| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
နမော တဿ ဘဂဝတော အရဟတော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ उन भगवान, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध को नमस्कार। ခုဒ္ဒကနိကာယေ खुद्दकनिकाय में ခုဒ္ဒကပါဌ-အဋ္ဌကထာ खुद्दकपाठ-अट्ठकथा ဂန္ထာရမ္ဘကထာ ग्रन्थारम्भकथा ဗုဒ္ဓံ [Pg.1] သရဏံ ဂစ္ဆာမိ; ဓမ္မံ သရဏံ ဂစ္ဆာမိ; သံဃံ သရဏံ ဂစ္ဆာမီတိ. मैं बुद्ध की शरण जाता हूँ; मैं धम्म की शरण जाता हूँ; मैं संघ की शरण जाता हूँ। အယံ သရဏဂမနနိဒ္ဒေသော ခုဒ္ဒကာနံ အာဒိ. यह शरणागमन निर्देश खुद्दक (पाठ) के ग्रंथों का आदि (प्रारम्भ) है। ဣမဿ ဒါနိ အတ္ထံ ပရမတ္ထဇောတိကာယ ခုဒ္ဒကဋ္ဌကထာယ ဝိဝရိတုံ ဝိဘဇိတုံ ဥတ္တာနီကာတုံ ဣဒံ ဝုစ္စတိ – अब इसके अर्थ को 'परमत्थजोतिका' नामक खुद्दक-अट्ठकथा के माध्यम से स्पष्ट करने, विभाजित करने और सुबोध बनाने के लिए यह कहा जाता है - ဥတ္တမံ ဝန္ဒနေယျာနံ, ဝန္ဒိတွာ ရတနတ္တယံ; ခုဒ္ဒကာနံ ကရိဿာမိ, ကေသဉ္စိ အတ္ထဝဏ္ဏနံ. वन्दनीय जनों में श्रेष्ठ रत्नत्रय की वन्दना करके, मैं खुद्दक (निकाय) के कुछ (ग्रंथों) की अर्थ-व्याख्या करूँगा। ခုဒ္ဒကာနံ ဂမ္ဘီရတ္တာ, ကိဉ္စာပိ အတိဒုက္ကရာ; ဝဏ္ဏနာ မာဒိသေနေသာ, အဗောဓန္တေန သာသနံ. खुद्दक (निकाय) की गम्भीरता के कारण, मुझ जैसे शासन (बुद्ध-वचन) को न समझने वाले व्यक्ति के लिए यह व्याख्या करना यद्यपि अत्यंत कठिन है। အဇ္ဇာပိ တု အဗ္ဗောစ္ဆိန္နော, ပုဗ္ဗာစရိယနိစ္ဆယော; တထေဝ စ ဌိတံ ယသ္မာ, နဝင်္ဂံ သတ္ထုသာသနံ. किन्तु आज भी पूर्व आचार्यों का निर्णय अविच्छिन्न रूप से विद्यमान है, और क्योंकि शास्ता का नौ अंगों वाला शासन उसी प्रकार स्थित है। တသ္မာဟံ ကာတုမိစ္ဆာမိ, အတ္ထသံဝဏ္ဏနံ ဣမံ; သာသနဉ္စေဝ နိဿာယ, ပေါရာဏဉ္စ ဝိနိစ္ဆယံ. इसलिए मैं शासन और प्राचीन (आचार्यों के) निर्णयों का आश्रय लेकर इस अर्थ-व्याख्या को करने की इच्छा करता हूँ। သဒ္ဓမ္မဗဟုမာနေန, နာတ္တုက္ကံသနကမျတာ; နာညေသံ ဝမ္ဘနတ္ထာယ, တံ သုဏာထ သမာဟိတာတိ. सद्धम्म के प्रति अत्यधिक सम्मान के कारण (मैं यह कर रहा हूँ), न कि आत्म-प्रशंसा की इच्छा से और न ही दूसरों की निंदा के लिए; अतः आप एकाग्रचित्त होकर उसे सुनें। ခုဒ္ဒကဝဝတ္ထာနံ खुद्दक-निर्धारण တတ္ထ [Pg.2] ‘‘ခုဒ္ဒကာနံ ကရိဿာမိ, ကေသဉ္စိ အတ္ထဝဏ္ဏန’’န္တိ ဝုတ္တတ္တာ ခုဒ္ဒကာနိ တာဝ ဝဝတ္ထပေတွာ ပစ္ဆာ အတ္ထဝဏ္ဏနံ ကရိဿာမိ. ခုဒ္ဒကာနိ နာမ ခုဒ္ဒကနိကာယဿ ဧကဒေသော, ခုဒ္ဒကနိကာယော နာမ ပဉ္စန္နံ နိကာယာနံ ဧကဒေသော. ပဉ္စ နိကာယာ နာမ – वहाँ, 'मैं कुछ खुद्दक (ग्रंथों) की अर्थ-व्याख्या करूँगा' ऐसा कहे जाने के कारण, पहले खुद्दक (ग्रंथों) को निर्धारित करके बाद में अर्थ-व्याख्या करूँगा। 'खुद्दक' खुद्दकनिकाय का एक अंश है, और 'खुद्दकनिकाय' पाँच निकायों में से एक अंश है। पाँच निकाय ये हैं - ဒီဃမဇ္ဈိမသံယုတ္တ, အင်္ဂုတ္တရိကခုဒ္ဒကာ; နိကာယာ ပဉ္စ ဂမ္ဘီရာ, ဓမ္မတော အတ္ထတော စိမေ. दीघ, मज्झिम, संयुत्त, अंगुत्तर और खुद्दक - ये पाँच निकाय शब्द और अर्थ दोनों ही दृष्टियों से गम्भीर हैं। တတ္ထ ဗြဟ္မဇာလသုတ္တာဒီနိ စတုတ္တိံသ သုတ္တာနိ ဒီဃနိကာယော. မူလပရိယာယသုတ္တာဒီနိ ဒိယဍ္ဎသတံ ဒွေ စ သုတ္တာနိ မဇ္ဈိမနိကာယော. ဩဃတရဏသုတ္တာဒီနိ သတ္တ သုတ္တသဟဿာနိ သတ္တ စ သုတ္တသတာနိ ဒွါသဋ္ဌိ စ သုတ္တာနိ သံယုတ္တနိကာယော. စိတ္တပရိယာဒါနသုတ္တာဒီနိ နဝ သုတ္တသဟဿာနိ ပဉ္စ စ သုတ္တသတာနိ သတ္တပညာသဉ္စ သုတ္တာနိ အင်္ဂုတ္တရနိကာယော. ခုဒ္ဒကပါဌော, ဓမ္မပဒံ, ဥဒါနံ, ဣတိဝုတ္တကံ, သုတ္တနိပါတော, ဝိမာနဝတ္ထု, ပေတဝတ္ထု, ထေရဂါထာ, ထေရီဂါထာ, ဇာတကံ, နိဒ္ဒေသော, ပဋိသမ္ဘိဒါ, အပဒါနံ, ဗုဒ္ဓဝံသော, စရိယာပိဋကံ, ဝိနယာဘိဓမ္မပိဋကာနိ, ဌပေတွာ ဝါ စတ္တာရော နိကာယေ အဝသေသံ ဗုဒ္ဓဝစနံ ခုဒ္ဒကနိကာယော. उनमें ब्रह्मजाल सुत्त आदि चौंतीस सुत्त 'दीघनिकाय' हैं। मूलपरियाय सुत्त आदि एक सौ बावन सुत्त 'मज्झिमनिकाय' हैं। ओघतरण सुत्त आदि सात हजार सात सौ बासठ सुत्त 'संयुत्तनिकाय' हैं। चित्तपरियादान सुत्त आदि नौ हजार पाँच सौ सत्तावन सुत्त 'अंगुत्तरनिकाय' हैं। खुद्दकपाठ, धम्मपद, उदान, इतिवुत्तक, सुत्तनिपात, विमानवत्थु, पेतवत्थु, थेरगाथा, थेरीगाथा, जातक, निद्देस, पटिसम्भिदामग्ग, अपदान, बुद्धवंस, चरियापिटक, तथा विनय और अभिधम्म पिटक - अथवा चार निकायों को छोड़कर शेष समस्त बुद्ध-वचन 'खुद्दकनिकाय' है। ကသ္မာ ပနေသ ခုဒ္ဒကနိကာယောတိ ဝုစ္စတိ? ဗဟူနံ ခုဒ္ဒကာနံ ဓမ္မက္ခန္ဓာနံ သမူဟတော နိဝါသတော စ. သမူဟနိဝါသာ ဟိ ‘‘နိကာယော’’တိ ဝုစ္စန္တိ. ‘‘နာဟံ, ဘိက္ခဝေ, အညံ ဧကနိကာယမ္ပိ သမနုပဿာမိ ဧဝံ စိတ္တံ, ယထယိဒံ, ဘိက္ခဝေ, တိရစ္ဆာနဂတာ ပါဏာ (သံ. နိ. ၃.၁၀၀). ပေါဏိကနိကာယော, စိက္ခလ္လိကနိကာယော’’တိ ဧဝမာဒီနိ စေတ္ထ သာဓကာနိ သာသနတော လောကတော စ. အယမဿ ခုဒ္ဒကနိကာယဿ ဧကဒေသော. ဣမာနိ သုတ္တန္တပိဋကပရိယာပန္နာနိ အတ္ထတော ဝိဝရိတုံ ဝိဘဇိတုံ ဥတ္တာနီကာတုဉ္စ အဓိပ္ပေတာနိ ခုဒ္ဒကာနိ, တေသမ္ပိ ခုဒ္ဒကာနံ သရဏသိက္ခာပဒဒွတ္တိံသာကာရကုမာရပဉှမင်္ဂလသုတ္တ- ရတနသုတ္တတိရောကုဋ္ဋနိဓိကဏ္ဍမေတ္တသုတ္တာနံ ဝသေန နဝပ္ပဘေဒေါ ခုဒ္ဒကပါဌော အာဒိ အာစရိယပရမ္ပရာယ ဝါစနာမဂ္ဂံ အာရောပိတဝသေန န ဘဂဝတာ ဝုတ္တဝသေန. ဘဂဝတာ ဟိ ဝုတ္တဝသေန – किन्तु इसे 'खुद्दकनिकाय' क्यों कहा जाता है? अनेक छोटे धर्म-स्कन्धों के समूह और निवास (आधार) होने के कारण। क्योंकि समूह और निवास को 'निकाय' कहा जाता है। 'भिक्षुओं, मैं किसी अन्य एक निकाय (समूह) को ऐसा विचित्र नहीं देखता जैसा कि ये तिर्यक-योनि के प्राणी हैं।' 'पोणिक-निकाय', 'चिक्खल्लिक-निकाय' आदि शासन और लोक के उदाहरण यहाँ प्रमाण हैं। यह इस खुद्दकनिकाय का एक अंश है। सुत्तपिटक के अंतर्गत आने वाले इन खुद्दक (सुत्तों) को अर्थ की दृष्टि से स्पष्ट करने, विभाजित करने और प्रकट करने का उद्देश्य है। उन खुद्दक (ग्रंथों) में भी शरण, शिक्षापद, द्वत्तिंसाकार, कुमारपञ्ह, मंगलसुत्त, रतनसुत्त, तिरोकुड्डसुत्त, निधिकण्डसुत्त और मेत्तसुत्त के भेद से नौ प्रकार का 'खुद्दकपाठ' आदि (प्रथम) है, जो आचार्य-परम्परा द्वारा वाचन-क्रम में रखे जाने के कारण है, न कि भगवान द्वारा कहे जाने के क्रम से। क्योंकि भगवान द्वारा कहे जाने के क्रम से तो - ‘‘အနေကဇာတိသံသာရံ, သန္ဓာဝိဿံ အနိဗ္ဗိသံ; ဂဟကာရံ ဂဝေသန္တော, ဒုက္ခာ ဇာတိ ပုနပ္ပုနံ. अनेक जन्मों के संसार में, मैं (गृह-कारक को) खोजता हुआ बिना रुके भटकता रहा; बार-बार जन्म लेना दुःखद है। ‘‘ဂဟကာရက [Pg.3] ဒိဋ္ဌောသိ, ပုန ဂေဟံ န ကာဟသိ; သဗ္ဗာ တေ ဖာသုကာ ဘဂ္ဂါ, ဂဟကူဋံ ဝိသင်္ခတံ; ဝိသင်္ခါရဂတံ စိတ္တံ, တဏှာနံ ခယမဇ္ဈဂါ’’တိ. (ဓ. ပ. ၁၅၃-၁၅၄) – हे गृह-कारक (तृष्णा)! तुम देख लिए गए हो, अब तुम फिर से घर (शरीर) नहीं बनाओगे; तुम्हारी सभी कड़ियाँ (क्लेश) टूट गई हैं, घर का शिखर (अविद्या) नष्ट हो गया है; चित्त संस्कारों से रहित (वि-संस्कार) हो गया है, तृष्णाओं का क्षय प्राप्त कर लिया है। ဣဒံ ဂါထာဒွယံ သဗ္ဗဿာပိ ဗုဒ္ဓဝစနဿ အာဒိ. တဉ္စ မနသာဝ ဝုတ္တဝသေန, န ဝစီဘေဒံ ကတွာ ဝုတ္တဝသေန. ဝစီဘေဒံ ပန ကတွာ ဝုတ္တဝသေန – यह गाथा-युगल समस्त बुद्ध-वचन का आदि (प्रारम्भ) है। और वह केवल मन में कहे जाने के कारण आदि है, वाणी से प्रकट करके कहे जाने के कारण नहीं। वाणी से प्रकट करके कहे जाने के कारण तो - ‘‘ယဒါ ဟဝေ ပါတုဘဝန္တိ ဓမ္မာ,အာတာပိနော ဈာယတော ဗြာဟ္မဏဿ; အထဿ ကင်္ခါ ဝပယန္တိ သဗ္ဗာ,ယတော ပဇာနာတိ သဟေတုဓမ္မ’’န္တိ. (ဥဒါ. ၁; မဟာဝ. ၁) – जब निश्चय ही उद्योगी, ध्यानी ब्राह्मण को धर्म प्रकट होते हैं, तब उसकी सभी शंकाएँ दूर हो जाती हैं, क्योंकि वह हेतु सहित धर्म को जान लेता है। အယံ ဂါထာ အာဒိ. တသ္မာ ယွာယံ နဝပ္ပဘေဒေါ ခုဒ္ဒကပါဌော ဣမေသံ ခုဒ္ဒကာနံ အာဒိ, တဿ အာဒိတော ပဘုတိ အတ္ထသံဝဏ္ဏနံ အာရဘိဿာမိ. यह गाथा आदि है। इसलिए जो यह नौ प्रकार का खुद्दकपाठ इन खुद्दक (ग्रंथों) का आदि है, उसकी आदि से लेकर अर्थ-व्याख्या आरम्भ करूँगा। နိဒါနသောဓနံ निदान-शोधन တဿ စာယမာဒိ ‘‘ဗုဒ္ဓံ သရဏံ ဂစ္ဆာမိ, ဓမ္မံ သရဏံ ဂစ္ဆာမိ, သံဃံ သရဏံ ဂစ္ဆာမီ’’တိ. တဿာယံ အတ္ထဝဏ္ဏနာယ မာတိကာ – उसका आदि यह है - 'बुद्धं सरणं गच्छामि, धम्मं सरणं गच्छामि, संघं सरणं गच्छामि'। उसकी इस अर्थ-व्याख्या की मातृका (विषय-सूची) यह है - ‘‘ကေန ကတ္ထ ကဒါ ကသ္မာ, ဘာသိတံ သရဏတ္တယံ; ကသ္မာ စိဓာဒိတော ဝုတ္တ, မဝုတ္တမပိ အာဒိတော. किसने, कहाँ, कब और क्यों इन तीन शरणों का उपदेश दिया? और यद्यपि तथागत द्वारा आदि में नहीं कहा गया, फिर भी यहाँ आदि में क्यों कहा गया? ‘‘နိဒါနသောဓနံ ကတွာ, ဧဝမေတ္ထ တတော ပရံ; ဗုဒ္ဓံ သရဏဂမနံ, ဂမကဉ္စ ဝိဘာဝယေ. इस प्रकार यहाँ निदान का शोधन करके, उसके बाद बुद्ध, शरणागमन और शरण जाने वाले व्यक्ति को स्पष्ट करना चाहिए। ‘‘ဘေဒါဘေဒံ ဖလဉ္စာပိ, ဂမနီယဉ္စ ဒီပယေ; ဓမ္မံ သရဏမိစ္စာဒိ, ဒွယေပေသ နယော မတော. (शरणागमन के) भेद-अभेद, फल और शरण लेने योग्य (विषय) को प्रकाशित करना चाहिए; 'धम्मं सरणं' आदि शेष दो पदों में भी यही विधि समझनी चाहिए। ‘‘အနုပုဗ္ဗဝဝတ္ထာနေ, ကာရဏဉ္စ ဝိနိဒ္ဒိသေ; သရဏတ္တယမေတဉ္စ, ဥပမာဟိ ပကာသယေ’’တိ. क्रमबद्ध निर्धारण में कारण का निर्देश करना चाहिए; और इस रत्नत्रय को उपमाओं के माध्यम से प्रकाशित करना चाहिए। တတ္ထ ပဌမဂါထာယ တာဝ ဣဒံ သရဏတ္တယံ ကေန ဘာသိတံ, ကတ္ထ ဘာသိတံ, ကဒါ ဘာသိတံ, ကသ္မာ ဘာသိတံ အဝုတ္တမပိစာဒိတော တထာဂတေန ကသ္မာ ဣဓာဒိတော ဝုတ္တန္တိ ပဉ္စ ပဉှာ. वहाँ पहली गाथा में - यह शरण-त्रय किसने कहा, कहाँ कहा, कब कहा, क्यों कहा, और तथागत द्वारा आदि में न कहे जाने पर भी यहाँ आदि में क्यों कहा गया - ये पाँच प्रश्न हैं। တေသံ [Pg.4] ဝိဿဇ္ဇနာ ကေန ဘာသိတန္တိ ဘဂဝတာ ဘာသိတံ, န သာဝကေဟိ, န ဣသီဟိ, န ဒေဝတာဟိ. ကတ္ထာတိ ဗာရာဏသိယံ ဣသိပတနေ မိဂဒါယေ. ကဒါတိ အာယသ္မန္တေ ယသေ သဒ္ဓိံ သဟာယကေဟိ အရဟတ္တံ ပတ္တေ ဧကသဋ္ဌိယာ အရဟန္တေသု ဗဟုဇနဟိတာယ လောကေ ဓမ္မဒေသနံ ကရောန္တေသု. ကသ္မာတိ ပဗ္ဗဇ္ဇတ္ထဉ္စ ဥပသမ္ပဒတ္ထဉ္စ. ယထာဟ – उन (प्रश्नों) का उत्तर इस प्रकार है: 'किसने कहा?'—भगवान ने कहा, श्रावकों ने नहीं, ऋषियों ने नहीं, देवताओं ने नहीं। 'कहाँ?'—वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाव में। 'कब?'—जब आयुष्मान यश अपने मित्रों के साथ अर्हत्त्व को प्राप्त हुए और इकसठ अर्हतों द्वारा लोक में बहुजन हिताय धर्मदेशना की जा रही थी। 'किसलिए?'—प्रव्रज्या और उपसम्पदा के लिए। जैसा कि कहा गया है— ‘‘ဧဝဉ္စ ပန, ဘိက္ခဝေ, ပဗ္ဗာဇေတဗ္ဗော ဥပသမ္ပာဒေတဗ္ဗော. ပဌမံ ကေသမဿုံ ဩဟာရေတွာ ကာသာယာနိ ဝတ္ထာနိ အစ္ဆာဒါပေတွာ ဧကံသံ ဥတ္တရာသင်္ဂံ ကာရာပေတွာ ဘိက္ခူနံ ပါဒေ ဝန္ဒာပေတွာ ဥက္ကုဋိကံ နိသီဒါပေတွာ အဉ္ဇလိံ ပဂ္ဂဏှာပေတွာ ‘ဧဝံ ဝဒေဟီ’တိ ဝတ္တဗ္ဗော ‘ဗုဒ္ဓံ သရဏံ ဂစ္ဆာမိ, ဓမ္မံ သရဏံ ဂစ္ဆာမိ, သံဃံ သရဏံ ဂစ္ဆာမီ’’’တိ (မဟာဝ. ၃၄). “भिक्षुओं! इस प्रकार प्रव्रज्या और उपसम्पदा देनी चाहिए। पहले केश और श्मश्रु (दाढ़ी) मुँडवाकर, काषाय वस्त्र पहनाकर, उत्तरासंग (चीवर) को एक कंधे पर करवाकर, भिक्षुओं के चरणों की वन्दना करवाकर, उकड़ूँ बिठाकर, अंजलिबद्ध करवाकर, ‘ऐसा कहो’—यह कहना चाहिए: ‘बुद्धं सरणं गच्छामि, धम्मं सरणं गच्छामि, संघं सरणं गच्छामि’।” ကသ္မာ စိဓာဒိတော ဝုတ္တန္တိ ဣဒဉ္စ နဝင်္ဂံ သတ္ထုသာသနံ တီဟိ ပိဋကေဟိ သင်္ဂဏှိတွာ ဝါစနာမဂ္ဂံ အာရောပေန္တေဟိ ပုဗ္ဗာစရိယေဟိ ယသ္မာ ဣမိနာ မဂ္ဂေန ဒေဝမနုဿာ ဥပါသကဘာဝေန ဝါ ပဗ္ဗဇိတဘာဝေန ဝါ သာသနံ ဩတရန္တိ, တသ္မာ သာသနောတာရဿ မဂ္ဂဘူတတ္တာ ဣဓ ခုဒ္ဒကပါဌေ အာဒိတော ဝုတ္တန္တိ ဉာတဗ္ဗံ. “यहाँ इसे आरम्भ में क्यों कहा गया है?”—क्योंकि तीन पिटकों के रूप में संकलित इस नौ-अंगों वाले शास्ता के शासन को वाचना-मार्ग में स्थापित करने वाले पूर्वाचार्यों ने (यह सोचा कि) जिस मार्ग से देव और मनुष्य उपासक-भाव या प्रव्रजित-भाव से शासन में प्रवेश करते हैं, उस शासन-प्रवेश का मार्ग होने के कारण, यहाँ खुद्दकपाठ में इसे आरम्भ में कहा गया है—ऐसा जानना चाहिए। ကတံ နိဒါနသောဓနံ. निदान-शोधन (प्रस्तावना का स्पष्टीकरण) समाप्त हुआ। ၁. သရဏတ္တယဝဏ္ဏနာ १. शरण-त्रय की व्याख्या। ဗုဒ္ဓဝိဘာဝနာ बुद्ध-विभावना (बुद्ध शब्द का स्पष्टीकरण)। ဣဒါနိ ယံ ဝုတ္တံ ‘‘ဗုဒ္ဓံ သရဏဂမနံ, ဂမကဉ္စ ဝိဘာဝယေ’’တိ, တတ္ထ သဗ္ဗဓမ္မေသု အပ္ပဋိဟတဉာဏနိမိတ္တာနုတ္တရဝိမောက္ခာဓိဂမပရိဘာဝိတံ ခန္ဓသန္တာနမုပါဒါယ, ပညတ္တိတော သဗ္ဗညုတညာဏပဒဋ္ဌာနံ ဝါ သစ္စာဘိသမ္ဗောဓိမုပါဒါယ ပညတ္တိတော သတ္တဝိသေသော ဗုဒ္ဓေါ. ယထာဟ – अब जो कहा गया है—“बुद्ध, शरण-गमन और गमन करने वाले को स्पष्ट करें”, वहाँ सभी धर्मों में अप्रतिहत (अबाधित) ज्ञान के निमित्त वाले अनुत्तर विमोक्ष की प्राप्ति से परिभावित स्कन्ध-सन्तान की अपेक्षा से, अथवा प्रज्ञप्ति के अनुसार सर्वज्ञता-ज्ञान के पदस्थान (निकट कारण) रूप सत्य-अभिसंबोधि की अपेक्षा से, प्रज्ञप्ति के अनुसार विशिष्ट सत्त्व ‘बुद्ध’ हैं। जैसा कि कहा गया है— ‘‘ဗုဒ္ဓေါတိ [Pg.5] ယော သော ဘဂဝါ သယမ္ဘူ အနာစရိယကော ပုဗ္ဗေ အနနုဿုတေသု ဓမ္မေသု သာမံ သစ္စာနိ အဘိသမ္ဗုဇ္ဈိ, တတ္ထ စ သဗ္ဗညုတံ ပတ္တော, ဗလေသု စ ဝသီဘာဝ’’န္တိ (မဟာနိ. ၁၉၂; စူဠနိ. ပါရာယနတ္ထုတိဂါထာနိဒ္ဒေသ ၉၇; ပဋိ. မ. ၁.၁၆၁). “‘बुद्ध’ वे भगवान हैं जो स्वयंभू हैं, बिना किसी आचार्य के पहले न सुने गए धर्मों में स्वयं सत्यों का अभिसंबोध (साक्षात्कार) किया, और वहाँ सर्वज्ञता को प्राप्त हुए, तथा बलों में वशीभाव (पूर्ण नियंत्रण) को प्राप्त हुए।” အယံ တာဝ အတ္ထတော ဗုဒ္ဓဝိဘာဝနာ. यह अर्थ के अनुसार बुद्ध-विभावना है। ဗျဉ္ဇနတော ပန ‘‘ဗုဇ္ဈိတာတိ ဗုဒ္ဓေါ, ဗောဓေတာတိ ဗုဒ္ဓေါ’’တိ ဧဝမာဒိနာ နယေန ဝေဒိတဗ္ဗော. ဝုတ္တဉ္စေတံ – व्यंजन (शब्द-व्युत्पत्ति) के अनुसार तो—“जानने के कारण बुद्ध हैं, बोध कराने (जगाने) के कारण बुद्ध हैं”—इस प्रकार की विधि से जानना चाहिए। और यह कहा भी गया है— ‘‘ဗုဒ္ဓေါတိ ကေနဋ္ဌေန ဗုဒ္ဓေါ? ဗုဇ္ဈိတာ သစ္စာနီတိ ဗုဒ္ဓေါ, ဗောဓေတာ ပဇာယာတိ ဗုဒ္ဓေါ, သဗ္ဗညုတာယ ဗုဒ္ဓေါ, သဗ္ဗဒဿာဝိတာယ ဗုဒ္ဓေါ, အနညနေယျတာယ ဗုဒ္ဓေါ, ဝိကသိတာယ ဗုဒ္ဓေါ, ခီဏာသဝသင်္ခါတေန ဗုဒ္ဓေါ, နိရုပက္ကိလေသသင်္ခါတေန ဗုဒ္ဓေါ, ဧကန္တဝီတရာဂေါတိ ဗုဒ္ဓေါ, ဧကန္တဝီတဒေါသောတိ ဗုဒ္ဓေါ, ဧကန္တဝီတမောဟောတိ ဗုဒ္ဓေါ, ဧကန္တနိက္ကိလေသောတိ ဗုဒ္ဓေါ, ဧကာယနမဂ္ဂံ ဂတောတိ ဗုဒ္ဓေါ, ဧကော အနုတ္တရံ သမ္မာသမ္ဗောဓိံ အဘိသမ္ဗုဒ္ဓေါတိ ဗုဒ္ဓေါ, အဗုဒ္ဓိဝိဟတတ္တာ ဗုဒ္ဓိပဋိလာဘာ ဗုဒ္ဓေါ. ဗုဒ္ဓေါတိ နေတံ နာမံ မာတရာ ကတံ, န ပိတရာ ကတံ, န ဘာတရာ ကတံ, န ဘဂိနိယာ ကတံ, န မိတ္တာမစ္စေဟိ ကတံ, န ဉာတိသာလောဟိတေဟိ ကတံ, န သမဏဗြာဟ္မဏေဟိ ကတံ, န ဒေဝတာဟိ ကတံ, ဝိမောက္ခန္တိကမေတံ ဗုဒ္ဓါနံ ဘဂဝန္တာနံ ဗောဓိယာ မူလေ သဟ သဗ္ဗညုတညာဏဿ ပဋိလာဘာ သစ္ဆိကာ ပညတ္တိ ယဒိဒံ ဗုဒ္ဓေါ’’တိ (မဟာနိ. ၁၉၂; စူဠနိ. ပါရာယနတ္ထုတိဂါထာနိဒ္ဒေသ ၉၇; ပဋိ. မ. ၁.၁၆၂). “‘बुद्ध’ किस अर्थ में बुद्ध हैं? सत्यों को जानने के कारण बुद्ध हैं, प्रजा (प्राणियों) को बोध कराने के कारण बुद्ध हैं, सर्वज्ञता के कारण बुद्ध हैं, सर्वदर्शिता के कारण बुद्ध हैं, किसी अन्य द्वारा न सिखाए जाने (स्वयं जानने) के कारण बुद्ध हैं, विकसित (खिले हुए) होने के कारण बुद्ध हैं, क्षीणासव (आस्रवों के क्षय) के कारण बुद्ध हैं, निरुपक्क्लेश (क्लेशरहित) होने के कारण बुद्ध हैं, एकान्ततः वीतराग होने के कारण बुद्ध हैं, एकान्ततः वीतदोष होने के कारण बुद्ध हैं, एकान्ततः वीतमोह होने के कारण बुद्ध हैं, एकान्ततः निष्क्लेश होने के कारण बुद्ध हैं, एकायन मार्ग पर जाने के कारण बुद्ध हैं, अकेले ही अनुत्तर सम्यक-संबोधि को प्राप्त करने के कारण बुद्ध हैं, अ-बुद्धि (अज्ञान) के विनाश और बुद्धि (ज्ञान) की प्राप्ति के कारण बुद्ध हैं। ‘बुद्ध’—यह नाम माता द्वारा नहीं रखा गया, पिता द्वारा नहीं, भाई द्वारा नहीं, बहन द्वारा नहीं, मित्र-अमात्यों द्वारा नहीं, ज्ञाति-सम्बन्धियों द्वारा नहीं, श्रमण-ब्राह्मणों द्वारा नहीं, और न ही देवताओं द्वारा रखा गया है। बुद्ध भगवानों के लिए बोधि-वृक्ष के मूल में सर्वज्ञता-ज्ञान की प्राप्ति के साथ विमोक्ष की पराकाष्ठा में जो साक्षात्कार हुआ, यह ‘बुद्ध’ वही प्रज्ञप्ति (नाम) है।” ဧတ္ထ စ ယထာ လောကေ အဝဂန္တာ အဝဂတောတိ ဝုစ္စတိ, ဧဝံ ဗုဇ္ဈိတာ သစ္စာနီတိ ဗုဒ္ဓေါ. ယထာ ပဏ္ဏသောသာ ဝါတာ ပဏ္ဏသုသာတိ ဝုစ္စန္တိ, ဧဝံ ဗောဓေတာ ပဇာယာတိ ဗုဒ္ဓေါ. သဗ္ဗညုတာယ ဗုဒ္ဓေါတိ သဗ္ဗဓမ္မဗုဇ္ဈနသမတ္ထာယ ဗုဒ္ဓိယာ ဗုဒ္ဓေါတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. သဗ္ဗဒဿာဝိတာယ ဗုဒ္ဓေါတိ သဗ္ဗဓမ္မဗောဓနသမတ္ထာယ ဗုဒ္ဓိယာ ဗုဒ္ဓေါတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. အနညနေယျတာယ ဗုဒ္ဓေါတိ အညေန အဗောဓိတော သယမေဝ ဗုဒ္ဓတ္တာ ဗုဒ္ဓေါတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဝိကသိတာယ ဗုဒ္ဓေါတိ နာနာဂုဏဝိကသနတော ပဒုမမိဝ ဝိကသနဋ္ဌေန ဗုဒ္ဓေါတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ခီဏာသဝသင်္ခါတေန ဗုဒ္ဓေါတိ ဧဝမာဒီဟိ စိတ္တသင်္ကောစကရဓမ္မပဟာနတော [Pg.6] နိဒ္ဒါက္ခယဝိဗုဒ္ဓေါ ပုရိသော ဝိယ သဗ္ဗကိလေသနိဒ္ဒါက္ခယဝိဗုဒ္ဓတ္တာ ဗုဒ္ဓေါတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဧကာယနမဂ္ဂံ ဂတောတိ ဗုဒ္ဓေါတိ ဗုဒ္ဓိယတ္ထာနံ ဂမနတ္ထပရိယာယတော ယထာ မဂ္ဂံ ဂတောပိ ပုရိသော ဂတောတိ ဝုစ္စတိ, ဧဝံ ဧကာယနမဂ္ဂံ ဂတတ္တာပိ ဗုဒ္ဓေါတိ ဝုစ္စတီတိ ဒဿေတုံ ဝုတ္တံ. ဧကော အနုတ္တရံ သမ္မာသမ္ဗောဓိံ အဘိသမ္ဗုဒ္ဓေါတိ ဗုဒ္ဓေါတိ န ပရေဟိ ဗုဒ္ဓတ္တာ ဗုဒ္ဓေါ, ကိန္တု သယမေဝ အနုတ္တရံ သမ္မာသမ္ဗောဓိံ အဘိသမ္ဗုဒ္ဓတ္တာ ဗုဒ္ဓေါတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. အဗုဒ္ဓိဝိဟတတ္တာ ဗုဒ္ဓိပဋိလာဘာ ဗုဒ္ဓေါတိ ဗုဒ္ဓိ ဗုဒ္ဓံ ဗောဓောတိ ပရိယာယဝစနမေတံ. တတ္ထ ယထာ နီလရတ္တဂုဏယောဂတော ‘‘နီလော ပဋော, ရတ္တော ပဋော’’တိ ဝုစ္စတိ, ဧဝံ ဗုဒ္ဓိဂုဏယောဂတော ဗုဒ္ဓေါတိ ဉာပေတုံ ဝုတ္တံ ဟောတိ. တတော ပရံ ဗုဒ္ဓေါတိ နေတံ နာမန္တိ ဧဝမာဒိ အတ္ထမနုဂတာ အယံ ပညတ္တီတိ ဗောဓနတ္ထံ ဝုတ္တန္တိ ဧဝရူပေန နယေန သဗ္ဗေသံ ပဒါနံ ဗုဒ္ဓသဒ္ဒဿ သာဓနသမတ္ထော အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. यहाँ जैसे लोक में जाने वाले को ‘गत’ कहा जाता है, वैसे ही सत्यों को जानने के कारण ‘बुद्ध’ हैं। जैसे पत्तों को सुखाने वाली हवाओं को ‘पर्णशोष’ कहा जाता है, वैसे ही प्रजा को बोध कराने के कारण ‘बुद्ध’ हैं। ‘सर्वज्ञता के कारण बुद्ध’ का अर्थ है—सभी धर्मों को जानने में समर्थ बुद्धि (ज्ञान) के कारण ‘बुद्ध’ कहा गया है। ‘सर्वदर्शिता के कारण बुद्ध’ का अर्थ है—सभी धर्मों का बोध कराने में समर्थ बुद्धि के कारण ‘बुद्ध’ कहा गया है। ‘अनन्यनेयता के कारण बुद्ध’ का अर्थ है—किसी अन्य द्वारा बोधित न होकर स्वयं जानने के कारण ‘बुद्ध’ कहा गया है। ‘विकसित होने के कारण बुद्ध’ का अर्थ है—विभिन्न गुणों के विकसित होने से कमल के समान खिलने के अर्थ में ‘बुद्ध’ कहा गया है। ‘क्षीणासव’ आदि पदों से यह अर्थ है कि चित्त को संकुचित करने वाले धर्मों के प्रहाण से, निद्रा के क्षय होने पर जागे हुए पुरुष के समान, सभी क्लेश रूपी निद्रा के क्षय होने से जागृत होने के कारण ‘बुद्ध’ कहा गया है। ‘एकायन मार्ग पर गए हुए बुद्ध’—यहाँ ‘बुद्धि’ शब्द के अर्थों में ‘गमन’ अर्थ के पर्याय से, जैसे मार्ग पर गए हुए पुरुष को ‘गत’ कहा जाता है, वैसे ही एकायन मार्ग पर जाने के कारण भी ‘बुद्ध’ कहा जाता है—यह दिखाने के लिए कहा गया है। ‘अकेले ही अनुत्तर सम्यक-संबोधि को प्राप्त बुद्ध’ का अर्थ है—दूसरों द्वारा बोधित होने के कारण बुद्ध नहीं हैं, बल्कि स्वयं ही अनुत्तर सम्यक-संबोधि को प्राप्त करने के कारण ‘बुद्ध’ कहा गया है। ‘अ-बुद्धि के विनाश और बुद्धि की प्राप्ति से बुद्ध’—यहाँ बुद्धि, बुद्ध और बोध ये पर्यायवाची शब्द हैं। वहाँ जैसे नील और रक्त गुणों के योग से ‘नीला वस्त्र, लाल वस्त्र’ कहा जाता है, वैसे ही ‘बुद्धि’ (ज्ञान) रूपी गुण के योग से ‘बुद्ध’ हैं—यह जनाने के लिए कहा गया है। इसके बाद ‘बुद्ध—यह नाम नहीं है’ इत्यादि वचन इस अर्थ का अनुसरण करते हैं कि यह एक प्रज्ञप्ति है—यह समझाने के लिए कहा गया है। इस प्रकार की विधि से सभी पदों का और ‘बुद्ध’ शब्द का साधन-समर्थ अर्थ जानना चाहिए। အယံ ဗျဉ္ဇနတောပိ ဗုဒ္ဓဝိဘာဝနာ. यह व्यंजन (शब्द) के अनुसार भी बुद्ध-विभावना है। သရဏဂမနဂမကဝိဘာဝနာ शरण-गमन और गमन करने वाले (शरणगामी) की विभावना। ဣဒါနိ သရဏဂမနာဒီသု ဟိံသတီတိ သရဏံ, သရဏဂတာနံ တေနေဝ သရဏဂမနေန ဘယံ သန္တာသံ ဒုက္ခံ ဒုဂ္ဂတိံ ပရိက္ကိလေသံ ဟိံသတိ ဝိဓမတိ နီဟရတိ နိရောဓေတီတိ အတ္ထော. အထ ဝါ ဟိတေ ပဝတ္တနေန အဟိတာ စ နိဝတ္တနေန သတ္တာနံ ဘယံ ဟိံသတီတိ ဗုဒ္ဓေါ, ဘဝကန္တာရာ ဥတ္တရဏေန အဿာသဒါနေန စ ဓမ္မော, အပ္ပကာနမ္ပိ ကာရာနံ ဝိပုလဖလပဋိလာဘကရဏေန သံဃော. တသ္မာ ဣမိနာပိ ပရိယာယေန တံ ရတနတ္တယံ သရဏံ. တပ္ပသာဒတဂ္ဂရုတာဟိ ဝိဟတဝိဒ္ဓံသိတကိလေသော တပ္ပရာယဏတာကာရပ္ပဝတ္တော အပရပ္ပစ္စယော ဝါ စိတ္တုပ္ပာဒေါ သရဏဂမနံ. တံသမင်္ဂီ သတ္တော တံ သရဏံ ဂစ္ဆတိ, ဝုတ္တပ္ပကာရေန စိတ္တုပ္ပာဒေန ‘‘ဧသ မေ သရဏံ, ဧသ မေ ပရာယဏ’’န္တိ ဧဝမေတံ ဥပေတီတိ အတ္ထော. ဥပေန္တော စ ‘‘ဧတေ မယံ, ဘန္တေ, ဘဂဝန္တံ သရဏံ ဂစ္ဆာမ, ဓမ္မဉ္စ, ဥပါသကေ နော ဘဂဝါ ဓာရေတူ’’တိ တပုဿဘလ္လိကာဒယော [Pg.7] ဝိယ သမာဒါနေန ဝါ, ‘‘သတ္ထာ မေ, ဘန္တေ, ဘဂဝါ, သာဝကောဟမသ္မီ’’တိ (သံ. နိ. ၂.၁၅၄) မဟာကဿပါဒယော ဝိယ သိဿဘာဝူပဂမနေန ဝါ, ‘‘ဧဝံ ဝုတ္တေ ဗြဟ္မာယု ဗြာဟ္မဏော ဥဋ္ဌာယာသနာ ဧကံသံ ဥတ္တရာသင်္ဂံ ကရိတွာ ယေန ဘဂဝါ တေနဉ္ဇလိံ ပဏာမေတွာ တိက္ခတ္တုံ ဥဒါနံ ဥဒါနေသိ ‘နမော တဿ ဘဂဝတော အရဟတော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ. နမော တဿ…ပေ… သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿာ’’’တိ (မ. နိ. ၂.၃၈၈) ဗြဟ္မာယုအာဒယော ဝိယ တပ္ပောဏတ္တေန ဝါ, ကမ္မဋ္ဌာနာနုယောဂိနော ဝိယ အတ္တသန္နိယျာတနေန ဝါ, အရိယပုဂ္ဂလာ ဝိယ သရဏဂမနုပက္ကိလေသသမုစ္ဆေဒေန ဝါတိ အနေကပ္ပကာရံ ဝိသယတော ကိစ္စတော စ ဥပေတိ. अब 'शरणगमन' आदि पदों में अर्थ इस प्रकार समझना चाहिए। जो नष्ट करता है, वह 'शरण' है। शरण में आए हुए व्यक्तियों के लिए उसी शरणगमन के द्वारा भय, संत्रास (डर), दुःख, दुर्गति और क्लेशों को नष्ट करता है, दूर करता है, हटाता है और शांत करता है - यह इसका अर्थ है। अथवा, प्राणियों के हित में प्रवृत्त होने और अहित से निवृत्त करने के कारण बुद्ध भय को नष्ट करते हैं, इसलिए वे 'शरण' हैं। संसार रूपी कान्तार (जंगल) से पार उतारने और आश्वासन देने के कारण धर्म 'शरण' है। अल्प मात्रा में दी गई वस्तुओं का भी विशाल फल प्राप्त कराने के कारण संघ 'शरण' है। इसलिए इस पर्याय से भी वह रत्नत्रय 'शरण' है। उन (रत्नों) के प्रति श्रद्धा और गौरव के कारण नष्ट और विध्वंस हुए क्लेशों वाला, उन्हीं के परायण होने के आकार में प्रवृत्त, अन्य किसी पर आश्रित न रहने वाला (या पर-प्रत्यय वाला) चित्तोत्पाद 'शरणगमन' है। उस (चित्तोत्पाद) से युक्त प्राणी उस शरण को प्राप्त होता है। उक्त प्रकार के चित्तोत्पाद से "यह मेरा शरण है, यह मेरा परायण है" - इस प्रकार इसे प्राप्त करता है, यह अर्थ है। और प्राप्त करने वाला व्यक्ति - "भन्ते! हम भगवान की शरण में जाते हैं, धर्म की शरण में जाते हैं; भगवान हमें उपासक के रूप में स्वीकार करें" - इस प्रकार तपुस्स और भल्लिक आदि के समान समादान (ग्रहण) के द्वारा; अथवा "भन्ते! भगवान मेरे शास्ता हैं, मैं श्रावक हूँ" - इस प्रकार महाकश्यप आदि के समान शिष्य-भाव को प्राप्त होने के द्वारा; अथवा "ऐसा कहे जाने पर ब्रह्मायु ब्राह्मण आसन से उठकर, एक कंधे पर उत्तरासंग (चीवर) कर, जहाँ भगवान थे वहाँ अंजलिबद्ध होकर तीन बार 'नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स' यह उदान प्रकट किया" - इस प्रकार ब्रह्मायु आदि के समान उस (बुद्ध) के प्रति झुकने के द्वारा; अथवा कर्मस्थान के योगियों के समान आत्म-समर्पण के द्वारा; अथवा आर्य पुद्गलों के समान शरणगमन के उपक्लेशों के समुच्छेद (पूर्ण विनाश) के द्वारा - इस प्रकार अनेक प्रकार से विषय और कृत्य के अनुसार (शरण को) प्राप्त करता है। အယံ သရဏဂမနဿ ဂမကဿ စ ဝိဘာဝနာ. यह शरणगमन और शरण जाने वाले (गमक) का स्पष्टीकरण है। ဘေဒါဘေဒဖလဒီပနာ (शरण के) टूटने, न टूटने और उसके फल का प्रकाश। ဣဒါနိ ‘‘ဘေဒါဘေဒံ ဖလဉ္စာပိ, ဂမနီယဉ္စ ဒီပယေ’’တိ ဝုတ္တာနံ ဘေဒါဒီနံ အယံ ဒီပနာ, ဧဝံ သရဏဂတဿ ပုဂ္ဂလဿ ဒုဝိဓော သရဏဂမနဘေဒေါ – သာဝဇ္ဇော စ အနဝဇ္ဇော စ. အနဝဇ္ဇော ကာလကိရိယာယ, သာဝဇ္ဇော အညသတ္ထရိ ဝုတ္တပ္ပကာရပ္ပဝတ္တိယာ, တသ္မိဉ္စ ဝုတ္တပ္ပကာရဝိပရီတပ္ပဝတ္တိယာ. သော ဒုဝိဓောပိ ပုထုဇ္ဇနာနမေဝ. ဗုဒ္ဓဂုဏေသု အညာဏသံသယမိစ္ဆာဉာဏပ္ပဝတ္တိယာ အနာဒရာဒိပ္ပဝတ္တိယာ စ တေသံ သရဏံ သံကိလိဋ္ဌံ ဟောတိ. အရိယပုဂ္ဂလာ ပန အဘိန္နသရဏာ စေဝ အသံကိလိဋ္ဌသရဏာ စ ဟောန္တိ. ယထာဟ ‘‘အဋ္ဌာနမေတံ, ဘိက္ခဝေ, အနဝကာသော, ယံ ဒိဋ္ဌိသမ္ပန္နော ပုဂ္ဂလော အညံ သတ္ထာရံ ဥဒ္ဒိသေယျာ’’တိ (အ. နိ. ၁.၂၇၆; မ. နိ. ၃.၁၂၈; ဝိဘ. ၈၀၉). ပုထုဇ္ဇနာ တု ယာဝဒေဝ သရဏဘေဒံ န ပါပုဏန္တိ, တာဝဒေဝ အဘိန္နသရဏာ. သာဝဇ္ဇောဝ နေသံ သရဏဘေဒေါ, သံကိလေသော စ အနိဋ္ဌဖလဒေါ ဟောတိ. အနဝဇ္ဇော အဝိပါကတ္တာ အဖလော, အဘေဒေါ ပန ဖလတော ဣဋ္ဌမေဝ ဖလံ ဒေတိ. अब "भेद (टूटना), अभेद, फल और गमनीय का प्रकाश करे" - इस प्रकार कहे गए भेद आदि का यह विवरण है। इस प्रकार शरण में आए हुए व्यक्ति के शरणगमन का भेद (टूटना) दो प्रकार का होता है - सावद्य (दोषपूर्ण) और अनवद्य (दोषरहित)। मृत्यु के द्वारा होना 'अनवद्य' (दोषरहित) भेद है। अन्य शास्ता (गुरु) के प्रति उक्त प्रकार की प्रवृत्ति होने से, और उसी (रत्नत्रय) के प्रति उक्त प्रकार की विपरीत प्रवृत्ति होने से 'सावद्य' (दोषपूर्ण) भेद होता है। वह दोनों प्रकार का भेद पृथग्जनों (साधारण मनुष्यों) को ही होता है, आर्यों को नहीं। बुद्ध के गुणों में अज्ञान, संशय और मिथ्या ज्ञान की प्रवृत्ति होने से तथा अनादर आदि की प्रवृत्ति होने से उनका शरण संक्लिष्ट (मलिन) हो जाता है। लेकिन आर्य पुद्गल अभिन्न-शरण (न टूटने वाले शरण वाले) और असंक्लिष्ट-शरण (निर्मल शरण वाले) होते हैं। जैसा कि कहा गया है - "भिक्षुओं! यह स्थान नहीं है, यह अवसर नहीं है कि दृष्टि-सम्पन्न (सोतापन्न) व्यक्ति किसी अन्य को शास्ता के रूप में निर्दिष्ट करे।" पृथग्जन तो जब तक शरण-भेद को प्राप्त नहीं होते, तब तक ही अभिन्न-शरण होते हैं। उनका शरण-भेद सावद्य ही होता है, और वह संक्लेशयुक्त तथा अनिष्ट फल देने वाला होता है। अनवद्य (मृत्यु जनित) भेद विपाक न होने के कारण निष्फल है, किन्तु अभेद (शरण का न टूटना) फल की दृष्टि से इष्ट (वांछित) फल ही देता है। ယထာဟ – जैसा कि कहा गया है - ‘‘ယေကေစိ [Pg.8] ဗုဒ္ဓံ သရဏံ ဂတာသေ, န တေ ဂမိဿန္တိ အပါယဘူမိံ; ပဟာယ မာနုသံ ဒေဟံ, ဒေဝကာယံ ပရိပူရေဿန္တီ’’တိ. (ဒီ. နိ. ၂.၃၃၂; သံ. နိ. ၁.၃၇); "जो कोई भी बुद्ध की शरण में गए हैं, वे अपाय (दुर्गति) की भूमि में नहीं जाएँगे; वे मनुष्य देह को त्याग कर देव-निकाय (देवलोक) को पूर्ण करेंगे।" တတြ စ ယေ သရဏဂမနုပက္ကိလေသသမုစ္ဆေဒေန သရဏံ ဂတာ, တေ အပါယံ န ဂမိဿန္တိ. ဣတရေ ပန သရဏဂမနေန န ဂမိဿန္တီတိ ဧဝံ ဂါထာယ အဓိပ္ပာယော ဝေဒိတဗ္ဗော. और वहाँ जो शरणगमन के उपक्लेशों के समुच्छेद (विनाश) के साथ शरण में गए हैं, वे अपाय में नहीं जाएँगे। अन्य लोग केवल शरणगमन मात्र से (अपाय में) नहीं जाएँगे - इस प्रकार गाथा का अभिप्राय समझना चाहिए। အယံ တာဝ ဘေဒါဘေဒဖလဒီပနာ. यह पहले भेद, अभेद और फल का विवरण है। ဂမနီယဒီပနာ गमनीय (शरण जाने की प्रक्रिया) का विवरण। ဂမနီယဒီပနာယံ စောဒကော အာဟ – ‘‘ဗုဒ္ဓံ သရဏံ ဂစ္ဆာမီ’’တိ ဧတ္ထ ယော ဗုဒ္ဓံ သရဏံ ဂစ္ဆတိ, ဧသ ဗုဒ္ဓံ ဝါ ဂစ္ဆေယျ သရဏံ ဝါ, ဥဘယထာပိ စ ဧကဿ ဝစနံ နိရတ္ထကံ. ကသ္မာ? ဂမနကိရိယာယ ကမ္မဒွယာဘာဝတော. န ဟေတ္ထ ‘‘အဇံ ဂါမံ နေတီ’’တိအာဒီသု ဝိယ ဒွိကမ္မကတ္တံ အက္ခရစိန္တကာ ဣစ္ဆန္တိ. गमनीय के विवरण में शंकाकार (चोदक) कहता है - "बुद्धं सरणं गच्छामि" (मैं बुद्ध की शरण में जाता हूँ) यहाँ जो बुद्ध की शरण में जाता है, वह या तो बुद्ध को प्राप्त करे या शरण को; दोनों ही स्थितियों में एक (क्रिया) का वचन निरर्थक है। क्यों? क्योंकि गमन क्रिया में दो कर्मों का अभाव होता है। यहाँ वैयाकरण (अक्षरचिन्तक) "अजं गामं नेति" (बकरी को गाँव ले जाता है) आदि के समान द्विकर्मकता स्वीकार नहीं करते। ‘‘ဂစ္ဆတေဝ ပုဗ္ဗံ ဒိသံ, ဂစ္ဆတိ ပစ္ဆိမံ ဒိသ’’န္တိအာဒီသု (သံ. နိ. ၁.၁၅၉; ၃.၈၇) ဝိယ သာတ္ထကမေဝါတိ စေ? န, ဗုဒ္ဓသရဏာနံ သမာနာဓိကရဏဘာဝဿာနဓိပ္ပေတတော. ဧတေသဉှိ သမာနာဓိကရဏဘာဝေ အဓိပ္ပေတေ ပဋိဟတစိတ္တောပိ ဗုဒ္ဓံ ဥပသင်္ကမန္တော ဗုဒ္ဓံ သရဏံ ဂတော သိယာ. ယဉှိ တံ ဗုဒ္ဓေါတိ ဝိသေသိတံ သရဏံ, တမေဝေသ ဂတောတိ. ‘‘ဧတံ ခေါ သရဏံ ခေမံ, ဧတံ သရဏမုတ္တမ’’န္တိ (ဓ. ပ. ၁၉၂) ဝစနတော သမာနာဓိကရဏတ္တမေဝါတိ စေ? န, တတ္ထေဝ တဗ္ဘာဝတော. တတ္ထေဝ ဟိ ဂါထာပဒေ ဧတံ ဗုဒ္ဓါဒိရတနတ္တယံ သရဏဂတာနံ ဘယဟရဏတ္တသင်္ခါတေ သရဏဘာဝေ အဗျဘိစရဏတော ‘‘ခေမမုတ္တမဉ္စ သရဏ’’န္တိ အယံ သမာနာဓိကရဏဘာဝေါ အဓိပ္ပေတော, အညတ္ထ တု ဂမိသမ္ဗန္ဓေ သတိ သရဏဂမနဿ အပ္ပသိဒ္ဓိတော အနဓိပ္ပေတောတိ အသာဓကမေတံ. ‘‘ဧတံ [Pg.9] သရဏမာဂမ္မ, သဗ္ဗဒုက္ခာ ပမုစ္စတီ’’တိ ဧတ္ထ ဂမိသမ္ဗန္ဓေပိ သရဏဂမနပသိဒ္ဓိတော သမာနာဓိကရဏတ္တမေဝါတိ စေ? န ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တဒေါသပ္ပသင်္ဂတော. တတြာပိ ဟိ သမာနာဓိကရဏဘာဝေ သတိ ဧတံ ဗုဒ္ဓဓမ္မသံဃသရဏံ ပဋိဟတစိတ္တောပိ အာဂမ္မ သဗ္ဗဒုက္ခာ ပမုစ္စေယျာတိ ဧဝံ ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တဒေါသပ္ပသင်္ဂေါ ဧဝ သိယာ, န စ နော ဒေါသေန အတ္ထိ အတ္ထောတိ အသာဓကမေတံ. ယထာ ‘‘မမဉှိ, အာနန္ဒ, ကလျာဏမိတ္တံ အာဂမ္မ ဇာတိဓမ္မာ သတ္တာ ဇာတိယာ ပရိမုစ္စန္တီ’’တိ (သံ. နိ. ၁.၁၂၉) ဧတ္ထ ဘဂဝတော ကလျာဏမိတ္တဿ အာနုဘာဝေန ပရိမုစ္စမာနာ သတ္တာ ‘‘ကလျာဏမိတ္တံ အာဂမ္မ ပရိမုစ္စန္တီ’’တိ ဝုတ္တာ. ဧဝမိဓာပိ ဗုဒ္ဓဓမ္မသံဃဿ သရဏဿာနုဘာဝေန မုစ္စမာနော ‘‘ဧတံ သရဏမာဂမ္မ, သဗ္ဗဒုက္ခာ ပမုစ္စတီ’’တိ ဝုတ္တောတိ ဧဝမေတ္ထ အဓိပ္ပာယော ဝေဒိတဗ္ဗော. जैसे 'पूर्व दिशा की ओर जाता है, पश्चिम दिशा की ओर जाता है' इत्यादि में (सार्थक है), वैसे ही यहाँ भी (बुद्धं शरणं) सार्थक ही है - यदि ऐसा कहा जाए? तो नहीं, क्योंकि 'बुद्ध' और 'शरण' शब्दों के सामानाधिकरण्य (एक ही अर्थ वाला होना) का यहाँ अभिप्राय नहीं है। यदि इनका सामानाधिकरण्य अभीष्ट होता, तो बुद्ध के प्रति द्वेषपूर्ण चित्त वाला व्यक्ति भी बुद्ध के पास जाते समय 'बुद्धं शरणं गतो' (बुद्ध की शरण में गया हुआ) हो जाता। क्योंकि जो 'बुद्ध' इस विशेषण से युक्त शरण है, वह उसी को प्राप्त हुआ है। 'यही क्षेमयुक्त शरण है, यही उत्तम शरण है' (धम्मपद १९२) इस वचन के कारण यहाँ सामानाधिकरण्य ही है - यदि ऐसा कहा जाए? तो नहीं, क्योंकि केवल वहीं (उस गाथा में) वैसा भाव है। उस गाथा के पद में बुद्ध आदि रत्नत्रय की शरण में गए हुए लोगों के लिए, भय को हरने के कारण शरण होने में कोई व्यभिचार (विचलना) न होने से 'क्षेम और उत्तम शरण' - यह सामानाधिकरण्य का भाव अभीष्ट है। परंतु अन्यत्र जहाँ 'गमि' (जाना) धातु का सम्बन्ध है, वहाँ 'शरण-गमन' की प्रसिद्धि न होने से (सामानाधिकरण्य) अनभीष्ट है, अतः यह तर्क साधक नहीं है। 'इस शरण को प्राप्त कर सभी दुखों से मुक्त हो जाता है' - यहाँ 'गमि' धातु का सम्बन्ध होने पर भी 'शरण-गमन' की प्रसिद्धि होने से सामानाधिकरण्य ही है - यदि ऐसा कहा जाए? तो नहीं, क्योंकि पूर्वोक्त दोष का प्रसंग आएगा। वहाँ भी सामानाधिकरण्य होने पर, बुद्ध-धम्म-संघ रूपी शरण को प्राप्त कर द्वेषपूर्ण चित्त वाला व्यक्ति भी सभी दुखों से मुक्त हो जाएगा - इस प्रकार पूर्वोक्त दोष का प्रसंग ही होगा। और हमें दोष से कोई प्रयोजन नहीं है, अतः यह तर्क साधक नहीं है। जैसे 'हे आनंद! मुझ कल्याणमित्र का आश्रय लेकर जन्म-मरण के स्वभाव वाले प्राणी जन्म से मुक्त हो जाते हैं' - यहाँ भगवान कल्याणमित्र के अनुभाव से मुक्त होने वाले प्राणियों के लिए 'कल्याणमित्र का आश्रय लेकर मुक्त होते हैं' ऐसा कहा गया है। इसी प्रकार यहाँ भी बुद्ध-धम्म-संघ रूपी शरण के अनुभाव से मुक्त होने वाले के लिए 'इस शरण को प्राप्त कर सभी दुखों से मुक्त हो जाता है' ऐसा कहा गया है - यहाँ ऐसा अभिप्राय समझना चाहिए। ဧဝံ သဗ္ဗထာပိ န ဗုဒ္ဓဿ ဂမနီယတ္တံ ယုဇ္ဇတိ, န သရဏဿ, န ဥဘယေသံ, ဣစ္ဆိတဗ္ဗဉ္စ ဂစ္ဆာမီတိ နိဒ္ဒိဋ္ဌဿ ဂမကဿ ဂမနီယံ, တတော ဝတ္တဗ္ဗာ ဧတ္ထ ယုတ္တီတိ. ဝုစ္စတေ – इस प्रकार सर्वथा न तो बुद्ध का 'गमनीयत्व' (गंतव्य होना) सिद्ध होता है, न शरण का, और न ही दोनों का। और 'गच्छामि' इस पद द्वारा निर्दिष्ट कर्ता (गमक) के लिए एक गंतव्य (गमनीय) की इच्छा की जानी चाहिए, इसलिए यहाँ उचित युक्ति कही जानी चाहिए। (उत्तर) कहा जाता है— ဗုဒ္ဓေါယေဝေတ္ထ ဂမနီယော, ဂမနာကာရဒဿနတ္ထံ တု တံ သရဏဝစနံ, ဗုဒ္ဓံ သရဏန္တိ ဂစ္ဆာမိ. ဧသ မေ သရဏံ, ဧသ မေ ပရာယဏံ, အဃဿ, တာတာ, ဟိတဿ စ ဝိဓာတာတိ ဣမိနာ အဓိပ္ပာယေန ဧတံ ဂစ္ဆာမိ ဘဇာမိ သေဝါမိ ပယိရုပါသာမိ, ဧဝံ ဝါ ဇာနာမိ ဗုဇ္ဈာမီတိ. ယေသဉှိ ဓာတူနံ ဂတိအတ္ထော ဗုဒ္ဓိပိ တေသံ အတ္ထောတိ. ဣတိ-သဒ္ဒဿ အပ္ပယောဂါ အယုတ္တမိတိ စေ? တံ န. တတ္ထ သိယာ – ယဒိ စေတ္ထ ဧဝမတ္ထော ဘဝေယျ, တတော ‘‘အနိစ္စံ ရူပံ အနိစ္စံ ရူပန္တိ ယထာဘူတံ ပဇာနာတီ’’တိ ဧဝမာဒီသု (သံ. နိ. ၃.၅၅, ၈၅) ဝိယ ဣတိ-သဒ္ဒေါ ပယုတ္တော သိယာ, န စ ပယုတ္တော, တသ္မာ အယုတ္တမေတန္တိ. တဉ္စ န, ကသ္မာ? တဒတ္ထသမ္ဘဝါ. ‘‘ယော စ ဗုဒ္ဓဉ္စ ဓမ္မဉ္စ သံဃဉ္စ သရဏံ ဂတော’’တိ ဧဝမာဒီသု (ဓ. ပ. ၁၉၀) ဝိယ ဣဓာပိ ဣတိ-သဒ္ဒဿ အတ္ထော သမ္ဘဝတိ, န စ ဝိဇ္ဇမာနတ္ထသမ္ဘဝါ ဣတိ-သဒ္ဒါ သဗ္ဗတ္ထ ပယုဇ္ဇန္တိ, အပ္ပယုတ္တဿာပေတ္ထ ပယုတ္တဿ ဝိယ ဣတိ-သဒ္ဒဿ အတ္ထော ဝိညာတဗ္ဗော အညေသု စ ဧဝံဇာတိကေသု, တသ္မာ အဒေါသော ဧဝ သောတိ. ‘‘အနုဇာနာမိ, ဘိက္ခဝေ, တီဟိ သရဏဂမနေဟိ ပဗ္ဗဇ္ဇ’’န္တိအာဒီသု (မဟာဝ. ၃၄) သရဏဿေဝ ဂမနီယတော ယံ ဝုတ္တံ ‘‘ဂမနာကာရဒဿနတ္ထံ တု သရဏဝစန’’န္တိ, တံ န ယုတ္တမိတိ စေ. တံ [Pg.10] နာယုတ္တံ. ကသ္မာ? တဒတ္ထသမ္ဘဝါ ဧဝ. တတြာပိ ဟိ တဿ အတ္ထော သမ္ဘဝတိ, ယတော ပုဗ္ဗသဒိသမေဝ အပ္ပယုတ္တောပိ ပယုတ္တော ဝိယ ဝေဒိတဗ္ဗော. ဣတရထာ ဟိ ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တဒေါသပ္ပသင်္ဂေါ ဧဝ သိယာ, တသ္မာ ယထာနုသိဋ္ဌမေဝ ဂဟေတဗ္ဗံ. यहाँ बुद्ध ही 'गमनीय' (गंतव्य) हैं, परंतु गमन के प्रकार को दिखाने के लिए 'शरण' शब्द का प्रयोग किया गया है, (अर्थात्) 'बुद्ध को शरण के रूप में प्राप्त करता हूँ'। 'ये मेरे शरण हैं, ये मेरे परायण हैं, ये दुखों का नाश करने वाले और हित का विधान करने वाले हैं' - इस अभिप्राय से 'मैं उन्हें प्राप्त करता हूँ, भजता हूँ, सेवन करता हूँ, उनकी उपासना करता हूँ', अथवा 'इस प्रकार जानता हूँ, बोध प्राप्त करता हूँ'। क्योंकि जिन धातुओं का अर्थ 'गति' (जाना) है, उनका अर्थ 'बुद्धि' (जानना) भी होता है। यदि 'इति' शब्द का प्रयोग न होने के कारण यह अयुक्त है - ऐसा कहा जाए? तो वह सही नहीं है। वहाँ यह शंका हो सकती है - यदि यहाँ ऐसा अर्थ होता, तो 'अनित्यं रूपं अनित्यं रूपन्ति यथाभूतं प्रजानाति' (रूप अनित्य है, इस प्रकार यथार्थ जानता है) इत्यादि की तरह 'इति' शब्द का प्रयोग होना चाहिए था, पर यहाँ प्रयोग नहीं हुआ है, इसलिए यह अयुक्त है। यह भी सही नहीं है, क्यों? क्योंकि उस अर्थ की संभावना है। 'जो बुद्ध, धम्म और संघ की शरण में गया है' इत्यादि की तरह यहाँ भी 'इति' शब्द का अर्थ संभव है। और अर्थ की विद्यमानता होने मात्र से 'इति' शब्द का प्रयोग सर्वत्र नहीं किया जाता। यहाँ प्रयोग न होने पर भी, प्रयुक्त के समान ही 'इति' शब्द का अर्थ समझना चाहिए, जैसे अन्य समान उदाहरणों में समझा जाता है। इसलिए यह निर्दोष ही है। 'हे भिक्षुओं! मैं तीन शरण-गमनों द्वारा प्रव्रज्या की अनुमति देता हूँ' इत्यादि में शरण को ही 'गमनीय' (गंतव्य) कहे जाने के कारण, जो यह कहा गया कि 'गमन के प्रकार को दिखाने के लिए शरण शब्द का प्रयोग है', वह अयुक्त है - यदि ऐसा कहा जाए? तो वह अयुक्त नहीं है। क्यों? क्योंकि वहाँ भी उस अर्थ की संभावना ही है। वहाँ भी उसका अर्थ संभव है, क्योंकि पूर्व के समान ही प्रयोग न होने पर भी उसे प्रयुक्त के समान ही समझना चाहिए। अन्यथा पूर्वोक्त दोष का प्रसंग होगा, इसलिए जैसा उपदेश दिया गया है, वैसा ही ग्रहण करना चाहिए। အယံ ဂမနီယဒီပနာ. यह 'गमनीय' (गंतव्य) का स्पष्टीकरण है। ဓမ္မသံဃသရဏဝိဘာဝနာ धम्म और संघ रूपी शरण का स्पष्टीकरण। ဣဒါနိ ယံ ဝုတ္တံ ‘‘ဓမ္မံ သရဏမိစ္စာဒိ, ဒွယေပေသ နယော မတော’’တိ ဧတ္ထ ဝုစ္စတေ – ယွာယံ ‘‘ဗုဒ္ဓံ သရဏံ ဂစ္ဆာမီ’’တိ ဧတ္ထ အတ္ထဝဏ္ဏနာနယော ဝုတ္တော, ‘‘ဓမ္မံ သရဏံ ဂစ္ဆာမိ, သံဃံ သရဏံ ဂစ္ဆာမီ’’တိ ဧတသ္မိမ္ပိ ပဒဒွယေ ဧသောဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. တတြာပိ ဟိ ဓမ္မသံဃာနံ အတ္ထတော ဗျဉ္ဇနတော စ ဝိဘာဝနမတ္တမေဝ အသဒိသံ, သေသံ ဝုတ္တသဒိသမေဝ. ယတော ယဒေဝေတ္ထ အသဒိသံ, တံ ဝုစ္စတေ – မဂ္ဂဖလနိဗ္ဗာနာနိ ဓမ္မောတိ ဧကေ. ဘာဝိတမဂ္ဂါနံ သစ္ဆိကတနိဗ္ဗာနာနဉ္စ အပါယေသု အပတနဘာဝေန ဓာရဏတော ပရမဿာသဝိဓာနတော စ မဂ္ဂဝိရာဂါ ဧဝ ဣမသ္မိံ အတ္ထေ ဓမ္မောတိ အမှာကံ ခန္တိ, အဂ္ဂပ္ပသာဒသုတ္တဉ္စေဝ သာဓကံ. ဝုတ္တဉ္စေတ္ထ ‘‘ယာဝတာ, ဘိက္ခဝေ, ဓမ္မာ သင်္ခတာ, အရိယော အဋ္ဌင်္ဂိကော မဂ္ဂေါ တေသံ အဂ္ဂမက္ခာယတီ’’တိ ဧဝမာဒိ (အ. နိ. ၄.၃၄; ဣတိဝု. ၉၀). अब जो कहा गया था कि 'धम्मं शरणं इत्यादि, इन दोनों में भी यही विधि मानी गई है', उसके विषय में कहा जाता है - जो यह 'बुद्धं शरणं गच्छामि' यहाँ अर्थ-व्याख्या की विधि कही गई है, वही 'धम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि' इन दो पदों में भी समझनी चाहिए। वहाँ भी धम्म और संघ के अर्थ और व्यंजन (शब्द) की दृष्टि से केवल स्पष्टीकरण मात्र का अंतर है, शेष पूर्वोक्त के समान ही है। अतः जो यहाँ भिन्न है, वह कहा जाता है - कुछ आचार्यों के अनुसार मार्ग, फल और निर्वाण 'धम्म' हैं। मार्ग का अभ्यास करने वालों और निर्वाण का साक्षात्कार करने वालों को अपायों (दुर्गति) में न गिरने देने के कारण और परम शांति (आश्वास) का विधान करने के कारण, 'मार्ग और विराग' ही इस अर्थ में धम्म हैं - यह हमारा मत (खन्ति) है, और 'अग्गप्पसाद सुत्त' ही इसका प्रमाण है। वहाँ ऐसा कहा गया है - 'हे भिक्षुओं! जितने भी संस्कृत (निर्मित) धर्म हैं, उनमें आर्य अष्टांगिक मार्ग सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है' इत्यादि। စတုဗ္ဗိဓအရိယမဂ္ဂသမင်္ဂီနံ စတုသာမညဖလသမဓိဝါသိတခန္ဓသန္တာနာနဉ္စ ပုဂ္ဂလာနံ သမူဟော ဒိဋ္ဌိသီလသံဃာတေန သံဟတတ္တာ သံဃော. ဝုတ္တဉ္စေတံ ဘဂဝတာ – चार प्रकार के आर्य मार्गों से युक्त और चार सामन्य फलों की समाधि से सुवासित स्कंध-संतान वाले व्यक्तियों का समूह, जो दृष्टि और शील की एकता के कारण संगठित है, 'संघ' कहलाता है। भगवान द्वारा भी यह कहा गया है— ‘‘တံ ကိံ မညသိ, အာနန္ဒ, ယေ ဝေါ မယာ ဓမ္မာ အဘိညာ ဒေသိတာ, သေယျထိဒံ, စတ္တာရော သတိပဋ္ဌာနာ, စတ္တာရော သမ္မပ္ပဓာနာ, စတ္တာရော ဣဒ္ဓိပါဒါ, ပဉ္စိန္ဒြိယာနိ, ပဉ္စ ဗလာနိ, သတ္တ ဗောဇ္ဈင်္ဂါ, အရိယော အဋ္ဌင်္ဂိကော မဂ္ဂေါ, ပဿသိ နော တွံ, အာနန္ဒ, ဣမေသု ဓမ္မေသု ဒွေပိ ဘိက္ခူ နာနာဝါဒေ’’တိ (မ. နိ. ၃.၄၃). हे आनंद! तुम क्या सोचते हो? जो धर्म मैंने तुम्हें विशेष ज्ञान (अभिज्ञा) से जानकर उपदेश दिए हैं, जैसे कि—चार स्मृतिप्रस्थान, चार सम्यक् प्रधान, चार ऋद्धिपाद, पाँच इन्द्रियाँ, पाँच बल, सात बोध्यंग और आर्य अष्टांगिक मार्ग; हे आनंद! क्या तुम इन धर्मों के विषय में किन्हीं दो भिक्षुओं को भी अलग-अलग बात करते हुए देखते हो? အယဉှိ ပရမတ္ထသံဃော သရဏန္တိ ဂမနီယော. သုတ္တေ စ ‘‘အာဟုနေယျော ပါဟုနေယျော ဒက္ခိဏေယျော အဉ္ဇလိကရဏီယော အနုတ္တရံ ပုညက္ခေတ္တံ လောကဿာ’’တိ [Pg.11] (ဣတိဝု. ၉၀; အ. နိ. ၄.၃၄, ၁၈၁) ဝုတ္တော. ဧတံ ပန သရဏံ ဂတဿ အညသ္မိမ္ပိ ဘိက္ခုသံဃေ ဝါ ဘိက္ခုနိသံဃေ ဝါ ဗုဒ္ဓပ္ပမုခေ ဝါ သံဃေ သမ္မုတိသံဃေ ဝါ စတုဝဂ္ဂါဒိဘေဒေ ဧကပုဂ္ဂလေပိ ဝါ ဘဂဝန္တံ ဥဒ္ဒိဿ ပဗ္ဗဇိတေ ဝန္ဒနာဒိကိရိယာယ သရဏဂမနံ နေဝ ဘိဇ္ဇတိ န သံကိလိဿတိ, အယမေတ္ထ ဝိသေသော. ဝုတ္တာဝသေသန္တု ဣမဿ ဒုတိယဿ စ သရဏဂမနဿ ဘေဒါဘေဒါဒိဝိဓာနံ ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗံ. အယံ တာဝ ‘‘ဓမ္မံ သရဏမိစ္စာဒိ, ဒွယေပေသ နယော မတော’’တိ ဧတဿ ဝဏ္ဏနာ. निश्चित ही यह परमार्थ संघ शरण के रूप में जाने योग्य है। और सूत्रों में कहा गया है—'आहुनेय, पाहुनेय, दक्षिणेय, अंजलि-करणीय और लोक का अनुपम पुण्यक्षेत्र है।' इस (परमार्थ संघ) की शरण में गए व्यक्ति का, अन्य भिक्षु संघ में, या भिक्षुणी संघ में, या बुद्ध-प्रमुख संघ में, या सम्मति संघ में, या चतुर्वर्ग आदि भेदों वाले (संघ) में, या भगवान के उद्देश्य से प्रव्रजित किसी एक व्यक्ति में भी वंदना आदि क्रिया करने से शरण-गमन न तो टूटता है और न ही मलिन होता है; यहाँ यही विशेषता है। इस दूसरे शरण-गमन के टूटने या न टूटने आदि का शेष विधान पहले बताए गए तरीके से ही समझना चाहिए। यह 'धम्मं सरणं' आदि दो (पदों) की व्याख्या है। အနုပုဗ္ဗဝဝတ္ထာနကာရဏနိဒ္ဒေသော क्रमशः व्यवस्थापन के कारण का निर्देश। ဣဒါနိ အနုပုဗ္ဗဝဝတ္ထာနေ, ကာရဏဉ္စ ဝိနိဒ္ဒိသေတိ ဧတ္ထ ဧတေသု စ တီသု သရဏဝစနေသု သဗ္ဗသတ္တာနံ အဂ္ဂေါတိ ကတွာ ပဌမံ ဗုဒ္ဓေါ, တပ္ပဘဝတော တဒုပဒေသိတတော စ အနန္တရံ ဓမ္မော, တဿ ဓမ္မဿ အာဓာရကတော တဒါသေဝနတော စ အန္တေ သံဃော. သဗ္ဗသတ္တာနံ ဝါ ဟိတေ နိယောဇကောတိ ကတွာ ပဌမံ ဗုဒ္ဓေါ, တပ္ပဘဝတော သဗ္ဗသတ္တဟိတတ္တာ အနန္တရံ ဓမ္မော, ဟိတာဓိဂမာယ ပဋိပန္နော အဓိဂတဟိတော စာတိ ကတွာ အန္တေ သံဃော သရဏဘာဝေန ဝဝတ္ထပေတွာ ပကာသိတောတိ ဧဝံ အနုပုဗ္ဗဝဝတ္ထာနေ ကာရဏဉ္စ ဝိနိဒ္ဒိသေ. अब 'क्रमशः व्यवस्थापन में कारण का निर्देश करें'—यहाँ इन तीन शरण-वचनों में, 'सभी सत्त्वों में श्रेष्ठ हैं' ऐसा मानकर पहले बुद्ध को (कहा गया है), उनसे उत्पन्न होने और उनके द्वारा उपदिष्ट होने के कारण उसके बाद धर्म को, और उस धर्म के आधार होने तथा उसका सेवन करने के कारण अंत में संघ को (कहा गया है)। अथवा, 'सभी सत्त्वों को हित में लगाने वाले हैं' ऐसा मानकर पहले बुद्ध को, उनसे उत्पन्न होने और सभी सत्त्वों के लिए हितकारी होने के कारण उसके बाद धर्म को, और हित की प्राप्ति के लिए प्रतिपन्न (प्रयत्नशील) होने तथा हित प्राप्त कर लेने के कारण अंत में संघ को शरण के रूप में व्यवस्थित कर प्रकाशित किया गया है—इस प्रकार क्रमशः व्यवस्थापन में कारण का निर्देश करना चाहिए। ဥပမာပကာသနာ उपमाओं द्वारा प्रकाशन। ဣဒါနိ ယမ္ပိ ဝုတ္တံ ‘‘သရဏတ္တယမေတဉ္စ, ဥပမာဟိ ပကာသယေ’’တိ, တမ္ပိ ဝုစ္စတေ – ဧတ္ထ ပန ပုဏ္ဏစန္ဒော ဝိယ ဗုဒ္ဓေါ, စန္ဒကိရဏနိကရော ဝိယ တေန ဒေသိတော ဓမ္မော, ပုဏ္ဏစန္ဒကိရဏသမုပ္ပာဒိတပီဏိတော လောကော ဝိယ သံဃော. ဗာလသူရိယော ဝိယ ဗုဒ္ဓေါ, တဿ ရသ္မိဇာလမိဝ ဝုတ္တပ္ပကာရော ဓမ္မော, တေန ဝိဟတန္ဓကာရော လောကော ဝိယ သံဃော. ဝနဒါဟကပုရိသော ဝိယ ဗုဒ္ဓေါ, ဝနဒဟနဂ္ဂိ ဝိယ ကိလေသဝနဒဟနော ဓမ္မော, ဒဍ္ဎဝနတ္တာ ခေတ္တဘူတော ဝိယ ဘူမိဘာဂေါ ဒဍ္ဎကိလေသတ္တာ ပုညက္ခေတ္တဘူတော သံဃော. မဟာမေဃော ဝိယ ဗုဒ္ဓေါ, သလိလဝုဋ္ဌိ ဝိယ ဓမ္မော, ဝုဋ္ဌိနိပါတူပသမိတရေဏု ဝိယ ဇနပဒေါ ဥပသမိတကိလေသရေဏု သံဃော. သုသာရထိ [Pg.12] ဝိယ ဗုဒ္ဓေါ, အဿာဇာနီယဝိနယူပါယော ဝိယ ဓမ္မော, သုဝိနီတဿာဇာနီယသမူဟော ဝိယ သံဃော. သဗ္ဗဒိဋ္ဌိသလ္လုဒ္ဓရဏတော သလ္လကတ္တော ဝိယ ဗုဒ္ဓေါ, သလ္လုဒ္ဓရဏူပါယော ဝိယ ဓမ္မော, သမုဒ္ဓဋသလ္လော ဝိယ ဇနော သမုဒ္ဓဋဒိဋ္ဌိသလ္လော သံဃော. မောဟပဋလသမုပ္ပာဋနတော ဝါ သာလာကိယော ဝိယ ဗုဒ္ဓေါ, ပဋလသမုပ္ပာဋနုပါယော ဝိယ ဓမ္မော, သမုပ္ပာဋိတပဋလော ဝိပ္ပသန္နလောစနော ဝိယ ဇနော သမုပ္ပာဋိတမောဟပဋလော ဝိပ္ပသန္နဉာဏလောစနော သံဃော. သာနုသယကိလေသဗျာဓိဟရဏသမတ္ထတာယ ဝါ ကုသလော ဝေဇ္ဇော ဝိယ ဗုဒ္ဓေါ, သမ္မာ ပယုတ္တဘေသဇ္ဇမိဝ ဓမ္မော, ဘေသဇ္ဇပယောဂေန သမုပသန္တဗျာဓိ ဝိယ ဇနသမုဒါယော သမုပသန္တကိလေသဗျာဓာနုသယော သံဃော. अब जो कहा गया है—'इस रत्नत्रय को उपमाओं द्वारा प्रकाशित करें', वह भी कहा जाता है—यहाँ पूर्ण चंद्रमा के समान बुद्ध हैं, चंद्रमा की किरणों के समूह के समान उनके द्वारा उपदिष्ट धर्म है, और पूर्ण चंद्रमा की किरणों से प्रसन्न हुए लोक के समान संघ है। बाल-सूर्य के समान बुद्ध हैं, उसकी रश्मियों के जाल के समान पूर्वोक्त धर्म है, और उसके द्वारा नष्ट किए गए अंधकार वाले लोक के समान संघ है। वन को जलाने वाले पुरुष के समान बुद्ध हैं, वन को जलाने वाली अग्नि के समान क्लेश-रूपी वन को जलाने वाला धर्म है, और जले हुए वन के कारण खेत बनी हुई भूमि के समान, क्लेशों के जल जाने के कारण पुण्यक्षेत्र बना हुआ संघ है। महामेघ के समान बुद्ध हैं, जल की वर्षा के समान धर्म है, और वर्षा की बूंदों से शांत हुई धूल वाले जनपद के समान, शांत हुए क्लेश-रूपी धूल वाला संघ है। कुशल सारथी के समान बुद्ध हैं, श्रेष्ठ घोड़ों को प्रशिक्षित करने के उपाय के समान धर्म है, और भली-भाँति प्रशिक्षित श्रेष्ठ घोड़ों के समूह के समान संघ है। सभी (मिथ्या) दृष्टि-रूपी शल्यों (काँटों) को निकालने के कारण शल्य-चिकित्सक के समान बुद्ध हैं, शल्य निकालने के उपाय के समान धर्म है, और निकाले गए शल्य वाले व्यक्ति के समान, निकाली गई दृष्टि-रूपी शल्य वाला संघ है। अथवा, मोह-रूपी पटल (मोतियाबिंद) को उखाड़ने के कारण नेत्र-चिकित्सक के समान बुद्ध हैं, पटल उखाड़ने के उपाय-रूपी औषधि के समान धर्म है, और उखाड़े गए पटल वाले निर्मल नेत्रों वाले व्यक्ति के समान, उखाड़े गए मोह-रूपी पटल वाले निर्मल ज्ञान-रूपी नेत्रों वाला संघ है। अथवा, अनुशय सहित क्लेश-रूपी व्याधि को दूर करने में समर्थ होने के कारण कुशल वैद्य के समान बुद्ध हैं, भली-भाँति प्रयोग की गई औषधि के समान धर्म है, और औषधि के प्रयोग से शांत हुई व्याधि वाले जन-समूह के समान, शांत हुई क्लेश-व्याधि और अनुशय वाला संघ है। အထ ဝါ သုဒေသကော ဝိယ ဗုဒ္ဓေါ, သုမဂ္ဂေါ ဝိယ ခေမန္တဘူမိ ဝိယ စ ဓမ္မော, မဂ္ဂပ္ပဋိပန္နော ခေမန္တဘူမိပ္ပတ္တော ဝိယ သံဃော. သုနာဝိကော ဝိယ ဗုဒ္ဓေါ, နာဝါ ဝိယ ဓမ္မော, ပါရပ္ပတ္တော သမ္ပတ္တိကော ဝိယ ဇနော သံဃော. ဟိမဝါ ဝိယ ဗုဒ္ဓေါ, တပ္ပဘဝေါသဓမိဝ ဓမ္မော, ဩသဓူပဘောဂေန နိရာမယော ဝိယ ဇနော သံဃော. ဓနဒေါ ဝိယ ဗုဒ္ဓေါ, ဓနံ ဝိယ ဓမ္မော, ယထာဓိပ္ပာယံ လဒ္ဓဓနော ဝိယ ဇနော သမ္မာလဒ္ဓအရိယဓနော သံဃော. နိဓိဒဿနကော ဝိယ ဗုဒ္ဓေါ, နိဓိ ဝိယ ဓမ္မော, နိဓိပ္ပတ္တော ဝိယ ဇနော သံဃော. अथवा, अच्छे मार्गदर्शक के समान बुद्ध हैं, अच्छे मार्ग और क्षेम-भूमि (सुरक्षित स्थान) के समान धर्म है, और मार्ग पर चलने वाले तथा क्षेम-भूमि पर पहुँचे हुए व्यक्ति के समान संघ है। कुशल नाविक के समान बुद्ध हैं, नौका के समान धर्म है, और पार पहुँचे हुए सुखी व्यक्ति के समान संघ है। हिमालय के समान बुद्ध हैं, उससे उत्पन्न औषधि के समान धर्म है, और औषधि के उपभोग से रोग-मुक्त व्यक्ति के समान संघ है। धन देने वाले के समान बुद्ध हैं, धन के समान धर्म है, और इच्छानुसार धन प्राप्त व्यक्ति के समान, भली-भाँति प्राप्त आर्य-धन वाला संघ है। निधि (खजाना) दिखाने वाले के समान बुद्ध हैं, निधि के समान धर्म है, और निधि को प्राप्त व्यक्ति के समान संघ है। အပိစ အဘယဒေါ ဝိယ ဝီရပုရိသော ဗုဒ္ဓေါ, အဘယမိဝ ဓမ္မော, သမ္ပတ္တာဘယော ဝိယ ဇနော အစ္စန္တသဗ္ဗဘယော သံဃော. အဿာသကော ဝိယ ဗုဒ္ဓေါ, အဿာသော ဝိယ ဓမ္မော, အဿတ္ထဇနော ဝိယ သံဃော. သုမိတ္တော ဝိယ ဗုဒ္ဓေါ, ဟိတူပဒေသော ဝိယ ဓမ္မော, ဟိတူပယောဂေန ပတ္တသဒတ္ထော ဝိယ ဇနော သံဃော. ဓနာကရော ဝိယ ဗုဒ္ဓေါ, ဓနသာရော ဝိယ ဓမ္မော, ဓနသာရူပဘောဂေါ ဝိယ ဇနော သံဃော. ရာဇကုမာရနှာပကော ဝိယ ဗုဒ္ဓေါ, သီသနှာနသလိလံ ဝိယ ဓမ္မော, သုနှာတရာဇကုမာရဝဂ္ဂေါ ဝိယ သဒ္ဓမ္မသလိလသုနှာတော သံဃော. အလင်္ကာရကာရကော ဝိယ ဗုဒ္ဓေါ, အလင်္ကာရော ဝိယ ဓမ္မော, အလင်္ကတရာဇပုတ္တဂဏော ဝိယ သဒ္ဓမ္မာလင်္ကတော သံဃော. စန္ဒနရုက္ခော ဝိယ ဗုဒ္ဓေါ, တပ္ပဘဝဂန္ဓော ဝိယ ဓမ္မော, စန္ဒနုပဘောဂေန သန္တပရိဠာဟော ဝိယ ဇနော သဒ္ဓမ္မူပဘောဂေန သန္တပရိဠာဟော သံဃော. ဒါယဇ္ဇသမ္ပဒါနကော ဝိယ ပိတာ ဗုဒ္ဓေါ, ဒါယဇ္ဇံ ဝိယ ဓမ္မော, ဒါယဇ္ဇဟရော ပုတ္တဝဂ္ဂေါ ဝိယ သဒ္ဓမ္မဒါယဇ္ဇဟရော သံဃော. ဝိကသိတပဒုမံ [Pg.13] ဝိယ ဗုဒ္ဓေါ, တပ္ပဘဝမဓု ဝိယ ဓမ္မော, တဒုပဘောဂီဘမရဂဏော ဝိယ သံဃော. ဧဝံ သရဏတ္တယမေတဉ္စ, ဥပမာဟိ ပကာသယေ. इसके अतिरिक्त, बुद्ध उस वीर पुरुष के समान हैं जो अभय दान देता है; धर्म अभय (भयहीनता) के समान है; और संघ उस जन-समूह के समान है जिसने अभय प्राप्त कर लिया है और जो पूर्णतः सुरक्षित है। बुद्ध आश्वासन देने वाले के समान हैं; धर्म आश्वासन के समान है; और संघ उस जन-समूह के समान है जिसे आश्वासन प्राप्त हो गया है। बुद्ध एक अच्छे मित्र के समान हैं; धर्म हितकारी उपदेश के समान है; और संघ उस जन-समूह के समान है जिसने हितकारी प्रयोग से अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया है। बुद्ध धन की खान के समान हैं; धर्म धन के सार के समान है; और संघ उस जन-समूह के समान है जो उस धन के सार का उपभोग करता है। बुद्ध राजकुमार को स्नान कराने वाले के समान हैं; धर्म सिर धोने के जल के समान है; और संघ सद्धर्म रूपी जल से भली-भाँति स्नान किए हुए उन राजकुमारों के समूह के समान है जिन्होंने सिर से स्नान किया है। बुद्ध अलंकार (आभूषण) पहनाने वाले के समान हैं; धर्म अलंकार के समान है; और संघ सद्धर्म रूपी अलंकार से अलंकृत राजकुमारों के समूह के समान है। बुद्ध चंदन के वृक्ष के समान हैं; धर्म उससे उत्पन्न सुगंध के समान है; और संघ उस जन-समूह के समान है जिसकी जलन चंदन के उपयोग से शांत हो गई है, अर्थात् सद्धर्म के उपभोग से जिसकी क्लेशों की जलन शांत हो गई है। बुद्ध पिता के समान हैं जो उत्तराधिकार (दायज) प्रदान करते हैं; धर्म उत्तराधिकार के समान है; और संघ उन पुत्रों के समूह के समान है जो उत्तराधिकार प्राप्त करते हैं, अर्थात् सद्धर्म रूपी उत्तराधिकार को ग्रहण करने वाले हैं। बुद्ध खिले हुए कमल के समान हैं; धर्म उससे उत्पन्न मकरंद (शहद) के समान है; और संघ उस मकरंद का उपभोग करने वाले भ्रमरों (भौरों) के समूह के समान है। इस प्रकार, इन तीन रत्नों को उपमाओं के माध्यम से प्रकाशित करना चाहिए। ဧတ္တာဝတာ စ ယာ ပုဗ္ဗေ ‘‘ကေန ကတ္ထ ကဒါ ကသ္မာ, ဘာသိတံ သရဏတ္တယ’’န္တိအာဒီဟိ စတူဟိ ဂါထာဟိ အတ္ထဝဏ္ဏနာယ မာတိကာ နိက္ခိတ္တာ, သာ အတ္ထတော ပကာသိတာ ဟောတီတိ. इतने मात्र से, पहले 'किसके द्वारा, कहाँ, कब और किसलिए तीन शरणों को कहा गया' इत्यादि चार गाथाओं के माध्यम से अर्थ-वर्णन के लिए जो मातृका (रूपरेखा) रखी गई थी, वह अर्थ के अनुसार प्रकाशित हो गई है। ပရမတ္ထဇောတိကာယ ခုဒ္ဒကပါဌ-အဋ္ဌကထာယ परमत्थजोतिका नामक खुद्दकपाठ-अट्ठकथा में သရဏတ္တယဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. शरण-त्रय वर्णन समाप्त हुआ। ၂. သိက္ခာပဒဝဏ္ဏနာ २. शिक्षापद वर्णन သိက္ခာပဒပါဌမာတိကာ शिक्षापद-पाठ की मातृका ဧဝံ သရဏဂမနေဟိ သာသနောတာရံ ဒဿေတွာ သာသနံ ဩတိဏ္ဏေန ဥပါသကေန ဝါ ပဗ္ဗဇိတေန ဝါ ယေသု သိက္ခာပဒေသု ပဌမံ သိက္ခိတဗ္ဗံ, တာနိ ဒဿေတုံ နိက္ခိတ္တဿ သိက္ခာပဒပါဌဿ ဣဒါနိ ဝဏ္ဏနတ္ထံ အယံ မာတိကာ – इस प्रकार शरण-गमन के माध्यम से शासन (बुद्ध-शासन) में प्रवेश को दिखाकर, अब शासन में प्रविष्ट हुए उपासक या प्रव्रजित (भिक्षु) को जिन शिक्षापदों में सबसे पहले शिक्षित होना चाहिए, उन्हें दिखाने के लिए प्रस्तुत शिक्षापद-पाठ के अर्थ की व्याख्या हेतु यह मातृका है – ‘‘ယေန ယတ္ထ ယဒါ ယသ္မာ, ဝုတ္တာနေတာနိ တံ နယံ; ဝတွာ ကတွာ ဝဝတ္ထာနံ, သာဓာရဏဝိသေသတော. 'किसके द्वारा, कहाँ, कब और किसलिए ये (शिक्षापद) कहे गए, उस विधि को कहकर और साधारण (सामान्य) तथा विशेष के आधार पर उनका निर्धारण करके। ‘‘ပကတိယာ စ ယံ ဝဇ္ဇံ, ဝဇ္ဇံ ပဏ္ဏတ္တိယာ စ ယံ; ဝဝတ္ထပေတွာ တံ ကတွာ, ပဒါနံ ဗျဉ္ဇနတ္ထတော. जो प्राकृतिक दोष (लोक-वज्र) है और जो प्रज्ञप्ति दोष (प्रज्ञप्ति-वज्र) है; उसे निर्धारित करके और पदों के व्यंजन (शब्द) तथा अर्थ के अनुसार। ‘‘သာဓာရဏာနံ သဗ္ဗေသံ, သာဓာရဏဝိဘာဝနံ; အထ ပဉ္စသု ပုဗ္ဗေသု, ဝိသေသတ္ထပ္ပကာသတော. सभी के लिए जो साधारण (सामान्य) है, उसका स्पष्टीकरण; फिर पहले के पाँच (शिक्षापदों) में विशेष अर्थ के प्रकाशन के माध्यम से। ‘‘ပါဏာတိပါတပဘုတိ-ဟေကတာနာနတာဒိတော; အာရမ္မဏာဒါနဘေဒါ, မဟာသာဝဇ္ဇတော တထာ. प्राणातिपात (जीव-हत्या) आदि के संबंध में एकता और नानात्व (विविधता) आदि के द्वारा; आलंबन, ग्रहण और भेद (भंग) के आधार पर, तथा महा-सावद्य (बड़े दोष) होने के आधार पर। ‘‘ပယောဂင်္ဂသမုဋ္ဌာနာ, ဝေဒနာမူလကမ္မတော; ဝိရမတော စ ဖလတော, ဝိညာတဗ္ဗော ဝိနိစ္ဆယော. प्रयोग (प्रयत्न), अंग, समुत्थान; वेदना, मूल और कर्म के आधार पर; तथा विरति और फल के आधार पर निश्चय (निर्णय) जानना चाहिए। ‘‘ယောဇေတဗ္ဗံ [Pg.14] တတော ယုတ္တံ, ပစ္ဆိမေသွပိ ပဉ္စသု; အာဝေဏိကဉ္စ ဝတ္တဗ္ဗံ, ဉေယျာ ဟီနာဒိတာပိ စာ’’တိ. उसके बाद बाद के पाँच (शिक्षापदों) में भी जो उचित हो उसे जोड़ना चाहिए; उनके विशिष्ट गुणों को कहना चाहिए, और हीनता आदि की अवस्था को भी जानना चाहिए।' – यह मातृका है। တတ္ထ ဧတာနိ ပါဏာတိပါတာဝေရမဏီတိအာဒီနိ ဒသ သိက္ခာပဒါနိ ဘဂဝတာ ဧဝ ဝုတ္တာနိ, န သာဝကာဒီဟိ. တာနိ စ သာဝတ္ထိယံ ဝုတ္တာနိ ဇေတဝနေ အနာထပိဏ္ဍိကဿ အာရာမေ အာယသ္မန္တံ ရာဟုလံ ပဗ္ဗာဇေတွာ ကပိလဝတ္ထုတော သာဝတ္ထိံ အနုပ္ပတ္တေန သာမဏေရာနံ သိက္ခာပဒဝဝတ္ထာပနတ္ထံ. ဝုတ္တံ ဟေတံ – वहाँ, 'प्राणातिपात से विरति' इत्यादि ये दस शिक्षापद भगवान बुद्ध द्वारा ही कहे गए हैं, श्रावकों (शिष्यों) आदि के द्वारा नहीं। और वे श्रावस्ती में, अनाथपिंडिक के आराम (विहार) जेतवन में, आयुष्मान राहुल को कपिलवस्तु से लाकर प्रव्रजित करने के बाद श्रावस्ती पहुँचे हुए भगवान द्वारा श्रामणेरों के लिए शिक्षापदों के निर्धारण हेतु कहे गए थे। क्योंकि ऐसा कहा गया है – ‘‘အထ ခေါ ဘဂဝါ ကပိလဝတ္ထုသ္မိံ ယထာဘိရန္တံ ဝိဟရိတွာ ယေန သာဝတ္ထိ တေန စာရိကံ ပက္ကာမိ. အနုပုဗ္ဗေန စာရိကံ စရမာနော ယေန သာဝတ္ထိ တဒဝသရိ. တတြ သုဒံ ဘဂဝါ သာဝတ္ထိယံ ဝိဟရတိ ဇေတဝနေ အနာထပိဏ္ဍိကဿ အာရာမေ. တေန ခေါ ပန သမယေန …ပေ… အထ ခေါ သာမဏေရာနံ ဧတဒဟောသိ – ‘ကတိ နု ခေါ အမှာကံ သိက္ခာပဒါနိ, ကတ္ထ စ အမှေဟိ သိက္ခိတဗ္ဗ’’’န္တိ. ဘဂဝတော ဧတမတ္ထံ အာရောစေသုံ – ‘‘အနုဇာနာမိ, ဘိက္ခဝေ, သာမဏေရာနံ ဒသ သိက္ခာပဒါနိ, တေသု စ သာမဏေရေဟိ သိက္ခိတုံ, ပါဏာတိပါတာဝေရမဏီ…ပေ… ဇာတရူပရဇတပဋိဂ္ဂဟဏာ ဝေရမဏီ’’တိ (မဟာဝ. ၁၀၅). 'तब भगवान कपिलवस्तु में यथाभिरुचि विहार करके जहाँ श्रावस्ती थी, उस ओर चारिका (यात्रा) पर निकल पड़े। क्रमशः चारिका करते हुए वे श्रावस्ती पहुँचे। वहाँ भगवान श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे। उस समय... तब श्रामणेरों को यह विचार आया – 'हमारे कितने शिक्षापद हैं और हमें किसमें शिक्षित होना चाहिए?' उन्होंने भगवान को यह बात बताई। (भगवान ने कहा –) 'भिक्षुओं, मैं श्रामणेरों के लिए दस शिक्षापदों की अनुमति देता हूँ, और श्रामणेरों को उनमें शिक्षित होने की अनुमति देता हूँ: प्राणातिपात से विरति... (पे)... जातरूप-रजत (सोना-चाँदी) ग्रहण करने से विरति।' တာနေတာနိ ‘‘သမာဒါယ သိက္ခတိ သိက္ခာပဒေသူ’’တိ (ဒီ. နိ. ၁.၁၉၃; မ. နိ. ၂.၂၄; ဝိဘ. ၅၀၈) သုတ္တာနုသာရေန သရဏဂမနေသု စ ဒဿိတပါဌာနုသာရေန ‘‘ပါဏာတိပါတာ ဝေရမဏိသိက္ခာပဒံ သမာဒိယာမီ’’တိ ဧဝံ ဝါစနာမဂ္ဂံ အာရောပိတာနီတိ ဝေဒိတဗ္ဗာနိ. ဧဝံ တာဝ ‘‘ယေန ယတ္ထ ယဒါ ယသ္မာ, ဝုတ္တာနေတာနိ တံ နယံ ဝတွာ’’တိ သော နယော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. इन शिक्षापदों को 'शिक्षापदों में समादान कर शिक्षा ग्रहण करता है' इस सूत्र के अनुसार और शरण-गमन में दिखाए गए पाठ के अनुसार 'मैं प्राणातिपात से विरति के शिक्षापद को ग्रहण करता हूँ' इस प्रकार वाचना-मार्ग (पाठ की विधि) में स्थापित किया गया है, ऐसा समझना चाहिए। इस प्रकार पहले 'किसके द्वारा, कहाँ, कब, किसलिए ये कहे गए, उस विधि को कहकर' – इस विधि को देखना चाहिए। သာဓာရဏဝိသေသဝဝတ္ထာနံ साधारण और विशेष का निर्धारण ဧတ္ထ စ အာဒိတော ဒွေ စတုတ္ထပဉ္စမာနိ ဥပါသကာနံ သာမဏေရာနဉ္စ သာဓာရဏာနိ နိစ္စသီလဝသေန. ဥပေါသထသီလဝသေန ပန ဥပါသကာနံ သတ္တမဋ္ဌမံ စေကံ အင်္ဂံ ကတွာ သဗ္ဗပစ္ဆိမဝဇ္ဇာနိ သဗ္ဗာနိပိ သာမဏေရေဟိ သာဓာရဏာနိ, ပစ္ဆိမံ ပန သာမဏေရာနမေဝ ဝိသေသဘူတန္တိ ဧဝံ သာဓာရဏဝိသေသတော ဝဝတ္ထာနံ ကာတဗ္ဗံ. ပုရိမာနိ စေတ္ထ ပဉ္စ ဧကန္တအကုသလစိတ္တသမုဋ္ဌာနတ္တာ ပါဏာတိပါတာဒီနံ ပကတိဝဇ္ဇတော ဝေရမဏိယာ, သေသာနိ [Pg.15] ပဏ္ဏတ္တိဝဇ္ဇတောတိ ဧဝံ ပကတိယာ စ ယံ ဝဇ္ဇံ, ဝဇ္ဇံ ပဏ္ဏတ္တိယာ စ ယံ, တံ ဝဝတ္ထပေတဗ္ဗံ. और यहाँ, प्रारंभ से दो (पहला और दूसरा) तथा चौथा और पाँचवाँ, नित्य-शील के रूप में उपासकों और श्रामणेरों के लिए साधारण (समान) हैं। किंतु उपोसथ-शील के रूप में, उपासकों के लिए सातवें और आठवें को एक अंग बनाकर, सबसे अंतिम (दसवें) को छोड़कर शेष सभी श्रामणेरों के साथ साधारण हैं, परंतु अंतिम शिक्षापद केवल श्रामणेरों के लिए ही विशेष है। इस प्रकार साधारण और विशेष के आधार पर निर्धारण करना चाहिए। और यहाँ पहले पाँच शिक्षापद एकांततः अकुशल चित्त से उत्पन्न होने के कारण प्राणातिपात आदि के प्राकृतिक दोष (लोक-वज्र) होने से विरति रूप हैं, और शेष प्रज्ञप्ति दोष (प्रज्ञप्ति-वज्र) के कारण हैं। इस प्रकार जो प्राकृतिक दोष है और जो प्रज्ञप्ति दोष है, उसे निर्धारित करना चाहिए। သာဓာရဏဝိဘာဝနာ साधारण स्पष्टीकरण ယသ္မာ စေတ္ထ ‘‘ဝေရမဏိသိက္ခာပဒံ သမာဒိယာမီ’’တိ ဧတာနိ သဗ္ဗသာဓာရဏာနိ ပဒါနိ, တသ္မာ ဧတေသံ ပဒါနံ ဗျဉ္ဇနတော စ အတ္ထတော စ အယံ သာဓာရဏဝိဘာဝနာ ဝေဒိတဗ္ဗာ – चूँकि यहाँ 'विरति के शिक्षापद को ग्रहण करता हूँ' ये पद सभी के लिए साधारण (समान) हैं, इसलिए इन पदों के व्यंजन (शब्द) और अर्थ के अनुसार यह साधारण स्पष्टीकरण जानना चाहिए – တတ္ထ ဗျဉ္ဇနတော တာဝ ဝေရံ မဏတီတိ ဝေရမဏီ, ဝေရံ ပဇဟတိ, ဝိနောဒေတိ, ဗျန္တီကရောတိ, အနဘာဝံ ဂမေတီတိ အတ္ထော. ဝိရမတိ ဝါ ဧတာယ ကရဏဘူတာယ ဝေရမှာ ပုဂ္ဂလောတိ, ဝိကာရဿ ဝေကာရံ ကတွာ ဝေရမဏီ. တေနေဝ စေတ္ထ ‘‘ဝေရမဏိသိက္ခာပဒံ ဝိရမဏိသိက္ခာပဒ’’န္တိ ဒွိဓာ သဇ္ဈာယံ ကရောန္တိ. သိက္ခိတဗ္ဗာတိ သိက္ခာ, ပဇ္ဇတေ အနေနာတိ ပဒံ. သိက္ခာယ ပဒံ သိက္ခာပဒံ, သိက္ခာယ အဓိဂမူပါယောတိ အတ္ထော. အထ ဝါ မူလံ နိဿယော ပတိဋ္ဌာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဝေရမဏီ ဧဝ သိက္ခာပဒံ ဝေရမဏိသိက္ခာပဒံ, ဝိရမဏိသိက္ခာပဒံ ဝါ ဒုတိယေန နယေန. သမ္မာ အာဒိယာမိ သမာဒိယာမိ, အဝီတိက္ကမနာဓိပ္ပာယေန အခဏ္ဍကာရိတာယ အစ္ဆိဒ္ဒကာရိတာယ အသဗလကာရိတာယ စ အာဒိယာမီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. वहाँ शब्द-व्युत्पत्ति के अनुसार, पहले इस प्रकार समझना चाहिए: जो शिक्षापद 'वेर' (अकुशल रूपी शत्रु) को दूर करता है, वह 'वेरमणी' है। इसका अर्थ है—जो वेर का त्याग करता है, उसे हटाता है, नष्ट करता है और उसे अस्तित्वहीन कर देता है। अथवा, जिसके द्वारा (करणभूत) पुद्गल वेर से विरत होता है, वह 'वेरमणी' है (यहाँ 'वि' के स्थान पर 'वे' आदेश हुआ है)। इसी कारण यहाँ 'वेरमणीसिक्खापदं' और 'विरमणीसिक्खापदं'—इन दो रूपों में पाठ किया जाता है। जो सीखने योग्य है, वह 'सिक्खा' है; जिसके द्वारा पहुँचा जाता है, वह 'पद' है। सिक्खा का पद 'सिक्खापद' है, जिसका अर्थ है—सिक्खा की प्राप्ति का उपाय। अथवा, इसका अर्थ मूल, आश्रय या प्रतिष्ठा है। 'वेरमणी' ही 'सिक्खापद' है, यह 'वेरमणीसिक्खापदं' है; अथवा दूसरे नय के अनुसार 'विरमणीसिक्खापदं' है। 'सम्मा आदियामि' (भली-भाँति ग्रहण करता हूँ) का अर्थ 'समादियामि' है। इसका तात्पर्य है—अतिक्रमण न करने के अभिप्राय से, अखंड, अछिद्र और अशबल (बिना किसी दोष के) रूप में ग्रहण करना। အတ္ထတော ပန ဝေရမဏီတိ ကာမာဝစရကုသလစိတ္တသမ္ပယုတ္တာ ဝိရတိ, သာ ပါဏာတိပါတာ ဝိရမန္တဿ ‘‘ယာ တသ္မိံ သမယေ ပါဏာတိပါတာ အာရတိ ဝိရတိ ပဋိဝိရတိ ဝေရမဏီ အကိရိယာ အကရဏံ အနဇ္ဈာပတ္တိ ဝေလာအနတိက္ကမော သေတုဃာတော’’တိ ဧဝမာဒိနာ (ဝိဘ. ၇၀၄) နယေန ဝိဘင်္ဂေ ဝုတ္တာ. ကာမဉ္စေသာ ဝေရမဏီ နာမ လောကုတ္တရာပိ အတ္ထိ, ဣဓ ပန သမာဒိယာမီတိ ဝုတ္တတ္တာ သမာဒါနဝသေန ပဝတ္တာရဟာ, တသ္မာ သာ န ဟောတီတိ ကာမာဝစရကုသလစိတ္တသမ္ပယုတ္တာ ဝိရတီတိ ဝုတ္တာ. अर्थ के अनुसार, 'वेरमणी' कामावचर कुशल चित्त से सम्प्रयुक्त 'विरति' (विरति चैतसिक) है। वह प्राणातिपात से विरत होने वाले व्यक्ति की विरति है, जिसे विभंग में इस प्रकार कहा गया है—'उस समय प्राणातिपात से जो आरति, विरति, प्रतिविरति, वेरमणी, अक्रिया, अकरण, अनध्यापत्ति, मर्यादा का उल्लंघन न करना और सेतुघात (पाप के मार्ग को तोड़ना) है'। यद्यपि यह वेरमणी लोकोत्तर भी होती है, किन्तु यहाँ 'समादियामि' (मैं ग्रहण करता हूँ) कहे जाने के कारण, यह समादान (ग्रहण करने) के वश में होने वाली विरति है। इसलिए यहाँ लोकोत्तर विरति नहीं ली गई है, बल्कि कामावचर कुशल चित्त से सम्प्रयुक्त विरति ही कही गई है। သိက္ခာတိ တိဿော သိက္ခာ အဓိသီလသိက္ခာ, အဓိစိတ္တသိက္ခာ, အဓိပညာသိက္ခာတိ. ဣမသ္မိံ ပနတ္ထေ သမ္ပတ္တဝိရတိသီလံ လောကိကာ ဝိပဿနာ ရူပါရူပဈာနာနိ အရိယမဂ္ဂေါ စ သိက္ခာတိ အဓိပ္ပေတာ. ယထာဟ – सिक्खा तीन हैं—अधिशील-सिक्खा, अधिचित्त-सिक्खा और अधिपज्ञा-सिक्खा। यहाँ इस अर्थ में संपत्त-विरति-शील, लौकिक विपश्यना, रूपावचर और अरूपावचर ध्यान तथा आर्यमार्ग को 'सिक्खा' के रूप में अभिप्रेत किया गया है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘ကတမေ ဓမ္မာ သိက္ခာ? ယသ္မိံ သမယေ ကာမာဝစရံ ကုသလံ စိတ္တံ ဥပ္ပန္နံ ဟောတိ, သောမနဿသဟဂတံ ဉာဏသမ္ပယုတ္တံ…ပေ… တသ္မိံ သမယေ [Pg.16] ဖဿော ဟောတိ…ပေ… အဝိက္ခေပေါ ဟောတိ, ဣမေ ဓမ္မာ သိက္ခာ. ''सिक्खा धर्म कौन से हैं? जिस समय कामावचर कुशल चित्त उत्पन्न होता है, जो सौमनस्य-सहगत और ज्ञान-सम्प्रयुक्त होता है... उस समय जो स्पर्श होता है... जो अविक्षेप (एकाग्रता) होता है, ये धर्म सिक्खा हैं। ‘‘ကတမေ ဓမ္မာ သိက္ခာ? ယသ္မိံ သမယေ ရူပူပပတ္တိယာ မဂ္ဂံ ဘာဝေတိ ဝိဝိစ္စေဝ ကာမေဟိ ဝိဝိစ္စ အကုသလေဟိ ဓမ္မေဟိ…ပေ… ပဌမံ ဈာနံ…ပေ… ပဉ္စမံ ဈာနံ ဥပသမ္ပဇ္ဇ ဝိဟရတိ…ပေ… အဝိက္ခေပေါ ဟောတိ, ဣမေ ဓမ္မာ သိက္ခာ. ''सिक्खा धर्म कौन से हैं? जिस समय रूपावचर भूमि में उत्पन्न होने के लिए मार्ग की भावना करता है, काम-भोगों से विविक्त होकर, अकुशल धर्मों से विविक्त होकर... प्रथम ध्यान... पंचम ध्यान को प्राप्त कर विहार करता है... जो अविक्षेप होता है, ये धर्म सिक्खा हैं। ‘‘ကတမေ ဓမ္မာ သိက္ခာ? ယသ္မိံ သမယေ အရူပပတ္တိယာ…ပေ… နေဝသညာနာသညာယတနသဟဂတံ…ပေ… အဝိက္ခေပေါ ဟောတိ, ဣမေ ဓမ္မာ သိက္ခာ. ''सिक्खा धर्म कौन से हैं? जिस समय अरूपावचर भूमि में उत्पन्न होने के लिए... नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन-सहगत... जो अविक्षेप होता है, ये धर्म सिक्खा हैं। ‘‘ကတမေ ဓမ္မာ သိက္ခာ? ယသ္မိံ သမယေ လောကုတ္တရံ ဈာနံ ဘာဝေတိ နိယျာနိကံ…ပေ… အဝိက္ခေပေါ ဟောတိ, ဣမေ ဓမ္မာ သိက္ခာ’’တိ (ဝိဘ. ၇၁၂-၇၁၃). ''सिक्खा धर्म कौन से हैं? जिस समय लोकोत्तर ध्यान की भावना करता है, जो निर्याणिक (मुक्तिगामी) है... जो अविक्षेप होता है, ये धर्म सिक्खा हैं'' (विभंग)। ဧတာသု သိက္ခာသု ယာယ ကာယစိ သိက္ခာယ ပဒံ အဓိဂမူပါယော, အထ ဝါ မူလံ နိဿယော ပတိဋ္ဌာတိ သိက္ခာပဒံ. ဝုတ္တဉှေတံ – ‘‘သီလံ နိဿာယ သီလေ ပတိဋ္ဌာယ သတ္တ ဗောဇ္ဈင်္ဂေ ဘာဝေန္တော ဗဟုလီကရောန္တော’’တိ ဧဝမာဒိ (သံ. နိ. ၅.၁၈၂). ဧဝမေတ္ထ သာဓာရဏာနံ ပဒါနံ သာဓာရဏာ ဗျဉ္ဇနတော အတ္ထတော စ ဝိဘာဝနာ ကာတဗ္ဗာ. इन सिक्खाओं में से किसी भी सिक्खा की प्राप्ति का जो उपाय है, अथवा जो मूल, आश्रय या प्रतिष्ठा है, वह 'सिक्खापद' है। यह कहा भी गया है—'शील के आश्रित होकर, शील में प्रतिष्ठित होकर सात बोध्यंगों की भावना करते हुए और उनका बहुलीकरण करते हुए' इत्यादि। इस प्रकार यहाँ साधारण पदों की शब्द और अर्थ के अनुसार व्याख्या समझनी चाहिए। ပုရိမပဉ္စသိက္ခာပဒဝဏ္ဏနာ प्रथम पाँच शिक्षापदों की व्याख्या ဣဒါနိ ယံ ဝုတ္တံ – ‘‘အထ ပဉ္စသု ပုဗ္ဗေသု, ဝိသေသတ္ထပ္ပကာသတော…ပေ… ဝိညာတဗ္ဗော ဝိနိစ္ဆယော’’တိ, တတ္ထေတံ ဝုစ္စတိ – ပါဏာတိပါတောတိ ဧတ္ထ တာဝ ပါဏောတိ ဇီဝိတိန္ဒြိယပ္ပဋိဗဒ္ဓါ ခန္ဓသန္တတိ, တံ ဝါ ဥပါဒါယ ပညတ္တော သတ္တော. တသ္မိံ ပန ပါဏေ ပါဏသညိနော တဿ ပါဏဿ ဇီဝိတိန္ဒြိယုပစ္ဆေဒကဥပက္ကမသမုဋ္ဌာပိကာ ကာယဝစီဒွါရာနံ အညတရဒွါရပ္ပဝတ္တာ ဝဓကစေတနာ ပါဏာတိပါတော. အဒိန္နာဒါနန္တိ ဧတ္ထ အဒိန္နန္တိ ပရပရိဂ္ဂဟိတံ, ယတ္ထ ပရော ယထာကာမကာရိတံ အာပဇ္ဇန္တော အဒဏ္ဍာရဟော အနုပဝဇ္ဇော စ ဟောတိ, တသ္မိံ ပရပရိဂ္ဂဟိတေ ပရပရိဂ္ဂဟိတသညိနော တဒါဒါယကဥပက္ကမသမုဋ္ဌာပိကာ ကာယဝစီဒွါရာနံ အညတရဒွါရပ္ပဝတ္တာ ဧဝ ထေယျစေတနာ အဒိန္နာဒါနံ. အဗြဟ္မစရိယန္တိ အသေဋ္ဌစရိယံ, ဒွယံဒွယသမာပတ္တိမေထုနပ္ပဋိသေဝနာ ကာယဒွါရပ္ပဝတ္တာ အသဒ္ဓမ္မပ္ပဋိသေဝနဋ္ဌာနဝီတိက္ကမစေတနာ အဗြဟ္မစရိယံ[Pg.17]. မုသာဝါဒေါတိ ဧတ္ထ မုသာတိ ဝိသံဝါဒနပုရေက္ခာရဿ အတ္ထဘဉ္ဇနကော ဝစီပယောဂေါ ကာယပယောဂေါ ဝါ, ဝိသံဝါဒနာဓိပ္ပာယေန ပနဿ ပရဝိသံဝါဒကကာယဝစီပယောဂသမုဋ္ဌာပိကာ ကာယဝစီဒွါရာနမေဝ အညတရဒွါရပ္ပဝတ္တာ မိစ္ဆာစေတနာ မုသာဝါဒေါ. သုရာမေရယမဇ္ဇပမာဒဋ္ဌာနန္တိ ဧတ္ထ ပန သုရာတိ ပဉ္စ သုရာ – ပိဋ္ဌသုရာ, ပူဝသုရာ, ဩဒနသုရာ, ကိဏ္ဏပက္ခိတ္တာ, သမ္ဘာရသံယုတ္တာ စာတိ. မေရယမ္ပိ ပုပ္ဖာသဝေါ, ဖလာသဝေါ, ဂုဠာသဝေါ, မဓွာသဝေါ, သမ္ဘာရသံယုတ္တော စာတိ ပဉ္စဝိဓံ. မဇ္ဇန္တိ တဒုဘယမေဝ မဒနိယဋ္ဌေန မဇ္ဇံ, ယံ ဝါ ပနညမ္ပိ ကိဉ္စိ အတ္ထိ မဒနိယံ, ယေန ပီတေန မတ္တော ဟောတိ ပမတ္တော, ဣဒံ ဝုစ္စတိ မဇ္ဇံ. ပမာဒဋ္ဌာနန္တိ ယာယ စေတနာယ တံ ပိဝတိ အဇ္ဈောဟရတိ, သာ စေတနာ မဒပ္ပမာဒဟေတုတော ပမာဒဋ္ဌာနန္တိ ဝုစ္စတိ, ယတော အဇ္ဈောဟရဏာဓိပ္ပာယေန ကာယဒွါရပ္ပဝတ္တာ သုရာမေရယမဇ္ဇာနံ အဇ္ဈောဟရဏစေတနာ ‘‘သုရာမေရယမဇ္ဇပမာဒဋ္ဌာန’’န္တိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ဧဝံ တာဝေတ္ထ ပါဏာတိပါတပ္ပဘုတီဟိ ဝိညာတဗ္ဗော ဝိနိစ္ဆယော. अब जो कहा गया था—'इसके बाद पहले के पाँच शिक्षापदों में, विशेष अर्थ के प्रकाशन से... निर्णय समझना चाहिए', उसके विषय में यह कहा जाता है—'प्राणातिपातो' यहाँ 'प्राण' का अर्थ है—जीवितेन्द्रिय से सम्बद्ध स्कंध-संतति, अथवा उसे उपादान बनाकर प्रज्ञप्त किया गया 'सत्व'। उस प्राणी के विषय में 'यह प्राणी है' ऐसी संज्ञा रखते हुए, उस प्राणी के जीवितेन्द्रिय का उच्छेद करने वाले उपक्रम (प्रयत्न) को समुत्थित करने वाली, काय-द्वार या वाक्-द्वार में से किसी एक द्वार से प्रवृत्त होने वाली 'वधक-चेतना' (मारने की इच्छा) 'प्राणातिपात' है। 'अदिन्नादानं' यहाँ 'अदिन्न' का अर्थ है—दूसरे के अधिकार की वस्तु (पर-परिगृहीत), जहाँ दूसरा व्यक्ति अपनी इच्छानुसार उसका उपयोग करने का अधिकारी हो और वह दंड के योग्य न हो तथा दोषरहित हो। उस पर-परिगृहीत वस्तु में 'यह दूसरे की वस्तु है' ऐसी संज्ञा रखते हुए, उसे लेने के उपक्रम को समुत्थित करने वाली, काय-द्वार या वाक्-द्वार में से किसी एक द्वार से प्रवृत्त होने वाली 'स्तेय-चेतना' (चोरी की नीयत) ही 'अदिन्नादान' है। 'अब्रह्मचरियं' का अर्थ है—अश्रेष्ठ आचरण; दो व्यक्तियों के समागम से होने वाला मैथुन-सेवन, जो काय-द्वार से प्रवृत्त होने वाली असद्धर्म-सेवन रूपी अतिक्रमण की चेतना है, वह 'अब्रह्मचर्य' है। 'मुसावादो' यहाँ 'मुसा' (मृषा) का अर्थ है—धोखा देने के उद्देश्य से दूसरे के हित का नाश करने वाला वाक्-प्रयोग या काय-प्रयोग। धोखा देने के अभिप्राय से, दूसरे को विसंवादित (गुमराह) करने वाले काय-वाक् प्रयोग को समुत्थित करने वाली, काय-वाक् द्वारों में से किसी एक द्वार से प्रवृत्त होने वाली मिथ्या-चेतना 'मृषावाद' है। 'सुरामेरयमज्जपमादट्ठानं' यहाँ 'सुरा' पाँच प्रकार की है—पिष्ट-सुरा (आटे से बनी), पूव-सुरा (पकवान से बनी), ओदन-सुरा (भात से बनी), किण्ण-पक्खित्ता (खमीर डालकर बनी) और सम्भार-संयुत्ता (मसालों के मिश्रण से बनी)। 'मेरय' भी पाँच प्रकार का है—पुष्पासव (फूलों का रस), फलासव (फलों का रस), गुड़ासव (गुड़ का रस), मध्वासव (महुए का रस) और सम्भार-संयुत्त (मिश्रण से बना)। 'मज्ज' (मद्य) का अर्थ है—वे दोनों ही (सुरा और मेरय) मद उत्पन्न करने के कारण 'मद्य' कहलाते हैं। अथवा जो कुछ भी अन्य मदकारी वस्तु है, जिसके पीने से व्यक्ति मत्त और प्रमत्त (असावधान) हो जाता है, उसे 'मद्य' कहा जाता है। 'पमादट्ठानं' (प्रमाद का स्थान) का अर्थ है—जिस चेतना से व्यक्ति उसे पीता है या निगलता है, वह चेतना मद और प्रमाद का हेतु होने के कारण 'प्रमाद-स्थान' कहलाती है। अतः निगलने के अभिप्राय से काय-द्वार को प्राप्त सुरा, मेरय और मद्य को निगलने की जो चेतना है, उसे 'सुरा-मेरय-मज्ज-पमादट्ठानं' समझना चाहिए। इस प्रकार यहाँ प्राणातिपात आदि के विषय में निर्णय समझना चाहिए। ဧကတာနာနတာဒိဝိနိစ္ဆယံ एकता-नानात्व आदि का निर्णय ဧကတာနာနတာဒိတောတိ ဧတ္ထ အာဟ – ကိံ ပန ဝဇ္ဈဝဓကပ္ပယောဂစေတနာဒီနံ ဧကတာယ ပါဏာတိပါတဿ အညဿ ဝါ အဒိန္နာဒါနာဒိနော ဧကတ္တံ, နာနတာယ နာနတ္တံ ဟောတိ, ဥဒါဟု နောတိ. ကသ္မာ ပနေတံ ဝုစ္စတိ? ယဒိ တာဝ ဧကတာယ ဧကတ္တံ, အထ ယဒါ ဧကံ ဝဇ္ဈံ ဗဟူ ဝဓကာ ဝဓေန္တိ, ဧကော ဝါ ဝဓကော ဗဟုကေ ဝဇ္ဈေ ဝဓေတိ, ဧကေန ဝါ သာဟတ္ထိကာဒိနာ ပယောဂေန ဗဟူ ဝဇ္ဈာ ဝဓီယန္တိ, ဧကာ ဝါ စေတနာ ဗဟူနံ ဝဇ္ဈာနံ ဇီဝိတိန္ဒြိယုပစ္ဆေဒကပယောဂံ သမုဋ္ဌာပေတိ, တဒါ ဧကေန ပါဏာတိပါတေန ဘဝိတဗ္ဗံ. ယဒိ ပန နာနတာယ နာနတ္တံ. အထ ယဒါ ဧကော ဝဓကော ဧကဿတ္ထာယ ဧကံ ပယောဂံ ကရောန္တော ဗဟူ ဝဇ္ဈေ ဝဓေတိ, ဗဟူ ဝါ ဝဓကာ ဒေဝဒတ္တယညဒတ္တသောမဒတ္တာဒီနံ ဗဟူနမတ္ထာယ ဗဟူ ပယောဂေ ကရောန္တာ ဧကမေဝ ဒေဝဒတ္တံ ယညဒတ္တံ သောမဒတ္တံ ဝါ ဝဓေန္တိ, ဗဟူဟိ ဝါ သာဟတ္ထိကာဒီဟိ ပယောဂေဟိ ဧကော ဝဇ္ဈော ဝဓီယတိ. ဗဟူ ဝါ စေတနာ ဧကဿေဝ ဝဇ္ဈဿ ဇီဝိတိန္ဒြိယုပစ္ဆေဒကပယောဂံ သမုဋ္ဌာပေန္တိ, တဒါ ဗဟူဟိ ပါဏာတိပါတေဟိ ဘဝိတဗ္ဗံ. ဥဘယမ္ပိ စေတမယုတ္တံ. အထ နေဝ ဧတေသံ ဝဇ္ဈာဒီနံ ဧကတာယ ဧကတ္တံ, နာနတာယ နာနတ္တံ, အညထေဝ တု ဧကတ္တံ နာနတ္တဉ္စ ဟောတိ, တံ ဝတ္တဗ္ဗံ ပါဏာတိပါတဿ, ဧဝံ သေသာနမ္ပီတိ. एकता-नानात्व आदि के विषय में यहाँ कहा गया है - क्या वध्य, वधक, प्रयोग और चेतना आदि की एकता से प्राणातिपात या अन्य अदत्तादान आदि की एकता होती है, अथवा नानात्व से नानात्व होता है, या नहीं? यह किसलिए कहा जाता है? यदि पहले एकता से एकता मानी जाए, तो जब एक वध्य को बहुत से वधक मारते हैं, या एक वधक बहुत से वध्यों को मारता है, या एक ही स्वहस्त आदि प्रयोग से बहुत से वध्य मारे जाते हैं, या एक ही चेतना बहुत से वध्यों के जीवितिन्द्रिय-विनाशक प्रयोग को उत्पन्न करती है, तब एक ही प्राणातिपात होना चाहिए। यदि नानात्व से नानात्व माना जाए, तो जब एक वधक एक के उद्देश्य से एक प्रयोग करते हुए बहुत से वध्यों को मारता है, या बहुत से वधक देवदत्त, यज्ञदत्त, सोमदत्त आदि बहुतों के उद्देश्य से बहुत से प्रयोग करते हुए केवल एक देवदत्त, यज्ञदत्त या सोमदत्त को मारते हैं, या बहुत से स्वहस्त आदि प्रयोगों द्वारा एक वध्य मारा जाता है, या बहुत सी चेतनाएँ एक ही वध्य के जीवितिन्द्रिय-विनाशक प्रयोग को उत्पन्न करती हैं, तब बहुत से प्राणातिपात होने चाहिए। ये दोनों ही बातें अयुक्त हैं। अतः न तो इन वध्य आदि की एकता से एकता होती है और न नानात्व से नानात्व, बल्कि अन्य प्रकार से ही एकता और नानात्व होता है; उसे प्राणातिपात के विषय में कहना चाहिए, और इसी प्रकार शेष के विषय में भी। ဝုစ္စတေ [Pg.18] – တတ္ထ တာဝ ပါဏာတိပါတဿ န ဝဇ္ဈဝဓကာဒီနံ ပစ္စေကမေကတာယ ဧကတာ, နာနတာယ နာနတာ, ကိန္တု ဝဇ္ဈဝဓကာဒီနံ ယုဂနန္ဓမေကတာယ ဧကတာ, ဒွိန္နမ္ပိ တု တေသံ, တတော အညတရဿ ဝါ နာနတာယ နာနတာ. တထာ ဟိ ဗဟူသု ဝဓကေသု ဗဟူဟိ သရက္ခေပါဒီဟိ ဧကေန ဝါ ဩပါတခဏနာဒိနာ ပယောဂေန ဗဟူ ဝဇ္ဈေ ဝဓေန္တေသုပိ ဗဟူ ပါဏာတိပါတာ ဟောန္တိ. ဧကသ္မိံ ဝဓကေ ဧကေန, ဗဟူဟိ ဝါ ပယောဂေဟိ တပ္ပယောဂသမုဋ္ဌာပိကာယ စ ဧကာယ, ဗဟူဟိ ဝါ စေတနာဟိ ဗဟူ ဝဇ္ဈေ ဝဓေန္တေပိ ဗဟူ ပါဏာတိပါတာ ဟောန္တိ, ဗဟူသု စ ဝဓကေသု ယထာဝုတ္တပ္ပကာရေဟိ ဗဟူဟိ, ဧကေန ဝါ ပယောဂေန ဧကံ ဝဇ္ဈံ ဝဓေန္တေသုပိ ဗဟူ ပါဏာတိပါတာ ဟောန္တိ. ဧသ နယော အဒိန္နာဒါနာဒီသုပီတိ. ဧဝမေတ္ထ ဧကတာနာနတာဒိတောပိ ဝိညာတဗ္ဗော ဝိနိစ္ဆယော. कहा जाता है - वहाँ प्राणातिपात के विषय में वध्य और वधक आदि की व्यक्तिगत एकता से एकता नहीं होती, और न ही नानात्व से नानात्व होता है, बल्कि वध्य और वधक इन दोनों के युगल की एकता से एकता होती है, और उन दोनों में से किसी एक के नानात्व से नानात्व होता है। जैसे कि, बहुत से वधकों द्वारा बहुत से बाण चलाने आदि से, या गड्ढा खोदने आदि के एक ही प्रयोग से बहुत से वध्यों को मारने पर भी बहुत से प्राणातिपात होते हैं। एक वधक द्वारा एक या अनेक प्रयोगों से और उस प्रयोग को उत्पन्न करने वाली एक या अनेक चेतनाओं से बहुत से वध्यों को मारने पर भी बहुत से प्राणातिपात होते हैं, और बहुत से वधकों द्वारा पूर्वोक्त प्रकार के अनेक या एक प्रयोग से एक वध्य को मारने पर भी बहुत से प्राणातिपात होते हैं। यही नियम अदत्तादान आदि में भी है। इस प्रकार यहाँ एकता-नानात्व आदि के द्वारा भी विनिश्चय समझना चाहिए। အာရမ္မဏတောတိ ပါဏာတိပါတော စေတ္ထ ဇီဝိတိန္ဒြိယာရမ္မဏော. အဒိန္နာဒါနအဗြဟ္မစရိယသုရာမေရယမဇ္ဇပမာဒဋ္ဌာနာနိ ရူပဓမ္မေသု ရူပါယတနာဒိအညတရသင်္ခါရာရမ္မဏာနိ. မုသာဝါဒေါ ယဿ မုသာ ဘဏတိ, တမာရဘိတွာ ပဝတ္တနတော သတ္တာရမ္မဏော. အဗြဟ္မစရိယမ္ပိ သတ္တာရမ္မဏန္တိ ဧကေ. အဒိန္နာဒါနဉ္စ ယဒါ သတ္တော ဟရိတဗ္ဗော ဟောတိ, တဒါ သတ္တာရမ္မဏန္တိ. အပိ စေတ္ထ သင်္ခါရဝသေနေဝ သတ္တာရမ္မဏံ, န ပဏ္ဏတ္တိဝသေနာတိ. ဧဝမေတ္ထ အာရမ္မဏတောပိ ဝိညာတဗ္ဗော ဝိနိစ္ဆယော. आलम्बन की दृष्टि से - यहाँ प्राणातिपात जीवितिन्द्रिय-आलम्बन वाला है। अदत्तादान, अब्रह्मचर्य और सुरामेरय-मज्ज-प्रमादस्थान रूप-धर्मों में रूपायातन आदि किसी एक संस्कार-आलम्बन वाले हैं। मृषावाद, जिसके प्रति झूठ बोला जाता है, उसे उद्देश्य बनाकर प्रवृत्त होने के कारण सत्त्व-आलम्बन वाला है। कुछ आचार्य कहते हैं कि अब्रह्मचर्य भी सत्त्व-आलम्बन वाला है। और अदत्तादान भी जब सत्त्व (प्राणी) को चुराना हो, तब सत्त्व-आलम्बन वाला होता है। अपितु यहाँ संस्कार के वश से ही सत्त्व आलम्बन है, प्रज्ञप्ति के वश से नहीं। इस प्रकार यहाँ आलम्बन के द्वारा भी विनिश्चय समझना चाहिए। အာဒါနတောတိ ပါဏာတိပါတာဝေရမဏိသိက္ခာပဒါဒီနိ စေတာနိ သာမဏေရေန ဘိက္ခုသန္တိကေ သမာဒိန္နာနေဝ သမာဒိန္နာနိ ဟောန္တိ, ဥပါသကေန ပန အတ္တနာ သမာဒိယန္တေနာပိ သမာဒိန္နာနိ ဟောန္တိ, ပရဿ သန္တိကေ သမာဒိယန္တေနာပိ. ဧကဇ္ဈံ သမာဒိန္နာနိပိ သမာဒိန္နာနိ ဟောန္တိ, ပစ္စေကံ သမာဒိန္နာနိပိ. ကိန္တု နာနံ ဧကဇ္ဈံ သမာဒိယတော ဧကာယေဝ ဝိရတိ, ဧကာဝ စေတနာ ဟောတိ, ကိစ္စဝသေန ပနေတာသံ ပဉ္စဝိဓတ္တံ ဝိညာယတိ. ပစ္စေကံ သမာဒိယတော ပန ပဉ္စေဝ ဝိရတိယော, ပဉ္စ စ စေတနာ ဟောန္တီတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ဧဝမေတ္ထ အာဒါနတောပိ ဝိညာတဗ္ဗော ဝိနိစ္ဆယော. आदान (ग्रहण करने) की दृष्टि से - ये प्राणातिपात-विरति आदि शिक्षापद सामणेर द्वारा भिक्षु के पास ग्रहण करने पर ही समादत्त (पूर्णतः गृहीत) होते हैं, किन्तु उपासक द्वारा स्वयं ग्रहण करने पर भी और दूसरे के पास ग्रहण करने पर भी समादत्त होते हैं। एक साथ ग्रहण किए जाने पर भी वे समादत्त होते हैं और पृथक-पृथक ग्रहण किए जाने पर भी। किन्तु विशेषता यह है कि एक साथ ग्रहण करने वाले की एक ही विरति और एक ही चेतना होती है, किन्तु कार्य के वश से उनका पाँच प्रकार का होना जाना जाता है। पृथक-पृथक ग्रहण करने वाले की पाँच ही विरतियाँ और पाँच ही चेतनाएँ होती हैं, ऐसा समझना चाहिए। इस प्रकार यहाँ आदान के द्वारा भी विनिश्चय समझना चाहिए। ဘေဒတောတိ သာမဏေရာနဉ္စေတ္ထ ဧကသ္မိံ ဘိန္နေ သဗ္ဗာနိပိ ဘိန္နာနိ ဟောန္တိ. ပါရာဇိကဋ္ဌာနိယာနိ ဟိ တာနိ တေသံ, ယံ တံ ဝီတိက္ကန္တံ ဟောတိ, တေနေဝ ကမ္မဗဒ္ဓေါ. ဂဟဋ္ဌာနံ ပန ဧကသ္မိံ ဘိန္နေ ဧကမေဝ ဘိန္နံ ဟောတိ, ယတော [Pg.19] တေသံ တံသမာဒါနေနေဝ ပုန ပဉ္စင်္ဂိကတ္တံ သီလဿ သမ္ပဇ္ဇတိ. အပရေ ပနာဟု – ‘‘ဝိသုံ ဝိသုံ သမာဒိန္နေသု ဧကသ္မိံ ဘိန္နေ ဧကမေဝ ဘိန္နံ ဟောတိ, ‘ပဉ္စင်္ဂသမန္နာဂတံ သီလံ သမာဒိယာမီ’တိ ဧဝံ ပန ဧကတော သမာဒိန္နေသု ဧကသ္မိံ ဘိန္နေ သေသာနိပိ သဗ္ဗာနိ ဘိန္နာနိ ဟောန္တိ. ကသ္မာ? သမာဒိန္နဿ အဘိန္နတ္တာ, ယံ တံ ဝီတိက္ကန္တံ, တေနေဝ ကမ္မဗဒ္ဓေါ’’တိ. ဧဝမေတ္ထ ဘေဒတောပိ ဝိညာတဗ္ဗော ဝိနိစ္ဆယော. भेद (खंडित होने) की दृष्टि से - यहाँ सामणेरों का एक शिक्षापद खंडित होने पर सभी खंडित हो जाते हैं। क्योंकि उनके लिए वे पाराजिक के समान हैं; जो भी उल्लंघन किया जाता है, उसी से वह कर्म-बद्ध हो जाता है। गृहस्थों का तो एक खंडित होने पर एक ही खंडित होता है, क्योंकि उनके लिए उसे पुनः ग्रहण करने मात्र से शील की पंच-अंगता सिद्ध हो जाती है। अन्य आचार्य कहते हैं - 'पृथक-पृथक ग्रहण किए जाने पर एक के खंडित होने पर एक ही खंडित होता है, किन्तु 'मैं पांच अंगों से युक्त शील को ग्रहण करता हूँ' इस प्रकार एक साथ ग्रहण किए जाने पर एक के खंडित होने पर शेष सभी खंडित हो जाते हैं। क्यों? क्योंकि समादान (ग्रहण करने की क्रिया) अभिन्न है; जो उल्लंघन किया गया, उसी से वह कर्म-बद्ध है।' इस प्रकार यहाँ भेद के द्वारा भी विनिश्चय समझना चाहिए। မဟာသာဝဇ္ဇတောတိ ဂုဏဝိရဟိတေသု တိရစ္ဆာနဂတာဒီသု ပါဏေသု ခုဒ္ဒကေ ပါဏေ ပါဏာတိပါတော အပ္ပသာဝဇ္ဇော, မဟာသရီရေ မဟာသာဝဇ္ဇော. ကသ္မာ? ပယောဂမဟန္တတာယ. ပယောဂသမတ္တေပိ ဝတ္ထုမဟန္တတာယ. ဂုဏဝန္တေသု ပန မနုဿာဒီသု အပ္ပဂုဏေ ပါဏာတိပါတော အပ္ပသာဝဇ္ဇော, မဟာဂုဏေ မဟာသာဝဇ္ဇော. သရီရဂုဏာနန္တု သမဘာဝေ သတိ ကိလေသာနံ ဥပက္ကမာနဉ္စ မုဒုတာယ အပ္ပသာဝဇ္ဇတာ, တိဗ္ဗတာယ မဟာသာဝဇ္ဇတာ စ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ဧသ နယော သေသေသုပိ. အပိ စေတ္ထ သုရာမေရယမဇ္ဇပမာဒဋ္ဌာနမေဝ မဟာသာဝဇ္ဇံ, န တထာ ပါဏာတိပါတာဒယော. ကသ္မာ? မနုဿဘူတဿာပိ ဥမ္မတ္တကဘာဝသံဝတ္တနေန အရိယဓမ္မန္တရာယကရဏတောတိ. ဧဝမေတ္ထ မဟာသာဝဇ္ဇတောပိ ဝိညာတဗ္ဗော ဝိနိစ္ဆယော. महासावद्य (बड़े अपराध) की दृष्टि से - गुण-रहित तिर्यंच आदि प्राणियों में छोटे प्राणी का प्राणातिपात अल्प-सावद्य है, और बड़े शरीर वाले का महा-सावद्य है। क्यों? प्रयोग की अधिकता के कारण। प्रयोग समान होने पर भी वस्तु (प्राणी) की विशालता के कारण वह महा-सावद्य है। गुणवान मनुष्यों आदि में अल्प-गुण वाले का प्राणातिपात अल्प-सावद्य है और महा-गुण वाले का महा-सावद्य है। शरीर और गुणों के समान होने पर क्लेशों और प्रयोगों की मृदुता से अल्प-सावद्यता और उनकी तीव्रता से महा-सावद्यता समझनी चाहिए। यही नियम शेष में भी है। अपितु यहाँ सुरामेरय-मज्ज-प्रमादस्थान ही महा-सावद्य है, प्राणातिपात आदि उस प्रकार नहीं हैं। क्यों? क्योंकि मनुष्य होने पर भी यह उन्मत्त भाव उत्पन्न करने वाला है और आर्य-धर्मों (ध्यान-मार्ग-फल) में बाधा पहुँचाने वाला है। इस प्रकार यहाँ महा-सावद्यता के द्वारा भी विनिश्चय समझना चाहिए। ပယောဂတောတိ ဧတ္ထ စ ပါဏာတိပါတဿ သာဟတ္ထိကော, အာဏတ္တိကော, နိဿဂ္ဂိယော, ထာဝရော, ဝိဇ္ဇာမယော, ဣဒ္ဓိမယောတိ ဆပ္ပယောဂါ. တတ္ထ ကာယေန ဝါ ကာယပ္ပဋိဗဒ္ဓေန ဝါ ပဟရဏံ သာဟတ္ထိကော ပယောဂေါ, သော ဥဒ္ဒိဿာနုဒ္ဒိဿဘေဒတော ဒုဝိဓော ဟောတိ. တတ္ထ ဥဒ္ဒိဿကေ ယံ ဥဒ္ဒိဿ ပဟရတိ, တဿေဝ မရဏေန ကမ္မုနာ ဗဇ္ဈတိ. ‘‘ယော ကောစိ မရတူ’’တိ ဧဝံ အနုဒ္ဒိဿကေ ပဟာရပစ္စယာ ယဿ ကဿစိ မရဏေန. ဥဘယထာပိ စ ပဟရိတမတ္တေ ဝါ မရတု, ပစ္ဆာ ဝါ တေနေဝ ရောဂေန, ပဟရိတက္ခဏေ ဧဝ ကမ္မုနာ ဗဇ္ဈတိ. မရဏာဓိပ္ပာယေန စ ပဟာရံ ဒတွာ တေန အမတဿ ပုန အညေန စိတ္တေန ပဟာရေ ဒိန္နေ ပစ္ဆာပိ ယဒိ ပဌမပဟာရေနေဝ မရတိ, တဒါ ဧဝ ကမ္မုနာ ဗဒ္ဓေါ ဟောတိ. အထ ဒုတိယပဟာရေန, နတ္ထိ ပါဏာတိပါတော. ဥဘယေဟိ မတေပိ ပဌမပဟာရေနေဝ ကမ္မုနာ ဗဒ္ဓေါ, ဥဘယေဟိပိ အမတေ နေဝတ္ထိ ပါဏာတိပါတော. ဧသ နယော ဗဟုကေဟိပိ [Pg.20] ဧကဿ ပဟာရေ ဒိန္နေ. တတြာပိ ဟိ ယဿ ပဟာရေန မရတိ, တဿေဝ ကမ္မဗဒ္ဓေါ ဟောတိ. प्रयोग के आधार पर यहाँ प्राणातिपात के छह प्रयोग हैं: साहत्थिक (स्वयं के हाथ से), आणत्तिक (आदेश देकर), निस्सग्गिय (फेंककर), थावर (स्थायी साधन द्वारा), विज्जामय (विद्या या मंत्र द्वारा), और इद्धिमय (ऋद्धि या शक्ति द्वारा)। इनमें से, शरीर से या शरीर से जुड़ी वस्तु से प्रहार करना 'साहत्थिक प्रयोग' है। वह उद्देश्य और अनूद्देश्य के भेद से दो प्रकार का होता है। वहाँ उद्देश्य (निश्चित लक्ष्य) में, जिसे उद्देश्य बनाकर प्रहार किया जाता है, उसी की मृत्यु होने पर कर्म से बंधता है। 'कोई भी मर जाए'—इस प्रकार अनूद्देश्य में प्रहार के कारण जिसकी भी मृत्यु होती है, उससे कर्म बंधता है। दोनों ही स्थितियों में, प्रहार करते ही मृत्यु हो जाए या बाद में उसी चोट के कारण मृत्यु हो, प्रहार के क्षण में ही कर्म से बंध जाता है। यदि मारने के अभिप्राय से प्रहार किया और उससे वह नहीं मरा, फिर बाद में किसी अन्य चित्त (क्रोध) से प्रहार करने पर यदि वह पहले प्रहार से ही मरता है, तो वह तभी कर्म से बंध जाता है। यदि दूसरे प्रहार से मरता है, तो (पहले प्रहार से) प्राणातिपात नहीं होता। यदि दोनों से मरता है, तो पहले प्रहार से ही कर्मबद्ध होता है; यदि दोनों से नहीं मरता, तो प्राणातिपात नहीं होता। यही नियम बहुतों द्वारा एक को प्रहार करने पर भी लागू होता है। वहाँ भी जिसके प्रहार से मृत्यु होती है, वही कर्मबद्ध होता है। အဓိဋ္ဌဟိတွာ ပန အာဏာပနံ အာဏတ္တိကော ပယောဂေါ. တတ္ထပိ သာဟတ္ထိကေ ပယောဂေ ဝုတ္တနယေနေဝ ကမ္မဗဒ္ဓေါ အနုဿရိတဗ္ဗော. ဆဗ္ဗိဓော စေတ္ထ နိယမော ဝေဒိတဗ္ဗော – निश्चय करके आदेश देना 'आणत्तिक प्रयोग' है। वहाँ भी साहत्थिक प्रयोग में बताए गए तरीके से ही कर्म-बंधन को समझना चाहिए। यहाँ छह प्रकार के नियम जानने चाहिए— ‘‘ဝတ္ထု ကာလော စ ဩကာသော, အာဝုဓံ ဣရိယာပထော; ကိရိယာဝိသေသောတိ ဣမေ, ဆ အာဏတ္တိနိယာမကာ’’တိ. (ပါစိ. အဋ္ဌ. ၂.၁၇၄); 'वस्तु (प्राणी), काल, अवसर (स्थान), आयुध (शस्त्र), इरियापथ (अवस्था) और क्रिया-विशेष—ये छह आणत्तिक (आदेश) के नियामक हैं।' တတ္ထ ဝတ္ထူတိ မာရေတဗ္ဗော ပါဏော. ကာလောတိ ပုဗ္ဗဏှသာယနှာဒိကာလော စ, ယောဗ္ဗနထာဝရိယာဒိကာလော စ. ဩကာသောတိ ဂါမော ဝါ နိဂမော ဝါ ဝနံ ဝါ ရစ္ဆာ ဝါ သိင်္ဃာဋကံ ဝါတိ ဧဝမာဒိ. အာဝုဓန္တိ အသိ ဝါ ဥသု ဝါ သတ္တိ ဝါတိ ဧဝမာဒိ. ဣရိယာပထောတိ မာရေတဗ္ဗဿ မာရကဿ စ ဌာနံ ဝါ နိသဇ္ဇာ ဝါတိ ဧဝမာဒိ. वहाँ 'वस्तु' का अर्थ है मारा जाने वाला प्राणी। 'काल' का अर्थ है सुबह, शाम आदि का समय, और युवावस्था, वृद्धावस्था आदि की अवस्था। 'अवसर' (स्थान) का अर्थ है गाँव, कस्बा, वन, मार्ग या चौराहा आदि। 'आयुध' का अर्थ है तलवार, बाण या भाला आदि। 'इरियापथ' का अर्थ है मरने वाले और मारने वाले का खड़े होना या बैठना आदि। ကိရိယာဝိသေသောတိ ဝိဇ္ဈနံ ဝါ ဆေဒနံ ဝါ ဘေဒနံ ဝါ သင်္ခမုဏ္ဍိကံ ဝါတိ ဧဝမာဒိ. ယဒိ ဟိ ဝတ္ထုံ ဝိသံဝါဒေတွာ ‘‘ယံ မာရေဟီ’’တိ အာဏတ္တော, တတော အညံ မာရေတိ, အာဏာပကဿ နတ္ထိ ကမ္မဗဒ္ဓေါ. အထ ဝတ္ထုံ အဝိသံဝါဒေတွာ မာရေတိ, အာဏာပကဿ အာဏတ္တိက္ခဏေ အာဏတ္တဿ မာရဏက္ခဏေတိ ဥဘယေသမ္ပိ ကမ္မဗဒ္ဓေါ. ဧသ နယော ကာလာဒီသုပိ. क्रिया-विशेष का अर्थ है छेदना, काटना, फाड़ना या शंखमुण्डिक (सिर की खाल उतारना) आदि। यदि वस्तु (प्राणी) के विषय में भिन्नता हो जाए और जिसे 'मारो' कहा गया था, उसके बजाय किसी अन्य को मारता है, तो आदेश देने वाले को कर्म-बंधन नहीं होता। यदि वस्तु में भिन्नता न हो और वह उसे मार देता है, तो आदेश देने वाले को आदेश के क्षण में और मारने वाले को मारने के क्षण में, दोनों को कर्म-बंधन होता है। यही नियम काल आदि के विषय में भी है। မာရဏတ္ထန္တု ကာယေန ဝါ ကာယပ္ပဋိဗဒ္ဓေန ဝါ ပဟရဏနိဿဇ္ဇနံ နိဿဂ္ဂိယော ပယောဂေါ. သောပိ ဥဒ္ဒိဿာနုဒ္ဒိဿဘေဒတော ဒုဝိဓော ဧဝ, ကမ္မဗဒ္ဓေါ စေတ္ထ ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. मारने के लिए शरीर से या शरीर से जुड़ी वस्तु से प्रहार को फेंकना 'निस्सग्गिय प्रयोग' है। वह भी उद्देश्य और अनूद्देश्य के भेद से दो प्रकार का ही है, और यहाँ कर्म-बंधन पहले बताए गए तरीके से ही समझना चाहिए। မာရဏတ္ထမေဝ ဩပါတခဏနံ, အပဿေနဥပနိက္ခိပနံ, ဘေသဇ္ဇဝိသယန္တာဒိပ္ပယောဇနံ ဝါ ထာဝရော ပယောဂေါ. သောပိ ဥဒ္ဒိဿာနုဒ္ဒိဿဘေဒတော ဒုဝိဓော, ယတော တတ္ထပိ ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေနေဝ ကမ္မဗဒ္ဓေါ ဝေဒိတဗ္ဗော. အယန္တု ဝိသေသော – မူလဋ္ဌေန ဩပါတာဒီသု ပရေသံ မူလေန ဝါ မုဓာ ဝါ ဒိန္နေသုပိ ယဒိ တပ္ပစ္စယာ ကောစိ မရတိ, မူလဋ္ဌဿေဝ ကမ္မဗဒ္ဓေါ. ယဒိပိ စ တေန အညေန ဝါ တတ္ထ ဩပါတေ ဝိနာသေတွာ ဘူမိသမေ ကတေပိ ပံသုဓောဝကာ ဝါ ပံသုံ ဂဏှန္တာ, မူလခဏကာ ဝါ မူလာနိ ခဏန္တာ အာဝါဋံ ကရောန္တိ[Pg.21], ဒေဝေ ဝါ ဝဿန္တေ ကဒ္ဒမော ဇာယတိ, တတ္ထ စ ကောစိ ဩတရိတွာ ဝါ လဂ္ဂိတွာ ဝါ မရတိ, မူလဋ္ဌဿေဝ ကမ္မဗဒ္ဓေါ. ယဒိ ပန ယေန လဒ္ဓံ, သော အညော ဝါ တံ ဝိတ္ထဋတရံ ဂမ္ဘီရတရံ ဝါ ကရောတိ, တပ္ပစ္စယာဝ ကောစိ မရတိ, ဥဘယေသမ္ပိ ကမ္မဗဒ္ဓေါ. ယထာ တု မူလာနိ မူလေဟိ သံသန္ဒန္တိ, တထာ တတြ ထလေ ကတေ မုစ္စတိ. ဧဝံ အပဿေနာဒီသုပိ ယာဝ တေသံ ပဝတ္တိ, တာဝ ယထာသမ္ဘဝံ ကမ္မဗဒ္ဓေါ ဝေဒိတဗ္ဗော. मारने के लिए ही गड्ढा खोदना, सहारा (जैसे दीवार या तख्ता) टिका कर रखना, या औषधि, विष, यंत्र आदि का प्रयोग करना 'थावर प्रयोग' है। वह भी उद्देश्य और अनूद्देश्य के भेद से दो प्रकार का है, क्योंकि वहाँ भी पहले बताए गए तरीके से ही कर्म-बंधन समझना चाहिए। विशेष बात यह है—यदि गड्ढा खोदने वाले (मूल कर्ता) ने वह गड्ढा आदि दूसरों को मूल्य लेकर या मुफ्त में दे दिया हो, फिर भी यदि उसके कारण कोई मरता है, तो मूल कर्ता को ही कर्म-बंधन होता है। यदि उसने या किसी अन्य ने उस गड्ढे को नष्ट कर जमीन बराबर कर दी हो, फिर भी यदि धूल साफ करने वाले धूल निकालते समय या जड़ खोदने वाले जड़ें खोदते समय फिर से गड्ढा बना दें, या वर्षा होने पर कीचड़ हो जाए, और वहाँ कोई गिरकर या फंसकर मर जाए, तो मूल कर्ता को ही कर्म-बंधन होता है। लेकिन यदि जिसे वह गड्ढा मिला, वह या कोई अन्य उसे और अधिक चौड़ा या गहरा कर देता है और उसके कारण कोई मरता है, तो दोनों को कर्म-बंधन होता है। जैसे जड़ें जड़ों से मिलती हैं, वैसे ही यदि वहाँ स्थल (समतल) कर दिया जाए तो वह मुक्त हो जाता है। इसी प्रकार सहारा टिकाने आदि के विषय में भी, जब तक वे बने रहते हैं, तब तक यथासंभव कर्म-बंधन समझना चाहिए। မာရဏတ္ထံ ပန ဝိဇ္ဇာပရိဇပ္ပနံ ဝိဇ္ဇာမယော ပယောဂေါ. ဒါဌာဝုဓာဒီနံ ဒါဌာကောဋနာဒိမိဝ မာရဏတ္ထံ ကမ္မဝိပါကဇိဒ္ဓိဝိကာရကရဏံ ဣဒ္ဓိမယော ပယောဂေါတိ. အဒိန္နာဒါနဿ တု ထေယျပသယှပဋိစ္ဆန္နပရိကပ္ပကုသာဝဟာရဝသပ္ပဝတ္တာ သာဟတ္ထိကာဏတ္တိကာဒယော ပယောဂါ, တေသမ္ပိ ဝုတ္တာနုသာရေနေဝ ပဘေဒေါ ဝေဒိတဗ္ဗော. အဗြဟ္မစရိယာဒီနံ တိဏ္ဏမ္ပိ သာဟတ္ထိကော ဧဝ ပယောဂေါ လဗ္ဘတီတိ. ဧဝမေတ္ထ ပယောဂတောပိ ဝိညာတဗ္ဗော ဝိနိစ္ဆယော. मारने के लिए मंत्रों का जाप करना 'विज्जामय प्रयोग' है। दाठावुध (जिनके दांतों में विष हो) आदि के दांतों को खटखटाने की तरह, मारने के लिए कर्म-विपाक से उत्पन्न ऋद्धि की विकृति उत्पन्न करना 'इद्धिमय प्रयोग' है। अदिन्नादान (चोरी) के विषय में चोरी, जबरदस्ती, छिपकर, संकल्प करके, कूट-तौल (धोखाधड़ी) आदि के माध्यम से होने वाले साहत्थिक, आणत्तिक आदि प्रयोग होते हैं; उनका भेद भी पहले बताए गए अनुसार ही समझना चाहिए। अब्रह्मचर्य आदि शेष तीन (काम-मिथ्याचार, मृषावाद, सुरापान) के विषय में केवल 'साहत्थिक प्रयोग' ही प्राप्त होता है। इस प्रकार यहाँ प्रयोग के आधार पर भी विनिश्चय समझना चाहिए। အင်္ဂတောတိ ဧတ္ထ စ ပါဏာတိပါတဿ ပဉ္စ အင်္ဂါနိ ဘဝန္တိ – ပါဏော စ ဟောတိ, ပါဏသညီ စ, ဝဓကစိတ္တဉ္စ ပစ္စုပဋ္ဌိတံ ဟောတိ, ဝါယမတိ, တေန စ မရတီတိ. အဒိန္နာဒါနဿာပိ ပဉ္စေဝ – ပရပရိဂ္ဂဟိတဉ္စ ဟောတိ, ပရပရိဂ္ဂဟိတသညီ စ, ထေယျစိတ္တဉ္စ ပစ္စုပဋ္ဌိတံ ဟောတိ, ဝါယမတိ, တေန စ အာဒါတဗ္ဗံ အာဒါနံ ဂစ္ဆတီတိ. အဗြဟ္မစရိယဿ ပန စတ္တာရိ အင်္ဂါနိ ဘဝန္တိ – အဇ္ဈာစရိယဝတ္ထု စ ဟောတိ, တတ္ထ စ သေဝနစိတ္တံ ပစ္စုပဋ္ဌိတံ ဟောတိ, သေဝနပစ္စယာ ပယောဂဉ္စ သမာပဇ္ဇတိ, သာဒိယတိ စာတိ, တထာ ပရေသံ ဒွိန္နမ္ပိ. တတ္ထ မုသာဝါဒဿ တာဝ မုသာ စ ဟောတိ တံ ဝတ္ထု, ဝိသံဝါဒနစိတ္တဉ္စ ပစ္စုပဋ္ဌိတံ ဟောတိ, တဇ္ဇော စ ဝါယာမော, ပရဝိသံဝါဒနဉ္စ ဝိညာပယမာနာ ဝိညတ္တိ ပဝတ္တတီတိ စတ္တာရိ အင်္ဂါနိ ဝေဒိတဗ္ဗာနိ. သုရာမေရယမဇ္ဇပမာဒဋ္ဌာနဿ ပန သုရာဒီနဉ္စ အညတရံ ဟောတိ မဒနီယပါတုကမျတာစိတ္တဉ္စ ပစ္စုပဋ္ဌိတံ ဟောတိ, တဇ္ဇဉ္စ ဝါယာမံ အာပဇ္ဇတိ, ပီတေ စ ပဝိသတီတိ ဣမာနိ စတ္တာရိ အင်္ဂါနီတိ. ဧဝမေတ္ထ အင်္ဂတောပိ ဝိညာတဗ္ဗော ဝိနိစ္ဆယော. अंगों (घटकों) के आधार पर यहाँ प्राणातिपात (जीव-हत्या) के पाँच अंग होते हैं - प्राणी हो, प्राणी होने की संज्ञा (बोध) हो, वध करने का चित्त उपस्थित हो, प्रयास (प्रयत्न) करे, और उससे उसकी मृत्यु हो जाए। अदत्तादान (चोरी) के भी पाँच ही अंग हैं - दूसरे के अधिकार की वस्तु हो, दूसरे के अधिकार की वस्तु होने की संज्ञा हो, चोरी का चित्त उपस्थित हो, प्रयास करे, और उससे वह वस्तु ले ली जाए। अब्रह्मचर्य के चार अंग होते हैं - मैथुन योग्य वस्तु (स्त्री आदि) हो, उसमें सेवन का चित्त उपस्थित हो, सेवन के कारण प्रयोग (प्रयत्न) करे, और उसे स्वीकार (आनंद) करे। इसी प्रकार अन्य दो (शिक्षापदों) के भी अंग होते हैं। उनमें मृषावाद (झूठ) के चार अंग जानने चाहिए - वह वस्तु असत्य हो, विसंवादन (धोखा देने) का चित्त उपस्थित हो, उसके अनुरूप प्रयास हो, और दूसरे को धोखा देने वाली विज्ञप्ति (संकेत या वाणी) प्रवृत्त हो। सुरा-मेरय-मज्ज-प्रमादस्थान (नशा) के चार अंग हैं - सुरा आदि में से कोई एक हो, उसे पीने की इच्छा वाला चित्त उपस्थित हो, उसके अनुरूप प्रयास करे, और पीने पर वह भीतर प्रवेश कर जाए। इस प्रकार यहाँ अंगों के आधार पर भी विनिश्चय (निर्णय) जानना चाहिए। သမုဋ္ဌာနတောတိ ပါဏာတိပါတအဒိန္နာဒါနမုသာဝါဒါ စေတ္ထ ကာယစိတ္တတော, ဝါစာစိတ္တတော, ကာယဝါစာစိတ္တတော စာတိ တိသမုဋ္ဌာနာ ဟောန္တိ. အဗြဟ္မစရိယံ ကာယစိတ္တဝသေန ဧကသမုဋ္ဌာနမေဝ. သုရာမေရယမဇ္ဇပမာဒဋ္ဌာနံ ကာယတော စ, ကာယစိတ္တတော စာတိ ဒွိသမုဋ္ဌာနန္တိ. ဧဝမေတ္ထ သမုဋ္ဌာနတောပိ ဝိညာတဗ္ဗော ဝိနိစ္ဆယော. समुत्थान (उत्पत्ति के स्रोत) के आधार पर यहाँ प्राणातिपात, अदत्तादान और मृषावाद - ये तीन समुत्थानों वाले होते हैं: काय-चित्त से, वाचा-चित्त से, और काय-वाचा-चित्त से। अब्रह्मचर्य काय-चित्त के वश से केवल एक समुत्थान वाला ही होता है। सुरा-मेरय-मज्ज-प्रमादस्थान काय से और काय-चित्त से - इस प्रकार दो समुत्थानों वाला होता है। इस प्रकार यहाँ समुत्थान के आधार पर भी विनिश्चय जानना चाहिए। ဝေဒနာတောတိ [Pg.22] ဧတ္ထ စ ပါဏာတိပါတော ဒုက္ခဝေဒနာသမ္ပယုတ္တောဝ. အဒိန္နာဒါနံ တီသု ဝေဒနာသု အညတရဝေဒနာသမ္ပယုတ္တံ, တထာ မုသာဝါဒေါ. ဣတရာနိ ဒွေ သုခါယ ဝါ အဒုက္ခမသုခါယ ဝါ ဝေဒနာယ သမ္ပယုတ္တာနီတိ. ဧဝမေတ္ထ ဝေဒနာတောပိ ဝိညာတဗ္ဗော ဝိနိစ္ဆယော. वेदना के आधार पर यहाँ प्राणातिपात केवल दुःख-वेदना से युक्त ही होता है। अदत्तादान तीन वेदनाओं में से किसी एक वेदना से युक्त होता है, वैसे ही मृषावाद भी। शेष दो (अब्रह्मचर्य और सुरापान) सुख-वेदना या अदुःख-असुख-वेदना से युक्त होते हैं। इस प्रकार यहाँ वेदना के आधार पर भी विनिश्चय जानना चाहिए। မူလတောတိ ပါဏာတိပါတော စေတ္ထ ဒေါသမောဟမူလော. အဒိန္နာဒါနမုသာဝါဒါ လောဘမောဟမူလာ ဝါ ဒေါသမောဟမူလာ ဝါ. ဣတရာနိ ဒွေ လောဘမောဟမူလာနီတိ. ဧဝမေတ္ထ မူလတောပိ ဝိညာတဗ္ဗော ဝိနိစ္ဆယော. मूल के आधार पर यहाँ प्राणातिपात द्वेष-मोह मूलक होता है। अदत्तादान और मृषावाद लोभ-मोह मूलक या द्वेष-मोह मूलक होते हैं। शेष दो लोभ-मोह मूलक होते हैं। इस प्रकार यहाँ मूल के आधार पर भी विनिश्चय जानना चाहिए। ကမ္မတောတိ ပါဏာတိပါတအဒိန္နာဒါနအဗြဟ္မစရိယာနိ စေတ္ထ ကာယကမ္မမေဝ ကမ္မပထပ္ပတ္တာနေဝ စ, မုသာဝါဒေါ ဝစီကမ္မမေဝ. ယော ပန အတ္ထဘဉ္ဇကော, သော ကမ္မပထပ္ပတ္တော. ဣတရော ကမ္မမေဝ. သုရာမေရယမဇ္ဇပမာဒဋ္ဌာနံ ကာယကမ္မမေဝါတိ. ဧဝမေတ္ထ ကမ္မတောပိ ဝိညာတဗ္ဗော ဝိနိစ္ဆယော. कर्म के आधार पर यहाँ प्राणातिपात, अदत्तादान और अब्रह्मचर्य केवल काय-कर्म ही हैं और कर्मपथ को प्राप्त हैं। मृषावाद केवल वची-कर्म (वाणी का कर्म) ही है। जो (मृषावाद) अर्थ (हित) का विनाश करने वाला है, वह कर्मपथ को प्राप्त है; दूसरा केवल कर्म है। सुरा-मेरय-मज्ज-प्रमादस्थान केवल काय-कर्म ही है। इस प्रकार यहाँ कर्म के आधार पर भी विनिश्चय जानना चाहिए। ဝိရမတောတိ ဧတ္ထ အာဟ ‘‘ပါဏာတိပါတာဒီဟိ ဝိရမန္တော ကုတော ဝိရမတီ’’တိ? ဝုစ္စတေ – သမာဒါနဝသေန တာဝ ဝိရမန္တော အတ္တနော ဝါ ပရေသံ ဝါ ပါဏာတိပါတာဒိအကုသလတော ဝိရမတိ. ကိမာရဘိတွာ? ယတော ဝိရမတိ, တဒေဝ. သမ္ပတ္တဝသေနာပိ ဝိရမန္တော ဝုတ္တပ္ပကာရာကုသလတောဝ. ကိမာရဘိတွာ? ပါဏာတိပါတာဒီနံ ဝုတ္တာရမ္မဏာနေဝ. ကေစိ ပန ဘဏန္တိ ‘‘သုရာမေရယမဇ္ဇသင်္ခါတေ သင်္ခါရေ အာရဘိတွာ သုရာမေရယမဇ္ဇပမာဒဋ္ဌာနာ ဝိရမတိ, သတ္တသင်္ခါရေသု ယံ ပန အဝဟရိတဗ္ဗံ ဘဉ္ဇိတဗ္ဗဉ္စ, တံ အာရဘိတွာ အဒိန္နာဒါနာ မုသာဝါဒါ စ, သတ္တေယေဝါရဘိတွာ ပါဏာတိပါတာ အဗြဟ္မစရိယာ စာ’’တိ. တဒညေ ‘‘ဧဝံ သန္တေ ‘အညံ စိန္တေန္တော အညံ ကရေယျ, ယဉ္စ ပဇဟတိ, တံ န ဇာနေယျာ’တိ ဧဝံဒိဋ္ဌိကာ ဟုတွာ အနိစ္ဆမာနာ ယဒေဝ ပဇဟတိ, တံ အတ္တနော ပါဏာတိပါတာဒိအကုသလမေဝါရဘိတွာ ဝိရမတီ’’တိ ဝဒန္တိ. တဒယုတ္တံ. ကသ္မာ? တဿ ပစ္စုပ္ပန္နာဘာဝတော ဗဟိဒ္ဓါဘာဝတော စ. သိက္ခာပဒါနဉှိ ဝိဘင်္ဂပါဌေ ‘‘ပဉ္စန္နံ သိက္ခာပဒါနံ ကတိ ကုသလာ…ပေ… ကတိ အရဏာ’’တိ ပုစ္ဆိတွာ ‘‘ကုသလာယေဝ, သိယာ သုခါယ ဝေဒနာယ သမ္ပယုတ္တာ’’တိ (ဝိဘ. ၇၁၆) ဧဝံ ပဝတ္တမာနေ ဝိဿဇ္ဇနေ ‘‘ပစ္စုပ္ပန္နာရမ္မဏာ’’တိ စ ‘‘ဗဟိဒ္ဓါရမ္မဏာ’’တိ စ ဧဝံ ပစ္စုပ္ပန္နဗဟိဒ္ဓါရမ္မဏတ္တံ ဝုတ္တံ, တံ အတ္တနော ပါဏာတိပါတာဒိအကုသလံ အာရဘိတွာ ဝိရမန္တဿ န ယုဇ္ဇတိ. ယံ ပန ဝုတ္တံ – ‘‘အညံ [Pg.23] စိန္တေန္တော အညံ ကရေယျ, ယဉ္စ ပဇဟတိ, တံ န ဇာနေယျာ’’တိ. တတ္ထ ဝုစ္စတေ – န ကိစ္စသာဓနဝသေန ပဝတ္တေန္တော အညံ စိန္တေန္တော အညံ ကရောတီတိ ဝါ, ယဉ္စ ပဇဟတိ, တံ န ဇာနာတီတိ ဝါ ဝုစ္စတိ. विरति (त्याग) के आधार पर यहाँ पूछा गया है - 'प्राणातिपात आदि से विरत होने वाला किससे विरत होता है?' उत्तर दिया जाता है - पहले समादान (व्रत ग्रहण) के वश से विरत होने वाला अपने या दूसरों के प्राणातिपात आदि अकुशल से विरत होता है। किसे आलम्बन बनाकर? जिससे विरत होता है, उसी को। सम्पत्ति (अवसर प्राप्त होने) के वश से भी विरत होने वाला पूर्वोक्त प्रकार के अकुशल से ही विरत होता है। किसे आलम्बन बनाकर? प्राणातिपात आदि के पूर्वोक्त आलम्बनों को ही। कुछ आचार्य कहते हैं - 'सुरा-मेरय-मज्ज संज्ञक संस्कारों को आलम्बन बनाकर सुरा-मेरय-मज्ज-प्रमादस्थान से विरत होता है; सत्व-संस्कारों में जो चुराने योग्य या नष्ट करने योग्य है, उसे आलम्बन बनाकर अदत्तादान और मृषावाद से, और सत्वों को ही आलम्बन बनाकर प्राणातिपात और अब्रह्मचर्य से विरत होता है।' अन्य आचार्य कहते हैं - 'ऐसा होने पर, एक का चिंतन करते हुए दूसरा कर सकता है, और जिसे त्यागता है उसे जान नहीं पाएगा - ऐसी दृष्टि वाले होकर, अनिच्छापूर्वक जिसे त्यागता है, अपने उसी प्राणातिपात आदि अकुशल को ही आलम्बन बनाकर विरत होता है।' यह अनुचित है। क्यों? क्योंकि वह (अकुशल) वर्तमान नहीं है और न ही वह बहिर्धा (बाह्य) है। शिक्षापदों के विभंग-पाठ में 'पाँच शिक्षापदों में कितने कुशल हैं... कितने अरण हैं?' ऐसा पूछकर 'कुशल ही हैं, कदाचित सुख-वेदना से युक्त होते हैं' - इस प्रकार उत्तर प्रवृत्त होने पर 'प्रत्युत्पन्न-आलम्बन' (वर्तमान आलम्बन) और 'बहिर्धा-आलम्बन' (बाह्य आलम्बन) कहा गया है; वह अपने प्राणातिपात आदि अकुशल को आलम्बन बनाकर विरत होने वाले के लिए संगत नहीं है। जो यह कहा गया है कि - 'एक का चिंतन करते हुए दूसरा कर सकता है, और जिसे त्यागता है उसे जान नहीं पाएगा' - उसके विषय में कहा जाता है कि कार्य-सिद्धि के वश से प्रवृत्त होने वाला न तो यह कहा जाता है कि वह एक का चिंतन करते हुए दूसरा करता है, और न ही यह कि जिसे त्यागता है उसे जानता नहीं है। ‘‘အာရဘိတွာန အမတံ, ဇဟန္တော သဗ္ဗပါပကေ; နိဒဿနဉ္စေတ္ထ ဘဝေ, မဂ္ဂဋ္ဌောရိယပုဂ္ဂလော’’တိ. 'अमृत (निर्वाण) को आलम्बन बनाकर, सभी पापों को त्यागते हुए; मार्गस्थ आर्य पुद्गल यहाँ उदाहरण होना चाहिए।' ဧဝမေတ္ထ ဝိရမတောပိ ဝိညာတဗ္ဗော ဝိနိစ္ဆယော. इस प्रकार यहाँ विरति के आधार पर भी विनिश्चय जानना चाहिए। ဖလတောတိ သဗ္ဗေ ဧဝ စေတေ ပါဏာတိပါတာဒယော ဒုဂ္ဂတိဖလနိဗ္ဗတ္တကာ ဟောန္တိ, သုဂတိယဉ္စ အနိဋ္ဌာကန္တာမနာပဝိပါကနိဗ္ဗတ္တကာ ဟောန္တိ, သမ္ပရာယေ ဒိဋ္ဌဓမ္မေ ဧဝ စ အဝေသာရဇ္ဇာဒိဖလနိဗ္ဗတ္တကာ. အပိစ ‘‘ယော သဗ္ဗလဟုသော ပါဏာတိပါတဿ ဝိပါကော မနုဿဘူတဿ အပ္ပာယုကသံဝတ္တနိကော ဟောတီ’’တိ (အ. နိ. ၈.၄၀) ဧဝမာဒိနာ နယေနေတ္ထ ဖလတောပိ ဝိညာတဗ္ဗော ဝိနိစ္ဆယော. फल के आधार पर ये सभी प्राणातिपात आदि दुर्गति रूपी फल को उत्पन्न करने वाले होते हैं, और सुगति में भी अनिष्ट, अकान्त और अमनाप (अप्रिय) विपाक उत्पन्न करने वाले होते हैं; परलोक में और इसी जन्म में भी अ-वैशारद्य (आत्मविश्वास की कमी) आदि फल उत्पन्न करने वाले होते हैं। इसके अतिरिक्त, 'प्राणातिपात का जो सबसे हल्का विपाक है, वह मनुष्य होने पर अल्पायु बनाने वाला होता है' - इस प्रकार के नय (विधि) से यहाँ फल के आधार पर भी विनिश्चय जानना चाहिए। အပိ စေတ္ထ ပါဏာတိပါတာဒိဝေရမဏီနမ္ပိ သမုဋ္ဌာနဝေဒနာမူလကမ္မဖလတော ဝိညာတဗ္ဗော ဝိနိစ္ဆယော. တတ္ထာယံ ဝိညာပနာ – သဗ္ဗာ ဧဝ စေတာ ဝေရမဏိယော စတူဟိ သမုဋ္ဌဟန္တိ ကာယတော, ကာယစိတ္တတော, ဝါစာစိတ္တတော, ကာယဝါစာစိတ္တတော စာတိ. သဗ္ဗာ ဧဝ စ သုခဝေဒနာသမ္ပယုတ္တာ ဝါ, အဒုက္ခမသုခဝေဒနာသမ္ပယုတ္တာ ဝါ, အလောဘာဒေါသမူလာ ဝါ အလောဘာဒေါသာမောဟမူလာ ဝါ. စတဿောပိ စေတ္ထ ကာယကမ္မံ, မုသာဝါဒါဝေရမဏီ ဝစီကမ္မံ, မဂ္ဂက္ခဏေ စ စိတ္တတောဝ သမုဋ္ဌဟန္တိ, သဗ္ဗာပိ မနောကမ္မံ. इसके अतिरिक्त, यहाँ प्राणातिपात आदि से विरति के संबंध में समुत्थान, वेदना, मूल और कर्म-फल के अनुसार निर्णय समझना चाहिए। यहाँ यह स्पष्टीकरण है - ये सभी विरतियाँ चार समुत्थानों से उत्पन्न होती हैं: काय से, काय-चित्त से, वाचा-चित्त से, और काय-वाचा-चित्त से। और ये सभी या तो सुख-वेदना से युक्त होती हैं या अदुःख-असुख-वेदना से युक्त होती हैं; और ये अलोभ-अद्वेष मूल वाली होती हैं या अलोभ-अद्वेष-अमोह मूल वाली होती हैं। यहाँ चार (विरतियाँ) काय-कर्म हैं, मृषावाद से विरति वची-कर्म है, और मार्ग-क्षण में वे केवल चित्त से ही उत्पन्न होती हैं, और सभी मनो-कर्म हैं। ပါဏာတိပါတာ ဝေရမဏိယာ စေတ္ထ အင်္ဂပစ္စင်္ဂသမ္ပန္နတာ အာရောဟပရိဏာဟသမ္ပတ္တိတာ ဇဝသမ္ပတ္တိတာ သုပ္ပတိဋ္ဌိတပါဒတာ စာရုတာ မုဒုတာ သုစိတာ သူရတာ မဟဗ္ဗလတာ ဝိဿတ္ထဝစနတာ လောကပိယတာ နေလတာ အဘေဇ္ဇပရိသတာ အစ္ဆမ္ဘိတာ ဒုပ္ပဓံသိတာ ပရူပက္ကမေန အမရဏတာ အနန္တပရိဝါရတာ သုရူပတာ သုသဏ္ဌာနတာ အပ္ပာဗာဓတာ အသောကိတာ ပိယေဟိ မနာပေဟိ သဒ္ဓိံ အဝိပ္ပယောဂတာ ဒီဃာယုကတာတိ ဧဝမာဒီနိ ဖလာနိ. यहाँ प्राणातिपात से विरति के ये फल हैं: अंगों और प्रत्यंगों की पूर्णता, शरीर की ऊँचाई और चौड़ाई की सुडौलता, गति की संपन्नता, सुप्रतिष्ठित पैर, सुंदरता, कोमलता, पवित्रता, शूरवीरता, महान बल, स्पष्ट वाणी, लोक-प्रियता, निर्दोषता, अटूट परिषद (अनुयायी), निर्भयता, दूसरों द्वारा अपराजित होना, दूसरों के प्रयास से मृत्यु न होना, अनंत परिवार (परिजन), सुंदर रूप, सुगठन, अल्प-व्याधि (निरोगता), शोक-रहित होना, प्रिय और मनभावन लोगों से वियोग न होना, और दीर्घायु होना। အဒိန္နာဒါနာ ဝေရမဏိယာ မဟဒ္ဓနတာ ပဟူတဓနဓညတာ အနန္တဘောဂတာ အနုပ္ပန္နဘောဂုပ္ပတ္တိတာ ဥပ္ပန္နဘောဂထာဝရတာ ဣစ္ဆိတာနံ ဘောဂါနံ ခိပ္ပပ္ပဋိလာဘိတာ ရာဇစောရုဒကဂ္ဂိအပ္ပိယဒါယာဒေဟိ အသာဓာရဏဘောဂတာ [Pg.24] အသာဓာရဏဓနပ္ပဋိလာဘိတာ လောကုတ္တမတာ နတ္ထိကဘာဝဿ အဇာနနတာ သုခဝိဟာရိတာတိ ဧဝမာဒီနိ. अदत्तादान (चोरी) से विरति के फल हैं: महाधनी होना, प्रचुर धन-धान्य होना, अनंत भोग-सामग्री, अप्राप्त भोगों की प्राप्ति, प्राप्त भोगों का स्थायित्व, इच्छित भोगों की शीघ्र प्राप्ति, राजा-चोर-जल-अग्नि और अप्रिय उत्तराधिकारियों के साथ साझा न होने वाला (सुरक्षित) भोग, असाधारण धन की प्राप्ति, लोक में श्रेष्ठता, 'नहीं है' इस भाव को न जानना (अभाव का अनुभव न करना), और सुखपूर्वक विहार करना। အဗြဟ္မစရိယာ ဝေရမဏိယာ ဝိဂတပစ္စတ္ထိကတာ သဗ္ဗဇနပိယတာ အန္နပါနဝတ္ထသယနာဒီနံ လာဘိတာ သုခသယနတာ သုခပ္ပဋိဗုဇ္ဈနတာ အပါယဘယဝိနိမုတ္တတာ ဣတ္ထိဘာဝပ္ပဋိလာဘဿ ဝါ နပုံသကဘာဝပ္ပဋိလာဘဿ ဝါ အဘဗ္ဗတာ အက္ကောဓနတာ ပစ္စက္ခကာရိတာ အပတိတက္ခန္ဓတာ အနဓောမုခတာ ဣတ္ထိပုရိသာနံ အညမညပိယတာ ပရိပုဏ္ဏိန္ဒြိယတာ ပရိပုဏ္ဏလက္ခဏတာ နိရာသင်္ကတာ အပ္ပောဿုက္ကတာ သုခဝိဟာရိတာ အကုတောဘယတာ ပိယဝိပ္ပယောဂါဘာဝတာတိ ဧဝမာဒီနိ. अब्रह्मचर्य (काम-मिथ्याचार) से विरति के फल हैं: शत्रुओं का न होना, सभी जनों का प्रिय होना, अन्न-पान-वस्त्र-शयन आदि की सुलभता, सुखपूर्वक सोना, सुखपूर्वक जागना, अपाय (दुर्गति) के भय से मुक्ति, स्त्री-भाव या नपुंसक-भाव की प्राप्ति न होना, क्रोध न करना, प्रत्यक्ष कार्य करने वाला होना, कंधों का न झुकना (आत्मविश्वास), मुख नीचे करके न चलना, स्त्री-पुरुषों का परस्पर प्रिय होना, इंद्रियों की पूर्णता, लक्षणों की पूर्णता, शंका-रहित होना, अल्प-उत्सुकता (चिंतामुक्त), सुखपूर्वक विहार करना, कहीं से भी भय न होना, और प्रियजनों से वियोग का अभाव। မုသာဝါဒါ ဝေရမဏိယာ ဝိပ္ပသန္နိန္ဒြိယတာ ဝိဿဋ္ဌမဓုရဘာဏိတာ သမသိတသုဒ္ဓဒန္တတာ နာတိထူလတာ နာတိကိသတာ နာတိရဿတာ နာတိဒီဃတာ သုခသမ္ဖဿတာ ဥပ္ပလဂန္ဓမုခတာ သုဿူသကပရိဇနတာ အာဒေယျဝစနတာ ကမလုပ္ပလသဒိသမုဒုလောဟိတတနုဇိဝှတာ အနုဒ္ဓတတာ အစပလတာတိ ဧဝမာဒီနိ. मृषावाद (झूठ) से विरति के फल हैं: अत्यंत प्रसन्न (निर्मल) इंद्रियाँ, स्पष्ट और मधुर वाणी, समान और स्वच्छ दाँत, न बहुत मोटा होना, न बहुत दुबला होना, न बहुत नाटा होना, न बहुत लंबा होना, सुखद स्पर्श, कमल की गंध जैसा मुख, आज्ञाकारी परिजन, स्वीकार्य वाणी, कमल के समान कोमल, लाल और पतली जिह्वा, चंचलता का अभाव, और स्थिरता। သုရာမေရယမဇ္ဇပမာဒဋ္ဌာနာ ဝေရမဏိယာ အတီတာနာဂတပစ္စုပ္ပန္နေသု သဗ္ဗကိစ္စကရဏီယေသု ခိပ္ပံ ပဋိဇာနနတာ သဒါ ဥပဋ္ဌိတသတိတာ အနုမ္မတ္တကတာ ဉာဏဝန္တတာ အနလသတာ အဇဠတာ အနေလမူဂတာ အမတ္တတာ အပ္ပမတ္တတာ အသမ္မောဟတာ အစ္ဆမ္ဘိတာ အသာရမ္ဘိတာ အနုဿင်္ကိတာ သစ္စဝါဒိတာ အပိသုဏာဖရုသာသမ္ဖပလာပဝါဒိတာ ရတ္တိန္ဒိဝမတန္ဒိတတာ ကတညုတာ ကတဝေဒိတာ အမစ္ဆရိတာ စာဂဝန္တတာ သီလဝန္တတာ ဥဇုတာ အက္ကောဓနတာ ဟိရိမနတာ ဩတ္တပ္ပိတာ ဥဇုဒိဋ္ဌိကတာ မဟာပညတာ မေဓာဝိတာ ပဏ္ဍိတတာ အတ္ထာနတ္ထကုသလတာတိ ဧဝမာဒီနိ ဖလာနိ. ဧဝမေတ္ထ ပါဏာတိပါတာဒိဝေရမဏီနံ သမုဋ္ဌာနဝေဒနာမူလကမ္မဖလတောပိ ဝိညာတဗ္ဗော ဝိနိစ္ဆယော. सुरा-मेरय-मज्ज-प्रमादस्थान (नशा) से विरति के फल हैं: अतीत, अनागत और वर्तमान के सभी कर्तव्यों को शीघ्र समझ लेना, सदा उपस्थित स्मृति (जागरूकता), पागलपन का न होना, ज्ञानवान होना, आलस्य का न होना, जड़ता का न होना, गूँगापन (या मतिभ्रम) का न होना, मद-रहित होना, अप्रमादी होना, सम्मोह (भ्रम) का न होना, निर्भयता, अहंकार या उग्रता का न होना, शंका-रहित होना, सत्यवादी होना, चुगली-कठोर वचन-व्यर्थ प्रलाप न करना, रात-दिन आलस्य-रहित होना, कृतज्ञता, कृतवेदिता (उपकार मानना), मत्सर (ईर्ष्या) का न होना, त्यागी होना, शीलवान होना, ऋजुता (सरलता), क्रोध न करना, ह्री (पाप से लज्जा), ओत्तप्प (पाप से भय), सम्यक दृष्टि, महाप्रज्ञा, मेधावी होना, पंडित होना, और हित-अहित के विवेक में कुशल होना। इस प्रकार, यहाँ प्राणातिपात आदि से विरति के संबंध में समुत्थान, वेदना, मूल और कर्म-फल के अनुसार निर्णय समझना चाहिए। ပစ္ဆိမပဉ္စသိက္ခာပဒဝဏ္ဏနာ अंतिम पाँच शिक्षापदों का वर्णन। ဣဒါနိ ယံ ဝုတ္တံ – अब, जो कहा गया है - ‘‘ယောဇေတဗ္ဗံ တတော ယုတ္တံ, ပစ္ဆိမေသွပိ ပဉ္စသု; အာဝေဏိကဉ္စ ဝတ္တဗ္ဗံ, ဉေယျာ ဟီနာဒိတာပိ စာ’’တိ. "उचित विधि को बाद के पाँच (शिक्षापदों) में भी लागू करना चाहिए; उनकी विशिष्टताओं को कहना चाहिए, और हीन आदि (भेदों) को भी जानना चाहिए।" တဿာယံ [Pg.25] အတ္ထဝဏ္ဏနာ – ဧတိဿာ ပုရိမပဉ္စသိက္ခာပဒဝဏ္ဏနာယ ယံ ယုဇ္ဇတိ, တံ တတော ဂဟေတွာ ပစ္ဆိမေသွပိ ပဉ္စသု သိက္ခာပဒေသု ယောဇေတဗ္ဗံ. တတ္ထာယံ ယောဇနာ – ယထေဝ ဟိ ပုရိမသိက္ခာပဒေသု အာရမ္မဏတော စ သုရာမေရယမဇ္ဇပမာဒဋ္ဌာနံ ရူပါယတနာဒိအညတရသင်္ခါရာရမ္မဏံ, တထာ ဣဓ ဝိကာလဘောဇနံ. ဧတေန နယေန သဗ္ဗေသံ အာရမ္မဏဘေဒေါ ဝေဒိတဗ္ဗော. အာဒါနတော စ ယထာ ပုရိမာနိ သာမဏေရေန ဝါ ဥပါသကေန ဝါ သမာဒိယန္တေန သမာဒိန္နာနိ ဟောန္တိ, တထာ ဧတာနိပိ. အင်္ဂတောပိ ယထာ တတ္ထ ပါဏာတိပါတာဒီနံ အင်္ဂဘေဒေါ ဝုတ္တော, ဧဝမိဓာပိ ဝိကာလဘောဇနဿ စတ္တာရိ အင်္ဂါနိ – ဝိကာလော, ယာဝကာလိကံ, အဇ္ဈောဟရဏံ, အနုမ္မတ္တကတာတိ. ဧတေနာနုသာရေန သေသာနမ္ပိ အင်္ဂဝိဘာဂေါ ဝေဒိတဗ္ဗော. ယထာ စ တတ္ထ သမုဋ္ဌာနတော သုရာမေရယမဇ္ဇပမာဒဋ္ဌာနံ ကာယတော စ ကာယစိတ္တတော စာတိ ဒွိသမုဋ္ဌာနံ, ဧဝမိဓ ဝိကာလဘောဇနံ. ဧတေန နယေန သဗ္ဗေသံ သမုဋ္ဌာနံ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ယထာ စ တတ္ထ ဝေဒနာတော အဒိန္နာဒါနံ တီသု ဝေဒနာသု အညတရဝေဒနာသမ္ပယုတ္တံ, တထာ ဣဓ ဝိကာလဘောဇနံ. ဧတေန နယေန သဗ္ဗေသံ ဝေဒနာသမ္ပယောဂေါ ဝေဒိတဗ္ဗော. ယထာ စ တတ္ထ အဗြဟ္မစရိယံ လောဘမောဟမူလံ, ဧဝမိဓ ဝိကာလဘောဇနံ. အပရာနိ စ ဒွေ ဧတေန နယေန သဗ္ဗေသံ မူလဘေဒေါ ဝေဒိတဗ္ဗော. ယထာ စ တတ္ထ ပါဏာတိပါတာဒယော ကာယကမ္မံ, ဧဝမိဓာပိ ဝိကာလဘောဇနာဒီနိ. ဇာတရူပရဇတပ္ပဋိဂ္ဂဟဏံ ပန ကာယကမ္မံ ဝါ သိယာ ဝစီကမ္မံ ဝါ ကာယဒွါရာဒီဟိ ပဝတ္တိသဗ္ဘာဝပရိယာယေန, န ကမ္မပထဝသေန. ဝိရမတောတိ ယထာ စ တတ္ထ ဝိရမန္တော အတ္တနော ဝါ ပရေသံ ဝါ ပါဏာတိပါတာဒိအကုသလတော ဝိရမတိ, ဧဝမိဓာပိ ဝိကာလဘောဇနာဒိအကုသလတော, ကုသလတောပိ ဝါ ဧကတော. ယထာ စ ပုရိမာ ပဉ္စ ဝေရမဏိယော စတုသမုဋ္ဌာနာ ကာယတော, ကာယစိတ္တတော, ဝါစာစိတ္တတော, ကာယဝါစာစိတ္တတော စာတိ, သဗ္ဗာ သုခဝေဒနာသမ္ပယုတ္တာ ဝါ အဒုက္ခမသုခဝေဒနာသမ္ပယုတ္တာ ဝါ, အလောဘာဒေါသမူလာ ဝါ အလောဘာဒေါသာမောဟမူလာ ဝါ, သဗ္ဗာ စ နာနပ္ပကာရဣဋ္ဌဖလနိဗ္ဗတ္တကာ, တထာ ဣဓာပီတိ. इसकी अर्थ-व्याख्या इस प्रकार है - उन पूर्ववर्ती पाँच शिक्षापदों की व्याख्या में जो कुछ भी उचित है, उसे वहाँ से लेकर बाद के पाँच शिक्षापदों में भी लागू किया जाना चाहिए। वहाँ यह योजना है - जैसे पूर्ववर्ती शिक्षापदों में आलम्बन की दृष्टि से 'सुरामेरयमज्जपमादट्ठान' (मदिरापान) रूपादि किसी एक संस्कार का आलम्बन वाला है, वैसे ही यहाँ 'विकालभोजन' (असमय भोजन) भी है। इसी रीति से सभी शिक्षापदों के आलम्बन-भेद को समझना चाहिए। ग्रहण करने की दृष्टि से, जैसे पूर्ववर्ती शिक्षापदों को श्रामणेर या उपासक द्वारा ग्रहण करने पर वे समादत्त (ग्रहण किए हुए) होते हैं, वैसे ही ये भी हैं। अंगों की दृष्टि से भी, जैसे वहाँ प्राणातिपात आदि के अंगों का भेद बताया गया है, वैसे ही यहाँ विकालभोजन के चार अंग हैं - विकाल (असमय), यावकालिक (भोजन), अज्झोहरण (निगलना), और अनुरुन्मत्तकता (पागल न होना)। इसी अनुसरण में शेष शिक्षापदों के अंगों का विभाजन भी समझना चाहिए। जैसे वहाँ समुत्थान की दृष्टि से 'सुरामेरयमज्जपमादट्ठान' काय से और काय-चित्त से - इस प्रकार दो समुत्थानों वाला है, वैसे ही यहाँ विकालभोजन है। इसी रीति से सभी का समुत्थान समझना चाहिए। जैसे वहाँ वेदना की दृष्टि से 'अदिन्नादान' (चोरी) तीन वेदनाओं में से किसी एक वेदना से सम्प्रयुक्त है, वैसे ही यहाँ विकालभोजन है। इसी रीति से सभी का वेदना-सम्प्रयोग समझना चाहिए। जैसे वहाँ 'अब्रह्मचर्य' लोभ और मोह मूल वाला है, वैसे ही यहाँ विकालभोजन है। अन्य दो भी इसी रीति से हैं, और सभी के मूल-भेद को समझना चाहिए। जैसे वहाँ प्राणातिपात आदि काय-कर्म हैं, वैसे ही यहाँ विकालभोजन आदि भी हैं। 'जातरूपरजतप्पटिग्गहण' (सोना-चाँदी स्वीकार करना) तो काय-द्वार आदि के माध्यम से होने वाली प्रवृत्ति के स्वभाव के पर्याय से काय-कर्म, वची-कर्म या मनो-कर्म हो सकता है, न कि कर्मपथ के वश से। 'विरमतो' (विरत होने वाला) के विषय में, जैसे वहाँ विरत होने वाला स्वयं के या दूसरों के प्राणातिपात आदि अकुशल से विरत होता है, वैसे ही यहाँ विकालभोजन आदि अकुशल से, या कुशल की ओर से भी विरत होता है। जैसे पूर्ववर्ती पाँच विरतियाँ चार समुत्थानों वाली हैं - काय से, काय-चित्त से, वाचा-चित्त से, और काय-वाचा-चित्त से, और सभी सुख-वेदना से सम्प्रयुक्त या अदुक्खमसुख-वेदना से सम्प्रयुक्त हैं, अलोभ-अदोष मूल वाली या अलोभ-अदोष-अमोह मूल वाली हैं, और सभी नाना प्रकार के इष्ट फलों को उत्पन्न करने वाली हैं, वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिए। ‘‘ယောဇေတဗ္ဗံ တတော ယုတ္တံ, ပစ္ဆိမေသွပိ ပဉ္စသု; အာဝေဏိကဉ္စ ဝတ္တဗ္ဗံ, ဉေယျာ ဟီနာဒိတာပိ စာ’’တိ. – "अतः जो उचित है उसे बाद के पाँच शिक्षापदों में भी लागू किया जाना चाहिए; उनकी विशिष्टताओं (आवेणिक) को भी बताया जाना चाहिए, और हीनता आदि के भेद को भी समझना चाहिए।" ဧတ္ထ ပန ဝိကာလဘောဇနန္တိ မဇ္ဈနှိကဝီတိက္ကမေ ဘောဇနံ. ဧတဉှိ အနုညာတကာလေ ဝီတိက္ကန္တေ ဘောဇနံ, တသ္မာ ‘‘ဝိကာလဘောဇန’’န္တိ ဝုစ္စတိ[Pg.26], တတော ဝိကာလဘောဇနာ. နစ္စဂီတဝါဒိတဝိသူကဒဿနန္တိ ဧတ္ထ နစ္စံ နာမ ယံကိဉ္စိ နစ္စံ, ဂီတန္တိ ယံကိဉ္စိ ဂီတံ, ဝါဒိတန္တိ ယံကိဉ္စိ ဝါဒိတံ. ဝိသူကဒဿနန္တိ ကိလေသုပ္ပတ္တိပစ္စယတော ကုသလပက္ခဘိန္ဒနေန ဝိသူကာနံ ဒဿနံ, ဝိသူကဘူတံ ဝါ ဒဿနံ ဝိသူကဒဿနံ. နစ္စာ စ ဂီတာ စ ဝါဒိတာ စ ဝိသူကဒဿနာ စ နစ္စဂီတဝါဒိတဝိသူကဒဿနာ. ဝိသူကဒဿနဉ္စေတ္ထ ဗြဟ္မဇာလေ ဝုတ္တနယေနေဝ ဂဟေတဗ္ဗံ. ဝုတ္တဉှိ တတ္ထ – यहाँ 'विकालभोजन' का अर्थ है दोपहर बीत जाने के बाद भोजन करना। चूँकि यह अनुमत समय बीत जाने के बाद का भोजन है, इसलिए इसे 'विकालभोजन' कहा जाता है। 'नच्चगीतवादितविसूकदस्सन' में 'नच्च' (नृत्य) का अर्थ है कोई भी नृत्य, 'गीत' का अर्थ है कोई भी गीत, 'वादित' का अर्थ है कोई भी वाद्य बजाना। 'विसूकदस्सन' का अर्थ है क्लेशों की उत्पत्ति का कारण होने से कुशल पक्ष को नष्ट करने वाले तमाशों को देखना, अथवा तमाशा बन चुके दृश्यों को देखना 'विसूकदस्सन' है। नृत्य, गीत, वाद्य और तमाशों का देखना - ये सब मिलकर 'नच्चगीतवादितविसूकदस्सन' कहलाते हैं। यहाँ 'विसूकदस्सन' का लक्षण ब्रह्मजाल सुत्त में बताए गए तरीके से ही ग्रहण करना चाहिए। वहाँ कहा गया है - ‘‘ယထာ ဝါ ပနေကေ ဘောန္တော သမဏဗြာဟ္မဏာ သဒ္ဓါဒေယျာနိ ဘောဇနာနိ ဘုဉ္ဇိတွာ တေ ဧဝရူပံ ဝိသူကဒဿနမနုယုတ္တာ ဝိဟရန္တိ, သေယျထိဒံ, နစ္စံ ဂီတံ ဝါဒိတံ ပေက္ခံ အက္ခာနံ ပါဏိဿရံ ဝေတာလံ ကုမ္ဘထူဏံ သောဘနကံ စဏ္ဍာလံ ဝံသံ ဓောဝနံ ဟတ္ထိယုဒ္ဓံ အဿယုဒ္ဓံ မဟိံသယုဒ္ဓံ ဥသဘယုဒ္ဓံ အဇယုဒ္ဓံ မေဏ္ဍယုဒ္ဓံ ကုက္ကုဋယုဒ္ဓံ ဝဋ္ဋကယုဒ္ဓံ ဒဏ္ဍယုဒ္ဓံ မုဋ္ဌိယုဒ္ဓံ နိဗ္ဗုဒ္ဓံ ဥယျောဓိကံ ဗလဂ္ဂံ သေနာဗျူဟံ အနီကဒဿနံ ဣတိ ဝါ, ဣတိ ဧဝရူပါ ဝိသူကဒဿနာ ပဋိဝိရတော သမဏော ဂေါတမော’’တိ (ဒီ. နိ. ၁.၁၂). "अथवा जैसे कुछ भदन्त श्रमण और ब्राह्मण श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजनों को ग्रहण करके इस प्रकार के तमाशों (विसूकदस्सन) को देखने में लगे रहते हैं, जैसे कि - नृत्य, गीत, वाद्य, प्रेक्षा (नाटक), आख्यान (कथा-वाचन), पाणिस्वर (हाथों से ताल बजाना), वेताल (ताल वाद्य), कुम्भथूण (घड़े जैसा वाद्य), शोभनक (कलात्मक प्रदर्शन), चण्डाल (बाजीगरी), वंश (बाँस पर चढ़ना), धोवन (हड्डियों का खेल), हाथी-युद्ध, अश्व-युद्ध, महिष-युद्ध, वृषभ-युद्ध, अज-युद्ध, मेष-युद्ध, कुक्कुट-युद्ध, वर्तक-युद्ध, दण्ड-युद्ध, मुष्टि-युद्ध, कुश्ती, युद्ध-अभ्यास, सेना की गिनती, सेना की व्यूह-रचना, अनीक-दर्शन (सेना का निरीक्षण) आदि; इस प्रकार के तमाशों को देखने से श्रमण गौतम विरत रहते हैं।" အထ ဝါ ယထာဝုတ္တေနတ္ထေန နစ္စဂီတဝါဒိတာနိ ဧဝ ဝိသူကာနိ နစ္စဂီတဝါဒိတဝိသူကာနိ, တေသံ ဒဿနံ နစ္စဂီတဝါဒိတဝိသူကဒဿနံ, တသ္မာ နစ္စဂီတဝါဒိတဝိသူကဒဿနာ. ‘‘ဒဿနသဝနာ’’တိ ဝတ္တဗ္ဗေ ယထာ ‘‘သော စ ဟောတိ မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိကော ဝိပရီတဒဿနော’’တိ ဧဝမာဒီသု (အ. နိ. ၁.၃၀၈) အစက္ခုဒွါရပ္ပဝတ္တမ္ပိ ဝိသယဂ္ဂဟဏံ ‘‘ဒဿန’’န္တိ ဝုစ္စတိ, ဧဝံ သဝနမ္ပိ ‘‘ဒဿန’’န္တွေဝ ဝုတ္တံ. ဒဿနကမျတာယ ဥပသင်္ကမိတွာ ပဿတော ဧဝ စေတ္ထ ဝီတိက္ကမော ဟောတိ. ဌိတနိသိန္နသယနောကာသေ ပန အာဂတံ ဂစ္ဆန္တဿ ဝါ အာပါထဂတံ ပဿတော သိယာ သံကိလေသော, န ဝီတိက္ကမော. ဓမ္မူပသံဟိတမ္ပိ စေတ္ထ ဂီတံ န ဝဋ္ဋတိ, ဂီတူပသံဟိတော ပန ဓမ္မော ဝဋ္ဋတီတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. अथवा, पूर्वोक्त अर्थ के अनुसार नृत्य, गीत और वाद्य ही तमाशे (विसूक) हैं, और उन्हें देखना 'नच्चगीतवादितविसूकदस्सन' है। यद्यपि यहाँ 'देखना और सुनना' (दस्सन-सवन) कहा जाना चाहिए था, फिर भी जैसे "वह मिथ्यादृष्टि और विपरीत दर्शन वाला होता है" आदि स्थलों पर चक्षु-द्वार के अतिरिक्त अन्य द्वारों से होने वाले विषय-ग्रहण को भी 'दर्शन' कहा जाता है, वैसे ही यहाँ सुनने को भी 'दर्शन' ही कहा गया है। यहाँ देखने की इच्छा से पास जाकर देखने वाले का ही उल्लंघन (नियम भंग) होता है। लेकिन खड़े होने, बैठने या लेटने के स्थान पर स्वयं आए हुए या मार्ग में चलते हुए सामने आए हुए दृश्य को देखने वाले को संक्लेश (चित्त की मलिनता) तो हो सकता है, पर उल्लंघन नहीं होता। यहाँ धर्म से संबंधित गीत भी उचित नहीं है, लेकिन गीत की लय में कहा गया धर्म उचित है - ऐसा समझना चाहिए। မာလာဒီနိ ဓာရဏာဒီဟိ ယထာသင်္ချံ ယောဇေတဗ္ဗာနိ. တတ္ထ မာလာတိ ယံကိဉ္စိ ပုပ္ဖဇာတံ. ဝိလေပနန္တိ ယံကိဉ္စိ ဝိလေပနတ္ထံ ပိသိတွာ ပဋိယတ္တံ. အဝသေသံ သဗ္ဗမ္ပိ ဝါသစုဏ္ဏဓူပနာဒိကံ ဂန္ဓဇာတံ ဂန္ဓော. တံ သဗ္ဗမ္ပိ မဏ္ဍနဝိဘူသနတ္ထံ န ဝဋ္ဋတိ, ဘေသဇ္ဇတ္ထန္တု ဝဋ္ဋတိ, ပူဇနတ္ထဉ္စ အဘိဟဋံ သာဒိယတော န ကေနစိ ပရိယာယေန န ဝဋ္ဋတိ. ဥစ္စာသယနန္တိ ပမာဏာတိက္ကန္တံ ဝုစ္စတိ. မဟာသယနန္တိ အကပ္ပိယသယနံ အကပ္ပိယတ္ထရဏဉ္စ. တဒုဘယမ္ပိ သာဒိယတော [Pg.27] န ကေနစိ ပရိယာယေန ဝဋ္ဋတိ. ဇာတရူပန္တိ သုဝဏ္ဏံ. ရဇတန္တိ ကဟာပဏော, လောဟမာသကဒါရုမာသကဇတုမာသကာဒိ ယံ ယံ တတ္ထ တတ္ထ ဝေါဟာရံ ဂစ္ဆတိ, တဒုဘယမ္ပိ ဇာတရူပရဇတံ. တဿ ယေန ကေနစိ ပကာရေန သာဒိယနံ ပဋိဂ္ဂဟော နာမ, သော န ယေန ကေနစိ ပရိယာယေန ဝဋ္ဋတီတိ ဧဝံ အာဝေဏိကံ ဝတ္တဗ္ဗံ. माला आदि को धारण करने आदि के साथ यथाक्रम जोड़ना चाहिए। वहाँ 'माला' का अर्थ है कोई भी पुष्प। 'विलेपन' का अर्थ है कोई भी लेपन के लिए पीसकर तैयार की गई वस्तु। शेष सभी सुगन्धित चूर्ण, धूप आदि 'गन्ध' हैं। वह सब सजावट और श्रृंगार के लिए अनुचित है, किन्तु औषधि के लिए उचित है। पूजा के लिए लाए गए पुष्प-गन्ध को स्वीकार करने वाले के लिए किसी भी प्रकार से अनुचित नहीं है, बल्कि उचित ही है। 'उच्चाशयन' का अर्थ है प्रमाण से अधिक ऊँचे पैरों वाला पलंग या पीठ। 'महाशयन' का अर्थ है अनुचित शय्या और अनुचित बिछौना। इन दोनों को स्वीकार करने वाले के लिए किसी भी प्रकार से उचित नहीं है। 'जातरूप' का अर्थ है सुवर्ण (सोना)। 'रजत' का अर्थ है कार्षापण (सिक्का), ताँबे के माषक, लकड़ी के माषक, लाख के माषक आदि जो जहाँ-जहाँ व्यवहार में आते हैं, वे दोनों 'जातरूप-रजत' कहलाते हैं। उसे किसी भी प्रकार से स्वीकार करना 'प्रतिग्रह' कहलाता है, वह किसी भी प्रकार से उचित नहीं है - इस प्रकार यह विशेष नियम कहा जाना चाहिए। ဒသပိ စေတာနိ သိက္ခာပဒါနိ ဟီနေန ဆန္ဒေန စိတ္တဝီရိယဝီမံသာဟိ ဝါ သမာဒိန္နာနိ ဟီနာနိ, မဇ္ဈိမေဟိ မဇ္ဈိမာနိ, ပဏီတေဟိ ပဏီတာနိ. တဏှာဒိဋ္ဌိမာနေဟိ ဝါ ဥပက္ကိလိဋ္ဌာနိ ဟီနာနိ, အနုပက္ကိလိဋ္ဌာနိ မဇ္ဈိမာနိ, တတ္ထ တတ္ထ ပညာယ အနုဂ္ဂဟိတာနိ ပဏီတာနိ. ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တေန ဝါ ကုသလစိတ္တေန သမာဒိန္နာနိ ဟီနာနိ, သသင်္ခါရိကဉာဏသမ္ပယုတ္တေန မဇ္ဈိမာနိ, အသင်္ခါရိကေန ပဏီတာနီတိ ဧဝံ ဉေယျာ ဟီနာဒိတာပိ စာတိ. ये दसों शिक्षापद हीन छन्द (इच्छा), चित्त, वीर्य या विमंसा (प्रज्ञा) से ग्रहण किए जाने पर 'हीन' होते हैं; मध्यम से 'मध्यम' और उत्तम से 'उत्तम' होते हैं। अथवा तृष्णा, दृष्टि और मान से मलिन होने पर 'हीन' होते हैं; अमलिन होने पर 'मध्यम' और वहाँ-वहाँ प्रज्ञा द्वारा अनुगृहीत होने पर 'उत्तम' होते हैं। अथवा ज्ञान-विप्रयुक्त कुशल चित्त से ग्रहण किए जाने पर 'हीन', ससंस्कारिक ज्ञान-सम्प्रयुक्त से 'मध्यम' और असंस्कारिक से 'उत्तम' होते हैं - इस प्रकार हीनता आदि को भी जानना चाहिए। ဧတ္တာဝတာ စ ယာ ပုဗ္ဗေ ‘‘ယေန ယတ္ထ ယဒါ ယသ္မာ’’တိအာဒီဟိ ဆဟိ ဂါထာဟိ သိက္ခာပဒပါဌဿ ဝဏ္ဏနတ္ထံ မာတိကာ နိက္ခိတ္တာ, သာ အတ္ထတော ပကာသိတာ ဟောတီတိ. यहाँ तक, पहले जो 'येन यत्थ यदा यस्मा' आदि छह गाथाओं द्वारा शिक्षापद पाठ की व्याख्या के लिए मातृका (विषय-सूची) रखी गई थी, वह अर्थतः प्रकाशित हो गई है। ပရမတ္ထဇောတိကာယ ခုဒ္ဒကပါဌ-အဋ္ဌကထာယ परमत्थजोतिका नामक खुद्दकपाठ-अट्ठकथा में। သိက္ခာပဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. शिक्षापद-वर्णना समाप्त हुई। ၃. ဒွတ္တိံသာကာရဝဏ္ဏနာ ३. द्वात्रिंशाकार-वर्णना (बत्तीस अंगों की व्याख्या)। ပဒသမ္ဗန္ဓဝဏ္ဏနာ पद-सम्बन्ध-वर्णना। ဣဒါနိ ယဒိဒံ ဧဝံ ဒသဟိ သိက္ခာပဒေဟိ ပရိသုဒ္ဓပယောဂဿ သီလေ ပတိဋ္ဌိတဿ ကုလပုတ္တဿ အာသယပရိသုဒ္ဓတ္ထံ စိတ္တဘာဝနတ္ထဉ္စ အညတြ ဗုဒ္ဓုပ္ပာဒါ အပ္ပဝတ္တပုဗ္ဗံ သဗ္ဗတိတ္ထိယာနံ အဝိသယဘူတံ တေသု တေသု သုတ္တန္တေသု – अब, इन दस शिक्षापदों द्वारा शुद्ध आचरण वाले और शील में प्रतिष्ठित कुलपुत्र के आशय की शुद्धि और चित्त की भावना के लिए, बुद्ध के उत्पाद के अतिरिक्त अन्य समय में जो पहले कभी प्रवृत्त नहीं हुआ और जो सभी तीर्थिकों के विषय से बाहर है, उन-उन सुत्तों में— ‘‘ဧကဓမ္မော, ဘိက္ခဝေ, ဘာဝိတော ဗဟုလီကတော မဟတော သံဝေဂါယ သံဝတ္တတိ. မဟတော အတ္ထာယ သံဝတ္တတိ. မဟတော ယောဂက္ခေမာယ သံဝတ္တတိ. မဟတော သတိသမ္ပဇညာယ သံဝတ္တတိ. ဉာဏဒဿနပ္ပဋိလာဘာယ သံဝတ္တတိ. ဒိဋ္ဌဓမ္မသုခဝိဟာရာယ သံဝတ္တတိ. ဝိဇ္ဇာဝိမုတ္တိဖလသစ္ဆိကိရိယာယ သံဝတ္တတိ. ကတမော [Pg.28] ဧကဓမ္မော? ကာယဂတာ သတိ. အမတံ တေ, ဘိက္ခဝေ, န ပရိဘုဉ္ဇန္တိ, ယေ ကာယဂတာသတိံ န ပရိဘုဉ္ဇန္တိ. အမတံ တေ, ဘိက္ခဝေ, ပရိဘုဉ္ဇန္တိ, ယေ ကာယဂတာသတိံ ပရိဘုဉ္ဇန္တိ. အမတံ တေသံ, ဘိက္ခဝေ, အပရိဘုတ္တံ ပရိဘုတ္တံ, ပရိဟီနံ အပရိဟီနံ, ဝိရဒ္ဓံ အာရဒ္ဓံ, ယေသံ ကာယဂတာ သတိ အာရဒ္ဓါ’’တိ. (အ. နိ. ၁.၅၆၄-၅၇၀) – "भिक्षुओं! एक धर्म भावित और बहुलीकृत होने पर महान संवेग के लिए होता है, महान अर्थ के लिए होता है, महान योगक्षेम के लिए होता है, महान स्मृति और सम्प्रजन्य के लिए होता है, ज्ञान-दर्शन की प्राप्ति के लिए होता है, दृष्टधर्म (वर्तमान जीवन) में सुखपूर्वक विहार के लिए होता है, और विद्या-विमुक्ति के फल के साक्षात्कार के लिए होता है। वह एक धर्म कौन सा है? वह है 'कायगता सति' (शरीर के प्रति स्मृति)। भिक्षुओं! जो कायगता सति का उपभोग नहीं करते, वे अमृत (निर्वाण) का उपभोग नहीं करते। भिक्षुओं! जो कायगता सति का उपभोग करते हैं, वे अमृत का उपभोग करते हैं। भिक्षुओं! जिन्होंने कायगता सति का उपभोग किया है, उन्होंने अमृत का उपभोग किया है; जिन्होंने नहीं किया, उन्होंने अमृत का उपभोग नहीं किया। भिक्षुओं! जिनकी कायगता सति नष्ट हो गई है, उनका अमृत नष्ट हो गया है; जिनकी नष्ट नहीं हुई, उनका अमृत नष्ट नहीं हुआ। भिक्षुओं! जिनकी कायगता सति चूक गई है, उनका अमृत चूक गया है; जिनकी नहीं चूकी, उनका अमृत नहीं चूका। भिक्षुओं! जिन्होंने कायगता सति का आरम्भ किया है, उन्होंने अमृत का आरम्भ किया है।" ဧဝံ ဘဂဝတာ အနေကာကာရေန ပသံသိတွာ – इस प्रकार भगवान द्वारा अनेक प्रकार से प्रशंसा किए जाने के बाद— ‘‘ကထံ ဘာဝိတာ, ဘိက္ခဝေ, ကာယဂတာသတိ ကထံ ဗဟုလီကတာ မဟဗ္ဗလာ ဟောတိ မဟာနိသံသာ? ဣဓ, ဘိက္ခဝေ, ဘိက္ခု အရညဂတော ဝါ’’တိ (မ. နိ. ၃.၁၅၄) – "भिक्षुओं! कायगता सति कैसे भावित और कैसे बहुलीकृत होने पर महाबलशाली और महान लाभ देने वाली होती है? यहाँ, भिक्षुओं! भिक्षु अरण्य में गया हुआ..." အာဒိနာ နယေန အာနာပါနပဗ္ဗံ ဣရိယာပထပဗ္ဗံ စတုသမ္ပဇညပဗ္ဗံ ပဋိကူလမနသိကာရပဗ္ဗံ ဓာတုမနသိကာရပဗ္ဗံ နဝ သိဝထိကပဗ္ဗာနီတိ ဣမေသံ စုဒ္ဒသန္နံ ပဗ္ဗာနံ ဝသေန ကာယဂတာသတိကမ္မဋ္ဌာနံ နိဒ္ဒိဋ္ဌံ. တဿ ဘာဝနာနိဒ္ဒေသော အနုပ္ပတ္တော. တတ္ထ ယသ္မာ ဣရိယာပထပဗ္ဗံ စတုသမ္ပဇညပဗ္ဗံ ဓာတုမနသိကာရပဗ္ဗန္တိ ဣမာနိ တီဏိ ဝိပဿနာဝသေန ဝုတ္တာနိ. နဝ သိဝထိကပဗ္ဗာနိ ဝိပဿနာဉာဏေသုယေဝ အာဒီနဝါနုပဿနာဝသေန ဝုတ္တာနိ. ယာပိ စေတ္ထ ဥဒ္ဓုမာတကာဒီသု သမာဓိဘာဝနာ ဣစ္ဆေယျ, သာ ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂေ ဝိတ္ထာရတော အသုဘဘာဝနာနိဒ္ဒေသေ ပကာသိတာ ဧဝ. အာနာပါနပဗ္ဗံ ပန ပဋိကူလမနသိကာရပဗ္ဗဉ္စေတိ ဣမာနေတ္ထ ဒွေ သမာဓိဝသေန ဝုတ္တာနိ. တေသု အာနာပါနပဗ္ဗံ အာနာပါနဿတိဝသေန ဝိသုံ ကမ္မဋ္ဌာနံယေဝ. ယံ ပနေတံ – इस आदि विधि से आनापान-पर्व, ईर्यापथ-पर्व, चतु-सम्प्रजन्य-पर्व, प्रतिकूल-मनसिकार-पर्व, धातु-मनसिकार-पर्व और नौ शिवथिक-पर्व—इन चौदह पर्वों के माध्यम से कायगतासति-कर्मस्थान का निर्देश किया गया है। उसकी भावना का निर्देश यहाँ प्राप्त है। वहाँ, चूँकि ईर्यापथ-पर्व, चतु-सम्प्रजन्य-पर्व और धातु-मनसिकार-पर्व—ये तीन विपश्यना के दृष्टिकोण से कहे गए हैं। नौ शिवथिक-पर्व विपश्यना-ज्ञानों में ही आदिनानुपश्यना के दृष्टिकोण से कहे गए हैं। यदि यहाँ उधुमातक आदि में समाधि-भावना की इच्छा हो, तो वह विशुद्धिमार्ग के 'अशुभ-भावना-निर्देश' में विस्तार से प्रकाशित की गई है। किन्तु आनापान-पर्व और प्रतिकूल-मनसिकार-पर्व—ये दो यहाँ समाधि के दृष्टिकोण से कहे गए हैं। उनमें से आनापान-पर्व आनापानसति के रूप में एक अलग ही कर्मस्थान है। किन्तु जो यह है— ‘‘ပုန စပရံ, ဘိက္ခဝေ, ဘိက္ခု ဣမမေဝ ကာယံ ဥဒ္ဓံ ပါဒတလာ အဓော ကေသမတ္ထကာ တစပရိယန္တံ ပူရံ နာနပ္ပကာရဿ အသုစိနော ပစ္စဝေက္ခတိ ‘အတ္ထိ ဣမသ္မိံ ကာယေ ကေသာ, လောမာ…ပေ… မုတ္တ’’န္တိ (မ. နိ. ၃.၁၅၄). "फिर और भी, भिक्षुओं! भिक्षु इसी शरीर को पैर के तलवों से ऊपर और केशों के अग्रभाग से नीचे, त्वचा से घिरे हुए और अनेक प्रकार की अशुद्धियों से भरे हुए के रूप में प्रत्यवेक्षण करता है—'इस शरीर में केश हैं, रोम हैं... (पे)... मूत्र है'।" ဧဝံ တတ္ထ တတ္ထ မတ္ထလုင်္ဂံ အဋ္ဌိမိဉ္ဇေန သင်္ဂဟေတွာ ဒေသိတံ ကာယဂတာသတိကောဋ္ဌာသဘာဝနာပရိယာယံ ဒွတ္တိံသာကာရကမ္မဋ္ဌာနံ အာရဒ္ဓံ, တဿာယံ အတ္ထဝဏ္ဏနာ – इस प्रकार उन-उन स्थानों पर 'अस्थि-मिञ्ज' शब्द के साथ 'मत्थलुङ्ग' (मस्तिष्क) को सम्मिलित करके उपदेश दिया गया है। कायगतासति के अंगों की भावना की विधि वाला यह 'द्वात्रिंशाकार-कर्मस्थान' आरम्भ किया गया है, यह उसकी अर्थ-व्याख्या है— တတ္ထ အတ္ထီတိ သံဝိဇ္ဇန္တိ. ဣမသ္မိန္တိ ယွာယံ ဥဒ္ဓံ ပါဒတလာ အဓော ကေသမတ္ထကာ တစပရိယန္တော ပူရော နာနပ္ပကာရဿ အသုစိနောတိ ဝုစ္စတိ, တသ္မိံ[Pg.29]. ကာယေတိ သရီရေ. သရီရဉှိ အသုစိသဉ္စယတော, ကုစ္ဆိတာနံ ဝါ ကေသာဒီနဉ္စေဝ စက္ခုရောဂါဒီနဉ္စ ရောဂသတာနံ အာယဘူတတော ကာယောတိ ဝုစ္စတိ. ကေသာ…ပေ… မုတ္တန္တိ ဧတေ ကေသာဒယော ဒွတ္တိံသာကာရာ, တတ္ထ ‘‘အတ္ထိ ဣမသ္မိံ ကာယေ ကေသာ အတ္ထိ လောမာ’’တိ ဧဝံ သမ္ဗန္ဓော ဝေဒိတဗ္ဗော. တေန ကိံ ကထိတံ ဟောတိ? ဣမသ္မိံ ပါဒတလာ ပဋ္ဌာယ ဥပရိ, ကေသမတ္ထကာ ပဋ္ဌာယ ဟေဋ္ဌာ, တစတော ပဋ္ဌာယ ပရိတောတိ ဧတ္တကေ ဗျာမမတ္တေ ကဠေဝရေ သဗ္ဗာကာရေနာပိ ဝိစိနန္တော န ကောစိ ကိဉ္စိ မုတ္တံ ဝါ မဏိံ ဝါ ဝေဠုရိယံ ဝါ အဂရုံ ဝါ စန္ဒနံ ဝါ ကုင်္ကုမံ ဝါ ကပ္ပူရံ ဝါ ဝါသစုဏ္ဏာဒိံ ဝါ အဏုမတ္တမ္ပိ သုစိဘာဝံ ပဿတိ, အထ ခေါ ပရမဒုဂ္ဂန္ဓဇေဂုစ္ဆံ အဿိရိကဒဿနံ နာနပ္ပကာရံ ကေသလောမာဒိဘေဒံ အသုစိမေဝ ပဿတီတိ. वहाँ 'अत्थि' (है) का अर्थ है 'विद्यमान हैं'। 'इमस्मिं' (इसमें) का अर्थ है—जिसे पैरों के तलवों से ऊपर और बालों के अग्रभाग से नीचे, त्वचा से घिरा हुआ और अनेक प्रकार की अशुद्धियों से भरा हुआ 'काया' कहा जाता है, उस (काया) में। 'काये' का अर्थ है शरीर में। शरीर को अशुद्धियों के संचय के कारण, अथवा निंदनीय केश आदि और सैकड़ों रोगों का आश्रय होने के कारण 'काया' कहा जाता है। केश... (आदि) ... मूत्र—ये केश आदि बत्तीस प्रकार के अंग हैं। वहाँ 'इस काया में केश हैं, रोम हैं'—इस प्रकार संबंध समझना चाहिए। इससे क्या कहा गया है? इस पैरों के तलवों से ऊपर, सिर के बालों से नीचे और त्वचा से चारों ओर घिरे हुए इस व्यायाम-मात्र (एक हाथ की लंबाई वाले) शरीर में सभी प्रकार से खोजने पर भी कोई व्यक्ति मोती, मणि, वैदूर्य, अगरु, चन्दन, कुंकुम, कपूर या सुगन्धित चूर्ण आदि जैसी अणु-मात्र भी पवित्रता नहीं देखता है; बल्कि वह केवल अत्यंत दुर्गन्धित, घृणास्पद, शोभाहीन और अनेक प्रकार के केश-रोम आदि भेदों वाली अशुद्धि को ही देखता है। အယံ တာဝေတ္ထ ပဒသမ္ဗန္ဓတော ဝဏ္ဏနာ. यह यहाँ पदों के संबंध के अनुसार व्याख्या है। အသုဘဘာဝနာ अशुभ भावना အသုဘဘာဝနာဝသေန ပနဿ ဧဝံ ဝဏ္ဏနာ ဝေဒိတဗ္ဗာ – ဧဝမေတသ္မိံ ပါဏာတိပါတာဝေရမဏိသိက္ခာပဒါဒိဘေဒေ သီလေ ပတိဋ္ဌိတေန ပယောဂသုဒ္ဓေန အာဒိကမ္မိကေန ကုလပုတ္တေန အာသယသုဒ္ဓိယာ အဓိဂမနတ္ထံ ဒွတ္တိံသာကာရကမ္မဋ္ဌာနဘာဝနာနုယောဂမနုယုဉ္ဇိတုကာမေန ပဌမံ တာဝဿ အာဝါသကုလလာဘဂဏကမ္မဒ္ဓါနဉာတိဂန္ထရောဂဣဒ္ဓိပလိဗောဓေန ကိတ္တိပလိဗောဓေန ဝါ သဟ ဒသ ပလိဗောဓာ ဟောန္တိ. အထာနေန အာဝါသကုလလာဘဂဏဉာတိကိတ္တီသု သင်္ဂပ္ပဟာနေန, ကမ္မဒ္ဓါနဂန္ထေသု အဗျာပါရေန, ရောဂဿ တိကိစ္ဆာယာတိ ဧဝံ တေ ဒသ ပလိဗောဓာ ဥပစ္ဆိန္ဒိတဗ္ဗာ, အထာနေန ဥပစ္ဆိန္နပလိဗောဓေန အနုပစ္ဆိန္နနေက္ခမ္မာဘိလာသေန ကောဋိပ္ပတ္တသလ္လေခဝုတ္တိတံ ပရိဂ္ဂဟေတွာ ခုဒ္ဒါနုခုဒ္ဒကမ္ပိ ဝိနယာစာရံ အပ္ပဇဟန္တေန အာဂမာဓိဂမသမန္နာဂတော တတော အညတရင်္ဂသမန္နာဂတော ဝါ ကမ္မဋ္ဌာနဒါယကော အာစရိယော ဝိနယာနုရူပေန ဝိဓိနာ ဥပဂန္တဗ္ဗော, ဝတ္တသမ္ပဒါယ စ အာရာဓိတစိတ္တဿ တဿ အတ္တနော အဓိပ္ပာယော နိဝေဒေတဗ္ဗော. တေန တဿ နိမိတ္တဇ္ဈာသယစရိယာဓိမုတ္တိဘေဒံ ဉတွာ ယဒိ ဧတံ ကမ္မဋ္ဌာနမနုရူပံ, အထ [Pg.30] ယသ္မိံ ဝိဟာရေ အတ္တနာ ဝသတိ, ယဒိ တသ္မိံယေဝ သောပိ ဝသိတုကာမော ဟောတိ, တတော သင်္ခေပတော ကမ္မဋ္ဌာနံ ဒါတဗ္ဗံ. အထ အညတြ ဝသိတုကာမော ဟောတိ, တတော ပဟာတဗ္ဗပရိဂ္ဂဟေတဗ္ဗာဒိကထနဝသေန သပုရေက္ခာရံ ရာဂစရိတာနုကုလာဒိကထနဝသေန သပ္ပဘေဒံ ဝိတ္ထာရေန ကထေတဗ္ဗံ. တေန တံ သပုရေက္ခာရံ သပ္ပဘေဒံ ကမ္မဋ္ဌာနံ ဥဂ္ဂဟေတွာ အာစရိယံ အာပုစ္ဆိတွာ ယာနိ တာနိ – अशुभ भावना के वश में इसकी व्याख्या इस प्रकार समझनी चाहिए—इस प्रकार प्राणातिपात से विरति आदि शिक्षापदों वाले शील में प्रतिष्ठित, शुद्ध प्रयास वाले और आदिकर्मिक (प्रारंभ करने वाले) कुलपुत्र को, आशय की शुद्धि और (मार्ग-फल की) प्राप्ति के लिए बत्तीस प्रकार के अंगों वाली कर्मस्थान-भावना के अभ्यास की इच्छा रखने वाले को, सबसे पहले आवास, कुल, लाभ, गण, कर्म (निर्माण कार्य), अध्वन (यात्रा), ज्ञाति (संबंधी), ग्रन्थ (अध्ययन), रोग और ऋद्धि (या कीर्ति) के साथ ये दस परिबोध (बाधाएँ) होते हैं। तब उसे आवास, कुल, लाभ, गण, ज्ञाति और कीर्ति में आसक्ति के त्याग द्वारा; कर्म और ग्रन्थ में व्याकुलता न रखने के द्वारा; और रोग की चिकित्सा के द्वारा—इस प्रकार उन दस परिबोधों को काट देना चाहिए। तब उन छिन्न-परिबोध (बाधाओं को दूर करने वाले), निष्काम भाव की अभिलाषा रखने वाले, परम संलेख-वृत्ति (अल्पेच्छता) को अपनाने वाले और क्षुद्रक-अनुक्षुद्रक विनय के नियमों का भी त्याग न करने वाले साधक को, आगम (शास्त्र) और अधिगम (साक्षात्कार) से संपन्न अथवा उनमें से किसी एक अंग से संपन्न कर्मस्थान देने वाले आचार्य के पास विनय के अनुरूप विधि से जाना चाहिए, और अपनी सेवा-शुश्रूषा से आचार्य के चित्त को प्रसन्न कर उन्हें अपना अभिप्राय बताना चाहिए। तब वे (आचार्य) उसके निमित्त, आशय, चर्या और अधिमुक्ति के भेद को जानकर, यदि यह कर्मस्थान उसके अनुरूप हो, और यदि वह उसी विहार में रहना चाहता हो जहाँ आचार्य स्वयं रहते हैं, तो उसे संक्षेप में कर्मस्थान देना चाहिए। यदि वह अन्यत्र रहना चाहता हो, तो उसे त्यागने योग्य और ग्रहण करने योग्य आदि के वर्णन के साथ, और राग-चर्या आदि के अनुकूल उपदेश के साथ विस्तार से कर्मस्थान बताना चाहिए। तब वह उस सविस्तार कर्मस्थान को ग्रहण कर और आचार्य से अनुमति लेकर— ‘‘မဟာဝါသံ နဝါဝါသံ, ဇရာဝါသဉ္စ ပန္ထနိံ; သောဏ္ဍိံ ပဏ္ဏဉ္စ ပုပ္ဖဉ္စ, ဖလံ ပတ္ထိတမေဝ စ. "बड़ा आवास, नया आवास, पुराना आवास, मार्ग पर स्थित आवास, जलाशय वाला, पत्तों वाला, फूलों वाला, फलों वाला और लोगों द्वारा वांछित आवास; ‘‘နဂရံ ဒါရုနာ ခေတ္တံ, ဝိသဘာဂေန ပဋ္ဋနံ; ပစ္စန္တသီမာသပ္ပာယံ, ယတ္ထ မိတ္တော န လဗ္ဘတိ. नगर के पास, लकड़ी (वन) के पास, खेत के पास, विजातीय (असंगत) लोगों वाला, पत्तन (बंदरगाह), सीमावर्ती क्षेत्र और अनुपयुक्त स्थान जहाँ मित्र न मिलता हो— ‘‘အဋ္ဌာရသေတာနိ ဌာနာနိ, ဣတိ ဝိညာယ ပဏ္ဍိတော; အာရကာ ပရိဝဇ္ဇေယျ, မဂ္ဂံ သပ္ပဋိဘယံ ယထာ’’တိ. (ဝိသုဒ္ဓိ. ၁.၅၂) – इन अठारह स्थानों को जानकर बुद्धिमान व्यक्ति को वैसे ही दूर से त्याग देना चाहिए जैसे भययुक्त मार्ग को।" ဧဝံ အဋ္ဌာရသ သေနာသနာနိ ပရိဝဇ္ဇေတဗ္ဗာနီတိ ဝုစ္စန္တိ. တာနိ ဝဇ္ဇေတွာ, ယံ တံ – इस प्रकार ये अठारह सेनासन (आवास) त्यागने योग्य कहे गए हैं। उन्हें त्याग कर, जो वह— ‘‘ကထဉ္စ, ဘိက္ခဝေ, သေနာသနံ ပဉ္စင်္ဂသမန္နာဂတံ ဟောတိ? ဣဓ, ဘိက္ခဝေ, သေနာသနံ နာတိဒူရံ ဟောတိ, နစ္စာသန္နံ, ဂမနာဂမနသမ္ပန္နံ, ဒိဝါ အပ္ပာကိဏ္ဏံ, ရတ္တိံ အပ္ပသဒ္ဒံ အပ္ပနိဂ္ဃောသံ အပ္ပဍံသမကသဝါတာတပသရီသပသမ္ဖဿံ. တသ္မိံ ခေါ ပန သေနာသနေ ဝိဟရန္တဿ အပ္ပကသိရေန ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ စီဝရပိဏ္ဍပါတသေနာသနဂိလာနပစ္စယဘေသဇ္ဇပရိက္ခာရာ. တသ္မိံ ခေါ ပန သေနာသနေ ထေရာ ဘိက္ခူ ဝိဟရန္တိ ဗဟုဿုတာ အာဂတာဂမာ ဓမ္မဓရာ ဝိနယဓရာ မာတိကာဓရာ, တေ ကာလေန ကာလံ ဥပသင်္ကမိတွာ ပရိပုစ္ဆတိ ပရိပဉှတိ ‘ဣဒံ, ဘန္တေ, ကထံ, ဣမဿ ကော အတ္ထော’တိ? တဿ, တေ အာယသ္မန္တော အဝိဝဋဉ္စေဝ ဝိဝရန္တိ, အနုတ္တာနီကတဉ္စ ဥတ္တာနိံ ကရောန္တိ, အနေကဝိဟိတေသု စ ကင်္ခါဌာနိယေသု ဓမ္မေသု ကင်္ခံ ပဋိဝိနောဒေန္တိ. ဧဝံ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, သေနာသနံ ပဉ္စင်္ဂသမန္နာဂတံ ဟောတီ’’တိ (အ. နိ. ၁၀.၁၁). – "भिक्षुओं! सेनासन पाँच अंगों से संपन्न कैसे होता है? यहाँ, भिक्षुओं! सेनासन न बहुत दूर होता है, न बहुत पास, आने-जाने के मार्ग से युक्त होता है, दिन में लोगों से रहित और रात में शांत, कम शोर वाला, डाँस-मच्छर, हवा, धूप और रेंगने वाले जीवों के स्पर्श से मुक्त होता है। उस सेनासन में विहार करने वाले को चीवर, पिण्डपात, सेनासन और ग्लान-प्रत्यय-भेषज-परिष्कार (दवाइयाँ) बिना कठिनाई के प्राप्त हो जाते हैं। उस सेनासन में बहुश्रुत, आगम के ज्ञाता, धम्मधर, विनयधर और मातृकाधर (अभिधम्म के ज्ञाता) स्थविर भिक्षु निवास करते हैं। वह समय-समय पर उनके पास जाकर पूछता है और चर्चा करता है—'भन्ते! यह कैसे है? इसका क्या अर्थ है?' वे आयुष्मान उसके लिए न खुले हुए (गूढ़) अर्थों को खोलते हैं, जो स्पष्ट नहीं है उसे स्पष्ट करते हैं, और अनेक प्रकार के संशयपूर्ण धर्मों में उसके संशय को दूर करते हैं। इस प्रकार, भिक्षुओं! सेनासन पाँच अंगों से संपन्न होता है।" ဧဝံ ပဉ္စင်္ဂသမန္နာဂတံ သေနာသနံ ဝုတ္တံ. တထာရူပံ သေနာသနံ ဥပဂမ္မ ကတသဗ္ဗကိစ္စေန ကာမေသု အာဒီနဝံ, နေက္ခမ္မေ စ အာနိသံသံ ပစ္စဝေက္ခိတွာ ဗုဒ္ဓသုဗုဒ္ဓတာယ [Pg.31] ဓမ္မသုဓမ္မတာယ သံဃသုပ္ပဋိပန္နတာယ စ အနုဿရဏေန စိတ္တံ ပသာဒေတွာ ယံ တံ – इस प्रकार पाँच अंगों से संपन्न सेनासन कहा गया है। वैसे सेनासन में जाकर, अपने सभी (प्रारंभिक) कर्तव्यों को पूरा कर, काम-भोगों में दोष और नैष्क्रम्य (त्याग) में लाभ को देखकर, बुद्ध की सुबुद्धता, धम्म की सुधम्मता और संघ की सुप्रतिपन्नता के अनुस्मरण से चित्त को प्रसन्न कर, जो वह— ‘‘ဝစသာ မနသာ စေဝ, ဝဏ္ဏသဏ္ဌာနတော ဒိသာ; ဩကာသတော ပရိစ္ဆေဒါ, သတ္တဓုဂ္ဂဟဏံ ဝိဒူ’’တိ. – "वाणी से, मन से, वर्ण (रंग) से, संस्थान (आकार) से, दिशा से, स्थान से और परिच्छेद (सीमा) से—इन सात प्रकारों से बुद्धिमान व्यक्ति (कर्मस्थान को) ग्रहण करता है।" ဧဝံ သတ္တဝိဓံ ဥဂ္ဂဟကောသလ္လံ; အနုပုဗ္ဗတော, နာတိသီဃတော, နာတိသဏိကတော, ဝိက္ခေပပ္ပဋိဗာဟနတော, ပဏ္ဏတ္တိသမတိက္ကမတော, အနုပုဗ္ဗမုဉ္စနတော, အပ္ပနာတော, တယော စ သုတ္တန္တာတိ ဧဝံ ဒသဝိဓံ မနသိကာရကောသလ္လဉ္စ ဝုတ္တံ. တံ အပရိစ္စဇန္တေန ဒွတ္တိံသာကာရဘာဝနာ အာရဘိတဗ္ဗာ. ဧဝဉှိ အာရဘတော သဗ္ဗာကာရေန ဒွတ္တိံသာကာရဘာဝနာ သမ္ပဇ္ဇတိ နော အညထာ. इस प्रकार सात प्रकार का ग्रहण-कौशल; और अनुक्रम से, न बहुत शीघ्र, न बहुत धीरे, विक्षेप (भटकाव) को रोकने से, प्रज्ञप्ति (नाम) के अतिक्रमण से, अनुक्रम से छोड़ने से, अप्पणा (समाधि) से और तीन सुत्तों के मनन से—इस प्रकार दस प्रकार का मनसिकार-कौशल कहा गया है। उसे न छोड़ते हुए बत्तीस प्रकार के अंगों की भावना प्रारंभ करनी चाहिए। इस प्रकार प्रारंभ करने वाले की बत्तीस प्रकार के अंगों की भावना सभी प्रकार से सिद्ध होती है, अन्यथा नहीं। တတ္ထ အာဒိတောဝ တစပဉ္စကံ တာဝ ဂဟေတွာ အပိ တေပိဋကေန ‘‘ကေသာ လောမာ’’တိအာဒိနာ နယေန အနုလောမတော, တသ္မိံ ပဂုဏီဘူတေ ‘‘တစော ဒန္တာ’’တိ ဧဝမာဒိနာ နယေန ပဋိလောမတော, တသ္မိမ္ပိ ပဂုဏီဘူတေ တဒုဘယနယေနေဝ အနုလောမပ္ပဋိလောမတော ဗဟိ ဝိသဋဝိတက္ကဝိစ္ဆေဒနတ္ထံ ပါဠိပဂုဏီဘာဝတ္ထဉ္စ ဝစသာ ကောဋ္ဌာသသဘာဝပရိဂ္ဂဟတ္ထံ မနသာ စ အဒ္ဓမာသံ ဘာဝေတဗ္ဗံ. ဝစသာ ဟိဿ ဘာဝနာ ဗဟိ ဝိသဋဝိတက္ကေ ဝိစ္ဆိန္ဒိတွာ မနသာ ဘာဝနာယ ပါဠိပဂုဏတာယ စ ပစ္စယော ဟောတိ, မနသာ ဘာဝနာ အသုဘဝဏ္ဏလက္ခဏာနံ အညတရဝသေန ပရိဂ္ဂဟဿ, အထ တေနေဝ နယေန ဝက္ကပဉ္စကံ အဒ္ဓမာသံ, တတော တဒုဘယမဒ္ဓမာသံ, တတော ပပ္ဖာသပဉ္စကမဒ္ဓမာသံ, တတော တံ ပဉ္စကတ္တယမ္ပိ အဒ္ဓမာသံ, အထ အန္တေ အဝုတ္တမ္ပိ မတ္ထလုင်္ဂံ ပထဝီဓာတုအာကာရေဟိ သဒ္ဓိံ ဧကတော ဘာဝနတ္ထံ ဣဓ ပက္ခိပိတွာ မတ္ထလုင်္ဂပဉ္စကံ အဒ္ဓမာသံ, တတော ပဉ္စကစတုက္ကမ္ပိ အဒ္ဓမာသံ, အထ မေဒဆက္ကမဒ္ဓမာသံ, တတော မေဒဆက္ကေန သဟ ပဉ္စကစတုက္ကမ္ပိ အဒ္ဓမာသံ, အထ မုတ္တဆက္ကမဒ္ဓမာသံ, တတော သဗ္ဗမေဝ ဒွတ္တိံသာကာရမဒ္ဓမာသန္တိ ဧဝံ ဆ မာသေ ဝဏ္ဏသဏ္ဌာနဒိသောကာသပရိစ္ဆေဒတော ဝဝတ္ထပေန္တေန ဘာဝေတဗ္ဗံ. ဧတံ မဇ္ဈိမပညံ ပုဂ္ဂလံ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ. မန္ဒပညေန တု ယာဝဇီဝံ ဘာဝေတဗ္ဗံ တိက္ခပညဿ န စိရေနေဝ ဘာဝနာ သမ္ပဇ္ဇတီတိ. वहाँ (उस भावना में) आरम्भ से ही पहले 'तच-पञ्चक' (त्वचा पर्यन्त पाँच) को ग्रहण कर त्रिपिटकधारी भिक्षु को 'केसा लोमा' आदि विधि से अनुलोमतः, उसके अभ्यस्त हो जाने पर 'तचो दन्ता' आदि विधि से प्रतिलोमतः, और उसके भी अभ्यस्त हो जाने पर उन दोनों ही विधियों से अनुलोम-प्रतिलोमतः, बाहर फैले हुए वितर्कों के विच्छेद के लिए और पालि के अभ्यास के लिए वाणी से, तथा अंगों के स्वभाव के निर्धारण के लिए मन से आधे महीने तक भावना करनी चाहिए। क्योंकि वाणी से की गई उसकी भावना बाहर फैले वितर्कों को काटकर मन से भावना करने और पालि के अभ्यास में सहायक होती है; और मन से की गई भावना अशुभ, वर्ण और लक्षणों में से किसी एक के द्वारा (अंगों के) निर्धारण में सहायक होती है। फिर उसी विधि से वक्क-पञ्चक को आधा महीना, फिर उन दोनों (पञ्चकों) को आधा महीना, फिर पप्फास-पञ्चक को आधा महीना, फिर उन तीनों पञ्चकों को आधा महीना, फिर अन्त में (पालि में) न कहे गए भी मथलुङ्ग (मस्तिष्क) को पृथ्वीधातु के आकारों के साथ एक साथ भावना करने के लिए यहाँ सम्मिलित कर मथलुङ्ग-पञ्चक को आधा महीना, फिर पञ्चक-चतुष्क को भी आधा महीना, फिर मेद-छक्क को आधा महीना, फिर मेद-छक्क के साथ पञ्चक-चतुष्क को आधा महीना, फिर मुत्त-छक्क को आधा महीना, फिर सम्पूर्ण बत्तीस आकारों को आधा महीना - इस प्रकार छह महीनों तक वर्ण, संस्थान, दिशा, अवकाश और परिच्छेद के द्वारा निश्चित करते हुए भावना करनी चाहिए। यह मध्यम प्रज्ञा वाले पुद्गल के सन्दर्भ में कहा गया है। मन्द प्रज्ञा वाले को तो जीवन भर भावना करनी चाहिए। तीव्र प्रज्ञा वाले की भावना शीघ्र ही सिद्ध हो जाती है - ऐसा जानना चाहिए। ဧတ္ထာဟ [Pg.32] – ‘‘ကထံ ပနာယမိမံ ဒွတ္တိံသာကာရံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတီ’’တိ? အယဉှိ ‘‘အတ္ထိ ဣမသ္မိံ ကာယေ ကေသာ’’တိ ဧဝမာဒိနာ နယေန တစပဉ္စကာဒိဝိဘာဂတော ဒွတ္တိံသာကာရံ ဘာဝေန္တော ကေသာ တာဝ ဝဏ္ဏတော ကာဠကာတိ ဝဝတ္ထပေတိ, ယာဒိသကာ ဝါနေန ဒိဋ္ဌာ ဟောန္တိ. သဏ္ဌာနတော ဒီဃဝဋ္ဋလိကာ တုလာဒဏ္ဍမိဝါတိ ဝဝတ္ထပေတိ. ဒိသတော ပန ယသ္မာ ဣမသ္မိံ ကာယေ နာဘိတော ဥဒ္ဓံ ဥပရိမာ ဒိသာ အဓော ဟေဋ္ဌိမာတိ ဝုစ္စတိ, တသ္မာ ဣမဿ ကာယဿ ဥပရိမာယ ဒိသာယ ဇာတာတိ ဝဝတ္ထပေတိ. ဩကာသတော နလာဋန္တကဏ္ဏစူဠိကဂလဝါဋကပရိစ္ဆိန္နေ သီသစမ္မေ ဇာတာတိ. တတ္ထ ယထာ ဝမ္မိကမတ္ထကေ ဇာတာနိ ကုဏ္ဌတိဏာနိ န ဇာနန္တိ ‘‘မယံ ဝမ္မိကမတ္ထကေ ဇာတာနီ’’တိ; နပိ ဝမ္မိကမတ္ထကော ဇာနာတိ ‘‘မယိ ကုဏ္ဌတိဏာနိ ဇာတာနီ’’တိ; ဧဝမေဝ န ကေသာ ဇာနန္တိ ‘‘မယံ သီသစမ္မေ ဇာတာ’’တိ, နပိ သီသစမ္မံ ဇာနာတိ ‘‘မယိ ကေသာ ဇာတာ’’တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ အစေတနာ အဗျာကတာ သုညာ ပရမဒုဂ္ဂန္ဓဇေဂုစ္ဆပ္ပဋိကူလာ, န သတ္တော န ပုဂ္ဂလောတိ ဝဝတ္ထပေတိ. ပရိစ္ဆေဒတောတိ ဒုဝိဓော ပရိစ္ဆေဒေါ သဘာဂဝိသဘာဂဝသေန. တတ္ထ ကေသာ ဟေဋ္ဌာ ပတိဋ္ဌိတစမ္မတလေန တတ္ထ ဝီဟဂ္ဂမတ္တံ ပဝိသိတွာ ပတိဋ္ဌိတေန အတ္တနော မူလတလေန စ ဥပရိ အာကာသေန တိရိယံ အညမညေန ပရိစ္ဆိန္နာတိ ဧဝံ သဘာဂပရိစ္ဆေဒတော, ကေသာ န အဝသေသဧကတိံသာကာရာ. အဝသေသာ ဧကတိံသာ န ကေသာတိ ဧဝံ ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒတော စ ဝဝတ္ထပေတိ. ဧဝံ တာဝ ကေသေ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. यहाँ प्रश्न है - 'वह इन बत्तीस आकारों को वर्ण आदि के द्वारा कैसे निश्चित करता है?' वह 'इस काय में केश हैं' इस विधि से तच-पञ्चक आदि के विभाग से बत्तीस आकारों की भावना करता हुआ, केशों को पहले वर्ण से 'काले' निश्चित करता है, अथवा जैसे उसने देखे हों। संस्थान (आकार) से वे तुला-दण्ड (तराजू की डंडी) के समान लम्बे और गोल हैं - ऐसा निश्चित करता है। दिशा से, क्योंकि इस काय में नाभि से ऊपर 'ऊर्ध्व दिशा' और नीचे 'अधो दिशा' कही जाती है, इसलिए वे इस काय की ऊर्ध्व दिशा में उत्पन्न हुए हैं - ऐसा निश्चित करता है। अवकाश (स्थान) से वे ललाट के अन्त, कान की जड़ और गर्दन के गड्ढे से परिच्छिन्न सिर की त्वचा पर उत्पन्न हुए हैं। वहाँ जैसे दीमक की बाम्बी के ऊपर उगी हुई घास नहीं जानती कि 'हम बाम्बी के ऊपर उगी हैं', और न ही बाम्बी जानती है कि 'मुझ पर घास उगी है'; वैसे ही न केश जानते हैं कि 'हम सिर की त्वचा पर उगे हैं', और न ही सिर की त्वचा जानती है कि 'मुझ पर केश उगे हैं'। क्योंकि ये धर्म आभोग और प्रत्यवेक्षण से रहित, अचेतन, अव्याकृत, शून्य, परम दुर्गन्धित और घृणित-प्रतिकूल हैं; 'न यह सत्त्व है, न पुद्गल' - ऐसा वह निश्चित करता है। परिच्छेद (सीमा) से दो प्रकार का परिच्छेद है - सभाग और विसभाग के भेद से। वहाँ केश नीचे की ओर त्वचा के तल में चावल के दाने के बराबर प्रवेश कर स्थित अपने मूल तल से, ऊपर आकाश से और तिरछे एक-दूसरे से परिच्छिन्न हैं - यह सभाग-परिच्छेद है। केश शेष इकतीस आकार नहीं हैं, और शेष इकतीस आकार केश नहीं हैं - यह विसभाग-परिच्छेद है। इस प्रकार वह केशों को वर्ण आदि से निश्चित करता है। အဝသေသေသု လောမာ ဝဏ္ဏတော ယေဘုယျေန နီလဝဏ္ဏာတိ ဝဝတ္ထပေတိ, ယာဒိသကာ ဝါနေန ဒိဋ္ဌာ ဟောန္တိ. သဏ္ဌာနတော ဩဏတစာပသဏ္ဌာနာ, ဥပရိ ဝင်္ကတာလဟီရသဏ္ဌာနာ ဝါ, ဒိသတော ဒွီသု ဒိသာသု ဇာတာ, ဩကာသတော ဟတ္ထတလပါဒတလေ ဌပေတွာ ယေဘုယျေန အဝသေသသရီရစမ္မေ ဇာတာတိ. शेष (अंगों) में, रोम (रोएँ) वर्ण से प्रायः नीले (काले) वर्ण के होते हैं - ऐसा निश्चित करता है, अथवा जैसे उसने देखे हों। संस्थान से वे झुके हुए धनुष के आकार के होते हैं, अथवा ऊपर से मुड़े हुए ताड़ के रेशों के आकार के होते हैं। दिशा से वे दोनों दिशाओं (ऊर्ध्व और अधो) में उत्पन्न होते हैं। अवकाश से, हथेलियों और तलवों को छोड़कर, वे प्रायः शेष शरीर की त्वचा पर उत्पन्न होते हैं। တတ္ထ ယထာ ပုရာဏဂါမဋ္ဌာနေ ဇာတာနိ ဒဗ္ဗတိဏာနိ န ဇာနန္တိ ‘‘မယံ ပုရာဏဂါမဋ္ဌာနေ ဇာတာနီ’’တိ, န စ ပုရာဏဂါမဋ္ဌာနံ ဇာနာတိ ‘‘မယိ ဒဗ္ဗတိဏာနိ ဇာတာနီ’’တိ, ဧဝမေဝ န လောမာ ဇာနန္တိ ‘‘မယံ သရီရစမ္မေ ဇာတာ’’တိ, နပိ သရီရစမ္မံ ဇာနာတိ ‘‘မယိ လောမာ ဇာတာ’’တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ အစေတနာ အဗျာကတာ သုညာ [Pg.33] ပရမဒုဂ္ဂန္ဓဇေဂုစ္ဆပဋိကူလာ, န သတ္တော န ပုဂ္ဂလောတိ ဝဝတ္ထပေတိ. ပရိစ္ဆေဒတော ဟေဋ္ဌာ ပတိဋ္ဌိတစမ္မတလေန တတ္ထ လိက္ခာမတ္တံ ပဝိသိတွာ ပတိဋ္ဌိတေန အတ္တနော မူလေန စ ဥပရိ အာကာသေန တိရိယံ အညမညေန ပရိစ္ဆိန္နာတိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတေသံ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ လောမေ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ जैसे किसी पुराने गाँव के स्थान पर उगी हुई दब्ब-घास (दूर्वा) नहीं जानती कि 'हम पुराने गाँव के स्थान पर उगी हैं', और न ही वह स्थान जानता है कि 'मुझ पर दब्ब-घास उगी है'; वैसे ही न रोम जानते हैं कि 'हम शरीर की त्वचा पर उगे हैं', और न ही शरीर की त्वचा जानती है कि 'मुझ पर रोम उगे हैं'। क्योंकि ये धर्म आभोग और प्रत्यवेक्षण से रहित, अचेतन, अव्याकृत, शून्य, परम दुर्गन्धित और घृणित-प्रतिकूल हैं; 'न यह सत्त्व है, न पुद्गल' - ऐसा वह निश्चित करता है। परिच्छेद से, नीचे की ओर त्वचा के तल में लीख के बराबर प्रवेश कर स्थित अपने मूल से, ऊपर आकाश से और तिरछे एक-दूसरे से परिच्छिन्न हैं - ऐसा निश्चित करता है। यह इनका सभाग-परिच्छेद है, और विसभाग-परिच्छेद तो केशों के समान ही है। इस प्रकार वह रोमों को वर्ण आदि से निश्चित करता है। တတော ပရံ နခါ ယဿ ပရိပုဏ္ဏာ, တဿ ဝီသတိ. တေ သဗ္ဗေပိ ဝဏ္ဏတော မံသဝိနိမုတ္တောကာသေ သေတာ, မံသသမ္ဗန္ဓေ တမ္ဗဝဏ္ဏာတိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော ယထာသကပတိဋ္ဌိတောကာသသဏ္ဌာနာ, ယေဘုယျေန မဓုကဖလဋ္ဌိကသဏ္ဌာနာ, မစ္ဆသကလိကသဏ္ဌာနာ ဝါတိ ဝဝတ္ထပေတိ. ဒိသတော ဒွီသု ဒိသာသု ဇာတာ, ဩကာသတော အင်္ဂုလီနံ အဂ္ဂေသု ပတိဋ္ဌိတာတိ. उसके बाद नख (नाखून), जिसके पूर्ण हों, उसके बीस होते हैं। वे सभी वर्ण से मांस से मुक्त स्थान पर श्वेत होते हैं और मांस से जुड़े स्थान पर ताँबे के रंग के होते हैं - ऐसा निश्चित करता है। संस्थान से वे अपने-अपने स्थित होने के स्थान के आकार के होते हैं; प्रायः महुआ के फल की गुठली के आकार के अथवा मछली के शल्क के आकार के होते हैं - ऐसा निश्चित करता है। दिशा से वे दोनों दिशाओं में उत्पन्न होते हैं। अवकाश से वे उँगलियों के अग्रभागों पर स्थित होते हैं। တတ္ထ ယထာ နာမ ဂါမဒါရကေဟိ ဒဏ္ဍကဂ္ဂေသု မဓုကဖလဋ္ဌိကာ ဌပိတာ န ဇာနန္တိ ‘‘မယံ ဒဏ္ဍကဂ္ဂေသု ဌပိတာ’’တိ, နပိ ဒဏ္ဍကာ ဇာနန္တိ ‘‘အမှေသု မဓုကဖလဋ္ဌိကာ ဌပိတာ’’တိ; ဧဝမေဝ နခါ န ဇာနန္တိ ‘‘မယံ အင်္ဂုလီနံ အဂ္ဂေသု ပတိဋ္ဌိတာ’’တိ, နပိ အင်္ဂုလိယော ဇာနန္တိ ‘‘အမှာကံ အဂ္ဂေသု နခါ ပတိဋ္ဌိတာ’’တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ အစေတနာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ ဝဝတ္ထပေတိ. ပရိစ္ဆေဒတော ဟေဋ္ဌာ မူလေ စ အင်္ဂုလိမံသေန, တတ္ထ ပတိဋ္ဌိတတလေန ဝါ ဥပရိ အဂ္ဂေ စ အာကာသေန, ဥဘတောပဿေသု အင်္ဂုလီနံ ဥဘတောကောဋိစမ္မေန ပရိစ္ဆိန္နာတိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတေသံ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ နခေ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ, जैसे गाँव के बच्चों द्वारा डंडों की नोक पर रखे गए महुआ के बीज यह नहीं जानते कि "हम डंडों की नोक पर रखे गए हैं", और न ही वे डंडे जानते हैं कि "हम पर महुआ के बीज रखे गए हैं"; उसी प्रकार नाखून नहीं जानते कि "हम उंगलियों के अग्रभाग पर स्थित हैं", और न ही उंगलियाँ जानती हैं कि "हमारे अग्रभाग पर नाखून स्थित हैं"। क्योंकि ये धर्म विचार और प्रत्यवेक्षण से रहित, अचेतन... और पुद्गल नहीं हैं - ऐसा निश्चय करता है। परिच्छेद की दृष्टि से, नीचे जड़ में उंगलियों के मांस से और वहाँ स्थित तल से, ऊपर अग्रभाग में आकाश से, और दोनों पार्श्वों में उंगलियों के दोनों किनारों की त्वचा से परिच्छिन्न हैं - ऐसा निश्चय करता है। यह इनका स्वभाव-परिच्छेद है, और विस्वभाव-परिच्छेद तो बालों के समान ही है - इस प्रकार नाखूनों का वर्ण आदि के द्वारा निश्चय करता है। တတော ပရံ ဒန္တာ ယဿ ပရိပုဏ္ဏာ, တဿ ဒွတ္တိံသ. တေ သဗ္ဗေပိ ဝဏ္ဏတော သေတဝဏ္ဏာတိ ဝဝတ္ထပေတိ. ယဿ သမသဏ္ဌိတာ ဟောန္တိ, တဿ ခရပတ္တစ္ဆိန္နသင်္ခပဋလမိဝ သမဂန္ထိတသေတကုသုမမကုဠမာလာ ဝိယ စ ခါယန္တိ. ယဿ ဝိသမသဏ္ဌိတာ, တဿ ဇိဏ္ဏအာသနသာလာပီဌကပဋိပါဋိ ဝိယ နာနာသဏ္ဌာနာတိ သဏ္ဌာနတော ဝဝတ္ထပေတိ. တေသဉှိ ဥဘယဒန္တပန္တိပရိယောသာနေသု ဟေဋ္ဌတော ဥပရိတော စ ဒွေ ဒွေ ကတွာ အဋ္ဌ ဒန္တာ စတုကောဋိကာ စတုမူလိကာ အာသန္ဒိကသဏ္ဌာနာ, တေသံ ဩရတော တေနေဝ [Pg.34] ကမေန သန္နိဝိဋ္ဌာ အဋ္ဌ ဒန္တာ တိကောဋိကာ တိမူလိကာ သိင်္ဃာဋကသဏ္ဌာနာ. တေသမ္ပိ ဩရတော တေနေဝ ကမေန ဟေဋ္ဌတော ဥပရိတော စ ဧကမေကံ ကတွာ စတ္တာရော ဒန္တာ ဒွိကောဋိကာ ဒွိမူလိကာ ယာနကူပတ္ထမ္ဘိနီသဏ္ဌာနာ. တေသမ္ပိ ဩရတော တေနေဝ ကမေန သန္နိဝိဋ္ဌာ စတ္တာရော ဒါဌာဒန္တာ ဧကကောဋိကာ ဧကမူလိကာ မလ္လိကာမကုဠသဏ္ဌာနာ. တတော ဥဘယဒန္တပန္တိဝေမဇ္ဈေ ဟေဋ္ဌာ စတ္တာရော ဥပရိ စတ္တာရော ကတွာ အဋ္ဌ ဒန္တာ ဧကကောဋိကာ ဧကမူလိကာ တုမ္ဗဗီဇသဏ္ဌာနာ. ဒိသတော ဥပရိမာယ ဒိသာယ ဇာတာ. ဩကာသတော ဥပရိမာ ဥပရိမဟနုကဋ္ဌိကေ အဓောကောဋိကာ, ဟေဋ္ဌိမာ ဟေဋ္ဌိမဟနုကဋ္ဌိကေ ဥဒ္ဓံကောဋိကာ ဟုတွာ ပတိဋ္ဌိတာတိ. उसके बाद दाँत, जिसके पूर्ण हों, उसके बत्तीस होते हैं। वे सभी वर्ण की दृष्टि से श्वेत वर्ण के हैं - ऐसा निश्चय करता है। जिसके दाँत समान रूप से स्थित होते हैं, उसके दाँत आरी से काटे गए शंख के पटल के समान और अच्छी तरह गूँथी हुई श्वेत पुष्पों की कलियों की माला के समान दिखाई देते हैं। जिसके विषम रूप से स्थित होते हैं, उसके दाँत पुरानी विश्रामशाला में रखे हुए पीढ़ों की पंक्ति के समान नाना प्रकार के आकार वाले होते हैं - ऐसा आकार की दृष्टि से निश्चय करता है। उन दोनों दाँतों की पंक्तियों के अंत में, नीचे और ऊपर दो-दो करके आठ दाँत चार कोनों वाले, चार जड़ों वाले और पीढ़े के आकार के होते हैं। उनके आगे उसी क्रम से स्थित आठ दाँत तीन कोनों वाले, तीन जड़ों वाले और तिराहे के आकार के होते हैं। उनके भी आगे उसी क्रम से नीचे और ऊपर एक-एक करके चार दाँत दो कोनों वाले, दो जड़ों वाले और बैलगाड़ी के खंभों के आकार के होते हैं। उनके भी आगे उसी क्रम से स्थित चार दाँत एक कोने वाले, एक जड़ वाले और बेला की कली के आकार के होते हैं। उसके बाद दोनों दाँतों की पंक्तियों के मध्य में नीचे चार और ऊपर चार करके आठ दाँत एक कोने वाले, एक जड़ वाले और कद्दू के बीज के आकार के होते हैं। दिशा की दृष्टि से, वे शरीर के ऊपरी भाग में उत्पन्न होते हैं। स्थान की दृष्टि से, ऊपर के दाँत ऊपर के जबड़े की हड्डी में नीचे की ओर मुख वाले होकर स्थित हैं, और नीचे के दाँत नीचे के जबड़े की हड्डी में ऊपर की ओर मुख वाले होकर स्थित हैं। တတ္ထ ယထာ နဝကမ္မိကပုရိသေန ဟေဋ္ဌာ သိလာတလေ ပတိဋ္ဌာပိတာ ဥပရိမတလေ ပဝေသိတာ ထမ္ဘာ န ဇာနန္တိ ‘‘မယံ ဟေဋ္ဌာသိလာတလေ ပတိဋ္ဌာပိတာ, ဥပရိမတလေ ပဝေသိတာ’’တိ, န ဟေဋ္ဌာသိလာတလံ ဇာနာတိ ‘‘မယိ ထမ္ဘာ ပတိဋ္ဌာပိတာ’’တိ, န ဥပရိမတလံ ဇာနာတိ ‘‘မယိ ထမ္ဘာ ပဝိဋ္ဌာ’’တိ; ဧဝမေဝ ဒန္တာ န ဇာနန္တိ ‘‘မယံ ဟေဋ္ဌာဟနုကဋ္ဌိကေ ပတိဋ္ဌိတာ, ဥပရိမဟနုကဋ္ဌိကေ ပဝိဋ္ဌာ’’တိ, နာပိ ဟေဋ္ဌာဟနုကဋ္ဌိကံ ဇာနာတိ ‘‘မယိ ဒန္တာ ပတိဋ္ဌိတာ’’တိ, န ဥပရိမဟနုကဋ္ဌိကံ ဇာနာတိ ‘‘မယိ ဒန္တာ ပဝိဋ္ဌာ’’တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော ဟေဋ္ဌာ ဟနုကဋ္ဌိကူပေန ဟနုကဋ္ဌိကံ ပဝိသိတွာ ပတိဋ္ဌိတေန အတ္တနော မူလတလေန စ ဥပရိ အာကာသေန တိရိယံ အညမညေန ပရိစ္ဆိန္နာတိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတေသံ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ ဒန္တေ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ, जैसे किसी राजमिस्त्री द्वारा नीचे के पत्थर के तल पर स्थापित और ऊपर के तल में प्रविष्ट कराए गए खंभे यह नहीं जानते कि "हम नीचे के पत्थर के तल पर स्थापित हैं और ऊपर के तल में प्रविष्ट हैं", न ही नीचे का पत्थर का तल जानता है कि "मुझमें खंभे स्थापित हैं", और न ही ऊपर का तल जानता है कि "मुझमें खंभे प्रविष्ट हैं"; उसी प्रकार दाँत नहीं जानते कि "हम नीचे के जबड़े में स्थित हैं और ऊपर के जबड़े में प्रविष्ट हैं", न ही नीचे का जबड़ा जानता है कि "मुझमें दाँत स्थित हैं", और न ही ऊपर का जबड़ा जानता है कि "मुझमें दाँत प्रविष्ट हैं"। क्योंकि ये धर्म विचार और प्रत्यवेक्षण से रहित... और पुद्गल नहीं हैं। परिच्छेद की दृष्टि से, नीचे जबड़े के गड्ढे के माध्यम से जबड़े की हड्डी में प्रविष्ट होकर स्थित अपने मूल तल से, ऊपर आकाश से और तिरछे एक-दूसरे से परिच्छिन्न हैं - ऐसा निश्चय करता है। यह इनका स्वभाव-परिच्छेद है, और विस्वभाव-परिच्छेद तो बालों के समान ही है - इस प्रकार दाँतों का वर्ण आदि के द्वारा निश्चय करता है। တတော ပရံ အန္တောသရီရေ နာနာကုဏပသဉ္စယပ္ပဋိစ္ဆာဒကံ တစော ဝဏ္ဏတော သေတောတိ ဝဝတ္ထပေတိ. သော ဟိ ယဒိပိ ဆဝိရာဂရဉ္ဇိတတ္တာ ကာဠကောဒါတာဒိဝဏ္ဏဝသေန နာနာဝဏ္ဏော ဝိယ ဒိဿတိ, တထာပိ သဘာဂဝဏ္ဏေန သေတော ဧဝ. သော ပနဿ သေတဘာဝေါ အဂ္ဂိဇာလာဘိဃာတပဟရဏပဟာရာဒီဟိ ဝိဒ္ဓံသိတာယ ဆဝိယာ ပါကဋော ဟောတိ. သဏ္ဌာနတော သင်္ခေပေန ကဉ္စုကသဏ္ဌာနော, ဝိတ္ထာရေန နာနာသဏ္ဌာနောတိ. တထာ ဟိ ပါဒင်္ဂုလိတ္တစော ကောသကာရကကောသသဏ္ဌာနော, ပိဋ္ဌိပါဒတ္တစော ပုဋဗဒ္ဓူပါဟနသဏ္ဌာနော, ဇင်္ဃတ္တစော ဘတ္တပုဋကတာလပဏ္ဏသဏ္ဌာနော[Pg.35], ဦရုတ္တစော တဏ္ဍုလဘရိတဒီဃတ္ထဝိကသဏ္ဌာနော, အာနိသဒတ္တစော ဥဒကပူရိတပဋပရိဿာဝနသဏ္ဌာနော, ပိဋ္ဌိတ္တစော ဖလကောနဒ္ဓစမ္မသဏ္ဌာနော, ကုစ္ဆိတ္တစော ဝီဏာဒေါဏိကောနဒ္ဓစမ္မသဏ္ဌာနော, ဥရတ္တစော ယေဘုယျေန စတုရဿသဏ္ဌာနော, ဒွိဗာဟုတ္တစော တူဏီရောနဒ္ဓစမ္မသဏ္ဌာနော, ပိဋ္ဌိဟတ္ထတ္တစော ခုရကောသသဏ္ဌာနော ဖဏကတ္ထဝိကသဏ္ဌာနော ဝါ, ဟတ္ထင်္ဂုလိတ္တစော ကုဉ္စိကာကောသသဏ္ဌာနော, ဂီဝတ္တစော ဂလကဉ္စုကသဏ္ဌာနော, မုခတ္တစော ဆိဒ္ဒါဝဆိဒ္ဒကိမိကုလာဝကသဏ္ဌာနော, သီသတ္တစော ပတ္တတ္ထဝိကသဏ္ဌာနောတိ. उसके बाद, शरीर के भीतर नाना प्रकार के अशुचि-समूहों को ढकने वाली त्वचा वर्ण की दृष्टि से श्वेत है - ऐसा निश्चय करता है। यद्यपि वह बाहरी त्वचा के राग से रंजित होने के कारण काले, गोरे आदि वर्णों के भेद से अनेक रंगों वाली जैसी दिखाई देती है, तथापि अपने स्वाभाविक वर्ण से वह श्वेत ही है। उसका वह श्वेत होना अग्नि की ज्वाला, चोट या प्रहार आदि से बाहरी त्वचा के नष्ट हो जाने पर स्पष्ट हो जाता है। आकार की दृष्टि से, संक्षेप में यह चोगे के आकार की है, और विस्तार से अनेक आकारों वाली है। जैसे - पैरों की उंगलियों की त्वचा रेशम के कीड़े के कोये के आकार की है, पैर के ऊपरी भाग की त्वचा बँधे हुए जूते के आकार की है, पिंडली की त्वचा भात लपेटे हुए ताड़ के पत्ते के आकार की है, जाँघ की त्वचा चावल से भरी लंबी थैली के आकार की है, नितंब की त्वचा जल से भरे हुए वस्त्र-छन्ने के आकार की है, पीठ की त्वचा लकड़ी के तख्ते पर मढ़े हुए चमड़े के आकार की है, पेट की त्वचा वीणा के खोल पर मढ़े हुए चमड़े के आकार की है, छाती की त्वचा प्रायः चौकोर आकार की है, दोनों भुजाओं की त्वचा तरकश पर मढ़े हुए चमड़े के आकार की है, हाथ के ऊपरी भाग की त्वचा उस्तरे के म्यान या कंघी की थैली के आकार की है, हाथ की उंगलियों की त्वचा चाबी की थैली के आकार की है, गर्दन की त्वचा गले के चोगे के आकार की है, मुख की त्वचा छिद्रों वाले कीड़ों के घोंसले के आकार की है, और सिर की त्वचा पात्र की थैली के आकार की है। တစပရိဂ္ဂဏှကေန စ ယောဂါဝစရေန ဥတ္တရောဋ္ဌတော ပဋ္ဌာယ တစဿ မံသဿ စ အန္တရေန စိတ္တံ ပေသေန္တေန ပဌမံ တာဝ မုခတ္တစော ဝဝတ္ထပေတဗ္ဗော, တတော သီသတ္တစော, အထ ဗဟိဂီဝတ္တစော, တတော အနုလောမေန ပဋိလောမေန စ ဒက္ခိဏဟတ္ထတ္တစော. အထ တေနေဝ ကမေန ဝါမဟတ္ထတ္တစော, တတော ပိဋ္ဌိတ္တစော, အထ အာနိသဒတ္တစော, တတော အနုလောမေန ပဋိလောမေန စ ဒက္ခိဏပါဒတ္တစော, အထ ဝါမပါဒတ္တစော, တတော ဝတ္ထိဥဒရဟဒယအဗ္ဘန္တရဂီဝတ္တစော, တတော ဟေဋ္ဌိမဟနုကတ္တစော, အထ အဓရောဋ္ဌတ္တစော. ဧဝံ ယာဝ ပုန ဥပရိ ဩဋ္ဌတ္တစောတိ. ဒိသတော ဒွီသု ဒိသာသု ဇာတော. ဩကာသတော သကလသရီရံ ပရိယောနန္ဓိတွာ ဌိတောတိ. त्वचा का परिग्रह करने वाले योगावचर को ऊपरी होंठ से शुरू करके, त्वचा और मांस के बीच में चित्त को भेजते हुए, सबसे पहले चेहरे की त्वचा का निर्धारण करना चाहिए, उसके बाद सिर की त्वचा का, फिर गर्दन के बाहरी हिस्से की त्वचा का, फिर अनुलोम और प्रतिलोम क्रम से दाहिने हाथ की त्वचा का। उसी क्रम से बाएं हाथ की त्वचा का, फिर पीठ की त्वचा का, फिर नितम्ब की त्वचा का, फिर अनुलोम और प्रतिलोम क्रम से दाहिने पैर की त्वचा का, फिर बाएं पैर की त्वचा का, फिर बस्ति (मूत्राशय), उदर, हृदय और गर्दन के भीतरी हिस्से की त्वचा का, फिर निचले जबड़े की त्वचा का, फिर निचले होंठ की त्वचा का। इस प्रकार पुनः ऊपरी होंठ की त्वचा तक निर्धारण करना चाहिए। दिशा की दृष्टि से यह दो दिशाओं (ऊपर और नीचे) में उत्पन्न है। स्थान की दृष्टि से यह पूरे शरीर को ढँक कर स्थित है। တတ္ထ ယထာ အလ္လစမ္မပရိယောနဒ္ဓါယ ပေဠာယ န အလ္လစမ္မံ ဇာနာတိ ‘‘မယာ ပေဠာ ပရိယောနဒ္ဓါ’’တိ, နပိ ပေဠာ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ အလ္လစမ္မေန ပရိယောနဒ္ဓါ’’တိ; ဧဝမေဝ န တစော ဇာနာတိ ‘‘မယာ ဣဒံ စာတုမဟာဘူတိကံ သရီရံ ဩနဒ္ဓ’’န္တိ, နပိ ဣဒံ စာတုမဟာဘူတိကံ သရီရံ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ တစေန ဩနဒ္ဓ’’န္တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ကေဝလံ တု – वहाँ जैसे गीले चमड़े से मढ़ी हुई पेटी (पिटारी) में न तो गीला चमड़ा जानता है कि "मैंने पेटी को मढ़ा है", और न ही पेटी जानती है कि "मैं गीले चमड़े से मढ़ी हुई हूँ"; उसी प्रकार न तो त्वचा जानती है कि "मैंने इस चार महाभूतों वाले शरीर को ढँका है", और न ही यह चार महाभूतों वाला शरीर जानता है कि "मैं त्वचा से ढँका हुआ हूँ"। क्योंकि ये धर्म चेतना और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... (पे)... यह पुद्गल नहीं है। केवल इतना है कि - ‘‘အလ္လစမ္မပဋိစ္ဆန္နော, နဝဒွါရော မဟာဝဏော; သမန္တတော ပဂ္ဃရတိ, အသုစိပူတိဂန္ဓိယော’’တိ. "गीले चमड़े से ढँका हुआ, नौ द्वारों वाला यह एक बड़ा घाव है; चारों ओर से अशुचि और दुर्गंध बहती रहती है।" ပရိစ္ဆေဒတော ဟေဋ္ဌာ မံသေန တတ္ထ ပတိဋ္ဌိတတလေန ဝါ ဥပရိ ဆဝိယာ ပရိစ္ဆိန္နောတိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ တစံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. परिच्छेद (सीमा) की दृष्टि से, नीचे मांस से या वहाँ स्थित तल से, और ऊपर चर्म (पतली त्वचा) से परिच्छिन्न (सीमित) है - ऐसा निर्धारण करता है। यह इसका सभागा-परिच्छेद है, और विसभागा-परिच्छेद तो बालों के समान ही है। इस प्रकार त्वचा का वर्ण आदि के द्वारा निर्धारण करता है। တတော [Pg.36] ပရံ သရီရေ နဝပေသိသတပ္ပဘေဒံ မံသံ ဝဏ္ဏတော ရတ္တံ ပါလိဘဒ္ဒကပုပ္ဖသန္နိဘန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော နာနာသဏ္ဌာနန္တိ. တထာ ဟိ တတ္ထ ဇင်္ဃမံသံ တာလပတ္တပုဋဘတ္တသဏ္ဌာနံ, အဝိကသိတကေတကီမကုဠသဏ္ဌာနန္တိပိ ကေစိ. ဦရုမံသံ သုဓာပိသနနိသဒပေါတကသဏ္ဌာနံ, အာနိသဒမံသံ ဥဒ္ဓနကောဋိသဏ္ဌာနံ, ပိဋ္ဌိမံသံ တာလဂုဠပဋလသဏ္ဌာနံ, ဖာသုကဒွယမံသံ ဝံသမယကောဋ္ဌကုစ္ဆိပဒေသမှိ တနုမတ္တိကာလေပသဏ္ဌာနံ, ထနမံသံ ဝဋ္ဋေတွာ အဝက္ခိတ္တဒ္ဓမတ္တိကာပိဏ္ဍသဏ္ဌာနံ, ဒွေဗာဟုမံသံ နင်္ဂုဋ္ဌသီသပါဒေ ဆေတွာ နိစ္စမ္မံ ကတွာ ဌပိတမဟာမူသိကသဏ္ဌာနံ, မံသသူနကသဏ္ဌာနန္တိပိ ဧကေ. ဂဏ္ဍမံသံ ဂဏ္ဍပ္ပဒေသေ ဌပိတကရဉ္ဇဗီဇသဏ္ဌာနံ, မဏ္ဍူကသဏ္ဌာနန္တိပိ ဧကေ. ဇိဝှာမံသံ နုဟီပတ္တသဏ္ဌာနံ, နာသာမံသံ ဩမုခနိက္ခိတ္တပဏ္ဏကောသသဏ္ဌာနံ, ၀.အက္ခိကူပမံသံ အဒ္ဓပက္ကဥဒုမ္ဗရသဏ္ဌာနံ, သီသမံသံ ပတ္တပစနကဋာဟတနုလေပသဏ္ဌာနန္တိ. မံသပရိဂ္ဂဏှကေန စ ယောဂါဝစရေန ဧတာနေဝ ဩဠာရိကမံသာနိ သဏ္ဌာနတော ဝဝတ္ထပေတဗ္ဗာနိ. ဧဝဉှိ ဝဝတ္ထာပယတော သုခုမာနိ မံသာနိ ဉာဏဿ အာပါထံ အာဂစ္ဆန္တီတိ. ဒိသတော ဒွီသု ဒိသာသု ဇာတံ. ဩကာသတော သာဓိကာနိ တီဏိ အဋ္ဌိသတာနိ အနုလိမ္ပိတွာ ဌိတန္တိ. उसके बाद शरीर में नौ सौ मांस-पेशियों के भेद वाले मांस का वर्ण की दृष्टि से "लाल, पलिभद्रक (कथिट) के फूल के समान" ऐसा निर्धारण करता है। संस्थान (आकृति) की दृष्टि से "अनेक आकृतियों वाला" है। जैसे कि, वहाँ पिण्डली का मांस ताड़ के पत्ते के दोने में रखे भात की आकृति का है, कुछ आचार्य इसे बिना खिले केतकी के मुकुल (कली) की आकृति का भी कहते हैं। जांघ का मांस चूने पीसने वाले पत्थर के लोढ़े की आकृति का है, नितम्ब का मांस चूल्हे के कोने की आकृति का है, पीठ का मांस ताड़ के फल के आधे हिस्से की आकृति का है, पसलियों के दोनों ओर का मांस बाँस के बने कोठार के भीतरी भाग में पतले मिट्टी के लेप की आकृति का है, स्तनों का मांस गोल करके रखी गई गीली मिट्टी के पिण्ड की आकृति का है, दोनों भुजाओं का मांस पूँछ, सिर और पैर काटकर, खाल उतारकर रखे हुए बड़े चूहे की आकृति का है, कुछ इसे मांस के टुकड़े (शूल) की आकृति का भी कहते हैं। गालों का मांस गाल के स्थान पर रखे हुए करंज के बीज की आकृति का है, कुछ इसे मेंढक की आकृति का भी कहते हैं। जीभ का मांस थूहर (नुही) के पत्ते की आकृति का है, नाक का मांस नीचे की ओर मुँह करके रखे हुए पत्तों के दोने की आकृति का है, नेत्र-कोटर का मांस आधे पके गूलर के फल की आकृति का है, सिर का मांस पात्र पकाने वाली हाँडी पर लगे मिट्टी के लेप की आकृति का है। मांस का परिग्रह करने वाले योगावचर को इन स्थूल मांस-पेशियों का आकृति की दृष्टि से निर्धारण करना चाहिए। इस प्रकार निर्धारण करने वाले के ज्ञान में सूक्ष्म मांस-पेशियाँ भी स्पष्ट होने लगती हैं। दिशा की दृष्टि से यह दो दिशाओं में उत्पन्न है। स्थान की दृष्टि से यह तीन सौ से अधिक हड्डियों को लेप कर स्थित है। တတ္ထ ယထာ ထူလမတ္တိကာနုလိတ္တာယ ဘိတ္တိယာ န ထူလမတ္တိကာ ဇာနာတိ ‘‘မယာ ဘိတ္တိ အနုလိတ္တာ’’တိ, နပိ ဘိတ္တိ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ထူလမတ္တိကာယ အနုလိတ္တာ’’တိ, ဧဝမေဝံ န နဝပေသိသတပ္ပဘေဒံ မံသံ ဇာနာတိ ‘‘မယာ အဋ္ဌိသတတ္တယံ အနုလိတ္တ’’န္တိ, နပိ အဋ္ဌိသတတ္တယံ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ နဝပေသိသတပ္ပဘေဒေန မံသေန အနုလိတ္တ’’န္တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ကေဝလံ တု – वहाँ जैसे मोटी मिट्टी से लीपी हुई दीवार में न तो मोटी मिट्टी जानती है कि "मैंने दीवार को लीपा है", और न ही दीवार जानती है कि "मैं मोटी मिट्टी से लीपी गई हूँ", उसी प्रकार नौ सौ मांस-पेशियों वाला मांस नहीं जानता कि "मैंने तीन सौ हड्डियों के समूह को लीपा है", और न ही तीन सौ हड्डियों का समूह जानता है कि "मैं नौ सौ मांस-पेशियों वाले मांस से लीपा गया हूँ"। क्योंकि ये धर्म चेतना और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... (पे)... यह पुद्गल नहीं है। केवल इतना है कि - ‘‘နဝပေသိသတာ မံသာ, အနုလိတ္တာ ကဠေဝရံ; နာနာကိမိကုလာကိဏ္ဏံ, မီဠှဋ္ဌာနံဝ ပူတိက’’န္တိ. "नौ सौ मांस-पेशियों से यह कलेवर लीपा गया है; अनेक कृमि-कुलों से व्याप्त यह विष्ठा-स्थान के समान दुर्गंधयुक्त है।" ပရိစ္ဆေဒတော ဟေဋ္ဌာ အဋ္ဌိသံဃာဋေန တတ္ထ ပတိဋ္ဌိတတလေန ဝါ ဥပရိ တစေန တိရိယံ အညမညေန ပရိစ္ဆိန္နန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ မံသံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. परिच्छेद की दृष्टि से, नीचे हड्डियों के समूह से या वहाँ स्थित तल से, ऊपर त्वचा से और तिरछे एक-दूसरे से परिच्छिन्न है - ऐसा निर्धारण करता है। यह इसका सभागा-परिच्छेद है, और विसभागा-परिच्छेद तो बालों के समान ही है। इस प्रकार मांस का वर्ण आदि के द्वारा निर्धारण करता है। တတော ပရံ သရီရေ နဝသတပ္ပဘေဒါ နှာရူ ဝဏ္ဏတော သေတာတိ ဝဝတ္ထပေတိ, မဓုဝဏ္ဏာတိပိ ဧကေ. သဏ္ဌာနတော နာနာသဏ္ဌာနာတိ. တထာ [Pg.37] ဟိ တတ္ထ မဟန္တာ မဟန္တာ နှာရူ ကန္ဒလမကုဠသဏ္ဌာနာ, တတော သုခုမတရာ သူကရဝါဂုရရဇ္ဇုသဏ္ဌာနာ, တတော အဏုကတရာ ပူတိလတာသဏ္ဌာနာ, တတော အဏုကတရာ သီဟဠမဟာဝီဏာတန္တိသဏ္ဌာနာ, တတော အဏုကတရာ ထူလသုတ္တကသဏ္ဌာနာ, ဟတ္ထပိဋ္ဌိပါဒပိဋ္ဌီသု နှာရူ သကုဏပါဒသဏ္ဌာနာ, သီသေ နှာရူ ဂါမဒါရကာနံ သီသေ ဌပိတဝိရဠတရဒုကူလသဏ္ဌာနာ, ပိဋ္ဌိယာ နှာရူ တေမေတွာ အာတပေ ပသာရိတမစ္ဆဇာလသဏ္ဌာနာ, အဝသေသာ ဣမသ္မိံ သရီရေ တံတံအင်္ဂပစ္စင်္ဂါနုဂတာ နှာရူ သရီရေ ပဋိမုက္ကဇာလကဉ္စုကသဏ္ဌာနာတိ. ဒိသတော ဒွီသု ဒိသာသု ဇာတာ. တေသု စ ဒက္ခိဏကဏ္ဏစူဠိကတော ပဋ္ဌာယ ပဉ္စ ကဏ္ဍရနာမကာ မဟာနှာရူ ပုရတော စ ပစ္ဆတော စ ဝိနန္ဓမာနာ ဝါမပဿံ ဂတာ, ဝါမကဏ္ဏစူဠိကတော ပဋ္ဌာယ ပဉ္စ ပုရတော စ ပစ္ဆတော စ ဝိနန္ဓမာနာ ဒက္ခိဏပဿံ ဂတာ, ဒက္ခိဏဂလဝါဋကတော ပဋ္ဌာယ ပဉ္စ ပုရတော စ ပစ္ဆတော စ ဝိနန္ဓမာနာ ဝါမပဿံ ဂတာ, ဝါမဂလဝါဋကတော ပဋ္ဌာယ ပဉ္စ ပုရတော စ ပစ္ဆတော စ ဝိနန္ဓမာနာ ဒက္ခိဏပဿံ ဂတာ, ဒက္ခိဏဟတ္ထံ ဝိနန္ဓမာနာ ပုရတော စ ပစ္ဆတော စ ပဉ္စ ပဉ္စာတိ ဒသ ကဏ္ဍရနာမကာ ဧဝ မဟာနှာရူ အာရုဠှာ. တထာ ဝါမဟတ္ထံ, ဒက္ခိဏပါဒံ, ဝါမပါဒဉ္စာတိ ဧဝမေတေ သဋ္ဌိ မဟာနှာရူ သရီရဓာရကာ သရီရနိယာမကာတိပိ ဝဝတ္ထပေတိ. ဩကာသတော သကလသရီရေ အဋ္ဌိစမ္မာနံ အဋ္ဌိမံသာနဉ္စ အန္တရေ အဋ္ဌီနိ အာဗန္ဓမာနာ ဌိတာတိ. इसके बाद, शरीर में नौ सौ प्रकार की नसों (स्नायुओं) को वर्ण (रंग) की दृष्टि से 'सफेद' के रूप में निर्धारित किया जाता है; कुछ आचार्य इन्हें 'मधु-वर्ण' (शहद के रंग का) भी कहते हैं। आकृति की दृष्टि से ये विभिन्न आकृतियों की होती हैं। जैसे कि, उनमें से जो बहुत बड़ी नसें हैं, वे कुन्द (चमेली) की कली के समान आकृति वाली होती हैं; उनसे जो सूक्ष्म हैं, वे सूअर को बाँधने वाली रस्सी के समान आकृति वाली होती हैं; उनसे जो और छोटी हैं, वे 'पूतिलता' (एक प्रकार की लता) की आकृति वाली होती हैं; उनसे जो और छोटी हैं, वे सिंहली (श्रीलंकाई) बड़ी वीणा के तारों के समान आकृति वाली होती हैं; उनसे जो और छोटी हैं, वे मोटे धागे के समान आकृति वाली होती हैं। हाथों और पैरों के पृष्ठ भाग (ऊपरी हिस्से) की नसें पक्षियों के पंजों के समान आकृति वाली होती हैं। सिर की नसें गाँव के बालकों के सिर पर रखे हुए झीने (पतले) रेशमी वस्त्र के समान आकृति वाली होती हैं। पीठ की नसें धूप में सुखाए गए गीले मछली पकड़ने के जाल के समान आकृति वाली होती हैं। इस शरीर में शेष नसें, जो विभिन्न अंगों और प्रत्यंगों में फैली हुई हैं, वे शरीर पर पहने हुए जालनुमा कवच (कंचुक) के समान आकृति वाली होती हैं। दिशा की दृष्टि से, ये दो दिशाओं (ऊर्ध्व और अधो) में उत्पन्न होती हैं। उनमें से, दाहिने कान के मूल से शुरू होकर 'कण्डर' नामक पाँच बड़ी नसें आगे और पीछे से लपेटती हुई बाईं ओर जाती हैं; बाएं कान के मूल से शुरू होकर पाँच (बड़ी नसें) आगे और पीछे से लपेटती हुई दाईं ओर जाती हैं; दाहिने गले के भाग से शुरू होकर पाँच (बड़ी नसें) आगे और पीछे से लपेटती हुई बाईं ओर जाती हैं; बाएं गले के भाग से शुरू होकर पाँच (बड़ी नसें) आगे और पीछे से लपेटती हुई दाईं ओर जाती हैं। दाहिने हाथ को लपेटती हुई आगे और पीछे से पाँच-पाँच, इस प्रकार 'कण्डर' नामक दस बड़ी नसें ऊपर की ओर गई हैं। इसी प्रकार बाएं हाथ, दाहिने पैर और बाएं पैर में भी (दस-दस नसें गई हैं)। इस प्रकार, इन साठ बड़ी नसों को शरीर को धारण करने वाली और शरीर का नियमन करने वाली भी कहा जाता है। स्थान की दृष्टि से, ये समस्त शरीर में हड्डियों और त्वचा के बीच तथा हड्डियों और मांस के बीच हड्डियों को आपस में बाँधते हुए स्थित हैं। တတ္ထ ယထာ ဝလ္လိသန္တာနဗဒ္ဓေသု ကုဋ္ဋဒါရူသု န ဝလ္လိသန္တာနာ ဇာနန္တိ ‘‘အမှေဟိ ကုဋ္ဋဒါရူနိ အာဗဒ္ဓါနီ’’တိ, နပိ ကုဋ္ဋဒါရူနိ ဇာနန္တိ ‘‘မယံ ဝလ္လိသန္တာနေဟိ အာဗဒ္ဓါနီ’’တိ; ဧဝမေဝ န နှာရူ ဇာနန္တိ ‘‘အမှေဟိ တီဏိ အဋ္ဌိသတာနိ အာဗဒ္ဓါနီ’’တိ, နပိ တီဏိ အဋ္ဌိသတာနိ ဇာနန္တိ ‘‘မယံ နှာရူဟိ အာဗဒ္ဓါနီ’’တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ကေဝလံ တု – वहाँ जैसे लताओं से बँधे हुए दीवार के काष्ठ (लकड़ियों) में लताएँ यह नहीं जानतीं कि "हमने इन लकड़ियों को बाँध रखा है", और न ही लकड़ियाँ यह जानती हैं कि "हमें लताओं ने बाँध रखा है"; वैसे ही नसें यह नहीं जानतीं कि "हमने तीन सौ हड्डियों को बाँध रखा है", और न ही वे तीन सौ हड्डियाँ यह जानती हैं कि "हमें नसों ने बाँध रखा है"। क्योंकि ये धर्म (तत्व) चेतना और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... (पे)... यह कोई पुद्गल (व्यक्ति) नहीं है। केवल इतना है कि - ‘‘နဝနှာရုသတာ ဟောန္တိ, ဗျာမမတ္တေ ကဠေဝရေ; ဗန္ဓန္တိ အဋ္ဌိသံဃာဋံ, အဂါရမိဝ ဝလ္လိယော’’တိ. "इस व्यायाम-मात्र (एक हाथ फैलाए हुए पुरुष की लंबाई के बराबर) शरीर में नौ सौ नसें होती हैं; वे हड्डियों के समूह को वैसे ही बाँधती हैं जैसे लताएँ घर को बाँधती हैं।" ပရိစ္ဆေဒတော ဟေဋ္ဌာ တီဟိ အဋ္ဌိသတေဟိ တတ္ထ ပတိဋ္ဌိတတလေဟိ ဝါ ဥပရိ တစမံသေဟိ တိရိယံ အညမညေန ပရိစ္ဆိန္နာတိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတေသံ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ နှာရူ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. परिच्छेद (सीमा) की दृष्टि से, नीचे की ओर तीन सौ हड्डियों से या उन पर स्थित तलों से, ऊपर की ओर त्वचा और मांस से, और तिरछी दिशा में एक-दूसरे से ये परिच्छिन्न (सीमित) हैं - ऐसा निर्धारित किया जाता है। यह इनका 'सभाग-परिच्छेद' (समान अंगों के साथ सीमा) है; 'विसभाग-परिच्छेद' (असमान अंगों के साथ सीमा) तो बालों के समान ही है। इस प्रकार नसों को वर्ण आदि के द्वारा निर्धारित किया जाता है। တတော [Pg.38] ပရံ သရီရေ ဒွတ္တိံသဒန္တဋ္ဌိကာနံ ဝိသုံ ဂဟိတတ္တာ သေသာနိ စတုသဋ္ဌိ ဟတ္ထဋ္ဌိကာနိ စတုသဋ္ဌိ ပါဒဋ္ဌိကာနိ စတုသဋ္ဌိ မုဒုကဋ္ဌိကာနိ မံသနိဿိတာနိ ဒွေ ပဏှိကဋ္ဌီနိ ဧကေကသ္မိံ ပါဒေ ဒွေ ဒွေ ဂေါပ္ဖကဋ္ဌိကာနိ ဒွေ ဇင်္ဃဋ္ဌိကာနိ ဧကံ ဇဏ္ဏုကဋ္ဌိ ဧကံ ဦရုဋ္ဌိ ဒွေ ကဋိဋ္ဌီနိ အဋ္ဌာရသ ပိဋ္ဌိကဏ္ဋကဋ္ဌီနိ စတုဝီသတိ ဖာသုကဋ္ဌီနိ စုဒ္ဒသ ဥရဋ္ဌီနိ ဧကံ ဟဒယဋ္ဌိ ဒွေ အက္ခကဋ္ဌီနိ ဒွေ ပိဋ္ဌိဗာဟဋ္ဌီနိ ဒွေ ဗာဟဋ္ဌီနိ ဒွေ ဒွေ အဂ္ဂဗာဟဋ္ဌီနိ သတ္တ ဂီဝဋ္ဌီနိ ဒွေ ဟနုကဋ္ဌီနိ ဧကံ နာသိကဋ္ဌိ ဒွေ အက္ခိဋ္ဌီနိ ဒွေ ကဏ္ဏဋ္ဌီနိ ဧကံ နလာဋဋ္ဌိ ဧကံ မုဒ္ဓဋ္ဌိ နဝ သီသကပါလဋ္ဌီနီတိ ဧဝမာဒိနာ နယေန ဝုတ္တပ္ပဘေဒါနိ အဋ္ဌီနိ သဗ္ဗာနေဝ ဝဏ္ဏတော သေတာနီတိ ဝဝတ္ထပေတိ. इसके बाद, शरीर में बत्तीस दाँतों की हड्डियों को अलग से ग्रहण करने के कारण, शेष चौंसठ हाथ की हड्डियाँ, चौंसठ पैर की हड्डियाँ, मांस के आश्रित चौंसठ कोमल हड्डियाँ, दो एड़ी की हड्डियाँ, प्रत्येक पैर में दो-दो टखने की हड्डियाँ, दो पिंडली की हड्डियाँ, एक घुटने की हड्डी, एक जांघ की हड्डी, दो कूल्हे की हड्डियाँ, अठारह रीढ़ की हड्डियाँ, चौबीस पसलियाँ, चौदह छाती की हड्डियाँ, एक हृदय की हड्डी (उरोस्थि), दो हंसली की हड्डियाँ, दो कंधे की हड्डियाँ, दो ऊपरी बाहु की हड्डियाँ, दो-दो अग्र-बाहु की हड्डियाँ, सात गर्दन की हड्डियाँ, दो जबड़े की हड्डियाँ, एक नाक की हड्डी, दो आँख की हड्डियाँ (नेत्र-कोटर), दो कान की हड्डियाँ, एक माथे की हड्डी, एक सिर के ऊपरी भाग की हड्डी और नौ कपाल की हड्डियाँ - इस प्रकार बताए गए भेदों वाली हड्डियाँ हैं। इन सभी को वर्ण की दृष्टि से 'सफेद' के रूप में निर्धारित किया जाता है। သဏ္ဌာနတော နာနာသဏ္ဌာနာနိ. တထာ ဟိ တတ္ထ အဂ္ဂပါဒင်္ဂုလိယဋ္ဌီနိ ကတကဗီဇသဏ္ဌာနာနိ, တဒနန္တရာနိ အင်္ဂုလီနံ မဇ္ဈပဗ္ဗဋ္ဌီနိ အပရိပုဏ္ဏပနသဋ္ဌိသဏ္ဌာနာနိ, မူလပဗ္ဗဋ္ဌီနိ ပဏဝသဏ္ဌာနာနိ, မောရသကလိသဏ္ဌာနာနီတိပိ ဧကေ. ပိဋ္ဌိပါဒဋ္ဌီနိ ကောဋ္ဋိတကန္ဒလကန္ဒရာသိသဏ္ဌာနာနိ ပဏှိကဋ္ဌီနိ ဧကဋ္ဌိတာလဖလဗီဇသဏ္ဌာနာနိ, ဂေါပ္ဖကဋ္ဌီနိ ဧကတောဗဒ္ဓကီဠာဂေါဠကသဏ္ဌာနာနိ, ဇင်္ဃဋ္ဌိကေသု ခုဒ္ဒကံ ဓနုဒဏ္ဍသဏ္ဌာနံ, မဟန္တံ ခုပ္ပိပါသာမိလာတဓမနိပိဋ္ဌိသဏ္ဌာနံ, ဇင်္ဃဋ္ဌိကဿ ဂေါပ္ဖကဋ္ဌိကေသု ပတိဋ္ဌိတဋ္ဌာနံ အပနီတတစခဇ္ဇူရီကဠီရသဏ္ဌာနံ, ဇင်္ဃဋ္ဌိကဿ ဇဏ္ဏုကဋ္ဌိကေ ပတိဋ္ဌိတဋ္ဌာနံ မုဒိင်္ဂမတ္ထကသဏ္ဌာနံ ဇဏ္ဏုကဋ္ဌိ ဧကပဿတော ဃဋ္ဋိတဖေဏသဏ္ဌာနံ, ဦရုဋ္ဌီနိ ဒုတ္တစ္ဆိတဝါသိဖရသုဒဏ္ဍသဏ္ဌာနာနိ, ဦရုဋ္ဌိကဿ ကဋဋ္ဌိကေ ပတိဋ္ဌိတဋ္ဌာနံ သုဝဏ္ဏကာရာနံ အဂ္ဂိဇာလနကသလာကာဗုန္ဒိသဏ္ဌာနံ, တပ္ပတိဋ္ဌိတောကာသော အဂ္ဂစ္ဆိန္နပုန္နာဂဖလသဏ္ဌာနော, ကဋိဋ္ဌီနိ ဒွေပိ ဧကာဗဒ္ဓါနိ ဟုတွာ ကုမ္ဘကာရေဟိ ကတစုလ္လိသဏ္ဌာနာနိ, တာပသဘိသိကာသဏ္ဌာနာနီတိပိ ဧကေ. အာနိသဒဋ္ဌီနိ ဟေဋ္ဌာမုခဌပိတသပ္ပဖဏသဏ္ဌာနာနိ, သတ္တဋ္ဌဋ္ဌာနေသု ဆိဒ္ဒါဝဆိဒ္ဒါနိ အဋ္ဌာရသ ပိဋ္ဌိကဏ္ဋကဋ္ဌီနိ အဗ္ဘန္တရတော ဥပရူပရိ ဌပိတသီသကပဋ္ဋဝေဌကသဏ္ဌာနာနိ, ဗာဟိရတော ဝဋ္ဋနာဝလိသဏ္ဌာနာနိ, တေသံ အန္တရန္တရာ ကကစဒန္တသဒိသာနိ ဒွေ တီဏိ ကဏ္ဋကာနိ ဟောန္တိ, စတုဝီသတိယာ [Pg.39] ဖာသုကဋ္ဌီသု ပရိပုဏ္ဏာနိ ပရိပုဏ္ဏသီဟဠဒါတ္တသဏ္ဌာနာနိ, အပရိပုဏ္ဏာနိ အပရိပုဏ္ဏသီဟဠဒါတ္တသဏ္ဌာနာနိ, သဗ္ဗာနေဝ ဩဒါတကုက္ကုဋဿ ပသာရိတပက္ခဒွယသဏ္ဌာနာနီတိပိ ဧကေ. စုဒ္ဒသ ဥရဋ္ဌီနိ ဇိဏ္ဏသန္ဒမာနိကဖလကပန္တိသဏ္ဌာနာနိ, ဟဒယဋ္ဌိ ဒဗ္ဗိဖဏသဏ္ဌာနံ, အက္ခကဋ္ဌီနိ ခုဒ္ဒကလောဟဝါသိဒဏ္ဍသဏ္ဌာနာနိ, တေသံ ဟေဋ္ဌာ အဋ္ဌိ အဒ္ဓစန္ဒသဏ္ဌာနံ, ပိဋ္ဌိဗာဟဋ္ဌီနိ ဖရသုဖဏသဏ္ဌာနာနိ, ဥပဍ္ဎစ္ဆိန္နသီဟဠကုဒါလသဏ္ဌာနာနီတိပိ ဧကေ. ဗာဟဋ္ဌီနိ အာဒါသဒဏ္ဍသဏ္ဌာနာနိ, မဟာဝါသိဒဏ္ဍသဏ္ဌာနာနီတိပိ ဧကေ. အဂ္ဂဗာဟဋ္ဌီနိ ယမကတာလကန္ဒသဏ္ဌာနာနိ, မဏိဗန္ဓဋ္ဌီနိ ဧကတော အလ္လိယာပေတွာ ဌပိတသီသကပဋ္ဋဝေဌကသဏ္ဌာနာနိ, ပိဋ္ဌိဟတ္ထဋ္ဌီနိ ကောဋ္ဋိတကန္ဒလကန္ဒရာသိသဏ္ဌာနာနိ, ဟတ္ထင်္ဂုလိမူလပဗ္ဗဋ္ဌီနိ ပဏဝသဏ္ဌာနာနိ, မဇ္ဈပဗ္ဗဋ္ဌီနိ အပရိပုဏ္ဏပနသဋ္ဌိသဏ္ဌာနာနိ, အဂ္ဂပဗ္ဗဋ္ဌီနိ ကတကဗီဇသဏ္ဌာနာနိ, သတ္တ ဂီဝဋ္ဌီနိ ဒဏ္ဍေ ဝိဇ္ဈိတွာ ပဋိပါဋိယာ ဌပိတဝံသကဠီရခဏ္ဍသဏ္ဌာနာနိ, ဟေဋ္ဌိမဟနုကဋ္ဌိ ကမ္မာရာနံ အယောကူဋယောတ္တကသဏ္ဌာနံ, ဥပရိမဟနုကဋ္ဌိ အဝလေခနသတ္ထကသဏ္ဌာနံ, အက္ခိနာသကူပဋ္ဌီနိ အပနီတမိဉ္ဇတရုဏတာလဋ္ဌိသဏ္ဌာနာနိ, နလာဋဋ္ဌိ အဓောမုခဌပိတဘိန္နသင်္ခကပါလသဏ္ဌာနံ, ကဏ္ဏစူဠိကဋ္ဌီနိ နှာပိတခုရကောသသဏ္ဌာနာနိ, နလာဋကဏ္ဏစူဠိကာနံ ဥပရိ ပဋ္ဋဗန္ဓနောကာသေ အဋ္ဌိဗဟလဃဋပုဏ္ဏပဋပိလောတိကခဏ္ဍသဏ္ဌာနံ, မုဒ္ဓနဋ္ဌိ မုခစ္ဆိန္နဝင်္ကနာဠိကေရသဏ္ဌာနံ, သီသဋ္ဌီနိ သိဗ္ဗေတွာ ဌပိတဇဇ္ဇရာလာဗုကဋာဟသဏ္ဌာနာနီတိ. ဒိသတော ဒွီသု ဒိသာသု ဇာတာနိ. आकृति की दृष्टि से वे विभिन्न आकृतियों की होती हैं। जैसे कि, वहाँ पैर की उंगलियों के अग्र भाग की हड्डियाँ कतक (निर्मली) के बीज के समान होती हैं; उनके बाद की उंगलियों के मध्य पर्व की हड्डियाँ अपूर्ण (पतले) कटहल के बीज के समान होती हैं; मूल पर्व की हड्डियाँ पणव (एक प्रकार का छोटा ढोल) के समान होती हैं, और कुछ आचार्यों के अनुसार मोर की गर्दन के जोड़ के समान होती हैं। पैर के ऊपरी भाग की हड्डियाँ कुचले हुए कन्दल की जड़ों के समूह के समान होती हैं; एड़ी की हड्डियाँ एक बीज वाले ताड़ के फल के बीज के समान होती हैं; टखने की हड्डियाँ एक साथ बँधी हुई खेलने की गोलियों के समान होती हैं; पिंडली की हड्डियों में छोटी हड्डी धनुष के दंड के समान होती है, और बड़ी हड्डी भूख-प्यास से सूखे हुए अजगर की पीठ के समान होती है; पिंडली की हड्डी का टखने की हड्डियों पर टिकने वाला स्थान छिले हुए खजूर के अंकुर के समान होता है; पिंडली की हड्डी का घुटने की हड्डी पर टिकने वाला स्थान मृदंग के ऊपरी भाग के समान होता है; घुटने की हड्डी एक ओर से कुलाल के औजार के समान होती है; जांघ की हड्डियाँ बिना छिले हुए बसूले या कुल्हाड़ी के दंड के समान होती हैं; जांघ की हड्डी का कूल्हे की हड्डी में टिकने वाला स्थान सुनारों की फूँकनी के हत्थे के समान होता है; वह स्थान जहाँ वह टिकती है, अग्र भाग से कटे हुए पुन्नाग के फल के समान होता है; कूल्हे की दोनों हड्डियाँ एक साथ जुड़कर कुम्हार के आवे के समान होती हैं, और कुछ आचार्यों के अनुसार तपस्वियों के आसन के समान होती हैं। नितंब की हड्डियाँ नीचे की ओर मुख किए हुए सर्प के फण के समान होती हैं; सात-आठ स्थानों पर छिद्रों वाली अठारह रीढ़ की हड्डियाँ भीतर से एक के ऊपर एक रखी हुई सीसे की पट्टियों के समान होती हैं और बाहर से गोल बाँस की पोरियों की पंक्ति के समान होती हैं; उनके बीच-बीच में आरी के दाँतों के समान दो-तीन काँटे होते हैं; चौबीस पसलियों में से पूर्ण पसलियाँ पूर्ण सिंहली हँसिये के समान होती हैं और अपूर्ण पसलियाँ अपूर्ण सिंहली हँसिये के समान होती हैं, और कुछ आचार्यों के अनुसार वे सभी एक सफेद मुर्गे के फैले हुए दोनों पंखों के समान होती हैं। चौदह छाती की हड्डियाँ पुरानी पालकी के तख्तों की पंक्ति के समान होती हैं; हृदय की हड्डी करछुल के फल के समान होती है; हँसली की हड्डियाँ छोटे लोहे के बसूले के दंड के समान होती हैं; उनके नीचे की हड्डी आधे चंद्रमा के समान होती है; कंधे की हड्डियाँ कुल्हाड़ी के फल के समान होती हैं, और कुछ आचार्यों के अनुसार आधी कटी हुई सिंहली कुदाल के समान होती हैं। बाहु की हड्डियाँ दर्पण के दंड के समान होती हैं, और कुछ आचार्यों के अनुसार बड़े बसूले के दंड के समान होती हैं। अग्रबाहु की हड्डियाँ ताड़ के जुड़वाँ अंकुरों के समान होती हैं; कलाई की हड्डियाँ एक साथ जोड़कर रखी हुई सीसे की पट्टियों के वलय के समान होती हैं; हाथ के ऊपरी भाग की हड्डियाँ कुचले हुए कन्दल की जड़ों के समूह के समान होती हैं; हाथ की उंगलियों के मूल पर्व की हड्डियाँ पणव के समान, मध्य पर्व की हड्डियाँ अपूर्ण कटहल के बीज के समान और अग्र पर्व की हड्डियाँ कतक के बीज के समान होती हैं। गर्दन की सात हड्डियाँ दंड में पिरोकर क्रम से रखे हुए बाँस के अंकुर के टुकड़ों के समान होती हैं; नीचे का जबड़ा लुहारों के लोहे के घन के हत्थे के समान होता है; ऊपर का जबड़ा छीलने वाले छोटे चाकू के समान होता है; आँख और नाक के कोटर की हड्डियाँ गूदा निकाले हुए ताड़ के कच्चे बीज के समान होती हैं; माथे की हड्डी नीचे की ओर मुख करके रखे हुए शंख के टूटे हुए कपाल के समान होती है; कान की जड़ की हड्डियाँ नाई के उस्तरे के कोश के समान होती हैं; माथे और कान की जड़ के ऊपर जहाँ पट्टी बाँधी जाती है, वहाँ की हड्डी घड़े पर ढके हुए मोटे पुराने कपड़े के टुकड़े के समान होती है; सिर के ऊपरी भाग की हड्डी मुख कटे हुए टेढ़े नारियल के समान होती है; सिर की हड्डियाँ सिलकर रखे हुए पुराने कद्दू के पात्र के समान होती हैं। दिशा की दृष्टि से वे दो दिशाओं में उत्पन्न होती हैं। ဩကာသတော အဝိသေသေန သကလသရီရေ ဌိတာနိ, ဝိသေသေန တု သီသဋ္ဌီနိ ဂီဝဋ္ဌိကေသု ပတိဋ္ဌိတာနိ, ဂီဝဋ္ဌီနိ ပိဋ္ဌိကဏ္ဋကဋ္ဌီသု ပတိဋ္ဌိတာနိ, ပိဋ္ဌိကဏ္ဋကဋ္ဌီနိ ကဋိဋ္ဌီသု ပတိဋ္ဌိတာနိ, ကဋိဋ္ဌီနိ ဦရုဋ္ဌိကေသု ပတိဋ္ဌိတာနိ, ဥရုဋ္ဌီနိ ဇဏ္ဏုကဋ္ဌိကေသု, ဇဏ္ဏုကဋ္ဌီနိ ဇင်္ဃဋ္ဌိကေသု, ဇင်္ဃဋ္ဌီနိ ဂေါပ္ဖကဋ္ဌိကေသု, ဂေါပ္ဖကဋ္ဌီနိ ပိဋ္ဌိပါဒဋ္ဌိကေသု ပတိဋ္ဌိတာနိ, ပိဋ္ဌိပါဒဋ္ဌိကာနိ စ ဂေါပ္ဖကဋ္ဌီနိ ဥက္ခိပိတွာ ဌိတာနိ, ဂေါပ္ဖကဋ္ဌီနိ ဇင်္ဃဋ္ဌီနိ…ပေ… ဂီဝဋ္ဌီနိ သီသဋ္ဌီနိ ဥက္ခိပိတွာ ဌိတာနီတိ ဧတေနာနုသာရေန အဝသေသာနိပိ အဋ္ဌီနိ ဝေဒိတဗ္ဗာနိ. स्थान की दृष्टि से वे सामान्य रूप से पूरे शरीर में स्थित होती हैं, किंतु विशेष रूप से सिर की हड्डियाँ गर्दन की हड्डियों पर टिकी होती हैं, गर्दन की हड्डियाँ रीढ़ की हड्डियों पर टिकी होती हैं, रीढ़ की हड्डियाँ कूल्हे की हड्डियों पर टिकी होती हैं, कूल्हे की हड्डियाँ जांघ की हड्डियों पर टिकी होती हैं, जांघ की हड्डियाँ घुटने की हड्डियों पर, घुटने की हड्डियाँ पिंडली की हड्डियों पर, पिंडली की हड्डियाँ टखने की हड्डियों पर और टखने की हड्डियाँ पैर के ऊपरी भाग की हड्डियों पर टिकी होती हैं; और पैर के ऊपरी भाग की हड्डियाँ टखने की हड्डियों को धारण किए हुए हैं, टखने की हड्डियाँ पिंडली की हड्डियों को... (पेय्याल)... गर्दन की हड्डियाँ सिर की हड्डियों को धारण किए हुए स्थित हैं। इस क्रम से शेष हड्डियों को भी समझना चाहिए। တတ္ထ ယထာ ဣဋ္ဌကဂေါပါနသိစယာဒီသု န ဥပရိမာ ဣဋ္ဌကာဒယော ဇာနန္တိ ‘‘မယံ ဟေဋ္ဌိမေသု ပတိဋ္ဌိတာ’’တိ, နပိ ဟေဋ္ဌိမာ ဇာနန္တိ ‘‘မယံ ဥပရိမာနိ ဥက္ခိပိတွာ ဌိတာ’’တိ; ဧဝမေဝ န သီသဋ္ဌိကာနိ ဇာနန္တိ ‘‘မယံ ဂီဝဋ္ဌိကေသု [Pg.40] ပတိဋ္ဌိတာနီ’’တိ…ပေ… န ဂေါပ္ဖကဋ္ဌိကာနိ ဇာနန္တိ ‘‘မယံ ပိဋ္ဌိပါဒဋ္ဌိကေသု ပတိဋ္ဌိတာနီ’’တိ, နပိ ပိဋ္ဌိပါဒဋ္ဌိကာနိ ဇာနန္တိ ‘‘မယံ ဂေါပ္ဖကဋ္ဌီနိ ဥက္ခိပိတွာ ဌိတာနီ’’တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ကေဝလံ တု ဣမာနိ သာဓိကာနိ တီဏိ အဋ္ဌိသတာနိ နဝဟိ နှာရုသတေဟိ နဝဟိ စ မံသပေသိသတေဟိ အာဗဒ္ဓါနုလိတ္တာနိ, ဧကဃနစမ္မပရိယောနဒ္ဓါနိ, သတ္တရသဟရဏီသဟဿာနုဂတသိနေဟသိနေဟိတာနိ, နဝနဝုတိလောမကူပသဟဿပရိဿဝမာနသေဒဇလ္လိကာနိ အသီတိကိမိကုလာနိ, ကာယောတွေဝ သင်္ချံ ဂတာနိ, ယံ သဘာဝတော ဥပပရိက္ခန္တော ယောဂါဝစရော န ကိဉ္စိ ဂယှူပဂံ ပဿတိ, ကေဝလံ တု နှာရုသမ္ဗန္ဓံ နာနာကုဏပသင်္ကိဏ္ဏံ အဋ္ဌိသံဃာဋမေဝ ပဿတိ. ယံ ဒိသွာ ဒသဗလဿ ပုတ္တဘာဝံ ဥပေတိ. ယထာဟ – वहाँ, जैसे ईंटों की छतों आदि के ढेर में, ऊपर की ईंटें आदि यह नहीं जानतीं कि 'हम नीचे की ईंटों पर टिकी हैं', और न ही नीचे की ईंटें यह जानती हैं कि 'हम ऊपर की ईंटों को उठाए हुए खड़ी हैं'; इसी प्रकार, न तो सिर की हड्डियाँ यह जानती हैं कि 'हम गर्दन की हड्डियों पर टिकी हैं'... और न ही टखने की हड्डियाँ यह जानती हैं कि 'हम पैर के ऊपरी हिस्से की हड्डियों पर टिकी हैं', और न ही पैर के ऊपरी हिस्से की हड्डियाँ यह जानती हैं कि 'हम टखने की हड्डियों को उठाए हुए खड़ी हैं'। क्योंकि ये धर्म (तत्व) चेतना और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... यह कोई पुद्गल (व्यक्ति) नहीं है। केवल ये तीन सौ से कुछ अधिक हड्डियाँ, नौ सौ स्नायुओं (नसों) और नौ सौ मांस-पेशियों से बंधी और लिप्त हैं, एक अखंड त्वचा से ढकी हुई हैं, सत्रह हजार वाहिनियों (धमनियों) के स्नेह (तरल) से सिंचित हैं, निन्यानवे हजार रोम-कूपों से बहने वाले पसीने और मैल से युक्त हैं, अस्सी प्रकार के कृमि-कुलों का निवास स्थान हैं, और केवल 'काया' (शरीर) के नाम से जानी जाती हैं। जब एक योगाभ्यास करने वाला (योगावाचर) स्वभाव से इसका निरीक्षण करता है, तो उसे इसमें कुछ भी ग्रहण करने योग्य नहीं दिखता, बल्कि वह केवल स्नायुओं से बंधे हुए, विभिन्न प्रकार के अशुद्ध पदार्थों से भरे हुए हड्डियों के ढांचे को ही देखता है। जिसे देखकर वह दशबल (बुद्ध) के पुत्रत्व को प्राप्त होता है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘ပဋိပါဋိယဋ္ဌီနိ ဌိတာနိ ကောဋိယာ,အနေကသန္ဓိယမိတော န ကေဟိစိ; ဗဒ္ဓေါ နဟာရူဟိ ဇရာယ စောဒိတော,အစေတနော ကဋ္ဌကလိင်္ဂရူပမော. हड्डियाँ क्रम से टिकी हुई हैं, कोनों और अनेक जोड़ों से जुड़ी हुई हैं, लेकिन किसी (चेतन कर्ता) द्वारा नहीं बांधी गई हैं; ये स्नायुओं द्वारा बंधी हुई हैं, बुढ़ापे से प्रेरित हैं, अचेतन हैं और लकड़ी के कुंदों के समान हैं। ‘‘ကုဏပံ ကုဏပေ ဇာတံ, အသုစိမှိ စ ပူတိနိ; ဒုဂ္ဂန္ဓေ စာပိ ဒုဂ္ဂန္ဓံ, ဘေဒနမှိ စ ဝယဓမ္မံ. यह शव (अशुद्ध शरीर) शव से ही उत्पन्न हुआ है, अशुद्ध और दुर्गंधयुक्त में ही उत्पन्न हुआ है; दुर्गंधयुक्त में ही दुर्गंध है, और यह विनाशशील तथा क्षय होने वाला है। ‘‘အဋ္ဌိပုဋေ အဋ္ဌိပုဋော, နိဗ္ဗတ္တော ပူတိနိ ပူတိကာယမှိ; တမှိ စ ဝိနေထ ဆန္ဒံ, ဟေဿထ ပုတ္တာ ဒသဗလဿာ’’တိ စ. हड्डियों के पिंजरे में हड्डियों का पिंजरा उत्पन्न हुआ है, इस दुर्गंधयुक्त शरीर में दुर्गंध ही उत्पन्न हुई है; इसमें अपनी तृष्णा (छंद) को त्याग दो, तब तुम दशबल (बुद्ध) के पुत्र बनोगे। ပရိစ္ဆေဒတော အန္တော အဋ္ဌိမိဉ္ဇေန ဥပရိတော မံသေန အဂ္ဂေ မူလေ စ အညမညေန ပရိစ္ဆိန္နာနီတိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတေသံ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ အဋ္ဌီနိ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. परिच्छेद (सीमा) की दृष्टि से, वह निर्धारित करता है कि 'अंदर से ये हड्डियों की मज्जा द्वारा, ऊपर से मांस द्वारा, और सिरों तथा आधारों पर एक-दूसरे द्वारा परिच्छिन्न (अलग) हैं'। यह इनका 'सभाग-परिच्छेद' (समान सीमा) है, और 'विसभाग-परिच्छेद' (असमान सीमा) तो बालों के समान ही है। इस प्रकार वह वर्ण (रंग) आदि के आधार पर हड्डियों का निर्धारण करता है। တတော ပရံ သရီရေ ယထာဝုတ္တပ္ပဘေဒါနံ အဋ္ဌီနံ အဗ္ဘန္တရဂတံ အဋ္ဌိမိဉ္ဇံ ဝဏ္ဏတော သေတန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော အတ္တနော ဩကာသသဏ္ဌာနန္တိ. သေယျထိဒံ – မဟန္တမဟန္တာနံ အဋ္ဌီနံ အဗ္ဘန္တရဂတံ သေဒေတွာ ဝဋ္ဋေတွာ မဟန္တေသု ဝံသနဠကပဗ္ဗေသု ပက္ခိတ္တမဟာဝေတ္တင်္ကုရသဏ္ဌာနံ, ခုဒ္ဒါနုခုဒ္ဒကာနံ [Pg.41] အဗ္ဘန္တရဂတံ သေဒေတွာ ဝဋ္ဋေတွာ ခုဒ္ဒါနုခုဒ္ဒကေသု ဝံသနဠကပဗ္ဗေသု ပက္ခိတ္တတနုဝေတ္တင်္ကုရသဏ္ဌာနန္တိ. ဒိသတော ဒွီသု ဒိသာသု ဇာတံ. ဩကာသတော အဋ္ဌီနံ အဗ္ဘန္တရေ ပတိဋ္ဌိတန္တိ. उसके बाद, वह शरीर में पूर्वोक्त प्रकार की हड्डियों के भीतर स्थित 'हड्डी की मज्जा' (अस्थि-मज्जा) का निर्धारण करता है कि वर्ण की दृष्टि से यह सफेद है। संस्थान (आकार) की दृष्टि से, यह अपने स्थान के आकार के अनुसार होती है। जैसे—बड़ी-बड़ी हड्डियों के भीतर स्थित मज्जा, उबाले और मरोड़े गए बड़े बांस या सरकंडे के पोरों में डाले गए बड़े बेंत के अंकुर के आकार की होती है; और छोटी-छोटी हड्डियों के भीतर स्थित मज्जा, उबाले और मरोड़े गए छोटे बांस या सरकंडे के पोरों में डाले गए पतले बेंत के अंकुर के आकार की होती है। दिशा की दृष्टि से, यह दोनों दिशाओं (ऊपर और नीचे) में उत्पन्न होती है। स्थान की दृष्टि से, यह हड्डियों के भीतर स्थित होती है। တတ္ထ ယထာ ဝေဠုနဠကာဒီနံ အန္တောဂတာနိ ဒဓိဖာဏိတာနိ န ဇာနန္တိ ‘‘မယံ ဝေဠုနဠကာဒီနံ အန္တောဂတာနီ’’တိ, နပိ ဝေဠုနဠကာဒယော ဇာနန္တိ ‘‘ဒဓိဖာဏိတာနိ အမှာကံ အန္တောဂတာနီ’’တိ; ဧဝမေဝ န အဋ္ဌိမိဉ္ဇံ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ အဋ္ဌီနံ အန္တောဂတ’’န္တိ, နပိ အဋ္ဌီနိ ဇာနန္တိ ‘‘အဋ္ဌိမိဉ္ဇံ အမှာကံ အန္တောဂတ’’န္တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော အဋ္ဌီနံ အဗ္ဘန္တရတလေဟိ အဋ္ဌိမိဉ္ဇဘာဂေန စ ပရိစ္ဆိန္နန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ အဋ္ဌိမိဉ္ဇံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ, जैसे बांस या सरकंडे आदि के भीतर स्थित दही या गुड़ यह नहीं जानते कि 'हम बांस या सरकंडे आदि के भीतर हैं', और न ही वे बांस या सरकंडे आदि यह जानते हैं कि 'दही या गुड़ हमारे भीतर हैं'; इसी प्रकार, न तो अस्थि-मज्जा यह जानती है कि 'मैं हड्डियों के भीतर हूँ', और न ही हड्डियाँ यह जानती हैं कि 'अस्थि-मज्जा हमारे भीतर है'। क्योंकि ये धर्म चेतना और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... यह कोई पुद्गल नहीं है। परिच्छेद की दृष्टि से, वह निर्धारित करता है कि 'यह हड्डियों की आंतरिक सतहों और मज्जा के अपने भाग द्वारा परिच्छिन्न है'। यह इसका सभाग-परिच्छेद है, और विसभाग-परिच्छेद तो बालों के समान ही है। इस प्रकार वह वर्ण आदि के आधार पर अस्थि-मज्जा का निर्धारण करता है। တတော ပရံ သရီရဿ အဗ္ဘန္တရေ ဒွိဂေါဠကပ္ပဘေဒံ ဝက္ကံ ဝဏ္ဏတော မန္ဒရတ္တံ ပါဠိဘဒ္ဒကဋ္ဌိဝဏ္ဏန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော ဂါမဒါရကာနံ သုတ္တာဝုတကီဠာဂေါဠကသဏ္ဌာနံ, ဧကဝဏ္ဋသဟကာရဒွယသဏ္ဌာနန္တိပိ ဧကေ. ဒိသတော ဥပရိမာယ ဒိသာယ ဇာတံ. ဩကာသတော ဂလဝါဋကာ ဝိနိက္ခန္တေန ဧကမူလေန ထောကံ ဂန္တွာ ဒွိဓာ ဘိန္နေန ထူလနှာရုနာ ဝိနိဗဒ္ဓံ ဟုတွာ ဟဒယမံသံ ပရိက္ခိပိတွာ ဌိတန္တိ. उसके बाद, वह शरीर के भीतर दो गोलों के रूप में स्थित 'वृक्क' (किडनी) का निर्धारण करता है कि वर्ण की दृष्टि से यह हल्का लाल है, जैसे पलिभद्रक (कथरी) के बीज का रंग होता है। संस्थान की दृष्टि से, यह गाँव के बच्चों द्वारा धागे में पिरोए गए खेलने वाले गोलों के आकार का होता है; कुछ आचार्य कहते हैं कि यह एक ही डंठल वाले दो आमों के आकार का होता है। दिशा की दृष्टि से, यह ऊपरी दिशा में उत्पन्न होता है। स्थान की दृष्टि से, यह कंठ के गड्ढे से निकलकर एक ही मूल से थोड़ा आगे जाकर दो भागों में विभाजित एक मोटी नस (स्नायु) द्वारा बंधा हुआ, हृदय-मांस को घेरकर स्थित होता है। တတ္ထ ယထာ ဝဏ္ဋူပနိဗဒ္ဓံ သဟကာရဒွယံ န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ဝဏ္ဋေန ဥပနိဗဒ္ဓ’’န္တိ, နပိ ဝဏ္ဋံ ဇာနာတိ ‘‘မယာ သဟကာရဒွယံ ဥပနိဗဒ္ဓ’’န္တိ; ဧဝမေဝ န ဝက္ကံ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ထူလနှာရုနာ ဥပနိဗဒ္ဓ’’န္တိ, နပိ ထူလနှာရု ဇာနာတိ ‘‘မယာ ဝက္ကံ ဥပနိဗဒ္ဓ’’န္တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော ဝက္ကံ ဝက္ကဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္နန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ ဝက္ကံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ, जैसे डंठल से बंधे हुए दो आम यह नहीं जानते कि 'हम डंठल द्वारा बंधे हुए हैं', और न ही वह डंठल यह जानता है कि 'मेरे द्वारा दो आम बंधे हुए हैं'; इसी प्रकार, न तो वृक्क यह जानता है कि 'मैं मोटी नस द्वारा बंधा हुआ हूँ', और न ही वह मोटी नस यह जानती है कि 'मेरे द्वारा वृक्क बंधा हुआ है'। क्योंकि ये धर्म चेतना और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... यह कोई पुद्गल नहीं है। परिच्छेद की दृष्टि से, वह निर्धारित करता है कि 'वृक्क, वृक्क के अपने भाग द्वारा परिच्छिन्न है'। यह इसका सभाग-परिच्छेद है, और विसभाग-परिच्छेद तो बालों के समान ही है। इस प्रकार वह वर्ण आदि के आधार पर वृक्क का निर्धारण करता है। တတော ပရံ သရီရဿ အဗ္ဘန္တရေ ဟဒယံ ဝဏ္ဏတော ရတ္တံ ရတ္တပဒုမပတ္တပိဋ္ဌိဝဏ္ဏန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော ဗာဟိရပတ္တာနိ အပနေတွာ အဓောမုခဌပိတပဒုမမကုဠသဏ္ဌာနံ, တဉ္စ အဂ္ဂစ္ဆိန္နပုန္နာဂဖလမိဝ ဝိဝဋေကပဿံ ဗဟိ မဋ္ဌံ အန္တော ကောသာတကီဖလဿ အဗ္ဘန္တရသဒိသံ. ပညာဗဟုလာနံ ထောကံ [Pg.42] ဝိကသိတံ, မန္ဒပညာနံ မကုဠိတမေဝ. ယံ ရူပံ နိဿာယ မနောဓာတု စ မနောဝိညာဏဓာတု စ ပဝတ္တန္တိ, တံ အပနေတွာ အဝသေသမံသပိဏ္ဍသင်္ခါတဟဒယဗ္ဘန္တရေ အဒ္ဓပသတမတ္တံ လောဟိတံ သဏ္ဌာတိ, တံ ရာဂစရိတဿ ရတ္တံ, ဒေါသစရိတဿ ကာဠကံ, မောဟစရိတဿ မံသဓောဝနောဒကသဒိသံ, ဝိတက္ကစရိတဿ ကုလတ္ထယူသဝဏ္ဏံ, သဒ္ဓါစရိတဿ ကဏိကာရပုပ္ဖဝဏ္ဏံ, ပညာစရိတဿ အစ္ဆံ ဝိပ္ပသန္နမနာဝိလံ, နိဒ္ဓေါတဇာတိမဏိ ဝိယ ဇုတိမန္တံ ခါယတိ. ဒိသတော ဥပရိမာယ ဒိသာယ ဇာတံ. ဩကာသတော သရီရဗ္ဘန္တရေ ဒွိန္နံ ထနာနံ မဇ္ဈေ ပတိဋ္ဌိတန္တိ. इसके बाद शरीर के भीतर हृदय को वर्ण से लाल, लाल कमल की पंखुड़ी के बाहरी भाग के रंग जैसा निर्धारित करता है। संस्थान से, बाहरी पंखुड़ियों को हटाकर नीचे की ओर मुख करके रखे गए कमल की कली के समान है; और वह ऊपर से कटे हुए पुन्नाग फल की तरह एक ओर से खुला हुआ, बाहर से चिकना और भीतर से कड़वी तोरई के फल के आंतरिक भाग के समान है। प्रज्ञावानों का हृदय थोड़ा खिला हुआ होता है, मंदबुद्धि वालों का केवल कली के समान ही होता है। जिस रूप के आश्रय से मनोधातु और मनोविज्ञानधातु प्रवृत्त होते हैं, उस हृदय-वस्तु को छोड़कर शेष मांसपिंड कहे जाने वाले हृदय के भीतर आधा पसेता (अंजलि) मात्र रक्त स्थित रहता है; वह राग-चरित वाले का लाल, द्वेष-चरित वाले का काला, मोह-चरित वाले का मांस धोने वाले पानी के समान, वितर्क-चरित वाले का कुल्थी के काढ़े के रंग जैसा, श्रद्धा-चरित वाले का कणिकार के पुष्प के रंग जैसा, और प्रज्ञा-चरित वाले का स्वच्छ, अत्यंत निर्मल, मैल-रहित, तराशे हुए उत्तम मणि की तरह दीप्तिमान दिखाई देता है। दिशा से, यह ऊपरी दिशा में उत्पन्न है। स्थान से, शरीर के भीतर दोनों स्तनों के बीच स्थित है। တတ္ထ ယထာ ဒွိန္နံ ဝါတပါနကဝါဋကာနံ မဇ္ဈေ ဌိတော အဂ္ဂဠတ္ထမ္ဘကော န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ဒွိန္နံ ဝါတပါနကဝါဋကာနံ မဇ္ဈေ ဌိတော’’တိ, နပိ ဝါတပါနကဝါဋကာနိ ဇာနန္တိ ‘‘အမှာကံ မဇ္ဈေ အဂ္ဂဠတ္ထမ္ဘကော ဌိတော’’တိ; ဧဝမေဝံ န ဟဒယံ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ဒွိန္နံ ထနာနံ မဇ္ဈေ ဌိတ’’န္တိ, နပိ ထနာနိ ဇာနန္တိ ‘‘ဟဒယံ အမှာကံ မဇ္ဈေ ဌိတ’’န္တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော ဟဒယံ ဟဒယဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္နန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ ဟဒယံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ जैसे दो खिड़कियों के पल्लों के बीच स्थित अर्गल-स्तंभ नहीं जानता कि 'मैं दो खिड़कियों के पल्लों के बीच स्थित हूँ', और न ही खिड़कियों के पल्ले जानते हैं कि 'हमारे बीच अर्गल-स्तंभ स्थित है'; वैसे ही हृदय नहीं जानता कि 'मैं दो स्तनों के बीच स्थित हूँ', और न ही स्तन जानते हैं कि 'हृदय हमारे बीच स्थित है'। क्योंकि ये धर्म आभोग और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... पे... पुद्गल नहीं हैं। परिच्छेद से, हृदय को हृदय के भाग द्वारा परिच्छिन्न निर्धारित करता है। यह इसका सभाग-परिच्छेद है, और विसभाग-परिच्छेद तो बालों के समान ही है; इस प्रकार हृदय को वर्ण आदि से निर्धारित करता है। တတော ပရံ သရီရဿ အဗ္ဘန္တရေ ယကနသညိတံ ယမကမံသပိဏ္ဍံ ဝဏ္ဏတော ရတ္တံ ရတ္တကုမုဒဗာဟိရပတ္တပိဋ္ဌိဝဏ္ဏန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော ဧကမူလံ ဟုတွာ အဂ္ဂေ ယမကံ ကောဝိဠာရပတ္တသဏ္ဌာနံ, တဉ္စ ဒန္ဓာနံ ဧကံယေဝ ဟောတိ မဟန္တံ, ပညဝန္တာနံ ဒွေ ဝါ တီဏိ ဝါ ခုဒ္ဒကာနီတိ. ဒိသတော ဥပရိမာယ ဒိသာယ ဇာတံ. ဩကာသတော ဒွိန္နံ ထနာနံ အဗ္ဘန္တရေ ဒက္ခိဏပဿံ နိဿာယ ဌိတန္တိ. इसके बाद शरीर के भीतर यकृत नामक मांस के दोहरे पिंड को वर्ण से लाल, लाल कुमुद की पंखुड़ी के बाहरी भाग के रंग जैसा निर्धारित करता है। संस्थान से, एक मूल वाला होकर अग्र भाग में दो हिस्सों वाला कचनार के पत्ते की आकृति जैसा है; और वह मंदबुद्धि वालों का एक ही और बड़ा होता है, प्रज्ञावानों का दो या तीन और छोटे होते हैं। दिशा से, ऊपरी दिशा में उत्पन्न है। स्थान से, दोनों स्तनों के भीतर दाहिनी ओर के आश्रय में स्थित है। တတ္ထ ယထာ ပိဌရကပဿေ လဂ္ဂါ မံသပေသိ န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ပိဌရကပဿေ လဂ္ဂါ’’တိ, နပိ ပိဌရကပဿံ ဇာနာတိ ‘‘မယိ မံသပေသိ လဂ္ဂါ’’တိ; ဧဝမေဝ န ယကနံ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ဒွိန္နံ ထနာနံ အဗ္ဘန္တရေ ဒက္ခိဏပဿံ နိဿာယ ဌိတ’’န္တိ, နပိ ထနာနံ အဗ္ဘန္တရေ ဒက္ခိဏပဿံ ဇာနာတိ ‘‘မံ နိဿာယ ယကနံ ဌိတ’’န္တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော ပန ယကနံ ယကနဘာဂေန [Pg.43] ပရိစ္ဆိန္နန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ ယကနံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ जैसे बर्तन के पार्श्व में चिपका हुआ मांस का टुकड़ा नहीं जानता कि 'मैं बर्तन के पार्श्व में चिपका हूँ', और न ही बर्तन का पार्श्व जानता है कि 'मुझमें मांस का टुकड़ा चिपका है'; वैसे ही यकृत नहीं जानता कि 'मैं दोनों स्तनों के भीतर दाहिनी ओर के आश्रय में स्थित हूँ', और न ही स्तनों के भीतर का दाहिना पार्श्व जानता है कि 'मेरे आश्रय में यकृत स्थित है'। क्योंकि ये धर्म आभोग और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... पे... पुद्गल नहीं हैं। परिच्छेद से, यकृत को यकृत के भाग द्वारा परिच्छिन्न निर्धारित करता है। यह इसका सभाग-परिच्छेद है, और विसभाग-परिच्छेद तो बालों के समान ही है; इस प्रकार यकृत को वर्ण आदि से निर्धारित करता है। တတော ပရံ သရီရေ ပဋိစ္ဆန္နာပဋိစ္ဆန္နဘေဒတော ဒုဝိဓံ ကိလောမကံ ဝဏ္ဏတော သေတံ ဒုကူလပိလောတိကဝဏ္ဏန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော အတ္တနော ဩကာသသဏ္ဌာနံ. ဒိသတော ဒွီသု ဒိသာသု ဇာတံ. ဩကာသတော ပဋိစ္ဆန္နကိလောမကံ ဟဒယဉ္စ ဝက္ကဉ္စ ပရိဝါရေတွာ, အပ္ပဋိစ္ဆန္နကိလောမကံ သကလသရီရေ စမ္မဿ ဟေဋ္ဌတော မံသံ ပရိယောနန္ဓိတွာ ဌိတန္တိ. इसके बाद शरीर में ढके हुए और बिना ढके हुए के भेद से दो प्रकार के विलोमक को वर्ण से सफेद, मटमैले सफेद वस्त्र के रंग जैसा निर्धारित करता है। संस्थान से, अपने स्थान की आकृति वाला है। दिशा से, दो दिशाओं में उत्पन्न है। स्थान से, ढका हुआ विलोमक हृदय और वृक्क को घेरकर स्थित है, और बिना ढका हुआ विलोमक पूरे शरीर में त्वचा के नीचे मांस को लपेटकर स्थित है। တတ္ထ ယထာ ပိလောတိကာယ ပလိဝေဌိတေ မံသေ န ပိလောတိကာ ဇာနာတိ ‘‘မယာ မံသံ ပလိဝေဌိတ’’န္တိ, နပိ မံသံ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ပိလောတိကာယ ပလိဝေဌိတ’’န္တိ; ဧဝမေဝ န ကိလောမကံ ဇာနာတိ ‘‘မယာ ဟဒယဝက္ကာနိ သကလသရီရေ စ စမ္မဿ ဟေဋ္ဌတော မံသံ ပလိဝေဌိတ’’န္တိ. နပိ ဟဒယဝက္ကာနိ သကလသရီရေ စ မံသံ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ကိလောမကေန ပလိဝေဌိတ’’န္တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော ဟေဋ္ဌာ မံသေန ဥပရိ စမ္မေန တိရိယံ ကိလောမကဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္နန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ ကိလောမကံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ जैसे पुराने कपड़े से मांस के लपेटे जाने पर न तो कपड़ा जानता है कि 'मेरे द्वारा मांस लपेटा गया है', और न ही मांस जानता है कि 'मैं पुराने कपड़े द्वारा लपेटा गया हूँ'; वैसे ही विलोमक नहीं जानता कि 'मेरे द्वारा हृदय, वृक्क और पूरे शरीर में त्वचा के नीचे का मांस लपेटा गया है'। और न ही हृदय, वृक्क और पूरे शरीर का मांस जानता है कि 'मैं विलोमक द्वारा लपेटा गया हूँ'। क्योंकि ये धर्म आभोग और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... पे... पुद्गल नहीं हैं। परिच्छेद से, नीचे मांस द्वारा, ऊपर त्वचा द्वारा और तिरछे विलोमक के भाग द्वारा परिच्छिन्न निर्धारित करता है। यह इसका सभाग-परिच्छेद है, और विसभाग-परिच्छेद तो बालों के समान ही है; इस प्रकार विलोमक को वर्ण आदि से निर्धारित करता है। တတော ပရံ သရီရဿ အဗ္ဘန္တရေ ပိဟကံ ဝဏ္ဏတော နီလံ မီလာတနိဂ္ဂုဏ္ဍီပုပ္ဖဝဏ္ဏန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော ယေဘုယျေန သတ္တင်္ဂုလပ္ပမာဏံ အဗန္ဓနံ ကာဠဝစ္ဆကဇိဝှာသဏ္ဌာနံ. ဒိသတော ဥပရိမာယ ဒိသာယ ဇာတံ. ဩကာသတော ဟဒယဿ ဝါမပဿေ ဥဒရပဋလဿ မတ္ထကပဿံ နိဿာယ ဌိတံ, ယမှိ ပဟရဏပဟာရေန ဗဟိ နိက္ခန္တေ သတ္တာနံ ဇီဝိတက္ခယော ဟောတီတိ. इसके बाद शरीर के भीतर प्लीहा को वर्ण से नीला, मुरझाए हुए निर्गुण्डी के फूल के रंग जैसा निर्धारित करता है। संस्थान से, प्रायः सात अंगुल के परिमाण वाली, बंधन-रहित, काले बछड़े की जीभ की आकृति जैसी है। दिशा से, ऊपरी दिशा में उत्पन्न है। स्थान से, हृदय के बाईं ओर उदर-पटल के ऊपरी भाग के आश्रय में स्थित है, जिसके प्रहार की चोट से बाहर निकल जाने पर प्राणियों के जीवन का क्षय हो जाता है। တတ္ထ ယထာ ကောဋ္ဌကမတ္ထကပဿံ နိဿာယ ဌိတာ န ဂေါမယပိဏ္ဍိ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ကောဋ္ဌကမတ္ထကပဿံ နိဿာယ ဌိတာ’’တိ, နပိ ကောဋ္ဌကမတ္ထကပဿံ ဇာနာတိ ‘‘ဂေါမယပိဏ္ဍိ မံ နိဿာယ ဌိတာ’’တိ; ဧဝမေဝ န ပိဟကံ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ဥဒရပဋလဿ မတ္ထကပဿံ နိဿာယ ဌိတ’’န္တိ, နပိ ဥဒရပဋလဿ မတ္ထကပဿံ ဇာနာတိ ‘‘ပိဟကံ မံ နိဿာယ ဌိတ’’န္တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော [Pg.44] ပိဟကံ ပိဟကဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္နန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ ပိဟကံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ, जैसे कोठार की दीवार के बाहरी हिस्से के सहारे स्थित गोबर का पिण्ड यह नहीं जानता कि 'मैं कोठार की दीवार के बाहरी हिस्से के सहारे स्थित हूँ', और न ही कोठार की दीवार का बाहरी हिस्सा यह जानता है कि 'गोबर का पिण्ड मेरे सहारे स्थित है'; इसी प्रकार प्लीहा (spleen) यह नहीं जानती कि 'मैं उदर-पटल (पेट की झिल्ली) के ऊपरी हिस्से के सहारे स्थित हूँ', और न ही उदर-पटल का ऊपरी हिस्सा यह जानता है कि 'प्लीहा मेरे सहारे स्थित है'। क्योंकि ये धर्म (तत्व) चेतना और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... (पे)... ये पुद्गल नहीं हैं। परिच्छेद (सीमा) की दृष्टि से, वह प्लीहा को प्लीहा के अपने भाग के रूप में परिच्छिन्न (सीमित) निर्धारित करता है। यह इसका स्वभाव-परिच्छेद है, और विस्वभाव-परिच्छेद तो बालों के समान ही है—इस प्रकार वह वर्ण आदि के द्वारा प्लीहा को निर्धारित करता है। တတော ပရံ သရီရဿ အဗ္ဘန္တရေ ဒွတ္တိံသမံသခဏ္ဍပ္ပဘေဒံ ပပ္ဖာသံ ဝဏ္ဏတော ရတ္တံ နာတိပရိပက္ကဥဒုမ္ဗရဝဏ္ဏန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော ဝိသမစ္ဆိန္နပူဝသဏ္ဌာနံ, ဆဒနိဋ္ဌကခဏ္ဍပုဉ္ဇသဏ္ဌာနန္တိပိ ဧကေ. တဒေတံ အဗ္ဘန္တရေ အသိတပီတာဒီနံ အဘာဝေ ဥဂ္ဂတေန ကမ္မဇတေဇုသ္မနာ အဗ္ဘာဟတတ္တာ သင်္ခါဒိတပလာလပိဏ္ဍမိဝ နိရသံ နိရောဇံ ဟောတိ. ဒိသတော ဥပရိမာယ ဒိသာယ ဇာတံ. ဩကာသတော သရီရဗ္ဘန္တရေ ဒွိန္နံ ထနာနံ အဗ္ဘန္တရေ ဟဒယဉ္စ ယကနဉ္စ ဥပရိ ဆာဒေတွာ ဩလမ္ဗန္တံ ဌိတန္တိ. उसके बाद, शरीर के भीतर बत्तीस मांस-खण्डों के भेद वाले फेफड़ों (papphāsa) को वर्ण की दृष्टि से लाल, जो बहुत अधिक पके हुए गूलर के फल के रंग जैसा नहीं है, ऐसा निर्धारित करता है। संस्थान (आकृति) की दृष्टि से, यह विषम रूप से कटे हुए पूए (केक) के आकार का है, और कुछ आचार्यों के अनुसार यह छत की खपरैलों के टुकड़ों के ढेर के आकार का है। वह फेफड़ा शरीर के भीतर खाए-पिए हुए आहार आदि के अभाव में ऊपर उठी हुई कर्मज-तेजो-अग्नि (शारीरिक ऊष्मा) से संतप्त होने के कारण, कुचले हुए पुआल के पिण्ड के समान नीरस और ओज-रहित होता है। दिशा की दृष्टि से, यह ऊपरी दिशा में उत्पन्न है। स्थान की दृष्टि से, यह शरीर के भीतर दोनों स्तनों के बीच में हृदय और यकृत को ऊपर से ढँकते हुए लटकती हुई स्थिति में स्थित है। တတ္ထ ယထာ ဇိဏ္ဏကောဋ္ဌဗ္ဘန္တရေ လမ္ဗမာနော သကုဏကုလာဝကော န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ဇိဏ္ဏကောဋ္ဌဗ္ဘန္တရေ လမ္ဗမာနော ဌိတော’’တိ, နပိ ဇိဏ္ဏကောဋ္ဌဗ္ဘန္တရံ ဇာနာတိ ‘‘သကုဏကုလာဝကော မယိ လမ္ဗမာနော ဌိတော’’တိ; ဧဝမေဝ န ပပ္ဖာသံ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ သရီရဗ္ဘန္တရေ ဒွိန္နံ ထနာနံ အန္တရေ လမ္ဗမာနံ ဌိတ’’န္တိ, နပိ သရီရဗ္ဘန္တရေ ဒွိန္နံ ထနာနံ အန္တရံ ဇာနာတိ ‘‘မယိ ပပ္ဖာသံ လမ္ဗမာနံ ဌိတ’’န္တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော ပပ္ဖာသံ ပပ္ဖာသဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္နန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ ပပ္ဖာသံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ, जैसे किसी पुराने कोठार के भीतर लटकता हुआ पक्षी का घोंसला यह नहीं जानता कि 'मैं पुराने कोठार के भीतर लटक रहा हूँ', और न ही पुराना कोठार यह जानता है कि 'पक्षी का घोंसला मुझमें लटक रहा है'; इसी प्रकार फेफड़ा यह नहीं जानता कि 'मैं शरीर के भीतर दोनों स्तनों के बीच लटकती हुई स्थिति में स्थित हूँ', और न ही दोनों स्तनों के बीच का आंतरिक भाग यह जानता है कि 'फेफड़ा मुझमें लटक रहा है'। क्योंकि ये धर्म चेतना और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... (पे)... ये पुद्गल नहीं हैं। परिच्छेद की दृष्टि से, वह फेफड़े को फेफड़े के अपने भाग के रूप में परिच्छिन्न निर्धारित करता है। यह इसका स्वभाव-परिच्छेद है, और विस्वभाव-परिच्छेद तो बालों के समान ही है—इस प्रकार वह वर्ण आदि के द्वारा फेफड़े को निर्धारित करता है। တတော ပရံ အန္တောသရီရေ ပုရိသဿ ဒွတ္တိံသဟတ္ထံ, ဣတ္ထိယာ အဋ္ဌဝီသတိဟတ္ထံ, ဧကဝီသတိယာ ဌာနေသု ဩဘဂ္ဂံ အန္တံ ဝဏ္ဏတော သေတံ သက္ခရသုဓာဝဏ္ဏန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော သီသံ ဆိန္ဒိတွာ လောဟိတဒေါဏိယံ သံဝေလ္လေတွာ ဌပိတဓမ္မနိသဏ္ဌာနံ. ဒိသတော ဒွီသု ဒိသာသု ဇာတံ. ဩကာသတော ဥပရိ ဂလဝါဋကေ ဟေဋ္ဌာ စ ကရီသမဂ္ဂေ ဝိနိဗန္ဓတ္တာ ဂလဝါဋကကရီသမဂ္ဂပရိယန္တေ သရီရဗ္ဘန္တရေ ဌိတန္တိ. उसके बाद, शरीर के भीतर पुरुष की बत्तीस हाथ लंबी और स्त्री की अट्ठाईस हाथ लंबी, इक्कीस स्थानों से मुड़ी हुई आँत (anta) को वर्ण की दृष्टि से सफेद, चूने के लेप के रंग जैसी निर्धारित करता है। संस्थान की दृष्टि से, यह सिर काटकर रक्त के कुंड में कुंडली मारकर रखे हुए अजगर के आकार की है। दिशा की दृष्टि से, यह दोनों दिशाओं (ऊपरी और निचली) में उत्पन्न है। स्थान की दृष्टि से, ऊपर गले के छिद्र से और नीचे गुदा-मार्ग से बँधे होने के कारण, यह गले के छिद्र और गुदा-मार्ग के बीच शरीर के भीतर स्थित है। တတ္ထ ယထာ လောဟိတဒေါဏိယံ ဌပိတံ ဆိန္နသီသံ ဓမ္မနိကဠေဝရံ န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ လောဟိတဒေါဏိယံ ဌိတ’’န္တိ, နပိ လောဟိတဒေါဏိ ဇာနာတိ ‘‘မယိ ဆိန္နသီသံ ဓမ္မနိကဠေဝရံ ဌိတ’’န္တိ; ဧဝမေဝ န အန္တံ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ သရီရဗ္ဘန္တရေ ဌိတ’’န္တိ, နပိ သရီရဗ္ဘန္တရံ ဇာနာတိ ‘‘မယိ အန္တံ ဌိတ’’န္တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ [Pg.45] ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော အန္တံ အန္တဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္နန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ အန္တံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ, जैसे रक्त के कुंड में रखा हुआ सिर-कटा अजगर का शरीर यह नहीं जानता कि 'मैं रक्त के कुंड में स्थित हूँ', और न ही रक्त का कुंड यह जानता है कि 'सिर-कटा अजगर का शरीर मुझमें स्थित है'; इसी प्रकार आँत यह नहीं जानती कि 'मैं शरीर के भीतर स्थित हूँ', और न ही शरीर का आंतरिक भाग यह जानता है कि 'आँत मुझमें स्थित है'। क्योंकि ये धर्म चेतना और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... (पे)... ये पुद्गल नहीं हैं। परिच्छेद की दृष्टि से, वह आँत को आँत के अपने भाग के रूप में परिच्छिन्न निर्धारित करता है। यह इसका स्वभाव-परिच्छेद है, और विस्वभाव-परिच्छेद तो बालों के समान ही है—इस प्रकार वह वर्ण आदि के द्वारा आँत को निर्धारित करता है। တတော ပရံ အန္တောသရီရေ အန္တန္တရေ အန္တဂုဏံ ဝဏ္ဏတော သေတံ ဒကသီတလိကမူလဝဏ္ဏန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော ဒကသီတလိကမူလသဏ္ဌာနမေဝါတိ, ဂေါမုတ္တသဏ္ဌာနန္တိပိ ဧကေ. ဒိသတော ဒွီသု ဒိသာသု ဇာတံ. ဩကာသတော ကုဒါလဖရသုကမ္မာဒီနိ ကရောန္တာနံ ယန္တာကဍ္ဎနကာလေ ယန္တသုတ္တကမိဝ ယန္တဖလကာနိ အန္တဘောဂေ ဧကတော အဂ္ဂဠန္တေ အာဗန္ဓိတွာ ပါဒပုဉ္ဆနရဇ္ဇုမဏ္ဍလကဿ အန္တရာ တံ သိဗ္ဗိတွာ ဌိတရဇ္ဇုကာ ဝိယ ဧကဝီသတိယာ အန္တဘောဂါနံ အန္တရာ ဌိတန္တိ. उसके बाद, शरीर के भीतर आँतों के बीच में स्थित आंत्र-बंधन (antaguṇa) को वर्ण की दृष्टि से सफेद, 'दकसीतलिक' की जड़ के रंग जैसा निर्धारित करता है। संस्थान की दृष्टि से, यह दकसीतलिक की जड़ के आकार का ही है, और कुछ के अनुसार यह गोमूत्र की धारा के आकार का है। दिशा की दृष्टि से, यह दोनों दिशाओं में उत्पन्न है। स्थान की दृष्टि से, जैसे कुदाल-कुल्हाड़ी आदि का काम करने वालों के यंत्र खींचते समय यंत्र की डोरी होती है, अथवा जैसे यंत्र के तख्तों को आँतों के घेरों में एक ओर कील से बाँधकर, पायदान के रस्सी के घेरे के बीच में उसे सीकर रखी गई रस्सी के समान, यह आँत के इक्कीस घेरों के बीच में स्थित है। တတ္ထ ယထာ ပါဒပုဉ္ဆနရဇ္ဇုမဏ္ဍလကံ သိဗ္ဗိတွာ ဌိတရဇ္ဇုကာ န ဇာနာတိ ‘‘မယာ ပါဒပုဉ္ဆနရဇ္ဇုမဏ္ဍလကံ သိဗ္ဗိတ’’န္တိ, နပိ ပါဒပုဉ္ဆနရဇ္ဇုမဏ္ဍလကံ ဇာနာတိ ‘‘ရဇ္ဇုကာ မံ သိဗ္ဗိတွာ ဌိတာ’’တိ, ဧဝမေဝ အန္တဂုဏံ န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ အန္တံ ဧကဝီသတိဘောဂဗ္ဘန္တရေ အာဗန္ဓိတွာ ဌိတ’’န္တိ, နပိ အန္တံ ဇာနာတိ ‘‘အန္တဂုဏံ မံ အာဗန္ဓိတွာ ဌိတ’’န္တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော အန္တဂုဏံ အန္တဂုဏဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္နန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ အန္တဂုဏံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ, जैसे पायदान के रस्सी के घेरे को सीकर स्थित रस्सी यह नहीं जानती कि 'मेरे द्वारा पायदान का रस्सी का घेरा सिया गया है', और न ही पायदान का रस्सी का घेरा यह जानता है कि 'रस्सी मुझे सीकर स्थित है'; इसी प्रकार आंत्र-बंधन यह नहीं जानता कि 'मैं आँत को इक्कीस घेरों के भीतर बाँधकर स्थित हूँ', और न ही आँत यह जानती है कि 'आंत्र-बंधन मुझे बाँधकर स्थित है'। क्योंकि ये धर्म चेतना और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... (पे)... ये पुद्गल नहीं हैं। परिच्छेद की दृष्टि से, वह आंत्र-बंधन को आंत्र-बंधन के अपने भाग के रूप में परिच्छिन्न निर्धारित करता है। यह इसका स्वभाव-परिच्छेद है, और विस्वभाव-परिच्छेद तो बालों के समान ही है—इस प्रकार वह वर्ण आदि के द्वारा आंत्र-बंधन को निर्धारित करता है। တတော ပရံ အန္တောသရီရေ ဥဒရိယံ ဝဏ္ဏတော အဇ္ဈောဟဋာဟာရဝဏ္ဏန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော ပရိဿာဝနေ သိထိလဗဒ္ဓတဏ္ဍုလသဏ္ဌာနံ. ဒိသတော ဥပရိမာယ ဒိသာယ ဇာတံ. ဩကာသတော ဥဒရေ ဌိတန္တိ. ဥဒရံ နာမ ဥဘတော နိပ္ပီဠိယမာနဿ အလ္လသာဋကဿ မဇ္ဈေ သဉ္ဇာတဖောဋကသဒိသံ အန္တပဋလံ, ဗဟိ မဋ္ဌံ, အန္တော မံသကသမ္ဗုပလိဝေဌိတံ, ကိလိဋ္ဌပါဝါရပုပ္ဖသဒိသံ, ကုထိတပနသဖလဿ အဗ္ဘန္တရသဒိသန္တိပိ ဧကေ. တတ္ထ တက္ကောလကာ ဂဏ္ဍုပ္ပာဒကာတာလဟီရကာသူစိမုခကာပဋတန္တုသုတ္တကာတိ ဧဝမာဒိဒွတ္တိံသကုလပ္ပဘေဒါ ကိမယော အာကုလဗျာကုလာ သဏ္ဍသဏ္ဍစာရိနော ဟုတွာ နိဝသန္တိ, ယေ ပါနဘောဇနာဒိမှိ အဝိဇ္ဇမာနေ ဥလ္လင်္ဃိတွာ ဝိရဝန္တာ [Pg.46] ဟဒယမံသံ အဘိတုဒန္တိ ပါနဘောဇနာဒီနိ အဇ္ဈောဟရဏဝေလာယဉ္စ ဥဒ္ဓံမုခါ ဟုတွာ ပဌမဇ္ဈောဟဋေ ဒွေ တယော အာလောပေ တုရိတတုရိတာ ဝိလုမ္ပန္တိ. ယံ ဧတေသံ ကိမီနံ ပသူတိဃရံ ဝစ္စကုဋိ ဂိလာနသာလာ သုသာနဉ္စ ဟောတိ, ယတ္ထ သေယျထာပိ နာမ စဏ္ဍာလဂါမဒွါရေ စန္ဒနိကာယ သရဒသမယေ ထူလဖုသိတကေ ဒေဝေ ဝဿန္တေ ဥဒကေန အာဝူဠှံ မုတ္တကရီသစမ္မဋ္ဌိနှာရုခဏ္ဍခေဠသိင်္ဃာဏိကာလောဟိတပ္ပဘုတိနာနာကုဏပဇာတံ နိပတိတွာ ကဒ္ဒမောဒကာလုဠိတံ သဉ္ဇာတကိမိကုလာကုလံ ဟုတွာ ဒွီဟတီဟစ္စယေန သူရိယာတပသန္တာပဝေဂကုထိတံ ဥပရိ ဖေဏပုပ္ဖုဠကေ မုဉ္စန္တံ အဘိနီလဝဏ္ဏံ ပရမဒုဂ္ဂန္ဓဇေဂုစ္ဆံ ဥပဂန္တုံ ဝါ ဒဋ္ဌုံ ဝါ အနရဟရူပတံ အာပဇ္ဇိတွာ တိဋ္ဌတိ, ပဂေဝ ဃာယိတုံ ဝါ သာယိတုံ ဝါ; ဧဝမေဝ နာနပ္ပကာရပါနဘောဇနာဒိ ဒန္တမုသလသံစုဏ္ဏိတံ ဇိဝှာဟတ္ထသမ္ပရိဝတ္တိတံ ခေဠလာလာပလိဗုဒ္ဓံ တင်္ခဏဝိဂတဝဏ္ဏဂန္ဓရသာဒိသမ္ပဒံ ကောလိယခလိသုဝါနဝမထုသဒိသံ နိပတိတွာ ပိတ္တသေမှဝါတပလိဝေဌိတံ ဟုတွာ ဥဒရဂ္ဂိသန္တာပဝေဂကုထိတံ ကိမိကုလာကုလံ ဥပရူပရိ ဖေဏပုပ္ဖုဠကာနိ မုဉ္စန္တံ ပရမကသမ္ဗုဒုဂ္ဂန္ဓဇေဂုစ္ဆဘာဝမာပဇ္ဇိတွာ တိဋ္ဌတိ. ယံ သုတွာပိ ပါနဘောဇနာဒီသု အမနုညတာ သဏ္ဌာတိ, ပဂေဝ ပညာစက္ခုနာ ဩလောကေတွာ. ယတ္ထ စ ပတိတံ ပါနဘောဇနာဒိ ပဉ္စဓာ ဝိဝေကံ ဂစ္ဆတိ, ဧကံ ဘာဂံ ပါဏကာ ခါဒန္တိ, ဧကံ ဘာဂံ ဥဒရဂ္ဂိ ဈာပေတိ, ဧကော ဘာဂေါ မုတ္တံ ဟောတိ, ဧကော ဘာဂေါ ကရီသံ ဟောတိ, ဧကော ဘာဂေါ ရသဘာဝံ အာပဇ္ဇိတွာ သောဏိတမံသာဒီနိ ဥပဗြူဟယတီတိ. इसके बाद, शरीर के भीतर 'उदरिय' (आमाशय के आहार) को वर्ण (रंग) की दृष्टि से निगले हुए भोजन के रंग जैसा निर्धारित करता है। आकार की दृष्टि से, यह जल-छन्नी में ढीले बँधे हुए चावलों की पोटली के समान है। दिशा की दृष्टि से, यह शरीर के ऊपरी भाग में उत्पन्न होता है। स्थान की दृष्टि से, यह आमाशय में स्थित है। आमाशय वह स्थान है जो दोनों ओर से निचोड़े जाते हुए गीले वस्त्र के बीच उभरे हुए फोड़े के समान है, जो बाहर से चिकना और भीतर से मांस के रेशों से लिपटा हुआ है; यह गंदे ऊनी वस्त्र के फूल के समान या कुछ आचार्यों के अनुसार सड़े हुए कटहल के भीतरी भाग जैसा है। वहाँ तक्कोलक, गण्डुप्पादक, तालहीरक, सूचिमुखक और पटतन्तुसुत्तक आदि बत्तीस प्रकार के कीड़े झुंड बनाकर रहते हैं। जब भोजन नहीं होता, तो वे उछलकर हृदय-मांस को काटते हैं। भोजन निगलते समय वे ऊपर की ओर मुँह करके पहले निगले गए दो-तीन ग्रासों को बड़ी तेजी से झपट लेते हैं। यह स्थान उन कीड़ों का प्रसूति-गृह, शौचालय, रुग्णालय और श्मशान है। जैसे शरद ऋतु में चाण्डाल बस्ती के द्वार पर गंदे गड्ढे में मूसलाधार वर्षा होने पर मूत्र, विष्ठा, हड्डी, नसें, थूक, नाक की गंदगी और रक्त आदि विभिन्न प्रकार के शव-अंश गिरकर कीचड़ के पानी से मिल जाते हैं और दो-तीन दिन बीतने पर सूर्य की गर्मी से खौलने लगते हैं, ऊपर झाग छोड़ते हुए अत्यंत नीले रंग के और अत्यंत दुर्गंधित एवं वीभत्स हो जाते हैं, जिन्हें देखना या पास जाना भी असहनीय होता है, चखने या सूँघने की तो बात ही क्या; वैसे ही विभिन्न प्रकार के भोजन और पेय, जो दाँतों रूपी मूसल से चूर्ण किए गए, जिह्वा रूपी हाथ से पलटे गए और लार से सने हुए होते हैं, वे आमाशय में गिरकर पित्त, कफ और वायु से घिर जाते हैं। वहाँ वे जठराग्नि की गर्मी से खौलते हुए, कीड़ों से भरे हुए और ऊपर झाग छोड़ते हुए अत्यंत दुर्गंधित और वीभत्स हो जाते हैं। इसे सुनकर ही भोजन के प्रति अरुचि हो जाती है, तो प्रज्ञा-चक्षु से देखने पर क्या कहना। वहाँ पहुँचा भोजन पाँच भागों में विभक्त हो जाता है: एक भाग कीड़े खाते हैं, एक भाग जठराग्नि जलाती है, एक भाग मूत्र बनता है, एक भाग मल बनता है, और एक भाग रस बनकर रक्त-मांस आदि की वृद्धि करता है। တတ္ထ ယထာ ပရမဇေဂုစ္ဆာယ သုဝါနဒေါဏိယာ ဌိတော သုဝါနဝမထု န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ သုဝါနဒေါဏိယာ ဌိတော’’တိ; နပိ သုဝါနဒေါဏိ ဇာနာတိ ‘‘မယိ သုဝါနဝမထု ဌိတော’’တိ. ဧဝမေဝ န ဥဒရိယံ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ဣမသ္မိံ ပရမဒုဂ္ဂန္ဓဇေဂုစ္ဆေ ဥဒရေ ဌိတ’’န္တိ; နပိ ဥဒရံ ဇာနာတိ ‘‘မယိ ဥဒရိယံ ဌိတ’’န္တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော ဥဒရိယံ ဥဒရိယဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္နန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ ဥဒရိယံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ जैसे अत्यंत घृणित कुत्ते की नाँद में स्थित कुत्ते की उल्टी यह नहीं जानती कि 'मैं कुत्ते की नाँद में स्थित हूँ', और न ही वह नाँद यह जानती है कि 'मुझमें कुत्ते की उल्टी स्थित है'; उसी प्रकार न तो 'उदरिय' (आहार) यह जानता है कि 'मैं इस अत्यंत दुर्गंधित और घृणित आमाशय में स्थित हूँ', और न ही आमाशय यह जानता है कि 'मुझमें आहार स्थित है'। क्योंकि ये धर्म (पदार्थ) चेतना और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... ये पुद्गल नहीं हैं। परिच्छेद (सीमा) की दृष्टि से, उदरिय अपने ही भाग से परिच्छिन्न है। यह इसका सजातीय परिच्छेद है, और विजातीय परिच्छेद बालों के समान है। इस प्रकार वर्ण आदि के द्वारा उदरिय का निर्धारण करता है। တတော [Pg.47] ပရံ အန္တောသရီရေ ကရီသံ ဝဏ္ဏတော ယေဘုယျေန အဇ္ဈောဟဋာဟာရဝဏ္ဏန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော ဩကာသသဏ္ဌာနံ, ဒိသတော ဟေဋ္ဌိမာယ ဒိသာယ ဇာတံ, ဩကာသတော ပက္ကာသယေ ဌိတန္တိ. ပက္ကာသယော နာမ ဟေဋ္ဌာ နာဘိပိဋ္ဌိကဏ္ဋကမူလာနံ အန္တရေ အန္တာဝသာနေ ဥဗ္ဗေဓေန အဋ္ဌင်္ဂုလမတ္တော ဝံသနဠကဗ္ဘန္တရသဒိသော ပဒေသော, ယတ္ထ သေယျထာပိ နာမ ဥပရိဘူမိဘာဂေ ပတိတံ ဝဿောဒကံ ဩဂဠိတွာ ဟေဋ္ဌာဘူမိဘာဂံ ပူရေတွာ တိဋ္ဌတိ, ဧဝမေဝ ယံကိဉ္စိ အာမာသယေ ပတိတံ ပါနဘောဇနာဒိကံ ဥဒရဂ္ဂိနာ ဖေဏုဒ္ဒေဟကံ ပက္ကံ ပက္ကံ သဏှကရဏိယာ ပိဋ္ဌမိဝ သဏှဘာဝံ အာပဇ္ဇိတွာ အန္တဗိလေန ဩဂဠိတွာ ဩမဒ္ဒိတွာ ဝံသနဠကေ ပက္ခိတ္တပဏ္ဍုမတ္တိကာ ဝိယ သန္နိစိတံ ဟုတွာ တိဋ္ဌတိ. इसके बाद, शरीर के भीतर 'करीस' (मल) को वर्ण की दृष्टि से प्रायः निगले हुए भोजन के रंग जैसा निर्धारित करता है। आकार की दृष्टि से, यह अपने स्थान के आकार जैसा है। दिशा की दृष्टि से, यह शरीर के निचले भाग में उत्पन्न होता है। स्थान की दृष्टि से, यह पक्वाशय में स्थित है। पक्वाशय वह स्थान है जो नाभि और रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से के बीच, बड़ी आँत के अंत में, लगभग आठ अंगुल ऊँचा, बाँस की नली के भीतरी भाग जैसा है। जैसे ऊँची भूमि पर गिरा हुआ वर्षा का जल नीचे की भूमि में जाकर भर जाता है, वैसे ही आमाशय में गिरा हुआ भोजन जठराग्नि द्वारा झागदार होकर, पककर, आटे की तरह महीन होकर आँतों के मार्ग से नीचे खिसककर पक्वाशय में बाँस की नली में ठूँसी गई पीली मिट्टी की तरह जमा हो जाता है। တတ္ထ ယထာ ဝံသနဠကေ ဩမဒ္ဒိတွာ ပက္ခိတ္တပဏ္ဍုမတ္တိကာ န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ဝံသနဠကေ ဌိတာ’’တိ, နပိ ဝံသနဠကော ဇာနာတိ ‘‘မယိ ပဏ္ဍုမတ္တိကာ ဌိတာ’’တိ; ဧဝမေဝ န ကရီသံ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ပက္ကာသယေ ဌိတ’’န္တိ, နပိ ပက္ကာသယော ဇာနာတိ ‘‘မယိ ကရီသံ ဌိတ’’န္တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော ကရီသံ ကရီသဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္နန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ ကရီသံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ जैसे बाँस की नली में ठूँसकर भरी गई पीली मिट्टी यह नहीं जानती कि 'मैं बाँस की नली में स्थित हूँ', और न ही वह नली यह जानती है कि 'मुझमें पीली मिट्टी स्थित है'; उसी प्रकार न तो मल यह जानता है कि 'मैं पक्वाशय में स्थित हूँ', और न ही पक्वाशय यह जानता है कि 'मुझमें मल स्थित है'। क्योंकि ये धर्म चेतना और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... ये पुद्गल नहीं हैं। परिच्छेद की दृष्टि से, मल अपने ही भाग से परिच्छिन्न है। यह इसका सजातीय परिच्छेद है, और विजातीय परिच्छेद बालों के समान है। इस प्रकार वर्ण आदि के द्वारा मल का निर्धारण करता है। တတော ပရံ သရီရေ သီသကဋာဟဗ္ဘန္တရေ မတ္ထလုင်္ဂံ ဝဏ္ဏတော သေတံ အဟိဆတ္တကပိဏ္ဍိဝဏ္ဏန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. ပက္ကုထိတဒုဒ္ဓဝဏ္ဏန္တိပိ ဧကေ. သဏ္ဌာနတော ဩကာသသဏ္ဌာနံ. ဒိသတော ဥပရိမာယ ဒိသာယ ဇာတံ. ဩကာသတော သီသကဋာဟဿ အဗ္ဘန္တရေ စတ္တာရော သိဗ္ဗိနိမဂ္ဂေ နိဿာယ သမောဓာယ ဌပိတာ စတ္တာရော ပိဋ္ဌပိဏ္ဍိကာ ဝိယ သမောဟိတံ စတုမတ္ထလုင်္ဂပိဏ္ဍပ္ပဘေဒံ ဟုတွာ ဌိတန္တိ. इसके बाद, शरीर में कपाल (खोपड़ी) के भीतर 'मत्थलुङ्ग' (मस्तिष्क) को वर्ण की दृष्टि से सफेद, कुकुरमुत्ते के समूह के रंग जैसा निर्धारित करता है। कुछ आचार्य इसे फटे हुए दूध के रंग जैसा भी कहते हैं। आकार की दृष्टि से, यह अपने स्थान के आकार जैसा है। दिशा की दृष्टि से, यह शरीर के ऊपरी भाग में उत्पन्न होता है। स्थान की दृष्टि से, यह कपाल के भीतर चार जोड़ों (सीवनों) के सहारे रखी गई आटे की चार लोइयों के समान एक साथ स्थित चार मस्तिष्क-पिण्डों के रूप में स्थित है। တတ္ထ ယထာ ပုရာဏလာဗုကဋာဟေ ပက္ခိတ္တပိဋ္ဌပိဏ္ဍိ ပက္ကုထိတဒုဒ္ဓံ ဝါ န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ပုရာဏလာဗုကဋာဟေ ဌိတ’’န္တိ, နပိ ပုရာဏလာဗုကဋာဟံ ဇာနာတိ ‘‘မယိ ပိဋ္ဌပိဏ္ဍိ ပက္ကုထိတဒုဒ္ဓံ ဝါ ဌိတ’’န္တိ; ဧဝမေဝ န မတ္ထလုင်္ဂံ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ သီသကဋာဟဗ္ဘန္တရေ ဌိတ’’န္တိ, နပိ သီသကဋာဟဗ္ဘန္တရံ ဇာနာတိ ‘‘မယိ မတ္ထလုင်္ဂံ ဌိတ’’န္တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော မတ္ထလုင်္ဂံ မတ္ထလုင်္ဂဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္နန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ မတ္ထလုင်္ဂံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ, जैसे किसी पुराने कद्दू के खोल (सूखे कद्दू के पात्र) में रखे हुए आटे के गोले या सड़े हुए दूध को यह पता नहीं होता कि "मैं पुराने कद्दू के खोल में स्थित हूँ", और न ही पुराने कद्दू के खोल को यह पता होता है कि "मुझमें आटे का गोला या सड़ा हुआ दूध स्थित है"; उसी प्रकार मस्तिष्क को यह पता नहीं होता कि "मैं कपाल (खोपड़ी) के भीतर स्थित हूँ", और न ही कपाल को यह पता होता है कि "मुझमें मस्तिष्क स्थित है"। क्योंकि ये धर्म चेतना और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... (पे)... यह कोई पुद्गल (व्यक्ति) नहीं है। परिच्छेद (सीमा) की दृष्टि से, वह मस्तिष्क को मस्तिष्क के भाग के रूप में परिच्छिन्न (सीमित) निर्धारित करता है। यह इसका सजातीय परिच्छेद है, और विजातीय परिच्छेद बालों के समान ही है—इस प्रकार वह वर्ण आदि के द्वारा मस्तिष्क का निर्धारण करता है। တတော [Pg.48] ပရံ သရီရေ ဗဒ္ဓါဗဒ္ဓဘေဒတော ဒုဝိဓမ္ပိ ပိတ္တံ ဝဏ္ဏတော ဗဟလမဓုကတေလဝဏ္ဏန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. အဗဒ္ဓပိတ္တံ မိလာတဗကုလပုပ္ဖဝဏ္ဏန္တိပိ ဧကေ. သဏ္ဌာနတော ဩကာသသဏ္ဌာနံ. ဒိသတော ဒွီသု ဒိသာသု ဇာတံ. ဩကာသတော အဗဒ္ဓပိတ္တံ ကေသလောမနခဒန္တာနံ မံသဝိနိမုတ္တဋ္ဌာနံ ထဒ္ဓသုက္ခစမ္မဉ္စ ဝဇ္ဇေတွာ ဥဒကမိဝ တေလဗိန္ဒု အဝသေသသရီရံ ဗျာပေတွာ ဌိတံ, ယမှိ ကုပိတေ အက္ခီနိ ပီတကာနိ ဟောန္တိ ဘမန္တိ, ဂတ္တံ ကမ္ပတိ ကဏ္ဍူယတိ. ဗဒ္ဓပိတ္တံ ဟဒယပပ္ဖာသာနမန္တရေ ယကနမံသံ နိဿာယ ပတိဋ္ဌိတေ မဟာကောသာတကိကောသကသဒိသေ ပိတ္တကောသကေ ဌိတံ, ယမှိ ကုပိတေ သတ္တာ ဥမ္မတ္တကာ ဟောန္တိ, ဝိပလ္လတ္ထစိတ္တာ ဟိရောတ္တပ္ပံ ဆဍ္ဍေတွာ အကတ္တဗ္ဗံ ကရောန္တိ, အဘာသိတဗ္ဗံ ဘာသန္တိ, အစိန္တိတဗ္ဗံ စိန္တေန္တိ. इसके पश्चात, शरीर में 'बद्ध' (जुड़ा हुआ) और 'अबद्ध' (मुक्त) के भेद से दो प्रकार के पित्त को वर्ण की दृष्टि से गाढ़े महुआ के तेल के रंग जैसा निर्धारित करता है। कुछ आचार्यों के अनुसार अबद्ध पित्त मुरझाए हुए बकुल के फूल के रंग जैसा होता है। संस्थान (आकार) की दृष्टि से, यह अपने स्थान के आकार का होता है। दिशा की दृष्टि से, यह दोनों दिशाओं (ऊपरी और निचले शरीर) में उत्पन्न होता है। स्थान की दृष्टि से, अबद्ध पित्त केश, रोम, नख, दाँत, मांस-रहित स्थानों और कठोर सूखी त्वचा को छोड़कर, जल में तेल की बूंद की तरह शेष संपूर्ण शरीर में व्याप्त होकर स्थित रहता है, जिसके कुपित होने पर आँखें पीली हो जाती हैं और चकराती हैं, शरीर काँपता है और खुजली होती है। बद्ध पित्त हृदय और फेफड़ों के बीच यकृत (जिगर) के मांस के आश्रय में स्थित, बड़ी तोरई के फल के कोश के समान पित्त-कोश (पित्ताशय) में स्थित होता है, जिसके कुपित होने पर प्राणी उन्मत्त (पागल) हो जाते हैं, उनका चित्त विपर्यस्त हो जाता है, वे ह्री और ओत्तप्प (लज्जा और भय) को त्याग कर न करने योग्य कार्य करते हैं, न बोलने योग्य बातें बोलते हैं और न सोचने योग्य बातें सोचते हैं। တတ္ထ ယထာ ဥဒကံ ဗျာပေတွာ ဌိတံ တေလံ န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ဥဒကံ ဗျာပေတွာ ဌိတ’’န္တိ, နပိ ဥဒကံ ဇာနာတိ ‘‘တေလံ မံ ဗျာပေတွာ ဌိတ’’န္တိ; ဧဝမေဝ န အဗဒ္ဓပိတ္တံ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ သရီရံ ဗျာပေတွာ ဌိတ’’န္တိ, နပိ သရီရံ ဇာနာတိ ‘‘အဗဒ္ဓပိတ္တံ မံ ဗျာပေတွာ ဌိတ’’န္တိ. ယထာ စ ကောသာတကိကောသကေ ဌိတံ ဝဿောဒကံ န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ကောသာတကိကောသကေ ဌိတ’’န္တိ, နပိ ကောသာတကိကောသကော ဇာနာတိ ‘‘မယိ ဝဿောဒကံ ဌိတ’’န္တိ; ဧဝမေဝ န ဗဒ္ဓပိတ္တံ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ပိတ္တကောသကေ ဌိတ’’န္တိ, နပိ ပိတ္တကောသကော ဇာနာတိ ‘‘မယိ ဗဒ္ဓပိတ္တံ ဌိတ’’န္တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော ပိတ္တံ ပိတ္တဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္နန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ ပိတ္တံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ, जैसे जल में व्याप्त होकर स्थित तेल को यह पता नहीं होता कि "मैं जल में व्याप्त होकर स्थित हूँ", और न ही जल को यह पता होता है कि "तेल मुझमें व्याप्त होकर स्थित है"; उसी प्रकार अबद्ध पित्त को यह पता नहीं होता कि "मैं शरीर में व्याप्त होकर स्थित हूँ", और न ही शरीर को यह पता होता है कि "अबद्ध पित्त मुझमें व्याप्त होकर स्थित है"। और जैसे तोरई के कोश में स्थित वर्षा के जल को यह पता नहीं होता कि "मैं तोरई के कोश में स्थित हूँ", और न ही तोरई के कोश को यह पता होता है कि "मुझमें वर्षा का जल स्थित है"; उसी प्रकार बद्ध पित्त को यह पता नहीं होता कि "मैं पित्त-कोश में स्थित हूँ", और न ही पित्त-कोश को यह पता होता है कि "मुझमें बद्ध पित्त स्थित है"। क्योंकि ये धर्म चेतना और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... (पे)... यह कोई पुद्गल नहीं है। परिच्छेद की दृष्टि से, वह पित्त को पित्त के भाग के रूप में परिच्छिन्न निर्धारित करता है। यह इसका सजातीय परिच्छेद है, और विजातीय परिच्छेद बालों के समान ही है—इस प्रकार वह वर्ण आदि के द्वारा पित्त का निर्धारण करता है। တတော ပရံ သရီရဗ္ဘန္တရေ ဧကပတ္တပူရပ္ပမာဏံ သေမှံ ဝဏ္ဏတော သေတံ ကစ္ဆကပဏ္ဏရသဝဏ္ဏန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော ဩကာသသဏ္ဌာနံ. ဒိသတော ဥပရိမာယ ဒိသာယ ဇာတံ. ဩကာသတော ဥဒရပဋလေ ဌိတန္တိ. ယံ [Pg.49] ပါနဘောဇနာဒိအဇ္ဈောဟရဏကာလေ သေယျထာပိ နာမ ဥဒကေ သေဝါလပဏကံ ကဋ္ဌေ ဝါ ကထလေ ဝါ ပတန္တေ ဆိဇ္ဇိတွာ ဒွိဓာ ဟုတွာ ပုန အဇ္ဈောတ္ထရိတွာ တိဋ္ဌတိ, ဧဝမေဝ ပါနဘောဇနာဒိမှိ နိပတန္တေ ဆိဇ္ဇိတွာ ဒွိဓာ ဟုတွာ ပုန အဇ္ဈောတ္ထရိတွာ တိဋ္ဌတိ, ယမှိ စ မန္ဒီဘူတေ ပက္ကမိဝ ဂဏ္ဍံ ပူတိကမိဝ ကုက္ကုဋဏ္ဍံ ဥဒရပဋလံ ပရမဇေဂုစ္ဆကုဏပဂန္ဓံ ဟောတိ. တတော ဥဂ္ဂတေန စ ဂန္ဓေန ဥဂ္ဂါရောပိ မုခမ္ပိ ဒုဂ္ဂန္ဓံ ပူတိကုဏပသဒိသံ ဟောတိ, သော စ ပုရိသော ‘‘အပေဟိ ဒုဂ္ဂန္ဓံ ဝါယသီ’’တိ ဝတ္တဗ္ဗတံ အာပဇ္ဇတိ, ယဉ္စ အဘိဝဍ္ဎိတံ ဗဟလတ္တမာပန္နံ ပဋိကုဇ္ဇနဖလကမိဝ ဝစ္စကုဋိယာ ဥဒရပဋလဗ္ဘန္တရေ ဧဝ ကုဏပဂန္ဓံ သန္နိရုမ္ဘိတွာ တိဋ္ဌတိ. इसके पश्चात, शरीर के भीतर एक पात्र (कटोरे) भर के परिमाण वाले श्लेष्म (कफ) को वर्ण की दृष्टि से श्वेत, 'कच्छक' के पत्तों के रस के रंग जैसा निर्धारित करता है। संस्थान की दृष्टि से, यह अपने स्थान के आकार का होता है। दिशा की दृष्टि से, यह ऊपरी दिशा में उत्पन्न होता है। स्थान की दृष्टि से, यह आमाशय की परत (उदर-पटल) पर स्थित होता है। जो पेय और भोजन आदि निगलने के समय, जैसे जल में काई (शैवाल) लकड़ी या पत्थर के गिरने पर फटकर दो भागों में हो जाती है और पुनः ढक लेती है, उसी प्रकार पेय-भोजन आदि के गिरने पर फटकर दो भागों में हो जाता है और पुनः ढक कर स्थित हो जाता है। जिसके कम हो जाने पर आमाशय की परत पके हुए फोड़े की तरह या सड़े हुए अंडे की तरह अत्यंत घृणित दुर्गंध वाली हो जाती है। उससे निकलने वाली गंध से डकार और मुख भी सड़े हुए शव के समान दुर्गंधयुक्त हो जाते हैं, और उस व्यक्ति को "दूर हटो, दुर्गंध आ रही है" ऐसा कहा जाने लगता है। और जो (श्लेष्म) बढ़ जाने पर गाढ़ा हो जाता है, वह शौचालय के ढक्कन के समान आमाशय की परत के भीतर ही दुर्गंध को रोककर स्थित रहता है। တတ္ထ ယထာ စန္ဒနိကာယ ဥပရိဖေဏပဋလံ န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ စန္ဒနိကာယ ဌိတ’’န္တိ, နပိ စန္ဒနိကာ ဇာနာတိ ‘‘မယိ ဖေဏပဋလံ ဌိတ’’န္တိ; ဧဝမေဝ န သေမှံ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ဥဒရပဋလေ ဌိတ’’န္တိ, နပိ ဥဒရပဋလံ ဇာနာတိ ‘‘မယိ သေမှံ ဌိတန္တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော သေမှံ သေမှဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္နန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ သေမှံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ, जैसे नाली (गंदे गड्ढे) के ऊपर स्थित झाग को यह पता नहीं होता कि "मैं नाली के ऊपर स्थित हूँ", और न ही नाली को यह पता होता है कि "मुझमें झाग स्थित है"; उसी प्रकार श्लेष्म को यह पता नहीं होता कि "मैं आमाशय की परत पर स्थित हूँ", और न ही आमाशय की परत को यह पता होता है कि "मुझमें श्लेष्म स्थित है"। क्योंकि ये धर्म चेतना और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... (पे)... यह कोई पुद्गल नहीं है। परिच्छेद की दृष्टि से, वह श्लेष्म को श्लेष्म के भाग के रूप में परिच्छिन्न निर्धारित करता है। यह इसका सजातीय परिच्छेद है, और विजातीय परिच्छेद बालों के समान ही है—इस प्रकार वह वर्ण आदि के द्वारा श्लेष्म का निर्धारण करता है। တတော ပရံ သရီရေ ပုဗ္ဗော ဝဏ္ဏတော ပဏ္ဍုပလာသဝဏ္ဏောတိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော ဩကာသသဏ္ဌာနော. ဒိသတော ဒွီသု ဒိသာသု ဇာတော. ဩကာသတော ပုဗ္ဗဿ ဩကာသော နာမ နိဗဒ္ဓေါ နတ္ထိ. ယတ္ထ ပုဗ္ဗော သန္နိစိတော တိဋ္ဌေယျ, ယတြ ယတြ ခါဏုကဏ္ဋကပ္ပဟရဏဂ္ဂိဇာလာဒီဟိ အဘိဟတေ သရီရပ္ပဒေသေ လောဟိတံ သဏ္ဌဟိတွာ ပစ္စတိ, ဂဏ္ဍပိဠကာဒယော ဝါ ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ, တတြ တတြ တိဋ္ဌတိ. इसके पश्चात, शरीर में पीब (पुय) को वर्ण की दृष्टि से पीले पत्ते के रंग जैसा निर्धारित करता है। संस्थान की दृष्टि से, यह अपने स्थान के आकार का होता है। दिशा की दृष्टि से, यह दोनों दिशाओं में उत्पन्न होता है। स्थान की दृष्टि से, पीब का कोई निश्चित स्थान नहीं है जहाँ वह संचित होकर रहे। जहाँ-जहाँ खूँटी, काँटे की चोट या अग्नि की ज्वाला आदि से आहत शरीर के प्रदेश में रक्त जमा होकर पक जाता है, या फोड़े-फुंसी आदि उत्पन्न होते हैं, वहाँ-वहाँ यह स्थित रहता है। တတ္ထ ယထာ ရုက္ခဿ တတ္ထ တတ္ထ ဖရသုဓာရာဒီဟိ ပဟတပ္ပဒေသေ အဝဂဠိတွာ ဌိတော နိယျာသော န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ရုက္ခဿ ပဟတပ္ပဒေသေ ဌိတော’’တိ, နပိ ရုက္ခဿ ပဟတပ္ပဒေသော ဇာနာတိ ‘‘မယိ နိယျာသော ဌိတော’’တိ; ဧဝမေဝ န ပုဗ္ဗော ဇာနာတိ ‘‘အဟံ သရီရဿ တတ္ထ တတ္ထ ခါဏုကဏ္ဋကာဒီဟိ အဘိဟတပ္ပဒေသေ ဂဏ္ဍပိဠကာဒီနံ ဥဋ္ဌိတပ္ပဒေသေ ဝါ ဌိတော’’တိ, နပိ သရီရပ္ပဒေသော ဇာနာတိ ‘‘မယိ ပုဗ္ဗော ဌိတော’’တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ [Pg.50] ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော ပုဗ္ဗော ပုဗ္ဗဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္နောတိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ ပုဗ္ဗံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ, जैसे किसी वृक्ष के उन-उन स्थानों पर जहाँ कुल्हाड़ी या चाकू आदि से प्रहार किया गया हो, वहाँ से रिसकर स्थित हुआ गोंद (असेय) यह नहीं जानता कि 'मैं वृक्ष के प्रहार किए गए स्थान पर स्थित हूँ', और न ही वृक्ष का वह प्रहार किया गया स्थान यह जानता है कि 'मुझमें गोंद स्थित है'; इसी प्रकार मवाद (पूय) यह नहीं जानता कि 'मैं शरीर के उन-उन स्थानों पर स्थित हूँ जहाँ खूँटी, काँटे आदि से चोट लगी है या जहाँ फोड़े-फुंसी आदि निकले हैं', और न ही शरीर का वह स्थान यह जानता है कि 'मुझमें मवाद स्थित है'। क्योंकि ये धर्म (तत्व) चेतना और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... यह पुद्गल नहीं है। परिच्छेद (सीमा) की दृष्टि से, वह मवाद को मवाद के भाग के रूप में निर्धारित करता है। यह इसका सजातीय परिच्छेद है, और विजातीय परिच्छेद बालों के समान है। इस प्रकार वह वर्ण आदि के द्वारा मवाद का निर्धारण करता है। တတော ပရံ သရီရေ သန္နိစိတလောဟိတံ သံသရဏလောဟိတန္တိ ဧဝံ ဒုဝိဓေ လောဟိတေ သန္နိစိတလောဟိတံ တာဝ ဝဏ္ဏတော ဗဟလကုထိတလာခါရသဝဏ္ဏန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ, သံသရဏလောဟိတံ အစ္ဆလာခါရသဝဏ္ဏန္တိ. သဏ္ဌာနတော သဗ္ဗမ္ပိ အတ္တနော ဩကာသသဏ္ဌာနံ. ဒိသတော သန္နိစိတလောဟိတံ ဥပရိမာယ ဒိသာယ ဇာတံ, သံသရဏလောဟိတံ ဒွီသုပီတိ. ဩကာသတော သံသရဏလောဟိတံ ကေသလောမနခဒန္တာနံ မံသဝိနိမုတ္တဋ္ဌာနဉ္စေဝ ထဒ္ဓသုက္ခစမ္မဉ္စ ဝဇ္ဇေတွာ ဓမနိဇာလာနုသာရေန သဗ္ဗံ ဥပါဒိန္နကသရီရံ ဖရိတွာ ဌိတံ. သန္နိစိတလောဟိတံ ယကနဿ ဟေဋ္ဌာဘာဂံ ပူရေတွာ ဧကပတ္တပူရဏမတ္တံ ဝက္ကဟဒယပပ္ဖာသာနံ ဥပရိ ထောကံ ထောကံ ဗိန္ဒုံ ပါတေန္တံ ဝက္ကဟဒယယကနပပ္ဖာသေ တေမေန္တံ ဌိတံ, ယမှိ ဝက္ကဟဒယာဒီနိ အတေမေန္တေ သတ္တာ ပိပါသိတာ ဟောန္တိ. उसके बाद, शरीर में संचित रक्त और संचरण करने वाले रक्त—इस प्रकार दो प्रकार के रक्त में से, संचित रक्त को वर्ण की दृष्टि से गाढ़े उबले हुए लाक्षा-रस (लाख के घोल) के रंग जैसा निर्धारित करता है, और संचरण करने वाले रक्त को स्वच्छ लाक्षा-रस के रंग जैसा। संस्थान (आकार) की दृष्टि से, सभी रक्त अपने स्थान के आकार का होता है। दिशा की दृष्टि से, संचित रक्त ऊपरी दिशा में उत्पन्न होता है, और संचरण करने वाला रक्त दोनों दिशाओं में। स्थान की दृष्टि से, संचरण करने वाला रक्त बाल, रोम, नाखून, दाँत, मांस-रहित स्थानों और कठोर सूखी त्वचा को छोड़कर, धमनियों के जाल के अनुसार पूरे उपात्त शरीर में व्याप्त होकर स्थित रहता है। संचित रक्त यकृत के निचले भाग को भरकर, लगभग एक पात्र की मात्रा में, हृदय, वृक्क (गुर्दे) और फेफड़ों के ऊपर थोड़ा-थोड़ा बूँद-बूँद गिरते हुए, वृक्क, हृदय, यकृत और फेफड़ों को गीला करते हुए स्थित रहता है, जिसके द्वारा वृक्क, हृदय आदि के गीला न होने पर प्राणी प्यासे (तृषित) हो जाते हैं। တတ္ထ ယထာ ဇဇ္ဇရကပါလေ ဌိတံ ဥဒကံ ဟေဋ္ဌာ လေဍ္ဍုခဏ္ဍာဒီနိ တေမေန္တံ န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ဇဇ္ဇရကပါလေ ဌိတံ ဟေဋ္ဌာ လေဍ္ဍုခဏ္ဍာဒီနိ တေမေမီ’’တိ, နပိ ဇဇ္ဇရကပါလံ ဟေဋ္ဌာ လေဍ္ဍုခဏ္ဍာဒီနိ ဝါ ဇာနန္တိ ‘‘မယိ ဥဒကံ ဌိတံ, အမှေ ဝါ တေမေန္တံ ဌိတ’’န္တိ; ဧဝမေဝ န လောဟိတံ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ယကနဿ ဟေဋ္ဌာဘာဂေ ဝက္ကဟဒယာဒီနိ တေမေန္တံ ဌိတ’’န္တိ, နပိ ယကနဿ ဟေဋ္ဌာဘာဂဋ္ဌာနံ ဝက္ကဟဒယာဒီနိ ဝါ ဇာနန္တိ ‘‘မယိ လောဟိတံ ဌိတံ, အမှေ ဝါ တေမေန္တံ ဌိတ’’န္တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော လောဟိတံ လောဟိတဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္နန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ လောဟိတံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ, जैसे किसी फूटे हुए घड़े के टुकड़े (ठीकरे) में स्थित जल नीचे रखे ढेलों आदि को गीला करते हुए यह नहीं जानता कि 'मैं फूटे हुए घड़े में स्थित हूँ और नीचे के ढेलों आदि को गीला कर रहा हूँ', और न ही वह फूटा हुआ घड़ा या नीचे के ढेले आदि यह जानते हैं कि 'मुझमें जल स्थित है, या हमें गीला करते हुए स्थित है'; इसी प्रकार रक्त यह नहीं जानता कि 'मैं यकृत के निचले भाग में वृक्क, हृदय आदि को गीला करते हुए स्थित हूँ', और न ही यकृत का निचला भाग या वृक्क, हृदय आदि यह जानते हैं कि 'मुझमें रक्त स्थित है, या हमें गीला करते हुए स्थित है'। क्योंकि ये धर्म चेतना और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... यह पुद्गल नहीं है। परिच्छेद की दृष्टि से, वह रक्त को रक्त के भाग के रूप में निर्धारित करता है। यह इसका सजातीय परिच्छेद है, और विजातीय परिच्छेद बालों के समान है। इस प्रकार वह वर्ण आदि के द्वारा रक्त का निर्धारण करता है। တတော ပရံ သရီရေ သေဒေါ ဝဏ္ဏတော ပသန္နတိလတေလဝဏ္ဏောတိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော ဩကာသသဏ္ဌာနော. ဒိသတော ဒွီသု ဒိသာသု ဇာတော. ဩကာသတော သေဒဿ ဩကာသော နာမ နိဗဒ္ဓေါ နတ္ထိ, ယတ္ထ သေဒေါ လောဟိတံ ဝိယ သဒါ တိဋ္ဌေယျ. ယသ္မာ ဝါ ယဒါ အဂ္ဂိသန္တာပသူရိယသန္တာပဥတုဝိကာရာဒီဟိ [Pg.51] သရီရံ သန္တပတိ, အထ ဥဒကတော အဗ္ဗူဠှမတ္တဝိသမစ္ဆိန္နဘိသမုဠာလကုမုဒနာလကလာပဥဒကမိဝ သဗ္ဗကေသလောမကူပဝိဝရေဟိ ပဂ္ဃရတိ. တသ္မာ တေသံ ကေသလောမကူပဝိဝရာနံ ဝသေန တံ သဏ္ဌာနတော ဝဝတ္ထပေတိ. ‘‘သေဒပရိဂ္ဂဏှကေန စ ယောဂါဝစရေန ကေသလောမကူပဝိဝရေ ပူရေတွာ ဌိတဝသေနေဝ သေဒေါ မနသိကာတဗ္ဗော’’တိ ဝုတ္တံ ပုဗ္ဗာစရိယေဟိ. उसके बाद, शरीर में पसीने (स्वेद) को वर्ण की दृष्टि से स्वच्छ तिल के तेल के रंग जैसा निर्धारित करता है। संस्थान की दृष्टि से, यह अपने स्थान के आकार का होता है। दिशा की दृष्टि से, यह दोनों दिशाओं में उत्पन्न होता है। स्थान की दृष्टि से, पसीने का कोई निश्चित स्थान नहीं है जहाँ वह रक्त की तरह हमेशा स्थित रहे। बल्कि, जब अग्नि के ताप, सूर्य के ताप या ऋतु परिवर्तन आदि से शरीर संतप्त होता है, तब वह जल से अभी-अभी निकाले गए और असमान रूप से कटे हुए कमल के डंठल, कुमुद के नाल या कमल के गुच्छे से निकलने वाले जल की तरह सभी रोम-कूपों के छिद्रों से रिसता है। इसलिए, उन रोम-कूपों के छिद्रों के आधार पर उसे संस्थान की दृष्टि से निर्धारित किया जाता है। प्राचीन आचार्यों ने कहा है कि 'पसीने का परिग्रह करने वाले योगी को रोम-कूपों के छिद्रों को भरकर स्थित होने के रूप में ही पसीने का मनस्कार करना चाहिए।' တတ္ထ ယထာ ဘိသမုဠာလကုမုဒနာလကလာပဝိဝရေဟိ ပဂ္ဃရန္တံ ဥဒကံ န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ဘိသမုဠာလကုမုဒနာလကလာပဝိဝရေဟိ ပဂ္ဃရာမီ’’တိ, နပိ ဘိသမုဠာလကုမုဒနာလကလာပဝိဝရာ ဇာနန္တိ ‘‘အမှေဟိ ဥဒကံ ပဂ္ဃရတီ’’တိ; ဧဝမေဝ န သေဒေါ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ကေသလောမကူပဝိဝရေဟိ ပဂ္ဃရာမီ’’တိ, နပိ ကေသလောမကူပဝိဝရာ ဇာနန္တိ ‘‘အမှေဟိ သေဒေါ ပဂ္ဃရတီ’’တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော သေဒေါ သေဒဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္နောတိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ သေဒံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ, जैसे कमल के डंठल, कुमुद के नाल या कमल के गुच्छे के छिद्रों से रिसता हुआ जल यह नहीं जानता कि 'मैं कमल के डंठल आदि के छिद्रों से रिस रहा हूँ', और न ही वे छिद्र यह जानते हैं कि 'हमसे जल रिस रहा है'; इसी प्रकार पसीना यह नहीं जानता कि 'मैं रोम-कूपों के छिद्रों से रिस रहा हूँ', और न ही वे रोम-कूपों के छिद्र यह जानते हैं कि 'हमसे पसीना रिस रहा है'। क्योंकि ये धर्म चेतना और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... यह पुद्गल नहीं है। परिच्छेद की दृष्टि से, वह पसीने को पसीने के भाग के रूप में निर्धारित करता है। यह इसका सजातीय परिच्छेद है, और विजातीय परिच्छेद बालों के समान है। इस प्रकार वह वर्ण आदि के द्वारा पसीने का निर्धारण करता है। တတော ပရံ သရီရေ စမ္မမံသန္တရေ မေဒေါ ဝဏ္ဏတော ဖာလိတဟလိဒ္ဒိဝဏ္ဏောတိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော ဩကာသသဏ္ဌာနော. တထာ ဟိ သုခိနော ထူလသရီရဿ စမ္မမံသန္တရေ ဖရိတွာ ဌိတော ဟလိဒ္ဒိရတ္တဒုကူလပိလောတိကသဏ္ဌာနော, ကိသသရီရဿ ဇင်္ဃမံသဦရုမံသပိဋ္ဌိကဏ္ဋကနိဿိတပိဋ္ဌိမံသဥဒရပဋလမံသာနိ နိဿာယ သံဝေလ္လိတွာ ဌပိတဟလိဒ္ဒိရတ္တဒုကူလပိလောတိကခဏ္ဍသဏ္ဌာနော. ဒိသတော ဒွီသု ဒိသာသု ဇာတော. ဩကာသတော ထူလသရီရဿ သကလသရီရံ ဖရိတွာ ကိသဿ ဇင်္ဃာမံသာဒီနိ နိဿာယ ဌိတော, ယော သိနေဟသင်္ခါတောပိ ဟုတွာ ပရမဇေဂုစ္ဆတ္တာ န မတ္ထကတေလတ္ထံ န ဂဏ္ဍူသတေလတ္ထံ န ဒီပဇာလနတ္ထံ သင်္ဂယှတိ. उसके बाद, शरीर में त्वचा और मांस के बीच स्थित वसा (मेद) को वर्ण की दृष्टि से कटी हुई हल्दी के रंग जैसा निर्धारित करता है। संस्थान की दृष्टि से, यह अपने स्थान के आकार का होता है। जैसे कि, सुखी और स्थूल शरीर वाले व्यक्ति की त्वचा और मांस के बीच व्याप्त होकर स्थित वसा, हल्दी से रंगे हुए पुराने दुकूल वस्त्र के टुकड़े के आकार की होती है; और कृश (दुबले) शरीर वाले व्यक्ति की वसा पिंडलियों के मांस, जाँघों के मांस, रीढ़ की हड्डी के आश्रित पीठ के मांस और उदर-पटल के मांस के आश्रित होकर, सिकुड़ी हुई और रखी हुई हल्दी से रंगे पुराने दुकूल वस्त्र के टुकड़े के आकार की होती है। दिशा की दृष्टि से, यह दोनों दिशाओं में उत्पन्न होती है। स्थान की दृष्टि से, स्थूल शरीर वाले के पूरे शरीर में व्याप्त होकर और कृश शरीर वाले के पिंडलियों के मांस आदि के आश्रित होकर स्थित होती है। जो स्नेह (चिकनाई) कहलाने पर भी, अत्यंत घृणित होने के कारण न तो सिर में लगाने वाले तेल के रूप में, न ही कुल्ला करने वाले तेल के रूप में और न ही दीपक जलाने के लिए उपयोग में ली जाती है। တတ္ထ ယထာ မံသပုဉ္ဇံ နိဿာယ ဌိတာ ဟလိဒ္ဒိရတ္တဒုကူလပိလောတိကာ န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ မံသပုဉ္ဇံ နိဿာယ ဌိတာ’’တိ, နပိ မံသပုဉ္ဇော ဇာနာတိ ‘‘ဟလိဒ္ဒိရတ္တဒုကူလပိလောတိကာ မံ နိဿာယ ဌိတာ’’တိ; ဧဝမေဝ န မေဒေါ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ သကလသရီရံ ဇင်္ဃာဒီသု ဝါ မံသံ နိဿာယ ဌိတော’’တိ, နပိ သကလသရီရံ ဇာနာတိ ဇင်္ဃာဒီသု ဝါ မံသံ ‘‘မေဒေါ မံ နိဿာယ ဌိတော’’တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော မေဒေါ ဟေဋ္ဌာ မံသေန, ဥပရိ စမ္မေန, သမန္တတော မေဒဘာဂေန [Pg.52] ပရိစ္ဆိန္နောတိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ မေဒံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ, जैसे मांस के ढेर के सहारे स्थित हल्दी से रंगा हुआ पुराना सफेद कपड़ा यह नहीं जानता कि "मैं मांस के ढेर के सहारे स्थित हूँ", और न ही मांस का ढेर यह जानता है कि "हल्दी से रंगा हुआ पुराना सफेद कपड़ा मेरे सहारे स्थित है"; इसी प्रकार वसा (मेदो) यह नहीं जानती कि "मैं संपूर्ण शरीर में या पिंडलियों आदि में मांस के सहारे स्थित हूँ", और न ही संपूर्ण शरीर या पिंडलियों आदि का मांस यह जानता है कि "वसा मेरे सहारे स्थित है"। ये धर्म (तत्व) विचार और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... (पे)... पुद्गल नहीं हैं। परिच्छेद (सीमा) की दृष्टि से, वसा नीचे मांस से, ऊपर त्वचा से और चारों ओर वसा के ही अंश से परिच्छिन्न (सीमित) है। यह इसका सजातीय परिच्छेद है, और विजातीय परिच्छेद तो बालों के समान ही है। इस प्रकार वसा को वर्ण आदि के द्वारा निर्धारित किया जाता है। တတော ပရံ သရီရေ အဿု ဝဏ္ဏတော ပသန္နတိလတေလဝဏ္ဏန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော ဩကာသသဏ္ဌာနံ. ဒိသတော ဥပရိမာယ ဒိသာယ ဇာတံ. ဩကာသတော အက္ခိကူပကေသု ဌိတန္တိ. န စေတံ ပိတ္တကောသကေ ပိတ္တမိဝ အက္ခိကူပကေသု သဒါ သန္နိစိတံ ဟုတွာ တိဋ္ဌတိ, ကိန္တု ယဒါ သောမနဿဇာတာ သတ္တာ မဟာဟသိတံ ဟသန္တိ, ဒေါမနဿဇာတာ ရောဒန္တိ ပရိဒေဝန္တိ, တထာရူပံ ဝိသမာဟာရံ ဝါ ဟရန္တိ, ယဒါ စ တေသံ အက္ခီနိ ဓူမရဇပံသုကာဒီဟိ အဘိဟညန္တိ, တဒါ ဧတေဟိ သောမနဿဒေါမနဿဝိသမာဟာရာဒီဟိ သမုဋ္ဌဟိတွာ အဿု အက္ခိကူပကေသု ပူရေတွာ တိဋ္ဌတိ ပဂ္ဃရတိ စ. ‘‘အဿုပရိဂ္ဂဏှကေန စ ယောဂါဝစရေန အက္ခိကူပကေ ပူရေတွာ ဌိတဝသေနေဝ တံ မနသိကာတဗ္ဗ’’န္တိ ပုဗ္ဗာစရိယာ ဝဏ္ဏယန္တိ. उसके बाद, शरीर में आँसुओं को वर्ण की दृष्टि से स्वच्छ तिल के तेल के रंग जैसा निर्धारित किया जाता है। संस्थान (आकार) की दृष्टि से, यह अपने स्थान के आकार का होता है। दिशा की दृष्टि से, यह ऊपरी दिशा में उत्पन्न होता है। स्थान की दृष्टि से, यह नेत्र-कोटरों (आँखों के गड्ढों) में स्थित होता है। और यह पित्ताशय में पित्त की तरह नेत्र-कोटरों में सदा संचित होकर नहीं रहता, बल्कि जब सौमनस्य (प्रसन्नता) युक्त प्राणी बहुत अधिक हँसते हैं, या दौर्मनस्य (दुःख) युक्त होकर रोते और विलाप करते हैं, अथवा उस प्रकार के विषम आहार का सेवन करते हैं, और जब उनकी आँखों में धुआँ, धूल, मिट्टी आदि से आघात पहुँचता है, तब इन सौमनस्य, दौर्मनस्य, विषम आहार आदि के कारण उत्पन्न होकर आँसू नेत्र-कोटरों को भरकर स्थित होते हैं और बहते हैं। "आँसुओं का ग्रहण करने वाले योगावाचर को नेत्र-कोटरों में भरकर स्थित होने की अवस्था में ही उसका मनसिकार करना चाहिए" - ऐसा पूर्वाचार्यों ने वर्णन किया है। တတ္ထ ယထာ မတ္ထကစ္ဆိန္နတရုဏတာလဋ္ဌိကူပကေသု ဌိတံ ဥဒကံ န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ မတ္ထကစ္ဆိန္နတရုဏတာလဋ္ဌိကူပကေသု ဌိတ’’န္တိ, နပိ မတ္ထကစ္ဆိန္နတရုဏတာလဋ္ဌိကူပကာ ဇာနန္တိ ‘‘အမှေသု ဥဒကံ ဌိတ’’န္တိ; ဧဝမေဝ န အဿု ဇာနာတိ ‘‘အဟံ အက္ခိကူပကေသု ဌိတ’’န္တိ, နပိ အက္ခိကူပကာ ဇာနန္တိ ‘‘အမှေသု အဿု ဌိတ’’န္တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော အဿု အဿုဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္နန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ အဿုံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ, जैसे डंठल कटे हुए कोमल ताड़ के फल के छिद्रों में स्थित जल यह नहीं जानता कि "मैं डंठल कटे हुए कोमल ताड़ के फल के छिद्रों में स्थित हूँ", और न ही वे छिद्र यह जानते हैं कि "हममें जल स्थित है"; इसी प्रकार आँसू यह नहीं जानते कि "मैं नेत्र-कोटरों में स्थित हूँ", और न ही नेत्र-कोटर यह जानते हैं कि "हममें आँसू स्थित हैं"। ये धर्म विचार और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... (पे)... पुद्गल नहीं हैं। परिच्छेद की दृष्टि से, आँसू आँसुओं के ही अंश से परिच्छिन्न हैं। यह इसका सजातीय परिच्छेद है, और विजातीय परिच्छेद तो बालों के समान ही है। इस प्रकार आँसुओं को वर्ण आदि के द्वारा निर्धारित किया जाता है। တတော ပရံ သရီရေ ဝိလီနသိနေဟသင်္ခါတာ ဝသာ ဝဏ္ဏတော အာစာမေ အာသိတ္တတေလဝဏ္ဏာတိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော ဩကာသသဏ္ဌာနာ. ဒိသတော ဒွီသု ဒိသာသု ဇာတာ. ဩကာသတော ဟတ္ထတလဟတ္ထပိဋ္ဌိပါဒတလပါဒပိဋ္ဌိနာသာပုဋနလာဋအံသကူဋေသု ဌိတာတိ. န စေသာ ဧတေသု ဩကာသေသု သဒါ ဝိလီနာ ဧဝ ဟုတွာ တိဋ္ဌတိ, ကိန္တု ယဒါ အဂ္ဂိသန္တာပသူရိယသန္တာပဥတုဝိသဘာဂဓာတုဝိသဘာဂေဟိ တေ ပဒေသာ ဥသ္မာဇာတာ ဟောန္တိ, တဒါ တတ္ထ ဝိလီနာဝ ဟုတွာ ပသန္နသလိလာသု ဥဒကသောဏ္ဍိကာသု နီဟာရော ဝိယ သရတိ. उसके बाद, शरीर में पिघले हुए स्नेह (तेल) कही जाने वाली 'वसा' (त्वचा का तेल) को वर्ण की दृष्टि से मांड (चावल के पानी) पर डाले गए तेल के रंग जैसा निर्धारित किया जाता है। संस्थान की दृष्टि से, यह अपने स्थान के आकार की होती है। दिशा की दृष्टि से, यह दोनों दिशाओं (ऊपरी और निचली) में उत्पन्न होती है। स्थान की दृष्टि से, यह हथेलियों, हाथों के पीछे, तलवों, पैरों के ऊपर, नासिका छिद्रों, ललाट और कंधों के जोड़ों पर स्थित होती है। और यह इन स्थानों पर सदा पिघली हुई अवस्था में ही नहीं रहती, बल्कि जब अग्नि के ताप, सूर्य के ताप, ऋतु के वैषम्य या धातुओं के वैषम्य से वे प्रदेश ऊष्म (गर्म) हो जाते हैं, तब वहाँ पिघलकर स्वच्छ जल वाले जलाशयों में कोहरे (भाप) की तरह फैलती है। တတ္ထ [Pg.53] ယထာ ဥဒကသောဏ္ဍိယော အဇ္ဈောတ္ထရိတွာ ဌိတော နီဟာရော န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ဥဒကသောဏ္ဍိယော အဇ္ဈောတ္ထရိတွာ ဌိတော’’တိ, နပိ ဥဒကသောဏ္ဍိယော ဇာနန္တိ ‘‘နီဟာရော အမှေ အဇ္ဈောတ္ထရိတွာ ဌိတော’’တိ; ဧဝမေဝ န ဝသာ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ဟတ္ထတလာဒီနိ အဇ္ဈောတ္ထရိတွာ ဌိတာ’’တိ, နပိ ဟတ္ထတလာဒီနိ ဇာနန္တိ ‘‘ဝသာ အမှေ အဇ္ဈောတ္ထရိတွာ ဌိတာ’’တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော ဝသာ ဝသာဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္နာတိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတိဿာ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ ဝသံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ, जैसे जलाशयों को ढककर स्थित कोहरा यह नहीं जानता कि "मैं जलाशयों को ढककर स्थित हूँ", और न ही जलाशय यह जानते हैं कि "कोहरा हमें ढककर स्थित है"; इसी प्रकार वसा यह नहीं जानती कि "मैं हथेलियों आदि को ढककर स्थित हूँ", और न ही हथेलियाँ आदि यह जानती हैं कि "वसा हमें ढककर स्थित है"। ये धर्म विचार और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... (पे)... पुद्गल नहीं हैं। परिच्छेद की दृष्टि से, वसा वसा के ही अंश से परिच्छिन्न है। यह इसका सजातीय परिच्छेद है, और विजातीय परिच्छेद तो बालों के समान ही है। इस प्रकार वसा को वर्ण आदि के द्वारा निर्धारित किया जाता है। တတော ပရံ သရီရေ မုခဿဗ္ဘန္တရေ ခေဠော ဝဏ္ဏတော သေတော ဖေဏဝဏ္ဏောတိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော ဩကာသသဏ္ဌာနောတိ, သမုဒ္ဒဖေဏသဏ္ဌာနောတိပိ ဧကေ. ဒိသတော ဥပရိမာယ ဒိသာယ ဇာတော. ဩကာသတော ဥဘောဟိ ကပေါလပဿေဟိ ဩရောဟိတွာ ဇိဝှာယ ဌိတောတိ. န စေသော ဧတ္ထ သဒါ သန္နိစိတော ဟုတွာ တိဋ္ဌတိ, ကိန္တု ယဒါ သတ္တာ တထာရူပံ အာဟာရံ ပဿန္တိ ဝါ သရန္တိ ဝါ, ဥဏှတိတ္တကဋုကလောဏမ္ဗိလာနံ ဝါ ကိဉ္စိ မုခေ ဌပေန္တိ. ယဒါ စ တေသံ ဟဒယံ အာဂိလာယတိ, ကိသ္မိဉ္စိဒေဝ ဝါ ဇိဂုစ္ဆာ ဥပ္ပဇ္ဇတိ, တဒါ ခေဠော ဥပ္ပဇ္ဇိတွာ ဥဘောဟိ ကပေါလပဿေဟိ ဩရောဟိတွာ ဇိဝှာယ သဏ္ဌာတိ. အဂ္ဂဇိဝှာယ စေသ ခေဠော တနုကော ဟောတိ, မူလဇိဝှာယ ဗဟလော, မုခေ ပက္ခိတ္တဉ္စ ပုထုကံ ဝါ တဏ္ဍုလံ ဝါ အညံ ဝါ ကိဉ္စိ ခါဒနီယံ နဒိပုလိနေ ခတကူပသလိလမိဝ ပရိက္ခယမဂစ္ဆန္တောဝ သဒါ တေမနသမတ္ထော ဟောတိ. उसके बाद, शरीर में मुख के भीतर लार (खेलो) को वर्ण की दृष्टि से सफेद, फेन (झाग) के रंग जैसा निर्धारित किया जाता है। संस्थान की दृष्टि से, यह अपने स्थान के आकार की होती है; कुछ आचार्य इसे समुद्र के फेन के आकार का भी कहते हैं। दिशा की दृष्टि से, यह ऊपरी दिशा में उत्पन्न होती है। स्थान की दृष्टि से, यह दोनों कपोलों (गालों) के पार्श्वों से उतरकर जिह्वा पर स्थित होती है। और यह यहाँ सदा संचित होकर नहीं रहती, बल्कि जब प्राणी उस प्रकार के आहार को देखते हैं या स्मरण करते हैं, अथवा गर्म, तीखे, कड़वे, नमकीन या खट्टे पदार्थों में से कुछ मुख में रखते हैं, और जब उनका हृदय ग्लानि का अनुभव करता है, या किसी कारण से घृणा उत्पन्न होती है, तब लार उत्पन्न होकर दोनों कपोलों के पार्श्वों से उतरकर जिह्वा पर स्थित हो जाती है। जिह्वा के अग्र भाग में यह लार पतली होती है और जिह्वा के मूल में गाढ़ी होती है, और मुख में डाले गए चिवड़ा, चावल या किसी अन्य खाद्य पदार्थ को, नदी के किनारे खोदे गए गड्ढे के जल की तरह, कभी समाप्त न होते हुए सदा गीला करने में समर्थ होती है। တတ္ထ ယထာ နဒိပုလိနေ ခတကူပတလေ သဏ္ဌိတံ ဥဒကံ န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ကူပတလေ သဏ္ဌိတ’’န္တိ, နပိ ကူပတလံ ဇာနာတိ ‘‘မယိ ဥဒကံ ဌိတ’’န္တိ; ဧဝမေဝ န ခေဠော ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ဥဘောဟိ ကပေါလပဿေဟိ ဩရောဟိတွာ ဇိဝှာတလေ သဏ္ဌိတော’’တိ, နပိ ဇိဝှာတလံ ဇာနာတိ ‘‘မယိ ဥဘောဟိ ကပေါလပဿေဟိ ဩရောဟိတွာ ခေဠော သဏ္ဌိတော’’တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော ခေဠော ခေဠဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္နောတိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ ခေဠံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ जैसे नदी के रेत के मैदान में खोदे गए कुएँ के तल में स्थित जल यह नहीं जानता कि "मैं कुएँ के तल में स्थित हूँ", और न ही कुएँ का तल यह जानता है कि "मुझमें जल स्थित है"; इसी प्रकार लार (थूक) यह नहीं जानती कि "मैं दोनों गालों के पार्श्वों से उतरकर जीभ के तल पर स्थित हूँ", और न ही जीभ का तल यह जानता है कि "मुझमें दोनों गालों के पार्श्वों से उतरकर लार स्थित है"। क्योंकि ये धर्म (तत्व) विचार और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... (पे)... यह पुद्गल (व्यक्ति) नहीं है। परिच्छेद (सीमा) की दृष्टि से, लार 'लार के भाग' के रूप में परिच्छिन्न (सीमित) है, ऐसा वह निर्धारित करता है। यह इसका सभागा-परिच्छेद (समान सीमा) है, और विसभागा-परिच्छेद (असमान सीमा) तो बालों के समान ही है। इस प्रकार वह वर्ण आदि के द्वारा लार का निर्धारण करता है। တတော [Pg.54] ပရံ သရီရေ သိင်္ဃာဏိကာ ဝဏ္ဏတော သေတာ တရုဏတာလမိဉ္ဇဝဏ္ဏာတိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော ဩကာသသဏ္ဌာနာ, သေဒေတွာ သေဒေတွာ နာသာပုဋေ နိရန္တရံ ပက္ခိတ္တဝေတ္တင်္ကုရသဏ္ဌာနာတိပိ ဧကေ. ဒိသတော ဥပရိမာယ ဒိသာယ ဇာတာ. ဩကာသတော နာသာပုဋေ ပူရေတွာ ဌိတာတိ. န စေသာ ဧတ္ထ သဒါ သန္နိစိတာ ဟုတွာ တိဋ္ဌတိ, ကိန္တု သေယျထာပိ နာမ ပုရိသော ပဒုမိနိပတ္တေ ဒဓိံ ဗန္ဓိတွာ ဟေဋ္ဌာ ပဒုမိနိပတ္တံ ကဏ္ဋကေန ဝိဇ္ဈေယျ, အထ တေန ဆိဒ္ဒေန ဒဓိပိဏ္ဍံ ဂဠိတွာ ဗဟိ ပပတေယျ; ဧဝမေဝ ယဒါ သတ္တာ ရောဒန္တိ, ဝိသဘာဂါဟာရဥတုဝသေန ဝါ သဉ္ဇာတဓာတုက္ခောဘာ ဟောန္တိ, တဒါ အန္တောသီသတော ပူတိသေမှဘာဝံ အာပန္နံ မတ္ထလုင်္ဂံ ဂဠိတွာ တာလုမတ္ထကဝိဝရေန ဩတရိတွာ နာသာပုဋေ ပူရေတွာ တိဋ္ဌတိ. उसके बाद, शरीर में नासिका-मल (शलेष्म/नरेटी) को वर्ण की दृष्टि से सफेद, कोमल ताड़ के फल के गूदे के रंग जैसा निर्धारित करता है। संस्थान (आकार) की दृष्टि से, यह अपने स्थान के आकार का होता है; कुछ आचार्यों के अनुसार, यह नासिका के छिद्रों में निरंतर ठूँसे गए बेंत के अंकुरों के आकार का होता है। दिशा की दृष्टि से, यह ऊपरी दिशा में उत्पन्न होता है। स्थान की दृष्टि से, यह नासिका के छिद्रों को भरकर स्थित रहता है। और यह यहाँ सदा संचित होकर नहीं रहता, बल्कि जैसे कोई मनुष्य कमल के पत्ते में दही बाँधकर नीचे से कमल के पत्ते को काँटे से छेद दे, तब उस छेद से दही का पिण्ड रिसकर बाहर गिर जाए; इसी प्रकार जब प्राणी रोते हैं, या विषम आहार और ऋतु के कारण धातुओं में क्षोभ (असंतुलन) उत्पन्न होता है, तब सिर के भीतर से सड़े हुए कफ की अवस्था को प्राप्त मस्तिष्क रिसकर, तालु के ऊपरी छिद्र से उतरकर नासिका के छिद्रों को भरकर स्थित हो जाता है। တတ္ထ ယထာ သိပ္ပိကာယ ပက္ခိတ္တံ ပူတိဒဓိ န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ သိပ္ပိကာယ ဌိတ’’န္တိ, နပိ သိပ္ပိကာ ဇာနာတိ ‘‘မယိ ပူတိကံ ဒဓိ ဌိတ’’န္တိ; ဧဝမေဝ န သိင်္ဃာဏိကာ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ နာသာပုဋေသု ဌိတာ’’တိ, နပိ နာသာပုဋာ ဇာနန္တိ ‘‘အမှေသု သိင်္ဃာဏိကာ ဌိတာ’’တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော သိင်္ဃာဏိကာ သိင်္ဃာဏိကဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္နာတိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတိဿာ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ သိင်္ဃာဏိကံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ जैसे सीप में रखा हुआ सड़ा हुआ दही यह नहीं जानता कि "मैं सीप में स्थित हूँ", और न ही सीप यह जानती है कि "मुझमें सड़ा हुआ दही स्थित है"; इसी प्रकार नासिका-मल यह नहीं जानता कि "मैं नासिका के छिद्रों में स्थित हूँ", और न ही नासिका के छिद्र यह जानते हैं कि "हममें नासिका-मल स्थित है"। क्योंकि ये धर्म विचार और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... (पे)... यह पुद्गल नहीं है। परिच्छेद की दृष्टि से, नासिका-मल 'नासिका-मल के भाग' के रूप में परिच्छिन्न है, ऐसा वह निर्धारित करता है। यह इसका सभागा-परिच्छेद है, और विसभागा-परिच्छेद तो बालों के समान ही है। इस प्रकार वह वर्ण आदि के द्वारा नासिका-मल का निर्धारण करता है। တတော ပရံ အန္တောသရီရေ လသိကာတိ သရီရသန္ဓီနံ အဗ္ဘန္တရေ ပိစ္ဆိလကုဏပံ. သာ ဝဏ္ဏတော ကဏိကာရနိယျာသဝဏ္ဏာတိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော ဩကာသသဏ္ဌာနာ. ဒိသတော ဒွီသု ဒိသာသု ဇာတာ. ဩကာသတော အဋ္ဌိသန္ဓီနံ အဗ္ဘဉ္ဇနကိစ္စံ သာဓယမာနာ အသီတိသတသန္ဓီနံ အဗ္ဘန္တရေ ဌိတာတိ. ယဿ စေသာ မန္ဒာ ဟောတိ, တဿ ဥဋ္ဌဟန္တဿ နိသီဒန္တဿ အဘိက္ကမန္တဿ ပဋိက္ကမန္တဿ သမိဉ္ဇန္တဿ ပသာရေန္တဿ အဋ္ဌိကာနိ ကဋကဋာယန္တိ, အစ္ဆရိကာသဒ္ဒံ ကရောန္တော ဝိယ ဝိစရတိ, ဧကယောဇနဒွိယောဇနမတ္တမ္ပိ အဒ္ဓါနံ ဂတဿ ဝါယောဓာတု ကုပ္ပတိ, ဂတ္တာနိ ဒုက္ခန္တိ ယဿ ပန စေသာ ဗဟုကာ ဟောတိ, တဿ ဥဋ္ဌာနနိသဇ္ဇာဒီသု န အဋ္ဌီနိ ကဋကဋာယန္တိ, ဒီဃမ္ပိ အဒ္ဓါနံ ဂတဿ န ဝါယောဓာတု ကုပ္ပတိ, န ဂတ္တာနိ ဒုက္ခန္တိ. उसके बाद, शरीर के भीतर 'लसिका' (जोड़ों का चिकना पदार्थ) है, जो शरीर के जोड़ों के भीतर एक पिच्छिल (लसदार) अशुचि है। वह वर्ण की दृष्टि से कचनार (कणिकार) के गोंद के रंग जैसी है, ऐसा वह निर्धारित करता है। संस्थान की दृष्टि से, यह अपने स्थान के आकार की होती है। दिशा की दृष्टि से, यह दोनों दिशाओं में उत्पन्न होती है। स्थान की दृष्टि से, यह हड्डियों के जोड़ों को चिकना करने का कार्य करते हुए एक सौ अस्सी जोड़ों के भीतर स्थित होती है। जिसकी यह (लसिका) कम होती है, उसके उठते, बैठते, आगे बढ़ते, पीछे हटते, अंगों को सिकोड़ते और फैलाते समय हड्डियाँ 'कड़क-कड़क' आवाज करती हैं, वह चुटकी बजाने जैसी आवाज करता हुआ चलता है, और एक-दो योजन की दूरी तय करने पर उसकी वायु धातु कुपित हो जाती है और अंग दुखने लगते हैं। परंतु जिसकी यह लसिका प्रचुर होती है, उसके उठने-बैठने आदि में हड्डियाँ 'कड़क-कड़क' नहीं करतीं, और लंबी दूरी तय करने पर भी न तो वायु धातु कुपित होती है और न ही अंग दुखते हैं। တတ္ထ [Pg.55] ယထာ အဗ္ဘဉ္ဇနတေလံ န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ အက္ခံ အဗ္ဘဉ္ဇိတွာ ဌိတ’’န္တိ, နပိ အက္ခော ဇာနာတိ ‘‘မံ တေလံ အဗ္ဘဉ္ဇိတွာ ဌိတ’’န္တိ; ဧဝမေဝ န လသိကာ ဇာနာတိ ‘‘အဟံ အသီတိသတသန္ဓိယော အဗ္ဘဉ္ဇိတွာ ဌိတာ’’တိ, နပိ အသီတိသတသန္ဓိယော ဇာနန္တိ ‘‘လသိကာ အမှေ အဗ္ဘဉ္ဇိတွာ ဌိတာ’’တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော လသိကာ လသိကဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္နာတိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတိဿာ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ လသိကံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. वहाँ जैसे धुरी में लगाया गया तेल यह नहीं जानता कि "मैं धुरी को चुपड़कर स्थित हूँ", और न ही धुरी यह जानती है कि "मुझमें तेल चुपड़ा हुआ स्थित है"; इसी प्रकार लसिका यह नहीं जानती कि "मैं एक सौ अस्सी जोड़ों को चुपड़कर स्थित हूँ", और न ही एक सौ अस्सी जोड़ यह जानते हैं कि "लसिका हमें चुपड़कर स्थित है"। क्योंकि ये धर्म विचार और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... (पे)... यह पुद्गल नहीं है। परिच्छेद की दृष्टि से, लसिका 'लसिका के भाग' के रूप में परिच्छिन्न है, ऐसा वह निर्धारित करता है। यह इसका सभागा-परिच्छेद है, और विसभागा-परिच्छेद तो बालों के समान ही है। इस प्रकार वह वर्ण आदि के द्वारा लसिका का निर्धारण करता है। တတော ပရံ အန္တောသရီရေ မုတ္တံ ဝဏ္ဏတော မာသခါရောဒကဝဏ္ဏန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. သဏ္ဌာနတော ဥဒကံ ပူရေတွာ အဓောမုခဌပိတဥဒကကုမ္ဘအန္တရဂတဥဒကသဏ္ဌာနံ. ဒိသတော ဟေဋ္ဌိမာယ ဒိသာယ ဇာတံ. ဩကာသတော ဝတ္ထိဿဗ္ဘန္တရေ ဌိတန္တိ. ဝတ္ထိ နာမ ဝတ္ထိပုဋော ဝုစ္စတိ, ယတ္ထ သေယျထာပိ နာမ စန္ဒနိကာယ ပက္ခိတ္တေ အမုခေ ပေဠာဃဋေ စန္ဒနိကာရသော ပဝိသတိ, န စဿ ပဝိသနမဂ္ဂေါ ပညာယတိ; ဧဝမေဝ သရီရတော မုတ္တံ ပဝိသတိ, န စဿ ပဝိသနမဂ္ဂေါ ပညာယတိ နိက္ခမနမဂ္ဂေါ ဧဝ တု ပါကဋော ဟောတိ, ယမှိ စ မုတ္တဿ ဘရိတေ ‘‘ပဿာဝံ ကရောမာ’’တိ သတ္တာနံ အာယူဟနံ ဟောတိ. တတ္ထ ယထာ စန္ဒနိကာယ ပက္ခိတ္တေ အမုခေ ပေဠာဃဋေ ဌိတော စန္ဒနိကာရသော န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ အမုခေ ပေဠာဃဋေ ဌိတော’’တိ, နပိ ပေဠာဃဋော ဇာနာတိ ‘‘မယိ စန္ဒနိကာရသော ဌိတော’’တိ; ဧဝမေဝ မုတ္တံ န ဇာနာတိ ‘‘အဟံ ဝတ္ထိမှိ ဌိတ’’န္တိ, နပိ ဝတ္ထိ ဇာနာတိ ‘‘မယိ မုတ္တံ ဌိတ’’န္တိ. အာဘောဂပစ္စဝေက္ခဏဝိရဟိတာ ဟိ ဧတေ ဓမ္မာ…ပေ… န ပုဂ္ဂလောတိ. ပရိစ္ဆေဒတော ဝတ္ထိအဗ္ဘန္တရေန စေဝ မုတ္တဘာဂေန စ ပရိစ္ဆိန္နန္တိ ဝဝတ္ထပေတိ. အယမေတဿ သဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ, ဝိသဘာဂပရိစ္ဆေဒေါ ပန ကေသသဒိသော ဧဝါတိ ဧဝံ မုတ္တံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. ဧဝမယံ ဣမံ ဒွတ္တိံသာကာရံ ဝဏ္ဏာဒိတော ဝဝတ္ထပေတိ. उसके बाद, शरीर के भीतर मूत्र को वर्ण की दृष्टि से उड़द के क्षार-जल (धोवन) के रंग जैसा निर्धारित करता है। संस्थान की दृष्टि से, यह जल से भरकर औंधे मुँह रखे गए जल-कुंभ के भीतर स्थित जल के आकार का होता है। दिशा की दृष्टि से, यह निचली दिशा में उत्पन्न होता है। स्थान की दृष्टि से, यह मूत्राशय (वत्थि) के भीतर स्थित होता है। मूत्राशय की थैली को 'वत्थि' कहा जाता है, जहाँ जैसे गंदे नाले में रखे गए बिना मुँह वाले घड़े में नाले का गंदा जल प्रवेश कर जाता है और उसके प्रवेश का मार्ग दिखाई नहीं देता; इसी प्रकार शरीर से मूत्र प्रवेश करता है और उसके प्रवेश का मार्ग दिखाई नहीं देता, केवल निकलने का मार्ग ही प्रकट होता है, और जिसके मूत्र से भर जाने पर प्राणियों को "हम पेशाब करें" ऐसा प्रयत्न होता है। वहाँ जैसे गंदे नाले में रखे गए बिना मुँह वाले घड़े में स्थित गंदा जल यह नहीं जानता कि "मैं बिना मुँह वाले घड़े में स्थित हूँ", और न ही वह घड़ा यह जानता है कि "मुझमें गंदा जल स्थित है"; इसी प्रकार मूत्र यह नहीं जानता कि "मैं मूत्राशय में स्थित हूँ", और न ही मूत्राशय यह जानता है कि "मुझमें मूत्र स्थित है"। क्योंकि ये धर्म विचार और प्रत्यवेक्षण से रहित हैं... (पे)... यह पुद्गल नहीं है। परिच्छेद की दृष्टि से, यह मूत्राशय के भीतर के भाग और मूत्र के भाग के रूप में परिच्छिन्न है, ऐसा वह निर्धारित करता है। यह इसका सभागा-परिच्छेद है, और विसभागा-परिच्छेद तो बालों के समान ही है। इस प्रकार वह वर्ण आदि के द्वारा मूत्र का निर्धारण करता है। इस प्रकार यह योगी इन बत्तीस प्रकार के अंगों का वर्ण आदि के द्वारा निर्धारण करता है। တဿေဝံ ဣမံ ဒွတ္တိံသာကာရံ ဝဏ္ဏာဒိဝသေန ဝဝတ္ထပေန္တဿ တံ တံ ဘာဝနာနုယောဂံ အာဂမ္မ ကေသာဒယော ပဂုဏာ ဟောန္တိ, ကောဋ္ဌာသဘာဝေန ဥပဋ္ဌဟန္တိ. တတော ပဘုတိ သေယျထာပိ နာမ စက္ခုမတော ပုရိသဿ ဒွတ္တိံသဝဏ္ဏာနံ ပုပ္ဖာနံ ဧကသုတ္တဂန္ထိတံ မာလံ ဩလောကေန္တဿ သဗ္ဗပုပ္ဖာနိ အပုဗ္ဗာပရိယမိဝ ပါကဋာနိ ဟောန္တိ; ဧဝမေဝ ‘‘အတ္ထိ ဣမသ္မိံ ကာယေ [Pg.56] ကေသာ’’တိ ဣမံ ကာယံ သတိယာ ဩလောကေန္တဿ သဗ္ဗေ တေ ဓမ္မာ အပုဗ္ဗာပရိယမိဝ ပါကဋာ ဟောန္တိ. ကေသေသု အာဝဇ္ဇိတေသု အသဏ္ဌဟမာနာဝ သတိ ယာဝ မုတ္တံ, တာဝ ပဝတ္တတိ. တတော ပဘုတိ တဿ အာဟိဏ္ဍန္တာ မနုဿတိရစ္ဆာနာဒယော စ သတ္တာကာရံ ဝိဇဟိတွာ ကောဋ္ဌာသရာသိဝသေနေဝ ဥပဋ္ဌဟန္တိ, တေဟိ စ အဇ္ဈောဟရိယမာနံ ပါနဘောဇနာဒိ ကောဋ္ဌာသရာသိမှိ ပက္ခိပ္ပမာနမိဝ ဥပဋ္ဌာတီတိ. इस प्रकार, वर्ण (रंग) आदि के माध्यम से इन बत्तीस अंगों का निर्धारण करने वाले उस योगी को, उस-उस भावना के अभ्यास के कारण, केश आदि अंग अभ्यस्त हो जाते हैं और वे अंगों के समूह (कोष्ठास) के रूप में प्रकट होते हैं। उसके बाद, जैसे किसी दृष्टि संपन्न व्यक्ति को बत्तीस रंगों के फूलों की एक ही धागे में पिरोई गई माला को देखते समय सभी फूल एक साथ (बिना किसी क्रम के भेद के) स्पष्ट दिखाई देते हैं; उसी प्रकार, "इस शरीर में केश हैं" इस प्रकार स्मृति के साथ इस शरीर को देखने वाले योगी को वे सभी धर्म (अंग) एक साथ स्पष्ट दिखाई देते हैं। केशों का आवर्जन (चिंतन) करने पर, स्मृति बिना रुके मूत्र तक प्रवाहित होती है। तब से, उस योगी को इधर-उधर घूमते हुए मनुष्य, पशु आदि प्राणी 'सत्व' के आकार को त्याग कर केवल अंगों के समूह के रूप में ही दिखाई देते हैं, और उनके द्वारा खाया जाने वाला पेय-भोजन आदि भी अंगों के समूह में डाले जाने के समान ही प्रतीत होता है। ဧတ္ထာဟ ‘‘အထာနေန တတော ပရံ ကိံ ကာတဗ္ဗ’’န္တိ? ဝုစ္စတေ – တဒေဝ နိမိတ္တံ အာသေဝိတဗ္ဗံ ဘာဝေတဗ္ဗံ ဗဟုလီကာတဗ္ဗံ သုဝဝတ္ထိတံ ဝဝတ္ထပေတဗ္ဗံ. ကထံ ပနာယံ တံ နိမိတ္တံ အာသေဝတိ ဘာဝေတိ ဗဟုလီကရောတိ သုဝဝတ္ထိတံ ဝဝတ္ထပေတီတိ? အယဉှိ တံ ကေသာဒီနံ ကောဋ္ဌာသဘာဝေန ဥပဋ္ဌာနနိမိတ္တံ အာသေဝတိ, သတိယာ အလ္လိယတိ ဘဇတိ ဥပဂစ္ဆတိ, သတိဂဗ္ဘံ ဂဏှာပေတိ. တတ္ထ လဒ္ဓံ ဝါ သတိံ ဝဍ္ဎေန္တော တံ ဘာဝေတီတိ ဝုစ္စတိ. ဗဟုလီကရောတီတိ ပုနပ္ပုနံ သတိသမ္ပယုတ္တံ ဝိတက္ကဝိစာရဗ္ဘာဟတံ ကရောတိ. သုဝဝတ္ထိတံ ဝဝတ္ထပေတီတိ ယထာ သုဋ္ဌု ဝဝတ္ထိတံ ဟောတိ, န ပုန အန္တရဓာနံ ဂစ္ဆတိ, တထာ တံ သတိယာ ဝဝတ္ထပေတိ, ဥပဓာရေတိ ဥပနိဗန္ဓတိ. यहाँ (आक्षेपकर्ता) पूछता है— "इसके बाद उसे क्या करना चाहिए?" उत्तर दिया जाता है— "उसी निमित्त का सेवन करना चाहिए, उसकी भावना करनी चाहिए, उसे बार-बार करना चाहिए और उसे भली-भांति निर्धारित करना चाहिए।" वह उस निमित्त का सेवन, भावना, बहुलीकरण और भली-भांति निर्धारण कैसे करता है? वह केश आदि के अंगों के समूह के रूप में प्रकट होने वाले उस निमित्त का सेवन करता है, स्मृति के साथ उसमें संलग्न होता है, उसका सेवन करता है, उसके समीप जाता है और स्मृति के गर्भ को ग्रहण करता है। वहाँ प्राप्त स्मृति को बढ़ाते हुए वह उसकी 'भावना' करता है, ऐसा कहा जाता है। 'बहुलीकरण' का अर्थ है—बार-बार स्मृति से युक्त वितर्क और विचार के साथ अभ्यास करना। 'भली-भांति निर्धारित करना' का अर्थ है—जिस प्रकार वह अच्छी तरह निर्धारित हो जाए और पुनः लुप्त न हो, उस प्रकार उसे स्मृति से निर्धारित करना, धारण करना और बांधना। အထ ဝါ ယံ ပုဗ္ဗေ အနုပုဗ္ဗတော, နာတိသီဃတော, နာတိသဏိကတော, ဝိက္ခေပပ္ပဟာနတော, ပဏ္ဏတ္တိသမတိက္ကမနတော, အနုပုဗ္ဗမုဉ္စနတော, လက္ခဏတော, တယော စ သုတ္တန္တာတိ ဧဝံ ဒသဝိဓံ မနသိကာရကောသလ္လံ ဝုတ္တံ. တတ္ထ အနုပုဗ္ဗတော မနသိကရောန္တော အာသေဝတိ, နာတိသီဃတော နာတိသဏိကတော စ မနသိကရောန္တော ဘာဝေတိ, ဝိက္ခေပပ္ပဟာနတော မနသိကရောန္တော ဗဟုလီ ကရောတိ, ပဏ္ဏတ္တိသမတိက္ကမနာဒိတော မနသိကရောန္တော သုဝဝတ္ထိတံ ဝဝတ္ထပေတီတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. अथवा, जो पहले दस प्रकार का मनसिकार-कौशल कहा गया है—अनुक्रम से, न बहुत शीघ्र, न बहुत धीरे, विक्षेप (भटकाव) के त्याग से, प्रज्ञप्ति के अतिक्रमण से, अनुक्रम को छोड़ने से, लक्षण से, और तीन सुत्तन्तों के अनुसार। उनमें से, अनुक्रम से मनसिकार करते हुए वह 'सेवन' करता है; न बहुत शीघ्र और न बहुत धीरे मनसिकार करते हुए वह 'भावना' करता है; विक्षेप के त्याग से मनसिकार करते हुए वह 'बहुलीकरण' करता है; और प्रज्ञप्ति के अतिक्रमण आदि के द्वारा मनसिकार करते हुए वह 'भली-भांति निर्धारण' करता है, ऐसा समझना चाहिए। ဧတ္ထာဟ ‘‘ကထံ ပနာယံ အနုပုဗ္ဗာဒိဝသေန ဧတေ ဓမ္မေ မနသိ ကရောတီ’’တိ? ဝုစ္စတေ – အယဉှိ ကေသေ မနသိ ကရိတွာ တဒနန္တရံ လောမေ မနသိ ကရောတိ, န နခေ. တထာ လောမေ မနသိ ကရိတွာ တဒနန္တရံ နခေ မနသိ ကရောတိ, န ဒန္တေ. ဧသ နယော သဗ္ဗတ္ထ. ကသ္မာ? ဥပ္ပဋိပါဋိယာ ဟိ မနသိကရောန္တော သေယျထာပိ နာမ အကုသလော ပုရိသော ဒွတ္တိံသပဒံ နိဿေဏိံ ဥပ္ပဋိပါဋိယာ အာရောဟန္တော ကိလန္တကာယော တတော နိဿေဏိတော [Pg.57] ပပတတိ, န အာရောဟနံ သမ္ပာဒေတိ; ဧဝမေဝ ဘာဝနာသမ္ပတ္တိဝသေန အဓိဂန္တဗ္ဗဿ အဿာဒဿ အနဓိဂမနတော ကိလန္တစိတ္တော ဒွတ္တိံသာကာရဘာဝနာတော ပပတတိ, န ဘာဝနံ သမ္ပာဒေတီတိ. यहाँ पूछा जाता है— "वह अनुक्रम आदि के माध्यम से इन धर्मों का मनसिकार कैसे करता है?" उत्तर दिया जाता है— वह केशों का मनसिकार करने के तुरंत बाद रोमों का मनसिकार करता है, नखों का नहीं। उसी प्रकार, रोमों का मनसिकार करने के तुरंत बाद नखों का मनसिकार करता है, दांतों का नहीं। यही नियम सर्वत्र समझना चाहिए। क्यों? क्योंकि अनुक्रम के बिना मनसिकार करने वाला व्यक्ति, जैसे कोई अकुशल मनुष्य बत्तीस डंडों वाली सीढ़ी पर बिना क्रम के चढ़ते हुए थक जाता है और उस सीढ़ी से गिर जाता है, चढ़ने के कार्य को पूरा नहीं कर पाता; उसी प्रकार, भावना की सिद्धि से प्राप्त होने वाले आनंद को न पा सकने के कारण थके हुए चित्त वाला योगी बत्तीस अंगों की भावना से गिर जाता है, भावना को पूरा नहीं कर पाता। အနုပုဗ္ဗတော မနသိကရောန္တောပိ စ ကေသာ လောမာတိ နာတိသီဃတောပိ မနသိ ကရောတိ. အတိသီဃတော ဟိ မနသိကရောန္တော သေယျထာပိ နာမ အဒ္ဓါနံ ဂစ္ဆန္တော ပုရိသော သမဝိသမရုက္ခထလနိန္နဒွေဓာပထာဒီနိ မဂ္ဂနိမိတ္တာနိ ဥပလက္ခေတုံ န သက္ကောတိ, တတော န မဂ္ဂကုသလော ဟောတိ, အဒ္ဓါနဉ္စ ပရိက္ခယံ နေတိ; ဧဝမေဝ ဝဏ္ဏသဏ္ဌာနာဒီနိ ဒွတ္တိံသာကာရနိမိတ္တာနိ ဥပလက္ခေတုံ န သက္ကောတိ, တတော န ဒွတ္တိံသာကာရေ ကုသလော ဟောတိ, ကမ္မဋ္ဌာနဉ္စ ပရိက္ခယံ နေတိ. अनुक्रम से मनसिकार करते हुए भी वह "केश, रोम" इस प्रकार बहुत शीघ्रता के बिना मनसिकार करता है। क्योंकि बहुत शीघ्रता से मनसिकार करने वाला व्यक्ति, जैसे लंबी यात्रा पर निकला कोई मनुष्य सम-विषम, वृक्ष, स्थल, निम्न (गड्ढे), दोराहे आदि मार्ग-चिन्हों को पहचानने में समर्थ नहीं होता, इसलिए वह मार्ग में कुशल नहीं होता और यात्रा पूरी नहीं कर पाता; उसी प्रकार, वह वर्ण, संस्थान आदि बत्तीस अंगों के निमित्तों को पहचानने में समर्थ नहीं होता, इसलिए वह बत्तीस अंगों में कुशल नहीं होता और कर्मस्थान को समाप्त (सिद्ध) नहीं कर पाता। ယထာ စ နာတိသီဃတော, ဧဝံ နာတိသဏိကတောပိ မနသိ ကရောတိ. အတိသဏိကတော ဟိ မနသိကရောန္တော သေယျထာပိ နာမ ပုရိသော အဒ္ဓါနမဂ္ဂံ ပဋိပန္နော အန္တရာမဂ္ဂေ ရုက္ခပဗ္ဗတတဠာကာဒီသု ဝိလမ္ဗမာနော ဣစ္ဆိတပ္ပဒေသံ အပါပုဏန္တော အန္တရာမဂ္ဂေယေဝ သီဟဗျဂ္ဃာဒီဟိ အနယဗျသနံ ပါပုဏာတိ; ဧဝမေဝ ဒွတ္တိံသာကာရဘာဝနာသမ္ပဒံ အပါပုဏန္တော ဘာဝနာဝိစ္ဆေဒေန အန္တရာယေဝ ကာမဝိတက္ကာဒီဟိ အနယဗျသနံ ပါပုဏာတိ. जैसे वह बहुत शीघ्रता से नहीं करता, वैसे ही वह बहुत धीरे भी मनसिकार नहीं करता। क्योंकि बहुत धीरे मनसिकार करने वाला व्यक्ति, जैसे लंबी यात्रा पर निकला कोई मनुष्य मार्ग के बीच में वृक्ष, पर्वत, तालाब आदि में रुककर विलंब करता है और इच्छित स्थान तक न पहुँच पाने के कारण मार्ग के बीच में ही सिंह, व्याघ्र आदि के द्वारा विनाश को प्राप्त होता है; उसी प्रकार, बत्तीस अंगों की भावना की पूर्णता को प्राप्त न कर पाने के कारण, भावना के विच्छेद से वह बीच में ही काम-वितर्क आदि के द्वारा विनाश को प्राप्त होता है। နာတိသဏိကတော မနသိကရောန္တောပိ စ ဝိက္ခေပပ္ပဟာနတောပိ မနသိ ကရောတိ. ဝိက္ခေပပ္ပဟာနတော နာမ ယထာ အညေသု နဝကမ္မာဒီသု စိတ္တံ န ဝိက္ခိပတိ, တထာ မနသိ ကရောတိ. ဗဟိဒ္ဓါ ဝိက္ခေပမာနစိတ္တော ဟိ ကေသာဒီသွေဝ အသမာဟိတစေတောဝိတက္ကော ဘာဝနာသမ္ပဒံ အပါပုဏိတွာ အန္တရာဝ အနယဗျသနံ အာပဇ္ဇတိ တက္ကသိလာဂမနေ ဗောဓိသတ္တဿ သဟာယကာ ဝိယ. အဝိက္ခိပမာနစိတ္တော ပန ကေသာဒီသွေဝ သမာဟိတစေတောဝိတက္ကော ဘာဝနာသမ္ပဒံ ပါပုဏာတိ ဗောဓိသတ္တော ဝိယ တက္ကသိလရဇ္ဇသမ္ပဒန္တိ. တဿေဝံ ဝိက္ခေပပ္ပဟာနတော မနသိကရောတော အဓိကာရစရိယာဓိမုတ္တီနံ ဝသေန တေ ဓမ္မာ အသုဘတော ဝါ ဝဏ္ဏတော ဝါ သုညတော ဝါ ဥပဋ္ဌဟန္တိ. बहुत धीरे मनसिकार न करते हुए भी वह विक्षेप (भटकाव) के त्याग के साथ मनसिकार करता है। विक्षेप का त्याग उसे कहते हैं, जिससे चित्त अन्य नए कार्यों (नवकर्म) आदि में नहीं भटकता, उस प्रकार वह मनसिकार करता है। क्योंकि बाहर भटकते हुए चित्त वाला व्यक्ति, केश आदि में ही असमाहित चित्त और वितर्क वाला होकर, भावना की पूर्णता को प्राप्त किए बिना बीच में ही विनाश को प्राप्त होता है, जैसे तक्षशिला जाते समय बोधिसत्व के साथी। परंतु जिसका चित्त नहीं भटकता, वह केश आदि में ही समाहित चित्त और वितर्क वाला होकर भावना की पूर्णता को प्राप्त करता है, जैसे तक्षशिला के राज्य की समृद्धि को प्राप्त करने वाले बोधिसत्व। इस प्रकार विक्षेप का त्याग कर मनसिकार करने वाले उस योगी को, उसके विशेष अभ्यास और अधिमुक्ति (दृढ़ निश्चय) के कारण, वे धर्म (अंग) अशुभ के रूप में, या वर्ण के रूप में, या शून्यता के रूप में प्रकट होते हैं। အထ ပဏ္ဏတ္တိသမတိက္ကမနတော တေ ဓမ္မေ မနသိ ကရောတိ. ပဏ္ဏတ္တိသမတိက္ကမနတောတိ ကေသာ လောမာတိ ဧဝမာဒိဝေါဟာရံ သမတိက္ကမိတွာ ဝိဿဇ္ဇေတွာ ယထူပဋ္ဌိတာနံ အသုဘာဒီနံယေဝ ဝသေန မနသိ ကရောတိ. ကထံ[Pg.58]? ယထာ အရညနိဝါသူပဂတာ မနုဿာ အပရိစိတဘူမိဘာဂတ္တာ ဥဒကဋ္ဌာနသဉ္ဇာနနတ္ထံ သာခါဘင်္ဂါဒိနိမိတ္တံ ကတွာ တဒနုသာရေန ဂန္တွာ ဥဒကံ ပရိဘုဉ္ဇန္တိ, ယဒါ ပန ပရိစိတဘူမိဘာဂါ ဟောန္တိ, အထ တံ နိမိတ္တံ ဝိဿဇ္ဇေတွာ အမနသိကတွာဝ ဥဒကဋ္ဌာနံ ဥပသင်္ကမိတွာ ဥဒကံ ပရိဘုဉ္ဇန္တိ, ဧဝမေဝါယံ ကေသာ လောမာတိအာဒိနာ တံတံဝေါဟာရဿ ဝသေန ပဌမံ တေ ဓမ္မေ မနသာကာသိ, တေသု ဓမ္မေသု အသုဘာဒီနံ အညတရဝသေန ဥပဋ္ဌဟန္တေသု တံ ဝေါဟာရံ သမတိက္ကမိတွာ ဝိဿဇ္ဇေတွာ အသုဘာဒိတောဝ မနသိ ကရောတိ. तब वह प्रज्ञप्ति (नाम-संज्ञा) का अतिक्रमण करके उन धर्मों का मनस्कार करता है। 'प्रज्ञप्ति का अतिक्रमण' का अर्थ है—'केश', 'लोम' आदि इस प्रकार के व्यवहारों (नामों) को पार कर और उन्हें छोड़कर, जिस प्रकार वे उपस्थित होते हैं, उन अशुचि आदि के रूप में ही मनस्कार करता है। जैसे वन में रहने वाले मनुष्य, भूमि से अपरिचित होने के कारण, जल के स्थान को जानने के लिए वृक्ष की शाखाओं को तोड़ने आदि के संकेतों को बनाकर और उनके अनुसार चलकर जल का उपभोग करते हैं; किन्तु जब वे भूमि से परिचित हो जाते हैं, तब उन संकेतों को छोड़कर और उन पर ध्यान न देते हुए सीधे जल के स्थान पर पहुँचकर जल का उपभोग करते हैं; इसी प्रकार यह (योगी) भी 'केश', 'लोम' आदि उन-उन व्यवहारों के माध्यम से पहले उन धर्मों का मनस्कार करता था, किन्तु जब उन धर्मों में अशुचि आदि में से किसी एक रूप में उपस्थिति होने लगती है, तब वह उस व्यवहार (नाम) का अतिक्रमण कर और उसे छोड़कर अशुचि आदि के रूप में ही मनस्कार करता है। ဧတ္ထာဟ ‘‘ကထံ ပနဿ ဧတေ ဓမ္မာ အသုဘာဒိတော ဥပဋ္ဌဟန္တိ, ကထံ ဝဏ္ဏတော, ကထံ သုညတော ဝါ, ကထဉ္စာယမေတေ အသုဘတော မနသိ ကရောတိ, ကထံ ဝဏ္ဏတော, ကထံ သုညတော ဝါ’’တိ? ကေသာ တာဝဿ ဝဏ္ဏသဏ္ဌာနဂန္ဓာသယောကာသဝသေန ပဉ္စဓာ အသုဘတော ဥပဋ္ဌဟန္တိ, ပဉ္စဓာ ဧဝ အယမေတေ အသုဘတော မနသိ ကရောတိ. သေယျထိဒံ – ကေသာ နာမေတေ ဝဏ္ဏတော အသုဘာ ပရမပ္ပဋိကူလဇေဂုစ္ဆာ. တထာ ဟိ မနုဿာ ဒိဝါ ပါနဘောဇနေ ပတိတံ ကေသဝဏ္ဏံ ဝါကံ ဝါ သုတ္တံ ဝါ ဒိသွာ ကေသသညာယ မနောရမမ္ပိ ပါနဘောဇနံ ဆဍ္ဍေန္တိ ဝါ ဇိဂုစ္ဆန္တိ ဝါ. သဏ္ဌာနတောပိ အသုဘာ. တထာ ဟိ ရတ္တိံ ပါနဘောဇနေ ပတိတံ ကေသသဏ္ဌာနံ ဝါကံ ဝါ သုတ္တံ ဝါ ဖုသိတွာ ကေသသညာယ မနောရမမ္ပိ ပါနဘောဇနံ ဆဍ္ဍေန္တိ ဝါ ဇိဂုစ္ဆန္တိ ဝါ. ဂန္ဓတောပိ အသုဘာ. တထာ ဟိ တေလမက္ခနပုပ္ဖဓူမာဒိသင်္ခါရေဟိ ဝိရဟိတာနံ ကေသာနံ ဂန္ဓော ပရမဇေဂုစ္ဆော ဟောတိ, အဂ္ဂီသု ပက္ခိတ္တဿ ကေသဿ ဂန္ဓံ ဃာယိတွာ သတ္တာ နာသိကံ ပိဓေန္တိ, မုခမ္ပိ ဝိကုဇ္ဇေန္တိ. အာသယတောပိ အသုဘာ. တထာ ဟိ နာနာဝိဓေန မနုဿာသုစိနိဿန္ဒေန သင်္ကာရဋ္ဌာနေ တဏ္ဍုလေယျကာဒီနိ ဝိယ ပိတ္တသေမှပုဗ္ဗလောဟိတနိဿန္ဒေန တေ အာစိတာ ဝုဒ္ဓိံ ဝိရူဠှိံ ဝေပုလ္လံ ဂမိတာတိ. ဩကာသတောပိ အသုဘာ. တထာ ဟိ သင်္ကာရဋ္ဌာနေ ဝိယ တဏ္ဍုလေယျကာဒီနိ ပရမဇေဂုစ္ဆေ လောမာဒိဧကတိံသကုဏပရာသိမတ္ထကေ မနုဿာနံ သီသပလိဝေဌကေ အလ္လစမ္မေ ဇာတာတိ. ဧသ နယော လောမာဒီသု. ဧဝံ တာဝ အယမေတေ ဓမ္မေ အသုဘတော ဥပဋ္ဌဟန္တေ အသုဘတော မနသိ ကရောတိ. यहाँ प्रश्न होता है—"उसे ये धर्म अशुचि आदि के रूप में कैसे उपस्थित होते हैं? वर्ण (रंग) के रूप में कैसे? अथवा शून्यता के रूप में कैसे? और यह योगी इनका अशुचि के रूप में कैसे मनस्कार करता है? वर्ण के रूप में कैसे? अथवा शून्यता के रूप में कैसे?" (उत्तर:) उसके लिए केश पहले वर्ण, संस्थान (आकार), गंध, आश्रय और स्थान के भेद से पाँच प्रकार से अशुचि के रूप में उपस्थित होते हैं, और वह पाँच प्रकार से ही इनका अशुचि के रूप में मनस्कार करता है। जैसे—ये केश वर्ण (रंग) से अशुचि हैं, अत्यंत प्रतिकूल और घृणास्पद हैं। क्योंकि लोग दिन में पेय या भोजन में गिरे हुए केश के समान वर्ण वाले वल्क (छाल के रेशे) या सूत्र (धागे) को देखकर, 'केश' की संज्ञा होने से, उस प्रिय पेय या भोजन को भी फेंक देते हैं या उससे घृणा करते हैं। संस्थान (आकार) से भी वे अशुचि हैं। क्योंकि रात में पेय या भोजन में गिरे हुए केश के आकार वाले वल्क या सूत्र का स्पर्श होने पर, 'केश' की संज्ञा होने से, उस प्रिय पेय या भोजन को भी फेंक देते हैं या उससे घृणा करते हैं। गंध से भी वे अशुचि हैं। क्योंकि तेल, पुष्प, धूप आदि संस्कारों से रहित केशों की गंध अत्यंत घृणास्पद होती है; अग्नि में डाले गए केश की गंध पाकर प्राणी नाक बंद कर लेते हैं और मुँह सिकोड़ लेते हैं। आश्रय से भी वे अशुचि हैं। क्योंकि मनुष्यों के नाना प्रकार के अशुचि स्रावों से, कूड़े के स्थान पर उगने वाले ताण्डुलेय्यक (चौलाई) आदि के समान, वे पित्त, कफ, पीप और रक्त के स्राव से संचित होकर वृद्धि, विरूढ़ि और विस्तार को प्राप्त होते हैं। स्थान से भी वे अशुचि हैं। क्योंकि कूड़े के स्थान के समान, अत्यंत घृणास्पद लोम आदि इकतीस कुणप (शव के अंगों) के समूह के ऊपर, मनुष्यों के सिर को ढकने वाली गीली त्वचा पर वे उत्पन्न होते हैं। यही विधि लोम आदि के विषय में भी जाननी चाहिए। इस प्रकार पहले वह इन धर्मों के अशुचि के रूप में उपस्थित होने पर अशुचि के रूप में मनस्कार करता है। ယဒိ ပနဿ ဝဏ္ဏတော ဥပဋ္ဌဟန္တိ, အထ ကေသာ နီလကသိဏဝသေန ဥပဋ္ဌဟန္တိ. တထာ လောမာ ဒန္တာ ဩဒါတကသိဏဝသေနာတိ. ဧသ နယော သဗ္ဗတ္ထ[Pg.59]. တံတံကသိဏဝသေနေဝ အယမေတေ မနသိ ကရောတိ, ဧဝံ ဝဏ္ဏတော ဥပဋ္ဌဟန္တေ ဝဏ္ဏတော မနသိ ကရောတိ. ယဒိ ပနဿ သုညတော ဥပဋ္ဌဟန္တိ, အထ ကေသာ ဃနဝိနိဗ္ဘောဂဝဝတ္ထာနေန ဩဇဋ္ဌမကသမူဟဝသေန ဥပဋ္ဌဟန္တိ. တထာ လောမာဒယော, ယထာ ဥပဋ္ဌဟန္တိ. အယမေတေ တထေဝ မနသိ ကရောတိ. ဧဝံ သုညတော ဥပဋ္ဌဟန္တေ သုညတော မနသိ ကရောတိ. यदि उसे वर्ण (रंग) के रूप में उपस्थित होते हैं, तो केश नील-कसिण के रूप में उपस्थित होते हैं। इसी प्रकार लोम और दाँत अवदात (श्वेत) कसिण के रूप में उपस्थित होते हैं—यही विधि सर्वत्र जाननी चाहिए। वह उन-उन कसिणों के वश से ही इनका मनस्कार करता है; इस प्रकार वर्ण के रूप में उपस्थित होने पर वर्ण के रूप में मनस्कार करता है। यदि उसे शून्यता के रूप में उपस्थित होते हैं, तो केश घन-विनिर्भोग (ठोसपन के विश्लेषण) की व्यवस्था से ओज-अष्टमक (आठ तत्वों के समूह) के रूप में उपस्थित होते हैं। इसी प्रकार लोम आदि भी जैसे उपस्थित होते हैं, वह उनका वैसे ही मनस्कार करता है। इस प्रकार शून्यता के रूप में उपस्थित होने पर शून्यता के रूप में मनस्कार करता है। ဧဝံ မနသိကရောန္တော အယမေတေ ဓမ္မေ အနုပုဗ္ဗမုဉ္စနတော မနသိ ကရောတိ. အနုပုဗ္ဗမုဉ္စနတောတိ အသုဘာဒီနံ အညတရဝသေန ဥပဋ္ဌိတေ ကေသေ မုဉ္စိတွာ လောမေ မနသိကရောန္တော သေယျထာပိ နာမ ဇလူကာ နင်္ဂုဋ္ဌေန ဂဟိတပ္ပဒေသေ သာပေက္ခာဝ ဟုတွာ တုဏ္ဍေန အညံ ပဒေသံ ဂဏှာတိ, ဂဟိတေ စ တသ္မိံ ဣတရံ မုဉ္စတိ, ဧဝမေဝ ကေသေသု သာပေက္ခောဝ ဟုတွာ လောမေ မနသိ ကရောတိ, လောမေသု စ ပတိဋ္ဌိတေ မနသိကာရေ ကေသေ မုဉ္စတိ. ဧသ နယော သဗ္ဗတ္ထ. ဧဝံ ဟိဿ အနုပုဗ္ဗမုဉ္စနတော မနသိကရောတော အသုဘာဒီသု အညတရဝသေန တေ ဓမ္မာ ဥပဋ္ဌဟန္တာ အနဝသေသတော ဥပဋ္ဌဟန္တိ, ပါကဋတရူပဋ္ဌာနာ စ ဟောန္တိ. इस प्रकार मनस्कार करता हुआ वह इन धर्मों का 'अनुक्रम से छोड़ने' (अनुपुब्ब-मुञ्चन) के द्वारा मनस्कार करता है। 'अनुक्रम से छोड़ने' का अर्थ है—अशुचि आदि में से किसी एक के रूप में उपस्थित केशों को छोड़कर जब वह लोमों का मनस्कार करता है, तो जैसे जोंक (जलूका) अपनी पूँछ से पकड़े हुए स्थान के प्रति सापेक्ष (जुड़ी हुई) रहती हुई ही मुख से दूसरे स्थान को पकड़ती है, और उस स्थान को पकड़ लेने पर दूसरे (पिछले) स्थान को छोड़ देती है; वैसे ही वह केशों के प्रति सापेक्ष रहता हुआ ही लोमों का मनस्कार करता है, और लोमों में मनस्कार के प्रतिष्ठित हो जाने पर केशों को छोड़ देता है। यही विधि सर्वत्र जाननी चाहिए। इस प्रकार अनुक्रम से छोड़ते हुए मनस्कार करने वाले उस योगी को अशुचि आदि में से किसी एक के रूप में वे धर्म बिना किसी शेष के उपस्थित होते हैं और अत्यंत स्पष्ट रूप से उपस्थित होते हैं। အထ ယဿ တေ ဓမ္မာ အသုဘတော ဥပဋ္ဌဟန္တိ, ပါကဋတရူပဋ္ဌာနာ စ ဟောန္တိ, တဿ သေယျထာပိ နာမ မက္ကဋော ဒွတ္တိံသတာလကေ တာလဝနေ ဗျာဓေန ပရိပါတိယမာနော ဧကရုက္ခေပိ အသဏ္ဌဟန္တော ပရိဓာဝိတွာ ယဒါ နိဝတ္တော ဟောတိ ကိလန္တော, အထ ဧကမေဝ ဃနတာလပဏ္ဏပရိဝေဌိတံ တာလသုစိံ နိဿာယ တိဋ္ဌတိ; ဧဝမေဝ စိတ္တမက္ကဋော ဒွတ္တိံသကောဋ္ဌာသကေ ဣမသ္မိံ ကာယေ တေနေဝ ယောဂိနာ ပရိပါတိယမာနော ဧကကောဋ္ဌာသကေပိ အသဏ္ဌဟန္တော ပရိဓာဝိတွာ ယဒါ အနေကာရမ္မဏဝိဓာဝနေ အဘိလာသာဘာဝေန နိဝတ္တော ဟောတိ ကိလန္တော. အထ ယွာဿ ကေသာဒီသု ဓမ္မော ပဂုဏတရော စရိတာနုရူပတရော ဝါ, ယတ္ထ ဝါ ပုဗ္ဗေ ကတာဓိကာရော ဟောတိ, တံ နိဿာယ ဥပစာရဝသေန တိဋ္ဌတိ. အထ တမေဝ နိမိတ္တံ ပုနပ္ပုနံ တက္ကာဟတံ ဝိတက္ကာဟတံ ကရိတွာ ယထာက္ကမံ ပဌမံ ဈာနံ ဥပ္ပာဒေတိ, တတ္ထ ပတိဋ္ဌာယ ဝိပဿနမာရဘိတွာ အရိယဘူမိံ ပါပုဏာတိ. तब जिसके लिए वे धर्म अशुचि के रूप में उपस्थित होते हैं और अत्यंत स्पष्ट रूप से उपस्थित होते हैं, उसके लिए—जैसे कोई बंदर बत्तीस ताड़ के वृक्षों वाले वन में शिकारी द्वारा खदेड़ा जाने पर, एक भी वृक्ष पर न ठहरकर इधर-उधर दौड़ता है, और जब वह थक जाता है, तब वह घने ताड़-पत्रों से घिरे हुए एक ही ताड़-अंकुर (फुनगी) के सहारे ठहर जाता है; वैसे ही यह चित्त-रूपी बंदर इस बत्तीस अंगों वाले शरीर में उसी योगी द्वारा खदेड़ा जाने पर, एक भी अंग में न ठहरकर इधर-उधर दौड़ता है, और जब वह अनेक आलम्बनों में दौड़ने की इच्छा न होने के कारण थक कर रुक जाता है, तब उसे केश आदि में से जो धर्म अधिक अभ्यस्त होता है, या जो उसके चरित के अधिक अनुकूल होता है, अथवा जिसमें उसने पूर्व जन्म में अभ्यास किया होता है, उसका सहारा लेकर वह उपचार (समाधि) के वश से ठहर जाता है। तब वह उसी निमित्त को बार-बार वितर्क द्वारा विचारित कर अनुक्रम से प्रथम ध्यान उत्पन्न करता है, और उसमें प्रतिष्ठित होकर विपश्यना का आरम्भ कर आर्य-भूमि को प्राप्त करता है। ယဿ ပန တေ ဓမ္မာ ဝဏ္ဏတော ဥပဋ္ဌဟန္တိ, တဿာပိ သေယျထာပိ နာမ မက္ကဋော…ပေ… အထ ယွာဿ ကေသာဒီသု ဓမ္မော ပဂုဏတရော စရိတာနုရူပတရော [Pg.60] ဝါ, ယတ္ထ ဝါ ပုဗ္ဗေ ကတာဓိကာရော ဟောတိ, တံ နိဿာယ ဥပစာရဝသေန တိဋ္ဌတိ. အထ တမေဝ နိမိတ္တံ ပုနပ္ပုနံ တက္ကာဟတံ ဝိတက္ကာဟတံ ကရိတွာ ယထာက္ကမံ နီလကသိဏဝသေန ပီတကသိဏဝသေန ဝါ ပဉ္စပိ ရူပါဝစရဇ္ဈာနာနိ ဥပ္ပာဒေတိ, တေသဉ္စ ယတ္ထ ကတ္ထစိ ပတိဋ္ဌာယ ဝိပဿနံ အာရဘိတွာ အရိယဘူမိံ ပါပုဏာတိ. परंतु जिस व्यक्ति को वे (केश आदि) धर्म वर्ण (रंग) के रूप में उपस्थित होते हैं, उस व्यक्ति के लिए भी, जैसे कि एक बंदर... फिर उसके केश आदि में जो धर्म अधिक अभ्यस्त या स्वभाव के अनुकूल होता है, या जहाँ पूर्व जन्म में अभ्यास किया गया होता है, उसका आश्रय लेकर वह उपचार (समाधि) के वश में स्थित होता है। फिर उसी निमित्त को बार-बार वितर्क और विचार से संस्कारित करके, क्रम के अनुसार नील-कसिण या पीत-कसिण के वश से पाँचों रूपावचर ध्यानों को उत्पन्न करता है, और उनमें से किसी एक में प्रतिष्ठित होकर विपश्यना आरम्भ कर आर्यभूमि (अरिहंत पद) को प्राप्त करता है। ယဿ ပန တေ ဓမ္မာ သုညတော ဥပဋ္ဌဟန္တိ, သော လက္ခဏတော မနသိ ကရောတိ, လက္ခဏတော မနသိကရောန္တော တတ္ထ စတုဓာတုဝဝတ္ထာနဝသေန ဥပစာရဇ္ဈာနံ ပါပုဏာတိ. အထ မနသိကရောန္တော တေ ဓမ္မေ အနိစ္စဒုက္ခာနတ္တသုတ္တတ္တယဝသေန မနသိ ကရောတိ. အယမဿ ဝိပဿနာနယော. သော ဣမံ ဝိပဿနံ အာရဘိတွာ ယထာက္ကမဉ္စ ပဋိပဇ္ဇိတွာ အရိယဘူမိံ ပါပုဏာတီတိ. परंतु जिस व्यक्ति को वे धर्म शून्यता (आत्मा से रहित) के रूप में उपस्थित होते हैं, वह लक्षणों के द्वारा मनस्कार करता है। लक्षणों के द्वारा मनस्कार करते हुए वह वहाँ चार धातुओं के व्यवस्थान के वश से उपचार ध्यान को प्राप्त करता है। फिर मनस्कार करते हुए वह उन धर्मों को अनित्य, दुःख और अनात्म—इन तीन सुत्तंतों के नय (तरीके) से मनस्कार करता है। यह उसकी विपश्यना की विधि है। वह इस विपश्यना को आरम्भ कर और क्रम के अनुसार प्रतिपत्ति (अभ्यास) कर आर्यभूमि को प्राप्त करता है। ဧတ္တာဝတာ စ ယံ ဝုတ္တံ – ‘‘ကထံ ပနာယံ အနုပုဗ္ဗာဒိဝသေန ဧတေ ဓမ္မေ မနသိ ကရောတီ’’တိ, တံ ဗျာကတံ ဟောတိ. ယဉ္စာပိ ဝုတ္တံ – ‘‘ဘာဝနာဝသေန ပနဿ ဧဝံ ဝဏ္ဏနာ ဝေဒိတဗ္ဗာ’’တိ, တဿတ္ထော ပကာသိတော ဟောတီတိ. इतने से जो कहा गया था—'किन्तु यह कैसे अनुक्रम आदि के वश से इन धर्मों को मनस्कार करता है?'—उसका उत्तर दे दिया गया है। और जो यह भी कहा गया था—'भावना के वश से इसकी व्याख्या जाननी चाहिए'—उसका अर्थ भी प्रकाशित हो गया है। ပကိဏ္ဏကနယော प्रकीर्णक विधि ဣဒါနိ ဣမသ္မိံယေဝ ဒွတ္တိံသာကာရေ ဝဏ္ဏနာပရိစယပါဋဝတ္ထံ အယံ ပကိဏ္ဏကနယော ဝေဒိတဗ္ဗော – अब इसी बत्तीस प्रकार के आकारों (द्वत्तिंसाकार) में व्याख्या के परिचय और कुशलता के लिए यह प्रकीर्णक विधि जाननी चाहिए— ‘‘နိမိတ္တတော လက္ခဏတော, ဓာတုတော သုညတောပိ စ; ခန္ဓာဒိတော စ ဝိညေယျော, ဒွတ္တိံသာကာရနိစ္ဆယော’’တိ. निमित्त से, लक्षण से, धातु से, शून्यता से भी, और स्कन्ध आदि से बत्तीस प्रकार के आकारों का निश्चय जानना चाहिए। တတ္ထ နိမိတ္တတောတိ ဧဝံ ဝုတ္တပ္ပကာရေ ဣမသ္မိံ ဒွတ္တိံသာကာရေ သဋ္ဌိသတံ နိမိတ္တာနိ ဟောန္တိ, ယေသံ ဝသေန ယောဂါဝစရော ဒွတ္တိံသာကာရံ ကောဋ္ဌာသတော ပရိဂ္ဂဏှာတိ. သေယျထိဒံ – ကေသဿ ဝဏ္ဏနိမိတ္တံ, သဏ္ဌာနနိမိတ္တံ, ဒိသာနိမိတ္တံ, ဩကာသနိမိတ္တံ, ပရိစ္ဆေဒနိမိတ္တန္တိ ပဉ္စ နိမိတ္တာနိ ဟောန္တိ. ဧဝံ လောမာဒီသု. वहाँ 'निमित्त से' का अर्थ है कि इस प्रकार कहे गए बत्तीस आकारों में एक सौ साठ निमित्त होते हैं, जिनके वश से योगावचर बत्तीस आकारों को कोष्ठास (भागों) के रूप में ग्रहण करता है। जैसे कि—केश का वर्ण-निमित्त, संस्थान-निमित्त, दिशा-निमित्त, अवकाश-निमित्त और परिच्छेद-निमित्त—ये पाँच निमित्त होते हैं। इसी प्रकार रोम आदि में भी। လက္ခဏတောတိ ဒွတ္တိံသာကာရေ အဋ္ဌဝီသတိသတံ လက္ခဏာနိ ဟောန္တိ, ယေသံ ဝသေန ယောဂါဝစရော ဒွတ္တိံသာကာရံ လက္ခဏတော မနသိ ကရောတိ[Pg.61]. သေယျထိဒံ – ကေသဿ ထဒ္ဓလက္ခဏံ, အာဗန္ဓနလက္ခဏံ, ဥဏှတ္တလက္ခဏံ, သမုဒီရဏလက္ခဏန္တိ စတ္တာရိ လက္ခဏာနိ ဟောန္တိ. ဧဝံ လောမာဒီသု. लक्षण से—बत्तीस आकारों में एक सौ अट्ठाईस लक्षण होते हैं, जिनके वश से योगावचर बत्तीस आकारों को लक्षण के रूप में मनस्कार करता है। जैसे कि—केश का स्तब्ध-लक्षण (कठोरता), आबंधन-लक्षण (जुड़ाव), उष्णत्व-लक्षण (गर्मी) और समुदीरण-लक्षण (गति)—ये चार लक्षण होते हैं। इसी प्रकार रोम आदि में भी। ဓာတုတောတိ ဒွတ္တိံသာကာရေ ‘‘ဆဓာတုရော, ဘိက္ခဝေ, အယံ ပုရိသပုဂ္ဂလော’’တိ (မ. နိ. ၃.၃၄၃-၃၄၄) ဧတ္ထ ဝုတ္တာသု ဓာတူသု အဋ္ဌဝီသတိသတံ ဓာတုယော ဟောန္တိ, ယာသံ ဝသေန ယောဂါဝစရော ဒွတ္တိံသာကာရံ ဓာတုတော ပရိဂ္ဂဏှာတိ. သေယျထိဒံ – ယာ ကေသေ ထဒ္ဓတာ, သာ ပထဝီဓာတု; ယာ အာဗန္ဓနတာ, သာ အာပေါဓာတု; ယာ ပရိပါစနတာ, သာ တေဇောဓာတု; ယာ ဝိတ္ထမ္ဘနတာ, သာ ဝါယောဓာတူတိ စတဿော ဓာတုယော ဟောန္တိ. ဧဝံ လောမာဒီသု. धातु से—बत्तीस आकारों में, 'भिक्षुओं, यह पुरुष-पुद्गल छह धातुओं वाला है'—यहाँ कही गई धातुओं में एक सौ अट्ठाईस धातुएँ होती हैं, जिनके वश से योगावचर बत्तीस आकारों को धातु के रूप में ग्रहण करता है। जैसे कि—केश में जो कठोरता है, वह पृथ्वी धातु है; जो आबंधन (चिपकाव) है, वह आप-धातु है; जो परिपाचन (पकना) है, वह तेज-धातु है; जो विष्टम्भन (सहारा) है, वह वायु-धातु है—ये चार धातुएँ होती हैं। इसी प्रकार रोम आदि में भी। သုညတောတိ ဒွတ္တိံသာကာရေ အဋ္ဌဝီသတိသတံ သုညတာ ဟောန္တိ, ယာသံ ဝသေန ယောဂါဝစရော ဒွတ္တိံသာကာရံ သုညတော ဝိပဿတိ. သေယျထိဒံ – ကေသေ တာဝ ပထဝီဓာတု အာပေါဓာတွာဒီဟိ သုညာ, တထာ အာပေါဓာတွာဒယော ပထဝီဓာတွာဒီဟီတိ စတဿော သုညတာ ဟောန္တိ. ဧဝံ လောမာဒီသု. शून्यता से—बत्तीस आकारों में एक सौ अट्ठाईस शून्यताएँ होती हैं, जिनके वश से योगावचर बत्तीस आकारों को शून्यता के रूप में विपश्यना करता है। जैसे कि—केश में पहले पृथ्वी-धातु आप-धातु आदि से शून्य है, वैसे ही आप-धातु आदि पृथ्वी-धातु आदि से शून्य हैं—ये चार शून्यताएँ होती हैं। इसी प्रकार रोम आदि में भी। ခန္ဓာဒိတောတိ ဒွတ္တိံသာကာရေ ကေသာဒီသု ခန္ဓာဒိဝသေန သင်္ဂယှမာနေသု ‘‘ကေသာ ကတိ ခန္ဓာ ဟောန္တိ, ကတိ အာယတနာနိ, ကတိ ဓာတုယော, ကတိ သစ္စာနိ, ကတိ သတိပဋ္ဌာနာနီ’’တိ ဧဝမာဒိနာ နယေန ဝိနိစ္ဆယော ဝေဒိတဗ္ဗော. ဧဝဉ္စဿ ဝိဇာနတော တိဏကဋ္ဌသမူဟော ဝိယ ကာယော ခါယတိ. ယထာဟ – स्कन्ध आदि से—बत्तीस आकारों में केश आदि को स्कन्ध आदि के वश से संगृहीत करते हुए—'केश कितने स्कन्ध हैं, कितने आयतन हैं, कितनी धातुएँ हैं, कितने सत्य हैं, कितने स्मृतिप्रस्थान हैं'—इस प्रकार की विधि से निश्चय जानना चाहिए। इस प्रकार जानने वाले को यह शरीर घास और लकड़ी के ढेर के समान प्रतीत होता है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘နတ္ထိ သတ္တော နရော ပေါသော, ပုဂ္ဂလော နူပလဗ္ဘတိ; သုညဘူတော အယံ ကာယော, တိဏကဋ္ဌသမူပမော’’တိ. परमार्थतः कोई सत्त्व नहीं है, न नर है, न पुरुष है, पुद्गल उपलब्ध नहीं होता; यह शरीर शून्यभूत है, घास और लकड़ी के ढेर के समान है। အထဿ ယာ သာ – तब उसकी जो वह— ‘‘သုညာဂါရံ ပဝိဋ္ဌဿ, သန္တစိတ္တဿ တာဒိနော; အမာနုသီ ရတိ ဟောတိ, သမ္မာ ဓမ္မံ ဝိပဿတော’’တိ. – शून्यागार (एकांत स्थान) में प्रविष्ट हुए, शांत चित्त वाले, तादी (अचल) और सम्यक् रूप से धर्म की विपश्यना करने वाले उस (योगी) को अलौकिक (अमानुषी) प्रीति प्राप्त होती है। ဧဝံ အမာနုသီ ရတိ ဝုတ္တာ, သာ အဒူရတရာ ဟောတိ. တတော ယံ တံ – इस प्रकार जो अलौकिक प्रीति कही गई है, वह सुलभ (निकट) हो जाती है। उसके बाद जो वह— ‘‘ယတော ယတော သမ္မသတိ, ခန္ဓာနံ ဥဒယဗ္ဗယံ; လဘတီ ပီတိပါမောဇ္ဇံ, အမတံ တံ ဝိဇာနတ’’န္တိ. (ဓ. ပ. ၃၇၃-၃၇၄) – जब-जब वह स्कन्धों के उदय और व्यय (उत्पत्ति और विनाश) का सम्मर्शन (विचार) करता है, तब-तब वह प्रीति और प्रमोद प्राप्त करता है; वह जानने वालों के लिए अमृत (निर्वाण) के समान है। ဧဝံ [Pg.62] ဝိပဿနာမယံ ပီတိပါမောဇ္ဇာမတံ ဝုတ္တံ. တံ အနုဘဝန္တော န စိရေနေဝ အရိယဇနသေဝိတံ အဇရာမရံ နိဗ္ဗာနာမတံ သစ္ဆိကရောတီတိ. इस प्रकार विपश्यनामय प्रीति-प्रमोद रूपी अमृत कहा गया है। उसका अनुभव करते हुए वह शीघ्र ही आर्यजनों द्वारा सेवित, अजर-अमर निर्वाण रूपी अमृत का साक्षात्कार करता है। ပရမတ္ထဇောတိကာယ ခုဒ္ဒကပါဌ-အဋ္ဌကထာယ परमत्थजोतिका नामक खुद्दकपाठ-अट्ठकथा में ဒွတ္တိံသာကာရဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. बत्तीस आकारों की व्याख्या (द्वत्तिंसाकार-वर्णना) समाप्त हुई। ၄. ကုမာရပဉှဝဏ္ဏနာ ४. कुमार-प्रश्न की व्याख्या (कुमारपञ्ह-वर्णना) အဋ္ဌုပ္ပတ္တိ उत्पत्ति का प्रसंग (अट्ठुप्पत्ति) ဣဒါနိ ဧကံ နာမ ကိန္တိ ဧဝမာဒီနံ ကုမာရပဉှာနံ အတ္ထဝဏ္ဏနာက္ကမော အနုပ္ပတ္တော. တေသံ အဋ္ဌုပ္ပတ္တိံ ဣဓ နိက္ခေပပ္ပယောဇနဉ္စ ဝတွာ ဝဏ္ဏနံ ကရိဿာမ – अब 'एक क्या है' (एकं नाम किं) आदि कुमार-प्रश्नों की अर्थ-व्याख्या का क्रम प्राप्त हुआ है। उनकी उत्पत्ति का प्रसंग और यहाँ उनके रखने का प्रयोजन बताकर हम व्याख्या करेंगे— အဋ္ဌုပ္ပတ္တိ တာဝ နေသံ သောပါကော နာမ ဘဂဝတော မဟာသာဝကော အဟောသိ. တေနာယသ္မတာ ဇာတိယာ သတ္တဝဿေနေဝ အညာ အာရာဓိတာ, တဿ ဘဂဝါ ပဉှဗျာကရဏေန ဥပသမ္ပဒံ အနုညာတုကာမော အတ္တနာ အဓိပ္ပေတတ္ထာနံ ပဉှာနံ ဗျာကရဏသမတ္ထတံ ပဿန္တော ‘‘ဧကံ နာမ ကိ’’န္တိ ဧဝမာဒိနာ ပဉှေ ပုစ္ဆိ. သော ဗျာကာသိ. တေန စ ဗျာကရဏေန ဘဂဝတော စိတ္တံ အာရာဓေသိ. သာဝ တဿာယသ္မတော ဥပသမ္ပဒါ အဟောသိ. उनकी उत्पत्ति का प्रसंग इस प्रकार है—सोपाक नाम के भगवान के एक महान श्रावक थे। उन आयुष्मान ने जन्म से सात वर्ष की आयु में ही अर्हत्व (अञ्ञा) प्राप्त कर लिया था। भगवान उन्हें प्रश्नों के उत्तर के माध्यम से उपसंपदा प्रदान करने के इच्छुक थे, और स्वयं के द्वारा अभिप्रेत अर्थ वाले प्रश्नों का उत्तर देने में उनकी सामर्थ्य को देखते हुए, 'एक क्या है' आदि प्रश्न पूछे। उन्होंने उत्तर दिया। और उस उत्तर से उन्होंने भगवान के चित्त को प्रसन्न किया। वही उन आयुष्मान की उपसंपदा हुई। အယံ တေသံ အဋ္ဌုပ္ပတ္တိ. यह उनकी उत्पत्ति का प्रसंग है। နိက္ခေပပ္ပယောဇနံ रखने का प्रयोजन (निक्खेप-प्पयोजन) ယသ္မာ ပန သရဏဂမနေဟိ ဗုဒ္ဓဓမ္မသံဃာနုဿတိဝသေန စိတ္တဘာဝနာ, သိက္ခာပဒေဟိ သီလဘာဝနာ, ဒွတ္တိံသာကာရေန စ ကာယဘာဝနာ ပကာသိတာ, တသ္မာ ဣဒါနိ နာနပ္ပကာရတော ပညာဘာဝနာမုခဒဿနတ္ထံ ဣမေ ပဉှဗျာကရဏာ ဣဓ နိက္ခိတ္တာ. ယသ္မာ ဝါ သီလပဒဋ္ဌာနော သမာဓိ, သမာဓိပဒဋ္ဌာနာ စ ပညာ; ယထာဟ – ‘‘သီလေ ပတိဋ္ဌာယ နရော သပညော, စိတ္တံ [Pg.63] ပညဉ္စ ဘာဝယ’’န္တိ (သံ. နိ. ၁.၂၃, ၁၉၂), တသ္မာ သိက္ခာပဒေဟိ သီလံ ဒွတ္တိံသာကာရေန တံဂေါစရံ သမာဓိဉ္စ ဒဿေတွာ သမာဟိတစိတ္တဿ နာနာဓမ္မပရိက္ခာရာယ ပညာယ ပဘေဒဒဿနတ္ထံ ဣဓ နိက္ခိတ္တာတိပိ ဝိညာတဗ္ဗာ. चूंकि शरणगमन के माध्यम से बुद्ध, धम्म और संघ की अनुस्मृति के वश से चित्त-भावना प्रकाशित की गई है; शिक्षापदों के माध्यम से शील-भावना प्रकाशित की गई है; और बत्तीस आकारों (द्वत्तिंसाकार) के माध्यम से काय-भावना प्रकाशित की गई है; इसलिए अब विभिन्न प्रकार से प्रज्ञा-भावना के स्वरूप को दिखाने के लिए ये प्रश्न-उत्तर (प्रश्न-व्याकरण) यहाँ रखे गए हैं। अथवा, चूंकि शील समाधि का आधार (पदस्थान) है और समाधि प्रज्ञा का आधार है; जैसा कि कहा गया है— 'शील में प्रतिष्ठित होकर प्रज्ञावान मनुष्य चित्त और प्रज्ञा की भावना करता है', इसलिए शिक्षापदों द्वारा शील को और बत्तीस आकारों द्वारा उस (शील) के विषयभूत समाधि को दिखाकर, समाहित चित्त वाले व्यक्ति के लिए विभिन्न धर्मों के विश्लेषण हेतु प्रज्ञा के भेदों को दिखाने के लिए ये यहाँ रखे गए हैं, ऐसा समझना चाहिए। ဣဒံ တေသံ ဣဓ နိက္ခေပပ္ပယောဇနံ. यह यहाँ उनके (प्रश्नों के) रखे जाने का प्रयोजन है। ပဉှဝဏ္ဏနာ प्रश्न-वर्णना (प्रश्नों की व्याख्या) ဧကံ နာမ ကိန္တိပဉှဝဏ္ဏနာ 'एक क्या है?' इस प्रश्न की व्याख्या ဣဒါနိ တေသံ အတ္ထဝဏ္ဏနာ ဟောတိ – ဧကံ နာမ ကိန္တိ ဘဂဝါ ယသ္မိံ ဧကဓမ္မသ္မိံ ဘိက္ခု သမ္မာ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော အနုပုဗ္ဗေန ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ, ယသ္မိံ စာယမာယသ္မာ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော အနုပုဗ္ဗေန ဒုက္ခဿန္တမကာသိ, တံ ဓမ္မံ သန္ဓာယ ပဉှံ ပုစ္ဆတိ. ‘‘သဗ္ဗေ သတ္တာ အာဟာရဋ္ဌိတိကာ’’တိ ထေရော ပုဂ္ဂလာဓိဋ္ဌာနာယ ဒေသနာယ ဝိဿဇ္ဇေတိ. ‘‘ကတမာ စ, ဘိက္ခဝေ, သမ္မာသတိ? ဣဓ, ဘိက္ခဝေ, ဘိက္ခု ကာယေ ကာယာနုပဿီ ဝိဟရတီ’’တိ (သံ. နိ. ၅.၈) ဧဝမာဒီနိ စေတ္ထ သုတ္တာနိ ဧဝံ ဝိဿဇ္ဇနယုတ္တိသမ္ဘဝေ သာဓကာနိ. ဧတ္ထ ယေနာဟာရေန သဗ္ဗေ သတ္တာ ‘‘အာဟာရဋ္ဌိတိကာ’’တိ ဝုစ္စန္တိ, သော အာဟာရော တံ ဝါ နေသံ အာဟာရဋ္ဌိတိကတ္တံ ‘‘ဧကံ နာမ ကိ’’န္တိ ပုဋ္ဌေန ထေရေန နိဒ္ဒိဋ္ဌန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. တဉှိ ဘဂဝတာ ဣဓ ဧကန္တိ အဓိပ္ပေတံ, န တု သာသနေ လောကေ ဝါ အညံ ဧကံ နာမ နတ္ထီတိ ဉာပေတုံ ဝုတ္တံ. ဝုတ္တဉှေတံ ဘဂဝတာ – अब उनकी अर्थ-वर्णना होती है— 'एक क्या है?' भगवान जिस एक धर्म के प्रति भिक्षु के सम्यक् रूप से निर्विग्न (वैराग्यवान) होने पर क्रमशः दुखों का अंत करने वाला होने की बात करते हैं, और जिस एक धर्म के प्रति निर्विग्न होकर इस आयुष्मान (सोपाक) ने क्रमशः दुखों का अंत किया, उस धर्म के संदर्भ में वे प्रश्न पूछते हैं। 'सभी प्राणी आहार पर स्थित हैं' (सब्बे सत्ता आहारट्ठितिका)—थेर (सोपाक) पुद्गलाधिष्ठान देशना के माध्यम से उत्तर देते हैं। 'भिक्षुओं, सम्यक् स्मृति क्या है? यहाँ, भिक्षुओं, भिक्षु काया में कायानुपश्यी होकर विहार करता है'—इस प्रकार के सूत्र यहाँ इस तरह के उत्तर की युक्ति की संभावना में प्रमाण हैं। यहाँ जिस आहार के कारण सभी प्राणियों को 'आहार पर स्थित' कहा जाता है, वह आहार अथवा उनका वह आहार पर स्थित होना ही 'एक क्या है?' पूछे जाने पर थेर द्वारा निर्दिष्ट किया गया है, ऐसा समझना चाहिए। क्योंकि भगवान को यहाँ 'एक' से यही अभिप्रेत है, न कि यह बताने के लिए कि शासन या लोक में 'एक' नाम का कोई अन्य धर्म नहीं है। भगवान द्वारा यह कहा गया है— ‘‘ဧကဓမ္မေ, ဘိက္ခဝေ, ဘိက္ခု သမ္မာ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော သမ္မာ ဝိရဇ္ဇမာနော သမ္မာ ဝိမုစ္စမာနော သမ္မာ ပရိယန္တဒဿာဝီ သမ္မတ္တံ အဘိသမေစ္စ ဒိဋ္ဌေဝ ဓမ္မေ ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ကတမသ္မိံ ဧကဓမ္မေ? သဗ္ဗေ သတ္တာ အာဟာရဋ္ဌိတိကာ. ဣမသ္မိံ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, ဧကဓမ္မေ ဘိက္ခု သမ္မာ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော…ပေ… ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ‘ဧကော ပဉှော ဧကော ဥဒ္ဒေသော ဧကံ ဝေယျာကရဏ’န္တိ ဣတိ ယံ တံ ဝုတ္တံ, ဣဒမေတံ ပဋိစ္စ ဝုတ္တ’’န္တိ (အ. နိ. ၁၀.၂၇). 'भिक्षुओं, एक धर्म में सम्यक् रूप से निर्विग्न होता हुआ, सम्यक् रूप से विरक्त होता हुआ, सम्यक् रूप से विमुक्त होता हुआ, सम्यक् रूप से अंत को देखने वाला, शांति (अर्हत्व) को प्राप्त कर इसी जन्म में दुखों का अंत करने वाला होता है। वह एक धर्म कौन सा है? सभी प्राणी आहार पर स्थित हैं। भिक्षुओं, इस एक धर्म में भिक्षु सम्यक् रूप से निर्विग्न होता हुआ... (पे)... दुखों का अंत करने वाला होता है। एक प्रश्न, एक उद्देश, एक व्याकरण—यह जो कहा गया है, वह इसी के संदर्भ में कहा गया है।' အာဟာရဋ္ဌိတိကာတိ စေတ္ထ ယထာ ‘‘အတ္ထိ, ဘိက္ခဝေ, သုဘနိမိတ္တံ. တတ္ထ အယောနိသော မနသိကာရဗဟုလီကာရော, အယမာဟာရော အနုပ္ပန္နဿ ဝါ ကာမစ္ဆန္ဒဿ ဥပ္ပာဒါယာ’’တိ ဧဝမာဒီသု (သံ. နိ. ၅.၂၃၂) ပစ္စယော အာဟာရောတိ ဝုစ္စတိ, ဧဝံ [Pg.64] ပစ္စယံ အာဟာရသဒ္ဒေန ဂဟေတွာ ပစ္စယဋ္ဌိတိကာ ‘‘အာဟာရဋ္ဌိတိကာ’’တိ ဝုတ္တာ. စတ္တာရော ပန အာဟာရေ သန္ဓာယ – ‘‘အာဟာရဋ္ဌိတိကာ’’တိ ဝုစ္စမာနေ ‘‘အသညသတ္တာ ဒေဝါ အဟေတုကာ အနာဟာရာ အဖဿကာ အဝေဒနကာ’’တိ ဝစနတော (ဝိဘ. ၁၀၁၇) ‘‘သဗ္ဗေ’’တိ ဝစနမယုတ္တံ ဘဝေယျ. यहाँ 'आहारट्ठितिका' (आहार पर स्थित) के विषय में, जैसे 'भिक्षुओं, शुभ निमित्त है; वहाँ अयोनिशो मनसिकार की बहुलता, यह आहार (कारण) अनुत्पन्न कामछन्द की उत्पत्ति के लिए होता है'—इस प्रकार के स्थलों में 'प्रत्यय' (कारण) को 'आहार' कहा गया है, वैसे ही यहाँ 'आहार' शब्द से 'प्रत्यय' को ग्रहण कर, प्रत्यय पर स्थित होने को 'आहारट्ठितिका' कहा गया है। यदि चार (कवलिंकार आदि) आहारों के संदर्भ में 'आहारट्ठितिका' कहा जाए, तो 'असंज्ञी सत्त्व देव अहेतुक, अनाहार, अफरसक और अवेदनक होते हैं'—इस वचन के कारण 'सब्बे' (सभी) शब्द अयुक्त (अनुचित) हो जाएगा। တတ္ထ သိယာ – ဧဝမ္ပိ ဝုစ္စမာနေ ‘‘ကတမေ ဓမ္မာ သပစ္စယာ? ပဉ္စက္ခန္ဓာ – ရူပက္ခန္ဓော…ပေ… ဝိညာဏက္ခန္ဓော’’တိ (ဓ. သ. ၁၀၈၉) ဝစနတော ခန္ဓာနံယေဝ ပစ္စယဋ္ဌိတိကတ္တံ ယုတ္တံ, သတ္တာနန္တု အယုတ္တမေဝေတံ ဝစနံ ဘဝေယျာတိ. န ခေါ ပနေတံ ဧဝံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ကသ္မာ? သတ္တေသု ခန္ဓောပစာရသိဒ္ဓိတော. သတ္တေသု ဟိ ခန္ဓောပစာရော သိဒ္ဓေါ. ကသ္မာ? ခန္ဓေ ဥပါဒါယ ပညာပေတဗ္ဗတော. ကထံ? ဂေဟေ ဂါမောပစာရော ဝိယ. သေယျထာပိ ဟိ ဂေဟာနိ ဥပါဒါယ ပညာပေတဗ္ဗတ္တာ ဂါမဿ ဧကသ္မိမ္ပိ ဒွီသု တီသုပိ ဝါ ဂေဟေသု ဒဍ္ဎေသု ‘‘ဂါမော ဒဍ္ဎော’’တိ ဧဝံ ဂေဟေ ဂါမောပစာရော သိဒ္ဓေါ, ဧဝမေဝ ခန္ဓေသု ပစ္စယဋ္ဌေန အာဟာရဋ္ဌိတိကေသု ‘‘သတ္တာ အာဟာရဋ္ဌိတိကာ’’တိ အယံ ဥပစာရော သိဒ္ဓေါတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. ပရမတ္ထတော စ ခန္ဓေသု ဇာယမာနေသု ဇီယမာနေသု မီယမာနေသု စ ‘‘ခဏေ ခဏေ တွံ ဘိက္ခု ဇာယသေ စ ဇီယသေ စ မီယသေ စာ’’တိ ဝဒတာ ဘဂဝတာ တေသု သတ္တေသု ခန္ဓောပစာရော သိဒ္ဓေါတိ ဒဿိတော ဧဝါတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. ယတော ယေန ပစ္စယာချေန အာဟာရေန သဗ္ဗေ သတ္တာ တိဋ္ဌန္တိ, သော အာဟာရော တံ ဝါ နေသံ အာဟာရဋ္ဌိတိကတ္တံ ဧကန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. အာဟာရော ဟိ အာဟာရဋ္ဌိတိကတ္တံ ဝါ အနိစ္စတာကာရဏတော နိဗ္ဗိဒါဋ္ဌာနံ ဟောတိ. အထ တေသု သဗ္ဗသတ္တသညိတေသု သင်္ခါရေသု အနိစ္စတာဒဿနေန နိဗ္ဗိန္ဒမာနော အနုပုဗ္ဗေန ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ, ပရမတ္ထဝိသုဒ္ဓိံ ပါပုဏာတိ. ယထာဟ – वहाँ यह शंका हो सकती है— 'ऐसा कहने पर भी, कौन से धर्म सप्रत्यय (कारण सहित) हैं? पाँच स्कन्ध—रूपस्कन्ध... (पे)... विज्ञानस्कन्ध'—इस वचन के अनुसार केवल स्कन्धों का ही प्रत्यय पर स्थित होना युक्त है, प्राणियों (सत्त्वों) के लिए यह कथन अयुक्त ही होगा। किन्तु इसे ऐसा नहीं देखना चाहिए। क्यों? क्योंकि सत्त्वों में स्कन्धों का उपचार (लाक्षणिक प्रयोग) सिद्ध है। सत्त्वों में स्कन्धों का उपचार सिद्ध है। क्यों? क्योंकि स्कन्धों के आधार पर ही प्रज्ञप्ति (नामकरण) की जाती है। कैसे? जैसे घर के होने पर गाँव का उपचार होता है। जैसे घरों के आधार पर गाँव की प्रज्ञप्ति होने के कारण, एक, दो या तीन घरों के जलने पर भी 'गाँव जल गया' ऐसा घर में गाँव का उपचार सिद्ध होता है, वैसे ही स्कन्धों के प्रत्यय के अर्थ में आहार पर स्थित होने पर 'प्राणी आहार पर स्थित हैं' यह उपचार सिद्ध है, ऐसा समझना चाहिए। परमार्थतः भी, स्कन्धों के उत्पन्न होने, जीर्ण होने और नष्ट होने पर 'क्षण-क्षण में तुम, भिक्षु, उत्पन्न होते हो, जीर्ण होते हो और मरते हो'—ऐसा कहने वाले भगवान ने उन सत्त्वों में स्कन्धों का उपचार सिद्ध है, यही दिखाया है, ऐसा समझना चाहिए। अतः जिस प्रत्यय नामक आहार से सभी प्राणी टिके रहते हैं, वह आहार अथवा उनका वह आहार पर स्थित होना ही 'एक' समझना चाहिए। आहार अथवा आहार पर स्थित होना अनित्यता के आकार के कारण निर्वेद (वैराग्य) का स्थान होता है। तब उन 'सभी सत्त्व' संज्ञा वाले संस्कारों में अनित्यता के दर्शन से निर्विग्न होता हुआ व्यक्ति क्रमशः दुखों का अंत करने वाला होता है और परमार्थ शुद्धि (निर्वाण) को प्राप्त करता है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘သဗ္ဗေ သင်္ခါရာ အနိစ္စာတိ, ယဒါ ပညာယ ပဿတိ; အထ နိဗ္ဗိန္ဒတိ ဒုက္ခေ, ဧသ မဂ္ဂေါ ဝိသုဒ္ဓိယာ’’တိ. (ဓ. ပ. ၂၇၇); 'जब प्रज्ञा से देखता है कि सभी संस्कार अनित्य हैं, तब वह दुख से निर्विग्न (विरक्त) हो जाता है; यही विशुद्धि का मार्ग है।' ဧတ္ထ စ ‘‘ဧကံ နာမ ကိ’’န္တိ စ ‘‘ကိဟာ’’တိ စ ဒုဝိဓော ပါဌော, တတ္ထ သီဟဠာနံ ကိဟာတိ ပါဌော. တေ ဟိ ‘‘ကိ’’န္တိ ဝတ္တဗ္ဗေ ‘‘ကိဟာ’’တိ ဝဒန္တိ. ကေစိ ဘဏန္တိ ‘‘ဟ-ဣတိ နိပါတော, ထေရိယာနမ္ပိ အယမေဝ ပါဌော’’တိ ဥဘယထာပိ ပန ဧကောဝ အတ္ထော. ယထာ ရုစ္စတိ, တထာ ပဌိတဗ္ဗံ. ယထာ ပန ‘‘သုခေန ဖုဋ္ဌော အထ ဝါ ဒုခေန (ဓ. ပ. ၈၃), ဒုက္ခံ ဒေါမနဿံ ပဋိသံဝေဒေတီ’’တိ ဧဝမာဒီသု [Pg.65] ကတ္ထစိ ဒုခန္တိ စ ကတ္ထစိ ဒုက္ခန္တိ စ ဝုစ္စတိ, ဧဝံ ကတ္ထစိ ဧကန္တိ, ကတ္ထစိ ဧက္ကန္တိ ဝုစ္စတိ. ဣဓ ပန ဧကံ နာမာတိ အယမေဝ ပါဌော. और यहाँ (इस खुद्दकपाठ में) 'एकं नाम किं' और 'किं ह' - ये दो प्रकार के पाठ हैं। उनमें से सिंहल (श्रीलंकाई) प्रतियों में 'किं ह' पाठ है। वे 'किं' कहने के स्थान पर 'किं ह' कहते हैं। कुछ आचार्य कहते हैं कि 'ह' एक निपात है, और थेरीगाथाओं में भी यही पाठ है। फिर भी, दोनों ही स्थितियों में अर्थ एक ही है। जैसा रुचिकर लगे, वैसा पढ़ना चाहिए। जैसे 'सुखेन फुट्ठो अथ वा दुखेन' (धम्मपद ८३) और 'दुक्खं दोमनस्सं पटिसंवेदेति' आदि में कहीं 'दुख' और कहीं 'दुक्ख' कहा जाता है, वैसे ही कहीं 'एकं' और कहीं 'एक्कं' कहा जाता है। किन्तु यहाँ 'एकं नाम' - यही पाठ है। ဒွေ နာမ ကိန္တိပဉှဝဏ္ဏနာ 'द्वे नाम किं' (दो नाम क्या हैं) प्रश्न की व्याख्या। ဧဝံ ဣမိနာ ပဉှဗျာကရဏေန အာရဒ္ဓစိတ္တော သတ္ထာ ပုရိမနယေနေဝ ဥတ္တရိံ ပဉှံ ပုစ္ဆတိ ဒွေ နာမ ကိန္တိ? ထေရော ဒွေတိ ပစ္စနုဘာသိတွာ ‘‘နာမဉ္စ ရူပဉ္စာ’’တိ ဓမ္မာဓိဋ္ဌာနာယ ဒေသနာယ ဝိဿဇ္ဇေတိ. တတ္ထ အာရမ္မဏာဘိမုခံ နမနတော, စိတ္တဿ စ နတိဟေတုတော သဗ္ဗမ္ပိ အရူပံ ‘‘နာမ’’န္တိ ဝုစ္စတိ. ဣဓ ပန နိဗ္ဗိဒါဟေတုတ္တာ သာသဝဓမ္မမေဝ အဓိပ္ပေတံ ရုပ္ပနဋ္ဌေန စတ္တာရော စ မဟာဘူတာ, သဗ္ဗဉ္စ တဒုပါဒါယ ပဝတ္တမာနံ ရူပံ ‘‘ရူပ’’န္တိ ဝုစ္စတိ, တံ သဗ္ဗမ္ပိ ဣဓာဓိပ္ပေတံ. အဓိပ္ပာယဝသေနေဝ စေတ္ထ ‘‘ဒွေ နာမ နာမဉ္စ ရူပဉ္စာ’’တိ ဝုတ္တံ, န အညေသံ ဒွိန္နမဘာဝတော. ယထာဟ – इस प्रकार, इस प्रश्न के उत्तर से प्रसन्नचित्त होकर शास्ता (बुद्ध) पूर्व रीति के अनुसार ही अगला प्रश्न पूछते हैं - "दो नाम क्या हैं?" स्थविर (सोपाक) "दो" ऐसा दोहराकर "नाम और रूप" - इस प्रकार धर्म-प्रधान देशना से उत्तर देते हैं। वहाँ आलम्बन की ओर झुकने (नमन) के कारण और चित्त के झुकने का हेतु होने के कारण सभी अरूप (अभौतिक) धर्मों को 'नाम' कहा जाता है। किन्तु यहाँ निर्वेद (वैराग्य) का हेतु होने के कारण केवल सासव (आस्रव-युक्त) धर्म ही अभिप्रेत हैं। विकृत होने (रुप्पन) के अर्थ में चार महाभूत और उन पर आश्रित होकर प्रवृत्त होने वाले सभी रूपों को 'रूप' कहा जाता है, वे सभी यहाँ अभिप्रेत हैं। यहाँ अभिप्राय के वश से ही "दो नाम - नाम और रूप" कहा गया है, न कि अन्य दो धर्मों के अभाव के कारण। जैसा कि कहा गया है - ‘‘ဒွီသု, ဘိက္ခဝေ, ဓမ္မေသု ဘိက္ခု သမ္မာ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော…ပေ… ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ကတမေသု ဒွီသု? နာမေ စ ရူပေ စ. ဣမေသု ခေါ, ဘိက္ခဝေ, ဒွီသု ဓမ္မေသု ဘိက္ခု သမ္မာ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော…ပေ… ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ‘ဒွေ ပဉှာ, ဒွေ ဥဒ္ဒေသာ, ဒွေ ဝေယျာကရဏာနီ’တိ ဣတိ ယံ တံ ဝုတ္တံ, ဣဒမေတံ ပဋိစ္စ ဝုတ္တ’’န္တိ (အ. နိ. ၁၀.၂၇). "भिक्षुओं! दो धर्मों में भिक्षु सम्यक् रूप से निर्वेद (वैराग्य) प्राप्त करता हुआ... (पे)... दुःख का अन्त करने वाला होता है। वे दो कौन से हैं? नाम और रूप। भिक्षुओं! इन दो धर्मों में भिक्षु सम्यक् रूप से निर्वेद प्राप्त करता हुआ... दुःख का अन्त करने वाला होता है। 'दो प्रश्न, दो उद्देश, दो व्याकरण (व्याख्या)' - यह जो कहा गया है, वह इसी के सन्दर्भ में कहा गया है।" (अंगुत्तर निकाय १०.२७) ဧတ္ထ စ နာမရူပမတ္တဒဿနေန အတ္တဒိဋ္ဌိံ ပဟာယ အနတ္တာနုပဿနာမုခေနေဝ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော အနုပုဗ္ဗေန ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ, ပရမတ္ထဝိသုဒ္ဓိံ ပါပုဏာတီတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. ယထာဟ – और यहाँ केवल नाम-रूप के दर्शन से आत्म-दृष्टि का त्याग कर, अनत्तानुपश्यना (अनात्म-अनुप्रेक्षा) के माध्यम से ही निर्वेद प्राप्त करता हुआ वह क्रमशः दुःख का अन्त करने वाला होता है और परमार्थ विशुद्धि को प्राप्त करता है - ऐसा समझना चाहिए। जैसा कि कहा गया है - ‘‘သဗ္ဗေ ဓမ္မာ အနတ္တာတိ, ယဒါ ပညာယ ပဿတိ; အထ နိဗ္ဗိန္ဒတိ ဒုက္ခေ, ဧသ မဂ္ဂေါ ဝိသုဒ္ဓိယာ’’တိ. (ဓ. ပ. ၂၇၉); "जब प्रज्ञा से देखता है कि 'सभी धर्म अनात्म हैं', तब वह दुःख से निर्वेद (विमुख) हो जाता है; यही विशुद्धि का मार्ग है।" (धम्मपद २७९) တီဏိ နာမ ကိန္တိပဉှဝဏ္ဏနာ 'तीणि नाम किं' (तीन नाम क्या हैं) प्रश्न की व्याख्या। ဣဒါနိ ဣမိနာပိ ပဉှဗျာကရဏေန အာရဒ္ဓစိတ္တော သတ္ထာ ပုရိမနယေနေဝ ဥတ္တရိံ ပဉှံ ပုစ္ဆတိ တီဏိ နာမ ကိန္တိ? ထေရော တီဏီတိ ပစ္စနုဘာသိတွာ ပုန ဗျာကရိတဗ္ဗဿ အတ္ထဿ လိင်္ဂါနုရူပံ သင်္ချံ ဒဿေန္တော ‘‘တိဿော ဝေဒနာ’’တိ ဝိဿဇ္ဇေတိ. အထ ဝါ ‘‘ယာ ဘဂဝတာ ‘တိဿော ဝေဒနာ’တိ ဝုတ္တာ, ဣမာသမတ္ထမဟံ [Pg.66] တီဏီတိ ပစ္စေမီ’’တိ ဒဿေန္တော အာဟာတိ ဧဝမ္ပေတ္ထ အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. အနေကမုခါ ဟိ ဒေသနာ ပဋိသမ္ဘိဒါပဘေဒေန ဒေသနာဝိလာသပ္ပတ္တာနံ. ကေစိ ပနာဟု ‘‘တီဏီတိ အဓိကပဒမိဒ’’န္တိ. ပုရိမနယေနေဝ စေတ္ထ ‘‘တိဿော ဝေဒနာ’’တိ ဝုတ္တံ, န အညေသံ တိဏ္ဏမဘာဝတော. ယထာဟ – अब इस प्रश्न के उत्तर से भी प्रसन्नचित्त होकर शास्ता पूर्व रीति के अनुसार ही अगला प्रश्न पूछते हैं - "तीन नाम क्या हैं?" स्थविर "तीन" ऐसा दोहराकर, फिर व्याख्या किए जाने वाले अर्थ के लिंग के अनुरूप संख्या दर्शाते हुए "तीन वेदनाएँ" - ऐसा उत्तर देते हैं। अथवा, "भगवान ने जो 'तीन वेदनाएँ' कही हैं, उनके इस अर्थ को मैं 'तीन' के रूप में स्वीकार करता हूँ" - ऐसा दर्शाते हुए उन्होंने कहा, इस प्रकार भी यहाँ अर्थ समझना चाहिए। क्योंकि प्रतिसम्भिदा के भेदों के कारण देशना-विलास को प्राप्त महापुरुषों की देशना अनेक प्रकार की होती है। किन्तु कुछ आचार्य कहते हैं कि "यहाँ 'तीणि' शब्द अधिक (अतिरिक्त) है।" यहाँ भी पूर्व रीति के अनुसार ही "तीन वेदनाएँ" कहा गया है, न कि अन्य तीन धर्मों के अभाव के कारण। जैसा कि कहा गया है - ‘‘တီသု, ဘိက္ခဝေ, ဓမ္မေသု ဘိက္ခု သမ္မာ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော…ပေ… ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ကတမေသု တီသု? တီသု ဝေဒနာသု. ဣမေသု ခေါ, ဘိက္ခဝေ, တီသု ဓမ္မေသု ဘိက္ခု သမ္မာ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော…ပေ… ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ‘တယော ပဉှာ, တယော ဥဒ္ဒေသာ, တီဏိ ဝေယျာကရဏာနီ’တိ ဣတိ ယံ တံ ဝုတ္တံ, ဣဒမေတံ ပဋိစ္စ ဝုတ္တ’’န္တိ (အ. နိ. ၁၀.၂၇). "भिक्षुओं! तीन धर्मों में भिक्षु सम्यक् रूप से निर्वेद प्राप्त करता हुआ... दुःख का अन्त करने वाला होता है। वे तीन कौन से हैं? तीन वेदनाएँ। भिक्षुओं! इन तीन धर्मों में भिक्षु सम्यक् रूप से निर्वेद प्राप्त करता हुआ... दुःख का अन्त करने वाला होता है। 'तीन प्रश्न, तीन उद्देश, तीन व्याकरण' - यह जो कहा गया है, वह इसी के सन्दर्भ में कहा गया है।" (अंगुत्तर निकाय १०.२७) ဧတ္ထ စ ‘‘ယံကိဉ္စိ ဝေဒယိတံ, သဗ္ဗံ တံ ဒုက္ခသ္မိန္တိ ဝဒါမီ’’တိ (သံ. နိ. ၄.၂၅၉) ဝုတ္တသုတ္တာနုသာရေန ဝါ. – और यहाँ "जो कुछ भी वेदित (अनुभव) किया जाता है, वह सब दुःख में ही है - ऐसा मैं कहता हूँ" (संयुत्त निकाय ४.२५९), इस कहे गए सूत्र के अनुसार, अथवा - ‘‘ယော သုခံ ဒုက္ခတော အဒ္ဒ, ဒုက္ခမဒ္ဒက္ခိ သလ္လတော; အဒုက္ခမသုခံ သန္တံ, အဒ္ဒက္ခိ နံ အနိစ္စတော’’တိ. (ဣတိဝု. ၅၃) – "जिसने सुख को दुःख के रूप में देखा, दुःख को शल्य (काँटे) के रूप में देखा, और शान्त अदुःख-असुख (उपेक्षा) को अनित्य के रूप में देखा।" (इतिवृत्तक ५३) - ဧဝံ ဒုက္ခဒုက္ခတာဝိပရိဏာမဒုက္ခတာသင်္ခါရဒုက္ခတာနုသာရေန ဝါ တိဿန္နံ ဝေဒနာနံ ဒုက္ခဘာဝဒဿနေန သုခသညံ ပဟာယ ဒုက္ခာနုပဿနာမုခေန နိဗ္ဗိန္ဒမာနော အနုပုဗ္ဗေန ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ, ပရမတ္ထဝိသုဒ္ဓိံ ပါပုဏာတီတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. ယထာဟ – इस प्रकार दुःख-दुःखता, विपरिणाम-दुःखता और संस्कार-दुःखता के अनुसार, अथवा तीनों वेदनाओं के दुःख-स्वभाव के दर्शन से 'सुख-संज्ञा' का त्याग कर, दुःखानुपश्यना के माध्यम से निर्वेद प्राप्त करता हुआ वह क्रमशः दुःख का अन्त करने वाला होता है और परमार्थ विशुद्धि को प्राप्त करता है - ऐसा समझना चाहिए। जैसा कि कहा गया है - ‘‘သဗ္ဗေ သင်္ခါရာ ဒုက္ခာတိ, ယဒါ ပညာယ ပဿတိ; အထ နိဗ္ဗိန္ဒတိ ဒုက္ခေ, ဧသ မဂ္ဂေါ ဝိသုဒ္ဓိယာ’’တိ. (ဓ. ပ. ၂၇၈); "जब प्रज्ञा से देखता है कि 'सभी संस्कार दुःख हैं', तब वह दुःख से निर्वेद (विमुख) हो जाता है; यही विशुद्धि का मार्ग है।" (धम्मपद २७८) စတ္တာရိ နာမ ကိန္တိပဉှဝဏ္ဏနာ 'चत्तारि नाम किं' (चार नाम क्या हैं) प्रश्न की व्याख्या। ဧဝံ ဣမိနာပိ ပဉှဗျာကရဏေန အာရဒ္ဓစိတ္တော သတ္ထာ ပုရိမနယေနေဝ ဥတ္တရိံ ပဉှံ ပုစ္ဆတိ စတ္တာရိ နာမ ကိန္တိ? တတ္ထ ဣမဿ ပဉှဿ ဗျာကရဏပက္ခေ ကတ္ထစိ ပုရိမနယေနေဝ စတ္တာရော အာဟာရာ အဓိပ္ပေတာ. ယထာဟ – इस प्रकार इस प्रश्न के उत्तर से भी प्रसन्नचित्त होकर शास्ता पूर्व रीति के अनुसार ही अगला प्रश्न पूछते हैं - "चार नाम क्या हैं?" वहाँ इस प्रश्न के उत्तर के पक्ष में कहीं पूर्व रीति के अनुसार ही "चार आहार" अभिप्रेत हैं। जैसा कि कहा गया है - ‘‘စတူသု[Pg.67], ဘိက္ခဝေ, ဓမ္မေသု ဘိက္ခု သမ္မာ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော…ပေ… ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ကတမေသု စတူသု? စတူသု အာဟာရေသု. ဣမေသု ခေါ, ဘိက္ခဝေ, စတူသု ဓမ္မေသု ဘိက္ခု သမ္မာ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော…ပေ… ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ‘စတ္တာရော ပဉှာ စတ္တာရော ဥဒ္ဒေသာ စတ္တာရိ ဝေယျာကရဏာနီ’တိ ဣတိ ယံ တံ ဝုတ္တံ, ဣဒမေတံ ပဋိစ္စ ဝုတ္တ’’န္တိ (အ. နိ. ၁၀.၂၇). "भिक्षुओं! चार धर्मों में भिक्षु सम्यक् रूप से निर्वेद प्राप्त करता हुआ... दुःख का अन्त करने वाला होता है। वे चार कौन से हैं? चार आहार। भिक्षुओं! इन चार धर्मों में भिक्षु सम्यक् रूप से निर्वेद प्राप्त करता हुआ... दुःख का अन्त करने वाला होता है। 'चार प्रश्न, चार उद्देश, चार व्याकरण' - यह जो कहा गया है, वह इसी के सन्दर्भ में कहा गया है।" (अंगुत्तर निकाय १०.२७) ကတ္ထစိ ယေသု သုဘာဝိတစိတ္တော အနုပုဗ္ဗေန ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ, တာနိ စတ္တာရိ သတိပဋ္ဌာနာနိ. ယထာဟ ကဇင်္ဂလာ ဘိက္ခုနီ – कहीं (किसी सन्दर्भ में) जिनमें चित्त को भली-भाँति भावित करने वाला व्यक्ति क्रमशः दुःख का अन्त करने वाला होता है, वे "चार स्मृति-प्रस्थान" (सतिपट्ठान) हैं। जैसा कि कजंगला भिक्षुणी ने कहा है - ‘‘စတူသု, အာဝုသော, ဓမ္မေသု ဘိက္ခု သမ္မာ သုဘာဝိတစိတ္တော သမ္မာ ပရိယန္တဒဿာဝီ သမ္မတ္တံ အဘိသမေစ္စ ဒိဋ္ဌေဝ ဓမ္မေ ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ကတမေသု စတူသု? စတူသု သတိပဋ္ဌာနေသု. ဣမေသု ခေါ, အာဝုသော, စတူသု ဓမ္မေသု ဘိက္ခု သမ္မာ သုဘာဝိတစိတ္တော…ပေ… ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ‘စတ္တာရော ပဉှာ စတ္တာရော ဥဒ္ဒေသာ စတ္တာရိ ဝေယျာကရဏာနီ’တိ ဣတိ ယံ တံ ဝုတ္တံ ဘဂဝတာ, ဣဒမေတံ ပဋိစ္စ ဝုတ္တ’’န္တိ (အ. နိ. ၁၀.၂၈). “हे आयुष्मन्! चार धर्मों में भिक्षु का चित्त सम्यक् रूप से सुभावित होने पर, सम्यक् रूप से (संसार के) अंत को देखने वाला होकर, शांत निर्वाण का साक्षात्कार कर, इसी जन्म में दुःख का अंत करने वाला होता है। वे चार कौन से हैं? चार स्मृतिप्रस्थान। हे आयुष्मन्! इन चार धर्मों में भिक्षु का चित्त सम्यक् रूप से सुभावित होने पर... दुःख का अंत करने वाला होता है। ‘चार प्रश्न, चार उद्देश, चार व्याकरण’ - भगवान द्वारा जो यह कहा गया है, वह इसी के संदर्भ में कहा गया है।” ဣဓ ပန ယေသံ စတုန္နံ အနုဗောဓပ္ပဋိဝေဓတော ဘဝတဏှာဆေဒေါ ဟောတိ, ယသ္မာ တာနိ စတ္တာရိ အရိယသစ္စာနိ အဓိပ္ပေတာနိ. ယသ္မာ ဝါ ဣမိနာ ပရိယာယေန ဗျာကတံ သုဗျာကတမေဝ ဟောတိ, တသ္မာ ထေရော စတ္တာရီတိ ပစ္စနုဘာသိတွာ ‘‘အရိယသစ္စာနီ’’တိ ဝိဿဇ္ဇေတိ. တတ္ထ စတ္တာရီတိ ဂဏနပရိစ္ဆေဒေါ. အရိယသစ္စာနီတိ အရိယာနိ သစ္စာနိ, အဝိတထာနိ အဝိသံဝါဒကာနီတိ အတ္ထော. ယထာဟ – यहाँ जिन चार (सत्यों) के अनुबोध और प्रतिवेध (साक्षात्कार) से भव-तृष्णा का क्षय होता है, क्योंकि वे चार आर्य सत्य ही अभिप्रेत हैं। अथवा, क्योंकि इस पद्धति से दिया गया उत्तर ही श्रेष्ठ उत्तर है, इसलिए स्थविर (सोपाक) ने ‘चार’ कहकर पुनः ‘आर्य सत्य’ ऐसा उत्तर दिया। वहाँ ‘चार’ गणना का परिच्छेद (संख्या) है। ‘आर्य सत्य’ का अर्थ है - श्रेष्ठ सत्य, जो यथार्थ हैं और विसंवादरहित (अमोघ) हैं। जैसा कि कहा गया है - ‘‘ဣမာနိ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, စတ္တာရိ အရိယသစ္စာနိ တထာနိ အဝိတထာနိ အနညထာနိ, တသ္မာ အရိယသစ္စာနီတိ ဝုစ္စန္တီ’’တိ (သံ. နိ. ၅.၁၀၉၇). “भिक्षुओं! ये चार आर्य सत्य तथ्य (सत्य), अवितथ (यथार्थ) और अनन्यथा (अपरिवर्तनीय) हैं, इसलिए इन्हें ‘आर्य सत्य’ कहा जाता है।” ယသ္မာ ဝါ သဒေဝကေန လောကေန အရဏီယတော အဘိဂမနီယတောတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ, ဝါယမိတဗ္ဗဋ္ဌာနသညိတေ အယေ ဝါ ဣရိယနတော, အနယေ ဝါ န ဣရိယနတော, သတ္တတိံသဗောဓိပက္ခိယအရိယဓမ္မသမာယောဂတော ဝါ အရိယသမ္မတာ ဗုဒ္ဓပစ္စေကဗုဒ္ဓဗုဒ္ဓသာဝကာ ဧတာနိ ပဋိဝိဇ္ဈန္တိ, တသ္မာပိ ‘‘အရိယသစ္စာနီ’’တိ ဝုစ္စန္တိ. ယထာဟ – अथवा, क्योंकि देवलोक सहित संपूर्ण लोक द्वारा इन्हें जाना जाना चाहिए और इनके सम्मुख जाना चाहिए, इसलिए ऐसा कहा गया है। अथवा, प्रयत्न करने योग्य स्थान के रूप में संज्ञित सुखों (आय) को प्राप्त कराने के कारण ‘आर्य’ कहलाते हैं, अथवा दुखों (अनय) को प्राप्त न कराने के कारण ‘आर्य’ कहलाते हैं। अथवा, सैंतीस बोधिपाक्षिक आर्य धर्मों के सम्यक् योग से ‘आर्य’ माने जाने वाले बुद्ध, प्रत्येक बुद्ध और बुद्ध-श्रावक इनका प्रतिवेध (साक्षात्कार) करते हैं, इसलिए भी इन्हें ‘आर्य सत्य’ कहा जाता है। जैसा कि कहा गया है - ‘‘စတ္တာရိမာနိ[Pg.68], ဘိက္ခဝေ, အရိယသစ္စာနိ…ပေ… ဣမာနိ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, စတ္တာရိ အရိယသစ္စာနိ, အရိယာ ဣမာနိ ပဋိဝိဇ္ဈန္တိ, တသ္မာ အရိယသစ္စာနီတိ ဝုစ္စန္တီ’’တိ. “भिक्षुओं! ये चार आर्य सत्य हैं... भिक्षुओं! ये चार आर्य सत्य हैं, आर्य इनका प्रतिवेध करते हैं, इसलिए इन्हें ‘आर्य सत्य’ कहा जाता है।” အပိစ အရိယဿ ဘဂဝတော သစ္စာနီတိပိ အရိယသစ္စာနိ. ယထာဟ – इसके अतिरिक्त, आर्य (श्रेष्ठ) भगवान के सत्य होने के कारण भी ये ‘आर्य सत्य’ हैं। जैसा कि कहा गया है - ‘‘သဒေဝကေ, ဘိက္ခဝေ…ပေ… သဒေဝမနုဿာယ တထာဂတော အရိယော, တသ္မာ အရိယသစ္စာနီတိ ဝုစ္စန္တီ’’တိ (သံ. နိ. ၅.၁၀၉၈). “भिक्षुओं! देवलोक सहित... देव और मनुष्यों सहित इस लोक में तथागत ‘आर्य’ हैं, इसलिए इन्हें ‘आर्य सत्य’ कहा जाता है।” အထ ဝါ ဧတေသံ အဘိသမ္ဗုဒ္ဓတ္တာ အရိယဘာဝသိဒ္ဓိတောပိ အရိယသစ္စာနိ. ယထာဟ – अथवा, इनके (बुद्ध आदि द्वारा) साक्षात्कार किए जाने के कारण और आर्य-भाव की सिद्धि करने के कारण भी ये ‘आर्य सत्य’ कहलाते हैं। जैसा कि कहा गया है - ‘‘ဣမေသံ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, စတုန္နံ အရိယသစ္စာနံ ယထာဘူတံ အဘိသမ္ဗုဒ္ဓတ္တာ တထာဂတော အရဟံ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါတိ ဝုစ္စတီ’’တိ (သံ. နိ. ၅.၁၀၉၃). “भिक्षुओं! इन चार आर्य सत्यों का यथार्थ रूप से साक्षात्कार करने के कारण ही तथागत को ‘अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध’ कहा जाता है, ऐसा भगवान ने कहा।” အယမေတေသံ ပဒတ္ထော. ဧတေသံ ပန အရိယသစ္စာနံ အနုဗောဓပ္ပဋိဝေဓတော ဘဝတဏှာဆေဒေါ ဟောတိ. ယထာဟ – यह इन (चार सत्यों) का पद-अर्थ है। इन आर्य सत्यों के अनुबोध और प्रतिवेध से भव-तृष्णा का क्षय होता है। जैसा कि कहा गया है - ‘‘တယိဒံ, ဘိက္ခဝေ, ဒုက္ခံ အရိယသစ္စံ အနုဗုဒ္ဓံ ပဋိဝိဒ္ဓံ…ပေ… ဒုက္ခနိရောဓဂါမိနိပဋိပဒါ အရိယသစ္စံ အနုဗုဒ္ဓံ ပဋိဝိဒ္ဓံ, ဥစ္ဆိန္နာ ဘဝတဏှာ, ခီဏာ ဘဝနေတ္တိ, နတ္ထိ ဒါနိ ပုနဗ္ဘဝေါ’’တိ (သံ. နိ. ၅.၁၀၉၁). “भिक्षुओं! उस इस दुःख आर्य सत्य का अनुबोध किया गया, प्रतिवेध किया गया... दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपदा आर्य सत्य का अनुबोध किया गया, प्रतिवेध किया गया; भव-तृष्णा छिन्न हो गई, भव-नेत्री (पुनर्जन्म की डोरी) क्षीण हो गई, अब पुनर्जन्म नहीं है।” ပဉ္စ နာမ ကိန္တိပဉှဝဏ္ဏနာ ‘पाँच क्या है?’ इस प्रश्न की व्याख्या ဣမိနာပိ ပဉှဗျာကရဏေန အာရဒ္ဓစိတ္တော သတ္ထာ ပုရိမနယေနေဝ ဥတ္တရိံ ပဉှံ ပုစ္ဆတိ ပဉ္စ နာမ ကိန္တိ? ထေရော ပဉ္စာတိ ပစ္စနုဘာသိတွာ ‘‘ဥပါဒါနက္ခန္ဓာ’’တိ ဝိဿဇ္ဇေတိ. တတ္ထ ပဉ္စာတိ ဂဏနပရိစ္ဆေဒေါ. ဥပါဒါနဇနိတာ ဥပါဒါနဇနကာ ဝါ ခန္ဓာ ဥပါဒါနက္ခန္ဓာ. ယံကိဉ္စိ ရူပံ, ဝေဒနာ, သညာ, သင်္ခါရာ, ဝိညာဏဉ္စ သာသဝါ ဥပါဒါနိယာ, ဧတေသမေတံ အဓိဝစနံ. ပုဗ္ဗနယေနေဝ စေတ္ထ ‘‘ပဉ္စုပါဒါနက္ခန္ဓာ’’တိ ဝုတ္တံ, န အညေသံ ပဉ္စန္နမဘာဝတော. ယထာဟ – इस प्रश्नोत्तर से भी प्रसन्नचित्त होकर शास्ता (बुद्ध) ने पूर्व पद्धति के अनुसार ही आगे का प्रश्न पूछा—‘पाँच क्या है?’ स्थविर ने ‘पाँच’ कहकर ‘उपादान स्कंध’ ऐसा उत्तर दिया। वहाँ ‘पाँच’ गणना का परिच्छेद है। उपादान से जनित होने के कारण स्कंध ‘उपादान स्कंध’ कहलाते हैं। जो कुछ भी रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान है, जो आस्रव-युक्त और उपादान के विषय हैं, यह उन्हीं का नाम है। पूर्व पद्धति के अनुसार ही यहाँ ‘पाँच उपादान स्कंध’ कहा गया है, क्योंकि इनके अतिरिक्त अन्य कोई पाँच (स्कंध) नहीं हैं। जैसा कि कहा गया है - ‘‘ပဉ္စသု, ဘိက္ခဝေ, ဓမ္မေသု ဘိက္ခု သမ္မာ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော…ပေ… ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ကတမေသု ပဉ္စသု? ပဉ္စသု ဥပါဒါနက္ခန္ဓေသု. ဣမေသု ခေါ, ဘိက္ခဝေ, ပဉ္စသု ဓမ္မေသု ဘိက္ခု သမ္မာ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော…ပေ… ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ‘ပဉ္စ ပဉှာ, ပဉ္စ ဥဒ္ဒေသာ[Pg.69], ပဉ္စ ဝေယျာကရဏာနီ’တိ ဣတိ ယံ တံ ဝုတ္တံ, ဣဒမေတံ ပဋိစ္စ ဝုတ္တ’’န္တိ (အ. နိ. ၁၀.၂၇). “भिक्षुओं! पाँच धर्मों में भिक्षु सम्यक् रूप से निर्वेद (वैराग्य) प्राप्त कर... दुःख का अंत करने वाला होता है। वे पाँच कौन से हैं? पाँच उपादान स्कंधों में। भिक्षुओं! इन पाँच धर्मों में भिक्षु सम्यक् रूप से निर्वेद प्राप्त कर... दुःख का अंत करने वाला होता है। ‘पाँच प्रश्न, पाँच उद्देश, पाँच व्याकरण’ - जो यह कहा गया है, वह इसी के संदर्भ में कहा गया है।” ဧတ္ထ စ ပဉ္စက္ခန္ဓေ ဥဒယဗ္ဗယဝသေန သမ္မသန္တော ဝိပဿနာမတံ လဒ္ဓါ အနုပုဗ္ဗေန နိဗ္ဗာနာမတံ သစ္ဆိကရောတိ. ယထာဟ – और यहाँ पाँच स्कंधों का उदय और व्यय (उत्पत्ति और विनाश) के रूप में मनन करने वाला व्यक्ति विपश्यना-ज्ञान प्राप्त कर क्रमशः निर्वाण-अमृत का साक्षात्कार करता है। जैसा कि कहा गया है - ‘‘ယတော ယတော သမ္မသတိ, ခန္ဓာနံ ဥဒယဗ္ဗယံ; လဘတီ ပီတိပါမောဇ္ဇံ, အမတံ တံ ဝိဇာနတ’’န္တိ. (ဓ. ပ. ၃၇၄); “जैसे-जैसे वह स्कंधों के उदय और व्यय का मनन करता है, वैसे-वैसे वह प्रीति और प्रमोद प्राप्त करता है; वह ज्ञानियों के लिए अमृत (निर्वाण) है।” ဆ နာမ ကိန္တိပဉှဝဏ္ဏနာ ‘छह क्या है?’ इस प्रश्न की व्याख्या ဧဝံ ဣမိနာပိ ပဉှဗျာကရဏေန အာရဒ္ဓစိတ္တော သတ္ထာ ပုရိမနယေနေဝ ဥတ္တရိံ ပဉှံ ပုစ္ဆတိ ‘‘ဆ နာမ ကိ’’န္တိ? ထေရော ဆဣတိ ပစ္စနုဘာသိတွာ ‘အဇ္ဈတ္တိကာနိ အာယတနာနီ’တိ ဝိဿဇ္ဇေတိ. တတ္ထ ဆဣတိ ဂဏနပရိစ္ဆေဒေါ, အဇ္ဈတ္တေ နိယုတ္တာနိ, အတ္တာနံ ဝါ အဓိကတွာ ပဝတ္တာနိ အဇ္ဈတ္တိကာနိ. အာယတနတော, အာယဿ ဝါ တနနတော, အာယတဿ ဝါ သံသာရဒုက္ခဿ နယနတော အာယတနာနိ, စက္ခုသောတဃာနဇိဝှာကာယမနာနမေတံ အဓိဝစနံ. ပုဗ္ဗနယေန စေတ္ထ ‘‘ဆ အဇ္ဈတ္တိကာနိ အာယတနာနီ’’တိ ဝုတ္တံ, န အညေသံ ဆန္နမဘာဝတော. ယထာဟ – इस प्रकार इस प्रश्नोत्तर से भी प्रसन्नचित्त होकर शास्ता ने पूर्व पद्धति के अनुसार ही आगे का प्रश्न पूछा—‘छह क्या है?’ स्थविर ने ‘छह’ कहकर ‘आध्यात्मिक आयतन’ ऐसा उत्तर दिया। वहाँ ‘छह’ गणना का परिच्छेद है। जो अध्यात्म (भीतर) में नियुक्त हैं, अथवा स्वयं को प्रधान मानकर प्रवृत्त होते हैं, वे ‘आध्यात्मिक’ कहलाते हैं। आय (संसार) को विस्तृत करने के कारण, अथवा आय (संसार) के विस्तार के कारण, अथवा दीर्घकालीन संसार-दुःख को ले जाने के कारण ‘आयतन’ कहलाते हैं। यह चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, जिह्वा, काय और मन का नाम है। पूर्व पद्धति के अनुसार ही यहाँ ‘छह आध्यात्मिक आयतन’ कहा गया है, क्योंकि इनके अतिरिक्त अन्य कोई छह नहीं हैं। जैसा कि कहा गया है - ‘‘ဆသု, ဘိက္ခဝေ, ဓမ္မေသု ဘိက္ခု သမ္မာ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော…ပေ… ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ကတမေသု ဆသု? ဆသု အဇ္ဈတ္တိကေသု အာယတနေသု. ဣမေသု ခေါ, ဘိက္ခဝေ, ဆသု ဓမ္မေသု ဘိက္ခု သမ္မာ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော…ပေ… ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ‘ဆ ပဉှာ ဆ ဥဒ္ဒေသာ ဆ ဝေယျာကရဏာနီ’တိ ဣတိ ယံ တံ ဝုတ္တံ, ဣဒမေတံ ပဋိစ္စ ဝုတ္တ’’န္တိ (အ. နိ. ၁၀.၂၇). “भिक्षुओं! छह धर्मों में भिक्षु सम्यक् रूप से निर्वेद प्राप्त कर... दुःख का अंत करने वाला होता है। वे छह कौन से हैं? छह आध्यात्मिक आयतनों में। भिक्षुओं! इन छह धर्मों में भिक्षु सम्यक् रूप से निर्वेद प्राप्त कर... दुःख का अंत करने वाला होता है। ‘छह प्रश्न, छह उद्देश, छह व्याकरण’ - जो यह कहा गया है, वह इसी के संदर्भ में कहा गया है।” ဧတ္ထ စ ဆ အဇ္ဈတ္တိကာနိ အာယတနာနိ, ‘‘သုညော ဂါမောတိ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, ဆန္နေတံ အဇ္ဈတ္တိကာနံ အာယတနာနံ အဓိဝစန’’န္တိ (သံ. နိ. ၄.၂၃၈) ဝစနတော သုညတော ပုဗ္ဗုဠကမရီစိကာဒီနိ ဝိယ အစိရဋ္ဌိတိကတော တုစ္ဆတော ဝဉ္စနတော စ သမနုပဿံ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော အနုပုဗ္ဗေန ဒုက္ခဿန္တံ ကတွာ မစ္စုရာဇဿ အဒဿနံ ဥပေတိ. ယထာဟ – यहाँ छह आध्यात्मिक (आन्तरिक) आयतन हैं। 'हे भिक्षुओं! शून्य ग्राम—यह छह आध्यात्मिक आयतनों का ही एक नाम है' (सं. नि. 4.238), इस वचन के अनुसार, इन्हें शून्य के रूप में, जल के बुलबुले और मरीचिका आदि के समान क्षणभंगुर होने के कारण, रिक्तता के कारण और वंचकता (छल) के कारण भली-भांति देखते हुए, निर्वेद (वैराग्य) प्राप्त कर, क्रमशः दुःख का अंत करके मृत्युराज की दृष्टि से ओझल (निर्वाण) हो जाता है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘ယထာ [Pg.70] ပုဗ္ဗုဠကံ ပဿေ, ယထာ ပဿေ မရီစိကံ; ဧဝံ လောကံ အဝေက္ခန္တံ, မစ္စုရာဇာ န ပဿတီ’’တိ. (ဓ. ပ. ၁၇၀); 'जैसे कोई जल के बुलबुले को देखे, जैसे कोई मरीचिका को देखे; इसी प्रकार जो लोक को देखता है, उसे मृत्युराज नहीं देख पाता।' သတ္တ နာမ ကိန္တိပဉှဝဏ္ဏနာ 'सात क्या है?' इस प्रश्न की व्याख्या। ဣမိနာပိ ပဉှဗျာကရဏေန အာရဒ္ဓစိတ္တော သတ္ထာ ဥတ္တရိံ ပဉှံ ပုစ္ဆတိ သတ္တ နာမ ကိန္တိ? ထေရော ကိဉ္စာပိ မဟာပဉှဗျာကရဏေ သတ္တ ဝိညာဏဋ္ဌိတိယော ဝုတ္တာ, အပိစ ခေါ ပန ယေသု ဓမ္မေသု သုဘာဝိတစိတ္တော ဘိက္ခု ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ, တေ ဒဿေန္တော ‘‘သတ္တ ဗောဇ္ဈင်္ဂါ’’တိ ဝိဿဇ္ဇေတိ. အယမ္ပိ စတ္ထော ဘဂဝတာ အနုမတော ဧဝ. ယထာဟ – इस प्रश्न के उत्तर से भी संतुष्ट चित्त वाले शास्ता (बुद्ध) अगला प्रश्न पूछते हैं—'सात क्या है?' यद्यपि 'महाप्रश्न' की व्याख्या में सात 'विज्ञान-स्थिति' (viññāṇaṭṭhiti) कही गई हैं, फिर भी स्थविर उन धर्मों को दिखाते हुए, जिनमें भली-भांति भावित चित्त वाला भिक्षु दुःख का अंत करने वाला होता है, 'सात बोध्यंग' (satta bojjhaṅgā) ऐसा उत्तर देते हैं। यह अर्थ भी भगवान द्वारा अनुमोदित ही है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘ပဏ္ဍိတာ ဂဟပတယော ကဇင်္ဂလိကာ ဘိက္ခုနီ, မဟာပညာ ဂဟပတယော ကဇင်္ဂလိကာ ဘိက္ခုနီ, မဉ္စေပိ တုမှေ ဂဟပတယော ဥပသင်္ကမိတွာ ဧတမတ္ထံ ပဋိပုစ္ဆေယျာထ, အဟမ္ပိ စေတံ ဧဝမေဝ ဗျာကရေယျံ, ယထာ တံ ကဇင်္ဂလိကာယ ဘိက္ခုနိယာ ဗျာကတ’’န္တိ (အ. နိ. ၁၀.၂၈). 'हे गृहपतियों! कजंगला की भिक्षुणी पंडित है; हे गृहपतियों! कजंगला की भिक्षुणी महाप्रज्ञावान है। यदि तुम गृहपति मेरे पास आकर भी यही अर्थ पूछते, तो मैं भी इसका वैसा ही उत्तर देता जैसा कजंगला की भिक्षुणी ने दिया है।' တာယ စ ဧဝံ ဗျာကတံ – और उसके द्वारा इस प्रकार उत्तर दिया गया— ‘‘သတ္တသု, အာဝုသော, ဓမ္မေသု ဘိက္ခု သမ္မာ သုဘာဝိတစိတ္တော…ပေ… ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ကတမေသု သတ္တသု? သတ္တသု ဗောဇ္ဈင်္ဂေသု. ဣမေသု ခေါ, အာဝုသော, သတ္တသု ဓမ္မေသု ဘိက္ခု သမ္မာ သုဘာဝိတစိတ္တော…ပေ… ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ‘သတ္တ ပဉှာ သတ္တ ဥဒ္ဒေသာ သတ္တ ဝေယျာကရဏာနီ’တိ ဣတိ ယံ တံ ဝုတ္တံ ဘဂဝတာ, ဣဒမေတံ ပဋိစ္စ ဝုတ္တ’’န္တိ (အ. နိ. ၁၀.၂၈). 'आयुष्मन्! सात धर्मों में भली-भांति भावित चित्त वाला भिक्षु... दुःख का अंत करने वाला होता है। किन सात में? सात बोध्यंगों में। आयुष्मन्! इन सात धर्मों में भली-भांति भावित चित्त वाला भिक्षु... दुःख का अंत करने वाला होता है। 'सात प्रश्न, सात उद्देश, सात व्याकरण'—भगवान द्वारा जो यह कहा गया है, वह इसी के संदर्भ में कहा गया है।' ဧဝမယမတ္ထော ဘဂဝတာ အနုမတော ဧဝါတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. इस प्रकार, यह अर्थ भगवान द्वारा अनुमोदित ही है, ऐसा समझना चाहिए। တတ္ထ သတ္တာတိ ဦနာဓိကနိဝါရဏဂဏနပရိစ္ဆေဒေါ. ဗောဇ္ဈင်္ဂါတိ သတိအာဒီနံ ဓမ္မာနမေတံ အဓိဝစနံ. တတြာယံ ပဒတ္ထော – ဧတာယ လောကိယလောကုတ္တရမဂ္ဂက္ခဏေ ဥပ္ပဇ္ဇမာနာယ လီနုဒ္ဓစ္စပတိဋ္ဌာနာယူဟနကာမသုခတ္တကိလမထာနုယောဂဥစ္ဆေဒသဿတာဘိနိဝေသာဒိ- အနေကုပဒ္ဒဝပ္ပဋိပက္ခဘူတာယ သတိဓမ္မဝိစယဝီရိယပီတိပ္ပဿဒ္ဓိသမာဓုပေက္ခာသင်္ခါတာယ ဓမ္မသာမဂ္ဂိယာ အရိယသာဝကော ဗုဇ္ဈတီတိ ကတွာ ဗောဓိ, ကိလေသသန္တာနနိဒ္ဒါယ ဥဋ္ဌဟတိ, စတ္တာရိ ဝါ အရိယသစ္စာနိ ပဋိဝိဇ္ဈတိ, နိဗ္ဗာနမေဝ ဝါ သစ္ဆိကရောတီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ယထာဟ – ‘‘သတ္တ ဗောဇ္ဈင်္ဂေ ဘာဝေတွာ အနုတ္တရံ သမ္မာသမ္ဗောဓိံ [Pg.71] အဘိသမ္ဗုဒ္ဓေါ’’တိ. ယထာဝုတ္တပ္ပကာရာယ ဝါ ဧတာယ ဓမ္မသာမဂ္ဂိယာ ဗုဇ္ဈတီတိ ကတွာ အရိယသာဝကောပိ ဗောဓိ. ဣတိ တဿာ ဓမ္မသာမဂ္ဂိသင်္ခါတာယ ဗောဓိယာ အင်္ဂဘူတတ္တာ ဗောဇ္ဈင်္ဂါ ဈာနင်္ဂမဂ္ဂင်္ဂါနိ ဝိယ, တဿ ဝါ ဗောဓီတိ လဒ္ဓဝေါဟာရဿ အရိယသာဝကဿ အင်္ဂဘူတတ္တာပိ ဗောဇ္ဈင်္ဂါ သေနင်္ဂရထင်္ဂါဒယော ဝိယ. वहाँ 'सात' (सत्त) शब्द न्यूनता या अधिकता का निवारण करने वाली संख्या का परिच्छेद है। 'बोध्यंग' (bojjhaṅgā) स्मृति आदि धर्मों का नाम है। वहाँ पद का अर्थ यह है—लौकिक और लोकोत्तर मार्ग के क्षण में उत्पन्न होने वाली, तथा स्त्यान-मृद्ध और औद्धत्य की स्थिति और प्रयत्न, कामसुख और आत्मक्लेश का अनुयोग, तथा उच्छेद और शाश्वत दृष्टि के अभिनिवेश आदि अनेक उपद्रवों की प्रतिपक्षभूत, स्मृति, धर्म-विचय, वीर्य, प्रीति, प्रश्रब्धि, समाधि और उपेक्षा नामक धर्म-सामग्री के द्वारा आर्य श्रावक जागता (बुझति) है, इसलिए इसे 'बोधि' कहते हैं; अथवा क्लेशों की संतति रूपी निद्रा से उठता है, अथवा चार आर्य सत्यों का प्रतिवेध (साक्षात्कार) करता है, अथवा निर्वाण का ही साक्षात्कार करता है—यह अर्थ है। जैसा कि कहा गया है—'सात बोध्यंगों की भावना कर अनुत्तर सम्यक-संबोधि को प्राप्त किया।' अथवा, पूर्वोक्त प्रकार की इस धर्म-सामग्री के द्वारा वह जागता है, इसलिए आर्य श्रावक भी 'बोधि' है। इस प्रकार, धर्म-सामग्री रूपी उस बोधि के अंग होने के कारण, ध्यान के अंगों (ध्यानांग) और मार्ग के अंगों (मार्गांग) की तरह ये 'बोध्यंग' हैं। अथवा, 'बोधि' नाम प्राप्त उस आर्य श्रावक के अंग होने के कारण भी, सेना के अंगों (सेनांग) या रथ के अंगों (रथांग) की तरह ये 'बोध्यंग' हैं। အပိစ ‘‘ဗောဇ္ဈင်္ဂါတိ ကေနဋ္ဌေန ဗောဇ္ဈင်္ဂါ? ဗောဓာယ သံဝတ္တန္တီတိ ဗောဇ္ဈင်္ဂါ, ဗုဇ္ဈန္တီတိ ဗောဇ္ဈင်္ဂါ, အနုဗုဇ္ဈန္တီတိ ဗောဇ္ဈင်္ဂါ, ပဋိဗုဇ္ဈန္တီတိ ဗောဇ္ဈင်္ဂါ, သမ္ဗုဇ္ဈန္တီတိ ဗောဇ္ဈင်္ဂါ’’တိ (ပဋိ. မ. ၂.၁၇) ဣမိနာပိ ပဋိသမ္ဘိဒါယံ ဝုတ္တေန ဝိဓိနာ ဗောဇ္ဈင်္ဂါနံ ဗောဇ္ဈင်္ဂဋ္ဌော ဝေဒိတဗ္ဗော. ဧဝမိမေ သတ္တ ဗောဇ္ဈင်္ဂေ ဘာဝေန္တော ဗဟုလီကရောန္တော န စိရဿေဝ ဧကန္တနိဗ္ဗိဒါဒိဂုဏပဋိလာဘီ ဟောတိ, တေန ဒိဋ္ဌေဝ ဓမ္မေ ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတီတိ ဝုစ္စတိ. ဝုတ္တဉ္စေတံ ဘဂဝတာ – इसके अतिरिक्त, 'बोध्यंग किस अर्थ में बोध्यंग हैं? संबोधि (निर्वाण) के लिए संवर्तित होते हैं, इसलिए बोध्यंग हैं; जानते हैं, इसलिए बोध्यंग हैं; अनुबोध करते हैं, इसलिए बोध्यंग हैं; प्रतिबोध करते हैं, इसलिए बोध्यंग हैं; संबुद्ध होते हैं, इसलिए बोध्यंग हैं'—प्रतिसंभिदामग्ग में कहे गए इस विधान से भी बोध्यंगों का 'बोध्यंग-अर्थ' समझना चाहिए। इस प्रकार इन सात बोध्यंगों की भावना और प्रचुर अभ्यास करते हुए, वह शीघ्र ही एकांत निर्वेद (वैराग्य) आदि गुणों को प्राप्त करने वाला होता है, इसलिए कहा जाता है कि वह 'इसी जन्म (दृष्ट धर्म) में दुःख का अंत करने वाला होता है'। ‘‘သတ္တိမေ, ဘိက္ခဝေ, ဗောဇ္ဈင်္ဂါ ဘာဝိတာ ဗဟုလီကတာ ဧကန္တနိဗ္ဗိဒါယ ဝိရာဂါယ နိရောဓာယ ဥပသမာယ အဘိညာယ သမ္ဗောဓာယ နိဗ္ဗာနာယ သံဝတ္တန္တီ’’တိ (သံ. နိ. ၅.၂၀၁). भगवान ने यह कहा है—'हे भिक्षुओं! ये सात बोध्यंग भावित और प्रचुर अभ्यास किए जाने पर एकांत निर्वेद, विराग, निरोध, उपशम, अभिज्ञा, संबोधि और निर्वाण के लिए संवर्तित होते हैं'। အဋ္ဌ နာမ ကိန္တိပဉှဝဏ္ဏနာ 'आठ क्या है?' इस प्रश्न की व्याख्या। ဧဝံ ဣမိနာပိ ပဉှဗျာကရဏေန အာရဒ္ဓစိတ္တော သတ္ထာ ဥတ္တရိံ ပဉှံ ပုစ္ဆတိ အဋ္ဌ နာမ ကိန္တိ? ထေရော ကိဉ္စာပိ မဟာပဉှဗျာကရဏေ အဋ္ဌ လောကဓမ္မာ ဝုတ္တာ, အပိစ ခေါ ပန ယေသု ဓမ္မေသု သုဘာဝိတစိတ္တော ဘိက္ခု ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ, တေ ဒဿေန္တော ‘‘အရိယာနိ အဋ္ဌ မဂ္ဂင်္ဂါနီ’’တိ အဝတွာ ယသ္မာ အဋ္ဌင်္ဂဝိနိမုတ္တော မဂ္ဂေါ နာမ နတ္ထိ, အဋ္ဌင်္ဂမတ္တမေဝ တု မဂ္ဂေါ, တသ္မာ တမတ္ထံ သာဓေန္တော ဒေသနာဝိလာသေန အရိယော အဋ္ဌင်္ဂိကော မဂ္ဂေါတိ ဝိဿဇ္ဇေတိ. ဘဂဝတာပိ စာယမတ္ထော ဒေသနာနယော စ အနုမတော ဧဝ. ယထာဟ – इस प्रकार, इस प्रश्न के उत्तर से भी संतुष्ट चित्त वाले शास्ता अगला प्रश्न पूछते हैं—'आठ क्या है?' यद्यपि 'महाप्रश्न' की व्याख्या में आठ 'लोक-धर्म' कहे गए हैं, फिर भी स्थविर उन धर्मों को दिखाते हुए, जिनमें भली-भांति भावित चित्त वाला भिक्षु दुःख का अंत करने वाला होता है, 'आर्य आठ मार्गांग' ऐसा न कहकर, क्योंकि आठ अंगों से मुक्त कोई मार्ग नहीं है और आठ अंगों का समूह ही मार्ग है, इसलिए उस अर्थ को सिद्ध करते हुए देशना के विलास (सौन्दर्य) के लिए 'आर्य अष्टांगिक मार्ग' ऐसा उत्तर देते हैं। भगवान द्वारा भी यह अर्थ और देशना की विधि अनुमोदित ही है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘ပဏ္ဍိတာ ဂဟပတယော ကဇင်္ဂလိကာ ဘိက္ခုနီ…ပေ… အဟမ္ပိ ဧဝမေဝ ဗျာကရေယျံ, ယထာ တံ ကဇင်္ဂလိကာယ ဘိက္ခုနိယာ ဗျာကတ’’န္တိ (အ. နိ. ၁၀.၂၈). 'हे गृहपतियों! कजंगला की भिक्षुणी पंडित है... मैं भी इसका वैसा ही उत्तर देता जैसा कजंगला की भिक्षुणी ने दिया है।' တာယ [Pg.72] စ ဧဝံ ဗျာကတံ – और उसके द्वारा इस प्रकार उत्तर दिया गया— ‘‘အဋ္ဌသု, အာဝုသော, ဓမ္မေသု ဘိက္ခု သမ္မာ သုဘာဝိတစိတ္တော…ပေ… ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ‘အဋ္ဌ ပဉှာ, အဋ္ဌ ဥဒ္ဒေသာ, အဋ္ဌ ဝေယျာကရဏာနီ’တိ ဣတိ ယံ တံ ဝုတ္တံ ဘဂဝတာ, ဣဒမေတံ ပဋိစ္စ ဝုတ္တ’’န္တိ (အ. နိ. ၁၀.၂၈). 'आयुष्मन्! आठ धर्मों में भली-भांति भावित चित्त वाला भिक्षु... दुःख का अंत करने वाला होता है। 'आठ प्रश्न, आठ उद्देश, आठ व्याकरण'—भगवान द्वारा जो यह कहा गया है, वह इसी के संदर्भ में कहा गया है।' ဧဝမယံ အတ္ထော စ ဒေသနာနယော စ ဘဂဝတာ အနုမတော ဧဝါတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. इस प्रकार, यह अर्थ और देशना की विधि भगवान द्वारा अनुमोदित ही है, ऐसा समझना चाहिए। တတ္ထ အရိယောတိ နိဗ္ဗာနတ္ထိကေဟိ အဘိဂန္တဗ္ဗော, အပိစ အာရကာ ကိလေသေဟိ ဝတ္တနတော, အရိယဘာဝကရဏတော, အရိယဖလပဋိလာဘတော စာပိ အရိယောတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. အဋ္ဌ အင်္ဂါနိ အဿာတိ အဋ္ဌင်္ဂိကော. သွာယံ စတုရင်္ဂိကာ ဝိယ သေနာ, ပဉ္စင်္ဂိကံ ဝိယ စ တူရိယံ အင်္ဂဝိနိဗ္ဘောဂေန အနုပလဗ္ဘသဘာဝတော အင်္ဂမတ္တမေဝါတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. မဂ္ဂတိ ဣမိနာ နိဗ္ဗာနံ, သယံ ဝါ မဂ္ဂတိ, ကိလေသေ မာရေန္တော ဝါ ဂစ္ဆတီတိ မဂ္ဂေါ. वहाँ 'अरिओ' (आर्य) का अर्थ है—निर्वाण के इच्छुक व्यक्तियों द्वारा प्राप्त करने योग्य। इसके अतिरिक्त, क्लेशों से दूर होने के कारण, आर्य-भाव उत्पन्न करने के कारण और आर्य-फल की प्राप्ति कराने के कारण भी इसे 'आर्य' समझना चाहिए। इसके आठ अंग हैं, इसलिए यह 'अष्टांगिक' है। जैसे चार अंगों वाली सेना या पाँच अंगों वाले वाद्ययंत्र होते हैं, वैसे ही अंगों के पृथक्करण से स्वतंत्र स्वभाव न होने के कारण इसे केवल अंगों का समूह ही समझना चाहिए। इसके द्वारा निर्वाण की खोज की जाती है, या यह स्वयं निर्वाण की खोज करता है, अथवा क्लेशों को मारते हुए (निर्वाण की ओर) जाता है, इसलिए यह 'मार्ग' है। ဧဝမဋ္ဌပ္ပဘေဒဉ္စိမံ အဋ္ဌင်္ဂိကံ မဂ္ဂံ ဘာဝေန္တော ဘိက္ခု အဝိဇ္ဇံ ဘိန္ဒတိ, ဝိဇ္ဇံ ဥပ္ပာဒေတိ, နိဗ္ဗာနံ သစ္ဆိကရောတိ, တေန ဒိဋ္ဌေဝ ဓမ္မေ ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတီတိ ဝုစ္စတိ. ဝုတ္တဉှေတံ – इस प्रकार, आठ प्रकार के भेदों वाले इस अष्टांगिक मार्ग की भावना करते हुए भिक्षु अविद्या का विनाश करता है, विद्या (ज्ञान) उत्पन्न करता है, निर्वाण का साक्षात्कार करता है; और उसके द्वारा इसी जन्म में दुखों का अंत करने वाला होता है—ऐसा कहा जाता है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘သေယျထာပိ, ဘိက္ခဝေ, သာလိသူကံ ဝါ ယဝသူကံ ဝါ သမ္မာ ပဏိဟိတံ ဟတ္ထေန ဝါ ပါဒေန ဝါ အက္ကန္တံ ဟတ္ထံ ဝါ ပါဒံ ဝါ ဘေစ္ဆတိ, လောဟိတံ ဝါ ဥပ္ပာဒေဿတီတိ ဌာနမေတံ ဝိဇ္ဇတိ. တံ ကိဿ ဟေတု? သမ္မာ ပဏိဟိတတ္တာ, ဘိက္ခဝေ, သူကဿ, ဧဝမေဝ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, သော ဝတ ဘိက္ခု သမ္မာ ပဏိဟိတာယ ဒိဋ္ဌိယာ သမ္မာ ပဏိဟိတာယ မဂ္ဂဘာဝနာယ အဝိဇ္ဇံ ဘေစ္ဆတိ, ဝိဇ္ဇံ ဥပ္ပာဒေဿတိ, နိဗ္ဗာနံ သစ္ဆိကရိဿတီတိ ဌာနမေတံ ဝိဇ္ဇတီ’’တိ (အ. နိ. ၁.၄၂). “भिक्षुओं! जैसे शाली (धान) की नोक या जौ की नोक यदि ठीक से रखी हो, और उस पर हाथ या पैर से प्रहार किया जाए, तो वह हाथ या पैर को छेद देगी या रक्त निकाल देगी—यह संभव है। वह किस कारण से? भिक्षुओं! क्योंकि वह नोक ठीक से रखी हुई है। इसी प्रकार, भिक्षुओं! वह भिक्षु निश्चित रूप से सम्यक् रूप से प्रतिष्ठित दृष्टि और सम्यक् रूप से प्रतिष्ठित मार्ग-भावना के द्वारा अविद्या को नष्ट करेगा, विद्या उत्पन्न करेगा और निर्वाण का साक्षात्कार करेगा—यह संभव है।” နဝ နာမ ကိန္တိပဉှဝဏ္ဏနာ नौ क्या है? - इस प्रश्न की व्याख्या। ဣမိနာပိ ပဉှဗျာကရဏေန အာရဒ္ဓစိတ္တော သတ္ထာ ဥတ္တရိံ ပဉှံ ပုစ္ဆတိ နဝ နာမ ကိန္တိ? ထေရော နဝဣတိ ပစ္စနုဘာသိတွာ ‘‘သတ္တာဝါသာ’’တိ ဝိဿဇ္ဇေတိ. တတ္ထ နဝါတိ ဂဏနပရိစ္ဆေဒေါ. သတ္တာတိ ဇီဝိတိန္ဒြိယပ္ပဋိဗဒ္ဓေ ခန္ဓေ [Pg.73] ဥပါဒါယ ပညတ္တာ ပါဏိနော ပဏ္ဏတ္တိ ဝါ. အာဝါသာတိ အာဝသန္တိ ဧတေသူတိ အာဝါသာ, သတ္တာနံ အာဝါသာ သတ္တာဝါသာ. ဧသ ဒေသနာမဂ္ဂေါ, အတ္ထတော ပန နဝဝိဓာနံ သတ္တာနမေတံ အဓိဝစနံ. ယထာဟ – इस प्रश्न के उत्तर से भी प्रसन्नचित्त होकर शास्ता (बुद्ध) अगला प्रश्न पूछते हैं—'नौ क्या है?' स्थविर 'नौ' शब्द को दोहराकर उत्तर देते हैं—'सत्त्वावास' (प्राणियों के नौ निवास स्थान)। वहाँ 'नौ' गणना का परिच्छेद है। 'सत्त्व' का अर्थ है—जीवितेन्द्रिय से सम्बद्ध स्कन्धों के आधार पर प्रज्ञप्त प्राणी या प्रज्ञप्ति। 'आवास' का अर्थ है—जहाँ वे निवास करते हैं, वे आवास हैं; प्राणियों के आवास 'सत्त्वावास' कहलाते हैं। यह देशना का मार्ग है, किन्तु अर्थ की दृष्टि से यह नौ प्रकार के प्राणियों का ही नाम है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘သန္တာဝုသော, သတ္တာ နာနတ္တကာယာ နာနတ္တသညိနော, သေယျထာပိ မနုဿာ ဧကစ္စေ စ ဒေဝါ ဧကစ္စေ စ ဝိနိပါတိကာ, အယံ ပဌမော သတ္တာဝါသော. သန္တာဝုသော, သတ္တာ နာနတ္တကာယာ ဧကတ္တသညိနော, သေယျထာပိ, ဒေဝါ ဗြဟ္မကာယိကာ, ပဌမာဘိနိဗ္ဗတ္တာ, အယံ ဒုတိယော သတ္တာဝါသော. သန္တာဝုသော, သတ္တာ ဧကတ္တကာယာ နာနတ္တသညိနော, သေယျထာပိ, ဒေဝါ အာဘဿရာ, အယံ တတိယော သတ္တာဝါသော. သန္တာဝုသော, သတ္တာ ဧကတ္တကာယာ ဧကတ္တသညိနော, သေယျထာပိ, ဒေဝါ သုဘကိဏှာ, အယံ စတုတ္ထော သတ္တာဝါသော. သန္တာဝုသော, သတ္တာ အသညိနော အပ္ပဋိသံဝေဒိနော, သေယျထာပိ, ဒေဝါ အသညသတ္တာ, အယံ ပဉ္စမော သတ္တာဝါသော. သန္တာဝုသော, သတ္တာ သဗ္ဗသော ရူပသညာနံ…ပေ… အာကာသာနဉ္စာယတနူပဂါ, အယံ ဆဋ္ဌော သတ္တာဝါသော. သန္တာဝုသော, သတ္တာ…ပေ… ဝိညာဏဉ္စာယတနူပဂါ, အယံ သတ္တမော သတ္တာဝါသော. သန္တာဝုသော, သတ္တာ…ပေ… အာကိဉ္စညာယတနူပဂါ, အယံ အဋ္ဌမော သတ္တာဝါသော. သန္တာဝုသော, သတ္တာ…ပေ… နေဝသညာနာသညာယတနူပဂါ, အယံ နဝမော သတ္တာဝါသော’’တိ (ဒီ. နိ. ၃.၃၄၁). “आयुष्मन्! ऐसे प्राणी हैं जिनके शरीर भिन्न हैं और संज्ञाएँ (विचार) भी भिन्न हैं, जैसे मनुष्य, कुछ देव और कुछ विनिपातिक (असुर आदि); यह पहला सत्त्वावास है। आयुष्मन्! ऐसे प्राणी हैं जिनके शरीर भिन्न हैं किन्तु संज्ञा एक ही है, जैसे प्रथम कल्प में उत्पन्न ब्रह्मकायिक देव; यह दूसरा सत्त्वावास है। आयुष्मन्! ऐसे प्राणी हैं जिनके शरीर एक समान हैं किन्तु संज्ञाएँ भिन्न हैं, जैसे आभास्वर देव; यह तीसरा सत्त्वावास है। आयुष्मन्! ऐसे प्राणी हैं जिनके शरीर एक समान हैं और संज्ञा भी एक ही है, जैसे शुभकृत्स्न देव; यह चौथा सत्त्वावास है। आयुष्मन्! ऐसे प्राणी हैं जो असंज्ञी (चेतना रहित) और वेदनारहित हैं, जैसे असंज्ञी-सत्त्व देव; यह पाँचवाँ सत्त्वावास है। आयुष्मन्! ऐसे प्राणी हैं जो पूर्णतः रूप-संज्ञाओं का अतिक्रमण कर... आकाशानन्त्यायतन को प्राप्त हैं; यह छठा सत्त्वावास है। आयुष्मन्! ऐसे प्राणी हैं जो... विज्ञानानन्त्यायतन को प्राप्त हैं; यह सातवाँ सत्त्वावास है। आयुष्मन्! ऐसे प्राणी हैं जो... आकिंचन्यायतन को प्राप्त हैं; यह आठवाँ सत्त्वावास है। आयुष्मन्! ऐसे प्राणी हैं जो... नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन को प्राप्त हैं; यह नौवाँ सत्त्वावास है।” ပုရိမနယေနေဝ စေတ္ထ ‘‘နဝ သတ္တာဝါသာ’’တိ ဝုတ္တံ, န အညေသံ နဝန္နမဘာဝတော. ယထာဟ – पूर्व पद्धति के अनुसार ही यहाँ 'नौ सत्त्वावास' कहा गया है, ऐसा नहीं है कि अन्य नौ प्रकार के धर्म विद्यमान नहीं हैं। जैसा कि कहा गया है— ‘‘နဝသု, ဘိက္ခဝေ, ဓမ္မေသု ဘိက္ခု သမ္မာ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော…ပေ… ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ကတမေသု နဝသု? နဝသု သတ္တာဝါသေသု. ဣမေသု ခေါ, ဘိက္ခဝေ, နဝသု ဓမ္မေသု ဘိက္ခု သမ္မာ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော…ပေ… ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ‘နဝ ပဉှာ, နဝ ဥဒ္ဒေသာ, နဝ ဝေယျာကရဏာနီ’တိ ဣတိ ယံ တံ ဝုတ္တံ, ဣဒမေတံ ပဋိစ္စ ဝုတ္တ’’န္တိ (အ. နိ. ၁၀.၂၇). “भिक्षुओं! नौ धर्मों में सम्यक् रूप से निर्वेद (वैराग्य) प्राप्त करता हुआ भिक्षु... दुखों का अंत करने वाला होता है। किन नौ में? नौ सत्त्वावासों में। भिक्षुओं! इन नौ धर्मों में सम्यक् रूप से निर्वेद प्राप्त करता हुआ भिक्षु... दुखों का अंत करने वाला होता है। 'नौ प्रश्न, नौ उद्देश, नौ व्याकरण (व्याख्या)'—यह जो कहा गया है, वह इसी के संदर्भ में कहा गया है।” ဧတ္ထ [Pg.74] စ ‘‘နဝ ဓမ္မာ ပရိညေယျာ. ကတမေ နဝ? နဝ သတ္တာဝါသာ’’တိ (ဒီ. နိ. ၃.၃၅၉) ဝစနတော နဝသု သတ္တာဝါသေသု ဉာတပရိညာယ ဓုဝသုဘသုခတ္တဘာဝဒဿနံ ပဟာယ သုဒ္ဓသင်္ခါရပုဉ္ဇမတ္တဒဿနေန နိဗ္ဗိန္ဒမာနော တီရဏပရိညာယ အနိစ္စာနုပဿနေန ဝိရဇ္ဇမာနော ဒုက္ခာနုပဿနေန ဝိမုစ္စမာနော အနတ္တာနုပဿနေန သမ္မာ ပရိယန္တဒဿာဝီ ပဟာနပရိညာယ သမ္မတ္တမဘိသမေစ္စ ဒိဋ္ဌေဝ ဓမ္မေ ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. တေနေတံ ဝုတ္တံ – और यहाँ 'नौ धर्म परिज्ञेय (भली-भाँति जानने योग्य) हैं। वे नौ कौन से हैं? नौ सत्त्वावास'—इस वचन के अनुसार, नौ सत्त्वावासों में 'ज्ञात-परिज्ञा' के द्वारा नित्य, शुभ, सुख और आत्म-भाव के दर्शन को त्यागकर, केवल शुद्ध संस्कारों के समूह मात्र को देखने से निर्वेद प्राप्त करता हुआ; 'तीरण-परिज्ञा' के द्वारा अनित्यानुपश्यना से विरक्त होता हुआ, दुःखानुपश्यना से विमुक्त होता हुआ, और अनात्मानुपश्यना से सम्यक् रूप से अंत (निर्वाण) को देखने वाला होकर; 'प्रहाण-परिज्ञा' के द्वारा शांति (निर्वाण) का साक्षात्कार कर इसी जन्म में दुखों का अंत करने वाला होता है। इसीलिए यह कहा गया है— ‘‘နဝသု, ဘိက္ခဝေ, ဓမ္မေသု ဘိက္ခု သမ္မာ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော…ပေ… ဒိဋ္ဌေဝ ဓမ္မေ ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ကတမေသု နဝသု? နဝသု သတ္တာဝါသေသူ’’တိ (အ. နိ. ၁၀.၂၇). “भिक्षुओं! नौ धर्मों में सम्यक् रूप से निर्वेद प्राप्त करता हुआ भिक्षु... इसी जन्म में दुखों का अंत करने वाला होता है। किन नौ में? नौ सत्त्वावासों में।” ဒသ နာမ ကိန္တိပဉှဝဏ္ဏနာ दस क्या है? - इस प्रश्न की व्याख्या। ဧဝံ ဣမိနာပိ ပဉှဗျာကရဏေန အာရဒ္ဓစိတ္တော သတ္ထာ ဥတ္တရိံ ပဉှံ ပုစ္ဆတိ ဒသ နာမ ကိန္တိ? တတ္ထ ကိဉ္စာပိ ဣမဿ ပဉှဿ ဣတော အညတြ ဝေယျာကရဏေသု ဒသ အကုသလကမ္မပထာ ဝုတ္တာ. ယထာဟ – इस प्रकार, इस प्रश्न के उत्तर से भी प्रसन्नचित्त होकर शास्ता अगला प्रश्न पूछते हैं—'दस क्या है?' वहाँ यद्यपि इस प्रश्न के अन्य व्याख्याओं में (अन्य उत्तर भी हैं), तथापि यहाँ दस अकुशल कर्मपथ कहे गए हैं। जैसा कि कहा गया है— ‘‘ဒသသု, ဘိက္ခဝေ, ဓမ္မေသု ဘိက္ခု သမ္မာ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော…ပေ… ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ကတမေသု ဒသသု? ဒသသု အကုသလကမ္မပထေသု. ဣမေသု ခေါ, ဘိက္ခဝေ, ဒသသု ဓမ္မေသု ဘိက္ခု သမ္မာ နိဗ္ဗိန္ဒမာနော…ပေ. … ဒုက္ခဿန္တကရော ဟောတိ. ‘ဒသ ပဉှာ ဒသ ဥဒ္ဒေသာ ဒသ ဝေယျာကရဏာနီ’တိ ဣတိ ယံ တံ ဝုတ္တံ, ဣဒမေတံ ပဋိစ္စ ဝုတ္တ’’န္တိ (အ. နိ. ၁၀.၂၇). “भिक्षुओं! दस धर्मों में सम्यक् रूप से निर्वेद प्राप्त करता हुआ भिक्षु... दुखों का अंत करने वाला होता है। किन दस में? दस अकुशल कर्मपथों में। भिक्षुओं! इन दस धर्मों में सम्यक् रूप से निर्वेद प्राप्त करता हुआ भिक्षु... दुखों का अंत करने वाला होता है। 'दस प्रश्न, दस उद्देश, दस व्याकरण'—यह जो कहा गया है, वह इसी के संदर्भ में कहा गया है।” ဣဓ ပန ယသ္မာ အယမာယသ္မာ အတ္တာနံ အနုပနေတွာ အညံ ဗျာကာတုကာမော, ယသ္မာ ဝါ ဣမိနာ ပရိယာယေန ဗျာကတံ သုဗျာကတမေဝ ဟောတိ, တသ္မာ ယေဟိ ဒသဟိ အင်္ဂေဟိ သမန္နာဂတော အရဟာတိ ပဝုစ္စတိ, တေသံ အဓိဂမံ ဒီပေန္တော ဒသဟင်္ဂေဟိ သမန္နာဂတော အရဟာတိ ပဝုစ္စတီတိ ပုဂ္ဂလာဓိဋ္ဌာနာယ ဒေသနာယ ဝိဿဇ္ဇေတိ. ယတော ဧတ္ထ ယေဟိ ဒသဟိ အင်္ဂေဟိ သမန္နာဂတော အရဟာတိ ပဝုစ္စတိ, တာနိ ဒသင်္ဂါနိ ‘‘ဒသ နာမ ကိ’’န္တိ ပုဋ္ဌေန ထေရေန နိဒ္ဒိဋ္ဌာနီတိ ဝေဒိတဗ္ဗာနိ. တာနိ စ ဒသ – यहाँ, क्योंकि यह आयुष्मान (सोपाक) स्वयं को आगे न लाकर अन्य (अर्हत्व फल) की घोषणा करना चाहते हैं, अथवा क्योंकि इस विधि से की गई व्याख्या भली-भांति की गई व्याख्या होती है, इसलिए जिन दस अंगों से युक्त व्यक्ति को 'अर्हन्त' कहा जाता है, उनकी प्राप्ति को दर्शाते हुए वे 'दस अंगों से युक्त व्यक्ति अर्हन्त कहलाता है' इस प्रकार पुग्गलाधिट्ठान (पुद्गल-अधिष्ठान) देशना के माध्यम से उत्तर देते हैं। यहाँ, जिन दस अंगों से युक्त होने पर 'अर्हन्त' कहा जाता है, उन दस अंगों को 'दस क्या हैं' इस प्रश्न के उत्तर में स्थविर द्वारा निर्दिष्ट किया गया है, ऐसा समझना चाहिए। वे दस ये हैं - ‘‘အသေခေါ အသေခေါတိ, ဘန္တေ, ဝုစ္စတိ, ကိတ္တာဝတာ နု ခေါ, ဘန္တေ, ဘိက္ခု အသေခေါ ဟောတီတိ? ဣဓ, ဘိက္ခဝေ, ဘိက္ခု အသေခါယ [Pg.75] သမ္မာဒိဋ္ဌိယာ သမန္နာဂတော ဟောတိ, အသေခေန သမ္မာသင်္ကပ္ပေန သမန္နာဂတော ဟောတိ, အသေခါယ သမ္မာဝါစာယ သမန္နာဂတော ဟောတိ, အသေခေန သမ္မာကမ္မန္တေန သမန္နာဂတော ဟောတိ, အသေခေန သမ္မာအာဇီဝေန သမန္နာဂတော ဟောတိ, အသေခေန သမ္မာဝါယာမေန သမန္နာဂတော ဟောတိ, အသေခါယ သမ္မာသတိယာ သမန္နာဂတော ဟောတိ, အသေခေန သမ္မာသမာဓိနာ သမန္နာဂတော ဟောတိ, အသေခေန သမ္မာဉာဏေန သမန္နာဂတော ဟောတိ, အသေခါယ သမ္မာဝိမုတ္တိယာ သမန္နာဂတော ဟောတိ. ဧဝံ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, ဘိက္ခု အသေခေါ ဟောတီ’’တိ (အ. နိ. ၁၀.၁၁၁). – "भन्ते! 'अशैक्ष, अशैक्ष' कहा जाता है; भन्ते! कितने (गुणों) से युक्त होने पर भिक्षु 'अशैक्ष' होता है? भिक्षुओं! यहाँ भिक्षु अशैक्ष सम्यक्-दृष्टि से युक्त होता है, अशैक्ष सम्यक्-संकल्प से युक्त होता है, अशैक्ष सम्यक्-वाचा से युक्त होता है, अशैक्ष सम्यक्-कर्मान्त से युक्त होता है, अशैक्ष सम्यक्-आजीव से युक्त होता है, अशैक्ष सम्यक्-व्यायाम से युक्त होता है, अशैक्ष सम्यक्-स्मृति से युक्त होता है, अशैक्ष सम्यक्-समाधि से युक्त होता है, अशैक्ष सम्यक्-ज्ञान से युक्त होता है, और अशैक्ष सम्यक्-विमुक्ति से युक्त होता है। भिक्षुओं! इस प्रकार भिक्षु 'अशैक्ष' होता है।" (अं. नि. 10.111)। ဧဝမာဒီသု သုတ္တေသု ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗာနီတိ. इस प्रकार के सूत्रों में बताए गए तरीके से ही इन्हें समझना चाहिए। ပရမတ္ထဇောတိကာယ ခုဒ္ဒကပါဌ-အဋ္ဌကထာယ परमत्थजोतिका नामक खुद्दकपाठ-अट्ठकथा में। ကုမာရပဉှဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. कुमार-प्रश्न की व्याख्या समाप्त हुई। ၅. မင်္ဂလသုတ္တဝဏ္ဏနာ ५. मंगलसुत्त की व्याख्या। နိက္ခေပပ္ပယောဇနံ (सूत्र के) स्थापन का प्रयोजन। ဣဒါနိ ကုမာရပဉှာနန္တရံ နိက္ခိတ္တဿ မင်္ဂလသုတ္တဿ အတ္ထဝဏ္ဏနာက္ကမော အနုပ္ပတ္တော, တဿ ဣဓ နိက္ခေပပ္ပယောဇနံ ဝတွာ အတ္ထဝဏ္ဏနံ ကရိဿာမ. သေယျထိဒံ – ဣဒဉှိ သုတ္တံ ဣမိနာ အနုက္ကမေန ဘဂဝတာ အဝုတ္တမ္ပိ ယွာယံ သရဏဂမနေဟိ သာသနောတာရော, သိက္ခာပဒဒွတ္တိံသာကာရကုမာရပဉှေဟိ စ သီလသမာဓိပညာပ္ပဘေဒနယော ဒဿိတော, သဗ္ဗောပေသ ပရမမင်္ဂလဘူတော, ယတော မင်္ဂလတ္ထိကေန ဧတ္ထေဝ အဘိယောဂေါ ကာတဗ္ဗော, သော စဿ မင်္ဂလဘာဝေါ ဣမိနာ သုတ္တာနုသာရေန ဝေဒိတဗ္ဗောတိ ဒဿနတ္ထံ ဝုတ္တံ. अब कुमार-प्रश्न के बाद रखे गए मंगलसुत्त की अर्थ-व्याख्या का क्रम प्राप्त हुआ है। यहाँ उसके स्थापन का प्रयोजन बताकर हम अर्थ-व्याख्या करेंगे। वह इस प्रकार है - यद्यपि यह सूत्र भगवान द्वारा इस क्रम में नहीं कहा गया था, फिर भी चूँकि शरणागमन के माध्यम से शासन में प्रवेश, और शिक्षापद, बत्तीस अंगों (द्वत्तिंसाकार) तथा कुमार-प्रश्नों के माध्यम से शील, समाधि और प्रज्ञा के भेदों की जो विधि दिखाई गई है, वह सब परम मंगल स्वरूप है, इसलिए मंगल की इच्छा रखने वाले को यहीं विशेष प्रयास करना चाहिए। उसका वह मंगल-भाव इस सूत्र के अनुसार ही जाना जाना चाहिए, यह दिखाने के लिए यह कहा गया है। ဣဒမဿ ဣဓ နိက္ခေပပ္ပယောဇနံ. यहाँ इस (ग्रन्थ) में यह इसके स्थापन का प्रयोजन है। ပဌမမဟာသင်္ဂီတိကထာ प्रथम महासंगीति की कथा। ဧဝံ [Pg.76] နိက္ခိတ္တဿ ပနဿ အတ္ထဝဏ္ဏနတ္ထံ အယံ မာတိကာ – इस प्रकार रखे गए इस (सूत्र) की अर्थ-व्याख्या के लिए यह मातृका (विषय-सूची) है - ‘‘ဝုတ္တံ ယေန ယဒါ ယသ္မာ, စေတံ ဝတွာ ဣမံ ဝိဓိံ; ဧဝမိစ္စာဒိပါဌဿ, အတ္ထံ နာနပ္ပကာရတော. "किसके द्वारा, कब और किसलिए यह कहा गया - यह विधि बताकर; 'एवं' (इस प्रकार) आदि पाठ का अर्थ अनेक प्रकार से..." ‘‘ဝဏ္ဏယန္တော သမုဋ္ဌာနံ, ဝတွာ ယံ ယတ္ထ မင်္ဂလံ; ဝဝတ္ထပေတွာ တံ တဿ, မင်္ဂလတ္တံ ဝိဘာဝယေ’’တိ. "...व्याख्या करते हुए, समुत्थान (उत्पत्ति का कारण) बताकर, जहाँ जो मंगल है उसे निर्धारित कर, उसके मंगल-भाव को स्पष्ट करना चाहिए।" တတ္ထ ‘‘ဝုတ္တံ ယေန ယဒါ ယသ္မာ, စေတံ ဝတွာ ဣမံ ဝိဓိ’’န္တိ အယံ တာဝ အဒ္ဓဂါထာ ယဒိဒံ ‘‘ဧဝံ မေ သုတံ ဧကံ သမယံ ဘဂဝါ…ပေ… ဘဂဝန္တံ ဂါထာယ အဇ္ဈဘာသီ’’တိ, ဣဒံ ဝစနံ သန္ဓာယ ဝုတ္တာ. ဣဒဉှိ အနုဿဝဝသေန ဝုတ္တံ, သော စ ဘဂဝါ သယမ္ဘူ အနာစရိယကော, တသ္မာ နေဒံ တဿ ဘဂဝတော ဝစနံ အရဟတော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ. ယတော ဝတ္တဗ္ဗမေတံ ‘‘ဣဒံ ဝစနံ ကေန ဝုတ္တံ, ကဒါ, ကသ္မာ စ ဝုတ္တ’’န္တိ. ဝုစ္စတေ – အာယသ္မတာ အာနန္ဒေန ဝုတ္တံ, တဉ္စ ပဌမမဟာသင်္ဂီတိကာလေ. वहाँ "किसके द्वारा, कब और किसलिए यह कहा गया - यह विधि बताकर" यह आधी गाथा "ऐसा मैंने सुना, एक समय भगवान... (पे)... भगवान से गाथा में कहा" इस वचन के संदर्भ में कही गई है। वास्तव में यह वचन अनुश्रुति (परम्परा से सुनने) के आधार पर कहा गया है, और वे भगवान स्वयंभू और बिना किसी आचार्य के (बुद्ध) हैं, इसलिए यह वचन उन अर्हन्त सम्यक्-सम्बुद्ध भगवान का नहीं है। इसलिए यह कहना चाहिए कि "यह वचन किसके द्वारा कहा गया, कब और क्यों कहा गया?" उत्तर दिया जाता है - यह आयुष्मान आनन्द द्वारा कहा गया था, और वह प्रथम महासंगीति के समय। ပဌမမဟာသင်္ဂီတိ စေသာ သဗ္ဗသုတ္တနိဒါနကောသလ္လတ္ထမာဒိတော ပဘုတိ ဧဝံ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ဓမ္မစက္ကပ္ပဝတ္တနဉှိ အာဒိံ ကတွာ ယာဝ သုဘဒ္ဒပရိဗ္ဗာဇကဝိနယနာ, ကတဗုဒ္ဓကိစ္စေ ကုသိနာရာယံ ဥပဝတ္တနေ မလ္လာနံ သာလဝနေ ယမကသာလာနမန္တရေ ဝိသာခပုဏ္ဏမဒိဝသေ ပစ္စူသသမယေ အနုပါဒိသေသာယ နိဗ္ဗာနဓာတုယာ ပရိနိဗ္ဗုတေ, ဘဂဝတိ လောကနာထေ ဘဂဝတော ပရိနိဗ္ဗာနေ သန္နိပတိတာနံ သတ္တန္နံ ဘိက္ခုသတသဟဿာနံ သံဃတ္ထေရော အာယသ္မာ မဟာကဿပေါ သတ္တာဟပရိနိဗ္ဗုတေ ဘဂဝတိ သုဘဒ္ဒေန ဝုဍ္ဎပဗ္ဗဇိတေန ‘‘အလံ, အာဝုသော, မာ သောစိတ္ထ, မာ ပရိဒေဝိတ္ထ, သုမုတ္တာ မယံ တေန မဟာသမဏေန, ဥပဒ္ဒုတာ စ ဟောမ ‘ဣဒံ ဝေါ ကပ္ပတိ ဣဒံ ဝေါ န ကပ္ပတီ’တိ, ဣဒါနိ ပန မယံ ယံ ဣစ္ဆိဿာမ တံ ကရိဿာမ, ယံ န ဣစ္ဆိဿာမ န တံ ကရိဿာမာ’’တိ (စူဠဝ. ၄၃၇; ဒီ. နိ. ၂.၂၃၂) ဝုတ္တဝစနမနုဿရန္တော ‘‘ဌာနံ ခေါ ပနေတံ ဝိဇ္ဇတိ ယံ ပါပဘိက္ခူ ‘အတီတသတ္ထုကံ ပါဝစန’န္တိ မညမာနာ ပက္ခံ လဘိတွာ န စိရဿေဝ သဒ္ဓမ္မံ အန္တရဓာပေယျုံ. ယာဝ စ ဓမ္မဝိနယော တိဋ္ဌတိ, တာဝ အနတီတသတ္ထုကမေဝ ပါဝစနံ ဟောတိ. ယထာဟ ဘဂဝါ – और यह प्रथम संगीति सभी सूत्रों के निदान (प्रसंग) में कुशलता के लिए आरम्भ से इस प्रकार समझनी चाहिए। धम्मचक्कपवत्तन (धर्मचक्रप्रवर्तन) से लेकर सुभद्र परिव्राजक के विनीत होने तक बुद्ध-कृत्यों को पूरा कर, कुसीनारा के उपवत्तन में मल्लों के शालवन में यमक शाल वृक्षों के बीच, वैशाख पूर्णिमा के दिन, प्रत्युष काल में, अनुपादिशेष निर्वाण-धातु में लोकनाथ भगवान के परिनिर्वाण प्राप्त होने पर, भगवान के परिनिर्वाण के अवसर पर एकत्रित सात लाख भिक्षुओं में संघ-स्थविर आयुष्मान महाकश्यप ने, भगवान के परिनिर्वाण के सात दिन बाद, सुभद्र नामक वृद्ध-प्रव्रजित द्वारा कहे गए इन वचनों को याद करते हुए - "बस आयुष्मानों! शोक न करें, विलाप न करें; हम उस महाश्रमण से अच्छी तरह मुक्त हो गए हैं, हम उनसे पीड़ित थे कि 'यह तुम्हारे लिए कल्प्य (उचित) है, यह तुम्हारे लिए अकल्प्य (अनुचित) है', अब हम जो चाहेंगे वह करेंगे, जो नहीं चाहेंगे वह नहीं करेंगे" - यह विचार किया कि "ऐसी स्थिति हो सकती है कि पाप-भिक्षु यह मानकर कि 'शास्ता (गुरु) अतीत हो गए हैं', अपना पक्ष बनाकर शीघ्र ही सद्धर्म का अन्त कर दें। जब तक धर्म और विनय स्थित हैं, तब तक शास्ता अतीत नहीं हुए हैं। जैसा कि भगवान ने कहा है -" ‘‘ယော [Pg.77] ဝေါ, အာနန္ဒ, မယာ ဓမ္မော စ ဝိနယော စ ဒေသိတော ပညတ္တော, သော ဝေါ မမစ္စယေန သတ္ထာ’’တိ (ဒီ. နိ. ၂.၂၁၆). "आनन्द! मेरे द्वारा जो धर्म और विनय देशित और प्रज्ञप्त किया गया है, वही मेरे बाद तुम्हारा शास्ता (गुरु) होगा।" (दी. नि. 2.216)। ‘‘ယံနူနာဟံ ဓမ္မဉ္စ ဝိနယဉ္စ သင်္ဂါယေယျံ, ယထယိဒံ သာသနံ အဒ္ဓနိယံ အဿ စိရဋ္ဌိတိကံ’’. "क्यों न मैं धर्म और विनय की संगीति (संगायन) करूँ, जिससे यह शासन दीर्घकाल तक स्थायी रहे।" ယဉ္စာဟံ ဘဂဝတာ – और जो मुझे भगवान द्वारा - ‘‘ဓာရေဿသိ ပန မေ တွံ, ကဿပ, သာဏာနိ ပံသုကူလာနိ နိဗ္ဗသနာနီ’’တိ ဝတွာ စီဝရေ သာဓာရဏပရိဘောဂေန စေဝ – "कश्यप! क्या तुम मेरे सन (सनई) के बने हुए पुराने पांसुकुल चीवरों को धारण करोगे?" ऐसा कहकर चीवर के साधारण परिभोग (साझा उपयोग) द्वारा अनुगृहीत किया गया - ‘‘အဟံ, ဘိက္ခဝေ, ယာဝဒေ အာကင်္ခါမိ ဝိဝိစ္စေဝ ကာမေဟိ…ပေ… ပဌမံ ဈာနံ ဥပသမ္ပဇ္ဇ ဝိဟရာမိ, ကဿပေါပိ, ဘိက္ခဝေ, ယာဝဒေဝ အာကင်္ခတိ ဝိဝိစ္စေဝ ကာမေဟိ…ပေ… ပဌမံ ဈာနံ ဥပသမ္ပဇ္ဇ ဝိဟရတီ’’တိ – "भिक्षुओं! मैं जब तक चाहता हूँ, काम-भोगों से विविक्त होकर... (पे)... प्रथम ध्यान को प्राप्त कर विहार करता हूँ; भिक्षुओं! कश्यप भी जब तक चाहता है, काम-भोगों से विविक्त होकर... (पे)... प्रथम ध्यान को प्राप्त कर विहार करता है" - ဧဝမာဒိနာ နယေန နဝါနုပုဗ္ဗဝိဟာရဆဠဘိညာပ္ပဘေဒေ ဥတ္တရိမနုဿဓမ္မေ အတ္တနာ သမသမဋ္ဌပနေန စ အနုဂ္ဂဟိတော, တဿ မေ ကိမညံ အာဏဏျံ ဘဝိဿတိ? ‘‘နနု မံ ဘဂဝါ ရာဇာ ဝိယ သကကဝစဣဿရိယာနုပ္ပဒါနေန အတ္တနော ကုလဝံသပ္ပတိဋ္ဌာပကံ ပုတ္တံ ‘သဒ္ဓမ္မဝံသပ္ပတိဋ္ဌာပကော မေ အယံ ဘဝိဿတီ’တိ မန္တွာ ဣမိနာ အသာဓာရဏေန အနုဂ္ဂဟေန အနုဂ္ဂဟေသီ’’တိ စိန္တယန္တော ဓမ္မဝိနယသင်္ဂါယနတ္ထံ ဘိက္ခူနံ ဥဿာဟံ ဇနေသိ? ယထာဟ – इस प्रकार की विधि से, नौ अनुक्रमिक विहारों (समापत्तियों) और छह अभिज्ञाओं के भेदों वाले उत्तर-मनुष्य धर्मों में भगवान द्वारा स्वयं के समान पद पर प्रतिष्ठित कर अनुगृहीत किए गए मुझ (महाकश्यप) के लिए (संगीति करने के अतिरिक्त) ऋण से मुक्ति का दूसरा क्या उपाय होगा? 'क्या भगवान ने मुझे राजा के समान अपने राजसी कवच और ऐश्वर्य को सौंपकर, अपने कुल-वंश को स्थापित करने वाले पुत्र की तरह, यह सोचकर कि 'यह मेरे सद्धर्म-वंश को स्थापित करने वाला होगा', इस असाधारण अनुग्रह से अनुगृहीत नहीं किया?' - ऐसा विचार करते हुए उन्होंने धर्म और विनय की संगीति के लिए भिक्षुओं में उत्साह उत्पन्न किया। जैसा कि कहा गया है - ‘‘အထ ခေါ အာယသ္မာ မဟာကဿပေါ ဘိက္ခူ အာမန္တေသိ – ဧကမိဒါဟံ, အာဝုသော, သမယံ ပါဝါယ ကုသိနာရံ အဒ္ဓါနမဂ္ဂပ္ပဋိပန္နော မဟတာ ဘိက္ခုသံဃေန သဒ္ဓိံ ပဉ္စမတ္တေဟိ ဘိက္ခုသတေဟီ’’တိ (ဒီ. နိ. ၂.၂၃၁; စူဠဝ. ၄၃၇) သဗ္ဗံ သုဘဒ္ဒကဏ္ဍံ ဝိတ္ထာရေတဗ္ဗံ. तब आयुष्मान महाकश्यप ने भिक्षुओं को संबोधित किया - 'आवुसो! एक समय मैं पावा से कुसीनारा के लंबे मार्ग पर पाँच सौ भिक्षुओं के बड़े भिक्षु-संघ के साथ जा रहा था' - इस प्रकार संपूर्ण सुभद्र-काण्ड का विस्तार करना चाहिए। တတော ပရံ အာဟ – उसके बाद कहा - ‘‘ဟန္ဒ မယံ, အာဝုသော, ဓမ္မဉ္စ ဝိနယဉ္စ သင်္ဂါယေယျာမ, ပုရေ အဓမ္မော ဒိပ္ပတိ, ဓမ္မော ပဋိဗာဟိယျတိ, အဝိနယော ဒိပ္ပတိ, ဝိနယော ပဋိဗာဟိယျတိ, ပုရေ အဓမ္မဝါဒိနော ဗလဝန္တော ဟောန္တိ, ဓမ္မဝါဒိနော ဒုဗ္ဗလာ ဟောန္တိ, အဝိနယဝါဒိနော ဗလဝန္တော ဟောန္တိ, ဝိနယဝါဒိနော ဒုဗ္ဗလာ ဟောန္တီ’’တိ (စူဠဝ. ၄၃၇). 'आवुसो! आओ हम धर्म और विनय की संगीति करें, इससे पहले कि अधर्म प्रदीप्त हो और धर्म बाधित हो जाए, अविनय प्रदीप्त हो और विनय बाधित हो जाए; इससे पहले कि अधर्मवादी बलवान हो जाएँ और धर्मवादी दुर्बल हो जाएँ, अविनयवादी बलवान हो जाएँ और विनयवादी दुर्बल हो जाएँ'। ဘိက္ခူ [Pg.78] အာဟံသု ‘‘တေန ဟိ, ဘန္တေ, ထေရော ဘိက္ခူ ဥစ္စိနတူ’’တိ. ထေရော သကလနဝင်္ဂသတ္ထုသာသနပရိယတ္တိဓရေ ပုထုဇ္ဇနသောတာပန္နသကဒါဂါမိအနာဂါမိသုက္ခဝိပဿကခီဏာသဝဘိက္ခူ အနေကသတေ အနေကသဟဿေ စ ဝဇ္ဇေတွာ တိပိဋကသဗ္ဗပရိယတ္တိပ္ပဘေဒဓရေ ပဋိသမ္ဘိဒါပ္ပတ္တေ မဟာနုဘာဝေ ယေဘုယျေန ဘဂဝတာ ဧတဒဂ္ဂံ အာရောပိတေ တေဝိဇ္ဇာဒိဘေဒေ ခီဏာသဝဘိက္ခူယေဝ ဧကူနပဉ္စသတေ ပရိဂ္ဂဟေသိ. ယေ သန္ဓာယ ဣဒံ ဝုတ္တံ ‘‘အထ ခေါ အာယသ္မာ မဟာကဿပေါ ဧကေနူနပဉ္စအရဟန္တသတာနိ ဥစ္စိနီ’’တိ (စူဠဝ. ၄၃၇). भिक्षुओं ने कहा, 'भन्ते! तो फिर स्थविर भिक्षुओं का चयन करें।' स्थविर ने संपूर्ण नौ अंगों वाले शास्ता के शासन की पर्यप्ति को धारण करने वाले अनेक सौ और अनेक हजार पृथग्जन, स्रोतआपन्न, सकृदागामी, अनागामी और शुद्ध-विपश्यक क्षीणास्त्रव भिक्षुओं को छोड़कर, त्रिपिटक की संपूर्ण पर्यप्ति के भेदों को धारण करने वाले, प्रतिसंविदा प्राप्त, महानुभाव, और प्रायः भगवान द्वारा एतदग्र पद पर प्रतिष्ठित, त्रिविद्या आदि भेदों वाले केवल क्षीणास्त्रव (अर्हत्) भिक्षुओं में से ही चार सौ निन्यानवे (एक कम पाँच सौ) को चुना। जिन्हें लक्ष्य कर यह कहा गया है - 'तब आयुष्मान महाकश्यप ने एक कम पाँच सौ अर्हन्तों को चुना'। ကိဿ ပန ထေရော ဧကေနူနမကာသီတိ? အာယသ္မတော အာနန္ဒတ္ထေရဿ ဩကာသကရဏတ္ထံ. တေန ဟာယသ္မတာ သဟာပိ ဝိနာပိ န သက္ကာ ဓမ္မသင်္ဂီတိ ကာတုံ. သော ဟာယသ္မာ သေခေါ သကရဏီယော, တသ္မာ သဟ န သက္ကာ, ယသ္မာ ပနဿ ကိဉ္စိ ဒသဗလဒေသိတံ သုတ္တဂေယျာဒိကံ ဘဂဝတော အသမ္မုခါ ပဋိဂ္ဂဟိတံ နာမ နတ္ထိ, တသ္မာ ဝိနာပိ န သက္ကာ. ယဒိ ဧဝံ သေခေါပိ သမာနော ဓမ္မသင်္ဂီတိယာ ဗဟူကာရတ္တာ ထေရေန ဥစ္စိနိတဗ္ဗော အဿ, အထ ကသ္မာ န ဥစ္စိနိတောတိ? ပရူပဝါဒဝိဝဇ္ဇနတော. ထေရော ဟိ အာယသ္မန္တေ အာနန္ဒေ အတိဝိယ ဝိဿတ္ထော အဟောသိ. တထာ ဟိ နံ သိရသ္မိံ ပလိတေသု ဇာတေသုပိ ‘‘န ဝါယံ ကုမာရကော မတ္တမညာသီ’’တိ (သံ. နိ. ၂.၁၅၄) ကုမာရကဝါဒေန ဩဝဒတိ. သကျကုလပ္ပသုတော စာယံ အာယသ္မာ တထာဂတဿ ဘာတာ စူဠပိတု ပုတ္တော, တတြ ဘိက္ခူ ဆန္ဒာဂမနံ ဝိယ မညမာနာ ‘‘ဗဟူ အသေခပဋိသမ္ဘိဒါပ္ပတ္တေ ဘိက္ခူ ဌပေတွာ အာနန္ဒံ သေခပဋိသမ္ဘိဒါပ္ပတ္တံ ထေရော ဥစ္စိနီ’’တိ ဥပဝဒေယျုံ. တံ ပရူပဝါဒံ ပရိဝိဝဇ္ဇေန္တော ‘‘အာနန္ဒံ ဝိနာ သင်္ဂီတိ န သက္ကာ ကာတုံ, ဘိက္ခူနံယေဝ အနုမတိယာ ဂဟေဿာမီ’’တိ န ဥစ္စိနိ. स्थविर ने एक कम (पाँच सौ) क्यों किए? आयुष्मान आनन्द स्थविर के लिए स्थान (अवसर) रखने के लिए। क्योंकि उस आयुष्मान के साथ भी और उनके बिना भी धर्म-संगीति करना संभव नहीं था। वह आयुष्मान शैक्ष (अभी पूर्ण अर्हत् नहीं) थे और उनका कार्य शेष था, इसलिए उनके साथ (उस समय) संगीति करना संभव नहीं था; और चूँकि भगवान द्वारा उपदिष्ट ऐसा कोई सूत्र-गेय आदि धर्म नहीं था जो उनके द्वारा भगवान के सम्मुख ग्रहण न किया गया हो, इसलिए उनके बिना भी संगीति करना संभव नहीं था। यदि ऐसा था, तो शैक्ष होते हुए भी धर्म-संगीति में बहुत उपकारी होने के कारण स्थविर द्वारा उनका चयन किया जाना चाहिए था, फिर क्यों नहीं किया गया? दूसरों के अपवाद (निंदा) से बचने के लिए। स्थविर आयुष्मान आनन्द पर अत्यंत विश्वास करते थे। इसीलिए, उनके सिर पर सफेद बाल आ जाने पर भी वे उन्हें 'यह बालक मात्रा (मर्यादा) नहीं जानता' कहकर बालक शब्द से उपदेश देते थे। यह आयुष्मान शाक्य कुल में उत्पन्न और तथागत के भाई (चाचा के पुत्र) भी थे, अतः भिक्षु इसे पक्षपात (छन्द) मानकर ऐसी निंदा कर सकते थे कि 'अनेक अशैक्ष प्रतिसंविदा प्राप्त भिक्षुओं को छोड़कर स्थविर ने शैक्ष प्रतिसंविदा प्राप्त आनन्द को चुना है'। उस पर-अपवाद से बचते हुए, 'आनन्द के बिना संगीति संभव नहीं है, मैं भिक्षुओं की अनुमति से ही उन्हें लूँगा' - ऐसा सोचकर उन्होंने स्वयं चयन नहीं किया। အထ သယမေဝ ဘိက္ခူ အာနန္ဒဿတ္ထာယ ထေရံ ယာစိံသု. ယထာဟ – तब भिक्षुओं ने स्वयं ही आनन्द के लिए स्थविर से याचना की। जैसा कि कहा गया है - ‘‘ဘိက္ခူ အာယသ္မန္တံ မဟာကဿပံ ဧတဒဝေါစုံ – ‘အယံ, ဘန္တေ, အာယသ္မာ အာနန္ဒော ကိဉ္စာပိ သေခေါ, အဘဗ္ဗော ဆန္ဒာ ဒေါသာ မောဟာ ဘယာ အဂတိံ ဂန္တုံ, ဗဟု စာနေန ဘဂဝတော သန္တိကေ ဓမ္မော စ ဝိနယော စ ပရိယတ္တော, တေန ဟိ, ဘန္တေ, ထေရော [Pg.79] အာယသ္မန္တမ္ပိ အာနန္ဒံ ဥစ္စိနတူ’တိ. အထ ခေါ အာယသ္မာ မဟာကဿပေါ အာယသ္မန္တမ္ပိ အာနန္ဒံ ဥစ္စိနီ’’တိ (စူဠဝ. ၄၃၇). भिक्षुओं ने आयुष्मान महाकश्यप से यह कहा - 'भन्ते! यह आयुष्मान आनन्द यद्यपि शैक्ष हैं, फिर भी वे छन्द, द्वेष, मोह और भय के कारण अगति (गलत मार्ग) पर जाने के अयोग्य हैं, और उन्होंने भगवान के सम्मुख बहुत धर्म और विनय सीखा है, इसलिए भन्ते! स्थविर आयुष्मान आनन्द को भी चुनें।' तब आयुष्मान महाकश्यप ने आयुष्मान आनन्द को भी चुन लिया। ဧဝံ ဘိက္ခူနံ အနုမတိယာ ဥစ္စိနိတေန တေနာယသ္မတာ သဒ္ဓိံ ပဉ္စထေရသတာနိ အဟေသုံ. इस प्रकार भिक्षुओं की अनुमति से चुने गए उन आयुष्मान के साथ पाँच सौ स्थविर हुए। အထ ခေါ ထေရာနံ ဘိက္ခူနံ ဧတဒဟောသိ – ‘‘ကတ္ထ နု ခေါ မယံ ဓမ္မဉ္စ ဝိနယဉ္စ သင်္ဂါယေယျာမာ’’တိ. အထ ခေါ ထေရာနံ ဘိက္ခူနံ ဧတဒဟောသိ ‘‘ရာဇဂဟံ ခေါ မဟာဂေါစရံ ပဟူတသေနာသနံ, ယံနူန မယံ ရာဇဂဟေ ဝဿံ ဝသန္တာ ဓမ္မဉ္စ ဝိနယဉ္စ သင်္ဂါယေယျာမ, နညေ ဘိက္ခူ ရာဇဂဟေ ဝဿံ ဥပဂစ္ဆေယျု’’န္တိ. ကသ္မာ ပန နေသံ ဧတဒဟောသိ? ဣဒံ အမှာကံ ထာဝရကမ္မံ, ကောစိ ဝိသဘာဂပုဂ္ဂလော သံဃမဇ္ဈံ ပဝိသိတွာ ဥက္ကောဋေယျာတိ. အထာယသ္မာ မဟာကဿပေါ ဉတ္တိဒုတိယေန ကမ္မေန သာဝေသိ. တံ သင်္ဂီတိက္ခန္ဓကေ (စူဠဝ. ၄၃၇) ဝုတ္တနယေနေဝ ဉာတဗ္ဗံ. तब स्थविर भिक्षुओं को यह विचार आया - 'हम धर्म और विनय की संगीति कहाँ करें?' तब स्थविर भिक्षुओं को यह विचार आया - 'राजगृह बड़ा गोचर क्षेत्र है और वहाँ पर्याप्त शयनासन (आवास) हैं, क्यों न हम राजगृह में वर्षावास करते हुए धर्म और विनय की संगीति करें, और अन्य भिक्षु राजगृह में वर्षावास न करें।' उन्हें ऐसा विचार क्यों आया? 'यह हमारा स्थायी कार्य है, कहीं कोई असहमत व्यक्ति संघ के बीच में आकर इसमें बाधा न डाल दे।' तब आयुष्मान महाकश्यप ने ज्ञप्ति-द्वितीय कर्म (प्रस्ताव) द्वारा संघ को सूचित किया। इसे संगीति-खन्धक में बताए गए तरीके से ही समझना चाहिए। အထ တထာဂတဿ ပရိနိဗ္ဗာနတော သတ္တသု သာဓုကီဠနဒိဝသေသု သတ္တသု စ ဓာတုပူဇာဒိဝသေသု ဝီတိဝတ္တေသု ‘‘အဍ္ဎမာသော အတိက္ကန္တော, ဣဒါနိ ဂိမှာနံ ဒိယဍ္ဎော မာသော သေသော, ဥပကဋ္ဌာ ဝဿူပနာယိကာ’’တိ မန္တွာ မဟာကဿပတ္ထေရော ‘‘ရာဇဂဟံ, အာဝုသော, ဂစ္ဆာမာ’’တိ ဥပဍ္ဎံ ဘိက္ခုသံဃံ ဂဟေတွာ ဧကံ မဂ္ဂံ ဂတော. အနုရုဒ္ဓတ္ထေရောပိ ဥပဍ္ဎံ ဂဟေတွာ ဧကံ မဂ္ဂံ ဂတော, အာနန္ဒတ္ထေရော ပန ဘဂဝတော ပတ္တစီဝရံ ဂဟေတွာ ဘိက္ခုသံဃပရိဝုတော သာဝတ္ထိံ ဂန္တွာ ရာဇဂဟံ ဂန္တုကာမော ယေန သာဝတ္ထိ, တေန စာရိကံ ပက္ကာမိ. အာနန္ဒတ္ထေရေန ဂတဂတဋ္ဌာနေ မဟာပရိဒေဝေါ အဟောသိ, ‘‘ဘန္တေ အာနန္ဒ, ကုဟိံ သတ္ထာရံ ဌပေတွာ အာဂတောသီ’’တိ? အနုပုဗ္ဗေန သာဝတ္ထိံ အနုပ္ပတ္တေ ထေရေ ဘဂဝတော ပရိနိဗ္ဗာနသမယေ ဝိယ မဟာပရိဒေဝေါ အဟောသိ. तब तथागत के परिनिर्वाण के बाद, सात दिनों के उत्सव और सात दिनों की धातु-पूजा (अस्थि-पूजा) के बीत जाने पर, 'डेढ़ महीना बीत गया है, अब ग्रीष्म ऋतु के डेढ़ महीने शेष हैं, वर्षावास का समय निकट है'—ऐसा सोचकर महाकस्सप स्थविर ने कहा, "आयुष्मन्! हम राजगृह चलते हैं।" वे आधे भिक्षु-संघ को लेकर एक मार्ग से चल दिए। अनुरुद्ध स्थविर भी आधे संघ को लेकर एक मार्ग से गए। आयुष्मान आनन्द भगवान के पात्र और चीवर लेकर भिक्षु-संघ के साथ सावत्थी गए और फिर राजगृह जाने की इच्छा से सावत्थी के मार्ग पर चारिका के लिए निकल पड़े। आयुष्मान आनन्द जहाँ-जहाँ गए, वहाँ-वहाँ भारी विलाप हुआ—"भन्ते आनन्द! शास्ता को कहाँ छोड़कर आए हैं?" स्थविर के सावत्थी पहुँचने पर वैसा ही भारी विलाप हुआ जैसा भगवान के परिनिर्वाण के समय हुआ था। တတြ သုဒံ အာယသ္မာ အာနန္ဒော အနိစ္စတာဒိပဋိသံယုတ္တာယ ဓမ္မိယာ ကထာယ တံ မဟာဇနံ သညာပေတွာ ဇေတဝနံ ပဝိသိတွာ ဒသဗလေန ဝသိတဂန္ဓကုဋိယာ ဒွါရံ ဝိဝရိတွာ မဉ္စပီဌံ နီဟရိတွာ ပပ္ဖောဋေတွာ ဂန္ဓကုဋိံ သမ္မဇ္ဇိတွာ မိလာတမာလာကစဝရံ ဆဍ္ဍေတွာ မဉ္စပီဌံ အတိဟရိတွာ ပုန ယထာဌာနေ ဌပေတွာ ဘဂဝတော ဌိတကာလေ ကရဏီယံ ဝတ္တံ သဗ္ဗမကာသိ. အထ [Pg.80] ထေရော ဘဂဝတော ပရိနိဗ္ဗာနတော ပဘုတိ ဌာနနိသဇ္ဇဗဟုလတ္တာ ဥဿန္နဓာတုကံ ကာယံ သမဿာသေတုံ ဒုတိယဒိဝသေ ခီရဝိရေစနံ ပိဝိတွာ ဝိဟာရေယေဝ နိသီဒိ, ယံ သန္ဓာယ သုဘေန မာဏဝေန ပဟိတံ မာဏဝကံ ဧတဒဝေါစ – वहाँ आयुष्मान आनन्द ने अनित्यता से संबंधित धार्मिक कथा द्वारा उस महाजन (जनसमूह) को समझाया और जेतवन में प्रवेश कर, दशबल (बुद्ध) के निवास स्थान गन्धकुटी का द्वार खोला, मंच और पीठ (पलंग और कुर्सी) को बाहर निकाला, उन्हें झाड़ा-पोंछा, गन्धकुटी की सफाई की, मुरझाए हुए फूलों और कचरे को फेंका, और मंच-पीठ को पुनः यथास्थान रखकर भगवान के जीवित रहते समय किए जाने वाले सभी कर्तव्यों का पालन किया। इसके बाद, भगवान के परिनिर्वाण के समय से ही निरंतर खड़े रहने और बैठे रहने की अधिकता के कारण शरीर की थकान मिटाने के लिए, दूसरे दिन स्थविर ने दूध मिश्रित विरेचन (दवा) पीकर विहार में ही विश्राम किया। इसी संदर्भ में उन्होंने सुभ माणवक द्वारा भेजे गए माणवक से यह कहा— ‘‘အကာလော ခေါ, မာဏဝက, အတ္ထိ မေ အဇ္ဇ ဘေသဇ္ဇမတ္တာ ပီတာ, အပ္ပေဝ နာမ သွေပိ ဥပသင်္ကမေယျာမာ’’တိ (ဒီ. နိ. ၁.၄၄၇). "हे माणवक! यह (मिलने का) सही समय नहीं है, आज मैंने औषधि की मात्रा ली है। संभवतः कल हम मिल सकेंगे।" ဒုတိယဒိဝသေ စေတကတ္ထေရေန ပစ္ဆာသမဏေန ဂန္တွာ သုဘေန မာဏဝေန ပုဋ္ဌော ဒီဃနိကာယေ သုဘသုတ္တံ နာမ ဒသမံ သုတ္တမဘာသိ. दूसरे दिन, चेतक स्थविर को अनुचर भिक्षु के रूप में साथ लेकर वे गए और सुभ माणवक द्वारा पूछे जाने पर दीघनिकाय के दसवें सुत्त, 'सुभ सुत्त' का उपदेश दिया। အထ ခေါ ထေရော ဇေတဝနေ ဝိဟာရေ ခဏ္ဍဖုလ္လပ္ပဋိသင်္ခရဏံ ကာရာပေတွာ ဥပကဋ္ဌာယ ဝဿူပနာယိကာယ ရာဇဂဟံ ဂတော. တထာ မဟာကဿပတ္ထေရော အနုရုဒ္ဓတ္ထေရော စ သဗ္ဗံ ဘိက္ခုသံဃံ ဂဟေတွာ ရာဇဂဟမေဝ ဂတာ. इसके बाद स्थविर ने जेतवन विहार की मरम्मत (टूटे-फूटे हिस्सों का जीर्णोद्धार) करवाई और वर्षावास निकट आने पर वे राजगृह चले गए। इसी प्रकार महाकस्सप स्थविर और अनुरुद्ध स्थविर भी समस्त भिक्षु-संघ को लेकर राजगृह ही गए। တေန ခေါ ပန သမယေန ရာဇဂဟေ အဋ္ဌာရသ မဟာဝိဟာရာ ဟောန္တိ. တေ သဗ္ဗေပိ ဆဍ္ဍိတပတိတဥက္လာပါ အဟေသုံ. ဘဂဝတော ဟိ ပရိနိဗ္ဗာနေ သဗ္ဗေ ဘိက္ခူ အတ္တနော အတ္တနော ပတ္တစီဝရံ ဂဟေတွာ ဝိဟာရေ စ ပရိဝေဏေ စ ဆဍ္ဍေတွာ အဂမံသု. တတ္ထ ထေရာ ဘဂဝတော ဝစနပူဇနတ္ထံ တိတ္ထိယဝါဒပရိမောစနတ္ထဉ္စ ‘‘ပဌမံ မာသံ ခဏ္ဍဖုလ္လပ္ပဋိသင်္ခရဏံ ကရောမာ’’တိ စိန္တေသုံ. တိတ္ထိယာ ဟိ ဝဒေယျုံ ‘‘သမဏဿ ဂေါတမဿ သာဝကာ သတ္ထရိ ဌိတေယေဝ ဝိဟာရေ ပဋိဇဂ္ဂိံသု, ပရိနိဗ္ဗုတေ ဆဍ္ဍေသု’’န္တိ. တေသံ ဝါဒပရိမောစနတ္ထဉ္စ စိန္တေသုန္တိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဝုတ္တမ္ပိ စေတံ – उस समय राजगृह में अठारह महाविहार थे। वे सभी परित्यक्त और गंदगी से भरे हुए थे। भगवान के परिनिर्वाण के कारण सभी भिक्षु अपने-अपने पात्र और चीवर लेकर विहारों और परिवेणों (आवासों) को छोड़कर चले गए थे। वहाँ स्थविरों ने भगवान के वचनों के सम्मान के लिए और अन्य मतवलंबियों (तीर्थिकों) के आक्षेपों से बचने के लिए सोचा—"पहले महीने हम टूटे-फूटे विहारों की मरम्मत करेंगे।" क्योंकि तीर्थिक कह सकते थे—"श्रमण गौतम के शिष्य शास्ता के रहते तो विहारों की देखभाल करते थे, उनके परिनिर्वाण के बाद उन्हें छोड़ दिया।" उनके इस आक्षेप से बचने के लिए उन्होंने ऐसा विचार किया। ऐसा कहा भी गया है— ‘‘အထ ခေါ ထေရာနံ ဘိက္ခူနံ ဧတဒဟောသိ – ဘဂဝတာ ခေါ, အာဝုသော, ခဏ္ဍဖုလ္လပ္ပဋိသင်္ခရဏံ ဝဏ္ဏိတံ, ဟန္ဒ မယံ, အာဝုသော, ပဌမံ မာသံ ခဏ္ဍဖုလ္လပ္ပဋိသင်္ခရဏံ ကရောမ, မဇ္ဈိမံ မာသံ သန္နိပတိတွာ ဓမ္မဉ္စ ဝိနယဉ္စ သင်္ဂါယိဿာမာ’’တိ (စူဠဝ. ၄၃၈). "तब उन स्थविर भिक्षुओं को यह विचार आया—'आयुष्मन्! भगवान ने विहारों की मरम्मत की प्रशंसा की है। आओ आयुष्मन्! हम पहले महीने मरम्मत का कार्य करें और बीच के महीने में एकत्रित होकर धम्म और विनय की संगीति करें'।" တေ ဒုတိယဒိဝသေ ဂန္တွာ ရာဇဒွါရေ အဋ္ဌံသု. အဇာတသတ္တု ရာဇာ အာဂန္တွာ ဝန္ဒိတွာ ‘‘အဟံ, ဘန္တေ, ကိံ ကရောမိ, ကေနတ္ထော’’တိ ပဝါရေသိ. ထေရာ အဋ္ဌာရသမဟာဝိဟာရပ္ပဋိသင်္ခရဏတ္ထာယ ဟတ္ထကမ္မံ ပဋိဝေဒေသုံ. ‘‘သာဓု, ဘန္တေ’’တိ ရာဇာ ဟတ္ထကမ္မကာရကေ မနုဿေ အဒါသိ. ထေရာ ပဌမံ မာသံ သဗ္ဗဝိဟာရေ ပဋိသင်္ခရာပေသုံ. वे दूसरे दिन जाकर राजद्वार पर खड़े हो गए। राजा अजातशत्रु ने आकर वन्दना की और निवेदन किया—"भन्ते! मैं क्या करूँ? आपको किस वस्तु की आवश्यकता है?" स्थविरों ने अठारह महाविहारों की मरम्मत के लिए श्रम (मजदूरों) की आवश्यकता बताई। राजा ने "बहुत अच्छा, भन्ते" कहकर काम करने वाले लोग उपलब्ध करा दिए। स्थविरों ने पहले महीने में सभी विहारों की मरम्मत करवा ली। အထ [Pg.81] ရညော အာရောစေသုံ – ‘‘နိဋ္ဌိတံ, မဟာရာဇ, ဝိဟာရပ္ပဋိသင်္ခရဏံ, ဣဒါနိ ဓမ္မဝိနယသင်္ဂဟံ ကရောမာ’’တိ. ‘‘သာဓု, ဘန္တေ, ဝိဿတ္ထာ ကရောထ, မယှံ အာဏာစက္ကံ, တုမှာကံ ဓမ္မစက္ကံ ဟောတု. အာဏာပေထ, ဘန္တေ, ကိံ ကရောမီ’’တိ? ‘‘ဓမ္မသင်္ဂဟံ ကရောန္တာနံ ဘိက္ခူနံ သန္နိသဇ္ဇဋ္ဌာနံ မဟာရာဇာ’’တိ. ‘‘ကတ္ထ ကရောမိ, ဘန္တေ’’တိ? ‘‘ဝေဘာရပဗ္ဗတပဿေ သတ္တပဏ္ဏိဂုဟာဒွါရေ ကာတုံ ယုတ္တံ မဟာရာဇာ’’တိ. ‘‘သာဓု, ဘန္တေ’’တိ ခေါ, ရာဇာ အဇာတသတ္တု, ဝိဿကမ္မုနာ နိမ္မိတသဒိသံ သုဝိဘတ္တဘိတ္တိထမ္ဘသောပါနံ နာနာဝိဓမာလာကမ္မလတာကမ္မဝိစိတြံ မဟာမဏ္ဍပံ ကာရာပေတွာ ဝိဝိဓကုသုမဒါမဩလမ္ဗကဝိနိဂ္ဂလန္တစာရုဝိတာနံ ရတနဝိစိတြမဏိကောဋ္ဋိမတလမိဝ စ နံ နာနာပုပ္ဖူပဟာရဝိစိတြံ သုပရိနိဋ္ဌိတဘူမိကမ္မံ ဗြဟ္မဝိမာနသဒိသံ အလင်္ကရိတွာ တသ္မိံ မဟာမဏ္ဍပေ ပဉ္စသတာနံ ဘိက္ခူနံ အနဂ္ဃာနိ ပဉ္စကပ္ပိယပစ္စတ္ထရဏသတာနိ ပညာပေတွာ ဒက္ခိဏဘာဂံ နိဿာယ ဥတ္တရာဘိမုခံ ထေရာသနံ, မဏ္ဍပမဇ္ဈေ ပုရတ္ထာဘိမုခံ ဗုဒ္ဓဿ ဘဂဝတော အာသနာရဟံ ဓမ္မာသနံ ပညာပေတွာ ဒန္တခစိတံ စိတ္တဗီဇနိဉ္စေတ္ထ ဌပေတွာ ဘိက္ခုသံဃဿ အာရောစာပေသိ ‘‘နိဋ္ဌိတံ, ဘန္တေ, ကိစ္စ’’န္တိ. तब उन्होंने राजा को सूचित किया—"महाराज! विहारों की मरम्मत का कार्य पूर्ण हो गया है, अब हम धम्म और विनय की संगीति करेंगे।" "बहुत अच्छा भन्ते! आप निशंक होकर करें। मेरा आज्ञा-चक्र (शासन) रहे और आपका धर्म-चक्र रहे। भन्ते! आज्ञा दें, मैं क्या करूँ?" "महाराज! संगीति करने वाले भिक्षुओं के बैठने के लिए एक स्थान बनवाएँ।" "भन्ते! कहाँ बनवाऊँ?" "महाराज! वेभार पर्वत के पार्श्व में सप्तपर्णी गुफा के द्वार पर बनाना उचित होगा।" राजा अजातशत्रु ने "बहुत अच्छा भन्ते" कहकर विश्वकर्मा द्वारा निर्मित के समान, सुविभक्त दीवारों, खम्भों और सीढ़ियों वाला, विविध प्रकार की पुष्प-मालाओं और लताओं की नक्काशी से सुसज्जित एक महामण्डप बनवाया। उसमें विविध पुष्प-हारों से लटकता हुआ सुंदर वितान (चंदोवा) था, जिसका फर्श रत्नों और मणियों से जड़ा हुआ सा प्रतीत होता था। वह मण्डप नाना प्रकार के पुष्पों से सजाया गया था, जिसका निर्माण कार्य अत्यंत कुशलता से पूर्ण हुआ था और जो ब्रह्म-विमान के समान भव्य था। उस महामण्डप में पाँच सौ भिक्षुओं के लिए बहुमूल्य पाँच सौ आसन बिछवाए। दक्षिण भाग की ओर उत्तर की ओर मुख किए हुए स्थविरों का आसन बिछाया और मण्डप के बीच में पूर्व की ओर मुख किए हुए भगवान बुद्ध के योग्य 'धर्मासन' लगवाया। वहाँ हाथीदाँत से जड़ा हुआ एक पंखा (बीजनी) रखा और भिक्षु-संघ को सूचित करवाया—"भन्ते! मण्डप का कार्य पूर्ण हो गया है।" ဘိက္ခူ အာယသ္မန္တံ အာနန္ဒံ အာဟံသု ‘‘သွေ, အာဝုသော အာနန္ဒ, သံဃသန္နိပါတော, တွဉ္စ သေခေါ သကရဏီယော, တေန တေ န ယုတ္တံ သန္နိပါတံ ဂန္တုံ, အပ္ပမတ္တော ဟောဟီ’’တိ. အထ ခေါ အာယသ္မာ အာနန္ဒော ‘‘သွေ သန္နိပါတော, န ခေါ ပန မေတံ ပတိရူပံ, ယွာဟံ သေခေါ သမာနော သန္နိပါတံ ဂစ္ဆေယျ’’န္တိ ဗဟုဒေဝ ရတ္တိံ ကာယဂတာယ သတိယာ ဝီတိနာမေတွာ ရတ္တိယာ ပစ္စူသသမယေ စင်္ကမာ ဩရောဟိတွာ ဝိဟာရံ ပဝိသိတွာ ‘‘နိပဇ္ဇိဿာမီ’’တိ ကာယံ အာဝဇ္ဇေသိ. ဒွေ ပါဒါ ဘူမိတော မုတ္တာ, အပ္ပတ္တဉ္စ သီသံ ဗိမ္ဗောဟနံ, ဧတသ္မိံ အန္တရေ အနုပါဒါယ အာသဝေဟိ စိတ္တံ ဝိမုစ္စိ. အယဉှိ အာယသ္မာ စင်္ကမေန ဗဟိ ဝီတိနာမေတွာ ဝိသေသံ နိဗ္ဗတ္တေတုံ အသက္ကောန္တော စိန္တေသိ ‘‘နနု မံ ဘဂဝါ ဧတဒဝေါစ – ‘ကတပုညောသိ တွံ, အာနန္ဒ, ပဓာနမနုယုဉ္ဇ, ခိပ္ပံ ဟောဟိသိ အနာသဝေါ’တိ (ဒီ. နိ. ၂.၂၀၇). ဗုဒ္ဓါနဉ္စ ကထာဒေါသော နာမ နတ္ထိ, မမ ပန အစ္စာရဒ္ဓံ ဝီရိယံ, တေန မေ စိတ္တံ ဥဒ္ဓစ္စာယ သံဝတ္တတိ, ဟန္ဒာဟံ ဝီရိယသမတံ ယောဇေမီ’’တိ စင်္ကမာ ဩရောဟိတွာ ပါဒဓောဝနဋ္ဌာနေ ဌတွာ ပါဒေ ဓောဝိတွာ ဝိဟာရံ ပဝိသိတွာ မဉ္စကေ နိသီဒိတွာ ‘‘ထောကံ ဝိဿမိဿာမီ’’တိ ကာယံ မဉ္စကေ ဥပနာမေသိ. ဒွေ ပါဒါ [Pg.82] ဘူမိတော မုတ္တာ, သီသဉ္စ ဗိမ္ဗောဟနမသမ္ပတ္တံ, ဧတသ္မိံ အန္တရေ အနုပါဒါယ အာသဝေဟိ စိတ္တံ ဝိမုစ္စိ. စတုဣရိယာပထဝိရဟိတံ ထေရဿ အရဟတ္တံ. တေန ‘‘ဣမသ္မိံ သာသနေ အနိသိန္နော အနိပန္နော အဋ္ဌိတော အစင်္ကမန္တော ကော ဘိက္ခု အရဟတ္တံ ပတ္တော’’တိ ဝုတ္တေ ‘‘အာနန္ဒတ္ထေရော’’တိ ဝတ္တုံ ဝဋ္ဋတိ. भिक्षुओं ने आयुष्मान आनंद से कहा, "हे आयुष्मान आनंद! कल संघ का सम्मेलन (सन्नपातः) होगा। आप अभी शैक्ष (sekha) हैं और आपका (अर्हत्व प्राप्ति का) कार्य अभी शेष है। इसलिए, आपका सम्मेलन में जाना उचित नहीं है। आप अप्रमादी बनें।" तब आयुष्मान आनंद ने सोचा, "कल सम्मेलन है। मेरे लिए यह उचित नहीं होगा कि मैं शैक्ष रहते हुए सम्मेलन में जाऊँ।" उन्होंने रात्रि का अधिकांश भाग कायगतासति (शरीर की स्मृति) में व्यतीत किया। रात्रि के अंतिम प्रहर में, चंक्रमण (टहलने) से उतरकर विहार में प्रवेश किया और "मैं लेटूँगा" ऐसा विचार कर शरीर को झुकाया। जैसे ही उनके दोनों पैर भूमि से ऊपर उठे और सिर अभी तक तकिये को नहीं छुआ था, इसी अंतराल में, उपादान रहित होकर उनका चित्त आस्रवों से विमुक्त हो गया। वास्तव में, आयुष्मान आनंद बाहर चंक्रमण करते हुए विशेष ज्ञान (अर्हत्व) प्राप्त करने में असमर्थ होकर सोचने लगे, "क्या भगवान ने मुझसे यह नहीं कहा था— 'आनंद! तुम पुण्यवान हो, प्रधान (साधना) में लगो, शीघ्र ही आस्रव-रहित हो जाओगे'? बुद्धों के वचन कभी मिथ्या नहीं होते। किंतु मेरा वीर्य (प्रयत्न) अत्यधिक है, जिससे मेरा चित्त उद्धच्च (चंचलता) की ओर जा रहा है। अब मैं वीर्य की समता (संतुलन) स्थापित करता हूँ।" चंक्रमण से उतरकर, पैर धोने के स्थान पर खड़े होकर पैर धोए, विहार में प्रवेश किया और मंचक (पलंग) पर बैठकर "थोड़ा विश्राम करूँगा" ऐसा सोचकर शरीर को मंचक की ओर झुकाया। जैसे ही दोनों पैर भूमि से ऊपर उठे और सिर तकिये तक नहीं पहुँचा था, इसी अंतराल में, उपादान रहित होकर उनका चित्त आस्रवों से विमुक्त हो गया। स्थविर की अर्हत्व प्राप्ति चारों ईर्यापथों (खड़े होना, बैठना, लेटना, चलना) से रहित थी। इसलिए, "इस शासन में बिना बैठे, बिना लेटे, बिना खड़े और बिना चले किस भिक्षु ने अर्हत्व प्राप्त किया?" ऐसा पूछे जाने पर "आनंद स्थविर" कहना उचित है। အထ ထေရာ ဘိက္ခူ ဒုတိယဒိဝသေ ဘတ္တကိစ္စံ ကတွာ ပတ္တစီဝရံ ပဋိသာမေတွာ ဓမ္မသဘာယံ သန္နိပတိတာ. အာနန္ဒတ္ထေရော ပန အတ္တနော အရဟတ္တပ္ပတ္တိံ ဉာပေတုကာမော ဘိက္ခူဟိ သဒ္ဓိံ န ဂတော. ဘိက္ခူ ယထာဝုဍ္ဎံ အတ္တနော အတ္တနော ပတ္တာသနေ နိသီဒန္တာ အာနန္ဒတ္ထေရဿ အာသနံ ဌပေတွာ နိသိန္နာ. တတ္ထ ကေဟိစိ ‘‘ဧတမာသနံ ကဿာ’’တိ ဝုတ္တေ အာနန္ဒဿာတိ. ‘‘အာနန္ဒော ပန ကုဟိံ ဂတော’’တိ. တသ္မိံ သမယေ ထေရော စိန္တေသိ ‘‘ဣဒါနိ မယှံ ဂမနကာလော’’တိ. တတော အတ္တနော အာနုဘာဝံ ဒဿေန္တော ပထဝိယံ နိမုဇ္ဇိတွာ အတ္တနော အာသနေယေဝ အတ္တာနံ ဒဿေသိ. အာကာသေနာဂန္တွာ နိသီဒီတိပိ ဧကေ. इसके बाद, दूसरे दिन स्थविर भिक्षुओं ने भोजन के पश्चात पात्र और चीवर को व्यवस्थित कर धर्मसभा में एकत्रित हुए। आयुष्मान आनंद अपनी अर्हत्व प्राप्ति की सूचना देने की इच्छा से भिक्षुओं के साथ नहीं गए। भिक्षुओं ने वरिष्ठता के अनुसार अपने-अपने आसन ग्रहण किए और आनंद स्थविर के लिए आसन छोड़कर बैठ गए। वहाँ किसी के द्वारा यह पूछे जाने पर कि "यह आसन किसका है?", उत्तर मिला "आनंद का"। "आनंद कहाँ गए हैं?" तब स्थविर ने सोचा, "अब मेरे जाने का समय है।" तब अपना प्रभाव दिखाते हुए, वे पृथ्वी में अंतर्ध्यान होकर अपने आसन पर ही प्रकट हो गए। कुछ आचार्यों का कहना है कि वे आकाश मार्ग से आकर बैठ गए। ဧဝံ နိသိန္နေ တသ္မိံ အာယသ္မန္တေ မဟာကဿပတ္ထေရော ဘိက္ခူ အာမန္တေသိ, ‘‘အာဝုသော, ကိံ ပဌမံ သင်္ဂါယာမ ဓမ္မံ ဝါ ဝိနယံ ဝါ’’တိ? ဘိက္ခူ အာဟံသု, ‘‘ဘန္တေ မဟာကဿပ, ဝိနယောနာမဗုဒ္ဓသာသနဿ အာယု, ဝိနယေ ဌိတေ သာသနံ ဌိတံ ဟောတိ, တသ္မာ ပဌမံ ဝိနယံ သင်္ဂါယာမာ’’တိ. ‘‘ကံ ဓုရံ ကတွာ ဝိနယော သင်္ဂါယိတဗ္ဗော’’တိ? ‘‘အာယသ္မန္တံ ဥပါလိ’’န္တိ. ‘‘ကိံ အာနန္ဒော နပ္ပဟောတီ’’တိ? ‘‘နော နပ္ပဟောတိ, အပိစ ခေါ ပန သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ ဓရမာနောယေဝ ဝိနယပရိယတ္တိံ နိဿာယ အာယသ္မန္တံ ဥပါလိံ ဧတဒဂ္ဂေ ဌပေသိ – ‘ဧတဒဂ္ဂံ, ဘိက္ခဝေ, မမ သာဝကာနံ ဘိက္ခူနံ ဝိနယဓရာနံ ယဒိဒံ ဥပါလီ’’’တိ (အ. နိ. ၁.၂၂၈). တသ္မာ ဥပါလိတ္ထေရံ ပုစ္ဆိတွာ ဝိနယံ သင်္ဂါယာမာတိ. တတော ထေရော ဝိနယံ ပုစ္ဆနတ္ထာယ အတ္တနာဝ အတ္တာနံ သမ္မန္နိ. ဥပါလိတ္ထေရောပိ ဝိဿဇ္ဇနတ္ထာယ သမ္မန္နိ. တတြာယံ ပါဠိ – उनके इस प्रकार बैठ जाने पर, आयुष्मान महाकश्यप स्थविर ने भिक्षुओं को संबोधित किया, "आयुष्मानों! हम पहले किसका संगायन (पाठ) करें—धम्म का या विनय का?" भिक्षुओं ने कहा, "भन्ते महाकश्यप! विनय ही बुद्ध शासन की आयु है; विनय के स्थित रहने पर शासन स्थित रहता है। इसलिए पहले विनय का संगायन करें।" "किसे प्रमुख बनाकर विनय का संगायन किया जाए?" "आयुष्मान उपालि को।" "क्या आनंद समर्थ नहीं हैं?" "असमर्थ नहीं हैं, अपितु सम्यक सम्बुद्ध ने जीवित रहते हुए ही विनय की शिक्षा के आधार पर आयुष्मान उपालि को एतदग्र (सर्वश्रेष्ठ) के पद पर स्थापित किया था— 'भिक्षुओं! विनयधरों में उपालि मेरे शिष्यों में सर्वश्रेष्ठ है।' इसलिए, उपालि स्थविर से पूछकर विनय का संगायन करें।" तब स्थविर (महाकश्यप) ने विनय पूछने के लिए स्वयं को नियुक्त किया। उपालि स्थविर ने भी उत्तर देने के लिए स्वयं को नियुक्त किया। इस विषय में यह पालि है— အထ ခေါ အာယသ္မာ မဟာကဿပေါ သံဃံ ဉာပေသိ – तब आयुष्मान महाकश्यप ने संघ को सूचित किया— ‘‘သုဏာတု မေ, အာဝုသော, သံဃော, ယဒိ သံဃဿ ပတ္တကလ္လံ, အဟံ ဥပါလိံ ဝိနယံ ပုစ္ဆေယျ’’န္တိ. "आयुष्मानों! संघ मेरी बात सुने। यदि संघ के लिए उचित समय हो, तो मैं उपालि से विनय के विषय में प्रश्न पूछूँ।" အာယသ္မာပိ [Pg.83] ဥပါလိ သံဃံ ဉာပေသိ – आयुष्मान उपालि ने भी संघ को सूचित किया— ‘‘သုဏာတု မေ, ဘန္တေ, သံဃော, ယဒိ သံဃဿ ပတ္တကလ္လံ, အဟံ အာယသ္မတာ မဟာကဿပေန ဝိနယံ ပုဋ္ဌော ဝိဿဇ္ဇေယျ’’န္တိ. "भन्ते! संघ मेरी बात सुने। यदि संघ के लिए उचित समय हो, तो मैं आयुष्मान महाकश्यप द्वारा विनय के विषय में पूछे जाने पर उत्तर दूँ।" ဧဝံ အတ္တနာဝ အတ္တာနံ သမ္မန္နိတွာ အာယသ္မာ, ဥပါလိ, ဥဋ္ဌာယာသနာ ဧကံသံ စီဝရံ ကတွာ ထေရေ ဘိက္ခူ ဝန္ဒိတွာ ဓမ္မာသနေ နိသီဒိ ဒန္တခစိတံ ဗီဇနိံ ဂဟေတွာ. တတော မဟာကဿပတ္ထေရော ဥပါလိတ္ထေရံ ပဌမပါရာဇိကံ အာဒိံ ကတွာ သဗ္ဗံ ဝိနယံ ပုစ္ဆိ, ဥပါလိတ္ထေရော ဝိဿဇ္ဇေသိ. သဗ္ဗေ ပဉ္စသတာ ဘိက္ခူ ပဌမပါရာဇိကသိက္ခာပဒံ သနိဒါနံ ကတွာ ဧကတော ဂဏသဇ္ဈာယမကံသု. ဧဝံ သေသာနိပီတိ သဗ္ဗံ ဝိနယဋ္ဌကထာယ ဂဟေတဗ္ဗံ. ဧတေန နယေန သဥဘတောဝိဘင်္ဂံ သခန္ဓကပရိဝါရံ သကလံ ဝိနယပိဋကံ သင်္ဂါယိတွာ ဥပါလိတ္ထေရော ဒန္တခစိတံ ဗီဇနိံ နိက္ခိပိတွာ ဓမ္မာသနာ ဩရောဟိတွာ ဝုဍ္ဎေ ဘိက္ခူ ဝန္ဒိတွာ အတ္တနော ပတ္တာသနေ နိသီဒိ. इस प्रकार स्वयं को नियुक्त कर, आयुष्मान उपालि आसन से उठकर, चीवर को एक कंधे पर कर, स्थविर भिक्षुओं को वंदन कर, हाथीदांत से जड़ित पंखा लेकर धर्मासन पर बैठ गए। तब महाकश्यप स्थविर ने उपालि स्थविर से प्रथम पाराजिक को आदि बनाकर संपूर्ण विनय के विषय में प्रश्न पूछे, और उपालि स्थविर ने उत्तर दिए। सभी पाँच सौ भिक्षुओं ने प्रथम पाराजिक शिक्षापद को उसके निदान (संदर्भ) सहित एक साथ मिलकर सस्वर पाठ (गणसज्झाय) किया। इसी प्रकार शेष शिक्षापदों का भी पाठ किया—यह सब विनय अट्ठकथा से ग्रहण करना चाहिए। इस विधि से दोनों विभंग (भिक्षु और भिक्षुणी), खन्धक और परिवार सहित संपूर्ण विनय पिटक का संगायन करके, उपालि स्थविर ने हाथीदांत का पंखा रखकर धर्मासन से उतरकर वृद्ध भिक्षुओं को वंदन किया और अपने नियत आसन पर बैठ गए। ဝိနယံ သင်္ဂါယိတွာ ဓမ္မံ သင်္ဂါယိတုကာမော အာယသ္မာ မဟာကဿပတ္ထေရော ဘိက္ခူ ပုစ္ဆိ – ‘‘ဓမ္မံ သင်္ဂါယန္တေဟိ ကံ ပုဂ္ဂလံ ဓုရံ ကတွာ ဓမ္မော သင်္ဂါယိတဗ္ဗော’’တိ? ဘိက္ခူ ‘‘အာနန္ဒတ္ထေရံ ဓုရံ ကတွာ’’တိ အာဟံသု. विनय का संगायन करने के पश्चात, धम्म का संगायन करने के इच्छुक आयुष्मान महाकश्यप स्थविर ने भिक्षुओं से पूछा— "धम्म का संगायन करते समय किसे प्रमुख बनाकर धम्म का संगायन किया जाए?" भिक्षुओं ने कहा— "आनंद स्थविर को प्रमुख बनाकर।" အထ ခေါ အာယသ္မာ မဟာကဿပေါ သံဃံ ဉာပေသိ – तब आयुष्मान महाकश्यप ने संघ को सूचित किया— ‘‘သုဏာတု မေ, အာဝုသော, သံဃော, ယဒိ သံဃဿ ပတ္တကလ္လံ, အဟံ အာနန္ဒံ ဓမ္မံ ပုစ္ဆေယျ’’န္တိ. "आयुष्मानों! संघ मेरी बात सुने। यदि संघ के लिए उचित समय हो, तो मैं आनंद से धम्म के विषय में प्रश्न पूछूँ।" အထ ခေါ အာယသ္မာ အာနန္ဒော သံဃံ ဉာပေသိ – तब आयुष्मान आनंद ने संघ को सूचित किया— ‘‘သုဏာတု မေ, ဘန္တေ, သံဃော, ယဒိ သံဃဿ ပတ္တကလ္လံ, အဟံ အာယသ္မတာ မဟာကဿပေန ဓမ္မံ ပုဋ္ဌော ဝိဿဇ္ဇေယျ’’န္တိ. "भन्ते! संघ मेरी बात सुने। यदि संघ के लिए उचित समय हो, तो मैं आयुष्मान महाकश्यप द्वारा धम्म के विषय में पूछे जाने पर उत्तर दूँ।" အထ ခေါ အာယသ္မာ အာနန္ဒော ဥဋ္ဌာယာသနာ ဧကံသံ စီဝရံ ကတွာ ထေရေ ဘိက္ခူ ဝန္ဒိတွာ ဓမ္မာသနေ နိသီဒိ ဒန္တခစိတံ ဗီဇနိံ ဂဟေတွာ. အထ မဟာကဿပတ္ထေရော အာနန္ဒတ္ထေရံ ဓမ္မံ ပုစ္ဆိ – ‘‘ဗြဟ္မဇာလံ, အာဝုသော အာနန္ဒ, ကတ္ထ ဘာသိတ’’န္တိ? ‘‘အန္တရာ စ, ဘန္တေ, ရာဇဂဟံ အန္တရာ စ နာဠန္ဒံ ရာဇာဂါရကေ အမ္ဗလဋ္ဌိကာယ’’န္တိ. ‘‘ကံ အာရဗ္ဘာ’’တိ? ‘‘သုပ္ပိယဉ္စ ပရိဗ္ဗာဇကံ ဗြဟ္မဒတ္တဉ္စ မာဏဝက’’န္တိ. အထ ခေါ အာယသ္မာ မဟာကဿပေါ အာယသ္မန္တံ အာနန္ဒံ ဗြဟ္မဇာလဿ နိဒါနမ္ပိ ပုစ္ဆိ, ပုဂ္ဂလမ္ပိ ပုစ္ဆိ. ‘‘သာမညဖလံ; ပနာဝုသော အာနန္ဒ, ကတ္ထ ဘာသိတ’’န္တိ? ‘‘ရာဇဂဟေ, ဘန္တေ, ဇီဝကမ္ဗဝနေ’’တိ. ‘‘ကေန သဒ္ဓိ’’န္တိ? ‘‘အဇာတသတ္တုနာ [Pg.84] ဝေဒေဟိပုတ္တေန သဒ္ဓိ’’န္တိ. အထ ခေါ အာယသ္မာ မဟာကဿပေါ အာယသ္မန္တံ အာနန္ဒံ သာမညဖလဿ နိဒါနမ္ပိ ပုစ္ဆိ, ပုဂ္ဂလမ္ပိ ပုစ္ဆိ. ဧတေနေဝ ဥပါယေန ပဉ္စပိ နိကာယေ ပုစ္ဆိ, ပုဋ္ဌော ပုဋ္ဌော အာယသ္မာ အာနန္ဒော ဝိဿဇ္ဇေသိ. အယံ ပဌမမဟာသင်္ဂီတိ ပဉ္စဟိ ထေရသတေဟိ ကတာ – तब आयुष्मान आनन्द अपने आसन से उठकर, चीवर को एक कंधे पर कर, स्थविर भिक्षुओं की वन्दना कर, हाथीदाँत से जड़ित पंखा लेकर धर्मासन पर बैठ गए। तब महाकस्सप स्थविर ने आयुष्मान आनन्द से धर्म के विषय में पूछा— "आवुस आनन्द! ब्रह्मजाल (सुत्त) कहाँ कहा गया था?" "भन्ते! राजगृह और नालन्दा के बीच अम्बलट्ठिका के राजागार (राजकीय विश्रामालय) में।" "किसके विषय में?" "सुप्पिय परिव्राजक और ब्रह्मदत्त माणवक के विषय में।" तब आयुष्मान महाकस्सप ने आयुष्मान आनन्द से ब्रह्मजाल सुत्त के निदान (भूमिका) और पुद्गल (व्यक्तियों) के विषय में भी पूछा। "आवुस आनन्द! सामञ्ञफल (सुत्त) कहाँ कहा गया था?" "भन्ते! राजगृह में जीवक के आम्रवन में।" "किसके साथ?" "वेदेहीपुत्र अजातशत्रु के साथ।" तब आयुष्मान महाकस्सप ने आयुष्मान आनन्द से सामञ्ञफल सुत्त के निदान और पुद्गल के विषय में भी पूछा। इसी प्रकार उन्होंने पाँचों निकायों के विषय में पूछा, और पूछे जाने पर आयुष्मान आनन्द ने उत्तर दिया। यह प्रथम महासंगीति पाँच सौ स्थविरों द्वारा की गई थी— ‘‘သတေဟိ ပဉ္စဟိ ကတာ, တေန ပဉ္စသတာတိ စ; ထေရေဟေဝ ကတတ္တာ စ, ထေရိကာတိ ပဝုစ္စတီ’’တိ. "चूँकि यह पाँच सौ (भिक्षुओं) द्वारा की गई थी, इसलिए इसे 'पञ्चसता' कहा जाता है; और केवल स्थविरों द्वारा किए जाने के कारण इसे 'थेरिका' कहा जाता है।" ဣမိဿာ ပဌမမဟာသင်္ဂီတိယာ ဝတ္တမာနာယ သဗ္ဗံ ဒီဃနိကာယံ မဇ္ဈိမနိကာယာဒိဉ္စ ပုစ္ဆိတွာ အနုပုဗ္ဗေန ခုဒ္ဒကနိကာယံ ပုစ္ဆန္တေန အာယသ္မတာ မဟာကဿပေန ‘‘မင်္ဂလသုတ္တံ, အာဝုသော အာနန္ဒ, ကတ္ထ ဘာသိတ’’န္တိ ဧဝမာဒိဝစနာဝသာနေ ‘‘နိဒါနမ္ပိ ပုစ္ဆိ, ပုဂ္ဂလမ္ပိ ပုစ္ဆီ’’တိ ဧတ္ထ နိဒါနေ ပုစ္ဆိတေ တံ နိဒါနံ ဝိတ္ထာရေတွာ ယထာ စ ဘာသိတံ, ယေန စ သုတံ, ယဒါ စ သုတံ, ယေန စ ဘာသိတံ, ယတ္ထ စ ဘာသိတံ, ယဿ စ ဘာသိတံ, တံ သဗ္ဗံ ကထေတုကာမေန ‘‘ဧဝံ ဘာသိတံ မယာ သုတံ, ဧကံ သမယံ သုတံ, ဘဂဝတာ ဘာသိတံ, သာဝတ္ထိယံ ဘာသိတံ, ဒေဝတာယ ဘာသိတ’’န္တိ ဧတမတ္ထံ ဒဿေန္တေန အာယသ္မတာ အာနန္ဒေန ဝုတ္တံ ‘‘ဧဝံ မေ သုတံ – ဧကံ သမယံ ဘဂဝါ သာဝတ္ထိယံ ဝိဟရတိ ဇေတဝနေ အနာထပိဏ္ဍိကဿ အာရာမေ…ပေ… ဘဂဝန္တံ ဂါထာယ အဇ္ဈဘာသီ’’တိ. ဧဝမိဒံ အာယသ္မတာ အာနန္ဒေန ဝုတ္တံ, တဉ္စ ပန ပဌမမဟာသင်္ဂီတိကာလေ ဝုတ္တန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. इस प्रथम महासंगीति के चलते समय, सम्पूर्ण दीघ निकाय, मज्झिम निकाय आदि के विषय में पूछने के बाद, क्रम से खुद्दक निकाय के विषय में पूछते हुए आयुष्मान महाकस्सप द्वारा "आवुस आनन्द! मङ्गल सुत्त कहाँ कहा गया था?" इस प्रकार के वचनों के अन्त में "निदान भी पूछा, पुद्गल भी पूछा" यहाँ निदान के पूछे जाने पर, उस निदान का विस्तार करते हुए—जैसे वह कहा गया, जिसके द्वारा सुना गया, जब सुना गया, जिसके द्वारा कहा गया, जहाँ कहा गया और जिसके लिए कहा गया—उस सब को कहने की इच्छा से "ऐसा कहा गया, मैंने सुना, एक समय सुना गया, भगवान द्वारा कहा गया, सावत्थी में कहा गया, देवता को कहा गया" इस अर्थ को दर्शाते हुए आयुष्मान आनन्द ने कहा— "एवं मे सुतं (ऐसा मैंने सुना)—एक समय भगवान सावत्थी में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे... (पे)... भगवान को गाथा में सम्बोधित किया।" इस प्रकार यह आयुष्मान आनन्द द्वारा कहा गया है, और यह समझना चाहिए कि यह प्रथम महासंगीति के समय कहा गया था। ဣဒါနိ ‘‘ကသ္မာ ဝုတ္တ’’န္တိ ဧတ္ထ ဝုစ္စတေ – ယသ္မာ အယမာယသ္မာ မဟာကဿပတ္ထေရေန နိဒါနံ ပုဋ္ဌော, တသ္မာနေန တံ နိဒါနံ အာဒိတော ပဘုတိ ဝိတ္ထာရေတုံ ဝုတ္တံ. ယသ္မာ ဝါ အာနန္ဒံ ဓမ္မာသနေ နိသိန္နံ ဝသီဂဏပရိဝုတံ ဒိသွာ ဧကစ္စာနံ ဒေဝတာနံ စိတ္တမုပ္ပန္နံ ‘‘အယမာယသ္မာ ဝေဒေဟမုနိ ပကတိယာပိ သကျကုလမနွယော ဘဂဝတော ဒါယာဒေါ, ဘဂဝတာပိ ပဉ္စက္ခတ္တုံ ဧတဒဂ္ဂေ နိဒ္ဒိဋ္ဌော, စတူဟိ အစ္ဆရိယအဗ္ဘုတဓမ္မေဟိ သမန္နာဂတော, စတုန္နံ ပရိသာနံ ပိယော မနာပေါ, ဣဒါနိ မညေ ဘဂဝတော ဓမ္မရဇ္ဇဒါယဇ္ဇံ ပတွာ ဗုဒ္ဓေါ ဇာတော’’တိ. တသ္မာ အာယသ္မာ အာနန္ဒော တာသံ ဒေဝတာနံ စေတသာ စေတောပရိဝိတက္ကမညာယ တံ အဘူတဂုဏသမ္ဘာဝနံ အနဓိဝါသေန္တော အတ္တနော သာဝကဘာဝမေဝ ဒီပေတုံ အာဟ ‘‘ဧဝံ မေ သုတံ ဧကံ သမယံ ဘဂဝါ [Pg.85] …ပေ… အဇ္ဈဘာသီ’’တိ. ဧတ္ထန္တရေ ပဉ္စ အရဟန္တသတာနိ အနေကာနိ စ ဒေဝတာသဟဿာနိ ‘‘သာဓု သာဓူ’’တိ အာယသ္မန္တံ အာနန္ဒံ အဘိနန္ဒိံသု, မဟာဘူမိစာလော အဟောသိ, နာနာဝိဓကုသုမဝဿံ အန္တလိက္ခတော ပပတိ, အညာနိ စ ဗဟူနိ အစ္ဆရိယာနိ ပါတုရဟေသုံ, ဗဟူနဉ္စ ဒေဝတာနံ သံဝေဂေါ ဥပ္ပဇ္ဇိ ‘‘ယံ အမှေဟိ ဘဂဝတော သမ္မုခါ သုတံ, ဣဒါနေဝ တံ ပရောက္ခာ ဇာတ’’န္တိ. ဧဝမိဒံ အာယသ္မတာ အာနန္ဒေန ပဌမမဟာသင်္ဂီတိကာလေ ဝဒန္တေနာပိ ဣမိနာ ကာရဏေန ဝုတ္တန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ဧတ္တာဝတာ စ ‘‘ဝုတ္တံ ယေန ယဒါ ယသ္မာ, စေတံ ဝတွာ ဣမံ ဝိဓိ’’န္တိ ဣမိဿာ အဒ္ဓဂါထာယ အတ္ထော ပကာသိတော ဟောတိ. अब "क्यों कहा गया?" इसके विषय में कहा जाता है— चूँकि इन आयुष्मान से महाकस्सप स्थविर द्वारा निदान पूछा गया था, इसलिए उन्होंने उस निदान को आरम्भ से विस्तारपूर्वक बताने के लिए यह कहा। अथवा, धर्मासन पर बैठे और वशी (अर्हतों) के समूह से घिरे हुए आनन्द को देखकर कुछ देवताओं के मन में यह विचार उत्पन्न हुआ— "ये आयुष्मान वेदेहमुनि स्वभाव से ही शाक्य कुल के वंशज और भगवान के उत्तराधिकारी हैं; भगवान ने भी इन्हें पाँच बार एतदग्र (सर्वश्रेष्ठ) घोषित किया है, ये चार आश्चर्यजनक और अद्भुत गुणों से युक्त हैं, चारों परिषदों के प्रिय और मनभावन हैं; अब, मुझे लगता है कि भगवान के धर्म-राज्य का उत्तराधिकार प्राप्त कर ये बुद्ध हो गए हैं।" इसलिए आयुष्मान आनन्द ने उन देवताओं के मन के विचार को अपने चित्त से जानकर, उस अभूतपूर्व गुण-प्रशंसा को स्वीकार न करते हुए, केवल अपने श्रावक-भाव (शिष्य होने की अवस्था) को ही प्रकट करने के लिए कहा— "एवं मे सुतं एकं समयं भगवा... (पे)... अज्झभासि।" इसी बीच, पाँच सौ अर्हतों और अनेक सहस्र देवताओं ने "साधु! साधु!" कहकर आयुष्मान आनन्द का अभिनन्दन किया, महा-भूकम्प हुआ, आकाश से नाना प्रकार के पुष्पों की वर्षा हुई और अन्य कई आश्चर्य प्रकट हुए। अनेक देवताओं में संवेग उत्पन्न हुआ— "जो हमने भगवान के सम्मुख सुना था, वह अभी परोक्ष (अतीत) हो गया।" इस प्रकार, आयुष्मान आनन्द द्वारा प्रथम महासंगीति के समय बोलते हुए भी इसी कारण से यह कहा गया, ऐसा समझना चाहिए। इतने से "किसके द्वारा, कब, क्यों कहा गया, यह विधि कहकर..." इस आधी गाथा का अर्थ प्रकाशित होता है। ဧဝမိစ္စာဒိပါဌဝဏ္ဏနာ 'एवं' इत्यादि पाठ की व्याख्या। ၁. ဣဒါနိ ‘‘ဧဝမိစ္စာဒိပါဌဿ, အတ္ထံ နာနပ္ပကာရတော’’တိ ဧဝမာဒိမာတိကာယ သင်္ဂဟိတတ္ထပ္ပကာသနတ္ထံ ဝုစ္စတေ – ဧဝန္တိ အယံ သဒ္ဒေါ ဥပမူပဒေသသမ္ပဟံသနဂရဟဏဝစနသမ္ပဋိဂ္ဂဟာကာရနိဒဿနာဝဓာရဏာဒီသု အတ္ထေသု ဒဋ္ဌဗ္ဗော. တထာ ဟေသ ‘‘ဧဝံ ဇာတေန မစ္စေန, ကတ္တဗ္ဗံ ကုသလံ ဗဟု’’န္တိ ဧဝမာဒီသု (ဓ. ပ. ၅၃) ဥပမာယံ ဒိဿတိ. ‘‘ဧဝံ တေ အဘိက္ကမိတဗ္ဗံ, ဧဝံ တေ ပဋိက္ကမိတဗ္ဗ’’န္တိအာဒီသု (အ. နိ. ၄.၁၂၂) ဥပဒေသေ. ‘‘ဧဝမေတံ ဘဂဝါ, ဧဝမေတံ သုဂတာ’’တိ ဧဝမာဒီသု (အ. နိ. ၃.၆၆) သမ္ပဟံသနေ. ‘‘ဧဝမေဝံ ပနာယံ ဝသလီ ယသ္မိံ ဝါ တသ္မိံ ဝါ တဿ မုဏ္ဍကဿ သမဏကဿ ဝဏ္ဏံ ဘာသတီ’’တိ ဧဝမာဒီသု (သံ. နိ. ၁.၁၈၇) ဂရဟဏေ. ‘‘ဧဝံ, ဘန္တေတိ ခေါ တေ ဘိက္ခူ ဘဂဝတော ပစ္စဿောသု’’န္တိ ဧဝမာဒီသု (မ. နိ. ၁.၁) ဝစနသမ္ပဋိဂ္ဂဟေ. ‘‘ဧဝံ ဗျာ ခေါ အဟံ, ဘန္တေ, ဘဂဝတာ ဓမ္မံ ဒေသိတံ အာဇာနာမီ’’တိ ဧဝမာဒီသု (မ. နိ. ၁.၃၉၈) အာကာရေ. ‘‘ဧဟိ တွံ, မာဏဝက, ယေန သမဏော အာနန္ဒော တေနုပသင်္ကမ, ဥပသင်္ကမိတွာ မမ ဝစနေန သမဏံ အာနန္ဒံ အပ္ပာဗာဓံ အပ္ပာတင်္ကံ လဟုဋ္ဌာနံ ဗလံ ဖာသုဝိဟာရံ ပုစ္ဆ. ‘သုဘော မာဏဝေါ တောဒေယျပုတ္တော ဘဝန္တံ အာနန္ဒံ အပ္ပာဗာဓံ အပ္ပာတင်္ကံ လဟုဋ္ဌာနံ ဗလံ ဖာသုဝိဟာရံ ပုစ္ဆတီ’တိ, ဧဝဉ္စ ဝဒေဟိ သာဓု ကိရ ဘဝံ အာနန္ဒော ယေန သုဘဿ မာဏဝဿ တောဒေယျပုတ္တဿ နိဝေသနံ, တေနုပသင်္ကမတု အနုကမ္ပံ ဥပါဒါယာ’’တိ ဧဝမာဒီသု (ဒီ. နိ. ၁.၄၄၅) နိဒဿနေ. ‘‘တံ ကိံ မညထ ကာလာမာ, ဣမေ ဓမ္မာ ကုသလာ ဝါ အကုသလာ ဝါတိ? အကုသလာ, ဘန္တေ. သာဝဇ္ဇာ ဝါ အနဝဇ္ဇာ ဝါတိ? သာဝဇ္ဇာ, ဘန္တေ. ဝိညုဂရဟိတာ ဝါ ဝိညုပ္ပသတ္ထာ [Pg.86] ဝါတိ? ဝိညုဂရဟိတာ, ဘန္တေ. သမတ္တာ သမာဒိန္နာ အဟိတာယ ဒုက္ခာယ သံဝတ္တန္တိ နော ဝါ, ကထံ ဝေါ ဧတ္ထ ဟောတီတိ? သမတ္တာ, ဘန္တေ, သမာဒိန္နာ အဟိတာယ ဒုက္ခာယ သံဝတ္တန္တိ, ဧဝံ နော ဧတ္ထ ဟောတီ’’တိ ဧဝမာဒီသု (အ. နိ. ၃.၆၆) အဝဓာရဏေ. ဣဓ ပန အာကာရနိဒဿနာဝဓာရဏေသု ဒဋ္ဌဗ္ဗော. १. अब, "एवं" आदि पाठ के अर्थ को विभिन्न प्रकार से बताने के लिए, "एवं" आदि मातृका (शीर्षक) द्वारा संगृहीत अर्थ के प्रकाशन हेतु कहा जाता है— "एवं" यह शब्द उपमा, उपदेश, प्रशंसा, निंदा, वचन-स्वीकृति, आकार (प्रकार), निदर्शन (दिखाना) और अवधारण (निश्चय) आदि अर्थों में देखा जाना चाहिए। जैसा कि, "एवं जातेन मच्चेन, कत्तब्बं कुसलं बहुं" (इस प्रकार उत्पन्न हुए मरणधर्मा मनुष्य द्वारा बहुत से कुशल कर्म किए जाने चाहिए) आदि में यह 'उपमा' के अर्थ में दिखता है। "एवं ते अभिक्कमितब्बं, एवं ते पटिक्कमितब्बं" (तुम्हें इस प्रकार आगे बढ़ना चाहिए, इस प्रकार पीछे हटना चाहिए) आदि में 'उपदेश' के अर्थ में। "एवमेतं भगवा, एवमेतं सुगता" (हे भगवन, यह ऐसा ही है; हे सुगत, यह ऐसा ही है) आदि में 'प्रशंसार्थ' में। "एवमेवं पनायं वसली यस्मिं वा तस्मिं वा तस्स मुण्डकस्स समणकस्स वण्णं भासति" (इस प्रकार यह नीच स्त्री जिस-तिस कारण से उस मुण्डित श्रमण के गुणों का बखान करती है) आदि में 'निंदा' के अर्थ में। "एवं, भन्तेति खो ते भिक्खू भगवतो पच्चस्सोसुं" (हे भदन्त, 'ऐसा ही हो', उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया) आदि में 'वचन-स्वीकृति' के अर्थ में। "एवं ब्या खो अहं, भन्ते, भगवता धम्मं देसितं आजानामि" (हे भदन्त, भगवान् द्वारा उपदिष्ट धर्म को मैं इस प्रकार (इस ढंग से) समझता हूँ) आदि में 'आकार' (प्रकार) के अर्थ में। "एहि त्वं, माणवक, येन समणो आनन्दो तेनुपसङ्कम... एवं च वदेहि... येन सुभस्स माणवस्स तोदेय्यपुत्तस्स निवेसनं, तेनुपसङ्कमतु अनुकम्पं उपादाया" (हे माणवक, आओ, जहाँ श्रमण आनन्द हैं वहाँ जाओ... और इस प्रकार कहो... कि सुभ माणवक के घर पर अनुकम्पा करके पधारें) आदि में 'निदर्शन' के अर्थ में। "तं किं मञ्ञथ कालामा, इमे धम्मा कुसला वा अकुसला वाति?... एवं नो एत्थ होतीति" (हे कालामो, तुम क्या सोचते हो, ये धर्म कुशल हैं या अकुशल?... इस विषय में हमारा ऐसा ही मत है) आदि में 'अवधारण' (निश्चय) के अर्थ में। यहाँ (मङ्गल सुत्त में) इसे आकार, निदर्शन और अवधारण के अर्थ में देखा जाना चाहिए। တတ္ထ အာကာရတ္ထေန ဧဝံ-သဒ္ဒေန ဧတမတ္ထံ ဒီပေတိ – နာနာနယနိပုဏမနေကဇ္ဈာသယသမုဋ္ဌာနံ အတ္ထဗျဉ္ဇနသမ္ပန္နံ ဝိဝိဓပါဋိဟာရိယံ ဓမ္မတ္ထဒေသနာပဋိဝေဓဂမ္ဘီရံ သဗ္ဗသတ္တာနံ သကသကဘာသာနုရူပတော သောတပထမာဂစ္ဆန္တံ တဿ ဘဂဝတော ဝစနံ သဗ္ဗပ္ပကာရေန ကော သမတ္ထော ဝိညာတုံ, သဗ္ဗထာမေန ပန သောတုကာမတံ ဇနေတွာပိ ဧဝံ မေ သုတံ, မယာပိ ဧကေနာကာရေန သုတန္တိ. वहाँ 'आकार' (प्रकार) के अर्थ वाले 'एवं' शब्द से इस अर्थ को प्रकट करते हैं— विभिन्न नयों में निपुण, अनेक आशयों से समुत्पन्न, अर्थ और व्यंजन से संपन्न, विविध प्रातिहार्यों से युक्त, धर्म, अर्थ, देशना और प्रतिवेध में गंभीर, तथा सभी प्राणियों की अपनी-अपनी भाषा के अनुरूप श्रवण-पथ में आने वाले उस भगवान् के वचन को पूर्ण रूप से (सभी प्रकार से) जानने में कौन समर्थ है? फिर भी, पूरी शक्ति से सुनने की इच्छा जाग्रत करके, "ऐसा मैंने सुना" (एवं मे सुतं), अर्थात् मेरे द्वारा भी एक प्रकार से सुना गया— ऐसा प्रकट करते हैं। နိဒဿနတ္ထေန ‘‘နာဟံ သယမ္ဘူ, န မယာ ဣဒံ သစ္ဆိကတ’’န္တိ အတ္တာနံ ပရိမောစေန္တော ‘‘ဧဝံ မေ သုတံ, မယာပိ ဧဝံ သုတ’’န္တိ ဣဒါနိ ဝတ္တဗ္ဗံ သကလသုတ္တံ နိဒဿေတိ. 'निदर्शन' (दिखाने) के अर्थ में, "मैं स्वयं-भू नहीं हूँ, न ही मैंने इसे स्वयं साक्षात् किया है"— इस प्रकार स्वयं को (कर्तृत्व से) मुक्त करते हुए, "ऐसा मैंने सुना, मेरे द्वारा भी ऐसा सुना गया"— इस प्रकार अब कहे जाने वाले संपूर्ण सुत्त का निर्देश करते हैं। အဝဓာရဏတ္ထေန ‘‘ဧတဒဂ္ဂံ, ဘိက္ခဝေ, မမ သာဝကာနံ ဘိက္ခူနံ ဗဟုဿုတာနံ ယဒိဒံ အာနန္ဒော, ဂတိမန္တာနံ, သတိမန္တာနံ, ဓိတိမန္တာနံ, ဥပဋ္ဌာကာနံ ယဒိဒံ အာနန္ဒော’’တိ (အ. နိ. ၁.၂၁၉-၂၂၃) ဧဝံ ဘဂဝတာ ပသတ္ထဘာဝါနုရူပံ အတ္တနော ဓာရဏဗလံ ဒဿေန္တော သတ္တာနံ သောတုကမျတံ ဇနေတိ ‘‘ဧဝံ မေ သုတံ, တဉ္စ ခေါ အတ္ထတော ဝါ ဗျဉ္ဇနတော ဝါ အနူနမနဓိကံ, ဧဝမေဝ, န အညထာ ဒဋ္ဌဗ္ဗ’’န္တိ. 'अवधारण' (निश्चय) के अर्थ में, "भिक्षुओं, मेरे बहुश्रुत भिक्षु शिष्यों में यह आनन्द अग्र है... गतिमानों में, स्मृतिमानों में, धृतिमानों में और उपस्थायकों में यह आनन्द अग्र है"— इस प्रकार भगवान् द्वारा की गई प्रशंसा के अनुरूप अपनी धारण-शक्ति को प्रदर्शित करते हुए, प्राणियों में सुनने की इच्छा उत्पन्न करते हैं कि— "ऐसा ही मैंने सुना, और वह अर्थ से अथवा व्यंजन से न कम है और न अधिक; ठीक वैसा ही है, उसे अन्यथा नहीं समझना चाहिए।" မေ-သဒ္ဒေါ တီသု အတ္ထေသု ဒိဿတိ. တထာ ဟိဿ ‘‘ဂါထာဘိဂီတံ မေ အဘောဇနေယျ’’န္တိ ဧဝမာဒီသု (သု. နိ. ၈၁) မယာတိ အတ္ထော. ‘‘သာဓု မေ, ဘန္တေ, ဘဂဝါ သံခိတ္တေန ဓမ္မံ ဒေသေတူ’’တိ ဧဝမာဒီသု (သံ. နိ. ၄.၈၈) မယှန္တိ အတ္ထော. ‘‘ဓမ္မဒါယာဒါ မေ, ဘိက္ခဝေ, ဘဝထာ’’တိ ဧဝမာဒီသု (မ. နိ. ၁.၂၉) မမာတိ အတ္ထော. ဣဓ ပန ‘‘မယာ သုတ’’န္တိ စ ‘‘မမ သုတ’’န္တိ စ အတ္ထဒွယေ ယုဇ္ဇတိ. 'मे' शब्द तीन अर्थों में देखा जाता है। जैसा कि "गाथाभिगीतं मे अभोजनेय्यं" (गाथा गाकर प्राप्त किया हुआ मेरे द्वारा अभोज्य है) आदि में 'मया' (मेरे द्वारा) अर्थ है। "साधु मे, भन्ते, भगवा संखित्तेन धम्मं देसेतु" (हे भदन्त, अच्छा हो कि भगवान् मुझे संक्षेप में धर्म उपदेश दें) आदि में 'मय्हं' (मेरे लिए/को) अर्थ है। "धम्मदायादा मे, भिक्खवे, भवथ" (हे भिक्षुओं, मेरे धर्म-दायाद बनो) आदि में 'मम' (मेरे) अर्थ है। यहाँ (मङ्गल सुत्त में) 'मेरे द्वारा सुना गया' और 'मेरा सुनना'— इन दोनों अर्थों में यह युक्त होता है। သုတန္တိ အယံ သုတသဒ္ဒေါ သဥပသဂ္ဂေါ အနုပသဂ္ဂေါ စ ဂမနချာတရာဂါဘိဘူတူပစိတာနုယောဂသောတဝိညေယျသောတဒွါရဝိညာတာဒိအနေကတ္ထပ္ပဘေဒေါ. တထာ ဟိဿ ‘‘သေနာယ ပသုတော’’တိ ဧဝမာဒီသု ဂစ္ဆန္တောတိ [Pg.87] အတ္ထော. ‘‘သုတဓမ္မဿ ပဿတော’’တိ ဧဝမာဒီသု ချာတဓမ္မဿာတိ အတ္ထော. ‘‘အဝဿုတာ အဝဿုတဿာ’’တိ ဧဝမာဒီသု (ပါစိ. ၆၅၇) ရာဂါဘိဘူတာ ရာဂါဘိဘူတဿာတိ အတ္ထော. ‘‘တုမှေဟိ ပုညံ ပသုတံ အနပ္ပက’’န္တိ ဧဝမာဒီသု (ခု. ပါ. ၇.၁၂) ဥပစိတန္တိ အတ္ထော. ‘‘ယေ ဈာနပ္ပသုတာ ဓီရာ’’တိ ဧဝမာဒီသု (ဓ. ပ. ၁၈၁) ဈာနာနုယုတ္တာတိ အတ္ထော. ‘‘ဒိဋ္ဌံ သုတံ မုတ’’န္တိ ဧဝမာဒီသု (မ. နိ. ၁.၂၄၁) သောတဝိညေယျန္တိ အတ္ထော. ‘‘သုတဓရော သုတသန္နိစယော’’တိ ဧဝမာဒီသု (မ. နိ. ၁.၃၃၉) သောတဒွါရာနုသာရဝိညာတဓရောတိ အတ္ထော. ဣဓ ပန သုတန္တိ သောတဝိညာဏပုဗ္ဗင်္ဂမာယ ဝိညာဏဝီထိယာ ဥပဓာရိတန္တိ ဝါ ဥပဓာရဏန္တိ ဝါတိ အတ္ထော. တတ္ထ ယဒါ မေ-သဒ္ဒဿ မယာတိ အတ္ထော, တဒါ ‘‘ဧဝံ မယာ သုတံ, သောတဝိညာဏပုဗ္ဗင်္ဂမာယ ဝိညာဏဝီထိယာ ဥပဓာရိတ’’န္တိ ယုဇ္ဇတိ. ယဒါ မေ-သဒ္ဒဿ မမာတိ အတ္ထော, တဒါ ‘‘ဧဝံ မမ သုတံ သောတဝိညာဏပုဗ္ဗင်္ဂမာယ ဝိညာဏဝီထိယာ ဥပဓာရဏ’’န္တိ ယုဇ္ဇတိ. 'सुतं' यह 'सुत' शब्द उपसर्ग के साथ और बिना उपसर्ग के, गमन, ख्यात (प्रसिद्ध/कहा गया), राग-अभिभूत, उपचित (संग्रहित), अनुयोग (निरन्तर अभ्यास), श्रोत्र-विज्ञेय (कान से जानने योग्य) और श्रोत्र-द्वार-विज्ञात आदि अनेक अर्थ-भेदों वाला है। जैसा कि "सेनाय पसुतो" (सेना के साथ जाता हुआ) आदि में 'जाता हुआ' अर्थ है। "सुतधम्मस्स पस्सतो" (जिसने धर्म को सुना है/जिसके लिए धर्म ख्यात है, उस देखने वाले का) आदि में 'ख्यात धर्म वाले का' अर्थ है। "अवस्सुता अवस्सुतस्स" (राग-अभिभूत स्त्री, राग-अभिभूत पुरुष के) आदि में 'राग-अभिभूत' अर्थ है। "तुम्हेहि पुञ्ञं पसुतं अनप्पकं" (तुम्हारे द्वारा बहुत पुण्य अर्जित किया गया) आदि में 'उपचित' (संग्रहित) अर्थ है। "ये झानप्पसुता धीरा" (जो ध्यान में लगे हुए धीर पुरुष हैं) आदि में 'ध्यान में प्रयुक्त/लीन' अर्थ है। "दिट्ठं सुतं मुतं" (देखा, सुना, अनुभव किया) आदि में 'श्रोत्र-विज्ञेय' अर्थ है। "सुतधरो सुतसन्निचयो" (श्रुत को धारण करने वाला, श्रुत का संचय करने वाला) आदि में 'श्रोत्र-द्वार के अनुसार विज्ञात को धारण करने वाला' अर्थ है। यहाँ 'सुतं' का अर्थ है— श्रोत्र-विज्ञान जिसमें प्रधान है, ऐसी विज्ञान-वीथि (चित्त-प्रक्रिया) द्वारा ग्रहण किया गया अथवा ग्रहण करना। वहाँ जब 'मे' शब्द का अर्थ 'मया' (मेरे द्वारा) होता है, तब "ऐसा मेरे द्वारा श्रोत्र-विज्ञान-प्रधान विज्ञान-वीथि से ग्रहण किया गया" यह अर्थ बैठता है। जब 'मे' शब्द का अर्थ 'मम' (मेरा) होता है, तब "ऐसा मेरा श्रोत्र-विज्ञान-प्रधान विज्ञान-वीथि से ग्रहण करना" यह अर्थ बैठता है। ဧဝမေတေသု တီသု ပဒေသု ဧဝန္တိ သောတဝိညာဏကိစ္စနိဒဿနံ. မေတိ ဝုတ္တဝိညာဏသမင်္ဂီပုဂ္ဂလနိဒဿနံ. သုတန္တိ အဿဝနဘာဝပ္ပဋိက္ခေပတော အနူနာနဓိကာဝိပရီတဂ္ဂဟဏနိဒဿနံ. တထာ ဧဝန္တိ သဝနာဒိစိတ္တာနံ နာနပ္ပကာရေန အာရမ္မဏေ ပဝတ္တဘာဝနိဒဿနံ. မေတိ အတ္တနိဒဿနံ. သုတန္တိ ဓမ္မနိဒဿနံ. इस प्रकार इन तीन पदों में, 'एवं' (evam) पद से श्रोत्र-विज्ञान के कार्य का प्रदर्शन होता है। 'मे' (me) पद से उक्त विज्ञान से युक्त पुगल (व्यक्ति) का प्रदर्शन होता है। 'सुतं' (sutam) पद से 'न सुनने' के भाव का निषेध करते हुए, न कम, न अधिक और न ही विपरीत ग्रहण का प्रदर्शन होता है। उसी प्रकार, 'एवं' पद से श्रवण आदि चित्तों का आलम्बन में विभिन्न प्रकार से प्रवृत्त होने के भाव का प्रदर्शन होता है। 'मे' पद से स्वयं (आत्मा) का प्रदर्शन होता है। 'सुतं' पद से धर्म का प्रदर्शन होता है। တထာ ဧဝန္တိ နိဒ္ဒိသိတဗ္ဗဓမ္မနိဒဿနံ. မေတိ ပုဂ္ဂလနိဒဿနံ. သုတန္တိ ပုဂ္ဂလကိစ္စနိဒဿနံ. उसी प्रकार, 'एवं' पद से निर्देश किए जाने योग्य धर्म का प्रदर्शन होता है। 'मे' पद से पुगल (व्यक्ति) का प्रदर्शन होता है। 'सुतं' पद से पुगल के कार्य का प्रदर्शन होता है। တထာ ဧဝန္တိ ဝီထိစိတ္တာနံ အာကာရပညတ္တိဝသေန နာနပ္ပကာရနိဒ္ဒေသော. မေတိ ကတ္တာရနိဒ္ဒေသော. သုတန္တိ ဝိသယနိဒ္ဒေသော. उसी प्रकार, 'एवं' यह शब्द वीथि-चित्तों के आकार-प्रज्ञप्ति के वश से विभिन्न प्रकार का निर्देश है। 'मे' यह शब्द कर्ता का निर्देश है। 'सुतं' यह शब्द विषय का निर्देश है। တထာ ဧဝန္တိ ပုဂ္ဂလကိစ္စနိဒ္ဒေသော. သုတန္တိ ဝိညာဏကိစ္စနိဒ္ဒေသော. မေတိ ဥဘယကိစ္စယုတ္တပုဂ္ဂလနိဒ္ဒေသော. उसी प्रकार, 'एवं' यह शब्द पुगल के कार्य का निर्देश है। 'सुतं' यह शब्द विज्ञान के कार्य का निर्देश है। 'मे' यह शब्द दोनों कार्यों से युक्त पुगल का निर्देश है। တထာ ဧဝန္တိ ဘာဝနိဒ္ဒေသော. မေတိ ပုဂ္ဂလနိဒ္ဒေသော. သုတန္တိ တဿ ကိစ္စနိဒ္ဒေသော. उसी प्रकार, 'एवं' यह शब्द भाव का निर्देश है। 'मे' यह शब्द पुगल का निर्देश है। 'सुतं' यह शब्द उसके कार्य का निर्देश है। တတ္ထ ဧဝန္တိ စ မေတိ စ သစ္ဆိကဋ္ဌပရမတ္ထဝသေန အဝိဇ္ဇမာနပညတ္တိ. သုတန္တိ ဝိဇ္ဇမာနပညတ္တိ. တထာ ဧဝန္တိ စ မေတိ စ တံ တံ ဥပါဒါယ ဝတ္တဗ္ဗတော [Pg.88] ဥပါဒါပညတ္တိ. သုတန္တိ ဒိဋ္ဌာဒီနိ ဥပနိဓာယ ဝတ္တဗ္ဗတော ဥပနိဓာပညတ္တိ. वहाँ 'एवं' और 'मे' शब्द सत्य-अर्थ (सच्छिकट्ठ) और परमार्थ के वश से 'अविद्यमान प्रज्ञप्ति' (avijjamānapaññatti) हैं। 'सुतं' शब्द 'विद्यमान प्रज्ञप्ति' (vijjamānapaññatti) है। उसी प्रकार, 'एवं' और 'मे' शब्द उस-उस (आकार) को आधार बनाकर कहे जाने के कारण 'उपादा-प्रज्ञप्ति' (upādāpaññatti) हैं। 'सुतं' शब्द दर्शन आदि की तुलना में कहे जाने के कारण 'उपनिधा-प्रज्ञप्ति' (upanidhāpaññatti) है। ဧတ္ထ စ ဧဝန္တိ ဝစနေန အသမ္မောဟံ ဒီပေတိ, သုတန္တိ ဝစနေန သုတဿ အသမ္မောသံ. တထာ ဧဝန္တိ ဝစနေန ယောနိသောမနသိကာရံ ဒီပေတိ အယောနိသော မနသိကရောတော နာနပ္ပကာရပ္ပဋိဝေဓာဘာဝတော. သုတန္တိ ဝစနေန အဝိက္ခေပံ ဒီပေတိ ဝိက္ခိတ္တစိတ္တဿ သဝနာဘာဝတော. တထာ ဟိ ဝိက္ခိတ္တစိတ္တော ပုဂ္ဂလော သဗ္ဗသမ္ပတ္တိယာ ဝုစ္စမာနောပိ ‘‘န မယာ သုတံ, ပုန ဘဏထာ’’တိ ဘဏတိ. ယောနိသောမနသိကာရေန စေတ္ထ အတ္တသမ္မာပဏိဓိံ ပုဗ္ဗေ ကတပုညတဉ္စ သာဓေတိ, အဝိက္ခေပေန သဒ္ဓမ္မဿဝနံ သပ္ပုရိသူပနိဿယဉ္စ. ဧဝန္တိ စ ဣမိနာ ဘဒ္ဒကေန အာကာရေန ပစ္ဆိမစက္ကဒွယသမ္ပတ္တိံ အတ္တနော ဒီပေတိ, သုတန္တိ သဝနယောဂေန ပုရိမစက္ကဒွယသမ္ပတ္တိံ. တထာ အာသယသုဒ္ဓိံ ပယောဂသုဒ္ဓိဉ္စ, တာယ စ အာသယသုဒ္ဓိယာ အဓိဂမဗျတ္တိံ, ပယောဂသုဒ္ဓိယာ အာဂမဗျတ္တိံ. और यहाँ 'एवं' वचन से असंमोह (मोह-रहित अवस्था) को दर्शाते हैं, 'सुतं' वचन से श्रुत (सुने हुए) के असंमोष (विस्मृति का अभाव) को। उसी प्रकार, 'एवं' वचन से योनिशो मनसिकार को दर्शाते हैं, क्योंकि अयोनिशो मनसिकार करने वाले के लिए विभिन्न प्रकार का प्रतिवेध (भेदना/समझना) संभव नहीं है। 'सुतं' वचन से अविक्षेप (एकाग्रता) को दर्शाते हैं, क्योंकि विक्षिप्त चित्त वाले के लिए श्रवण संभव नहीं है। इसीलिए, विक्षिप्त चित्त वाला व्यक्ति सब प्रकार की संपत्तियों से कहे जाने पर भी कहता है— 'मैंने नहीं सुना, फिर से कहें'। यहाँ योनिशो मनसिकार से 'आत्म-सम्यक्-प्रणिधि' (स्वयं का सही दिशा में स्थापन) और 'पूर्व-कृत-पुण्यता' सिद्ध होती है, और अविक्षेप से 'सद्धर्म-श्रवण' और 'सत्पुरुष-संश्रय' सिद्ध होता है। 'एवं' इस कल्याणकारी आकार से वह अपनी 'पश्चिम-चक्र-द्वय-संपत्ति' (अंतिम दो चक्रों की प्राप्ति) को दर्शाता है, और 'सुतं' श्रवण-योग से 'पूर्व-चक्र-द्वय-संपत्ति' को। उसी प्रकार आशय-शुद्धि और प्रयोग-शुद्धि को; और उस आशय-शुद्धि से अधिगम-व्युत्पत्ति (प्राप्ति में कुशलता) को, और प्रयोग-शुद्धि से आगम-व्युत्पत्ति (शास्त्रों में कुशलता) को। ဧဝန္တိ စ ဣမိနာ နာနပ္ပကာရပဋိဝေဓဒီပကေန ဝစနေန အတ္တနော အတ္ထပဋိဘာနပဋိသမ္ဘိဒါသမ္ပဒံ ဒီပေတိ. သုတန္တိ ဣမိနာ သောတဗ္ဗဘေဒပဋိဝေဓဒီပကေန ဓမ္မနိရုတ္တိပဋိသမ္ဘိဒါသမ္ပဒံ ဒီပေတိ. ဧဝန္တိ စ ဣဒံ ယောနိသောမနသိကာရဒီပကံ ဝစနံ ဘဏန္တော ‘‘ဧတေ မယာ ဓမ္မာ မနသာနုပေက္ခိတာ ဒိဋ္ဌိယာ သုပ္ပဋိဝိဒ္ဓါ’’တိ ဉာပေတိ. သုတန္တိ ဣဒံ သဝနယောဂဒီပကဝစနံ ဘဏန္တော ‘‘ဗဟူ မယာ ဓမ္မာ သုတာ ဓာတာ ဝစသာ ပရိစိတာ’’တိ ဉာပေတိ. တဒုဘယေနပိ အတ္ထဗျဉ္ဇနပါရိပူရိံ ဒီပေန္တော သဝနေ အာဒရံ ဇနေတိ. और 'एवं' इस विभिन्न प्रकार के प्रतिवेध को दर्शाने वाले वचन से वह अपनी 'अर्थ-प्रतिभान-प्रतिसम्भिदा-संपत्ति' को दर्शाता है। 'सुतं' इस श्रोतव्य-भेद के प्रतिवेध को दर्शाने वाले वचन से 'धर्म-निरुक्ति-प्रतिसम्भिदा-संपत्ति' को दर्शाता है। 'एवं' इस योनिशो मनसिकार को दर्शाने वाले वचन को कहते हुए (आयुष्मान आनन्द) यह ज्ञापित करते हैं कि— 'इन धर्मों का मैंने मन से अनुप्रेक्षण किया है और दृष्टि से भली-भाँति प्रतिवेध किया है'। 'सुतं' इस श्रवण-योग को दर्शाने वाले वचन को कहते हुए यह ज्ञापित करते हैं कि— 'बहुत से धर्म मेरे द्वारा सुने गए, धारण किए गए और वचनों से अभ्यस्त किए गए हैं'। इन दोनों के द्वारा अर्थ और व्यंजन की परिपूर्णता को दर्शाते हुए वे श्रवण में आदर उत्पन्न करते हैं। ဧဝံ မေ သုတန္တိ ဣမိနာ ပန သကလေနပိ ဝစနေန အာယသ္မာ အာနန္ဒော တထာဂတပ္ပဝေဒိတံ ဓမ္မံ အတ္တနော အဒဟန္တော အသပ္ပုရိသဘူမိံ, အတိက္ကမတိ, သာဝကတ္တံ ပဋိဇာနန္တော သပ္ပုရိသဘူမိံ ဩက္ကမတိ. တထာ အသဒ္ဓမ္မာ စိတ္တံ ဝုဋ္ဌာပေတိ, သဒ္ဓမ္မေ စိတ္တံ ပတိဋ္ဌာပေတိ. ‘‘ကေဝလံ သုတမေဝေတံ မယာ, တဿေဝ တု ဘဂဝတော ဝစနံ အရဟတော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿာ’’တိ စ ဒီပေန္တော အတ္တာနံ ပရိမောစေတိ, သတ္ထာရံ အပဒိသတိ, ဇိနဝစနံ အပ္ပေတိ, ဓမ္မနေတ္တိံ ပတိဋ္ဌာပေတိ. परन्तु 'एवं मे सुतं' इस सम्पूर्ण वचन से आयुष्मान आनन्द तथागत द्वारा उपदिष्ट धर्म को अपना न मानते हुए असत्पुरुष-भूमि का अतिक्रमण करते हैं, और श्रावक-भाव को स्वीकार करते हुए सत्पुरुष-भूमि में प्रवेश करते हैं। उसी प्रकार, असद्धर्म से चित्त को हटाते हैं और सद्धर्म में चित्त को प्रतिष्ठित करते हैं। 'यह मेरे द्वारा केवल सुना गया है, यह तो उन भगवान्, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध का ही वचन है'—ऐसा दर्शाते हुए वे स्वयं को मुक्त करते हैं, शास्ता का निर्देश करते हैं, जिन-वचन को अर्पित करते हैं और धर्म-नेत्री (धर्म-मार्ग) को प्रतिष्ठित करते हैं। အပိစ ‘‘ဧဝံ မေ သုတ’’န္တိ အတ္တနာ ဥပ္ပာဒိတဘာဝံ အပ္ပဋိဇာနန္တော ပုရိမဿဝနံ ဝိဝရန္တော ‘‘သမ္မုခါ ပဋိဂ္ဂဟိတမိဒံ မယာ တဿ ဘဂဝတော စတုဝေသာရဇ္ဇဝိသာရဒဿ [Pg.89] ဒသဗလဓရဿ အာသဘဋ္ဌာနဋ္ဌာယိနော သီဟနာဒနာဒိနော သဗ္ဗသတ္တုတ္တမဿ ဓမ္မိဿရဿ ဓမ္မရာဇဿ ဓမ္မာဓိပတိနော ဓမ္မဒီပဿ ဓမ္မပ္ပဋိသရဏဿ သဒ္ဓမ္မဝရစက္ကဝတ္တိနော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ. န ဧတ္ထ အတ္ထေ ဝါ ဓမ္မေ ဝါ ပဒေ ဝါ ဗျဉ္ဇနေ ဝါ ကင်္ခါ ဝါ ဝိမတိ ဝါ ကာတဗ္ဗာ’’တိ သဗ္ဗဒေဝမနုဿာနံ ဣမသ္မိံ ဓမ္မေ အဿဒ္ဓိယံ ဝိနာသေတိ, သဒ္ဓါသမ္ပဒံ ဥပ္ပာဒေတီတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. ဟောတိ စေတ္ထ – इसके अतिरिक्त, 'एवं मे सुतं' कहते हुए, स्वयं द्वारा उत्पादित होने के भाव को स्वीकार न करते हुए और पूर्व श्रवण को प्रकट करते हुए (वे कहते हैं)— 'यह मैंने उन भगवान् के सम्मुख ग्रहण किया है, जो चार वैशारद्य में विशारद हैं, दशबल-धारी हैं, ऋषभ-स्थान पर स्थित हैं, सिंहनाद करने वाले हैं, समस्त सत्त्वों में उत्तम हैं, धर्म के ईश्वर हैं, धर्मराज हैं, धर्माधिपति हैं, धर्म-दीप हैं, धर्म-शरण हैं, सद्धर्म-वर-चक्रवर्ती हैं और सम्यक्सम्बुद्ध हैं। यहाँ न तो अर्थ में, न धर्म में, न पद में और न ही व्यंजन में कोई शंका या विमति (संदेह) करनी चाहिए'—इस प्रकार वे समस्त देवों और मनुष्यों के इस धर्म के प्रति अश्रद्धा का विनाश करते हैं और श्रद्धा-संपत्ति उत्पन्न करते हैं, ऐसा समझना चाहिए। यहाँ यह (संग्रह गाथा) है— ‘‘ဝိနာသယတိ အဿဒ္ဓံ, သဒ္ဓံ ဝဍ္ဎေတိ သာသနေ; ဧဝံ မေ သုတမိစ္စေဝံ, ဝဒံ ဂေါတမသာဝကော’’တိ. 'अश्रद्धा का विनाश करता है, शासन में श्रद्धा बढ़ाता है; 'एवं मे सुतं' इस प्रकार कहते हुए गौतम का श्रावक (आनन्द)।' ဧကန္တိ ဂဏနပရိစ္ဆေဒနိဒ္ဒေသော. သမယန္တိ ပရိစ္ဆိန္နနိဒ္ဒေသော. ဧကံ သမယန္တိ အနိယမိတပရိဒီပနံ. တတ္ထ သမယသဒ္ဒေါ – 'एकं' गणना-परिच्छेद (संख्या की सीमा) का निर्देश है। 'समयं' परिच्छिन्न (सीमित काल) का निर्देश है। 'एकं समयं' अनियत (अनिश्चित काल) का प्रदर्शन है। वहाँ 'समय' शब्द— သမဝါယေ ခဏေ ကာလေ, သမူဟေ ဟေတုဒိဋ္ဌိသု; ပဋိလာဘေ ပဟာနေ စ, ပဋိဝေဓေ စ ဒိဿတိ. समवाय (सामग्री), क्षण (अवसर), काल, समूह, हेतु (कारण), दृष्टि, प्रतिलाभ (प्राप्ति), प्रहाण (त्याग) और प्रतिवेध (भेदना/समझना) में देखा जाता है। တထာ ဟိဿ ‘‘အပ္ပေဝ နာမ သွေပိ ဥပသင်္ကမေယျာမ ကာလဉ္စ သမယဉ္စ ဥပါဒါယာ’’တိ ဧဝမာဒီသု (ဒီ. နိ. ၁.၄၄၇) သမဝါယော အတ္ထော. ‘‘ဧကောဝ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, ခဏော စ သမယော စ ဗြဟ္မစရိယဝါသာယာ’’တိ ဧဝမာဒီသု (အ. နိ. ၈.၂၉) ခဏော. ‘‘ဥဏှသမယော ပရိဠာဟသမယော’’တိ ဧဝမာဒီသု (ပါစိ. ၃၅၈) ကာလော. ‘‘မဟာသမယော ပဝနသ္မိ’’န္တိ ဧဝမာဒီသု သမူဟော. ‘‘သမယောပိ ခေါ တေ, ဘဒ္ဒါလိ, အပ္ပဋိဝိဒ္ဓေါ အဟောသိ, ဘဂဝါ ခေါ သာဝတ္ထိယံ ဝိဟရတိ, သောပိ မံ ဇာနိဿတိ, ‘ဘဒ္ဒါလိ, နာမ ဘိက္ခု သတ္ထုသာသနေ သိက္ခာယ အပရိပူရကာရီ’တိ, အယမ္ပိ ခေါ တေ ဘဒ္ဒါလိ သမယော အပ္ပဋိဝိဒ္ဓေါ အဟောသီ’’တိ ဧဝမာဒီသု (မ. နိ. ၂.၁၃၅) ဟေတု. ‘‘တေန ခေါ ပန သမယေန ဥဂ္ဂါဟမာနော ပရိဗ္ဗာဇကော သမဏမုဏ္ဍိကာပုတ္တော သမယပ္ပဝါဒကေ တိန္ဒုကာစီရေ ဧကသာလကေ မလ္လိကာယ အာရာမေ ပဋိဝသတီ’’တိ ဧဝမာဒီသု (မ. နိ. ၂.၂၆၀) ဒိဋ္ဌိ. क्योंकि 'शायद हम कल भी समय और अवसर (काल और समय) को देखते हुए पास जाएँ' इत्यादि में 'समवाय' (कारणों का मिलन) अर्थ है। 'भिक्षुओं, ब्रह्मचर्य वास के लिए एक ही क्षण और एक ही समय है' इत्यादि में 'क्षण' (अवसर) अर्थ है। 'गर्मी का समय, जलन का समय' इत्यादि में 'काल' (समय) अर्थ है। 'महावन में महासमय (देवताओं का समूह)' इत्यादि में 'समूह' अर्थ है। 'हे भद्दाली, तुमने उस समय (कारण) को नहीं समझा, भगवान श्रावस्ती में विहार करते हैं, वह मुझे जानेंगे कि भद्दाली नामक भिक्षु शास्ता के शासन में शिक्षा में अपरिपूर्णकारी है, हे भद्दाली, तुमने इस समय (कारण) को भी नहीं समझा' इत्यादि में 'हेतु' (कारण) अर्थ है। 'उस समय उग्गहामान नामक परिव्राजक, जो समणमुण्डिकापुत्त था, समयप्पवादक (सिद्धांतों की चर्चा वाले) तिन्दुकाचीर नामक मल्लिका के एकशालक आराम में रहता था' इत्यादि में 'दृष्टि' (सिद्धांत/मत) अर्थ है। ‘‘ဒိဋ္ဌေ ဓမ္မေ စ ယော အတ္ထော, ယော စတ္ထော သမ္ပရာယိကော; အတ္ထာဘိသမယာ ဓီရော, ပဏ္ဍိတောတိ ပဝုစ္စတီ’’တိ. (သံ. နိ. ၁.၁၂၉) – जो अर्थ (लाभ) इसी जन्म में है और जो अर्थ परलोक में है; अर्थ की प्राप्ति (अभिसमय) के कारण ही धीर पुरुष को 'पण्डित' कहा जाता है। ဧဝမာဒီသု ပဋိလာဘော. ‘‘သမ္မာ မာနာဘိသမယာ အန္တမကာသိ ဒုက္ခဿာ’’တိ ဧဝမာဒီသု (မ. နိ. ၁.၂၈) ပဟာနံ. ‘‘ဒုက္ခဿ ပီဠနဋ္ဌော သင်္ခတဋ္ဌော သန္တာပဋ္ဌော [Pg.90] ဝိပရိဏာမဋ္ဌော အဘိသမယဋ္ဌော’’တိ ဧဝမာဒီသု (ပဋိ. မ. ၂.၈) ပဋိဝေဓော. ဣဓ ပနဿ ကာလော အတ္ထော. တေန ဧကံ သမယန္တိ သံဝစ္ဆရဥတုမာသအဍ္ဎမာသရတ္တိဒိဝပုဗ္ဗဏှမဇ္ဈနှိကသာယနှပဌမမဇ္ဈိမ- ပစ္ဆိမယာမမုဟုတ္တာဒီသု ကာလချေသု သမယေသု ဧကံ သမယန္တိ ဒီပေတိ. इत्यादि में 'प्रतिलाभ' (प्राप्ति) अर्थ है। 'मान के सम्यक् अभिसमय (त्याग) से दुखों का अंत किया' इत्यादि में 'प्रहाण' (त्याग) अर्थ है। 'दुःख का पी़ड़न अर्थ, संस्कृत अर्थ, संताप अर्थ, विपरिणाम अर्थ और अभिसमय अर्थ है' इत्यादि में 'प्रतिवेध' (साक्षात्कार) अर्थ है। यहाँ (इस मंगल सुत्त में) इसका अर्थ 'काल' (समय) है। उस 'एकं समयं' (एक समय) पद से वर्ष, ऋतु, मास, अर्धमास, रात-दिन, पूर्वाह्न, मध्याह्न, सायाह्न, प्रथम-मध्यम-पश्चिम याम और मुहूर्त आदि कालवाची समयों में से किसी एक समय को सूचित किया गया है। ယေ ဝါ ဣမေ ဂဗ္ဘောက္ကန္တိသမယော ဇာတိသမယော သံဝေဂသမယော အဘိနိက္ခမနသမယော ဒုက္ကရကာရိကသမယော မာရဝိဇယသမယော အဘိသမ္ဗောဓိသမယော ဒိဋ္ဌဓမ္မသုခဝိဟာရသမယော ဒေသနာသမယော ပရိနိဗ္ဗာနသမယောတိ ဧဝမာဒယော ဘဂဝတော ဒေဝမနုဿေသု အတိဝိယ ပကာသာ အနေကကာလချာ ဧဝ သမယာ. တေသု သမယေသု ဒေသနာသမယသင်္ခါတံ ဧကံ သမယန္တိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ယော စာယံ ဉာဏကရုဏာကိစ္စသမယေသု ကရုဏာကိစ္စသမယော, အတ္တဟိတပရဟိတပ္ပဋိပတ္တိသမယေသု ပရဟိတပ္ပဋိပတ္တိသမယော, သန္နိပတိတာနံ ကရဏီယဒွယသမယေသု ဓမ္မီကထာသမယော, ဒေသနာပဋိပတ္တိသမယေသု ဒေသနာသမယော, တေသုပိ သမယေသု ယံ ကိဉ္စိ သန္ဓာယ ‘‘ဧကံ သမယ’’န္တိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. अथवा भगवान के जो ये समय हैं—गर्भ में आने का समय, जन्म का समय, संवेग का समय, अभिनिष्क्रमण का समय, दुष्करचर्या का समय, मार-विजय का समय, अभिसंबोधि का समय, दृष्टधर्मसुखविहार का समय, देशना का समय और परिनिर्वाण का समय—जो देवों और मनुष्यों में अत्यंत प्रसिद्ध हैं और अनेक कालों को बताने वाले हैं। उन समयों में से 'देशना-समय' (उपदेश का समय) को यहाँ 'एकं समयं' कहा गया है। और जो यह ज्ञान-करुणा के कृत्यों के समयों में 'करुणा-कृत्य का समय' है, आत्महित-परहित की प्रतिपत्ति के समयों में 'परहित-प्रतिपत्ति का समय' है, एकत्रित लोगों के लिए दो करणीय कार्यों के समयों में 'धर्मकथा का समय' है, देशना और प्रतिपत्ति के समयों में 'देशना का समय' है; उन समयों में से किसी एक को लक्ष्य करके 'एकं समयं' कहा गया है। ဧတ္ထာဟ – အထ ကသ္မာ ယထာ အဘိဓမ္မေ ‘‘ယသ္မိံ သမယေ ကာမာဝစရ’’န္တိ စ ဣတော အညေသု သုတ္တပဒေသု ‘‘ယသ္မိံ သမယေ, ဘိက္ခဝေ, ဘိက္ခု ဝိဝိစ္စေဝ ကာမေဟီ’’တိ စ ဘုမ္မဝစနေန နိဒ္ဒေသော ကတော, ဝိနယေ စ ‘‘တေန သမယေန ဗုဒ္ဓေါ ဘဂဝါ’’တိ ကရဏဝစနေန, တထာ အကတွာ ဣဓ ‘‘ဧကံ သမယ’’န္တိ ဥပယောဂဝစနနိဒ္ဒေသော ကတောတိ. တတ္ထ တထာ, ဣဓ စ အညထာ အတ္ထသမ္ဘဝတော. တတ္ထ ဟိ အဘိဓမ္မေ ဣတော အညေသု သုတ္တပဒေသု စ အဓိကရဏတ္ထော ဘာဝေနဘာဝလက္ခဏတ္ထော စ သမ္ဘဝတိ. အဓိကရဏဉှိ ကာလတ္ထော သမူဟတ္ထော စ သမယော, တတ္ထ ဝုတ္တာနံ ဖဿာဒိဓမ္မာနံ ခဏသမဝါယဟေတုသင်္ခါတဿ စ သမယဿ ဘာဝေန တေသံ ဘာဝေါ လက္ခီယတိ, တသ္မာ တဒတ္ထဇောတနတ္ထံ တတ္ထ ဘုမ္မဝစနနိဒ္ဒေသော ကတော. यहाँ कोई प्रश्न करता है—तो फिर क्यों, जैसे अभिधम्म में 'यस्मिं समये कामावचरं' और अन्य सुत्त पदों में 'भिक्षुओं, जिस समय भिक्षु काम-भोगों से विविक्त होकर' इत्यादि में सप्तमी विभक्ति द्वारा निर्देश किया गया है, और विनय में 'तेन समयेन बुद्धो भगवा' इत्यादि में तृतीया विभक्ति द्वारा; वैसा न करके यहाँ 'एकं समयं' इस प्रकार द्वितीया विभक्ति द्वारा निर्देश क्यों किया गया है? उत्तर: वहाँ वैसा और यहाँ अन्य प्रकार से अर्थ की संभावना होने के कारण। क्योंकि वहाँ अभिधम्म में और अन्य सुत्त पदों में 'अधिकरण' अर्थ और 'भाव' द्वारा 'भावलक्षण' अर्थ संभव है। 'अधिकरण' ही काल और समूह अर्थ वाला 'समय' है, वहाँ कहे गए स्पर्श आदि धर्मों के क्षण-समवाय (कारणों की एकता) रूपी समय के होने से उनका होना लक्षित होता है, इसलिए उस अर्थ को प्रकट करने के लिए वहाँ सप्तमी विभक्ति का प्रयोग किया गया है। ဝိနယေ စ ဟေတွတ္ထော ကရဏတ္ထော စ သမ္ဘဝတိ. ယော ဟိ သော သိက္ခာပဒပညတ္တိသမယော သာရိပုတ္တာဒီဟိပိ ဒုဗ္ဗိညေယျော, တေန သမယေန ဟေတုဘူတေန ကရဏဘူတေန စ သိက္ခာပဒါနိ ပညပေန္တော သိက္ခာပဒပညတ္တိဟေတုဉ္စ အပေက္ခမာနော ဘဂဝါ တတ္ထ တတ္ထ ဝိဟာသိ, တသ္မာ တဒတ္ထဇောတနတ္ထံ တတ္ထ ကရဏဝစနနိဒ္ဒေသော ကတော. और विनय में 'हेतु' अर्थ और 'करण' अर्थ संभव है। क्योंकि वह जो शिक्षापद की प्रज्ञप्ति का समय है, वह सारिपुत्र आदि के लिए भी दुर्विज्ञेय है; उस समय को हेतु और करण बनाकर शिक्षापदों को प्रज्ञप्त करते हुए और शिक्षापद की प्रज्ञप्ति के कारण की अपेक्षा रखते हुए भगवान वहाँ-वहाँ विहार करते थे, इसलिए उस अर्थ को प्रकट करने के लिए वहाँ तृतीया विभक्ति का प्रयोग किया गया है। ဣဓ [Pg.91] ပန အညသ္မိဉ္စ ဧဝံဇာတိကေ သုတ္တန္တပါဌေ အစ္စန္တသံယောဂတ္ထော သမ္ဘဝတိ. ယဉှိ သမယံ ဘဂဝါ ဣမံ အညံ ဝါ သုတ္တန္တံ ဒေသေသိ, အစ္စန္တမေဝ တံ သမယံ ကရုဏာဝိဟာရေန ဝိဟာသိ. တသ္မာ တဒတ္ထဇောတနတ္ထံ ဣဓ ဥပယောဂဝစနနိဒ္ဒေသော ကတောတိ ဝိညေယျော. ဟောတိ စေတ္ထ – परंतु यहाँ और इस प्रकार के अन्य सुत्त पाठों में 'अत्यंत-संयोग' (निरंतरता) अर्थ संभव है। क्योंकि जिस समय भगवान ने इस सुत्त का या अन्य सुत्त का उपदेश दिया, उस पूरे समय वे निरंतर करुणा-विहार से युक्त रहे। इसलिए उस अर्थ को प्रकट करने के लिए यहाँ द्वितीया विभक्ति का प्रयोग किया गया है, ऐसा समझना चाहिए। इस विषय में यह संग्रह गाथा है— ‘‘တံ တံ အတ္ထမပေက္ခိတွာ, ဘုမ္မေန ကရဏေန စ; အညတြ သမယော ဝုတ္တော, ဥပယောဂေန သော ဣဓာ’’တိ. उन-उन अर्थों की अपेक्षा रखते हुए, (अभिधम्म और विनय में) सप्तमी और तृतीया विभक्ति द्वारा 'समय' शब्द कहा गया है, किंतु यहाँ (सुत्त में) वह द्वितीया विभक्ति द्वारा कहा गया है। ဘဂဝါတိ ဂုဏဝိသိဋ္ဌသတ္တုတ္တမဂရုဂါရဝါဓိဝစနမေတံ. ယထာဟ – 'भगवान'—यह शब्द गुणों से विशिष्ट, प्राणियों में उत्तम और गुरुता एवं गौरव का वाचक है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘ဘဂဝါတိ ဝစနံ သေဋ္ဌံ, ဘဂဝါတိ ဝစနမုတ္တမံ; ဂရု ဂါရဝယုတ္တော သော, ဘဂဝါ တေန ဝုစ္စတီ’’တိ. 'भगवान' यह शब्द श्रेष्ठ है, 'भगवान' यह शब्द उत्तम है; वे गुरुता और गौरव से युक्त हैं, इसलिए उन्हें 'भगवान' कहा जाता है। စတုဗ္ဗိဓဉှိ နာမံ အာဝတ္ထိကံ, လိင်္ဂိကံ, နေမိတ္တကံ, အဓိစ္စသမုပ္ပန္နန္တိ. အဓိစ္စသမုပ္ပန္နံ နာမ ‘‘ယဒိစ္ဆက’’န္တိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. တတ္ထ ဝစ္ဆော ဒမ္မော ဗလိဗဒ္ဓေါတိ ဧဝမာဒိ အာဝတ္ထိကံ, ဒဏ္ဍီ ဆတ္တီ သိခီ ကရီတိ ဧဝမာဒိ လိင်္ဂိကံ, တေဝိဇ္ဇော ဆဠဘိညောတိ ဧဝမာဒိ နေမိတ္တကံ, သိရိဝဍ္ဎကော ဓနဝဍ္ဎကောတိ ဧဝမာဒိ ဝစနတ္ထမနပေက္ခိတွာ ပဝတ္တံ အဓိစ္စသမုပ္ပန္နံ. ဣဒံ ပန ဘဂဝါတိ နာမံ ဂုဏနေမိတ္တကံ, န မဟာမာယာယ, န သုဒ္ဓေါဒနမဟာရာဇေန, န အသီတိယာ ဉာတိသဟဿေဟိ ကတံ, န သက္ကသန္တုသိတာဒီဟိ ဒေဝတာဝိသေသေဟိ ကတံ. ယထာဟ အာယသ္မာ သာရိပုတ္တတ္ထေရော ‘‘ဘဂဝါတိ နေတံ နာမံ မာတရာ ကတံ…ပေ… သစ္ဆိကာ ပညတ္တိ ယဒိဒံ ဘဂဝါ’’တိ (မဟာနိ. ၈၄). नाम चार प्रकार के होते हैं: आवत्थिक (अवस्था-आधारित), लिंगिक (चिह्न-आधारित), नैमित्तिक (निमित्त/गुण-आधारित), और अधिच्चसमुप्पन्न (आकस्मिक)। 'अधिच्चसमुप्पन्न' का अर्थ 'यदृच्छया' (इच्छा के अनुसार रखा गया) है। वहाँ 'वच्छ' (बछड़ा), 'दम्म' (दम्य बैल), 'बलीबद्द' (बैल) आदि 'आवत्थिक' नाम हैं। 'दण्डी' (दंडधारी), 'छत्ती' (छत्रधारी), 'सिखी' (शिखाधारी), 'करी' (हाथ वाला/हाथी) आदि 'लिंगिक' नाम हैं। 'तेविज्जो' (त्रिविद्य), 'छळभिञ्ञो' (षडभिज्ञ) आदि 'नैमित्तिक' नाम हैं। 'सिरिवड्ढक', 'धनवड्ढक' आदि शब्दों के अर्थ की अपेक्षा किए बिना प्रवृत्त नाम 'अधिच्चसमुप्पन्न' हैं। परंतु यह 'भगवा' नाम नैमित्तिक है; यह न तो महामाया द्वारा, न महाराज शुद्धोदन द्वारा, न अस्सी हजार ज्ञातियों द्वारा और न ही शक्र-संतुषित आदि विशिष्ट देवताओं द्वारा रखा गया है। जैसा कि आयुष्मान सारिपुत्र स्थविर ने कहा है— 'भगवा' यह नाम माता द्वारा नहीं रखा गया... (पे)... यह विमोक्ष के अंत में (अर्हत्व फल की प्राप्ति पर) साक्षात्कृत प्रज्ञप्ति है जो कि 'भगवा' है। ယံ ဂုဏနေမိတ္တကဉ္စေတံ နာမံ, တေသံ ဂုဏာနံ ပကာသနတ္ထံ ဣမံ ဂါထံ ဝဒန္တိ – चूँकि यह नाम गुणों पर आधारित (नैमित्तिक) है, उन गुणों को प्रकाशित करने के लिए वे इस गाथा को कहते हैं— ‘‘ဘဂီ ဘဇီ ဘာဂီ ဝိဘတ္တဝါ ဣတိ,အကာသိ ဘဂ္ဂန္တိ ဂရူတိ ဘာဂျဝါ; ဗဟူဟိ ဉာယေဟိ သုဘာဝိတတ္တနော,ဘဝန္တဂေါ သော ဘဂဝါတိ ဝုစ္စတီ’’တိ. 'वे भगी (ऐश्वर्यवान), भजी (भजने योग्य), भागी (भक्त), और विभत्तवा (विभाजन करने वाले) हैं; उन्होंने क्लेशों को भग्न (नष्ट) किया है, वे गुरु हैं और भाग्यवान हैं; अनेक न्यायसंगत विधियों से स्वयं को सुभावित करने के कारण और भवों के अंत तक पहुँचने के कारण, उन्हें 'भगवा' कहा जाता है।' နိဒ္ဒေသာဒီသု (မဟာနိ. ၈၄; စူဠနိ. အဇိတမာဏဝပုစ္ဆာနိဒ္ဒေသ ၂) ဝုတ္တနယေနေဝ စဿ အတ္ထော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. इसका अर्थ 'निद्देस' आदि ग्रंथों में बताई गई विधि के अनुसार ही समझना चाहिए। အယံ ပန အပရော ပရိယာယော – यह एक अन्य पर्याय (व्याख्या की विधि) है— ‘‘ဘာဂျဝါ ဘဂ္ဂဝါ ယုတ္တော, ဘဂေဟိ စ ဝိဘတ္တဝါ; ဘတ္တဝါ ဝန္တဂမနော, ဘဝေသု ဘဂဝါ တတော’’တိ. 'वे भाग्यवान हैं, क्लेशों को नष्ट करने वाले (भग्गवा) हैं, गुणों (भग) से युक्त हैं, धर्मों का विभाजन करने वाले (विभत्तवा) हैं, श्रेष्ठ धर्मों का सेवन करने वाले (भत्तवा) हैं और भवों में गमन का वमन (त्याग) करने वाले हैं, इसलिए उन्हें 'भगवा' कहा जाता है।' တတ္ထ [Pg.92] ‘‘ဝဏ္ဏာဂမော ဝဏ္ဏဝိပရိယာယော’’တိ ဧဝံ နိရုတ္တိလက္ခဏံ ဂဟေတွာ သဒ္ဒနယေန ဝါ ပိသောဒရာဒိပက္ခေပလက္ခဏံ ဂဟေတွာ ယသ္မာ လောကိယလောကုတ္တရသုခါဘိနိဗ္ဗတ္တကံ ဒါနသီလာဒိပါရပ္ပတ္တံ ဘာဂျမဿ အတ္ထိ, တသ္မာ ဘာဂျဝါတိ ဝတ္တဗ္ဗေ ဘဂဝါတိ ဝုစ္စတီတိ ဉာတဗ္ဗံ. ယသ္မာ ပန လောဘဒေါသမောဟဝိပရီတမနသိကာရအဟိရိကာနောတ္တပ္ပကောဓူပနာဟမက္ခပလာ- ဣဿာမစ္ဆရိယမာယာသာဌေယျထမ္ဘသာရမ္ဘမာနာတိမာနမဒပမာဒတဏှာဝိဇ္ဇာတိဝိဓာကုသလမူလဒုစ္စရိတ- သံကိလေသမလဝိသမသညာဝိတက္ကပပဉ္စစတုဗ္ဗိဓဝိပရိယေသအာသဝဂန္ထဩဃယောဂအဂတိတဏှုပါဒါန- ပဉ္စစေတောခိလဝိနိဗန္ဓနီဝရဏာဘိနန္ဒနဆဝိဝါဒမူလတဏှာကာယသတ္တာနုသယ- အဋ္ဌမိစ္ဆတ္တနဝတဏှာမူလကဒသာကုသလကမ္မပထဒွါသဋ္ဌိဒိဋ္ဌိဂတ- အဋ္ဌသတတဏှာဝိစရိတပ္ပဘေဒသဗ္ဗဒရထပရိဠာဟကိလေသသတသဟဿာနိ, သင်္ခေပတော ဝါ ပဉ္စ ကိလေသက္ခန္ဓအဘိသင်္ခါရမစ္စုဒေဝပုတ္တမာရေ အဘဉ္ဇိ, တသ္မာ ဘဂ္ဂတ္တာ ဧတေသံ ပရိဿယာနံ ဘဂ္ဂဝါတိ ဝတ္တဗ္ဗေ ဘဂဝါတိ ဝုစ္စတိ. အာဟ စေတ္ထ – वहाँ 'वर्णों का आगम' या 'वर्णों का विपर्यय' इस प्रकार निरुक्ति के लक्षणों को लेकर अथवा व्याकरण की विधि से 'पिसोदरादि' गण में समाहित करने के लक्षण को लेकर— चूँकि उनमें लौकिक और लोकोत्तर सुख उत्पन्न करने वाले दान-शील आदि पारमिताओं से प्राप्त 'भाग्य' विद्यमान है, इसलिए 'भाग्यवा' कहे जाने के स्थान पर उन्हें 'भगवा' कहा जाता है, ऐसा समझना चाहिए। पुनः, चूँकि उन्होंने लोभ, द्वेष, मोह, विपरीत मनसिकार, अहीरिक, अनोत्तप्प, क्रोध, उपनाह, मख, पळास, ईर्ष्या, मत्सर, माया, शाठ्य, स्तंभ, सारंभ, मान, अतिमान, मद, प्रमाद, तृष्णा, अविद्या, तीन प्रकार के अकुशल मूल, दुश्चरित, संक्लेश, मल, विषम संज्ञा, वितर्क, प्रपंच, चार प्रकार के विपर्यास, आस्रव, ग्रंथ, ओघ, योग, अगति, तृष्णा-उपादान, पाँच चेतोखिल, विनिबंध, नीवरण, अभिनंदन, छह विवादमूल, तृष्णाकाय, सात अनुशय, आठ मिच्छत्त (मिथ्यात्व), नौ तृष्णामूलक धर्म, दस अकुशल कर्मपथ, बासठ दृष्टिगत, एक सौ आठ तृष्णा-विचरित के भेद वाले सभी दरथ (पीड़ा) और परिळाह (जलन) उत्पन्न करने वाले लाखों क्लेशों को, अथवा संक्षेप में पाँच मारों— क्लेश मार, स्कंध मार, अभिसंस्कार मार, मृत्यु मार और देवपुत्र मार को भग्न (नष्ट) कर दिया है, इसलिए इन शत्रुओं (परिस्रवों) को भग्न करने के कारण 'भग्गवा' कहे जाने के स्थान पर उन्हें 'भगवा' कहा जाता है। इस विषय में यह भी कहा गया है— ‘‘ဘဂ္ဂရာဂေါ ဘဂ္ဂဒေါသော, ဘဂ္ဂမောဟော အနာသဝေါ; ဘဂ္ဂါဿ ပါပကာ ဓမ္မာ, ဘဂဝါ တေန ဝုစ္စတီ’’တိ. 'जिन्होंने राग को भग्न किया, द्वेष को भग्न किया और मोह को भग्न किया, जो आस्रव-रहित हैं; जिनके पापमय धर्म भग्न हो चुके हैं, इसलिए उन्हें 'भगवा' कहा जाता है।' ဘာဂျဝတာယ စဿ သတပုညလက္ခဏဓရဿ ရူပကာယသမ္ပတ္တိ ဒီပိတာ ဟောတိ, ဘဂ္ဂဒေါသတာယ ဓမ္မကာယသမ္ပတ္တိ. တထာ လောကိယသရိက္ခကာနံ ဗဟုမာနဘာဝေါ, ဂဟဋ္ဌပဗ္ဗဇိတေဟိ အဘိဂမနီယတာ. တထာ အဘိဂတာနဉ္စ နေသံ ကာယစိတ္တဒုက္ခာပနယနေ ပဋိဗလဘာဝေါ, အာမိသဒါနဓမ္မဒါနေဟိ ဥပကာရိတာ. လောကိယလောကုတ္တရသုခေဟိ စ သံယောဇနသမတ္ထတာ ဒီပိတာ ဟောတိ. 'भाग्यवान' होने से उन सौ पुण्यों के लक्षणों को धारण करने वाले बुद्ध की रूपकाय-संपत्ति (शारीरिक पूर्णता) दर्शित होती है, और 'भग्न-दोष' होने से उनकी धर्मकाय-संपत्ति। उसी प्रकार, लौकिक जनों के लिए वे अत्यधिक सम्मान के पात्र हैं और गृहस्थों एवं प्रव्रजितों द्वारा शरण लेने योग्य हैं। साथ ही, उनके पास आए हुए लोगों के कायिक और मानसिक दुखों को दूर करने में वे समर्थ हैं, और आमिष-दान एवं धर्म-दान द्वारा उपकार करने वाले हैं। इससे लौकिक और लोकोत्तर सुखों के साथ जोड़ने की उनकी सामर्थ्य दर्शित होती है। ယသ္မာ စ လောကေ ဣဿရိယဓမ္မယသသိရိကာမပယတ္တေသု ဆသု ဓမ္မေသု ဘဂသဒ္ဒေါ ဝတ္တတိ, ပရမဉ္စဿ သကစိတ္တေ ဣဿရိယံ, အဏိမာလဃိမာဒိကံ ဝါ လောကိယသမ္မတံ သဗ္ဗာကာရပရိပူရံ အတ္ထိ, တထာ လောကုတ္တရော ဓမ္မော, လောကတ္တယဗျာပကော ယထာဘုစ္စဂုဏာဓိဂတော အတိဝိယ ပရိသုဒ္ဓေါ ယသော, ရူပကာယဒဿနဗျာဝဋဇနနယနမနပ္ပသာဒဇနနသမတ္ထာ သဗ္ဗာကာရပရိပူရာ သဗ္ဗင်္ဂပစ္စင်္ဂသိရီ, ယံ ယံ အနေန ဣစ္ဆိတံ ပတ္ထိတံ အတ္တဟိတံ ပရဟိတံ ဝါ, တဿ တဿ တထေဝ အဘိနိပ္ဖန္နတ္တာ ဣစ္ဆိတတ္ထနိပ္ဖတ္တိသညိတော ကာမော, သဗ္ဗလောကဂရုဘာဝပ္ပတ္တိဟေတုဘူတော သမ္မာဝါယာမသင်္ခါတော ပယတ္တော စ အတ္ထိ, တသ္မာ ဣမေဟိ ဘဂေဟိ ယုတ္တတ္တာပိ ဘဂါ အဿ သန္တီတိ ဣမိနာ အတ္ထေန ‘‘ဘဂဝါ’’တိ ဝုစ္စတိ. चूँकि लोक में ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, काम और प्रयत्न— इन छह धर्मों के लिए 'भग' शब्द प्रयुक्त होता है; और बुद्ध के अपने चित्त पर परम ऐश्वर्य है, अथवा लोक-सम्मत अणिमा-लघिमा आदि सिद्धियाँ जो सभी प्रकार से परिपूर्ण हैं, वे उनमें विद्यमान हैं; उसी प्रकार लोकोत्तर धर्म, तीनों लोकों में व्याप्त यथार्थ गुणों से प्राप्त अत्यंत शुद्ध यश, रूपकाय के दर्शन में लगे हुए लोगों के नेत्रों और मन में प्रसाद (प्रसन्नता) उत्पन्न करने में समर्थ सभी अंगों-प्रत्यंगों की शोभा (श्री), और उनके द्वारा जो-जो अपने हित या परहित के लिए चाहा गया या प्रार्थना की गई, उस-उस अर्थ की उसी प्रकार सिद्धि होने के कारण 'इच्छित-अर्थ-निष्पत्ति' नामक काम, तथा समस्त लोक के लिए गुरु-भाव की प्राप्ति का हेतुभूत 'सम्यक् व्यायाम' संज्ञक प्रयत्न उनमें विद्यमान है; इसलिए इन 'भग' (ऐश्वर्य आदि गुणों) से युक्त होने के कारण भी, 'उनके पास भग हैं' इस अर्थ में उन्हें 'भगवा' कहा जाता है। ယသ္မာ [Pg.93] ပန ကုသလာဒိဘေဒေဟိ သဗ္ဗဓမ္မေ, ခန္ဓာယတနဓာတုသစ္စဣန္ဒြိယပဋိစ္စသမုပ္ပာဒါဒီဟိ ဝါ ကုသလာဒိဓမ္မေ, ပီဠနသင်္ခတသန္တာပဝိပရိဏာမဋ္ဌေန ဝါ ဒုက္ခမရိယသစ္စံ, အာယူဟနနိဒါနသံယောဂပလိဗောဓဋ္ဌေန သမုဒယံ, နိဿရဏဝိဝေကာသင်္ခတအမတဋ္ဌေန နိရောဓံ, နိယျာနိကဟေတုဒဿနာဓိပတေယျဋ္ဌေန မဂ္ဂံ ဝိဘတ္တဝါ, ဝိဘဇိတွာ ဝိဝရိတွာ ဒေသိတဝါတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ, တသ္မာ ဝိဘတ္တဝါတိ ဝတ္တဗ္ဗေ ‘‘ဘဂဝါ’’တိ ဝုစ္စတိ. पुनः, चूँकि उन्होंने कुशल आदि भेदों से सभी धर्मों को, अथवा स्कंध, आयतन, धातु, सत्य, इंद्रिय, प्रतीत्यसमुत्पाद आदि के माध्यम से कुशल आदि धर्मों को; अथवा पीड़ा, संस्कृत, संताप और विपरिणाम के अर्थ में 'दुःख आर्यसत्य' को; आयूहण (एकत्र करना), निदान, संयोग और पलिबोध के अर्थ में 'समुदय' को; निस्सरण, विवेक, असंस्कृत और अमृत के अर्थ में 'निरोध' को; और निर्याणिक, हेतु, दर्शन और आधिपत्य के अर्थ में 'मार्ग' को विभक्त किया है— अर्थात् विस्तार से विभाजित कर, खोलकर उपदेश दिया है, इसलिए 'विभत्तवा' (विभाजन करने वाले) कहे जाने के स्थान पर उन्हें 'भगवा' कहा जाता है। ယသ္မာ စ ဧသ ဒိဗ္ဗဗြဟ္မအရိယဝိဟာရေ ကာယစိတ္တဥပဓိဝိဝေကေ သုညတာပ္ပဏိဟိတာနိမိတ္တဝိမောက္ခေ အညေ စ လောကိယလောကုတ္တရေ ဥတ္တရိမနုဿဓမ္မေ ဘဇိ သေဝိ ဗဟုလမကာသိ, တသ္မာ ဘတ္တဝါတိ ဝတ္တဗ္ဗေ ‘‘ဘဂဝါ’’တိ ဝုစ္စတိ. और चूँकि उन्होंने दिव्य-विहार, ब्रह्म-विहार, आर्य-विहार, काय-विवेक, चित्त-विवेक, उपधि-विवेक, शून्यता-विमोक्ष, अप्रणिहित-विमोक्ष, अनिमित्त-विमोक्ष और अन्य लौकिक-लोकोत्तर उत्तर-मनुष्य धर्मों का भजन किया, सेवन किया और प्रचुरता से अभ्यास किया, इसलिए 'भत्तवा' (सेवन करने वाले) कहे जाने के स्थान पर उन्हें 'भगवा' कहा जाता है। ယသ္မာ ပန တီသု ဘဝေသု တဏှာသင်္ခါတံ ဂမနံ အနေန ဝန္တံ, တသ္မာ ဘဝေသု ဝန္တဂမနောတိ ဝတ္တဗ္ဗေ ဘဝသဒ္ဒတော ဘကာရံ ဂမနသဒ္ဒတော ဂကာရံ ဝန္တသဒ္ဒတော ဝကာရဉ္စ ဒီဃံ ကတွာ အာဒါယ ‘‘ဘဂဝါ’’တိ ဝုစ္စတိ, ယထာ လောကေ ‘‘မေဟနဿ ခဿ မာလာ’’တိ ဝတ္တဗ္ဗေ ‘‘မေခလာ’’တိ. पुनः, चूँकि उन्होंने तीनों भवों में तृष्णा-रूपी गमन का वमन (त्याग) कर दिया है, इसलिए 'भवों में वान्त-गमन' (भवेसु वन्तगमनो) कहे जाने के स्थान पर, 'भव' शब्द से 'भ' कार, 'गमन' शब्द से 'ग' कार और 'वन्त' शब्द से 'व' कार लेकर तथा उसे दीर्घ करके 'भगवा' कहा जाता है; जैसे लोक में 'मेहनस्स खस्स माला' (गुह्य अंग के आकाश की माला) कहे जाने के स्थान पर 'मेखला' कहा जाता है। ဧတ္တာဝတာ စေတ္ထ ဧဝံ မေ သုတန္တိ ဝစနေန ယထာသုတံ ယထာပရိယတ္တံ ဓမ္မံ ဒေသေန္တော ပစ္စက္ခံ ကတွာ ဘဂဝတော ဓမ္မသရီရံ ပကာသေတိ, တေန ‘‘နယိဒံ အတီတသတ္ထုကံ ပါဝစနံ, အယံ ဝေါ သတ္ထာ’’တိ ဘဂဝတော အဒဿနေန ဥက္ကဏ္ဌိတဇနံ သမဿာသေတိ. इस प्रकार, यहाँ 'एवं मे सुतं' (ऐसा मैंने सुना है) इन वचनों के द्वारा, जैसा सुना गया और जैसा सीखा गया, उस धर्म का उपदेश करते हुए (आयुष्मान आनन्द) भगवान के धर्म-शरीर को प्रत्यक्ष कर प्रकट करते हैं। उससे, "यह प्रवचन अतीत (बीते हुए) शास्ता वाला नहीं है, यह (धर्म) ही तुम्हारा शास्ता है" - इस प्रकार भगवान को न देख पाने के कारण उत्कण्ठित (व्याकुल) लोगों को वे आश्वस्त करते हैं। ဧကံ သမယံ ဘဂဝါတိ ဝစနေန တသ္မိံ သမယေ ဘဂဝတော အဝိဇ္ဇမာနဘာဝံ ဒဿေန္တော ရူပကာယပရိနိဗ္ဗာနံ ဒဿေတိ. တေန ‘‘ဧဝံဝိဓဿ ဣမဿ အရိယဓမ္မဿ ဒေသေတာ ဒသဗလဓရော ဝဇိရသံဃာတကာယော သောပိ ဘဂဝါ ပရိနိဗ္ဗုတော, တတ္ထ ကေနညေန ဇီဝိတေ အာသာ ဇနေတဗ္ဗာ’’တိ ဇီဝိတမဒမတ္တံ ဇနံ သံဝေဇေတိ, သဒ္ဓမ္မေ စဿ ဥဿာဟံ ဇနေတိ. 'एकं समयं भगवा' (एक समय भगवान) इन वचनों के द्वारा, उस समय भगवान की अविद्यमानता (अनुपस्थिति) को दर्शाते हुए वे रूप-काय के परिनिर्वाण को दिखाते हैं। उससे, "इस प्रकार के इस आर्य धर्म के उपदेशक, दशबलधारी, वज्र के समान सुदृढ़ शरीर वाले वे भगवान भी परिनिर्वृत्त हो गए, तो फिर किसी अन्य के द्वारा जीवन में क्या आशा की जानी चाहिए" - इस प्रकार जीवन के मद में मत्त लोगों को वे संविग्न (उद्वेलित) करते हैं, और उनमें सद्धर्म के प्रति उत्साह जगाते हैं। ဧဝန္တိ စ ဘဏန္တော ဒေသနာသမ္ပတ္တိံ နိဒ္ဒိသတိ, မေ သုတန္တိ သာဝကသမ္ပတ္တိံ, ဧကံ သမယန္တိ ကာလသမ္ပတ္တိံ, ဘဂဝါတိ ဒေသကသမ္ပတ္တိံ. 'एवं' (ऐसा) कहते हुए वे देशना-सम्पत्ति (उपदेश की पूर्णता) को निर्दिष्ट करते हैं, 'मे सुतं' (मैंने सुना) से श्रावक-सम्पत्ति को, 'एकं समयं' (एक समय) से काल-सम्पत्ति को, और 'भगवा' (भगवान) से देशक-सम्पत्ति (उपदेशक की पूर्णता) को निर्दिष्ट करते हैं। သာဝတ္ထိယံ ဝိဟရတီတိ ဧတ္ထ သာဝတ္ထီတိ သဝတ္ထဿ ဣသိနော နိဝါသဋ္ဌာနဘူတံ နဂရံ, ယထာ ကာကန္ဒီ မာကန္ဒီတိ, ဧဝံ ဣတ္ထိလိင်္ဂဝသေန သာဝတ္ထီတိ ဝုစ္စတိ, ဧဝံ အက္ခရစိန္တကာ. အဋ္ဌကထာစရိယာ ပန ဘဏန္တိ ‘‘ယံကိဉ္စိ [Pg.94] မနုဿာနံ ဥပဘောဂပရိဘောဂံ သဗ္ဗမေတ္ထ အတ္ထီ’’တိ သာဝတ္ထီ. သတ္ထသမာယောဂေ စ ‘‘ကိံ ဘဏ္ဍမတ္ထီ’’တိ ပုစ္ဆိတေ ‘‘သဗ္ဗမတ္ထီ’’တိ ဝစနမုပါဒါယ သာဝတ္ထီ. 'सावत्थियं विहरति' (श्रावस्ती में विहार करते थे) यहाँ 'सावत्थी' (श्रावस्ती) वह नगर है जो 'सवत्थ' नामक ऋषि का निवास स्थान था; जैसे 'काकन्दी' और 'माकन्दी', वैसे ही स्त्रीलिंग के वश से इसे 'सावत्थी' कहा जाता है - ऐसा वैयाकरण (अक्षरचिन्तक) कहते हैं। किन्तु अट्ठकथाचार्य कहते हैं कि "मनुष्यों के उपभोग और परिभोग की जो कुछ भी वस्तुएँ हैं, वे सब यहाँ हैं (सब्बं एत्थ अत्थि)", इसलिए यह 'सावत्थी' है। सार्थ (काफिले) के मेल होने पर "क्या सामान है?" ऐसा पूछने पर "सब कुछ है (सब्बं अत्थि)" - इस वचन के आधार पर भी इसे 'सावत्थी' कहा जाता है। ‘‘သဗ္ဗဒါ သဗ္ဗူပကရဏံ, သာဝတ္ထိယံ သမောဟိတံ; တသ္မာ သဗ္ဗမုပါဒါယ, သာဝတ္ထီတိ ပဝုစ္စတိ. "श्रावस्ती में सदा सभी उपकरण (आवश्यक वस्तुएँ) एकत्रित रहती हैं; इसलिए सब कुछ (सब्बं) होने के कारण इसे 'सावत्थी' कहा जाता है।" ‘‘ကောသလာနံ ပုရံ ရမ္မံ, ဒဿနေယျံ မနောရမံ; ဒသဟိ သဒ္ဒေဟိ အဝိဝိတ္တံ, အန္နပါနသမာယုတံ. "कोसल देश का यह नगर रमणीय, दर्शनीय और मनमोहक है; यह दस प्रकार के शब्दों (ध्वनियों) से गूँजता रहता है और अन्न-पान से परिपूर्ण है।" ‘‘ဝုဍ္ဎိံ ဝေပုလ္လတံ ပတ္တံ, ဣဒ္ဓံ ဖီတံ မနောရမံ; အာဠကမန္ဒာဝ ဒေဝါနံ, သာဝတ္ထိပုရမုတ္တမ’’န္တိ. (မ. နိ. အဋ္ဌ. ၁.၁၄); "वृद्धि और विस्तार को प्राप्त, समृद्ध, वैभवशाली और मनोरम, देवताओं की अलकमन्दा नगरी के समान यह उत्तम श्रावस्ती नगर है।" တဿံ သာဝတ္ထိယံ. သမီပတ္ထေ ဘုမ္မဝစနံ. 'तस्सं सावत्थियं' (उस श्रावस्ती में)। यहाँ सप्तमी विभक्ति (भुम्मवचन) सामीप्य के अर्थ में है। ဝိဟရတီတိ အဝိသေသေန ဣရိယာပထဒိဗ္ဗဗြဟ္မအရိယဝိဟာရေသု အညတရဝိဟာရသမင်္ဂိပရိဒီပနမေတံ. ဣဓ ပန ဌာနဂမနာသနသယနပ္ပဘေဒေသု ဣရိယာပထေသု အညတရဣရိယာပထသမာယောဂပရိဒီပနံ, တေန ဌိတောပိ ဂစ္ဆန္တောပိ နိသိန္နောပိ သယာနောပိ ဘဂဝါ ဝိဟရတိစ္စေဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. သော ဟိ ဧကံ ဣရိယာပထဗာဓနံ အပရေန ဣရိယာပထေန ဝိစ္ဆိန္ဒိတွာ အပရိပတန္တံ အတ္တဘာဝံ ဟရတိ ပဝတ္တေတိ. တသ္မာ ဝိဟရတီတိ ဝုစ္စတိ. 'विहरति' (विहार करते हैं) यह सामान्य रूप से ईर्यापथ-विहार, दिव्य-विहार, ब्रह्म-विहार और आर्य-विहारों में से किसी एक विहार से युक्त होने का परिचायक है। किन्तु यहाँ खड़े होने, चलने, बैठने और लेटने के भेद वाले ईर्यापथों में से किसी एक ईर्यापथ के प्रयोग को दर्शाया गया है; इसलिए खड़े होते हुए, चलते हुए, बैठे हुए या लेटे हुए भी भगवान 'विहार ही कर रहे हैं' ऐसा समझना चाहिए। क्योंकि वे एक ईर्यापथ की पीड़ा को दूसरे ईर्यापथ से दूर कर, इस शरीर (आत्मभाव) को गिरने न देते हुए धारण करते हैं और चलाते हैं। इसलिए 'विहरति' कहा जाता है। ဇေတဝနေတိ ဧတ္ထ အတ္တနော ပစ္စတ္ထိကဇနံ ဇိနာတီတိ ဇေတော, ရညာ ဝါ အတ္တနော ပစ္စတ္ထိကဇနေ ဇိတေ ဇာတောတိ ဇေတော, မင်္ဂလကမျတာယ ဝါ တဿ ဧဝံ နာမမေဝ ကတန္တိပိ ဇေတော. ဝနယတီတိ ဝနံ, အတ္တသမ္ပဒါယ သတ္တာနံ ဘတ္တိံ ကာရေတိ, အတ္တနိ သိနေဟံ ဥပ္ပာဒေတီတိ အတ္ထော. ဝနုတေ ဣတိ ဝါ ဝနံ, နာနာဝိဓကုသုမဂန္ဓသမ္မောဒမတ္တကောကိလာဒိဝိဟင်္ဂဝိရုတေဟိ မန္ဒမာလုတစလိတရုက္ခသာခါဝိဋပပုပ္ဖဖလပလ္လဝပလာသေဟိ စ ‘‘ဧထ မံ ပရိဘုဉ္ဇထာ’’တိ ပါဏိနော ယာစတိ ဝိယာတိ အတ္ထော. ဇေတဿ ဝနံ ဇေတဝနံ. တဉှိ ဇေတေန ရာဇကုမာရေန ရောပိတံ သံဝဍ္ဎိတံ ပရိပါလိတံ, သော စ တဿ သာမီ အဟောသိ, တသ္မာ ဇေတဝနန္တိ ဝုစ္စတိ. တသ္မိံ ဇေတဝနေ. 'जेतवने' (जेतवन में) यहाँ जो अपने शत्रुओं को जीतता है वह 'जेत' है; अथवा राजा द्वारा अपने शत्रुओं को जीत लेने पर जो उत्पन्न हुआ वह 'जेत' है; अथवा मंगल की कामना से उसका ऐसा नाम रखा गया, इसलिए भी वह 'जेत' है। जो (प्राणियों को) अपनी ओर आकर्षित करता है वह 'वन' है, अर्थात् अपनी समृद्धि से प्राणियों में भक्ति उत्पन्न करता है और अपने प्रति स्नेह जगाता है। अथवा 'वनुते' (सेवन किया जाता है) इसलिए 'वन' है; जो नाना प्रकार के फूलों की गंध से मत्त कोयल आदि पक्षियों के कलरव से और मन्द पवन से हिलती हुई वृक्षों की शाखाओं, विटपों, पुष्पों, फलों और पल्लवों के द्वारा "आओ, मेरा उपभोग करो" - इस प्रकार मानो प्राणियों से याचना करता है। जेत (राजकुमार) का वन 'जेतवन' है। क्योंकि उसे जेत राजकुमार ने रोपा था, बढ़ाया था और उसकी रक्षा की थी, और वह उसका स्वामी था, इसलिए इसे 'जेतवन' कहा जाता है। उस जेतवन में। အနာထပိဏ္ဍိကဿ အာရာမေတိ ဧတ္ထ သုဒတ္တော နာမ သော ဂဟပတိ မာတာပိတူဟိ ကတနာမဝသေန, သဗ္ဗကာမသမိဒ္ဓိတာယ တု ဝိဂတမလမစ္ဆေရတာယ ကရုဏာဒိဂုဏသမင်္ဂိတာယ စ နိစ္စကာလံ အနာထာနံ ပိဏ္ဍံ [Pg.95] အဒါသိ, တေန အနာထပိဏ္ဍိကောတိ သင်္ချံ ဂတော. အာရမန္တိ ဧတ္ထ ပါဏိနော, ဝိသေသေန ဝါ ပဗ္ဗဇိတာတိ အာရာမော, တဿ ပုပ္ဖဖလပလ္လဝါဒိသောဘနတာယ နာတိဒူရနာစ္စာသန္နတာဒိပဉ္စဝိဓသေနာသနင်္ဂသမ္ပတ္တိယာ စ တတော တတော အာဂမ္မ ရမန္တိ အဘိရမန္တိ အနုက္ကဏ္ဌိတာ ဟုတွာ နိဝသန္တီတိ အတ္ထော. ဝုတ္တပ္ပကာရာယ ဝါ သမ္ပတ္တိယာ တတ္ထ တတ္ထ ဂတေပိ အတ္တနော အဗ္ဘန္တရံယေဝ အာနေတွာ ရမေတီတိ အာရာမော. သော ဟိ အနာထပိဏ္ဍိကေန ဂဟပတိနာ ဇေတဿ ရာဇကုမာရဿ ဟတ္ထတော အဋ္ဌာရသဟိရညကောဋိသန္ထာရေန ကိဏိတွာ အဋ္ဌာရသဟိရညကောဋီဟိ သေနာသနံ ကာရာပေတွာ အဋ္ဌာရသဟိရညကောဋီဟိ ဝိဟာရမဟံ နိဋ္ဌာပေတွာ ဧဝံ စတုပညာသာယ ဟိရညကောဋိပရိစ္စာဂေန ဗုဒ္ဓပ္ပမုခဿ ဘိက္ခုသံဃဿ နိယျာတိတော, တသ္မာ ‘‘အနာထပိဏ္ဍိကဿ အာရာမော’’တိ ဝုစ္စတိ. တသ္မိံ အနာထပိဏ္ဍိကဿ အာရာမေ. 'अनाथपिण्डिकस्स आरामे' (अनाथपिण्डिक के आराम में) यहाँ माता-पिता द्वारा रखे गए नाम के अनुसार वह गृहपति 'सुदत्त' नाम का था; किन्तु सभी कामनाओं की समृद्धि होने से, मात्सर्य (कंजूसी) रूपी मल से रहित होने के कारण और करुणा आदि गुणों से युक्त होने के कारण वह सदा अनाथों को पिण्ड (भोजन) देता था, इसलिए वह 'अनाथपिण्डिक' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। जहाँ प्राणी, और विशेष रूप से प्रव्रजित (भिक्षु) रमण करते हैं, वह 'आराम' है; उसके पुष्प, फल, पल्लव आदि की शोभा के कारण और न बहुत दूर, न बहुत पास आदि पाँच प्रकार की शयनासन-सम्पत्तियों के कारण लोग वहाँ अलग-अलग स्थानों से आकर रमण करते हैं, प्रसन्न होते हैं और बिना ऊबे निवास करते हैं। अथवा उक्त प्रकार की सम्पत्ति के कारण, जो अन्यत्र गए हुए लोगों को भी अपने भीतर खींचकर प्रसन्न करता है, वह 'आराम' है। वह (आराम) गृहपति अनाथपिण्डिक द्वारा राजकुमार जेत के हाथ से अठारह करोड़ स्वर्ण मुद्राओं को बिछाकर खरीदा गया, अठारह करोड़ स्वर्ण मुद्राओं से वहाँ शयनासन (आवास) बनवाए गए और अठारह करोड़ स्वर्ण मुद्राओं से विहार-मह (उद्घाटन उत्सव) सम्पन्न किया गया; इस प्रकार कुल चौवन करोड़ स्वर्ण मुद्राओं के त्याग से बुद्ध प्रमुख भिक्षु-संघ को समर्पित किया गया, इसलिए इसे 'अनाथपिण्डिक का आराम' कहा जाता है। उस अनाथपिण्डिक के आराम में। ဧတ္ထ စ ‘‘ဇေတဝနေ’’တိ ဝစနံ ပုရိမသာမိပရိကိတ္တနံ, ‘‘အနာထပိဏ္ဍိကဿ အာရာမေ’’တိ ပစ္ဆိမသာမိပရိကိတ္တနံ. ကိမေတေသံ ပရိကိတ္တနေ ပယောဇနန္တိ? ဝုစ္စတေ – အဓိကာရတော တာဝ ‘‘ကတ္ထ ဘာသိတ’’န္တိ ပုစ္ဆာနိယာမကရဏံ အညေသံ ပုညကာမာနံ ဒိဋ္ဌာနုဂတိအာပဇ္ဇနေ နိယောဇနဉ္စ. တတ္ထ ဟိ ဒွါရကောဋ္ဌကပါသာဒမာပနေ ဘူမိဝိက္ကယလဒ္ဓါ အဋ္ဌာရသ ဟိရညကောဋိယော အနေကကောဋိအဂ္ဃနကာ ရုက္ခာ စ ဇေတဿ ပရိစ္စာဂေါ, စတုပညာသ ကောဋိယော အနာထပိဏ္ဍိကဿ. ယတော တေသံ ပရိကိတ္တနေန ‘‘ဧဝံ ပုညကာမာ ပုညာနိ ကရောန္တီ’’တိ ဒဿေန္တော အာယသ္မာ အာနန္ဒော အညေပိ ပုညကာမေ တေသံ ဒိဋ္ဌာနုဂတိအာပဇ္ဇနေ နိယောဇေတိ. ဧဝမေတ္ထ ပုညကာမာနံ ဒိဋ္ဌာနုဂတိအာပဇ္ဇနေ နိယောဇနံ ပယောဇနန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. और यहाँ 'जेतवने' यह वचन पूर्व स्वामी का कीर्तन (उल्लेख) है, और 'अनाथपिण्डिकस्स आरामे' यह बाद के स्वामी का कीर्तन है। इनके कीर्तन का क्या प्रयोजन है? कहा जाता है - अधिकार के वश से पहले तो "कहाँ कहा गया?" इस प्रश्न का निश्चय करना, और अन्य पुण्यकामी व्यक्तियों को उनके दृष्टान्त का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करना। वहाँ द्वार-कोष्ठक और प्रासाद बनवाने में, भूमि के विक्रय से प्राप्त अठारह करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ और अनेक करोड़ के मूल्य वाले वृक्ष राजकुमार जेत का त्याग था, और चौवन करोड़ (कुल) अनाथपिण्डिक का त्याग था। चूँकि उनके कीर्तन से "इस प्रकार पुण्यकामी लोग पुण्य करते हैं" यह दिखाते हुए आयुष्मान आनन्द अन्य पुण्यकामियों को भी उनके दृष्टान्त का अनुसरण करने में नियोजित (प्रेरित) करते हैं। इस प्रकार यहाँ पुण्यकामियों को दृष्टान्त के अनुसरण में प्रेरित करना ही प्रयोजन है, ऐसा समझना चाहिए। ဧတ္ထာဟ – ‘‘ယဒိ တာဝ ဘဂဝါ သာဝတ္ထိယံ ဝိဟရတိ, ‘ဇေတဝနေ အနာထပိဏ္ဍိကဿ အာရာမေ’တိ န ဝတ္တဗ္ဗံ. အထ တတ္ထ ဝိဟရတိ, ‘သာဝတ္ထိယ’န္တိ န ဝတ္တဗ္ဗံ. န ဟိ သက္ကာ ဥဘယတ္ထ ဧကံ သမယံ ဝိဟရိတု’’န္တိ. ဝုစ္စတေ – နနု ဝုတ္တမေတံ ‘‘သမီပတ္ထေ ဘုမ္မဝစန’’န္တိ, ယတော ယထာ ဂင်္ဂါယမုနာဒီနံ သမီပေ ဂေါယူထာနိ စရန္တာနိ ‘‘ဂင်္ဂါယ စရန္တိ, ယမုနာယ စရန္တီ’’တိ ဝုစ္စန္တိ, ဧဝမိဓာပိ ယဒိဒံ သာဝတ္ထိယာ သမီပေ ဇေတဝနံ အနာထပိဏ္ဍိကဿ အာရာမော, တတ္ထ ဝိဟရန္တော ဝုစ္စတိ ‘‘သာဝတ္ထိယံ ဝိဟရတိ ဇေတဝနေ [Pg.96] အနာထပိဏ္ဍိကဿ အာရာမေ’’တိ ဝေဒိတဗ္ဗော. ဂေါစရဂါမနိဒဿနတ္ထံ ဟိဿ သာဝတ္ထိဝစနံ, ပဗ္ဗဇိတာနုရူပနိဝါသဋ္ဌာနနိဒဿနတ္ထံ သေသဝစနံ. यहाँ (एक आक्षेपकर्ता) कहता है - "यदि भगवान श्रावस्ती में विहार करते हैं, तो 'जेतवन में अनाथपिण्डिक के आराम में' ऐसा नहीं कहना चाहिए। यदि वे वहाँ (आराम में) विहार करते हैं, तो 'श्रावस्ती में' ऐसा नहीं कहना चाहिए। क्योंकि एक ही समय में दोनों स्थानों पर विहार करना संभव नहीं है।" उत्तर दिया जाता है - क्या यह नहीं कहा गया है कि यहाँ सप्तमी विभक्ति 'सामीप्य' (निकटता) के अर्थ में है? जैसे गंगा, यमुना आदि के समीप चरते हुए गायों के झुंडों के लिए कहा जाता है कि वे 'गंगा में चर रहे हैं, यमुना में चर रहे हैं', वैसे ही यहाँ भी जो श्रावस्ती के समीप जेतवन अनाथपिण्डिक का आराम है, वहाँ विहार करते हुए (भगवान के लिए) 'श्रावस्ती में जेतवन अनाथपिण्डिक के आराम में विहार करते हैं' ऐसा कहा जाता है, यह समझना चाहिए। 'श्रावस्ती' शब्द उनके गोचर-ग्राम (भिक्षाटन के स्थान) को दर्शाने के लिए है, और शेष शब्द प्रव्रजितों के अनुरूप निवास स्थान को दर्शाने के लिए हैं। တတ္ထ သာဝတ္ထိကိတ္တနေန ဘဂဝတော ဂဟဋ္ဌာနုဂ္ဂဟကရဏံ ဒဿေတိ, ဇေတဝနာဒိကိတ္တနေန ပဗ္ဗဇိတာနုဂ္ဂဟကရဏံ. တထာ ပုရိမေန ပစ္စယဂ္ဂဟဏတော အတ္တကိလမထာနုယောဂဝိဝဇ္ဇနံ, ပစ္ဆိမေန ဝတ္ထုကာမပ္ပဟာနတော ကာမသုခလ္လိကာနုယောဂဝဇ္ဇနူပါယဒဿနံ. ပုရိမေန စ ဓမ္မဒေသနာဘိယောဂံ, ပစ္ဆိမေန ဝိဝေကာဓိမုတ္တိံ. ပုရိမေန ကရုဏာယ ဥပဂမနံ, ပစ္ဆိမေန စ ပညာယ အပဂမနံ. ပုရိမေန သတ္တာနံ ဟိတသုခနိပ္ဖာဒနာဓိမုတ္တိတံ, ပစ္ဆိမေန ပရဟိတသုခကရဏေ နိရုပလေပတံ. ပုရိမေန ဓမ္မိကသုခါပရိစ္စာဂနိမိတ္တံ ဖာသုဝိဟာရံ, ပစ္ဆိမေန ဥတ္တရိမနုဿဓမ္မာနုယောဂနိမိတ္တံ. ပုရိမေန မနုဿာနံ ဥပကာရဗဟုလတံ, ပစ္ဆိမေန ဒေဝါနံ. ပုရိမေန လောကေ ဇာတဿ လောကေ သံဝဍ္ဎဘာဝံ, ပစ္ဆိမေန လောကေန အနုပလိတ္တတန္တိ ဧဝမာဒိ. वहाँ 'श्रावस्ती' के कीर्तन (उल्लेख) से भगवान द्वारा गृहस्थों पर अनुग्रह करना प्रदर्शित होता है, और 'जेतवन' आदि के उल्लेख से प्रव्रजितों (भिक्षुओं) पर अनुग्रह करना। उसी प्रकार, पहले (श्रावस्ती) के द्वारा प्रत्यय (भिक्षा आदि) ग्रहण करने से 'आत्म-क्लेश' (अत्तकिलमथानुयोग) के वर्जन को दिखाया गया है, और बाद वाले (जेतवन) के द्वारा वस्तु-काम के त्याग से 'काम-सुख' (कामसुखल्लिकानुयोग) के वर्जन के उपाय को दिखाया गया है। पहले के द्वारा धर्म-देशना में संलग्नता को, और बाद वाले के द्वारा विवेक (एकान्त) के प्रति झुकाव को। पहले के द्वारा करुणा से (संसार के) समीप जाना, और बाद वाले के द्वारा प्रज्ञा से (संसार से) दूर होना। पहले के द्वारा प्राणियों के हित-सुख की सिद्धि में तत्परता, और बाद वाले के द्वारा परहित-सुख करते हुए भी निर्लिप्तता। पहले के द्वारा धार्मिक सुख का परित्याग न करने के कारण 'फासु-विहार' (सुखपूर्वक विहार), और बाद वाले के द्वारा उत्तर-मनुष्य धर्म के अभ्यास के कारण। पहले के द्वारा मनुष्यों के लिए अत्यधिक उपकार, और बाद वाले के द्वारा देवताओं के लिए। पहले के द्वारा लोक में उत्पन्न होकर लोक में ही संवर्धित होने का भाव, और बाद वाले के द्वारा लोक से निर्लिप्त रहने का भाव, इत्यादि प्रदर्शित होता है। အထာတိ အဝိစ္ဆေဒတ္ထေ, ခေါတိ အဓိကာရန္တရနိဒဿနတ္ထေ နိပါတော. တေန အဝိစ္ဆိန္နေယေဝ တတ္ထ ဘဂဝတော ဝိဟာရေ ဣဒမဓိကာရန္တရံ ဥဒပါဒီတိ ဒဿေတိ. ကိံ တန္တိ? အညတရာ ဒေဝတာတိအာဒိ. တတ္ထ အညတရာတိ အနိယမိတနိဒ္ဒေသော. သာ ဟိ နာမဂေါတ္တတော အပါကဋာ, တသ္မာ ‘‘အညတရာ’’တိ ဝုတ္တာ. ဒေဝေါ ဧဝ ဒေဝတာ, ဣတ္ထိပုရိသသာဓာရဏမေတံ. ဣဓ ပန ပုရိသော ဧဝ, သော ဒေဝပုတ္တော ကိန္တု, သာဓာရဏနာမဝသေန ဒေဝတာတိ ဝုတ္တော. 'अथ' (Atha) शब्द निरंतरता (अविच्छेद) के अर्थ में है, और 'खो' (Kho) शब्द एक अन्य प्रसंग (अधिकारान्तर) को दर्शाने के अर्थ में निपात है। उससे यह प्रदर्शित होता है कि भगवान के वहाँ विहार करते समय निरंतरता में ही यह अन्य प्रसंग उत्पन्न हुआ। वह क्या है? 'अञ्ञतरा देवता' (एक देवता) आदि। वहाँ 'अञ्ञतरा' एक अनिश्चित निर्देश है। क्योंकि वह (देवता) नाम और गोत्र से अप्रकट (अज्ञात) था, इसलिए 'अञ्ञतरा' कहा गया है। 'देव' ही 'देवता' है, यह शब्द स्त्री और पुरुष दोनों के लिए सामान्य है। किंतु यहाँ वह पुरुष ही है, वह देवपुत्र है, फिर भी सामान्य नाम के कारण उसे 'देवता' कहा गया है। အဘိက္ကန္တာယ ရတ္တိယာတိ ဧတ္ထ အဘိက္ကန္တသဒ္ဒေါ ခယသုန္ဒရာဘိရူပအဗ္ဘနုမောဒနာဒီသု ဒိဿတိ. တတ္ထ ‘‘အဘိက္ကန္တာ, ဘန္တေ, ရတ္တိ, နိက္ခန္တော ပဌမော ယာမော, စိရနိသိန္နော ဘိက္ခုသံဃော, ဥဒ္ဒိသတု, ဘန္တေ, ဘဂဝါ ဘိက္ခူနံ ပါတိမောက္ခ’’န္တိ ဧဝမာဒီသု (စူဠဝ. ၃၈၃; အ. နိ. ၈.၂၀) ခယေ ဒိဿတိ. ‘‘အယံ ဣမေသံ စတုန္နံ ပုဂ္ဂလာနံ အဘိက္ကန္တတရော စ ပဏီတတရော စာ’’တိ ဧဝမာဒီသု (အ. နိ. ၄.၁၀၀) သုန္ဒရေ. 'अभिक्कन्ताय रत्तिया' (Abhikkantāya rattiyā) यहाँ 'अभिक्कन्त' शब्द क्षय (समाप्ति), सुन्दर, अभिरूप (अत्यधिक सुन्दर) और अभिनन्दन (प्रशंसा) आदि अर्थों में देखा जाता है। वहाँ "भन्ते! रात्रि बीत गई (अभिक्कन्ता), प्रथम पहर निकल गया, भिक्षु संघ बहुत देर से बैठा है, भन्ते! भगवान भिक्षुओं को पातिमोक्ख का उपदेश दें" इत्यादि में यह 'क्षय' (समाप्ति) के अर्थ में दिखता है। "यह इन चार पुद्गलों में अधिक श्रेष्ठ (अभिक्कन्ततरो) और अधिक प्रणीत है" इत्यादि में 'सुन्दर' (श्रेष्ठ) के अर्थ में। ‘‘ကော မေ ဝန္ဒတိ ပါဒါနိ, ဣဒ္ဓိယာ ယသသာ ဇလံ; အဘိက္ကန္တေန ဝဏ္ဏေန, သဗ္ဗာ ဩဘာသယံ ဒိသာ’’တိ. (ဝိ. ဝ. ၈၅၇); – "कौन मेरी ऋद्धि और यश से देदीप्यमान चरणों की वन्दना कर रहा है, जो अपने 'अभिक्कन्त' (अत्यधिक सुन्दर) वर्ण (आभा) से सभी दिशाओं को प्रकाशित कर रहा है?" ဧဝမာဒီသု [Pg.97] အဘိရူပေ. ‘‘အဘိက္ကန္တံ, ဘော ဂေါတမ, အဘိက္ကန္တံ, ဘော ဂေါတမာ’’တိ ဧဝမာဒီသု (အ. နိ. ၂.၁၆; ပါရာ. ၁၅) အဗ္ဘနုမောဒနေ. ဣဓ ပန ခယေ. တေန အဘိက္ကန္တာယ ရတ္တိယာတိ ပရိက္ခီဏာယ ရတ္တိယာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. इत्यादि में 'अभिरूप' (अत्यधिक सुन्दर) के अर्थ में है। "अति सुन्दर (अभिक्कन्तं), भो गौतम! अति सुन्दर, भो गौतम!" इत्यादि में 'अभिनन्दन' (प्रशंसा) के अर्थ में है। किंतु यहाँ यह 'क्षय' (समाप्ति) के अर्थ में है। इसलिए 'अभिक्कन्ताय रत्तिया' का अर्थ 'रात्रि के बीत जाने पर' (परिक्खीणाय रत्तिया) है। အဘိက္ကန္တဝဏ္ဏာတိ ဧတ္ထ အဘိက္ကန္တသဒ္ဒေါ အဘိရူပေ, ဝဏ္ဏသဒ္ဒေါ ပန ဆဝိထုတိကုလဝဂ္ဂကာရဏသဏ္ဌာနပမာဏရူပါယတနာဒီသု ဒိဿတိ. တတ္ထ ‘‘သုဝဏ္ဏဝဏ္ဏောသိ ဘဂဝါ’’တိ ဧဝမာဒီသု (မ. နိ. ၂.၃၉၉; သု. နိ. ၅၅၃) ဆဝိယံ. ‘‘ကဒါ သညူဠှာ ပန တေ ဂဟပတိ ဣမေ သမဏဿ ဂေါတမဿ ဝဏ္ဏာ’’တိ ဧဝမာဒီသု (မ. နိ. ၂.၇၇) ထုတိယံ. ‘‘စတ္တာရောမေ, ဘော ဂေါတမ, ဝဏ္ဏာ’’တိ ဧဝမာဒီသု (ဒီ. နိ. ၃.၁၁၅) ကုလဝဂ္ဂေ. ‘‘အထ ကေန နု ဝဏ္ဏေန, ဂန္ဓထေနောတိ ဝုစ္စတီ’’တိ ဧဝမာဒီသု (သံ. နိ. ၁.၂၃၄) ကာရဏေ. ‘‘မဟန္တံ ဟတ္ထိရာဇဝဏ္ဏံ အဘိနိမ္မိနိတွာ’’တိ ဧဝမာဒီသု (သံ. နိ. ၁.၁၃၈) သဏ္ဌာနေ. ‘‘တယော ပတ္တဿ ဝဏ္ဏာ’’တိ ဧဝမာဒီသု ပမာဏေ. ‘‘ဝဏ္ဏော ဂန္ဓော ရသော ဩဇာ’’တိ ဧဝမာဒီသု ရူပါယတနေ. သော ဣဓ ဆဝိယံ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. တေန အဘိက္ကန္တဝဏ္ဏာတိ အဘိရူပစ္ဆဝီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. 'अभिक्कन्तवण्णा' (Abhikkantavaṇṇā) यहाँ 'अभिक्कन्त' शब्द 'अभिरूप' (अत्यधिक सुन्दर) के अर्थ में है, और 'वण्ण' शब्द छवि (त्वचा का रंग), स्तुति (प्रशंसा), कुल (जाति), कारण, संस्थान (आकृति), प्रमाण (माप) और रूपायातन आदि अर्थों में देखा जाता है। वहाँ "भगवान सुवर्ण-वर्ण (स्वर्ण जैसी कान्ति वाले) हैं" इत्यादि में 'छवि' (त्वचा) के अर्थ में। "हे गृहपति! श्रमण गौतम की ये स्तुतियाँ (वण्णा) आपने कब सुनीं?" इत्यादि में 'स्तुति' के अर्थ में। "हे गौतम! ये चार वर्ण (जातियाँ) हैं" इत्यादि में 'कुल-वर्ग' के अर्थ में। "फिर किस कारण (वण्णेन) से उसे 'गन्ध-चोर' कहा जाता है?" इत्यादि में 'कारण' के अर्थ में। "एक महान हस्तिराज का रूप (वण्णं) निर्मित करके" इत्यादि में 'संस्थान' (आकृति) के अर्थ में। "पात्र के तीन प्रमाण (वण्णा) होते हैं" इत्यादि में 'प्रमाण' के अर्थ में। "वर्ण (रंग), गन्ध, रस, ओज" इत्यादि में 'रूपायातन' के अर्थ में। यहाँ इसे 'छवि' (त्वचा की कान्ति) के अर्थ में देखना चाहिए। इसलिए 'अभिक्कन्तवण्णा' का अर्थ 'अत्यधिक सुन्दर कान्ति वाला' (अभिरूपच्छवी) है। ကေဝလကပ္ပန္တိ ဧတ္ထ ကေဝလသဒ္ဒေါ အနဝသေသယေဘုယျအဗျာမိဿာနတိရေကဒဠှတ္ထဝိသံယောဂါဒိအနေကတ္ထော. တထာ ဟိဿ ‘‘ကေဝလပရိပုဏ္ဏံ ပရိသုဒ္ဓံ ဗြဟ္မစရိယ’’န္တိ ဧဝမာဒီသု (ပါရာ. ၁) အနဝသေသတာ အတ္ထော. ‘‘ကေဝလကပ္ပာ စ အင်္ဂမာဂဓာ ပဟူတံ ခါဒနီယံ ဘောဇနီယံ အာဒါယ ဥပသင်္ကမိဿန္တီ’’တိ ဧဝမာဒီသု (မဟာဝ. ၄၃) ယေဘုယျတာ. ‘‘ကေဝလဿ ဒုက္ခက္ခန္ဓဿ သမုဒယော ဟောတီ’’တိ ဧဝမာဒီသု (ဝိဘ. ၂၂၅) အဗျာမိဿတာ. ‘‘ကေဝလံ သဒ္ဓါမတ္တကံ နူန အယမာယသ္မာ’’တိ ဧဝမာဒီသု (မဟာဝ. ၂၄၄) အနတိရေကတာ. ‘‘အာယသ္မတော, ဘန္တေ, အနုရုဒ္ဓဿ ဗာဟိယော နာမ သဒ္ဓိဝိဟာရိကော ကေဝလကပ္ပံ သံဃဘေဒါယ ဌိတော’’တိ ဧဝမာဒီသု (အ. နိ. ၄.၂၄၃) ဒဠှတ္ထတာ. ‘‘ကေဝလီ ဝုသိတဝါ ဥတ္တမပုရိသောတိ ဝုစ္စတီ’’တိ ဧဝမာဒီသု (သံ. နိ. ၃.၅၇) ဝိသံယောဂေါ. ဣဓ ပနဿ အနဝသေသတ္တမတ္ထော အဓိပ္ပေတော. 'केवलकप्पं' (Kevalakappanti) यहाँ 'केवल' शब्द के अनेक अर्थ हैं - अशेष (बिना कुछ शेष रहे/सम्पूर्ण), बाहुल्य (अधिकतर), अमिश्रित (शुद्ध), अनतिरेक (मात्र), दृढ़ता और विसंयोग (अलगाव) आदि। जैसे "सम्पूर्ण (केवल) परिपूर्ण और परिशुद्ध ब्रह्मचर्य" इत्यादि में 'अशेषता' (सम्पूर्णता) अर्थ है। "लगभग सभी (केवलकप्पा) अंग और मगध के लोग प्रचुर खाद्य और भोज्य सामग्री लेकर आएँगे" इत्यादि में 'बाहुल्य' (अधिकतर) अर्थ है। "इस सम्पूर्ण (केवलस्स) दुःख-स्कन्ध का उदय होता है" इत्यादि में 'अमिश्रितता' अर्थ है। "निश्चय ही यह आयुष्मान मात्र (केवलं) श्रद्धावान है" इत्यादि में 'अनतिरेकता' (मात्र) अर्थ है। "भन्ते! आयुष्मान अनुरुद्ध का बाहिय नामक सार्धविहारिक दृढ़तापूर्वक (केवलकप्पं) संघ-भेद के लिए खड़ा है" इत्यादि में 'दृढ़ता' अर्थ है। "जो विसंयोजित (केवली) है, कृतकृत्य है, उसे उत्तम पुरुष कहा जाता है" इत्यादि में 'विसंयोग' अर्थ है। किंतु यहाँ इसका 'अशेषता' (सम्पूर्णता) अर्थ अभिप्रेत है। ကပ္ပသဒ္ဒေါ ပနာယံ အဘိသဒ္ဒဟနဝေါဟာရကာလပညတ္တိဆေဒနဝိကပ္ပလေသသမန္တဘာဝါဒိအနေကတ္ထော. တထာ ဟိဿ ‘‘ဩကပ္ပနီယမေတံ [Pg.98] ဘောတော ဂေါတမဿ, ယထာ တံ အရဟတော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿာ’’တိ ဧဝမာဒီသု (မ. နိ. ၁.၃၈၇) အဘိသဒ္ဒဟနမတ္ထော. ‘‘အနုဇာနာမိ, ဘိက္ခဝေ, ပဉ္စဟိ သမဏကပ္ပေဟိ ဖလံ ပရိဘုဉ္ဇိတု’’န္တိ ဧဝမာဒီသု (စူဠဝ. ၂၅၀) ဝေါဟာရော. ‘‘ယေန သုဒံ နိစ္စကပ္ပံ ဝိဟရာမီ’’တိ ဧဝမာဒီသု (မ. နိ. ၁.၃၈၇) ကာလော. ‘‘ဣစ္စာယသ္မာ ကပ္ပော’’တိ ဧဝမာဒီသု (သု. နိ. ၁၀၉၈; စူဠနိ. ကပ္ပမာဏဝပုစ္ဆာ ၁၁၇, ကပ္ပမာဏဝပုစ္ဆာနိဒ္ဒေသ ၆၁) ပညတ္တိ. ‘‘အလင်္ကတော ကပ္ပိတကေသမဿူ’’တိ ဧဝမာဒီသု (ဇာ. ၂.၂၂.၁၃၆၈) ဆေဒနံ. ‘‘ကပ္ပတိ ဒွင်္ဂုလကပ္ပော’’တိ ဧဝမာဒီသု (စူဠဝ. ၄၄၆) ဝိကပ္ပော. ‘‘အတ္ထိ ကပ္ပော နိပဇ္ဇိတု’’န္တိ ဧဝမာဒီသု (အ. နိ. ၈.၈၀) လေသော. ‘‘ကေဝလကပ္ပံ ဝေဠုဝနံ ဩဘာသေတွာ’’တိ ဧဝမာဒီသု (သံ. နိ. ၁.၉၄) သမန္တဘာဝေါ. ဣဓ ပနဿ သမန္တဘာဝေါ အတ္ထော အဓိပ္ပေတော. ယတော ကေဝလကပ္ပံ ဇေတဝနန္တိ ဧတ္ထ အနဝသေသံ သမန္တတော ဇေတဝနန္တိ ဧဝမတ္ထော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. यहाँ 'कप्प' शब्द के अनेक अर्थ हैं, जैसे—श्रद्धा (अभिद्धहन), व्यवहार (वोहार), काल, प्रज्ञप्ति (पञ्ञत्ति), छेदन, विकल्प, लेश (संकेत) और सामन्तभाव (पूर्णता) आदि। जैसे 'ओकप्पनीयमेतं भोतो गोतमस्स, यथा तं अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स' (म.नि. १.३८७) आदि में इसका अर्थ 'श्रद्धा' है। 'अनुजानामि, भिक्खवे, पञ्चहि समणकप्पेहि फलं परिभुञ्जितुं' (चूळव. २५०) आदि में इसका अर्थ 'व्यवहार' है। 'येन सुदं निच्चकप्पं विहरामि' (म.नि. १.३८७) आदि में इसका अर्थ 'काल' है। 'इच्चायस्मा कप्पो' (सु.नि. १०९८) आदि में इसका अर्थ 'प्रज्ञप्ति' है। 'अलङ्कतो कप्पितकेसमस्सु' (जा. २.२२.१३६८) आदि में इसका अर्थ 'छेदन' है। 'कप्पति द्वङ्गुलकप्पो' (चूळव. ४४६) आदि में इसका अर्थ 'विकल्प' है। 'अत्थि कप्पो निपज्जितुं' (अ.नि. ८.८०) आदि में इसका अर्थ 'लेश' (संकेत) है। 'केवलकप्पं वेळुवनं ओभासेत्वा' (सं.नि. १.९४) आदि में इसका अर्थ 'सामन्तभाव' (पूर्णता) है। यहाँ (इस सन्दर्भ में) इसका 'सामन्तभाव' अर्थ ही अभिप्रेत है। इसलिए 'केवलकप्पं जेतवनं' का अर्थ 'बिना किसी शेष के, चारों ओर से सम्पूर्ण जेतवन' ऐसा समझना चाहिए। ဩဘာသေတွာတိ အာဘာယ ဖရိတွာ, စန္ဒိမာ ဝိယ သူရိယော ဝိယ စ ဧကောဘာသံ ဧကပဇ္ဇောတံ ကရိတွာတိ အတ္ထော. 'ओभासेत्वा' का अर्थ है—अपनी आभा (प्रकाश) से व्याप्त कर, चन्द्रमा और सूर्य की भाँति (सम्पूर्ण जेतवन को) एक ही प्रकाशपुञ्ज या एक ही प्रद्योत (चमक) के समान कर देना। ယေန ဘဂဝါ တေနုပသင်္ကမီတိ ဘုမ္မတ္ထေ ကရဏဝစနံ. ယတော ယတ္ထ ဘဂဝါ, တတ္ထ ဥပသင်္ကမီတိ ဧဝမေတ္ထ အတ္ထော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ယေန ဝါ ကာရဏေန ဘဂဝါ ဒေဝမနုဿေဟိ ဥပသင်္ကမိတဗ္ဗော, တေနေဝ ကာရဏေန ဥပသင်္ကမီတိ ဧဝမ္ပေတ္ထ အတ္ထော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ကေန စ ကာရဏေန ဘဂဝါ ဥပသင်္ကမိတဗ္ဗော? နာနပ္ပကာရဂုဏဝိသေသာဓိဂမာဓိပ္ပာယေန, သာဒုရသဖလူပဘောဂါဓိပ္ပာယေန ဒိဇဂဏေဟိ နိစ္စဖလိတမဟာရုက္ခော ဝိယ. ဥပသင်္ကမီတိ စ ဂတာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဥပသင်္ကမိတွာတိ ဥပသင်္ကမနပရိယောသာနဒီပနံ. အထ ဝါ ဧဝံ ဂတာ တတော အာသန္နတရံ ဌာနံ ဘဂဝတော သမီပသင်္ခါတံ ဂန္တွာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဘဂဝန္တံ အဘိဝါဒေတွာတိ ဘဂဝန္တံ ဝန္ဒိတွာ ပဏမိတွာ နမဿိတွာ. 'येन भगवा तेनुपसङ्कमि' यहाँ सप्तमी विभक्ति के अर्थ में करण विभक्ति का प्रयोग हुआ है। जहाँ भगवान थे, वहाँ वह (देवता) गया—ऐसा यहाँ अर्थ समझना चाहिए। अथवा, जिस कारण से देवताओं और मनुष्यों को भगवान के पास जाना चाहिए, उसी कारण से वह गया—ऐसा भी अर्थ यहाँ समझना चाहिए। भगवान के पास किस कारण से जाना चाहिए? अनेक प्रकार के विशेष गुणों की प्राप्ति की इच्छा से, जैसे पक्षियों का समूह मीठे और रसदार फलों का उपभोग करने की इच्छा से सदा फलों से लदे हुए विशाल वृक्ष के पास जाता है। 'उपसङ्कमि' का अर्थ है 'गया'। 'उपसङ्कमित्वा' शब्द पहुँचने की क्रिया की समाप्ति को दर्शाता है। अथवा, इस प्रकार जाकर, भगवान के समीप कहे जाने वाले अत्यन्त निकट स्थान पर पहुँचकर—यह इसका अर्थ है। 'भगवन्तं अभिवादेत्वा' का अर्थ है—भगवान की वन्दना कर, उन्हें प्रणाम कर और नमस्कार कर। ဧကမန္တန္တိ ဘာဝနပုံသကနိဒ္ဒေသော ဧကောကာသံ ဧကပဿန္တိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဘုမ္မတ္ထေ ဝါ ဥပယောဂဝစနံ. အဋ္ဌာသီတိ နိသဇ္ဇာဒိပဋိက္ခေပေါ, ဌာနံ ကပ္ပေသိ, ဌိတာ အဟောသီတိ အတ္ထော. 'एकमन्तं' यह क्रिया-विशेषण (भावनपुंसक) निर्देश है, जिसका अर्थ है 'एक ओर' या 'एक स्थान पर'। अथवा यह सप्तमी के अर्थ में द्वितीया विभक्ति है। 'अट्ठासि' का अर्थ है—बैठने आदि अन्य मुद्राओं का त्याग कर खड़ा हो गया; अर्थात् उसने खड़े होने की मुद्रा अपनाई। ကထံ [Pg.99] ဌိတာ ပန သာ ဧကမန္တံ ဌိတာ အဟူတိ? किन्तु वह 'एकमन्तं' (एक ओर) किस प्रकार खड़ी हुई? ‘‘န ပစ္ဆတော န ပုရတော, နာပိ အာသန္နဒူရတော; န ကစ္ဆေ နောပိ ပဋိဝါတေ, န စာပိ ဩဏတုဏ္ဏတေ; ဣမေ ဒေါသေ ဝိဝဇ္ဇေတွာ, ဧကမန္တံ ဌိတာ အဟူ’’တိ. न पीछे, न आगे, न बहुत पास और न बहुत दूर; न हवा के सामने (प्रतिवात) और न ही ऊँचे-नीचे स्थान पर; इन (आठ) दोषों को त्यागकर वह एक ओर खड़ी हुई। ကသ္မာ ပနာယံ အဋ္ဌာသိ ဧဝ, န နိသီဒီတိ? လဟုံ နိဝတ္တိတုကာမတာယ. ဒေဝတာယော ဟိ ကဉ္စိဒေဝ အတ္ထဝသံ ပဋိစ္စ သုစိပုရိသော ဝိယ ဝစ္စဋ္ဌာနံ မနုဿလောကံ အာဂစ္ဆန္တိ. ပကတိယာ ပန တာသံ ယောဇနသတတော ပဘုတိ မနုဿလောကော ဒုဂ္ဂန္ဓတာယ ပဋိကူလော ဟောတိ, န ဧတ္ထ အဘိရမန္တိ, တေန သာ အာဂတကိစ္စံ ကတွာ လဟုံ နိဝတ္တိတုကာမတာယ န နိသီဒိ. ယဿ စ ဂမနာဒိဣရိယာပထပရိဿမဿ ဝိနောဒနတ္ထံ နိသီဒန္တိ, သော ဒေဝါနံ ပရိဿမော နတ္ထိ, တသ္မာပိ န နိသီဒိ. ယေ စ မဟာသာဝကာ ဘဂဝန္တံ ပရိဝါရေတွာ ဌိတာ, တေ ပတိမာနေတိ, တသ္မာပိ န နိသီဒိ. အပိစ ဘဂဝတိ ဂါရဝေနေဝ န နိသီဒိ. ဒေဝတာနဉှိ နိသီဒိတုကာမာနံ အာသနံ နိဗ္ဗတ္တတိ, တံ အနိစ္ဆမာနာ နိသဇ္ဇာယ စိတ္တမ္ပိ အကတွာ ဧကမန္တံ အဋ္ဌာသိ. वह देवता खड़ा ही क्यों रहा, बैठा क्यों नहीं? शीघ्र वापस लौटने की इच्छा के कारण। देवता किसी विशेष प्रयोजन से ही मनुष्य लोक में आते हैं, जैसे कोई स्वच्छ पुरुष शौचालय में जाता है। स्वभावतः, सौ योजन दूर से ही मनुष्यों का लोक अपनी दुर्गन्ध के कारण देवताओं के लिए प्रतिकूल होता है, वे यहाँ रमण नहीं करते; इसलिए वह देवता अपना कार्य (प्रश्न पूछना) कर शीघ्र लौटने की इच्छा से नहीं बैठा। इसके अतिरिक्त, मनुष्य चलने आदि की थकान मिटाने के लिए बैठते हैं, किन्तु देवताओं को वैसी थकान नहीं होती, इसलिए भी वह नहीं बैठा। जो महान श्रावक भगवान को घेरे हुए खड़े थे, उनके प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए भी वह नहीं बैठा। इसके अलावा, भगवान के प्रति गौरव (आदर) के कारण ही वह नहीं बैठा। बैठने की इच्छा करने वाले देवताओं के लिए आसन स्वतः उत्पन्न हो जाते हैं, किन्तु बैठने की इच्छा न होने के कारण, बैठने का विचार तक न कर वह एक ओर खड़ा रहा। ဧကမန္တံ ဌိတာ ခေါ သာ ဒေဝတာတိ ဧဝံ ဣမေဟိ ကာရဏေဟိ ဧကမန္တံ ဌိတာ ခေါ သာ ဒေဝတာ. ဘဂဝန္တံ ဂါထာယ အဇ္ဈဘာသီတိ ဘဂဝန္တံ အက္ခရပဒနိယမိတဂန္ထိတေန ဝစနေန အဘာသီတိ အတ္ထော. ကထံ? ဗဟူ ဒေဝါ မနုဿာ စ…ပေ… ဗြူဟိ မင်္ဂလမုတ္တမန္တိ. 'एकमन्तं ठिता खो सा देवता'—इस प्रकार इन कारणों से वह देवता एक ओर खड़ा हुआ। 'भगवन्तं गाथाय अज्झभासि' का अर्थ है—भगवान से अक्षरों और पदों से बद्ध (गाथा रूपी) वाणी में बोला। कैसे बोला? 'बहू देवा मनुस्सा च... पे... ब्रूहि मङ्गलमुत्तमं'—इस प्रकार बोला। မင်္ဂလပဉှသမုဋ္ဌာနကထာ मंगल-प्रश्न की उत्पत्ति की कथा တတ္ထ ယသ္မာ ‘‘ဧဝမိစ္စာဒိပါဌဿ, အတ္ထံ နာနပ္ပကာရတော. ဝဏ္ဏယန္တော သမုဋ္ဌာနံ, ဝတွာ’’တိ မာတိကာ ဌပိတာ, တဿ စ သမုဋ္ဌာနဿ အယံ ဝတ္တဗ္ဗတာယ ဩကာသော, တသ္မာ မင်္ဂလပဉှသမုဋ္ဌာနံ တာဝ ဝတွာ ပစ္ဆာ ဣမေသံ ဂါထာပဒါနမတ္ထံ ဝဏ္ဏယိဿာမိ. ကိဉ္စ မင်္ဂလပဉှသမုဋ္ဌာနံ? ဇမ္ဗုဒီပေ ကိရ တတ္ထ တတ္ထ နဂရဒွါရသန္ထာဂါရသဘာဒီသု မဟာဇနော သန္နိပတိတွာ ဟိရညသုဝဏ္ဏံ ဒတွာ နာနပ္ပကာရံ သီတာဟရဏာဒိကထံ ကထာပေတိ, ဧကေကာ ကထာ စတုမာသစ္စယေန နိဋ္ဌာတိ. တတ္ထ ဧကဒိဝသံ မင်္ဂလကထာ သမုဋ္ဌာသိ ‘‘ကိံ နု ခေါ မင်္ဂလံ, ကိံ ဒိဋ္ဌံ မင်္ဂလံ, သုတံ မင်္ဂလံ, မုတံ မင်္ဂလံ, ကော မင်္ဂလံ ဇာနာတီ’’တိ. वहाँ, चूँकि 'एवमिच्चादिपाठस्स...' आदि के द्वारा मूल विषय (मातिका) स्थापित की गई है कि 'विभिन्न प्रकार से अर्थ का वर्णन करते हुए पहले उत्पत्ति (समुट्ठान) को कहूँगा', अतः उस उत्पत्ति को कहने का यह अवसर है। इसलिए पहले मंगल-प्रश्न की उत्पत्ति को कहकर बाद में इन गाथा-पदों के अर्थ की व्याख्या करूँगा। मंगल-प्रश्न की उत्पत्ति क्या है? सुना जाता है कि जम्बुद्वीप में जगह-जगह नगर-द्वारों, विश्रामशालाओं और सभाओं आदि में बहुत से लोग एकत्रित होकर और स्वर्ण-मुद्राएँ देकर अनेक प्रकार की 'सीता-हरण' आदि कथाएँ सुनते थे। एक-एक कथा चार महीने में समाप्त होती थी। वहाँ एक दिन 'मंगल-कथा' आरम्भ हुई कि 'मंगल क्या है? क्या देखा गया (रूप) मंगल है, सुना गया (शब्द) मंगल है, या अनुभव किया गया (गन्ध-रस-स्पर्श) मंगल है? मंगल को कौन जानता है?' အထ [Pg.100] ဒိဋ္ဌမင်္ဂလိကော နာမေကော ပုရိသော အာဟ ‘‘အဟံ မင်္ဂလံ ဇာနာမိ, ဒိဋ္ဌံ လောကေ မင်္ဂလံ ဒိဋ္ဌံ နာမ အဘိမင်္ဂလသမ္မတံ ရူပံ. သေယျထိဒံ – ဣဓေကစ္စော ကာလဿေဝ ဝုဋ္ဌာယ စာတကသကုဏံ ဝါ ပဿတိ, ဗေလုဝလဋ္ဌိံ ဝါ ဂဗ္ဘိနိံ ဝါ ကုမာရကေ ဝါ အလင်္ကတပဋိယတ္တေ ပုဏ္ဏဃဋေ ဝါ အလ္လရောဟိတမစ္ဆံ ဝါ အာဇညံ ဝါ အာဇညရထံ ဝါ ဥသဘံ ဝါ ဂါဝိံ ဝါ ကပိလံ ဝါ, ယံ ဝါ ပနညမ္ပိ ကိဉ္စိ ဧဝရူပံ အဘိမင်္ဂလသမ္မတံ ရူပံ ပဿတိ, ဣဒံ ဝုစ္စတိ ဒိဋ္ဌမင်္ဂလ’’န္တိ. တဿ ဝစနံ ဧကစ္စေ အဂ္ဂဟေသုံ, ဧကစ္စေ န အဂ္ဂဟေသုံ. ယေ န အဂ္ဂဟေသုံ, တေ တေန သဟ ဝိဝဒိံသု. तब 'दिट्ठमंगलिका' (दृष्ट-मंगल) नामक एक पुरुष ने कहा— "मैं मंगल को जानता हूँ। लोक में जो देखा जाता है, वह मंगल है। 'दृष्ट' नाम का वह रूप है जिसे परम मंगल माना गया है। वह क्या है? जैसे—यहाँ कोई व्यक्ति प्रातःकाल उठकर नीलकंठ पक्षी को देखता है, या बेल की छड़ी (या कमल का गुच्छा) लिए हुए व्यक्ति को, या गर्भवती स्त्री को, या अलंकृत और सुसज्जित बालकों को, या पूर्ण कुम्भों (भरे हुए घड़ों) को, या ताजी रोहू मछली को, या उत्तम घोड़े को, या उत्तम रथ को, या बैल को, या गाय को, या भूरे रंग के बंदर को, अथवा इसी प्रकार के किसी अन्य रूप को देखता है जिसे परम मंगल माना गया है, इसे 'दिट्ठमंगल' (दृष्ट-मंगल) कहा जाता है।" उसकी बात को कुछ लोगों ने स्वीकार किया, कुछ ने नहीं। जिन्होंने स्वीकार नहीं किया, उन्होंने उसके साथ विवाद किया। အထ သုတမင်္ဂလိကော နာမ ဧကော ပုရိသော အာဟ – ‘‘စက္ခုနာမေတံ, ဘော, သုစိမ္ပိ ပဿတိ အသုစိမ္ပိ, တထာ သုန္ဒရမ္ပိ, အသုန္ဒရမ္ပိ, မနာပမ္ပိ, အမနာပမ္ပိ. ယဒိ တေန ဒိဋ္ဌံ မင်္ဂလံ သိယာ, သဗ္ဗမ္ပိ မင်္ဂလံ သိယာ. တသ္မာ န ဒိဋ္ဌံ မင်္ဂလံ, အပိစ ခေါ ပန သုတံ မင်္ဂလံ. သုတံ နာမ အဘိမင်္ဂလသမ္မတော သဒ္ဒေါ. သေယျထိဒံ? ဣဓေကစ္စော ကာလဿေဝ ဝုဋ္ဌာယ ဝဍ္ဎာတိ ဝါ ဝဍ္ဎမာနာတိ ဝါ ပုဏ္ဏာတိ ဝါ ဖုဿာတိ ဝါ သုမနာတိ ဝါ သိရီတိ ဝါ သိရိဝဍ္ဎာတိ ဝါ အဇ္ဇ သုနက္ခတ္တံ သုမုဟုတ္တံ သုဒိဝသံ သုမင်္ဂလန္တိ ဧဝရူပံ ဝါ ယံကိဉ္စိ အဘိမင်္ဂလသမ္မတံ သဒ္ဒံ သုဏာတိ, ဣဒံ ဝုစ္စတိ သုတမင်္ဂလ’’န္တိ. တဿာပိ ဝစနံ ဧကစ္စေ အဂ္ဂဟေသုံ, ဧကစ္စေ န အဂ္ဂဟေသုံ. ယေ န အဂ္ဂဟေသုံ, တေ တေန သဟ ဝိဝဒိံသု. तब 'सुतमंगलिका' (श्रुत-मंगल) नामक एक पुरुष ने कहा— "हे महानुभावों! आँख से तो मनुष्य पवित्र भी देखता है और अपवित्र भी, सुंदर भी और असुंदर भी, प्रिय भी और अप्रिय भी। यदि देखा गया रूप मंगल होता, तो सब कुछ मंगल हो जाता। इसलिए देखा गया रूप मंगल नहीं है, बल्कि सुना गया शब्द मंगल है। 'श्रुत' नाम का वह शब्द है जिसे परम मंगल माना गया है। वह क्या है? जैसे—यहाँ कोई व्यक्ति प्रातःकाल उठकर 'वर्धमान' (बढ़ने वाला), 'पूर्ण' (भरा हुआ), 'पुष्य', 'सुमन', 'श्री', 'श्रीवर्द्ध' जैसे शब्द सुनता है, या 'आज शुभ नक्षत्र है, शुभ मुहूर्त है, शुभ दिन है, शुभ मंगल है'—इस प्रकार के या किसी अन्य ऐसे शब्द को सुनता है जिसे परम मंगल माना गया है, इसे 'सुतमंगल' (श्रुत-मंगल) कहा जाता है।" उसकी बात को भी कुछ लोगों ने स्वीकार किया, कुछ ने नहीं। जिन्होंने स्वीकार नहीं किया, उन्होंने उसके साथ विवाद किया। အထ မုတမင်္ဂလိကော နာမေကော ပုရိသော အာဟ ‘‘သောတမ္ပိ ဟိ နာမေတံ, ဘော, သာဓုမ္ပိ အသာဓုမ္ပိ မနာပမ္ပိ အမနာပမ္ပိ သဒ္ဒံ သုဏာတိ. ယဒိ တေန သုတံ မင်္ဂလံ သိယာ, သဗ္ဗမ္ပိ မင်္ဂလံ သိယာ. တသ္မာ န သုတံ မင်္ဂလံ, အပိစ ခေါ ပန မုတံ မင်္ဂလံ. မုတံ နာမ အဘိမင်္ဂလသမ္မတံ ဂန္ဓရသဖောဋ္ဌဗ္ဗံ. သေယျထိဒံ – ဣဓေကစ္စော ကာလဿေဝ ဝုဋ္ဌာယ ပဒုမဂန္ဓာဒိပုပ္ဖဂန္ဓံ ဝါ ဃာယတိ, ဖုဿဒန္တကဋ္ဌံ ဝါ ခါဒတိ, ပထဝိံ ဝါ အာမသတိ, ဟရိတသဿံ ဝါ အလ္လဂေါမယံ ဝါ ကစ္ဆပံ ဝါ တိလံ ဝါ ပုပ္ဖံ ဝါ ဖလံ ဝါ အာမသတိ, ဖုဿမတ္တိကာယ ဝါ သမ္မာ လိမ္ပတိ, ဖုဿသာဋကံ ဝါ နိဝါသေတိ, ဖုဿဝေဌနံ ဝါ ဓာရေတိ. ယံ ဝါ ပနညမ္ပိ ကိဉ္စိ ဧဝရူပံ အဘိမင်္ဂလသမ္မတံ ဂန္ဓံ ဝါ ဃာယတိ, ရသံ ဝါ သာယတိ, ဖောဋ္ဌဗ္ဗံ ဝါ ဖုသတိ, ဣဒံ ဝုစ္စတိ မုတမင်္ဂလ’’န္တိ. တဿာပိ ဝစနံ ဧကစ္စေ အဂ္ဂဟေသုံ, ဧကစ္စေ န အဂ္ဂဟေသုံ. तब 'मुतमंगलिका' (अनुभूत-मंगल) नामक एक पुरुष ने कहा— "हे महानुभावों! कान से भी मनुष्य अच्छा और बुरा, प्रिय और अप्रिय शब्द सुनता है। यदि सुना गया शब्द मंगल होता, तो सब कुछ मंगल हो जाता। इसलिए सुना गया शब्द मंगल नहीं है, बल्कि जो अनुभूत (गंध, रस, स्पर्श) है, वह मंगल है। 'मुत' (अनुभूत) नाम का वह गंध, रस और स्पर्श है जिसे परम मंगल माना गया है। वह क्या है? जैसे—यहाँ कोई व्यक्ति प्रातःकाल उठकर पद्म (कमल) आदि फूलों की सुगंध सूंघता है, या सुखद दातून करता है, या पृथ्वी का स्पर्श करता है, या हरी फसल, ताज़ा गोबर, कछुआ, तिल, फूल या फल का स्पर्श करता है, या सुखद मिट्टी का लेप करता है, या सुखद वस्त्र पहनता है, या सुखद पगड़ी धारण करता है। अथवा इसी प्रकार की किसी अन्य वस्तु की सुगंध सूंघता है, रस चखता है या स्पर्श का अनुभव करता है जिसे परम मंगल माना गया है, इसे 'मुतमंगल' (अनुभूत-मंगल) कहा जाता है।" उसकी बात को भी कुछ लोगों ने स्वीकार किया, कुछ ने नहीं। တတ္ထ [Pg.101] န ဒိဋ္ဌမင်္ဂလိကော သုတမုတမင်္ဂလိကေ အသက္ခိ ဉာပေတုံ, န တေသံ အညတရော ဣတရေ ဒွေ. တေသု စ မနုဿေသု ယေ ဒိဋ္ဌမင်္ဂလိကဿ ဝစနံ ဂဏှိံသု, တေ ‘‘ဒိဋ္ဌံယေဝ မင်္ဂလ’’န္တိ ဂတာ. ယေ သုတမုတမင်္ဂလိကာနံ, တေ ‘‘သုတံယေဝ မုတံယေဝ မင်္ဂလ’’န္တိ ဂတာ. ဧဝမယံ မင်္ဂလကထာ သကလဇမ္ဗုဒီပေ ပါကဋာ ဇာတာ. उनमें से न तो 'दिट्ठमंगलिका' (दृष्ट-मंगलवादी) 'सुतमंगलिका' और 'मुतमंगलिका' को समझा सका, और न ही उनमें से कोई अन्य शेष दो को समझा सका। उन मनुष्यों में से जिन्होंने 'दिट्ठमंगलिका' की बात मानी, वे 'दृष्ट ही मंगल है' इस विचार के हो गए। जिन्होंने 'सुतमंगलिका' और 'मुतमंगलिका' की बात मानी, वे 'श्रुत ही मंगल है' या 'अनुभूत ही मंगल है' इस विचार के हो गए। इस प्रकार यह मंगल-कथा संपूर्ण जम्बूद्वीप में प्रसिद्ध हो गई। အထ သကလဇမ္ဗုဒီပေ မနုဿာ ဂုမ္ဗဂုမ္ဗာ ဟုတွာ ‘‘ကိံ နု ခေါ မင်္ဂလ’’န္တိ မင်္ဂလာနိ စိန္တယိံသု. တေသံ မနုဿာနံ အာရက္ခဒေဝတာ တံ ကထံ သုတွာ တထေဝ မင်္ဂလာနိ စိန္တယိံသု. တာသံ ဒေဝတာနံ ဘုမ္မဒေဝတာ မိတ္တာ ဟောန္တိ, အထ တတော သုတွာ ဘုမ္မဒေဝတာပိ တထေဝ မင်္ဂလာနိ စိန္တယိံသု, တာသံ ဒေဝတာနံ အာကာသဋ္ဌဒေဝတာ မိတ္တာ ဟောန္တိ, အာကာသဋ္ဌဒေဝတာနံ စတုမဟာရာဇိကာ ဒေဝတာ မိတ္တာ ဟောန္တိ, ဧတေနုပါယေန ယာဝ သုဒဿီဒေဝတာနံ အကနိဋ္ဌဒေဝတာ မိတ္တာ ဟောန္တိ, အထ တတော သုတွာ အကနိဋ္ဌဒေဝတာပိ တထေဝ ဂုမ္ဗဂုမ္ဗာ ဟုတွာ မင်္ဂလာနိ စိန္တယိံသု. ဧဝံ ယာဝ ဒသသဟဿစက္ကဝါဠေသု သဗ္ဗတ္ထ မင်္ဂလစိန္တာ ဥဒပါဒိ. ဥပ္ပန္နာ စ ‘‘ဣဒံ မင်္ဂလံ ဣဒံ မင်္ဂလ’’န္တိ ဝိနိစ္ဆယမာနာပိ အပ္ပတ္တာ ဧဝ ဝိနိစ္ဆယံ ဒွါဒသ ဝဿာနိ အဋ္ဌာသိ. သဗ္ဗေ မနုဿာ စ ဒေဝါ စ ဗြဟ္မာနော စ ဌပေတွာ အရိယသာဝကေ ဒိဋ္ဌသုတမုတဝသေန တိဓာ ဘိန္နာ. ဧကောပိ ‘‘ဣဒမေဝ မင်္ဂလ’’န္တိ ယထာဘုစ္စတော နိဋ္ဌင်္ဂတော နာဟောသိ, မင်္ဂလကောလာဟလံ လောကေ ဥပ္ပဇ္ဇိ. तब संपूर्ण जम्बूद्वीप में मनुष्य समूहों में एकत्रित होकर "मंगल क्या है?" इस विषय पर विचार करने लगे। उन मनुष्यों के आरक्षक देवताओं ने उस चर्चा को सुना और वे भी उसी प्रकार मंगल के विषय में विचार करने लगे। उन देवताओं के मित्र भूम्य-देवता थे, उन्होंने उनसे सुनकर उसी प्रकार विचार किया। भूम्य-देवताओं के मित्र आकाशस्थ देवता थे, आकाशस्थ देवताओं के मित्र चातुर्महाराजिक देवता थे। इसी क्रम से सुदस्सी देवताओं के मित्र अकनिठ्ठ (अकनिष्ठ) देवताओं तक यह बात पहुँची। तब अकनिठ्ठ देवताओं ने भी समूहों में एकत्रित होकर मंगल के विषय में विचार किया। इस प्रकार दस हज़ार चक्रवातों में सर्वत्र मंगल-चिंता उत्पन्न हो गई। "यह मंगल है, वह मंगल है" इस प्रकार विचार करते हुए भी वे किसी निर्णय पर नहीं पहुँच सके और यह स्थिति बारह वर्षों तक बनी रही। आर्य श्रावकों को छोड़कर सभी मनुष्य, देवता और ब्रह्मा 'दृष्ट', 'श्रुत' और 'मुत' के आधार पर तीन समूहों में बँट गए। कोई एक भी यथार्थ रूप से यह निर्णय नहीं कर सका कि "यही मंगल है"। इस प्रकार लोक में 'मंगल-कोलाहल' उत्पन्न हो गया। ကောလာဟလံ နာမ ပဉ္စဝိဓံ ကပ္ပကောလာဟလံ, စက္ကဝတ္တိကောလာဟလံ, ဗုဒ္ဓကောလာဟလံ, မင်္ဂလကောလာဟလံ, မောနေယျကောလာဟလန္တိ. တတ္ထ ကာမာဝစရဒေဝါ မုတ္တသိရာ ဝိကိဏ္ဏကေသာ ရုဒမ္မုခါ အဿူနိ ဟတ္ထေဟိ ပုဉ္ဆမာနာ ရတ္တဝတ္ထနိဝတ္ထာ အတိဝိယ ဝိရူပဝေသဓာရိနော ဟုတွာ ‘‘ဝဿသတသဟဿစ္စယေန ကပ္ပုဋ္ဌာနံ ဟောဟိတိ, အယံ လောကော ဝိနဿိဿတိ, မဟာသမုဒ္ဒေါ သုဿိဿတိ, အယဉ္စ မဟာပထဝီ သိနေရု စ ပဗ္ဗတရာဇာ ဥဍ္ဎယှိဿတိ ဝိနဿိဿတိ, ယာဝ ဗြဟ္မလောကာ လောကဝိနာသော ဘဝိဿတိ, မေတ္တံ မာရိသာ ဘာဝေထ, ကရုဏံ မုဒိတံ ဥပေက္ခံ မာရိသာ ဘာဝေထ, မာတရံ ဥပဋ္ဌဟထ, ပိတရံ ဥပဋ္ဌဟထ, ကုလေ ဇေဋ္ဌာပစာယိနော ဟောထ, ဇာဂရထ မာ ပမာဒတ္ထာ’’တိ မနုဿပထေ ဝိစရိတွာ အာရောစေန္တိ. ဣဒံ ကပ္ပကောလာဟလံ နာမ. कोलाहल पाँच प्रकार के होते हैं— कल्प-कोलाहल, चक्रवर्ती-कोलाहल, बुद्ध-कोलाहल, मंगल-कोलाहल और मोनेय्य-कोलाहल। उनमें से (कल्प-कोलाहल के समय) कामावचर देवता अपने सिर के आभूषण उतारकर, बाल बिखेरकर, रोते हुए मुख के साथ, हाथों से आँसू पोंछते हुए, लाल वस्त्र धारण कर और अत्यंत विकृत रूप बनाकर एक लाख वर्ष पूर्व ही यह घोषणा करते हुए मनुष्यों के बीच घूमते हैं— "हे महानुभावों! एक लाख वर्ष बीतने पर कल्प का अंत होगा, यह लोक नष्ट हो जाएगा, महासमुद्र सूख जाएगा, यह महापृथ्वी और पर्वतों का राजा सुमेरु जलकर नष्ट हो जाएगा, ब्रह्मलोक तक विनाश होगा। हे महानुभावों! आप मैत्री की भावना करें, करुणा, मुदिता और उपेक्षा की भावना करें। माता की सेवा करें, पिता की सेवा करें, कुल के वृद्धों का आदर करें, जागृत रहें और प्रमाद न करें।" इसे 'कल्प-कोलाहल' कहा जाता है। ကာမာဝစရဒေဝါယေဝ ‘‘ဝဿသတဿစ္စယေန စက္ကဝတ္တိရာဇာ လောကေ ဥပ္ပဇ္ဇိဿတီ’’တိ မနုဿပထေ ဝိစရိတွာ အာရောစေန္တိ. ဣဒံ စက္ကဝတ္တိကောလာဟလံ နာမ. သုဒ္ဓါဝါသာ ပန ဒေဝါ ဗြဟ္မာဘရဏေန အလင်္ကရိတွာ ဗြဟ္မဝေဌနံ [Pg.102] သီသေ ကတွာ ပီတိသောမနဿဇာတာ ဗုဒ္ဓဂုဏဝါဒိနော ‘‘ဝဿသဟဿစ္စယေန ဗုဒ္ဓေါ လောကေ ဥပ္ပဇ္ဇိဿတီ’’တိ မနုဿပထေ ဝိစရိတွာ အာရောစေန္တိ. ဣဒံ ဗုဒ္ဓကောလာဟလံ နာမ. သုဒ္ဓါဝါသာ ဧဝ ဒေဝါ ဒေဝမနုဿာနံ စိတ္တံ ဉတွာ ‘‘ဒွါဒသန္နံ ဝဿာနံ အစ္စယေန သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ မင်္ဂလံ ကထေဿတီ’’တိ မနုဿပထေ ဝိစရိတွာ အာရောစေန္တိ. ဣဒံ မင်္ဂလကောလာဟလံ နာမ. သုဒ္ဓါဝါသာ ဧဝ ဒေဝါ ‘‘သတ္တန္နံ ဝဿာနံ အစ္စယေန အညတရော ဘိက္ခု ဘဂဝတာ သဒ္ဓိံ သမာဂမ္မ မောနေယျပ္ပဋိပဒံ ပုစ္ဆိဿတီ’’တိ မနုဿပထေ ဝိစရိတွာ အာရောစေန္တိ. ဣဒံ မောနေယျကောလာဟလံ နာမ. ဣမေသု ပဉ္စသု ကောလာဟလေသု ဒေဝမနုဿာနံ ဣဒံ မင်္ဂလကောလာဟလံ လောကေ ဥပ္ပဇ္ဇိ. कामावचर देव ही "सौ वर्ष बीतने पर संसार में चक्रवर्ती राजा उत्पन्न होगा" ऐसा कहकर मनुष्य-पथ (मनुष्य लोक) में घूमते हुए घोषणा करते हैं। इसे 'चक्रवर्ती कोलाहल' कहा जाता है। शुद्धवास देव, ब्रह्म-आभूषणों से अलंकृत होकर, सिर पर ब्रह्म-मुकुट धारण कर, प्रीति और प्रसन्नता से युक्त होकर बुद्ध के गुणों का गान करते हुए "एक हजार वर्ष बीतने पर संसार में बुद्ध उत्पन्न होंगे" ऐसा कहकर मनुष्य-पथ में घूमते हुए घोषणा करते हैं। इसे 'बुद्ध कोलाहल' कहा जाता है। शुद्धवास देव ही देवों और मनुष्यों के चित्त को जानकर "बारह वर्ष बीतने पर सम्यक्सम्बुद्ध मंगल (उपदेश) कहेंगे" ऐसा कहकर मनुष्य-पथ में घूमते हुए घोषणा करते हैं। इसे 'मंगल कोलाहल' कहा जाता है। शुद्धवास देव ही "सात वर्ष बीतने पर एक भिक्षु भगवान के पास आकर मौनेय-प्रतिपदा (मौन साधना) के बारे में पूछेगा" ऐसा कहकर मनुष्य-पथ में घूमते हुए घोषणा करते हैं। इसे 'मौनेय कोलाहल' कहा जाता है। इन पाँच कोलाहलों में से, देवों और मनुष्यों का यह 'मंगल कोलाहल' संसार में उत्पन्न हुआ। အထ ဒေဝေသု စ မနုဿေသု စ ဝိစိနိတွာ ဝိစိနိတွာ မင်္ဂလာနိ အလဘမာနေသု ဒွါဒသန္နံ ဝဿာနံ အစ္စယေန တာဝတိံသကာယိကာ ဒေဝတာ သင်္ဂမ္မ သမာဂမ္မ ဧဝံ သမစိန္တေသုံ ‘‘သေယျထာပိ နာမ ဃရသာမိကော အန္တောဃရဇနာနံ, ဂါမသာမိကော ဂါမဝါသီနံ, ရာဇာ သဗ္ဗမနုဿာနံ, ဧဝမေဝ အယံ သက္ကော ဒေဝါနမိန္ဒော အမှာကံ အဂ္ဂေါ စ သေဋ္ဌော စ ယဒိဒံ ပုညေန တေဇေန ဣဿရိယေန ပညာယ ဒွိန္နံ ဒေဝလောကာနံ အဓိပတိ, ယံနူန မယံ သက္ကံ ဒေဝါနမိန္ဒံ ဧတမတ္ထံ ပုစ္ဆေယျာမာ’’တိ. တာ သက္ကဿ သန္တိကံ ဂန္တွာ သက္ကံ ဒေဝါနမိန္ဒံ တင်္ခဏာနုရူပနိဝါသနာဘရဏသဿိရိကသရီရံ အဍ္ဎတေယျကောဋိအစ္ဆရာဂဏပရိဝုတံ ပါရိစ္ဆတ္တကမူလေ ပဏ္ဍုကမ္ဗလဝရာသနေ နိသိန္နံ အဘိဝါဒေတွာ ဧကမန္တံ ဌတွာ ဧတဒဝေါစုံ ‘‘ယဂ္ဃေ, မာရိသ, ဇာနေယျာသိ, ဧတရဟိ မင်္ဂလပဉှာ သမုဋ္ဌိတာ, ဧကေ ‘ဒိဋ္ဌံ မင်္ဂလ’န္တိ ဝဒန္တိ, ဧကေ ‘သုတံ မင်္ဂလ’န္တိ, ဧကေ ‘မုတံ မင်္ဂလ’န္တိ, တတ္ထ မယဉ္စ အညေ စ အနိဋ္ဌင်္ဂတာ, သာဓု ဝတ နော တွံ ယာထာဝတော ဗျာကရောဟီ’’တိ. ဒေဝရာဇာ ပကတိယာပိ ပညဝါ ‘‘အယံ မင်္ဂလကထာ ကတ္ထ ပဌမံ သမုဋ္ဌိတာ’’တိ အာဟ. ‘‘မယံ, ဒေဝ, စာတုမဟာရာဇိကာနံ အဿုမှာ’’တိ အာဟံသု. တတော စာတုမဟာရာဇိကာ အာကာသဋ္ဌဒေဝတာနံ, အာကာသဋ္ဌဒေဝတာ ဘုမ္မဒေဝတာနံ, ဘုမ္မဒေဝတာ မနုဿာရက္ခဒေဝတာနံ, မနုဿာရက္ခဒေဝတာ ‘‘မနုဿလောကေ သမုဋ္ဌိတာ’’တိ အာဟံသု. तब देवों और मनुष्यों के बीच (मंगल क्या है) खोजते-खोजते जब मंगल का पता नहीं चला, तो बारह वर्ष बीतने पर तावतिंस लोक के देवताओं ने एकत्रित होकर और मिलकर इस प्रकार विचार किया— "जैसे घर का स्वामी घर के लोगों के लिए, गाँव का स्वामी गाँव वालों के लिए, और राजा सभी मनुष्यों के लिए (हितकारी) होता है, वैसे ही यह देवराज शक्र हमारे अग्र और श्रेष्ठ हैं, जो पुण्य, तेज, ऐश्वर्य और प्रज्ञा में दोनों देवलोकों के अधिपति हैं। क्यों न हम देवराज शक्र से इस विषय में पूछें?" वे शक्र के पास गए और देवराज शक्र को, जो उस समय के अनुरूप वेशभूषा और आभूषणों से सुशोभित शरीर वाले थे, साढ़े पच्चीस करोड़ अप्सराओं से घिरे हुए पारिजात वृक्ष के नीचे पाण्डुकम्बल शिला रूपी श्रेष्ठ आसन पर विराजमान थे, उन्हें अभिवादन कर एक ओर खड़े होकर बोले— "हे मारिष (मित्र)! क्या आप जानते हैं, इस समय 'मंगल प्रश्न' खड़ा हुआ है। कुछ लोग 'दृष्ट मंगल' (देखी गई वस्तु) को मंगल कहते हैं, कुछ 'श्रुत मंगल' (सुनी गई बात) को, और कुछ 'मुत मंगल' (अनुभव की गई वस्तु) को। इस विषय में हम और अन्य सभी अनिश्चय की स्थिति में हैं। अच्छा होगा यदि आप हमें इसका यथार्थ उत्तर दें।" देवराज शक्र, जो स्वभाव से ही प्रज्ञावान थे, बोले— "यह मंगल की चर्चा सबसे पहले कहाँ शुरू हुई?" उन्होंने कहा— "हे देव! हमने चातुमहाराजिक देवों से सुना है।" फिर चातुमहाराजिक देवों ने आकाशस्थ देवताओं से, आकाशस्थ देवताओं ने भूम्य देवताओं से, और भूम्य देवताओं ने मनुष्य-रक्षक देवताओं से सुना, और मनुष्य-रक्षक देवताओं ने कहा कि यह "मनुष्य लोक में उत्पन्न हुई है।" အထ ဒေဝါနမိန္ဒော ‘‘သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ ကတ္ထ ဝသတီ’’တိ ပုစ္ဆိ. ‘‘မနုဿလောကေ ဒေဝါ’’တိ အာဟံသု. တံ ဘဂဝန္တံ ကောစိ ပုစ္ဆီတိ, န ကောစိ ဒေဝါတိ[Pg.103]. ကိန္နု နာမ တုမှေ မာရိသာ အဂ္ဂိံ ဆဍ္ဍေတွာ ခဇ္ဇောပနကံ ဥဇ္ဇာလေထ, ယေန တုမှေ အနဝသေသမင်္ဂလဒေသကံ တံ ဘဂဝန္တံ အတိက္ကမိတွာ မံ ပုစ္ဆိတဗ္ဗံ မညထ, အာဂစ္ဆထ မာရိသာ, တံ ဘဂဝန္တံ ပုစ္ဆာမ, အဒ္ဓါ သဿိရိကံ ပဉှဝေယျာကရဏံ လဘိဿာမာတိ ဧကံ ဒေဝပုတ္တံ အာဏာပေသိ ‘‘တံ ဘဂဝန္တံ ပုစ္ဆာ’’တိ. သော ဒေဝပုတ္တော တင်္ခဏာနုရူပေန အလင်္ကာရေန အတ္တာနံ အလင်္ကရိတွာ ဝိဇ္ဇုရိဝ ဝိဇ္ဇောတမာနော ဒေဝဂဏပရိဝုတော ဇေတဝနမဟာဝိဟာရံ ဂန္တွာ ဘဂဝန္တံ အဘိဝါဒေတွာ ဧကမန္တံ ဌတွာ မင်္ဂလပဉှံ ပုစ္ဆန္တော ဂါထာယ အဇ္ဈဘာသိ ‘‘ဗဟူ ဒေဝါ မနုဿာ စာ’’တိ. तब देवराज शक्र ने पूछा— "सम्यक्सम्बुद्ध कहाँ निवास करते हैं?" उन्होंने कहा— "हे देव! मनुष्य लोक में।" जब यह कहा गया, तब शक्र ने पूछा— "क्या किसी ने भगवान से पूछा है?" उन्होंने कहा— "हे देव! किसी ने नहीं पूछा।" तब शक्र ने कहा— "हे मारिष! तुम लोग आग को छोड़कर जुगनू क्यों जला रहे हो? तुम उस भगवान को छोड़कर, जो पूर्ण मंगल के उपदेशक हैं, मुझसे पूछना उचित समझते हो? आओ मारिष! हम भगवान से ही पूछते हैं, निश्चय ही हमें गौरवपूर्ण प्रश्न का उत्तर प्राप्त होगा।" ऐसा कहकर उन्होंने एक देवपुत्र को आज्ञा दी— "तुम भगवान से पूछो।" उस देवपुत्र ने उस समय के योग्य आभूषणों से स्वयं को अलंकृत किया और बिजली की तरह चमकते हुए, देव-समूह से घिरे हुए जेतवन महाविहार जाकर भगवान को अभिवादन किया और एक ओर खड़े होकर मंगल-प्रश्न पूछते हुए गाथा में कहा— "बहू देवा मनुस्सा च..." (बहुत से देव और मनुष्य...)। ဣဒံ မင်္ဂလပဉှသမုဋ္ဌာနံ. यह मंगल-प्रश्न की उत्पत्ति (पृष्ठभूमि) है। ဗဟူဒေဝါတိဂါထာဝဏ္ဏနာ 'बहू देवा' इत्यादि गाथा की व्याख्या। ၂. ဣဒါနိ ဂါထာပဒါနံ အတ္ထဝဏ္ဏနာ ဟောတိ. ဗဟူတိ အနိယမိတသင်္ချာနိဒ္ဒေသော, တေန အနေကသတာ အနေကသဟဿာ အနေကသတသဟဿာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဒိဗ္ဗန္တီတိ ဒေဝါ, ပဉ္စဟိ ကာမဂုဏေဟိ ကီဠန္တိ, အတ္တနော ဝါ သိရိယာ ဇောတေန္တီတိ အတ္ထော. အပိစ ဒေဝါတိ တိဝိဓာ ဒေဝါ သမ္မုတိဥပပတ္တိဝိသုဒ္ဓိဝသေန. ယထာဟ – २. अब गाथा के पदों की अर्थ-व्याख्या की जाती है। 'बहू' यह अनिश्चित संख्या का निर्देश है, इससे 'अनेक सौ', 'अनेक हजार', 'अनेक लाख'—यह कहा गया है। जो दीप्तिमान होते हैं, वे 'देवा' हैं; वे पाँच कामगुणों से क्रीड़ा करते हैं या अपनी शोभा से प्रकाशित होते हैं—यह अर्थ है। इसके अतिरिक्त, 'देव' तीन प्रकार के होते हैं— सम्मति-देव, उपपत्ति-देव और विशुद्धि-देव। जैसा कि कहा गया है— ‘‘ဒေဝါတိ တယော ဒေဝါ – သမ္မုတိဒေဝါ, ဥပပတ္တိဒေဝါ, ဝိသုဒ္ဓိဒေဝါ. တတ္ထ သမ္မုတိဒေဝါ နာမ ရာဇာနော ဒေဝိယော ရာဇကုမာရာ. ဥပပတ္တိဒေဝါ နာမ စာတုမဟာရာဇိကေ ဒေဝေ ဥပါဒါယ တဒုတ္တရိဒေဝါ. ဝိသုဒ္ဓိဒေဝါ နာမ အရဟန္တော ဝုစ္စန္တီ’’တိ (စူဠနိ. ဓောတကမာဏဝပုစ္ဆာနိဒ္ဒေသ ၃၂, ပါရာယနာနုဂီတိဂါထာနိဒ္ဒေသ ၁၁၉). "देव तीन प्रकार के हैं— सम्मति-देव, उपपत्ति-देव और विशुद्धि-देव। वहाँ सम्मति-देव का अर्थ राजा, रानियाँ और राजकुमार हैं। उपपत्ति-देव का अर्थ चातुमहाराजिक देवों से लेकर उनके ऊपर के देव हैं। विशुद्धि-देव अरहंतों को कहा जाता है।" တေသု ဣဓ ဥပပတ္တိဒေဝါ အဓိပ္ပေတာ. မနုနော အပစ္စာတိ မနုဿာ. ပေါရာဏာ ပန ဘဏန္တိ – မနသော ဥဿန္နတာယ မနုဿာ. တေ ဇမ္ဗုဒီပကာ, အပရဂေါယာနကာ, ဥတ္တရကုရုကာ, ပုဗ္ဗဝိဒေဟကာတိ စတုဗ္ဗိဓာ, ဣဓ ဇမ္ဗုဒီပကာ အဓိပ္ပေတာ. မင်္ဂလန္တိ မဟန္တိ ဣမေဟိ သတ္တာတိ မင်္ဂလာနိ, ဣဒ္ဓိံ ဝုဒ္ဓိဉ္စ ပါပုဏန္တီတိ အတ္ထော. အစိန္တယုန္တိ စိန္တေသုံ အာကင်္ခမာနာတိ ဣစ္ဆမာနာ ပတ္ထယမာနာ ပိဟယမာနာ. သောတ္ထာနန္တိ သောတ္ထိဘာဝံ, သဗ္ဗေသံ ဒိဋ္ဌဓမ္မိကသမ္ပရာယိကာနံ သောဘနာနံ သုန္ဒရာနံ ကလျာဏာနံ ဓမ္မာနမတ္ထိတန္တိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဗြူဟီတိ ဒေသေဟိ ပကာသေဟိ, အာစိက္ခ ဝိဝရ [Pg.104] ဝိဘဇ ဥတ္တာနီကရောဟိ. မင်္ဂလန္တိ ဣဒ္ဓိကာရဏံ ဝုဒ္ဓိကာရဏံ သဗ္ဗသမ္ပတ္တိကာရဏံ. ဥတ္တမန္တိ ဝိသိဋ္ဌံ ပဝရံ သဗ္ဗလောကဟိတသုခါဝဟန္တိ အယံ ဂါထာယ အနုပုဗ္ဗပဒဝဏ္ဏနာ. इनमें से यहाँ 'उपपत्ति-देव' अभिप्रेत हैं। 'मनु' की संतान होने के कारण 'मनुस्सा' (मनुष्य) कहलाते हैं। प्राचीन आचार्य कहते हैं— मन की उच्चता (प्रधानता) के कारण 'मनुष्य' कहलाते हैं। वे चार प्रकार के हैं— जम्बुद्वीपवासी, अपरगोयानवासी, उत्तरकुरुवासी और पूर्वविदेहवासी; यहाँ 'जम्बुद्वीपवासी' अभिप्रेत हैं। 'मंगल' का अर्थ है— जिनसे प्राणी महानता को प्राप्त होते हैं, अर्थात् वे ऋद्धि और वृद्धि को प्राप्त करते हैं। 'अचिन्तयुं' का अर्थ है— विचार किया। 'आकङ्खमाना' का अर्थ है— इच्छा करते हुए, प्रार्थना करते हुए, चाहत रखते हुए। 'सोत्थानं' का अर्थ है— स्वस्ति-भाव (कल्याण), अर्थात् सभी दृष्टधार्मिक (इस लोक के) और साम्परायिक (परलोक के) शोभन, सुन्दर और कल्याणकारी धर्मों का अस्तित्व। 'ब्रूहि' का अर्थ है— उपदेश दें, प्रकाशित करें, कहें, खोलें, विभाजन करें, स्पष्ट करें। 'मंगलं' का अर्थ है— ऋद्धि का कारण, वृद्धि का कारण, समस्त संपत्तियों का कारण। 'उत्तमं' का अर्थ है— विशिष्ट, प्रवर (श्रेष्ठ), समस्त लोक के हित और सुख को लाने वाला। यह गाथा के पदों की क्रमिक व्याख्या है। အယံ ပန ပိဏ္ဍတ္ထော – သော ဒေဝပုတ္တော ဒသသဟဿစက္ကဝါဠေသု ဒေဝတာ မင်္ဂလပဉှံ သောတုကာမတာယ ဣမသ္မိံ စက္ကဝါဠေ သန္နိပတိတွာ ဧကဝါလဂ္ဂကောဋိဩကာသမတ္တေ ဒသပိ ဝီသမ္ပိ တိံသမ္ပိ စတ္တာလီသမ္ပိ ပညာသမ္ပိ သဋ္ဌိပိ သတ္တတိပိ အသီတိပိ သုခုမတ္တဘာဝေ နိမ္မိနိတွာ သဗ္ဗဒေဝမာရဗြဟ္မာနော သိရိယာ စ တေဇသာ စ အဓိဂ္ဂယှ ဝိရောစမာနံ ပညတ္တဝရဗုဒ္ဓါသနေ နိသိန္နံ ဘဂဝန္တံ ပရိဝါရေတွာ ဌိတာ ဒိသွာ တသ္မိဉ္စ သမယေ အနာဂတာနမ္ပိ သကလဇမ္ဗုဒီပကာနံ မနုဿာနံ စေတသာ စေတောပရိဝိတက္ကမညာယ သဗ္ဗဒေဝမနုဿာနံ ဝိစိကိစ္ဆာသလ္လသမုဒ္ဓရဏတ္ထံ အာဟ – यह संक्षिप्त अर्थ है - वह देवपुत्र, दस हजार चक्रवालो के देवताओं द्वारा मंगल-प्रश्न सुनने की इच्छा से इस चक्रवाल में एकत्रित होकर, एक बाल के अग्रभाग जितनी सूक्ष्म जगह में दस, बीस, तीस, चालीस, पचास, साठ, सत्तर या अस्सी की संख्या में अपने सूक्ष्म शरीरों को निर्मित कर, सभी देवों, मारों और ब्रह्माओं को अपनी श्री और तेज से अभिभूत कर देदीप्यमान, बिछाए गए श्रेष्ठ बुद्ध-आसन पर विराजमान भगवान को घेरकर खड़े हुए देखकर, और उस समय न आ सके संपूर्ण जम्बूद्वीप के मनुष्यों के मन के विचारों को जानकर, सभी देवों और मनुष्यों के संशय रूपी शल्य (काँटे) को निकालने के लिए बोला - ‘‘ဗဟူ ဒေဝါ မနုဿာ စ, မင်္ဂလာနိ အစိန္တယုံ; အာကင်္ခမာနာ သောတ္ထာနံ, ဗြူဟိ မင်္ဂလမုတ္တမ’’န္တိ. "बहुत से देवों और मनुष्यों ने अपने कल्याण की आकांक्षा करते हुए मंगलों के बारे में सोचा है; आप उत्तम मंगल का उपदेश दें।" တာသံ ဒေဝတာနံ အနုမတိယာ မနုဿာနဉ္စ အနုဂ္ဂဟေန မယာ ပုဋ္ဌော သမာနော ယံ သဗ္ဗေသမေဝ အမှာကံ ဧကန္တဟိတသုခါဝဟတော ဥတ္တမံ မင်္ဂလံ, တံ နော အနုကမ္ပံ ဥပါဒါယ ဗြူဟိ ဘဂဝါတိ. उन देवताओं की अनुमति से और मनुष्यों पर अनुग्रह करने के लिए मेरे द्वारा पूछे जाने पर, जो हम सभी के लिए एकांततः हित और सुख लाने वाला उत्तम मंगल है, हे भगवान! हम पर अनुकम्पा करते हुए उसे कहें। အသေဝနာစာတိဂါထာဝဏ္ဏနာ 'असेवना च' इत्यादि गाथा की व्याख्या। ၃. ဧဝမေတံ ဒေဝပုတ္တဿ ဝစနံ သုတွာ ဘဂဝါ ‘‘အသေဝနာ စ ဗာလာန’’န္တိ ဂါထမာဟ. တတ္ထ အသေဝနာတိ အဘဇနာ အပယိရုပါသနာ. ဗာလာနန္တိ ဗလန္တိ အဿသန္တီတိ ဗာလာ, အဿသိတပဿသိတမတ္တေန ဇီဝန္တိ, န ပညာဇီဝိတေနာတိ အဓိပ္ပာယော. တေသံ ဗာလာနံ. ပဏ္ဍိတာနန္တိ ပဏ္ဍန္တီတိ ပဏ္ဍိတာ, သန္ဒိဋ္ဌိကသမ္ပရာယိကေသု အတ္ထေသု ဉာဏဂတိယာ ဂစ္ဆန္တီတိ အဓိပ္ပာယော. တေသံ ပဏ္ဍိတာနံ. သေဝနာတိ ဘဇနာ ပယိရုပါသနာ တံသဟာယတာ တံသမ္ပဝင်္ကတာ တံသမင်္ဂိတာ ပူဇာတိ သက္ကာရဂရုကာရမာနနဝန္ဒနာ. ပူဇနေယျာနန္တိ ပူဇာရဟာနံ. ဧတံ မင်္ဂလမုတ္တမန္တိ ယာ စ ဗာလာနံ အသေဝနာ, ယာ စ ပဏ္ဍိတာနံ သေဝနာ, ယာ စ ပူဇနေယျာနံ ပူဇာ, တံ သဗ္ဗံ သမ္ပိဏ္ဍေတွာ အာဟ ‘‘ဧတံ မင်္ဂလမုတ္တမ’’န္တိ. ယံ တယာ ပုဋ္ဌံ ‘‘ဗြူဟိ မင်္ဂလမုတ္တမ’’န္တိ, ဧတ္ထ တာဝ ဧတံ မင်္ဂလမုတ္တမန္တိ ဂဏှာဟီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. အယမေတိဿာ ဂါထာယ ပဒဝဏ္ဏနာ. ३. इस प्रकार देवपुत्र के वचनों को सुनकर भगवान ने "असेवना च बालानं" यह गाथा कही। वहाँ 'असेवना' का अर्थ है - संगति न करना, सेवा न करना। 'बालानं' का अर्थ है - जो केवल श्वास लेते हैं वे 'बाल' हैं; वे केवल श्वास-प्रश्वास मात्र से जीवित रहते हैं, प्रज्ञा के जीवन से नहीं - यह अभिप्राय है। उन मूर्खों की। 'पण्डितानं' का अर्थ है - जो जानते हैं वे 'पण्डित' हैं; जो दृष्ट (इहलोक) और साम्परायिक (परलोक) अर्थों में ज्ञान की गति से चलते हैं - यह अभिप्राय है। उन पण्डितों की। 'सेवना' का अर्थ है - संगति करना, सेवा करना, उनकी मित्रता, उनका साथ, उनकी संगति। 'पूजा' का अर्थ है - सत्कार, आदर, सम्मान और वन्दना। 'पूजनेय्यानं' का अर्थ है - पूजा के योग्य व्यक्तियों की। 'एतं मङ्गलमुत्तमं' का अर्थ है - जो मूर्खों की असेवना है, जो पण्डितों की सेवना है, और जो पूजनीय व्यक्तियों की पूजा है, उन सबको मिलाकर कहा - "यह उत्तम मंगल है।" जो तुम्हारे द्वारा पूछा गया था कि "उत्तम मंगल कहें", उसके उत्तर में यहाँ "इसे उत्तम मंगल समझो" ऐसा कहा गया है। यह इस गाथा की पद-व्याख्या है। အတ္ထဝဏ္ဏနာ [Pg.105] ပနဿာ ဧဝံ ဝေဒိတဗ္ဗာ – ဧဝမေတံ ဒေဝပုတ္တဿ ဝစနံ သုတွာ ဘဂဝါ ‘‘အသေဝနာ စ ဗာလာန’’န္တိ ဣမံ ဂါထမာဟ. တတ္ထ ယသ္မာ စတုဗ္ဗိဓာ ဂါထာ ပုစ္ဆိတဂါထာ, အပုစ္ဆိတဂါထာ, သာနုသန္ဓိကဂါထာ, အနနုသန္ဓိကဂါထာတိ. တတ္ထ ‘‘ပုစ္ဆာမိ တံ, ဂေါတမ, ဘူရိပည, ကထင်္ကရော သာဝကော သာဓု ဟောတီ’’တိ (သု. နိ. ၃၇၈) စ ‘‘ကထံ နု တွံ, မာရိသ, ဩဃမတရီ’’တိ (သံ. နိ. ၁.၁) စ ဧဝမာဒီသု ပုစ္ဆိတေန ကထိတာ ပုစ္ဆိတဂါထာ. ‘‘ယံ ပရေ သုခတော အာဟု, တဒရိယာ အာဟု ဒုက္ခတော’’တိ ဧဝမာဒီသု (သု. နိ. ၇၆၇) အပုစ္ဆိတေန အတ္တဇ္ဈာသယဝသေန ကထိတာ အပုစ္ဆိတဂါထာ. သဗ္ဗာပိ ဗုဒ္ဓါနံ ဂါထာ ‘‘သနိဒါနာဟံ, ဘိက္ခဝေ, ဓမ္မံ ဒေသေဿာမီ’’တိ (အ. နိ. ၃.၁၂၆; ကထာ. ၈၀၆) ဝစနတော သာနုသန္ဓိကဂါထာ. အနနုသန္ဓိကဂါထာ ဣမသ္မိံ သာသနေ နတ္ထိ. ဧဝမေတာသု ဂါထာသု အယံ ဒေဝပုတ္တေန ပုစ္ဆိတေန ဘဂဝတာ ကထိတတ္တာ ပုစ္ဆိတဂါထာ. အယဉ္စ ယထာ ဆေကော ပုရိသော ကုသလော မဂ္ဂဿ ကုသလော အမဂ္ဂဿ မဂ္ဂံ ပုဋ္ဌော ပဌမံ ဝိဇဟိတဗ္ဗံ အာစိက္ခိတွာ ပစ္ဆာ ဂဟေတဗ္ဗံ အာစိက္ခတိ ‘‘အသုကသ္မိံ နာမ ဌာနေ ဒွေဓာပထော ဟောတိ, တတ္ထ ဝါမံ မုဉ္စိတွာ ဒက္ခိဏံ ဂဏှထာ’’တိ, ဧဝံ သေဝိတဗ္ဗာသေဝိတဗ္ဗေသု အသေဝိတဗ္ဗံ အာစိက္ခိတွာ သေဝိတဗ္ဗံ အာစိက္ခတိ. ဘဂဝါ စ မဂ္ဂကုသလပုရိသသဒိသော. ယထာဟ – इसकी अर्थ-व्याख्या इस प्रकार जाननी चाहिए - इस प्रकार देवपुत्र के वचनों को सुनकर भगवान ने "असेवना च बालानं" यह गाथा कही। वहाँ क्योंकि गाथा चार प्रकार की होती है - पृच्छित गाथा, अपृच्छित गाथा, सानुसन्धिक गाथा और अननुसन्धिक गाथा। वहाँ "हे प्रचुर प्रज्ञा वाले गौतम! मैं आपसे पूछता हूँ, कैसा आचरण करने वाला श्रावक साधु होता है?" और "हे मारिष! आपने ओघ को कैसे पार किया?" इत्यादि में पूछने पर कही गई गाथा 'पृच्छित गाथा' है। "जिसे दूसरे सुख कहते हैं, उसे आर्य दुख कहते हैं" इत्यादि में बिना पूछे अपने आशय के वश से कही गई गाथा 'अपृच्छित गाथा' है। बुद्धों की सभी गाथाएँ "हे भिक्षुओं! मैं निदान सहित धर्म का उपदेश दूँगा" इस वचन के कारण 'सानुसन्धिक गाथा' हैं। इस शासन में 'अननुसन्धिक गाथा' नहीं है। इस प्रकार इन गाथाओं में यह गाथा देवपुत्र द्वारा पूछे जाने पर भगवान द्वारा कही जाने के कारण 'पृच्छित गाथा' है। और जैसे कोई चतुर पुरुष जो मार्ग का कुशल हो और कुमार्ग का भी जानकार हो, मार्ग पूछे जाने पर पहले त्यागने योग्य मार्ग को बताकर बाद में ग्रहण करने योग्य मार्ग को बताता है कि "अमुक स्थान पर दो रास्ते हैं, वहाँ बाएँ को छोड़कर दायाँ पकड़ो", वैसे ही सेवन करने योग्य और न करने योग्य के विषय में, न सेवन करने योग्य को बताकर सेवन करने योग्य को बताते हैं। और भगवान मार्ग-कुशल पुरुष के समान हैं। जैसा कि कहा गया है - ‘‘ပုရိသော မဂ္ဂကုသလောတိ ခေါ, တိဿ, တထာဂတဿေတံ အဓိဝစနံ အရဟတော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ. သော ဟိ ကုသလော ဣမဿ လောကဿ, ကုသလော ပရဿ လောကဿ, ကုသလော မစ္စုဓေယျဿ, ကုသလော အမစ္စုဓေယျဿ, ကုသလော မာရဓေယျဿ, ကုသလော အမာရဓေယျဿာ’’တိ. "हे तिस्स! 'मार्ग-कुशल पुरुष' यह अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध तथागत का ही नाम है। वे इस लोक के कुशल हैं, परलोक के कुशल हैं, मृत्यु के क्षेत्र के कुशल हैं, अमृत के क्षेत्र के कुशल हैं, मार के क्षेत्र के कुशल हैं और मार-रहित क्षेत्र के कुशल हैं।" တသ္မာ ပဌမံ အသေဝိတဗ္ဗံ အာစိက္ခန္တော အာဟ – ‘‘အသေဝနာ စ ဗာလာနံ, ပဏ္ဍိတာနဉ္စ သေဝနာ’’တိ. ဝိဇဟိတဗ္ဗမဂ္ဂေါ ဝိယ ဟိ ပဌမံ ဗာလာ န သေဝိတဗ္ဗာ န ပယိရုပါသိတဗ္ဗာ, တတော ဂဟေတဗ္ဗမဂ္ဂေါ ဝိယ ပဏ္ဍိတာ သေဝိတဗ္ဗာ ပယိရုပါသိတဗ္ဗာတိ. ကသ္မာ ပန ဘဂဝတာ မင်္ဂလံ ကထေန္တေန ပဌမံ ဗာလာနမသေဝနာ ပဏ္ဍိတာနဉ္စ သေဝနာ ကထိတာတိ? ဝုစ္စတေ – ယသ္မာ ဣမံ ဒိဋ္ဌာဒီသု မင်္ဂလဒိဋ္ဌိံ ဗာလသေဝနာယ ဒေဝမနုဿာ ဂဏှိံသု, သာ စ အမင်္ဂလံ, တသ္မာ တေသံ တံ ဣဓလောကပရလောကတ္ထဘဉ္ဇကံ အကလျာဏမိတ္တသံသဂ္ဂံ ဂရဟန္တေန ဥဘယလောကတ္ထသာဓကဉ္စ ကလျာဏမိတ္တသံသဂ္ဂံ [Pg.106] ပသံသန္တေန ဘဂဝတာ ပဌမံ ဗာလာနမသေဝနာ ပဏ္ဍိတာနဉ္စ သေဝနာ ကထိတာတိ. इसलिए पहले न सेवन करने योग्य को बताते हुए कहा - "मूर्खों की असेवना और पण्डितों की सेवना।" क्योंकि त्यागने योग्य मार्ग की तरह पहले मूर्खों की सेवा नहीं करनी चाहिए, उनकी संगति नहीं करनी चाहिए; उसके बाद ग्रहण करने योग्य मार्ग की तरह पण्डितों की सेवा और संगति करनी चाहिए। लेकिन भगवान ने मंगल का उपदेश देते समय पहले मूर्खों की असेवना और पण्डितों की सेवना क्यों कही? उत्तर दिया जाता है - क्योंकि रूप आदि को देखने में मंगल मानने वाली इस 'मंगल-दृष्टि' को देवों और मनुष्यों ने मूर्खों की संगति के कारण ग्रहण किया था, और वह अमंगल है; इसलिए उनके उस इहलोक और परलोक के अर्थ का विनाश करने वाले अकलयाण-मित्र संसर्ग की निंदा करते हुए और दोनों लोकों के अर्थ को सिद्ध करने वाले कल्याण-मित्र संसर्ग की प्रशंसा करते हुए भगवान ने पहले मूर्खों की असेवना और पण्डितों की सेवना कही। တတ္ထ ဗာလာ နာမ ယေ ကေစိ ပါဏာတိပါတာဒိအကုသလကမ္မပထသမန္နာဂတာ သတ္တာ, တေ တီဟာကာရေဟိ ဇာနိတဗ္ဗာ. ယထာဟ ‘‘တီဏိမာနိ, ဘိက္ခဝေ, ဗာလဿ ဗာလလက္ခဏာနီ’’တိ သုတ္တံ (အ. နိ. ၃.၃; မ. နိ. ၃.၂၄၆). အပိစ ပူရဏကဿပါဒယော ဆ သတ္ထာရော, ဒေဝဒတ္တကောကာလိကကဋမောဒကတိဿခဏ္ဍဒေဝိယာပုတ္တသမုဒ္ဒဒတ္တစိဉ္စမာဏဝိကာဒယော အတီတကာလေ စ ဒီဃဝိဒဿ ဘာတာတိ ဣမေ အညေ စ ဧဝရူပါ သတ္တာ ဗာလာတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. वहाँ 'मूर्ख' वे हैं जो प्राणातिपात आदि अकुशल कर्मपथों से युक्त प्राणी हैं, उन्हें तीन लक्षणों से जानना चाहिए। जैसा कि कहा गया है - "हे भिक्षुओं! मूर्ख के ये तीन मूर्ख-लक्षण हैं" (सुत्त)। इसके अतिरिक्त, पूर्णकस्सप आदि छह शास्ता, देवदत्त, कोकालिक, कटमोदक-तिस्स, खण्डदेवी का पुत्र, समुद्रदत्त, चिञ्चामाणविका आदि और अतीत काल में दीर्घविदु का भाई - ये और इस प्रकार के अन्य प्राणी 'मूर्ख' समझने चाहिए। တေ အဂ္ဂိပဒိတ္တမိဝ အဂါရံ အတ္တနာ ဒုဂ္ဂဟိတေန အတ္တာနဉ္စေဝ အတ္တနော ဝစနကာရကေ စ ဝိနာသေန္တိ. ယထာ ဒီဃဝိဒဿ ဘာတာ စတုဗုဒ္ဓန္တရံ သဋ္ဌိယောဇနမတ္တေန အတ္တဘာဝေန ဥတ္တာနော ပတိတော မဟာနိရယေ ပစ္စတိ, ယထာ စ တဿ ဒိဋ္ဌိံ အဘိရုစနကာနိ ပဉ္စ ကုလသတာနိ တဿေဝ သဟဗျတံ ဥပပန္နာနိ မဟာနိရယေ ပစ္စန္တိ. ဝုတ္တဉ္စေတံ ဘဂဝတာ – वे (देवदत्त आदि), जलते हुए घर की तरह, अपनी गलत धारणा (मिथ्या दृष्टि) के कारण स्वयं को और अपने वचनों का पालन करने वालों को नष्ट कर देते हैं। जैसे दीघविदु का भाई चार बुद्धों के अंतराल तक साठ योजन के शरीर के साथ महानिरय (नरक) में पीठ के बल गिरकर पकता रहा, और जैसे उसकी दृष्टि में रुचि रखने वाले पाँच सौ कुल भी उसी के साथ महानिरय में पके। भगवान ने यह कहा है - ‘‘သေယျထာပိ, ဘိက္ခဝေ, နဠာဂါရာ ဝါ တိဏာဂါရာ ဝါ အဂ္ဂိ မုတ္တော ကူဋာဂါရာနိပိ ဍဟတိ ဥလ္လိတ္တာဝလိတ္တာနိ နိဝါတာနိ ဖုသိတဂ္ဂဠာနိ ပိဟိတဝါတပါနာနိ, ဧဝမေဝ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, ယာနိ ကာနိစိ ဘယာနိ ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ, သဗ္ဗာနိ တာနိ ဗာလတော ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ, နော ပဏ္ဍိတတော. ယေ ကေစိ ဥပဒ္ဒဝါ ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ…ပေ… ယေ ကေစိ ဥပသဂ္ဂါ…ပေ… နော ပဏ္ဍိတတော. ဣတိ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, သပ္ပဋိဘယော ဗာလော, အပ္ပဋိဘယော ပဏ္ဍိတော. သဥပဒ္ဒဝေါ ဗာလော, အနုပဒ္ဒဝေါ ပဏ္ဍိတော, သဥပသဂ္ဂေါ ဗာလော, အနုပသဂ္ဂေါ ပဏ္ဍိတော’’တိ (အ. နိ. ၃.၁). “भिक्षुओं! जैसे सरकंडे के घर या घास के घर से उठी हुई आग उन कूटागारों (महलों) को भी जला देती है जो भीतर-बाहर से लिपे-पुते हों, जहाँ हवा न पहुँचती हो, जिनकी अर्गलाएँ (कुंडी) अच्छी तरह लगी हों और खिड़कियाँ बंद हों; इसी प्रकार, भिक्षुओं! जो भी भय उत्पन्न होते हैं, वे सब मूर्ख (बाल) के कारण उत्पन्न होते हैं, बुद्धिमान (पंडित) के कारण नहीं। जो भी उपद्रव उत्पन्न होते हैं... जो भी उपसर्ग उत्पन्न होते हैं... वे बुद्धिमान के कारण नहीं होते। इस प्रकार, भिक्षुओं! मूर्ख भययुक्त होता है, बुद्धिमान भयरहित। मूर्ख उपद्रवयुक्त होता है, बुद्धिमान उपद्रवरहित। मूर्ख उपसर्गयुक्त होता है, बुद्धिमान उपसर्गरहित।” အပိစ ပူတိမစ္ဆသဒိသော ဗာလော, ပူတိမစ္ဆဗန္ဓပတ္တပုဋသဒိသော ဟောတိ တဒုပသေဝီ, ဆဍ္ဍနီယတံ ဇိဂုစ္ဆနီယတဉ္စ ပါပုဏာတိ ဝိညူနံ. ဝုတ္တဉ္စေတံ – इसके अतिरिक्त, मूर्ख सड़ी हुई मछली के समान है, और उसका सेवन करने वाला (साथी) सड़ी मछली लपेटने वाले पत्ते के दोने के समान होता है; वह बुद्धिमानों के बीच त्यागने योग्य और घृणा के योग्य हो जाता है। यह कहा गया है - ‘‘ပူတိမစ္ဆံ ကုသဂ္ဂေန, ယော နရော ဥပနယှတိ; ကုသာပိ ပူတီ ဝါယန္တိ, ဧဝံ ဗာလူပသေဝနာ’’တိ. (ဇာ. ၁.၁၅.၁၈၃; ၂.၂၂.၁၂၅၇); “जो मनुष्य सड़ी हुई मछली को कुशा घास के अग्रभाग से बाँधता है, वे कुशा भी सड़न की दुर्गंध देने लगते हैं; मूर्खों की संगति ऐसी ही होती है।” အကိတ္တိပဏ္ဍိတော စာပိ သက္ကေန ဒေဝါနမိန္ဒေန ဝရေ ဒိယျမာနေ ဧဝမာဟ – अकित्ति पंडित ने भी, जब देवराज शक्र वरदान दे रहे थे, तब इस प्रकार कहा - ‘‘ဗာလံ [Pg.107] န ပဿေ န သုဏေ, န စ ဗာလေန သံဝသေ; ဗာလေနလ္လာပသလ္လာပံ, န ကရေ န စ ရောစယေ. “मैं मूर्ख को न देखूँ, न सुनूँ, न मूर्ख के साथ रहूँ; मूर्ख के साथ बातचीत न करूँ और न ही उसमें रुचि रखूँ।” ‘‘ကိန္နု တေ အကရံ ဗာလော, ဝဒ ကဿပ ကာရဏံ; ကေန ကဿပ ဗာလဿ, ဒဿနံ နာဘိကင်္ခသိ. “हे काश्यप! मूर्ख ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? कारण बताओ; तुम मूर्ख के दर्शन की इच्छा क्यों नहीं करते?” ‘‘အနယံ နယတိ ဒုမ္မေဓော, အဓုရာယံ နိယုဉ္ဇတိ; ဒုန္နယော သေယျသော ဟောတိ, သမ္မာ ဝုတ္တော ပကုပ္ပတိ; ဝိနယံ သော န ဇာနာတိ, သာဓု တဿ အဒဿန’’န္တိ. (ဇာ. ၁.၁၃.၉၀-၉၂); “दुर्बुद्धि (मूर्ख) अनर्थ की ओर ले जाता है, अकर्तव्य में नियुक्त करता है; उसका मार्गदर्शन बुरा होता है, सही बात कहने पर भी वह क्रोधित हो जाता है; वह अनुशासन (विनय) को नहीं जानता, इसलिए उसका न दिखना ही अच्छा है।” ဧဝံ ဘဂဝါ သဗ္ဗာကာရေန ဗာလူပသေဝနံ ဂရဟန္တော ‘‘ဗာလာနမသေဝနာ မင်္ဂလ’’န္တိ ဝတွာ ဣဒါနိ ပဏ္ဍိတသေဝနံ ပသံသန္တော ‘‘ပဏ္ဍိတာနဉ္စ သေဝနာ မင်္ဂလ’’န္တိ အာဟ. တတ္ထ ပဏ္ဍိတာ နာမ ယေ ကေစိ ပါဏာတိပါတာဝေရမဏိအာဒိဒသကုသလကမ္မပထသမန္နာဂတာ သတ္တာ, တေ တီဟာကာရေဟိ ဇာနိတဗ္ဗာ. ယထာဟ ‘‘တီဏိမာနိ, ဘိက္ခဝေ, ပဏ္ဍိတဿ ပဏ္ဍိတလက္ခဏာနီ’’တိ (အ. နိ. ၃.၃; မ. နိ. ၃.၂၅၃) သုတ္တံ. အပိစ ဗုဒ္ဓပစ္စေကဗုဒ္ဓအသီတိမဟာသာဝကာ အညေ စ တထာဂတဿ သာဝကာ သုနေတ္တမဟာဂေါဝိန္ဒဝိဓုရသရဘင်္ဂမဟောသဓသုတသောမနိမိရာဇ- အယောဃရကုမာရအကိတ္တိပဏ္ဍိတာဒယော စ ပဏ္ဍိတာတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. इस प्रकार भगवान ने सब प्रकार से मूर्खों की संगति की निंदा करते हुए “मूर्खों की संगति न करना मंगल है” ऐसा कहा, और अब बुद्धिमानों की संगति की प्रशंसा करते हुए “पंडितों की संगति मंगल है” ऐसा कहा। वहाँ ‘पंडित’ वे प्राणी हैं जो प्राणातिपात (हिंसा) से विरति आदि दस कुशल कर्मपथों से युक्त हैं; उन्हें तीन लक्षणों से जानना चाहिए। जैसा कि “भिक्षुओं! पंडित के ये तीन पंडित-लक्षण हैं” इस सूत्र में कहा गया है। इसके अतिरिक्त, बुद्ध, प्रत्येकबुद्ध, अस्सी महाश्रावक और तथागत के अन्य श्रावक, तथा सुनेत्त, महागोविंद, विधुर, सरभंग, महौषध, सुतसोम, निमिराज, अयोगघर कुमार, अकित्ति पंडित आदि को ‘पंडित’ समझना चाहिए। တေ ဘယေ ဝိယ ရက္ခာ အန္ဓကာရေ ဝိယ ပဒီပေါ ခုပ္ပိပါသာဒိဒုက္ခာဘိဘဝေ ဝိယ အန္နပါနာဒိပ္ပဋိလာဘော အတ္တနော ဝစနကရာနံ သဗ္ဗဘယုပဒ္ဒဝူပသဂ္ဂဝိဒ္ဓံသနသမတ္ထာ ဟောန္တိ. တထာ ဟိ တထာဂတံ အာဂမ္မ အသင်္ချေယျာ အပရိမာဏာ ဒေဝမနုဿာ အာသဝက္ခယံ ပတ္တာ, ဗြဟ္မလောကေ ပတိဋ္ဌိတာ, ဒေဝလောကေ ပတိဋ္ဌိတာ, သုဂတိလောကေ ဥပ္ပန္နာ, သာရိပုတ္တတ္ထေရေ စိတ္တံ ပသာဒေတွာ စတူဟိ စ ပစ္စယေဟိ ထေရံ ဥပဋ္ဌဟိတွာ အသီတိ ကုလသဟဿာနိ သဂ္ဂေ နိဗ္ဗတ္တာနိ. တထာ မဟာမောဂ္ဂလ္လာနမဟာကဿပပ္ပဘုတီသု သဗ္ဗမဟာသာဝကေသု, သုနေတ္တဿ သတ္ထုနော သာဝကာ အပ္ပေကစ္စေ ဗြဟ္မလောကေ ဥပ္ပဇ္ဇိံသု, အပ္ပေကစ္စေ ပရနိမ္မိတဝသဝတ္တီနံ ဒေဝါနံ သဟဗျတံ…ပေ… အပ္ပေကစ္စေ ဂဟပတိမဟာသာလာနံ သဟဗျတံ ဥပပဇ္ဇိံသု. ဝုတ္တမ္ပိ စေတံ – वे (पंडित) भय में रक्षा के समान, अंधकार में दीपक के समान, और भूख-प्यास आदि दुखों के अभिभव (कष्ट) में अन्न-पान की प्राप्ति के समान होते हैं; वे अपने वचनों का पालन करने वालों के सभी भय, उपद्रव और उपसर्गों को नष्ट करने में समर्थ होते हैं। जैसे तथागत के आश्रय से असंख्य और अपार देव और मनुष्य आस्रवों के क्षय (अर्हत्व) को प्राप्त हुए, ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित हुए, देवलोक में प्रतिष्ठित हुए, सुगति लोक में उत्पन्न हुए। सारिपुत्त स्थविर के प्रति चित्त प्रसन्न कर और चार प्रत्ययों से स्थविर की सेवा कर अस्सी हजार कुल स्वर्ग में उत्पन्न हुए। इसी प्रकार महामौद्गल्यायन, महाकाश्यप आदि सभी महाश्रावकों के संदर्भ में; सुनेत्त शास्ता के कुछ श्रावक ब्रह्मलोक में उत्पन्न हुए, कुछ परनिर्मितवसवर्ती देवों की संगति में... कुछ महाशाल गृहपतियों की संगति में उत्पन्न हुए। यह भी कहा गया है - ‘‘နတ္ထိ, ဘိက္ခဝေ, ပဏ္ဍိတတော ဘယံ, နတ္ထိ ပဏ္ဍိတတော ဥပဒ္ဒဝေါ, နတ္ထိ ပဏ္ဍိတတော ဥပသဂ္ဂေါ’’တိ (အ. နိ. ၃.၁). “भिक्षुओं! पंडित से कोई भय नहीं होता, पंडित से कोई उपद्रव नहीं होता, पंडित से कोई उपसर्ग नहीं होता।” အပိစ [Pg.108] တဂရမာလာဒိဂန္ဓသဒိသော ပဏ္ဍိတော, တဂရမာလာဒိဂန္ဓဗန္ဓပလိဝေဌနပတ္တသဒိသော ဟောတိ တဒုပသေဝီ, ဘာဝနီယတံ မနုညတဉ္စ အာပဇ္ဇတိ ဝိညူနံ. ဝုတ္တမ္ပိ စေတံ – इसके अतिरिक्त, पंडित तगर (एक सुगंधित पुष्प) की माला आदि की सुगंध के समान है, और उसका सेवन करने वाला तगर की माला आदि को लपेटने वाले पत्ते के समान होता है; वह बुद्धिमानों के बीच सम्मान और प्रियता को प्राप्त करता है। यह भी कहा गया है - ‘‘တဂရဉ္စ ပလာသေန, ယော နရော ဥပနယှတိ; ပတ္တာပိ သုရဘီ ဝါယန္တိ, ဧဝံ ဓီရူပသေဝနာ’’တိ. (ဣတိဝု. ၇၆; ဇာ. ၁.၁၅.၁၈၄; ၂.၂၂.၁၂၅၈); “जो मनुष्य तगर को पलाश के पत्ते से बाँधता है, वे पत्ते भी सुगंधित महकने लगते हैं; धीर (बुद्धिमान) पुरुषों की संगति ऐसी ही होती है।” အကိတ္တိပဏ္ဍိတော စာပိ သက္ကေန ဒေဝါနမိန္ဒေန ဝရေ ဒိယျမာနေ ဧဝမာဟ – अकित्ति पंडित ने भी, जब देवराज शक्र वरदान दे रहे थे, तब इस प्रकार कहा - ‘‘ဓီရံ ပဿေ သုဏေ ဓီရံ, ဓီရေန သဟ သံဝသေ; ဓီရေနလ္လာပသလ္လာပံ, တံ ကရေ တဉ္စ ရောစယေ. “मैं धीर (बुद्धिमान) को देखूँ, धीर को सुनूँ, धीर के साथ रहूँ; धीर के साथ बातचीत करूँ और उसी में रुचि रखूँ।” ‘‘ကိန္နု တေ အကရံ ဓီရော, ဝဒ ကဿပ ကာရဏံ; ကေန ကဿပ ဓီရဿ, ဒဿနံ အဘိကင်္ခသိ. “हे काश्यप! धीर ने तुम्हारा क्या भला किया है? कारण बताओ; तुम धीर के दर्शन की आकांक्षा क्यों करते हो?” ‘‘နယံ နယတိ မေဓာဝီ, အဓုရာယံ န ယုဉ္ဇတိ; သုနယော သေယျသော ဟောတိ, သမ္မာ ဝုတ္တော န ကုပ္ပတိ; ဝိနယံ သော ပဇာနာတိ, သာဓု တေန သမာဂမော’’တိ. (ဇာ. ၁.၁၃.၉၄-၉၆); “मेधावी (बुद्धिमान) सही मार्ग पर ले जाता है, अकर्तव्य में नियुक्त नहीं करता; उसका मार्गदर्शन अच्छा होता है, सही बात कहने पर वह क्रोधित नहीं होता; वह अनुशासन को जानता है, इसलिए उसके साथ समागम (मिलन) श्रेष्ठ है।” ဧဝံ ဘဂဝါ သဗ္ဗာကာရေန ပဏ္ဍိတသေဝနံ ပသံသန္တော ‘‘ပဏ္ဍိတာနံ သေဝနာ မင်္ဂလ’’န္တိ ဝတွာ ဣဒါနိ တာယ ဗာလာနံ အသေဝနာယ ပဏ္ဍိတာနံ သေဝနာယ စ အနုပုဗ္ဗေန ပူဇနေယျဘာဝံ ဥပဂတာနံ ပူဇံ ပသံသန္တော ‘‘ပူဇာ စ ပူဇနေယျာနံ မင်္ဂလ’’န္တိ အာဟ. တတ္ထ ပူဇနေယျာ နာမ သဗ္ဗဒေါသဝိရဟိတတ္တာ သဗ္ဗဂုဏသမန္နာဂတတ္တာ စ ဗုဒ္ဓါ ဘဂဝန္တော, တတော ပစ္ဆာ ပစ္စေကဗုဒ္ဓါ, အရိယသာဝကာ စ. တေသဉှိ ပူဇာ အပ္ပကာပိ ဒီဃရတ္တံ ဟိတာယ သုခါယ ဟောတိ, သုမနမာလာကာရမလ္လိကာဒယော စေတ္ထ နိဒဿနံ. इस प्रकार भगवान ने सब प्रकार से पंडितों की संगति की प्रशंसा करते हुए “पंडितों की संगति मंगल है” ऐसा कहा, और अब उस मूर्खों की असंगति और पंडितों की संगति के कारण क्रमशः पूजनीय अवस्था को प्राप्त हुए व्यक्तियों की पूजा की प्रशंसा करते हुए “पूजनीय व्यक्तियों की पूजा मंगल है” ऐसा कहा। वहाँ ‘पूजनीय’ वे हैं जो सभी दोषों से रहित होने के कारण और सभी गुणों से संपन्न होने के कारण बुद्ध भगवान हैं, उसके बाद प्रत्येकबुद्ध और आर्य श्रावक हैं। उनकी पूजा, चाहे थोड़ी ही क्यों न हो, दीर्घकाल तक हित और सुख के लिए होती है; सुमन मालाकार और मल्लिका आदि इसके उदाहरण हैं। တတ္ထေကံ နိဒဿနမတ္တံ ဘဏာမ – ဘဂဝါ ဟိ ဧကဒိဝသံ ပုဗ္ဗဏှသမယံ နိဝါသေတွာ ပတ္တစီဝရမာဒါယ ရာဇဂဟံ ပိဏ္ဍာယ ပါဝိသိ. အထ ခေါ သုမနမာလာကာရော ရညော မာဂဓဿ သေနိယဿ ဗိမ္ဗိသာရဿ ပုပ္ဖာနိ ဂဟေတွာ ဂစ္ဆန္တော အဒ္ဒသ ဘဂဝန္တံ နဂရဒွါရမနုပ္ပတ္တံ ပါသာဒိကံ ပသာဒနီယံ ဒွတ္တိံသမဟာပုရိသလက္ခဏာသီတာနုဗျဉ္ဇနပ္ပဋိမဏ္ဍိတံ ဗုဒ္ဓသိရိယာ ဇလန္တံ, ဒိသွာနဿ ဧတဒဟောသိ ‘‘ရာဇာ ပုပ္ဖာနိ ဂဟေတွာ သတံ ဝါ သဟဿံ ဝါ ဒဒေယျ[Pg.109], တဉ္စ ဣဓလောကမတ္တမေဝ သုခံ ဘဝေယျ, ဘဂဝတော ပန ပူဇာ အပ္ပမေယျအသင်္ချေယျဖလာ ဒီဃရတ္တံ ဟိတသုခါဝဟာ ဟောတိ, ဟန္ဒာဟံ ဣမေဟိ ပုပ္ဖေဟိ ဘဂဝန္တံ ပူဇေမီ’’တိ ပသန္နစိတ္တော ဧကံ ပုပ္ဖမုဋ္ဌိံ ဂဟေတွာ ဘဂဝတော ပဋိမုခံ ခိပိ, ပုပ္ဖာနိ အာကာသေန ဂန္တွာ ဘဂဝတော ဥပရိ မာလာဝိတာနံ ဟုတွာ အဋ္ဌံသု. မာလာကာရော တမာနုဘာဝံ ဒိသွာ ပသန္နတရစိတ္တော ပုန ဧကံ ပုပ္ဖမုဋ္ဌိံ ခိပိ, တာနိပိ ဂန္တွာ မာလာကဉ္စုကော ဟုတွာ အဋ္ဌံသု. ဧဝံ အဋ္ဌ ပုပ္ဖမုဋ္ဌိယော ခိပိ, တာနိ ဂန္တွာ ပုပ္ဖကူဋာဂါရံ ဟုတွာ အဋ္ဌံသု. यहाँ हम एक उदाहरण कहते हैं - भगवान एक दिन पूर्वाह्न समय में निवासादि पहनकर और पात्र-चीवर लेकर राजगृह में भिक्षा के लिए प्रविष्ट हुए। तब राजा मगध सेनीय बिम्बिसार के लिए फूल लेकर जाते हुए सुमन मालाकार ने नगर द्वार पर पहुँचे हुए, प्रासादिक, दर्शनीय, बत्तीस महापुरुष लक्षणों और अस्सी अनुव्यंजनों से सुशोभित, बुद्ध-श्री से देदीप्यमान भगवान को देखा। उन्हें देखकर उसे यह विचार आया - "राजा इन फूलों को लेकर मुझे सौ या हजार (मुद्राएँ) दे सकता है, और वह सुख केवल इसी लोक तक सीमित होगा। किन्तु भगवान की पूजा अनन्त और असंख्य फल देने वाली तथा दीर्घकाल तक हित और सुख पहुँचाने वाली होती है। क्यों न मैं इन फूलों से भगवान की पूजा करूँ?" ऐसा सोचकर प्रसन्न चित्त से उसने एक मुट्ठी फूल लेकर भगवान के सामने फेंके। वे फूल आकाश में जाकर भगवान के ऊपर पुष्प-वितान (चंदोवा) बनकर स्थित हो गए। मालाकार ने उस प्रभाव को देखकर और अधिक प्रसन्न चित्त से पुनः एक मुट्ठी फूल फेंके, वे भी जाकर पुष्प-कवच बनकर स्थित हो गए। इस प्रकार उसने आठ मुट्ठी फूल फेंके, वे जाकर पुष्प-कूटागार (फूलों का महल) बनकर स्थित हो गए। ဘဂဝါ အန္တောကူဋာဂါရေ အဟောသိ, မဟာဇနကာယော သန္နိပတိ. ဘဂဝါ မာလာကာရံ ပဿန္တော သိတံ ပါတွာကာသိ. အာနန္ဒတ္ထေရော ‘‘န ဗုဒ္ဓါ အဟေတူ အပစ္စယာ သိတံ ပါတုကရောန္တီ’’တိ သိတကာရဏံ ပုစ္ဆိ. ဘဂဝါ အာဟ ‘‘ဧသော, အာနန္ဒ, မာလာကာရော ဣမိဿာ ပူဇာယ အာနုဘာဝေန သတသဟဿကပ္ပေ ဒေဝေသု စ မနုဿေသု စ သံသရိတွာ ပရိယောသာနေ သုမနိဿရော နာမ ပစ္စေကဗုဒ္ဓေါ ဘဝိဿတီ’’တိ. ဝစနပရိယောသာနေ ဓမ္မဒေသနတ္ထံ ဣမံ ဂါထံ အဘာသိ – भगवान उस पुष्प-कूटागार के भीतर थे, और महाजन समूह वहाँ एकत्रित हो गया। भगवान ने मालाकार की ओर देखते हुए मुस्कान प्रकट की। आयुष्मान आनन्द ने यह सोचकर कि "बुद्ध बिना कारण और बिना हेतु के मुस्कान प्रकट नहीं करते", मुस्कान का कारण पूछा। भगवान ने कहा - "आनन्द, यह मालाकार इस पूजा के प्रभाव से एक लाख कल्पों तक देवों और मनुष्यों में संचरण कर अंत में सुमनिस्सर नामक प्रत्येक बुद्ध होगा।" वचन के अंत में धर्मोपदेश के लिए यह गाथा कही - ‘‘တဉ္စ ကမ္မံ ကတံ သာဓု, ယံ ကတွာ နာနုတပ္ပတိ; ယဿ ပတီတော သုမနော, ဝိပါကံ ပဋိသေဝတီ’’တိ. (ဓ. ပ. ၆၈); "वह कर्म किया हुआ श्रेष्ठ है, जिसे करके पश्चाताप नहीं होता; जिसका फल व्यक्ति प्रसन्न और हर्षित मन से भोगता है।" ဂါထာဝသာနေ စတုရာသီတိယာ ပါဏသဟဿာနံ ဓမ္မာဘိသမယော အဟောသိ. ဧဝံ အပ္ပကာပိ တေသံ ပူဇာ ဒီဃရတ္တံ ဟိတာယ သုခါယ ဟောတီတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. သာ စ အာမိသပူဇာဝ, ကော ပန ဝါဒေါ ပဋိပတ္တိပူဇာယ? ယတော ယေ ကုလပုတ္တာ သရဏဂမနသိက္ခာပဒပ္ပဋိဂ္ဂဟဏေန ဥပေါသထင်္ဂသမာဒါနေန စတုပါရိသုဒ္ဓိသီလာဒီဟိ စ အတ္တနော ဂုဏေဟိ ဘဂဝန္တံ ပူဇေန္တိ, ကော တေသံ ပူဇာဖလံ ဝဏ္ဏယိဿတိ? တေ ဟိ တထာဂတံ ပရမာယ ပူဇာယ ပူဇေန္တီတိ ဝုတ္တာ. ယထာဟ – गाथा के अंत में चौरासी हजार प्राणियों को धम्म का साक्षात्कार हुआ। इस प्रकार यह समझना चाहिए कि पूजनीय व्यक्तियों की थोड़ी सी भी पूजा दीर्घकाल तक हित और सुख के लिए होती है। और वह तो केवल आमिष-पूजा (भौतिक भेंट) थी, तो प्रतिपत्ति-पूजा (धम्म-आचरण) के विषय में क्या कहना? जो कुलपुत्र शरणगमन और शिक्षापदों को ग्रहण करने से, उपोसथ अंगों के समादान से और चतु-पारिशुद्धि शील आदि अपने गुणों से भगवान की पूजा करते हैं, उनकी पूजा के फल का वर्णन कौन कर सकता है? वे ही तथागत की परम पूजा से पूजा करते हैं, ऐसा कहा गया है। जैसा कि कहा गया है - ‘‘ယော ခေါ, အာနန္ဒ, ဘိက္ခု ဝါ ဘိက္ခုနီ ဝါ ဥပါသကော ဝါ ဥပါသိကာ ဝါ ဓမ္မာနုဓမ္မပ္ပဋိပန္နော ဝိဟရတိ သာမီစိပ္ပဋိပန္နော အနုဓမ္မစာရီ, သော တထာဂတံ သက္ကရောတိ ဂရုံ ကရောတိ မာနေတိ ပူဇေတိ အပစိယတိ ပရမာယ ပူဇာယာ’’တိ (ဒီ. နိ. ၂.၁၉၉). "आनन्द! जो कोई भिक्षु या भिक्षुणी, उपासक या उपासिका धर्म के अनुकूल धर्म का आचरण करते हुए विहार करता है, जो सम्यक प्रतिपत्ति वाला और धर्मानुसार चलने वाला है, वही तथागत का सत्कार करता है, गुरु मानता है, मान देता है, पूजा करता है और परम पूजा से पूजता है।" ဧတေနာနုသာရေန ပစ္စေကဗုဒ္ဓအရိယသာဝကာနမ္ပိ ပူဇာယ ဟိတသုခါဝဟတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. इसी अनुसरण (तर्क) से प्रत्येक बुद्धों और आर्य श्रावकों की पूजा का भी हित-सुखकारी होना समझना चाहिए। အပိစ [Pg.110] ဂဟဋ္ဌာနံ ကနိဋ္ဌဿ ဇေဋ္ဌော ဘာတာပိ ဘဂိနီပိ ပူဇနေယျာ, ပုတ္တဿ မာတာပိတရော, ကုလဝဓူနံ သာမိကသဿုသသုရာတိ ဧဝမေတ္ထ ပူဇနေယျာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ဧတေသမ္ပိ ဟိ ပူဇာ ကုသလဓမ္မသင်္ခါတတ္တာ အာယုအာဒိဝုဍ္ဎိဟေတုတ္တာ စ မင်္ဂလမေဝ. ဝုတ္တဉှေတံ – इसके अतिरिक्त, गृहस्थों के लिए छोटा भाई अपने बड़े भाई और बड़ी बहन की पूजा (आदर) करे, पुत्र अपने माता-पिता की, और कुल की वधुएँ अपने पति और सास-ससुर की पूजा करें - इस प्रकार यहाँ पूजनीय व्यक्तियों को समझना चाहिए। इनकी पूजा भी कुशल धर्म होने के कारण और आयु आदि की वृद्धि का हेतु होने के कारण मंगल ही है। क्योंकि ऐसा कहा गया है - ‘‘တေ မတ္တေယျာ ဘဝိဿန္တိ ပေတ္တေယျာ သာမညာ ဗြဟ္မညာ ကုလေ ဇေဋ္ဌာပစာယိနော, ဣဒံ ကုသလံ ဓမ္မံ သမာဒါယ ဝတ္တိဿန္တိ, တေ တေသံ ကုသလာနံ ဓမ္မာနံ သမာဒါနဟေတု အာယုနာပိ ဝဍ္ဎိဿန္တိ, ဝဏ္ဏေနပိ ဝဍ္ဎိဿန္တီ’’တိအာဒိ (ဒီ. နိ. ၃.၁၀၅). "वे माता के भक्त होंगे, पिता के भक्त होंगे, श्रमणों के भक्त होंगे, ब्राह्मणों के भक्त होंगे और कुल में बड़ों का आदर करने वाले होंगे। वे इस कुशल धर्म को अपनाकर चलेंगे। उन कुशल धर्मों के समादान के कारण वे आयु में भी बढ़ेंगे और वर्ण (सौन्दर्य) में भी बढ़ेंगे" आदि। ဣဒါနိ ယသ္မာ ‘‘ယံ ယတ္ထ မင်္ဂလံ. ဝဝတ္ထပေတွာ တံ တဿ, မင်္ဂလတ္တံ ဝိဘာဝယေ’’တိ ဣတိ မာတိကာ နိက္ခိတ္တာ, တသ္မာ ဣဒံ ဝုစ္စတိ – ဧဝမေတိဿာ ဂါထာယ ဗာလာနံ အသေဝနာ, ပဏ္ဍိတာနံ သေဝနာ, ပူဇနေယျာနဉ္စ ပူဇာတိ တီဏိ မင်္ဂလာနိ ဝုတ္တာနိ. တတ္ထ ဗာလာနံ အသေဝနာ ဗာလသေဝနပစ္စယဘယာဒိပရိတ္တာဏေန ဥဘယလောကတ္ထဟေတုတ္တာ, ပဏ္ဍိတာနံ သေဝနာ ပူဇနေယျာနံ ပူဇာ စ တာသံ ဖလဝိဘူတိဝဏ္ဏနာယံ ဝုတ္တနယေနေဝ နိဗ္ဗာနသုဂတိဟေတုတ္တာ မင်္ဂလန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ဣတော ပရံ တု မာတိကံ အဒဿေတွာ ဧဝ ယံ ယတ္ထ မင်္ဂလံ, တံ ဝဝတ္ထပေတွာ တဿ မင်္ဂလတ္တံ ဝိဘာဝယိဿာမာတိ. अब चूँकि यह मातृका (विषय-सूची) रखी गई थी कि "जहाँ जो मंगल है, उसे निर्धारित कर उसके मंगल-भाव को स्पष्ट करना चाहिए", इसलिए यह कहा जाता है - इस प्रकार इस गाथा में 'बालों की असेवना', 'पण्डितों की सेवना' और 'पूजनीय व्यक्तियों की पूजा' - ये तीन मंगल कहे गए हैं। वहाँ 'बालों की असेवना' बाल-सेवन के कारण होने वाले भय आदि से रक्षा करने के कारण दोनों लोकों के हित का हेतु है। 'पण्डितों की सेवना' और 'पूजनीय व्यक्तियों की पूजा' उनके फलों की महिमा के वर्णन में कहे गए तरीके से निर्वाण और सुगति का हेतु होने के कारण मंगल है, ऐसा समझना चाहिए। इसके बाद मातृका को दिखाए बिना ही, जहाँ जो मंगल है, उसे निर्धारित कर उसके मंगल-भाव को स्पष्ट करेंगे। နိဋ္ဌိတာ အသေဝနာ စ ဗာလာနန္တိ ဣမိဿာ ဂါထာယ အတ္ထဝဏ္ဏနာ. "असेवना च बालानं" इस गाथा की अर्थ-व्याख्या समाप्त हुई। ပတိရူပဒေသဝါသောစာတိဂါထာဝဏ္ဏနာ "पतिरूपदेसवासो च" आदि गाथा की व्याख्या। ၄. ဧဝံ ဘဂဝါ ‘‘ဗြူဟိ မင်္ဂလမုတ္တမ’’န္တိ ဧကံ အဇ္ဈေသိတောပိ အပ္ပံ ယာစိတော ဗဟုဒါယကော ဥဠာရပုရိသော ဝိယ ဧကာယ ဂါထာယ တီဏိ မင်္ဂလာနိ ဝတွာ တတော ဥတ္တရိပိ ဒေဝတာနံ သောတုကာမတာယ မင်္ဂလာနမတ္ထိတာယ ယေသံ ယေသံ ယံ ယံ အနုကုလံ, တေ တေ သတ္တေ တတ္ထ တတ္ထ မင်္ဂလေ နိယောဇေတုကာမတာယ စ ‘‘ပတိရူပဒေသဝါသော စာ’’တိအာဒီဟိ ဂါထာဟိ ပုနပိ အနေကာနိ မင်္ဂလာနိ ဝတ္တုမာရဒ္ဓေါ. တတ္ထ ပဌမဂါထာယ တာဝ ပတိရူပေါတိ အနုစ္ဆဝိကော. ဒေသောတိ ဂါမောပိ နိဂမောပိ နဂရမ္ပိ ဇနပဒေါပိ ယော ကောစိ သတ္တာနံ နိဝါသော ဩကာသော. ဝါသောတိ တတ္ထ [Pg.111] နိဝါသော. ပုဗ္ဗေတိ ပုရာ အတီတာသု ဇာတီသု. ကတပုညတာတိ ဥပစိတကုသလတာ. အတ္တာတိ စိတ္တံ ဝုစ္စတိ သကလော ဝါ အတ္တဘာဝေါ, သမ္မာပဏိဓီတိ တဿ အတ္တနော သမ္မာ ပဏိဓာနံ နိယုဉ္ဇနံ, ဌပနန္တိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. သေသံ ဝုတ္တနယမေဝါတိ. အယမေတ္ထ ပဒဝဏ္ဏနာ. ४. इस प्रकार भगवान ने "ब्रूहि मङ्गलमुत्तमं" कहकर एक (मंगल) के लिए प्रार्थना किए जाने पर भी, थोड़ा माँगे जाने पर बहुत देने वाले किसी उदार पुरुष की तरह, एक गाथा से तीन मंगल कहे। उसके बाद भी देवताओं की सुनने की इच्छा होने के कारण और मंगलों की विद्यमानता के कारण, जिन-जिन प्राणियों के लिए जो-जो अनुकूल है, उन-उन प्राणियों को उन-उन मंगलों में नियोजित करने की इच्छा से "पतिरूपदेसवासो च" आदि गाथाओं से पुनः अनेक मंगलों को कहना आरम्भ किया। वहाँ पहली गाथा में 'पतिरूपो' का अर्थ है उपयुक्त। 'देसो' का अर्थ है गाँव, कस्बा, नगर या जनपद - जो भी प्राणियों का निवास स्थान हो। 'वासो' का अर्थ है वहाँ निवास करना। 'पुब्बे' का अर्थ है पहले, अतीत जन्मों में। 'कतपुञ्ञता' का अर्थ है संचित पुण्य। 'अत्ता' का अर्थ चित्त कहा जाता है या सम्पूर्ण आत्मभाव (शरीर)। 'सम्मापणिधि' का अर्थ है उस अपने (चित्त या स्वयं) को सम्यक प्रकार से लगाना, नियुक्त करना या स्थापित करना। शेष (व्याख्या) पूर्वोक्त रीति के अनुसार ही है। यह यहाँ पदों की व्याख्या है। အတ္ထဝဏ္ဏနာ ပန ဧဝံ ဝေဒိတဗ္ဗာ – ပတိရူပဒေသဝါသော နာမ ယတ္ထ စတဿော ပရိသာ ဝိစရန္တိ, ဒါနာဒီနိ ပုညကိရိယဝတ္ထူနိ ဝတ္တန္တိ, နဝင်္ဂံ သတ္ထု သာသနံ ဒိဗ္ဗတိ, တတ္ထ နိဝါသော သတ္တာနံ ပုညကိရိယာယ ပစ္စယတ္တာ မင်္ဂလန္တိ ဝုစ္စတိ. သီဟဠဒီပပဝိဋ္ဌကေဝဋ္ဋာဒယော စေတ္ထ နိဒဿနံ. अर्थ की व्याख्या इस प्रकार जाननी चाहिए - 'प्रतिरूपदेशवास' का अर्थ है जहाँ चारों परिषदें (भिक्षु, भिक्षुणी, उपासक, उपासिका) विचरण करती हैं, दान आदि पुण्य-क्रियाएँ प्रचलित होती हैं, और शास्ता का नौ अंगों वाला शासन प्रकाशित होता है; वहाँ निवास करना प्राणियों के लिए पुण्य करने का कारण होने से 'मंगल' कहा जाता है। श्रीलंका (सिंहल द्वीप) में प्रवेश करने वाले मछुआरे आदि इसके उदाहरण हैं। အပရော နယော – ပတိရူပဒေသဝါသော နာမ ဘဂဝတော ဗောဓိမဏ္ဍပ္ပဒေသော ဓမ္မစက္ကဝတ္တိတပ္ပဒေသော ဒွါဒသယောဇနာယ ပရိသာယ မဇ္ဈေ သဗ္ဗတိတ္ထိယမတံ ဘိန္ဒိတွာ ယမကပါဋိဟာရိယဒဿိတကဏ္ဍမ္ဗ ရုက္ခမူလပ္ပဒေသော ဒေဝေါရောဟဏပ္ပဒေသော, ယော ဝါ ပနညောပိ သာဝတ္ထိရာဇဂဟာဒိ ဗုဒ္ဓါဓိဝါသပ္ပဒေသော, တတ္ထ နိဝါသော သတ္တာနံ ဆအနုတ္တရိယပ္ပဋိလာဘပစ္စယတော မင်္ဂလန္တိ ဝုစ္စတိ. दूसरा प्रकार - 'प्रतिरूपदेशवास' का अर्थ है भगवान का बोधिमण्ड प्रदेश, धर्मचक्र प्रवर्तन का प्रदेश, बारह योजन की परिषद के मध्य सभी तीर्थिकों के मतों का खंडन कर यमक-प्रातिहार्य दिखाने का स्थान कण्डम्ब वृक्ष का मूल प्रदेश, देवलोक से अवतरण का प्रदेश, अथवा श्रावस्ती, राजगृह आदि अन्य बुद्धों के निवास स्थान; वहाँ निवास करना प्राणियों के लिए छह अनुत्तरियों की प्राप्ति का कारण होने से 'मंगल' कहा जाता है। အပရော နယော (မဟာဝ. ၂၅၉) – ပုရတ္ထိမာယ ဒိသာယ ဂဇင်္ဂလံ နာမ နိဂမော, တဿ ပရေန မဟာသာလာ, တတော ပရံ ပစ္စန္တိမာ ဇနပဒါ, ဩရတော မဇ္ဈေ. ဒက္ခိဏပုရတ္ထိမာယ ဒိသာယ သလ္လဝတီ နာမ နဒီ, တတော ပရံ ပစ္စန္တိမာ ဇနပဒါ, ဩရတော မဇ္ဈေ. ဒက္ခိဏာယ ဒိသာယ သေတကဏ္ဏိကံ နာမ နိဂမော, တတော ပရံ ပစ္စန္တိမာ ဇနပဒါ, ဩရတော မဇ္ဈေ. ပစ္ဆိမာယ ဒိသာယ ထူဏံ နာမ ဗြာဟ္မဏဂါမော, တတော ပရံ ပစ္စန္တိမာ ဇနပဒါ, ဩရတော မဇ္ဈေ. ဥတ္တရာယ ဒိသာယ ဥသီရဒ္ဓဇော နာမ ပဗ္ဗတော, တတော ပရံ ပစ္စန္တိမာ ဇနပဒါ, ဩရတော မဇ္ဈေ. အယံ မဇ္ဈိမဒေသော အာယာမေန တီဏိ ယောဇနသတာနိ, ဝိတ္ထာရေန အဍ္ဎတေယျာနိ, ပရိက္ခေပေန နဝ ယောဇနသတာနိ ဟောန္တိ. ဧသော ပတိရူပဒေသော နာမ. दूसरा प्रकार (महावग्ग के अनुसार) - पूर्व दिशा में 'गजंगल' नामक कस्बा है, उसके आगे महाशाल वन है, उसके परे प्रत्यन्त (सीमावर्ती) जनपद हैं, और इस ओर मध्य देश है। दक्षिण-पूर्व दिशा में 'सल्लावती' नामक नदी है, उसके परे प्रत्यन्त जनपद हैं, और इस ओर मध्य देश है। दक्षिण दिशा में 'सेतकण्णिक' नामक कस्बा है, उसके परे प्रत्यन्त जनपद हैं, और इस ओर मध्य देश है। पश्चिम दिशा में 'थूण' नामक ब्राह्मण गाँव है, उसके परे प्रत्यन्त जनपद हैं, और इस ओर मध्य देश है। उत्तर दिशा में 'उसीरद्धज' नामक पर्वत है, उसके परे प्रत्यन्त जनपद हैं, और इस ओर मध्य देश है। यह मध्य देश लंबाई में तीन सौ योजन, चौड़ाई में ढाई सौ योजन और परिधि में नौ सौ योजन है। इसे 'प्रतिरूपदेश' कहा जाता है। ဧတ္ထ စတုန္နံ မဟာဒီပါနံ ဒွိသဟဿာနံ ပရိတ္တဒီပါနဉ္စ ဣဿရိယာဓိပစ္စကာရကာ စက္ကဝတ္တီ ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ, ဧကံ အသင်္ချေယျံ ကပ္ပသတသဟဿဉ္စ ပါရမိယော ပူရေတွာ သာရိပုတ္တမောဂ္ဂလ္လာနာဒယော မဟာသာဝကာ ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ, ဒွေ အသင်္ချေယျာနိ ကပ္ပသတသဟဿဉ္စ ပါရမိယော ပူရေတွာ ပစ္စေကဗုဒ္ဓါ, စတ္တာရိ အဋ္ဌ သောဠသ ဝါ အသင်္ချေယျာနိ ကပ္ပသတသဟဿဉ္စ ပါရမိယော ပူရေတွာ [Pg.112] သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓါ ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ. တတ္ထ သတ္တာ စက္ကဝတ္တိရညော ဩဝါဒံ ဂဟေတွာ ပဉ္စသု သီလေသု ပတိဋ္ဌာယ သဂ္ဂပရာယဏာ ဟောန္တိ. တထာ ပစ္စေကဗုဒ္ဓါနံ ဩဝါဒေ ပတိဋ္ဌာယ, သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓါနံ ပန ဗုဒ္ဓသာဝကာနံ ဩဝါဒေ ပတိဋ္ဌာယ သဂ္ဂပရာယဏာ နိဗ္ဗာနပရာယဏာ စ ဟောန္တိ. တသ္မာ တတ္ထ ဝါသော ဣမာသံ သမ္ပတ္တီနံ ပစ္စယတော မင်္ဂလန္တိ ဝုစ္စတိ. यहाँ चार महाद्वीपों और दो हजार छोटे द्वीपों पर आधिपत्य करने वाले चक्रवर्ती राजा उत्पन्न होते हैं; एक असंख्येय और एक लाख कल्पों तक पारमिताओं को पूर्ण कर सारिपुत्र-मौद्गल्यायन आदि महाश्रावक उत्पन्न होते हैं; दो असंख्येय और एक लाख कल्पों तक पारमिताओं को पूर्ण कर प्रत्येक बुद्ध उत्पन्न होते हैं; अथवा चार, आठ या सोलह असंख्येय और एक लाख कल्पों तक पारमिताओं को पूर्ण कर सम्यक सम्बुद्ध उत्पन्न होते हैं। वहाँ रहने वाले प्राणी चक्रवर्ती राजा के उपदेश को ग्रहण कर पाँच शीलों में प्रतिष्ठित होकर स्वर्गगामी होते हैं। उसी प्रकार प्रत्येक बुद्धों के उपदेश में प्रतिष्ठित होकर, और सम्यक सम्बुद्धों तथा बुद्ध-श्रावकों के उपदेश में प्रतिष्ठित होकर वे स्वर्गगामी और निर्वाणगामी होते हैं। इसलिए वहाँ निवास करना इन संपत्तियों का कारण होने से 'मंगल' कहा जाता है। ပုဗ္ဗေ ကတပုညတာ နာမ အတီတဇာတိယံ ဗုဒ္ဓပစ္စေကဗုဒ္ဓခီဏာသဝေ အာရဗ္ဘ ဥပစိတကုသလတာ, သာပိ မင်္ဂလံ. ကသ္မာ? ဗုဒ္ဓပစ္စေကဗုဒ္ဓသမ္မုခတော ဒဿေတွာ ဗုဒ္ဓါနံ ဗုဒ္ဓသာဝကာနံ ဝါ သမ္မုခါ သုတာယ စတုပ္ပဒိကာယပိ ဂါထာယ ပရိယောသာနေ အရဟတ္တံ ပါပေတီတိ ကတွာ. ယော စ မနုဿော ပုဗ္ဗေ ကတာဓိကာရော ဥဿန္နကုသလမူလော ဟောတိ, သော တေနေဝ ကုသလမူလေန ဝိပဿနံ ဥပ္ပာဒေတွာ အာသဝက္ခယံ ပါပုဏာတိ ယထာ ရာဇာ မဟာကပ္ပိနော အဂ္ဂမဟေသီ စ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘ပုဗ္ဗေ စ ကတပုညတာ မင်္ဂလ’’န္တိ. 'पूर्वकृतपुण्यता' का अर्थ है पिछले जन्मों में बुद्धों, प्रत्येक बुद्धों और क्षीणास्त्रवों (अर्हतों) के प्रति संचित किया गया कुशल (पुण्य)। वह भी मंगल है। क्यों? क्योंकि बुद्धों या प्रत्येक बुद्धों के सम्मुख दर्शन कर, अथवा बुद्धों या बुद्ध-श्रावकों के सम्मुख सुनी गई चार पदों वाली गाथा के अंत में भी यह अर्हत्व तक पहुँचा देता है। जो मनुष्य पूर्व जन्मों में कृत-अधिकार (प्रार्थना युक्त) और प्रचुर कुशल-मूल वाला होता है, वह उसी कुशल-मूल के कारण विपश्यना उत्पन्न कर आस्रवों के क्षय (अर्हत्व) को प्राप्त कर लेता है, जैसे राजा महाकप्पिन और उनकी अग्र-महिषी (अनोज़ा)। इसलिए कहा गया है - "पूर्व में किया गया पुण्य मंगल है।" အတ္တသမ္မာပဏိဓိ နာမ ဣဓေကစ္စော အတ္တာနံ ဒုဿီလံ သီလေ ပတိဋ္ဌာပေတိ, အဿဒ္ဓံ သဒ္ဓါသမ္ပဒါယ ပတိဋ္ဌာပေတိ, မစ္ဆရိံ စာဂသမ္ပဒါယ ပတိဋ္ဌာပေတိ. အယံ ဝုစ္စတိ ‘‘အတ္တသမ္မာပဏိဓီ’’တိ, ဧသော စ မင်္ဂလံ. ကသ္မာ? ဒိဋ္ဌဓမ္မိကသမ္ပရာယိကဝေရပ္ပဟာနဝိဝိဓာနိသံသာဓိဂမဟေတုတောတိ. 'आत्मसम्यक्प्रणिधि' का अर्थ है - यहाँ कोई व्यक्ति अपने दुशील (चरित्रहीन) स्वयं को शील में प्रतिष्ठित करता है, अश्रद्धालु को श्रद्धा-संपदा में प्रतिष्ठित करता है, और कंजूस को त्याग-संपदा (दान) में प्रतिष्ठित करता है। इसे 'आत्मसम्यक्प्रणिधि' कहा जाता है, और यह मंगल है। क्यों? क्योंकि यह इस लोक और परलोक के वैरों (शत्रुताओं) के त्याग और विविध लाभों की प्राप्ति का कारण है। ဧဝံ ဣမိဿာပိ ဂါထာယ ပတိရူပဒေသဝါသော စ, ပုဗ္ဗေ စ ကတပုညတာ, အတ္တသမ္မာပဏိဓီ စာတိ တီဏိယေဝ မင်္ဂလာနိ ဝုတ္တာနိ. မင်္ဂလတ္တဉ္စ နေသံ တတ္ထ တတ္ထ ဝိဘာဝိတမေဝါတိ. इस प्रकार इस गाथा में भी 'प्रतिरूपदेशवास', 'पूर्वकृतपुण्यता' और 'आत्मसम्यक्प्रणिधि' - ये तीन ही मंगल कहे गए हैं। इनका मंगल-स्वरूप उन-उन स्थानों पर स्पष्ट किया ही गया है। နိဋ္ဌိတာ ပတိရူပဒေသဝါသော စာတိ ဣမိဿာ ဂါထာယ အတ္ထဝဏ္ဏနာ. 'प्रतिरूपदेशवासो च' इस गाथा की अर्थ-व्याख्या समाप्त हुई। ဗာဟုသစ္စဉ္စာတိဂါထာဝဏ္ဏနာ 'बाहुसच्चञ्च' गाथा की व्याख्या। ၅. ဣဒါနိ ဗာဟုသစ္စဉ္စာတိ ဧတ္ထ ဗာဟုသစ္စန္တိ ဗဟုဿုတဘာဝေါ. သိပ္ပန္တိ ယံ ကိဉ္စိ ဟတ္ထကောသလ္လံ. ဝိနယောတိ ကာယဝါစာစိတ္တဝိနယနံ. သုသိက္ခိတောတိ သုဋ္ဌု သိက္ခိတော. သုဘာသိတာတိ သုဋ္ဌု ဘာသိတာ. ယာတိ အနိယတနိဒ္ဒေသော. ဝါစာတိ ဂိရာ ဗျပ္ပထော. သေသံ ဝုတ္တနယမေဝါတိ. အယမေတ္ထ ပဒဝဏ္ဏနာ. ५. अब 'बाहुसच्चञ्च' यहाँ 'बाहुसच्च' का अर्थ है बहुश्रुत होना (अधिक ज्ञान)। 'सिप्प' (शिल्प) का अर्थ है कोई भी हस्त-कौशल। 'विनय' का अर्थ है काय, वाणी और चित्त का दमन (अनुशासन)। 'सुसिक्खितो' का अर्थ है अच्छी तरह सीखा हुआ। 'सुभासिता' का अर्थ है अच्छी तरह बोली गई। 'या' शब्द अनियत (अनिश्चित) निर्देश के लिए है। 'वाचा' का अर्थ है वाणी या कथन। शेष भाग पहले बताए गए तरीके के अनुसार ही है। यह यहाँ पदों की व्याख्या (पद-वर्णना) है। အတ္ထဝဏ္ဏနာ [Pg.113] ပန ဧဝံ ဝေဒိတဗ္ဗာ – ဗာဟုသစ္စံ နာမ ယံ တံ ‘‘သုတဓရော ဟောတိ သုတသန္နိစယော’’တိ (မ. နိ. ၁.၃၃၉; အ. နိ. ၄.၂၂) စ ‘‘ဣဓေကစ္စဿ ဗဟုကံ သုတံ ဟောတိ, သုတ္တံ ဂေယျံ ဝေယျာကရဏ’’န္တိ စ (အ. နိ. ၄.၆) ဧဝမာဒိနာ နယေန သတ္ထုသာသနဓရတ္တံ ဝဏ္ဏိတံ, တံ အကုသလပ္ပဟာနကုသလာဓိဂမဟေတုတော အနုပုဗ္ဗေန ပရမတ္ထသစ္စသစ္ဆိကိရိယာဟေတုတော စ မင်္ဂလန္တိ ဝုစ္စတိ. ဝုတ္တဉှေတံ ဘဂဝတာ – अर्थ की व्याख्या इस प्रकार जाननी चाहिए - 'बाहुसच्च' (बहुश्रुतता) उसे कहते हैं जिसे "श्रुतधर और श्रुत-सन्निचय" कहा गया है, और "यहाँ किसी के पास बहुत श्रुत (ज्ञान) होता है, जैसे सुत्त, गेय्य, वेय्याकरण" आदि; इस प्रकार शास्ता के शासन को धारण करने की महिमा वर्णित है। वह अकुशल के त्याग और कुशल की प्राप्ति का कारण होने से, तथा क्रमशः परमार्थ सत्य के साक्षात्कार का कारण होने से 'मंगल' कहा जाता है। भगवान द्वारा यह कहा भी गया है - ‘‘သုတဝါ စ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, အရိယသာဝကော အကုသလံ ပဇဟတိ, ကုသလံ ဘာဝေတိ, သာဝဇ္ဇံ ပဇဟတိ, အနဝဇ္ဇံ ဘာဝေတိ, သုဒ္ဓမတ္တာနံ ပရိဟရတီ’’တိ (အ. နိ. ၇.၆၇). "भिक्षुओं! श्रुतवान आर्य श्रावक अकुशल को त्यागता है, कुशल की भावना करता है; सदोष को त्यागता है, निर्दोष की भावना करता है; और स्वयं को शुद्ध रखता है।" အပရမ္ပိ ဝုတ္တံ – अन्यत्र भी कहा गया है - ‘‘ဓတာနံ ဓမ္မာနံ အတ္ထမုပပရိက္ခတိ, အတ္ထံ ဥပပရိက္ခတော ဓမ္မာ နိဇ္ဈာနံ ခမန္တိ, ဓမ္မနိဇ္ဈာနက္ခန္တိယာ သတိ ဆန္ဒော ဇာယတိ, ဆန္ဒဇာတော ဥဿဟတိ, ဥဿဟန္တော တုလယတိ, တုလယန္တော ပဒဟတိ ပဒဟန္တော ကာယေန စေဝ ပရမတ္ထသစ္စံ သစ္ဆိကရောတိ, ပညာယ စ အတိဝိဇ္ဈ ပဿတီ’’တိ (မ. နိ. ၂.၄၃၂). वह धारण किए हुए धर्मों के अर्थ की परीक्षा करता है; अर्थ की परीक्षा करने वाले के लिए धर्म प्रज्ञा में स्पष्ट होते हैं; धर्मों के प्रज्ञा में स्पष्ट होने पर छंद (इच्छा) उत्पन्न होता है; छंद उत्पन्न होने पर वह उत्साह करता है; उत्साह करते हुए वह तुलना (विचार) करता है; तुलना करते हुए वह प्रधान (प्रयत्न) करता है; प्रयत्न करते हुए वह काया से परमार्थ सत्य का साक्षात्कार करता है और प्रज्ञा से उसे बेधकर देखता है। အပိစ အဂါရိကဗာဟုသစ္စမ္ပိ ယံ အနဝဇ္ဇံ, တံ ဥဘယလောကဟိတသုခါဝဟနတော မင်္ဂလန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. इसके अतिरिक्त, गृहस्थ का वह बहुश्रुत होना (ज्ञान) भी जो निर्दोष है, दोनों लोकों के हित और सुख को लाने वाला होने के कारण 'मंगल' समझना चाहिए। သိပ္ပံ နာမ အဂါရိကသိပ္ပဉ္စ အနဂါရိကသိပ္ပဉ္စ. တတ္ထ အဂါရိကသိပ္ပံ နာမ ယံ ပရူပရောဓဝိရဟိတံ အကုသလဝိဝဇ္ဇိတံ မဏိကာရသုဝဏ္ဏကာရကမ္မာဒိကံ, တံ ဣဓလောကတ္ထာဝဟနတော မင်္ဂလံ. အနဂါရိကသိပ္ပံ နာမ စီဝရဝိစာရဏသိဗ္ဗနာဒိသမဏပရိက္ခာရာဘိသင်္ခရဏံ, ယံ တံ ‘‘ဣဓ, ဘိက္ခဝေ, ဘိက္ခု ယာနိ တာနိ သဗြဟ္မစာရီနံ ဥစ္စာဝစာနိ ကိံ ကရဏီယာနိ, တတ္ထ ဒက္ခော ဟောတီ’’တိအာဒိနာ (ဒီ. နိ. ၃.၃၄၅; ၃၆၀; အ. နိ. ၁၀.၁၇) နယေန တတ္ထ တတ္ထ သံဝဏ္ဏိတံ, ယံ ‘‘နာထကရော ဓမ္မော’’တိ စ ဝုတ္တံ, တံ အတ္တနော စ ပရေသဉ္စ ဥဘယလောကဟိတသုခါဝဟနတော မင်္ဂလန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. शिल्प (कला) दो प्रकार का है: गृहस्थ शिल्प और अनगारिक (भिक्षु) शिल्प। उनमें गृहस्थ शिल्प वह है जो दूसरों को पीड़ा देने से रहित और अकुशल से वर्जित हो, जैसे मणिकार (रत्न तराशना), स्वर्णकार का कार्य आदि; वह इस लोक में हितकारी होने के कारण मंगल है। अनगारिक शिल्प का अर्थ है चीवर का विचार करना, उसे सीना आदि श्रमण-परिष्कारों का निर्माण करना; जैसा कि कहा गया है—'भिक्षुओं! यहाँ भिक्षु अपने सब्रह्मचारियों के छोटे-बड़े कार्यों में दक्ष होता है'—इस प्रकार विभिन्न सूत्रों में वर्णित है। जिसे 'नाथकर धर्म' भी कहा गया है, वह अपने और दूसरों के लिए दोनों लोकों में हित और सुख लाने वाला होने के कारण मंगल समझना चाहिए। ဝိနယော နာမ အဂါရိကဝိနယော စ အနဂါရိကဝိနယော စ. တတ္ထ အဂါရိကဝိနယော နာမ ဒသအကုသလကမ္မပထဝိရမဏံ, သော တတ္ထ သုသိက္ခိတော အသံကိလေသာပဇ္ဇနေန အာစာရဂုဏဝဝတ္ထာနေန စ ဥဘယလောကဟိတသုခါဝဟနတော [Pg.114] မင်္ဂလံ. အနဂါရိကဝိနယော နာမ သတ္တာပတ္တိက္ခန္ဓအနာပဇ္ဇနံ, သောပိ ဝုတ္တနယေနေဝ သုသိက္ခိတော, စတုပါရိသုဒ္ဓိသီလံ ဝါ အနဂါရိကဝိနယော, သော ယထာ တတ္ထ ပတိဋ္ဌာယ အရဟတ္တံ ပါပုဏာတိ, ဧဝံ သိက္ခနေန သုသိက္ခိတော လောကိယလောကုတ္တရသုခါဓိဂမဟေတုတော မင်္ဂလန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗော. विनय दो प्रकार का है: गृहस्थ विनय और अनगारिक विनय। उनमें गृहस्थ विनय का अर्थ है दस अकुशल कर्मपथों से विरत होना; यदि वह उसमें सुशिक्षित है, तो संक्लेश (मलिनता) को प्राप्त न होने से और आचार-गुणों के निर्धारण से दोनों लोकों के हित-सुख को लाने वाला होने के कारण मंगल है। अनगारिक विनय का अर्थ है सात आपत्ति-निकायों (दोषों) में न पड़ना; वह भी पूर्वोक्त विधि से सुशिक्षित होने पर मंगल है। अथवा चतुष्पारिशुद्धि शील ही अनगारिक विनय है; जिस प्रकार उसमें प्रतिष्ठित होकर वह अर्हत्व को प्राप्त करता है, इस प्रकार की शिक्षा से सुशिक्षित होना लौकिक और लोकोत्तर सुख की प्राप्ति का हेतु होने के कारण मंगल समझना चाहिए। သုဘာသိတာ ဝါစာ နာမ မုသာဝါဒါဒိဒေါသဝိရဟိတာ. ယထာဟ ‘‘စတူဟိ, ဘိက္ခဝေ, အင်္ဂေဟိ သမန္နာဂတော ဝါစာ သုဘာသိတာ ဟောတီ’’တိ (သု. နိ. သုဘာသိတသုတ္တံ). အသမ္ဖပ္ပလာပါ ဝါစာ ဧဝ ဝါ သုဘာသိတာ. ယထာဟ – सुभाषित वाणी का अर्थ है मृषावाद (झूठ) आदि दोषों से रहित वाणी। जैसा कि कहा गया है—'भिक्षुओं! चार अंगों से युक्त वाणी सुभाषित होती है।' अथवा व्यर्थ प्रलाप से रहित वाणी ही सुभाषित है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘သုဘာသိတံ ဥတ္တမမာဟု သန္တော,ဓမ္မံ ဘဏေ နာဓမ္မံ တံ ဒုတိယံ; ပိယံ ဘဏေ နာပ္ပိယံ တံ တတိယံ,သစ္စံ ဘဏေ နာလိကံ တံ စတုတ္ထ’’န္တိ. (သု. နိ. ၄၅၂); सत्पुरुष सुभाषित को उत्तम कहते हैं; धर्मयुक्त बात कहे, अधर्मयुक्त नहीं—यह दूसरा अंग है; प्रिय कहे, अप्रिय नहीं—यह तीसरा अंग है; सत्य कहे, असत्य नहीं—यह चौथा अंग है। အယမ္ပိ ဥဘယလောကဟိတသုခါဝဟနတော မင်္ဂလန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ယသ္မာ စ အယံ ဝိနယပရိယာပန္နာ ဧဝ, တသ္မာ ဝိနယဂ္ဂဟဏေန ဧတံ အသင်္ဂဏှိတွာ ဝိနယော သင်္ဂဟေတဗ္ဗော. အထ ဝါ ကိံ ဣမိနာ ပရိဿမေန ပရေသံ ဓမ္မဒေသနာဒိဝါစာ ဣဓ သုဘာသိတာ ဝါစာတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. သာ ဟိ ယထာ ပတိရူပဒေသဝါသော, ဧဝံ သတ္တာနံ ဥဘယလောကဟိတသုခနိဗ္ဗာနာဓိဂမပစ္စယတော မင်္ဂလန္တိ ဝုစ္စတိ. အာဟ စ – यह भी दोनों लोकों के हित और सुख को लाने वाली होने के कारण मंगल समझनी चाहिए। चूँकि यह विनय के अंतर्गत ही आती है, इसलिए 'विनय' शब्द के ग्रहण से इसे अलग न गिनकर विनय में ही सम्मिलित किया जाना चाहिए। अथवा इस परिश्रम की क्या आवश्यकता? दूसरों को धर्मोपदेश आदि देना ही यहाँ 'सुभाषित वाणी' समझना चाहिए। जैसे 'प्रतिरूप देश में वास' मंगल है, वैसे ही यह प्राणियों के लिए दोनों लोकों के हित-सुख और निर्वाण प्राप्ति का प्रत्यय (कारण) होने से मंगल कही जाती है। और कहा भी गया है— ‘‘ယံ ဗုဒ္ဓေါ ဘာသတိ ဝါစံ, ခေမံ နိဗ္ဗာနပတ္တိယာ; ဒုက္ခဿန္တကိရိယာယ, သာ ဝေ ဝါစာနမုတ္တမာ’’တိ. (သု. နိ. ၄၅၆); बुद्ध जो वाणी कहते हैं, जो क्षेम (सुरक्षित) है, निर्वाण की प्राप्ति के लिए है और दुखों के अंत के लिए है, वह वाणी निश्चित ही वाणियों में उत्तम है। ဧဝံ ဣမိဿာ ဂါထာယ ဗာဟုသစ္စံ, သိပ္ပံ, ဝိနယော သုသိက္ခိတော, သုဘာသိတာ ဝါစာတိ စတ္တာရိ မင်္ဂလာနိ ဝုတ္တာနိ. မင်္ဂလတ္တဉ္စ နေသံ တတ္ထ တတ္ထ ဝိဘာဝိတမေဝါတိ. इस प्रकार इस गाथा में—बहुश्रुत होना, शिल्प (कला), सुशिक्षित विनय और सुभाषित वाणी—ये चार मंगल कहे गए हैं। इनका मंगल होना उन-उन स्थानों पर स्पष्ट किया ही गया है। နိဋ္ဌိတာ ဗာဟုသစ္စဉ္စာတိ ဣမိဿာ ဂါထာယ အတ္ထဝဏ္ဏနာ. 'बाहुसच्चञ्च' इस गाथा की अर्थ-व्याख्या समाप्त हुई। မာတာပိတုဥပဋ္ဌာနန္တိဂါထာဝဏ္ဏနာ 'मातापितु उपट्ठानं' गाथा की व्याख्या। ၆. ဣဒါနိ [Pg.115] မာတာပိတုဥပဋ္ဌာနန္တိ ဧတ္ထ မာတု စ ပိတု စာတိ မာတာပိတု. ဥပဋ္ဌာနန္တိ ဥပဋ္ဌဟနံ. ပုတ္တာနဉ္စ ဒါရာနဉ္စာတိ ပုတ္တဒါရဿ သင်္ဂဏှနံ သင်္ဂဟော. န အာကုလာ အနာကုလာ. ကမ္မာနိ ဧဝ ကမ္မန္တာ. သေသံ ဝုတ္တနယမေဝါတိ အယံ ပဒဝဏ္ဏနာ. ६. अब 'मातापितु उपट्ठानं' यहाँ—माता और पिता 'माता-पिता' हैं। 'उपट्ठानं' का अर्थ है सेवा-सुश्रूषा करना। 'पुत्तदारस्स सङ्ग्रहो' का अर्थ है पुत्रों और पत्नी का संग्रह (भरण-पोषण) करना। जो व्याकुल (बाधित) नहीं हैं, वे 'अनाकुला' हैं। कर्म ही 'कम्मन्ता' (कर्मान्त/व्यवसाय) हैं। शेष व्याख्या पूर्वोक्त विधि के अनुसार ही है—यह पद-व्याख्या है। အတ္ထဝဏ္ဏနာ ပန ဧဝံ ဝေဒိတဗ္ဗာ – မာတာ နာမ ဇနိကာ ဝုစ္စတိ, တထာ ပိတာ. ဥပဋ္ဌာနံ နာမ ပါဒဓောဝနသမ္ဗာဟနုစ္ဆာဒနနှာပနေဟိ စတုပစ္စယသမ္ပဒါနေန စ ဥပကာရကရဏံ. တတ္ထ ယသ္မာ မာတာပိတရော ဗဟူပကာရာ ပုတ္တာနံ အတ္ထကာမာ အနုကမ္ပကာ, ယေ ပုတ္တကေ ဗဟိ ကီဠိတွာ ပံသုမက္ခိတသရီရကေ အာဂတေ ဒိသွာ ပံသုံ ပုဉ္ဆိတွာ မတ္ထကံ ဥပသိင်္ဃာယန္တာ ပရိစုမ္ဗန္တာ စ သိနေဟံ ဥပ္ပာဒေန္တိ, ဝဿသတမ္ပိ မာတာပိတရော သီသေန ပရိဟရန္တာ ပုတ္တာ တေသံ ပတိကာရံ ကာတုံ အသမတ္ထာ. ယသ္မာ စ တေ အာပါဒကာ ပေါသကာ ဣမဿ လောကဿ ဒဿေတာရော, ဗြဟ္မသမ္မတာ ပုဗ္ဗာစရိယသမ္မတာ, တသ္မာ တေသံ ဥပဋ္ဌာနံ ဣဓ ပသံသံ, ပေစ္စ သဂ္ဂသုခဉ္စ အာဝဟတိ. တေန မင်္ဂလန္တိ ဝုစ္စတိ. ဝုတ္တဉှေတံ ဘဂဝတာ – अर्थ-व्याख्या इस प्रकार समझनी चाहिए—जन्म देने वाली को 'माता' कहा जाता है, वैसे ही 'पिता' (जनक) को। सेवा (उपट्ठानं) का अर्थ है पैर धोना, मालिश करना, उबटन लगाना, स्नान कराना और चार प्रत्ययों (भोजन, वस्त्र, आवास, औषधि) को प्रदान कर उपकार करना। वहाँ चूँकि माता-पिता पुत्रों के लिए बहुत उपकारी, हित चाहने वाले और अनुकम्पा करने वाले होते हैं; जो पुत्रों को बाहर खेलकर धूल से सने शरीर के साथ आए हुए देखकर, धूल पोंछकर, सिर सूंघकर और चूमकर स्नेह प्रकट करते हैं; सौ वर्षों तक भी यदि पुत्र माता-पिता को अपने सिर पर ढोए, तो भी वह उनका बदला चुकाने में समर्थ नहीं हो सकता। चूँकि वे जन्मदाता, पोषक और इस लोक को दिखाने वाले हैं, ब्रह्मा के समान माने गए हैं और प्रथम आचार्य माने गए हैं, इसलिए उनकी सेवा इस लोक में प्रशंसा और परलोक में स्वर्ग-सुख लाती है। इसलिए इसे मंगल कहा जाता है। भगवान द्वारा यह कहा भी गया है— ‘‘ဗြဟ္မာတိ မာတာပိတရော, ပုဗ္ဗာစရိယာတိ ဝုစ္စရေ; အာဟုနေယျာ စ ပုတ္တာနံ, ပဇာယ အနုကမ္ပကာ. माता-पिता को 'ब्रह्मा' कहा जाता है और 'पूर्वाचार्य' भी कहा जाता है; वे पुत्रों के लिए आहुति (पूजा) के योग्य हैं और अपनी संतान पर अनुकम्पा करने वाले हैं। ‘‘တသ္မာ ဟိ နေ နမဿေယျ, သက္ကရေယျ စ ပဏ္ဍိတော; အန္နေန အထ ပါနေန, ဝတ္ထေန သယနေန စ; ဥစ္ဆာဒနေန နှာပနေန, ပါဒါနံ ဓောဝနေန စ. इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को उन्हें नमस्कार करना चाहिए और उनका सत्कार करना चाहिए; अन्न से, पेय से, वस्त्र से, शय्या से, उबटन लगाने से, स्नान कराने से और पैर धोने से। ‘‘တာယ နံ ပါရိစရိယာယ, မာတာပိတူသု ပဏ္ဍိတာ; ဣဓေဝ နံ ပသံသန္တိ, ပေစ္စ သဂ္ဂေ ပမောဒတီ’’တိ. (ဣတိဝု. ၁၀၆; ဇာ. ၂.၂၀.၁၈၁-၁၈၃); माता-पिता की उस सेवा के कारण, बुद्धिमान लोग इसी लोक में उसकी प्रशंसा करते हैं और परलोक में वह स्वर्ग में आनंदित होता है। အပရော နယော – ဥပဋ္ဌာနံ နာမ ဘရဏကိစ္စကရဏကုလဝံသဋ္ဌပနာဒိပဉ္စဝိဓံ, တံ ပါပနိဝါရဏာဒိပဉ္စဝိဓဒိဋ္ဌဓမ္မိကဟိတသုခဟေတုတော မင်္ဂလန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ဝုတ္တဉှေတံ ဘဂဝတာ – एक अन्य विधि—सेवा (उपट्ठानं) पाँच प्रकार की है: भरण-पोषण करना, उनके कार्यों को करना, कुल-वंश को बनाए रखना आदि। उसे पाप से रोकना आदि पाँच प्रकार के दृष्टधर्म (इसी जन्म) के हित-सुख का हेतु होने के कारण मंगल समझना चाहिए। भगवान द्वारा यह कहा भी गया है— ‘‘‘ပဉ္စဟိ ခေါ, ဂဟပတိပုတ္တ, ဌာနေဟိ ပုတ္တေန ပုရတ္ထိမာ ဒိသာ မာတာပိတရော ပစ္စုပဋ္ဌာတဗ္ဗာ ဘတော နေ ဘရိဿာမိ, ကိစ္စံ နေသံ ကရိဿာမိ[Pg.116], ကုလဝံသံ ဌပေဿာမိ, ဒါယဇ္ဇံ ပဋိပဇ္ဇိဿာမိ, အထ ဝါ ပန ပေတာနံ ကာလကတာနံ ဒက္ခိဏံ အနုပ္ပဒဿာမီ’တိ. ဣမေဟိ ခေါ, ဂဟပတိပုတ္တ, ပဉ္စဟိ ဌာနေဟိ ပုတ္တေန ပုရတ္ထိမာ ဒိသာ မာတာပိတရော ပစ္စုပဋ္ဌိတာ ပဉ္စဟိ ဌာနေဟိ ပုတ္တံ အနုကမ္ပန္တိ, ပါပါ နိဝါရေန္တိ, ကလျာဏေ နိဝေသေန္တိ, သိပ္ပံ သိက္ခာပေန္တိ, ပတိရူပေန ဒါရေန သံယောဇေန္တိ, သမယေ ဒါယဇ္ဇံ နိယျာဒေန္တီ’’တိ (ဒီ. နိ. ၃.၂၆၇). हे गृहपतिपुत्र! पुत्र को पाँच कारणों से पूर्व दिशा के समान माता-पिता की सेवा करनी चाहिए— 'उन्होंने मेरा पालन-पोषण किया है, मैं उनका भरण-पोषण करूँगा; मैं उनके कार्यों को करूँगा; मैं कुल-वंश को बनाए रखूँगा; मैं उत्तराधिकार (दायज) को प्राप्त करूँगा; अथवा परलोक सिधारे हुए माता-पिता के निमित्त दान (दक्षिणा) दूँगा।' हे गृहपतिपुत्र! इन पाँच कारणों से पुत्र द्वारा सेवा किए जाने पर माता-पिता भी पाँच कारणों से पुत्र पर अनुकम्पा करते हैं— वे उसे पाप से रोकते हैं, कल्याणकारी कार्यों में लगाते हैं, शिल्प (विद्या) सिखाते हैं, योग्य जीवनसाथी से जोड़ते हैं और समय आने पर उत्तराधिकार सौंपते हैं। အပိစ ယော မာတာပိတရော တီသု ဝတ္ထူသု ပသာဒုပ္ပာဒနေန, သီလသမာဒါပနေန, ပဗ္ဗဇ္ဇာယ ဝါ ဥပဋ္ဌဟတိ, အယံ မာတာပိတုဥပဋ္ဌာကာနံ အဂ္ဂေါ. တဿ တံ မာတာပိတုဥပဋ္ဌာနံ မာတာပိတူဟိ ကတဿ ဥပကာရဿ ပစ္စုပကာရဘူတံ အနေကေသံ ဒိဋ္ဌဓမ္မိကာနံ သမ္ပရာယိကာနဉ္စ အတ္ထာနံ ပဒဋ္ဌာနတော မင်္ဂလန္တိ ဝုစ္စတိ. इसके अतिरिक्त, जो पुत्र माता-पिता को तीन रत्नों (बुद्ध, धम्म, संघ) में श्रद्धा उत्पन्न कराकर, उन्हें शील ग्रहण कराकर, अथवा प्रव्रज्या दिलाकर उनकी सेवा करता है, वह माता-पिता के सेवकों में श्रेष्ठ है। माता-पिता की वह सेवा, उनके द्वारा किए गए उपकारों का प्रत्युपकार होने के कारण और अनेक दृष्टधार्मिक (वर्तमान) तथा साम्परायिक (परलोक) लाभों का मूल कारण होने के कारण 'मंगल' कही जाती है। ပုတ္တဒါရဿာတိ ဧတ္ထ အတ္တတော ဇာတာ ပုတ္တာပိ ဓီတရောပိ ပုတ္တာဣစ္စေဝ သင်္ချံ ဂစ္ဆန္တိ. ဒါရာတိ ဝီသတိယာ ဘရိယာနံ ယာ ကာစိ ဘရိယာ. ပုတ္တာ စ ဒါရာ စ ပုတ္တဒါရံ, တဿ ပုတ္တဒါရဿ. သင်္ဂဟောတိ သမ္မာနနာဒီဟိ ဥပကာရကရဏံ. တံ သုသံဝိဟိတကမ္မန္တတာဒိဒိဋ္ဌဓမ္မိကဟိတသုခဟေတုတော မင်္ဂလန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ဝုတ္တဉှေတံ ဘဂဝတာ – ‘‘ပစ္ဆိမာ ဒိသာ ပုတ္တဒါရာ ဝေဒိတဗ္ဗာ’’တိ ဧတ္ထ ဥဒ္ဒိဋ္ဌံ ပုတ္တဒါရံ ဘရိယာသဒ္ဒေန သင်္ဂဏှိတွာ ‘‘ပဉ္စဟိ ခေါ, ဂဟပတိပုတ္တ, ဌာနေဟိ သာမိကေန ပစ္ဆိမာ ဒိသာ ဘရိယာ ပစ္စုပဋ္ဌာတဗ္ဗာ သမ္မာနနာယ, အနဝမာနနာယ, အနတိ စရိယာယ, ဣဿရိယဝေါဿဂ္ဂေန, အလင်္ကာရာနုပ္ပဒါနေန. ဣမေဟိ ခေါ, ဂဟပတိပုတ္တ, ပဉ္စဟိ ဌာနေဟိ သာမိကေန ပစ္ဆိမာ ဒိသာ ဘရိယာ ပစ္စုပဋ္ဌိတာ ပဉ္စဟိ ဌာနေဟိ သာမိကံ အနုကမ္ပတိ, သုသံဝိဟိတကမ္မန္တာ စ ဟောတိ, သင်္ဂဟိတပရိဇနာ စ, အနတိစာရိနီ စ, သမ္ဘတဉ္စ အနုရက္ခတိ ဒက္ခာ စ ဟောတိ အနလသာ သဗ္ဗကိစ္စေသူ’’တိ (ဒီ. နိ. ၃.၂၆၉). 'पुत्तदारस्स' (पुत्र और पत्नी) यहाँ स्वयं से उत्पन्न पुत्र और पुत्रियाँ दोनों ही 'पुत्र' शब्द के अंतर्गत आते हैं। 'दार' का अर्थ बीस प्रकार की पत्नियों में से कोई भी पत्नी है। पुत्र और पत्नी 'पुत्तदार' कहलाते हैं। 'संगहो' का अर्थ सम्मान आदि के द्वारा उनकी सहायता करना है। उसे सुव्यवस्थित कार्य आदि के माध्यम से वर्तमान जीवन में हित और सुख का कारण होने से 'मंगल' समझना चाहिए। भगवान ने कहा भी है— 'पश्चिम दिशा को पुत्र और पत्नी समझना चाहिए।' यहाँ 'पुत्तदार' शब्द में पत्नी शब्द को सम्मिलित करते हुए कहा गया है— 'हे गृहपतिपुत्र! पति को पाँच कारणों से पश्चिम दिशा के समान पत्नी की सेवा करनी चाहिए— सम्मान देकर, अपमान न करके, व्यभिचार न करके, ऐश्वर्य (घर का अधिकार) सौंपकर और आभूषण आदि प्रदान करके। हे गृहपतिपुत्र! इन पाँच कारणों से पति द्वारा सेवा की गई पत्नी भी पाँच कारणों से पति पर अनुकम्पा करती है— वह कार्यों को सुव्यवस्थित ढंग से करती है, परिजनों का संग्रह (देखभाल) करती है, व्यभिचार नहीं करती, पति द्वारा संचित धन की रक्षा करती है और सभी कार्यों में दक्ष तथा आलस्य रहित होती है।' အယံ ဝါ အပရော နယော – သင်္ဂဟောတိ ဓမ္မိကာဟိ ဒါနပိယဝါစာတ္ထစရိယာဟိ သင်္ဂဏှနံ. သေယျထိဒံ – ဥပေါသထဒိဝသေသု ပရိဗ္ဗယဒါနံ, နက္ခတ္တဒိဝသေသု နက္ခတ္တဒဿာပနံ, မင်္ဂလဒိဝသေသု မင်္ဂလကရဏံ, ဒိဋ္ဌဓမ္မိကသမ္ပရာယိကေသု အတ္ထေသု ဩဝါဒါနုသာသနန္တိ. တံ ဝုတ္တနယေနေဝ ဒိဋ္ဌဓမ္မိကဟိတဟေတုတော သမ္ပရာယိကဟိတဟေတုတော ဒေဝတာဟိပိ နမဿနီယဘာဝဟေတုတော စ မင်္ဂလန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ယထာဟ သက္ကော ဒေဝါနမိန္ဒော – अथवा यह दूसरा तरीका है— 'संग्रह' का अर्थ धार्मिक दान, प्रिय वचन और अर्थचर्या (परोपकार) के माध्यम से सहायता करना है। जैसे कि— उपोसथ के दिनों में भोजन आदि का दान देना, उत्सव के दिनों में उत्सव दिखाना, मांगलिक दिनों में मंगल कार्य करना, और वर्तमान तथा परलोक संबंधी विषयों में उपदेश और शिक्षा देना। उसे पूर्वोक्त विधि से ही वर्तमान हित का कारण, परलोक हित का कारण और देवताओं द्वारा भी पूजनीय होने के कारण 'मंगल' समझना चाहिए। जैसा कि देवराज शक्र ने कहा है— ‘‘ယေ [Pg.117] ဂဟဋ္ဌာ ပုညကရာ, သီလဝန္တော ဥပါသကာ; ဓမ္မေန ဒါရံ ပေါသေန္တိ, တေ နမဿာမိ မာတလီ’’တိ. (သံ.နိ.၁.၁.၂၆၄); 'हे मातलि! जो गृहस्थ पुण्य करने वाले, शीलवान उपासक हैं और धर्मपूर्वक अपनी पत्नी का भरण-पोषण करते हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।' အနာကုလာ ကမ္မန္တာ နာမ ကာလညုတာယ ပတိရူပကာရိတာယ အနလသတာယ ဥဋ္ဌာနဝီရိယသမ္ပဒါယ, အဗျသနီယတာယ စ ကာလာတိက္ကမနအပ္ပတိရူပကရဏသိထိလကရဏာဒိအာကုလဘာဝဝိရဟိတာ ကသိဂေါရက္ခဝါဏိဇ္ဇာဒယော ကမ္မန္တာ. ဧတေ အတ္တနော ဝါ ပုတ္တဒါရဿ ဝါ ဒါသကမ္မကရာနံ ဝါ ဗျတ္တတာယ ဧဝံ ပယောဇိတာ ဒိဋ္ဌေဝ ဓမ္မေ ဓနဓညဝုဒ္ဓိပဋိလာဘဟေတုတော မင်္ဂလန္တိ ဝုစ္စန္တိ. ဝုတ္တဉှေတံ ဘဂဝတာ – 'अनाकुल कर्म' का अर्थ है— समय की पहचान, उचित कार्य करने की प्रवृत्ति, आलस्य का अभाव, उत्साह और वीर्य की संपन्नता तथा बिना किसी विनाश के कार्यों को करना। जो कार्य समय बीत जाने पर करने, अनुचित ढंग से करने या शिथिलता से करने आदि व्याकुलताओं से रहित हों, जैसे कृषि, गोपालन, व्यापार आदि, वे 'कर्म' कहलाते हैं। ये कार्य स्वयं के लिए, पुत्र-पत्नी के लिए या दास-कर्मकारों के लिए निपुणता के साथ इस प्रकार किए जाने पर, वर्तमान जीवन में ही धन-धान्य की वृद्धि और प्राप्ति का कारण होने से 'मंगल' कहे जाते हैं। भगवान ने कहा भी है— ‘‘ပတိရူပကာရီ ဓုရဝါ, ဥဋ္ဌာတာ ဝိန္ဒတေ ဓန’’န္တိ စ (သု. နိ. ၁၈၅; သံ. နိ. ၁.၂၄၆). 'उचित कार्य करने वाला, धैर्यवान और पुरुषार्थी व्यक्ति धन प्राप्त करता है।' ‘‘န ဒိဝါ သောပ္ပသီလေန, ရတ္တိမုဋ္ဌာနဒေဿိနာ; နိစ္စံ မတ္တေန သောဏ္ဍေန, သက္ကာ အာဝသိတုံ ဃရံ. जो दिन में सोने वाला है, रात में उठने (जागने) से द्वेष करने वाला है, और जो सदा मदमत्त तथा शराबी है, वह घर (गृहस्थी) नहीं चला सकता। ‘‘အတိသီတံ အတိဥဏှံ, အတိသာယမိဒံ အဟု; ဣတိ ဝိဿဋ္ဌကမ္မန္တေ, အတ္ထာ အစ္စေန္တိ မာဏဝေ. 'बहुत ठंड है, बहुत गर्मी है, बहुत देर हो गई है'— इस प्रकार कहकर जो अपने कार्यों को छोड़ देते हैं, उन युवकों के अवसर (लाभ) हाथ से निकल जाते हैं। ‘‘ယောဓ သီတဉ္စ ဥဏှဉ္စ, တိဏာ ဘိယျော န မညတိ; ကရံ ပုရိသကိစ္စာနိ, သော သုခံ န ဝိဟာယတီ’’တိ. (ဒီ. နိ. ၃.၂၅၃); किन्तु जो व्यक्ति सर्दी और गर्मी को घास के तिनके से अधिक नहीं मानता और अपने पुरुषोचित कर्तव्यों को करता है, वह सुख से कभी वंचित नहीं होता। ‘‘ဘောဂေ သံဟရမာနဿ, ဘမရဿေဝ ဣရီယတော; ဘောဂါ သန္နိစယံ ယန္တိ, ဝမ္မိကောဝူပစီယတီ’’တိ. စ ဧဝမာဒိ (ဒီ. နိ. ၃.၂၆၅); भ्रमर (मधुमक्खी) के समान धन संचित करने वाले व्यक्ति का भोग (संपत्ति) उसी प्रकार बढ़ता है जैसे दीमक की बांबी (वम्मीक) धीरे-धीरे संचित होकर बड़ी हो जाती है— इत्यादि कहा गया है। ဧဝံ ဣမိဿာ ဂါထာယ မာတုဥပဋ္ဌာနံ, ပိတုဥပဋ္ဌာနံ, ပုတ္တဒါရဿ သင်္ဂဟော, အနာကုလာ စ ကမ္မန္တာတိ စတ္တာရိ မင်္ဂလာနိ ဝုတ္တာနိ, ပုတ္တဒါရဿ သင်္ဂဟံ ဝါ ဒွိဓာ ကတွာ ပဉ္စ, မာတာပိတုဥပဋ္ဌာနံ ဝါ ဧကမေဝ ကတွာ တီဏိ. မင်္ဂလတ္တဉ္စ နေသံ တတ္ထ တတ္ထ ဝိဘာဝိတမေဝါတိ. इस प्रकार इस गाथा में— माता की सेवा, पिता की सेवा, पुत्र-पत्नी की सहायता और अनाकुल कर्म— ये चार मंगल कहे गए हैं। अथवा 'पुत्र-पत्नी की सहायता' पद को दो भागों में बाँटकर पाँच मंगल, या 'माता-पिता की सेवा' को एक मानकर तीन मंगल कहे गए हैं। इनका मंगल होना उन-उन स्थानों पर स्पष्ट किया ही गया है। နိဋ္ဌိတာ မာတာပိတုဥပဋ္ဌာနန္တိ ဣမိဿာ ဂါထာယ အတ္ထဝဏ္ဏနာ. 'माता-पिता की सेवा' (मातापितु उपट्ठानं) इस गाथा की अर्थ-व्याख्या समाप्त हुई। ဒါနဉ္စာတိဂါထာဝဏ္ဏနာ 'दानञ्च' (दान और...) गाथा की व्याख्या। ၇. ဣဒါနိ ဒါနဉ္စာတိ ဧတ္ထ ဒီယတေ ဣမိနာတိ ဒါနံ, အတ္တနော သန္တကံ ပရဿ ပဋိပါဒီယတီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဓမ္မဿ စရိယာ, ဓမ္မာ ဝါ အနပေတာ စရိယာ [Pg.118] ဓမ္မစရိယာ. ဉာယန္တေ ‘‘အမှာကံ ဣမေ’’တိ ဉာတကာ. န အဝဇ္ဇာနိ အနဝဇ္ဇာနိ, အနိန္ဒိတာနိ အဂရဟိတာနီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. သေသံ ဝုတ္တနယမေဝါတိ အယံ ပဒဝဏ္ဏနာ. ७. अब 'दानञ्च' यहाँ— जिसके द्वारा दिया जाता है वह 'दान' है; इसका अर्थ है अपनी वस्तु दूसरे को सौंपना। धर्म का आचरण 'धम्मचरिया' है, अथवा धर्म से विमुख न होकर आचरण करना 'धम्मचरिया' है। 'ये हमारे हैं'— इस प्रकार जो जाने जाते हैं, वे 'ज्ञातक' (रिश्तेदार) हैं। जो दोषपूर्ण नहीं हैं वे 'अनवज्ज' हैं; इसका अर्थ है जो परोक्ष में निंदनीय न हों और प्रत्यक्ष में भी तिरस्कृत न हों। शेष व्याख्या पूर्वोक्त विधि के अनुसार ही है— यह पदों की व्याख्या है। အတ္ထဝဏ္ဏနာ ပန ဧဝံ ဝေဒိတဗ္ဗာ – ဒါနံ နာမ ပရံ ဥဒ္ဒိဿ သုဗုဒ္ဓိပုဗ္ဗိကာ အန္နာဒိဒသဒါနဝတ္ထုပရိစ္စာဂစေတနာ, တံသမ္ပယုတ္တော ဝါ အလောဘော. အလောဘေန ဟိ တံ ဝတ္ထုံ ပရဿ ပဋိပါဒေတိ, တေန ဝုတ္တံ ‘‘ဒီယတေ ဣမိနာတိ ဒါန’’န္တိ. တံ ဗဟုဇနပိယမနာပတာဒီနံ ဒိဋ္ဌဓမ္မိကသမ္ပရာယိကာနံ ဖလဝိသေသာနံ အဓိဂမဟေတုတော မင်္ဂလန္တိ ဝုစ္စတိ. ‘‘ဒါယကော, သီဟ ဒါနပတိ, ဗဟုနော ဇနဿ ပိယော ဟောတိ မနာပေါ’’တိ ဧဝမာဒီနိ (အ. နိ. ၅.၃၄) စေတ္ထ သုတ္တာနိ အနုဿရိတဗ္ဗာနိ. अर्थ-वर्णन इस प्रकार समझना चाहिए - 'दान' का अर्थ है दूसरों के उद्देश्य से, उत्तम प्रज्ञा को आगे रखकर, अन्न आदि दस प्रकार की दान-वस्तुओं के त्याग की चेतना, अथवा उससे युक्त अलोभ। अलोभ के कारण ही वह वस्तु दूसरे को प्रदान की जाती है, इसलिए कहा गया है - 'जिसके द्वारा दिया जाता है, वह दान है।' वह बहुत से लोगों का प्रिय और मनभावन होने आदि के कारण, तथा इहलोक और परलोक के विशिष्ट फलों की प्राप्ति का हेतु होने के कारण 'मंगल' कहा जाता है। 'हे सीह सेनापति! दान देने वाला व्यक्ति बहुत से लोगों का प्रिय और मनभावन होता है' - इस प्रकार के सूत्रों का यहाँ स्मरण करना चाहिए। အပရော နယော – ဒါနံ နာမ ဒုဝိဓံ အာမိသဒါနံ, ဓမ္မဒါနဉ္စ, တတ္ထ အာမိသဒါနံ ဝုတ္တပ္ပကာရမေဝ. ဣဓလောကပရလောကဒုက္ခက္ခယသုခါဝဟဿ ပန သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓပ္ပဝေဒိတဿ ဓမ္မဿ ပရေသံ ဟိတကာမတာယ ဒေသနာ ဓမ္မဒါနံ , ဣမေသဉ္စ ဒွိန္နံ ဒါနာနံ ဧတဒေဝ အဂ္ဂံ. ယထာဟ – दूसरा प्रकार - दान दो प्रकार का है: आमिष-दान और धम्म-दान। उनमें से आमिष-दान पूर्वोक्त प्रकार का ही है। इस लोक और परलोक के दुखों का क्षय कर सुख पहुँचाने वाले, सम्यक सम्बुद्ध द्वारा उपदिष्ट धर्म का दूसरों के हित की कामना से उपदेश देना 'धम्म-दान' है। इन दोनों दानों में यही (धम्म-दान) श्रेष्ठ है। जैसा कि कहा गया है - ‘‘သဗ္ဗဒါနံ ဓမ္မဒါနံ ဇိနာတိ,သဗ္ဗရသံ ဓမ္မရသော ဇိနာတိ; သဗ္ဗရတိံ ဓမ္မရတိ ဇိနာတိ,တဏှက္ခယော သဗ္ဗဒုက္ခံ ဇိနာတီ’’တိ. (ဓ. ပ. ၃၅၄); 'सब दानों में धम्म-दान श्रेष्ठ है; सब रसों में धम्म-रस श्रेष्ठ है; सब रतियों (आनंद) में धम्म-रति श्रेष्ठ है; तृष्णा का क्षय सब दुखों को जीत लेता है।' တတ္ထ အာမိသဒါနဿ မင်္ဂလတ္တံ ဝုတ္တမေဝ. ဓမ္မဒါနံ ပန ယသ္မာ အတ္ထပဋိသံဝေဒိတာဒီနံ ဂုဏာနံ ပဒဋ္ဌာနံ, တသ္မာ မင်္ဂလန္တိ ဝုစ္စတိ. ဝုတ္တဉှေတံ ဘဂဝတာ – वहाँ आमिष-दान का मंगल-स्वरूप तो कहा ही जा चुका है। धम्म-दान क्योंकि अर्थ-प्रतिसंवेदिता (अर्थ का अनुभव) आदि गुणों का पदस्थान (मुख्य कारण) है, इसलिए उसे 'मंगल' कहा जाता है। भगवान द्वारा यह कहा गया है - ‘‘ယထာ ယထာ, ဘိက္ခဝေ, ဘိက္ခု ယထာသုတံ ယထာပရိယတ္တံ ဓမ္မံ ဝိတ္ထာရေန ပရေသံ ဒေသေတိ, တထာ တထာ သော တသ္မိံ ဓမ္မေ အတ္ထပဋိသံဝေဒီ စ ဟောတိ ဓမ္မပဋိသံဝေဒီ စာ’’တိ ဧဝမာဒိ (အ. နိ. ၅.၂၆). 'हे भिक्षुओं! जैसे-जैसे भिक्षु सुने हुए और सीखे हुए धर्म का विस्तार से दूसरों को उपदेश देता है, वैसे-वैसे वह उस धर्म में अर्थ-प्रतिसंवेदी (अर्थ को जानने वाला) और धर्म-प्रतिसंवेदी होता है।' ဓမ္မစရိယာ နာမ ဒသကုသလကမ္မပထစရိယာ. ယထာဟ – ‘‘တိဝိဓာ ခေါ ဂဟပတယော ကာယေန ဓမ္မစရိယာ သမစရိယာ ဟောတီ’’တိ ဧဝမာဒိ. သာ ပနေသာ ဓမ္မစရိယာ သဂ္ဂလောကူပပတ္တိဟေတုတော မင်္ဂလန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ဝုတ္တဉှေတံ ဘဂဝတာ – ‘‘ဓမ္မစရိယာသမစရိယာဟေတု ခေါ ဂဟပတယော ဧဝမိဓေကစ္စေ သတ္တာ ကာယဿ ဘေဒါ ပရံ မရဏာ သုဂတိံ သဂ္ဂံ လောကံ ဥပပဇ္ဇန္တီ’’တိ (မ. နိ. ၁.၄၃၉). 'धम्म-चरिया' का अर्थ है दस कुशल कर्मपथों का आचरण। जैसा कि कहा गया है - 'हे गृहपतियों! कायिक धर्म-चर्या और सम-चर्या तीन प्रकार की होती है।' वह यह धर्म-चर्या स्वर्ग-लोक में उत्पत्ति का हेतु होने के कारण 'मंगल' समझनी चाहिए। भगवान द्वारा यह कहा गया है - 'हे गृहपतियों! धर्म-चर्या और सम-चर्या के कारण ही यहाँ कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग-लोक में उत्पन्न होते हैं।' ဉာတကာ [Pg.119] နာမ မာတိတော ဝါ ပိတိတော ဝါ ယာဝ သတ္တမာ ပိတာမဟယုဂါ သမ္ဗန္ဓာ. တေသံ ဘောဂပါရိဇုညေန ဝါ ဗျာဓိပါရိဇုညေန ဝါ အဘိဟတာနံ အတ္တနော သမီပံ အာဂတာနံ ယထာဗလံ ဃာသစ္ဆာဒနဓနဓညာဒီဟိ သင်္ဂဟော ပသံသာဒီနံ ဒိဋ္ဌဓမ္မိကာနံ သုဂတိဂမနာဒီနဉ္စ သမ္ပရာယိကာနံ ဝိသေသာဓိဂမာနံ ဟေတုတော မင်္ဂလန္တိ ဝုစ္စတိ. 'ज्ञाति' (रिश्तेदार) का अर्थ है माता या पिता की ओर से सातवीं पीढ़ी तक के संबंधी। धन की हानि या रोग से पीड़ित होकर अपने पास आए हुए उन संबंधियों का अपनी शक्ति के अनुसार भोजन, वस्त्र, धन-धान्य आदि से संग्रह (सहायता) करना, प्रशंसा आदि इहलोकिक लाभों और सुगति-गमन आदि पारलौकिक विशिष्ट प्राप्तियों का हेतु होने के कारण 'मंगल' कहा जाता है। အနဝဇ္ဇာနိ ကမ္မာနိ နာမ ဥပေါသထင်္ဂသမာဒါနဝေယျာဝစ္စကရဏအာရာမဝနရောပနသေတုကရဏာဒီနိ ကာယဝစီမနောသုစရိတကမ္မာနိ. တာနိ ဟိ နာနပ္ပကာရဟိတသုခါဓိဂမဟေတုတော မင်္ဂလန္တိ ဝုစ္စန္တိ. ‘‘ဌာနံ ခေါ ပနေတံ, ဝိသာခေ, ဝိဇ္ဇတိ ယံ ဣဓေကစ္စော ဣတ္ထီ ဝါ ပုရိသော ဝါ အဋ္ဌင်္ဂသမန္နာဂတံ ဥပေါသထံ ဥပဝသိတွာ ကာယဿ ဘေဒါ ပရံ မရဏာ စာတုမဟာရာဇိကာနံ ဒေဝါနံ သဟဗျတံ ဥပပဇ္ဇေယျာ’’တိ ဧဝမာဒီနိ စေတ္ထ သုတ္တာနိ (အ. နိ. ၈.၄၃) အနုဿရိတဗ္ဗာနိ. 'अनवद्य कर्म' (निर्दोष कार्य) का अर्थ है उपोसथ के अंगों को ग्रहण करना, वैयावृत्य (सेवा) करना, आराम (विहार) और वन लगाना, पुल बनाना आदि कायिक, वाचिक और मानसिक सुचरित कर्म। वे विभिन्न प्रकार के हित और सुख की प्राप्ति के हेतु होने के कारण 'मंगल' कहे जाते हैं। 'हे विशाखा! यह संभव है कि यहाँ कोई स्त्री या पुरुष आठ अंगों से युक्त उपोसथ का पालन कर, शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, चातुमहाराजिक देवों के साथ उत्पन्न हो' - इस प्रकार के सूत्रों का यहाँ स्मरण करना चाहिए। ဧဝံ ဣမိဿာ ဂါထာယ ဒါနဉ္စ, ဓမ္မစရိယာ စ, ဉာတကာနဉ္စ သင်္ဂဟော, အနဝဇ္ဇာနိ ကမ္မာနီတိ စတ္တာရိ မင်္ဂလာနိ ဝုတ္တာနိ. မင်္ဂလတ္တဉ္စ နေသံ တတ္ထ တတ္ထ ဝိဘာဝိတမေဝါတိ. इस प्रकार इस गाथा में - दान, धर्म-चर्या, ज्ञातियों का संग्रह और अनवद्य कर्म - ये चार मंगल कहे गए हैं। इनका मंगल-स्वरूप उन-उन स्थानों पर स्पष्ट किया ही गया है। နိဋ္ဌိတာ ဒါနဉ္စာတိ ဣမိဿာ ဂါထာယ အတ္ထဝဏ္ဏနာ. 'दानञ्च' इस गाथा का अर्थ-वर्णन समाप्त हुआ। အာရတီတိဂါထာဝဏ္ဏနာ 'आरती' गाथा का वर्णन। ၈. ဣဒါနိ အာရတီ ဝိရတီတိ ဧတ္ထ အာရတီတိ အာရမဏံ, ဝိရတီတိ ဝိရမဏံ, ဝိရမန္တိ ဝါ ဧတာယ သတ္တာတိ ဝိရတိ. ပါပါတိ အကုသလာ. မဒနီယဋ္ဌေန မဇ္ဇံ, မဇ္ဇဿ ပါနံ မဇ္ဇပါနံ, တတော မဇ္ဇပါနာ. သံယမနံ သံယမော အပ္ပမဇ္ဇနံ အပ္ပမာဒေါ. ဓမ္မေသူတိ ကုသလေသု. သေသံ ဝုတ္တနယမေဝါတိ အယံ ပဒဝဏ္ဏနာ. ८. अब 'आरती विरती' यहाँ - 'आरती' का अर्थ है विरक्त होना (हटना), 'विरती' का अर्थ है विशेष रूप से विरक्त होना, अथवा जिसके द्वारा प्राणी (पाप से) विरत होते हैं, वह 'विरती' है। 'पापा' का अर्थ है अकुशल कर्म। मदमत्त करने के अर्थ में 'मज्ज' (मदिरा) है, मदिरा का पान 'मज्जपान' है, उस मद्यपान से (विरत होना)। 'संयमन' ही 'संयम' है, 'अप्रमाद' ही 'अप्पमाद' है। 'धम्मेसु' का अर्थ है कुशल धर्मों में। शेष अर्थ पूर्वोक्त रीति से ही है - यह पद-वर्णन है। အတ္ထဝဏ္ဏနာ ပန ဧဝံ ဝေဒိတဗ္ဗာ – အာရတိ နာမ ပါပေ အာဒီနဝဒဿာဝိနော မနသာ ဧဝ အနဘိရတိ. ဝိရတိ နာမ ကမ္မဒွါရဝသေန ကာယဝါစာဟိ ဝိရမဏံ, သာ စေသာ ဝိရတိ နာမ သမ္ပတ္တဝိရတိ, သမာဒါနဝိရတိ, သမုစ္ဆေဒဝိရတီတိ တိဝိဓာ ဟောတိ, တတ္ထ ယာ ကုလပုတ္တဿ အတ္တနော ဇာတိံ ဝါ ကုလံ ဝါ ဂေါတ္တံ ဝါ ပဋိစ္စ ‘‘န မေ ဧတံ ပတိရူပံ, ယွာဟံ [Pg.120] ဣမံ ပါဏံ ဟနေယျံ, အဒိန္နံ အာဒိယေယျ’’န္တိအာဒိနာ နယေန သမ္ပတ္တဝတ္ထုတော ဝိရတိ, အယံ သမ္ပတ္တဝိရတိ နာမ. သိက္ခာပဒသမာဒါနဝသေန ပဝတ္တာ သမာဒါနဝိရတိ နာမ, ယဿာ ပဝတ္တိတော ပဘုတိ ကုလပုတ္တော ပါဏာတိပါတာဒီနိ န ကရောတိ. အရိယမဂ္ဂသမ္ပယုတ္တာ သမုစ္ဆေဒဝိရတိ နာမ, ယဿာ ပဝတ္တိတော ပဘုတိ အရိယသာဝကဿ ပဉ္စ ဘယာနိ ဝေရာနိ ဝူပသန္တာနိ ဟောန္တိ. ပါပံ နာမ ယံ တံ ‘‘ပါဏာတိပါတော ခေါ, ဂဟပတိပုတ္တ, ကမ္မကိလေသော, အဒိန္နာဒါနံ…ပေ… ကာမေသုမိစ္ဆာစာရော…ပေ… မုသာဝါဒေါ’’တိ ဧဝံ ဝိတ္ထာရေတွာ – अर्थ-वर्णन इस प्रकार समझना चाहिए - पाप में दोष देखने वाले व्यक्ति की मन से ही जो अरुचि होती है, वह 'आरती' है। कर्म-द्वारों के वश से काया और वाणी द्वारा जो विरति (निवृत्ति) है, वह 'विरती' है। वह विरती तीन प्रकार की होती है - सम्पत्त-विरति, समादान-विरति और समुच्छेद-विरति। उनमें से, किसी कुलपुत्र द्वारा अपनी जाति, कुल या गोत्र का विचार कर 'मेरे लिए यह उचित नहीं है कि मैं प्राणी की हत्या करूँ या बिना दिया हुआ धन लूँ' - इस प्रकार प्राप्त वस्तु से जो विरति होती है, वह 'सम्पत्त-विरति' है। शिक्षापदों को ग्रहण करने के कारण जो विरति होती है, वह 'समादान-विरति' है, जिसके होने के बाद से कुलपुत्र प्राणातिपात आदि नहीं करता। आर्यमार्ग से युक्त विरति 'समुच्छेद-विरति' है, जिसके होने के बाद से आर्यश्रावक के पाँचों भय और वैर शांत हो जाते हैं। 'पाप' क्या है? 'हे गृहपति-पुत्र! प्राणातिपात कर्म-क्लेश है, अदत्तादान... पे... काम-मिथ्याचार... पे... मृषावाद' - इस प्रकार विस्तार से - ‘‘ပါဏာတိပါတော အဒိန္နာဒါနံ, မုသာဝါဒေါ စ ဝုစ္စတိ; ပရဒါရဂမနဉ္စေဝ, နပ္ပသံသန္တိ ပဏ္ဍိတာ’’တိ. (ဒီ. နိ. ၃.၂၄၅) – 'प्राणातिपात, अदत्तादान, मृषावाद और परस्त्री-गमन - इनकी विद्वान प्रशंसा नहीं करते।' ဧဝံ ဂါထာယ သင်္ဂဟိတံ ကမ္မကိလေသသင်္ခါတံ စတုဗ္ဗိဓံ အကုသလံ, တတော ပါပါ. သဗ္ဗာပေသာ အာရတိ စ ဝိရတိ စ ဒိဋ္ဌဓမ္မိကသမ္ပရာယိကဘယဝေရပ္ပဟာနာဒိနာနပ္ပကာရဝိသေသာဓိဂမဟေတုတော မင်္ဂလန္တိ ဝုစ္စတိ. ‘‘ပါဏာတိပါတာ ပဋိဝိရတော ခေါ, ဂဟပတိပုတ္တ, အရိယသာဝကော’’တိအာဒီနိ စေတ္ထ သုတ္တာနိ အနုဿရိတဗ္ဗာနိ. इस प्रकार गाथा में संगृहीत, 'कर्म-क्लेश' कहे जाने वाले चार प्रकार के अकुशल से, उस पाप से (विरत होना)। यह सब 'आरति' और 'विरति' है, जो इस लोक और परलोक के भय और वैर के त्याग आदि अनेक प्रकार के विशेष लाभों की प्राप्ति का कारण होने से 'मङ्गल' कही जाती है। यहाँ "हे गृहपतिपुत्र! आर्यश्रावक प्राणातिपात से विरत होता है" आदि सूत्रों का स्मरण करना चाहिए। မဇ္ဇပါနာ သံယမော နာမ ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တသုရာမေရယမဇ္ဇပ္ပမာဒဋ္ဌာနာ ဝေရမဏိယာ ဧဝေတံ အဓိဝစနံ. ယသ္မာ ပန မဇ္ဇပါယီ အတ္ထံ န ဇာနာတိ, ဓမ္မံ န ဇာနာတိ, မာတု အန္တရာယံ ကရောတိ, ပိတု ဗုဒ္ဓပစ္စေကဗုဒ္ဓတထာဂတသာဝကာနမ္ပိ အန္တရာယံ ကရောတိ, ဒိဋ္ဌေဝ ဓမ္မေ ဂရဟံ သမ္ပရာယေ ဒုဂ္ဂတိံ အပရာပရိယေ ဥမ္မာဒဉ္စ ပါပုဏာတိ. မဇ္ဇပါနာ ပန သံယမော တေသံ ဒေါသာနံ ဝူပသမံ တဗ္ဗိပရီတဂုဏသမ္ပဒဉ္စ ပါပုဏာတိ. တသ္မာ အယံ မဇ္ဇပါနာ သံယမော မင်္ဂလန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗော. 'मद्यपान से संयम' का अर्थ पहले कही गई 'सुरा-मेरय-मज्ज-पमादट्ठाना वेरमणी' (मदिरा और नशीले पदार्थों के सेवन से विरति) का ही यह पर्यायवाची नाम है। क्योंकि मद्यपान करने वाला व्यक्ति न तो अर्थ (कल्याण) को जानता है और न ही धर्म को; वह माता का अहित करता है, पिता का, तथा बुद्ध, प्रत्येकबुद्ध और तथागत के श्रावकों का भी अहित करता है। वह इसी जन्म में निंदा और परलोक में दुर्गति तथा आगामी जन्मों में उन्माद (पागलपन) को प्राप्त होता है। मद्यपान से संयम इन दोषों के शमन और उनके विपरीत गुणों की प्राप्ति कराता है। इसलिए मद्यपान से इस संयम को 'मङ्गल' समझना चाहिए। ကုသလေသု ဓမ္မေသု အပ္ပမာဒေါ နာမ ‘‘ကုသလာနံ ဝါ ဓမ္မာနံ ဘာဝနာယ အသက္ကစ္စကိရိယတာ, အသာတစ္စကိရိယတာ, အနဋ္ဌိတကိရိယတာ, ဩလီနဝုတ္တိတာ, နိက္ခိတ္တဆန္ဒတာ, နိက္ခိတ္တဓုရတာ, အနာသေဝနာ, အဘာဝနာ, အဗဟုလီကမ္မံ, အနဓိဋ္ဌာနံ, အနနုယောဂေါ, ပမာဒေါ. ယော ဧဝရူပေါ ပမာဒေါ ပမဇ္ဇနာ ပမဇ္ဇိတတ္တံ, အယံ ဝုစ္စတိ ပမာဒေါ’’တိ (ဝိဘ. ၈၄၆). ဧတ္ထ ဝုတ္တဿ ပမာဒဿ ပဋိပက္ခဝသေန အတ္ထတော ကုသလေသု ဓမ္မေသု သတိယာ အဝိပ္ပဝါသော ဝေဒိတဗ္ဗော. သော နာနပ္ပကာရကုသလာဓိဂမဟေတုတော အမတာဓိဂမဟေတုတော စ မင်္ဂလန္တိ ဝုစ္စတိ[Pg.121]. တတ္ထ ‘‘အပ္ပမတ္တဿ အာတာပိနော’’တိ စ (မ. နိ. ၂.၁၈; အ. နိ. ၅.၂၆), ‘‘အပ္ပမာဒေါ အမတံ ပဒ’’န္တိ စ, ဧဝမာဒိ (ဓ. ပ. ၂၁) သတ္ထု သာသနံ အနုဿရိတဗ္ဗံ. कुशल धर्मों में 'अप्रमाद' का अर्थ है—"कुशल धर्मों की भावना में अनादरपूर्वक कार्य करना, निरंतरता का अभाव, अस्थिरता, शिथिलता, उत्साह की कमी, उत्तरदायित्व का त्याग, सेवन न करना, भावना न करना, बार-बार न करना, अधिष्ठान न करना, अनुयोग न करना—यह 'प्रमाद' है। जो इस प्रकार का प्रमाद, असावधानी या प्रमाद की अवस्था है, उसे 'प्रमाद' कहा जाता है।" यहाँ कहे गए प्रमाद के प्रतिपक्ष के रूप में, अर्थतः कुशल धर्मों में स्मृति (जागरूकता) का न बिछुड़ना 'अप्रमाद' समझना चाहिए। वह अनेक प्रकार के कुशल की प्राप्ति और अमृत (निर्वाण) की प्राप्ति का कारण होने से 'मङ्गल' कहा जाता है। वहाँ "अप्रमत्त और आतपी (पुरुष) का" तथा "अप्रमाद अमृत पद है" आदि शास्ता के शासन का स्मरण करना चाहिए। ဧဝံ ဣမိဿာ ဂါထာယ ပါပါ ဝိရတိ, မဇ္ဇပါနာ သံယမော, ကုသလေသု ဓမ္မေသု အပ္ပမာဒေါတိ တီဏိ မင်္ဂလာနိ ဝုတ္တာနိ. မင်္ဂလတ္တဉ္စ နေသံ တတ္ထ တတ္ထ ဝိဘာဝိတမေဝါတိ. इस प्रकार इस गाथा में—पाप से विरति, मद्यपान से संयम और कुशल धर्मों में अप्रमाद—ये तीन मङ्गल कहे गए हैं। इनका मङ्गल होना उन-उन स्थानों पर स्पष्ट किया ही गया है। နိဋ္ဌိတာ အာရတီတိ ဣမိဿာ ဂါထာယ အတ္ထဝဏ္ဏနာ. 'आरति' आदि इस गाथा की अर्थ-वर्णना समाप्त हुई। ဂါရဝေါစာတိဂါထာဝဏ္ဏနာ 'गाखावो च' आदि गाथा की व्याख्या। ၉. ဣဒါနိ ဂါရဝေါ စာတိ ဧတ္ထ ဂါရဝေါတိ ဂရုဘာဝေါ. နိဝါတောတိ နီစဝုတ္တိတာ. သန္တုဋ္ဌီတိ သန္တောသော. ကတဿ ဇာနနတာ ကတညုတာ. ကာလေနာတိ ခဏေန သမယေန. ဓမ္မဿ သဝနံ ဓမ္မဿဝနံ. သေသံ ဝုတ္တနယမေဝါတိ အယံ ပဒဝဏ္ဏနာ. ९. अब 'गाखावो च' (आदर) यहाँ 'गाखावो' का अर्थ है गुरुजनों के प्रति आदर भाव। 'निवातो' का अर्थ है विनम्रता (नीचवृत्ति)। 'सन्तुट्ठी' का अर्थ है संतोष। किए हुए उपकार को जानना 'कृतज्ञता' है। 'कालेन' का अर्थ है उचित समय या क्षण पर। धर्म का श्रवण करना 'धर्मश्रवण' है। शेष बातें पहले बताए गए तरीके के अनुसार ही हैं—यह पद-वर्णना है। အတ္ထဝဏ္ဏနာ ပန ဧဝံ ဝေဒိတဗ္ဗာ – ဂါရဝေါ နာမ ဂရုကာရပ္ပယောဂါရဟေသု ဗုဒ္ဓပစ္စေကဗုဒ္ဓတထာဂတသာဝကအာစရိယုပဇ္ဈာယမာတာပိတုဇေဋ္ဌကဘာတိကဘဂိနီအာဒီသု ယထာနုရူပံ ဂရုကာရော ဂရုကရဏံ သဂါရဝတာ. သ စာယံ ဂါရဝေါ ယသ္မာ သုဂတိဂမနာဒီနံ ဟေတု. ယထာဟ – अर्थ-वर्णना इस प्रकार समझनी चाहिए—'गाखावो' (आदर) का अर्थ है आदर और सत्कार के योग्य बुद्ध, प्रत्येकबुद्ध, तथागत के श्रावक, आचार्य, उपाध्याय, माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि के प्रति यथायोग्य आदर, सत्कार और गौरव का भाव रखना। और यह आदर भाव क्योंकि सुगति में जाने आदि का कारण होता है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘ဂရုကာတဗ္ဗံ ဂရုံ ကရောတိ, မာနေတဗ္ဗံ မာနေတိ, ပူဇေတဗ္ဗံ ပူဇေတိ. သော တေန ကမ္မေန ဧဝံ သမတ္တေန ဧဝံ သမာဒိန္နေန ကာယဿ ဘေဒါ ပရံ မရဏာ သုဂတိံ သဂ္ဂံ လောကံ ဥပပဇ္ဇတိ. နော စေ ကာယဿ…ပေ… ဥပပဇ္ဇတိ, သစေ မနုဿတ္တံ အာဂစ္ဆတိ, ယတ္ထ ယတ္ထ ပစ္စာဇာယတိ, ဥစ္စာကုလီနော ဟောတီ’’တိ (မ. နိ. ၃.၂၉၅). "जो आदर के योग्य है उसका आदर करता है, जो सम्मान के योग्य है उसका सम्मान करता है, जो पूजा के योग्य है उसकी पूजा करता है। वह उस कर्म से, इस प्रकार पूर्ण और समादत्त (अपनाए गए) कर्म के कारण, शरीर के भेद के बाद मृत्यु के उपरांत सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होता है। यदि वह स्वर्ग में उत्पन्न नहीं होता और मनुष्य लोक में आता है, तो जहाँ-जहाँ वह जन्म लेता है, वहाँ वह उच्च कुल वाला होता है।" ယထာ စာဟ – ‘‘သတ္တိမေ, ဘိက္ခဝေ, အပရိဟာနိယာ ဓမ္မာ. ကတမေ သတ္တ? သတ္ထုဂါရဝတာ’’တိအာဒိ (အ. နိ. ၇.၃၃), တသ္မာ မင်္ဂလန္တိ ဝုစ္စတိ. जैसा कि कहा गया है—"भिक्षुओं! ये सात अपरिहाणीय (पतन न होने देने वाले) धर्म हैं। वे सात कौन से हैं? शास्ता के प्रति आदर भाव..." आदि, इसलिए इसे 'मङ्गल' कहा जाता है। နိဝါတော နာမ နီစမနတာ နိဝါတဝုတ္တိတာ, ယာယ သမန္နာဂတော ပုဂ္ဂလော နိဟတမာနော နိဟတဒပ္ပော ပါဒပုဉ္ဆနကစောဠသဒိသော ဆိန္နဝိသာဏဥသဘသမော ဥဒ္ဓဋဒါဌသပ္ပသမော စ ဟုတွာ သဏှော သခိလော သုခသမ္ဘာသော [Pg.122] ဟောတိ, အယံ နိဝါတော. သွာယံ ယသာဒိဂုဏပ္ပဋိလာဘဟေတုတော မင်္ဂလန္တိ ဝုစ္စတိ. အာဟ စ ‘‘နိဝါတဝုတ္တိ အတ္ထဒ္ဓေါ, တာဒိသော လဘတေ ယသ’’န္တိ ဧဝမာဒိ (ဒီ. နိ. ၃.၂၇၃). 'निवातो' (विनम्रता) का अर्थ है मन की कोमलता और विनम्र व्यवहार, जिससे युक्त व्यक्ति मान-मर्दन किया हुआ, दर्प-रहित, पैर पोंछने वाले कपड़े के समान, टूटे हुए सींग वाले बैल के समान और निकाले हुए विष-दंत वाले सर्प के समान होकर मृदु, सौम्य और सुखद संभाषण करने वाला होता है; यह 'निवातो' है। यह यश आदि गुणों की प्राप्ति का कारण होने से 'मङ्गल' कहा जाता है। और कहा भी गया है—"विनम्र व्यवहार वाला और जो स्तब्ध (अहंकारी) नहीं है, ऐसा व्यक्ति यश प्राप्त करता है" इत्यादि। သန္တုဋ္ဌိ နာမ ဣတရီတရပစ္စယသန္တောသော, သော ဒွါဒသဝိဓော ဟောတိ. သေယျထိဒံ – စီဝရေ ယထာလာဘသန္တောသော, ယထာဗလသန္တောသော, ယထာသာရုပ္ပသန္တောသောတိ တိဝိဓော. ဧဝံ ပိဏ္ဍပါတာဒီသု. 'सन्तुट्ठी' (संतोष) का अर्थ है जो भी प्राप्त हो जाए, उन-उन प्रत्ययों (साधनों) में भली-भांति संतुष्ट रहना। वह बारह प्रकार का होता है। जैसे कि—चीवर में यथालाभ-संतोष, यथाबल-संतोष और यथासारूप्य-संतोष—इस प्रकार तीन प्रकार का। इसी प्रकार पिण्डपात (भोजन) आदि में भी। တဿာယံ ပဘေဒဝဏ္ဏနာ – ဣဓ ဘိက္ခု စီဝရံ လဘတိ သုန္ဒရံ ဝါ အသုန္ဒရံ ဝါ. သော တေနေဝ ယာပေတိ, အညံ န ပတ္ထေတိ, လဘန္တောပိ န ဂဏှာတိ, အယမဿ စီဝရေ ယထာလာဘသန္တောသော. အထ ပန ဘိက္ခု အာဗာဓိကော ဟောတိ, ဂရုံ စီဝရံ ပါရုပန္တော ဩဏမတိ ဝါ ကိလမတိ ဝါ, သော သဘာဂေန ဘိက္ခုနာ သဒ္ဓိံ တံ ပရိဝတ္တေတွာ လဟုကေန ယာပေန္တောပိ သန္တုဋ္ဌောဝ ဟောတိ, အယမဿ စီဝရေ ယထာဗလသန္တောသော. အပရော ဘိက္ခု ပဏီတပစ္စယလာဘီ ဟောတိ, သော ပဋ္ဋစီဝရာဒီနံ အညတရံ မဟဂ္ဃံ စီဝရံ လဘိတွာ ‘‘ဣဒံ ထေရာနံ စိရပဗ္ဗဇိတာနံ ဗဟုဿုတာနဉ္စ အနုရူပ’’န္တိ တေသံ ဒတွာ အတ္တနာ သင်္ကာရကူဋာ ဝါ အညတော ဝါ ကုတောစိ နန္တကာနိ ဥစ္စိနိတွာ သံဃာဋိံ ကရိတွာ ဓာရေန္တောပိ သန္တုဋ္ဌောဝ ဟောတိ, အယမဿ စီဝရေ ယထာသာရုပ္ပသန္တောသော. इसका भेद-वर्णन इस प्रकार है—यहाँ भिक्षु अच्छा या बुरा चीवर प्राप्त करता है। वह उसी से निर्वाह करता है, दूसरे की इच्छा नहीं करता, प्राप्त होने पर भी (अतिरिक्त) नहीं लेता; यह उसका चीवर में 'यथालाभ-संतोष' है। फिर यदि भिक्षु रोगी हो और भारी चीवर ओढ़ने पर झुक जाता हो या थक जाता हो, तो वह किसी अनुकूल भिक्षु के साथ उसे बदलकर हल्के चीवर से निर्वाह करते हुए भी संतुष्ट ही रहता है; यह उसका चीवर में 'यथाबल-संतोष' है। दूसरा भिक्षु उत्तम प्रत्यय (चीवर) प्राप्त करने वाला होता है, वह पात्र-चीवर आदि में से कोई बहुमूल्य चीवर प्राप्त कर यह सोचकर कि "यह वृद्धों, चिर-प्रव्रजितों और बहुश्रुत भिक्षुओं के योग्य है", उन्हें दे देता है और स्वयं कूड़े के ढेर से या कहीं और से चिथड़े चुनकर, संघाटी बनाकर धारण करते हुए भी संतुष्ट ही रहता है; यह उसका चीवर में 'यथासारूप्य-संतोष' है। ဣဓ ပန ဘိက္ခု ပိဏ္ဍပါတံ လဘတိ လူခံ ဝါ ပဏီတံ ဝါ, သော တေနေဝ ယာပေတိ, အညံ န ပတ္ထေတိ, လဘန္တောပိ န ဂဏှာတိ, အယမဿ ပိဏ္ဍပါတေ ယထာလာဘသန္တောသော. အထ ပန ဘိက္ခု အာဗာဓိကော ဟောတိ, လူခံ ပိဏ္ဍပါတံ ဘုဉ္ဇိတွာ ဂါဠှံ ရောဂါတင်္ကံ ပါပုဏာတိ, သော တံ သဘာဂဿ ဘိက္ခုနော ဒတွာ တဿ ဟတ္ထတော သပ္ပိမဓုခီရာဒီနိ ဘုဉ္ဇိတွာ သမဏဓမ္မံ ကရောန္တောပိ သန္တုဋ္ဌောဝ ဟောတိ, အယမဿ ပိဏ္ဍပါတေ ယထာဗလသန္တောသော. အပရော ဘိက္ခု ပဏီတံ ပိဏ္ဍပါတံ လဘတိ, သော ‘‘အယံ ပိဏ္ဍပါတော ထေရာနံ စိရပဗ္ဗဇိတာနံ အညေသဉ္စ ပဏီတပိဏ္ဍပါတံ ဝိနာ အယာပေန္တာနံ သဗြဟ္မစာရီနံ အနုရူပေါ’’တိ တေသံ ဒတွာ အတ္တနာ ပိဏ္ဍာယ စရိတွာ မိဿကာဟာရံ ဘုဉ္ဇန္တောပိ သန္တုဋ္ဌောဝ ဟောတိ, အယမဿ ပိဏ္ဍပါတေ ယထာသာရုပ္ပသန္တောသော. यहाँ इस शासन में भिक्षु को चाहे रूखा या उत्तम पिण्डपात प्राप्त हो, वह उसी से निर्वाह करता है, अन्य की इच्छा नहीं करता, प्राप्त होने पर भी नहीं लेता, यह उसका पिण्डपात में 'यथालाभ-सन्तोष' है। यदि भिक्षु बीमार हो और रूखा पिण्डपात खाकर रोग बढ़ जाए, तो वह उसे किसी अनुकूल भिक्षु को देकर उसके हाथ से घी, शहद, दूध आदि लेकर श्रमण-धर्म करते हुए भी सन्तुष्ट ही होता है, यह उसका पिण्डपात में 'यथाबल-सन्तोष' है। दूसरा भिक्षु उत्तम पिण्डपात प्राप्त करता है, वह यह सोचकर कि "यह पिण्डपात चिर-प्रव्रजित स्थविरों और अन्य उत्तम पिण्डपात के बिना निर्वाह न कर पाने वाले सब्रह्मचारियों के लिए उपयुक्त है", उन्हें देकर स्वयं भिक्षाटन कर मिश्रित आहार खाते हुए भी सन्तुष्ट ही होता है, यह उसका पिण्डपात में 'यथासारूप्य-सन्तोष' है। ဣဓ [Pg.123] ပန ဘိက္ခုနော သေနာသနံ ပါပုဏာတိ. သော တေနေဝ သန္တုဿတိ, ပုန အညံ သုန္ဒရတရမ္ပိ ပါပုဏန္တံ န ဂဏှာတိ, အယမဿ သေနာသနေ ယထာလာဘသန္တောသော. အထ ပန ဘိက္ခု အာဗာဓိကော ဟောတိ, နိဝါတသေနာသနေ ဝသန္တော အတိဝိယ ပိတ္တရောဂါဒီဟိ အာတုရီယတိ. သော တံ သဘာဂဿ ဘိက္ခုနော ဒတွာ တဿ ပါပုဏနေ သဝါတေ သီတလသေနာသနေ ဝသိတွာ သမဏဓမ္မံ ကရောန္တောပိ သန္တုဋ္ဌောဝ ဟောတိ, အယမဿ သေနာသနေ ယထာဗလသန္တောသော. အပရော ဘိက္ခု သုန္ဒရံ သေနာသနံ ပတ္တမ္ပိ န သမ္ပဋိစ္ဆတိ ‘‘သုန္ဒရသေနာသနံ ပမာဒဋ္ဌာနံ, တတြ နိသိန္နဿ ထိနမိဒ္ဓံ ဩက္ကမတိ, နိဒ္ဒါဘိဘူတဿ စ ပုန ပဋိဗုဇ္ဈတော ကာမဝိတက္ကော သမုဒါစရတီ’’တိ. သော တံ ပဋိက္ခိပိတွာ အဇ္ဈောကာသရုက္ခမူလပဏ္ဏကုဋီသု ယတ္ထ ကတ္ထစိ နိဝသန္တောပိ သန္တုဋ္ဌောဝ ဟောတိ, အယမဿ သေနာသနေ ယထာသာရုပ္ပသန္တောသော. यहाँ भिक्षु को जो शयनासन प्राप्त होता है, वह उसी से सन्तुष्ट रहता है, पुनः प्राप्त होने वाले किसी अन्य सुन्दर शयनासन को भी नहीं लेता, यह उसका शयनासन में 'यथालाभ-सन्तोष' है। यदि भिक्षु बीमार हो और हवा रहित शयनासन में रहने से पित्त-रोग आदि से बहुत पीड़ित हो, तो वह उसे किसी अनुकूल भिक्षु को देकर उसके हिस्से के हवादार और शीतल शयनासन में रहकर श्रमण-धर्म करते हुए भी सन्तुष्ट ही होता है, यह उसका शयनासन में 'यथाबल-सन्तोष' है। दूसरा भिक्षु प्राप्त हुए सुन्दर शयनासन को भी यह सोचकर स्वीकार नहीं करता कि "सुन्दर शयनासन प्रमाद का स्थान है, वहाँ बैठने वाले को स्त्यान-मृद्ध घेर लेता है और नींद से अभिभूत होकर पुनः जागने पर काम-वितर्क उत्पन्न होते हैं।" वह उसे अस्वीकार कर खुले आकाश में, वृक्ष के नीचे या पर्णकुटी में कहीं भी रहते हुए सन्तुष्ट ही होता है, यह उसका शयनासन में 'यथासारूप्य-सन्तोष' है। ဣဓ ပန ဘိက္ခု ဘေသဇ္ဇံ လဘတိ ဟရီတကံ ဝါ အာမလကံ ဝါ. သော တေနေဝ ယာပေတိ, အညေဟိ လဒ္ဓသပ္ပိမဓုဖာဏိတာဒိမ္ပိ န ပတ္ထေတိ, လဘန္တောပိ န ဂဏှာတိ, အယမဿ ဂိလာနပစ္စယေ ယထာလာဘသန္တောသော. အထ ပန ဘိက္ခု အာဗာဓိကော ဟောတိ, တေလေနတ္ထိကော ဖာဏိတံ လဘတိ, သော တံ သဘာဂဿ ဘိက္ခုနော ဒတွာ တဿ ဟတ္ထတော တေလေန ဘေသဇ္ဇံ ကတွာ သမဏဓမ္မံ ကရောန္တောပိ သန္တုဋ္ဌောဝ ဟောတိ, အယမဿ ဂိလာနပစ္စယေ ယထာဗလသန္တောသော. အပရော ဘိက္ခု ဧကသ္မိံ ဘာဇနေ ပူတိမုတ္တဟရီတကံ ဌပေတွာ ဧကသ္မိံ စတုမဓုရံ ‘‘ဂဏှထ, ဘန္တေ, ယဒိစ္ဆသီ’’တိ ဝုစ္စမာနော သစဿ တေသံ ဒွိန္နမညတရေနပိ ဗျာဓိ ဝူပသမ္မတိ, အထ ‘‘ပူတိမုတ္တဟရီတကံ နာမ ဗုဒ္ဓါဒီဟိ ဝဏ္ဏိတ’’န္တိ စ ‘‘ပူတိမုတ္တဘေသဇ္ဇံ နိဿာယ ပဗ္ဗဇ္ဇာ, တတ္ထ တေ ယာဝဇီဝံ ဥဿာဟော ကရဏီယောတိ ဝုတ္တ’’န္တိ (မဟာဝ. ၁၂၈) စ စိန္တေန္တော စတုမဓုရဘေသဇ္ဇံ ပဋိက္ခိပိတွာ ပူတိမုတ္တဟရီတကေန ဘေသဇ္ဇံ ကရောန္တောပိ ပရမသန္တုဋ္ဌောဝ ဟောတိ. အယမဿ ဂိလာနပစ္စယေ ယထာသာရုပ္ပသန္တောသော. यहाँ भिक्षु को हरड़ या आँवला जैसा औषध प्राप्त होता है। वह उसी से निर्वाह करता है, दूसरों द्वारा प्राप्त घी, शहद, गुड़ आदि की इच्छा नहीं करता, प्राप्त होने पर भी नहीं लेता, यह उसका ग्लान-प्रत्यय में 'यथालाभ-सन्तोष' है। यदि भिक्षु बीमार हो और उसे तेल की आवश्यकता हो पर गुड़ प्राप्त हो, तो वह उसे किसी अनुकूल भिक्षु को देकर उसके हाथ से तेल लेकर औषध के रूप में प्रयोग कर श्रमण-धर्म करते हुए भी सन्तुष्ट ही होता है, यह उसका ग्लान-प्रत्यय में 'यथाबल-सन्तोष' है। दूसरा भिक्षु, जिसे एक पात्र में गोमूत्र में भिगोई हुई हरड़ और दूसरे में चतुमधुर रखकर कहा जाए कि "भन्ते, जो इच्छा हो वह लें", यदि उसका रोग दोनों में से किसी एक से भी शान्त हो सकता हो, तो वह यह सोचकर कि "बुद्ध आदि महापुरुषों ने गोमूत्र-हरड़ की प्रशंसा की है" और "गोमूत्र औषध के आश्रय में प्रव्रज्या है, उसमें तुम्हें जीवन भर उत्साह करना चाहिए - ऐसा कहा गया है", चतुमधुर औषध को अस्वीकार कर गोमूत्र-हरड़ से औषध करते हुए भी परम सन्तुष्ट होता है। यह उसका ग्लान-प्रत्यय में 'यथासारूप्य-सन्तोष' है। ဧဝံပဘေဒေါ သဗ္ဗောပေသော သန္တောသော သန္တုဋ္ဌီတိ ဝုစ္စတိ. သာ အတြိစ္ဆတာမဟိစ္ဆတာပါပိစ္ဆတာဒီနံ ပါပဓမ္မာနံ ပဟာနာဓိဂမဟေတုတော, သုဂတိဟေတုတော, အရိယမဂ္ဂသမ္ဘာရဘာဝတော, စာတုဒ္ဒိသာဒိဘာဝဟေတုတော စ မင်္ဂလန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. အာဟ စ – इस प्रकार के भेदों वाला यह सम्पूर्ण सन्तोष 'सन्तुष्टि' कहलाता है। वह अति-इच्छा, महा-इच्छा और पाप-इच्छा आदि पाप-धर्मों के प्रहाण का कारण होने से, सुगति का हेतु होने से, आर्यमार्ग की सामग्री होने से और चारों दिशाओं में निर्बाध होने का हेतु होने से 'मङ्गल' जानना चाहिए। और कहा भी है - ‘‘စာတုဒ္ဒိသော [Pg.124] အပ္ပဋိဃော စ ဟောတိ,သန္တုဿမာနော ဣတရီတရေနာ’’တိ. ဧဝမာဒိ (သု. နိ. ၄၂); "जो जैसा भी प्राप्त हो उसी से सन्तुष्ट रहता है, वह चारों दिशाओं में निर्बाध और प्रतिघात-रहित होता है।" इत्यादि। ကတညုတာ နာမ အပ္ပဿ ဝါ ဗဟုဿ ဝါ ယေန ကေနစိ ကတဿ ဥပကာရဿ ပုနပ္ပုနံ အနုဿရဏဘာဝေန ဇာနနတာ. အပိစ နေရယိကာဒိဒုက္ခပရိတ္တာဏတော ပုညာနိ ဧဝ ပါဏီနံ ဗဟူပကာရာနိ, တတော တေသမ္ပိ ဥပကာရာနုဿရဏတာ ကတညုတာတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. သာ သပ္ပုရိသေဟိ ပသံသနီယာဒိနာနပ္ပကာရဝိသေသာဓိဂမဟေတုတော မင်္ဂလန္တိ ဝုစ္စတိ. အာဟ စ ‘‘ဒွေမေ, ဘိက္ခဝေ, ပုဂ္ဂလာ ဒုလ္လဘာ လောကသ္မိံ. ကတမေ ဒွေ? ယော စ ပုဗ္ဗကာရီ ယော စ ကတညူ ကတဝေဒီ’’တိ (အ. နိ. ၂.၁၂၀). कृतज्ञता का अर्थ है - किसी के भी द्वारा किए गए थोड़े या बहुत उपकार को बार-बार स्मरण करते हुए जानना। इसके अतिरिक्त, नरक आदि दुखों से रक्षा करने के कारण पुण्य ही प्राणियों के लिए महान उपकारी हैं, अतः उनके उपकार का स्मरण करना भी 'कृतज्ञता' जानना चाहिए। वह सत्पुरुषों द्वारा प्रशंसनीय होने आदि अनेक प्रकार के विशेष गुणों की प्राप्ति का हेतु होने से 'मङ्गल' कही जाती है। और भगवान ने कहा है - "भिक्षुओं, संसार में ये दो व्यक्ति दुर्लभ हैं। कौन से दो? जो पहले उपकार करने वाला है और जो कृतज्ञ और कृतवेदी है।" ကာလေန ဓမ္မဿဝနံ နာမ ယသ္မိံ ကာလေ ဥဒ္ဓစ္စသဟဂတံ စိတ္တံ ဟောတိ, ကာမဝိတက္ကာဒီနံ ဝါ အညတရေန အဘိဘူတံ, တသ္မိံ ကာလေ တေသံ ဝိနောဒနတ္ထံ ဓမ္မဿဝနံ. အပရေ အာဟု ‘‘ပဉ္စမေ ပဉ္စမေ ဒိဝသေ ဓမ္မဿဝနံ ကာလေန ဓမ္မဿဝနံ နာမ. ယထာဟ အာယသ္မာ အနုရုဒ္ဓေါ ‘ပဉ္စာဟိကံ ခေါ ပန မယံ, ဘန္တေ, သဗ္ဗရတ္တိံ ဓမ္မိယာ ကထာယ သန္နိသီဒါမာ’’’တိ (မ. နိ. ၁.၃၂၇; မဟာဝ. ၄၆၆). 'समय पर धम्म-श्रवण' का अर्थ है - जिस समय चित्त उद्धत्य से युक्त हो या काम-वितर्क आदि में से किसी से अभिभूत हो, उस समय उन्हें दूर करने के लिए धम्म-श्रवण करना। अन्य आचार्य कहते हैं - "प्रत्येक पाँचवें दिन धम्म-श्रवण करना 'समय पर धम्म-श्रवण' है। जैसा कि आयुष्मान अनिरुद्ध ने कहा - 'भन्ते, हम प्रत्येक पाँचवें दिन पूरी रात धम्म-चर्चा के लिए बैठते हैं'।" အပိစ ယသ္မိံ ကာလေ ကလျာဏမိတ္တေ ဥပသင်္ကမိတွာ သက္ကာ ဟောတိ အတ္တနော ကင်္ခါဝိနောဒကံ ဓမ္မံ သောတုံ, တသ္မိံ ကာလေပိ ဓမ္မဿဝနံ ကာလေန ဓမ္မဿဝနန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ယထာဟ ‘‘တေ ကာလေန ကာလံ ဥပသင်္ကမိတွာ ပရိပုစ္ဆတိ ပရိပဉှတီ’’တိအာဒိ (ဒီ. နိ. ၃.၃၅၈). တဒေတံ ကာလေန ဓမ္မဿဝနံ နီဝရဏပ္ပဟာနစတုရာနိသံသအာသဝက္ခယာဒိနာနပ္ပကာရဝိသေသာဓိဂမဟေတုတော မင်္ဂလန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ဝုတ္တဉှေတံ – इसके अतिरिक्त, जिस समय कल्याणमित्रों के पास जाकर अपनी शंकाओं को दूर करने वाले धम्म को सुनना सम्भव हो, उस समय के धम्म-श्रवण को भी 'समय पर धम्म-श्रवण' जानना चाहिए। जैसा कि कहा गया है - "वह समय-समय पर उनके पास जाकर पूछता है, परिप्रश्न करता है" इत्यादि। वह यह 'समय पर धम्म-श्रवण' नीवरणों के प्रहाण, चार प्रकार के लाभों और आस्रवों के क्षय आदि अनेक प्रकार के विशेष गुणों की प्राप्ति का हेतु होने से 'मङ्गल' जानना चाहिए। क्योंकि ऐसा कहा गया है - ‘‘ယသ္မိံ, ဘိက္ခဝေ, သမယေ အရိယသာဝကော အဋ္ဌိံ ကတွာ မနသိ ကတွာ သဗ္ဗံ စေတသာ သမန္နာဟရိတွာ ဩဟိတသောတော ဓမ္မံ သုဏာတိ, ပဉ္စဿ နီဝရဏာ တသ္မိံ သမယေ န ဟောန္တီ’’တိ စ (သံ. နိ. ၅.၂၁၉). "हे भिक्षुओं! जिस समय आर्य श्रावक आदरपूर्वक, मन लगाकर, सब कुछ चित्त में एकाग्र कर और कान लगाकर धर्म सुनता है, उस समय उसके पाँचों नीवरण नहीं होते।" ‘‘သောတာနုဂတာနံ, ဘိက္ခဝေ, ဓမ္မာနံ…ပေ… သုပ္ပဋိဝိဒ္ဓါနံ စတ္တာရော အာနိသံသာ ပါဋိကင်္ခါ’’တိ စ (အ. နိ. ၄.၁၉၁). "हे भिक्षुओं! कानों तक पहुँचे हुए (सुने हुए) धर्मों को... अच्छी तरह भेदन कर (समझकर) जानने वाले व्यक्तियों के लिए चार लाभों की अपेक्षा की जा सकती है।" ‘‘စတ္တာရောမေ, ဘိက္ခဝေ, ဓမ္မာ ကာလေန ကာလံ သမ္မာ ဘာဝိယမာနာ သမ္မာ အနုပရိဝတ္တိယမာနာ အနုပုဗ္ဗေန အာသဝါနံ ခယံ ပါပေန္တိ. ကတမေ စတ္တာရော? ကာလေန ဓမ္မဿဝန’’န္တိ စ ဧဝမာဒိ (အ. နိ. ၄.၁၄၇). "हे भिक्षुओं! ये चार धर्म समय-समय पर अच्छी तरह भावना किए जाने और अच्छी तरह अनुवर्तन किए जाने पर क्रमशः आस्रवों के क्षय तक पहुँचा देते हैं। वे चार कौन से हैं? समय-समय पर धर्म श्रवण करना, इत्यादि।" ဧဝံ [Pg.125] ဣမိဿာ ဂါထာယ ဂါရဝေါ, နိဝါတော, သန္တုဋ္ဌိ, ကတညုတာ, ကာလေန ဓမ္မဿဝနန္တိ ပဉ္စ မင်္ဂလာနိ ဝုတ္တာနိ. မင်္ဂလတ္တဉ္စ နေသံ တတ္ထ တတ္ထ ဝိဘာဝိတမေဝါတိ. इस प्रकार इस गाथा में गौरव, विनम्रता, संतुष्टि, कृतज्ञता और समय पर धर्म श्रवण - ये पाँच मंगल कहे गए हैं। उनका मंगल होना उन-उन स्थानों पर स्पष्ट रूप से प्रकाशित किया गया है। နိဋ္ဌိတာ ဂါရဝေါ စာတိ ဣမိဿာ ဂါထာယ အတ္ထဝဏ္ဏနာ. 'गाारवो च' इस गाथा की अर्थ-व्याख्या समाप्त हुई। ခန္တီစာတိဂါထာဝဏ္ဏနာ 'खन्ती च' गाथा की व्याख्या। ၁၀. ဣဒါနိ ခန္တီ စာတိ ဧတ္ထ ခမနံ ခန္တိ. ပဒက္ခိဏဂ္ဂါဟိတာယ သုခံ ဝစော အသ္မိန္တိ သုဝစော, သုဝစဿ ကမ္မံ သောဝစဿံ, သောဝစဿဿ ဘာဝေါ သောဝစဿတာ. ကိလေသာနံ သမိတတ္တာ သမဏာ. ဒဿနန္တိ ပေက္ခနံ. ဓမ္မဿ သာကစ္ဆာ ဓမ္မသာကစ္ဆာ. သေသံ ဝုတ္တနယမေဝါတိ. အယံ ပဒဝဏ္ဏနာ. १०. अब 'खन्ती च' यहाँ: क्षमा करना 'क्षान्ति' है। आदरपूर्वक सुनने और ग्रहण करने की सुगमता के कारण जिसमें वचन सुखद हों, वह 'सुवच' है। सुवच का कर्म 'सोवचस्य' है, और सोवचस्य का भाव 'सोवचस्यता' (सुवचनता) है। क्लेशों के शांत होने के कारण 'श्रमण' कहलाते हैं। 'दस्सनं' का अर्थ देखना है। धर्म की चर्चा 'धर्म-चर्चा' है। शेष पूर्वोक्त रीति के अनुसार ही है। यह पदों की व्याख्या है। အတ္ထဝဏ္ဏနာ ပန ဧဝံ ဝေဒိတဗ္ဗာ – ခန္တိ နာမ အဓိဝါသနက္ခန္တိ, တာယ သမန္နာဂတော ဘိက္ခု ဒသဟိ အက္ကောသဝတ္ထူဟိ အက္ကောသန္တေ ဝဓဗန္ဓာဒီဟိ ဝါ ဝိဟေသန္တေ ပုဂ္ဂလေ အသုဏန္တော ဝိယ အပဿန္တော ဝိယ စ နိဗ္ဗိကာရော ဟောတိ ခန္တိဝါဒီ ဝိယ. ယထာဟ – अर्थ-व्याख्या इस प्रकार जाननी चाहिए - क्षान्ति का अर्थ 'सहनशीलता' है। उससे युक्त भिक्षु, दस प्रकार के अपशब्दों से गाली देने वाले व्यक्तियों को, या वध-बन्धन आदि से कष्ट देने वाले व्यक्तियों के प्रति न सुनता हुआ सा और न देखता हुआ सा, क्षान्तिवादी ऋषि की तरह निर्विकार रहता है। जैसा कि कहा गया है - ‘‘အဟု အတီတမဒ္ဓါနံ, သမဏော ခန္တိဒီပနော; တံ ခန္တိယာယေဝ ဌိတံ, ကာသိရာဇာ အဆေဒယီ’’တိ. (ဇာ. ၁.၄.၅၁); "अतीत काल में एक श्रमण था जो क्षान्ति का ही उपदेश देता था। उस क्षान्ति में ही स्थित श्रमण को काशिराज ने काट डाला था।" ဘဒြကတော ဝါ မနသိ ကရောတိ တတော ဥတ္တရိ အပရာဓာဘာဝေန အာယသ္မာ ပုဏ္ဏတ္ထေရော ဝိယ. ယထာဟ သော – अथवा, उससे भी बढ़कर दूसरों के द्वारा अपराध न किए जाने के भाव से उसे 'भला' मानकर मन में धारण करता है, जैसे आयुष्मान् पूर्ण स्थविर। जैसा कि उन्होंने कहा - ‘‘သစေ မံ, ဘန္တေ, သုနာပရန္တကာ မနုဿာ အက္ကောသိဿန္တိ ပရိဘာသိဿန္တိ, တတ္ထ မေ ဧဝံ ဘဝိဿတိ ‘ဘဒ္ဒကာ ဝတိမေ သုနာပရန္တကာ မနုဿာ, သုဘဒ္ဒကာ ဝတိမေ သုနာပရန္တကာ မနုဿာ, ယံ မေ နယိမေ ပါဏိနာ ပဟာရံ ဒေန္တီ’’’တိအာဒိ (မ. နိ. ၃.၃၉၆; သံ. နိ. ၄.၈၈). "भन्ते! यदि सुनापरान्तक देश के मनुष्य मुझे गाली देंगे, अपशब्द कहेंगे, तो वहाँ मेरा ऐसा विचार होगा - 'ये सुनापरान्तक मनुष्य कितने भले हैं, ये सुनापरान्तक मनुष्य कितने बहुत भले हैं, जो मुझे हाथों से प्रहार नहीं कर रहे हैं' इत्यादि।" ယာယ စ သမန္နာဂတော ဣသီနမ္ပိ ပသံသနီယော ဟောတိ. ယထာဟ သရဘင်္ဂေါ ဣသိ – जिस क्षान्ति से युक्त होने पर वह ऋषियों के द्वारा भी प्रशंसनीय होता है। जैसा कि सरभंग ऋषि ने कहा - ‘‘ကောဓံ [Pg.126] ဝဓိတွာ န ကဒါစိ သောစတိ,မက္ခပ္ပဟာနံ ဣသယော ဝဏ္ဏယန္တိ; သဗ္ဗေသံ ဝုတ္တံ ဖရုသံ ခမေထ,ဧတံ ခန္တိံ ဥတ္တမမာဟု သန္တော’’တိ. (ဇာ. ၂.၁၇.၆၄); "क्रोध को मारकर कोई कभी शोक नहीं करता। ऋषिगण 'मक्ख' (ईर्ष्या/कृतघ्नता) के त्याग की प्रशंसा करते हैं। सभी के द्वारा कहे गए कठोर वचनों को क्षमा कर देना चाहिए। सत्पुरुष इस क्षान्ति को उत्तम कहते हैं।" ဒေဝတာနမ္ပိ ပသံသနီယော ဟောတိ. ယထာဟ သက္ကော ဒေဝါနမိန္ဒော – वह देवताओं के लिए भी प्रशंसनीय होता है। जैसा कि देवराज शक्र ने कहा - ‘‘ယော ဟဝေ ဗလဝါ သန္တော, ဒုဗ္ဗလဿ တိတိက္ခတိ; တမာဟု ပရမံ ခန္တိံ, နိစ္စံ ခမတိ ဒုဗ္ဗလော’’တိ. (သံ. နိ. ၁.၂၅၀-၂၅၁); "जो वास्तव में बलवान होते हुए भी निर्बल के प्रति सहनशील रहता है, सत्पुरुष उस क्षान्ति को परम क्षान्ति कहते हैं; निर्बल तो हमेशा ही सहता है।" ဗုဒ္ဓါနမ္ပိ ပသံသနီယော ဟောတိ. ယထာဟ ဘဂဝါ – वह बुद्धों के लिए भी प्रशंसनीय होता है। जैसा कि भगवान ने कहा - ‘‘အက္ကောသံ ဝဓဗန္ဓဉ္စ, အဒုဋ္ဌော ယော တိတိက္ခတိ; ခန္တီဗလံ ဗလာဏီကံ, တမဟံ ဗြူမိ ဗြာဟ္မဏ’’န္တိ. (ဓ. ပ. ၃၉၉); "जो गाली, वध और बन्धन को बिना क्रोधित हुए सहन करता है, जिसके पास क्षान्ति रूपी बल ही सेना है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।" သာ ပနေသာ ခန္တိ ဧတေသဉ္စ ဣဓ ဝဏ္ဏိတာနံ အညေသဉ္စ ဂုဏာနံ အဓိဂမဟေတုတော မင်္ဂလန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. वह यह क्षान्ति, यहाँ वर्णित इन गुणों और अन्य गुणों की प्राप्ति का कारण होने से 'मंगल' जाननी चाहिए। သောဝစဿတာ နာမ သဟဓမ္မိကံ ဝုစ္စမာနေ ဝိက္ခေပံ ဝါ တုဏှီဘာဝံ ဝါ ဂုဏဒေါသစိန္တနံ ဝါ အနာပဇ္ဇိတွာ အတိဝိယ အာဒရဉ္စ ဂါရဝဉ္စ နီစမနတဉ္စ ပုရက္ခတွာ သာဓူတိ ဝစနကရဏတာ. သာ သဗြဟ္မစာရီနံ သန္တိကာ ဩဝါဒါနုသာသနိပ္ပဋိလာဘဟေတုတော ဒေါသပ္ပဟာနဂုဏာဓိဂမဟေတုတော စ မင်္ဂလန္တိ ဝုစ္စတိ. सुवचनता का अर्थ है - सहधार्मिक द्वारा समझाए जाने पर विरोध, मौन रहना या गुण-दोष का विचार न करते हुए, अत्यधिक आदर, गौरव और विनम्रता को सामने रखकर 'ठीक है' कहकर वचन का पालन करना। वह सब्रह्मचारियों से उपदेश और शिक्षा प्राप्त करने का कारण होने से, तथा दोषों के त्याग और गुणों की प्राप्ति का कारण होने से 'मंगल' कही जाती है। သမဏာနံ ဒဿနံ နာမ ဥပသမိတကိလေသာနံ ဘာဝိတကာယဝစီစိတ္တပညာနံ ဥတ္တမဒမထသမထသမန္နာဂတာနံ ပဗ္ဗဇိတာနံ ဥပသင်္ကမနုပဋ္ဌာနာနုဿရဏဿဝနဒဿနံ, သဗ္ဗမ္ပိ ဩမကဒေသနာယ ဒဿနန္တိ ဝုတ္တံ, တံ မင်္ဂလန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ကသ္မာ? ဗဟူပကာရတ္တာ. အာဟ စ ‘‘ဒဿနမ္ပဟံ, ဘိက္ခဝေ, တေသံ ဘိက္ခူနံ ဗဟူပကာရံ ဝဒါမီ’’တိအာဒိ (ဣတိဝု. ၁၀၄). ယတော ဟိတကာမေန ကုလပုတ္တေန သီလဝန္တေ ဘိက္ခူ ဃရဒွါရံ သမ္ပတ္တေ ဒိသွာ ယဒိ ဒေယျဓမ္မော အတ္ထိ, ယထာဗလံ ဒေယျဓမ္မေန ပတိမာနေတဗ္ဗာ. ယဒိ နတ္ထိ, ပဉ္စပတိဋ္ဌိတံ ကတွာ ဝန္ဒိတဗ္ဗာ. တသ္မိမ္ပိ အသမ္ပဇ္ဇမာနေ အဉ္ဇလိံ ပဂ္ဂဟေတွာ နမဿိတဗ္ဗာ, တသ္မိမ္ပိ အသမ္ပဇ္ဇမာနေ ပသန္နစိတ္တေန ပိယစက္ခူဟိ သမ္ပဿိတဗ္ဗာ. ဧဝံ ဒဿနမူလကေနပိ ဟိ ပုညေန အနေကာနိ ဇာတိသဟဿာနိ စက္ခုမှိ ရောဂေါ ဝါ ဒါဟော [Pg.127] ဝါ ဥဿဒါ ဝါ ပိဠကာ ဝါ န ဟောန္တိ, ဝိပ္ပသန္နပဉ္စဝဏ္ဏသဿိရိကာနိ ဟောန္တိ စက္ခူနိ ရတနဝိမာနေ ဥဂ္ဃာဋိတမဏိကဝါဋသဒိသာနိ, သတသဟဿကပ္ပမတ္တံ ဒေဝေသု စ မနုဿေသု စ သမ္ပတ္တီနံ လာဘီ ဟောတိ. အနစ္ဆရိယဉ္စေတံ, ယံ မနုဿဘူတော သပ္ပညဇာတိကော သမ္မာ ပဝတ္တိတေန သမဏဒဿနမယေန ပုညေန ဧဝရူပံ ဝိပါကသမ္ပတ္တိံ အနုဘဝေယျ, ယတ္ထ တိရစ္ဆာနဂတာနမ္ပိ ကေဝလံ သဒ္ဓါမတ္တကေန ကတဿ သမဏဒဿနဿ ဧဝံ ဝိပါကသမ္ပတ္တိံ ဝဏ္ဏယန္တိ. श्रमणों के दर्शन का अर्थ है - जिनके क्लेश शांत हो गए हैं, जिन्होंने काया, वचन, चित्त और प्रज्ञा की भावना की है, जो उत्तम दमन और शम से युक्त हैं, उन प्रव्रजितों के पास जाना, उनकी सेवा करना, उनका स्मरण करना, उन्हें सुनना और देखना। यह सब 'दर्शन' शब्द से कहा गया है। उसे मंगल जानना चाहिए। क्यों? क्योंकि यह बहुत उपकारी है। भगवान ने कहा भी है - 'हे भिक्षुओं! मैं उन भिक्षुओं के दर्शन को बहुत उपकारी कहता हूँ' इत्यादि। इसलिए हित चाहने वाले कुलपुत्र को, शीलवान भिक्षुओं को घर के द्वार पर आया देखकर, यदि दान देने योग्य वस्तु हो, तो यथाशक्ति दान देकर उनका सत्कार करना चाहिए। यदि न हो, तो पञ्चप्रतिष्ठित प्रणाम करना चाहिए। यदि वह भी संभव न हो, तो अंजलिबद्ध होकर नमस्कार करना चाहिए। यदि वह भी संभव न हो, तो प्रसन्न चित्त से और प्रिय आँखों से उन्हें देखना चाहिए। इस प्रकार दर्शन-मूलक पुण्य से अनेक हजारों जन्मों तक आँखों में रोग, जलन, धुंधलापन या मोतियाबिंद आदि नहीं होते। आँखें निर्मल, पाँच रंगों वाली और शोभायमान होती हैं, जैसे रत्न-विमान में खुले हुए नीलम के किवाड़ हों। वह एक लाख कल्पों तक देवों और मनुष्यों में सभी संपत्तियों को प्राप्त करने वाला होता है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि मनुष्य रूप में उत्पन्न प्रज्ञावान व्यक्ति, भली-भांति किए गए श्रमण-दर्शन रूपी पुण्य से इस प्रकार की विपाक-संपत्ति का अनुभव करे, जबकि पशु-पक्षियों के लिए भी केवल श्रद्धा मात्र से किए गए श्रमण-दर्शन की विपाक-संपत्ति की ऐसी प्रशंसा की जाती है। ‘‘ဥလူကော မဏ္ဍလက္ခိကော, ဝေဒိယကေ စိရဒီဃဝါသိကော; သုခိတော ဝတ ကောသိယော အယံ, ကာလုဋ္ဌိတံ ပဿတိ ဗုဒ္ဓဝရံ. "गोल आँखों वाला, वेदिसा पर्वत पर लंबे समय से रहने वाला, यह सुखी कौशिक (उल्लू) पक्षी, प्रातःकाल उठे हुए श्रेष्ठ बुद्ध को देख रहा है।" ‘‘မယိ စိတ္တံ ပသာဒေတွာ, ဘိက္ခုသံဃေ အနုတ္တရေ; ကပ္ပာနံ သတသဟဿာနိ, ဒုဂ္ဂတေသော န ဂစ္ဆတိ. "मुझमें और अनुत्तर भिक्षु संघ में चित्त को प्रसन्न कर, यह एक लाख कल्पों तक दुर्गति में नहीं जाएगा।" ‘‘သ ဒေဝလောကာ စဝိတွာ, ကုသလကမ္မေန စောဒိတော; ဘဝိဿတိ အနန္တဉာဏော, သောမနဿောတိ ဝိဿုတော’’တိ. (မ. နိ. အဋ္ဌ. ၁.၁၄၄); वह देवलोक से च्युत होकर, कुशल कर्म से प्रेरित होकर, अनंत ज्ञान से संपन्न 'सोमनस' नाम से प्रसिद्ध (प्रत्येकबुद्ध) होगा। ကာလေန ဓမ္မသာကစ္ဆာ နာမ ပဒေါသေ ဝါ ပစ္စူသေ ဝါ ဒွေ သုတ္တန္တိကာ ဘိက္ခူ အညမညံ သုတ္တန္တံ သာကစ္ဆန္တိ, ဝိနယဓရာ ဝိနယံ, အာဘိဓမ္မိကာ အဘိဓမ္မံ, ဇာတကဘာဏကာ ဇာတကံ, အဋ္ဌကထိကာ အဋ္ဌကထံ, လီနုဒ္ဓတဝိစိကိစ္ဆာပရေတစိတ္တဝိသောဓနတ္ထံ ဝါ တမှိ တမှိ ကာလေ သာကစ္ဆန္တိ, အယံ ကာလေန ဓမ္မသာကစ္ဆာ. သာ အာဂမဗျတ္တိအာဒီနံ ဂုဏာနံ ဟေတုတော မင်္ဂလန္တိ ဝုစ္စတီတိ. समय पर धम्म-चर्चा (कालेन धम्मसाकच्छा) का अर्थ है—रात्रि के प्रथम प्रहर में या भोर के समय दो सूत्रान्तिक भिक्षुओं का आपस में सूत्रों पर चर्चा करना, विनयधरों का विनय पर, आभिधार्मिकों का अभिधम्म पर, जातक-भानकों का जातक पर, और अट्ठकथा-विशेषज्ञों का अट्ठकथा पर चर्चा करना। अथवा आलस्य, उद्विग्नता और संशय से ग्रस्त चित्त की शुद्धि के लिए समय-समय पर चर्चा करना; यह 'समय पर धम्म-चर्चा' है। आगम (शास्त्र) की निपुणता आदि गुणों का कारण होने से इसे 'मंगल' कहा जाता है। ဧဝံ ဣမိဿာ ဂါထာယ ခန္တိ, သောဝစဿတာ, သမဏဒဿနံ, ကာလေန ဓမ္မသာကစ္ဆာတိ စတ္တာရိ မင်္ဂလာနိ ဝုတ္တာနိ. မင်္ဂလတ္တဉ္စ နေသံ တတ္ထ တတ္ထ ဝိဘာဝိတမေဝါတိ. इस प्रकार, इस गाथा में क्षमा (खन्ति), सुवचता (आज्ञाकारिता), श्रमणों के दर्शन और समय पर धम्म-चर्चा—ये चार मंगल कहे गए हैं। इनका मंगल-स्वरूप उन-उन स्थानों पर स्पष्ट किया गया है। နိဋ္ဌိတာ ခန္တီ စာတိ ဣမိဿာ ဂါထာယ အတ္ထဝဏ္ဏနာ. 'खन्ती च' इस गाथा की अर्थ-व्याख्या समाप्त हुई। တပေါစာတိဂါထာဝဏ္ဏနာ 'तपो च' गाथा की व्याख्या। ၁၁. ဣဒါနိ [Pg.128] တပေါ စာတိ ဧတ္ထ ပါပကေ ဓမ္မေ တပတီတိ တပေါ. ဗြဟ္မံ စရိယံ, ဗြဟ္မာနံ ဝါ စရိယံ ဗြဟ္မစရိယံ, သေဋ္ဌစရိယန္တိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. အရိယသစ္စာနံ ဒဿနံ အရိယသစ္စာနဒဿနံ, အရိယသစ္စာနိ ဒဿနန္တိပိ ဧကေ, တံ န သုန္ဒရံ. နိက္ခန္တံ ဝါနတောတိ နိဗ္ဗာနံ, သစ္ဆိကရဏံ သစ္ဆိကိရိယာ, နိဗ္ဗာနဿ သစ္ဆိကိရိယာ နိဗ္ဗာနသစ္ဆိကိရိယာ. သေသံ ဝုတ္တနယမေဝါတိ အယံ ပဒဝဏ္ဏနာ. ११. अब 'तपो च' के विषय में—जो पाप धर्मों को जलाता है, वह 'तप' है। 'ब्रह्मचर्य' का अर्थ है श्रेष्ठ आचरण या श्रेष्ठ पुरुषों (बुद्ध आदि) का आचरण। 'अरिियसच्चानं दस्सनं' का अर्थ है आर्य सत्यों का दर्शन; कुछ आचार्य 'अरिियसच्चानि दस्सनं' ऐसा पाठ करते हैं, जो उचित नहीं है। 'वान' (तृष्णा) से निकल जाने के कारण 'निर्वाण' कहलाता है। 'सच्छिकिरिया' का अर्थ है साक्षात्कार। निर्वाण का साक्षात्कार 'निर्वाण-साक्षात्कार' है। शेष व्याख्या पूर्ववत है। यह पदों की व्याख्या है। အတ္ထဝဏ္ဏနာ ပန ဧဝံ ဝေဒိတဗ္ဗာ – တပေါ နာမ အဘိဇ္ဈာဒေါမနဿာဒီနံ တပနတော ဣန္ဒြိယသံဝရော, ကောသဇ္ဇဿ ဝါ တပနတော ဝီရိယံ, တေဟိ သမန္နာဂတော ပုဂ္ဂလော အာတာပီတိ ဝုစ္စတိ. သွာယံ အဘိဇ္ဈာဒိပ္ပဟာနဈာနာဒိပ္ပဋိလာဘဟေတုတော မင်္ဂလန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗော. अर्थ-व्याख्या इस प्रकार समझनी चाहिए—अभिध्या (लोभ) और दौर्मनस्य आदि को जलाने के कारण इन्द्रिय-संयम 'तप' है, अथवा आलस्य को जलाने के कारण 'वीर्य' (पुरुषार्थ) तप है। इनसे युक्त व्यक्ति को 'आतापी' कहा जाता है। अभिध्या आदि के प्रहाण और ध्यान आदि की प्राप्ति का कारण होने से इसे 'मंगल' समझना चाहिए। ဗြဟ္မစရိယံ နာမ မေထုနဝိရတိသမဏဓမ္မသာသနမဂ္ဂါနမဓိဝစနံ. တထာ ဟိ ‘‘အဗြဟ္မစရိယံ ပဟာယ ဗြဟ္မစာရီ ဟောတီ’’တိ ဧဝမာဒီသု (ဒီ. နိ. ၁.၁၉၄; မ. နိ. ၁.၂၉၂) မေထုနဝိရတိ ဗြဟ္မစရိယန္တိ ဝုစ္စတိ. ‘‘ဘဂဝတိ နော, အာဝုသော, ဗြဟ္မစရိယံ ဝုဿတီတိ? ဧဝမာဝုသော’’တိ ဧဝမာဒီသု (မ. နိ. ၁.၂၅၇) သမဏဓမ္မော. ‘‘န တာဝါဟံ, ပါပိမ, ပရိနိဗ္ဗာယိဿာမိ, ယာဝ မေ ဣဒံ ဗြဟ္မစရိယံ န ဣဒ္ဓဉ္စေဝ ဘဝိဿတိ ဖီတဉ္စ ဝိတ္ထာရိကံ ဗာဟုဇည’’န္တိ ဧဝမာဒီသု (ဒီ. နိ. ၂.၁၆၈; သံ. နိ. ၅.၈၂၂; ဥဒါ. ၅၁) သာသနံ. ‘‘အယမေဝ ခေါ, ဘိက္ခု, အရိယော အဋ္ဌင်္ဂိကော မဂ္ဂေါ ဗြဟ္မစရိယံ. သေယျထိဒံ, သမ္မာဒိဋ္ဌီ’’တိ ဧဝမာဒီသု (သံ. နိ. ၅.၆) မဂ္ဂေါ. ဣဓ ပန အရိယသစ္စဒဿနေန ပရတော မဂ္ဂဿ သင်္ဂဟိတတ္တာ အဝသေသံ သဗ္ဗမ္ပိ ဝဋ္ဋတိ. တဉ္စေတံ ဥပရူပရိ နာနပ္ပကာရဝိသေသာဓိဂမဟေတုတော မင်္ဂလန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. 'ब्रह्मचर्य' मैथुन-विरति (संयम), श्रमण-धर्म, शासन (बुद्ध-उपदेश) और मार्ग (अष्टांगिक मार्ग) का नाम है। जैसा कि 'अब्रह्मचर्य को छोड़कर ब्रह्मचारी होता है' आदि में मैथुन-विरति को ब्रह्मचर्य कहा गया है। 'आयुष्मान्, भगवान के पास ब्रह्मचर्य का वास किया जाता है' आदि में श्रमण-धर्म को। 'हे पापी (मार)! जब तक मेरा यह ब्रह्मचर्य (शासन) समृद्ध और विस्तृत नहीं हो जाता...' आदि में शासन को। 'भिक्षुओं! यह आर्य अष्टांगिक मार्ग ही ब्रह्मचर्य है' आदि में मार्ग को ब्रह्मचर्य कहा गया है। यहाँ आर्य सत्यों के दर्शन द्वारा (शैक्ष पुद्गल के लिए) मार्ग का ग्रहण हो जाने से, शेष सभी प्रकार का ब्रह्मचर्य भी उपयुक्त है। उत्तरोत्तर विभिन्न विशेष गुणों की प्राप्ति का कारण होने से इसे 'मंगल' समझना चाहिए। အရိယသစ္စာန ဒဿနံ နာမ ကုမာရပဉှေ ဝုတ္တာနံ စတုန္နံ အရိယသစ္စာနံ အဘိသမယဝသေန မဂ္ဂဒဿနံ, တံ သံသာရဒုက္ခဝီတိက္ကမဟေတုတော မင်္ဂလန္တိ ဝုစ္စတိ. 'आर्य सत्यों का दर्शन' का अर्थ है—कुमार-प्रश्न में कहे गए चार आर्य सत्यों का अभिसमय (साक्षात्कार) करने वाले मार्ग का दर्शन। संसार के दुखों से पार होने का कारण होने से इसे 'मंगल' कहा जाता है। နိဗ္ဗာနသစ္ဆိကိရိယာ နာမ ဣဓ အရဟတ္တဖလံ နိဗ္ဗာနန္တိ အဓိပ္ပေတံ. တမ္ပိ ဟိ ပဉ္စဂတိဝါနနေန ဝါနသညိတာယ တဏှာယ နိက္ခန္တတ္တာ နိဗ္ဗာနန္တိ ဝုစ္စတိ. တဿ [Pg.129] ပတ္တိ ဝါ ပစ္စဝေက္ခဏာ ဝါ သစ္ဆိကိရိယာတိ ဝုစ္စတိ. ဣတရဿ ပန နိဗ္ဗာနဿ အရိယသစ္စာနံ ဒဿနေနေဝ သစ္ဆိကိရိယာ သိဒ္ဓါ, တေနေတံ ဣဓ နာဓိပ္ပေတံ. ဧဝမေသာ နိဗ္ဗာနသစ္ဆိကိရိယာ ဒိဋ္ဌဓမ္မိကသုခဝိဟာရာဒိဟေတုတော မင်္ဂလန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. 'निर्वाण-साक्षात्कार' से यहाँ 'अर्हत्-फल' अभिप्रेत है। पाँच गतियों में स्थित 'वान' कही जाने वाली तृष्णा से मुक्त होने के कारण इसे भी 'निर्वाण' कहा जाता है। उसकी प्राप्ति या प्रत्यवेक्षण (समीक्षा) को 'साक्षात्कार' कहते हैं। अन्य (मुख्य) निर्वाण का साक्षात्कार तो आर्य सत्यों के दर्शन से ही सिद्ध हो जाता है, इसलिए वह यहाँ (अलग से) अभिप्रेत नहीं है। इस प्रकार, यह निर्वाण-साक्षात्कार 'दृष्टधम्म-सुख-विहार' (इसी जीवन में सुखपूर्वक विहार) का कारण होने से 'मंगल' समझना चाहिए। ဧဝံ ဣမိဿာ ဂါထာယ တပေါ ဗြဟ္မစရိယံ, အရိယသစ္စာနံ ဒဿနံ, နိဗ္ဗာနသစ္ဆိကိရိယာတိ စတ္တာရိ မင်္ဂလာနိ ဝုတ္တာနိ. မင်္ဂလတ္တဉ္စ နေသံ တတ္ထ တတ္ထ ဝိဘာဝိတမေဝါတိ. इस प्रकार, इस गाथा में तप, ब्रह्मचर्य, आर्य सत्यों का दर्शन और निर्वाण का साक्षात्कार—ये चार मंगल कहे गए हैं। इनका मंगल-स्वरूप उन-उन स्थानों पर स्पष्ट किया गया है। နိဋ္ဌိတာ တပေါ စာတိ ဣမိဿာ ဂါထာယ အတ္ထဝဏ္ဏနာ. 'तपो च' इस गाथा की अर्थ-व्याख्या समाप्त हुई। ဖုဋ္ဌဿလောကဓမ္မေဟီတိဂါထာဝဏ္ဏနာ 'फुट्ठस्स लोकधम्मेहि' गाथा की व्याख्या। ၁၂. ဣဒါနိ ဖုဋ္ဌဿ လောကဓမ္မေဟီတိ ဧတ္ထ ဖုဋ္ဌဿာတိ ဖုသိတဿ ဆုပိတဿ သမ္ပတ္တဿ. လောကေ ဓမ္မာ လောကဓမ္မာ, ယာဝ လောကပ္ပဝတ္တိ, တာဝ အနိဝတ္တကာ ဓမ္မာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. စိတ္တန္တိ မနော မာနသံ. ယဿာတိ နဝဿ ဝါ မဇ္ဈိမဿ ဝါ ထေရဿ ဝါ. န ကမ္ပတီတိ န စလတိ န ဝေဓတိ. အသောကန္တိ နိဿောကံ အဗ္ဗူဠှသောကသလ္လံ. ဝိရဇန္တိ ဝိဂတရဇံ ဝိဒ္ဓံသိတရဇံ. ခေမန္တိ အဘယံ နိရုပဒ္ဒဝံ. သေသံ ဝုတ္တနယမေဝါတိ အယံ ပဒဝဏ္ဏနာ. १२. अब 'फुट्ठस्स लोकधम्मेहि' के विषय में—'फुट्ठस्स' का अर्थ है स्पर्श किए हुए, प्राप्त हुए। लोक में होने वाले धर्म 'लोकधर्म' हैं; जब तक लोक की प्रवृत्ति है, तब तक ये अनिवार्य धर्म हैं। 'चित्तं' का अर्थ है मन या मानस। 'यस्स' का अर्थ है—चाहे नवदीक्षित हो, मध्यम हो या स्थविर भिक्षु हो। 'न कम्पति' का अर्थ है विचलित नहीं होता, डगमगाता नहीं है। 'असोकं' का अर्थ है शोक-रहित, जिससे शोक रूपी शल्य निकाल दिया गया हो। 'विरजं' का अर्थ है क्लेश रूपी रज (धूल) से रहित। 'खेमं' का अर्थ है निर्भय, उपद्रव-रहित। शेष व्याख्या पूर्ववत है। यह पदों की व्याख्या है। အတ္ထဝဏ္ဏနာ ပန ဧဝံ ဝေဒိတဗ္ဗာ – ဖုဋ္ဌဿ လောကဓမ္မေဟိ စိတ္တံ ယဿ န ကမ္ပတိ နာမ ယဿ လာဘာလာဘာဒီဟိ အဋ္ဌဟိ လောကဓမ္မေဟိ ဖုဋ္ဌဿ အဇ္ဈောတ္ထဋဿ စိတ္တံ န ကမ္ပတိ န စလတိ န ဝေဓတိ, တဿ တံ စိတ္တံ ကေနစိ အကမ္ပနီယလောကုတ္တမဘာဝါဝဟနတော မင်္ဂလန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. अर्थ-व्याख्या इस प्रकार समझनी चाहिए—'लोकधर्मों से स्पर्श होने पर जिसका चित्त नहीं कांपता' का अर्थ है कि लाभ-अलाभ आदि आठ लोकधर्मों के प्रभाव में आने पर भी जिस (अर्हत्) का चित्त विचलित नहीं होता, डगमगाता नहीं है। उसका वह चित्त किसी भी कारण से विचलित न होने के कारण और लोकोत्तर अवस्था को प्राप्त कराने वाला होने से 'मंगल' समझना चाहिए। ကဿ စ ဧတေဟိ ဖုဋ္ဌဿ စိတ္တံ န ကမ္ပတီတိ? အရဟတော ခီဏာသဝဿ, န အညဿ ကဿစိ. ဝုတ္တဉှေတံ – इन लोकधर्मों के स्पर्श होने पर किसका चित्त नहीं कांपता? केवल क्षीणास्त्रव अर्हत् का, किसी अन्य का नहीं। जैसा कि कहा गया है— ‘‘သေလော ယထာ ဧကဂ္ဃနော, ဝါတေန န သမီရတိ; ဧဝံ ရူပါ ရသာ သဒ္ဒါ, ဂန္ဓာ ဖဿာ စ ကေဝလာ. जैसे एक ठोस चट्टान हवा से नहीं हिलती, वैसे ही सभी रूप, रस, शब्द, गंध और स्पर्श— ‘‘ဣဋ္ဌာ ဓမ္မာ အနိဋ္ဌာ စ, န ပဝေဓေန္တိ တာဒိနော; ဌိတံ စိတ္တံ ဝိပ္ပမုတ္တံ, ဝယဉ္စဿာနုပဿတီ’’တိ. (မဟာဝ. ၂၄၄); चाहे वे प्रिय हों या अप्रिय, उस 'तादी' (स्थितप्रज्ञ अर्हत्) को विचलित नहीं कर सकते। उसका चित्त स्थिर और विमुक्त है, और वह (संस्कारों के) व्यय (विनाश) को देखता रहता है। အသောကံ [Pg.130] နာမ ခီဏာသဝဿေဝ စိတ္တံ. တဉှိ ယွာယံ ‘‘သောကော သောစနာ သောစိတတ္တံ အန္တောသောကော အန္တောပရိသောကော စေတသော ပရိနိဇ္ဈာယိတတ္တ’’န္တိအာဒိနာ (ဝိဘ. ၂၃၇) နယေန ဝုစ္စတိ သောကော, တဿ အဘာဝတော အသောကံ. ကေစိ နိဗ္ဗာနံ ဝဒန္တိ, တံ ပုရိမပဒေန နာနုသန္ဓိယတိ. ယထာ စ အသောကံ, ဧဝံ ဝိရဇံ ခေမန္တိပိ ခီဏာသဝဿေဝ စိတ္တံ. တဉှိ ရာဂဒေါသမောဟရဇာနံ ဝိဂတတ္တာ ဝိရဇံ, စတူဟိ စ ယောဂေဟိ ခေမတ္တာ ခေမံ, ယတော ဧတံ တေန တေနာကာရေန တမှိ တမှိ ပဝတ္တိက္ခဏေ ဂဟေတွာ နိဒ္ဒိဋ္ဌဝသေန တိဝိဓမ္ပိ အပ္ပဝတ္တက္ခန္ဓတာဒိလောကုတ္တမဘာဝါဝဟနတော အာဟုနေယျာဒိဘာဝါဝဟနတော စ မင်္ဂလန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. "अशोक" (शोक-रहित) नाम क्षीणाश्रव (अर्हन्त) का ही चित्त है। क्योंकि जिसे "शोक, शोचना, शोचित-भाव, अन्तःशोक, अन्तःपरिशोक, चित्त का परिनिझायित-भाव" आदि विधियों से शोक कहा जाता है, उस शोक के अभाव के कारण (अर्हन्त का चित्त) "अशोक" है। कुछ आचार्य निर्वाण को "अशोक" कहते हैं, किन्तु वह पूर्व पद (चित्त) के साथ मेल नहीं खाता। जैसे "अशोक" है, वैसे ही "विरज" (रज-रहित) और "क्षेम" (सुरक्षित) भी क्षीणाश्रव का ही चित्त है। राग, द्वेष और मोह रूपी रज (धूल) के विगत होने के कारण वह "विरज" है, और चार योगों से मुक्त होने के कारण "क्षेम" है। चूँकि इसे उन-उन आकारों में, उन-उन प्रवृत्ति-क्षणों में ग्रहण कर निर्दिष्ट किया गया है, इसलिए इन तीनों (अशोक, विरज, क्षेम) को अप्रवृत्त-स्कन्ध आदि लोकोत्तर भाव को लाने वाला और आहुनेय आदि भाव को लाने वाला होने के कारण "मङ्गल" समझना चाहिए। ဧဝံ ဣမိဿာ ဂါထာယ အဋ္ဌလောကဓမ္မေဟိ အကမ္ပိတစိတ္တံ, အသောကစိတ္တံ, ဝိရဇစိတ္တံ, ခေမစိတ္တန္တိ စတ္တာရိ မင်္ဂလာနိ ဝုတ္တာနိ. မင်္ဂလတ္တဉ္စ နေသံ တတ္ထ တတ္ထ ဝိဘာဝိတမေဝါတိ. इस प्रकार इस गाथा में आठ लोक-धर्मों से "अकम्पित चित्त", "अशोक चित्त", "विरज चित्त" और "क्षेम चित्त" - ये चार मङ्गल कहे गए हैं। और इनका मङ्गल-भाव उन-उन स्थानों पर स्पष्ट किया ही गया है। နိဋ္ဌိတာ ဖုဋ္ဌဿ လောကဓမ္မေဟီတိ ဣမိဿာ ဂါထာယ အတ္ထဝဏ္ဏနာ. "फुट्टस्स लोकधम्मेहि" (लोक-धर्मों द्वारा स्पर्श किए जाने पर) इस गाथा की अर्थ-व्याख्या समाप्त हुई। ဧတာဒိသာနီတိဂါထာဝဏ္ဏနာ "एतादिसानि" (इस प्रकार के) गाथा की व्याख्या। ၁၃. ဧဝံ ဘဂဝါ အသေဝနာ စ ဗာလာနန္တိအာဒီဟိ ဒသဟိ ဂါထာဟိ အဋ္ဌတိံသ မဟာမင်္ဂလာနိ ကထေတွာ ဣဒါနိ ဧတာနေဝ အတ္တနာ ဝုတ္တမင်္ဂလာနိ ထုနန္တော ‘‘ဧတာဒိသာနိ ကတွာနာ’’တိ အဝသာနဂါထမဘာသိ. १३. इस प्रकार भगवान ने "असेवना च बालानं" आदि दस गाथाओं द्वारा अड़तीस महामङ्गलों को कहकर, अब स्वयं द्वारा कहे गए उन्हीं मङ्गलों की प्रशंसा करते हुए "एतादिसानि कत्वान" आदि अन्तिम गाथा कही। တဿာယမတ္ထဝဏ္ဏနာ – ဧတာဒိသာနီတိ ဧတာနိ ဤဒိသာနိ မယာ ဝုတ္တပ္ပကာရာနိ ဗာလာနံ အသေဝနာဒီနိ. ကတွာနာတိ ကတွာ. ကတွာန ကတွာ ကရိတွာတိ ဟိ အတ္ထတော အနညံ. သဗ္ဗတ္ထမပရာဇိတာတိ သဗ္ဗတ္ထ ခန္ဓကိလေသာဘိသင်္ခါရဒေဝပုတ္တမာရပ္ပဘေဒေသု စတူသု ပစ္စတ္ထိကေသု ဧကေနာပိ အပရာဇိတာ ဟုတွာ, သယမေဝ တေ စတ္တာရော မာရေ ပရာဇေတွာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. မကာရော စေတ္ထ ပဒသန္ဓိကရမတ္တောတိ ဝိညာတဗ္ဗော. उसकी यह अर्थ-व्याख्या है - "एतादिसानि" का अर्थ है मेरे द्वारा कहे गए इस प्रकार के "बालों की असेवना" आदि। "कत्वान" का अर्थ है "करके" (कृत्वा)। "कत्वान", "कत्वा" और "करित्वा" अर्थ की दृष्टि से भिन्न नहीं हैं। "सब्बत्थमपराजिता" का अर्थ है सब जगह स्कन्ध-मार, क्लेश-मार, अभिसंस्कार-मार और देवपुत्र-मार के भेदों वाले चारों शत्रुओं (मारों) में से किसी एक के द्वारा भी पराजित न होकर, स्वयं ही उन चारों मारों को पराजित करके। यहाँ 'म' (मकार) केवल पद-सन्धि करने के लिए है, ऐसा समझना चाहिए। သဗ္ဗတ္ထ သောတ္ထိံ ဂစ္ဆန္တီတိ ဧတာဒိသာနိ မင်္ဂလာနိ ကတွာ စတူဟိ မာရေဟိ အပရာဇိတာ ဟုတွာ သဗ္ဗတ္ထ ဣဓလောကပရလောကေသု ဌာနစင်္ကမနာဒီသု စ သောတ္ထိံ ဂစ္ဆန္တိ, ဗာလသေဝနာဒီဟိ ယေ ဥပ္ပဇ္ဇေယျုံ အာသဝါ [Pg.131] ဝိဃာတပရိဠာဟာ, တေသံ အဘာဝါ သောတ္ထိံ ဂစ္ဆန္တိ, အနုပဒ္ဒုတာ အနုပသဋ္ဌာ ခေမိနော အပ္ပဋိဘယာ ဂစ္ဆန္တီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. အနုနာသိကော စေတ္ထ ဂါထာဗန္ဓသုခတ္ထံ ဝုတ္တောတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. "सब्बत्थ सोत्थिं गच्छन्ति" का अर्थ है - इस प्रकार के मङ्गलों को करके और चारों मारों से अपराजित होकर, सब जगह इस लोक और परलोक में तथा खड़े होने, चलने आदि (सभी अवस्थाओं) में कल्याण (क्षेम) को प्राप्त होते हैं। मूर्खों की सेवा आदि से जो विघ्न और परिदाह (संताप) उत्पन्न हो सकते थे, उनके अभाव के कारण वे कल्याण को प्राप्त होते हैं; वे उपद्रव-रहित, बाधा-रहित, सुरक्षित और निर्भय होकर जाते हैं। यहाँ अनुनासिक (निग्गहीत) गाथा-रचना की सुगमता के लिए कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। တံ တေသံ မင်္ဂလမုတ္တမန္တိ ဣမိနာ ဂါထာပဒေန ဘဂဝါ ဒေသနံ နိဋ္ဌာပေသိ. ကထံ? ဧဝံ, ဒေဝပုတ္တ, ယေ ဧတာဒိသာနိ ကရောန္တိ, တေ ယသ္မာ သဗ္ဗတ္ထ သောတ္ထိံ ဂစ္ဆန္တိ, တသ္မာ တံ ဗာလာနံ အသေဝနာဒိအဋ္ဌတိံသဝိဓမ္ပိ တေသံ ဧတာဒိသကာရကာနံ မင်္ဂလမုတ္တမံ သေဋ္ဌံ ပဝရန္တိ ဂဏှာဟီတိ. "तं तेसं मङ्गलमुत्तमं" इस गाथा-पद से भगवान ने देशना समाप्त की। कैसे? "हे देवपुत्र! इस प्रकार जो (देव-मनुष्य) ऐसे मङ्गलों को करते हैं, वे चूँकि सब जगह कल्याण को प्राप्त होते हैं, इसलिए 'बालों की असेवना' आदि अड़तीस प्रकार के वे मङ्गल उन (मङ्गल करने वाले) लोगों के लिए उत्तम, श्रेष्ठ और प्रवर हैं - ऐसा तुम ग्रहण करो (समझो)।" ဧဝဉ္စ ဘဂဝတာ နိဋ္ဌာပိတာယ ဒေသနာယ ပရိယောသာနေ ကောဋိသတသဟဿဒေဝတာယော အရဟတ္တံ ပါပုဏိံသု, သောတာပတ္တိသကဒါဂါမိအနာဂါမိဖလသမ္ပတ္တာနံ ဂဏနာ အသင်္ချေယျာ အဟောသိ. အထ ဘဂဝါ ဒုတိယဒိဝသေ အာနန္ဒတ္ထေရံ အာမန္တေသိ – ‘‘ဣမံ ပန, အာနန္ဒ, ရတ္တိံ အညတရာ ဒေဝတာ မံ ဥပသင်္ကမိတွာ မင်္ဂလပဉှံ ပုစ္ဆိ, အထဿာဟံ အဋ္ဌတိံသ မင်္ဂလာနိ အဘာသိံ, ဥဂ္ဂဏှာဟိ, အာနန္ဒ, ဣမံ မင်္ဂလပရိယာယံ, ဥဂ္ဂဟေတွာ ဘိက္ခူ ဝါစေဟီ’’တိ. ထေရော ဥဂ္ဂဟေတွာ ဘိက္ခူ ဝါစေသိ. တယိဒံ အာစရိယပရမ္ပရာယ အာဘတံ ယာဝဇ္ဇတနာ ပဝတ္တတိ, ‘‘ဧဝမိဒံ ဗြဟ္မစရိယံ ဣဒ္ဓဉ္စေဝ ဖီတဉ္စ ဝိတ္ထာရိကံ ဗာဟုဇညံ ပုထုဘူတံ ယာဝ ဒေဝမနုဿေဟိ သုပ္ပကာသိတ’’န္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. इस प्रकार भगवान द्वारा समाप्त की गई देशना के अन्त में एक लाख करोड़ देवताओं ने अर्हत्त्व प्राप्त किया; स्रोतआपत्ति, सकृदागामी और अनागामी फल प्राप्त करने वालों की गणना असंख्य थी। फिर भगवान ने दूसरे दिन आयुष्मान आनन्द को सम्बोधित किया - "आनन्द! इस बीती रात एक देवता ने मेरे पास आकर मङ्गल-प्रश्न पूछा था, तब मैंने उसे अड़तीस मङ्गल कहे थे। आनन्द! तुम इस मङ्गल-पर्याय को सीखो और सीखकर भिक्षुओं को सिखाओ।" स्थविर (आनन्द) ने उसे सीखकर भिक्षुओं को सिखाया। वही यह (मङ्गल सुत्त) आचार्यों की परम्परा से लाया गया आज तक प्रचलित है। "इस प्रकार यह ब्रह्मचर्य (शासन) समृद्ध, स्फीत, विस्तृत, बहुजन-ज्ञात, विशाल और देवताओं तथा मनुष्यों के बीच भली-भाँति प्रकाशित है" - ऐसा समझना चाहिए। ဣဒါနိ ဧတေသွေဝ မင်္ဂလေသု ဉာဏပရိစယပါဋဝတ္ထံ အယမာဒိတော ပဘုတိ ယောဇနာ – ဧဝမိမေ ဣဓလောကပရလောကလောကုတ္တရသုခကာမာ သတ္တာ ဗာလဇနသေဝနံ ပဟာယ, ပဏ္ဍိတေ နိဿာယ, ပူဇနေယျေ ပူဇေတွာ, ပတိရူပဒေသဝါသေန ပုဗ္ဗေ စ ကတပုညတာယ ကုသလပ္ပဝတ္တိယံ စောဒိယမာနာ အတ္တာနံ သမ္မာ ပဏိဓာယ, ဗာဟုသစ္စသိပ္ပဝိနယေဟိ အလင်္ကတတ္တဘာဝါ, ဝိနယာနုရူပံ သုဘာသိတံ ဘာသမာနာ, ယာဝ ဂိဟိဘာဝံ န ဝိဇဟန္တိ, တာဝ မာတာပိတူပဋ္ဌာနေန ပေါရာဏံ ဣဏမူလံ ဝိသောဓယမာနာ, ပုတ္တဒါရသင်္ဂဟေန နဝံ ဣဏမူလံ ပယောဇယမာနာ, အနာကုလကမ္မန္တတာယ ဓနဓညာဒိသမိဒ္ဓိံ ပါပုဏန္တာ, ဒါနေန ဘောဂသာရံ ဓမ္မစရိယာယ ဇီဝိတသာရဉ္စ ဂဟေတွာ, ဉာတိသင်္ဂဟေန သကဇနဟိတံ အနဝဇ္ဇကမ္မန္တတာယ ပရဇနဟိတဉ္စ ကရောန္တာ, ပါပဝိရတိယာ ပရူပဃာတံ မဇ္ဇပါနသံယမေန အတ္တူပဃာတဉ္စ ဝိဝဇ္ဇေတွာ, ဓမ္မေသု အပ္ပမာဒေန ကုသလပက္ခံ ဝဍ္ဎေတွာ, ဝဍ္ဎိတကုသလတာယ ဂိဟိဗျဉ္ဇနံ ဩဟာယ ပဗ္ဗဇိတဘာဝေ ဌိတာပိ ဗုဒ္ဓဗုဒ္ဓသာဝကူပဇ္ဈာယာစရိယာဒီသု ဂါရဝေန နိဝါတေန စ ဝတ္တသမ္ပဒံ အာရာဓေတွာ, သန္တုဋ္ဌိယာ [Pg.132] ပစ္စယဂေဓံ ပဟာယ, ကတညုတာယ သပ္ပုရိသဘူမိယံ ဌတွာ, ဓမ္မဿဝနေန စိတ္တလီနတံ ပဟာယ, ခန္တိယာ သဗ္ဗပရိဿယေ အဘိဘဝိတွာ, သောဝစဿတာယ သနာထံ အတ္တာနံ ကတွာ, သမဏဒဿနေန ပဋိပတ္တိပယောဂံ ပဿန္တာ, ဓမ္မသာကစ္ဆာယ ကင်္ခါဋ္ဌာနိယေသု ဓမ္မေသု ကင်္ခံ ဝိနောဒေတွာ, ဣန္ဒြိယသံဝရတပေန သီလဝိသုဒ္ဓိံ သမဏဓမ္မဗြဟ္မစရိယေန စိတ္တဝိသုဒ္ဓိံ တတော ပရာ စ စတဿော ဝိသုဒ္ဓိယော သမ္ပာဒေန္တာ, ဣမာယ ပဋိပဒါယ အရိယသစ္စဒဿနပရိယာယံ ဉာဏဒဿနဝိသုဒ္ဓိံ ပတွာ အရဟတ္တဖလသင်္ချံ နိဗ္ဗာနံ သစ္ဆိကရောန္တိ, ယံ သစ္ဆိကရိတွာ သိနေရုပဗ္ဗတော ဝိယ ဝါတဝုဋ္ဌီဟိ အဋ္ဌဟိ လောကဓမ္မေဟိ အဝိကမ္ပမာနစိတ္တာ အသောကာ ဝိရဇာ ခေမိနော ဟောန္တိ. ယေ စ ခေမိနော ဟောန္တိ, တေ သဗ္ဗတ္ထ ဧကေနပိ အပရာဇိတာ ဟောန္တိ, သဗ္ဗတ္ထ သောတ္ထိံ ဂစ္ဆန္တိ. တေနာဟ ဘဂဝါ – अब, इन मंगलों में ज्ञान के अभ्यास में कुशलता के लिए आदि से लेकर यह योजना (संबंध) है - इस प्रकार, इस लोक, परलोक और लोकोत्तर सुख की इच्छा रखने वाले ये प्राणी, बालकों (मूर्खों) की संगति को त्यागकर, पंडितों का आश्रय लेकर, पूजनीय व्यक्तियों का पूजन करके, उपयुक्त स्थान में निवास करते हुए, पूर्व में किए गए पुण्यों के कारण कुशल प्रवृत्तियों में प्रेरित होकर, स्वयं को सम्यक रूप से प्रतिष्ठित कर, बहुश्रुत, शिल्प और विनय से अलंकृत होकर, विनय के अनुरूप सुभाषित वचन बोलते हुए, जब तक वे गृहस्थ भाव को नहीं त्यागते, तब तक माता-पिता की सेवा द्वारा पुराने ऋण को चुकाते हुए, पुत्र और पत्नी के संग्रह (पालन-पोषण) द्वारा नए ऋण का निवेश करते हुए, व्याकुलता रहित कर्मों से धन-धान्य आदि की समृद्धि प्राप्त करते हुए, दान से भोगों के सार को और धर्मचर्या से जीवन के सार को ग्रहण कर, ज्ञाति-संग्रह (रिश्तेदारों की सहायता) से स्वजनों का हित और निर्दोष कर्मों से परायों का हित करते हुए, पाप से विरति द्वारा दूसरों के घात को और मद्यपान के संयम द्वारा स्वयं के घात को वर्जित कर, धर्मों में अप्रमाद से कुशल पक्ष को बढ़ाकर, बढ़े हुए कुशल भाव के कारण गृहस्थ के चिह्नों को त्यागकर प्रव्रजित भाव (संन्यास) में स्थित होकर भी बुद्ध, बुद्ध-श्रावक, उपाध्याय और आचार्यों आदि के प्रति गौरव और नम्रता से विनय-सम्पदा को सिद्ध कर, संतुष्टि से प्रत्ययों (संसाधनों) के प्रति लोभ को त्यागकर, कृतज्ञता से सत्पुरुषों की भूमि में स्थित होकर, धर्म-श्रवण से चित्त की लीनता (सुस्ती) को त्यागकर, क्षान्ति (सहनशीलता) से सभी बाधाओं को जीतकर, सुवचता (विनम्रता) से स्वयं को सनाथ (सुरक्षित) कर, श्रमणों के दर्शन से प्रतिपत्ति (अभ्यास) के प्रयोग को देखते हुए, धर्म-साकच्छा (चर्चा) से संशय के स्थानों वाले धर्मों में शंका को दूर कर, इन्द्रिय-संयम रूपी तप से शील-विशुद्धि को और श्रमण-धर्म रूपी ब्रह्मचर्य से चित्त-विशुद्धि को, और उसके बाद की चार विशुद्धियों को पूर्ण करते हुए, इस प्रतिपदा (मार्ग) से आर्यसत्यों के दर्शन की विधि रूपी ज्ञानदर्शन-विशुद्धि को प्राप्त कर अर्हत्वफल संज्ञक निर्वाण का साक्षात्कार करते हैं, जिसका साक्षात्कार करके वे सुमेरु पर्वत के समान वायु और वर्षा से विचलित न होने वाले, आठ लोकधर्मों से अकम्पित चित्त वाले, शोकरहित, विरज (निर्मल) और क्षेम (सुरक्षित) हो जाते हैं। जो क्षेमवान होते हैं, वे सर्वत्र एक (शत्रु) से भी पराजित नहीं होते, वे सर्वत्र कुशलतापूर्वक जाते हैं। इसीलिए भगवान ने कहा है - ‘‘ဧတာဒိသာနိ ကတွာန, သဗ္ဗတ္ထမပရာဇိတာ; သဗ္ဗတ္ထ သောတ္ထိံ ဂစ္ဆန္တိ, တံ တေသံ မင်္ဂလမုတ္တမ’’န္တိ. “ऐसा करके, वे सर्वत्र अपराजित रहते हैं; वे सर्वत्र कल्याण (कुशलता) को प्राप्त होते हैं, यही उनका उत्तम मंगल है।” ပရမတ္ထဇောတိကာယ ခုဒ္ဒကပါဌ-အဋ္ဌကထာယ परमत्थजोतिका नामक खुद्दकपाठ-अट्ठकथा में। မင်္ဂလသုတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. मंगलसुत्त-वर्णना (व्याख्या) समाप्त हुई। ၆. ရတနသုတ္တဝဏ္ဏနာ ६. रतनसुत्त-वर्णना (रत्न सूत्र की व्याख्या) နိက္ခေပပ္ပယောဇနံ निक्षेप-प्रयोजन (सूत्र के स्थापना का उद्देश्य) ဣဒါနိ ယာနီဓ ဘူတာနီတိဧဝမာဒိနာ မင်္ဂလသုတ္တာနန္တရံ နိက္ခိတ္တဿ ရတနသုတ္တဿ အတ္ထဝဏ္ဏနာက္ကမော အနုပ္ပတ္တော. တဿ ဣဓ နိက္ခေပပ္ပယောဇနံ ဝတွာ တတော ပရံ သုပရိသုဒ္ဓေန တိတ္ထေန နဒိတဠာကာဒီသု သလိလဇ္ဈောဂါဟဏမိဝ သုပရိသုဒ္ဓေန နိဒါနေန ဣမဿ သုတ္တဿ အတ္ထဇ္ဈောဂါဟဏံ ဒဿေတုံ – अब, 'यानीध भूतानि' इत्यादि शब्दों से शुरू होने वाले, मंगल सुत्त के ठीक बाद रखे गए रतन सुत्त की अर्थ-व्याख्या का क्रम प्राप्त हुआ है। यहाँ इसके निक्षेप (स्थापना) का प्रयोजन कहकर, उसके बाद अत्यंत शुद्ध घाट से नदी, तालाब आदि में जल में प्रवेश करने के समान, अत्यंत शुद्ध निदान (पृष्ठभूमि) के माध्यम से इस सुत्त के अर्थ में प्रवेश को दिखाने के लिए - ‘‘ယေန ဝုတ္တံ ယဒါ ယတ္ထ, ယသ္မာ စေတံ ဣမံ နယံ; ပကာသေတွာန ဧတဿ, ကရိဿာမတ္ထဝဏ္ဏနံ’’. “किसने कहा, कब कहा, कहाँ कहा और किसलिए कहा - इस पद्धति को प्रकाशित करके, हम इसकी अर्थ-व्याख्या करेंगे।” တတ္ထ [Pg.133] ယသ္မာ မင်္ဂလသုတ္တေန အတ္တရက္ခာ အကလျာဏကရဏကလျာဏာကရဏပစ္စယာနဉ္စ အာသဝါနံ ပဋိဃာတော ဒဿိတော, ဣမဉ္စ သုတ္တံ ပရာရက္ခံ အမနုဿာဒိပစ္စယာနဉ္စ အာသဝါနံ ပဋိဃာတံ သာဓေတိ, တသ္မာ တဒနန္တရံ နိက္ခိတ္တံ သိယာတိ. वहाँ, चूँकि मंगल सुत्त द्वारा आत्म-रक्षा और अकल्याणकारी तथा कल्याणकारी कारणों वाले आस्रवों का विनाश दिखाया गया है, और यह सुत्त (रतन सुत्त) पर-रक्षा (दूसरों की रक्षा) तथा अमनुष्यों आदि के कारण उत्पन्न होने वाले आस्रवों के विनाश को सिद्ध करता है, इसलिए इसे उसके (मंगल सुत्त के) तुरंत बाद रखा गया है। ဣဒံ တာဝဿ ဣဓ နိက္ခေပပ္ပယောဇနံ. यह यहाँ इसके निक्षेप का प्रयोजन है। ဝေသာလိဝတ္ထု वैशाली-वस्तु (वैशाली की कथा) ဣဒါနိ ‘‘ယေန ဝုတ္တံ ယဒါ ယတ္ထ, ယသ္မာ စေတ’’န္တိ ဧတ္ထာဟ ‘‘ကေန ပနေတံ သုတ္တံ ဝုတ္တံ, ကဒါ ကတ္ထ, ကသ္မာ စ ဝုတ္တ’’န္တိ. ဝုစ္စတေ – ဣဒဉှိ ဘဂဝတာ ဧဝ ဝုတ္တံ, န သာဝကာဒီဟိ. တဉ္စ ယဒါ ဒုဗ္ဘိက္ခာဒီဟိ ဥပဒ္ဒဝေဟိ ဥပဒ္ဒုတာယ ဝေသာလိယာ လိစ္ဆဝီဟိ ရာဇဂဟတော ယာစိတွာ ဘဂဝါ ဝေသာလိံ အာနီတော, တဒါ ဝေသာလိယံ တေသံ ဥပဒ္ဒဝါနံ ပဋိဃာတတ္ထာယ ဝုတ္တန္တိ. အယံ တေသံ ပဉှာနံ သင်္ခေပဝိဿဇ္ဇနာ. ဝိတ္ထာရတော ပန ဝေသာလိဝတ္ထုတော ပဘုတိ ပေါရာဏေဟိ ဝဏ္ဏီယတိ. अब, “किसने कहा, कब कहा, कहाँ कहा और किसलिए कहा” - इस विषय में पूछा जाता है कि “यह सुत्त किसके द्वारा कहा गया, कब, कहाँ और क्यों कहा गया?” उत्तर दिया जाता है - यह स्वयं भगवान द्वारा कहा गया है, श्रावकों आदि द्वारा नहीं। और जब दुर्भिक्ष आदि उपद्रवों से पीड़ित वैशाली में लिच्छवियों द्वारा राजगृह से याचना करके भगवान को वैशाली लाया गया, तब वैशाली में उन उपद्रवों को दूर करने के लिए यह कहा गया था। यह उन प्रश्नों का संक्षिप्त उत्तर है। विस्तार से तो वैशाली की कथा से लेकर प्राचीन आचार्यों द्वारा व्याख्या की गई है। တတြာယံ ဝဏ္ဏနာ – ဗာရာဏသိရညော ကိရ အဂ္ဂမဟေသိယာ ကုစ္ဆိမှိ ဂဗ္ဘော သဏ္ဌာသိ, သာ တံ ဉတွာ ရညော နိဝေဒေသိ, ရာဇာ ဂဗ္ဘပရိဟာရံ အဒါသိ. သာ သမ္မာ ပရိဟရိယမာနဂဗ္ဘာ ဂဗ္ဘပရိပါကကာလေ ဝိဇာယနဃရံ ပါဝိသိ. ပုညဝတီနံ ပစ္စူသသမယေ ဂဗ္ဘဝုဋ္ဌာနံ ဟောတိ. သာ စ တာသံ အညတရာ, တေန ပစ္စူသသမယေ အလတ္တကပဋလဗန္ဓုဇီဝကပုပ္ဖသဒိသံ မံသပေသိံ ဝိဇာယိ. တတော ‘‘အညာ ဒေဝိယော သုဝဏ္ဏဗိမ္ဗသဒိသေ ပုတ္တေ ဝိဇာယန္တိ, အဂ္ဂမဟေသီ မံသပေသိန္တိ ရညော ပုရတော မမ အဝဏ္ဏော ဥပ္ပဇ္ဇေယျာ’’တိ စိန္တေတွာ တေန အဝဏ္ဏဘယေန တံ မံသပေသိံ ဧကသ္မိံ ဘာဇနေ ပက္ခိပိတွာ အညတရေန ပဋိကုဇ္ဇိတွာ ရာဇမုဒ္ဒိကာယ လဉ္ဆိတွာ ဂင်္ဂါယ သောတေ ပက္ခိပါပေသိ. မနုဿေဟိ ဆဍ္ဍိတမတ္တေ ဒေဝတာ အာရက္ခံ သံဝိဒဟိံသု. သုဝဏ္ဏပဋ္ဋကဉ္စေတ္ထ ဇာတိဟိင်္ဂုလကေန ‘‘ဗာရာဏသိရညော အဂ္ဂမဟေသိယာ ပဇာ’’တိ လိခိတွာ ဗန္ဓိံသု. တတော တံ ဘာဇနံ ဦမိဘယာဒီဟိ အနုပဒ္ဒုတံ ဂင်္ဂါသောတေန ပါယာသိ. वहाँ यह व्याख्या है - कहा जाता है कि वाराणसी के राजा की अग्र-महिषी (मुख्य रानी) के गर्भ में गर्भ स्थित हुआ। उसने यह जानकर राजा को सूचित किया, राजा ने गर्भ-परिहार (गर्भावस्था की देखभाल) की व्यवस्था की। सम्यक रूप से देखभाल किए गए गर्भ वाली वह रानी गर्भ के परिपक्व होने के समय प्रसूति-गृह में प्रविष्ट हुई। पुण्यवती स्त्रियों का गर्भ-मोचन (प्रसव) प्रातःकाल के समय होता है। वह भी उनमें से एक थी, इसलिए प्रातःकाल के समय उसने लाक्षा-रस (आलता) के लेप और बंधुजीवक पुष्प के समान मांस-पेशी (मांस के लोथड़े) को जन्म दिया। तब उसने सोचा - “अन्य रानियाँ स्वर्ण-प्रतिमा के समान पुत्रों को जन्म देती हैं, और अग्र-महिषी ने मांस-पेशी को जन्म दिया - ऐसा राजा के सामने होने पर मेरा अपयश होगा।” ऐसा सोचकर उस अपयश के भय से उसने उस मांस-पेशी को एक पात्र में रखकर, दूसरे पात्र से ढँककर, राज-मुद्रा से अंकित कर गंगा के प्रवाह में फिंकवा दिया। मनुष्यों द्वारा फेंके जाते ही देवताओं ने रक्षा की व्यवस्था की। वहाँ एक स्वर्ण-पट्ट पर जात्य-हिंगुल (शुद्ध सिंदूर) से “वाराणसी के राजा की अग्र-महिषी की संतान” लिखकर बाँध दिया गया। उसके बाद वह पात्र लहरों के भय आदि से रहित होकर गंगा के प्रवाह के साथ आगे बढ़ा। တေန စ သမယေန အညတရော တာပသော ဂေါပါလကုလံ နိဿာယ ဂင်္ဂါတီရေ ဝိဟရတိ. သော ပါတောဝ ဂင်္ဂံ ဩတရန္တော ဘာဇနံ အာဂစ္ဆန္တံ ဒိသွာ [Pg.134] ပံသုကူလသညာယ အဂ္ဂဟေသိ. တတော တတ္ထ တံ အက္ခရပဋ္ဋကံ ရာဇမုဒ္ဒိကာလဉ္ဆနဉ္စ ဒိသွာ မုဉ္စိတွာ တံ မံသပေသိံ အဒ္ဒသ, ဒိသွာနဿ ဧတဒဟောသိ ‘‘သိယာ ဂဗ္ဘော, တထာ ဟိဿ ဒုဂ္ဂန္ဓပူတိဘာဝေါ နတ္ထီ’’တိ. တံ အဿမံ နေတွာ သုဒ္ဓေ ဩကာသေ ဌပေသိ. အထ အဍ္ဎမာသစ္စယေန ဒွေ မံသပေသိယော အဟေသုံ. တာပသော ဒိသွာ သာဓုတရံ ဌပေသိ, တတော ပုန အဍ္ဎမာသစ္စယေန ဧကမေကိဿာ ပေသိယာ ဟတ္ထပါဒသီသာနမတ္ထာယ ပဉ္စ ပဉ္စ ပိဠကာ ဥဋ္ဌဟိံသု. တာပသော ဒိသွာ ပုန သာဓုတရံ ဌပေသိ. အထ အဍ္ဎမာသစ္စယေန ဧကာ မံသပေသိ သုဝဏ္ဏဗိမ္ဗသဒိသော ဒါရကော, ဧကာ ဒါရိကာ အဟောသိ. တေသု တာပသဿ ပုတ္တသိနေဟော ဥပ္ပဇ္ဇိ. အင်္ဂုဋ္ဌကတော စဿ ခီရံ နိဗ္ဗတ္တိ. တတော ပဘုတိ စ ခီရဘတ္တံ လဘတိ, သော ဘတ္တံ ဘုဉ္ဇိတွာ ခီရံ ဒါရကာနံ မုခေ အာသိဉ္စတိ. တေသံ ယံ ယံ ဥဒရံ ပဝိဋ္ဌံ, တံ သဗ္ဗံ မဏိဘာဇနဂတံ ဝိယ ဒိဿတိ. ဧဝံ လိစ္ဆဝီ အဟေသုံ. အပရေ ပနာဟု ‘‘သိဗ္ဗေတွာ ဌပိတာ ဝိယ နေသံ အညမညံ လီနာ ဆဝိ အဟောသီ’’တိ. ဧဝံ တေ နိစ္ဆဝိတာယ ဝါ လီနစ္ဆဝိတာယ ဝါ လိစ္ဆဝီတိ ပညာယိံသု. उस समय एक तपस्वी ग्वालों के परिवार के आश्रय में गंगा के तट पर रहता था। वह सुबह गंगा में उतरते समय एक पात्र को बहते हुए आते देख उसे पांसुकूल (फेंका हुआ वस्त्र) समझकर उठा लिया। फिर वहाँ उस पर अक्षरों वाली स्वर्णपट्टिका और राजमुद्रा का चिह्न देखकर उसे खोला और उस मांस-पेशी को देखा। उसे देखकर उसे यह विचार आया—"यह गर्भ हो सकता है, क्योंकि इसमें दुर्गंध या सड़ांध नहीं है।" वह उसे आश्रम ले गया और एक स्वच्छ स्थान पर रख दिया। फिर आधे महीने के बीतने पर वे दो मांस-पेशियाँ हो गईं। तपस्वी ने उन्हें देखकर और अच्छी तरह रख दिया। फिर आधे महीने के बीतने पर प्रत्येक मांस-पेशी में हाथ, पैर और सिर के लिए पाँच-पाँच उभार (पिड़क) उत्पन्न हुए। तपस्वी ने उन्हें देखकर फिर अच्छी तरह रख दिया। फिर आधे महीने के बीतने पर एक मांस-पेशी सुवर्ण-प्रतिमा के समान बालक और एक बालिका बन गई। उनमें तपस्वी को पुत्र-स्नेह उत्पन्न हुआ। उसके अँगूठे से दूध निकलने लगा। तब से वह दूध-भात खाकर दूध बच्चों के मुँह में डाल देता था। उनके पेट में जो-जो भोजन प्रवेश करता था, वह सब मणि-पात्र में रखे हुए के समान दिखाई देता था। इस प्रकार वे 'लिच्छवि' हुए। दूसरे आचार्य कहते हैं—"जैसे सिलकर रखे गए हों, वैसे उनकी त्वचा एक-दूसरे से जुड़ी हुई (लीन-छवि) थी।" इस प्रकार वे 'निच्छवि' (त्वचा रहित) होने के कारण या 'लीन-छवि' (जुड़ी हुई त्वचा) होने के कारण 'लिच्छवि' कहलाए। တာပသော ဒါရကေ ပေါသေန္တော ဥဿူရေ ဂါမံ ပိဏ္ဍာယ ပဝိသတိ, အတိဒိဝါ ပဋိက္ကမတိ. တဿ တံ ဗျာပါရံ ဉတွာ ဂေါပါလကာ အာဟံသု, ‘‘ဘန္တေ, ပဗ္ဗဇိတာနံ ဒါရကပေါသနံ ပလိဗောဓော, အမှာကံ ဒါရကေ ဒေထ, မယံ ပေါသေဿာမ, တုမှေ အတ္တနော ကမ္မံ ကရောထာ’’တိ. တာပသော ‘‘သာဓူ’’တိ ပဋိဿုဏိ. ဂေါပါလကာ ဒုတိယဒိဝသေ မဂ္ဂံ သမံ ကတွာ ပုပ္ဖေဟိ ဩကိရိတွာ ဓဇပဋာကံ ဥဿာပေတွာ တူရိယေဟိ ဝဇ္ဇမာနေဟိ အဿမံ အာဂတာ. တာပသော ‘‘မဟာပုညာ ဒါရကာ, အပ္ပမာဒေန ဝဍ္ဎေထ, ဝဍ္ဎေတွာ စ အညမညံ အာဝါဟဝိဝါဟံ ကရောထ, ပဉ္စဂေါရသေန ရာဇာနံ တောသေတွာ ဘူမိဘာဂံ ဂဟေတွာ နဂရံ မာပေထ, တတ္ထ ကုမာရံ အဘိသိဉ္စထာ’’တိ ဝတွာ ဒါရကေ အဒါသိ. တေ ‘‘သာဓူ’’တိ ပဋိဿုဏိတွာ ဒါရကေ နေတွာ ပေါသေသုံ. तपस्वी बच्चों का पालन-पोषण करते हुए देर से गाँव में भिक्षा के लिए प्रवेश करता था और बहुत देर से लौटता था। उसके उस परिश्रम को जानकर ग्वालों ने कहा—"भन्ते! प्रव्रजितों के लिए बच्चों का पालन-पोषण एक बाधा (परिबोध) है। आप बच्चों को हमें दे दें, हम इनका पालन करेंगे; आप अपना तपस्या का कार्य करें।" तपस्वी ने "ठीक है" कहकर स्वीकार कर लिया। ग्वालों ने दूसरे दिन मार्ग को समतल कर, फूलों से सजाकर, ध्वजा-पताकाएँ फहराकर और वाद्य-यंत्रों को बजाते हुए आश्रम आए। तपस्वी ने कहा—"ये बच्चे महापुण्यवान हैं, इन्हें प्रमाद रहित होकर बड़ा करें। बड़ा होने पर इनका आपस में विवाह (आवाह-विवाह) कर दें। पंच-गोरस से राजा को प्रसन्न कर भूमि का भाग लेकर नगर बसाएँ और वहाँ कुमार का अभिषेक करें।" ऐसा कहकर उन्होंने बच्चों को सौंप दिया। उन्होंने "ठीक है" कहकर स्वीकार किया और बच्चों को ले जाकर उनका पालन-पोषण किया। ဒါရကာ ဝုဍ္ဎိမနွာယ ကီဠန္တာ ဝိဝါဒဋ္ဌာနေသု အညေ ဂေါပါလဒါရကေ ဟတ္ထေနပိ ပါဒေနပိ ပဟရန္တိ, တေ ရောဒန္တိ. ‘‘ကိဿ ရောဒထာ’’တိ စ မာတာပိတူဟိ ဝုတ္တာ ‘‘ဣမေ နိမ္မာတာပိတိကာ တာပသပေါသိတာ အမှေ အတီဝ ပဟရန္တီ’’တိ ဝဒန္တိ. တတော တေသံ မာတာပိတရော ‘‘ဣမေ ဒါရကာ အညေ ဒါရကေ ဝိဟေဌေန္တိ ဒုက္ခာပေန္တိ, န ဣမေ သင်္ဂဟေတဗ္ဗာ, ဝဇ္ဇိတဗ္ဗာ ဣမေ’’တိ အာဟံသု. တတော ပဘုတိ ကိရ သော ပဒေသော ‘‘ဝဇ္ဇီ’’တိ [Pg.135] ဝုစ္စတိ, တိယောဇနသတံ ပရိမာဏေန. အထ တံ ပဒေသံ ဂေါပါလကာ ရာဇာနံ တောသေတွာ အဂ္ဂဟေသုံ. တတ္ထေဝ နဂရံ မာပေတွာ သောဠသဝဿုဒ္ဒေသိကံ ကုမာရံ အဘိသိဉ္စိတွာ ရာဇာနံ အကံသု. တာယ စဿ ဒါရိကာယ သဒ္ဓိံ ဝါရေယျံ ကတွာ ကတိကံ အကံသု ‘‘န ဗာဟိရတော ဒါရိကာ အာနေတဗ္ဗာ, ဣတော ဒါရိကာ န ကဿစိ ဒါတဗ္ဗာ’’တိ. တေသံ ပဌမသံဝါသေန ဒွေ ဒါရကာ ဇာတာ ဓီတာ စ ပုတ္တော စ, ဧဝံ သောဠသက္ခတ္တုံ ဒွေ ဒွေ ဇာတာ. တတော တေသံ ဒါရကာနံ ယထာက္ကမံ ဝဍ္ဎန္တာနံ အာရာမုယျာနနိဝါသဋ္ဌာနပရိဝါရသမ္ပတ္တိံ ဂဟေတုံ အပ္ပဟောန္တံ တံ နဂရံ တိက္ခတ္တုံ ဂါဝုတန္တရေန ဂါဝုတန္တရေန ပါကာရေန ပရိက္ခိပိံသု, တဿ ပုနပ္ပုနံ ဝိသာလီကတတ္တာ ဝေသာလီတွေဝ နာမံ ဇာတံ. ဣဒံ ဝေသာလိဝတ္ထု. बच्चे बड़े होने पर खेलते समय विवाद के स्थानों में अन्य ग्वाल-बालों को हाथ और पैर से मारते थे। वे रोने लगते थे। माता-पिता द्वारा "क्यों रो रहे हो?" पूछे जाने पर वे कहते थे—"ये बिना माता-पिता वाले, तपस्वी द्वारा पाले गए बच्चे हमें बहुत मारते हैं।" तब उनके माता-पिता ने कहा—"ये बच्चे अन्य बच्चों को सताते हैं, कष्ट देते हैं; इन्हें साथ नहीं रखना चाहिए, इन्हें त्याग देना (वर्जित करना) चाहिए।" कहते हैं कि तब से वह प्रदेश, जो परिमाण में तीन सौ योजन था, 'वज्जी' कहलाया। फिर ग्वालों ने राजा को प्रसन्न कर वह प्रदेश प्राप्त कर लिया। वहीं नगर बसाकर सोलह वर्ष की आयु वाले कुमार का अभिषेक कर उसे राजा बनाया। उस कन्या के साथ उसका विवाह कर उन्होंने यह नियम बनाया—"बाहर से कन्या नहीं लानी चाहिए और यहाँ से कन्या किसी बाहरी को नहीं देनी चाहिए।" उनके प्रथम सहवास से दो बच्चे—एक पुत्री और एक पुत्र—उत्पन्न हुए। इस प्रकार सोलह बार दो-दो बच्चे उत्पन्न हुए। फिर उन बच्चों के क्रमशः बड़े होने पर आराम, उद्यान, निवास स्थान और परिचारकों की संपत्ति के लिए वह नगर अपर्याप्त होने लगा, तब उस नगर को तीन बार एक-एक गावुत के अंतर पर प्राचीर से घेरा गया। उस नगर के बार-बार विशाल किए जाने के कारण ही उसका नाम 'वैशाली' पड़ा। यह वैशाली की कथा है। ဘဂဝတော နိမန္တနံ भगवान का निमंत्रण। အယံ ပန ဝေသာလီ ဘဂဝတော ဥပ္ပန္နကာလေ ဣဒ္ဓါ ဝေပုလ္လပ္ပတ္တာ အဟောသိ. တတ္ထ ဟိ ရာဇူနံယေဝ သတ္တ သဟဿာနိ သတ္တ သတာနိ သတ္တ စ ရာဇာနော အဟေသုံ. တထာ ယုဝရာဇသေနာပတိဘဏ္ဍာဂါရိကပ္ပဘုတီနံ. ယထာဟ – यह वैशाली भगवान के उत्पन्न होने के समय समृद्ध और अत्यंत विस्तार को प्राप्त थी। वहाँ सात हजार सात सौ सात राजा थे। वैसे ही उपराजा, सेनापति और भंडागारिक (कोषाध्यक्ष) आदि भी थे। जैसा कि कहा गया है— ‘‘တေန ခေါ ပန သမယေန ဝေသာလီ ဣဒ္ဓါ စေဝ ဟောတိ ဖီတာ စ ဗဟုဇနာ အာကိဏ္ဏမနုဿာ သုဘိက္ခာ စ, သတ္တ စ ပါသာဒသဟဿာနိ သတ္တ စ ပါသာဒသတာနိ သတ္တ စ ပါသာဒါ, သတ္တ စ ကူဋာဂါရသဟဿာနိ သတ္တ စ ကူဋာဂါရသတာနိ သတ္တ စ ကူဋာဂါရာနိ, သတ္တ စ အာရာမသဟဿာနိ သတ္တ စ အာရာမသတာနိ သတ္တ စ အာရာမာ, သတ္တ စ ပေါက္ခရဏိသဟဿာနိ သတ္တ စ ပေါက္ခရဏိသတာနိ သတ္တ စ ပေါက္ခရဏိယော’’တိ (မဟာဝ. ၃၂၆). "उस समय वैशाली समृद्ध, संपन्न, बहुत जनसमूह वाली, मनुष्यों से भरी हुई और सुभिक्ष थी। वहाँ सात हजार सात सौ सात प्रासाद, सात हजार सात सौ सात कूटागार (शिखर वाले घर), सात हजार सात सौ सात आराम (उद्यान) और सात हजार सात सौ सात पुष्करिणियाँ (तालाब) थीं।" သာ အပရေန သမယေန ဒုဗ္ဘိက္ခာ အဟောသိ ဒုဗ္ဗုဋ္ဌိကာ ဒုဿဿာ. ပဌမံ ဒုဂ္ဂတမနုဿာ မရန္တိ, တေ ဗဟိဒ္ဓါ ဆဍ္ဍေန္တိ. မတမနုဿာနံ ကုဏပဂန္ဓေန အမနုဿာ နဂရံ ပဝိသိံသု, တတော ဗဟုတရာ မရန္တိ. တာယ ပဋိကူလတာယ သတ္တာနံ အဟိဝါတရောဂေါ ဥပ္ပဇ္ဇိ. ဣတိ တီဟိ ဒုဗ္ဘိက္ခအမနုဿရောဂဘယေဟိ ဥပဒ္ဒုတာ ဝေသာလိနဂရဝါသိနော ဥပသင်္ကမိတွာ ရာဇာနံ အာဟံသု, ‘‘မဟာရာဇ, ဣမသ္မိံ နဂရေ တိဝိဓံ ဘယမုပ္ပန္နံ, ဣတော ပုဗ္ဗေ ယာဝ သတ္တမာ ရာဇကုလပရိဝဋ္ဋာ ဧဝရူပံ အနုပ္ပန္နပုဗ္ဗံ, တုမှာကံ မညေ အဓမ္မိကတ္တေန [Pg.136] တံ ဧတရဟိ ဥပ္ပန္န’’န္တိ. ရာဇာ သဗ္ဗေ သန္ထာဂါရေ သန္နိပါတာပေတွာ ‘‘မယှံ အဓမ္မိကဘာဝံ ဝိစိနထာ’’တိ အာဟ. တေ သဗ္ဗံ ပဝေဏိံ ဝိစိနန္တာ န ကိဉ္စိ အဒ္ဒသံသု. वह वैशाली बाद के समय में अकाल, अल्पवृष्टि और दुर्भिक्ष से ग्रस्त हो गई। सबसे पहले निर्धन लोग मरने लगे, उन्हें नगर के बाहर फेंक दिया जाता था। मृत मनुष्यों के शवों की गंध से अमनुष्य (राक्षस आदि) नगर में प्रवेश कर गए, जिससे और भी अधिक लोग मरने लगे। उस अपवित्रता के कारण प्राणियों को 'अहिवात-रोग' (महामारी) हो गया। इस प्रकार अकाल, अमनुष्य और रोग—इन तीन भयों से पीड़ित वैशाली नगर के निवासियों ने राजा के पास जाकर कहा—"महाराज! इस नगर में तीन प्रकार के भय उत्पन्न हो गए हैं। इससे पहले सात राजकुलों की पीढ़ी तक ऐसा कभी नहीं हुआ था। हमारा मानना है कि आपकी अधार्मिकता के कारण यह अब उत्पन्न हुआ है।" राजा ने सभी को संस्थागार (सभा भवन) में एकत्रित कर कहा—"मेरी अधार्मिकता की जाँच करें।" उन्होंने पूरी परंपरा की जाँच की, पर उन्हें कोई दोष नहीं मिला। တတော ရညော ဒေါသမဒိသွာ ‘‘ဣဒံ ဘယံ အမှာကံ ကထံ ဝူပသမေယျာ’’တိ စိန္တေသုံ. တတ္ထ ဧကစ္စေ ဆ သတ္ထာရေ အပဒိသိံသု ‘‘ဧတေဟိ ဩက္ကန္တမတ္တေ ဝူပသမေဿတီ’’တိ. ဧကစ္စေ အာဟံသု – ‘‘ဗုဒ္ဓေါ ကိရ လောကေ ဥပ္ပန္နော, သော ဘဂဝါ သဗ္ဗသတ္တဟိတာယ ဓမ္မံ ဒေသေတိ မဟိဒ္ဓိကော မဟာနုဘာဝေါ, တေန ဩက္ကန္တမတ္တေ သဗ္ဗဘယာနိ ဝူပသမေယျု’’န္တိ. တေန တေ အတ္တမနာ ဟုတွာ ‘‘ကဟံ ပန သော ဘဂဝါ ဧတရဟိ ဝိဟရတိ, အမှေဟိ ပေသိတော န အာဂစ္ဆေယျာ’’တိ အာဟံသု. အထာပရေ အာဟံသု – ‘‘ဗုဒ္ဓါ နာမ အနုကမ္ပကာ, ကိဿ နာဂစ္ဆေယျုံ, သော ပန ဘဂဝါ ဧတရဟိ ရာဇဂဟေ ဝိဟရတိ, ရာဇာ ဗိမ္ဗိသာရော တံ ဥပဋ္ဌဟတိ, သော အာဂန္တုံ န ဒဒေယျာ’’တိ. ‘‘တေန ဟိ ရာဇာနံ သညာပေတွာ အာနေယျာမာ’’တိ ဒွေ လိစ္ဆဝိရာဇာနော မဟတာ ဗလကာယေန ပဟူတံ ပဏ္ဏာကာရံ ဒတွာ ရညော သန္တိကံ ပေသိံသု ‘‘ဗိမ္ဗိသာရံ သညာပေတွာ ဘဂဝန္တံ အာနေထာ’’တိ. တေ ဂန္တွာ ရညော ပဏ္ဏာကာရံ ဒတွာ တံ ပဝတ္တိံ နိဝေဒေတွာ, ‘‘မဟာရာဇ, ဘဂဝန္တံ အမှာကံ နဂရံ ပေသေဟီ’’တိ အာဟံသု. ရာဇာ န သမ္ပဋိစ္ဆိ, ‘‘တုမှေယေဝ ဇာနာထာ’’တိ အာဟ. တေ ဘဂဝန္တံ ဥပသင်္ကမိတွာ ဝန္ဒိတွာ ဧဝမာဟံသု – ‘‘ဘန္တေ, အမှာကံ နဂရေ တီဏိ ဘယာနိ ဥပ္ပန္နာနိ, သစေ ဘဂဝါ အာဂစ္ဆေယျ, သောတ္ထိ နော ဘဝေယျာ’’တိ. ဘဂဝါ အာဝဇ္ဇေတွာ ‘‘ဝေသာလိယံ ရတနသုတ္တေ ဝုတ္တေ သာ ရက္ခာ ကောဋိသတသဟဿံ စက္ကဝါဠာနံ ဖရိဿတိ, သုတ္တပရိယောသာနေ စတုရာသီတိယာ ပါဏသဟဿာနံ ဓမ္မာဘိသမယော ဘဝိဿတီ’’တိ အဓိဝါသေသိ. အထ ရာဇာ ဗိမ္ဗိသာရော ဘဂဝတော အဓိဝါသနံ သုတွာ ‘‘ဘဂဝတာ ဝေသာလိဂမနံ အဓိဝါသိတ’’န္တိ နဂရေ ဃောသနံ ကာရာပေတွာ ဘဂဝန္တံ ဥပသင်္ကမိတွာ အာဟ – ‘‘ကိံ, ဘန္တေ, သမ္ပဋိစ္ဆထ ဝေသာလိဂမန’’န္တိ? အာမ, မဟာရာဇာတိ. တေန ဟိ, ဘန္တေ, တာဝ အာဂမေထ, ယာဝ မဂ္ဂံ ပဋိယာဒေမီတိ. उसके बाद, राजा (लिच्छवियों) का कोई दोष न देखकर, उन्होंने सोचा, "हमारे इस भय को कैसे शांत किया जाए?" वहाँ कुछ लोगों ने छह (तीर्थंकर) गुरुओं का सुझाव दिया, "उनके आने मात्र से ही (भय) शांत हो जाएगा।" कुछ ने कहा— "सुना है कि लोक में बुद्ध उत्पन्न हुए हैं, वे भगवान सभी प्राणियों के कल्याण के लिए धर्म का उपदेश देते हैं, वे महान ऋद्धिमान और महान प्रभावशाली हैं, उनके आने मात्र से ही सभी भय शांत हो जाएंगे।" इससे वे प्रसन्न होकर बोले— "परंतु वे भगवान इस समय कहाँ विहार कर रहे हैं? यदि हमारे द्वारा बुलाए गए, तो क्या वे नहीं आएंगे?" तब दूसरों ने कहा— "बुद्ध दयालु होते हैं, वे क्यों नहीं आएंगे? परंतु वे भगवान इस समय राजगृह में विहार कर रहे हैं, राजा बिम्बिसार उनकी सेवा करते हैं, वे उन्हें आने नहीं देंगे।" "तो फिर राजा को समझाकर उन्हें ले आते हैं"—ऐसा सोचकर उन्होंने दो लिच्छवी राजाओं को बड़ी सेना और प्रचुर उपहार देकर राजा (बिम्बिसार) के पास भेजा कि "बिम्बिसार को समझाकर भगवान को ले आओ।" उन्होंने जाकर राजा को उपहार दिए और उस स्थिति की सूचना देते हुए कहा— "महाराज, भगवान को हमारे नगर भेज दीजिए।" राजा ने स्वीकार नहीं किया और कहा— "तुम स्वयं ही (भगवान से) निवेदन करो।" उन्होंने भगवान के पास जाकर वंदना की और इस प्रकार कहा— "भन्ते, हमारे नगर में तीन प्रकार के भय उत्पन्न हो गए हैं, यदि भगवान पधारें, तो हमारा कल्याण होगा।" भगवान ने विचार किया कि "वैशाली में रतन सुत्त का पाठ किए जाने पर, वह रक्षा एक लाख करोड़ चक्रवातों तक फैल जाएगी, और सुत्त के अंत में चौरासी हजार प्राणियों को धम्म का बोध होगा"—ऐसा सोचकर उन्होंने स्वीकृति दे दी। तब राजा बिम्बिसार ने भगवान की स्वीकृति के बारे में सुनकर नगर में घोषणा करवाई कि "भगवान ने वैशाली जाने की स्वीकृति दे दी है," और भगवान के पास जाकर पूछा— "भन्ते, क्या आपने वैशाली जाने की स्वीकृति दे दी है?" (भगवान ने कहा—) "हाँ, महाराज।" "तो भन्ते, तब तक प्रतीक्षा करें जब तक मैं मार्ग तैयार न करवा दूँ।" အထ ခေါ ရာဇာ ဗိမ္ဗိသာရော ရာဇဂဟဿ စ ဂင်္ဂါယ စ အန္တရာ ပဉ္စယောဇနဘူမိံ သမံ ကတွာ ယောဇနေ ယောဇနေ ဝိဟာရံ မာပေတွာ ဘဂဝတော ဂမနကာလံ ပဋိဝေဒေသိ. ဘဂဝါ ပဉ္စဟိ ဘိက္ခုသတေဟိ ပရိဝုတော [Pg.137] ပါယာသိ. ရာဇာ ပဉ္စယောဇနံ မဂ္ဂံ ပဉ္စဝဏ္ဏေဟိ ပုပ္ဖေဟိ ဇာဏုမတ္တံ ဩကိရာပေတွာ ဓဇပဋာကပုဏ္ဏဃဋကဒလိအာဒီနိ ဥဿာပေတွာ ဘဂဝတော ဒွေ သေတစ္ဆတ္တာနိ ဧကမေကဿ စ ဘိက္ခုဿ ဧကမေကံ ဥက္ခိပါပေတွာ သဒ္ဓိံ အတ္တနော ပရိဝါရေန ပုပ္ဖဂန္ဓာဒီဟိ ပူဇံ ကရောန္တော ဧကေကသ္မိံ ဝိဟာရေ ဘဂဝန္တံ ဝသာပေတွာ မဟာဒါနာနိ ဒတွာ ပဉ္စဟိ ဒိဝသေဟိ ဂင်္ဂါတီရံ နေသိ. တတ္ထ သဗ္ဗာလင်္ကာရေဟိ နာဝံ အလင်္ကရောန္တော ဝေသာလိကာနံ သာသနံ ပေသေသိ ‘‘အာဂတော ဘဂဝါ, မဂ္ဂံ ပဋိယာဒေတွာ သဗ္ဗေ ဘဂဝတော ပစ္စုဂ္ဂမနံ ကရောထာ’’တိ. တေ ‘‘ဒိဂုဏံ ပူဇံ ကရိဿာမာ’’တိ ဝေသာလိယာ စ ဂင်္ဂါယ စ အန္တရာ တိယောဇနဘူမိံ သမံ ကတွာ ဘဂဝတော စတ္တာရိ ဧကမေကဿ စ ဘိက္ခုဿ ဒွေ ဒွေ သေတစ္ဆတ္တာနိ သဇ္ဇေတွာ ပူဇံ ကုရုမာနာ ဂင်္ဂါတီရံ အာဂန္တွာ အဋ္ဌံသု. तब राजा बिम्बिसार ने राजगृह और गंगा के बीच की पाँच योजन भूमि को समतल करवाया, प्रत्येक योजन पर एक विहार बनवाया और भगवान को प्रस्थान के समय की सूचना दी। भगवान पाँच सौ भिक्षुओं के साथ प्रस्थान कर गए। राजा ने पाँच योजन के मार्ग पर पाँच रंगों के फूलों को घुटनों तक बिछवाया, ध्वजा-पताका, पूर्ण-घट और कदली (केले के पेड़) आदि लगवाए, भगवान के लिए दो श्वेत छत्र और प्रत्येक भिक्षु के लिए एक-एक श्वेत छत्र धारण करवाए, और अपने परिवार के साथ पुष्प-गंध आदि से पूजा करते हुए, प्रत्येक विहार में भगवान को ठहराते हुए और महादान देते हुए, पाँच दिनों में गंगा के तट पर ले आए। वहाँ नाव को सभी अलंकारों से सजाते हुए उन्होंने वैशालीवासियों को संदेश भेजा— "भगवान आ गए हैं, मार्ग तैयार कर आप सभी भगवान की अगवानी करें।" उन्होंने सोचा, "हम दुगुनी पूजा करेंगे," और वैशाली तथा गंगा के बीच की तीन योजन भूमि को समतल किया, भगवान के लिए चार और प्रत्येक भिक्षु के लिए दो-दो श्वेत छत्र तैयार किए, और पूजा करते हुए गंगा के तट पर आकर खड़े हो गए। အထ ဗိမ္ဗိသာရော ဒွေ နာဝါယော သံဃဋေတွာ မဏ္ဍပံ ကတွာ ပုပ္ဖဒါမာဒီဟိ အလင်္ကရိတွာ တတ္ထ သဗ္ဗရတနမယံ ဗုဒ္ဓါသနံ ပညပေသိ, ဘဂဝါ တတ္ထ နိသီဒိ. ပဉ္စ သတာ ဘိက္ခူပိ နာဝံ အာရုဟိတွာ ယထာနုရူပံ နိသီဒိံသု. ရာဇာ ဘဂဝန္တံ အနုဂစ္ဆန္တော ဂလပ္ပမာဏံ ဥဒကံ ဩဂါဟေတွာ ‘‘ယာဝ, ဘန္တေ, ဘဂဝါ အာဂစ္ဆတိ, တာဝါဟံ ဣဓေဝ ဂင်္ဂါတီရေ ဝသိဿာမီ’’တိ ဝတွာ နိဝတ္တော. ဥပရိ ဒေဝတာ ယာဝ အကနိဋ္ဌဘဝနာ ပူဇံ အကံသု. ဟေဋ္ဌာဂင်္ဂါနိဝါသိနော ကမ္ဗလဿတရာဒယော နာဂရာဇာနော ပူဇံ အကံသု. ဧဝံ မဟတိယာ ပူဇာယ ဘဂဝါ ယောဇနမတ္တံ အဒ္ဓါနံ ဂင်္ဂါယ ဂန္တွာ ဝေသာလိကာနံ သီမန္တရံ ပဝိဋ္ဌော. तब बिम्बिसार ने दो नावों को जोड़कर एक मंडप बनाया, उसे पुष्प-मालाओं आदि से सजाया और वहाँ सर्व-रत्नमय बुद्धासन बिछाया; भगवान वहाँ विराजमान हुए। पाँच सौ भिक्षु भी नाव पर चढ़कर यथायोग्य बैठ गए। राजा भगवान के पीछे-पीछे गले तक गहरे पानी में उतर गए और कहा— "भन्ते, जब तक भगवान (वापस) नहीं आते, तब तक मैं यहीं गंगा के तट पर रहूँगा," और फिर वे लौट आए। ऊपर देवताओं ने अकनिष्ट भवन तक पूजा की। नीचे गंगा में रहने वाले कंबल, अश्वतर आदि नागराजों ने पूजा की। इस प्रकार महान पूजा के साथ भगवान गंगा में एक योजन की दूरी तय कर वैशाली की सीमा में प्रविष्ट हुए। တတော လိစ္ဆဝိရာဇာနော ဗိမ္ဗိသာရေန ကတပူဇာယ ဒိဂုဏံ ကရောန္တာ ဂလပ္ပမာဏေ ဥဒကေ ဘဂဝန္တံ ပစ္စုဂ္ဂစ္ဆိံသု. တေနေဝ ခဏေန တေန မုဟုတ္တေန ဝိဇ္ဇုပ္ပဘာဝိနဒ္ဓန္ဓကာရဝိသဋကူဋော ဂဠဂဠာယန္တော စတူသု ဒိသာသု မဟာမေဃော ဝုဋ္ဌာသိ. အထ ဘဂဝတာ ပဌမပါဒေ ဂင်္ဂါတီရေ နိက္ခိတ္တမတ္တေ ပေါက္ခရဝဿံ ဝဿိ. ယေ တေမေတုကာမာ, တေ ဧဝ တေမေန္တိ, အတေမေတုကာမာ န တေမေန္တိ. သဗ္ဗတ္ထ ဇာဏုမတ္တံ ဦရုမတ္တံ ကဋိမတ္တံ ဂလပ္ပမာဏံ ဥဒကံ ဝဟတိ, သဗ္ဗကုဏပါနိ ဥဒကေန ဂင်္ဂံ ပဝေသိတာနိ, ပရိသုဒ္ဓေါ ဘူမိဘာဂေါ အဟောသိ. तब लिच्छवी राजाओं ने बिम्बिसार द्वारा की गई पूजा से दुगुनी पूजा करते हुए, गले तक गहरे पानी में उतरकर भगवान की अगवानी की। उसी क्षण, उसी मुहूर्त में, बिजली की चमक से अंधकार को चीरते हुए और गरजते हुए चारों दिशाओं में महामेघ उमड़ आए। तब जैसे ही भगवान ने अपना पहला कदम गंगा के तट पर रखा, 'पोक्खरवस्स' (कमल-पत्र जैसी वर्षा) होने लगी। जो भीगना चाहते थे, केवल वे ही भीगे; जो नहीं भीगना चाहते थे, वे नहीं भीगे। सब जगह घुटनों तक, जांघों तक, कमर तक और गले तक पानी बहने लगा; सभी शवों (गंदगी) को पानी के बहाव ने गंगा में बहा दिया और भूमि का भाग पूरी तरह शुद्ध हो गया। လိစ္ဆဝိရာဇာနော ဘဂဝန္တံ အန္တရာ ယောဇနေ ယောဇနေ ဝါသာပေတွာ မဟာဒါနာနိ ဒတွာ တီဟိ ဒိဝသေဟိ ဒိဂုဏံ ပူဇံ ကရောန္တာ ဝေသာလိံ နယိံသု[Pg.138]. ဝေသာလိံ သမ္ပတ္တေ ဘဂဝတိ သက္ကော ဒေဝါနမိန္ဒော ဒေဝသံဃပုရက္ခတော အာဂစ္ဆိ. မဟေသက္ခာနံ ဒေဝတာနံ သန္နိပါတေန အမနုဿာ ယေဘုယျေန ပလာယိံသု. ဘဂဝါ နဂရဒွါရေ ဌတွာ အာနန္ဒတ္ထေရံ အာမန္တေသိ – ‘‘ဣမံ, အာနန္ဒ, ရတနသုတ္တံ ဥဂ္ဂဟေတွာ ဗလိကမ္မူပကရဏာနိ ဂဟေတွာ လိစ္ဆဝိရာဇကုမာရေဟိ သဒ္ဓိံ ဝေသာလိယာ တိပါကာရန္တရေ ဝိစရန္တော ပရိတ္တံ ကရောဟီ’’တိ ရတနသုတ္တံ အဘာသိ. ‘‘ဧဝံ ကေန ပနေတံ သုတ္တံ ဝုတ္တံ, ကဒါ, ကတ္ထ, ကသ္မာ စ ဝုတ္တ’’န္တိ ဧတေသံ ပဉှာနံ ဝိဿဇ္ဇနာ ဝိတ္ထာရေန ဝေသာလိဝတ္ထုတော ပဘုတိ ပေါရာဏေဟိ ဝဏ္ဏီယတိ. लिच्छवि राजाओं ने भगवान को मार्ग में प्रत्येक योजन पर ठहराते हुए, महादान देते हुए और तीन दिनों तक दुगनी पूजा करते हुए वैशाली पहुँचाया। भगवान के वैशाली पहुँचने पर, देवराज शक्र देव-समूह के साथ आए। शक्तिशाली देवताओं के एकत्रित होने से अधिकांश अमनुष्य (दुष्ट आत्माएँ) भाग गए। भगवान ने नगर-द्वार पर खड़े होकर स्थविर आनन्द को संबोधित किया— "आनन्द, इस रतन सुत्त को सीखकर और बलि-कर्म की सामग्री लेकर लिच्छवि राजकुमारों के साथ वैशाली की तीनों प्राचीरों के बीच विचरण करते हुए परित्राण करो।" ऐसा कहकर उन्होंने रतन सुत्त का उपदेश दिया। "इस प्रकार यह सुत्त किसके द्वारा, कब, कहाँ और क्यों कहा गया?" इन प्रश्नों का उत्तर प्राचीन आचार्यों द्वारा वैशाली की कथा से लेकर विस्तारपूर्वक वर्णित किया गया है। ဧဝံ ဘဂဝတော ဝေသာလိံ အနုပ္ပတ္တဒိဝသေယေဝ ဝေသာလိနဂရဒွါရေ တေသံ ဥပဒ္ဒဝါနံ ပဋိဃာတတ္ထာယ ဝုတ္တမိဒံ ရတနသုတ္တံ ဥဂ္ဂဟေတွာ အာယသ္မာ အာနန္ဒော ပရိတ္တတ္ထာယ ဘာသမာနော ဘဂဝတော ပတ္တေန ဥဒကမာဒါယ သဗ္ဗနဂရံ အဗ္ဘုက္ကိရန္တော အနုဝိစရိ. ယံ ကိဉ္စီတိ ဝုတ္တမတ္တေ ဧဝ ထေရေန ယေ ပုဗ္ဗေ အပလာတာ သင်္ကာရကူဋဘိတ္တိပ္ပဒေသာဒိနိဿိတာ အမနုဿာ, တေ စတူဟိ ဒွါရေဟိ ပလာယိံသု, ဒွါရာနိ အနောကာသာနိ အဟေသုံ. တတော ဧကစ္စေ ဒွါရေသု ဩကာသံ အလဘမာနာ ပါကာရံ ဘိန္ဒိတွာ ပလာတာ. အမနုဿေသု ဂတမတ္တေသု မနုဿာနံ ဂတ္တေသု ရောဂေါ ဝူပသန္တော. တေ နိက္ခမိတွာ သဗ္ဗပုပ္ဖဂန္ဓာဒီဟိ ထေရံ ပူဇေသုံ. မဟာဇနော နဂရမဇ္ဈေ သန္ထာဂါရံ သဗ္ဗဂန္ဓေဟိ လိမ္ပိတွာ ဝိတာနံ ကတွာ သဗ္ဗာလင်္ကာရေဟိ အလင်္ကရိတွာ တတ္ထ ဗုဒ္ဓါသနံ ပညပေတွာ ဘဂဝန္တံ အာနေသိ. इस प्रकार, भगवान के वैशाली पहुँचने के दिन ही, वैशाली के नगर-द्वार पर उन उपद्रवों के विनाश के लिए कहे गए इस रतन सुत्त को सीखकर, आयुष्मान आनन्द ने परित्राण के लिए पाठ करते हुए, भगवान के पात्र में जल लेकर पूरे नगर में छिड़कते हुए विचरण किया। स्थविर द्वारा "यं किञ्चि" कहते ही, जो अमनुष्य पहले नहीं भागे थे और कूड़े के ढेरों, दीवारों आदि के आश्रय में थे, वे चारों द्वारों से भागने लगे; द्वार संकुचित (भीड़भाड़ वाले) हो गए। तब कुछ अमनुष्यों ने द्वारों पर स्थान न पाकर प्राचीर को तोड़कर पलायन किया। अमनुष्यों के चले जाने मात्र से मनुष्यों के शरीरों के रोग शांत हो गए। वे बाहर निकलकर पुष्प-गंध आदि से स्थविर की पूजा करने लगे। जनसमूह ने नगर के मध्य में संथागार (सभा-भवन) को सभी प्रकार के सुगंधित द्रव्यों से लीपकर, वितान (चंदोवा) लगाकर और सभी अलंकारों से सजाकर, वहाँ बुद्धासन बिछाया और भगवान को वहाँ ले आए। ဘဂဝါ သန္ထာဂါရံ ပဝိသိတွာ ပညတ္တေ အာသနေ နိသီဒိ. ဘိက္ခုသံဃောပိ ခေါ ရာဇာနော မနုဿာ စ ပတိရူပေ ပတိရူပေ အာသနေ နိသီဒိံသု. သက္ကောပိ ဒေဝါနမိန္ဒော ဒွီသု ဒေဝလောကေသု ဒေဝပရိသာယ သဒ္ဓိံ ဥပနိသီဒိ အညေ စ ဒေဝါ, အာနန္ဒတ္ထေရောပိ သဗ္ဗံ ဝေသာလိံ အနုဝိစရန္တော ရက္ခံ ကတွာ ဝေသာလိနဂရဝါသီဟိ သဒ္ဓိံ အာဂန္တွာ ဧကမန္တံ နိသီဒိ. တတ္ထ ဘဂဝါ သဗ္ဗေသံ တဒေဝ ရတနသုတ္တံ အဘာသီတိ. भगवान ने संथागार में प्रवेश कर बिछाए गए आसन पर विराजमान हुए। भिक्षु-संघ, राजा और मनुष्य भी अपने-अपने उचित स्थानों पर बैठ गए। देवराज शक्र भी दो देवलोकों के देव-समूह के साथ समीप ही बैठ गए और अन्य देवता भी बैठ गए। स्थविर आनन्द भी संपूर्ण वैशाली में विचरण कर रक्षा करने के पश्चात वैशाली के निवासियों के साथ आकर एक ओर बैठ गए। वहाँ भगवान ने सभी को वही रतन सुत्त सुनाया। ဧတ္တာဝတာ စ ယာ ‘‘ယေန ဝုတ္တံ ယဒါ ယတ္ထ, ယသ္မာ စေတံ ဣမံ နယံ. ပကာသေတွာနာ’’တိ မာတိကာ နိက္ခိတ္တာ, သာ သဗ္ဗပ္ပကာရေန ဝိတ္ထာရိတာ ဟောတိ. यहाँ तक, "किसके द्वारा, कब, कहाँ और किस कारण से यह विधि प्रकाशित की गई," यह जो मातृका (विषय-सूची) रखी गई थी, वह सभी प्रकार से सविस्तार स्पष्ट हो गई है। ယာနီဓာတိဂါထာဝဏ္ဏနာ 'यानीध' (Yānīdha) इत्यादि गाथा की व्याख्या। ၁. ဣဒါနိ [Pg.139] ‘‘ဧတဿ ကရိဿာမတ္ထဝဏ္ဏန’’န္တိ ဝုတ္တတ္တာ အတ္ထဝဏ္ဏနာ အာရဗ္ဘတေ. အပရေ ပန ဝဒန္တိ ‘‘အာဒိတော ပဉ္စေဝ ဂါထာ ဘဂဝတာ ဝုတ္တာ, သေသာ ပရိတ္တကရဏသမယေ အာနန္ဒတ္ထေရေနာ’’တိ. ယထာ ဝါ တထာ ဝါ ဟောတု, ကိံ နော ဣမာယ ပရိက္ခာယ, သဗ္ဗထာပိ ဧတဿ ရတနသုတ္တဿ ကရိဿာမတ္ထဝဏ္ဏနံ. १. अब, "इसकी अर्थ-वर्णना (व्याख्या) करेंगे" ऐसा कहे जाने के कारण अर्थ-वर्णना प्रारंभ की जाती है। अन्य आचार्य कहते हैं— "प्रारंभ की केवल पाँच गाथाएँ भगवान द्वारा कही गई थीं, शेष गाथाएँ परित्राण करते समय स्थविर आनन्द द्वारा कही गई थीं।" चाहे जो भी हो, हमें इस जाँच-पड़ताल से क्या प्रयोजन? हम तो सभी प्रकार से इस रतन सुत्त की अर्थ-वर्णना करेंगे। ယာနီဓ ဘူတာနီတိ ပဌမဂါထာ. တတ္ထ ယာနီတိ ယာဒိသာနိ အပ္ပေသက္ခာနိ ဝါ မဟေသက္ခာနိ ဝါ. ဣဓာတိ ဣမသ္မိံ ပဒေသေ, တသ္မိံ ခဏေ သန္နိပါတဋ္ဌာနံ သန္ဓာယာဟ. ဘူတာနီတိ ကိဉ္စာပိ ဘူတသဒ္ဒေါ ‘‘ဘူတသ္မိံ ပါစိတ္တိယ’’န္တိ ဧဝမာဒီသု (ပါစိ. ၆၉) ဝိဇ္ဇမာနေ. ‘‘ဘူတမိဒန္တိ, ဘိက္ခဝေ, သမနုပဿထာ’’တိ ဧဝမာဒီသု (မ. နိ. ၁.၄၀၁) ခန္ဓပဉ္စကေ. ‘‘စတ္တာရော ခေါ, ဘိက္ခု, မဟာဘူတာ ဟေတူ’’တိ ဧဝမာဒီသု (မ. နိ. ၃.၈၆) စတုဗ္ဗိဓေ ပထဝီဓာတွာဒိရူပေ. ‘‘ယော စ ကာလဃသော ဘူတော’’တိ ဧဝမာဒီသု (ဇာ. ၁.၂.၁၉၀) ခီဏာသဝေ. ‘‘သဗ္ဗေဝ နိက္ခိပိဿန္တိ, ဘူတာ လောကေ သမုဿယ’’န္တိ ဧဝမာဒီသု (ဒီ. နိ. ၂.၂၂၀) သဗ္ဗသတ္တေ. ‘‘ဘူတဂါမပါတဗျတာယာ’’တိ ဧဝမာဒီသု (ပါစိ. ၉၀) ရုက္ခာဒိကေ. ‘‘ဘူတံ ဘူတတော သဉ္ဇာနာတီ’’တိ ဧဝမာဒီသု (မ. နိ. ၁.၃) စာတုမဟာရာဇိကာနံ ဟေဋ္ဌာ သတ္တနိကာယံ ဥပါဒါယ ဝတ္တတိ. ဣဓ ပန အဝိသေသတော အမနုဿေသု ဒဋ္ဌဗ္ဗော. "यानीध भूतानि" (Yānīdha bhūtāni) यह प्रथम गाथा है। वहाँ 'यानि' का अर्थ है—जिस प्रकार के, चाहे वे अल्प-शक्तिशाली हों या महा-शक्तिशाली। 'इध' का अर्थ है—इस प्रदेश में, उस क्षण में, सभा-स्थल के संदर्भ में कहा गया है। 'भूतानि' के विषय में—यद्यपि 'भूत' शब्द "भूतस्मिं पाचित्तियं" आदि में 'विद्यमान' (सत्य) के अर्थ में; "भूतमिदं भिक्खवे समनुपस्सथ" आदि में 'पंच-स्कंध' के अर्थ में; "चत्तारो खो भिक्खु महाभूता हेतू" आदि में चार प्रकार के 'पृथ्वी-धातु आदि रूप' के अर्थ में; "यो च कालघसो भूतो" आदि में 'क्षीणास्त्रव' (अर्हत्) के अर्थ में; "सब्बेव निक्खिपिस्सन्ति भूता लोके समुस्सयं" आदि में 'सभी प्राणियों' के अर्थ में; "भूतगामपातब्यताय" आदि में 'वृक्ष आदि' के अर्थ में; और "भूतं भूततो संजानाति" आदि में चातुमहाराजिक देवलोक से नीचे के 'प्राणी-निकाय' के अर्थ में प्रयुक्त होता है। किंतु यहाँ इसे सामान्य रूप से 'अमनुष्यों' (देवताओं/यक्षों) के अर्थ में समझना चाहिए। သမာဂတာနီတိ သန္နိပတိတာနိ. ဘုမ္မာနီတိ ဘူမိယံ နိဗ္ဗတ္တာနိ. ဝါ-ဣတိ ဝိကပ္ပနေ. တေန ယာနီဓ ဘုမ္မာနိ ဝါ ဘူတာနိ သမာဂတာနီတိ ဣမမေကံ ဝိကပ္ပံ ကတွာ ပုန ဒုတိယဝိကပ္ပံ ကာတုံ ‘‘ယာနိ ဝ အန္တလိက္ခေ’’တိ အာဟ. အန္တလိက္ခေ ဝါ ယာနိ ဘူတာနိ နိဗ္ဗတ္တာနိ, တာနိ သဗ္ဗာနိ ဣဓ သမာဂတာနီတိ အတ္ထော. ဧတ္ထ စ ယာမတော ယာဝ အကနိဋ္ဌံ, တာဝ နိဗ္ဗတ္တာနိ ဘူတာနိ အာကာသေ ပါတုဘူတဝိမာနေသု နိဗ္ဗတ္တတ္တာ ‘‘အန္တလိက္ခေ ဘူတာနီ’’တိ ဝေဒိတဗ္ဗာနိ. တတော ဟေဋ္ဌာ သိနေရုတော ပဘုတိ ယာဝ ဘူမိယံ ရုက္ခလတာဒီသု အဓိဝတ္ထာနိ ပထဝိယဉ္စ နိဗ္ဗတ္တာနိ ဘူတာနိ, တာနိ သဗ္ဗာနိ ဘူမိယံ ဘူမိပဋိဗဒ္ဓေသု စ ရုက္ခလတာပဗ္ဗတာဒီသု နိဗ္ဗတ္တတ္တာ ‘‘ဘုမ္မာနိ ဘူတာနီ’’တိ ဝေဒိတဗ္ဗာနိ. 'समागतानि' (samāgatāni) का अर्थ है—एकत्रित हुए। 'भुम्मानि' (bhummāni) का अर्थ है—पृथ्वी पर उत्पन्न हुए। 'वा' (vā) शब्द विकल्प के अर्थ में है। उससे "यानीध भुम्मानि वा भूतानि समागतानि" (जो यहाँ पृथ्वी पर स्थित प्राणी एकत्रित हुए हैं)—यह एक विकल्प कर, पुनः दूसरा विकल्प करने के लिए "यानि व अन्तलिक्खे" (yani va antalikkhe) कहा। अर्थ यह है कि—अथवा जो प्राणी अंतरिक्ष (आकाश) में उत्पन्न हुए हैं, वे सभी यहाँ एकत्रित हुए हैं। यहाँ याम लोक से लेकर अकनिष्ठ लोक तक जो प्राणी उत्पन्न हुए हैं, वे आकाश में प्रकट विमानों में उत्पन्न होने के कारण 'अन्तरिक्खे भूतानि' (अंतरिक्ष के प्राणी) समझने चाहिए। उससे नीचे सुमेरु पर्वत से लेकर पृथ्वी तक, जो वृक्ष-लता आदि पर अधिष्ठित हैं और पृथ्वी पर उत्पन्न हुए हैं, वे सभी पृथ्वी पर या पृथ्वी से संबद्ध वृक्ष, लता, पर्वत आदि में उत्पन्न होने के कारण 'भुम्मानि भूतानि' (पृथ्वी के प्राणी) समझने चाहिए। ဧဝံ [Pg.140] ဘဂဝါ သဗ္ဗာနေဝ အမနုဿဘူတာနိ ‘‘ဘုမ္မာနိ ဝါ ယာနိ ဝ အန္တလိက္ခေ’’တိ ဒွီဟိ ပဒေဟိ ဝိကပ္ပေတွာ ပုန ဧကေန ပဒေန ပရိဂ္ဂဟေတွာ ဒဿေတုံ ‘‘သဗ္ဗေဝ ဘူတာ သုမနာ ဘဝန္တူ’’တိ အာဟ. သဗ္ဗေတိ အနဝသေသာ. ဧဝါတိ အဝဓာရဏေ, ဧကမ္ပိ အနပနေတွာတိ အဓိပ္ပာယော. ဘူတာတိ အမနုဿာ. သုမနာ ဘဝန္တူတိ သုခိတမနာ ပီတိသောမနဿဇာတာ ဘဝန္တု. အထောပီတိ ကိစ္စန္တရသန္နိယောဇနတ္ထံ ဝါကျောပါဒါနေ နိပါတဒွယံ. သက္ကစ္စ သုဏန္တု ဘာသိတန္တိ အဋ္ဌိံ ကတွာ မနသိကတွာ သဗ္ဗံ စေတသာ သမန္နာဟရိတွာ ဒိဗ္ဗသမ္ပတ္တိလောကုတ္တရသုခါဝဟံ မမ ဒေသနံ သုဏန္တု. इस प्रकार भगवान ने सभी अमनुष्य प्राणियों को 'भुम्मानि वा यानि व अन्तलिक्खे' (जो पृथ्वी पर हैं या जो आकाश में हैं) इन दो पदों से वर्गीकृत करके, पुनः एक पद से उन्हें संगृहीत करते हुए यह दिखाने के लिए कि 'सब्वेव भूता सुमना भवन्तु' (सभी प्राणी प्रसन्नचित्त हों) ऐसा कहा। 'सब्वे' का अर्थ है बिना किसी शेष के (सभी)। 'एव' शब्द अवधारण (निश्चय) के अर्थ में है, जिसका अभिप्राय है कि एक को भी छोड़े बिना। 'भूता' का अर्थ है अमनुष्य (देवता/यक्ष)। 'सुमना भवन्तु' का अर्थ है सुखी मन वाले और प्रीति-सौमनस्य से युक्त हों। 'अथोपि' शब्द किसी अन्य कार्य के संयोजन के लिए वाक्य के आरम्भ में प्रयुक्त दो निपातों का समूह है। 'सक्कच्च सुणन्तु भासितं' का अर्थ है—आदरपूर्वक, मन लगाकर, अपने सम्पूर्ण चित्त को एकाग्र करके, दिव्य सम्पत्ति और लोकोत्तर सुख प्रदान करने वाले मेरे उपदेश को सुनें। ဧဝမေတ္ထ ဘဂဝါ ‘‘ယာနီဓ ဘူတာနိ သမာဂတာနီ’’တိ အနိယမိတဝစနေန ဘူတာနိ ပရိဂ္ဂဟေတွာ ပုန ‘‘ဘုမ္မာနိ ဝါ ယာနိ ဝ အန္တလိက္ခေ’’တိ ဒွိဓာ ဝိကပ္ပေတွာ တတော ‘‘သဗ္ဗေဝ ဘူတာ’’တိ ပုန ဧကဇ္ဈံ ကတွာ ‘‘သုမနာ ဘဝန္တူ’’တိ ဣမိနာ ဝစနေန အာသယသမ္ပတ္တိယံ နိယောဇေန္တော ‘‘သက္ကစ္စ သုဏန္တု ဘာသိတ’’န္တိ ပယောဂသမ္ပတ္တိယံ, တထာ ယောနိသောမနသိကာရသမ္ပတ္တိယံ ပရတောဃောသသမ္ပတ္တိယဉ္စ, တထာ အတ္တသမ္မာပဏိဓိသပ္ပုရိသူပနိဿယသမ္ပတ္တီသု သမာဓိပညာဟေတုသမ္ပတ္တီသု စ နိယောဇေန္တော ဂါထံ သမာပေသိ. यहाँ इस प्रकार भगवान ने 'यानीध भूतानि समागतानि' इस अनिश्चित वचन से प्राणियों को संगृहीत किया, फिर 'भुम्मानि वा यानि व अन्तलिक्खे' इस प्रकार दो भागों में विभाजित किया, उसके बाद 'सब्वेव भूता' कहकर पुनः एक साथ किया। 'सुमना भवन्तु' इस वचन से उन्हें आशय-सम्पत्ति (शुद्ध संकल्प) में नियोजित करते हुए, 'सक्कच्च सुणन्तु भासितं' इस वचन से प्रयोग-सम्पत्ति (सम्यक् प्रयास) में, तथा योनिसो मनसिकार-सम्पत्ति (उचित ध्यान) और परतोघोष-सम्पत्ति (सद्धम्म श्रवण) में, और इसी प्रकार आत्म-सम्यक्-प्रणिधि (स्वयं का सही मार्गदर्शन), सत्पुरुष-उपनिस्सय-सम्पत्ति (सत्पुरुषों का सान्निध्य), तथा समाधि-प्रज्ञा-हेतु-सम्पत्ति में नियोजित करते हुए इस गाथा को पूर्ण किया। တသ္မာ ဟီတိဂါထာဝဏ္ဏနာ 'तस्मा ही' इस गाथा की व्याख्या। ၂. တသ္မာ ဟိ ဘူတာတိ ဒုတိယဂါထာ. တတ္ထ တသ္မာတိ ကာရဏဝစနံ. ဘူတာတိ အာမန္တနဝစနံ. နိသာမေထာတိ သုဏာထ. သဗ္ဗေတိ အနဝသေသာ. ကိံ ဝုတ္တံ ဟောတိ? ယသ္မာ တုမှေ ဒိဗ္ဗဋ္ဌာနာနိ တတ္ထ ဥပဘောဂပရိဘောဂသမ္ပဒဉ္စ ပဟာယ ဓမ္မဿဝနတ္ထံ ဣဓ သမာဂတာ, န နဋနစ္စနာဒိဒဿနတ္ထံ, တသ္မာ ဟိ ဘူတာ နိသာမေထ သဗ္ဗေတိ. အထ ဝါ ‘‘သုမနာ ဘဝန္တု, သက္ကစ္စ သုဏန္တူ’’တိ ဝစနေန တေသံ သုမနဘာဝံ သက္ကစ္စံ သောတုကမျတဉ္စ ဒိသွာ အာဟ ‘‘ယသ္မာ တုမှေ သုမနဘာဝေန အတ္တသမ္မာပဏိဓိယောနိသောမနသိကာရာသယသုဒ္ဓီဟိ သက္ကစ္စံ သောတုကမျတာယ သပ္ပုရိသူပနိဿယပရတောဃောသပဒဋ္ဌာနတော ပယောဂသုဒ္ဓီဟိ စ ယုတ္တာ, တသ္မာ ဟိ ဘူတာ နိသာမေထ သဗ္ဗေ’’တိ. အထ ဝါ ယံ [Pg.141] ပုရိမဂါထာယ အန္တေ ‘‘ဘာသိတ’’န္တိ ဝုတ္တံ, တံ ကာရဏဘာဝေန အပဒိသန္တော အာဟ ‘‘ယသ္မာ မမ ဘာသိတံ နာမ အတိဒုလ္လဘံ အဋ္ဌက္ခဏပရိဝဇ္ဇိတဿ ခဏဿ ဒုလ္လဘတ္တာ, အနေကာနိသံသဉ္စ ပညာကရုဏာဂုဏေန ပဝတ္တတ္တာ, တဉ္စာဟံ ဝတ္တုကာမော ‘သုဏန္တု ဘာသိတ’န္တိ အဝေါစံ, တသ္မာ ဟိ ဘူတာ နိသာမေထ သဗ္ဗေ’’တိ. ဣဒံ ဣမိနာ ဂါထာပဒေန ဝုတ္တံ ဟောတိ. २. 'तस्मा हि भूता' यह दूसरी गाथा है। वहाँ 'तस्मा' शब्द कारणवाचक है। 'भूता' संबोधनवाचक है। 'निसामेथ' का अर्थ है 'सुनो'। 'सब्वे' का अर्थ है बिना किसी शेष के। क्या कहा गया है? चूँकि आप लोग दिव्य स्थानों और वहाँ के उपभोग-परिभोग की सम्पदा को त्यागकर धर्म-श्रवण के लिए यहाँ (वैशाली में) एकत्रित हुए हैं, न कि नाच-गाने आदि देखने के लिए, इसलिए 'हे प्राणियों! आप सभी ध्यानपूर्वक सुनें।' अथवा, 'सुमना भवन्तु, सक्कच्च सुणन्तु' इस वचन से उनके प्रसन्न भाव और आदरपूर्वक सुनने की इच्छा को देखकर कहा—'चूँकि आप प्रसन्न भाव से, आत्म-सम्यक्-प्रणिधि, योनिसो मनसिकार और आशय की शुद्धि के साथ, तथा आदरपूर्वक सुनने की इच्छा से, सत्पुरुषों के आश्रय और परतोघोष (दूसरों से उपदेश सुनने) के आधार पर प्रयोग-शुद्धि से युक्त हैं, इसलिए हे प्राणियों! आप सभी ध्यानपूर्वक सुनें।' अथवा, पिछली गाथा के अंत में जो 'भासितं' (कहा गया) शब्द आया है, उसे कारण के रूप में बताते हुए कहा—'चूँकि मेरा उपदेश (भासित) अत्यंत दुर्लभ है, क्योंकि बुद्ध के प्रादुर्भाव का क्षण (क्षण-सम्पत्ति) दुर्लभ है और आठ अक्षणों से वर्जित है, तथा प्रज्ञा और करुणा के गुणों से प्रवर्तित होने के कारण यह अनेक लाभ देने वाला है, और मैं उसे कहना चाहता हूँ, इसलिए उपदेश को सुनें ऐसा कहा, अतः हे प्राणियों! आप सभी ध्यानपूर्वक सुनें।' इस गाथा पद से यही कहा गया है। ဧဝမေတံ ကာရဏံ နိရောပေန္တော အတ္တနော ဘာသိတနိသာမနေ နိယောဇေတွာ နိသာမေတဗ္ဗံ ဝတ္တုမာရဒ္ဓေါ ‘‘မေတ္တံ ကရောထ မာနုသိယာ ပဇာယာ’’တိ. တဿတ္ထော – ယာယံ တီဟိ ဥပဒ္ဒဝေဟိ ဥပဒ္ဒုတာ မာနုသီ ပဇာ, တဿာ မာနုသိယာ ပဇာယ မေတ္တံ မိတ္တဘာဝံ ဟိတဇ္ဈာသယတံ ပစ္စုပဋ္ဌပေထာတိ. ကေစိ ပန ‘‘မာနုသိကံ ပဇ’’န္တိ ပဌန္တိ, တံ ဘုမ္မတ္ထာသမ္ဘဝါ န ယုဇ္ဇတိ. ယမ္ပိ အညေ အတ္ထံ ဝဏ္ဏယန္တိ, သောပိ န ယုဇ္ဇတိ. အဓိပ္ပာယော ပနေတ္ထ – နာဟံ ဗုဒ္ဓေါတိ ဣဿရိယဗလေန ဝဒါမိ, အပိ တု ယံ တုမှာကဉ္စ ဣမိဿာ စ မာနုသိယာ ပဇာယ ဟိတတ္ထံ ဝဒါမိ ‘‘မေတ္တံ ကရောထ မာနုသိယာ ပဇာယာ’’တိ. ဧတ္ထ စ – इस प्रकार इस कारण को स्थापित करते हुए, अपने उपदेश को सुनने में उन्हें नियोजित कर, जो सुना जाना चाहिए उसे कहने के लिए 'मेत्तं करोथ मानुसिया पजाय' (मानव जाति पर मैत्री करो) आरम्भ किया। इसका अर्थ है—जो यह मानव जाति तीन उपद्रवों से पीड़ित है, उस मानव जाति के प्रति मैत्री भाव और उनके हित की इच्छा धारण करें। कुछ लोग 'मानुसिकं पजं' ऐसा पाठ पढ़ते हैं, जो पृथ्वी पर रहने वालों के लिए संभव न होने के कारण उचित नहीं है। अन्य जो अर्थ बताते हैं, वह भी उचित नहीं है। यहाँ अभिप्राय यह है—मैं बुद्ध हूँ, इस ऐश्वर्य के बल पर नहीं कह रहा हूँ, बल्कि जो आपके और इस मानव जाति के हित के लिए है, वह कह रहा हूँ कि 'मानव जाति पर मैत्री करो।' और यहाँ— ‘‘ယေ သတ္တသဏ္ဍံ ပထဝိံ ဝိဇေတွာ,ရာဇိသယော ယဇမာနာနုပရိယဂါ; အဿမေဓံ ပုရိသမေဓံ,သမ္မာပါသံ ဝါဇပေယျံ နိရဂ္ဂဠံ. 'जिन्होंने सात द्वीपों वाली पृथ्वी को जीत लिया है, वे राजर्षि यज्ञ करते हुए विचरण करते थे; अश्वमेध, पुरुषमेध, सम्मापास, वाजपेय और निरग्गल (यज्ञ)।' ‘‘မေတ္တဿ စိတ္တဿ သုဘာဝိတဿ,ကလမ္ပိ တေ နာနုဘဝန္တိ သောဠသိံ; ဧကမ္ပိ စေ ပါဏမဒုဋ္ဌစိတ္တော,မေတ္တာယတိ ကုသလော တေန ဟောတိ. 'वे भली-भाँति भावित मैत्री-चित्त के सोलहवें भाग के बराबर भी (फल) प्राप्त नहीं करते। यदि कोई शुद्ध चित्त वाला व्यक्ति एक भी प्राणी के प्रति मैत्री करता है, तो वह उससे कुशल (पुण्य) प्राप्त करता है।' ‘‘သဗ္ဗေ စ ပါဏေ မနသာနုကမ္ပီ, ပဟူတမရိယော ပကရောတိ ပုည’’န္တိ. (ဣတိဝု. ၂၇; အ. နိ. ၈.၁) – 'और जो सभी प्राणियों पर मन से अनुकम्पा करता है, वह आर्य पुरुष प्रचुर पुण्य अर्जित करता है।' ဧဝမာဒီနံ သုတ္တာနံ ဧကာဒသာနိသံသာနဉ္စ ဝသေန ယေ မေတ္တံ ကရောန္တိ, ဧတေသံ မေတ္တာ ဟိတာတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. इस प्रकार के सूत्रों और (मैत्री के) ग्यारह लाभों के वश से जो मैत्री करते हैं, उनके लिए मैत्री हितकारी है, ऐसा जानना चाहिए। ‘‘ဒေဝတာနုကမ္ပိတော ပေါသော, သဒါ ဘဒြာနိ ပဿတီ’’တိ. (ဥဒါ. ၇၆; မဟာဝ. ၂၈၆) – 'देवताओं द्वारा अनुकम्पित मनुष्य सदा कल्याणकारी दृश्यों को देखता है।' ဧဝမာဒီနံ [Pg.142] သုတ္တာနံ ဝသေန ယေသု ကယိရတိ, တေသမ္ပိ ဟိတာတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. इस प्रकार के सूत्रों के वश से, जिन (मनुष्यों) के प्रति मैत्री की जाती है, उनके लिए भी वह हितकारी है, ऐसा जानना चाहिए। ဧဝံ ဥဘယေသမ္ပိ ဟိတဘာဝံ ဒဿေန္တော ‘‘မေတ္တံ ကရောထ မာနုသိယာ’’တိ ဝတွာ ဣဒါနိ ဥပကာရမ္ပိ ဒဿေန္တော အာဟ ‘‘ဒိဝါ စ ရတ္တော စ ဟရန္တိ ယေ ဗလိံ, တသ္မာ ဟိ နေ ရက္ခထ အပ္ပမတ္တာ’’တိ. တဿတ္ထော – ယေ မနုဿာ စိတ္တကမ္မကဋ္ဌကမ္မာဒီဟိပိ ဒေဝတာ ကတွာ စေတိယရုက္ခာဒီနိ စ ဥပသင်္ကမိတွာ ဒေဝတာ ဥဒ္ဒိဿ ဒိဝါ ဗလိံ ကရောန္တိ, ကာလပက္ခာဒီသု စ ရတ္တိံ ဗလိံ ကရောန္တိ, သလာကဘတ္တာဒီနိ ဝါ ဒတွာ အာရက္ခဒေဝတာ ဥပါဒါယ ယာဝ ဗြဟ္မဒေဝတာနံ ပတ္တိဒါနနိယျာတနေန ဒိဝါ ဗလိံ ကရောန္တိ, ဆတ္တာရောပနဒီပမာလာယ သဗ္ဗရတ္တိကဓမ္မဿဝနာဒီနိ ကာရာပေတွာ ပတ္တိဒါနနိယျာတနေန စ ရတ္တိံ ဗလိံ ကရောန္တိ, တေ ကထံ န ရက္ခိတဗ္ဗာ? ယတော ဧဝံ ဒိဝါ စ ရတ္တော စ တုမှေ ဥဒ္ဒိဿ ကရောန္တိ ယေ ဗလိံ, တသ္မာ ဟိ နေ ရက္ခထ; တသ္မာ ဗလိကမ္မကရဏာပိ တေ မနုဿေ ရက္ခထ ဂေါပယထ, အဟိတံ နေသံ အပနေထ, ဟိတံ ဥပနေထ အပ္ပမတ္တာ ဟုတွာ တံ ကတညုဘာဝံ ဟဒယေ ကတွာ နိစ္စမနုဿရန္တာတိ. इस प्रकार दोनों के हित-भाव को दिखाते हुए 'मेत्तं करोथ मानुसिया' कहकर, अब उपकार को भी दिखाते हुए कहा—'दिवा च रत्तो च हरन्ति ye बलिं, तस्मा हि ने रक्खथ अप्पमत्ता' (जो दिन और रात बलि/भेंट लाते हैं, इसलिए आप प्रमाद रहित होकर उनकी रक्षा करें)। इसका अर्थ है—जो मनुष्य चित्रकारी, काष्ठ-कला आदि के माध्यम से भी देवताओं की मूर्तियाँ बनाकर, चैत्यों और वृक्षों आदि के पास जाकर देवताओं के उद्देश्य से दिन में बलि (पूजा सामग्री) अर्पित करते हैं, और कृष्ण पक्ष आदि में रात को बलि देते हैं, अथवा शलाका-भक्त आदि देकर, अंगरक्षक देवताओं से लेकर ब्रह्मलोक के देवताओं तक पुण्य का दान (पत्तिदान) करके दिन में बलि देते हैं, और छत्र अर्पण, दीप-माला, तथा रात भर धर्म-श्रवण आदि कराकर पुण्य-दान के माध्यम से रात में बलि देते हैं, उनकी रक्षा क्यों नहीं की जानी चाहिए? चूँकि वे इस प्रकार दिन और रात आपके उद्देश्य से बलि देते हैं, इसलिए उनकी रक्षा करें; उस बलि-कर्म के कारण भी उन मनुष्यों की रक्षा करें, उनका पालन करें, उनके अहित को दूर करें और हित को प्राप्त कराएं, प्रमाद रहित होकर और उस कृतज्ञता के भाव को हृदय में रखकर निरंतर उनका स्मरण करते हुए। ယံကိဉ္စီတိဂါထာဝဏ္ဏနာ 'यं किञ्चि' इस गाथा की व्याख्या। ၃. ဧဝံ ဒေဝတာသု မနုဿာနံ ဥပကာရကဘာဝံ ဒဿေတွာ တေသံ ဥပဒ္ဒဝဝူပသမနတ္ထံ ဗုဒ္ဓါဒိဂုဏပ္ပကာသနေန စ ဒေဝမနုဿာနံ ဓမ္မဿဝနတ္ထံ ‘‘ယံကိဉ္စိ ဝိတ္တ’’န္တိအာဒိနာ နယေန သစ္စဝစနံ ပယုဉ္ဇိတုမာရဒ္ဓေါ. တတ္ထ ယံကိဉ္စီတိ အနိယမိတဝသေန အနဝသေသံ ပရိယာဒိယတိ ယံကိဉ္စိ တတ္ထ တတ္ထ ဝေါဟာရူပဂံ. ဝိတ္တန္တိ ဓနံ. တဉှိ ဝိတ္တိံ ဇနေတီတိ ဝိတ္တံ. ဣဓ ဝါတိ မနုဿလောကံ နိဒ္ဒိသတိ. ဟုရံ ဝါတိ တတော ပရံ အဝသေသလောကံ, တေန စ ဌပေတွာ မနုဿေ သဗ္ဗလောကဂ္ဂဟဏေ ပတ္တေ ‘‘သဂ္ဂေသု ဝါ’’တိ ပရတော ဝုတ္တတ္တာ ဌပေတွာ မနုဿေ စ သဂ္ဂေ စ အဝသေသာနံ နာဂသုပဏ္ဏာဒီနံ ဂဟဏံ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ३. इस प्रकार देवताओं के प्रति मनुष्यों की उपकारिता को दिखाकर, उनके उपद्रवों की शांति के लिए और बुद्ध आदि के गुणों के प्रकाशन द्वारा देव-मनुष्यों को धर्म श्रवण कराने के लिए, 'यं किञ्चि वित्तं' आदि विधि से सत्य-वचन का प्रयोग आरम्भ किया गया। वहाँ 'यं किञ्चि' पद से बिना किसी सीमा के सब कुछ ग्रहण किया जाता है जो कहीं भी व्यवहार (व्यापार) के योग्य है। 'वित्तं' का अर्थ धन है। क्योंकि वह प्रसन्नता (वित्ति) उत्पन्न करता है, इसलिए 'वित्त' कहलाता है। 'इध' (यहाँ) से मनुष्य लोक का निर्देश है। 'हुरं' (वहाँ) से उससे परे शेष लोकों का; और चूँकि आगे 'सग्गेसु वा' (स्वर्गों में) कहा गया है, इसलिए 'हुरं' शब्द से मनुष्य लोक को छोड़कर शेष नाग-सुपर्ण आदि के लोकों का ग्रहण समझना चाहिए। ဧဝံ ဣမေဟိ ဒွီဟိ ပဒေဟိ ယံ မနုဿာနံ ဝေါဟာရူပဂံ အလင်္ကာရပရိဘောဂူပဂဉ္စ ဇာတရူပရဇတမုတ္တာမဏိဝေဠုရိယပဝါဠလောဟိတင်္ကမသာရဂလ္လာဒိကံ, ယဉ္စ မုတ္တာမဏိဝါလုကတ္ထတာယ ဘူမိယာ ရတနမယဝိမာနေသု အနေကယောဇနသတဝိတ္ထတေသု ဘဝနေသု ဥပ္ပန္နာနံ နာဂသုပဏ္ဏာဒီနံ ဝိတ္တံ, တံ နိဒ္ဒိဋ္ဌံ ဟောတိ. သဂ္ဂေသု ဝါတိ ကာမာဝစရရူပါဝစရဒေဝလောကေသု. တေ [Pg.143] ဟိ သောဘနေန ကမ္မေန အဇီယန္တီတိ သဂ္ဂါ. သုဋ္ဌု အဂ္ဂါတိပိ သဂ္ဂါ. ယန္တိ ယံ သသာမိကံ ဝါ အသာမိကံ ဝါ. ရတနန္တိ ရတိံ နယတိ ဝဟတိ ဇနယတိ ဝဍ္ဎေတီတိ ရတနံ. ယံကိဉ္စိ စိတ္တီကတံ မဟဂ္ဃံ အတုလံ ဒုလ္လဘဒဿနံ အနောမသတ္တပရိဘောဂဉ္စ, တဿေတံ အဓိဝစနံ. ယထာဟ – इस प्रकार इन दो पदों से मनुष्यों के व्यवहार (व्यापार) और अलंकार-उपभोग के योग्य जो सुवर्ण, रजत, मुक्ता, मणि, वैदूर्य, प्रवाल, लोहितमणि, मसारगल्ल आदि हैं, और जो मुक्ता-मणि की बालुका से बिछी हुई भूमि वाले, अनेक सौ योजन विस्तृत रत्नमय विमानों (भवनों) में उत्पन्न नाग-सुपर्ण आदि का धन है, वह निर्दिष्ट होता है। 'सग्गेसु वा' का अर्थ कामावचर और रूपावचर देवलोक है। वे शुभ कर्मों द्वारा सुशोभित होते हैं, इसलिए 'सग्ग' (स्वर्ग) कहलाते हैं। अथवा वे श्रेष्ठ (अग्ग) हैं, इसलिए भी 'सग्ग' हैं। 'यं' का अर्थ है जो स्वामी सहित (सस्वामिक) हो या स्वामी रहित (अस्वामिक)। 'रतनं' (रत्न) वह है जो प्रीति (रति) को ले जाता है, वहन करता है, उत्पन्न करता है या बढ़ाता है। जो कुछ भी आदरणीय (चित्तीकत), बहुमूल्य (महग्घ), अतुलनीय (अतुल), दुर्लभ दर्शन वाला और उत्तम सत्त्वों द्वारा उपभोग के योग्य होता है, यह उसी का नाम है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘စိတ္တီကတံ မဟဂ္ဃဉ္စ, အတုလံ ဒုလ္လဘဒဿနံ; အနောမသတ္တပရိဘောဂံ, ရတနံ တေန ဝုစ္စတီ’’တိ. "जो आदरणीय, बहुमूल्य, अतुलनीय, दुर्लभ दर्शन वाला और उत्तम सत्त्वों द्वारा उपभोग के योग्य है, उसे 'रत्न' कहा जाता है।" ပဏီတန္တိ ဥတ္တမံ သေဋ္ဌံ အတပ္ပကံ. ဧဝံ ဣမိနာ ဂါထာပဒေန ယံ သဂ္ဂေသု အနေကယောဇနသတပ္ပမာဏသဗ္ဗရတနမယဝိမာနသုဓမ္မဝေဇယန္တပ္ပဘုတီသု သသာမိကံ, ယဉ္စ ဗုဒ္ဓုပ္ပာဒဝိရဟေန အပါယမေဝ ပရိပူရေန္တေသု သတ္တေသု သုညဝိမာနပ္ပဋိဗဒ္ဓံ အသာမိကံ, ယံ ဝါ ပနညမ္ပိ ပထဝိမဟာသမုဒ္ဒဟိမဝန္တာဒိနိဿိတမသာမိကံ ရတနံ, တံ နိဒ္ဒိဋ္ဌံ ဟောတိ. 'पणीतं' का अर्थ उत्तम, श्रेष्ठ और अनर्घ (अमूल्य) है। इस प्रकार इस गाथा-पद से स्वर्गों में अनेक सौ योजन परिमाण वाले सर्व-रत्नमय सुधर्मा और वैजयन्त आदि विमानों में जो सस्वामिक (स्वामी सहित) रत्न हैं, और बुद्ध के उत्पाद के अभाव में केवल अपायों को ही भरने वाले सत्त्वों के कारण शून्य विमानों से सम्बद्ध जो अस्वामिक (स्वामी रहित) रत्न हैं, अथवा जो अन्य भी पृथ्वी, महासमुद्र और हिमवन्त आदि के आश्रित अस्वामिक रत्न हैं, वे निर्दिष्ट होते हैं। န နော သမံ အတ္ထိ တထာဂတေနာတိ န-ဣတိ ပဋိသေဓေ. နော-ဣတိ အဝဓာရဏေ. သမန္တိ တုလျံ. အတ္ထီတိ ဝိဇ္ဇတိ. တထာဂတေနာတိ ဗုဒ္ဓေန. ကိံ ဝုတ္တံ ဟောတိ? ယံ ဧတံ ဝိတ္တဉ္စ ရတနဉ္စ ပကာသိတံ, ဧတ္ထ ဧကမ္ပိ ဗုဒ္ဓရတနေန သဒိသံ ရတနံ နေဝတ္ထိ. ယမ္ပိ ဟိ တံ စိတ္တီကတဋ္ဌေန ရတနံ, သေယျထိဒံ – ရညော စက္ကဝတ္တိဿ စက္ကရတနံ မဏိရတနဉ္စ, ယမှိ ဥပ္ပန္နေ မဟာဇနော န အညတ္ထ စိတ္တီကာရံ ကရောတိ, န ကောစိ ပုပ္ဖဂန္ဓာဒီနိ ဂဟေတွာ ယက္ခဋ္ဌာနံ ဝါ ဘူတဋ္ဌာနံ ဝါ ဂစ္ဆတိ, သဗ္ဗောပိ ဇနော စက္ကရတနမဏိရတနမေဝ စိတ္တီကာရံ ကရောတိ ပူဇေတိ, တံ တံ ဝရံ ပတ္ထေတိ, ပတ္ထိတပတ္ထိတဉ္စဿ ဧကစ္စံ သမိဇ္ဈတိ, တမ္ပိ ရတနံ ဗုဒ္ဓရတနေန သမံ နတ္ထိ. ယဒိ ဟိ စိတ္တီကတဋ္ဌေန ရတနံ, တထာဂတောဝ ရတနံ. တထာဂတေ ဟိ ဥပ္ပန္နေ ယေ ကေစိ မဟေသက္ခာ ဒေဝမနုဿာ န တေ အညတြ စိတ္တီကာရံ ကရောန္တိ, န ကဉ္စိ အညံ ပူဇေန္တိ. တထာ ဟိ ဗြဟ္မာ သဟမ္ပတိ သိနေရုမတ္တေန ရတနဒါမေန တထာဂတံ ပူဇေသိ, ယထာဗလဉ္စ အညေ ဒေဝါ မနုဿာ စ ဗိမ္ဗိသာရကောသလရာဇအနာထပိဏ္ဍိကာဒယော. ပရိနိဗ္ဗုတမ္ပိ ဘဂဝန္တံ ဥဒ္ဒိဿ ဆန္နဝုတိကောဋိဓနံ ဝိဿဇ္ဇေတွာ အသောကမဟာရာဇာ သကလဇမ္ဗုဒီပေ စတုရာသီတိ ဝိဟာရသဟဿာနိ ပတိဋ္ဌာပေသိ, ကော ပန ဝါဒေါ အညေသံ စိတ္တီကာရာနံ. အပိစ ကဿညဿ ပရိနိဗ္ဗုတဿာပိ ဇာတိဗောဓိဓမ္မစက္ကပ္ပဝတ္တနပရိနိဗ္ဗာနဋ္ဌာနာနိ ပဋိမာစေတိယာဒီနိ ဝါ ဥဒ္ဒိဿ ဧဝံ စိတ္တီကာရဂရုကာရော ပဝတ္တတိ ယထာ ဘဂဝတော. ဧဝံစိတ္တီကတဋ္ဌေနာပိ တထာဂတသမံ ရတနံ နတ္ထိ. 'न नो समं अत्थि तथागतेन' में 'न' प्रतिषेध (नकार) के अर्थ में निपात है। 'नो' अवधारण (निश्चय) के अर्थ में निपात है। 'समं' का अर्थ तुल्य है। 'अत्थि' का अर्थ विद्यमान है। 'तथागतेन' का अर्थ बुद्ध के साथ है। क्या कहा गया है? जो यह धन और रत्न प्रकाशित किए गए हैं, इनमें एक भी रत्न बुद्ध-रत्न के समान नहीं है। जो आदरणीय होने के कारण रत्न कहलाते हैं, जैसे—चक्रवर्ती राजा का चक्र-रत्न और मणि-रत्न, जिनके उत्पन्न होने पर महाजन अन्यत्र आदर नहीं करते, कोई पुष्प-गंध आदि लेकर यक्ष-स्थान या भूत-स्थान नहीं जाता, बल्कि सभी लोग चक्र-रत्न और मणि-रत्न का ही आदर और पूजन करते हैं, उन्हीं से वर माँगते हैं और उनकी माँगी हुई इच्छाएँ पूर्ण होती हैं, वे रत्न भी बुद्ध-रत्न के समान नहीं हैं। यदि आदरणीय होने के कारण कोई रत्न है, तो तथागत ही रत्न हैं। क्योंकि तथागत के उत्पन्न होने पर जो कोई भी महेशाख्य (महाशक्तिशाली) देव और मनुष्य हैं, वे अन्यत्र आदर नहीं करते, किसी अन्य की पूजा नहीं करते। जैसा कि ब्रह्मा सहम्पति ने सुमेरु पर्वत के समान रत्न-माला से तथागत की पूजा की, और अपनी शक्ति के अनुसार अन्य देवों और मनुष्यों जैसे बिम्बिसार, कोसल राज, अनाथपिण्डिक आदि ने भी। परिनिर्वाण प्राप्त भगवान के उद्देश्य से भी छियानवे करोड़ धन व्यय करके सम्राट अशोक ने सकल जम्बूद्वीप में चौरासी हजार विहार स्थापित किए, तो अन्य आदर करने वालों की तो बात ही क्या! इसके अतिरिक्त, किसी अन्य परिनिर्वाण प्राप्त व्यक्ति के जन्म, बोधि, धर्मचक्र-प्रवर्तन और परिनिर्वाण स्थलों अथवा प्रतिमा और चैत्य आदि के प्रति वैसा आदर-सत्कार नहीं होता जैसा भगवान के प्रति होता है। इस प्रकार आदरणीय होने के कारण भी तथागत के समान कोई रत्न नहीं है। တထာ [Pg.144] ယမ္ပိ တံ မဟဂ္ဃဋ္ဌေန ရတနံ. သေယျထိဒံ – ကာသိကံ ဝတ္ထံ. ယထာဟ – ‘‘ဇိဏ္ဏမ္ပိ, ဘိက္ခဝေ, ကာသိကံ ဝတ္ထံ ဝဏ္ဏဝန္တဉ္စေဝ ဟောတိ သုခသမ္ဖဿဉ္စ မဟဂ္ဃဉ္စာ’’တိ (အ. နိ. ၃.၁၀၀), တမ္ပိ ဗုဒ္ဓရတနေန သမံ နတ္ထိ. ယဒိ ဟိ မဟဂ္ဃဋ္ဌေန ရတနံ, တထာဂတောဝ ရတနံ. တထာဂတော ဟိ ယေသံ ပံသုကမ္ပိ ပဋိဂ္ဂဏှာတိ, တေသံ တံ မဟပ္ဖလံ ဟောတိ မဟာနိသံသံ သေယျထာပိ အသောကရညော, ဣဒမဿ မဟဂ္ဃတာယ. ဧဝံ မဟဂ္ဃတာဝစနေန စေတ္ထ ဒေါသာဘာဝသာဓကံ ဣဒံ သုတ္တပဒံ ဝေဒိတဗ္ဗံ – उसी प्रकार, जो बहुमूल्य होने के कारण रत्न है, जैसे—काशि का वस्त्र। जैसा कि कहा गया है— "भिक्षुओं! पुराना होने पर भी काशि का वस्त्र वर्णवान (सुन्दर), सुख-स्पर्श और बहुमूल्य होता है", वह भी बुद्ध-रत्न के समान नहीं है। यदि बहुमूल्य होने के कारण कोई रत्न है, तो तथागत ही रत्न हैं। क्योंकि तथागत जिनका धूल (मिट्टी) भी ग्रहण कर लेते हैं, उनके लिए वह दान महाफलदायी और महान आनृशंस (लाभकारी) होता है, जैसे सम्राट अशोक के लिए हुआ था; यह उनकी बहुमूल्यता के कारण है। इस प्रकार बहुमूल्यता के वचन से यहाँ दोष-अभाव को सिद्ध करने वाला यह सूत्र-पद समझना चाहिए— ‘‘ယေသံ ခေါ ပန သော ပဋိဂ္ဂဏှာတိ စီဝရပိဏ္ဍပါတသေနာသနဂိလာနပစ္စယဘေသဇ္ဇပရိက္ခာရံ, တေသံ တံ မဟပ္ဖလံ ဟောတိ မဟာနိသံသံ. ဣဒမဿ မဟဂ္ဃတာယ ဝဒါမိ. သေယျထာပိ တံ, ဘိက္ခဝေ, ကာသိကံ ဝတ္ထံ မဟဂ္ဃံ, တထူပမာဟံ, ဘိက္ခဝေ, ဣမံ ပုဂ္ဂလံ ဝဒါမီ’’တိ (အ. နိ. ၃.၁၀၀). "जिनका वह (तथागत) चीवर, पिण्डपात, शयनासन और ग्लान-प्रत्यय-भैषज्य-परिष्कार ग्रहण करते हैं, उनके लिए वह महाफलदायी और महान आनृशंस होता है। मैं इसे उनकी बहुमूल्यता के कारण कहता हूँ। भिक्षुओं! जैसे वह काशि का वस्त्र बहुमूल्य है, वैसे ही, भिक्षुओं! मैं इस पुद्गल (तथागत) को बहुमूल्य कहता हूँ।" ဧဝံ မဟဂ္ဃဋ္ဌေနပိ တထာဂတသမံ ရတနံ နတ္ထိ. इस प्रकार बहुमूल्य होने के कारण भी तथागत के समान कोई रत्न नहीं है। တထာ ယမ္ပိ တံ အတုလဋ္ဌေန ရတနံ. သေယျထိဒံ – ရညော စက္ကဝတ္တိဿ စက္ကရတနံ ဥပ္ပဇ္ဇတိ ဣန္ဒနီလမဏိမယနာဘိ သတ္တရတနမယသဟဿာရံ ပဝါဠမယနေမိ ရတ္တသုဝဏ္ဏမယသန္ဓိ, ယဿ ဒသန္နံ ဒသန္နံ အရာနမုပရိ ဧကံ မုဏ္ဍာရံ ဟောတိ ဝါတံ ဂဟေတွာ သဒ္ဒကရဏတ္ထံ, ယေန ကတော သဒ္ဒေါ သုကုသလပ္ပတာဠိတပဉ္စင်္ဂိကတူရိယသဒ္ဒေါ ဝိယ ဟောတိ, ယဿ နာဘိယာ ဥဘောသု ပဿေသု ဒွေ သီဟမုခါနိ ဟောန္တိ, အဗ္ဘန္တရံ သကဋစက္ကဿေဝ သုသိရံ. တဿ ကတ္တာ ဝါ ကာရေတာ ဝါ နတ္ထိ, ကမ္မပစ္စယေန ဥတုတော သမုဋ္ဌာတိ. ယံ ရာဇာ ဒသဝိဓံ စက္ကဝတ္တိဝတ္တံ ပူရေတွာ တဒဟုပေါသထေ ပုဏ္ဏမဒိဝသေ သီသံနှာတော ဥပေါသထိကော ဥပရိပါသာဒဝရဂတော သီလာနိ သောဓေန္တော နိသိန္နော ပုဏ္ဏစန္ဒံ ဝိယ သူရိယံ ဝိယ စ ဥဋ္ဌေန္တံ ပဿတိ, ယဿ ဒွါဒသယောဇနတော သဒ္ဒေါ သုယျတိ, ယောဇနတော ဝဏ္ဏော ဒိဿတိ, ယံ မဟာဇနေန ‘‘ဒုတိယော မညေ စန္ဒော သူရိယော ဝါ ဥဋ္ဌိတော’’တိ အတိဝိယ ကောတူဟလဇာတေန ဒိဿမာနံ နဂရဿ ဥပရိ အာဂန္တွာ ရညော အန္တေပုရဿ ပါစီနပဿေ နာတိဥစ္စံ နာတိနီစံ ဟုတွာ မဟာဇနဿ ဂန္ဓပုပ္ဖာဒီဟိ ပူဇေတုံ, ယုတ္တဋ္ဌာနေ အက္ခာဟတံ ဝိယ တိဋ္ဌတိ. इसी प्रकार, वह जो अतुलनीय होने के अर्थ में 'रत्न' है। जैसे कि—चक्रवर्ती राजा का 'चक्र-रत्न' उत्पन्न होता है, जिसकी नाभि इन्द्रनील मणि से बनी होती है, जिसमें सात रत्नों से निर्मित एक हजार आरे (spokes) होते हैं, जिसकी नेमि (rim) मूँगे (coral) की होती है, और जिसके जोड़ लाल सोने के होते हैं। जिसके प्रत्येक दस-दस आरों के ऊपर वायु को ग्रहण कर शब्द करने के लिए एक-एक घुँघरू (घंटी) होती है, जिससे उत्पन्न शब्द सुकुशल व्यक्ति द्वारा बजाए गए पंच-अंगीय वाद्ययंत्र के संगीत के समान होता है। जिसकी नाभि के दोनों ओर दो सिंह-मुख होते हैं, और भीतर से वह बैलगाड़ी के पहिये की तरह खोखला होता है। उसका कोई कर्ता या कराने वाला नहीं होता, वह कर्म-प्रत्यय से ऋतु (प्रकृति) द्वारा उत्पन्न होता है। जिसे राजा, दस प्रकार के चक्रवर्ती-व्रतों को पूर्ण कर, उस उपोसथ के पूर्णिमा के दिन, सिर से स्नान कर, उपोसथ व्रत धारण किए हुए, श्रेष्ठ प्रासाद के ऊपर स्थित होकर, अपने शीलों को शुद्ध करते हुए बैठे हुए, पूर्ण चन्द्रमा या सूर्य के समान उदय होते हुए देखता है। जिसका शब्द बारह योजन दूर से सुनाई देता है और वर्ण (रंग) एक योजन से दिखाई देता है। जिसे जनसमूह "मानो दूसरा चन्द्रमा या सूर्य उदय हुआ है" ऐसा समझकर अत्यंत कौतूहल के साथ देखता है, वह नगर के ऊपर आकर राजा के अन्तःपुर के पूर्व भाग में, न बहुत ऊँचा न बहुत नीचा होकर, जनसमूह द्वारा गंध-पुष्प आदि से पूजा करने के योग्य स्थान पर, धुरी में लगे हुए पहिये के समान स्थिर हो जाता है। တဒေဝ [Pg.145] အနုဗန္ဓမာနံ ဟတ္ထိရတနံ ဥပ္ပဇ္ဇတိ, သဗ္ဗသေတော ရတ္တပါဒေါ သတ္တပ္ပတိဋ္ဌော ဣဒ္ဓိမာ ဝေဟာသင်္ဂမော ဥပေါသထကုလာ ဝါ ဆဒ္ဒန္တကုလာ ဝါ အာဂစ္ဆတိ, ဥပေါသထကုလာ စ အာဂစ္ဆန္တော သဗ္ဗဇေဋ္ဌော အာဂစ္ဆတိ, ဆဒ္ဒန္တကုလာ သဗ္ဗကနိဋ္ဌော သိက္ခိတသိက္ခော ဒမထူပေတော, သော ဒွါဒသယောဇနံ ပရိသံ ဂဟေတွာ သကလဇမ္ဗုဒီပံ အနုသံယာယိတွာ ပုရေပါတရာသမေဝ သကံ ရာဇဓာနိံ အာဂစ္ဆတိ. उसी (चक्र-रत्न) के पीछे-पीछे 'हस्ती-रत्न' (हाथी रत्न) उत्पन्न होता है, जो पूर्णतः श्वेत, लाल पैरों वाला, सात अंगों से पृथ्वी को स्पर्श करने वाला (सप्त-प्रतिष्ठित), ऋद्धिमान और आकाशगामी होता है। वह या तो उपोसथ कुल से आता है या छद्दन्त कुल से। यदि उपोसथ कुल से आता है, तो वह सबसे ज्येष्ठ होता है; यदि छद्दन्त कुल से आता है, तो वह सबसे कनिष्ठ होता है। वह पूर्णतः शिक्षित और विनीत होता है। वह बारह योजन के जनसमूह को साथ लेकर संपूर्ण जम्बूद्वीप की प्रदक्षिणा कर, प्रातःकाल के भोजन से पहले ही अपनी राजधानी वापस आ जाता है। တမ္ပိ အနုဗန္ဓမာနံ အဿရတနံ ဥပ္ပဇ္ဇတိ, သဗ္ဗသေတော ရတ္တပါဒေါ ကာဠသီသော မုဉ္ဇကေသော ဝလာဟကဿရာဇကုလာ အာဂစ္ဆတိ. သေသမေတ္ထ ဟတ္ထိရတနသဒိသမေဝ. उसके पीछे-पीछे 'अश्व-रत्न' (घोड़ा रत्न) उत्पन्न होता है, जो पूर्णतः श्वेत, लाल पैरों वाला, काले सिर वाला और मूँज जैसी गर्दन के बालों (अयाल) वाला होता है। वह बलाहक अश्व-राज के कुल से आता है। शेष विवरण हस्ती-रत्न के समान ही है। တမ္ပိ အနုဗန္ဓမာနံ မဏိရတနံ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. သော ဟောတိ မဏိ ဝေဠုရိယော သုဘော ဇာတိမာ အဋ္ဌံသော သုပရိကမ္မကတော အာယာမတော စက္ကနာဘိသဒိသော, ဝေပုလ္လပဗ္ဗတာ အာဂစ္ဆတိ. သော စတုရင်္ဂသမန္နာဂတေပိ အန္ဓကာရေ ရညော ဓဇဂ္ဂံ ဂတော ယောဇနံ ဩဘာသေတိ, ယဿောဘာသေန မနုဿာ ‘‘ဒိဝါ’’တိ မညမာနာ ကမ္မန္တေ ပယောဇေန္တိ, အန္တမသော ကုန္ထကိပိလ္လိကံ ဥပါဒါယ ပဿန္တိ. उसके पीछे-पीछे 'मणि-रत्न' उत्पन्न होता है। वह मणि वैदूर्य (beryl), शुभ, उत्तम जाति की, आठ पहलुओं वाली और सुसंस्कृत (अच्छी तरह तराशी हुई) होती है। लंबाई में वह चक्र की नाभि के समान होती है और वेपुल्ल पर्वत से आती है। वह चारों अंगों वाली (घोर) अंधकारपूर्ण रात्रि में भी, राजा की ध्वजा के अग्रभाग पर रखे जाने पर, एक योजन तक प्रकाश फैलाती है। उसके प्रकाश से मनुष्य "दिन है" ऐसा मानकर अपने कार्यों में लग जाते हैं, यहाँ तक कि वे चींटी-मकोड़ों जैसे सूक्ष्म जीवों को भी देख पाते हैं। တမ္ပိ အနုဗန္ဓမာနံ ဣတ္ထိရတနံ ဥပ္ပဇ္ဇတိ, ပကတိအဂ္ဂမဟေသီ ဝါ ဟောတိ, ဥတ္တရကုရုတော ဝါ အာဂစ္ဆတိ မဒ္ဒရာဇကုလတော ဝါ, အတိဒီဃတာဒိဆဒေါသဝိဝဇ္ဇိတာ အတိက္ကန္တာ မာနုသဝဏ္ဏံ အပ္ပတ္တာ ဒိဗ္ဗဝဏ္ဏံ, ယဿာ ရညော သီတကာလေ ဥဏှာနိ ဂတ္တာနိ ဟောန္တိ, ဥဏှကာလေ သီတာနိ, သတဓာ ဖောဋိတ တူလပိစုနော ဝိယ သမ္ဖဿော ဟောတိ, ကာယတော စန္ဒနဂန္ဓော ဝါယတိ, မုခတော ဥပ္ပလဂန္ဓော, ပုဗ္ဗုဋ္ဌာယိနိတာဒိအနေကဂုဏသမန္နာဂတာ စ ဟောတိ. उसके पीछे-पीछे 'स्त्री-रत्न' उत्पन्न होता है, जो या तो स्वाभाविक पट्टमहिषी होती है या उत्तरकुरु अथवा मद्द राजकुल से आती है। वह अति-दीर्घ आदि छह दोषों से रहित होती है; उसका रूप मानवीय वर्ण का अतिक्रमण कर दिव्य वर्ण तक न पहुँचा हुआ (अर्थात् श्रेष्ठ मानवीय) होता है। राजा के लिए शीतकाल में उसका शरीर उष्ण होता है और उष्णकाल में शीतल। उसका स्पर्श सौ बार धुनी हुई रुई के समान कोमल होता है। उसके शरीर से चंदन की सुगंध आती है और मुख से उत्पल (नीलकमल) की सुगंध। वह (पति से) पहले जागने वाली आदि अनेक गुणों से संपन्न होती है। တမ္ပိ အနုဗန္ဓမာနံ ဂဟပတိရတနံ ဥပ္ပဇ္ဇတိ ရညော ပကတိကမ္မကာရော သေဋ္ဌိ, ယဿ စက္ကရတနေ ဥပ္ပန္နမတ္တေ ဒိဗ္ဗံ စက္ခု ပါတုဘဝတိ, ယေန သမန္တတော ယောဇနမတ္တေ နိဓိံ ပဿတိ အသာမိကမ္ပိ သသာမိကမ္ပိ, သော ရာဇာနံ ဥပသင်္ကမိတွာ ပဝါရေတိ ‘‘အပ္ပောဿုက္ကော တွံ, ဒေဝ, ဟောဟိ, အဟံ တေ ဓနေန ဓနကရဏီယံ ကရိဿာမီ’’တိ. उसके पीछे-पीछे 'गृहपति-रत्न' उत्पन्न होता है, जो राजा का स्वाभाविक सेवक श्रेष्ठी (धनी व्यापारी) होता है। चक्र-रत्न के उत्पन्न होते ही उसे दिव्य-चक्षु प्राप्त हो जाते हैं, जिससे वह चारों ओर एक योजन तक के स्वामी-रहित या स्वामी-सहित निधियों (खजानों) को देख लेता है। वह राजा के पास जाकर निवेदन करता है—"देव! आप निश्चिंत रहें, मैं आपके धन संबंधी कार्यों को (निधियों से) पूर्ण कर दूँगा।" တမ္ပိ [Pg.146] အနုဗန္ဓမာနံ ပရိဏာယကရတနံ ဥပ္ပဇ္ဇတိ ရညော ပကတိဇေဋ္ဌပုတ္တော. စက္ကရတနေ ဥပ္ပန္နမတ္တေ အတိရေကပညာဝေယျတ္တိယေန သမန္နာဂတော ဟောတိ, ဒွါဒသယောဇနာယ ပရိသာယ စေတသာ စိတ္တံ ပရိဇာနိတွာ နိဂ္ဂဟပဂ္ဂဟသမတ္ထော ဟောတိ, သော ရာဇာနံ ဥပသင်္ကမိတွာ ပဝါရေတိ ‘‘အပ္ပောဿုက္ကော တွံ, ဒေဝ, ဟောဟိ, အဟံ တေ ရဇ္ဇံ အနုသာသိဿာမီ’’တိ. ယံ ဝါ ပနညမ္ပိ ဧဝရူပံ အတုလဋ္ဌေန ရတနံ, ယဿ န သက္ကာ တုလယိတွာ တီရယိတွာ အဂ္ဃော ကာတုံ ‘‘သတံ ဝါ သဟဿံ ဝါ အဂ္ဃတိ ကောဋိံ ဝါ’’တိ. တတ္ထ ဧကရတနမ္ပိ ဗုဒ္ဓရတနေန သမံ နတ္ထိ. ယဒိ ဟိ အတုလဋ္ဌေန ရတနံ, တထာဂတောဝ ရတနံ. တထာဂတော ဟိ န သက္ကာ သီလတော ဝါ သမာဓိတော ဝါ ပညာဒီနံ ဝါ အညတရတော ကေနစိ တုလယိတွာ တီရယိတွာ ‘‘ဧတ္တကဂုဏော ဝါ ဣမိနာ သမော ဝါ သပ္ပဋိဘာဂေါ ဝါ’’တိ ပရိစ္ဆိန္ဒိတုံ. ဧဝံ အတုလဋ္ဌေနပိ တထာဂတသမံ ရတနံ နတ္ထိ. उसके पीछे-पीछे 'परिणायक-रत्न' (मंत्री/सेनापति रत्न) उत्पन्न होता है, जो राजा का स्वाभाविक ज्येष्ठ पुत्र होता है। चक्र-रत्न के उत्पन्न होते ही वह अत्यंत प्रज्ञा और निपुणता से संपन्न हो जाता है। वह बारह योजन की परिषद के चित्त को अपने चित्त से जानकर, निग्रह (दंड) और प्रग्रह (अनुग्रह) करने में समर्थ होता है। वह राजा के पास जाकर निवेदन करता है—"देव! आप निश्चिंत रहें, मैं आपके राज्य का शासन करूँगा।" अथवा, जो कोई भी अन्य इस प्रकार का 'अतुलनीय' होने के अर्थ में रत्न है, जिसका मूल्य तौलकर या विचार कर "सौ, हजार या करोड़" के रूप में निर्धारित नहीं किया जा सकता, उनमें से एक भी रत्न बुद्ध-रत्न के समान नहीं है। यदि 'अतुलनीय' होने के अर्थ में कोई रत्न है, तो वह तथागत ही हैं। तथागत को शील, समाधि या प्रज्ञा आदि किसी भी गुण के आधार पर किसी के द्वारा तौलकर या विचार कर "इतने गुणों वाला है" या "इसके समान है" या "इसके सदृश है", इस प्रकार परिसीमित नहीं किया जा सकता। इस प्रकार, अतुलनीय होने के अर्थ में भी तथागत के समान कोई रत्न नहीं है। တထာ ယမ္ပိ တံ ဒုလ္လဘဒဿနဋ္ဌေန ရတနံ, သေယျထိဒံ ဒုလ္လဘပါတုဘာဝေါ ရာဇာ စက္ကဝတ္တိ, စက္ကာဒီနိ စ တဿ ရတနာနိ, တမ္ပိ ဗုဒ္ဓရတနေန သမံ နတ္ထိ. ယဒိ ဟိ ဒုလ္လဘဒဿနဋ္ဌေန ရတနံ, တထာဂတောဝ ရတနံ, ကုတော စက္ကဝတ္တိအာဒီနံ ရတနတ္တံ. တာနိ ဟိ ဧကသ္မိံယေဝ ကပ္ပေ အနေကာနိ ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ. ယသ္မာ ပန အသင်္ချေယျေပိ ကပ္ပေ တထာဂတသုညော လောကော ဟောတိ, တသ္မာ တထာဂတောဝ ကဒါစိ ကရဟစိ ဥပ္ပဇ္ဇနတော ဒုလ္လဘဒဿနော. ဝုတ္တမ္ပိ စေတံ ဘဂဝတာ ပရိနိဗ္ဗာနသမယေ – इसी प्रकार, वह जो 'दुर्लभ दर्शन' होने के अर्थ में 'रत्न' है। जैसे कि—चक्रवर्ती राजा का प्रादुर्भाव दुर्लभ है और उसके चक्र आदि रत्न भी दुर्लभ हैं; वे भी बुद्ध-रत्न के समान नहीं हैं। यदि दुर्लभ दर्शन होने के अर्थ में कोई रत्न है, तो वह तथागत ही हैं; चक्रवर्ती आदि में रत्न-भाव कहाँ? वे तो एक ही कल्प में अनेक उत्पन्न हो जाते हैं। किंतु चूँकि असंख्य कल्पों तक भी लोक तथागत से शून्य होता है, इसलिए तथागत ही कभी-कभार उत्पन्न होने के कारण 'दुर्लभ दर्शन' वाले हैं। भगवान ने परिनिर्वाण के समय यह कहा भी है— ‘‘ဒေဝတာ, အာနန္ဒ, ဥဇ္ဈာယန္တိ ‘ဒူရာ စ ဝတမှ အာဂတာ တထာဂတံ ဒဿနာယ, ကဒါစိ ကရဟစိ တထာဂတာ လောကေ ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ အရဟန္တော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓါ, အဇ္ဇေဝ ရတ္တိယာ ပစ္ဆိမေ ယာမေ တထာဂတဿ ပရိနိဗ္ဗာနံ ဘဝိဿတိ, အယဉ္စ မဟေသက္ခော ဘိက္ခု ဘဂဝတော ပုရတော ဌိတော ဩဝါရေန္တော, န မယံ လဘာမ ပစ္ဆိမေ ကာလေ တထာဂတံ ဒဿနာယာ’’’တိ (ဒီ. နိ. ၂.၂၀၀). “हे आनंद! देवता शिकायत कर रहे हैं—‘हम तथागत के दर्शन के लिए दूर से आए हैं। लोक में अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध तथागत कभी-कभार ही उत्पन्न होते हैं। आज ही रात के अंतिम प्रहर में तथागत का परिनिर्वाण होगा, और यह महान प्रभावशाली भिक्षु भगवान के सामने खड़ा होकर (हमें) रोक रहा है; हमें अंतिम समय में तथागत के दर्शन का अवसर नहीं मिल रहा है।’” ဧဝံ ဒုလ္လဘဒဿနဋ္ဌေနာပိ တထာဂတသမံ ရတနံ နတ္ထိ. इस प्रकार, दर्शन की दुर्लभता के कारण भी तथागत के समान कोई रत्न नहीं है। တထာ ယမ္ပိ တံ အနောမသတ္တပရိဘောဂဋ္ဌေန ရတနံ. သေယျထိဒံ – ရညော စက္ကဝတ္တိဿ စက္ကရတနာဒိ တဉှိ ကောဋိသတသဟဿဓနာနမ္ပိ သတ္တဘူမိကပါသာဒဝရတလေ [Pg.147] ဝသန္တာနမ္ပိ စဏ္ဍာလဝေနနေသာဒရထကာရပုက္ကုသာဒီနံ နီစကုလိကာနံ ဩမကပုရိသာနံ သုပိနန္တေပိ ပရိဘောဂတ္ထာယ န နိဗ္ဗတ္တတိ. ဥဘတော သုဇာတဿ ပန ရညော ခတ္တိယဿေဝ ပရိပူရိတဒသဝိဓစက္ကဝတ္တိဝတ္တဿ ပရိဘောဂတ္ထာယ နိဗ္ဗတ္တနတော အနောမသတ္တပရိဘောဂံယေဝ ဟောတိ, တမ္ပိ ဗုဒ္ဓရတနသမံ နတ္ထိ. ယဒိ ဟိ အနောမသတ္တပရိဘောဂဋ္ဌေန ရတနံ, တထာဂတောဝ ရတနံ. တထာဂတော ဟိ လောကေ ဩမကသတ္တသမ္မတာနံ အနုပနိဿယသမ္ပန္နာနံ ဝိပရီတဒဿနာနံ ပူရဏကဿပါဒီနံ ဆန္နံ သတ္ထာရာနံ အညေသဉ္စ ဧဝရူပါနံ သုပိနန္တေပိ အပရိဘောဂေါ. ဥပနိဿယသမ္ပန္နာနံ ပန စတုပ္ပဒါယပိ ဂါထာယ ပရိယောသာနေ အရဟတ္တမဓိဂန္တုံ သမတ္ထာနံ နိဗ္ဗေဓိကဉာဏဒဿနာနံ ဗာဟိယဒါရုစီရိယပ္ပဘုတီနံ အညေသဉ္စ မဟာကုလပ္ပသုတာနံ မဟာသာဝကာနံ ပရိဘောဂေါ, တေ ဟိ တံ ဒဿနာနုတ္တရိယသဝနာနုတ္တရိယပါရိစရိယာနုတ္တရိယာဒီနိ သာဓေန္တာ တထာဂတံ ပရိဘုဉ္ဇန္တိ. ဧဝံ အနောမသတ္တပရိဘောဂဋ္ဌေနာပိ တထာဂတသမံ ရတနံ နတ္ထိ. उसी प्रकार, वह जो ‘श्रेष्ठ सत्त्वों द्वारा उपभोग किए जाने’ के अर्थ में रत्न है। जैसे—चक्रवर्ती राजा का चक्र-रत्न आदि; वह रत्न सौ हजार करोड़ धन से भी बढ़कर है, और सात मंजिला श्रेष्ठ प्रासाद में रहने वाले राजाओं के लिए तो होता है, किंतु चांडाल, वेणुकार, निषाद, रथकार, पुक्कुस आदि नीच कुल के अधम पुरुषों के लिए स्वप्न में भी उपभोग के लिए उत्पन्न नहीं होता। केवल दोनों पक्षों (माता-पिता) से सुजात और दस प्रकार के चक्रवर्ती कर्तव्यों को पूर्ण करने वाले क्षत्रिय राजा के उपभोग के लिए ही उत्पन्न होने के कारण वह ‘श्रेष्ठ सत्त्वों का उपभोग’ ही है; फिर भी वह बुद्ध-रत्न के समान नहीं है। यदि ‘श्रेष्ठ सत्त्वों द्वारा उपभोग’ के अर्थ में कोई रत्न है, तो वह तथागत ही रत्न हैं। क्योंकि तथागत का उपभोग लोक में अधम माने जाने वाले, उपनिश्रय (आध्यात्मिक योग्यता) से रहित, विपरीत दृष्टि वाले पूर्ण काश्यप आदि छह शास्तओं और उनके जैसे अन्य लोगों के लिए स्वप्न में भी संभव नहीं है। किंतु जो उपनिश्रय से संपन्न हैं, जो चार चरणों वाली गाथा के अंत में भी अर्हत्व प्राप्त करने में समर्थ हैं, उन भेदी प्रज्ञा वाले बाहिय दारुचीरिय आदि और अन्य महाकुलों में उत्पन्न महाश्रावकों के लिए ही (तथागत का) उपभोग संभव है; वे ही दर्शन-अनुत्तरिय, श्रवण-अनुत्तरिय, परिचर्या-अनुत्तरिय आदि को सिद्ध करते हुए तथागत का उपभोग करते हैं। इस प्रकार, श्रेष्ठ सत्त्वों द्वारा उपभोग किए जाने के अर्थ में भी तथागत के समान कोई रत्न नहीं है। ယမ္ပိ တံ အဝိသေသတော ရတိဇနနဋ္ဌေန ရတနံ. သေယျထိဒံ – ရညော စက္ကဝတ္တိဿ စက္ကရတနံ. တဉှိ ဒိသွာဝ ရာဇာ စက္ကဝတ္တိ အတ္တမနော ဟောတိ, ဧဝမ္ပိ တံ ရညော ရတိံ ဇနေတိ. ပုန စပရံ ရာဇာ စက္ကဝတ္တိ ဝါမေန ဟတ္ထေန သုဝဏ္ဏဘိင်္ကာရံ ဂဟေတွာ ဒက္ခိဏေန ဟတ္ထေန စက္ကရတနံ အဗ္ဘုက္ကိရတိ ‘‘ပဝတ္တတု ဘဝံ စက္ကရတနံ, အဘိဝိဇိနာတု ဘဝံ စက္ကရတန’’န္တိ. တတော စက္ကရတနံ ပဉ္စင်္ဂိကံ ဝိယ တူရိယံ မဓုရဿရံ နိစ္ဆရန္တံ အာကာသေန ပုရတ္ထိမံ ဒိသံ ဂစ္ဆတိ, အနွဒေဝ ရာဇာ, စက္ကဝတ္တိ စက္ကာနုဘာဝေန ဒွါဒသယောဇနဝိတ္ထိဏ္ဏာယ စတုရင်္ဂိနိယာ သေနာယ နာတိဥစ္စံ နာတိနီစံ ဥစ္စရုက္ခာနံ ဟေဋ္ဌာဘာဂေန, နီစရုက္ခာနံ ဥပရိဘာဂေန, ရုက္ခေသု ပုပ္ဖဖလပလ္လဝါဒိပဏ္ဏာကာရံ ဂဟေတွာ အာဂတာနံ ဟတ္ထတော ပဏ္ဏာကာရဉ္စ ဂဏှန္တော ‘‘ဧဟိ ခေါ, မဟာရာဇာ’’တိ ဧဝမာဒိနာ ပရမနိပစ္စကာရေန အာဂတေ ပဋိရာဇာနော ‘‘ပါဏော န ဟန္တဗ္ဗော’’တိအာဒိနာ နယေန အနုသာသန္တော ဂစ္ဆတိ. ယတ္ထ ပန ရာဇာ ဘုဉ္ဇိတုကာမော ဝါ ဒိဝါသေယျံ ဝါ ကပ္ပေတုကာမော ဟောတိ, တတ္ထ စက္ကရတနံ အာကာသာ ဩရောဟိတွာ ဥဒကာဒိသဗ္ဗကိစ္စက္ခမေ သမေ ဘူမိဘာဂေ အက္ခာဟတံ ဝိယ တိဋ္ဌတိ. ပုန ရညော ဂမနစိတ္တေ ဥပ္ပန္နေ ပုရိမနယေနေဝ သဒ္ဒံ ကရောန္တံ ဂစ္ဆတိ, တံ သုတွာ ဒွါဒသယောဇနိကာပိ ပရိသာ အာကာသေန ဂစ္ဆတိ[Pg.148]. စက္ကရတနံ အနုပုဗ္ဗေန ပုရတ္ထိမံ သမုဒ္ဒံ အဇ္ဈောဂါဟတိ, တသ္မိံ အဇ္ဈောဂါဟန္တေ ဥဒကံ ယောဇနပ္ပမာဏံ အပဂန္တွာ ဘိတ္တီကတံ ဝိယ တိဋ္ဌတိ. မဟာဇနော ယထာကာမံ သတ္တ ရတနာနိ ဂဏှာတိ. ပုန ရာဇာ သုဝဏ္ဏဘိင်္ကာရံ ဂဟေတွာ ‘‘ဣတော ပဋ္ဌာယ မမ ရဇ္ဇ’’န္တိ ဥဒကေန အဗ္ဘုက္ကိရိတွာ နိဝတ္တတိ. သေနာ ပုရတော ဟောတိ, စက္ကရတနံ ပစ္ဆတော, ရာဇာ မဇ္ဈေ. စက္ကရတနေန ဩသက္ကိတောသက္ကိတဋ္ဌာနံ ဥဒကံ ပရိပူရတိ. ဧတေနေဝ ဥပါယေန ဒက္ခိဏပစ္ဆိမုတ္တရေပိ သမုဒ္ဒေ ဂစ္ဆတိ. वह जो सामान्य रूप से ‘प्रीति उत्पन्न करने’ के अर्थ में रत्न है। जैसे—चक्रवर्ती राजा का चक्र-रत्न। उसे देखकर ही चक्रवर्ती राजा प्रसन्न होता है, इस प्रकार वह राजा के लिए प्रीति उत्पन्न करता है। पुनः, चक्रवर्ती राजा बाएं हाथ में स्वर्ण-भृंगार (झारी) लेकर दाहिने हाथ से चक्र-रत्न पर जल छिड़कता है—‘आप चक्र-रत्न प्रवृत्त हों, आप विजय प्राप्त करें।’ तब वह चक्र-रत्न पाँच अंगों वाले वाद्ययंत्र के समान मधुर स्वर निकालते हुए आकाश मार्ग से पूर्व दिशा की ओर जाता है। उसके पीछे-पीछे राजा चक्र-रत्न के प्रभाव से बारह योजन विस्तृत चतुरंगिणी सेना के साथ, न बहुत ऊँचे और न बहुत नीचे होकर, ऊँचे वृक्षों के नीचे से और नीचे वृक्षों के ऊपर से जाता है। वह वृक्षों के फूल, फल, पल्लव आदि उपहार लेकर आए लोगों के हाथों से उपहार ग्रहण करते हुए और ‘आइए महाराज’ इस प्रकार अत्यंत विनम्रता से आए हुए शत्रु राजाओं को ‘प्राणी की हत्या नहीं करनी चाहिए’ आदि विधि से उपदेश देते हुए जाता है। जहाँ राजा भोजन करना चाहता है या विश्राम करना चाहता है, वहाँ चक्र-रत्न आकाश से उतरकर जल आदि सभी कार्यों के लिए उपयुक्त समतल भूमि पर धुरी के समान स्थिर हो जाता है। पुनः जब राजा के मन में चलने का विचार उत्पन्न होता है, तो वह पहले की तरह शब्द करता हुआ चलता है, जिसे सुनकर बारह योजन की परिषद भी आकाश मार्ग से चलती है। चक्र-रत्न क्रमशः पूर्वी समुद्र में प्रवेश करता है; उसके प्रवेश करने पर जल एक योजन तक हटकर दीवार की तरह खड़ा हो जाता है। जनसमूह अपनी इच्छानुसार सात रत्न ग्रहण करता है। पुनः राजा स्वर्ण-भृंगार लेकर ‘आज से यह मेरा राज्य है’ ऐसा कहकर जल छिड़ककर लौटता है। सेना आगे होती है, चक्र-रत्न पीछे और राजा बीच में होता है। चक्र-रत्न के हटने के साथ-साथ जल पुनः भर जाता है। इसी उपाय से वह दक्षिण, पश्चिम और उत्तर के समुद्रों में भी जाता है। ဧဝံ စတုဒ္ဒိသံ အနုသံယာယိတွာ စက္ကရတနံ တိယောဇနပ္ပမာဏံ အာကာသံ အာရောဟတိ. တတ္ထ ဌိတော ရာဇာ စက္ကရတနာနုဘာဝေန ဝိဇိတဝိဇယော ပဉ္စသတပရိတ္တဒီပပဋိမဏ္ဍိတံ သတ္တယောဇနသဟဿပရိမဏ္ဍလံ ပုဗ္ဗဝိဒေဟံ, တထာ အဋ္ဌယောဇနသဟဿပရိမဏ္ဍလံ ဥတ္တရကုရုံ, သတ္တယောဇနသဟဿပရိမဏ္ဍလံယေဝ အပရဂေါယာနံ, ဒသယောဇနသဟဿပရိမဏ္ဍလံ ဇမ္ဗုဒီပဉ္စာတိ ဧဝံ စတုမဟာဒီပဒွိသဟဿပရိတ္တဒီပပဋိမဏ္ဍိတံ ဧကံ စက္ကဝါဠံ သုဖုလ္လပုဏ္ဍရီကဝနံ ဝိယ ဩလောကေတိ. ဧဝံ ဩလောကယတော စဿ အနပ္ပကာ ရတိ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. ဧဝမ္ပိ တံ စက္ကရတနံ ရညော ရတိံ ဇနေတိ, တမ္ပိ ဗုဒ္ဓရတနသမံ နတ္ထိ. ယဒိ ဟိ ရတိဇနနဋ္ဌေန ရတနံ, တထာဂတောဝ ရတနံ, ကိံ ကရိဿတိ ဧတံ စက္ကရတနံ? တထာဂတော ဟိ ယဿာ ဒိဗ္ဗာယ ရတိယာ စက္ကရတနာဒီဟိ သဗ္ဗေဟိပိ ဇနိတာ စက္ကဝတ္တိရတိ သင်္ခမ္ပိ ကလမ္ပိ ကလဘာဂမ္ပိ န ဥပေတိ, တတောပိ ရတိတော ဥတ္တရိတရဉ္စ ပဏီတတရဉ္စ အတ္တနော ဩဝါဒပ္ပဋိကရာနံ အသင်္ချေယျာနမ္ပိ ဒေဝမနုဿာနံ ပဌမဇ္ဈာနရတိံ ဒုတိယတတိယစတုတ္ထပဉ္စမဇ္ဈာနရတိံ, အာကာသာနဉ္စာယတနရတိံ, ဝိညာဏဉ္စာယတနအာကိဉ္စညာယတနနေဝသညာနာသညာယတနရတိံ, သောတာပတ္တိမဂ္ဂရတိံ, သောတာပတ္တိဖလရတိံ, သကဒါဂါမိအနာဂါမိအရဟတ္တမဂ္ဂဖလရတိဉ္စ ဇနေတိ. ဧဝံ ရတိဇနနဋ္ဌေနာပိ တထာဂတသမံ ရတနံ နတ္ထီတိ. इस प्रकार चारों दिशाओं में भ्रमण करने के बाद, चक्र-रत्न तीन सौ योजन के आकाश में ऊपर उठता है। वहाँ स्थित होकर, चक्रवर्ती राजा चक्र-रत्न के प्रभाव से विजित शत्रुओं वाला होकर, पाँच सौ छोटे द्वीपों से सुशोभित सात हजार योजन परिधि वाले पूर्वविदेह द्वीप को, उसी प्रकार आठ हजार योजन परिधि वाले उत्तरकुरु द्वीप को, सात हजार योजन परिधि वाले अपरगोयान द्वीप को, और दस हजार योजन परिधि वाले जम्बुद्वीप को—इस प्रकार चार महाद्वीपों और दो हजार छोटे द्वीपों से सुशोभित इस चक्रवाल को खिले हुए श्वेत कमलों के वन के समान देखता है। इस प्रकार देखते हुए उस राजा को अपार प्रीति उत्पन्न होती है। इस प्रकार वह चक्र-रत्न राजा के लिए प्रीति उत्पन्न करता है, फिर भी वह बुद्ध-रत्न के समान नहीं है। वास्तव में, यदि प्रीति उत्पन्न करने के अर्थ में ही कोई वस्तु 'रत्न' कहलाती है, तो तथागत ही वास्तविक रत्न हैं; यह चक्र-रत्न क्या करेगा? क्योंकि तथागत जिस दिव्य प्रीति को उत्पन्न करते हैं, वह चक्र-रत्न आदि सभी रत्नों द्वारा उत्पन्न चक्रवर्ती की प्रीति के अंश, कला या कला के भाग के बराबर भी नहीं पहुँचती। उस प्रीति से भी तथागत-रत्न श्रेष्ठतर और प्रणीततर है, जो अपने उपदेशों का पालन करने वाले असंख्य देवों और मनुष्यों को प्रथम ध्यान की प्रीति, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ और पंचम ध्यान की प्रीति, आकाशानन्त्यायतन की प्रीति, विज्ञानानन्त्यायतन, आकिंचन्यायतन और नैवसंज्ञानासंज्ञायतन की प्रीति, स्रोतपत्ति-मार्ग की प्रीति, स्रोतपत्ति-फल की प्रीति, सकृदागामी, अनागामी और अर्हत् मार्ग-फल की प्रीति प्रदान करते हैं। इस प्रकार प्रीति उत्पन्न करने के अर्थ में भी तथागत के समान कोई रत्न नहीं है। အပိစ ရတနံ နာမေတံ ဒုဝိဓံ ဟောတိ သဝိညာဏကမဝိညာဏကဉ္စ. တတ္ထ အဝိညာဏကံ စက္ကရတနံ မဏိရတနဉ္စ, ယံ ဝါ ပနညမ္ပိ အနိန္ဒြိယဗဒ္ဓသုဝဏ္ဏရဇတာဒိ, သဝိညာဏကံ ဟတ္ထိရတနာဒိပရိဏာယကရတနပရိယောသာနံ, ယံ ဝါ ပနညမ္ပိ ဧဝရူပံ ဣန္ဒြိယဗဒ္ဓံ. ဧဝံ ဒုဝိဓေ စေတ္ထ သဝိညာဏကရတနံ အဂ္ဂမက္ခာယတိ[Pg.149]. ကသ္မာ? ယသ္မာ အဝိညာဏကံ သုဝဏ္ဏရဇတမဏိမုတ္တာဒိရတနံ သဝိညာဏကာနံ ဟတ္ထိရတနာဒီနံ အလင်္ကာရတ္ထာယ ဥပနီယတိ. इसके अतिरिक्त, रत्न दो प्रकार के होते हैं: सचेतन और अचेतन। उनमें से अचेतन रत्न चक्र-रत्न और मणि-रत्न हैं, अथवा अन्य कोई भी इन्द्रिय-रहित सोना, चाँदी आदि। सचेतन रत्न हस्ति-रत्न से लेकर परिणायक-रत्न तक हैं, अथवा अन्य कोई भी इस प्रकार का इन्द्रिय-युक्त रत्न। इन दोनों प्रकारों में सचेतन रत्न को श्रेष्ठ कहा जाता है। क्यों? क्योंकि अचेतन रत्न जैसे सोना, चाँदी, मणि, मोती आदि सचेतन रत्नों जैसे हस्ति-रत्न आदि के अलंकरण के लिए लाए जाते हैं। သဝိညာဏကရတနမ္ပိ ဒုဝိဓံ တိရစ္ဆာနဂတရတနံ, မနုဿရတနဉ္စ. တတ္ထ မနုဿရတနံ အဂ္ဂမက္ခာယတိ. ကသ္မာ? ယသ္မာ တိရစ္ဆာနဂတရတနံ မနုဿရတနဿ ဩပဝယှံ ဟောတိ. မနုဿရတနမ္ပိ ဒုဝိဓံ ဣတ္ထိရတနံ, ပုရိသရတနဉ္စ. တတ္ထ ပုရိသရတနံ အဂ္ဂမက္ခာယတိ. ကသ္မာ? ယသ္မာ ဣတ္ထိရတနံ ပုရိသရတနဿ ပရိစာရိကတ္တံ အာပဇ္ဇတိ. ပုရိသရတနမ္ပိ ဒုဝိဓံ အဂါရိကရတနံ, အနဂါရိကရတနဉ္စ. တတ္ထ အနဂါရိကရတနံ အဂ္ဂမက္ခာယတိ. ကသ္မာ? ယသ္မာ အဂါရိကရတနေသု အဂ္ဂေါ စက္ကဝတ္တိပိ သီလာဒိဂုဏယုတ္တံ အနဂါရိကရတနံ ပဉ္စပတိဋ္ဌိတေန ဝန္ဒိတွာ ဥပဋ္ဌဟိတွာ ပယိရုပါသိတွာ ဒိဗ္ဗမာနုသိကာ သမ္ပတ္တိယော ပါပုဏိတွာ အန္တေ နိဗ္ဗာနသမ္ပတ္တိံ ပါပုဏာတိ. सचेतन रत्न भी दो प्रकार के होते हैं: तिर्यक (पशु) रत्न और मनुष्य रत्न। उनमें से मनुष्य रत्न को श्रेष्ठ कहा जाता है। क्यों? क्योंकि तिर्यक रत्न मनुष्य रत्न के लिए सवारी के रूप में होता है। मनुष्य रत्न भी दो प्रकार के होते हैं: स्त्री रत्न और पुरुष रत्न। उनमें से पुरुष रत्न को श्रेष्ठ कहा जाता है। क्यों? क्योंकि स्त्री रत्न पुरुष रत्न की परिचारिका होती है। पुरुष रत्न भी दो प्रकार के होते हैं: गृहस्थ रत्न और अनगारिक (संन्यासी) रत्न। उनमें से अनगारिक रत्न को श्रेष्ठ कहा जाता है। क्यों? क्योंकि गृहस्थ रत्नों में श्रेष्ठ चक्रवर्ती राजा भी शील आदि गुणों से युक्त अनगारिक रत्न को पंचांग नमस्कार कर, उनकी सेवा और उपासना कर, दिव्य और मानवीय संपत्तियों को प्राप्त कर अंत में निर्वाण की संपत्ति को प्राप्त करता है। ဧဝံ အနဂါရိကရတနမ္ပိ ဒုဝိဓံ အရိယပုထုဇ္ဇနဝသေန. အရိယရတနမ္ပိ ဒုဝိဓံ သေခါသေခဝသေန. အသေခရတနမ္ပိ ဒုဝိဓံ သုက္ခဝိပဿကသမထယာနိကဝသေန. သမထယာနိကရတနမ္ပိ ဒုဝိဓံ သာဝကပါရမိပ္ပတ္တမပ္ပတ္တဉ္စ. တတ္ထ သာဝကပါရမိပ္ပတ္တံ အဂ္ဂမက္ခာယတိ. ကသ္မာ? ဂုဏမဟန္တတာယ. သာဝကပါရမိပ္ပတ္တရတနတောပိ ပစ္စေကဗုဒ္ဓရတနံ အဂ္ဂမက္ခာယတိ. ကသ္မာ? ဂုဏမဟန္တတာယ. သာရိပုတ္တမောဂ္ဂလ္လာနသဒိသာပိ ဟိ အနေကသတာ သာဝကာ ဧကဿ ပစ္စေကဗုဒ္ဓဿ ဂုဏာနံ သတဘာဂမ္ပိ န ဥပေန္တိ. ပစ္စေကဗုဒ္ဓရတနတောပိ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓရတနံ အဂ္ဂမက္ခာယတိ. ကသ္မာ? ဂုဏမဟန္တတာယ. သကလမ္ပိ ဟိ ဇမ္ဗုဒီပံ ပူရေတွာ ပလ္လင်္ကေန ပလ္လင်္ကံ ဃဋေန္တာ နိသိန္နာ ပစ္စေကဗုဒ္ဓါ ဧကဿ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ ဂုဏာနံ နေဝ သင်္ခံ န ကလံ န ကလဘာဂံ ဥပေန္တိ. ဝုတ္တဉှေတံ ဘဂဝတာ – ‘‘ယာဝတာ, ဘိက္ခဝေ, သတ္တာ အပဒါ ဝါ…ပေ… တထာဂတော တေသံ အဂ္ဂမက္ခာယတီ’’တိအာဒိ (အ. နိ. ၄.၃၄; ၅.၃၂; ဣတိဝု. ၉၀). ဧဝံ ကေနစိ ပရိယာယေန တထာဂတသမံ ရတနံ နတ္ထိ. တေနာဟ ဘဂဝါ – ‘‘န နော သမံ အတ္ထိ တထာဂတေနာ’’တိ. इसी प्रकार, अनगारिक रत्न भी आर्य और पृथग्जन के भेद से दो प्रकार के होते हैं। आर्य रत्न भी शैक्ष और अशैक्ष के भेद से दो प्रकार के होते हैं। अशैक्ष रत्न भी शुष्क-विपश्यक और शमथ-यानिक के भेद से दो प्रकार के होते हैं। शमथ-यानिक रत्न भी श्रावक-पारमिता प्राप्त और अप्राप्त के भेद से दो प्रकार के होते हैं। उनमें से श्रावक-पारमिता प्राप्त रत्न को श्रेष्ठ कहा जाता है। क्यों? गुणों की महानता के कारण। श्रावक-पारमिता प्राप्त रत्न से भी प्रत्येकबुद्ध रत्न को श्रेष्ठ कहा जाता है। क्यों? गुणों की महानता के कारण। वास्तव में, सारिपुत्र और मोग्गल्लान के समान सैकड़ों श्रावक भी एक प्रत्येकबुद्ध के गुणों के सौवें भाग के बराबर भी नहीं होते। प्रत्येकबुद्ध रत्न से भी सम्यक्सम्बुद्ध रत्न को श्रेष्ठ कहा जाता है। क्यों? गुणों की महानता के कारण। वास्तव में, संपूर्ण जम्बुद्वीप को भरकर एक-दूसरे के आसन से सटकर बैठे हुए प्रत्येकबुद्ध भी एक सम्यक्सम्बुद्ध के गुणों की संख्या, कला या कला के भाग के बराबर नहीं पहुँच सकते। भगवान ने यह कहा भी है— "हे भिक्षुओं! जितने भी जीव हैं, चाहे वे बिना पैर वाले हों... (आदि)... उन सबमें तथागत श्रेष्ठ कहे जाते हैं।" इस प्रकार, किसी भी दृष्टिकोण से तथागत के समान कोई रत्न नहीं है। इसीलिए भगवान ने कहा— "तथागत के समान कोई दूसरा नहीं है।" ဧဝံ ဘဂဝါ ဗုဒ္ဓရတနဿ အညေဟိ ရတနေဟိ အသမတံ ဝတွာ ဣဒါနိ တေသံ သတ္တာနံ ဥပ္ပန္နဥပဒ္ဒဝဝူပသမတ္ထံ နေဝ ဇာတိံ န ဂေါတ္တံ န ကောလပုတ္တိယံ န ဝဏ္ဏပေါက္ခရတာဒိံ နိဿာယ, အပိစ ခေါ အဝီစိမုပါဒါယ ဘဝဂ္ဂပရိယန္တေ [Pg.150] လောကေ သီလသမာဓိက္ခန္ဓာဒီဟိ ဂုဏေဟိ ဗုဒ္ဓရတနဿ အသဒိသဘာဝံ နိဿာယ သစ္စဝစနံ ပယုဉ္ဇတိ ‘‘ဣဒမ္ပိ ဗုဒ္ဓေ ရတနံ ပဏီတံ, ဧတေန သစ္စေန သုဝတ္ထိ ဟောတူ’’တိ. इस प्रकार भगवान ने बुद्ध-रत्न की अन्य रत्नों के साथ असमानता बताकर, अब उन प्राणियों के उत्पन्न उपद्रवों को शांत करने के लिए, न तो जाति, न गोत्र, न कुल-पुत्रता, और न ही वर्ण-सौन्दर्य आदि का सहारा लेकर, बल्कि अवीचि नरक से लेकर भवाग्र तक के इस लोक में शील, समाधि आदि गुणों के कारण बुद्ध-रत्न की अद्वितीयता का सहारा लेकर यह सत्य-वचन कहा: "बुद्ध में यह रत्न श्रेष्ठ है, इस सत्य के प्रभाव से सबका कल्याण हो।" တဿတ္ထော – ဣဒမ္ပိ ဣဓ ဝါ ဟုရံ ဝါ သဂ္ဂေသု ဝါ ယံကိဉ္စိ အတ္ထိ ဝိတ္တံ ဝါ ရတနံ ဝါ, တေန သဒ္ဓိံ တေဟိ တေဟိ ဂုဏေဟိ အသမတ္တာ ဗုဒ္ဓေ ရတနံ ပဏီတံ. ယဒိ ဟိ ဧတံ သစ္စံ, အထ ဧတေန သစ္စေန ဣမေသံ ပါဏီနံ သုဝတ္ထိ ဟောတု, သောဘနာနံ အတ္ထိတာ ဟောတု အရောဂတာ နိရုပဒ္ဒဝတာတိ. ဧတ္ထ စ ယထာ ‘‘စက္ခု ခေါ, အာနန္ဒ, သုညံ အတ္တေန ဝါ အတ္တနိယေန ဝါ’’တိ ဧဝမာဒီသု (သံ. နိ. ၄.၈၅) အတ္တဘာဝေန ဝါ အတ္တနိယဘာဝေန ဝါတိ အတ္ထော. ဣတရထာ ဟိ စက္ခု အတ္တာ ဝါ အတ္တနိယံ ဝါတိ အပ္ပဋိသိဒ္ဓမေဝ သိယာ. ဧဝံ ရတနံ ပဏီတန္တိ ရတနတ္တံ ပဏီတံ, ရတနဘာဝေါ ပဏီတောတိ အယမတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. ဣတရထာ ဟိ ဗုဒ္ဓေါ နေဝ ရတနန္တိ သိဇ္ဈေယျ. န ဟိ ယတ္ထ ရတနံ အတ္ထိ, တံ ရတနန္တိ န သိဇ္ဈတိ. ယတ္ထ ပန စိတ္တီကတာဒိအတ္ထသင်္ခါတံ ယေန ဝါ တေန ဝါ ဝိဓိနာ သမ္ဗန္ဓဂတံ ရတနံ အတ္ထိ, ယသ္မာ တံ ရတနတ္တမုပါဒါယ ရတနန္တိ ပညာပီယတိ, တသ္မာ တဿ ရတနဿ အတ္ထိတာယ ရတနန္တိ သိဇ္ဈတိ. အထ ဝါ ဣဒမ္ပိ ဗုဒ္ဓေ ရတနန္တိ ဣမိနာပိ ပကာရေန ဗုဒ္ဓေါဝ ရတနန္တိ ဧဝမတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. ဝုတ္တမတ္တာယ စ ဘဂဝတာ ဣမာယ ဂါထာယ ရာဇကုလဿ သောတ္ထိ ဇာတာ, ဘယံ ဝူပသန္တံ. ဣမိဿာ ဂါထာယ အာဏာ ကောဋိသတသဟဿစက္ကဝါဠေသု အမနုဿေဟိ ပဋိဂ္ဂဟိတာတိ. इसका अर्थ इस प्रकार समझना चाहिए—इस मनुष्य लोक में, या नाग-गरुड़ लोक में, या देवलोकों में जो कुछ भी धन या रत्न है, उन विशिष्ट गुणों के कारण उन लौकिक रत्नों के साथ तुलना न हो पाने के कारण, बुद्ध में यह रत्न श्रेष्ठ है। यदि यह सत्य है, तो इस सत्य वचन के प्रभाव से इन प्राणियों का कल्याण हो, शुभ की प्राप्ति हो, वे रोगमुक्त हों और उपद्रव रहित हों। यहाँ 'चक्खु खो आनन्द सुञ्ञं अत्तेन वा अत्ततियेन वा' आदि के समान 'आत्म-भाव' या 'आत्मीय-भाव' से शून्य होना ही अर्थ है। अन्यथा चक्षु को 'आत्मा' या 'आत्मीय' कहना प्रतिषिद्ध नहीं होगा। इसी प्रकार 'रतनं पणीतं' का अर्थ 'रत्नत्व श्रेष्ठ है' या 'रत्न-भाव श्रेष्ठ है' समझना चाहिए। अन्यथा बुद्ध को 'रत्न' सिद्ध नहीं किया जा सकेगा। जहाँ रत्न नहीं होता, वहाँ उसे रत्न नहीं कहा जा सकता। परन्तु जहाँ पूजा आदि अर्थों वाला रत्न किसी भी विधि से सम्बद्ध होता है, उस रत्नत्व के कारण ही उसे 'रत्न' कहा जाता है, इसलिए उस रत्नत्व की विद्यमानता के कारण बुद्ध 'रत्न' सिद्ध होते हैं। अथवा 'इदम्पि बुद्धे रतनं' इस प्रकार से भी 'बुद्ध ही रत्न हैं' ऐसा अर्थ समझना चाहिए। भगवान द्वारा इस गाथा के कहे जाने मात्र से राजकुल का कल्याण हुआ और भय शान्त हो गया। इस गाथा की आज्ञा को सौ करोड़ चक्रवातों में अमनुष्यों द्वारा स्वीकार किया गया है। ခယံ ဝိရာဂန္တိဂါထာဝဏ္ဏနာ 'खयं विरागं' (क्षय विराग) गाथा की व्याख्या। ၄. ဧဝံ ဗုဒ္ဓဂုဏေန သစ္စံ ဝတွာ ဣဒါနိ နိဗ္ဗာနဓမ္မဂုဏေန ဝတ္တုမာရဒ္ဓေါ ‘‘ခယံ ဝိရာဂ’’န္တိ. တတ္ထ ယသ္မာ နိဗ္ဗာနသစ္ဆိကိရိယာယ ရာဂါဒယော ခီဏာ ဟောန္တိ ပရိက္ခီဏာ, ယသ္မာ ဝါ တံ တေသံ အနုပ္ပာဒနိရောဓက္ခယမတ္တံ, ယသ္မာ စ တံ ရာဂါဒိဝိပ္ပယုတ္တံ သမ္ပယောဂတော စ အာရမ္မဏတော စ, ယသ္မာ ဝါ တမှိ သစ္ဆိကတေ ရာဂါဒယော အစ္စန္တံ ဝိရတ္တာ ဟောန္တိ ဝိဂတာ ဝိဒ္ဓသ္တာ, တသ္မာ ခယန္တိ စ ဝိရာဂန္တိ စ ဝုစ္စတိ. ယသ္မာ ပနဿ န ဥပ္ပာဒေါ ပညာယတိ, န ဝယော, န ဌိတဿ အညထတ္တံ တသ္မာ တံ န ဇာယတိ န ဇီယတိ န မီယတီတိ ကတွာ အမတန္တိ ဝုစ္စတိ. ဥတ္တမတ္ထေန ပန အတပ္ပကဋ္ဌေန စ ပဏီတန္တိ. ယဒဇ္ဈဂါတိ ယံ အဇ္ဈဂါ ဝိန္ဒိ ပဋိလဘိ, အတ္တနော ဉာဏဗလေန သစ္ဆာကာသိ. သကျမုနီတိ [Pg.151] သကျကုလပ္ပသုတတ္တာ သကျော, မောနေယျဓမ္မသမန္နာဂတတ္တာ မုနိ, သကျော ဧဝ မုနိ သကျမုနိ. သမာဟိတောတိ အရိယမဂ္ဂသမာဓိနာ သမာဟိတစိတ္တော. န တေန ဓမ္မေန သမတ္ထိ ကိဉ္စီတိ တေန ခယာဒိနာမကေန သကျမုနိနာ အဓိဂတေန ဓမ္မေန သမံ ကိဉ္စိ ဓမ္မဇာတံ နတ္ထိ. တသ္မာ သုတ္တန္တရေပိ ဝုတ္တံ – ‘‘ယာဝတာ, ဘိက္ခဝေ, ဓမ္မာ သင်္ခတာ ဝါ အသင်္ခတာ ဝါ, ဝိရာဂေါ တေသံ အဂ္ဂမက္ခာယတီ’’တိအာဒိ (အ. နိ. ၄.၃၄; ဣတိဝု. ၉၀). ४. इस प्रकार बुद्ध के गुणों के द्वारा सत्य वचन कहकर, अब निर्वाण-धर्म के गुणों के द्वारा सत्य कहने के लिए 'खयं विरागं' आदि गाथा आरम्भ की गई है। वहाँ, क्योंकि निर्वाण के साक्षात्कार से राग आदि क्षीण और परिक्षीण हो जाते हैं, अथवा क्योंकि वह निर्वाण उन आर्य पुद्गलों के लिए अनुत्पाद, निरोध और क्षय मात्र है, और क्योंकि वह संप्रयोग और आलम्बन की दृष्टि से राग आदि से विप्रयुक्त है, अथवा क्योंकि उसके साक्षात्कार होने पर राग आदि अत्यन्त विरक्त, विगत और विनष्ट हो जाते हैं, इसलिए उसे 'क्षय' और 'विराग' कहा जाता है। क्योंकि उसका न उत्पाद दिखाई देता है, न व्यय और न ही स्थिति का अन्यथा होना, इसलिए वह न जन्म लेता है, न बूढ़ा होता है और न मरता है—ऐसा मानकर उसे 'अमृत' कहा जाता है। उत्तम अर्थ में और संताप रहित होने के अर्थ में उसे 'प्रणीत' (श्रेष्ठ) कहा जाता है। 'यदज्झगा' का अर्थ है—जिसे प्राप्त किया, जिसे अपने ज्ञान के बल से साक्षात्कार किया। 'सक्यमुनी' का अर्थ है—शाक्य कुल में उत्पन्न होने के कारण 'शाक्य' और मौनेय धर्म से युक्त होने के कारण 'मुनि'; शाक्य ही मुनि हैं, इसलिए 'शाक्यमुनि'। 'समाहितो' का अर्थ है—आर्यमार्ग के समाधि द्वारा समाहित चित्त वाले। 'न तेन धम्मेन समत्थि किञ्चि' का अर्थ है—शाक्यमुनि बुद्ध द्वारा प्राप्त उस क्षय आदि नाम वाले धर्म के समान अन्य कोई धर्म नहीं है। इसीलिए अन्य सूत्र में भी कहा गया है—'भिक्षुओं! जितने भी संस्कृत या असंस्कृत धर्म हैं, उनमें विराग ही श्रेष्ठ कहा गया है।' ဧဝံ ဘဂဝါ နိဗ္ဗာနဓမ္မဿ အညေဟိ ဓမ္မေဟိ အသမတံ ဝတွာ ဣဒါနိ တေသံ သတ္တာနံ ဥပ္ပန္နဥပဒ္ဒဝဝူပသမတ္ထံ ခယဝိရာဂါမတပဏီတတာဂုဏေဟိ နိဗ္ဗာနဓမ္မရတနဿ အသဒိသဘာဝံ နိဿာယ သစ္စဝစနံ ပယုဉ္ဇတိ ‘‘ဣဒမ္ပိ ဓမ္မေ ရတနံ ပဏီတံ, ဧတေန သစ္စေန သုဝတ္ထိ ဟောတူ’’တိ. တဿတ္ထော ပုရိမဂါထာယ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. ဣမိဿာပိ ဂါထာယ အာဏာ ကောဋိသတသဟဿစက္ကဝါဠေသု အမနုဿေဟိ ပဋိဂ္ဂဟိတာတိ. इस प्रकार भगवान ने निर्वाण-धर्म की अन्य धर्मों के साथ असमानता बताकर, अब उन प्राणियों के उत्पन्न उपद्रवों को शान्त करने के लिए क्षय, विराग, अमृत और प्रणीतता के गुणों के कारण निर्वाण-धर्म रूपी रत्न की अद्वितीयता का आश्रय लेकर सत्य वचन प्रयुक्त किया—'इदम्पि धम्मे रतनं पणीतं, एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु'। इसका अर्थ पिछली गाथा में बताए गए तरीके से ही समझना चाहिए। इस गाथा की आज्ञा को भी सौ करोड़ चक्रवातों में अमनुष्यों द्वारा स्वीकार किया गया है। ယံ ဗုဒ္ဓသေဋ္ဌောတိဂါထာဝဏ္ဏနာ 'यं बुद्धसेट्ठो' गाथा की व्याख्या। ၅. ဧဝံ နိဗ္ဗာနဓမ္မဂုဏေန သစ္စံ ဝတွာ ဣဒါနိ မဂ္ဂဓမ္မဂုဏေန ဝတ္တုမာရဒ္ဓေါ ‘‘ယံ ဗုဒ္ဓသေဋ္ဌော’’တိ. တတ္ထ ‘‘ဗုဇ္ဈိတာ သစ္စာနီ’’တိအာဒိနာ နယေန ဗုဒ္ဓေါ, ဥတ္တမော ပသံသနီယော စာတိ သေဋ္ဌော, ဗုဒ္ဓေါ စ သော သေဋ္ဌော စာတိ ဗုဒ္ဓသေဋ္ဌော, အနုဗုဒ္ဓပစ္စေကဗုဒ္ဓသုတဗုဒ္ဓချေသု ဝါ ဗုဒ္ဓေသု သေဋ္ဌောတိ ဗုဒ္ဓသေဋ္ဌော. သော ဗုဒ္ဓသေဋ္ဌော ယံ ပရိဝဏ္ဏယီ ‘‘အဋ္ဌင်္ဂိကောဝ မဂ္ဂါနံ, ခေမံ နိဗ္ဗာနပတ္တိယာ’’တိ (မ. နိ. ၂.၂၁၅) စ ‘‘အရိယံ ဝေါ, ဘိက္ခဝေ, သမ္မာသမာဓိံ ဒေသိဿာမိ သဥပနိသံ သပရိက္ခာရ’’န္တိ (မ. နိ. ၃.၁၃၆) စ ဧဝမာဒိနာ နယေန တတ္ထ တတ္ထ ပသံသိ ပကာသယိ. သုစိန္တိ ကိလေသမလသမုစ္ဆေဒကရဏတော အစ္စန္တဝေါဒါနံ. သမာဓိမာနန္တရိကညမာဟူတိ ယဉ္စ အတ္တနော ပဝတ္တိသမနန္တရံ နိယမေနေဝ ဖလပဒါနတော ‘‘အာနန္တရိကသမာဓီ’’တိ အာဟု. န ဟိ မဂ္ဂသမာဓိမှိ ဥပ္ပန္နေ တဿ ဖလုပ္ပတ္တိနိသေဓကော ကောစိ အန္တရာယော အတ္ထိ. ယထာဟ – ५. इस प्रकार निर्वाण-धर्म के गुणों से सत्य वचन कहकर, अब मार्ग-धर्म के गुणों से सत्य कहने के लिए 'यं बुद्धसेट्ठो' आदि गाथा आरम्भ की गई है। वहाँ 'बुज्झिता सच्चानि' आदि विधि से 'बुद्ध' हैं, और उत्तम तथा प्रशंसनीय होने के कारण 'श्रेष्ठ' हैं; वे बुद्ध भी हैं और श्रेष्ठ भी, इसलिए 'बुद्धश्रेष्ठ' हैं। अथवा अनुबुद्ध, प्रत्येकबुद्ध और श्रुतबुद्ध आदि बुद्धों में श्रेष्ठ होने के कारण 'बुद्धश्रेष्ठ' हैं। उन बुद्धश्रेष्ठ ने जिसकी प्रशंसा की—'मार्गों में अष्टांगिक मार्ग ही निर्वाण प्राप्ति के लिए क्षेम है' और 'भिक्षुओं! मैं तुम्हें उपनिषा और परिष्कार सहित आर्य सम्यक् समाधि का उपदेश दूँगा'—इस प्रकार विभिन्न स्थानों पर प्रशंसा की और प्रकाशित किया। 'सुचिं' का अर्थ है—क्लेश रूपी मल का समूच्छेद करने के कारण अत्यन्त शुद्ध। 'समाधिमानन्तरिकञ्ञमाहू' का अर्थ है—जिस आर्यमार्ग समाधि को अपनी प्रवृत्ति के ठीक बाद निश्चित रूप से फल देने के कारण 'आनन्तरिक समाधि' कहा गया है। क्योंकि मार्ग-समाधि के उत्पन्न होने पर उसके फल की उत्पत्ति को रोकने वाला कोई अन्तराय नहीं होता। जैसा कि कहा गया है— ‘‘အယဉ္စ ပုဂ္ဂလော သောတာပတ္တိဖလသစ္ဆိကိရိယာယ ပဋိပန္နော အဿ, ကပ္ပဿ စ ဥဍ္ဍယှနဝေလာ အဿ, နေဝ တာဝ ကပ္ပော ဥဍ္ဍယှေယျ, ယာဝါယံ ပုဂ္ဂလော န သောတာပတ္တိဖလံ သစ္ဆိကရောတိ, အယံ [Pg.152] ဝုစ္စတိ ပုဂ္ဂလော ဌိတကပ္ပီ. သဗ္ဗေပိ မဂ္ဂသမင်္ဂိနော ပုဂ္ဂလာ ဌိတကပ္ပိနော’’တိ (ပု. ပ. ၁၇). 'यदि यह पुद्गल स्रोतापत्ति-फल के साक्षात्कार के लिए प्रतिपन्न हो और कल्प के जलने का समय आ जाए, तो जब तक यह पुद्गल स्रोतापत्ति-फल का साक्षात्कार नहीं कर लेता, तब तक कल्प नहीं जलेगा। इस पुद्गल को स्थितकल्पी कहा जाता है। मार्ग से युक्त सभी पुद्गल स्थितकल्पी होते हैं।' သမာဓိနာ တေန သမော န ဝိဇ္ဇတီတိ တေန ဗုဒ္ဓသေဋ္ဌပရိဝဏ္ဏိတေန သုစိနာ အာနန္တရိကသမာဓိနာ သမော ရူပါဝစရသမာဓိ ဝါ အရူပါဝစရသမာဓိ ဝါ ကောစိ န ဝိဇ္ဇတိ. ကသ္မာ? တေသံ ဘာဝိတတ္တာ တတ္ထ တတ္ထ ဗြဟ္မလောကေ ဥပပန္နဿာပိ ပုန နိရယာဒီသုပိ ဥပပတ္တိသမ္ဘဝတော, ဣမဿ စ အရဟတ္တသမာဓိဿ ဘာဝိတတ္တာ အရိယပုဂ္ဂလဿ သဗ္ဗူပပတ္တိသမုဂ္ဃာတသမ္ဘဝတော. တသ္မာ သုတ္တန္တရေပိ ဝုတ္တံ – ‘‘ယာဝတာ, ဘိက္ခဝေ, ဓမ္မာ သင်္ခတာ…ပေ… အရိယော အဋ္ဌင်္ဂိကော မဂ္ဂေါ, တေသံ အဂ္ဂမက္ခာယတီ’’တိအာဒိ (အ. နိ. ၄.၃၄; ဣတိဝု. ၉၀). "उस समाधि के समान कोई अन्य समाधि नहीं है" - उस बुद्धश्रेष्ठ द्वारा प्रशंसित, शुद्ध, आनन्तरिक समाधि के समान कोई रूपावचर समाधि या अरूपावचर समाधि नहीं है। क्यों? क्योंकि उन (रूपावचर और अरूपावचर) समाधियों के भावित होने के कारण, उन-उन ब्रह्मलोकों में उत्पन्न होने पर भी पुनः नरक आदि में उत्पत्ति की संभावना बनी रहती है, जबकि इस अर्हत्व-समाधि के भावित होने के कारण आर्य पुद्गल के लिए समस्त पुनर्जन्मों का समूल विनाश संभव हो जाता है। इसलिए अन्य सूत्र में भी कहा गया है - "हे भिक्षुओं, जितने भी संस्कृत (संस्कारित) धर्म हैं... उनमें आर्य अष्टांगिक मार्ग श्रेष्ठ कहा गया है।" ဧဝံ ဘဂဝါ အာနန္တရိကသမာဓိဿ အညေဟိ သမာဓီဟိ အသမတံ ဝတွာ ဣဒါနိ ပုရိမနယေနေဝ မဂ္ဂဓမ္မရတနဿ အသဒိသဘာဝံ နိဿာယ သစ္စဝစနံ ပယုဉ္ဇတိ ‘‘ဣဒမ္ပိ ဓမ္မေ…ပေ… ဟောတူ’’တိ. တဿတ္ထော ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. ဣမိဿာပိ ဂါထာယ အာဏာ ကောဋိသတသဟဿစက္ကဝါဠေသု အမနုဿေဟိ ပဋိဂ္ဂဟိတာတိ. इस प्रकार भगवान ने आनन्तरिक समाधि की अन्य समाधियों के साथ असमानता बताकर, अब पूर्व विधि के अनुसार ही मार्ग-धम्म-रत्न की अद्वितीयता के आधार पर "इदम्पि धम्मे... सुवत्थि होतु" यह सत्य-वचन कहा। इसका अर्थ पूर्व में बताए गए तरीके से ही समझना चाहिए। इस गाथा की आज्ञा को भी एक लाख करोड़ चक्रवातों में अमनुष्यों (देवताओं) द्वारा स्वीकार किया गया है। ယေ ပုဂ္ဂလာတိဂါထာဝဏ္ဏနာ "ये पुग्गला" गाथा की व्याख्या। ၆. ဧဝံ မဂ္ဂဓမ္မဂုဏေနာပိ သစ္စံ ဝတွာ ဣဒါနိ သံဃဂုဏေနာပိ ဝတ္တုမာရဒ္ဓေါ ‘‘ယေ ပုဂ္ဂလာ’’တိ. တတ္ထ ယေတိ အနိယမေတွာ ဥဒ္ဒေသော. ပုဂ္ဂလာတိ သတ္တာ. အဋ္ဌာတိ တေသံ ဂဏနပရိစ္ဆေဒေါ. တေ ဟိ စတ္တာရော စ ပဋိပန္နာ စတ္တာရော စ ဖလေ ဌိတာတိ အဋ္ဌ ဟောန္တိ. သတံ ပသတ္ထာတိ သပ္ပုရိသေဟိ ဗုဒ္ဓပစ္စေကဗုဒ္ဓဗုဒ္ဓသာဝကေဟိ အညေဟိ စ ဒေဝမနုဿေဟိ ပသတ္ထာ. ကသ္မာ? သဟဇာတသီလာဒိဂုဏယောဂါ. တေသဉှိ စမ္ပကဝကုလကုသုမာဒီနံ သဟဇာတဝဏ္ဏဂန္ဓာဒယော ဝိယ သဟဇာတာ သီလသမာဓိအာဒယော ဂုဏာ, တေန တေ ဝဏ္ဏဂန္ဓာဒိသမ္ပန္နာနိ ဝိယ ပုပ္ဖာနိ ဒေဝမနုဿာနံ သတံ ပိယာ မနာပါ ပသံသနီယာ စ ဟောန္တိ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘ယေ ပုဂ္ဂလာ အဋ္ဌသတံ ပသတ္ထာ’’တိ. ६. इस प्रकार मार्ग-धम्म के गुण के द्वारा सत्य कहकर, अब संघ के गुण के द्वारा कहने के लिए "ये पुग्गला" (जो पुद्गल) आदि गाथा आरम्भ की। वहाँ 'ये' शब्द अनिश्चित निर्देश है। 'पुग्गला' का अर्थ प्राणी है। 'अट्ठ' (आठ) उनकी संख्या का परिच्छेद है। वे चार प्रतिपन्न (मार्गस्थ) और चार फल में स्थित होने से आठ होते हैं। 'सतं पसत्था' का अर्थ है सत्पुरुषों—बुद्धों, प्रत्येकबुद्धों, बुद्ध-श्रावकों और अन्य देव-मनुष्यों द्वारा प्रशंसित। क्यों? क्योंकि वे सहज शील आदि गुणों से युक्त हैं। जैसे चम्पक, बकुल आदि पुष्पों के सहज वर्ण और गंध होते हैं, वैसे ही उनके शील, समाधि आदि गुण सहज होते हैं, इसलिए वे वर्ण-गंध युक्त पुष्पों के समान देव-मनुष्यों (सत्पुरुषों) के प्रिय, मनभावन और प्रशंसनीय होते हैं। इसीलिए कहा गया— "ये पुग्गला अट्ठ सतं पसत्था"। အထ ဝါ ယေတိ အနိယမေတွာ ဥဒ္ဒေသော. ပုဂ္ဂလာတိ သတ္တာ. အဋ္ဌသတန္တိ တေသံ ဂဏနပရိစ္ဆေဒေါ. တေ ဟိ ဧကဗီဇီ ကောလံကောလော သတ္တက္ခတ္တုပရမောတိ တယော သောတာပန္နာ. ကာမရူပါရူပဘဝေသု အဓိဂတဖလာ [Pg.153] တယော သကဒါဂါမိနော. တေ သဗ္ဗေပိ စတုန္နံ ပဋိပဒါနံ ဝသေန စတုဝီသတိ. အန္တရာပရိနိဗ္ဗာယီ, ဥပဟစ္စပရိနိဗ္ဗာယီ, သသင်္ခါရပရိနိဗ္ဗာယီ, အသင်္ခါရပရိနိဗ္ဗာယီ, ဥဒ္ဓံသောတော, အကနိဋ္ဌဂါမီတိ အဝိဟေသု ပဉ္စ. တထာ အတပ္ပသုဒဿသုဒဿီသု. အကနိဋ္ဌေသု ပန ဥဒ္ဓံသောတဝဇ္ဇာ စတ္တာရောတိ စတုဝီသတိ အနာဂါမိနော. သုက္ခဝိပဿကော သမထယာနိကောတိ ဒွေ အရဟန္တော. စတ္တာရော မဂ္ဂဋ္ဌာတိ စတုပညာသ. တေ သဗ္ဗေပိ သဒ္ဓါဓုရပညာဓုရာနံ ဝသေန ဒိဂုဏာ ဟုတွာ အဋ္ဌသတံ ဟောန္တိ. သေသံ ဝုတ္တနယမေဝ. अथवा, 'ये' अनिश्चित निर्देश है। 'पुग्गला' का अर्थ प्राणी है। 'अट्ठसतं' (एक सौ आठ) उनकी संख्या का परिच्छेद है। वे (आर्य पुद्गल) इस प्रकार हैं: एकबीजी, कोलंकुल और सप्तकृत्वपरम—ये तीन स्रोतआपन्न हैं। काम, रूप और अरूप भव में फल प्राप्त करने वाले तीन सकृदागामी हैं। ये सभी चार प्रतिपदाओं के वश से चौबीस (24) होते हैं। अन्तरापरिनिब्बायी, उपहच्चपरिनिब्बायी, ससंखारपरिनिब्बायी, असंखारपरिनिब्बायी और उद्धंस्तोत-अकनिठ्ठगामी—इस प्रकार अविह लोक में पाँच अनागामी हैं। इसी प्रकार अतप्प, सुदस्स और सुदस्सी लोकों में (पाँच-पाँच) हैं। अकनिठ्ठ लोक में उद्धंस्तोत को छोड़कर चार अनागामी हैं। इस प्रकार चौबीस (24) अनागामी होते हैं। शुद्धविपश्यक और शमथयानिक—ये दो अर्हन्त हैं। चार मार्गस्थ हैं। इस प्रकार (कुल) चौवन (54) होते हैं। ये सभी श्रद्धाधुर और प्रज्ञाधुर के भेद से दोगुने होकर एक सौ आठ (108) होते हैं। शेष व्याख्या पूर्ववत ही है। စတ္တာရိ ဧတာနိ ယုဂါနိ ဟောန္တီတိ တေ သဗ္ဗေပိ အဋ္ဌ ဝါ အဋ္ဌသတံ ဝါတိ ဝိတ္ထာရဝသေန ဥဒ္ဒိဋ္ဌပုဂ္ဂလာ သင်္ခေပဝသေန သောတာပတ္တိမဂ္ဂဋ္ဌော ဖလဋ္ဌောတိ ဧကံ ယုဂံ, ဧဝံ ယာဝ အရဟတ္တမဂ္ဂဋ္ဌော ဖလဋ္ဌောတိ ဧကံ ယုဂန္တိ စတ္တာရိ ယုဂါနိ ဟောန္တိ. တေ ဒက္ခိဏေယျာတိ ဧတ္ထ တေတိ ပုဗ္ဗေ အနိယမေတွာ ဥဒ္ဒိဋ္ဌာနံ နိယမေတွာ နိဒ္ဒေသော. ယေ ပုဂ္ဂလာ ဝိတ္ထာရဝသေန အဋ္ဌ ဝါ, အဋ္ဌသတံ ဝါ, သင်္ခေပဝသေန စတ္တာရိ ယုဂါနိ ဟောန္တီတိ ဝုတ္တာ, သဗ္ဗေပိ တေ ဒက္ခိဏံ အရဟန္တီတိ ဒက္ခိဏေယျာ. ဒက္ခိဏာ နာမ ကမ္မဉ္စ ကမ္မဝိပါကဉ္စ သဒ္ဒဟိတွာ ‘‘ဧသ မေ ဣဒံ ဝေဇ္ဇကမ္မံ ဝါ ဇင်္ဃပေသနိကံ ဝါ ကရိဿတီ’’တိ ဧဝမာဒီနိ အနပေက္ခိတွာ ဒိယျမာနော ဒေယျဓမ္မော, တံ အရဟန္တိ နာမ သီလာဒိဂုဏယုတ္တာ ပုဂ္ဂလာ, ဣမေ စ တာဒိသာ, တေန ဝုစ္စန္တိ ‘‘တေ ဒက္ခိဏေယျာ’’တိ. "चत्तारि एतानि युगानि होन्ति" (ये चार जोड़े हैं)—वे सभी चाहे विस्तार से आठ हों या एक सौ आठ, संक्षेप में: स्रोतआपत्ति-मार्गस्थ और फलस्थ—यह एक जोड़ा; इसी प्रकार अर्हत्व-मार्गस्थ और फलस्थ तक—ये चार जोड़े होते हैं। "ते दक्खिणेय्या" (वे दक्षिणीय हैं)—यहाँ 'ते' शब्द पूर्व में अनिश्चित रूप से निर्दिष्ट पुद्गलों का निश्चित निर्देश है। जो पुद्गल विस्तार से आठ या एक सौ आठ, और संक्षेप में चार जोड़े कहे गए हैं, वे सभी दक्षिणा (दान) के योग्य होने के कारण 'दक्षिणीय' हैं। 'दक्षिणा' उस देय-वस्तु (दान) को कहते हैं जो कर्म और कर्म-फल में श्रद्धा रखकर, "यह व्यक्ति मेरा यह चिकित्सा-कार्य या संदेश-वाहक का कार्य करेगा" आदि की अपेक्षा न करते हुए दी जाती है। शील आदि गुणों से युक्त पुद्गल उसके योग्य होते हैं, और ये (आर्य) वैसे ही हैं, इसलिए इन्हें "ते दक्खिणेय्या" कहा जाता है। သုဂတဿ သာဝကာတိ ဘဂဝါ သောဘနေန ဂမနေန ယုတ္တတ္တာ, သောဘနဉ္စ ဌာနံ ဂတတ္တာ, သုဋ္ဌု စ ဂတတ္တာ, သုဋ္ဌု ဧဝ စ ဂဒတ္တာ သုဂတော, တဿ သုဂတဿ. သဗ္ဗေပိ တေ ဝစနံ သုဏန္တီတိ သာဝကာ. ကာမဉ္စ အညေပိ သုဏန္တိ, န ပန သုတွာ ကတ္တဗ္ဗကိစ္စံ ကရောန္တိ, ဣမေ ပန သုတွာ ကတ္တဗ္ဗံ ဓမ္မာနုဓမ္မပ္ပဋိပတ္တိံ ကတွာ မဂ္ဂဖလာနိ ပတ္တာ, တသ္မာ ‘‘သာဝကာ’’တိ ဝုစ္စန္တိ. ဧတေသု ဒိန္နာနိ မဟပ္ဖလာနီတိ ဧတေသု သုဂတသာဝကေသု အပ္ပကာနိပိ ဒါနာနိ ဒိန္နာနိ ပဋိဂ္ဂါဟကတော ဒက္ခိဏာဝိသုဒ္ဓိဘာဝံ ဥပဂတတ္တာ မဟပ္ဖလာနိ ဟောန္တိ. တသ္မာ သုတ္တန္တရေပိ ဝုတ္တံ – "सुगतस्स सावका" (सुगत के श्रावक)—भगवान शोभन गमन (सुन्दर चाल) से युक्त होने के कारण, शोभन स्थान (निर्वाण) को प्राप्त होने के कारण, भली-भाँति जाने के कारण और भली-भाँति (सत्य) बोलने के कारण 'सुगत' हैं। वे सभी उनके वचन सुनते हैं, इसलिए 'श्रावक' हैं। यद्यपि अन्य लोग भी सुनते हैं, किन्तु वे सुनकर कर्तव्य का पालन नहीं करते; परन्तु ये (आर्य) सुनकर कर्तव्य रूप 'धम्मानुधम्म-प्रतिपत्ति' (धर्म के अनुकूल आचरण) करके मार्ग-फल को प्राप्त हुए हैं, इसलिए 'श्रावक' कहे जाते हैं। "एतेसु दिन्नानि महप्फलानि" (इनको दिया गया दान महाफलदायी होता है)—इन सुगत-श्रावकों को दिया गया थोड़ा सा दान भी, प्रतिग्राहक (दान लेने वाले) की शुद्धता के कारण दक्षिणा की विशुद्धि को प्राप्त होकर महाफलदायी होता है। इसीलिए अन्य सूत्र में भी कहा गया है— ‘‘ယာဝတာ, ဘိက္ခဝေ, သံဃာ ဝါ ဂဏာ ဝါ တထာဂတသာဝကသံဃော, တေသံ အဂ္ဂမက္ခာယတိ, ယဒိဒံ စတ္တာရိ ပုရိသယုဂါနိ အဋ္ဌ ပုရိသပုဂ္ဂလာ, ဧသ ဘဂဝတော သာဝကသံဃော…ပေ… အဂ္ဂေါ ဝိပါကော ဟောတီ’’တိ (အ. နိ. ၄.၃၄; ၅.၃၂; ဣတိဝု. ၉၀). "हे भिक्षुओं! जितने भी संघ या गण हैं, उनमें तथागत का श्रावक-संघ सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है, जो कि ये चार पुरुष-युगल और आठ पुरुष-पुद्गल हैं। यह भगवान का श्रावक-संघ है... इसका विपाक (फल) श्रेष्ठ होता है।" ဧဝံ [Pg.154] ဘဂဝါ သဗ္ဗေသမ္ပိ မဂ္ဂဋ္ဌဖလဋ္ဌာနံ ဝသေန သံဃရတနဿ ဂုဏံ ဝတွာ ဣဒါနိ တမေဝ ဂုဏံ နိဿာယ သစ္စဝစနံ ပယုဉ္ဇတိ ‘‘ဣဒမ္ပိ သံဃေ’’တိ. တဿတ္ထော ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. ဣမိဿာပိ ဂါထာယ အာဏာ ကောဋိသတသဟဿစက္ကဝါဠေသု အမနုဿေဟိ ပဋိဂ္ဂဟိတာတိ. इस प्रकार भगवान ने सभी मार्गस्थ और फलस्थ पुद्गलों के माध्यम से संघ-रत्न के गुणों को कहकर, अब उसी गुण के आधार पर "इदम्पि संघे" आदि सत्य-वचन कहा। इसका अर्थ पूर्व में बताए गए तरीके से ही समझना चाहिए। इस गाथा की आज्ञा को भी एक लाख करोड़ चक्रवातों में अमनुष्यों द्वारा स्वीकार किया गया है। ယေ သုပ္ပယုတ္တာတိဂါထာဝဏ္ဏနာ "ये सुप्पयुत्ता" गाथा की व्याख्या। ၇. ဧဝံ မဂ္ဂဋ္ဌဖလဋ္ဌာနံ ဝသေန သံဃဂုဏေန သစ္စံ ဝတွာ ဣဒါနိ တတော ဧကစ္စာနံ ဖလသမာပတ္တိသုခမနုဘဝန္တာနံ ခီဏာသဝပုဂ္ဂလာနံယေဝ ဂုဏေန ဝတ္တုမာရဒ္ဓေါ ‘‘ယေ သုပ္ပယုတ္တာ’’တိ. တတ္ထ ယေတိ အနိယမိတုဒ္ဒေသဝစနံ. သုပ္ပယုတ္တာတိ သုဋ္ဌု ပယုတ္တာ, အနေကဝိဟိတံ အနေသနံ ပဟာယ သုဒ္ဓါဇီဝိတံ နိဿာယ ဝိပဿနာယ အတ္တာနံ ပယုဉ္ဇိတုမာရဒ္ဓါတိ အတ္ထော. အထ ဝါ သုပ္ပယုတ္တာတိ သုဝိသုဒ္ဓကာယဝစီပယောဂသမန္နာဂတာ, တေန တေသံ သီလက္ခန္ဓံ ဒဿေတိ. မနသာ ဒဠှေနာတိ ဒဠှေန မနသာ, ထိရသမာဓိယုတ္တေန စေတသာတိ အတ္ထော. တေန တေသံ သမာဓိက္ခန္ဓံ ဒဿေတိ. နိက္ကာမိနောတိ ကာယေ စ ဇီဝိတေ စ အနပေက္ခာ ဟုတွာ ပညာဓုရေန ဝီရိယေန သဗ္ဗကိလေသေဟိ ကတနိက္ကမနာ. တေန တေသံ ဝီရိယသမ္ပန္နံ ပညက္ခန္ဓံ ဒဿေတိ. ७. इस प्रकार मार्गस्थ और फलस्थ व्यक्तियों के आधार पर संघ के गुणों द्वारा सत्य वचन कहकर, अब उसके बाद फल-समापत्ति के सुख का अनुभव करने वाले कुछ क्षीणास्त्रव (अर्हत्) व्यक्तियों के ही गुणों के माध्यम से 'ये सुप्पयुत्ता' आदि गाथा कहना आरम्भ किया। वहाँ 'ये' यह पद अनियत (अनिश्चित) निर्देश वाचक है। 'सुप्पयुत्ता' का अर्थ है - भली-भाँति प्रयुक्त, अनेक प्रकार की अनुचित आजीविका (अनेसन) को त्यागकर शुद्ध आजीविका के आश्रय से विपश्यना में स्वयं को लगाने के लिए आरम्भ किया हुआ। अथवा 'सुप्पयुत्ता' का अर्थ है - अत्यंत शुद्ध कायिक और वाचिक प्रयोगों से युक्त; इससे उनके शीलस्कन्ध को दर्शाते हैं। 'मनसा दळ्हेन' का अर्थ है - दृढ़ मन से, अर्थात् स्थिर समाधि से युक्त चित्त से। इससे उनके समाधिस्कन्ध को दर्शाते हैं। 'निक्कामिनो' का अर्थ है - शरीर और जीवन की अपेक्षा न रखकर प्रज्ञा-प्रधान वीर्य (पुरुषार्थ) के द्वारा समस्त क्लेशों से निष्क्रमण (निकलना) करने वाले। इससे उनके वीर्य-सम्पन्न प्रज्ञास्कन्ध को दर्शाते हैं। ဂေါတမသာသနမှီတိ ဂေါတ္တတော ဂေါတမဿ တထာဂတဿေဝ သာသနမှိ. တေန ဣတော ဗဟိဒ္ဓါ နာနပ္ပကာရမ္ပိ အမရတပံ ကရောန္တာနံ သုပ္ပယောဂါဒိဂုဏာဘာဝတော ကိလေသေဟိ နိက္ကမနာဘာဝံ ဒဿေတိ. တေတိ ပုဗ္ဗေ ဥဒ္ဒိဋ္ဌာနံ နိဒ္ဒေသဝစနံ. ပတ္တိပတ္တာတိ ဧတ္ထ ပတ္တဗ္ဗာတိ ပတ္တိ, ပတ္တဗ္ဗာ နာမ ပတ္တုံ အရဟာ, ယံ ပတွာ အစ္စန္တယောဂက္ခေမိနော ဟောန္တိ, အရဟတ္တဖလဿေတံ အဓိဝစနံ, တံ ပတ္တိံ ပတ္တာတိ ပတ္တိပတ္တာ. အမတန္တိ နိဗ္ဗာနံ. ဝိဂယှာတိ အာရမ္မဏဝသေန ဝိဂါဟိတွာ. လဒ္ဓါတိ လဘိတွာ. မုဓာတိ အဗျယေန ကာကဏိကမတ္တမ္ပိ ဗျယံ အကတွာ. နိဗ္ဗုတိန္တိ ပဋိပ္ပဿဒ္ဓကိလေသဒရထံ ဖလသမာပတ္တိံ. ဘုဉ္ဇမာနာတိ အနုဘဝမာနာ. ကိံ ဝုတ္တံ ဟောတိ? ယေ ဣမသ္မိံ ဂေါတမသာသနမှိ သီလသမ္ပန္နတ္တာ သုပ္ပယုတ္တာ, သမာဓိသမ္ပန္နတ္တာ မနသာ ဒဠှေန, ပညာသမ္ပန္နတ္တာ နိက္ကာမိနော, တေ ဣမာယ သမ္မာပဋိပဒါယ အမတံ ဝိဂယှ မုဓာ လဒ္ဓါ ဖလသမာပတ္တိသညိတံ နိဗ္ဗုတိံ ဘုဉ္ဇမာနာ ပတ္တိပတ္တာ နာမ ဟောန္တီတိ. 'गोतमसासनम्हि' का अर्थ है - गोत्र से 'गोतम' नाम वाले तथागत के ही शासन में। इसके द्वारा इस शासन से बाहर विभिन्न प्रकार के (दूसरों को) तपाने वाले तप करने वालों में उत्तम प्रयोग आदि गुणों के अभाव के कारण क्लेशों से निष्क्रमण के अभाव को दर्शाते हैं। 'ते' यह पद पूर्व में निर्दिष्ट पदों का निर्देश वाचक है। 'पत्तिपत्ता' यहाँ जो प्राप्त करने योग्य है वह 'पत्ति' है; प्राप्त करने योग्य का अर्थ है प्राप्त करने के योग्य, जिसे प्राप्त कर अत्यंत योगक्षेम (निर्वाण) प्राप्त होता है, यह अर्हत्-फल का ही नाम है; उस प्राप्ति (अर्हत्-फल) को प्राप्त कर लिया है, इसलिए 'पत्तिपत्ता' हैं। 'अमतं' का अर्थ है निर्वाण। 'विगाय्ह' का अर्थ है आलम्बन के रूप में ग्रहण करके। 'लद्धा' का अर्थ है प्राप्त करके। 'मुधा' का अर्थ है बिना किसी व्यय के, एक काकणी (नगण्य मुद्रा) मात्र भी व्यय किए बिना। 'निब्बुतिं' का अर्थ है क्लेशों की तपन को शान्त करने वाली फल-समापत्ति। 'भुञ्जमाना' का अर्थ है अनुभव करते हुए। क्या कहा गया है? जो इस गौतम शासन में शील-सम्पन्न होने के कारण 'सुप्पयुत्ता' (सुप्रयुक्त) हैं, समाधि-सम्पन्न होने के कारण 'मनसा दळ्हेन' (दृढ़ मन वाले) हैं, प्रज्ञा-सम्पन्न होने के कारण 'निक्कामिनो' (निष्कर्मी/क्लेश-मुक्त) हैं, वे इस सम्यक् प्रतिपदा (मार्ग) के द्वारा अमृत (निर्वाण) में प्रवेश कर, उसे बिना किसी मूल्य के प्राप्त कर, फल-समापत्ति नामक शान्ति का उपभोग करते हुए 'पत्तिपत्ता' (प्राप्ति-प्राप्त) कहलाते हैं। ဧဝံ [Pg.155] ဘဂဝါ ဖလသမာပတ္တိသုခမနုဘဝန္တာနံ ခီဏာသဝပုဂ္ဂလာနမေဝ ဝသေန သံဃရတနဿ ဂုဏံ ဝတွာ ဣဒါနိ တမေဝ ဂုဏံ နိဿာယ သစ္စဝစနံ ပယုဉ္ဇတိ ‘‘ဣဒမ္ပိ သံဃေ’’တိ. တဿတ္ထော ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. ဣမိဿာပိ ဂါထာယ အာဏာ ကောဋိသတသဟဿစက္ကဝါဠေသု အမနုဿေဟိ ပဋိဂ္ဂဟိတာတိ. इस प्रकार भगवान ने फल-समापत्ति के सुख का अनुभव करने वाले क्षीणास्त्रव व्यक्तियों के ही माध्यम से संघ-रत्न के गुण को कहकर, अब उसी गुण के आश्रय से 'इदम्पि सङ्घे' यह सत्य वचन प्रयुक्त किया। इसका अर्थ पूर्व में बताए गए तरीके से ही समझना चाहिए। इस गाथा की आज्ञा को भी एक लाख करोड़ चक्रवातों में अमनुष्यों (देवताओं) द्वारा स्वीकार किया गया है। ယထိန္ဒခီလောတိဂါထာဝဏ္ဏနာ 'यथिन्दखीलो' गाथा की व्याख्या। ၈. ဧဝံ ခီဏာသဝပုဂ္ဂလာနံ ဂုဏေန သံဃာဓိဋ္ဌာနံ သစ္စံ ဝတွာ ဣဒါနိ ဗဟုဇနပစ္စက္ခေန သောတာပန္နဿေဝ ဂုဏေန ဝတ္တုမာရဒ္ဓေါ ‘‘ယထိန္ဒခီလော’’တိ. တတ္ထ ယထာတိ ဥပမာဝစနံ. ဣန္ဒခီလောတိ နဂရဒွါရဝိနိဝါရဏတ္ထံ ဥမ္မာရဗ္ဘန္တရေ အဋ္ဌ ဝါ ဒသ ဝါ ဟတ္ထေ ပထဝိံ ခဏိတွာ အာကောဋိတဿ သာရဒါရုမယထမ္ဘဿေတံ အဓိဝစနံ. ပထဝိန္တိ ဘူမိံ. သိတောတိ အန္တော ပဝိသိတွာ နိဿိတော. သိယာတိ ဘဝေယျ. စတုဗ္ဘိ ဝါတေဟီတိ စတူဟိ ဒိသာဟိ အာဂတေဟိ ဝါတေဟိ. အသမ္ပကမ္ပိယောတိ ကမ္ပေတုံ ဝါ စာလေတုံ ဝါ အသက္ကုဏေယျော. တထူပမန္တိ တထာဝိဓံ. သပ္ပုရိသန္တိ ဥတ္တမပုရိသံ. ဝဒါမီတိ ဘဏာမိ. ယော အရိယသစ္စာနိ အဝေစ္စ ပဿတီတိ ယော စတ္တာရိ အရိယသစ္စာနိ ပညာယ အဇ္ဈောဂါဟေတွာ ပဿတိ. တတ္ထ အရိယသစ္စာနိ ကုမာရပဉှေ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗာနိ. ८. इस प्रकार क्षीणास्त्रव व्यक्तियों के गुण के द्वारा संघ पर आधारित सत्य वचन कहकर, अब बहुत से लोगों के प्रत्यक्ष अनुभव वाले स्रोतआपन्न व्यक्ति के ही गुण के माध्यम से 'यथिन्दखीलो' आदि गाथा कहना आरम्भ किया। वहाँ 'यथा' यह पद उपमा वाचक है। 'इन्दखीलो' यह नगर के द्वार को रोकने (मजबूत करने) के लिए देहली के भीतर आठ या दस हाथ पृथ्वी खोदकर गाड़े गए सारयुक्त लकड़ी के खम्भे का नाम है। 'पठविं' का अर्थ है भूमि। 'सितो' का अर्थ है भीतर प्रविष्ट होकर आश्रित। 'सिया' का अर्थ है हो। 'चतुब्भि वातेहि' का अर्थ है चारों दिशाओं से आई हुई हवाओं के द्वारा। 'असम्पकम्पियो' का अर्थ है जिसे कँपाया या हिलाया न जा सके। 'तथूपमं' का अर्थ है उसी प्रकार का। 'सप्पुरिसं' का अर्थ है उत्तम पुरुष। 'वदामि' का अर्थ है कहता हूँ। 'यो अरियसच्चानि अवेच्च पस्सति' का अर्थ है जो चार आर्य सत्यों को प्रज्ञा से गहराई में जाकर देखता है। वहाँ आर्य सत्यों को 'कुमारपञ्ह' में बताए गए तरीके से ही समझना चाहिए। အယံ ပနေတ္ထ သင်္ခေပတ္ထော – ယထာ ဟိ ဣန္ဒခီလော ဂမ္ဘီရနေမတာယ ပထဝိဿိတော စတုဗ္ဘိ ဝါတေဟိ အသမ္ပကမ္ပိယော သိယာ, ဣမမ္ပိ သပ္ပုရိသံ တထူပမမေဝ ဝဒါမိ, ယော အရိယသစ္စာနိ အဝေစ္စ ပဿတိ. ကသ္မာ? ယသ္မာ သောပိ ဣန္ဒခီလော ဝိယ စတူဟိ ဝါတေဟိ သဗ္ဗတိတ္ထိယဝါဒဝါတေဟိ အသမ္ပကမ္ပိယော ဟောတိ, တမှာ ဒဿနာ ကေနစိ ကမ္ပေတုံ ဝါ စာလေတုံ ဝါ အသက္ကုဏေယျော. တသ္မာ သုတ္တန္တရေပိ ဝုတ္တံ – यहाँ यह संक्षिप्त अर्थ है - जैसे इन्द्रकील (नगर-द्वार का खम्भा) अपनी गहरी नींव के कारण पृथ्वी में स्थित होने पर चारों दिशाओं की हवाओं से अकम्प्य (अविचल) होता है, वैसे ही मैं इस सत्पुरुष को भी उसी के समान कहता हूँ, जो आर्य सत्यों को गहराई से देखता है। क्यों? क्योंकि वह भी इन्द्रकील की तरह चारों हवाओं, अर्थात् सभी तीर्थिकों (अन्य मतावलम्बियों) के वाद-विवाद रूपी हवाओं से अकम्प्य होता है, उस (आर्य सत्यों के) दर्शन के कारण उसे किसी के द्वारा कँपाया या हिलाया नहीं जा सकता। इसलिए अन्य सूत्रान्त में भी कहा गया है - ‘‘သေယျထာပိ, ဘိက္ခဝေ, အယောခီလော ဝါ ဣန္ဒခီလော ဝါ ဂမ္ဘီရနေမော သုနိခါတော အစလော အသမ္ပကမ္ပီ, ပုရတ္ထိမာယ စေပိ ဒိသာယ အာဂစ္ဆေယျ ဘုသာ ဝါတဝုဋ္ဌိ, နေဝ နံ သင်္ကမ္ပေယျ န သမ္ပကမ္ပေယျ န သမ္ပစာလေယျ. ပစ္ဆိမာယ…ပေ… ဒက္ခိဏာယ, ဥတ္တရာယပိ စေ…ပေ… န သမ္ပစာလေယျ. တံ ကိဿ ဟေတု? ဂမ္ဘီရတ္တာ, ဘိက္ခဝေ, နေမဿ[Pg.156], သုနိခါတတ္တာ ဣန္ဒခီလဿ. ဧဝမေဝ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, ယေ စ ခေါ ကေစိ သမဏာ ဝါ ဗြာဟ္မဏာ ဝါ ‘ဣဒံ ဒုက္ခန္တိ…ပေ… ပဋိပဒါ’တိ ယထာဘူတံ ပဇာနန္တိ, တေ န အညဿ သမဏဿ ဝါ ဗြာဟ္မဏဿ ဝါ မုခံ ဩလောကေန္တိ ‘အယံ နူန ဘဝံ ဇာနံ ဇာနာတိ, ပဿံ ပဿတီ’တိ. တံ ကိဿ ဟေတု? သုဒိဋ္ဌတ္တာ, ဘိက္ခဝေ, စတုန္နံ အရိယသစ္စာန’’န္တိ (သံ. နိ. ၅.၁၁၀၉). "भिक्षुओं! जैसे लोहे का खम्भा या इन्द्रकील गहरी नींव वाला, अच्छी तरह गाड़ा हुआ, अचल और अकम्प्य हो, यदि पूर्व दिशा से भी तेज हवा और वर्षा आए, तो वह उसे न कँपा सके, न हिला सके, न विचलित कर सके। पश्चिम से... दक्षिण से... उत्तर से भी यदि... न विचलित कर सके। वह किस कारण से? भिक्षुओं! नींव के गहरे होने के कारण और इन्द्रकील के अच्छी तरह गाड़े होने के कारण। इसी प्रकार, भिक्षुओं! जो कोई भी श्रमण या ब्राह्मण 'यह दुःख है... यह (दुःख निरोधगामिनी) प्रतिपदा है' - ऐसा यथार्थ रूप से जानते हैं, वे किसी अन्य श्रमण या ब्राह्मण के मुख की ओर नहीं देखते कि 'निश्चित ही ये महानुभाव जानते हुए जानते हैं, देखते हुए देखते हैं'। वह किस कारण से? भिक्षुओं! चार आर्य सत्यों के भली-भाँति देखे जाने के कारण।" (सं. नि. 5.1109) ဧဝံ ဘဂဝါ ဗဟုဇနပစ္စက္ခဿ သောတာပန္နဿေဝ ဝသေန သံဃရတနဿ ဂုဏံ ဝတွာ ဣဒါနိ တမေဝ ဂုဏံ နိဿာယ သစ္စဝစနံ ပယုဉ္ဇတိ ‘‘ဣဒမ္ပိ သံဃေ’’တိ. တဿတ္ထော ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. ဣမိဿာပိ ဂါထာယ အာဏာ ကောဋိသတသဟဿစက္ကဝါဠေသု အမနုဿေဟိ ပဋိဂ္ဂဟိတာတိ. इस प्रकार भगवान ने बहुत से लोगों के प्रत्यक्ष अनुभव वाले स्रोतआपन्न व्यक्ति के ही माध्यम से संघ-रत्न के गुण को कहकर, अब उसी गुण के आश्रय से 'इदम्पि सङ्घे' यह सत्य वचन प्रयुक्त किया। इसका अर्थ पूर्व में बताए गए तरीके से ही समझना चाहिए। इस गाथा की आज्ञा को भी एक लाख करोड़ चक्रवातों में अमनुष्यों द्वारा स्वीकार किया गया है। ယေ အရိယသစ္စာနီတိဂါထာဝဏ္ဏနာ 'ये अरियसच्चानि' गाथा की व्याख्या। ၉. ဧဝံ အဝိသေသတော သောတာပန္နဿ ဂုဏေန သံဃာဓိဋ္ဌာနံ သစ္စံ ဝတွာ ဣဒါနိ ယေ တေ တယော သောတာပန္နာ ဧကဗီဇီ ကောလံကောလော သတ္တက္ခတ္တုပရမောတိ. ယထာဟ – ९. इस प्रकार, सामान्य रूप से (अविशेषतः) स्रोतापन्न के गुणों के माध्यम से संघ पर आधारित सत्य को कहकर, अब वे जो तीन प्रकार के स्रोतापन्न हैं—एकबीजी, कोलंकुल और सप्तकृत्वपरम—उनके विषय में (कहते हैं)। जैसा कि कहा गया है— ‘‘ဣဓေကစ္စော ပုဂ္ဂလော တိဏ္ဏံ သံယောဇနာနံ ပရိက္ခယာ သောတာပန္နော ဟောတိ…ပေ… သော ဧကံယေဝ ဘဝံ နိဗ္ဗတ္တိတွာ ဒုက္ခဿန္တံ ကရောတိ, အယံ ဧကဗီဇီ. တထာ ဒွေ ဝါ တီဏိ ဝါ ကုလာနိ သန္ဓာဝိတွာ သံသရိတွာ ဒုက္ခဿန္တံ ကရောတိ, အယံ ကောလံကောလော. တထာ သတ္တက္ခတ္တုံ ဒေဝေသု စ မနုဿေသု စ သန္ဓာဝိတွာ သံသရိတွာ ဒုက္ခဿန္တံ ကရောတိ, အယံ သတ္တက္ခတ္တုပရမော’’တိ (ပု. ပ. ၃၁-၃၃). "यहाँ (इस शासन में) कोई व्यक्ति तीन संयोजनों के पूर्ण क्षय से स्रोतापन्न होता है... वह केवल एक ही जन्म लेकर दुःख का अंत करता है, यह 'एकबीजी' है। उसी प्रकार, दो या तीन कुलों (जन्मों) में संचरण कर और संसार में भटक कर दुःख का अंत करता है, यह 'कोलंकुल' है। उसी प्रकार, सात बार देवों और मनुष्यों में संचरण कर और संसार में भटक कर दुःख का अंत करता है, यह 'सप्तकृत्वपरम' है।" တေသံ သဗ္ဗကနိဋ္ဌဿ သတ္တက္ခတ္တုပရမဿ ဂုဏေန ဝတ္တုမာရဒ္ဓေါ ‘‘ယေ အရိယသစ္စာနီ’’တိ. တတ္ထ ယေ အရိယသစ္စာနီတိ ဧတံ ဝုတ္တနယမေဝ. ဝိဘာဝယန္တီတိ ပညာဩဘာသေန သစ္စပ္ပဋိစ္ဆာဒကံ ကိလေသန္ဓကာရံ ဝိဓမိတွာ အတ္တနော ပကာသာနိ ပါကဋာနိ ကရောန္တိ. ဂမ္ဘီရပညေနာတိ အပ္ပမေယျပညတာယ သဒေဝကဿ လောကဿ ဉာဏေန အလဗ္ဘနေယျပ္ပတိဋ္ဌပညေန, သဗ္ဗညုနာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. သုဒေသိတာနီတိ သမာသဗျာသသာကလျဝေကလျာဒီဟိ တေဟိ တေဟိ နယေဟိ သုဋ္ဌု ဒေသိတာနိ. ကိဉ္စာပိ တေ ဟောန္တိ [Pg.157] ဘုသံ ပမတ္တာတိ တေ ဝိဘာဝိတအရိယသစ္စာ ပုဂ္ဂလာ ကိဉ္စာပိ ဒေဝရဇ္ဇစက္ကဝတ္တိရဇ္ဇာဒိပ္ပမာဒဋ္ဌာနံ အာဂမ္မ ဘုသံ ပမတ္တာ ဟောန္တိ, တထာပိ သောတာပတ္တိမဂ္ဂဉာဏေန အဘိသင်္ခါရဝိညာဏဿ နိရောဓေန ဌပေတွာ သတ္တ ဘဝေ အနမတဂ္ဂေ သံသာရေ ယေ ဥပ္ပဇ္ဇေယျုံ နာမဉ္စ ရူပဉ္စ, တေသံ နိရုဒ္ဓတ္တာ အတ္ထင်္ဂတတ္တာ န အဋ္ဌမံ ဘဝံ အာဒိယန္တိ, သတ္တမဘဝေ ဧဝ ပန ဝိပဿနံ အာရဘိတွာ အရဟတ္တံ ပါပုဏန္တိ. उनमें से सबसे कनिष्ठ 'सप्तकृत्वपरम' के गुणों का वर्णन करने के लिए "ये अरियसच्चानि" (जो आर्य सत्य) आरम्भ किया गया है। वहाँ "ये अरियसच्चानि" का अर्थ पूर्वोक्त ही है। "विभावयन्ति" का अर्थ है—प्रज्ञा के प्रकाश से सत्यों को ढकने वाले क्लेश रूपी अंधकार को नष्ट कर, अपने लिए प्रकाशित धर्मों को स्पष्ट करते हैं। "गम्भीरपञ्ञेन" का अर्थ है—अपरिमेय प्रज्ञा होने के कारण, देवों सहित लोक के ज्ञान द्वारा अप्राप्य आधार वाली प्रज्ञा वाले, अर्थात् 'सर्वज्ञ' द्वारा (कहा गया)। "सुदेसितानि" का अर्थ है—संक्षेप, विस्तार, पूर्णता और अपूर्णता आदि विभिन्न विधियों से भली-भांति उपदिष्ट। "किञ्चापि ते होन्ति भुसं पमत्ता" का अर्थ है—वे आर्य सत्यों को जानने वाले व्यक्ति यद्यपि देव-राज्य या चक्रवर्ती-राज्य आदि प्रमाद के स्थानों के कारण अत्यधिक प्रमाद में पड़ सकते हैं, फिर भी स्रोतापत्ति-मार्ग ज्ञान के द्वारा (अपुण्य) अभिसंस्कार-विज्ञान के निरोध के कारण, सात भवों को छोड़कर इस अनादि संसार में जो नाम और रूप उत्पन्न हो सकते थे, उनके निरुद्ध और अस्त हो जाने के कारण वे आठवां भव ग्रहण नहीं करते हैं; बल्कि सातवें भव में ही विपश्यना आरम्भ कर अर्हत्व प्राप्त कर लेते हैं। ဧဝံ ဘဂဝါ သတ္တက္ခတ္တုပရမဝသေန သံဃရတနဿ ဂုဏံ ဝတွာ ဣဒါနိ တမေဝ ဂုဏံ နိဿာယ သစ္စဝစနံ ပယုဉ္ဇတိ ‘‘ဣဒမ္ပိ သံဃေ’’တိ. တဿတ္ထော ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. ဣမိဿာပိ ဂါထာယ အာဏာ ကောဋိသတသဟဿစက္ကဝါဠေသု အမနုဿေဟိ ပဋိဂ္ဂဟိတာတိ. इस प्रकार भगवान ने सप्तकृत्वपरम के माध्यम से संघ-रत्न के गुणों को कहकर, अब उसी गुण के आधार पर "इदम्पि सङ्घे" (यह भी संघ में) इस सत्य-वचन का प्रयोग किया है। इसका अर्थ पूर्वोक्त विधि से ही समझना चाहिए। इस गाथा की आज्ञा को भी सौ अरब चक्रवातों में अमनुष्यों (देवताओं) द्वारा स्वीकार किया गया है। သဟာဝဿာတိဂါထာဝဏ္ဏနာ "सहावस्स" गाथा की व्याख्या। ၁၀. ဧဝံ သတ္တက္ခတ္တုပရမဿ အဋ္ဌမံ ဘဝံ အနာဒိယနဂုဏေန သံဃာဓိဋ္ဌာနံ သစ္စံ ဝတွာ ဣဒါနိ တဿေဝ သတ္တ ဘဝေ အာဒိယတောပိ အညေဟိ အပ္ပဟီနဘဝါဒါနေဟိ ပုဂ္ဂလေဟိ ဝိသိဋ္ဌေန ဂုဏေန ဝတ္တုမာရဒ္ဓေါ ‘‘သဟာဝဿာ’’တိ. တတ္ထ သဟာဝါတိ သဒ္ဓိံယေဝ. အဿာတိ ‘‘န တေ ဘဝံ အဋ္ဌမမာဒိယန္တီ’’တိ ဝုတ္တေသု အညတရဿ. ဒဿနသမ္ပဒါယာတိ သောတာပတ္တိမဂ္ဂသမ္ပတ္တိယာ. သောတာပတ္တိမဂ္ဂေါ ဟိ နိဗ္ဗာနံ ဒိသွာ ကတ္တဗ္ဗကိစ္စသမ္ပဒါယ သဗ္ဗပဌမံ နိဗ္ဗာနဒဿနတော ‘‘ဒဿန’’န္တိ ဝုစ္စတိ, တဿ အတ္တနိ ပါတုဘာဝေါ ဒဿနသမ္ပဒါ, တာယ ဒဿနသမ္ပဒါယ သဟ ဧဝ. တယဿု ဓမ္မာ ဇဟိတာ ဘဝန္တီတိ ဧတ္ထ အဿု-ဣတိ ပဒပူရဏမတ္တေ နိပါတော ‘‘ဣဒံ သု မေ, သာရိပုတ္တ, မဟာဝိကဋဘောဇနသ္မိံ ဟောတီ’’တိအာဒီသု (မ. နိ. ၁.၁၅၆) ဝိယ. ယတော သဟာဝဿ ဒဿနသမ္ပဒါယ တယော ဓမ္မာ ဇဟိတာ ဘဝန္တိ ပဟီနာ ဟောန္တီတိ အယမေတ္ထ အတ္ထော. १०. इस प्रकार सप्तकृत्वपरम के आठवां भव न लेने के गुण के माध्यम से संघ पर आधारित सत्य को कहकर, अब उसी (स्रोतापन्न) के सात भव लेने पर भी, उन अन्य व्यक्तियों से जो भव के बंधन को नहीं त्याग पाए हैं, विशिष्ट गुणों का वर्णन करने के लिए "सहावस्स" आरम्भ किया गया है। वहाँ "सहावा" का अर्थ है—साथ ही। "अस्स" का अर्थ है—"वे आठवां भव ग्रहण नहीं करते" ऐसा कहे गए व्यक्तियों में से किसी एक का। "दस्सनसम्पदाय" का अर्थ है—स्रोतापत्ति-मार्ग की प्राप्ति से। क्योंकि स्रोतापत्ति-मार्ग निर्वाण को देखकर कर्तव्य कार्य की पूर्णता के कारण सबसे पहले निर्वाण का दर्शन करने से "दर्शन" कहलाता है; उसका अपने भीतर प्रकट होना "दर्शन-सम्पदा" है, उस दर्शन-सम्पदा के साथ ही। "तयस्सु धम्मा जहिता भवन्ती" यहाँ "अस्सु" शब्द केवल पद-पूर्ति के लिए निपात है, जैसे "इदं सु मे, सारिपुत्त, महाविकटभोजनस्मिं होति" आदि में। अतः "दर्शन-सम्पदा के साथ ही उसके तीन धर्म त्याग दिए जाते हैं, प्रहीण हो जाते हैं"—यह यहाँ अर्थ है। ဣဒါနိ ဇဟိတဓမ္မဒဿနတ္ထမာဟ ‘‘သက္ကာယဒိဋ္ဌီ ဝိစိကိစ္ဆိတဉ္စ, သီလဗ္ဗတံ ဝါပိ ယဒတ္ထိ ကိဉ္စီ’’တိ. တတ္ထ သတိ ကာယေ ဝိဇ္ဇမာနေ ဥပါဒါနက္ခန္ဓပဉ္စကာချေ ကာယေ ဝီသတိဝတ္ထုကာ ဒိဋ္ဌိ သက္ကာယဒိဋ္ဌိ, သတီ ဝါ တတ္ထ ကာယေ ဒိဋ္ဌီတိပိ သက္ကာယဒိဋ္ဌိ, ယထာဝုတ္တပ္ပကာရေ ကာယေ ဝိဇ္ဇမာနာ ဒိဋ္ဌီတိ အတ္ထော. သတိယေဝ ဝါ ကာယေ ဒိဋ္ဌီတိပိ သက္ကာယဒိဋ္ဌိ, ယထာဝုတ္တပ္ပကာရေ ကာယေ ဝိဇ္ဇမာနေ [Pg.158] ရူပါဒိသင်္ခါတော အတ္တာတိ ဧဝံ ပဝတ္တာ ဒိဋ္ဌီတိ အတ္ထော. တဿာ စ ပဟီနတ္တာ သဗ္ဗဒိဋ္ဌိဂတာနိ ပဟီနာနေဝ ဟောန္တိ. သာ ဟိ နေသံ မူလံ. သဗ္ဗကိလေသဗျာဓိဝူပသမနတော ပညာ‘‘စိကိစ္ဆိတ’’န္တိ ဝုစ္စတိ, တံ ပညာစိကိစ္ဆိတံ ဣတော ဝိဂတံ, တတော ဝါ ပညာစိကိစ္ဆိတာ ဣဒံ ဝိဂတန္တိ ဝိစိကိစ္ဆိတံ. ‘‘သတ္ထရိ ကင်္ခတီ’’တိအာဒိနာ (ဓ. သ. ၁၀၀၈; ဝိဘ. ၉၁၅) နယေန ဝုတ္တာယ အဋ္ဌဝတ္ထုကာယ ဝိမတိယာ ဧတံ အဓိဝစနံ. တဿာ ပဟီနတ္တာ သဗ္ဗာနိပိ ဝိစိကိစ္ဆိတာနိ ပဟီနာနိ ဟောန္တိ. တဉှိ နေသံ မူလံ. ‘‘ဣတော ဗဟိဒ္ဓါ သမဏဗြာဟ္မဏာနံ သီလေန သုဒ္ဓိ ဝတေန သုဒ္ဓီ’’တိ ဧဝမာဒီသု (ဓ. သ. ၁၂၂၂; ဝိဘ. ၉၃၈) အာဂတံ ဂေါသီလကုက္ကုရသီလာဒိကံ သီလံ ဂေါဝတကုက္ကုရဝတာဒိကဉ္စ ဝတံ သီလဗ္ဗတန္တိ ဝုစ္စတိ, တဿ ပဟီနတ္တာ သဗ္ဗမ္ပိ နဂ္ဂိယမုဏ္ဍိကာဒိအမရတပံ ပဟီနံ ဟောတိ. တဉှိ တဿ မူလံ, တေနေဝ သဗ္ဗာဝသာနေ ဝုတ္တံ ‘‘ယဒတ္ထိ ကိဉ္စီ’’တိ. ဒုက္ခဒဿနသမ္ပဒါယ စေတ္ထ သက္ကာယဒိဋ္ဌိ သမုဒယဒဿနသမ္ပဒါယ ဝိစိကိစ္ဆိတံ, မဂ္ဂဒဿနနိဗ္ဗာနဒဿနသမ္ပဒါယ သီလဗ္ဗတံ ပဟီယတီတိ ဝိညာတဗ္ဗံ. अब त्यागे गए धर्मों को दिखाने के लिए कहा—"सक्कायदिट्ठी विचिकिच्छितञ्च, सीलब्बतं वापि यदत्थि किञ्चि"। वहाँ विद्यमान 'काय' (शरीर) में, अर्थात् पाँच उपादान स्कन्धों रूपी काय में बीस प्रकार की दृष्टि 'सत्काय-दृष्टि' है; अथवा उस काय में जो दृष्टि है वह 'सत्काय-दृष्टि' है, अर्थात् पूर्वोक्त प्रकार के काय में विद्यमान दृष्टि—यह अर्थ है। अथवा विद्यमान काय में ही जो दृष्टि है वह 'सत्काय-दृष्टि' है, अर्थात् पूर्वोक्त प्रकार के काय के विद्यमान होने पर "रूप आदि ही आत्मा है" इस प्रकार प्रवृत्त दृष्टि—यह अर्थ है। उसके प्रहीण होने से सभी दृष्टिगत (मिथ्या दृष्टियाँ) प्रहीण ही हो जाती हैं। क्योंकि वह (सत्काय-दृष्टि) उनका मूल है। सभी क्लेश रूपी रोगों के उपशमन के कारण प्रज्ञा को "चिकित्सित" (उपचार) कहा जाता है; वह प्रज्ञा-चिकित्सा जिससे दूर हो गई है, अथवा उस प्रज्ञा-चिकित्सा से जो दूर हो गया है, वह "विचिकिच्छित" (विचिकित्सा/संदेह) है। "शास्ता में शंका करता है" आदि विधि से कही गई आठ वस्तुओं वाली विमति (संदेह) का यह नाम है। उसके प्रहीण होने से सभी विचिकित्साएँ प्रहीण हो जाती हैं। क्योंकि वह उनका मूल है। "इस (शासन) से बाहर श्रमण-ब्राह्मणों की शील से शुद्धि होती है, व्रत से शुद्धि होती है" इत्यादि में आए गो-शील, कुक्कुर-शील आदि शील और गो-व्रत, कुक्कुर-व्रत आदि व्रत को "शीलव्रत" कहा जाता है; उसके प्रहीण होने से नग्नता, मुंडन आदि सभी तप (जो स्वयं को कष्ट देते हैं) प्रहीण हो जाते हैं। क्योंकि वह उनका मूल है, इसीलिए अंत में कहा गया—"यदत्थि किञ्चि" (जो कुछ भी है)। यहाँ यह जानना चाहिए कि दुःख-दर्शन-सम्पदा से सत्काय-दृष्टि, समुदय-दर्शन-सम्पदा से विचिकित्सा, और मार्ग-दर्शन एवं निर्वाण-दर्शन-सम्पदा से शीलव्रत-परामर्श प्रहीण होता है। စတူဟပါယေဟီတိဂါထာဝဏ္ဏနာ "चतूहपायेहि" गाथा की व्याख्या। ၁၁. ဧဝမဿ ကိလေသဝဋ္ဋပ္ပဟာနံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ တသ္မိံ ကိလေသဝဋ္ဋေ သတိ ယေန ဝိပါကဝဋ္ဋေန ဘဝိတဗ္ဗံ, တပ္ပဟာနာ တဿာပိ ပဟာနံ ဒီပေန္တော အာဟ ‘‘စတူဟပါယေဟိ စ ဝိပ္ပမုတ္တော’’တိ. တတ္ထ စတ္တာရော အပါယာ နာမ နိရယတိရစ္ဆာနပေတ္တိဝိသယအသုရကာယာ. တေဟိ ဧသ သတ္တ ဘဝေ အာဒိယန္တောပိ ဝိပ္ပမုတ္တောတိ အတ္ထော. ११. इस प्रकार उस (श्रोतापन्न) के क्लेश-वर्त (kilesavaṭṭa) के प्रहाण को दिखाकर, अब उस क्लेश-वर्त के होने पर जो विपाक-वर्त (vipākavaṭṭa) होना चाहिए था, उसके प्रहाण से उस (विपाक-वर्त) के भी प्रहाण को प्रकाशित करते हुए "catūhapāyehi ca vippamutto" (चार अपायों से मुक्त) कहा। वहाँ चार अपायों के नाम हैं - नरक, तिर्यक, प्रेत-विषय और असुर-काय। उनसे यह (श्रोतापन्न) सात भवों को ग्रहण करते हुए भी मुक्त है - यह अर्थ है। ဧဝမဿ ဝိပါကဝဋ္ဋပ္ပဟာနံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ ယမဿ ဝိပါကဝဋ္ဋဿ မူလဘူတံ ကမ္မဝဋ္ဋံ, တဿာပိ ပဟာနံ ဒဿေန္တော အာဟ ‘‘ဆစ္စာဘိဌာနာနိ အဘဗ္ဗ ကာတု’’န္တိ. တတ္ထ အဘိဌာနာနီတိ ဩဠာရိကဋ္ဌာနာနိ, တာနိ ဧသ ဆ အဘဗ္ဗော ကာတုံ. တာနိ စ ‘‘အဋ္ဌာနမေတံ, ဘိက္ခဝေ, အနဝကာသော, ယံ ဒိဋ္ဌိသမ္ပန္နော ပုဂ္ဂလော မာတရံ ဇီဝိတာ ဝေါရောပေယျာ’’တိအာဒိနာ (အ. နိ. ၁.၂၇၁; မ. နိ. ၃.၁၂၈; ဝိဘ. ၈၀၉) နယေန ဧကကနိပါတေ ဝုတ္တာနိ မာတုဃာတပိတုဃာတအရဟန္တဃာတလောဟိတုပ္ပာဒသံဃဘေဒအညသတ္ထာရုဒ္ဒေသကမ္မာနီတိ ဝေဒိတဗ္ဗာနိ. တာနိ ဟိ ကိဉ္စာပိ ဒိဋ္ဌိသမ္ပန္နော အရိယသာဝကော ကုန္ထကိပိလ္လိကမ္ပိ ဇီဝိတာ န ဝေါရောပေတိ, အပိစ [Pg.159] ခေါ ပန ပုထုဇ္ဇနဘာဝဿ ဝိဂရဟဏတ္ထံ ဝုတ္တာနိ. ပုထုဇ္ဇနော ဟိ အဒိဋ္ဌိသမ္ပန္နတ္တာ ဧဝံမဟာသာဝဇ္ဇာနိ အဘိဌာနာနိပိ ကရောတိ, ဒဿနသမ္ပန္နော ပန အဘဗ္ဗော တာနိ ကာတုန္တိ. အဘဗ္ဗဂ္ဂဟဏဉ္စေတ္ထ ဘဝန္တရေပိ အကရဏဒဿနတ္ထံ. ဘဝန္တရေပိ ဟိ ဧသ အတ္တနော အရိယသာဝကဘာဝံ အဇာနန္တောပိ ဓမ္မတာယ ဧဝ ဧတာနိ ဝါ ဆ ပကတိပါဏာတိပါတာဒီနိ ဝါ ပဉ္စ ဝေရာနိ အညသတ္ထာရုဒ္ဒေသေန သဟ ဆ ဌာနာနိ န ကရောတိ, ယာနိ သန္ဓာယ ဧကစ္စေ ‘‘ဆ ဆာဘိဌာနာနီ’’တိပိ ပဌန္တိ. မတမစ္ဆဂ္ဂါဟာဒယော စေတ္ထ အရိယသာဝကဂါမဒါရကာနံ နိဒဿနံ. इस प्रकार उसके विपाक-वर्त के प्रहाण को दिखाकर, अब जो उसके विपाक-वर्त का मूल कारण कर्म-वर्त (kammavaṭṭa) है, उसके भी प्रहाण को दिखाते हुए "chaccābhiṭhānāni abhabba kātuṃ" (छह अभिस्थानों को करने में असमर्थ) कहा। वहाँ 'अभिस्थान' का अर्थ है स्थूल (जघन्य) अपराध; उन्हें यह (श्रोतापन्न) करने में असमर्थ है। और वे (अपराध) "भिक्षुओं, यह असंभव है, यह अवसर नहीं है कि दृष्टि-सम्पन्न व्यक्ति अपनी माता के जीवन का अंत करे" इत्यादि विधि से एकक-निपात में कहे गए मातृ-घात, पितृ-घात, अर्हन्त-घात, लोहित-उत्पाद (बुद्ध का रक्त बहाना), संघ-भेद और अन्य शास्ता (गुरु) को मानने के कर्म समझने चाहिए। यद्यपि दृष्टि-सम्पन्न आर्य श्रावक एक छोटे कीड़े (कुन्थ-किपिल्लिक) के जीवन का भी अंत नहीं करता, फिर भी यह पृथग्जन-भाव की निंदा के लिए कहा गया है। क्योंकि पृथग्जन दृष्टि-सम्पन्न न होने के कारण ऐसे महा-सावद्य (भारी पाप) अभिस्थानों को भी कर देता है, किन्तु दर्शन-सम्पन्न उन्हें करने में असमर्थ है। यहाँ 'अभव्य' (असमर्थ) शब्द का प्रयोग दूसरे जन्म में भी न करने को दिखाने के लिए है। क्योंकि दूसरे जन्म में भी यह अपने आर्य-श्रावक भाव को न जानते हुए भी, स्वभाव से ही इन छह (अभिस्थानों) को या पाँच स्वाभाविक प्राणातिपात आदि वैर (पाप) को और अन्य शास्ता के उपदेश के साथ छह स्थानों को नहीं करता है, जिनके संदर्भ में कुछ आचार्य "cha chābhiṭhānāni" भी पढ़ते हैं। यहाँ मृत मछली को उठाने वाली आर्य-श्राविका ग्राम-बालिकाओं का उदाहरण दृष्टव्य है। ဧဝံ ဘဂဝါ သတ္တ ဘဝေ အာဒိယတောပိ အရိယသာဝကဿ အညေဟိ အပ္ပဟီနဘဝါဒါနေဟိ ပုဂ္ဂလေဟိ ဝိသိဋ္ဌဂုဏဝသေန သံဃရတနဿ ဂုဏံ ဝတွာ ဣဒါနိ တမေဝ ဂုဏံ နိဿာယ သစ္စဝစနံ ပယုဉ္ဇတိ ‘‘ဣဒမ္ပိ သံဃေ’’တိ. တဿတ္ထော ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. ဣမိဿာပိ ဂါထာယ အာဏာ ကောဋိသတသဟဿစက္ကဝါဠေသု အမနုဿေဟိ ပဋိဂ္ဂဟိတာတိ. इस प्रकार भगवान ने सात भवों को ग्रहण करने वाले भी आर्य श्रावक के, अन्य उन पुद्गलों से जो भव-ग्रहण का प्रहाण नहीं कर पाए हैं, विशिष्ट गुणों के कारण संघ-रत्न के गुण को कहकर, अब उसी गुण के आश्रय से "idampi saṅghe" (यह भी संघ में [रत्न है]) यह सत्य-वचन प्रयुक्त किया। इसका अर्थ पूर्व में कहे गए तरीके से ही समझना चाहिए। इस गाथा की आज्ञा (प्रताप) को भी एक लाख करोड़ चक्रवातों में अमनुष्यों (देवताओं) द्वारा स्वीकार किया गया है। ကိဉ္စာပိ သောတိဂါထာဝဏ္ဏနာ 'किञ्चापि' (Kiñcāpi) इत्यादि गाथा का वर्णन। ၁၂. ဧဝံ သတ္တ ဘဝေ အာဒိယတောပိ အညေဟိ အပ္ပဟီနဘဝါဒါနေဟိ ပုဂ္ဂလေဟိ ဝိသိဋ္ဌဂုဏေန သံဃာဓိဋ္ဌာနံ သစ္စံ ဝတွာ ဣဒါနိ န ကေဝလံ ဒဿနသမ္ပန္နော ဆ အဘိဌာနာနိ အဘဗ္ဗော ကာတုံ, ကိန္တု အပ္ပမတ္တကမ္ပိ ပါပကမ္မံ ကတွာ တဿ ပဋိစ္ဆာဒနာယပိ အဘဗ္ဗောတိ ပမာဒဝိဟာရိနောပိ ဒဿနသမ္ပန္နဿ ကတပ္ပဋိစ္ဆာဒနာဘာဝဂုဏေန ဝတ္တုမာရဒ္ဓေါ ‘‘ကိဉ္စာပိ သော ကမ္မ ကရောတိ ပါပက’’န္တိ. १२. इस प्रकार सात भवों को ग्रहण करने वाले के भी, अन्य भव-ग्रहण न छोड़ने वाले पुद्गलों से विशिष्ट गुण के कारण संघ-अधिष्ठान सत्य को कहकर, अब न केवल दर्शन-सम्पन्न छह अभिस्थानों को करने में असमर्थ है, बल्कि थोड़ा सा भी पाप कर्म करके उसे छिपाने में भी असमर्थ है - इस प्रकार प्रमाद-विहारी होने पर भी दर्शन-सम्पन्न व्यक्ति के 'किए हुए पाप को न छिपाने' के गुण को कहने के लिए "kiñcāpi so kamma karoti pāpakaṃ" (यद्यपि वह पाप कर्म करता है) इत्यादि आरम्भ किया। တဿတ္ထော – သော ဒဿနသမ္ပန္နော ကိဉ္စာပိ သတိသမ္မောသေန ပမာဒဝိဟာရံ အာဂမ္မ ယံ တံ ဘဂဝတာ လောကဝဇ္ဇံ သဉ္စိစ္စာတိက္ကမနံ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ ‘‘ယံ မယာ သာဝကာနံ သိက္ခာပဒံ ပညတ္တံ, တံ မမ သာဝကာ ဇီဝိတဟေတုပိ နာတိက္ကမန္တီ’’တိ (စူဠဝ. ၃၈၅; ဥဒါ. ၄၅) တံ ဌပေတွာ အညံ ကုဋိကာရသဟသေယျာဒိံ ပဏ္ဏတ္တိဝဇ္ဇဝီတိက္ကမသင်္ခါတံ ဗုဒ္ဓပ္ပတိကုဋ္ဌံ ကာယေန ပါပကမ္မံ ကရောတိ, ပဒသောဓမ္မဥတ္တရိဆပ္ပဉ္စဝါစာဓမ္မဒေသနသမ္ဖပ္ပလာပဖရုသဝစနာဒိံ ဝါ ဝါစာယ , ဥဒ စေတသာ ဝါ ကတ္ထစိ လောဘဒေါသုပ္ပာဒနံ ဇာတရူပါဒိသာဒိယနံ စီဝရာဒိပရိဘောဂေသု အပစ္စဝေက္ခဏာဒိံ ဝါ ပါပကမ္မံ ကရောတိ. အဘဗ္ဗော သော တဿ [Pg.160] ပဋိစ္ဆဒါယ န သော တံ ‘‘ဣဒံ အကပ္ပိယမကရဏီယ’’န္တိ ဇာနိတွာ မုဟုတ္တမ္ပိ ပဋိစ္ဆာဒေတိ, တံခဏံ ဧဝ ပန သတ္ထရိ ဝါ ဝိညူသု ဝါ သဗြဟ္မစာရီသု အာဝိ ကတွာ ယထာဓမ္မံ ပဋိကရောတိ, ‘‘န ပုန ကရိဿာမီ’’တိ ဧဝံ သံဝရိတဗ္ဗံ ဝါ သံဝရတိ. ကသ္မာ? ယသ္မာ အဘဗ္ဗတာ ဒိဋ္ဌပဒဿ ဝုတ္တာ, ဧဝရူပမ္ပိ ပါပကမ္မံ ကတွာ တဿ ပဋိစ္ဆာဒါယ ဒိဋ္ဌနိဗ္ဗာနပဒဿ ဒဿနသမ္ပန္နဿ ပုဂ္ဂလဿ အဘဗ္ဗတာ ဝုတ္တာတိ အတ္ထော. उसका अर्थ है - वह दर्शन-सम्पन्न व्यक्ति यद्यपि स्मृति-भ्रंश (satisammosa) के कारण प्रमाद-विहार को प्राप्त होकर, भगवान द्वारा जिस लोक-वद्य (लोक-निन्दित) जानबूझकर किए गए उल्लंघन के संदर्भ में कहा गया है कि "मेरे श्रावकों के लिए जो शिक्षापद प्रज्ञप्त किया गया है, मेरे श्रावक जीवन के लिए भी उसका उल्लंघन नहीं करते", उसे छोड़कर अन्य कुटीकार, सहशय्या आदि प्रज्ञप्ति-वद्य (नियम-विरुद्ध) उल्लंघन रूप बुद्ध द्वारा निन्दित कायिक पाप कर्म करता है, या पदसो-धम्म, उत्तरि-छ-पञ्च-वाचा, धर्म-देशना, सम्फप्पलाप (व्यर्थ प्रलाप), परुष-वचन आदि वाचिक पाप करता है, अथवा चित्त से कहीं लोभ-दोष की उत्पत्ति, स्वर्ण-रजत आदि का ग्रहण, चीवर आदि के परिभोग में प्रत्यवेक्षण न करना आदि पाप कर्म करता है। वह उसे छिपाने में असमर्थ है; वह "यह अकल्पनीय (अनुचित) और अकरणीय है" ऐसा जानकर उसे क्षण भर के लिए भी नहीं छिपाता, बल्कि उसी क्षण शास्ता (बुद्ध) के पास या विज्ञ सब्रह्मचारियों के पास उसे प्रकट करके धर्मानुसार उसका प्रतिकार (प्रायश्चित) करता है, और "पुनः ऐसा नहीं करूँगा" इस प्रकार संवर (संयम) धारण करता है। क्यों? क्योंकि निर्वाण-पद को देखने वाले की 'अभव्यता' (असमर्थता) कही गई है; इस प्रकार का पाप कर्म करके भी उसे छिपाने में निर्वाण-पद को देखने वाले दर्शन-सम्पन्न पुद्गल की अभव्यता कही गई है - यह अर्थ है। ကထံ? कैसे? ‘‘သေယျထာပိ, ဘိက္ခဝေ, ဒဟရော ကုမာရော မန္ဒော ဥတ္တာနသေယျကော ဟတ္ထေန ဝါ ပါဒေန ဝါ အင်္ဂါရံ အက္ကမိတွာ ခိပ္ပမေဝ ပဋိသံဟရတိ, ဧဝမေဝ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, ဓမ္မတာ ဧသာ ဒိဋ္ဌိသမ္ပန္နဿ ပုဂ္ဂလဿ, ကိဉ္စာပိ တထာရူပိံ အာပတ္တိံ အာပဇ္ဇတိ, ယထာရူပါယ အာပတ္တိယာ ဝုဋ္ဌာနံ ပညာယတိ. အထ ခေါ နံ ခိပ္ပမေဝ သတ္ထရိ ဝါ ဝိညူသု ဝါ သဗြဟ္မစာရီသု ဒေသေတိ ဝိဝရတိ ဥတ္တာနီကရောတိ, ဒေသေတွာ ဝိဝရိတွာ ဥတ္တာနီကတွာ အာယတိံ သံဝရံ အာပဇ္ဇတီ’’တိ (မ. နိ. ၁.၄၉၆). "जैसे, भिक्षुओं, कोई छोटा बालक, मन्दबुद्धि, पीठ के बल लेटा हुआ, हाथ या पैर से अंगारे को छूकर तुरंत पीछे खींच लेता है; वैसे ही, भिक्षुओं, यह दर्शन-सम्पन्न पुद्गल का स्वभाव (धम्मता) है कि यद्यपि वह वैसी आपत्ति (दोष) को प्राप्त होता है, जिस आपत्ति से निकलना (वुट्ठान) प्रज्ञप्त है। तब वह उसे तुरंत शास्ता के पास या विज्ञ सब्रह्मचारियों के पास देशना करता है, विवृत (प्रकट) करता है, स्पष्ट करता है; और देशना करके, विवृत करके, स्पष्ट करके भविष्य के लिए संवर (संयम) को प्राप्त होता है।" ဧဝံ ဘဂဝါ ပမာဒဝိဟာရိနောပိ ဒဿနသမ္ပန္နဿ ကတပ္ပဋိစ္ဆာဒနာဘာဝဂုဏေန သံဃရတနဿ ဂုဏံ ဝတွာ ဣဒါနိ တမေဝ ဂုဏံ နိဿာယ သစ္စဝစနံ ပယုဉ္ဇတိ ‘‘ဣဒမ္ပိ သံဃေ’’တိ. တဿတ္ထော ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. ဣမိဿာပိ ဂါထာယ အာဏာ ကောဋိသတသဟဿစက္ကဝါဠေသု အမနုဿေဟိ ပဋိဂ္ဂဟိတာတိ. इस प्रकार भगवान ने प्रमाद-विहारी होने पर भी दर्शन-सम्पन्न व्यक्ति के 'किए हुए पाप को न छिपाने' के गुण के माध्यम से संघ-रत्न के गुण को कहकर, अब उसी गुण के आश्रय से "idampi saṅghe" यह सत्य-वचन प्रयुक्त किया। इसका अर्थ पूर्व में कहे गए तरीके से ही समझना चाहिए। इस गाथा की आज्ञा को भी एक लाख करोड़ चक्रवातों में अमनुष्यों द्वारा स्वीकार किया गया है। ဝနပ္ပဂုမ္ဗေတိဂါထာဝဏ္ဏနာ 'वनप्पगुम्बे' (Vanappagumbe) इत्यादि गाथा का वर्णन। ၁၃. ဧဝံ သံဃပရိယာပန္နာနံ ပုဂ္ဂလာနံ တေန တေန ဂုဏပ္ပကာရေန သံဃာဓိဋ္ဌာနံ သစ္စံ ဝတွာ ဣဒါနိ ယွာယံ ဘဂဝတာ ရတနတ္တယဂုဏံ ဒီပေန္တေန ဣဓ သင်္ခေပေန အညတြ စ ဝိတ္ထာရေန ပရိယတ္တိဓမ္မော ဒေသိတော, တမ္ပိ နိဿာယ ပုန ဗုဒ္ဓါဓိဋ္ဌာနံ သစ္စံ ဝတ္တုမာရဒ္ဓေါ ‘‘ဝနပ္ပဂုမ္ဗေ ယထာ ဖုဿိတဂ္ဂေ’’တိ. တတ္ထ အာသန္နသန္နိဝေသဝဝတ္ထိတာနံ ရုက္ခာနံ သမူဟော ဝနံ, မူလသာရဖေဂ္ဂုတစသာခါပလာသေဟိ ပဝုဒ္ဓေါ ဂုမ္ဗော ပဂုမ္ဗော, ဝနဿ, ဝနေ ဝါ ပဂုမ္ဗော ဝနပ္ပဂုမ္ဗော. သွာယံ ‘‘ဝနပ္ပဂုမ္ဗေ’’တိ ဝုတ္တော, ဧဝမ္ပိ ဟိ ဝတ္တုံ လဗ္ဘတိ ‘‘အတ္ထိ သဝိတက္ကသဝိစာရေ[Pg.161], အတ္ထိ အဝိတက္ကဝိစာရမတ္တေ, သုခေ ဒုက္ခေ ဇီဝေ’’တိအာဒီသု (ဒီ. နိ. ၁.၁၇၄; မ. နိ. ၂.၂၂၈) ဝိယ. ယထာတိ ဥပမာဝစနံ. ဖုဿိတာနိ အဂ္ဂါနိ အဿာတိ ဖုဿိတဂ္ဂေါ, သဗ္ဗသာခါပသာခါသု သဉ္ဇာတပုပ္ဖောတိ အတ္ထော. သော ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေနေဝ ‘‘ဖုဿိတဂ္ဂေ’’တိ ဝုတ္တော. ဂိမှာနမာသေ ပဌမသ္မိံ ဂိမှေတိ ယေ စတ္တာရော ဂိမှာနံ မာသာ, တေသံ စတုန္နံ ဂိမှမာသာနံ ဧကသ္မိံ မာသေ. ကတရသ္မိံ မာသေ ဣတိ စေ? ပဌမသ္မိံ ဂိမှေ, စိတြမာသေတိ အတ္ထော. သော ဟိ ‘‘ပဌမဂိမှော’’တိ စ ‘‘ဗာလဝသန္တော’’တိ စ ဝုစ္စတိ. တတော ပရံ ပဒတ္ထတော ပါကဋမေဝ. १३. इस प्रकार संघ में सम्मिलित व्यक्तियों के उन-उन गुणों के प्रकार से संघ-आधारित सत्य को कहकर, अब भगवान ने रत्नत्रय के गुणों को प्रकाशित करते हुए, यहाँ संक्षेप में और अन्यत्र विस्तार से जिस परियत्ति धर्म का उपदेश दिया है, उसी का आश्रय लेकर पुनः बुद्ध-आधारित सत्य वचन कहने के लिए "वनप्पगुम्बे यथा फुस्सितग्गे" (जैसे खिले हुए अग्रभागों वाला वन-समूह) यह गाथा आरम्भ की। वहाँ (उस गाथा में), पास-पास स्थित वृक्षों के समूह को 'वन' कहते हैं। जड़, सार (अन्तःकाष्ठ), छाल, शाखा और पत्तों से बढ़ा हुआ गुच्छ 'पगुम्ब' कहलाता है। वन का अथवा वन में स्थित गुच्छ 'वनप्पगुम्ब' है। वह यहाँ 'वनप्पगुम्बे' (सप्तमी विभक्ति में) कहा गया है, क्योंकि ऐसा कहना "अत्थि सवितक्कसविचारे..." आदि के समान संभव है। 'यथा' उपमावाचक शब्द है। जिसके अग्रभाग (फुल्लित) खिले हुए हों, वह 'फुस्सितग्गो' है, अर्थात् जिसकी सभी शाखाओं और उपशाखाओं में फूल खिले हों। उसे पूर्वोक्त विधि से ही 'फुस्सितग्गे' कहा गया है। 'गिम्हानमासे पठमस्मिं गिम्हे' का अर्थ है—ग्रीष्म ऋतु के जो चार महीने होते हैं, उन चार ग्रीष्म-मासों में से एक मास में। यदि कहें कि किस मास में? तो प्रथम ग्रीष्म मास में, जिसका अर्थ 'चित्त' (चैत्र) मास है। उसे 'प्रथम ग्रीष्म' और 'बाल वसंत' भी कहा जाता है। इसके आगे के पदों का अर्थ स्पष्ट ही है। အယံ ပနေတ္ထ ပိဏ္ဍတ္ထော – ယထာ ပဌမဂိမှနာမကေ ဗာလဝသန္တေ နာနာဝိဓရုက္ခဂဟနေ ဝနေ သုပုပ္ဖိတဂ္ဂသာခေါ တရုဏရုက္ခဂစ္ဆပရိယာယနာမော ပဂုမ္ဗော အတိဝိယ သဿိရိကော ဟောတိ, ဧဝမေဝ ခန္ဓာယတနာဒီဟိ သတိပဋ္ဌာနသမ္မပ္ပဓာနာဒီဟိ သီလသမာဓိက္ခန္ဓာဒီဟိ ဝါ နာနပ္ပကာရေဟိ အတ္ထပ္ပဘေဒပုပ္ဖေဟိ အတိဝိယ သဿိရိကတ္တာ တထူပမံ နိဗ္ဗာနဂါမိမဂ္ဂဒီပနတော နိဗ္ဗာနဂါမိံ ပရိယတ္တိဓမ္မဝရံ နေဝ လာဘဟေတု န သက္ကာရာဒိဟေတု, ကေဝလန္တု မဟာကရုဏာယ အဗ္ဘုဿာဟိတဟဒယော သတ္တာနံ ပရမဟိတာယ အဒေသယီတိ. ပရမံ ဟိတာယာတိ ဧတ္ထ စ ဂါထာဗန္ဓသုခတ္ထံ အနုနာသိကော. အယံ ပနတ္ထော – ပရမဟိတာယ နိဗ္ဗာနာယ အဒေသယီတိ. यहाँ यह संक्षिप्त अर्थ (पिण्डार्थ) है—जैसे प्रथम ग्रीष्म नामक बाल-वसंत में, नाना प्रकार के वृक्षों से गहन वन में, सुन्दर खिले हुए अग्रभागों वाली शाखाओं वाला नवीन वृक्षों का समूह (पगुम्ब) अत्यधिक शोभायमान होता है, उसी प्रकार स्कन्ध, आयतन आदि के द्वारा, अथवा स्मृतिप्रस्थान, सम्यक् प्रधान आदि के द्वारा, अथवा शील, समाधि स्कन्ध आदि के द्वारा, नाना प्रकार के अर्थ-विभेद रूपी पुष्पों से अत्यधिक शोभायमान होने के कारण, उस वन-समूह के समान उपमा वाले, निर्वाणगामी मार्ग को प्रकाशित करने वाले, निर्वाणगामी श्रेष्ठ परियत्ति धर्म का उपदेश (भगवान ने) न तो लाभ के लिए और न ही सत्कार आदि के लिए दिया, बल्कि केवल महाकरुणा से प्रेरित हृदय होकर प्राणियों के परम हित के लिए दिया। 'परमं हिताय' यहाँ गाथा के छंद की सुगमता के लिए अनुनासिक (मकार) का प्रयोग हुआ है। इसका अर्थ है—परम हित रूप निर्वाण के लिए उपदेश दिया। ဧဝံ ဘဂဝါ ဣမံ သုပုပ္ဖိတဂ္ဂဝနပ္ပဂုမ္ဗသဒိသံ ပရိယတ္တိဓမ္မံ ဝတွာ ဣဒါနိ တမေဝ နိဿာယ ဗုဒ္ဓါဓိဋ္ဌာနံ သစ္စဝစနံ ပယုဉ္ဇတိ ‘‘ဣဒမ္ပိ ဗုဒ္ဓေ’’တိ. တဿတ္ထော ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. ကေဝလံ ပန ဣဒမ္ပိ ယထာဝုတ္တပကာရပရိယတ္တိဓမ္မသင်္ခါတံ ဗုဒ္ဓေ ရတနံ ပဏီတန္တိ ဧဝံ ယောဇေတဗ္ဗံ. ဣမိဿာပိ ဂါထာယ အာဏာ ကောဋိသတသဟဿစက္ကဝါဠေသု အမနုဿေဟိ ပဋိဂ္ဂဟိတာတိ. इस प्रकार भगवान ने इस खिले हुए अग्रभागों वाले वन-समूह के समान परियत्ति धर्म को कहकर, अब उसी का आश्रय लेकर बुद्ध-आधारित सत्य वचन का प्रयोग किया—"इदम्पि बुद्धे" (यह भी बुद्ध में)। इसका अर्थ पूर्वोक्त विधि से ही समझना चाहिए। केवल इतना विशेष है कि "बुद्ध में यह यथोक्त प्रकार का परियत्ति धर्म रूपी रत्न श्रेष्ठ है"—इस प्रकार अर्थ जोड़ना चाहिए। इस गाथा की आज्ञा को भी सौ करोड़ (एक खरब) चक्रवातों में अमनुष्यों (देवताओं) द्वारा स्वीकार किया गया है। ဝရော ဝရညူတိဂါထာဝဏ္ဏနာ "वरो वरञ्ञू" गाथा की व्याख्या। ၁၄. ဧဝံ ဘဂဝါ ပရိယတ္တိဓမ္မေန ဗုဒ္ဓါဓိဋ္ဌာနံ သစ္စံ ဝတွာ ဣဒါနိ လောကုတ္တရဓမ္မေန ဝတ္တုမာရဒ္ဓေါ ‘‘ဝရော ဝရညူ’’တိ. တတ္ထ ဝရောတိ ပဏီတာဓိမုတ္တိကေဟိ ဣစ္ဆိတော ‘‘အဟော ဝတ မယမ္ပိ ဧဝရူပါ အဿာမာ’’တိ, ဝရဂုဏယောဂတော ဝါ ဝရော ဥတ္တမော သေဋ္ဌောတိ အတ္ထော. ဝရညူတိ [Pg.162] နိဗ္ဗာနညူ. နိဗ္ဗာနဉှိ သဗ္ဗဓမ္မာနံ ဥတ္တမဋ္ဌေန ဝရံ, တဉ္စေသ ဗောဓိမူလေ သယံ ပဋိဝိဇ္ဈိတွာ အညာသိ. ဝရဒေါတိ ပဉ္စဝဂ္ဂိယဘဒ္ဒဝဂ္ဂိယဇဋိလာဒီနံ အညေသဉ္စ ဒေဝမနုဿာနံ နိဗ္ဗေဓဘာဂိယဝါသနာဘာဂိယဝရဓမ္မဒါယီတိ အတ္ထော. ဝရာဟရောတိ ဝရဿ မဂ္ဂဿ အာဟဋတ္တာ ဝရာဟရောတိ ဝုစ္စတိ. သော ဟိ ဘဂဝါ ဒီပင်္ကရတော ပဘုတိ သမတိံသ ပါရမိယော ပူရေန္တော ပုဗ္ဗကေဟိ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေဟိ အနုယာတံ ပုရာဏမဂ္ဂဝရမာဟရိ, တေန ‘‘ဝရာဟရော’’တိ ဝုစ္စတိ. १४. इस प्रकार भगवान ने परियत्ति धर्म के द्वारा बुद्ध-आधारित सत्य को कहकर, अब लोकोत्तर धर्म के द्वारा (सत्य) कहने के लिए "वरो वरञ्ञू" (श्रेष्ठ, श्रेष्ठ को जानने वाले) यह गाथा आरम्भ की। वहाँ 'वर' का अर्थ है—श्रेष्ठ वस्तुओं में रुचि रखने वालों द्वारा वांछित, "अहो! हम भी ऐसे ही हो जाएँ"; अथवा श्रेष्ठ गुणों से युक्त होने के कारण 'वर' का अर्थ उत्तम या श्रेष्ठ है। 'वरञ्ञू' का अर्थ है—निर्वाण को जानने वाले। क्योंकि निर्वाण सभी धर्मों में उत्तम होने के कारण 'वर' (श्रेष्ठ) है, और उसे भगवान ने बोधि-वृक्ष के मूल में स्वयं साक्षात् कर जाना। 'वरदो' का अर्थ है—पञ्चवर्गीय, भद्रवर्गीय, जटिल आदि को तथा अन्य देव-मनुष्यों को निर्वेध-भागीया (भेदन करने वाली) और वासना-भागीया श्रेष्ठ धर्म प्रदान करने वाले। 'वराहो' का अर्थ है—श्रेष्ठ मार्ग को लाने वाले होने के कारण 'वराहो' कहा जाता है। क्योंकि वे भगवान दीपंकर बुद्ध के समय से लेकर तीस पारमिताओं को पूर्ण करते हुए, पूर्ववर्ती सम्यक् सम्बुद्धों द्वारा अनुसरित उस प्राचीन श्रेष्ठ मार्ग को लेकर आए, इसलिए उन्हें 'वराहो' कहा जाता है। အပိစ သဗ္ဗညုတညာဏပ္ပဋိလာဘေန ဝရော, နိဗ္ဗာနသစ္ဆိကိရိယာယ ဝရညူ, သတ္တာနံ ဝိမုတ္တိသုခဒါနေန ဝရဒေါ, ဥတ္တမပဋိပဒါဟရဏေန ဝရာဟရော. ဧတေဟိ လောကုတ္တရဂုဏေဟိ အဓိကဿ ကဿစိ ဂုဏဿ အဘာဝတော အနုတ္တရော. इसके अतिरिक्त, सर्वज्ञता-ज्ञान की प्राप्ति के कारण वे 'वर' हैं, निर्वाण का साक्षात्कार करने के कारण 'वरञ्ञू' हैं, प्राणियों को विमुक्ति-सुख प्रदान करने के कारण 'वरद' हैं, और उत्तम प्रतिपदा (मार्ग) को लाने के कारण 'वराहर' हैं। इन लोकोत्तर गुणों से अधिक किसी अन्य के गुण न होने के कारण वे 'अनुत्तर' (सर्वश्रेष्ठ) हैं। အပရော နယော – ဝရော ဥပသမာဓိဋ္ဌာနပရိပူရဏေန, ဝရညူ ပညာဓိဋ္ဌာနပရိပူရဏေန, ဝရဒေါ စာဂါဓိဋ္ဌာနပရိပူရဏေန, ဝရာဟရော သစ္စာဓိဋ္ဌာနပရိပူရဏေန, ဝရံ မဂ္ဂသစ္စမာဟရီတိ. တထာ ဝရော ပုညုဿယေန, ဝရညူ ပညုဿယေန, ဝရဒေါ ဗုဒ္ဓဘာဝတ္ထိကာနံ တဒုပါယသမ္ပဒါနေန, ဝရာဟရော ပစ္စေကဗုဒ္ဓဘာဝတ္ထိကာနံ တဒုပါယာဟရဏေန, အနုတ္တရော တတ္ထ တတ္ထ အသဒိသတာယ, အတ္တနာ ဝါ အနာစရိယကော ဟုတွာ ပရေသံ အာစရိယဘာဝေန, ဓမ္မဝရံ အဒေသယိ သာဝကဘာဝတ္ထိကာနံ တဒတ္ထာယ သွာက္ခာတတာဒိဂုဏယုတ္တဿ ဓမ္မဝရဿ ဒေသနတော. သေသံ ဝုတ္တနယမေဝါတိ. एक अन्य विधि—उपशम-अधिष्ठान की परिपूर्णता के कारण 'वर' हैं, प्रज्ञा-अधिष्ठान की परिपूर्णता के कारण 'वरञ्ञू' हैं, त्याग-अधिष्ठान की परिपूर्णता के कारण 'वरद' हैं, और सत्य-अधिष्ठान की परिपूर्णता के कारण 'वराहर' हैं, क्योंकि वे श्रेष्ठ मार्ग-सत्य को लेकर आए। इसी प्रकार, पुण्य की अधिकता से 'वर', प्रज्ञा की अधिकता से 'वरञ्ञू', बुद्धत्व चाहने वालों को उसके उपाय प्रदान करने से 'वरद', और प्रत्येक-बुद्धत्व चाहने वालों को उसके उपाय लाने से 'वराहर' हैं। उन-उन गुणों में अद्वितीय होने के कारण 'अनुत्तर' हैं, अथवा स्वयं बिना किसी आचार्य के (बुद्ध होकर) दूसरों के आचार्य होने के कारण 'अनुत्तर' हैं। श्रावक-पद चाहने वालों के लिए उस प्रयोजन हेतु स्वाख्यात आदि गुणों से युक्त श्रेष्ठ धर्म का उपदेश देने के कारण 'धम्मवरं अदेसयि' (श्रेष्ठ धर्म का उपदेश दिया) कहा गया है। शेष अर्थ पूर्वोक्त विधि के समान ही है। ဧဝံ ဘဂဝါ နဝဝိဓေန လောကုတ္တရဓမ္မေန အတ္တနော ဂုဏံ ဝတွာ ဣဒါနိ တမေဝ ဂုဏံ နိဿာယ ဗုဒ္ဓါဓိဋ္ဌာနံ သစ္စဝစနံ ပယုဉ္ဇတိ ‘‘ဣဒမ္ပိ ဗုဒ္ဓေ’’တိ. တဿတ္ထော ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. ကေဝလံ ပန ယံ ဝရံ လောကုတ္တရဓမ္မံ ဧသ အညာသိ, ယဉ္စ အဒါသိ, ယဉ္စ အာဟရိ, ယဉ္စ ဒေသေသိ, ဣဒမ္ပိ ဗုဒ္ဓေ ရတနံ ပဏီတန္တိ ဧဝံ ယောဇေတဗ္ဗံ. ဣမိဿာပိ ဂါထာယ အာဏာ ကောဋိသတသဟဿစက္ကဝါဠေသု အမနုဿေဟိ ပဋိဂ္ဂဟိတာတိ. इस प्रकार भगवान ने नौ प्रकार के लोकोत्तर धर्मों के द्वारा अपने गुणों को कहकर, अब उन्हीं गुणों का आश्रय लेकर बुद्ध-आधारित सत्य वचन का प्रयोग किया—"इदम्पि बुद्धे"। इसका अर्थ पूर्वोक्त विधि से ही समझना चाहिए। केवल इतना विशेष है कि "जिस श्रेष्ठ लोकोत्तर धर्म को इन्होंने जाना, जिसे प्रदान किया, जिसे लेकर आए और जिसका उपदेश दिया, वह भी बुद्ध में श्रेष्ठ रत्न है"—इस प्रकार अर्थ जोड़ना चाहिए। इस गाथा की आज्ञा को भी सौ करोड़ चक्रवातों में अमनुष्यों द्वारा स्वीकार किया गया है। ခီဏန္တိဂါထာဝဏ္ဏနာ "खीणं" गाथा की व्याख्या। ၁၅. ဧဝံ ဘဂဝါ ပရိယတ္တိဓမ္မဉ္စ နဝလောကုတ္တရဓမ္မဉ္စ နိဿာယ ဒွီဟိ ဂါထာဟိ ဗုဒ္ဓါဓိဋ္ဌာနံ သစ္စံ ဝတွာ ဣဒါနိ ယေ တံ ပရိယတ္တိဓမ္မံ အဿောသုံ, သုတာနုသာရေန [Pg.163] စ ပဋိပဇ္ဇိတွာ နဝပ္ပကာရမ္ပိ လောကုတ္တရဓမ္မံ အဓိဂမိံသု, တေသံ အနုပါဒိသေသနိဗ္ဗာနပတ္တိဂုဏံ နိဿာယ ပုန သံဃာဓိဋ္ဌာနံ သစ္စံ ဝတ္တုမာရဒ္ဓေါ ‘‘ခီဏံ ပုရာဏ’’န္တိ. တတ္ထ ခီဏန္တိ သမုစ္ဆိန္နံ. ပုရာဏန္တိ ပုရာတနံ. နဝန္တိ သမ္ပတိ ဝတ္တမာနံ. နတ္ထိ သမ္ဘဝန္တိ အဝိဇ္ဇမာနပါတုဘာဝံ. ဝိရတ္တစိတ္တာတိ ဝီတရာဂစိတ္တာ. အာယတိကေ ဘဝသ္မိန္တိ အနာဂတမဒ္ဓါနံ ပုနဗ္ဘဝေ. တေတိ ယေသံ ခီဏံ ပုရာဏံ နဝံ နတ္ထိ သမ္ဘဝံ, ယေ စ အာယတိကေ ဘဝသ္မိံ ဝိရတ္တစိတ္တာ, တေ ခီဏာသဝါ ဘိက္ခူ. ခီဏဗီဇာတိ ဥစ္ဆိန္နဗီဇာ. အဝိရူဠှိဆန္ဒာတိ ဝိရူဠှိဆန္ဒဝိရဟိတာ. နိဗ္ဗန္တီတိ ဝိဇ္ဈာယန္တိ. ဓီရာတိ ဓိတိသမ္ပန္နာ. ယထာယံ ပဒီပေါတိ အယံ ပဒီပေါ ဝိယ. १५. इस प्रकार भगवान ने परियत्ति धर्म और नौ प्रकार के लोकोत्तर धर्म का आश्रय लेकर दो गाथाओं द्वारा बुद्ध-अधिष्ठान (बुद्ध पर आधारित) सत्य वचन कहकर, अब जिन्होंने उस परियत्ति धर्म को सुना और श्रवण के अनुसार प्रतिपत्ति (अभ्यास) कर नौ प्रकार के लोकोत्तर धर्म को प्राप्त किया, उनके अनुपधिशेष निर्वाण प्राप्ति के गुण का आश्रय लेकर पुनः संघ-अधिष्ठान सत्य वचन कहने के लिए "खीणं पुराणं" (पुराना क्षीण हो गया है) आदि गाथा आरम्भ की। वहाँ 'खीणं' का अर्थ है सम्यक् रूप से कटा हुआ (समुच्छिन्न)। 'पुराणं' का अर्थ है पुराना (अतीत का कर्म)। 'नवं' का अर्थ है वर्तमान में होने वाला (नया कर्म)। 'नत्थि सम्भवं' का अर्थ है (पुनर्जन्म का) प्रादुर्भाव न होना। 'विरत्तचित्ता' का अर्थ है विरक्त चित्त वाले (राग रहित)। 'आयतिके भवस्मिं' का अर्थ है भविष्य के काल में पुनर्जन्म में। 'ते' का अर्थ है वे (अरहंत) जिनका पुराना क्षीण हो गया है और नया उत्पन्न नहीं होता, और जो भविष्य के भव के प्रति विरक्त चित्त हैं, वे क्षीणाश्रव भिक्षु हैं। 'खीणबीजा' का अर्थ है जिनके (पुनर्जन्म के) बीज नष्ट हो गए हैं। 'अविरूळ्हिछन्दा' का अर्थ है जिनकी (पुनः उत्पन्न होने की) छन्द (इच्छा) की वृद्धि रुक गई है। 'निब्बन्ति' का अर्थ है बुझ जाते हैं (शान्त हो जाते हैं)। 'धीरा' का अर्थ है धृति (प्रज्ञा) से सम्पन्न। 'यथायं पदीपो' का अर्थ है जैसे यह दीपक। ကိံ ဝုတ္တံ ဟောတိ? ယံ တံ သတ္တာနံ ဥပ္ပဇ္ဇိတွာ နိရုဒ္ဓမ္ပိ ပုရာဏံ အတီတကာလိကံ ကမ္မံ တဏှာသိနေဟဿ အပ္ပဟီနတ္တာ ပဋိသန္ဓိအာဟရဏသမတ္ထတာယ အခီဏံယေဝ ဟောတိ, တံ ပုရာဏံ ကမ္မံ ယေသံ အရဟတ္တမဂ္ဂေန တဏှာသိနေဟဿ သောသိတတ္တာ အဂ္ဂိနာ ဒဍ္ဎဗီဇမိဝ အာယတိံ ဝိပါကဒါနာသမတ္ထတာယ ခီဏံ. ယဉ္စ နေသံ ဗုဒ္ဓပူဇာဒိဝသေန ဣဒါနိ ပဝတ္တမာနံ ကမ္မံ နဝန္တိ ဝုစ္စတိ, တဉ္စ တဏှာပဟာနေနေဝ ဆိန္နမူလပါဒပပုပ္ဖမိဝ အာယတိံ ဖလဒါနာသမတ္ထတာယ ယေသံ နတ္ထိ သမ္ဘဝံ, ယေ စ တဏှာပဟာနေနေဝ အာယတိကေ ဘဝသ္မိံ ဝိရတ္တစိတ္တာ, တေ ခီဏာသဝါ ဘိက္ခူ ‘‘ကမ္မံ ခေတ္တံ ဝိညာဏံ ဗီဇ’’န္တိ (အ. နိ. ၃.၇၇) ဧတ္ထ ဝုတ္တဿ ပဋိသန္ဓိဝိညာဏဿ ကမ္မက္ခယေနေဝ ခီဏတ္တာ ခီဏဗီဇာ. ယောပိ ပုဗ္ဗေ ပုနဗ္ဘဝသင်္ခါတာယ ဝိရူဠှိယာ ဆန္ဒော အဟောသိ. တဿပိ သမုဒယပ္ပဟာနေနေဝ ပဟီနတ္တာ ပုဗ္ဗေ ဝိယ စုတိကာလေ အသမ္ဘဝေန အဝိရူဠှိဆန္ဒာ ဓိတိသမ္ပန္နတ္တာ ဓီရာ စရိမဝိညာဏနိရောဓေန ယထာယံ ပဒီပေါ နိဗ္ဗုတော, ဧဝံ နိဗ္ဗန္တိ, ပုန ‘‘ရူပိနော ဝါ အရူပိနော ဝါ’’တိ ဧဝမာဒိံ ပညတ္တိပထံ အစ္စေန္တီတိ. တသ္မိံ ကိရ သမယေ နဂရဒေဝတာနံ ပူဇနတ္ထာယ ဇာလိတေသု ပဒီပေသု ဧကော ပဒီပေါ ဝိဇ္ဈာယိ, တံ ဒဿေန္တော အာဟ ‘‘ယထာယံ ပဒီပေါ’’တိ. इसका क्या अर्थ है? प्राणियों का वह पुराना अतीत का कर्म, जो उत्पन्न होकर निरुद्ध हो चुका है, तृष्णा रूपी स्नेह (चिपचिपाहट) के न छूटने के कारण प्रतिसन्धि (पुनर्जन्म) लाने में समर्थ होने से 'अक्षीण' (क्षीण न हुआ) ही रहता है; वह पुराना कर्म उन (अरहंतों) के लिए, अरहंत मार्ग द्वारा तृष्णा रूपी स्नेह के सुखा दिए जाने के कारण, अग्नि से जले हुए बीज की तरह भविष्य में विपाक देने में असमर्थ होने से 'क्षीण' हो गया है। और उनका जो बुद्ध-पूजा आदि के रूप में वर्तमान में होने वाला कर्म है, उसे 'नया' कहा जाता है; वह भी तृष्णा के प्रहाण से ही, जड़ से कटे हुए वृक्ष के फूल की तरह भविष्य में फल देने में असमर्थ होने के कारण, जिसका 'सम्भव' (उत्पत्ति) नहीं है। और जो तृष्णा के प्रहाण से ही भविष्य के भव में विरक्त चित्त हैं, वे क्षीणाश्रव भिक्षु हैं। "कर्म खेत है, विज्ञान बीज है" - यहाँ कहे गए प्रतिसन्धि-विज्ञान के, कर्म के क्षय होने से ही क्षीण हो जाने के कारण, वे 'क्षीणबीज' हैं। पहले जो पुनर्जन्म रूपी वृद्धि के लिए छन्द (इच्छा) थी, वह भी समुदय (तृष्णा) के प्रहाण से ही नष्ट हो जाने के कारण, पहले की तरह मृत्यु के समय (पुनर्जन्म) न होने से वे 'अविरूळ्हिछन्द' (वृद्धि-रहित इच्छा वाले) हैं। धृति (प्रज्ञा) से सम्पन्न होने के कारण वे 'धीर' हैं। जैसे यह दीपक बुझ गया, वैसे ही वे (अन्तिम विज्ञान के निरोध से) निर्वाण प्राप्त करते हैं (बुझ जाते हैं), और पुनः "रूपी या अरूपी" आदि प्रज्ञप्ति-पथ (नामकरण की सीमा) को पार कर जाते हैं। कहते हैं कि उस समय नगर-देवताओं की पूजा के लिए जलाए गए दीपकों में से एक दीपक बुझ गया था, उसे दिखाते हुए बुद्ध ने कहा - "यथायं पदीपो" (जैसे यह दीपक)। ဧဝံ ဘဂဝါ ယေ တံ ပုရိမာဟိ ဒွီဟိ ဂါထာဟိ ဝုတ္တံ ပရိယတ္တိဓမ္မံ အဿောသုံ, သုတာနုသာရေန စ ပဋိပဇ္ဇိတွာ နဝပ္ပကာရမ္ပိ လောကုတ္တရဓမ္မံ အဓိဂမိံသု, တေသံ အနုပါဒိသေသနိဗ္ဗာနပတ္တိဂုဏံ ဝတွာ ဣဒါနိ တမေဝ ဂုဏံ နိဿာယ သံဃာဓိဋ္ဌာနံ သစ္စဝစနံ ပယုဉ္ဇန္တော ဒေသနံ သမာပေသိ ‘‘ဣဒမ္ပိ သံဃေ’’တိ. တဿတ္ထော [Pg.164] ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. ကေဝလံ ပန ဣဒမ္ပိ ယထာဝုတ္တေန ပကာရေန ခီဏာသဝဘိက္ခူနံ နိဗ္ဗာနသင်္ခါတံ သံဃေ ရတနံ ပဏီတန္တိ ဧဝံ ယောဇေတဗ္ဗံ. ဣမိဿာပိ ဂါထာယ အာဏာ ကောဋိသတသဟဿစက္ကဝါဠေသု အမနုဿေဟိ ပဋိဂ္ဂဟိတာတိ. इस प्रकार भगवान ने, जिन्होंने पहले की दो गाथाओं में कहे गए परियत्ति धर्म को सुना और श्रवण के अनुसार आचरण कर नौ प्रकार के लोकोत्तर धर्म को प्राप्त किया, उनके अनुपधिशेष निर्वाण प्राप्ति के गुण को कहकर, अब उसी गुण का आश्रय लेकर संघ-अधिष्ठान सत्य वचन का प्रयोग करते हुए "इदम्पि सङ्घे" इस गाथा से देशना समाप्त की। इसका अर्थ पहले बताए गए तरीके से ही समझना चाहिए। केवल यहाँ इस प्रकार जोड़ना चाहिए कि "यथोक्त प्रकार से क्षीणाश्रव भिक्षुओं के संघ में जो निर्वाण रूपी रत्न है, वह प्रणीत (श्रेष्ठ) है।" इस गाथा की आज्ञा (शक्ति) को भी एक लाख करोड़ चक्रवातों में अमनुष्यों (देवताओं) द्वारा स्वीकार किया गया। ဒေသနာပရိယောသာနေ ရာဇကုလဿ သောတ္ထိ အဟောသိ, သဗ္ဗူပဒ္ဒဝါ ဝူပသမိံသု, စတုရာသီတိယာ ပါဏသဟဿာနံ ဓမ္မာဘိသမယော အဟောသိ. देशना की समाप्ति पर राजकुल का कल्याण हुआ, सभी उपद्रव शान्त हो गए और चौरासी हजार प्राणियों को धम्माभिसमय (धर्म का साक्षात्कार) हुआ। ယာနီဓာတိဂါထာတ္တယဝဏ္ဏနာ "यानीध" आदि तीन गाथाओं की व्याख्या। ၁၆. အထ သက္ကော ဒေဝါနမိန္ဒော ‘‘ဘဂဝတာ ရတနတ္တယဂုဏံ နိဿာယ သစ္စဝစနံ ပယုဉ္ဇမာနေန နာဂရဿ သောတ္ထိ ကတာ, မယာပိ နာဂရဿ သောတ္ထိတ္ထံ ရတနတ္တယဂုဏံ နိဿာယ ကိဉ္စိ ဝတ္တဗ္ဗ’’န္တိ စိန္တေတွာ အဝသာနေ ဂါထာတ္တယံ အဘာသိ ‘‘ယာနီဓ ဘူတာနီ’’တိ တတ္ထ ယသ္မာ ဗုဒ္ဓေါ ယထာ လောကဟိတတ္ထာယ ဥဿုက္ကံ အာပန္နေဟိ အာဂန္တဗ္ဗံ, တထာ အာဂတတော ယထာ စ တေဟိ ဂန္တဗ္ဗံ, တထာ ဂတတော ယထာ စ တေဟိ အာဇာနိတဗ္ဗံ, တထာ အာဇာနနတော, ယထာ စ ဇာနိတဗ္ဗံ, တထာ ဇာနနတော, ယဉ္စ တထေဝ ဟောတိ, တဿ ဂဒနတော စ ‘‘တထာဂတော’’တိ ဝုစ္စတိ. ယသ္မာ စ သော ဒေဝမနုဿေဟိ ပုပ္ဖဂန္ဓာဒိနာ ဗဟိ နိဗ္ဗတ္တေန ဥပကာရကေန, ဓမ္မာနုဓမ္မပဋိပတ္တာဒိနာ စ အတ္တနိ နိဗ္ဗတ္တေန အတိဝိယ ပူဇိတော, တသ္မာ သက္ကော ဒေဝါနမိန္ဒော သဗ္ဗံ ဒေဝပရိသံ အတ္တနာ သဒ္ဓိံ သမ္ပိဏ္ဍေတွာ အာဟ ‘‘တထာဂတံ ဒေဝမနုဿပူဇိတံ, ဗုဒ္ဓံ နမဿာမ သုဝတ္ထိ ဟောတူ’’တိ. १६. तब देवराज शक्र ने सोचा - "भगवान ने रत्नत्रय के गुणों का आश्रय लेकर सत्य वचन का प्रयोग करते हुए नगर का कल्याण किया है, मुझे भी नगर के कल्याण के लिए रत्नत्रय के गुणों का आश्रय लेकर कुछ कहना चाहिए।" ऐसा सोचकर उन्होंने अन्त में "यानीध भूतानि" आदि तीन गाथाएँ कहीं। वहाँ, क्योंकि बुद्ध वैसे ही आए हैं जैसे लोक-हित के लिए प्रयत्नशील बुद्धों को आना चाहिए, इसलिए वे 'तथागत' हैं; जैसे उन्हें जाना चाहिए वैसे ही वे गए, इसलिए 'तथागत' हैं; जैसा उन्हें जानना चाहिए वैसा ही उन्होंने जाना, इसलिए 'तथागत' हैं; जैसा उन्हें बोध होना चाहिए वैसा ही उन्हें बोध हुआ, इसलिए 'तथागत' हैं; और जो (सत्य) जैसा है वैसा ही कहने के कारण वे 'तथागत' कहे जाते हैं। और क्योंकि वे देवों और मनुष्यों द्वारा बाहर उत्पन्न पुष्प-गन्ध आदि उपकरणों से और स्वयं में उत्पन्न धर्मानुकूल प्रतिपत्ति (आचरण) आदि से अत्यधिक पूजित हैं, इसलिए देवराज शक्र ने समस्त देव-परिषद को अपने साथ सम्मिलित करते हुए कहा - "तथागतं देवमनुस्सपूजितं, बुद्धं नमस्साम सुवत्थि होतु" (देवों और मनुष्यों द्वारा पूजित तथागत बुद्ध को हम नमस्कार करते हैं, कल्याण हो)। ၁၇. ယသ္မာ ပန ဓမ္မေ မဂ္ဂဓမ္မော ယထာ ယုဂနဒ္ဓသမထဝိပဿနာဗလေန ဂန္တဗ္ဗံ ကိလေသပက္ခံ သမုစ္ဆိန္ဒန္တေန, တထာ ဂတောတိ တထာဂတော. နိဗ္ဗာနဓမ္မောပိ ယထာ ဂတော ပညာယ ပဋိဝိဒ္ဓေါ သဗ္ဗဒုက္ခပ္ပဋိဝိဃာတာယ သမ္ပဇ္ဇတိ, ဗုဒ္ဓါဒီဟိ တထာ အဝဂတော, တသ္မာ ‘‘တထာဂတော’’တွေဝ ဝုစ္စတိ. ယသ္မာ စ သံဃောပိ ယထာ အတ္တဟိတာယ ပဋိပန္နေဟိ ဂန္တဗ္ဗံ တေန တေန မဂ္ဂေန, တထာ ဂတောတိ ‘‘တထာဂတော’’တွေဝ ဝုစ္စတိ. တသ္မာ အဝသေသဂါထာဒွယေပိ တထာဂတံ ဓမ္မံ နမဿာမ သုဝတ္ထိ ဟောတု, တထာဂတံ သံဃံ နမဿာမ သုဝတ္ထိ ဟောတူတိ ဝုတ္တံ. သေသံ ဝုတ္တနယမေဝါတိ. १७. और क्योंकि धर्म में, मार्ग-धर्म वैसे ही गया है (प्राप्त किया गया है) जैसे युगनद्ध (युगल) शमथ और विपश्यना के बल से क्लेश-पक्ष का समूल उच्छेद करते हुए जाना चाहिए, इसलिए वह 'तथागत' है। निर्वाण-धर्म भी जैसा है वैसा ही प्रज्ञा द्वारा प्रतिविद्ध (साक्षात्कृत) होने पर सभी दुखों के विनाश के लिए सिद्ध होता है, बुद्ध आदि द्वारा वैसा ही जाना गया है, इसलिए वह 'तथागत' ही कहलाता है। और क्योंकि संघ भी वैसे ही गया है जैसे आत्म-हित के लिए प्रतिपन्न (साधना में लगे) व्यक्तियों को उन-उन मार्गों से जाना चाहिए, इसलिए वह 'तथागत' ही कहलाता है। इसलिए शेष दो गाथाओं में भी "तथागतं धम्मं नमस्साम सुवत्थि होतु" (तथागत धर्म को हम नमस्कार करते हैं, कल्याण हो) और "तथागतं सङ्घं नमस्साम सुवत्थि होतु" (तथागत संघ को हम नमस्कार करते हैं, कल्याण हो) - ऐसा कहा गया है। शेष अर्थ पहले बताए गए तरीके के समान ही है। ဧဝံ [Pg.165] သက္ကော ဒေဝါနမိန္ဒော ဣမံ ဂါထာတ္တယံ ဘာသိတွာ ဘဂဝန္တံ ပဒက္ခိဏံ ကတွာ ဒေဝပုရမေဝ ဂတော သဒ္ဓိံ ဒေဝပရိသာယ. ဘဂဝါ ပန တဒေဝ ရတနသုတ္တံ ဒုတိယဒိဝသေပိ ဒေသေသိ, ပုန စတုရာသီတိယာ ပါဏသဟဿာနံ ဓမ္မာဘိသမယော အဟောသိ, ဧဝံ ယာဝ သတ္တမဒိဝသံ ဒေသေသိ, ဒိဝသေ ဒိဝသေ တထေဝ ဓမ္မာဘိသမယော အဟောသိ. ဘဂဝါ အဍ္ဎမာသမေဝ ဝေသာလိယံ ဝိဟရိတွာ ရာဇူနံ ‘‘ဂစ္ဆာမာ’’တိ ပဋိဝေဒေသိ. တတော ရာဇာနော ဒိဂုဏေန သက္ကာရေန ပုန တီဟိ ဒိဝသေဟိ ဘဂဝန္တံ ဂင်္ဂါတီရံ နယိံသု. ဂင်္ဂါယ နိဗ္ဗတ္တာ နာဂရာဇာနော စိန္တေသုံ ‘‘မနုဿာ တထာဂတဿ သက္ကာရံ ကရောန္တိ, မယံ ကိံ န ကရိဿာမာ’’တိ သုဝဏ္ဏရဇတမဏိမယာ နာဝါယော မာပေတွာ သုဝဏ္ဏရဇတမဏိမယေ ဧဝ ပလ္လင်္ကေ ပညပေတွာ ပဉ္စဝဏ္ဏပဒုမသဉ္ဆန္နံ ဥဒကံ ကရိတွာ ‘‘အမှာကံ အနုဂ္ဂဟံ ကရောထာ’’တိ ဘဂဝန္တံ ယာစိံသု. ဘဂဝါ အဓိဝါသေတွာ ရတနနာဝမာရူဠှော, ပဉ္စ စ ဘိက္ခုသတာနိ ပဉ္စသတံ နာဝါယော အဘိရူဠှာ. နာဂရာဇာနော ဘဂဝန္တံ သဒ္ဓိံ ဘိက္ခုသံဃေန နာဂဘဝနံ ပဝေသေသုံ. တတြ သုဒံ ဘဂဝါ သဗ္ဗရတ္တိံ နာဂပရိသာယ ဓမ္မံ ဒေသေသိ. ဒုတိယဒိဝသေ ဒိဗ္ဗေဟိ ခါဒနီယဘောဇနီယေဟိ မဟာဒါနံ အကံသု, ဘဂဝါ အနုမောဒိတွာ နာဂဘဝနာ နိက္ခမိ. इस प्रकार देवताओं के इंद्र शक्र ने इन तीन गाथाओं को कहकर, भगवान की प्रदक्षिणा की और अपनी देव-परिषद के साथ देवलोक को चले गए। भगवान ने दूसरे दिन भी उसी रतन सुत्त का उपदेश दिया, जिससे पुनः चौरासी हजार प्राणियों को धम्म का साक्षात्कार (धम्माभिसमय) हुआ। इस प्रकार सातवें दिन तक उपदेश दिया, और प्रतिदिन उसी प्रकार धम्माभिसमय हुआ। भगवान आधे महीने तक वैशाली में विहार करने के बाद राजाओं (लिच्छवियों) को सूचित किया कि "हम जा रहे हैं।" तब राजाओं ने दोगुने सत्कार के साथ तीन दिनों में भगवान को पुनः गंगा के तट पर पहुँचाया। गंगा में उत्पन्न नागराजों ने सोचा, "मनुष्य तथागत का सत्कार कर रहे हैं, हम क्यों नहीं करेंगे?" उन्होंने सोने, चाँदी और मणियों से बनी नावें बनाईं, उनमें सोने, चाँदी और मणियों के ही पलंग बिछाए, जल को पाँच रंगों के कमलों से ढँक दिया और भगवान से प्रार्थना की, "हम पर अनुग्रह करें।" भगवान ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और रत्नमयी नौका पर सवार हुए, और पाँच सौ भिक्षु भी पाँच सौ नौकाओं पर सवार हुए। नागराजों ने भिक्षु संघ के साथ भगवान को नागलोक में प्रवेश कराया। वहाँ भगवान ने पूरी रात नाग-परिषद को धम्म का उपदेश दिया। दूसरे दिन उन्होंने दिव्य खाद्य और भोज्य पदार्थों से महादान किया। भगवान ने अनुमोदन किया और नागलोक से प्रस्थान किया। ဘူမဋ္ဌာ ဒေဝါ ‘‘မနုဿာ စ နာဂါ စ တထာဂတဿ သက္ကာရံ ကရောန္တိ, မယံ ကိံ န ကရိဿာမာ’’တိ စိန္တေတွာ ဝနပ္ပဂုမ္ဗရုက္ခပဗ္ဗတာဒီသု ဆတ္တာတိဆတ္တာနိ ဥက္ခိပိံသု. ဧတေနေဝ ဥပါယေန ယာဝ အကနိဋ္ဌဗြဟ္မဘဝနံ, တာဝ မဟာသက္ကာရဝိသေသော နိဗ္ဗတ္တိ. ဗိမ္ဗိသာရောပိ လိစ္ဆဝီဟိ အာဂတကာလေ ကတသက္ကာရတော ဒိဂုဏမကာသိ. ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေနေဝ ပဉ္စဟိ ဒိဝသေဟိ ဘဂဝန္တံ ရာဇဂဟံ အာနေသိ. भूमि पर स्थित देवताओं ने सोचा, "मनुष्य और नाग तथागत का सत्कार कर रहे हैं, हम क्यों नहीं करेंगे?" और उन्होंने वनों, झाड़ियों, वृक्षों और पर्वतों आदि पर छत्रों के ऊपर छत्र लगा दिए। इसी प्रकार अकनिष्ठ ब्रह्मलोक तक महान सत्कार का विशेष आयोजन हुआ। बिम्बिसार ने भी लिच्छवियों द्वारा आगमन के समय किए गए सत्कार से दोगुना सत्कार किया। पूर्व में बताए गए तरीके से ही पाँच दिनों में भगवान को राजगृह ले आए। ရာဇဂဟမနုပ္ပတ္တေ ဘဂဝတိ ပစ္ဆာဘတ္တံ မဏ္ဍလမာဠေ သန္နိပတိတာနံ ဘိက္ခူနံ အယမန္တရကထာ ဥဒပါဒိ ‘‘အဟော ဗုဒ္ဓဿ ဘဂဝတော အာနုဘာဝေါ, ယံ ဥဒ္ဒိဿ ဂင်္ဂါယ ဩရတော စ ပါရတော စ အဋ္ဌယောဇနော ဘူမိဘာဂေါ နိန္နဉ္စ ထလဉ္စ သမံ ကတွာ ဝါလုကာယ ဩကိရိတွာ ပုပ္ဖေဟိ သဉ္ဆန္နော, ယောဇနပ္ပမာဏံ ဂင်္ဂါယ ဥဒကံ နာနာဝဏ္ဏေဟိ ပဒုမေဟိ သဉ္ဆန္နံ, ယာဝ အကနိဋ္ဌဘဝနံ, တာဝ ဆတ္တာတိဆတ္တာနိ ဥဿိတာနီ’’တိ. ဘဂဝါ တံ ပဝတ္တိံ ဉတွာ ဂန္ဓကုဋိတော နိက္ခမိတွာ တင်္ခဏာနုရူပေန ပါဋိဟာရိယေန ဂန္တွာ မဏ္ဍလမာဠေ ပညတ္တဝရဗုဒ္ဓါသနေ နိသီဒိ. နိသဇ္ဇ ခေါ ဘဂဝါ ဘိက္ခူ အာမန္တေသိ – ‘‘ကာယ နုတ္ထ, ဘိက္ခဝေ, ဧတရဟိ ကထာယ သန္နိသိန္နာ’’တိ. ဘိက္ခူ သဗ္ဗံ [Pg.166] အာရောစေသုံ ဘဂဝါ ဧတဒဝေါစ – ‘‘န, ဘိက္ခဝေ, အယံ ပူဇာဝိသေသော မယှံ ဗုဒ္ဓါနုဘာဝေန နိဗ္ဗတ္တော, န နာဂဒေဝဗြဟ္မာနုဘာဝေန, အပိစ ခေါ ပုဗ္ဗေ အပ္ပမတ္တကပရိစ္စာဂါနုဘာဝေန နိဗ္ဗတ္တော’’တိ. ဘိက္ခူ အာဟံသု ‘‘န မယံ, ဘန္တေ, တံ အပ္ပမတ္တကံ ပရိစ္စာဂံ ဇာနာမ, သာဓု နော ဘဂဝါ တထာ ကထေတု, ယထာ မယံ တံ ဇာနေယျာမာ’’တိ. भगवान के राजगृह पहुँचने पर, भोजन के पश्चात मण्डलमार्ग (सभा भवन) में एकत्रित भिक्षुओं के बीच यह चर्चा छिड़ी: "अहो! भगवान बुद्ध का क्या ही प्रभाव है! गंगा के इस पार और उस पार आठ योजन तक की भूमि के ऊँचे-नीचे स्थानों को समतल कर बालू बिछाई गई और फूलों से ढँक दिया गया। गंगा का एक योजन तक का जल विभिन्न रंगों के कमलों से ढँक गया, और अकनिष्ठ लोक तक छत्रों के ऊपर छत्र लगाए गए।" भगवान ने उस बात को जानकर गंधकुटी से बाहर निकले और उस क्षण के अनुरूप प्रातिहार्य (चमत्कार) से मण्डलमार्ग में बिछाए गए श्रेष्ठ बुद्धासन पर विराजमान हुए। विराजमान होकर भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— "भिक्षुओं, तुम अभी किस चर्चा के लिए यहाँ बैठे हो?" भिक्षुओं ने सब कुछ बताया। भगवान ने यह कहा— "भिक्षुओं, यह विशेष पूजा मेरे बुद्ध-प्रभाव से उत्पन्न नहीं हुई है, न ही नागों, देवताओं या ब्रह्मा के प्रभाव से। बल्कि यह पूर्व जन्म में किए गए थोड़े से त्याग (परित्याग) के प्रभाव से उत्पन्न हुई है।" भिक्षुओं ने कहा— "भन्ते, हम उस थोड़े से त्याग को नहीं जानते। अच्छा हो यदि भगवान हमें इस प्रकार बताएँ जिससे हम उसे जान सकें।" ဘဂဝါ အာဟ – ဘူတပုဗ္ဗံ, ဘိက္ခဝေ, တက္ကသိလာယံ သင်္ခေါ နာမ ဗြာဟ္မဏော အဟောသိ. တဿ ပုတ္တော သုသီမော နာမ မာဏဝေါ သောဠသဝဿုဒ္ဒေသိကော ဝယေန. သော ဧကဒိဝသံ ပိတရံ ဥပသင်္ကမိတွာ အဘိဝါဒေတွာ ဧကမန္တံ အဋ္ဌာသိ. အထ တံ ပိတာ အာဟ ‘‘ကိံ, တာတ, သုသီမာ’’တိ? သော အာဟ ‘‘ဣစ္ဆာမဟံ, တာတ, ဗာရာဏသိံ ဂန္တွာ သိပ္ပံ ဥဂ္ဂဟေတု’’န္တိ. ‘‘တေန ဟိ, တာတ, သုသီမ, အသုကော နာမ ဗြာဟ္မဏော မမ သဟာယကော, တဿ သန္တိကံ ဂန္တွာ ဥဂ္ဂဏှာဟီ’’တိ ကဟာပဏသဟဿံ အဒါသိ. သော တံ ဂဟေတွာ မာတာပိတရော အဘိဝါဒေတွာ အနုပုဗ္ဗေန ဗာရာဏသိံ ဂန္တွာ ဥပစာရယုတ္တေန ဝိဓိနာ အာစရိယံ ဥပသင်္ကမိတွာ အဘိဝါဒေတွာ အတ္တာနံ နိဝေဒေသိ. အာစရိယော ‘‘မမ သဟာယကဿ ပုတ္တော’’တိ မာဏဝံ သမ္ပဋိစ္ဆိတွာ သဗ္ဗံ ပါဟုနေယျဝတ္တမကာသိ. သော အဒ္ဓါနကိလမထံ ဝိနောဒေတွာ တံ ကဟာပဏသဟဿံ အာစရိယဿ ပါဒမူလေ ဌပေတွာ သိပ္ပံ ဥဂ္ဂဟေတုံ ဩကာသံ ယာစိ. အာစရိယော ဩကာသံ ကတွာ ဥဂ္ဂဏှာပေသိ. भगवान ने कहा— "भिक्षुओं, प्राचीन काल में तक्षशिला में शंख नाम का एक ब्राह्मण था। उसका सुसीम नाम का एक पुत्र था, जो आयु में लगभग सोलह वर्ष का था। एक दिन वह अपने पिता के पास गया, अभिवादन किया और एक ओर खड़ा हो गया। तब पिता ने उससे कहा— "पुत्र सुसीम, क्या बात है?" उसने कहा— "पिताजी, मैं वाराणसी जाकर शिल्प (विद्या) सीखना चाहता हूँ।" "तो पुत्र सुसीम, अमुक नाम का ब्राह्मण मेरा मित्र है, उसके पास जाकर सीखो," ऐसा कहकर उन्होंने एक हजार कार्षापण दिए। वह उन्हें लेकर, माता-पिता का अभिवादन कर, क्रमशः वाराणसी पहुँचा और उचित विधि-विधान के साथ आचार्य के पास जाकर, अभिवादन कर अपना परिचय दिया। आचार्य ने "यह मेरे मित्र का पुत्र है" कहकर युवक का स्वागत किया और अतिथि-सत्कार के सभी कर्तव्य निभाए। उसने मार्ग की थकान दूर कर, वह एक हजार कार्षापण आचार्य के चरणों में रखे और शिल्प सीखने की अनुमति माँगी। आचार्य ने अनुमति देकर उसे सिखाना शुरू किया।" သော လဟုဉ္စ ဂဏှန္တော, ဗဟုဉ္စ ဂဏှန္တော, ဂဟိတဂဟိတဉ္စ သုဝဏ္ဏဘာဇနေ ပက္ခိတ္တတေလမိဝ အဝိနဿမာနံ ဓာရေန္တော, ဒွါဒသဝဿိကံ သိပ္ပံ ကတိပယမာသေနေဝ ပရိယောသာပေသိ. သော သဇ္ဈာယံ ကရောန္တော အာဒိမဇ္ဈံယေဝ ပဿတိ, နော ပရိယောသာနံ. အထ အာစရိယံ ဥပသင်္ကမိတွာ အာဟ ‘‘ဣမဿ သိပ္ပဿ အာဒိမဇ္ဈမေဝ ပဿာမိ, နော ပရိယောသာန’’န္တိ. အာစရိယော အာဟ ‘‘အဟမ္ပိ, တာတ, ဧဝမေဝါ’’တိ. အထ ကော, အာစရိယ, ဣမဿ သိပ္ပဿ ပရိယောသာနံ ဇာနာတီတိ? ဣသိပတနေ, တာတ, ဣသယော အတ္ထိ, တေ ဇာနေယျုန္တိ. တေ ဥပသင်္ကမိတွာ ပုစ္ဆာမိ, အာစရိယာတိ? ပုစ္ဆ, တာတ, ယထာသုခန္တိ. သော ဣသိပတနံ ဂန္တွာ ပစ္စေကဗုဒ္ဓေ ဥပသင်္ကမိတွာ ပုစ္ဆိ ‘‘အပိ, ဘန္တေ, ပရိယောသာနံ ဇာနာထာ’’တိ? အာမ, အာဝုသော, ဇာနာမာတိ. တံ မမ္ပိ သိက္ခာပေထာတိ. တေန ဟာဝုသော, ပဗ္ဗဇာဟိ, န သက္ကာ အပဗ္ဗဇိတေန သိက္ခာပေတုန္တိ. သာဓု, ဘန္တေ, ပဗ္ဗာဇေထ ဝါ မံ, ယံ ဝါ ဣစ္ဆထ, တံ ကတွာ ပရိယောသာနံ [Pg.167] ဇာနာပေထာတိ. တေ တံ ပဗ္ဗာဇေတွာ ကမ္မဋ္ဌာနေ နိယောဇေတုံ အသမတ္ထာ ‘‘ဧဝံ တေ နိဝါသေတဗ္ဗံ, ဧဝံ ပါရုပိတဗ္ဗ’’န္တိအာဒိနာ နယေန အာဘိသမာစာရိကံ သိက္ခာပေသုံ. သော တတ္ထ သိက္ခန္တော ဥပနိဿယသမ္ပန္နတ္တာ န စိရေနေဝ ပစ္စေကဗောဓိံ အဘိသမ္ဗုဇ္ဈိ. သကလဗာရာဏသိယံ ‘‘သုသီမပစ္စေကဗုဒ္ဓေါ’’တိ ပါကဋော အဟောသိ လာဘဂ္ဂယသဂ္ဂပ္ပတ္တော သမ္ပန္နပရိဝါရော. သော အပ္ပာယုကသံဝတ္တနိကဿ ကမ္မဿ ကတတ္တာ န စိရေနေဝ ပရိနိဗ္ဗာယိ. တဿ ပစ္စေကဗုဒ္ဓါ စ မဟာဇနကာယော စ သရီရကိစ္စံ ကတွာ ဓာတုယော ဂဟေတွာ နဂရဒွါရေ ထူပံ ပတိဋ္ဌာပေသုံ. उस (सुपिम) युवक ने शीघ्रता से और बहुत कुछ सीखते हुए, जो कुछ भी सीखा उसे स्वर्ण पात्र में रखे तेल की भाँति नष्ट न होने देते हुए धारण किया, और बारह वर्षों में सीखी जाने वाली विद्या को कुछ ही महीनों में समाप्त कर लिया। वह स्वाध्याय करते समय केवल आदि और मध्य को ही देखता था, अंत को नहीं। तब उसने आचार्य के पास जाकर कहा, "मैं इस विद्या के आदि और मध्य को तो देखता हूँ, पर अंत को नहीं।" आचार्य ने कहा, "तात! मैं भी वैसा ही हूँ (मुझे भी अंत नहीं पता)।" तब उसने पूछा, "आचार्य! इस विद्या के अंत को कौन जानता है?" आचार्य ने कहा, "तात! ऋषिपतन में प्रत्येक बुद्ध रहते हैं, वे जानते होंगे।" उसने कहा, "आचार्य! मैं उनके पास जाकर पूछूँगा।" आचार्य ने कहा, "तात! सुखपूर्वक पूछो।" वह ऋषिपतन गया और प्रत्येक बुद्धों के पास जाकर पूछा, "भन्ते! क्या आप (विद्या का) अंत जानते हैं?" उन्होंने कहा, "हाँ आवुसो! हम जानते हैं।" उसने कहा, "तो मुझे भी सिखाएँ।" उन्होंने कहा, "आवुसो! तो प्रव्रज्या ग्रहण करो, बिना प्रव्रज्या के सिखाना संभव नहीं है।" उसने कहा, "साधु भन्ते! मुझे प्रव्रजित करें, या जो आप चाहें वह करके मुझे अंत का ज्ञान कराएँ।" उन्होंने उसे प्रव्रजित किया, किन्तु कर्मस्थान में नियुक्त करने में असमर्थ होने के कारण, "तुम्हें ऐसे पहनना चाहिए, ऐसे ओढ़ना चाहिए" आदि विधि से आभिसमाचारिक (आचरण संबंधी) शिक्षा दी। वहाँ शिक्षा ग्रहण करते हुए, उपनिसम्पन्न (पूर्व संस्कारों से युक्त) होने के कारण, उसने शीघ्र ही प्रत्येकबोधि प्राप्त कर ली। वह संपूर्ण वाराणसी में 'सुसीम प्रत्येकबुद्ध' के नाम से प्रसिद्ध हुआ और उसे श्रेष्ठ लाभ, यश तथा अनुयायी प्राप्त हुए। अल्पायु वाले कर्म के कारण उसने शीघ्र ही परिनिर्वाण प्राप्त किया। प्रत्येक बुद्धों और जनसमूह ने उसका शरीर-कृत्य (अंतिम संस्कार) किया और धातुओं को लेकर नगर के द्वार पर स्तूप स्थापित किया। အထ ခေါ သင်္ခေါ ဗြာဟ္မဏော ‘‘ပုတ္တော မေ စိရဂတော, န စဿ ပဝတ္တိံ ဇာနာမီ’’တိ ပုတ္တံ ဒဋ္ဌုကာမော တက္ကသိလာယ နိက္ခမိတွာ အနုပုဗ္ဗေန ဗာရာဏသိံ ဂန္တွာ မဟာဇနကာယံ သန္နိပတိတံ ဒိသွာ ‘‘အဒ္ဓါ ဗဟူသု ဧကောပိ မေ ပုတ္တဿ ပဝတ္တိံ ဇာနိဿတီ’’တိ စိန္တေန္တော ဥပသင်္ကမိတွာ ပုစ္ဆိ ‘‘သုသီမော နာမ မာဏဝေါ ဣဓ အာဂတော အတ္ထိ, အပိ နု တဿ ပဝတ္တိံ ဇာနာထာ’’တိ? တေ ‘‘အာမ, ဗြာဟ္မဏ, ဇာနာမ, ဣမသ္မိံ နဂရေ ဗြာဟ္မဏဿ သန္တိကေ တိဏ္ဏံ ဝေဒါနံ ပါရဂူ ဟုတွာ ပစ္စေကဗုဒ္ဓါနံ သန္တိကေ ပဗ္ဗဇိတွာ ပစ္စေကဗုဒ္ဓေါ ဟုတွာ အနုပါဒိသေသာယ နိဗ္ဗာနဓာတုယာ ပရိနိဗ္ဗာယိ, အယမဿ ထူပေါ ပတိဋ္ဌာပိတော’’တိ အာဟံသု. သော ဘူမိံ ဟတ္ထေန ပဟရိတွာ ရောဒိတွာ စ ပရိဒေဝိတွာ စ တံ စေတိယင်္ဂဏံ ဂန္တွာ တိဏာနိ ဥဒ္ဓရိတွာ ဥတ္တရသာဋကေန ဝါလုကံ အာနေတွာ ပစ္စေကဗုဒ္ဓစေတိယင်္ဂဏေ ဩကိရိတွာ ကမဏ္ဍလုတော ဥဒကေန သမန္တတော ဘူမိံ ပရိပ္ဖောသိတွာ ဝနပုပ္ဖေဟိ ပူဇံ ကတွာ ဥတ္တရသာဋကေန ပဋာကံ အာရောပေတွာ ထူပဿ ဥပရိ အတ္တနော ဆတ္တံ ဗန္ဓိတွာ ပက္ကာမီတိ. तब शंख नामक ब्राह्मण ने सोचा, "मेरा पुत्र बहुत समय से गया हुआ है, मुझे उसके बारे में कुछ पता नहीं है।" पुत्र को देखने की इच्छा से वह तक्षशिला से निकलकर क्रमशः वाराणसी पहुँचा। वहाँ जनसमूह को एकत्रित देख उसने सोचा, "निश्चित ही इतने लोगों में से कोई एक तो मेरे पुत्र का समाचार जानता होगा।" उसने पास जाकर पूछा, "क्या सुसीम नाम का युवक यहाँ आया है? क्या आप उसके बारे में कुछ जानते हैं?" उन्होंने कहा, "हाँ ब्राह्मण! हम जानते हैं। इस नगर में एक ब्राह्मण के पास तीनों वेदों में पारंगत होकर, उसने प्रत्येक बुद्धों के पास प्रव्रज्या ली और प्रत्येक बुद्ध बनकर अनुपधिशेष निर्वाण धातु में परिनिर्वाण प्राप्त किया। यह उन्हीं का स्तूप स्थापित किया गया है।" उसने अपने हाथों से भूमि को पीटा, रोया और विलाप किया। फिर उस चैत्य प्रांगण में जाकर घास उखाड़ी, अपने उत्तरीय वस्त्र से बालू लाकर प्रत्येक बुद्ध के चैत्य प्रांगण में बिखेरी, कमंडलु के जल से चारों ओर भूमि को सींचा, जंगली फूलों से पूजा की, अपने उत्तरीय वस्त्र से ध्वजा फहराई और स्तूप के ऊपर अपना छत्र बाँधकर चला गया। ဧဝံ အတီတံ ဒေသေတွာ ဇာတကံ ပစ္စုပ္ပန္နေန အနုသန္ဓေန္တော ဘိက္ခူနံ ဓမ္မကထံ ကထေသိ. ‘‘သိယာ ခေါ ပန ဝေါ, ဘိက္ခဝေ, ဧဝမဿ ‘အညော နူန တေန သမယေန သင်္ခေါ ဗြာဟ္မဏော အဟောသီ’တိ, န ခေါ ပနေတံ ဧဝံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ, အဟံ တေန သမယေန သင်္ခေါ ဗြာဟ္မဏော အဟောသိံ, မယာ သုသီမဿ ပစ္စေကဗုဒ္ဓဿ စေတိယင်္ဂဏေ တိဏာနိ ဥဒ္ဓဋာနိ, တဿ မေ ကမ္မဿ နိဿန္ဒေန အဋ္ဌယောဇနမဂ္ဂံ ဝိဂတခါဏုကဏ္ဋကံ ကတွာ သမံ သုဒ္ဓမကံသု. မယာ တတ္ထ ဝါလုကာ ဩကိဏ္ဏာ, တဿ မေ နိဿန္ဒေန အဋ္ဌယောဇနမဂ္ဂေ ဝါလုကံ ဩကိရိံသု. မယာ တတ္ထ ဝနကုသုမေဟိ ပူဇာ ကတာ, တဿ မေ နိဿန္ဒေန နဝယောဇနေ မဂ္ဂေ ထလေ စ ဥဒကေ စ နာနာပုပ္ဖေဟိ [Pg.168] ပုပ္ဖသန္ထရမကံသု. မယာ တတ္ထ ကမဏ္ဍလုဒကေန ဘူမိ ပရိပ္ဖောသိတာ, တဿ မေ နိဿန္ဒေန ဝေသာလိယံ ပေါက္ခရဝဿံ ဝဿိ. မယာ တသ္မိံ စေတိယေ ပဋာကာ အာရောပိတာ, ဆတ္တဉ္စ ဗဒ္ဓံ, တဿ မေ နိဿန္ဒေန ယာဝ အကနိဋ္ဌဘဝနာ ပဋာကာ စ အာရောပိတာ, ဆတ္တာတိဆတ္တာနိ စ ဥဿိတာနိ. ဣတိ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, အယံ မယှံ ပူဇာဝိသေသော နေဝ ဗုဒ္ဓါနုဘာဝေန နိဗ္ဗတ္တော, န နာဂဒေဝဗြဟ္မာနုဘာဝေန, အပိစ ခေါ အပ္ပမတ္တကပရိစ္စာဂါနုဘာဝေန နိဗ္ဗတ္တော’’တိ. ဓမ္မကထာပရိယောသာနေ ဣမံ ဂါထမဘာသိ – इस प्रकार अतीत की कथा सुनाकर, जातक को वर्तमान से जोड़ते हुए उन्होंने भिक्षुओं को धर्मोपदेश दिया। "भिक्षुओं! तुम्हें ऐसा लग सकता है कि उस समय शंख ब्राह्मण कोई और था, किन्तु इसे ऐसा नहीं देखना चाहिए। मैं ही उस समय शंख ब्राह्मण था। मैंने सुसीम प्रत्येक बुद्ध के चैत्य प्रांगण में घास उखाड़ी थी, उस कर्म के फल से (मेरे लिए) आठ योजन के मार्ग को खूँटों और काँटों से रहित कर समतल और स्वच्छ बनाया गया। मैंने वहाँ बालू बिखेरी थी, उस कर्म के फल से आठ योजन के मार्ग पर बालू बिखेरी गई। मैंने वहाँ जंगली फूलों से पूजा की थी, उस कर्म के फल से नौ योजन के मार्ग पर स्थल और जल में विभिन्न प्रकार के फूलों की शय्या बिछाई गई। मैंने वहाँ कमंडलु के जल से भूमि को सींचा था, उस कर्म के फल से वैशाली में पोक्खरवस्स (पुष्करवृष्टि) हुई। मैंने उस चैत्य पर ध्वजा फहराई थी और छत्र बाँधा था, उस कर्म के फल से अकनिष्ट भवन तक ध्वजाएँ फहराई गईं और छत्र के ऊपर छत्र लगाए गए। भिक्षुओं! मेरी यह विशिष्ट पूजा न तो बुद्ध के प्रभाव से हुई, न नागों, देवों या ब्रह्मा के प्रभाव से, बल्कि यह थोड़े से त्याग के प्रभाव से उत्पन्न हुई है।" धर्मोपदेश के अंत में उन्होंने यह गाथा कही— ‘‘မတ္တာသုခပရိစ္စာဂါ, ပဿေ စေ ဝိပုလံ သုခံ; စဇေ မတ္တာသုခံ ဓီရော, သမ္ပဿံ ဝိပုလံ သုခ’’န္တိ. (ဓ. ပ. ၂၉၀); "यदि अल्प सुख के त्याग से विपुल सुख दिखाई दे, तो धीर पुरुष विपुल सुख को देखते हुए अल्प सुख का त्याग कर दे।" ပရမတ္ထဇောတိကာယ ခုဒ္ဒကပါဌ-အဋ္ဌကထာယ परमत्थजोतिका नामक खुद्दकपाठ-अट्ठकथा में ရတနသုတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. रतनसुत्त की व्याख्या समाप्त हुई। ၇. တိရောကုဋ္ဋသုတ္တဝဏ္ဏနာ ७. तिरोकुट्टसुत्त की व्याख्या နိက္ခေပပ္ပယောဇနံ निक्षेप का प्रयोजन ဣဒါနိ ‘‘တိရောကုဋ္ဋေသု တိဋ္ဌန္တီ’’တိအာဒိနာ ရတနသုတ္တာနန္တရံ နိက္ခိတ္တဿ တိရောကုဋ္ဋသုတ္တဿ အတ္ထဝဏ္ဏနာက္ကမော အနုပ္ပတ္တော, တဿ ဣဓ နိက္ခေပပ္ပယောဇနံ ဝတွာ အတ္ထဝဏ္ဏနံ ကရိဿာမ. अब "तिरोकुट्टेसु तिट्ठन्ति" आदि से प्रारंभ होने वाले, रतनसुत्त के बाद रखे गए तिरोकुट्टसुत्त की अर्थ-व्याख्या का क्रम प्राप्त हुआ है। यहाँ उसके निक्षेप का प्रयोजन बताकर हम अर्थ-व्याख्या करेंगे। တတ္ထ ဣဒဉှိ တိရောကုဋ္ဋံ ဣမိနာ အနုက္ကမေန ဘဂဝတာ အဝုတ္တမ္ပိ ယာယံ ဣတော ပုဗ္ဗေ နာနပ္ပကာရေန ကုသလကမ္မပဋိပတ္တိ ဒဿိတာ, တတ္ထ ပမာဒံ အာပဇ္ဇမာနော နိရယတိရစ္ဆာနယောနီဟိ ဝိသိဋ္ဌတရေပိ ဌာနေ ဥပ္ပဇ္ဇမာနော ယသ္မာ ဧဝရူပေသု ပေတေသု ဥပ္ပဇ္ဇတိ, တသ္မာ န ဧတ္ထ ပမာဒေါ ကရဏီယောတိ ဒဿနတ္ထံ, ယေဟိ စ ဘူတေဟိ ဥပဒ္ဒုတာယ ဝေသာလိယာ ဥပဒ္ဒဝဝူပသမနတ္ထံ ရတနသုတ္တံ ဝုတ္တံ, တေသု ဧကစ္စာနိ ဧဝရူပါနီတိ ဒဿနတ္ထံ ဝါ ဝုတ္တန္တိ. वहाँ, यद्यपि यह तिरोकुट्ट सुत्त भगवान बुद्ध द्वारा इस क्रम में नहीं कहा गया था, फिर भी इससे पहले विभिन्न प्रकार के कुशल कर्मों के अभ्यास को दिखाया गया है। उस कुशल कर्म के अभ्यास में प्रमाद (लापरवाही) करने वाला व्यक्ति, नरक और तिर्यक योनियों से श्रेष्ठ स्थान में उत्पन्न होने पर भी, जिस कारण से इस प्रकार के प्रेतों में उत्पन्न होता है, इसलिए यहाँ प्रमाद नहीं करना चाहिए—यह दिखाने के लिए यह कहा गया है। अथवा, वैशाली में उपद्रवों की शांति के लिए जो रतन सुत्त कहा गया था, जिन भूतों द्वारा वह उपद्रव किया गया था, उनमें से कुछ इस प्रकार के (प्रेत) होते हैं—यह दिखाने के लिए भी यह कहा गया है। ဣဒမဿ ဣဓ နိက္ခေပပ္ပယောဇနံ ဝေဒိတဗ္ဗံ. यहाँ इस (तिरोकुट्ट सुत्त) को सम्मिलित करने का यह प्रयोजन समझना चाहिए। အနုမောဒနာကထာ अनुमोदना कथा ယသ္မာ [Pg.169] ပနဿ အတ္ထဝဏ္ဏနာ – चूँकि इसकी अर्थ-व्याख्या (इस प्रकार है) — ‘‘ယေန ယတ္ထ ယဒါ ယသ္မာ, တိရောကုဋ္ဋံ ပကာသိတံ; ပကာသေတွာန တံ သဗ္ဗံ, ကယိရမာနာ ယထာက္ကမံ; သုကတာ ဟောတိ တသ္မာဟံ, ကရိဿာမိ တထေဝ တံ’’. जिसके द्वारा, जहाँ, जब और जिस कारण से यह तिरोकुट्ट सुत्त प्रकाशित किया गया; उन सबको क्रम के अनुसार प्रकाशित करते हुए यह व्याख्या अच्छी तरह से की गई है, इसलिए मैं भी उसी प्रकार इसकी व्याख्या करूँगा। ကေန ပနေတံ ပကာသိတံ, ကတ္ထ ကဒါ ကသ္မာ စာတိ? ဝုစ္စတေ – ဘဂဝတာ ပကာသိတံ, တံ ခေါ ပန ရာဇဂဟေ ဒုတိယဒိဝသေ ရညော မာဂဓဿ အနုမောဒနတ္ထံ. ဣမဿ စတ္ထဿ ဝိဘာဝနတ္ထံ အယမေတ္ထ ဝိတ္ထာရကထာ ကထေတဗ္ဗာ – यह किसके द्वारा प्रकाशित किया गया, कहाँ, कब और क्यों? उत्तर दिया जाता है—यह भगवान बुद्ध द्वारा राजगृह में (पहुँचने के) दूसरे दिन मगधराज (बिम्बिसार) के अनुमोदन के लिए कहा गया था। इस अर्थ को स्पष्ट करने के लिए यहाँ यह विस्तृत कथा कही जानी चाहिए— ဣတော ဒွါနဝုတိကပ္ပေ ကာသိ နာမ နဂရံ အဟောသိ. တတ္ထ ဇယသေနော နာမ ရာဇာ. တဿ သိရိမာ နာမ ဒေဝီ, တဿာ ကုစ္ဆိယံ ဖုဿော နာမ ဗောဓိသတ္တော နိဗ္ဗတ္တိတွာ အနုပုဗ္ဗေန သမ္မာသမ္ဗောဓိံ အဘိသမ္ဗုဇ္ဈိ. ဇယသေနော ရာဇာ ‘‘မမ ပုတ္တော အဘိနိက္ခမိတွာ ဗုဒ္ဓေါ ဇာတော, မယှမေဝ ဗုဒ္ဓေါ, မယှံ ဓမ္မော, မယှံ သံဃော’’တိ မမတ္တံ ဥပ္ပာဒေတွာ သဗ္ဗကာလံ သယမေဝ ဥပဋ္ဌဟတိ, န အညေသံ ဩကာသံ ဒေတိ. आज से बानवे (92) कल्प पूर्व कासी नामक एक नगर था। वहाँ जयसेन नाम का राजा था। उसकी सिरिमा नाम की देवी (रानी) थी। उसकी कोख में फुस्स नामक बोधिसत्व उत्पन्न हुए और क्रमशः सम्यक्सम्बुद्धि को प्राप्त हुए। राजा जयसेन ने यह सोचकर कि 'मेरा पुत्र अभिनिष्क्रमण कर बुद्ध बन गया है, बुद्ध केवल मेरे हैं, धर्म मेरा है, संघ मेरा है', ममत्व भाव उत्पन्न कर लिया और वे स्वयं ही सदा सेवा करते थे, दूसरों को अवसर नहीं देते थे। ဘဂဝတော ကနိဋ္ဌဘာတရော ဝေမာတိကာ တယော ဘာတရော စိန္တေသုံ – ‘‘ဗုဒ္ဓါ နာမ သဗ္ဗလောကဟိတာယ ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ, န စေကဿေဝတ္ထာယ, အမှာကဉ္စ ပိတာ အညေသံ ဩကာသံ န ဒေတိ, ကထံ နု မယံ လဘေယျာမ ဘဂဝန္တံ ဥပဋ္ဌာတု’’န္တိ. တေသံ ဧတဒဟောသိ – ‘‘ဟန္ဒ မယံ ကိဉ္စိ ဥပါယံ ကရောမာ’’တိ. တေ ပစ္စန္တံ ကုပိတံ ဝိယ ကာရာပေသုံ. တတော ရာဇာ ‘‘ပစ္စန္တော ကုပိတော’’တိ သုတွာ တယောပိ ပုတ္တေ ပစ္စန္တဝူပသမနတ္ထံ ပေသေသိ. တေ ဝူပသမေတွာ အာဂတာ, ရာဇာ တုဋ္ဌော ဝရံ အဒါသိ ‘‘ယံ ဣစ္ဆထ, တံ ဂဏှထာ’’တိ. တေ ‘‘မယံ ဘဂဝန္တံ ဥပဋ္ဌာတုံ ဣစ္ဆာမာ’’တိ အာဟံသု. ရာဇာ ‘‘ဧတံ ဌပေတွာ အညံ ဂဏှထာ’’တိ အာဟ. တေ ‘‘မယံ အညေန အနတ္ထိကာ’’တိ အာဟံသု. တေန ဟိ ပရိစ္ဆေဒံ ကတွာ ဂဏှထာတိ. တေ သတ္တ ဝဿာနိ ယာစိံသု, ရာဇာ န အဒါသိ. ဧဝံ ဆ, ပဉ္စ, စတ္တာရိ, တီဏိ, ဒွေ, ဧကံ, သတ္တ မာသာနိ, ဆ, ပဉ္စ, စတ္တာရီတိ ယာဝ တေမာသံ ယာစိံသု. ရာဇာ ‘‘ဂဏှထာ’’တိ အဒါသိ. भगवान के तीन सौतेले छोटे भाइयों ने सोचा—'बुद्ध समस्त लोक के कल्याण के लिए उत्पन्न होते हैं, न कि केवल एक व्यक्ति के लिए। और हमारे पिता दूसरों को अवसर नहीं देते। हम भगवान की सेवा करने का अवसर कैसे प्राप्त करें?' उन्हें यह विचार आया—'आओ, हम कोई उपाय करें।' उन्होंने सीमावर्ती क्षेत्र (प्रत्यंत) में विद्रोह जैसा करवा दिया। तब राजा ने यह सुनकर कि 'प्रत्यंत में विद्रोह हो गया है', तीनों पुत्रों को विद्रोह शांत करने के लिए भेजा। उन्होंने विद्रोह शांत कर दिया और जब वे लौटे, तो राजा ने प्रसन्न होकर वरदान दिया—'जो चाहते हो, वह ले लो।' उन्होंने कहा—'हम भगवान की सेवा करना चाहते हैं।' राजा ने कहा—'इसे छोड़कर कुछ और ले लो।' उन्होंने कहा—'हमें और कुछ नहीं चाहिए।' तब (राजा ने कहा)—'समय सीमा निर्धारित कर ले लो।' उन्होंने सात वर्ष तक सेवा करने की याचना की, राजा ने नहीं दिया। इसी प्रकार छह, पाँच, चार, तीन, दो, एक वर्ष, सात महीने, छह, पाँच, चार महीने—इस प्रकार तीन महीने तक की याचना की। राजा ने 'ले लो' कहकर (तीन महीने का समय) दे दिया। တေ ဝရံ လဘိတွာ ပရမတုဋ္ဌာ ဘဂဝန္တံ ဥပသင်္ကမိတွာ ဝန္ဒိတွာ အာဟံသု – ‘‘ဣစ္ဆာမ မယံ, ဘန္တေ, ဘဂဝန္တံ တေမာသံ ဥပဋ္ဌာတုံ, အဓိဝါသေတု နော, ဘန္တေ[Pg.170], ဘဂဝါ ဣမံ တေမာသံ ဝဿာဝါသ’’န္တိ. အဓိဝါသေသိ ဘဂဝါ တုဏှီဘာဝေန. တတော တေ အတ္တနော ဇနပဒေ နိယုတ္တကပုရိသဿ လေခံ ပေသေသုံ ‘‘ဣမံ တေမာသံ အမှေဟိ ဘဂဝါ ဥပဋ္ဌာတဗ္ဗော, ဝိဟာရံ အာဒိံ ကတွာ သဗ္ဗံ ဘဂဝတော ဥပဋ္ဌာနသမ္ဘာရံ ကရောဟီ’’တိ. သော တံ သဗ္ဗံ သမ္ပာဒေတွာ ပဋိနိဝေဒေသိ. တေ ကာသာယဝတ္ထနိဝတ္ထာ ဟုတွာ အဍ္ဎတေယျေဟိ ပုရိသသဟဿေဟိ ဝေယျာဝစ္စကရေဟိ ဘဂဝန္တံ သက္ကစ္စံ ဥပဋ္ဌဟမာနာ ဇနပဒံ နေတွာ ဝိဟာရံ နိယျာတေတွာ ဝသာပေသုံ. वे वरदान पाकर अत्यंत प्रसन्न हुए और भगवान के पास जाकर, वंदना कर बोले—'भन्ते, हम तीन महीने तक भगवान की सेवा करना चाहते हैं। भन्ते, भगवान इन तीन महीनों के वर्षावास को स्वीकार करें।' भगवान ने मौन रहकर स्वीकार किया। तब उन्होंने अपने जनपद के नियुक्त पुरुष (अधिकारी) को पत्र भेजा—'इन तीन महीनों में हमें भगवान की सेवा करनी है। विहार से लेकर भगवान की सेवा की सभी आवश्यक सामग्री तैयार करो।' उसने वह सब संपन्न कर सूचित किया। वे काषाय वस्त्र धारण कर ढाई हजार परिचारकों (वैयावृत्य करने वालों) के साथ भगवान की श्रद्धापूर्वक सेवा करते हुए उन्हें जनपद ले गए और विहार समर्पित कर वहाँ निवास कराया। တေသံ ဘဏ္ဍာဂါရိကော ဧကော ဂဟပတိပုတ္တော သပဇာပတိကော သဒ္ဓေါ အဟောသိ ပသန္နော. သော ဗုဒ္ဓပ္ပမုခဿ သံဃဿ ဒါနဝတ္တံ သက္ကစ္စံ အဒါသိ. ဇနပဒေ နိယုတ္တကပုရိသော တံ ဂဟေတွာ ဇာနပဒေဟိ ဧကာဒသမတ္တေဟိ ပုရိသသဟဿေဟိ သဒ္ဓိံ သက္ကစ္စမေဝ ဒါနံ ပဝတ္တာပေသိ. တတ္ထ ကေစိ ဇာနပဒါ ပဋိဟတစိတ္တာ အဟေသုံ. တေ ဒါနဿ အန္တရာယံ ကတွာ ဒေယျဓမ္မေ အတ္တနာ ခါဒိံသု, ဘတ္တသာလဉ္စ အဂ္ဂိနာ ဒဟိံသု. ပဝါရိတေ ရာဇပုတ္တာ ဘဂဝတော မဟန္တံ သက္ကာရံ ကတွာ ဘဂဝန္တံ ပုရက္ခတွာ ပိတုနော သကာသမေဝ အဂမံသု. တတ္ထ ဂန္တွာ ဧဝ ဘဂဝါ ပရိနိဗ္ဗာယိ. ရာဇာ စ ရာဇပုတ္တာ စ ဇနပဒေ နိယုတ္တကပုရိသော စ ဘဏ္ဍာဂါရိကော စ အနုပုဗ္ဗေန ကာလံ ကတွာ သဒ္ဓိံ ပရိသာယ သဂ္ဂေ ဥပ္ပဇ္ဇိံသု, ပဋိဟတစိတ္တဇနာ နိရယေသု နိဗ္ဗတ္တိံသု. ဧဝံ တေသံ ဒွိန္နံ ဂဏာနံ သဂ္ဂတော သဂ္ဂံ, နိရယတော နိရယံ ဥပပဇ္ဇန္တာနံ ဒွါနဝုတိကပ္ပာ ဝီတိဝတ္တာ. उनमें एक कोषाध्यक्ष (भण्डागारिक), जो एक गृहपति का पुत्र था, अपनी पत्नी के साथ श्रद्धालु और प्रसन्नचित्त था। उसने बुद्ध प्रमुख संघ को श्रद्धापूर्वक दान दिया। जनपद के अधिकारी ने उसे साथ लेकर जनपद के लगभग ग्यारह हजार पुरुषों के साथ श्रद्धापूर्वक दान की व्यवस्था की। वहाँ कुछ जनपदवासी द्वेषपूर्ण चित्त वाले थे। उन्होंने दान में बाधा डाली और दान की वस्तुओं को स्वयं खा लिया, और रसोई (भक्तशाला) को आग लगा दी। वर्षावास की समाप्ति (पवारणा) पर राजकुमारों ने भगवान का महान सत्कार किया और भगवान को आगे कर अपने पिता के पास ही चले गए। वहाँ पहुँचकर ही भगवान परिनिर्वाण को प्राप्त हुए। राजा, राजकुमार, जनपद का अधिकारी और कोषाध्यक्ष क्रमशः काल कवलित होकर अपने अनुयायियों के साथ स्वर्ग में उत्पन्न हुए, और वे द्वेषपूर्ण चित्त वाले लोग नरकों में उत्पन्न हुए। इस प्रकार उन दो समूहों के स्वर्ग से स्वर्ग और नरक से नरक में उत्पन्न होते हुए बानवे (92) कल्प बीत गए। အထ ဣမသ္မိံ ဘဒ္ဒကပ္ပေ ကဿပဗုဒ္ဓဿ ကာလေ တေ ပဋိဟတစိတ္တဇနာ ပေတေသု ဥပ္ပန္နာ. တဒါ မနုဿာ အတ္တနော ဉာတကာနံ ပေတာနံ အတ္ထာယ ဒါနံ ဒတွာ ဥဒ္ဒိသန္တိ ‘‘ဣဒံ အမှာကံ ဉာတီနံ ဟောတူ’’တိ. တေ သမ္ပတ္တိံ လဘန္တိ. အထ ဣမေပိ ပေတာ တံ ဒိသွာ ဘဂဝန္တံ ကဿပံ ဥပသင်္ကမိတွာ ပုစ္ဆိံသု – ‘‘ကိံ နု ခေါ, ဘန္တေ, မယမ္ပိ ဧဝရူပံ သမ္ပတ္တိံ လဘေယျာမာ’’တိ? ဘဂဝါ အာဟ – ‘‘ဣဒါနိ န လဘထ, အပိစ အနာဂတေ ဂေါတမော နာမ ဗုဒ္ဓေါ ဘဝိဿတိ, တဿ ဘဂဝတော ကာလေ ဗိမ္ဗိသာရော နာမ ရာဇာ ဘဝိဿတိ, သော တုမှာကံ ဣတော ဒွါနဝုတိကပ္ပေ ဉာတိ အဟောသိ, သော ဗုဒ္ဓဿ ဒါနံ ဒတွာ တုမှာကံ ဥဒ္ဒိသိဿတိ, တဒါ လဘိဿထာ’’တိ. ဧဝံ ဝုတ္တေ ကိရ တေသံ ပေတာနံ တံ ဝစနံ ‘‘သွေ လဘိဿထာ’’တိ ဝုတ္တံ ဝိယ အဟောသိ. इसके बाद, इस भद्रकल्प में, कश्यप बुद्ध के समय में, वे द्वेषपूर्ण चित्त वाले लोग प्रेतों के रूप में उत्पन्न हुए। तब मनुष्य अपने संबंधी प्रेतों के कल्याण के लिए दान देकर यह संकल्प करते थे— "यह हमारे संबंधियों को प्राप्त हो।" वे प्रेत संपत्ति प्राप्त करते थे। तब इन प्रेतों ने भी उन्हें संपत्ति प्राप्त करते हुए देखकर भगवान कश्यप के पास जाकर पूछा— "भन्ते! क्या हमें भी इस प्रकार की संपत्ति प्राप्त हो सकती है?" भगवान ने कहा— "अभी तुम प्राप्त नहीं करोगे, लेकिन भविष्य में गौतम नाम के बुद्ध होंगे, उन भगवान के समय में बिम्बिसार नाम का राजा होगा। वह इस भद्रकल्प से बानवे (92) कल्प पूर्व तुम्हारा संबंधी था। वह बुद्ध को दान देकर तुम्हारे लिए पुण्य समर्पित करेगा, तब तुम्हें प्राप्त होगा।" ऐसा कहे जाने पर, उन प्रेतों को वह वचन ऐसा लगा जैसे कहा गया हो— "कल तुम्हें प्राप्त होगा।" အထ ဧကသ္မိံ ဗုဒ္ဓန္တရေ ဝီတိဝတ္တေ အမှာကံ ဘဂဝါ လောကေ ဥပ္ပဇ္ဇိ. တေပိ တယော ရာဇပုတ္တာ တေဟိ အဍ္ဎတေယျေဟိ ပုရိသသဟဿေဟိ သဒ္ဓိံ [Pg.171] ဒေဝလောကာ စဝိတွာ မဂဓရဋ္ဌေ ဗြာဟ္မဏကုလေ ဥပ္ပဇ္ဇိတွာ အနုပုဗ္ဗေန ဣသိပဗ္ဗဇ္ဇံ ပဗ္ဗဇိတွာ ဂယာသီသေ တယော ဇဋိလာ အဟေသုံ, ဇနပဒေ နိယုတ္တကပုရိသော, ရာဇာ အဟောသိ ဗိမ္ဗိသာရော, ဘဏ္ဍာဂါရိကော, ဂဟပတိ ဝိသာခေါ နာမ မဟာသေဋ္ဌိ အဟောသိ, တဿ ပဇာပတိ ဓမ္မဒိန္နာ နာမ သေဋ္ဌိဓီတာ အဟောသိ. ဧဝံ သဗ္ဗာပိ အဝသေသာ ပရိသာ ရညော ဧဝ ပရိဝါရာ ဟုတွာ နိဗ္ဗတ္တာ. इसके बाद, एक बुद्ध-अन्तर (दो बुद्धों के बीच का समय) बीत जाने पर, हमारे भगवान लोक में उत्पन्न हुए। वे तीनों राजकुमार भी उन ढाई हजार पुरुषों के साथ देवलोक से च्युत होकर मगध देश में ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुए और क्रमशः ऋषि-प्रव्रज्या लेकर गयाशीर्ष पर्वत पर तीन जटिल (जटाधारी तपस्वी) हुए। जनपद में नियुक्त पुरुष बिम्बिसार राजा हुआ। भण्डागारिक (कोषाध्यक्ष) विशाख नाम का महासेठ हुआ और उसकी पत्नी धम्मदिन्ना नाम की सेठ-पुत्री हुई। इस प्रकार शेष सभी परिषद भी राजा के ही परिवार के रूप में उत्पन्न हुई। အမှာကံ ဘဂဝါ လောကေ ဥပ္ပဇ္ဇိတွာ သတ္တသတ္တာဟံ အတိက္ကမိတွာ အနုပုဗ္ဗေန ဗာရာဏသိံ အာဂမ္မ ဓမ္မစက္ကံ ပဝတ္တေတွာ ပဉ္စဝဂ္ဂိယေ အာဒိံ ကတွာ ယာဝ အဍ္ဎတေယျသဟဿပရိဝါရေ တယော ဇဋိလေ ဝိနေတွာ ရာဇဂဟံ အဂမာသိ. တတ္ထ စ တဒဟုပသင်္ကမန္တံယေဝ ရာဇာနံ ဗိမ္ဗိသာရံ သောတာပတ္တိဖလေ ပတိဋ္ဌာပေသိ ဧကာဒသနဝုတေဟိ မာဂဓကေဟိ ဗြာဟ္မဏဂဟပတိကေဟိ သဒ္ဓိံ. အထ ရညာ သွာတနာယ ဘတ္တေန နိမန္တိတော ဘဂဝါ အဓိဝါသေတွာ ဒုတိယဒိဝသေ သက္ကေန ဒေဝါနမိန္ဒေန ပုရတော ပုရတော ဂစ္ဆန္တေန – हमारे भगवान लोक में उत्पन्न होकर, सात सप्ताह (49 दिन) व्यतीत कर, क्रमशः वाराणसी आकर और धर्मचक्र प्रवर्तन कर, पंचवर्गीय भिक्षुओं को आदि बनाकर, ढाई हजार अनुयायियों वाले उन तीन जटिल तपस्वियों को विनीत कर राजगृह गए। वहाँ उन्होंने उसी दिन दर्शन के लिए आए राजा बिम्बिसार को ग्यारह नहुत (1,10,000) मगधवासी ब्राह्मणों और गृहपतियों के साथ स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित किया। तब राजा द्वारा अगले दिन के भोजन के लिए निमंत्रित किए जाने पर, भगवान ने उसे स्वीकार किया और दूसरे दिन देवराज शक्र द्वारा आगे-आगे चलते हुए— ‘‘ဒန္တော ဒန္တေဟိ သဟ ပုရာဏဇဋိလေဟိ, ဝိပ္ပမုတ္တော ဝိပ္ပမုတ္တေဟိ; သိင်္ဂီနိက္ခသဝဏ္ဏော, ရာဇဂဟံ ပါဝိသိ ဘဂဝါ’’တိ. (မဟာဝ. ၅၈) – "स्वयं दान्त (इन्द्रियजयी) होकर, दान्त हुए पूर्व-जटिलों के साथ; स्वयं विमुक्त होकर, विमुक्तों के साथ; सुवर्ण के निष्क (स्वर्ण-मुद्रा) के समान वर्ण वाले भगवान ने राजगृह में प्रवेश किया।" ဧဝမာဒီဟိ ဂါထာဟိ အဘိတ္ထဝိယမာနော ရာဇဂဟံ ပဝိသိတွာ ရညော နိဝေသနေ မဟာဒါနံ သမ္ပဋိစ္ဆိ. တေ ပေတာ ‘‘ဣဒါနိ ရာဇာ အမှာကံ ဒါနံ ဥဒ္ဒိသိဿတိ, ဣဒါနိ ဥဒ္ဒိသိဿတီ’’တိ အာသာယ ပရိဝါရေတွာ အဋ္ဌံသု. इस प्रकार की गाथाओं से स्तुति किए जाते हुए, भगवान ने राजगृह में प्रवेश कर राजा के भवन में महादान ग्रहण किया। वे प्रेत इस आशा से कि "अब राजा हमारे लिए दान का पुण्य समर्पित करेगा, अब समर्पित करेगा", उन्हें घेरकर खड़े हो गए। ရာဇာ ဒါနံ ဒတွာ ‘‘ကတ္ထ နု ခေါ ဘဂဝါ ဝိဟရေယျာ’’တိ ဘဂဝတော ဝိဟာရဋ္ဌာနမေဝ စိန္တေသိ, န တံ ဒါနံ ကဿစိ ဥဒ္ဒိသိ. ပေတာ ဆိန္နာသာ ဟုတွာ ရတ္တိံ ရညော နိဝေသနေ အတိဝိယ ဘိံသနကံ ဝိဿရမကံသု. ရာဇာ ဘယသံဝေဂသန္တာသမာပဇ္ဇိ, တတော ပဘာတာယ ရတ္တိယာ ဘဂဝတော အာရောစေသိ – ‘‘ဧဝရူပံ သဒ္ဒမဿောသိံ, ကိံ နု ခေါ မေ, ဘန္တေ, ဘဝိဿတီ’’တိ. ဘဂဝါ အာဟ – ‘‘မာ ဘာယိ, မဟာရာဇ, န တေ ကိဉ္စိ ပါပကံ ဘဝိဿတိ, အပိစ ခေါ တေ ပုရာဏဉာတကာ ပေတေသု ဥပ္ပန္နာ သန္တိ, တေ ဧကံ ဗုဒ္ဓန္တရံ တမေဝ ပစ္စာသီသမာနာ ဝိစရန္တိ ‘ဗုဒ္ဓဿ ဒါနံ ဒတွာ အမှာကံ ဥဒ္ဒိသိဿတီ’တိ[Pg.172], န တေသံ တွံ ဟိယျော ဥဒ္ဒိသိ, တေ ဆိန္နာသာ တထာရူပံ ဝိဿရမကံသူ’’တိ. राजा ने दान देकर "भगवान कहाँ विहार करेंगे?"—केवल भगवान के विहार-स्थान के बारे में ही सोचा, उस दान को किसी के लिए समर्पित नहीं किया। प्रेत निराश होकर रात में राजा के भवन में अत्यंत भयानक चीख-पुकार करने लगे। राजा भय, संवेग और त्रास को प्राप्त हुआ। फिर रात बीतने पर उसने भगवान को सूचित किया— "मैंने इस प्रकार का शब्द सुना, भन्ते! मेरे साथ क्या होगा?" भगवान ने कहा— "महाराज! डरो मत, तुम्हारा कुछ भी अनिष्ट नहीं होगा। बल्कि तुम्हारे पुराने संबंधी प्रेतों के रूप में उत्पन्न हुए हैं। वे एक बुद्ध-अन्तर से तुम्हारी ही प्रतीक्षा में भटक रहे हैं कि 'बुद्ध को दान देकर हमारे लिए पुण्य समर्पित करेगा'। तुमने कल उनके लिए पुण्य समर्पित नहीं किया, इसलिए वे निराश होकर इस प्रकार की भयानक चीख-पुकार कर रहे थे।" သော အာဟ ‘‘ဣဒါနိ ပန, ဘန္တေ, ဒိန္နေ လဘေယျု’’န္တိ? ‘‘အာမ, မဟာရာဇာ’’တိ. ‘‘တေန ဟိ မေ, ဘန္တေ, အဓိဝါသေတု ဘဂဝါ အဇ္ဇတနာယ ဒါနံ, တေသံ ဥဒ္ဒိသိဿာမီ’’တိ? ဘဂဝါ အဓိဝါသေသိ. ရာဇာ နိဝေသနံ ဂန္တွာ မဟာဒါနံ ပဋိယာဒေတွာ ဘဂဝတော ကာလံ အာရောစာပေသိ. ဘဂဝါ ရာဇန္တေပုရံ ဂန္တွာ ပညတ္တေ အာသနေ နိသီဒိ သဒ္ဓိံ ဘိက္ခုသံဃေန. တေပိ ခေါ ပေတာ ‘‘အပိ နာမ အဇ္ဇ လဘေယျာမာ’’တိ ဂန္တွာ တိရောကုဋ္ဋာဒီသု အဋ္ဌံသု. ဘဂဝါ တထာ အကာသိ, ယထာ တေ သဗ္ဗေဝ ရညော ပါကဋာ အဟေသုံ. ရာဇာ ဒက္ခိဏောဒကံ ဒေန္တော ‘‘ဣဒံ မေ ဉာတီနံ ဟောတူ’’တိ ဥဒ္ဒိသိ, တင်္ခဏညေဝ တေသံ ပေတာနံ ပဒုမသဉ္ဆန္နာ ပေါက္ခရဏိယော နိဗ္ဗတ္တိံသု. တေ တတ္ထ နှတွာ စ ပိဝိတွာ စ ပဋိပ္ပဿဒ္ဓဒရထကိလမထပိပါသာ သုဝဏ္ဏဝဏ္ဏာ အဟေသုံ. ရာဇာ ယာဂုခဇ္ဇကဘောဇနာနိ ဒတွာ ဥဒ္ဒိသိ, တင်္ခဏညေဝ တေသံ ဒိဗ္ဗယာဂုခဇ္ဇကဘောဇနာနိ နိဗ္ဗတ္တိံသု. တေ တာနိ ပရိဘုဉ္ဇိတွာ ပီဏိန္ဒြိယာ အဟေသုံ. အထ ဝတ္ထသေနာသနာနိ ဒတွာ ဥဒ္ဒိသိ. တေသံ ဒိဗ္ဗဝတ္ထဒိဗ္ဗယာနဒိဗ္ဗပါသာဒဒိဗ္ဗပစ္စတ္ထရဏဒိဗ္ဗသေယျာဒိအလင်္ကာရဝိဓယော နိဗ္ဗတ္တိံသု. သာပိ တေသံ သမ္ပတ္တိ ယထာ သဗ္ဗာဝ ပါကဋာ ဟောတိ, တထာ ဘဂဝါ အဓိဋ္ဌာသိ. ရာဇာ အတိဝိယ အတ္တမနော အဟောသိ. တတော ဘဂဝါ ဘုတ္တာဝီ ပဝါရိတော ရညော မာဂဓဿ အနုမောဒနတ္ထံ ‘‘တိရောကုဋ္ဋေသု တိဋ္ဌန္တီ’’တိ ဣမာ ဂါထာ အဘာသိ. उसने कहा— "भन्ते! क्या अब देने पर वे प्राप्त करेंगे?" "हाँ, महाराज!" "तो भन्ते! भगवान आज के दान को स्वीकार करें, मैं उन्हें पुण्य समर्पित करूँगा।" भगवान ने स्वीकार किया। राजा ने भवन जाकर महादान तैयार करवाया और भगवान को समय की सूचना दी। भगवान राज-अन्तःपुर में जाकर भिक्षु-संघ के साथ बिछाए गए आसन पर बैठ गए। वे प्रेत भी "शायद आज हमें प्राप्त हो जाए" ऐसा सोचकर वहाँ जाकर दीवारों के पीछे आदि स्थानों पर खड़े हो गए। भगवान ने ऐसा किया जिससे वे सभी राजा को स्पष्ट दिखाई देने लगे। राजा ने दान का जल देते हुए संकल्प किया— "यह मेरे संबंधियों को प्राप्त हो।" उसी क्षण उन प्रेतों के लिए कमलों से ढके हुए सरोवर उत्पन्न हो गए। उन्होंने वहाँ स्नान किया और जल पिया, जिससे उनकी जलन, थकान और प्यास शांत हो गई और वे स्वर्ण-वर्ण के हो गए। राजा ने यवागू, खाद्य और भोज्य पदार्थ देकर पुण्य समर्पित किया, उसी क्षण उनके लिए दिव्य यवागू, खाद्य और भोज्य पदार्थ उत्पन्न हो गए। उन्होंने उनका उपभोग किया और उनकी इन्द्रियाँ पुष्ट हो गईं। फिर वस्त्र और शय्या-आसन देकर पुण्य समर्पित किया। उनके लिए दिव्य वस्त्र, दिव्य यान, दिव्य प्रासाद, दिव्य बिछौने और दिव्य शय्या आदि अलंकारों की व्यवस्था उत्पन्न हो गई। भगवान ने ऐसा अधिष्ठान किया जिससे उनकी वह सारी संपत्ति स्पष्ट दिखाई दे। राजा अत्यंत प्रसन्न हुआ। इसके बाद, भगवान ने भोजन कर लेने और पात्र से हाथ हटा लेने पर, मगधराज बिम्बिसार के अनुमोदन के लिए "तिरोकुट्टेसु तिट्ठन्ति" यह गाथा कही। ဧတ္တာဝတာ စ ‘‘ယေန ယတ္ထ ယဒါ ယသ္မာ, တိရောကုဋ္ဋံ ပကာသိတံ, ပကာသေတွာန တံ သဗ္ဗ’’န္တိ အယံ မာတိကာ သင်္ခေပတော ဝိတ္ထာရတော စ ဝိဘတ္တာ ဟောတိ. इतने से और इस वचन-क्रम से— "किसके द्वारा, कहाँ, कब और किसलिए 'तिरोकुट्ट' प्रकाशित किया गया, वह सब प्रकाशित करके"—यह मातृका संक्षेप और विस्तार से व्याख्यायित हो जाती है। ပဌမဂါထာဝဏ္ဏနာ प्रथम गाथा की व्याख्या। ၁. ဣဒါနိ ဣမဿ တိရောကုဋ္ဋဿ ယထာက္ကမံ အတ္ထဝဏ္ဏနံ ကရိဿာမ. သေယျထိဒံ – ပဌမဂါထာယ တာဝ တိရောကုဋ္ဋာတိ ကုဋ္ဋာနံ ပရဘာဂါ ဝုစ္စန္တိ. တိဋ္ဌန္တီတိ နိသဇ္ဇာဒိပ္ပဋိက္ခေပတော ဌာနကပ္ပနဝစနမေတံ. တေန ယထာ ပါကာရပရဘာဂံ ပဗ္ဗတပရဘာဂဉ္စ ဂစ္ဆန္တံ ‘‘တိရောပါကာရံ တိရောပဗ္ဗတံ အသဇ္ဇမာနော ဂစ္ဆတီ’’တိ ဝဒန္တိ, ဧဝမိဓာပိ ကုဋ္ဋဿ ပရဘာဂေသု တိဋ္ဌန္တေ ‘‘တိရောကုဋ္ဋေသု [Pg.173] တိဋ္ဌန္တီ’’တိ အာဟ. သန္ဓိသိင်္ဃာဋကေသု စာတိ ဧတ္ထ သန္ဓိယောတိ စတုက္ကောဏရစ္ဆာ ဝုစ္စန္တိ ဃရသန္ဓိဘိတ္တိသန္ဓိအာလောကသန္ဓိယော စာပိ. သိင်္ဃာဋကာတိ တိကောဏရစ္ဆာ ဝုစ္စန္တိ, တဒေကဇ္ဈံ ကတွာ ပုရိမေန သဒ္ဓိံ သံဃဋေန္တော ‘‘သန္ဓိသိင်္ဃာဋကေသု စာ’’တိ အာဟ. ဒွါရဗာဟာသု တိဋ္ဌန္တီတိ နဂရဒွါရဃရဒွါရာနံ ဗာဟာ နိဿာယ တိဋ္ဌန္တိ. အာဂန္တွာန သကံ ဃရန္တိ ဧတ္ထ သကံ ဃရံ နာမ ပုဗ္ဗဉာတိဃရမ္ပိ အတ္တနာ သာမိကဘာဝေန အဇ္ဈာဝုတ္ထပုဗ္ဗဃရမ္ပိ. တဒုဘယမ္ပိ ယသ္မာ တေ သကဃရသညာယ အာဂစ္ဆန္တိ, တသ္မာ ‘‘အာဂန္တွာန သကံ ဃရ’’န္တိ အာဟ. १. अब हम इस तिरोकुट्ट सुत्त की क्रमानुसार अर्थ-व्याख्या (अत्थवण्णना) करेंगे। वह इस प्रकार है—पहली गाथा में सबसे पहले 'तिरोकुट्टा' का अर्थ दीवारों के बाहरी भाग (परभाग) कहा जाता है। 'तिट्ठन्ति' (खड़े रहते हैं) यह पद बैठने आदि का निषेध करते हुए खड़े रहने की अवस्था को बताने वाला शब्द है। उस 'तिट्ठन्ति' पद के द्वारा, जैसे प्राकार (चारदीवारी) के दूसरी ओर या पर्वत के दूसरी ओर जाने वाले के लिए कहते हैं कि 'वह बिना रुके प्राकार के पार या पर्वत के पार जाता है', वैसे ही यहाँ भी दीवार के बाहरी भागों में स्थित होने के कारण 'तिरोकुट्टेसु तिट्ठन्ति' (दीवारों के पीछे खड़े रहते हैं) कहा गया है। 'सन्धि-सिङ्घाटकेसु च' यहाँ 'सन्धियो' का अर्थ चौराहों की गलियाँ (चतुष्कोण रथ्या) कहा जाता है, और घर के जोड़ों, दीवारों के जोड़ों तथा झरोखों (आलोक-सन्धि) को भी 'सन्धि' कहा जाता है। 'सिङ्घाटका' तिराहों (त्रिकोण रथ्या) को कहा जाता है। उन दोनों पदों को एक साथ करके, पूर्व पद के साथ जोड़ते हुए 'सन्धि-सिङ्घाटकेसु च' कहा गया है। 'द्वारबाहासु तिट्ठन्ति' का अर्थ है कि वे नगर के द्वारों और घरों के द्वारों की चौखटों (बाहा) के सहारे खड़े रहते हैं। 'आगन्त्वान सकं घरं' यहाँ 'सकं घरं' (अपना घर) का अर्थ पूर्व जन्म के रिश्तेदारों का घर भी है और वह घर भी है जहाँ वे स्वयं पहले स्वामी के रूप में रहे थे। उन दोनों ही प्रकार के घरों में चूँकि वे 'यह मेरा घर है' इस संज्ञा से आते हैं, इसलिए 'आगन्त्वान सकं घरं' कहा गया है। ဒုတိယဂါထာဝဏ္ဏနာ दूसरी गाथा की व्याख्या ၂. ဧဝံ ဘဂဝါ ပုဗ္ဗေ အနဇ္ဈာဝုတ္ထပုဗ္ဗမ္ပိ ပုဗ္ဗဉာတိဃရံ ဗိမ္ဗိသာရနိဝေသနံ သကဃရသညာယ အာဂန္တွာ တိရောကုဋ္ဋသန္ဓိသိင်္ဃာဋကဒွါရဗာဟာသု ဌိတေ ဣဿာမစ္ဆရိယဖလံ အနုဘဝန္တေ, အပ္ပေကစ္စေ ဒီဃမဿုကေသဝိကာရဓရေ အန္ဓကာရမုခေ သိထိလဗန္ဓနဝိလမ္ဗမာနကိသဖရုသကာဠကင်္ဂပစ္စင်္ဂေ တတ္ထ တတ္ထ ဌိတဝနဒါဟဒဍ္ဎတာလရုက္ခသဒိသေ, အပ္ပေကစ္စေ ဇိဃစ္ဆာပိပါသာရဏိနိမ္မထနေန ဥဒရတော ဥဋ္ဌာယ မုခတော ဝိနိစ္ဆရန္တာယ အဂ္ဂိဇာလာယ ပရိဍယှမာနသရီရေ, အပ္ပေကစ္စေ သူစိဆိဒ္ဒါဏုမတ္တကဏ္ဌဗိလတာယ ပဗ္ဗတာကာရကုစ္ဆိတာယ စ လဒ္ဓမ္ပိ ပါနဘောဇနံ ယာဝဒတ္ထံ ဘုဉ္ဇိတုံ အသမတ္ထတာယ ခုပ္ပိပါသာပရေတေ အညံ ရသမဝိန္ဒမာနေ, အပ္ပေကစ္စေ အညမညဿ အညေသံ ဝါ သတ္တာနံ ပဘိန္နဂဏ္ဍပိဠကမုခါ ပဂ္ဃရိတရုဓိရပုဗ္ဗလသိကာဒိံ လဒ္ဓါ အမတမိဝ သာယမာနေ အတိဝိယ ဒုဒ္ဒသိကဝိရူပဘယာနကသရီရေ ဗဟူ ပေတေ ရညော နိဒဿေန္တော – २. इस प्रकार भगवान ने बिम्बिसार के महल में—जो उनके पूर्व रिश्तेदारों का घर था और जहाँ वे पहले कभी नहीं रहे थे—'अपने घर' की संज्ञा से आए हुए, दीवारों के पीछे, चौराहों, तिराहों और द्वारों की चौखटों पर खड़े, ईर्ष्या और कंजूसी के फल का अनुभव करते हुए, कुछ लम्बी दाढ़ी वाले, विकृत रूप वाले, अंधकारमय मुख वाले, ढीले जोड़ों के कारण लटकते हुए दुबले, कठोर और काले अंगों वाले, यहाँ-वहाँ स्थित दावानल से जले हुए ताड़ के वृक्षों के समान दिखने वाले, कुछ भूख और प्यास की पीड़ा से मथते हुए पेट से उठकर मुख से निकलती हुई अग्नि की ज्वालाओं से जलते शरीर वाले, कुछ सुई के छेद के समान अत्यंत सूक्ष्म गले वाले और पर्वत के समान विशाल पेट वाले होने के कारण प्राप्त हुए अन्न-पान को भी इच्छानुसार खाने में असमर्थ, भूख-प्यास से पीड़ित और अन्य किसी रस को न पाने वाले, कुछ एक-दूसरे के या अन्य प्राणियों के फटे हुए फोड़ों और फुंसियों के मुख से बहते हुए रक्त, पीप और लसीका आदि को पाकर उसे अमृत के समान चाटते हुए, अत्यंत दुर्दर्शनीय, विरूप और भयानक शरीर वाले बहुत से प्रेतों को राजा को दिखाते हुए— ‘‘တိရောကုဋ္ဋေသု တိဋ္ဌန္တိ, သန္ဓိသိင်္ဃာဋကေသု စ; ဒွါရဗာဟာသု တိဋ္ဌန္တိ, အာဂန္တွာန သကံ ဃရ’’န္တိ. – "वे दीवारों के पीछे खड़े रहते हैं, और चौराहों एवं तिराहों पर; वे अपने (पूर्व) घर आकर द्वारों की चौखटों पर खड़े रहते हैं।"— ဝတွာ ပုန တေဟိ ကတဿ ကမ္မဿ ဒါရုဏဘာဝံ ဒဿေန္တော ‘‘ပဟူတေ အန္နပါနမှီ’’တိ ဒုတိယဂါထမာဟ. यह कहकर, पुनः उनके द्वारा किए गए कर्मों की भयानकता को दिखाते हुए 'पहुते अन्नपानम्हि' (प्रचुर अन्न-पान होने पर) यह दूसरी गाथा कही। တတ္ထ ပဟူတေတိ အနပ္ပကေ ဗဟုမှိ, ယာဝဒတ္ထိကေတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဘ-ကာရဿ ဟိ ဟ-ကာရော လဗ္ဘတိ ‘‘ပဟု သန္တော န ဘရတီ’’တိအာဒီသု (သု. နိ. ၉၈) ဝိယ. ကေစိ ပန ‘‘ဗဟူတေ’’ ဣတိ စ ‘‘ဗဟူကေ’’ ဣတိ စ ပဌန္တိ. ပမာဒပါဌာ ဧတေ[Pg.174]. အန္နေ စ ပါနမှိ စ အန္နပါနမှိ. ခဇ္ဇေ စ ဘောဇ္ဇေ စ ခဇ္ဇဘောဇ္ဇေ, ဧတေန အသိတပီတခါယိတသာယိတဝသေန စတုဗ္ဗိဓံ အာဟာရံ ဒဿေတိ. ဥပဋ္ဌိတေတိ ဥပဂမ္မ ဌိတေ, သဇ္ဇိတေ ပဋိယတ္တေ သမောဟိတေတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. န တေသံ ကောစိ သရတိ, သတ္တာနန္တိ တေသံ ပေတ္တိဝိသယေ ဥပ္ပန္နာနံ သတ္တာနံ ကောစိ မာတာ ဝါ ပိတာ ဝါ ပုတ္တော ဝါ န သရတိ. ကိံ ကာရဏာ? ကမ္မပစ္စယာ, အတ္တနာ ကတဿ အဒါနဒါနပ္ပဋိသေဓနာဒိဘေဒဿ ကဒရိယကမ္မဿ ပစ္စယာ. တဉှိ တေသံ ကမ္မံ ဉာတီနံ သရိတုံ န ဒေတိ. वहाँ 'पहुते' का अर्थ है प्रचुर, बहुत अधिक, इच्छानुसार। यहाँ 'भ' अक्षर के स्थान पर 'ह' अक्षर का प्रयोग हुआ है, जैसे 'पहु सन्तो न भरति' आदि में होता है। कुछ आचार्य 'बहूते' और 'बहूके' पाठ भी पढ़ते हैं, किंतु वे प्रमादवश लिखे गए पाठ हैं। अन्न और पान में—'अन्नपानम्हि'। खाद्य और भोज्य में—'खज्जभोज्जे'। इस पद से खाने, पीने, चबाने और चाटने के भेद से चार प्रकार के आहार को दिखाया गया है। 'उपट्ठिते' का अर्थ है पास में उपस्थित होने पर, तैयार किए जाने पर, सजाए जाने पर। 'न तेसं कोचि सरति सत्तानां' का अर्थ है कि उन प्रेत योनि में उत्पन्न प्राणियों को कोई माता, पिता या पुत्र याद नहीं करता। किस कारण से? कर्म-प्रत्यय के कारण, अर्थात् स्वयं के द्वारा किए गए दान न देने और दान देने से रोकने आदि भेदों वाले कंजूसी के कर्म के कारण। वह कर्म उन्हें रिश्तेदारों द्वारा याद नहीं किए जाने देता। တတိယဂါထာဝဏ္ဏနာ तीसरी गाथा की व्याख्या ၃. ဧဝံ ဘဂဝါ အနပ္ပကေပိ အန္နပါနာဒိမှိ ပစ္စုပဋ္ဌိတေ ‘‘အပိ နာမ အမှေ ဥဒ္ဒိဿ ကိဉ္စိ ဒဒေယျု’’န္တိ ဉာတီ ပစ္စာသီသန္တာနံ ဝိစရတံ တေသံ ပေတာနံ တေဟိ ကတဿ အတိကဋုကဝိပါကကရဿ ကမ္မဿ ပစ္စယေန ကဿစိ ဉာတိနော အနုဿရဏမတ္တာဘာဝံ ဒဿေန္တော – ३. इस प्रकार भगवान, प्रचुर अन्न-पान आदि उपस्थित होने पर भी 'शायद वे हमारे उद्देश्य से कुछ देंगे' इस प्रकार रिश्तेदारों से आशा रखते हुए यहाँ-वहाँ घूमने वाले उन प्रेतों के, उनके द्वारा किए गए अत्यंत कड़वे विपाक वाले कर्म के कारण, किसी भी रिश्तेदार द्वारा याद मात्र भी न किए जाने की स्थिति को दिखाते हुए— ‘‘ပဟူတေ အန္နပါနမှိ, ခဇ္ဇဘောဇ္ဇေ ဥပဋ္ဌိတေ; န တေသံ ကောစိ သရတိ, သတ္တာနံ ကမ္မပစ္စယာ’’တိ. – "प्रचुर अन्न और पान, तथा खाद्य और भोज्य पदार्थों के उपस्थित होने पर भी, उन प्राणियों को उनके कर्मों के कारण कोई याद नहीं करता।"— ဝတွာ ပုန ရညော ပေတ္တိဝိသယူပပန္နေ ဉာတကေ ဥဒ္ဒိဿ ဒိန္နံ ဒါနံ ပသံသန္တော ‘‘ဧဝံ ဒဒန္တိ ဉာတီန’’န္တိ တတိယဂါထမာဟ. यह कहकर, पुनः राजा द्वारा प्रेत योनि में उत्पन्न रिश्तेदारों के उद्देश्य से दिए गए दान की प्रशंसा करते हुए 'एवं ददन्ति ज्ञातीनं' यह तीसरी गाथा कही। တတ္ထ ဧဝန္တိ ဥပမာဝစနံ. တဿ ဒွိဓာ သမ္ဗန္ဓော – တေသံ သတ္တာနံ ကမ္မပစ္စယာ အသရန္တေပိ ကိသ္မိဉ္စိ ဒဒန္တိ, ဉာတီနံ, ယေ ဧဝံ အနုကမ္ပကာ ဟောန္တီတိ စ ယထာ တယာ, မဟာရာဇ, ဒိန္နံ, ဧဝံ သုစိံ ပဏီတံ ကာလေန ကပ္ပိယံ ပါနဘောဇနံ ဒဒန္တိ ဉာတီနံ, ယေ ဟောန္တိ အနုကမ္ပကာတိ စ. ဒဒန္တီတိ ဒေန္တိ ဥဒ္ဒိသန္တိ နိယျာတေန္တိ. ဉာတီနန္တိ မာတိတော စ ပိတိတော စ သမ္ဗန္ဓာနံ. ယေတိ ယေ ကေစိ ပုတ္တာ ဝါ ဓီတရော ဝါ ဘာတရော ဝါ ဟောန္တီတိ ဘဝန္တိ. အနုကမ္ပကာတိ အတ္ထကာမာ ဟိတေသိနော. သုစိန္တိ ဝိမလံ ဒဿနေယျံ မနောရမံ ဓမ္မိကံ ဓမ္မလဒ္ဓံ. ပဏီတန္တိ ဥတ္တမံ သေဋ္ဌံ. ကာလေနာတိ ဉာတိပေတာနံ တိရောကုဋ္ဋာဒီသု အာဂန္တွာ ဌိတကာလေန. ကပ္ပိယန္တိ အနုစ္ဆဝိကံ ပတိရူပံ အရိယာနံ ပရိဘောဂါရဟံ. ပါနဘောဇနန္တိ ပါနဉ္စ ဘောဇနဉ္စ. ဣဓ ပါနဘောဇနမုခေန သဗ္ဗောပိ ဒေယျဓမ္မော အဓိပ္ပေတော. वहाँ 'एवं' यह उपमा वाचक शब्द है। इसका दो प्रकार से सम्बन्ध समझना चाहिए—उन प्राणियों के कर्म-प्रत्यय के कारण याद न करने पर भी, जो रिश्तेदार इस प्रकार अनुकम्पा करने वाले होते हैं, वे किसी कारण से दान देते हैं—एक सम्बन्ध यह है। दूसरा यह कि—हे महाराज! जैसे आपके द्वारा दिया गया है, वैसे ही जो रिश्तेदार अपने प्रेत-रिश्तेदारों के प्रति अनुकम्पा करने वाले होते हैं, वे समय पर शुद्ध, उत्तम और कल्पनीय (उचित) अन्न-पान देते हैं। 'ददन्ति' का अर्थ है देते हैं, समर्पित करते हैं। 'ज्ञातीनं' का अर्थ है माता और पिता की ओर से सम्बन्धित व्यक्तियों को। 'ये' का अर्थ है जो कोई भी पुत्र, पुत्री या भाई आदि होते हैं। 'अनुकम्पका' का अर्थ है हित चाहने वाले और कल्याण की इच्छा रखने वाले। 'सुचिं' का अर्थ है निर्मल, दर्शनीय, मनमोहक और धर्मपूर्वक प्राप्त। 'पणीतं' का अर्थ है उत्तम, श्रेष्ठ। 'कालेन' का अर्थ है प्रेत-रिश्तेदारों के दीवारों के पीछे आदि स्थानों पर आने के समय पर। 'कप्पियं' का अर्थ है योग्य, उचित और आर्यों के उपभोग के योग्य। 'पानभोजनं' का अर्थ है पेय और भोज्य पदार्थ। यहाँ अन्न-पान के माध्यम से सभी प्रकार की दान-वस्तुएँ (देयधम्म) अभिप्रेत हैं। စတုတ္ထဂါထာပုဗ္ဗဒ္ဓဝဏ္ဏနာ चौथी गाथा के पूर्वार्ध की व्याख्या ၄. ဧဝံ [Pg.175] ဘဂဝါ ရညာ မာဂဓေန ပေတဘူတာနံ ဉာတီနံ အနုကမ္ပာယ ဒိန္နံ ပါနဘောဇနံ ပသံသန္တော – ४. इस प्रकार भगवान, मगधराज द्वारा प्रेत बने रिश्तेदारों के प्रति अनुकम्पा से दिए गए अन्न-पान की प्रशंसा करते हुए— ‘‘ဧဝံ ဒဒန္တိ ဉာတီနံ, ယေ ဟောန္တိ အနုကမ္ပကာ; သုစိံ ပဏီတံ ကာလေန, ကပ္ပိယံ ပါနဘောဇန’’န္တိ. – जो अनुकम्पा करने वाले (दयालु) होते हैं, वे अपने (प्रेत) सम्बन्धियों को इस प्रकार समय पर शुद्ध, उत्तम और कल्पनीय (उपयुक्त) खान-पान प्रदान करते हैं। ဝတွာ ပုန ယေန ပကာရေန ဒိန္နံ တေသံ ဟောတိ, တံ ဒဿေန္တော ‘‘ဣဒံ ဝေါ ဉာတီနံ ဟောတူ’’တိ စတုတ္ထဂါထာယ ပုဗ္ဗဒ္ဓမာဟ တံ တတိယဂါထာယ ပုဗ္ဗဒ္ဓေန သမ္ဗန္ဓိတဗ္ဗံ – यह कहकर, फिर जिस प्रकार से दिया हुआ दान उन (प्रेतों) को प्राप्त होता है, उसे दिखाते हुए "इदं वो ज्ञातीनं होतु" (यह दान तुम्हारे सम्बन्धियों को प्राप्त हो) - इस चौथी गाथा के पूर्वार्ध को कहा। इसे तीसरी गाथा के पूर्वार्ध के साथ जोड़ना चाहिए। ‘‘ဧဝံ ဒဒန္တိ ဉာတီနံ, ယေ ဟောန္တိ အနုကမ္ပကာ; ဣဒံ ဝေါ ဉာတီနံ ဟောတု, သုခိတာ ဟောန္တု ဉာတယော’’တိ. "जो अनुकम्पा करने वाले होते हैं, वे अपने सम्बन्धियों को इस प्रकार दान देते हैं— 'यह (दान) तुम्हारे सम्बन्धियों को प्राप्त हो, सम्बन्धी सुखी हों'।" တေန ‘‘ဣဒံ ဝေါ ဉာတီနံ ဟောတူတိ ဧဝံ ဒဒန္တိ, နော အညထာ’’တိ ဧတ္ထ အာကာရတ္ထေန ဧဝံသဒ္ဒေန ဒါတဗ္ဗာကာရနိဒဿနံ ကတံ ဟောတိ. इससे "यह तुम्हारे सम्बन्धियों को प्राप्त हो—इस प्रकार देते हैं, अन्य प्रकार से नहीं"—यहाँ 'एवं' शब्द के द्वारा दान देने की विधि का प्रदर्शन किया गया है। တတ္ထ ဣဒန္တိ ဒေယျဓမ္မနိဒဿနံ. ဝေါတိ ‘‘ကစ္စိ ပန ဝေါ အနုရုဒ္ဓါ သမဂ္ဂါ သမ္မောဒမာနာ’’တိ စ (မ. နိ. ၁.၃၂၆; မဟာဝ. ၄၆၆), ‘‘ယေဟိ ဝေါ အရိယာ’’တိ စ ဧဝမာဒီသု ဝိယ ကေဝလံ နိပါတမတ္တံ, န သာမိဝစနံ. ဉာတီနံ ဟောတူတိ ပေတ္တိဝိသယေ ဥပ္ပန္နာနံ ဉာတကာနံ ဟောတု. သုခိတာ ဟောန္တု ဉာတယောတိ တေ ပေတ္တိဝိသယူပပန္နာ ဉာတယော ဣဒံ ပစ္စနုဘဝန္တာ သုခိတာ ဟောန္တူတိ. वहाँ 'इदं' देय-धर्म (दान की वस्तु) का सूचक है। 'वो' शब्द... केवल एक निपात मात्र है, षष्ठी विभक्ति (सम्बन्ध कारक) नहीं। 'ज्ञातीनं होतु' का अर्थ है—प्रेत लोक में उत्पन्न हुए सम्बन्धियों को प्राप्त हो। 'सुखिता होन्तु ज्ञातयो' का अर्थ है—वे प्रेत लोक में उत्पन्न सम्बन्धी इस (दान के फल) का अनुभव करते हुए सुखी हों। စတုတ္ထဂါထာပရဒ္ဓပဉ္စမဂါထာပုဗ္ဗဒ္ဓဝဏ္ဏနာ चौथी गाथा के उत्तरार्ध और पाँचवीं गाथा के पूर्वार्ध की व्याख्या। ၄-၅. ဧဝံ ဘဂဝါ ယေန ပကာရေန ပေတ္တိဝိသယူပပန္နာနံ ဉာတီနံ ဒါတဗ္ဗံ, တံ ဒဿေန္တော ‘‘ဣဒံ ဝေါ ဉာတီနံ ဟောတု, သုခိတာ ဟောန္တု ဉာတယော’’တိ ဝတွာ ပုန ယသ္မာ ‘‘ဣဒံ ဝေါ ဉာတီနံ ဟောတူ’’တိ ဝုတ္တေပိ န အညေန ကတံ ကမ္မံ အညဿ ဖလဒံ ဟောတိ, ကေဝလန္တု တထာ ဥဒ္ဒိဿ ဒိယျမာနံ တံ ဝတ္ထု ဉာတီနံ ကုသလကမ္မဿ ပစ္စယော ဟောတိ. တသ္မာ ယထာ တေသံ တသ္မိံယေဝ ဝတ္ထုသ္မိံ တင်္ခဏေ ဖလနိဗ္ဗတ္တကံ ကုသလကမ္မံ ဟောတိ, တံ ဒဿေန္တော ‘‘တေ စ တတ္ထာ’’တိ စတုတ္ထဂါထာယ ပစ္ဆိမဒ္ဓံ ‘‘ပဟူတေ အန္နပါနမှီ’’တိ ပဉ္စမဂါထာယ ပုဗ္ဗဒ္ဓဉ္စ အာဟ. ४-५. इस प्रकार भगवान ने जिस विधि से प्रेत योनि में उत्पन्न सम्बन्धियों को दान देना चाहिए, उसे दिखाते हुए 'इदं वो ज्ञातीनं होतु, सुखिता होन्तु ज्ञातयो' कहकर, फिर चूँकि 'इदं वो ज्ञातीनं होतु' कहने पर भी किसी अन्य द्वारा किया गया कर्म किसी दूसरे को फल देने वाला नहीं होता, बल्कि केवल उस प्रकार से उद्देश्य करके दी जाने वाली वह वस्तु (दान) उन सम्बन्धियों के कुशल कर्म के लिए प्रत्यय (कारण) बनती है। इसलिए, जिस प्रकार उन्हें उसी वस्तु के आधार पर उसी क्षण फल देने वाला कुशल कर्म प्राप्त होता है, उसे दिखाते हुए 'ते च तत्थ'—इस चौथी गाथा का उत्तरार्ध और 'पहूते अन्नपानम्हि'—इस पाँचवीं गाथा का पूर्वार्ध कहा। တေသံ [Pg.176] အတ္ထော – တေ ဉာတိပေတာ ယတ္ထ တံ ဒါနံ ဒီယတိ, တတ္ထ သမန္တတော အာဂန္တွာ သမာဂန္တွာ, သမောဓာယ ဝါ ဧကဇ္ဈံ ဟုတွာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ, သမ္မာ အာဂတာ သမာဂတာ ‘‘ဣမေ နော ဉာတယော အမှာကံ အတ္ထာယ ဒါနံ ဥဒ္ဒိသိဿန္တီ’’တိ ဧတဒတ္ထံ သမ္မာ အာဂတာ ဟုတွာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ပဟူတေ အန္နပါနမှီတိ တသ္မိံ အတ္တနော ဥဒ္ဒိဿမာနေ ပဟူတေ အန္နပါနမှိ. သက္ကစ္စံ အနုမောဒရေတိ အဘိသဒ္ဒဟန္တာ ကမ္မဖလံ အဝိဇဟန္တာ စိတ္တီကာရံ အဝိက္ခိတ္တစိတ္တာ ဟုတွာ ‘‘ဣဒံ နော ဒါနံ ဟိတာယ သုခါယ ဟောတူ’’တိ မောဒန္တိ အနုမောဒန္တိ, ပီတိသောမနဿဇာတာ ဟောန္တီတိ. उनका अर्थ है—वे ज्ञाति-प्रेत जहाँ वह दान दिया जाता है, वहाँ चारों ओर से आकर, एकत्रित होकर, या सम्मिलित होकर एक साथ होते हैं। 'समागत' का अर्थ है—अच्छी तरह आए हुए, यह सोचकर कि 'ये हमारे सम्बन्धी हमारे लिए दान का उद्देश्य करेंगे', इस प्रयोजन के लिए भली-भाँति आए हुए। 'पहूते अन्नपानम्हि' का अर्थ है—अपने लिए उद्दिष्ट उस प्रचुर अन्न और पान के होने पर। 'सक्कच्चं अनुमोदरे' का अर्थ है—कर्म-फल में पूर्ण श्रद्धा रखते हुए, उसे न छोड़ते हुए, आदरपूर्वक और एकाग्र चित्त होकर 'यह दान हमारे हित और सुख के लिए हो'—ऐसा मानकर वे प्रसन्न होते हैं, अनुमोदन करते हैं और प्रीति एवं सौमनस्य से युक्त होते हैं। ပဉ္စမဂါထာပရဒ္ဓဆဋ္ဌဂါထာပုဗ္ဗဒ္ဓဝဏ္ဏနာ पाँचवीं गाथा के उत्तरार्ध और छठी गाथा के पूर्वार्ध की व्याख्या। ၅-၆. ဧဝံ ဘဂဝါ ယထာ ပေတ္တိဝိသယူပပန္နာနံ တင်္ခဏေ ဖလနိဗ္ဗတ္တကံ ကုသလံ ကမ္မံ ဟောတိ, တံ ဒဿေန္တော – ५-६. इस प्रकार भगवान ने जिस प्रकार प्रेत योनि में उत्पन्न प्राणियों को उसी क्षण फल देने वाला कुशल कर्म होता है, उसे दिखाते हुए— ‘‘တေ စ တတ္ထ သမာဂန္တွာ, ဉာတိပေတာ သမာဂတာ; ပဟူတေ အန္နပါနမှိ, သက္ကစ္စံ အနုမောဒရေ’’တိ. – "वे ज्ञाति-प्रेत वहाँ एकत्रित होकर, प्रचुर अन्न और पान मिलने पर, आदरपूर्वक अनुमोदन करते हैं।" ဝတွာ ပုန ဉာတကေ နိဿာယ နိဗ္ဗတ္တကုသလကမ္မဖလံ ပစ္စနုဘောန္တာနံ တေသံ ဉာတီ အာရဗ္ဘ ထောမနာကာရံ ဒဿေန္တော ‘‘စိရံ ဇီဝန္တူ’’တိ ပဉ္စမဂါထာယ ပစ္ဆိမဒ္ဓံ ‘‘အမှာကဉ္စ ကတာ ပူဇာ’’တိ ဆဋ္ဌဂါထာယ ပုဗ္ဗဒ္ဓဉ္စ အာဟ. यह कहकर, फिर सम्बन्धियों के आश्रय से उत्पन्न कुशल कर्म के फल का अनुभव करने वाले उन (प्रेतों) के सम्बन्धियों के प्रति प्रशंसा के भाव को दिखाते हुए 'चिरं जीवन्तु'—इस पाँचवीं गाथा का उत्तरार्ध और 'अम्हाकञ्च कता पूजा'—इस छठी गाथा का पूर्वार्ध कहा। တေသံ အတ္ထော – စိရံ ဇီဝန္တူတိ စိရဇီဝိနော ဒီဃာယုကာ ဟောန္တု. နော ဉာတီတိ အမှာကံ ဉာတကာ. ယေသံ ဟေတူတိ ယေ နိဿာယ ယေသံ ကာရဏာ. လဘာမသေတိ လဘာမ. အတ္တနာ တင်္ခဏံ ပဋိလဒ္ဓသမ္ပတ္တိံ အပဒိသန္တာ ဘဏန္တိ. ပေတာနဉှိ အတ္တနော အနုမောဒနေန, ဒါယကာနံ ဥဒ္ဒေသေန, ဒက္ခိဏေယျသမ္ပဒါယ စာတိ တီဟိ အင်္ဂေဟိ ဒက္ခိဏာ သမိဇ္ဈတိ, တင်္ခဏေ ဖလနိဗ္ဗတ္တိကာ ဟောတိ. တတ္ထ ဒါယကာ ဝိသေသဟေတု. တေနာဟံသု ‘‘ယေသံ ဟေတု လဘာမသေ’’တိ. အမှာကဉ္စ ကတာ ပူဇာတိ ‘‘ဣဒံ ဝေါ ဉာတီနံ ဟောတူ’’တိ ဧဝံ ဣမံ ဒါနံ ဥဒ္ဒိသန္တေဟိ အမှာကဉ္စ ပူဇာ ကတာ. ဒါယကာ စ အနိပ္ဖလာတိ ယမှိ သန္တာနေ ပရိစ္စာဂမယံ ကမ္မံ ကတံ, တဿ တတ္ထေဝ ဖလဒါနတော ဒါယကာ စ အနိပ္ဖလာတိ. उनका अर्थ है—'चिरं जीवन्तु' अर्थात् वे चिरजीवी और दीर्घायु हों। 'नो ज्ञाती' अर्थात् हमारे सम्बन्धी। 'येसं हेतु' अर्थात् जिनके आश्रय से, जिनके कारण। 'लभांसे' अर्थात् हम प्राप्त करते हैं। वे स्वयं उस क्षण प्राप्त हुई सम्पत्ति को देखते हुए ऐसा कहते हैं। क्योंकि प्रेतों के लिए स्वयं के अनुमोदन से, दाताओं के उद्देश्य (संकल्प) से और दक्षिणीय (दान लेने वाले) की सम्पन्नता से—इन तीन अंगों से दक्षिणा (दान) सिद्ध होती है और उसी क्षण फल देने वाली होती है। वहाँ दाता विशेष कारण होते हैं। इसीलिए उन्होंने कहा—'येसं हेतु लभांसे'। 'अम्हाकञ्च कता पूजा' का अर्थ है—'यह तुम्हारे सम्बन्धियों को प्राप्त हो'—इस प्रकार इस दान का उद्देश्य करने वालों द्वारा हमारी पूजा (सत्कार) की गई है। 'दायका च अनिप्फला' का अर्थ है—जिस (चित्त) सन्तति में त्याग-मय कर्म किया गया है, उसे वहीं फल प्राप्त होने के कारण दाता भी निष्फल नहीं होते। ဧတ္ထာဟ [Pg.177] – ‘‘ကိံ ပန ပေတ္တိဝိသယူပပန္နာ ဧဝ ဉာတယော လဘန္တိ, ဥဒါဟု အညေပိ လဘန္တီ’’တိ? ဝုစ္စတေ – ဘဂဝတာ ဧဝေတံ ဗျာကတံ ဇာဏုဿောဏိနာ ဗြာဟ္မဏေန ပုဋ္ဌေန, ကိမေတ္ထ အမှေဟိ ဝတ္တဗ္ဗံ အတ္ထိ. ဝုတ္တံ ဟေတံ – यहाँ (कोई) पूछता है—'क्या केवल प्रेत योनि में उत्पन्न सम्बन्धी ही (दान) प्राप्त करते हैं, अथवा अन्य भी प्राप्त करते हैं?' उत्तर में कहा जाता है—भगवान ने ही जानुस्सोणि ब्राह्मण द्वारा पूछे जाने पर इसका स्पष्टीकरण दिया था कि 'यहाँ हमारे द्वारा क्या कहा जाना चाहिए'। यह कहा गया है— ‘‘မယမဿု, ဘော ဂေါတမ, ဗြာဟ္မဏာ နာမ ဒါနာနိ ဒေမ, သဒ္ဓါနိ ကရောမ ‘ဣဒံ ဒါနံ ပေတာနံ ဉာတိသာလောဟိတာနံ ဥပကပ္ပတု, ဣဒံ ဒါနံ ပေတာ ဉာတိသာလောဟိတာ ပရိဘုဉ္ဇန္တူ’တိ, ကစ္စိ တံ, ဘော ဂေါတမ, ဒါနံ ပေတာနံ ဉာတိသာလောဟိတာနံ ဥပကပ္ပတိ, ကစ္စိ တေ ပေတာ ဉာတိသာလောဟိတာ တံ ဒါနံ ပရိဘုဉ္ဇန္တီတိ. ဌာနေ ခေါ, ဗြာဟ္မဏ, ဥပကပ္ပတိ, နော အဋ္ဌာနေတိ. 'हे गौतम! हम ब्राह्मण दान देते हैं, श्राद्ध करते हैं (यह सोचकर कि)—'यह दान प्रेत हुए ज्ञाति-सम्बन्धियों को प्राप्त हो, प्रेत ज्ञाति-सम्बन्धी इस दान का उपभोग करें'। हे गौतम! क्या वह दान प्रेत हुए ज्ञाति-सम्बन्धियों को प्राप्त होता है? क्या वे प्रेत ज्ञाति-सम्बन्धी उस दान का उपभोग करते हैं?' 'हे ब्राह्मण! स्थान (उचित स्थिति) में तो प्राप्त होता है, अस्थान (अनुचित स्थिति) में नहीं'। ‘‘ကတမံ ပန တံ, ဘော ဂေါတမ, ဌာနံ, ကတမံ အဋ္ဌာနန္တိ? ဣဓ, ဗြာဟ္မဏ, ဧကစ္စော ပါဏာတိပါတီ ဟောတိ…ပေ… မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိကော ဟောတိ, သော ကာယဿ ဘေဒါ ပရံ မရဏာ နိရယံ ဥပပဇ္ဇတိ. ယော နေရယိကာနံ သတ္တာနံ အာဟာရော, တေန သော တတ္ထ ယာပေတိ, တေန သော တတ္ထ တိဋ္ဌတိ. ဣဒံ ခေါ, ဗြာဟ္မဏ, အဋ္ဌာနံ, ယတ္ထ ဌိတဿ တံ ဒါနံ န ဥပကပ္ပတိ. 'हे गौतम! वह स्थान कौन सा है और अस्थान कौन सा है?' 'हे ब्राह्मण! यहाँ कोई प्राणी हिंसा करने वाला होता है... (पेय्याल)... मिथ्यादृष्टि होता है, वह शरीर के भेद होने पर मृत्यु के बाद नरक में उत्पन्न होता है। जो नारकीय जीवों का आहार है, उससे वह वहाँ यापन करता है, उसी से वह वहाँ टिकता है। हे ब्राह्मण! यह 'अस्थान' है, जहाँ स्थित प्राणी को वह दान प्राप्त नहीं होता'। ‘‘ဣဓ ပန, ဗြာဟ္မဏ, ဧကစ္စော ပါဏာတိပါတီ ဟောတိ…ပေ… မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိကော ဟောတိ, သော ကာယဿ ဘေဒါ ပရံ မရဏာ တိရစ္ဆာနယောနိံ ဥပပဇ္ဇတိ. ယော တိရစ္ဆာနယောနိကာနံ သတ္တာနံ အာဟာရော, တေန သော တတ္ထ ယာပေတိ, တေန သော တတ္ထ တိဋ္ဌတိ. ဣဒမ္ပိ ခေါ, ဗြာဟ္မဏ, အဋ္ဌာနံ, ယတ္ထ ဌိတဿ တံ ဒါနံ န ဥပကပ္ပတိ. "हे ब्राह्मण! यहाँ कोई व्यक्ति प्राणी-हिंसक होता है... (पे)... मिथ्यादृष्टि होता है। वह शरीर के भेद होने पर मृत्यु के बाद तिर्यक (पशु) योनि में उत्पन्न होता है। तिर्यक योनि के प्राणियों का जो आहार होता है, उसी से वह वहाँ जीवन यापन करता है और उसी से वह वहाँ जीवित रहता है। हे ब्राह्मण! यह भी वह स्थान (अवस्था) है जहाँ स्थित होने पर वह दान (उसे) प्राप्त नहीं होता।" ‘‘ဣဓ ပန, ဗြာဟ္မဏ, ဧကစ္စော ပါဏာတိပါတာ ပဋိဝိရတော ဟောတိ…ပေ… သမ္မာဒိဋ္ဌိကော ဟောတိ, သော ကာယဿ ဘေဒါ ပရံ မရဏာ မနုဿာနံ သဟဗျတံ ဥပပဇ္ဇတိ…ပေ… ဒေဝါနံ သဟဗျတံ ဥပပဇ္ဇတိ. ယော ဒေဝါနံ အာဟာရော, တေန သော တတ္ထ ယာပေတိ, တေန သော တတ္ထ တိဋ္ဌတိ. ဣဒမ္ပိ ခေါ, ဗြာဟ္မဏ, အဋ္ဌာနံ, ယတ္ထ ဌိတဿ တံ ဒါနံ န ဥပကပ္ပတိ. "हे ब्राह्मण! यहाँ कोई व्यक्ति प्राणी-हिंसा से विरत होता है... (पे)... सम्यकदृष्टि होता है। वह शरीर के भेद होने पर मृत्यु के बाद मनुष्यों के लोक में उत्पन्न होता है... (पे)... देवों के लोक में उत्पन्न होता है। देवों का जो आहार होता है, उसी से वह वहाँ जीवन यापन करता है और उसी से वह वहाँ जीवित रहता है। हे ब्राह्मण! यह भी वह स्थान है जहाँ स्थित होने पर वह दान (उसे) प्राप्त नहीं होता।" ‘‘ဣဓ ပန, ဗြာဟ္မဏ, ဧကစ္စော ပါဏာတိပါတီ ဟောတိ…ပေ… မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိကော ဟောတိ, သော ကာယဿ ဘေဒါ ပရံ မရဏာ ပေတ္တိဝိသယံ ဥပပဇ္ဇတိ. ယော ပေတ္တိဝေသယိကာနံ သတ္တာနံ အာဟာရော, တေန [Pg.178] သော တတ္ထ ယာပေတိ, တေန သော တတ္ထ တိဋ္ဌတိ. ယံ ဝါ ပနဿ ဣတော အနုပဝေစ္ဆန္တိ မိတ္တာမစ္စာ ဝါ ဉာတိသာလောဟိတာ ဝါ, တေန သော တတ္ထ ယာပေတိ, တေန သော တတ္ထ တိဋ္ဌတိ. ဣဒံ ခေါ, ဗြာဟ္မဏ, ဌာနံ, ယတ္ထ ဌိတဿ တံ ဒါနံ ဥပကပ္ပတီတိ. "हे ब्राह्मण! यहाँ कोई व्यक्ति प्राणी-हिंसक होता है... (पे)... मिथ्यादृष्टि होता है। वह शरीर के भेद होने पर मृत्यु के बाद प्रेत-लोक में उत्पन्न होता है। प्रेत-लोक के प्राणियों का जो आहार होता है, उसी से वह वहाँ जीवन यापन करता है और उसी से वह वहाँ जीवित रहता है। अथवा यहाँ से उसके मित्र, अमात्य या ज्ञाति-संबंधी जो (दान) उसे समर्पित करते हैं, उससे वह वहाँ जीवन यापन करता है और उसी से वह वहाँ जीवित रहता है। हे ब्राह्मण! निश्चय ही यह वह स्थान है जहाँ स्थित होने पर वह दान (उसे) प्राप्त होता है।" ‘‘သစေ ပန, ဘော ဂေါတမ, သော ပေတော ဉာတိသာလောဟိတော တံ ဌာနံ အနုပပန္နော ဟောတိ, ကော တံ ဒါနံ ပရိဘုဉ္ဇတီတိ? အညေပိဿ, ဗြာဟ္မဏ, ပေတာ ဉာတိသာလောဟိတာ တံ ဌာနံ ဥပပန္နာ ဟောန္တိ, တေ တံ ဒါနံ ပရိဘုဉ္ဇန္တီတိ. "हे गौतम! यदि वह प्रेत बना ज्ञाति-संबंधी उस स्थान (प्रेत-लोक) में उत्पन्न न हुआ हो, तो उस दान का उपभोग कौन करता है? हे ब्राह्मण! उसके अन्य ज्ञाति-संबंधी भी प्रेत-लोक में उत्पन्न हुए होते हैं, वे उस दान का उपभोग करते हैं।" ‘‘သစေ ပန, ဘော ဂေါတမ, သော စေဝ ပေတော ဉာတိသာလောဟိတော တံ ဌာနံ အနုပပန္နော ဟောတိ, အညေပိဿ ပေတာ ဉာတိသာလောဟိတာ တံ ဌာနံ အနုပပန္နာ ဟောန္တိ, ကော တံ ဒါနံ ပရိဘုဉ္ဇတီတိ? အဋ္ဌာနံ ခေါ ဧတံ ဗြာဟ္မဏ အနဝကာသော, ယံ တံ ဌာနံ ဝိဝိတ္တံ အဿ ဣမိနာ ဒီဃေန အဒ္ဓုနာ ယဒိဒံ ပေတေဟိ ဉာတိသာလောဟိတေဟိ. အပိစ ဗြာဟ္မဏ ဒါယကောပိ အနိပ္ဖလော’’တိ (အ. နိ. ၁၀.၁၇၇). "हे गौतम! यदि वह प्रेत बना ज्ञाति-संबंधी भी उस स्थान में उत्पन्न न हुआ हो और उसके अन्य ज्ञाति-संबंधी भी प्रेत-लोक में उत्पन्न न हुए हों, तो उस दान का उपभोग कौन करता है? हे ब्राह्मण! यह असंभव है, ऐसा कोई अवसर नहीं है कि यह दीर्घ काल प्रेत बने ज्ञाति-संबंधियों से शून्य हो। और हे ब्राह्मण! दान देने वाला भी निष्फल नहीं होता।" ဆဋ္ဌဂါထာပရဒ္ဓသတ္တမဂါထာဝဏ္ဏနာ छठी गाथा के उत्तरार्ध और सातवीं गाथा की व्याख्या। ၆-၇. ဧဝံ ဘဂဝါ ရညော မာဂဓဿ ပေတ္တိဝိသယူပပန္နာနံ ပုဗ္ဗဉာတီနံ သမ္ပတ္တိံ နိဿာယ ထောမေန္တော ‘‘ဧတေ တေ, မဟာရာဇ, ဉာတီ ဣမာယ ဒါနသမ္ပဒါယ အတ္တမနာ ဧဝံ ထောမေန္တီ’’တိ ဒဿေန္တော – ६-७. इस प्रकार भगवान् मगधराज (बिम्बिसार) के प्रेत-लोक में उत्पन्न पूर्व-ज्ञातियों की सुख-संपत्ति के आधार पर प्रशंसा करते हुए—'हे महाराज! आपके वे ज्ञाति इस दान-संपदा से प्रसन्न होकर इस प्रकार प्रशंसा करते हैं'—यह दिखाते हुए— ‘‘စိရံ ဇီဝန္တု နော ဉာတီ, ယေသံ ဟေတု လဘာမသေ; အမှာကဉ္စ ကတာ ပူဇာ, ဒါယကာ စ အနိပ္ဖလာ’’တိ. – 'हमारे वे ज्ञाति चिरंजीवी हों, जिनके कारण हमें (यह सुख) प्राप्त हो रहा है; हमारी पूजा (सत्कार) की गई है और दान देने वाले भी निष्फल नहीं हैं।' ဝတွာ ပုန တေသံ ပေတ္တိဝိသယူပပန္နာနံ အညဿ ကသိဂေါရက္ခာဒိနော သမ္ပတ္တိပဋိလာဘကာရဏဿ အဘာဝံ ဣတော ဒိန္နေန ယာပနဘာဝဉ္စ ဒဿေန္တော ‘‘န ဟိ တတ္ထ ကသီ အတ္ထီ’’တိ ဆဋ္ဌဂါထာယ ပစ္ဆိမဒ္ဓံ ‘‘ဝဏိဇ္ဇာ တာဒိသီ’’တိ ဣမံ သတ္တမဂါထဉ္စ အာဟ. यह कहकर, पुनः उन प्रेत-लोक में उत्पन्न प्राणियों के लिए कृषि, गोरक्षा आदि अन्य संपत्ति-प्राप्ति के कारणों के अभाव को और यहाँ से दिए गए दान से ही जीवन-यापन होने को दिखाते हुए, 'वहाँ कृषि नहीं है'—इस छठी गाथा के उत्तरार्ध को और 'वैसा व्यापार (भी नहीं है)'—इस सातवीं गाथा को कहा। တတြာယံ အတ္ထဝဏ္ဏနာ – န ဟိ, မဟာရာဇ, တတ္ထ ပေတ္တိဝိသယေ ကသိ အတ္ထိ, ယံ နိဿာယ တေ ပေတာ သမ္ပတ္တိံ ပဋိလဘေယျုံ. ဂေါရက္ခေတ္ထ န ဝိဇ္ဇတီတိ န ကေဝလံ ကသိ ဧဝ, ဂေါရက္ခာပိ ဧတ္ထ ပေတ္တိဝိသယေ န ဝိဇ္ဇတိ, ယံ [Pg.179] နိဿာယ တေ သမ္ပတ္တိံ ပဋိလဘေယျုံ. ဝဏိဇ္ဇာ တာဒိသီ နတ္ထီတိ ဝါဏိဇ္ဇာပိ တာဒိသီ နတ္ထိ, ယာ တေသံ သမ္ပတ္တိပဋိလာဘဟေတု ဘဝေယျ. ဟိရညေန ကယာကယန္တိ ဟိရညေန ကယဝိက္ကယမ္ပိ တတ္ထ တာဒိသံ နတ္ထိ, ယံ တေသံ သမ္ပတ္တိပဋိလာဘဟေတု ဘဝေယျ. ဣတော ဒိန္နေန ယာပေန္တိ, ပေတာ ကာလဂတာ တဟိန္တိ ကေဝလံ ပန ဣတော ဉာတီဟိ ဝါ မိတ္တာမစ္စေဟိ ဝါ ဒိန္နေန ယာပေန္တိ, အတ္တဘာဝံ ဂမေန္တိ. ပေတာတိ ပေတ္တိဝိသယူပပန္နာ သတ္တာ. ကာလဂတာတိ အတ္တနော မရဏကာလေန ဂတာ, ‘‘ကာလကတာ’’တိ ဝါ ပါဌော, ကတကာလာ ကတမရဏာတိ အတ္ထော. တဟိန္တိ တသ္မိံ ပေတ္တိဝိသယေ. वहाँ यह अर्थ-व्याख्या है—हे महाराज! उस प्रेत-लोक में कृषि नहीं है, जिसके सहारे वे प्रेत संपत्ति प्राप्त कर सकें। 'वहाँ गोरक्षा नहीं पाई जाती' का अर्थ है कि न केवल कृषि, बल्कि गोरक्षा भी उस प्रेत-लोक में नहीं है, जिसके सहारे वे संपत्ति प्राप्त कर सकें। 'वैसा व्यापार नहीं है' का अर्थ है कि वैसा कोई व्यापार भी नहीं है जो उनकी संपत्ति-प्राप्ति का कारण बने। 'हिरण्य (स्वर्ण-मुद्रा) से क्रय-विक्रय' का अर्थ है कि वहाँ स्वर्ण आदि से वैसा क्रय-विक्रय भी नहीं है जो उनकी संपत्ति-प्राप्ति का कारण बने। 'यहाँ से दिए गए दान से जीवन यापन करते हैं, वहाँ कालगत (मृत) हुए प्रेत' का अर्थ है कि केवल यहाँ से ज्ञातियों या मित्र-अमात्यों द्वारा दिए गए दान से ही वे जीवन यापन करते हैं, अपने अस्तित्व को बनाए रखते हैं। 'प्रेत' का अर्थ है प्रेत-लोक में उत्पन्न प्राणी। 'कालगत' का अर्थ है अपने मरण-काल को प्राप्त हुए, अथवा 'कालकत' पाठ है, जिसका अर्थ है जिन्होंने काल (मृत्यु) को प्राप्त किया है। 'तहिं' का अर्थ है उस प्रेत-लोक में। အဋ္ဌမနဝမဂါထာဒွယဝဏ္ဏနာ आठवीं और नौवीं, इन दो गाथाओं की व्याख्या। ၈-၉. ဧဝံ ‘‘ဣတော ဒိန္နေန ယာပေန္တိ, ပေတာ ကာလဂတာ တဟိ’’န္တိ ဝတွာ ဣဒါနိ ဥပမာဟိ တမတ္ထံ ပကာသေန္တော ‘‘ဥန္နမေ ဥဒကံ ဝုဋ္ဌ’’န္တိ ဣဒံ ဂါထာဒွယမာဟ. ८-९. इस प्रकार 'यहाँ से दिए गए दान से वे वहाँ कालगत प्रेत जीवन यापन करते हैं'—यह कहकर, अब उपमाओं के माध्यम से उस अर्थ को प्रकाशित करते हुए 'ऊँचे स्थान पर बरसा हुआ जल'—ये दो गाथाएँ कहीं। တဿတ္ထော – ယထာ ဥန္နတေ ထလေ ဥဿာဒေ ဘူမိဘာဂေ မေဃေဟိ အဘိဝုဋ္ဌံ ဥဒကံ နိန္နံ ပဝတ္တတိ, ယော ယော ဘူမိဘာဂေါ နိန္နော ဩဏတော, တံ တံ ပဝတ္တတိ ဂစ္ဆတိ ပါပုဏာတိ, ဧဝမေဝ ဣတော ဒိန္နံ ဒါနံ ပေတာနံ ဥပကပ္ပတိ နိဗ္ဗတ္တတိ, ပါတုဘဝတီတိ အတ္ထော. နိန္နမိဝ ဟိ ဥဒကပ္ပဝတ္တိယာ ဌာနံ ပေတလောကော ဒါနုပကပ္ပနာယ. ယထာဟ – ‘‘ဣဒံ ခေါ, ဗြာဟ္မဏ, ဌာနံ, ယတ္ထ ဌိတဿ တံ ဒါနံ ဥပကပ္ပတီ’’တိ (အ. နိ. ၁၀.၁၇၇). ယထာ စ ကန္ဒရပဒရသာခါပသာခကုသောဗ္ဘမဟာသောဗ္ဘသန္နိပါတေဟိ ဝါရိဝဟာ မဟာနဇ္ဇော ပူရာ ဟုတွာ သာဂရံ ပရိပူရေန္တိ, ဧဝမ္ပိ ဣတော ဒိန္နဒါနံ ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေနေဝ ပေတာနံ ဥပကပ္ပတီတိ. उसका अर्थ है—जैसे ऊँचे स्थल या जलरहित भूमि-भाग पर मेघों द्वारा बरसाया गया जल नीचे की ओर बहता है, जो-जो भूमि-भाग नीचा या गहरा होता है, वहाँ-वहाँ वह बहता है, जाता है, पहुँचता है; वैसे ही यहाँ से दिया गया दान प्रेतों को प्राप्त होता है, निष्पन्न होता है, प्रकट होता है—यह अर्थ है। जैसे जल के प्रवाह के लिए नीचा स्थान आधार होता है, वैसे ही दान की प्राप्ति के लिए प्रेत-लोक को समझना चाहिए। जैसा कि कहा गया है—'हे ब्राह्मण! यह वह स्थान है जहाँ स्थित होने पर वह दान प्राप्त होता है।' और जैसे कंदराओं, दरारों, छोटी-बड़ी शाखाओं और नालों के संगम से जल ले जाने वाली महानदियाँ पूर्ण होकर सागर को भर देती हैं, वैसे ही यहाँ से दिया गया दान पूर्वोक्त विधि से ही प्रेतों को प्राप्त होता है। ဒသမဂါထာဝဏ္ဏနာ दसवीं गाथा की व्याख्या। ၁၀. ဧဝံ ဘဂဝါ ‘‘ဣတော ဒိန္နေန ယာပေန္တိ, ပေတာ ကာလဂတာ တဟိ’’န္တိ ဣမံ အတ္ထံ ဥပမာဟိ ပကာသေတွာ ပုန ယသ္မာ တေ ပေတာ ‘‘ဣတော ကိဉ္စိ လစ္ဆာမာ’’တိ အာသာဘိဘူတာ ဉာတိဃရံ အာဂန္တွာပိ ‘‘ဣဒံ နာမ နော ဒေထာ’’တိ ယာစိတုံ အသမတ္ထာ, တသ္မာ တေသံ ဣမာနိ အနုဿရဏဝတ္ထူနိ အနုဿရန္တော [Pg.180] ကုလပုတ္တော ဒက္ခိဏံ ဒဇ္ဇာတိ ဒဿေန္တော ‘‘အဒါသိ မေ’’တိ ဣမံ ဂါထမာဟ. १०. इस प्रकार भगवान् ने 'यहाँ से दिए गए दान से वहाँ कालगत प्रेत जीवन यापन करते हैं'—इस अर्थ को उपमाओं से प्रकाशित कर, पुनः चूँकि वे प्रेत 'यहाँ से कुछ प्राप्त करेंगे'—ऐसी आशा से दबे हुए ज्ञाति-घर आकर भी 'हमें यह अमुक वस्तु दो'—ऐसी याचना करने में असमर्थ होते हैं, इसलिए उनके इन अनुस्मरण-विषयों को याद करते हुए कुलपुत्र को दक्षिणा (दान) देनी चाहिए—यह दिखाते हुए 'उसने मुझे दिया'—यह गाथा कही। တဿတ္ထော – ‘‘ဣဒံ နာမ မေ ဓနံ ဝါ ဓညံ ဝါ အဒါသီ’’တိ စ, ‘‘ဣဒံ နာမ မေ ကိစ္စံ အတ္တနာ ဥယျောဂမာပဇ္ဇန္တော အကာသီ’’တိ စ, ‘‘အမု မေ မာတိတော ဝါ ပိတိတော ဝါ သမ္ဗန္ဓတ္တာ ဉာတီ’’တိ စ သိနေဟဝသေန တာဏသမတ္ထတာယ ‘‘မိတ္တာ’’တိ စ, ‘‘အသုကော မေ သဟ ပံသုကီဠကော သခါ’’တိ စ ဧဝံ သဗ္ဗမနုဿရန္တော ပေတာနံ ဒက္ခိဏံ ဒဇ္ဇာ, ဒါနံ နိယျာတေယျာတိ. အပရော ပါဌော ‘‘ပေတာနံ ဒက္ခိဏာ ဒဇ္ဇာ’’တိ. တဿတ္ထော – ဒါတဗ္ဗာတိ ဒဇ္ဇာ. ကာ သာ? ပေတာနံ ဒက္ခိဏာ, တေနေဝ ‘‘အဒါသိ မေ’’တိအာဒိနာ နယေန ပုဗ္ဗေ ကတမနုဿရံ အနုဿရတာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ကရဏဝစနပ္ပသင်္ဂေ ပစ္စတ္တဝစနံ ဝေဒိတဗ္ဗံ. इसका अर्थ है - "उसने मुझे यह धन या अनाज दिया था", "उसने स्वयं प्रयास करते हुए मेरे लिए यह कार्य किया था", "वह मेरी माता या पिता की ओर से संबंध होने के कारण मेरा ज्ञाति (रिश्तेदार) है", स्नेह के कारण और रक्षा करने में समर्थ होने के कारण वह "मित्र" है, "वह मेरा धूल में साथ खेलने वाला सखा है" - इस प्रकार सब कुछ याद करते हुए प्रेतों के लिए दक्षिणा देनी चाहिए, दान समर्पित करना चाहिए। दूसरा पाठ है "पेतानं दक्खिणा दज्जा"। इसका अर्थ है - देनी चाहिए, इसलिए 'दज्जा' है। वह क्या है? प्रेतों के लिए दक्षिणा। इसीलिए "अदासि मे" इत्यादि विधि से पूर्व में किए गए उपकार को याद करते हुए (अनुस्सरं) ऐसा कहा गया है। यहाँ करण विभक्ति के प्रसंग में प्रथमा विभक्ति समझनी चाहिए। ဧကာဒသမဂါထာဝဏ္ဏနာ ग्यारहवीं गाथा की व्याख्या। ၁၁. ဧဝံ ဘဂဝါ ပေတာနံ ဒက္ခိဏာနိယျာတနေ ကာရဏဘူတာနိ အနုဿရဏဝတ္ထူနိ ဒဿေန္တော – ११. इस प्रकार भगवान् प्रेतों को दक्षिणा देने में कारणभूत अनुस्मरण के विषयों को दिखाते हुए - ‘‘အဒါသိ မေ အကာသိ မေ, ဉာတိမိတ္တာ သခါ စ မေ; ပေတာနံ ဒက္ခိဏံ ဒဇ္ဇာ, ပုဗ္ဗေ ကတမနုဿရ’’န္တိ. – "उसने मुझे दिया, उसने मेरे लिए काम किया, वह मेरा संबंधी, मित्र और सखा था; पूर्व में किए गए उपकारों को याद करते हुए प्रेतों के लिए दक्षिणा देनी चाहिए।" - ဝတွာ ပုန ယေ ဉာတိမရဏေန ရုဏ္ဏသောကာဒိပရာ ဧဝ ဟုတွာ တိဋ္ဌန္တိ, န တေသံ အတ္ထာယ ကိဉ္စိ ဒေန္တိ, တေသံ တံ ရုဏ္ဏသောကာဒိ ကေဝလံ အတ္တပရိတာပနမေဝ ဟောတိ, န ပေတာနံ ကိဉ္စိ အတ္ထံ နိပ္ဖာဒေတီတိ ဒဿေန္တော ‘‘န ဟိ ရုဏ္ဏံ ဝါ’’တိ ဣမံ ဂါထမာဟ. यह कहकर, फिर जो लोग संबंधियों की मृत्यु पर केवल रोने-शोक करने आदि में ही लगे रहते हैं और उनके कल्याण के लिए कुछ दान नहीं देते, उनका वह रोना-शोक करना आदि केवल स्वयं को कष्ट देना ही होता है, वह प्रेतों के लिए किसी अर्थ (लाभ) को सिद्ध नहीं करता - यह दिखाते हुए "न हि रुण्णं वा" यह गाथा कही। တတ္ထ ရုဏ္ဏန္တိ ရောဒနာ ရောဒိတတ္တံ အဿုပါတနံ, ဧတေန ကာယပရိဿမံ ဒဿေတိ. သောကောတိ သောစနာ သောစိတတ္တံ, ဧတေန စိတ္တပရိဿမံ ဒဿေတိ. ယာ စညာတိ ယာ စ ရုဏ္ဏသောကေဟိ အညာ. ပရိဒေဝနာတိ ဉာတိဗျသနေန ဖုဋ္ဌဿ လာလပ္ပနာ, ‘‘ကဟံ ဧကပုတ္တက ပိယ မနာပါ’’တိ ဧဝမာဒိနာ နယေန ဂုဏသံဝဏ္ဏနာ, ဧတေန ဝစီပရိဿမံ ဒဿေတိ. वहाँ 'रुण्णं' का अर्थ है रोना, रुदन करना, आँसू बहाना; इससे शरीर के परिश्रम को दिखाया गया है। 'सोको' का अर्थ है शोक करना, शोकाकुल होना; इससे चित्त के परिश्रम को दिखाया गया है। 'या चञ्ञा' का अर्थ है जो रोने और शोक के अतिरिक्त अन्य है। 'परिदेवना' का अर्थ है संबंधियों के विनाश (मृत्यु) से प्रभावित व्यक्ति का विलाप करना, जैसे "कहाँ है मेरा इकलौता प्रिय और मनभावन पुत्र" इत्यादि प्रकार से गुणों का वर्णन करना; इससे वाणी के परिश्रम को दिखाया गया है। ဒွါဒသမဂါထာဝဏ္ဏနာ बारहवीं गाथा की व्याख्या। ၁၂. ဧဝံ [Pg.181] ဘဂဝါ ‘‘ရုဏ္ဏံ ဝါ သောကော ဝါ ယာ စညာ ပရိဒေဝနာ, သဗ္ဗမ္ပိ တံ ပေတာနံ အတ္ထာယ န ဟောတိ, ကေဝလန္တု အတ္တာနံ ပရိတာပနမတ္တမေဝ, ဧဝံ တိဋ္ဌန္တိ ဉာတယော’’တိ ရုဏ္ဏာဒီနံ နိရတ္ထကဘာဝံ ဒဿေတွာ ပုန မာဂဓရာဇေန ယာ ဒက္ခိဏာ ဒိန္နာ, တဿာ သာတ္ထကဘာဝံ ဒဿေန္တော ‘‘အယဉ္စ ခေါ ဒက္ခိဏာ’’တိ ဣမံ ဂါထမာဟ. १२. इस प्रकार भगवान् ने "रोना, शोक या अन्य जो विलाप है, वह सब प्रेतों के कल्याण के लिए नहीं होता, बल्कि केवल स्वयं को संतप्त करना मात्र है, संबंधी इसी प्रकार (मृत्यु के बाद) स्थित रहते हैं" - ऐसा कहकर रोने आदि की निरर्थकता दिखाई, और फिर मगधराज (बिम्बिसार) द्वारा जो दक्षिणा दी गई थी, उसकी सार्थकता दिखाते हुए "अयञ्च खो दक्खिणा" यह गाथा कही। တဿတ္ထော – အယဉ္စ ခေါ, မဟာရာဇ, ဒက္ခိဏာ တယာ အဇ္ဇ အတ္တနော ဉာတိဂဏံ ဥဒ္ဒိဿ ဒိန္နာ, သာ ယသ္မာ သံဃော အနုတ္တရံ ပုညက္ခေတ္တံ လောကဿ, တသ္မာ သံဃမှိ သုပ္ပတိဋ္ဌိတာ အဿ ပေတဇနဿ ဒီဃရတ္တံ ဟိတာယ ဥပကပ္ပတိ သမ္ပဇ္ဇတိ ဖလတီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဥပကပ္ပတီတိ စ ဌာနသော ဥပကပ္ပတိ, တံခဏံယေဝ ဥပကပ္ပတိ, န စိရေန. ယထာ ဟိ တံခဏညေဝ ပဋိဘန္တံ ‘‘ဌာနသောဝေတံ တထာဂတံ ပဋိဘာတီ’’တိ ဝုစ္စတိ, ဧဝမိဓာပိ တံခဏံယေဝ ဥပကပ္ပန္တာ ‘‘ဌာနသော ဥပကပ္ပတီ’’တိ ဝုတ္တာ. ယံ ဝါ တံ ‘‘ဣဒံ ခေါ, ဗြာဟ္မဏ, ဌာနံ, ယတ္ထ ဌိတဿ တံ ဒါနံ ဥပကပ္ပတီ’’တိ (အ. နိ. ၁၀.၁၇၇) ဝုတ္တံ, တတ္ထ ခုပ္ပိပါသိကဝန္တာသပရဒတ္တူပဇီဝိနိဇ္ဈာမတဏှိကာဒိဘေဒဘိန္နေ ဌာနေ ဥပကပ္ပတီတိ ဝုတ္တံ ယထာ ကဟာပဏံ ဒေန္တော ‘‘ကဟာပဏသော ဒေတီ’’တိ လောကေ ဝုစ္စတိ. ဣမသ္မိဉ္စ အတ္ထဝိကပ္ပေ ဥပကပ္ပတီတိ ပါတုဘဝတိ, နိဗ္ဗတ္တတီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. इसका अर्थ है - हे महाराज! यह जो दक्षिणा आज आपने अपने ज्ञाति-समूह (संबंधियों) के उद्देश्य से दी है, क्योंकि संघ लोक के लिए अनुपम पुण्यक्षेत्र है, इसलिए संघ में भली-भांति प्रतिष्ठित वह दान उस प्रेत-जन के दीर्घकाल तक हित के लिए प्राप्त होता है, सिद्ध होता है और फल देता है - ऐसा कहा गया है। 'उपकप्पति' का अर्थ है तत्काल प्राप्त होना, उसी क्षण प्राप्त होना, देर से नहीं। जैसे उसी क्षण प्रतिभासित होने वाले के लिए कहा जाता है "यह तथागत को तत्काल प्रतिभासित होता है", वैसे ही यहाँ भी उसी क्षण प्राप्त होने के कारण "ठाणसो उपकप्पति" (तत्काल प्राप्त होता है) कहा गया है। अथवा जो यह कहा गया है - "हे ब्राह्मण! यह वह स्थान है जहाँ स्थित होने पर वह दान प्राप्त होता है", वहाँ क्षुत्-पिपासा (भूख-प्यास) से पीड़ित, वन्तास (वमन खाने वाले), परदत्तूपजीवी (दूसरों के दिए पर जीने वाले), निज्झामतण्हिक (तृष्णा से जले हुए) आदि भेदों वाले स्थान (प्रेत योनि) में स्थित होने पर प्राप्त होता है, ऐसा कहा गया है; जैसे लोक में कार्षापण देते हुए कहा जाता है "कार्षापण के रूप में देता है"। और इस अर्थ-विकल्प में 'उपकप्पति' का अर्थ है प्रकट होना, निष्पन्न होना। တေရသမဂါထာဝဏ္ဏနာ तेरहवीं गाथा की व्याख्या। ၁၃. ဧဝံ ဘဂဝါ ရညာ ဒိန္နာယ ဒက္ခိဏာယ သာတ္ထကဘာဝံ ဒဿေန္တော – १३. इस प्रकार भगवान् राजा द्वारा दी गई दक्षिणा की सार्थकता दिखाते हुए - ‘‘အယဉ္စ ခေါ ဒက္ခိဏာ ဒိန္နာ, သံဃမှိ သုပ္ပတိဋ္ဌိတာ; ဒီဃရတ္တံ ဟိတာယဿ, ဌာနသော ဥပကပ္ပတီ’’တိ. – "और यह जो दक्षिणा दी गई है, जो संघ में भली-भांति प्रतिष्ठित है, वह उसके (प्रेत के) दीर्घकालिक हित के लिए तत्काल प्राप्त होती है।" - ဝတွာ ပုန ယသ္မာ ဣမံ ဒက္ခိဏံ ဒေန္တေန ဉာတီနံ ဉာတီဟိ ကတ္တဗ္ဗကိစ္စကရဏဝသေန ဉာတိဓမ္မော နိဒဿိတော, ဗဟုဇနဿ ပါကဋီကတော, နိဒဿနံ ဝါ ကတော, တုမှေဟိပိ ဉာတီနံ ဧဝမေဝ ဉာတီဟိ ကတ္တဗ္ဗကိစ္စကရဏဝသေန ဉာတိဓမ္မော ပရိပူရေတဗ္ဗော, န နိရတ္ထကေဟိ ရုဏ္ဏာဒီဟိ အတ္တာ ပရိတာပေတဗ္ဗောတိ စ ပေတေ ဒိဗ္ဗသမ္ပတ္တိံ အဓိဂမေန္တေန ပေတာနံ ပူဇာ ကတာ ဥဠာရာ, ဗုဒ္ဓပ္ပမုခဉ္စ ဘိက္ခုသံဃံ အန္နပါနာဒီဟိ သန္တပ္ပေန္တေန ဘိက္ခူနံ ဗလံ အနုပဒိန္နံ, အနုကမ္ပာဒိဂုဏပရိဝါရဉ္စ စာဂစေတနံ နိဗ္ဗတ္တေန္တေန အနပ္ပကံ ပုညံ [Pg.182] ပသုတံ, တသ္မာ ဘဂဝါ ဣမေဟိ ယထာဘုစ္စဂုဏေဟိ ရာဇာနံ သမ္ပဟံသေန္တော – यह कहकर, फिर चूँकि इस दक्षिणा को देने वाले के द्वारा संबंधियों के प्रति किए जाने वाले कर्तव्य के रूप में 'ज्ञाति-धर्म' (संबंधियों का धर्म) दिखाया गया है, बहुत से लोगों के लिए प्रकट किया गया है या उदाहरण प्रस्तुत किया गया है; (और यह भी कि) "आपके द्वारा भी संबंधियों के लिए इसी प्रकार कर्तव्य-पालन के रूप में ज्ञाति-धर्म पूरा किया जाना चाहिए, निरर्थक रोने आदि से स्वयं को संतप्त नहीं करना चाहिए"; और प्रेतों को दिव्य संपत्ति प्राप्त कराते हुए प्रेतों की उदार पूजा की गई है, बुद्ध प्रमुख भिक्षु-संघ को अन्न-पान आदि से तृप्त करते हुए भिक्षुओं को बल प्रदान किया गया है, और अनुकंपा आदि गुणों से युक्त त्याग की चेतना उत्पन्न करते हुए अपार पुण्य अर्जित किया गया है - इसलिए भगवान् इन यथार्थ गुणों के द्वारा राजा को हर्षित करते हुए - ‘‘သော ဉာတိဓမ္မော စ အယံ နိဒဿိတော,ပေတာန ပူဇာ စ ကတာ ဥဠာရာ; ဗလဉ္စ ဘိက္ခူနမနုပ္ပဒိန္နံ,တုမှေဟိ ပုညံ ပသုတံ အနပ္ပက’’န္တိ. – "वह यह ज्ञाति-धर्म दिखाया गया है, प्रेतों की उदार पूजा की गई है, भिक्षुओं को बल प्रदान किया गया है और आपके द्वारा अपार पुण्य अर्जित किया गया है।" - ဣမာယ ဂါထာယ ဒေသနံ ပရိယောသာပေတိ. इस गाथा से देशना समाप्त करते हैं। အထ ဝါ ‘‘သော ဉာတိဓမ္မော စ အယံ နိဒဿိတော’’တိ ဣမိနာ ဂါထာပဒေန ဘဂဝါ ရာဇာနံ ဓမ္မိယာ ကထာယ သန္ဒဿေတိ. ဉာတိဓမ္မနိဒဿနမေဝ ဟိ ဧတ္ထ သန္ဒဿနံ ပေတာန ပူဇာ စ ကတာ ဥဠာရာတိ ဣမိနာ သမာဒပေတိ. ဥဠာရာတိ ပသံသနမေဝ ဟိ ဧတ္ထ ပုနပ္ပုနံ ပူဇာကရဏေ သမာဒပနံ. ဗလဉ္စ ဘိက္ခူနမနုပ္ပဒိန္နန္တိ ဣမိနာ သမုတ္တေဇေတိ. ဗလာနုပ္ပဒါနမေဝ ဟိ ဧတ္ထ ဧဝံ ဒါနံ, ဗလာနုပ္ပဒါနတာတိ တဿ ဥဿာဟဝဍ္ဎနေန သမုတ္တေဇနံ. တုမှေဟိ ပုညံ ပသုတံ အနပ္ပကန္တိ ဣမိနာ သမ္ပဟံသေတိ. ပုညပ္ပသုတကိတ္တနမေဝ ဟိ ဧတ္ထ တဿ ယထာဘုစ္စဂုဏသံဝဏ္ဏနဘာဝေန သမ္ပဟံသနဇနနတော သမ္ပဟံသနန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. अथवा "सो ञातिधम्मो च अयं निदस्सितो" इस गाथा-पद से भगवान् राजा को धार्मिक कथा से 'संदस्सेति' (भली-भांति दिखाते) हैं। यहाँ ज्ञाति-धर्म का प्रदर्शन ही 'संदस्सन' है। "पेतानं पूजा च कता उळारा" इससे 'समादपेति' (प्रेरित करते) हैं। यहाँ 'उळारा' (उदार) यह प्रशंसा ही बार-बार पूजा करने के लिए प्रेरित करना है। "बलञ्च भिक्खूनमनुप्पदिन्नं" इससे 'समुत्तेजेति' (उत्साहित करते) हैं। यहाँ इस प्रकार का दान बल प्रदान करना ही है, बल प्रदान करने के भाव से उसके उत्साह को बढ़ाने के कारण यह 'समुत्तेजन' है। "तुम्हेहि पुञ्ञं पसुतं अनप्पकं" इससे 'सम्पहंसेति' (अत्यधिक हर्षित करते) हैं। यहाँ पुण्य अर्जन का कीर्तन ही उसके यथार्थ गुणों के वर्णन के रूप में हर्ष उत्पन्न करने के कारण 'सम्पहंसन' (हर्षित करना) समझना चाहिए। ဒေသနာပရိယောသာနေ စ ပေတ္တိဝိသယူပပတ္တိအာဒီနဝသံဝဏ္ဏနေန သံဝိဂ္ဂါနံ ယောနိသော ပဒဟတံ စတုရာသီတိယာ ပါဏသဟဿာနံ ဓမ္မာဘိသမယော အဟောသိ. ဒုတိယဒိဝသေပိ ဘဂဝါ ဒေဝမနုဿာနံ ဣဒမေဝ တိရောကုဋ္ဋံ ဒေသေသိ, ဧဝံ ယာဝ သတ္တမဒိဝသာ တာဒိသော ဧဝ ဓမ္မာဘိသမယော အဟောသီတိ. उपदेश के अंत में, प्रेत लोक में उत्पन्न होने के दोषों के वर्णन से संविग्न (भयभीत) हुए और उचित रूप से प्रयत्न करने वाले चौरासी हजार प्राणियों को धम्म का साक्षात्कार हुआ। दूसरे दिन भी भगवान ने देवों और मनुष्यों को यही तिरोकुट्ट सुत्त सुनाया, इस प्रकार सातवें दिन तक वैसा ही धम्म-साक्षात्कार हुआ। ပရမတ္ထဇောတိကာယ ခုဒ္ဒကပါဌ-အဋ္ဌကထာယ परमत्थजोतिका नामक खुद्दकपाठ-अट्ठकथा में। တိရောကုဋ္ဋသုတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. तिरोकुट्ट सुत्त की व्याख्या समाप्त हुई। ၈. နိဓိကဏ္ဍသုတ္တဝဏ္ဏနာ ८. निधिकण्ड सुत्त की व्याख्या। နိက္ခေပကာရဏံ सुत्त के रखे जाने का कारण। ဣဒါနိ ယဒိဒံ တိရောကုဋ္ဋာနန္တရံ ‘‘နိဓိံ နိဓေတိ ပုရိသော’’တိအာဒိနာ နိဓိကဏ္ဍံ နိက္ခိတ္တံ, တဿ – अब, तिरोकुट्ट सुत्त के ठीक बाद जो "निधिं निधेति पुरिसो" आदि से शुरू होने वाला निधिकण्ड सुत्त रखा गया है, उसका— ‘‘ဘာသိတွာ [Pg.183] နိဓိကဏ္ဍဿ, ဣဓ နိက္ခေပကာရဏံ; အဋ္ဌုပ္ပတ္တိဉ္စ ဒီပေတွာ, ကရိဿာမတ္ထဝဏ္ဏနံ’’. "यहाँ निधिकण्ड सुत्त के रखे जाने का कारण बताकर और उसकी उत्पत्ति (अट्ठुप्पत्ति) को स्पष्ट कर, हम अर्थ की व्याख्या करेंगे।" တတ္ထ ဣဓ နိက္ခေပကာရဏံ တာဝဿ ဧဝံ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ဣဒဉှိ နိဓိကဏ္ဍံ ဘဂဝတာ ဣမိနာ အနုက္ကမေန အဝုတ္တမ္ပိ ယသ္မာ အနုမောဒနဝသေန ဝုတ္တဿ တိရောကုဋ္ဋဿ မိထုနဘူတံ, တသ္မာ ဣဓ နိက္ခိတ္တံ. တိရောကုဋ္ဋေန ဝါ ပုညဝိရဟိတာနံ ဝိပတ္တိံ ဒဿေတွာ ဣမိနာ ကတပုညာနံ သမ္ပတ္တိဒဿနတ္ထမ္ပိ ဣဒံ ဣဓ နိက္ခိတ္တန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ဣဒမဿ ဣဓ နိက္ခေပကာရဏံ. वहाँ, पहले इसके यहाँ रखे जाने का कारण इस प्रकार समझना चाहिए। यद्यपि यह निधिकण्ड सुत्त भगवान द्वारा इस क्रम में नहीं कहा गया था, फिर भी चूँकि यह अनुमोदन के रूप में कहे गए तिरोकुट्ट सुत्त का जोड़ा (मिथुनभूत) है, इसलिए इसे यहाँ रखा गया है। अथवा, तिरोकुट्ट सुत्त के माध्यम से पुण्य रहित लोगों की विपत्ति को दिखाकर, इस सुत्त के माध्यम से पुण्य करने वालों की संपत्ति (सफलता) दिखाने के लिए भी इसे यहाँ रखा गया है, ऐसा समझना चाहिए। यह इसके यहाँ रखे जाने का कारण है। သုတ္တဋ္ဌုပ္ပတ္တိ सुत्त की उत्पत्ति (अट्ठुप्पत्ति) အဋ္ဌုပ္ပတ္တိ ပနဿ – သာဝတ္ထိယံ ကိရ အညတရော ကုဋုမ္ဗိကော အဍ္ဎော မဟဒ္ဓနော မဟာဘောဂေါ. သော စ သဒ္ဓေါ ဟောတိ ပသန္နော, ဝိဂတမလမစ္ဆေရေန စေတသာ အဂါရံ အဇ္ဈာဝသတိ. သော ဧကသ္မိံ ဒိဝသေ ဗုဒ္ဓပ္ပမုခဿ ဘိက္ခုသံဃဿ ဒါနံ ဒေတိ. တေန စ သမယေန ရာဇာ ဓနတ္ထိကော ဟောတိ, သော တဿ သန္တိကေ ပုရိသံ ပေသေသိ ‘‘ဂစ္ဆ, ဘဏေ, ဣတ္ထန္နာမံ ကုဋုမ္ဗိကံ အာနေဟီ’’တိ. သော ဂန္တွာ တံ ကုဋုမ္ဗိကံ အာဟ ‘‘ရာဇာ တံ ဂဟပတိ အာမန္တေတီ’’တိ. ကုဋုမ္ဗိကော သဒ္ဓါဒိဂုဏသမန္နာဂတေန စေတသာ ဗုဒ္ဓပ္ပမုခံ ဘိက္ခုသံဃံ ပရိဝိသန္တော အာဟ ‘‘ဂစ္ဆ, ဘော ပုရိသ, ပစ္ဆာ အာဂမိဿာမိ, ဣဒါနိ တာဝမှိ နိဓိံ နိဓေန္တော ဌိတော’’တိ. အထ ဘဂဝါ ဘုတ္တာဝီ ပဝါရိတော တမေဝ ပုညသမ္ပဒံ ပရမတ္ထတော နိဓီတိ ဒဿေတုံ တဿ ကုဋုမ္ဗိကဿ အနုမောဒနတ္ထံ ‘‘နိဓိံ နိဓေတိ ပုရိသော’’တိ ဣမာ ဂါထာယော အဘာသိ. အယမဿ အဋ္ဌုပ္ပတ္တိ. इसकी उत्पत्ति इस प्रकार है— सुना जाता है कि सावत्थी में कोई एक धनी, महाधनी और महाभोगी गृहपति था। वह श्रद्धालु और प्रसन्न था, और लोभ के मैल से रहित चित्त के साथ घर में रहता था। उसने एक दिन बुद्ध के नेतृत्व वाले भिक्षु संघ को दान दिया। उसी समय राजा को धन की आवश्यकता हुई, उसने उसके पास एक पुरुष को यह कहकर भेजा कि "जाओ भाई, अमुक नाम के गृहपति को ले आओ।" उसने जाकर उस गृहपति से कहा, "गृहपति, राजा आपको बुला रहे हैं।" गृहपति ने श्रद्धा आदि गुणों से युक्त चित्त से बुद्ध के नेतृत्व वाले भिक्षु संघ को भोजन परोसते हुए कहा, "जाओ भद्र पुरुष, मैं बाद में आऊँगा, अभी तो मैं निधि (पुण्य रूपी खजाना) जमा करने में लगा हूँ।" तब भगवान ने भोजन कर लेने और पुनः भोजन के लिए मना कर देने के बाद, उसी पुण्य-संपत्ति को परमार्थतः 'निधि' के रूप में दिखाने के लिए और उस गृहपति के अनुमोदन के लिए "निधिं निधेति पुरिसो" आदि गाथाएँ कहीं। यह इसकी उत्पत्ति है। ဧဝမဿ – इस प्रकार इसके— ‘‘ဘာသိတွာ နိဓိကဏ္ဍဿ, ဣဓ နိက္ခေပကာရဏံ; အဋ္ဌုပ္ပတ္တိဉ္စ ဒီပေတွာ, ကရိဿာမတ္ထဝဏ္ဏနံ’’. "यहाँ निधिकण्ड सुत्त के रखे जाने का कारण बताकर और उसकी उत्पत्ति को स्पष्ट कर, हम अर्थ की व्याख्या करेंगे।" ပဌမဂါထာဝဏ္ဏနာ प्रथम गाथा की व्याख्या ၁. တတ္ထ နိဓိံ နိဓေတိ ပုရိသောတိ နိဓီယတီတိ နိဓိ, ဌပီယတိ ရက္ခီယတိ ဂေါပီယတီတိ အတ္ထော. သော စတုဗ္ဗိဓော ထာဝရော, ဇင်္ဂမော, အင်္ဂသမော, အနုဂါမိကောတိ. တတ္ထ ထာဝရော နာမ ဘူမိဂတံ ဝါ ဝေဟာသဋ္ဌံ ဝါ ဟိရညံ ဝါ [Pg.184] သုဝဏ္ဏံ ဝါ ခေတ္တံ ဝါ ဝတ္ထု ဝါ, ယံ ဝါ ပနညမ္ပိ ဧဝရူပံ ဣရိယာပထဝိရဟိတံ, အယံ ထာဝရော နိဓိ. ဇင်္ဂမော နာမ ဒါသိဒါသံ ဟတ္ထိဂဝဿဝဠဝံ အဇေဠကံ ကုက္ကုဋသူကရံ ယံ ဝါ ပနညမ္ပိ ဧဝရူပံ ဣရိယာပထပဋိသံယုတ္တံ. အယံ ဇင်္ဂမော နိဓိ အင်္ဂသမော နာမ ကမ္မာယတနံ, သိပ္ပာယတနံ, ဝိဇ္ဇာဋ္ဌာနံ, ဗာဟုသစ္စံ, ယံ ဝါ ပနညမ္ပိ ဧဝရူပံ သိက္ခိတွာ ဂဟိတံ အင်္ဂပစ္စင်္ဂမိဝ အတ္တဘာဝပ္ပဋိဗဒ္ဓံ, အယံ အင်္ဂသမော နိဓိ. အနုဂါမိကော နာမ ဒါနမယံ ပုညံ သီလမယံ ဘာဝနာမယံ ဓမ္မဿဝနမယံ ဓမ္မဒေသနာမယံ, ယံ ဝါ ပနညမ္ပိ ဧဝရူပံ ပုညံ တတ္ထ တတ္ထ အနုဂန္တွာ ဝိယ ဣဋ္ဌဖလမနုပ္ပဒေတိ, အယံ အနုဂါမိကော နိဓိ. ဣမသ္မိံ ပန ဌာနေ ထာဝရော အဓိပ္ပေတော. १. वहाँ "निधिं निधेति पुरिसो" में— जो संचित किया जाता है वह 'निधि' है; इसका अर्थ है जिसे रखा जाता है, रक्षा की जाती है और सुरक्षित किया जाता है। वह चार प्रकार की होती है: स्थावर (स्थिर), जंगम (चलने वाली), अंगसम (अंग के समान) और अनुगामिक (पीछे चलने वाली)। वहाँ स्थावर निधि का अर्थ है— जमीन में गड़ा हुआ या आकाश (ऊँचे स्थान) में रखा हुआ चाँदी, सोना, खेत या वास्तु (भूमि), या अन्य कोई भी इस प्रकार की वस्तु जो गतिहीन है; यह स्थावर निधि है। जंगम निधि का अर्थ है— दासी-दास, हाथी-गाय-घोड़े-घोड़ियाँ, बकरी-भेड़, मुर्गे-सूअर या अन्य कोई भी इस प्रकार की वस्तु जो गति से संबंधित है। यह जंगम निधि है। अंगसम निधि का अर्थ है— कर्म-कौशल, शिल्प-कौशल, विद्या-स्थान, बहुश्रुतता (ज्ञान), या अन्य कोई भी इस प्रकार की विद्या जिसे सीखकर ग्रहण किया गया है और जो अंगों-प्रत्यंगों की तरह व्यक्तित्व से जुड़ी है; यह अंगसम निधि है। अनुगामिक निधि का अर्थ है— दानमय पुण्य, शीलमय पुण्य, भावनामय पुण्य, धर्म-श्रवणमय पुण्य, धर्म-देशनामय पुण्य, या अन्य कोई भी इस प्रकार का पुण्य जो उन-उन जन्मों में पीछे-पीछे चलने की तरह इष्ट फल प्रदान करता है; यह अनुगामिक निधि है। परंतु इस स्थान पर स्थावर निधि अभिप्रेत है। နိဓေတီတိ ဌပေတိ ပဋိသာမေတိ ဂေါပေတိ. ပုရိသောတိ မနုဿော. ကာမဉ္စ ပုရိသောပိ ဣတ္ထီပိ ပဏ္ဍကောပိ နိဓိံ နိဓေတိ, ဣဓ ပန ပုရိသသီသေန ဒေသနာ ကတာ, အတ္ထတော ပန တေသမ္ပိ ဣဓ သမောဓာနံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ဂမ္ဘီရေ ဩဒကန္တိကေတိ ဩဂါဟေတဗ္ဗဋ္ဌေန ဂမ္ဘီရံ, ဥဒကဿ အန္တိကဘာဝေန ဩဒကန္တိကံ. အတ္ထိ ဂမ္ဘီရံ န ဩဒကန္တိကံ ဇင်္ဂလေ ဘူမိဘာဂေ သတိကပေါရိသော အာဝါဋော ဝိယ, အတ္ထိ ဩဒကန္တိကံ န ဂမ္ဘီရံ နိန္နေ ပလ္လလေ ဧကဒွိဝိဒတ္ထိကော အာဝါဋော ဝိယ, အတ္ထိ ဂမ္ဘီရဉ္စေဝ ဩဒကန္တိကဉ္စ ဇင်္ဂလေ ဘူမိဘာဂေ ယာဝ ဣဒါနိ ဥဒကံ အာဂမိဿတီတိ, တာဝ ခတော အာဝါဋော ဝိယ. တံ သန္ဓာယ ဣဒံ ဝုတ္တံ ‘‘ဂမ္ဘီရေ ဩဒကန္တိကေ’’တိ. အတ္ထေ ကိစ္စေ သမုပ္ပန္နေတိ အတ္ထာ အနပေတန္တိ အတ္ထံ, အတ္ထာဝဟံ ဟိတာဝဟန္တိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ကာတဗ္ဗန္တိ ကိစ္စံ, ကိဉ္စိဒေဝ ကရဏီယန္တိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဥပ္ပန္နံ ဧဝ သမုပ္ပန္နံ, ကတ္တဗ္ဗဘာဝေန ဥပဋ္ဌိတန္တိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. တသ္မိံ အတ္ထေ ကိစ္စေ သမုပ္ပန္နေ. အတ္ထာယ မေ ဘဝိဿတီတိ နိဓာနပ္ပယောဇနနိဒဿနမေတံ. ဧတဒတ္ထဉှိ သော နိဓေတိ ‘‘အတ္ထာဝဟေ ကိသ္မိဉ္စိဒေဝ ကရဏီယေ သမုပ္ပန္နေ အတ္ထာယ မေ ဘဝိဿတိ, တဿ မေ ကိစ္စဿ နိပ္ဖတ္တိယာ ဘဝိဿတီ’’တိ. ကိစ္စနိပ္ဖတ္တိယေဝ ဟိ တဿ ကိစ္စေ သမုပ္ပန္နေ အတ္ထောတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. "निधेति" का अर्थ है रखता है, संचित करता है, सुरक्षित करता है। "पुरिसो" का अर्थ है मनुष्य। यद्यपि पुरुष, स्त्री या नपुंसक भी निधि जमा करते हैं, फिर भी यहाँ पुरुष को मुख्य मानकर देशना की गई है, अर्थ के रूप में यहाँ उनका भी समावेश समझना चाहिए। "गम्भीरे ओदकन्तिके" में— प्रवेश करके लेने योग्य होने के कारण 'गम्भीर' (गहरा) है, जल के समीप होने के कारण 'ओदकन्तिक' है। कोई गहरा होता है पर जल के समीप नहीं, जैसे सूखे भू-भाग में एक पुरुष से अधिक गहरा गड्ढा; कोई जल के समीप होता है पर गहरा नहीं, जैसे निचले दलदल में एक-दो बित्ते का गड्ढा; कोई गहरा भी होता है और जल के समीप भी, जैसे सूखे भू-भाग में तब तक खोदा गया गड्ढा जब तक कि पानी न आ जाए। उसे लक्ष्य करके यह कहा गया है— "गम्भीरे ओदकन्तिके"। "अत्थे किच्चे समुप्पन्ने" में— जो लाभ से अलग न हो वह 'अत्थ' (लाभ/प्रयोजन) है, इसका अर्थ लाभ पहुँचाने वाला या हितकारी है। जो किया जाना चाहिए वह 'किच्च' (कार्य/कर्तव्य) है, इसका अर्थ कोई करणीय कार्य है। 'उप्पन्न' ही 'समुप्पन्न' है, इसका अर्थ कर्तव्य के रूप में सामने आया हुआ कार्य है। उस लाभ या कार्य के उत्पन्न होने पर। "अत्थाय मे भविस्सति"— यह निधि जमा करने के प्रयोजन का प्रदर्शन है। वह इसी प्रयोजन के लिए निधि जमा करता है कि "लाभ पहुँचाने वाले किसी करणीय कार्य के उत्पन्न होने पर यह मेरे लाभ के लिए होगा, यह मेरे उस कार्य की सिद्धि के लिए होगा।" कार्य की सिद्धि ही उस कार्य के उत्पन्न होने पर उसका लाभ है, ऐसा समझना चाहिए। ဒုတိယဂါထာဝဏ္ဏနာ दूसरी गाथा की व्याख्या ဧဝံ နိဓာနပ္ပယောဇနံ ဒဿေန္တော အတ္ထာဓိဂမာဓိပ္ပာယံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ အနတ္ထာပဂမာဓိပ္ပာယံ ဒဿေတုမာဟ – इस प्रकार निधि जमा करने का प्रयोजन दिखाते हुए, लाभ प्राप्ति के उद्देश्य को बताकर, अब अनर्थ (हानि) से बचने के उद्देश्य को दिखाने के लिए कहा— ၂. ‘‘ရာဇတော [Pg.185] ဝါ ဒုရုတ္တဿ, စောရတော ပီဠိတဿ ဝါ. २. "राजा द्वारा झूठा आरोप लगाए जाने पर, या चोर द्वारा पीड़ित होने पर।" ဣဏဿ ဝါ ပမောက္ခာယ, ဒုဗ္ဘိက္ခေ အာပဒါသု ဝါ’’တိ. "अथवा ऋण से मुक्ति के लिए, अकाल में या विपत्तियों में।" တဿတ္ထော ‘‘အတ္ထာယ မေ ဘဝိဿတီ’’တိ စ ‘‘ဣဏဿ ဝါ ပမောက္ခာယာ’’တိ စ ဧတ္ထ ဝုတ္တေဟိ ဒွီဟိ ဘဝိဿတိပမောက္ခာယ-ပဒေဟိ သဒ္ဓိံ ယထာသမ္ဘဝံ ယောဇေတွာ ဝေဒိတဗ္ဗော. उसका अर्थ इस प्रकार समझना चाहिए: 'मेरे लाभ के लिए होगा' और 'ऋण से मुक्ति के लिए' - यहाँ कहे गए इन दो पदों 'भविष्यति' (होगा) और 'पमोक्खाय' (मुक्ति के लिए) के साथ यथासंभव जोड़कर अर्थ समझना चाहिए। တတ္ထာယံ ယောဇနာ – န ကေဝလံ အတ္ထာယ မေ ဘဝိဿတီတိ ဧဝ ပုရိသော နိဓိံ နိဓေတိ, ကိန္တု ‘‘အယံ စောရော’’တိ ဝါ ‘‘ပါရဒါရိကော’’တိ ဝါ ‘‘သုင်္ကဃာတကော’’တိ ဝါ ဧဝမာဒိနာ နယေန ပစ္စတ္ထိကေဟိ ပစ္စာမိတ္တေဟိ ဒုရုတ္တဿ မေ သတော ရာဇတော ဝါ ပမောက္ခာယ ဘဝိဿတိ, သန္ဓိစ္ဆေဒါဒီဟိ ဓနဟရဏေန ဝါ, ‘‘ဧတ္တကံ ဟိရညသုဝဏ္ဏံ ဒေဟီ’’တိ ဇီဝဂ္ဂါဟေန ဝါ စောရေဟိ မေ ပီဠိတဿ သတော စောရတော ဝါ ပမောက္ခာယ ဘဝိဿတိ. သန္တိ မေ ဣဏာယိကာ, တေ မံ ‘‘ဣဏံ ဒေဟီ’’တိ စောဒေဿန္တိ, တေဟိ မေ စောဒိယမာနဿ ဣဏဿ ဝါ ပမောက္ခာယ ဘဝိဿတိ. ဟောတိ သော သမယော, ယံ ဒုဗ္ဘိက္ခံ ဟောတိ ဒုဿဿံ ဒုလ္လဘပိဏ္ဍံ, တတ္ထ န သုကရံ အပ္ပဓနေန ယာပေတုံ, တထာဝိဓေ အာဂတေ ဒုဗ္ဘိက္ခေ ဝါ မေ ဘဝိဿတိ. ယထာရူပါ အာပဒါ ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ အဂ္ဂိတော ဝါ ဥဒကတော ဝါ အပ္ပိယဒါယာဒတော ဝါ, တထာရူပါသု ဝါ ဥပ္ပန္နာသု အာပဒါသု မေ ဘဝိဿတီတိပိ ပုရိသော နိဓိံ နိဓေတီတိ. वहाँ यह व्याख्या है - मनुष्य केवल इस विचार से निधि नहीं गाड़ता कि 'यह मेरे लाभ के लिए होगी', बल्कि 'यह व्यक्ति चोर है' या 'परस्त्रीगामी है' या 'कर-चोर है' इत्यादि प्रकार से शत्रुओं या विरोधियों द्वारा मुझ पर दोषारोपण किए जाने पर राजा से मुक्ति के लिए होगी; अथवा सेंधमारी आदि द्वारा धन की चोरी होने पर, या 'इतना सोना-चाँदी दो' इस प्रकार प्राणों के संकट के समय चोरों द्वारा पीड़ित होने पर चोरों से मुक्ति के लिए होगी। मेरे लेनदार हैं, वे मुझसे 'ऋण चुकाओ' ऐसी माँग करेंगे, उनके द्वारा माँग किए जाने पर ऋण से मुक्ति के लिए होगी। ऐसा समय आता है जब अकाल होता है, फसलें नष्ट हो जाती हैं, भोजन मिलना कठिन होता है, वहाँ थोड़े धन से निर्वाह करना सुगम नहीं होता, वैसे अकाल के आने पर मेरे काम आएगी। जिस प्रकार की आपदाएँ अग्नि, जल या अप्रिय उत्तराधिकारियों से उत्पन्न होती हैं, वैसी आपदाओं के उत्पन्न होने पर भी मेरे काम आएगी - इस प्रकार भी मनुष्य निधि गाड़ता है। ဧဝံ အတ္ထာဓိဂမာဓိပ္ပာယံ အနတ္ထာပဂမာဓိပ္ပာယဉ္စာတိ ဒွီဟိ ဂါထာဟိ ဒုဝိဓံ နိဓာနပ္ပယောဇနံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ တမေဝ ဒုဝိဓံ ပယောဇနံ နိဂမေန္တော အာဟ – इस प्रकार 'लाभ प्राप्ति की इच्छा' और 'हानि निवारण की इच्छा' - इन दो गाथाओं द्वारा निधि गाड़ने के दो प्रकार के प्रयोजनों को दिखाकर, अब उसी दो प्रकार के प्रयोजन का उपसंहार करते हुए भगवान ने कहा - ‘‘ဧတဒတ္ထာယ လောကသ္မိံ, နိဓိ နာမ နိဓီယတီ’’တိ. 'इसी प्रयोजन के लिए लोक में निधि नामक वस्तु गाड़ी जाती है।' တဿတ္ထော – ယွာယံ ‘‘အတ္ထာယ မေ ဘဝိဿတီ’’တိ စ ‘‘ရာဇတော ဝါ ဒုရုတ္တဿာ’’တိ ဧဝမာဒီဟိ စ အတ္ထာဓိဂမော အနတ္ထာပဂမော စ ဒဿိတော. ဧတဒတ္ထာယ ဧတေသံ နိပ္ဖာဒနတ္ထာယ ဣမသ္မိံ ဩကာသလောကေ ယော ကောစိ ဟိရညသုဝဏ္ဏာဒိဘေဒေါ နိဓိ နာမ နိဓီယတိ ဌပီယတိ ပဋိသာမီယတီတိ. उसका अर्थ है - जो यह 'मेरे लाभ के लिए होगा' और 'राजा द्वारा प्रताड़ित होने पर' इत्यादि शब्दों द्वारा लाभ की प्राप्ति और अनर्थ का निवारण दिखाया गया है। इसी प्रयोजन के लिए, इनकी सिद्धि के लिए, इस अवकाश-लोक में जो कोई भी सोना-चाँदी आदि के रूप में निधि कही जाती है, वह गाड़ी जाती है, रखी जाती है, सुरक्षित की जाती है। တတိယဂါထာဝဏ္ဏနာ तीसरी गाथा की व्याख्या। ဣဒါနိ [Pg.186] ယသ္မာ ဧဝံ နိဟိတောပိ သော နိဓိ ပုညဝတံယေဝ အဓိပ္ပေတတ္ထသာဓကော ဟောတိ, န အညေသံ, တသ္မာ တမတ္ထံ ဒီပေန္တော အာဟ – अब चूँकि इस प्रकार गाड़ी हुई वह निधि केवल पुण्यवानों के ही अभीष्ट अर्थ को सिद्ध करने वाली होती है, अन्यों के लिए नहीं, इसलिए उस अर्थ को प्रकाशित करते हुए भगवान ने कहा - ၃. ‘‘တာဝဿုနိဟိတော သန္တော, ဂမ္ဘီရေ ဩဒကန္တိကေ. ३. 'यद्यपि वह निधि गहराई में, जल के निकट भली-भाँति गाड़ी गई हो, န သဗ္ဗော သဗ္ဗဒါ ဧဝ, တဿ တံ ဥပကပ္ပတီ’’တိ. तथापि वह सब सदा उसके काम नहीं आती।' တဿတ္ထော – သော နိဓိ တာဝ သုနိဟိတော သန္တော, တာဝ သုဋ္ဌု နိခဏိတွာ ဌပိတော သမာနောတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ကီဝ သုဋ္ဌူတိ? ဂမ္ဘီရေ ဩဒကန္တိကေ, ယာဝ ဂမ္ဘီရေ ဩဒကန္တိကေ နိဟိတောတိ သင်္ခံ ဂစ္ဆတိ, တာဝ သုဋ္ဌူတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. န သဗ္ဗော သဗ္ဗဒါ ဧဝ, တဿ တံ ဥပကပ္ပတီတိ ယေန ပုရိသေန နိဟိတော, တဿ သဗ္ဗောပိ သဗ္ဗကာလံ န ဥပကပ္ပတိ န သမ္ပဇ္ဇတိ, ယထာဝုတ္တကိစ္စကရဏသမတ္ထော န ဟောတီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ကိန္တု ကောစိဒေဝ ကဒါစိဒေဝ ဥပကပ္ပတိ, နေဝ ဝါ ဥပကပ္ပတီတိ. ဧတ္ထ စ န္တိ ပဒပူရဏမတ္တေ နိပါတော ဒဋ္ဌဗ္ဗော ‘‘ယထာ တံ အပ္ပမတ္တဿ အာတာပိနော’’တိ ဧဝမာဒီသု (မ. နိ. ၂.၁၈-၁၉; ၃.၁၅၄) ဝိယ. လိင်္ဂဘေဒံ ဝါ ကတွာ ‘‘သော’’တိ ဝတ္တဗ္ဗေ ‘‘တ’’န္တိ ဝုတ္တံ. ဧဝံ ဟိ ဝုစ္စမာနေ သော အတ္ထော သုခံ ဗုဇ္ဈတီတိ. उसका अर्थ है - वह निधि 'भली-भाँति गाड़ी गई' होने पर, अर्थात् अच्छी तरह खोदकर रखी गई होने पर। कितनी अच्छी तरह? 'गहराई में जल के निकट', जितनी गहराई में जल के निकट गाड़ी गई होने की गणना की जाती है, उतनी अच्छी तरह। 'वह सब सदा उसके काम नहीं आती' का अर्थ है कि जिस मनुष्य द्वारा वह गाड़ी गई है, उसे वह पूरी निधि हर समय काम नहीं आती, सफल नहीं होती, अर्थात् पूर्वोक्त कार्यों को सिद्ध करने में समर्थ नहीं होती। बल्कि कोई निधि कभी काम आती है, या बिल्कुल भी काम नहीं आती। और यहाँ 'न्ति' (nti) शब्द केवल पद की पूर्ति के लिए निपात समझना चाहिए, जैसे 'यथा तं अप्पमत्तस्स आतापिनो' इत्यादि में। अथवा लिंग-परिवर्तन करके जहाँ 'सो' कहना चाहिए था, वहाँ 'तं' कहा गया है। ऐसा कहने पर वह अर्थ सुगमता से समझ में आता है। စတုတ္ထပဉ္စမဂါထာဝဏ္ဏနာ चौथी और पाँचवीं गाथा की व्याख्या। ဧဝံ ‘‘န သဗ္ဗော သဗ္ဗဒါ ဧဝ, တဿ တံ ဥပကပ္ပတီ’’တိ ဝတွာ ဣဒါနိ ယေဟိ ကာရဏေဟိ န ဥပကပ္ပတိ, တာနိ ဒဿေန္တော အာဟ – इस प्रकार 'वह सब सदा उसके काम नहीं आती' ऐसा कहकर, अब जिन कारणों से वह काम नहीं आती, उन्हें दिखाते हुए कहा - ၄. ‘‘နိဓိ ဝါ ဌာနာ စဝတိ, သညာ ဝါဿ ဝိမုယှတိ. ४. 'या तो निधि अपने स्थान से खिसक जाती है, या उसकी स्मृति भ्रमित हो जाती है। နာဂါ ဝါ အပနာမေန္တိ, ယသ္မာ ဝါပိ ဟရန္တိ နံ. या नाग उसे हटा देते हैं, या यक्ष उसे हर ले जाते हैं। ၅. ‘‘အပ္ပိယာ ဝါပိ ဒါယာဒါ, ဥဒ္ဓရန္တိ အပဿတော’’တိ. ५. अथवा अप्रिय उत्तराधिकारी उसके न देखते हुए उसे निकाल लेते हैं।' တဿတ္ထော – ယသ္မိံ ဌာနေ သုနိဟိတော ဟောတိ နိဓိ, သော ဝါ နိဓိ တမှာ ဌာနာ စဝတိ အပေတိ ဝိဂစ္ဆတိ, အစေတနောပိ သမာနော ပုညက္ခယဝသေန အညံ ဌာနံ ဂစ္ဆတိ. သညာ ဝါ အဿ ဝိမုယှတိ, ယသ္မိံ ဌာနေ နိဟိတော နိဓိ, တံ န ဇာနာတိ, အဿ ပုညက္ခယစောဒိတာ နာဂါ ဝါ တံ နိဓိံ အပနာမေန္တိ အညံ ဌာနံ ဂမေန္တိ. ယက္ခာ ဝါပိ ဟရန္တိ ယေနိစ္ဆကံ အာဒါယ [Pg.187] ဂစ္ဆန္တိ. အပဿတော ဝါ အဿ အပ္ပိယာ ဝါ ဒါယာဒါ ဘူမိံ ခဏိတွာ တံ နိဓိံ ဥဒ္ဓရန္တိ. ဧဝမဿ ဧတေဟိ ဌာနာ စဝနာဒီဟိ ကာရဏေဟိ သော နိဓိ န ဥပကပ္ပတီတိ. उसका अर्थ है - जिस स्थान पर निधि भली-भाँति गाड़ी गई होती है, वह निधि उस स्थान से खिसक जाती है, हट जाती है, दूर हो जाती है; अचेतन होने पर भी पुण्य के क्षय होने के कारण दूसरे स्थान पर चली जाती है। अथवा उसकी स्मृति भ्रमित हो जाती है, जिस स्थान पर निधि गाड़ी गई है, उसे वह नहीं जान पाता। उसके पुण्य-क्षय से प्रेरित होकर नाग उस निधि को हटा देते हैं, दूसरे स्थान पर पहुँचा देते हैं। अथवा यक्ष उसे हर लेते हैं, जहाँ चाहते हैं वहाँ लेकर चले जाते हैं। अथवा उसके न देखते हुए अप्रिय उत्तराधिकारी भूमि खोदकर उस निधि को निकाल लेते हैं। इस प्रकार, स्थान से खिसकने आदि इन कारणों से वह निधि उसके काम नहीं आती। ဧဝံ ဌာနာ စဝနာဒီနိ လောကသမ္မတာနိ အနုပကပ္ပနကာရဏာနိ ဝတွာ ဣဒါနိ ယံ တံ ဧတေသမ္ပိ ကာရဏာနံ မူလဘူတံ ဧကညေဝ ပုညက္ခယသညိတံ ကာရဏံ, တံ ဒဿေန္တော အာဟ – इस प्रकार स्थान से खिसकने आदि लोक-प्रसिद्ध अनुपयोगिता के कारणों को कहकर, अब जो इन कारणों का भी मूल कारण है, वह एकमात्र 'पुण्य-क्षय' नामक कारण दिखाते हुए कहा - ‘‘ယဒါ ပုညက္ခယော ဟောတိ, သဗ္ဗမေတံ ဝိနဿတီ’’တိ. 'जब पुण्य का क्षय होता है, तब यह सब नष्ट हो जाता है।' တဿတ္ထော – ယသ္မိံ သမယေ ဘောဂသမ္ပတ္တိနိပ္ဖာဒကဿ ပုညဿ ခယော ဟောတိ, ဘောဂပါရိဇုညသံဝတ္တနိကမပုညမောကာသံ ကတွာ ဌိတံ ဟောတိ, အထ ယံ နိဓိံ နိဓေန္တေန နိဟိတံ ဟိရညသုဝဏ္ဏာဒိဓနဇာတံ, သဗ္ဗမေတံ ဝိနဿတီတိ. उसका अर्थ है - जिस समय भोग-सम्पत्ति को उत्पन्न करने वाले पुण्य का क्षय होता है, और भोगों के विनाश का कारण बनने वाला अपुण्य (पाप) अवसर पाकर उपस्थित होता है, तब निधि गाड़ने वाले द्वारा जो सोना-चाँदी आदि धन गाड़ा गया है, वह सब नष्ट हो जाता है। ဆဋ္ဌဂါထာဝဏ္ဏနာ छठी गाथा की व्याख्या। ဧဝံ ဘဂဝါ တေန တေန အဓိပ္ပာယေန နိဟိတမ္ပိ ယထာဓိပ္ပာယံ အနုပကပ္ပန္တံ နာနပ္ပကာရေဟိ နဿနဓမ္မံ လောကသမ္မတံ နိဓိံ ဝတွာ ဣဒါနိ ယံ ပုညသမ္ပဒံ ပရမတ္ထတော နိဓီတိ ဒဿေတုံ တဿ ကုဋုမ္ဗိကဿ အနုမောဒနတ္ထမိဒံ နိဓိကဏ္ဍမာရဒ္ဓံ, တံ ဒဿေန္တော အာဟ – इस प्रकार भगवान ने उस-उस अभिप्राय से गाड़ी गई होने पर भी इच्छानुसार काम न आने वाली और अनेक प्रकार से नष्ट होने के स्वभाव वाली लोक-प्रसिद्ध निधि के बारे में कहकर, अब जिस पुण्य-सम्पदा को परमार्थतः 'निधि' कहा जाता है, उसे दिखाने के लिए और उस गृहपति के अनुमोदन के लिए इस 'निधिकण्ड' को आरम्भ किया; उसे दिखाते हुए कहा - ၆. ‘‘ယဿ ဒါနေန သီလေန, သံယမေန ဒမေန စ. ६. 'जिस स्त्री या पुरुष के द्वारा दान, शील, संयम और दमन से, နိဓီ သုနိဟိတော ဟောတိ, ဣတ္ထိယာ ပုရိသဿ ဝါ’’တိ. निधि भली-भाँति संचित की गई होती है, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष।' တတ္ထ ဒါနန္တိ ‘‘ဒါနဉ္စ ဓမ္မစရိယာ စာ’’တိ ဧတ္ထ ဝုတ္တနယေနေဝ ဂဟေတဗ္ဗံ. သီလန္တိ ကာယိကဝါစသိကော အဝီတိက္ကမော. ပဉ္စင်္ဂဒသင်္ဂပါတိမောက္ခသံဝရာဒိ ဝါ သဗ္ဗမ္ပိ သီလံ ဣဓ သီလန္တိ အဓိပ္ပေတံ. သံယမောတိ သံယမနံ သံယမော, စေတသော နာနာရမ္မဏဂတိနိဝါရဏန္တိ ဝုတ္တံ ဟောတိ, သမာဓိဿေတံ အဓိဝစနံ. ယေန သံယမေန သမန္နာဂတော ‘‘ဟတ္ထသံယတော, ပါဒသံယတော, ဝါစာသံယတော, သံယတုတ္တမော’’တိ ဧတ္ထ သံယတုတ္တမောတိ ဝုတ္တော. အပရေ အာဟု ‘‘သံယမနံ သံယမော, သံဝရဏန္တိ ဝုတ္တံ ဟောတိ, ဣန္ဒြိယသံဝရဿေတံ အဓိဝစန’’န္တိ. ဒမောတိ ဒမနံ, ကိလေသူပသမနန္တိ ဝုတ္တံ ဟောတိ, ပညာယေတံ အဓိဝစနံ. ပညာ ဟိ ကတ္ထစိ ပညာတွေဝ [Pg.188] ဝုစ္စတိ ‘‘သုဿူသာ လဘတေ ပည’’န္တိ ဧဝမာဒီသု (သံ. နိ. ၁.၂၄၆; သု. နိ. ၁၈၈). ကတ္ထစိ ဓမ္မောတိ ‘‘သစ္စံ ဓမ္မော ဓိတိ စာဂေါ’’တိ ဧဝမာဒီသု. ကတ္ထစိ ဒမောတိ ‘‘ယဒိ သစ္စာ ဒမာ စာဂါ, ခန္တျာ ဘိယျော န ဝိဇ္ဇတီ’’တိအာဒီသု. वहाँ 'दान' का अर्थ 'दानञ्च धम्मचरिया च' (मङ्गल सुत्त) में बताए गए तरीके से ही ग्रहण करना चाहिए। 'शील' का अर्थ है काया और वाणी से होने वाला असंयम (अतिक्रमण) न करना। यहाँ पाँच, दस, या पातिमोक्ख संवर आदि सभी प्रकार के शील अभिप्रेत हैं। 'संयम' का अर्थ है मन को विभिन्न आलम्बनों में भटकने से रोकना; यह 'समाधि' का पर्यायवाची है। जिस संयम से युक्त व्यक्ति को 'हाथ से संयमित, पैर से संयमित, वाणी से संयमित, श्रेष्ठ संयमी' कहा जाता है, यहाँ उसे ही 'संयत-उत्तम' कहा गया है। अन्य आचार्यों का कहना है कि 'संयम' का अर्थ इन्द्रिय-संवर (इन्द्रियों का निग्रह) है। 'दम' का अर्थ है क्लेशों का उपशमन (दमन); यह 'प्रज्ञा' का पर्यायवाची है। प्रज्ञा को कहीं 'सुस्सूसा लभते पञ्ञं' आदि में 'प्रज्ञा' ही कहा गया है, कहीं 'सच्चं धम्मो धिति चागो' आदि में 'धम्म' कहा गया है, और कहीं 'यदि सच्चा दमा चागा' आदि में 'दम' कहा गया है। ဧဝံ ဒါနာဒီနိ ဉတွာ ဣဒါနိ ဧဝံ ဣမိဿာ ဂါထာယ သမ္ပိဏ္ဍေတွာ အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော – ယဿ ဣတ္ထိယာ ဝါ ပုရိသဿ ဝါ ဒါနေန သီလေန သံယမေန ဒမေန စာတိ ဣမေဟိ စတူဟိ ဓမ္မေဟိ ယထာ ဟိရညေန သုဝဏ္ဏေန မုတ္တာယ မဏိနာ ဝါ ဓနမယော နိဓိ တေသံ သုဝဏ္ဏာဒီနံ ဧကတ္ထ ပက္ခိပနေန နိဓီယတိ, ဧဝံ ပုညမယော နိဓိ တေသံ ဒါနာဒီနံ ဧကစိတ္တသန္တာနေ စေတိယာဒိမှိ ဝါ ဝတ္ထုမှိ သုဋ္ဌု ကရဏေန သုနိဟိတော ဟောတီတိ. इस प्रकार दान आदि को जानकर, अब इस गाथा का संक्षिप्त अर्थ इस प्रकार समझना चाहिए—जिस स्त्री या पुरुष के द्वारा दान, शील, संयम और दम, इन चार धर्मों के माध्यम से (पुण्य रूपी खजाना जमा किया जाता है)। जैसे सोने, चाँदी, मोती या मणियों से बना धन-भण्डार एक स्थान पर गाड़कर रखा जाता है, वैसे ही दान आदि के माध्यम से पुण्यमयी निधि (खजाना) अपने चित्त-सन्तान में या चैत्य आदि वस्तुओं के प्रति उत्तम कर्म करने से 'सुनिहित' (भली-भाँति स्थापित) होती है। သတ္တမဂါထာဝဏ္ဏနာ सातवीं गाथा की व्याख्या। ဧဝံ ဘဂဝါ ‘‘ယဿ ဒါနေနာ’’တိ ဣမာယ ဂါထာယ ပုညသမ္ပဒါယ ပရမတ္ထတော နိဓိဘာဝံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ ယတ္ထ နိဟိတော, သော နိဓိ သုနိဟိတော ဟောတိ, တံ ဝတ္ထုံ ဒဿေန္တော အာဟ – इस प्रकार भगवान ने 'यस्स दानेन' इस गाथा से पुण्य-सम्पदा के परमार्थतः निधि (खजाना) होने को दिखाकर, अब वह निधि जहाँ जमा की जाने पर 'सुनिहित' (सुरक्षित) होती है, उस स्थान को दर्शाते हुए कहा— ၇. ‘‘စေတိယမှိ စ သံဃေ ဝါ, ပုဂ္ဂလေ အတိထီသု ဝါ. ७. चैत्य में, संघ में, किसी व्यक्ति विशेष में, अतिथियों में, မာတရိ ပိတရိ စာပိ, အထော ဇေဋ္ဌမှိ ဘာတရီ’’တိ. माता में, पिता में और बड़े भाई में भी। တတ္ထ စယိတဗ္ဗန္တိ စေတိယံ, ပူဇေတဗ္ဗန္တိ ဝုတ္တံ ဟောတိ, စိတတ္တာ ဝါ စေတိယံ. တံ ပနေတံ စေတိယံ တိဝိဓံ ဟောတိ ပရိဘောဂစေတိယံ, ဥဒ္ဒိဿကစေတိယံ, ဓာတုကစေတိယန္တိ. တတ္ထ ဗောဓိရုက္ခော ပရိဘောဂစေတိယံ, ဗုဒ္ဓပဋိမာ ဥဒ္ဒိဿကစေတိယံ, ဓာတုဂဗ္ဘထူပါ သဓာတုကာ ဓာတုကစေတိယံ. သံဃောတိ ဗုဒ္ဓပ္ပမုခါဒီသု ယော ကောစိ. ပုဂ္ဂလောတိ ဂဟဋ္ဌပဗ္ဗဇိတေသု ယော ကောစိ. နတ္ထိ အဿ တိထိ, ယမှိ ဝါ တမှိ ဒိဝသေ အာဂစ္ဆတီတိ အတိထိ. တင်္ခဏေ အာဂတပါဟုနကဿေတံ အဓိဝစနံ. သေသံ ဝုတ္တနယမေဝ. वहाँ 'चैत्य' (चेतिय) का अर्थ है जो पूजनीय हो, अथवा जो (ईंटों आदि से) चुना गया हो। वह चैत्य तीन प्रकार का होता है—परिभोग चैत्य, उद्दिसक चैत्य और धातु चैत्य। उनमें बोधिवृक्ष 'परिभोग चैत्य' है, बुद्ध-प्रतिमा 'उद्दिसक चैत्य' है और धातु-गर्भित स्तूप 'धातु चैत्य' हैं। 'संघ' का अर्थ है बुद्ध को प्रमुख मानकर कोई भी संघ-सदस्य। 'पुग्गल' (व्यक्ति) का अर्थ है गृहस्थों या प्रव्रजितों में से कोई भी। जिसकी कोई निश्चित तिथि न हो, जो किसी भी दिन आ जाए, वह 'अतिथि' है। यह उस समय आए हुए पाहुन (मेहमान) का नाम है। शेष अर्थ पहले बताए अनुसार ही है। ဧဝံ စေတိယာဒီနိ ဉတွာ ဣဒါနိ ဧဝံ ဣမိဿာ ဂါထာယ သမ္ပိဏ္ဍေတွာ အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော – ယော သော နိဓိ ‘‘သုနိဟိတော ဟောတီ’’တိ ဝုတ္တော, သော ဣမေသု ဝတ္ထူသု သုနိဟိတော ဟောတိ. ကသ္မာ? ဒီဃရတ္တံ ဣဋ္ဌဖလာနုပ္ပဒါနသမတ္ထတာယ. တထာ ဟိ အပ္ပကမ္ပိ စေတိယမှိ ဒတွာ ဒီဃရတ္တံ ဣဋ္ဌဖလလာဘိနော ဟောန္တိ. ယထာဟ – इस प्रकार चैत्य आदि को जानकर, अब इस गाथा का सम्मिलित अर्थ इस प्रकार समझना चाहिए—जो वह निधि 'सुनिहित' कही गई है, वह इन (चैत्य आदि) वस्तुओं में भली-भाँति स्थापित होती है। क्यों? क्योंकि यह दीर्घकाल तक इष्ट फल देने में समर्थ है। जैसे चैत्य में थोड़ा सा भी दान देकर लोग दीर्घकाल तक इष्ट फल प्राप्त करने वाले होते हैं। जैसा कि कहा गया है— ‘‘ဧကပုပ္ဖံ [Pg.189] ယဇိတွာန, အသီတိကပ္ပကောဋိယော; ဒုဂ္ဂတိံ နာဘိဇာနာမိ, ပုပ္ဖဒါနဿိဒံ ဖလ’’န္တိ စ. 'एक पुष्प चढ़ाकर, अस्सी करोड़ कल्पों तक मैं दुर्गति को प्राप्त नहीं हुआ; यह पुष्प-दान का फल है।' ‘‘မတ္တာသုခပရိစ္စာဂါ, ပဿေ စေ ဝိပုလံ သုခ’’န္တိ စ. (ဓ. ပ. ၂၉၀); 'यदि अल्प सुख के त्याग से विशाल सुख दिखाई दे (तो बुद्धिमान को अल्प सुख त्याग देना चाहिए)।' ဧဝံ ဒက္ခိဏာဝိသုဒ္ဓိဝေလာမသုတ္တာဒီသု ဝုတ္တနယေန သံဃာဒိဝတ္ထူသုပိ ဒါနဖလဝိဘာဂေါ ဝေဒိတဗ္ဗော. ယထာ စ စေတိယာဒီသု ဒါနဿ ပဝတ္တိ ဖလဝိဘူတိ စ ဒဿိတာ, ဧဝံ ယထာယောဂံ သဗ္ဗတ္ထ တံ တံ အာရဘိတွာ စာရိတ္တဝါရိတ္တဝသေန သီလဿ, ဗုဒ္ဓါနုဿတိဝသေန သံယမဿ, တဗ္ဗတ္ထုကဝိပဿနာမနသိကာရပစ္စဝေက္ခဏဝသေန ဒမဿ စ ပဝတ္တိ တဿ တဿ ဖလဝိဘူတိ စ ဝေဒိတဗ္ဗာ. इस प्रकार दक्खिणाविभङ्ग सुत्त और वेलाम सुत्त आदि में बताए गए तरीके से संघ आदि वस्तुओं में भी दान-फल का विभाजन समझना चाहिए। जैसे चैत्य आदि में दान की प्रवृत्ति और फल की महिमा दिखाई गई है, वैसे ही यथासंभव सभी स्थानों पर उन-उन (पुण्य कर्मों) को आरम्भ कर चारित्र-वारित्र के रूप में शील की, बुद्धानुस्मृति के रूप में संयम की, और उन वस्तुओं के प्रति विपश्यना, मनसिकार एवं प्रत्यवेक्षण के रूप में दम (प्रज्ञा) की प्रवृत्ति और उनके फल की महिमा समझनी चाहिए। အဋ္ဌမဂါထာဝဏ္ဏနာ आठवीं गाथा की व्याख्या। ဧဝံ ဘဂဝါ ဒါနာဒီဟိ နိဓီယမာနဿ ပုညမယနိဓိနော စေတိယာဒိဘေဒံ ဝတ္ထုံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ ဧတေသု ဝတ္ထူသု သုနိဟိတဿ တဿ နိဓိနော ဂမ္ဘီရေ ဩဒကန္တိကေ နိဟိတနိဓိတော ဝိသေသံ ဒဿေန္တော အာဟ – इस प्रकार भगवान ने दान आदि के द्वारा संचित पुण्यमयी निधि के चैत्य आदि विभिन्न आधारों को दिखाकर, अब इन वस्तुओं में सुनिहित उस निधि की, गहरे पानी के पास गाड़े गए (सांसारिक) खजाने से विशेषता बताते हुए कहा— ၈. ‘‘ဧသော နိဓိ သုနိဟိတော, အဇေယျော အနုဂါမိကော. ८. यह निधि भली-भाँति स्थापित है, अजेय है और साथ जाने वाली है। ပဟာယ ဂမနီယေသု, ဧတံ အာဒါယ ဂစ္ဆတီ’’တိ. छोड़कर जाने योग्य (सांसारिक) वस्तुओं के बीच, इसे लेकर (प्राणी) जाता है। တတ္ထ ပုဗ္ဗပဒေန တံ ဒါနာဒီဟိ သုနိဟိတနိဓိံ နိဒ္ဒိသတိ ‘‘ဧသော နိဓိ သုနိဟိတော’’တိ. အဇေယျောတိ ပရေဟိ ဇေတွာ ဂဟေတုံ န သက္ကာ, အစ္စေယျောတိပိ ပါဌော, တဿ အစ္စိတဗ္ဗော အစ္စနာရဟော ဟိတသုခတ္ထိကေန ဥပစိတဗ္ဗောတိ အတ္ထော. ဧတသ္မိဉ္စ ပါဌေ ဧသော နိဓိ အစ္စေယျောတိ သမ္ဗန္ဓိတွာ ပုန ‘‘ကသ္မာ’’တိ အနုယောဂံ ဒဿေတွာ ‘‘ယသ္မာ သုနိဟိတော အနုဂါမိကော’’တိ သမ္ဗန္ဓိတဗ္ဗံ. ဣတရထာ ဟိ သုနိဟိတဿ အစ္စေယျတ္တံ ဝုတ္တံ ဘဝေယျ, န စ သုနိဟိတော အစ္စနီယော. အစ္စိတော ဧဝ ဟိ သောတိ. အနုဂစ္ဆတီတိ အနုဂါမိကော, ပရလောကံ ဂစ္ဆန္တမ္ပိ တတ္ထ တတ္ထ ဖလဒါနေန န ဝိဇဟတီတိ အတ္ထော. वहाँ पूर्व पद 'एसो निधि सुनिहितो' के द्वारा दान आदि से भली-भाँति स्थापित उस निधि का निर्देश किया गया है। 'अजेय' का अर्थ है जिसे दूसरे जीतकर नहीं ले सकते। 'अच्चेय्यो' (Acceyya) ऐसा पाठ भी मिलता है, जिसका अर्थ है—हित और सुख चाहने वाले व्यक्ति द्वारा संचित करने योग्य या पूजनीय। इस पाठ में 'एसो निधि अच्चेय्यो' जोड़कर फिर 'क्यों?' यह प्रश्न कर 'क्योंकि यह सुनिहित और अनुगामी है' ऐसा सम्बन्ध जोड़ना चाहिए। अन्यथा, केवल सुनिहित होने का अर्थ 'संचित करने योग्य' हो जाएगा, जबकि सुनिहित वस्तु स्वयं पूजनीय (अर्चित) ही होती है। जो साथ चले वह 'अनुगामी' है, अर्थात् परलोक जाने वाले का भी वहाँ-वहाँ फल देने के कारण साथ नहीं छोड़ती। ပဟာယ ဂမနီယေသု ဧတံ အာဒါယ ဂစ္ဆတီတိ မရဏကာလေ ပစ္စုပဋ္ဌိတေ သဗ္ဗဘောဂေသု ပဟာယ ဂမနီယေသု ဧတံ နိဓိံ အာဒါယ ပရလောကံ ဂစ္ဆတီတိ အယံ ကိရ ဧတဿ အတ္ထော. သော ပန န ယုဇ္ဇတိ. ကသ္မာ? ဘောဂါနံ [Pg.190] အဂမနီယတော. ပဟာတဗ္ဗာ ဧဝ ဟိ တေ တေ ဘောဂါ, န ဂမနီယာ, ဂမနီယာ ပန တေ တေ ဂတိဝိသေသာ. ယတော ယဒိ ဧသ အတ္ထော သိယာ, ပဟာယ ဘောဂေ ဂမနီယေသု ဂတိဝိသေသေသု ဣတိ ဝဒေယျ. တသ္မာ ဧဝမေတ္ထ အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော – ‘‘နိဓိ ဝါ ဌာနာ စဝတီ’’တိ ဧဝမာဒိနာ ပကာရေန ပဟာယ မစ္စံ ဘောဂေသု ဂစ္ဆန္တေသု ဧတံ အာဒါယ ဂစ္ဆတီတိ. ဧသော ဟိ အနုဂါမိကတ္တာ တံ နပ္ပဇဟတီတိ. जब मृत्यु का समय निकट आता है, तब सभी भोगों को त्याग कर जाते समय, इस (पुण्य रूपी) निधि को लेकर परलोक जाता है - यह इसका अर्थ है। परन्तु यह उचित नहीं है। क्यों? क्योंकि भोग साथ नहीं जाते। वे विभिन्न भोग त्यागने योग्य ही हैं, साथ ले जाने योग्य नहीं; बल्कि वे विभिन्न गतियाँ (पुनर्जन्म के स्थान) ही जाने योग्य हैं। यदि यह अर्थ होता, तो 'भोगों को त्याग कर जाने योग्य गतियों में' ऐसा कहा जाता। इसलिए यहाँ इस प्रकार अर्थ समझना चाहिए - 'निधि स्थान से च्युत होती है' इत्यादि प्रकार से जब मरणशील प्राणी भोगों को छोड़कर जा रहे होते हैं, तब वह इसे लेकर जाता है। क्योंकि अनुगामी होने के कारण यह उसे नहीं छोड़ता है। တတ္ထ သိယာ ‘‘ဂမနီယေသူတိ ဧတ္ထ ဂန္တဗ္ဗေသူတိ အတ္ထော, န ဂစ္ဆန္တေသူ’’တိ. တံ န ဧကံသတော ဂဟေတဗ္ဗံ. ယထာ ဟိ ‘‘အရိယာ နိယျာနိကာ’’တိ (ဒီ. နိ. ၂.၁၄၁) ဧတ္ထ နိယျန္တာတိ အတ္ထော, န နိယျာတဗ္ဗာတိ, ဧဝမိဓာပိ ဂစ္ဆန္တေသူတိ အတ္ထော, န ဂန္တဗ္ဗေသူတိ. वहाँ यह शंका हो सकती है कि 'गमनीयेसु' यहाँ 'गन्तब्बेसु' (जाने योग्य वस्तुओं में) यह अर्थ है, न कि 'गच्छन्तेसु' (जाने वालों में)। उसे पूर्णतः स्वीकार नहीं करना चाहिए। जैसे 'अरिया निय्यानिका' यहाँ 'निय्यन्ता' (निकलने वाले) अर्थ है, न कि 'निय्यातब्बा' (निकलने योग्य), वैसे ही यहाँ भी 'गच्छन्तेसु' (जाने वालों में) ही अर्थ है, 'गन्तब्बेसु' (जाने योग्य में) नहीं। အထ ဝါ ယသ္မာ ဧသ မရဏကာလေ ကဿစိ ဒါတုကာမော ဘောဂေ အာမသိတုမ္ပိ န လဘတိ, တသ္မာ တေန တေ ဘောဂါ ပုဗ္ဗံ ကာယေန ပဟာတဗ္ဗာ, ပစ္ဆာ ဝိဟတာသေန စေတသာ ဂန္တဗ္ဗာ, အတိက္ကမိတဗ္ဗာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. တသ္မာ ပုဗ္ဗံ ကာယေန ပဟာယ ပစ္ဆာ စေတသာ ဂမနီယေသု ဘောဂေသူတိ ဧဝမေတ္ထ အတ္ထော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ပုရိမသ္မိံ အတ္ထေ နိဒ္ဓါရဏေ ဘုမ္မဝစနံ, ပဟာယ ဂမနီယေသု ဘောဂေသု ဧကမေဝေတံ ပုညနိဓိဝိဘဝံ တတော နီဟရိတွာ အာဒါယ ဂစ္ဆတီတိ. ပစ္ဆိမေ အတ္ထေ ဘာဝေနဘာဝလက္ခဏေ ဘုမ္မဝစနံ. ဘောဂါနဉှိ ဂမနီယဘာဝေန ဧတဿ နိဓိဿ အာဒါယ ဂမနီယဘာဝေါ လက္ခီယတီတိ. अथवा, क्योंकि यह व्यक्ति मृत्यु के समय किसी को देने की इच्छा रखते हुए भी भोगों को छू तक नहीं पाता, इसलिए उसके द्वारा वे भोग पहले शरीर से त्यागने योग्य हैं और बाद में विरक्त चित्त से छोड़ने योग्य या पार करने योग्य हैं - ऐसा कहा गया है। इसलिए यहाँ अर्थ इस प्रकार देखना चाहिए - 'पहले शरीर से त्याग कर, बाद में चित्त से त्याग कर जाने वाले भोगों में'। पहले अर्थ में 'निर्धारण' (niddhāraṇa) में सप्तमी विभक्ति है - 'त्याग कर जाने वाले भोगों में से केवल इस पुण्य-निधि रूपी वैभव को वहाँ से निकालकर साथ लेकर जाता है'। बाद के अर्थ में 'भावलक्षण' (bhāvalakkhaṇa) में सप्तमी विभक्ति है। भोगों के जाने के भाव से इस निधि के साथ जाने का भाव लक्षित होता है। နဝမဂါထာဝဏ္ဏနာ नौवीं गाथा की व्याख्या। ဧဝံ ဘဂဝါ ဣမဿ ပုညနိဓိနော ဂမ္ဘီရေ ဩဒကန္တိကေ နိဟိတနိဓိတော ဝိသေသံ ဒဿေတွာ ပုန အတ္တနော ဘဏ္ဍဂုဏသံဝဏ္ဏနေန ကယဇနဿ ဥဿာဟံ ဇနေန္တော ဥဠာရဘဏ္ဍဝါဏိဇော ဝိယ အတ္တနာ ဒေသိတပုညနိဓိဂုဏသံဝဏ္ဏနေန တသ္မိံ ပုညနိဓိမှိ ဒေဝမနုဿာနံ ဥဿာဟံ ဇနေန္တော အာဟ – इस प्रकार भगवान ने इस पुण्य-निधि की, गहरे जल के निकट गाड़े हुए खजाने से विशेषता दिखाकर, पुनः अपनी वस्तु के गुणों का वर्णन करते हुए खरीदार में उत्साह जगाने वाले एक महान व्यापारी की तरह, स्वयं द्वारा उपदिष्ट पुण्य-निधि के गुणों का वर्णन करते हुए, उस पुण्य-निधि के प्रति देवों और मनुष्यों में उत्साह उत्पन्न करते हुए कहा — ၉. ‘‘အသာဓာရဏမညေသံ, အစောရာဟရဏော နိဓိ. ९. “यह निधि दूसरों के लिए असाधारण (साझा न की जाने वाली) है और चोरों द्वारा नहीं छीनी जा सकती। ကယိရာထ ဓီရော ပုညာနိ, ယော နိဓိ အနုဂါမိကော’’တိ. बुद्धिमान व्यक्ति को पुण्यों का संचय करना चाहिए, जो निधि पीछे-पीछे चलने वाली (अनुगामी) है।” တတ္ထ [Pg.191] အသာဓာရဏမညေသန္တိ အသာဓာရဏော အညေသံ, မကာရော ပဒသန္ဓိကရော ‘‘အဒုက္ခမသုခါယ ဝေဒနာယ သမ္ပယုတ္တာ’’တိအာဒီသု ဝိယ. န စောရေဟိ အာဟရဏော အစောရာဟရဏော, စောရေဟိ အာဒါတဗ္ဗော န ဟောတီတိ အတ္ထော. နိဓာတဗ္ဗောတိ နိဓိ. ဧဝံ ဒွီဟိ ပဒေဟိ ပုညနိဓိဂုဏံ သံဝဏ္ဏေတွာ တတော ဒွီဟိ တတ္ထ ဥဿာဟံ ဇနေတိ ‘‘ကယိရာထ ဓီရော ပုညာနိ, ယော နိဓိ အနုဂါမိကော’’တိ. တဿတ္ထော – ယသ္မာ ပုညာနိ နာမ အသာဓာရဏော အညေသံ, အစောရာဟရဏော စ နိဓိ ဟောတိ. န ကေဝလဉ္စ အသာဓာရဏော အစောရာဟရဏော စ နိဓိ, အထ ခေါ ပန ‘‘ဧသော နိဓိ သုနိဟိတော, အဇေယျော အနုဂါမိကော’’တိ ဧတ္ထ ဝုတ္တော ယော နိဓိ အနုဂါမိကော. သော စ ယသ္မာ ပုညာနိယေဝ, တသ္မာ ကယိရာထ ကရေယျ ဓီရော ဗုဒ္ဓိသမ္ပန္နော ဓိတိသမ္ပန္နော စ ပုဂ္ဂလော ပုညာနီတိ. वहाँ 'असाधारणमञ्ञेसं' का अर्थ है - दूसरों के लिए असाधारण। यहाँ 'म' अक्षर पद-सन्धि करने वाला है, जैसे 'अदुक्खमसुखाय वेदनाय सम्पयुत्ता' आदि में। चोरों द्वारा नहीं ले जाई जा सकने वाली 'अचोराहरणो' है, अर्थात चोरों द्वारा ग्रहण करने योग्य नहीं है। जिसे संचित किया जाना चाहिए, वह 'निधि' है। इस प्रकार दो पदों से पुण्य-निधि के गुणों का वर्णन कर, उसके बाद दो पदों से उसमें उत्साह जगाते हैं - 'कयिराथ धीरो पुञ्ञानि, यो निधि अनुगामिको'। इसका अर्थ है - चूँकि पुण्य दूसरों के लिए असाधारण और चोरों द्वारा न छीनी जा सकने वाली निधि है। और न केवल असाधारण और चोरों द्वारा न छीनी जा सकने वाली निधि है, बल्कि 'एसो निधि सुनिहितो, अजेय्यो अनुगामिको' यहाँ जो अनुगामी निधि कही गई है, वह चूँकि पुण्य ही है, इसलिए बुद्धि और धैर्य से संपन्न व्यक्ति को पुण्यों का संचय करना चाहिए। ဒသမဂါထာဝဏ္ဏနာ दसवीं गाथा की व्याख्या। ဧဝံ ဘဂဝါ ဂုဏသံဝဏ္ဏနေန ပုညနိဓိမှိ ဒေဝမနုဿာနံ ဥဿာဟံ ဇနေတွာ ဣဒါနိ ယေ ဥဿဟိတွာ ပုညနိဓိကိရိယာယ သမ္ပာဒေန္တိ, တေသံ သော ယံ ဖလံ ဒေတိ, တံ သင်္ခေပတော ဒဿေန္တော အာဟ – इस प्रकार भगवान ने गुणों के वर्णन द्वारा पुण्य-निधि के प्रति देवों और मनुष्यों में उत्साह उत्पन्न कर, अब जो लोग उत्साहित होकर पुण्य-निधि के कार्य को संपन्न करते हैं, उन्हें वह जो फल देती है, उसे संक्षेप में दिखाते हुए कहा — ၁၀. १०. ‘‘ဧသ ဒေဝမနုဿာနံ, သဗ္ဗကာမဒဒေါ နိဓီ’’တိ. “यह निधि देवों और मनुष्यों की सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली है।” ဣဒါနိ ယသ္မာ ပတ္ထနာယ ပဋိဗန္ဓိတဿ သဗ္ဗကာမဒဒတ္တံ, န ဝိနာ ပတ္ထနံ ဟောတိ. ယထာဟ – अब चूँकि सभी कामनाओं को पूर्ण करने की शक्ति प्रार्थना (आकांक्षा) से जुड़ी है, और प्रार्थना के बिना यह संभव नहीं होती। जैसा कि कहा गया है — ‘‘အာကင်္ခေယျ စေ ဂဟပတယော ဓမ္မစာရီ သမစာရီ ‘အဟော ဝတာဟံ ကာယဿ ဘေဒါ ပရံ မရဏာ ခတ္တိယမဟာသာလာနံ သဟဗျတံ ဥပပဇ္ဇေယျ’န္တိ, ဌာနံ ခေါ ပနေတံ ဝိဇ္ဇတိ ယံ သော ကာယဿ ဘေဒါ ပရံ မရဏာ ခတ္တိယမဟာသာလာနံ သဟဗျတံ ဥပပဇ္ဇေယျ. တံ ကိဿ ဟေတု? တထာ ဟိ သော ဓမ္မစာရီ သမစာရီ’’ (မ. နိ. ၁.၄၄၂). “हे गृहपतियों! यदि धर्म का आचरण करने वाला और सम्यक आचरण करने वाला व्यक्ति यह आकांक्षा करे—'अहो! काश मैं शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, क्षत्रिय महाशालों की सहभागिता (कुल) में उत्पन्न होऊँ', तो यह स्थान (संभावना) विद्यमान है कि वह शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, क्षत्रिय महाशालों की सहभागिता में उत्पन्न हो। उसका क्या कारण है? क्योंकि वह धर्मचारी और समचारी है।” ဧဝံ ‘‘အနာသဝံ စေတောဝိမုတ္တိံ ပညာဝိမုတ္တိံ ဒိဋ္ဌေဝ ဓမ္မေ သယံ အဘိညာ သစ္ဆိကတွာ ဥပသမ္ပဇ္ဇ ဝိဟရေယျ. တံ ကိဿ ဟေတု? တထာ ဟိ သော ဓမ္မစာရီ သမစာရီ’’တိ (မ. နိ. ၁.၄၄၂). इसी प्रकार 'आस्रव-रहित चेतोविमुक्ति और प्रज्ञाविमुक्ति को इसी जन्म में स्वयं अभिज्ञा द्वारा साक्षात् कर, उसे प्राप्त कर विहार करे। उसका क्या कारण है? क्योंकि वह धर्मचारी और समचारी है'। တထာ [Pg.192] စာဟ – और वैसा ही कहा है — ‘‘ဣဓ, ဘိက္ခဝေ, ဘိက္ခု သဒ္ဓါယ သမန္နာဂတော ဟောတိ, သီလေန, သုတေန, စာဂေန, ပညာယ သမန္နာဂတော ဟောတိ, တဿ ဧဝံ ဟောတိ ‘အဟော ဝတာဟံ ကာယဿ ဘေဒါ ပရံ မရဏာ ခတ္တိယမဟာသာလာနံ သဟဗျတံ ဥပပဇ္ဇေယျ’န္တိ. သော တံ စိတ္တံ ပဒဟတိ, တံ စိတ္တံ အဓိဋ္ဌာတိ, တံ စိတ္တံ ဘာဝေတိ. တဿ တေ သင်္ခါရာ စ ဝိဟာရာ စ ဧဝံ ဘာဝိတာ ဧဝံ ဗဟုလီကတာ တတြူပပတ္တိယာ သံဝတ္တန္တီ’’တိ (မ. နိ. ၃.၁၆၁) ဧဝမာဒိ. “यहाँ, भिक्षुओं! भिक्षु श्रद्धा से संपन्न होता है, शील, श्रुत, त्याग और प्रज्ञा से संपन्न होता है। उसे ऐसा विचार आता है—'अहो! काश मैं शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, क्षत्रिय महाशालों की सहभागिता में उत्पन्न होऊँ'। वह उस चित्त को दृढ़ करता है, उस चित्त को अधिष्ठित करता है, उस चित्त को भावित करता है। उसके वे संस्कार और विहार इस प्रकार भावित और इस प्रकार बहुलीकृत होने पर वहाँ उत्पत्ति के लिए संवर्तित होते हैं” इत्यादि। တသ္မာ တံ တထာ တထာ အာကင်္ခပရိယာယံ စိတ္တပဒဟနာဓိဋ္ဌာနဘာဝနာပရိက္ခာရံ ပတ္ထနံ တဿ သဗ္ဗကာမဒဒတ္တေ ဟေတုံ ဒဿေန္တော အာဟ – इसलिए उस-उस प्रकार से आकांक्षा के क्रम में चित्त के उद्योग, अधिष्ठान और भावना से परिष्कृत प्रार्थना को, उसकी सर्व-कामना-प्रदाता होने में कारण के रूप में दिखाते हुए कहा — ‘‘ယံ ယဒေဝါဘိပတ္ထေန္တိ, သဗ္ဗမေတေန လဗ္ဘတီ’’တိ. “वे जिस-जिस की भी प्रार्थना करते हैं, वह सब इसके द्वारा प्राप्त हो जाता है।” ဧကာဒသမဂါထာဝဏ္ဏနာ ग्यारहवीं गाथा की व्याख्या। ၁၁. ဣဒါနိ ယံ တံ သဗ္ဗံ ဧတေန လဗ္ဘတိ, တံ ဩဓိသော ဩဓိသော ဒဿေန္တော ‘‘သုဝဏ္ဏတာ သုသရတာ’’တိ ဧဝမာဒိဂါထာယော အာဟ. ११. अब वह सब जो इसके द्वारा प्राप्त होता है, उसे अलग-अलग (विस्तार से) दिखाते हुए 'सुवण्णता सुसरता' इत्यादि गाथाएँ कहीं। တတ္ထ ပဌမဂါထာယ တာဝ သုဝဏ္ဏတာ နာမ သုန္ဒရစ္ဆဝိဝဏ္ဏတာ ကဉ္စနသန္နိဘတ္တစတာ, သာပိ ဧတေန ပုညနိဓိနာ လဗ္ဘတိ. ယထာဟ – वहाँ पहली गाथा में 'सुवण्णता' का अर्थ है - सुंदर त्वचा का वर्ण और स्वर्ण के समान कान्ति वाली त्वचा; वह भी इस पुण्य-निधि द्वारा प्राप्त होती है। जैसा कि कहा गया है — ‘‘ယမ္ပိ, ဘိက္ခဝေ, တထာဂတော ပုရိမံ ဇာတိံ…ပေ… ပုဗ္ဗေ မနုဿဘူတော သမာနော အက္ကောဓနော အဟောသိ အနုပါယာသဗဟုလော, ဗဟုမ္ပိ ဝုတ္တော သမာနော နာဘိသဇ္ဇိ န ကုပ္ပိ န ဗျာပဇ္ဇိ န ပတိတ္ထီယိ, န ကောပဉ္စ ဒေါသဉ္စ အပ္ပစ္စယဉ္စ ပါတွာကာသိ, ဒါတာ စ အဟောသိ သုခုမာနံ မုဒုကာနံ အတ္ထရဏာနံ ပါဝုရဏာနံ ခေါမသုခုမာနံ ကပ္ပာသိက…ပေ… ကောသေယျ…ပေ… ကမ္ဗလသုခုမာနံ. သော တဿ ကမ္မဿ ကတတ္တာ ဥပစိတတ္တာ…ပေ… ဣတ္ထတ္တံ အာဂတော သမာနော ဣမံ မဟာပုရိသလက္ခဏံ ပဋိလဘတိ. သုဝဏ္ဏဝဏ္ဏော ဟောတိ ကဉ္စနသန္နိဘတ္တစော’’တိ (ဒီ. နိ. ၃.၂၁၈). “हे भिक्षुओं, तथागत ने पूर्व जन्म में... पहले मनुष्य होते हुए, वे क्रोधरहित थे, अत्यधिक संताप से रहित थे। बहुत कुछ कहे जाने पर भी वे न तो आसक्त हुए, न क्रुद्ध हुए, न द्वेष किया, न ही मन में गांठ बांधी। उन्होंने क्रोध, द्वेष और अप्रसन्नता को प्रकट नहीं किया। वे सूक्ष्म और कोमल बिछौनों, वस्त्रों, सूक्ष्म क्षौम (अलसी के रेशों के), कपास के... रेशमी... और सूक्ष्म कम्बलों के दाता थे। उस कर्म के किए जाने और संचित होने के कारण... यहाँ (इस जन्म में) आकर वे इस महापुरुष लक्षण को प्राप्त करते हैं—वे सुवर्ण वर्ण के होते हैं और उनकी त्वचा कंचन के समान आभा वाली होती है।” (दी. नि. 3.218) သုသရတာ နာမ ဗြဟ္မဿရတာ ကရဝီကဘာဏိတာ, သာပိ ဧတေန လဗ္ဘတိ. ယထာဟ – सुस्वरता का अर्थ है ब्रह्म-स्वर होना और करविक पक्षी के समान मधुर बोलना; वह भी इसी (पुण्य) से प्राप्त होती है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘ယမ္ပိ[Pg.193], ဘိက္ခဝေ, တထာဂတော ပုရိမံ ဇာတိံ…ပေ… ဖရုသံ ဝါစံ ပဟာယ ဖရုသာယ ဝါစာယ ပဋိဝိရတော အဟောသိ, ယာ သာ ဝါစာ နေလာ ကဏ္ဏသုခါ…ပေ… တထာရူပိံ ဝါစံ ဘာသိတာ အဟောသိ. သော တဿ ကမ္မဿ ကတတ္တာ ဥပစိတတ္တာ…ပေ… ဣတ္ထတ္တံ အာဂတော သမာနော ဣမာနိ ဒွေ မဟာပုရိသလက္ခဏာနိ ပဋိလဘတိ. ပဟုတဇိဝှော စ ဟောတိ ဗြဟ္မဿရော စ ကရဝီကဘာဏီ’’တိ (ဒီ. နိ. ၃.၂၃၆). “हे भिक्षुओं, तथागत ने पूर्व जन्म में... परुष (कठोर) वाणी को त्याग कर, वे कठोर वाणी से विरत रहे। जो वाणी निर्दोष, कानों को सुख देने वाली... वैसी वाणी बोलने वाले थे। उस कर्म के किए जाने और संचित होने के कारण... यहाँ आकर वे इन दो महापुरुष लक्षणों को प्राप्त करते हैं—उनकी जिह्वा विशाल होती है और उनका स्वर ब्रह्म-स्वर तथा करविक पक्षी के समान मधुर होता है।” (दी. नि. 3.236) သုသဏ္ဌာနာတိ သုဋ္ဌု သဏ္ဌာနတာ, သမစိတဝဋ္ဋိတယုတ္တဋ္ဌာနေသု အင်္ဂပစ္စင်္ဂါနံ သမစိတဝဋ္ဋိတဘာဝေန သန္နိဝေသောတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. သာပိ ဧတေန လဗ္ဘတိ. ယထာဟ – सुसंस्थान का अर्थ है भली-भांति सुगठित होना। अंगों और प्रत्यंगों का उन स्थानों पर जहाँ उन्हें सम, गोल और युक्त होना चाहिए, भली-भांति विन्यास होना 'सुसंस्थान' कहलाता है। वह भी इसी (पुण्य) से प्राप्त होता है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘ယမ္ပိ, ဘိက္ခဝေ, တထာဂတော ပုရိမံ ဇာတိံ…ပေ… ပုဗ္ဗေ မနုဿဘူတော သမာနော ဗဟုဇနဿ အတ္ထကာမော အဟောသိ ဟိတကာမော ဖာသုကာမော ယောဂက္ခေမကာမော ‘ကိန္တိ မေ သဒ္ဓါယ ဝဍ္ဎေယျုံ, သီလေန သုတေန စာဂေန ပညာယ ဓနဓညေန ခေတ္တဝတ္ထုနာ ဒွိပဒစတုပ္ပဒေဟိ ပုတ္တဒါရေဟိ ဒါသကမ္မကရပေါရိသေဟိ ဉာတီဟိ မိတ္တေဟိ ဗန္ဓဝေဟိ ဝဍ္ဎေယျု’န္တိ, သော တဿ ကမ္မဿ…ပေ… သမာနော ဣမာနိ တီဏိ မဟာပုရိသလက္ခဏာနိ ပဋိလဘတိ, သီဟပုဗ္ဗဍ္ဎကာယော စ ဟောတိ စိတန္တရံသော စ သမဝဋ္ဋက္ခန္ဓော စာ’’တိ (ဒီ. နိ. ၃.၂၂၄) ဧဝမာဒိ. “हे भिक्षुओं, तथागत ने पूर्व जन्म में... पहले मनुष्य होते हुए, वे बहुजन के अर्थकामी, हितकामी, सुखकामी और योगक्षेमकामी थे—'कैसे ये श्रद्धा, शील, श्रुत, त्याग, प्रज्ञा, धन-धान्य, खेत-संपत्ति, दोपायों-चौपायों, पुत्र-स्त्री, दास-कर्मकार-पुरुषों, ज्ञाति, मित्रों और बांधवों में वृद्धि करें?' उस कर्म के... कारण वे इन तीन महापुरुष लक्षणों को प्राप्त करते हैं—उनका शरीर सिंह के पूर्वार्ध के समान होता है, उनके कंधे भरे हुए होते हैं और उनका धड़ सम और गोल होता है।” (दी. नि. 3.224) इत्यादि। ဣမိနာ နယေန ဣတော ပရေသမ္ပိ ဣမိနာ ပုညနိဓိနာ ပဋိလာဘသာဓကာနိ သုတ္တပဒါနိ တတော တတော အာနေတွာ ဝတ္တဗ္ဗာနိ. အတိဝိတ္ထာရဘယေန တု သံခိတ္တံ, ဣဒါနိ အဝသေသပဒါနံ ဝဏ္ဏနံ ကရိဿာမိ. इसी विधि से, यहाँ से आगे के अन्य लक्षणों के लिए भी, इस पुण्य-निधि से उनकी प्राप्ति सिद्ध करने वाले सुत्त-पदों को उन-उन (सुत्तों) से लाकर कहना चाहिए। विस्तार के भय से यहाँ संक्षेप किया गया है, अब शेष पदों की व्याख्या करूँगा। သုရူပတာတိ ဧတ္ထ သကလသရီရံ ရူပန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ ‘‘အာကာသော ပရိဝါရိတော ရူပံတွေဝ သင်္ခံ ဂစ္ဆတီ’’တိအာဒီသု (မ. နိ. ၁.၃၀၆) ဝိယ, တဿ ရူပဿ သုန္ဒရတာ သုရူပတာ နာတိဒီဃတာ နာတိရဿတာ နာတိကိသတာ နာတိထူလတာ နာတိကာဠတာ နစ္စောဒါတတာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. အာဓိပစ္စန္တိ အဓိပတိဘာဝေါ, ခတ္တိယမဟာသာလာဒိဘာဝေန သာမိကဘာဝေါတိ အတ္ထော. ပရိဝါရောတိ အဂါရိကာနံ သဇနပရိဇနသမ္ပတ္တိ, အနဂါရိကာနံ ပရိသသမ္ပတ္တိ, အာဓိပစ္စဉ္စ [Pg.194] ပရိဝါရော စ အာဓိပစ္စပရိဝါရော. ဧတ္ထ စ သုဝဏ္ဏတာဒီဟိ သရီရသမ္ပတ္တိ, အာဓိပစ္စေန ဘောဂသမ္ပတ္တိ, ပရိဝါရေန သဇနပရိဇနသမ္ပတ္တိ ဝုတ္တာတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. သဗ္ဗမေတေန လဗ္ဘတီတိ ယံ တံ ‘‘ယံ ယဒေဝါဘိပတ္ထေန္တိ, သဗ္ဗမေတေန လဗ္ဘတီ’’တိ ဝုတ္တံ, တတ္ထ ဣဒမ္ပိ တာဝ ပဌမံ ဩဓိသော ဝုတ္တသုဝဏ္ဏတာဒိ သဗ္ဗမေတေန လဗ္ဘတီတိ ဝေဒိတဗ္ဗန္တိ ဒဿေတိ. यहाँ 'सुरूपता' में समस्त शरीर को 'रूप' समझना चाहिए, जैसे 'आकाश से घिरा हुआ रूप ही संज्ञा को प्राप्त होता है' आदि में। उस रूप की सुन्दरता ही सुरूपता है—न बहुत लंबा होना, न बहुत छोटा, न बहुत दुबला, न बहुत स्थूल, न बहुत काला और न ही बहुत गोरा होना। 'आधिपत्य' का अर्थ है अधिपति-भाव, क्षत्रिय महाशाल आदि होने के कारण स्वामी-भाव। 'परिवार' का अर्थ है गृहस्थों के लिए स्वजन-परिजन की संपत्ति और अनगारिकों (संन्यासियों) के लिए परिषद की संपत्ति। आधिपत्य और परिवार मिलकर 'आधिपत्य-परिवार' हैं। यहाँ सुवर्णता आदि से शरीर-संपत्ति, आधिपत्य से भोग-संपत्ति और परिवार से स्वजन-परिजन की संपत्ति कही गई है, ऐसा समझना चाहिए। 'सब कुछ इससे प्राप्त होता है'—जो यह कहा गया है कि 'वे जिस-जिस की प्रार्थना करते हैं, वह सब इससे प्राप्त होता है', वहाँ पहले विभाग के अनुसार कही गई सुवर्णता आदि सब कुछ इससे प्राप्त होता है, ऐसा समझना चाहिए—यह दिखाया गया है। ဒွါဒသမဂါထာဝဏ္ဏနာ बारहवीं गाथा की व्याख्या ၁၂. ဧဝမိမာယ ဂါထာယ ပုညာနုဘာဝေန လဘိတဗ္ဗံ ရဇ္ဇသမ္ပတ္တိတော ဩရံ ဒေဝမနုဿသမ္ပတ္တိံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ တဒုဘယရဇ္ဇသမ္ပတ္တိံ ဒဿေန္တော ‘‘ပဒေသရဇ္ဇ’’န္တိ ဣမံ ဂါထမာဟ. १२. इस प्रकार इस गाथा द्वारा पुण्य के प्रभाव से प्राप्त होने वाली राज्य-संपत्ति से भी श्रेष्ठ देव-मनुष्य संपत्ति को दिखाकर, अब उन दोनों प्रकार की राज्य-संपत्तियों को दिखाते हुए 'पदेसरज्जं' (प्रादेशिक राज्य) यह गाथा कही। တတ္ထ ပဒေသရဇ္ဇန္တိ ဧကဒီပမ္ပိ သကလံ အပါပုဏိတွာ ပထဝိယာ ဧကမေကသ္မိံ ပဒေသေ ရဇ္ဇံ. ဣဿရဘာဝေါ ဣဿရိယံ, ဣမိနာ ဒီပစက္ကဝတ္တိရဇ္ဇံ ဒဿေတိ. စက္ကဝတ္တိသုခံ ပိယန္တိ ဣဋ္ဌံ ကန္တံ မနာပံ စက္ကဝတ္တိသုခံ. ဣမိနာ စာတုရန္တစက္ကဝတ္တိရဇ္ဇံ ဒဿေတိ. ဒေဝေသု ရဇ္ဇံ ဒေဝရဇ္ဇံ, ဧတေန မန္ဓာတာဒီနမ္ပိ မနုဿာနံ ဒေဝရဇ္ဇံ ဒဿိတံ ဟောတိ. အပိ ဒိဗ္ဗေသူတိ ဣမိနာ ယေ တေ ဒိဝိ ဘဝတ္တာ ‘‘ဒိဗ္ဗာ’’တိ ဝုစ္စန္တိ, တေသု ဒိဗ္ဗေသု ကာယေသု ဥပ္ပန္နာနမ္ပိ ဒေဝရဇ္ဇံ ဒဿေတိ. သဗ္ဗမေတေန လဗ္ဘတီတိ ယံ တံ ‘‘ယံ ယဒေဝါဘိပတ္ထေန္တိ, သဗ္ဗမေတေန လဗ္ဘတီ’’တိ ဝုတ္တံ, တတ္ထ ဣဒမ္ပိ ဒုတိယံ ဩဓိသော ပဒေသရဇ္ဇာဒိ သဗ္ဗမေတေန လဗ္ဘတီတိ ဝေဒိတဗ္ဗန္တိ ဒဿေတိ. वहाँ 'पदेसरज्जं' का अर्थ है—एक द्वीप को भी पूर्णतः प्राप्त न कर पृथ्वी के किसी एक प्रदेश (क्षेत्र) में राज्य करना। ईश्वर-भाव ही 'ऐश्वर्य' है, इससे द्वीप-चक्रवर्ती के राज्य को दिखाते हैं। चक्रवर्ती का सुख 'प्रिय' है, अर्थात इष्ट, कान्त और मनाप (मनभावन) चक्रवर्ती-सुख। इससे चारों दिशाओं (चारों द्वीपों) के चक्रवर्ती राज्य को दिखाते हैं। देवों में राज्य 'देवराज्य' है, इससे मान्धाता आदि मनुष्यों के देवराज्य को भी दिखाया गया है। 'अपि दिब्बेसु' (दिव्य लोकों में भी) पद से, जो स्वर्ग में होने के कारण 'दिव्य' कहे जाते हैं, उन दिव्य निकायों में उत्पन्न होने वालों के देवराज्य को भी दिखाते हैं। 'सब कुछ इससे प्राप्त होता है'—जो यह कहा गया है कि 'वे जिस-जिस की प्रार्थना करते हैं, वह सब इससे प्राप्त होता है', वहाँ दूसरे विभाग के अनुसार प्रादेशिक राज्य आदि सब कुछ इससे प्राप्त होता है, ऐसा समझना चाहिए—यह दिखाया गया है। တေရသမဂါထာဝဏ္ဏနာ तेरहवीं गाथा की व्याख्या ၁၃. ဧဝမိမာယ ဂါထာယ ပုညာနုဘာဝေန လဘိတဗ္ဗံ ဒေဝမနုဿရဇ္ဇသမ္ပတ္တိံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ ဒွီဟိ ဂါထာဟိ ဝုတ္တံ သမ္ပတ္တိံ သမာသတော ပုရက္ခတွာ နိဗ္ဗာနသမ္ပတ္တိံ ဒဿေန္တော ‘‘မာနုဿိကာ စ သမ္ပတ္တီ’’တိ ဣမံ ဂါထမာဟ. १३. इस प्रकार इस गाथा द्वारा पुण्य के प्रभाव से प्राप्त होने वाली देव-मनुष्य राज्य-संपत्ति को दिखाकर, अब दो गाथाओं में कही गई संपत्ति को संक्षेप में सामने रखकर निर्वाण-संपत्ति को दिखाते हुए 'मानुस्सिका च सम्पत्ती' यह गाथा कही। တဿာယံ ပဒဝဏ္ဏနာ – မနုဿာနံ အယန္တိ မာနုဿီ, မာနုဿီ ဧဝ မာနုဿိကာ. သမ္ပဇ္ဇနံ သမ္ပတ္တိ. ဒေဝါနံ လောကော ဒေဝလောကော. တသ္မိံ ဒေဝလောကေ. ယာတိ အနဝသေသပရိယာဒါနံ, ရမန္တိ ဧတာယ အဇ္ဈတ္တံ ဥပ္ပန္နာယ ဗဟိဒ္ဓါ ဝါ ဥပကရဏဘူတာယာတိ ရတိ, သုခဿ သုခဝတ္ထုနော စေတံ [Pg.195] အဓိဝစနံ. ယာတိ အနိယတဝစနံ စသဒ္ဒေါ ပုဗ္ဗသမ္ပတ္တိယာ သဟ သမ္ပိဏ္ဍနတ္ထော. နိဗ္ဗာနံယေဝ နိဗ္ဗာနသမ္ပတ္တိ. उसकी यह पद-व्याख्या है—मनुष्यों की (संपत्ति) 'मानुसी' है, मानुसी ही 'मानुसिका' है। पूर्णता प्राप्त करना 'संपत्ति' है। देवों का लोक 'देवलोक' है। उस देवलोक में भी। 'या' (जो) पद से—जिससे देवता पूर्णतः रमण करते हैं, चाहे वह भीतर (अध्यात्म) उत्पन्न हुई हो या बाहर के उपकरणों से बनी हो, वह 'रति' (प्रसन्नता) है; यह सुख और सुख के साधनों का पर्यायवाची है। 'या' पद अनियत वचन है। 'च' शब्द पूर्वोक्त संपत्ति के साथ समुच्चय (जोड़ने) के अर्थ में है। निर्वाण ही 'निर्वाण-संपत्ति' है। အယံ ပန အတ္ထဝဏ္ဏနာ – ယာ ဧသာ ‘‘သုဝဏ္ဏတာ’’တိအာဒီဟိ ပဒေဟိ မာနုဿိကာ စ သမ္ပတ္တိ ဒေဝလောကေ စ ယာ ရတိ ဝုတ္တာ, သာ စ သဗ္ဗာ, ယာ စာယမပရာ သဒ္ဓါနုသာရိဘာဝါဒိဝသေန ပတ္တဗ္ဗာ နိဗ္ဗာနသမ္ပတ္တိ, သာ စာတိ ဣဒံ တတိယမ္ပိ ဩဓိသော သဗ္ဗမေတေန လဗ္ဘတီတိ. यह अर्थ-व्याख्या है - 'सुवर्णता' आदि पदों द्वारा जो यह मनुष्यों की संपत्ति और देवलोक में जो रति (आनंद) कही गई है, वह सब, और जो यह अन्य श्रद्धानुसारि-भाव आदि के वश से प्राप्त होने वाली निर्वाण-संपत्ति है, वह भी - इस प्रकार यह तीसरी बार भी विभागपूर्वक सब कुछ इसके (पुण्य रूपी निधि) द्वारा प्राप्त होता है। အထ ဝါ ယာ ပုဗ္ဗေ သုဝဏ္ဏတာဒီဟိ အဝုတ္တာ ‘‘သူရာ သတိမန္တော ဣဓ ဗြဟ္မစရိယဝါသော’’တိ ဧဝမာဒိနာ (အ. နိ. ၉.၂၁) နယေန နိဒ္ဒိဋ္ဌာ ပညာဝေယျတ္တိယာဒိဘေဒါ စ မာနုဿိကာ သမ္ပတ္တိ, အပရာ ဒေဝလောကေ စ ယာ ဈာနာဒိရတိ, ယာ စ ယထာဝုတ္တပ္ပကာရာ နိဗ္ဗာနသမ္ပတ္တိ စာတိ ဣဒမ္ပိ တတိယံ ဩဓိသော သဗ္ဗမေတေန လဗ္ဘတီတိ. ဧဝမ္ပေတ္ထ အတ္ထဝဏ္ဏနာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. अथवा, जो पहले 'सुवर्णता' आदि के द्वारा नहीं कही गई, 'शूर, स्मृतिमान, यहाँ ब्रह्मचर्य वास' इत्यादि विधि से निर्दिष्ट प्रज्ञा-वैशारद्य आदि के भेद वाली मानुषी संपत्ति, और दूसरी देवलोक में जो ध्यानादि की रति है, और जो पूर्वोक्त प्रकार की निर्वाण-संपत्ति है - यह भी तीसरी बार विभागपूर्वक सब कुछ इसके द्वारा प्राप्त होता है। इस प्रकार यहाँ अर्थ-व्याख्या समझनी चाहिए। စုဒ္ဒသမဂါထာဝဏ္ဏနာ चौदहवीं गाथा की व्याख्या। ၁၄. ဧဝမိမာယ ဂါထာယ ပုညာနုဘာဝေန လဘိတဗ္ဗံ သဒ္ဓါနုသာရီဘာဝါဒိဝသေန ပတ္တဗ္ဗံ နိဗ္ဗာနသမ္ပတ္တိမ္ပိ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ တေဝိဇ္ဇဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တဘာဝဝသေနပိ ပတ္တဗ္ဗံ တမေဝ တဿ ဥပါယဉ္စ ဒဿေန္တော ‘‘မိတ္တသမ္ပဒမာဂမ္မာ’’တိ ဣမံ ဂါထမာဟ. १४. इस प्रकार इस गाथा द्वारा पुण्य के प्रभाव से प्राप्त होने वाली, श्रद्धानुसारि-भाव आदि के वश से प्राप्त होने वाली निर्वाण-संपत्ति को भी दिखाकर, अब त्रिविद्या और उभतोभागविमुक्त भाव के वश से भी प्राप्त होने वाली उसी (संपत्ति) को और उसके उपाय को दिखाते हुए 'मित्तसम्पदमागम्म' (मित्र-संपत्ति को प्राप्त कर) यह गाथा कही। တဿာယံ ပဒဝဏ္ဏနာ – သမ္ပဇ္ဇတိ ဧတာယ ဂုဏဝိဘူတိံ ပါပုဏာတီတိ သမ္ပဒါ, မိတ္တော ဧဝ သမ္ပဒါ မိတ္တသမ္ပဒါ, တံ မိတ္တသမ္ပဒံ. အာဂမ္မာတိ နိဿာယ. ယောနိသောတိ ဥပါယေန. ပယုဉ္ဇတောတိ ယောဂါနုဋ္ဌာနံ ကရောတော. ဝိဇာနာတိ ဧတာယာတိ ဝိဇ္ဇာ, ဝိမုစ္စတိ ဧတာယ, သယံ ဝါ ဝိမုစ္စတီတိ ဝိမုတ္တိ, ဝိဇ္ဇာ စ ဝိမုတ္တိ စ ဝိဇ္ဇာဝိမုတ္တိယော, ဝိဇ္ဇာဝိမုတ္တီသု ဝသီဘာဝေါ ဝိဇ္ဇာဝိမုတ္တိဝသီဘာဝေါ. उसकी यह पद-व्याख्या है - जिससे गुणों की विभूति (समृद्धि) संपन्न होती है, प्राप्त होती है, वह 'संपदा' है। मित्र ही संपदा है, सो 'मित्र-संपदा' है, उस मित्र-संपदा को। 'आगम्म' का अर्थ है - आश्रय लेकर। 'योनिसो' का अर्थ है - उपाय से। 'पयुञ्जतो' का अर्थ है - योग का अनुष्ठान करने वाले का। जिससे जानते हैं, वह 'विद्या' है; जिससे मुक्त होते हैं या स्वयं मुक्त होती है, वह 'विमुक्ति' है। विद्या और विमुक्ति 'विद्या-विमुक्तियाँ' हैं। विद्या और विमुक्तियों में वशीभाव (पूर्ण नियंत्रण) 'विद्या-विमुक्ति-वशीभाव' है। အယံ ပန အတ္ထဝဏ္ဏနာ – ယွာယံ မိတ္တသမ္ပဒမာဂမ္မ သတ္ထာရံ ဝါ အညတရံ ဝါ ဂရုဋ္ဌာနိယံ သဗြဟ္မစာရိံ နိဿာယ တတော ဩဝါဒဉ္စ အနုသာသနိဉ္စ ဂဟေတွာ ယထာနုသိဋ္ဌံ ပဋိပတ္တိယာ ယောနိသော ပယုဉ္ဇတော ပုဗ္ဗေနိဝါသာဒီသု တီသု ဝိဇ္ဇာသု ‘‘တတ္ထ ကတမာ ဝိမုတ္တိ? စိတ္တဿ စ အဓိမုတ္တိ နိဗ္ဗာနဉ္စာ’’တိ (ဓ. သ. ၁၃၈၁) ဧဝံ အာဂတာယ အဋ္ဌသမာပတ္တိနိဗ္ဗာနဘေဒါယ ဝိမုတ္တိယာ စ တထာ တထာ အဒန္ဓာယိတတ္တေန [Pg.196] ဝသီဘာဝေါ, ဣဒမ္ပိ စတုတ္ထံ ဩဓိသော သဗ္ဗမေတေန လဗ္ဘတီတိ. यह अर्थ-व्याख्या है - जो यह व्यक्ति मित्र-संपदा को प्राप्त कर, शास्ता (बुद्ध) का अथवा किसी अन्य गुरु-स्थानीय सब्रह्मचारी का आश्रय लेकर, उनसे ओवाद (उपदेश) और अनुशासनी ग्रहण कर, उपदेश के अनुसार प्रतिपत्ति (अभ्यास) द्वारा योनिशः (सही ढंग से) प्रयत्न करता है, उसका पूर्वनिवास आदि तीन विद्याओं में, और 'वहाँ विमुक्ति क्या है? चित्त की अधिमुक्ति और निर्वाण' - इस प्रकार आई हुई आठ समापत्तियों और निर्वाण के भेद वाली विमुक्ति में, उस-उस प्रकार से बिना किसी विलंब के जो वशीभाव है - यह भी चौथी बार विभागपूर्वक सब कुछ इसके द्वारा प्राप्त होता है। ပန္နရသမဂါထာဝဏ္ဏနာ पंद्रहवीं गाथा की व्याख्या। ၁၅. ဧဝမိမာယ ဂါထာယ ပုဗ္ဗေ ကထိတဝိဇ္ဇာဝိမုတ္တိဝသီဘာဝဘာဂိယပုညာနုဘာဝေန လဘိတဗ္ဗံ တေဝိဇ္ဇဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တဘာဝဝသေနပိ ပတ္တဗ္ဗံ နိဗ္ဗာနသမ္ပတ္တိံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ ယသ္မာ ဝိဇ္ဇာဝိမုတ္တိဝသီဘာဝပ္ပတ္တာ တေဝိဇ္ဇာ ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တာပိ သဗ္ဗေ ပဋိသမ္ဘိဒါဒိဂုဏဝိဘူတိံ လဘန္တိ, ဣမာယ ပုညသမ္ပဒါယ စ တဿာ ဂုဏဝိဘူတိယာ ပဒဋ္ဌာနဝသေန တထာ တထာ သာပိ လဗ္ဘတိ, တသ္မာ တမ္ပိ ဒဿေန္တော ‘‘ပဋိသမ္ဘိဒါ ဝိမောက္ခာ စာ’’တိ ဣမံ ဂါထမာဟ. १५. इस प्रकार इस गाथा द्वारा पहले कही गई विद्या-विमुक्ति-वशीभाव के पक्ष वाले पुण्य के प्रभाव से प्राप्त होने वाली, त्रिविद्या और उभतोभागविमुक्त भाव के वश से भी प्राप्त होने वाली निर्वाण-संपत्ति को दिखाकर, अब चूँकि विद्या-विमुक्ति-वशीभाव को प्राप्त त्रिविद्य और उभतोभागविमुक्त भी सभी प्रतिसंविदा आदि गुणों की विभूति को प्राप्त करते हैं, और इस पुण्य-संपदा से उस गुण-विभूति के पदस्थान (निकट कारण) के वश से उस-उस प्रकार वह भी प्राप्त होती है, इसलिए उसे भी दिखाते हुए 'पटिसम्भिदा विमोक्खा च' यह गाथा कही। ‘‘ယတော သမ္မာ ကတေန ယာ စာယံ ဓမ္မတ္ထနိရုတ္တိပဋိဘာနေသု ပဘေဒဂတာ ပညာ ပဋိသမ္ဘိဒါ’’တိ ဝုစ္စတိ, ယေ စိမေ ‘‘ရူပီ ရူပါနိ ပဿတီ’’တိအာဒိနာ (ဒီ. နိ. ၂.၁၂၉; ၃.၃၃၉) နယေန အဋ္ဌ ဝိမောက္ခာ, ယာ စာယံ ဘဂဝတော သာဝကေဟိ ပတ္တဗ္ဗာ သာဝကသမ္ပတ္တိသာဓိကာ သာဝကပါရမီ, ယာ စ သယမ္ဘုဘာဝသာဓိကာ ပစ္စေကဗောဓိ, ယာ စ သဗ္ဗသတ္တုတ္တမဘာဝသာဓိကာ ဗုဒ္ဓဘူမိ, ဣဒမ္ပိ ပဉ္စမံ ဩဓိသော သဗ္ဗမေတေန လဗ္ဘတီတိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. चूँकि सम्यक् रूप से किए गए (पुण्य) से जो यह धर्म, अर्थ, निरुक्ति और प्रतिभान में प्रभेद (विभाजन) को प्राप्त प्रज्ञा 'प्रतिसंविदा' कही जाती है, और जो ये 'रूपी रूपों को देखता है' इत्यादि विधि से आठ विमोक्ष हैं, और जो यह भगवान के श्रावकों द्वारा प्राप्त की जाने वाली, श्रावक-संपत्ति को सिद्ध करने वाली श्रावक-पारमी है, और जो स्वयंभू-भाव को सिद्ध करने वाली प्रत्येकबोधि है, और जो सभी सत्त्वों में उत्तम भाव को सिद्ध करने वाली बुद्ध-भूमि है - यह भी पाँचवीं बार विभागपूर्वक सब कुछ इसके द्वारा प्राप्त होता है, ऐसा समझना चाहिए। သောဠသမဂါထာဝဏ္ဏနာ सोलहवीं गाथा की व्याख्या। ၁၆. ဧဝံ ဘဂဝါ ယံ တံ ‘‘ယံ ယဒေဝါဘိပတ္ထေန္တိ, သဗ္ဗမေတေန လဗ္ဘတီ’’တိ ဝုတ္တံ, တံ ဣမာဟိ ပဉ္စဟိ ဂါထာဟိ ဩဓိသော ဩဓိသော ဒဿေတွာ ဣဒါနိ သဗ္ဗမေဝိဒံ သဗ္ဗကာမဒဒနိဓိသညိတံ ပုညသမ္ပဒံ ပသံသန္တော ‘‘ဧဝံ မဟတ္ထိကာ ဧသာ’’တိ ဣမာယ ဂါထာယ ဒေသနံ နိဋ္ဌပေသိ. १६. इस प्रकार भगवान ने जो यह कहा था कि 'वे जिस-जिस की भी प्रार्थना करते हैं, वह सब इसके द्वारा प्राप्त होता है', उसे इन पाँच गाथाओं द्वारा विभाग-विभाग कर दिखाकर, अब इस सब-कुछ-प्रदान करने वाली 'निधि' नामक पुण्य-संपदा की प्रशंसा करते हुए 'एवं महत्थिका एसा' इस गाथा से देशना को समाप्त किया। တဿာယံ ပဒဝဏ္ဏနာ – ဧဝန္တိ အတီတတ္ထနိဒဿနံ. မဟန္တော အတ္ထော အဿာတိ မဟတ္ထိကာ, မဟတော အတ္ထာယ သံဝတ္တတီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ, မဟိဒ္ဓိကာတိပိ ပါဌော. ဧသာတိ ဥဒ္ဒေသဝစနံ, တေန ‘‘ယဿ ဒါနေန သီလေနာ’’တိ ဣတော ပဘုတိ ယာဝ ‘‘ကယိရာထ ဓီရော ပုညာနီ’’တိ ဝုတ္တံ ပုညသမ္ပဒံ ဥဒ္ဒိသတိ. ယဒိဒန္တိ အဘိမုခကရဏတ္ထေ နိပါတော, တေန ဧသာတိ ဥဒ္ဒိဋ္ဌံ နိဒ္ဒိသိတုံ ယာ ဧသာတိ အဘိမုခံ ကရောတိ. ပုညာနံ သမ္ပဒါ ပုညသမ္ပဒါ[Pg.197]. တသ္မာတိ ကာရဏဝစနံ. ဓီရာတိ ဓိတိမန္တော. ပသံသန္တီတိ ဝဏ္ဏယန္တိ. ပဏ္ဍိတာတိ ပညာသမ္ပန္နာ. ကတပုညတန္တိ ကတပုညဘာဝံ. उसकी यह पद-व्याख्या है - 'एवं' अतीत अर्थ का निदर्शन (संकेत) है। जिसका महान अर्थ (प्रयोजन/लाभ) हो, वह 'महत्थिका' है; महान अर्थ के लिए संवर्तित (प्रवृत्त) होती है, यह कहा गया है। 'महिद्धिका' (महान ऋद्धि वाली) ऐसा भी पाठ है। 'एसा' यह निर्देश-वचन है, उससे 'जिसके दान से, शील से' यहाँ से लेकर 'धीर को पुण्यों को करना चाहिए' तक कही गई पुण्य-संपदा को निर्दिष्ट करते हैं। 'यदिदं' सम्मुख करने के अर्थ में निपात है, उससे 'एसा' इस प्रकार निर्दिष्ट को दिखाने के लिए 'जो यह' (या एसा) इस प्रकार सम्मुख करते हैं। पुण्यों की संपदा 'पुण्य-संपदा' है। 'तस्मा' कारण-वचन है। 'धीरा' का अर्थ है - धृतिमान (धैर्यवान/बुद्धिमान)। 'पसंसन्ति' का अर्थ है - वर्णन (प्रशंसा) करते हैं। 'पण्डिता' का अर्थ है - प्रज्ञा-संपन्न। 'कतपुञ्ञतं' का अर्थ है - किए हुए पुण्य का भाव। အယံ ပန အတ္ထဝဏ္ဏနာ – ဣတိ ဘဂဝါ သုဝဏ္ဏတာဒိံ ဗုဒ္ဓဘူမိပရိယောသာနံ ပုညသမ္ပဒါနုဘာဝေန အဓိဂန္တဗ္ဗမတ္ထံ ဝဏ္ဏယိတွာ ဣဒါနိ တမေဝတ္ထံ သမ္ပိဏ္ဍေတွာ ဒဿေန္တော တေနေဝတ္ထေန ယထာဝုတ္တပ္ပကာရာယ ပုညသမ္ပဒါယ မဟတ္ထိကတ္တံ ထုနန္တော အာဟ – ဧဝံ မဟတော အတ္ထဿ အာဝဟနေန မဟတ္ထိကာ ဧသာ, ယဒိဒံ မယာ ‘‘ယဿ ဒါနေန သီလေနာ’’တိအာဒိနာ နယေန ဒေသိတာ ပုညသမ္ပဒါ, တသ္မာ မာဒိသာ သတ္တာနံ ဟိတသုခါဝဟာယ ဓမ္မဒေသနာယ အကိလာသုတာယ ယထာဘူတဂုဏေန စ ဓီရာ ပဏ္ဍိတာ ‘‘အသာဓာရဏမညေသံ, အစောရာဟရဏော နိဓီ’’တိအာဒီဟိ ဣဓ ဝုတ္တေဟိ စ, အဝုတ္တေဟိ စ ‘‘မာ, ဘိက္ခဝေ, ပုညာနံ ဘာယိတ္ထ, သုခဿေတံ, ဘိက္ခဝေ, အဓိဝစနံ, ယဒိဒံ ပုညာနီ’’တိအာဒီဟိ (အ. နိ. ၇.၆၂; ဣတိဝု. ၂၂; နေတ္တိ. ၁၂၁) ဝစနေဟိ အနေကာကာရဝေါကာရံ ကတပုညတံ ပသံသန္တိ, န ပက္ခပါတေနာတိ. यह अर्थ की व्याख्या है—इस प्रकार भगवान ने सुवर्णता (सुन्दर वर्ण) आदि से लेकर बुद्धत्व की प्राप्ति तक पुण्य-सम्पदा के प्रभाव से प्राप्त होने वाले लाभों की प्रशंसा की। अब उसी अर्थ को संकलित कर दिखाते हुए और उसी अर्थ के माध्यम से पूर्वोक्त प्रकार की पुण्य-सम्पदा की महान उपयोगिता की स्तुति करते हुए कहा—इस प्रकार महान अर्थ (प्रयोजन) को सिद्ध करने वाली होने के कारण यह पुण्य-सम्पदा महान फलदायी है, जिसे मैंने 'यस्स दानेन सीलेन' (जिसके दान और शील से) आदि विधि से उपदिष्ट किया है। अतः मेरे जैसे (बुद्ध), जो प्राणियों के हित और सुख के लिए धर्म-देशना देने में कभी थकते नहीं हैं और जो यथार्थ गुणों से युक्त हैं, वे धीर पण्डित यहाँ कहे गए 'असाधारणमञ्ञेसं, अचोराहरणो निधी' (दूसरों के लिए असाधारण और चोरों द्वारा न चुराया जा सकने वाला निधि) आदि वचनों से, तथा अन्यत्र कहे गए 'हे भिक्षुओं! पुण्यों से मत डरो, क्योंकि पुण्यों का दूसरा नाम सुख ही है' आदि वचनों से अनेक प्रकार के पुण्य-कर्मों की प्रशंसा करते हैं, पक्षपात के कारण नहीं। ဒေသနာပရိယောသာနေ သော ဥပါသကော ဗဟုဇနေန သဒ္ဓိံ သောတာပတ္တိဖလေ ပတိဋ္ဌာသိ, ရညော စ ပသေနဒိကောသလဿ သန္တိကံ ဂန္တွာ ဧတမတ္ထံ အာရောစေသိ, ရာဇာ အတိဝိယ တုဋ္ဌော ဟုတွာ ‘‘သာဓု, ဂဟပတိ, သာဓု ခေါ တွံ, ဂဟပတိ, မာဒိသေဟိပိ အနာဟရဏီယံ နိဓိံ နိဓေသီ’’တိ သံရာဓေတွာ မဟတိံ ပူဇမကာသီတိ. देशना की समाप्ति पर वह उपासक अनेक लोगों के साथ स्रोतापत्ति-फल में प्रतिष्ठित हुआ। उसने राजा प्रसेनजित कोसल के पास जाकर यह वृत्तांत सुनाया। राजा अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले—'साधु गृहपति! बहुत अच्छा! तुमने ऐसी निधि (पुण्य-कोष) संचित की है जिसे मेरे जैसे राजा भी नहीं छीन सकते।' ऐसा कहकर उन्होंने उसका बड़ा सत्कार किया। ပရမတ္ထဇောတိကာယ ခုဒ္ဒကပါဌ-အဋ္ဌကထာယ परमत्थजोतिका नामक खुद्दकपाठ-अट्ठकथा में, နိဓိကဏ္ဍသုတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. निधिकण्ड सुत्त की व्याख्या समाप्त हुई। ၉. မေတ္တသုတ္တဝဏ္ဏနာ ९. मेत्त सुत्त (मैत्री सुत्त) की व्याख्या နိက္ခေပပ္ပယောဇနံ सुत्त के रखे जाने (क्रम) का प्रयोजन ဣဒါနိ နိဓိကဏ္ဍာနန္တရံ နိက္ခိတ္တဿ မေတ္တသုတ္တဿ ဝဏ္ဏနာက္ကမော အနုပ္ပတ္တော. တဿ ဣဓ နိက္ခေပပ္ပယောဇနံ ဝတွာ တတော ပရံ – अब निधिकण्ड सुत्त के बाद रखे गए मेत्त सुत्त की व्याख्या का क्रम प्राप्त हुआ है। यहाँ इसके रखे जाने का प्रयोजन बताकर उसके बाद— ‘‘ယေန ဝုတ္တံ ယဒါ ယတ္ထ, ယသ္မာ စေတေသ ဒီပနာ; နိဒါနံ သောဓယိတွာဿ, ကရိဿာမတ္ထဝဏ္ဏနံ’’. 'किसने कहा, कब कहा, कहाँ कहा और किसलिए कहा—इनका स्पष्टीकरण करते हुए, इसके निदान (पृष्ठभूमि) को शुद्ध कर, हम इसकी अर्थ-व्याख्या करेंगे।' တတ္ထ [Pg.198] ယသ္မာ နိဓိကဏ္ဍေန ဒါနသီလာဒိပုညသမ္ပဒါ ဝုတ္တာ, သာ စ သတ္တေသု မေတ္တာယ ကတာယ မဟပ္ဖလာ ဟောတိ ယာဝ ဗုဒ္ဓဘူမိံ ပါပေတုံ သမတ္ထာ, တသ္မာ တဿာ ပုညသမ္ပဒါယ ဥပကာရဒဿနတ္ထံ, ယသ္မာ ဝါ သရဏေဟိ သာသနေ ဩတရိတွာ သိက္ခာပဒေဟိ သီလေ ပတိဋ္ဌိတာနံ ဒွတ္တိံသာကာရေန ရာဂပ္ပဟာနသမတ္ထံ, ကုမာရပဉှေန မောဟပ္ပဟာနသမတ္ထဉ္စ ကမ္မဋ္ဌာနံ ဒဿေတွာ, မင်္ဂလသုတ္တေန တဿ ပဝတ္တိယာ မင်္ဂလဘာဝေါ အတ္တရက္ခာ စ, ရတနသုတ္တေန တဿာနုရူပါ ပရရက္ခာ, တိရောကုဋ္ဋေန ရတ္တနသုတ္တေ ဝုတ္တဘူတေသု ဧကစ္စဘူတဒဿနံ ဝုတ္တပ္ပကာရာယ ပုညသမ္ပတ္တိယာ ပမဇ္ဇန္တာနံ ဝိပတ္တိ စ, နိဓိကဏ္ဍေန တိရောကုဋ္ဋေ ဝုတ္တဝိပတ္တိပဋိပက္ခဘူတာ သမ္ပတ္တိ စ ဒဿိတာ, ဒေါသပ္ပဟာနသမတ္ထံ ပန ကမ္မဋ္ဌာနံ အဒဿိတမေဝ, တသ္မာ တံ ဒေါသပ္ပဟာနသမတ္ထံ ကမ္မဋ္ဌာနံ ဒဿေတုံ ဣဒံ မေတ္တသုတ္တံ ဣဓ နိက္ခိတ္တံ. ဧဝဉှိ သုပရိပူရော ဟောတိ ခုဒ္ဒကပါဌောတိ ဣဒမဿ ဣဓ နိက္ခေပပ္ပယောဇနံ. वहाँ, चूँकि निधिकण्ड सुत्त में दान-शील आदि पुण्य-सम्पदा कही गई है, और वह प्राणियों के प्रति मैत्री भाव होने पर ही महाफलदायी होती है तथा बुद्धत्व तक पहुँचाने में समर्थ होती है, इसलिए उस पुण्य-सम्पदा की उपकारिता दिखाने के लिए (यह सुत्त यहाँ रखा गया है)। अथवा, चूँकि शरणगमन के द्वारा शासन में प्रवेश कर शिक्षापदों के माध्यम से शील में प्रतिष्ठित व्यक्तियों के लिए 'द्वत्तिंसाकार' (बत्तीस अंगों का ध्यान) द्वारा राग के प्रहाण में समर्थ कर्मस्थान, और 'कुमारपण्ह' (बालक के प्रश्न) द्वारा मोह के प्रहाण में समर्थ कर्मस्थान दिखाया गया है; 'मंगल सुत्त' द्वारा उसकी प्रवृत्ति में मंगल भाव और आत्म-रक्षा दिखाई गई है; 'रतन सुत्त' द्वारा उसके अनुरूप पर-रक्षा (दूसरों की रक्षा) दिखाई गई है; 'तिरोकुट्ट सुत्त' द्वारा रतन सुत्त में कहे गए भूतों (प्राणियों) में से कुछ के दर्शन और पूर्वोक्त पुण्य-सम्पदा में प्रमाद करने वालों की विपत्ति दिखाई गई है; तथा 'निधिकण्ड सुत्त' द्वारा तिरोकुट्ट सुत्त में कही गई विपत्ति के प्रतिपक्ष-भूत सम्पत्ति दिखाई गई है; किन्तु द्वेष (दोष) के प्रहाण में समर्थ कर्मस्थान अभी तक नहीं दिखाया गया था। अतः उस द्वेष-प्रहाण में समर्थ कर्मस्थान को दिखाने के लिए यह 'मेत्त सुत्त' यहाँ रखा गया है। इस प्रकार खुद्दकपाठ पूर्ण होता है—यही यहाँ इसके रखे जाने का प्रयोजन है। နိဒါနသောဓနံ निदान (पृष्ठभूमि) का शोधन ဣဒါနိ ယာယံ – अब जो यह— ‘‘ယေန ဝုတ္တံ ယဒါ ယတ္ထ, ယသ္မာ စေတေသ ဒီပနာ; နိဒါနံ သောဓယိတွာဿ, ကရိဿာမတ္ထဝဏ္ဏန’’န္တိ. – 'किसने कहा, कब कहा, कहाँ कहा और किसलिए कहा—इनका स्पष्टीकरण करते हुए, इसके निदान को शुद्ध कर, हम इसकी अर्थ-व्याख्या करेंगे'— မာတိကာ နိက္ခိတ္တာ, တတ္ထ ဣဒံ မေတ္တသုတ္တံ ဘဂဝတာဝ ဝုတ္တံ, န သာဝကာဒီဟိ, တဉ္စ ပန ယဒါ ဟိမဝန္တပဿတော ဒေဝတာဟိ ဥဗ္ဗာဠှာ ဘိက္ခူ ဘဂဝတော သန္တိကံ အာဂတာ, တဒါ သာဝတ္ထိယံ တေသံ ဘိက္ခူနံ ပရိတ္တတ္ထာယ ကမ္မဋ္ဌာနတ္ထာယ စ ဝုတ္တန္တိ ဧဝံ တာဝ သင်္ခေပတော ဧတေသံ ပဒါနံ ဒီပနာ နိဒါနသောဓနာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. यह मातृका (विषय-सूची) रखी गई है, उसमें यह मेत्त सुत्त भगवान द्वारा ही कहा गया है, श्रावकों आदि द्वारा नहीं। और वह तब कहा गया जब हिमालय के पार्श्व में देवताओं द्वारा परेशान किए गए भिक्षु भगवान के पास आए; तब श्रावस्ती में उन भिक्षुओं की रक्षा (परित्राण) और कर्मस्थान के लिए यह कहा गया—इस प्रकार संक्षेप में इन पदों की व्याख्या और निदान-शोधन समझना चाहिए। ဝိတ္ထာရတော ပန ဧဝံ ဝေဒိတဗ္ဗာ – ဧကံ သမယံ ဘဂဝါ သာဝတ္ထိယံ ဝိဟရတိ ဥပကဋ္ဌာယ ဝဿူပနာယိကာယ, တေန ခေါ ပန သမယေန သမ္ဗဟုလာ နာနာဝေရဇ္ဇကာ ဘိက္ခူ ဘဂဝတော သန္တိကေ ကမ္မဋ္ဌာနံ ဂဟေတွာ တတ္ထ တတ္ထ ဝဿံ ဥပဂန္တုကာမာ ဘဂဝန္တံ ဥပသင်္ကမန္တိ. တတြ သုဒံ ဘဂဝါ ရာဂစရိတာနံ သဝိညာဏကအဝိညာဏကဝသေန ဧကာဒသဝိဓံ အသုဘကမ္မဋ္ဌာနံ, ဒေါသစရိတာနံ စတုဗ္ဗိဓံ မေတ္တာဒိကမ္မဋ္ဌာနံ, မောဟစရိတာနံ မရဏဿတိကမ္မဋ္ဌာနာဒီနိ, ဝိတက္ကစရိတာနံ အာနာပါနဿတိပထဝီကသိဏာဒီနိ, သဒ္ဓါစရိတာနံ ဗုဒ္ဓါနုဿတိကမ္မဋ္ဌာနာဒီနိ, ဗုဒ္ဓိစရိတာနံ စတုဓာတုဝဝတ္ထာနာဒီနီတိ [Pg.199] ဣမိနာ နယေန စတုရာသီတိသဟဿပ္ပဘေဒစရိတာနုကူလာနိ ကမ္မဋ္ဌာနာနိ ကထေတိ. विस्तार से इसे इस प्रकार समझना चाहिए—एक समय भगवान श्रावस्ती में विहार कर रहे थे और वर्षावास का समय निकट था। उस समय विभिन्न प्रदेशों से आए हुए अनेक भिक्षु भगवान के पास से कर्मस्थान ग्रहण कर अलग-अलग स्थानों पर वर्षावास व्यतीत करने की इच्छा से भगवान के पास आए। वहाँ भगवान ने राग-चरित वालों के लिए सचेतन और अचेतन के भेद से ग्यारह प्रकार के अशुभ-कर्मस्थान, द्वेष-चरित वालों के लिए चार प्रकार के मैत्री आदि कर्मस्थान, मोह-चरित वालों के लिए मरणस्मृति आदि कर्मस्थान, वितर्क-चरित वालों के लिए आनापानस्मृति और पृथ्वी-कसिण आदि, श्रद्धा-चरित वालों के लिए बुद्धानुस्मृति आदि कर्मस्थान, और बुद्धि-चरित वालों के लिए चतुर्धातु-व्यवस्थान आदि—इस विधि से चौरासी हजार प्रकार के चरित्रों के अनुकूल कर्मस्थानों का उपदेश दिया। အထ ခေါ ပဉ္စမတ္တာနိ ဘိက္ခုသတာနိ ဘဂဝတော သန္တိကေ ကမ္မဋ္ဌာနံ ဥဂ္ဂဟေတွာ သပ္ပာယသေနာသနဉ္စ ဂေါစရဂါမဉ္စ ပရိယေသမာနာနိ အနုပုဗ္ဗေန ဂန္တွာ ပစ္စန္တေ ဟိမဝန္တေန သဒ္ဓိံ ဧကာဗဒ္ဓံ နီလကာစမဏိသန္နိဘသိလာတလံ သီတလဃနစ္ဆာယနီလဝနသဏ္ဍမဏ္ဍိတံ မုတ္တာဇာလရဇတပဋ္ဋသဒိသဝါလုကာကိဏ္ဏဘူမိဘာဂံ သုစိသာတသီတလဇလာသယပရိဝါရိတံ ပဗ္ဗတမဒ္ဒသံသု. အထ တေ ဘိက္ခူ တတ္ထေကရတ္တိံ ဝသိတွာ ပဘာတာယ ရတ္တိယာ သရီရပရိကမ္မံ ကတွာ တဿ အဝိဒူရေ အညတရံ ဂါမံ ပိဏ္ဍာယ ပဝိသိံသု. ဂါမော ဃနနိဝေသနသန္နိဝိဋ္ဌကုလသဟဿယုတ္တော, မနုဿာ စေတ္ထ သဒ္ဓါ ပသန္နာ တေ ပစ္စန္တေ ပဗ္ဗဇိတဒဿနဿ ဒုလ္လဘတာယ ဘိက္ခူ ဒိသွာ ဧဝ ပီတိသောမနဿဇာတာ ဟုတွာ တေ ဘိက္ခူ ဘောဇေတွာ ‘‘ဣဓေဝ, ဘန္တေ, တေမာသံ ဝသထာ’’တိ ယာစိတွာ ပဉ္စ ပဓာနကုဋိသတာနိ ကာရေတွာ တတ္ထ မဉ္စပီဌပါနီယပရိဘောဇနီယဃဋာဒီနိ သဗ္ဗူပကရဏာနိ ပဋိယာဒေသုံ. तब लगभग पाँच सौ भिक्षुओं ने भगवान के पास से कर्मस्थान (ध्यान की विधि) सीखकर, अपने लिए अनुकूल शयनासन और गोचर ग्राम (भिक्षा प्राप्ति का गाँव) की खोज करते हुए, क्रमशः चलते हुए प्रत्यन्त देश (सीमावर्ती क्षेत्र) में हिमालय से सटे हुए एक पर्वत को देखा, जिसका शिलातल नीलमणि के समान नीला था, जो शीतल और घनी छाया वाले नीले वन-समूहों से सुशोभित था, जिसका भू-भाग मोतियों के जाल और चांदी के पट्ट के समान बालू से ढका हुआ था और जो स्वच्छ, मधुर एवं शीतल जलाशयों से घिरा हुआ था। तब उन भिक्षुओं ने वहाँ एक रात बिताकर, प्रातःकाल होने पर शरीर-कृत्य (शौच आदि) पूर्ण किए और उस पर्वत के पास ही एक गाँव में भिक्षा के लिए प्रवेश किया। वह गाँव घनी बस्तियों वाले एक हजार कुलों से युक्त था। वहाँ के मनुष्य श्रद्धालु और प्रसन्नचित्त थे। प्रत्यन्त देश में प्रव्रजितों (भिक्षुओं) के दर्शन दुर्लभ होने के कारण, भिक्षुओं को देखते ही वे अत्यंत हर्षित और प्रसन्न हुए। उन्होंने उन भिक्षुओं को भोजन कराया और प्रार्थना की— 'भन्ते! आप यहीं तीन महीने वर्षावास व्यतीत करें।' उन्होंने पाँच सौ ध्यान-कुटियाँ बनवाईं और वहाँ मंच, पीठ (आसन), पीने और उपयोग के पानी के घड़े आदि सभी आवश्यक उपकरण तैयार कर दिए। ဘိက္ခူ ဒုတိယဒိဝသေ အညံ ဂါမံ ပိဏ္ဍာယ ပဝိသိံသု. တတ္ထပိ မနုဿာ တထေဝ ဥပဋ္ဌဟိတွာ ဝဿာဝါသံ ယာစိံသု. ဘိက္ခူ ‘‘အသတိ အန္တရာယေ’’တိ အဓိဝါသေတွာ တံ ဝနသဏ္ဍံ ပဝိသိတွာ သဗ္ဗရတ္တိန္ဒိဝံ အာရဒ္ဓဝီရိယာ ယာမဃဏ္ဍိကံ ကောဋ္ဋေတွာ ယောနိသောမနသိကာရဗဟုလာ ဝိဟရန္တာ ရုက္ခမူလာနိ ဥပဂန္တွာ နိသီဒိံသု. သီလဝန္တာနံ ဘိက္ခူနံ တေဇေန ဝိဟတတေဇာ ရုက္ခဒေဝတာ အတ္တနော အတ္တနော ဝိမာနာ ဩရုယှ ဒါရကေ ဂဟေတွာ ဣတော စိတော ဝိစရန္တိ. သေယျထာပိ နာမ ရာဇူဟိ ဝါ ရာဇမဟာမတ္တေဟိ ဝါ ဂါမကာဝါသံ ဂတေဟိ ဂါမဝါသီနံ ဃရေသု ဩကာသေ ဂဟိတေ ဃရမနုဿကာ ဃရာ နိက္ခမိတွာ အညတြ ဝသန္တာ ‘‘ကဒါ နု ဂမိဿန္တီ’’တိ ဒူရတောဝ ဩလောကေန္တိ, ဧဝမေဝ ဒေဝတာ အတ္တနော အတ္တနော ဝိမာနာနိ ဆဍ္ဍေတွာ ဣတော စိတော စ ဝိစရန္တိယော ဒူရတောဝ ဩလောကေန္တိ ‘‘ကဒါ နု ဘဒန္တာ ဂမိဿန္တီ’’တိ. တတော ဧဝံ သမစိန္တေသုံ ‘‘ပဌမဝဿူပဂတာ ဘိက္ခူ အဝဿံ တေမာသံ ဝသိဿန္တိ, မယံ ပန တာဝ စိရံ ဒါရကေ ဂဟေတွာ ဩက္ကမ္မ ဝသိတုံ န သက္ကောမ, ဟန္ဒ မယံ ဘိက္ခူနံ ဘယာနကံ အာရမ္မဏံ ဒဿေမာ’’တိ. တာ ရတ္တိံ ဘိက္ခူနံ သမဏဓမ္မကရဏဝေလာယ ဘိံသနကာနိ ယက္ခရူပါနိ နိမ္မိနိတွာ ပုရတော [Pg.200] ပုရတော တိဋ္ဌန္တိ, ဘေရဝသဒ္ဒဉ္စ ကရောန္တိ. ဘိက္ခူနံ တာနိ ရူပါနိ ဒိသွာ တဉ္စ သဒ္ဒံ သုတွာ ဟဒယံ ဖန္ဒိ, ဒုဗ္ဗဏ္ဏာ စ အဟေသုံ ဥပ္ပဏ္ဍုပ္ပဏ္ဍုကဇာတာ. တေန တေ ဘိက္ခူ စိတ္တံ ဧကဂ္ဂံ ကာတုံ နာသက္ခိံသု, တေသံ အနေကဂ္ဂစိတ္တာနံ ဘယေန စ ပုနပ္ပုနံ သံဝိဂ္ဂါနံ သတိ သမ္မုဿိ, တတော တေသံ မုဋ္ဌသတီနံ ဒုဂ္ဂန္ဓာနိ အာရမ္မဏာနိ ပယောဇေသုံ, တေသံ တေန ဒုဂ္ဂန္ဓေန နိမ္မထိယမာနမိဝ မတ္ထလုင်္ဂံ အဟောသိ, ဂါဠှာ သီသဝေဒနာ ဥပ္ပဇ္ဇိံသု, န စ တံ ပဝတ္တိံ အညမညဿ အာရောစေသုံ. दूसरे दिन भिक्षुओं ने दूसरे गाँव में भिक्षा के लिए प्रवेश किया। वहाँ भी मनुष्यों ने उसी प्रकार सेवा-सत्कार किया और वर्षावास के लिए प्रार्थना की। भिक्षुओं ने 'यदि कोई बाधा न हुई तो' कहकर स्वीकार कर लिया और उस वन-समूह में प्रवेश करके, दिन-रात वीर्य आरम्भ कर (प्रयत्नशील होकर), समय बताने वाला घंटा बजाकर और योनिशो मनसिकार (उचित चिंतन) में संलग्न रहकर वृक्षों के मूल में जाकर बैठ गए। शीलवान भिक्षुओं के तेज से निष्प्रभ हुए वृक्ष-देवता अपने-अपने विमानों से उतरकर, अपने बच्चों को लेकर इधर-उधर घूमने लगे। जैसे जब राजा या राज-अमात्य किसी छोटे गाँव में जाते हैं और ग्रामीणों के घरों पर अधिकार कर लेते हैं, तो घर के लोग घरों से निकलकर अन्यत्र रहते हुए दूर से ही देखते हैं कि 'वे कब जाएँगे', उसी प्रकार देवता भी अपने-अपने विमानों को छोड़कर इधर-उधर भटकते हुए दूर से ही देखते थे कि 'ये भदन्त कब जाएँगे'। तब उन्होंने ऐसा सोचा— 'वर्षावास आरम्भ करने वाले ये भिक्षु निश्चित ही तीन महीने यहाँ रहेंगे, किन्तु हम इतने लंबे समय तक बच्चों को लेकर बाहर रहने में समर्थ नहीं हैं। क्यों न हम भिक्षुओं को डरावने दृश्य दिखाएँ।' उस रात, भिक्षुओं के श्रमण-धर्म (साधना) करने के समय, उन्होंने उनके सामने भयानक यक्ष-रूप निर्मित किए और डरावनी आवाजें करने लगे। उन रूपों को देखकर और उन आवाजों को सुनकर भिक्षुओं का हृदय कांपने लगा, वे विवर्ण और पीले पड़ गए। इस कारण वे चित्त को एकाग्र नहीं कर सके। भयभीत और बार-बार उद्विग्न होने के कारण उन विक्षिप्त चित्त वाले भिक्षुओं की स्मृति लुप्त हो गई। तब उन विस्मृत-स्मृति वाले भिक्षुओं के लिए देवताओं ने दुर्गंधयुक्त विषयों का प्रयोग किया। उस दुर्गंध से उन्हें ऐसा लगा जैसे उनका मस्तिष्क मथा जा रहा हो और उन्हें तीव्र सिरदर्द होने लगा। उन्होंने इस वृत्तांत को एक-दूसरे को नहीं बताया। အထေကဒိဝသံ သံဃတ္ထေရဿ ဥပဋ္ဌာနကာလေ သဗ္ဗေသု သန္နိပတိတေသု သံဃတ္ထေရော ပုစ္ဆိ ‘‘တုမှာကံ, အာဝုသော, ဣမံ ဝနသဏ္ဍံ ပဝိဋ္ဌာနံ ကတိပါဟံ အတိဝိယ ပရိသုဒ္ဓေါ ဆဝိဝဏ္ဏော အဟောသိ ပရိယောဒါတော, ဝိပ္ပသန္နာနိ စ ဣန္ဒြိယာနိ, ဧတရဟိ ပနတ္ထ ကိသာ ဒုဗ္ဗဏ္ဏာ ဥပ္ပဏ္ဍုပ္ပဏ္ဍုကဇာတာ, ကိံ ဝေါ ဣဓ အသပ္ပာယ’’န္တိ. တတော ဧကော ဘိက္ခု အာဟ – ‘‘အဟံ, ဘန္တေ, ရတ္တိံ ဤဒိသဉ္စ ဤဒိသဉ္စ ဘေရဝါရမ္မဏံ ပဿာမိ စ သုဏာမိ စ, ဤဒိသဉ္စ ဂန္ဓံ ဃာယာမိ, တေန မေ စိတ္တံ န သမာဓိယတီ’’တိ, ဧတေနေဝ ဥပါယေန သဗ္ဗေဝ တေ တံ ပဝတ္တိံ အာရောစေသုံ. သံဃတ္ထေရော အာဟ – ‘‘ဘဂဝတာ, အာဝုသော, ဒွေ ဝဿူပနာယိကာ ပညတ္တာ, အမှာကဉ္စ ဣဒံ သေနာသနံ အသပ္ပာယံ, အာယာမာဝုသော, ဘဂဝတော သန္တိကံ ဂန္တွာ အညံ သပ္ပာယသေနာသနံ ပုစ္ဆာမာ’’တိ. ‘‘သာဓု, ဘန္တေ’’တိ တေ ဘိက္ခူ ထေရဿ ပဋိဿုဏိတွာ သဗ္ဗေဝ သေနာသနံ သံသာမေတွာ ပတ္တစီဝရမာဒါယ အနုပလိတ္တတ္တာ ကုလေသု ကဉ္စိ အနာမန္တေတွာ ဧဝ ယေန သာဝတ္ထိ တေန စာရိကံ ပက္ကမိံသု. အနုပုဗ္ဗေန သာဝတ္ထိံ ဂန္တွာ ဘဂဝတော သန္တိကံ အာဂမိံသု. तब एक दिन, संघ-स्थविर की सेवा के समय जब सभी भिक्षु एकत्रित हुए, तो संघ-स्थविर ने पूछा— 'आयुष्मन्! जब आप इस वन-समूह में आए थे, तब कुछ दिनों तक आपका वर्ण अत्यंत शुद्ध, उज्ज्वल और इंद्रियाँ अत्यंत प्रसन्न थीं। किन्तु अब आप दुर्बल, विवर्ण और पीले पड़ गए हैं। क्या यहाँ आपको कुछ असुविधा है?' तब एक भिक्षु ने कहा— 'भन्ते! मैं रात में ऐसे-ऐसे भयानक दृश्य देखता और शब्द सुनता हूँ, और ऐसी गंध सूंघता हूँ, जिससे मेरा चित्त समाहित नहीं होता।' इसी प्रकार सभी ने अपना-अपना वृत्तांत सुनाया। संघ-स्थविर ने कहा— 'आयुष्मन्! भगवान ने दो प्रकार के वर्षावास प्रज्ञप्त किए हैं। हमारे लिए यह शयनासन अनुपयुक्त है। चलिए आयुष्मन्! भगवान के पास चलकर दूसरे अनुकूल शयनासन के लिए पूछते हैं।' भिक्षुओं ने 'ठीक है भन्ते' कहकर स्थविर की बात स्वीकार की और अपने शयनासन समेटकर, पात्र-चीवर लेकर, अनासक्त होने के कारण गृहस्थों को बिना सूचित किए ही श्रावस्ती की ओर चल दिए। क्रमशः श्रावस्ती पहुँचकर वे भगवान के पास आए। ဘဂဝါ တေ ဘိက္ခူ ဒိသွာ ဧတဒဝေါစ – ‘‘န, ဘိက္ခဝေ, အန္တောဝဿံ စာရိကာ စရိတဗ္ဗာတိ မယာ သိက္ခာပဒံ ပညတ္တံ, ကိဿ တုမှေ စာရိကံ စရထာ’’တိ. တေ ဘဂဝတော သဗ္ဗမာရောစေသုံ. ဘဂဝါ အာဝဇ္ဇေန္တော သကလဇမ္ဗုဒီပေ အန္တမသော စတုပါဒပီဌကဋ္ဌာနမတ္တမ္ပိ တေသံ သပ္ပာယသေနာသနံ နာဒ္ဒသ. အထ တေ ဘိက္ခူ အာဟ – ‘‘န, ဘိက္ခဝေ, တုမှာကံ အညံ သပ္ပာယသေနာသနံ အတ္ထိ, တတ္ထေဝ တုမှေ ဝိဟရန္တာ အာသဝက္ခယံ ပါပုဏိဿထ, ဂစ္ဆထ, ဘိက္ခဝေ, တမေဝ သေနာသနံ ဥပနိဿာယ ဝိဟရထ, သစေ ပန ဒေဝတာဟိ အဘယံ ဣစ္ဆထ, ဣမံ ပရိတ္တံ ဥဂ္ဂဏှထ. ဧတဉှိ ဝေါ ပရိတ္တဉ္စ ကမ္မဋ္ဌာနဉ္စ ဘဝိဿတီ’’တိ ဣဒံ သုတ္တမဘာသိ. भगवान ने उन भिक्षुओं को देखकर यह कहा— 'भिक्षुओं! मैंने यह शिक्षापद प्रज्ञप्त किया है कि वर्षाकाल के भीतर चारिका (यात्रा) नहीं करनी चाहिए। तुम चारिका क्यों कर रहे हो?' उन्होंने भगवान को सब कुछ विस्तार से बताया। भगवान ने विचार करते हुए संपूर्ण जम्बूद्वीप में उनके लिए एक चार पैरों वाली छोटी चौकी रखने जितनी जगह भी कोई अन्य अनुकूल शयनासन नहीं देखा। तब उन्होंने उन भिक्षुओं से कहा— 'भिक्षुओं! तुम्हारे लिए कोई दूसरा अनुकूल शयनासन नहीं है। वहीं रहते हुए ही तुम आस्रवों के क्षय (अर्हत् पद) को प्राप्त करोगे। जाओ भिक्षुओं, उसी शयनासन के आश्रय में रहो। यदि तुम देवताओं से अभय चाहते हो, तो इस परित्त (रक्षा-सूत्र) को सीखो। यह तुम्हारे लिए रक्षा-कवच भी होगा और कर्मस्थान (ध्यान का विषय) भी।' ऐसा कहकर भगवान ने यह (करणीयमेत्त) सुत्त कहा। အပရေ [Pg.201] ပနာဟု – ‘‘ဂစ္ဆထ, ဘိက္ခဝေ, တမေဝ သေနာသနံ ဥပနိဿာယ ဝိဟရထာ’’တိ ဣဒဉ္စ ဝတွာ ဘဂဝါ အာဟ – ‘‘အပိစ ခေါ အာရညကေန ပရိဟရဏံ ဉာတဗ္ဗံ. သေယျထိဒံ – သာယံ ပါတံ ကရဏဝသေန ဒွေ မေတ္တာ ဒွေ ပရိတ္တာ ဒွေ အသုဘာ ဒွေ မရဏဿတီ အဋ္ဌမဟာသံဝေဂဝတ္ထုသမာဝဇ္ဇနဉ္စ, အဋ္ဌ မဟာသံဝေဂဝတ္ထူနိ နာမ ဇာတိဇရာဗျာဓိမရဏံ စတ္တာရိ အပါယဒုက္ခာနီတိ, အထ ဝါ ဇာတိဇရာဗျာဓိမရဏာနိ စတ္တာရိ, အပါယဒုက္ခံ ပဉ္စမံ, အတီတေ ဝဋ္ဋမူလကံ ဒုက္ခံ, အနာဂတေ ဝဋ္ဋမူလကံ ဒုက္ခံ, ပစ္စုပ္ပန္နေ အာဟာရပရိယေဋ္ဌိမူလကံ ဒုက္ခ’’န္တိ. ဧဝံ ဘဂဝါ ပရိဟရဏံ အာစိက္ခိတွာ တေသံ ဘိက္ခူနံ မေတ္တတ္ထဉ္စ ပရိတ္တတ္ထဉ္စ ဝိပဿနာပါဒကဇ္ဈာနတ္ထဉ္စ ဣဒံ သုတ္တမဘာသီတိ. ဧဝံ ဝိတ္ထာရတောပိ ‘‘ယေန ဝုတ္တံ ယဒါ ယတ္ထ, ယသ္မာ စေ’’တိ ဧတေသံ ပဒါနံ ဒီပနာ နိဒါနသောဓနာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. अन्य आचार्य कहते हैं— "हे भिक्षुओं! जाओ, उसी सेनासन (आवास) के आश्रय में विहार करो," यह कहकर भगवान ने कहा— "किन्तु वनवासी भिक्षु को परिहरण (चर्या/रक्षा) का ज्ञान होना चाहिए। वह इस प्रकार है— सायंकाल और प्रातःकाल के अभ्यास द्वारा दो बार मैत्री, दो बार परित्त, दो बार अशुभ, दो बार मरणस्मृति और आठ संवेग-वस्तुओं का समावर्जन (मनन) करना चाहिए। आठ संवेग-वस्तुएँ ये हैं— जाति (जन्म), जरा, व्याधि, मरण और चार अपायों के दुःख। अथवा जाति, जरा, व्याधि, मरण— ये चार, पाँचवाँ अपाय-दुःख, अतीत में वट्ट (संसार-चक्र) मूलक दुःख, अनागत में वट्ट-मूलक दुःख और वर्तमान में आहार की खोज से उत्पन्न दुःख। इस प्रकार भगवान ने परिहरण (चर्या) का उपदेश देकर उन भिक्षुओं के लिए मैत्री, परित्त और विपश्यना के आधारभूत ध्यान के निमित्त इस (मेत्त) सुत्त का उपदेश दिया। इस प्रकार विस्तार से भी 'येन वुत्तं यदा यत्थ, यस्मा चे' आदि पदों के स्पष्टीकरण द्वारा निदान का शोधन जानना चाहिए। ဧတ္တာဝတာ စ ယာ သာ ‘‘ယေန ဝုတ္တံ ယဒါ ယတ္ထ, ယသ္မာ စေတေသ ဒီပနာ. နိဒါနံ သောဓယိတွာ’’တိ မာတိကာ ဌပိတာ, သာ သဗ္ဗာကာရေန ဝိတ္ထာရိတာ ဟောတိ. इतने से, जो 'येन वुत्तं यदा यत्थ, यस्मा चेतेसं दीपना, निदानं सोधयित्वा' (किसने कहा, कब, कहाँ और किसलिए—इनका स्पष्टीकरण कर निदान का शोधन करके) यह मातृका (रूपरेखा) स्थापित की गई थी, वह सभी प्रकार से विस्तृत हो गई है। ပဌမဂါထာဝဏ္ဏနာ प्रथम गाथा की व्याख्या। ၁. ဣဒါနိ ‘‘အဿ ကရိဿာမတ္ထဝဏ္ဏန’’န္တိ ဝုတ္တတ္တာ ဧဝံ ကတနိဒါနသောဓနဿ အဿ သုတ္တဿ အတ္ထဝဏ္ဏနာ အာရဗ္ဘတေ. တတ္ထ ကရဏီယမတ္ထကုသလေနာတိ ဣမိဿာ ပဌမဂါထာယ တာဝ အယံ ပဒဝဏ္ဏနာ – ကရဏီယန္တိ ကာတဗ္ဗံ, ကရဏာရဟန္တိ အတ္ထော. အတ္ထောတိ ပဋိပဒါ, ယံ ဝါ ကိဉ္စိ အတ္တနော ဟိတံ, တံ သဗ္ဗံ အရဏီယတော အတ္ထောတိ ဝုစ္စတိ, အရဏီယတော နာမ ဥပဂန္တဗ္ဗတော. အတ္ထေ ကုသလေန အတ္ထကုသလေန အတ္ထဆေကေနာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ယန္တိ အနိယမိတပစ္စတ္တံ. န္တိ နိယမိတဥပယောဂံ, ဥဘယမ္ပိ ဝါ ယံ တန္တိ ပစ္စတ္တဝစနံ. သန္တံ ပဒန္တိ ဥပယောဂဝစနံ, တတ္ထ လက္ခဏတော သန္တံ, ပတ္တဗ္ဗတော ပဒံ, နိဗ္ဗာနဿေတံ အဓိဝစနံ. အဘိသမေစ္စာတိ အဘိသမာဂန္တွာ. သက္ကောတီတိ သက္ကော, သမတ္ထော ပဋိဗလောတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဥဇူတိ အဇ္ဇဝယုတ္တော. သုဋ္ဌု ဥဇူတိ သုဟုဇု. သုခံ ဝစော တသ္မိန္တိ သုဝစော. အဿာတိ ဘဝေယျ. မုဒူတိ မဒ္ဒဝယုတ္တော. န အတိမာနီတိ အနတိမာနိ. १. अब, "इसकी अर्थ-व्याख्या करेंगे" ऐसा कहे जाने के कारण, इस प्रकार निदान का शोधन किए गए इस सुत्त की अर्थ-व्याख्या आरम्भ की जाती है। वहाँ 'करणीयमत्थकुसलेन' इस प्रथम गाथा की पहले यह पद-व्याख्या है— 'करणीयं' का अर्थ है 'करने योग्य' (कर्तव्य) या 'करने के योग्य'। 'अत्थो' का अर्थ है 'प्रतिपदा' (मार्ग/आचरण), अथवा जो कुछ भी अपना हित है, वह सब प्राप्त करने योग्य होने के कारण 'अत्थ' (अर्थ) कहलाता है; 'अरणीयतो' का अर्थ है 'पहुँचने योग्य होने से'। 'अत्थे कुसलेन' का अर्थ है 'अर्थकुसलेन' अर्थात् मार्ग या हित में निपुण। 'यं' अनियत प्रथमा विभक्ति है। 'तं' नियत द्वितीया विभक्ति है, अथवा दोनों ही 'यं तं' प्रथमा विभक्ति के वचन हैं। 'सन्तं पदं' द्वितीया विभक्ति का वचन है; वहाँ लक्षण से 'सन्त' (शान्त) है और प्राप्त करने योग्य होने से 'पद' है; यह 'निर्वाण' का नाम है। 'अभिसमेच्च' का अर्थ है 'साक्षात्कार करके' या 'समझकर'। 'सक्कोति' (समर्थ है) इसलिए 'सक्को' (शक्य/समर्थ) है, अर्थात् समर्थ या शक्तिमान। 'उजू' का अर्थ है 'ऋजुता (सीधेपन) से युक्त'। 'सुट्ठु उजू' (भली-भाँति सीधा) होने से 'सुहुजु' है। जिसमें सुखद वचन हों, वह 'सुवचो' (सुवच) है। 'अस्स' का अर्थ है 'होवे'। 'मुदू' का अर्थ है 'मृदुता (कोमलता) से युक्त'। 'न अतिमानी' का अर्थ है 'अनतिमानी' (अहंकार रहित)। အယံ ပနေတ္ထ အတ္ထဝဏ္ဏနာ – ကရဏီယမတ္ထကုသလေန, ယန္တံ သန္တံ ပဒံ အဘိသမေစ္စာတိ ဧတ္ထ တာဝ အတ္ထိ ကရဏီယံ, အတ္ထိ အကရဏီယံ. တတ္ထ သင်္ခေပတော [Pg.202] သိက္ခတ္တယံ ကရဏီယံ. သီလဝိပတ္တိ, ဒိဋ္ဌိဝိပတ္တိ, အာစာရဝိပတ္တိ, အာဇီဝဝိပတ္တီတိ ဧဝမာဒိ အကရဏီယံ. တထာ အတ္ထိ အတ္ထကုသလော, အတ္ထိ အနတ္ထကုသလော. တတ္ထ ယော ဣမသ္မိံ သာသနေ ပဗ္ဗဇိတွာ န အတ္တာနံ သမ္မာ ပယောဇေတိ, ခဏ္ဍသီလော ဟောတိ, ဧကဝီသတိဝိဓံ အနေသနံ နိဿာယ ဇီဝိကံ ကပ္ပေတိ. သေယျထိဒံ – ဝေဠုဒါနံ ပတ္တဒါနံ ပုပ္ဖဒါနံ ဖလဒါနံ ဒန္တကဋ္ဌဒါနံ မုခေါဒကဒါနံ သိနာနဒါနံ စုဏ္ဏဒါနံ မတ္တိကာဒါနံ စာဋုကမျတံ မုဂ္ဂသူပျတံ ပါရိဘဋယတံ ဇင်္ဃပေသနိကံ ဝေဇ္ဇကမ္မံ ဒူတကမ္မံ ပဟိဏဂမနံ ပိဏ္ဍပဋိပိဏ္ဍံ ဒါနာနုပ္ပဒါနံ ဝတ္ထုဝိဇ္ဇံ နက္ခတ္တဝိဇ္ဇံ အင်္ဂဝိဇ္ဇန္တိ. ဆဗ္ဗိဓေ စ အဂေါစရေ စရတိ. သေယျထိဒံ – ဝေသိယာဂေါစရေ ဝိဓဝထုလ္လကုမာရိကပဏ္ဍကဘိက္ခုနီပါနာဂါရဂေါစရေတိ. သံသဋ္ဌော စ ဝိဟရတိ ရာဇူဟိ ရာဇမဟာမတ္တေဟိ တိတ္ထိယေဟိ တိတ္ထိယသာဝကေဟိ အနနုလောမိကေန ဂိဟိသံသဂ္ဂေန, ယာနိ ဝါ ပန တာနိ ကုလာနိ အဿဒ္ဓါနိ အပ္ပသန္နာနိ အနောပါနဘူတာနိ အက္ကောသကပရိဘာသကာနိ အနတ္ထကာမာနိ အဟိတအဖာသုကယောဂက္ခေမကာမာနိ ဘိက္ခူနံ…ပေ… ဥပါသိကာနံ, တထာရူပါနိ ကုလာနိ သေဝတိ ဘဇတိ ပယိရုပါသတိ. အယံ အနတ္ထကုသလော. यहाँ यह अर्थ-व्याख्या है— 'करणीयमत्थकुसलेन, यन्तं सन्तं पदं अभिसमेच्च' यहाँ पहले 'करणीय' (कर्तव्य) है और 'अकरणीय' (अकर्तव्य) है। वहाँ संक्षेप में 'शिक्षा-त्रय' (शील, समाधि, प्रज्ञा) करणीय है। शील-विपत्ति, दृष्टि-विपत्ति, आचार-विपत्ति, आजीव-विपत्ति आदि अकरणीय हैं। उसी प्रकार 'अर्थ-कुशल' (हित में निपुण) होता है और 'अनर्थ-कुशल' (अहित में निपुण) होता है। वहाँ जो इस शासन में प्रव्रजित होकर अपने आप को सम्यक् रूप से (धर्म में) नियोजित नहीं करता, खण्ड-शील (टूटे हुए शील वाला) होता है, और इक्कीस प्रकार की 'अनेषणा' (अनुचित आजीविका) के सहारे जीवन बिताता है। जैसे कि— बाँस देना, पत्ता देना, पुष्प देना, फल देना, दातून देना, मुख-प्रक्षालन का जल देना, स्नान का चूर्ण देना, मिट्टी देना, चाटुकारिता करना, मूंग की दाल के समान (आधा सच-आधा झूठ) बोलना, बच्चों का पालन-पोषण करना, दूत का कार्य करना, वैद्य का कार्य करना, संदेश पहुँचाना, भोजन के बदले भोजन देना, वास्तु-विद्या, नक्षत्र-विद्या, अंग-विद्या आदि। और वह छह प्रकार के 'अगोचर' (अनुचित स्थानों) में विचरण करता है। जैसे कि— वेश्याओं के यहाँ, विधवाओं, प्रौढ़ कुमारियों, नपुंसकों, भिक्षुणियों और मदिरालयों में जाना। वह राजाओं, राज-महामात्रों, तीर्थिकों और तीर्थिक-श्रावकों के साथ अनुचित गृहस्थ-संसर्ग में रहता है। अथवा जो कुल अश्रद्धालु, अप्रसन्न, अपानभूत (दान न देने वाले), गाली-गलौज करने वाले, अहित चाहने वाले, भिक्षुओं और भिक्षुणियों का अकल्याण चाहने वाले हैं, ऐसे कुलों की सेवा करता है, उनसे मिलता-जुलता है और उनकी उपासना करता है। यह 'अनर्थ-कुशल' है। ယော ပန ဣမသ္မိံ သာသနေ ပဗ္ဗဇိတွာ အတ္တာနံ သမ္မာ ပယောဇေတိ, အနေသနံ ပဟာယ စတုပါရိသုဒ္ဓိသီလေ ပတိဋ္ဌာတုကာမော သဒ္ဓါသီသေန ပါတိမောက္ခသံဝရံ သတိသီသေန ဣန္ဒြိယသံဝရံ ဝီရိယသီသေန အာဇီဝပါရိသုဒ္ဓိံ, ပညာသီသေန ပစ္စယပဋိသေဝနံ ပူရေတိ. အယံ အတ္ထကုသလော. किन्तु जो इस शासन में प्रव्रजित होकर अपने आप को सम्यक् रूप से नियोजित करता है, अनेषणा को त्यागकर चतु-पारिशुद्धि-शील में प्रतिष्ठित होने की इच्छा से, श्रद्धा को मुख्य रखकर पातिमोक्ख-संवर शील को, स्मृति को मुख्य रखकर इन्द्रिय-संवर शील को, वीर्य को मुख्य रखकर आजीव-पारिशुद्धि शील को, और प्रज्ञा को मुख्य रखकर प्रत्यय-प्रतिसेवन (परिष्कारों के उपयोग) शील को पूर्ण करता है। यह 'अर्थ-कुशल' है। ယော ဝါ သတ္တာပတ္တိက္ခန္ဓသောဓနဝသေန ပါတိမောက္ခသံဝရံ, ဆဒွါရေ ဃဋ္ဋိတာရမ္မဏေသု အဘိဇ္ဈာဒီနံ အနုပ္ပတ္တိဝသေန ဣန္ဒြိသံဝရံ, အနေသနပရိဝဇ္ဇနဝသေန ဝိညုပ္ပသတ္ထဗုဒ္ဓဗုဒ္ဓသာဝကဝဏ္ဏိတပစ္စယပဋိသေဝနေန စ အာဇီဝပါရိသုဒ္ဓိံ, ယထာဝုတ္တပစ္စဝေက္ခဏဝသေန ပစ္စယပဋိသေဝနံ, စတုဣရိယာပထပရိဝတ္တနေ သာတ္ထကတာဒိပစ္စဝေက္ခဏဝသေန သမ္ပဇညဉ္စ သောဓေတိ. အယမ္ပိ အတ္ထကုသလော. अथवा जो सात आपत्ति-स्कन्धों के शोधन द्वारा पातिमोक्ख-संवर को, छह द्वारों पर टकराने वाले आरम्बणों (विषयों) में अभिध्या (लोभ) आदि की अनुत्पत्ति द्वारा इन्द्रिय-संवर को, अनेषणा के वर्जन द्वारा और विद्वानों द्वारा प्रशंसित तथा बुद्ध एवं बुद्ध-श्रावकों द्वारा वर्णित विधि से प्रत्ययों के सेवन द्वारा आजीव-पारिशुद्धि को, यथोक्त प्रत्यवेक्षण (विचार) द्वारा प्रत्यय-प्रतिसेवन को, और चारों ईर्यापथों के परिवर्तन में सार्थकता आदि के प्रत्यवेक्षण द्वारा सम्प्रजन्य को शुद्ध करता है। यह भी 'अर्थ-कुशल' है। ယော ဝါ ယထာ ဦသောဒကံ ပဋိစ္စ သံကိလိဋ္ဌံ ဝတ္ထံ ပရိယောဒါပယတိ, ဆာရိကံ ပဋိစ္စ အာဒါသော, ဥက္ကာမုခံ ပဋိစ္စ ဇာတရူပံ, တထာ ဉာဏံ ပဋိစ္စ သီလံ ဝေါဒါယတီတိ ဉတွာ ဉာဏောဒကေန ဓောဝန္တော သီလံ ပရိယောဒါပေတိ. ယထာ စ ကိကီ သကုဏိကာ အဏ္ဍံ, စမရီ မိဂေါ ဝါလဓိံ, ဧကပုတ္တိကာ နာရီ [Pg.203] ပိယံ ဧကပုတ္တကံ, ဧကနယနော ပုရိသော တံ ဧကနယနဉ္စ ရက္ခတိ, တထာ အတိဝိယ အပ္ပမတ္တော အတ္တနော သီလက္ခန္ဓံ ရက္ခတိ, သာယံ ပါတံ ပစ္စဝေက္ခမာနော အဏုမတ္တမ္ပိ ဝဇ္ဇံ န ပဿတိ. အယမ္ပိ အတ္ထကုသလော. अथवा जैसे कोई ऊसर-जल (क्षारीय जल) के सहारे मैले वस्त्र को स्वच्छ करता है, राख के सहारे दर्पण को, और भट्टी के मुख (अग्नि) के सहारे सुवर्ण को स्वच्छ करता है, वैसे ही ज्ञान के सहारे शील शुद्ध होता है—ऐसा जानकर ज्ञान रूपी जल से धोते हुए जो शील को निर्मल करता है। और जैसे किकी पक्षी अपने अण्डे की, चमरी मृग अपनी पूँछ की, एक पुत्र वाली स्त्री अपने प्रिय इकलौते पुत्र की, और एक आँख वाला पुरुष अपनी उस एक आँख की रक्षा करता है, वैसे ही जो अत्यन्त अप्रमत्त होकर अपने शील-स्कन्ध की रक्षा करता है, और सायंकाल एवं प्रातःकाल प्रत्यवेक्षण करते हुए अणुमात्र भी दोष नहीं देखता। यह भी 'अर्थ-कुशल' है। ယော ဝါ ပန အဝိပ္ပဋိသာရကရေ သီလေ ပတိဋ္ဌာယ ကိလေသဝိက္ခမ္ဘနပဋိပဒံ ပဂ္ဂဏှာတိ, တံ ပဂ္ဂဏှိတွာ ကသိဏပရိကမ္မံ ကရောတိ, ကသိဏပရိကမ္မံ ကတွာ သမာပတ္တိယော နိဗ္ဗတ္တေတိ. အယမ္ပိ အတ္ထကုသလော. अथवा, जो भिक्षु पश्चाताप-रहित (प्रसन्नता उत्पन्न करने वाले) शील में प्रतिष्ठित होकर, क्लेशों के विष्खम्भन (दबाने) की प्रतिपदा (अभ्यास) को ग्रहण करता है, उसे ग्रहण कर कसिण-परिकर्म करता है, और कसिण-परिकर्म करके समापत्तियों को उत्पन्न करता है। वह भी 'अत्थकुसलो' (अपने कल्याण में कुशल) है। ယော ဝါ ပန သမာပတ္တိတော ဝုဋ္ဌာယ သင်္ခါရေ သမ္မသိတွာ အရဟတ္တံ ပါပုဏာတိ, အယံ အတ္ထကုသလာနံ အဂ္ဂေါ. တတ္ထ ယေ ဣမေ ယာဝ အဝိပ္ပဋိသာရကရေ သီလေ ပတိဋ္ဌာနေန ယာဝ ဝါ ကိလေသဝိက္ခမ္ဘနပဋိပဒါယပဂ္ဂဟဏေန ဝဏ္ဏိတာ အတ္ထကုသလာ, တေ ဣမသ္မိံ အတ္ထေ အတ္ထကုသလာတိ အဓိပ္ပေတာ. တထာ ဝိဓာ စ တေ ဘိက္ခူ. တေန ဘဂဝါ တေ ဘိက္ခူ သန္ဓာယ ဧကပုဂ္ဂလာဓိဋ္ဌာနာယ ဒေသနာယ ‘‘ကရဏီယမတ္ထကုသလေနာ’’တိ အာဟ. अथवा, जो समापत्ति से उठकर संस्कारों का सम्मर्शन कर अर्हत्व को प्राप्त करता है, वह कल्याण-कुशलों में श्रेष्ठ है। वहाँ, जो ये पश्चाताप-रहित शील में प्रतिष्ठित होने से लेकर क्लेश-विष्खम्भन प्रतिपदा के ग्रहण तक वर्णित 'अत्थकुसल' हैं, वे इस अर्थ में 'अत्थकुसल' अभिप्रेत हैं। और वे भिक्षु उसी प्रकार के थे। इसलिए भगवान ने उन भिक्षुओं को लक्ष्य करके, एक व्यक्ति के आधार पर दी गई देशना के माध्यम से 'करणीयमत्थकुसलेन' कहा। တတော ‘‘ကိံ ကရဏီယ’’န္တိ တေသံ သဉ္ဇာတကင်္ခါနံ အာဟ ‘‘ယန္တံ သန္တံ ပဒံ အဘိသမေစ္စာ’’တိ. အယမေတ္ထ အဓိပ္ပာယော – တံ ဗုဒ္ဓါနုဗုဒ္ဓေဟိ ဝဏ္ဏိတံ သန္တံ နိဗ္ဗာနပဒံ ပဋိဝေဓဝသေန အဘိသမေစ္စ ဝိဟရိတုကာမေန ယံ ကရဏီယန္တိ. ဧတ္ထ စ ယန္တိ ဣမဿ ဂါထာပဒဿ အာဒိတော ဝုတ္တမေဝ ကရဏီယန္တိ အဓိကာရတော အနုဝတ္တတိ, တံ သန္တံ ပဒံ အဘိသမေစ္စာတိ. အယံ ပန ယသ္မာ သာဝသေသပါဌော အတ္ထော, တသ္မာ ဝိဟရိတုကာမေနာတိ ဝုတ္တန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. उसके बाद, 'क्या किया जाना चाहिए?' ऐसी शंका उत्पन्न होने पर उनसे कहा— 'यन्तं सन्तं पदं अभिसमेच्च'। यहाँ यह अभिप्राय है— बुद्धों और बुद्ध-अनुयायियों द्वारा प्रशंसित उस शान्त निर्वाण-पद को प्रतिवेध के माध्यम से जानकर विहार करने की इच्छा रखने वाले के द्वारा जो किया जाना चाहिए। और यहाँ 'यं' यह पद इस गाथा-पद के आरम्भ में ही कहा गया है, और 'करणीयं' यह अधिकार के वश से अनुवृत्त होता है— 'तं सन्तं पदं अभिसमेच्च'। चूँकि यह पाठ शेष अर्थ वाला है, इसलिए यहाँ 'विहरितुकामेन' ऐसा कहा गया है, यह समझना चाहिए। အထ ဝါ သန္တံ ပဒံ အဘိသမေစ္စာတိ အနုဿဝါဒိဝသေန လောကိယပညာယ နိဗ္ဗာနပဒံ ‘‘သန္တ’’န္တိ ဉတွာ တံ အဓိဂန္တုကာမေန ယန္တံ ကရဏီယန္တိ အဓိကာရတော အနုဝတ္တတိ, တံ ကရဏီယမတ္ထကုသလေနာတိ ဧဝမ္ပေတ္ထ အဓိပ္ပာယော ဝေဒိတဗ္ဗော. အထ ဝါ ‘‘ကရဏီယမတ္ထကုသလေနာ’’တိ ဝုတ္တေ ‘‘ကိ’’န္တိ စိန္တေန္တာနံ အာဟ ‘‘ယန္တံ သန္တံ ပဒံ အဘိသမေစ္စာ’’တိ. တဿေဝံ အဓိပ္ပာယော ဝေဒိတဗ္ဗော – လောကိယပညာယ သန္တံ ပဒံ အဘိသမေစ္စ ယံ ကရဏီယံ ကာတဗ္ဗံ, တံ ကရဏီယံ, ကရဏာရဟမေဝ တန္တိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. अथवा, 'शान्त पद को जानकर' का अर्थ है— अनुश्रव आदि के माध्यम से लौकिक प्रज्ञा द्वारा निर्वाण-पद को 'शान्त' जानकर, उसे प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले के द्वारा जो किया जाना चाहिए, वह अधिकार के वश से अनुवृत्त होता है। 'कल्याण-कुशल द्वारा वह किया जाना चाहिए'— ऐसा भी यहाँ अभिप्राय समझना चाहिए। अथवा, 'कल्याण-कुशल द्वारा किया जाना चाहिए' ऐसा कहने पर, 'क्या?' ऐसा सोचने वालों के लिए कहा— 'यन्तं सन्तं पदं अभिसमेच्च'। इसका अभिप्राय इस प्रकार समझना चाहिए— लौकिक प्रज्ञा से शान्त पद को जानकर जो करणीय कार्य करना चाहिए, वह करणीय है, वह करने योग्य ही है— ऐसा कहा गया है। ကိံ ပန တန္တိ? ကိမညံ သိယာ အညတြ တဒဓိဂမုပါယတော, ကာမဉ္စေတံ ကရဏာရဟဋ္ဌေန သိက္ခတ္တယဒီပကေန အာဒိပဒေနေဝ ဝုတ္တံ. တထာ ဟိ တဿ အတ္ထဝဏ္ဏနာယံ အဝေါစုမှာ ‘‘အတ္ထိ ကရဏီယံ, အတ္ထိ အကရဏီယံ. တတ္ထ [Pg.204] သင်္ခေပတော သိက္ခတ္တယံ ကရဏီယ’’န္တိ. အတိသင်္ခေပေန ဒေသိတတ္တာ ပန တေသံ ဘိက္ခူနံ ကေဟိစိ ဝိညာတံ, ကေဟိစိ န ဝိညာတံ. တတော ယေဟိ န ဝိညာတံ, တေသံ ဝိညာပနတ္ထံ ယံ ဝိသေသတော အာရညကေန ဘိက္ခုနာ ကာတဗ္ဗံ, တံ ဝိတ္ထာရေန္တော ‘‘သက္ကော ဥဇူ စ သုဟုဇူ စ, သုဝစော စဿ မုဒု အနတိမာနီ’’တိ ဣမံ တာဝ ဥပဍ္ဎဂါထမာဟ. किन्तु वह 'क्या' है? उसे प्राप्त करने के उपाय के अतिरिक्त और क्या हो सकता है? यद्यपि यह 'करणीय' होने के अर्थ में त्रिशिक्षा को प्रकाशित करने वाले प्रथम पद द्वारा ही कहा गया है। जैसा कि उसकी अर्थ-व्याख्या में हमने कहा था— 'करणीय है और अकरणीय है। वहाँ संक्षेप में त्रिशिक्षा ही करणीय है।' किन्तु अत्यंत संक्षेप में उपदेश दिए जाने के कारण, उन भिक्षुओं में से कुछ ने इसे समझा और कुछ ने नहीं समझा। अतः जिन्होंने नहीं समझा, उन्हें समझाने के लिए, जो विशेष रूप से आरण्यक भिक्षु द्वारा किया जाना चाहिए, उसका विस्तार करते हुए— 'सक्को उजू च सुहुजू च, सुवचो चस्स मुदु अनतिमानी'— यह आधी गाथा पहले कही। ကိံ ဝုတ္တံ ဟောတိ? သန္တံ ပဒံ အဘိသမေစ္စ ဝိဟရိတုကာမော, လောကိယပညာယ ဝါ တံ အဘိသမေစ္စ တဒဓိဂမာယ ပဋိပဇ္ဇမာနော အာရညကော ဘိက္ခု ဒုတိယစတုတ္ထပဓာနိယင်္ဂသမန္နာဂမေန ကာယေ စ ဇီဝိတေ စ အနပေက္ခော ဟုတွာ သစ္စပ္ပဋိဝေဓာယ ပဋိပဇ္ဇိတုံ သက္ကော အဿ, တထာ ကသိဏပရိကမ္မဝတ္တသမာဒါနာဒီသု အတ္တနော ပတ္တစီဝရပ္ပဋိသင်္ခရဏာဒီသု စ ယာနိ တာနိ သဗြဟ္မစာရီနံ ဥစ္စာဝစာနိ ကိံ ကရဏီယာနိ, တေသု အညေသု စ ဧဝရူပေသု သက္ကော အဿ ဒက္ခော အနလသော သမတ္ထော. သက္ကော ဟောန္တောပိ စ တတိယပဓာနိယင်္ဂသမန္နာဂမေန ဥဇု အဿ. ဥဇု ဟောန္တောပိ စ သကိံ ဥဇုဘာဝေန ဒဟရကာလေ ဝါ ဥဇုဘာဝေန သန္တောသံ အနာပဇ္ဇိတွာ ယာဝဇီဝံ ပုနပ္ပုနံ အသိထိလကရဏေန သုဋ္ဌုတရံ ဥဇု အဿ. အသဌတာယ ဝါ ဥဇု, အမာယာဝိတာယ သုဟုဇု. ကာယဝစီဝင်္ကပ္ပဟာနေန ဝါ ဥဇု, မနောဝင်္ကပ္ပဟာနေန သုဟုဇု. အသန္တဂုဏဿ ဝါ အနာဝိကရဏေန ဥဇု, အသန္တဂုဏေန ဥပ္ပန္နဿ လာဘဿ အနဓိဝါသနေန သုဟုဇု. ဧဝံ အာရမ္မဏလက္ခဏူပနိဇ္ဈာနေဟိ ပုရိမဒွယတတိယသိက္ခာဟိ ပယောဂါသယသုဒ္ဓီဟိ စ ဥဇု စ သုဟုဇု စ အဿ. क्या कहा गया है? शान्त पद को जानकर विहार करने की इच्छा रखने वाला, अथवा लौकिक प्रज्ञा से उसे जानकर उसकी प्राप्ति के लिए प्रतिपन्न आरण्यक भिक्षु, दूसरे और चौथे प्रधान-अंगों से युक्त होकर, शरीर और जीवन की अपेक्षा न रखते हुए, सत्यों के प्रतिवेध के लिए प्रतिपन्न होने में समर्थ हो। उसी प्रकार कसिण-परिकर्म, व्रतों के समादान आदि में, अपने पात्र-चीवर के संस्कार आदि में, और सब्रह्मचारियों के जो भी छोटे-बड़े कार्य हों, उनमें तथा इसी प्रकार के अन्य कार्यों में वह समर्थ, दक्ष, आलस्य-रहित और सक्षम हो। समर्थ होते हुए भी, वह तीसरे प्रधान-अंग से युक्त होकर ऋजु हो। ऋजु होते हुए भी, केवल एक बार ऋजु होने से या युवावस्था में ऋजु होने से ही संतोष न कर, जीवन भर बार-बार शिथिलता न बरतते हुए भली-भाँति ऋजु हो। शठता न होने से 'उजु' है, माया न होने से 'सुहुजु' है। काय और वाणी की कुटिलता के त्याग से 'उजु' है, मन की कुटिलता के त्याग से 'सुहुजु' है। अविद्यमान गुणों को प्रकट न करने से 'उजु' है, अविद्यमान गुणों के कारण उत्पन्न लाभ को स्वीकार न करने से 'सुहुजु' है। इस प्रकार आलम्बन और लक्षणों के उपनिध्यान द्वारा, पहले की दो और तीसरी शिक्षा द्वारा, तथा प्रयोग और आशय की शुद्धि द्वारा वह 'उजु' और 'सुहुजु' हो। န ကေဝလဉ္စ ဥဇု စ သုဟုဇု စ, အပိစ ပန သုဝစော စ အဿ. ယော ဟိ ပုဂ္ဂလော ‘‘ဣဒံ န ကတ္တဗ္ဗ’’န္တိ ဝုတ္တော ‘‘ကိံ တေ ဒိဋ္ဌံ, ကိံ တေ သုတံ, ကော မေ သုတွာ ဝဒသိ, ကိံ ဥပဇ္ဈာယော အာစရိယော သန္ဒိဋ္ဌော သမ္ဘတ္တော ဝါ’’တိ ဝဒေတိ, တုဏှီဘာဝေန ဝါ တံ ဝိဟေသေတိ, သမ္ပဋိစ္ဆိတွာ ဝါ န တထာ ကရောတိ, သော ဝိသေသာဓိဂမဿ ဒူရေ ဟောတိ. ယော ပန ဩဝဒိယမာနော ‘‘သာဓု, ဘန္တေ သုဋ္ဌု ဝုတ္တံ, အတ္တနော ဝဇ္ဇံ နာမ ဒုဒ္ဒသံ ဟောတိ, ပုနပိ မံ ဧဝရူပံ ဒိသွာ ဝဒေယျာထ အနုကမ္ပံ ဥပါဒါယ, စိရဿံ မေ တုမှာကံ သန္တိကာ ဩဝါဒေါ လဒ္ဓေါ’’တိ ဝဒတိ, ယထာနုသိဋ္ဌဉ္စ ပဋိပဇ္ဇတိ, သော ဝိသေသာဓိဂမဿ အဝိဒူရေ ဟောတိ. တသ္မာ ဧဝံ ပရဿ ဝစနံ သမ္ပဋိစ္ဆိတွာ ကရောန္တော သုဝစော စ အဿ. न केवल ऋजु और सु-ऋजु हो, अपितु 'सुवच' भी हो। जो व्यक्ति 'यह नहीं करना चाहिए' ऐसा कहे जाने पर कहता है— 'तुमने क्या देखा है? तुमने क्या सुना है? तुम कौन होते हो मुझे कहने वाले? क्या तुम उपाध्याय हो, आचार्य हो, या कोई परिचित या घनिष्ठ मित्र हो?', अथवा मौन रहकर उसे कष्ट पहुँचाता है, अथवा स्वीकार करके भी वैसा नहीं करता, वह विशेष उपलब्धि से दूर होता है। किन्तु जो उपदेश दिए जाने पर कहता है— 'साधु भन्ते! आपने बहुत अच्छा कहा। अपना दोष देखना कठिन होता है। पुनः भी मुझे ऐसा देखकर अनुकम्पा वश कहिएगा। बहुत समय बाद मुझे आपसे उपदेश प्राप्त हुआ है', और जैसा सिखाया गया है वैसा ही आचरण करता है, वह विशेष उपलब्धि के निकट होता है। इसलिए इस प्रकार दूसरे के वचन को स्वीकार कर वैसा करने वाला 'सुवच' हो। ယထာ [Pg.205] စ သုဝစော, ဧဝံ မုဒု အဿ. မုဒူတိ ဂဟဋ္ဌေဟိ ဒူတဂမနပဟိဏဂမနာဒီသု နိယုဇ္ဇမာနော တတ္ထ မုဒုဘာဝံ အကတွာ ထဒ္ဓေါ ဟုတွာ ဝတ္တပဋိပတ္တိယံ သကလဗြဟ္မစရိယေ စ မုဒု အဿ သုပရိကမ္မကတသုဝဏ္ဏံ ဝိယ တတ္ထ တတ္ထ ဝိနိယောဂက္ခမော. အထ ဝါ မုဒူတိ အဘာကုဋိကော ဥတ္တာနမုခေါ သုခသမ္ဘာသော ပဋိသန္ထာရဝုတ္တိ သုတိတ္ထံ ဝိယ သုခါဝဂါဟော အဿ. န ကေဝလဉ္စ မုဒု, အပိစ ပန အနတိမာနီ အဿ, ဇာတိဂေါတ္တာဒီဟိ အတိမာနဝတ္ထူဟိ ပရေ နာတိမညေယျ, သာရိပုတ္တတ္ထေရော ဝိယ စဏ္ဍာလကုမာရကသမေန စေတသာ ဝိဟရေယျာတိ. जैसे वह सुवच (वचनों को मानने वाला) है, वैसे ही उसे मृदु (कोमल) होना चाहिए। 'मृदु' का अर्थ है कि गृहस्थों द्वारा दूत-कार्य या संदेश ले जाने आदि कार्यों में नियुक्त किए जाने पर वहाँ कठोरता न दिखाकर, अपने कर्तव्यों और सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य में मृदु होना चाहिए, जैसे अच्छी तरह तपाया हुआ शुद्ध स्वर्ण हो, जो हर स्थान पर विनियोग (उपयोग) के योग्य होता है। अथवा 'मृदु' का अर्थ है—भृकुटी न चढ़ाने वाला (मुख न सिकोड़ने वाला), प्रसन्नमुख, सुखपूर्वक संभाषण करने वाला, शिष्टाचारपूर्ण व्यवहार वाला और एक अच्छे घाट के समान सुखपूर्वक प्रवेश करने योग्य होना चाहिए। और न केवल मृदु, बल्कि उसे अतिमानी (अहंकारी) भी नहीं होना चाहिए; जाति, गोत्र आदि अतिमान के कारणों से दूसरों का अपमान नहीं करना चाहिए, और सारिपुत्र स्थविर के समान चाण्डाल बालक के सदृश (विनम्र) चित्त से विहार करना चाहिए। ဒုတိယဂါထာဝဏ္ဏနာ द्वितीय गाथा की व्याख्या। ၂. ဧဝံ ဘဂဝါ သန္တံ ပဒံ အဘိသမေစ္စ ဝိဟရိတုကာမဿ တဒဓိဂမာယ ဝါ ပဋိပဇ္ဇမာနဿ ဝိသေသတော အာရညကဿ ဘိက္ခုနော ဧကစ္စံ ကရဏီယံ ဝတွာ ပုန တတုတ္တရိပိ ဝတ္တုကာမော ‘‘သန္တုဿကော စာ’’တိ ဒုတိယဂါထမာဟ. २. इस प्रकार भगवान ने शान्त पद (निर्वाण) का साक्षात्कार कर विहार करने की इच्छा रखने वाले, अथवा विशेष रूप से उसकी प्राप्ति के लिए प्रतिपन्न (प्रयत्नशील) आरण्यक भिक्षु के लिए एक साथ किए जाने वाले कर्तव्यों को कहकर, पुनः उससे आगे भी कहने की इच्छा से "सन्तुस्सको च" आदि दूसरी गाथा कही। တတ္ထ ‘‘သန္တုဋ္ဌီ စ ကတညုတာ’’တိ ဧတ္ထ ဝုတ္တပ္ပဘေဒေန ဒွါဒသဝိဓေန သန္တောသေန သန္တုဿတီတိ သန္တုဿကော. အထ ဝါ တုဿတီတိ တုဿကော, သကေန တုဿကော, သန္တေန တုဿကော, သမေန တုဿကောတိ သန္တုဿကော. တတ္ထ သကံ နာမ ‘‘ပိဏ္ဍိယာလောပဘောဇနံ နိဿာယာ’’တိ ဧဝံ ဥပသမ္ပဒမဏ္ဍလေ ဥဒ္ဒိဋ္ဌံ အတ္တနာ စ သမ္ပဋိစ္ဆိတံ စတုပစ္စယဇာတံ, တေန သုန္ဒရေန ဝါ အသုန္ဒရေန ဝါ သက္ကစ္စံ ဝါ အသက္ကစ္စံ ဝါ ဒိန္နေန ပဋိဂ္ဂဟဏကာလေ ပရိဘောဂကာလေ စ ဝိကာရံ အဒဿေတွာ ယာပေန္တော ‘‘သကေန တုဿကော’’တိ ဝုစ္စတိ. သန္တံ နာမ ယံ လဒ္ဓံ ဟောတိ အတ္တနော ‘ဝိဇ္ဇမာနံ, တေန သန္တေနေဝ တုဿန္တော တတော ပရံ န ပတ္ထေန္တော အတြိစ္ဆတံ ပဇဟန္တော ‘‘သန္တေန တုဿကော’’တိ ဝုစ္စတိ. သမံ နာမ ဣဋ္ဌာနိဋ္ဌေသု အနုနယပဋိဃပ္ပဟာနံ, တေန သမေန သဗ္ဗာရမ္မဏေသု တုဿန္တော ‘‘သမေန တုဿကော’’တိ ဝုစ္စတိ. वहाँ "सन्तुट्ठी च कृतज्ञता" यहाँ कहे गए भेदों के अनुसार बारह प्रकार के सन्तोष से जो भली-भाँति सन्तुष्ट होता है, वह 'सन्तुस्सको' (सन्तुष्ट) है। अथवा जो सन्तुष्ट होता है वह 'तुस्सको' है; अपने से सन्तुष्ट, जो विद्यमान है उससे सन्तुष्ट, और समता से सन्तुष्ट—वह 'सन्तुस्सको' है। वहाँ 'स्वकीय' (अपना) का अर्थ है—"पिण्डपात भोजन के आश्रित" इस प्रकार उपसम्पदा मण्डल में निर्दिष्ट और स्वयं द्वारा स्वीकार किए गए चार प्रत्यय; उनसे, चाहे वे सुन्दर हों या असुन्दर, आदरपूर्वक दिए गए हों या अनादरपूर्वक, ग्रहण करते समय और उपभोग करते समय विकार न दिखाते हुए जीवन यापन करने वाला 'स्वकीय से सन्तुष्ट' कहलाता है। 'विद्यमान' का अर्थ है जो प्राप्त हुआ है और अपने पास मौजूद है; उस विद्यमान वस्तु से ही सन्तुष्ट रहते हुए, उससे अधिक की इच्छा न करते हुए और लोभ का त्याग करने वाला 'विद्यमान से सन्तुष्ट' कहलाता है। 'सम' का अर्थ है इष्ट और अनिष्ट आरम्बनों में अनुनय (राग) और प्रतिघ (द्वेष) का त्याग; उस समता के द्वारा सभी आरम्बनों में सन्तुष्ट रहने वाला 'समता से सन्तुष्ट' कहलाता है। သုခေန ဘရီယတီတိ သုဘရော, သုပေါသောတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ယော ဟိ ဘိက္ခု မနုဿေဟိ သာလိမံသောဒနာဒီနံ ပတ္တေ ပူရေတွာ ဒိန္နေပိ ဒုမ္မုခဘာဝံ အနတ္တမနဘာဝမေဝ စ ဒဿေတိ, တေသံ ဝါ သမ္မုခါဝ တံ ပိဏ္ဍပါတံ ‘‘ကိံ တုမှေဟိ ဒိန္န’’န္တိ အပသာဒေန္တော သာမဏေရဂဟဋ္ဌာဒီနံ ဒေတိ, ဧသ ဒုဗ္ဘရော. ဧတံ ဒိသွာ မနုဿာ ဒူရတောဝ ပရိဝဇ္ဇေန္တိ ‘‘ဒုဗ္ဘရော ဘိက္ခု န သက္ကာ ပေါသေတု’’န္တိ[Pg.206]. ယော ပန ယံ ကိဉ္စိ လူခံ ဝါ ပဏီတံ ဝါ အပ္ပံ ဝါ ဗဟုံ ဝါ လဘိတွာ အတ္တမနော ဝိပ္ပသန္နမုခေါ ဟုတွာ ယာပေတိ, ဧသ သုဘရော. ဧတံ ဒိသွာ မနုဿာ အတိဝိယ ဝိဿတ္ထာ ဟောန္တိ, ‘‘အမှာကံ ဘဒန္တော သုဘရော, ထောကထောကေနာပိ တုဿတိ, မယမေဝ နံ ပေါသေဿာမာ’’တိ ပဋိညံ ကတွာ ပေါသေန္တိ. ဧဝရူပေါ ဣဓ သုဘရောတိ အဓိပ္ပေတော. जो सुखपूर्वक भरण-पोषण के योग्य हो, वह 'सुभरो' है, अर्थात् 'सुपोष' (आसानी से पोसा जाने वाला)। जो भिक्षु मनुष्यों द्वारा पात्र भरकर शाली चावल और मांस आदि दिए जाने पर भी अप्रसन्नता या खिन्नता दिखाता है, अथवा उनके सामने ही उस पिण्डपात को "तुमने यह क्या दिया है" कहकर तिरस्कार करते हुए श्रमणेरों या गृहस्थों को दे देता है, वह 'दुर्भरो' (कठिनाई से पोसा जाने वाला) है। उसे देखकर मनुष्य दूर से ही यह सोचकर बचते हैं कि "यह भिक्षु दुर्भर है, इसका भरण-पोषण नहीं किया जा सकता"। किन्तु जो भिक्षु जो कुछ भी—रूखा या स्वादिष्ट, थोड़ा या बहुत—प्राप्त कर सन्तुष्ट और प्रसन्नमुख होकर जीवन यापन करता है, वह 'सुभरो' है। उसे देखकर मनुष्य अत्यन्त विश्वस्त होते हैं और "हमारे भदन्त सुभर हैं, वे थोड़े से भी सन्तुष्ट हो जाते हैं, हम ही इनका भरण-पोषण करेंगे" ऐसी प्रतिज्ञा करके उनका पोषण करते हैं। यहाँ इसी प्रकार का भिक्षु 'सुभरो' अभिप्रेत है। အပ္ပံ ကိစ္စမဿာတိ အပ္ပကိစ္စော, န ကမ္မာရာမတာဘဿာရာမတာသင်္ဂဏိကာရာမတာဒိအနေကကိစ္စဗျာဝဋော, အထ ဝါ သကလဝိဟာရေ နဝကမ္မသံဃပရိဘောဂသာမဏေရအာရာမိကဝေါသာသနာဒိကိစ္စဝိရဟိတော, အတ္တနော ကေသနခစ္ဆေဒနပတ္တစီဝရကမ္မာဒိံ ကတွာ သမဏဓမ္မကိစ္စပရော ဟောတီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. जिसके थोड़े कार्य हों, वह 'अप्पकिच्चो' (अल्पकृत्य) है; वह निर्माण-कार्य, गपशप, संगति आदि अनेक कार्यों में व्यस्त नहीं होता। अथवा सम्पूर्ण विहार में नवनिर्माण, संघ के कार्य, श्रमणेरों और आरामपालकों के अनुशासन आदि कार्यों से मुक्त होकर, अपने बाल-नाखून काटना, पात्र-चीवर का कार्य आदि करके श्रमण-धर्म के कार्यों में तत्पर रहने वाला 'अल्पकृत्य' कहलाता है। သလ္လဟုကာ ဝုတ္တိ အဿာတိ သလ္လဟုကဝုတ္တိ. ယထာ ဧကစ္စော ဗဟုဘဏ္ဍော ဘိက္ခု ဒိသာပက္ကမနကာလေ ဗဟုံ ပတ္တစီဝရပစ္စတ္ထရဏတေလဂုဠာဒိံ မဟာဇနေန သီသဘာရကဋိဘာရာဒီဟိ ဥဗ္ဗဟာပေတွာ ပက္ကမတိ, ဧဝံ အဟုတွာ ယော အပ္ပပရိက္ခာရော ဟောတိ, ပတ္တစီဝရာဒိအဋ္ဌသမဏပရိက္ခာရမတ္တမေဝ ပရိဟရတိ, ဒိသာပက္ကမနကာလေ ပက္ခီ သကုဏော ဝိယ သမာဒါယေဝ ပက္ကမတိ, ဧဝရူပေါ ဣဓ သလ္လဟုကဝုတ္တီတိ အဓိပ္ပေတော. သန္တာနိ ဣန္ဒြိယာနိ အဿာတိ သန္တိန္ဒြိယော, ဣဋ္ဌာရမ္မဏာဒီသု ရာဂါဒိဝသေန အနုဒ္ဓတိန္ဒြိယောတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. နိပကောတိ ဝိညူ ဝိဘာဝီ ပညဝါ, သီလာနုရက္ခဏပညာယ စီဝရာဒိဝိစာရဏပညာယ အာဝါသာဒိသတ္တသပ္ပာယပရိဇာနနပညာယ စ သမန္နာဂတောတိ အဓိပ္ပာယော. जिसकी आजीविका हल्की (सादा) हो, वह 'सल्लहुकवुत्ति' (लघुवृत्ति) है। जैसे कोई बहुत सामान वाला भिक्षु किसी दिशा में प्रस्थान करते समय बहुत से पात्र, चीवर, बिछावन, तेल, गुड़ आदि को लोगों से सिर या कमर पर उठवाकर जाता है, वैसा न होकर जो अल्प-परिष्कारी (कम सामान वाला) होता है, केवल पात्र-चीवर आदि आठ श्रमण-परिष्कारों को ही धारण करता है और प्रस्थान करते समय पक्षी के समान (केवल अपने पंख लेकर) उड़ जाता है, यहाँ ऐसा भिक्षु 'लघुवृत्ति' अभिप्रेत है। जिसकी इन्द्रियाँ शान्त हों, वह 'सन्तिन्द्रियो' है; अर्थात् इष्ट आरम्बनों आदि में राग आदि के वश में न होने वाली इन्द्रियों वाला। 'निपको' का अर्थ है—विज्ञ, बुद्धिमान और प्रज्ञावान; जो शील की रक्षा की प्रज्ञा, चीवर आदि के विचार की प्रज्ञा और आवास आदि सात प्रकार के साप्त-सप्पाय (अनुकूलताओं) को जानने वाली प्रज्ञा से युक्त हो, वह 'निपको' है। န ပဂဗ္ဘောတိ အပ္ပဂဗ္ဘော, အဋ္ဌဋ္ဌာနေန ကာယပါဂဗ္ဘိယေန စတုဋ္ဌာနေန ဝစီပါဂဗ္ဘိယေန အနေကေန ဌာနေန မနောပါဂဗ္ဘိယေန စ ဝိရဟိတောတိ အတ္ထော. जो प्रगल्भ (धृष्ट) न हो, वह 'अप्पगब्भो' (अधृष्ट) है; जो आठ प्रकार की कायिक प्रगल्भता, चार प्रकार की वाचिक प्रगल्भता और अनेक प्रकार की मानसिक प्रगल्भता से रहित हो, यह अर्थ है। အဋ္ဌဋ္ဌာနံ ကာယပါဂဗ္ဘိယံ (မဟာနိ. ၈၇) နာမ သံဃဂဏပုဂ္ဂလဘောဇနသာလာဇန္တာဃရနှာနတိတ္ထဘိက္ခာစာရမဂ္ဂအန္တရဃရပ္ပဝေသနေသု ကာယေန အပ္ပတိရူပကရဏံ. သေယျထိဒံ – ဣဓေကစ္စော သံဃမဇ္ဈေ ပလ္လတ္ထိကာယ ဝါ နိသီဒတိ ပါဒေ ပါဒမောဒဟိတွာ ဝါတိ ဧဝမာဒိ. တထာ ဂဏမဇ္ဈေ စတုပရိသသန္နိပါတေ, တထာ ဝုဍ္ဎတရေ ပုဂ္ဂလေ. ဘောဇနသာလာယံ ပန ဝုဍ္ဎာနံ အာသနံ [Pg.207] န ဒေတိ, နဝါနံ အာသနံ ပဋိဗာဟတိ. တထာ ဇန္တာဃရေ, ဝုဍ္ဎေ စေတ္ထ အနာပုစ္ဆာ အဂ္ဂိဇာလနာဒီနိ ကရောတိ. နှာနတိတ္ထေ စ ယဒိဒံ ‘‘ဒဟရော ဝုဍ္ဎောတိ ပမာဏံ အကတွာ အာဂတပဋိပါဋိယာ နှာယိတဗ္ဗ’’န္တိ ဝုတ္တံ, တမ္ပိ အနာဒိယန္တော ပစ္ဆာ အာဂန္တွာ ဥဒကံ ဩတရိတွာ ဝုဍ္ဎေ စ နဝေ စ ဗာဓေတိ. ဘိက္ခာစာရမဂ္ဂေ ပန အဂ္ဂါသနအဂ္ဂေါဒကအဂ္ဂပိဏ္ဍတ္ထံ ဝုဍ္ဎာနံ ပုရတော ပုရတော ယာတိ, ဗာဟာယ ဗာဟံ ပဟရန္တော. အန္တရဃရပ္ပဝေသနေ ဝုဍ္ဎာနံ ပဌမတရံ ပဝိသတိ, ဒဟရေဟိ ကာယကီဠနံ ကရောတီတိ ဧဝမာဒိ. आठ स्थानों पर होने वाली 'कायिक प्रगल्भता' का अर्थ है—संघ, गण, पुद्गल, भोजनशाला, जन्ताघर (स्नानागार), स्नान-घाट, भिक्षाटन मार्ग और घरों में प्रवेश करते समय शरीर से अनुचित व्यवहार करना। जैसे—यहाँ कोई संघ के बीच में घुटनों को बाँधकर (पल्लात्थिका) बैठता है या पैर पर पैर चढ़ाकर बैठता है आदि। वैसे ही गण के बीच में, चारों परिषदों के सम्मेलन में और वृद्ध व्यक्तियों के सामने बैठना। भोजनशाला में वृद्धों को आसन न देना और नवोदितों (कनिष्ठों) को आसन देने से रोकना। वैसे ही जन्ताघर में वृद्धों से बिना पूछे अग्नि जलाना आदि कार्य करना। स्नान-घाट पर "यह छोटा है, यह बड़ा है" ऐसा विचार न कर, आने के क्रम से स्नान करना चाहिए—इस नियम को न मानते हुए बाद में आकर जल में उतरकर वृद्धों और नवोदितों को बाधा पहुँचाना। भिक्षाटन के मार्ग पर श्रेष्ठ आसन, श्रेष्ठ जल और श्रेष्ठ पिण्डपात के लिए वृद्धों के आगे-आगे चलना, बाहु से बाहु टकराते हुए चलना। घरों में प्रवेश करते समय वृद्धों से पहले प्रवेश करना, कनिष्ठों के साथ शारीरिक क्रीड़ा करना आदि कायिक प्रगल्भता है। စတုဋ္ဌာနံ ဝစီပါဂဗ္ဘိယံ (မဟာနိ. ၈၇) နာမ သံဃဂဏပုဂ္ဂလအန္တရဃရေသု အပ္ပတိရူပဝါစာနိစ္ဆာရဏံ. သေယျထိဒံ – ဣဓေကစ္စော သံဃမဇ္ဈေ အနာပုစ္ဆာ ဓမ္မံ ဘာသတိ, တထာ ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တပ္ပကာရေ ဂဏေ ဝုဍ္ဎတရေ ပုဂ္ဂလေ စ, တတ္ထ မနုဿေဟိ ပဉှံ ပုဋ္ဌော ဝုဍ္ဎတရံ အနာပုစ္ဆာ ဝိဿဇ္ဇေတိ, အန္တရဃရေ ပန ‘‘ဣတ္ထန္နာမေ ကိံ အတ္ထိ, ကိံ ယာဂု ဥဒါဟု ခါဒနီယံ ဝါ ဘောဇနီယံ ဝါ, ကိံ မေ ဒဿသိ, ကိံ အဇ္ဇ ခါဒိဿာမိ, ကိံ ဘုဉ္ဇိဿာမိ, ကိံ ပိဝိဿာမီ’’တိ ဧဝမာဒိံ ဘာသတိ. चार कारणों से होने वाली 'वचिपगब्भिय' (वाणी की धृष्टता) का अर्थ है संघ, गण, व्यक्ति और घरों के बीच अनुपयुक्त वाणी का उच्चारण करना। जैसे - यहाँ कोई भिक्षु संघ के बीच बड़ों से बिना पूछे धर्म चर्चा करता है, उसी प्रकार पहले बताए गए गण में और वृद्ध व्यक्तियों के बीच भी बिना पूछे धर्म चर्चा करता है; वहाँ मनुष्यों द्वारा प्रश्न पूछे जाने पर वृद्ध भिक्षु से बिना पूछे उत्तर देता है; और घर के भीतर (गाँव में) "इस नाम वाले के पास क्या है? क्या कांजी (यागु) है या खाद्य अथवा भोज्य पदार्थ है? मुझे क्या दोगे? आज हम क्या खाएंगे? क्या भोजन करेंगे? क्या पिएंगे?" - इस प्रकार की बातें करता है। အနေကဋ္ဌာနံ မနောပါဂဗ္ဘိယံ (မဟာနိ. ၈၇) နာမ တေသု တေသု ဌာနေသု ကာယဝါစာဟိ အဇ္ဈာစာရံ အနာပဇ္ဇိတွာပိ မနသာ ဧဝ ကာမဝိတက္ကာဒိနာနပ္ပကာရံ အပ္ပတိရူပဝိတက္ကနံ. अनेक कारणों से होने वाली 'मनोपगब्भिय' (मन की धृष्टता) का अर्थ है उन-उन स्थानों पर काया और वाणी से अतिचार (उल्लंघन) न करते हुए भी केवल मन से काम-वितर्क आदि विभिन्न प्रकार के अनुपयुक्त विचारों का चिंतन करना। ကုလေသွနနုဂိဒ္ဓေါတိ ယာနိ တာနိ ကုလာနိ ဥပသင်္ကမတိ, တေသု ပစ္စယတဏှာယ ဝါ အနနုလောမိကဂိဟိသံသဂ္ဂဝသေန ဝါ အနနုဂိဒ္ဓေါ, န သဟသောကီ, န သဟနန္ဒီ, န သုခိတေသု သုခိတော, န ဒုက္ခိတေသု ဒုက္ခိတော, န ဥပ္ပန္နေသု ကိစ္စကရဏီယေသု အတ္တနာ ဝါ ဥယျောဂမာပဇ္ဇိတာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဣမိဿာယ စ ဂါထာယ ယံ ‘‘သုဝစော စဿာ’’တိ ဧတ္ထ ဝုတ္တံ အဿာတိ ဝစနံ, တံ သဗ္ဗပဒေဟိ သဒ္ဓိံ သန္တုဿကော စ အဿ, သုဘရော စ အဿာတိ ဧဝံ ယောဇေတဗ္ဗံ. 'कुलेस्वननुगिद्धो' का अर्थ है कि जिन कुलों (परिवारों) में वह जाता है, उनमें प्रत्यय (आवश्यकताओं) की तृष्णा के कारण या गृहस्थों के साथ अनुचित संसर्ग के कारण आसक्त न हो; न उनके साथ शोक करे, न उनके साथ हर्ष मनाए; उनके सुखी होने पर (स्वयं) सुखी न हो और उनके दुखी होने पर दुखी न हो; और उनके कार्यों के उपस्थित होने पर स्वयं उनमें संलग्न न हो - यह कहा गया है। और इस गाथा में जो 'सुवचो चस्स' यहाँ 'अस्स' शब्द है, उसे सभी पदों के साथ जोड़ना चाहिए, जैसे - 'सन्तुस्सको च अस्स' (संतुष्ट हो), 'सुभरो च अस्स' (सुखपूर्वक पोषण करने योग्य हो) - इस प्रकार अर्थ लगाना चाहिए। တတိယဂါထာဝဏ္ဏနာ तीसरी गाथा की व्याख्या। ၃. ဧဝံ ဘဂဝါ သန္တံ ပဒံ အဘိသမေစ္စ ဝိဟရိတုကာမဿ တဒဓိဂမာယ ဝါ ပဋိပဇ္ဇိတုကာမဿ ဝိသေသတော အာရညကဿ ဘိက္ခုနော တဒုတ္တရိပိ ကရဏီယံ အာစိက္ခိတွာ ဣဒါနိ အကရဏီယမ္ပိ အာစိက္ခိတုကာမော ‘‘န စ ခုဒ္ဒမာစရေ ကိဉ္စိ, ယေန ဝိညူ ပရေ ဥပဝဒေယျု’’န္တိ ဣမံ ဥပဍ္ဎဂါထမာဟ. ३. इस प्रकार भगवान ने शांत पद (निर्वाण) का साक्षात्कार कर विहार करने की इच्छा रखने वाले या उसकी प्राप्ति के लिए प्रतिपत्ति (साधना) करने की इच्छा रखने वाले, विशेष रूप से आरण्यक (वनवासी) भिक्षु के लिए, उससे आगे भी जो करणीय (कर्तव्य) है उसे बताकर, अब जो अकरणीय (न करने योग्य) है उसे भी बताने की इच्छा से "न च खुद्दमचरे किञ्चि, येन विञ्ञू परे उपवदेय्युं" - यह आधी गाथा कही। တဿတ္ထော [Pg.208] – ဧဝမိမံ ကရဏီယံ ကရောန္တော ယံ တံ ကာယဝစီမနောဒုစ္စရိတံ ခုဒ္ဒံ လာမကန္တိ ဝုစ္စတိ, တံ န စ ခုဒ္ဒံ သမာစရေ, အသမာစရန္တော စ န ကေဝလံ ဩဠာရိကံ, ကိန္တု ကိဉ္စိ န သမာစရေ, အပ္ပမတ္တကမ္ပိ အဏုမတ္တကမ္ပိ န သမာစရေတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. इसका अर्थ है - इस प्रकार इस करणीय को करते हुए, जो वह कायिक, वाचिक और मानसिक दुश्चरित्र है जिसे 'क्षुद्र' या 'नीच' कहा जाता है, उस क्षुद्र आचरण को न करे; और आचरण न करते हुए न केवल स्थूल (बड़े) पापों को, बल्कि किसी भी (सूक्ष्म) पाप का आचरण न करे; अल्प मात्र या अणु मात्र भी (अकुशल) आचरण न करे - यह कहा गया है। တတော တဿ သမာစာရေ သန္ဒိဋ္ဌိကမေဝါဒီနဝံ ဒဿေတိ ‘‘ယေန ဝိညူ ပရေ ဥပဝဒေယျု’’န္တိ. ဧတ္ထ စ ယသ္မာ အဝိညူ ပရေ အပ္ပမာဏံ. တေ ဟိ အနဝဇ္ဇံ ဝါ သာဝဇ္ဇံ ကရောန္တိ, အပ္ပသာဝဇ္ဇံ ဝါ မဟာသာဝဇ္ဇံ. ဝိညူ ဧဝ ပန ပမာဏံ. တေ ဟိ အနုဝိစ္စ ပရိယောဂါဟေတွာ အဝဏ္ဏာရဟဿ အဝဏ္ဏံ ဘာသန္တိ, ဝဏ္ဏာရဟဿ ဝဏ္ဏံ ဘာသန္တိ. တသ္မာ ‘‘ဝိညူ ပရေ’’တိ ဝုတ္တံ. उसके बाद, उसके आचरण में प्रत्यक्ष (दृष्टधर्मिक) दोष को "येन विञ्ञू परे उपवदेय्युं" (जिससे दूसरे विद्वान निंदा करें) के द्वारा दिखाते हैं। यहाँ क्योंकि 'अविद्वान' (अज्ञानी) दूसरे लोग प्रमाण नहीं होते। वे तो निर्दोष को सदोष बना देते हैं, या अल्प दोष को महादोष बना देते हैं। विद्वान ही प्रमाण होते हैं। वे ही भली-भाँति जाँच-परखकर निंदा के योग्य की निंदा करते हैं और प्रशंसा के योग्य की प्रशंसा करते हैं। इसलिए "विञ्ञू परे" (विद्वान दूसरे लोग) कहा गया है। ဧဝံ ဘဂဝါ ဣမာဟိ အဍ္ဎတေယျာဟိ ဂါထာဟိ သန္တံ ပဒံ အဘိသမေစ္စ ဝိဟရိတုကာမဿ တဒဓိဂမာယ ဝါ ပဋိပဇ္ဇိတုကာမဿ ဝိသေသတော အာရညကဿ, အာရညကသီသေန စ သဗ္ဗေသမ္ပိ ကမ္မဋ္ဌာနံ ဂဟေတွာ ဝိဟရိတုကာမာနံ ကရဏီယာကရဏီယဘေဒံ ကမ္မဋ္ဌာနူပစာရံ ဝတွာ ဣဒါနိ တေသံ ဘိက္ခူနံ တဿ ဒေဝတာဘယဿ ပဋိဃာတာယ ပရိတ္တတ္ထံ ဝိပဿနာပါဒကဇ္ဈာနဝသေန ကမ္မဋ္ဌာနတ္ထဉ္စ ‘‘သုခိနောဝ ခေမိနော ဟောန္တူ’’တိအာဒိနာ နယေန မေတ္တကထံ ကထေတုမာရဒ္ဓေါ. इस प्रकार भगवान ने इन ढाई गाथाओं के द्वारा शांत पद (निर्वाण) का साक्षात्कार कर विहार करने की इच्छा रखने वाले या उसकी प्राप्ति के लिए साधना करने की इच्छा रखने वाले, विशेष रूप से आरण्यक भिक्षु के लिए, और आरण्यक के बहाने उन सभी भिक्षुओं के लिए जो कर्मस्थान (ध्यान) लेकर विहार करना चाहते हैं, करणीय और अकरणीय के भेद सहित कर्मस्थान के उपचार (तैयारी) को बताकर; अब उन भिक्षुओं के उन देवताओं के भय को दूर करने के लिए, रक्षा (परित्राण) के लिए, विपश्यना के आधारभूत ध्यान के द्वारा और कर्मस्थान के प्रयोजन के लिए "सुखिनो व खेमिनो होन्तु" आदि विधि से मैत्री-कथा कहना आरम्भ किया। တတ္ထ သုခိနောတိ သုခသမ္ပန္နာ. ခေမိနောတိ ခေမဝန္တော, အဘယာ နိရုပဒ္ဒဝါတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. သဗ္ဗေတိ အနဝသေသာ. သတ္တာတိ ပါဏိနော. သုခိတတ္တာတိ သုခိတစိတ္တာ. ဧတ္ထ စ ကာယိကေန သုခေန သုခိနော, မာနသေန သုခိတတ္တာ, တဒုဘယေနာပိ သဗ္ဗဘယုပဒ္ဒဝဝိဂမေန ဝါ ခေမိနောတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. ကသ္မာ ပန ဧဝံ ဝုတ္တံ? မေတ္တာဘာဝနာကာရဒဿနတ္ထံ. ဧဝဉှိ မေတ္တာ ဘာဝေတဗ္ဗာ ‘‘သဗ္ဗေ သတ္တာ သုခိနော ဟောန္တူ’’တိ ဝါ, ‘‘ခေမိနော ဟောန္တူ’’တိ ဝါ, ‘‘သုခိတတ္တာ ဟောန္တူ’’တိ ဝါ. वहाँ 'सुखिनो' का अर्थ है सुख से संपन्न। 'खेमिनो' का अर्थ है क्षेमयुक्त (सुरक्षित), निर्भय और उपद्रव रहित - यह कहा गया है। 'सब्बे' का अर्थ है बिना किसी शेष के (सभी)। 'सत्ता' का अर्थ है प्राणी। 'सुखितत्ता' का अर्थ है सुखी चित्त वाले। यहाँ कायिक सुख से 'सुखिनो', मानसिक सुख से 'सुखितत्ता', और उन दोनों से अथवा सभी भय और उपद्रवों के दूर होने से 'खेमिनो' समझना चाहिए। ऐसा क्यों कहा गया है? मैत्री भावना के प्रकार को दिखाने के लिए। मैत्री की भावना इस प्रकार करनी चाहिए - "सभी प्राणी सुखी हों" या "क्षेमयुक्त हों" या "सुखी चित्त वाले हों"। စတုတ္ထဂါထာဝဏ္ဏနာ चौथी गाथा की व्याख्या। ၄. ဧဝံ ယာဝ ဥပစာရတော အပ္ပနာကောဋိ, တာဝ သင်္ခေပေန မေတ္တာဘာဝနံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ ဝိတ္ထာရတောပိ တံ ဒဿေတုံ ‘‘ယေ ကေစီ’’တိ ဂါထာဒွယမာဟ. အထ ဝါ ယသ္မာ ပုထုတ္တာရမ္မဏေ ပရိစိတံ စိတ္တံ န အာဒိကေနေဝ ဧကတ္တေ သဏ္ဌာတိ အာရမ္မဏပ္ပဘေဒံ ပန အနုဂန္တွာ အနုဂန္တွာ ကမေန [Pg.209] သဏ္ဌာတိ, တသ္မာ တဿ တသထာဝရာဒိဒုကတိကပ္ပဘေဒေ အာရမ္မဏေ အနုဂန္တွာ အနုဂန္တွာ သဏ္ဌာနတ္ထမ္ပိ ‘‘ယေ ကေစီ’’တိ ဂါထာဒွယမာဟ. အထ ဝါ ယသ္မာ ယဿ ယံ အာရမ္မဏံ ဝိဘူတံ ဟောတိ, တဿ တတ္ထ စိတ္တံ သုခံ တိဋ္ဌတိ, တသ္မာ တေသံ ဘိက္ခူနံ ယဿ ယံ ဝိဘူတံ အာရမ္မဏံ, တဿ တတ္ထ စိတ္တံ သဏ္ဌာပေတုကာမော တသထာဝရာဒိဒုကတိကာရမ္မဏဘေဒဒီပကံ ‘‘ယေ ကေစီ’’တိ ဣမံ ဂါထာဒွယမာဟ. ४. इस प्रकार उपचार से लेकर अर्पणा की सीमा तक संक्षेप में मैत्री भावना को दिखाकर, अब विस्तार से उसे दिखाने के लिए "ये केचि" आदि दो गाथाएँ कहीं। अथवा, क्योंकि विस्तृत आलम्बन (विषय) में अभ्यस्त चित्त आरम्भ में ही एकत्व (एक व्यक्ति) पर स्थिर नहीं होता, बल्कि आलम्बन के भेदों का अनुसरण करते-करते क्रमशः स्थिर होता है, इसलिए उस (भिक्षु) के 'त्रस' (चलायमान) और 'स्थावर' (स्थिर) आदि द्विक और त्रिक भेदों वाले आलम्बन का अनुसरण करते हुए चित्त की स्थिरता के लिए "ये केचि" आदि दो गाथाएँ कहीं। अथवा, जिस (भिक्षु) को जो आलम्बन स्पष्ट होता है, उसका चित्त वहाँ सुखपूर्वक स्थिर होता है, इसलिए उन भिक्षुओं में से जिसे जो आलम्बन स्पष्ट हो, उसका चित्त वहाँ स्थिर करने की इच्छा से 'त्रस-स्थावर' आदि द्विक और त्रिक आलम्बन के भेदों को प्रकाशित करने वाली "ये केचि" आदि ये दो गाथाएँ कहीं। ဧတ္ထ ဟိ တသထာဝရဒုကံ ဒိဋ္ဌာဒိဋ္ဌဒုကံ ဒူရသန္တိကဒုကံ ဘူတသမ္ဘဝေသိဒုကန္တိ စတ္တာရော ဒုကေ, ဒီဃာဒီဟိ စ ဆဟိ ပဒေဟိ မဇ္ဈိမပဒဿ တီသု အဏုကပဒဿ စ ဒွီသု တိကေသု အတ္ထသမ္ဘဝတော ဒီဃရဿမဇ္ဈိမတိကံ မဟန္တာဏုကမဇ္ဈိမတိကံ ထူလာဏုကမဇ္ဈိမတိကန္တိ တယော တိကေ စ ဒီပေတိ. တတ္ထ ယေ ကေစီတိ အနဝသေသဝစနံ. ပါဏာ ဧဝ ဘူတာ ပါဏဘူတာ. အထ ဝါ ပါဏန္တီတိ ပါဏာ, ဧတေန အဿာသပဿာသပ္ပဋိဗဒ္ဓေ ပဉ္စဝေါကာရသတ္တေ ဂဏှာတိ. ဘဝန္တီတိ ဘူတာ, ဧတေန ဧကဝေါကာရစတုဝေါကာရသတ္တေ ဂဏှာတိ. အတ္ထီတိ သန္တိ သံဝိဇ္ဇန္တိ. यहाँ 'तस-थावर' द्विक, 'दिट्ठ-अदिट्ठ' (दृष्ट-अदृष्ट) द्विक, 'दूर-सन्तिक' (दूर-समीप) द्विक, 'भूत-सम्भावेसी' (भूत-संभवैषी) द्विक - ये चार द्विक प्रकाशित किए गए हैं। और 'दीघ' (दीर्घ) आदि छह पदों के द्वारा, मध्यम पद के तीनों त्रिकों में और 'अणुक' पद के दो त्रिकों में अर्थ की संभावना होने से - 'दीघ-रस्स-मज्झिम' (दीर्घ-ह्रस्व-मध्यम) त्रिक, 'महन्त-अणुक-मज्झिम' (महान-अणु-मध्यम) त्रिक, 'थूल-अणुक-मज्झिम' (स्थूल-अणु-मध्यम) त्रिक - इन तीन त्रिकों को भी प्रकाशित करते हैं। वहाँ 'ये केचि' शब्द नि:शेष (बिना किसी अपवाद के) वाचक है। प्राणी ही 'भूत' हैं, इसलिए 'पाणभूता'। अथवा, जो श्वास लेते हैं वे 'पाणा' हैं, इससे श्वास-प्रश्वास से सम्बद्ध पञ्चवोकार (पाँच स्कन्ध वाले) सत्त्वों को ग्रहण किया गया है। जो उत्पन्न होते हैं वे 'भूता' हैं, इससे एकवोकार और चतुवोकार सत्त्वों को ग्रहण किया गया है। 'अत्थि' का अर्थ है - हैं, विद्यमान हैं। ဧဝံ ‘‘ယေ ကေစိ ပါဏဘူတတ္ထီ’’တိ ဣမိနာ ဝစနေန ဒုကတိကေဟိ သင်္ဂဟေတဗ္ဗေ သဗ္ဗသတ္တေ ဧကတော ဒဿေတွာ ဣဒါနိ သဗ္ဗေပိ တေ တသာ ဝါ ထာဝရာ ဝ နဝသေသာတိ ဣမိနာ ဒုကေန သင်္ဂဟေတွာ ဒဿေတိ. इस प्रकार, "ये केचि पाणभूतत्थि" (जो कोई भी प्राणी हैं) इस वचन के द्वारा द्विकों और त्रिकों में समाहित होने वाले सभी प्राणियों को एक साथ प्रदर्शित कर, अब उन सभी को "तसा वा थावरा व नवसेसा" (त्रस हों या स्थावर, बिना किसी शेष के) इस द्विक के माध्यम से संग्रहित कर दिखाते हैं। တတ္ထ တသန္တီတိ တသာ, သတဏှာနံ သဘယာနဉ္စေတံ အဓိဝစနံ. တိဋ္ဌန္တီတိ ထာဝရာ, ပဟီနတဏှာဘယာနံ အရဟတံ ဧတံ အဓိဝစနံ. နတ္ထိ တေသံ အဝသေသန္တိ အနဝသေသာ, သဗ္ဗေပီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ယဉ္စ ဒုတိယဂါထာယ အန္တေ ဝုတ္တံ, တံ သဗ္ဗဒုကတိကေဟိ သမ္ဗန္ဓိတဗ္ဗံ ‘‘ယေ ကေစိ ပါဏဘူတတ္ထိ တသာ ဝါ ထာဝရာ ဝါ အနဝသေသာ, ဣမေပိ သဗ္ဗေ သတ္တာ ဘဝန္တု သုခိတတ္တာ. ဧဝံ ယာဝ ဘူတာ ဝါ သမ္ဘဝေသီ ဝါ, ဣမေပိ သဗ္ဗေ သတ္တာ ဘဝန္တု သုခိတတ္တာ’’တိ. वहाँ, 'तसन्ति' (जो कांपते/डरते हैं) वे 'तसा' (त्रस) हैं; यह तृष्णा और भय युक्त प्राणियों का नाम है। 'तिट्ठन्ति' (जो स्थिर रहते हैं) वे 'थावरा' (स्थावर) हैं; यह क्षीण तृष्णा और भय वाले अर्हतों का नाम है। उनका कोई शेष नहीं है, इसलिए 'अनवसेसा' (निःशेष) कहा गया है, जिसका अर्थ है 'सभी'। दूसरी गाथा के अंत में जो कहा गया है, उसे सभी द्विकों और त्रिकों के साथ जोड़ना चाहिए— "जो कोई भी प्राणी हैं, त्रस हों या स्थावर, बिना किसी शेष के, ये सभी प्राणी सुखी हों। इसी प्रकार 'भूता वा सम्भवेसी वा' तक, ये सभी प्राणी सुखी हों।" ဣဒါနိ ဒီဃရဿမဇ္ဈိမာဒိတိကတ္တယဒီပကေသု ဒီဃာ ဝါတိအာဒီသု ဆသု ပဒေသု ဒီဃာတိ ဒီဃတ္တဘာဝါ နာဂမစ္ဆဂေါဓာဒယော. အနေကဗျာမသတပ္ပမာဏာပိ ဟိ မဟာသမုဒ္ဒေ နာဂါနံ အတ္တဘာဝါ အနေကယောဇနပ္ပမာဏာ စ မစ္ဆဂေါဓာဒီနံ အတ္တဘာဝါ ဟောန္တိ. မဟန္တာတိ မဟန္တတ္တဘာဝါ ဇလေ မစ္ဆကစ္ဆပါဒယော, ထလေ ဟတ္ထိနာဂါဒယော, အမနုဿေသု ဒါနဝါဒယော[Pg.210]. အာဟ စ ‘‘ရာဟုဂ္ဂံ အတ္တဘာဝီန’’န္တိ (အ. နိ. ၄.၁၅). တဿ ဟိ အတ္တဘာဝေါ ဥဗ္ဗေဓေန စတ္တာရိ ယောဇနသဟဿာနိ အဋ္ဌ စ ယောဇနသတာနိ, ဗာဟူ ဒွါဒသယောဇနသတပရိမာဏာ, ပညာသယောဇနံ ဘမုကန္တရံ, တထာ အင်္ဂုလန္တရိကာ, ဟတ္ထတလာနိ ဒွေ ယောဇနသတာနီတိ. မဇ္ဈိမာတိ အဿဂေါဏမဟိံသသူကရာဒီနံ အတ္တဘာဝါ. ရဿကာတိ တာသု တာသု ဇာတီသု ဝါမနာဒယော ဒီဃမဇ္ဈိမေဟိ ဩမကပ္ပမာဏာ သတ္တာ. အဏုကာတိ မံသစက္ခုဿ အဂေါစရာ ဒိဗ္ဗစက္ခုဝိသယာ ဥဒကာဒီသု နိဗ္ဗတ္တာ သုခုမတ္တဘာဝါ သတ္တာ ဦကာဒယော ဝါ. အပိစ ယေ တာသု တာသု ဇာတီသု မဟန္တမဇ္ဈိမေဟိ ထူလမဇ္ဈိမေဟိ စ ဩမကပ္ပမာဏာ သတ္တာ, တေ အဏုကာတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ထူလာတိ ပရိမဏ္ဍလတ္တဘာဝါ သိပ္ပိကသမ္ဗုကာဒယော သတ္တာ. अब दीर्घ, ह्रस्व, मध्यम आदि तीन त्रिकों को बताने वाले 'दीघा वा' आदि छह पदों में: 'दीघा' (लंबे) वे हैं जिनका शरीर लंबा होता है, जैसे नाग, मछली, गोह आदि। महासमुद्र में नागों के शरीर अनेक सौ व्याम (हाथ) के परिमाण वाले होते हैं और मछलियों तथा गोहों के शरीर अनेक योजन के परिमाण वाले होते हैं। 'महन्ता' (बड़े) वे हैं जिनका शरीर विशाल होता है, जैसे जल में मछली, कछुआ आदि, थल में हाथी, नाग आदि, और अमनुष्यों में दानव आदि। भगवान ने कहा भी है— "राहु का शरीर विशाल होता है" (अं. नि. 4.15)। उसका शरीर ऊंचाई में चार हजार आठ सौ योजन है, भुजाएं बारह सौ योजन की हैं, भौंहों के बीच का अंतर पचास योजन है, वैसे ही अंगुलियों के बीच का अंतर और हथेलियां दो सौ योजन की हैं। 'मज्झिमा' (मध्यम) वे हैं जैसे घोड़ा, गाय, भैंस, सूअर आदि के शरीर। 'रस्सका' (छोटे) वे हैं जो अपनी-अपनी जातियों में बौने आदि होते हैं, जो लंबे और मध्यम वालों की तुलना में कम परिमाण वाले होते हैं। 'अणुका' (सूक्ष्म) वे प्राणी हैं जो मांस-चक्षु के अगोचर हैं और दिव्य-चक्षु के विषय हैं, या जो जल आदि में उत्पन्न सूक्ष्म शरीर वाले प्राणी हैं, अथवा जुएं आदि। इसके अतिरिक्त, जो अपनी-अपनी जातियों में बड़े और मध्यम तथा स्थूल और मध्यम की तुलना में कम परिमाण वाले हैं, उन्हें 'अणुक' समझना चाहिए। 'थूला' (स्थूल) वे प्राणी हैं जिनका शरीर गोल (परिमंडल) होता है, जैसे सीप, शंख आदि। ပဉ္စမဂါထာဝဏ္ဏနာ पांचवीं गाथा की व्याख्या। ၅. ဧဝံ တီဟိ တိကေဟိ အနဝသေသတော သတ္တေ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ ‘‘ဒိဋ္ဌာ ဝါ ယေ ဝ အဒိဋ္ဌာ’’တိအာဒီဟိ တီဟိ ဒုကေဟိပိ တေ သင်္ဂဟေတွာ ဒဿေတိ. ५. इस प्रकार तीन त्रिकों के द्वारा बिना किसी शेष के प्राणियों को दिखाकर, अब "दिट्ठा वा ये व अदिट्ठा" (देखे हुए या अनदेखे) आदि तीन द्विकों के द्वारा भी उन्हें संग्रहित कर दिखाते हैं। တတ္ထ ဒိဋ္ဌာတိ ယေ အတ္တနော စက္ခုဿ အာပါထမာဂတဝသေန ဒိဋ္ဌပုဗ္ဗာ. အဒိဋ္ဌာတိ ယေ ပရသမုဒ္ဒပရသေလပရစက္ကဝါဠာဒီသု ဌိတာ. ‘‘ယေ ဝါ ဒူရေ ဝသန္တိ အဝိဒူရေ’’တိ ဣမိနာ ပန ဒုကေန အတ္တနော အတ္တဘာဝဿ ဒူရေ စ အဝိဒူရေ စ ဝသန္တေ သတ္တေ ဒဿေတိ, တေ အပဒဒွိပဒဝသေန ဝေဒိတဗ္ဗာ. အတ္တနော ဟိ ကာယေ ဝသန္တာ သတ္တာ အဝိဒူရေ, ဗဟိကာယေ ဝသန္တာ သတ္တာ ဒူရေ. တထာ အန္တောဥပစာရေ ဝသန္တာ အဝိဒူရေ, ဗဟိဥပစာရေ ဝသန္တာ ဒူရေ. အတ္တနော ဝိဟာရေ ဂါမေ ဇနပဒေ ဒီပေ စက္ကဝါဠေ ဝသန္တာ အဝိဒူရေ, ပရစက္ကဝါဠေ ဝသန္တာ ဒူရေ ဝသန္တီတိ ဝုစ္စန္တိ. वहाँ, 'दिट्ठा' (दृष्ट) वे हैं जो अपनी आँखों के सामने आने के कारण पहले देखे जा चुके हैं। 'अदिट्ठा' (अदृष्ट) वे हैं जो दूसरे समुद्र, दूसरे पर्वत, दूसरे चक्रवाल आदि में स्थित हैं। "ये वा दूरे वसन्ति अविदूरे" (जो दूर रहते हैं या पास) इस द्विक के द्वारा अपने शरीर से दूर और पास रहने वाले प्राणियों को दिखाते हैं; उन्हें बिना पैर वाले और दो पैर वाले आदि के रूप में समझना चाहिए। अपने शरीर में रहने वाले प्राणी 'अविदूरे' (पास) हैं, शरीर के बाहर रहने वाले 'दूरे' (दूर) हैं। वैसे ही, अपनी सीमा (उपचार) के भीतर रहने वाले पास हैं, सीमा के बाहर रहने वाले दूर हैं। अपने विहार, गाँव, जनपद, द्वीप और चक्रवाल में रहने वाले पास हैं, और दूसरे चक्रवाल में रहने वालों को 'दूरे वसन्ति' (दूर रहने वाले) कहा जाता है। ဘူတာတိ ဇာတာ အဘိနိဗ္ဗတ္တာ. ယေ ဘူတာ ဧဝ, န ပုန ဘဝိဿန္တီတိ သင်္ချံ ဂစ္ဆန္တိ, တေသံ ခီဏာသဝါနံ ဧတံ အဓိဝစနံ. သမ္ဘဝမေသန္တီတိ သမ္ဘဝေသီ. အပ္ပဟီနဘဝသံယောဇနတ္တာ အာယတိမ္ပိ သမ္ဘဝံ ဧသန္တာနံ သေခပုထုဇ္ဇနာနမေတံ အဓိဝစနံ. အထ ဝါ စတူသု ယောနီသု အဏ္ဍဇဇလာဗုဇာ သတ္တာ ယာဝ အဏ္ဍကောသံ ဝတ္ထိကောသဉ္စ န ဘိန္ဒန္တိ, တာဝ သမ္ဘဝေသီ နာမ, အဏ္ဍကောသံ ဝတ္ထိကောသဉ္စ ဘိန္ဒိတွာ ဗဟိ နိက္ခန္တာ ဘူတာ နာမ[Pg.211]. သံသေဒဇာ ဩပပါတိကာ စ ပဌမစိတ္တက္ခဏေ သမ္ဘဝေသီ နာမ, ဒုတိယစိတ္တက္ခဏတော ပဘုတိ ဘူတာ နာမ. ယေန ဝါ ဣရိယာပထေန ဇာယန္တိ, ယာဝ တတော အညံ န ပါပုဏန္တိ, တာဝ သမ္ဘဝေသီ နာမ, တတော ပရံ ဘူတာတိ. 'भूता' (भूत) का अर्थ है जो उत्पन्न हो चुके हैं, प्रकट हो चुके हैं। जो केवल उत्पन्न हो चुके हैं और पुनः उत्पन्न नहीं होंगे (अर्थात् जिनका पुनर्जन्म नहीं होगा), यह उन क्षीणास्त्रवों (अर्हतों) का नाम है। 'सम्भवं एसन्ति' (जो जन्म की खोज में हैं) वे 'सम्भवेसी' (संभवैषी) हैं। भव-संयोजनों के क्षीण न होने के कारण भविष्य में भी जन्म की खोज करने वाले शैक्ष और पृथग्जनों का यह नाम है। अथवा, चार योनियों में अंडज और जरायुज प्राणी जब तक अंडे के खोल या गर्भाशय के आवरण को नहीं तोड़ते, तब तक वे 'सम्भवेसी' कहलाते हैं; अंडे के खोल या गर्भाशय को तोड़कर बाहर निकलने पर वे 'भूत' कहलाते हैं। संस्वेदज और ओपपातिक प्राणी प्रथम चित्त-क्षण (प्रतिसंधि) में 'सम्भवेसी' कहलाते हैं, और द्वितीय चित्त-क्षण से लेकर 'भूत' कहलाते हैं। अथवा, जिस ईर्यापथ (अवस्था) में वे उत्पन्न होते हैं, जब तक वे उससे दूसरे ईर्यापथ को प्राप्त नहीं होते, तब तक 'सम्भवेसी' कहलाते हैं, उसके बाद 'भूत' कहलाते हैं। ဆဋ္ဌဂါထာဝဏ္ဏနာ छठी गाथा की व्याख्या। ၆. ဧဝံ ဘဂဝါ ‘‘သုခိနော ဝါ’’တိအာဒီဟိ အဍ္ဎတေယျာဟိ ဂါထာဟိ နာနပ္ပကာရတော တေသံ ဘိက္ခူနံ ဟိတသုခါဂမပတ္ထနာဝသေန သတ္တေသု မေတ္တာဘာဝနံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ အဟိတဒုက္ခာနာဂမပတ္ထနာဝသေနာပိ တံ ဒဿေန္တော အာဟ ‘‘န ပရော ပရံ နိကုဗ္ဗေထာ’’တိ. ဧသ ပေါရာဏော ပါဌော, ဣဒါနိ ပန ‘‘ပရံ ဟီ’’တိပိ ပဌန္တိ, အယံ န သောဘနော. ६. इस प्रकार भगवान ने "सुखिनो वा" आदि ढाई गाथाओं के द्वारा विभिन्न प्रकार से उन भिक्षुओं को हित और सुख की प्राप्ति की प्रार्थना के माध्यम से प्राणियों में मैत्री-भावना को दिखाकर, अब अहित और दुःख के न आने की प्रार्थना के माध्यम से भी उसे दिखाते हुए "न परो परं निकुब्बेथ" (कोई दूसरे को न ठगे) आदि कहा। यह प्राचीन पाठ है, किंतु अब "परं हि" ऐसा भी पढ़ते हैं, जो शोभनीय नहीं है। တတ္ထ ပရောတိ ပရဇနော. ပရန္တိ ပရဇနံ. န နိကုဗ္ဗေထာတိ န ဝဉ္စေယျ. နာတိမညေထာတိ န အတိက္ကမိတွာ မညေယျ. ကတ္ထစီတိ ကတ္ထစိ ဩကာသေ, ဂါမေ ဝါ ဂါမခေတ္တေ ဝါ ဉာတိမဇ္ဈေ ဝါ ပူဂမဇ္ဈေ ဝါတိအာဒိ. နန္တိ ဧတံ. ကဉ္စီတိ ယံ ကဉ္စိ ခတ္တိယံ ဝါ ဗြာဟ္မဏံ ဝါ ဂဟဋ္ဌံ ဝါ ပဗ္ဗဇိတံ ဝါ သုခိတံ ဝါ ဒုက္ခိတံ ဝါတိအာဒိ. ဗျာရောသနာ ပဋိဃသညာတိ ကာယဝစီဝိကာရေဟိ ဗျာရောသနာယ စ မနောဝိကာရေန ပဋိဃသညာယ စ. ‘‘ဗျာရောသနာယ ပဋိဃသညာယာ’’တိ ဟိ ဝတ္တဗ္ဗေ ‘‘ဗျာရောသနာ ပဋိဃသညာ’’တိ ဝုစ္စတိ, ယထာ ‘‘သမ္မဒညာယ ဝိမုတ္တာ’’တိ ဝတ္တဗ္ဗေ ‘‘သမ္မဒညာ ဝိမုတ္တာ’’တိ, ယထာ စ ‘‘အနုပုဗ္ဗသိက္ခာယ အနုပုဗ္ဗကိရိယာယ အနုပုဗ္ဗပဋိပဒါယာ’’တိ ဝတ္တဗ္ဗေ ‘‘အနုပုဗ္ဗသိက္ခာ အနုပုဗ္ဗကိရိယာ အနုပုဗ္ဗပဋိပဒါ’’တိ. နာညမညဿ ဒုက္ခမိစ္ဆေယျာတိ အညမညဿ ဒုက္ခံ န ဣစ္ဆေယျ. ကိံ ဝုတ္တံ ဟောတိ? န ကေဝလံ ‘‘သုခိနော ဝါ ခေမိနော ဝါ ဟောန္တူ’’တိအာဒိမနသိကာရဝသေနေဝ မေတ္တံ ဘာဝေယျ, ကိန္တု ‘‘အဟောဝတ ယော ကောစိ ပရပုဂ္ဂလော ယံ ကဉ္စိ ပရပုဂ္ဂလံ ဝဉ္စနာဒီဟိ နိကတီဟိ န နိကုဗ္ဗေထ, ဇာတိအာဒီဟိ စ နဝဟိ မာနဝတ္ထူဟိ ကတ္ထစိ ပဒေသေ ကဉ္စိ ပရပုဂ္ဂလံ နာတိမညေယျ, အညမညဿ စ ဗျာရောသနာယ ဝါ ပဋိဃသညာယ ဝါ ဒုက္ခံ န ဣစ္ဆေယျာ’’တိ ဧဝမ္ပိ မနသိကရောန္တော ဘာဝေယျာတိ. वहाँ 'परो' का अर्थ है दूसरा व्यक्ति। 'परं' का अर्थ है दूसरे व्यक्ति को। 'न निकुब्बेथ' का अर्थ है धोखा न दे। 'नातिमञ्ञेथ' का अर्थ है तिरस्कार न करे। 'कत्थचि' का अर्थ है किसी भी स्थान पर, जैसे गाँव में, खेत में, सम्बन्धियों के बीच या समूह के बीच आदि। 'नं' का अर्थ है उसे। 'कञ्चि' का अर्थ है किसी को भी, चाहे वह क्षत्रिय हो, ब्राह्मण हो, गृहस्थ हो, भिक्षु हो, सुखी हो या दुखी हो आदि। 'ब्यारोसना पटिघसञ्ञा' का अर्थ है शरीर और वाणी के विकारों द्वारा क्रोध (ब्यारोसना) और मन के विकार द्वारा प्रतिघ-संज्ञा (द्वेष की भावना)। यहाँ 'ब्यारोसनाय पटिघसञ्ञाय' कहना चाहिए था, किन्तु 'ब्यारोसना पटिघसञ्ञा' कहा गया है, जैसे 'सम्म दञ्ञाय विमुत्ता' के स्थान पर 'सम्म दञ्ञा विमुत्ता' और 'अनुपुब्बसिक्खाय अनुपुब्बकिरियाय अनुपुब्बपटिपदाय' के स्थान पर 'अनुपुब्बसिक्खा अनुपुब्बकिरिया अनुपुब्बपटिपदा' कहा जाता है। 'नाञ्ञमञ्ञस्स दुक्खमिच्छेय्य' का अर्थ है एक-दूसरे के लिए दुःख की इच्छा न करे। इसका क्या अर्थ है? केवल 'वे सुखी हों या सुरक्षित हों' आदि मनसिकार के वश में ही मैत्री की भावना न करे, बल्कि 'अहो! कोई भी व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को छल आदि कपटों से धोखा न दे, और जाति आदि नौ प्रकार के मान-वस्तुओं के कारण किसी भी स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति का तिरस्कार न करे, तथा एक-दूसरे के प्रति क्रोध या द्वेष की भावना से दुःख की इच्छा न करे'—इस प्रकार मनसिकार करते हुए भी भावना करनी चाहिए। သတ္တမဂါထာဝဏ္ဏနာ सातवीं गाथा की व्याख्या। ၇. ဧဝံ [Pg.212] အဟိတဒုက္ခာနာဂမပတ္ထနာဝသေန အတ္ထတော မေတ္တာဘာဝနံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ တမေဝ ဥပမာယ ဒဿေန္တော အာဟ ‘‘မာတာ ယထာ နိယံပုတ္တ’’န္တိ. ७. इस प्रकार अहित और दुःख के न आने की प्रार्थना के माध्यम से अर्थतः मैत्री-भावना को दिखाकर, अब उसी को उपमा के माध्यम से दिखाते हुए 'माता यथा नियं पुत्तं' आदि कहा। တဿတ္ထော – ယထာ မာတာ နိယံ ပုတ္တံ အတ္တနိ ဇာတံ ဩရသံ ပုတ္တံ, တဉ္စ ဧကပုတ္တမေဝ အာယုသာ အနုရက္ခေ, တဿ ဒုက္ခာဂမပ္ပဋိဗာဟနတ္ထံ အတ္တနော အာယုမ္ပိ စဇိတွာ တံ အနုရက္ခေ, ဧဝမ္ပိ သဗ္ဗဘူတေသု ဣဒံ မေတ္တာချံ မာနသံ ဘာဝယေ, ပုနပ္ပုနံ ဇနယေ ဝဍ္ဎယေ, တဉ္စ အပရိမာဏသတ္တာရမ္မဏဝသေန ဧကသ္မိံ ဝါ သတ္တေ အနဝသေသဖရဏဝသေန အပရိမာဏံ ဘာဝယေတိ. उसका अर्थ है—जैसे माता अपने निज के पुत्र, अपने से उत्पन्न औरस पुत्र, और वह भी इकलौते पुत्र की अपने प्राणों से रक्षा करती है, उसके दुःख के आगमन को रोकने के लिए अपने प्राणों का त्याग करके भी उसकी रक्षा करती है, वैसे ही सभी प्राणियों के प्रति इस मैत्री नामक मानस की भावना करनी चाहिए, उसे बार-बार उत्पन्न करना और बढ़ाना चाहिए। और उस मैत्री को अपरिमित प्राणियों के आलम्बन के वश से, या एक प्राणी में भी पूर्ण रूप से व्याप्त होने के वश से, अपरिमित रूप में भावित करना चाहिए। အဋ္ဌမဂါထာဝဏ္ဏနာ आठवीं गाथा की व्याख्या। ၈. ဧဝံ သဗ္ဗာကာရေန မေတ္တာဘာဝနံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ တဿေဝ ဝဍ္ဎနံ ဒဿေန္တော အာဟ ‘‘မေတ္တဉ္စ သဗ္ဗလောကသ္မီ’’တိ. ८. इस प्रकार सभी प्रकार से मैत्री-भावना को दिखाकर, अब उसी की वृद्धि को दिखाते हुए 'मेत्तञ्च सब्बलोकस्मिं' आदि कहा। တတ္ထ မိဇ္ဇတိ တာယတိ စာတိ မိတ္တော, ဟိတဇ္ဈာသယတာယ သိနိယှတိ, အဟိတာဂမတော ရက္ခတိ စာတိ အတ္ထော. မိတ္တဿ ဘာဝေါ မေတ္တံ. သဗ္ဗလောကသ္မီတိ အနဝသေသေ သတ္တလောကေ. မနသိ ဘဝန္တိ မာနသံ. တဉှိ စိတ္တသမ္ပယုတ္တတ္တာ ဧဝံ ဝုတ္တံ. ဘာဝယေတိ ဝဍ္ဎယေ. န အဿ ပရိမာဏန္တိ အပရိမာဏံ, အပ္ပမာဏသတ္တာရမ္မဏတာယ ဧဝံ ဝုတ္တံ. ဥဒ္ဓန္တိ ဥပရိ, တေန အရူပဘဝံ ဂဏှာတိ. အဓောတိ ဟေဋ္ဌာ, တေန ကာမဘဝံ ဂဏှာတိ. တိရိယန္တိ ဝေမဇ္ဈံ, တေန ရူပဘဝံ ဂဏှာတိ. အသမ္ဗာဓန္တိ သမ္ဗာဓဝိရဟိတံ, ဘိန္နသီမန္တိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. သီမာ နာမ ပစ္စတ္ထိကော ဝုစ္စတိ, တသ္မိမ္ပိ ပဝတ္တန္တိ အတ္ထော. အဝေရန္တိ ဝေရဝိရဟိတံ, အန္တရန္တရာပိ ဝေရစေတနာပါတုဘာဝဝိရဟိတန္တိ အတ္ထော. အသပတ္တန္တိ ဝိဂတပစ္စတ္ထိကံ. မေတ္တာဝိဟာရီ ဟိ ပုဂ္ဂလော မနုဿာနံ ပိယော ဟောတိ, အမနုဿာနံ ပိယော ဟောတိ, နာဿ ကောစိ ပစ္စတ္ထိကော ဟောတိ, တေနဿ တံ မာနသံ ဝိဂတပစ္စတ္ထိကတ္တာ အသပတ္တန္တိ ဝုစ္စတိ. ပရိယာယဝစနဉှိ ဧတံ, ယဒိဒံ ပစ္စတ္ထိကော သပတ္တောတိ. အယံ အနုပဒတော အတ္ထဝဏ္ဏနာ. वहाँ जो स्नेह करता है और रक्षा करता है, वह 'मित्त' (मित्र) है; हित की इच्छा के कारण स्नेह करता है और अहित के आगमन से रक्षा करता है, यह इसका अर्थ है। मित्र का भाव 'मेत्तं' (मैत्री) है। 'सब्बलोकस्मिं' का अर्थ है समस्त सत्त्व-लोक में। मन में होने वाला 'मानसं' (मानस) है। चित्त के साथ सम्प्रयुक्त होने के कारण ऐसा कहा गया है। 'भावये' का अर्थ है बढ़ाए। जिसका कोई परिमाण (सीमा) न हो, वह 'अपरिमाणं' है; अपरिमित प्राणियों के आलम्बन होने के कारण ऐसा कहा गया है। 'उद्धं' का अर्थ है ऊपर, इससे अरूप-भव को ग्रहण किया जाता है। 'अधो' का अर्थ है नीचे, इससे काम-भव को ग्रहण किया जाता है। 'तिरियं' का अर्थ है मध्य में, इससे रूप-भव को ग्रहण किया जाता है। 'असम्बाधं' का अर्थ है बाधा (संकीर्णता) से रहित; इसका अर्थ है सीमाओं को तोड़ने वाला। 'सीमा' शत्रु को कहा जाता है, उसमें भी (मैत्री) प्रवृत्त होती है, यह अर्थ है। 'अवेरं' का अर्थ है वैर से रहित, अर्थात् बीच-बीच में भी वैर-चेतना के प्रादुर्भाव से रहित। 'असपत्तं' का अर्थ है शत्रुओं से रहित। मैत्री में विहार करने वाला व्यक्ति मनुष्यों का प्रिय होता है, अमनुष्यों का प्रिय होता है, उसका कोई शत्रु नहीं होता, इसलिए उसके उस मानस को शत्रु-रहित होने के कारण 'असपत्तं' कहा जाता है। 'पच्चत्थिक' और 'सपत्त' ये पर्यायवाची शब्द हैं। यह पदों के अनुसार अर्थ-व्याख्या है। အယံ [Pg.213] ပနေတ္ထ အဓိပ္ပေတတ္ထဒီပနာ – ယဒိဒံ ‘‘ဧဝမ္ပိ သဗ္ဗဘူတေသု မာနသံ ဘာဝယေ အပရိမာဏ’’န္တိ ဝုတ္တံ, တဉ္စေတံ အပရိမာဏံ မေတ္တံ မာနသံ သဗ္ဗလောကသ္မိံ ဘာဝယေ ဝဍ္ဎယေ, ဝုဍ္ဎိံ ဝိရူဠှိံ ဝေပုလ္လံ ဂမယေ ပါပယေ. ကထံ? ဥဒ္ဓံ အဓော စ တိရိယဉ္စ, ဥဒ္ဓံ ယာဝ ဘဝဂ္ဂါ, အဓော ယာဝ အဝီစိတော, တိရိယံ ယာဝ အဝသေသဒိသာ. ဥဒ္ဓံ ဝါ အာရုပ္ပံ, အဓော ကာမဓာတုံ, တိရိယံ ရူပဓာတုံ အနဝသေသံ ဖရန္တော. ဧဝံ ဘာဝေန္တောပိ စ တံ ယထာ အသမ္ဗာဓံ အဝေရံ အသပတ္တဉ္စ ဟောတိ, တထာ သမ္ဗာဓဝေရသပတ္တာနံ အဘာဝံ ကရောန္တော ဘာဝယေ. ယံ ဝါ တံ ဘာဝနာသမ္ပဒံ ပတ္တံ သဗ္ဗတ္ထ ဩကာသလောကဝသေန အသမ္ဗာဓံ, အတ္တနော ပရေသု အာဃာတပ္ပဋိဝိနယနေန အဝေရံ, အတ္တနိ စ ပရေသံ အာဃာတဝိနယနေန အသပတ္တံ ဟောတိ. တံ အသမ္ဗာဓမဝေရမသပတ္တံ အပရိမာဏံ မေတ္တံ မာနသံ ဥဒ္ဓံ အဓော တိရိယဉ္စာတိ တိဝိဓပရိစ္ဆေဒေ သဗ္ဗလောကသ္မိံ ဘာဝယေ ဝဍ္ဎယေတိ. यहाँ अभिप्रेत अर्थ का स्पष्टीकरण यह है—जो यह कहा गया है कि 'इस प्रकार सभी प्राणियों के प्रति अपरिमित मानस की भावना करे', उस अपरिमित मैत्रीपूर्ण मानस को समस्त लोक में भावित करे, बढ़ाए, उसे वृद्धि, विरूढ़ि और विपुलता तक पहुँचाए। कैसे? ऊपर, नीचे और तिरछा (मध्य में); ऊपर भवाग्र तक, नीचे अवीचि नरक तक, और तिरछा शेष दिशाओं तक। अथवा ऊपर अरूप धातु तक, नीचे काम धातु तक और तिरछा रूप धातु तक बिना किसी शेष के व्याप्त करते हुए। इस प्रकार भावना करते हुए भी, वह जैसे बाधा-रहित, वैर-रहित और शत्रु-रहित हो, वैसे ही बाधा, वैर और शत्रुता के अभाव को करते हुए भावना करे। अथवा जो वह भावना की पूर्णता प्राप्त है, वह सर्वत्र ओकास-लोक (अवकाश लोक) के वश से बाधा-रहित है, दूसरों के प्रति अपने आघात (क्रोध) को दूर करने से वैर-रहित है, और अपने प्रति दूसरों के आघात को दूर करने से शत्रु-रहित है। उस बाधा-रहित, वैर-रहित, शत्रु-रहित और अपरिमित मैत्रीपूर्ण मानस को ऊपर, नीचे और तिरछा—इन तीन प्रकार के परिच्छेदों (विभाजनों) में समस्त लोक में भावित करे और बढ़ाए। နဝမဂါထာဝဏ္ဏနာ नौवीं गाथा की व्याख्या। ၉. ဧဝံ မေတ္တာဘာဝနာယ ဝဍ္ဎနံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ တံ ဘာဝနမနုယုတ္တဿ ဝိဟရတော ဣရိယာပထနိယမာဘာဝံ ဒဿေန္တော အာဟ ‘‘တိဋ္ဌံ စရံ…ပေ… အဓိဋ္ဌေယျာ’’တိ. ९. इस प्रकार मैत्री-भावना की वृद्धि को दिखाकर, अब उस भावना में लगे हुए विहार करने वाले व्यक्ति के लिए ईर्यापथ (अवस्था) के नियम के अभाव को दिखाते हुए 'तिट्ठं चरं... पे... अधिट्ठेय्य' आदि कहा। တဿတ္ထော – ဧဝမေတံ မေတ္တံ မာနသံ ဘာဝေန္တော သော ‘‘နိသီဒတိ ပလ္လင်္ကံ အာဘုဇိတွာ ဥဇုံ ကာယံ ပဏိဓာယာ’’တိအာဒီသု ဝိယ ဣရိယာပထနိယမံ အကတွာ ယထာသုခံ အညတရညတရဣရိယာပထဗာဓနဝိနောဒနံ ကရောန္တော တိဋ္ဌံ ဝါ စရံ ဝါ နိသိန္နော ဝါ သယာနော ဝါ ယာဝတာ ဝိဂတမိဒ္ဓေါ အဿ, အထ ဧတံ မေတ္တာဈာနသတိံ အဓိဋ္ဌေယျ. उसका अर्थ है—इस प्रकार इस मैत्रीपूर्ण मानस की भावना करते हुए वह 'पालथी मारकर, शरीर को सीधा रखकर बैठता है' आदि (वचनों) की तरह ईर्यापथ का नियम न करके, अपनी सुख-सुविधा के अनुसार किसी न किसी ईर्यापथ की पीड़ा को दूर करते हुए, खड़े होकर, चलते हुए, बैठे हुए या लेटे हुए, जब तक वह तन्द्रा (नींद) से रहित हो, तब तक इस मैत्री-ध्यान की स्मृति को अधिष्ठित (दृढ़) करे। အထ ဝါ ဧဝံ မေတ္တာဘာဝနာယ ဝဍ္ဎနံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ ဝသီဘာဝံ ဒဿေန္တော အာဟ ‘‘တိဋ္ဌံ စရ’’န္တိ. ဝသိပ္ပတ္တော ဟိ တိဋ္ဌံ ဝါ စရံ ဝါ နိသိန္နော ဝါ သယာနော ဝါ ယာဝတာ ဣရိယာပထေန ဧတံ မေတ္တာဈာနသတိံ အဓိဋ္ဌာတုကာမော ဟောတိ, အထ ဝါ တိဋ္ဌံ ဝါ စရံ ဝါ…ပေ… သယာနော ဝါတိ န တဿ ဌာနာဒီနိ အန္တရာယကရာနိ ဟောန္တိ, အပိစ ခေါ ယာဝတာ ဧတံ မေတ္တာဈာနသတိံ အဓိဋ္ဌာတုကာမော ဟောတိ, တာဝတာ ဝိဂတမိဒ္ဓေါ ဟုတွာ အဓိဋ္ဌာတိ, နတ္ထိ တဿ တတ္ထ ဒန္ဓာယိတတ္တံ. တေနာဟ ‘‘တိဋ္ဌံ စရံ နိသိန္နော ဝ, သယာနော ယာဝတာဿ ဝိတမိဒ္ဓေါ. ဧတံ သတိံ အဓိဋ္ဌေယျာ’’တိ. अथवा, इस प्रकार मैत्री-भावना की वृद्धि को दिखाकर, अब वशीभाव (कौशल) को दिखाने के लिए 'तिष्ठन् चरन्' (खड़े होते हुए, चलते हुए) आदि कहा। वास्तव में, वशीभाव प्राप्त व्यक्ति चाहे खड़ा हो, चल रहा हो, बैठा हो या लेटा हो, जिस भी ईर्यापथ (अवस्था) में वह इस मैत्री-ध्यान की स्मृति को अधिष्ठित करना चाहता है, तब खड़े होने या चलने आदि की अवस्थाएँ उसके लिए बाधक नहीं होतीं। बल्कि, जब तक वह इस मैत्री-ध्यान की स्मृति को अधिष्ठित करना चाहता है, तब तक वह आलस्य-रहित होकर अधिष्ठान करता है; वहाँ उसे कोई सुस्ती नहीं होती। इसीलिए कहा— 'खड़े होते, चलते, बैठे या लेटे हुए, जब तक वह तन्द्रा-रहित (जागृत) रहे, इस स्मृति को अधिष्ठित करे'। တဿာယမဓိပ္ပာယော [Pg.214] – ယံ တံ ‘‘မေတ္တဉ္စ သဗ္ဗလောကသ္မိ, မာနသံ ဘာဝယေ’’တိ ဝုတ္တံ, တံ ယထာ ဘာဝေယျ, ယထာ ဌာနာဒီသု ယာဝတာ ဣရိယာပထေန ဌာနာဒီနိ ဝါ အနာဒိယိတွာ ယာဝတာ ဧတံ မေတ္တာဈာနသတိံ အဓိဋ္ဌာတုကာမော အဿ, တာဝတာ ဝိဂတမိဒ္ဓေါဝ ဟုတွာ ဧတံ သတိံ အဓိဋ္ဌေယျာတိ. इसका यह अभिप्राय है— जो यह कहा गया है कि 'सम्पूर्ण लोक के प्रति मैत्री-भाव विकसित करे', उसे उसी प्रकार विकसित करना चाहिए। जैसे खड़े होने आदि ईर्यापथों में, बिना किसी विशेष अवस्था का आग्रह किए, जब तक वह इस मैत्री-ध्यान की स्मृति को अधिष्ठित करना चाहे, तब तक आलस्य-रहित होकर इस स्मृति को अधिष्ठित करे। ဧဝံ မေတ္တာဘာဝနာယ ဝသီဘာဝံ ဒဿေန္တော ‘‘ဧတံ သတိံ အဓိဋ္ဌေယျာ’’တိ တသ္မိံ မေတ္တာဝိဟာရေ နိယောဇေတွာ ဣဒါနိ တံ ဝိဟာရံ ထုနန္တော အာဟ ‘‘ဗြဟ္မမေတံ ဝိဟာရမိဓမာဟူ’’တိ. इस प्रकार मैत्री-भावना के वशीभाव को दिखाते हुए 'इस स्मृति को अधिष्ठित करे'—ऐसा कहकर उस मैत्री-विहार में नियोजित कर, अब उस विहार की प्रशंसा करते हुए कहा— 'इसे यहाँ ब्रह्म-विहार कहते हैं'। တဿတ္ထော – ယွာယံ ‘‘သုခိနော ဝါ ခေမိနော ဝါ ဟောန္တူ’’တိအာဒိ ကတွာ ယာဝ ‘‘ဧတံ သတိံ အဓိဋ္ဌေယျာ’’တိ ဝဏ္ဏိတော မေတ္တာဝိဟာရော. ဧတံ စတူသု ဒိဗ္ဗဗြဟ္မအရိယဣရိယာပထဝိဟာရေသု နိဒ္ဒေါသတ္တာ အတ္တနောပိ ပရေသမ္ပိ အတ္ထကရတ္တာ စ ဣဓ အရိယဿ ဓမ္မဝိနယေ ဗြဟ္မဝိဟာရမာဟု သေဋ္ဌဝိဟာရမာဟူတိ, ယတော သတတံ သမိတံ အဗ္ဗောကိဏ္ဏံ တိဋ္ဌံ စရံ နိသိန္နော ဝါ သယာနော ဝါ ယာဝတာဿ ဝိဂတမိဒ္ဓေါ, ဧတံ သတိံ အဓိဋ္ဌေယျာတိ. इसका अर्थ यह है— 'सुखी या क्षेमयुक्त हों' आदि से लेकर 'इस स्मृति को अधिष्ठित करे' तक जिस मैत्री-विहार का वर्णन किया गया है, उसे चार विहारों (दिव्य, ब्रह्म, आर्य, ईर्यापथ) में से निर्दोष होने के कारण और स्वयं तथा दूसरों के लिए हितकारी होने के कारण, इस आर्य धर्म-विनय में 'ब्रह्म-विहार' या 'श्रेष्ठ विहार' कहा गया है। क्योंकि जब भी निरंतर, बिना रुके, खड़े, चलते, बैठे या लेटे हुए, जब तक वह आलस्य-रहित हो, इस स्मृति को अधिष्ठित करे। ဒသမဂါထာဝဏ္ဏနာ दसवीं गाथा की व्याख्या। ၁၀. ဧဝံ ဘဂဝါ တေသံ ဘိက္ခူနံ နာနပ္ပကာရတော မေတ္တာဘာဝနံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ ယသ္မာ မေတ္တာ သတ္တာရမ္မဏတ္တာ အတ္တဒိဋ္ဌိယာ အာသန္နာ ဟောတိ, တသ္မာ ဒိဋ္ဌိဂဟနနိသေဓနမုခေန တေသံ ဘိက္ခူနံ တဒေဝ မေတ္တာဈာနံ ပါဒကံ ကတွာ အရိယဘူမိပ္ပတ္တိံ ဒဿေန္တော ‘‘ဒိဋ္ဌိဉ္စ အနုပဂ္ဂမ္မာ’’တိ ဣမာယ ဂါထာယ ဒေသနံ သမာပေသိ. १०. इस प्रकार भगवान ने उन भिक्षुओं को अनेक प्रकार से मैत्री-भावना दिखाकर, अब चूँकि मैत्री 'सत्त्व' (प्राणी) को आलम्बन बनाने के कारण 'आत्म-दृष्टि' (अहंकार) के निकट होती है, इसलिए दृष्टि-ग्रहण के निषेध के माध्यम से उन भिक्षुओं को उसी मैत्री-ध्यान को आधार बनाकर आर्य-भूमि (सोतापन्न आदि) की प्राप्ति दिखाने के लिए 'दृष्टिं च अनुपगम्य' (मिथ्या दृष्टि में न पड़कर) इस गाथा से देशना का समापन किया। တဿတ္ထော – ယွာယံ ‘‘ဗြဟ္မမေတံ ဝိဟာရမိဓမာဟူ’’တိ သံဝဏ္ဏိတော မေတ္တာဈာနဝိဟာရော, တတော ဝုဋ္ဌာယ ယေ တတ္ထ ဝိတက္ကဝိစာရာဒယော ဓမ္မာ, တေ တေသဉ္စ ဝတ္ထာဒိအနုသာရေန ရူပဓမ္မေ ပရိဂ္ဂဟေတွာ ဣမိနာ နာမရူပပရိစ္ဆေဒေန ‘‘သုဒ္ဓသင်္ခါရပုဉ္ဇောယံ, နယိဓ သတ္တူပလဗ္ဘတီ’’တိ (သံ. နိ. ၁.၁၇၁; မဟာနိ. ၁၈၆) ဧဝံ ဒိဋ္ဌိဉ္စ အနုပဂ္ဂမ္မ အနုပုဗ္ဗေန လောကုတ္တရသီလေန သီလဝါ ဟုတွာ လောကုတ္တရသီလသမ္ပယုတ္တေနေဝ သောတာပတ္တိမဂ္ဂသမ္မာဒိဋ္ဌိသညိတေန ဒဿနေန သမ္ပန္နော, တတော ပရံ ယောပါယံ ဝတ္ထုကာမေသု ဂေဓော ကိလေသကာမော အပ္ပဟီနော ဟောတိ, တမ္ပိ သကဒါဂါမိအနာဂါမိမဂ္ဂေဟိ တနုဘာဝေန အနဝသေသပ္ပဟာနေန [Pg.215] စ ကာမေသု ဂေဓံ ဝိနေယျ ဝိနယိတွာ ဝူပသမေတွာ န ဟိ ဇာတု ဂဗ္ဘသေယျံ ပုန ရေတိ ဧကံသေနေဝ ပုန ဂဗ္ဘသေယျံ န ဧတိ. သုဒ္ဓါဝါသေသု နိဗ္ဗတ္တိတွာ တတ္ထေဝ အရဟတ္တံ ပါပုဏိတွာ ပရိနိဗ္ဗာတီတိ. इसका अर्थ यह है— जिस मैत्री-ध्यान रूपी विहार की 'इसे यहाँ ब्रह्म-विहार कहते हैं' कहकर प्रशंसा की गई है, उससे व्युत्थान कर (उठकर), वहाँ जो वितर्क-विचार आदि धर्म हैं, उन्हें और उनके आधारभूत हृदय-वस्तु आदि रूप-धर्मों को ग्रहण कर, इस नाम-रूप परिच्छेद के द्वारा— 'यह केवल संस्कारों का समूह है, यहाँ कोई सत्त्व (प्राणी) उपलब्ध नहीं होता'—इस प्रकार मिथ्या दृष्टि में न पड़कर, क्रमशः लोकोत्तर शील से शीलवान होकर, लोकोत्तर शील से युक्त सोतापत्ति-मार्ग की सम्यक्-दृष्टि रूपी दर्शन से संपन्न होकर, उसके बाद जो वस्तु-कामों में आसक्ति रूपी क्लेश-काम शेष है, उसे भी सकदागामी और अनागामी मार्गों द्वारा क्षीण और पूर्णतः प्रहाण कर, काम-वासनाओं में आसक्ति को दूर कर और शांत कर, वह निश्चित रूप से फिर कभी गर्भ-शय्या में नहीं आता (पुनर्जन्म नहीं लेता)। वह शुद्धावास लोकों में उत्पन्न होकर वहीं अर्हत्व प्राप्त कर परिनिर्वाण प्राप्त करता है। ဧဝံ ဘဂဝါ ဒေသနံ သမာပေတွာ တေ ဘိက္ခူ အာဟ – ‘‘ဂစ္ဆထ, ဘိက္ခဝေ, တသ္မိံယေဝ ဝနသဏ္ဍေ ဝိဟရထ, ဣမဉ္စ သုတ္တံ မာသဿ အဋ္ဌသု ဓမ္မဿဝနဒိဝသေသု ဃဏ္ဍိံ အာကောဋေတွာ ဥဿာရေထ, ဓမ္မကထံ ကရောထ သာကစ္ဆထ အနုမောဒထ, ဣဒမေဝ ကမ္မဋ္ဌာနံ အာသေဝထ ဘာဝေထ ဗဟုလီကရောထ, တေပိ ဝေါ အမနုဿာ တံ ဘေရဝါရမ္မဏံ န ဒဿေဿန္တိ, အညဒတ္ထု အတ္ထကာမာ ဟိတကာမာ ဘဝိဿန္တီ’’တိ. တေ ‘‘သာဓူ’’တိ ဘဂဝတော ပဋိဿုဏိတွာ ဥဋ္ဌာယာသနာ ဘဂဝန္တံ အဘိဝါဒေတွာ ပဒက္ခိဏံ ကတွာ တတ္ထ ဂန္တွာ တထာ အကံသု. ဒေဝတာယော စ ‘‘ဘဒန္တာ အမှာကံ အတ္ထကာမာ ဟိတကာမာ’’တိ ပီတိသောမနဿဇာတာ ဟုတွာ သယမေဝ သေနာသနံ သမ္မဇ္ဇန္တိ, ဥဏှောဒကံ ပဋိယာဒေန္တိ, ပိဋ္ဌိပရိကမ္မံ ပါဒပရိကမ္မံ ကရောန္တိ, အာရက္ခံ သံဝိဒဟန္တိ. တေပိ ဘိက္ခူ တမေဝ မေတ္တံ ဘာဝေတွာ တမေဝ စ ပါဒကံ ကတွာ ဝိပဿနံ အာရဘိတွာ သဗ္ဗေ တသ္မိံယေဝ အန္တောတေမာသေ အဂ္ဂဖလံ အရဟတ္တံ ပါပုဏိတွာ မဟာပဝါရဏာယ ဝိသုဒ္ဓိပဝါရဏံ ပဝါရေသုန္တိ. इस प्रकार भगवान ने देशना समाप्त कर उन भिक्षुओं से कहा— 'भिक्षुओं! जाओ, उसी वन-खंड में विहार करो। महीने के आठ धर्म-श्रवण के दिनों में घंटा बजाकर इस सूत्र का पाठ करो, धर्म-कथा करो, चर्चा करो और अनुमोदन करो। इसी कर्मस्थान का अभ्यास करो, भावना करो और इसे बहुलीकृत करो। वे अमनुष्य (यक्ष) तुम्हें वे भयानक दृश्य नहीं दिखाएंगे; बल्कि वे तुम्हारे हितैषी और मंगल चाहने वाले हो जाएंगे।' उन्होंने 'साधु' कहकर भगवान की आज्ञा स्वीकार की, आसन से उठकर भगवान का अभिवादन और प्रदक्षिणा कर वहाँ जाकर वैसा ही किया। देवताओं ने सोचा— 'ये भदन्त हमारे हितैषी और मंगल चाहने वाले हैं', और वे प्रसन्न होकर स्वयं ही सेनासन की सफाई करने लगे, गर्म पानी तैयार करने लगे, पीठ और पैरों की मालिश करने लगे और सुरक्षा का प्रबंध करने लगे। उन भिक्षुओं ने भी उसी मैत्री की भावना की और उसी को आधार बनाकर विपश्यना का आरम्भ किया, और उन सभी ने उसी वर्षावास के तीन महीनों के भीतर अग्रफल अर्हत्व प्राप्त कर लिया और महाप्रवारणा के दिन विशुद्धि-प्रवारणा की। ဧဝမ္ပိ အတ္ထကုသလေန တထာဂတေန,ဓမ္မိဿရေန ကထိတံ ကရဏီယမတ္ထံ; ကတွာနုဘုယျ ပရမံ ဟဒယဿ သန္တိံ,သန္တံ ပဒံ အဘိသမေန္တိ သမတ္တပညာ. इस प्रकार, अर्थ-कुशल तथागत, धर्म के स्वामी द्वारा उपदिष्ट इस करणीय अर्थ (कर्तव्य) को पूर्ण कर और हृदय की परम शांति का अनुभव कर, वे पूर्ण प्रज्ञावान भिक्षु उस शांत पद (निर्वाण) को प्राप्त करते हैं। တသ္မာ ဟိ တံ အမတမဗ္ဘုတမရိယကန္တံ,သန္တံ ပဒံ အဘိသမေစ္စ ဝိဟရိတုကာမော; ဝိညူ ဇနော ဝိမလသီလသမာဓိပညာ-ဘေဒံ ကရေယျ သတတံ ကရဏီယမတ္ထန္တိ. इसलिए, उस अमृत, अद्भुत, आर्यों को प्रिय और शांत पद (निर्वाण) को साक्षात् कर विहार करने का इच्छुक बुद्धिमान व्यक्ति, निर्मल शील, समाधि और प्रज्ञा के भेदों वाले इस निरंतर करणीय अर्थ (कर्तव्य) को सिद्ध करे। ပရမတ္ထဇောတိကာယ ခုဒ္ဒကပါဌ-အဋ္ဌကထာယ परमत्थजोतिका नामक खुद्दकपाठ-अट्ठकथा में। မေတ္တသုတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. मैत्री-सुत्त की व्याख्या समाप्त हुई। နိဂမနကထာ उपसंहार कथा। ဧတ္တာဝတာ [Pg.216] စ ယံ ဝုတ္တံ – और अब तक जो कहा गया है— ‘‘ဥတ္တမံ ဝန္ဒနေယျာနံ, ဝန္ဒိတွာ ရတနတ္တယံ; ခုဒ္ဒကာနံ ကရိဿာမိ, ကေသဉ္စိ အတ္ထဝဏ္ဏန’’န္တိ. 'वंदनीय रत्नों में उत्तम रत्नत्रय की वंदना कर, मैं खुद्दकपाठ के कुछ अंशों की अर्थ-व्याख्या करूँगा'। တတ္ထ သရဏသိက္ခာပဒဒွတ္တိံသာကာရကုမာရပဉှမင်္ဂလသုတ္တရတနသုတ္တတိရောကုဋ္ဋနိဓိကဏ္ဍမေတ္တသုတ္တဝသေန နဝပ္ပဘေဒဿ ခုဒ္ဒကပါဌဿ တာဝ အတ္ထဝဏ္ဏနာ ကတာ ဟောတိ. တေနေတံ ဝုစ္စတိ – वहाँ शरणगमन, शिक्षापद, द्वत्तिंसाकार, कुमार-प्रश्न, मंगल-सुत्त, रतन-सुत्त, तिरोकुट्ट-सुत्त, निधिकण्ड-सुत्त और मेत्त-सुत्त के क्रम से नौ प्रकार के खुद्दकपाठ की अर्थ-व्याख्या पूर्ण हुई। इसीलिए यह कहा गया है— ‘‘ဣမံ ခုဒ္ဒကပါဌဿ, ကရောန္တေနတ္ထဝဏ္ဏနံ; သဒ္ဓမ္မဋ္ဌိတိကာမေန, ယံ ပတ္တံ ကုသလံ မယာ.တဿာနုဘာဝတော ခိပ္ပံ, ဓမ္မေ အရိယပ္ပဝေဒိတေ; ဝုဒ္ဓိံ ဝိရူဠှိံ ဝေပုလ္လံ, ပါပုဏာတု အယံ ဇနော’’တိ. सद्धर्म की स्थिरता की इच्छा रखने वाले मेरे द्वारा इस खुद्दकपाठ की अर्थ-व्याख्या (अट्ठकथा) करते हुए जो पुण्य प्राप्त किया गया है, उसके प्रभाव से यह जनसमूह आर्यों द्वारा उपदिष्ट धर्म में शीघ्र ही वृद्धि, उन्नति और प्रचुरता को प्राप्त करे। ပရမဝိသုဒ္ဓသဒ္ဓါဗုဒ္ဓိဝီရိယဂုဏပ္ပဋိမဏ္ဍိတေန သီလာစာရဇ္ဇဝမဒ္ဒဝါဒိဂုဏသမုဒယသမုဒိတေန သကသမယသမယန္တရဂဟနဇ္ဈောဂါဟဏသမတ္ထေန ပညာဝေယျတ္တိယသမန္နာဂတေန တိပိဋကပရိယတ္တိဓမ္မပ္ပဘေဒေ သာဋ္ဌကထေ သတ္ထုသာသနေ အပ္ပဋိဟတဉာဏပ္ပဘာဝေန ဆမဟာဝေယျာကရဏေနဆမဟာဝေယျာကရဏေန ကရဏသမ္ပတ္တိဇနိတသုခဝိနိဂ္ဂတမဓုရောဒါရဝစနလာဝဏ္ဏယုတ္တေန ယုတ္တမုတ္တဝါဒိနာ ဝါဒီဝရေန မဟာကဝိနာ ဆဠဘိညာပဋိသမ္ဘိဒါဒိပ္ပဘေဒဂုဏပ္ပဋိမဏ္ဍိတေ ဥတ္တရိမနုဿဓမ္မေ သုပ္ပတိဋ္ဌိတဗုဒ္ဓီနံ ထေရဝံသပ္ပဒီပါနံ ထေရာနံ မဟာဝိဟာရဝါသီနံ ဝံသာလင်္ကာရဘူတေန ဝိပုလဝိသုဒ္ဓဗုဒ္ဓိနာ ဗုဒ္ဓဃောသောတိ ဂရူဟိ ဂဟိတနာမဓေယျေန ထေရေန ကတာ အယံ ပရမတ္ထဇောတိကာ နာမ ခုဒ္ဒကပါဌဝဏ္ဏနာ – अत्यंत शुद्ध श्रद्धा, प्रज्ञा और वीर्य के गुणों से अलंकृत; शील, आचार, आर्जव (सीधापन) और मार्दव (कोमलता) आदि गुणों के समूह से युक्त; अपने और दूसरों के सिद्धांतों के गहन अध्ययन में समर्थ; प्रज्ञा की निपुणता से संपन्न; अट्ठकथा सहित शास्ता के शासन और त्रिपिटक पर्यति धर्म के भेदों में अप्रतिहत (निर्बाध) ज्ञान के प्रभाव वाले; महान वैयाकरण; उत्तम साधन-संपत्ति से जनित सुखद, मधुर, स्पष्ट और लावण्ययुक्त वाणी से युक्त; युक्तियुक्त और मुक्त वचन बोलने वाले; श्रेष्ठ वक्ता; महाकवि; छह अभिज्ञाओं और चार प्रतिसंभिदाओं आदि गुणों से अलंकृत उत्तर-मनुष्य धर्म में सुप्रतिष्ठित बुद्धि वाले, स्थविर वंश के प्रदीप, महाविहारवासी स्थविरों के वंश के अलंकार स्वरूप; अत्यंत निर्मल और विशाल बुद्धि वाले; गुरुओं द्वारा 'बुद्धघोष' नाम से अभिहित स्थविर द्वारा रचित यह 'परमत्थजोतिका' नामक खुद्दकपाठ की व्याख्या (अट्ठकथा) है। တာဝ တိဋ္ဌတု လောကသ္မိံ, လောကနိတ္ထရဏေသိနံ; ဒဿေန္တီ ကုလပုတ္တာနံ, နယံ သီလာဒိသုဒ္ဓိယာ. यह (अट्ठकथा) संसार से मुक्त होने की इच्छा रखने वाले कुलपुत्रों को शील आदि की शुद्धि का मार्ग दिखाते हुए इस लोक में तब तक बनी रहे— ယာဝ ဗုဒ္ဓေါတိ နာမမ္ပိ, သုဒ္ဓစိတ္တဿ တာဒိနော; လောကမှိ လောကဇေဋ္ဌဿ, ပဝတ္တတိ မဟေသိနောတိ. जब तक इस लोक में शुद्ध चित्त वाले, तादी (अचल), लोक-ज्येष्ठ, महर्षि का 'बुद्ध' यह नाम प्रवर्तित (विद्यमान) है। ပရမတ္ထဇောတိကာယ ခုဒ္ဒက-အဋ္ဌကထာယ परमत्थजोतिका नामक खुद्दक-अट्ठकथा की— ခုဒ္ဒကပါဌဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. खुद्दकपाठ-व्याख्या समाप्त हुई। | |||
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| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |