| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| Français | |||
| Canon Pali | Commentaires | Sous-commentaires | Autres |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| Deutsch | |||
| Pali-Kanon | Kommentare | Subkommentare | Sonstige |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
1 นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धाला माझा नमस्कार असो. ขุทฺทกนิกาเย खुद्दकनिकाय เปฏโกปเทสปาฬิ पेटकोपदेसपाळी ๑. อริยสจฺจปฺปกาสนปฐมภูมิ १. आर्यसत्यप्रकाशन प्रथमभूमी นโม สมฺมาสมฺพุทฺธานํ ปรมตฺถทสฺสีนํ परमार्थदर्शी (परम सत्याचे दर्शन घेणाऱ्या) सम्यक्संबुद्धांना नमस्कार असो. สีลาทิคุณปารมิปฺปตฺตานํ. शील इत्यादी गुणांच्या पारमितेला (पूर्णत्वाला) प्राप्त झालेल्यांना. ๑. ทุเว [Pg.167] เหตู ทุเว ปจฺจยา สาวกสฺส สมฺมาทิฏฺฐิยา อุปฺปาทาย – ปรโต จ โฆโส สจฺจานุสนฺธิ, อชฺฌตฺตญฺจ โยนิโส มนสิกาโร. ตตฺถ กตโม ปรโต โฆโส? ยา ปรโต เทสนา โอวาโท อนุสาสนี สจฺจกถา สจฺจานุโลโม. จตฺตาริ สจฺจานิ – ทุกฺขํ สมุทโย นิโรโธ มคฺโค. อิเมสํ จตุนฺนํ สจฺจานํ ยา เทสนา สนฺทสฺสนา วิวรณา วิภชนา อุตฺตานีกิริยา ปกาสนา – อยํ วุจฺจติ สจฺจานุโลโม โฆโสติ. १. श्रावकाच्या सम्यग्दृष्टीच्या उत्पत्तीसाठी दोन हेतू आणि दोन प्रत्यय (कारण) आहेत - इतरांकडून ऐकलेला घोष (परतोघोष) जो सत्याशी संबंधित आहे, आणि स्वतःच्या ठिकाणी असलेला योनिशो मनसिकार (योग्य विचार). त्यामध्ये परतोघोष कोणता? जी इतरांकडून होणारी देशना (उपदेश), ओवाद (अनुशासन), अनुशासनी (शिक्षण), सत्यकथा (सत्याची चर्चा) आणि सत्यानुकूल (सत्याला अनुकूल ज्ञान) आहे, तो परतोघोष होय. चार सत्ये आहेत - दुःख, समुदय, निरोध आणि मार्ग. या चार सत्यांची जी देशना (उपदेश), संदर्शना (दर्शन), विवरणा (स्पष्टीकरण), विभजना (विभागणी), उत्तानीक्रिया (स्पष्ट करणे) आणि प्रकाशना (प्रकट करणे) आहे, त्याला 'सत्यानुकूल घोष' असे म्हटले जाते. ๒. ตตฺถ กตโม อชฺฌตฺตํ โยนิโส มนสิกาโร? २. त्यामध्ये अध्यात्म (स्वतःच्या ठिकाणी असलेला) योनिशो मनसिकार कोणता? อชฺฌตฺตํ โยนิโส มนสิกาโร นาม โย ยถาเทสิเต ธมฺเม พหิทฺธา อารมฺมณํ อนภินีหริตฺวา โยนิโส มนสิกาโร – อยํ วุจฺจติ โยนิโส มนสิกาโร. अध्यात्म योनिशो मनसिकार म्हणजे, उपदेशिलेल्या धर्मामध्ये बाह्य आरंभाला (विषयाला) मनात न आणता जो योनिशो मनसिकार (योग्य विचार) केला जातो, त्याला योनिशो मनसिकार असे म्हटले जाते. ตํอากาโร โยนิโส ทฺวาโร วิธิ อุปาโย. ยถา ปุริโส สุกฺเข กฏฺเฐ วิคตสฺเนเห สุกฺขาย อุตฺตรารณิยา ถเล อภิมนฺถมานํ ภพฺโพ โชติสฺส อธิคมาย. ตํ กิสฺส เหตุ. โยนิโส อคฺคิสฺส อธิคมาย. เอวเมวสฺส ยมิทํ ทุกฺขสมุทยนิโรธมคฺคานํ อวิปรีตธมฺมเทสนํ มนสิกโรติ – อยํ วุจฺจติ โยนิโส มนสิกาโร. तो प्रकार म्हणजे योनिशो द्वार, विधी आणि उपाय होय. ज्याप्रमाणे एखादा मनुष्य कोरड्या, रस नसलेल्या लाकडाला कोरड्या उत्तरारणीवर जमिनीवर घासून अग्नी प्राप्त करण्यास समर्थ होतो. ते कोणत्या कारणाने? योग्य पद्धतीने अग्नी प्राप्त करण्यासाठी. त्याचप्रमाणे, दुःख, समुदय, निरोध आणि मार्ग यांच्या अविपरीत (अचूक) धर्मदेशनेचा जो मनसिकार करतो, त्याला योनिशो मनसिकार असे म्हटले जाते. ยถา [Pg.168] ติสฺโส อุปมา ปุพฺเพ อสฺสุตา จ อสฺสุตปุพฺพา จ ปฏิภนฺติ. โย หิ โกจิ กาเมสุ อวีตราโคติ…เป… ทุเว อุปมา อโยนิโส กาตพฺพา ปจฺฉิเมสุ วุตฺตํ. ตตฺถ โย จ ปรโต โฆโส โย จ อชฺฌตฺตํ โยนิโส มนสิกาโร – อิเม ทฺเว ปจฺจยา. ปรโต โฆเสน ยา อุปฺปชฺชติ ปญฺญา – อยํ วุจฺจติ สุตมยี ปญฺญา. ยา อชฺฌตฺตํ โยนิโส มนสิกาเรน อุปฺปชฺชติ ปญฺญา – อยํ วุจฺจติ จินฺตามยี ปญฺญาติ. อิมา ทฺเว ปญฺญา เวทิตพฺพา. ปุริมกา จ ทฺเว ปจฺจยา. อิเม ทฺเว เหตู ทฺเว ปจฺจยา สาวกสฺส สมฺมาทิฏฺฐิยา อุปฺปาทาย. ज्याप्रमाणे पूर्वी न ऐकलेल्या आणि अपूर्व अशा तीन उपमा स्पष्ट होतात. 'जो कोणी कामासक्तीतून मुक्त झालेला नाही...' इत्यादी... नंतरच्या दोन उपमा अयोनिशो मनसिकाराच्या संदर्भात सांगितल्या आहेत. त्यामध्ये जो परतोघोष आणि जो अध्यात्म योनिशो मनसिकार आहे - हे दोन प्रत्यय आहेत. परतोघोषाने जी प्रज्ञा उत्पन्न होते, तिला 'श्रुतमयी प्रज्ञा' असे म्हटले जाते. अध्यात्म योनिशो मनसिकाराने जी प्रज्ञा उत्पन्न होते, तिला 'चिंतामयी प्रज्ञा' असे म्हटले जाते. या दोन प्रज्ञा जाणाव्यात, आणि पूर्वीचे दोन प्रत्यय देखील. हे दोन हेतू आणि दोन प्रत्यय श्रावकाच्या सम्यग्दृष्टीच्या उत्पत्तीसाठी आहेत. ๓. ตตฺถ ปรโต โฆสสฺส สจฺจานุสนฺธิสฺส เทสิตสฺส อตฺถํ อวิชานนฺโต อตฺถปฺปฏิสํเวที ภวิสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. น จ อตฺถปฺปฏิสํเวที โยนิโส มนสิกริสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. ปรโต โฆสสฺส สจฺจานุสนฺธิสฺส เทสิตสฺส อตฺถํ วิชานนฺโต อตฺถปฺปฏิสํเวที ภวิสฺสตีติ ฐานเมตํ วิชฺชติ. อตฺถปฺปฏิสํเวที จ โยนิโส มนสิกริสฺสตีติ ฐานเมตํ วิชฺชติ. เอส เหตุ เอตํ อารมฺมณํ เอโส อุปาโย สาวกสฺส นิยฺยานสฺส, นตฺถญฺโญ. โสยํ น จ สุตฺตสฺส อตฺถวิชานนาย สห ยุตฺโต นาปิ โฆสานุโยเคน ปรโต โฆสสฺส อตฺถํ อวิชานนฺเตน สกฺกา อุตฺตริมนุสฺสธมฺมํ อลมริยญาณทสฺสนํ อธิคนฺตุํ, ตสฺมา นิพฺพายิตุกาเมน สุตมเยน อตฺถา ปริเยสิตพฺพา. ตตฺถ ปริเยสนาย อยํ อนุปุพฺพี ภวติ โสฬส หารา, ปญฺจ นยา, อฏฺฐารส มูลปทานิ. ३. त्यामध्ये, सत्याशी संबंधित उपदेशिलेल्या परतोघोषाचा अर्थ न जाणता कोणी अर्थप्रतिसंवेदी होईल, हे शक्य नाही. आणि अर्थप्रतिसंवेदी नसलेला मनुष्य योनिशो मनसिकार करेल, हेही शक्य नाही. परतोघोषाचा अर्थ जाणून अर्थप्रतिसंवेदी होईल, हे शक्य आहे. आणि अर्थप्रतिसंवेदी होऊन योनिशो मनसिकार करेल, हेही शक्य आहे. हाच हेतू, हेच आलंबन आणि हाच उपाय श्रावकाच्या संसारातून सुटकेसाठी (निर्वाणासाठी) आहे, दुसरा नाही. जर तो सूत्राच्या अर्थज्ञानाशी युक्त नसेल आणि घोषाच्या अभ्यासाशीही युक्त नसेल, तर परतोघोषाचा अर्थ न जाणणाऱ्या व्यक्तीला उत्तरिमनुष्यधर्म आणि आर्यज्ञानदर्शन प्राप्त करणे शक्य नाही. म्हणून, निर्वाण प्राप्त करू इच्छिणाऱ्याने श्रुतमयी प्रज्ञेने अर्थाचा शोध घेतला पाहिजे. त्या शोधाचा हा अनुक्रम आहे - सोळा हार, पाच नय आणि अठरा मूळपदे. ตตฺถายํ อุทฺทานคาถา त्यामध्ये ही उद्दानगाथा आहे: โสฬสหารา เนตฺตี, ปญฺจนยา สาสนสฺส ปริเยฏฺฐิ; อฏฺฐารสมูลปทา, กจฺจายนโคตฺตนิทฺทิฏฺฐา. शासनाचा (धम्माचा) शोध घेणारी नेत्ती (मार्गदर्शक ग्रंथ) सोळा हार, पाच नय आणि अठरा मूळपदांनी युक्त आहे, जी कच्चायनगोत्राच्या (महाकच्चायन) थेरांनी दर्शविली आहे. ๔. ตตฺถ กตเม โสฬสหารา? ४. त्यामध्ये सोळा हार कोणते आहेत? เทสนา วิจโย ยุตฺติ ปทฏฺฐานํ ลกฺขณํ จตุพฺยูโห อาวฏฺโฏ วิภตฺติ ปริวตฺตโน เววจโน ปญฺญตฺติ โอตรโณ โสธโน อธิฏฺฐาโน ปริกฺขาโร สมาโรปโน – อิเม โสฬส หารา. देशना, विचय, युत्ती, पदट्ठान, लक्खण, चतुब्यूह, आवट्ट, विभत्ती, परिवत्तन, वेवचन, पण्णत्ती, ओतरण, सोधन, अधिट्ठान, परिक्खार आणि समारोपन - हे सोळा हार आहेत. ตตฺถ อุทฺทานคาถา त्यामध्ये उद्दानगाथा: เทสนา [Pg.169] วิจโย ยุตฺติ, ปทฏฺฐาโน จ ลกฺขโณ ; จตุพฺยูโห จ อาวฏฺโฏ, วิภตฺติ ปริวตฺตโน. देशना, विचय, युत्ती, पदट्ठान आणि लक्खण; चतुब्यूह, आवट्ट, विभत्ती आणि परिवत्तन. เววจโน จ ปญฺญตฺติ, โอตรโณ จ โสธโน; อธิฏฺฐาโน ปริกฺขาโร, สมาโรปโน โสฬโส – ; वेवचन, पण्णत्ती, ओतरण आणि सोधन; अधिट्ठान, परिक्खार आणि सोळावा समारोपन. ๕. ตตฺถ กตเม ปญฺจ นยา? ५. त्यामध्ये पाच नय कोणते आहेत? นนฺทิยาวฏฺโฏ ติปุกฺขโล สีหวิกฺกีฬิโต ทิสาโลจโน องฺกุโสติ. नंदियावट्ट, तिपुक्खल, सीहविक्कीळित, दिसालोचन आणि अंकुस. ตตฺถ อุทฺทานคาถา त्यामध्ये उद्दानगाथा: ปฐโม นนฺทิยาวฏฺโฏ, ทุติโย จ ติปุกฺขโล; สีหวิกฺกีฬิโต นาม, ตติโย โหติ โส นโย. पहिला नंदियावट्ट, दुसरा तिपुक्खल; तिसरा नय सीहविक्कीळित नावाचा आहे. ทิสาโลจนมาหํสุ, จตุตฺโถ นยลญฺชโก; ปญฺจโม องฺกุโส นาม, สพฺเพ ปญฺจ นยา คตา. चौथ्या नयला दिसालोचन म्हणतात; पाचवा अंकुस नावाचा आहे. हे सर्व पाच नय सांगितले आहेत. ๖. ตตฺถ กตมานิ อฏฺฐารส มูลปทานิ? ६. त्यामध्ये अठरा मूळपदे कोणती आहेत? อวิชฺชา ตณฺหา โลโภ โทโส โมโห สุภสญฺญา สุขสญฺญา นิจฺจสญฺญา อตฺตสญฺญา สมโถ วิปสฺสนา อโลโภ อโทโส อโมโห อสุภสญฺญา ทุกฺขสญฺญา อนิจฺจสญฺญา อนตฺตสญฺญา, อิมานิ อฏฺฐารส มูลปทานิ. ตตฺถ นว ปทานิ อกุสลานิ ยตฺถ สพฺพํ อกุสลํ สโมสรติ. นว ปทานิ กุสลานิ ยตฺถ สพฺพํ กุสลํ สโมสรติ. अविद्या, तृष्णा, लोभ, द्वेष, मोह, शुभसंज्ञा, सुखसंज्ञा, नित्यसंज्ञा, आत्मसंज्ञा, शमथ, विपश्यना, अलोभ, अद्वेष, अमोह, अशुभसंज्ञा, दुःखसंज्ञा, अनित्यसंज्ञा, अनात्मसंज्ञा - ही अठरा मूळपदे आहेत. त्यामध्ये नऊ पदे अकुशल आहेत, ज्यामध्ये सर्व अकुशल समाविष्ट होते. नऊ पदे कुशल आहेत, ज्यामध्ये सर्व कुशल समाविष्ट होते. กตมานิ นว ปทานิ อกุสลานิ ยตฺถ สพฺพํ อกุสลํ สโมสรติ? ती नऊ अकुशल पदे कोणती आहेत, ज्यामध्ये सर्व अकुशल समाविष्ट होते? อวิชฺชา ยาว อตฺตสญฺญา, อิมานิ นว ปทานิ อกุสลานิ, ยตฺถ สพฺพํ อกุสลํ สโมสรติ. अविद्येपासून आत्मसंज्ञेपर्यंतची ही नऊ अकुशल पदे आहेत, ज्यामध्ये सर्व अकुशल समाविष्ट होते. กตมานิ นว ปทานิ กุสลานิ ยตฺถ สพฺพํ กุสลํ สโมสรติ? ती नऊ कुशल पदे कोणती आहेत, ज्यामध्ये सर्व कुशल समाविष्ट होते? สมโถ ยาว อนตฺตสญฺญา, อิมานิ นว ปทานิ กุสลานิ ยตฺถ สพฺพํ กุสลํ สโมสรติ. อิมานิ อฏฺฐารส มูลปทานิ. शमथापासून अनात्मसंज्ञेपर्यंतची ही नऊ कुशल पदे आहेत, ज्यामध्ये सर्व कुशल समाविष्ट होते. ही अठरा मूळपदे आहेत. ตตฺถ อิมา อุทฺทานคาถา त्यामध्ये या उद्दानगाथा आहेत: ตณฺหา [Pg.170] จ อวิชฺชา โลโภ, โทโส ตเถว โมโห จ; จตฺตาโร จ วิปลฺลาสา, กิเลสภูมิ นว ปทานิ. तृष्णा, अविद्या, लोभ, द्वेष आणि तसेच मोह; आणि चार विपर्यास - ही नऊ पदे क्लेशभूमी आहेत. เย จ สติปฏฺฐานา สมโถ, วิปสฺสนา กุสลมูลํ; เอตํ สพฺพํ กุสลํ, อินฺทฺริยภูมิ นวปทานิ. जे सतिपट्ठान, शमथ, विपश्यना आणि कुशलमूळ आहेत; हे सर्व कुशल असून, ही नऊ पदे इंद्रियभूमी आहेत. สพฺพํ กุสลํ นวหิ ปเทหิ ยุชฺชติ, นวหิ เจว อกุสลํ; เอกเก นว มูลปทานิ, อุภยโต อฏฺฐารส มูลปทานิ. सर्व कुशल नऊ पदांशी जोडले जाते, आणि सर्व अकुशल देखील नऊ पदांशीच जोडले जाते; प्रत्येकात नऊ मूळपदे आहेत, दोन्ही मिळून अठरा मूळपदे होतात. อิเมสํ อฏฺฐารสนฺนํ มูลปทานํ ยานิ นว ปทานิ อกุสลานิ, อยํ ทุกฺขสมุทโย; ยานิ นว ปทานิ กุสลานิ, อยํ ทุกฺขนิโรธคามินี ปฏิปทา. อิติ สมุทยสฺส ทุกฺขํ ผลํ, ทุกฺขนิโรธคามินิยา ปฏิปทาย นิโรธํ ผลํ. อิมานิ จตฺตาริ อริยสจฺจานิ ภควตา พาราณสิยํ เทสิตานิ. या अठरा मूळपदांपैकी जी नऊ अकुशल पदे आहेत, तो दुःखसमुदय आहे; जी नऊ कुशल पदे आहेत, तो दुःख निरोधाकडे नेणारा मार्ग (प्रतिपदा) आहे. अशा प्रकारे, समुदयाचे फळ दुःख आहे, आणि दुःख निरोधाकडे नेणाऱ्या मार्गाचे फळ निरोध आहे. ही चार आर्यसत्ये भगवंतांनी वाराणसी येथे उपदेशिली आहेत. ๗. ตตฺถ ทุกฺขสฺส อริยสจฺจสฺส อปริมาณานิ อกฺขรานิ ปทานิ พฺยญฺชนานิ อาการานิ นิรุตฺติโย นิทฺเทสา เทสิตา เอตสฺเสวตฺถสฺส สงฺกาสนาย ปกาสนาย วิวรณาย วิภชนาย อุตฺตานีกมฺมตาย ปญฺญาปนายาติ ยา เอวํ สพฺเพสํ สจฺจานํ. อิติ เอกเมกํ สจฺจํ อปริมาเณหิ อกฺขรปทพฺยญฺชนอาการนิรุตฺตินิทฺเทเสหิ ปริเยสิตพฺพํ, ตญฺจ พฺยญฺชนํ อตฺถปุถุตฺเตน ปน อตฺเถว พฺยญฺชนปุถุตฺเตน. ७. त्या (चार आर्यसत्यां)मध्ये, दुःख आर्यसत्याचे अनंत अक्षरे, पदे, व्यंजने, आकार, निरुक्ती आणि निर्देश याच अर्थाचे प्रकटीकरण करण्यासाठी, प्रकाशन करण्यासाठी, विवरणासाठी, विभाजनासाठी, स्पष्टीकरणासाठी आणि प्रज्ञापनासाठी उपदेशिले आहेत; याचप्रमाणे सर्व सत्यांचेही आहे. अशा प्रकारे, प्रत्येक सत्य हे अनंत अक्षरे, पदे, व्यंजने, आकार, निरुक्ती आणि निर्देश यांच्याद्वारे शोधले पाहिजे; आणि ते व्यंजन अर्थाच्या विविधतेने आणि अर्थ व्यंजनाच्या विविधतेने शोधले पाहिजे। โย หิ โกจิ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา เอวํ วเทยฺย ‘‘อหํ อิทํ ทุกฺขํ ปจฺจกฺขาย อญฺญํ ทุกฺขํ ปญฺญเปสฺสามี’’ติ ตสฺส ตํ วาจาวตฺถุกเมวสฺส ปุจฺฉิโต จ น สมฺปายิสฺสติ. เอวํ สจฺจานิ. ยญฺจ รตฺตึ ภควา อภิสมฺพุทฺโธ, ยญฺจ รตฺตึ อนุปาทาย ปรินิพฺพุโต, เอตฺถนฺตเร ยํ กิญฺจิ ภควตา ภาสิตํ สุตฺตํ เคยฺยํ เวยฺยากรณํ คาถา อุทานํ อิติวุตฺตกํ ชาตกํ อพฺภุตธมฺมํ เวทลฺลํ, สพฺพํ ตํ ธมฺมจกฺกํ ปวตฺติตํ. น กิญฺจิ พุทฺธานํ ภควนฺตานํ [Pg.171] ธมฺมเทสนาย ธมฺมจกฺกโต พหิทฺธา, ตสฺส สพฺพํ สุตฺตํ อริยธมฺเมสุ ปริเยสิตพฺพํ. ตตฺถ ปริคฺคณฺหนาย อาโลกสภานิ จตฺตาริ อริยสจฺจานิ ถาวรานิ อิมานิ. जो कोणी श्रमण किंवा ब्राह्मण असे म्हणेल की, 'मी या दुःखाचा प्रत्यक्ष अनुभव न घेता (किंवा अव्हेरून) दुसऱ्या दुःखाची प्रज्ञापना करीन (ते स्पष्ट करीन)', तर त्याचे ते बोलणे केवळ शब्दांचेच खेळ ठरेल आणि विचारले असता तो ते सिद्ध करू शकणार नाही. अशी ही सत्ये आहेत. ज्या रात्री भगवंतांनी पूर्ण संबोधी प्राप्त केली आणि ज्या रात्री ते उपादानरहित होऊन परिनिर्वाण पावले, या दरम्यानच्या काळात भगवंतांनी जे काही सुत्त, गेय्य, वेय्याकरण, गाथा, उदान, इतिवृत्तक, जातक, अब्भुतधम्म आणि वेदल्ल भाष्य केले, ते सर्व धम्मचक्रच प्रवर्तित केले गेले आहे. बुद्ध भगवंतांच्या धम्मदेशनेमध्ये धम्मचक्राच्या बाहेर काहीही नाही. म्हणून ते सर्व सुत्त आर्यधम्मांमध्ये (आर्यसत्यांमध्ये) शोधले पाहिजे. त्यामध्ये आकलन करण्यासाठी शेकडो प्रकाशासमान असणारी ही चार आर्यसत्ये अढळ आहेत। ตตฺถ กตมํ ทุกฺขํ? ชาติ ชรา พฺยาธิ มรณํ สํขิตฺเตน ปญฺจุปาทานกฺขนฺธา ทุกฺขา. ตตฺถายํ ลกฺขณนิทฺเทโส, ปาตุภาวลกฺขณา ชาติ, ปริปากลกฺขณา ชรา, ทุกฺขทุกฺขตาลกฺขโณ พฺยาธิ, จุติลกฺขณํ มรณํ, ปิยวิปฺปโยควิปริณามปริตาปนลกฺขโณ โสโก, ลาลปฺปนลกฺขโณ ปริเทโว, กายสมฺปีฬนลกฺขณํ ทุกฺขํ, จิตฺตสมฺปีฬนลกฺขณํ โทมนสฺสํ, กิเลสปริทหนลกฺขโณ อุปายาโส, อมนาปสโมธานลกฺขโณ อปฺปิยสมฺปโยโค, มนาปวินาภาวลกฺขโณ ปิยวิปฺปโยโค, อธิปฺปายวิวตฺตนลกฺขโณ อลาโภ, อปริญฺญาลกฺขณา ปญฺจุปาทานกฺขนฺธา, ปริปากจุติลกฺขณํ ชรามรณํ, ปาตุภาวจุติลกฺขณํ จุโตปปตฺติ, ปฏิสนฺธินิพฺพตฺตนลกฺขโณ สมุทโย, สมุทยปริชหนลกฺขโณ นิโรโธ, อนุสยสมุจฺเฉทลกฺขโณ มคฺโค. พฺยาธิลกฺขณํ ทุกฺขํ, สญฺชานนลกฺขโณ สมุทโย, นิยฺยานิกลกฺขโณ มคฺโค, สนฺติลกฺขโณ นิโรโธ. อปฺปฏิสนฺธิภาวนิโรธลกฺขณา อนุปาทิเสสา นิพฺพานธาตุ, ทุกฺขญฺจ สมุทโย จ, ทุกฺขญฺจ นิโรโธ จ, ทุกฺขญฺจ มคฺโค จ, สมุทโย จ ทุกฺขญฺจ, สมุทโย จ นิโรโธ จ, สมุทโย จ มคฺโค จ, นิโรโธ จ สมุทโย จ, นิโรโธ จ ทุกฺขญฺจ, นิโรโธ จ มคฺโค จ, มคฺโค จ นิโรโธ จ, มคฺโค จ สมุทโย จ, มคฺโค จ ทุกฺขญฺจ. त्यामध्ये दुःख कोणते? जन्म, जरा (वृद्धत्व), व्याधी (आजारपण), मरण आणि संक्षेपाने पाच उपादानस्कंध हे दुःख आहेत. त्यामध्ये हा लक्षणांचा निर्देश आहे: जन्म हा प्रकट होण्याच्या लक्षणाचा आहे; जरा ही परिपक्व होण्याच्या (झीज होण्याच्या) लक्षणाची आहे; व्याधी ही दुःख-दुःखतेच्या (अतिशय पीडा देण्याच्या) लक्षणाची आहे; मरण हे च्युती (नाशाच्या) लक्षणाचे आहे; शोक हा प्रिय व्यक्तीचा वियोग, विपरिणाम आणि संतापाच्या लक्षणाचा आहे; परिदेव (विलाप) हा विलाप करण्याच्या लक्षणाचा आहे; दुःख हे शरीराला पीडा देण्याच्या लक्षणाचे आहे; दोमनस्स (मानसिक दुःख) हे चित्ताला पीडा देण्याच्या लक्षणाचे आहे; उपायास (हताशपणा) हा क्लेशांनी जळण्याच्या लक्षणाचा आहे; अप्रिय संप्रयोग हा अप्रिय गोष्टींच्या एकत्र येण्याच्या लक्षणाचा आहे; प्रिय विप्रयोग हा प्रिय गोष्टींच्या वियोगाच्या लक्षणाचा आहे; अलाभ हा इच्छेच्या विपरित होण्याच्या लक्षणाचा आहे; पाच उपादानस्कंध हे अपरिज्ञानाच्या लक्षणाचे आहेत; जरामरण हे परिपक्वता आणि च्युतीच्या लक्षणाचे आहे; च्युती आणि उत्पत्ती हे प्रकट होणे आणि च्युती होण्याच्या लक्षणाचे आहे; समुदय हा प्रतिसंधी (पुनर्जन्म) घडवून आणण्याच्या लक्षणाचा आहे; निरोध हा समुदयाचा त्याग करण्याच्या (किंवा पूर्णपणे जाणण्याच्या) लक्षणाचा आहे; मार्ग हा अनुशायांचा (सुप्त क्लेशांचा) समूळ उच्छेद करण्याच्या लक्षणाचा आहे। दुःख हे व्याधीच्या (पीडेच्या) लक्षणाचे आहे; समुदय हा संचित करण्याच्या लक्षणाचा आहे; मार्ग हा मुक्तीच्या लक्षणाचा आहे; निरोध हा शांतीच्या लक्षणाचा आहे। अनुपादिशेष निर्वाणधातू ही पुनर्जन्म न होण्याच्या आणि संसाराच्या बंधनातून मुक्त होण्याच्या लक्षणाची आहे। आणि दुःख व समुदय, दुःख व निरोध, दुःख व मार्ग, समुदय व दुःख, समुदय व निरोध, समुदय व मार्ग, निरोध व समुदय, निरोध व दुःख, निरोध व मार्ग, मार्ग व निरोध, मार्ग व समुदय, मार्ग व दुःख। ๘. ตตฺถิมานิ สุตฺตานิ. ८. त्यामध्ये ही सुत्ते आहेत. ‘‘ยเมกรตฺตึ ปฐมํ, คพฺเภ วสติ มาณโว; อพฺภุฏฺฐิโตว โส ยาติ, ส คจฺฉํ น นิวตฺตตี’’ติ. “मनुष्य ज्या पहिल्या रात्री मातेच्या गर्भात वास करतो, तेव्हापासूनच तो (मृत्यूच्या दिशेने) पुढे जात राहतो; तो पुढे जात असताना कधीही मागे फिरत नाही.” อฏฺฐิมา, อานนฺท, ทานุปปตฺติโย เอกุตฺตริเก สุตฺตํ – อยํ ชาติ. “हे आनंदा, या दानाच्या आठ उत्पत्ती आहेत,” हे एकुत्तरिक निकायातील सुत्त आहे – हा जन्म (जाती) होय. ตตฺถ กตมา ชรา? त्यामध्ये जरा (वृद्धत्व) कोणती? อจริตฺวา พฺรหฺมจริยํ, อลทฺธา โยพฺพเน ธนํ; ชิณฺณโกญฺจาว ฌายนฺติ, ขีณมจฺเฉว ปลฺลเล. तारुण्यात ब्रह्मचर्याचे आचरण न केल्यामुळे आणि धन प्राप्त न केल्यामुळे, मासे संपलेल्या चिखलाच्या डबक्यात पंख तुटलेल्या वृद्ध क्रौंच पक्ष्याप्रमाणे ते चिंतातूर होऊन बसतात. ปญฺจ ปุพฺพนิมิตฺตานิ เทเวสุ – อยํ ชรา. देवांमध्ये पाच पूर्वनिमित्ते (मृत्यूची चिन्हे) प्रकट होतात – ही जरा (वृद्धत्व) होय. ตตฺถ [Pg.172] กตโม พฺยาธิ? त्यामध्ये व्याधी (आजारपण) कोणती? สามํ เตน กุโต ราช, ตุวมฺปิ ชรายนฺติ เวเทสิ; ขตฺติย กมฺมสฺส ผโล, โลโก น หิ กมฺมํ ปนยติ. “हे राजा, तू स्वतः देखील वृद्ध होत आहेस असे म्हणालास; हे क्षत्रिय, हा लोक कर्माचे फळ आहे, कारण कर्माला टाळता येत नाही.” ตโย คิลานา – อยํ พฺยาธิ. तीन प्रकारचे रोगी – ही व्याधी होय. ตตฺถ กตมํ มรณํ? त्यामध्ये मरण कोणते? ยถาปิ กุมฺภการสฺส, กตํ มตฺติกภาชนํ; ขุทฺทกญฺจ มหนฺตญฺจ, ยํ ปกฺกํ ยญฺจ อามกํ; สพฺพํ เภทนปริยนฺตํ, เอวํ มจฺจาน ชีวิตํ. ज्याप्रमाणे कुंभाराने बनवलेली मातीची भांडी, मग ती लहान असोत वा मोठी, भाजलेली असोत वा कच्ची, त्या सर्वांचा शेवट फुटण्यातच होतो; त्याचप्रमाणे मर्त्य मानवांचे जीवन मरणातच संपणारे आहे. มมายิเต ปสฺสถ ผนฺทมาเน, มจฺเฉว อปฺโปทเก ขีณโสเต; เอตมฺปิ ทิสฺวา อมโม จเรยฺย, ภเวสุ อาสตฺติมกุพฺพมาโน. पाणी कमी असलेल्या आणि प्रवाह आटलेल्या डबक्यातील माशांप्रमाणे, 'माझे माझे' म्हणून आसक्त असलेल्या आणि तडफडणाऱ्या प्राण्यांना पहा; हे पाहून, भवांमध्ये (अस्तित्वाच्या रूपांमध्ये) कोणतीही आसक्ती न ठेवता, 'माझेपणा' विरहित होऊन आचरण करावे. อุทกปฺปนสุตฺตํ – อิทํ มรณํ. उदकप्पन सुत्त – हे मरण होय. ตตฺถ กตโม โสโก? त्यामध्ये शोक कोणता? อิธ โสจติ เปจฺจ โสจติ, ปาปการี อุภยตฺถ โสจติ; โส โสจติ โส วิหญฺญติ, ทิสฺวา กมฺมกิลิฏฺฐมตฺตโน. पाप करणारा मनुष्य या लोकात शोक करतो, परलोकात शोक करतो, तो दोन्ही ठिकाणी शोक करतो; स्वतःचे मलीन (पाप) कर्म पाहून तो शोक करतो आणि पीडित होतो. ตีณิ ทุจฺจริตานิ – อยํ โสโก. तीन दुश्चरिते – हा शोक होय. ตตฺถ กตโม ปริเทโว? त्यामध्ये परिदेव (विलाप) कोणता? กาเมสุ คิทฺธา ปสุตา ปมูฬฺหา, อวทานิยา เต วิสเม นิวิฏฺฐา; ทุกฺขูปนีตา ปริเทวยนฺติ, กึสุ ภวิสฺสาม อิโต จุตาเส. भोगविलासात आसक्त, मग्न, मोहित, कृपण आणि अयोग्य मार्गावर चालणारे लोक, जेव्हा दुःखाने ग्रासले जातात, तेव्हा विलाप करतात की, 'इथून च्युत (मृत) झाल्यावर आमचे काय होईल?' ติสฺโส วิปตฺติโย – อยํ ปริเทโว. तीन विपत्ती – हा परिदेव (विलाप) होय. ตตฺถ [Pg.173] กตมํ ทุกฺขํ? त्यामध्ये दुःख कोणते? สตํ อาสิ อโยสงฺกู, สพฺเพ ปจฺจตฺตเวทนา; ชลิตา ชาตเวทาว, อจฺจิสงฺฆสมากุลา. शंभर तापलेले लोखंडी खिळे टोचल्याप्रमाणे, पेटलेल्या अग्नीसारख्या आणि ज्वालांच्या समूहाने वेढलेल्या वेदना सर्वांना आपापल्या शरीरात सहन कराव्या लागतात. มหา วต โส ปริฬาโห สํยุตฺตเก สุตฺตํ สจฺจสํยุตฺเตสุ – อิทํ ทุกฺขํ. “खरोखर तो मोठा संताप (दाह) आहे,” हे संयुक्त निकायातील सच्चसंयुत्तातील सुत्त आहे – हे दुःख होय. ตตฺถ กตมํ โทมนสฺสํ? त्यामध्ये दोमनस्स (मानसिक दुःख) कोणते? สงฺกปฺเปหิ ปเรโต โส, กปโณ วิย ฌายติ; สุตฺวา ปเรสํ นิคฺโฆสํ, มงฺกุ โหติ ตถาวิโธ. वाईट विचारांनी ग्रस्त असलेला तो मनुष्य एखाद्या दीन माणसाप्रमाणे चिंता करत बसतो; इतरांचे निंदात्मक शब्द ऐकून तशा प्रकारचा मनुष्य खिन्न (उदास) होतो. ทฺเวเม ตปนียา ธมฺมา – อิทํ โทมนสฺสํ. हे दोन पश्चात्ताप देणारे धम्म आहेत – हे दोमनस्स (मानसिक दुःख) होय. ตตฺถ กตโม อุปายาโส? त्यामध्ये उपायास (हताशपणा) कोणता? กมฺมารานํ ยถา อุกฺกา, อนฺโต ฑยฺหติ โน พหิ; เอวํ ฑยฺหติ เม หทยํ, สุตฺวา นิพฺพตฺตมมฺพุชํ. ज्याप्रमाणे लोहाराची भट्टी आतून जळते पण बाहेरून जळत नाही, त्याचप्रमाणे शांत झालेल्या मनाच्या व्यक्तीविषयी ऐकून माझे हृदय आतून जळत आहे. ตโย อคฺคี – อยํ อุปายาโส. तीन अग्नी – हा उपायास (हताशपणा) होय. ตตฺถ กตโม อปฺปิยสมฺปโยโค? त्यामध्ये अप्रिय संप्रयोग कोणता? อยสาว มลํ สมุฏฺฐิตํ, ตตุฏฺฐาย ตเมว ขาทติ; เอวํ อติโธนจารินํ, สานิ กมฺมานิ นยนฺติ ทุคฺคตึ. ज्याप्रमाणे लोखंडापासूनच गंज उत्पन्न होतो आणि तो त्या लोखंडालाच खाऊन टाकतो; त्याचप्रमाणे अतिशय वाईट आचरण करणाऱ्या मनुष्याला त्याचे स्वतःचेच कर्म दुर्गतीकडे घेऊन जाते. ทฺเวเม ตถาคตํ อพฺภาจิกฺขนฺติ, เอกุตฺตริเก สุตฺตํ ทุเกสุ – อยํ อปฺปิยสมฺปโยโค. “हे दोन प्रकारचे लोक तथागतांवर खोटा आरोप करतात,” हे एकुत्तरिक निकायातील दुक निपातातील सुत्त आहे – हा अप्रिय संप्रयोग होय. ตตฺถ กตโม ปิยวิปฺปโยโค? त्यामध्ये प्रिय विप्रयोग कोणता? สุปิเนน ยถาปิ สงฺคตํ, ปฏิพุทฺโธ ปุริโส น ปสฺสติ; เอวมฺปิ ปิยายิตํ ชนํ, เปตํ กาลงฺกตํ น ปสฺสติ. ज्याप्रमाणे स्वप्नात झालेली भेट जागा झालेला मनुष्य पुन्हा पाहू शकत नाही; त्याचप्रमाणे प्रिय व्यक्ती मृत झाल्यावर मनुष्य तिला पुन्हा पाहू शकत नाही. เต เทวา จวนธมฺมํ วิทิตฺวา ตีหิ วาจาหิ อนุสาสนฺติ. อยํ ปิยวิปฺปโยโค. ते देव (त्या देवाचा) च्युत होण्याचा स्वभाव जाणून तीन वाक्यांनी उपदेश करतात – हा प्रिय विप्रयोग होय. ยมฺปิจฺฉํ [Pg.174] น ลภติ, ติสฺโส มารธีตโร; ตสฺส เจ กามยานสฺส, ฉนฺทชาตสฺส ชนฺตุโน; เต กามา ปริหายนฺติ, สลฺลวิทฺโธว รุปฺปติ. जे इच्छितो ते न मिळणे (हे दुःख आहे). मारच्या तीन कन्या (असे म्हणतात) – भोग विलासाची तीव्र इच्छा करणाऱ्या त्या प्राण्याचे जर ते भोग नष्ट झाले, तर तो बाण लागलेल्या मनुष्याप्रमाणे तडफडतो. สํขิตฺเตน ปญฺจุปาทานกฺขนฺธา ทุกฺขา. संक्षेपाने पाच उपादानस्कंध हे दुःख आहेत. จกฺขุ โสตญฺจ ฆานญฺจ, ชิวฺหา กาโย ตโต มนํ; เอเต โลกามิสา โฆรา, ยตฺถ สตฺตา ปุถุชฺชนา. चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, जिव्हा, काय आणि मन – हे जगातील भयंकर आमिष (मोह) आहेत, ज्यामध्ये सामान्य लोक (पृथग्जन) आसक्त असतात. ปญฺจิเม ภิกฺขเว ขนฺธา – อิทํ ทุกฺขํ. भिक्खूहो, हे पाच स्कंध आहेत – हे दुःख आहे. ตตฺถ กตมา ชรา จ มรณญฺจ? त्यात, जरा आणि मरण कोणते आहे? อปฺปํ วต ชีวิตํ อิทํ, โอรํ วสฺสสตาปิ มียเต ; อถ วาปิ อกิจฺฉํ ชีวิตํ, อถ โข โส ชรสาปิ มียเต. खरोखर, हे जीवन अल्प आहे, शंभर वर्षांच्या आतही मनुष्य मरतो; किंवा जरी जीवन कष्टप्रद असले, तरीही तो वृद्धत्वामुळे मरतोच. สํยุตฺตเก ปเสนทิสํยุตฺตเก สุตฺตํ อยฺยิกา เม กาลงฺกตา – อยํ ชรา จ มรณญฺจ. संयुत्त निकायातील पसेनदि-संयुत्तातील सूत्त – 'माझी आजी कालवश झाली' – ही जरा आणि मरण आहे. ตตฺถ กตมา จุติ จ อุปปตฺติ จ? त्यात, च्युती आणि उपपत्ती कोणती आहे? ‘‘สพฺเพ สตฺตา มริสฺสนฺติ, มรณนฺตํ หิ ชีวิตํ; ยถากมฺมํ คมิสฺสนฺติ, อตฺตกมฺมผลูปคา’’ติ. – “सर्व प्राणी मरणार आहेत, कारण जीवनाचा अंत मरण आहे; ते आपापल्या कर्माच्या फळानुसार, कर्माप्रमाणे गती प्राप्त करतील.” อยํ จุติ จ อุปปตฺติ จ. ही च्युती आणि उपपत्ती आहे. อิเมหิ สุตฺเตหิ เอกสทิเสหิ จ อญฺเญหิ นววิธํ สุตฺตํ ตํ อนุปวิฏฺเฐหิ ลกฺขณโต ทุกฺขํ ญตฺวา สาธารณญฺจ อสาธารณญฺจ ทุกฺขํ อริยสจฺจํ นิทฺทิสิตพฺพํ. คาถาหิ คาถา อนุมินิตพฺพา, พฺยากรเณหิ วา พฺยากรณํ – อิทํ ทุกฺขํ. या सूत्तांद्वारे आणि अशाच प्रकारच्या इतर सूत्तांद्वारे नऊ प्रकारच्या सूत्तांचे निर्देश केले पाहिजेत. त्या समाविष्ट केलेल्या सूत्तांद्वारे लक्षणावरून दुःख जाणून, साधारण आणि असाधारण दुःख-आर्यसत्य निर्देशित केले पाहिजे. गाथांद्वारे गाथांचे अनुमान केले पाहिजे, आणि व्याकरणाद्वारे व्याकरणाचे – हे दुःख आहे. ๙. ตตฺถ กตโม ทุกฺขสมุทโย? ९. त्यात, दुःखसमुदय कोणता आहे? กาเมสุ สตฺตา กามสงฺคสตฺตา, สํโยชเน วชฺชมปสฺสมานา; น หิ ชาตุ สํโยชนสงฺคสตฺตา, โอฆํ ตเรยฺยุํ วิปุลํ มหนฺตํ. कामामध्ये आसक्त असलेले प्राणी, काम-आसक्तीने बांधलेले, संयोजनांमधील दोष न पाहणारे; संयोजनांच्या आसक्तीत अडकलेले प्राणी कधीही या विस्तीर्ण आणि अथांग ओघाला पार करू शकत नाहीत. จตฺตาโร อาสวา สุตฺตํ – อยํ ทุกฺขสมุทโย. चार आसवांचे सूत्त – हा दुःखसमुदय आहे. ตตฺถ [Pg.175] กตโม ทุกฺขนิโรโธ? त्यात, दुःखनिरोध कोणता आहे? ยมฺหิ น มายา วสตี น มาโน,โย วีตโลโภ อมโม นิราโส,ปนุณฺณโกโธ อภินิพฺพุตตฺโต; โส พฺราหฺมโณ โส สมโณ ส ภิกฺขุ. ज्याच्यामध्ये माया आणि मान वास करत नाही, जो लोभरहित, ममतारहित आणि आशारहित आहे, ज्याचा क्रोध नष्ट झाला आहे आणि ज्याचे चित्त शांत झाले आहे; तोच ब्राह्मण, तोच श्रमण आणि तोच भिक्खू होय. ทฺเวมา วิมุตฺติโย, ราควิราคา จ เจโตวิมุตฺติ; อวิชฺชาวิราคา จ ปญฺญาวิมุตฺติ – อยํ นิโรโธ. ह्या दोन विमुक्ती आहेत – रागाच्या विरागामुळे चेतोविमुक्ती; आणि अविद्येच्या विरागामुळे प्रज्ञाविमुक्ती – हा निरोध आहे. ตตฺถ กตโม มคฺโค? त्यात, मार्ग कोणता आहे? เอเสว มคฺโค นตฺถญฺโญ, ทสฺสนสฺส วิสุทฺธิยา; อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, มารสฺเสตํ ปโมหนํ. हाच मार्ग आहे, दुसरा नाही, जो दृष्टीच्या विशुद्धीसाठी आहे; हा आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे, जो माराला मोहित करणारा आहे. สตฺติเม, ภิกฺขเว, โพชฺฌงฺคา – อยํ มคฺโค. भिक्खूहो, हे सात बोज्झंग आहेत – हा मार्ग आहे. ตตฺถ กตมานิ จตฺตาริ อริยสจฺจานิ? त्यात, चार आर्यसत्ये कोणती आहेत? ‘‘เย ธมฺมา เหตุปฺปภวา, เตสํ เหตุํ ตถาคโต อาห; เตสญฺจ โย นิโรโธ, เอวํวาที มหาสมโณ’’ติ. “जे धर्म कारणापासून उत्पन्न होतात, त्यांचे कारण तथागतांनी सांगितले आहे; आणि त्यांचा जो निरोध आहे, तोही त्यांनी सांगितला आहे, असे सांगणारे महाश्रमण आहेत.” เหตุปฺปภวา ธมฺมา ทุกฺขํ, เหตุสมุทโย, ยํ ภควโต วจนํ. อยํ ธมฺโม โย นิโรโธ, เย หิ เกจิ สํโยชนิเยสุ ธมฺเมสุ อสฺสทานุปสฺสิโน วิหรนฺติ. กิเลสา ตณฺหา ปวฑฺฒติ, ตณฺหาปจฺจยา อุปาทานํ…เป… เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส สมุทโย โหติ. ตตฺถ ยํ สํโยชนํ – อยํ สมุทโย. เย สํโยชนิยา ธมฺมา เย จ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา สมฺภวนฺติ – อิทํ ทุกฺขํ. ยา สํโยชนิเยสุ ธมฺเมสุ อาทีนวานุปสฺสนา – อยํ มคฺโค. ปริมุจฺจติ ชาติยา ชราย พฺยาธีหิ มรเณหิ โสเกหิ ปริเทเวหิ ยาว อุปายาเสหิ – อิทํ นิพฺพานํ. อิมานิ จตฺตาริ สจฺจานิ. कारणापासून उत्पन्न होणारे धर्म म्हणजे दुःख, कारण म्हणजे समुदय, हे भगवंतांचे वचन आहे. जो निरोध आहे तो हा धर्म आहे. जे कोणी संयोजनीय धर्मांमध्ये आस्वादाचे दर्शन घेत विहरतात, त्यांची क्लेशकारक तृष्णा वाढते, तृष्णेमुळे उपादान वाढते... अशा प्रकारे या केवळ दुःखसमूहाचा समुदय होतो. त्यात जे संयोजन आहे – तो समुदय आहे. जे संयोजनीय धर्म आहेत आणि जे शोक, परिदेव, दुःख, दोमनस्य व उपायास उत्पन्न होतात – ते दुःख आहे. संयोजनीय धर्मांमध्ये जी आदीनवानुपस्सना आहे – तो मार्ग आहे. जो जाती, जरा, व्याधी, मरण, शोक, परिदेव आणि उपायासांपासून मुक्त होतो – ते निर्वाण आहे. ही चार सत्ये आहेत. ตตฺถ กตมา อนุปาทิเสสา นิพฺพานธาตุ? त्यात, अनुपादिशेष निर्वाणधातू कोणती आहे? อตฺถงฺคตสฺส น ปมาณมตฺถิ, ตํ หิ วา นตฺถิ เยน นํ ปญฺญเปยฺย; สพฺพสงฺคานํ สมูหตตฺตา วิทู, สิตา วาทสตสฺสุ สพฺเพ. जो अस्तंगत झाला आहे, त्याचे कोणतेही प्रमाण नाही; कारण त्याच्यासाठी असे काहीही उरलेले नाही ज्याद्वारे त्याचे वर्णन केले जाऊ शकेल. सर्व आसक्तींचे समूळ उच्चाटन झाल्यामुळे, सर्व ज्ञानी लोक शेकडो वादांच्या पलीकडे जाऊन शांत झाले आहेत. สํยุตฺตเก โคธิกสํยุตฺตํ. संयुत्त निकायातील गोधिक-संयुत्त. อิมานิ [Pg.176] อสาธารณานิ สุตฺตานิ. ยหึ ยหึ สจฺจานิ นิทฺทิฏฺฐานิ, ตหึ ตหึ สจฺจลกฺขณโต โอตาเรตฺวา อปริมาเณหิ พฺยญฺชเนหิ โส อตฺโถ ปริเยสิตพฺโพ. ตตฺถ อตฺถานุปริวตฺติ พฺยญฺชเนน ปุน พฺยญฺชนานุปริวตฺติ อตฺเถน ตสฺส เอกเมกสฺส อปริมาณานิ พฺยญฺชนานิ อิเมหิ สุตฺเตหิ ยถานิกฺขิตฺเตหิ จตฺตาริ อริยสจฺจานิ นิทฺทิสิตพฺพานิ. ปญฺจนิกาเย อนุปวิฏฺฐาหิ คาถาหิ คาถา อนุมินิตพฺพา, พฺยากรเณน พฺยากรณํ. อิมานิ อสาธารณานิ สุตฺตานิ. ही असाधारण सूत्ते आहेत. ज्या ज्या सूत्तांमध्ये सत्यांचे निर्देश केले आहेत, त्या त्या सूत्तांमध्ये सत्यांच्या लक्षणांनुसार अर्थाचे अवतरण करून, अमर्याद व्यंजनांद्वारे तो अर्थ शोधला पाहिजे. तेथे व्यंजनाद्वारे अर्थाचे अनुवर्तन आणि पुन्हा अर्थाद्वारे व्यंजनाचे अनुवर्तन शोधले पाहिजे. या सूत्तांमध्ये जसे मांडले आहे, त्यानुसार प्रत्येक सत्याचे आणि अमर्याद व्यंजनांचे, तसेच चार आर्यसत्यांचे निर्देश केले पाहिजेत. पाच निकायांमध्ये समाविष्ट असलेल्या गाथांद्वारे गाथांचे अनुमान केले पाहिजे, आणि व्याकरणाद्वारे व्याकरणाचे. ही असाधारण सूत्ते आहेत. เตสํ อิมา อุทฺทานคาถา त्यांच्या या उद्दानगाथा आहेत: ยเมกรตฺตึ ปฐมํ, อฏฺฐ ทานูปปตฺติโย; ปญฺจ ปุพฺพนิมิตฺตานิ, ขีณมจฺฉํว ปลฺลลํ. ‘यमेकरत्तिं’ (ज्या एका रात्री प्रथम गर्भात वास करतो), आठ दान-उपपत्ती, पाच पूर्वनिमित्ते, आणि मासे संपलेल्या चिखलाच्या डबक्याप्रमाणे. สามํ เตน กุโต ราช, ตโย เทวา คิลานกา; ยถาปิ กุมฺภการสฺส, ยถา นทิทกปฺปนํ. ‘सामं तेन कुतो राज’ (सामंत राजाकडून भय कोठून असणार?), तीन आजारी देवदूत, कुंभाराच्या घटाप्रमाणे, आणि पाणी नसलेल्या नदीप्रमाणे. อิธ โสจติ เปจฺจ โสจติ, ตีณิ ทุจฺจริตานิ จ; กาเมสุ คิทฺธา ปสุตา, ยาว ติสฺโส วิปตฺติโย. ‘इध सोचति पेच्च सोचति’ (येथे शोक करतो, परलोकात शोक करतो), तीन दुश्चरिते, कामामध्ये आसक्त व मग्न असलेले, आणि तीन विपत्तींपर्यंत. สตํ อาสิ อโยสงฺกู, ปริฬาโห มหตฺตโร; สงฺกปฺเปหิ ปเรโต โส, ตตฺถ ตปนิเยหิ จ. लोखंडाच्या तापलेल्या खिळ्याप्रमाणे शंभर वर्षे वेदना भोगणारा, तीव्र परिदाह असणारा, जो संकल्पांनी पीडित आहे, आणि तेथे तापदायक दुःखांनी पीडित आहे. กมฺมารานํ ยถา อุกฺกา, ตโย อคฺคี ปกาสิตา; อยโต มลมุปฺปนฺนํ, อพฺภกฺขานํ ตถาคเต. लोहाराच्या भट्टीतून निघणाऱ्या ठिणगीप्रमाणे, तीन अग्नींचे प्रकाशन, लोखंडापासून उत्पन्न होणारा गंज, आणि तथागतांवरील खोटा आरोप. ติวิธํ เทวานุสาสนฺติ, สุปิเนน สงฺคโม ยถา; ติสฺโส เจว มารธีตา, สลฺลวิทฺโธว รุปฺปติ. देव तीन प्रकारे उपदेश करतात, स्वप्नातील भेटीप्रमाणे, माराच्या तीन कन्या, आणि बाण लागलेल्या माणसाप्रमाणे तडफडणारा. จกฺขุ โสตญฺจ ฆานญฺจ, ปญฺจกฺขนฺธา ปกาสิตา; อปฺปํ วต ชีวิตํ อิทํ, อยฺยิกา เม มหลฺลิกา. चक्षू, श्रोत्र आणि घ्राण, पाच स्कंध प्रकाशित केले आहेत; खरोखर हे जीवन अल्प आहे, माझी वृद्ध आजी. สพฺเพ สตฺตา มริสฺสนฺติ, อุปปตฺติ จุติจยํ; กาเมสุ สตฺตา ปสุตา, อาสเวหิ จตูหิ จ. सर्व प्राणी मरणार आहेत, ही उपपत्ती आणि च्युती; कामामध्ये मग्न असलेले प्राणी, आणि चार आसव. ยมฺหิ น มายา วสติ, ทฺเวมา เจโตวิมุตฺติโย; เอเสว มคฺโค นตฺถญฺโญ, โพชฺฌงฺคา จ สุเทสิตา. ज्याच्यामध्ये माया वास करत नाही, ह्या दोन चेतोविमुक्ती; हाच मार्ग आहे, दुसरा नाही, आणि चांगल्या प्रकारे उपदेशिलेले बोज्झंग. อตฺถงฺคตสฺส [Pg.177] น ปมาณมตฺถิ, โคธิโก ปรินิพฺพุโต; เย ธมฺมา เหตุปฺปภวา, สํโยชนานุปสฺสิโน. अस्तंगत झालेल्याचे कोणतेही प्रमाण नाही, गोधिक परिनिर्वाण पावला; जे धर्म कारणापासून उत्पन्न होतात, आणि संयोजनांचे वारंवार दर्शन घेणारा. อิมา ทส เตสํ อุทฺทานคาถา. या दहा त्यांच्या उद्दानगाथा आहेत. ๑๐. ตตฺถิมานิ สาธารณานิ สุตฺตานิ เยสุ สุตฺเตสุ สาธารณานิ สจฺจานิ เทสิตานิ อนุโลมมฺปิ ปฏิโลมมฺปิ โวมิสฺสกมฺปิ. ตตฺถ อยํ อาทิ. १०. त्यात ही साधारण सूत्ते आहेत, ज्या सूत्तांमध्ये अनुलोम, प्रतिलोम आणि मिश्र रूपाने साधारण सत्यांचा उपदेश केला आहे. त्यात ही सुरुवात आहे. อวิชฺชาย นิวุโต โลโก, [อชิตาติ ภควา]วิวิจฺฉา ปมาทา นปฺปกาสติ; ชปฺปาภิเลปนํ พฺรูมิ, ทุกฺขมสฺส มหพฺภยํ. “अविद्येने झाकलेला हा लोक, हे अजिता! (भगवंतांनी म्हटले), संशय आणि प्रमादामुळे प्रकाशित होत नाही; मी तृष्णेला त्याचे लेपन म्हणतो आणि दुःख हे त्याचे मोठे भय आहे असे सांगतो.” ตตฺถ ยา อวิชฺชา จ วิวิจฺฉา จ, อยํ สมุทโย. ยํ มหพฺภยํ, อิทํ ทุกฺขํ. อิมานิ ทฺเว สจฺจานิ – ทุกฺขญฺจ สมุทโย จ. ‘‘สํโยชนํ สํโยชนิยา จ ธมฺมา’’ติ สํยุตฺตเก จิตฺตสํยุตฺตเกสุ พฺยากรณํ. ตตฺถ ยํ สํโยชนํ, อยํ สมุทโย. เย สํโยชนิยา ธมฺมา, อิทํ ทุกฺขํ. อิมานิ ทฺเว สจฺจานิ – ทุกฺขญฺจ สมุทโย จ. त्यात जी अविद्या आणि विचिकित्सा आहे, तो समुदय आहे. जे मोठे भय आहे, ते दुःख आहे. ही दोन सत्ये आहेत – दुःख आणि समुदय. संयुत्त निकायातील चित्त-संयुत्तामध्ये 'संयोजन आणि संयोजनीय धर्म' असे स्पष्टीकरण आहे. त्यात जे संयोजन आहे, तो समुदय आहे. जे संयोजनीय धर्म आहेत, ते दुःख आहे. ही दोन सत्ये आहेत – दुःख आणि समुदय. ตตฺถ กตมํ ทุกฺขญฺจ นิโรโธ จ? त्यात, दुःख आणि निरोध कोणते आहे? อุจฺฉินฺนภวตณฺหสฺส, เนตฺติจฺฉินฺนสฺส ภิกฺขุโน; วิกฺขีโณ ชาติสํสาโร, นตฺถิ ทานิ ปุนพฺภโว. ज्याची भव-तृष्णा नष्ट झाली आहे आणि ज्याने (संसाराची) आसक्तीरूपी दोरी तोडून टाकली आहे, अशा भिक्षूचा जन्म-संसार क्षीण झाला आहे; आता त्याला पुनर्भव (पुनर्जन्म) नाही. ยํ จิตฺตํ, อิทํ ทุกฺขํ. โย ภวตณฺหาย อุปจฺเฉโท, อยํ ทุกฺขนิโรโธ. วิกฺขีโณ ชาติสํสาโร, นตฺถิ ทานิ ปุนพฺภโวติ นิทฺเทโส. อิมานิ ทฺเว สจฺจานิ – ทุกฺขญฺจ นิโรโธ จ. ทฺเวมา, ภิกฺขเว, วิมุตฺติโย; ราควิราคา จ เจโตวิมุตฺติ, อวิชฺชาวิราคา จ ปญฺญาวิมุตฺติ. ยํ จิตฺตํ, อิทํ ทุกฺขํ. ยา วิมุตฺติ, อยํ นิโรโธ. อิมานิ ทฺเว สจฺจานิ – ทุกฺขญฺจ นิโรโธ จ. जे चित्त आहे, ते दुःख आहे. जो भव-तृष्णेचा उच्छेद (नाश) आहे, तो दुःख-निरोध आहे. 'जन्म-संसार क्षीण झाला आहे, आता पुनर्भव नाही' हा निर्देश आहे. ही दोन सत्ये आहेत – दुःख आणि निरोध. भिक्षूंनो, या दोन विमुक्ती आहेत – रागाच्या विरागातून मिळणारी चेतोविमुक्ती आणि अविद्येच्या विरागातून मिळणारी प्रज्ञाविमुक्ती. जे चित्त आहे, ते दुःख आहे. जी विमुक्ती आहे, तो निरोध आहे. ही दोन सत्ये आहेत – दुःख आणि निरोध. ตตฺถ กตมํ ทุกฺขญฺจ มคฺโค จ? त्यामध्ये दुःख आणि मार्ग कोणते आहे? กุมฺภูปมํ กายมิมํ วิทิตฺวา, นครูปมํ จิตฺตมิทํ ฐเปตฺวา; โยเธถ มารํ ปญฺญาวุเธน, ชิตญฺจ รกฺเข อนิเวสโน สิยา. या शरीराला मातीच्या कुंभासारखे (नश्वर) जाणून आणि या चित्ताला नगरासारखे (सुरक्षित) करून, प्रज्ञारूपी शस्त्राने माराशी युद्ध करावे; आणि जिंकलेल्याचे रक्षण करावे व अनासक्त व्हावे. ตตฺถ [Pg.178] ยญฺจ กุมฺภูปโม กาโย ยญฺจ นครูปมํ จิตฺตํ, อิทํ ทุกฺขํ. ยํ ปญฺญาวุเธน มารํ โยเธถาติ อยํ มคฺโค. อิมานิ ทฺเว สจฺจานิ. ยํ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ, ตํ ปชหิตพฺพํ. ยา สํโยชนา, อยํ มคฺโค. เย เต ธมฺมา อนตฺตนิยา ปหาตพฺพา, รูปํ ยาว วิญฺญาณํ, อิทํ ทุกฺขญฺจ มคฺโค จ. त्यामध्ये, जे कुंभासारखे शरीर आहे आणि जे नगरासारखे चित्त आहे, ते दुःख आहे. 'प्रज्ञारूपी शस्त्राने माराशी युद्ध करावे' हा मार्ग आहे. ही दोन सत्ये आहेत. भिक्षूंनो, जे तुमचे नाही, त्याचा तुम्ही त्याग केला पाहिजे. जी संयोजने (नष्ट करणे) आहे, तो मार्ग आहे. जे अनात्म आणि त्याग करण्यायोग्य धर्म आहेत – रूपापासून विज्ञानापर्यंत – ते दुःख आणि मार्ग आहेत. ตตฺถ กตมํ ทุกฺขญฺจ สมุทโย จ นิโรโธ จ? त्यामध्ये दुःख, समुदय आणि निरोध कोणते आहे? เย เกจิ โสกา ปริเทวิตา วา, ทุกฺขา จ โลกสฺมิมเนกรูปา; ปิยํ ปฏิจฺจปฺปภวนฺติ เอเต, ปิเย อสนฺเต น ภวนฺติ เอเต. या जगात जे काही शोक, विलाप आणि अनेक प्रकारचे दुःख आहेत, ते सर्व प्रिय गोष्टीवर अवलंबून उत्पन्न होतात; प्रिय गोष्ट नसताना हे उत्पन्न होत नाहीत. เย โสกปริเทวา, ยํ จ อเนกรูปํ ทุกฺขํ, ยํ เปมโต ภวติ, อิทํ ทุกฺขํ. ยํ เปมํ, อยํ สมุทโย. โย ตตฺถ ฉนฺทราควินโย ปิยสฺส อกิริยา, อยํ นิโรโธ. อิมานิ ตีณิ สจฺจานิ. ติมฺพรุโก ปริพฺพาชโก ปจฺเจติ ‘‘สยํกตํ ปรํกต’’นฺติ. ยเถสา วีมํสา, อิทํ ทุกฺขํ. ยา เอเต ทฺเว อนฺเต อนุปคมฺม มชฺฌิมา ปฏิปทา อวิชฺชาปจฺจยา สงฺขารา ยาว ชาติปจฺจยา ชรามรณํ, อิทมฺปิ ทุกฺขญฺจ สมุทโย จ. วิญฺญาณํ นามรูปํ สฬายตนํ ผสฺโส เวทนา ภโว ชาติ ชรามรณํ, อิทํ ทุกฺขํ. อวิชฺชา สงฺขารา ตณฺหา อุปาทานํ, อยํ สมุทโย. อิติ อิทํ สยํกตํ วีมํเสยฺยาติ ยญฺจ ปฏิจฺจสมุปฺปาเท ทุกฺขํ, อิทํ เอโส สมุทโย นิทฺทิฏฺโฐ. อวิชฺชานิโรธา สงฺขารนิโรโธ จ ยาว จ ชรามรณนิโรโธติ อยํ นิโรโธ. อิมานิ ตีณิ สจฺจานิ ทุกฺขญฺจ สมุทโย จ นิโรโธ จ. जे शोक आणि विलाप आहेत, आणि जे अनेक प्रकारचे दुःख आहे, जे प्रेमामुळे (आसक्तीमुळे) उत्पन्न होते, ते दुःख आहे. जे प्रेम (आसक्ती) आहे, तो समुदय आहे. त्यामध्ये जो छंद-रागाचा त्याग आणि प्रिय गोष्टीची निर्मिती न करणे आहे, तो निरोध आहे. ही तीन सत्ये आहेत. तिम्बरुक परिव्राजक 'स्वतः केलेले किंवा दुसऱ्याने केलेले' असे मानतो. या मीमांसेनुसार हे दुःख आहे. या दोन टोकांना न जाता जो मध्यम मार्ग आहे, ज्यामध्ये अविद्येच्या प्रत्ययाने संस्कार आणि जातीच्या प्रत्ययाने जरामरण होते, हे देखील दुःख आणि समुदय आहे. विज्ञान, नामरूप, सळायतन, स्पर्श, वेदना, भव, जाती आणि जरामरण हे दुःख आहे. अविद्या, संस्कार, तृष्णा आणि उपादान हा समुदय आहे. अशा प्रकारे 'हे स्वतः केलेले आहे' अशी मीमांसा करावी. प्रतीत्यसमुत्पादात जे दुःख आहे, ते दुःख आणि समुदय म्हणून निर्दिष्ट केले आहे. अविद्येच्या निरोधाने संस्कारांचा निरोध होतो... जरामरणाचा निरोध होतो, हा निरोध आहे. ही दुःख, समुदय आणि निरोध अशी तीन सत्ये आहेत. ๑๑. ตตฺถ กตมํ ทุกฺขญฺจ สมุทโย จ มคฺโค จ? ११. त्यामध्ये दुःख, समुदय आणि मार्ग कोणते आहे? ‘‘โย ทุกฺขมทฺทกฺขิ ยโตนิทานํ, กาเมสุ โส ชนฺตุ กถํ นเมยฺย; กามา หิ โลเก สงฺคาติ ญตฺวา, เตสํ สตีมา วินยาย สิกฺเข’’ติ. ज्या मनुष्याने कामांमधील (भोगांमधील) दुःखाचे मूळ कारण पाहिले आहे, तो मनुष्य कामांकडे कसा बरे वळेल? लोकात कामासक्ती हीच आसक्ती (बंधन) आहे हे जाणून, स्मृतिमान (जागरूक) मनुष्याने तिच्या त्यागासाठी अभ्यास करावा. โย [Pg.179] ทุกฺขมทฺทกฺขิ, อิทํ ทุกฺขํ. ยโต ภวติ, อยํ สมุทโย. สนฺทิฏฺฐํ ยโต ภวติ ยาว ตสฺส วินยาย สิกฺขา, อยํ มคฺโค. อิมานิ ตีณิ สจฺจานิ. 'ज्याने दुःख पाहिले आहे' हे दुःख आहे. ज्या कारणाने ते उत्पन्न होते, तो समुदय आहे. ज्या कारणाने प्रत्यक्ष फळ मिळते आणि त्याच्या त्यागासाठी जो अभ्यास आहे, तो मार्ग आहे. ही तीन सत्ये आहेत. เอกาทสงฺคุตฺตเรสุ โคปาลโกปมสุตฺตํ. एकादश अंगुत्तर निकायात 'गोपालकोपम सुत्त' आहे. ตตฺถ ยาว รูปสญฺญุตฺตา ยญฺจ สฬายตนํ ยถา วณํ ปฏิจฺฉาเทติ ยญฺจ ติตฺถํ ยถา จ ลภติ ธมฺมูปสญฺหิตํ อุฬารํ ปีติปาโมชฺชํ จตุพฺพิธํ จ อตฺตภาวโต จ วตฺถุ, อิทํ ทุกฺขํ. ยาว อาสาฏิกํ หาเรตา โหติ, อยํ สมุทโย. รูปสญฺญุตฺตา อาสาฏกหรณํ วณปฏิจฺฉาทนํ วีถิญฺญุตา โคจรกุสลญฺจ, อยํ มคฺโค. อวเสสา ธมฺมา อตฺถิ เหตู อตฺถิ ปจฺจยา อตฺถิ นิสฺสยา สาวเสสโทหิตา อเนกปูชา จ กลฺยาณมิตฺตตปฺปจฺจยา ธมฺมา วีถิญฺญุตา จ เหตุ, อิมานิ ตีณิ สจฺจานิ. त्यामध्ये, जोपर्यंत रूपाशी संबंधित असलेले जे सळायतन आहे, ज्याप्रमाणे जखम झाकली जाते, आणि जे चार प्रकारचे श्रेष्ठ प्रीती व प्रामोज्य (आनंद) धर्माशी संबंधित आहे आणि आत्मभावाचे जे आश्रयस्थान आहे, ते दुःख आहे. जोपर्यंत आसाटिका (माशांची अंडी/परजीवी) काढली जातात, तो समुदय आहे. रूपाशी संबंधित आसाटिका काढणे, जखम झाकणे, मार्ग जाणणे आणि गोचरकुशलता (योग्य क्षेत्र जाणणे) हा मार्ग आहे. उर्वरित धर्म, हेतू, प्रत्यय, सावशेष हित, अनेक पूजांचा प्रवाह आणि धर्ममार्ग जाणणे हे हेतू आहेत; ही तीन सत्ये आहेत. ตตฺถ กตมํ ทุกฺขญฺจ มคฺโค จ นิโรโธ จ? त्यामध्ये दुःख, मार्ग आणि निरोध कोणते आहे? สติ กายคตา อุปฏฺฐิตา, ฉสุ ผสฺสายตเนสุ สํวุโต ; สตตํ ภิกฺขุ สมาหิโต, ชญฺญา นิพฺพานมตฺตโน. ज्याची कायागत स्मृती प्रस्थापित झाली आहे, जो सहा स्पर्शायतनांमध्ये संयम राखतो, तो समाहित भिक्षू सतत स्वतःच्या निर्वाणाला जाणतो. ตตฺถ ยา จ กายคตา สติ ยญฺจ สฬายตนํ ยตฺถ สพฺพญฺเจตํ ทุกฺขํ. ยา จ กายคตา สติ โย จ สีลสํวโร โย จ สมาธิ ยตฺถ ยา สติ, อยํ ปญฺญากฺขนฺโธ. สพฺพมฺปิ สีลกฺขนฺโธ สมาธิกฺขนฺโธ, อยํ มคฺโค. เอวํวิหารินา ญาตพฺพํ นิพฺพานํ. อยํ นิโรโธ, อิมานิ ตีณิ สจฺจานิ. สีเล ปติฏฺฐาย ทฺเว ธมฺมา ภาเวตพฺพา สมโถ จ วิปสฺสนา จ. ตตฺถ ยํ จิตฺตสหชาตา ธมฺมา, อิทํ ทุกฺขํ. โย จ สมโถ ยา จ วิปสฺสนา, อยํ มคฺโค. ราควิราคา จ เจโตวิมุตฺติ, อวิชฺชาวิราคา จ ปญฺญาวิมุตฺติ, อยํ นิโรโธ. อิมานิ ตีณิ สจฺจานิ. त्यामध्ये, जी कायागत स्मृती आहे आणि जे सळायतन आहे, ते सर्व दुःख आहे. जी कायागत स्मृती आहे, जो शील-संयम आहे आणि जी समाधी आहे, जिथे जी स्मृती आहे, तो प्रज्ञास्कंध आहे. सर्व शीलस्कंध आणि समाधीस्कंध हा मार्ग आहे. अशा प्रकारे विहार करणाऱ्याने निर्वाण जाणले पाहिजे, हा निरोध आहे. ही तीन सत्ये आहेत. शीलामध्ये प्रतिष्ठित होऊन शमथ आणि विपश्यना या दोन धर्मांची भावना (विकास) करावी. त्यामध्ये चित्तासोबत उत्पन्न होणारे जे धर्म आहेत, ते दुःख आहे. जो शमथ आणि जी विपश्यना आहे, तो मार्ग आहे. रागाच्या विरागामुळे चेतोविमुक्ती आणि अविद्येच्या विरागामुळे प्रज्ञाविमुक्ती होते, हा निरोध आहे. ही तीन सत्ये आहेत. ตตฺถ [Pg.180] กตโม สมุทโย จ นิโรโธ จ? त्यामध्ये समुदय आणि निरोध कोणते आहे? อาสา จ ปีหา อภินนฺทนา จ, อเนกธาตูสุ สรา ปติฏฺฐิตา; อญฺญาณมูลปฺปภวา ปชปฺปิตา, สพฺพา มยา พฺยนฺติกตา สมูลิกา. अनेक धातूंमध्ये प्रतिष्ठित असलेल्या आशा, आकांक्षा आणि अभिनंदन (आनंद), ज्या अज्ञानाच्या मुळापासून उत्पन्न झाल्या आहेत, त्या सर्व मुळासकट माझ्याद्वारे नष्ट केल्या गेल्या आहेत. อญฺญาณมูลปฺปภวาติ ปุริมเกหิ สมุทโย. สพฺพา มยา พฺยนฺติกตา สมูลิกาติ นิโรโธ. อิมานิ ทฺเว สจฺจานิ. จตุนฺนํ ธมฺมานํ อนนุโพธา อปฺปฏิเวธา วิตฺถาเรน กาตพฺพํ. อริยสฺส สีลสฺส สมาธิโน ปญฺญาย วิมุตฺติยา. ตตฺถ โย อิเมสํ จตุนฺนํ ธมฺมานํ อนนุโพธา อปฺปฏิเวธา, อยํ สมุทโย. ปฏิเวโธ ภวเนตฺติยา, อยํ นิโรโธ. อยํ สมุทโย จ นิโรโธ จ. पूर्वीच्या पदांद्वारे 'अज्ञानमूलप्रभवा' याने समुदय सांगितला आहे. 'सब्बा मया ब्यंतिकता समूलिका' याने निरोध सांगितला आहे. ही दोन सत्ये आहेत. आर्य शील, समाधी, प्रज्ञा आणि विमुक्ती या चार धर्मांचा बोध न झाल्यामुळे व प्रतिवेध (साक्षात्कार) न झाल्यामुळे विस्ताराने सांगितले पाहिजे. त्यामध्ये, या चार धर्मांचा जो बोध न होणे आणि प्रतिवेध न होणे आहे, तो समुदय आहे. भव-तृष्णेचा जो प्रतिवेध (नाश) आहे, तो निरोध आहे. हा समुदय आणि निरोध आहे. ตตฺถ กตโม สมุทโย จ มคฺโค จ? त्यामध्ये समुदय आणि मार्ग कोणते आहे? ยานิ โสตานิ โลกสฺมึ, [อชิตาติ ภควา]สติ เตสํ นิวารณํ; โสตานํ สํวรํ พฺรูมิ, ปญฺญาเยเต ปิธียเร. भगवान म्हणाले – 'अजित! जगात जे प्रवाह (स्त्रोत) आहेत, स्मृती हे त्यांचे निवारण (रोखणारे) आहे. मी प्रवाहांचा संयम सांगतो, प्रज्ञेने ते बंद केले जातात.' ยานิ โสตานีติ อยํ สมุทโย. ยา จ ปญฺญา ยา จ สติ นิวารณํ ปิธานญฺจ, อยํ มคฺโค. อิมานิ ทฺเว สจฺจานิ. สญฺเจตนิยํ สุตฺตํ ทฬฺหเนมิยานากาโร ฉหิ มาเสหิ นิทฺทิฏฺโฐ. ตตฺถ ยํ กายํ กายกมฺมํ สวงฺกํ สโทสํ สกสาวํ ยา สวงฺกตา สโทสตา สกสาวตา, อยํ สมุทโย. เอวํ วจีกมฺมํ มโนกมฺมํ อวงฺกํ อโทสํ อกสาวํ, ยา อวงฺกตา อโทสตา อกสาวตา, อยํ มคฺโค. เอวํ วจีกมฺมํ มโนกมฺมํ. อิมานิ ทฺเว สจฺจานิ สมุทโย จ มคฺโค จ. 'यानि सोतानि' हा उपदेश समुदय आहे. जी प्रज्ञा आणि जी स्मृती निवारण व आवरण (बंद करणे) आहे, तो मार्ग आहे. ही दोन सत्ये आहेत. संचेतनिय सुत्तात दृढनेमी राजाच्या देवलोकात जाण्याचा प्रकार सहा महिन्यांनी निर्देशित केला आहे. त्यामध्ये, जे कायकर्म वक्र (कुटिल), सदोष आणि सकषाय (मलयुक्त) आहे, आणि जी वक्रता, सदोषता व सकषायता आहे, तो समुदय आहे. तसेच जे वचीकर्म आणि मनोकर्म अवक्र (सरळ), अदोष आणि अकषाय आहे, आणि जी अवक्रता, अदोषता व अकषायता आहे, तो मार्ग आहे. वचीकर्म आणि मनोकर्म देखील असेच आहे. ही दोन सत्ये आहेत – समुदय आणि मार्ग. ตตฺถ กตโม สมุทโย จ นิโรโธ จ มคฺโค จ? त्यामध्ये समुदय, निरोध आणि मार्ग कोणते आहे? ‘‘นิสฺสิตสฺส จลิตํ, อนิสฺสิตสฺส จลิตํ นตฺถิ, จลิเต อสติ ปสฺสทฺธิ, ปสฺสทฺธิยา สติ นติ น โหติ, นติยา อสติ อาคติคติ น โหติ, อาคติคติยา อสติ จุตูปปาโต น โหติ, จุตูปปาเต อสติ เนวิธ น หุรํ น อุภยมนฺตเรน. เอเสวนฺโต ทุกฺขสฺสา’’ติ. आश्रित (संसारावर अवलंबून असलेल्या) व्यक्तीमध्ये चंचलता असते; अनाश्रित व्यक्तीमध्ये चंचलता नसते. चंचलता नसताना प्रस्रब्धी (शांतता) असते. प्रस्रब्धी असताना प्रवृत्ती (झुकाव) नसतो. प्रवृत्ती नसताना गमन-आगमन (आगति-गति) नसते. गमन-आगमन नसताना च्युती आणि उत्पत्ती (मृत्यू आणि जन्म) नसते. च्युती आणि उत्पत्ती नसताना इहलोक नाही, परलोक नाही आणि या दोन्हीच्या मध्ये काही नाही. हाच दुःखाचा अंत आहे. ตตฺถ [Pg.181] ทฺเว นิสฺสยา, อยํ สมุทโย. โย จ อนิสฺสโย, ยา จ อนติ, อยํ มคฺโค. ยา อาคติคติ น โหติ จุตูปปาโต จ โย เอเสวนฺโต ทุกฺขสฺสาติ, อยํ นิโรโธ. อิมานิ ตีณิ สจฺจานิ. อนุปฏฺฐิตกายคตา สติ…เป… ยํ วิมุตฺติญาณทสฺสนํ, อยํ สมุทโย. เอการสอุปนิสฺสยา วิมุตฺติโย ยาว อุปนิสฺสยอุปสมฺปทา อุปฏฺฐิตกายคตาสติสฺส วิหรติ. สีลสํวโร โสสานิโย โหติ, ยญฺจ วิมุตฺติญาณทสฺสนํ, อยํ มคฺโค. ยา จ วิมุตฺติ, อยํ นิโรโธ. อิมานิ ตีณิ สจฺจานิ. สมุทโย จ นิโรโธ จ มคฺโค จ. तेथे दोन आश्रय आहेत, हा 'समुदय' आहे. जो अनाश्रय आहे आणि जी अनती (झुकाव नसणे) आहे, हा 'मार्ग' आहे. जे गमन-आगमन नसणे आणि च्युती-उत्पत्ती नसणे आहे, हाच दुःखाचा अंत आहे, हा 'निरोध' आहे. ही तीन सत्ये आहेत. अनुपस्थित कायगतास्मृती... (पेय्याल)... जे विमुक्ती-ज्ञानदर्शन आहे, हा 'समुदय' आहे. अकरा उपनिसय (उपनिषय) असलेल्या विमुक्ती, जोपर्यंत उपनिसय-संपदा प्राप्त होत नाही तोपर्यंत, उपस्थित कायगतास्मृती असलेल्या व्यक्तीमध्ये वास करतात. शीलसंवर हा त्याचा आश्रय होतो, आणि जे विमुक्ती-ज्ञानदर्शन आहे, हा 'मार्ग' आहे. आणि जी विमुक्ती आहे, हा 'निरोध' आहे. ही तीन सत्ये आहेत: समुदय, निरोध आणि मार्ग. ๑๒. ตตฺถ กตโม นิโรโธ จ มคฺโค จ? १२. त्यात निरोध आणि मार्ग कोणते आहेत? สยํ กเตน สจฺเจน, เตน อตฺตนา อภินิพฺพานคโต วิติณฺณกงฺโข; วิภวญฺจ ญตฺวา โลกสฺมึ, ตาว ขีณปุนพฺภโว ส ภิกฺขุ. स्वतः साध्य केलेल्या सत्याने, स्वतः निर्वाणप्रत पोहोचलेला आणि शंकामुक्त झालेला; आणि जगामध्ये विभव (भव-विनाश) जाणून, ज्याचा पुनर्जन्म नष्ट झाला आहे, तोच भिक्खू होय. ยํ สจฺเจน, อยํ มคฺโค. ยํ ขีณปุนพฺภโว, อยํ นิโรโธ. อิมานิ ทฺเว สจฺจานิ. ปญฺจ วิมุตฺตายตนานิ สตฺถา วา ธมฺมํ เทเสสิ อญฺญตโร วา วิญฺญู สพฺรหฺมจารีติ วิตฺถาเรน กาตพฺพา. ตสฺส อตฺถปฺปฏิสํเวทิสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ, ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ, ยาว นิพฺพินฺทนฺโต วิรชฺชติ, อยํ มคฺโค. ยา วิมุตฺติ, อยํ นิโรโธ. เอวํ ปญฺจ วิมุตฺตายตนานิ วิตฺถาเรน. อิมานิ ทฺเว สจฺจานิ นิโรโธ จ มคฺโค จ. जे सत्याने (प्राप्त होते), हा 'मार्ग' आहे. जे क्षीणपुनर्भव (पुनर्जन्म नष्ट होणे) आहे, हा 'निरोध' आहे. ही दोन सत्ये आहेत. पाच विमुक्तायतने (विमुक्तीची स्थाने) - 'शास्ता (बुद्ध) धर्मोपदेश करतात किंवा अन्य कोणी सुज्ञ सब्रह्मचारी उपदेश करतो' - हे विस्ताराने जाणावे. त्या अर्थाचे संवेदन करणाऱ्याला प्रमोद उत्पन्न होतो, प्रमुदिताला प्रीती उत्पन्न होते, जोपर्यंत तो निर्वेद (वैराग्य) प्राप्त करून विरक्त होत नाही; हा 'मार्ग' आहे. जी विमुक्ती आहे, हा 'निरोध' आहे. याप्रमाणे पाच विमुक्तायतने विस्ताराने सांगितली आहेत. ही दोन सत्ये आहेत: निरोध आणि मार्ग. อิมานิ สาธารณานิ สุตฺตานิ. อิเมหิ สาธารเณหิ สุตฺเตหิ ยถานิกฺขิตฺเตหิ ปฏิเวธโต จ ลกฺขณโต จ โอตาเรตฺวา อญฺญานิ สุตฺตานิ นิทฺทิสิตพฺพานิ อปริหายนฺเตน. คาถาหิ คาถา อนุมินิตพฺพา, พฺยากรเณหิ พฺยากรณํ. อิเม จ สาธารณา ทส ปริวฑฺฒกา เอโก จ จตุกฺโก นิทฺเทโส สาธารโณ. อยญฺจ ปกิณฺณกนิทฺเทโส. เอกํ ปญฺจ ฉ จ สเวกเทโส สพฺพํ. อิเม ทฺเว ปริวชฺชนา ปุริมกา จ ทส. อิเม ทฺวาทส ปริวฑฺฒกา สจฺจานิ. เอตฺตาวตา สพฺพํ สุตฺตํ นตฺถิ, ตํ พฺยากรณํ วา คาถา วิย. อิเมหิ ทฺวาทสหิ ปริวฑฺฒเกหิ น โอตริตุํ อปฺปมตฺเตน ปริเยสิตฺวา นิทฺทิสิตพฺพา. ही साधारण (सामायिक) सुत्ते आहेत. या मांडलेल्या साधारण सुत्तांच्या आधारे, प्रतिवेध (साक्षात्कार) आणि लक्षण यांच्याद्वारे पडताळून पाहून, इतर सुत्तांचे न चुकता निर्देश करावेत. गाथांद्वारे गाथांची तुलना करावी, व्याकरणाद्वारे (स्पष्टीकरणाद्वारे) व्याकरणाची. ही दहा साधारण सुत्ते वाढवणारी (परिवर्धक) आहेत आणि एक चतुष्क निर्देश साधारण आहे. आणि हा प्रकीर्णक निर्देश आहे. एक, पाच आणि सहा हे सर्व एका अंशाने आहेत. हे दोन वर्ज्य करून आणि पूर्वीचे दहा, ही बारा परिवर्धक सत्ये आहेत. एवढ्यानेच सर्व सुत्त संपत नाही, ते व्याकरणासारखे किंवा गाथेसारखे आहे. या बारा परिवर्धकांद्वारे आकलन न करता, थोडा शोध घेऊन निर्देश करू नये. ตตฺถายํ สงฺเขโป. สพฺพํ ทุกฺขํ สตฺตหิ ปเทหิ สโมสรณํ คจฺฉติ. กตเรหิ สตฺตหิ? อปฺปิยสมฺปโยโค จ ปิยวิปฺปโยโค จ, อิเมหิ ทฺวีหิ [Pg.182] ปเทหิ สพฺพํ ทุกฺขํ นิทฺทิสิตพฺพํ. ตสฺส ทฺเว นิสฺสยา – กาโย จ จิตฺตญฺจ. เตน วุจฺจติ ‘‘กายิกํ ทุกฺขํ เจตสิกญฺเจ’’ติ, นตฺถิ ตํ ทุกฺขํ น กายิกํ วา น เจตสิกํ, สพฺพํ ทุกฺขํ ทฺวีหิ ทุกฺเขหิ นิทฺทิสิตพฺพํ กายิเกน จ เจตสิเกน จ. ตีหิ ทุกฺขตาหิ สงฺคหิตํ ทุกฺขทุกฺขตาย สงฺขารทุกฺขตาย วิปริณามทุกฺขตาย. อิติ ตํ สพฺพํ ทุกฺขํ ตีหิ ทุกฺขตาหิ สงฺคหิตํ. อิติ อิทญฺจ ทุกฺขํ ติวิธํ. ทุวิธํ ทุกฺขํ กายิกญฺจ เจตสิกญฺจ. ทุวิธํ อปฺปิยสมฺปโยโค จ ปิยวิปฺปโยโค จ. อิทํ สตฺตวิธํ ทุกฺขํ. तेथे हा संक्षेप आहे: सर्व दुःख सात पदांमध्ये समाविष्ट होते. कोणत्या सात पदांमध्ये? 'अप्रिय संप्रयोग' आणि 'प्रिय विप्रयोग' - या दोन पदांद्वारे सर्व दुःखाचा निर्देश केला पाहिजे. त्याचे दोन आश्रय आहेत - काय (शरीर) आणि चित्त. म्हणूनच म्हटले जाते: 'कायिक दुःख आणि चैतसिक दुःख'. असे कोणतेही दुःख नाही जे कायिक किंवा चैतसिक नाही. सर्व दुःखाचा निर्देश कायिक आणि चैतसिक या दोन दुःखांद्वारे केला पाहिजे. ते तीन दुःखतांमध्ये समाविष्ट आहे: दुःख-दुःखता, संस्कार-दुःखता आणि विपरिणाम-दुःखता. अशा प्रकारे ते सर्व दुःख तीन दुःखतांमध्ये समाविष्ट आहे. या प्रकारे हे दुःख त्रिविध (तीन प्रकारचे) आहे. द्विविध दुःख म्हणजे कायिक आणि चैतसिक. द्विविध म्हणजे अप्रिय संप्रयोग आणि प्रिय विप्रयोग. हे सात प्रकारचे दुःख आहे. ตตฺถ ติวิโธ สมุทโย อจตุตฺโถ อปญฺจโม. กตโม ติวิโธ? ตณฺหา จ ทิฏฺฐิ จ กมฺมํ. ตตฺถ ตณฺหา จ ภวสมุทโย กมฺมํ. ตถา นิพฺพตฺตสฺส หีนปณีตตา, อยํ สมุทโย. อิติ ยาปิ ภวคตีสุ หีนตา จ ปณีตตา จ, ยาปิ ตีหิ ทุกฺขตาหิ สงฺคหิตา, โยปิ ทฺวีหิ มูเลหิ สมุทานีโต อวิชฺชาย นิวุตสฺส ภวตณฺหาสํยุตฺตสฺส สวิญฺญาณโก กาโย, โสปิ ตีหิ ทุกฺขตาหิ สงฺคหิโต. तेथे समुदय त्रिविध (तीन प्रकारचा) आहे, चौथा किंवा पाचवा नाही. तो त्रिविध कोणता? तण्हा (तृष्णा), दिट्ठी (दृष्टी) आणि कम्म (कर्म). तेथे तण्हा आणि कम्म हे भवसमुदय (भवाचे कारण) आहेत. तसेच उत्पन्न झालेल्या जीवाचे हीनत्व आणि प्रणीतत्व (उच्चत्व) हे देखील 'समुदय' आहे. अशा प्रकारे भवगतींमध्ये जे हीनत्व आणि प्रणीतत्व आहे, जे three दुःखतांमध्ये समाविष्ट आहे, आणि जे दोन मुळांद्वारे (अविद्या आणि भवतण्हा) निर्माण झाले आहे - अविद्येने झाकलेल्या आणि भवतण्हेने युक्त असलेल्या जीवाचे जे सविज्ञानक काय (शरीर) आहे, ते देखील तीन दुःखतांमध्ये समाविष्ट आहे. ตถา วิปลฺลาสโต ทิฏฺฐิภวคนฺตพฺพา. สา สตฺตวิธา นิทฺทิสิตพฺพา. เอโก วิปลฺลาโส ตีณิ นิทฺทิสียติ, จตฺตาริ วิปลฺลาสวตฺถูนิ. ตตฺถ กตโม เอโก วิปลฺลาโส? โย วิปรีตคฺคาโห ปฏิกฺเขเปน, โอตรณํ ยถา ‘‘อนิจฺเจ นิจฺจ’’มิติ วิปรีตํ คณฺหาติ. เอวํ จตฺตาโร วิปลฺลาสา. อยเมโก วิปลฺลาสียติ สญฺญา จิตฺตํ ทิฏฺฐิ. กตมานิ จตฺตาริ วิปลฺลาสวตฺถูนิ? กาโย เวทนา จิตฺตํ ธมฺมา. เอวํ วิปลฺลาสคตสฺส อกุสลญฺจ ปวฑฺเฒติ. ตตฺถ สญฺญาวิปลฺลาโส โทสํ อกุสลมูลํ ปวฑฺเฒติ. จิตฺตวิปลฺลาโส โลภํ อกุสลมูลํ ปวฑฺเฒติ. ทิฏฺฐิวิปลฺลาโส โมหํ อกุสลมูลํ ปวฑฺเฒติ. ตตฺถ โทสสฺส อกุสลมูลสฺส ตีณิ มิจฺฉตฺตานิ ผลํ – มิจฺฉาวาจา มิจฺฉากมฺมนฺโต มิจฺฉาอาชีโว; โลภสฺส อกุสลมูลสฺส ตีณิ มิจฺฉตฺตานิ ผลํ – มิจฺฉาสงฺกปฺโป มิจฺฉาวายาโม มิจฺฉาสมาธิ; โมหสฺส อกุสลมูลสฺส ทฺเว มิจฺฉตฺตานิ ผลํ – มิจฺฉาทิฏฺฐิ จ มิจฺฉาสติ จ. เอวํ อกุสลํ สเหตุ สปฺปจฺจยํ วิปลฺลาสา จ ปจฺจโย, อกุสลมูลานิ สเหตู เอเตเยว ปฏิปกฺเขน อนูนา อนธิกา ทฺวีหิ ปจฺจเยหิ นิทฺทิสิตพฺพา. นิโรเธ จ มคฺเค จ วิปลฺลาสมุปาทาย ปรโต ปฏิปกฺเขน จตสฺโส. तसेच, विपल्लासाने (विपर्यासाने) दिट्ठी (मिथ्या दृष्टी) समजली पाहिजे. ती सात प्रकारांनी निर्देशित केली पाहिजे. एक विपर्यास तीन प्रकारे निर्देशित केला जातो, आणि चार विपर्यास-वस्तू आहेत. तेथे एक विपर्यास कोणता? जो विपरीत ग्रह (चुकीचे ग्रहण करणे) आहे, जो निषेधाने दर्शविला जातो; जसे की 'अनित्यामध्ये नित्य' असे विपरीत ग्रहण करणे. याप्रमाणे चार विपर्यास आहेत. हा एक विपर्यास संज्ञा, चित्त आणि दृष्टी यांच्याद्वारे विपर्यस्त होतो. चार विपर्यास-वस्तू कोणत्या? काय (शरीर), वेदना, चित्त आणि धम्म (धर्म). अशा प्रकारे विपर्यास पावलेल्या व्यक्तीचे अकुशल वाढते. तेथे संज्ञा-विपर्यास हा दोस (द्वेष) या अकुशलमुळाला वाढवतो. चित्त-विपर्यास हा लोभ या अकुशलमुळाला वाढवतो. दृष्टी-विपर्यास हा मोह या अकुशलमुळाला वाढवतो. तेथे दोस या अकुशलमुळाचे तीन मिथ्यात्व हे फळ आहे - मिच्छावाचा, मिच्छाकम्मंत आणि मिच्छाआजीव; लोभ या अकुशलमुळाचे तीन मिथ्यात्व हे फळ आहे - मिच्छासंकप्प, मिच्छावायाम आणि मिच्छासमाधी; मोह या अकुशलमुळाचे दोन मिथ्यात्व हे फळ आहे - मिच्छादिट्ठी आणि मिच्छासती. याप्रमाणे अकुशल हे सहेतुक आणि सप्रत्यय (प्रत्ययासह) आहे, आणि विपर्यास हे त्याचे कारण आहे. अकुशलमुळे सहेतुक आहेत. याच गोष्टी प्रतिपक्षाने (विरुद्ध बाजूने), कमी किंवा जास्त न करता, दोन प्रत्ययांद्वारे निर्देशित केल्या पाहिजेत. निरोध आणि मार्ग यांमध्ये विपर्यासाला अनुसरून पुढे प्रतिपक्षाने चार (विपर्यास-रहित अवस्था) निर्देशित केल्या पाहिजेत. ตตฺถิมา อุทฺทานคาถา तेथे या उद्दानगाथा (संग्रह-गाथा) आहेत: อวิชฺชาย [Pg.183] นิวุโต โลโก, จิตฺตํ สํโยชนมฺปิ; สา ปจฺฉินฺนภวตณฺหา, ทฺเวมา เจว วิมุตฺติโย. जग अविद्येने झाकलेले आहे, चित्त संयोजनाने (बंधनाने) बांधलेले आहे; तिची भवतण्हा (भवतृष्णा) छिन्न झाली आहे, आणि या दोनच विमुक्ती आहेत. กุมฺภูปมํ กายมิมํ, ยํ น ตุมฺหากํ ตํ ปชห ; เย เกจิ โสกปริเทวา, ติมฺพรุโก จ สยํกตํ. हा काय (देह) घटासारखा आहे, जे तुमचे नाही त्याचा त्याग करा; जे काही शोक आणि परिदेव आहेत, ते तिंबरुक आणि स्वतः केलेले (कर्म) आहेत. ทุกฺขํ ทิฏฺฐิ จ อุปฺปนฺนํ, ยญฺจ โคปาลโกปมํ; สติ กายคตา มาหุ, สมโถ จ วิปสฺสนา. उत्पन्न झालेले दुःख आणि जी दृष्टी आहे, ती गोपाळकासारखी (गुराख्यासारखी) आहे; कायगतास्मृती, समथ आणि विपश्यना असे (ज्ञानी लोक) म्हणतात. อาสา ปิหา จ อภินนฺทนา จ, จตุนฺนมนนุโพธนา; ยานิ โสตานิ โลกสฺมึ, ทฬฺหํ เนมิยานากาโร. आशा (इच्छा), स्पृहा आणि अभिनंदना (आसक्ती), आणि चार (आर्य सत्यांचे) आकलन न होणे; जगात जे काही स्त्रोत (प्रवाह) आहेत, ते रथाच्या चाकाच्या धावेसारखे घट्ट आहेत, जे यान बनवणाऱ्यासारखे आहेत. ยํ นิสฺสิตสฺส จลิตํ, อนุปฏฺฐิตกายคตาสติ; สยํ กเตน สจฺเจน, วิมุตฺตายตเนหิ จ. आश्रित व्यक्तीमध्ये जी चंचलता असते, ती अनुपस्थित कायगतास्मृतीमुळे असते; स्वतः साध्य केलेल्या सत्याने आणि विमुक्तायतनांद्वारे (ती दूर केली जाते). เปฏโกปเทเส มหากจฺจายเนน ภาสิเต ปฐมภูมิ อริยสจฺจปฺปกาสนา นาตํ ชีวตา ภควตา มาทิเสน สมุทฺทเนน ตถาคเตนาติ. आयुष्यमान भगवंतांनी, माझ्यासारख्या तथागतांनी चांगल्या प्रकारे उपदेशिलेल्या, आणि महाकच्चायनांनी भाषिलेल्या या 'पेटकोपदेस' ग्रंथातील पहिली भूमी 'अरियासच्चप्पकासना' (आर्यसत्य-प्रकाशन) नावाची आहे. ๒. สาสนปฏฺฐานทุติยภูมิ २. सासनपट्ठान-दुतीयभूमी ๑๓. ตตฺถ กตมํ สาสนปฺปฏฺฐานํ? สํกิเลสภาคิยํ สุตฺตํ, วาสนา ภาคิยํ สุตฺตํ, นิพฺเพธภาคิยํ สุตฺตํ, อเสกฺขภาคิยํ สุตฺตํ, สํกิเลสภาคิยญฺจ วาสนาภาคิยญฺจ, สํกิเลสภาคิยญฺจ นิพฺเพธภาคิยญฺจ, สํกิเลสภาคิยญฺจ นิพฺเพธภาคิยญฺจ อเสกฺขภาคิยญฺจ, วาสนาภาคิยญฺจ นิพฺเพธภาคิยญฺจ. อาณตฺติ, ผลํ, อุปาโย, อาณตฺติ จ ผลญฺจ, ผลญฺจ อุปาโย จ, อาณตฺติ จ ผลญฺจ อุปาโย จ. อสฺสาโท, อาทีนโว, นิสฺสรณํ, อสฺสาโท จ อาทีนโว จ, อสฺสาโท จ นิสฺสรณญฺจ, อาทีนโว จ นิสฺสรณญฺจ, อสฺสาโท จ อาทีนโว จ นิสฺสรณญฺจ. โลกิกํ, โลกุตฺตรํ, โลกิกญฺจ โลกุตฺตรญฺจ. กมฺมํ, วิปาโก, กมฺมญฺจ วิปาโก จ. นิทฺทิฏฺฐํ, อนิทฺทิฏฺฐํ, นิทฺทิฏฺฐญฺจ อนิทฺทิฏฺฐญฺจ. ญาณํ, เญยฺยํ, ญาณญฺจ เญยฺยญฺจ. ทสฺสนํ, ภาวนา, ทสฺสนญฺจ ภาวนา จ. วิปากกมฺมํ, น วิปากกมฺมํ, เนววิปากนวิปากกมฺมํ[Pg.184]. สกวจนํ, ปรวจนํ, สกวจนญฺจ ปรวจนญฺจ. สตฺตาธิฏฺฐานํ, ธมฺมาธิฏฺฐานํ, สตฺตาธิฏฺฐานญฺจ ธมฺมาธิฏฺฐานญฺจ. ถโว, สกวจนาธิฏฺฐานํ, ปรวจนาธิฏฺฐานํ, สกวจนาธิฏฺฐานญฺจ ปรวจนาธิฏฺฐานญฺจ. กิริยํ, ผลํ, กิริยญฺจ ผลญฺจ. อนุญฺญาตํ, ปฏิกฺขิตฺตํ, อนุญฺญาตญฺจ ปฏิกฺขิตฺตญฺจ. อิมานิ ฉ ปฏิกฺขิตฺตานิ. १३. त्यामध्ये सासनपट्ठान कोणते? संकिलेसभागिय सुत्त, वासनाभागिय सुत्त, niब्बेधभागिय सुत्त, असेक्खभागिय सुत्त, संकिलेसभागिय आणि वासनाभागिय सुत्त, संकिलेसभागिय आणि निब्बेधभागिय सुत्त, संकिलेसभागिय, निब्बेधभागिय आणि असेक्खभागिय सुत्त, वासनाभागिय आणि निब्बेधभागिय सुत्त. आणत्ति सुत्त, फल सुत्त, उपाय सुत्त, आणत्ति आणि फल सुत्त, फल आणि उपाय सुत्त, आणत्ति, फल आणि उपाय सुत्त. अस्साद सुत्त, आदीनव सुत्त, निस्सरण सुत्त, अस्साद आणि आदीनव सुत्त, अस्साद आणि निस्सरण सुत्त, आदीनव आणि निस्सरण सुत्त, अस्साद, आदीनव आणि निस्सरण सुत्त. लोकिक सुत्त, लोकुत्तर सुत्त, लोकिक आणि लोकुत्तर सुत्त. कम्म सुत्त, विपाक सुत्त, कम्म आणि विपाक सुत्त. निद्दिठ्ठ सुत्त, अनिद्दिठ्ठ सुत्त, निद्दिठ्ठ आणि अनिद्दिठ्ठ सुत्त. ञाण सुत्त, ञेय्य सुत्त, ञाण आणि ञेय्य सुत्त. दस्सन सुत्त, भावना सुत्त, दस्सन आणि भावना सुत्त. विपाककम्म सुत्त, न-विपाककम्म सुत्त, नेवविपाक-नविपाककम्म सुत्त. सकवचन सुत्त, परवचन सुत्त, सकवचन आणि परवचन सुत्त. सत्ताधिट्ठान सुत्त, धम्माधिट्ठान सुत्त, सत्ताधिट्ठान आणि धम्माधिट्ठान सुत्त. थव सुत्त, सकवचनाधिट्ठान सुत्त, परवचनाधिट्ठान सुत्त, सकवचनाधिट्ठान आणि परवचनाधिट्ठान सुत्त. किरिय सुत्त, फल सुत्त, किरिय आणि फल सुत्त. अनुञ्ञात सुत्त, पटिक्खित्त सुत्त, अनुञ्ञात आणि पटिक्खित्त सुत्त. ही सहा पटिक्खित्त सुत्ते आहेत. ๑๔. ตตฺถ กตมํ สํกิเลสภาคิยํ สุตฺตํ? १४. त्यामध्ये संकिलेसभागिय सुत्त कोणते? กามนฺธา ชาลสญฺฉนฺนา, ตณฺหาฉทนฉาทิตา; ปมตฺตพนฺธุนา พทฺธา, มจฺฉาว กุมินามุเข; ชรามรณมนฺเวนฺติ, วจฺโฉ ขีรปโกว มาตรํ. कामवासनेने आंधळे झालेले, तृष्णेच्या जाळ्याने वेढलेले, तृष्णेच्या छताने झाकलेले, आणि प्रमत्त बंधूने (माराने) बांधलेले प्राणी, माशांच्या सापळ्यात अडकलेल्या माशांप्रमाणे, जरा आणि मरणाच्या मागे जातात; ज्याप्रमाणे दूध पिणारे वासरू आपल्या आईच्या मागे जाते. ปญฺจิเม, ภิกฺขเว, นีวรณา. भिक्खूहो, ही पाच नीवरणे आहेत. ตตฺถ กตมํ วาสนาภาคิยํ สุตฺตํ? त्यामध्ये वासनाभागिय सुत्त कोणते? มโนปุพฺพงฺคมา ธมฺมา, มโนเสฏฺฐา มโนมยา; มนสา เจ ปสนฺเนน, ภาสติ วา กโรติ วา; ตโต นํ สุขมนฺเวติ, ฉายาว อนปายินี. सर्व मानसिक अवस्थांमध्ये मन हे अग्रगामी आहे, मन हे श्रेष्ठ आहे आणि त्या मनोमय आहेत. जर कोणी प्रसन्न मनाने बोलतो किंवा कृती करतो, तर सुख त्याच्या मागे जाते, ज्याप्रमाणे कधीही सोडून न जाणारी सावली मागे जाते. สํยุตฺตเก สุตฺตํ. हे संयुत्त निकामधील सुत्त आहे. มหานามสฺส สกฺกสฺส อิทํ ภควา สกฺยานํ กปิลวตฺถุมฺหิ นคเร นยวิตฺถาเรน สทฺธาสีลปริภาวิตํ สุตฺตํ ภาวญฺเญน ปริภาวิตํ ตํ นาม ปจฺฉิเม กาเล. भगवंतांनी शाक्यांच्या कपिलवस्तू नगरात, शाक्य महानामाला विस्तृत पद्धतीने श्रद्धा आणि शीलाने परिभावित असलेले हे सुत्त उपदेशिले, जे नंतरच्या काळात भावनायुक्त होईल. ตตฺถ กตมํ นิพฺเพธภาคิยํ สุตฺตํ? त्यामध्ये निब्बेधभागिय सुत्त कोणते? อุทฺธํ อโธ สพฺพธิ วิปฺปมุตฺโต, อยํ อหสฺมีติ อนานุปสฺสี; เอวํ วิมุตฺโต อุทตาริ โอฆํ, อติณฺณปุพฺพํ อปุนพฺภวาย. वर, खाली आणि सर्व बाजूंनी पूर्णपणे मुक्त असलेला, 'मी हा आहे' असे न पाहणारा; अशा प्रकारे मुक्त झालेला अरिहंत, पुनर्जन्म न होण्यासाठी, पूर्वी कधीही पार न केलेल्या ओघाला (संसार-प्रवाहाला) पार करतो. สีลานิ นุ โข ภวนฺติ กิมตฺถิยานิ อานนฺโท ปุจฺฉติ สตฺถารํ. आनंद शास्त्यांना विचारतात, 'शील कोणत्या उद्देशासाठी असतात?' ตตฺถ [Pg.185] กตมํ อเสกฺขภาคิยํ สุตฺตํ? त्यामध्ये असेक्खभागिय सुत्त कोणते? ‘‘ยสฺส เสลูปมํ จิตฺตํ, ฐิตํ นานุปกมฺปติ; วิรตฺตํ รชนีเยสุ, โกปเนยฺเย น กุปฺปติ; ยสฺเสวํ ภาวิตํ จิตฺตํ, กุโต ตํ ทุกฺขเมสฺสตี’’ติ. ज्याचे चित्त पर्वतासारखे स्थिर आहे आणि डळमळीत होत नाही; जे राग उत्पन्न करणाऱ्या गोष्टींमध्ये अनासक्त आहे आणि क्रोध उत्पन्न करणाऱ्या गोष्टींवर क्रुद्ध होत नाही; ज्याचे चित्त अशा प्रकारे विकसित झाले आहे, त्याला दुःख कोठून स्पर्श करणार? สาริปุตฺโต นาม ภควา เถรญฺญตโร โส มํ อาสชฺช อปฺปฏินิสฺสชฺช จาริกํ ปกฺกมติ, สาริปุตฺตสฺส พฺยากรณํ กาตพฺพํ. ยสฺส นูน ภควา กายคตา สติ อภาวิตา อสฺส อพหุลีกตา วิตฺถาเรน กาตพฺพํ. भगवंतांनी म्हटले, 'सारिपुत्त नावाचे एक थेर आहेत. ते माझ्या जवळ येऊन, मला न सोडता चारिकेसाठी निघाले आहेत. सारिपुत्तांचे स्पष्टीकरण केले पाहिजे. ज्याने खरोखर कायगतासती विकसित केली नाही, वारंवार अभ्यासली नाही, त्याचे विस्तृत वर्णन केले पाहिजे.' ๑๕. ตตฺถ กตมํ สํกิเลสภาคิยญฺจ วาสนาภาคิยญฺจ? १५. त्यामध्ये संकिलेसभागिय आणि वासनाभागिय सुत्त कोणते? ฉนฺนมติวสฺสติ, วิวฏํ นาติวสฺสติ; ตสฺมา ฉนฺนํ วิวเรถ, เอวํ ตํ นาติวสฺสติ. झाकलेल्या गोष्टीवर पाऊस पडतो, उघड्या केलेल्या गोष्टीवर पाऊस पडत नाही; म्हणून झाकलेले उघडे करावे, म्हणजे त्यावर पाऊस पडणार नाही. ฉนฺนมติวสฺสตีติ สํกิเลโส. วิวฏํ นาติวสฺสตีติ วาสนา. ตโม ตมปรายโนติ วิตฺถาเรน. ตตฺถ โย จ ตโม โย จ ตมปรายโน, อยํ สํกิเลโส. โย จ โชติ โย จ โชติปรายโน, อยํ วาสนา. 'झाकलेल्या गोष्टीवर पाऊस पडतो' हे संकिलेस सुत्त आहे. 'उघड्या केलेल्या गोष्टीवर पाऊस पडत नाही' हे वासना सुत्त आहे. 'अंधाराकडून अंधाराकडे जाणारा' इत्यादी विस्तृतपणे समजावे. त्यामध्ये जो अंधारात आहे आणि जो अंधाराकडे जाणारा आहे, हे संकिलेस सुत्त आहे. आणि जो प्रकाशात आहे आणि जो प्रकाशाकडे जाणारा आहे, हे वासना सुत्त आहे. ตตฺถ กตมํ สํกิเลสภาคิยญฺจ นิพฺเพธภาคิยญฺจ สุตฺตํ? त्यामध्ये संकिलेसभागिय आणि निब्बेधभागिय सुत्त कोणते? น ตํ ทฬฺหํ พนฺธนมาหุ ธีรา, ยทายสํ ทารุชปพฺพชญฺจ ; สารตฺตรตฺตา มณิกุณฺฑเลสุ, ปุตฺเตสุ ทาเรสุ จ ยา อเปกฺขา. ज्ञानी लोक त्याला मजबूत बंधन म्हणत नाहीत, जे लोखंडाचे, लाकडाचे किंवा दोरीचे बनलेले असते; परंतु मणी आणि कुंडलांमधील तीव्र आसक्ती, आणि मुले व पत्नी यांच्याविषयीची जी आसक्ती असते, (तेच खरे मजबूत बंधन आहे). น ตํ ทฬฺหํ พนฺธนมาหุ ธีรา, ยทา ปุตฺเตสุ ทาเรสุ จ ยา อเปกฺขา, อยํ สํกิเลโส. เอตมฺปิ เฉตฺวา ปริพฺพชนฺติ ธีรา อนเปกฺขิโน สพฺพกาเม ปหายาติ, อยํ นิพฺเพโธ. ยํ เจตยิตํ ปกปฺปิตํ ยา จ นามรูปสฺส อวกฺกนฺติ โหติ. อิเมหิ จตูหิ ปเทหิ สํกิเลโส. ปจฺฉิมเกหิ จตูหิ นิพฺเพโธ. 'ज्ञानी लोक त्याला मजबूत बंधन म्हणत नाहीत...' आणि 'मुले व पत्नी यांच्याविषयीची जी आसक्ती असते', हे संकिलेस सुत्त आहे. 'या बंधनालाही तोडून, सर्व कामांचा त्याग करून, अनासक्त होऊन ज्ञानी लोक प्रव्रजित होतात', हे निब्बेध सुत्त आहे. जे संकल्प, विचार आणि नामरूपाचा जो प्रवेश होतो, या चार पदांनी संकिलेस दर्शविला आहे. नंतरच्या चार पदांनी निब्बेध दर्शविला आहे. ตตฺถ กตมํ สํกิเลสภาคิยญฺจ นิพฺเพธภาคิยญฺจ อเสกฺขภาคิยญฺจ สุตฺตํ? त्यामध्ये संकिलेसभागिय, निब्बेधभागिय आणि असेक्खभागिय सुत्त कोणते? อยํ [Pg.186] โลโก สนฺตาปชาโต, ผสฺสปเรโต โรคํ วทติ อตฺตโต; เยน เยน หิ มญฺญนฺติ, ตโต ตํ โหติ อญฺญถา. हा लोक संतापाने पीडित आहे, वेदनांनी ग्रस्त आहे आणि रोगालाच 'आत्मा' म्हणतो; ते ज्या ज्या प्रकारे विचार करतात, ते त्यापेक्षा वेगळेच होते. อญฺญถาภาวี ภวสตฺโต โลโก, ภวปเรโต ภวเมวาภินนฺทติ; ยทภินนฺทติ ตํ ภยํ, ยสฺส ภายติ ตํ ทุกฺขํ; ภววิปฺปหานาย โข ปนิทํ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ. बदलणारा आणि भवात आसक्त असलेला हा लोक, भवाने ग्रस्त होऊन भवाचाच आनंद घेतो; ज्याचा तो आनंद घेतो, तेच भय आहे, ज्याची त्याला भीती वाटते, तेच दुःख आहे; भवाचा पूर्ण त्याग करण्यासाठीच हे ब्रह्मचर्य पाळले जाते. เย หิ เกจิ สมณา วา พฺราหฺมณา วา ภเวน ภวสฺส วิปฺปโมกฺขมาหํสุ, สพฺเพเต ‘‘อวิปฺปมุตฺตา ภวสฺมา’’ติ วทามิ. เย วา ปน เกจิ สมณา วา พฺราหฺมณา วา วิภเวน ภวสฺส นิสฺสรณมาหํสุ, สพฺเพเต ‘‘อนิสฺสฏา ภวสฺมา’’ติ วทามิ. อุปธึ หิ ปฏิจฺจ ทุกฺขมิทํ สมฺโภติ, สพฺพุปาทานกฺขยา นตฺถิ ทุกฺขสฺส สมฺภโว, โลกมิมํ ปสฺส, ปุถู อวิชฺชาย ปเรตา ภูตา ภูตรตา ภวา อปริมุตฺตา. เย หิ เกจิ ภวา สพฺพธิ สพฺพตฺถตาย สพฺเพเต ภวา อนิจฺจา ทุกฺขา วิปริณามธมฺมาติ. जे कोणी श्रमण किंवा ब्राह्मण भवाद्वारे भवापासून मुक्ती सांगतात, ते सर्व 'भवापासून मुक्त झालेले नाहीत' असे मी सांगतो. किंवा जे कोणी श्रमण किंवा ब्राह्मण विभवाद्वारे भवापासून सुटका सांगतात, ते सर्व 'भवापासून बाहेर पडलेले नाहीत' असे मी सांगतो. उपाधीवर अवलंबून हे दुःख निर्माण होते, सर्व उपादानांचा क्षय झाल्याने दुःखाची उत्पत्ती होत नाही. या जगाकडे पहा, जे अज्ञानाने ग्रस्त आहेत, प्राण्यांमध्ये रममाण आहेत आणि भवापासून मुक्त झालेले नाहीत. जे काही भव सर्व ठिकाणी आणि सर्व प्रकारे अस्तित्वात आहेत, ते सर्व भव अनित्य, दुःख आणि विपरिणामधर्मी आहेत. ‘‘เอวเมตํ ยถาภูตํ, สมฺมปฺปญฺญาย ปสฺสโต; ภวตณฺหา ปหียติ, วิภวํ นาภินนฺทติ; สพฺพโส ตณฺหานํ ขยา, อเสสวิราคนิโรโธ นิพฺพานํ. हे अशा प्रकारे यथार्थ रूपाने सम्यक प्रज्ञेने पाहणाऱ्याची भवतण्हा नष्ट होते, तो विभवाचा आनंद घेत नाही; सर्व प्रकारे तृष्णेचा क्षय झाल्याने, संपूर्ण विराग आणि निरोध म्हणजेच निर्वाण होय. ‘‘ตสฺส นิพฺพุตสฺส ภิกฺขุโน, อนุปาทา ปุนพฺภโว น โหติ; อภิภูโต มาโร วิชิตสงฺคาโม, อุเปจฺจคา สพฺพภวานิ ตาที’’ติ. त्या निवृत्त झालेल्या भिक्खूचा, उपादानरहित असल्यामुळे पुनर्जन्म होत नाही; त्याने माराचा पराभव केला आहे, संग्राम जिंकला आहे, आणि अशा तादी पुरुषाने सर्व भवांचे उल्लंघन केले आहे. อยํ โลโก สนฺตาปชาโต ยาว ทุกฺขนฺติ ยํ ตณฺหา สํกิเลโส. 'हा लोक संतापाने पीडित आहे...' इथपासून ते 'दुःख' पर्यंत, जी तृष्णा आहे, ते संकिलेस सुत्त आहे. ยํ ปุนคฺคหณํ เย หิ เกจิ สมณา วา พฺราหฺมณา วา ภเวน ภวสฺส วิโมกฺขมาหํสุ, สพฺเพเต ‘‘อวิมุตฺตา ภวสฺมา’’ติ วทามิ. เย วา ปน เกจิ สมณา วา พฺราหฺมณา วา วิภเวน ภวสฺส นิสฺสรณมาหํสุ ‘‘อนิสฺสฏา ภวสฺมา’’ติ วทามิ. อยํ ทิฏฺฐิสํกิเลโส, ตํ ทิฏฺฐิสํกิเลโส [Pg.187] จ ตณฺหาสํกิเลโส จ, อุภยเมตํ สํกิเลโส. ยํ ปุนคฺคหณํ ภววิปฺปหานาย พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ, ยาว สพฺพโส อุปาทานกฺขยา สมฺภวา, อิทํ นิพฺเพธภาคิยํ. ตสฺส นิพฺพุตสฺส ภิกฺขุโน ยาว อุปจฺจคา สพฺพภวานิ ตาทีติ อิทํ อเสกฺขภาคิยํ. จตฺตาโร ปุคฺคลา อนุโสตคามี สํกิเลโส ฐิตตฺโต จ ปฏิโสตคามี จ นิพฺเพโธ. ถเล ติฏฺฐตีติ อเสกฺขภูมิ. जे कोणी श्रमण किंवा ब्राह्मण भवाच्या (अस्तित्वाच्या) माध्यमातून भवापासून मुक्ती सांगतात, ते सर्व 'भवापासून मुक्त झालेले नाहीत' असे मी म्हणतो. आणि जे कोणी श्रमण किंवा ब्राह्मण विभवाच्या (अ-अस्तित्वाच्या) माध्यमातून भवापासून सुटका (निस्सरण) सांगतात, ते 'भवापासून बाहेर पडलेले नाहीत' असे मी म्हणतो. हा दृष्टी-संक्लेश (दृष्टीची अशुद्धता) आहे; आणि तो दृष्टी-संक्लेश व तृष्णा-संक्लेश, हे दोन्ही मिळून संक्लेश आहेत. भवाचा पूर्णपणे त्याग करण्यासाठी जे ब्रह्मचर्य आचरले जाते, जे सर्व प्रकारे उपादानाच्या क्षयापर्यंत पोहोचवणारे असते, ते 'निब्बेधभागीय' (भेदक ज्ञानाला पूरक) आहे. त्या शांत (निब्बुत्त) झालेल्या भिक्खूचे, ज्याने सर्व भवांचे उल्लंघन केले आहे, असे जे वर्णन आहे, ते 'असेक्खभागीय' (अशैक्ष-भूमीशी संबंधित) आहे. चार पुद्गल (व्यक्ती) आहेत: अनुसोतगामी (प्रवाहाच्या दिशेने जाणारा) हा संक्लेश आहे, आणि ठितत्त (स्थिरचित्त) व पटिसोतगामी (प्रवाहाच्या विरुद्ध जाणारा) हा निब्बेध आहे. जो 'थले' (किनाऱ्यावर/स्थळावर) उभा राहतो, ती 'असेक्खभूमी' आहे. ๑๖. ตตฺถ กตมํ วาสนาภาคิยญฺจ นิพฺเพธภาคิยญฺจ สุตฺตํ? १६. त्यात वासनाभागीय (संस्कारांना पूरक) आणि निब्बेधभागीय (भेदक ज्ञानाला पूरक) सुत्त कोणते आहे? ‘‘ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒติ, สํยมโต เวรํ น จียติ; กุสโล จ ชหาติ ปาปกํ, ราคโทสโมหกฺขยา สนิพฺพุโต’’ติ. “दान देणाऱ्याचे पुण्य वाढते, संयम राखणाऱ्याचे वैर साचत नाही; कुशल मनुष्य पापाचा त्याग करतो आणि राग, द्वेष व मोहाचा क्षय झाल्यामुळे तो शांत (निब्बुत्त) होतो.” ‘‘ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒติ, สํยมโต เวรํ น จียตี’’ติ วาสนา. ‘‘กุสโล จ ชหาติ ปาปกํ, ราคโทสโมหกฺขยา สนิพฺพุโต’’ติ นิพฺเพโธ. “दान देणाऱ्याचे पुण्य वाढते, संयम राखणाऱ्याचे वैर साचत नाही” हे वासनाभागीय आहे. “कुशल मनुष्य पापाचा त्याग करतो आणि राग, द्वेष व मोहाचा क्षय झाल्यामुळे तो शांत होतो” हे निब्बेधभागीय आहे. โสตานุคเตสุ ธมฺเมสุ วจสา ปริจิเตสุ มนสานุเปกฺขิเตสุ ทิฏฺฐิยา สุปฺปฏิวิทฺเธสุ ปญฺจานิสํสา ปาฏิกงฺขา. อิเธกจฺจสฺส พหุสฺสุตา ธมฺมา โหนฺติ ธาตา อปมุฏฺฐา วจสา ปริจิตา มนสานุเปกฺขิตา ทิฏฺฐิยา สุปฺปฏิวิทฺธา, โส ยุญฺชนฺโต ฆเฏนฺโต วายมนฺโต ทิฏฺเฐว ธมฺเม วิเสสํ ปปฺโปติ. โน เจ ทิฏฺเฐว ธมฺเม วิเสสํ ปปฺโปติ, คิลาโน ปปฺโปติ. โน เจ คิลาโน ปปฺโปติ, มรณกาลสมเย ปปฺโปติ. โน เจ มรณกาลสมเย ปปฺโปติ, เทวภูโต ปาปุณาติ. โน เจ เทวภูโต ปาปุณาติ, เตน ธมฺมราเคน ตาย ธมฺมนนฺทิยา ปจฺเจกโพธึ ปาปุณาติ. श्रवण केलेल्या, वाणीने पाठ केलेल्या, मनाने चिंतन केलेल्या आणि दृष्टीने चांगल्या प्रकारे भेदलेल्या धर्मांचे पाच फायदे अपेक्षित असतात. येथे एखाद्या बहुश्रुत व्यक्तीला धर्म स्मरणात राहतात, ते विसरत नाहीत, वाणीने पाठ केलेले असतात, मनाने चिंतन केलेले असतात आणि दृष्टीने चांगल्या प्रकारे भेदलेले असतात; तो प्रयत्न करत, उद्योग करत आणि परिश्रम करत याच जन्मात विशेषाला (उच्च आध्यात्मिक अवस्थेला) प्राप्त करतो. जर याच जन्मात विशेषाला प्राप्त करू शकला नाही, तर आजारी असताना प्राप्त करतो. जर आजारी असताना प्राप्त करू शकला नाही, तर मृत्यूच्या वेळी प्राप्त करतो. जर मृत्यूच्या वेळी प्राप्त करू शकला नाही, तर देवलोकात उत्पन्न झाल्यावर प्राप्त करतो. जर देवलोकात उत्पन्न झाल्यावरही प्राप्त करू शकला नाही, तर त्या धर्म-रागामुळे आणि त्या धर्म-नंदीमुळे तो प्रत्येकबोधीला प्राप्त करतो. ตตฺถายํ ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปาปุณาติ, อยํ นิพฺเพโธ. ยํ สมฺปราเย ปจฺเจกโพธึ ปาปุณาติ, อยํ วาสนา. อิมานิ โสฬส สุตฺตานิ สพฺพสาสนํ อติคฺคณฺหนฺโต ติฏฺฐนฺติ. อิเมหิ โสฬสหิ สุตฺเตหิ นววิโธ สุตฺตนฺโต วิภตฺโต ภวติ. โส จ ปญฺญวโต โน ทุปฺปญฺญสฺส, ยุตฺตสฺส โน อยุตฺตสฺส, อกมฺมสฺส วิหาริสฺส ปกติยา โลเก สํกิเลโส [Pg.188] จรติ. โส สํกิเลโส ติวิโธ – ตณฺหาสํกิเลโส ทิฏฺฐิสํกิเลโส ทุจฺจริตสํกิเลโส. ตโต สํกิเลสโต อุฏฺฐหนฺโต สํกิเลโส ธมฺเมสุ ปติฏฺฐหติ, โลกิเยสุ ปติฏฺฐหตีติ. ตตฺถากุสโล ทิฏฺฐโต สเจ ตํ สีลญฺจ ทิฏฺฐิญฺจ ปรามสติ, ตสฺส โส ตณฺหาสํกิเลโส โหติ. สเจ ปนสฺส เอวํ โหติ ‘‘อิมินาหํ สีเลน วา วเตน วา พฺรหฺมจริเยน วา เทโว วา ภวิสฺสํ เทวญฺญตโร วา’’ติ ยสฺส โหติ มิจฺฉาทิฏฺฐิ, เอตสฺส มิจฺฉาทิฏฺฐิสํกิเลโส ภวติ. สเจ ปน สีเล ปติฏฺฐิโต อปรามฏฺฐสฺส หิ สีลวตํ โหติ, ตสฺส ตํ สีลวโต โยนิโส คหิตํ อวิปฺปฏิสารํ ชเนติ ยาว วิมุตฺติญาณทสฺสนํ, ตญฺจ ตสฺส ทิฏฺเฐว ธมฺเม กาลงฺกตสฺส วา ตมฺหิเยว วา ปน อปราปริยาเยน วา, อญฺเญสุ ขนฺเธสุ เอวํ สุตํ ‘‘สุจริตํ วาสนาย สํวตฺตตี’’ติ วาสนาภาคิยํ สุตฺตํ วุจฺจติ. ตตฺถ สีเลสุ ฐิตสฺส วินีวรณํ จิตฺตํ, ตํ ตโต สกฺกายทิฏฺฐิปฺปหานาย ภควา ธมฺมํ เทเสติ. โส อจฺจนฺตนิฏฺฐํ นิพฺพานํ ปาปุณาติ; ยทิ วา สาสนนฺตเร, อจฺจนฺตํ นิพฺพานํ ปาปุณาติ, ยทิ วา เอกาสเน ฉ อภิญฺเญ. ตตฺถ ทฺเว ปุคฺคลา อริยธมฺเม ปาปุณนฺติ สทฺธานุสารี จ ธมฺมานุสารี จ. ตตฺถ ธมฺมานุสารี อุคฺฆฏิตญฺญู, สทฺธานุสารี เนยฺโย. ตตฺถ อุคฺฆฏิตญฺญู ทุวิโธ – โกจิ ติกฺขินฺทฺริโย โกจิ มุทินฺทฺริโย. ตตฺถ เนยฺโยปิ ทุวิโธ – โกจิ ติกฺขินฺทฺริโย โกจิ มุทินฺทฺริโย. ตตฺถ โย จ อุคฺฆฏิตญฺญู มุทินฺทฺริโย, โย จ เนยฺโย ติกฺขินฺทฺริโย, อิเม ปุคฺคลา อสมินฺทฺริยา โหนฺติ. ตตฺถ อิเม ปุคฺคลา สมินฺทฺริยา ปริหายนฺติ จ อุคฺฆฏิตญฺญุโต, วิปญฺจิตญฺญู เนยฺยโต, อิเม มชฺฌิมา ภูมิคตา วิปญฺจิตญฺญู โหติ. อิเม ตโย ปุคฺคลา. त्यात, जो याच जन्मात प्राप्त करतो, तो 'निब्बेध' (भेदक ज्ञान) आहे. जो परलोकात प्रत्येकबोधी प्राप्त करतो, तो 'वासना' (संस्कार) आहे. ही सोळस (सोळा) सुत्ते संपूर्ण शासनाला व्यापून राहतात. या सोळस सुत्तांद्वारे नऊ प्रकारच्या सुत्तांचे (नवांग बुद्धशासनाचे) वर्गीकरण होते. आणि ते प्रज्ञावंतासाठी आहे, प्रज्ञाहीनासाठी नाही; जो योगात (साधनेत) युक्त आहे त्याच्यासाठी आहे, जो अयुक्त आहे त्याच्यासाठी नाही. जो अकर्मण्य होऊन विहरतो, तो स्वभावानेच लोकात संक्लेशात (अशुद्धतेत) वावरतो. तो संक्लेश तीन प्रकारचा आहे – तृष्णा-संक्लेश, दृष्टी-संक्लेश आणि दुश्चरित-संक्लेश. त्या संक्लेशापासून उत्पन्न होणारा संक्लेश अकुशल धर्मांमध्ये प्रतिष्ठित होतो, लौकिक धर्मांमध्ये प्रतिष्ठित होतो. त्यात, जर अकुशल मनुष्य दृष्टीच्या प्रभावाने त्या शीलाला आणि दृष्टीला चुकीच्या पद्धतीने ग्रहण करतो (परामर्श करतो), तर त्याचा तो तृष्णा-संक्लेश होतो. परंतु जर त्याला असे वाटते की, 'मी या शीलाने, व्रताने किंवा ब्रह्मचर्याने देव किंवा इतर कोणताही देव होईल', तर ज्याची अशी मिथ्यादृष्टी असते, त्याचा तो मिथ्यादृष्टी-संक्लेश होतो. पण जर शीलामध्ये प्रतिष्ठित असलेल्या आणि चुकीचे ग्रहण न केलेल्या (अपरामृष्ट) शीलवानाचे शील असेल, तर त्या शीलवानाचे ते योग्य प्रकारे ग्रहण केलेले शील विमुत्ती-ज्ञानदर्शनापर्यंत पश्चात्तापहीनता (अविप्पटिसार) निर्माण करते. आणि त्याचे ते सुचरित याच जन्मात किंवा मृत्यूच्या वेळी किंवा त्याच जन्मात किंवा पुढील जन्मात इतर स्कंधांमध्ये 'सुचरित हे वासनेसाठी (संस्कारासाठी) कारणीभूत ठरते' असे ऐकले जाते; याला 'वासनाभागीय सुत्त' म्हटले जाते. त्यात, शीलांमध्ये प्रतिष्ठित असलेल्याचे चित्त नीवरणमुक्त होते; त्यानंतर भगवान त्याला सत्कायदृष्टी (सक्कायदिठ्ठी) नष्ट करण्यासाठी धर्माचा उपदेश करतात. तो अत्यंत निष्ठा असलेल्या निब्बाणाला प्राप्त करतो; किंवा बुद्ध शासनात अत्यंत निब्बाणाला प्राप्त करतो, किंवा एकाच आसनावर सहा अभिज्ञा प्राप्त करतो. त्यात दोन पुद्गल आर्यधर्माला प्राप्त करतात: सद्धानुसारी आणि धम्मानुसारी. त्यात धम्मानुसारी हा उग्घटितञ्ञू असतो आणि सद्धानुसारी हा नेय्य असतो. त्यात उग्घटितञ्ञू दोन प्रकारचा असतो – कोणी तीक्ष्णेंद्रिय तर कोणी मृदुइंद्रिय. त्यात नेय्य देखील दोन प्रकारचा असतो – कोणी तीक्ष्णेंद्रिय तर कोणी मृदुइंद्रिय. त्यात जो उग्घटितञ्ञू मृदुइंद्रिय आहे आणि जो नेय्य तीक्ष्णेंद्रिय आहे, हे पुद्गल असम-इंद्रिय असतात. त्यात हे पुद्गल सम-इंद्रिय असतात, आणि ते उग्घटितञ्ञूपासून घसरतात, तर विपंचितञ्ञू नेय्यपासून घसरतात; हे मध्यम भूमीत राहणारे 'विपंचितञ्ञू' होतात. हे तीन पुद्गल आहेत. ๑๗. ตตฺถ จตุตฺถา ปน ปญฺจมา อุคฺฆฏิตญฺญู วิปญฺจิตญฺญู เนยฺโย จ, ตตฺถ อุคฺฆฏิตญฺญู ปุคฺคโล อินฺทฺริยานิ ปฏิลภิตฺวา ทสฺสนภูมิยํ ฐิโต โสตาปตฺติผลญฺจ ปาปุณาติ, เอกพีชี โหติ ปฐโม โสตาปนฺโน. ตตฺถ วิปญฺจิตญฺญู ปุคฺคโล อินฺทฺริยานิ ปฏิลภิตฺวา ทสฺสนภูมิยํ ฐิโต โสตาปตฺติผลญฺจ ปาปุณาติ, โกลํโกโล จ โหติ ทุติโย โสตาปนฺโน. ตตฺถ เนยฺโย ปุคฺคโล อินฺทฺริยานิ ปฏิลภิตฺวา ทสฺสนภูมิยํ ฐิโต โสตาปตฺติผลญฺจ ปาปุณาติ, สตฺตกฺขตฺตุปรโม จ โหติ[Pg.189], อยํ ตติโย โสตาปนฺโน. อิเม ตโย ปุคฺคลา อินฺทฺริยเวมตฺตตาย โสตาปตฺติผเล ฐิตา. १७. त्यात चौथे आणि पाचवे म्हणजे उग्घटितञ्ञू, विपंचितञ्ञू आणि नेय्य आहेत. त्यात उग्घटितञ्ञू पुद्गल इंद्रिये प्राप्त करून दर्शनभूमीत प्रतिष्ठित होऊन सोतापत्ती फलाला प्राप्त करतो; तो पहिला सोतापन्न 'एकबीजी' होतो. त्यात विपंचितञ्ञू पुद्गल इंद्रिये प्राप्त करून दर्शनभूमीत प्रतिष्ठित होऊन सोतापत्ती फलाला प्राप्त करतो; तो दुसरा सोतापन्न 'कोलंकोल' होतो. त्यात नेय्य पुद्गल इंद्रिये प्राप्त करून दर्शनभूमीत प्रतिष्ठित होऊन सोतापत्ती फलाला प्राप्त करतो; तो तिसरा सोतापन्न 'सत्तक्खत्तुपरम' होतो. हे तीन पुद्गल इंद्रियांच्या भिन्नतेमुळे सोतापत्ती फलामध्ये प्रतिष्ठित आहेत. อุคฺฆฏิตญฺญู เอกพีชี โหติ, วิปญฺจิตญฺญู โกลํโกโล โหติ, เนยฺโย สตฺตกฺขตฺตุปรโม โหติ. อิทํ นิพฺเพธภาคิยํ สุตฺตํ. สเจ ปน ตทุตฺตริ วายมติ, อจฺจนฺตนิฏฺฐํ นิพฺพานํ ปาปุณาติ. ตตฺถ อุคฺฆฏิตญฺญู ปุคฺคโล โย ติกฺขินฺทฺริโย, เต ทฺเว ปุคฺคลา โหนฺติ – อนาคามิผลํ ปาปุณิตฺวา อนฺตราปรินิพฺพายี จ อุปหจฺจปรินิพฺพายี จ. ตตฺถ วิปญฺจิตญฺญู ปุคฺคโล โย ติกฺขินฺทฺริโย, เต ทฺเว ปุคฺคลา โหนฺติ – อนาคามิผลํ ปาปุณนฺติ อสงฺขารปรินิพฺพายี จ สสงฺขารปรินิพฺพายี จ. ตตฺถ เนยฺโย อนาคามิผลํ ปาปุณนฺโต อุทฺธํโสโต อกนิฏฺฐคามี โหติ, อุคฺฆฏิตญฺญู จ วิปญฺจิตญฺญู จ, อินฺทฺริยนานตฺเตน อุคฺฆฏิตญฺญู ปุคฺคโล ติกฺขินฺทฺริโย อนฺตราปรินิพฺพายี โหติ, อุคฺฆฏิตญฺญู มุทินฺทฺริโย อุทฺธํโสโต อกนิฏฺฐคามี โหติ. อุคฺฆฏิตญฺญู จ วิปญฺจิตญฺญู จ อินฺทฺริยนานตฺเตน อุคฺฆฏิตญฺญู ปุคฺคโล ติกฺขินฺทฺริโย สสงฺขารปรินิพฺพายี โหติ, ติกฺขินฺทฺริโย อนฺตราปรินิพฺพายี โหติ, อุคฺฆฏิตญฺญู มุทินฺทฺริโย อุปหจฺจปรินิพฺพายี โหติ. วิปญฺจิตญฺญู ติกฺขินฺทฺริโย อสงฺขารปรินิพฺพายี โหติ, วิปญฺจิตญฺญู มุทินฺทฺริโย สสงฺขารปรินิพฺพายี โหติ, เนยฺโย อุปหจฺจปรินิพฺพายี โหติ, วิปญฺจิตญฺญู ติกฺขินฺทฺริโย อสงฺขารปรินิพฺพายี โหติ. วิปญฺจิตญฺญู มุทินฺทฺริโย สสงฺขารปรินิพฺพายี โหติ, เนยฺโย อุทฺธํโสโต อกนิฏฺฐคามี โหติ. อิติ ปญฺจ อนาคามิโน, ฉฏฺโฐ สกทาคามี, ตโย จ โสตาปนฺนาติ อิเม นว เสกฺขา. उग्घटितञ्ञू हा 'एकबीजी' असतो, विपञ्चितञ्ञू हा 'कोलङ्कोल' असतो, आणि नेय्य हा 'सत्तक्खत्तुपरम' असतो. हे निब्बेधभागिय सुत्त आहे. परंतु जर तो त्याहून अधिक प्रयत्न करतो, तर तो अत्यंत अंतिम निर्वाण प्राप्त करतो. तेथे उग्घटितञ्ञू व्यक्तींमध्ये जो तीक्ष्णेंद्रिय असतो, ते दोन प्रकारचे व्यक्ती होतात – अनागामी फल प्राप्त करून अंतरापरिनिब्बायी आणि उपहच्चपरिनिब्बायी. तेथे विपञ्चितञ्ञू व्यक्तींमध्ये जो तीक्ष्णेंद्रिय असतो, ते दोन प्रकारचे व्यक्ती होतात – अनागामी फल प्राप्त करून असङ्खारपरिनिब्बायी आणि ससङ्खारपरिनिब्बायी. तेथे नेय्य व्यक्ती अनागामी फल प्राप्त करताना उद्धंसोत अकनिठ्ठगामी होतो. उग्घटितञ्ञू आणि विपञ्चितञ्ञू यांच्यामध्ये इंद्रियांच्या विविधतेमुळे, उग्घटितञ्ञू व्यक्ती जर तीक्ष्णेंद्रिय असेल तर तो अंतरापरिनिब्बायी होतो, आणि उग्घटितञ्ञू व्यक्ती जर मृदुइंद्रिय असेल तर तो उद्धंसोत अकनिठ्ठगामी होतो. उग्घटितञ्ञू आणि विपञ्चितञ्ञू यांच्यामध्ये इंद्रियांच्या विविधतेमुळे, उग्घटितञ्ञू व्यक्ती जर तीक्ष्णेंद्रिय असेल तर तो ससङ्खारपरिनिब्बायी होतो, तीक्ष्णेंद्रिय असेल तर अंतरापरिनिब्बायी होतो, आणि उग्घटितञ्ञू व्यक्ती जर मृदुइंद्रिय असेल तर तो उपहच्चपरिनिब्बायी होतो. विपञ्चितञ्ञू व्यक्ती जर तीक्ष्णेंद्रिय असेल तर तो असङ्खारपरिनिब्बायी होतो, विपञ्चितञ्ञू व्यक्ती जर मृदुइंद्रिय असेल तर तो ससङ्खारपरिनिब्बायी होतो, नेय्य व्यक्ती उपहच्चपरिनिब्बायी होतो, विपञ्चितञ्ञू व्यक्ती जर तीक्ष्णेंद्रिय असेल तर तो असङ्खारपरिनिब्बायी होतो. विपञ्चितञ्ञू व्यक्ती जर मृदुइंद्रिय असेल तर तो ससङ्खारपरिनिब्बायी होतो, आणि नेय्य व्यक्ती उद्धंसोत अकनिठ्ठगामी होतो. अशा प्रकारे पाच अनागामी, सहावा सकदागामी आणि तीन सोतापन्न – हे नऊ सेक्ख (शिक्षार्थी) आहेत. ตตฺถ อุคฺฆฏิตญฺญู ปุคฺคโล ติกฺขินฺทฺริโย อรหตฺตํ ปาปุณนฺโต ทฺเว ปุคฺคลา โหนฺติ อุภโตภาควิมุตฺโต ปญฺญาวิมุตฺโต จ. ตตฺถ อุคฺฆฏิตญฺญู ปุคฺคโล มุทินฺทฺริโย อรหตฺตํ ปาปุณนฺโต ทฺเว ปุคฺคลา โหนฺติ, ฐิตกปฺปี จ ปฏิเวธนภาโว ปุคฺคโล จ ติกฺขินฺทฺริโย โส อรหตฺตํ ปาปุณนฺโต ทฺเว ปุคฺคลา โหนฺติ เจตนาภพฺโพ จ รกฺขณาภพฺโพ จ. ตตฺถ วิปญฺจิตญฺญู มุทินฺทฺริโย อรหตฺตํ ปาปุณนฺโต ทฺเว ปุคฺคลา โหนฺติ, สเจ เจเตติ น ปรินิพฺพายี, โน เจ เจเตติ ปรินิพฺพายีติ. สเจ อนุรกฺขติ น ปรินิพฺพายี, โน เจ อนุรกฺขติ ปรินิพฺพายีติ. ตตฺถ เนยฺโย ปุคฺคโล ภาวนานุโยคมนุยุตฺโต ปริหานธมฺโม [Pg.190] โหติ กมฺมนิยโต วา สมสีสิ วา, อิเม นว อรหนฺโต อิทํ จตุพฺพิธํ สุตฺตํ สํกิเลสภาคิยํ อเสกฺขภาคิยํ. อิเมสุ ปุคฺคเลสุ ตถาคตสฺส ทสวิธํ พลํ ปวตฺตติ. तेथे उग्घटितञ्ञू व्यक्ती तीक्ष्णेंद्रिय असताना अरहंतपद प्राप्त करताना दोन प्रकारचे व्यक्ती होतात – उभतोभागविमुक्त आणि प्रज्ञाविमुक्त. तेथे उग्घटितञ्ञू व्यक्ती मृदुइंद्रिय असताना अरहंतपद प्राप्त करताना दोन प्रकारचे व्यक्ती होतात – ठितकप्पी आणि पटिवेधनभाव व्यक्ती; आणि तोच जर तीक्ष्णेंद्रिय असेल तर अरहंतपद प्राप्त करताना दोन प्रकारचे व्यक्ती होतात – चेतनाभब्ब आणि रक्खणाभब्ब. तेथे विपञ्चितञ्ञू व्यक्ती मृदुइंद्रिय असताना अरहंतपद प्राप्त करताना दोन प्रकारचे व्यक्ती होतात – जर तो चेतना करतो तर परिनिर्वाण पावत नाही, आणि जर चेतना करत नाही तर परिनिर्वाण पावतो; जर तो रक्षण करतो तर परिनिर्वाण पावत नाही, आणि जर रक्षण करत नाही तर परिनिर्वाण पावतो. तेथे नेय्य व्यक्ती भावनायोगात मग्न असताना परिहानधम्म किंवा कम्मनियत किंवा समसीसी होतो. हे नऊ अरहंत आहेत. हे चार प्रकारचे सुत्त संकिलेसभागिय आणि असेक्खभागिय आहे. या व्यक्तींच्या बाबतीत तथागतांचे दहा प्रकारचे बल प्रवृत्त होते. ๑๘. กตมํ ทสวิธํ? อิธ พุทฺธานํ ภควนฺตานํ อปฺปวตฺติเต ธมฺมจกฺเก มเหสกฺขา เทวปุตฺตา ยาจนาย อภิยาตา โหนฺติ ‘‘เทเสตุ สุคโต ธมฺม’’นฺติ. โส อนุตฺตเรน พุทฺธจกฺขุนา โวโลเกนฺโต อทฺทสาสิ สตฺตานํ ตโย ราสีนํ สมฺมตฺตนิยโต มิจฺฉตฺตนิยโต อนิยโต. ตตฺถ สมฺมตฺตนิยโต ราสิ มิจฺฉาสตึ อาปชฺเชยฺยาติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ, อสตฺถุโก ปรินิพฺพาเยยฺยาติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ, สมาปตฺตึ อาปชฺเชยฺยาติ ฐานเมตํ วิชฺชติ. ตตฺถ มิจฺฉตฺตนิยโต ราสิ อริยสมาปตฺตึ ปฏิปชฺชิสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ, อนริยมิจฺฉาปฏิปตฺตึ ปฏิปชฺชิสฺสตีติ ฐานเมตํ วิชฺชติ. ตตฺถ อนิยโต ราสิ สมฺมาปฏิปชฺชมานํ สมฺมตฺตนิยตราสึ คมิสฺสตีติ ฐานเมตํ วิชฺชติ, มิจฺฉาปฏิปชฺชมาโน สมฺมตฺตนิยตราสึ คมิสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. สมฺมาปฏิปชฺชมานํ สมฺมตฺตนิยตราสึ คมิสฺสตีติ ฐานเมตํ วิชฺชติ, มิจฺฉาปฏิปชฺชมานํ มิจฺฉตฺตนิยตราสึ คมิสฺสตีติ ฐานเมตํ วิชฺชติ. อิเม ตโย อนุตฺตเรน พุทฺธจกฺขุนา โวโลเกนฺตสฺส สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส เม สโต อิเม ธมฺมา อนภิสมฺพุทฺธาติ เอตฺตวตา มํ โกจิ สหธมฺเมน ปฏิโจทิสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ, วีตราคสฺส เต ปฏิชานโต อขีณาสวตาย สหธมฺเมน โกจิ ปฏิโจทิสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. ยโต ปน อิมสฺส อนิยตสฺส ราสิสฺส ธมฺมเทสนา, สา น ทิสฺสติ ตกฺกรสฺส สมฺมาทุกฺขกฺขยายาติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ, ตถา โอวทิโต ยํ ปน เม อนิยตราสิ สาวโก ปุพฺเพนาปรํ วิเสสํ น สจฺฉิกริสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. १८. दहा प्रकारचे कोणते? या शासनात, भगवान बुद्धांनी अद्याप धर्मचक्र प्रवर्तित केले नसताना, महायशस्वी देवपुत्र याचना करण्यासाठी समोर आलेले असतात की, 'सुगत धर्माचा उपदेश करोत'. त्यांनी (भगवंतांनी) अनुत्तर बुद्धचक्षूने अवलोकन करताना प्राण्यांच्या तीन राशी पाहिल्या – सम्यक्त्वनियत राशी, मिथ्यात्वनियत राशी आणि अनियत राशी. तेथे, सम्यक्त्वनियत राशीतील व्यक्ती मिथ्या स्मृतीला प्राप्त होईल, हे शक्य नाही; तो मार्गदर्शकाशिवाय परिनिर्वाण पावेल, हे शक्य नाही; परंतु तो समापत्तीला प्राप्त होईल, हे शक्य आहे. तेथे, मिथ्यात्वनियत राशीतील व्यक्ती आर्य समापत्तीचे आचरण करेल, हे शक्य नाही; परंतु तो अनार्य मिथ्या प्रतिपत्तीचे आचरण करेल, हे शक्य आहे. तेथे, अनियत राशीतील व्यक्ती योग्य प्रकारे आचरण करत असताना सम्यक्त्वनियत राशीला प्राप्त होईल, हे शक्य आहे; परंतु चुकीच्या मार्गाने आचरण करत असताना सम्यक्त्वनियत राशीला प्राप्त होईल, हे शक्य नाही. योग्य प्रकारे आचरण करत असताना सम्यक्त्वनियत राशीला प्राप्त होईल, हे शक्य आहे; आणि चुकीच्या मार्गाने आचरण करत असताना मिथ्यात्वनियत राशीला प्राप्त होईल, हे शक्य आहे. या तिन्हींचे अनुत्तर बुद्धचक्षूने अवलोकन करणाऱ्या, सम्यक्संबुद्ध असलेल्या मला 'या धर्मांचे ज्ञान झालेले नाही' असे म्हणून कोणी सहेतुकपणे दोष देईल, हे शक्य नाही; 'तू स्वतःला वीतराग म्हणवून घेतोस, पण तुझे आसव क्षीण झालेले नाहीत' असे म्हणून कोणी सहेतुकपणे तुला दोष देईल, हे शक्य नाही. परंतु, या अनियत राशीच्या व्यक्तीसाठी जो धर्मोपदेश आहे, तो त्याचे आचरण करणाऱ्यासाठी योग्य प्रकारे दुःखाचा क्षय करणारा ठरणार नाही, हे शक्य नाही; तसेच, माझ्याद्वारे उपदेशित केलेला अनियत राशीचा श्रावक पूर्वीपेक्षा अधिक विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करणार नाही, हे शक्य नाही. ๑๙. ยํ โข มุนิ นานปฺปการสฺส นานานิรุตฺติโย เทวนาคยกฺขานํ ทเมติ ธมฺเม ววตฺถาเนน วตฺวา การณโต อญฺญํ ปารํ คมิสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. ธมฺมปฏิสมฺภิทา. ยโต ปนิมา นิรุตฺติโต สตฺต สตฺต นิรุตฺติโย นาภิสมฺภุเนยฺยาติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. นิรุตฺติปฏิสมฺภิทา. นิรุตฺติ โข ปน อภิสมคฺครตานํ สาวกานํ ตมตฺถมวิญฺญาปเยติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. อตฺถปฏิสมฺภิทา. มเหสกฺขา เทวปุตฺตา อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺเห ปุจฺฉึสุ[Pg.191]. กายิเกน วา มานสิเกน วา ปริปีฬิตสฺส หตฺถกุณีติ วา ปาเท วา ขญฺเช ทนฺธสฺส โส อตฺโถ น ปริภาชิยตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. ปฏิภานปฏิสมฺภิทา. ยมฺหิ ตํ เตสํ โหติ ตมฺหิ อสนฺตํ ภวตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. ยํ หิ นาสํ เตสํ น ภวติ, ตมฺหิ นาสํ เตสํ ภวิสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. เอวํ สมุทยสฺส นิโรธาย ทส อกุสลกมฺมปถา. มาโร วา อินฺโท วา พฺรหฺมา วา ตถาคโต วา จกฺกวตฺตี วา โส วต นาม มาตุคาโม ภวิสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ, ปุริโส อสฺส ราชา จกฺกวตฺตี สกฺโก เทวานมินฺโท ภวิสฺสตีติ ฐานเมตํ วิชฺชติ. อิติสฺส เอวรูปํ พลํ เอวรูปํ ญาณํ, อิทํ วุจฺจติ ฐานาฏฺฐานญาณํ ปฐมํ ตถาคตพลํ ตํ นิทฺทิสิตพฺพํ. ตีหิ ราสีหิ จตูหิ เวสารชฺเชหิ จตูหิ ปฏิสมฺภิทาหิ ปฏิจฺจสมุปฺปาทสฺส ปวตฺติยํ นิวตฺติยํ ภาคิยญฺจ. กุสลํ กุสลวิปาเกสุ จ อุปปชฺชติ ยญฺจ อิตฺถิปุริสานํ. อิทํ ปฐมํ พลํ ตถาคโต เอวํ ชานาติ. १९. मुनी (बुद्ध) विविध प्रकारच्या आणि विविध निरुक्तींच्या (भाषांच्या) द्वारे देव, नाग व यक्षांना धम्माच्या निश्चितीने उपदेश करून कारणासहित दुसऱ्या तीरावर (अर्हत्त्वावर) घेऊन जाणार नाहीत, हे अशक्य आहे (असे स्थान अस्तित्वात नाही). ही धम्मपटिसंभिदा (धम्मप्रतिसंविदा) होय. परंतु, या निरुक्तींमधून सात-सात निरुक्तींना प्राप्त करू शकत नाही, हे अशक्य आहे. ही निरुत्तिपटिसंभिदा होय. निरुत्तीचे ज्ञान एकोप्यात रममाण असणाऱ्या श्रावकांना त्या अर्थाचे आकलन करून देणार नाही, हे अशक्य आहे. ही अत्थपटिसंभिदा (अर्थप्रतिसंविदा) होय. महानुभाव देवपुत्रांनी जवळ येऊन प्रश्न विचारले. कायिक किंवा मानसिक दुःखाने पीडित झालेल्या, हात अधू असलेल्या, पांगळ्या किंवा मंद बुद्धीच्या माणसाला तो अर्थ स्पष्ट होणार नाही, हे अशक्य आहे. ही पटिभानपटिसंभिदा (प्रतिभानप्रतिसंविदा) होय. ज्याच्यामध्ये ते ज्ञान आहे, त्याला त्याचा अभाव होईल, हे अशक्य आहे. ज्याच्यामध्ये विनाश आहे, त्याला तो होणार नाही, आणि ज्याच्यामध्ये विनाश आहे, त्याला तो भविष्यात होईल, हे अशक्य आहे. अशा प्रकारे समुदयाच्या निरोधासाठी दहा अकुशल कर्मपथ आहेत. मार, इंद्र, ब्रह्मा, तथागत किंवा चक्रवर्ती राजा हा स्त्री होईल, हे अशक्य आहे; परंतु पुरुष हा चक्रवर्ती राजा किंवा शक्र देवेन्द्र होईल, हे शक्य आहे. अशा प्रकारे त्यांचे हे अशा प्रकारचे बल आणि अशा प्रकारचे ज्ञान आहे, याला 'स्थानास्थानज्ञान' (ठानाठानञाण) असे म्हणतात, जे पहिले तथागतबल आहे आणि ते निर्देशित केले पाहिजे. तीन राशी, चार वैशारद्ये आणि चार पटिसंभिदा यांच्या आधारे प्रतीत्यसमुत्पादाच्या प्रवृत्तीमध्ये (उत्पत्तीमध्ये), निवृत्तीमध्ये (निरोधामध्ये) आणि मार्गामध्ये ते निर्देशित केले पाहिजे. कुशल आणि अकुशल विपाकांमध्ये स्त्री-पुरुषांना जे काही उत्पन्न होते, हे पहिले बल तथागत अशा प्रकारे जाणतात। เยสํ ปน สมฺมตฺตนิยโต ราสิ, นายํ สพฺพตฺถคามินี ปฏิปทา, นิพฺพานคามินีเยวายํ ปฏิปทา. ตตฺถ สิยา มิจฺฉตฺตนิยโต ราสิ, เอสาปิ น สพฺพตฺถคามินี ปฏิปทา. สกฺกายสมุทยคามินีเยวายํ ปฏิปทา โหตุ, อยํ ตตฺถ ตตฺถ ปฏิปตฺติยา ฐิโต คจฺฉติ นิพฺพานํ, คจฺฉติ อปายํ, คจฺฉติ เทวมนุสฺสสฺส. ยํ ยํ วา ปฏิปทํ ปฏิปชฺเชยฺย สพฺพตฺถ คจฺเฉยฺย, อยํ สพฺพตฺถคามินี ปฏิปทา. ยํ เอตฺถ ญาณํ ยถาภูตํ, อิทํ วุจฺจติ สพฺพตฺถคามินี ปฏิปทาญาณํ ทุติยํ ตถาคตพลํ. परंतु, ज्यांच्यासाठी सम्यक्त्वनियत राशी आहे, ही सर्वगामी प्रतिपदा नाही, तर ही केवळ निर्वाणाकडे नेणारीच प्रतिपदा आहे. तिथे मिथ्यात्वनियत राशी असू शकते, ही देखील सर्वगामी प्रतिपदा नाही. ही केवळ सत्कायसमुदयाकडे (सक्कायसमुदय) नेणारीच प्रतिपदा असो. हा मनुष्य त्या त्या प्रतिपदेमध्ये स्थित होऊन निर्वाणाला जातो, अपायाला (दुर्गतीला) जातो, देव आणि मनुष्यांच्या लोकाला जातो. ज्या ज्या प्रतिपदेचे तो आचरण करेल, त्याद्वारे तो सर्व ठिकाणी जाऊ शकतो, हीच 'सर्वगामी प्रतिपदा' (सब्बत्थगामिनी पटिपदा) होय. याविषयी जे यथाभूत (यथार्थ) ज्ञान आहे, त्याला 'सर्वगामी प्रतिपदा ज्ञान' असे म्हणतात, जे दुसरे तथागतबल आहे। สา โข ปนายํ สพฺพตฺถคามินี ปฏิปทา นานาธิมุตฺตา เกจิ กาเมสุ เกจิ ทุกฺกรการิยํ เกจิ อตฺตกิลมถานุโยคมนุยุตฺตา เกจิ สํสาเรน สุทฺธึ ปจฺเจนฺติ เกจิ อนชฺชาภาวนาติ. เตน เตน จริเตน วินิพนฺธานํ สตฺตานํ ยํ ญาณํ ยถาภูตํ นานาคตํ โลกสฺส อเนกาธิมุตฺตคตํ ยถาภูตํ ปชานาติ. อิทํ ตติยํ ตถาคตพลํ. ती सर्वगामी प्रतिपदा विविध अधिमुक्ती (कल) असणारी आहे. काही लोक कामांमध्ये (इंद्रियभोगांमध्ये), काही कठीण तपश्चर्येत, काही आत्मक्लेशाच्या अभ्यासात मग्न असतात; काही संसाराद्वारे शुद्धीला प्राप्त होतात, तर काही अनध्या भावनेला प्राप्त होतात. अशा प्रकारे, त्या त्या स्वभावाने बद्ध झालेल्या प्राण्यांचे जे यथाभूत ज्ञान आहे, आणि जगाच्या अनेकविध अधिमुक्तींचे जे नानाविध यथाभूत ज्ञान आहे, ते तथागत जाणतात. हे तिसरे तथागतबल आहे। ตตฺถ สตฺตานํ อธิมุตฺตา ภวนฺติ อาเสวนฺติ ภาเวนฺติ พหุลีกโรนฺติ. เตสํ กมฺมุปสยานํ ตทาธิมุตฺตานํ. สา เจว ธาตุ สํวหติ. กตรา ปเนสา ธาตุ เนกฺขมฺมธาตุ พลธาตุ กาจิ สมฺปตฺติ กาจิ มิจฺฉตฺตญฺจ ธาตุ อธิมุตฺตา ภวนฺติ. อญฺญตรา อุตฺตริ น สมนุปสฺสนฺติ. เต ตเทวฏฺฐานํ มยา [Pg.192] ชรามรณสฺส อภินิวิสฺส โวหรนฺติ ‘‘อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’’นฺติ. ยถา ภควา สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ภาสิตํ. ยํ ตตฺถ ยถาภูตํ ญาณํ. อิทํ วุจฺจติ จตุตฺถํ ตถาคตพลํ. त्यामध्ये प्राण्यांच्या अधिमुक्ती (कल) असतात, ज्यांचे ते सेवन करतात, भावना करतात आणि वारंवार सराव करतात. कर्माचा आश्रय घेणाऱ्या आणि त्यामध्येच मग्न असणाऱ्या त्या प्राण्यांना तोच धातू (स्वभाव) वाहून नेतो. तो धातू कोणता आहे? नैष्क्रम्य धातू (नेक्خम्मधातू), बल धातू, काही संपत्ती धातू आणि काही मिथ्यात्व धातू, ज्यांच्यामध्ये ते अधिमुक्त असतात. त्यापेक्षा श्रेष्ठ असे ते काही पाहत नाहीत. ते त्याच स्थानाला दृढ धरून, जरा-मरणाच्या अधीन होऊन, "हेच सत्य आहे, इतर सर्व व्यर्थ आहे" असा व्यवहार करतात (असे म्हणतात). ज्याप्रमाणे भगवंतांनी शक्र देवेन्द्राला उपदेश केला होता. त्यामध्ये जे यथाभूत ज्ञान आहे, त्याला चौथे तथागतबल म्हटले जाते। ตตฺถ ยํเยว ธาตุ เสฏฺฐนฺติ ตํ ตํ กาเยน จ วาจาย จ อารมฺภนฺติ เจตสิโก. อารมฺโภ เจตนา กมฺมํ กายิกา วาจสิกา อารมฺโภ เจตสิกตฺตา กมฺมนฺตรํ ตถาคโต เอวํ ปชานาติ ‘‘อิมินา สตฺเตน เอวํ ธาตุเกน เอวรูปํ กมฺมํ กตํ, ตํ อตีตมทฺธานํ อิมินา เหตุนา ตสฺส เอวรูโป วิปาโก วิปจฺจติ เอตรหิ วิปจฺจิสฺสติ วา อนาคตมทฺธาน’’นฺติ. เอวํ ปจฺจุปฺปนฺนมทฺธานํ ปชานาติ ‘‘อยํ ปุคฺคโล เอวํธาตุโก อิทํ กมฺมํ กโรติ’’. ตณฺหาย จ ทิฏฺฐิยา จ อิมินา เหตุนา น ตสฺส วิปาโก ทิฏฺเฐเยว ธมฺเม นิพฺพตฺติสฺสติ, อุปปชฺเช วา’’ติ อปรมฺหิ วา ปริยาเย เอวํ ปชานาติ ‘‘อยํ ปุคฺคโล เอวรูปํ กมฺมํ กริสฺสติ อนาคตมทฺธานํ, อิมินา เหตุนา ตสฺส เอวรูโป วิปาโก นิพฺพตฺติสฺสติ, อิมินา เหตุนา ยานิ จตฺตาริ กมฺมฏฺฐานานิ อิทํ กมฺมฏฺฐานํ ปจฺจุปฺปนฺนสุขํ อายตึ จ สุขวิปากํ’’ …เป… อิติ อยํ อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺนานํ กมฺมสมาทานานํ เหตุโส ฐานโส วิปากเวมตฺตตํ ปชานาติ อุจฺจาวจา หีนปณีตตา, อิทํ วุจฺจติ กมฺมวิปากญาณํ ปญฺจมํ ตถาคตพลํ. त्यामध्ये जोच धातू श्रेष्ठ आहे, म्हणून त्या त्या धातूला कायेने (शरीराने), वाचेने (वाणीने) आणि चैतसिक (मनाने) आरंभ करतात (प्रयत्न करतात). चेतना कर्माचा आरंभ केला जातो, कायिक आणि वाचिक कर्माचा आरंभ केला जातो, चैतसिक असल्यामुळे. कर्मांमधील भेद जाणणारे तथागत अशा प्रकारे जाणतात: 'या अशा स्वभावाच्या (धातूच्या) प्राण्याने भूतकाळात अशा प्रकारचे कर्म केले आहे, त्या कर्मामुळे या कारणामुळे त्याला आता (वर्तमानकाळात) अशा प्रकारचा विपाक मिळत आहे किंवा भविष्यकाळात विपाचित होईल.' अशाच प्रकारे वर्तमानकाळाविषयी जाणतात: 'हा पुद्गल अशा स्वभावाचा असून हे कर्म करतो.' तृष्णेमुळे आणि दृष्टीमुळे (मिथ्यादृष्टीमुळे) या कारणामुळे त्याचा विपाक याच जन्मात उत्पन्न होणार नाही, किंवा पुढील जन्मात, किंवा त्यानंतरच्या जन्मात (असे नाही, तर तो उत्पन्न होईलच) अशा प्रकारे जाणतात. 'हा पुद्गल भविष्यकाळात अशा प्रकारचे कर्म करेल, या कारणामुळे त्याला अशा प्रकारचा विपाक उत्पन्न होईल. या कारणामुळे जी चार कर्मस्थाने (कर्मठ्ठाने) आहेत, त्यातील हे कर्मस्थान वर्तमानकाळात सुख देणारे आणि भविष्यात देखील सुखकारक विपाक देणारे आहे' ...इत्यादी. अशा प्रकारे, भूत, भविष्य आणि वर्तमानकाळातील कर्मांच्या समादानाचा (स्वीकाराचा) कारणाने आणि स्थानाने, विपाकातील नानात्व (विविधता) आणि उच्च-नीच, हीन-प्रणीत (उत्कृष्ट) अवस्था तथागत जाणतात. याला पाचवे 'कर्मविपाकज्ञान' तथागतबल म्हटले जाते। ตถา สตฺตา ยํ วา กมฺมสมาทานํ สมาทิยนฺตา ตตฺถ เอวํ ปชานาติ อิมสฺส ปุคฺคลสฺส กมฺมาธิมุตฺตสฺส ราคจริตสฺส เนกฺขมฺมธาตูนํ ปาริปูรึ คจฺฉนฺติ, ตสฺส ราคานุคเต สุญฺญมานสฺส ปฐมํ ฌานํ สํกิลิสฺสติ, สเจ ปุน อุตฺตริ วายามโต ฌานโวทานคเต มานเส วิเสสภาคิยํ ปฏิปทํ อนุยุญฺชิยติ. ตสฺส หิ ฌานภาคิยํเยว ปฐมชฺฌาเน ฐิตสฺส ทุติยํ ฌานํ โวทานํ คจฺฉติ, ตติยญฺจ ฌานํ สมาปชฺชิตุกามสฺส โสมนสฺสินฺทฺริยํ จิตฺตํ ปริยาทาย ติฏฺฐติ, ตสฺส สา ปีติ อวิเสสภาคิยํ ตติยํ ฌานํ อาทิสฺส ติฏฺฐติ. สเจ ตสฺส นิสฺสรณํ ยถาภูตํ ปชานาติ. ตถาคตสฺส จตุตฺถชฺฌานํ โวทานํ คจฺฉติเยว, จตุตฺถสฺส ฌานสฺส หานภาคิยา ธมฺมา, เต จ ธมฺมา ยตฺถ ปชายนฺติ เยหิ จตุตฺถชฺฌานํ โวทานํ ทิสฺสติ. เอวํ อชฺฌาสยสมาปตฺติยา ยา จตสฺโส สมาปตฺติโย ตีณิ วิโมกฺขมุขานิ อฏฺฐ วิโมกฺขฌานานีติ จตฺตาริ ฌานานิ วิโมกฺขาติ. อฏฺฐ จ วิโมกฺขา ตีณิ จ วิโมกฺขมุขานิ. สมาธีติ จตฺตาโร [Pg.193] สมาธี – ฉนฺทสมาธิ วีริยสมาธิ จิตฺตสมาธิ วีมํสาสมาธีติ. สมาปตฺติโย จตสฺโส อชฺฌาสยสมาปตฺติโย อิติ อิเมสํ ฌานานํ วิโมกฺขสมาปตฺตีติ เอวรูโป สํกิเลโส ราคจริตสฺส ปุคฺคลสฺส. เอวํ โทสจริตสฺส. โมหจริตสฺส. ราคจริตสฺส ปุคฺคลสฺส เอวรูปํ โวทานํ อิติ ยํ เอตฺถ ญาณํ ยถาภูตํ อสาธารณํ สพฺพสตฺเตหิ. อิทํ วุจฺจติ ฉฏฺฐํ ตถาคตพลํ. त्याचप्रमाणे, प्राणी ज्या कर्माचे ग्रहण (समादान) करतात, त्याविषयी तथागत असे यथाभूत जाणतात की, या कर्मात दृढ विश्वास ठेवणाऱ्या (कर्माधिमुक्त) आणि रागचरित पुद्गलाचे (व्यक्तीचे) नैष्क्रम्यधातू परिपूर्णतेप्रत पोहोचतात. त्या रागाचे अनुकरण करणाऱ्या आणि कम्मठ्ठानपासून शून्य असलेल्या पुद्गलाचे पहिले ध्यान (नीवरणांमुळे) संक्लिष्ट (मलीन) होईल. जर पुन्हा त्याने अधिक प्रयत्न केले, तर ध्यानाने शुद्ध झालेल्या चित्तामुळे तो विशेषभागीय प्रतिपदेचा (अभ्यासाचा) अनुयोग करतो. पहिल्या ध्यानात (जे नीवरणांचा नाश करणारे आहे) स्थित असलेल्या त्या योग्याला दुसरे ध्यान शुद्धतेप्रत (वोदान) पोहोचते. आणि तिसऱ्या ध्यानात समापन्न होऊ इच्छिणाऱ्या योग्याला सोमनस्येंद्रिय चित्ताला व्यापून राहते. त्याची ती प्रीती (पीति) अविशेषभागीय तिसऱ्या ध्यानाला उद्देशून राहते. जर तो त्याचे निःसरण यथाभूत जाणतो, तर तथागतांचे चौथे ध्यान शुद्धतेप्रतच जाते. चौथ्या ध्यानाचे ऱ्हास करणारे (हानभागीय) धर्म असतात, आणि ते धर्म जेथे उत्पन्न होतात, ज्यांच्याद्वारे चौथ्या ध्यानाची शुद्धता (वोदान) दिसून येते. अशा प्रकारे अध्याशय-समापत्तीने युक्त असलेल्या पुद्गलाला ज्या चार समापत्ती, तीन विमोक्षमुखे आणि आठ विमोक्षध्याने प्राप्त होतात, त्यातील चार ध्यानांना विमोक्ष म्हणतात. तसेच आठ विमोक्ष आणि तीन विमोक्षमुखे आहेत. समाधी म्हणजे चार समाधी आहेत - छंदसमाधी, वीर्यसमाधी, चित्तसमाधी आणि वीमंसासमाधी. चार समापत्ती या अध्याशय-समापत्ती आहेत. अशा प्रकारे या ध्यानांना 'विमोक्ष-समापत्ती' म्हणतात. अशा प्रकारचा संक्लेश (मलीनता) रागचरित पुद्गलाला होतो. याचप्रमाणे द्वेषचरित आणि मोहचरित पुद्गलालाही होतो. रागचरित पुद्गलाला अशा प्रकारची शुद्धता (वोदान) प्राप्त होते. अशा प्रकारे, येथे जे सर्व प्राण्यांशी असाधारण (अनन्य) असलेले यथाभूत ज्ञान आहे, याला तथागतांचे सहावे बळ म्हणतात। ตตฺถ ตถาคโต เอวํ ปชานาติ โลกิกา ธมฺมา โลกุตฺตรา ธมฺมา ภาวนาภาคิยํ อินฺทฺริยํ นามํ ลภนฺติ. อาธิปเตยฺยภูมึ อุปาทาย พลํ นามํ ลภนฺติ ถามคตํ มโน มนินฺทฺริยํ ตํ อุปาทาย. วีริยํ นามํ ลภนฺติ อารมฺภธาตุํ อุปาทาย. อิติสฺส เทว เอวรูปํ ญาณํ อิเมหิ จ ธมฺเมหิ อิเม ปุคฺคลา สมนฺนาคตาติปิ ธมฺมเทสนํ อกาสิ. อาการโต จ โวการโต จ อาสยชฺฌาสยสฺส อธิมุตฺติสมนฺนาคตานํ. อิทํ วุจฺจติ ปรสตฺตานํ ปรปุคฺคลานํ อินฺทฺริยพลวีริยเวมตฺตตํ ญาณํ สตฺตมํ ตถาคตพลํ. त्यामध्ये तथागत असे जाणतात की, लौकिक धर्म आणि लोकोत्तर धर्म भावनेच्या भागात 'इंद्रिय' हे नाव प्राप्त करतात. अधिपत्यभूमीचा आश्रय करून ते 'बळ' हे नाव प्राप्त करतात; सामर्थ्यवान झालेले मन त्या मनेंद्रियाचा आश्रय करून 'बळ' हे नाव प्राप्त करते. आरंभधातूचा आश्रय करून ते 'वीर्य' हे नाव प्राप्त करतात. अशा प्रकारे हे अशा स्वरूपाचे ज्ञान त्यांनाच (तथागतांनाच) असते. 'हे पुद्गल या धर्मांनी युक्त आहेत' अशीही त्यांनी धर्मदेशना केली. आकाराने (प्रकाराने) आणि वोकाराने (मिश्रणाने), आशय आणि अनुशायाने युक्त असलेल्या, तसेच अधिमुक्तीने युक्त असलेल्या पुद्गलांना त्यांनी उपदेश केला. याला इतर प्राण्यांच्या आणि इतर पुद्गलांच्या इंद्रिय, बळ आणि वीर्य यांच्या विविधतेचे (वेमत्तता) ज्ञान म्हणतात, जे तथागतांचे सातवे बळ आहे। ตตฺถ จ ตถาคโต โลกาทีสุ จ ภูมีสุ สํโยชนานญฺจ เสกฺขานํ ทฺวีหิ พเลหิ คตึ ปชานาติ, ปุพฺเพนิวาสานุสฺสติยา อตีเต สํสาเร เอตรหิ จ ปจฺจุปฺปนฺเน ทิพฺพจกฺขุนา จุตูปปาตํ อิติ อิมานิ ทฺเว พลานิ ทิพฺพจกฺขุโต อภินีหิตานิ. โส อตีตมทฺธานํ ทิพฺพสฺส จกฺขุโน โคจโร โส เอตรหิ สติ โคจโร อิติ อตฺตโน จ ปเรสํ จ ปุพฺเพนิวาสญาณํ อเนกวิธํ นานปฺปการกํ ปจฺจุปฺปนฺนมทฺธานํ ทิพฺเพน จกฺขุนา อิมานิ ทฺเว ตถาคตพลานิ, อฏฺฐมํ ปุพฺเพนิวาโส, นวมํ ทิพฺพจกฺขุ. आणि त्यामध्ये तथागत मनुष्यलोक इत्यादी चार भूमींमध्ये संयोजनांचे आणि शैक्ष (सेक्ख) पुद्गलांचे दोन बळांच्या द्वारे गतीला जाणतात. पूर्वनिवासानुस्मृती ज्ञानाने भूतकाळातील संसारात आणि आताच्या वर्तमान काळात, दिव्यचक्षूने च्युती आणि उत्पत्ती (मृत्यू आणि जन्म) जाणतात. अशा प्रकारे ही दोन बळे दिव्यचक्षूपासून प्रवृत्त झाली आहेत. तो भूतकाळ दिव्यचक्षूचा गोचर (विषय) आहे, आणि तो वर्तमानकाळ स्मृतीचा (सतीचा) गोचर आहे. अशा प्रकारे स्वतःच्या आणि इतरांच्या पूर्वनिवास ज्ञानाला अनेक प्रकारच्या आणि विविध प्रकारच्या वर्तमानकाळाला दिव्यचक्षूने जाणतात. ही दोन तथागत बळे आहेत - आठवे पूर्वनिवास (ज्ञान) आणि नववे दिव्यचक्षू (ज्ञान). ปุน จปรํ ตถาคโต อริยปุคฺคลานํ ฌานํ โวทานํ นิพฺเพธภาคิยํ ปชานาติ อยํ ปุคฺคโล อิมินา มคฺเคน อิมาย ปฏิปทาย อาสวานํ ขยา อนาสวํ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหรตีติ อิติ อตฺตโน จ อาสวานํ ขยํ ญาณํ ทิฏฺเฐกฏฺฐานํ จตุภูมิมุปาทาย ยาว นวนฺนํ อรหนฺตานํ อาสวกฺขโย โอธิโส เสกฺขานํ อโนธิโส อรหนฺตานํ. ตตฺถ เจโตวิมุตฺติ ทฺวีหิ อาสเวหิ อนาสวา กามาสเวน จ ภวาสเวน จ, ปญฺญาวิมุตฺติ ทฺวีหิ อาสเวหิ อนาสวา ทิฏฺฐาสเวน จ อวิชฺชาสเวน จ, อิมาสํ ทฺวินฺนํ วิมุตฺตีนํ ยถาภูตํ ญาณํ, อิทํ วุจฺจติ อาสวกฺขเย ญาณํ. ทสมํ ตถาคตพลํ. पुन्हा आणखी, तथागत आर्यपुद्गलांचे ध्यान, शुद्धता (वोदान) आणि निर्वेधभागीय ध्यान जाणतात की, 'हा पुद्गल या मार्गाने, या प्रतिपदेने (आचरणाने), आसवांच्या क्षयामुळे अनासव (आसवरहित) चेतोविमुक्तीला आणि प्रज्ञाविमुक्तीला याच जन्मात साक्षात करून, प्राप्त करून विहरतो.' अशा प्रकारे स्वतःच्याही आसवांच्या क्षयाचे ज्ञान, दृष्टीने प्रहाण करण्यायोग्य धर्मांच्या समानतेने, चार भूमींचा आश्रय करून, नऊ प्रकारच्या अर्हंतांपर्यंत जाणतात. शैक्ष पुद्गलांचा आसवक्षय ससीम (मर्यादित) असतो, आणि अर्हंतांचा आसवक्षय असीम (मर्यादारहित) असतो. त्यामध्ये चेतोविमुक्ती दोन आसवांपासून अनासव (मुक्त) असते - कामासव आणि भवासव यांच्यापासून. प्रज्ञाविमुक्ती दोन आसवांपासून अनासव असते - दृष्ट्यासव आणि अविद्यासव यांच्यापासून. या दोन्ही विमुक्तींचे जे यथाभूत ज्ञान आहे, याला 'आसवक्षय ज्ञान' म्हणतात. हे तथागतांचे दहावे बळ आहे। ๒๐. อิเมสุ [Pg.194] ทสสุ พเลสุ ฐิโต ตถาคโต ปญฺจวิธํ สาสนํ เทเสติ สํกิเลสภาคิยํ วาสนาภาคิยํ ทสฺสนภาคิยํ ภาวนาภาคิยํ อเสกฺขภาคิยํ. ตตฺถ โย ตณฺหาสํกิเลโส, อิมสฺส อโลโภ นิสฺสรณํ. โย ทิฏฺฐิสํกิเลโส, อิมสฺส อโมโห นิสฺสรณํ. โย ทุจฺจริตสํกิเลโส, อิมสฺส ตีณิ กุสลานิ นิสฺสรณํ. กึ นิทานํ? ตีณิ อิมานิ มโนทุจฺจริตานิ – อภิชฺฌา พฺยาปาโท มิจฺฉาทิฏฺฐิ. ตตฺถ อภิชฺฌา มโนทุจฺจริตํ กายกมฺมํ อุปฏฺฐเปติ, อทินฺนาทานํ สพฺพญฺจ ตทุปนิพฺพทฺธํ วาจากมฺมํ อุปฏฺฐเปติ, มุสาวาทญฺจ สพฺพวิตถํ สพฺพํ วาจมภาวํ สพฺพมกฺขํ ปลาสํ อภิชฺฌา อกุสลมูลนฺติ, สุจริเต สุจริตํ มุสาวาทา อทินฺนาทานา อภิชฺฌาย เจตนา, ตตฺถ พฺยาปาโท มโนทุจฺจริตํ กายกมฺมํ อุปฏฺฐเปติ, ปาณาติปาตํ สพฺพญฺจ เมตํ อากฑฺฒนํ ปริกฑฺฒนํ นิพฺพทฺธํ โรจนํ วาจากมฺมํ อุปฏฺฐเปติ, ปิสุณวาจํ ผรุสวาจํ มิจฺฉาทิฏฺฐิ มโนทุจฺจริตญฺจ อภิชฺฌํ พฺยาปาทํ มิจฺฉาทิฏฺฐึ ปโยเชติ, ตสฺส โย โกจิ มิจฺฉาทิฏฺฐิ จาโค ราคโช วา โทสโช วา สพฺพโส มิจฺฉาทิฏฺฐิ สมฺภูโต อิมินา การเณน มิจฺฉาทิฏฺฐึ อุปฏฺฐเปติ, กาเมสุมิจฺฉาจารํ วจีกมฺมํ อุปฏฺฐเปติ สมฺผปฺปลาปํ. อิมานิ ตีณิ ทุจฺจริตานิ อกุสลมูลานิ. २०. या दहा बळांमध्ये स्थित असलेले तथागत पाच प्रकारच्या शासनाचा (उपदेशाचा) उपदेश करतात - संक्लेशभागीय, वासनाभागीय, दर्शनभागीय, भावनाभागीय आणि अशैक्षभागीय. त्यामध्ये जो तृष्णा-संक्लेश आहे, त्यापासून अलोभ हे निःसरण (मुक्त होण्याचा मार्ग) आहे. जो दृष्टी-संक्लेश आहे, त्यापासून अमोह हे निःसरण आहे. जो दुश्चरित-संक्लेश आहे, त्यापासून तीन कुशळ धर्म हे निःसरण आहेत. त्याचे कारण (निदान) काय आहे? ही तीन मनोदुश्चरिते आहेत - अभिध्या (लोभ), व्यापाद (द्वेष) आणि मिथ्यादृष्टी. त्यामध्ये अभिध्या हे मनोदुश्चरित कायकर्माला उत्पन्न करते, अदत्तादान (चोरी) आणि त्याशी संबंधित सर्व वचीकर्माला उत्पन्न करते, आणि मृषावादाला (असत्य बोलण्याला) उत्पन्न करते, जे पूर्णपणे असत्य आहे, सर्व सत्यरहित वचन आहे, सर्व गुणनाशक (मक्ख) आहे आणि मत्सराने युक्त (पलास) आहे; अभिध्या हे अकुशळमूळ आहे. सुचरितामध्ये जे सुचरित आहे, ते मृषावादापासून, अदत्तादानापासून आणि अभिध्येपासून विरक्त होण्याची चेतना आहे. त्यामध्ये व्यापाद हे मनोदुश्चरित कायकर्माला उत्पन्न करते, प्राणातिपाताला (जीवहिंसेला) आणि या सर्वांना ओढणारे, खेचणारे, निरंतर ठेवणारे आणि आवड निर्माण करणारे वचीकर्म उत्पन्न करते, जसे की पिशुनवाचा (चुगली) आणि परुषवाचा (कठोर बोलणे). आणि मिथ्यादृष्टी हे मनोदुश्चरित अभिध्या, व्यापाद आणि मिथ्यादृष्टीला प्रवृत्त करते. त्याचा जो काही मिथ्यादृष्टीचा त्याग आहे, तो रागामुळे किंवा द्वेषामुळे झालेला असतो, तो पूर्णपणे मिथ्यादृष्टीपासून उत्पन्न झालेला असतो. या कारणाने तो मिथ्यादृष्टीला उत्पन्न करतो, कामेसू मिच्छाचाराला (व्यभिचाराला) आणि संफप्पलाप (व्यर्थ बडबड) नावाच्या वचीकर्माला उत्पन्न करतो. ही तीन दुश्चरिते अकुशळमूळे आहेत। ยา อภิชฺฌา, โส โลโภ. โย พฺยาปาโท, โส โทโส. ยา มิจฺฉาทิฏฺฐิ, โส โมโห. ตานิ อฏฺฐ มิจฺฉตฺตานิ อุปฏฺฐเปนฺติ. เตสุ คหิเตสุ ตีสุ อกุสลมูเลสุ ทสวิธํ อกุสลมูลํ ปาริปูรึ คจฺฉติ, ตสฺส ติวิธสฺส ทุจฺจริตสํกิเลสสฺส วาสนาภาคิยญฺจ สุตฺตํ นิสฺสรณํ. ตตฺถ โย พหุสิโต นิทฺเทโส ยถา โลโภ โทโส โมโหปิ, ตตฺถ อสิตุํ เอตฺถ โลโภ อุสฺสโท เตน การเณน เตสุ วา ธมฺเมสุ โลโภ ปญฺญปิยติ. ตตฺถายํ โมโห อกุสลํ โมโห อยํ อวิชฺชา, สา จตุพฺพิธา รูเป อภินิวิฏฺฐา, รูปํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, อวิชฺชาคโต รูปวนฺตํ อตฺตานํ, อตฺตนิ วา รูปํ, รูปสฺมึ วา อตฺตานํ. ตตฺถ กตมํ ปทํ สกฺกายทิฏฺฐิยา อุจฺเฉทํ วทติ ‘‘ตํ ชีวํ ตํ สรีร’’นฺติ นตฺถิกทิฏฺฐิ อธิจฺจสมุปฺปนฺนทิฏฺฐิ จ อญฺโญ จ กโรติ, อญฺโญ ปฏิสํเวทิยติ. ปจฺฉิมสฏฺฐิกปฺปานํ ตีณิ ปทานิ สกฺกายทิฏฺฐิยา สสฺสตํ ภชนฺติ ‘‘อญฺญํ ชีวํ อญฺญํ สรีร’’นฺติ อกิริยญฺจ ตํ ทุกฺขมิจฺฉโต อเหตุกา จ ปตนฺติ อนชฺฌาภาโว จ กมฺมานํ สพฺพญฺจ มานยิ. ตตฺถ ‘‘อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’’นฺติ สํสาเรน [Pg.195] สุทฺธิ อาชีวกา ฉฬาสีติ ปญฺญเปนฺติ. ยถารูเป สกฺกายทิฏฺฐิยา จตุวตฺถุกา, เอวํ ปญฺจสุ ขนฺเธสุ วีสติวตฺถุกา สกฺกายทิฏฺฐิยา สสฺสตํ ภชติ. อญฺญาชีวกา จ สสฺสตวาทิเก จ สีลพฺพตํ ภชนฺติ ปรามสนฺติ อิมินา ภวิสฺสามิ เทโว วา เทวญฺญตโร วา, อยํ สีลพฺพตปรามาโส. ตตฺถ สกฺกายทิฏฺฐิยา โส รูปํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, ‘‘ตํ ชีวํ ตํ สรีร’’มิติ ตํ กงฺขติ วิจิกิจฺฉติ นาธิมุจฺจติ นาภิปฺปสีทติ ปุพฺพนฺเต อปรนฺเต ปุพฺพนฺตาปรนฺเต…เป… อิติ วาสนาภาคิเยสุ ฐิตสฺส อยํ อุปกฺกิเลโส. जी अभिज्झा (अति-इच्छा) आहे, तो लोभ आहे. जो व्यापाद (द्वेष) आहे, तो द्वेष आहे. जी मिच्छादिट्ठी (मिथ्या दृष्टी) आहे, तो मोह आहे. ते आठ मिथ्यात्वांना उत्पन्न करतात. त्या तीन अकुशल मुळांचे दमन केले असता, दहा प्रकारचे अकुशल मूळ परिपूर्णतेला प्राप्त होते. त्या तीन प्रकारच्या दुश्चरित-संक्लेशापासून सुटका मिळवण्यासाठी वासनाभागीय सुत्त हे निस्सरण (मार्ग) आहे. तेथे जो बहुश्रुत निर्देश आहे, जसे की लोभ, द्वेष आणि मोह सुद्धा; तेथे आश्रय न घेण्यासाठी येथे लोभ प्रबळ आहे, त्या कारणाने त्या धर्मांमध्ये लोभ प्रज्ञप्त केला जातो. तेथे हा मोह म्हणजे अकुशल मोह आहे, ही अविज्जा (अविद्या) आहे. ती रूपावर अभिनिविष्ट (दृढपणे स्थिरावलेली) होऊन चार प्रकारची होते: ती रूपाला आत्मा म्हणून पाहते; अविद्येने ग्रासलेला मनुष्य आत्म्याला रूपवान पाहतो, किंवा आत्म्यामध्ये रूप पाहतो, किंवा रूपामध्ये आत्मा पाहतो. तेथे कोणते पद सक्कायदिट्ठीच्या (सत्कायदृष्टीच्या) उच्छेदवादाला सांगते? 'जे जीव आहे, तेच शरीर आहे' हे. नत्थिकदिट्ठी (नास्तिकदृष्टी) आणि अधिच्चसमुप्पन्नदिट्ठी (अकस्मात उत्पन्न होणारी दृष्टी) सुद्धा 'दुसरा करतो आणि दुसरा भोगतो' असे मानतात. मागील साठ कल्पांमधील तीन पदे सक्कायदिट्ठीच्या शाश्वतवादाला अनुसरतात, 'जीव वेगळा आहे आणि शरीर वेगळे आहे' हे. आणि अक्रियावाद आणि दुःखाची इच्छा करणाऱ्यासाठी अहेतुक दृष्टी सुद्धा त्यात पडतात, आणि कर्मांचा अभाव आणि सर्व काही घेऊन येते. तेथे 'हेच सत्य आहे, इतर सर्व व्यर्थ आहे' असे मानून, संसाराने शुद्धी होते, असे शहाऐंशी हजार आजीवक प्रज्ञप्त करतात. जसे रूपाच्या बाबतीत सक्कायदिट्ठी चार वस्तूंवर आधारित असते, त्याचप्रमाणे पाच स्कंधांमध्ये ती वीस वस्तूंवर आधारित असते आणि सक्कायदिट्ठी शाश्वतवादाला अनुसरते. इतर आजीवक आणि शाश्वतवादी सुद्धा शीलव्रत-परामर्शाला अनुसरतात आणि त्याचे चुकीचे ग्रहण करतात की, 'याने मी देव किंवा देवांपैकी एक होईन'; हा शीलव्रतपरामर्श आहे. तेथे सक्कायदिट्ठीमुळे तो रूपाला आत्मा म्हणून पाहतो, 'जे जीव आहे तेच शरीर आहे' असे मानून, तो त्याविषयी शंका घेतो, संशय धरतो, अधिमुक्त होत नाही, प्रसन्न होत नाही, पूर्वान्तात, अपरांतात, पूर्वान्त-अपरांतात... पे... अशा प्रकारे वासनाभागीय धर्मांमध्ये राहिलेल्या व्यक्तीचा हा उपक्लेश आहे. ๒๑. ตตฺถ สทฺธินฺทฺริเยน สพฺพํ วิจิกิจฺฉิตํ ปชหติ, ปญฺญินฺทฺริเยน อุทยพฺพยํ ปสฺสติ, สมาธินฺทฺริเยน จิตฺตํ เอโกทิ กโรติ วีริยินฺทฺริเยน อารภติ. โส อิเมหิ ปญฺจหิ อินฺทฺริเยหิ สทฺธานุสารี อเวจฺจปฺปสาเท นิรโต อนนฺตริยํ สมาธึ อุปฺปาเทติ. อินฺทฺริเยหิ สุทฺเธหิ ธมฺมานุสารี อปฺปจฺจยตาย อนนฺตริยํ สมาธึ อุปฺปาเทติ. โส ‘‘อิทํ ทุกฺข’’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ. สจฺจานิ อิทํ ทสฺสนภาคิยํ สุตฺตํ. ตสฺส ปญฺจนฺนํ โอรมฺภาคิยานํ สํโยชนานํ ตีณิ สํโยชนานิ ทสฺสนปหาตพฺพานิ สพฺเพน สพฺพํ ปหีนานิ ทฺเว ปุคฺคลกตานิ. ตตฺถ ตีณิ อกุสลมูลานิ ภาวนาปหาตพฺพานิ อุปริกฺขิตฺตานิ ฉ ภเว นิพฺพตฺเตนฺติ. ตตฺถ เตสุ อภิชฺฌาย จ พฺยาปาเทสุ ตนุกเตสุ ฉ ภวา ปริกฺขยา มริยาทํ คจฺฉนฺติ, ทฺเว ภวา อวสิฏฺฐา. ตสฺส อภิชฺฌา จ พฺยาปาโท จ สพฺเพน สพฺพํ ปริกฺขีณา โหนฺติ. เอโก ภโว อวสิฏฺโฐ โหติ. โส จ มานวเสน นิพฺพตฺเตติ. กิญฺจาปิ เอตฺถ อญฺเญปิ จตฺตาโร กิเลสา รูปราโค ภวราโค อวิชฺชา อุทฺธจฺจํ เกตุสฺมิมานภูตา นปฺปฏิพลา อสฺมิมานํ วินิวตฺเตตุํ, สพฺเพปิ เต อสฺมิมานสฺส ปหานํ อารภเต. ขีเณสุ น จ เตสุ อิทมุตฺตริทสฺสนภูมิยํ ปญฺจสุ เสกฺขปุคฺคเลสุ ตีสุ จ ปฏิปฺปนฺนเกสุ ทฺวีสุ จ ผลฏฺเฐสุ ภาวนาภาคิยํ สุตฺตํ. ตทุตฺตริ อเสกฺขภาคิยสุตฺตํ, กตฺถจิ ภูมิ นิปีฬิยติ. อิทญฺจ ปญฺจมํ สุตฺตํ. ติณฺณํ ปุคฺคลานํ เทสิตํ ปุถุชฺชนสฺส เสกฺขสฺส อเสกฺขสฺส สํกิเลสภาคิยํ วาสนาภาคิยํ. ปุถุชฺชนสฺส ทสฺสนภาคิยํ. ภาวนาภาคิยํ ปญฺจนฺนํ เสกฺขานํ. ยํ ปฐมนิทฺทิฏฺฐํ อเสกฺขภาคิยํ สพฺเพสํ อรหนฺตานํ. สา ปน ปญฺจวิธา สตฺตวีสอากาเร ปริเยสิตพฺพํ. เอเตสุ ตสฺส คตีนํ ตโต อุตฺตริ. ตญฺจ โข สงฺเขเปน ปญฺญาสาย อากาเรหิ [Pg.196] สมฺปตติ, เย ปญฺญาส อาการา สาสเน นิทฺทิฏฺฐา, เต สงฺขิปิยนฺตา ทสหิ อากาเรหิ ปตนฺติ. เย อริยสจฺจํ นิกฺเขเปน ฐิเต สงฺขิปิยตฺตา อฏฺฐสุ อากาเรสุ ปตนฺติ. จตูสุ จ สาธารเณสุ สุตฺเตสุ ยา หารสมฺปาตสฺส ภูมิ, เต สงฺขิปิยนฺตา ปญฺจสุ สุตฺเตสุ ปตนฺติ. สํกิเลสภาคิเย วาสนาภาคิเย ภาวนาภาคิเย นิพฺเพธภาคิเย อเสกฺขภาคิเย จ. เต สงฺขิปิยนฺตา จตูสุ สุตฺเตสุ ปตนฺติ. สํกิเลสภาคิเย วาสนาภาคิเย นิพฺเพธภาคิเย อเสกฺขภาคิเย จ. เต สงฺขิปิยมานา ตีสุ สุตฺเตสุ ปตนฺติ, ปุถุชฺชนภาคิเย เสกฺขภาคิเย อเสกฺขภาคิเย จ. เต สงฺขิปิยนฺตา ทฺวีสุ สุตฺเตสุ ปตนฺติ นิพฺเพธภาคิเย จ ปุพฺพโยคภาคิเย จ. ยถา วุตฺตํ ภควตา ทฺเว อตฺถวเส สมฺปสฺสมานา ตถาคตา อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา ธมฺมํ เทเสนฺติ สุตฺตํ เคยฺยํ…เป… สตฺถา ปุพฺพโยคสมนฺนาคเต อปฺปกสิเรน มญฺญมานา วสิยนฺติ ปุพฺพโยคา จ ภวิสฺสนฺติ สนฺตานํ มญฺญมานาธราย. ตตฺถ ปญฺญาเวมตฺตตํ อตฺตโน สมนุปสฺสมาเนน อฏฺฐวิเธ สุตฺตสงฺเขเป, ยตฺถ ยตฺถ สกฺโกติ, ตตฺถ ตตฺถ โยเชตพฺพํ. ตตฺถ ตตฺถ โยเชตฺวา สุตฺตสฺส อตฺโถ นิทฺทิสิตพฺโพ. น หิ สติ เวทนา มโน ธาเรตฺวา สกฺกา เยน เกนจิ สุตฺตสฺส อตฺโถ ยถาภูตํ นิทฺทิสิตุํ. २१. तेथे सद्धिंद्रियाने (श्रद्धेंद्रियाने) सर्व संशयाचा त्याग करतो, प्रज्ञेंद्रियाने उदय आणि व्यय (उत्पत्ती आणि विनाश) पाहतो, समाधियेंद्रियाने चित्ताला एकाग्र करतो, वीर्येंद्रियाने प्रयत्न सुरू करतो. तो या पाच इंद्रियांच्या द्वारे श्रद्धानुसार (सद्धानुसार) होऊन, अचल श्रद्धेमध्ये मग्न होऊन आनंतर्य समाधी उत्पन्न करतो. शुद्ध इंद्रियांच्या द्वारे धर्मानुसार (धम्मानुसार) होऊन, प्रत्ययहीनतेमुळे आनंतर्य समाधी उत्पन्न करतो. तो 'हे दुःख आहे' असे यथाभूत जाणतो. सत्यांचे (दर्शन घडवणारे) हे दस्सनभागीय (दर्शनभागीय) सुत्त आहे. त्याच्या पाच ओरंभागीय (अधोभागीय) संयोजनांपैकी तीन संयोजने दर्शनाने (सोतापत्ती मार्गाने) प्रहाण करण्यायोग्य असतात, ती पूर्णपणे नष्ट होतात, जी दोन पुद्गलांद्वारे (व्यक्तींद्वारे) केली जातात. तेथे तीन अकुशल मुळे भावनेने प्रहाण करण्यायोग्य असतात, ती वर फेकली असता सहा भव उत्पन्न करतात. तेथे त्या अभिज्झा आणि व्यापादाला क्षीण केले असता, सहा भव क्षीण होऊन मर्यादेला प्राप्त होतात, दोन भव शिल्लक राहतात. त्याचे अभिज्झा आणि व्यापाद पूर्णपणे क्षीण होतात. एक भव शिल्लक राहतो. आणि तो मानाच्या प्रभावाने उत्पन्न होतो. जरी येथे इतर चार क्लेश - रूपराग, भवरॉग, अविज्जा आणि उद्धच्च - हे ध्वजासारखे मानाच्या रूपात असले, तरी ते अस्मिमानाला नष्ट करण्यास समर्थ नसतात. ते सर्व अस्मिमानाचा त्याग करण्याचा आरंभ करतात. ते क्षीण झाले असता, याहून अधिक दर्शनभूमीत ते उत्पन्न होत नाहीत. पाच शैक्ष पुद्गलांमध्ये, तीन प्रतिपन्नकांमध्ये (मार्गस्थांमध्ये) आणि दोन फलस्थांमध्ये हे भावनाभागीय सुत्त आहे. त्याहून वर अशैक्षभागीय सुत्त आहे, जेथे काही भूमी दाबल्या जातात. आणि हे पाचवे सुत्त आहे. तीन पुद्गलांसाठी (व्यक्तींसाठी) उपदेशिले आहे: पृथग्जन, शैक्ष आणि अशैक्ष यांच्यासाठी संक्लेशभागीय आणि वासनाभागीय. पृथग्जनासाठी दर्शनभागीय आहे. पाच शैक्षांसाठी भावनाभागीय आहे. जे प्रथम निर्दिष्ट केलेले अशैक्षभागीय आहे, ते सर्व अरहंतांसाठी आहे. ते पाच प्रकारचे सुत्त सत्तावीस आकारांमध्ये शोधले पाहिजे. यांमध्ये त्याच्या गती त्याहून वर आहेत. आणि ते संक्षेपाने पन्नास आकारांमध्ये समाविष्ट होते. जे पन्नास आकार शासनात निर्दिष्ट केले आहेत, ते संकुचित केले असता दहा आकारांमध्ये समाविष्ट होतात. जे आर्यसत्याच्या स्थापनेने संकुचित केले असता आठ आकारांमध्ये समाविष्ट होतात. आणि चार साधारण सुत्तांमध्ये जी हारसंपाताची भूमी आहे, ते संकुचित केले असता पाच सुत्तांमध्ये समाविष्ट होतात: संक्लेशभागीय, वासनाभागीय, भावनाभागीय, निर्वेधभागीय आणि अशैक्षभागीय सुत्तांमध्ये. ते संकुचित केले असता चार सुत्तांमध्ये समाविष्ट होतात: संक्लेशभागीय, वासनाभागीय, निर्वेधभागीय आणि अशैक्षभागीय सुत्तांमध्ये. ते संकुचित केले असता तीन सुत्तांमध्ये समाविष्ट होतात: पृथग्जनभागीय, शैक्षभागीय आणि अशैक्षभागीय सुत्तांमध्ये. ते संकुचित केले असता दोन सुत्तांमध्ये समाविष्ट होतात: निर्वेधभागीय आणि पूर्वयोगभागीय सुत्तांमध्ये. भगवंतांनी सांगितल्याप्रमाणे, दोन प्रयोजनांना नीट पाहून, तथागत अरहंत सम्यक्संबुद्ध धर्माचा उपदेश करतात - सुत्त, गेय... पे... शास्ता (बुद्ध) पूर्वयोगाने युक्त असलेल्यांना विनासायास जाणतात आणि वश करतात, आणि पूर्वयोग हे प्राण्यांच्या कल्याणासाठी आणि धारणेसाठी कारणीभूत ठरतील. तेथे स्वतःच्या प्रज्ञेची विविधता नीट पाहून, आठ प्रकारच्या सुत्त-संक्षेपात, जेथे जेथे शक्य असेल, तेथे तेथे योजना करावी. तेथे तेथे योजना करून सुत्ताचा अर्थ निर्दिष्ट करावा. कारण वेदना असताना मनाला एकाग्र न करता, कोणत्याही प्रकारे सुत्ताचा अर्थ यथाभूतपणे निर्दिष्ट करणे शक्य नाही. ตตฺถ ปุริมกานํ สุตฺตานํ อิมา อุทฺทานคาถา तेथे मागील सुत्तांच्या या उद्दानगाथा आहेत: กามนฺธา ชาลสญฺฉนฺนา, ปญฺจ นีวรณานิ จ; มโนปุพฺพงฺคมา ธมฺมา, มหานาโม จ สากิโย. कामांध (कामवासनेने आंधळे झालेले), जालाने (लोभरूपी जाळ्याने) आच्छादित, आणि पाच नीवरण; मनोपुब्बंगमा धम्मा (मन हे सर्व धर्मांमध्ये अग्रगामी आहे), आणि शाक्य महानाम. อุทฺธํ อโธ วิปฺปมุตฺโต, ยญฺจ สีลกิมตฺถิยา; ยสฺส เสลูปมํ จิตฺตํ, อุปติสฺส ปุจฺฉาทิกา. वर आणि खाली विमुक्त झालेला, आणि 'शील कशासाठी' (शील कशासाठी आहे); ज्याचे चित्त पर्वतासारखे (अचल) आहे, आणि उपतिस्स-प्रश्न इत्यादी. ยสฺส กายคตาสติ, ฉนฺนํ ตโมปรายโณ; น ตํ ทฬฺหํ เจตสิกํ, อยํ โลโกติอาทิกํ. ज्याला कायगतासती (शरीराविषयीची स्मृती) आहे, छन्न (झाकलेला) आणि तमोपरायण (अंधकारात लीन असलेला); ते दृढ नाही, चेतसिक, 'हा लोक' इत्यादी. จตฺตาโร เจว ปุคฺคลา, ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒิตํ; โสตานุคตธมฺเมสุ, อิมา เตสํ อุทฺทานคาถา. चारच व्यक्ती, दान देणाऱ्याचे पुण्य वाढते, श्रोतानुगत धर्मांमध्ये; या त्यांच्या उद्दान गाथा आहेत. ๒๒. ตตฺถ กตมา อาณตฺติ? २२. त्यात आज्ञा कोणती? สเจ ภายถ ทุกฺขสฺส, สเจ โว ทุกฺขมปฺปิยํ; มากตฺถ ปาปกํ กมฺมํ, อาวิ วา ยทิ วา รโห. जर तुम्ही दुःखाला भित असाल, जर तुम्हाला दुःख अप्रिय असेल, तर उघडपणे किंवा गुप्तपणे कोणतेही पापकर्म करू नका. ‘‘อตีเต[Pg.197], ราธ, รูเป อนเปกฺโข โหหี’’ติ วิตฺถาเรน กาตพฺพา. ‘‘สีลวนฺเตน, อานนฺท, ปุคฺคเลน สทา กรณียา กินฺติเม อวิปฺปฏิสาโร อสฺสา’’ติ. อยํ วุจฺจติ อาณตฺติ. “हे राध! भूतकाळातील रूपाविषयी अनासक्त हो,” हे विस्ताराने जाणावे. “हे आनंदा! शीलवान व्यक्तीने नेहमी असे करावे जेणेकरून पश्चात्ताप होणार नाही.” याला आज्ञा असे म्हणतात. ตตฺถ กตมํ ผลํ? त्यात फल कोणते? ธมฺโม หเว รกฺขติ ธมฺมจารึ, ฉตฺตํ มหนฺตํ ยถ วสฺสกาเล; เอสานิสํโส ธมฺเม สุจิณฺเณ, น ทุคฺคตึ คจฺฉติ ธมฺมจารี. नक्कीच धर्म हा धर्माचरण करणाऱ्याचे रक्षण करतो, जसे पावसाळ्यात मोठे छत्र रक्षण करते; चांगल्या प्रकारे आचरण केलेल्या धर्माचा हाच फायदा आहे की धर्माचारी दुर्गतीला जात नाही. อิทํ ผลํ. हे फल आहे. ตตฺถ กตโม อุปาโย? त्यात उपाय कोणता? ‘‘สพฺเพ ธมฺมา อนตฺตา’’ติ, ยทา ปญฺญาย ปสฺสติ; อถ นิพฺพินฺทติ ทุกฺเข, เอส มคฺโค วิสุทฺธิยา. “सर्व धर्म अनात्म आहेत,” जेव्हा मनुष्य प्रज्ञेने हे पाहतो, तेव्हा तो दुःखापासून विरक्त होतो; हाच विशुद्धीचा मार्ग आहे. ‘‘สตฺตหงฺเคหิ สมนฺนาคโต โข, ภิกฺขุ, อปิ หิมวนฺตํ ปพฺพตราชานํ จาเลยฺย, โก ปน วาโท ฉวํ อวิชฺชํ สตฺตเกสุ’’ เวยฺยากรณํ กาตพฺพํ. อยํ อุปาโย. “सात अंगांनी युक्त असलेला भिक्खू पर्वतराज हिमालयालाही हलवू शकतो, मग त्या क्षुद्र अविद्येला सात तलवारींनी नष्ट करण्याविषयी काय सांगावे!” असे स्पष्टीकरण करावे. हा उपाय आहे. ตตฺถ กตมา อาณตฺติ จ ผลญฺจ? त्यात आज्ञा आणि फल कोणते? สเจ ภายถ ทุกฺขสฺส, สเจ โว ทุกฺขมปฺปิยํ; มากตฺถ ปาปกํ กมฺมํ, อาวิ วา ยทิ วา รโห. जर तुम्ही दुःखाला भित असाल, जर तुम्हाला दुःख अप्रिय असेल, तर उघडपणे किंवा गुप्तपणे कोणतेही पापकर्म करू नका. สเจ หิ ปาปกํ กมฺมํ, กโรถ วา กริสฺสถ; น โว ทุกฺขา ปโมกฺขาตฺถิ, อุปจฺจาปิ ปลายตํ. कारण जर तुम्ही पापकर्म करत असाल किंवा कराल, तर पळून जात असतानाही तुमची दुःखातून सुटका होणार नाही. ปุริมิกาย คาถาย อาณตฺติ ปจฺฉิมิกาย ผลํ. สีเล ปติฏฺฐาย ทฺเว ธมฺมา ภาเวตพฺพา ยา จ จิตฺตภาวนา ยา จ ปญฺญาภาวนา ยา จ อาณตฺติ ราควิราคา จ ผลํ. पहिल्या गाथेने आज्ञा आणि दुसऱ्या गाथेने फल दर्शविले आहे. शीलावर प्रतिष्ठित होऊन दोन धर्मांची भावना करावी—चित्तभावना आणि प्रज्ञाभावना; ही आज्ञा आहे. आणि रागविराग हे फल आहे. ตตฺถ กตมํ ผลญฺจ อุปาโย จ? त्यात फल आणि उपाय कोणते? สีเล ปติฏฺฐาย นโร สปญฺโญ, จิตฺตํ ปญฺญญฺจ ภาวยํ; อาตาปี นิปโก ภิกฺขุ, โส อิมํ วิชฏเย ชฏํ. शीलावर प्रतिष्ठित होऊन, चित्त आणि प्रज्ञेचा विकास करणारा, उद्योगी आणि बुद्धिमान प्रज्ञावान मनुष्य, तो भिक्खू या जटांना (तृष्णेच्या गुंतागुंतीला) सोडवू शकतो. ปุริมิกาย อฑฺฒคาถาย อุปาโย, ปจฺฉิมิกาย อฑฺฒคาถาย ผลํ. นนฺทิโย สกฺโก อิสิวุตฺถปุริริกามเอกรกฺเข สุตฺตํ มูลโต อุปาทาย ยาว [Pg.198] ฉสุ ธมฺเมสุ. อุตฺตริ ปญฺจสุ ธมฺเมสุ ยาจโยโค กรณีโย, อยํ อุปาโย. อสหคตสฺส กามาสวาปิ จิตฺตํ มุจฺจตีติ. สพฺพาสุ ฉสุ ตีสุ. อยํ อุปาโย จ ผลญฺจ. पहिल्या अर्ध्या गाथेने उपाय आणि दुसऱ्या अर्ध्या गाथेने फल दर्शविले आहे. नंदी, शक्र, ऋषींनी सांगितलेले, एका यक्षाचे रक्षण करणाऱ्या सूत्राच्या सुरुवातीपासून सहा धर्मांपर्यंत प्रयत्न करावा. त्यापुढे पाच धर्मांमध्ये जो प्रयत्न करायचा आहे, तो उपाय आहे. क्लेशांशिवाय असणाऱ्या व्यक्तीचे चित्त कामासवापासूनही मुक्त होते. हे सर्व सहा आणि तीन धर्मांमध्ये जाणावे. हा उपाय आणि फल आहे. ตตฺถ กตมา อาณตฺติ จ ผลญฺจ อุปาโย จ? त्यात आज्ञा, फल आणि उपाय कोणते? สุญฺญโต โลกํ อเวกฺขสฺสุ, โมฆราช สทา สโต; อตฺตานุทิฏฺฐึ อุหจฺจ, เอวํ มจฺจุตโร สิยา. हे मोघराज! नेहमी स्मृतिमान राहून जगाकडे शून्य म्हणून बघ; आत्मदृष्टीचा समूळ नाश करून, अशा प्रकारे मृत्यूला पार करता येईल. ‘‘สุญฺญโต โลกํ อเวกฺขสฺสุ, โมฆราชา’’ติ อาณตฺติ. ‘‘สทา สโต’’ติ อุปาโย. ‘‘อตฺตานุทิฏฺฐึ อุหจฺจ, เอวํ มจฺจุตโร สิยา’’ติ ผลํ. สมาธึ, ภิกฺขเว, ภาเวถ, สมาหิโต, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ รูปํ อนิจฺจนฺติ ปชานาติ. เอวํ ปสฺสํ อริยสาวโก ปริมุจฺจติ ชาติยาปิ…เป… อุปายาเสหิปิ อิธ ตีณิปิ’’. “हे मोघराज! जगाकडे शून्य म्हणून बघ” ही आज्ञा आहे. “नेहमी स्मृतिमान राहून” हा उपाय आहे. “आत्मदृष्टीचा समूळ नाश करून, अशा प्रकारे मृत्यूला पार करता येईल” हे फल आहे. “भिक्खूंनो, समाधीचा अभ्यास करा; समाहित झालेला भिक्खू रूपाला अनित्य म्हणून जाणतो. असे पाहणारा आर्यश्रावक जन्मापासूनही मुक्त होतो... पे... निराशेपासूनही मुक्त होतो.” येथे हे तिन्ही आहेत. ๒๓. ตตฺถ กตโม อสฺสาโท? २३. त्यात आस्वाद कोणता? กามํ กามยมานสฺส, ตสฺส เจตํ สมิชฺฌติ. อยํ อสฺสาโท. कामाची इच्छा करणाऱ्या व्यक्तीची ती इच्छा जर पूर्ण झाली, तर हा आस्वाद आहे. ‘‘ธมฺมจริยา สมจริยา กุสลจริยา เหตูหิ, พฺราหฺมณ, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ’’. อยํ อสฺสาโท. “हे ब्राह्मणा! धर्माचरण, समचरण आणि कुशल आचरण या कारणांमुळे, या जगात काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर सुगती स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” हा आस्वाद आहे. ตตฺถ กตโม อาทีนโว? त्यात आदीनव कोणता? กาเมสุ เว หญฺญเต สพฺพา มุจฺเจว – อยํ อาทีนโว. ปเสนทิสํยุตฺตเก สุตฺเต ปพฺพโตปมา – อยํ อาทีนโว. कामांच्या पाठीमागे लागून मनुष्य नक्कीच पीडित होतो आणि नष्ट होतो—हा आदीनव आहे. पसेनदी संयुक्तातील सूत्रात पर्वताची उपमा दिली आहे—हा आदीनव आहे. ตตฺถ กตมํ นิสฺสรณํ? त्यात निस्सरण कोणते? โย กาเม ปริวชฺเชติ, สปฺปสฺเสว ปทา สิโร; โสมํ วิสตฺติกํ โลเก, สโต สมติวตฺตติ. जो मनुष्य सर्पाच्या डोक्यावर पाय देण्याप्रमाणे कामांचा त्याग करतो, तो स्मृतिमान पुरुष जगातील या विषारी तृष्णेला चांगल्या प्रकारे पार करतो. สํยุตฺตเก สุตฺตํ ปาริจฺฉตฺตโก ปณฺฑุปลาโส สนฺนิปลาโส – อิทํ นิสฺสรณํ. संयुत्तनिकायातील पारिच्छत्तक सूत्र, पांढरे पडलेले पान, गळून पडलेले पान—हे निस्सरण आहे. ตตฺถ [Pg.199] กตโม อสฺสาโท จ อาทีนโว จ? त्यात आस्वाद आणि आदीनव कोणते? ยานิ กโรติ ปุริโส, ตานิ อตฺตนิ ปสฺสติ; กลฺยาณการี กลฺยาณํ, ปาปการี จ ปาปกํ. मनुष्य जी कर्मे करतो, ती तो स्वतःमध्ये पाहतो; कल्याणकारी कल्याणाचा अनुभव घेतो आणि पापकर्म करणारा पापाचा अनुभव घेतो. ตตฺถ ยํ ปาปการี ปจฺจนุโภติ อยํ อสฺสาโท. ลาภาลาภอฏฺฐเกสุ พฺยากรณํ, ตตฺถ อลาโภ อยโส นินฺทา ทุกฺขํ, อยํ อาทีนโว. ลาโภ ยโส สุขํ ปสํสา, อยํ อสฺสาโท. त्यात पापकर्म करणारा जो अनुभव घेतो, तो आस्वाद आहे. लाभ-अलाभ इत्यादी आठ लोकधर्मांचे स्पष्टीकरण करताना, त्यात अलाभ, अयश, निंदा, दुःख—हा आदीनव आहे. लाभ, यश, सुख, प्रशंसा—हा आस्वाद आहे. ตตฺถ กตมํ อสฺสาโท จ นิสฺสรณญฺจ? त्यात आस्वाद आणि निस्सरण कोणते? ‘‘สุโข วิปาโก ปุญฺญานํ, อธิปฺปาโย จ อิชฺฌติ; ขิปฺปญฺจ ปรมํ สนฺตึ, นิพฺพานมธิคจฺฉตี’’ติ. “पुण्यांचा विपाक सुखकारक असतो आणि इच्छा पूर्ण होते; आणि मनुष्य लवकरच परम शांतीला, निर्वाणाला प्राप्त करतो।” โย จ วิปาโก ปุญฺญานํ ยา จ อธิปฺปายสฺส อิชฺฌนา, อยํ อสฺสาโท. ยํ ขิปฺปญฺจ ปรมํ สนฺตึ นิพฺพานมธิคจฺฉติ, อิทํ นิสฺสรณํ. पुण्यांचा जो विपाक आहे आणि इच्छेची जो पूर्तता आहे, तो आस्वाद आहे. आणि जे लवकरच परम शांतीला, निर्वाणाला प्राप्त करतो, ते निस्सरण आहे. พาตฺตึสาย เจว มหาปุริสลกฺขเณหิ สมนฺนาคตสฺส มหาปุริสสฺส ทฺเวเยว คติโย โหนฺติ, สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี ยาว อภิวิชินิตฺวา อชฺฌาวสติ อยํ อสฺสาโท. สเจ อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชติ สพฺเพน โอเฆน นิสฺสรณํ อยํ อสฺสาโท จ นิสฺสรณญฺจ. बत्तीस महापुरुष लक्षणांनी युक्त असलेल्या महापुरुषाच्या दोनच गती असतात; जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर ते चक्रवर्ती राजे होतात आणि सर्व जिंकून राज्य करतात—हा आस्वाद आहे. जर ते घराचा त्याग करून अनगारिक होतात, तर सर्व ओघांमधून सुटका होते—हे आस्वाद आणि निस्सरण आहे. ตตฺถ กตโม อาทีนโว จ นิสฺสรณญฺจ? त्यात आदीनव आणि निस्सरण कोणते? อาทานสฺส ภยํ ญตฺวา, ชาติมรณสมฺภวํ; อนาทาตุํ นิพฺพตฺตติ, ชาติมรณสงฺขยา. उपादानाचा आणि जन्म-मरणाच्या उत्पत्तीचा धोका जाणून, जन्म-मरणाच्या क्षयासाठी उपादान न करणे घडते. ปุริมิกาย อฑฺฒคาถาย ชาติมรณสมฺภโว อาทีนโว. อนาทาตุํ นิพฺพตฺตติ ชาติมรณสงฺขยาติ นิสฺสรณํ. पहिल्या अर्ध्या गाथेने जन्म-मरणाची उत्पत्ती हा आदीनव आहे. 'उपादान न करणे जन्म-मरणाच्या क्षयासाठी घडते' हे निस्सरण आहे. กิจฺฉํ วตายํ โลโก อาปนฺโน ยมิทํ ชายเต จ มียเต จ. ยาว กุทสฺสุนามสฺส ทุกฺขสฺส อนฺโต ภวิสฺสติ ปรโต วาติ เอตฺถ ยา อุปริกฺขา, อยํ อาทีนโว. โย เคธํ ญตฺวา อภินิกฺขมติ ยาว ปุราณกาย ราชธานิยา, อิทํ นิสฺสรณํ. อยํ อาทีนโว จ นิสฺสรณญฺจ. हा लोक खरोखरच संकटात सापडला आहे, जो जन्म घेतो आणि मरतो. 'कधी बरं या दुःखाचा अंत होईल किंवा यापलीकडे जाईल?' याविषयीचे जे चिंतन आहे, तो आदीनव आहे. जो आसक्ती जाणून जुन्या राजधानीतून गृहत्याग करतो, ते निस्सरण आहे. हा आदीनव आणि निस्सरण आहे. ตตฺถ [Pg.200] กตโม อสฺสาโท จ อาทีนโว จ นิสฺสรณญฺจ? त्यात आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण कोणते? กามา หิ จิตฺรา วิวิธา มโนรมา, วิรูปรูเปหิ มเถนฺติ จิตฺตํ; ตสฺมา อหํ ปพฺพชิโตมฺหิ ราช, อปณฺณกํ สามญฺญเมว เสยฺโย. काम हे खरोखरच चित्रविचित्र, विविध आणि मनोरम असतात, ते विविध रूपांनी चित्ताला विचलित करतात. म्हणूनच, हे राजा! मी प्रव्रजित झालो आहे; संशयरहित श्रमणत्वच श्रेष्ठ आहे. ยํ ‘‘กามา หิ จิตฺรา วิวิธา มโนรมา’’ติ อยํ อสฺสาโท. ยํ ‘‘วิรูปรูเปหิ มเถนฺติ จิตฺต’’นฺติ อยํ อาทีนโว. ยํ อหํ อคารสฺมา ปพฺพชิโตมฺหิ ราช อปณฺณกํ สามญฺญเมว เสยฺโยติ อิทํ นิสฺสรณํ. जे 'काम हे खरोखरच चित्रविचित्र, विविध आणि मनोरम असतात' असे म्हटले आहे, तो 'आस्वाद' (assāda) आहे. जे 'ते विविध रूपांनी चित्ताला विचलित करतात' असे म्हटले आहे, तो 'आदीनव' (दोष) आहे. जे 'हे राजा, मी घराबाहेर पडून प्रव्रजित झालो आहे, संशयरहित श्रमणत्वच श्रेष्ठ आहे' असे म्हटले आहे, ते 'निस्सरण' (मुक्ती) आहे. พลวํ พาโลปมสุตฺตํ ยํ อาสาย วา เวทนียํ กมฺมํ คาหติ, ตถา เจปิ ยํ ยํ ปาปกมฺมํ อนุโภติ, ตตฺถ ทุกฺขเวทนีเยน กมฺเมน อภาวิตกาเยน จ ยาว ปริตฺตเจตโส จ อาทีนวํ ทสฺเสติ สุขเวทนีเยน กมฺเมน อสฺสาเทติ. ยํ ปุราสทิโส โหติ. ภาวิตจิตฺโต ภาวิตกาโย ภาวิตปญฺโญ มหานาโม อปริตฺตเจตโส, อิทํ นิสฺสรณํ. शक्तिशाली 'बालोपम सुत्त' मध्ये, आशेने ज्या वेदनीय कर्माचे ग्रहण केले जाते, तसेच जे जे पापकर्म भोगले जाते, त्यामध्ये दुःख-वेदनीय कर्माद्वारे आणि भावना न केलेल्या (अभावित) कायेद्वारे, संकुचित चित्त असलेल्याचा 'आदीनव' (दोष) दाखवला जातो, आणि सुख-वेदनीय कर्माद्वारे आस्वाद घेतला जातो. जे पूर्वीसारखेच असते. परंतु ज्यांचे चित्त भावित आहे, काय भावित आहे, प्रज्ञा भावित आहे आणि जे संकुचित चित्त नसलेले आहेत अशा महानामांसाठी हे 'निस्सरण' आहे. ๒๔. ตตฺถ กตมํ โลกิกํ สุตฺตํ? २४. त्यात लौकिक सुत्त कोणते? น หิ ปาปํ กตํ กมฺมํ, สชฺชุขีรํว มุจฺจติ; ฑหนฺตํ พาลมนฺเวติ, ภสฺมจฺฉนฺโนว ปาวโก. केलेले पापकर्म हे तात्काळ काढलेल्या दुधासारखे लगेच विरत (दही बनत) नाही; तर ते राखेने झाकलेल्या अग्नीप्रमाणे, मूर्खाला आतून जाळत त्याचा पाठलाग करते. จตฺตาริ อคติคมนานิ, อิทํ โลกิกํ สุตฺตํ. चार अगतींचे मार्ग (अगतिगमन), हे लौकिक सुत्त आहे. ตตฺถ กตมํ โลกุตฺตรํ สุตฺตํ? त्यात लोकोत्तर सुत्त कोणते? ‘‘ยสฺสินฺทฺริยานิ สมถงฺคตานิ, อสฺสา ยถา สารถินา สุทนฺตา; ปหีนมานสฺส อนาสวสฺส, เทวาปิ ตสฺส ปิหยนฺติ ตาทิโน’’ติ. ज्याची इंद्रिये, सारथीने चांगल्या प्रकारे प्रशिक्षित केलेल्या घोड्यांप्रमाणे, शांत झाली आहेत; ज्याचा मान (अहंकार) नष्ट झाला आहे आणि जो अनास्रव (आसवरहित) व तादी (अविचल) आहे, अशा पुरुषाची देवसुद्धा आकांक्षा करतात. ‘‘อริยํ โว, ภิกฺขเว, สมฺมาสมาธึ เทเสสฺสามี’’ติ อิทํ โลกุตฺตรํ สุตฺตํ. “भिक्खूंनो, मी तुम्हांला आर्य सम्यक समाधीचा उपदेश करीन,” हे लोकोत्तर सुत्त आहे. ตตฺถ [Pg.201] กตมํ โลกิกํ โลกุตฺตรญฺจ สุตฺตํ? त्यात लौकिक आणि लोकोत्तर दोन्ही असलेले सुत्त कोणते? สตฺติยา วิย โอมฏฺโฐ, ทยฺหมาโนว มตฺถเก; กามราคปฺปหานาย, สโต ภิกฺขุ ปริพฺพเช. भाला खुपसल्याप्रमाणे किंवा डोक्याला आग लागल्याप्रमाणे, कामरागाचा त्याग करण्यासाठी भिक्खूने स्मृतिमान होऊन विहार करावा. ‘‘สตฺติยา วิย โอมฏฺโฐ, ทยฺหมาโนว มตฺถเก’’ติ โลกิกํ; ‘‘กามราคปฺปหานาย, สโต ภิกฺขุ ปริพฺพเช’’ติ โลกุตฺตรํ; “भाला खुपसल्याप्रमाणे किंवा डोक्याला आग लागल्याप्रमाणे” हे लौकिक आहे; “कामरागाचा त्याग करण्यासाठी भिक्खूने स्मृतिमान होऊन विहार करावा” हे लोकोत्तर आहे. กพฬีกาเร อาหาเร อตฺถิ ฉนฺโทติ โลกิกํ. นตฺถิ ฉนฺโทติ โลกุตฺตรํ สุตฺตํ. कवळीकार आहारात (कवळ करून खाण्याच्या अन्नात) इच्छा असणे हे लौकिक आहे. इच्छा नसणे हे लोकोत्तर सुत्त आहे. ตตฺถ กตมํ กมฺมํ? त्यात कर्म कोणते? โย ปาณมติปาเตติ, มุสาวาทญฺจ ภาสติ; โลเก อทินฺนํ อาทิยติ, ปรทารญฺจ คจฺฉติ. जो प्राणातिपात (जीवहिंसा) करतो, असत्य बोलतो, जगात न दिलेले (चोरीने) घेतो आणि परस्त्रीगमन करतो. สุราเมรยปานญฺจ, โย นโร อนุยุญฺชติ; อปฺปหาย ปญฺจ เวรานิ, ทุสฺสีโล อิติ วุจฺจติ. आणि जो मनुष्य सुरा-मेरय (मद्यपान) घेतो; पाच वैरांचा त्याग न केल्यामुळे त्याला 'दुःशील' (चरित्रहीन) म्हटले जाते. ตีณิมานิ, ภิกฺขเว, ทุจฺจริตานิ. อิทํ กมฺมํ. “भिक्खूंनो, ही तीन दुश्चरिते आहेत.” हे कर्म आहे. ตตฺถ กตโม วิปาโก? त्यात विपाक (फळ) कोणता? สฏฺฐิวสฺสสหสฺสานิ, ยถารูปี วิปจฺจคา. साठ हजार वर्षांपर्यंत जसेच्या तसे परिपक्व होते. ‘‘ทิฏฺฐา มยา, ภิกฺขเว, ฉ ผสฺสายตนิกา นาม นิรยา. ทิฏฺฐา มยา, ภิกฺขเว, ฉ ผสฺสายตนิกา นาม สคฺคา’’. อยํ วิปาโก. “भिक्खूंनो, मी सहा स्पर्शायतन नावाचे नरक पाहिले आहेत. भिक्खूंनो, मी सहा स्पर्शायतन नावाचे स्वर्ग पाहिले आहेत.” हा विपाक आहे. ตตฺถ กตมํ กมฺมญฺจ วิปาโก จ? त्यात कर्म आणि विपाक दोन्ही कोणते? อยสาว มลํ สมุฏฺฐิตํ, ตตุฏฺฐาย ตเมว ขาทติ; เอวํ อติโธนจารินํ, สานิ กมฺมานิ นยนฺติ ทุคฺคตึ. ज्याप्रमाणे लोखंडापासूनच गंज उत्पन्न होतो आणि तो उत्पन्न होऊन त्याच लोखंडाला खाऊन टाकतो; उसीप्रमाणे अतिभोग घेणाऱ्यांचे (अतिधोनचारींचे) स्वतःचेच कर्म त्यांना दुर्गतीकडे घेऊन जाते. อยสาว มลํ สมุฏฺฐิตํ, ยาว สานิ กมฺมานีติ อิทํ กมฺมํ. นยนฺติ ทุคฺคตินฺติ วิปาโก. “ज्याप्रमाणे लोखंडापासूनच गंज उत्पन्न होतो...” इथपासून “स्वतःचेच कर्म...” इथपर्यंत हे कर्म आहे. “दुर्गतीकडे घेऊन जाते” हा विपाक आहे. จตูสุ สมฺมาปฏิปชฺชมาโน มาตริ ปิตริ ตถาคเต ตถาคตสาวเก ยา สมฺมาปฏิปตฺติ, อิทํ กมฺมํ. ยํ เทเวสุ อุปปชฺชติ, อยํ วิปาโก. อิทํ กมฺมญฺจ วิปาโก จ. माता, पिता, तथागत आणि तथागतांचे श्रावक या चौघांच्या बाबतीत सम्यक आचरण करत असताना जे सम्यक आचरण घडते, ते कर्म आहे. ज्या कर्मामुळे तो देवांमध्ये (स्वर्गात) उत्पन्न होतो, तो विपाक आहे. हे कर्म आणि विपाक दोन्ही आहे. ๒๕. ตตฺถ [Pg.202] กตมํ นิทฺทิฏฺฐํ สุตฺตํ? २५. त्यात निर्दिष्ट (स्पष्ट केलेले) सुत्त कोणते? เนลงฺโค เสตปจฺฉาโท, เอกาโร วตฺตตี รโถ; อนีฆํ ปสฺส อายนฺตํ, ฉินฺนโสตํ อพนฺธนํ; ยํ วา จิตฺตํ สมเณสุ, จิตฺตาคหปติ ทิสฺสติ. हे चित्त गृहपती! निष्पाप (दोषरहित) अंगांचा, पांढऱ्या वस्त्राने झाकलेला, एक कणा असलेला रथ चालत आहे. क्लेशरहित, तृष्णेचा प्रवाह तोडलेल्या, बंधनरहित आणि श्रमणांमध्ये ज्यांचे चित्त स्थिर दिसते अशा येणाऱ्या भिक्खूकडे पहा. เอวํ อิมาย คาถาย นิทฺทิฏฺโฐ อตฺโถ. अशा प्रकारे या गाथेद्वारे अर्थ निर्दिष्ट (स्पष्ट) केला आहे. โคปาลโกปเม เอกาทส ปทานิ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ รูปญฺญู โหติ. ยา จ อติเรกปูชาย ปูเชตา โหตีติ. อิมานิ เอกาทส ปทานิ ยถาภาสิตานิ นิทฺทิฏฺโฐ อตฺโถ. गोपालक उपमेमध्ये अकरा पदे आहेत. “भिक्खूंनो, अशा प्रकारे भिक्खू रूप जाणणारा (रूपज्ञू) होतो...” आणि “अतिरेक पूजेने जो पूजक होतो...” ही अकरा पदे जशी भाषिली आहेत, तसा अर्थ निर्दिष्ट केला आहे. ตตฺถ กตโม อนิทฺทิฏฺโฐ อตฺโถ? त्यात अनिर्दिष्ट (अस्पष्ट) अर्थ कोणता? สุโข วิเวโก ตุฏฺฐสฺส, สุตธมฺมสฺส ปสฺสโต; อพฺยาปชฺชํ สุขํ โลเก, ปาณภูเตสุ สํยโมติ. संतुष्ट असलेल्या, धर्म ऐकलेल्या आणि सत्य पाहणाऱ्या व्यक्तीसाठी विवेक (एकांत) सुखकारक आहे. जगात प्राणिमात्रांविषयी संयम बाळगणे आणि अव्यापन्न (द्वेषरहित) असणे हे सुखकारक आहे. สุขา วิราคตา โลเก, กามานํ สมติกฺกโม; อสฺมิมานสฺส โย วินโย, เอตํ เว ปรมํ สุขนฺติ. जगात वैराग्य (रागविरहितता) सुखकारक आहे, कामांचे (भोगांचे) उल्लंघन करणे सुखकारक आहे. 'मी' पणाचा (अस्मिमान) जो विनय (नाश) आहे, तेच खरोखर परम सुख आहे. อิทํ อนิทฺทิฏฺฐํ. อฏฺฐ มหาปุริสวิตกฺกา. อิทํ อนิทฺทิฏฺฐํ. हे अनिर्दिष्ट आहे. आठ महापुरुष-वितर्क (विचार), हे अनिर्दिष्ट आहे. ตตฺถ กตมํ นิทฺทิฏฺฐญฺจ อนิทฺทิฏฺฐญฺจ? त्यात निर्दिष्ट आणि अनिर्दिष्ट दोन्ही असलेले कोणते? ปสนฺนเนตฺโต สุมุโข, พฺรหา อุชุ ปตาปวา; มชฺเฌ สมณสงฺฆสฺส, อาทิจฺโจว วิโรจสิ. प्रसन्न नेत्र असलेले, सुमुख (सुंदर मुख असलेले), ब्रह्मदेवासारखे सरळ शरीर असलेले आणि तेजस्वी असे भगवान भिक्खू संघाच्या मध्यभागी सूर्याप्रमाणे शोभून दिसतात. ปสนฺนเนตฺโต ยาว อาทิจฺโจว วิโรจสีติ นิทฺทิฏฺโฐ. ปสนฺนเนตฺโต โย ภควา กถญฺจ ปน ปสนฺนเนตฺตตา, กถํ สุมุขตา, กถํ พฺรหกายตา, กถํ อุชุกตา, กถํ ปตาปวตา, กถํ วิโรจตาติ อนิทฺทิฏฺโฐ. เผณปิณฺโฑปมํ เวยฺยากรณํ ยถา เผณปิณฺโฑ เอวํ รูปํ ยถา ปุพฺพุโฬ เอวํ เวทนา มายา วิญฺญาณํ ปญฺจกฺขนฺธา ปญฺจหิ อุปมาหิ นิทฺทิฏฺฐา. เกน การเณน เผณปิณฺโฑปมํ รูปํ สพฺพญฺจ จกฺขุวิญฺเญยฺยํ ยํ วา จตูหิ อายตเนหิ? กถํ เวทนา ปุพฺพุฬูปมา? กตรา จ สา เวทนา สุขา ทุกฺขา อทุกฺขมสุขา? เอวเมสา อนิทฺทิฏฺฐา. เอวํ นิทฺทิฏฺฐญฺจ อนิทฺทิฏฺฐญฺจ. “प्रसन्न नेत्र असलेले...” इथपासून “सूर्याप्रमाणे शोभून दिसतात” इथपर्यंत निर्दिष्ट आहे. 'प्रसन्न नेत्र असलेले जे भगवान आहेत, त्यांचे प्रसन्न नेत्र असणे म्हणजे काय? सुमुख असणे म्हणजे काय? ब्रह्मदेवासारखे शरीर असणे म्हणजे काय? सरळ असणे म्हणजे काय? तेजस्वी असणे म्हणजे काय? शोभून दिसणे म्हणजे काय?' हे अनिर्दिष्ट आहे. फेणपिंडोपम (पाण्याच्या फेसाच्या गोळ्यासारखे) व्याकरणात, ज्याप्रमाणे फेसाचा गोळा आहे त्याप्रमाणे रूप आहे, ज्याप्रमाणे पाण्याचा बुडबुडा आहे त्याप्रमाणे वेदना आहे, ज्याप्रमाणे जादू (माया) आहे त्याप्रमाणे विज्ञान आहे; अशा प्रकारे पाच स्कंध पाच उपमांद्वारे निर्दिष्ट केले आहेत. कोणत्या कारणाने रूप हे फेसाच्या गोळ्यासारखे आहे, जे सर्व चक्षुविज्ञानाने जाणले जाते किंवा चार आयतनांनी जाणले जाते? वेदना पाण्याच्या बुडबुड्यासारखी कशी आहे? आणि ती वेदना कोणती आहे—सुख, दुःख की अदुःख-असुख? अशा प्रकारे हे अनिर्दिष्ट आहे. हे निर्दिष्ट आणि अनिर्दिष्ट दोन्ही आहे. ๒๖. ตตฺถ [Pg.203] กตมํ ญาณํ? २६. त्यात ज्ञान कोणते? ปญฺญา หิ เสฏฺฐา โลกสฺมึ, ยายํ นิพฺเพธคามินี; ยาย สมฺมา ปชานาติ, ชาติมรณสงฺขยํ. जगात प्रज्ञाच श्रेष्ठ आहे, जी भेदून जाणारी (निर्वेधगामिनी) आहे; जिच्याद्वारे मनुष्य जन्म आणि मरणाचा क्षय (नाश) सम्यक प्रकारे जाणतो. ตีณิมานิ อินฺทฺริยานิ อนญฺญาตญฺญสฺสามีตินฺทฺริยํ อญฺญินฺทฺริยํ อญฺญาตาวินฺทฺริยํ, อิทํ ญาณํ. ही तीन इंद्रिये आहेत: अनञ्ञातञ्ञस्सामीतिन्द्रिय (अनज्ञात-ज्ञातुकाम्येंद्रिय), अञ्ञिन्द्रिय (आज्ञेंद्रिय) आणि अञ्ञाताविन्द्रिय (आज्ञातावींद्रिय). हे ज्ञान आहे. ตตฺถ กตมํ เนยฺยํ? त्यात नेय्य (जाणून घेण्याजोगे) कोणते? กาเมสุ สตฺตา กามสงฺคสตฺตา, สํโยชเน วชฺชมปสฺสมานา; น หิ ชาตุ สํโยชนสงฺคสตฺตา, โอฆํ ตเรยฺยุํ วิปุลํ มหนฺตํ. कामांमध्ये (भोगांमध्ये) आसक्त असलेले, कामसंगात अडकलेले आणि संयोजनांमधील (बंधनांमधील) दोष न पाहणारे प्राणी; संयोजनांच्या संगात आसक्त असलेले ते कधीही या विस्तीर्ण आणि महान ओघाला (संसाररूपी प्रवाहाला) पार करू शकत नाहीत. จตูหิ องฺเคหิ สมนฺนาคตา กายสฺส เภทา เทเวสุ อุปฺปชฺชนฺติ. อุทาเน กาปิยํ สุตฺตํ อปณฺณกปสาทนียํ – อิทํ เนยฺยํ. चार अंगांनी युक्त असलेले लोक शरीराच्या भेदानंतर (मृत्यूनंतर) देवलोकात उत्पन्न होतात. उदानातील 'कापिय सुत्त' जे अपण्णकप्रसादनीय (निश्चितपणे प्रसन्न करणारे) आहे – हे 'नेय्य' (मार्गदर्शनपर सुत्त) आहे. ตตฺถ กตมํ ญาณญฺจ เนยฺยญฺจ? त्यात 'ज्ञान' आणि 'नेय्य' कोणते आहे? สพฺเพ ธมฺมา อนตฺตาติ, ยทา ปญฺญาย ปสฺสติ; อถ นิพฺพินฺทติ ทุกฺเข, เอส มคฺโค วิสุทฺธิยา. जेव्हा प्रज्ञेने पाहतो की, 'सर्व संस्कार अनात्म (आत्माविरहित) आहेत', तेव्हा तो दुःखापासून विरक्त होतो. हाच विशुद्धीचा मार्ग आहे. ยทา ปสฺสตีติ ญาณํ. โย สพฺพธมฺเม อนตฺตากาเรน อุปฏฺฐเปติ อิทํ เนยฺยํ. 'जेव्हा (प्रज्ञेने) पाहतो' हे 'ज्ञान' आहे. जो सर्व धर्मांना अनात्म रूपाने प्रस्थापित करतो, हे 'नेय्य' आहे. จตฺตาริ อริยสจฺจานิ, ตตฺถ ตีณิ เนยฺยานิ มคฺคสจฺจํ สีลกฺขนฺโธ จ ปญฺญากฺขนฺโธ จ, อิทํ ญาณญฺจ เนยฺยญฺจ. चार आर्यसत्ये आहेत; त्यातील तीन 'नेय्य' आहेत, आणि शीलस्कंध व प्रज्ञास्कंध असलेले 'मार्गसत्य' हे 'ज्ञान' आहे. हे 'ज्ञान आणि नेय्य' आहे. ๒๗. ตตฺถ กตมํ ทสฺสนํ? २७. त्यात 'दर्शन' कोणते आहे? เอเสว มคฺโค นตฺถญฺโญ, ทสฺสนสฺส วิสุทฺธิยา; เอตญฺหิ ตุมฺเห ปฏิปชฺชถ, มารสฺเสตํ ปโมหนํ. दर्शनाच्या विशुद्धीसाठी हाच एक मार्ग आहे, दुसरा नाही. तुम्ही याच मार्गाचे आचरण करा, हा मारला (मोहाला) पराभूत करणारा आहे. จตูหิ องฺเคหิ สมนฺนาคโต อริยสาวโก อตฺตนาว อตฺตานํ พฺยากเรยฺย ‘‘ขีณนิรโยมฺหิ ยาว โสตาปนฺโนหมสฺมิ อวินิปาตธมฺโม นิยโต สมฺโพธิปรายโณ’’ติ. อิทํ ทสฺสนํ. चार अंगांनी युक्त असलेला आर्यश्रावक स्वतःच स्वतःविषयी असे घोषित करू शकतो: 'माझे नरकगमन नष्ट झाले आहे, मी सोतापन्न झालो आहे, माझा अधःपात होणार नाही, मी नियत आहे आणि संबोधीप्रत जाणारा आहे.' हे 'दर्शन' आहे. ตตฺถ [Pg.204] กตมา ภาวนา? त्यात 'भावना' कोणती आहे? ยสฺสินฺทฺริยานิ สุภาวิตานิ, อชฺฌตฺตํ พหิทฺธา จ สพฺพโลเก; โส ปุคฺคโล มติ จ รูปสญฺญี, สุโมหคตา น ชานาติ. ज्याची इंद्रिये अध्यात्म (स्वतःच्या आत) आणि बाह्य अशा संपूर्ण लोकात चांगल्या प्रकारे भावित झाली आहेत, तो प्रज्ञावान पुरुष रूपसंज्ञेमध्ये मोहाप्रत गेलेल्यांना जाणत नाही (त्यांच्यासारखा मोहित होत नाही). จตฺตาริ ธมฺมปทานิ – อนภิชฺฌา อพฺยาปาโท สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ ภาวนา. चार धर्मपदे आहेत – अनभिध्या (लोभ नसणे), अव्यापाद (द्वेष नसणे), सम्यक स्मृती आणि सम्यक समाधी. ही 'भावना' आहे. ตตฺถ กตมํ ทสฺสนญฺจ ภาวนา จ? त्यात 'दर्शन आणि भावना' दोन्ही कोणते आहे? วจสา มนสาถ กมฺมุนา จ, อวิรุทฺโธ สมฺมา วิทิตฺวา ธมฺมํ; นิพฺพานปทาภิปตฺถยาโน, สมฺมา โส โลเก ปริพฺพเชยฺย. वाणीने, मनाने आणि कर्माने अविरुद्ध राहून, धर्माला सम्यक प्रकारे जाणून, निर्वाणपदाची आकांक्षा बाळगणारा तो पुरुष या लोकात सम्यक प्रकारे परिव्रजन करो. โสตาปตฺติผลํ สจฺฉิกาตุกาเมน กตเม ธมฺมา มนสิกาตพฺพา, ภควา อาห ปญฺจุปาทานกฺขนฺธา. อิทํ ทสฺสนญฺจ ภาวนา จ. सोतापत्तिफलाचा साक्षात्कार करू इच्छिणाऱ्याने कोणत्या धर्मांचे मनन केले पाहिजे? भगवंतांनी सांगितले की, 'पाच उपादानस्कंध'. हे 'दर्शन आणि भावना' दोन्ही आहे. ๒๘. ตตฺถ กตเม วิปากธมฺมธมฺมา? २८. त्यात 'विपाकधम्म-धर्म' कोणते आहेत? ยานิ กโรติ ปุริโสติ วิตฺถาโร. ตีณิมานิ, ภิกฺขเว, สุจริตานิ. อิเม วิปากธมฺมธมฺมา. 'मनुष्य जे कर्म करतो...' हा विस्तार जाणावा. 'भिक्षूंनो, ही तीन सुचरिते आहेत.' हे 'विपाकधम्म-धर्म' आहेत. ตตฺถ กตเม นวิปากธมฺมธมฺมา? त्यात 'न-विपाकधम्म-धर्म' कोणते आहेत? รูปํ เวทยิตํ สญฺญา, วิญฺญาณํ ยา เจว เจตนา; เนโสหมสฺมิ น เมโส อตฺตา, อิติ ทิฏฺโฐ วิรชฺชติ. रूप, वेदन, संज्ञा, विज्ञान आणि जी चेतना आहे; 'हे माझे नाही, मी हे नाही, हा माझा आत्मा नाही' असे पाहणारा विरक्त होतो. ปญฺจิเม, ภิกฺขเว, ขนฺธา – อิเม นวิปากธมฺมธมฺมา. भिक्षूंनो, हे पाच स्कंध आहेत – हे 'न-विपाकधम्म-धर्म' आहेत. ตตฺถ กตโม เนววิปาโก นวิปากธมฺมธมฺโม? त्यात 'नेवविपाक-नविपाकधम्म-धर्म' कोणता आहे? ‘‘เย เอวํ ปฏิปชฺชนฺติ, นยํ พุทฺเธน เทสิตํ; เต ทุกฺขสฺสนฺตํ กริสฺสนฺติ, สตฺถุสาสนการกา’’ติ. 'जे बुद्धांनी उपदेशिलेल्या मार्गाचे अशा प्रकारे आचरण करतात, ते शास्त्यांच्या शासनाचे पालन करणारे दुःखाचा अंत करतील.' อิติ ยา จ สมฺมาปฏิปตฺติ โย จ นิโรโธ, อุภยเมตํ เนววิปาโก นวิปากธมฺโม. พฺรหฺมจริยํ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ, พฺรหฺมจริยผลานิ จ พฺรหฺมจริยญฺจ อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค พฺรหฺมจริยผลานิ โสตาปตฺติผลํ ยาว อรหตฺตํ. अशा प्रकारे जी सम्यक प्रतिपत्ती आहे आणि जो निरोध आहे, हे दोन्ही 'नेवविपाक-नविपाकधम्म' आहेत. भिक्षूंनो, मी तुम्हांला ब्रह्मचर्य आणि ब्रह्मचर्याची फळे उपदेशितो. आर्य अष्टांगिक मार्ग हे 'ब्रह्मचर्य' आहे आणि सोतापत्तिफलापासून अर्हत्त्वापर्यंतची फळे ही 'ब्रह्मचर्यफळे' आहेत. ๒๙. ตตฺถ [Pg.205] กตมํ สกวจนํ? २९. त्यात 'सकवचन' कोणते आहे? สพฺพปาปสฺส อกรณํ, กุสลสฺส อุปสมฺปทา; สจิตฺตปริโยทปนํ, เอตํ พุทฺธาน สาสนํ. सर्व पापांचा अटकाव, कुशलाची उपसंपदा आणि स्वतःच्या चित्ताची शुद्धी करणे – हे बुद्धांचे शासन आहे. ตีณิมานิ, ภิกฺขเว, วิโมกฺขมุขานิ. อิทํ สกวจนํ. भिक्षूंनो, ही तीन विमोक्षमुखे आहेत. हे 'सकवचन' आहे. ตตฺถ กตมํ ปรวจนํ? त्यात 'परवचन' कोणते आहे? นตฺถิ ปุตฺตสมํ เปมํ, นตฺถิ โคณสมิตํ ธนํ; นตฺถิ สูริยสมา อาภา, สมุทฺทปรมา สรา. पुत्रासारखे प्रेम नाही, गोधनासारखे धन नाही, सूर्यासारखा प्रकाश नाही आणि समुद्रासारखे मोठे जलाशय नाही. เหตุนา มาริสา โกสิยา สุภาสิเตน สงฺคามวิชโย โสปิ นาม, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท สกํ ผลํ ปริภุญฺชมาโนติ วิตฺถาเรน กาตพฺพํ. อิทํ ปรวจนํ. 'हे कोसीय! सुभाषित कारणाने युद्धात विजय झाला...' आणि 'भिक्षूंनो, तो देवांचा राजा शक्र स्वतःच्या कर्माचे फळ भोगत आहे...' हा विस्तार जाणावा. हे 'परवचन' आहे. ตตฺถ กตมํ สกวจนญฺจ ปรวจนญฺจ? त्यात 'सकवचन आणि परवचन' दोन्ही असलेले सुत्त कोणते आहे? ‘‘ยํ ปตฺตํ ยญฺจ ปตฺตพฺพํ, อุภยเมตํ รชานุกิณฺณํ; เย เอวํวาทิโน นตฺถิ, เตสํ กาเมสุ โทโส’’ติ. 'जे प्राप्त झाले आहे आणि जे प्राप्त करायचे आहे, हे दोन्ही धुळीने माखलेले आहे; जे असे मानत नाहीत, त्यांचा कामासक्तीमध्ये दोष असतो.' อิทํ ปรวจนํ. เย จ โข เต อุโภ อนฺเต อนุปคมฺม วฏฺฏํ เตสํ นตฺถิ ปญฺญาปนาย. อิทํ สกวจนํ. हे 'परवचन' आहे. आणि जे त्या दोन्ही टोकांना न जाता राहतात, त्यांच्यासाठी संसार प्रस्थापित करण्यासाठी उरत नाही. हे 'सकवचन' आहे. ‘‘นนฺทติ ปุตฺเตหิ ปุตฺติมา, โคมา โคหิ ตเถว นนฺทติ; อุปธี หิ นรสฺส นนฺทนา, น หิ โส นนฺทติ โย นิรูปธี’’ติ – ปรวจนํ. 'पुत्रवान पुत्रांमुळे आनंदित होतो, गोधन असलेला गाई-बैलांमुळे आनंदित होतो; कारण उपाधी माणसाला आनंद देतात, ज्याच्याकडे उपाधी नाही तो आनंदित होत नाही' – हे 'परवचन' आहे. ‘‘โสจติ ปุตฺเตหิ ปุตฺติมา, โคมา โคหิ ตเถว โสจติ; อุปธี หิ นรสฺส โสจนา, น หิ โส โสจติ โย นิรูปธี’’ติ – สกวจนํ. 'पुत्रवान पुत्रांमुळे शोक करतो, गोधन असलेला गाई-बैलांमुळे शोक करतो; कारण उपाधी माणसाला शोक देतात, ज्याच्याकडे उपाधी नाही तो शोक करत नाही' – हे 'सकवचन' आहे. อิทํ สกวจนํ ปรวจนญฺจ. हे 'सकवचन आणि परवचन' दोन्ही आहे. ๓๐. ตตฺถ [Pg.206] กตมํ สตฺตาธิฏฺฐานํ? ३०. त्यात 'सत्त्वाधिष्ठान' कोणते आहे? เย เกจิ ภูตา ภวิสฺสนฺติ เย วาปิ, สพฺเพ คมิสฺสนฺติ ปหาย เทหํ; ตํ สพฺพชานึ กุสโล วิทิตฺวา, ธมฺเม ฐิโต พฺรหฺมจริยํ จเรยฺย. जे काही प्राणी जन्माला आले आहेत किंवा येतील, ते सर्व शरीर सोडून जातील. हे सर्व विनाशी आहे असे कुशल पुरुषाने जाणून, धर्मात प्रतिष्ठित होऊन ब्रह्मचर्याचे आचरण करावे. ตโยเม, ภิกฺขเว, สตฺถาโร, ตถาคโต อรหํ เสกฺโข ปฏิปโท. อิทํ สตฺตาธิฏฺฐานํ. भिक्षूंनो, हे तीन शास्ते आहेत – तथागत, अर्हत आणि प्रतिपदेवर असलेला शैक्ष. हे 'सत्त्वाधिष्ठान' आहे. ตตฺถ กตมํ ธมฺมาธิฏฺฐานํ? त्यात 'धर्माधिष्ठान' कोणते आहे? ยญฺจ กามสุขํ โลเก, ยญฺจิทํ ทิวิยํ สุขํ; ตณฺหกฺขยสุขสฺเสเต, กลํ นาคฺฆนฺติ โสฬสึ. या लोकात जे काही कामसुख आहे आणि जे काही दिव्य सुख आहे, ते दोन्ही तृष्णाक्षयाच्या सुखाच्या सोळाव्या भागाचीही बरोबरी करू शकत नाहीत. สตฺติเม, ภิกฺขเว, โพชฺฌงฺคา, อิทํ ธมฺมาธิฏฺฐานํ. भिक्षूंनो, हे सात बोध्यंग आहेत. हे 'धर्माधिष्ठान' आहे. ตตฺถ กตมํ สตฺตาธิฏฺฐานญฺจ ธมฺมาธิฏฺฐานญฺจ? ทุทฺทสมนฺตํ สจฺจํ ทุทฺทโส ปฏิเวโธ พาเลหิ, ชานโต ปสฺสโต นตฺถิ นนฺทีติ วทามิ. ทุทฺทสมนฺตํ สจฺจํ ทุทฺทโส ปฏิเวโธ พาเลหีติ ธมฺมาธิฏฺฐานํ. ชานโต ปสฺสโต นตฺถิ นนฺทีติ สตฺตาธิฏฺฐานํ. ทารุกฺขนฺโธปมํ คงฺคาย ตีริยา โอริมญฺจ ตีรํ ปาริมญฺจ ตีรํ ถเล วา น จ อุสฺสีทนํ, มชฺเฌ จ น สํสีทนํ มนุสฺสคฺคาโห จ อมนุสฺสคฺคาโห จ อนฺโตปูติภาโว จ, อิทํ ธมฺมาธิฏฺฐานํ. เอวํ ปน ภิกฺขุ นิพฺพานนินฺโน ภวิสฺสติ นิพฺพานปรายโณติ สตฺตาธิฏฺฐานํ. อิทํ สตฺตาธิฏฺฐานญฺจ ธมฺมาธิฏฺฐานญฺจ. त्यात सत्त्वाधिष्ठान आणि धम्माधिष्ठान कोणते? 'मूर्खांना अंत्य सत्य पाहणे कठीण आहे आणि प्रतिवेध समजणे कठीण आहे; जाणणाऱ्या व पाहणाऱ्याला कोणतीही नंदी (तृष्णा) नसते, असे मी म्हणतो.' 'मूर्खांना अंत्य सत्य पाहणे कठीण आहे आणि प्रतिवेध समजणे कठीण आहे' हे धम्माधिष्ठान आहे. 'जाणणाऱ्या व पाहणाऱ्याला नंदी नसते' हे सत्त्वाधिष्ठान आहे. 'गंगेच्या प्रवाहातील लाकडाच्या ओंडक्याप्रमाणे, जो अलीकडच्या तीरावर किंवा पलीकडच्या तीरावर अडकत नाही, जमिनीवर फेकला जात नाही, मध्यभागी बुडत नाही, माणसांकडून पकडला जात नाही, अमानुषांकडून पकडला जात नाही आणि आतून सडत नाही' हे धम्माधिष्ठान आहे. 'परंतु अशा प्रकारे भिक्खू निर्वाणाभिमुख होईल, निर्वाणपरायण होईल' हे सत्त्वाधिष्ठान आहे. हे सत्त्वाधिष्ठान आणि धम्माधिष्ठान आहे. ตตฺถ กตโม ถโว? त्यात 'थव' (स्तुती) कोणता? มคฺคานฏฺฐงฺคิโก เสฏฺโฐ, สจฺจานํ จตุโร ปทา; วิราโค เสฏฺโฐ ธมฺมานํ, ทฺวิปทานญฺจ จกฺขุมา. मार्गांमध्ये अष्टांगिक मार्ग श्रेष्ठ आहे, सत्यांमध्ये चार पदे (चार आर्यसत्ये) श्रेष्ठ आहेत; धम्मांमध्ये विराग श्रेष्ठ आहे, आणि द्विपदांमध्ये (दोन पायांच्या प्राण्यांमध्ये) चक्षुमान (बुद्ध) श्रेष्ठ आहेत. ตีณิมานิ, ภิกฺขเว, อคฺคานิ – พุทฺโธ สตฺตานํ, วิราโค ธมฺมานํ, สงฺโฆ คณานํ. อยํ ถโว. भिक्खूंनो, या तीन श्रेष्ठ गोष्टी आहेत – सत्त्वांमध्ये बुद्ध श्रेष्ठ आहेत, धम्मांमध्ये विराग श्रेष्ठ आहे, आणि समूहांमध्ये संघ श्रेष्ठ आहे. हा 'थव' (स्तुती) होय. ๓๑. ตตฺถ [Pg.207] กตมํ อนุญฺญาตํ? ३१. त्यात अनुज्ञात (अनुमती दिलेले) कोणते? กาเยน สํวโร สาธุ, สาธุ วาจาย สํวโร; มนสา สํวโร สาธุ, สาธุ สพฺพตฺถ สํวุโต; สพฺพตฺถ สํวุโต ภิกฺขุ, สพฺพทุกฺขา ปมุจฺจติ. कायेने संयम राखणे चांगले आहे, वाणीने संयम राखणे चांगले आहे; मनाने संयम राखणे चांगले आहे, सर्व प्रकारे संयमित असणे चांगले आहे; सर्व प्रकारे संयमित असलेला भिक्खू सर्व दुःखांतून मुक्त होतो. อิทํ ภควตา อนุญฺญาตํ. हे भगवंतांनी अनुज्ञात केले आहे. ตีณิมานิ, ภิกฺขเว, กรณียานิ – กายสุจริตํ วจีสุจริตํ มโนสุจริตํ. อิทํ อนุญฺญาตํ. भिक्खूंनो, ही तीन कर्तव्ये आहेत – कायसुचरित, वचीसुचरित आणि मनःसुचरित. हे अनुज्ञात होय. ตตฺถ กตมํ ปฏิกฺขิตฺตํ? त्यात पटिक्खित्त (प्रतिषिद्ध) कोणते? นตฺถิ ปุตฺตสมํ เปมํ. วิตฺถาโร อิทํ ปฏิกฺขิตฺตํ. 'पुत्रासमान प्रेम नाही.' याचा सविस्तर अर्थ जाणावा. हे पटिक्खित्त होय. ตีณิมานิ, ภิกฺขเว, อกรณียานิ สยํ อภิญฺญาย เทสิตานิ. กตมานิ ตีณิ? กายทุจฺจริตํ วจีทุจฺจริตํ มโนทุจฺจริตํ. อิทํ ปฏิกฺขิตฺตํ. भिक्खूंनो, स्वतः अभिज्ञेने जाणून उपदेशिलेल्या या तीन अकरणीय गोष्टी आहेत. कोणत्या तीन? कायदुच्चरित, वचीदुच्चरित आणि मनोदुच्चरित. हे पटिक्खित्त होय. ตตฺถ กตมํ อนุญฺญาตญฺจ ปฏิกฺขิตฺตญฺจ? त्यात अनुज्ञात आणि पटिक्खित्त दोन्ही केलेले कोणते? กาเยน กุสลํ กเร, อสฺส กาเยน สํวุโต; กายทุจฺจริตํ หิตฺวา, กายสุจริตํ จเร. कायेने कुशल कर्म करावे, कायेने संयमित असावे; कायदुच्चरित सोडून कायसुचरिताचे आचरण करावे. ทฺวีหิ ปฐมปเทหิ จตุตฺเถน จ ปเทน อนุชานาติ. กายทุจฺจริตํ หิตฺวาติ ตติเยน ปเทน ปฏิกฺขิตฺตนฺติ. มหาวิภงฺโค อจิรตปานาโท. पहिल्या दोन पदांनी आणि चौथ्या पदाने (भगवंत) अनुमती देतात. 'कायदुच्चरितं हित्वा' या तिसऱ्या पदाने प्रतिषेध करतात. महाविभंग आणि अचिरतपानाद याप्रमाणे जाणावे. ตตฺถิมา อุทฺทานคาถา त्यात या उद्दानगाथा आहेत – สเจ ภายสิ ทุกฺขสฺส, มาภินนฺทิ อนาคตํ; วสฺสกาเล ยถา ฉตฺตํ, กุสลานิ กมตฺถเก. जर तू दुःखाला भितोस, तर अनागताचे अभिनंदन करू नकोस; पावसाळ्यात छत्रीप्रमाणे, कुशल कर्मांचे अनुक्रमाने आचरण करावे. สพฺเพ ธมฺมา อนตฺตาติ, สมาคตํ วิจาลเย; น โว ทุกฺขา ปโมกฺขาตฺถิ, สมโถ จ วิปสฺสนา. 'सर्व धम्म अनत्त आहेत', एकत्र आलेल्या गोष्टींचे विश्लेषण करावे; 'तुम्हाला दुःखातून मुक्ती नाही', आणि समथ व विपश्यना. กามจฺฉนฺทํ อุปาทาย, โย โส วิตกฺเกหิ ขชฺชติ; สุภาวิตตฺเต โพชฺฌงฺเค, โส อิมํ วิชฏเย ชฏํ. कामच्छंदाचे ग्रहण करून जो वितर्कांनी ग्रासला जातो; सुभावित बोध्यंगांच्या द्वारे त्याने ही जटा सोडवावी. สุญฺญโต โลกํ อเวกฺขสฺสุ, สมาธิภาวิ ภาวเส; กามํ กามยมานสฺส, ธมฺมจริยาย สุคตึ. जगाकडे शून्यतेने पहावे, समाधीची भावना करावी; कामाची इच्छा करणाऱ्याला, धम्माचरणाने सुगती मिळते. หญฺญเต สพฺพา มุจฺเจว, นิปฺโปเฐนฺโต จตุทฺทิสา; โย กาเม ปริวชฺเชติ, ปาริฉตฺโตปเมว จ. चारही दिशांना प्रहार करत सर्व पीडित होतात; जो कामांचा त्याग करतो, तो पारिजात वृक्षाच्या उपमेप्रमाणे मुक्त होतो. ยานิ [Pg.208] กโรติ ปุริโส, โลกธมฺมา ปกาสิตา; สุโข วิปาโก ปุญฺญานํ, ตติยํ อญฺญํ น วิชฺชติ. मनुष्य जी कर्मे करतो, लोकधम्म प्रकाशित केले आहेत; पुण्याचा विपाक सुखकारक असतो, तिसऱ्याशिवाय इतर काही अस्तित्वात नाही. อาทานสฺส ภยํ ญตฺวา, ชายเต ชียเตปิ จ; กามา หิ จิตฺรา วิวิธา, อถ โลณสลฺโลปมํ. आदानाचा धोका जाणून, मनुष्य जन्म घेतो आणि वृद्धही होतो; कारण काम हे विचित्र व विविध आहेत, आणि मिठाच्या खड्याची उपमा. น หิ ปาปํ กตํ กมฺมํ, อคตีหิ จ คจฺฉติ; ยสฺสินฺทฺริยานิ สมถงฺคตานิ, ตเถว ปญฺจญาณิโก. केलेले पाप कर्म चांगले नसते, आणि मनुष्य अगतिकतेने जातो; ज्याची इंद्रिये शम पावली आहेत, तसेच पंचज्ञानयुक्त. สตฺติยา วิย โอมฏฺโฐ, วิญฺญาณญฺจ ปติฏฺฐิตา; โย ปาณมติปาเตติ, ตีณิ ทุจฺจริตานิ จ. भाल्याने टोचल्याप्रमाणे, आणि विज्ञानाची प्रतिष्ठा; जो प्राणांचा घात करतो, आणि तीन दुष्कृते. สฏฺฐิวสฺสสหสฺสานิ, ขณํ ลทฺธาน ทุลฺลภํ; อยสาว มลํ สมุฏฺฐิตํ, จตูสุ ปฏิปตฺติสุ. दुर्लभ क्षण प्राप्त करून साठ हजार वर्षे; लोखंडापासून उत्पन्न झालेल्या गंज्याप्रमाणे, चार प्रतिपत्तींमध्ये. เนลงฺโค เสตปจฺฉาโท, อถ โคปาลโกปมํ; สุโข วิเวโก ตุฏฺฐสฺส, วิตกฺกา จ สุเทสิตา. दोषरहित आणि पांढरे वस्त्र पांघरलेला, तसेच गोपाळकाची उपमा; संतुष्ट माणसाला विवेक सुखकारक असतो, आणि वितर्क चांगल्या प्रकारे उपदेशिले आहेत. เผณปิณฺโฑปมํ รูปํ, พฺรหา อุชุ ปตาปวา; ปญฺญา หิ เสฏฺฐา โลกสฺมึ, อนญฺญา ตีณิ อินฺทฺริยานิ. फेसाच्या गोळ्यासारखे रूप, महान, सरळ व प्रतापी; जगात प्रज्ञाच श्रेष्ठ आहे, आणि 'अनञ्ञा' इत्यादी तीन इंद्रिये. กาเมสุ สตฺตา กามสงฺคสตฺตา, อถ วณฺโณ รหสฺสวา; สพฺเพ ธมฺมา อนตฺตาติ, อริยสจฺจญฺจ เทสิตํ. कामांमध्ये आसक्त असलेले प्राणी कामसंगाने बद्ध आहेत, तसेच रहस्याचे वर्णन; 'सर्व धम्म अनत्त आहेत' आणि आर्यसत्य उपदेशिले आहे. เอเสว มคฺโค นตฺถญฺโญ, โสตาปนฺโนติ พฺยากเร; ยสฺสินฺทฺริยานิ สุภาวิตานิ, อถ ธมฺมปเทหิ จ. 'हाच मार्ग आहे, दुसरा नाही', 'तो सोतापन्न आहे' असे घोषित करावे; ज्याची इंद्रिये सुभावित आहेत, आणि धम्मपदांच्या द्वारे. วจสา มนสา เจว, ปญฺจกฺขนฺธา อนิจฺจโต; ยานิ กโรติ ปุริโส, ตีณิ สุจริตานิ จ. वाणीने आणि मनाने देखील, पंचस्कंध अनित्यतेने पाहणे; मनुष्य जी कर्मे करतो, आणि three सुचरिते. รูปํ เวทยิตํ สญฺญา, ปญฺจกฺขนฺธา ปกาสิตา; โย เอวํ ปฏิปชฺชติ, พฺรหฺมา เจว ผลานิ จ. रूप, वेदन, संज्ञा, पंचस्कंध प्रकाशित केले आहेत; जो अशा प्रकारे आचरण करतो, तो ब्रह्मस्वरूप आणि फळ प्राप्त करतो. สพฺพปาปสฺส อกรณํ, วิโมกฺขา ตํ หิ เทสิตา; นตฺถิ ปุตฺตสมํ เปมํ, เทวานํ อสุราน จ. सर्व पापांचे न करणे, विमोक्ष उपदेशिला आहे; पुत्रासमान प्रेम नाही, देव आणि असुरांमध्ये. ยํ ปตฺตํ ยญฺจ ปตฺตพฺพํ, นนฺทติ โสจติ นิจฺจํ; เย เกจิ ภูตา ภวิสฺสนฺติ, สตฺถาโร จ ปกาสิตา. जे प्राप्त झाले आहे आणि जे प्राप्त करायचे आहे, तो नेहमी आनंदित होतो व शोक करतो; जे काही प्राणी उत्पन्न होतील, आणि शास्ते प्रकाशित केले आहेत. ยญฺจ [Pg.209] กามสุขํ โลเก, โพชฺฌงฺคา จ สุเทสิตา; มคฺคานฏฺฐงฺคิโก เสฏฺโฐ, ตโย จ อคฺคปตฺติโย. जगात जे कामसुख आहे, आणि बोध्यंग चांगल्या प्रकारे उपदेशिले आहेत; मार्गांमध्ये अष्टांगिक मार्ग श्रेष्ठ आहे, आणि तीन अग्रप्राप्ती आहेत. กาเยน สํวโร สาธุ, กรณียญฺจ เทสิตํ; นตฺถิ อตฺตสมํ เปมํ, อริยา ตีณิ จ เทสิตา. कायेने संयम राखणे चांगले आहे, आणि करणीय उपदेशिले आहे; आत्म्यासारखे प्रेम नाही, आणि तीन आर्य उपदेशिले आहेत. กาเยน กุสลํ อภิรโต, วินยญฺจ กามสุขํ โลเก; โพชฺฌงฺคา จ สุเทสิตา, ทุทฺทสํ อนตํ เจว ปราปรํ จ; कायेने कुशल कर्मात रममाण होणारा, आणि जगातील कामसुखाचा विनय; बोध्यंग चांगल्या प्रकारे उपदेशिले आहेत, आणि अनंत व परापर पाहणे कठीण आहे. เปฏโกปเทเส สาสนปฺปฏฺฐานํ นาม ทุติยภูมิ สมตฺตา. पेटकोपदेशातील 'सासनपट्ठान' नावाची दुसरी भूमी समाप्त झाली. ๓. สุตฺตาธิฏฺฐานตติยภูมิ ३. सुत्ताधिष्ठान तिसरी भूमी. ๓๒. ตตฺถ กตมํ สุตฺตาธิฏฺฐานํ? ३२. त्यात सुत्ताधिष्ठान कोणते? โลภาธิฏฺฐานํ โทสาธิฏฺฐานํ โมหาธิฏฺฐานํ อโลภาธิฏฺฐานํ อโทสาธิฏฺฐานํ อโมหาธิฏฺฐานํ กายกมฺมาธิฏฺฐานํ วาจากมฺมาธิฏฺฐานํ มโนกมฺมาธิฏฺฐานํ สทฺธินฺทฺริยาธิฏฺฐานํ วีริยินฺทฺริยาธิฏฺฐานํ สตินฺทฺริยาธิฏฺฐานํ สมาธินฺทฺริยาธิฏฺฐานํ ปญฺญินฺทฺริยาธิฏฺฐานํ. लोभाधिष्ठान, दोषाधिष्ठान, मोहाधिष्ठान, अलोभाधिष्ठान, अदोषाधिष्ठान, अमोहाधिष्ठान, कायकर्माधिष्ठान, वाक्कर्माधिष्ठान, मनःकर्माधिष्ठान, सद्धिंद्रियाधिष्ठान, वीरियिंद्रियाधिष्ठान, सतिंद्रियाधिष्ठान, समाधिंद्रियाधिष्ठान, पञ्ञिंद्रियाधिष्ठान. ตตฺถ กตมํ โลภาธิฏฺฐานํ? त्यात लोभाधिष्ठान (लोभावर आधारित सुत्त) कोणते? วิตกฺกมถิตสฺส ชนฺตุโน, ติพฺพราคสฺส สุภานุปสฺสิโน; ภิยฺโย ตณฺหา ปวฑฺฒติ, เอส โข คาฬฺหํ กโรติ พนฺธนํ. अशुभाला शुभ समजून पाहणाऱ्या (सुभानुपस्सी), तीव्र राग (आसक्ती) असलेल्या आणि वितर्कांनी (कामाचाराच्या विचारांनी) मथित झालेल्या प्राण्याची तृष्णा अधिकच वाढते. तो खरोखरच आपले बंधन घट्ट करतो. วิตกฺกมถิตสฺสาติ กามราโค. สุภานุปสฺสิโนติ กามราควตฺถุ. ภิยฺโย ตณฺหา ปวฑฺฒตีติ กามตณฺหา. เอส คาฬฺหํ กโรติ พนฺธนนฺติ ราคํ, อิติ โย โย ธมฺโม มูลนิกฺขิตฺโต, โส เยเวตฺถ ธมฺโม อุคฺคาวหิตพฺโพ. น ภควา เอกํ ธมฺมํ อารพฺภ อญฺญํ ธมฺมํ เทเสติ. ยสฺส วิตกฺเกติ กามวิตกฺโก ตเมว วิตกฺกํ กามวิตกฺเกน นิทฺทิสียติ. ติพฺพราคสฺสาติ ตสฺเสว วิตกฺกสฺส วตฺถุํ นิทฺทิสติ. สุภานุปสฺสิโน ภิยฺโย ตณฺหา ปวฑฺฒตีติ ตเมว ราคํ กามตณฺหาติ นิทฺทิสติ. เอส คาฬฺหํ กโรติ พนฺธนนฺติ ตเมว ตณฺหาสํโยชนํ นิทฺทิสติ. เอวํ คาถาสุ อนุมินิตพฺพํ. เอวํ สเวยฺยากรเณสุ. 'वितक्कमथितस्स' म्हणजे कामराग होय. 'सुभानुपस्सिनो' म्हणजे कामरागाची वस्तू (आलंबन) होय. 'भिय्यो तण्हा पवड्ढति' म्हणजे कामतृष्णा होय. 'एस गाळ्हं करोति बन्धनं' म्हणजे राग (आसक्ती) होय. अशा प्रकारे, जो जो धर्म मुळाशी ठेवला आहे, तोच धर्म येथे ग्रहण केला पाहिजे. भगवान एका धर्माचा संदर्भ घेऊन दुसऱ्याच धर्माचा उपदेश करत नाहीत. ज्याला कामवितर्क येतो, त्या वितर्कालाच कामवितर्काने निर्देशित केले जाते. 'तिब्बरागस्स' द्वारे त्याच वितर्काच्या वस्तूचा (आलंबनाचा) निर्देश केला जातो. 'सुभानुपस्सिनो भिय्यो तण्हा पवड्ढति' द्वारे त्याच रागाला कामतृष्णा म्हणून निर्देशित केले जाते. 'एस गाळ्हं करोति बन्धनं' द्वारे त्याच तृष्णा-संयोजनाचा निर्देश केला जातो. अशा प्रकारे गाथांमध्ये अनुमान लावले पाहिजे. सवेय्याकरणांमध्ये (प्रश्नोत्तरांच्या सुत्तांमध्ये) देखील असेच समजले पाहिजे. ตตฺถ [Pg.210] ภควา เอกํ ธมฺมํ ติวิธํ นิทฺทิสติ, นิสฺสนฺทโต เหตุโต ผลโต. त्यात भगवान एकाच धर्माचा तीन प्रकारे निर्देश करतात - निस्यंद (परिणाम/अंश), हेतू (कारण) आणि फल (अंतिम फळ) या रूपाने. ททํ ปิโย โหติ ภชนฺติ นํ พหู, กิตฺติญฺจ ปปฺโปติ ยโส จ วฑฺฒติ; อมงฺกุภูโต ปริสํ วิคาหติ, วิสารโท โหติ นโร อมจฺฉรี. दान देणारा मनुष्य सर्वांना प्रिय होतो, अनेक जण त्याचा आश्रय घेतात, त्याला कीर्ती प्राप्त होते आणि त्याचा यश वाढतो. तो संकोच न बाळगता (प्रसन्न मुखाने) सभेत प्रवेश करतो. असा मत्सररहित (अमच्छरी) मनुष्य निर्भय (विशारद) असतो. ททนฺติ ยํ ยํ ทานํ, อิทํ ทานมยิกํ ปุญฺญกฺริยํ. ตตฺถ เหตุ. ยํ เจตํ. ภชนฺติ นํ พหู, กิตฺตินฺติ โย จ กลฺยาโณ กิตฺติสทฺโท โลเก อพฺภุคฺคจฺฉติ, ยํ พหุกสฺส ชนสฺส ปิโย ภวติ มนาโป จ. ยญฺจ อวิปฺปฏิสารี กาลงฺกโรติ อยํ นิสฺสนฺโท. ยํ กายสฺส เภทา เทเวสุ อุปปชฺชตีติ อิทํ ผลํ. อิทํ โลภาธิฏฺฐานํ. जे जे दान दिले जाते, ते दानमय पुण्यक्रिया आहे. त्यात तो 'हेतू' आहे. आणि जे हे 'अनेक जण त्याचा आश्रय घेतात, कीर्ती' म्हटले आहे, ती जी जगात कल्याणकारी कीर्ती पसरते, आणि जो अनेक लोकांचा प्रिय व मनाला आनंद देणारा होतो, तसेच जो पश्चात्तापरहित (अविप्पटिसारी) होऊन मृत्यू पावतो, हा 'निस्यंद' (परिणाम) आहे. आणि जे 'काया भेदून (मृत्यूनंतर) देवांमध्ये उत्पन्न होतो' म्हटले आहे, हे 'फल' आहे. हे अलोभाधिष्ठान (लोभाचा अभाव असलेले अधिष्ठान) आहे. ๓๓. ตตฺถ กตมํ โทสาธิฏฺฐานํ? ३३. त्यात द्वेषाधिष्ठान (द्वेषावर आधारित सुत्त) कोणते? โย ปาณมติปาเตติ, มุสาวาทญฺจ ภาสติ; โลเก อทินฺนํ อาทิยติ, ปรทารญฺจ คจฺฉติ; สุราเมรยปานญฺจ, โย นโร อนุยุญฺชติ. जो प्राणातिपात (जीवहत्या) करतो, असत्य बोलतो, जगात न दिलेले (चोरीने) घेतो, परस्त्रीगमन करतो आणि जो मनुष्य सुरा-मेरय (मद्यपान) घेण्याच्या आहारी जातो. อปฺปหาย ปญฺจ เวรานิ, ทุสฺสีโล อิติ วุจฺจติ; กายสฺส เภทา ทุปฺปญฺโญ, นิรยํ โสปปชฺชติ. या पाच वैरांचा (पाच शीलभंगांच्या पापांचा) त्याग न करता, तो 'दुःशील' म्हटला जातो. तो दुर्बुद्धी मनुष्य काया भेदून (मृत्यूनंतर) नरकात उत्पन्न होतो. โย ปาณมติปาเตตีติ ทุฏฺโฐ ปาณมติปาเตติ. มุสาวาทญฺจ ภาสตีติ โทโสปฆาตาย มุสาวาทญฺจ ภาสติ. สุราเมรยปานญฺจ, โย นโร อนุยุญฺชตีติ โทโส นิทานํ. โย จ สุราเมรยปานํ อนุยุญฺชติ ยถาปรทารวิหารี อมิตฺตา ชนยนฺติ. 'जो प्राणातिपात करतो' म्हणजे द्वेषाने युक्त (दुट्ठो) होऊन प्राणातिपात करतो. 'असत्य बोलतो' म्हणजे स्वतःचा दोष लपवण्यासाठी (किंवा दुसऱ्याला हानी पोहोचवण्यासाठी) असत्य बोलतो. 'जो मनुष्य सुरा-मेरय पिण्याच्या आहारी जातो' यात द्वेष (दोष) हेच कारण आहे. आणि जो सुरा-मेरय पिण्याच्या आहारी जातो, जसे परस्त्रीगमन करणाऱ्याचे शत्रू निर्माण होतात, तसेच त्याचेही शत्रू निर्माण होतात. ปญฺจ เวรานิ อปฺปหายาติ ปญฺจนฺนํ ภิกฺขาปทานํ สมติกฺกมนํ สพฺเพสํ โทสชานํ สา ปณฺณตฺติ, เตเนว โทสชนิเตน กมฺเมน ทุสฺสีโล อิติ วุจฺจติ โสปิ ธมฺโม เหตุนา นิทฺทิสิตพฺโพ, นิสฺสนฺเทน ผเลน จ. 'पाच वैरांचा त्याग न करता' म्हणजे पाच शिक्षानियमांचे (शील नियमांचे) उल्लंघन करणे होय. ती सर्व द्वेषापासून उत्पन्न होणाऱ्या धर्मांची संज्ञा (प्रज्ञप्ती) आहे. त्याच द्वेषजन्य कर्मामुळे त्याला 'दुःशील' म्हटले जाते. तो धर्म देखील हेतू, निस्यंद आणि फल या रूपाने निर्देशित केला पाहिजे. ตีณิ พาลสฺส พาลลกฺขณานิ – ทุพฺภาสิตภาสี จ โหติ, ทุจฺจินฺติตจินฺตี จ ทุกฺกฏกมฺมการี จ. ตตฺถ ยํ กาเยน จ วาจาย จ ปรกฺกมติ, อิทมสฺส ทุกฺกฏกมฺมการี. ตายํ ยถา จ มุสาวาทํ ภาสติ ยถา ปุพฺพนิทฺทิฏฺฐํ[Pg.211], อิทมสฺส ทุพฺภาสิตา. ยญฺจ สงฺกปฺเปติ มโนทุจฺจริตํ พฺยาปาทํ, อิทมสฺส ทุจฺจินฺติตจินฺติตา. ยํ โส อิเมหิ ตีหิ พาลลกฺขเณหิ สมนฺนาคโต ตีณิ ตชฺชานิ ทุกฺขานิ โทมนสฺสานิ อนุภวติ, โส จ โหติ สภคฺคโต วา ปริสคฺคโต วา ตชฺชํ กถํ กถนฺติ. ยทา ภวติ โส จ ปาณาติปาตาทิทสอกุสลกมฺมปถา, โส ตโตนิทานํ ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวเทตีติ. ปุน จปรํ ยทา ปสฺสติ โจรํ ราชาปราธิกํ รญฺญา คหิตํ ชีวิตา โวโรเปตํ, ตสฺเสวํ ภวติ สเจ มมมฺปิ ราชา ชาเนยฺย มมมฺปิ ราชา คาหาเปตฺวา ชีวิตา โวโรเปยฺยาติ, โส ตโตนิทานํ ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวเทติ. ปุน จปรํ พาโล ยทา ภวติ อาสนา สมารูฬฺโห ยาว ยา เม คติ ภวิสฺสติ อิโต เปจฺจ ปรํ มรณาติ โส ตโตนิทานํ ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวเทติ อิติ พาลลกฺขณํ เหตุ. ตีณิ ตชฺชานิ ทุกฺขานิ นิสฺสนฺโท. กายสฺส เภทา นิรเยสุ อุปปชฺชติ, อิทํ ผลํ. อิทํ โทสาธิฏฺฐานํ. मूर्खाची (बालाची) तीन मूर्ख-लक्षणे असतात - तो वाईट बोलणारा (दुब्भासितभासी), वाईट विचार करणारा (दुच्चिंतितचिंती) आणि वाईट कर्मे करणारा (दुक्कटकम्मकारी) असतो. त्यात, तो शरीराने आणि वाणीने जे काही दुष्कृत्य करतो, ते त्याने केलेले 'वाईट कर्म' होय. पूर्वी सांगितल्याप्रमाणे तो जे असत्य बोलतो, ते त्याचे 'वाईट बोलणे' होय. आणि तो मनाच्या दुश्चरित्राचा, व्यापादाचा (द्वेषाचा) जो संकल्प करतो, ते त्याचे 'वाईट विचार करणे' होय. या तीन मूर्ख-लक्षणांनी युक्त असल्यामुळे तो त्यासंबंधी तीन प्रकारची दुःखे आणि दौर्मनस्य भोगतो. जेव्हा तो सभेत किंवा परिषदेत जातो, तेव्हा लोक त्यासंबंधीच चर्चा करतात. जेव्हा तो प्राणातिपातादी दहा अकुशल कर्मपथांमुळे दुःख आणि दौर्मनस्य अनुभवतो, तेव्हा असे जाणावे. पुन्हा आणखी, जेव्हा तो राजाने पकडलेल्या आणि फाशी दिलेल्या (जीवनातून उठवलेल्या) गुन्हेगार चोराला पाहतो, तेव्हा त्याच्या मनात असा विचार येतो - 'जर राजाला माझ्याबद्दलही समजले, तर राजा मलाही पकडून जीवनातून उठवेल (मृत्यूदंड देईल).' या कारणामुळे तो दुःख आणि दौर्मनस्य अनुभवतो. पुन्हा आणखी, जेव्हा तो मूर्ख मनुष्य आपल्या आसनावरून उठतो (किंवा मृत्यूशय्येवर असतो) आणि विचार करतो की, 'या जगातून गेल्यानंतर, मृत्यूनंतर माझी कोणती गती होईल?' या कारणामुळे तो दुःख आणि दौर्मनस्य अनुभवतो. हे मूर्ख-लक्षण 'हेतू' आहे. त्यासंबंधीची तीन दुःखे 'निस्यंद' आहेत. आणि काया भेदून नरकात उत्पन्न होणे, हे 'फल' आहे. हे द्वेषाधिष्ठान आहे. ๓๔. ตตฺถ กตมํ โมหาธิฏฺฐานํ? ३४. त्यात मोहाधिष्ठान (मोहावर आधारित सुत्त) कोणते? สตญฺเจว สหสฺสานํ, กปฺปานํ สํสริสฺสติ; อถวา ปิ ตโต ภิยฺโย, คพฺภา คพฺภํ คมิสฺสถ. शेकडो आणि हजारो कल्पपर्यंत तो संसारात भटकत राहील, किंवा त्याहूनही अधिक काळ एका गर्भातून दुसऱ्या गर्भात जात राहील. อนุปาทาย พุทฺธวจนํ, สงฺขาเร อตฺตโต อุปาทาย; ทุกฺขสฺสนฺตํ กริสฺสนฺติ, ฐานเมตํ น วิชฺชติ. बुद्धवचनाचे ग्रहण न करता, संस्कारांना 'आत्मा' मानून (त्यात आसक्त होऊन) दुःखाचा अंत करतील, हे अशक्य आहे (असे स्थान अस्तित्वात नाही). โย ยํ อนมตคฺคสํสารํ สมาปนฺโน ชายเต จ มียเต จ, อยํ อวิชฺชาเหตุกา. ยานิปิ จ สงฺขารานํ ปโยชนานิ, ตานิปิ อวิชฺชาปจฺจยานิ, ยํ อทสฺสนํ พุทฺธวจนสฺส, อยํ อวิชฺชาสุตฺเตเยว นิทฺทิฏฺฐํ. โย จ สงฺขาเร อตฺตโต หรติ ปญฺจกฺขนฺเธ ปญฺจ ทิฏฺฐิโย อุปคจฺฉติ. ‘‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’ติ อิทํ สุตฺตํ อวิชฺชาย นิกฺขิตฺตํ, อวิชฺชาย นิกฺขิปิตํ. เอวํ สตฺถา สุตฺเต นเยน ธมฺเมน นิทฺทิสติ. อสาธารเณน ตํเยว ตตฺถ นิทฺทิสิตพฺพํ. น อญฺญํ. जो या अनादी (अनमतग्ग) संसारात पडलेला आहे, जन्म घेतो आणि मरतो, हे अविद्येमुळे (अविज्जाहेतुका) होते. संस्कारांचे जे काही परिणाम (प्रयोजने) आहेत, ते देखील अविद्या-प्रत्ययाने (अविद्येमुळे) आहेत. बुद्धवचनाचे जे अदर्शन (न दिसणे/न समजणे) आहे, तीच अविद्या आहे, असे सुत्तातच निर्देशित केले आहे. आणि जो संस्कारांना 'आत्मा' मानतो, तो पंचस्कंधांमध्ये पाच प्रकारच्या दृष्टींना (मिथ्या दृष्टींना) प्राप्त होतो. 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' - हे सुत्त अविद्येमध्ये स्थापित (निक्खित्त) केले आहे. अशा प्रकारे शास्ता (बुद्ध) सुत्तात योग्य पद्धतीने आणि धर्माने निर्देश करतात. त्या सुत्तात केवळ त्याच असाधारण धर्माचा निर्देश केला पाहिजे, दुसऱ्याचा नाही. เย หิ เกจิ, ภิกฺขเว, สมณา วา พฺราหฺมณา วา ‘‘อิทํ ทุกฺข’’นฺติ นปฺปชานนฺติ จตฺตาริ สจฺจานิ วิตฺถาเรน, ยํ ตตฺถ อปฺปชานนา, อิทํ ทุกฺขํ, อยํ เหตุ. อปฺปชานนฺโต วิวิเธ สงฺขาเร อภิสงฺขโรติ, อยํ นิสฺสนฺโท. ยญฺจ ทิฏฺฐิคตานิ ปรามสติ ‘‘อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’’นฺติ อยํ นิสฺสนฺโท. ยํ [Pg.212] ปุนพฺภวํ นิพฺพตฺเตติ, อิทํ ผลํ. อยมฺปิ ธมฺโม สนิทฺทิฏฺโฐ เหตุโต จ ผลโต จ นิสฺสนฺทโต จ. भिक्खूहो, जे कोणी श्रमण किंवा ब्राह्मण 'हे दुःख आहे' असे चार आर्यसत्यांना सविस्तरपणे जाणत नाहीत, त्यांचे ते न जाणणे हेच 'दुःख' आहे आणि हाच 'हेतू' आहे. न जाणणारा मनुष्य विविध संस्कारांचे अभिसंस्कार करतो, हा 'निस्यंद' आहे. आणि तो 'हेच सत्य आहे, इतर सर्व व्यर्थ आहे' अशा मिथ्या दृष्टींचे ग्रहण करतो, हा 'निस्यंद' आहे. जे पुनर्जन्म घडवून आणते, ते 'फल' आहे. हा धर्म देखील हेतू, फल आणि निस्यंद या रूपाने चांगल्या प्रकारे निर्देशित केला आहे. เอตฺถ ปน เกจิ ธมฺมา สาธารณา ภวนฺติ. เหตุ ขลุ อาทิโตเยว สุตฺเต นิกฺขิปิสฺสนฺติ. ยถา กึ ภเว จตฺตาริมานิ, ภิกฺขเว, อคติคมนานิ. ตตฺถ ยญฺจ ฉนฺทาคตึ คจฺฉติ ยญฺจ ภยาคตึ คจฺฉติ, อยํ โลโภ อกุสลมูลํ. ยํ โทสา, อยํ โทโสเยว. ยํ โมหา, อยํ โมโหเยว. เอวํ อิมานิ ตีณิ อกุสลมูลานิ อาทิโตเยว อุปปริกฺขิตพฺพานิ. ยตฺถ เอกํ นิทฺทิสิตพฺพํ, ตตฺถ เอกํ นิทฺทิสียติ. ตถา ทฺเว ยถา ตีณิ, น หิ อาทีหิ อนิกฺขิตฺเต เหตุ วา นิสฺสนฺโท วา ผลํ วา นิทฺทิสิตพฺพํ. परंतु येथे काही धर्म सामायिक (साधारण) असतात. सुत्ताच्या सुरुवातीलाच हेतू स्थापित केला जाईल. जसे की - 'भिक्खूहो, संसारात ही चार अगतीगमन (अयोग्य मार्गाने जाणे) आहेत.' त्यात जो छंदागतीला (आसक्तीने अयोग्य मार्गाला) जातो आणि जो भयागतीला (भयाने अयोग्य मार्गाला) जातो, ते 'लोभ' हे अकुशलमूळ आहे. जे द्वेषाने (दोसा) होते, ते 'द्वेष'च आहे. जे मोहाने होते, ते 'मोह'च आहे. अशा प्रकारे या तीन अकुशलमुळांचे सुरुवातीपासूनच परीक्षण केले पाहिजे. जेथे एकाचा निर्देश करायचा असतो, तेथे एकाचा निर्देश केला जातो. जसे तीन, तसेच दोनचाही निर्देश केला जातो. कारण सुरुवातीला हेतू स्थापित केल्याशिवाय हेतू, निस्यंद किंवा फल निर्देशित केले जाऊ शकत नाही. อยญฺเจตฺถ คาถา – या संदर्भात ही गाथा आहे – ฉนฺทา โทสา ภยา โมหา, โย ธมฺมํ อติวตฺตติ; นิหียติ ตสฺส ยโส, กาฬปกฺเขว จนฺทิมา. जो मनुष्य छंद (आसक्ती), द्वेष, भय किंवा मोहाने धर्माचे उल्लंघन करतो; त्याची कीर्ती कृष्णपक्षातील चंद्राप्रमाणे क्षीण होत जाते. กตฺถ ฉนฺทา จ อยํ โลโภ ยถา นิทฺทิฏฺฐํ ปุพฺเพ. อิทํ โมหาธิฏฺฐานํ. येथे 'छंद' म्हणजे लोभ आहे, जसे पूर्वी निर्देशिले आहे. हे मोहाचे अधिष्ठान (पाया) आहे. ๓๕. ตตฺถ กตมํ อโลภาธิฏฺฐานํ? ३५. त्यात अलोभ-अधिष्ठान कोणते? ‘‘อสุภานุปสฺสึ วิหรนฺตํ, อินฺทฺริเยสุ สุสํวุตํ; โภชนมฺหิ จ มตฺตญฺญุํ, สทฺธํ อารทฺธวีริยํ; ตํ เว นปฺปสหติ มาโร, วาโต เสลํว ปพฺพต’’นฺติ. “जो अशुभाचे (शरीराच्या अपवित्रतेचे) अनुदर्शन करत विहरतो, इंद्रियांवर उत्तम संयम ठेवतो, भोजनाच्या बाबतीत मर्यादेचे भान राखतो, श्रद्धावान आणि दृढ वीर्यवान (प्रयत्नशील) आहे; त्याला मार नक्कीच पराभूत करू शकत नाही, ज्याप्रमाणे वारा खडकाळ पर्वताला हलवू शकत नाही.” ตตฺถ ยา อสุภาย อุปปริกฺขา, อยํ กาเมสุ อาทีนวทสฺสเนน ปริจฺจาโค. อินฺทฺริเยสุ สุสํวุโต ตสฺเสว อโลภสฺส ปาริปูริยํ มม อายตนโสจิตํ อนุปาทาย. โภชนมฺหิ จ มตฺตญฺญุนฺติ รสตณฺหาปหานํ. อิติ อยํ อโลโภ อสุภานุปสฺสิตาย วตฺถุโต ธารยติ, โส อโลโภ เหตุ. อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวารตาย โคจรโต ธารยติ, โภชเนมตฺตญฺญุตาย ปรโต ธารยติ, อยํ นิสฺสนฺโท. ตํ เว นปฺปสหติ มาโร, วาโต เสลํ ว ปพฺพตนฺติ, อิทํ ผลํ. อิติ โยเยว ธมฺโม อาทิมฺหิ นิกฺขิตฺโต, โสเยว มชฺเฌ เจว อวสาเน จ. त्यात, जी अशुभाची परीक्षा (चिंतन) आहे, तो कामांमधील (भोगांमधील) दोष पाहून केलेला त्याग आहे. इंद्रियांमध्ये सुसंयत असणे हे त्या अलोभाच्याच परिपूर्णतेसाठी आहे, जे माझ्या आयतनांच्या संदर्भात उपादान न करण्याच्या (अनासक्तीच्या) स्वरूपात संचित होते. 'भोजनाच्या बाबतीत मर्यादेचे भान राखणे' म्हणजे रस-तृष्णेचा त्याग होय. अशा प्रकारे, हा अलोभ अशुभाच्या अनुदर्शनाने वस्तूच्या (विषयाच्या) स्वरूपात धारण करतो, तो अलोभ हा 'हेतू' (कारण) आहे. इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवल्याने तो गोचराच्या (विषयाच्या) स्वरूपात धारण करतो, भोजनात मर्यादेचे भान राखल्याने तो परतः (दुसऱ्या बाजूने) धारण करतो, हा 'निष्यंद' (परिणाम) आहे. 'त्याला मार नक्कीच पराभूत करू शकत नाही, ज्याप्रमाणे वारा खडकाळ पर्वताला हलवू शकत नाही' हे 'फल' (फळ) आहे. अशा प्रकारे, जो धर्म सुरुवातीला मांडला गेला आहे, तोच मध्ये आणि शेवटीही मांडला गेला आहे. นาหํ, ภิกฺขเว, อญฺญํ เอกธมฺมมฺปิ สมนุปสฺสามิ อสมุปฺปนฺนสฺส กามจฺฉนฺทสฺส อนุปฺปาทาย อุปฺปนฺนสฺส วา ปหานาย, ยถยิทํ อสุภนิมิตฺตํ. ตตฺถ อสุภนิมิตฺตํ [Pg.213] มนสิกโรนฺตสฺส อนุปฺปนฺโน เจว กามจฺฉนฺโท น อุปฺปชฺชติ, อุปฺปนฺโน จ กามจฺฉนฺโท ปหียติ. อิทํ อโลภสฺส วตฺถุ. ยํ ปุน อนุปฺปนฺโน กามราโค ปริยาทิยติ รูปราคํ อรูปราคํ, อิติ ผลํ. อิติ อยมฺปิ จ ธมฺโม นิทฺทิฏฺโฐ เหตุโต จ นิสฺสนฺทโต จ ผลโต จ. อิทํ อโลภาธิฏฺฐานํ. “भिक्षूंनो, अनुत्पन्न कामच्छंदाच्या (वासनेच्या) अनुत्पत्तीसाठी किंवा उत्पन्न झालेल्या कामच्छंदाच्या प्रहाणासाठी (नाशासाठी) मी अशुभाच्या निमित्तासारखा (अशुभ-निमित्त) दुसरा एकही धर्म पाहत नाही. त्यात, अशुभ-निमित्ताचे मनसिकार (चिंतन) करणाऱ्या व्यक्तीमध्ये अनुत्पन्न कामराग उत्पन्न होत नाही आणि उत्पन्न झालेला कामराग नष्ट होतो. हे अलोभाचे वस्तू (कारण) आहे. पुन्हा, जो अनुत्पन्न कामराग रूपराग आणि अरूपरागाला नष्ट करतो, हे 'फल' आहे. अशा प्रकारे, हा धर्म देखील हेतू, निष्यंद आणि फल या स्वरूपात निर्देशित केला आहे. हे अलोभ-अधिष्ठान होय.” ตตฺถ กตมํ อโทสาธิฏฺฐานํ? त्यात अद्वेष-अधिष्ठान कोणते? เอกมฺปิ เจ ปาณมทุฏฺฐจิตฺโต, เมตฺตายติ กุสโล เตน โหติ; สพฺเพ จ ปาเณ มนสานุกมฺปํ, ปหูตมริโย ปกโรติ ปุญฺญํ. “जरी एखाद्या प्राण्यावरही द्वेषरहित चित्ताने मैत्री केली, तर मनुष्य त्यामुळे कुशल (पुण्यवान) होतो; आणि सर्व प्राण्यांबद्दल मनात अनुकंपा बाळगून, तो आर्य पुरुष विपुल पुण्याची निर्मिती करतो.” เอกมฺปิ เจ ปาณมทุฏฺฐจิตฺโต เมตฺตายตีติ อยํ อโทโส. นิคฺฆาเตน อสฺสาโท, กุสโล เตน โหตีติ เตน กุสเลน ธมฺเมน สํยุตฺโต ธมฺมปญฺญตฺตึ คจฺฉติ. กุสโลติ ยถา ปญฺญาย ปญฺโญ ปณฺฑิจฺเจน ปณฺฑิโต. ปหูตมริโย ปกโรติ ปุญฺญนฺติ ตสฺสาเยว วิปาโก อยํ โลกิยสฺส, น หิ โลกุตฺตรสฺส. ตตฺถ ยา เมตฺตายนา, อยํ เหตุ. ยํ กุสโล ภวติ อยํ นิสฺสนฺโท. ยาว อพฺยาปชฺโช ภูมิยํ พหุปุญฺญํ ปสวติ, อิทํ ผลํ. อิติ อโทโส นิทฺทิฏฺโฐ เหตุโต จ นิสฺสนฺทโต จ ผลโต จ. 'जरी एखाद्या प्राण्यावरही द्वेषरहित चित्ताने मैत्री केली' हे 'अद्वेष' आहे. (द्वेषाच्या) शमनाने मिळणारा हा आस्वाद आहे. 'त्यामुळे तो कुशल होतो' म्हणजे त्या कुशल धर्माशी युक्त होऊन तो धर्म-प्रज्ञप्तीला प्राप्त होतो. 'कुशल' म्हणजे प्रज्ञेनुसार प्रज्ञावान आणि पांडित्यामुळे पंडित. 'तो आर्य पुरुष विपुल पुण्याची निर्मिती करतो' हा केवळ लौकिक विपाक (परिणाम) आहे, लोकोत्तर नाही. त्यात, जी मैत्रीची भावना आहे, तो 'हेतू' आहे. जो कुशल होतो, तो 'निष्यंद' आहे. अव्यापाद भूमीपर्यंत (द्वेषरहित अवस्थेपर्यंत) जे विपुल पुण्य प्रसवते (मिळते), ते 'फल' आहे. अशा प्रकारे, अद्वेष हा हेतू, निष्यंद आणि फल या स्वरूपात निर्देशित केला आहे. เอกาทสานิสํสา เมตฺตาย เจโตวิมุตฺติยา. ตตฺถ ยา เมตฺตาเจโตวิมุตฺติ, อยํ อริยธมฺเมสุ ราควิราคา เจโตวิมุตฺติ, โลกิกาย ภูมิกา เหตุ, ยํ สุขํ อายตึ มนาโป โหติ มนุสฺสานํ, อิเม เอกาทส ธมฺมา นิสฺสนฺโท. ยญฺจ อกตาวี พฺรหฺมกาเย อุปปชฺชติ. อิทํ ผลํ. อิทํ อโทสาธิฏฺฐานํ. मैत्रीयुक्त चेतोविमुक्तीचे अकरा अनिशंस (फायदे) आहेत. त्यात, जी मैत्री-चेतोविमुक्ती आहे, ती आर्य धर्मांमध्ये राग-विरागापासून होणारी चेतोविमुक्ती आहे; लौकिक भूमी ही 'हेतू' आहे; जे सुख भविष्यात मनुष्यांसाठी प्रिय (मनोनुकूल) ठरते, हे अकरा धर्म 'निष्यंद' आहेत; आणि जो (अनागामी मार्ग) पूर्ण न करताही ब्रह्मलोकात उत्पन्न होतो, ते 'फल' आहे. हे अद्वेष-अधिष्ठान होय. ๓๖. ตตฺถ กตมํ อโมหาธิฏฺฐานํ? ३६. त्यात अमोह-अधिष्ठान कोणते? ปญฺญา หิ เสฏฺฐา โลกสฺมึ, ยายํ นิพฺเพธคามินี ; ยาย สมฺมา ปชานาติ, ชาติมรณสงฺขยํ. “या जगात प्रज्ञाच सर्वश्रेष्ठ आहे, जी (क्लेशांचा) भेद करून निर्वाणाकडे नेणारी आहे; जिच्याद्वारे मनुष्य जन्म आणि मरणाच्या क्षयाला (निर्वाणाला) सम्यक प्रकारे जाणतो.” ปญฺญา [Pg.214] หิ เสฏฺฐาติ วตฺถุํ. นิพฺเพธคามินีติ นิพฺพานคามินิยํ ยถาภูตํ ปฏิวิชฺฌติ. สมฺมา ปชานาติ, ชาติมรณสงฺขยนฺติ อโมโห. ปญฺญาติ เหตุ. ยํ ปชานาติ อยํ นิสฺสนฺโท. โย ชาติมรณสงฺขโย, อิทํ ผลํ. อิติ อโมโห นิทฺทิฏฺโฐ เหตุนา จ นิสฺสนฺเทน จ ผเลน จ. 'प्रज्ञाच सर्वश्रेष्ठ आहे' हे 'वस्तू' (विषय) आहे. 'भेद करून नेणारी' म्हणजे निर्वाणगामी मार्गाला यथार्थपणे भेदून जाणणे होय. 'जन्म आणि मरणाच्या क्षयाला सम्यक प्रकारे जाणतो' हा 'अमोह' आहे. 'प्रज्ञा' हा 'हेतू' आहे. जे जाणतो, तो 'निष्यंद' आहे. जो जन्म-मरणाचा क्षय आहे, ते 'फल' आहे. अशा प्रकारे, अमोह हा हेतू, निष्यंद आणि फल या स्वरूपात निर्देशित केला आहे. ตีณิมานิ, ภิกฺขเว, อินฺทฺริยานิ อนญฺญาตญฺญสฺสามีตินฺทฺริยํ อญฺญินฺทฺริยํ อญฺญาตาวินฺทฺริยํ. ตตฺถ กตมํ อนญฺญาตญฺญสฺสามีตินฺทฺริยํ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อนภิสเมตสฺส ทุกฺขสฺส อริยสจฺจสฺส อภิสมยาย ฉนฺทํ ชเนติ วายมติ, วีริยํ อารภติ, จิตฺตํ ปคฺคณฺหาติ ปทหติ. เอวํ จตุนฺนํ อริยสจฺจานํ กาตพฺพํ. ตตฺถ กตมํ อญฺญินฺทฺริยํ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ‘‘อิทํ ทุกฺขํ อริยสจฺจ’’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ, ยา จ มคฺโค, อิทํ อญฺญินฺทฺริยํ. อาสวกฺขยา อนาสโว โหติ, อิทํ วุจฺจติ อญฺญาตาวินฺทฺริยํ. ตถายํ ปญฺญา, อยํ เหตุ. ยํ ฉนฺทํ ชเนติ วายมติ, ยา ปชานาติ, อยํ นิสฺสนฺโท. เยน สพฺพโส อาสวานํ ขยา เหตุ, ยํ ขเย ญาณมุปฺปชฺชติ, อนุปฺปาเท ญาณญฺจ, อยํ นิสฺสนฺโท. ยํ อรหตฺตํ, อิทํ ผลํ. ตตฺถ ขีณา เม ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียนฺติ, อิทํ ขเย ญาณํ. นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานามีติ อิทํ อนุปฺปาเท ญาณํ. อิติ อิมานิ อินฺทฺริยานิ อโมโห นิทฺทิฏฺโฐ เหตุนา จ นิสฺสนฺเทน จ ผเลน จ. อิมานิ อสาธารณานิ นิทฺทิฏฺฐานิ. “भिक्षूंनो, ही तीन इंद्रिये आहेत: अनज्ञात-न्यास्यामीतींद्रिय (अद्याप न जाणलेले जाणण्याची इच्छा असणारे इंद्रिय), आज्ञेंद्रिय (जाणणारे इंद्रिय) आणि आज्ञातावींद्रिय (पूर्णपणे जाणलेल्याचे इंद्रिय). त्यात, अनज्ञात-न्यास्यामीतींद्रिय कोणते? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू अद्याप न समजलेल्या दुःख-आर्यसत्याच्या साक्षात्कारासाठी छंद (इच्छा) उत्पन्न करतो, प्रयत्न करतो, वीर्य (उत्साह) आरंभितो, चित्ताला प्रगत करतो आणि दृढ निश्चय करतो. चारही आर्यसत्यांच्या बाबतीत असेच केले पाहिजे. त्यात, आज्ञेंद्रिय कोणते? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू 'हे दुःख-आर्यसत्य आहे' असे यथार्थपणे जाणतो, आणि जो मार्ग आहे, हे 'आज्ञेंद्रिय' होय. आसवांच्या क्षयामुळे तो अनासव (आसवरहित) होतो, याला 'आज्ञातावींद्रिय' म्हटले जाते. त्याचप्रमाणे, ही जी प्रज्ञा आहे, तो 'हेतू' आहे. जो छंद उत्पन्न करतो, प्रयत्न करतो आणि जे जाणतो, तो 'निष्यंद' आहे. ज्याद्वारे सर्व प्रकारे आसवांचा क्षय होतो तो 'हेतू' आहे; आसवांच्या क्षयावर जे ज्ञान उत्पन्न होते आणि अनुत्पाद ज्ञान (पुन्हा जन्म न होण्याचे ज्ञान) उत्पन्न होते, तो 'निष्यंद' आहे. जे अर्हत्त्व आहे, ते 'फल' आहे. त्यात, 'माझा जन्म क्षीण झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे' हे 'क्षय-ज्ञान' आहे. 'आता या जन्मानंतर दुसरा जन्म नाही, असे मी जाणतो' हे 'अनुत्पाद-ज्ञान' आहे. अशा प्रकारे, या इंद्रियांच्या द्वारे अमोह हा हेतू, निष्यंद आणि फल या स्वरूपात निर्देशित केला आहे. हे असाधारण (विशिष्ट) धर्म निर्देशित केले आहेत.” ตตฺถ กตมานิ กุสลมูลานิ สาธารณานิ? กุสลญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ กุสลมูลญฺเจว. ตตฺถ กตมํ กุสลมูลํ? อโลโภ อโทโส อโมโห. ตตฺถ กตมํ กุสลํ? อฏฺฐ สมฺมตฺตานิ สมฺมาทิฏฺฐิ ยาว สมฺมาสมาธิ. ตตฺถ ยานิ กุสลมูลานิ, อยํ เหตุ. ยญฺจ อโลโภ ตีณิ กมฺมานิ สมุฏฺฐาเปติ สงฺกปฺปํ วายามํ สมาธิญฺจ, อยํ อโลภสฺส นิสฺสนฺโท. ตตฺถ โย อโทโส, อยํ เหตุ. ยํ ตโย ธมฺเม ปฏฺฐเปติ สมฺมาวาจํ สมฺมากมฺมนฺตํ สมฺมาอาชีวญฺจ, อยํ นิสฺสนฺโท. ตตฺถ โย อโมโห เหตุ, ยํ ทฺเว ธมฺเม อุปฏฺฐเปติ อวิปรีตทสฺสนมฺปิ จ อนภิลาปนํ, อยํ นิสฺสนฺโท. อิมสฺส พฺรหฺมจริยสฺส ยํ ผลํ, ตา ทฺเว วิมุตฺติโย ราควิราคา เจโตวิมุตฺติ อวิชฺชา วิราคา จ ปญฺญาวิมุตฺติ, อิทํ ผลํ. อิติ อิมานิ ตีณิ กุสลมูลานิ นิทฺทิฏฺฐานิ เหตุโต [Pg.215] จ นิสฺสนฺทโต จ ผลโต จ. เอวํ สาธารณานิ กุสลานิ ปฏิวิชฺฌิตพฺพานิ. त्यात, सामायिक (साधारण) कुशलमुळे कोणती? “भिक्षूंनो, मी तुम्हाला कुशल आणि कुशलमुळे या दोन्हीचा उपदेश करीन. त्यात, कुशलमूळ कोणते? अलोभ, अद्वेष आणि अमोह. त्यात, कुशल कोणते? आठ सम्यक्त्व (योग्य मार्ग) – सम्यक दृष्टीपासून ते सम्यक समाधीपर्यंत. त्यात, जी कुशलमुळे आहेत, तो 'हेतू' आहे. आणि जो अलोभ तीन कर्मे उत्पन्न करतो – सम्यक संकल्प, सम्यक व्यायाम (प्रयत्न) आणि सम्यक समाधी, हा अलोभाचा 'निष्यंद' आहे. त्यात, जो अद्वेष आहे, तो 'हेतू' आहे. जो तीन धर्म प्रस्थापित करतो – सम्यक वाचा, सम्यक कर्मांत आणि सम्यक आजीव, हा 'निष्यंद' आहे. त्यात, जो अमोह हेतू आहे, जो दोन धर्म उपस्थित करतो – अविपरीत दर्शन (यथार्थ दृष्टी) आणि अनभिलापन (अनासक्ती/मौन), हा 'निष्यंद' आहे. या ब्रह्मचर्याचे जे फल आहे, त्या दोन विमुक्ती आहेत – राग-विरागापासून मिळणारी चेतोविमुक्ती आणि अविद्या-विरागापासून मिळणारी प्रज्ञाविमुक्ती, हे 'फल' आहे. अशा प्रकारे, ही तीन कुशलमुळे हेतू, निष्यंद आणि फल या स्वरूपात निर्देशित केली आहेत. अशा प्रकारे, सामायिक कुशल धर्म भेदून जाणले पाहिजेत. ยตฺถ ทุเว ยตฺถ ตีณิ. อยญฺเจตฺถ คาถา. जिथे दोन, जिथे तीन (धर्म एकत्र येतात). या संदर्भात ही गाथा आहे: ‘‘ตุลมตุลญฺจ สมฺภวํ, ภวสงฺขารมวสฺสชิ มุนิ; อชฺฌตฺตรโต สมาหิโต, อภินฺทิ กวจมิวตฺตสมฺภว’’นฺติ. “मुनींनी (बुद्धांनी) अस्तित्वाचे कारण (संभव) आणि अस्तित्वाचे संस्कार (भवसंस्कार), जे मोजता येण्याजोगे (तुल) आणि अमर्याद (अतुल) आहेत, त्यांचा त्याग केला; अध्यात्मात रममाण आणि समाधीस्थ होऊन, त्यांनी स्वतःमध्ये उत्पन्न झालेल्या क्लेशांना कवचाप्रमाणे भेदून टाकले.” ตุลมตุลญฺจ สมฺภวนฺติ ตุลสงฺขตํ อตุลสงฺขตํ. ตตฺถ เย สงฺขตา ตุลํ, เต ทฺเว ธมฺมา อสฺสาโท จ อาทีนโว จ ตุลิตา ภวนฺติ. เอตฺตโก กาเมสุ อสฺสาโท. เอตฺตโก อาทีนโว อิมสฺส, อิทํ นิสฺสรณนฺติ อิติ นิพฺพานํ ปชานาติ. ทฺวีหิ การเณหิ อตุลํ น จ สกฺกา ตุลยิตุํ. เอตฺตกํ เอตํ เนตํ ปรมตฺถีติ เตน อตุลํ. อถ ปาปุณา รตนํ กริตฺวา อจฺฉริยภาเวน อตุลํ. ตตฺถ กุสลสฺส จ อภิสมฺภวา ชานนา ปสฺสนา, อยํ อโมโห. ยํ ตตฺถ ญาตา โอสิรณา ภวสงฺขารานํ, อยํ อโลโภ. ยํ อชฺฌตฺตรโต สมาหิโตติ วิกฺเขปปฏิสํหรณา, อยํ อโทโส. อิติ อิมานิ ตีณิ กุสลมูลานิ. ตุลมตุลสมฺภวนฺติ อยํ อโมโห. โย ภวสงฺขารานํ สโมสรณํ โลโภ สมฺมาสมาธีนํ อสฺสาโท, อยํ เหตุ. ยํ อชฺฌตฺตรโต อวิชฺชณฺฑโกสํ สมฺเภโท, อยํ นิสฺสนฺโท. สา ปวตฺติ อิมานิ ตีณิ นิทฺทิฏฺฐานิ กุสลมูลานิ เหตุโต จ นิสฺสนฺทโต จ ผลโต จ. तुल आणि अतुल यांची उत्पत्ती म्हणजे तुल संखत (संस्कृत) धर्म आणि अतुल असंखत (असंस्कृत) धर्म होय. त्या दोन्हीमध्ये जे संखत धर्म आहेत ते 'तुल' (तुलनीय) आहेत; ते दोन धर्म म्हणजे आस्वाद (सुखद पैलू) आणि आदीनव (दोष) हे (अनित्यता इत्यादी रूपाने) तोलले जातात. 'कामांमध्ये एवढा आस्वाद आहे', 'या कामाचा एवढा दोष आहे' आणि 'हे निस्सरण (मुक्ती) आहे' अशा प्रकारे तो निर्वाणाला जाणतो. दोन कारणांमुळे 'अतुल' (निर्वाण) तोलणे शक्य नाही. 'हे एवढ्या गुणांचे स्थान आहे आणि यापेक्षा श्रेष्ठ दुसरा कोणताही धर्म नाही', म्हणून ते 'अतुल' आहे. तसेच, निर्वाणाला प्राप्त झालेले लोक त्याला रत्न मानून त्याच्या आश्चर्यकारक स्वरूपामुळे 'अतुल' म्हणतात. तेथे कुशलाची उत्पत्ती, ज्ञान आणि दर्शन असणे, हा 'अमोह' आहे. तेथे भवसंस्कारांचे ज्ञान होऊन जी अनासक्ती (त्याग) होते, हा 'अलोभ' आहे. जे 'अध्यात्मरत आणि समाहित' असे म्हटले आहे, ते विक्षेपाचे निवारण आहे, हा 'अद्वेष' आहे. अशी ही तीन कुशलमुळे आहेत. 'तुल आणि अतुल यांची उत्पत्ती' हा अमोह आहे. जो भवसंस्कारांचा संग्रह करणारा लोभ आणि सम्यक समाधीचा आस्वाद आहे, तो 'हेतू' आहे. जे अध्यात्मरत होऊन अविद्यारूपी अंडकोशाचा भेद करणे आहे, तो 'निष्यंद' (परिणाम) आहे. ती प्रवृत्ती आहे. ही तीन कुशलमुळे हेतूने, निष्यंदाने आणि फलाने निर्दिष्ट केली आहेत. เอตฺตาวตา เอสา ปวตฺติ จ นิวตฺติ จ อกุสลมูเลหิ ปวตฺตติ, กุสลมูเลหิ นิวตฺตตีติ อิเมหิ จ ตีหิ สพฺพํ อกุสลมูลํ สโมสรณํ คจฺฉติ. โส ธมฺเม วา วจนโต นิทฺทิฏฺโฐ ตณฺหาติ วา โกโธติ วา อสมฺปชญฺญนฺติ วา อนุสโยติ วา มกฺโขติ วา ปฬาโสติ วา อสฺสตีติ วา อิสฺสาติ วา มจฺฉริยนฺติ วา อญฺญาณนฺติ วา, เตหิ เย จ วตฺถูหิ นิทฺทิสิตพฺพํ. ยสฺสิมานิ ทฺเว วจนานิ ธมฺมปทานิ นิทฺทิฏฺฐานิ น โส อตฺถิ กิเลสา, โย อิเมสุ นวสุ ปเทสุ สโมธานํ สโมสรณํ คจฺฉติ. อยํ กิเลโส, น จ โลโภ, น จ โทโส, น จ โมโห. यावरून ही प्रवृत्ती आणि निवृत्ती अकुशल मुळांमुळे प्रवृत्त होते आणि कुशल मुळांमुळे निवृत्त होते. या तिन्हींमुळे सर्व अकुशल मुळे एकत्र येतात. तो धर्मामध्ये उपदेश केल्यामुळे निर्दिष्ट केला आहे; जसे की तृष्णा, क्रोध, असं प्रज्ञान (असावधपणा), अनुशय, मक्ष (गुणलोप), पळास (मत्सर), अस्मृती, ईर्ष्या, मात्सर्य किंवा अज्ञान, या शब्दांनी जे अर्थ निर्दिष्ट केले पाहिजेत. ज्या आस्वादाचे हे दोन शब्द धर्मपदे म्हणून निर्दिष्ट केले आहेत, तो क्लेश नाही, जो या नऊ पदांमध्ये समाविष्ट होतो. हा क्लेश आहे, पण तो लोभ नाही, द्वेष नाही आणि मोह नाही. ยถา อกุสลมูลานิ, เอวํ กุสลานิ ปฏิกฺเขเปน นิทฺทิสิตพฺพานิ. ज्याप्रमाणे अकुशल मुळे निर्दिष्ट केली जातात, त्याचप्रमाणे कुशल मुळे त्याच्या उलट (व्यतिरेक रूपाने) निर्दिष्ट केली पाहिजेत. อิทํ อโมหาธิฏฺฐานํ. हे अमोहाचे अधिष्ठान आहे. ๓๗. ตตฺถ [Pg.216] กตมํ กายกมฺมาธิฏฺฐานํ? ३७. त्यात कायकर्म-अधिष्ठान कोणते? กาเยน กุสลํ กเร, อสฺส กาเยน สํวุโต; กายทุจฺจริตํ หิตฺวา, กาเยน สุจริตํ จเร. कायाने (शरीराने) कुशल कर्म करावे, कायाने संयमित असावे; काय-दुश्चरित्राचा त्याग करून कायाने सुचरित आचरावे. ตีณิมานิ, ภิกฺขเว, สุจริตานิ. ปาณาติปาตา เวรมณี, อทินฺนาทานา เวรมณี, กาเมสุมิจฺฉาจารา เวรมณี, อิทํ กายกมฺมาธิฏฺฐานํ. भिक्खूहो, ही तीन काय-सुचरिते आहेत: प्राणातिपातापासून (जीवहिंसेपासून) विरती, अदत्तादानापासून (चोरीपासून) विरती आणि कामेसू मिच्छाचारापासून (व्यभिचारापासून) विरती. हे कायकर्म-अधिष्ठान आहे. ตตฺถ กตมํ วาจากมฺมาธิฏฺฐานํ? त्यात वाक्कर्म-अधिष्ठान कोणते? สุภาสิตํ อุตฺตมมาหุ สนฺโต, ธมฺมํ ภเณ นาธมฺมํ ตํ ทุติยํ; ปิยํ ภเณ นาปฺปิยํ ตํ ตติยํ, สจฺจํ ภเณ นาลิกํ ตํ จตุตฺถํ. सत्पुरुष सुभाषित (सुंदर रीतीने बोललेले) वचन सर्वोत्तम आहे असे म्हणतात. धर्माचे बोलावे, अधर्माचे बोलू नये; हे दुसरे आहे. प्रिय बोलावे, अप्रिय बोलू नये; हे तिसरे आहे. सत्य बोलावे, असत्य बोलू नये; हे चौथे आहे. จตฺตาริมานิ จ วจีสุจริตานิ อิทํ วาจากมฺมาธิฏฺฐานํ. आणि ही चार वाक्-सुचरिते आहेत. हे वाक्कर्म-अधिष्ठान आहे. ตตฺถ กตมํ มโนกมฺมาธิฏฺฐานํ? त्यात मनःकर्म-अधिष्ठान कोणते? มเนน กุสลํ กมฺมํ, มนสา สํวุโต ภเว; มโนทุจฺจริตํ หิตฺวา, มนสา สุจริตํ จเร. मनाने कुशल कर्म करावे, मनाने संयमित असावे; मन-दुश्चरित्राचा त्याग करून मनाने सुचरित आचरावे. ตีณิมานิ มโนสุจริตานิ, อนภิชฺฌา, อพฺยาปาโท, สมฺมาทิฏฺฐิ, อิทํ มโนกมฺมาธิฏฺฐานํ. อิมานิ อสาธารณานิ สุตฺตานิ. ही तीन मन-सुचरिते आहेत: अनभिध्या (लोभ नसणे), अव्यापाद (द्वेष नसणे) आणि सम्यक दृष्टी. हे मनःकर्म-अधिष्ठान आहे. ही असाधारण (विशिष्ट) सुत्ते आहेत. ตตฺถ กตมานิ สาธารณานิ สุตฺตานิ? त्यात साधारण (सामान्य) सुत्ते कोणती? วาจานุรกฺขี มนสา สุสํวุโต, กาเยน จ นากุสลํ กยิรา ; เอเต ตโย กมฺมปเถ วิโสธเย, อาราธเย มคฺคมิสิปฺปเวทิตํ. वाणीचे रक्षण करणारा (वाचेवर ताबा ठेवणारा), मनाने सुसंयमित असणारा आणि कायाने अकुशल कर्म न करणारा असावा. या तीन कर्मपथांचे विशोधन करावे आणि ऋषींनी (बुद्धांनी) सांगितलेल्या मार्गाची आराधना करावी (त्या मार्गावर चालावे). ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, ปาริสุทฺธิโย – กายกมฺมปาริสุทฺธิ, วาจากมฺมปาริสุทฺธิ, มโนกมฺมปาริสุทฺธิ. भिक्खूहो, या तीन पारिशुद्धी (शुद्धता) आहेत – कायकर्म-पारिशुद्धी, वाक्कर्म-पारिशुद्धी आणि मनःकर्म-पारिशुद्धी. ตตฺถ กตมา กายกมฺมปาริสุทฺธิ? ปาณาติปาตา เวรมณี, อทินฺนาทานา เวรมณี, กาเมสุมิจฺฉาจารา เวรมณี. ตตฺถ กตมา วจีกมฺมปาริสุทฺธิ? มุสาวาทา เวรมณี…เป… สมฺผปฺปลาปา เวรมณี. ตตฺถ กตมา มโนกมฺมปาริสุทฺธิ? อนภิชฺฌา อพฺยาปาโท สมฺมาทิฏฺฐิ. อิทํ สาธารณสุตฺตํ. त्यात कायकर्म-पारिशुद्धी कोणती? प्राणातिपातापासून विरती, अदत्तादानापासून विरती आणि कामेसू मिच्छाचारापासून विरती. त्यात वाक्कर्म-पारिशुद्धी कोणती? मुसावादापासून (असत्य बोलण्यापासून) विरती... पे... संफप्पलापापासून (व्यर्थ बडबडीपासून) विरती. त्यात मनःकर्म-पारिशुद्धी कोणती? अनभिध्या, अव्यापाद आणि सम्यक दृष्टी. हे साधारण सुत्त आहे. อิติ [Pg.217] สาธารณานิ จ สุตฺตานิ อสาธารณานิ จ สุตฺตานิ ปฏิวิชฺฌิตพฺพานิ. ปฏิวิชฺฌิตฺวา วาจาย กาเยน จ สุตฺตสฺส อตฺโถ นิทฺทิสิตพฺโพ. अशा प्रकारे, साधारण सुत्ते आणि असाधारण सुत्ते यांचे आकलन (प्रतिवेध) केले पाहिजे. आकलन करून वाणीने आणि कायाने सुत्ताचा अर्थ निर्दिष्ट केला पाहिजे. ๓๘. ตตฺถ กตมํ สทฺธินฺทฺริยาธิฏฺฐานํ? ३८. त्यात सद्धिंद्रिय-अधिष्ठान कोणते? ยสฺส สทฺธา ตถาคเต, อจลา สุปฺปติฏฺฐิตา; สีลญฺจ ยสฺส กลฺยาณํ, อริยกนฺตํ ปสํสิตํ. ज्याची तथागतांवर अचल व सुप्रतिष्ठित श्रद्धा आहे; आणि ज्याचे शील कल्याणकारी, आर्यांना प्रिय व प्रशंसनीय आहे; สงฺเฆ ปสาโท ยสฺสตฺถิ, อุชุภูตญฺจ ทสฺสนํ; อทลิทฺโทติ ตํ อาหุ, อโมฆํ ตสฺส ชีวิตํ. ज्याची संघावर प्रसन्नता (श्रद्धा) आहे आणि ज्याची दृष्टी सरळ (सम्यक) झाली आहे; त्याला 'दरिद्री नव्हे' असे म्हणतात, त्याचे जीवन निष्फळ नाही. สทฺธา เว นนฺทิกา อาราธิโก, โน ตสฺส สทฺโธติ; สพฺพํ สิยาติ ภควนฺตํ, ตถารูโป ธมฺมสมฺปสาโท. श्रद्धा खरोखरच आनंद देणारी आणि आराधक (प्रसन्न करणारी) आहे, त्याची श्रद्धा निष्फळ नाही; हे सर्व घडून येते. भगवंतांविषयी अशा प्रकारची धर्माची प्रसन्नता (श्रद्धा) म्हणजेच भगवंतांवरील श्रद्धा होय. อิทํ สทฺธินฺทฺริยาธิฏฺฐานํ. हे सद्धिंद्रिय-अधिष्ठान आहे. ตตฺถ กตมํ วีริยาธิฏฺฐานํ? त्यात वीरियाधिष्ठान (वीर्य-अधिष्ठान) कोणते? อารมฺภถ นิกฺกมถ, ยุญฺชถ พุทฺธสาสเน; ธุนาถ มจฺจุโน เสนํ, นฬาคารํว กุญฺชโร. आरंभ करा, निष्क्रमण करा (आळस सोडा), बुद्धशासनात स्वतःला जोडून घ्या; ज्याप्रमाणे हत्ती गवताची झोपडी मोडून टाकतो, त्याप्रमाणे मृत्यूच्या (मारच्या) सेनेचा नाश करा. จตฺตาโรเม, ภิกฺขเว, สมฺมปฺปธานา, อิทํ วีริยาธิฏฺฐานํ. भिक्खूहो, हे चार सम्यक प्रधान (सम्यक व्यायाम) आहेत. हे वीर्य-अधिष्ठान आहे. ตตฺถ กตมํ สตินฺทฺริยาธิฏฺฐานํ? त्यात सतिंद्रिय-अधिष्ठान कोणते? สตีมโต สทา ภทฺทํ, ภทฺทมตฺถุ สตีมโต; สตีมโต สทา เสยฺโย, สตีมา สุขเมธติ. स्मृतीमान (जागरूक) व्यक्तीचे नेहमी कल्याण होते, स्मृतीमान व्यक्तीचे कल्याण असो; स्मृतीमान व्यक्तीसाठी नेहमीच श्रेष्ठता असते, स्मृतीमान व्यक्ती सुखाचा उपभोग घेते. จตฺตาโร สติปฏฺฐานา วิตฺถาเรน กาตพฺพา, อิทํ สตินฺทฺริยาธิฏฺฐานํ. चार स्मृतिप्रस्थान विस्ताराने जाणावे. हे सतिंद्रिय-अधिष्ठान आहे. ตตฺถ กตมํ สมาธินฺทฺริยาธิฏฺฐานํ? त्यात समाधिंद्रिय-अधिष्ठान कोणते? อากงฺขโต เต นรทมฺมสารถิ, เทวา มนุสฺสา มนสา วิจินฺติตํ; สพฺเพน ชญฺญา กสิณาปิ ปาณิโน, สนฺตํ สมาธึ อรณํ นิเสวโต. हे नरदम्यसारथी (मनुष्यांना वश करणारे सारथी)! देव आणि मनुष्य आपल्या मनामध्ये ज्याची आकांक्षा धरतात; त्या शांत, क्लेशरहित समाधीचे सेवन करणाऱ्या व्यक्तीला सर्व प्राणी आणि संपूर्ण विश्व देखील ओळखते. ตโยเม, ภิกฺขเว, สมาธี – สวิตกฺโก สวิจาโร, อวิตกฺโก วิจารมตฺโต, อวิตกฺโก อวิจาโร. อิทํ สมาธินฺทฺริยาธิฏฺฐานํ. भिक्खूहो, या तीन समाधी आहेत – सवितर्क-सविचार समाधी, अवितर्क-विचारमात्र समाधी आणि अवितर्क-अविचार समाधी. हे समाधिंद्रिय-अधिष्ठान आहे. ตตฺถ [Pg.218] กตมํ ปญฺญินฺทฺริยาธิฏฺฐานํ? त्यात प्रज्ञिंद्रिय-अधिष्ठान कोणते? ปญฺญา หิ เสฏฺฐา โลกสฺมินฺติ วิตฺถาเรน. 'या जगात प्रज्ञाच सर्वश्रेष्ठ आहे' हे विस्ताराने जाणावे. ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, ปญฺญา – สุตมยี, จินฺตามยี, ภาวนามยี, อิทํ ปญฺญินฺทฺริยาธิฏฺฐานํ สุตฺตํ, อิมานิ อินฺทฺริยาธิฏฺฐานานิ อสาธารณานิ สุตฺตานิ. भिक्खूहो, या तीन प्रज्ञा आहेत – श्रुतमयी प्रज्ञा, चिंतामयी (चिंतनमयी) प्रज्ञा आणि भावनामयी प्रज्ञा. हे प्रज्ञिंद्रिय-अधिष्ठान सुत्त आहे. ही इंद्रिय-अधिष्ठान असणारी असाधारण सुत्ते आहेत. ๓๙. ตตฺถ กตมานิ สาธารณานิ อินฺทฺริยาธิฏฺฐานานิ สุตฺตานิ? ३९. त्यात साधारण इंद्रिय-अधिष्ठान सुत्ते कोणती? อวีตราโค กาเมสุ, ยสฺส ปญฺจินฺทฺริยา มุทู; สทฺธา สติ จ วีริยํ, สมโถ จ วิปสฺสนา; ตาทิสํ ภิกฺขุมาสชฺช, ปุพฺเพว อุปหญฺญติ. कामांमध्ये जो वीतराग झालेला नाही, ज्याची पाच इंद्रिये – श्रद्धा, स्मृती, वीर्य, शमथ आणि विपश्यना – मृदू (कोमल) आहेत; अशा भिक्खूवर आघात केल्यास, तो आधीच नष्ट होतो. ปญฺจิมานิ อินฺทฺริยานิ. สทฺธินฺทฺริยาทิอินฺทฺริยํ ทฏฺฐพฺพํ. ตีสุ อเวจฺจปฺปสาเท วิตฺถาเรน สุตฺตํ กาตพฺพํ. อิมานิ สาธารณานิ อินฺทฺริยาธิฏฺฐานานิ สุตฺตานิ. ยํ ยสฺส สมฺพนฺธํ กุสลสฺส วา อกุสลสฺส วา เตน เตน อธิฏฺฐาเนน ตํ สุตฺตํ นิทฺทิสิตพฺพํ, นตฺถญฺโญ ธมฺโม นิทฺทิสิตพฺโพ. ตตฺถ สาธารณํ กุสลํ นาปิ กุสลํ อกุสลํ ยถา สาธารณานิ จ กุสลมูลานิ สาธารณานิ จ อกุสลมูลานิ อุปฺปนฺนํ กามวิตกฺกํ ปชหติ…เป… จตฺตาโร สมฺมปฺปธานา กุสลํ อกุสลญฺจ. ही पाच इंद्रिये आहेत. श्रद्धेंद्रिय इत्यादी इंद्रिये जाणावीत. तीन (रत्नांविषयीच्या) अचल प्रसादाच्या (श्रद्धेच्या) बाबतीत विस्ताराने सूत्राचे कथन करावे. ही इंद्रियांचे अधिष्ठान असणारी साधारण (सामान्य) सूत्रे आहेत. ज्या कुशल किंवा अकुशलाशी ज्याचा संबंध आहे, त्या त्या अधिष्ठानाने ते सूत्र निर्देशित करावे; दुसरा कोणताही धर्म निर्देशित करण्याजोगा नाही. तेथे साधारण कुशल आणि कुशल नसलेले अकुशल देखील, ज्याप्रमाणे साधारण कुशलमुळे आणि साधारण अकुशलमुळे उत्पन्न झालेल्या कामवितर्काचा त्याग करतात... पे... चार सम्यक्प्रधान कुशल आणि अकुशल (दोन्हीशी संबंधित) आहेत. ตตฺถิมา อุทฺทานคาถา त्या सूत्रांमध्ये या उद्दान गाथा (संग्रह गाथा) आहेत: วิตกฺโก หิ มมตฺถิโก, ททํ ปิโย นโร อิติ; โย ปาณมติปาเตติ, ตีณิ ตสฺส พาลลกฺขณํ. कामवितर्कामुळे अत्यंत आसक्त झालेला मनुष्य (दुसऱ्या) मनुष्याला प्रिय वाटतो (असे सांगणारे सूत्र); जो प्राण्याचा घात करतो (असे सांगणारे सूत्र); आणि त्याचे तीन बाललक्षण (मूर्खाची लक्षणे सांगणारे सूत्र). สตญฺเจว สหสฺสานํ, เย จ สมณพฺราหฺมณา; ฉนฺทา โทสา ภยา โมหา, จตูหิ อคตีหิ จ. शंभर वर्षे आणि हजारो कल्पपर्यंत (फळ भोगण्याविषयीचे सूत्र); जे श्रमण आणि ब्राह्मण आहेत (असे सांगणारे सूत्र); आणि छंद (राग), द्वेष, भय व मोह या चार अगतींविषयीचे (अयोग्य मार्गांविषयीचे) सूत्र. อสุภานุปสฺสึ วิหรนฺตํ, นิมิตฺเตสุ อสุภา จ; เอกมฺปิ เจ ปิยํ ปาณํ, มิตฺตา สเจ สุภาสิตา. अशुभाचे अनुदर्शन करत विहरण करणाऱ्याविषयीचे सूत्र; निमित्तांमध्ये अशुभाची भावना करणाऱ्याविषयीचे सूत्र; जर एका जरी प्रिय प्राण्यावर (प्रेम असेल तर, असे सांगणारे सूत्र); आणि मित्र व जर सुभाषित (सुंदर वचन बोलले तर, असे सांगणारे सूत्र). ปญฺญา หิ เสฏฺฐา โลกสฺมึ, อนุญฺญา ตีณิ อินฺทฺริยานิ; กุสลากุสลมูลานิ จ, ตุลมตุลญฺจ สมฺภวํ. जगात प्रज्ञाच श्रेष्ठ आहे (असे सांगणारे सूत्र); तीन इंद्रियांविषयीचे (अज्ञाताज्ञास्यामींद्रिय इत्यादी) सूत्र; कुशल आणि अकुशल मुळांविषयीचे सूत्र; आणि तुल्य व अतुल्य उत्पत्तीविषयीचे सूत्र. กาเยน กุสลํ กเร, ตีณิ สุจริตานิ จ; สุภาสิตํ อุตฺตมมาหุ, สนฺโต วจีสุจริตานิ จ. कायेने कुशल करावे (असे सांगणारे सूत्र); तीन सुचरितांविषयीचे सूत्र; सत्पुरुष सुभाषिताला उत्तम म्हणतात (असे सांगणारे सूत्र); आणि वाणीच्या सुचरितांविषयीचे (वचीसुचरितांविषयीचे) सूत्र. กาเยน [Pg.219] จ กุสลํ กยิรา, มโนทุจฺจริตานิ จ; กายานุรกฺขี จ สทา, ติสฺโส จ ปาริสุทฺธิโย. कायेने कुशल करावे (असे सांगणारे सूत्र); मनोदुश्चरितांविषयीचे सूत्र; नेहमी कायेचे रक्षण करणाऱ्याविषयीचे सूत्र; आणि तीन परिशुद्धींविषयीचे सूत्र. ยสฺส สทฺธา ตถาคเต, สมุปฺปาเท จ เทสิโต; อารมฺภถ นิกฺกมถ, ยา จ สมฺมปฺปธานตา. ज्याची तथागतांवर श्रद्धा आहे (असे सांगणारे सूत्र); उत्पत्तीविषयी उपदेश केलेले सूत्र; 'आरंभ करा, निष्क्रमण करा' (आळस सोडा) असे सांगणारे सूत्र; आणि सम्यक्प्रधानापर्यंत अनुक्रमाने सांगणारे सूत्र. สตีมโต สทา ภทฺทํ, สติปฏฺฐานภาวนา; อากงฺขโต จ อนญฺญาณํ, เย จ ตีณิ สมาธโย. नेहमी स्मृतिमान असणाऱ्याचे कल्याण होते (असे सांगणारे सूत्र); सतिपट्ठान (स्मृतिप्रस्थान) भावनेविषयीचे सूत्र; आकांक्षा करणाऱ्याविषयीचे सूत्र; अज्ञाताज्ञास्यामींद्रियाविषयीचे सूत्र; आणि तीन समाधींविषयीचे सूत्र. ปญฺญา หิ เสฏฺฐา โลกสฺมึ, ติสฺโส ปญฺญา ปกาสิตา; อวีตราโค กาเมสุ, ตเถว ปญฺจินฺทฺริยา. जगात प्रज्ञाच श्रेष्ठ आहे (असे सांगणारे सूत्र); तीन प्रज्ञा प्रकाशित करणारे सूत्र; कामांविषयी ज्याचा राग नष्ट झालेला नाही (असे सांगणारे सूत्र); आणि त्याचप्रमाणे प्रज्ञेंद्रियाविषयीचे सूत्र. อิติ เถรสฺส มหากจฺจายนสฺส अशा प्रकारे, स्थवीर महाकच्चायनांचे ชมฺพุวนวาสิโน เปฏโกปเทเส जंबूवनात राहणाऱ्या (स्थवीरांच्या) पेटकोपदेशातील ตติยภูมิ สุตฺตาธิฏฺฐานํ นาม. 'सूत्ताधिट्ठान' (सूत्रांचे अधिष्ठान) नावाची तिसरी भूमी समाप्त झाली. ๔. สุตฺตวิจยจตุตฺถภูมิ ४. सूत्तविचय (सूत्र-विचार) चौथी भूमी ๔๐. ตตฺถ กตโม สุตฺตวิจโย? ४०. त्यामध्ये सूत्तविचय (सूत्राचा विचार) म्हणजे काय? ตตฺถ กุสเลหิ ธมฺเมหิ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ ปุพฺพาปรโส สาธุกํ อุปปริกฺขิยติ. กึนุ โข อิทํ สุตฺตํ อารภิ…เป… เตหิ สุตฺเตหิ สห อธิสนฺนฏฺเฐหิ ยุชฺชติ อุทาหุ น ยุชฺชตีติ? त्यामध्ये कुशल धर्मांद्वारे आणि अकुशल धर्मांद्वारे पूर्व-अपर (आधी आणि नंतरच्या) संबंधाने चांगल्या प्रकारे परीक्षण केले जाते. 'हे सूत्र कशासाठी आरंभिले गेले? ...पे... त्या सूत्रांसह तुलना करण्याच्या अर्थाने हे जुळते की नाही?' अशा प्रकारे. ยถา ภควา กิเลเส อาทิมฺหิ ตตฺถ เทเสติ. กึ เทสิตํ? เตสํ กิเลสานํ ปหานํ อุทาหุ โน เทสิตนฺติ อุปปริกฺขิตพฺพํ. ยทิ น เทสิตํ ภควติ เตสํ กิเลสานํ ปหานํ กุสลา ธมฺมา ปริเยสิตพฺพา ยตฺถ เต อกุสลา ปหานํ คจฺฉนฺติ. สเจ สมนฺเนหมาโน น ลภติ. ตตฺถ อกุสลา ธมฺมา อปกฑฺฒิตพฺพา วีมํสิตพฺพา, สํกิเลสภาคิยสุตฺตํ, ยทิ กิเลสา อปกฑฺฒิยนฺตา. เย วา น เทนฺติ ตตฺถ อุปปริกฺขิตพฺพา อริยมคฺคธมฺมา ตาสุ ภูมีสุ กิเลสา ปหานํ คจฺฉนฺติ, อุทาหุ น คจฺฉนฺตีติ. ยตฺตกา ปน กิเลสา เทสิตา. น ตตฺตกา อริยธมฺมา เทสิตา. ยตฺถ กิเลสา ปหานํ คจฺฉนฺติ, ตตฺถ เย กิเลสา อริยธมฺมานํ ปฏิปกฺเขน น ยุชฺชนฺติ, เต อปกฑฺฒิตพฺพา, สเจ อปกฑฺฒิยนฺตา โยชนํ เทติ. ตตฺถ เอวํ วีมํสิตพฺพํ. ทฺเว ตีณิ วา ตทุตฺตริ วา กิเลสา เอเกน อริยมคฺเคน ปหานํ คจฺฉนฺตีติ. สเจ เอวํ วีมํสิยนฺตา โยชนํ เทติ, ตตฺถ อุปปริกฺขิตพฺพํ. ปรมฺปราย วา ปิฏกสมฺปทาเนน วา สุตฺตสฺส อตฺโถ จ นตฺโถ จ. ยํ วา น สกฺกา สุตฺตํ นิทฺทิสิตุํ เนว สุตฺตํ วิจิกิจฺฉิตพฺพํ. เอวํ ยถา อาทิมฺหิ กุสลา ธมฺมา โหนฺติ. เย กิเลสา [Pg.220] เต ปหีเนยฺยาติ. เต อุปปริกฺขิตพฺพา. ปุโร วา กุสโล ปฏิปกฺเขน วา ปุโร เทสนา, อนูนา อนธิกา อุคฺคเหตพฺพา. ยถา ปฐโม อุตฺติโล เยสมิทานิ กิเลสานํ เย อริยธมฺมา เทสิตา อิเม กิเลสา อิเมหิ อริยธมฺเมหิ ปหียนฺติ, อุทาหุ นปฺปหียนฺตีติ วิจินิตพฺพา. ยทิ อุปปริกฺขิยมานา ยุชฺชนฺติ, คเหตพฺพา. อถ น ยุชฺชนฺติ, เย กิเลสา อปฏิปกฺขา โหนฺติ, เต กิเลสา อปริปกฺขิตพฺพา. เย จ อริยธมฺมา ปฏิปกฺขา โหนฺติ, เต อริยธมฺมา อปกฑฺฒิตพฺพา. น หิ อริยธมฺมา อนาคามิกิเลสปฺปหานํ คจฺฉนฺติ, นาปิ อริยธมฺมา สพฺพกิเลสานํ ปหานาย สํวตฺตนฺติ. ยถา กุสลา เมตฺตา อกุสโล ราโค น ตุ กุสลา เมตฺตาติ กาเรตฺวา อกุสลสฺส ราคสฺส ปหานาย สมฺภวติ พฺยาปาโท เมตฺตาย ปหานํ คจฺฉติ. ตสฺมา อุโภ กิเลสา อุปปริกฺขิตพฺพา. โย โย จ ธมฺโม อุปทิสิยติ กุสโล วา อกุสโล วา โส อปกฑฺฒิตพฺโพ. สเจ เต ยุชฺชนฺติ อปกฑฺฒิยมาโน นตฺถิ อุปปริกฺขิตพฺพํ. ทฺเว วา กิเลสา เอเกน อริยธมฺเมน ปหีเนยฺยาติ ทฺวีหิ วา อริยธมฺเมหิ เอโก วา กิเลโส ปหียตีติ. ज्याप्रमाणे भगवान सुरुवातीला त्या सूत्रात क्लेशांचा उपदेश करतात. त्या क्लेशांचे प्रहाण (त्याग) उपदेशिले आहे की नाही, याचे परीक्षण करावे. जर भगवंतांनी त्या क्लेशांच्या प्रहाणाचा उपदेश केला नसेल, तर अशा कुशल धर्मांचा शोध घ्यावा, ज्यांच्याद्वारे ते अकुशल क्लेश प्रहाणास प्राप्त होतात. शोध घेत असताना जर ते सापडले नाहीत, तर तेथे अकुशल धर्म बाजूला काढावेत आणि संक्लेशभागीय सूत्राचे परीक्षण करावे. जर बाजूला काढलेले क्लेश जुळणी देत नसतील, तर तेथे आर्यमार्गधर्मांचे परीक्षण करावे की, त्या भूमींमध्ये क्लेश प्रहाणास प्राप्त होतात की नाही. जितके क्लेश उपदेशिले आहेत, तितके आर्यधर्म उपदेशिलेले नाहीत. जेथे क्लेश प्रहाणास प्राप्त होतात, तेथे जे क्लेश आर्यधर्मांच्या प्रतिपक्षाशी जुळत नाहीत, ते बाजूला काढावेत. बाजूला काढत असताना जर ते जुळणी देत असतील, तर तेथे असा विचार करावा की, 'दोन, तीन किंवा त्याहून अधिक क्लेश एकाच आर्यमार्गाने प्रहाणास प्राप्त होतात का?' जर असा विचार करत असताना जुळणी मिळत असेल, तर तेथे परीक्षण करावे. परंपरेने किंवा पिटक-संप्रदायाने सूत्राचा अर्थ आणि शब्दाचा अर्थ यांचे परीक्षण करावे. किंवा ज्या सूत्राचा निर्देश करणे शक्य नसेल, त्या सूत्राविषयी शंका घेऊ नये. अशा प्रकारे, ज्याप्रमाणे सुरुवातीला कुशल धर्म असतात आणि जे क्लेश असतात त्यांचा नाश व्हावा, त्यांचे परीक्षण करावे. आधीचा कुशल धर्म किंवा त्याच्या प्रतिपक्षाने आधीचा उपदेश यांचे परीक्षण करावे (कमी किंवा जास्त न करता ते ग्रहण करावे). ज्याप्रमाणे पहिला उत्तिल. आता ज्या क्लेशांसाठी जे आर्यधर्म उपदेशिले आहेत, 'हे क्लेश या आर्यधर्मांद्वारे नष्ट होतात की नाही?' असा विचार करावा. जर परीक्षण करताना ते जुळत असतील, तर ते ग्रहण करावेत. आणि जर ते जुळत नसतील, तर जे क्लेश प्रतिपक्ष नसतात, त्या क्लेशांचे परीक्षण करू नये. आणि जे आर्यधर्म प्रतिपक्ष असतात, ते आर्यधर्म बाजूला काढावेत. कारण अनागामी मार्ग हे (रूपराग इत्यादी) क्लेशांच्या प्रहाणास प्राप्त होत नाहीत, तसेच सर्व आर्यधर्म सर्व क्लेशांच्या प्रहाणासाठी कारणीभूत ठरत नाहीत. ज्याप्रमाणे कुशल ही मैत्री आहे आणि अकुशल हा राग आहे, परंतु कुशल मैत्रीला राग म्हणता येत नाही, असा निर्णय करून, अकुशल रागाच्या प्रहाणासाठी (मैत्री नव्हे, तर अशुभाची भावना कारणीभूत ठरते आणि) व्यापाद (द्वेष) हा मैत्रीने प्रहाणास प्राप्त होतो. म्हणून दोन्ही क्लेशांचे परीक्षण करावे. ज्या ज्या कुशल किंवा अकुशल धर्माचा निर्देश केला जातो, तो बाजूला काढावा. बाजूला काढत असताना जर ते जुळत असतील, तर परीक्षण करण्याची गरज नाही. दोन क्लेश एकाच आर्यधर्माने नष्ट व्हावेत किंवा दोन आर्यधर्मांद्वारे एकच क्लेश नष्ट होतो (असे जाणावे). อถ วา เอวมฺปิ อุปปริกฺขิยมานํ ยุชฺชติ, ตตฺถ วีมํสิตพฺพํ วา ยถา ยุชฺชติ ตตฺถ วีมํสิตพฺพํ วา, ยถา นนุ สกฺกา สุตฺตํ นิทฺทิสิตุํ, น หิ สุตฺเต วิจิกิจฺฉิตพฺพํ. กิเลโส มํ อริยธมฺเมสุ เทสิเตสุ อุภยโต อุปปริกฺขิตพฺพํ. กิร เย วา อิเม กิเลสา เทสิตา เย จ อริยธมฺมา เทสิตา คาถาย วา พฺยากรเณน วา, กึ นุ โข อิเม กิเลสา อิเมหิ อริยธมฺเมหิ ปหียนฺติ, อุทาหุ นปฺปหียนฺติ? อิเม วา อริยธมฺมา อิเมสํ กิเลสานํ ปหานาย สํวตฺตนฺตีติ. กิญฺจาปิ กุสเลหิ ธมฺเมหิ อกุสลา ธมฺมา ปหานํ คจฺฉนฺติ. น ตุ สพฺเพหิ อริยธมฺเมหิ สพฺพากุสลา ปหานํ คจฺฉนฺติ. ยถา เมตฺตา กุสโล อกุสโล จ ราโค น ตุ กุสลา เมตฺตา อกุสโล ราโคติ กาเรตฺวา เมตฺตาย ราโค ปหานํ, พฺยาปาโท เมตฺตาย ปหานํ คจฺฉนฺติ. เอวํ กิเลโสติ กาเรตฺวา สุตฺเตน ปหานํ คจฺฉติ. น สุตฺโต ธมฺโมติ กาเรตฺวา สพฺพํ กิเลสสฺส ปหานาย สํวตฺตติ. ยํ ตุ สุตฺตสฺส อริยธมฺโม สํกิเลสปฏิปกฺโข, โส เตน ปหานํ คจฺฉตีติ. किंवा अशा प्रकारे देखील परीक्षण करताना जुळते. तेथे विचार करावा किंवा सूत्र ज्या प्रकारे जुळते तेथे विचार करावा. ज्या प्रकारे सूत्राचा निर्देश करणे शक्य नसेल, तर सूत्राविषयी शंका घेण्याचे कारण नाही. आर्यधर्मांचा उपदेश केला असता, क्लेशांचे दोन्ही बाजूंनी (दर्शन आणि भावना या दोन्ही दृष्टीने) परीक्षण करावे. गाथेने किंवा व्याकरणाने जे हे क्लेश उपदेशिले आहेत आणि जे हे आर्यधर्म उपदेशिले आहेत, 'हे क्लेश या आर्यधर्मांद्वारे नष्ट होतात की नाही? किंवा हे आर्यधर्म या क्लेशांच्या प्रहाणासाठी कारणीभूत ठरतात की नाही?' असा प्रश्न उपस्थित झाला असता, कुशल धर्मांद्वारे अकुशल धर्म जरी प्रहाणास प्राप्त होत असले, तरी सर्व आर्यधर्मांद्वारे सर्व अकुशल धर्म प्रहाणास प्राप्त होत नाहीत. ज्याप्रमाणे मैत्री कुशल आहे आणि राग अकुशल आहे, परंतु कुशल मैत्रीला अकुशल राग म्हणता येत नाही, असा निर्णय करून, मैत्रीने रागाचा नाश होत नाही, तर व्यापाद (द्वेष) हा मैत्रीने प्रहाणास प्राप्त होतो. अशा प्रकारे, 'हा क्लेश आहे' असा निर्णय करून सूत्रात सांगितलेल्या आर्यमार्गाने तो प्रहाणास प्राप्त होतो. परंतु 'हे सूत्र धर्म आहे' असा निर्णय करून ते सर्व क्लेशांच्या प्रहाणासाठी कारणीभूत ठरत नाही. परंतु सूत्रातील जो आर्यधर्म संक्लेशाचा प्रतिपक्ष (विरोधी) असतो, तोच त्याद्वारे प्रहाणास प्राप्त होतो. ๔๑. ตตฺถ กุสเล เทสิเต สุตฺเต พฺยากรเณ วา สํกิเลสา น ยุชฺชนฺติ อริยธมฺมา วา, เต มหาปเทเส นิทฺทิสิตพฺพาวยเวน อปกฑฺฒิตพฺพา[Pg.221]. ตตฺถ กิเลเสหิ จ เทสิเตหิ อริยธมฺเมสุ จ ยทิปิ เตน อริยธมฺเมน เต กิเลสา ปหานํ คจฺฉนฺติ. ตตฺถปิ อุตฺตริ อุปปริกฺขิตพฺพํ. เกน การเณน เอเต กิเลสา ปชหิตพฺพา, เกน การเณน อริยธมฺมา เทสิตาติ? เยน เยน วา อากาเรน อริยธมฺมา เทสิตา, เตน เตน ปกาเรน อยํ กิเลโส ฐิโต. อตฺถิ หิ เอโก กิเลโส, เตน วา อริยธมฺมา น อญฺญถา อญฺญถา ปหาตพฺโพ, ยถา ทิฏฺฐิ ราโค อวิชฺชา จ ทสฺสเนน ปหาตพฺพา. สา เจ เอวญฺจ อวิชฺชา ภาวนาย ภูมิ วา ธมฺมา ภาวนาย ปหาตพฺพา. สาเยว อุทฺธํภาคิยํ อสงฺขตทสฺสนาย วิมุตฺติยา อนิมิตฺเตน เจโตสมาธินา อมนสิกาเรน ปหียติ. เอวํ สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ อุปปริกฺขิตพฺพํ. เย ทสฺสเนน ปหาตพฺพา กิเลสา ทสฺสนากาเรน อริยธมฺโม เทสิโต, ภาวนาย ปหาตพฺพา ภาวนากาเรน อริยธมฺโม เทสิโต, ปติเสวนา ปหาตพฺพา ปติเสวนากาเรน อริยธมฺโม เทสิโต, เอวํ วิโนทนปหาตพฺพา ยาว สตฺต อาสวา กาตพฺพา, ยาวญฺญถา. อญฺญถา เหส ธมฺโม ปหาตพฺโพ อญฺเญนากาเรน อริยธมฺโม เทสิโต, โส อริยธมฺโม อญฺญถา ปริเยสิตพฺโพ. ยทิ อยํ ธมฺโม ปริเยสโต โย จ เทเสติ เยน เยนากาเรน, โส อริยธมฺโม ปริเยสิตพฺโพ, เตนากาเรน กิเลโส ปหียติ. โส ตตฺถ อุปปริกฺขิตพฺโพ. อถ น ยุชฺชติ ยทิ หิ เตน สุตฺเตน วิหิตํ สุตฺตํ วีมํสิตพฺพํ. ยถา ยุชฺชติ, ตถา คเหตพฺพํ. ยถา น ยุชฺชติ, ตถา น คเหตพฺพํ, อทฺธา เอตํ ภควตา น ภาสิตํ, อายสฺมตา วา ทุคฺคหิตํ, ยถา มหาปเทเส นิทฺทิสิตพฺพํ, ภควตา ยถาภูตํ เทสิตํ, โย จ ธมฺโม เทสิโต กุสโล จ อกุสโล จ ตสฺส ธมฺมสฺส ปจฺจโย ปริเยสิตพฺโพ. น หิ ปจฺจยา วินา ธมฺโม อปฺปจฺจโย อุปฺปชฺชติ. ตตฺถ โก อากาโร ปริเยสนาย? ४१. तेथे, सूत्रात किंवा व्याकरणात (स्पष्टीकरणात) कुशल धर्मांचा उपदेश केला असता, संक्लेश (मळ) जुळत नाहीत किंवा आर्यधर्म जुळतात; ते महाप्रदेशात अंशाने निर्देशित करून बाजूला काढले पाहिजेत. तेथे उपदेशिलेल्या क्लेशांमध्ये आणि आर्यधर्मांमध्ये, जर त्या आर्यधर्माने ते क्लेश प्रहाण पावत असतील (नष्ट होत असतील), तर तेथेही पुढे अधिक परीक्षण केले पाहिजे. कोणत्या कारणाने हे क्लेश नष्ट केले पाहिजेत आणि कोणत्या कारणाने आर्यधर्मांचा उपदेश केला गेला आहे? ज्या ज्या प्रकारे आर्यधर्मांचा उपदेश केला गेला आहे, त्या त्या प्रकारे हा क्लेश टिकून राहतो. कारण असा एक क्लेश आहे, जो त्या आर्यधर्माने किंवा इतर प्रकारे नष्ट केला पाहिजे, जसे की दृष्टी (मिथ्यादृष्टी), राग आणि अविद्या दर्शनाने (स्रोतापत्ती मार्गाने) नष्ट केले पाहिजेत. आणि जर ती अविद्या भावनाभूमी असेल, तर ते धर्म भावनेने नष्ट केले पाहिजेत. तीच (अविद्या) उर्ध्वभागीय असंस्कृत (निर्वाण) दर्शनासाठी विमुक्तीच्या अनिमित्त चेतोसमाधीच्या अमनसिकाराने नष्ट होते. अशा प्रकारे अर्थासह आणि व्यंजनासह (शब्दांसह) परीक्षण केले पाहिजे. जे क्लेश दर्शनाने नष्ट करायचे आहेत, त्यांच्यासाठी दर्शनाच्या आकाराने आर्यधर्माचा उपदेश केला आहे; जे भावनेने नष्ट करायचे आहेत, त्यांच्यासाठी भावनेच्या आकाराने आर्यधर्माचा उपदेश केला आहे; जे प्रतिसेवनाने नष्ट करायचे आहेत, त्यांच्यासाठी प्रतिसेवनाच्या आकाराने आर्यधर्माचा उपदेश केला आहे; अशा प्रकारे विनोदानाने (दूर करून) नष्ट करायचे क्लेश सात आसवांपर्यंत केले पाहिजेत. अन्यथा हा धर्म नष्ट केला पाहिजे, दुसऱ्या प्रकारे आर्यधर्माचा उपदेश केला आहे, तो आर्यधर्म इतर प्रकारे शोधला पाहिजे. जर हा धर्म शोधत असताना जो उपदेश करतो, ज्या ज्या प्रकारे तो आर्यधर्म शोधला पाहिजे, त्या प्रकारे क्लेश नष्ट होतो. त्याचे तेथे परीक्षण केले पाहिजे. जर ते जुळत नसेल, तर त्या सूत्राने विहित केलेल्या सूत्राची मीमांसा केली पाहिजे. जसे जुळते, तसे ग्रहण करावे. जसे जुळत नाही, तसे ग्रहण करू नये. निश्चितच हे भगवंतांनी भाषिलेले नाही, किंवा आयुष्यमानांनी चुकीचे ग्रहण केले आहे, जसे महाप्रदेशात निर्देशित केले पाहिजे. भगवंतांनी यथाभूत उपदेश केला आहे. आणि जो कुशल किंवा अकुशल धर्म उपदेशिला आहे, त्या धर्माचा प्रत्यय (कारण) शोधला पाहिजे. कारण कारणाशिवाय कोणताही धर्म अप्रत्यय (कारणाशिवाय) उत्पन्न होत नाही. तेथे शोधण्याचा प्रकार कोणता आहे? ตตฺถ ตถารูปํ สเหตุ สปฺปจฺจยํ โสยํ ธมฺโม วุตฺโตติ อิทํ วีมํสิตพฺพํ. โส จ ปจฺจโย ติวิโธ – มุทุ มชฺโฌ อธิมตฺโต. ตตฺถ มุทุมฺหิ ปจฺจเย มุทุธมฺโม คเหตพฺโพ, เอวํ สตฺเยส ปจฺจโย ทุวิโธ ปรํปราปจฺจโย จ สมนนฺตรปจฺจโย จ. โส ปจฺจโย มุทุเตน พฺยาธิมตฺตํ ปริเยสิตพฺพํ. กึ การณํ? อญฺญตโรปิ ปจฺจโย อญฺเญหิ ปจฺจเยหิ ปริยตฺตึ วา ปาริปูรึ วา คจฺฉติ. ตตฺถ โย ธมฺโม เทสิโต, ตสฺส ธมฺมสฺส [Pg.222] เอเตน วา การเณน วา เหตุ ปริเยสิตพฺโพ. ยถา ปจฺจโย เหตุนา ปจฺจเยน จ, โส ตสฺส ธมฺมสฺส นิสฺสนฺโท ปริเยสิตพฺโพ. ยถา นิทฺทิฏฺโฐ อธิฏฺฐาเน ปธานํ ปริเยสติ, โส ปจฺจโย ปริเยสิตพฺโพ. น หิ มุทุสฺส ธมฺมสฺส อธิมตฺโต นิสฺสนฺโท อธิมตฺตสฺส วา นิสฺสนฺทสฺส มุทุธมฺโม, อถ มุทุสฺส มุทุ มชฺฌาย มชฺโฌ อธิมตฺตสฺส อธิมตฺโต ยุชฺชติ, ตํ คเหตพฺพํ, อถ น ยุชฺชติ น คเหตพฺพํ. ยญฺจ ภควา อารภติ ธมฺมํ เทเสตุํ, ตํเยว ธมฺมํ มชฺฌนฺตปริโยสานํ เทเสติ, ยถา สุตฺตาธิฏฺฐาเน ธมฺมา อาทิมฺหิ นิทฺทิสติ, ตํเยว พหุ ตสฺส สุตฺตสฺส ปริโยสานํ. ตสฺส หิ ธมฺมสฺส วเสน ตํ สุตฺตํ โหติ คาถา วา พฺยากรณํ ขุทฺทกํ มหนฺตํ วา, ยถา ปน ทุวิธา อนุรูปนฺติ วา ถปนา จ เทสนาถปนา. รูปนฺติปิ ธมฺมสฺส ปริเยสิตพฺพา. ยถา จ ภควตา ปญฺจนฺนํ อินฺทฺริยานํ สํวรณํ เทสิตํ ตณฺหาย นิคฺคหณตฺถํ อิจฺฉาว โหติ. เทเสติ ยถา โคปาลโกปเม สุตฺเต อญฺเญหิปิ สุตฺเตหิ ภควา ภาสติ อิจฺฉาว โหติ มชฺฌิมนิกาเย วิตกฺโก อยํ ภควโต เทสนานุรูปนฺติ อิติ โส ธมฺโม อญฺเญสุปิ เวยฺยากรเณสุ ปริเยสิตพฺโพ. น หิ เอกํ หิ สุตฺเต ทฏฺฐพฺโพ. ยุชฺชนํ ตํ คเหตพฺพํ. तेथे, त्या रूपाचे सहेतुक आणि सप्रत्यय (कारणासह) हा तो धर्म सांगितला आहे, याची मीमांसा केली पाहिजे. आणि तो प्रत्यय (कारण) तीन प्रकारचा आहे - मृदू (सौम्य), मध्य आणि अधिमात्र (तीव्र). तेथे मृदू प्रत्यय असताना मृदू धर्म ग्रहण केला पाहिजे. असे असताना हा प्रत्यय दोन प्रकारचा होतो - परंपरा प्रत्यय आणि समनंतर प्रत्यय. तो प्रत्यय मृदूपणाने किंवा अधिमात्रतेने शोधला पाहिजे. काय कारण आहे? कोणताही एक प्रत्यय इतर प्रत्ययांच्या साहाय्याने परिपक्वतेला किंवा परिपूर्णतेला प्राप्त होतो. तेथे जो धर्म उपदेशिला आहे, त्या धर्माचा या किंवा त्या कारणाने हेतू शोधला पाहिजे. जसे हेतूने प्रत्यय आणि प्रत्ययाने हेतू शोधला पाहिजे, तसा त्या धर्माचा निष्यंद (परिणाम) शोधला पाहिजे. जसे अधिष्ठानात निर्दिष्ट केलेले प्रधान शोधले जाते, तसा तो प्रत्यय शोधला पाहिजे. कारण मृदू धर्माचा निष्यंद अधिमात्र नसतो, किंवा अधिमात्र निष्यंदाचा मृदू धर्म नसतो. तर मृदूसाठी मृदू, मध्यासाठी मध्य आणि अधिमात्रासाठी अधिमात्र जुळते, ते ग्रहण करावे. जर जुळत नसेल, तर ग्रहण करू नये. आणि भगवंत ज्या धर्माचा उपदेश करण्यास आरंभ करतात, त्याच धर्माचा मध्य आणि अंतापर्यंत उपदेश करतात. जसे सूत्राच्या अधिष्ठानात धर्मांचे सुरुवातीला निर्देश करतात, तोच बहुतांश त्या सूत्राचा अंत असतो. कारण त्या धर्माच्या प्रभावाने ते सूत्र गाथा, व्याकरण, लहान किंवा मोठे होते. जसे की अनुरूप-स्थापना आणि देशना-स्थापना असे दोन प्रकार आहेत. धर्माचे रूप देखील शोधले पाहिजे. आणि जसे भगवंतांनी तृष्णेच्या निग्रहासाठी पाच इंद्रियांच्या संवराचा उपदेश केला आहे, ती केवळ इच्छाच असते. जसे गोपालकोपम सूत्रात उपदेश केला आहे, तसेच इतर सूत्रांद्वारेही भगवंत उपदेश करतात, ती केवळ इच्छाच असते. मज्झिमनिकायातील हा वितर्क भगवंतांच्या देशनेला अनुरूप आहे, म्हणून तो धर्म इतर व्याकरणांमध्येही शोधला पाहिजे. कारण केवळ एकाच सूत्रात ते पाहिले जाऊ नये. जे जुळणारे आहे, ते ग्रहण करावे. ๔๒. ตตฺถ กตมํ อนุญฺญาตํ? ยํ กิญฺจิ สุตฺตํ ภควตา น ภาสิตํ ตญฺจ สุตฺเตสุเยว นฺทิสฺสติ, เอวเมตํ ธาเรตพฺพํ. ยถา อสุเกน ภาสิตนฺติ, ตํ สุตฺตํ วีมํสิตพฺพํ. กึ นุ โข อิมํ สุตฺตํ อนุญฺญาตํ ขมํ ภควโต อุทาหุ นานุญฺญาตํ ขมํ, กิญฺจิ รูปญฺจ สุตฺตํ ภควโต อนุญฺญาตํ ขมํ กิญฺจิ รูปญฺจ นานุญฺญาตํ ขมํ? ยํ สพฺพโส อโนตาเรตฺวา ทสพโล โคจรํ เทเสติ, ตํ สพฺพํ สุตฺตํ ภควโต นานุญฺญาตํ ขมํ. อตฺถิปิ โส สาวโก ทสพลานํ โคจรํ ชานาติ โอธิโส อโนธิโส, ตํ ปน พลํ สพฺพโส น ชานาติ อญฺญถา นาม สวเนน, ยถา อายสฺมตา สาริปุตฺเตน เยน พฺราหฺมโณ โอวทิโต, ตสฺส อายสฺมโต นตฺถิ อินฺทฺริยพลเวมตฺตญาณํ, เตน ปุคฺคลปโร ปรญฺจ ตํ อชานนฺโต สติ อุตฺตริกรณีเย อุปฺปาทิโต, โส ภควตา อปสาทิโต. ยถาว อายสฺมา มหากสฺสโป ภาคิเนยฺยํ โอวทติ อนนฺตริยสมนฺนาคโต อิทฺธิปาฏิหีเรน องฺคุลิโย อทีเปตฺวา [Pg.223] ยํ สพฺเพสํ ธมฺมานํ กมฺมสมาทานานํ เหตุโส ฐานโส ยถาภูตํ ญาณํ, ตสฺส อายสฺมโต สํวิชฺชเต, เตน นํ โอวทติ, ตํ ภควา กโรติ. ४२. तेथे अनुज्ञात (स्वीकृत) कोणते आहे? जे काही सूत्र भगवंतांनी भाषिलेले नाही, परंतु ते सूत्रांमध्येच दिसून येते, ते अशा प्रकारे धारण केले पाहिजे. जसे की 'अमुक व्यक्तीने हे भाषिले आहे', त्या सूत्राची मीमांसा केली पाहिजे. हे सूत्र भगवंतांच्या अनुज्ञेसाठी (स्वीकृतीसाठी) योग्य आहे की अयोग्य आहे? काही स्वरूपाचे सूत्र भगवंतांच्या अनुज्ञेसाठी योग्य असते, तर काही स्वरूपाचे सूत्र अयोग्य असते. जे पूर्णपणे न उतरता दशबल (बुद्ध) आपल्या गोचराचा (ज्ञानाचा विषय) उपदेश करतात, ते सर्व सूत्र भगवंतांच्या अनुज्ञेसाठी अयोग्य नसते. असा श्रावक देखील असतो जो दशबलांच्या गोचराला मर्यादित किंवा अमर्यादित रूपाने जाणतो, परंतु तो त्या बलाला पूर्णपणे जाणत नाही, तर केवळ ऐकण्याद्वारे (श्रवणाने) जाणतो. जसे आयुष्यमान सारिपुत्तांनी जयन ब्राह्मणाला उपदेश केला; त्या आयुष्यमानांजवळ इंद्रिय-बल-वैमत्तता ज्ञान नव्हते. त्यामुळे ते पुद्गलश्रेष्ठ आणि त्यांच्या त्या ज्ञानाला न जाणता, अधिक कर्तव्य शिल्लक असतानाही (त्याला ब्रह्मलोकात उत्पन्न केले), म्हणून भगवंतांनी त्यांची नापसंती दर्शवली. किंवा जसे आयुष्यमान महाकश्यप आपल्या भाच्याला उपदेश करतात; आनंतर्य समाधीने युक्त होऊन, ऋद्धिप्रातिहार्याने बोटे न पेटवता, जे सर्व धर्मांच्या आणि कर्म-समादानाच्या हेतू व स्थानाचे यथाभूत ज्ञान आहे, ते त्या आयुष्यमानांजवळ विद्यमान होते. त्याने ते त्याला उपदेश करतात, भगवंत त्याचे अनुमोदन करतात. ‘‘สเจปิ ทส ปชฺโชเต, ธารยิสฺสสิ กสฺสป; เนว ทกฺขติ รูปานิ, จกฺขุ ตสฺส น วิชฺชตี’’ติ. “हे कश्यप! जरी तू दहा दिवे (प्रकाश) धारण केलेस, तरी तो रूपांना पाहू शकणार नाही, कारण त्याच्याकडे दृष्टी (डोळे) नाही.” อปิ จ โข ยถา ทูโต ราชวจเนน สตฺตมนุสาสติ, เอวํ เสสานุโค อญฺญาตกํ โฆสํ ปเรสํ เทเสติ. อนุญฺญาตขมสุตฺตํ คเหตพฺพํ. อนนุญฺญาตขมํ น คเหตพฺพํ. परंतु खरोखर, जसे एखादा दूत राजाच्या वचनाने प्रजेला उपदेश करतो, तसेच इतर अनुगामी होऊन इतरांना अज्ञात असलेला उपदेश ऐकवतात. अनुज्ञेसाठी योग्य असलेले सूत्र ग्रहण करावे. अनुज्ञेसाठी अयोग्य असलेले सूत्र ग्रहण करू नये. ตตฺถ กตโม สุตฺตสงฺกโร? ปญฺจวิธํ สุตฺตํ, สํกิเลสภาคิยํ วาสนาภาคิยํ ทสฺสนภาคิยํ ภาวนาภาคิยํ อเสกฺขภาคิยํ. อญฺญํ อาราเธยฺย อญฺญํ เทเสติ อญฺญสฺส จ สุตฺตสฺส อตฺถํ อญฺญมฺหิ สุตฺเต นิทฺทิสติ. สุตฺตสฺส วา หิ อเนกาการํ อตฺถํ นิทฺทิสติ. อริยธมฺมสาธเน อตฺถํ วิวรติ. วาสนาภาคิยสฺส อตฺถํ ทสฺสนภาคิเยสุ นิทฺทิสติ. โอรมฺภาคิยานํ สํโยชนานํ อตฺถํ อุทฺธํภาคิเยสุ นิทฺทิสติ. มุทุมชฺฌานํ อินฺทฺริยานํ อธิมตฺเตสุ สุตฺเตสุ นิทฺทิสติ. อิติ อยํ สุตฺตํ สมฺเภทํ เหตุนา จ นิสฺสนฺเทน จ ผเลน จ นิทฺเทเสน จ มุทุมชฺฌาธิมตฺตตายปิ จ อตฺเถน จ พฺยญฺชเนน จ โย สมฺเภโท, อยํ วุจฺจติ สุตฺตสงฺกโร. โย อสมฺเภโท, อยํ วุจฺจติ สุตฺตวิจโย. त्यामध्ये 'सुत्तसंकर' (सूत्रांचे संमिश्रण) कोणता? सुत्त (सूत्रे) पाच प्रकारचे आहे: संकिलेसभागीय (संक्लेशभागीय), वासनाभागीय, दस्सनाभागीय (दर्शनाभागीय), भावनाभागीय आणि असेक्खभागीय (अशैक्ष्यभागीय). एका विषयाची आराधना करण्यासाठी दुसऱ्या विषयाचा उपदेश केला जातो आणि एका सुत्ताचा अर्थ दुसऱ्या सुत्तात निर्देशित केला जातो. किंवा सुत्ताचा अनेक प्रकारचा अर्थ निर्देशित केला जातो. आर्यधर्माच्या साधनेमध्ये अर्थ प्रकट केला जातो. वासनाभागीय सुत्ताचा अर्थ दस्सनाभागीय सुत्तांमध्ये निर्देशित केला जातो. ओरंभागीय (अधोभागीय) संयोजनांचा अर्थ उद्धंभागीय (ऊर्ध्वभागीय) सुत्तांमध्ये निर्देशित केला जातो. मृदू आणि मध्यम इंद्रियांचा अर्थ तीक्ष्ण (अधिमात्र) इंद्रियांच्या सुत्तांमध्ये निर्देशित केला जातो. अशा प्रकारे, सुत्तांचे हे संमिश्रण हेतूने, निस्यंदाने (परिणामाने), फलाने, निर्देशाने, मृदू-मध्यम-अधिमात्रतेने, अर्थाने आणि व्यंजनाने (शब्दाने) जे संमिश्रण होते, त्याला 'सुत्तसंकर' असे म्हटले जाते. जे संमिश्रण नसणे (असंभेद) आहे, त्याला 'सुत्तविचय' असे म्हटले जाते. ตตฺถายํ อุทฺทานคาถา त्यामध्ये ही उद्दानगाथा (संग्रह-गाथा) आहे: ปุริมานํ อกฺขณฺฑํ, ยถาภูตสฺส ปจฺจโย; นิสฺสนฺโท วาสนาสทฺธิ, อนุญฺญา สุตฺตสงฺกโร. पूर्वी सांगितलेल्या सुत्तांचे अखंडत्व, यथाभूताचा प्रत्यय (कारण), निस्यंद (परिणाम), वासनाभागीयांसह (पाच सुत्ते), अनुज्ञा आणि सुत्तसंकर (सूत्रांचे संमिश्रण) हे आहेत. เถรสฺส มหากจฺจายนสฺส स्थवीर महाकात्यायनांचे (हे कथन आहे). สุตฺตวิจโย นาม จตุตฺถภูมิ. 'सुत्तविचय' (सूत्रांचे विश्लेषण) नावाची ही चौथी भूमी आहे. ๕. ปญฺจมภูมิ ५. पाचवी भूमी. ๔๓. ตตฺถ กตโม หารวิภงฺโค? ยตฺถ โสฬส หารา อกฺขรโส เภทํ คจฺฉนฺติ. ตตฺถ อาทิมฺหิ เทสนาหาโร. ตตฺถ อยํ คาถา กุสลา วา อกุสลา วา สจฺจานิ วา สจฺเจกเทโส วา. กึ เทสิตนฺติ? สุตฺเต วีมํสา เทสนาหาโร. ยถา อริยสจฺจานิ นิกฺเขโป จตฺตาริ สจฺจานิ [Pg.224] สาธารณานิ อสาธารณานิ จ. ยานิ จ อฏฺฐารส ปทานิ ทุกฺขโต สตฺต ปทานิ สงฺเขเปน กายิเกน เจตสิเกน ทุกฺเขน, อปฺปิยสมฺปโยเคน ปิยวิปฺปโยเคน จ ตีหิ จ สงฺขตาหิ. ตตฺถ ตีณิ สงฺขตลกฺขณานิ ติสฺโส ทุกฺขตา อุปฺปาโท สงฺขตลกฺขณํ, สงฺขารทุกฺขตาย ทุกฺขตา จ สงฺขตลกฺขณํ, วิปริณามทุกฺขตาย ทุกฺขตาติ อญฺญถตฺถํ จ สงฺขตลกฺขณํ, ทุกฺขทุกฺขตาย จ ทุกฺขตา, อิเมสํ ติณฺณํ สงฺขตลกฺขณานํ ตีสุ เวทนาภูมีสุ อทุกฺขมสุขา เวทนา อุปฺปาโท สงฺขตลกฺขณํ, สงฺขารทุกฺขตาย จ ทุกฺขตา ตโย สงฺขตลกฺขณํ, สุขา เวทนาย จ วิปริณามทุกฺขตาย จ ทุกฺขตาติ อญฺญถตฺตํ สงฺขตลกฺขณํ, ทุกฺขาเวทนา ทุกฺขทุกฺขตา จ ทุกฺขตา อิมมฺหิ อิเมสุ นวปเทสุ ปฐมเกสุ สตฺตสุ ปเทสุ โสฬสสุ ปเทสุ ทุกฺขา ปริเยสิตพฺพา, เอกาทส ทุกฺขตาย จ ลกฺขณํ นิทฺเทเส นิทฺทิฏฺฐํ. ปาตุภาวลกฺขณา ชาติยา จ ปาตุภาวจุติลกฺขโณ จุโตติ วิตฺถาเรน ปนฺนรสปทานิ กตฺตพฺพานิ, เอวํ สาธารณานิ อสาธารณานิ จ สตฺตสุ ทสสุ ปเทสุ สญฺญาส ติวิเธ จ สาสนปฺปฏฺฐาเน อฏฺฐารสวิเธสุ จ สุตฺตาธิฏฺฐาเนสุ ทสวิเธสุ จ สุตฺตวิเธยฺเยสุ โสฬสวิเธสุ จ หาเรสุ เอกวีสติวิธาย จ ปวิจยวีมํสายาติ อิทํ เทสิตํ. ยถาภูตญฺจ เทสิตนฺติ, อยํ วุจฺจติ เทสนาหาโร. ४३. त्यामध्ये 'हारविभंग' (हारांचे वर्गीकरण) कोणता? जिथे सोळा हार अक्षरांच्या आधारे भिन्नता प्राप्त करतात. त्यामध्ये सुरुवातीला 'देसनाहार' (देशनाहार) आहे. त्यामध्ये ही गाथा आहे: 'कुशल किंवा अकुशल, सत्ये किंवा सत्याचा एक भाग. काय उपदेशिले आहे?' सुत्तातील अशा प्रकारची मीमांसा (तपासणी) म्हणजे 'देसनाहार' होय. ज्याप्रमाणे चार आर्यसत्यांची मांडणी केली जाते, जी साधारण (सामान्य) आणि असाधारण (विशेष) आहेत. आणि जी अठरा पदे आहेत, ती संक्षेपाने दुःखाच्या दृष्टीने सात पदे होतात: कायिक दुःख, चैतसिक दुःख, अप्रिय संप्रयोग दुःख, प्रिय विप्रयोग दुःख आणि तीन संखत (संस्कृत) लक्षणे. त्यामध्ये तीन संखत लक्षणे आणि तीन दुःखता आहेत. उत्पाद हे संखत लक्षण आहे; संखारादुःखतेमध्ये (संस्कारदुःखतेमध्ये) दुःख असणे हे संखत लक्षण आहे; विपरिणामदुःखतेमध्ये दुःख असणे म्हणजेच अन्यथाभाव (बदलणे) हे संखत लक्षण आहे; आणि दुःखदुःखतेमध्ये दुःख असणे. या तीन संखत लक्षणांचे तीन वेदनाभूमींमध्ये (अनुभव): अदुःखमसुख वेदनेमध्ये उत्पाद हे संखत लक्षण आहे आणि संखारादुःखतेमध्ये दुःख असणे हे तीन संखत लक्षणे आहेत. सुख वेदनेमध्ये विपरिणामदुःखतेमध्ये दुःख असणे म्हणजेच अन्यथाभाव हे संखत लक्षण आहे. दुःख वेदनेमध्ये दुःखदुःखता हे दुःख असणे आहे. या नऊ पदांमध्ये, पहिल्या सात पदांमध्ये आणि सोळा पदांमध्ये दुःखाचा शोध घेतला पाहिजे, आणि अकरा प्रकारच्या दुःखतेचे लक्षण निर्देशात स्पष्ट केले आहे. उत्पत्तीचे लक्षण 'जाती' (जन्म) आहे आणि विनाशाचे लक्षण 'च्युती' (मृत्यू) आहे; अशा प्रकारे विस्ताराने पंधरा पदे केली पाहिजेत. अशा प्रकारे, साधारण आणि असाधारण सुत्तांना सात आणि दहा पदांमध्ये, पन्नास प्रकारच्या शासनप्रस्थानात, अठरा प्रकारच्या सुत्ताधिष्ठानांमध्ये, दहा प्रकारच्या सूत्रविधेयांमध्ये, सोळा प्रकारच्या हारांमध्ये आणि एकवीस प्रकारच्या प्रविचय-मीमांसेमध्ये उपदेशिले गेले आहे. आणि जसे आहे तसे (यथाभूत) उपदेशिले गेले आहे, याला 'देसनाहार' असे म्हणतात. ๔๔. ตตฺถ กตโม วิจโย หาโร? ४४. त्या हारांमध्ये 'विचय हार' कोणता? ปทํ ปญฺหา จ ปุจฺฉา จ, กึ ปุพฺพํ กิญฺจ ปจฺฉิมํ; อนุคีติ สา จ วิจโย, หาโร วิจโยติ นิทฺทิฏฺโฐ. पद, प्रश्न आणि पृच्छा (विचारणा), आधी काय आणि नंतर काय, आणि अनुगीती (पुन्हा म्हणणे) - हे सर्व मिळून 'विचय' होतो; या हाराला 'विचय हार' असे निर्देशित केले आहे. ปทนฺติ ปฐมํ ปทํ. ตสฺส โก อตฺโถ? ยํ ภควา ปุฏฺโฐ อายสฺมตา อชิเตน ตํ คเหตพฺพํ, กติปทานิ ปุฏฺฐานิ ยถากึ เกนสฺสุ นิวุโต โลโกติ คาถา, อิมานิ กติปทานิ จตฺตาริ อิติ วิสชฺชนาย ปุจฺฉา. ยตฺตเกหิ ปเทหิ ภควตา วิสชฺชิตานิ ปทานิ อิติ ปุจฺฉาย จ ยา ปทานํ สงฺกาสนา, อิทํ วุจฺจติ ปทนฺติ. 'पद' म्हणजे पहिले पद. त्याचा अर्थ काय? आयुष्यमान अजिताने भगवंतांना जो प्रश्न विचारला, तो ग्रहण केला पाहिजे. किती पदे विचारली गेली? जसे की, 'केनस्सु निवृतो लोको' (जगाने कशाने वेढले आहे?) ही गाथा. ही किती पदे आहेत? ही चार पदे आहेत. अशा प्रकारे उत्तरासाठी विचारलेला हा प्रश्न आहे. भगवंतांनी जितक्या पदांनी उत्तरे दिली, त्या प्रश्नातील पदांचे जे प्रकटीकरण (संकासना) आहे, त्याला 'पद' असे म्हटले जाते. ปญฺหาติ อิมานิ จตฺตาริ ปทานิ. กติ ปญฺหา? เอโก วา ทฺเว วา ตทุตฺตริ วา อิมานิ จตฺตาริ ปทานิ เอโก ปญฺโห, อตฺถานุปริวตฺติ พฺยญฺชนํ โหติ, สมฺพหุลานิปิ ปทานิ เอกเมวตฺถํ ปุจฺฉติ. อิมานิ จตฺตาริ ปทานิ อนุปริวตฺตีนิ ตํ พฺยญฺชเนน เอโก ปญฺโหว โหติ. เกนสฺสุ นิวุโต โลโกติ [Pg.225] โลกํ สนฺธาย ปุจฺฉติ, เกนสฺสุ นปฺปกาสติ กิสฺสาภิเลปนํ พฺรูสีติ ตํเยว ปุจฺฉติ. กึสุ ตสฺส มหพฺภยนฺติ ตํเยว ปุจฺฉติ. เอวํ อตฺถานุปริวตฺติ พฺยญฺชนํ เอโก ปญฺโห โหติ, โส ปญฺโห จตุพฺพิโธ เอกํสพฺยากรณีโย วิภชฺชพฺยากรณีโย ปฏิปุจฺฉาพฺยากรณีโย ฐปนิโยติ. ตตฺถ จกฺขุ อนิจฺจนฺติ เอกํสพฺยากรณีโย, ยํ อนิจฺจํ ตํ ทุกฺขนฺติ วิภชฺชพฺยากรณีโย, สิยา อนิจฺจํ น จกฺขุ, ยานิปิ อายตนานิ จ น จกฺขุ, ตานิปิ อนิจฺจนฺติ น จกฺขุเยว, อยํ วิภชฺชพฺยากรณีโย, ยํ จกฺขุ ตํ จกฺขุนฺทฺริยํ เนติ ปฏิปุจฺฉาพฺยากรณีโย, ตํ จกฺขุ ตถาคโตติ ฐปนิโย. อญฺญตฺร จกฺขุนาติ ฐปนิโย ปญฺโห. อิทํ ปญฺหํ ภควา กึ ปุจฺฉิโต, โลกสฺส สํกิเลโส ปุจฺฉิโต. กึ การณํ? ติวิโธ หิ สํกิเลโส ตณฺหาสํกิเลโส จ ทิฏฺฐิสํกิเลโส จ ทุจฺจริตสํกิเลโส จ. ตตฺถ อวิชฺชาย นิวุโตติ อวิชฺชํ ทสฺเสติ, ชปฺปาติ ตณฺหํ ทสฺเสติ, มหพฺภยนฺติ อกุสลสฺส กมฺมสฺส วิปากํ ทสฺเสติ, โสตํ นาม สุขเวทนียสฺส กมฺมสฺส ทุกฺขเวทนีโย วิปาโก ภวิสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชตีติ ภควา วิสชฺเชติ, จตูหิ โย ปเทหิ อวิชฺชาย นิวุโต โลโกติ…เป… เอวํ วุจฺจติ. 'प्रश्न' म्हणजे ही चार पदे. प्रश्न किती आहेत? एक, दोन किंवा त्याहून अधिक. ही चार पदे मिळून एकच प्रश्न होतो. व्यंजन (शब्दरचना) अर्थाचे अनुकरण करणारे असते. अनेक पदे असूनही ती एकाच अर्थाविषयी विचारतात. ही चार पदे परस्पर अनुवर्ती आहेत, त्यामुळे शब्दाच्या दृष्टीने तो एकच प्रश्न होतो. 'केनस्सु निवृतो लोको' (जगाने कशाने वेढले आहे?) हे जगाला उद्देशून विचारले आहे. 'ते कशामुळे प्रकाशित होत नाही? त्याचा लेप (कलंक) काय आहे, ते सांगा?' हे देखील त्याच (जगाविषयी) विचारले आहे. 'त्याला मोठे भय कोणते आहे?' हे देखील त्याचविषयी विचारले आहे. अशा प्रकारे, अर्थाचे अनुकरण करणारे व्यंजन (शब्दरचना) एकच प्रश्न बनतो. तो प्रश्न चार प्रकारचा असतो: एकंशव्याकरणीय (निश्चित उत्तर देण्याजोगा), विभज्जव्याकरणीय (विभाजन करून उत्तर देण्याजोगा), प्रतिपृच्छाव्याकरणीय (प्रतिप्रश्न करून उत्तर देण्याजोगा) आणि ठपनीय (उत्तर न देता बाजूला ठेवण्याजोगा). त्यामध्ये, 'चक्षू अनित्य आहे का?' हा एकंशव्याकरणीय प्रश्न आहे. 'जे अनित्य आहे ते दुःख आहे का?' हा विभज्जव्याकरणीय प्रश्न आहे. कदाचित काही अनित्य असेल पण ते चक्षू नसेल; जी आयतने चक्षू नाहीत, ती देखील अनित्य आहेत का? तर ती चक्षू नाहीतच (पण अनित्य आहेत). हा विभज्जव्याकरणीय प्रश्न आहे. 'जे चक्षू आहे, ते चक्षुरिंद्रिय आहे का?' हा प्रतिपृच्छाव्याकरणीय प्रश्न आहे. 'तो चक्षू तथागत आहे का?' हा ठपनीय प्रश्न आहे. चक्षूशिवाय इतर गोष्टींविषयी विचारल्यामुळे हा ठपनीय प्रश्न आहे. या प्रश्नाद्वारे भगवंतांना काय विचारले गेले आहे? जगाच्या संक्लेशाविषयी (मलीनतेविषयी) विचारले गेले आहे. त्याचे कारण काय? संक्लेश तीन प्रकारचा असतो: तृष्णा-संक्लेश, दृष्टी-संक्लेश आणि दुश्चरित-संक्लेश. त्यामध्ये, 'अविद्येने वेढलेले' या शब्दाने अविद्या दर्शविली आहे. 'जप्पा' (तृष्णा) या शब्दाने तृष्णा दर्शविली आहे. 'महाभय' या शब्दाने अकुशल कर्माचा विपाक (परिणाम) दर्शविला आहे. 'सुखद वेदना देणाऱ्या कर्माचा विपाक दुःखद होईल, हे शक्य नाही,' असे भगवंत उत्तर देतात. 'अविद्येने वेढलेले जग...' इत्यादी चार पदांनी जे उत्तर दिले आहे, त्याला असे म्हटले जाते. ๔๕. ตทุตฺตริ ปฏิปุจฺฉติ, สวนฺติ สพฺพธิ โสตาติ คาถา, จตฺตาริ ปทานิ ปุจฺฉติ ตํ ภควา ทฺวีหิ ปเทหิ วิสชฺเชติ. ४५. त्यानंतर ते पुन्हा विचारतात, 'सवन्ति सब्बधी सोता' (प्रवाह सर्वत्र वाहतात) या गाथेने चार पदे विचारतात. भगवंत त्याचे दोन पदांनी उत्तर देतात: ยานิ โสตานิ โลกสฺมึ, สติ เตสํ นิวารณํ; โสตานํ สํวรํ พฺรูมิ, ปญฺญาเยเต ปิธียเร. जगात जे प्रवाह (स्रोत) वाहतात, त्यांना रोखणारा स्मृती हा त्यांचा संवर (प्रतिबंध) आहे, असे मी सांगतो; आणि प्रज्ञेने ते प्रवाह बंद केले जातात. อิมานิ จตฺตาริ ปทานิ ทฺวีหิ ปเทหิ วิสชฺเชติ. อิทํ ปทนฺติ ปุจฺฉิโต, ตสฺส สํกิลิฏฺฐสฺส โลกสฺส โวทานํ ปุจฺฉิโต, โสตานิ ฉ ตณฺหากายา พหุลาธิวจเนน นิทฺทิฏฺฐา ภวนฺติ สพฺเพหิ อายตเนหิ. ตานิ โสตานิ เกน นิวาริยนฺตีติ ปริยุฏฺฐานปหานํ ปุจฺฉติ, เกน โสตา ปิธียเรติ อนุสยสมุคฺฆาตํ ปุจฺฉติ. ตตฺถ ภควา ฉสุ ทฺวาเรสุ สติยา เทเสติ, โย หิ สมฺปชาโน วิหรติ สติโทวาริเก จ ตสฺส อินฺทฺริยานิ คุตฺตานิ สมฺภวนฺติ. ตตฺถ คุตฺเตสุ อินฺทฺริเยสุ ยา ยา วิปสฺสนา, สา สา เตสํ เตสํ โสตานํ ตสฺสา จ อวิชฺชาย โย โลโก นิวุโต อจฺจนฺตปหานาย สํวตฺตติ. เอวํ โสตานิ ปิหิตานิปิ ภวนฺติ ตโต อุตฺตริ ปุจฺฉติ. या चार पदांचे भगवान दोन पदांद्वारे उत्तर देतात. 'हे पद' असे विचारले असता, त्या संक्लिष्ट (मलिन) जगाच्या शुद्धीकरणाविषयी (वोदान) विचारले आहे. सहा प्रकारच्या तृष्णा-कायांच्या विपुलतेच्या संज्ञेने सर्व आयतनांद्वारे 'स्रोत' दर्शविले जातात. 'ते स्रोत कशाने अडवले जातात?' या प्रश्नाने पर्युत्थानाचे (उफाळून येणाऱ्या क्लेशांचे) प्रहाण विचारले आहे, आणि 'ते स्रोत कशाने बंद केले जातात?' याने अनुसयाचे समूळ उच्चाटन विचारले आहे. तेथे भगवान सहा द्वारांवर स्मृतीच्या (सतीच्या) रक्षणाने उपदेश करतात. कारण जो संपजन्ययुक्त (जागृत) होऊन विहरतो आणि स्मृतीरूपी द्वारपालाद्वारे त्याची इंद्रिये सुरक्षित होतात. तेथे इंद्रिये सुरक्षित असताना जी जी विपश्यना असते, ती ती त्या त्या स्रोतांच्या आणि ज्या अविद्येने लोक झाकलेला आहे, तिच्या अत्यंत प्रहाणासाठी (पूर्ण नाशासाठी) कारणीभूत ठरते. अशा प्रकारे स्रोत बंद देखील होतात. त्यानंतर ते पुढे विचारतात. ปญฺญา [Pg.226] จ สติ จ นามรูปสฺส โข ตสฺส ภควนฺตํ ปุฏฺฐุมาคมฺม กตฺเถตํ อุปสมฺมติ อิมานิ จตฺตาริ ปทานิ ภควา เอเกน ปเทน วิสชฺเชติ. प्रज्ञा आणि स्मृती त्या नामरूपाच्या विस्ताराला अनुसरून कोठे शांत होतात? असे भगवंतांना विचारतात. भगवान या चार पदांचे एकाच पदाने उत्तर देतात. ยเมตํ ปญฺหํ อปุจฺฉิ, อชิต ตํ วทามิ เต…เป…; วิญฺญาณสฺส นิโรเธน, เอตฺเถตํ อุปสมฺมติ. “हे अजित! तू जो हा प्रश्न विचारला आहेस, तो मी तुला सांगतो... विज्ञानाच्या निरोधाने येथे (निर्वाणात) हे शांत होते.” อิมินา ปญฺเหน กึ ปุจฺฉติ? อนุปาทิเสสนิพฺพานธาตุํ ปุจฺฉติ, ตํ ภควา อนุปาทิเสสาย นิพฺพานธาตุยา วิสชฺเชติ. ตตฺถ ปฐเมน ปญฺเหน สํกิเลสํ ปุจฺฉติ. ทุติเยน ปญฺเหน โวทานํ ปุจฺฉติ. ตติเยน ปญฺเหน โสปาทิเสสนิพฺพานธาตุํ ปุจฺฉติ. จตุตฺเถน ปญฺเหน อนุปาทิเสสนิพฺพานธาตุํ ปฏิปุจฺฉติ ตโต อุตฺตริ ปฏิปุจฺฉติ. या प्रश्नाने काय विचारले आहे? अनुपादिशेष निर्वाणधातूविषयी विचारले आहे. भगवान त्याचे अनुपादिशेष निर्वाणधातूने उत्तर देतात. तेथे पहिल्या प्रश्नाने संक्लेश (मलिनता) विचारला आहे. दुसऱ्या प्रश्नाने वोदान (शुद्धीकरण) विचारले आहे. तिसऱ्या प्रश्नाने सोपादिशेष निर्वाणधातू विचारला आहे. चौथ्या प्रश्नाने पुन्हा अनुपादिशेष निर्वाणधातू विचारला आहे. त्यानंतर ते पुढे पुन्हा विचारतात. เย จ สงฺขาตธมฺมาเส, เย จ เสขา ปุถู อิธ; เตสํ เม นิปโก อิริยํ, ปุฏฺโฐ ปพฺรูหิ มาริส. “हे पूजनीय! या जगात जे संस्कारी धर्म (अर्हत) आहेत आणि जे अनेक शैक्ष आहेत, त्यांचे वर्तन प्रज्ञावान कसे आहे? मी विचारले असता मला सांगा.” อิมานิ จตฺตาริ ปทานิ ปุจฺฉติ. กติ จ ปน เต ปญฺเห สงฺขาตธมฺมา จ อรหนฺตา เสกฺขา จ? กึ ปุพฺพํ กิญฺจ ปจฺฉิมนฺติ อยมตฺโถ. ตตฺถ กตรํ ปฐมํ ปุจฺฉติ, กตรํ ปจฺฉา? อรหนฺตํ ปฐมํ ปุจฺฉติ. เสกฺขธมฺเม ตตฺถ เกน ปเทน สงฺขาตธมฺมาติ อรหนฺโต คหิตา, ปุถูติ เสกฺขา คหิตา. เตสํ เม นิปโกติ สาธารณํ ปทํ ภควนฺตํ ปุจฺฉติ. ตสฺส สาธารณานิ จ อสาธารณานิ จ ปญฺเหสุ ปุจฺฉิตพฺพานิ. ตํ ภควา วิสชฺเชติ. น ตถา ปุฏฺฐํ, ปฐมํ ปุฏฺฐํ, ตํ ปจฺฉา วิสชฺเชติ. ยํ ปจฺฉา ปุจฺฉิตํ ปฐมํ วิสชฺเชติ. กิญฺจ อิทํ ปุจฺฉิตํ วิสุทฺธานํ วิสุชฺฌนฺตานญฺจ กา อิริยาติ อิทํ ปุจฺฉิ, ตํ กาเมสุ นาภิคิชฺเฌยฺย. มนสานาวิโล สิยาติ ปริยุฏฺฐานานิ วิตกฺเกน จ ภควา นิวาเรติ, ทฺเว ปน วิตกฺกอนาวิลตาย ปริยุฏฺฐานํ, ยถา นีวรเณสุ นิทฺทิฏฺฐํ. กุสลา สพฺพธมฺเมสูติ อรหนฺตํ วิสชฺเชติ. या चार पदांविषयी ते विचारतात. आणि ते प्रश्न किती आहेत? ते संस्कारी धर्म असलेले अर्हत आणि शैक्ष यांच्याविषयीचे आहेत. आधी कोण आणि नंतर कोण, असा याचा अर्थ आहे. तेथे आधी कोणाविषयी विचारतात? आधी अर्हताविषयी विचारतात. तेथे 'संखतधम्म' या पदाने अर्हत घेतले आहेत, आणि 'पुथू' (अनेक) या पदाने शैक्ष घेतले आहेत. 'त्यांचे प्रज्ञावान वर्तन' या सामायिक (साधारण) पदाने भगवंतांना विचारतात. प्रश्नांमध्ये त्याचे सामायिक आणि असाधारण पैलू विचारले पाहिजेत. भगवान त्याचे उत्तर देतात. जसे विचारले आहे तसे उत्तर देत नाहीत; जे आधी विचारले आहे, त्याचे नंतर उत्तर देतात, आणि जे नंतर विचारले आहे, त्याचे आधी उत्तर देतात. हे काय विचारले आहे? शुद्ध झालेल्यांचे (अर्हतांचे) आणि शुद्ध होत असलेल्यांचे (शैक्षांचे) वर्तन काय आहे? असे हे विचारले आहे. त्याचे, 'कामासक्तीमध्ये गुंतू नये, मन कलुषित असू नये' या गाथेने, भगवान पर्युत्थानांना आणि वितर्कांना रोखतात. वितर्कांच्या अकलुषिततेने दोन पर्युत्थाने रोखली जातात, जसे नीवरणांमध्ये दर्शविले आहे. 'सर्व धर्मांमध्ये कुशल' या पदाने भगवान अर्हताविषयी उत्तर देतात. เกนสฺสุ ตรติ โอฆนฺติ คาถา, อิมานิ จตฺตาริ ปทานิ. จตฺตาโรเยว ปญฺหา. กึ การณํ, น หิ เอตฺถ อตฺถานุปริวตฺติ พฺยญฺชนํ ยถา ปฐมํ อชิตปญฺเหสุ, ตสฺส น เอกํเสน พหูนิ วิสชฺชนานิ, พหุกา ปญฺหา, เอโกว น จาปิ, สพฺเพ ปุจฺฉติ, ปุพฺเพ วิสชฺชิโต, ยถา จตุตฺโถ อชิโตปญฺเห, ยํ [Pg.227] เอตฺถ ยถาภูตํ ปริเยสนาปทพนฺเธน วิสชฺชนาโย เอวํ ยถาภูตํ ปริเยสติ. โย ปุน เอตฺถ ยํ เอวํ ปุจฺฉติ ตตฺถ อยมากาโร ปุจฺฉนายํ อนฺโตชฏา พหิชฏาติ คาถา ปุจฺฉิตวิสชฺชนาย มคฺคิตพฺพา. กถํ วิสชฺชิตาติ ภควาติ วิสชฺเชติ? สีเล ปติฏฺฐาย นโร สปญฺโญติ คาถา. ตตฺถ จิตฺตภาวนาย สมถา, ปญฺญาภาวนาย วิปสฺสนา. ตตฺถ เอวํ อนุมียติ, เย ธมฺมา สมเถน จ วิปสฺสนาย จ ปหียนฺติ, เต อิเม อนฺโตชฏา พหิชฏา. ตตฺถ วิสชฺชนํ สมเถน ราโค ปหียติ, วิปสฺสนาย อวิชฺชา. อชฺฌตฺตวตฺถุโก ราโค อนฺโตชฏา, พาหิรวตฺถุโก ราโค พหิชฏา. อชฺฌตฺตวตฺถุกา สกฺกายทิฏฺฐิ, อยํ อนฺโตชฏา. เอกสฏฺฐิ ทิฏฺฐิคตานิ จ พาหิรวตฺถุกานิ พหิชฏา, ยา หิ อชฺฌตฺตวตฺถุกา ยา ทิฏฺฐิภาคิเยน ภวิสฺสติ, อยํ ชฏา. ตถา สํขิตฺเตน ยา กาจิ อชฺฌตฺตวตฺถุกา ตณฺหา จ ทิฏฺฐิ จ, อยํ อนฺโตชฏา. ยา กาจิ พาหิรวตฺถุกา ตณฺหา จ ทิฏฺฐิ จ, อยํ พหิชฏา. “कशाने ओघ (प्रवाह) तरून जातो?” ही गाथा, ही चार पदे आहेत. हे चारच प्रश्न आहेत. काय कारण आहे? कारण येथे अर्थाला अनुसरून असणारे व्यंजन आहे. जसे आधी अजितच्या प्रश्नांमध्ये, त्याचे केवळ एकच उत्तर नाही, तर अनेक उत्तरे आहेत, अनेक प्रश्न आहेत; केवळ एकच प्रश्न-उत्तर नाही. सर्वांना विचारतात, आधी उत्तर दिले आहे. जसे अजितच्या चौथ्या प्रश्नात, यथार्थ शोध घेणाऱ्या पदांच्या जोडणीने उत्तरे होतात, त्याचप्रमाणे यथार्थ शोध घेतात. पुन्हा येथे जे असे विचारतात, तेथे हा विचारण्याचा प्रकार होतो. “अंतर्जटा (आतील गुंता) आणि बहिर्जटा (बाहेरील गुंता)” ही जी गाथा आहे, या गाथेचे प्रश्न आणि उत्तर शोधले पाहिजे. उत्तर कसे दिले आहे? असे विचारले असता, भगवान उत्तर देतात: “शीलावर प्रतिष्ठित होऊन प्रज्ञावान मनुष्य...” ही गाथा. तेथे चित्तभावनेने शमथ होतो, आणि प्रज्ञाभावनेने विपश्यना होते. तेथे असे अनुमान केले जाते की, जे धर्म शमथ आणि विपश्यनेने नष्ट होतात, ते हे अंतर्जटा आणि बहिर्जटा आहेत. तेथे उत्तर असे आहे: शमथाने राग नष्ट होतो, आणि विपश्यनेने अविद्या नष्ट होते. अध्यात्म-वस्तूला (अंतर्गत वस्तूला) आश्रित असलेला राग म्हणजे अंतर्जटा होय, आणि बाह्य वस्तूला आश्रित असलेला राग म्हणजे बहिर्जटा होय. अध्यात्म-वस्तूला आश्रित असलेली जी सत्कायदृष्टी आहे, ती अंतर्जटा होय. बाह्य वस्तूंना आश्रित असलेल्या ज्या एकसष्ट (६१) दृष्ट्या आहेत, त्या बहिर्जटा होत. जी अध्यात्म-वस्तूला आश्रित असणारी दृष्टीच्या भागातील जटा असेल, ती जटा होय. त्याचप्रमाणे संक्षेपाने, जी कोणतीही अध्यात्म-वस्तूला आश्रित असणारी तृष्णा आणि दृष्टी आहे, ती अंतर्जटा होय. जी कोणतीही बाह्य वस्तूला आश्रित असणारी तृष्णा आणि दृष्टी आहे, ती बहिर्जटा होय. ยถา เทวตา ภควนฺตํ ปุจฺฉติ ‘‘จตุจกฺกํ นวทฺวาร’’นฺติ คาถา. ตตฺถ ภควา วิสชฺเชติ ‘‘เฉตฺวา นทฺธึ วรตฺตํ จา’’ติ คาถา, อิทํ ภควา ทุกฺขนิโรธคามินึ ปฏิปทํ วิสชฺเชติ. อิมาย วิสชฺชนาย ภควา อนุมียติ กิเลเส เอตฺถ ปุริมาย คาถาย นิทฺทิสิตพฺเพน. ตํ หิ จตุจกฺกนฺติ จตฺตาโร วา หตฺถปาทา. นวทฺวารนฺติ นว วณมุขานิ. ยถา จตุจกฺกนฺติ จตฺตาโร อุปาทานา, อุปาทานปฺปจฺจยา ภโว, อุปาทานนิโรธา ภวนิโรโธ. นวทฺวารนฺติ นว มานวิธา, มานชาติกาย หิ ทุกฺขํ เสยฺเยนมฺหิ ปรโส ตีณิ ติกานิ ปุณฺณํ. ติเกน สํยุตฺตํ หิ ปญฺจกามคุณิโก ราโค. ตตฺถ นทฺธีติ ตณฺหา วิสชฺชียติ. วรตฺตนฺติ มานํ วิสชฺเชติ, อิจฺฉา โลโภ จ ปาปโกติ ปญฺจกามคุณิโก ราโค. ตตฺถ วิสมโลโภ ปาปโกติ นิทฺทิสิยติ สมูลตณฺหนฺติ. อญฺญาณมูลกา ตณฺหาติ อญฺญาณมูลกา ตณฺหา, ตณฺหาย จ ทิฏฺฐิยา จ ปหานํ. เย จ ปุน อญฺเญปิ เกจิ จตุจกฺกโยเคน เตเนว การเณน จ ยุชฺชนฺติ, สํสารคามิโน ธมฺมา สพฺเพ นิทฺทิสิตพฺพา. ตตฺถายํ คาถา วิสชฺชนา ปุจฺฉาย จ วิสชฺชนาย สเมติ. ยํ ยทิ สนฺเทน อถ สห พฺยากรเณน อนุคีติยํ จ โส วิจโยติ ภควา ยตฺตกานิ ปทานิ นิกฺขิปติ, ตตฺตเกหิ อนุคายติ. जसे देवता भगवंतांना विचारते, “चार चक्रे, नऊ द्वारे” ही गाथा. तेथे भगवान उत्तर देतात, “दोरी आणि कातडीची वादी तोडून...” ही गाथा. याद्वारे भगवान दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदेचे (मार्ग सत्याचे) निरूपण करतात. या उत्तराद्वारे भगवान पूर्वीच्या गाथेत दर्शविलेल्या येथील क्लेशांचे अनुमानाने ज्ञान करून देतात. ते खरोखर, “चार चक्रे” म्हणजे दोन हात आणि दोन पाय मिळून चार अवयव होत. “नऊ द्वारे” म्हणजे नऊ जखमांची मुखे होत. किंवा दुसऱ्या अर्थाने, “चार चक्रे” म्हणजे चार उपादान होत; उपादानाच्या कारणाने भव होतो, आणि उपादानाच्या निरोधाने भवाचा निरोध होतो. “नऊ द्वारे” म्हणजे नऊ प्रकारचे मान (अहंकार) होत. हे सत्य आहे, मान-स्वभाव असलेल्या व्यक्तीला “मी श्रेष्ठ आहे” या मानाने दुःख होते. इतरांच्या तुलनेत तीन त्रिक पूर्ण होतात. कारण पाच कामगुणांमधील राग त्रिकाशी युक्त असतो. तेथे 'नद्धी' (नंदी-तृष्णा) चे निरूपण केले आहे. 'वरत्तं' (कातडीची वादी) याने भगवान मानाचे (अहंकाराचे) निरूपण करतात. “इच्छा आणि पापी लोभ” म्हणजे पाच कामगुणांमधील राग होय. तेथे विषम लोभाला 'पापक' असे म्हटले आहे आणि 'समूळ तृष्णा' असे दर्शविले आहे. 'अज्ञानमूलक तृष्णा' म्हणजे अज्ञानावर आधारित असणारी तृष्णा होय; तृष्णा आणि दृष्टीचे प्रहाण होय. आणि जे इतर कोणीही चार सत्यांच्या धर्मचक्राच्या योगाने आणि त्याच कारणाने युक्त होतात, संसारात नेणारे ते सर्व धर्म दर्शविले पाहिजेत. तेथे हे गाथारूपी उत्तर प्रश्न आणि उत्तराशी सुसंगत आहे. जर ते पूर्वापर संबंधाशी आणि व्याकरणासह सुसंगत असेल, तर ते अनुगीतीशीही सुसंगत असते. “तो निश्चय” असे म्हणून भगवान जितकी पदे मांडतात, तितक्याच पदांनी पुन्हा उपदेश करतात. ๔๖. อฏฺฐหิ[Pg.228], ภิกฺขเว, องฺเคหิ สมนฺนาคโต ภิกฺขุ ทูเตยฺยํ คนฺตุมรหติ. อิมานิ อฏฺฐ ปทานิ นิกฺขิตฺตานิ. ฉหิ ปเทหิ ภควา อนุคายติ. ४६. “भिक्खूंनो, आठ अंगांनी युक्त असलेला भिक्खू दूताचे काम करण्यास योग्य असतो...” ही आठ पदे मांडली आहेत. भगवान सहा पदांनी पुन्हा उपदेश करतात. ‘‘โย เว น พฺยถติ ปตฺวา, ปริสํ อุคฺควาทินึ; น จ หาเปติ วจนํ, น จ ฉาเทติ สาสนํ. जो खरोखर उग्र भाषण करणाऱ्या परिषदेत (सभेत) पोहोचल्यावर भयभीत होत नाही, आणि आपल्या वचनाला सोडत नाही (कमी करत नाही) आणि शासनाला (बुद्धांच्या शिकवणीला) लपवत नाही. ‘‘อสนฺทิทฺธึ จ ภณติ, ปุจฺฉิโต น จ กุปฺปติ; ส เว ตาทิสโก ภิกฺขุ, ทูเตยฺยํ คนฺตุมรหตี’’ติ. आणि जो संशयरहित (स्पष्ट) बोलतो, विचारले असता क्रुद्ध (रागवत) होत नाही; असा भिक्षू खरोखर दूताचे कार्य करण्यास (दूता म्हणून जाण्यास) योग्य ठरतो. ตตฺถ ปน ภควา ยตฺตกานิ ปทานิ นิกฺขิปติ, ตตฺตเกหิ อนุคายติ. สตฺตหิ, ภิกฺขเว, องฺเคหิ สมนฺนาคโต กลฺยาณมิตฺโต ปิโย ครุภาวนีโยติ วิตฺถาเรน, อิทํ ภควา สตฺตหิ ปเทหิ อนุคายติ. อิติ พหุสฺสุตวา อนุคายติ, อปฺปตรกถํ ปทํ วา นิกฺเขโป, พหุสฺสุตวา นว ปทานิ นิกฺเขโป, อปฺปตริกา อนุคีติยา พหุตริกา อนุคายติ. อยํ วุจฺจติ เต อนุคีติ จ วิจโย, อยํ วิจโย นาม หาโร. तेथे भगवान जितकी पदे मांडतात, तितक्याच पदांनी अनुगायन (पुनरुच्चार) करतात. 'भिक्षूंनो, सात अंगांनी युक्त असलेला कल्याणमित्र प्रिय, आदरणीय आणि भावना करण्यायोग्य असतो' या सूत्राचा विस्ताराने निर्देश करावा; भगवान या उपदेशाचे सात पदांनी अनुगायन करतात. अशा प्रकारे बहुश्रुत देखील अनुगायन करतो; संक्षिप्त उपदेशाचे किंवा पदाचे मांडणे होते, बहुश्रुत नऊ पदांचे मांडणे करतो, संक्षिप्त उपदेशाचे अनुगीतीद्वारे आणि विस्तृत उपदेशाचे अनुगायन करतो. यालाच 'अनुगीती' आणि 'विचय' (विश्लेषण) म्हटले जाते. हा 'विचय हार' नावाचा हार आहे. ตตฺถ กตโม ยุตฺติหาโร? त्या हारांमध्ये 'युक्ती हार' कोणता आहे? สพฺเพสํ หารานํ, ยา ภูมี โย จ โคจโร เตสํ; ยุตฺตายุตฺติ ปริกฺขา, หาโร ยุตฺตีติ นิทฺทิฏฺโฐ. सर्व हारांची (किंवा सूत्रांची) जी भूमी आहे, जो गोचर (विषय) आहे आणि त्यांचा जो निस्यंद (परिणाम) आहे, त्यांच्या योग्य-अयोग्यतेची परीक्षा करणारा जो हार आहे, त्याला 'युक्ती हार' असे निर्दिष्ट केले आहे. หารานํ โสฬสนฺนํ ยถา เทสนา ยถา วิจโย โย จ นิทฺทิสิยติ, อยํ นิทฺเทโส. อยํ ปุจฺฉา สุตฺเตสุ น ยุชฺชตีติ ยา ตตฺถ วีมํสา, อยํ ยุตฺติ. सोळा हारांचे देशनेनुसार आणि विवचेनेनुसार जे निर्देशन केले जाते, तो 'निर्देश' होय. 'हा प्रश्न सूत्रांमध्ये जुळत नाही' अशा प्रकारे तेथे जी मीमांसा (तपासणी) केली जाते, ती 'युक्ती' होय. ยถา หิ สเหตู สปฺปจฺจยา สตฺตา สํกิลิสฺสนฺติ, อตฺถิ เหตุ อตฺถิ ปจฺจโย สตฺตานํ สํกิเลสาย, สเหตู สปฺปจฺจยา สตฺตา วิสุชฺฌนฺติ, อตฺถิ เหตุ อตฺถิ ปจฺจโย สตฺตานํ วิสุทฺธิยา. สีลวตา, อานนฺท, ปุคฺคเลน น เวยฺยากรณิยา กินฺติ เม วิปฺปฏิสาโร อุปฺปาเทยฺย…เป… อพฺยากรณํ กตฺตพฺพํ, อยํ วิสุทฺธิยา มคฺโค. ตสฺส เหตุ โก ปจฺจโย, สีลกฺขนฺธสฺส จตฺตาริ จตฺตาริ เหตุ จ ปจฺจโย จ. สปฺปุริสสํเสโว โย จ ปติรูปเทสวาโส จ, อยํ อุปาทาปจฺจยตา สปฺปจฺจโย. ยํ โปราณกมฺมํ อสฺส วิปาโก ปจฺจโย, ตาย ปจฺจยาย อตฺตสมฺมาปณิธิ, อยํ [Pg.229] เหตุ. อิติ สีลกฺขนฺโธ สเหตุ สปฺปจฺจโยติ อิทํ โลกิกํ สีลํ. कारण की, प्राण्यांच्या संक्लेशासाठी (मलीनतेसाठी) हेतू आहे, प्रत्यय आहे; ज्याप्रमाणे सहेतुक आणि सप्रत्यय असणारे प्राणी संक्लिष्ट (मलीन) होतात. प्राण्यांच्या विशुद्धीसाठी हेतू आहे, प्रत्यय आहे; सहेतुक आणि सप्रत्यय असणारे प्राणी विशुद्ध होतात. 'हे आनंदा! शीलवान पुद्गलाने (व्यक्तीने) व्याकरण (स्पष्टीकरण) न केल्याने माझ्यामध्ये विप्रतिसार (पश्चात्ताप) उत्पन्न होईल का?' ...पे... 'अव्याकरण (मौन) राखले पाहिजे, हा विशुद्धीचा मार्ग आहे.' त्याचा हेतू काय आणि प्रत्यय काय? शीलस्कंधाचे चार हेतू आणि चार प्रत्यय आहेत. सत्पुरुष संसेवन (सज्जनांची संगत) आणि प्रतिरूपदेशवास (योग्य ठिकाणी निवास करणे) हे उपादान-प्रत्ययतेमुळे सप्रत्यय आहेत. जे जुने कर्म आहे, त्याचा विपाक हा प्रत्यय आहे; त्या प्रत्ययामुळे जी आत्मसम्यक्प्रणिधी (स्वतःला योग्य मार्गावर स्थापित करणे) आहे, तो हेतू आहे. अशा प्रकारे शीलस्कंध सहेतुक आणि सप्रत्यय आहे; हे 'लौकिक शील' आहे. ยํ ปน โลกุตฺตรํ สีลํ, ตสฺส ตีณิ อินฺทฺริยานิ ปจฺจโย – สทฺธินฺทฺริยํ วีริยินฺทฺริยํ สมาธินฺทฺริยํ – อยํ ปจฺจโย. สตินฺทฺริยญฺจ ปญฺญินฺทฺริยญฺจ เหตุ. ปญฺญาย นิพฺเพธคามินิยา, ยํ สีลํ ชายติ. โสตาปนฺนสฺส จ สีลํ เตนายํ เหตุ อยํ ปจฺจโย. ยํ ปุน สมาธิโน ปสฺสทฺธิ จ ปีติ จ ปาโมชฺชํ ปจฺจโย. ยํ สุขํ เหตุ เตน สมาธิกฺขนฺโธ สเหตุ สปฺปจฺจโย. ยํ สมาหิโต ยถาภูตํ ปชานาติ, อยํ ปญฺญา. ตสฺส ปรโตโฆโส อชฺฌตฺตํ จ โยนิโส มนสิกาโร เหตุ จ ปจฺจโย จ, อิติ อิเม ตโย ขนฺธา สเหตู สปฺปจฺจยา เอวํ สตฺต ปญฺญา. สตฺตพฺยากรณีสุ จ สุตฺเตสุ น ยุชฺชติ. อยํ ยุตฺติหาโร. โส จตูสุ มหาปเทเสสุ ทฏฺฐพฺโพ. परंतु जे लोकोत्तर शील आहे, त्याचे तीन इंद्रिये प्रत्यय आहेत – श्रद्धा-इंद्रिय, वीर्य-इंद्रिय आणि समाधी-इंद्रिय – हा प्रत्यय आहे. स्मृती-इंद्रिय आणि प्रज्ञा-इंद्रिय हे हेतू आहेत. निर्वेधगामी (भेद करणाऱ्या) प्रज्ञेमुळे जे शील उत्पन्न होते, आणि स्रोतापन्नाचे जे शील आहे, त्यामुळे हा हेतू आणि हा प्रत्यय आहे. पुन्हा, समाधीयुक्त पुद्गलाची प्रस्सब्धी (शांतता), प्रीती (आनंद) आणि जे प्रामोज्य (प्रसन्नता) आहे, तो प्रत्यय आहे. जे सुख आहे, तो हेतू आहे; त्यामुळे समाधीस्कंध सहेतुक आणि सप्रत्यय आहे. समाधीयुक्त पुद्गलाला यथाभूत (जसे आहे तसे) जे ज्ञान होते, ती प्रज्ञा आहे. तिचे अध्यात्म (स्वतःमध्ये) योनिशो मनसिकार (योग्य विचार) आणि परतोघोष (इतरांकडून ऐकलेला उपदेश) हे हेतू आणि प्रत्यय आहेत. अशा प्रकारे हे तिन्ही स्कंध सहेतुक आणि सप्रत्यय आहेत; अशा प्रकारे प्रज्ञा सात प्रकारची आहे. सात व्याकरणांमध्ये (स्पष्टीकरणांमध्ये) आणि सूत्रांमध्ये हे जुळत नाही. हा 'युक्ती हार' आहे. तो चार महाप्रदेशांमध्ये पाहावा. ๔๗. ตตฺถ กตมํ ปทฏฺฐานํ? ४७. त्या हारांमध्ये 'पदस्थान हार' कोणता आहे? ธมฺมํ เทเสติ ชิโน, ตสฺส จ ธมฺมสฺส ยํ ปทฏฺฐานํ; อิติ ยาว สพฺพธมฺมา, เอโส หาโร ปทฏฺฐาโน. जिन (बुद्ध) धम्माचा उपदेश करतात, आणि त्या धम्माचे जे पदस्थान (जवळचे कारण) आहे, अशा प्रकारे सर्व धम्मांचे जे पदस्थान आहे, तो 'पदस्थान हार' होय. ตตฺถ ปญฺจกามคุณา กามราคสฺส ปทฏฺฐานํ. เยสํ เกสญฺจิ กามราโค อุปฺปชฺชติ อุปฺปนฺโน วา อุปฺปชฺชิสฺสติ วา, เอเตสุ เยปิ ปญฺจสุ รูเปสุ อายตเนสุ นาญฺญตฺร เอเตหิ กามราคสฺส ปทฏฺฐานนฺติ. วุจฺจเต, เตน ปญฺจ กามคุณา กามราคสฺส ปทฏฺฐานํ. ปญฺจินฺทฺริยานิ รูปราคสฺส ปทฏฺฐานํ. มนินฺทฺริยํ ภวราคสฺส ปทฏฺฐานํ. ปญฺจกฺขนฺธา สกฺกายทิฏฺฐิยา ปทฏฺฐานํ. เอกสฏฺฐิ ทิฏฺฐิคตานิ ทิฏฺฐิราคสฺส ปทฏฺฐานํ. กามธาตุ กามราคสฺส ปทฏฺฐานํ. อรูปธาตุ อรูปราคสฺส ปทฏฺฐานํ. สุขสญฺญา กามราคสฺส ปทฏฺฐานํ. พฺยาปาทสญฺญา พฺยาปาทสฺส ปทฏฺฐานํ. อสมฺปชญฺญตา สมฺโมหสฺส ปทฏฺฐานํ. นว อาฆาตวตฺถูนิ พฺยาปาทสฺส ปทฏฺฐานํ. นววิธํ มานํ มานสฺส ปทฏฺฐานํ. สุขา เวทนา ราคานุสยสฺส ปทฏฺฐานํ. ทุกฺขา เวทนา ปฏิฆานุสยสฺส ปทฏฺฐานํ. อทุกฺขมสุขา เวทนา อวิชฺชานุสยสฺส ปทฏฺฐานํ. อตฺตวาทุปาทานญฺจ มุสาวาโท จ โลภสฺส ปทฏฺฐานํ. ปาณาติปาโต จ ปิสุณวาจา จ ผรุสวาจา จ พฺยาปาทสฺส ปทฏฺฐานํ. มิจฺฉตฺตญฺจ สมฺผปฺปลาโป จ โมหสฺส ปทฏฺฐานํ. ภวํ โภคญฺจ โวกาโร อหํการสฺส ปทฏฺฐานํ. พาหิรานํ ปริคฺคโห [Pg.230] มมํการสฺส ปทฏฺฐานํ. กายสฺส สงฺคํ ทิฏฺฐิยา ปทฏฺฐานํ. กายิกโทโส โทสสฺส ปทฏฺฐานํ. กายิกกาสาโว โลภสฺส ปทฏฺฐานํ. โย โย วา ปน ธมฺโม เยน เยน อารมฺมเณน อุปฺปชฺชติ สจฺจาธิฏฺฐาเนน วา ธมฺมาธิฏฺฐาเนน วา อนุสยเนน วา, โส ธมฺโม ตสฺส ปทฏฺฐานํ. เตน สารมฺมเณน โส ธมฺโม อุปฺปชฺชติ. तेथे पाच कामगुण हे कामरागाचे पदस्थान (जवळचे कारण) आहेत. ज्या कोणामध्येही कामराग उत्पन्न होतो, किंवा उत्पन्न झाला आहे, किंवा उत्पन्न होईल, तो या पाच रूपांमध्ये आणि आयतनांमध्येच होतो; यांच्याशिवाय अन्यत्र कामरागाचे पदस्थान नाही, असे म्हटले जाते. म्हणून पाच कामगुण हे कामरागाचे पदस्थान आहेत. पाच इंद्रिये हे रूपरागाचे पदस्थान आहेत. मन-इंद्रिय हे भवररागाचे पदस्थान आहे. पाच स्कंध हे सत्कार्यदृष्टीचे (सक्कायदिट्ठीचे) पदस्थान आहेत. एकसष्ट (६१) दृष्टिगत हे दृष्टीरागाचे पदस्थान आहेत. कामधातू हे कामरागाचे पदस्थान आहे. अरूपधातू हे अरूपरागाचे पदस्थान आहे. सुखसंज्ञा हे कामरागाचे पदस्थान आहे. व्यापादसंज्ञा हे व्यापादाचे पदस्थान आहे. असं प्रजन्यता (असावधपणा) हे संमोहाचे पदस्थान आहे. नऊ आघातवस्तू हे व्यापादाचे पदस्थान आहेत. नऊ प्रकारचा मान हा मानाचे पदस्थान आहे. सुखवेदना हे राग-अनुशयाचे पदस्थान आहे. दुःखवेदना हे प्रतिघ-अनुशयाचे पदस्थान आहे. अदुःख-असुख वेदना हे अविद्या-अनुशयाचे पदस्थान आहे. आत्मवाद-उपादान आणि मृषावाद (असत्य बोलणे) हे लोभाचे पदस्थान आहे. प्राणातिपात (हिंसा), पिशुनवाचा (चहाडी) आणि परुषवाचा (कठोर बोलणे) हे व्यापादाचे पदस्थान आहेत. मिथ्यात्व आणि संफप्पलाप (व्यर्थ बडबड) हे मोहाचे पदस्थान आहे. भव, भोग आणि वोकार (स्कंध) हे अहंकाराचे पदस्थान आहे. बाह्य वस्तूंचे परिग्रह (स्वीकार) हे ममकाराचे (माझेपणाचे) पदस्थान आहे. शरीराची आसक्ती हे दृष्टीचे पदस्थान आहे. कायिक दोष हे द्वेषाचे पदस्थान आहे. कायिक काषाय हे लोभाचे पदस्थान आहे. ज्या ज्या आलंबनाने (विषयाने), किंवा सत्याधिष्ठानाने, किंवा धम्माधिष्ठानाने, किंवा अनुशयाने जो जो धम्म उत्पन्न होतो, तो धम्म त्याचे पदस्थान आहे. त्या आलंबनासह तो धम्म उत्पन्न होतो. ยถา มนุสฺโส ปุริมสฺส ปทสฺส ปทฏฺฐานํ อลภนฺโต ทุติยํ ปทํ อุทฺธรติ, โส ปจฺฉานุปทํ สํหรติ. ยทิ ปน โย น ทุติยปทสฺส ปทฏฺฐานํ ลภติ, อปรํ ปทํ อุทฺธรติ. ตสฺส โย เจโส ปจฺจโย ภวติ. เอวํ ธมฺโม กุสโล วา อกุสโล วา อพฺยากโต วา ปทฏฺฐานํ อลภนฺโต น ปวตฺตติ. ยถา ปยุตฺตสฺส ธมฺมสฺส โยนิลาโภ, อยํ วุจฺจติ ปทฏฺฐาโน หาโร. ज्याप्रमाणे मनुष्य पहिल्या पावलाचे पदस्थान (आधार) न मिळवता दुसरे पाऊल उचलतो, तो मागील पाऊल पुढे नेतो. जर तो दुसऱ्या पावलाचे पदस्थान मिळवत नाही, तर तो दुसरे पाऊल उचलतो, त्याला जो प्रत्यय होतो. अशा प्रकारे कुशल, अकुशल किंवा अव्याकृत धम्म पदस्थान न मिळवता प्रवृत्त होत नाही. ज्याप्रमाणे प्रयुक्त झालेल्या धम्माची योनीची प्राप्ती (उत्पत्तीस्थान मिळणे) असते, याला 'पदस्थान हार' असे म्हटले जाते. ๔๘. ตตฺถ กตโม ลกฺขโณ หาโร? ४८. त्या हारांमध्ये 'लक्षण हार' कोणता आहे? วุตฺตมฺหิ เอกธมฺเม, เย ธมฺมา เอกลกฺขณา เตน; สพฺเพ ภวนฺติ วุตฺตา, โส หาโร ลกฺขโณ นาม. एका धम्माचे कथन केले असता, जे धम्म एकाच लक्षणाचे असतात, त्यामुळे ते सर्व धम्म कथित झाले असे होते; तो 'लक्षण हार' नावाचा हार आहे. เยสญฺจ สุสมารทฺธา, นิจฺจํ กายคตาสตีติ คาถาย วุตฺตาย กายคตาสติยา วุตฺตา เวทนาคตา จิตฺตคตา ธมฺมคตา จ สติ จตุนฺนํ สติปฏฺฐานานํ เอเกน สติปฏฺฐาเนน. น หิ จิตฺตํ เอกสฺมึ วิญฺญาณฏฺฐิติยา ปวตฺตติ, นานาสุ คตีสุ ปวตฺตติ, กายคตาสติยา วุตฺตาย วุตฺตา เวทนาคตา จิตฺตธมฺมคตา จ. น หิ กายคตาสติยา ภาวิตาย สติปฏฺฐานา จตฺตาโร ภาวนาปาริปูรึ น คจฺฉนฺติ. เอวํ ตสฺสทิเสสุ ธมฺเมสุ วุตฺเตสุ สพฺพธมฺมา วุตฺตา จ ภวนฺติ. 'ज्यांनी नेहमी कायगतास्मृतीचा चांगला आरंभ केला आहे' या गाथेने कायगतास्मृतीचे कथन केले असता, चार स्मृतिप्रस्थानांपैकी एका स्मृतिप्रस्थानाने वेदनागतास्मृती, चित्तगतास्मृती आणि धम्मगतास्मृती देखील कथित होते. कारण चित्त एकाच विज्ञानस्थितीमध्ये प्रवृत्त होत नाही, तर विविध गतींमध्ये प्रवृत्त होते. कायगतास्मृतीचे कथन केले असता, वेदनागतास्मृती, चित्तगतास्मृती आणि धम्मगतास्मृती देखील कथित होते. कारण कायगतास्मृतीची भावना केली असता, चारही स्मृतिप्रस्थान भावनेच्या परिपूर्तीला पोहोचत नाहीत असे नाही, तर ते पोहोचतातच. अशा प्रकारे, तशा प्रकारच्या धम्मांचे कथन केले असता, सर्व धम्म कथित झाले असे होते. สจิตฺตปริโยทาปนํ, เอตํ พุทฺธาน สาสนนฺติ คาถา เจตสิกา ธมฺมา วุตฺตา, จิตฺเต รูปํ วุตฺตํ. อิทํ นามรูปํ ทุกฺขํ อริยสจฺจํ. ตโต สจิตฺตปริโยทาปนา ยํ ยํ โอทเปติ, ตํ ทุกฺขํ. เยน โอทเปติ, โส มคฺโค. ยโต โอทปนา, โส นิโรโธ. จกฺขุํ จ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณํ, ตตฺถ สหชาตา เวทนา สญฺญา เจตนา ผสฺโส มนสิกาโร เอเต เต ธมฺมา เอกลกฺขณา อุปฺปาทลกฺขเณน. โย จ รูเป นิพฺพินฺทติ, เวทนาย โส นิพฺพินฺทติ, สญฺญาสงฺขารวิญฺญาเณสุปิ โส นิพฺพินฺทติ. อิติ [Pg.231] เย เอกลกฺขณา ธมฺมา, เตสํ เอกมฺหิ ธมฺเม นิทฺทิฏฺเฐ สพฺเพ ธมฺมา นิทฺทิฏฺฐา โหนฺติ, อยํ วุจฺจติ ลกฺขโณ หาโร. ‘सचित्तपरियोदापनं एतं बुद्धान सासनं’ (स्वतःच्या चित्ताला पूर्णपणे शुद्ध करणे, हे बुद्धांचे शासन आहे) या गाथेमध्ये चैतसिक धर्मांचे कथन केले आहे; चित्ताचे कथन केले असता रूपाचेही कथन होते. हे नामरूप ‘दुःख आर्यसत्य’ आहे. त्या चित्तशुद्धीमध्ये जे काही शुद्ध करते (ती भावना), ते दुःख (सत्य) आहे. ज्याच्याद्वारे शुद्ध केले जाते, तो मार्ग (मार्ग सत्य) आहे. ज्याच्यामुळे शुद्धता (क्लेशांची निवृत्ती) होते, तो निरोध (निरोध सत्य) आहे. डोळा आणि रूपावर अवलंबून चक्षु-विज्ञान उत्पन्न होते; तेथे सहजात (एकत्र उत्पन्न होणारे) वेदना, संज्ञा, चेतना, स्पर्श आणि मनसिकार हे धर्म उत्पत्तीच्या लक्षणाने ‘एकलक्षण’ (समान लक्षण असलेले) आहेत. आणि जो रूपाविषयी निर्वेद पावतो (कंटाळतो), तो वेदनेविषयी निर्वेद पावतो; संज्ञा, संस्कार आणि विज्ञानाविषयीही तो निर्वेद पावतो. अशा प्रकारे जे एकलक्षण धर्म आहेत, त्यांपैकी एका धर्माचे निर्देश केले असता सर्व धर्मांचे निर्देश केल्यासारखे होते. याला ‘लक्षण हार’ असे म्हणतात. ตตฺถ กตโม จตุพฺยูโห หาโร? त्यात ‘चतुब्यूह हार’ कोणता? นิรุตฺติ อธิปฺปาโย จ, พฺยญฺชนา เทสนาย จ; สุตฺตตฺโถ ปุพฺพาปรสนฺธิ, เอโส หาโร จตุพฺยูโห. निरुत्ती (शब्दांची व्युत्पत्ती) आणि अभिप्राय (उद्देश), व्यंजन (अक्षरे/शब्द) आणि देशना, सूत्राचा अर्थ आणि पूर्वापर संबंध (संदर्भ); हा ‘चतुब्यूह हार’ आहे. ตตฺถ กตมา นิรุตฺติ, สา กถํ ปริเยสิตพฺพา ? ยถา วุตฺตํ ภควตา เอกาทสหิ องฺเคหิ สมนฺนาคโต ภิกฺขุ ขิปฺปํ ธมฺเมสุ มหตฺตํ ปาปุณาติ, อตฺถกุสโล จ โหติ, ธมฺมกุสโล จ โหติ, นิรุตฺติกุสโล จ โหติ, อิตฺถาธิวจนกุสโล จ โหติ, ปุริสาธิวจนกุสโล จ, วิปุริสาธิวจนกุสโล จ, อตีตาธิวจนกุสโล จ, อนาคตาธิวจนกุสโล จ, ปจฺจุปฺปนฺนาธิวจนกุสโล จ. เอกาธิปฺปาเยน กุสโล นานาธิปฺปาเยน กุสโล. กิมฺหิ เทสิตํ, อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺนํ. อิตฺถาธิวจเนน ปุริสาธิวจเนน วิปุริสาธิวจเนน สพฺพํ ยถาสุตฺตํ นิทฺทิฏฺฐํ. ตํ พฺยญฺชนโต นิรุตฺติโกสลฺลโต โย ยํ สุตฺตสฺส สุนิรุตฺติทุนฺนิรุตฺติตํ อเวกฺขติ, อิทํ เอวํ นิโรปยิตพฺพํ. อิทมฺปิ น นิโรปยิตพฺพํ. อิทํ วุจฺจเต นิรุตฺติโกสลฺลํ. त्यात निरुत्ती कोणती आणि ती कशी शोधावी? जसे भगवंतांनी म्हटले आहे—अकरा अंगांनी युक्त असलेला भिक्षू धर्मांमध्ये लवकरच मोठेपणाला प्राप्त होतो; तो अर्थकुशल असतो, धर्मकुशल असतो, निरुत्तीकुशल असतो, स्त्रीलिंगी संज्ञांमध्ये कुशल असतो, पुल्लिंगी संज्ञांमध्ये कुशल असतो, नपुंसकलिंगी संज्ञांमध्ये कुशल असतो, भूतकाळातील संज्ञांमध्ये कुशल असतो, भविष्यकाळातील संज्ञांमध्ये कुशल असतो आणि वर्तमानकाळातील संज्ञांमध्ये कुशल असतो; तसेच एका अभिप्रायाने कुशल आणि विविध अभिप्रायांनी कुशल असतो. कशामध्ये उपदेश केला आहे? भूत, भविष्य आणि वर्तमानकाळात. स्त्रीलिंगी संज्ञेने, पुल्लिंगी संज्ञेने आणि नपुंसकलिंगी संज्ञेने सर्व काही सूत्राप्रमाणे निर्देशित केले आहे. त्याला व्यंजनाद्वारे आणि निरुत्ती-कौशल्याद्वारे जो सूत्राच्या सु-निरुत्ती (योग्य व्युत्पत्ती) आणि दुन्-निरुत्ती (अयोग्य व्युत्पत्ती) कडे लक्ष देतो की, ‘हे अशा प्रकारे स्वीकारले पाहिजे’ आणि ‘हे स्वीकारले नाही पाहिजे’, याला ‘निरुत्ती-कौशल्य’ असे म्हटले जाते. ๔๙. ตตฺถ กตมํ อธิปฺปายโกสลฺลํ? ยถาเทสิตสฺส สุตฺตสฺส สพฺพสฺส วารํ คจฺฉติ อิเมน ภควตา เทสิตพฺพนฺติ. ยถา กึ อปฺปมาโท อมตํ ปทํ, ปมาโท มจฺจุโน ปทนฺติ คาถา. เอตฺถ ภควโต โก อธิปฺปาโย? เย อสีติเมว อากงฺขนฺติ เต อปฺปมตฺตา วิหริสฺสนฺติ, อยํ อธิปฺปาโย. ४९. त्यात अभिप्राय-कौशल्य कोणते? ज्या प्रकारे उपदेशिलेल्या सर्व सूत्रांचा क्रम चालतो की, ‘हे भगवंतांनी उपदेशिले आहे.’ जसे की—‘अप्पमादो अमतं पदं, पमादो मच्चुनो पदं’ (अप्रमाद हे अमृताचे स्थान आहे, प्रमाद हे मृत्यूचे स्थान आहे) ही गाथा. येथे भगवंतांचा काय अभिप्राय आहे? ‘जे ऐंशी वर्षांचे आयुष्य इच्छितात, ते अप्रमत्त होऊन विहरतील,’ हा अभिप्राय आहे. โยคสฺส กาลํ น นิวตฺตติ ยา จ, โส น ตตฺถ ปาปินฺตเว ภวนฺติ; เวทนามคฺคอิสินา ปเวทิตํ, ธุตรชาสวา ทุกฺขา ปโมกฺขาตา. योगी पुरुषाने बुद्ध उत्पत्तीचा काळ व्यर्थ जाऊ देऊ नये, तो तेथे पापी धर्मांमध्ये पडत नाही. वेदना-मार्गाचा शोध घेणाऱ्या ऋषींनी (बुद्धांनी) जे उपदेशिले आहे, त्यानुसार ज्यांनी क्लेशांची धूळ झटकून टाकली आहे आणि जे आसवमुक्त झाले आहेत, ते दुःखातून मुक्त होतात. เอตฺถ ภควโต โก อธิปฺปาโย? เย ทุกฺเข นาสฺสาทกา, เต วีริยมารภิสฺสนฺติ ทุกฺขกฺขยายาติ. อยํ ตตฺถ ภควโต อธิปฺปาโย. อิติ คาถาย วา พฺยากรเณน วา เทสิเต อิมินา สุตฺเตน สาธกา, โย [Pg.232] เอวํ ธมฺมานุธมฺมํ ปฏิปชฺชตีติ โส อธิปฺปาโย, อยํ วุจฺจติ เทสนาธิปฺปาโย. येथे भगवंतांचा काय अभिप्राय आहे? ‘जे दुःखात आसक्त होत नाहीत, ते दुःखाच्या क्षयासाठी वीर्य (प्रयत्न) आरंभतील.’ हा तेथे भगवंतांचा अभिप्राय आहे. अशा प्रकारे गाथेने किंवा स्पष्टीकरणाने या सूत्राद्वारे पुरावे देऊन उपदेश केला असता, ‘जो अशा प्रकारे धर्मानुकूल धर्माचे आचरण करतो,’ हाच अभिप्राय आहे. याला ‘देशना-अभिप्राय’ असे म्हटले जाते. ตตฺถ กตโม ปุพฺพาปรสนฺธิ? ยํ คาถายํ วา สุตฺเตสุ วา ปทานิ อสีติ ตานิ ภวนฺติ เอวํ วา เอวเมติ ตสฺสา คาถาย สุตฺตสฺส วา ยานิ ปุริมานิ ปทานิ ยานิ จ ปจฺฉิมกานิ, ตานิ สโมสาเรตพฺพานิ. เอวํ โส ปุพฺพาปเรน สนฺธิ ญายติ. ยา เอกา สมารทฺธา คาถา ทฺเว ตีณิ วา ตสฺส เมกเทเส ภาสิตานํ อภาสิตาหิ คาถาหิ อนิทฺทิฏฺโฐ อตฺโถ ภวติ ตทุปธาริตพฺพํ. ยํว สพฺพา อิติสฺส ปริเยสมานสฺส ปริเยสนา กงฺขา, ตสฺส วา ปุคฺคลสฺส ปญฺญตฺตีนํ อปเร ปริเยสิตพฺพํ. อิทํ วุจฺจเต ปุพฺพาปเรน สนฺธิ. โกสลฺลนฺติ วตฺถุโต นิทานโกสลฺลํ. พฺยญฺชนโต นิรุตฺติโกสลฺลํ. เทสนาธิปฺปายโกสลฺลํ. ปุพฺพาปเรน สนฺธิโกสลฺลํ. ตตฺถ ตสฺส คาถา ปริเยสิตา นิทานํ วา. อุปลพฺภิตุํ น อตฺโถ นิทฺทิสิตพฺโพ วตฺถุโต นิทานโกสลฺลํ อตฺถโกสลฺลํ อิเมหิ จตูหิ ปเทหิ อตฺโถ ปริเยสิยนฺโต ยถาภูตํ ปริยิฏฺโฐ โหติ. อถ จ สพฺโพ วตฺถุโต วา นิทาเนน วา โย อธิปฺปาโย พฺยญฺชโน นิรุตฺติ สนฺธิ จ อนุตฺตโร เอโส ปุพฺพาปเรน เอวํ สุตฺตตฺเถน เทสิตพฺพํ. อยํ จตุพฺยูโห หาโร. त्यात पूर्वापर संबंध कोणता? गाथेमध्ये किंवा सूत्रांमध्ये जी पदे असतात, ती अशा प्रकारे किंवा तशा प्रकारे असतात; त्या गाथेची किंवा सूत्राची जी पूर्व पदे (आधीची पदे) आणि पश्चिम पदे (नंतरची पदे) असतात, त्यांचा मेळ घातला पाहिजे. अशा प्रकारे तो पूर्वापर संबंध ओळखला जातो. जी एक, दोन किंवा तीन गाथा चांगल्या प्रकारे आरंभल्या आहेत, त्यांच्या एका भागात जे सांगितले आहे, त्याचा अर्थ न सांगितलेल्या गाथांद्वारे स्पष्ट होत नसेल, तर त्याचा विचार केला पाहिजे. अशा प्रकारे शोध घेणाऱ्या व्यक्तीच्या शंकांचे निरसन करण्यासाठी किंवा त्या व्यक्तीच्या प्रज्ञेसाठी इतर सूत्रांमध्ये शोध घेतला पाहिजे. याला ‘पूर्वापर संबंध’ असे म्हटले जाते. कौशल्य म्हणजे—वस्तूच्या (धर्माच्या) आधारे निदान-कौशल्य, व्यंजनाद्वारे निरुत्ती-कौशल्य, देशना-अभिप्राय-कौशल्य आणि पूर्वापर संबंध-कौशल्य होय. तेथे त्या गाथेचा शोध घेतला असता, निदान सापडो वा न सापडो, अर्थ स्पष्ट केला पाहिजे; वस्तूच्या आधारे निदान-कौशल्य आणि अर्थ-कौशल्य स्पष्ट केले पाहिजे. या चार पदांद्वारे अर्थ शोधला असता तो यथार्थपणे शोधला जातो. तसेच, वस्तूच्या आधारे किंवा निदानाच्या आधारे सर्व अभिप्राय, व्यंजन, निरुत्ती आणि पूर्वापर संबंध यांचा उत्तम मेळ घालून सूत्राच्या अर्थासह उपदेश केला पाहिजे. हा ‘चतुब्यूह हार’ आहे. ๕๐. ตตฺถ กตโม อาวฏฺโฏ หาโร? ५०. त्यात ‘आवृत्त हार’ कोणता? เอกมฺหิ ปทฏฺฐาเน, ปริเยสติ เสสกํ ปทฏฺฐานํ; อาวฏฺฏติ ปฏิปกฺเข, อาวฏฺโฏ นาม โส หาโร. एका पदस्थानाचा (जवळच्या कारणाचा) आधार घेऊन उर्वरित पदस्थानांचा शोध घेणे आणि प्रतिपक्षाकडे (विरुद्ध बाजूकडे) वळणे; याला ‘आवृत्त हार’ असे म्हणतात. ยถา กึ อุนฺนฬานํ ปมตฺตานนฺติ คาถาโย. ยํ ปมาโท, อิทํ กิสฺส ปทฏฺฐานํ? กุสลานํ ธมฺมานํ โอสคฺคสฺส. กุสลธมฺโมสคฺโค ปน กิสฺส ปทฏฺฐานํ? อกุสลธมฺมปฏิเสวนาย. กิสฺส ปทฏฺฐานํ, กุสลธมฺมปฏิเสวนาย? กิสฺส ปทฏฺฐานํ, กิเลสวตฺถุปฏิเสวนาย? อิติ ปมาเทน โมหปกฺขิยา ทิฏฺฐิ อวิชฺชา ฉนฺทราคปกฺขิยา. ตตฺถ ตณฺหา จ ทิฏฺฐิ จตฺตาโร อาสวา ตณฺหา กามาสโว จ ภวาสโว จ ทิฏฺฐาสโว จ อวิชฺชาสโว จ. ตตฺถ จิตฺเต อตฺถีติ ทิฏฺฐิ เจตสิเกสุ นิจฺจนฺติ ปญฺจสุ กามคุเณสุ อชฺฌาวหเนน กามาสโว, อุปปตฺตีสุ อาสตฺติ ภวาสโว. ตตฺถ รูปกาโย [Pg.233] กามาสวสฺส ภวาสวสฺส จ ปทฏฺฐานํ. นามกาโย ทิฏฺฐาสวสฺส อวิชฺชาสวสฺส จ ปทฏฺฐานํ. जसे की—‘उण्णळानं पमत्तानं’ (उद्धत आणि प्रमत्त लोकांची) ही गाथा. जो प्रमाद आहे, तो कशाचे पदस्थान (जवळचे कारण) आहे? कुशल धर्मांच्या त्यागाचे. कुशल धर्मांचा त्याग कशाचे पदस्थान आहे? अकुशल धर्मांच्या सेवनाचे. अकुशल धर्मांचे सेवन कशाचे पदस्थान आहे? क्लेशवस्तूंच्या सेवनाचे. अशा प्रकारे प्रमादामुळे मोहपक्षातील दृष्टी आणि छंदरागपक्षातील अविद्या उत्पन्न होते. तेथे तृष्णा आणि दृष्टी हे आहेत. चार आसव आहेत—कामासव, भवासव, दृष्टी-आसव आणि अविद्यासव. तेथे चित्तामध्ये ‘आहे’ अशी दृष्टी, चैतसिकांमध्ये ‘नित्य आहे’ अशी दृष्टी; पाच कामगुणांमध्ये आसक्त होण्याने ‘कामासव’ होतो, आणि उत्पत्तीमध्ये (पुनर्जन्मात) आसक्ती असण्याने ‘भवासव’ होतो. तेथे रूपकाय हे कामासवाचे आणि भवासवाचे पदस्थान आहे. नामकाय हे दृष्टी-आसवाचे आणि अविद्यासवाचे पदस्थान आहे. ตตฺถ อลฺลิยนาย อชฺฌตฺตวาหนํ กามาสวสฺส ลกฺขณํ. ปตฺถนคนฺถนอภิสงฺขารกายสงฺขารณํ ภวาสวสฺส ลกฺขณํ, อภินิเวโส จ ปรามาโส จ ทิฏฺฐาสวสฺส ลกฺขณํ. อปฺปฏิเวโธ ธมฺเมสุ อสมฺปชญฺญา จ อวิชฺชาสวสฺส ลกฺขณํ. อิเม จตฺตาโร อาสวา จตฺตาริ อุปาทานานิ. กามาสโว กามุปาทานํ, ภวาสโว ภวุปาทานํ, ทิฏฺฐาสโว ทิฏฺฐุปาทานํ, อวิชฺชาสโว อตฺตวาทุปาทานํ, อิเมหิ จตูหิ อุปาทาเนหิ ปญฺจกฺขนฺธา. ตตฺถ อวิชฺชาสโว จิตฺเต ปหาตพฺโพ, โส จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสิสฺส ปหียติ. ทิฏฺฐาสโว ธมฺเมสุ ปหาตพฺโพ, โส ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสิสฺส ปหียติ. ภวาสโว อาสตฺติยา ปหาตพฺโพ, โส เวทนาสุ เวทนานุปสฺสิสฺส ปหียติ. กามาสโว ปญฺจสุ กามคุเณสุ ปหาตพฺโพ, โส กาเย กายานุปสฺสิสฺส ปหียติ. ตตฺถ กายานุปสฺสนา ทุกฺขมริยสจฺจํ ภชติ. เวทนานุปสฺสนา ปญฺจนฺนํ อินฺทฺริยานํ ปจฺจโย สุขินฺทฺริยสฺส ทุกฺขินฺทฺริยสฺส โสมนสฺสินฺทฺริยสฺส โทมนสฺสินฺทฺริยสฺส อุเปกฺขินฺทฺริยสฺส, สตฺตกิเลโสปจาโร เตน สมุทยํ ภชติ. จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสนา นิโรธํ ภชติ. ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสนา มคฺคํ ภชติ. เตนสฺส จตูสุ จ ทสฺสเนน ตสฺเสว สพฺเพ ปหียนฺติ, เยน นิทฺทิฏฺฐา ปฐมํ อุนฺนฬานํ ปมตฺตานํ เตสํ วฑฺฒนฺติ อาสวา. ชานโต หิ ปสฺสโต อาสวานํ ขโย ทุกฺขํ สมุทโย นิโรโธ มคฺโค หิ อกุสลา ธมฺมา. เอวํ ปริเยสิตพฺพา. ยาว ตสฺส อกุสลสฺส คติ ตโต ปฏิปกฺเขน อกุสเล ธมฺเม ปริเยสติ เตสํ กิเลสานํ หาเรน อาวฏฺฏติ. อยํ วุจฺจเต อาวฏฺโฏ หาโร. เอวํ สุกฺกาปิ ธมฺมา ปริเยสิตพฺพา. อกุสลธมฺเม อาคมิสฺส. त्यामध्ये, चिकटून राहण्याने (आसक्तीने) अध्यात्माला वाहून नेणे हे कामासवाचे लक्षण आहे. इच्छा (तहान), ग्रंथी (गाठणे), अभिसंस्कार आणि कायसंस्कार हे भवासवाचे लक्षण आहे; अभिनिवेश (हट्ट) आणि परामर्श (चुकीचे आकलन) हे दिट्ठिआसवाचे (दृष्ट्यासवाचे) लक्षण आहे. धम्मांचे आकलन न होणे (अप्रतिवेध) आणि असं प्रजन्य (असंप्रजन्य) हे अविज्जासवाचे (अविद्यासवाचे) लक्षण आहे. हे चार आसव म्हणजेच चार उपादान आहेत. कामासव हे कामुपादान आहे, भवासव हे भवोपादान आहे, दिट्ठिआसव हे दिट्ठुपादान आहे, अविज्जासव हे अत्तवादुपादान आहे; या चार उपादानांमुळे पंचस्कंध (पाच स्कंध) उत्पन्न होतात. त्यामध्ये, अविज्जासव चित्तामध्ये नष्ट केला पाहिजे; तो चित्तामध्ये चित्तानुपश्यना करणाऱ्याचा नष्ट होतो. दिट्ठिआसव धम्मांमध्ये नष्ट केला पाहिजे; तो धम्मांमध्ये धम्मानुपश्यना करणाऱ्याचा नष्ट होतो. भवासव आसक्तीमध्ये नष्ट केला पाहिजे; तो वेदनांमध्ये वेदनानुपश्यना करणाऱ्याचा नष्ट होतो. कामासव पाच कामगुणांमध्ये नष्ट केला पाहिजे; तो कायेमध्ये कायानुपश्यना करणाऱ्याचा नष्ट होतो. त्यामध्ये, कायानुपश्यना दुःख-आर्यसत्याचा आश्रय घेते. वेदनानुपश्यना ही पाच इंद्रियांचा—सुखिंद्रिय, दुःखांद्रिय, सोमनस्येंद्रिय, दोमनस्येंद्रिय आणि उपेक्षेंद्रिय—प्रत्यय (कारण) असून, ती प्राण्यांच्या क्लेशांचे क्षेत्र असल्याने समुदय सत्याचा आश्रय घेते. चित्तातील चित्तानुपश्यना निरोध सत्याचा आश्रय घेते. धम्मांमधील धम्मानुपश्यना मार्ग सत्याचा आश्रय घेते. म्हणून, चार (सत्यांच्या) दर्शनाने त्या (साधकाचे) सर्व क्लेश नष्ट होतात, ज्यांच्यामुळे सुरुवातीला उद्धत आणि प्रमत्त (बेसावध) लोकांचे आसव वाढतात. कारण दुःख, समुदय, nirodha आणि मार्ग या सत्यांना जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याचा आसवांचा क्षय होतो; हेच अकुशल धम्म आहेत. अशा प्रकारे अकुशल धम्मांचा शोध घेतला पाहिजे. जोपर्यंत त्या अकुशलाची गती आहे, तोपर्यंत त्याच्या प्रतिपक्षाने (विरोधी मार्गाने) अकुशल धम्मांचा शोध घेत तो क्लेशांच्या वहनाने (हाराने) फिरतो (आवर्तन करतो). याला 'आवृत्त हार' (आवट्ठ हार) असे म्हणतात. याचप्रमाणे शुक्ल (कुशल) धम्मांचाही शोध घेतला पाहिजे, जेणेकरून अकुशल धम्मांचे आगमन होणार नाही. ตตฺถ อาวฏฺฏสฺส หารสฺส อยํ ภูมิ สติ อุปฏฺฐานา จ วิปลฺลาสา จ จตฺตาริ ญาณานิ สกฺกายสมุปฺปาทายคามินี จ ปฏิปทา สกฺกายนิโรธคามินี ปฏิปทา. त्यामध्ये, आवृत्त हाराची (आवट्ठ हाराची) ही भूमी (अधिष्ठान) आहे: स्मृतिप्रस्थान (सतिपट्ठान), विपर्यास (विपल्लास), चार ज्ञाने, सक्काय-समुदयाकडे घेऊन जाणारा मार्ग (प्रतिपदा) आणि सक्काय-निरोधाकडे घेऊन जाणारा मार्ग. ๕๑. ตตฺถ กตโม วิภตฺติ หาโร? ยํ กิญฺจิ วิภชฺชพฺยากรณียํ วุจฺจติ วิภตฺติ หาโร. ยถา กึ อาคนฺตฺวา จ ปุน ปุคฺคโล โหติ, โน วาคตํ [Pg.234] น ปริภาสติ ปริปุจฺฉตาย ปญฺหาย อติยนํ เอกสฺส กิญฺจิ – อยํ วุจฺจเต วิภตฺติ หาโร. ५१. त्यामध्ये, 'विभक्ती हार' (विभत्ति हार) कोणता आहे? जे काही विश्लेषण करून (विभजन करून) उत्तर देण्यायोग्य आहे, त्याला 'विभक्ती हार' असे म्हणतात. जसे की काय? एखादा पुद्गल (व्यक्ती) पुन्हा येणारा असतो किंवा न येणारा असतो, प्रश्नाचे स्पष्टीकरण विचारले असता तो बोलतो (उत्तर देतो), हे एकाच्या इच्छेनुसार काही साधे उत्तर नाही—याला 'विभक्ती हार' असे म्हणतात. ตตฺถ กตโม ปริวตฺตโน หาโร. ยํ กิญฺจิ ปฏิปกฺขนิทฺเทโส, อยํ วุจฺจติ ปริวตฺตโน หาโร. ยถา วุตฺตํ ภควตา สมฺมาทิฏฺฐิกสฺส ปุริสปุคฺคลสฺส มิจฺฉาทิฏฺฐิ นิชฺชิณฺณา โหตีติ วิตฺถาเรน สพฺพานิ มคฺคงฺคานิ. อยํ วุจฺจเต ปริวตฺตโน หาโร. त्यामध्ये, 'परिवर्तन हार' (परिवत्तन हार) कोणता आहे? जे काही प्रतिपक्षाच्या (विरोधी बाजूच्या) निर्देशाने दर्शवले जाते, त्याला 'परिवर्तन हार' असे म्हणतात. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे: 'सम्यक्-दृष्टी असलेल्या पुरुष-पुद्गलाची मिथ्या-दृष्टी नष्ट (क्षीर्ण) होते.' विस्ताराने सर्व मार्गांगांचा शोध घ्यावा. याला 'परिवर्तन हार' असे म्हणतात. ตตฺถ กตโม เววจโน หาโร? त्यामध्ये, 'वेवचन हार' (पर्यायवाची शब्द हार) कोणता आहे? เววจเนหิ อเนเกหิ, เอกํ ธมฺมํ ปกาสิตํ; สุตฺเต โย ชานาติ สุตฺตวิทู, เววจโน นาม โส หาโร. अनेक वेवचनांनी (पर्यायवाची शब्दांनी) एकाच धम्माचे प्रकाशन केले आहे; सुत्तामध्ये जो हे जाणतो तो 'सुत्तविदू' (सुत्त जाणणारा) होय, आणि त्या पद्धतीला 'वेवचन हार' असे म्हणतात. ยถา อายสฺมา สาริปุตฺโต เอกมฺหิ วตฺถุมฺหิ เววจเนน นานาวุตฺเตน ภควตา ปสํสิโต ‘‘มหาปญฺโญ สาริปุตฺโต หาสปญฺโญ ชวนปญฺโญ’’ติ อิทํ ปญฺญาย เววจนํ. ยถา จ มคฺควิภงฺเค นิยฺยานตฺโถ เอกเมกํ มคฺคงฺคํ เววจเนหิ นิทฺทิฏฺฐํ. เอวํ อวิชฺชาย เววจนา. เอกํ อกุสลมูลํ ตเทว สนฺตํ เตสุ เตสุ ชนปเทสุ เตน เตน ปชานนฺติ. น หิ อเนน ตเทวปิ อาลปิยนฺติ อญฺญํ ภชติ. สพฺพกามชหสฺส ภิกฺขุโนติ กามา อาลปิตา. ยสฺส นิตฺถิณฺโณ สงฺโกติ เตเยว กาเม สงฺกาติ อาลปติ. สุณมานสฺส ปุเรตรํ รชฺชนฺติ เตเยว กาเม รชฺชนฺติ อาลปติ. เอวํ สุตฺตมฺหิ โย ธมฺโม เทสิยติ ตสฺส ปริเยฏฺฐิ ‘‘กตมสฺส ธมฺมสฺส อิทํ นามํ กตมสฺส อิทํ เววจน’’นฺติ. สพฺพญฺญู หิ เยสํ เยสํ ยา นิรุตฺติ โหติ, ยถาคามิ เตน เตน เทเสตีติ ตสฺส เววจนํ ปริเยสิตพฺพํ. อยํ เววจโน หาโร. जसे की आयुष्यमान सारिपुत्तांची भगवंतांनी एकाच विषयावर वेगवेगळ्या वेवचनांनी (पर्यायांनी) प्रशंसा केली: 'सारिपुत्त महाप्रज्ञ आहेत, हासप्रज्ञ आहेत, जवनप्रज्ञ आहेत.' हे प्रज्ञेचे वेवचन (पर्याय) आहे. आणि जसे मार्गविभंगात नैर्याणिक अर्थाने प्रत्येक मार्गांग वेवचनांनी निर्देशित केले आहे. याचप्रमाणे अविज्जेची (अविद्येची) वेवचने आहेत. एकच अकुशल मूळ अस्तित्वात असताना, त्या त्या जनपदांमध्ये (प्रदेशांमध्ये) लोक त्याला त्या त्या वेवचनाने (नावाने) ओळखतात. कारण या लोकांनी ज्या नावाने त्याला संबोधले, तेच ते ओळखतात, इतर नाही. 'सर्व कामे सोडणाऱ्या भिक्खूची' यामध्ये 'काम' या शब्दाने संबोधले आहे. 'ज्याची शंका पार झाली आहे' यामध्ये त्या कामांविषयीच शंका असे संबोधले आहे. 'ऐकणाऱ्याला आधीच राग (आसक्ती) उत्पन्न होतो' यामध्ये त्या कामांमध्येच ते रमतात असे संबोधले आहे. अशा प्रकारे सुत्तामध्ये ज्या धम्माचा उपदेश केला आहे, त्याचा शोध घ्यावा: 'हा कोणत्या धम्माचा नामनिर्देश आहे? हे कोणत्या धम्माचे वेवचन आहे?' कारण सर्वज्ञ (बुद्ध) ज्यांची जी निरुक्ती (भाषा/व्याख्या) असते, त्यांच्या ज्ञानाच्या क्षमतेनुसार त्या त्या वेवचनाने उपदेश करतात. म्हणून त्याचे वेवचन शोधले पाहिजे. याला 'वेवचन हार' असे म्हणतात. ๕๒. ตตฺถ กตโม ปญฺญตฺติ หาโร? จตฺตาริ อริยสจฺจานีติ สุตฺตํ นิทฺทิสติ, นิกฺเขปปญฺญตฺติ. ยา สมุทยปญฺญตฺติ. กพฬีกาเร อาหาเร อตฺถิ ฉนฺโท อตฺถิ ราโค ยาว ปติฏฺฐิตํ. ตตฺถ วิญฺญาณํ ปภวปญฺญตฺตึ ปญฺญเปติ. กพฬีกาเร อาหาเร นตฺถิ ฉนฺโท…เป… สมุคฺฆาติ ปญฺญตฺติ. ५२. त्यामध्ये, 'प्रज्ञप्ती हार' (पण्ञत्ति हार) कोणता आहे? 'चार आर्यसत्ये' हे सुत्त निर्देश करते, ही 'निक्षेप प्रज्ञप्ती' (निक्खेपपण्ञत्ति) आहे. जी 'समुदय प्रज्ञप्ती' आहे. कवलिकार आहारावर (कवळीकार आहारावर) जोपर्यंत छंद आणि राग असतो, तोपर्यंत विज्ञान प्रतिष्ठित राहते. तेथे विज्ञानाला 'प्रभव प्रज्ञप्ती' (उत्पत्ती प्रज्ञप्ती) म्हणून प्रज्ञप्त केले जाते. कवलिकार आहारावर छंद नसतो... पे... ही 'समुद्घात प्रज्ञप्ती' (नष्ट करणारी प्रज्ञप्ती) आहे. ตสฺส กามาสวาปิ จิตฺตํ วิมุจฺจติ, ภวาสวาปิ จิตฺตํ วิมุจฺจติ, อวิชฺชาสวาปิ จิตฺตํ วิมุจฺจตีติ ปหานปญฺญตฺตึ ปญฺญเปติ. ตณฺหา ยสฺส ปุรกฺขตา ปญฺญา [Pg.235] ปริวตฺตติ คาถา มนาปปญฺญตฺตึ ปญฺญเปติ. เอวํ ปน มนาปปญฺญตฺตีติ เอกธมฺมํ ภควา ปญฺญเปติ. น หิ ตณฺหา ทุกฺขสมุทโยติ กาเรตฺวา สพฺพตฺถ ตณฺหาสมุทโย นิทฺทิสิตพฺโพ. ยถา อุปฺปนฺนํ กามวิตกฺกํ นาธิวาเสติ วิโนเทติ ปชหตีติ ปฏิกฺเขปปญฺญตฺติ. เอวํ สพฺเพสํ ธมฺมานํ กุสลานญฺจ อกุสลานญฺจ ยญฺจสฺส ธมฺมกฺเขตฺตํ ภวติ, โส เจว ธมฺโม ตตฺถ ปวตฺตติ. ตทวสิฏฺฐา ธมฺมา ตสฺสานุวตฺตกา โหนฺติ. สา ทุวิธา ปญฺญตฺติ – ปราธีนปญฺญตฺติ จ สาธีนปญฺญตฺติ จ. กตมา สาธีนปญฺญตฺติ? สมาธึ, ภิกฺขเว, ภาเวถ, สมาหิโต, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ยถาภูตํ ปชานาติ. ‘‘รูปํ อนิจฺจ’’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ, อยํ สาธีนปญฺญตฺติ ปราธีนปญฺญตฺติ จ, สา ปญฺญตฺติ ปญฺญาย จ สีลสฺส จ, ยถา จตฺตาริ ฌานานิ ภาเวถ. ตสฺส อตฺถิ สมาธินฺทฺริยํ มุทูนิ จตฺตาริ อินฺทฺริยานิ ตานิ จตุปราธีนานิ, ตีณิ อเวจฺจปฺปสาเทติ ปราธีนํ สมาธินฺทฺริยํ จตฺตาริ อินฺทฺริยานิ ปราธีนาติ จตูสุ อริยสจฺเจสุ อปราธีนํ ปญฺญินฺทฺริยํ สติปฏฺฐาเนสุ สมฺมปฺปธาเนสุ วีริยินฺทฺริยํ. อิติ สเก ปทฏฺฐาเน สเก เขตฺตสาธีโน โส ธมฺโม, โส จ ตตฺถ ปญฺญาเปตพฺโพ. ตสฺส ปฏิปกฺขา นิฆาโต นิทฺทิสิตพฺโพ. เอตฺถายํ อเนกาการปญฺญตฺติ เกน การเณน อยํ ธมฺโม ปญฺญตฺโตติ. อยํ วุจฺจเต ปญฺญตฺติ. त्या साधकाच्या चित्ताची कामासवापासूनही मुक्ती होते, भवासवापासूनही चित्ताची मुक्ती होते आणि अविद्यासवापासूनही चित्ताची मुक्ती होते, अशी 'प्रहाण-प्रज्ञप्ती' भगवान प्रज्ञापित करतात. 'ज्याला तृष्णा समोर ठेवलेली असते, त्याची प्रज्ञा फिरते' ही गाथा 'मनाप-प्रज्ञप्ती' (मनोरम प्रज्ञप्ती) प्रज्ञापित करते. अशा प्रकारे, 'मनाप-प्रज्ञप्ती' द्वारे भगवान एकाच धर्माला प्रज्ञापित करतात. कारण तृष्णा हाच दुःखसमुदय आहे, असा निश्चय न करता सर्व ठिकाणी तृष्णा हाच समुदय आहे असे निर्देशित केले पाहिजे. जसे की, उत्पन्न झालेल्या कामवितर्काचा स्वीकार न करणे, तो दूर करणे आणि त्याचा त्याग करणे, याला 'प्रतिक्षेप-प्रज्ञप्ती' म्हणतात. अशा प्रकारे, सर्व कुशल आणि अकुशल धर्मांमध्ये जे त्याचे धर्मक्षेत्र असते, तोच धर्म तेथे प्रवृत्त होतो. त्याचे उरलेले धर्म त्याचे अनुवर्ती होतात. ती प्रज्ञप्ती दोन प्रकारची आहे - पराधीन-प्रज्ञप्ती आणि स्वाधीन-प्रज्ञप्ती. स्वाधीन-प्रज्ञप्ती कोणती? 'भिक्खूहो, समाधीची भावना करा. समाहित झालेला भिक्खू यथाभूत (जसे आहे तसे) जाणतो.' 'रूप अनित्य आहे' असे तो यथाभूत जाणतो. ही 'स्वाधीन-प्रज्ञप्ती' आहे. आणि पराधीन-प्रज्ञप्ती कोणती? ती प्रज्ञा आणि शीलाची प्रज्ञप्ती आहे, जसे की 'चार ध्यानांची भावना करा'. त्याच्याकडे समाधीन्द्रिय असते. जी चार मृदू इंद्रिये आहेत, ती चार पराधीन आहेत. तीन अवेच्चप्पसाद (अढळ श्रद्धा) वर पराधीन आहेत. समाधीन्द्रिय आणि चार इंद्रिये पराधीन आहेत. चार आर्य सत्यांवर प्रज्ञेन्द्रिय अपराधीन (स्वाधीन) आहे, आणि सतिपट्ठनांमध्ये व सम्मप्पधानांमध्ये वीरियिन्द्रिय अपराधीन आहे. अशा प्रकारे, आपल्या स्वतःच्या पदस्थानात आणि स्वतःच्या क्षेत्रात स्वाधीन असलेला तो धर्म तेथे प्रज्ञापित केला पाहिजे. त्याच्या प्रतिपक्षाचा (विरोधी धर्माचा) विनाश निर्देशित केला पाहिजे. येथे ही अनेक प्रकारची प्रज्ञप्ती कोणत्या कारणाने हा धर्म प्रज्ञापित केला गेला आहे, हे दर्शवते. याला 'प्रज्ञप्ती हार' असे म्हणतात. ๕๓. ตตฺถ กตโม โอตรโณ หาโร? ฉสุ ธมฺเมสุ โอตาเรตพฺพํ. กตเมสุ ฉสุ? ขนฺเธสุ ธาตูสุ อายตเนสุ อินฺทฺริเยสุ สจฺเจสุ ปฏิจฺจสมุปฺปาเทสุ. นตฺถิ ตํ สุตฺตํ วา คาถา วา พฺยากรณํ วา. อิเมสุ ฉนฺนํ ธมฺมานํ อญฺญตรสฺมึ น สนฺทิสฺสติ. เอตฺตาวตา เอส สพฺพา เทสนา ยา ตา ขนฺธา วา ธาตุโย วา อายตนานิ วา สจฺจานิ วา ปฏิจฺจสมุปฺปาโท วา, ตตฺถ ปญฺจนฺนํ ขนฺธานํ เวทนากฺขนฺโธ ราคโทสโมหานํ ปทฏฺฐานํ. ตตฺถ ติสฺโส เวทนาโย ตสฺส สุขาย เวทนาย โสมนสฺโส สวิจาโร, ทุกฺขาย เวทนาย โทมนสฺโส สวิจาโร, อทุกฺขมสุขาย เวทนาย อุเปกฺโข สวิจาโร. ยํ ปุน ตตฺถ เวทยิตํ อิทํ ทุกฺขสจฺจํ, ขนฺเธสุ สงฺขารกฺขนฺโธ ตตฺถ กาโย ปมตฺตํ สอุปวตฺตติ, ตญฺจ สงฺขารคโต ทฺวิธา จ ภวงฺโคตรณํ กมฺมํ ตีณิ จ สงฺขารานิ ปุญฺญาภิสงฺขารา วา อปุญฺญา วา อาเนญฺชา วา เหตุ สพฺพสราคสฺส โน วีตราคสฺส, โทสสฺส อภิสงฺขารานิ จ อวีตราโค เจเตติ จ ปกปฺเปติ จ, วีตราโค [Pg.236] ปน เจเตติ จ โน อภิสงฺขโรติ, ยํ อุณฺหํ วชิรํ กฏฺเฐ วา รุกฺเข วา อญฺญตฺถ วา ปตนฺตํ ภินฺทติ จ ฑหติ จ, เอวํ สราคเจตนา เจเตติ จ อภิสงฺขโรติ จ. ยถา สตํ วชิรํ น ภินฺทติ น จ ฑหติ, เอวํ วีตราคเจตนา เจเตติ น จ อภิสงฺขโรติ. ตตฺถ ปญฺจนฺนํ ขนฺธานํ เอโก ขนฺโธ อนินฺทฺริยสรีรํ สญฺญากฺขนฺโธ. ५३. त्यात 'ओतरण हार' (अवतरण हार) कोणता? सहा धर्मांमध्ये अवतरण केले पाहिजे. कोणत्या सहा धर्मांमध्ये? स्कंध, धातू, आयतने, इंद्रिये, सत्ये आणि प्रतीत्यसमुत्पाद यामध्ये. असे कोणतेही सूत्र, गाथा किंवा व्याकरण (स्पष्टीकरण) नाही, जे या सहा धर्मांपैकी कोणत्या ना कोणत्या धर्मात दिसून येत नाही. या मर्यादेपर्यंत, ही सर्व देशना आहे, जी स्कंध, धातू, आयतने, सत्ये किंवा प्रतीत्यसमुत्पाद आहे. तेथे पाच स्कंधांपैकी वेदनास्कंध हा राग, द्वेष आणि मोहाचे पदस्थान (तात्कालिक कारण) आहे. तेथे तीन वेदना आहेत. त्यात, सुखद वेदनेमध्ये सविचार सोमनस्य (आनंद) असतो, दुःखद वेदनेमध्ये सविचार डोमनस्य (खिन्नता) असते, आणि अदुःख-असुख (तटस्थ) वेदनेमध्ये सविचार उपेक्षा असते. पुन्हा, तेथे जे काही अनुभवले जाते, ते 'दुःख सत्य' आहे. स्कंधांमध्ये तो संस्कारस्कंध आहे. तेथे प्रमादी (असावध) व्यक्तीच्या शरीराचा संबंध येतो, आणि तो संस्कारात गेलेला असताना, दोन प्रकारे भवंगात अवतरण करणारे कर्म होते. तसेच तीन प्रकारचे संस्कार - पुण्याभिसंस्कार, अपुण्याभिसंस्कार किंवा आणेञ्जाभिसंस्कार (अचल संस्कार) - हे सर्व सराग (रागासहित) व्यक्तीसाठी कारण असतात, वीतराग (रागरहित) व्यक्तीसाठी नाही. द्वेषाचे अभिसंस्कार देखील अवीतराग व्यक्ती चेतित करतो (विचार करतो) आणि कल्पित करतो, परंतु वीतराग व्यक्ती चेतित करतो, पण अभिसंस्कार करत नाही. जसे की, उष्ण वज्र लाकडावर, झाडावर किंवा इतर कोणत्याही ठिकाणी पडले असता, ते त्याला छिन्नभिन्न करते आणि जाळून टाकते; त्याचप्रमाणे, सराग चेतना चेतितही करते आणि अभिसंस्कारही करते. जसे की, शीतल वज्र छिन्नभिन्न करत नाही आणि जाळतही नाही; त्याचप्रमाणे, वीतराग चेतना चेतित करते, पण अभिसंस्कार करत नाही. तेथे पाच स्कंधांपैकी एक स्कंध जो इंद्रियरहित शरीराशी संबंधित आहे, तो संज्ञास्कंध आहे. ตตฺถ ธาตูนํ อฏฺฐารส ธาตุโย. ตตฺถ ยา รูปี ทส ธาตุโย, ตาสุ เทสิยมานาสุ รูปกฺขนฺโธ นิทฺทิสิตพฺโพ, ทุกฺขํ อริยสจฺจํ. เยปิ จ ฉ วิญฺญาณกายา มโนธาตุสตฺตมา, ตตฺถ วิญฺญาณกฺขนฺโธ จ นิทฺทิสิตพฺโพ, ทุกฺขํ อริยสจฺจํ. ธมฺมธาตุ ปน ธมฺมสโมสรณา, โส ธมฺโม เหตุนา จ นิสฺสนฺเทน จ ผเลน จ กิจฺเจน จ เววจเนน จ เยน เยน อุปลพฺภติ, เตน เตน นิทฺทิสิตพฺโพ. ยทิ วา กุสลา ยทิ วา อกุสลา ยทิ วา อพฺยากตา ยทิ วา อสงฺขตา. ทฺวาทสนฺนํ อายตนานํ ทส อายตนานิ รูปานิ ตํ ทุกฺขํ อริยสจฺจํ นิทฺทิสิตพฺพํ. รูปกฺขนฺโธ จ มนายตนญฺจ วิญฺญาณกฺขนฺเธน นิทฺทิสิตพฺพํ, ทุกฺขํ อริยสจฺจํ. ธมฺมายตนํ นานาธมฺมสโมสรณํ. ตตฺถ เย ธมฺมา อินฺทฺริยานํ อินฺทฺริเยสุ นิทฺทิสิตพฺพา, เย อนินฺทฺริยานํ อนินฺทฺริเยสุ นิทฺทิสิตพฺพา. ปริยายโต จ โอตาเรตพฺพา. ยถา สา ธมฺมธาตุ ตถา ธมฺมายตนํ ปริเยสิตพฺพํ. ยาเยว หิ ธมฺมธาตุ ตเทว ธมฺมายตนํ อนูนํ อนธิกํ. तेथे धातूंमध्ये अठरा धातू आहेत. तेथे ज्या दहा रूपी (भौतिक) धातू आहेत, यांचे उपदेशन करताना रूपस्कंध निर्देशित केला पाहिजे, जो 'दुःख आर्यसत्य' आहे. आणि जे सहा विज्ञान-काय (विज्ञान धातू) आहेत आणि सातवी मनोधातू आहे, तेथे विज्ञानस्कंध निर्देशित केला पाहिजे, जो 'दुःख आर्यसत्य' आहे. परंतु धर्मधातू ही धर्मांचे संमीलन (एकत्र येणे) आहे. तो धर्म हेतूने, निस्यंदाने (परिणामाने), फलाने, कृत्याने (कार्याने) आणि वेवचनाने (पर्यायी शब्दाने) ज्या ज्या प्रकारे उपलब्ध होतो, त्या त्या प्रकारे निर्देशित केला पाहिजे - मग तो कुशल असो, अकुशल असो, अव्याकृत असो वा असंस्कृत असो. बारा आयतनांपैकी दहा आयतने रूप (भौतिक) आहेत, ती 'दुःख आर्यसत्य' म्हणून निर्देशित केली पाहिजेत. रूपस्कंध आणि मनायतन हे विज्ञानस्कंधाद्वारे निर्देशित केले पाहिजे, जे 'दुःख आर्यसत्य' आहे. धर्मायतन हे विविध धर्मांचे संमीलन आहे. तेथे जे धर्म इंद्रियांचे आहेत, ते इंद्रियांमध्ये निर्देशित केले पाहिजेत; जे अनेंद्रियांचे (इंद्रियेतर) आहेत, ते अनेंद्रियांमध्ये निर्देशित केले पाहिजेत. आणि पर्यायाने त्यांचे अवतरण केले पाहिजे. जशी ती धर्मधातू आहे, तसेच धर्मायतन शोधले पाहिजे. कारण जी धर्मधातू आहे, तेच धर्मायतन आहे - कमी नाही आणि जास्तही नाही. ตตฺถ ปฏิจฺจสมุปฺปาโท อตฺถิ ติวิโธ, อตฺถิ จตุพฺพิโธ, อตฺถิ ทุวิโธ. ตตฺถ ติวิโธ ปฏิจฺจสมุปฺปาโท เหตุผลนิสฺสนฺโท. อวิชฺชา สงฺขารา ตณฺหา อุปาทานํ จ อยํ เหตุ, วิญฺญาณํ นามรูปํ สฬายตนํ ผสฺโส เวทนา จ อยํ ปจฺจโย, โย ภโว อยํ วิปาโก, ยา ชาติ มรณํ อยํ นิสฺสนฺโท. तेथे प्रतीत्यसमुत्पाद तीन प्रकारचा आहे, चार प्रकारचा आहे आणि दोन प्रकारचा आहे. तेथे तीन प्रकारचा प्रतीत्यसमुत्पाद म्हणजे - हेतू, फल आणि निस्यंद (परिणाम) असा आहे. अविद्या, संस्कार, तृष्णा आणि उपादान - हा 'हेतू' आहे. विज्ञान, नामरूप, षडायतन, स्पर्श आणि वेदना - हा 'प्रत्यय' आहे. जो भव आहे, तो 'विपाक' (फल) आहे. जी जाती (जन्म) आणि मरण आहे, तो 'निस्यंद' (परिणाम) आहे. กถํ จตุพฺพิโธ เหตุ ปจฺจโย วิปาโก นิสฺสนฺโท จ? อวิชฺชา จ ตณฺหาสงฺขารา จ อุปาทานํ จ – อยํ เหตุ. วิญฺญาณํ นามรูปสฺส ปจฺจโย. นามรูปํ อุปปชฺชติ, ตถา อุปปนฺนสฺส สฬายตนํ ผสฺโส เวทนา จ – อยํ ปจฺจโย. โย ภโว อยํ วิปาโก. ยา ชาติ ยา จ ชรามรณํ – อยํ นิสฺสนฺโท. चार प्रकारचा प्रतीत्यसमुत्पाद कसा असतो - हेतू, प्रत्यय, विपाक आणि निस्यंद? अविद्या, तृष्णा, संस्कार आणि उपादान - हा 'हेतू' आहे. विज्ञान हे नामरूपासाठी प्रत्यय होते, नामरूप उत्पन्न होते; तसेच, उत्पन्न झालेल्या नामरूपासाठी षडायतन, स्पर्श आणि वेदना हे प्रत्यय होतात - हा 'प्रत्यय' आहे. जो भव आहे, तो 'विपाक' आहे. जी जाती (जन्म) आणि जे जरामरण आहे, तो 'निस्यंद' आहे. กถํ ทุวิโธ ปฏิจฺจสมุปฺปาโท? อวิชฺชา สงฺขารา ตณฺหา อุปาทานํ – อยํ สมุทโย. วิญฺญาณํ นามรูปํ สฬายตนํ ผสฺโส เวทนา ภโว ชาติ มรณญฺจ [Pg.237] – อิทํ ทุกฺขํ. ยํ ปน อวิชฺชานิโรธา สงฺขารนิโรโธ อิมานิ ตปฺปฏิปกฺเขน ทฺเว สจฺจานิ. ตสฺมา ปฏิจฺจสมุปฺปาโท เยน อากาเรน นิทฺทิฏฺโฐ, เตน เตน นิทฺทิสิตพฺโพ. दोन प्रकारचा प्रतीत्यसमुत्पाद कसा असतो? अविद्या, संस्कार, तृष्णा आणि उपादान - हा 'समुदय' आहे. विज्ञान, नामरूप, षडायतन, स्पर्श, वेदना, भव, जाती आणि मरण - हे 'दुःख' आहे. परंतु अविद्येच्या निरोधाने जो संस्कारांचा निरोध होतो, हे त्याच्या प्रतिपक्षाने इतर दोन सत्ये आहेत. म्हणून, प्रतीत्यसमुत्पाद ज्या ज्या प्रकारे निर्देशित केला गेला आहे, त्या त्या प्रकारे तो निर्देशित केला पाहिजे. ตถา พาวีสติ อินฺทฺริยานิ. ทฺวาทส อินฺทฺริยานิ จกฺขุนฺทฺริยานิ จกฺขุนฺทฺริยํ เยน โทมนสฺสินฺทฺริยํ, อิทํ ทุกฺขํ. ปุริสินฺทฺริยํ จ ทิฏฺฐิยา จ ตณฺหาปทฏฺฐานํ. ยโต ปุริโส ปุริสกานํ ตํ เอวํ กาตพฺพตา. อถ อชฺฌตฺตํ สารชฺชติ. อยํ อหํกาโร ตํ ยสา สารตฺโต พหิทฺธา ปริเยสติ, อยํ มมํกาโร เอวํ อิตฺถี, ตตฺถ สุขินฺทฺริยํ จ โสมนสฺสินฺทฺริยํ จ ปุริสินฺทฺริยสฺสานุวตฺตกา โหนฺติ. ตสฺส อธิปฺปายปริปุณฺณา โลภธมฺมา กุสลมูเล ปวฑฺเฒนฺติ. ตสฺส เจ อยมธิปฺปาโย น ปาริปูรึ คจฺฉติ. ตสฺส ทุกฺขินฺทฺริยํ จ โทมนสฺสินฺทฺริยํ จ วตฺตติ. โทโส จ อกุสลมูลํ ปวฑฺฒติ. สเจ ปน อุเปกฺขา ภาเวติ อุเปกฺขินฺทฺริยสฺส อนุวตฺตกามา ภวติ. อโมโห จ กุสลมูลํ ปวฑฺฒติ. อิติ สตฺต อินฺทฺริยานิ กิเลสวตฺถุมุปาทาย อนนฺเวมานิ อวมานิ สพฺพสฺส เวทนา อิตฺถินฺทฺริยํ ปุริสินฺทฺริยํ. ตตฺถ อฏฺฐ อินฺทฺริยานิ สทฺธินฺทฺริยํ ยาว อญฺญาตาวิโน อินฺทฺริยํ, อยํ ทุกฺขนิโรธคามินี ปฏิปทา. ทสนฺนํ ปญฺญินฺทฺริยานํ กามราคสฺส ปทฏฺฐานํ. มนินฺทฺริยํ ภวราคสฺส ปทฏฺฐานํ. ปญฺญินฺทฺริยานิ รูปราคสฺส ปทฏฺฐานํ. อิตฺถินฺทฺริยํ จ ปุริสินฺทฺริยํ จ สตฺต ปญฺญตฺติยา ปทฏฺฐานํ. ตตฺถ เยน เยน อินฺทฺริเยน ยุตฺตํ วา คาถาย โอตาเรตุํ สกฺโกติ, เตน เตน นิทฺทิสิตพฺโพ. เอวํ ขนฺเธสุ ธาตูสุ อายตเนสุ สจฺเจสุ ปฏิจฺจสมุปฺปาเทสุ อยํ โอตรโณ หาโร. तसेच बावीस इंद्रिये आहेत. बारा इंद्रिये, चक्षुंद्रिय आणि चक्षुंद्रिय ज्या कारणाने दोमनस्सिंद्रिय होते, हे दुःख (सत्य) आहे. पुरिसिंद्रिय हे दृष्टी आणि तृष्णेचे जवळचे कारण (पदस्थान) आहे. ज्या कारणाने पुरुष पुरुषांच्या त्या कर्तव्याला अशा प्रकारे करतो. नंतर तो अध्यात्मात (स्वतःमध्ये) आसक्त होतो. हा अहंकार आहे; तो यशात आसक्त होऊन बाह्य गोष्टींचा शोध घेतो, हा ममंकार आहे. याचप्रमाणे स्त्री देखील आसक्त होते. त्या इंद्रियांमध्ये सुखिंद्रिय आणि सोमनस्सिंद्रिय हे पुरिसिंद्रियाचे अनुगमन करणारे असतात. त्याच्या इच्छा पूर्ण करणारे लोभधर्म अकुशल मुळांना वाढवतात. जर त्याची ही इच्छा पूर्ण झाली नाही, तर त्याचे दुक्खिंद्रिय आणि दोमनस्सिंद्रिय प्रवृत्त होते, आणि द्वेष अकुशल मूळ वाढवतो. परंतु जर तो उपेक्षेची भावना करतो, तर तो उपेक्खिंद्रियाचे अनुगमन करण्याची इच्छा असणारा होतो, आणि अमोह कुशल मूळ वाढवतो. अशा प्रकारे सात इंद्रिये क्लेशवस्तूला धरून उत्पन्न होतात; ती कमी किंवा जास्त नसतात. सर्वांची वेदना, इत्थिंद्रिय आणि पुरिसिंद्रिय (यांच्या आश्रयाने होतात). त्यामध्ये सद्धिंद्रियापासून ते अञ्ञाताविंद्रियापर्यंत आठ इंद्रिये आहेत; ही दुःख निरोधगामिनी प्रतिपदा (मार्ग सत्य) आहे. दहा इंद्रियांमध्ये प्रज्ञेंद्रिये ही कामरागाचे जवळचे कारण आहेत. मनेंद्रिय हे भवरागाचे जवळचे कारण आहे. प्रज्ञेंद्रिये ही रूपरागाचे जवळचे कारण आहेत. इत्थिंद्रिय आणि पुरिसिंद्रिय हे सात प्रज्ञप्तींचे जवळचे कारण आहेत. त्या देशनेत ज्या ज्या इंद्रियाशी युक्त गाथेत प्रवेश करवून घेण्यास समर्थ होतो, त्या त्या इंद्रियाने निर्देश केला पाहिजे. अशा प्रकारे स्कंध, धातू, आयतन, सत्य आणि प्रतीत्यसमुत्पाद यांच्यामध्ये निर्देश केला पाहिजे. हा 'ओतरण हार' आहे. ๕๔. ตตฺถ กตโม โสธโน หาโร? โย คาถา เอเกน อารมฺโภ ภาสิสฺสนฺติ. ตตฺถ เอกิสฺสา ภาสิตาย อวสิฏฺฐาสุ ภาสิตาสุ โส อตฺโถ น นิทฺทิสิตพฺโพ. กึ การณํ? น หิ ตาว โส อตฺโถ ภาสิโต, โส อภาสิโต น สกฺกา นิทฺทิสิตุํ. ยถา กึ อปฺปมาโท อมตํ ปทนฺติ คาถา อยเมกา คาถา นิทฺทิสิตพฺพา. กึ การณํ, อตฺถิกฺขาตาว อิมสฺส อารมฺภสฺส อนภาสิตํ? ५४. त्यामध्ये 'शोधन हार' कोणता? जो गाथा एका पदाने आरंभ करून भाष्य करेल. त्यामध्ये एका गाथेचे भाष्य केले असता, उर्वरित न भाष्य केलेल्या गाथांमधील तो अर्थ निर्देशित करता येत नाही. काय कारण आहे? कारण तो अर्थ अजून भाष्य केलेला नाही; तो न भाष्य केलेला अर्थ निर्देशित करणे शक्य नाही. जसे की, 'अप्पमादो अमतं पदं' ही गाथा; ही एक गाथा निर्देशित केली पाहिजे. काय कारण आहे? कारण या आरंभाचे जे न भाष्य केलेले आहे, ते केवळ व्याख्यात (सांगितलेले) आहे. เอวํ วิเสสโต ญตฺวา, อปฺปมาทมฺหิ ปณฺฑิตา; อปฺปมาเท ปโมทนฺติ, อริยานํ โคจเร รตาติ. अशा प्रकारे विशेष रूपाने जाणून, अप्रमादामध्ये (जागरूकतेमध्ये) पंडित लोक; अप्रमादाचा आनंद घेतात, आणि आर्यांच्या गोचरात (विहारात) रममाण होतात. อิทํ [Pg.238] อภาสิตํ. อิมิสฺสาปิ คาถาย ภาสิตาย อตฺโถ นิทฺทิสิตพฺโพ. กึ การณํ, อตฺถิ ตตฺถ อวสิฏฺฐํ? เต ฌายิโน สาตติกา, นิจฺจํ ทฬฺหปรกฺกมาติ คาถา, เอวํ อิมา คาถาโย อุปธาริตา ยทา ภวนฺติ, ตทา อตฺโถ นิทฺทิสิตพฺโพ. เอวํ อสฺสุตปุพฺเพสุ สุตฺเตสุ พฺยากรเณสุ วา เอกุทฺเทโส ภาสิโต. ยา วีมํสา ตุลนา อิทํ อตฺถิ กิจฺจํ, อิทํ สุตฺตํ ภาสิตํ ตสฺส เววจนํ นิทฺทิฏฺฐํ วา น วาติ. ตตฺถ ยา วีมํสา, อยํ วุจฺจเต โสธโน หาโร. हे न भाष्य केलेले (अभाषित) आहे. या गाथेचे देखील भाष्य केले असता अर्थ निर्देशित केला पाहिजे. काय कारण आहे? कारण तेथे उर्वरित (अवशिष्ट) भाग आहे. 'ते झायिनो साततिका, निच्चं दळ्हपरक्कमा' ही गाथा; अशा प्रकारे जेव्हा या गाथा धारण केल्या जातात, तेव्हा अर्थ निर्देशित केला पाहिजे. अशा प्रकारे पूर्वी न ऐकलेल्या सूत्रांमध्ये किंवा व्याकरणांमध्ये एकच उद्देश भाष्य केला जातो. जी मीमांसा (तपासणी) आणि तुलना आहे, हे कार्य आहे. हे सूत्र भाष्य केले आहे, त्याचे वेवचन (समानार्थी शब्द) निर्देशित केले आहे की नाही. त्यामध्ये जी मीमांसा आहे, त्याला 'शोधन हार' असे म्हटले जाते. ๕๕. ตตฺถ กตโม อธิฏฺฐาโน หาโร? เอกตฺตตา จ เวมตฺตตา จ. ตตฺถ กิตปญฺญตฺติ จ กิจฺจปญฺญตฺติ จ. สา เอกตฺตตา จ เวมตฺตตา จ ยถา ปญฺญตฺติ เอกเววจเนน เวมตฺตตา ปชานาตีติ ปญฺญา, สา จ อาธิปเตยฺยฏฺเฐน ปญฺญตฺติ. ยํ อโนมตฺติยฏฺเฐน ปญฺญตฺตนฺติ. ตํ อโนมตฺติยฏฺเฐน ปญฺญาพลํ. ตนุภูตา โคจรตฺตวสา เสวสติ ตีสุ รตเนสุ อนุสฺสติ พุทฺธานุสฺสติ ธมฺมานุสฺสติ สงฺฆานุสฺสติ อวิปรีตานุสฺสรณตาย. สมฺมาทิฏฺฐิ ธมฺมานํ ปวิจเยน ธมฺมวิจยสมฺโพชฺฌงฺโค อภินีหารโต อภิญฺญาติ. สงฺเขเปน มคฺคา กา วตฺถุ อวิโกปนตาย เอกตฺตา, ยถา อุณฺเหน สํสฏฺฐํ อุณฺโหทกํ, สีเตน สํสฏฺฐํ สีโตทกํ ขาโรทกํ คุฬฺโหทกนฺติ, อิทํ เอกตฺตตา เวมตฺตตา จ. ५५. त्यामध्ये 'अधिष्ठान हार' कोणता? एकत्व (समानता) आणि भिन्नता (विविधता). त्यामध्ये प्रज्ञप्ती आणि कृत्यप्रज्ञप्ती आहे. ती एकत्व आणि भिन्नता प्रज्ञप्तीनुसार एकाच वेवचनाने (समानार्थी शब्दाने) भिन्नता जाणते, म्हणून ती 'प्रज्ञा' आहे; आणि ती अधिपत्य अर्थाने प्रज्ञप्ती आहे. जी न उणे असण्याच्या (पूर्णतेच्या) अर्थाने प्रज्ञप्त आहे, ती न उणे असण्याच्या अर्थाने 'प्रज्ञाबळ' आहे. तीन रत्नांमध्ये अविपरीत (अचूक) अनुस्मरण करण्याच्या भावाने अनुस्मृती होते - बुद्धानुस्मृती, धम्मानुस्मृती, संघानुस्मृती. गोचराच्या (आलंबनाच्या) वशतेमुळे ती 'स्मृती' (सती) आहे. सम्यक् दृष्टी ही धर्मांच्या प्रविचय (निवड) करण्याच्या अर्थाने 'धम्मविचय संबोध्यंग' आहे. अभिनीहार (प्रवृत्ती) मुळे ती 'अभिज्ञा' आहे. संक्षेपाने, वस्तूचा नाश न होण्याच्या (अविकंपन) अर्थाने मार्ग हे एकत्व आहे. जसे की गरम पाण्याने मिश्रित केलेले पाणी 'उष्णोदक' (गरम पाणी) होते, थंड पाण्याने मिश्रित केलेले पाणी 'शीतोदक' (थंड पाणी) होते, खारट पाणी, गुळोदक (गोड पाणी) होते; हे एकत्व आणि भिन्नता आहे. อตฺถิ ปุน ธมฺโม นานาธมฺมสงฺฆโต เอกโต ยถารูปํ จตฺตาโร วาเรตพฺพา, ตญฺจ รูปนฺติ เอกตฺตตา. ปถวีธาตุ อาโป เตโช วาโยธาตูติ เวมตฺตตา. เอวํ สพฺพา จตสฺโส ธาตุโย รูปนฺติ เอกตฺตตา, ปถวีธาตุ อาโป เตโช วาโยธาตูติ เวมตฺตตา. ปถวีธาตูติ ลกฺขณโต เอกตฺตตา, สํกิณฺณวตฺถุโต เวมตฺตตา. ยํ กิญฺจิ กกฺขฬลกฺขณํ, สพฺพํ ตํ ปถวีธาตูติ เอกตฺตตา. เกสา โลมา นขา ทนฺตา ฉวิ จมฺมนฺติ เวมตฺตตา. เอวํ สพฺพํ จตสฺโส ธาตุโย รูปนฺติ เอกตฺตํ. สทฺทา คนฺธา รสา โผฏฺฐพฺพาติ เวมตฺตตา. पुन्हा, विविध धर्मांच्या समूहातून एकत्रपणे योग्यतेनुसार चार गोष्टींचे ग्रहण केले जाते, आणि ते 'रूप' आहे, हे एकत्व आहे. पृथ्वीधातू, आपधातू, तेजोधातू, वायोधातू ही भिन्नता आहे. अशा प्रकारे सर्व चार धातू 'रूप' आहेत, हे एकत्व आहे; पृथ्वीधातू, आपधातू, तेजोधातू, वायोधातू ही भिन्नता आहे. 'पृथ्वीधातू' हे लक्षणाच्या दृष्टीने एकत्व आहे, संकीर्ण (मिश्रित) वस्तूच्या दृष्टीने भिन्नता आहे. जे काही कठीण लक्षण आहे, ते सर्व 'पृथ्वीधातू' आहे, हे एकत्व आहे. केस, रोम (केस), नखे, दात, त्वचा, चामडी ही भिन्नता आहे. अशा प्रकारे सर्व चार धातू 'रूप' आहेत, हे एकत्व आहे. शब्द, गंध, रस, स्प्रष्टव्य (स्पर्श) ही भिन्नता आहे. อตฺถิ ปุน ธมฺโม เวมตฺตตา อญฺโญ นามํ ลภติ. ยถา กายานุปสฺสนาย นวสญฺญา วินีลกสญฺญา อุทฺธุมาตกสญฺญา, อยํ อสุภสญฺญา, ยา เอกตฺตตา อารมฺมณโต เวมตฺตโต, สา เอวํ สญฺญาเวทนาสุ อาทีนวํ สมนุปสฺสโต ตถาธิฏฺฐานํ สมาธินฺทฺริยํ จ สาเยว [Pg.239] ธมฺเมสุ ตตฺถ สญฺญาภาวนา วีริยินฺทฺริยํ จ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสนา จิตฺเต อตฺตสญฺญํ ปชหโต ปญฺญินฺทฺริยํ จ จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสนา. (อิติ) โย โกจิ ญาณปจาโร สพฺพโส ปญฺญาย โคจโร ปญฺญา, อยํ เวมตฺตตา, ยถา กามราโค ภวราโค ทิฏฺฐิราโคติ เวมตฺตตา ตณฺหาย. อิติ ยํ เอกตฺตตาย จ เวมตฺตตาย จ ญาณํ วีมํสนา ตุลนา. อยํ อธิฏฺฐาโน หาโร. पुन्हा, असा धर्म आहे जो भिन्नतेमुळे दुसरे नाव प्राप्त करतो. जसे की कायानुपश्यनेत नऊ संज्ञा - विनीलक संज्ञा, उद्धुमातक संज्ञा इत्यादी; ही 'अशुभ संज्ञा' आहे. जी आलंबनाच्या (विषयाच्या) दृष्टीने भिन्नतेमध्ये एकत्व आहे. ती अशा प्रकारे संज्ञा आणि वेदनांमध्ये आदीनव (दोष) पाहणाऱ्या व्यक्तीसाठी तसे अधिष्ठान 'समाधिंद्रिय' आहे. तीच धर्मांमध्ये तेथे संज्ञा-भावना 'वीर्यिंद्रिय' आहे. धर्मांमध्ये धम्मानुपश्यना आणि चित्तामध्ये आत्मसंज्ञा सोडणाऱ्यासाठी 'प्रज्ञेंद्रिय' आहे; चित्तामध्ये चित्तानुपश्यना आहे. अशा प्रकारे जो काही ज्ञानाचा संचार आहे, जो पूर्णपणे प्रज्ञेचा गोचर (विषय) आहे, ती 'प्रज्ञा' आहे; ही भिन्नता आहे. जसे की कामराग, भवराग, दृष्टीराग ही तृष्णेची भिन्नता आहे. अशा प्रकारे एकत्व आणि भिन्नतेमध्ये जे ज्ञान, मीमांसा आणि तुलना आहे, हा 'अधिष्ठान हार' आहे. ๕๖. ตตฺถ กตโม ปริกฺขาโร หาโร? สเหตุ สปฺปจฺจยํ โวทานญฺจ สํกิเลโส จ, ยํ ตทุภยํ ปริเยฏฺฐิ, ส ปริกฺขาโร หาโร. อิติ ธมฺมานํ สเหตุกานํ เหตุ ปริเยสิตพฺโพ, สปฺปจฺจยานํ ปจฺจโย ปริเยสิตพฺโพ. ५६. त्यामध्ये 'परिकार हार' कोणता? हेतू आणि प्रत्ययांसह असणारे वोदान (शुद्धी) आणि संक्लेश (अशुद्धी), या दोन्हीचा जो शोध (अन्वेषण) आहे, तो 'परिकार हार' आहे. अशा प्रकारे सहेतुक धर्मांचा हेतू शोधला पाहिजे, सप्रत्यय धर्मांचा प्रत्यय शोधला पाहिजे. ตตฺถ กึ นานากรณํ, เหตุสฺส จ ปจฺจยสฺส จ? สภาโว เหตุ, ปรภาโว ปจฺจโย. ปรภาวสฺส ปจฺจโย เหตุปิ, สภาวสฺส เหตุยา ปรภาวสฺส กสฺสจิ ปจฺจโย อวุตฺโต เหตุ, วุตฺโต ปจฺจโย. อชฺฌตฺติโก เหตุ, พาหิโร ปจฺจโย. สภาโว เหตุ, ปรภาโว ปจฺจโย. นิพฺพตฺตโก เหตุ, ปฏิคฺคาหโก ปจฺจโย. เนวาสิโก เหตุ, อาคนฺตุโก ปจฺจโย. อสาธารโณ เหตุ, สาธารโณ ปจฺจโย. เอโกเยว เหตุ, อปราปโร ปจฺจโย. त्यामध्ये हेतू आणि प्रत्यय यातील काय फरक (नानाकरण) आहे? स्वभाव हा 'हेतू' आहे, परभाव हा 'प्रत्यय' आहे. परभावाचा प्रत्यय हा हेतू देखील असू शकतो, स्वभावाच्या हेतूचा परभाव हा काही ठिकाणी प्रत्यय म्हणून न बोलता हेतू म्हणून बोलला जातो, आणि प्रत्यय म्हणून बोलला जातो. आध्यात्मिक (अंतर्गत) हा 'हेतू' आहे, बाह्य हा 'प्रत्यय' आहे. स्वभाव हा 'हेतू' आहे, परभाव हा 'प्रत्यय' आहे. उत्पादक (निर्वर्तक) हा 'हेतू' आहे, प्रतिग्राहक (स्वीकारणारा) हा 'प्रत्यय' आहे. निवासी हा 'हेतू' आहे, आगंतुक (पाहुणा) हा 'प्रत्यय' आहे. असाधारण हा 'हेतू' आहे, साधारण हा 'प्रत्यय' आहे. एकच असणारा हा 'हेतू' आहे, उत्तरोत्तर (परंपरेने येणारा) हा 'प्रत्यय' आहे. เหตุสฺส อุปกรณํ สมุทาเนตพฺโพ. สมุทานํ เหตุ, ตตฺถ ทุวิโธ เหตุ. ทุวิโธ ปจฺจโย – สมนนฺตรปจฺจโย จ ปรมฺปรปจฺจโย จ. เหตุปิ ทุวิโธ – สมนนฺตรเหตุ จ ปรมฺปรเหตุ จ. ตตฺถ กตโม ปรมฺปรปจฺจโย? อวิชฺชา นามรูปสฺส ปรมฺปรปจฺจโย, วิญฺญาณํ สมนนฺตรปจฺจยตาย ปจฺจโย. ยทิ อาทิมฺหิ อวิชฺชานิโรโธ ภวติ นามรูปสฺส นิโรโธปิ. ตตฺถ สมนนฺตรํ กึ การณํ ปรมฺปรปจฺจโย สมนนฺตรปจฺจโย สมุทฺทานิโต, อยํ ปจฺจยโต. ตตฺถ กตโม ปรมฺปรเหตุ? วิชานนฺตสฺส ปรมฺปรเหตุตาย เหตุ, อญฺญากาโร สมนนฺตรเหตุตาย เหตุ. ยสฺส หิ ยํ สมนนฺตรํ นิพฺพตฺตติ, โส ตสฺส เหตุปิ ชาตินิโรธา พหิ อาการนิโรโธ, อาการนิโรธา ทณฺฑนิโรโธ, ทณฺฑนิโรธา ขณฺฑนิโรโธ. เอวํ เหตุปิ ทฺวิธา โส ตาหิ ปสฺสิตพฺโพ. हेतूच्या उपकाराचा संग्रह केला पाहिजे. हा 'समुदान-हेतू' (एकत्रित करणारा हेतू) आहे. त्यामध्ये हेतू दोन प्रकारचा आहे. प्रत्यय देखील दोन प्रकारचा आहे - समनंतर-प्रत्यय आणि परंपरा-प्रत्यय. हेतू देखील दोन प्रकारचा आहे - समनंतर-हेतू आणि परंपरा-हेतू. त्यामध्ये परंपरा-प्रत्यय कोणता आहे? अविद्या ही नाम-रूपासाठी परंपरा-प्रत्यय आहे, आणि विज्ञान हे समनंतर-प्रत्ययभावाने प्रत्यय (कारण) बनते. जर सुरुवातीला अविद्येचा निरोध झाला, तर नाम-रूपाचाही निरोध होतो. त्यामध्ये समनंतर कारण कोणते? परंपरा-प्रत्ययाने समनंतर-प्रत्यय संग्रहित केला आहे, हा 'प्रत्यय' (प्रत्ययतः) आहे. त्यामध्ये परंपरा-हेतू कोणता? जाणणाऱ्यासाठी परंपरा-हेतूच्या रूपाने तो हेतू असतो, आणि दुसरा प्रकार समनंतर-हेतूच्या रूपाने हेतू असतो. कारण ज्याच्यासाठी जे समनंतर उत्पन्न होते, ते त्याच्यासाठी हेतू देखील असते. जातीच्या (जन्माच्या) निरोधाने बाह्य आकाराचा निरोध होतो; आकाराच्या निरोधाने दंडाचा (काठीचा) निरोध होतो; दंडाच्या निरोधाने खंडाचा (तुकड्याचा) निरोध होतो. अशा प्रकारे, तो हेतू देखील दोन प्रकारांनी (त्या योग्यांनी) पाहिला पाहिजे। ปฏิจฺจสมุปฺปาโท [Pg.240] ยถา อวิชฺชาปจฺจโย ตสฺส ปุน กึปจฺจโย, อโยนิโส มนสิกาโร. โส กสฺส ปจฺจโย สงฺขารานํ, อิติ ปจฺจโย จ สมุปฺปนฺนํ จ ตสฺส โก เหตุ อวิชฺชาเยว. ตถา หิ ปุริมา โกฏิ น ปญฺญายติ. ตตฺถ อวิชฺชานุสโย อวิชฺชาปริยุฏฺฐานสฺส เหตุ ปุริมา เหตุ ปจฺฉา ปจฺจโย, สาปิ อวิชฺชาสงฺขารานํ ปจฺจโย จตูหิ การเณหิ สหชาตปจฺจยตาย สมนนฺตรปจฺจยตาย อภิสนฺทนปจฺจยตาย ปติฏฺฐานปจฺจยตาย. प्रतीत्यसमुत्पादाप्रमाणे अविद्या हा प्रत्यय (कारण) आहे. पुन्हा त्याचे कारण काय? अयोनिशो-मनसिकार (अयोग्य विचार). तो कशाचा प्रत्यय आहे? संस्कारांचा. अशा प्रकारे, प्रत्यय आणि समुत्पन्न (उत्पन्न झालेले) या दोन्हीचा हेतू कोणता? अविद्याच होय. म्हणूनच पूर्व कोटी (सुरुवात) ज्ञात होत नाही. त्यामध्ये अविद्येचा अनुशय (सुप्त वासना) हा अविद्येच्या परियुत्थानाचा (प्रकट होण्याचा) हेतू आहे. पूर्व हेतू नंतर प्रत्यय बनतो. ती अविद्या देखील संस्कारांसाठी चार कारणांनी प्रत्यय ठरते: सहजात-प्रत्ययभावाने, समनंतर-प्रत्ययभावाने, अभिष्यंदन-प्रत्ययभावाने (प्रवाहित होण्याच्या भावाने) आणि प्रतिष्ठान-प्रत्ययभावाने (आधाराच्या भावाने)। ๕๗. กถํ สหชาตปจฺจยตาย อวิชฺชาสงฺขารานํ ปจฺจโย? ยํ จิตฺตํ ราคปริยุฏฺฐํ, ตตฺถ อวิชฺชาปริยุฏฺฐาเนน สพฺพํ ปญฺญาย โคจรํ หนฺติ. ตตฺถ สงฺขารา ติปจฺจยฏฺฐิกา อทฺธาภูมิการมหตฺตสฺส อยํ อวิชฺชาสหสมุปฺปนฺนํ วุทฺธึ วิรูฬฺหึ เวปุลฺลตมาปชฺชนฺตี จตูหิ การเณหิ ปญฺญา ปหียติ. กตเมหิ จตูหิ? อนุสโย ปริยุฏฺฐานํ สํโยชนํ อุปาทานํ. ตตฺถ อนุสโย ปริยุฏฺฐานํ ชาติ ปริยุฏฺฐิตา สํยุชฺชติ สํยุตฺตา อุปาทิยติ อุปาทานปจฺจยา ภโว. เอวํ เต สงฺขารา ติวิธา อุปฺปนฺนา ภูมิคตา นาสญฺญตฺถ อยํ มคฺเคน วินีตตฺตายาติ เต ถามคตา อปติวินีตาติปิ เต สงฺขาราติ วุจฺจติ, เอวํ สเหตุสมุปฺปนฺนฏฺเฐน อตฺถิ เมว ปจฺจยา สงฺขารานํ ปจฺจโย นิทฺทิฏฺฐํ อปเนตฺวา กุสลํ อกุสลํ กุสโล จ อกุสโล จ ปกฺขิปิตพฺโพ, วิปากธมฺมา อปเนตฺวา วจนียํ อวจนียํ วจนียญฺจ อวจนียญฺจ ปกฺขิปิตพฺพํ, ภวอเปวิริตฺตา, สพฺพสุตฺตํ ปริกฺขิปิตพฺพํ. ५७. सहजात-प्रत्ययभावाने अविद्या ही संस्कारांसाठी कशी प्रत्यय (कारण) ठरते? जे चित्त रागाने (आसक्तीने) व्यापलेले असते, तिथे अविद्येच्या परियुत्थानामुळे (प्रकटीकरणामुळे) प्रज्ञेचा सर्व गोचर (विषय) नष्ट होतो. त्यामध्ये, तीन प्रत्ययांवर आधारलेले आणि अविद्येसोबत सह-उत्पन्न झालेले हे संस्कार वृद्धी, विरूळ्ही (विकास) आणि विपुलतेला प्राप्त होतात. चार कारणांमुळे प्रज्ञा नष्ट होते. ती चार कोणती? अनुशय (सुप्त वासना), परियुत्थान (प्रकटीकरण), संयोजन (बंधन) आणि उपादान (आसक्ती). त्यामध्ये, अनुशय हा परियुत्थानाशी जोडला जातो; जोडले गेल्यामुळे मनुष्य उपादान करतो; उपादानाच्या प्रत्ययाने (कारणाने) 'भव' (अस्तित्व) उत्पन्न होतो. अशा प्रकारे, भूमीला प्राप्त झालेले ते संस्कार तीन प्रकारचे उत्पन्न होतात, इतरत्र नाही. हे मार्गाद्वारे (अष्टांगिक मार्गाने) विनीत (नियंत्रित) करण्यासाठी आहे. जर ते दृढ झालेले आणि अविनीत (अनियंत्रित) राहिले, तर त्यांना 'संस्कार' (संखार) असे म्हटले जाते. अशा प्रकारे, सहेतुक उत्पन्न होण्याच्या अर्थाने प्रत्यय अस्तित्वात आहेच, जो संस्कारांसाठी प्रत्यय ठरतो. निर्दिष्ट केलेले कुशल आणि अकुशल काढून टाकून, कुशल आणि अकुशल समाविष्ट केले पाहिजे. विपाकधर्मांना काढून टाकून, वक्तव्य (बोलण्याजोगे) आणि अवक्तव्य (न बोलण्याजोगे) समाविष्ट केले पाहिजे. भवाचा क्षय होईपर्यंत संपूर्ण सूत्राचा विचार केला पाहिजे। ทส ตถาคตพลานิ จตฺตาริ เวสารชฺชานิ ปุญฺญานิ อนญฺญากตํ อวิชฺชา สมนนฺตรปจฺจยตาย สงฺขารานํ ปจฺจโย เยน จิตฺเตน สห สมุปฺปนฺนา อวิชฺชา ตสฺส จิตฺตสฺส สมนนฺตรจิตฺตํ สมุปฺปนฺนนฺติ, ตสฺส ยํ สมนนฺตรจิตฺตํ สมุปฺปนฺนนฺติ, ตสฺส ปจฺฉิมสฺส จิตฺตสฺส ปุริมจิตฺตํ เหตุปจฺจยตาย ปจฺจโย, เตน อวิชฺชา เหตุ เตน จิตฺเตน อุปาทานํ อโนกาสกตา ญาณํ น อุปฺปชฺชนฺติ. ยา ตสฺส อปฺปมาทา ธาตุ อภิชฺฌาภิสนฺทิตา ตหึ วิปลฺลาสา อุปฺปชฺชนฺติ ‘‘อสุเภ สุภ’’นฺติ ‘‘ทุกฺเข สุข’’นฺติ, ตตฺถ สงฺขารา อุปฺปชฺชนฺติ รตฺตา ทุฏฺฐา มูลสฺส เจตนา ราคปริยุฏฺฐาเนน พฺยาปาทปริยุฏฺฐาเนน อวิชฺชาปริยุฏฺฐาเนน ทิฏฺฐิวิปลฺลาโส วตฺถุนิทฺเทเส นิทฺทิสิตพฺโพ[Pg.241], ยํ วิปรีตจิตฺโต วิชานาติ อยํ จิตฺตวิปลฺลาโส, ยา วิปรีตสญฺญา อุปคฺคณฺหาติ อยํ สญฺญาวิปลฺลาโส. ยํ วิปรีตทิฏฺฐิ อภินิวิสติ อยํ ทิฏฺฐิวิปลฺลาโส. อฏฺฐ มิจฺฉตฺตานิ วฑฺฒนฺติ, ตีณิ อกุสลานิ อโยนิโส มนสิกาเร อุปฺปนฺนํ วิญฺญาณญฺจ วิชฺชญฺจ กโรนฺติ. อิติ ปุพฺพาปรนฺเต อกุสลานาตริตโร สงฺขารา วุทฺธึ เวปุลฺลตํ คจฺฉนฺติ. เต จ มหตา จ อปฺปฏิวิทิตา โปโนภวิกา สงฺขารา ภวนฺติ. อิติ เอวํ อวิชฺชา สหชาตปจฺจยตาย สงฺขารานํ ปจฺจโย สมนนฺตรปจฺจยตาย จ. तथागतांची दहा बले, चार वैशारद्ये (निर्भयता) ही पुण्यरूप आहेत, ती दुसऱ्या कोणाकडून केली जात नाहीत. अविद्या ही समनंतर-प्रत्ययभावाने संस्कारांसाठी प्रत्यय (कारण) ठरते. ज्या चित्तासोबत अविद्या उत्पन्न होते, त्या चित्तानंतरचे समनंतर-चित्त उत्पन्न होते. त्या चित्तानंतर जे समनंतर-चित्त उत्पन्न होते, त्या नंतरच्या चित्तासाठी पूर्वीचे चित्त हे हेतू-प्रत्ययभावाने प्रत्यय ठरते. त्यामुळे अविद्या हा हेतू आहे. त्या चित्तामुळे उपादान होते आणि (ज्ञानाला) वाव न मिळाल्यामुळे ज्ञान उत्पन्न होत नाही. त्याची जी अप्रमाद-धातू अभिध्येने (लोभाने) व्यापलेली असते, तिथे विपर्यास (भ्रम) उत्पन्न होतात - "अशुभाला शुभ मानणे" आणि "दुःखाला सुख मानणे". तिथे रागाच्या परियुत्थानाने, व्यापादाच्या (द्वेषाच्या) परियुत्थानाने आणि अविद्येच्या परियुत्थानाने मूळ चेतनेमध्ये आसक्त व दूषित झालेले संस्कार उत्पन्न होतात. दृष्टी-विपर्यास हा वस्तू-निर्देशामध्ये दर्शवला पाहिजे. विपरीत चित्ताने जे जाणले जाते, तो 'चित्त-विपर्यास' होय. विपरीत संज्ञेने जे ग्रहण केले जाते, तो 'संज्ञा-विपर्यास' होय. विपरीत दृष्टीने ज्याचा अभिनिवेश (दृढ निश्चय) केला जातो, तो 'दृष्टी-विपर्यास' होय. आठ मिथ्यात्वे (चुकीचे मार्ग) वाढतात. तीन अकुशल (मुळे) अयोनिशो-मनसिकारामध्ये उत्पन्न झालेल्या विज्ञानाला आणि विद्येला दूषित करतात. अशा प्रकारे, पूर्व आणि अपर अंतामध्ये (भूतकाळ आणि भविष्यकाळात) अकुशलापेक्षा श्रेष्ठ नसलेले संस्कार वृद्धी आणि विपुलतेला प्राप्त होतात. आणि ते संस्कार मोठ्या प्रमाणावर न समजलेले (अप्रतिविदित) आणि पुनर्जन्म देणारे (पौनब्भविक) ठरतात. अशा प्रकारे, अविद्या ही सहजात-प्रत्ययभावाने आणि समनंतर-प्रत्ययभावाने संस्कारांसाठी प्रत्यय ठरते। ๕๘. กถํ อภิสนฺทนากาเรน อวิชฺชา สงฺขารานํ ปจฺจโย? สา อวิชฺชา เต สงฺขาเร อภิสนฺเนติ ปริปฺผรติ. เสยฺยถาปิ นาม อุปฺปลํ วา ปทุมํ วา ตํ อุทเก วฑฺฒํ อสฺส, สีเตน วารินา อภิสนฺนํ ปริสนฺทนํ วุทฺธึ วิรูฬฺหึ เวปุลฺลตํ อาปชฺชติ. เอวํ อภิสนฺทนฏฺเฐน อวิชฺชา สงฺขารานํ ปจฺจโย. ५८. अभिष्यंदन-रूपाने (प्रवाहित होण्याच्या किंवा ओलावण्याच्या भावाने) अविद्या ही संस्कारांसाठी कशी प्रत्यय (कारण) ठरते? ती अविद्या त्या संस्कारांना ओले करते (अभिष्यंदित करते) आणि व्यापून टाकते. जसे की एखादे निळे कमळ (उत्पल) किंवा लाल कमळ (पदुम) पाण्यात वाढणारे असावे, आणि ते थंड पाण्याने ओले व सिंचित होऊन वृद्धी, विरूळ्ही (विकास) आणि विपुलतेला प्राप्त होते, त्याचप्रमाणे, अभिष्यंदनाच्या (ओलावण्याच्या) अर्थाने अविद्या ही संस्कारांसाठी प्रत्यय ठरते। กถํ ปติฏฺฐหนฏฺเฐน อวิชฺชา สงฺขารานํ ปจฺจโย? เต สงฺขารา อวิชฺชายํ นิสฺสาย วุทฺธึ วิรูฬฺหึ เวปุลฺลตํ อาปชฺชนฺติ. เสยฺยถาปิ นาม อุปฺปลํ วา ปทุมํ วา ปถวึ นิสฺสาย ปถวึ ปติฏฺฐาย วุทฺธึ วิรูฬฺหึ เวปุลฺลตํ อาปชฺชติ. เอเต สงฺขารา อวิชฺชายํ ปติฏฺฐิตา อวิชฺชายํ นิสฺสาย วุทฺธึ วิรูฬฺหึ เวปุลฺลตํ คจฺฉนฺติ. เอวํ ปติฏฺฐหนฏฺเฐน อวิชฺชา สงฺขารานํ ปจฺจโย. प्रतिष्ठान (आधाराच्या) अर्थाने अविद्या ही संस्कारांसाठी कशी प्रत्यय (कारण) ठरते? ते संस्कार अविद्येचा आश्रय घेऊन वृद्धी, विरूळ्ही (विकास) आणि विपुलतेला प्राप्त होतात. जसे की एखादे निळे कमळ किंवा लाल कमळ पृथ्वीचा आश्रय घेऊन, पृथ्वीवर प्रतिष्ठित होऊन वृद्धी, विरूळ्ही आणि विपुलतेला प्राप्त होते, तसेच हे संस्कार अविद्येमध्ये प्रतिष्ठित होऊन, अविद्येचा आश्रय घेऊन वृद्धी, विरूळ्ही आणि विपुलतेला प्राप्त होतात. अशा प्रकारे, प्रतिष्ठान (आधाराच्या) अर्थाने अविद्या ही संस्कारांसाठी प्रत्यय ठरते। ปุน ราคสหคตสฺส กมฺมสฺส วิปาเกน ปฏิสนฺธิมฺหิ ภโว นิพฺพตฺตติ, ตํ กมฺมสฺส สพฺพํ อภินิวิฏฺฐํ อญฺญาณวเสน โปโนภวิกา สงฺขาราติ วุจฺจนฺติ, เอวมฺปิ อวิชฺชาปจฺจยา สงฺขารา อตฺถิ. ปุน ปญฺจสุ เย จ เสกฺขา ปุคฺคลา, เย จ อสญฺญิสมาปตฺตึ สมาปนฺนา, เย จ ภวคตา, เย จ อนฺโตคตาเยว สํเสทชา, เย จ วา ปน อญฺโญ หิ โกจิ อนาคามิภูตา น เจเตนฺติ น จ ปตฺเถนฺติ, เตสํ กึ ปจฺจยา สงฺขารา. ปุน ราคา อตฺถิ เตสํ สงฺขารานิ อุปาทานานิ จิตฺตมนุสฺสรนฺติเยว อวิปกฺกวิปากสมูหตา อสมุจฺฉินฺนปจฺจยา เตสํ ปุน จ คโต ภวติ. เอวมฺปิ หิ อวิชฺชาปจฺจยา สงฺขารา. ปุน สา เต น อุปาทานา นปิ สงฺขารา อตฺถิ, ปุน เตสํ สตฺต อนุสยา อสมูหตา อสมุจฺฉินฺนา ตทารมฺมณํ ภวติ. วิญฺญาณสฺส ปติฏฺฐาย วิญฺญาณปจฺจยา นามรูปํ. เอวมฺปิ อวิชฺชาปจฺจยา สงฺขารา. ปุน สา ยํ กิญฺจิ กมฺมํ อาจยคามิ สพฺพํ ตํ อวิชฺชาวเสน อภิสงฺขริยติ [Pg.242] ตณฺหาวเสน จ อลฺลียติ อญฺญาณวเสน จ ตตฺถ อาทีนวมฺปิ น ชานาติ. ตเทว วิญฺญาณพีชํ ภวติ, สาเยว ตณฺหาสิเนโห ภวติ. สาเยว อวิชฺชา สมฺโมโหติ. เอวมฺปิ อวิชฺชาปจฺจยา สงฺขารา วตฺตพฺพา. อิติ อิเมหิ อากาเรหิ อวิชฺชา สงฺขารานํ ปจฺจโย. पुन्हा, रागासह असलेल्या कर्माच्या विपाकाने प्रतिसंधीमध्ये (पुनर्जन्मात) भव उत्पन्न होतो. कर्माचे ते सर्व अभिनिविष्ट (अज्ञानामुळे नवीन भवात उत्पन्न होणे) अज्ञानाच्या वशाने 'पोनोब्भविक संस्कार' (पुनर्भवाचे संस्कार) असे म्हटले जाते. अशा प्रकारे सुद्धा अविद्याप्रत्ययाने प्रवृत्त झालेले संस्कार असतात. पुन्हा, पाच प्रकारच्या पुद्गलांमध्ये जे शैक्ष पुद्गल आहेत, आणि जे असज्ञी समापत्तीला प्राप्त झालेले पुद्गल आहेत, जे भगवंतांच्या अंतर्गतच आहेत, जे संसेदज आहेत, किंवा जे इतर कोणी अनागामी झालेले आहेत, ते चेतना करत नाहीत आणि प्रवृत्ती (इच्छा) करत नाहीत; त्यांच्यासाठी कोणत्या प्रत्ययाने संस्कार होतात? पुन्हा, त्यांच्यामध्ये राग अस्तित्वात असतो; त्यांचे संस्कार उपादान आणि चित्ताचेच अनुस्मरण करतात. अविपक्व विपाकाच्या समूहामुळे आणि न तुटलेल्या प्रत्ययामुळे (कारणामुळे) त्यांचे पुन्हा भवामध्ये जाणे होते. अशा प्रकारे सुद्धा अविद्याप्रत्ययाने संस्कार होतात. पुन्हा, ते उपादानही नाहीत आणि संस्कारही नाहीत. पुन्हा, त्यांचे सात अनुशय नष्ट न झाल्यामुळे व न तुटल्यामुळे ते विज्ञानाच्या प्रतिष्ठेसाठी आलंबन होतात आणि विज्ञानप्रत्ययाने नामरूप होते. अशा प्रकारे सुद्धा अविद्याप्रत्ययाने संस्कार होतात. पुन्हा, जे काही उपचयगामी कर्म आहे, ते सर्व अविद्येच्या वशाने अभिसंस्कृत केले जाते, तृष्णेच्या वशाने चिकटते, आणि अज्ञानाच्या वशाने त्यात दोषही जाणत नाही. तेच विज्ञान-बीज होते, तीच तृष्णा स्नेह (ओलावा) होते, तीच अविद्या संमोह होते. अशा प्रकारे अविद्याप्रत्ययाने संस्कार सांगितले पाहिजेत. अशा प्रकारे या आकारांनी अविद्या ही संस्कारांचा प्रत्यय (कारण) आहे. ตตฺถ อวิชฺชาย เหตุ อโยนิโส มนสิกาโร ปจฺจโย โหติ. ตตฺถ อภิจฺเฉโท อยํ ตตฺถ ตติยํ พลํ นิวตฺติ, อยํ ปฏิสนฺธิ. ตตฺถ ปุนพฺภโว โย อเวจฺเฉโท อสมุคฺฆาตนฏฺเฐน อยํ อนุสโย. ยถา ปฏากํ วา สาฏกํ วา ทฺเว ชนา ปีเฬสุ จ เอกา วา พลํ วา อสฺส นิวาฏสฺเสสุ, น ปน ปีเฬสุ โสเสยฺย. ตตฺถ ยํ สิเนหา อาโปธาตุ อนุปุลฺลนา โสเสตพฺพา. อุณฺหธาตุมาคมฺม สเจ ปุน ตํ อากาเส นิกฺขิเปยฺย ตํ อุสฺสาเวน เยภุยฺยตรํ สิเนหมาปชฺเชยฺย, น หิ อนาคมฺม เตโชธาตุํ ปริเสสํ คจฺเฉยฺย. เอวเมว ภวคฺคปรมาปิ สมาปตฺติ น อนุรูปสฺส สมุคฺฆาตาย สํวตฺตติ. เต หิ อาลยนฺติ สมฺมสนฺติ, น จ ตณฺหาย ตณฺหาปหานํ คจฺฉนฺติ. ตตฺถ โส อสมุคฺฆาโต. อวิชฺชาย อนุสโย จ จิตฺตสฺส สมฺปลิโพโธ, อิทํ ปริยุฏฺฐานํ. ยถาภูตํ วิญฺญาณสฺส อปฺปฏิเวโธ อยํ อวิชฺชาอาสโว อวิชฺชาวิญฺญาณพีชํ ภวติ. ยํ พีชํ โส เหตุ น สมุจฺฉิชฺชติ, อสมุจฺฉิชฺชนฺโต ปฏิสนฺเทหติ. ปฏิสนฺทหนฺโต น สมุคฺฆาตํ คจฺฉติ. อสมุคฺฆาตํ จิตฺตํ ปริโยนหติ, ปริโยนทฺธจิตฺโต ยถาภูตํ นปฺปชานาติ, อิติ สญฺญาณสฺส สาสวตฺโถ, อวิชฺชตฺโถ, เหตุอตฺโถ, อวจฺเฉทตฺโถ, อนิวตฺติอตฺโถ, ผลตฺโถ ปฏิสนฺธิอตฺโถ, ปุนพฺภวตฺโถ, อสมุคฺฆาตตฺโถ, อนุสยตฺโถ, ปริยุฏฺฐานตฺโถ, อปฏิเวธนตฺโถ. เอตฺตาวตา อวิชฺชาย เขตฺตํ นิทฺทิฏฺฐํ ภวติ. อยํ วุจฺจเต ปริกฺขาโร นาม หาโร. त्यामध्ये, अविद्येचा हेतू अयोनिशो मनसिकार हा प्रत्यय (कारण) होतो. तेथे संसाराचा जो विच्छेद आहे, तो तेथे तिसऱ्या बलाला नष्ट करतो, ही प्रतिसंधी आहे. तेथे मार्गाने नष्ट न केल्याच्या स्वभावामुळे पुनर्भवाचा जो अविच्छेद (न तुटणे) आहे, तो अनुशय आहे. जसे की एखादे वस्त्र किंवा धोतर दोन व्यक्तींनी पिळले असता, त्या ओल्या वस्त्रात एक पीळ किंवा बळ निर्माण होईल, परंतु केवळ पिळल्याने ते वाळणार नाही. त्या वस्त्रातील ओलावा असलेली आपोधातू (जलतत्त्व) तेजोधातूचा (उष्णतेचा) आश्रय घेऊन वाळवली पाहिजे. जर पुन्हा ते वस्त्र उघड्यावर (आकाशात) टाकले, तर ते दवबिंदूंमुळे बहुतांश प्रमाणात पुन्हा ओले होईल; कारण तेजोधातूचा आश्रय घेतल्याशिवाय ते पूर्णपणे वाळणार नाही. याचप्रमाणे, भवाग्रापर्यंतची (नैवसंज्ञानासंज्ञायतन) समापत्ती सुद्धा अनुरूप अशा अरूपरागाच्या समूच्छेदासाठी (नष्ट करण्यासाठी) समर्थ ठरत नाही. तेथे उत्पन्न झालेले ब्रह्मदेव तृष्णेने आसक्त होतात, स्पर्श करतात, आणि तृष्णेच्या प्रहाणाला प्राप्त होत नाहीत. तेथे तो समूच्छेद होत नाही. अविद्येचा अनुशय आणि चित्ताचा अडथळा, याला परियुत्थान म्हणतात. विज्ञानाला यथाभूत (यथार्थ) ज्ञान न होणे, हा अविद्यास्रव आहे. अविद्या ही विज्ञानाचे बीज होते. जे बीज आहे, तो हेतू नष्ट होत नाही; नष्ट न झाल्यामुळे तो प्रतिसंधी घेतो. प्रतिसंधी घेणारा समूच्छेदाला प्राप्त होत नाही. समूच्छेद न झालेले चित्त आच्छादित होते; आच्छादित चित्त असलेला मनुष्य यथाभूत जाणत नाही. अशा प्रकारे संज्ञानाचा (ज्ञानाचा) सास्रव अर्थ, अविद्या अर्थ, हेतू अर्थ, अवच्छेद अर्थ, अनिवृत्ती अर्थ, फल अर्थ, प्रतिसंधी अर्थ, पुनर्भव अर्थ, असमूच्छेद अर्थ, अनुशय अर्थ, परियुत्थान अर्थ आणि अप्रतिवेध अर्थ आहे. एवढ्याने अविद्येचे क्षेत्र निर्दिष्ट होते. याला 'परिक्खार हार' असे म्हटले जाते. ๕๙. ตตฺถ กตโม สมาโรปโน หาโร? อุคฺฆฏิตมฺหิ ตมฺหิ สนฺตญฺเจว จ นํ วิตฺถารํ ปน วตฺตพฺพํ. วิตฺถารวิธํ จิตฺตญฺญา อยํ สมาโรปโน หาโร. ตตฺถ นามนิทฺเทโส อุปฆฏกา วตฺถุนิทฺเทโส เววจนํ วตฺถุภูโต วิตฺถาโร. ยถา กึ, ยา ภิกฺขูนํ วตฺตโต ปหาตพฺโพ, อยํ อุปฆฏนา. ५९. त्यामध्ये, समारोपन हार कोणता आहे? उद्घटितज्ञ पुद्गलामध्ये (थोडक्यात सांगताच समजणाऱ्या पुद्गलामध्ये) जर विस्तृत आणि स्पष्ट असलेले वचन सांगितले गेले, तर तो विविध प्रकारच्या विस्तृत चित्ताला जाणतो. हा 'समारोपन हार' आहे. त्यामध्ये नावाचा निर्देश करणे, उपघातक वस्तूचा निर्देश करणे, हे वेवचन (पर्यायवाची शब्द) आहे. वस्तूच्या स्वरूपातील निर्देश हा विस्तार आहे. जसे की काय? भिक्खूंच्या व्रताने (कर्तव्याने) जे प्रहीण (नष्ट) केले पाहिजे, ही उपघातना आहे. ตตฺถ [Pg.243] กตโม สมาโรปโน? กิญฺจิ น วตฺตพฺพํ, รูปราคํ วา นามวนฺตปหาตพฺพํ. ยาว วิญฺญาณนฺติ วิตฺถาเรน กาตพฺพานิ. อวิชฺชา ตา โอปมฺเมน ปญฺญาเปตพฺพา, อยํ สมาโรปโน. นิสฺสิตจิตฺตสฺส จ มตฺติโก จ นิสฺสโย ตณฺหา จ ทิฏฺฐิ จ. ตตฺถ ทิฏฺฐิ อวิชฺชา ตณฺหา สงฺขารา. ตตฺถ ทิฏฺฐิปจฺจยา ตณฺหา อิเม อวิชฺชาปจฺจยา สงฺขารา. ตตฺถ นิสฺสิตํ วิญฺญาณํ อิทํ สงฺขารปจฺจยา วิญฺญาณํ ยาว ชรามรณํ, อิทํ สํขิตฺเตน ภาสิเต อวสิฏฺฐํ ปโรปยติ. त्यामध्ये समारोपन कोणते आहे? काहीही सांगण्यासारखे नाही; रूपरागाला किंवा नामाच्या अंतापर्यंत प्रहीण केले पाहिजे, विज्ञानापर्यंत प्रहीण केले पाहिजे, अशा प्रकारे विस्ताराने केले पाहिजे. अविद्येचे स्वरूप उपमेने समजवले पाहिजे, हे समारोपन आहे. अविद्येवर आश्रित असलेल्या चित्ताचा मर्यादित धर्म, तृष्णा आणि दृष्टी हा आश्रय आहे. त्यामध्ये दृष्टी, अविद्या, तृष्णा आणि संस्कार आहेत. तेथे दृष्टीप्रत्ययाने तृष्णा होते, आणि अविद्याप्रत्ययाने हे संस्कार होतात. तेथे आश्रित असलेले विज्ञान, आणि संस्कारप्रत्ययाने प्रवृत्त झालेले हे विज्ञान जरा-मरणापर्यंत उत्पन्न होते. हे संक्षेपाने (थोडक्यात) सांगितले असता, उर्वरित प्रतीत्यसमुत्पादाचे समारोपन केले जाते. อนิสฺสิตสฺส จลิตํ นตฺถีติ ตสฺส เอวํ ทิฏฺฐิยา ตณฺหาย จ ปหานํ ตตฺถ ทิฏฺฐิอวิชฺชานิโรธาย ภูตํ วิญฺญาณํ สราคฏฺฐานิเยสุ ธมฺเมสุ ตํ ตํ ธมฺมํ อุเปจฺจ อญฺญํ ธมฺมํ ธาวติ มกฺกโฏปมตาย, อถ ขฺวสฺส ปริตฺเตสุ ธมฺเมสุ สราคฏฺฐานิเยสุ ฉนฺทราโค นตฺถิ กุโต ตโต จลนา, อธิมตฺเตสุ สตฺเตสุ จิตฺตํ นิเวสฺสยติ ตํ อปติฏฺฐิตํ วิญฺญาณํ อนาหารํ นิรุชฺฌติ วิญฺญาณนิโรธา นามรูปนิโรโธ ยาว ชรามรณนิโรโธ. อยํ สมาโรปโน. अनाश्रित चित्ताचे (अविद्येचा आश्रय नसलेल्या चित्ताचे) चलन (कंपन) नसते; म्हणून, दृष्टी आणि तृष्णेचे प्रहाण होते. तेथे दृष्टी आणि अविद्येच्या निरोधाने उत्पन्न झालेले विज्ञान, रागाचे आलंबन असलेल्या धर्मांमध्ये त्या त्या धर्माकडे न जाता, माकडाच्या उपमेप्रमाणे इतर धर्माकडे धावते. परंतु, त्या पुद्गलाच्या रागाचे आलंबन असलेल्या परीत्त (काम) धर्मांमध्ये छंदराग नसतो; मग तेथून चलन कोठून असणार? अधिमात्र (उत्कृष्ट) सत्त्वांमध्ये चित्ताचा आश्रय घेऊन प्रवृत्त झालेले, अप्रतिष्ठित विज्ञान आहाराशिवाय (कारणाशिवाय) निरुद्ध होते. विज्ञानाच्या निरोधाने नामरूपाचा निरोध होतो, आणि जरा-मरणाच्या निरोधापर्यंत निरोध होतो. हे समारोपन आहे. ตตฺถ ราควเสน วิญฺญาณสฺส จลิตํ สปริคฺคโห, ตสฺมึ จลิเต อสติ โย ปริกิเลโสปจาโร ติวิโธ อคฺคิ ปฏิปฺปสฺสทฺโธ ภวติ. เตนาห จลิเต อสนฺเต ปสฺสทฺธิ โหติ. ตตฺถ ยํ สมาโรปนา ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวเทติ, สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. ยาว วิมุตฺติตมิติ ญาณทสฺสนํ ภวติ. โส อาสวานํ ขยา จ วิมุตฺติ โน อุปปชฺชติ. ตสฺส อุปปตฺติสฺส อาคติคติยา อสนฺติยา เนวิธ น หุรํ น อุภยมนฺตเรน. เอเสวนฺโต ทุกฺขสฺสาติ อนุปาทิเสสา นิพฺพานธาตุ. อิทมสฺส สุตฺตสฺส มชฺเฌ สมาโรปิตํ ปฏิจฺจสมุปฺปาเท จ วิมุตฺติยํ จ โยโค น จ เอตํ ตสฺส สํขิตฺเตน ภาสิตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภชฺชนฺติ. อยํ วุจฺจเต สมาโรปโน หาโร. น จ สํกิเลสภาคิเยน สุตฺเตน สํกิเลสภาคิโย เย จ ธมฺมา สมาโรปยิตพฺพา นาญฺเญ. เอวํ วาสนาภาคิเย นิพฺเพธภาคิเย, อยํ สมาโรปโน หาโร. อิเม โสฬส หารา. त्यामध्ये, रागाच्या वशाने विज्ञानाचे जे चलन होते, ते परिग्रहाने (आसक्तीने) युक्त असते. ते चलन नसताना, जो क्लेशांचा प्रवृत्ती-उपचार होतो, तो त्रिविध अग्नी (राग, द्वेष, मोह) शांत होतो. म्हणून म्हटले आहे: 'चलन नसताना प्रस्सब्धी (शांती) होते.' तेथे हे समारोपन आहे: प्रस्सब्ध-काय (शांत शरीर) असलेला सुख अनुभवतो, सुखी असलेल्याचे चित्त समाहित होते, आणि विमुक्तीपर्यंत ज्ञानदर्शन होते. तो आसवांच्या क्षयामुळे विमुक्त होऊन निर्वाणात प्राप्त होतो. त्या निर्वाणाला प्राप्त झालेल्या पुद्गलाच्या बाबतीत, आगती आणि गती अस्तित्वात नसते; 'येथेही नाही, परलोकातही नाही, आणि दोन्हीच्या मध्येही नाही. हाच दुःखाचा अंत आहे' - हीच अनुपधिशेष निर्वाणधातू आहे. हे या सूत्राच्या मध्ये समारोपित केले आहे. प्रतीत्यसमुत्पादामध्ये आणि विमुक्तीमध्ये संबंध असावा. संक्षेपाने सांगितलेल्या त्या सूत्राचा हा अर्थ विस्ताराने विभाजित करत नाहीत. याला 'समारोपन हार' असे म्हटले जाते. संक्लेशभागीय सूत्राने जे संक्लेशभागीय धर्म आहेत, त्यांचेच समारोपन करावे, इतरांचे नाही. याचप्रमाणे वासनाभागीय आणि निर्वेधभागीय सूत्रांमध्ये सुद्धा (इतर धर्मांचे) समारोपन करू नये. हा समारोपन हार आहे. हे सोळा हार आहेत. สุวีรสฺส มหากจฺจายนสฺส ชมฺพุวนวาสิโน เปฏโกปเทเส उत्तम वीर्य (प्रयत्न) असलेल्या आणि जंबूवन येथे राहणाऱ्या महाकात्यायन थेरांच्या पेटकोपदेशामध्ये... ปญฺจมา ภูมิ. पाचवी भूमी समाप्त झाली. ๖. สุตฺตตฺถสมุจฺจยภูมิ ६. ६. सुत्तत्थसमुच्चयभूमी (सूत्राच्या अर्थाचा समुच्चय करणारी भूमी) ๖๐. พุทฺธานํ [Pg.244] ภควนฺตานํ สาสนํ ติวิเธน สงฺคหํ คจฺฉติ, ขนฺเธสุ ธาตูสุ อายตเนสุ จ. ตตฺถ ปญฺจกฺขนฺธา รูปกฺขนฺโธ ยาว วิญฺญาณกฺขนฺโธ. ทส รูปอายตนานิ จกฺขุ รูปา จ ยาว กาโย โผฏฺฐพฺพา จ, อยํ รูปกฺขนฺโธ. ตตฺถ ฉ เวทนากายา เวทนากฺขนฺโธ จกฺขุสมฺผสฺสชา เวทนา ยาว มโนสมฺผสฺสชา เวทนา, อยํ เวทนากฺขนฺโธ. ตตฺถ ฉ สญฺญากายา สญฺญากฺขนฺโธ, รูปสญฺญา ยาว ธมฺมสญฺญา อิเม ฉ สญฺญากายา, อยํ สญฺญากฺขนฺโธ. ตตฺถ ฉ เจตนากายา สงฺขารกฺขนฺโธ, รูปสญฺเจตนา ยาว ธมฺมสญฺเจตนา อิเม ฉ เจตนากายา, อยํ สงฺขารกฺขนฺโธ. ตตฺถ ฉ วิญฺญาณกายา วิญฺญาณกฺขนฺโธ, จกฺขุวิญฺญาณํ ยาว มโนวิญฺญาณํ อิเม ฉ วิญฺญาณกายา, อยํ วิญฺญาณกฺขนฺโธ. อิเม ปญฺจกฺขนฺธา. ६०. भगवान बुद्धांचे शासन स्कंध, धातू आणि आयतन अशा तीन प्रकारे संग्रहित (वर्गीकृत) होते. त्यामध्ये रूपस्कंधापासून ते विज्ञानस्कंधापर्यंत पाच स्कंध आहेत. दहा रूप-आयतन, जसे की चक्षू व रूप यांपासून ते काय व स्प्रष्टव्य (स्पर्श) पर्यंत, हा रूपस्कंध होय. त्यामध्ये सहा वेदना-समूह (वेदनाकाय) हा वेदनास्कंध होय; चक्षु-संस्पर्शजन्य वेदनेपासून ते मन-संस्पर्शजन्य वेदनेपर्यंत, हा वेदनास्कंध होय. त्यामध्ये सहा संज्ञा-समूह (संज्ञाकाय) हा संज्ञास्कंध होय; रूपसंज्ञेपासून ते धर्मसंज्ञेपर्यंत हे सहा संज्ञा-समूह आहेत, हा संज्ञास्कंध होय. त्यामध्ये सहा चेतना-समूह (चेतनाकाय) हा संस्कारस्कंध होय; रूप-संचेतनेपासून ते धर्म-संचेतनेपर्यंत हे सहा चेतना-समूह आहेत, हा संस्कारस्कंध होय. त्यामध्ये सहा विज्ञान-समूह (विज्ञानकाय) हा विज्ञानस्कंध होय; चक्षु-विज्ञानापासून ते मनो-विज्ञानापर्यंत हे सहा विज्ञान-समूह आहेत, हा विज्ञानस्कंध होय. हे पाच स्कंध आहेत. เตสํ กา ปริญฺญา? อนิจฺจํ ทุกฺขํ สญฺญา อนตฺตาติ เอสา เอเตสํ ปริญฺญา. ตตฺถ กตโม ขนฺธตฺโถ? สมูหตฺโถ ขนฺธตฺโถ, ปุญฺชตฺโถ ขนฺธตฺโถ, ราสตฺโถ ขนฺธตฺโถ. ตํ ยถา ทพฺพกฺขนฺโธ วนกฺขนฺโธ ทารุกฺขนฺโธ อคฺคิกฺขนฺโธ อุทกกฺขนฺโธ วายุกฺขนฺโธ อิติ เอวํ ขนฺเธสุ สพฺพสงฺคโหว เอวํ ขนฺธตฺโถ. त्यांची परिज्ञा (पूर्ण ज्ञान) कोणती? 'अनित्य, दुःख आणि अनात्म' अशी संज्ञा (जाणीव) असणे, ही त्यांची परिज्ञा होय. त्यामध्ये 'स्कंध' या शब्दाचा अर्थ काय? समूहाचा अर्थ म्हणजे स्कंध, पुंजाचा (संचयाचा) अर्थ म्हणजे स्कंध, आणि राशीचा अर्थ म्हणजे स्कंध होय. जसे की, द्रव्य-स्कंध (द्रव्याचा समूह), वन-स्कंध (वनाचा समूह), दारु-स्कंध (लाकडाचा समूह), अग्नि-स्कंध (अग्नीचा समूह), उदक-स्कंध (पाण्याचा समूह), आणि वायु-स्कंध (वायूचा समूह). अशा प्रकारे, स्कंधांमध्ये सर्व संग्रह (एकत्र करणे) असणे हाच स्कंधाचा अर्थ आहे. ตตฺถ อฏฺฐารส ธาตุโย จกฺขุธาตุ รูปธาตุ จกฺขุวิญฺญาณธาตุ…เป… มโนธาตุ ธมฺมธาตุ มโนวิญฺญาณธาตุ. เอตาโย อฏฺฐารส ธาตุโย. ตาสํ ปริญฺญา อนิจฺจํ ทุกฺขํ สญฺญา อนตฺตาติ เอสา เอตาสํ ปริญฺญา. ตตฺถ โก ธาตุอตฺโถ? วุจฺจเต อวยวตฺโถ ธาตุอตฺโถ. อวยโวติ จกฺขุ โน ปสาโท จกฺขุธาตุ. เอวํ ปญฺจสุ ธาตูสุ ปุน ราคววจฺเฉทตฺโถ ธาตุอตฺโถ. ววจฺฉินฺนา หิ จกฺขุธาตุ. เอวํ ปญฺจสุ ปุนราห เอกนฺติปกตฺยตฺเถน ธาตุอตฺโถติ วุจฺจเต. ตํ ยถา, ปกติยา อยํ ปุริโส ปิตฺติโก เสมฺหิโก วาติโก สนฺนิปาติโกติ เอวํ ปกติจกฺขุธาตุ ทสนฺนํ ปิยา จ สพฺเพสุ อินฺทฺริเยสุ…เป… วิสภาคตฺโถ ธาตุอตฺโถ. त्यामध्ये अठरा धातू आहेत: चक्षुधातू, रूपधातू, चक्षुविज्ञानधातू... पे... मनोधातू, धर्मधातू, मनोविज्ञानधातू. हे अठरा धातू आहेत. त्यांची परिज्ञा म्हणजे 'अनित्य, दुःख आणि अनात्म' अशी संज्ञा असणे, ही त्यांची परिज्ञा होय. त्यामध्ये 'धातू' या शब्दाचा अर्थ काय? असे म्हटले जाते की, अवयवाचा (घटकाचा) अर्थ म्हणजे धातूचा अर्थ होय. अवयव म्हणजे चक्षूचा प्रसाद (चक्षुप्रसाद) हा चक्षुधातू होय. अशा प्रकारे पाच धातूंमध्ये (जाणावे). पुन्हा, रागाचा उच्छेद (विच्छेद) करण्याचा अर्थ म्हणजे धातूचा अर्थ होय; कारण चक्षुधातू हा (रागापासून) विच्छिन्न करणारा आहे. अशा प्रकारे पाच धातूंमध्ये पुन्हा म्हटले आहे की, एकांततः प्रकृती (स्वभाव) च्या अर्थाने 'धातूचा अर्थ' असे म्हटले जाते. जसे की, प्रकृतीने (स्वभावाने) हा मनुष्य पित्तप्रकृतीचा, कफप्रकृतीचा, वातप्रकृतीचा किंवा संनिपातप्रकृतीचा आहे. अशा प्रकारे प्रकृती-चक्षुधातू हा सर्व दहा इंद्रियांमध्ये... पे... विसभागाचा (भिन्न स्वभावाचा) अर्थ म्हणजे धातूचा अर्थ होय. ตตฺถ ทฺวาทสายตนานิ กตมานิ? ฉ อชฺฌตฺติกานิ ฉ พาหิรานิ. จกฺขายตนํ ยาว มนายตนนฺติ อชฺฌตฺติกํ, รูปายตนํ ยาว ธมฺมายตนนฺติ พาหิรํ. เอตานิ ทฺวาทส อายตนานิ. เอเตสํ กา ปริญฺญา? อนิจฺจํ ทุกฺขํ สญฺญา อนตฺตาติ, เอสา เอเตสํ ปริญฺญา. อปิ [Pg.245] จ ทฺวิธา ปริญฺญา ญาตปริญฺญา จ ปหานปริญฺญา จ. ตตฺถ ญาตปริญฺญา นาม อนิจฺจํ ทุกฺขํ สญฺญา อนตฺตาติ, เอสา ญาตปริญฺญา. ปหานปริญฺญา ปน ฉนฺทราคปฺปหานา, เอสา ปหานปริญฺญา. ตตฺถ กตโม อายตนตฺโถ? วุจฺจเต อาการตฺโถ อายตนตฺโถ. ยถา สุวณฺณากโร ทุพฺพณฺณากโร, ยถา ทฺวีหิ เตหิ อากาเรหิ เต เต คาวา อุตฺติฏฺฐนฺติ. เอวํ เอเตหิ จิตฺตเจตสิกา คาวา อุตฺติฏฺฐนฺติ กมฺมกิเลสา ทุกฺขธมฺมา จ. ปุนราห อายทานตฺโถ อายตนตฺโถ. ยถา รญฺโญ อายทาเนหิ อาโย ภวติ, เอวํ อายทานตฺโถ อายตนตฺโถ. त्यामध्ये बारा आयतने कोणती? सहा आध्यात्मिक (अंतर्गत) आणि सहा बाह्य. चक्षु-आयतनापासून ते मन-आयतनापर्यंत हे आध्यात्मिक आयतन होय, आणि रूप-आयतनापासून ते धर्म-आयतनापर्यंत हे बाह्य आयतन होय. ही बारा आयतने आहेत. त्यांची परिज्ञा कोणती? 'अनित्य, दुःख आणि अनात्म' अशी संज्ञा असणे, ही त्यांची परिज्ञा होय. शिवाय, परिज्ञा दोन प्रकारची आहे: ज्ञातपरिज्ञा आणि प्रहाणपरिज्ञा. त्यामध्ये ज्ञातपरिज्ञा म्हणजे 'अनित्य, दुःख आणि अनात्म' अशी संज्ञा असणे, ही ज्ञातपरिज्ञा होय. आणि प्रहाणपरिज्ञा म्हणजे छंद-रागाचा त्याग (प्रहाण) करणे, ही प्रहाणपरिज्ञा होय. त्यामध्ये 'आयतन' या शब्दाचा अर्थ काय? असे म्हटले जाते की, आकराचा अर्थ (खाणीचा किंवा उत्पत्तीच्या स्थानाचा अर्थ) म्हणजे आयतनाचा अर्थ होय. जसे की सोन्याची खाण (सुवर्णाकर) किंवा निकृष्ट धातूची खाण (दुर्वर्णाकर); आणि ज्याप्रमाणे त्या दोन आकरांनी (स्थानांनी) ते ते बैल उभे राहतात (किंवा एकत्र येतात), त्याचप्रमाणे या आयतनांद्वारे चित्त आणि चैतसिक रूपी बैल उभे राहतात (उत्पन्न होतात) आणि कर्म-क्लेश रूपी दुःखधर्म देखील उत्पन्न होतात. पुन्हा म्हटले आहे की, आय-दान (उत्पत्ती किंवा प्राप्तीचे स्थान) चा अर्थ म्हणजे आयतनाचा अर्थ होय. ज्याप्रमाणे राजाला आय-दानातून (कराच्या उत्पन्नाच्या ठिकाणांहून) आय (उत्पन्न) प्राप्त होतो, त्याचप्रमाणे आय-दानाचा अर्थ म्हणजे आयतनाचा अर्थ होय. ๖๑. จตฺตาริ อริยสจฺจานิ ทุกฺขํ สมุทโย นิโรโธ มคฺโค จ. ทุกฺขํ ยถา สมาเสน ธมฺมาจริยํ มานสญฺจ, สมุทโย สมาเสน อวิชฺชา จ ตณฺหา จ, นิโรโธ สมาเสน วิชฺชา จ วิมุตฺติ จ, มคฺโค สมาเสน สมโถ จ วิปสฺสนา จ. ६१. चार आर्यसत्ये आहेत: दुःख, समुदाय (दुःखसमुदय), निरोध (दुःखनिरोध) आणि मार्ग (दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदा). संक्षेपाने दुःख म्हणजे धर्माचरण आणि मन होय; संक्षेपाने समुदाय म्हणजे अविद्या आणि तृष्णा होय; संक्षेपाने निरोध म्हणजे विद्या आणि विमुक्ती होय; आणि संक्षेपाने मार्ग म्हणजे शमथ आणि विपश्यना होय. ตตฺถ สตฺตตึส โพธิปกฺขิกา ธมฺมา กตเม? จตฺตาโร สติปฏฺฐานา ยาว อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอวเมเต สตฺตตึส โพธิปกฺขิกา ธมฺมา. เย ธมฺมา อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺนานํ พุทฺธานํ ภควนฺตานํ ปจฺเจกพุทฺธานํ สาวกานํ จ นิพฺพานาย สํวตฺตนฺตีติ, โส มคฺโค จตฺตาโร สติปฏฺฐานา. กตเม จตฺตาโร? อิธ ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ, สมฺมปฺปธานํ…เป… อิทฺธิปาทํ…เป… อินฺทฺริยานิ…เป… พลานิ…เป… ตตฺถ โก อินฺทฺริยตฺโถ? อินฺทตฺโถ อินฺทฺริยตฺโถ, อาธิปเตยฺยตฺโถ อินฺทฺริยตฺโถ, ปสาทตฺโถ อินฺทฺริยตฺโถ, อสาธารณํ กสฺส กิริยตฺโถ อินฺทฺริยตฺโถ อนวปริยตฺโถ พลตฺโถ, ถามตฺโถ พลตฺโถ, อุปาทายตฺโถ พลตฺโถ, อุปตฺถมฺภนตฺโถ พลตฺโถ. त्यामध्ये सदतीस (३७) बोधिपाक्षिक धर्म कोणते? चार स्मृतिप्रस्थान (सतिपट्ठान) यांपासून ते आर्य अष्टांगिक मार्गापर्यंत; अशा प्रकारे हे सदतीस बोधिपाक्षिक धर्म आहेत. जे धर्म भूत, भविष्य आणि वर्तमान काळातील भगवान बुद्ध, प्रत्येकबुद्ध आणि त्यांच्या श्रावकांच्या निर्वाणासाठी कारणीभूत ठरतात, तो मार्ग म्हणजे चार स्मृतिप्रस्थान होय. ते चार कोणते? येथे भिक्खू कायेमध्ये कायानुपश्यी (कायेचे सतत अवलोकन करणारा) होऊन विहरतो, सम्यक्प्रधान... पे... ऋद्धिपाद... पे... इंद्रिये... पे... बले... पे... त्यामध्ये 'इंद्रिय' या शब्दाचा अर्थ काय? इंद्राचा (स्वामीचा) अर्थ म्हणजे इंद्रिय, आधिपत्याचा अर्थ म्हणजे इंद्रिय, प्रसादाचा (प्रसन्नतेचा) अर्थ म्हणजे इंद्रिय, आणि असाधारण अशा क्रियेचा अर्थ म्हणजे इंद्रिय होय. अथक प्रयत्नाचा अर्थ म्हणजे बल, सामर्थ्याचा अर्थ म्हणजे बल, आधाराचा अर्थ म्हणजे बल, आणि उपस्तंभाचा (मदतीचा) अर्थ म्हणजे बल होय. ตตฺถ กตเม สตฺต โพชฺฌงฺคา? สติสมฺโพชฺฌงฺโค ยาว อุเปกฺขาสมฺโพชฺฌงฺโค. ตตฺถ กตโม อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค? สมฺมาทิฏฺฐิ ยาว สมฺมาสมาธิ. ตตฺถ อฏฺฐงฺคิโก มคฺโคติ ขนฺโธ สีลกฺขนฺโธ จ สมาธิกฺขนฺโธ จ ปญฺญากฺขนฺโธ จ. ตตฺถ ยา จ สมฺมาวาจา โย จ สมฺมากมฺมนฺโต โย จ สมฺมาอาชีโว, อยํ สีลกฺขนฺโธ. ยา จ สมฺมาสติ โย จ สมฺมาวายาโม โย จ สมฺมาสมาธิ, อยํ สมาธิกฺขนฺโธ. โย จ สมฺมาสงฺกปฺโป ยา จ สมฺมาทิฏฺฐิ, อยํ ปญฺญากฺขนฺโธ. เอวํ ตาโย ติสฺโส สิกฺขา. เอวํ ตีหากาเรหิ ทส ปทานิ…เป…. त्यामध्ये सात बोध्यंग कोणते? स्मृति-संबोध्यंगापासून ते उपेक्षा-संबोध्यंगापर्यंत. त्यामध्ये अष्टांगिक मार्ग कोणता? सम्यक्-दृष्टीपासून ते सम्यक्-समाधीपर्यंत. त्यामध्ये अष्टांगिक मार्ग म्हणजे तीन स्कंध आहेत: शीलस्कंध, समाधिस्कंध आणि प्रज्ञास्कंध. त्यामध्ये जी सम्यक्-वाचा, जो सम्यक्-कर्मान्त आणि जो सम्यक्-आजीव आहे, हा शीलस्कंध होय. जी सम्यक्-स्मृति, जो सम्यक्-व्यायाम आणि जो सम्यक्-समाधी आहे, हा समाधिस्कंध होय. जो सम्यक्-संकल्प आणि जी सम्यक्-दृष्टी आहे, हा प्रज्ञास्कंध होय. अशा प्रकारे हे तीन स्कंध म्हणजेच तीन शिक्षा (त्रिशिक्षा) होत. अशा प्रकारे तीन प्रकारांनी दहा पदे होतात... पे... ตตฺถ [Pg.246] โยคาวจโร สีลกฺขนฺเธ ฐิโต โทสํ อกุสลํ น อุปาทิยติ, โทสานุสยํ สมูหนติ, โทสสลฺลํ อุทฺธรติ, ทุกฺขเวทนํ ปริชานาติ, กามธาตุํ สมติกฺกมติ. สมาธิกฺขนฺเธ ฐิโต โลภํ อกุสลํ น อุปาทิยติ, ราคานุสยํ สมูหนติ, โลภสลฺลํ อุทฺธรติ, สุขเวทนํ ปริชานาติ, รูปธาตุํ สมติกฺกมติ. ปญฺญากฺขนฺเธ ฐิโต โมหํ อกุสลํ น อุปาทิยติ, อวิชฺชานุสยํ สมูหนติ, โมหสลฺลํ ทิฏฺฐิสลฺลญฺจ อุทฺธรติ, อทุกฺขมสุขเวทนํ ปริชานาติ, อรูปธาตุํ สมติกฺกมติ. อิติ ตีหิ ขนฺเธหิ ตีณิ อกุสลมูลานิ น อุปาทิยติ, จตฺตาริ สลฺลานิ อุทฺธรติ, ติสฺโส เวทนา ปริชานาติ, เตธาตุกํ สมติกฺกมติ. त्यामध्ये योगावाचर (साधक) शीलस्कंधामध्ये प्रतिष्ठित होऊन द्वेष रूपी अकुशलाचे उपादान करत नाही, द्वेष-अनुशयाचे समूळ उच्चाटन करतो, द्वेष रूपी शल्य (काटा) उपटून टाकतो, दुःख-वेदनेची परिज्ञा करतो, आणि कामधातूचे अतिक्रमण करतो. समाधिस्कंधामध्ये प्रतिष्ठित होऊन लोभ रूपी अकुशलाचे उपादान करत नाही, राग-अनुशयाचे समूळ उच्चाटन करतो, लोभ रूपी शल्य उपटून टाकतो, सुख-वेदनेची परिज्ञा करतो, आणि रूपधातूचे अतिक्रमण करतो. प्रज्ञास्कंधामध्ये प्रतिष्ठित होऊन मोह रूपी अकुशलाचे उपादान करत नाही, अविद्या-अनुशयाचे समूळ उच्चाटन करतो, मोह रूपी शल्य आणि दृष्टी रूपी शल्य उपटून टाकतो, अदुःख-असुख वेदनेची परिज्ञा करतो, आणि अरूपधातूचे अतिक्रमण करतो. अशा प्रकारे, तीन स्कंधांच्या द्वारे तीन अकुशल मुळांचे उपादान करत नाही, चार शल्यांना उपटून टाकतो, तीन वेदनांची परिज्ञा करतो, आणि त्रिधातूचे अतिक्रमण करतो. ๖๒. ตตฺถ กตมา อวิชฺชา? ยํ จตูสุ อริยสจฺเจสุ อญฺญาณนฺติ วิตฺถาเรน ยถา โส ปาณสชฺเชสุ กถํกถา กาตพฺพํ. ตตฺถ กตมํ วิญฺญาณํ? ฉ วิญฺญาณกายา เวทนา สญฺญา เจตนา ผสฺโส มนสิกาโร, อิทํ นามํ. ตตฺถ กตมํ รูปํ? จาตุมหาภูติกํ จตุนฺนํ มหาภูตานํ อุปาทายรูปสฺส ปญฺญตฺตึ. อิติ ปุริมกญฺจ นามํ อิทญฺจ รูปํ ตทุภยํ นามรูปนฺติ วุจฺจติ. ตตฺถ ฉฬายตนนฺติ ฉ อชฺฌตฺติกานิ อายตนานิ, จกฺขุ อชฺฌตฺติกํ อายตนํ ยาว มโน อชฺฌตฺติกํ อายตนํ. ผสฺโสติ ฉ ผสฺสกายา จกฺขุสมฺผสฺโส ยาว มโนสมฺผสฺโสติ ผสฺโส. ฉ เวทนากายา เวทนา. ตณฺหาติ ฉ ตณฺหากายา ตณฺหา. อุปาทานนฺติ จตฺตาริ อุปาทานานิ กามุปาทานํ ทิฏฺฐุปาทานํ สีลพฺพตุปาทานํ อตฺตวาทุปาทานนฺติ อุปาทานํ. ภโวติ ตโย ภวา กามภโว รูปภโว อรูปภโว. ตตฺถ กตมา ชาติ? ยา ปฐมํ ขนฺธานํ ปฐมํ ธาตูนํ ปฐมํ อายตนานํ อุปฺปตฺติ ชาติ สญฺชาติ โอกฺกนฺติ อภินิพฺพตฺติ ขนฺธานํ ปาตุภาโว, อยํ ชาติ. ตตฺถ กตมา ชรา? ชรา นาม ยํ ตํ ขณฺฑิจฺจํ ปาลิจฺจํ วลิตฺตจตา ปวิวิตฺตํ จตุนฺนํ มหาภูตานํ วิวณฺณตํ ภคฺโค ตํ ชรา หียนา ปหียนา อายุโน หานิ สํหานิ อินฺทฺริยานํ ปริเภโท อุปนาโห ปริปาโก, อยํ ชรา. ตตฺถ กตมํ มรณํ? มรณํ นาม ยํ ตสฺมึ ตสฺมึ สตฺตนิกาเย เตสํ เตสํ สตฺตานํ จุติ จวนตา มรณํ กาลงฺกิริยา อุทฺธุมาตกานํ เภโท กายสฺส ชีวิตินฺทฺริยสฺส อุปจฺเฉโท, อิทํ มรณํ. อิติ ปุริมิกา จ ชรา อิทญฺจ มรณํ ตทุภยํ ชรามรณํ. ६२. तेथे अविद्या कोणती? चार आर्यसत्यांविषयी जे अज्ञान आहे, ते विस्ताराने समजावे, ज्याप्रमाणे जिन्याच्या पायऱ्या तयार करताना 'असे की तसे' अशी शंका निर्माण होते, त्याप्रमाणे अविद्येचे स्वरूप समजावे. तेथे विज्ञान कोणते? सहा विज्ञान-काय (विज्ञानाचे समूह), वेदना, संज्ञा, चेतना, स्पर्श आणि मनसिकार, याला "नाम" म्हणतात. तेथे रूप कोणते? चार महाभूते आणि चार महाभूतांवर आधारित (उपादाय) रूपाची प्रज्ञप्ती. अशा प्रकारे, पूर्वी सांगितलेले नाम आणि हे रूप, या दोन्हीला मिळून "नामरूप" असे म्हटले जाते. तेथे "षळायतन" (सहा आयतने) म्हणजे सहा अंतर्गत आयतने होय; चक्षु हे अंतर्गत आयतन आहे, मनापर्यंत ही अंतर्गत आयतने आहेत. "स्पर्श" म्हणजे सहा स्पर्श-काय होत; चक्षु-संस्पर्श पासून मन-संस्पर्शापर्यंतच्या समूहाला स्पर्श म्हणतात. सहा वेदना-काय म्हणजे वेदना होय. "तृष्णा" म्हणजे सहा तृष्णा-काय होय. "उपादान" म्हणजे चार उपादाने होत: कामुपादान, दिट्ठुपादान (दृष्ट्युपादान), शीलब्बतूपादान (शीलव्रतोपादान) आणि अत्तवादुपादान (आत्मवादोपादान); याला उपादान म्हणतात. "भव" म्हणजे तीन भव होत: कामभव, रूपभव आणि अरूपभव. तेथे "जाती" (जन्म) कोणती? ज्याद्वारे स्कंधांची पहिली उत्पत्ती, धातूंची पहिली उत्पत्ती, आयतनांची पहिली उत्पत्ती होते; जन्म (जाती), संजाती, अवक्रांती, अभिनिर्वृत्ती आणि स्कंधांचे प्रादुर्भाव होणे, याला "जाती" म्हणतात. तेथे "जरा" (वृद्धत्व) कोणती? जरा म्हणजे जे दात पडणे, केस पांढरे होणे, त्वचेला सुरकुत्या पडणे, चार महाभूतांचे क्षीण होणे, शरीराचा वर्ण बदलणे, अवयव वाकणे आहे, ती जरा होय. तसेच आयुष्याचा ऱ्हास होणे, पूर्णपणे ऱ्हास होणे, इंद्रियांची हानी होणे, इंद्रियांचा नाश होणे, इंद्रियांचे परिपक्व होणे, याला "जरा" म्हणतात. तेथे "मरण" कोणते? मरण म्हणजे त्या त्या प्राणीसमूहातील त्या त्या प्राण्यांचे च्युत होणे, च्युत होण्याची अवस्था, मृत्यू, कालक्रिया, शरीराचा नाश होणे, जीवितेंद्रियाचा उच्छेद होणे, याला "मरण" म्हणतात. अशा प्रकारे, पूर्वी सांगितलेली जरा आणि हे मरण, या दोन्हीला मिळून "जरामरण" म्हणतात. ตตฺถ [Pg.247] อนฺธการติมิสา ยถาภูตํ อปฺปชานนลกฺขณา อวิชฺชา สงฺขารานํ ปทฏฺฐานํ ห. อภิสงฺขรณลกฺขณา สงฺขารา, อุปจยปุนพฺภวาภิโรปนปจฺจุปฏฺฐานา. เต วิญฺญาณสฺส ปทฏฺฐานํ. วตฺถุ สวิญฺญตฺติลกฺขณํ วิญฺญาณํ, ตํ นามรูปสฺส ปทฏฺฐานํ. อเนกสนฺนิสฺสยลกฺขณํ นามรูปํ, ตํ สฬายตนสฺส ปทฏฺฐานํ. อินฺทฺริยววตฺถาปนลกฺขณํ สฬายตนํ, ตํ ผสฺสสฺส ปทฏฺฐานํ. สนฺนิปาตลกฺขโณ ผสฺโส, โส เวทนาย ปทฏฺฐานํ. อนุภวนลกฺขณา เวทนา, สา ตณฺหาย ปทฏฺฐานํ. อชฺโฌสานลกฺขณา ตณฺหา, สา อุปาทานสฺส ปทฏฺฐานํ. อาทานปริหนนลกฺขณํ อุปาทานํ, ตํ ภวสฺส ปทฏฺฐานํ. นานาคติวิกฺเขปลกฺขโณ ภโว, โส ชาติยา ปทฏฺฐานํ. ขนฺธานํ ปาตุภาวลกฺขณา ชาติ, สา ชราย ปทฏฺฐานํ. อุปนยปริปากลกฺขณา ชรา, สา มรณสฺส ปทฏฺฐานํ. อายุกฺขยชีวิตอุปโรธลกฺขณํ มรณํ, ตํ ทุกฺขสฺส ปทฏฺฐานํ. กายสมฺปีฬนลกฺขณํ ทุกฺขํ, ตํ โทมนสฺสสฺส ปทฏฺฐานํ. จิตฺตสมฺปีฬนลกฺขณํ โทมนสฺสํ, ตํ โสกสฺส ปทฏฺฐานํ. โสจนลกฺขโณ โสโก, โส ปริเทวสฺส ปทฏฺฐานํ. วจีนิจฺฉารณลกฺขโณ ปริเทโว, โส อุปายาสสฺส ปทฏฺฐานํ. เย อายาสา เต อุปายาสา. तेथे, अंधकारमय मोहाने युक्त असणारी, गोष्टी जशा आहेत तशा न जाणण्याचे लक्षण असणारी "अविद्या" ही संस्कारांचे आसन्नकारण आहे. अभिसंस्कार करण्याचे लक्षण असणारे "संस्कार" हे पुनर्जन्माच्या प्रक्रियेत प्रवृत्त होण्याचे लक्षण असणारे आहेत. ते विज्ञानाचे आसन्नकारण आहेत. वस्तूचे ज्ञान करून घेण्याचे लक्षण असणारे "विज्ञान" हे नामरूपाचे आसन्नकारण आहे. अनेक आश्रयांचे लक्षण असणारे "नामरूप" हे षळायतनाचे आसन्नकारण आहे. इंद्रियांचे व्यवस्थापन करण्याचे लक्षण असणारे "षळायतन" हे स्पर्शाचे आसन्नकारण आहे. संनिपाताचे लक्षण असणारा "स्पर्श" हा वेदनेचे आसन्नकारण आहे. अनुभव घेण्याचे लक्षण असणारी "वेदना" ही तृष्णेचे आसन्नकारण आहे. आसक्तीचे लक्षण असणारी "तृष्णा" ही उपादानाचे आसन्नकारण आहे. घट्ट पकडून ठेवण्याचे लक्षण असणारे "उपादान" हे भवाचे आसन्नकारण आहे. विविध गतींमध्ये फेकण्याचे लक्षण असणारा "भव" हा जातीचे आसन्नकारण आहे. स्कंधांच्या प्रादुर्भावाचे लक्षण असणारी "जाती" ही जरेचे आसन्नकारण आहे. विनाशाकडे नेण्याचे आणि परिपक्वतेचे लक्षण असणारी "जरा" ही मरणाचे आसन्नकारण आहे. आयुष्याचा क्षय आणि जीवितेंद्रियाचा निरोध करण्याचे लक्षण असणारे "मरण" हे दुःखाचे आसन्नकारण आहे. शरीराला पीडा देण्याचे लक्षण असणारे "दुःख" हे दोमनस्याचे आसन्नकारण आहे. चित्ताला पीडा देण्याचे लक्षण असणारे "दोमनस्य" हे शोकाचे आसन्नकारण आहे. शोक करण्याचे लक्षण असणारा "शोक" हा परिदेवाचे आसन्नकारण आहे. वाणीद्वारे विलाप करण्याचे लक्षण असणारा "परिदेव" हा उपायासाचे आसन्नकारण आहे. जे आयास आहेत, तेच उपायास होत. นว ปทานิ ยตฺถ สพฺโพ อกุสลปกฺโข สงฺคหํ สโมสรณํ คจฺฉติ. กตมานิ นว ปทานิ? ทฺเว มูลกิเลสา, ตีณิ อกุสลมูลานิ, จตฺตาโร วิปลฺลาสา. ตตฺถ ทฺเว มูลกิเลสา อวิชฺชา จ ภวตณฺหา จ, ตีณิ อกุสลมูลานิ โลโภ โทโส โมโห จ. จตฺตาโร วิปลฺลาสา – ‘‘อนิจฺเจ นิจฺจ’’นฺติ สญฺญาวิปลฺลาโส จิตฺตวิปลฺลาโส ทิฏฺฐิวิปลฺลาโส, ‘‘ทุกฺเข สุข’’นฺติ สญฺญาวิปลฺลาโส จิตฺตวิปลฺลาโส ทิฏฺฐิวิปลฺลาโส, ‘‘อนตฺตนิ อตฺตา’’ติ สญฺญาวิปลฺลาโส จิตฺตวิปลฺลาโส ทิฏฺฐิวิปลฺลาโส, ‘‘อสุเภ สุภ’’นฺติ สญฺญาวิปลฺลาโส จิตฺตวิปลฺลาโส ทิฏฺฐิวิปลฺลาโส. नऊ पदे अशी आहेत, ज्यांच्यामध्ये सर्व अकुशल पक्ष समाविष्ट आणि एकत्रित होतो. ती नऊ पदे कोणती? दोन मूळ क्लेश, तीन अकुशल मुळे आणि चार विपर्यास. तेथे दोन मूळ क्लेश म्हणजे अविद्या आणि भवतृष्णा हे होत; तीन अकुशल मुळे म्हणजे लोभ, द्वेष आणि मोह हे होत. चार विपर्यास म्हणजे – "अनित्याला नित्य मानणे" हा संज्ञा-विपर्यास, चित्त-विपर्यास आणि दृष्टी-विपर्यास; "दुःखाला सुख मानणे" हा संज्ञा-विपर्यास, चित्त-विपर्यास आणि दृष्टी-विपर्यास; "अनात्म्याला आत्मा मानणे" हा संज्ञा-विपर्यास, चित्त-विपर्यास आणि दृष्टी-विपर्यास; "अशुभाला शुभ मानणे" हा संज्ञा-विपर्यास, चित्त-विपर्यास आणि दृष्टी-विपर्यास. ๖๓. ตตฺถ อวิชฺชา นาม จตูสุ อริยสจฺเจสุ ยถาภูตํ อญฺญาณํ, อยํ อวิชฺชา. ภวตณฺหา นาม โย ภเวสุ ราโค สาราโค อิจฺฉา มุจฺฉา ปตฺถนา นนฺที อชฺโฌสานํ อปริจฺจาโค, อยํ ภวตณฺหา. ६३. तेथे "अविद्या" म्हणजे चार आर्यसत्यांविषयी जसे आहे तसे न जाणणे होय, याला अविद्या म्हणतात. "भवतृष्णा" म्हणजे भवांमध्ये असणारा जो राग, तीव्र राग, इच्छा, मूर्च्छा, प्रार्थना, नंदी, अध्यवसान आणि अपरित्याग आहे, याला भवतृष्णा म्हणतात. ตตฺถ กตโม โลโภ อกุสลมูลํ? तेथे "लोभ" हे अकुशल मूळ कोणते? โลโภ นาม โส เตสุ เตสุ ปรวตฺถูสุ ปรทพฺเพสุ ปรฏฺฐาเนสุ ปรสาปเตยฺเยสุ ปรปริคฺคหิเตสุ [Pg.248] โลโภ ลุพฺภนา อิจฺฉา มุจฺฉา ปตฺถนา นนฺที อชฺโฌสานํ อปริจฺจาโค, อยํ โลโภ อกุสลมูลํ. กสฺเสตํ มูลํ? โลโภ โลภชสฺส อกุสลสฺส กายกมฺมสฺส วจีกมฺมสฺส มโนกมฺมสฺส จ, ตถา ยถา ตํสมฺปยุตฺตานํ จิตฺตเจตสิกานํ ธมฺมานํ มูลํ. "लोभ" म्हणजे त्या त्या परक्या वस्तूंवर, परक्या द्रव्यांवर, परक्या स्थानांवर, परक्या संपत्तीवर आणि इतरांनी ग्रहण केलेल्या गोष्टींवर असणारा लोभ, लुब्धता, इच्छा, मूर्च्छा, प्रार्थना, नंदी, अध्यवसान आणि अपरित्याग होय; याला लोभ हे अकुशल मूळ म्हणतात. हे कशाचे मूळ आहे? लोभ हा लोभापासून उत्पन्न होणाऱ्या अकुशल कायकर्म, वचीकर्म आणि मनोकर्म यांचे मूळ आहे, तसेच त्यांच्याशी संप्रयुक्त असणाऱ्या चित्त आणि चैतसिक धर्मांचे मूळ आहे. ตตฺถ กตโม โทโส อกุสลมูลํ? तेथे "द्वेष" हे अकुशल मूळ कोणते? โส สตฺเตสุ อาฆาโต อกฺขนฺติ อปฺปจฺจโย พฺยาปาโท ปโทโส อนตฺถกามตา เจตโส ปฏิฆาโต, อยํ โทโส อกุสลมูลํ. प्राण्यांविषयी असणारा जो आघात, अक्षमा, अप्रत्यय, व्यापाद, प्रद्वेष, अनर्थ करण्याची इच्छा आणि चित्ताचा प्रतिघात आहे, याला द्वेष हे अकुशल मूळ म्हणतात. กสฺเสตํ มูลํ? हे कशाचे मूळ आहे? โทสชสฺส กายกมฺมสฺส วจีกมฺมสฺส มโนกมฺมสฺส สมฺปยุตฺตานญฺจ จิตฺตเจตสิกานํ ธมฺมานํ มูลํ. हे द्वेषापासून उत्पन्न होणाऱ्या कायकर्म, वचीकर्म, मनोकर्म आणि त्यांच्याशी संप्रयुक्त असणाऱ्या चित्त व चैतसिक धर्मांचे मूळ आहे. ตตฺถ กตโม โมโห อกุสลมูลํ? तेथे "मोह" हे अकुशल मूळ कोणते? ยํ จตูสุ อริยสจฺเจสุ อนภิสมโย อสมฺปชฺชคฺคาโห อปฺปฏิเวโธ โมโห มุยฺหนา สมฺโมโห สมฺมุยฺหนา อวิชฺชา ตโม อนฺธกาโร อาวรณํ นีวรณํ ฉทนํ อจฺฉทนํ อปสจฺฉาคมนํ กุสลานํ ธมฺมานํ, อยํ โมโห อกุสลมูลํ. चार आर्यसत्यांविषयी जे अनभिसमय, असंप्रग्रह, अप्रतिवेध, मोह, संमोह, अविद्या, तम, अंधकार, आवरण, नीवरण, छादन, वाईट आच्छादन आणि कुशल धर्मांपासून दूर जाणे आहे, याला मोह हे अकुशल मूळ म्हणतात. กสฺเสตํ มูลํ? हे कशाचे मूळ आहे? โมหชสฺส อกุสลสฺส กายกมฺมสฺส วจีกมฺมสฺส มโนกมฺมสฺส จ ตํสมฺปยุตฺตกานญฺจ จิตฺตเจตสิกานํ ธมฺมานํ มูลํ. हे मोहापासून उत्पन्न होणाऱ्या अकुशल कायकर्म, वचीकर्म, मनोकर्म आणि त्यांच्याशी संप्रयुक्त असणाऱ्या चित्त व चैतसिक धर्मांचे मूळ आहे. ตตฺถ วิปลฺลาสา ชานิตพฺพา, วิปลฺลาสานํ วตฺถุ ชานิตพฺพํ. ยํ วิปลฺลาสํ สิยา, ตํ ชานิตพฺพํ. ตตฺถ เอโก วิปลฺลาโส ตีณิ วิปลฺลาสานิ จตฺตาริ วิปลฺลาสวตฺถูนิ. กตโม เอโก วิปลฺลาโส จ, เยน ปฏิปกฺเขน วิปลฺลาสิตํ คณฺหาติ? तेथे विपर्यास जाणले पाहिजेत, विपर्यासांचे विषय जाणले पाहिजेत. जो विपर्यास असू शकतो, तो जाणला पाहिजे. तेथे एक विपर्यास, तीन विपर्यास आणि चार विपर्यास-वस्तू आहेत. तो एक विपर्यास कोणता आहे, ज्याच्याद्वारे मनुष्य प्रतिपक्षाने विपर्यस्त गोष्टी ग्रहण करतो? ‘‘อนิจฺเจ นิจฺจ’’นฺติ, ‘‘ทุกฺเข สุข’’นฺติ, ‘‘อนตฺตนิ อตฺตา’’ติ, ‘‘อสุเภ สุภ’’นฺติ, อยํ เอโก วิปลฺลาโส. "अनित्याला नित्य मानणे", "दुःखाला सुख मानणे", "अनात्म्याला आत्मा मानणे", "अशुभाला शुभ मानणे", हा एक विपर्यास आहे. กตมานิ จตฺตาริ วิปลฺลาสวตฺถูนิ? चार विपल्लासवस्तू (विपर्यास-वस्तू) कोणत्या आहेत? กาโย เวทนา จิตฺตํ ธมฺมา จ. อิมานิ จตฺตาริ วิปลฺลาสวตฺถูนิ. काया (शरीर), वेदना, चित्त आणि धम्म. या चार विपल्लासवस्तू आहेत. กตมานิ ตีณิ วิปลฺลาสานิ? तीन विपल्लास (विपर्यास) कोणते आहेत? สญฺญา จิตฺตํ ทิฏฺฐิ จ. อิมานิ ตีณิ วิปลฺลาสานิ. सञ्ञा (संज्ञा), चित्त आणि दिट्ठि (दृष्टी). हे तीन विपल्लास आहेत. ตตฺถ มนาปิเก วตฺถุมฺหิ อินฺทฺริยวตฺเถ วณฺณายตเน วา โย นิมิตฺตสฺส อุคฺคาโห, อยํ สญฺญาวิปลฺลาโส. ตตฺถ วิปรีตจิตฺตสฺส วตฺถุมฺหิ สติ วิญฺญตฺติ, อยํ จิตฺตวิปลฺลาโส. ตตฺถ วิปรีตจิตฺตสฺส ตมฺหิ รูเป ‘‘อสุเภ สุภ’’นฺติ ยา ขนฺติ รุจิ อุเปกฺขนา นิจฺฉโย ทิฏฺฐิ นิทสฺสนํ สนฺตีรณา, อยํ ทิฏฺฐิวิปลฺลาโส. ตตฺถ วตฺถุเภเทน กาเยสุ ทฺวาทส วิปลฺลาสา ภวนฺติ. ตโย [Pg.249] กาเย ตโย เวทนาย ตโย จิตฺเต ตโย ธมฺเม, จตฺตาโร สญฺญาวิปลฺลาสา จตฺตาโร จิตฺตวิปลฺลาสา จตฺตาโร ทิฏฺฐิวิปลฺลาสา, อายตนูปจยโต จกฺขุวิญฺญาณสญฺญาสมงฺคิสฺส รูเปสุ ทฺวาทส วิปลฺลาสา ยาว มโน สญฺญาสมงฺคิสฺส, ธมฺเมสุ ทฺวาทส วิปลฺลาสา ฉ ทฺวาทสกา จตฺตาริ วิปลฺลาสา ภวนฺติ. อารมฺมณนานตฺตโต หิ อปริมิตสงฺเขยฺยานํ สตฺตานํ อปริมิตมสงฺเขยฺยา วิปลฺลาสา ภวนฺติ หีนุกฺกฏฺฐมชฺฌิมตาย. तेथे, प्रिय वाटणाऱ्या वस्तूमध्ये, इंद्रियांच्या विषयात किंवा वर्णाच्या आयतनात (रूपात) जो निमित्ताचा (चिन्हाचा) चुकीचा स्वीकार होतो, तो 'सञ्ञा-विपल्लास' (संज्ञा-विपर्यास) होय. तेथे, विपरीत चित्त असलेल्या व्यक्तीच्या बाबतीत, वस्तू असताना जी विञ्ञत्ति (जाणीव) होते, तो 'चित्त-विपल्लास' होय. तेथे, विपरीत चित्त असलेल्या व्यक्तीची त्या अशुभाच्या रूपात 'हे शुभ आहे' अशी जी स्वीकृती (खन्ति), आवड (रुचि), उपेक्षा (पेक्खना), निश्चय, दृष्टी (दिट्ठि), दर्शन (निदस्सन) आणि मीमांसा (सन्तीरणा) असते, तो 'दिट्ठि-विपल्लास' (दृष्टी-विपर्यास) होय. तेथे, वस्तूच्या भेदाने काया इत्यादींमध्ये बारा विपल्लास होतात. तीन कायेमध्ये, तीन वेदनेमध्ये, तीन चित्तामध्ये आणि तीन धम्मामध्ये; चार सञ्ञा-विपल्लास, चार चित्त-विपल्लास आणि चार दिट्ठि-विपल्लास होतात. आयतन उपचयाच्या दृष्टीने, चक्षु-विञ्ञाण-सञ्ञायुक्त व्यक्तीच्या रूपांमध्ये बारा विपल्लास होतात, आणि मनो-सञ्ञायुक्त व्यक्तीच्या धम्मांमध्ये बारा विपल्लास होतात. अशा प्रकारे सहा प्रकारचे बारा आणि चार विपल्लास होतात. कारण, आलंबनाच्या (विषयांच्या) विविधतेमुळे आणि हीन, मध्यम व उत्कृष्ट अशा अवस्थांमुळे अपरिमित आणि असंख्य प्राण्यांचे अपरिमित व असंख्य विपल्लास होतात. ๖๔. ตตฺถ ปญฺจกฺขนฺธา จตฺตาริ อตฺตภาววตฺถูนิ ภวนฺติ. โย รูปกฺขนฺโธ, โส กาโย อตฺตภาววตฺถุ. โย เวทนากฺขนฺโธ, โส เวทนา อตฺตภาววตฺถุ. โย สญฺญากฺขนฺโธ จ สงฺขารกฺขนฺโธ จ, เต ธมฺมา อตฺตภาววตฺถุ. โย วิญฺญาณกฺขนฺโธ, โส จิตฺตํ อตฺตภาววตฺถุ. อิติ ปญฺจกฺขนฺธา จตฺตาริ อตฺตภาววตฺถูนิ. ตตฺถ กาเย ‘‘อสุเภ สุภ’’นฺติ วิปลฺลาโส ภวติ. เอวํ เวทนาสุ…เป… จิตฺเต…เป… ธมฺเมสุ จ อตฺตวิปลฺลาโส ภวติ. ตตฺถ จตุนฺนํ วิปลฺลาสานํ สมุคฺฆาตนตฺถํ ภควา จตฺตาโร สติปฏฺฐาเน เทเสติ ปญฺญเปติ กาเย กายานุปสฺสี วิหรโต ‘‘อสุเภ สุภ’’นฺติ วิปลฺลาสํ สมุคฺฆาเตติ, เอวํ เวทนาสุ, จิตฺเต, ธมฺเมสุ จ กาตพฺพํ. ६४. तेथे, पाच स्कंध हे चार आत्मभाव-वस्तू (अत्तभाववत्थु) होतात. जो रूपस्कंध आहे, ती काया आत्मभाव-वस्तू आहे. जो वेदनास्कंध आहे, ती वेदना आत्मभाव-वस्तू आहे. जो सञ्ञास्कंध आणि संखारास्कंध आहे, ते धम्म आत्मभाव-वस्तू आहेत. जो विञ्ञाणस्कंध आहे, ते चित्त आत्मभाव-वस्तू आहे. अशा प्रकारे पाच स्कंध हे चार आत्मभाव-वस्तू आहेत. तेथे, कायेमध्ये 'अशुभात शुभ' असा विपल्लास होतो. त्याचप्रमाणे वेदनांमध्ये... चित्तामध्ये... आणि धम्मांमध्ये 'आत्म-विपल्लास' (अत्त-विपल्लास) होतो. तेथे, या चार विपल्लासांचे समूळ उच्चाटन करण्यासाठी भगवंतांनी चार सतिपट्ठान (स्मृतिप्रस्थान) उपदेशिले आहेत व प्रज्ञापित केले आहेत. कायेमध्ये कायानुपस्सी (कायेचे सतत दर्शन घेणारा) होऊन विहरणाऱ्या व्यक्तीचा 'अशुभात शुभ' हा विपल्लास नष्ट होतो. याचप्रमाणे वेदना, चित्त आणि धम्मांच्या बाबतीतही करावे. ตตฺถ อนฺธการติมิสา อปฺปฏิเวธลกฺขณา อวิชฺชา, ตสฺสา วิปลฺลาสปทฏฺฐานํ. อชฺโฌสานลกฺขณา ตณฺหา, ตสฺสา ปิยรูปสาตรูปํ ปทฏฺฐานํ. อตฺตาสยวญฺจนาลกฺขโณ โลโภ, ตสฺส อทินฺนาทานํ ปทฏฺฐานํ. อิธ วิวาทลกฺขโณ โทโส, ตสฺส ปาณาติปาโต ปทฏฺฐานํ. วตฺถุวิปฺปฏิปตฺติลกฺขโณ โมโห, ตสฺส มิจฺฉาปฏิปตฺติ ปทฏฺฐานํ. สงฺขตานํ ธมฺมานํ อวินาสคฺคหณลกฺขณา นิจฺจสญฺญา, ตสฺสา สพฺพสงฺขารา ปทฏฺฐานํ. สาสวผสฺโสปคมนลกฺขณา สุขสญฺญา, ตสฺสา มมงฺกาโร ปทฏฺฐานํ. ธมฺเมสุ อุปคมนลกฺขณา อตฺตสญฺญา, ตสฺสา อหงฺกาโร ปทฏฺฐานํ. วณฺณสงฺคหณลกฺขณา สุภสญฺญา, ตสฺสา อินฺทฺริยอสํวโร ปทฏฺฐานํ. เอเตหิ นวหิ ปเทหิ อุทฺทิฏฺเฐหิ สพฺโพ อกุสลปกฺโข นิทฺทิฏฺโฐ ภวติ, โส จ โข พหุสฺสุเตน สกฺกา ชานิตุํ โน อปฺปสฺสุเตน, ปญฺญวตา โน ทุปฺปญฺเญน, ยุตฺเตน โน อยุตฺเตน. तेथे, अंधकारमय आणि अज्ञानाचे लक्षण असलेली 'अविज्जा' (अविद्या) आहे; तिचे जवळचे कारण (पदट्ठान) विपल्लास आहे. आसक्तीचे लक्षण असलेली 'तण्हा' (तृष्णा) आहे; तिचे जवळचे कारण प्रिय रूप आणि मधुर रूप (पियरूप-सातरूप) आहे. स्वतःच्या इच्छेने फसवणूक करण्याचे लक्षण असलेला 'लोभ' आहे; त्याचे जवळचे कारण अदित्नादान (चोरी) आहे. या जगात वादाचे लक्षण असलेला 'दोस' (द्वेष) आहे; त्याचे जवळचे कारण पाणातिपात (प्राणघात) आहे. वस्तूच्या विपरीत आकलनाचे लक्षण असलेला 'मोह' आहे; त्याचे जवळचे कारण मिच्छापटिपत्ती (मिथ्या आचरण) आहे. संस्कृत (संस्कारित) धम्मांना अविनाशी मानण्याचे लक्षण असलेली 'निच्चसञ्ञा' (नित्य-संज्ञा) आहे; तिचे जवळचे कारण सर्व संखारे (संस्कार) आहेत. आसवयुक्त स्पर्शाच्या प्राप्तीचे लक्षण असलेली 'सुखसञ्ञा' आहे; तिचे जवळचे कारण 'ममंकार' (माझेपणा) आहे. धम्मांमध्ये आत्मभावाने प्रवृत्त होण्याचे लक्षण असलेली 'अत्तसञ्ञा' (आत्म-संज्ञा) आहे; तिचे जवळचे कारण 'अहंकार' (मीपणा) आहे. वर्णाच्या (रूपाच्या) ग्रहणाचे लक्षण असलेली 'सुभसञ्ञा' (शुभ-संज्ञा) आहे; तिचे जवळचे कारण इंद्रिय-असंवर (इंद्रियांवर ताबा न ठेवणे) आहे. या निर्दिष्ट केलेल्या नऊ पदांद्वारे संपूर्ण अकुशल पक्ष दर्शविला गेला आहे, आणि तो केवळ वयोवृद्ध व बहुश्रुत व्यक्तीच जाणू शकते, अल्पश्रुत नाही; प्रज्ञावान व्यक्तीच जाणू शकते, मंदबुद्धी नाही; आणि युक्त (प्रयत्नशील) व्यक्तीच जाणू शकते, अयुक्त नाही. นว [Pg.250] ปทานิ กุสลานิ ยตฺถ สพฺโพ กุสลปกฺโข สงฺคโห สโมสรณํ คจฺฉนฺติ. กตมานิ นว ปทานิ? สมโถ วิปสฺสนา อโลโภ อโทโส อโมโห อนิจฺจสญฺญา ทุกฺขสญฺญา อนตฺตสญฺญา อสุภสญฺญา จ. नऊ कुशल पदे अशी आहेत, ज्यांच्यामध्ये संपूर्ण कुशल पक्ष समाविष्ट होतो आणि एकत्र येतो. ती नऊ पदे कोणती आहेत? समथ (शम), विपस्सना (विपश्यना), अलोभ, अदोस (अद्वेष), अमोह, अनिच्चसञ्ञा (अनित्य-संज्ञा), दुक्खसञ्ञा (दुःख-संज्ञा), अनत्तसञ्ञा (अनात्म-संज्ञा) आणि असुभसञ्ञा (अशुभ-संज्ञा). ตตฺถ กตโม สมโถ? ยา จิตฺตสฺส ฐิติ สณฺฐิติ อวฏฺฐิติ ฐานํ ปฏฺฐานํ อุปฏฺฐานํ สมาธิ สมาธานํ อวิกฺเขโป อวิปฺปฏิสาโร วูปสโม มานโส เอกคฺคํ จิตฺตสฺส, อยํ สมโถ. तेथे, समथ म्हणजे काय? चित्ताची जी स्थिती (स्थिरता), संस्थिती (उत्कृष्ट स्थिरता), अवस्थिती (दृढ स्थिरता), स्थान, प्रस्थान, उपस्थान, समाधी, समाधान, अविक्षेप (एकाग्रता), अविप्रतिसार (प्रसन्नता), मनाचा उपशम (शांतता) आणि चित्ताची एकाग्रता आहे, याला 'समथ' म्हणतात. ตตฺถ กตมา วิปสฺสนา? ขนฺเธสุ วา ธาตูสุ วา อายตเนสุ วา นามรูเปสุ วา ปฏิจฺจสมุปฺปาเทสุ วา ปฏิจฺจสมุปฺปนฺเนสุ วา ธมฺเมสุ ทุกฺเขสุ วา สมุทเยสุ วา นิโรเธ วา มคฺเค วา กุสลากุสเลสุ วา ธมฺเมสุ สาวชฺชอนวชฺเชสุ วา กณฺหสุกฺเกสุ วา เสวิตพฺพอเสวิตพฺเพสุ วา โส ยถาภูตํ วิจโย ปวิจโย วีมํสา ปรวีมํสา คาหนา อคฺคาหนา ปริคฺคาหนา จิตฺเตน ปริจิตนา ตุลนา อุปปริกฺขา ญาณํ วิชฺชา วา จกฺขุ พุทฺธิ เมธา ปญฺญา โอภาโส อาโลโก อาภา ปภา ขคฺโค นาราโจ ธมฺมวิจยสมฺโพชฺฌงฺโค สมฺมาทิฏฺฐิ มคฺคงฺคํ, อยํ วิปสฺสนา. เตเนสา วิปสฺสนา อิติ วุจฺจติ วิวิธา วา เอสา วิปสฺสนาติ, ตสฺมา เอสา วิปสฺสนาติ วุจฺจติ. ทฺวิธา เจสา หิ วิปสฺสนา ธมฺมวิปสฺสนาติ วุจฺจติ, ทฺวิธา อิมาย ปสฺสติ สุภญฺจ อสุภญฺจ กณฺหญฺจ สุกฺกญฺจ เสวิตพฺพญฺจ อเสวิตพฺพญฺจ กมฺมญฺจ วิปากญฺจ พนฺธญฺจ วิโมกฺขญฺจ อาจยญฺจ อปจยญฺจ ปวตฺติญฺจ นิวตฺติญฺจ สํกิเลสญฺจ โวทานญฺจ, เอวํ วิปสฺสนาติ วุจฺจติ. อถ วา วิอิติ อุปสคฺโค ปสฺสนาติ อตฺโถ ตสฺมา วิปสฺสนาติ วุจฺจเต, อยํ วิปสฺสนา. तेथे, विपस्सना म्हणजे काय? स्कंधांमध्ये, धातूंमध्ये, आयतनांमध्ये, नाम-रूपांमध्ये, पटिच्चसमुप्पादांमध्ये (प्रतीत्यसमुत्पाद), पटिच्चसमुप्पन्न (प्रतीत्यसमुत्पन्न) धम्मांमध्ये, दुःखात, समुदयात, निरोधात, मार्गात, कुशल-अकुशल धम्मांमध्ये, सावद्य-अनवद्य (दोषयुक्त व दोषरहित) धम्मांमध्ये, कृष्ण-शुक्ल (पाप व पुण्य) धम्मांमध्ये किंवा सेव्य-असेव्य (सेवन करण्यायोग्य व न करण्यायोग्य) धम्मांमध्ये; त्यांचे यथाभूत (जसे आहे तसे) जे विचय (शोध), प्रविचय (विशेष शोध), वीमंसा (मीमांसा), परवीमंसा (उत्कृष्ट मीमांसा), ग्रहण, प्रग्रहण, परिग्रहण, चित्ताने केलेले चिंतन, तुलना, उपपरीक्षा, ज्ञान, विद्या, चक्षु (ज्ञानचक्षु), बुद्धी, मेधा, प्रज्ञा, ओभास (प्रकाश), आलोक, आभा, प्रभा, खग्ग (प्रज्ञारूपी तलवार), नाराच (प्रज्ञारूपी बाण), धम्मविचय-संबोज्झंग आणि सम्मादिट्ठि (सम्यक् दृष्टी) हे मग्गंग (मार्गांग) आहे, याला 'विपस्सना' म्हणतात. म्हणून याला 'विपस्सना' असे म्हटले जाते. किंवा ही विविध प्रकारची आहे म्हणून तिला 'विपस्सना' म्हटले जाते. आणि ही विपस्सना दोन प्रकारची असल्याने तिला 'धम्म-विपस्सना' असेही म्हटले जाते. या विपस्सनेद्वारे मनुष्य दोन प्रकारच्या गोष्टी पाहतो: शुभ आणि अशुभ, कृष्ण आणि शुक्ल, सेव्य आणि असेव्य, कर्म आणि विपाक, बंध आणि विमोक्ष, आचय (संचय) आणि अपचय (क्षय), प्रवृत्ती आणि निवृत्ती, संकिलेस (क्लेशयुक्तता) आणि वोदान (शुद्धता); म्हणून याला 'विपस्सना' म्हटले जाते. अथवा, 'वि' हा उपसर्ग आहे आणि 'पस्सना' (पाहणे) हा त्याचा अर्थ आहे, म्हणून याला 'विपस्सना' म्हटले जाते. ही विपस्सना होय. ๖๕. ตตฺถ ทฺเว โรคา สตฺตานํ อวิชฺชา จ ภวตณฺหา จ, เอเตสํ ทฺวินฺนํ โรคานํ นิฆาตาย ภควตา ทฺเว เภสชฺชานิ วุตฺตานิ สมโถ จ วิปสฺสนา จ. อิมานิ ทฺเว เภสชฺชานิ ปฏิเสเวนฺโต ทฺเว อโรเค สจฺฉิกโรติ ราควิราคํ เจโตวิมุตฺตึ อวิชฺชาวิราคญฺจ ปญฺญาวิมุตฺตึ. ตตฺถ ตณฺหาโรคสฺส สมโถ เภสชฺชํ, ราควิราคา เจโตวิมุตฺติ อโรคํ. อวิชฺชาโรคสฺส วิปสฺสนาเภสชฺชํ อวิชฺชาวิราคา ปญฺญาวิมุตฺติ อโรคํ. เอวญฺหิ ภควา จาห, ‘‘ทฺเว ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา นามญฺจ รูปญฺจ, ทฺเว ธมฺมา ปหาตพฺพา อวิชฺชา จ ภวตณฺหา จ, ทฺเว ธมฺมา ภาเวตพฺพา สมโถ จ วิปสฺสนา [Pg.251] จ, ทฺเว ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา วิชฺชา จ วิมุตฺติ จา’’ติ. ตตฺถ สมถํ ภาเวนฺโต รูปํ ปริชานาติ, รูปํ ปริชานนฺโต ตณฺหํ ปชหติ, ตณฺหํ ปชหนฺโต ราควิราคา เจโตวิมุตฺตึ สจฺฉิกโรติ, วิปสฺสนํ ภาเวนฺโต นามํ ปริชานาติ, นามํ ปริชานนฺโต อวิชฺชํ ปชหติ, อวิชฺชํ ปชหนฺโต อวิชฺชาวิราคา ปญฺญาวิมุตฺตึ สจฺฉิกโรติ. ยทา ภิกฺขุโน ทฺเว ธมฺมา ปริญฺญาตา ภวนฺติ นามญฺจ รูปญฺจ, ตถาสฺส ทฺเว ธมฺมา ปหีนา ภวนฺติ อวิชฺชา จ ภวตณฺหา จ. ทฺเว ธมฺมา ภาวิตา ภวนฺติ สมโถ จ วิปสฺสนา จ, ทฺเว ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา ภวนฺติ วิชฺชา จ วิมุตฺติ จ. เอตฺตาวตา ภิกฺขุ กตกิจฺโจ ภวติ. เอสา โสปาทิเสสา นิพฺพานธาตุ. ตสฺส อายุปริยาทานา ชีวิตินฺทฺริยสฺส อุปโรธา อิทญฺจ ทุกฺขํ นิรุชฺฌติ, อญฺญญฺจ ทุกฺขํ น อุปฺปชฺชติ. ตตฺถ โย อิเมสํ ขนฺธานํ ธาตุอายตนานํ นิโรโธ วูปสโม อญฺเญสญฺจ ขนฺธธาตุอายตนานํ อปฺปฏิสนฺธิ อปาตุภาโว, อยํ อนุปาทิเสสา นิพฺพานธาตุ. ६५. त्यामध्ये प्राण्यांचे दोन रोग आहेत - अविद्या आणि भवतण्हा (भवतृष्णा). या दोन रोगांच्या विनाशासाठी भगवंतांनी दोन औषधे सांगितली आहेत - समथ आणि विपश्यना. या दोन औषधांचे सेवन करणारा मनुष्य दोन आरोग्यांचा (रोगमुक्ततेचा) साक्षात्कार करतो - रागविरागापासून मिळणारी चेतोविमुक्ती आणि अविद्याविरागापासून मिळणारी प्रज्ञाविमुक्ती. त्यामध्ये, तण्हा (तृष्णा) रूपी रोगाचे औषध समथ आहे आणि रागविरागापासून मिळणारी चेतोविमुक्ती हे आरोग्य आहे. अविद्या रूपी रोगाचे औषध विपश्यना आहे आणि अविद्याविरागापासून मिळणारी प्रज्ञाविमुक्ती हे आरोग्य आहे. कारण भगवंतांनी असे म्हटले आहे: 'दोन धर्म परिज्ञेय (पूर्णपणे जाणण्याजोगे) आहेत - नाम आणि रूप; दोन धर्म प्रहातव्य (त्याग करण्याजोगे) आहेत - अविद्या आणि भवतण्हा; दोन धर्म भावितव्य (भावना करण्याजोगे) आहेत - समथ आणि विपश्यना; दोन धर्म साक्षात्कर्तव्य (साक्षात्कार करण्याजोगे) आहेत - विद्या आणि विमुक्ती.' त्यामध्ये, समथाची भावना करणारा रूपाला परिपूर्णपणे जाणतो; रूपाला परिपूर्णपणे जाणत असताना तो तण्हा (तृष्णा) त्याग करतो; तृष्णेचा त्याग करत असताना तो रागविरागामुळे चेतोविमुक्तीचा साक्षात्कार करतो. विपश्यनेची भावना करणारा नामाला परिपूर्णपणे जाणतो; नामाला परिपूर्णपणे जाणत असताना तो अविद्येचा त्याग करतो; अविद्येचा त्याग करत असताना तो अविद्याविरागामुळे प्रज्ञाविमुक्तीचा साक्षात्कार करतो. जेव्हा भिक्खूचे नाम आणि रूप हे दोन धर्म परिज्ञात (पूर्णपणे जाणलेले) होतात, तसेच त्याचे अविद्या आणि भवतण्हा हे दोन धर्म प्रहीण (नष्ट) होतात, समथ आणि विपश्यना हे दोन धर्म भावित (विकसित) होतात, आणि विद्या व विमुक्ती हे दोन धर्म साक्षात्कृत होतात, तेव्हा एवढ्याने भिक्खू कृतकृत्य होतो. ही सोपादिशेष निर्वाणधातू आहे. त्याच्या आयुष्याच्या समाप्तीमुळे आणि जीवितेंद्रियाच्या निरोधाने हे (वर्तमान) दुःख निरुद्ध होते आणि इतर (भविष्यातील) दुःख उत्पन्न होत नाही. त्यामध्ये, या स्कंध, धातू आणि आयतनांचा जो निरोध व उपशम आहे, आणि इतर स्कंध, धातू व आयतनांचे जे अप्रतिसंधी (पुन्हा न जोडणे) आणि अप्रादुर्भाव (प्रकट न होणे) आहे, ही अनुपपादिशेष निर्वाणधातू आहे. ตตฺถ กตมํ อโลโภ กุสลมูลํ? ยํธาตุโก อโลโภ อลุพฺภนา อลุพฺภิตตฺตํ อนิจฺฉา อปตฺถนา อกนฺตา อนชฺโฌสานํ. อยํ อโลโภ กุสลมูลํ. กสฺเสตํ มูลํ? อโลภชสฺส กุสลสฺส กายกมฺมสฺส วจีกมฺมสฺส มโนกมฺมสฺส ตํสมฺปยุตฺตานญฺจ จิตฺตเจตสิกานํ ธมฺมานํ มูลํ. อถ วา อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค กุสลนฺติ วุจฺจติ, โส ติณฺณํ มคฺคงฺคานํ มูลํ. กตเมสํ ติณฺณํ, สมฺมาสงฺกปฺปสฺส สมฺมาวายามสฺส สมฺมาสมาธิสฺส จ อิเมสํ มูลนฺติ, ตสฺมา กุสลมูลนฺติ วุจฺจติ. त्यामध्ये, अलोभ कुशलमूळ कोणते आहे? जो अलोभ (लोभ नसणे), अलोभन (लोभ न करण्याची प्रवृत्ती), अलोभितत्व (लोभ नसण्याची अवस्था), अनिच्छा (इच्छा नसणे), अप्रार्थना (इच्छा न बाळगणे), अकान्ता (आसक्ती नसणे), अनध्यवसान (आसक्तीचा अभाव) आहे. हे अलोभ कुशलमूळ आहे. हे कशाचे मूळ आहे? अलोभापासून उत्पन्न होणाऱ्या कुशल कायकर्म, वचीकर्म, मनोकर्म आणि त्यांच्याशी संप्रयुक्त चित्त-चेतसिक धर्मांचे हे मूळ आहे. अथवा, आर्य अष्टांगिक मार्गाला 'कुशल' असे म्हटले जाते; तो तीन मार्गांगांचे मूळ आहे. कोणत्या तीन? सम्यक संकल्प, सम्यक व्यायाम आणि सम्यक समाधी; यांचे हे मूळ आहे, म्हणून याला 'कुशलमूळ' असे म्हटले जाते. ตตฺถ กตมํ อโทโส กุสลมูลํ? ยา สตฺเตสุ วา สงฺขาเรสุ วา อนฆาโต อปฺปฏิฆาโต อพฺยาปตฺติ อพฺยาปาโท อโทโส เมตฺตา เมตฺตายนา อตฺถกามตา หิตกามตา เจตโส ปสาโท, อยํ อโทโส กุสลมูลํ. กสฺเสตํ มูลํ? อโทสชสฺส กุสลสฺส กายกมฺมสฺส วจีกมฺมสฺส มโนกมฺมสฺส ตํสมฺปยุตฺตานญฺจ จิตฺตเจตสิกานํ ธมฺมานํ มูลํ. อถ วา ติณฺณํ มคฺคงฺคานํ มูลํ. กตเมสํ ติณฺณํ? สมฺมาวาจาย สมฺมากมฺมนฺตสฺส สมฺมาอาชีวสฺส จ อิเมสํ ติณฺณํ มคฺคงฺคานํ มูลํ, ตสฺมา กุสลมูลนฺติ วุจฺจติ. त्यामध्ये, अद्वेष कुशलमूळ कोणते आहे? प्राण्यांविषयी किंवा संस्कारांविषयी जो अनाघात (पीडा न देणे), अप्रतिघात (क्रोध न करणे), अव्यापत्ती (द्वेषरहितता), अव्यापाद (कल्याणभावना), अद्वेष, मैत्री, मैत्रीभाव, हितकामना, कल्याणकामना आणि चित्ताची प्रसन्नता आहे; हे अद्वेष कुशलमूळ आहे. हे कशाचे मूळ आहे? अद्वेषापासून उत्पन्न होणाऱ्या कुशल कायकर्म, वचीकर्म, मनोकर्म आणि त्यांच्याशी संप्रयुक्त चित्त-चेतसिक धर्मांचे हे मूळ आहे. अथवा, हे तीन मार्गांगांचे मूळ आहे. कोणत्या तीन? सम्यक वाचा, सम्यक कर्मांत आणि सम्यक आजीव; या तीन मार्गांगांचे हे मूळ आहे, म्हणून याला 'कुशलमूळ' असे म्हटले जाते. ตตฺถ กตมํ อโมโห กุสลมูลํ? ยํ จตูสุ อริยสจฺเจสุ ยถาภูตํ ญาณทสฺสนํ อภิสมโย สมฺมา จ ปจฺจาคโม ปฏิเวโธ อโมโห อสมฺมุยฺหนา อสมฺโมโห วิชฺชาปกาโส อาโลโก อนาวรณํ [Pg.252] เสกฺขานํ กุสลานํ ธมฺมานํ, อยํ อโมโห กุสลมูลํ. กสฺเสตํ มูลํ? อโมหชสฺส กุสลสฺส กายกมฺมสฺส วจีกมฺมสฺส มโนกมฺมสฺส ตํสมฺปยุตฺตานญฺจ จิตฺตเจตสิกานํ ธมฺมานํ มูลํ. อถ วา ทฺวินฺนํ มคฺคงฺคานํ เอตํ มูลํ. กตเมสํ ทฺวินฺนํ? สมฺมาทิฏฺฐิยา จ สมฺมาสติยา จ อิเมสํ ทฺวินฺนํ มคฺคงฺคานํ มูลํ, ตสฺมา กุสลมูลนฺติ วุจฺจติ. เอวํ อิเมสํ ตีหิ กุสลมูเลหิ อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค โยเชตพฺโพ. त्यामध्ये, अमोह कुशलमूळ कोणते आहे? चार आर्यसत्यांविषयी जे यथाभूत ज्ञानदर्शन, अभिसमय (साक्षात्कार), सम्यक प्रत्यय (बोध), प्रतिवेध (भेदून जाणणे), अमोह (भ्रम नसणे), असंमुह्यता (भ्रमित न होण्याची प्रवृत्ती), असंमोह (भ्रमाचा पूर्ण अभाव), विद्याप्रकाश, आलोक (प्रकाश) आणि शैक्ष (साधना करणाऱ्या) पुद्गलांच्या कुशल धर्मांचे जे अनावरण (अडथळामुक्तता) आहे; हे अमोह कुशलमूळ आहे. हे कशाचे मूळ आहे? अमोहापासून उत्पन्न होणाऱ्या कुशल कायकर्म, वचीकर्म, मनोकर्म आणि त्यांच्याशी संप्रयुक्त चित्त-चेतसिक धर्मांचे हे मूळ आहे. अथवा, हे दोन मार्गांगांचे मूळ आहे. कोणत्या दोन? सम्यक दृष्टी आणि सम्यक स्मृती; या दोन मार्गांगांचे हे मूळ आहे, म्हणून याला 'कुशलमूळ' असे म्हटले जाते. अशा प्रकारे, या तीन कुशलमुळांशी अष्टांगिक मार्ग जोडला पाहिजे. ๖๖. ตตฺถ กตมา อนิจฺจสญฺญา? ‘‘สพฺเพ สงฺขารา อุปฺปาทวยธมฺมิโน’’ติ จ ยา สญฺญา สญฺชานนา ววตฺถปนา อุคฺคาโห, อยํ อนิจฺจสญฺญา. ตสฺสา โก นิสฺสนฺโท? อนิจฺจสญฺญาย ภาวิตาย พหุลีกตาย อฏฺฐสุ โลกธมฺเมสุ จิตฺตํ นานุสนฺธติ น สนฺธติ น สณฺฐหติ, อุเปกฺขา วา ปฏิกฺกูลตา วา สณฺฐหติ, อยมสฺสา นิสฺสนฺโท. ६६. त्यामध्ये, अनित्यसंज्ञा कोणती आहे? 'सर्व संस्कार उत्पन्न होणारे आणि नष्ट होणारे (उत्पाद-व्यय-धर्मी) आहेत' अशी जी संज्ञा (जाणीव), संज्ञान (समजून घेणे), व्यवस्थापन (निश्चिती) आणि उद्ग्रह (ग्रहण करणे) आहे; ही अनित्यसंज्ञा आहे. तिचा परिणाम (निस्यंद) काय आहे? अनित्यसंज्ञेची भावना केली असता, तिचा वारंवार अभ्यास केला असता, आठ लोकधर्मांमध्ये चित्त आसक्त होत नाही, जोडले जात नाही, स्थिर होत नाही; तर उपेक्षा किंवा प्रतिकूलता (विरक्ती) प्रस्थापित होते. हा तिचा परिणाम आहे. ตตฺถ กตมา ทุกฺขสญฺญา? ‘‘สพฺเพ สงฺขารา ทุกฺขา’’ติ ยา สญฺญา สญฺชานนา ววตฺถปนา อุคฺคาโห, อยํ ทุกฺขสญฺญา. ตสฺสา โก นิสฺสนฺโท? ทุกฺขสญฺญาย ภาวิตาย พหุลีกตาย อาลสฺเส สํปมาเท วิมฺหเย จ จิตฺตํ นานุสนฺธติ น สนฺธติ น สณฺฐหติ, อุเปกฺขา วา ปฏิกฺกูลตา วา สณฺฐหติ, อยมสฺสา นิสฺสนฺโท. त्यामध्ये, दुःखसंज्ञा कोणती आहे? 'सर्व संस्कार दुःखकारक आहेत' अशी जी संज्ञा, संज्ञान, व्यवस्थापन आणि उद्ग्रह आहे; ही दुःखसंज्ञा आहे. तिचा परिणाम काय आहे? दुःखसंज्ञेची भावना केली असता, तिचा वारंवार अभ्यास केला असता, आळस, प्रमाद (दुर्लक्ष) आणि विस्मय (आश्चर्य) यामध्ये चित्त आसक्त होत नाही, जोडले जात नाही, स्थिर होत नाही; तर उपेक्षा किंवा प्रतिकूलता प्रस्थापित होते. हा तिचा परिणाम आहे. ตตฺถ กตมา อนตฺตสญฺญา? ‘‘สพฺเพสุ ธมฺเมสุ อนตฺตา’’ติ ยา สญฺญา สญฺชานนา ววตฺถปนา อุคฺคาโห, อยํ อนตฺตสญฺญา. ตสฺสา โก นิสฺสนฺโท, อนตฺตสญฺญาย ภาวิตาย พหุลีกตาย อหงฺกาโร จิตฺตํ นานุสนฺธติ น สนฺธติ, มมงฺกาโร น สณฺฐหติ, อุเปกฺขา วา ปฏิกฺกูลตา วา สณฺฐหติ, อยมสฺสา นิสฺสนฺโท. त्यामध्ये, अनात्मसंज्ञा कोणती आहे? 'सर्व धर्म अनात्म (आत्मा नसलेले) आहेत' अशी जी संज्ञा, संज्ञान, व्यवस्थापन आणि उद्ग्रह आहे; ही अनात्मसंज्ञा आहे. तिचा परिणाम काय आहे? अनात्मसंज्ञेची भावना केली असता, तिचा वारंवार अभ्यास केला असता, अहंकारामध्ये चित्त आसक्त होत नाही, जोडले जात नाही, आणि ममकार (माझेपणाची भावना) प्रस्थापित होत नाही; तर उपेक्षा किंवा प्रतिकूलता प्रस्थापित होते. हा तिचा परिणाम आहे. ตตฺถ กตมา อสุภสญฺญา? ‘‘สตฺต สงฺขารา อสุภา’’ติ ยา สญฺญา สญฺชานนา ววตฺถปนา อุคฺคาโห, อยํ อสุภสญฺญา. ตสฺสา โก นิสฺสนฺโท? อสุภสญฺญาย ภาวิตาย พหุลีกตาย สุภนิมิตฺเต จิตฺตํ นานุสนฺธติ น สนฺธติ น สณฺฐหติ, อุเปกฺขา วา ปฏิกฺกูลตา วา สณฺฐหติ, อยมสฺสา นิสฺสนฺโท. त्यामध्ये, अशुभसंज्ञा कोणती आहे? 'प्राणी आणि संस्कार अशुभ आहेत' अशी जी संज्ञा, संज्ञान, व्यवस्थापन आणि उद्ग्रह आहे; ही अशुभसंज्ञा आहे. तिचा परिणाम काय आहे? अशुभसंज्ञेची भावना केली असता, तिचा वारंवार अभ्यास केला असता, शुभ निमित्तामध्ये चित्त आसक्त होत नाही, जोडले जात नाही, स्थिर होत नाही; तर उपेक्षा किंवा प्रतिकूलता प्रस्थापित होते. हा तिचा परिणाम आहे. ตตฺถ ปญฺจนฺนํ ขนฺธานํ ปริญฺญา ภควตา เทสิตา, โย ตตฺถ อสุภสญฺญา รูปกฺขนฺธสฺส ปริญฺญตฺตํ, ทุกฺขสญฺญา เวทนากฺขนฺธสฺส ปริญฺญตฺตํ, อนตฺตสญฺญา สญฺญากฺขนฺธสฺส สงฺขารกฺขนฺธสฺส ปริญฺญตฺตํ, อนิจฺจสญฺญา วิญฺญาณกฺขนฺธสฺส ปริญฺญตฺตํ. ตตฺถ สมเถน ตณฺหํ สมุคฺฆาเตติ, วิปสฺสนา อวิชฺชํ [Pg.253] สมุคฺฆาเตติ, อโทเสน โทสํ สมุคฺฆาเตติ, อโมเหน โมหํ สมุคฺฆาเตติ, อนิจฺจสญฺญาย นิจฺจสญฺญํ สมุคฺฆาเตติ, ทุกฺขสญฺญาย สุขสญฺญํ สมุคฺฆาเตติ, อนตฺตสญฺญาย อตฺตสญฺญํ สมุคฺฆาเตติ, อสุภสญฺญาย สุภสญฺญํ สมุคฺฆาเตติ. त्या उपदेशात, पाच स्कंधांचे परिज्ञान भगवंतांनी उपदेशिले आहे. त्यामध्ये, अशुभसंज्ञा ही रूपस्कंधाचे परिज्ञान आहे, दुःखसंज्ञा ही वेदनास्कंधाचे परिज्ञान आहे, अनात्मसंज्ञा ही संज्ञास्कंध आणि संस्कारस्कंधाचे परिज्ञान आहे, आणि अनित्यसंज्ञा ही विज्ञानस्कंधाचे परिज्ञान आहे. त्यामध्ये, शमथाने तृष्णेचा समूच्छेद करतो, विपश्यनेने अविद्येचा समूच्छेद करतो, अद्वेषाने द्वेषाचा समूच्छेद करतो, अमोहाने मोहाचा समूच्छेद करतो, अनित्यसंज्ञेने नित्यसंज्ञेचा समूच्छेद करतो, दुःखसंज्ञेने सुखसंज्ञेचा समूच्छेद करतो, अनात्मसंज्ञेने आत्मसंज्ञेचा समूच्छेद करतो, आणि अशुभसंज्ञेने शुभसंज्ञेचा समूच्छेद करतो. จิตฺตวิกฺเขปปฏิสํหรณลกฺขโณ สมโถ, ตสฺส ฌานานิ ปทฏฺฐานํ. สพฺพธมฺมํ ยถาภูตํ ปฏิเวธลกฺขณา วิปสฺสนา, ตสฺสา สพฺพเนยฺยํ ปทฏฺฐานํ. อิจฺฉาปฏิสํหรณลกฺขโณ อโลโภ, ตสฺส อทินฺนาทานา เวรมณี ปทฏฺฐานํ. อพฺยาปาทลกฺขโณ อโทโส, ตสฺส ปาณาติปาตา เวรมณี ปทฏฺฐานํ. วตฺถุอปฺปฏิหตลกฺขโณ อโมโห, ตสฺส สมฺมาปฏิปตฺติ ปทฏฺฐานํ. สงฺขตานํ ธมฺมานํ วินาสคฺคหณลกฺขณา อนิจฺจสญฺญา, ตสฺสา อุทยพฺพโย ปทฏฺฐานํ. สาสวผสฺสสญฺชานนลกฺขณา ทุกฺขสญฺญา, ตสฺสา เวทนา ปทฏฺฐานํ. สพฺพธมฺมอนุปคมนลกฺขณา อนตฺตสญฺญา, ตสฺสา ธมฺมสญฺญา ปทฏฺฐานํ. วินีลกวิปุพฺพกอุทฺธุมาตกสมุคฺคหณลกฺขณา อสุภสญฺญา, ตสฺสา นิพฺพิทา ปทฏฺฐานํ. อิเมสุ นวสุ ปเทสุ อุปทิฏฺเฐสุ สพฺโพ กุสลปกฺโข อุปทิฏฺโฐ ภวติ, โส จ พหุสฺสุเตน สกฺกา ชานิตุํ โน อปฺปสฺสุเตน, ปญฺญวตา โน ทุปฺปญฺเญน, ยุตฺเตน โน อยุตฺเตนาติ. चित्ताचा विक्षेप दूर करणे हे लक्षण असलेला शमथ आहे, ध्यान हे त्याचे निकटचे कारण आहे. सर्व धर्मांचे यथार्थ प्रतिवेध (भेदून जाणणे) करणे हे लक्षण असलेली विपश्यना आहे, सर्व ज्ञेय हे तिचे निकटचे कारण आहे. इच्छेचा निरोध करणे हे लक्षण असलेला अलोभ आहे, अदत्तादानापासून (चोरीपासून) विरती हे त्याचे निकटचे कारण आहे. अव्यापाद (द्वेषरहितता) हे लक्षण असलेला अद्वेष आहे, प्राणातिपातापासून (हिंसेपासून) विरती हे त्याचे निकटचे कारण आहे. वस्तूच्या स्वरूपात अडथळा न येणे हे लक्षण असलेला अमोह आहे, सम्यक् प्रतिपत्ती हे त्याचे निकटचे कारण आहे. संस्कृत धर्मांच्या विनाशाचे ग्रहण करणे हे लक्षण असलेली अनित्यसंज्ञा आहे, उदय आणि व्यय हे तिचे निकटचे कारण आहे. सास्रव स्पर्शाचे ज्ञान करून घेणे हे लक्षण असलेली दुःखसंज्ञा आहे, वेदना हे तिचे निकटचे कारण आहे. सर्व धर्मांमध्ये आत्मभावाचा अभाव हे लक्षण असलेली अनात्मसंज्ञा आहे, धर्मसंज्ञा हे तिचे निकटचे कारण आहे. विनीलक, विपुब्बक आणि उद्धुमातक शव यांचे अशुभरूपाने ग्रहण करणे हे लक्षण असलेली अशुभसंज्ञा आहे, निर्वेद हे तिचे निकटचे कारण आहे. या नऊ पदांचा उपदेश केला असता, संपूर्ण कुशलपक्ष उपदिष्ट होतो. आणि तो बहुश्रुताला जाणणे शक्य आहे, अल्पश्रुताला नाही; प्रज्ञावानाला शक्य आहे, दुष्प्रज्ञावानाला नाही; युक्त (प्रयत्नशील) व्यक्तीला शक्य आहे, अयुक्त व्यक्तीला नाही. ๖๗. ตตฺถ นิจฺจสญฺญาธิมุตฺตสฺส อปราปรํ จิตฺตํ ปณาเมนฺโต สติมปจฺจเวกฺขโต อนิจฺจสญฺญา น อุปฏฺฐาติ, ปญฺจสุ กามคุเณสุ สุขสฺสาทาธิมุตฺตสฺส อิริยาปถสฺส อคติมปจฺจเวกฺขโต ทุกฺขสญฺญา น อุปฏฺฐาติ, ขนฺธธาตุอายตเนสุ อตฺตาธิมุตฺตสฺส นานาธาตุอเนกธาตุวินิพฺโภคมปจฺจเวกฺขโต อนตฺตสญฺญา น อุปฏฺฐาติ, วณฺณสณฺฐานาภิรตสฺส กาเย สุภาธิมุตฺตสฺส จ วิปฺปฏิจฺฉนฺนา อสุภสญฺญา น อุปฏฺฐาติ. ६७. त्यामध्ये, नित्यसंज्ञेकडे कल असलेल्या व्यक्तीला, चित्ताला इकडेतिकडे वळवताना, स्मृतीचा अभाव असल्यामुळे आणि प्रत्यवेक्षण न केल्यामुळे अनित्यसंज्ञा उपस्थित होत नाही. पाच कामगुणांमध्ये सुखाच्या आस्वादाकडे कल असलेल्या व्यक्तीला, इरियापथाच्या (हालचालींच्या) अनित्यतेचे प्रत्यवेक्षण न केल्यामुळे दुःखसंज्ञा उपस्थित होत नाही. स्कंध, धातू आणि आयतनांमध्ये आत्मभावाकडे कल असलेल्या व्यक्तीला, विविध धातू आणि अनेक धातूंच्या विश्लेषणाचे प्रत्यवेक्षण न केल्यामुळे अनात्मसंज्ञा उपस्थित होत नाही. शरीराच्या वर्ण आणि आकारावर रममाण झालेल्या आणि शरीराला शुभ मानणाऱ्या व्यक्तीला, विपरीत स्वरूपामुळे अशुभसंज्ञा उपस्थित होत नाही. อวิปฺปฏิสารลกฺขณา สทฺธา, สทฺทหนา ปจฺจุปฏฺฐานํ. ตสฺส จตฺตาริ โสตาปตฺติยงฺคานิ ปทฏฺฐานํ. เอวญฺหิ วุตฺตํ ภควตา สทฺธินฺทฺริยํ ภิกฺขเว, กุหึ ทฏฺฐพฺพํ, จตูสุ โสตาปตฺติยงฺเคสุ กุสเลสุ ธมฺเมสุ. पश्चात्तापरहितता हे लक्षण असलेली श्रद्धा आहे, विश्वास ठेवणे हे तिचे प्रकटीकरण आहे. स्रोतापत्तीची चार अंगे हे तिचे निकटचे कारण आहे. कारण भगवंतांनी असे म्हटले आहे: 'भिक्खूहो, श्रद्धेंद्रिय कोठे पाहावे? चार स्रोतापत्ती अंगांमध्ये, जे कुशल धर्म आहेत, तेथे पाहावे.' สูราอปฏิกฺเขปนลกฺขณํ วีริยินฺทฺริยํ, วีริยินฺทฺริยารมฺโภ ปจฺจุปฏฺฐานํ. ตสฺส อตีตา จตฺตาโร สมฺมปฺปธานา ปทฏฺฐานํ. ยถา วุตฺตํ ภควตา วีริยินฺทฺริยํ, ภิกฺขเว, กุหึ ทฏฺฐพฺพํ, จตูสุ สมฺมปฺปธาเนสุ. शौर्य आणि मागे न हटणे हे लक्षण असलेले वीर्येंद्रिय आहे, वीर्याचा आरंभ हे त्याचे प्रकटीकरण आहे. चार सम्यक्प्रधान हे त्याचे निकटचे कारण आहे. जसे भगवंतांनी म्हटले आहे: 'भिक्खूहो, वीर्येंद्रिय कोठे पाहावे? चार सम्यक्प्रधानांमध्ये पाहावे.' สติ [Pg.254] สรณลกฺขณา, อสมฺโมหปจฺจุปฏฺฐานา. ตสฺส อตีตา จตฺตาโร สติปฏฺฐานา ปทฏฺฐานํ. ยถา วุตฺตํ ภควตา สตินฺทฺริยํ ภิกฺขเว, กุหึ ทฏฺฐพฺพํ, จตูสุ สติปฏฺฐาเนสุ. स्मरण करणे हे लक्षण असलेली स्मृती आहे, असंमोह (भ्रमरहितता) हे तिचे प्रकटीकरण आहे. चार स्मृतिप्रस्थान हे तिचे निकटचे कारण आहे. जसे भगवंतांनी म्हटले आहे: 'भिक्खूहो, स्मृतींद्रिय कोठे पाहावे? चार स्मृतिप्रस्थानांमध्ये पाहावे.' เอกคฺคลกฺขโณ สมาธิ, อวิกฺเขปปจฺจุปฏฺฐาโน, ตสฺส จตฺตาริ ญาณานิ ปทฏฺฐานํ. ยถา วุตฺตํ ภควตา สมาธินฺทฺริยํ, ภิกฺขเว, กุหึ ทฏฺฐพฺพํ, จตูสุ ฌาเนสุ. एकाग्रता हे लक्षण असलेला समाधी आहे, अविक्षेप हे त्याचे प्रकटीकरण आहे. चार ज्ञाने हे त्याचे निकटचे कारण आहे. जसे भगवंतांनी म्हटले आहे: 'भिक्खूहो, समाधींद्रिय कोठे पाहावे? चार ध्यानांमध्ये पाहावे.' ปชานนลกฺขณา ปญฺญา, ภูตตฺถสนฺตีรณา ปจฺจุปฏฺฐานา, ตสฺส จตฺตาริ อริยสจฺจานิ ปทฏฺฐานํ. ยถา วุตฺตํ ภควตา ปญฺญินฺทฺริยํ, ภิกฺขเว, กุหึ ทฏฺฐพฺพํ, จตูสุ อริยสจฺเจสุ. विशेष रूपाने जाणणे हे लक्षण असलेली प्रज्ञा आहे, यथार्थ स्वरूपाचे परीक्षण करणे हे तिचे प्रकटीकरण आहे. चार आर्यसत्ये हे तिचे निकटचे कारण आहे. जसे भगवंतांनी म्हटले आहे: 'भिक्खूहो, प्रज्ञेंद्रिय कोठे पाहावे? चार आर्यसत्यांमध्ये पाहावे.' จตฺตาริ จกฺกานิ ปติรูปเทสวาโส จกฺกํ, สปฺปุริสูปนิสฺสโย จกฺกํ, อตฺตสมฺมาปณิธานํ จกฺกํ, ปุพฺเพ กตปุญฺญตา จกฺกํ. ตตฺถ อริยสนฺนิสฺสยลกฺขโณ ปติรูปเทสวาโส, โส สปฺปุริสูปนิสฺสยสฺส ปทฏฺฐานํ. อริยสนฺนิสฺสยลกฺขโณ สปฺปุริสฺสูปนิสฺสโย, โส อตฺตสมฺมาปณิธานสฺส ปทฏฺฐานํ. สมฺมาปฏิปตฺติลกฺขณํ อตฺตสมฺมาปณิธานํ, ตํ ปุญฺญานํ ปทฏฺฐานํ. กุสลธมฺโมปจยลกฺขณํ ปุญฺญํ, ตํ สพฺพสมฺปตฺตีนํ ปทฏฺฐานํ. चार चक्रे आहेत: प्रतिरूपदेशवास (अनुकूल ठिकाणी राहणे) हे चक्र, सत्पुरुषोपसंश्रय (सत्पुरुषांचा आश्रय घेणे) हे चक्र, आत्मसम्यक्प्रणिधान (स्वतःला योग्य मार्गावर ठेवणे) हे चक्र, आणि पूर्वकृतपुण्यता (पूर्वी केलेले पुण्य असणे) हे चक्र. त्यामध्ये, आर्यांचा आश्रय घेणे हे लक्षण असलेला प्रतिरूपदेशवास आहे, तो सत्पुरुषोपसंश्रयाचे निकटचे कारण आहे. आर्यांचा आश्रय घेणे हे लक्षण असलेला सत्पुरुषोपसंश्रय आहे, तो आत्मसम्यक्प्रणिधानाचे निकटचे कारण आहे. सम्यक् प्रतिपत्ती हे लक्षण केलेले आत्मसम्यक्प्रणिधान आहे, ते पुण्याचे निकटचे कारण आहे. कुशल धर्मांचा संचय करणे हे लक्षण केलेले पुण्य आहे, ते सर्व संपत्तीचे निकटचे कारण आहे. เอกาทสสีลมูลกา ธมฺมา สีลวโต อวิปฺปฏิสาโร ภวติ…เป… โส วิมุตฺติญาณทสฺสนํ ‘‘นาปรํ อิตฺถตฺตายา’’ติ ปชานนา. ตตฺถ เวรมณิลกฺขณํ สีลํ, ตํ อวิปฺปฏิสารสฺส ปทฏฺฐานํ. น อตฺตานุวาทลกฺขโณ อวิปฺปฏิสาโร, โส ปาโมชฺชสฺส ปทฏฺฐานํ. อภิปฺปโมทนลกฺขณํ ปาโมชฺชํ, ตํ ปีติยา ปทฏฺฐานํ. อตฺตมนลกฺขณา ปีติ, สา ปสฺสทฺธิยา ปทฏฺฐานํ. กมฺมนิยลกฺขณา ปสฺสทฺธิ, สา สุขสฺส ปทฏฺฐานํ. อพฺยาปาทลกฺขณํ สุขํ, ตํ สมาธิโน ปทฏฺฐานํ. อวิกฺเขปนลกฺขโณ สมาธิ, โส ยถาภูตญาณทสฺสนสฺส ปทฏฺฐานํ. อวิปรีตสนฺตีรณลกฺขณา ปญฺญา, สา นิพฺพิทาย ปทฏฺฐานํ อนาลยนลกฺขณา นิพฺพิทา, สา วิราคสฺส ปทฏฺฐานํ. อสํกิเลสลกฺขโณ วิราโค, โส วิมุตฺติยา ปทฏฺฐานํ. อกุสลธมฺมวิเวกลกฺขณา วิมุตฺติ, สา วิมุตฺติโน โวทานสฺส ปทฏฺฐานํ. शील हे मूळ असलेले अकरा धर्म आहेत. शीलवानाला पश्चात्तापरहितता प्राप्त होते... इत्यादी... तो विमुक्तीचे ज्ञानदर्शन प्राप्त करतो आणि 'या अस्तित्वासाठी आता काहीही कर्तव्य उरलेले नाही' असे जाणतो. त्यामध्ये, विरती हे लक्षण असलेले शील आहे, ते पश्चात्तापरहिततेचे निकटचे कारण आहे. स्वतःवर दोषारोप न करणे हे लक्षण असलेली पश्चात्तापरहितता आहे, ती प्रामोद्याचे निकटचे कारण आहे. अत्यंत आनंदित होणे हे लक्षण असलेले प्रामोद्य आहे, ते प्रीतीचे निकटचे कारण आहे. मन प्रसन्न करणे हे लक्षण असलेली प्रीती आहे, ती प्रश्रब्धीचे निकटचे कारण आहे. कर्मण्यता हे लक्षण असलेली प्रश्रब्धी आहे, ती सुखाचे निकटचे कारण आहे. अव्यापाद हे लक्षण असलेले सुख आहे, ते समाधीचे निकटचे कारण आहे. अविक्षेप हे लक्षण असलेला समाधी आहे, तो यथाभूतज्ञानदर्शनाचे निकटचे कारण आहे. अचूक परीक्षण करणे हे लक्षण असलेली प्रज्ञा आहे, ती निर्वेदाचे निकटचे कारण आहे. आसक्ती नसणे हे लक्षण असलेला निर्वेद आहे, तो विरागाचे निकटचे कारण आहे. संक्लेशरहितता हे लक्षण असलेला विराग आहे, तो विमुक्तीचे निकटचे कारण आहे. अकुशल धर्मांपासून अलिप्तता हे लक्षण असलेली विमुक्ती आहे, ती विमुक्तीच्या परिशुद्धीचे निकटचे कारण आहे. ๖๘. จตสฺโส อริยภูมิโย จตฺตาริ สามญฺญผลานิ. ตตฺถ โย ยถาภูตํ ปชานาติ, เอสา ทสฺสนภูมิ. โสตาปตฺติผลญฺจ โส ยถาภูตํ [Pg.255] ปชานิตฺวา นิพฺพินฺทติ, อิทํ ตนุกามราคสฺส ปทฏฺฐานํ พฺยาปาทานํ. สกทาคามิผลญฺจ สณฺหํ วิรชฺชติ, อยํ ราควิราคา เจโตวิมุตฺติ. อนาคามิผลญฺจ ยํ อวิชฺชาวิราคา วิมุจฺจติ, อยํ กตาภูมิ. อรหตฺตญฺจ สามญฺญผลานีติ โก วจนตฺโถ, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค สามญฺญํ, ตสฺเสตานิ ผลานิ สามญฺญผลานีติ วุจฺจติ. กิสฺส พฺรหฺมญฺญผลานีติ วุจฺจนฺเต? พฺรหฺมญฺญอริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, ตสฺส ตานิ ผลานีติ พฺรหฺมญฺญผลานีติ วุจฺจนฺเต. ६८. चार आर्यभूमी आहेत आणि चार श्रामण्यफळे आहेत. त्यामध्ये, जो यथार्थ स्वरूपात जाणतो, ती दर्शनभूमी आहे. आणि स्रोतापत्तीफळाला यथार्थ स्वरूपात जाणून तो निर्वेद प्राप्त करतो, हे कामराग आणि व्यापादाला मंद करण्याचे निकटचे कारण आहे. आणि सकदागामीफळामध्ये तो सूक्ष्म रागापासून विरक्त होतो, ही रागविरागामुळे झालेली चेतोविमुक्ती आहे. आणि अनागामीफळामध्ये जो अविद्येच्या विरागामुळे मुक्त होतो, ही कृतभूमी आहे. आणि अर्हत्त्व व श्रामण्यफळे यांचा काय अर्थ आहे? आर्य अष्टांगिक मार्ग हा 'श्रामण्य' आहे, आणि त्याची ही फळे 'श्रामण्यफळे' म्हटली जातात. त्यांना 'ब्रह्मण्यफळे' का म्हटले जाते? 'ब्रह्मण्य' म्हणजे आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे, आणि त्याची ती फळे 'ब्रह्मण्यफळे' म्हटली जातात. ตตฺถ โสตาปนฺโน กถํ โหติ? สห สจฺจาภิสมยา อริยสาวกสฺส ตีณิ สํโยชนานิ ปหียนฺติ สกฺกายทิฏฺฐิ วิจิกิจฺฉา สีลพฺพตปรามาโส จ, อิเมสํ ติณฺณํ สํโยชนานํ ปหานา ปริกฺขยา อริยสาวโก โหติ โสตาปนฺโน อวินิปาตธมฺโม ยาว ทุกฺขสฺสนฺตํ กโรติ. त्यामध्ये स्रोतापन्न कसा होतो? सत्याचा साक्षात्कार (सच्चाभिसमय) होण्याबरोबरच आर्यश्रावकाची तीन संयोजने नष्ट होतात—सत्कायदिट्ठि (सत्कायदृष्टी), विचिकिच्छा (संदेह) आणि सीलब्बतपरामास (शीलव्रतपरामर्श). या तीन संयोजनांच्या प्रहाणामुळे व क्षयामुळे तो आर्यश्रावक स्रोतापन्न होतो, जो अधोगतीला न पडणारा (अविनिपातधर्मी) असतो आणि दुःखाचा अंत करतो. ตตฺถ กตมา สกฺกายทิฏฺฐิ? อสฺสุตวา พาโล ปุถุชฺชโน ยาว อริยธมฺเม อโกวิโท, โส รูปํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ ยาว วิญฺญาณสฺมึ อตฺตานํ, โส อิเมสุ ปญฺจสุ ขนฺเธสุ อตฺตคฺคาโห วา อตฺตนิยคฺคาโห วา เอโสหมสฺมิ เอกสฺมึ วสวตฺติโก ปกฺขิตฺโต อนุคฺคโห อนุสยนฺโต องฺคมงฺคนฺติ ปรติ. ยา ตถาภูตสฺส ขนฺติ รุจิ เปกฺขนา อาการปริวิตกฺโก ทิฏฺฐินิชฺฌายนา อภิปฺปสนฺนา, อยํ วุจฺจเต สกฺกายทิฏฺฐีติ. त्यामध्ये सत्कायदिट्ठि कोणती आहे? अश्रुतवान, अज्ञानी पृथग्जन जो आर्यधम्मामध्ये अकुशल आहे, तो रूपाला आत्मा म्हणून पाहतो... विज्ञानापर्यंत (सर्व स्कंधांमध्ये) आत्मा पाहतो. तो या पाच स्कंधांमध्ये 'हा आत्मा आहे' असे ग्रहण करतो किंवा 'हे आत्म्याचे आहे' असे ग्रहण करतो; 'हा मी आहे', माझ्या वशामध्ये असणारा आहे, प्रक्षिप्त आहे, अनुग्रहित आहे, अनुशयित आहे, अंगप्रत्यंग आहे अशा प्रकारे तो आसक्त होतो. अशा प्रकारे झालेल्या व्यक्तीची जी स्वीकृती (खन्ति), आवड (रुचि), पाहणे (पेक्खना), आकाराचा विचार (आकारपरिवितक्क), दृष्टीचे चिंतन (दिट्ठिनिज्झायना) आणि गाढ श्रद्धा (अभिप्पसन्ना) असते, याला 'सत्कायदिट्ठि' असे म्हटले जाते. ตตฺถ ปญฺจ ทิฏฺฐิโย อุจฺเฉทํ ภชนฺติ. กตมาโย ปญฺจ? รูปํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, ยาว วิญฺญาณํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, อิมาโย ปญฺจ อุจฺเฉทํ ภชนฺติ, อวเสสาโย ปนฺนรส สสฺสตํ ภชนฺติ. อิติ สกฺกายทิฏฺฐิปหานา ทฺวาสฏฺฐิทิฏฺฐิคตานิ ปหียนฺติ. ปหานา อุจฺเฉทํ สสฺสตญฺจ น ภชติ. อิติ อุจฺเฉทสสฺสตปฺปหานา อริยสาวกสฺส น กิญฺจิ ทิฏฺฐิคตํ ภวติ, อญฺญา วา โลกุตฺตราย สมฺมาทิฏฺฐิยา. กถํ ปน สกฺกายทิฏฺฐิ น ภวติ? อิธ อริยสาวโก สุตวา โหติ, สพฺโพ สุกฺกปกฺโข กาตพฺโพ, ยาว อริยธมฺเมสุ โกวิโท รูปํ อนตฺตโต สมนุปสฺสติ, ยาว วิญฺญาณํ…เป… เอวมสฺส สมนุปสฺสนฺตสฺส สกฺกายทิฏฺฐิ น ภวติ. त्या सत्कायदिट्ठिमध्ये पाच दृष्टी उच्छेदवादाकडे झुकतात. त्या पाच कोणत्या? रूपाला आत्मा म्हणून पाहणे... विज्ञानाला आत्मा म्हणून पाहणे; या पाच उच्छेदवादाकडे झुकतात. उरलेल्या पंधरा दृष्टी शाश्वतवादाकडे झुकतात. अशा प्रकारे सत्कायदिट्ठि नष्ट झाल्यामुळे बासष्ट (६२) प्रकारच्या मिथ्या दृष्टी नष्ट होतात. उच्छेदवादाचे प्रहाण केल्यामुळे तो शाश्वतवादाकडेही झुकत नाही. अशा प्रकारे उच्छेदवाद आणि शाश्वतवाद नष्ट झाल्यामुळे आर्यश्रावकामध्ये कोणतीही मिथ्या दृष्टी उरत नाही, तर केवळ लोकोत्तर सम्यक्-दृष्टी (सम्मादिट्ठि) असते. पण सत्कायदिट्ठि कशी नष्ट होते? येथे आर्यश्रावक बहुश्रुत असतो, सर्व शुक्लपक्ष (कुशल धर्म) आचरले पाहिजेत, आर्यधम्मामध्ये कुशल असलेला तो रूपाला अनात्मा म्हणून पाहतो, विज्ञानापर्यंत... पे... अशा प्रकारे पाहणाऱ्या त्या व्यक्तीमध्ये सत्कायदिट्ठि उत्पन्न होत नाही. กถํ [Pg.256] วิจิกิจฺฉา น ภวติ? อิธ อริยสาวโก พุทฺเธ น กงฺขติ, น วิจิกิจฺฉติ อภิปฺปสีทติ, อิติปิ โส ภควาติ สพฺพํ. ธมฺเม น กงฺขติ น วิจิกิจฺฉติ สพฺพํ. ยาว ตณฺหกฺขโย วิราโค นิโรโธ นิพฺพานนฺติ, อิมินา ทุติเยน อากงฺขิเยน ธมฺเมน สมนฺนาคโต โหติ. สงฺเฆ น กงฺขติ…เป… ยาว ปูชา เทวานญฺจ มนุสฺสานญฺจาติ, อิมินา ตติเยน อากงฺขิเยน ธมฺเมน สมนฺนาคโต โหติ. विचिकित्सा (संदेह) कशी नष्ट होते? येथे आर्यश्रावक बुद्धांविषयी शंका घेत नाही, संदेह बाळगत नाही, अत्यंत प्रसन्न असतो—'इतिपि सो भगवा...' (ते भगवान असे आहेत...) इत्यादी सर्व गुणांना जाणतो. धम्माविषयी शंका घेत नाही, संदेह बाळगत नाही, सर्व गुणांना जाणतो. तृष्णेचा क्षय, विराग, निरोध, निर्वाण यांपर्यंत, या दुसऱ्या आकांक्षणीय धम्माने तो युक्त असतो. संघाविषयी शंका घेत नाही... पे... देव आणि मनुष्यांच्या पूजेपर्यंत, या तिसऱ्या आकांक्षणीय धम्माने तो युक्त असतो. สพฺเพ สงฺขารา ทุกฺขาติ น กงฺขติ น วิจิกิจฺฉติ อธิมุจฺจติ อภิปฺปสีทติ. ตณฺหา ทุกฺขสมุทโยติ น กงฺขติ น วิจิกิจฺฉติ. ตณฺหานิโรธา ทุกฺขนิโรโธติ น กงฺขติ น วิจิกิจฺฉติ. อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค ทุกฺขนิโรธคามินี ปฏิปทาติ น กงฺขติ น วิจิกิจฺฉติ อธิมุจฺจติ อภิปฺปสีทติ. ยาว พุทฺเธ วา ธมฺเม วา สงฺเฆ วา ทุกฺเข วา สมุทเย วา นิโรเธ วา มคฺเค วา กงฺขายนา วิมติ วิจิกิจฺฉา ทฺเวธาปถา อาสปฺปนา ปริสปฺปนา อนวฏฺฐานํ อธิฏฺฐาคมนํ อเนกํโส อเนกํสิกตา, เต ตสฺส ปหีนา ภวนฺติ ปณุนฺนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวํกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. 'सर्व संस्कार दुःखकारक आहेत' याविषयी तो शंका घेत नाही, संदेह बाळगत नाही, दृढ निश्चय करतो, अत्यंत प्रसन्न होतो. 'तृष्णा हा दुःखाचा उदय (समुदय) आहे' याविषयी तो शंका घेत नाही, संदेह बाळगत नाही. 'तृष्णेच्या निरोधाने दुःखाचा निरोध होतो' याविषयी तो शंका घेत नाही, संदेह बाळगत नाही. 'आर्य अष्टांगिक मार्ग हा दुःख निरोधाकडे नेणारा मार्ग आहे' याविषयी तो शंका घेत नाही, संदेह बाळगत नाही, दृढ निश्चय करतो, अत्यंत प्रसन्न होतो. बुद्धांविषयी, धम्माविषयी, संघाविषयी, दुःखाविषयी, समुदयाविषयी, निरोधाविषयी किंवा मार्गाविषयी जी शंका, विमति, विचिकित्सा, द्विधा मनःस्थिती, दोलायमानता, अस्थिरता, अनिर्णय, अनिश्चितता असते, त्या सर्व गोष्टी त्याच्याकडून नष्ट केल्या जातात, दूर केल्या जातात, समूळ उपटून टाकल्या जातात, ताडाच्या झाडासारख्या नष्ट केल्या जातात, पुन्हा कधीही उत्पन्न न होणाऱ्या (अनुत्पादधर्मी) केल्या जातात. ๖๙. ตตฺถ สีลพฺพตปรามาโส ทฺวิธา – สีลสฺส วา สุทฺธสฺส วา. ตตฺถ สีลสฺส สีลพฺพตปรามาโส อิมินาหํ สีเลน วา วเตน วา ตเปน วา พฺรหฺมจริเยน วา เทโว วา ภวิสฺสามิ เทวญฺญตโร วา ตตฺถ กโปตปาทาหิ อจฺฉราหิ สทฺธึ กีฬิสฺสามิ รมิสฺสามิ ปริจริสฺสามีติ. ยถาภูตทสฺสนนฺติ รุจิวิมุตฺติ ราโค ราคปริวตฺตกา ทิฏฺฐิรูปนา ปสฺสนา อสนฺตุสฺสิตสฺส สีลพฺพตปรามาโส. ตตฺถ กตโม สุทฺธสฺส สีลพฺพตปรามาโส? อิเธกจฺโจ สีลํ ปรามสติ, สีเลน สุชฺฌติ, สีเลน นียติ, สีเลน มุจฺจติ, สุขํ วีติกฺกมติ, ทุกฺขํ วีติกฺกมติ, สุขทุกฺขํ วีติกฺกมติ อนุปาปุณาติ อุปริเมน. ตทุภยํ สีลวตํ ปรามสติ ตทุภเยน สีลวเตน สุชฺฌนฺติ มุจฺจนฺติ นียนฺติ, สุขํ วีติกฺกมนฺติ, ทุกฺขํ วีติกฺกมนฺติ, สุขทุกฺขํ วีติกฺกมนฺติ, อนุปาปุณนฺตีติ อวิสุจิกรํ ธมฺมํ อวิมุตฺติกรํ ธมฺมํ วิสุจิโต วิมุตฺติโต ปจฺจาคจฺฉนฺตสฺส ยา ตถาภูตสฺส ขนฺติ รุจิ มุตฺติ เปกฺขนา อาการปริวิตกฺโก ทิฏฺฐินิชฺฌายนา ปสฺสนา, อยํ สุทฺธสฺส สีลพฺพตปรามาโส. เอเต อุโภ ปรามาสา อริยสาวกสฺส ปหีนา [Pg.257] ภวนฺติ ยาว อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา, โส สีลวา ภวติ อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคโต อกฺขณฺเฑหิ ยาว อุปสมสํวตฺตนิเกหิ. อิเมสํ ติณฺณํ สํโยชนานํ ปหานา สุตวา อริยสาวโก ภวติ โสตาปนฺโน อวินิปาตธมฺโม, สพฺพํ. ६९. त्यामध्ये शीलव्रतपरामर्श (सीलब्बतपरामास) दोन प्रकारचा आहे—शीलाचा किंवा शुद्धीचा. त्यामध्ये शीलाचा शीलव्रतपरामर्श कोणता? 'मी या शीलाने, व्रताने, तपाने किंवा ब्रह्मचर्याने देव किंवा देवांपैकी एक होईन, तिथे कबुतराच्या पायांसारखे पाय असलेल्या अप्सरांसोबत क्रीडा करीन, रमीन, विहार करीन.' अशा प्रकारे यथाभूतदर्शनाचा अभाव, आवड, राग, रागाने वेढलेली दृष्टी, रूप-नामाचे दर्शन आणि असंतुष्टता असणे, याला शीलाचा शीलव्रतपरामर्श म्हणतात. त्यामध्ये शुद्धीचा शीलव्रतपरामर्श कोणता? येथे एखादी व्यक्ती शीलाचा चुकीचा परामर्श घेते: 'शीलाने शुद्धी होते, शीलाने निर्वाण प्राप्त होते, शीलाने मुक्ती मिळते, सुखाचे उल्लंघन होते, दुःखाचे उल्लंघन होते, सुख-दुःखाचे उल्लंघन होते आणि उच्च पदाची प्राप्ती होते.' तो या दोन्ही शील आणि व्रतांचे चुकीचे ग्रहण करतो की, 'या दोन्ही शील-व्रतांनी लोक शुद्ध होतात, मुक्त होतात, निर्वाणाप्रत जातात, सुखाचे उल्लंघन करतात, दुःखाचे उल्लंघन करतात, सुख-दुःखाचे उल्लंघन करतात आणि निर्वाण प्राप्त करतात.' अशुद्ध करणाऱ्या धर्माला आणि अमुक्त करणाऱ्या धर्माला 'हा शुद्ध करणारा आहे, हा मुक्त करणारा आहे' असे समजणाऱ्या व्यक्तीची जी स्वीकृती, आवड, मुक्ती, पाहणे, आकाराचा विचार, दृष्टीचे चिंतन आणि दर्शन असते, याला शुद्धीचा शीलव्रतपरामर्श म्हणतात. हे दोन्ही परामर्श आर्यश्रावकाचे नष्ट झालेले असतात, जे भविष्यात कधीही उत्पन्न न होणारे असतात. तो शीलवान असतो, आर्यांना प्रिय असलेल्या, अखंडित असलेल्या आणि उपशमाकडे (शांततेकडे) नेणाऱ्या शीलांनी युक्त असतो. या तीन संयोजनांच्या प्रहाणामुळे तो बहुश्रुत आर्यश्रावक स्रोतापन्न होतो, जो अधोगतीला न पडणारा असतो—हे सर्व जाणावे. สหสจฺจาภิสมยา, อิติ โก วจนตฺโถ? จตฺตาโร อภิสมยา, ปริญฺญาภิสมโย ปหานาภิสมโย สจฺฉิกิริยาภิสมโย ภาวนาภิสมโย. 'सच्चाभिसमया' (सत्याचा साक्षात्कार) याचा अर्थ काय? चार प्रकारचे अभिसमय (साक्षात्कार) आहेत: परिज्ञाभिसमय (पूर्ण ज्ञान), प्रहाणाभिसमय (त्याग), सच्चिकिरियाभिसमय (साक्षात्कार) आणि भावनाभिसमय (साधना). ตตฺถ อริยสาวโก ทุกฺขํ ปริญฺญาภิสมเยน อภิสเมติ, สมุทยํ ปหานาภิสมเยน อภิสเมติ, นิโรธํ สจฺฉิกิริยาภิสมเยน อภิสเมติ, มคฺคํ ภาวนาภิสมเยน อภิสเมติ. กึ การณํ? ทุกฺขสฺส ปริญฺญาภิสมโย, สมุทยสฺส ปหานาภิสมโย, นิโรธสฺส สจฺฉิกิริยาภิสมโย, มคฺคสฺส ภาวนาภิสมโย. สมถวิปสฺสนาย กถํ อภิสเมติ? อารมฺมเณ จิตฺตํ อุปนิพนฺเธตฺวา ปญฺจกฺขนฺเธ ทุกฺขโต ปสฺสติ. ตตฺถ โย อุปนิพนฺโธ, อยํ สมโถ. ยา ปริโยคาหนา, อยํ วิปสฺสนา. ปญฺจกฺขนฺเธ ทุกฺขาติ ปสฺสโต โย ปญฺจกฺขนฺเธสุ อาลโย นิกนฺติ อุปคมนํ อชฺโฌสานา อิจฺฉา มุจฺฉา ปณิธิ ปตฺถนา ปหียติ. ตตฺถ ปญฺจกฺขนฺธา ทุกฺขํ. โย ตตฺถ อาลโย นิกนฺติ อุปคมนํ อชฺโฌสานํ อิจฺฉา มุจฺฉา ปณิธิ ปตฺถนา, อยํ สมุทโย. ยํ ตสฺส ปหานํ, โส นิโรโธ สมโถ วิปสฺสนา จ มคฺโค, เอวํ เตสํ จตุนฺนํ อริยสจฺจานํ เอกกาเล เอกกฺขเณ เอกจิตฺเต อปุพฺพํ อจริมํ อภิสมโย ภวติ. เตนาห ภควา ‘‘สหสจฺจาภิสมยา อริยสาวกสฺส ตีณิ สํโยชนานิ ปหียนฺตี’’ติ. त्यामध्ये, आर्यश्रावक दुःखाला परिज्ञा-अभिसमयाने जाणतो (साक्षात् करतो), समुदयाला प्रहाण-अभिसमयाने जाणतो, निरोधाला साक्षात्करण-अभिसमयाने जाणतो आणि मार्गाला भावना-अभिसमयाने जाणतो. याचे कारण काय? दुःखाचा परिज्ञा-अभिसमय, समुदयाचा प्रहाण-अभिसमय, निरोधाचा साक्षात्करण-अभिसमय आणि मार्गाचा भावना-अभिसमय (हेच त्याचे कारण आहे). शमथ आणि विपश्यनेद्वारे तो कशा प्रकारे जाणतो? आलंबनावर (विषयावर) चित्त एकाग्र करून (बांधून) तो पंचस्कंधांना दुःख म्हणून पाहतो. त्यामध्ये जे चित्त एकाग्र करणे (बांधणे) आहे, तो 'शमथ' होय. जी सखोल तपासणी (प्रवेश) आहे, ती 'विपश्यना' होय. पंचस्कंधांना 'दुःख' म्हणून पाहणाऱ्याचे, पंचस्कंधांमधील जी आसक्ती (आलय), अभिलाषा (निकंती), जवळीक (उपगमन), तल्लीनता (अज्झोसान), इच्छा, मोह (मुच्छा), प्रणिधी आणि प्रार्थना आहे, ती नष्ट होते. त्यामध्ये पंचस्कंध हे 'दुःख' (दुःख सत्य) आहेत. त्यामध्ये जी आसक्ती, अभिलाषा, जवळीक, तल्लीनता, इच्छा, मोह, प्रणिधी आणि प्रार्थना आहे, तो 'समुदय' (समुदय सत्य) होय. त्याचे जे प्रहाण (त्याग) आहे, तो 'निरोध' (निरोध सत्य) होय आणि शमथ व विपश्यना हा 'मार्ग' (मार्ग सत्य) होय. अशा प्रकारे, या चार आर्य सत्यांचा एकाच वेळी, एकाच क्षणी, एकाच चित्तात, मागे-पुढे न होता (एकत्रच) अभिसमय (साक्षात्कार) होतो. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे: 'सत्याच्या अभिसमयाबरोबरच (साक्षात्काराबरोबरच) आर्यश्रावकाची तीन संयोजने नष्ट होतात.' ๗๐. ตตฺถ สมถวิปสฺสนา ยุคนทฺธา วตฺตมานา เอกกาเล เอกกฺขเณ เอกจิตฺเต จตฺตาริ กิจฺจานิ กโรติ, ทุกฺขํ ปริญฺญาภิสมเยน อภิสเมติ, ยาว มคฺคํ ภาวนาภิสมเยน อภิสเมติ. กึ การณา? ทุกฺขํ ปริญฺญาภิสมโย, ยาว มคฺคํ ภาวนาภิสมโย. เอวํ ทิฏฺฐนฺโต ยถา นาวา ชลํ คจฺฉนฺตี จตฺตาริ กิจฺจานิ กโรติ, ปาริมํ ตีรํ ปาเปติ, โอริมํ ตีรํ ชหติ, ภารํ วหติ, โสตํ ฉินฺทติ; เอวเมว สมถวิปสฺสนา ยุคนทฺธา วตฺตมานา เอกกาเล เอกกฺขเณ เอกจิตฺเต จตฺตาริ กิจฺจานิ กโรติ[Pg.258], ทุกฺขํ ปริญฺญาภิสมเยน อภิสเมติ, ยาว มคฺคํ ภาวนาภิสมเยน อภิสเมติ. ยถา วา สูริโย อุทยนฺโต เอกกาเล อปุพฺพํ อจริมํ จตฺตาริ กิจฺจานิ กโรติ, อนฺธการํ วิธมติ, อาโลกํ ปาตุกโรติ, รูปํ นิทสฺสียติ, สีตํ ปริยาทิยติ; เอวเมว สมถวิปสฺสนา ยุคนทฺธา วตฺตมานา เอกกาเล…เป… ยถา ปทีโป ชลนฺโต เอกกาเล อปุพฺพํ อจริมํ จตฺตาริ กิจฺจานิ กโรติ, อนฺธการํ วิธมติ, อาโลกํ ปาตุกโรติ, รูปํ นิทสฺสียติ, อุปาทานํ ปริยาทิยติ; เอวเมว สมถวิปสฺสนา ยุคนทฺธา วตฺตมานา เอกกาเล…เป…. ७०. त्यामध्ये, शमथ आणि विपश्यना एकत्र (युगनद्ध - जोडीने) प्रवृत्त होत असताना एकाच वेळी, एकाच क्षणी, एकाच चित्तात चार कार्ये करतात - दुःखाला परिज्ञा-अभिसमयाने जाणतात, आणि मार्गाला भावना-अभिसमयाने जाणतात. याचे कारण काय? दुःखाचा परिज्ञा-अभिसमय आणि मार्गाचा भावना-अभिसमय (हेच कारण आहे). याचे उदाहरण असे आहे: ज्याप्रमाणे पाण्यात चालणारी नौका एकाच वेळी चार कार्ये करते - पलीकडच्या किनाऱ्याला पोहोचवते, अलीकडचा किनारा सोडते, भार (ओझे) वाहून नेते आणि पाण्याचा प्रवाह कापते; त्याचप्रमाणे, शमथ आणि विपश्यना एकत्र प्रवृत्त होत असताना एकाच वेळी, एकाच क्षणी, एकाच चित्तात चार कार्ये करतात - दुःखाला परिज्ञा-अभिसमयाने जाणतात, आणि मार्गाला भावना-अभिसमयाने जाणतात. किंवा ज्याप्रमाणे सूर्य उगवताना एकाच वेळी, मागे-पुढे न होता (एकत्रच) चार कार्ये करतो - अंधाराचा नाश करतो, प्रकाश प्रकट करतो, रूप दाखवतो आणि थंडी नष्ट करतो; त्याचप्रमाणे, शमथ आणि विपश्यना एकत्र प्रवृत्त होत असताना एकाच वेळी... (पेय्याल)... ज्याप्रमाणे जळणारा दिवा एकाच वेळी, मागे-पुढे न होता चार कार्ये करतो - अंधाराचा नाश करतो, प्रकाश प्रकट करतो, रूप दाखवतो आणि इंधन संपवतो; त्याचप्रमाणे, शमथ आणि विपश्यना एकत्र प्रवृत्त होत असताना एकाच वेळी... (पेय्याल)... ยทา อริยสาวโก โสตาปนฺโน ภวติ อวินิปาตธมฺโม นิยโต ยาว ทุกฺขสฺสนฺตํ กโรติ, อยํ ทสฺสนภูมิ. โสตาปตฺติผลญฺจ โสตาปตฺติผเล ฐิโต อุตฺตริ สมถวิปสฺสนํ ภาเวนฺโต ยุคนทฺธา วตฺตมานา กามราคพฺยาปาทานํ เยภุยฺเยน ปหานา อริยสาวโก โหติ. สกทาคามิ ปรินิฏฺฐิตตฺตา สกิเทว อิมํ โลกํ อาคนฺตฺวา ทุกฺขสฺสนฺตํ กโรติ, อยํ ตนุภูมิ. जेव्हा आर्यश्रावक स्रोतापन्न होतो, तेव्हा तो अधोगतीला न जाणारा (अविनिपातधर्मी), नियत (निश्चितपणे संबोधी प्राप्त करणारा) आणि दुःखाचा अंत करणारा होतो; ही 'दर्शनभूमी' होय. आणि स्रोतापत्ती फलामध्ये स्थित असलेला (स्रोतापन्न), पुढे शमथ आणि विपश्यनेची भावना करत असताना, ती एकत्र प्रवृत्त होत असताना, कामराग आणि व्यापाद यांच्या बहुतांश प्रहाणामुळे (नष्ट झाल्यामुळे) तो आर्यश्रावक (सकृदागामी) होतो. सकृदागामी अवस्था पूर्ण झाल्यामुळे, या लोकात केवळ एकदाच येऊन तो दुःखाचा अंत करतो; ही 'तनुभूमी' होय. สกทาคามิผลญฺจ โย สกทาคามิผเล ฐิโต วิปสฺสนํ ภาเวนฺโต กามราคพฺยาปาเท สานุสเย อนวเสสํ ปชหติ, กามราคพฺยาปาเทสุ อนวเสสํ ปหีเนสุ ปญฺโจรมฺภาคิยานิ สํโยชนานิ ปหีนานิ ภวนฺติ สกฺกายทิฏฺฐิ สีลพฺพตปรามาโส วิจิกิจฺฉา กามจฺฉนฺโท พฺยาปาโท จ, อิเมสํ ปญฺจนฺนํ โอรมฺภาคิยานํ สํโยชนานํ ปหานา อริยสาวโก โหติ อนาคามี ตตฺถ ปรินิพฺพายี อนาวตฺติธมฺโม ตสฺมา โลกา, อยํ วีตราคภูมิ. आणि जो सकृदागामी फलामध्ये स्थित असलेला साधक, विपश्यनेची भावना करत असताना कामराग आणि व्यापाद यांना त्यांच्या अनुसयांसह पूर्णपणे (निरवशेष) नष्ट करतो; कामराग आणि व्यापाद पूर्णपणे नष्ट झाल्यावर पाच अवरभागीय संयोजने नष्ट होतात - सत्कायदृष्टी, शीलव्रतपरामर्श, विचिकित्सा, कामच्छंद आणि व्यापाद. या पाच अवरभागीय संयोजने नष्ट झाल्यामुळे तो आर्यश्रावक 'अनागामी' होतो, जो तिथेच (शुद्धावास लोकात) परिनिर्वाण प्राप्त करणारा आणि त्या लोकातून परत न येणारा (अनावृत्ती-धर्मी) होतो; ही 'वीतरागभूमी' होय. อนาคามิผลญฺจ อนาคามิผเล ฐิโต อุตฺตริ สมถวิปสฺสนํ ภาเวนฺโต ปญฺจ อุทฺธมฺภาคิยานิ สํโยชนานิ ปชหติ รูปราคอรูปราคมานอุทฺธจฺจอวิชฺชญฺจ. อิเมสํ ปญฺจนฺนํ อุทฺธมฺภาคิยานํ สํโยชนานํ ปหานา อริยสาวโก อรหา ภวติ, ขีณาสโว วุสิตวา สมฺมทญฺญา วิมุตฺโต ปริกฺขีณภวสํโยชโน อนุปฺปตฺตสทตฺโถ, อยํ กตาภูมิ. आणि अनागामी फलामध्ये स्थित असलेला साधक, पुढे शमथ आणि विपश्यनेची भावना करत असताना पाच उर्ध्वभागीय संयोजने नष्ट करतो - रूपराग, अरूपराग, मान, औद्धत्य आणि अविद्या. या पाच उर्ध्वभागीय संयोजने नष्ट झाल्यामुळे तो आर्यश्रावक 'अर्हत' होतो, जो क्षीणासव, ब्रह्मचर्य पूर्ण केलेला (वुसितवा), सम्यक् ज्ञानाने विमुक्त झालेला, भवसंयोजने पूर्णपणे नष्ट झालेला आणि स्वतःचे कल्याण (सद्-अर्थ) प्राप्त केलेला असतो; ही 'कृताभूमी' (कृतभूमी) होय. อรหนฺโตว อยํ โสปาทิเสสา นิพฺพานธาตุ. ตสฺส อายุกฺขยา ชีวิตินฺทฺริยาปโรธา อิทญฺจ ทุกฺขํ นิรุชฺฌติ, อญฺญญฺจ ทุกฺขํ น อุปฺปชฺชติ. โย อิมสฺส ทุกฺขสฺส นิโรโธ วูปสโม, อญฺญสฺส จ อปาตุภาโว, อยํ [Pg.259] อนุปาทิเสสา นิพฺพานธาตุ. อิมา ทฺเว นิพฺพานธาตุโย. อิติ สจฺจานิ วุตฺตานิ. สจฺจาภิสมโย วุตฺโต, กิเลสววตฺถานํ วุตฺตํ, ปหานํ วุตฺตํ, ภูมิโย วุตฺตา, ผลานิ วุตฺตานิ, นิพฺพานธาตุโย วุตฺตา. เอวมิเมสุ วุตฺเตสุ สพฺพโพธิ วุตฺตา ภวติ. เอตฺถ โยโค กรณีโย. अर्हताची ही अवस्था 'सोपादिशेष निर्वाणधातू' होय. त्याच्या आयुष्याचा क्षय झाल्यामुळे आणि जीवितेंद्रियाचा निरोध झाल्यामुळे, हे (वर्तमान) दुःखही निरुद्ध होते आणि इतर कोणतेही (भविष्यातील) दुःख उत्पन्न होत नाही. या दुःखाचा जो निरोध आणि उपशम आहे, आणि इतर दुःखाचे जे अप्रकट होणे (उत्पन्न न होणे) आहे, ती 'अनुपादिशेष निर्वाणधातू' होय. या दोन निर्वाणधातू आहेत. अशा प्रकारे सत्यांचे कथन केले गेले आहे. सत्याचा अभिसमय सांगितला गेला आहे, क्लेशांचे निर्धारण सांगितले गेले आहे, प्रहाण सांगितले गेले आहे, भूमी सांगितल्या गेल्या आहेत, फले सांगितली गेली आहेत आणि निर्वाणधातू सांगितल्या गेल्या आहेत. अशा प्रकारे, हे सांगितले असता सर्व-बोधी (पूर्ण ज्ञान) सांगितली जाते. येथे (या साधनेत) योग (प्रयत्न) केला पाहिजे. ๗๑. ตตฺถ กตมาโย นว อนุปุพฺพสมาปตฺติโย? จตฺตาริ ฌานานิ จตสฺโส จ อรูปสมาปตฺติโย นิโรธสมาปตฺติ จ. ตตฺถ จตฺตาริ ฌานานิ กตมานิ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ วิวิจฺเจว กาเมหีติ วิตฺถาเรน กาตพฺพานิ. ตตฺถ กตมา จตฺตาโร อรูปสมาปตฺติโย? วิราคิโน วต วตฺตพฺโพ, ยาว นิโรธสมาปตฺติ วิตฺถาเรน กาตพฺพา. อิมาโย นว อนุปุพฺพสมาปตฺติโย. ७१. त्यामध्ये नऊ अनुक्रमिक समापत्ती (अनुपूर्वसमापत्ती) कोणत्या आहेत? चार ध्याने, चार अरूप समापत्ती आणि निरोध समापत्ती. त्यामध्ये चार ध्याने कोणती आहेत? 'येथे, भिक्खूंनो, भिक्खू कामांपासून अलिप्त होऊनच...' इत्यादी विस्ताराने जाणावे. त्यामध्ये चार अरूप समापत्ती कोणत्या आहेत? विरागी पुरुषाविषयी खरोखरच सांगितले पाहिजे, निरोध समापत्तीपर्यंत विस्ताराने जाणावे. या नऊ अनुक्रमिक समापत्ती (अनुपूर्वसमापत्ती) आहेत. ตตฺถ กตมํ ปฐมํ ฌานํ? ปญฺจงฺควิปฺปยุตฺตํ ปญฺจงฺคสมนฺนาคตํ. กตเมหิ ปญฺจหิ องฺเคหิ วิปฺปยุตฺตํ? ปญฺจหิ นีวรเณหิ. ตตฺถ กตมานิ ปญฺจ นีวรณานิ? กามจฺฉนฺโทติ วิตฺถาเรตพฺโพ. ตตฺถ กตโม กามจฺฉนฺโท? โย ปญฺจสุ กามคุเณสุ ฉนฺทราโค เปมํ นิกนฺติ อชฺโฌสานํ อิจฺฉา มุจฺฉา ปตฺถนา อปริจฺจาโค อนุสโย ปริยุฏฺฐานํ, อยํ กามจฺฉนฺทนีวรณํ. ตตฺถ กตมํ พฺยาปาทนีวรณํ? โย สตฺเตสุ สงฺขาเรสุ จ อาฆาโต…เป… ยถา โทเส ตถา นิโอฏฺฐานา, อยํ พฺยาปาโท นีวรณํ. ตตฺถ กตมํ มิทฺธํ? ยา จิตฺตสฺส ชฬตา จิตฺตสฺส ครุตฺตํ จิตฺตสฺส อกมฺมนียตา จิตฺตสฺส นิกฺเขโป นิทฺทายนา ปจลิกตา ปจลายนา ปจลายนํ, อิทํ มิทฺธํ. ตตฺถ กตมํ ถินํ ? ยา กายสฺส ถินตา ชฬตา กายสฺส ครุตฺตา กายสฺส อปฺปสฺสทฺธิ, อิทํ ถินํ. อิติ อิทญฺจ ถินํ ปุริมกญฺจ มิทฺธํ ตทุภยํ ถินมิทฺธนีวรณนฺติ วุจฺจติ. ตตฺถ กตมํ อุทฺธจฺจํ? โย อวูปสโม จิตฺตสฺส, อิทํ อุทฺธจฺจํ. ตตฺถ กตมํ กุกฺกุจฺจํ? โย เจตโส วิเลโข อลญฺจนา วิลญฺจนา หทยเลโข วิปฺปฏิสาโร, อิทํ กุกฺกุจฺจํ. อิติ อิทญฺจ กุกฺกุจฺจํ ปุริมกญฺจ อุทฺธจฺจํ ตทุภยํ อุทฺธจฺจกุกฺกุจฺจนีวรณนฺติ วุจฺจติ. ตตฺถ กตมํ วิจิกิจฺฉานีวรณํ? โย พุทฺเธ วา ธมฺเม วา สงฺเฆ วา…เป… อยํ วิจิกิจฺฉา. อปิ จ โข ปน ปญฺจ วิจิกิจฺฉาโย สมนนฺตรายิกา เทสนฺตรายิกา สมาปตฺตนฺตรายิกา มคฺคนฺตรายิกา สคฺคนฺตรายิกา, อิมาโย ปญฺจ วิจิกิจฺฉาโย[Pg.260]. อิธ ปน สมาปตฺตนฺตรายิกา วิจิกิจฺฉา อธิปฺเปตา. อิเม ปญฺจ นีวรณา. त्यामध्ये पहिले ध्यान कोणते? पाच अंगांनी विप्रयुक्त (रहित) आणि पाच अंगांनी समन्वागत (युक्त). कोणत्या पाच अंगांनी विप्रयुक्त आहे? पाच नीवरणांनी. त्यामध्ये पाच नीवरणे कोणती? 'कामच्छंद' इत्यादींचा विस्तार करावा. त्यामध्ये कामच्छंद कोणता? जो पाच कामगुणांमध्ये छंदराग, प्रेम, निकंती (आसक्ती), अध्यवसान (गुंतून राहणे), इच्छा, मूर्च्छा, प्रार्थना (आकांक्षा), अपरित्याग (न सोडणे), अनुशय (सुप्त क्लेश) आणि पर्युत्थान (उफाळून येणे) आहे, याला कामच्छंद नीवरण म्हणतात. त्यामध्ये व्यापाद नीवरण कोणते? जो प्राण्यांवर आणि संस्कारांवर आघात (द्वेष)... पे... जसा द्वेषात तसाच उपद्रव (पीडा) आहे, याला व्यापाद नीवरण म्हणतात. त्यामध्ये मिद्ध कोणते? जी चित्ताची जडता (मंदता), चित्ताचे गुरुत्व (जडपणा), चित्ताची अकर्मण्यता, चित्ताचा निक्षेप (टाकून देणे), निद्रायन (झोप येणे), पचलिकता (डुलकी घेणे), पचलायन (झोपेत झोके घेणे) आहे, याला मिद्ध म्हणतात. त्यामध्ये थिन (स्त्यान) कोणते? जी कायाची (मानसिक स्कंधांची) स्त्यानता, जडता, कायाचे गुरुत्व, कायाची अप्रश्रब्धी (अशांतता) आहे, याला थिन म्हणतात. अशा प्रकारे हे थिन आणि पूर्वीचे मिद्ध, या दोन्हीला मिळून 'थिनमिद्ध नीवरण' (स्त्यान-मिद्ध नीवरण) असे म्हटले जाते. त्यामध्ये उद्धच्च (औद्धत्य) कोणते? जो चित्ताचा अव्युपशम (अशांतता) आहे, याला उद्धच्च म्हणतात. त्यामध्ये कुक्कुच्च (कौकृत्य) कोणते? जो चेतसाचा (चित्ताचा) विलेख (खिन्नता), अलंचना (असमाधान), विलंचना, हृदयलेख (हृदयातील सल), विप्रतिसार (पश्चात्ताप) आहे, याला कुक्कुच्च म्हणतात. अशा प्रकारे हे कुक्कुच्च आणि पूर्वीचे उद्धच्च, या दोन्हीला मिळून 'उद्धच्चकुक्कुच्च नीवरण' (औद्धत्य-कौकृत्य नीवरण) असे म्हटले जाते. त्यामध्ये विचिकित्सा नीवरण कोणते? जी बुद्धांविषयी, धर्माविषयी किंवा संघाविषयी... पे... शंका आहे, याला विचिकित्सा म्हणतात. शिवाय, पाच प्रकारच्या विचिकित्सा आहेत: शमन-अंतरायिका, देश-अंतरायिका, समापत्ति-अंतरायिका, मार्ग-अंतरायिका आणि स्वर्ग-अंतरायिका; या पाच विचिकित्सा आहेत. परंतु येथे समापत्ति-अंतरायिका (समापत्तीत अडथळा आणणारी) विचिकित्सा अभिप्रेत आहे. ही पाच नीवरणे आहेत. ตตฺถ นีวรณานีติ โก วจนตฺโถ, กุโต นิวารยนฺตีติ? สพฺพโต กุสลปกฺขิกา นิวารยนฺติ. กถํ นิวารยนฺติ? กามจฺฉนฺโท อสุภโต นิวารยติ, พฺยาปาโท เมตฺตาย นิวารยติ, ถินํ ปสฺสทฺธิโต นิวารยติ, มิทฺธํ วีริยารมฺภโต นิวารยติ, อุทฺธจฺจํ สมถโต นิวารยติ, กุกฺกุจฺจํ อวิปฺปฏิสารโต นิวารยติ, วิจิกิจฺฉา ปญฺญาโต ปฏิจฺจสมุปฺปาทโต นิวารยติ. त्यामध्ये 'नीवरण' याचा काय अर्थ आहे, ते कशापासून निवारण (प्रतिबंध) करतात? ते सर्व कुशल पक्षांपासून निवारण करतात. ते कशा प्रकारे निवारण करतात? कामच्छंद अशुभापासून निवारण करतो, व्यापाद मैत्रीपासून निवारण करतो, थिन (स्त्यान) प्रश्रब्धीपासून निवारण करतो, मिद्ध वीर्यारंभापासून निवारण करतो, उद्धच्च शमथापासून निवारण करतो, कुक्कुच्च अविप्रतिसारापासून निवारण करतो, आणि विचिकित्सा प्रज्ञेपासून व प्रतीत्यसमुत्पादापासून निवारण करते. อปโร ปริยาโย. กามจฺฉนฺโท อโลภโต กุสลมูลโต นิวารยติ, พฺยาปาโท อโทสโต นิวารยติ, ถินมิทฺธํ สมาธิโต นิวารยติ, อุทฺธจฺจกุกฺกุจฺจํ สติปฏฺฐาเนหิ นิวารยติ, วิจิกิจฺฉา อโมหโต กุสลมูลโต นิวารยติ. दुसरा पर्याय: कामच्छंद अलोभ या कुशलमुळापासून निवारण करतो, व्यापाद अद्वेषापासून निवारण करतो, थिन-मिद्ध समाधीपासून निवारण करते, उद्धच्च-कुक्कुच्च स्मृतिप्रस्थानांपासून निवारण करते, आणि विचिकित्सा अमोहाच्या कुशलमुळापासून निवारण करते. อปโร ปริยาโย. ตโย วิหารา ทิพฺพวิหาโร พฺรหฺมวิหาโร อริยวิหาโร. ทิพฺพวิหาโร จตฺตาริ ฌานานิ, พฺรหฺมวิหาโร จตฺตาริ อปฺปมาณานิ, อริยวิหาโร สตฺตตึส โพธิปกฺขิยา ธมฺมา. ตตฺถ กามจฺฉนฺโท อุทฺธจฺจํ กุกฺกุจฺจญฺจ ทิพฺพวิหารํ นิวารยติ, พฺยาปาโท พฺรหฺมวิหารํ นิวารยติ, ถินมิทฺธํ วิจิกิจฺฉา จ อริยวิหารํ นิวารยติ. दुसरा पर्याय: तीन विहार आहेत - दिव्यविहार, ब्रह्मविहार आणि आर्यविहार. चार ध्याने म्हणजे दिव्यविहार होय, चार अप्रमाण म्हणजे ब्रह्मविहार होय, आणि सदतीस बोधिपाक्षिक धर्म म्हणजे आर्यविहार होय. त्यामध्ये कामच्छंद, उद्धच्च आणि कुक्कुच्च दिव्यविहारापासून निवारण करतात; व्यापाद ब्रह्मविहारापासून निवारण करतो; आणि थिन-मिद्ध व विचिकित्सा आर्यविहारापासून निवारण करतात. อปโร ปริยาโย. กามจฺฉนฺโท พฺยาปาโท อุทฺธจฺจกุกฺกุจฺจญฺจ สมถํ นิวารยนฺติ, ถินมิทฺธํ วิจิกิจฺฉา จ วิปสฺสนํ นิวารยนฺติ, อโต นีวรณนฺติ วุจฺจนฺเต. อิเมหิ ปญฺจหิ องฺเคหิ วิปฺปยุตฺตํ ปฐมํ ฌานํ. दुसरा पर्याय: कामच्छंद, व्यापाद आणि उद्धच्च-कुक्कुच्च शमथापासून निवारण करतात; थिन-मिद्ध आणि विचिकित्सा विपश्यनेपासून निवारण करतात; म्हणून त्यांना 'नीवरण' असे म्हटले जाते. या पाच अंगांनी विप्रयुक्त (रहित) असे पहिले ध्यान आहे. กตเมหิ ปญฺจหิ องฺเคหิ สมฺปยุตฺตํ ปฐมํ ฌานํ? วิตกฺกวิจาเรหิ ปีติยา สุเขน จ จิตฺเตกคฺคตาย จ. อิเมสํ ปญฺจนฺนํ องฺคานํ อุปฺปาทปฏิลาภสมนฺนาคโม สจฺฉิกิริยํ ปฐมํ ฌานํ ปฏิลทฺธนฺติ วุจฺจติ. อิมานิ ปญฺจ องฺคานิ อุปฺปาเทตฺวา วิหรตีติ, เตน วุจฺจเต ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรตีติ ทิพฺเพน วิหาเรน. कोणत्या पाच अंगांनी पहिले ध्यान संप्रयुक्त (युक्त) आहे? वितर्क, विचार, प्रीती, सुख आणि चित्तेकाग्रता या पाच अंगांनी. या पाच अंगांची उत्पत्ती, प्राप्ती, समन्वागम आणि साक्षात्काराला 'पहिले ध्यान प्राप्त झाले' असे म्हटले जाते. या पाच अंगांना उत्पन्न करून तो विहरतो, म्हणून त्याला 'दिव्य विहाराने पहिल्या ध्यानाचा उपसंपदा करून विहरतो' असे म्हटले जाते. ตตฺถ ทุติยํ ฌานํ จตุรงฺคสมนฺนาคตํ ปีติสุเขน จิตฺเตกคฺคตาย อชฺฌตฺตํ สมฺปสาทเนน อิมานิ จตฺตาริ องฺคานิ อุปฺปาเทตฺวา สมฺปาเทตฺวา วิหรติ, เตน วุจฺจติ ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรตีติ. त्यामध्ये दुसरे ध्यान चार अंगांनी समन्वागत आहे - प्रीती, सुख, चित्तेकाग्रता आणि अध्यात्म संप्रसादन. या चार अंगांना उत्पन्न करून व परिपूर्ण करून तो विहरतो, म्हणून त्याला 'दुसऱ्या ध्यानाचा उपसंपदा करून विहरतो' असे म्हटले जाते. ตตฺถ [Pg.261] ปญฺจงฺคสมนฺนาคตํ ตติยํ ฌานํ สติยา สมฺปชญฺเญ สุเขน จิตฺเตกคฺคตาย อุเปกฺขาย อิมานิ ปญฺจงฺคานิ อุปฺปาเทตฺวา สมฺปาเทตฺวา วิหรติ, เตน วุจฺจติ ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรตีติ. त्यामध्ये तिसरे ध्यान पाच अंगांनी समन्वागत आहे - स्मृती, संप्रजन्य, सुख, चित्तेकाग्रता आणि उपेक्षा. या पाच अंगांना उत्पन्न करून व परिपूर्ण करून तो विहरतो, म्हणून त्याला 'तिसऱ्या ध्यानाचा उपसंपदा करून विहरतो' असे म्हटले जाते. ตตฺถ จตุตฺถํ ฌานํ จตุรงฺคสมนฺนาคตํ อุเปกฺขาย สติปาริสุทฺธิยา อทุกฺขมสุขาย เวทนาย จิตฺเตกคฺคตา จ, อิเมหิ จตูหงฺเคหิ สมนฺนาคตํ จตุตฺถํ ฌานํ. อิติ อิเมสํ จตุนฺนํ องฺคานํ อุปฺปาโท ปฏิลาโภ สมนฺนาคโม สจฺฉิกิริยา จตุตฺถํ ฌานํ ปฏิลทฺธนฺติ วุจฺจติ. อิมานิ จตฺตาริ ฌานานิ อุปฺปาเทตฺวา สมฺปาเทตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหรติ, เตน วุจฺจติ ทิพฺเพน วิหาเรน วิหรตีติ. त्यामध्ये चौथे ध्यान चार अंगांनी समन्वागत आहे - उपेक्षा, स्मृतीची परिशुद्धी, अदुःख-असुख वेदना आणि चित्तेकाग्रता; या चार अंगांनी समन्वागत चौथे ध्यान आहे. अशा प्रकारे या चार अंगांची उत्पत्ती, प्राप्ती, समन्वागम आणि साक्षात्काराला 'चौथे ध्यान प्राप्त झाले' असे म्हटले जाते. या चार ध्यानांना उत्पन्न करून, परिपूर्ण करून आणि उपसंपदा करून तो विहरतो, म्हणून त्याला 'दिव्य विहाराने विहरतो' असे म्हटले जाते. ตตฺถ กตโม อนิจฺจฏฺโฐ? ปีฬนฏฺโฐ อนิจฺจฏฺโฐ ปภงฺคฏฺโฐ สมฺปาปนฏฺโฐ วิเวกฏฺโฐ อนิจฺจฏฺโฐ, อยํ อนิจฺจฏฺโฐ. त्यामध्ये अनित्य अर्थ कोणता? पीडन अर्थ हा अनित्य अर्थ आहे, प्रभंग अर्थ, संपापन अर्थ, विवेक अर्थ हा अनित्य अर्थ आहे; हा अनित्य अर्थ होय. ตตฺถ กตโม ทุกฺขฏฺโฐ? ปีฬนฏฺโฐ ทุกฺขฏฺโฐ สมฺปีฬนฏฺโฐ สํเวคฏฺโฐ พฺยาธินฏฺโฐ, อยํ ทุกฺขฏฺโฐ. त्यामध्ये दुःख अर्थ कोणता? पीडन अर्थ हा दुःख अर्थ आहे, संपीडन अर्थ, संवेग अर्थ, व्याधी अर्थ हा दुःख अर्थ आहे; हा दुःख अर्थ होय. ตตฺถ กตโม สุญฺญฏฺโฐ? อนุปลิตฺโต สุญฺญฏฺโฐ, อสมฺภาชนฏฺโฐ คตปฏฺโฐ วิวฏฺฏฏฺโฐ, อยํ สุญฺญฏฺโฐ. त्यामध्ये शून्य अर्थ कोणता? अलिप्त असणे हा शून्य अर्थ आहे, असंभजन अर्थ, गतपथ अर्थ, विवर्त अर्थ हा शून्य अर्थ आहे; हा शून्य अर्थ होय. ตตฺถ กตโม อนตฺตฏฺโฐ? อนิสฺสริยฏฺโฐ อนตฺตฏฺโฐ, อวสวตฺตนฏฺโฐ, อกามการิฏฺโฐ ปริวิทฏฺโฐ, อยํ อนตฺตฏฺโฐติ. त्यामध्ये अनात्म अर्थ कोणता? अनैश्वर्य अर्थ हा अनात्म अर्थ आहे, अवशवर्तन अर्थ, अकामकारित्व अर्थ, परिविद् अर्थ हा अनात्म अर्थ आहे; याला अनात्म अर्थ असे म्हणतात. สุตฺตตฺถสมุจฺจโย นาม สํวตฺติสนฺติกา เปฏกภูมิ สมตฺตา. ‘सुत्तत्थसमुच्चय’ नावाची संवत्तिसंतिका पेटकभूमी समाप्त झाली. ๗. หารสมฺปาตภูมิ ७. हारसंपातभूमी ๗๒. ฌานํ วิราโค. จตฺตาริ ฌานานิ วิตฺถาเรน กาตพฺพานิ. ตานิ ทุวิธานิ; โพชฺฌงฺควิปฺปยุตฺตานิ จ โพชฺฌงฺคสมฺปยุตฺตานิ จ. ตตฺถ โพชฺฌงฺควิปฺปยุตฺตานิ พาหิรกานิ, โพชฺฌงฺคสมฺปยุตฺตานิ อริยปุคฺคลานิ. ตตฺถ เยน ฉ ปุคฺคลมูลานิ เตสํ นิกฺขิเปตฺวา ราคจริโต, โทสจริโต, โมหจริโต, ราคโทสจริโต, ราคโมหจริโต, โทสโมหจริโต, สมภาคจริโต, อิติ อิเมสํ ปุคฺคลานํ ฌานํ สมาปชฺชิตานํ ปญฺจ นีวรณานิ ปฏิปกฺโข เตสํ ปฏิฆาตาย ยถา อสมตฺโถ ตีณิ อกุสลมูลานิ [Pg.262] นิคฺคณฺหาติ. โลเภน อกุสลมูเลน อภิชฺฌา จ อุทฺธจฺจญฺจ อุปฺปิลวตํ อโลเภน กุสลมูเลน นิคฺคณฺหาติ, กุกฺกุจฺจญฺจ วิจิกิจฺฉา จ โมหปกฺโข, ตํ อโมเหน นิคฺคณฺหาติ. โทโส จ ถินมิทฺธญฺจ โทสปกฺโข, ตํ อโทเสน นิคฺคณฺหาติ. ७२. ध्यान म्हणजे वैराग्य होय. चार ध्यानांचे विस्ताराने वर्णन केले पाहिजे. ती दोन प्रकारची आहेत: बोध्यंग-विप्रयुक्त (बोध्यंगांशी विरहित) आणि बोध्यंग-संप्रयुक्त (बोध्यंगांशी युक्त). त्यापैकी, बोध्यंग-विप्रयुक्त ही बाह्य (पृथग्जनांची) असतात आणि बोध्यंग-संप्रयुक्त ही आर्य पुद्गलांची असतात. तेथे, सहा पुद्गल-मूळ बाजूला ठेवून, रागचरित, द्वेषचरित, mohacarito (मोहचरित), राग-द्वेषचरित, राग-मोहचरित, द्वेष-मोहचरित आणि समभागचरित अशा ध्यानात समापन्न होणाऱ्या पुद्गलांच्या पाच नीवरणांचे जे प्रतिपक्ष आहे, ते त्यांचा समूळ नाश करण्यास असमर्थ ठरल्यास तीन अकुशल मुळांचे दमन करते. लोभ या अकुशल मुळाने उत्पन्न होणारे अभिज्झा (अभिलाषा), उद्धच्च (औद्धत्य) आणि उप्पिलावत (चंचलता) यांचे अलोभ या कुशल मुळाने दमन केले जाते. कुक्कुच्च (पश्चात्ताप) आणि विचिकित्सा (शंका) हे मोहाचे पक्ष आहेत, त्यांचे अमोहाने दमन केले जाते. द्वेष आणि थिनमिद्ध (ग्लानी-तंद्रा) हे द्वेषाचे पक्ष आहेत, त्यांचे अद्वेषाने दमन केले जाते. ตตฺถ อโลภสฺส ปาริปูริยา เนกฺขมฺมวิตกฺกํ วิตกฺเกติ. ตตฺถ อโทสสฺส ปาริปูริยา อพฺยาปาทวิตกฺกํ วิตกฺเกติ. ตตฺถ อโมหสฺส ปาริปูริยา อวิหึสาวิตกฺกํ วิตกฺเกติ. ตตฺถ อโลภสฺส ปาริปูริยา วิวิตฺโต โหติ กาเมหิ. ตตฺถ อโทสสฺส ปาริปูริยา อโมหสฺส ปาริปูริยา จ วิวิตฺโต โหติ ปาปเกหิ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ, สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. तेथे, अलोभाच्या परिपूर्तीसाठी तो नैष्क्रम्य-वितर्काचा विचार करतो. तेथे, अद्वेषाच्या परिपूर्तीसाठी तो अव्यापाद-वितर्काचा विचार करतो. तेथे, अमोहाच्या परिपूर्तीसाठी तो अविहिंसा-वितर्काचा विचार करतो. तेथे, अलोभाच्या परिपूर्तीसाठी तो कामभोगांपासून विरक्त होतो. तेथे, अद्वेषाच्या आणि अमोहाच्या परिपूर्तीसाठी तो पापी अकुशल धर्मांपासून विरक्त होतो, आणि वितर्क व विचाराने युक्त, विवेकापासून उत्पन्न झालेल्या प्रीती व सुखाने युक्त अशा प्रथम ध्यानाला प्राप्त करून विहरतो. วิตกฺกาติ ตโย วิตกฺกา – เนกฺขมฺมวิตกฺโก อพฺยาปาทวิตกฺโก อวิหึสาวิตกฺโก. ตตฺถ ปฐมาภินิปาโต วิตกฺโก, ปฏิลทฺธสฺส วิจรณํ วิจาโร. ยถา ปุริโส ทูรโต ปุริสํ ปสฺสติ อาคจฺฉนฺตํ, น จ ตาว ชานาติ เอโส อิตฺถีติ วา ปุริโสติ วา ยทา ตุ ปฏิลภติ อิตฺถีติ วา ปุริโสติ วา เอวํ วณฺโณติ วา เอวํ สณฺฐาโนติ วา อิเม วิตกฺกยนฺโต อุตฺตริ อุปปริกฺขนฺติ กึ นุ โข อยํ สีลวา อุทาหุ ทุสฺสีโล อฑฺโฒ วา ทุคฺคโตติ วา. เอวํ วิจาโร วิตกฺเก อปฺเปติ, วิจาโร จริยติ จ อนุวตฺตติ จ. ยถา ปกฺขี ปุพฺพํ อายูหติ ปจฺฉา นายูหติ ยถา อายูหนา เอวํ วิตกฺโก, ยถา ปกฺขานํ ปสารณํ เอวํ วิจาโร อนุปาลติ วิตกฺเกติ วิจรติ วิจาเรติ. วิตกฺกยติ วิตกฺเกติ, อนุวิจรติ วิจาเรติ. กามสญฺญาย ปฏิปกฺโข วิตกฺโก, พฺยาปาทสญฺญาย วิหึสสญฺญาย จ ปฏิปกฺโข วิจาโร. วิตกฺกานํ กมฺมํ อกุสลสฺส อมนสิกาโร, วิจารานํ กมฺมํ เชฏฺฐานํ สํวารณา. ยถา ปลิโก ตุณฺหิโก สชฺฌายํ กโรติ เอวํ วิตกฺโก, ยถา ตํเยว อนุปสฺสติ เอวํ วิจาโร. ยถา อปริญฺญา เอวํ วิตกฺโก. ยถา ปริญฺญา เอวํ วิจาโร. นิรุตฺติปฏิสมฺภิทายญฺจ ปฏิภานปฏิสมฺภิทายญฺจ วิตกฺโก, ธมฺมปฏิสมฺภิทายญฺจ อตฺถปฏิสมฺภิทายญฺจ วิจาโร. กลฺลิตา โกสลฺลตฺตํ จิตฺตสฺส วิตกฺโก, อภินีหารโกสลฺลํ จิตฺตสฺส วิจาโร. อิทํ กุสลํ อิทํ อกุสลํ อิทํ ภาเวตพฺพํ อิทํ ปหาตพฺพํ อิทํ สจฺฉิกาตพฺพนฺติ วิตกฺโก, ยถา ปหานญฺจ ภาวนา จ สจฺฉิกิริยา จ เอวํ วิจาโร. อิเมสุ วิตกฺกวิจาเรสุ ฐิตสฺส ทุวิธํ ทุกฺขํ น อุปฺปชฺชติ กายิกญฺจ เจตสิกญฺจ; ทุวิธํ สุขํ อุปฺปชฺชติ กายิกญฺจ [Pg.263] เจตสิกญฺจ. อิติ วิตกฺกชนิตํ เจตสิกํ สุขํ ปีติ กายิกํ สุขํ กายิโกเยว. ยา ตตฺถ จิตฺตสฺส เอกคฺคตา, อยํ สมาธิ. อิติ ปฐมํ ฌานํ ปญฺจงฺควิปฺปหีนํ ปญฺจงฺคสมนฺนาคตํ. वितर्क म्हणजे तीन वितर्क आहेत - नैष्क्रम्य-वितर्क, अव्यापाद-वितर्क आणि अविहिंसा-वितर्क. त्यापैकी, आलंबनावर चित्ताचे पहिले पडणे म्हणजे वितर्क होय, आणि प्राप्त झालेल्या आलंबनाचे वारंवार परीक्षण करणे म्हणजे विचार होय. जसे एखादा मनुष्य दूरवरून एका मनुष्याला येताना पाहतो, आणि तोपर्यंत त्याला हे माहीत नसते की ती स्त्री आहे की पुरुष. परंतु जेव्हा त्याला समजते की ती स्त्री आहे की पुरुष, तिचा वर्ण असा आहे किंवा तिचा आकार असा आहे, तेव्हा या गोष्टींचा विचार करत तो पुढे अधिक परीक्षण करतो की, 'हा शीलवान आहे की दुःशील? श्रीमंत आहे की गरीब?' अशा प्रकारे विचार हा वितर्कात प्रवेश करतो, विचार संचार करतो आणि त्याचे अनुकरण करतो. जसे एखादा पक्षी सुरुवातीला पंख हलवून उडण्याचा प्रयत्न करतो आणि नंतर प्रयत्न न करता तरंगतो; जसा तो पंख हलवण्याचा प्रयत्न आहे, तसा वितर्क समजावा. जसे पंख पसरवून तरंगणे आहे, तसा विचार समजावा. तो रक्षण करतो, वितर्क करतो, विचार करतो आणि विचार करायला लावतो. तो वितर्क करतो, वितर्क करायला लावतो, अनुविचार करतो आणि विचार करायला लावतो. कामसंज्ञेचा प्रतिपक्ष वितर्क आहे, तर व्यापादसंज्ञा आणि विहिंसासंज्ञेचा प्रतिपक्ष विचार आहे. वितर्कांचे कार्य अकुशलाचा अमनसिकार करणे हे आहे, तर विचारांचे कार्य मुख्य क्लेशांचे संवरण करणे हे आहे. जसे एखादा बलवान मनुष्य शांत राहून सज्झाय (सराव) करतो, तसा वितर्क समजावा. जसे तो त्याच गोष्टीचे अनुदर्शन करतो, तसा विचार समजावा. जसे अपरिज्ञा (अपूर्ण ज्ञान) तसा वितर्क समजावा. जसे परिज्ञा (पूर्ण ज्ञान) तसा विचार समजावा. निरुक्ति-प्रतिसंभिदा आणि प्रतिभान-प्रतिसंभिदामध्ये वितर्क असतो, तर धर्म-प्रतिसंभिदा आणि अर्थ-प्रतिसंभिदामध्ये विचार असतो. चित्ताची सज्जता आणि कुशलता हा वितर्क आहे, तर चित्ताची अभिनिहार-कुशलता हा विचार आहे. 'हे कुशल आहे, हे अकुशल आहे, हे विकसित करावे, हे त्यागावे, हे साक्षात करावे' असा विचार करणे म्हणजे वितर्क होय, तर जसे प्रहाण, भावना आणि साक्षात्क्रिया घडून येते, तसा विचार समजावा. या वितर्क आणि विचारात स्थित असलेल्या व्यक्तीला कायिक आणि चैतसिक असे दोन्ही प्रकारचे दुःख उत्पन्न होत नाही; कायिक आणि चैतसिक असे दोन्ही प्रकारचे सुख उत्पन्न होते. अशा प्रकारे, वितर्कापासून उत्पन्न झालेले चैतसिक सुख म्हणजे प्रीती आणि कायिक सुख हे शरीरातच जाणवते. तेथे चित्ताची जी एकाग्रता असते, तो समाधी होय. अशा प्रकारे, प्रथम ध्यान हे पाच अंगांनी विप्रहीन आणि पाच अंगांनी समन्वागत असते. เตสํเยว วิตกฺกวิจารานํ อภิกฺขณํ อาเสวนาย ตสฺส ตปฺโปณมานสํ โหติ. ตสฺส วิตกฺกวิจารา โอฬาริกา ขายนฺติ. ยญฺจ ปีติสุขญฺจ เนกฺขมฺมญฺจ โอฬาริกํ ภวติ. อปิ จ สมาธิชา ปีติ รติ จ ชายติ. ตสฺส วิจารารมฺมณํ. เตสํ วูปสมา อชฺฌตฺตํ เจโต สมฺปสีทติ. เย วิตกฺกวิจารา ทฺเว ธมฺมานุสฺสริตพฺพา. ปจฺจุปฺปนฺนา ทรณิตพฺพํ. เตสํ วูปสมา เอโกทิภาวํ จิตฺเตกคฺคตํ โหติ. ตสฺส เอโกทิภาเวน ปีติ ปาริปูรึ คจฺฉติ. ยา ปีติ, ตํ โสมนสฺสินฺทฺริยํ, ยํ สุขํ, ตํ สุขินฺทฺริยํ. ยา จิตฺเตกคฺคตา, อยํ สมาธิ. ตํ ทุติยํ ฌานํ จตุรงฺคสมนฺนาคตํ. โส ปีติยา วิราคา ยาติ โอชหิ ชลฺลสหคตํ. त्याच वितर्क आणि विचारांच्या निरंतर सेवनाने त्याचे चित्त त्याकडेच प्रवृत्त होते. त्याला ते वितर्क आणि विचार स्थूल भासतात. तसेच जे प्रीती, सुख आणि नैष्क्रम्य आहे, तेही स्थूल वाटते. शिवाय, समाधीपासून उत्पन्न झालेली प्रीती आणि रती उत्पन्न होते. त्याला विचाराचे आलंबन असते. त्यांच्या उपशमाने अध्यात्मिक चित्त अत्यंत प्रसन्न होते. जे वितर्क आणि विचार हे दोन धर्म अनुस्मरण करण्याजोगे आहेत, त्या वर्तमानकालीन निमित्ताचे आदराने ग्रहण केले पाहिजे. त्यांच्या उपशमाने चित्ताचा एकोदीभाव आणि चित्ताची एकाग्रता प्राप्त होते. त्या एकोदीभावाने प्रीती परिपूर्णतेला जाते. जी प्रीती आहे, ते सोमनस्येंद्रिय होय; जे सुख आहे, ते सुखेंद्रिय होय; जी चित्ताची एकाग्रता आहे, तो समाधी होय. ते द्वितीय ध्यान चार अंगांनी समन्वागत असते. तो प्रीतीच्या विरागाने, तृष्णेच्या आसक्तीचा त्याग करून पुढे जातो. ๗๓. ตตฺถ โสมนสฺสจิตฺตมุปาทานนฺติ จ โส ตํ วิจินนฺโต อุเปกฺขเมว มนสิกโรติ. โส ปีติยา วิราคา อุเปกฺขโก วิหรติ. ยถา จ ปีติยา สุขมานิตํ, ตํ กาเยน ปฏิสํเวเทติ สมฺปชาโน วิหรติ. เยน สติสมฺปชญฺเญน อุเปกฺขาปาริปูรึ คจฺฉติ. อิทํ ตติยํ ฌานํ จตุรงฺคสมนฺนาคตํ. ७३. तेथे, सोमनस्य चित्त हे उपादान आहे असे समजून, तो त्याचे परीक्षण करत उपेक्षेचाच मनसिकार करतो. तो प्रीतीच्या विरागाने उपेक्षक होऊन विहरतो. आणि जसे प्रीतीशिवाय केवळ सुखाचा अनुभव येतो, तो शरीराने त्याचा अनुभव घेत, संप्रजन्ययुक्त होऊन विहरतो. ज्या स्मृती आणि संप्रजन्याने उपेक्षेची परिपूर्ती होते, हे तृतीय ध्यान चार अंगांनी समन्वागत असते. ตถา กายิกสฺส สุขสฺส ปหานาย ปฐเม ฌาเน โสมนสฺสินฺทฺริยํ นิรุชฺฌติ. ทุติเย ฌาเน ทุกฺขินฺทฺริยํ นิรุชฺฌติ. โส สุขสฺส จ ปหานา ทุกฺขสฺส จ ปหานา ปุพฺเพว โสมนสฺสโทมนสฺสานํ อตฺถงฺคมา อทุกฺขมสุขํ อุเปกฺขาสติปาริสุทฺธึ จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. ตตฺถ จตูหิ อินฺทฺริเยหิ อุเปกฺขา ปสาทา โหติ, ทุกฺขินฺทฺริเยน โทมนสฺสินฺทฺริเยน สุขินฺทฺริเยน โสมนสฺสินฺทฺริเยน จ. เตสํ นิโรธา อุเปกฺขาสมฺปชญฺญํ โหติ, ตตฺถ สุขินฺทฺริเยน โสมนสฺสินฺทฺริเยน จ อสติ โหติ, เตสํ นิโรธา สติมา โหติ, ทุกฺขินฺทฺริเยน โทมนสฺสินฺทฺริเยน จ อสมฺปชญฺญํ, เตสํ นิโรธา สมฺปชญฺญํ โหติ, อิติ อุเปกฺขาย จ สญฺญา, สโต สมฺปชาโน จิตฺเตกคฺคตา จ อิทํ วุจฺจเต จ จตุตฺถํ ฌานํ. त्याचप्रमाणे, कायिक सुखाच्या प्रहाणासाठी प्रथम ध्यानात सोमनस्येंद्रिय निरुद्ध होते. द्वितीय ध्यानात दुःखेंद्रिय निरुद्ध होते. तो सुखाच्या प्रहाणाने आणि दुःखाच्या प्रहाणाने, तसेच पूर्वीच सोमनस्य आणि डोमनस्याच्या अस्त होण्याने, अदुःख-असुखकारक, उपेक्षा आणि स्मृतीच्या परिशुद्धीने युक्त अशा चतुर्थ ध्यानाला प्राप्त करून विहरतो. तेथे चार इंद्रियांद्वारे उपेक्षा प्रसन्न होते - दुःखेंद्रिय, डोमनस्येंद्रिय, सुखेंद्रिय आणि सोमनस्येंद्रिय यांच्याद्वारे. त्यांच्या निरोधाने उपेक्षा-संप्रजन्य प्राप्त होते. तेथे सुखेंद्रिय आणि सोमनस्येंद्रियामुळे अस्मृती होते, त्यांच्या निरोधाने तो स्मृतीवान होतो. दुःखेंद्रिय आणि डोमनस्येंद्रियामुळे असंप्रजन्य होते, त्यांच्या निरोधाने संप्रजन्य प्राप्त होते. अशा प्रकारे, उपेक्षेची संज्ञा, स्मृतीवान, संप्रजन्ययुक्त आणि चित्ताची एकाग्रता असणे, याला चतुर्थ ध्यान असे म्हटले जाते. ตตฺถ โย ราคจริโต ปุคฺคโล ตสฺส สุขินฺทฺริยญฺจ โสมนสฺสินฺทฺริยญฺจ; โย โทสจริโต ปุคฺคโล ตสฺส ทุกฺขินฺทฺริยญฺจ โทมนสฺสินฺทฺริยญฺจ; โย โมหจริโต ปุคฺคโล ตสฺส อสติ จ อสมฺปชญฺญญฺจ. त्यापैकी, जो रागचरित पुद्गल आहे, त्याला सुखेंद्रिय आणि सोमनस्येंद्रिय प्राप्त होते; जो द्वेषचरित पुद्गल आहे, त्याला दुःखेंद्रिय आणि डोमनस्येंद्रिय प्राप्त होते; जो मोहचरित पुद्गल आहे, त्याला अस्मृती आणि असंप्रजन्य प्राप्त होते. ตตฺถ [Pg.264] ราคจริตสฺส ปุคฺคลสฺส ตติเย ฌาเน จตุตฺเถ จ อนุนโย นิรุชฺฌติ, โทสจริตสฺส ปฐเม ฌาเน ทุติเย จ ปฏิฆํ นิรุชฺฌติ, โมหจริตสฺส ปุคฺคลสฺส ปฐเม ฌาเน ทุติเย จ อสมฺปชญฺญํ นิรุชฺฌติ. ตติเย ฌาเน จตุตฺเถ จ อสติ นิรุชฺฌติ, เอวเมว เตสํ ติณฺณํ ปุคฺคลานํ จตฺตาริ ฌานานิ โวทานํ คมิสฺสนฺติ. तेथे, रागचरित पुद्गलाचा तिसऱ्या आणि चौथ्या ध्यानात अनुनय निरुद्ध होतो; द्वेषचरित पुद्गलाचा पहिल्या आणि दुसऱ्या ध्यानात प्रतिघ निरुद्ध होतो; मोहचरित पुद्गलाचा पहिल्या आणि दुसऱ्या ध्यानात असंप्रजन्य निरुद्ध होते, आणि तिसऱ्या व चौथ्या ध्यानात असती निरुद्ध होते. अशाच प्रकारे, त्या तिन्ही पुद्गलांची चारही ध्याने विशुद्धीला प्राप्त होतील. ตตฺถ ราคโทสจริตสฺส ปุคฺคลสฺส อสมฺปชญฺญญฺจ อนุนโย จ ปฏิฆญฺจ, เตน หานภาคิยํ ฌานํ โหติ. ตตฺถ ราคโมหจริตสฺส ปุคฺคลสฺส อนุนยตฺตํ จ อาทีนวํ ทสฺสิตา, ตํ ตสฺส หานภาคิยํ ฌานํ โหติ. ตตฺถ โทสโมหจริตสฺส ปุคฺคลสฺส ปฏิโฆ จ อสติ จ อสมฺปชญฺญญฺจ อาทีนวํ ทสฺสิตา เตน ตสฺส หานภาคิยํ ฌานํ โหติ. तेथे, राग-द्वेषचरित पुद्गलाचे असंप्रजन्य, अनुनय आणि प्रतिघ (हे दोष असतात), त्यामुळे त्याचे ध्यान हानभागीय (ऱ्हास पावणारे) ध्यान होते. तेथे, राग-मोहचरित पुद्गलाचा अनुनयभाव आणि आदीनव (दोष) दर्शविला आहे, ते त्याचे हानभागीय ध्यान होते. तेथे, द्वेष-मोहचरित पुद्गलाचा प्रतिघ, असती आणि असंप्रजन्य हा आदीनव दर्शविला आहे, त्यामुळे त्याचे ध्यान हानभागीय ध्यान होते. ตตฺถ ราคโทสโมหสมภาคจริตสฺส ปุคฺคลสฺส วิเสสภาคิยํ ฌานํ โหติ, อิมานิ จตฺตาริ ฌานานิ สตฺตสุ ปุคฺคเลสุ นิทฺทิสิตพฺพานิ. จตูสุ จ สมาธีสุ ฉนฺทสมาธินา ปฐมํ ฌานํ, วีริยสมาธินา ทุติยํ ฌานํ, จิตฺตสมาธินา ตติยํ ฌานํ, วีมํสาสมาธินา จตุตฺถํ ฌานํ. อปฺปณิหิเตน ปฐมํ ฌานํ, สุญฺญตาย ทุติยํ ฌานํ, อนิมิตฺเตน ตติยํ ฌานํ, อานาปานสฺสติยา จตุตฺถํ ฌานํ. กามวิตกฺกพฺยาปาทานญฺจ ตํ ตํ วูปสเมน ปฐมํ ฌานํ โหติ, วิตกฺกวิจารานํ วูปสเมน ทุติยํ ฌานํ, สุขินฺทฺริยโสมนสฺสินฺทฺริยานํ วูปสเมน ตติยํ ฌานํ, กายสงฺขารานํ วูปสเมน จตุตฺถํ ฌานญฺจ. จาคาธิฏฺฐาเนน ปฐมํ ฌานํ, สจฺจาธิฏฺฐาเนน ทุติยํ ฌานํ, ปญฺญาธิฏฺฐาเนน ตติยํ ฌานํ, อุปสมาธิฏฺฐาเนน จตุตฺถํ ฌานํ. อิมานิ จตฺตาริ ฌานานิ สงฺเขปนิทฺเทเสน นิทฺทิฏฺฐานิ, ตตฺถ สมาธินฺทฺริยํ ปาริปูรึ คจฺฉติ. อนุวตฺตนกานิ จตฺตาริ, ตตฺถ โย ปฐมํ ฌานํ นิสฺสาย อาสวกฺขยํ ปาปุณาติ, โส สุขาย ปฏิปทาย ทนฺธาภิญฺญาย โทมนสฺสินฺทฺริยปฏิปกฺเขน. โย ทุติยํ ฌานํ นิสฺสาย อาสวานํ ขยํ ปาปุณาติ, โส สุขาย ปฏิปทาย ขิปฺปาภิญฺญาย ทุกฺขินฺทฺริยปฏิปกฺเขน. โย ตติยํ ฌานํ นิสฺสาย อาสวานํ ขยํ ปาปุณาติ, โส สุขาย ปฏิปทาย ทนฺธาภิญฺญาย โสมนสฺสินฺทฺริยปฏิปกฺเขน. โย จตุตฺถํ ฌานํ นิสฺสาย อาสวานํ ขยํ ปาปุณาติ, โส สุขาย ปฏิปทาย ขิปฺปาภิญฺญาย สุขินฺทฺริยปฏิปกฺเขน คโต. तेथे, राग-द्वेष-मोह समभागचरित पुद्गलाचे विशेषभागीय ध्यान होते. ही चार ध्याने सात पुद्गलांमध्ये निर्दिष्ट केली पाहिजेत. आणि चार समाधींमध्ये: छंदसमाधीद्वारे पहिले ध्यान, वीर्यसमाधीद्वारे दुसरे ध्यान, चित्तसमाधीद्वारे तिसरे ध्यान, आणि मीमांसासमाधीद्वारे चौथे ध्यान (निर्देशित केले आहे). अप्रणिहिताद्वारे पहिले ध्यान, शून्यतेद्वारे दुसरे ध्यान, अनिमित्ताद्वारे तिसरे ध्यान, आणि आनापानस्मृतीद्वारे चौथे ध्यान (निर्देशित केले आहे). कामवितर्क आणि व्यापाद यांच्या त्या त्या उपशमाने पहिले ध्यान होते; वितर्क आणि विचारांच्या उपशमाने दुसरे ध्यान होते; सुखेंद्रिय आणि सौमनस्येंद्रियाच्या उपशमाने तिसरे ध्यान होते; आणि कायसंस्कारांच्या उपशमाने चौथे ध्यान होते. त्यागाधिष्ठानाने पहिले ध्यान, सत्याधिष्ठानाने दुसरे ध्यान, प्रज्ञाधिष्ठानाने तिसरे ध्यान, आणि उपशमाधिष्ठानाने चौथे ध्यान (निर्देशित केले आहे). ही चार ध्याने संक्षेपनिर्देशाने निर्दिष्ट केली आहेत; तेथे समाधींद्रिय परिपूर्णतेला प्राप्त होते. अनुवर्तन करणारी (इतर) चार इंद्रिये आहेत. तेथे, जो पहिल्या ध्यानाचा आश्रय घेऊन आसवांच्या क्षयाला प्राप्त होतो, तो सुख प्रतिपदेने, दंधाभिज्ञेने (मंद अभिज्ञेने) आणि दौर्मनस्येंद्रियाच्या प्रतिपक्षाने गेलेला असतो. जो दुसऱ्या ध्यानाचा आश्रय घेऊन आसवांच्या क्षयाला प्राप्त होतो, तो सुख प्रतिपदेने, क्षिप्राभिज्ञेने (शीघ्र अभिज्ञेने) आणि दुःखेंद्रियाच्या प्रतिपक्षाने गेलेला असतो. जो तिसऱ्या ध्यानाचा आश्रय घेऊन आसवांच्या क्षयाला प्राप्त होतो, तो सुख प्रतिपदेने, दंधाभिज्ञेने आणि सौमनस्येंद्रियाच्या प्रतिपक्षाने गेलेला असतो. जो चौथ्या ध्यानाचा आश्रय घेऊन आसवांच्या क्षयाला प्राप्त होतो, तो सुख प्रतिपदेने, क्षिप्राभिज्ञेने आणि सुखेंद्रियाच्या प्रतिपक्षाने गेलेला असतो. ปกิณฺณกนิทฺเทโส. प्रकीर्णक निर्देश. ๗๔. ยานิ [Pg.265] จตฺตาริ ฌานานิ, เตสํ ฌานานํ อิมานิ องฺคานิ, เตสํ องฺคานํ สมูโห อสฺส องฺคา, อยํ ฌานภูมิ โก วิเสโสติ อสฺส วิเสโส. อิเม สมฺภารา เตหิ อยํ สมุทาคโม, ตสฺส สมุทาคมสฺส อยํ อุปนิสา, ตาย อุปนิสาย อยํ ภาวนา. ตสฺสา ภาวนาย อยํ อาทีนโว. เตน อยํ ปริหานิ. กสฺส ปริหานีติ ตทุปคชฺฌายิโน. ตํ ยถา ภณิตํ ปจฺจเวกฺขนฺโต อยํ วิเสโส. เตน วิเสเสน อยํ อสฺสาโท, โส กสฺส อสฺสาโท อฌานิยา ฌายิโน, ตสฺสา อฌานิยา ฌายิโน, อิทํ กลฺลิตา โกสลฺเล ฐิตชฺฌานํ อโนมทฺทิยตํ คจฺฉติ ฌานพลํ, ฌานพเล ฐิตสฺส อยํ ปารมิปฺปตฺตสฺส อิมานิ ฌานงฺคานิ อนาวิลสงฺกปฺโป ปฐเม ฌาเน ฌานงฺคานิ ภาวี. โส ปีติ ตทนุสาริตฺตาว ปฐเม ฌาเน ฌานงฺคํ ตสฺสงฺคุโน จ ธมฺมา ตทภิสนฺนิตาย จ. ปีติ ทุติเย ฌาเน ฌานงฺคธมฺมตา โข ปน ตถา ปวตฺตสฺส สหคตํ ฌานงฺคธมฺมํ สสุขตาย อชฺฌตฺตํ สมฺปสาโท ทุติเย ฌาเน ฌานงฺคํ มโนสมฺปสาทนตาย ตทภิสนฺนิตาย จ. ปีติ ทุติเย ฌาเน ฌานงฺคํ อชฺฌตฺตํ สมฺปสาทนํ สมาธิตา ปีติ ทุติเย ฌาเน ฌานงฺคํ, เจตโส เอโกทิภาโว ทุติเย ฌาเน ฌานงฺคํ, อุเปกฺขา ผสฺสตา ตติเย ฌาเน ฌานงฺคํ, สุขํ ตสฺส องฺคนฺติ จ. เจตโส เอโกทิภาโว จตุตฺเถ ฌาเน ฌานงฺคํ, อุเปกฺขา อทุกฺขมสุขา จตุตฺเถ ฌาเน ฌานงฺคํ, อภินิสาภูมิ อุเปกฺขาสติปาริสุทฺธิ จตุตฺเถ ฌาเน ฌานงฺคํ. สติปาริสุทฺธิ จ อเนกชฺฌาภูมีสุ ฌานงฺคสมายุตฺตา ปีติ เจตโส เอโกทิภาโว จตุตฺเถ ฌาเน ฌานงฺคํ. ७४. जी चार ध्याने आहेत, त्या ध्यानांची ही अंगे आहेत. त्या अंगांचा समूह म्हणजे त्याची अंगे होत. ही ध्यानभूमी आहे. 'काय विशेष आहे?' हा त्याचा विशेष आहे. हे संभार (साहित्य) आहेत, त्यांच्याद्वारे हा समुदाय (उत्पत्ती) होतो. त्या समुदायाचे हे उपनिषद (कारण) आहे; त्या उपनिषदाने ही भावना उत्पन्न होते. त्या भावनेचा हा आदीनव (दोष) आहे. त्यामुळे ही परिहानी (ऱ्हास) होते. 'कोणाची परिहानी?' त्या ध्यानात प्रवेश करणाऱ्याची. जसे म्हटले आहे, 'प्रत्यवेक्षण करणारा' हा विशेष आहे. त्या विशेषाने हा आस्वाद होतो. तो कोणाचा आस्वाद आहे? ध्यान नसताना ध्यान करणाऱ्याचा. हे ध्यान कौशल्यात स्थित असलेले ध्यान आहे, ते अनवमर्द्यतेला (पराभूत न होण्याला) प्राप्त होऊन ध्यानबळ बनते. ध्यानबळात स्थित असलेल्या आणि पारमिप्राप्त व्यक्तीची ही ध्यानअंगे आहेत. पहिल्या ध्यानात अनाविल संकल्प (निर्मळ विचार) ध्यानअंगे म्हणून प्रकट होतात. तो प्रीतीचा अनुगामी असल्यामुळेच पहिल्या ध्यानात ध्यानअंग आणि त्याचे गुणधर्म त्याच्याशी संलग्न असतात. दुसऱ्या ध्यानात प्रीती ही ध्यानअंगता आहे; तसेच प्रवृत्त झालेल्या सहगत ध्यानअंगधर्माच्या सुखकारकतेमुळे अध्यात्म संप्रसाद (अंतर्गत प्रसन्नता) हे दुसऱ्या ध्यानात ध्यानअंग आहे, कारण ते मनाला प्रसन्न करणारे आणि त्याच्याशी संलग्न असणारे आहे. दुसऱ्या ध्यानात प्रीती हे ध्यानअंग आहे, अध्यात्म संप्रसाद आणि समाधीयुक्त प्रीती हे दुसऱ्या ध्यानात ध्यानअंग आहे. चित्ताचा एकोदीभाव (एकाग्रता) हे दुसऱ्या ध्यानात ध्यानअंग आहे. उपेक्षा आणि स्पर्शता (अनुभूती) हे तिसऱ्या ध्यानात ध्यानअंग आहे, आणि सुख हे त्याचे अंग आहे. चित्ताचा एकोदीभाव हे चौथ्या ध्यानात ध्यानअंग आहे. अदुःख-असुख उपेक्षा हे चौथ्या ध्यानात ध्यानअंग आहे. अभिनिषद्भूमी असलेली उपेक्षा-स्मृती-पारिशुद्धी हे चौथ्या ध्यानात ध्यानअंग आहे. आणि अनेक ध्यानभूमींमध्ये ध्यानअंगांशी संयुक्त असलेली स्मृती-पारिशुद्धी, प्रीती आणि चित्ताचा एकोदीभाव हे चौथ्या ध्यानात ध्यानअंग आहे. ตตฺถ กตมา ฌานภูมิ? สวิตกฺเก สวิจาเร วิเวกา อนุคตา ปฐเม ฌาเน ฌานภูมิ. อวิตกฺเก อวิจาเร อชฺฌตฺตํ สมฺปสาทนํ ชนิตํ ปีติมนุคตา ทุติเย ฌาเน ฌานภูมิ. สุขสาตสโมหิตา สปฺปีติกา ตติเย ฌาเน ฌานภูมิ. ตสฺส สุขทุกฺขสหคตา อภินีหารสหคตา จตุตฺเถ ฌาเน ฌานภูมิ. อปฺปมาณสหคตา สตฺตารมฺมณา ปฐเม ฌาเน ฌานภูมิ. อภิภูมิอายตนสหคตา รูปสญฺญีสุ ทุติเย ฌาเน ฌานภูมิ. วิโมกฺขสหคตานํ วิโมกฺเขสุ ตติเย ฌาเน ฌานภูมิ. อนุปสฺสนาสหคตา กายสงฺขารา สมฺมา จตุตฺถสฺส ฌานสฺส ภูมิ. तेथे ध्यानभूमी कोणती? सवितर्क आणि सविचार धर्मांना विवेकाद्वारे अनुगमन करणे, ही पहिल्या ध्यानातील ध्यानभूमी आहे. अवितर्क आणि अविचार असलेल्या, अध्यात्म संप्रसाद उत्पन्न करणाऱ्या प्रीतीचे अनुगमन करणे, ही दुसऱ्या ध्यानातील ध्यानभूमी आहे. सुख आणि साता (मधुरता) यांनी युक्त असलेली, सप्रीतिक असणे, ही तिसऱ्या ध्यानातील ध्यानभूमी आहे. तिची सुख-दुःखसहगत आणि अभिनिहारसहगत असणे, ही चौथ्या ध्यानातील ध्यानभूमी आहे. अप्रमाणसहगत आणि सत्त्वारंबण (प्राण्यांना आलंबन बनवणारी) असणे, ही पहिल्या ध्यानातील ध्यानभूमी आहे. रूपसंज्ञांमध्ये अभिभू-आयतनसहगत असणे, ही दुसऱ्या ध्यानातील ध्यानभूमी आहे. विमोक्षसहगत धर्मांचे विमोक्षांमध्ये असणे, ही तिसऱ्या ध्यानातील ध्यानभूमी आहे. अनुपश्यनासहगत कायसंस्कार हे सम्यक प्रकारे चौथ्या ध्यानाची भूमी आहे. ๗๕. ตตฺถ [Pg.266] กตเม ฌานวิเสสา? วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ ปาปเกหิ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ จิตฺตเจตสิกสหคตา กามธาตุสมติกฺกมนตาปิ, อยํ ฌานวิเสโส. อวิตกฺกา เจว อวิจารา จ สปฺปีติกาย สติสหคตาย ปีติสหคตา สญฺญามนสิการา สมุทาจรนฺติ. อยํ ฌานวิเสโส. อวิตกฺกาย ภูมิยา อวิจาเรเยว สติ อนุคตา อุเปกฺขาสหคตา มนสิการา สมุทาจรนฺติ. ตทนุธมฺมตาย จ สติ สณฺฑหติ. ตญฺจ ภูมึ อุปสมฺปชฺช วิหรติ, อยํ ฌานวิเสโส. สติปาริสุทฺธิสหคตา สญฺญามนสิการา สมุทาจรนฺติ, ตญฺจ ภูมึ อุปสมฺปชฺช วิหรติ, อยํ ฌานวิเสโส. วิญฺญาณญฺจายตนสหคตาย ภูมิยํ อากิญฺจญฺญายตนสหคตา สญฺญามนสิการา สมุทาจรนฺติ, ตญฺจ ภูมึ อุปสมฺปชฺช วิหรติ, อยํ ฌานวิเสโส. ७५. त्यात ध्यानांचे विशेष कोणते आहेत? कामांपासून अलिप्त होऊनच, पापी अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, चित्त व चेतसिकांसह उत्पन्न होणारी कामधातूचे अतिक्रमण करण्याची अवस्था देखील आहे; हा ध्यानाचा विशेष होय. वितर्क नसलेले आणि विचारही नसलेले, प्रीतीसह व स्मृतीसह असणारे प्रीतीयुक्त संज्ञा आणि मनसिकार प्रवृत्त होतात; हा ध्यानाचा विशेष होय. अवितर्क भूमीमध्ये अविचारच असणारे, स्मृतीचे अनुगमन करणारे आणि उपेक्षेसह असणारे मनसिकार प्रवृत्त होतात, आणि त्या धर्माच्या अनुकूलतेने स्मृती प्रस्थापित होते, तसेच त्या भूमीला प्राप्त करून तो विहरतो; हा ध्यानाचा विशेष होय. स्मृतीच्या परिशुद्धीसह असणारे संज्ञा आणि मनसिकार प्रवृत्त होतात, आणि त्या भूमीला प्राप्त करून तो विहरतो; हा ध्यानाचा विशेष होय. विज्ञानांचायतनासह असणाऱ्या भूमीमध्ये आकिंचन्यायतनासह असणारे संज्ञा आणि मनसिकार प्रवृत्त होतात, आणि त्या भूमीला प्राप्त करून तो विहरतो; हा ध्यानाचा विशेष होय. ฌานสมฺภารา เนกฺขมฺมวิตกฺโก สมฺภาโร กามวิตกฺกวิโนทนาธิปฺปายตา. อพฺยาปาทวิตกฺโก สมฺภาโร พฺยาปาทวิตกฺกปฏิวิโนทนาธิปฺปายตา. อวิหึสาวิตกฺโก สมฺภาโร วิหึสาวิตกฺกปฏิวิโนทนาธิปฺปายตา. อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวารตา อปฺปิจฺฉตา สมฺภาโร ปริสุทฺธาชีโว จตุนฺนํ สมาปตฺตีนํ สมฺภาโร อกมฺมสฺส วิหาริตา. มคฺคสมฺภาโร สมาปตฺติปชฺชนตา. ผลสมฺภาโร ฌานนิพฺพตฺติตาย ฌานสมุทาคโม. กุสลเหตุ ยํ ฌานํ สมุทยํ คจฺฉนฺติ โก จ น กุโตจิ เนกฺขมฺมปฺปตฺตา สมุทาคจฺฉนฺติ. อาลมฺพนิโรธสมาธิ สนฺโต สมุทาคจฺฉนฺติ. อวีติกฺกนฺตา สมุทาคจฺฉนฺติ. สุขินฺทฺริยํ โสมนสฺสินฺทฺริยํ ปหานาย เต จ อพฺยาปชฺชตาย สมุทาคจฺฉนฺติ. ตํ ปน สนฺธาย สมุทาคจฺฉนฺติ. อปริทาหนาย สมุทาคจฺฉนฺติ. อยํ ญาณสมุทาคโม. ध्यानाचे संभार (साहित्य) खालीलप्रमाणे आहेत: नैष्क्रम्य-वितर्क हा संभार काम-वितर्काचे निवारण करण्याची इच्छा असणे होय. अव्यापाद-वितर्क हा संभार व्यापाद-वितर्काचे निवारण करण्याची इच्छा असणे होय. अविहिंसा-वितर्क हा संभार विहिंसा-वितर्काचे निवारण करण्याची इच्छा असणे होय. इंद्रियांमध्ये संयमित द्वार असणे, अल्पेच्छता हा संभार, परिशुद्ध आजीव आणि चार समापत्तींचा संभार हा अकर्मण्यतेचा अभाव असणे होय. मार्ग-संभार म्हणजे समापत्तीला प्राप्त होणे होय. फल-संभार हा ध्यानाच्या उत्पत्तीमुळे ध्यानाचा समुदागम (उदय) होय. कुशल हेतूमुळे ध्यान उदयाला जाते; काहीही कशानेही नैष्क्रम्याला प्राप्त होऊन उदयाला येत नाही. आलंबन-निरोध समाधी शांत होऊन उदयाला येते. अनतिक्रांत (अतिक्रमण न केलेले) होऊन उदयाला येते. सुखेन्द्रिय आणि सोमनस्येन्द्रिय यांच्या प्रहाणासाठी आणि ते अव्यापन्नतेने (व्यापाद नसलेल्या भावाने) उदयाला येतात. परंतु त्यालाच उद्देशून ते उदयाला येतात. परिदाह (दाह) न होण्यासाठी ते उदयाला येतात. हा ज्ञान-समुदागम होय. ๗๖. ตตฺถ กตมา อุปนิสา? กลฺยาณมิตฺตตา ฌานสฺส อุปนิสา. กลฺยาณสมฺปวงฺกตา ฌานสฺส อุปนิสา. อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวารตา ฌานสฺส อุปนิสา. อสนฺตุฏฺฐิตา กุสเลสุ ธมฺเมสุ ฌานสฺส อุปนิสา. สทฺธมฺมสฺสวนํ ฌานสฺส อุปนิสา. สํเวชนิเย ฐาเน สํวิคฺคสฺส โยนิโส ปธานํ. อยํ ฌาโนปนิสา. ७६. त्यात उपनिषा (कारण/आश्रय) कोणती आहे? कल्याणमित्रता हा ध्यानाचा उपनिष आहे. कल्याणाकडे झुकलेली प्रवृत्ती हा ध्यानाचा उपनिष आहे. इंद्रियांमध्ये संयमित द्वार असणे हा ध्यानाचा उपनिष आहे. कुशल धर्मांमध्ये असंतुष्टता (तृप्ती न मानणे) हा ध्यानाचा उपनिष आहे. सद्धर्माचे श्रवण हा ध्यानाचा उपनिष आहे. संवेजनीय स्थानांमध्ये संवेग प्राप्त झालेल्या व्यक्तीचे योनिशो प्रधान (योग्य प्रयत्न) असणे; हा ध्यानाचा उपनिष (ध्यानोपनिष) होय. ตตฺถ [Pg.267] กตมา ภาวนา? เมตฺตาเสวนา อพฺยาปาทวิตกฺกภาวนา. กรุณาเสวนา อวิหึสาวิตกฺกภาวนา. มุทิตาภาวนา ปีติสุขสมฺปชญฺญา การิตา. อุเปกฺขาภาวนา ปสฺสวตา อุเปกฺขาภาวนา อปสฺสวตา อุเปกฺขา จ อชฺฌุเปกฺขา จ, อสุภสญฺญาภาวนา ทุกฺขาปฏิปทา ทนฺธาภิญฺญา ภวสนฺธาภิญฺญา ภวสนฺธานํ, สา ฉพฺพิธา ภาวนา ภาวิตา พหุลีกตา อนุฏฺฐิตา วตฺถุกตา ยานีกตา ปริจิตา สุสมารทฺธา. อยํ ภาวนา. त्यात भावना कोणती आहे? मैत्रीचे सेवन करणे ही अव्यापाद-वितर्क भावना होय. करुणेचे सेवन करणे ही अविहिंसा-वितर्क भावना होय. मुदिता भावनेने प्रीती, सुख आणि संप्रजन्य निर्माण केले जाते. उपेक्षा भावना पाहणाऱ्यासाठी आणि उपेक्षा भावना न पाहणाऱ्यासाठी उपेक्षा आणि अज्झुपेक्षा (अध्युपेक्षा) होय; अशुभसंज्ञा भावना, दुःखा प्रतिपदा मंदाभिज्ञा, भवसंधाभिज्ञा आणि भवसंधान; ती सहा प्रकारची भावना भाविलेली, बहुलीकृत केलेली, अनुष्ठित केलेली, वस्तूकृत (अधिष्ठान) केलेली, यानकृत (वाहन बनवलेली), परिचित (अभ्यासिलेली) आणि सुसमारब्ध (चांगल्या प्रकारे आरंभ केलेली) आहे. ही भावना होय. เอวํ ภาวยนฺตสฺส อยํ อาทีนโว. ปฐเม ฌาเน สงฺขารสมนฺนาคโต เอโส ธมฺโม อสฺสุโต สาสโว. สเจ เอส ธมฺโม อยํ สีโล อาสนฺนปฏิปกฺโข จ เอส ธมฺโม กาโม ปติจาโร ปติวิจาโร สมาปตฺตีนํ จ สพฺโพฬาริโก เอส ธมฺโม วิตกฺกวิจาโร จ. ตตฺถ จิตฺตํ โขเภนฺติ, กาโย เจตฺถ กิลมติ, กายมฺหิ เจตฺถ กิลนฺเต จิตฺตํ วิหญฺญติ. อนภินีหารกฺขโมว อภิญฺญานํ อิเม อาทีนวา ปฐเม ฌาเน. अशा प्रकारे भावना करणाऱ्यासाठी हा आदीनव (दोष) आहे. प्रथम ध्यानामध्ये संस्कारांनी युक्त असलेला हा धर्म अशुभ आणि सासव (आसवयुक्त) आहे. जर हा धर्म, हा शील आणि जवळचा प्रतिपक्ष असेल, तर हा धर्म काम, प्रतिचार, प्रतिविचार आणि समापत्तींमध्ये सर्वात ओळारिक (स्थूल) असा वितर्क आणि विचार आहे. तिथे ते चित्ताला क्षोभित करतात, आणि येथे शरीर थकते, आणि शरीर थकले असता चित्त व्याकुळ होते. हे अभिज्ञांच्या प्राप्तीसाठी अयोग्यच असते; हे प्रथम ध्यानातील आदीनव आहेत. ทุติเย ฌาเน อิเม อาทีนวา ปีติผรณสหคโต จ เอโส ธมฺโม, น สมุทาจารสฺเสติ จิตฺตํ. อโสธยํ อุปคโม เจส ธมฺโม อุปคมิปริสฺสโย โทมนสฺสปจฺจตฺถิโก เจส ธมฺโม. ตตฺถ ตตฺถ ยุตฺตีนํ ปีติ ปรชฺชโต เจส ธมฺโม ทุกฺกรํ โหติ, อวตฺตสนฺตาสภูมิปริวชฺชยนฺโต จตูสุ ทุกฺขตาสุ เอส ธมฺโม อนุวิทฺธาปนสทฺธาย ทุกฺขตาย จ น ปลิโพธทุกฺขตาย จ อภิญฺญาทุกฺขตาย จ โรคทุกฺขตาย จ, อิเม อาทีนวา ทุติเย ฌาเน. द्वितीय ध्यानामध्ये हे आदीनव आहेत: प्रीती-स्फुरणाने युक्त असलेला हा धर्म चित्ताची प्रवृत्ती होऊ देणार नाही. शुद्ध न करता जवळ जाणे हा धर्म उपद्रवयुक्त आणि दौर्मनस्याचा शत्रू आहे. त्या त्या ध्यानाशी युक्त असणाऱ्यांना प्रीतीचा शत्रू असल्यामुळे हा धर्म कठीण होतो; न होणाऱ्या भयाचे स्थान वर्ज्य करत, चार दुःखतांमध्ये हा धर्म अनुवेध करणाऱ्या श्रद्धेमुळे दुःखता, पलिबोध नसलेली दुःखता, अभिज्ञा-दुःखता आणि रोग-दुःखता या रूपाने असतो; हे द्वितीय ध्यानातील आदीनव आहेत. ตตฺถ กตเม อาทีนวา ตติเย ฌาเน? อุเปกฺขาสุขสหคตาย ตตฺถ สาตาวีนํ ปญฺจนฺนํ อุเปกฺขาสุขํ ปริวตฺติโต เอส ธมฺโม เตน นิจฺจสญฺญิตานญฺจ ยํ โหติ. ทุกฺโขปนิยํ สุขํ จิตฺตสฺส สงฺโขภตํ อุปาทาย สุขทุกฺขาย คโต สวติ. สุขทุกฺขานุกตญฺจ อุปาทาย อนภิหารกฺขมํ จิตฺตํ โหติ. อภิญฺญาย สจฺฉิกิริยาสุ สพฺเพปิ เจเต ธมฺมา ตีสุ ฌานสมาปตฺตีสุ จตูหิ จ ทุกฺขตาหิ อนุวิทฺธานํ สา ภยา ทุกฺขตาย ปลิโพธทุกฺขตาย จ อภิญฺญาย ทุกฺขตาย จ อิเม อาทีนวา ตติเย ฌาเน. त्यात तृतीय ध्यानामध्ये कोणते आदीनव आहेत? उपेक्षा-सुखासह असणाऱ्या, त्यात आस्वाद घेणाऱ्या पाच वेदनांपैकी उपेक्षा-सुख बदलणारे आहे; हा धर्म त्यामुळे नित्य संज्ञा असणाऱ्यांना ज्या कारणाने होतो, ते दुःखाकडे नेणारे सुख चित्ताच्या क्षोभाला ग्रहण करून सुख-दुःखाप्रत जाऊन पाझरते. आणि सुख-दुःखाचे अनुकरण ग्रहण करून चित्त अभिनिहारासाठी अयोग्य होते. अभिज्ञेने साक्षात्कृत करण्यामध्ये हे सर्व धर्म देखील तीन ध्यान-समापत्तींमध्ये आणि चार दुःखतांनी अनुवेध केलेल्यांना दुःखता, पलिबोध-दुःखता आणि अभिज्ञा-दुःखता या रूपाने असतात; हे तृतीय ध्यानातील आदीनव आहेत. ตตฺถ [Pg.268] กตเม อาทีนวา จตุตฺเถ ฌาเน? อากิญฺจญฺญาสมาปตฺติกา เต ธมฺมานุสมาปตฺติกา เอติสฺสา จ ภูมิยํ สาตานํ พาลปุถุชฺชนานํ อเนกวิธานิ ทิฏฺฐิคตานิ อุปฺปชฺชนฺติ. โอฬาริกา สุขุเมหิ จ รูปสญฺญาหิ อนุวิธานิ เอตานิ ฌานานิ สทา อนุทยเมตฺตาฌานกลานุทนุกลาย สาธารณา, ทุกฺกรา จ สพฺเพ จตฺตาโร มหาสมฺภารา สมุทาคตานิ จ เอตานิ ฌานานิ อญฺญมญฺญํ นิสฺสาย สมุทาคจฺฉนฺติ. เอตฺถ สมุทาคตา จ เอเต ธมฺมา น สมตฺตา โหนฺติ. อสมุคฺคหิตนิมิตฺตา จ เอเต ธมฺมา ปริหายนฺติ. นิรุชฺฌนฺติ จ เอเต ธมฺมา น อุปาทิยนฺติ นิรุชฺฌงฺคานิ จ, เอเตสํ ธมฺมานํ ฌานานิ นิมิตฺตานิ น ฌานนิมิตฺตสญฺญา โวกิรติ. อปฺปฏิลทฺธปุพฺพา จ ฌายีวเสน จ ภวติ. อิเมหิ อาทีนเวหิ อยํ ฌานปริหานิ. त्यात चतुर्थ ध्यानामध्ये कोणते आदीनव आहेत? प्रथम आकिंचन्यायतन समापत्ती असणाऱ्या, त्या समापत्तीच्या अनुकूल असणाऱ्या आणि त्या भूमीमध्ये आस्वाद घेणाऱ्या बालपृथग्जनांना अनेक प्रकारच्या दृष्टी (मिथ्या दृष्टी) उत्पन्न होतात. ओळारिक (स्थूल) आणि सूक्ष्म रूपसंज्ञांनी अनुगत असणारी ही ध्याने नेहमी अनुदय-मैत्री आणि ध्यानाच्या अंशांच्या अनुक्रमाने सामायिक असतात. आणि चारही महासंभार कठीण आहेत, तसेच उदयाला आलेली ही ध्याने परस्परांवर अवलंबून उदयाला येतात. येथे उदयाला आलेले हे धर्म पूर्ण होत नाहीत. आणि अयोग्य प्रकारे ग्रहण केलेल्या निमित्तांमुळे हे धर्म नष्ट होतात. आणि हे धर्म निरुद्ध होतात, ते ग्रहण केले जात नाहीत आणि निरोधाचे अंग बनतात. या धर्मांसाठी ध्याने ही निमित्ते (कारणे) आहेत, ध्यानाच्या निमित्ताची संज्ञा संमिश्रित होत नाही. आणि पूर्वी कधीही प्राप्त न झाल्यामुळे ध्यानीच्या वशाने होते. या आदीनवांमुळे ही ध्यानाची हानी होते. ๗๗. นิโรธสมาปตฺติยา อปฏิสงฺขาย อวเสสสญฺญิโน อากิญฺจญฺญายตนสหคตา สญฺญามนสิการา สมุทาจรนฺติ, โส นิโรธสมาปตฺติโต ปริหายติ. อาเนญฺชสญฺญิโน อสญฺญายตนํ สมาปนฺนสฺส อากิญฺจญฺญายตนสหคตา มนสิการา สมุทาจรนฺติ, ตญฺจ ภูมึ น ปชานาติ, โส ตโต ปริหายติ. อากิญฺจญฺญายตนํ สมาปนฺนสฺส วิญฺญาณญฺจายตนสญฺญา มนสิการา สมุทาจรนฺติ, ตญฺจ ภูมึ น ปชานาติ, โส ตโต ปริหายติ. วิญฺญาณญฺจายตนํ สมาปนฺนสฺส รูปสญฺญาสหคตา. วิตฺถาเรน…เป… ยาว ปฐเม ฌาเน กามสญฺญาสหคตา กาตพฺพา. สกสฺส ปริหายติ, กลงฺกชฺฌาเน กลงฺกํ ฌายติ, ปริสมนฺตโต ฌายติ, ภินฺทนฺโต ฌายติ, น สชฺฌายติ, อายูหนฺโต ฌายติ, กิญฺจิ จ นิปริจิโต ฌายติ. อติวิธาวนฺโต ฌายติ, อติมญฺญนฺโต ฌายติ, กายสงฺขาเร อปฺปฏิสมฺภาเร ฌายติ, ปริยุฏฺฐานสฺส นิสฺสรณํ อชานนฺโต ฌายติ, นีวรณาภิภูโต ฌายติ, อสฺสาปตฺติมนสิกโรนฺโต ฌานสฺส อสฺสาโท กามราคปริยุฏฺฐานํ ปหานํ ฌานสฺส อสฺสาโท กามราคเหตูนํ ธมฺมานํ อุทยนฺติ, นิรุชฺฌงฺคานิ เอเตสํ ธมฺมานํ ฌานานิ อุปริมา สุขุเปกฺขา กามกมฺมกิเลสานํ ปหานํ อสฺสาโท, เอวํ โข ปุน ฌานสฺส อสฺสาโท มหาสํวาสมปฺปีฬิเต โลกสํนิวาเส อสมฺโพโธกาสา วิคเมสฺสมิทํ ฌานปฺปหานา. อยํ ปลิโรธมปฺปลิโรธโลกสนฺนิวาเส เอสนิธมิทํ ฌานํ อนมตคฺคสํสารสมาปนฺนานํ สตฺตานํ สํสารปฺปหานนา อานิสํโส, ยมิทํ ฌานสฺส [Pg.269] อสฺสาโท กายสฺส อฌานิยฌายิโน ภวติ. อฌานิยฌานิยฌายีหิ อปรามสนฺโต อฌานิยฌายิตํ ฌายติ, ยานิ กลงฺกชฺฌายิโน ปทานิ, ตานิ อนุธิตานิ ปฏิปกฺเข. ७७. निरोधसमापत्तीचे मनन न केल्यामुळे, उर्वरित संज्ञा असलेल्या व्यक्तीला आकिंचन्यायतनसहगत संज्ञा आणि मनसिकार प्रवृत्त होतात; तो निरोधसमापत्तीपासून भ्रष्ट होतो. आनेञ्ज संज्ञा असलेल्याला, असंज्ञायतन (नेवसंज्ञानासंज्ञायतन) समापत्तीला प्राप्त झालेल्याला आकिंचन्यायतनसहगत मनसिकार प्रवृत्त होतात, आणि तो त्या भूमीला जाणत नाही; तो तिथून भ्रष्ट होतो. आकिंचन्यायतन समापत्तीला प्राप्त झालेल्याला विज्ञाणंचायतन संज्ञा आणि मनसिकार प्रवृत्त होतात, आणि तो त्या भूमीला जाणत नाही; तो तिथून भ्रष्ट होतो. विज्ञाणंचायतन समापत्तीला प्राप्त झालेल्याला रूपसंज्ञासहगत (मनसिकार प्रवृत्त होतात). विस्ताराने... पहिल्या ध्यानापर्यंत कामसंज्ञासहगत (मनसिकार) करावेत. तो स्वतःच्या ध्यानापासून भ्रष्ट होतो, कलंकित ध्यानात कलंकित ध्यान करतो, सभोवताली ध्यान करतो, (नीवरणांना) भेदून ध्यान करतो, आसक्त न होता ध्यान करतो, प्रयत्नपूर्वक ध्यान करतो, आणि काहीही सतत सराव न करता ध्यान करतो. अतिवेगाने धावत ध्यान करतो, अतिमान बाळगत ध्यान करतो, कायसंस्कारांचे संपादन न करता ध्यान करतो, पर्युत्थानातून सुटकेचा मार्ग न जाणता ध्यान करतो, नीवरणांनी अभिभूत होऊन ध्यान करतो. ध्यानाच्या प्राप्तीचे मनन करणे हा ध्यानाचा आस्वाद आहे; कामराग-पर्युत्थानाचा प्रहाण हा ध्यानाचा आस्वाद आहे. कामराग-हेतुक धर्मांचा उदय होतो; या धर्मांचे निरोध करणारे अंग असलेले ध्यान आणि वरील सुख व उपेक्षा, कामकर्म-क्लेशांचा प्रहाण हा आस्वाद आहे. अशा प्रकारे पुन्हा ध्यानाचा आस्वाद होतो. मोठ्या संवासाने (समुदायाने) पीडित नसलेल्या लोकसंनिवासात असंबोधाच्या अवकाशातून दूर होणे, हे ध्यानाचे प्रहाण आहे. हा अडथळा असलेल्या आणि अडथळा नसलेल्या लोकसंनिवासातील शोध आहे. हे ध्यान अनादी संसारात पडलेल्या सत्त्वांच्या संसार-प्रहाणाचा आनिशंस (फायदा) आहे, जो हा ध्यानाचा आस्वाद अ-ध्यानी ध्यान करणाऱ्याच्या कायेला होतो. अ-ध्यानी ध्यान करणाऱ्यांनी स्पर्श न करता अ-ध्यानी ध्यान करतो. जी कलंकित ध्यान करणाऱ्याची पदे आहेत, ती प्रतिपक्षाशी सुसंगत आहेत। ๗๘. ตตฺถ กตมํ ฌานโกสลฺลํ? สมาปตฺติโกสลฺลํ ฌานโกสลฺลํ, ฌานวิเสสโกสลฺลํ ฌานโกสลฺลํ, ฌานนฺตริกโกสลฺลํ ฌานโกสลฺลํ, สมาปตฺติวุฏฺฐานโกสลฺลํ ฌานโกสลฺลํ, ฌาเน สภาวโกสลฺลํ ฌานโกสลฺลํ, ฌาเน อาทีนวโกสลฺลํ ฌานโกสลฺลํ, ฌาเน นิสฺสรณโกสลฺลํ ฌานโกสลฺลํ, ฌานผเลน อุปาทาย โกสลฺลํ, ฌานผเลน ปฏิสงฺขานผเล อปริหานธมฺมตา นิพฺพตฺติฌาเน จ กีฬิตาปิ วิเสสภาคิยํ ฌานํ ปฏิลพฺภติ. อิทํ ปนสฺสาติ ภวหาริตา จ อารมฺมณานิมิตฺตคฺคาโห อนภินีหารพลํ, จิตฺเตกคฺคตา นิมิตฺตาสุ คติสหิตา สมถพเลน อสํสีทนญฺจ ฌาเน มคฺคผลํ สมถํ ปวตฺเต สมาธิโน อุเปกฺขาปลิปุพฺพาปรนิมิตฺตาสโย ปคฺคาหิโน สติพลํ ตํ ปวตฺติตานญฺจ วิปสฺสนานํ สมญฺญาพเล. ७८. तिथे ध्यानकौशल्य कोणते? समापत्तीतील कौशल्य हे ध्यानकौशल्य आहे, ध्यानविशेषातील कौशल्य हे ध्यानकौशल्य आहे, ध्यानाच्या अंतराळातील (कारणातील) कौशल्य हे ध्यानकौशल्य आहे, समापत्तीतून उठण्यातील (व्युत्थानातील) कौशल्य हे ध्यानकौशल्य आहे, ध्यानाच्या स्वभावातील कौशल्य हे ध्यानकौशल्य आहे, ध्यानातील आदीनवातील (दोषांमधील) कौशल्य हे ध्यानकौशल्य आहे, ध्यानातून निसरणातील (सुटकेतील) कौशल्य हे ध्यानकौशल्य आहे. ध्यानफलाचा आश्रय घेऊन कौशल्य, ध्यानफलाद्वारे विचार करण्याच्या फलामध्ये अपरिहाणधर्मता (ऱ्हास न होण्याचा स्वभाव) आणि उत्पन्न झालेल्या ध्यानात क्रीडा केल्याने देखील विशेषभागीय ध्यान प्राप्त होते. हे पुन्हा त्याचे भव वाहून नेणारे असणे, आलंबन-निमित्ताचे ग्रहण करणे, हे अभिनिहाराचे बल नाही. चित्ताची एकाग्रता ही निमित्तांच्या चांगल्या ग्रहणासह असते आणि शमथबलाने संकोच न पावणे हे आहे. ध्यानात मार्गफल रूप शमथ प्रवृत्त झाल्यावर, समाधीच्या उपेक्षेने युक्त, पूर्व आणि उत्तर निमित्तांचा आश्रय असलेला, प्रग्रहाचे आणि स्मृतिबलाचे, आणि ते प्रवृत्त करणाऱ्या विपश्यनांच्या समान बलामध्ये प्राप्त होते। ตตฺถ กตมา ฌานปารมิตา? สุปารมิตา เมตฺตา กาเมสุ สตฺตา กามสงฺคสตฺตาติ ยมฺหิ สุตฺเต เทสนาย โวหาเรน ทฺเว สจฺจานิ นิทฺทิฏฺฐานิ, ทุกฺขญฺจ สมุทโย จ, วิจเยน หาเรน เย สํโยชนีเยสุ ธมฺเมสุ วชฺชํ น ปสฺสนฺติ, เต โอฆํ ตริสฺสนฺตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. น ตริสฺสนฺตีติ อตฺถิ เอสา ยุตฺติ จ วิจโย จ อิทํ นุ กิสฺส ปทฏฺฐานํ, กาเมสุ สตฺตาติ ปญฺจ กามคุณา, ตํ กามตณฺหาย ปทฏฺฐานํ. สํโยชเน วชฺชมปสฺสมานาติ อวิชฺชาย ปทฏฺฐานํ, น หิ ชาตุ สํโยชนสงฺคสตฺตา โอฆํ ตเรยฺยุํ วิปุลํ มหนฺตนฺติ อุปาทานสฺส ปทฏฺฐานํ. กาเมสุ สตฺตาติ กามา ทฺวิธา – วตฺถุกามา จ กิเลสกามา จ, ตตฺถ กิเลสกามา กามตณฺหา กามตณฺหาย ยุตฺตา ภวนฺติ รูปตณฺหา ภวตณฺหา ลกฺขเณน หาเรน, สํโยชเน วชฺชมปสฺสมานาติ สํโยชนสฺส. โย ตตฺถ ฉนฺทราโค ตสฺส กึ ปทฏฺฐานํ? สุขา เวทนา ทฺเว จ อินฺทฺริยานิ – สุขินฺทฺริยญฺจ โสมนสฺสินฺทฺริยญฺจ. อิติ สุขาย เวทนาย คหิตาย ตโยปิ เวทนา คหิตา โหนฺติ. เวทนากฺขนฺเธ คหิเต สพฺเพ ปญฺจกฺขนฺธา คหิตา โหนฺติ. รูปสทฺทคนฺธรสโผฏฺฐพฺพา คหิตา, วตฺถุกาเมสุ [Pg.270] คหิเตสุ สพฺพานิ ฉ พาหิรานิ อายตนานิ คหิตานิ โหนฺติ. อชฺฌตฺติกพาหิเรสุ อายตเนสุ โย สโต, อยํ วุจฺจเต ลกฺขโณ หาโร, ตตฺถ โย โอฬาริกมฺหิ กิเลเส อชฺฌาวสิโต สพฺพกิเลเสสุ โย น ตโต สุขุมตเรสุ น วีตราโค ภวติ. ตตฺถ พาหิรสํโยชนํ มมนฺติ อชฺฌตฺตสํโยชนํ อหนฺติ. ตตฺถ ภควโต โก อธิปฺปาโย? เย โอฆํ ตริตุกามา เต สํโยชนีเยสุ ธมฺเมสุ อาทีนวานุปสฺสิโน วิหริสฺสนฺตีติ อยเมตฺถ ภควโต อธิปฺปาโย. กาเมสุ สตฺตาติ เยสุ จ สตฺตา เยน จ สตฺตา เยสญฺจ สตฺตา อยํ จตุพฺพิโธ อากาโร สพฺเพสํ หารภาคิโย. तिथे ध्यानपारमिता कोणती? सु-पारमिता असलेली मैत्री. 'कामात आसक्त' (कामेसु सत्ता) आणि 'कामसंगात आसक्त' (कामसंगसत्ता) असे ज्या सूत्तात देशनेच्या व्यवहाराने दोन सत्ये दर्शविली आहेत - दुःख आणि समुदाय. विचय हाराने (पद्धतीने): जे संयोजनीय धर्मांमध्ये दोष पाहत नाहीत, ते ओघाला (संसारप्रवाहाला) पार करतील, हे शक्य नाही (असे स्थान अस्तित्वात नाही). ते पार करणार नाहीत, हे सत्य आहे (असे स्थान आहे). हा युक्ति हार आणि विचय हार आहे. हे कशाचे पदस्थान (जवळचे कारण) आहे? 'कामात आसक्त' म्हणजे पाच कामगुण; ते कामतृष्णेचे पदस्थान आहे. 'संयोजनात दोष न पाहणे' हे अविद्येचे पदस्थान आहे. कारण संयोजनाच्या संगात आसक्त असलेले कधीही ओघाला पार करू शकत नाहीत. 'विपुल आणि महान' हे उपादानाचे पदस्थान आहे. 'कामात आसक्त' यामध्ये काम दोन प्रकारचे आहेत - वस्तुकाम आणि क्लेशकाम. तिथे क्लेशकाम म्हणजे कामतृष्णा; कामतृष्णेने युक्त असलेले रूपतृष्णा आणि भवतृष्णा हे लक्षण हाराने आहेत. 'संयोजनात दोष न पाहणे' हे संयोजनाचे (पदस्थान) आहे. तिथे जो छंदराग आहे, त्याचे पदस्थान काय आहे? सुख वेदना आणि दोन इंद्रिये - सुखिंद्रिय आणि सौमनस्यिंद्रिय. अशा प्रकारे सुख वेदना ग्रहण केली असता, तिन्ही वेदना ग्रहण केल्या जातात. वेदनास्कंध ग्रहण केला असता, सर्व पाचही स्कंध ग्रहण केले जातात. रूप, शब्द, गंध, रस आणि स्प्रष्टव्य ग्रहण केले जातात. वस्तुकाम ग्रहण केले असता, सर्व सहा बाह्य आयतने ग्रहण केली जातात. आध्यात्मिक आणि बाह्य आयतनांमध्ये जी स्मृती आहे, त्याला 'लक्षण हार' असे म्हटले जाते. तिथे जो स्थूल क्लेशांमध्ये गुरफटलेला आहे, तो सर्व क्लेशांमध्ये गुरफटलेला असल्यामुळे त्यापेक्षा सूक्ष्मतर क्लेशांमध्ये वीतराग होत नाही. तिथे बाह्य संयोजनाला 'माझे' (मम) आणि आध्यात्मिक संयोजनाला 'मी' (अहं) असे मानणे होते. तिथे भगवंतांचा काय अभिप्राय आहे? 'ज्यांना ओघ पार करण्याची इच्छा आहे, त्यांनी संयोजनीय धर्मांमध्ये आदीनव (दोष) पाहत विहरावे', हा येथे भगवंतांचा अभिप्राय आहे. 'कामात आसक्त' म्हणजे ज्यांच्यामध्ये आसक्त, ज्याच्याद्वारे आसक्त, आणि ज्यांच्यासाठी आसक्त, हा चार प्रकारचा आकार सर्वांसाठी हारभागीय आहे। ๗๙. ตตฺถ กตมานิ ตีณิ วิปลฺลาสานิ ปทฏฺฐานานิ จ? จิตฺตวิปลฺลาสสฺส ทิฏฺฐิวิปลฺลาสสฺส สญฺญาวิปลฺลาสสฺส ตโย วิปลฺลาสา ตีณิ อกุสลมูลานิ ปทฏฺฐานํ. ตีณิ อกุสลมูลานิ หีนปฺปณีตการิยกมฺมสฺส ปทฏฺฐานํ. จตุนฺนญฺจ อุปาทานานํ โทโส อกุสลมูลํ ทิสฺสติ. หีนปฺปณีตการิยกมฺมสฺส ปทฏฺฐานํ. ยถา มาตุยา วา ปิตุโน วา อญฺญตรสฺส วา ปุน อุฬารสฺส ภิกฺขุโน อภยํ เทติ. ตตฺถ อญฺโญ มิจฺฉา ปฏิปชฺเชยฺย กาเยน วา วาจาย วา. ตตฺถ โส พฺยาปาทมุปาทาย เตสํ อุฬารานํ รกฺขาวรณคุตฺติยา อนุปาลยนฺโต โย อุฬารานํ อภยํ เทติ. เตสํ อภเย ทินฺเน โย ตตฺถ มิจฺฉา ปฏิปชฺเชยฺย. ตตฺถ โส พฺยาปาทํ อุปาทายนฺโต โทสชํ กมฺมํ กโรติ. โย ตตฺถ อสาธุ อินฺทฺริยา นีวรณํ ยํ เตสํ อภยํ ทกฺขิณโต สญฺญํ อิทํ ปณีตํ การณํ มยา ปุน ตตฺถ มิจฺฉาปฏิปตฺติ อยํ พฺยาปาโท หีนคมิวกมฺมํ โลโภ โมโห จ อิมานิ นีวรณานิ วจนานิ ตานิ จตฺตาริ อุปาทานานิ เตหิ จตูหิ อุปาทาเนหิ โย โส อุปาทาโน อิตฺถี วา ปุริโส วา เตสํ ปญฺจกฺขนฺธานํ เตเยว อุปาทาโน สมุทโย อิทํ ทุกฺขญฺจ สมุทโย จ โสเยว เทสนาหาโร. ७९. त्यामध्ये, तीन विपर्यास कोणते आणि प्रस्थान (अधिष्ठान) कोणते? चित्तविपर्यास, दृष्टिविपर्यास आणि संज्ञाविपर्यास हे तीन विपर्यास आणि तीन अकुशलमुळे हे प्रस्थान आहे. तीन अकुशलमुळे हे हीन (कनिष्ठ) आणि प्रणीत (उत्कृष्ट) कर्माचे प्रस्थान आहे. चार उपादानांमध्ये द्वेष हे अकुशलमूळ दिसून येते, जे हीन आणि प्रणीत कर्माचे प्रस्थान आहे. जसे की आईला, वडिलांना किंवा इतर कोणाला, अथवा पुन्हा एखाद्या श्रेष्ठ भिक्खूला अभय देतो. तेथे दुसरा कोणी कायेने किंवा वाचेने मिथ्या आचरण करतो. तेथे तो व्यापाद धरून, त्या श्रेष्ठ व्यक्तींच्या संरक्षणासाठी त्यांचे रक्षण करत, जो श्रेष्ठ व्यक्तींना अभय देतो. त्यांना अभय दिले असता, जो तेथे मिथ्या आचरण करतो, तेथे तो व्यापाद धरून द्वेषजन्य कर्म करतो. जो तेथे अकुशल इंद्रियांमुळे जे नीवरण आहे, त्यांना अभय देतो... ही संज्ञा, हे प्रणीत कारण माझ्याद्वारे पुन्हा तेथे मिथ्या प्रतिपत्ती (चुकीचे आचरण) आहे, हा व्यापाद आहे, हीन गती देणारे कर्म आहे. लोभ आणि मोह ही नीवरणे म्हटली आहेत. ती चार उपादाने आहेत. त्या चार उपादानांद्वारे जो कोणी स्त्री किंवा पुरुष उपादान करतो, त्या पंचस्कंधांचे तेच उपादान हा समुदय आहे. हे दुःख आणि हा समुदय आहे. हाच 'देशनाहार' (Desanāhāra) होय. ตตฺถ กาเมสุ เย น ปชฺชนฺติ, เต อาทีนวานุปสฺสนาย ปชฺชนฺติ. อิติสฺสา กามธาตุยา นิกฺขมิตุกามตา, อยํ วุจฺจติ เนกฺขมฺมจฺฉนฺโท. โย ตตฺถ อนภิสงฺขารานํ กิญฺจิ วิโสเธติ ตสฺส ธาวรา วา, อยํ อพฺยาปาทจฺฉนฺโท. กิญฺจิ วิหึสติ, อยํ วิหึสาฉนฺโท. อิติ เนกฺขมฺมาภินีหตา ตโย ฉนฺทา – เนกฺขมฺมจฺฉนฺโท อพฺยาปาทจฺฉนฺโท อวิหึสาฉนฺโท. ตตฺถ [Pg.271] เนกฺขมฺมจฺฉนฺโท อโลโภ; อพฺยาปาทจฺฉนฺโท อโทโส; อวิหึสาฉนฺโท อโมโห. อิมานิ ตีณิ กุสลมูลานิ อฏฺฐสุ สมฺปตฺเตสุ ปรหิตานิ, เตสํเยว จตุนฺนํ อุปาทานานํ นิโรธาย สํวตฺตนฺติ. สเจ วา ปุน กมฺมํ กเรยฺย กณฺหํ วา สุกฺกํ วา ตสฺส วิปากหานาย สํวตฺตนฺติ. อิทํ กมฺมํ อกณฺหํ อสุกฺกํ กมฺมกฺขยาย สํวตฺตติ. ตตฺถ โย ติณฺณํ อกุสลมูลานํ นิโรโธ, อยํ นิโรโธ. โสเยว มคฺโค ตตฺถ ปฏิปทานิ อิมานิ ทฺเว สจฺจานิ อิมานิ จตฺตาริ สจฺจานิ อาวฏฺโฏ หาโร. तेथे जे कामांमध्ये (कामभोगांमध्ये) प्रवृत्त होत नाहीत, ते आदीनवानुपश्यनेमध्ये (दोषांच्या अनुप्रेक्षणामध्ये) प्रवृत्त होतात. म्हणून, या कामधातूपासून मुक्त होण्याची जी इच्छा आहे, त्याला 'नेक्खम्मच्छंद' (नैष्क्रम्य-छंद) म्हटले जाते. जो तेथे अनभिसंस्कारांपैकी कशाचे तरी विशोधन करतो, त्याचा जो दृढ प्रयत्न असतो, त्याला 'अव्यापादछंद' (अद्वेष-छंद) म्हटले जाते. जो कशाची तरी हिंसा करतो, तो 'विहिंसाछंद' (हिंसा-छंद) होय. अशा प्रकारे, नैष्क्रम्याकडे नेणारे तीन छंद आहेत – नेक्खम्मच्छंद, अव्यापादछंद आणि अविहिंसाछंद. त्यामध्ये, नेक्खम्मच्छंद म्हणजे अलोभ; अव्यापादछंद म्हणजे अद्वेष; आणि अविहिंसाछंद म्हणजे अमोह होय. ही तीन कुशलमुळे आठ संपत्तींमध्ये परोपकारी (परहितकारक) असतात आणि ती त्याच चार उपादानांच्या निरोधासाठी कारणीभूत ठरतात. जर पुन्हा कोणी कृष्ण (अकुशल) किंवा शुक्ल (कुशल) कर्म केले, तर ते त्याच्या विपाकाच्या (फलाच्या) नाशासाठी कारणीभूत ठरतात. हे अकृष्ण-अशुक्ल कर्म कर्मक्षयासाठी कारणीभूत ठरते. तेथे जे तीन अकुशलमुळांचा निरोध आहे, तो 'निरोध' (निरोधसत्य) होय. तोच मार्ग (मार्गसत्य) आहे, तेथील प्रतिपत्ती ही दोन सत्ये आहेत. ही चार सत्ये म्हणजे 'आवट्तहार' (Āvaṭṭahāra) होय. กาเมสุ สตฺตาติ เย เสกฺขา, เต เอเกเนวากาเรน สตฺตา. เย ปุถุชฺชนา, เต ทฺวีหากาเรหิ สตฺตา, ตสฺสายํ ปญฺโห วิภชฺชพฺยากรณีโย วตฺตพฺโพ. กิญฺจาปิ โสตาปนฺโน ปฏิเสวนาย, โน จ โข อภินิเวเส สตฺโต โย หิ อปจยาย ปทหติ, น อุปจยาย. เสกฺโข หิ กิเลสวเสน กาเม ปฏิเสวติ. ปุถุชฺชโน ปน กิเลสสมุฏฺฐานาย กาเม ปฏิเสวติ. ตตฺถ กาเมสุ สตฺตานํ จตุโอฆํ ตริสฺสตีติ วิภชฺชพฺยากรณีโย, อยํ วิภตฺติ. ‘कामांमध्ये आसक्त’ याविषयी, जे शैक्ष (सेक्ख) आहेत, ते एकाच प्रकारे आसक्त असतात. जे पृथग्जन (पुथुज्जन) आहेत, ते दोन प्रकारे आसक्त असतात; त्यांच्या या प्रश्नाचे उत्तर विभज्य-व्याकरण (विभाजन करून स्पष्टीकरण) पद्धतीने दिले पाहिजे. जरी सोतापन्न उपभोग घेण्यासाठी आसक्त असला, तरी तो अभिनिवेशात (दृढ आसक्तीत) आसक्त नसतो; कारण तो अपचयासाठी (क्लेश कमी करण्यासाठी) प्रयत्न करतो, उपचयासाठी (क्लेश वाढवण्यासाठी) नाही. शैक्ष हा क्लेशांच्या प्रभावामुळे कामांचे सेवन करतो. परंतु पृथग्जन हा क्लेशांच्या उत्पत्तीसाठी कामांचे सेवन करतो. तेथे, कामांमध्ये आसक्त असलेल्या लोकांच्या चार ओघांना (प्रवाहांना) पार करण्याविषयीचे जे विभज्य-व्याकरण आहे, तो 'विभत्तीहार' (Vibhattihāra) होय. ๘๐. ปริวตฺตโนติ กาเม เย เนว สชฺชนฺติ น จ สํโยชเนหิ สํยุตฺตา, เต โอฆํ ตริสฺสนฺติ วิปุลํ มหนฺตนฺติ. อยํ สุตฺตสฺส ปฏิปกฺโข. ८०. ‘परिवर्तन’ (Parivattana) म्हणजे जे कामांमध्ये आसक्त होत नाहीत आणि संयोजनांनी युक्त नसतात, ते विस्तीर्ण आणि महान ओघाला पार करतील. हा सुत्ताचा प्रतिपक्ष (विरुद्ध बाजू) आहे. เววจนนฺติ โย กาเมสุ สตฺโต โย จ ตตฺถ กามานํ คุโณ, ตตฺถ วิโส สตฺโต. เยปิ กามานํ อาหารา ธมฺมา, ตตฺถ วิโส สตฺโต. ตตฺถิมํ กามานํ เววจนํ ปาโก รโช สลฺลํ คณฺโฑ อีติ อุปทฺทโวติ. ยานิ วา ปน อญฺญานิ เววจนานิ ตตฺถ วิโส สตฺโตติ เววจนํ. สตฺโต พนฺโธ มุจฺฉิโต คธิโต อชฺโฌสิโต กาเม อชฺฌาปนฺนา ปริมุตฺโต ตพฺพหุลวิหารีติ. ยานิ วา ปน อญฺญานิ เววจนานิ, อยํ เววจโน นาม. กามปฺปจารปญฺญตฺติยา กิเลสโคจรปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตา จิตฺตนฺติ เววจนํ. สตฺโต ตพฺพหุลวิหารีติ ยานิ วา ปน อญฺญานิ. อิเม กามปฺปจารปญฺญตฺติยา กิเลสโคจร ปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตา, พีชปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตา, สงฺขารา สํโยชนปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตา, อุปาทานํ เหตุปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ, ปุคฺคโล ปุถุปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺโต. ‘वेवचन’ (पर्यायवाची शब्द) म्हणजे जो कामांमध्ये आसक्त आहे आणि तेथे कामांचा जो गुण आहे, तेथे तो विषाप्रमाणे आसक्त आहे. जे कामांचे आहाररूप धर्म आहेत, तेथेही तो विषाप्रमाणे आसक्त आहे. तेथे कामांचे हे वेवचन (पर्याय) आहेत: पाक (परिपक्वता), रज (धूळ), शल्य (बाण), गंड (गळू), ईती (संकट) आणि उपद्रव. किंवा इतर जी वेवचने आहेत, त्यामध्ये 'विषाप्रमाणे आसक्त' हे वेवचन आहे. आसक्त (सत्त), बद्ध, मूच्छित, गधित (गृद्ध), अध्यवसित (अज्झोसित), कामांमध्ये गुरफटलेला (अज्झापन्न), परिमुक्त, तद्बहुलविहारी (त्यातच मग्न राहणारा) इत्यादी जी इतर वेवचने आहेत, त्याला 'वेवचनहार' (Vevacanahāra) म्हटले जाते. कामावचार-प्रज्ञप्तीद्वारे आणि क्लेशगोचर-प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त केलेले 'चित्त' हे वेवचन आहे. 'आसक्त आणि तद्बहुलविहारी' इत्यादी इतर ज्या प्रज्ञप्त्या आहेत, त्या कामावचार-प्रज्ञप्तीद्वारे, क्लेशगोचर-प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त केल्या आहेत; बीज-प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त केल्या आहेत; संस्कार आणि संयोजन-प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त केल्या आहेत; उपादान हे हेतू-प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त केले आहे; आणि पुद्गल हा पृथक्-प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त केला आहे. โอตรโณติ อิมาย ปฏิจฺจสมุปฺปาโท ทุกฺขญฺจ สมุทโย จ. เย กิเลสา เย สงฺขารา สํโยชนานิ จ ปญฺจสุ ขนฺเธสุ สงฺขารกฺขนฺโธ ธมฺมายตเนสุ [Pg.272] อกุสลา ธมฺมายตนานิ อินฺทฺริเยสุ สุขินฺทฺริยญฺจ, โสมนสฺสินฺทฺริยญฺจ, อยํ อินฺทฺริโยตรโณ. ‘ओतरण’ (अवतरण) म्हणजे याच्याद्वारे प्रतीत्यसमुत्पाद, दुःख आणि समुदय यांचा प्रवेश होतो. जे क्लेश, जे संस्कार आणि जी संयोजने आहेत, ती पंचस्कंधांमधील संस्कारस्कंधात, धर्मायतनांमधील अकुशल धर्मायतनांमध्ये आणि इंद्रियांमधील सुखिंद्रिय व सौमनस्येंद्रिय यामध्ये समाविष्ट होतात; हे 'इंद्रिय-ओतरण' (इंद्रियांचे अवतरण) होय. โสธโนติ เอตฺตโก. เอเสว อารมฺโภ นิทฺทิสิตพฺโพ สุตฺตตฺโถ. ‘शोधन’ (Sodhana) म्हणजे एवढेच. हाच आरंभ निर्देशिण्याजोगा सुत्ताचा अर्थ आहे. อธิฏฺฐาโนติ อิเม ธมฺมา อตฺถิ เอกตฺตตาย ปญฺญตฺตา อตฺถิ เวมตฺตตาย. เย สญฺญา พาหิโร กาเม, เต เวมตฺตตาย ปญฺญตฺตา. ปญฺจสุ กามคุเณสุ สตฺตาติ ปริยุฏฺฐานวิปลฺลาสา เวมตฺตตาย ปญฺญตฺตา โอฆํ ตเรยฺยุํ. วิปุลํ มหนฺตนฺติ อวิชฺชา เอกตฺตตาย ปญฺญตฺตา. ‘अधिष्ठान’ (Adhiṭṭhāna) म्हणजे हे धर्म काही एकत्वाच्या (समानतेच्या) रूपाने प्रज्ञप्त केले आहेत, तर काही नानात्वाच्या (भिन्नतेच्या) रूपाने प्रज्ञप्त केले आहेत. ज्या संज्ञा आणि बाह्य काम आहेत, त्या नानात्वाच्या रूपाने प्रज्ञप्त केल्या आहेत. ‘पाच कामगुणांमध्ये आसक्त’ हे पर्युत्थान आणि विपर्यास नानात्वाच्या रूपाने प्रज्ञप्त केले आहेत. ‘ते विस्तीर्ण आणि महान ओघाला पार करतील’ यामध्ये अविद्या ही एकत्वाच्या रूपाने प्रज्ञप्त केली आहे. ปริกฺขาโรติ ตสฺส โก เหตุ โก ปจฺจโย? อารมฺมณปจฺจยตาย ปจฺจโย. อโยนิโส จ มนสิกาโร สนฺนิสฺสยสฺส ปจฺจยตาย ปจฺจโย. อวิชฺชา สมนนฺตรปจฺจยตาย ปจฺจโย. ราคานุสโย เหตุปจฺจยตาย ปจฺจโย. อยํ เหตุ, อยํ ปจฺจโย. ‘परिकार’ (Parikkhāra) म्हणजे त्याचा हेतू काय आणि प्रत्यय (कारण) काय? आलंबन-प्रत्ययभावाने तो प्रत्यय होतो. अयोनिशो मनसिकार हा संनिश्रय-प्रत्ययभावाने प्रत्यय होतो. अविद्या ही समनंतर-प्रत्ययभावाने प्रत्यय होते. रागानुशय हा हेतू-प्रत्ययभावाने प्रत्यय होतो. हा हेतू आहे आणि हा प्रत्यय आहे. สมาโรปโน ปจฺจโยติ เย กาเมสุ สตฺตา สุคตา สุรูปาติ อยํ กามธาตุยา ฉนฺโท ราโค เต อปุญฺญมยา สงฺขารา. เต กึ ปจฺจยา? อวิชฺชา ปจฺจยา. เต กิสฺส ปจฺจยา? วิญฺญาณสฺส ปจฺจยา. อิติ อวิชฺชาปจฺจยา สงฺขารา. สงฺขารปจฺจยา วิญฺญาณํ ยาว ชรามรณํ เอวเมตสฺส เกวลสฺส มหโต ทุกฺขกฺขนฺธสฺส สมุทโย โหติ เอกํ สุตฺตํ คตํ. ปญฺจนีวรณิกํ สุตฺตํ กาตพฺพํ. ‘समारोपण प्रत्यय’ म्हणजे जे कामांमध्ये आसक्त आहेत, सुगतीला गेलेले आहेत आणि सुरूप आहेत, हा कामधातूतील छंद-राग आहे; ते अपुण्यमय संस्कार आहेत. ते कशाच्या प्रत्ययाने (कारणाने) होतात? अविद्येच्या प्रत्ययाने होतात. ते कशासाठी प्रत्यय (कारण) ठरतात? विज्ञानासाठी प्रत्यय ठरतात. अशा प्रकारे, अविद्या-प्रत्ययाने संस्कार होतात. संस्कार-प्रत्ययाने विज्ञान होते... याप्रमाणे जरा-मरणापर्यंत (उत्पत्ती होते). अशा प्रकारे या केवळ महान दुःखस्कंधाचा समुदय होतो. हे एक सुत्त पूर्ण झाले. पाच नीवरणांचे सुत्त तयार केले पाहिजे. ๘๑. ตตฺถ กตโม เทสนาหาโร นาม? ยา จ อภิชฺฌา โย จ พฺยาปาโท ยญฺจ อุทฺธจฺจํ, อยํ ตณฺหา. ยญฺจ ถินมิทฺธํ, ยญฺจ กุกฺกุจฺจํ ยา จ วิจิกิจฺฉา, อยํ ทิฏฺฐิ. ยา ปน กายสฺส อกมฺมนิยตา กิญฺจาปิ ตํ มิทฺธํ โน ตุ สภาวกิเลสตาย กิเลโส, อิติ ยา จ จิตฺตสลฺลียนา ยา จ กายากมฺมนิยตา, อยํ ปกฺโขปกิเลโส น ตุ สภาวกิเลโส. ตตฺถ อตฺตสญฺญานุปจิตฺตํ กิลมโถ กุกฺกุจฺจานุปจิตฺตํ ถินํ ยา จิตฺตสฺส ลียนา, อิติ อิเม ปญฺจ นีวรณา จตฺตาริ นีวรณานิ สภาวกิเลสา ถินมิทฺธํ นีวรณปกฺโขปกิเลโส. ยถา จตฺตาโร อาสวา สภาวอาสวตาย อาสวา โน ตุ จิตฺตสาสวตาย อาสวา. สภาวตาย อาสวา. ปกฺเข อาสวตาย อาสวา. อถ ปนาห สุตฺตนฺตํ เยน เต สมฺปยุตฺตา วา วิปฺปยุตฺตา วา อาสวา, เตเยว เอเต วตฺตพฺพา สาสวา วา อนาสวา วา. ८१. त्यामध्ये 'देशनाहार' म्हणजे काय? जी अभिलाषा (अभिज्झा), जो द्वेष (व्यापाद) आणि जो विक्षेप (उद्धच्च) आहे, ती तृष्णा (तण्हा) होय. आणि जे आळस व ग्लानी (थिनमिद्ध), जो पश्चात्ताप (कुक्कुच्च) आणि जो संशय (विचिकिच्छा) आहे, ती दृष्टी (दिट्ठि) होय. शरीराची जी अकर्मण्यता (अकार्यक्षमता) आहे, ती जरी 'मिद्ध' (ग्लानी) असली, तरी स्वभावाने क्लेश नसल्यामुळे तो प्रत्यक्ष क्लेश नव्हे. अशा प्रकारे, चित्ताचे जे संकोचन (लीनता) आणि शरीराची जी अकर्मण्यता आहे, तो पक्षाचा उपक्लेश (पक्षोपक्लेश) आहे, पण स्वभाव-क्लेश नव्हे. तेथे आत्मसंज्ञेने युक्त चित्ताचा थकवा आणि पश्चात्तापाने युक्त चित्ताचे जे संकोचन आहे, ते 'थिन' (आळस) होय. अशा प्रकारे हे पाच नीवरण आहेत; (त्यापैकी) चार नीवरणे हे स्वभाव-क्लेश आहेत आणि थिनमिद्ध हे नीवरण-पक्षाचा उपक्लेश आहे. ज्याप्रमाणे चार आसव हे स्वभाव-आसवत्वामुळे आसव आहेत, चित्ताच्या सासवत्वामुळे नव्हे. स्वभावामुळे ते आसव आहेत आणि पक्षातील आसवत्वामुळे ते आसव आहेत. शिवाय, सूत्रात म्हटले आहे की, ज्यांच्याशी ते (धर्म) संप्रयुक्त किंवा विप्रयुक्त असतात, त्यांनाच 'सासव' (आसवयुक्त) किंवा 'अनासव' (आसवरहित) म्हटले पाहिजे। ตตฺถ [Pg.273] กตโม วิจโย. อภิชฺฌา กามตณฺหา รูปตณฺหา ภวตณฺหา. ยํ วา ปน กิญฺจิ อชฺโฌสานคตํ สาสวา อภิชฺฌิตสฺส เมตฺตานุปสฺสิย โย อนตฺถํ จรติ. ตตฺถ โย พฺยาปาทํ อุปฺปาเทติ, อจริ จริสฺสตีติ. เอวํ นว อาฆาตวตฺถูนิ กตฺตพฺพานิ, ตสฺเสวํ พฺยาปาทานุปสฺสิสฺส กิเลโส โย ปริทาโห กายกิลมโถ อกมฺมนิยตา มิทฺธํ. จิตฺตานุปสฺสิสฺส ปฏิฆาเตน ขิยนา, อิทํ ถินมิทฺธํ. ตตฺถ อธิกรณอวูปสโม, อิทํ อุทฺธจฺจํ. ยํ กึ กสถมีติ อิทํ กุกฺกุจฺจํ. ยํ ยถา อิทํ สนฺตีรณํ, อยํ วิจิกิจฺฉา. ตตฺถ อวิชฺชา จ ตณฺหา จ อตฺถิ, อิทํ ปริยุฏฺฐานํ. อาวรณํ นีวรณํ ฉทนํ อุปกฺกิเลโส จ อตฺถิ, อิทํ กามจฺฉนฺโท กามราคปริยุฏฺฐานสฺส ปทฏฺฐานํ. พฺยาปาโท พฺยาปาทปริยุฏฺฐานสฺส ปทฏฺฐานํ. ถินมิทฺธํ ถินมิทฺธปริยุฏฺฐานสฺส ปทฏฺฐานํ. อุทฺธจฺจกุกฺกุจฺจํ อวิชฺชาปริยุฏฺฐานสฺส ปทฏฺฐานํ. วิจิกิจฺฉา วิจิกิจฺฉาปริยุฏฺฐานสฺส ปทฏฺฐานํ. กามราคปริยุฏฺฐานํ อนุสยสํโยชนสฺส ปทฏฺฐานํ. พฺยาปาทปริยุฏฺฐานํ ปฏิฆสํโยชนสฺส ปทฏฺฐานํ. ถินมิทฺธปริยุฏฺฐานํ มานสํโยชนสฺส ปทฏฺฐานํ. อวิชฺชาปริยุฏฺฐานญฺจ วิจิกิจฺฉาปริยุฏฺฐานญฺจ ทิฏฺฐิสํโยชนสฺส ปทฏฺฐานํ. त्यामध्ये 'विचय' (विचयहार) म्हणजे काय? अभिलाषा (अभिज्झा), कामतृष्णा, रूपतृष्णा आणि भवतृष्णा. किंवा जे काही आसक्तीने युक्त आहे, ते सासव (आसवयुक्त) होय. दुसऱ्याच्या संपत्तीची अभिलाषा धरणाऱ्या आणि मैत्रीची भावना करणाऱ्या व्यक्तीच्या बाबतीत जो अनर्थ करतो, तेथे जो द्वेष (व्यापाद) उत्पन्न करतो, ज्याने पूर्वी केला किंवा जो भविष्यात करेल, अशा प्रकारे नऊ आघातवस्तू जाणाव्यात. अशा प्रकारे द्वेषाचे अनुदर्शन करणाऱ्या व्यक्तीचा जो क्लेश, जो संताप (परिदाह), शरीराचा थकवा आणि अकर्मण्यता आहे, ते 'मिद्ध' (ग्लानी) होय. चित्ताचे अनुदर्शन करणाऱ्या व्यक्तीचे प्रतिघातामुळे (द्वेषामुळे) जे खिन्न होणे आहे, ते 'थिनमिद्ध' होय. तेथे वादाचा (अधिकरण) उपशम न होणे, हे 'उद्धच्च' (विक्षेप) होय. जे काही पश्चात्तापयुक्त कृत्य आहे, ते 'कुक्कुच्च' होय. जे जसे आहे तसे तपासणे (संतीरण), ती 'विचिकिच्छा' (संशय) होय. तेथे अविद्या आणि तृष्णा आहेत, ते 'परियुट्ठान' (उद्रेक) होय. जे आवरण, नीवरण, छादन (झाकण) आणि उपक्लेश आहे, तो 'कामच्छंद' असून तो कामराग-परियुट्ठानाचे पदस्थान (नजीकचे कारण) आहे. व्यापाद हा व्यापाद-परियुट्ठानाचे पदस्थान आहे. थिनमिद्ध हे थिनमिद्ध-परियुट्ठानाचे पदस्थान आहे. उद्धच्च-कुक्कुच्च हे अविद्या-परियुट्ठानाचे पदस्थान आहे. विचिकिच्छा ही विचिकिच्छा-परियुट्ठानाचे पदस्थान आहे. कामराग-परियुट्ठान हे अनुशय-संयोजनाचे पदस्थान आहे. व्यापाद-परियुट्ठान हे प्रतिघ-संयोजनाचे पदस्थान आहे. थिनमिद्ध-परियुट्ठान हे मान-संयोजनाचे पदस्थान आहे. अविद्या-परियुट्ठान आणि विचिकिच्छा-परियुट्ठान हे दृष्टी-संयोजनाचे पदस्थान आहे। ตตฺถ กตโม ลกฺขโณ หาโร? กามราคปริยุฏฺฐาเน วุตฺเต สพฺพานิ ปริยุฏฺฐานานิ วุตฺตานิ โหนฺตีติ. สํโยชเนสุ วุตฺเตสุ สพฺพสํโยชนานิ วุตฺตานิ โหนฺติ. อยํ ลกฺขโณ หาโร. त्यामध्ये 'लक्षणहार' म्हणजे काय? कामराग-परियुट्ठानाचा (कामरागाच्या उद्रेकाचा) उल्लेख केला असता, सर्व परियुट्ठानांचा उल्लेख केला जातो. संयोजनांचा उल्लेख केला असता, सर्व संयोजनांचा उल्लेख केला जातो. हा 'लक्षणहार' होय। ๘๒. ตตฺถ กตโม จตุพฺยูโห หาโร? เย อิเม ปญฺจ นีวรณา ฌานปฏิปกฺโข โส ทุกฺขสมุทโย. ยํ ผลํ, อิทํ ทุกฺขํ. ตตฺถ กามจฺฉนฺทสฺส เนกฺขมฺมวิตกฺโก ปฏิปกฺโข; พฺยาปาทสฺส อพฺยาปาทวิตกฺโก ปฏิปกฺโข; ติณฺณํ นีวรณานํ อวิหึสาวิตกฺโก ปฏิปกฺโข. อิติ อิเม ตโย วิตกฺกา. เนกฺขมฺมวิตกฺโก สมาธิกฺขนฺธํ ภชติ. อพฺยาปาทวิตกฺโก สีลกฺขนฺธํ ภชติ. อวิหึสาวิตกฺโก ปญฺญากฺขนฺธํ ภชติ. อิเม ตโย ขนฺธา. อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค นีวรณปฺปหานาย สํวตฺตติ. ยํ นีวรณปฺปหานํ, อยํ นิโรโธ. อิมานิ จตฺตาริ สจฺจานิ. อยํ จตุพฺยูโห หาโร. ८२. त्यामध्ये 'चतुब्यूहहार' म्हणजे काय? जे हे पाच नीवरण आहेत, जे ध्यानाचे प्रतिपक्ष (विरोधी) आहेत, तो 'दुःखसमुदय' होय. त्याचे जे फळ आहे, ते 'दुःख' होय. तेथे कामच्छंदाचा प्रतिपक्ष 'नेक्खम्मवितक्क' (नैष्क्रम्यवितर्क) आहे; व्यापादाचा प्रतिपक्ष 'अव्यापादवितक्क' (अद्वेषवितर्क) आहे; आणि उर्वरित तीन नीवरणांचा प्रतिपक्ष 'अविहिंसावितक्क' (अहिंसावितर्क) आहे. अशा प्रकारे हे तीन वितर्क आहेत. नेक्खम्मवितक्क हा समाधी स्कंधाचा (समाधिक्खंध) आश्रय घेतो. अव्यापादवितक्क हा शील स्कंधाचा (सीलक्खंध) आश्रय घेतो. अविहिंसावितक्क हा प्रज्ञा स्कंधाचा (पञ्ञाक्खंध) आश्रय घेतो. हे तीन स्कंध आहेत. आर्य अष्टांगिक मार्ग हा नीवरणांच्या प्रहाणासाठी (नष्ट करण्यासाठी) प्रवृत्त होतो. नीवरणांचे जे प्रहाण आहे, तो 'निरोध' होय. ही चार आर्यसत्ये आहेत. हा 'चतुब्यूहहार' होय। ตตฺถ กตโม อาวฏฺโฏ หาโร? ปญฺจ นีวรณานิ ทส ภวนฺติ. ยทปิ อชฺฌตฺตํ สารชฺชติ, ตทปิ นีวรณํ. ยทปิ พหิทฺธา สารชฺชติ, ตทปิ นีวรณํ, เอวํ [Pg.274] ยาว วิจิกิจฺฉา อิเม ทส นีวรณา. อชฺฌตฺตพหิทฺธา กิเลสา อิมานิ ทฺเว สํโยชนานิ อชฺฌตฺตสํโยชนญฺจ พหิทฺธาสํโยชนญฺจ. ตตฺถ อหนฺติ อชฺฌตฺตํ, มมนฺติ พหิทฺธา. สกฺกายทิฏฺฐิ อชฺฌตฺตํ, เอกสฏฺฐิ ทิฏฺฐิคตานิ พหิทฺธา. โย อชฺฌตฺตํ ฉนฺทราโค รูเปสุ อวีตราโค ภวติ อวีตจฺฉนฺโท. เอวํ ยาว วิญฺญาเณ, อยํ อชฺฌตฺตา ตณฺหา. ยํ ฉสุ พาหิเรสุ อายตเนสุ ตีสุ จ ภเวสุ อชฺโฌสานํ, อยํ พหิทฺธา ตณฺหา. อิมานิ ทฺเว สจฺจานิ สํโยชนานิ สํโยชนียา จ ธมฺมา. ตตฺถ สํโยชเนสุ ธมฺเมสุ ยา นิพฺพิทานุปสฺสนา จ, อยํ มคฺโค. ยํ สํโยชนปฺปหานํ, อยํ นิโรโธ. อยํ อาวฏฺโฏ หาโร. त्यामध्ये 'आवृत्तहार' (आवट्ठहार) म्हणजे काय? पाच नीवरणे दहा होतात. जेव्हा अध्यात्मात (स्वतःच्या ठिकाणी) आसक्ती निर्माण होते, तेव्हा तेही नीवरण आहे. जेव्हा बाह्य वस्तूंमध्ये आसक्ती निर्माण होते, तेव्हा तेही नीवरण आहे. अशा प्रकारे विचिकिच्छापर्यंत (संशयापर्यंत) हे दहा नीवरण आहेत. अध्यात्म आणि बाह्य क्लेश हे दोन संयोजन आहेत: अध्यात्म-संयोजन आणि बाह्य-संयोजन. तेथे 'मी' (अहं) हे अध्यात्म आहे, 'माझे' (मम) हे बाह्य आहे. सक्कायदिट्ठि (सत्कायदृष्टी) हे अध्यात्म आहे, एकसष्ट मिथ्यादृष्टी हे बाह्य आहे. रूपांच्या बाबतीत अध्यात्मात जो छंदराग आहे, जो वीतराग झालेला नाही, वीतछंद झालेला नाही, अशा प्रकारे विज्ञानापर्यंत (विञ्ञाण) जी आसक्ती आहे, ती अध्यात्म-तृष्णा होय. सहा बाह्य आयतनांमध्ये आणि तीन भावांमध्ये जी आसक्ती आहे, ती बाह्य-तृष्णा होय. ही दोन सत्ये, संयोजने आणि संयोजनीय धर्म आहेत. तेथे संयोजनीय धर्मांच्या बाबतीत जी निर्वेदानुदर्शना (वैराग्य पाहणे) आहे, तो 'मार्ग' होय. संयोजनांचे जे प्रहाण आहे, तो 'निरोध' होय. हा 'आवृत्तहार' होय। ตตฺถ กตโม วิภตฺติหาโร? สํโยชนนฺติ น เอตํ เอกํเสน. มานสํโยชนํ ทิฏฺฐิภาคิยนฺติ น ตํ เอกํเสน อทิฏฺฐมานํ นิสฺสายมานํ น ปชหติ. โย ปญฺจ อุทฺธมฺภาคิโย มาโน กิญฺจาปิ โส ทิฏฺฐิปกฺเข สิยา. น ตุ โอรมฺภาคิยํ สํโยชนํ ตสฺส ปหานาย สํวตฺตตีติ. โย จ อหํกาโร น ปวิทฺโธยํ ปนสฺส เอวํ โหติ. กทาสุ นามาหํ ตํ สนฺตํ อายตนํ สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหริสฺสามิ, ยํ อริยา สนฺตํ อายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหริสฺสนฺตีติ, อยํ อภิชฺฌา น จ ตํ นีวรณํ. อตฺถิ ปน อรหโต กายกิเลสมิทฺธญฺจ โอกฺกมติ น จ ตํ นีวรณํ ตสฺส ถินมิทฺธํ นีวรณนฺติ. น เอกํเสน. อยํ วิภตฺติหาโร. त्यामध्ये 'विभक्तिहार' म्हणजे काय? 'संयोजन' हे एकांताने (निश्चितपणे) नाही. मान-संयोजन हे दृष्टी-भागीय (दृष्टीच्या भागाचे) आहे, असे एकांताने नाही; कारण ते दृष्टीरहित मानाचा आश्रय घेणाऱ्या मानाचा त्याग करत नाही. जो पाच उद्धंभागिय (उच्च स्तरावरील) मान आहे, तो जरी दृष्टीच्या पक्षात असला, तरी ओरंभागिय (निम्न स्तरावरील) संयोजन त्याच्या प्रहाणासाठी प्रवृत्त होत नाही. आणि ज्याचा अहंकार नष्ट झालेला नाही, त्याच्या मनात असा विचार येतो: 'मी कधी बरं त्या शांत आयतनाचा (निर्वाणाचा) साक्षात्कार करून, त्यात उपसंपन्न होऊन विहरेन, ज्या शांत आयतनात आर्य उपसंपन्न होऊन विहरतात?' ही अभिलाषा (अभिज्झा) आहे, पण ते नीवरण नव्हे. अर्हंताला देखील शरीराचा थकवा आणि ग्लानी (मिद्ध) प्राप्त होते, पण ते नीवरण नव्हे; (सामान्य पुद्गलाचे) थिनमिद्ध हे नीवरण आहे. अशा प्रकारे हे एकांताने नाही. हा 'विभक्तिहार' होय। ปริวตฺตโนติ ปญฺจ นีวรณา ปญฺจงฺคิเกน ฌาเนน ปหานํ คจฺฉนฺติ. อยํ เตสํ ปฏิปกฺโข นีวรโณ อสุกสฺส ปหีนาติ น อญฺญานุมินิตพฺพํ, ปรมตฺถมชฺฌตฺตํ, อยํ ปริวตฺตนา. 'परिवर्तना' (परिवर्तनहार) म्हणजे: पाच नीवरणे पाच अंगांनी युक्त अशा ध्यानाद्वारे प्रहाणाला (नाशाला) प्राप्त होतात. हा त्यांचा प्रतिपक्ष आहे. 'अमुक एका व्यक्तीचे नीवरण नष्ट झाले आहे' असे केवळ अनुमानाने ठरवू नये; परमार्थ हा अध्यात्मात (स्वतःच्या ठिकाणी) असतो. ही 'परिवर्तना' होय। ตตฺถ กตโม เววจโน? กามจฺฉนฺโท ฉนฺทราโค เปมํ นิกนฺตีติ เววจนํ. นีวรณํ ฉทนํ อุปกฺกิเลโส ปริยุฏฺฐานนฺติ เววจนํ. त्यामध्ये 'वेवचन' (समानार्थी शब्द) म्हणजे काय? कामच्छंद, छंदराग, प्रेम आणि निकंती (आसक्ती) हे समानार्थी शब्द आहेत. नीवरण, छादन (झाकण), उपक्लेश आणि परियुट्ठान (उद्रेक) हे समानार्थी शब्द आहेत। ปญฺญตฺตีติ อวิชฺชาปจฺจยา กิจฺจปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺติ, พฺยาปาโท วิกฺเขปปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺติ, ถินมิทฺธํ อสมุคฺฆาตปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺติ. เอวํ สพฺเพปิ เอเต ปญฺจ นีวรณา อิมมฺหิ สุตฺเต วิกฺเขปปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺติ. 'प्रज्ञप्ती' (पञ्ञत्तिहार) म्हणजे: अविद्या ही कृत्य-प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त केली आहे, व्यापाद हा विक्षेप-प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त केला आहे, थिनमिद्ध हे असमुद्घात-प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त केले आहे. अशा प्रकारे हे सर्व पाचही नीवरण या सूत्रात विक्षेप-प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त केले आहेत। ตตฺถ กตโม โอตรโณ? อิเม ปญฺจ นีวรณา อวิชฺชา จ ตณฺหา จ ตตฺถ อวิชฺชามูลา นีวรณา. ยา ตณฺหา อิเม สงฺขารา, เต อวิชฺชาปจฺจยา อิเม [Pg.275] ทฺเว ธมฺมา ปญฺจสุ ขนฺเธสุ สงฺขารกฺขนฺธปริยาปนฺนา, อายตเนสุ ธมฺมายตนํ, ธาตูสุ ธมฺมธาตุ, อินฺทฺริเยสุ อิเมสํ ธมฺมานํ ปทฏฺฐานํ สุขินฺทฺริยสฺส จ โสมนสฺสินฺทฺริยสฺส จ อิตฺถินฺทฺริยสฺส จ ปุริสินฺทฺริยสฺส จ. तेथे ओतरण (अवतरण) हार कोणता? हे पाच नीवरण, अविद्या आणि तृष्णा आहेत. त्यापैकी नीवरण हे अविद्या-मूलक (अविद्येवर आधारित) आहेत. जी तृष्णा आणि हे संस्कार आहेत, ते अविद्येच्या प्रत्ययाने (कारणाने) होतात. हे दोन धर्म पाच स्कंधांपैकी संस्कारस्कंधात समाविष्ट होतात; आयतनांमध्ये ते धर्मायतन आहेत; धातूमध्ये ते धर्मधातू आहेत; आणि इंद्रियांमध्ये ते सुखेन्द्रिय, सोमनस्येन्द्रिय, इत्थीन्द्रिय (स्त्री-इंद्रिय) आणि पुरिसेन्द्रिय (पुरुष-इंद्रिय) या धर्मांचे पदस्थान (जवळचे कारण) आहेत. ตตฺถ กตโม โสธโน หาโร? อิทํ สุตฺตํ ยถา อารพฺภ นิกฺขิตฺตํ โส อตฺโถ ภาสิโต อิเมหิ ปญฺจหิ ปเทหิ. तेथे शोधन हार कोणता? हे सुत्त ज्या कारणाने आरंभ करून मांडले गेले आहे, तो अर्थ या पाच पदांद्वारे स्पष्ट केला (सांगितला) गेला आहे. ตตฺถ กามจฺฉนฺโท จ พฺยาปาโท จ วิจิกิจฺฉา จ น เอกตฺตตาย ปญฺญตฺตา, กามาติ น เอกตฺตตาย ปญฺญตฺตา, อถ ขลุ เวมตฺตตาย ปญฺญตฺตา. อยํ อธิฏฺฐาโน หาโร. तेथे कामच्छंद, व्यापाद आणि विचिकित्सा हे एकत्वाच्या (एकरूपतेच्या) रूपाने प्रज्ञप्त (व्याख्यायित) केलेले नाहीत; 'काम' हे देखील एकत्वाच्या रूपाने प्रज्ञप्त केलेले नाही, तर ते नानात्वाच्या (विविधतेच्या) रूपाने प्रज्ञप्त केले आहे. हा अधिष्ठान हार होय. ตตฺถ กตโม ปริกฺขาโร? กามจฺฉนฺทสฺส อโยนิโส มนสิกาโร สุภารมฺมณปจฺจโย; สุภนิมิตฺตญฺจ เหตุ. พฺยาปาทสฺส อโยนิโส มนสิกาโร อาฆาตวตฺถูนิ จ ปจฺจโย; ปฏิฆานุสโย เหตุ. ถินมิทฺธสฺส ปฏิสํหาโร ปจฺจโย; ปวตฺติยา กิลมถา จลนา ตญฺจ เหตุ. อุทฺธจฺจกุกฺกุจฺจสฺส รชนียํ อารมฺมณิยํ อสฺสาทิยากินฺทฺริยํ ตาว อปริปุณฺณญฺจ ญาณํ ปจฺจโย; กามสญฺญา จ ทิฏฺฐิอนุสโย จ เหตุ. วิจิกิจฺฉาย นว มานวิธา อารมฺมณํ มานานุสโย, โสว ปจฺจโย; วิจิกิจฺฉานุสโย เหตุ. เอเต ปญฺจ ธมฺมา สเหตุ สปฺปจฺจยา อุปฺปชฺชนฺติ. तेथे परिक्खार (परिकार) हार कोणता? कामच्छंदासाठी अयोनिशो मनसिकार हा शुभ-आलंबन-प्रत्यय (सुंदर विषयाचा प्रत्यय) आहे आणि शुभनिमित्त हे त्याचे हेतू (जनक कारण) आहे. व्यापादासाठी अयोनिशो मनसिकार आणि आघातवस्तू (द्वेषाचे विषय) हे प्रत्यय आहेत आणि प्रतिघानुशय हा हेतू आहे. थिनमिद्धासाठी (आळस व सुस्तीसाठी) प्रतिसंहार (संकोच/आकुंचन) हा प्रत्यय आहे; आणि प्रवृत्तीच्या वेळी होणारा थकवा व चंचलता हे हेतू आहेत. उद्धच्च-कुक्कुच्चासाठी (उद्धतपणा व पश्चात्तापासाठी) राग उत्पन्न करणारे आलंबन, आस्वाद्य इंद्रिय आणि अपरिपूर्ण ज्ञान हे प्रत्यय आहेत; आणि कामसंज्ञा व दृष्टी-अनुशय हे हेतू आहेत. विचिकित्सेसाठी नऊ प्रकारच्या मानाचे आलंबन असलेला मानानुशय हाच प्रत्यय आहे; आणि विचिकित्सानुशय हा हेतू आहे. हे पाच धर्म सहेतुक आणि सप्रत्यय (कारणांसह) उत्पन्न होतात. ตตฺถ กตโม สมาโรปโน หาโร? อิเม ปญฺจ นีวรณา จตฺตาโรปิ เอเต อาสวา คณฺฑาปิ เอเต สลฺลาปิ เอเต อุปาทานานิ เอเต. เตสุ เอว พาหิเรสุ ธมฺเมสุ สํกิเลสภาคิยํ สุตฺตนฺติ ปญฺญตฺตึ คจฺฉติ. อยํ สมาโรปโน หาโร. तेथे समारोपण हार कोणता? हे पाच नीवरण, हे चार आसव, हेच गंड (गळू), हेच शल्य (बाण) आणि हेच उपादान आहेत. त्या बाह्य धर्मांमध्येच 'संक्लेशभागीय सुत्त' अशी प्रज्ञप्ती होते. हा समारोपण हार होय. นิทฺทิฏฺฐํ สํกิเลสิกภาคิยํ สุตฺตํ. संक्लेशिकभागीय सुत्त निर्दिष्ट (स्पष्ट) केले गेले. ๘๓. มโนปุพฺพงฺคมา ธมฺมาติ คาถา. ८३. 'मनोपुब्बङ्गमा धम्मा' (मन सर्व धर्मांचे पूर्वगामी आहे) ही गाथा आहे. ตตฺถ กตโม เทสนา หาโร? อิมมฺหิ สุตฺเต โก อตฺโถ ขนฺธววตฺถาเนน วิญฺญาณกฺขนฺธํ เทเสติ, ธาตุววตฺถาเนน มโนวิญฺญาณธาตุํ, อายตนววตฺถาเนน มนายตนํ, อินฺทฺริยววตฺถาเนน มนินฺทฺริยํ. ตสฺส กึ ปุพฺพงฺคมา ธมฺมา? สํขิตฺเตน ฉ ธมฺมา ปุพฺพงฺคมา ธมฺมา กุสลมูลานิ จ อกุสลมูลานิ จ อนิมิตฺตํ อิมมฺหิ สุตฺเต กุสลมูลํ เทสิตํ. ตตฺถ กตมา มโนปุพฺพงฺคมา ธมฺมา? มโน เตสํ ปุพฺพงฺคมํ, ยถาปิ พลสฺส ราชา ปุพฺพงฺคโม, เอวเมว [Pg.276] ธมฺมานํ มโนปุพฺพงฺคมา. ตตฺถ ติวิธานํ ปุพฺพงฺคมานํ เนกฺขมฺมจฺฉนฺเทน อพฺยาปาทจฺฉนฺเทน อวิหึสาฉนฺเทน. อโลภสฺส เนกฺขมฺมจฺฉนฺเทน ปุพฺพงฺคมา. อโทสสฺส อพฺยาปาทจฺฉนฺเทน ปุพฺพงฺคมา. อโมหสฺส อวิหึสาฉนฺเทน ปุพฺพงฺคมา. ตตฺถ มโนเสฏฺฐาติ มนสา อิเม ธมฺมา อุสฺสฏา มเนน วา นิมฺมิตา. มโนว อิเมสํ ธมฺมานํ เสฏฺโฐติ มโนว อิเมสํ ธมฺมานํ เสฏฺฐเชฏฺโฐติ มโนว อิเมสํ ธมฺมานํ อาธิปจฺจํ กโรตีติ มโนเสฏฺฐา. มโนชวาติ ยตฺถ มโน คจฺฉติ. ตตฺถ อิเม ธมฺมา คจฺฉนฺตีติ มโนชวา. ยถา วาโต สีฆํ คจฺฉติ อญฺโญ วา โกจิ สีฆํ คามโก วุจฺจเต วาตชโวติ ปกฺขิคามิโกติ, เอวเมว อิเม ธมฺมา มเนน สมฺปชายมานา คจฺฉนฺติ, ตตฺถ อิเม ธมฺมา คจฺฉนฺตีติ มโนชวาติ. เต ติวิธา ฉนฺทสมุทานิตา อนาวิลตา จ สงฺกปฺโป. สตฺตวิธา จ กายิกํ สุจริตํ วาจสิกํ สุจริตํ, เต ทส กุสลกมฺมปถา. ตตฺถ มนสา เจ ปสนฺเนนาติ มโนกมฺมํ. ภาสติ วาติ วจีกมฺมํ. กโรติ วาติ กายกมฺมํ. อิเมหิ อิมสฺมึ สุตฺเต ทส กุสลกมฺมปถา ปรมาปิ สนฺตา สีลวตา ปรมา. โส ภวติ วิวตฺติยํ น โลกนิยฺยานาย วาสนาภาคิยํ สุตฺตํ ภวติ. อยํ เทสนา. तेथे देसना (देशना) हार कोणता? या सुत्तात काय अर्थ आहे? स्कंध-व्यवस्थापनाने (स्कंधांच्या वर्गीकरणाने) भगवान विज्ञाणस्कंधाची (विज्ञानस्कंधाची) देशना करतात; धातू-व्यवस्थापनाने मनोविज्ञाणधातूची (विज्ञानधातूची) देशना करतात; आयतन-व्यवस्थापनाने मनायतनाची देशना करतात; इंद्रिय-व्यवस्थापनाने मनिंद्रियाची देशना करतात. त्याचे पूर्वगामी धर्म कोणते? संक्षेपाने सहा धर्म हे पूर्वगामी धर्म आहेत—कुशलमुळे आणि अकुशलमुळे. या सुत्तात अकारण (अनिमित्त) कुशलमुळाची देशना केली आहे. तेथे 'मनोपुब्बङ्गमा धम्मा' (मन सर्व धर्मांचे पूर्वगामी आहे) म्हणजे कोणते धर्म? मन हे त्यांचे पूर्वगामी आहे; ज्याप्रमाणे सैन्यामध्ये राजा पूर्वगामी (प्रमुख) असतो, त्याचप्रमाणे धर्मांमध्ये मन पूर्वगामी असते. तेथे तीन प्रकारच्या पूर्वगामींमध्ये—नैष्क्रम्य-छंदाने, अव्यापाद-छंदाने आणि अविहिंसा-छंदाने. अलोभाचे नैष्क्रम्य-छंदाने पूर्वगामीत्व असते. अद्वेषाचे (अदोसाचे) अव्यापाद-छंदाने पूर्वगामीत्व असते. अमोहाचे अविहिंसा-छंदाने पूर्वगामीत्व असते. तेथे 'मनोसेट्ठा' (मन श्रेष्ठ आहे) म्हणजे मनाने हे धर्म उंचावले जातात किंवा मनानेच निर्माण केले जातात. मनच या धर्मांमध्ये श्रेष्ठ आहे, मनच या धर्मांमध्ये श्रेष्ठ व ज्येष्ठ आहे, मनच या धर्मांवर अधिपत्य गाजवते, म्हणून 'मनोसेट्ठा' म्हटले आहे. 'मनोजवा' (मनोवेगवान) म्हणजे जिथे मन जाते, तिथे हे धर्म जातात, म्हणून 'मनोजवा' म्हटले आहे. किंवा ज्याप्रमाणे वारा वेगाने वाहतो किंवा इतर कोणी वेगाने जाणारा असेल तर त्याला 'वातजवा' (वाऱ्यासारखा वेगवान) किंवा 'पक्खिजवा' (पक्ष्यासारखा वेगवान) म्हटले जाते, त्याचप्रमाणे हे धर्म मनाद्वारे चांगल्या प्रकारे उत्पन्न होऊन (मनासोबतच) जातात; तिथे हे धर्म जातात म्हणूनंना 'मनोजवा' असे म्हटले जाते. ते तीन प्रकारचे आहेत—छंद-समुत्थित (इच्छेने उत्पन्न झालेले), अनाविलता (प्रसन्नता/स्वच्छता) आणि संकल्प. आणि सात प्रकारचे कायिक सुचरित व वाचिक सुचरित आहेत; ते दहा कुशलकर्मपथ आहेत. तेथे 'मनसा चे पसन्नेन' (प्रसन्न मनाने) म्हणजे मनोकर्म होय. 'भासति वा' (बोलतो) म्हणजे वचीकर्म (वाणीचे कर्म) होय. 'करोति वा' (करतो) म्हणजे कायकर्म (शारीरिक कर्म) होय. या कर्मांद्वारे या सुत्तात दहा कुशलकर्मपथ श्रेष्ठ असूनही, शीलवानासाठी ते श्रेष्ठ ठरतात. ते विवृत्तीमध्ये (संसारचक्रातून बाहेर पडण्यासाठी) कारणीभूत ठरतात, परंतु लोकोत्तर मुक्तीसाठी (लोकनिर्वाणासाठी) ते वासनाभागीय सुत्त ठरत नाही. ही देसना (देशना) होय. ตตฺถ กตโม วิจโย หาโร? มโนปุพฺพงฺคมา ธมฺมาติ กุสลมูลานิ จ อฏฺฐงฺคสมฺมตฺตานิ. อิทํ สุตฺตํ. तेथे विचय हार कोणता? 'मनोपुब्बङ्गमा धम्मा' म्हणजे कुशलमुळे आणि अष्टांगिक सम्यक्त्व (आठ सम्यक् मार्ग) होय. हे सुत्त आहे. ยุตฺตีติ ทสนฺนํ กุสลกมฺมปถานํ โย วิปาโก, โส สุขเวทนีโย อพฺยาปาทสฺสงฺคมาโน. ฉายาว อนปายินีติ อนุคจฺฉติ อตฺถิ เอสา ยุตฺติ. 'युत्ती' (युक्ती हार) म्हणजे दहा कुशलकर्मपथांचा जो विपाक (परिणाम) आहे, तो अव्यापादाशी सुसंगत असून सुखद वेदना देणारा असतो. 'छायाव अनपायिनी' (कधीही सोडून न जाणारी सावली) म्हणजे ती मागे मागे जाते. ही युत्ती होय. ปทฏฺฐานนฺติ อฏฺฐารสนฺนํ มโนปวิจารานํ ปทฏฺฐานํ. มโนปุพฺพงฺคมา ธมฺมาติ สพฺพกุสลปกฺขสฺส อิเม ธมฺมา ปทฏฺฐานํ. มนสา เจ ปสนฺเนนาติ โย เจตโส ปสาโท, อิทํ สทฺธินฺทฺริยสฺส ปทฏฺฐานํ. ภาสติ วาติ สมฺมาวาจาย. กโรติ วาติ สมฺมากมฺมนฺตสฺส จ สมฺมาวายามสฺส จ ปทฏฺฐานํ. 'पदट्ठान' (पदस्थान हार) म्हणजे अठरा मनोपविचारांचे पदस्थान (जवळचे कारण) होय. 'मनोपुब्बङ्गमा धम्मा' म्हणजे सर्व कुशल पक्षांचे हे धर्म पदस्थान आहेत. 'मनसा चे पसन्नेन' म्हणजे मनाची जी प्रसन्नता आहे, ते सद्धिंद्रियाचे (श्रद्धेंद्रियाचे) पदस्थान आहे. 'भासति वा' हे सम्यक् वाचेचे पदस्थान आहे. 'करोति वा' हे सम्यक् कर्मांत आणि सम्यक् व्यायामाचे पदस्थान आहे. ลกฺขโณติ อิติ ปุพฺพงฺคมา ธมฺมาติ เวทนาปุพฺพงฺคมาปิ เอเต, สญฺญาปุพฺพงฺคมาปิ เอเต, สงฺขารปุพฺพงฺคมาปิ เอเต. เย เกจิ ธมฺมา สหชาตา สพฺเพ ปุพฺพงฺคมา เอเตสํ ธมฺมานํ. ตโต นํ สุขมนฺเวตีติ โสมนสฺสมปิ นํ อนฺเวติ ยํ สุสุขจฺฉายา ตทาปิ นํ สุขํ ตทปิ อนฺเวติ. 'लक्खण' (लक्षण हार) म्हणजे—अशा प्रकारे 'पूर्वगामी धर्म' म्हटले असता, हे वेदना-पूर्वगामी देखील आहेत, संज्ञा-पूर्वगामी देखील आहेत आणि संस्कार-पूर्वगामी देखील आहेत. जे काही सहजात (एकत्र उत्पन्न होणारे) धर्म आहेत, ते सर्व या धर्मांचे पूर्वगामी आहेत. 'ततो नं सुखमन्वेति' (त्यामुळे सुख त्याच्या मागे जाते) म्हणजे सोमनस्य (आनंद) देखील त्याच्या मागे जातो; जी अत्यंत सुखद सावली आहे, ते सुख देखील त्याच्या मागे मागे जाते. ๘๔. ตตฺถ [Pg.277] กตโม จตุพฺยูโห หาโร? มโนปุพฺพงฺคมาติ น อิทํ เอกาทิวจนํ. กึ การณา? สพฺเพ เยว อิเม ฉวิญฺญาณกายา, อิมมฺหิ ภควโต โก อธิปฺปาโย? เย สุเขน อตฺถิกา, เต มนํ ปสาเทนฺตีติ อยํ อิมมฺหิ สุตฺเต ภควโต อธิปฺปาโย. อตฺโถ ปุพฺเพเยว นิทฺทิฏฺโฐ. ८४. तेथे चतुब्यूह (चतुर्व्यूह) हार कोणता? 'मनोपुब्बङ्गमा' हे केवळ एकवचन इत्यादी नाही. काय कारण आहे? हे सर्व सहा विज्ञानकाय आहेत. या सुत्तात भगवंतांचा काय अभिप्राय आहे? 'ज्यांना सुखाची इच्छा आहे, त्यांनी आपले मन प्रसन्न करावे'—हा या सुत्तात भगवंतांचा अभिप्राय आहे. अर्थ पूर्वीच स्पष्ट केला आहे. ยานิ หิ กุสลมูลานิ, ตานิ อฏฺฐานิสํสมตฺตา เหตุ, อยํ อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค. ทส ฐานานิ เทสนาเหตูนิ เทสนาปจฺจยา นิทฺเทสนา จ. ตตฺถ ยํ มญฺเญ ทุกฺเขน สห นามรูปํ วิญฺญาณสจฺจนฺติ องฺเคน กุสลมูลํ ปหียติ, อยํ อปฺปหีนภูมิยํ สมุทโย. ยํ เตสํ ปหานา, อยํ นิโรโธ. อิมานิ จตฺตาริ สจฺจานิ. อยํ อาวฏฺโฏ หาโร. कारण जी कुशलमुळे आहेत, ती आठ प्रकारच्या शंसांनी (फलांनी) युक्त असलेला हेतू आहेत, हा अष्टांगिक मार्ग होय. दहा स्थाने हे देशनेचे हेतू आणि देशनेचे प्रत्यय दर्शवणारे आहेत. तेथे 'दुःखासह नामरूप आणि विज्ञान हे सत्य आहे' असे मानून ज्या अंगाने कुशलमूळ प्रहीन (नष्ट) केले जाते, तो अप्रहीन भूमीतील 'समुदय' (समुदय सत्य) होय. त्यांचा जो प्रहाण (नाश) आहे, तो 'निरोध' (निरोध सत्य) होय. ही चार सत्ये आहेत. हा आवट्ट (आवर्त) हार होय. วิภตฺตีติ – विभत्ती (विभक्ती हार) म्हणजे – มโนปุพฺพงฺคมา ธมฺมา, มโนเสฏฺฐา มโนมยา; มนสา เจ ปสนฺเนน, ภาสติ วา กโรติ วา; ตโต นํ สุขมนฺเวติ, ฉายาว อนปายินีติ. मन सर्व धर्मांचे पूर्वगामी आहे, मन श्रेष्ठ आहे, सर्व धर्म मनोमय आहेत; जर कोणी प्रसन्न मनाने बोलतो किंवा कार्य करतो, तर सुख त्याच्या मागे जाते, ज्याप्रमाणे कधीही सोडून न जाणारी सावली मागे जाते. ตํ น เอกํเสน สมณสฺส วา พฺราหฺมณสฺส วา ปน โหติ. ตสฺส วา มิจฺฉาทิฏฺฐิกสฺส สกสตฺเถ จิตฺตํ ปสาเทติ, เตน จ ปสนฺเนน จิตฺเตน ภาสติ พฺยากโรติ น ตํ สุขมนฺเวติ น ฉายาว อนุคามินี, ทุกฺขเมว ตํ อนฺเวติ. ยถา วหนฺตํ จกฺกํ ปทมนฺเวติ, อิทํ ตํ วิภชฺชพฺยากรณียํ. มนสา เจ ปสนฺเนน กายกมฺมํ วจีกมฺมํ สุขเวทนียนฺติ สมคฺคเต สุขเวทนียํ มิจฺฉคฺคเต ทุกฺขเวทนียํ, อยํ วิภตฺติ. ते निश्चितपणे श्रमणाला किंवा ब्राह्मणाला लागू होत नाही. त्या मिथ्यादृष्टी व्यक्तीच्या स्वतःच्या सिद्धांतावर (मतावर) चित्त प्रसन्न होते, आणि त्या प्रसन्न चित्ताने तो बोलतो किंवा स्पष्ट करतो, तेव्हा सुख त्याच्या मागे जात नाही, जसे की सोबत न जाणारी सावली; तर दुःखच त्याच्या मागे जाते. ज्याप्रमाणे ओझे वाहणाऱ्या बैलाच्या पावलांच्या मागे चाक जाते, हे 'विभज्जव्याकरणीय' (विभाजन करून उत्तर देण्याजोगे) आहे. जर प्रसन्न मनाने कायकर्म आणि वचीकर्म केले, तर ते सुखद वेदना देणारे होते; सम्यक् मार्गाने गेलेल्या कर्मात सुखद वेदना मिळते आणि मिथ्या मार्गाने गेलेल्या कर्मात दुःखद वेदना मिळते, ही 'विभत्ती' (विभक्ति हार) आहे. ตตฺถ กตโม ปริวตฺตโน หาโร? มโนปุพฺพงฺคมา ธมฺมาติ ยํ มนสา ปทุฏฺเฐน ภาสติ วา กโรติ วา ทุกฺขมสฺสานุคามินี, เอตานิเยว ทฺเว สุตฺตานิ ภาสิตานิ เอส เอว จ ปฏิปกฺโข. เววจนนฺติ ยทิทํ มโนจิตฺตํ วิญฺญาณํ มนินฺทฺริยํ มโนวิญฺญาณธาตุ. त्या हारांमध्ये 'परिवत्त हार' (परिवर्तन हार) कोणता आहे? 'मनोपुब्बङ्गमा धम्मा' (सर्व धर्मांमध्ये मन अग्रगामी आहे) म्हणजे जेव्हा माणूस दूषित मनाने बोलतो किंवा कृती करतो, तेव्हा दुःख त्याच्या मागे जाते. हे दोनच सुत्त सांगितले आहेत आणि हाच त्याचा प्रतिपक्ष (विरुद्ध बाजू) आहे. 'वेवचन' (पर्यायवाची हार) म्हणजे जे हे मन, चित्त, विञ्ञाण (विज्ञान), मनिन्द्रिय आणि मनोविञ्ञाणधातु आहेत. ปญฺญตฺตีติ มโนปุพฺพงฺคมา ธมฺมาติ อยํ มโน กิญฺจิ ปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ. ธมฺมาติ กุสลกมฺมปถปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ. มโนเสฏฺฐาติ วิสิฏฺฐปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ. มโนชวาติ สหปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ. จิตฺตนฺติ เนกฺขมฺมปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ. มนสา เจ ปสนฺเนนาติ สทฺธินฺทฺริยปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ. มนสา เจ ปสนฺเนนาติ อนาวิลสงฺกปฺปทุติยชฺฌานปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ. มนสา เจ ปสนฺเนนาติ [Pg.278] อสฺสทฺธานํ ปฏิปกฺขปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ. ภาสติ วาติ สมฺมาวาจาปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ. กโรติ วาติ สมฺมากมฺมนฺตปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ. ตโต นํ สุขมนฺเวตีติ ฌานสมาธานํ. อินฺทฺริเยสุ มนินฺทฺริยํ. ปฏิจฺจสมุปฺปาเท วิญฺญาณํ. มโนปุพฺพงฺคมา ธมฺมาติ เมตฺตา จ มุทุตา จ ฌาเนสุ ทุติยํ ฌานํ ตติยญฺจ. ขนฺเธสุ สงฺขารกฺขนฺธปริยาปนฺโน. ธาตูสุ ธมฺมธาตุ, อายตเนสุ ธมฺมายตนํ. ยํ กุสลํ อินฺทฺริเยสุ สุขินฺทฺริยญฺจ โสมนสฺสินฺทฺริยญฺจ ปทฏฺฐานํ. อิเมสํ ธมฺมานํ ปฏิจฺจสมุปฺปนฺนานํ ผสฺสปจฺจยา สุขเวทนีโย ผสฺโส สุขเวทนา มโนปวิจาเรสุ โสมนสฺสวิจาโร ฉตฺตึเสสุ ปฐมปเทสุ ฉ โสมนสฺสเนกฺขมฺมสฺสิตา. อิติ อยํ โอตรโณ หาโร. 'पञ्ञत्ति' (प्रज्ञप्ति हार) म्हणजे: 'मनोपुब्बङ्गमा धम्मा' या पदात हे मन काही प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त (स्पष्ट) केले आहे. 'धम्मा' म्हणजे कुशल कर्मपथ प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त केले आहे. 'मनोसेट्ठा' म्हणजे विशिष्ट प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त केले आहे. 'मनोजवा' म्हणजे सह-प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त केले आहे. 'चित्तं' म्हणजे नैष्क्रम्य (नेक्खम्म) प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त केले आहे. 'मनसा चे पसन्नेन' म्हणजे सद्धिन्द्रिय (श्रद्धेंद्रिय) प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त केले आहे. 'मनसा चे पसन्नेन' म्हणजे अनाविल संकल्प (कलुषित नसलेला संकल्प) आणि द्वितीय ध्यान प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त केले आहे. 'मनसा चे पसन्नेन' म्हणजे अश्रद्धाळू लोकांच्या प्रतिपक्ष प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त केले आहे. 'भासति वा' म्हणजे सम्मावाचा (सम्यक् वाचा) प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त केले आहे. 'करोति वा' म्हणजे सम्माकम्मन्त (सम्यक् कर्मान्त) प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त केले आहे. 'ततो नं सुखमन्वेति' म्हणजे ध्यान-समाधान प्रज्ञप्त केले आहे. इंद्रियांमध्ये मनिन्द्रिय आहे. प्रतीत्यसमुत्पादामध्ये विञ्ञाण (विज्ञान) आहे. 'मनोपुब्बङ्गमा धम्मा' म्हणजे मैत्री आणि मुदुता (मृदुता) आहे; ध्यानांमध्ये द्वितीय ध्यान आणि तृतीय ध्यान आहे. स्कंधांमध्ये संस्कारस्कंधात समाविष्ट आहे. धातूंमध्ये धम्मधातु आहे, आयतनांमध्ये धम्मायतन आहे. जे कुशल आहे, ते इंद्रियांमध्ये सुखिन्द्रिय आणि सोमनस्सिन्द्रिय आहे, जे जवळचे कारण (पदस्थान) आहे. प्रतीत्यसमुत्पन्न झालेल्या या धर्मांमध्ये फस्स (स्पर्श) प्रत्ययामुळे सुखद वेदना देणारा फस्स आहे, सुखद वेदना आहे, मन आहे; सविचार चित्तांमध्ये सोमनस्ययुक्त विचार आहे; छत्तीस प्रथम पदांमध्ये सहा पदे सोमनस्ययुक्त नैष्क्रम्यावर आश्रित आहेत. हा असा 'ओतरण हार' (अवतरण हार) आहे. ตตฺถ กตโม โสธโน หาโร? ยํ อตฺถํ อารพฺภ อิทํ สุตฺตํ ภาสิตํ. โส อตฺโถ นิยุตฺโต เอตมตฺถํ อารพฺภ สุตฺตํ. อยํ โสธโน หาโร. त्या हारांमध्ये 'शोधन हार' कोणता आहे? ज्या अर्थाला उद्देशून हे सुत्त सांगितले आहे, तो अर्थ जोडला गेला आहे; या अर्थाला उद्देशून सुत्त सांगितले आहे. हा 'शोधन हार' आहे. ๘๕. ตตฺถ กตโม อธิฏฺฐาโน หาโร? มโนปุพฺพงฺคมา ธมฺมาติ เววจนปญฺญตฺติ, น เอกตฺตปญฺญตฺติ. ธมฺมาติ เอกโต น เววจนปญฺญตฺติ. มนสา เจ ปสนฺเนนาติ โส ปสาโท ทฺวิโธ อชฺฌตฺตญฺจ อพฺยาปาทาวิกฺขมฺภนพหิทฺธา จ โอกปฺปนโต. โส อชฺฌตฺตปสาโท ทฺวิโธ. สมุคฺฆาตปสาโท จ วิกฺขมฺภนปสาโท จ พฺยาปาทปริยุฏฺฐานํ. วิฆาโต น มูลปสาโท ชาตมูลมฺปิ วา. ปสาโท สพฺยาปาทํ วิฆาเตน. ตโต นํ สุขมนฺเวตีติ สุขํ กายิกญฺจ เจตสิกญฺจ อปฺปิยวิปฺปโยโคปิ ปิยสมฺปโยโคปิ เนกฺขมฺมสุขมฺปิ ปุถุชฺชนสุขมฺปิ ปีติสมฺโพชฺฌงฺคมฺปิ เจตสิกํ สุขํ. ยมฺปิ ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวเทติ, ตมฺปิ กายิกํ สุขํ โพชฺฌงฺคา จ เจตสิกํ สุขํ. ยมฺปิ ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวเทสิ, ตมฺปิ ตญฺจ สุขปทฏฺฐานํ ปญฺญตฺติยา ยถาวุตฺตํ ตํ อปรามฏฺฐํ กุสลานํ ธมฺมานํ. อนฺเวตีติ อปฺปนา สนฺทิสฺสติ น จายํ วา ปตฺตภูโต อนฺเวติ. ตทิทํ สุตฺตํ ทฺวีหิ อากาเรหิ อธิฏฺฐาตพฺพํ. เหตุนา จ โย ปสนฺนมานโส วิปาเกน จ โย ทุกฺขเวทนีโย. ८५. त्या हारांमध्ये 'अधिष्ठान हार' कोणता आहे? 'मनोपुब्बङ्गमा धम्मा' ही वेवचन प्रज्ञप्ति (पर्यायवाची प्रज्ञप्ति) आहे, एकार्थ प्रज्ञप्ति नाही. 'धम्मा' ही एकत्व प्रज्ञप्ति आहे, वेवचन प्रज्ञप्ति नाही. 'मनसा चे पसन्नेन' म्हणजे ती प्रसन्नता दोन प्रकारची आहे: अंतर्गत (अध्यात्म) आणि अद्वेष (अव्यापाद) विक्षेपापासून मुक्त बाह्य, दृढ विश्वासाने. ती अंतर्गत प्रसन्नता दोन प्रकारची आहे: समूद्घात प्रसन्नता (समूळ नष्ट करणारी प्रसन्नता) आणि विष्कंभन प्रसन्नता (दडपून टाकणारी प्रसन्नता), जी द्वेषाच्या उद्रेकाला दडपते. नष्ट झालेली प्रसन्नता ही मूळ प्रसन्नता नाही, किंवा ती उत्पन्न झालेले मूळही नाही. द्वेषयुक्त धर्माला नष्ट केल्याने होणारी प्रसन्नता म्हणजे प्रसन्नता होय. 'ततो नं सुखमन्वेति' म्हणजे सुख हे कायिक (शारीरिक) आणि चैतसिक (मानसिक) आहे; अप्रियांचा वियोग देखील, प्रियांचा संयोग देखील, नैष्क्रम्य सुख देखील, पृथग्जनांचे सुख देखील, पीति-संबोज्झङ्ग देखील चैतसिक सुख आहे. शांत शरीर असलेला मनुष्य जे सुख अनुभवतो, ते देखील कायिक सुख आहे आणि बोध्यंग देखील चैतसिक सुख आहे. शांत शरीर असलेला मनुष्य जे सुख अनुभवतो, ते देखील आणि ते शांत शरीर देखील सुखाचे जवळचे कारण (पदस्थान) आहे, प्रज्ञप्तीमध्ये सांगितल्याप्रमाणे ते कुशल धर्मांचे अपरामृष्ट (आसक्ती नसलेले) रूप आहे. 'अन्वेति' म्हणजे अर्पणा दिसून येते, आणि हे प्राप्त झालेले असूनही मागे जात नाही. ते हे सुत्त दोन प्रकारांनी अधिष्ठित केले पाहिजे: कारणाने देखील, जो प्रसन्न मनाचा आहे, आणि विपाकाने (परिणामाने) देखील, जो दुःखद वेदना देणारा आहे. ปริกฺขาโรติ ภควา ปญฺจสเตน ภิกฺขุสงฺเฆน นครํ ปวิสติ ราชคหํ. ตตฺถ มนุสฺโส ปุคฺคโล ภควนฺตํ ปริวิสติ, ตสฺส ปสาโท อุปฺปนฺโน กุสลมูลปุพฺพโยคาวจโรปิ. โส อญฺเญสญฺจ อกฺขาติ, อิทํ วาจํ ภาสติ [Pg.279] ลาภา เตสํ, เยสํ นิเวสนํ ภควา ปวิสติ, อมฺหากมฺปิ ยทิ ภเวยฺย มยมฺปิ ภควโต สํปสาทํ ลจฺฉมฺหาติ. เยน ภควา เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา ‘‘นโม ภควโต นโม ภควโต’’ติ อพฺยาปาทมาโน เอกมนฺเต อฏฺฐาสิ. ตทนนฺตเร ภควา อิมํ สุตฺตํ อภาสิตฺถ ‘‘มโนปุพฺพงฺคมา ธมฺมา’’ติ. สพฺพํ สุตฺตํ ตถา ยํ ปเรสํ ภาสติ อิทํ วาจากมฺมํ. ยํ อญฺชลึ ปณาเมติ, อิทํ กายกมฺมํ. โย มโนปสาโท, อิทํ มโนกมฺมํ. ตตฺถ ยํ ปเรสํ ปกาเสติ ภาสติ วณฺณํ. เยสํ ภควา นิเวสนํ คจฺฉตีติ. สพฺพํ ตสฺส อโลโภ กุสลมูลํ. ยํ ภควติ เมตฺตจิตฺโต, ตสฺส อโทโส กุสลมูลํ. ยํ อญฺชลึ ปณาเมติ มานญฺจ นิคฺคณฺหาติ, ตตฺถสฺส อโมโห กุสลมูลํ ปาตุภวติ. ยํ อุฬารปญฺญํ ปฏิลภติ, อิทมสฺส ทิฏฺฐิวิปลฺลาสปฺปหานํ. ยํ ตถาเยว สํวโร โหติ, อิทมสฺส สญฺญาวิปลฺลาสปฺปหานํ. ยํ มนสฺส ปสาทนํ, อิทมสฺส จิตฺตวิปลฺลาสปฺปหานนฺติ อกุสลวิปลฺลาสานํ วิกฺขมฺภนํ ปหานํ ปจฺจโย. ตีณิ กุสลมูลานิ โย อนาวิลจิตฺตสงฺกปฺโป, โส ตสฺส มนสิกาโรติ วุจฺจติ. ยํ กิเลเสหิ วิกฺขมฺภนํ อิติ วิปลฺลาสา จ อารมฺมณา สปฺปจฺจยตาย ปจฺจโย กุสลมูลานิ จ สนฺทิสฺสยตาย ปจฺจโย, โส จ มนสิกาโร เหตุนา อิมินา ปจฺจเยน จิตฺตํ อุปฺปนฺนํ. ตตฺถ ยํ สสตฺถารมฺมณํ จิตฺตํ ปวตฺตํ อยํ พุทฺธานุสฺสติ. ยมฺปิ ภควโต คุเณ มนสิ กโรติ, อยมสฺส ธมฺมานุสฺสติ. ตตฺถ สติสมฺปชญฺญํ เหตุ, อยญฺจ ปจฺจโย. วาจา ปญฺญา เหตุ วิตกฺกวิจารา ปจฺจโย. กายสงฺขารา กมฺมสฺส อภิสงฺขาโร นาม เหตุ วา อปฺปจฺจโย สุขเวทนียสฺส กมฺมสฺส อุปจโย เหตุกา กมฺมสฺส ปจฺจโย. 'परिक्खार' (परिकार हार) म्हणजे: भगवान पाचशे भिक्खूंच्या संघासह राजगृह नगरात प्रवेश करतात. तेथे एक मनुष्य भगवंतांची सेवा करतो, त्याची श्रद्धा (प्रसन्नता) उत्पन्न होते; पूर्वजन्मीच्या कुशलमुळांचा अभ्यास असलेला तो योगी देखील तेथे असतो. तो इतरांना देखील सांगतो आणि हे वचन बोलतो: 'त्यांचा मोठा लाभ आहे, ज्यांच्या घरी भगवान प्रवेश करतात. जर आमच्या घरी देखील भगवान आले असते, तर आम्ही देखील भगवंतांविषयी परम श्रद्धा (प्रसन्नता) प्राप्त केली असती.' जेथे भगवान होते, तेथे हात जोडून (अंजली जोडून) 'नमो भगवतो नमो भगवतो' असे म्हणत, अद्वेषी मनाने तो एका बाजूला उभा राहिला. त्यानंतर लगेचच भगवंतांनी हे सुत्त सांगितले: 'मनोपुब्बङ्गमा धम्मा' (सर्व धर्मांमध्ये मन अग्रगामी आहे). संपूर्ण सुत्त त्याचप्रमाणे आहे. जे इतरांना सांगितले जाते, ते वचीकर्म (वाणीचे कर्म) आहे. जे हात जोडले जातात, ते कायकर्म (शारीरिक कर्म) आहे. जी मनाची प्रसन्नता आहे, ते मनोकर्म (मानसिक कर्म) आहे. त्या कर्मांमध्ये, जे इतरांना भगवंतांचे गुण प्रकट केले जातात आणि सांगितले जातात, जसे की 'ज्यांच्या घरी भगवान जातात', त्या सर्व कर्मांमध्ये त्याचे अलोभ हे कुशलमूळ आहे. जे भगवंतांविषयी मैत्रीपूर्ण चित्त आहे, त्याचे अद्वेष हे कुशलमूळ आहे. जे हात जोडले जातात आणि मानाचे (अहंकाराचे) दमन केले जाते, तेथे त्याचे अमोह हे कुशलमूळ प्रकट होते. जी श्रेष्ठ प्रज्ञा तो प्राप्त करतो, हे त्याचे 'दृष्टिविपर्यास-प्रहाण' (दृष्टीच्या भ्रमाचा त्याग) आहे. त्याचप्रमाणे जे संवर (संयम) होतो, हे त्याचे 'संज्ञाविपर्यास-प्रहाण' (संज्ञेच्या भ्रमाचा त्याग) आहे. जी मनाची प्रसन्नता आहे, हे त्याचे 'चित्तविपर्यास-प्रहाण' (चित्ताच्या भ्रमाचा त्याग) आहे; अशा प्रकारे अकुशल विपर्यासांचे विक्षेपण आणि प्रहाण हे त्याचे प्रत्यय (कारण) आहे. तीन कुशलमुळे आणि जो अनाविल चित्तसंकल्प आहे, त्याला त्याचा 'मनसिकार' (मनन) असे म्हटले जाते. क्लेशांपासून जे विक्षेपण होते आणि हे विपर्यास देखील आलंबन प्रत्ययत्वामुळे प्रत्यय (कारण) आहेत, आणि कुशलमुळे देखील स्पष्टपणे दिसून येत असल्यामुळे प्रत्यय आहेत; आणि तो मनसिकार देखील जनक हेतू आणि या उपनिषय प्रत्ययामुळे चित्त उत्पन्न झाले आहे. तेथे शास्त्यांचे (बुद्धांचे) आलंबन असलेले जे चित्त प्रवृत्त होते, ती 'बुद्धानुस्मृती' (बुद्धानुस्सति) आहे. भगवंतांच्या गुणांचे जे मनन करतो, ती त्याची 'धम्मानुस्मृती' (धम्मानुस्सति) आहे. तेथे सति-संपजन्य हा हेतू आहे आणि हाच प्रत्यय आहे. वाणी आणि प्रज्ञा हा हेतू आहे, वितर्क आणि विचार हा प्रत्यय आहे. कायसंस्कार हे कर्माचा अभिसंस्कार नावाचा हेतू किंवा अप्रत्यय आहे; सुखद वेदना देणाऱ्या कर्माचा उपचय (संचय) हा हेतू आहे आणि कर्माचा प्रत्यय आहे. ๘๖. ตตฺถ กตโม สมาโรปโน หาโร? มนสาเยว ปสนฺเนน สโตเยเวตฺถ ปสนฺโน อปิ จ จิตฺตโวทานา สตฺตา วิมุจฺจนฺตีติ เตน สตฺตา จิตฺตปุพฺพงฺคมา จิตฺเตน ปสนฺเนน เจตนาปิ ตตฺถ จิตฺตภูตา ภวนฺตีติ ปฏิฆา อยํ เจตนานํ ปสาเทน กาโย จสฺส ปสาโท, โส จ อารภติ ปสาเทน ปสนฺโน สญฺญานนฺติ จสฺส อวิปรีตา, โส ปญฺจวิโธ วิกฺขมฺภนา, กายปสฺสมฺภนาเยวา ปสาโท จิตฺตสิโต จิตฺตํ ปน ปุพฺพํเยว ปสนฺนํ. อยํ สมาโรปนา. เอวํ ปญฺจนฺนมฺปิ ปสาโท. ตโต นํ สุขมนฺเวตีติ กตมํ ภควา นิทฺทิสติ? น หิ อตฺตสจฺจํ ตสฺส กมฺมสฺส วิปาโก อนฺเวติ. ตสฺส อุปาโย อนุคจฺฉติ ยทา สิตปจฺจยา อุปฺปชฺชเต [Pg.280] โสมนสฺสํ อวิปฺปฏิสาโรปิ อนฺเวติ. อยํ สมาโรปโน หาโร. ८६. त्या हारांमध्ये समारोपन हार कोणता आहे? प्रसन्न चित्तानेच आणि स्मृतिमान राहूनच या त्रिरत्नांमध्ये प्रसन्न होतो. आणखी असे की, चित्ताच्या विशुद्धीमुळे प्राणी क्लेशांपासून मुक्त होतात; म्हणून प्राणी चित्तपूर्वंगम असतात. प्रसन्न चित्ताने चेतना सुद्धा तिथे चित्तस्वरूप होऊन उत्पन्न होते. म्हणून क्रोधापासून चेतनांच्या निर्मळतेमुळे त्याचा हा काय सुद्धा शांत होतो, आणि तो प्रसन्नतेने उद्योग करतो. प्रसन्नता ही संज्ञेची अविपरीतता आहे. ती पाच प्रकारची विक्षंभण करणारी आणि कायप्रस्रब्धी करणारी प्रसन्नता चित्तावर आश्रित असते, परंतु चित्त तर आधीच प्रसन्न असते. हा समारोपन हार आहे. अशा प्रकारे पाचही श्रद्धा इत्यादींची प्रसन्नता सांगितली आहे. 'त्यामुळे सुख त्याच्या मागे चालते' याने भगवान कशाचा निर्देश करतात? खरोखर, ते आत्म-सत्याचा निर्देश करतात. त्या कर्माचा विपाक मागे चालतो. त्याचा उपाय अनुगमन करतो, जेव्हा स्मित-प्रत्ययाने सोमनस्य उत्पन्न होते, तेव्हा अविप्रतिसार सुद्धा मागे चालतो. हा समारोपन हार आहे. มหานาม สกฺกสฺส สุตฺตํ. ตสฺมึ เจ สมเย อสฺสโต อสมฺปชาโน กาลํ กเรยฺย กาเม ภวติ. อสฺสโต อภิสมาหาโร โย มา ภายิ, มหานาม, ยํ ตํ จิตฺตํ ทีฆรตฺตํ สทฺธาปริภาวิตํ สีลปริภาวิตํ สุตจาคปริภาวิตนฺติ วิตฺถาเรน กาตพฺพํ. จาเคน จ ปญฺญาย จ กึ ทสฺเสติ? ยา สทฺธา, สา เจตโส ปสาโท. ยา อนาวิลสงฺกปฺปิตา, สา สทฺธา. กึ การณา? อนาวิลลกฺขณา. อนาวิลลกฺขณา หิ สทฺธา. อปเร อาหุ คุณปริสุทฺธินิฏฺฐาคมนลกฺขณา, ยญฺจ อปเร วา วจนปฏิคฺคหลกฺขณา สทฺธา. อปโร ปริยาโย อตฺตานํ ยทิ เอวํ โอกปฺเปติ ‘‘นาหํ กิญฺจิ ชานามีติ เอสา อหํ ตตฺถ อนุญฺญตฺตา อนญฺญตา’’ติ. อยํ สทฺธาติ. อปโร ปริยาโย เอกสฏฺฐิยา ทิฏฺฐิคตานํ อาทีนวานุปสฺสนา อนิจฺจํ ทุกฺขมนตฺตาติ. เตน จ ปทิฏฺฐํ ภวติ ยถา คมฺภีเร อุทปาเน อุทกํ จกฺขุนา ปสฺสติ น จ กาเยน อภิสมฺภุนาติ. เอวมสฺส อริยา นิชฺฌานกฺขนฺติยา ทิฏฺฐิ ภวติ, น จ สจฺฉิกตา. อยํ วุจฺจติ สทฺธา. สา จ โลกิกา. อปโร ปริยาโย ขมติ ปุถุชฺชนภูตสฺส วีสติ จาติ โก สกฺกายาธีนา น นิเวโส. น เอตํ เอกนฺติ นยสญฺญา ยถาภูตํ ทิฏฺฐิยา ตุ ขลุ มุทูหิ ปญฺจหิ อินฺทฺริเยหิ ทสฺสนมคฺเคน ปหีนา ภวนฺติ. ทิฏฺเฐกฏฺฐา จ กิเลสา, อยํ สทฺธา. महानाम शाक्याचे सूत्र आहे. जर त्या वेळी स्मृतिहीन आणि संप्रजन्य नसताना कोणी काळ करेल, तर तो कामलोकात उत्पन्न होतो. जो स्मृतिहीनतेचा संस्कार आहे, 'महानाम, भिऊ नकोस, जे चित्त दीर्घकाळ श्रद्धेने भावित, शीलाने भावित, श्रुत आणि त्यागाने भावित आहे...' हे विस्ताराने जाणावे. त्यागाने आणि प्रज्ञेने काय दर्शविले जाते? जी श्रद्धा आहे, ती चित्ताची प्रसन्नता आहे. जो अकलुषित संकल्प आहे, ती श्रद्धा आहे. कोणत्या कारणाने? अकलुषितता हे तिचे लक्षण आहे. कारण श्रद्धा ही अकलुषित-लक्षणाची असते. इतर आचार्य म्हणतात की, गुणांच्या अत्यंत शुद्धीप्रत पोहोचणे हे तिचे लक्षण आहे; आणि इतर म्हणतात की, वचनाचा स्वीकार करण्याचे लक्षण असलेली श्रद्धा आहे. दुसरा पर्याय असा की, जर स्वतःला असे समर्पित करतो: 'मी काहीही जाणत नाही, ती मी तिथे स्वीकृत आहे, अन्य नाही.' ही श्रद्धा आहे, असे म्हणतात. दुसरा पर्याय असा की, एकसष्ट मिथ्यादृष्टींच्या बाबतीत 'अनित्य, दुःख, अनात्मा' अशी दोषांची अनुपश्यना करणे. आणि त्यामुळे यथार्थ दर्शन होते, ज्याप्रमाणे खोल विहिरीतील पाणी डोळ्यांनी दिसते, पण शरीराने प्राप्त करता येत नाही. त्याचप्रमाणे त्याला आर्य सत्यांचे निध्यान-क्षंतीने दर्शन होते, पण साक्षात्कार झालेला नसतो. याला श्रद्धा म्हटले जाते, आणि ती लौकिक श्रद्धा आहे. दुसरा पर्याय असा की, पृथग्जन असलेल्या व्यक्तीला वीस प्रकारच्या सत्कायदृष्टीला संमती देणे, अशा प्रकारे सत्कायदृष्टीच्या अधीन राहून अभिनिवेश न करणे. 'हे एकच नाही' अशी नय-संज्ञा यथाभूत असते. दृष्टी तर खरोखर मृदू अशा पाच इंद्रियांद्वारे दर्शनमार्गाने प्रहीन होते. आणि दृष्टीशी संबंधित असणारे क्लेश नष्ट होतात, ही श्रद्धा आहे. โสตาปตฺตงฺคมทุกฺขายํ ภูมิยํ ปริปุณฺณา วุจฺจติ. ตสฺมึเยว ภูมิยํ เสกฺขสีลํ อริยา ธารนฺติ วุจฺจติ. ตสฺมึเยว ภูมิยํ มุทุปญฺญา ปญฺญินฺทฺริยนฺติ วุจฺจติ. ตสฺมึเยว ภูมิยํ ขนฺเธหิ อนตฺถิกตา, อยํ จาโค. ตสฺมา สทฺธา จาคาธิฏฺฐาเนน นิทฺทิสิตพฺพา. ยติเกน ภิยฺโย มเนน สา หิสฺส วิปรีตา ทิฏฺฐิกา อสฺสทฺธา, สา นยนอุปธีสุ ปมตฺตา สมาทินฺนา. ตตฺถ สทฺธินฺทฺริยํ โย กามํ ปริวิสฺสนฺติ อิติ สนฺตปาปปฏินิสฺสคฺคา น จาคาธิฏฺฐานํ ปญฺญินฺทฺริเยน ปญฺญาธิฏฺฐานํ, สีเลน อุปสมาธิฏฺฐานํ. อิเม จตฺตาโร ธมฺมา สีลํ ปริภาวยนฺติ สทฺธา สีลํ จาโค จ ปญฺญาติ. ตตฺถ สทฺธาย โอฆํ ตรติ. ยํ สีลํ, อยํ อปฺปมาโท. โย จาโค, อิทํ ปญฺญาย กมฺมํ. ยา ปญฺญา, อิทํ ปญฺญินฺทฺริยํ, ตตฺถ ยํ สทฺธินฺทฺริยํ. ตํ ตีสุ อเวจฺจปฺปสาเทสุ. ยํ สีลํ, ตํ สทฺธินฺทฺริเยสุ. โย จาโค, โส จตูสุ [Pg.281] ฌาเนสุ. ยา ปญฺญา, สา สจฺเจสุ, สติ สพฺพตฺถคามินี. ตสฺส เสกฺขสฺส ภทฺทิกา ภติ, ภทฺทิโก อภิสมฺปราโย. ตสฺส สมฺมุฏฺฐสฺสติกสฺส สีลํ กโรนฺตสฺส น กายสมฺมุฏฺฐสฺสติตาย ตานิ วา อินฺทฺริยานิ ตํ วา กุสลมูลํ กมฺมวิปากํ ภวติ. ตสฺส ติกสฺส อตฺถนิทฺเทโส. ตตฺถ สทฺธา สีลํ จาโค ปญฺญา จตฺตาโร ธมฺมา. ยา สทฺธา ยา จ ปญฺญา, อิทํ มโนสุจริตํ. ยํ สีลํ, อิทํ กายิกํ วาจสิกํ สุจริตํ. โย จาโค, อิทํ เจตสิกํ อโลโภ สุจริตํ. อิติ จิตฺเต คหิเต ปญฺจกฺขนฺธา คหิตา ภวนฺติ. อิเมหิ ธมฺเมหิ สุจริตํ อิทํ ทุกฺขญฺจ อริยสจฺจํ ปทฏฺฐานํ มคฺคสฺส. स्रोतापत्तीचे अंग अदुःख भूमीमध्ये परिपूर्ण आहे असे म्हटले जाते. त्याच भूमीमध्ये आर्य जन शैक्ष शील धारण करतात असे म्हटले जाते. त्याच भूमीमध्ये मृदू प्रज्ञा हे प्रज्ञेंद्रिय आहे असे म्हटले जाते. त्याच भूमीमध्ये स्कंधांच्या बाबतीत अनासक्ती असणे, हा त्याग आहे. म्हणून श्रद्धा ही त्यागाच्या अधिष्ठानाने निर्देशित केली पाहिजे. भिक्षूने अधिक प्रमाणात विचार केला असता, ती त्याची विपरीत दृष्टी असलेली अश्रद्धा होईल, ती नयन-उपधींमध्ये प्रमत्त होऊन ग्रहण केली जाते. त्यामध्ये श्रद्धेंद्रिय आहे, जे कामाचे सेवन करतील, अशा प्रकारे प्रकट पापाचा त्याग केल्यामुळे हे त्यागाचे अधिष्ठान नाही. प्रज्ञेंद्रियाने प्रज्ञा-अधिष्ठान होते, शीलाने उपशम-अधिष्ठान होते. हे चार धर्म शीलाला भावित करतात: श्रद्धा, शील, त्याग आणि प्रज्ञा. त्यामध्ये श्रद्धेने ओघ पार करतो. जे शील आहे, तो अप्रमाद आहे. जो त्याग आहे, ते प्रज्ञेचे कार्य आहे. जी प्रज्ञा आहे, ते प्रज्ञेंद्रिय आहे. त्यामध्ये जे श्रद्धेंद्रिय आहे, ते तीन अचल श्रद्धांमध्ये असते. जे शील आहे, ते श्रद्धेंद्रियांमध्ये असते. जो त्याग आहे, तो चार ध्यानांमध्ये असतो. जी प्रज्ञा आहे, ती सत्यांमध्ये असते; स्मृती ही सर्वगामी असते. त्या शैक्ष पुद्गलाची उपजीविका कल्याणकारी असते आणि परलोक कल्याणकारी असतो. त्या विस्मृत-स्मृती असलेल्या व्यक्तीने शील पाळले तरी, कायेच्या विस्मृतीमुळे ती इंद्रिये किंवा ते कुशलमूळ कर्माचा विपाक होत नाही. हा त्या त्रिकाचा अर्थनिर्देश आहे. त्यामध्ये श्रद्धा, शील, त्याग आणि प्रज्ञा हे चार धर्म आहेत. जी श्रद्धा आणि जी प्रज्ञा आहे, ते मनःसुचरित आहे. जे शील आहे, ते कायिक आणि वाचिक सुचरित आहे. जो त्याग आहे, ते चैतसिक अलोभ सुचरित आहे. अशा प्रकारे चित्त ग्रहण केले असता पाचही स्कंध ग्रहण केले जातात. या धर्मांद्वारे सुचरित होते, हे दुःख आर्यसत्य आहे, जे मार्गाचे पदस्थान आहे. ๘๗. ตตฺถ กตโม วิจโย หาโร? ยา จ สทฺธา ยญฺจ สีลํ. ตํ กิสฺส กโรติ? ยา สทฺธา ตาย ภควนฺตํ อนุสฺสรติ มตฺเตนปิ หตฺถินา สมาคตา, อสฺส โภ กุกฺกุรา สพฺพํ สีเลน นปฺปฏิปชฺชติ กาเยน วา วาจาย วา ฐานํ วิสารโท ภวตีติ อวิปฺปฏิสารี ปญฺญา ยสฺส ปญฺญตฺตํ อุปฏฺฐเปติ. ตสฺส อขณฺฑสฺส สีลํ ยํ น ปจฺฉิ ตสฺสํ โมหสฺส อกุสลจิตฺตํ อุปฺปชฺชติ มิจฺฉาทิฏฺฐิสหคตํ วา, อยํ วิจโย หาโร. ธมฺมวาทิโน ภทฺทิการาติ ภวิสฺสติ อตฺถิ เอสา ยุตฺติ. ८७. त्या हारांमध्ये विचय हार कोणता आहे? जी श्रद्धा आणि जे शील आहे, ते काय करते? ज्या श्रद्धेने तो भगवंतांचे अनुस्मरण करतो, मत्त हत्तीशी गाठ पडली असताही, 'अहो कुत्र्यांनो!' तो होईल. सर्व काही शीलाने आचरत नाही, कायेने किंवा वाचेने कारणाने तो विशारद होतो. अशा प्रकारे पश्चात्तापरहित होतो, प्रज्ञा त्याच्यासाठी प्रज्ञप्ती उपस्थित करते. त्या अखंड व्यक्तीचे जे शील तुटत नाही, त्याच्या मोहामुळे मिथ्यादृष्टीसहगत अकुशल चित्त उत्पन्न होते. हा विचय हार आहे. 'धम्मवादी कल्याण करणारे होतील' ही युक्ती आहे. ตตฺถ กตโม ปทฏฺฐาโน หาโร? ยมิทํ จิตฺตํ ทีฆรตฺตํ ปริภาวิตํ สทฺธาย สีเลน จาเคน ปญฺญาย สมาธินา ปฐมชฺฌานสฺส ปทฏฺฐานํ. ยา สทฺธา อสฺส อนาวิลสงฺกปฺโป, ตํ ทุติยชฺฌานสฺส ปทฏฺฐานํ. ตีณิ จ อเวจฺจปฺปสาทา ยํ สีลํ, ตํ อริยกนฺตํ, ตํ สีลกฺขนฺธสฺส ปทฏฺฐานํ. ยา ปญฺญา, สา ปญฺญากฺขนฺธสฺส ปทฏฺฐานํ. อิเม จ ธมฺมา อิทญฺจ จิตฺตํ เอโกทิภูตสมาธิสฺส ปทฏฺฐานํ. สทฺธา สทฺธินฺทฺริยสฺส ปทฏฺฐานํ. จาโค สมาธินฺทฺริยสฺส ปทฏฺฐานํ. ปญฺญา ปญฺญินฺทฺริยสฺส ปทฏฺฐานํ. สทฺธา จ ปญฺญา จ วิปสฺสนา ปทฏฺฐานํ. สีลญฺจ จาโค จ สมถสฺส ปทฏฺฐานํ. สทฺธา จ ปญฺญา จ อวิชฺชา วิราคาย ปญฺญาวิมุตฺติยา ปทฏฺฐานํ. สีลญฺจ จาโค จ ราควิราคาย เจโตวิมุตฺติยา ปทฏฺฐานํ. त्या हारांमध्ये पदस्थान हार कोणता आहे? जे हे चित्त दीर्घकाळ श्रद्धा, शील, त्याग, प्रज्ञा आणि समाधीने भावित केले आहे, ते प्रथम ध्यानाचे पदस्थान आहे. जी श्रद्धा आहे, तो त्याचा अकलुषित संकल्प होतो, ते द्वितीय ध्यानाचे पदस्थान आहे. आणि तीन अचल श्रद्धा व जे शील आहे, ते आर्यकांत आहे, ते शीलस्कंधाचे पदस्थान आहे. जी प्रज्ञा आहे, ती प्रज्ञास्कंधाचे पदस्थान आहे. हे धर्म आणि हे चित्त एकोदीभाव समाधीचे पदस्थान आहे. श्रद्धा ही श्रद्धेंद्रियाचे पदस्थान आहे. त्याग हा समाधींद्रियाचे पदस्थान आहे. प्रज्ञा ही प्रज्ञेंद्रियाचे पदस्थान आहे. श्रद्धा आणि प्रज्ञा ही विपश्यनेचे पदस्थान आहे. शील आणि त्याग हे शमथाचे पदस्थान आहे. श्रद्धा आणि प्रज्ञा ही अविद्येच्या विरागासाठी आणि प्रज्ञाविमुक्तीचे पदस्थान आहे. शील आणि त्याग हे रागाच्या विरागासाठी आणि चेतोविमुक्तीचे पदस्थान आहे. ตตฺถ กตโม ลกฺขโณ หาโร? วิญฺญาเณ วุตฺเต สทฺธาสติภาวิเต สพฺเพ ปญฺจกฺขนฺธา วุตฺตา ภวนฺติ. สทฺธาย ภณิตาย สพฺพานิ สตฺต ธนานิ ภณิตานิ โหนฺติ สทฺธาธนํ…เป… สีลกฺขนฺเธ วุตฺเต สมาธิกฺขนฺโธ จ ปญฺญากฺขนฺโธ จ วุตฺตา ภวนฺติ. ยํ ตํ จิตฺตํ ทีฆรตฺตํ ปริภาวิตํ ปจฺฉิมเก [Pg.282] กาเล น ตทนุปริวตฺติ ภวิสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. ตตฺถ สญฺญาปิ ตทนุปริวตฺตินี ภวติ. เยปิ ตชฺชาติกา ธมฺมา, เตปิ ตทนุปริวตฺติโน ภวนฺติ. รูปสญฺญา รูปสญฺเจตนานุปสฺสนมนสิกาโร เอวํ ฉนฺนํ อายตนานํ วิญฺญาณกาเย, อยํ ลกฺขโณ หาโร. त्या (हारां)मध्ये 'लक्षण हार' (लक्खणहार) कोणता आहे? विज्ञानाचे (विञ्ञाण) कथन केले असता आणि श्रद्धा व स्मृती (सति) भावित केली असता, सर्व पाच स्कंध (पंचक्खन्ध) कथित होतात. श्रद्धेचे कथन केले असता, श्रद्धाधन... इत्यादी सर्व सात (आर्य) धने कथित होतात. शीलस्कंधाचे कथन केले असता, समाधिस्कंध आणि प्रज्ञास्कंध देखील कथित होतात. जे चित्त दीर्घकाळापर्यंत भावित (विकसित) केले गेले आहे, ते अंतिम काळात (मरणाच्या वेळी) त्याच्या (त्या गुणांच्या) अनुगामी होणार नाही, असे घडणे शक्य नाही. तेथे संज्ञा देखील त्याची अनुगामी होते. जे काही त्या जातीचे (त्या चित्ताशी संबंधित) धर्म आहेत, ते देखील त्याचे अनुगामी होतात. रूपसंज्ञा, रूपसंचेतना आणि अनुपश्यना-मनसिकार अशा प्रकारे सहा आयतनांच्या विज्ञानकायामध्ये अनुगामी होतात. हा 'लक्षण हार' होय। ตตฺถ กตโม จตุพฺยูโห หาโร? อิธ สุตฺเต ภควโต โก อธิปฺปาโย? เย ภทฺทิกํ ภตึ อากงฺเขยฺย ภทฺทิกญฺจ อภิสมฺปรายํ, เต สทฺธํ สีลํ จาคํ ปญฺญญฺจ มนสิ กริสฺสนฺติ, อยํ อธิปฺปาโย. เย จญฺเญปิ สตฺตา ตถาคตสฺส สมฺมุขํ น ปฏิยุชฺฌนฺเต, อิมํ ธมฺมํ โสตา อวิปฺปฏิสารโต กาลํ กริสฺสนฺตีติ, อยํ อธิปฺปาโย. त्यामध्ये 'चतुब्यूह हार' (चतुब्यूहहार) कोणता आहे? या सूत्तात भगवंतांचा काय अभिप्राय आहे? जे कल्याणकारी भति (पुण्यरूपी शिदोरी) आणि कल्याणकारी परलोक इच्छितात, ते श्रद्धा, शील, त्याग आणि प्रज्ञा यांचे मनसिकार करतील, हा (पहिला) अभिप्राय आहे. आणि जे इतर प्राणी देखील तथागतांच्या संमुख विरोध करत नाहीत, ते या धर्माचे श्रवण करून पश्चात्तापरहित होऊन मृत्यू पावतील, हा (दुसरा) अभिप्राय आहे। ๘๘. ตตฺถ กตโม อาวฏฺโฏ หาโร? อิทมฺปิ จตฺตาโร ธมฺมา สทฺธา จ ปญฺญา จ อสฺสทฺธิยญฺจ อวิชฺชญฺจ หนนฺติ. สีลญฺจ จาโค จ ตณฺหา จ โทสญฺจ หนนฺติ. ตสฺส ทฺเว มูลานิ ปหียนฺติ. ทุกฺขํ นิวตฺเตติ อปฺปหีนภูมิยญฺจ ทฺวิมูลานิ ปญฺจกฺขนฺธา. ทฺเว อริยสจฺจานิ สมโถ จ วิปสฺสนา จ. ทฺวินฺนํ มูลานํ ปหานํ. อิมานิ ทฺเว สจฺจานิ นิโรโธ จ มคฺโค จ. อยํ อาวฏฺโฏ หาโร. ८८. त्यामध्ये 'आवट्ट हार' (आवट्टहार) कोणता आहे? येथे देखील चार धर्म जाणावे - श्रद्धा आणि प्रज्ञा हे अश्रद्धा व अविद्येचा नाश करतात; शील आणि त्याग हे तृष्णा व द्वेषाचा नाश करतात. त्याचे दोन मूळ प्रहीण (नष्ट) होतात. तो दुःखाचा निरोध करतो आणि अप्रहीण भूमीमध्ये दोन मुळे पाच स्कंधांमध्ये समाविष्ट असतात. शमथ आणि विपश्यना ही दोन आर्यसत्ये आहेत. दोन मुळांचा प्रहाण होतो; निरोध आणि मार्ग ही दोन सत्ये आहेत. हा 'आवट्ट हार' होय। ตตฺถ กตโม วิภตฺติ? ยํ ตํ จิตฺตํ สทฺธาปริภาวิตํ…เป… สเจ ปุถุชฺชนสฺส ตสฺสปิ ภทฺทิกา ภติ ภวิสฺสตีติ น เอกํเสน ตสฺส กมฺมํ ทิฏฺเฐเยว ธมฺเม วิปากนฺติ ปจฺเจสฺสติ, อปรมฺหิ วา ปริยาเย ภวิสฺสติ. ยํ วา อตีตํ วิปากาย ปจฺจุปฏฺฐิตํ, ตปฺปจฺจยานิ เจตานิ, เย ยถา มหากมฺมวิภงฺเค ‘‘เตนายํ วิภชฺชพฺยากรณิโย นิทฺเทโส ธมฺมจาริโน ยา ภทฺทิกา ภตี’’ติ. त्यामध्ये 'विभत्ती हार' (विभत्तिहार) कोणता आहे? जे चित्त श्रद्धेने भावित आहे... इत्यादी. जर त्या पृथग्जनाला देखील कल्याणकारी भति (पुण्यरूपी शिदोरी) प्राप्त होणार असेल, तर तो निश्चितपणे असे मानणार नाही की त्याच्या कर्माचा विपाक याच जन्मात मिळेल, तर तो दुसऱ्या जन्मात देखील होईल. किंवा जे भूतकाळातील कर्म विपाकासाठी उपस्थित झाले आहे, हे सर्व त्याच कर्माच्या प्रत्ययाने (कारणाने) होते, जसे 'महाकम्मविभंग' मध्ये सांगितले आहे - 'त्यामुळे, धर्माचरण करणाऱ्याची जी कल्याणकारी भति आहे, हा निर्देश विभज्य-व्याकरणीय (विश्लेषण करून स्पष्ट करण्याजोगा) आहे।' ตตฺถ กตมา ปริวตฺตนา? อสฺสทฺธิยํ ทุสฺสีลฺยํ ยํ มจฺเฉรํ ทุปฺปญฺญํ จ ยญฺจ ปฏิปกฺเขน ปหีนา ภวนฺติ, อยํ ปริวตฺตนา. त्यामध्ये 'परिवर्तना हार' (परिवत्तनहार) कोणता आहे? अश्रद्धा, दुःशीलपणा, मत्सर आणि दुर्बुद्धी, जे त्यांच्या प्रतिपक्षाद्वारे (विरुद्ध गुणांद्वारे) प्रहीण (नष्ट) होतात, हा 'परिवर्तना हार' होय। ตตฺถ กตมํ เววจนํ? ยํ ตํ จิตฺตํ ทีฆรตฺตํ ปริภาวิตํ จิตฺตํ มโนวิญฺญาณํ…เป… ยํ สทฺธาพลํ สทฺธินฺทฺริยํ, ยํ สีลํ ตํ สุจริตํ, สํยโม นิยโม ทโม ขนฺธตา อิมานิ ตสฺส เววจนานิ. โย จาโค โส ปฏินิสฺสคฺโค อโลโภ โวสคฺโค จาโคยิฏฺฐานํ. ยา ปญฺญา สา ปญฺญตฺตา ปญฺญปฺปภา ปญฺญินฺทฺริยํ ปญฺญาพลํ. त्यामध्ये 'वेवचन हार' (वेवचनहार) कोणता आहे? जे चित्त दीर्घकाळापर्यंत भावित केले गेले आहे, ते चित्त, मनोविज्ञान... इत्यादी. जे श्रद्धाबल, श्रद्धेंद्रिय आहे; जे शील आहे, ते सुचरित आहे. संयम, नियम, दम, स्कंधता हे त्याचे समानार्थी शब्द (वेवचन) आहेत. जो त्याग आहे, तो प्रतिनिसर्ग (परित्याग), अलोभ, वोसग्ग (विसर्ग), त्याग आणि दानस्थान होय. जी प्रज्ञा आहे, ती प्रज्ञता, प्रज्ञाप्रभा, प्रज्ञेंद्रिय आणि प्रज्ञाबल होय। ตตฺถ [Pg.283] กตมา ปญฺญตฺติ? ยํ ตํ จิตฺตํ พีชํ ปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ. ปริภาวนา วาสนา ปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺติ. สทฺธา ปสาทปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตา. สีลํ สุจริตปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ. จาโค ปุญฺญกิริยปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺโต. ปญฺญา วีมํสปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตา. อิเม ตโย ธมฺมา สทฺธา สีลํ จาโค ปญฺญวโต ปาริสุทฺธึ คจฺฉนฺติ. त्यामध्ये 'प्रज्ञप्ती हार' (पण्ञत्तिहार) कोणता आहे? जे चित्त आहे, ते 'बीज' या प्रज्ञप्तीने प्रज्ञप्त (दर्शविले) केले आहे. भावना ही 'वासना' या प्रज्ञप्तीने प्रज्ञप्त केली आहे. श्रद्धा ही 'प्रसाद' या प्रज्ञप्तीने प्रज्ञप्त केली आहे. शील हे 'सुचरित' या प्रज्ञप्तीने प्रज्ञप्त केले आहे. त्याग हा 'पुण्यक्रिया' या प्रज्ञप्तीने प्रज्ञप्त केला आहे. प्रज्ञा ही 'मीमांसा' या प्रज्ञप्तीने प्रज्ञप्त केली आहे. हे तीन धर्म - श्रद्धा, शील आणि त्याग प्रज्ञावंताच्या ठिकाणी परिशुद्धीला प्राप्त होतात। ตตฺถ กตโม โอตรโณ? ยํ จิตฺตํ, ตํ ขนฺเธสุ วิญฺญาณกฺขนฺโธ, ธาตูสุ มโนวิญฺญาณธาตุ, อายตเนสุ มนายตนํ. เย จตฺตาโร ธมฺมา, เต ขนฺเธสุ สงฺขารกฺขนฺเธ ปริยาปนฺนา…เป… ธาตูสุ อายตเนสุ. त्यामध्ये 'ओतरण हार' (ओतरणहार) कोणता आहे? जे चित्त आहे, ते स्कंधांमध्ये 'विज्ञानस्कंध', धातूंमध्ये 'मनोविज्ञानधातू' आणि आयतनांमध्ये 'मनायतन' होय. जे चार धर्म आहेत, ते स्कंधांमध्ये 'संस्कारस्कंधात' समाविष्ट आहेत... इत्यादी... धातूंमध्ये आणि आयतनांमध्ये (धर्मधातू आणि धर्मायतन यात समाविष्ट आहेत). ตตฺถ กตโม โสธโน หาโร? อิทํ ภควโต ภาสิตํ มหานาเมน สกฺเกน ปุจฺฉิเตน สพฺพํ ตํ นิยุตฺตํ. त्यामध्ये 'शोधन हार' (sodhano hāro) कोणता आहे? शाक्य महानामाने विचारलेल्या प्रश्नावरून भगवंतांनी हा जो उपदेश केला आहे, तो सर्व सुसंगत आहे। ตตฺถ กตโม อธิฏฺฐาโน? อิทํ จิตฺตํ เวมตฺตตาย ปญฺญตฺตํ อกุสเลหิ จิตฺเตหิ อปริภาวิเตหิ ปริภาวิตนฺติ ยานิ ปุน ปริภาวิตานิ อญฺเญสมฺปิ ตตฺถ อุปาทาย ปญฺญตฺตํ สพฺเพปิเม จตฺตาโร ธมฺมา เอกตฺตตาย ปญฺญตฺตา. ภทฺทิกา ภตีติ กามโภคิโน เตว รูปธาตุ อรูปธาตุ มนุสฺสาติ สพฺพา ภทฺทิกา ภติ ตเทว กถาย ปญฺญตฺตํ, อยํ ปญฺญตฺติ. त्यामध्ये 'अधिष्ठान हार' (अधिट्ठानहार) कोणता आहे? हे चित्त नानात्वाच्या (भिन्नतेच्या) रूपाने प्रज्ञप्त केले आहे. जे अकुशल चित्तांनी भावित केले गेले नाही, ते भावित केले गेले आहे; आणि जे पुन्हा भावित केले गेले आहे, तेथे इतरांना देखील आश्रय करून प्रज्ञप्त केले आहे. हे सर्व चारही धर्म एकत्वाच्या रूपाने प्रज्ञप्त केले आहेत. 'कल्याणकारी भति' असे जे म्हटले आहे, ते कामभोगी, रूपधातू, अरूपधातू आणि मनुष्य यांच्यासाठीच आहे. ती सर्व कल्याणकारी भति त्याच कथेमध्ये प्रज्ञप्त केली आहे, ही प्रज्ञप्ती होय। ตตฺถ กตโม ปริกฺขาโร? จิตฺตสฺส อินฺทฺริยานิ ปจฺจโย อาธิปเตยฺยปจฺจยตาย มนสิกาโร. เหตุปจฺจยตาย ปจฺจโย. สทฺธาย โลกิกา ปญฺญา เหตุปจฺจยตาย ปจฺจโย. โยนิโส จ มนสิกาโร ปจฺจโย. สีลสฺส ปติรูปเทสวาโส ปจฺจโย. อตฺตสมฺมาปณิธานญฺจ เหตุ. จาคสฺส อโลโภ เหตุ. อวิปฺปฏิสาโร จ เหตุปจฺจโย. ปญฺญา ปรโต จ โฆโส อชฺฌตฺตญฺจ โยนิโส มนสิกาโร เหตุปจฺจโย จ. त्यामध्ये 'परिकार हार' (परिक्खारहार) कोणता आहे? चित्तासाठी इंद्रिये ही अधिपती-प्रत्यय म्हणून प्रत्यय (कारण) आहेत. मनसिकार हा हेतू-प्रत्यय म्हणून प्रत्यय आहे. श्रद्धेसाठी लौकिक प्रज्ञा ही हेतू-प्रत्यय म्हणून प्रत्यय आहे, आणि योनिशो मनसिकार हा प्रत्यय आहे. शीलासाठी प्रतिरूपदेशवास (योग्य ठिकाणी राहणे) हा प्रत्यय आहे, आणि आत्मसम्यक्प्रणिधान (स्वतःला योग्य मार्गावर प्रस्थापित करणे) हा हेतू आहे. त्यागासाठी अलोभ हा हेतू आहे, आणि अविप्रतिसार (पश्चात्ताप नसणे) हा हेतू-प्रत्यय आहे. प्रज्ञेसाठी परतोघोष (दुसऱ्याकडून उपदेश ऐकणे) आणि अध्यात्मिक योनिशो मनसिकार हे हेतू आणि प्रत्यय आहेत। ตตฺถ กตโม สมาโรปโน? ยํ ตํ จิตฺตํ ทีฆรตฺตํ ปริภาวิตนฺติ เจตสิกาปิ. เอตฺถ สพฺเพ ธมฺมา ปริภาวิตา ภทฺทิกา เต ภติ ภวิสฺสติ, ภทฺทิกา อุปปตฺติโก อภิสมฺปราโย. อิติ เย เกจิ มนุสฺสกา อุปโภคปริโภคา สพฺเพ ภทฺทิกา ภติเยว, อยํ สมาโรปโน. त्यामध्ये 'समारोपण हार' (समारोपनहार) कोणता आहे? 'जे चित्त दीर्घकाळापर्यंत भावित केले गेले आहे', यावरून चैतसिक देखील भावित केले गेले आहेत (असा समारोप होतो). येथे सर्व धर्म भावित केले असता, तुझी भति (शिदोरी) कल्याणकारी होईल आणि परलोकातील उत्पत्ती (पुनर्जन्म) देखील कल्याणकारी होईल. अशा प्रकारे, जे काही मानवी उपभोग आणि परिभोग आहेत, ते सर्व कल्याणकारी भतिच आहेत. हा 'समारोपण हार' होय। ๘๙. อุทฺธํ [Pg.284] อโธ สพฺพธิ วีตราโคติ คาถา. ตตฺถ กึ อุทฺธํ นาม? ยํ อิโต อุทฺธํ ภวิสฺสติ อนาคามี, อิทํ อุทฺธํ. อโธ นาม ยมติกฺกนฺตมตีตํ, อิทมโวจ อปทานตนฺติ อุทฺธํ. ตตฺถ อตีเตน สสฺสตทิฏฺฐิ ปุพฺพนฺตากปฺปิกานํ อปรนฺตทิฏฺฐิ เกสญฺจิ, อุจฺเฉททิฏฺฐึ ยํ วุตฺตกปฺปิกานํ อิมา เจว ทิฏฺฐิโย อุจฺเฉททิฏฺฐิ จ สสฺสตทิฏฺฐิ จ. ตตฺถายํ สสฺสตทิฏฺฐิ อิมานิ ปนฺนรส ปทานิ สกฺกายทิฏฺฐิ สสฺสตํ ภชนฺติ. รูปวนฺตํ เม อตฺตา, อตฺตนิ เม รูปํ, รูปํ เม อตฺตาติ ยทุจฺจเต ปญฺญํ ปริทหนฺติ. ยา อุจฺเฉททิฏฺฐิ สา ปญฺจสตานิ อุจฺเฉทํ ภชนฺติ. เต ‘‘ตํ ชีวํ ตํ สรีร’’นฺติ ปสฺสนฺติ, รูปํ เม อตฺตาติ ตถารูปา จตุพฺพิธา สกฺกายทิฏฺฐิ อุจฺเฉเทน จ สสฺสเตน จ. เอวํ ปญฺจสุ ขนฺเธสุ วีสติวตฺถุกาย ทิฏฺฐิยา ปนฺนรส ปทานิ ปุพฺพนฺตํ ภชนฺติ. สสฺสตทิฏฺฐิยา ปญฺจ ปทานิ อปรนฺตํ ภชนฺติ อุจฺเฉททิฏฺฐิยา. ตตฺถ ‘‘อยมหมสฺมี’’ติ ปสฺสนฺตา รูปํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, โส อุจฺเฉทวาที รูปวนฺตญฺจ อตฺตานํ, อตฺตนิ จ รูปํ, รูปสฺมึ วา อตฺตาติ โส ปสฺสติ จาติ อิติ อุจฺเฉททิฏฺฐิ จ, อตฺตโต ปฏิสฺสรติ สสฺสตทิฏฺฐิ ปุพฺพนฺตโต จ ปฏิสฺสรติ. ‘‘อยมหมสฺมี’’ติ น สมนุปสฺสติ. ตสฺส ทิฏฺฐาสวา ปหานํ คจฺฉนฺติ. โย ตีสุ อทฺธาสุ ปุพฺพนฺเต จ อปรนฺเต จ เตน เตน นิทฺทิฏฺฐาเนน อุทฺธํ อโธ สพฺพธิ วีตราโค ‘‘อหมสฺมี’’ติ น อนุปสฺสตีติ อิมินา ทฺวาเรน อิมินา ปโยเคน อิมินา อุปาเยน อิทํ ทสฺสนภูมิ จ โสตาปตฺติผลญฺจ โส อริโย ปโยโค อนภาวํคเตน สํสาเรน อปุนพฺภวาติ โย โกจิ อริโย ปโยโค ปุนพฺภวาย มุทูนิ วา ปญฺจินฺทฺริยานิ มชฺฌานิ อธิมตฺตานิ วา สพฺพํ อปุนพฺภวปฺปหานาย สํวตฺตนฺติ. อหนฺติ ทิฏฺโฐโฆ กาโมโฆ ภโวโฆ อวิชฺโชโฆ จ โอธิโส. ตตฺถ เทสนาหาเรน จตฺตาริ สจฺจานิ ปญฺจหิ อินฺทฺริเยหิ โสตาปตฺติผเลน จ ทฺเว สจฺจานิ มคฺโค จ นิโรโธ จ. สกฺกายสมุทเยน ทฺเว สจฺจานิ ทุกฺขญฺจ สมุทโย จ, อยํ เทสนา หาโร. ८९. ‘वर, खाली, सर्वत्र रागरहित’ ही गाथा आहे. तिथे ‘वर’ (उद्धं) म्हणजे काय? जे या वर्तमानापासून वर, भविष्यात अनागामी (न आलेले) असेल, ते ‘वर’ होय. ‘खाली’ (अधो) म्हणजे जे निघून गेले आहे, अतीत (भूतकाळ) आहे. हे अपदान पाळीमध्ये सांगितले आहे. तिथे अतीत काळाच्या संबंधात पूर्वान्त-कल्पिकांची शाश्वतदृष्टी असते, तर काहींची अपरान्तदृष्टी असते. पूर्वोक्त कल्पिक जे उच्छेददृष्टी ग्रहण करतात, ती उच्छेददृष्टी आणि शाश्वतदृष्टी या दोन्ही दृष्टी होतात. त्यापैकी ही शाश्वतदृष्टी आणि हे पंधरा प्रकार सत्कायदृष्टीच्या शाश्वततेचा आश्रय घेतात. ‘माझा आत्मा रूपवान आहे’, ‘माझ्या आत्म्यात रूप आहे’, ‘रूप हाच माझा आत्मा आहे’ असे जे म्हटले जाते, ते प्रज्ञेला झाकोळून टाकतात. जी उच्छेददृष्टी आहे, ती आणि पाच प्रकार उच्छेदाचा आश्रय घेतात. ते ‘तोच जीव आणि तेच शरीर’ असे पाहतात. ‘रूप हा माझा आत्मा आहे’ अशा प्रकारची चार प्रकारची सत्कायदृष्टी उच्छेद आणि शाश्वत या दोन्ही रूपांत असते. अशा प्रकारे पाच स्कंधांमध्ये वीस प्रकारच्या सत्कायदृष्टीपैकी पंधरा प्रकार पूर्वान्ताचा (शाश्वतदृष्टीचा) आश्रय घेतात. शाश्वतदृष्टीची पाच पदे अपरान्ताचा आश्रय घेतात आणि उच्छेददृष्टीची पाच पदे अपरान्ताचा आश्रय घेतात. तिथे ‘हा मी आहे’ असे पाहणारे रूपाला आत्मा म्हणून पाहतात. तो उच्छेदवादी स्वतःला रूपवान पाहतो, किंवा आत्म्यामध्ये रूप पाहतो, किंवा रूपामध्ये आत्मा पाहतो. अशा प्रकारे तो पाहतो, ही उच्छेददृष्टी आहे. आत्म्याला शरण जाणारी शाश्वतदृष्टी पूर्वान्ताकडून शरण जाते. ‘हा मी आहे’ असे जो पाहत नाही, त्याचे दृष्ट्यासव नष्ट होतात. जो तिन्ही काळांत (पूर्वान्त, अपरान्त आणि वर्तमानात), त्या त्या निर्देशानुसार वर, खाली आणि सर्वत्र रागरहित होऊन ‘मी आहे’ असे अनुदर्शन करत नाही, या द्वाराने, या प्रयत्नाने, या उपायाने ही दर्शनभूमी आणि स्रोतापत्ती-फल प्राप्त होते. तो आर्य संसाराच्या अभावाला प्राप्त होऊन पुनर्जन्म न घेणारा होतो. जो कोणी आर्य पुनर्जन्माचा निरोध करण्यासाठी प्रयत्न करतो, त्याची मृदू, मध्यम किंवा तीक्ष्ण अशी पाच इंद्रिये पुनर्जन्म न होण्यासाठी आणि प्रहाणासाठी कारणीभूत ठरतात. ‘मी’ या कल्पनेत दृष्टीओघ, कामौघ, भवोघ आणि अविद्याओघ हे चार विभाग आहेत. तिथे देशनाहाराने पाच इंद्रियांद्वारे चार आर्यसत्ये आणि स्रोतापत्ती-फलाद्वारे मार्ग आणि निरोध ही दोन सत्ये, तसेच सत्काय-समुदयाने दुःख आणि समुदय ही दोन सत्ये उपदेशित केली आहेत. हा ‘देशना हार’ होय। ตตฺถ กตโม วิจโย? ‘‘อยมหมสฺมี’’ติ อสมนุปสฺสนฺโต ตีณิ ทสฺสนปฺปหาตพฺพานิ สํโยชนานิ ปชหติ. อยํ วิจโย. त्यात ‘विचय’ (संशोधन/विश्लेषण) कोणता? ‘हा मी आहे’ असे न पाहणारा मनुष्य, दर्शनाने (स्रोतापत्ती मार्गाने) नष्ट होणारी तीन संयोजने नष्ट करतो. हा ‘विचय हार’ होय। ตตฺถ กตมา ยุตฺติ? ติวิธา ปุคฺคลา โกจิ อุคฺฆฏิตญฺญู โกจิ วิปญฺจิตญฺญู โกจิ เนยฺโย. อุคฺฆฏิตญฺญู ติกฺขินฺทฺริโย จ ตโต วิปญฺจิตญฺญู มุทินฺทฺริโย ตโต มุทินฺทฺริเยหิ เนยฺโย. ตตฺถ อุคฺฆฏิตญฺญู ติกฺขินฺทฺริยตาย ทสฺสนภูมิมาคมฺม [Pg.285] โสตาปตฺติผลํ ปาปุณาติ, เอกพีชโก ภวติ. อยํ ปฐโม โสตาปนฺโน. วิปญฺจิตญฺญู มุทูหิ อินฺทฺริเยหิ ทสฺสนภูมิมาคมฺม โสตาปตฺติผลํ ปาปุณาติ, โกลํโกโล จ โหติ. อยํ ทุติโย โสตาปนฺโน. ตตฺถ เนยฺโย ทสฺสนภูมิมาคมฺม โสตาปตฺติผลํ ปาปุณาติ, สตฺตกฺขตฺตุปรโม จ ภวติ. อยํ ตติโย โสตาปนฺโน. त्यात ‘युक्ती’ कोणती? पुद्गल (व्यक्ती) तीन प्रकारचे असतात: कोणी ‘उग्घटितज्ञू’ (शीघ्र बुद्धीचा), कोणी ‘विपंचितज्ञू’ (विस्ताराने समजणारा), तर कोणी ‘नेय्य’ (मार्गदर्शनाने समजणारा) असतो. उग्घटितज्ञू हा तीक्ष्ण इंद्रियांचा असतो; त्यापेक्षा विपंचितज्ञू हा मृदू इंद्रियांचा असतो; आणि त्यापेक्षा मृदू इंद्रियांचा नेय्य असतो. तिथे उग्घटितज्ञू आपल्या तीक्ष्ण इंद्रियांमुळे दर्शनभूमीचा आश्रय घेऊन स्रोतापत्ती-फल प्राप्त करतो आणि तो ‘एकबीजी’ होतो. हा पहिला स्रोतापन्न होय. विपंचितज्ञू आपल्या मृदू इंद्रियांमुळे दर्शनभूमीचा आश्रय घेऊन स्रोतापत्ती-फल प्राप्त करतो आणि तो ‘कोलंकोल’ होतो. हा दुसरा स्रोतापन्न होय. तिथे नेय्य पुद्गल दर्शनभूमीचा आश्रय घेऊन स्रोतापत्ती-फल प्राप्त करतो आणि तो ‘सत्तक्खत्tuपरम’ (सात जन्मांत मुक्त होणारा) होतो. हा तिसरा स्रोतापन्न होय। อตฺถิ เอสา ยุตฺติ มุทุมชฺฌาธิมตฺเตหิ อินฺทฺริเยหิ มุทุมชฺฌาธิมตฺตํ ภูมึ สจฺฉิกเรยฺย สกฺกายทิฏฺฐิปฺปหาเนน วา ทิฏฺฐิคตานิ ปชหติ. อยํ ยุตฺติ. मृदू, मध्यम आणि तीक्ष्ण इंद्रियांद्वारे मृदू, मध्यम आणि तीक्ष्ण भूमीचा साक्षात्कार करावा, किंवा सत्कायदृष्टीच्या प्रहाणाने मिथ्या दृष्टींचा त्याग करावा, हीच ‘युक्ती’ आहे. हा ‘युक्ती हार’ होय। ตตฺถ กตโม ปทฏฺฐาโน? ตตฺถ สกฺกายทิฏฺฐิ สพฺพมิจฺฉาทิฏฺฐิยา ปทฏฺฐานํ. สกฺกาโย นามรูปสฺส ปทฏฺฐานํ. นามรูปํ สกฺกายทิฏฺฐิยา ปทฏฺฐานํ. ปญฺจ อินฺทฺริยานิ รูปีนิ รูปราคสฺส ปทฏฺฐานํ. สฬายตนํ อหํการสฺส ปทฏฺฐานํ. ตตฺถ กตโม ลกฺขโณ? ทฺวีสุ ทิฏฺฐีสุ ปหีนาสุ ตตฺถ เอกา ทิฏฺฐิ ทิฏฺฐิคตานิ ปหานํ คจฺฉนฺติ. อุทฺธํ จ อโธ จ วีตราโค สพฺพรชนีเยสุ วีตราโค โหติ. ตชฺชา ปรภูมิยํ, อิทํ ปจฺจยนฺติ ยถาภูตํ ปสฺสติ. โส สพฺพปฏิจฺจสมุปฺปาทํ อามสติ. อยํ ลกฺขโณ หาโร. त्यात ‘पदस्थान’ (नजीकचे कारण) कोणते? तिथे सत्कायदृष्टी ही सर्व मिथ्या दृष्टींचे पदस्थान आहे. सत्काय हे नामरूपाचे पदस्थान आहे. नामरूप हे सत्कायदृष्टीचे पदस्थान आहे. पाच रूपी इंद्रिये ही रूपरागाचे पदस्थान आहेत. षडायतन हे अहंकाराचे पदस्थान आहे. त्यात ‘लक्षण’ कोणते? दोन दृष्टी नष्ट झाल्या असता, तिथे एक दृष्टी आणि इतर सर्व मिथ्या दृष्टी नष्ट होतात. वर आणि खाली रागरहित असलेला मनुष्य सर्व राग उत्पन्न करणाऱ्या विषयांमध्ये रागरहित होतो. त्या क्लेशांच्या अनुरूप दुसऱ्या भूमीमध्ये ‘हे प्रत्यययुक्त (कारणयुक्त) आहे’ असे तो यथार्थ पाहतो. तो संपूर्ण प्रतीत्यसमुत्पादाचा स्पर्श (अनुभव) करतो. हा ‘लक्षण हार’ होय। ๙๐. ตตฺถ กตโม จตุพฺยูโห หาโร? อิมมฺหิ สุตฺเต ภควโต โก อธิปฺปาโย? เย สตฺตา เย นาภิรมิสฺสนฺติ, เต ทิฏฺฐิปฺปหานาย วายมิสฺสนฺติ. อยเมตฺถ ภควโต อธิปฺปาโย. อยํ จตุพฺยูโห หาโร. ९०. त्यात ‘चतुर्व्यूह हार’ कोणता? या सुत्तात भगवंतांचा काय अभिप्राय आहे? जे प्राणी (संसारात) रममाण होणार नाहीत, ते दृष्टीच्या प्रहाणासाठी प्रयत्न करतील. हाच येथे भगवंतांचा अभिप्राय आहे. हा ‘चतुर्व्यूह हार’ होय। ตตฺถ กตโม อาวฏฺโฏ หาโร? ยานิมานิ มุทูนิ ปญฺจินฺทฺริยานิ ตานิ โอรมฺภาคิยานิ ปญฺจินฺทฺริยานิ. สพฺเพน สพฺพํ สมูหนนฺติ อภิชฺฌาพฺยาปาโท จ ภาวนากาเรน เสกฺขาย วิมุตฺติยา พลํ สทฺธา, อุทฺธมฺภาคิยานิ ทิฏฺฐิวเสน พลํ สทฺธา, วีริยินฺทฺริยํ อารภิตตฺตา สตินฺทฺริยํ ปคฺคหิตตฺตา อจฺจนฺตํ นิฏฺฐํ คจฺฉนฺติ. ตตฺถ ยานิ อินฺทฺริยานิ, อยํ มคฺโค สํกิเลสปฺปหานํ. อยํ นิโรโธ อายตึ อนุปฺปาทธมฺโม, อิทํ ทุกฺขํ. อยํ อาวฏฺโฏ หาโร. त्यात ‘आवर्त हार’ कोणता? जी ही पाच मृदू इंद्रिये आहेत, ती खालच्या लोकांत (कामधातूमध्ये) नेणारी पाच इंद्रिये आहेत. ती अभिध्या (लोभ) आणि व्यापाद (द्वेष) पूर्णपणे नष्ट करतात. भावनेच्या मार्गाने शैक्ष (साधक) मुक्तीसाठी श्रद्धा हे बल बनते. ऊर्ध्वभागीय संयोजनांच्या दृष्टीने श्रद्धा हे बल बनते. वीर्येंद्रियाचा आरंभ केल्यामुळे आणि स्मृतींद्रियाचा संग्रह केल्यामुळे ते अत्यंत निष्ठा (अंतिम ध्येय) प्राप्त करतात. तिथे जी इंद्रिये आहेत, तो मार्ग आहे आणि क्लेशांचे प्रहाण आहे. जो निरोध आहे, तो भविष्यात अनुत्पादधर्मी (पुन्हा उत्पन्न न होणारा) आहे, हे दुःख आहे. हा ‘आवर्त हार’ होय। ตตฺถ กตโม วิภตฺติ หาโร? ‘‘อยมหมสฺมี’’ติ โย สมนุปสฺสติ, โส จ โข อธิมตฺเตน โลกิกา ยํ ภูมิยํ น ตุ อริเยน ปโยเคน โส สกฺกายทิฏฺฐิ ปชหติ. ยํ วุจฺจติ ตชฺชาย ภูมิยา อธิมตฺตาย. ตตฺถ ตชฺชาย ภูมิยํ ปญฺจหิ อากาเรหิ อธิมตฺตตํ ปฏิลภติ สีเลน วเตน พาหุสฺสจฺเจน สมาธินา เนกฺขมฺมสุเขน. ตตฺถ อปฺปตฺเต ปตฺตสญฺญี [Pg.286] อธิมานํ คณฺหาติ. เอตสฺมึเยว วตฺถุปฺปตฺติยํ ภควา อิทํ สุตฺตํ ภาสติ. สีลวา วตมตฺเตนาติ. ตตฺถ โย อปฺปตฺเต ปตฺตสญฺญี ตสฺส โย สมาธิ, โส สามิโส กาปุริสเสวิโต ปน โส กาปุริสา วุจฺจนฺติ ปุถุชฺชนา. อามิสํ ยญฺจ อริยมคฺคมาคมฺม โลกิกา อนริยํ เตน สมาธิ โหติ อนริโย กาปุริสเสวิโต. โย ปน อริยากาเรน ยถาภูตํ น ชานาติ น ปสฺสติ, โส อธิคมนํ ปชหติ โย อริเยน สมาธินา อกาปุริสเสวิเตน นิรามิเสน นียติ, ตตฺถ อกาปุริสา วุจฺจนฺติ อริยปุคฺคลา. โย เตหิ เสวิโต สมาธิ, โส อกาปุริสเสวิโต. ตสฺมา เอกํ วิภชฺชพฺยากรณียํ ‘‘อยมหมสฺมี’’ติ อสมนุปสฺสนฺโต ตถา ปาเตติ. तेथे विभत्ती हार कोणता आहे? 'हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे जो वारंवार पाहतो, तो खरोखरच तीव्र इंद्रियाने लौकिक भूमीवर असतो, परंतु आर्य प्रयोगाने (प्रयत्नाने) तो सक्कायदिट्ठि (सत्कायदृष्टी) नष्ट करत नाही. ज्याला 'त्या अनुरूप भूमीच्या तीव्रतेमुळे' (तज्जाय भूमीच्या अधिमत्तेमुळे) असे म्हटले जाते. तेथे त्या अनुरूप भूमीमध्ये पाच प्रकारांनी तीव्रतेची प्राप्ती होते: शील, व्रत, बहुश्रुतता, समाधी आणि नैष्क्रम्यसुख याद्वारे. तेथे अप्राप्त ध्यानामध्ये 'प्राप्त झाले आहे' अशी संज्ञा असणारा अभिमान धरतो. याच प्रसंगी भगवान हे सुत्त सांगतात: 'शीलवान आणि व्रतमात्रेने...' तेथे जो अप्राप्त ध्यानात 'प्राप्त झाले आहे' अशी संज्ञा बाळगतो, त्याची जी समाधी असते, ती सामिष (आमिषासह) आणि कापुरुष-सेवित (हीन पुरुषाने सेवन केलेली) असते. आणि त्या कापुरुषांना 'पुथुज्जन' (पृथग्जन) असे म्हटले जाते. आमिषाला आणि आर्यमार्गाला सोडून जी लौकिक समाधी असते, ती अनार्य असते; त्यामुळे ती समाधी अनार्य आणि कापुरुष-सेवित होते. परंतु जो आर्य पद्धतीने यथाभूत जाणत नाही आणि पाहत नाही, तो अधिगमाचा (प्राप्तीचा) त्याग करतो. जो अकापुरुष-सेवित (श्रेष्ठ पुरुषांनी सेवन केलेल्या) आणि निरामिश अशा आर्य समाधीने संसारातून मुक्त होतो, तेथे 'अकापुरुष' म्हणजे 'आर्यपुद्गल' (आर्य व्यक्ती) असे म्हटले जाते. त्यांनी सेवन केलेली जी समाधी आहे, ती 'अकापुरुष-सेवित' होय. म्हणून, 'हा मी आहे' असे न पाहणारा एका विभज्जव्याकरणीय (विभजून उत्तर देण्यायोग्य) प्रश्नाला तशा प्रकारे पाडतो (निराकरण करतो). ตตฺถ กตมา ปริวตฺตนา? อิมาย ทสฺสนภูมิยา กิเลสา ปหาตพฺพา, เตหิ ปหียนฺติ อนิทฺทิฏฺฐาปิ ภควตา นิทฺทิสิตพฺพา โย. तेथे परिवर्तना हार कोणती आहे? या दस्सनभूमीमध्ये (दर्शनभूमीमध्ये) जे क्लेश नष्ट केले पाहिजेत, ते नष्ट होतात; भगवंतांनी जे स्पष्टपणे निर्देशिले नसले तरी, जो अर्थ निर्देशित केला पाहिजे (तो निर्देशित केला जातो). ตตฺถ กตมํ เววจนํ? ยา สกฺกายทิฏฺฐิยา อตฺตทิฏฺฐิยา. อยํ ภูมิ. เย กิเลสา ปหาตพฺพา. เต อปฺปหียนฺติ อนิทฺทิฏฺฐาปิ ภควตา สสฺสตทิฏฺฐิ จ อุจฺเฉททิฏฺฐิ จ, สา ปริยนฺตทิฏฺฐิ จ. ยา อปริยนฺตทิฏฺฐิ จ, สา สสฺสตทิฏฺฐิ จ. ยา อุจฺเฉททิฏฺฐิ, สา นตฺถิกา ทิฏฺฐิ. ยา สสฺสตทิฏฺฐิ, สา อกิริยทิฏฺฐิ. อิทํ เววจนํ. तेथे वेवचन हार कोणते आहे? जे सक्कायदिट्ठि (सत्कायदृष्टी) आणि अत्तदिट्ठि (आत्मदृष्टी) मध्ये आहे. ही भूमी आहे. जे क्लेश नष्ट केले पाहिजेत, ते नष्ट होत नाहीत. भगवंतांनी स्पष्टपणे न दर्शविलेली सुद्धा सस्सतदिट्ठि (शाश्वतदृष्टी) आणि उच्छेददिट्ठि (उच्छेददृष्टी) आहे, ती परियंतदिट्ठि (मर्यादित दृष्टी) देखील आहे. आणि जी अपरियंतदिट्ठि (अमर्यादित दृष्टी) आहे, ती सस्सतदिट्ठि (शाश्वतदृष्टी) आहे. जी उच्छेददिट्ठि आहे, ती नत्थिकदिट्ठि (नास्तिकदृष्टी) आहे. जी सस्सतदिट्ठि आहे, ती अकिरियदिट्ठि (अक्रियादृष्टी) आहे. हे वेवचन हार आहे. ตตฺถ กตมา ปญฺญตฺติ? ตณฺหา สํโยชนปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตา. มคฺโค ปฏิลาภปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺโต. อินฺทฺริยา ปฏิลาภปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตาติ. ตตฺถ กตโม โอตรโณ? สกฺกาโย ทุกฺขํ ทสฺสนปฺปหาตพฺโพ. สมุทโย มคฺโค. อินฺทฺริยานิ ตานิ จ นิทฺทิฏฺฐานิ ขนฺธธาตุอายตเนสุ. तेथे पण्णत्ति हार कोणती आहे? तण्हा (तृष्णा) ही संयोजन-पण्णत्तीमध्ये प्रज्ञप्त केली आहे. मार्ग हा पटिलाभ-पण्णत्तीमध्ये (प्राप्ती प्रज्ञप्तीमध्ये) प्रज्ञप्त केला आहे. इंद्रिये ही पटिलाभ-पण्णत्तीमध्ये प्रज्ञप्त केली आहेत. तेथे ओतरण हार कोणता आहे? सक्काय (सत्काय) हे दुःख आहे, जे दस्सन (दर्शनमार्गाने) नष्ट करण्यायोग्य आहे. समुदय आणि मार्ग (हे देखील आहेत). आणि ती इंद्रिये खंध (स्कंध), धातू आणि आयतनांमध्ये निर्देशित केली आहेत. ตตฺถ กตโม โสธโน หาโร? ยญฺหิ อารพฺภ ภควตา อิทํ สุตฺตํ ภาสิตํ, โส อารพฺภ นิทฺทิฏฺโฐ. ตตฺถ กตโม ปริกฺขาโร? นามรูปสฺส เหตุปจฺจโยปิ วิญฺญาณํ เหตุ พีชํ. เตน อวิชฺชา จ สงฺขารา จ ปจฺจโย. นิวตฺตินโย น อปโร ปริยาโย สพฺพภโว, เย จ สพฺพภวสฺส เหตุ ปรภณฺฑปจฺจโย อิติ สมฺมาทิฏฺฐิ ปรโต จ โฆโส โยนิโส จ มนสิกาโร ปจฺจโย. ยา ปญฺญา อุปฺปาเทติ, เอสา เหตุ สมฺมาทิฏฺฐิยา สมฺมาสงฺกปฺโป ภวติ, ยา สมฺมาสมาธิ, อยํ ปริกฺขาโร. तेथे शोधन हार कोणता आहे? ज्याला उद्देशून भगवंतांनी हे सुत्त भाषिले आहे, त्यालाच उद्देशून ते निर्देशित केले आहे. तेथे परिक्खार (परिष्कार हार) कोणता आहे? नामरूपाचा हेतू आणि प्रत्यय देखील; विञ्ञाण (विज्ञान) हे हेतू-बीज आहे. त्यामुळे अविज्जा (अविद्या) आणि संखारा (संस्कार) हे प्रत्यय आहेत. निवर्तनय (निवृत्तीचा मार्ग) हा दुसरा पर्याय नाही. सर्व भव आणि सर्व भवाचे जे हेतू आहेत, ते परभांड-प्रत्यय (परकीय वस्तूंचे प्रत्यय) आहेत. अशा प्रकारे, सम्मादिट्ठि (सम्यक् दृष्टी) साठी परतोघोष (दुसऱ्याकडून ऐकणे) आणि योनिसोमनसिकार (योग्य मनन) हे प्रत्यय आहेत. जी प्रज्ञा उत्पन्न होते, ती हेतू आहे. सम्मादिट्ठिमुळे सम्मासंकप्प (सम्यक् संकल्प) होतो. जी सम्मासमाधि (सम्यक् समाधी) आहे, हा परिक्खार (परिष्कार हार) आहे. ตตฺถ [Pg.287] กตโม สมาโรปโน? ‘‘อยมหมสฺมี’’ติ อสมนุปสฺสี ทุกฺขโต โรคโต…เป… ปนฺนรส ปทานิ. สีลานิ ภควา กิมตฺถิยานิ กิมานิสํสานิ. สีลานิ, อานนฺท, อวิปฺปฏิสารตฺถานิ ยาว วิมุตฺติ. ตตฺถ ทุวิโธ อตฺโถ – ปุริสตฺโถ จ วจนตฺโถ จ. तेथे समारोपन हार कोणता आहे? 'हा मी आहे' असे न पाहणारा दुःखाने, रोगाने... पे... पंधरा पदांनी पाहतो. 'हे भगवंता, शील कशासाठी आहेत आणि त्यांचे काय फायदे (आनिसंस) आहेत?' 'हे आनंदा, शील हे अविप्पटिसार (चित्तप्रसन्नता) या अर्थासाठी आहेत, जोपर्यंत विमुक्ती (प्राप्त होत नाही).' तेथे दोन प्रकारचा अर्थ आहे – पुरिसत्थ (पुरुषार्थ) आणि वचनत्थ (शब्दाचा अर्थ). ๙๑. ตตฺถ กตโม ปุริสตฺโถ? ยายํ น ปจฺฉานุตาปิตา อยํ อวิปฺปฏิสาโร, อยํ ปุริสตฺโถ. ยถา โกจิ พฺรูหยติ อิมตฺถมาเสวติ โส ภเณยฺย, กิญฺจิ มเมตฺถ อธีนํ ตสฺสตฺถาย อิทํ กิริยํ อารภามีติ. อยํ ปุริสตฺโถ. ९१. तेथे पुरिसत्थ (पुरुषार्थ) कोणता आहे? जो हा पश्चात्ताप न होणे आहे, हाच अविप्पटिसार (चित्तप्रसन्नता) आहे; हा पुरिसत्थ आहे. जसे की कोणी या अर्थाची वृद्धी करतो, याचे सेवन करतो, तो कदाचित् म्हणेल: 'येथे माझे काहीतरी अधीन (संबंधित) आहे, त्याच्या कल्याणासाठी मी ही क्रिया आरंभित आहे.' हा पुरिसत्थ आहे. ตตฺถ กตโม วจนตฺโถ? สีลานิ กายิกํ วา วาจสิกํ วา สุจริตํ อวิปฺปฏิสาโรติ. ตตฺถ สีลสฺส วตสฺส จ ภาโสเยว. อนญฺญา สุคตกมฺมตา สุจริตํ อยํ อวิปฺปฏิสาโร. เอวํ ยาว วิมุตฺตีติ เอกเมกสฺมึ ปเท ทฺเว อตฺถา – ปุริสตฺโถ จ วจนตฺโถ จ, ยถา อิมมฺหิ สุตฺเต เอวํ สพฺเพสุ สุตฺเตสุ ทฺเว ทฺเว อตฺถา. อยํ หิ ปรมตฺโถ อุตฺตมตฺโถ จ. ยํ นิพฺพานสจฺฉิกํ นิสฺสาย ยํ สกํ สจฺฉิกาตพฺพํ ภวติ, โส วุจฺจติ กตสฺส กตฺโถติ. อยํ ปุน เววจนํ สมฺปชานาติ. อิมินา นิยุตฺตตฺถมภิลพฺภนฺติ วจนตฺโถ. ตตฺถ ยํ อตฺถํ สาวโก อภิกงฺขติ. ตสฺส โย ปฏิลาโภ, อยํ ปุริสตฺโถ. ยํ ยํ ภควา ธมฺมํ เทเสติ, ตสฺส ตสฺส ธมฺมสฺส ยา อตฺถวิญฺญตฺติ. อยํ อตฺโถ, ตตฺถ สีลานํ อวิปฺปฏิสาโร อตฺโถปิ อานิสํโสปิ. เอโส จ อานิสํโส ยํ ทุคฺคตึ น คจฺฉติ. ยถา ตํ ภควตา เอสานิสํโส ธมฺเม สุจิณฺเณ น ทุคฺคตึ คจฺฉติ ธมฺมจารี, อยํ อตฺโถ. तेथे वचनत्थ (शब्दाचा अर्थ) कोणता आहे? शील म्हणजे कायिक किंवा वाचिक सुचरित होय, जे अविप्पटिसार (चित्तप्रसन्नता) चे कारण आहे. तेथे शील आणि व्रताचा केवळ प्रकाश आहे. सुगत-कर्मतेपेक्षा (बुद्धांच्या शिकवणीनुसार आचरणापेक्षा) अन्य नसलेले सुचरित म्हणजे हा अविप्पटिसार होय. अशा प्रकारे 'विमुक्तीपर्यंत' या प्रत्येक पदामध्ये दोन अर्थ आहेत – पुरिसत्थ आणि वचनत्थ. जसे या सुत्तामध्ये दोन-दोन अर्थ आहेत, तसेच सर्व सुत्तांमध्ये दोन-दोन अर्थ असतात. हाच खरोखर परमार्थ आणि उत्तमार्थ आहे. ज्या निर्वाण-साक्षात्काराचा आश्रय घेऊन जे स्वतः साक्षात करायचे असते, त्याला 'कृतकृत्य व्यक्तीचा अर्थ' (कतस्स कत्थो) असे म्हटले जाते. पुन्हा, तो हे वेवचन चांगल्या प्रकारे जाणतो. याद्वारे योग्य अर्थाची प्राप्ती होते, तो वचनत्थ आहे. तेथे ज्या अर्थाची श्रावक आकांक्षा करतो, त्याची जी प्राप्ती होते, तो पुरिसत्थ आहे. भगवान ज्या ज्या धम्माचा उपदेश करतात, त्या त्या धम्माची जी अर्थ-विज्ञप्ती (अर्थ समजणे) असते, तो 'अर्थ' आहे. तेथे शीलांचा अविप्पटिसार हा अर्थ देखील आहे आणि आनिसंस (फायदा) देखील आहे. आणि हा आनिसंस असा आहे की ज्यामुळे मनुष्य दुर्गतीला जात नाही. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे: 'धम्माचे सुचरित (चांगले आचरण) केल्यास मनुष्य दुर्गतीला जात नाही, धम्मचारी सुखाने जगतो,' हा अर्थ आहे. ยํ ปุริโส ภาวนาภูมิยํ สีลานิ อารพฺภ สีเลน สํยุตฺโต โหติ เอวํ ยาว วิมุตฺติ ตถา สีลกฺขนฺโธ. ตตฺถ โย จ อวิปฺปฏิสาโร อนุสยวเสน นิทฺทิฏฺโฐ, ตญฺจ สีลํ อยํ สีลกฺขนฺโธ. ปาโมชฺชปีติปสฺสทฺธีติ จ สมาธินฺทฺริเยน, อยํ สมาธิกฺขนฺโธ. ยํ สมาหิโต ยถาภูตํ ปชานาติ, อยํ ปญฺญากฺขนฺโธ. อิเม ตโย ขนฺธา สีลํ สมาธิ ปญฺญา จ ตถา สีลํ ปริปูเรติ ยํ วีริยินฺทฺริยํ เตน การเณน โส สีลํ ปริปูเรติ, อนุปฺปนฺนสฺส จ อกุสลสฺส อนุปฺปาทาย วายมติ, อุปฺปนฺนสฺส จ ปหานาย อนุปฺปนฺนสฺส จ กุสลสฺส อุปฺปาทาย, อุปฺปนฺนสฺส จ กุสลสฺส ภิยฺโยภาวาย [Pg.288] อิติ วีริยินฺทฺริยํ นิทฺทิฏฺฐํ. ตตฺถ โย สมาธิกฺขนฺโธ, อิทํ สมาธินฺทฺริยํ. ปญฺญากฺขนฺโธ ปญฺญินฺทฺริยํ, ตํ จตูสุ สมฺมปฺปธาเนสุ ทฏฺฐพฺพํ. ตถา โย อนุปฺปนฺนสฺส จ อกุสลสฺส อนุปฺปาทาย วายมติ, อิทํ ปฐมํ สมฺมปฺปธานํ. ยํ อุปฺปนฺนสฺส, อิทํ ทุติยํ. จตฺตาริ สมฺมปฺปธานานิ จตูสุ ฌาเนสุ ปสฺสิตพฺพานิ. ตถา สีลกฺขนฺเธน เนกฺขมฺมธาตุ จ อธิกา, ตโย จ วิตกฺกา เนกฺขมฺมวิตกฺโก อพฺยาปาทวิตกฺโก อวิหึสาวิตกฺโก จ. สาธารณภูตา. ยา ปิยายมานสฺส ปาโมชฺเชน อิทํ กายิกํ สุขํ อานิตํ อนิยมีติเปเมน, อิทํ ทุกฺขํ. โย ตตฺถ อวิกฺเขโป, อยํ สมาธิ. อิทํ ปญฺจงฺคิกํ ปฐมํ ฌานํ. ยา เจตสิกา ปสฺสทฺธิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิโรธนํ, โย กิเลโส จ ปริทาโห, โส ปฐเม ฌาเน นิรุทฺโธ. ตถา ยา จ กิเลสปสฺสทฺธิ ยา จ วิตกฺกวิจารานํ ปสฺสทฺธิ, อุภเยปิ เอเต ธมฺเม ปสฺสทฺธายํ. ตตฺถ กายสฺส จิตฺตสฺส จ สุขํ สุขายนา, อิทํ ปีติสุขิโน ปสฺสทฺธิ. โยปิ เอโกทิภาโว จิตฺตสฺส, เตน เอโกทิภาเวน ยํ จิตฺตสฺส อชฺฌตฺตํ สมฺปสาทนํ, อิทํ จตุตฺถํ ฌานงฺคํ. อิติ อชฺฌตฺตญฺจ สมฺปสาโท เจตโส จ เอโกทิภาโว ปีติ จ สุขญฺจ, อิทํ ทุติยํ ฌานํ จตุรงฺคิกํ. โย ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวเทติ, เตน อธิมตฺเตน สุเขน ผริตฺวา สุขํ เจตสิกํ ยํ, โส ปีติวีตราโค เอวํ ตสฺส ปีติวีตราคตาย อุเปกฺขํ ปฏิลภติ. โส ปีติยา จ วิราคา อุเปกฺขํ ปฏิลภติ. สุขญฺจ ปฏิสํเวเทติ. สติ จ สมฺมา ปญฺญาย ปฏิลภติ. สเจ สติ เอกคฺคตา อิทํ ปญฺจงฺคิกํ ตติยํ ฌานํ. ยํ สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ, อยํ เอกคฺคตาย ปราวิธานภาคิยา, ปฐเม ฌาเน อตฺถิ จิตฺเตกคฺคตา โน จกฺขุสฺส เวทนา สพฺพํ ปาริปูรึ คจฺฉติ. ยถา จตุตฺเถ ฌาเน, ตถา ยา อุเปกฺขา ปสฺสมฺภยํ สติสมฺปชญฺญํ จิตฺเตกคฺคตา จ, อิทํ จตุตฺถํ ฌานํ. जेव्हा एखादा मनुष्य भावनाभूमीत (साधनेच्या भूमीत) शील आरंभून शीलाने युक्त होतो, अशा प्रकारे विमुक्तीपर्यंत पोहोचतो, तसेच तो शीलस्कंध होय. तेथे जो पश्चात्तापविरहितपणा (अविप्पटिसार) अनुसयाच्या रूपाने दर्शविला आहे, ते शील आहे आणि हाच शीलस्कंध होय. प्रामोज्य (आनंद), प्रीती आणि प्रस्सद्धी (शांतता) हे समाधींद्रियासह समाधीस्कंध आहेत. समाधीस्थ झालेला मनुष्य जे यथाभूत (आहे तसे) जाणतो, तो प्रज्ञास्कंध होय. हे तीन स्कंध म्हणजे शील, समाधी आणि प्रज्ञा होत. तसेच तो शीलाची परिपूर्ती करतो. ज्या वीर्येन्द्रियाच्या कारणाने तो शीलाची परिपूर्ती करतो, अनुत्पन्न अकुशलाच्या अनुत्पादासाठी (उत्पन्न न होण्यासाठी) प्रयत्न करतो, उत्पन्न अकुशलाच्या प्रहाणासाठी (नष्ट करण्यासाठी) प्रयत्न करतो, अनुत्पन्न कुशलाच्या उत्पादासाठी (उत्पन्न करण्यासाठी) आणि उत्पन्न कुशलाच्या वृद्धीसाठी (वाढवण्यासाठी) प्रयत्न करतो, याला वीर्येन्द्रिय म्हटले गेले आहे. तेथे जो समाधीस्कंध आहे, ते समाधींद्रिय होय. प्रज्ञास्कंध हे प्रज्ञेन्द्रिय आहे, ते चार सम्यक् प्रधानात पाहिले पाहिजे. तसेच, जो अनुत्पन्न अकुशलाच्या अनुत्पादासाठी प्रयत्न करतो, हे पहिले सम्यक् प्रधान होय. जे उत्पन्न अकुशलाच्या प्रहाणासाठी आहे, ते दुसरे होय. चार सम्यक् प्रधाने चार ध्यानांमध्ये पाहिली पाहिजेत. तसेच शीलस्कंधाद्वारे नैष्क्रम्यधातू अधिक दृढ होतो आणि तीन वितर्क—नैष्क्रम्यवितर्क, अव्यापादवितर्क आणि अविहिंसावितर्क—हे साधारण (सहगामी) होतात. प्रामोज्याने (आनंदाने) प्रिय वाटणाऱ्याला जे कायिक सुख प्राप्त होते, ते अनियंत्रित प्रेमामुळे दुःख ठरते. तेथे जो अविक्षेप (एकाग्रता) आहे, ती समाधी होय. हे पाच अंगांनी युक्त पहिले ध्यान होय. जी चैतसिक प्रस्सद्धी (मानसिक शांतता) आहे, ती सवितर्क आणि सविचार यांच्या विरोधाचा, तसेच जो क्लेश आणि परिदाह (संताप) आहे, त्याचा पहिल्या ध्यानात निरोध करते. तसेच जी क्लेशांची प्रस्सद्धी आणि जी वितर्क-विचारांची प्रस्सद्धी आहे, हे दोन्ही धर्म प्रस्सद्धीमध्ये (शांततेत) समाविष्ट आहेत. तेथे शरीराचे आणि चित्ताचे जे सुख व सुखावस्था आहे, ती प्रीती आणि सुखाने युक्त असणाऱ्याची प्रस्सद्धी होय. चित्ताचा जो एकोदीभाव (एकाग्रता) आहे, त्या एकोदीभावाने चित्ताची जी आध्यात्मिक प्रसन्नता (संप्रसाद) होते, ते चौथे ध्यानांग होय. अशा प्रकारे, आध्यात्मिक प्रसन्नता, चित्ताचा एकोदीभाव, प्रीती आणि सुख, हे चार अंगांनी युक्त दुसरे ध्यान होय. ज्याचा काय (शरीर) शांत झाला आहे तो सुखाचा अनुभव घेतो, त्या अतिशय सुखाने व्याप्त होऊन जे चैतसिक सुख मिळते, त्यामुळे तो प्रीतीपासून विरक्त (पीतिवीतराग) होतो आणि अशा प्रकारे प्रीती विरक्त झाल्यामुळे तो उपेक्षेला प्राप्त करतो. तो प्रीतीच्या विरागामुळे उपेक्षेला प्राप्त करतो, सुखाचा अनुभव घेतो आणि सम्यक् प्रज्ञेसह स्मृती (सती) प्राप्त करतो. जर स्मृती आणि एकाग्रता असेल, तर हे पाच अंगांनी युक्त तिसरे ध्यान होय. सुखी माणसाचे जे चित्त समाधीस्थ होते, ती एकाग्रता इतर विकासाला पूरक असते; पहिल्या ध्यानात चित्ताची एकाग्रता असते, परंतु चक्षूची वेदना पूर्णपणे शांत होत नाही. जसे चौथ्या ध्यानात असते, तसेच जी उपेक्षा, शांत करणारी स्मृती-संप्रजन्य आणि चित्ताची एकाग्रता आहे, ते चौथे ध्यान होय. ๙๒. ยถา สมาธิ ทสฺสยิตพฺพํ, ตถา ปญฺญินฺทฺริยํ ตํ จตูสุ อริยสจฺเจสุ ปสฺสิตพฺพํ. ยํ สมาหิโต ยถาภูตํ ปชานาติ, สา ปชานนา จตุพฺพิธา อสุภโต ทุกฺขโต อนตฺตโต จ, ยทารมฺมณํ ตํ ทุกฺขํ อริยสจฺจํ, ยํ ปชานนฺโต นิพฺพินฺทติ วิมุจฺจติ ตถา ยํ กามาสวสฺส ปหานํ ภวาสวสฺส ทิฏฺฐาสวสฺส อวิชฺชาสวสฺส, อยํ นิโรโธ อปฺปหีนภูมิยํ [Pg.289] อาสวสมุทโย. อิมานิ จตฺตาริ อริยสจฺจานิ ยถา ปญฺญินฺทฺริยํ ปสฺสิตพฺพํ. ยถายํ สมาหิโต ยถาภูตํ ปชานาติ, อยํ ทสฺสนภูมิ. โสตาปตฺติผลญฺจ ยถาภูตํ ปชานนฺโต นิพฺพินฺทตีติ, อิทํ ตนุกญฺจ. กามราคพฺยาปาทํ สกทาคามิผลญฺจ ยํ นิพฺพินฺทติ วิรชฺชติ, อยํ ปฐมชฺฌานภาวนาภูมิ จ ราควิราคา เจโตวิมุตฺติ อนาคามิผลญฺจ. ยํ วิมุตฺติ วิมุจฺจติ, อยํ อวิชฺชาวิราคา ปญฺญาวิมุตฺติ อรหตฺตญฺจ. อิเม อวิปฺปฏิสารา จ วีริยินฺทฺริยญฺจ จตฺตาโร สมฺมปฺปธานา อวิปฺปฏิสารา ตญฺจ อุปริ ยาว สมาธิ, เอวํ เต จตฺตาริ ฌานานิ สมาธินฺทฺริยญฺจ ยํ สมาหิโต ยถาภูตํ ปชานาติ. อิเม จตฺตาโร สติปฏฺฐานา สีลปาริปูริมุปาทาย จาคสํหิเตน จ นิพฺเพธิกานญฺจ นิมิตฺตานํ อนาวิลมนา, อิทํ สตินฺทฺริยํ จตฺตาโร สติปฏฺฐานา. ยํ ปุน อิมาย ธมฺมเทสนาย ตีสุ ฐาเนสุ ทิฏฺโฐคมนกินฺทฺริยํ กิเลสปหาเนน จ เสกฺขสีลํ, อิทํ สทฺธินฺทฺริยํ. จตฺตาริ จ โสตาปตฺติยงฺคานิ ผลานิ. สมาธินฺทฺริยานิ โสปนิยาหารีนิ สพฺพสุตฺเตสุ นิทฺทิสิตพฺพานิ. ยํ ฌานํ ปฏิลภนํ วีริยคหิตํเยว ญาณํ ปฏิสฺสรโต, อยํ สุตมยี ปญฺญา. โย สมาธิ ปุพฺพาปรนิมิตฺตาภาโส อโนมคติตาย ยถากาโม, อยํ จินฺตามยี ปญฺญา, ยํ ตถาสมาหิโต ยถาภูตํ ปชานาติ, อยํ ภาวนามยี ปญฺญา. อยํ สุตฺตนิทฺเทโส. ९२. ज्याप्रमाणे समाधी दर्शविली पाहिजे, त्याचप्रमाणे प्रज्ञेन्द्रिय हे चार आर्यसत्यांमध्ये पाहिले पाहिजे. समाधीस्थ झालेला मनुष्य जे यथाभूत (आहे तसे) जाणतो, ते जाणणे चार प्रकारचे असते: अशुभाने, दुःखाने आणि अनात्मभावाने. ज्याचे आलंबन घेतले जाते ते दुःख आर्यसत्य आहे, जे जाणल्याने मनुष्य निर्वेद (वैराग्य) प्राप्त करतो आणि विमुक्त होतो. तसेच जे कामासव, भवासव, दृष्ट्यासव आणि अविद्यासवाचे प्रहाण आहे, तो निरोध होय; आणि अप्रहीन भूमीत (ज्या भूमीत क्लेश नष्ट झाले नाहीत तेथे) आसवांचा समुदाय (उत्पत्ती) होतो. ही चार आर्यसत्ये प्रज्ञेन्द्रियाच्या रूपात पाहिली पाहिजेत. ज्याप्रमाणे हा समाधीस्थ मनुष्य यथाभूत जाणतो, ही दर्शनभूमी होय. आणि स्रोतापत्तीफळ यथाभूत जाणणारा निर्वेद प्राप्त करतो, हे क्लेशांचे तनूकरण (कमी करणे) होय. कामराग आणि व्यापाद यांच्याविषयी जो निर्वेद व विराग प्राप्त करतो, ते सकृदागामीफळ होय; ही प्रथम ध्यान भावनाभूमी आहे आणि रागाच्या विरागामुळे चेतोविमुक्ती व अनागामीफळ प्राप्त होते. ज्या विमुक्तीने तो विमुक्त होतो, ती अविद्येच्या विरागामुळे प्रज्ञाविमुक्ती आणि अर्हत्त्व होय. हे पश्चात्तापविरहितपण (अविप्पटिसार), वीर्येन्द्रिय, चार सम्यक् प्रधाने, पश्चात्तापविरहितपण आणि त्यावरील समाधीपर्यंतचे धर्म, अशा प्रकारे ती चार ध्याने आणि समाधींद्रिय आहेत, जे समाधीस्थ मनुष्य यथाभूत जाणतो. हे चार स्मृतिप्रस्थान शीलाच्या परिपूर्तीवर अवलंबून असतात, आणि त्यागाशी (दानाश्रित) संबंधित व भेदक (क्लेश भेदणाऱ्या) निमित्तांनी युक्त अशा अनाविल (प्रसन्न/अकलुषित) मनाचे जे स्वरूप आहे, ते स्मृतीन्द्रिय होय; हेच चार स्मृतिप्रस्थान आहेत. पुन्हा, या धर्मदेशनेत तीन स्थानांवर जे दृष्टीच्या प्रवेशाचे इंद्रिय आहे आणि क्लेशप्रहाणाने युक्त जे शैक्ष शील (सेक्खसील) आहे, ते श्रद्धेन्द्रिय होय. आणि चार स्रोतापत्तीची अंगे ही फळे आहेत. समाधीन्द्रिये ही वर नेणारी (उन्नतीकडे नेणारी) असून सर्व सूत्तांमध्ये ती निर्देशित केली पाहिजेत. ध्यान प्राप्त करताना, वीर्याने ग्रहण केलेले आणि स्मरण करणाऱ्याचे जे ज्ञान असते, ती श्रुतमयी प्रज्ञा होय. जो समाधी पूर्व आणि उत्तर निमित्तांच्या आभासाने युक्त, श्रेष्ठ गतीमुळे इच्छेनुसार प्राप्त होणारा असतो, ती चिंतामयी प्रज्ञा होय; आणि जो तशा प्रकारे समाधीस्थ होऊन यथाभूत जाणतो, ती भावनामयी प्रज्ञा होय. हा सूत्तनिर्देश (सूत्ताचे स्पष्टीकरण) होय. อิมํ สุตฺตํ นิพฺเพธภาคิยํ พุชฺฌการธิกํ พุชฺฌิตพฺพํ. เยหิ องฺเคหิ สมนฺนาคตํ ตํ พุชฺฌิสฺสนฺติ ตสฺส องฺคานิ พุชฺฌิสฺสนฺติ, เตน โพชฺฌงฺคา. ตถา อาทิโต ยาว สีลํ วตํ เจตนา กรณียา, กิสฺส สีลานิ ปาริปูเรติ. อนุปฺปนฺนสฺส จ อกุสลสฺส อนุปฺปาทาย อุปฺปนฺนสฺส จ อกุสลสฺส ปหานาย อนุปฺปนฺนสฺส กุสลสฺส อุปฺปาทาย อุปฺปนฺนสฺส จ กุสลสฺส ภิยฺโยภาวาย, อิทํ วีริยํ ตสฺส ตสฺส พุชฺฌิตสฺส องฺคนฺติ. อยํ วีริยสมฺโพชฺฌงฺโค. อิมินา วีริเยน ทฺเว ธมฺมา อาทิโต อวิปฺปฏิสาโร ปาโมชฺชญฺจ ยา ปุน ปีติ อวิปฺปฏิสารปจฺจยา ปาโมชฺชปจฺจยา, อยํ ปีติสมฺโพชฺฌงฺโค. ยํ ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. อยํ ปสฺสทฺธิสมฺโพชฺฌงฺโค. เตน กายิกสุขมานิตํ ยํ สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ, อยํ สมาธิสมฺโพชฺฌงฺโค. ยํ สมาหิโต ยถาภูตํ ปชานาติ, อยํ ธมฺมวิจยสมฺโพชฺฌงฺโค. ยา สีลมุปาทาย ปญฺจนฺนํ โพชฺฌงฺคานํ อุปาทายานุโลมตา นิมิตฺตายนา ปีติภาคิยานญฺจ วิเสสภาคิยานญฺจ [Pg.290] อปิลาปนตา สหคตา โหติ อนวมคฺโค, อยํ สติสมฺโพชฺฌงฺโค. ยํ ยถาภูตํ ปชานาติ, อจฺจารทฺธวีริยํ กโรติ. อุทฺธจฺจภูมีติ กตา อภิปตฺถิตํ เปเสติ. โกสชฺชภูมีติ ครหิโต รหิเตหิ องฺเคหิ พุชฺฌติ ยํ จกฺขุสมถปถํ, สา อุเปกฺขาติ. เตน สา อุเปกฺขา ตสฺส โพชฺฌงฺคสฺส องฺคนฺติ กริตฺวา อุเปกฺขาสมฺโพชฺฌงฺโคติ วุจฺจเต. เอโส สุตฺตนิทฺเทโส. हे सुत्त निर्वेधभागी (भेद पाडणारे) असून ते जाणून घेतले पाहिजे. ज्या अंगांनी युक्त होऊन ते (या सुत्ताला) जाणतील आणि त्याच्या अंगांना जाणतील, म्हणून त्यांना 'बोज्झंग' (बोध्यंग) म्हणतात. त्याचप्रमाणे सुरुवातीपासून शीलापर्यंत आणि व्रतापर्यंत चेतना केली पाहिजे. तो कशासाठी शीलांचे परिपूर्णन करतो? अनुत्पन्न अकुशलाच्या अनुत्पादासाठी, उत्पन्न अकुशलाच्या प्रहाणासाठी, अनुत्पन्न कुशलाच्या उत्पादासाठी आणि उत्पन्न कुशलाच्या वृद्धीसाठी तो प्रयत्न करतो. हे वीर्य (प्रयत्न) त्या त्या जाणलेल्याचे अंग आहे. हा 'वीर्य-संबोज्झंग' होय. या वीर्यामुळे सुरुवातीला अविप्रतिसार (पश्चात्ताप नसणे) आणि प्रामोज्य (आनंद) हे दोन धर्म उत्पन्न होतात. पुन्हा, अविप्रतिसार आणि प्रामोज्य यांच्या प्रत्ययाने (कारणाने) जी प्रीती उत्पन्न होते, तो 'प्रीती-संबोज्झंग' होय. प्रीतीयुक्त मनाच्या व्यक्तीची जी काया शांत (प्रस्रब्ध) होते, तो 'पस्सद्धि-संबोज्झंग' होय. त्याद्वारे कायिक सुख प्राप्त होते. सुखी असलेल्याचे जे चित्त समाहित होते, तो 'समाधी-संबोज्झंग' होय. समाहित झालेला पुरुष जे यथाभूत (आहे तसे) जाणतो, तो 'धम्मविचय-संबोज्झंग' होय. शीलाचा आश्रय घेऊन आणि पाच बोज्झंगांचा आश्रय घेऊन जी अनुलोमता, जे निमित्तत्व आणि प्रीतीभागी व विशेषभागी धर्मांची जी असंमुषितता (न विसरणे) सहगत असते, तो 'सती-संबोज्झंग' होय. जो यथाभूत जाणतो, तो अत्यंत दृढ वीर्य करतो. 'उद्धच्चभूमी' (उद्धत अवस्था) असे म्हटले असता, तो इच्छित ध्येयाकडे मन लावतो. 'कोसज्जभूमी' (आळसाची अवस्था) म्हणजे निंदेपासून मुक्त अशा अंगांनी जो चक्षु-शमथ-पथ जाणतो, ती उपेक्षा होय. म्हणून ती उपेक्षा त्या बोज्झंगाचे अंग मानून तिला 'उपेक्षा-संबोज्झंग' असे म्हटले जाते. हा सुत्त-निर्देश होय. ๙๓. ตตฺถ กตมา เทสนา? อสฺมึ สุตฺเต จตฺตาริ อริยสจฺจานิ เทสิตานิ. ตตฺถ กตโม วิจโย? สีลวโต อวิปฺปฏิสาโร ยาว วิมุตฺติ อิมิสฺสาย ปุจฺฉาย มินิกิมตฺถสฺสมีติ ทฺเว ปทานิ ปุจฺฉา ทฺเว ปทานิ วิสชฺชนานิ ทฺวีหิ ปเทหิ ทฺเว อภิญฺญํ ทฺวีหิ เจว ปเทหิ วิสชฺชนา กึ ปุจฺฉติ นิพฺพาธิกํ กายภูมึ กมฺมสฺส ตถา หิ ปติฏฺฐา จ อเสกฺเข ธมฺเม อุปฺปาเทติ. ตตฺถ กตมา ยุตฺติ? สีลวโต อวิปฺปฏิสาโร ภวติ กึ นิจฺฉนฺทสฺส จ วิราโค อตฺถิ เอสา ยุตฺติ. ตตฺถ กตมํ ปทฏฺฐานํ? วีริยํ วีริยินฺทฺริยสฺส ปทฏฺฐานํ. สมาธิ สมาธินฺทฺริยสฺส ปทฏฺฐานํ. ปญฺญา ปญฺญินฺทฺริยสฺส ปทฏฺฐานํ. วีริยํ อโทสสฺส ปทฏฺฐานํ. สมาธิ อโลภสฺส ปทฏฺฐานํ. ปญฺญา อโมหสฺส ปทฏฺฐานํ. วีริยินฺทฺริยํ ติณฺณํ มคฺคงฺคานํ ปทฏฺฐานํ, สมฺมาวาจาย สมฺมากมฺมนฺตสฺส สมฺมาอาชีวสฺส. สมาธินฺทฺริยํ ติณฺณํ มคฺคงฺคานํ ปทฏฺฐานํ, สมฺมาสงฺกปฺปสฺส สมฺมาวาจาย สมฺมาสมาธิโน. ปญฺญินฺทฺริยํ ทฺวินฺนํ มคฺคงฺคานํ ปทฏฺฐานํ, สมฺมาสติยา สมฺมาทิฏฺฐิยา จ. ९३. त्यात 'देसना' (देशना-हार) कोणता? या सुत्तात चार आर्यसत्ये उपदेशिली आहेत. त्यात 'विचय' (विचय-हार) कोणता? शीलवानाचा अविप्रतिसार विमुक्तीपर्यंत जातो. या प्रश्नाने तो तुलना करतो. कोणत्या अर्थाची तुलना करतो? असे विचारले असता, दोन पदे प्रश्न आहेत आणि दोन पदे उत्तरे आहेत. दोन पदांद्वारे दोन गोष्टी विशेष रूपाने जाणल्या जातात आणि दोन पदांद्वारेच उत्तर दिले जाते. तो काय विचारतो? तो कर्माच्या बाधारहित अशा कायभूमीविषयी विचारतो. कारण, शीलरूपी प्रतिष्ठा अशैक्ष धर्मांना उत्पन्न करते. त्यात 'युत्ती' (युक्ति-हार) कोणता? शीलवानाला अविप्रतिसार होतो. काय होते? इच्छारहित (निष्काम) असलेल्याला विराग प्राप्त होतो, ही युत्ती होय. त्यात 'पदट्ठान' (पदस्थान-हार) कोणते? वीर्य हे वीर्येंद्रियाचे पदट्ठान (निकटचे कारण) आहे. समाधी हे समाधर्मेंद्रियाचे पदट्ठान आहे. प्रज्ञा हे प्रज्ञेंद्रियाचे पदट्ठान आहे. वीर्य हे अद्वेषाचे पदट्ठान आहे. समाधी हे अलोभाचे पदट्ठान आहे. प्रज्ञा हे अमोहाचे पदट्ठान आहे. वीर्येंद्रिय हे सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त आणि सम्यक् आजीव या तीन मार्गअंगांचे पदट्ठान आहे. समाधर्मेंद्रिय हे सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा आणि सम्यक् समाधी या तीन मार्गअंगांचे पदट्ठान आहे. प्रज्ञेंद्रिय हे सम्यक् सती आणि सम्यक् दिट्ठी या दोन मार्गअंगांचे पदट्ठान आहे. ตตฺถ กตโม ลกฺขโณ? สีลกฺขนฺเธ วุตฺเต สพฺเพ ตโย ขนฺธา วุตฺตา ภวนฺติ, สีลเมว หิ เสโลปมตา ยถา เสโล สพฺพปจฺจตฺถิเกหิ อกรณีโย เอวํ ตํ จิตฺตํ สพฺพกิเลเสหิ น กมฺปตีติ, อยํ อโมโห. วิรตฺตํ รชนีเยสูติ อยํ อโลโภ. โกปเนยฺเย น กุปฺปตีติ อยํ อโทโส. ตตฺถ ปญฺญา อโมโห กุสลมูลํ, อโลโภ อโลโภเยว, อโทโส อโทโสเยว. อิเมหิ ตีหิ กุสลมูเลหิ เสกฺขภูมิยํ ฐิโต อเสกฺขมคฺคํ อุปฺปาเทติ. เสกฺขภูมิ สมฺปตฺติกมฺมธมฺเม อุปฺปาเทติ, สา จ สมฺมาวิมุตฺติ, ยญฺจ วิมุตฺติรสญาณทสฺสนํ อิเม ทส อเสกฺขานํ อรหตฺตํ ธมฺมา. ตตฺถ อฏฺฐงฺคิเกน มคฺเคน จตุพฺพิธา ภาวนาปิ ลพฺภติ. สีลภาวนา กายภาวนา จิตฺตภาวนา [Pg.291] ปญฺญาภาวนา จ. ตตฺถ สมฺมากมฺมนฺเตน สมฺมาอาชีเวน จ กาโย ภาวิโต. สมฺมาวาจาย สมฺมาวายาเมน จ สีลํ ภาวิตํ. สมฺมาสงฺกปฺเปน สมฺมาสมาธินา จ จิตฺตํ ภาวิตํ. สมฺมาทิฏฺฐิยา สมฺมาสติยา จ ปญฺญา ภาวิตา. อิมาย จตุพฺพิธาย ภาวนาย ทฺเว ธมฺมา ภาวนาปาริปูรึ คจฺฉนฺติ จิตฺตํ ปญฺญญฺจ. จิตฺตํ ภาวนาย สมโถ, ปญฺญา ภาวนาย วิปสฺสนา. ตตฺถ ปญฺญา อวิชฺชาปหาเนน จิตฺตํ อุปกฺกิเลเสหิ อมิสฺสีกตนฺติ. ปญฺญา ภาวนาย จิตฺตภาวนํเยว ปริปูเรติ. เอวํ ยสฺส สุภาวิตํ จิตฺตํ กุโต ตํ ทุกฺขเมสฺสตีติ. อปิ จ โข ปน ตสฺส อายสฺมโต อพฺยาปาทธาตุ อธิมุตฺตา, น โส เปตํ สมาปนฺโน ตสฺส สงฺขาปหารํ เทติ, สงฺขาวิตกฺกิเต สรีเร ทุกฺขํ น เวทิยติ, อยํ สุตฺตตฺโถ. त्यात 'लक्खण' (लक्षण-हार) कोणता? शीलस्कंधाविषयी सांगितले असता, सर्व तिन्ही स्कंध सांगितले जातात. शील हेच पर्वतासारखे आहे; ज्याप्रमाणे पर्वत सर्व शत्रूंकडून अभेद्य असतो, त्याचप्रमाणे ते चित्त सर्व क्लेशांमुळे कंपित होत नाही, हा 'अमोह' होय. राग उत्पन्न करणाऱ्या विषयांमध्ये विरक्त असणे, हा 'अलोभ' होय. क्रोध आणणाऱ्या गोष्टींवर क्रोध न करणे, हा 'अद्वेष' होय. त्यात प्रज्ञा हा अमोह नावाचा कुशलमूळ आहे, अलोभ हा अलोभच आहे आणि अद्वेष हा अद्वेषच आहे. या तीन कुशलमुळांद्वारे शैक्षभूमीत स्थित असलेला पुरुष अशैक्ष मार्गाला उत्पन्न करतो. शैक्षभूमी समृद्ध कर्माच्या धर्मांना उत्पन्न करते. ती सम्यक् विमुक्ती आणि जे विमुक्तीच्या रसाचे ज्ञानदर्शन आहे, हे दहा अशैक्षांचे अर्हत्त्व धर्म (अर्हत-धर्म) आहेत. त्यात अष्टांगिक मार्गाने चार प्रकारची भावना देखील प्राप्त होते: शीलभावना, कायभावना, चित्तभावना आणि प्रज्ञाभावना. त्यात सम्यक् कर्मान्त आणि सम्यक् आजीव याद्वारे काया भावित केली जाते. सम्यक् वाचा आणि सम्यक् व्यायामाद्वारे शील भावित केले जाते. सम्यक् संकल्प आणि सम्यक् समाधीद्वारे चित्त भावित केले जाते. सम्यक् दृष्टी आणि सम्यक् सतीद्वारे प्रज्ञा भावित केली जाते. या चार प्रकारच्या भावनेने चित्त आणि प्रज्ञा हे दोन धर्म भावनेच्या परिपूर्णतेला प्राप्त होतात. चित्त हे भावनेचा शमथ आहे आणि प्रज्ञा ही भावनेची विपश्यना आहे. त्यात प्रज्ञा अविद्येच्या प्रहाणाने चित्ताला उपक्लेशांशी अमिश्रित करते. अशा प्रकारे प्रज्ञाभावनेने चित्तभावनेलाच परिपूर्ण करतो. अशा प्रकारे ज्याचे चित्त सुभावित आहे, त्याला दुःख कोठून प्राप्त होणार? परंतु तरीही, त्या आयुष्यमानाची अव्यापाद-धातू अधिमुक्त असते, तो त्यात समापन्न होतो, त्याला प्रहारांची संख्या जाणवत नाही आणि शरीरावर प्रहार झाले तरी तो दुःखाचा अनुभव घेत नाही. हा सुत्ताचा अर्थ होय. ๙๔. ตตฺถ กตมา เทสนา? อิมมฺหิ สุตฺเต ทส อเสกฺขา อรหตฺตธมฺมา เทสิตา อปฺปมาณา จ สมฺมา วิภาวนา. ตตฺถ กตโม วิจโย? เสโลปมตา เย เย ธมฺมา เวทนียสุขทุกฺโขปคตา, เต สพฺเพ นิรูปํ วานุปสฺสนฺตานํ วูปคตา กายโต เวทยิตปริกฺขาโร อปฺปวตฺติโต ทุกฺขํ น เวทิยติ. ตตฺถ กตมา ยุตฺติ, ยสฺเสวํ ภาวิตํ จิตฺตํ กุโต ตํ ทุกฺขเมสฺสตีติ. ตีสุ ภาวนาสุ ทุกฺขํ นกฺขมติ จิตฺตํ จิตฺตภาวนาย จ. นิโรธภาวนาย จ อานนฺตริกา สมาธิภาวนาย จ. อิติ ยสฺเสวํ ภาวิตํ จิตฺตนฺติ สมาธิ ผลสฺส ปทฏฺฐานํ. ९४. त्यात 'देसना' (देशना-हार) कोणता? या सुत्तात दहा अशैक्ष अर्हत्त्व धर्म आणि अप्रमाण अशी सम्यक् विभावना देशित केली आहे. त्यात 'विचय' (विचय-हार) कोणता? पर्वताची उपमा असलेले जे जे धर्म अनुभवल्या जाणाऱ्या सुख-दुःखाला प्राप्त होतात, ते सर्व अरूपाचे अनुदर्शन करणाऱ्यांना शांत होतात. कायापासून अनुभवण्याचे साधन प्रवृत्त न झाल्यामुळे तो दुःखाचा अनुभव घेत नाही. त्यात 'युत्ती' (युक्ति-हार) कोणती? 'ज्याचे चित्त अशा प्रकारे भावित आहे, त्याला दुःख कोठून प्राप्त होणार?' चित्तभावना, निरोधभावना आणि आनंतरीक समाधीभावना या तीन भावनांमध्ये दुःख प्रवेश करत नाही. अशा प्रकारे 'ज्याचे चित्त सुभावित आहे' या पदाने समाधी हे फलाचे पदट्ठान (निकटचे कारण) आहे, असे दर्शविले आहे. ตตฺถ กตโม ลกฺขโณ? ยสฺเสวํ ภาวิตํ จิตฺตนฺติ จิตฺตานิ ภาวิตานิ ยถา ปฐมํ นิทฺทิฏฺฐานิ ปญฺญา สีลํ กาโย จิตฺตํ, สีลมฺปิ สุภาวิตํ กายิกเจตสิกญฺจ ฐิตตฺตา นานุปกมฺปตีติ เวทนาปิ ตถา สญฺญาปิ สงฺขาราปิ. กุโต ตํ ทุกฺขเมสฺสตีติ สุขมฺปิ นานุคจฺฉติ, อทุกฺขมสุขมฺปิ นาคตนฺติ. त्यात 'लक्खण' (लक्षण-हार) कोणता? 'ज्याचे चित्त अशा प्रकारे भावित आहे' या पदात, आधी निर्देश केल्याप्रमाणे प्रज्ञा, शील, काय आणि चित्त हे भावित केले जातात. शील देखील सुभावित केले असता, कायिक आणि चैतसिक सुख देखील सुभावित होते. स्थित असल्यामुळे ते कंपित होत नाही; वेदना, संज्ञा आणि संस्कार यांच्या बाबतीतही तसेच आहे. 'त्याला दुःख कोठून प्राप्त होणार?' या पदाने सुख देखील मागे येत नाही आणि अदुःख-असुख (उपेक्षा) देखील उत्पन्न होत नाही. ตตฺถ กตโม จตุพฺยูโห หาโร? อิธ ภควโต โก อธิปฺปาโย? เย ทุกฺเขน อธิกา ภวิสฺสนฺติ, เต เอวรูปาหิ สมาปตฺตีหิ วิรหิสฺสนฺติ. อยเมตฺถ ภควโต อธิปฺปาโย. เย จ อปฺปสนฺนา, เต หิ ภวิสฺสนฺติ, ปสนฺนานญฺจ [Pg.292] ปีติปาโมชฺชํ ภวิสฺสติ, อยํ ตตฺถ ภควโต อธิปฺปาโย. อาวฏฺโฏติ นตฺถิ อาวฏฺฏนสฺส ภูมิ. तेथे चतुब्यूह हार कोणता? येथे भगवंतांचा काय अभिप्राय आहे? जे दुःखाने ग्रस्त (अधिक) असतील, ते अशा प्रकारच्या समापत्तींनी विहार करतील. हा येथे भगवंतांचा अभिप्राय आहे. आणि जे अप्रसन्न आहेत, ते प्रसन्न होतील, आणि जे प्रसन्न आहेत त्यांना प्रीती व प्रामोद्य (आनंद) होईल, हा तेथे भगवंतांचा अभिप्राय आहे. 'आवर्त' म्हणजे आवर्तनाचा कोणताही वाव (भूमी) नाही. วิภตฺตีติ ยสฺเสวํ ภาวิตํ จิตฺตํ กุโต ตํ ทุกฺขเมสฺสตีติ ทุวิโธ นิทฺเทโส – ทุกฺขเหตุนิทฺเทโส จ ปฏิปกฺขนิทฺเทโส จ. โก โส ทุกฺขเหตุ? ยโต ทุกฺขํ อาคจฺฉติ ปฏิปกฺเข วุตฺเต เสสธมฺมานํ สีลํ เหตุ จ ปจฺจโย จ, เต สพฺเพ ธมฺมา วุตฺตา โหนฺติ. เอกโพธิปกฺขิเย ธมฺเม วุตฺเต สพฺเพ โพธคมนียา ธมฺมา วุตฺตา ภวนฺติ. 'विभक्ती' म्हणजे 'ज्याचे चित्त अशा प्रकारे भावित झाले आहे, त्याला दुःख कोठून येणार?' यात दोन प्रकारचे निर्देश आहेत - दुःखहेतू निर्देश आणि प्रतिपक्ष निर्देश. तो दुःखहेतू कोणता? ज्याच्यापासून दुःख येते. प्रतिपक्षाचे कथन केले असता, उर्वरित धर्मांसाठी शील हे हेतू आणि प्रत्यय (कारण) ठरते, ते सर्व धर्म कथित होतात. एका बोधिपाक्षिक धर्माचे कथन केले असता, सर्व बोधगमनीय (सत्य जाणवून देणारे) धर्म कथित होतात. ตตฺถ กตโม จตุพฺยูโห หาโร? อิมมฺหิ สุตฺเต ภควโต โก อธิปฺปาโย? เย อวิปฺปฏิสาเรน ฉนฺทิกา, เต สีลปาริปูรี ภวนฺติ ปาโมชฺชฉนฺทิกา อวิปฺปฏิสารีปาริปูรี, อยเมตฺถ ภควโต อธิปฺปาโย…เป… อยํ จตุพฺยูโห หาโร. तेथे चतुब्यूह हार कोणता? या सुत्तात भगवंतांचा काय अभिप्राय आहे? जे अविप्रतिसाराने (पश्चात्तापविरहिततेने) युक्त (इच्छुक) आहेत, ते शील परिपूर्ण करणारे होतात; जे प्रामोद्याचे (आनंदाचे) इच्छुक आहेत, ते अविप्रतिसार परिपूर्ण करणारे होतात. हा येथे भगवंतांचा अभिप्राय आहे... पे... हा चतुब्यूह हार होय. ตตฺถ กตโม อาวฏฺโฏ? อิทํ สุตฺตํ นิพฺเพธภาคิยํ. โย นิพฺเพโธ, อยํ นิโรโธ. เยน นิพฺพิชฺฌติ, โส มคฺโค. ยํ นิพฺพิชฺฌติ, ตํ ทุกฺขํ. ยํ นิพฺเพธคามินา มคฺเคน ปหียติ, สมุทโยยํ วุตฺโต. तेथे आवर्त (हार) कोणता? हे सुत्त निर्वेधभागीय (भेद पाडणारे/ज्ञान देणारे) आहे. जो निर्वेध (भेद) आहे, तो निरोध (सत्य) होय. ज्याच्याद्वारे भेद केला जातो, तो मार्ग होय. ज्याचा भेद केला जातो, ते दुःख होय. निर्वेधगामी मार्गाने जे प्रहीण (नष्ट) केले जाते, त्याला समुदाय म्हटले आहे. ตตฺถ กตมา วิภตฺติ? สีลวโต อวิปฺปฏิสาโรติ วิภชฺชพฺยากรณียํ, ปรามสนฺตสฺส นตฺถิ อวิปฺปฏิสาโร ยาว โทสกตํ กาเยน วา วาจาย วา อกุสลํ อารภติ. กิญฺจิปิสฺส เอวํ โหติ ‘‘สุกตเมตํ สุจริตเมตํ โน จสฺส เตน อวิปฺปฏิสาเรน ปาโมชฺชํ ชายติ ยาว วิมุตฺติ, ตสฺส สีลวโต อวิปฺปฏิสาโร’’ติ วิภชฺชพฺยากรณียํ, อยํ วิภตฺติหาโร. तेथे विभक्ती कोणती? 'शीलवानाला अविप्रतिसार (पश्चात्ताप नसणे) होतो' हे विभज्य-व्याकरणीय (विश्लेषण करून उत्तर देण्याजोगे) आहे. जो चुकीचा विचार करतो (परामर्श करतो) त्याला अविप्रतिसार नसतो, जोपर्यंत तो कायेने किंवा वाचेने द्वेषाने केलेले अकुशल कर्म आरंभितो. जरी त्याचे असे असले की 'हे सुकृत आहे, हे सुचरित आहे', तरीही त्याला त्या अविप्रतिसाराने विमुक्तीपर्यंत प्रामोद्य (आनंद) उत्पन्न होत नाही. 'त्या शीलवानाला अविप्रतिसार होतो' हे विभज्य-व्याकरणीय आहे. हा विभक्ती हार होय. ตตฺถ กตมา ปริวตฺตนา? อิเมหิ สตฺตหิ อุปนิสาสมฺปตฺตีหิ เอกาทส อุปนิสา วิภตฺติยํ ปชหานํ ปชหนฺติ, อยํ ปริวตฺตนา. तेथे परिवर्तन (हार) कोणता? या सात उपनिषा-संपत्तींनी (कारणांच्या परिपूर्णतेने) अकरा उपनिषा (कारण) विभक्तीमध्ये प्रहाण करणाऱ्या धर्मांना प्रहीण करतात. हे परिवर्तन होय. ตตฺถ กตมา เววจนา? อิเมสํ อริยธมฺมานํ พลโพชฺฌงฺควิโมกฺขสมาธิสมาปตฺตีนํ อิมานิ เววจนานิ. तेथे वेवचन (समानार्थी शब्द) कोणते? या आर्यधर्मांचे, म्हणजेच बल, बोध्यंग, विमोक्ष, समाधी आणि समापत्ती यांचे हे समानार्थी शब्द (वेवचने) आहेत. ตตฺถ กตมา ปญฺญตฺติ? สีลวโต อวิปฺปฏิสาโรติ สีลกฺขนฺเธ เนกฺขมฺมปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ, นิสชฺชปญฺญตฺติ จ เอวํ ทส องฺคานิ ทฺวีหิ ทฺวีหิ องฺเคหิ ปญฺญตฺตานิ. तेथे प्रज्ञप्ती कोणती? 'शीलवानाला अविप्रतिसार होतो' असे शीलस्कंधात नैष्क्रम्य-प्रज्ञप्तीने प्रज्ञप्त (स्पष्ट) केले आहे, आणि निसज्ज-प्रज्ञप्ती देखील. अशा प्रकारे दहा अंग दोन-दोन अंगांनी प्रज्ञप्त केली आहेत. ตตฺถ กตโม โอตรโณ? อิทํ นิพฺเพธภาคิยสุตฺตํ ปญฺจสุ โอติณฺณํ ยถา ยํ ปฐมํ นิทฺทิฏฺฐํ เอวมินฺทฺริยาทิขนฺธธาตุอายตเนสุ นิทฺทิสิตพฺพานิ. तेथे अवतरण कोणता? हे निर्वेधभागीय सुत्त पाच सुत्तांमध्ये अवतीर्ण (प्रविष्ट) होते. जसे प्रथम निर्देशित केले आहे, तसेच इंद्रिय, स्कंध, धातू आणि आयतनांमध्ये निर्देशित केले पाहिजे. ตตฺถ [Pg.293] กตโม โสธโน หาโร? สีลวโต อวิปฺปฏิสาโรติ น ตาว สุทฺโธ อารมฺโภ อวิปฺปฏิสาริโน ปาโมชฺชนฺติ น ตาว สุทฺโธ อารมฺโภ ยานิ เอกาทส ปทานิ เทสิตานิ ยทา ตทา สุทฺโธ อารมฺโภ, อยํ โสธโน. तेथे शोधन हार कोणता? 'शीलवानाला अविप्रतिसार होतो' हा आरंभ तोपर्यंत शुद्ध नाही; 'अविप्रतिसारी माणसाला प्रामोद्य होते' हा आरंभ तोपर्यंत शुद्ध नाही. जेव्हा अकरा पदे देशित केली जातात, तेव्हाच आरंभ शुद्ध होतो. हा शोधन होय. ตตฺถ กตโม อธิฏฺฐาโน? สีลเวมตฺตตาย ปญฺญตฺตํ เอวํ ทส ปทานิ สพฺพานิ สีลกฺขนฺธสฺส อานิสํโส, เต จ ปติรูปเทสวาโส จ ปจฺจโย อตฺตสมฺมาปณิธานญฺจ เหตุ, สมาธิกฺขนฺธสฺส สุขํ เหตุ ปสฺสทฺธิ ปจฺจโย, เยน ฌานสหชาติ จ ฐานนฺติ ฌานงฺคา อปโร ปริยาโย กาเมสุ อาทีนวานุปสฺสนา สมาธิโน ปจฺจโย เนกฺขมฺเม อานิสํสทสฺสาวิตา เหตุ. तेथे अधिष्ठान कोणता? शील-वैचित्र्यामुळे (शीलवेमत्तता) प्रज्ञप्त केले आहे. अशा प्रकारे सर्व दहा पदे शीलस्कंधाचे आनिशंस (फायदे) आहेत. आणि ते (फायदे) प्रतिरूपदेशवास (योग्य ठिकाणी राहणे) हा प्रत्यय आहे आणि आत्मसम्यक्प्रणिधान (स्वतःला योग्य मार्गावर ठेवणे) हा हेतू आहे. समाधिस्कंधासाठी सुख हा हेतू आहे आणि प्रस्सब्धी (शांतता) हा प्रत्यय आहे, ज्याच्याद्वारे ध्यान-सहजात आणि स्थान हे ध्यानांग आहेत. दुसरा पर्याय म्हणजे, कामांमधील आदीनवानुपश्यना (दोषांचे दर्शन) हा समाधीचा प्रत्यय आहे आणि नैष्क्रम्यातील आनिशंसदर्शित्व (फायदा पाहणे) हा हेतू आहे. ตตฺถ กตมา สมาโรปนา? ยํ วีริยินฺทฺริยํ, โส สีลกฺขนฺโธ. ยํ สีลํ, เต จตฺตาโร ธมฺมา ปธานา. ยํ ธมฺมานุธมฺมปฏิปตฺติ, โส ปาติโมกฺขสํวโร. तेथे समारोपण कोणते? जे वीर्येंद्रिय आहे, तो शीलस्कंध होय. जे शील आहे, ते चार धर्म प्रधान (सम्यक्प्रधान) आहेत. जी धर्मानुधर्मप्रतिपत्ती आहे, तो प्रातिमोक्षसंवर होय. ๙๕. ยสฺส เสโลปมํ จิตฺตนฺติ คาถา, เสโลปมนฺติ อุปมา ยถา เสโล วาเตน น กมฺปติ น อุณฺเหน น สีเตน สํกมฺปติ. ยถา อเนกา อเจตนา, เต อุณฺเหน มิลายนฺติ, สีเตน อวสุสฺสนฺติ, วาเตน ภชนฺติ. น เอวํ เสโล วิรตฺตํ รชนีเยสุ โทสนีเย น ทุสฺสตีติ การณํ โทสนีเย โทมนสฺสนฺตํ, น ทุฏฺเฐน วา กมฺปติ อุณฺเหน วา, โส มิลายติ สีเตน วา อวสุสฺสติ, เอวํ จิตฺตํ ราเคน นานุสฺสติ สีเตน กมฺปตีติ. กึ การณํ? วิรตฺตํ รชนีเยสุ โทสนีเย น ทุสฺสติ. กึ การณํ? โทสนีเย ปนสฺสนฺติ น ทุสฺสติ, อทุฏฺฐํ ตํ น โกสิสฺสนฺติ, เตน กุปฺปนีเย น กุปฺปติ, ยสฺเสวํ ภาวิตํ จิตฺตํ กุโต ตํ ทุกฺขนิทฺเทโส จ กุโต เอวรูปสฺส ทุกฺขํ อาคมิสฺสตีติ นิทฺทิฏฺฐํ. ९५. 'ज्याचे चित्त पर्वतासारखे आहे' ही गाथा आहे. 'शैल उपम' (पर्वतासारखे) ही उपमा आहे. ज्याप्रमाणे पर्वत वाऱ्याने कंपित होत नाही, उष्णतेने किंवा थंडीने थरथरत नाही. ज्याप्रमाणे अनेक अचेतन वस्तू उष्णतेने कोमेजतात, थंडीने सुकतात, वाऱ्याने भंग पावतात. पर्वत तसा नसतो. तो रंजनीय (आकर्षक) गोष्टींमध्ये विरक्त असतो आणि द्वेषयुक्त गोष्टींमध्ये द्वेष करत नाही, हे कारण आहे. द्वेषयुक्त गोष्टींमध्ये दौर्मनस्य संपते. तो दुष्टाने कंपित होत नाही किंवा उष्णतेने कोमेजत नाही किंवा थंडीने सुकत नाही. त्याचप्रमाणे चित्त रागाने अनुसरत नाही (किंवा आसक्त होत नाही) आणि थंडीने कंपित होत नाही. काय कारण आहे? रंजनीय गोष्टींमध्ये विरक्त असणे आणि द्वेषयुक्त गोष्टींमध्ये द्वेष न करणे. काय कारण आहे? द्वेषयुक्त गोष्टींमध्ये त्याचे चित्त द्वेष करत नाही. त्या अदुष्ट (द्वेषरहित) व्यक्तीवर ते रागवणार नाहीत, म्हणून तो कोपायमान होणाऱ्या गोष्टींवर कोपत नाही. 'ज्याचे चित्त अशा प्रकारे भावित झाले आहे, त्याला दुःख कोठून येणार?' हा निर्देश आहे आणि 'अशा व्यक्तीला दुःख कोठून येईल?' असे निर्देशित केले आहे. ปริวตฺตนาติ กุโต ตํ ทุกฺขเมสฺสตีติ ยํ เจตสิกํ สุขํ อนุปาทิเสสา อยํ นตฺถิ โสปาทิเสสา อยํ อตฺถิ. ปุน เอวมาหํสุ ตํ ขณํ ตํ มุหุตฺตํ อุภยเมว อเวทยิตํ โสปาทิเสสํ ยญฺจ อนุปาทิเสสํ ยญฺจ ตํ ขณํ ตํ มุหุตฺตํ อนุปาทิเสสํ ยญฺจ โสปาทิเสสํ จ อเวทยิตํ. สุขมาปนฺนสฺส อนาวตฺติกนฺติ อยเมตฺถ วิเสโส ปริวตฺตนา. 'परिवर्तन' म्हणजे 'त्याला दुःख कोठून येणार?' जे चैतसिक सुख आहे, ते अनुपधिशेष (निर्वाणधातू) मध्ये नाही, सोपधिशेष मध्ये आहे. पुन्हा असे म्हटले आहे की, त्या क्षणी, त्या मुहूर्ताला दोन्ही अनुभवले जातात - सोपधिशेष आणि अनुपधिशेष देखील. आणि त्या क्षणी, त्या मुहूर्ताला अनुपधिशेष आणि सोपधिशेष देखील अनुभवले जाते. सुखाला प्राप्त झालेल्या व्यक्तीचे पुनरागमन होत नाही (अनावर्तिक). हा येथे विशेष परिवर्तन (हार) आहे. ตตฺถ [Pg.294] กตโม เววจโน? ยสฺเสวํ ภาวิตํ จิตฺตํ วา ภาวิตํ สุภาวิตํ อนุฏฺฐิตํ วตฺถุกตํ สุสมารทฺธํ. จิตฺตนฺติ มโน วิญฺญาณํ มนินฺทฺริยํ มโนวิญฺญาณธาตุ. तेथे वेवचन कोणते? 'ज्याचे चित्त अशा प्रकारे भावित झाले आहे' किंवा भावित, सुभावित, अनुष्ठित, वस्तुकृत, सुसमारब्ध. 'चित्त' म्हणजे मन, विज्ञान, मनेंद्रिय, मनोविज्ञानधातू. ตตฺถ กตมา ปญฺญตฺติ? จิตฺตํ มโน สงฺขารา วูปสมปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ. สมาธิ อเสกฺขปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺโต. ทุกฺขํ อุจฺฉินฺนปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ. तेथे प्रज्ञप्ती कोणती? चित्त हे मनःसंस्कारांच्या उपशम-प्रज्ञप्तीने प्रज्ञप्त केले आहे. समाधी अशैक्ष-प्रज्ञप्तीने प्रज्ञप्त केली आहे. दुःख उच्छिन्न-प्रज्ञप्तीने प्रज्ञप्त केले आहे. ตตฺถ กตโม โอตรโณ? จิตฺเต นิทฺทิฏฺเฐ ปญฺจกฺขนฺธา นิทฺทิฏฺฐา โหนฺติ, อยํ ขนฺเธสุ โอตรโณ, มโนวิญฺญาณธาตุยา นิทฺทิฏฺฐาย อฏฺฐารส ธาตุโย นิทฺทิฏฺฐา โหนฺติ, อยํ ธาตูสุ โอตรโณ. มนายตเน นิทฺทิฏฺเฐ สพฺพานิ อายตนานิ นิทฺทิฏฺฐานิ โหนฺติ. ตตฺถ มนายตนํ นามรูปสฺส ปทฏฺฐานํ. นามรูปปจฺจยา สฬายตนํ. ตถา ปฏิจฺจสมุปฺปาเท. อยํ โอตรโณ. ตตฺถ กตโม โสธโน สุทฺโธเยว อารมฺโภ. तेथे अवतरण कोणता? चित्त निर्देशित केले असता पाच स्कंध निर्देशित होतात, हे स्कंधांमध्ये अवतरण होय. मनोविज्ञानाचा निर्देश केला असता अठरा धातू निर्देशित होतात, हे धातूंमध्ये अवतरण होय. मनायतन निर्देशित केले असता सर्व आयतने निर्देशित होतात. तेथे मनायतन हे नामरूपाचे पदस्थान (जवळचे कारण) आहे. नामरूपप्रत्ययाने षडायतन होते. तसेच प्रतीत्यसमुत्पादात देखील. हा अवतरण होय. तेथे शोधन कोणता? केवळ शुद्ध आरंभ. ตตฺถ กตโม อธิฏฺฐาโน? ฉฬินฺทฺริยํ ภาวนา เอกตฺตายํ ปญฺญตฺติ ฉฏฺฐิเตน กาโย เอกตฺตาย ปญฺญตฺโต. तेथे अधिष्ठान कोणता? सहा इंद्रियांची भावना एकत्वासाठी प्रज्ञप्त करणे होय. सहाव्या (मनाने) युक्त असलेल्या कायेला एकत्वासाठी प्रज्ञप्त केले आहे. ตตฺถ กตโม ปริกฺขาโร? จิตฺตสฺส ปุพฺพเหตุ สมุปฺปาทาย มนสิกาโร จ ตปฺโปณตา จ ยํ อสมาหิตภูมิยํ จ วิเสสธมฺมานํ อภาวิตตฺตา จิตฺตสตตํ คจฺฉติ, สเจ สมาธิโน สุขํ เหตุ อวิปฺปฏิสาโร ปจฺจโย, อยํ เหตุ อยํ ปจฺจโย ปริกฺขาโร. तेथे परिष्कार कोणता? चित्ताच्या पूर्वहेतूच्या उत्पत्तीसाठी मनस्कार आणि त्याकडे असणारी प्रवणता, आणि असमाहित भूमीमध्ये विशेष धर्मांचे भावन न केल्यामुळे जे चित्त सतत धावते; जर समाधीचे सुख हे हेतू असेल, तर अविप्रतिसार (पश्चात्ताप नसणे) हा प्रत्यय आहे. हा हेतू आणि हा प्रत्यय म्हणजेच परिष्कार होय. ตตฺถ กตมา สมาโรปนา? ยสฺเสวํ ภาวิตนฺติ ตสฺส ธมฺมา สมาโรปยิตพฺพา. กาโย สีลํ ปญฺญา ภาวิตจิตฺตนฺติ อนภิรตํ อนปณตํ อเนกํ อนุตํ อนาปชฺชาสตฺตํ อยํ สมญฺญายตนา น ตสฺส เสกฺขสฺส สมฺมาสมาธิ สพฺเพ อเสกฺขา ทส อรหนฺตธมฺมา นิทฺทิฏฺฐา โหนฺติ. อเสกฺขภาคิยานิ สุตฺตานิ. तेथे समारोपणा कोणती? 'ज्याचे अशा प्रकारे भावन झाले आहे' या सूत्रात त्या पुद्गलावर धर्मांचा समारोप केला पाहिजे. काय, शील, प्रज्ञा आणि भावित चित्त म्हणजे अनभिरत (आसक्ती नसलेले), अनवनत (न झुकलेले), अनेक (विविध), अनुक्त आणि अनासक्त होय. हे सामान्य आयतन आहे, त्या शैक्ष पुद्गलाचा हा सम्यक् समाधी नाही. येथे सर्व दहा अशैक्ष अर्हंत-धर्मांचे निर्देश केले आहेत. ही अशैक्ष-भागी सूत्रे आहेत. ๙๖. ยสฺส นูน, ภนฺเต, กายคตาสติ อภาวิตา, อยํ โส อญฺญตรํ สพฺรหฺมจารึ อาสชฺช สมาปชฺช อปฺปฏินิสชฺช ชนปทจาริกํ ปกฺกเมยฺย, โส อายสฺมา อิมสฺมึ วิปฺปฏิชานาติ ทฺเว ปชานิ ปฏิชานาติ จิตฺตภาวนายญฺจ ทิฏฺฐิยา ปหานํ, กายภาวนายญฺจ ทิฏฺฐิปฺปหานํ, กายภาวนายญฺจ ตณฺหาปหานํ, ยํ ปฐมํ อุปมํ กโรติ. อสุจินาปิ สุจินาปิ ปถวี เนว อฏฺฏิยติ น ชิคุจฺฉติ น ปีติปาโมชฺชํ ปฏิลภติ, เอวเมว [Pg.295] หิ ปถวีสเมน โส เจตสา อนฺวเยน อปฺปเกน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน วิหรามีติ. อิติ โส อายสฺมา กึ ปฏิชานาติ, กายภาวนาย สุขินฺทฺริยปหานํ ปฏิชานาติ, จิตฺตภาวนาย โสมนสฺสินฺทฺริยปหานํ ปฏิชานาติ. กายิกา เวทนา ราคานุสยมนุคตานํ สุขินฺทฺริยํ ปฏิกฺขิปติ. น หิ เวทนากฺขนฺธํ ยา เจตสิกา สุขเวทนา ตตฺถ อยํ ปฏิลาภปจฺจยา อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ. โสตํ ปฏิกฺขิปติ, น หิ มโนสมฺผสฺสชํ เวทนํ. ตตฺถ จตูสุ มหาภูเตสุ รูปกฺขนฺธสฺส อนุสยปฏิฆปหานํ ภณติ. กาเม รูปญฺจ ตญฺจ อเสกฺขภูมิยํ. กาเย กายานุปสฺสนา ทิฏฺฐธมฺมสุขวิหารญฺจ. พเลน จ อุสฺสาเหน จ สพฺพํ มนสิ กตตฺตานํ ปหานํ เมทํ กตาลิกาย จ ปุริเสน จ มณฺฑนกชาติเกน จ, เอเตหิ อิมสฺส มาตาปิตุสมฺภูตํ ปจฺจเวกฺขณํ, โส กาเยน จ กายานุปสฺสนาย จ จิตฺเตน จ จิตฺตานุปสฺสนาย จ ทฺเว ธมฺเม ธาเรติ. กายกิเลสวตฺถุํ จิตฺเตน จ จิตฺตสนฺนิสฺสเย จิตฺเตน สุภาวิเตน สตฺตนฺนํ จ สมาปตฺตีนํ วิหริตุํ ปฏิชานาติ. ९६. भन्ते, ज्याने खरोखर कायगतासतीचे भावन केले नाही, तो आपल्या सब्रह्मचाऱ्यांपैकी कोणावर तरी आघात करून, अपराध करून, तो न सोडता जनपदचारिकेला (देशाटनाला) निघून जाईल. ते आयुष्मान् यामध्ये दोन गोष्टींचे प्रतिपादन करतात - चित्तभावनेने दृष्टीचे प्रहाण आणि कायभावनेने तृष्णेचे प्रहाण, ज्यासाठी ते सर्वप्रथम एक उपमा देतात. ज्याप्रमाणे पृथ्वी अशुद्ध किंवा शुद्ध गोष्टीने कंटाळत नाही, किळस मानत नाही आणि प्रीती-प्रामोज्य देखील मिळवत नाही; त्याचप्रमाणे ते आयुष्मान् 'मी पृथ्वीसमान, वैर नसलेल्या, व्यापाद नसलेल्या चित्ताने विहार करतो' असे म्हणतात. अशा प्रकारे ते आयुष्मान् काय प्रतिपादन करतात? कायभावनेने सुखिंद्रियाचे प्रहाण प्रतिपादन करतात, आणि चित्तभावनेने सौमनस्यिंद्रियाचे प्रहाण प्रतिपादन करतात. राग-अनुशयाचे अनुसरण करणाऱ्यांना कायिक वेदना सुखिंद्रियाला नाकारते. वेदनास्कंधात जी चैतसिक सुखवेदना आहे, ती प्राप्तीच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होते, सुख आणि सौमनस्य. ते श्रोताला नाकारते, पण मनःसंस्पर्शजन्य वेदनेला नाकारत नाही. तेथे चार महाभूतांमध्ये रूपस्कंधाच्या प्रतिघ-अनुशयाचे प्रहाण सांगितले आहे. कामलोकात रूप आहे आणि ते अशैक्ष भूमीमध्ये देखील असते. कायेमध्ये कायानुपश्यना आणि दृष्टधर्मसुखविहार देखील होतो. बलाने आणि प्रयत्नाने सर्व काही मनात धारण करणाऱ्यांचे हे प्रहाण एखाद्या अलंकारप्रिय पुरुषाने स्वतःचे रूप पाहिल्यासारखे आहे. या मनस्कारांद्वारे या पुद्गलाचे मातापित्यांपासून उत्पन्न झालेल्या शरीराचे प्रत्यवेक्षण होते. ते कायेने व कायानुपश्यनेने, आणि चित्ताने व चित्तानुपश्यनेने या दोन धर्मांना धारण करतात. कायिक क्लेशांच्या वस्तूला चित्ताने आणि चित्ताच्या आश्रयाने सुभावित चित्ताने सात समापत्तींमध्ये विहार करण्याचे ते प्रतिपादन करतात. คหปติปุตฺโตปมตาย จ ยถา คหปติปุตฺตสฺส นานารงฺคานํ วตฺถกรณฺฑโก ปุณฺโณ ภเวยฺย, โส ยํ ยเทว วตฺถยุคํ ปุพฺพณฺหสมเย อากงฺขติ, ปุพฺพณฺหสมเย นิพฺพาเปติ, เอวํ มชฺฌนฺหิกสมเย, สายนฺหสมเย, เอวเมว โส อายสฺมา จิตฺตสฺส สุภาวิตตฺตา ยถารูเปน วิหาเรน อากงฺขติ ปุพฺพณฺหสมยํ วิหริตุํ, ตถารูเปน ปุพฺพณฺหสมยํ วิหรติ, มชฺฌนฺหิกสมเย, สายนฺหสมเย. เตน เวส อายสฺมตา อุปมาย เม อาสิตาย ปถวี วา อนุตฺตรา อินฺทฺริยภาวนา ภาวิตจิตฺเตน. เตน โส อายสฺมา อิทํ อฏฺฐวิธํ ภาวนํ ปฏิชานาติ จตูสุ มหาภูเตสุ, กายภาวนํ อุปกจณฺฑาลํ ปุริสเมตกํ ภวตลากาสุ จิตฺตภาวนํ, อิมาหิ ภาวนาหิ ตาย ภาวนาย จ สมถา ปาริปูริมนฺเตหิ. อิเมหิ จตูหิ ปญฺญาปาริปูริมนฺเตหิ. आणि गृहपतीच्या पुत्राच्या उपमेने देखील हे जाणले पाहिजे. ज्याप्रमाणे एखाद्या गृहपतीच्या पुत्राचा विविध रंगांच्या वस्त्रांनी भरलेला पेटारा असावा, आणि तो सकाळी ज्या वस्त्रजोडीची इच्छा करतो, ती सकाळी परिधान करतो, मध्याह्नकाळी आणि सायंकाळी देखील तसेच करतो; त्याचप्रमाणे ते आयुष्मान् चित्ताच्या सुभावितपणामुळे सकाळी ज्या प्रकारच्या विहाराने विहार करण्याची इच्छा करतात, सकाळी त्याच विहाराने विहार करतात, मध्याह्नकाळी आणि सायंकाळी देखील तसेच करतात. म्हणूनच त्या आयुष्मंतांनी माझ्याद्वारे सांगितलेल्या उपमेने, ही पृथ्वी किंवा भावित चित्ताने केलेली अनुत्तर इंद्रियभावना आहे. त्यामुळे ते आयुष्मान् चार महाभूतांमध्ये या आठ प्रकारच्या भावनेचे प्रतिपादन करतात - कायभावना, उपककंडाल, पुरुषमेतक आणि भवतलाकांमध्ये चित्तभावना. या भावनांनी आणि त्या भावनेने शमथ परिपूर्णतेला प्राप्त होतो, आणि शेवटच्या या चार प्रकारांनी प्रज्ञा परिपूर्णतेला प्राप्त होते. ๙๗. กถํ อุปกจณฺฑาลํ ปฏิกูเลสุ ธมฺเมสุ อปฺปฏิกูลสญฺญี วิหรติ? กาโย ปกติยา อปฺปฏิกูลํ กาเย อุทฺธุมาตกสญฺญา สํขิตฺเตน นว สญฺญา อิเม ปฏิกูลา ธมฺมา เจโส อายสฺมา ปฏิกูลโต อชิคุจฺฉิโต กายคตาสติยา ภาวนานุโยคมนุยุตฺโต วิหรติ, น หิ ตสฺส ชิคุจฺฉปฺปหาย จิตฺตํ ปฏิกูลติ. ९७. उपककंडाल प्रतिकूल धर्मांमध्ये अप्रतिकूल संज्ञेने कसा विहार करतो? शरीर हे स्वभावाने अप्रतिकूल आहे. शरीरात सूजलेल्या शरीराची संज्ञा आणि थोडक्यात नऊ संज्ञा, हे प्रतिकूल धर्म आहेत. ते आयुष्मान् प्रतिकूलतेने किळस न मानता कायगतासतीच्या भावनेच्या अभ्यासात युक्त होऊन विहार करतात. हे सत्य आहे की, त्यांच्या किळस मानण्याच्या प्रहाणामुळे चित्त प्रतिकूल मानत नाही. กถํ [Pg.296] อปฺปฏิกูเลสุ ธมฺเมสุ ปฏิกูลสญฺญี วิหรตีติ? กาโย สพฺพโลกสฺส อปฺปฏิกูโล ตํ โส อายสฺมา อสุภสญฺญาย วิหรติ. เอวํ อปฺปฏิกูเลสุ ธมฺเมสุ ปฏิกูลสญฺญี วิหรติ. अप्रतिकूल धर्मांमध्ये प्रतिकूल संज्ञेने कसा विहार करतो? शरीर हे सर्व जगासाठी अप्रतिकूल आहे, ते आयुष्मान् त्यामध्ये अशुभाच्या संज्ञेने विहार करतात. अशा प्रकारे ते अप्रतिकूल धर्मांमध्ये प्रतिकूल संज्ञेने विहार करतात. กถํ ปฏิกูเลสุ จ อปฺปฏิกูเลสุ จ อปฺปฏิกูลสญฺญี วิหรตีติ อปิ สพฺโพยํ โลกสฺส ยมิทํ มุณฺโฑ ปตฺตปาณี กุเลสุ ปิณฺฑาย วิจรติ, เตน จ โส อายสฺมา สุวณฺณทุพฺพณฺเณน อปฺปฏิกูลสญฺญี จิตฺเตน จ กาเยน นิพฺพิทาสหคเตน อปฺปฏิกูลสญฺญี, เอวํ ปฏิกูเลสุ อปฺปฏิกูเลสุ จ ธมฺเมสุ อปฺปฏิกูลสญฺญี วิหรติ. प्रतिकूल आणि अप्रतिकूल दोन्हीमध्ये अप्रतिकूल संज्ञेने कसा विहार करतो? नक्कीच, सर्व लोकांमध्ये जो हा मुंडित डोक्याचा, हातात भिक्षापात्र घेऊन कुळांमध्ये भिक्षेसाठी फिरतो, त्यामुळे ते आयुष्मान् सुवर्ण व दुर्वर्ण (चांगल्या व वाईट रंगाच्या) गोष्टींमध्ये अप्रतिकूल संज्ञेच्या चित्ताने आणि निर्वेदाने युक्त कायेने अप्रतिकूल संज्ञेने युक्त असतात. अशा प्रकारे ते प्रतिकूल आणि अप्रतिकूल धर्मांमध्ये अप्रतिकूल संज्ञेने विहार करतात. กถํ ปฏิกูเลสุ จ ธมฺเมสุ อปฺปฏิกูลสญฺญี วิหรติ? ปฏิกูเลสุ จ ธมฺเมสุ สุภสญฺญิโน อิตฺถิรูเป ปฏิกูเลสุ จ ชิคุจฺฉิโน วินีลกวิปุพฺพเก ตตฺถ โส อายสฺมา ปฏิกูลสญฺญี วิหรติ. प्रतिकूल धर्मांमध्ये अप्रतिकूल संज्ञेने कसा विहार करतो? प्रतिकूल धर्मांमध्ये आणि किळसवाण्या, निळ्या पडलेल्या व पू वाहणाऱ्या स्त्रीरूपासारख्या प्रतिकूल गोष्टींमध्ये ज्यांची शुभसंज्ञा असते, तेथे ते आयुष्मान् प्रतिकूल संज्ञेने विहार करतात. กถํ ปฏิกูเลสุ ธมฺเมสุ ตทุภยํ อภินิวชฺชยิตฺวา อุเปกฺขโก วิหรติ สโต จ สมฺปชาโน จ? อปฺปฏิกูเลสุ จ ธมฺเมสุ สุภสญฺญิโน อิตฺถิรูเป ปฏิกูเลสุ จ ชิคุจฺฉิโน วินีลกวิปุพฺพเก ตทุภยํ อภินิวชฺชยิตฺวา ‘เนตํ มม’‘เนโสหมสฺมิ’‘เนโส เม’ อตฺตาติ วิหรติ. เอวํ ตทุภยํ อภินิวชฺชยิตฺวา อุเปกฺขโก วิหรติ สโต สมฺปชาโน. प्रतिकूल धर्मांमध्ये त्या दोन्ही गोष्टी वर्ज्य करून उपेक्षक, स्मृतीमान आणि संप्रजन्ययुक्त होऊन कसा विहार करतो? अप्रतिकूल धर्मांमध्ये आणि किळसवाण्या, निळ्या पडलेल्या व पू वाहणाऱ्या स्त्रीरूपासारख्या प्रतिकूल गोष्टींमध्ये ज्यांची शुभसंज्ञा असते, त्या दोन्ही गोष्टी वर्ज्य करून 'हे माझे नाही', 'हे मी नाही', 'हा माझा आत्मा नाही' असा विचार करून विहार करतो. अशा प्रकारे त्या दोन्ही गोष्टी वर्ज्य करून उपेक्षक, स्मृतीमान आणि संप्रजन्ययुक्त होऊन विहार करतो. อปโร ปริยาโย. เตธาตุโก โลกสนฺนิวาโส สพฺพพาลปุถุชฺชนานํ อปฺปฏิกูลสญฺญา. ตตฺถ จ อายสฺมา สาริปุตฺโต อปฺปฏิกูลสญฺญี วิหรติ. เอวํ อปฺปฏิกูเลสุ ธมฺเมสุ ปฏิกูลสญฺญี วิหรติ. दुसरा पर्याय असा आहे. त्रिधातूच्या लोकसंनिवासात सर्व अज्ञानी पृथग्जनांची अप्रतिकूल संज्ञा असते. आणि तेथे आयुष्मान् सारिपुत्र अप्रतिकूल संज्ञेने विहार करतात. अशा प्रकारे ते अप्रतिकूल धर्मांमध्ये प्रतिकूल संज्ञेने विहार करतात. กถํ ปฏิกูเลสุ ธมฺเมสุ อปฺปฏิกูลสญฺญี วิหรติ? ปฏิกูลสญฺญิโน สพฺพเสกฺขา อิธ กา เตธาตุเก สพฺพโลเก. ตตฺถ กตโม ภูมิปฺปตฺโต สมาธิผเล สจฺฉิกโต อปฺปฏิกูลสญฺญี วิหรติ? กึ การณํ? น หิ ตํ อตฺถิ ยสฺส โลกสฺส ปหานาย ปฏิกูลสญฺญี อุปฺปาเทยฺย. प्रतिकूल धर्मांमध्ये अप्रतिकूल संज्ञेने कसा विहार करतो? या त्रिधातूच्या सर्व लोकात सर्व शैक्ष प्रतिकूल संज्ञा असणारे आहेत. तेथे भूमीला प्राप्त झालेला आणि समाधीफलाचा साक्षात्कार केलेला कोणता पुद्गल अप्रतिकूल संज्ञेने विहार करतो? याचे कारण काय? कारण की, ज्या लोकाच्या प्रहाणासाठी ती समाधी आहे, तेथे प्रतिकूल संज्ञा उत्पन्न होत नाही. กถํ ปฏิกูเลสุ จ อปฺปฏิกูเลสุ จ ธมฺเมสุ ปฏิกูลสญฺญี วิหรติ? เตธาตุเก โลกสนฺนิวาเส ยาว กามโลกภูมตา หิ ราคานํ วีตราคานํ ปฏิกูลสมตา รูปารูปธาตุํ อปฺปฏิกูลสมตา. ตตฺถ จ อายสฺมา สาริปุตฺโต ปฏิกูลสญฺญี วิหรติ. เอวํ ปฏิกูเลสุ จ อปฺปฏิกูเลสุ จ ธมฺเมสุ ปฏิกูลสญฺญี วิหรติ. प्रतिकूल आणि अप्रतिकूल धर्मांमध्ये प्रतिकूलसंज्ञी होऊन कशा प्रकारे विहार करतो? त्रिधातूंच्या या लोकसंनिवासात, जोपर्यंत रागयुक्त व्यक्तींसाठी कामलोकाची भूमी असते, आणि वीतरागी व्यक्तींसाठी प्रतिकूलतेची समता असते, तसेच रूप आणि अरूप धातूंमध्ये अप्रतिकूलतेची समता असते. तेथे आयुष्यमान सारिपुत्त प्रतिकूलसंज्ञी होऊन विहार करतात. अशा प्रकारे, प्रतिकूल आणि अप्रतिकूल धर्मांमध्ये प्रतिकूलसंज्ञी होऊन विहार करतो. กถํ [Pg.297] ปฏิกูเลสุ จ อปฺปฏิกูเลสุ จ ธมฺเมสุ อปฺปฏิกูลสญฺญี วิหรติ? ยํ กิญฺจิ ปรโต ทุรุตฺตานํ ทุราคตานํ วจนปถานํ ตํ วจนํ อปฺปฏิกูลํ ยาวตา วาจโส อปฺปติรูปา ตถา ชนสฺส อปฺปฏิกูลสญฺญา. ตตฺถ อายสฺมา สาริปุตฺโต อภิญฺญาย สจฺฉิกโต อปฺปฏิกูลสญฺญี วิหรติ, เอวํ ปฏิกูเลสุ จ อปฺปฏิกูเลสุ จ ธมฺเมสุ อปฺปฏิกูลสญฺญี วิหรติ. प्रतिकूल आणि अप्रतिकूल धर्मांमध्ये अप्रतिकूलसंज्ञी होऊन कशा प्रकारे विहार करतो? इतरांकडून बोलले गेलेले जे काही अपशब्द किंवा वाईट शब्द असतात, ते वचन अप्रतिकूल असते; जोपर्यंत ते शब्द अयोग्य असतात, तोपर्यंत लोकांमध्ये अप्रतिकूलसंज्ञा असते. तेथे आयुष्यमान सारिपुत्त अभिज्ञेने जाणून आणि साक्षात करून अप्रतिकूलसंज्ञी होऊन विहार करतात. अशा प्रकारे, प्रतिकूल आणि अप्रतिकूल धर्मांमध्ये अप्रतिकूलसंज्ञी होऊन विहार करतो. ๙๘. กถํ ปฏิกูเลสุ จ อปฺปฏิกูเลสุ จ ธมฺเมสุ ตทุภยํ อภินิวชฺชยิตฺวา อุเปกฺขโก จ วิหรติ สโต จ สมฺปชาโน? ยญฺจ เนสํ สมนุปสฺสติ เย ธมฺมา ทุจฺจริตา, เต ธมฺมา อปฺปฏิกูลา. ตตฺถ อายสฺมา สาริปุตฺโต อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ เย ธมฺมา ทุจฺจริตา, เต ธมฺมา อนิฏฺฐวิปากา. เย ธมฺมา สุจริตา, เต อาจยคามิโน. โส จ สุจริตํ อาจยคามินึ กริตฺวา ทุจฺจริตํ อนิฏฺฐวิปากํ กริตฺวา ตทุภยํ อภินิวชฺชยิตฺวา อุเปกฺขโก วิหรติ. ९८. प्रतिकूल आणि अप्रतिकूल धर्मांमध्ये त्या दोन्हीचा त्याग करून, उपेक्षक, स्मृतिमान आणि संप्रजन्ययुक्त होऊन कशा प्रकारे विहार करतो? तो ज्यांना पाहतो, जे दुश्चरित धर्म आहेत, ते धर्म अप्रतिकूल आहेत. तेथे आयुष्यमान सारिपुत्त असा विचार करतात की, जे दुश्चरित धर्म आहेत, ते अनिष्ट विपाक देणारे आहेत. जे सुचरित धर्म आहेत, ते उपचयगामी आहेत. तो उपचयगामी सुचरिताचे आचरण करून आणि अनिष्ट विपाक देणाऱ्या दुश्चरिताचा त्याग करून, त्या दोन्हीला टाळून उपेक्षक होऊन विहार करतो. อถ ปฏิกูเลสุ จ ธมฺเมสุ อปฺปฏิกูเลสุ จ ปฏิกูลสญฺญี วิหรติ. ตณฺหา ปฏิกูลธมฺมา กึ การณํ? ตณฺหาวเสน หิ สตฺตา ทฺวีหิ ธมฺเมหิ สตฺตา, กพฬีกาเร อาหาเร รสตณฺหาย สตฺตา, ผสฺเส สุขสญฺญาย สตฺตา. ตตฺถายสฺมา สาริปุตฺโต กพฬีกาเร จ อาหาเร ปฏิกูลสญฺญี วิหรติ, ผสฺเส จ ทุกฺขสญฺญี วิหรติ. เอวํ ปฏิกูเลสุ จ อปฺปฏิกูเลสุ จ ปฏิกูลสญฺญี วิหรติ. त्यानंतर, प्रतिकूल आणि अप्रतिकूल धर्मांमध्ये प्रतिकूलसंज्ञी होऊन विहार करतो. तृष्णा हा प्रतिकूल धर्म आहे, याचे कारण काय? कारण तृष्णेच्या वशतेमुळे प्राणी दोन धर्मांमध्ये आसक्त होतात—कवळीकार आहारात रस-तृष्णेमुळे आसक्त होतात, आणि स्पर्शात सुखसंज्ञेमुळे आसक्त होतात. तेथे आयुष्यमान सारिपुत्त कवळीकार आहारात प्रतिकूलसंज्ञी होऊन विहार करतात, आणि स्पर्शात दुःखसंज्ञी होऊन विहार करतात. अशा प्रकारे, प्रतिकूल आणि अप्रतिकूल धर्मांमध्ये प्रतिकूलसंज्ञी होऊन विहार करतो. กถํ ปฏิกูเลสุ จ ธมฺเมสุ อปฺปฏิกูเลสุ จ ธมฺเมสุ อปฺปฏิกูลสญฺญี วิหรติ? ตณฺหากฺขยํ อนุตฺตรํ นิพฺพานํ ตถา พาลปุถุชฺชนานํ ปฏิกูลสญฺญา ปหตสญฺญา จ. ตตฺถายสฺมโต สาริปุตฺตสฺส อปฺปฏิกูลสญฺญา อพฺยาปาทสญฺญา จ สามํ ปญฺญาย ปสฺสิตฺวา เอวํ ปฏิกูเลสุ จ ธมฺเมสุ อปฺปฏิกูลสญฺญี วิหรติ. प्रतिकूल आणि अप्रतिकूल धर्मांमध्ये अप्रतिकूलसंज्ञी होऊन कशा प्रकारे विहार करतो? तृष्णेचा क्षय असणारे अनुत्तर निर्वाण हे बाल-पृथग्जनांसाठी प्रतिकूलसंज्ञा आणि प्रहातसंज्ञा असणारे असते. तेथे आयुष्यमान सारिपुत्त स्वतः प्रज्ञेने पाहून, अप्रतिकूलसंज्ञा आणि अव्यापादसंज्ञा ठेवून, अशा प्रकारे प्रतिकूल आणि अप्रतिकूल धर्मांमध्ये अप्रतिकूलसंज्ञी होऊन विहार करतात. กถํ ปฏิกูเลสุ จ อปฺปฏิกูเลสุ จ ธมฺเมสุ อปฺปฏิกูลสญฺญี วิหรติ? ตติเย จ นิพฺพาเน ปฏิกูลสญฺญิโน ยเสน จ กิตฺตินิ จ อปฺปฏิกูลสญฺญิโน. ตตฺถายสฺมา สาริปุตฺโต อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ สมฺมาปญฺญาย ปฏิชานนฺโต ปฏิกูลญฺจ อปฺปฏิกูลญฺจ ธมฺมํ ตทุภยํ อภินิวชฺชยิตฺวา อปฺปฏิกูลสญฺญี วิหรติ. प्रतिकूल आणि अप्रतिकूल धर्मांमध्ये अप्रतिकूलसंज्ञी होऊन कशा प्रकारे विहार करतो? तिसऱ्या निर्वाणात प्रतिकूलसंज्ञा असणाऱ्याला, यश आणि कीर्तीमध्ये अप्रतिकूलसंज्ञा असते. तेथे आयुष्यमान सारिपुत्त आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण यांना यथाभूत सम्यक् प्रज्ञेने जाणून, प्रतिकूल आणि अप्रतिकूल या दोन्ही धर्मांचा त्याग करून, अप्रतिकूलसंज्ञी होऊन विहार करतात. กถํ [Pg.298] ปฏิกูลํ อปฺปฏิกูลญฺจ ธมฺมํ ตทุภยํ อภินิวชฺชยิตฺวา อุเปกฺขโก วิหรติ? สโต จ สมฺปชาโน จ, ยญฺจ สมนุปสฺสติ อนุนโย อปฺปฏิกูโล ธมฺโม ปฏิโฆ จ ปฏิกูโล ธมฺโม, ตตฺถายสฺมา สาริปุตฺโต อนุนยสฺส ปฏิฆปฺปหีนตฺตา อุเปกฺขโก วิหรติ สโต สมฺปชาโน จ. ยญฺจสฺส สมนุปสฺสติ อยํ ปญฺจวิธา อนุตฺตรา อินฺทฺริยภาวนา. อยํ สุตฺตนิทฺเทโส. प्रतिकूल आणि अप्रतिकूल या दोन्ही धर्मांचा त्याग करून, स्मृतिमान आणि संप्रजन्ययुक्त होऊन उपेक्षक कशा प्रकारे विहार करतो? तो असे पाहतो की, अनुनय हा अप्रतिकूल धर्म आहे आणि प्रतिघ हा प्रतिकूल धर्म आहे. तेथे आयुष्यमान सारिपुत्त अनुनय आणि प्रतिघ नष्ट झाल्यामुळे उपेक्षक, स्मृतिमान आणि संप्रजन्ययुक्त होऊन विहार करतात. तो जे काही वारंवार पाहतो, ही पाच प्रकारची अनुत्तर इंद्रियभावना आहे. हा सुत्तनिद्देस आहे. ๙๙. ตตฺถ กตโม เทสนาหาโร? อิมมฺหิ สุตฺเต กึ เทสิตพฺพํ? ตตฺถ วุจฺจเต, อิมมฺหิ สุตฺเต ทิฏฺฐธมฺมสุขวิหาโร เทสิโต, ตถา วิมุตฺตํ จิตฺตํ ปจฺจเวกฺขณา จ อธิปญฺญาธมฺมํ เทสิตํ. ९९. तेथे देशनाहार कोणता आहे? या सुत्तात काय उपदेशिले आहे? तेथे सांगितले आहे की, या सुत्तात दृष्टधम्मसुखविहार उपदेशिला आहे, तसेच विमुक्त चित्त, प्रत्यवेक्षण आणि अधिपज्ञाधम्म उपदेशिला आहे. ตตฺถ กตโม วิจโย? เย กาเย กายานุปสฺสิโน วิหรนฺติ, เตสํ จิตฺตํ อนุนยปฺปฏิเฆน น วิหรติ อนุนยปฺปฏิเฆน จาภิรมมานสฺส จิตฺตํ สมคฺคตํ ภวิสฺสตีติ ภาวนาย พลเมตํ, อยํ วิจโย หาโร. तेथे विचयहार कोणता आहे? जे कायेमध्ये कायानुपस्सी होऊन विहार करतात, त्यांचे चित्त अनुनय-प्रतिघाने युक्त होऊन विहार करत नाही; आणि अनुनय-प्रतिघाने रममाण न होणाऱ्याचे चित्त समतायुक्त होईल, हे भावनेचे बल आहे. हा विचयहार आहे. ตตฺถ กตโม ยุตฺติหาโร? กายภาวนาย จ จิตฺตภาวนาย จ น กิญฺจิ สพฺรหฺมจารี อติมญฺญิสฺสตีติ. อตฺถิ เอสา ยุตฺติ, อยํ ยุตฺติหาโร. तेथे युक्तिहार कोणता आहे? कायभावना आणि चित्तभावनेमुळे कोणताही सब्रह्मचारी कोणाचाही अवमान करणार नाही. ही युक्ती येथे आहे. हा युक्तिहार आहे. ตตฺถ กตโม ปทฏฺฐาโน หาโร? กายภาวนาย ปฐมสฺส สติ อุปฏฺฐานสฺส ปทฏฺฐานํ. ยา ปถวีสมจิตฺตตา, สา อนิจฺจานุปสฺสนาย ปทฏฺฐานํ. तेथे पदस्थानहार कोणता आहे? कायभावना ही पहिल्या सतिपट्ठानाचे पदस्थान आहे. जी पृथ्वीसम चित्तता आहे, ती अनित्यानुपश्यनेचे पदस्थान आहे. ตตฺถ กตโม ลกฺขโณ? ยํ ปถวีสเมน เจตสา วิหรติ อตฺตานุปสฺสี ปถวีสเมน คิหี วิหรติ. โก อตฺโถ ปถวีสเมนาติ? ยถา เย จ เสโลปมตาย อกมฺมยุตฺตา เอวเมว ปถวีสโม อยํ หิริยตาย. อยํ ลกฺขโณ. तेथे लक्षणहार कोणता आहे? जो पृथ्वीसम चित्ताने विहार करतो, तो स्वतःचे वारंवार निरीक्षण करणारा असतो; पृथ्वीसम चित्ताने गृहस्थही विहार करतो. 'पृथ्वीसम' याचा अर्थ काय? जसे जे लोक शिलापर्वतासारखे अचल असतात, तसेच हा मनुष्य लज्जेमुळे पृथ्वीसम असतो. हा लक्षणहार आहे. ตตฺถ กตโม จตุพฺยูโห หาโร? อิมมฺหิ พฺยากรเณ โก ตสฺส อายสฺมโต อธิปฺปาโย? เย เกจิ อรหนฺตา อินฺทฺริยภาวนํ อากงฺขิยนฺติ, เต ปถวีสมตํ อุปฺปาทยิสฺสนฺตีติ. อยํ อธิปฺปาโย. तेथे चतुर्व्यूहहार कोणता आहे? या व्याकरणात त्या आयुष्यमानांचा काय अभिप्राय आहे? जे कोणी अरहंत इंद्रियभावनेची आकांक्षा करतात, ते पृथ्वीसमता उत्पन्न करतील. हा त्यांचा अभिप्राय आहे. ตตฺถ กตโม อาวฏฺโฏติ? นตฺถิ อาวฏฺฏสฺส ภูมิ. तेथे आवर्तहार कोणता आहे? आवर्तहारासाठी कोणतीही भूमी नाही. ตตฺถ [Pg.299] กตโม วิภตฺติ? โย กายานุปสฺสี วิหรติ, โส ปถวีสมจิตฺตตํ ปฏิลภิสฺสตีติ น เอกํเสน. กึ การณํ? เย ขณฺฑกาทิฉินฺนกาทิโน, น เต ปถวีสมจิตฺตตํ ปฏิลภนฺติ. สพฺพา กายคตาสติ เสกฺขภาวนาย นิพฺพานํ ผลํ, อยํ วิภตฺติ. तेथे विभक्तिहार कोणता आहे? जो कायानुपस्सी होऊन विहार करतो, त्याला पृथ्वीसम चित्तता प्राप्त होईलच असे एकांताने नाही. याचे कारण काय? ज्यांचे शील खंडित किंवा छिन्न झालेले असते, त्यांना पृथ्वीसम चित्तता प्राप्त होत नाही. शैक्ष भावनेद्वारे सर्व कायागतास्मृतीचे फळ निर्वाण आहे. हा विभक्तिहार आहे. ตตฺถ กตโม ปริวตฺตโน หาโร? เย กายานุปสฺสิโน วิหริสฺสนฺติ, เตสํเยว กายปจฺจยา อุปฺปชฺเชยฺย อาสวา วิฆาตปริฬาหา, อยํ ปริวตฺตโน หาโร. तेथे परिवर्तनहार कोणता आहे? जे कायानुपस्सी होऊन विहार करतील, त्यांनाच कायेच्या प्रत्ययामुळे क्लेश आणि परिदाह देणारे आसव उत्पन्न होऊ शकतात. हा परिवर्तनहार आहे. ตตฺถ กตโม โอตรโณ? ปญฺจกฺขนฺธา อวิติณฺณา พาวีสตินฺทฺริยานิ, ตถา ยํ มนินฺทฺริยํ, ตํ มโนธาตุ มนายตนญฺจ. ยํ สมาธินฺทฺริยํ, ตํ ธมฺมธาตุ ธมฺมายตนญฺจ. อยํ โอตรโณ หาโร. तेथे अवतरणहार कोणता आहे? बावीस इंद्रिये पंचस्कंधांच्या पलीकडे गेलेली नाहीत. तसेच, जे मनिंद्रिय आहे, ते मनोधातू आणि मनायतनही आहे. जे समाधींद्रिय आहे, ते धर्मधातू आणि धर्मायतनही आहे. हा अवतरणहार आहे. ตตฺถ กตโม โสธโน หาโร? เย จ มนสา จตฺตาโร ภาเวตพฺพา, เต สพฺเพ ภาวิตา ยํ ตํ มเนน ปหีเน ปตฺตพฺพตํ สพฺพตฺถ เอตสฺส จ อตฺถาย อารมฺโภ, โส อตฺโถ สุทฺโธ. อยํ โสธโน หาโร. तेथे शोधनहार कोणता आहे? मनाने ज्या चार धर्मांची भावना करायची आहे, त्या सर्वांची मनाने भावना केली असता, जे प्रहाण करून प्राप्त करायचे आहे, त्या सर्वांच्या प्राप्तीसाठीच हा आरंभ आहे; तो अर्थ शुद्ध आहे. हा शोधनहार आहे. ตตฺถ กตโม อธิฏฺฐาโน? อยํ สมาธิ เอกตฺตตาย ปญฺญตฺโต, ฉ กายา เอกตฺตตาย ปญฺญตฺตา. ปญฺจินฺทฺริยานิ รูปีนิ รูปกาโย. ฉ เวทนากายา เวทนากาโย. ฉ สญฺญากายา สญฺญากาโย. ฉ เจตนากายา เจตนากาโย. ฉ วิญฺญาณกายา วิญฺญาณกาโย. สพฺเพปิ เอเต ธมฺมา ธมฺมกาโยติเยว สงฺขํ คจฺฉนฺติ. อยํ อธิฏฺฐาโน. तेथे अधिष्ठान (अधिट्ठान) हार कोणता? हा समाधी एकत्वामध्ये (एकत्तता) प्रज्ञप्त केला आहे, आणि सहा काय (समूह) एकत्वामध्ये प्रज्ञप्त केले आहेत. रूप असणारी पाच इंद्रिये म्हणजे 'रूपकाय' होय. सहा वेदना-काय म्हणजे 'वेदनाकाय' होय. सहा संज्ञा-काय म्हणजे 'संज्ञाकाय' होय. सहा चेतना-काय म्हणजे 'चेतनाकाय' होय. सहा विज्ञाण-काय म्हणजे 'विज्ञाणकाय' होय. हे सर्वच धर्म केवळ 'धम्मकाय' या संज्ञेस प्राप्त होतात. हा 'अधिष्ठान' हार होय. ปริกฺขาโรติ สมาปตฺติโกสลฺลญฺจ วีถิโกสลฺลญฺจ เหตุ. ยญฺจ โคจรโกสลฺลํ ยญฺจ กลฺลํ ตํ โกสลฺลํ ปจฺจโย. โวทานโกสลฺลํ เหตุ, กลฺลํ ปจฺจโย. สุขํ เหตุ, อพฺยาปชฺชํ ปจฺจโย. อยํ ปริกฺขาโร. 'परिक्खार' (परिकार) हार म्हणजे: समापत्ती-कौशल्य (समापत्तीमध्ये निपुणता) आणि वीथी-कौशल्य (चित्तवीथीमध्ये निपुणता) हे हेतू (कारण) आहेत. जे गोचर-कौशल्य (गोचरामध्ये निपुणता) आणि जे कल्ल-कौशल्य (सज्जतेमध्ये निपुणता) आहे, ते प्रत्यय (पच्चय) आहे. वोदान-कौशल्य (परिशुद्धीमध्ये निपुणता) हा हेतू आहे, कल्ल (सज्जता) हा प्रत्यय आहे. सुख हा हेतू आहे, अव्यापज्झ (अव्यापाद) हा प्रत्यय आहे. हा 'परिक्खार' हार होय. ตตฺถ กตโม สมาโรปโนติ? ยถา ปถวี สุจิมฺปิ นิกฺขีปนฺเต อสุจิมฺปิ นิกฺขิตฺเต ตาทิเสเยว เอวํ กาโย มนาปิเกหิปิ ผสฺเสหิ อมนาปิเกหิปิ ผสฺเสหิ ตาทิโสเยว ปฏิฆสมฺผสฺเสน วา สุขาย เวทนาย ตาทิสํ โย จิตฺตํ. อิทํ สุตฺตํ วิภตฺตํ สโอปมฺมํ อุคฺฆฏิตญฺญุสฺส ปุคฺคลสฺส วิภาเคน. ตตฺถ สมาโรปนาย อวกาโส นตฺถิ. तेथे समारोपन (समारोपना) हार कोणता? ज्याप्रमाणे पृथ्वीवर स्वच्छ वस्तू ठेवली किंवा अस्वच्छ वस्तू ठेवली, तरी ती तशीच राहते; त्याचप्रमाणे हा काय (शरीर) अनुकूल स्पर्शांनी किंवा प्रतिकूल स्पर्शांनी तसाच राहतो, आणि प्रतिघ-स्पर्शाने किंवा सुखकारक वेदनेने चित्तही तसेच राहते. हे उपमेसह असलेले सुत्त 'उग्घटितञ्ञू' (शीघ्र बुद्धीच्या) पुद्गलासाठी विश्लेषणाद्वारे विभक्त (स्पष्ट) केले गेले आहे. तेथे समारोपणाचा कोणताही वाव (अवकाश) नाही. ๑๐๐. ตตฺถ [Pg.300] กตมํ สุตฺตํ สํกิเลสภาคิยํ? ยโต จ กุสเลหิ ธมฺเมหิ น วิโรธติ, น วฑฺฒติ, อิมํ อาทีนวํ ภควา เทเสติ, ตสฺมา ฉนฺนํ วิวเรยฺย, วิวฏํ นาติวสฺสติ, ตโต อาทีนวโต วิวเรยฺยาติ ตํ ตีหิ ธมฺเมหิ นาภิธํสิตาติ อสุภสญฺญาย ราเคน นาภิธํสิยติ. เมตฺตาย โทเสน นาภิธํสิยติ. วิปสฺสนา โมเหน นาภิธํสิยติ. เอวญฺจสฺส โย โย ธมฺโม ปฏิปกฺโข ตมฺหิ ตมฺหิ ธมฺเม ปริปูริสฺสติ. โย ตสฺส ธมฺมสฺส อกุสโล ธมฺโม ปฏิปกฺโข, เตน นาธิวาสิยติ. १००. तेथे संकिलेसभागिय (संक्लेशभागीय) सुत्त कोणते? जेव्हा कुशल धर्मांशी विरोध होत नाही आणि ते वाढत नाहीत, तेव्हा भगवान हा आदीनव (दोष/धोका) दाखवून देतात. म्हणून, 'झाकलेले उघडावे, उघड्यावर पाऊस पडत नाही (गळत नाही)'; म्हणून आदीनवापासून ते उघडावे. ते तीन धर्मांनी नष्ट होत नाही: अशुभसंज्ञेमुळे रागाद्वारे त्याचा नाश होत नाही; मेत्तेमुळे (मैत्रीमुळे) द्वेषाद्वारे त्याचा नाश होत नाही; विपस्सेनेमुळे मोहाद्वारे त्याचा नाश होत नाही. आणि अशा प्रकारे, ज्या ज्या धर्माचा जो जो प्रतिपक्ष (विरोधी) धर्म आहे, तो त्या त्या धर्मामध्ये परिपूर्ण होईल. त्या कुशल धर्माचा जो अकुशल धर्म प्रतिपक्ष आहे, तो सहन केला जात नाही (त्याचा स्वीकार केला जात नाही). อปโร ปริยาโย. เย อิเม ธมฺมา อตฺตนา น สกฺโกติ วุฏฺฐานํ, เต เอเต ธมฺมา เทสิตา. ฉนฺนมติวสฺสตีติ เตหิ วิตกฺกํ เยน จ สกฺกา ปุน เทสิตํ จิตฺตํ วิภาเวตุํ ปริโยทาเปตุํ วิเวกนินฺนสฺส วิเวกโปณสฺส วิเวกปพฺภารสฺส วุทฺธึ วิรูฬฺหึ เวปุลฺลตํ อาปชฺชติ กุสเลสุ ธมฺเมสุ, เสยฺยถาปิ นาม อุปฺปลํ วา กุมุทํ วา ปทุมํ วา อุทเก สุกฺกปกฺเข จนฺโท ยาวรตฺติ ยาวทิวโส อาคจฺฉติ, ตสฺส วุทฺธิเยว ปาฏิกงฺขิตพฺพา, น ปริหานิ, เอวํวิธํ ตํ จิตฺตํ นาภิธํสิยติ. อปโรเปตฺถ โย อกูโฏ อสโฐ อมายาวี อุชุ ปุริโส ยถาภูตํ อตฺตานํ อาวิกโรติ. ตตฺถ โย ฉาเทติ ตสฺส อกุสลา ธมฺมา จิตฺตํ อนุธาวนฺติ. ฉนฺนมติวสฺสตีติ โย ปน โหติ อสโฐ อกูโฏ อมายาวี อุชุ ปุริโส ยถาภูตํ อตฺตานํ อาวิกโรติ. ตสฺส จิตฺตํ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ น วิทฺธํสิยติ, อยํ สุตฺตตฺโถ. दुसरी पद्धत (पर्याय): जे लोक स्वतःहून (अकुशल धर्मांतून) वर उठण्यास असमर्थ आहेत, त्यांच्यासाठी हे धर्म उपदेशिले आहेत. 'झाकलेल्यावर पाऊस पडतो' (छन्नमतिवस्सति) म्हणजे त्यांच्या वितर्काद्वारे, उपदेशिलेल्या चित्ताला पुन्हा स्पष्ट करणे आणि शुद्ध करणे शक्य आहे. जो विवेकाकडे झुकलेला (विवेकनिन्न), विवेकाकडे प्रवृत्त (विवेकपोण) आणि विवेकाकडे भारलेला (विवेकपब्भार) आहे, तो कुशल धर्मांमध्ये वृद्धी, वाढ आणि विपुलता प्राप्त करतो. जसे की पाण्यात उगवलेले निळे कमळ (उप्पल), पांढरे कमळ (कुमुद) किंवा तांबडे कमळ (पदुम) असो, किंवा शुक्लपक्षातील चंद्र असो, जशी रात्र आणि दिवस पुढे सरकतात, तशी त्याची केवळ वृद्धीच अपेक्षित असते, ऱ्हास नाही; त्याचप्रमाणे अशा चित्ताचा नाश होत नाही. येथे दुसराही एक प्रकार आहे: जो निष्कपट (अकूट), कपटविरहित (अशठ), मायारहित (अमायावी) आणि सरळ (उजू) मनुष्य आहे, तो स्वतःला जसे आहे तसे प्रकट करतो. तेथे जो (आपले दोष) लपवतो, त्याच्या चित्ताच्या मागे अकुशल धर्म धावतात. 'झाकलेल्यावर पाऊस पडतो' (छन्नमतिवस्सति); परंतु जो कपटविरहित, निष्कपट, मायारहित आणि सरळ मनुष्य असतो, तो स्वतःला जसे आहे तसे प्रकट करतो. त्याचे चित्त अकुशल धर्मांद्वारे नष्ट होत नाही. हा सुत्ताचा अर्थ (सुत्तत्थ) आहे. ๑๐๑. ตตฺถ กตมา เทสนา? อิธ เทสิตา ทส อกุสลกมฺมปถา อธิวสฺสนตาย ทส กุสลกมฺมปถา อนธิวสฺสนตาย อกุสเลหิ น วิสุชฺฌติ. ยถา วุตฺตํ ภควตา ‘‘จิตฺตสํกิเลสา, ภิกฺขเว, สตฺตา สํกิลิสฺสนฺตี’’ติ. १०१. तेथे देसना (देशना) हार कोणता? येथे उपदेशिलेले दहा अकुशल कर्मपथ हे (क्लेशरूपी पावसाने) भिजल्यामुळे (अधिवस्सनता) आणि दहा कुशल कर्मपथ हे न भिजल्यामुळे (अनधिवस्सनता) अकुशल धर्मांनी मलिन होत नाहीत. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे: 'भिक्खूहो! चित्ताच्या संक्लेशाने (मलिनेतेने) प्राणी संक्लिष्ट (मलिन) होतात.' ตตฺถ กตโม วิจโย? ยสฺเสวํ จิตฺตํ อธิวาสิยติ, ตสฺส พุชฺฌิตสฺส ยํ ภเวยฺย กูเฏยฺย, ตํ อานนฺตริเยนปิ สตฺถริ วา คุณานุกมฺปนตาย, อยํ วิจโย. तेथे विचय (विचय) हार कोणता? ज्याचे चित्त अशा प्रकारे (अकुशल धर्मांना) थारा देते (सहन करते), त्या जागृत झालेल्या पुरुषाचे जे काही कपट (कुटिलता) असू शकते, ते शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) गुणांविषयीच्या करुणेमुळे तात्काळ (आनंतर्य) दूर होते. हा 'विचय' हार होय. ตตฺถ กตมา ยุตฺตีติ? เอวํ อนธิวสิยนฺตํ จิตฺตํ วุฏฺฐาติ. วุฏฺฐิตํ ปติฏฺฐหติ กุสเลสุ ธมฺเมสูติ อตฺถิ เอสา ยุตฺติ. तेथे युत्ती (युक्ति) हार कोणता? अशा प्रकारे (अकुशल धर्मांना) थारा न देणारे चित्त वर उठते (मुक्त होते). वर उठलेले चित्त कुशल धर्मांमध्ये प्रतिष्ठित होते, हीच 'युत्ती' (तर्कसंगती) होय. ปทฏฺฐานนฺติ [Pg.301] ฉนฺนมติวสฺสตีติ ฉนฺนํ อสํวรานํ ปทฏฺฐานํ, วิวฏํ นาติวสฺสตีติ อฉนฺนํ สํวรณานํ. ตสฺมา ฉนฺนํ วิวเรยฺย วิวฏํ นาติวสฺสตีติ เทสนาย ปทฏฺฐานํ. 'पदट्ठान' (पदस्थान/निकटचे कारण) म्हणजे: 'झाकलेल्यावर पाऊस पडतो' (छन्नमतिवस्सति) - येथे 'झाकलेले' हे असंयमाचे (असंवर) पदट्ठान (निकटचे कारण) आहे. 'उघड्यावर पाऊस पडत नाही' (विवटं नातिवस्सति) - येथे 'उघडे' (अनावृत) हे संयमाचे (संवर) पदट्ठान आहे. म्हणून, 'झाकलेले उघडावे, उघड्यावर पाऊस पडत नाही' हे या देशनेचे पदट्ठान आहे. ลกฺขโณติ ฉนฺนมติวสฺสตีติ เย เกจิ วิจิตฺเตน ฉนฺเนน เอกลกฺขณา ธมฺมา สพฺเพ เต อวิทฺธํสิยนฺติ. ตสฺมา ฉนฺนํ วิวเรยฺย. วิวฏํ นาติวสฺสตีติ เย เกจิ เตน อจฺฉนฺเนน เอกลกฺขณา ธมฺมา สพฺเพ เต นาติวสฺสนฺตีติ ลกฺขโณ หาโร. 'लक्खण' (लक्षण) हार म्हणजे: 'झाकलेल्यावर पाऊस पडतो' (छन्नमतिवस्सति) - जे काही विविध प्रकारच्या झाकलेल्या गोष्टींशी समान लक्षण असणारे धर्म आहेत, ते सर्व नष्ट होतात. म्हणून 'झाकलेले उघडावे, उघड्यावर पाऊस पडत नाही' - जे काही त्या उघड्या (अनावृत) गोष्टीशी समान लक्षण असणारे धर्म आहेत, त्या सर्वांवर पाऊस पडत नाही (ते क्लेशांनी मलिन होत नाहीत). हा 'लक्खण' हार होय. ตตฺถ กตโม จตุพฺยูโห หาโร? อิมมฺหิ สุตฺเต ภควโต โก อธิปฺปาโย? เยสํ เกสญฺจิ จิตฺตํ อกุสลา ธมฺมา อธิปฏิเทสิตา เต ยถาธมฺมํ ปฏิกริสฺสนฺตีติ อยํ ตตฺถ ภควโต อธิปฺปาโย. อยํ จตุพฺยูโห หาโร. तेथे चतुब्यूह (चतुर्व्यूह) हार कोणता? या सुत्तामध्ये भगवंतांचा काय अभिप्राय आहे? ज्या कोणाच्या चित्ताला अकुशल धर्मांविषयी उपदेश केला गेला आहे, ते धर्माच्या नियमांनुसार त्याचे निवारण (प्रतिकार) करतील, हाच तेथे भगवंतांचा अभिप्राय आहे. हा 'चतुब्यूह' हार होय. อาวฏฺโฏติ ยํ ฉนฺนํ ตํ ทุวิธํ กมฺปมานํ สมุจฺฉิตพฺโพ. อานนฺตริยสมาธีนํ. ตตฺถ ปสฺสทฺธิยญฺจ มาโน อาสเว วฑฺเฒติ, อสฺสทฺธิเยน จ ปมาทํ คจฺฉติ, ปมาเทน โอนมติ, อุนฺนฬภาวํ คจฺฉติ. วุตฺตํ เจตํ ภควตา ‘‘อุนฺนฬานํ ปมตฺตานํ เตสํ วฑฺฒนฺติ อาสวา’’ติ จตฺตาริ ตานิ อุปาทานานิ, ยานิ จตฺตาริ อุปาทานานิ, เต ปญฺจุปาทานกฺขนฺธา ภวนฺติ. อิมานิ สจฺจานิ ทุกฺขญฺจ สมุทโย จ. ตสฺมา ฉนฺนํ วิวเรยฺยาติ เยน เหตุนา, เต อาสวา วฑฺฒนฺติ. เตสํ ปหีนตฺตา อาสวา ปหียนฺเต. ตตฺถ อปฺปมาเทน อสฺสทฺธิยํ ปหียติ อุทฺธจฺจกุกฺกุจฺจปฺปหาเนน โอฬาริกตา ตสฺส ทฺเว ธมฺมา น สมโถ จ ภาวนา จ ปาริปูรึ คจฺฉนฺติ. โย เตสํ อาสวานํ ขโย, อยํ นิโรโธ. อิมานิ จตฺตาริ สจฺจานิ, อยํ อาวฏฺโฏ. 'आवट्ट' (आवर्त) हार म्हणजे: जे झाकलेले आहे, ते दोन प्रकारच्या कंपायमान गोष्टींचे समूळ उच्चाटन करणारे आहे. आनंतर्य-समाधींमध्ये, तेथे प्रस्सद्धी (प्रश्रब्धी) आणि मान (अहंकार) आसवांना वाढवतात, आणि अश्रद्धेमुळे मनुष्य प्रमादाला (बेसावधपणाला) प्राप्त होतो, प्रमादामुळे तो अधोगतीला जातो आणि उद्धतपणाला (उन्मत्ततेला) प्राप्त होतो. भगवंतांनी म्हटलेच आहे: 'जे उद्धत आणि प्रमत्त (बेसावध) आहेत, त्यांचे आसव वाढतात.' ती चार उपादाने आहेत; जी चार उपादाने आहेत, तीच पाच उपादानस्कंध बनतात. हे दुःख आणि समुदय हे सत्य आहेत. म्हणून, 'झाकलेले उघडावे' कारण ज्या हेतूने ते आसव वाढतात, त्यांचा त्याग केल्यामुळे आसव नष्ट होतात. तेथे अप्पमादाने (अप्रमादाने) अश्रद्धा नष्ट होते. उद्धच्च-कुक्कुच्च (औद्धत्य आणि कौकृत्य) नष्ट केल्याने, त्याच्या स्थूलतेमुळे, त्याचे समथ (शमथ) आणि भावना हे दोन धर्म परिपूर्णतेला जात नाहीत. त्या आसवांचा जो क्षय आहे, तो 'निरोध' होय. ही चार सत्ये आहेत. हा 'आवट्ट' हार होय. ตตฺถ กตโม วิภตฺติ หาโร? ฉนฺนมติวสฺสตีติ น เอกํโส. กึ การณํ? ยสฺส อสฺสา นิวตฺตนา ยถาปิ เสกฺขานํ. ยถาวุตฺตํ ภควตา – तेथे विभत्ती (विभक्ती) हार कोणता? 'झाकलेल्यावर पाऊस पडतो' हे एकांतिक (निश्चित) नाही. कारण काय? ज्याप्रमाणे सेख (शैक्ष) पुद्गलांचेही (अकुशल धर्मांपासून) परावर्तन (निवर्तन) होते. जसे भगवंतांनी म्हटले आहे – ‘‘กิญฺจาปิ เสกฺโข ปกเรยฺย ปาปํ, กาเยน วาจาย อุท เจตสา วา; อภพฺโพ หิ ตสฺส ปริคุหนาย, อภพฺพตา ทิฏฺฐปทสฺส โหตี’’ติ. 'जरी सेख (शैक्ष) पुद्गलाने कायेने, वाचेने किंवा मनाने काही पाप केले, तरी तो ते लपविण्यास असमर्थ असतो; कारण सत्यपदाचे (निर्वाणाचे) दर्शन घेतलेल्या व्यक्तीमध्ये अशी असमर्थता (अभव्यता) असते.' กิญฺจาปิ [Pg.302] เตสํ นิวารณํ จิตฺตํ โหติ. อปิ ตุ อปฺปจฺจยา สมาเย จ เต นิทฺทิสิตพฺพา, อยํ วิภตฺติหาโร. जरी त्यांचे चित्त नीवरणयुक्त (अडथळ्यांनी युक्त) असले, तरीही प्रत्यय (कारण) नसताना आणि योग्य वेळी ते धर्म निर्देशित केले पाहिजेत. हा 'विभत्ती' हार होय. ตตฺถ กตโม ปริวตฺตโน หาโร. ฉนฺนมติวสฺสตีติ ยสฺส เย ธมฺมา สพฺพํ อนวิวฏํ อติวสฺสิยติ, วิวฏํ นาติวสฺสติ, อวคุณนฺตํ นาติวสฺสติ. อยํ ปริวตฺตโน หาโร. तेथे परिवर्तन (परिवत्तन) हार कोणता? 'झाकलेल्यावर पाऊस पडतो' (छन्नमतिवस्सति) म्हणजे ज्या व्यक्तीचे जे धर्म पूर्णपणे अनावृत (संसारात अडकलेले) आहेत, त्यावर पाऊस पडतो; जो आवृत (मुक्त/विवट्ट) आहे, त्यावर पाऊस पडत नाही; आणि जो आपले दोष लपवत नाही (प्रकट करतो), त्यावर पाऊस पडत नाही. हा 'परिवत्तन' हार होय. ตตฺถ กตโม เววจโน หาโร. ฉนฺนนฺติ อาวุตํ นิวุตํ ปิหิตํ ปฏิกุชฺชิตํ สญฺฉนฺนํ ปโรธํ, วิวฏํ นาติวสฺสตีติ ยสฺส เต ธมฺมา ปพฺพชฺชิตา วิโนทํ นาธิวสฺสิตา วนฺติกตาติ, อยํ เววจโน หาโร. त्यात वेवचन हार कोणता? 'छन्न' (झाकलेले) म्हणजे वेढलेले, आच्छादित, बंद केलेले, उपडे केलेले, पूर्णपणे झाकलेले आणि कोंडलेले. 'उघडे केलेल्यावर पाऊस पडत नाही' म्हणजे ज्या प्रव्रजितासाठी ते (अकुशल) धर्म पर्जन्यवृष्टीने ओले न होण्याच्या अवस्थेत आणले गेले आहेत (म्हणजेच नष्ट केले गेले आहेत). हा वेवचन हार होय. ตตฺถ กตโม ปญฺญตฺติ หาโร. ฉนฺนมติวสฺสตีติ กิเลสภาคิยปญฺญตฺตํ วิวฏํ นาติวสฺสตีติ สธมฺมกิจฺจํ ยํ ปฏิปทา ปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ, ตสฺมา หิ ฉนฺนํ วิวเรยฺยาติ อนุสาสนปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ, วิวฏํ นาติวสฺสตีติ นิทฺธานปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ, อยํ ปญฺญตฺติ หาโร. त्यात प्रज्ञप्ति हार कोणता? 'झाकलेल्यावर पाऊस पडतो' हे क्लेश-भागीयामध्ये प्रज्ञप्त केले आहे. 'उघड्यावर पाऊस पडत नाही' हे स्वतःचे सद्धर्म-कार्य आहे, जे प्रतिपदा प्रज्ञप्तीने प्रज्ञप्त केले आहे. म्हणूनच, 'झाकलेले उघडावे' असे अनुशासनी प्रज्ञप्तीने प्रज्ञप्त केले आहे. 'उघड्यावर पाऊस पडत नाही' हे निधान प्रज्ञप्तीने प्रज्ञप्त केले आहे. हा प्रज्ञप्ति हार होय. ตตฺถ กตโม โอตรโณ หาโร? ฉนฺนมติวสฺสตีติ ตโย กิเลสา ราโค โทโส โมโห, เต ขนฺเธสุ สงฺขารกฺขนฺโธ…เป… เต ปุรา ยถา นิทฺทิฏฺฐํ ขนฺธธาตุอายตเนสุ, อยํ โอตรโณ หาโร. त्यात ओतरण हार कोणता? 'झाकलेल्यावर पाऊस पडतो' म्हणजे राग, द्वेष आणि मोह हे तीन क्लेश होत. ते स्कंधांमध्ये 'संस्कार स्कंध' आहेत... (इत्यादी)... त्यांना पूर्वीप्रमाणेच स्कंध, धातू आणि आयतनांमध्ये निर्देशित केले आहे. हा ओतरण हार होय. ตตฺถ กตโม โสธโน หาโร? เยนารมฺเภน อิทํ สุตฺตํ ภาสติ โส อารมฺโภ นิยุตฺโต. त्यात शोधन हार कोणता? ज्या आरंभाने (प्रयत्नाने) हे सूत्र उपदेशिले आहे, तो आरंभ (त्या सूत्राशी) युक्त केला आहे. อธิฏฺฐาโนติ ฉนฺนมติวสฺสตีติ เอกตฺตตาย ปญฺญตฺตํ. กึการณํ? อิทํ หิ อติวสฺสตีติ อิมสฺส จ อติวสฺสติ เอวญฺจ อติวสฺสตีติ อยํ เวมตฺตตาย ยา สุณสาธารเณหิ ลกฺขเณหิ ปญฺญาปิยติ, สา เอกตฺตปญฺญตฺติ. 'अधिष्ठान' म्हणजे 'झाकलेल्यावर पाऊस पडतो' हे एकत्वभावाने प्रज्ञप्त केले आहे. कारण काय? 'पाऊस पडतो' हे वाक्य 'या व्यक्तीवर पाऊस पडतो' आणि 'अशा प्रकारे पाऊस पडतो' या नानात्वाच्या (भिन्नतेच्या) रूपाने ऐकण्याच्या सामान्य लक्षणांद्वारे जे प्रज्ञप्त केले जाते, ती एकत्व प्रज्ञप्ति होय. ตตฺถ กตโม ปริกฺขาโร? ยญฺจ ตํ อติวสฺสิยนฺติ, ตสฺส ทฺเว เหตู ทฺเว ปจฺจยา อกุสลปสุเตว วาจกตฺตาภิรติ จ. อิเม ทฺเว อโยนิโสมนสิกาโร จ กุสลา ธมฺมา โวปสคฺคา จ, อิเม ทฺเว ปจฺจยา. त्यात परिकार हार कोणता? ज्या व्यक्तीला ते (क्लेश) अतिशय ओले करतात, त्याचे दोन हेतू आणि दोन प्रत्यय आहेत. अकुशलाच्या अभ्यासात प्रवृत्त असणे आणि त्यातच रममाण होणे, हे दोन हेतू आहेत. अयोनिशोमनसिकार आणि कुशल धर्मांचा ऱ्हास होणे, हे दोन प्रत्यय आहेत. ตตฺถ กตโม สมาโรปโน? ฉนฺนมติวสฺสตีติ เวมติ ปสฺสตีติ ฉนฺนํ ยํ ปริคฺคหิตุํ ยํ อเทสิตุํ อปฺปสฺสุตํ ยํ กถํกถา วิภูเตน อกุสลมูเลน ยํ ตณฺหาย จ เต วฑฺฒติ โทสาติ สนฺนิตฺวา เต อปฺปสกฺขเยน สงฺขารา. สงฺขารปจฺจยา วิญฺญาณํ ยาว ชรามรณํ, อยํ สมาโรปโน[Pg.303]. ยํ ปุน ตถา เทสนา, ตสฺเสว อกุสลา ธมฺมา วุทฺธึ วิรูฬฺหึ เวปุลฺลตมาปชฺชติ ตสฺส สงฺขารา นิโรธา, อยํ สมาโรปโน. त्यात समारोपण हार कोणता? 'झाकलेल्यावर पाऊस पडतो' यात 'संशय पाहतो' म्हणजे जे झाकलेले ग्रहण करण्यासाठी, ज्या अल्पश्रुताला उपदेश न करण्यासाठी, जी शंका प्रकट झालेल्या अकुशल मुळामुळे आणि तृष्णेमुळे 'तुझा द्वेष वाढतो' असा निश्चय करून, त्यांच्या अल्प सामर्थ्यामुळे संस्कार वाढतात. संस्कारांच्या प्रत्ययाने विज्ञान जरामरणापर्यंत वाढते. हा समारोपण हार होय. पुन्हा, त्याच प्रकारे जो उपदेश आहे, ज्यामुळे त्याच्याच अकुशल धर्मांची वृद्धी, रूढी आणि विपुलता होते, आणि त्याच्या संस्कारांचा निरोध होतो, हा समारोपण हार होय. ๑๐๒. จตฺตาโร ปุคฺคลา ตโม ตมปรายโนติ…เป… ตตฺถ กตโม วุจฺจเต ตโม นาม? โย ตโม อนฺธกาโร, ยถา วุตฺตํ ภควตา ‘‘ยถา อนฺธกาเร ตสฺมึ ภยานเก สกมฺปิธาตุปุริโส น ปสฺสติ, เอวเมว อญฺญาณโต ตโมปนนฺธกาโร ปาปกสกมฺมสวิปากํ น สทฺโธ โหติ. อิติ เอวํ ลกฺขณตา อญฺญาณํ ตโม อวิชฺชา โมโห, เยน สตฺตา ยถาภูตํ นปฺปชานนฺติ, อิติ วุจฺจติ ตโมติ. โส ติณฺณํ จกฺขูนํ ตโม มํสจกฺขุโน ทิพฺพจกฺขุโน ปญฺญาจกฺขุโน, อิเมสํ จกฺขูนํ อิธ ตโม นิทฺทิสิยติ อญฺญาณนฺติ. ตตฺถ กตมํ อญฺญาณํ อทสฺสนํ? อถ นิสฺสเย ยํ ปุพฺพนฺเต อญฺญาณํ อปรนฺเต อญฺญาณํ ปุพฺพนฺตาปรนฺเต อญฺญาณํ เหตุมฺหิ อญฺญาณํ ปจฺจยมฺหิ อญฺญาณํ ตสฺส อญฺญาณิโน สมาธิภูตสฺส เอโส นิสฺสนฺโท. ยํ น ชานาติ อิทํ เสวิตพฺพํ อิทํ น มนสิกาตพฺพนฺติ. โส เตน ตเมน นิทฺทิสิยติ ตโมปิ ยถา วุจฺจติ. มูฬฺโหติ เอวํ เจตนา. เตน ตเมน โส ปุคฺคโล วุจฺจติ. ตโมติ โส เตน ตเมน อสมูหเตน อสมุจฺฉินฺเนน ตปฺปรโม ภวติ ตปฺปรายโน, อยํ วุจฺจติ ปุคฺคโล ตโม ตมปรายโนติ. ปรายโนเยว ธมฺโม มนสิกาตพฺโพ โส ตโม ทหติ อญฺญจิตฺตํ อุปฏฺฐเปติ. เต จสฺส ธมฺมา นิชฺฌานกฺขมนฺติ. โส สุตมยาย ปญฺญาย สมนุปสฺสติ. १०२. पुद्गल (व्यक्ती) 'तम-तमपरायण' इत्यादी असे चार आहेत. त्यात 'तम' कोणाला म्हटले जाते? जो तम आहे तो अंधकारासारखा आहे. ज्याप्रमाणे भगवंतांनी म्हटले आहे, 'त्या भयानक अंधकारात थरथरणारा मनुष्य पाहू शकत नाही, त्याचप्रमाणे अज्ञानामुळे तम हा अंधकार आहे, पापी मनुष्य स्वतःच्या कर्माच्या विपाकावर श्रद्धा ठेवत नाही.' अशा लक्षणांमुळे अज्ञान हे तम, अविद्या आणि मोह आहे, ज्यामुळे प्राणी यथार्थ जाणत नाहीत; म्हणून त्याला 'तम' म्हटले जाते. तो तीन चक्षूंचा—मांसचक्षू, दिव्यचक्षू आणि प्रज्ञाचक्षूचा अंधकार आहे. येथे या चक्षूंच्या अंधकाराला 'अज्ञान' असे निर्देशित केले आहे. त्यात अज्ञान कोणते? अदर्शन (न पाहणे). तसेच, आश्रय असलेल्या पूर्व अंताविषयी (भूतकाळाविषयी) जे अज्ञान आहे, पूर्व-अपर अंताविषयी जे अज्ञान आहे, हेतूविषयी जे अज्ञान आहे, प्रत्ययाविषयी जे अज्ञान आहे, समाधी नसलेल्या त्या अज्ञानी व्यक्तीचे जे अज्ञान आहे, हा त्याचा निष्यंद (परिणाम) आहे. तो जाणत नाही की 'हे सेवन करण्यायोग्य आहे, याचे मनसिकार करू नये'. त्या अज्ञानरूपी तमाने त्याला निर्देशित केले जाते. ज्याप्रमाणे त्याला 'तम' म्हटले जाते, 'तो मूढ आहे' अशी त्याची चेतना असते. त्या मोहामुळे ती व्यक्ती 'तम' म्हटली जाते. ती व्यक्ती पूर्णपणे नष्ट न झालेल्या, पूर्णपणे उच्छेद न झालेल्या त्या मोहामुळे त्यातच रममाण असणारी आणि त्याचाच आश्रय घेणारी होते. या व्यक्तीला 'तम-तमपरायण' असे म्हटले जाते. पुढील जन्मात तोच धर्म मनन करण्यायोग्य असतो, तो तमाला जाळून टाकतो आणि अर्हतफळ चित्ताला प्रस्थापित करतो. त्याच्यासाठी ते धर्म चिंतनास योग्य वाटतात. तो श्रुतमय प्रज्ञेने पाहतो. ตตฺถ กตโม ตโม โชติปรายโน? โส เตน ปญฺญาวเสน อิริยติ เอวํ ตสฺเสว อิริยนฺตสฺส ปรายโน ภวติ. อยํ วุจฺจเต ปุคฺคโล ตโม โชติปรายโน. त्यात 'तम-ज्योतिपरायण' कोणता? तो त्या प्रज्ञेच्या बळाने वर्तन करतो आणि अशा प्रकारे वर्तन करणाऱ्यासाठी ती प्रज्ञाच आश्रयस्थान होते. या व्यक्तीला 'तम-ज्योतिपरायण' असे म्हटले जाते. ตตฺถ กตโม ปุคฺคโล โชติ โชติปรายโน ? ตตฺถ วุจฺจติ โชติ นาม ยํ ตสฺส เจ ตมสฺส ปฏิปกฺเขน เย จ ธมฺเม อนฺตมโส ญาณาโลโก, โส สุณธมฺโม ปุคฺคโล ตโม โชติปรายโน, ตตฺถ วุจฺจเต, โยยํ ปุคฺคโล ตโม โชติปรายโน, โส ยทิ ตถารูปํ กลฺยาณมิตฺตํ ปฏิลภติ, โย นํ อกุสลโต จ นิวาเรติ [Pg.304] ภาวิตกุสลตาว ภาวี นิโยเชตีติ. เอวญฺจ สทฺธมฺมํ เทเสติ. อิเม ธมฺมา กุสลา, อิเม ธมฺมา อกุสลา. อิเม ธมฺมา สาวชฺชา, อิเม ธมฺมา อนวชฺชา. อิเม ธมฺมา เสวิตพฺพา, อิเม ธมฺมา น เสวิตพฺพา. อิเม ธมฺมา ภชิตพฺพา, อิเม ธมฺมา น ภชิตพฺพา. อิเม ธมฺมา อุปสมฺปชฺช วิหาตพฺพา, อิเม ธมฺมา น อุปสมฺปชฺช วิหาตพฺพา. อิเม ธมฺมา มนสิกาตพฺพา, อิเม ธมฺมา น มนสิกาตพฺพาติ. ปจฺจเต สญฺญาย ยถา สญฺญายติ สตินฺทฺริยานิ, โส เอวํ ปชานาติ. อิเม ธมฺมา กุสลา, อิเม ธมฺมา อกุสลา. อิเม ธมฺมา สาวชฺชา, อิเม ธมฺมา อนวชฺชา. อิเม ธมฺมา เสวิตพฺพา, อิเม ธมฺมา น เสวิตพฺพา. อิเม ธมฺมา ภาเวตพฺพา, อิเม ธมฺมา น ภาเวตพฺพา. อิเม ธมฺมา อุปสมฺปชฺช วิหาตพฺพา, อิเม ธมฺมา น อุปสมฺปชฺช วิหาตพฺพา. อิเม ธมฺมา มนสิกาตพฺพา, อิเม ธมฺมา น มนสิกาตพฺพาติ. โส เต ธมฺเม สุสุยฺยติ, โสตํ โอทหติ, อญฺญํ จิตฺตํ อุปฏฺฐเปติ, เต จสฺส ธมฺมา นิชฺฌานกฺขมนฺติ, โส สุตมยาย ปญฺญาย สมนฺนาคโต โส เตน ปจฺจยวเสน อิริยติ เอวํ ตสฺเสว อิริยนฺติ ตปฺปรโม ภวติ ตปฺปรายโน. อยํ วุจฺจเต ปุคฺคโล ตโม ตมปรายโน. त्यात 'ज्योति-ज्योतिपरायण' व्यक्ती कोणती? येथे 'ज्योति' म्हणजे ज्या कारणामुळे त्याच्या तमाच्या (अंधकाराच्या) विरुद्ध जे धर्म आहेत, किमानपक्षी ज्ञानरूपी प्रकाश आहे, धर्म ऐकणारा स्वभाव आहे. जर त्या व्यक्तीला 'तम-ज्योतिपरायण' म्हटले गेले, तर त्यावर उत्तर दिले जाते: जी व्यक्ती 'तम-ज्योतिपरायण' आहे, तिला जर तशा प्रकारचा कल्याणमित्र लाभला, जो त्याला अकुशलापासून परावृत्त करतो आणि कुशल भावना वाढवून भावना करण्यास प्रवृत्त करतो. आणि अशा प्रकारे सद्धर्माचा उपदेश करतो: 'हे धर्म कुशल आहेत, हे धर्म अकुशल आहेत. हे धर्म सदोष आहेत, हे धर्म निर्दोष आहेत. हे धर्म सेवन करण्यायोग्य आहेत, हे धर्म सेवन न करण्यायोग्य आहेत. हे धर्म भजण्यायोग्य आहेत, हे धर्म न भजण्यायोग्य आहेत. हे धर्म अंगीकारून राहावे, हे धर्म अंगीकारून राहू नये. हे धर्म मननात आणण्यायोग्य आहेत, हे धर्म मननात न आणण्यायोग्य आहेत.' असे संज्ञेने जाणले जाते, ज्याप्रमाणे स्मृतींद्रिये संज्ञेने जाणली जातात. तो अशा प्रकारे जाणतो: 'हे धर्म कुशल आहेत, हे धर्म अकुशल आहेत. हे धर्म सदोष आहेत, हे धर्म निर्दोष आहेत. हे धर्म सेवन करण्यायोग्य आहेत, हे धर्म सेवन न करण्यायोग्य आहेत. हे धर्म भावित करण्यायोग्य आहेत, हे धर्म भावित न करण्यायोग्य आहेत. हे धर्म अंगीकारून राहावे, हे धर्म अंगीकारून राहू नये. हे धर्म मननात आणण्यायोग्य आहेत, हे धर्म मननात न आणण्यायोग्य आहेत.' तो त्या धर्मांना चांगल्या प्रकारे ऐकतो, कान देऊन ऐकतो, अर्हतफळ चित्ताला प्रस्थापित करतो, आणि त्याचे ते धर्म चिंतनास योग्य वाटतात. तो श्रुतमय प्रज्ञेने युक्त होतो. तो त्या प्रत्ययाच्या बळाने वर्तन करतो. अशा प्रकारे त्याच्यासाठीच वर्तन घडते, तो त्यातच रममाण होतो आणि त्याचाच आश्रय घेणारा होतो. या व्यक्तीला 'तम-तमपरायण' असे म्हटले जाते. ตตฺถ กตโม ปุคฺคโล โชติ ตมปรายโน? โชติ นาม ยา ตสฺเสว ตมสฺส ปฏิปกฺเขน เย ธมฺมา อนฺตมโส ญาณาโลโก, โส ปุน ธมฺโม. กตมา อุจฺจเต? ปญฺญายโต ปณฺฑิโตติ วุจฺจเต, โส เอวํ ปชานาติ. อิเม ธมฺมา กุสลา, อิเม ธมฺมา อกุสลา. อิเม ธมฺมา สาวชฺชา, อิเม ธมฺมา อนวชฺชา. อิเม ธมฺมา เสวิตพฺพา, อิเม ธมฺมา น เสวิตพฺพา. อิเม ธมฺมา ภาวิตพฺพา, อิเม ธมฺมา น ภาวิตพฺพา. อิเม ธมฺมา อุปสมฺปชฺช วิหาตพฺพา, อิเม ธมฺมา น อุปสมฺปชฺช วิหาตพฺพา. อิเม ธมฺมา มนสิกาตพฺพา, อิเม ธมฺมา น มนสิกาตพฺพา. อิธ ปน ปาปมิตฺตสํเสวโน ปาปมิตฺตวสานุโค อกุสเล ธมฺเม อภิวฑฺเฒติ, กุสเล ธมฺเม ปชหติ. โส เตน ปมาเทน ปจฺจยสญฺญา อมนสิกตฺวา อสฺสติอสมฺปชญฺญํ อาเสวติ. ตยา โย ปฏิปกฺโข ตโม, โส ปวฑฺเฒติ. โส ตมาภิภูโต ปรายโน ตมปรโม เจว ภวติ. อยํ วุจฺจติ ปุคฺคโล โชติ ตมปรายโน. तेथे 'ज्योतीकडून अंधकाराकडे जाणारा' (जोती-तमपरायण) व्यक्ती कोणता? 'ज्योती' म्हणजे त्या अंधकाराच्या विरुद्ध असलेले जे धर्म आहेत, अगदी कनिष्ठ पातळीवर जे ज्ञानाचा प्रकाश आहे, तो पुन्हा धर्म होय. तो कसा सांगितला जातो? प्रज्ञावान असल्यामुळे त्याला 'पंडित' (बुद्धिमान) म्हटले जाते, तो अशा प्रकारे जाणतो: 'हे धर्म कुशल आहेत, हे धर्म अकुशल आहेत. हे धर्म सदोष आहेत, हे धर्म निर्दोष आहेत. हे धर्म सेवन करण्यायोग्य आहेत, हे धर्म सेवन न करण्यायोग्य आहेत. हे धर्म भावना (विकसित) करण्यायोग्य आहेत, हे धर्म भावना न करण्यायोग्य आहेत. हे धर्म प्राप्त करून विहरण्यायोग्य आहेत, हे धर्म प्राप्त न करून विहरण्यायोग्य आहेत. हे धर्म मनसिकार (मनन) करण्यायोग्य आहेत, हे धर्म मनसिकार न करण्यायोग्य आहेत.' परंतु, या जगात पापी मित्रांची संगत करणारा, पापी मित्रांच्या आहारी गेलेला मनुष्य अकुशल धर्मांची वृद्धी करतो आणि कुशल धर्मांचा त्याग करतो. तो त्या प्रमादामुळे (बेसावधपणामुळे) प्रत्यय-संज्ञेकडे (कारणाच्या जाणिवेकडे) मनसिकार न करता, स्मृतिहीनता आणि असं प्रजन्य (अज्ञान) यांचे सेवन करतो. त्यामुळे जो (कुशलाचा) विरोधी अंधकार आहे, तो त्याला वाढवतो. तो अंधकाराने ग्रासलेला, अंधकाराचा आश्रय घेणारा आणि अंधकारातच रमणारा होतो. या व्यक्तीला 'ज्योतीकडून अंधकाराकडे जाणारा' (जोती-तमपरायण) व्यक्ती असे म्हटले जाते. ๑๐๓. ตตฺถ กตโม ปุคฺคโล โชติ โชติปรายโน? ตตฺถ วุจฺจเต โสยํ ปุคฺคโล กลฺยาณมิตฺตสฺส สนฺนิสฺสิโต ภวติ สกฺกา สํโยคี กุสลํ [Pg.305] คเวสี, โส กลฺยาณมิตฺเต อุปสงฺกมิตฺวา ปริปุจฺฉติ, ปริปญฺหยติ? กึ กุสลํ, กึ อกุสลํ? กึ สาวชฺชํ, กึ อนวชฺชํ? กึ เสวิตพฺพํ, กึ น เสวิตพฺพํ? กึ ภาวิตพฺพํ, กึ น ภาวิตพฺพํ? กึ อุปสมฺปชฺช วิหาตพฺพํ, กึ น อุปสมฺปชฺช วิหาตพฺพํ? กึ มนสิกาตพฺพํ, กึ น มนสิกาตพฺพํ? กถํ สํกิเลโส โหติ, กถํ โวทานํ โหติ? กถํ ปวตฺติ โหติ, กถํ นิวตฺติ โหติ? กถํ พนฺโธ โหติ, กถํ โมกฺโข โหติ? กถํ สกฺกายสมุทโย โหติ, กถํ สกฺกายนิโรโธ โหติ? โส เอตฺถ เทสิตํ ยถา อุปฏฺฐิตํ ตถา สมฺปฏิปชฺชนฺโต โส เอวํ ปชานาติ. อิเม ธมฺมา กุสลา, อิเม ธมฺมา อกุสลา. เอวํ…เป… ยาว กถํ สกฺกายสมุทโย โหติ, กถํ สกฺกายนิโรโธ โหตีติ วิตฺถาเรน กาตพฺพํ. โส เต ธมฺเม อธิปาฏิกงฺขาติ เอวํ ลกฺขณํ ญาณํ วิชฺชา อาโลกํ วฑฺเฒติ. โส ปุคฺคโล ตปฺปรโม ภวติ ตปฺปรายโน, อยํ วุจฺจเต ปุคฺคโล โชติ โชติปรายโน. १०३. तेथे 'ज्योतीकडून ज्योतीकडे जाणारा' (जोती-जोतीपरायण) व्यक्ती कोणता? तेथे उत्तर दिले जाते: तो हा व्यक्ती कल्याणमित्राच्या आश्रयाला जातो, (कुशलाशी) युक्त होतो, कुशल शोधणारा बनतो. तो कल्याणमित्रांकडे जाऊन विचारतो, प्रश्न करतो: 'कुशल काय आहे, अकुशल काय आहे? सदोष काय आहे, निर्दोष काय आहे? सेवन करण्यायोग्य काय आहे, सेवन न करण्यायोग्य काय आहे? भावना करण्यायोग्य काय आहे, भावना न करण्यायोग्य काय आहे? प्राप्त करून विहरण्यायोग्य काय आहे, प्राप्त न करून विहरण्यायोग्य काय आहे? मनसिकार करण्यायोग्य काय आहे, मनसिकार न करण्यायोग्य काय आहे? संक्लेश (मलिनता) कसा होतो, वोदान (शुद्धता) कशी होते? प्रवृत्ती कशी होते, निवृत्ती कशी होते? बंध कसा होतो, मोक्ष कसा होतो? सत्काय-समुदय कसा होतो, सत्काय-निरोध कसा होतो?' तो येथे उपदेशिलेल्या धर्माचे जसे समोर येईल तसे योग्य प्रकारे आचरण करत, अशा प्रकारे जाणतो: 'हे धर्म कुशल आहेत, हे धर्म अकुशल आहेत...' अशा प्रकारे... 'सत्काय-समुदय कसा होतो आणि सत्काय-निरोध कसा होतो' इथपर्यंत विस्ताराने जाणावे. तो त्या धर्मांची अत्यंत आकांक्षा बाळगतो, अशा प्रकारे लक्षण, ज्ञान, विद्या आणि प्रकाश वाढवतो. तो व्यक्ती त्यातच रमणारा, त्याचाच आश्रय घेणारा होतो. या व्यक्तीला 'ज्योतीकडून ज्योतीकडे जाणारा' (जोती-जोतीपरायण) व्यक्ती असे म्हटले जाते. ตตฺถ กตโม ปุคฺคโล ตโม ตมปรายโน? โย อกุสลํ ธมฺมํ ทีเปติ. ตํ ภาวนาย หีนาสุ คตีสุ อุปปตฺตึ ทสฺเสติ, ตปฺปรโม ภวติ ตปฺปรายโน. อยํ วุจฺจเต ปุคฺคโล ตโม ตมปรายโน. तेथे 'अंधकाराकडून अंधकाराकडे जाणारा' (तमो-तमपरायण) व्यक्ती कोणता? जो अकुशल धर्माला प्रकट करतो. तो भावनेद्वारे हीन गतींमध्ये उत्पत्ती (पुनर्जन्म) दर्शवतो, त्यातच रमणारा आणि त्याचाच आश्रय घेणारा होतो. या व्यक्तीला 'अंधकाराकडून अंधकाराकडे जाणारा' (तमो-तमपरायण) व्यक्ती असे म्हटले जाते. ตตฺถ โย ปุคฺคโล ตโม โชติปรายโน? โส ตเมน อกุสลสฺส กมฺมสฺส วิปากํ ทสฺเสติ. ตเมติ ยํ จกฺขุ กลฺยาณมิตฺตสฺส เยน อกุสเล ธมฺเม ปชหติ, กุสเล ธมฺเม อภิวฑฺฒติ. तेथे 'अंधकाराकडून ज्योतीकडे जाणारा' (तमो-जोतीपरायण) व्यक्ती कोणता? वो अंधकाराने अकुशल कर्माचा विपाक (परिणाम) दर्शवतो. अंधकारात टाकणारे जे चक्षू (अज्ञान) आहे, ते कल्याणमित्राच्या साहाय्याने दूर होते, ज्याद्वारे तो अकुशल धर्मांचा त्याग करतो आणि कुशल धर्मांची वृद्धी करतो. ตตฺถ โย จ ปณีตาสุ คตีสุ อุปปตฺตึ ทสฺเสติ, ตปฺปรโม เตน วุจฺจเต ตโม โชติปรายโน. तेथे जो श्रेष्ठ गतींमध्ये उत्पत्ती (पुनर्जन्म) दर्शवतो आणि त्यातच रमणारा होतो, म्हणून त्याला 'अंधकाराकडून ज्योतीकडे जाणारा' (तमो-जोतीपरायण) असे म्हटले जाते. ตตฺถ โย ปุคฺคโล โชติ ตมปรายโน? กุสลสฺส กมฺมวิปากํ ทสฺเสติ. ยํ จกฺขุ ปาปมิตฺตสํสคฺเคน ปาปมิตฺตุปเสเวน ปาปมิตฺตวสานุโค อกุสลํ ธมฺมํ อภิวฑฺฒติ, ตํ ภาวนาย หีนาสุ คตีสุ อุปปตฺตึ ทสฺเสติ. ตปฺปรโม เตน วุจฺจเต โชติ ตมปรายโน. तेथे 'ज्योतीकडून अंधकाराकडे जाणारा' (जोती-तमपरायण) व्यक्ती कोणता? जो कुशल कर्माचा विपाक दर्शवतो. परंतु पापी मित्रांच्या संगतीने, पापी मित्रांच्या सेवनाने आणि पापी मित्रांच्या आहारी गेल्याने जे प्रज्ञा-चक्षू नष्ट होते आणि तो अकुशल धर्माची वृद्धी करतो, तो भावनेद्वारे हीन गतींमध्ये उत्पत्ती दर्शवतो. त्यातच रमणारा असल्यामुळे त्याला 'ज्योतीकडून अंधकाराकडे जाणारा' (जोती-तमपरायण) असे म्हटले जाते. ตตฺถ โย ปุคฺคโล โชติ โชติปรายโน โส โชติตา ปภาตา ยาว ปณีตาสุ คตีสุ อุปปตฺตึ ทสฺเสติ. ตปฺปรโม เตนาห โชติ โชติปรายโน. तेथे जो 'ज्योतीकडून ज्योतीकडे जाणारा' (जोती-जोतीपरायण) व्यक्ती आहे, तो प्रकाशित आणि देदीप्यमान होऊन श्रेष्ठ गतींमध्ये उत्पत्ती दर्शवतो. त्यातच रमणारा असल्यामुळे त्याला 'ज्योतीकडून ज्योतीकडे जाणारा' (जोती-जोतीपरायण) असे म्हटले आहे. โชติตมปรายเนน [Pg.306] ทส อกุสลานํ กมฺมานํ อุทยํ ทสฺเสติ. ตเมน ปุคฺคเลน อกุสลานํ กมฺมานํ วิปากํ ทสฺเสติ. น อกุสลานํ ธมฺมานํ วิปากํ ทสฺเสติ. ตเมน อฏฺฐ มิจฺฉตฺตานิ ทสฺเสติ. โชตินา อฏฺฐ สมฺมตฺตานิ ทสฺเสติ. โชตินา ตมปรายเนน ทส อกุสลกมฺมปเถ ทสฺเสติ. โชตินา ปณีตตฺตํ ทสฺเสติ. ตเมน โชติปรายเนน อตปนียํ ธมฺมํ ทสฺเสติ. โชตินา ตมปรายเนน ตปนียํ ธมฺมํ ทสฺเสติ. อยํ สุตฺตตฺโถ. 'ज्योतीकडून अंधकाराकडे जाणाऱ्या' (जोती-तमपरायण) द्वारे दहा अकुशल कर्मांचा उदय दर्शवला जातो. अंधकारमय व्यक्तीद्वारे अकुशल कर्मांचा विपाक दर्शवला जातो, अकुशल धर्मांचा विपाक दर्शवला जात नाही. अंधकाराने (मोहाने) आठ मिच्छात्त (मिथ्यात्व) दर्शवले जातात. ज्योतीने आठ सम्मत्त (सम्यक्त्व) दर्शवले जातात. ज्योती असलेल्या तमपरायणाद्वारे दहा अकुशल कर्मपथ दर्शवले जातात. ज्योतीने श्रेष्ठत्व दर्शवले जाते. अंधकार असलेल्या जोतीपरायणाद्वारे अतपनीय (संताप न देणारा) धर्म दर्शवला जातो. ज्योती असलेल्या तमपरायणाद्वारे तपनीय (संताप देणारा) धर्म दर्शवला जातो. हा सूत्राचा अर्थ आहे. ๑๐๔. ตตฺถ กตโม เทสนา หาโร? อิมมฺหิ สุตฺเต กึ เทสิตํ? ตตฺถ วุจฺจเต อิมมฺหิ สุตฺเต กุสลากุสลา ธมฺมา เทสิตา. กุสลากุสลานญฺจ ธมฺมานํ วิปาโก เทสิโต. หีนปฺปณีตานญฺจ สตฺตานํ คติ นานาการณํ เทสิตํ. อยํ เทสนา หาโร. १०४. तेथे 'देशना हार' कोणता? या सूत्रात काय उपदेशिले आहे? तेथे उत्तर दिले जाते: या सूत्रात कुशल आणि अकुशल धर्म उपदेशिले आहेत. तसेच कुशल आणि अकुशल धर्मांचा विपाक उपदेशिला आहे. आणि हीन व श्रेष्ठ प्राण्यांच्या गतींमधील वैविध्य उपदेशिले आहे. हा 'देशना हार' होय. ตตฺถ กตโม วิจโย หาโร? อกุสลสฺส กมฺมสฺส โย วิปากํ ปจฺจนุโภติ. ตตฺถ ฐิโต อกุสเล ธมฺเม อุปฺปาทิยติ วิจยนฺตํ ยุชฺชติ. กุสลสฺส กมฺมสฺส โย วิปากํ ปจฺจนุโภติ. ตตฺถ ฐิโต กุสเล ธมฺเม อุปฺปาทิยติ วิจยนฺตํ ยุชฺชติ. อยํ วิจโย ยุตฺติ จ. तेथे 'विचय हार' कोणता? जो अकुशल कर्माचा विपाक भोगतो, तेथे स्थित राहून तो अकुशल धर्म उत्पन्न करतो, त्याचे विश्लेषण करणे योग्य आहे. जो कुशल कर्माचा विपाक भोगतो, तेथे स्थित राहून तो कुशल धर्म उत्पन्न करतो, त्याचे विश्लेषण करणे योग्य आहे. हा 'विचय हार' आणि 'युक्ती हार' देखील आहे. ตตฺถ กตโม ปทฏฺฐาโน หาโร? โย ปุคฺคโล โชติ, โส ปจฺจเวกฺขณาย ปทฏฺฐานํ. โย ปุคฺคโล ตโม, โส ตมาทินฺนํ วานุปสฺสนาย ปทฏฺฐานนฺติ ทสฺเสติ. ตเมน โชติปรายเนน อปฺปมาทสฺส ปทฏฺฐานํ ทสฺเสติ, ตโม อวิชฺชาย จ ทิฏฺฐิยา จ ปทฏฺฐานํ ทสฺเสติ. โชตินา ตมปรายเนน ปมาทสฺส จ ทิฏฺฐิยา จ ปทฏฺฐานํ ทสฺเสติ. อยํ ปทฏฺฐาโน. तेथे 'पदस्थान हार' कोणता? जो व्यक्ती ज्योती (प्रकाशमान) आहे, तो प्रत्यवेक्षणाचा (पुनरावलोकनाचा) जवळचा हेतू (पदस्थान) आहे. जो व्यक्ती अंधकारमय आहे, तो अंधकाराने ग्रहण केलेल्या गोष्टींच्या अनुपश्यनेचा (वारंवार पाहण्याचा) जवळचा हेतू आहे, असे दर्शवले जाते. अंधकार असलेल्या जोतीपरायणाद्वारे अप्रमादाचा (जागरूकतेचा) जवळचा हेतू दर्शवला जातो. अंधकार हा अविद्येचा आणि दृष्टीचा (मिथ्यादृष्टीचा) जवळचा हेतू दर्शवतो. ज्योती असलेल्या तमपरायणाद्वारे प्रमादाचा (बेसावधपणाचा) आणि दृष्टीचा जवळचा हेतू दर्शवला जातो. हा 'पदस्थान हार' होय. ตตฺถ กตโม ลกฺขโณ หาโร? ตเมน ตมปรายเนน ตโมติ อวิชฺชาย นิทฺทิฏฺฐาย สพฺพกิเลสธมฺมา นิทฺทิฏฺฐา โหนฺติ. ตเมน โชติปรายเนน โชติวิชฺชาย นิทฺทิฏฺฐาย สพฺเพ โพธิปกฺขิยธมฺมา นิทฺทิฏฺฐา โหนฺติ. โชติตมปรายเนน ปมาโท นิทฺทิฏฺโฐ โหติ. ตเมน โชติปรายเนน อปฺปมาโท นิทฺทิฏฺโฐ โหติ. อยํ ลกฺขโณ หาโร. तेथे 'लक्षण हार' कोणता? अंधकार असलेल्या तमपरायणाद्वारे 'अंधकार' म्हणून अविद्येचा निर्देश केला असता, सर्व क्लेश-धर्मांचा निर्देश केला जातो. अंधकार असलेल्या जोतीपरायणाद्वारे 'ज्योती' म्हणून विद्येचा निर्देश केला असता, सर्व बोधिपक्षीय धर्मांचा निर्देश केला जातो. ज्योती असलेल्या तमपरायणाद्वारे प्रमादाचा निर्देश केला जातो. अंधकार असलेल्या जोतीपरायणाद्वारे अप्रमादाचा निर्देश केला जातो. हा 'लक्षण हार' होय. ตตฺถ กตโม จตุพฺยูโห หาโร? อิมมฺหิ สุตฺเต ภควโต โก อธิปฺปาโย? เย สตฺตา นีจกุลิโน, น เต อิมํ สุตฺวา กุสเล ธมฺเม สมาทาย วตฺติสฺสนฺติ. เย สตฺตา อุจฺจกุลิโน, เต อิมํ ธมฺมเทสนํ สุตฺวา [Pg.307] ภิยฺโยโส มตฺตาย กุสเล ธมฺเม สมาทาย วตฺติสฺสนฺตีติ. อยํ จตุพฺยูโห หาโร. ภูมิยํ อุปเทโส. तेथे 'चतुर्व्यूह हार' कोणता? या सूत्रात भगवंतांचा काय अभिप्राय आहे? जे प्राणी नीच कुळातील आहेत, ते हे ऐकून कुशल धर्मांचे ग्रहण करून आचरण करणार नाहीत. जे प्राणी उच्च कुळातील आहेत, ते हा धर्मोपदेश ऐकून अधिक प्रमाणात कुशल धर्मांचे ग्रहण करून आचरण करतील. हा 'चतुर्व्यूह हार' होय. हा भूमीवरील उपदेश आहे. ตตฺถ กตโม อาวฏฺโฏ หาโร? ยา อวิชฺชาโต ปภูติ ตณฺหา, อยํ สมุทโย. โย ตโม ตมปรายโน, อิทํ ทุกฺขํ. อิมานิ ทฺเว สจฺจานิ ทุกฺขญฺจ สมุทโย จ โชติ เยน สุตฺเตน ธมฺเมน ปญฺญาปิยติ, โส ธมฺโม ปญฺญินฺทฺริยสฺส ปทฏฺฐานํ. เตน อโมเหน ตีณิ กุสลมูลานิ ปาริปูรึ คจฺฉนฺติ สคฺคสฺส ปทฏฺฐานํ. त्यात आवट्ट हार (आवर्त हार) कोणता? जी अविद्यापासून सुरू होणारी तृष्णा आहे, तो समुदय आहे. जो अंधकार (मोह) अंधकारपरायण आहे, ते दुःख आहे. दुःख आणि समुदय ही दोन सत्ये आहेत. ज्या सूत्राने किंवा धर्माने 'जोती' (प्रकाश) प्रज्ञापित केला जातो, तो धर्म प्रज्ञेंद्रियाचे पदस्थान (निकटचे कारण) आहे. त्या अमोहाने तीन कुशलमुळे परिपूर्णतेला प्राप्त होतात, जे स्वर्गाचे पदस्थान आहे। ตตฺถ กตมา วิภตฺติ? ตโม ตมปรายโนติ น เอกํเสน. กึ การณํ? อตฺถิ ตโม จ ภโว อปราปริยเวทนีเยน จ กุสเลน โชตินา ปุคฺคเลน สโหปตฺติภาเว. อตฺถิ โชติ จ ภโว อปราปริยเวทนีเยน จ อกุสเลน ตเมน ปุคฺคเลน สโหปตฺติภาเว ปริวตฺตนา ตเมสุ ปฏิปกฺโขติ โชตินา ตมปรายโน. त्यात विभत्ती हार (विभक्ती हार) कोणता? 'अंधकार अंधकारपरायण आहे' हे एकांताने (निश्चितपणे) नाही. काय कारण आहे? अपरापरियवेदनीय कुशल कर्म असलेल्या प्रकाशमान पुद्गलाच्या (व्यक्तीच्या) सह-उत्पत्तीच्या अवस्थेत अंधकार आणि भव देखील असतो. तसेच, अपरापरियवेदनीय अकुशल कर्म असलेल्या अंधकारमय पुद्गलाच्या सह-उत्पत्तीच्या अवस्थेत प्रकाश आणि भव देखील असतो. अंधकारामध्ये परिवर्तन हे प्रतिपक्ष (विरोधी) आहे, म्हणून प्रकाशाने अंधकारपरायण होतो। ตตฺถ กตโม เววจโน? โย ตโม, โส เอวํ อตฺตพฺยาปาทาย ปฏิปนฺโน, โส อสฺสทฺธาย พาโล อกุสโล อพฺยตฺโต อนาทีนวทสฺสี. โย โชติ, โส อตฺตหิตาย ปฏิปนฺโน ปณฺฑิโต กุสโล พฺยตฺโต อาทีนวทสฺสี. อยํ เววจโน. त्यात वेवचन हार कोणता? जो अंधकार (मोह) आहे, तो स्वतःच्या विनाशासाठी प्रवृत्त झालेला असतो; तो अश्रद्ध, बाल (मूर्ख), अकुशल, अव्यक्त आणि आदीनव (दोष) न पाहणारा असतो. जो प्रकाश (जोती) आहे, तो स्वतःच्या हितासाठी प्रवृत्त झालेला असतो; तो पंडित, कुशल, व्यक्त आणि आदीनव (दोष) पाहणारा असतो. हा वेवचन हार आहे। ตตฺถ กตมา ปญฺญตฺติ? โส ปุคฺคโล วิปากปญฺญตฺติยา ปญฺญาปิยติ, อกุสเล ปริยาทินฺนตา ปญฺญาปิยติ. โชติกุสลธมฺมุปปตฺติปญฺญตฺติยา ปญฺญาปิยติ กุสลธมฺมวิปากปญฺญตฺติยา จาติ. त्यात पण्णत्ती हार (प्रज्ञप्ती हार) कोणता? तो पुद्गल विपाक-प्रज्ञप्तीने प्रज्ञापित केला जातो, अकुशल धर्मांच्या क्षीणतेने प्रज्ञापित केला जातो. प्रकाश (जोती) हा कुशल धर्मांच्या उत्पत्तीच्या प्रज्ञप्तीने प्रज्ञापित केला जातो आणि कुशल धर्मांच्या विपाकाच्या प्रज्ञप्तीने प्रज्ञापित केला जातो। โอตรโณติ เย อวิชฺชาปจฺจยา สงฺขารา ยญฺจ ชรามรณํ ยา จ อวิชฺชา, ตํ ปทฏฺฐานํ, นิทฺเทเสน วิชฺชุปฺปาโท อวิชฺชานิโรโธ โย ยาว ชรามรณนิโรโธ, อิเม ทฺเว ธมฺมา สงฺขารกฺขนฺธปริยาปนฺนา. ธมฺมธาตุ ธมฺมายตนญฺจ ปทฏฺฐานํ นิทฺเทเสน ธาตูสุ. ओतरण (अवतरण हार) म्हणजे: अविद्येच्या प्रत्ययाने (कारणाने) जे संस्कार उत्पन्न होतात, आणि जे जरामरण आहे व जी अविद्या आहे, ते पदस्थान (निकटचे कारण) आहे. निर्देशानुसार, विद्येचा उत्पाद (उत्पत्ती) आणि अविद्येचा निरोध, जो जरामरणाच्या निरोधापर्यंत आहे, हे दोन धर्म संस्कारस्कंधात समाविष्ट आहेत. धम्मधातू आणि धम्मायतन हे धातूंच्या निर्देशात पदस्थान आहेत। ตตฺถ กตโม โสธโน? อิมสฺส สุตฺตสฺส เทสิตสฺส อารมฺโภ. อธิฏฺฐาโนติ ตโมติ ภควา พฺรวีติ, น เอกํ ปุคฺคลํ เทเสติ. ยาวตา สตฺตานํ คติ, ตตฺถ เย ทุจฺจริตธมฺเมน อุปปนฺนา, เต พหุลาธิวจเนน ตโม นิทฺทิสติ. ยา โชติ สพฺพสตฺเตสุ กุสลธมฺโมปปตฺติ สพฺพํ ตํ โชตีติ อภิลปติ อยเมกตา ปจฺจโย โยนิโสมนสิการปญฺญตฺติ จตุนฺนํ มหาภูตานํ ปุคฺคลานํ. त्यात सोधन हार (शोधन हार) कोणता? या देशित केलेल्या सूत्राचा आरंभ होय. अधिष्ठान हार म्हणजे: 'अंधकार' असे भगवान म्हणतात, ते केवळ एका पुद्गलाला (व्यक्तीला) उद्देशून देशित करत नाहीत. जितकी प्राण्यांची गती आहे, त्यात जे दुश्चरित धर्माने उत्पन्न झाले आहेत, त्यांना बहुवचनाने 'अंधकार' असे निर्देशित करतात. सर्व प्राण्यांमध्ये जी कुशल धर्मांची उत्पत्ती आहे, त्या सर्वांना 'प्रकाश' (जोती) असे म्हणतात. हा चार महाभूतांच्या पुद्गलांसाठी एकतेचा प्रत्यय (कारण) आणि योनिशोमनसिकार प्रज्ञप्ती आहे। ตตฺถ [Pg.308] กตโม ปริกฺขาโร? อกุสลสฺส ปาปมิตฺตตา ปจฺจโย, อโยนิโส มนสิกาโร เหตุ. กุสลสฺส กลฺยาณมิตฺตตา ปจฺจโย, โยนิโส มนสิกาโร เหตุ. त्यात परिक्खार हार (परिकार हार) कोणता? अकुशलासाठी पापमित्रता हा प्रत्यय (कारण) आहे आणि अयोनिशोमनसिकार हा हेतू आहे. कुशलासाठी कल्याणमित्रता हा प्रत्यय आहे आणि योनिशोमनसिकार हा हेतू आहे। ตตฺถ กตมา สมาโรปนาติ? อิเธกจฺโจ นีเจ กุเล ปจฺจาชาโต โหตีติ นีเจ กุเล ปจฺจาชาโต รูเปสุ สทฺเทสุ คนฺเธสุ รเสสุ ผสฺเสสุ, โส อุปปนฺโน สพฺพมฺหิ มานุสฺสเก อุปโภคปริโภเค. โชติ ปณีเตสุ กุสเลสุ อุปปนฺโน สพฺพมฺหิ มานุสฺสเก อุปโภคปริโภเค อุปปนฺโนติ. त्यात समारोपना हार (समारोपण हार) कोणता? 'येथे एखादा नीच कुळात जन्माला येतो' म्हणजे नीच कुळात जन्माला येऊन रूप, शब्द, गंध, रस आणि स्पर्श यांमध्ये तो संपूर्ण मानवी उपभोग-परिभोगात उत्पन्न होतो. प्रकाश (जोती) हा प्रणीत (उत्कृष्ट) कुशल धर्मांमध्ये उत्पन्न होऊन संपूर्ण मानवी उपभोग-परिभोगात उत्पन्न होतो। ๑๐๕. ตตฺถ กตมํ สํกิเลสภาคิยํ นิพฺเพธภาคิยํ จ สุตฺตํ? น ตํ ทฬฺหํ พนฺธนมาหุ ธีราติ คาถา. เกน การเณน ตํ พนฺธนํ ทฬฺหํ? จตูหิ การเณหิ อิสฺสริเยน สกฺกา โมเจตุํ ธเนน วา อญฺเญน วา ยาจนาย วา ปรายเนน วา. เยสุ จ อยํ ราโค มณิกุณฺฑเลสุ ปุตฺเตสุ ทาเรสุ จ ยา อเปกฺขา, อิทมสฺส เจตสิกพนฺธนํ. ตํ น สกฺกา อิสฺสริเยน วา ธเนน วา อญฺเญน วา ยาจนาย วา ปรายเนน วา โมเจตุํ. น จ ตตฺถ โกจิ อตฺถิ ปาฏิโภโค. อิมินา พนฺธนโต โมจยิตฺถาติ เทโว วา มนุสฺโส วา ตทิทํ พนฺธนํ ราคานุสเยน จ ฉสุ พาหิเรสุ จ อายตเนสุ พนฺธติ. รูเปสุ รูปตณฺหา พนฺธติ, ยาว ธมฺเมสุ ธมฺมตณฺหา. โย อิธ โลเก พนฺโธ ปรโลกสฺมึ พนฺโธ นียติ. โส พนฺโธ ชายติ, พนฺโธ มียติ. พนฺโธ อสฺมา โลกา ปรํ โลกํ คจฺฉติ. น สกฺกา โมเจตุํ อญฺญตฺร อริยมคฺเคน อิมญฺจ พนฺธนํ. มรณภาวญฺจ อุปปตฺติภาวญฺจ ภยโต วิทิตฺวา ฉนฺทราคํ ปชหติ. โส อิมํ ฉนฺทราคํ ปชหิตฺวา อติกฺกมติ. อยญฺจ โลโก อิโต ปรํ ทุติโย. १०५. त्यात संकिलेसभागिय (संक्लेशभागीय) आणि निब्बेधभागिय (निर्वेधभागीय) सूत्र कोणते? 'धीर पुरुष त्याला दृढ बंधन म्हणत नाहीत' ही गाथा होय. कोणत्या कारणाने ते बंधन दृढ असते? चार कारणांनी: ऐश्वर्याने, धनाने, किंवा इतर याचनेने किंवा आश्रयाने ते सोडवता येऊ शकते. परंतु ज्यांच्यामध्ये हा राग (आसक्ती) मणिकुंडल, पुत्र आणि पत्नी यांच्याविषयी जी अपेक्षा (आसक्ती) असते, हे त्याचे चेतसिक (मानसिक) बंधन आहे. ते ऐश्वर्याने, धनाने, इतरांनी, याचनेने किंवा आश्रयाने सोडवता येत नाही. आणि तिथे कोणीही जामीनदार नसतो की 'या बंधनातून मुक्त करा'. देव किंवा मनुष्य असो, हे बंधन रागानुशयाने आणि सहा बाह्य आयतनांमध्ये बांधते. रूपांमध्ये रूपतृष्णा बांधते, धर्मांमध्ये धर्मतृष्णा बांधते. जो या लोकात बांधलेला आहे, तो परलोकातही बांधलेलाच नेला जातो. तो बांधलेलाच जन्मतो, बांधलेलाच मरतो. बांधलेलाच या लोकातून परलोकात जातो. आर्यमार्गाशिवाय या बंधनातून मुक्त होणे शक्य नाही. मरणभाव आणि उत्पत्तीभाव यांना भय म्हणून जाणून तो छंदरागाचा त्याग करतो. तो या छंदरागाचा त्याग करून (संसाराला) ओलांडून जातो. आणि हा लोक यानंतर दुसरा (परलोक) होतो। ตตฺถ ยํ พนฺธนาสงฺขารานํ ปหานํ อิทํ วุจฺจติ อุภเยสุ ฐาเนสุ วีริยํ, คนฺธปริวาโต สุมุนิ โนปลิมฺปติ. ตเถว ปริคฺคเหสุ ปุตฺเตสุ ทาเรสุ จ อวูฬฺโห สลฺโลติ ตสฺเสว ตณฺหาย ปหานํ ทสฺเสติ. อยํ ตณฺหามูลสฺส ปหานา วเร อปฺปมตฺโตติ กาโม ปมาทวตฺตติ ปหานาย เนกฺขมฺมาภิรโต อปฺปมาทวิหารี ภวติ. ตสฺส อาสยํ ปหานาย เนว อิมํ โลกํ อาสีสติ น ปรโลกํ. น อิธโลกํ นิสฺสิตํ, ปิยรูปํ สาตรูปํ อากงฺขติ. นาปิ ปรโลกํ นิสฺสิตํ ปิยรูปํ สาตรูปํ [Pg.309] อากงฺขติ, เตน วุจฺจเต ‘‘นาสีสเต โลกมิมํ ปรํ โลกญฺจา’’ติ. ยํ ตสฺส ปหานํ ตํ เฉทนํ อฏฺฐกวคฺคิเยสุ มุนิ นิทฺทิฏฺโฐ. โส อิธ วิโรโธ อฏฺฐกวคฺคิเยสุ นาสีสนํ อิธ อนาถา. ตถายํ ตณฺหาย ตสฺส ปริคฺคหสฺส วตฺถุกามสฺส เอกคาถาย เอเต สพฺเพ กามา ทสฺสิตา. เตน ภควา เทเสติ ‘‘เอตมฺปิ เฉตฺวาน ปริพฺพชนฺติ อนเปกฺขิโน สพฺพกาเม ปหายา’’ติ. อิมิสฺสา คาถาย ทฺวิธา นิทฺเทโส สํสนฺทนนิทฺเทโส จ สมยนิทฺเทโส จ, ยถา อยํ คาถา สํกิเลสภาคิยญฺจ นิพฺเพธภาคิยญฺจ, เอวํ ตาย คาถาย สํกิเลสภาคิยญฺจ นิพฺเพธภาคิยญฺจ วิสชฺชนา. เอวํ คาถา สพฺพคาถาสุ พฺยากรเณสุ วา นิทฺทิฏฺฐํ สุตฺตํ. त्यात बंधनरूप संस्कारांचा जो प्रहाण (त्याग) आहे, त्याला दोन्ही स्थानांमध्ये 'वीर्य' (प्रयत्न) म्हटले जाते. ग्रंथांनी (बंधनांनी) वेढलेला नसलेला सुमुनी (उत्कृष्ट मुनी) लिप्त होत नाही. तसेच परिग्रहांमध्ये, पुत्रांमध्ये आणि पत्नींमध्ये जो शल्याने (लोभरूपी शल्याने) विद्ध झालेला नाही, तो त्याच्या तृष्णेचा प्रहाण दर्शवतो. हा तृष्णामुळाच्या प्रहाणामुळे श्रेष्ठ धर्मात अप्रमत्त (सावध) असतो. वट्टातून (संसारातून) मुक्त होण्याची इच्छा असणारा, प्रमादाचा त्याग करण्यासाठी नैष्क्रम्यात (संन्यासात) अभिरत राहून अप्रमादविहारी होतो. त्याच्या आशयाचा (इच्छेचा) प्रहाण झाल्यामुळे तो या लोकाची आकांक्षा करत नाही आणि परलोकाचीही आकांक्षा करत नाही. तो या लोकावर आश्रित असलेल्या प्रियरूप आणि सातरूपाची (सुखद रूपाची) आकांक्षा करत नाही. तसेच परलोकावर आश्रित असलेल्या प्रियरूप आणि सातरूपाची आकांक्षा करत नाही, म्हणून म्हटले जाते: 'तो या लोकाची आणि परलोकाची आकांक्षा करत नाही'. त्याचा जो प्रहाण आणि छेद आहे, तो अठ्ठकवग्गिय सूत्रांमध्ये मुनींनी (बुद्धांनी) निर्दिष्ट केला आहे. तो येथे विरोध आहे, अठ्ठकवग्गिय सूत्रांमध्ये आकांक्षा नसणे आणि येथे अनाथ (आश्रयहीन) असणे आहे. तसेच तृष्णेने वस्तूकामाचा परिग्रह करणाऱ्या त्या पुद्गलाचे एका गाथेने हे सर्व काम दर्शवले आहेत. म्हणून भगवान उपदेश करतात: 'यालाही छेदून, अपेक्षारहित होऊन, सर्व कामांचा त्याग करून ते परिव्राजक होतात (प्रव्रज्या घेतात)'. या गाथेचा दोन प्रकारे निर्देश आहे: संसंदन-निर्देश (तुलना) आणि समय-निर्देश. जशी ही गाथा संक्लेशभागीय आणि निर्वेधभागीय आहे, तसेच त्या गाथेने संक्लेशभागीय आणि निर्वेधभागीय उत्तर दिले आहे. अशा प्रकारे सर्व गाथांमध्ये आणि व्याकरणांमध्ये सूत्राचा निर्देश केला आहे। ๑๐๖. ตตฺถ กตมา เทสนา? อิมํ สุตฺตํ เกนาธิปฺปาเยน เทสิตํ. เย ราคจริตา สตฺตา, เต กาเม ปชหิสฺสนฺตีติ อยํ ตตฺถ ภควโต อธิปฺปาโย. १०६. त्यात देसना हार (देशना हार) कोणता? हे सूत्र कोणत्या अभिप्रायाने (हेतूने) देशित केले आहे? जे रागचरित प्राणी आहेत, ते कामांचा त्याग करतील, हाच तेथे भगवंतांचा अभिप्राय आहे। ตตฺถ กตโม วิจโย? ยสฺส ทสวตฺถุกา กิเลสา อุตฺติณฺณา วนฺตา วิทิตา. กตเม ทสวิธาติ, กิเลสกามา จ โอรมฺภาคิยอุทฺธมฺภาคิยา จ สํโยชนา ทสวตฺถุกานิ อายตนานิ, อยํ วิจโย. त्यात विचय हार कोणता? ज्याचे दहा वस्तूंचे (कारणांचे) क्लेश पार झाले आहेत, ओकून टाकले (नष्ट केले) गेले आहेत आणि जाणले गेले आहेत. ते दहा प्रकार कोणते? क्लेशकाम, ओरंभागीय (अधोभागीय) आणि उद्धंभागीय (ऊर्ध्वभागीय) संयोजने, आणि दहा वस्तूंचे आयतने; हा विचय हार आहे। ตตฺถ กตมา ยุตฺติ? เย สารตฺตา เต คาฬฺหพนฺธเนน พนฺธนฺติ อตฺถิ เอสา ยุตฺติ. त्यात युत्ती हार (युक्ती हार) कोणता? जे अत्यंत आसक्त (सारत्त) आहेत, त्यांना दृढ बंधनाने बांधले जाते; ही युक्ती आहे। ตตฺถ กตโม ปทฏฺฐาโน? สารตฺโต มณิกุณฺฑเลสุ มมํการสฺส ปทฏฺฐานํ. อเปกฺขาติ อตีตวตฺถุสฺส สราคสฺส ปทฏฺฐานํ. เอตมฺปิ เฉตฺวาติ ภาวนาย ปทฏฺฐานํ. तेथे पदट्ठान हार कोणता आहे? मणिकुंडलांमध्ये (रत्नजडित कर्णभूषणांमध्ये) तीव्र आसक्त असणे हे 'ममंकार' (माझेपणा) चे पदट्ठान (निकटचे कारण) आहे. 'अपेक्षा' म्हणजे भूतकाळातील वस्तूंच्या संदर्भातील सरागतेचे (आसक्तीचे) पदट्ठान होय. 'यालाही तोडून' हे भावनेचे पदट्ठान आहे. ตตฺถ กตโม ลกฺขโณ? สารตฺตจิตฺโต มณิกุณฺฑเลสุ โย อหํกาเร วิสตฺโต มมํกาเร วิสตฺโต, โย ปุตฺตทาเร สารตฺโต. เขตฺตวตฺถุสฺมึ สารตฺโต. อยํ ลกฺขโณ หาโร. तेथे लक्षण हार कोणता आहे? मणिकुंडलांमध्ये तीव्र आसक्त चित्त असलेला जो मनुष्य अहंकारात आसक्त आहे, ममंकारात आसक्त आहे, जो पुत्र आणि पत्नीमध्ये आसक्त आहे, शेत आणि जमिनीत आसक्त आहे; हा लक्षण हार होय. ตตฺถ กตโม จตุพฺยูโห หาโร? อิธ สุตฺเต ภควโต โก อธิปฺปาโย. เย นิพฺพาเนน ฉนฺทิกา ภวิสฺสนฺติ, เต ปุตฺตทาเร ตณฺหํ ปชหิสฺสนฺติ. อยํ ตตฺถ ภควโต อธิปฺปาโย. อิมานิ จตฺตาริ สจฺจานิ. तेथे चतुब्यूह हार कोणता आहे? या सूत्तात भगवंतांचा काय अभिप्राय आहे? जे निर्वाणाची आकांक्षा बाळगणारे असतील, ते पुत्र आणि पत्नीवरील तृष्णेचा त्याग करतील. हा तेथे भगवंतांचा अभिप्राय आहे. ही चार आर्यसत्ये आहेत. ตตฺถ กตโม อาวฏฺโฏ? ยา ปุตฺตทาเร ตณฺหา, อยํ สมุทโย. เย อุปาทินฺนกฺขนฺธา, เต เย จ พาหิเรสุ รูเปสุ รูปปริคฺคโห, อิทํ ทุกฺขํ, ยํ [Pg.310] ตตฺถ เฉทนียํ, อยํ นิโรโธ. เยน ภิชฺชติ, อยํ มคฺโค. วิภตฺตีติ นตฺถิ วิภตฺติยา ภูมิ, ปริวตฺตโนติ ปฏิปกฺโข นิทฺทิฏฺโฐ. तेथे आवट्ट हार कोणता आहे? पुत्र आणि पत्नीविषयी जी तृष्णा आहे, तो 'समुदय' आहे. जे उपादानस्कंध आहेत आणि बाह्य रूपांमध्ये जे रूपाचे ग्रहण आहे, ते 'दुःख' आहे. तेथे जे छेदून टाकण्यासारखे आहे, तो 'निरोध' आहे. ज्याने (क्लेशांचा) नाश होतो, तो 'मार्ग' आहे. 'विभत्ती' च्या बाबतीत येथे विभत्तीची भूमी नाही. 'परिवत्तन' द्वारे प्रतिपक्षाचे निर्देश केले आहे. ตตฺถ กตโม เววจโน? นิทฺทิฏฺโฐ เววจโน. ตตฺถ กตโม โอตรโณ? อตฺถิ ตณฺหา เอโก สตฺโต โอติณฺโณ ตปฺปจฺจยา วิญฺญาณํ ยาว ชรามรณํ. ยา ตตฺถ เวทนา, อยํ อวิชฺชา วิชฺชุปฺปาทา อวิชฺชานิโรโธ ยาว ชรามรณนิโรโธ. तेथे वेवचन हार कोणता आहे? वेवचन निर्देशित केले आहे. तेथे ओतरण हार कोणता आहे? तृष्णा अस्तित्वात आहे, ज्यामध्ये एक प्राणी प्रविष्ट झालेला आहे; तिच्या प्रत्ययाने (कारणाने) विज्ञानाचा जरामरणापर्यंत प्रवेश होतो. तेथे जी वेदना आहे, ती अविद्या आहे. विद्येच्या उत्पत्तीने अविद्येचा निरोध होतो आणि जरामरणाचा निरोध होतो. ตตฺถ กตโม โสธโน? สุทฺโธ คาถาย อารมฺโภ. ตตฺถ กตโม อธิฏฺฐาโน? น ตํ ทฬฺหํ พนฺธนมาหุ ธีราติ เอกตฺตตาย ปญฺญตฺตา, น เวมตฺตตาย. จตฺตาโร ราคา กามราโค รูปราโค ภวราโค ทิฏฺฐิราโค จาติ เอกตฺตตาย ปญฺญตฺตา. तेथे सोधन हार कोणता आहे? गाथेचा आरंभ शुद्ध आहे. तेथे अधिठ्ठान हार कोणता आहे? 'धीरांनी त्याला दृढ बंधन म्हटले नाही' (न तं दळ्हं बन्धनमाहु धीरा) या गाथेत एकत्वाच्या रूपाने प्रज्ञप्त केले आहे, भिन्नतेच्या रूपाने नाही. चार प्रकारचे राग—कामराग, रूपराग, भवराग आणि दिठ्ठिराग—हे एकत्वाच्या रूपाने प्रज्ञप्त केले आहेत. ตตฺถ กตโม ปริกฺขาโร? เยสํ ราโค มณิกุณฺฑเลสุ ตสฺส สุภสญฺญา เหตุ, อนุพฺยญฺชนโส จ นิมิตฺตคฺคาหิตา ปจฺจโย. ยาย เต ฉินฺนานิ ตสฺส อสุภสญฺญา เหตุ, นิมิตฺตคฺคหณอนุพฺยญฺชนคฺคหณวิโนทนํ ปจฺจโย. तेथे परिक्खार हार कोणता आहे? ज्यांचा मणिकुंडलांवर राग (आसक्ती) आहे, त्यांच्यासाठी 'सुभसञ्ञा' (शुभसंज्ञा) हे हेतू आहे, आणि अनुव्यंजनांसह निमित्तग्रहण करणे हा प्रत्यय आहे. ज्या प्रज्ञेने ते छेदले जातात, तिच्यासाठी 'असुभसञ्ञा' (अशुभसंज्ञा) हे हेतू आहे, आणि निमित्तग्रहण व अनुव्यंजनग्रहाचा त्याग करणे हा प्रत्यय आहे. ตตฺถ กตโม สมาโรปโน? สารตฺโต มณิกุณฺฑเลสุ สมฺมูฬฺหวิโธ ทุฏฺฐาติปิ เอตมฺปิ เฉตฺวาน ปริพฺพชนฺตีติ ตํ ปริญฺญาตตฺถํ ปริวชฺชิตตฺถํ ปชหิตา, อยํ สมาโรปโน. तेथे समारोपन हार कोणता आहे? मणिकुंडलांमध्ये तीव्र आसक्त असलेला, संमोहित झालेला आणि द्वेषयुक्त असलेला मनुष्यसुद्धा 'याला छेदून प्रव्रजित होतो'. म्हणून, त्या रागादींना परिज्ञेय (पूर्णपणे जाणण्यासाठी) आणि परिवर्जनीय (त्याग करण्यासाठी) सोडून दिले जाते; हा समारोपन हार आहे. ๑๐๗. ยํ เจตสิกํ ยํ ปกปฺปิตํ วิตฺถาเรน ปจฺจโย, ยํ วา เจตสิกํ กายิกํ เจตสิกํ กมฺมํ. กึการณา? เจตสิกา หิ เจตนา มโนกมฺมาติ วุจฺจเต, สา เจตนากมฺมํ, ยํ เจตสิกํ อิมํ กายิกญฺจ วาจสิกญฺจ อิมานิ ตีณิ กมฺมานิ นิทฺทิฏฺฐานิ. กายกมฺมํ วจีกมฺมญฺจ ตานิ กุสลานิ ปิยํ กาเยน จ วาจาย จ อารภติ ปรามสติ, อยํ วุจฺจติ สีลพฺพตปรามาโส. สงฺกปฺปนา เต ติวิธา สงฺขารา ปุญฺญมยา อปุญฺญมยา อาเนญฺชมยา, ตปฺปจฺจยา วิญฺญาณํ เต อารมฺมณเมตํ โหติ วิญฺญาณสฺส ฐิติยา. ยา สุภสญฺญา สุขสญฺญา อตฺตสญฺญา จ. อิทํ เจตสิกํ. ยํ รูปูปคํ วิญฺญาณํ ติฏฺฐติ รูปารมฺมณํ รูปปติฏฺฐิตํ นนฺทูปเสจนํ วุทฺธึ วิรูฬฺหึ เวปุลฺลตํ คจฺฉติ, อยํ สงฺกปฺปนา, อิติ ยํ วิญฺญาณฏฺฐิตีสุ [Pg.311] ฐิตํ ปฐมาภินิพฺพตฺติอารมฺมณวเสน อุปาทานํ, อิทํ วุจฺจติ เจตสิกนฺติ. १०७. जे चैतसिक आहे आणि जे कल्पित आहे, ते विस्ताराने प्रत्यय आहे; किंवा जे चैतसिक, कायिक आणि चैतसिक कर्म आहे. कोणत्या कारणाने? कारण चैतसिक चेतनेलाच 'मनोकम' (मनोकर्म) असे म्हटले जाते, ती चेतनाच कर्म आहे. जे चैतसिक आहे, ते कायिक आणि वाचिक देखील आहे; ही तीन कर्मे निर्देशित केली आहेत. कायकर्म आणि वचीकर्म हे कुशल देखील असतात. जे कायेने आणि वाचेने आरंभ करतो आणि स्पर्श करतो (परामर्श करतो), त्याला 'सीलब्बतपरामास' (शीलव्रतपरामर्श) असे म्हटले जाते. संकल्पना आणि ते त्रिविध संस्कार—पुण्यमय, अपुण्यमय आणि आनेञ्जमय—आहेत; त्यांच्या प्रत्ययाने विज्ञान उत्पन्न होते. ते विज्ञानाच्या स्थितीसाठी आलंबन बनते. जी सुभसञ्ञा, सुखसञ्ञा आणि अत्तसञ्ञा आहे, ती चैतसिक आहे. जे रूपाप्रत पोहोचलेले विज्ञान टिकून राहते, ते रूपाचे आलंबन घेणारे, रूपात प्रतिष्ठित असलेले आणि नंदीने (तृष्णेने) सिंचित होऊन वृद्धी, विरूढी आणि विपुलतेला प्राप्त होते; ही संकल्पना आहे. अशा प्रकारे, विज्ञानस्थितींमध्ये जे स्थित आहे, ते प्रथम अभिनिर्वृत्तीच्या आलंबनाच्या वशाने 'उपादान' आहे; याला 'चैतसिक' असे म्हटले जाते. ตตฺถ ฐิตสฺส อรูปสฺส ยา นิกนฺติ อชฺโฌสานํ, อิทมฺปิ สกมฺปิตํ มนาปิเกสุ รูเปสุ ปิยรูปสาตรูเปสุ อาโภโค, อิทํ เจตสิกํ. ยํ เจเตติ สตฺเตสุ มนาปิเกสุ อภิชฺฌากายคนฺโถ ปฏิฆานุสเยสุ พฺยาปาทกายคนฺโถ สพฺเพ จตฺตาโร คนฺถา, อยํ ปญฺจสุ กามคุเณสุ ปฐมาภินิปาโต จิตฺตสฺส ยา เจตนา ยสฺส ตตฺถ อสฺสาทานุปสฺสิสฺส อเนกา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา จิตฺตํ อรูปวติโย โหนฺติ. ปุคฺคโล ราคานุพนฺธิภูโต เตหิ กิเลสกาเมหิ ยถา กามกรณีโย, อยํ วุจฺจเต กาเมสุ ปกปฺปนา. เอวํ สพฺเพ จตฺตาโร โอฆา. ยํ เตหิ กาเมหิ สํยุตฺโต วิหรติ ภาวิโต อชฺโฌสนฺโน, อยํ เจตนา. ยสฺส ตถายํ อวีตราคสฺส อธิคตเปมสฺส ตสฺส วิปริณามญฺญถาภาวา อุปฺปชฺชนฺติ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา ทุกฺขานุปริวตฺติตํ วิญฺญาณํ โหติ สริตสฺส วยธมฺมสมุปฺปาโท จิตฺตํ ปริยาทิยติ, อิทํ วุจฺจติ ปกปฺปิตนฺติ. तेथे स्थित असलेल्या अरूपाची (नामाची) जी निकंती (आसक्ती) आणि अध्यवसान आहे, ते देखील सकंपित आहे. मनपसंत रूपांमध्ये, प्रिय आणि सुखद रूपांमध्ये जो आभोग आहे, ते चैतसिक आहे. मनपसंत प्राण्यांच्या बाबतीत जे चेतित होते, तो 'अभिज्झाकायगंथ' आहे; आणि प्रतिघानुशयांमध्ये 'ब्यापादकायगंथ' आहे; हे सर्व चार कायग्रंथ आहेत. पाच कामगुणांमध्ये चित्ताचा जो प्रथम अभिनिपात होतो, ती चेतना आहे. तेथे आस्वाद पाहणाऱ्या व्यक्तीच्या चित्तात अनेक पापी अकुशल धर्म उत्पन्न होतात. रागाने अनुबंधित झालेला पुद्गल त्या क्लेशयुक्त कामांद्वारे आपल्या इच्छेनुसार वागवला जातो; याला कामांमधील 'पकप्पना' असे म्हटले जाते. अशा प्रकारे सर्व चार ओघ आहेत. जो त्या कामांशी संयुक्त होऊन, प्रभावित होऊन आणि आसक्त होऊन विहार करतो, ती चेतना आहे. ज्या अवीतराग आणि अतिशय प्रेम असलेल्या व्यक्तीला तशा प्रकारे जे प्राप्त होते, त्याच्यासाठी विपरिणाम आणि अन्यथाभावामुळे शोक, परिदेव, दुःख, दोमनस्य आणि उपायास उत्पन्न होतात. दुःखानुपरिवर्तित विज्ञान निर्माण होते. स्मरण करणाऱ्या व्यक्तीच्या चित्ताला व्ययधर्माचा उदय व्यापून टाकतो; याला 'पकप्पिक' असे म्हटले जाते. เอกเมกสฺส เจเตติ จ ปกปฺเปติ จ วิญฺญาณสฺส ฐิติ ยา โหติ, สา จ ฐิติ ทฺวิธา อารมฺมณฏฺฐิติ จ อาหารฏฺฐิติ จ. ตตฺถ ยา อารมฺมณฏฺฐิติ, อยํ นามรูปสฺส ปจฺจโย. ยา อาหารฏฺฐิติ ยา ปุนพฺภวาภินิพฺพตฺติกา ฐิติ ยา จ โปโนภวิกา ฐิติ, อยํ วุจฺจติ อารมฺมณํ. ตํ โหติ วิญฺญาณสฺส ฐิติยา ตสฺส วิญฺญาณปจฺจยา นามรูปํ ยาว ชรามรณญฺจ เจเตติ, อถ จ ปุน ปตฺถยเต ยโต น โปโนภวิกา อนาคตวตฺถุมฺหิ, อยํ ปฏิปกฺโข นิทฺทิฏฺโฐ. น เจเตติ น ปตฺถยติ อถ จ ทูเสตีติ ทุวิโธ นิทฺเทโส. อสฺส ปุพฺเพ โหติ ตํ เจตสิกํ ตํ ปกปฺปิตํ อสมูหตํ ตปฺปจฺจยา, อยํ วิญฺญาณสฺส ฐิติ โหติ. प्रत्येक आलंबनाचा जो चेतित करतो आणि कल्पित करतो, ती विज्ञानाची जो स्थिती होते, ती स्थिती दोन प्रकारची असते—आलंबनस्थिती आणि आहारस्थिती. तेथे जी आलंबनस्थिती आहे, ती नामरूपाचा प्रत्यय आहे. जी आहारस्थिती आहे, ती पुनरुत्पत्ती घडवून आणणारी स्थिती आहे; आणि जी पुनरुत्पत्तीशी संबंधित स्थिती आहे, तिला आलंबन असे म्हटले जाते. ती विज्ञानाच्या स्थितीसाठी कारणीभूत ठरते. विज्ञानाच्या प्रत्ययाने तो नामरूपाचा जरामरणापर्यंत विचार करतो. आणि पुन्हा, ज्या कारणाने तो अनागत वस्तूंमध्ये पुनरुत्पत्ती न होण्याची आकांक्षा बाळगतो, हा प्रतिपक्ष निर्देशित केला आहे. 'तो विचार करत नाही, आकांक्षा बाळगत नाही आणि तरीही दूषित करतो' असा निर्देश दोन प्रकारचा आहे. त्याच्यासाठी पूर्वी जे चैतसिक आणि कल्पित होते, ते त्या प्रत्ययाने उन्मूलित न झालेले असते; ही विज्ञानाची स्थिती होते. ๑๐๘. อถ วา ตสฺส อนุสยา อาวิภวนฺติ ตปฺปจฺจยา ตสฺส ปุนพฺภโว นิพฺพตฺตติ. อถ วา นํ สํกิยเต อปฺเปตุ อาคาเร วา, สุขุมา วา สนฺติ วา น สํกิยเต กาเม ตํ เอวํ นิจฺเจสุปิ อาคาเรสุ ชาโต โหติ. ตํ นยติ ยํ โน กปฺเปตุํ เอวํ สงฺขารา เจติตา ปกปฺปิตา จ อารมฺมณภูตา [Pg.312] โหนฺติ, ยา จ เจตนา ยา จ ปกปฺปนา ยญฺจ วตฺถุ นิพฺพตฺตํ, อุโภปิ เอเต อารมฺมณํ วิญฺญาณสฺส ตถา เจตนาย จ สงฺกปฺปนาย จ ปตฺถนาย จ ภูตา สตฺตา เจเตติ จ สงฺกปฺเปติ จ. ยํ คเวสนา น จ เจเตติ น จ สงฺกปฺเปติ. กตเม จ สตฺตา ภูตา? เย จ ตนุชาตอณฺฑชาปิ อณฺฑกา อนุภินฺนา สํเสทชา น จ สมฺภินฺนา อิเม ภูตา. กตเม สมฺภเวสิโน คพฺภคตา อณฺฑคตา สํสรนฺโต อิเม น เจเตติ น ปตฺเถติ น จ สงฺกปฺเปติ. อนุสเย น จ ปุนพฺภโว นิพฺพตฺตีติ? เย ภูตา สตฺตา เย สมฺภเวสิโน, เต ถาวรา. เย วา สโต เจเตนฺติ ปตฺเถนฺติ จ เย ถาวรา. เต น จ เจเตนฺติ, น จ ปตฺเถนฺติ, น จ สงฺกปฺเปนฺติ, อนุสเยน จ สํสรนฺติ. १०८. किंवा, त्याचे अनुशय प्रकट होतात आणि त्या कारणामुळे त्याचा पुनर्जन्म होतो. किंवा, त्याला घरात प्रवेश दिला तरी त्याची प्रशंसा केली जाते. सूक्ष्म किंवा शांत अशा कामांमध्ये त्याची प्रशंसा केली जात नाही. अशा प्रकारे तो नित्य घरांमध्ये जन्मलेला असतो. भिक्खू त्याला नेतो ज्याची कल्पना करणे शक्य नाही. अशा प्रकारे संस्कार चेतित आणि कल्पित होऊन आलंबनभूत होतात, आणि जी चेतना, जी कल्पना आणि जे उत्पन्न झालेले वस्तू-आलंबन आहे, हे दोन्ही विज्ञानाचे आलंबन आहेत. त्याचप्रमाणे चेतना, संकल्प आणि प्रार्थना यांच्याद्वारे उत्पन्न झालेले प्राणी चेतना करतात आणि संकल्प करतात. जे शोधत असताना चेतना करत नाही आणि संकल्पही करत नाही. 'भूत' प्राणी कोणते? जे अंड्यातून उत्पन्न झालेले (अंडज) आहेत, जे अंडकोशात राहून बाहेर पडतात, आणि जे संस्वेदज (ओलाव्यापासून उत्पन्न होणारे) आहेत जे फुटत नाहीत, हे 'भूत' प्राणी आहेत. 'संभवेसी' कोणते? जे गर्भाशयात असलेले, अंड्यात असलेले आणि संसरण करणारे आहेत, जे चेतना करत नाहीत, प्रार्थना करत नाहीत आणि संकल्प करत नाहीत. अनुशायामुळे पुनर्जन्म उत्पन्न होतो का? जे भूत प्राणी आणि जे संभवेसी आहेत, ते स्थावर आहेत. किंवा जे स्मृती ठेवून चेतना करतात आणि प्रार्थना करतात, ते स्थावर आहेत. ते चेतना करत नाहीत, प्रार्थना करत नाहीत, संकल्प करत नाहीत, आणि अनुशायामुळे संसरण करतात. อปโร ปริยาโย. เย อริยปุคฺคลา เสกฺขา, ตตฺถ เต น จ เจเตนฺติ, น จ สงฺกปฺเปนฺติ, อนุสเยน ปุน อุปฺปชฺชนฺติ. दुसरा पर्याय: जे आर्यपुद्गल शैक्ष (अद्याप अर्हत्त्व न पावलेले) आहेत, ते तिथे चेतना करत नाहीत, संकल्प करत नाहीत, परंतु अनुशायामुळे पुन्हा जन्म घेतात. อปโร ปริยาโย. สุขุมา ปาณา ภูมิคตา อุทกคตา จกฺขุโน อาปาถํ นาคจฺฉนฺติ, เต น จ เจเตนฺติ, น จ สงฺกปฺเปนฺติ, อนุสเยน จ สํสรนฺติ. दुसरा पर्याय: जे सूक्ष्म प्राणी जमिनीत किंवा पाण्यात राहतात आणि डोळ्यांच्या दृष्टीपथात येत नाहीत, ते चेतना करत नाहीत, संकल्प करत नाहीत, आणि अनुशायामुळे संसरण करतात. อปโร ปริยาโย. พาหิกา สพฺเพ ภิกฺขู อภิมานิกา, เต น จ เจเตนฺติ, น จ ปตฺถยนฺติ, อนุสเยน จ สํสรนฺติ, น จ เจเตนฺติ, น จ สงฺกปฺเปนฺติ, น จ อนุเสนฺติ. อารมฺมณมฺเปตํ น โหติ วิญฺญาณสฺส ฐิติยา. दुसरा पर्याय: जे बाह्य (शासनाबाहेरील) आणि अत्यंत अभिमानी असलेले सर्व भिक्खू आहेत, ते चेतना करत नाहीत, प्रार्थना करत नाहीत, आणि अनुशायामुळे संसरण करतात; ते चेतना करत नाहीत, संकल्प करत नाहीत, आणि अनुशयित होत नाहीत. हे विज्ञानाच्या स्थितीसाठी आलंबन होत नाही. น จ เจเตตีติ ปริยุฏฺฐานสมุคฺฆาตํ ทสฺเสติ. น จ อนุเสตีติ อนุสยสมุคฺฆาตํ ทสฺเสติ. น จ เจเตตีติ โอฬาริกานํ กิเลสานํ ปหานํ ทสฺเสติ. น จ อนุเสตีติ สุขุมานํ กิเลสานํ ปหานํ ทสฺเสติ. น จ เจเตตีติ เยน ภูมิ จ น จ ปตฺถยนฺตีติ สกทาคามี อนาคามี, น จ อนุเสตีติ อรหํ, น จ เจเตตีติ สีลกฺขนฺธสฺส ปฏิปกฺเขน ปหานํ ทสฺเสติ, น จ ปตฺถยตีติ สมาธิกฺขนฺธสฺส ปฏิปกฺเขน ปหานํ ทสฺเสติ, น จ อนุสยตีติ ปญฺญากฺขนฺธสฺส ปฏิปกฺเขน ปหานํ ทสฺเสติ, น จ เจเตตีติ อปุญฺญมยานํ สงฺขารานํ ปหานํ ทสฺเสติ, น จ ปตฺถยตีติ ปุญฺญมยานํ สงฺขารานํ ปหานํ ทสฺเสติ, น จ อนุเสตีติ อาเนญฺชมยานํ สงฺขารานํ ปหานํ ทสฺเสติ, น จ เจเตตีติ อนญฺญาตญฺญสฺสามีตินฺทฺริยํ, น จ ปตฺถยตีติ อญฺญินฺทฺริยํ, น จ อนุสยตีติ อญฺญาตาวิโน อินฺทฺริยํ. น จ เจเตตีติ มุทุกา อินฺทฺริยภาวนา, น จ ปตฺถยตีติ [Pg.313] มชฺฌอินฺทฺริยภาวนา, น จ อนุเสตีติ อธิมตฺตา อินฺทฺริยภาวนา. อยํ สุตฺตตฺโถ. 'चेतना करत नाही' याने परियुत्थान (उफाळून येणारे क्लेश) चा समूळ नाश दर्शवला जातो. 'अनुशयित होत नाही' याने अनुशायाचा समूळ नाश दर्शवला जातो. 'चेतना करत नाही' याने स्थूल क्लेशांचे प्रहाण दर्शवले जाते. 'अनुशयित होत नाही' याने सूक्ष्म क्लेशांचे प्रहाण दर्शवले जाते. 'चेतना करत नाही' याने दर्शनभूमी दर्शवली जाते, 'प्रार्थना करत नाही' याने सकदागामी व अनागामी दर्शवले जातात, आणि 'अनुशयित होत नाही' याने अर्हत दर्शवला जातो. 'चेतना करत नाही' याने शीलस्कंधाच्या विरोधी धर्मांचे प्रहाण दर्शवले जाते. 'प्रार्थना करत नाही' याने समाधिस्कंधाच्या विरोधी धर्मांचे प्रहाण दर्शवले जाते. 'अनुशय करत नाही' याने प्रज्ञास्कंधाच्या विरोधी धर्मांचे प्रहाण दर्शवले जाते. 'चेतना करत नाही' याने अपुण्यमय (अकुशल) संस्कारांचे प्रहाण दर्शवले जाते. 'प्रार्थना करत नाही' याने पुण्यमय (कुशल) संस्कारांचे प्रहाण दर्शवले जाते. 'अनुशयित होत नाही' याने आनिंजमय (अचल) संस्कारांचे प्रहाण दर्शवले जाते. 'चेतना करत नाही' याने 'अनज्ञातज्ञास्यामीतीन्द्रिय' दर्शवले जाते. 'प्रार्थना करत नाही' याने 'अज्ञिन्द्रिय' दर्शवले जाते. 'अनुशय करत नाही' याने 'अज्ञातावीन्द्रिय' दर्शवले जाते. 'चेतना करत नाही' याने मृदू इंद्रियभावना दर्शवली जाते, 'प्रार्थना करत नाही' याने मध्यम इंद्रियभावना दर्शवली जाते, आणि 'अनुशयित होत नाही' याने अधिमात्र (तीव्र) इंद्रियभावना दर्शवली जाते. हा सूत्राचा अर्थ आहे. ๑๐๙. ตตฺถ กตมา เทสนา? อิธ สุตฺเต จตฺตาริ สจฺจานิ เทสิตานิ. ยญฺจ เจตยิตํ ยญฺจ ปกปฺปิตํ อตฺถิ เอตํ อารมฺมณํ จิตฺตํ ปติฏฺฐติ วิจินติ ยุชฺชติ. น จ เจเตตีติ น จ ปตฺถยตีติ อตฺถิ เอวํ อารมฺมณํ อนุสเย วิญฺญาณมิติ วิจินิยติ ยุชฺชติ น จ เจเตติ น จ ปตฺถยติ. อนุสยปฺปหานา วิญฺญาณฏฺฐิตึ น คเวสนฺติ, วิจิยนฺตํ ยุชฺชติ. อยํ ยุตฺติวิจโย. १०९. त्यामध्ये देशना कोणती? या सूत्रात चार आर्यसत्ये उपदेशिली आहेत. जे चेतित (प्रेरित) आहे आणि जे कल्पित आहे, ते आलंबन चित्तात प्रतिष्ठित होते, त्याचे परीक्षण केले जाते आणि ते जोडले जाते. 'चेतना करत नाही' आणि 'प्रार्थना करत नाही' असे असताना, अनुशायामध्ये विज्ञानाचे आलंबन आहे असे परीक्षण केले जाते आणि जोडले जाते, तो चेतना करत नाही आणि प्रार्थना करत नाही. अनुशायाच्या प्रहाणामुळे ते विज्ञानस्थितीचा शोध घेत नाहीत, परीक्षणाशी ते जुळते. हा युक्तिविचय आहे. ตตฺถ กตโม ปทฏฺฐาโน? เจตนา ปริยุฏฺฐานํ เจตนาปริยุฏฺฐานสฺส ปทฏฺฐานํ. สงฺกปฺปนํ อุปาทานสฺส ปทฏฺฐานํ. อนุสโย ปริยุฏฺฐานสฺส ปทฏฺฐานํ. เตสํ ฉนฺทราควินาสาย ภาวนา ภวราคสฺส ปหานํ. त्यामध्ये पदस्थान (जवळचे कारण) कोणते? चेतना हे परियुत्थानाचे पदस्थान आहे. संकल्प हे उपादानाचे पदस्थान आहे. अनुशय हा परियुत्थानाचा पदस्थान आहे. त्यांच्या छंदरागाच्या विनाशासाठी केलेली भावना ही भवरगाचे प्रहाण आहे. ตตฺถ กตโม ลกฺขโณ? ยํ เจตสิกนฺติ เวทยิตํ ปกปฺปิตํ อุคฺคหิตํ วิญฺญาตํ ตพฺพิญฺญาณํ อารมฺมณมฺปิ ปจฺจโยปิ. त्यामध्ये लक्षण कोणते? जे चैतसिक म्हणून वेदित (अनुभवलेले), कल्पित, ग्रहण केलेले आणि विज्ञात आहे, ते विज्ञान आलंबनही आहे आणि प्रत्यय (कारण) देखील आहे. ตตฺถ กตโม จตุพฺยูโห? อิธ สุตฺเต ภควโต โก อธิปฺปาโย? เย ปุนพฺภวํ น อิจฺฉนฺติ, เต น เจตยิสฺสนฺติ น จ ปตฺถยิสฺสนฺตีติ, อยํ อธิปฺปาโย. त्यामध्ये चतुर्व्यूह कोणता? या सूत्रात भगवंतांचा काय अभिप्राय आहे? 'जे पुनर्जन्म इच्छित नाहीत, ते चेतना करणार नाहीत आणि प्रार्थनाही करणार नाहीत', हा अभिप्राय आहे. อาวฏฺโฏติ ยา จ เจตนา ปตฺถนา จ อนุสโย จ วิญฺญาณฏฺฐิติปหานา จ, อิมานิ ทฺเว สจฺจานิ. วิภตฺตีติ นตฺถิ วิภตฺติยา ภูมิ. ปริวตฺตนา ปน ปฏิปกฺขํ สุตฺตํ. आवर्त म्हणजे जी चेतना, प्रार्थना, अनुशय आणि विज्ञानस्थितीचे प्रहाण आहे, ही दोन सत्ये आहेत. विभक्ती म्हणजे विभक्तीसाठी कोणतीही भूमी नाही. परिवर्तन म्हणजे विरोधी (प्रतिपक्ष) सूत्र होय. ตตฺถ กตโม เววจโน? เจตนา รูปสญฺเจตนา ยาวธมฺมสญฺเจตนา. โย อนุสโย, เต สตฺต อนุสยา. त्यामध्ये वेवचन (समानार्थी शब्द) कोणते? चेतना म्हणजे रूपसंचेतना ते धर्मसंचेतना पर्यंत होय. जो अनुशय आहे, ते सात अनुशय आहेत. ปญฺญตฺตีติ เจตนาปริยุฏฺฐานํ ปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตา. สงฺกปฺปนํ อุปาทานปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ. อนุสโย เหตุปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺโต. วิญฺญาณฏฺฐิติ อุปปตฺติเหตุปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตา. เจตนา สงฺกปฺปนา อนุสโย สมุจฺเฉโท ฉนฺทราควินยปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺโต. ปฐเม เกจิ ทฺวีหิ ปริวตฺตเกหิ ปฏิจฺจสมุปฺปาโท อิทปฺปจฺจยตาย มชฺฌปญฺญตฺติ. प्रज्ञप्ती म्हणजे चेतना ही परियुत्थान-प्रज्ञप्तीमध्ये प्रज्ञप्त केली आहे. संकल्प हा उपादान-प्रज्ञप्तीमध्ये प्रज्ञप्त केला आहे. अनुशय हा हेतू-प्रज्ञप्तीमध्ये प्रज्ञप्त केला आहे. विज्ञानस्थिती ही उपपत्तीहेतू-प्रज्ञप्तीमध्ये प्रज्ञप्त केली आहे. चेतना, संकल्प, अनुशय आणि समुच्छेद हे छंदराग-विनय-प्रज्ञप्तीमध्ये प्रज्ञप्त केले आहेत. पहिल्या भागात काही दोन आवर्तनांद्वारे प्रतीत्यसमुत्पाद हा इदंप्रत्ययतेमुळे मध्य-प्रज्ञप्ती आहे. โอตรโณติ [Pg.314] ทฺวีหิ ปริวตฺตเกหิ ทุกฺขญฺจ สมุทโย จ มชฺฌิมเกหิ มคฺโค จ นิโรโธ จ. โสธโนติ สุตฺเต สุตฺตสฺส อารมฺโภ. अवतरण म्हणजे दोन आवर्तनांद्वारे दुःख आणि समुदय यांचे, आणि मध्यम मार्गांद्वारे मार्ग आणि निरोध यांचे अवतरण करणे होय. शोधन म्हणजे सूत्रात सूत्राचा आरंभ करणे होय. อธิฏฺฐาโนติ ยญฺเจตยิตํ สพฺพํ อธิฏฺฐาเนน เอกตฺตาย ปญฺญตฺตํ. สงฺกปฺปิตนฺติ อุปาทาเนกตฺตาย ปญฺญตฺตํ. วิญฺญาณํ เอกตฺตาย ปญฺญตฺตํ. अधिष्ठान म्हणजे जे काही चेतित आहे, ते सर्व अधिष्ठानाद्वारे एकत्वामध्ये प्रज्ञप्त केले आहे. कल्पित हे उपादान-एकत्वामध्ये प्रज्ञप्त केले आहे. विज्ञान हे एकत्वामध्ये प्रज्ञप्त केले आहे. ปริกฺขาโรติ สุภญฺจ อารมฺมณํ อโยนิโส มนสิกาโร เจตนา เหตุปจฺจยตาย ปจฺจโย. วิญฺญาณสฺส ปติฏฺฐาโน ธมฺโม อารมฺมณปจฺจยตาย ปจฺจโย. ตสฺส มนสิกาโร เหตุปจฺจยตาย ปจฺจโย. परिकार म्हणजे शुभ आलंबन, अयोनिशो मनसिकार आणि चेतना हे हेतू-प्रत्ययतेने प्रत्यय (कारण) होतात. विज्ञानाचा प्रतिष्ठा-धर्म हा आलंबन-प्रत्ययतेने प्रत्यय होतो. त्याचा मनसिकार हा हेतू-प्रत्ययतेने प्रत्यय होतो. ตตฺถ กตโม สมาโรปโน? อิทํ สุตฺตํ สญฺญิตํ ตตฺถ เจเตติ วิสชฺชนา อิติ นิทฺทิสิตพฺพา. ตสฺส ทิฏฺฐิยา วิญฺญาณปจฺจยา นามรูปํ ยาว ชรามรณํ, อยํ สมาโรปโน. อารมฺมณเมตํ น โหติ วิญฺญาณสฺส ฐิติยา, วิญฺญาณนิโรธา นามรูปนิโรโธ, นามรูปนิโรธา ยาว ชรามรณนิโรโธ. त्यामध्ये समारोपण कोणता? हे सूत्र संज्ञित आहे, तिथे 'चेतना करतो' हे उत्तर म्हणून निर्देशित केले पाहिजे. त्याच्या दृष्टीने विज्ञान-प्रत्ययामुळे नामरूप आणि जरामरणापर्यंतची उत्पत्ती होते, हा समारोपण आहे. हे आलंबन विज्ञानाच्या स्थितीसाठी होत नाही; विज्ञान-निरोधाने नामरूप-निरोध होतो, आणि नामरूप-निरोधाने जरामरण-निरोधापर्यंत निरोध होतो. ๑๑๐. ตตฺถ กตมํ สํกิเลสภาคิยญฺจ นิพฺเพธภาคิยญฺจ อเสกฺขภาคิยญฺจ สุตฺตํ? อยํ โลโก สนฺตาปชาโต ยาว เย หิ เกจิ สมณา วา พฺราหฺมณา วา ภเวน ภวสฺส วิปฺปโมกฺขมาหํสุ. สํกิเลสภาคิยํ อุปธึ หิ ปฏิจฺจ ทุกฺขมิทํ สมฺโภติ, ยา ตา ปน ตณฺหา ปหียนฺติ, ภวํ นาภินนฺทตีติ นิพฺเพธสฺส นิพฺพุตสฺส ภิกฺขุโน อนุปาทาย ปุนพฺภโว น โหติ. อุปจฺจคา สพฺพภวานิ ตาทีติ อเสกฺขภาคิยํ. ११०. तेथे संकिलेसभागिय (संक्लेशभागीय), निब्बेधभागिय (निर्वेधभागीय) आणि असेक्खभागिय (अशैक्ष्यभागीय) सुत्त कोणते आहे? 'हा लोक संतापाने युक्त आहे, ज्या काही श्रमण किंवा ब्राह्मणांनी भवाच्या माध्यमातून भवापासून मुक्ती सांगितली आहे.' हे संकिलेसभागिय आहे. 'कारण उपधीवर अवलंबून हे दुःख निर्माण होते, परंतु ज्या तृष्णा नष्ट केल्या जातात, तो भवाचे अभिनंदन करत नाही,' म्हणून निब्बेध आणि निब्बुता भिक्खूचा उपादानरहित पुनर्जन्म होत नाही. 'अशा पुरुषाने सर्व भवांचे उल्लंघन केले आहे,' हे असेक्खभागिय आहे. ตตฺถ สนฺตาปชาโตติ ราคโช สนฺตาโป โทสโช โมหโชติ. เตสํ สตฺตานํ ฐานํ ทสฺเสติ. โลโก สนฺตาปชาโตติ ผสฺโส ติวิโธ สุขเวทนีโย ทุกฺขเวทนีโย อทุกฺขมสุขเวทนีโย. ตตฺถ สุขเวทนีโย ผสฺโส ราคสนฺตาโป, ทุกฺขเวทนีโย โทสสนฺตาโป, อทุกฺขมสุขเวทนีโย โมหสนฺตาโป. ยถา จ ภควา อาห ปฐมกสฺส วลาหกสฺส โคมคฺเค เยหิ คหปติปุตฺต ราคเชหิ โทสเชหิ โมหเชหิ สนฺตาเปหิ ทุกฺขํ สุปติ, เต มม สนฺตาปา น สนฺติ. तेथे 'संतापजातो' म्हणजे रागापासून उत्पन्न झालेला संताप, द्वेषापासून उत्पन्न झालेला संताप आणि मोहापासून उत्पन्न झालेला संताप होय. हे त्या प्राण्यांची स्थिती दर्शवते. 'लोको संतापजातो' म्हणजे फस्स (स्पर्श) तीन प्रकारचा आहे: सुखवेदनीय, दुःखवेदनीय आणि अदुःखमसुखवेदनीय. तेथे सुखवेदनीय फस्स हा रागसंताप आहे, दुःखवेदनीय फस्स हा दोससंताप (द्वेषसंताप) आहे, आणि अदुःखमसुखवेदनीय फस्स हा मोहसंताप आहे. जसे की भगवंतांनी पहिल्या वलाहक सुत्तात गृहपतीच्या पुत्राला मार्गामध्ये विचारले होते: 'हे गृहपतीपुत्र! ज्या रागजन्य, द्वेषजन्य आणि मोहजन्य संतापांमुळे दुःख होते, ते संताप माझ्यात अस्तित्वात नाहीत.' โรคํ [Pg.315] วทติ อตฺตโตติ เตหิ สนฺตาเปหิ สนฺตาปิโต ติวิธํ วิปลฺลาสํ ปฏิลภติ สญฺญาวิปลฺลาสํ จิตฺตวิปลฺลาสํ ทิฏฺฐิวิปลฺลาสํ. ตตฺถ อสุเภ สุภนฺติ สญฺญาวิปลฺลาโส. ทุกฺเข สุขนฺติ จิตฺตวิปลฺลาโส. อนิจฺเจ นิจฺจนฺติ อนตฺตนิ อตฺตาติ ทิฏฺฐิวิปลฺลาโส. 'रोगाला आत्मा मानणे' म्हणजे त्या संतापांनी संतप्त झालेला मनुष्य तीन प्रकारचा विपल्लास प्राप्त करतो: सञ्ञाविपल्लास, चित्तविपल्लास आणि दिट्ठिविपल्लास. तेथे असुभाला सुभ मानणे हा सञ्ञाविपल्लास आहे. दुःखाला सुख मानणे हा चित्तविपल्लास आहे. अनित्याला नित्य मानणे आणि अनात्म्याला आत्मा मानणे हा दिट्ठिविपल्लास आहे. ยถา จิตฺตสฺส วิปลฺลาโส สญฺญาทิฏฺฐิเต ติวิธา วิตกฺกา – จิตฺตวิตกฺโก วิปลฺลาโส สญฺญาวิตกฺโก วิปลฺลาโส ทิฏฺฐิวิตกฺโก วิปลฺลาโสปิ. ตตฺถ อวิชฺชา วิปลฺลาโส โคจรา คติปเตยฺยภูมิ, ยถา หิ ตํ สญฺชานาติ ยถา วิชานาติ ยถา สญฺชานาติ จ วิชานาติ จ. ยถา ขนฺติ เจเตติ อิเม จตฺตาโร วิปลฺลาสา สตฺตา เยหิ จตุพฺพิธํ อตฺตภาววตฺถุํ โรคภูตํ คณฺฑภูตํ ‘‘อตฺตา’’ติ วทนฺติ. โรคํ วทติ อตฺตโตติ อยํ อาวฏฺโฏ. เยน เยน หิ มญฺญติ ตโต ตํ โหติ อญฺญถาติ สุภนฺติ มญฺญติ น ตถา โหติ. เอวํ สุขนฺติ นิจฺจํ อตฺตาติ โส อญฺญถา ภวเมว สนฺตํ อนาคตํ ภวํ ปตฺถยติ, เตน วุจฺจติ ‘‘ภวราโค’’ติ. ภวเมวาภินนฺทติ, ยํ อภินนฺทติ, ตํ ทุกฺขนฺติ ปญฺจกฺขนฺเธ นิทฺทิสิยติ. ยญฺจ ตปฺปจฺจยา โสกปริเทวทุกฺขํ ตสฺส หิ ภาเวสฺสติ. เอตฺตาวตา สํกิเลโส โหติ. ปหานตฺถํ โข ปน พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ. ติณฺณํ สนฺตาปานํ ฉนฺทราควินโย โหติ. जसा चित्ताचा विपल्लास असतो, तसेच संज्ञा आणि दृष्टीच्या बाबतीत तीन प्रकारचे वितक्क असतात - चित्तवितक्क विपल्लास, सञ्ञावितक्क विपल्लास आणि दिट्ठिवितक्क विपल्लास. तेथे अविज्जा विपल्लास हा गोचर आणि गतीचा आधार आहे, कारण तो जसे ओळखतो, जसे जाणतो, आणि जसे ओळखतो व जाणतो. जशी क्षंती आणि चेतना असते, या चार विपल्लासांमुळे प्राणी चार प्रकारच्या आत्मभाव-वस्तूला, जी रोगरूप आणि गंड (गळू) रूप आहे, 'आत्मा' म्हणतात. रोगाला आत्मा म्हणणे हा 'आवट्त' हार आहे. कारण ज्या ज्या प्रकारे तो विचार करतो, त्यापेक्षा ते वेगळे होते. तो 'शुभ' मानतो, पण ते तसे नसते. अशा प्रकारे 'सुख', 'नित्य' आणि 'आत्मा' मानून तो विपरीतपणे वर्तमान भवाचा किंवा अनागत भवाचाच अभिलाष करतो, म्हणून त्याला 'भवराग' म्हटले जाते. तो भवाचेच अभिनंदन करतो; ज्याचे तो अभिनंदन करतो, ते दुःख आहे, असे पंचक्खंधांच्या संदर्भात निर्देशिले जाते. आणि त्याच्या प्रत्ययाने जे शोक, परिदेव आणि दुःख निर्माण होते, ते त्याच्यासाठी वाढेल. एवढ्याने संकिलेस होतो. परंतु प्रहाणासाठी ब्रह्मचर्य आचरले जाते. तीन संतापांच्या छंदरागाचा विनय होतो. อุปธึ หิ ปฏิจฺจ ทุกฺขมิทํ ภวตีติ เย ภวเมวาภินนฺทนฺติ ยสฺส ภาเวสฺสติ, ตํ ทุกฺขํ ตสฺส ทุกฺขสฺส ปหานมาห. สพฺพโส อุปาทานญฺจ ยํ นตฺถิ ทุกฺขสฺส สมฺภโวติ จตฺตาโร วิปลฺลาสา ยถา นิทฺทิฏฺฐอุปาทานมาห. ตสฺส ปฐโม วิปลฺลาโส กามุปาทานํ, ทุติยํ ทิฏฺฐุปาทานํ, ตติยํ สีลพฺพตุปาทานํ, จตุตฺถํ อตฺตวาทุปาทานํ, เตสํ โย ขโย นตฺถิ ทุกฺขสฺส สมฺภโว อุปธิ นิทานํ ทุกฺขนิโรธมาห. เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ปสฺสโต วิภวตณฺหา น โหติ. วิภวํ นาภินนฺทตีติ ทสฺสนภูมึ มนฺเตติ สพฺพโส ตณฺหกฺขยํ นิพฺพานนฺติ ทฺเว วิมุตฺติโย กเถติ ราควิราคญฺจ อวิชฺชาวิราคญฺจ. ตสฺส ภิกฺขุโนติ อนุปาทิเสสนิพฺพานธาตุํ มนฺเตติ. อยํ สุตฺตสฺส อตฺถนิทฺเทโส. 'उपधीवर अवलंबून हे दुःख निर्माण होते' - जे केवळ भवाचेच अभिनंदन करतात, ज्यांच्यासाठी ते वाढेल, त्या दुःखाच्या प्रहाणाविषयी भगवंतांनी सांगितले आहे. 'सर्व प्रकारे उपादान नसणे हा दुःखाचा असंभव आहे' - येथे चार विपल्लासांना निर्दिष्ट उपादान म्हटले आहे. त्यातील पहिला विपल्लास म्हणजे कामुपादान, दुसरा दिट्ठुपादान, तिसरा सीलब्बतुपादान आणि चौथा अत्तवादुपादान होय. त्यांचा जो क्षय आहे, तो दुःखाचा असंभव आहे, कारण उपधी हे त्याचे निदान आहे, असे सांगून दुःख निरोधाविषयी सांगितले आहे. अशा प्रकारे याला यथार्थपणे सम्यक् प्रज्ञेने पाहणाऱ्याला विभवतण्हा होत नाही. 'तो विभवाचे अभिनंदन करत नाही' - हे दस्सनभूमीचे वर्णन करते. सर्व प्रकारे तृष्णेचा क्षय म्हणजे निब्बान होय, असे सांगून दोन विमुक्तींविषयी सांगितले आहे - रागविराग आणि अविज्जाविराग. 'त्या भिक्खूचा' या शब्दाने अनुपदिसेस निब्बानधातूचा निर्देश केला आहे. हा सुत्ताचा अर्थनिर्देश आहे. ๑๑๑. ตตฺถ กตโม วิจโย? ยสฺส ยตฺถ ปริฬาเหติ ตสฺส ปริฑยฺหนฺตสฺส โส ยถาภูตํ นตฺถิ นิพฺพินฺทติ จ, อยํ วิจโย จ ยุตฺติ จ. ปทฏฺฐาโน [Pg.316] ราคโช ปริฬาโห สุขินฺทฺริยสฺส โทมนสฺสินฺทฺริยสฺส จ ปทฏฺฐานํ. โทสโช ปริฬาโห สุขินฺทฺริยสฺส โทมนสฺสินฺทฺริยสฺส จ ปทฏฺฐานํ. โมหโช ปริฬาโห อุเปกฺขินฺทฺริยสฺส โทมนสฺสินฺทฺริยสฺส จ ปทฏฺฐานํ. १११. तेथे विचय कोणता आहे? ज्याला ज्या संसारात राग इत्यादींनी संतप्त केले जाते, त्या संतप्त होणाऱ्या व्यक्तीला यथार्थ ज्ञान होत नाही आणि तो कंटाळतही नाही, हा 'विचय' आणि 'युत्ती' हार आहे. पदट्ठान म्हणजे: रागजन्य परिळाह हा सुखिंद्रिय आणि दोमनस्सिंद्रियाचे पदट्ठान आहे. दोसजन्य परिळाह हा सुखिंद्रिय आणि दोमनस्सिंद्रियाचे पदट्ठान आहे. मोहजन्य परिळाह हा उपेक्खिंद्रिय आणि दोमनस्सिंद्रियाचे पदट्ठान आहे. ตตฺถ กตโม ลกฺขโณ หาโร? ผสฺสปเรโต เวทนาปเรโต สญฺญาปเรโตปิ สงฺขารปเรโตปิ เยน เยน มญฺญติ ยทิ สุภนิมิตฺเตน ยทิ สุขนิมิตฺเตน ยทิ นิจฺจนิมิตฺเตน ยทิ อตฺตนิมิตฺเตน อสุเภ สุภนฺติ มญฺญติ, เอวํ สพฺพํ ราคเช ปริฬาเห วุตฺเต จตฺตาโร ปริฬาหา วุตฺตา ภวนฺติ. ราคโช โทสโช โมหโช ทิฏฺฐิโช จ ราคํ วทามีติ อตฺตโต วทติ. สพฺพานิ ปนฺนรส ปทานิ อนิจฺจํ ทุกฺขนฺติ. तेथे लक्खण हार कोणता आहे? फस्स पीडित, वेदना पीडित, सञ्ञा पीडित किंवा संखाराने पीडित असलेला मनुष्य ज्या ज्या प्रकारे विचार करतो - मग ते शुभनिमित्ताने असो, सुखनिमित्ताने असो, नित्यनिमित्ताने असो किंवा आत्मनिमित्ताने असो - तो असुभाला सुभ मानतो. अशा प्रकारे सर्व रागजन्य परिळाहाविषयी सांगितले असता, चार परिळाह सांगितले जातात. रागजन्य, दोसजन्य, मोहजन्य आणि दिट्ठिजन्य या सर्वांना मी 'राग' म्हणतो, असे आत्म्याच्या संदर्भात सांगितले आहे. ही सर्व पंधरा पदे अनित्य आणि दुःख अशी जाणावीत. ตตฺถ กตโม จตุพฺยูโห? อิธ สุตฺเต ภควโต โก อธิปฺปาโย? เย ปริฬาเหน น อจฺฉนฺติ เต ภวํ นาภินนฺทนฺติ. เย ภวํ นาภินนฺทนฺติ, เต ปรินิพฺพายิสฺสนฺติ. อยํ อธิปฺปาโย. तेथे चतुब्यूह हार कोणता आहे? या सुत्तात भगवंतांचा काय अभिप्राय आहे? जे परिळाहाने युक्त राहत नाहीत, ते भवाचे अभिनंदन करत नाहीत. जे भवाचे अभिनंदन करत नाहीत, ते परिनिब्बान प्राप्त करतील. हा भगवंतांचा अभिप्राय आहे. ตตฺถ กตโม อาวฏฺโฏ? สํกิเลสภาคิเยน ทุกฺขญฺจ สมุทยญฺจ นิทฺทิสติ. นิพฺเพธภาคิเยน มคฺคญฺจ นิโรธญฺจ. तेथे आवट्ट हार कोणता आहे? संकिलेसभागिय सुत्ताद्वारे दुःख आणि समुदय निर्देशित केले जातात. निब्बेधभागिय सुत्ताद्वारे मग्ग आणि निरोध निर्देशित केले जातात. ตตฺถ กตมา วิภตฺติ? สนฺตาปชาโต โรคชาโต โรคํ วทติ อตฺตโต ตํ น เอกํเสน โหติ อมนสิการา สนฺตาปชาโต โข น จ โรคํ อตฺตโต วทติ. तेथे विभत्ती हार कोणता आहे? संतापजन्य हा रोगजन्य आहे. रोगाला आत्मा म्हणणे हे एकांताने होत नाही. अमनसिकारामुळे संतापजन्य असलेला रोगाला आत्मा म्हणत नाही. ตตฺถ กตโม ปริวตฺตโน? ปกฺขปฏิปกฺขนิทสฺสนตฺถํ ภูมิ ปริวตฺตนาย. तेथे परिवत्तन हार कोणता आहे? पक्ष आणि प्रतिपक्ष दर्शवण्यासाठी परिवर्तनाची ही भूमी आहे. ตตฺถ กตโม เววจโน หาโร? โรคญฺจ อตฺตโต วทติ สลฺลํ อตฺตโต วทติ. ปนฺนรส ปทานิ สพฺพานิ วตฺตพฺพานิ. तेथे वेवचन हार कोणता आहे? रोगाला आत्मा म्हणणे, सल्ल याला आत्मा म्हणणे. ही सर्व पंधरा पदे सांगावीत. ตตฺถ กตมา ปญฺญตฺติ? สนฺตาปชาโตติ โทมนสฺสปทฏฺฐานํ. สพฺเพ วจนปญฺญตฺติยา ปญฺญเปติ. โรคํ วทติ อตฺตโต วิปลฺลาโส สํกิเลสปญฺญตฺติยา ปญฺญเปติ. ยํ นาภินนฺทติ, ตํ ทุกฺขนฺติ วิปลฺลาสนิกฺเขปปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตา. เต อกตสตฺตา โลกา มชฺเฌน เวมตฺตตาย ปญฺญตฺตา. तेथे पञ्ञत्ती हार कोणती आहे? 'संतापजातो' हे दोमनस्सचे पदट्ठान आहे. सर्व वचनांना वचनपञ्ञत्तीद्वारे प्रज्ञापित केले जाते. रोगाला आत्मा म्हणणे हा विपल्लास आहे, जो संकिलेसपञ्ञत्तीद्वारे प्रज्ञापित केला जातो. 'ज्याचे अभिनंदन केले जात नाही, ते दुःख आहे' हे विपल्लास-निक्खेप-पञ्ञत्तीद्वारे प्रज्ञापित केले आहे. ते अकृतसत्त्व लोक मध्यम वेमत्ततेने प्रज्ञापित केले आहेत. ตตฺถ กตโม โอตรโณ? สนฺตาปชาโตติ ตีณิ อกุสลมูลานิ, เต สงฺขารา สงฺขารกฺขนฺธปริยาปนฺนา, ธาตูสุ ธมฺมธาตุ, อายตเนสุ ธมฺมายตนํ. อินฺทฺริเยสุ อิตฺถินฺทฺริยํ ปุริสินฺทฺริยญฺจ ปทฏฺฐานํ. तेथे ओतरण हार कोणता आहे? 'संतापजातो' म्हणजे तीन अकुशलमुळे होत. ते संखारांमध्ये संखारकंधात समाविष्ट आहेत. धातूंमध्ये ती धम्मधातू आहे, आयतनांमध्ये धम्मायतन आहे. इंद्रियांमध्ये इत्थिंद्रिय आणि पुरिसिंद्रिय हे पदट्ठान आहे. ตตฺถ [Pg.317] กตโม โสธโน? สุทฺโธ สุตฺตสฺส อารมฺโภ. तेथे सोधन हार कोणता आहे? सुत्ताचा आरंभ शुद्ध आहे. ตตฺถ กตโม อธิฏฺฐาโน หาโร? ปริฬาโหติ เย สตฺตา โลกา เอกตฺตปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตา, เต อกตสตฺตา โลกา มชฺเฌน เวมตฺตตาย ปญฺญตฺตา. तेथे अधिष्ठान हार (अधिट्ठानहार) कोणता? 'परिळाह' (दाह/संताप) म्हणजे जे आसक्त प्राणी एकात्मतेच्या प्रज्ञप्तीने (एकत्व-प्रज्ञप्तीने) प्रज्ञप्त केले आहेत, आणि जे अनासक्त प्राणी मध्यम मार्गाने विविधतेच्या (नानात्वाच्या) स्वरूपात प्रज्ञप्त केले आहेत. ตตฺถ กตโม ปริกฺขาโร? สนฺตาปชาโตติ อโยนิโส มนสิกาโร เหตุ, วิปลฺลาสญฺจ ปจฺจโย. ตตฺถ ทฺวีหิ ธมฺเมหิ อตฺตา อภินิวิฏฺฐา จิตฺตญฺจ เจตสิกญฺจ ธมฺเม อุภยานิ ตสฺส วิปรีเตน ปรามสโต. อปโร ปริยาโย, เจตสิเกหิ ธมฺเมหิ อตฺตสญฺญา อนตฺตสญฺญา สมุคฺฆาเตติ. อปโร ปริยาโย. อนิจฺจสญฺญา เจตสิเกสุ ธมฺเมสุ, น ตุ อตฺตสญฺญา. อิทํ วุจฺจติ จิตฺตนฺติ วา มโนติ วา วิญฺญาณนฺติ วา อิทํ ทีฆรตฺตํ อพฺภุคฺคตํ เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตาติ. ตตฺถ เจตสิกา ธมฺมานุปสฺสนา เอสาปิ ธมฺมสญฺญา. ตสฺส โก เหตุ, โก ปจฺจโย? อหํกาโร เหตุ, มมํกาโร ปจฺจโย. तेथे परिक्खार हार (परिकराचा हार) कोणता? 'संतापजात' म्हणजे अयोनिसो मनसिकार (अयोग्य मनन) हा हेतू आहे आणि विपल्लास (विपर्यास) हा प्रत्यय (कारण) आहे. तेथे चित्त आणि चैतसिक या दोन्ही धर्मांच्या विपरीत परामर्शाने (चुकीच्या आकलनाने) आत्म्याचा अभिनिवेश होतो. दुसरा पर्याय: चैतसिक धर्मांद्वारे आत्मसंज्ञा आणि अनात्मसंज्ञा यांचे उच्चाटन (नष्ट) केले जाते. आणखी एक पर्याय: चैतसिक धर्मांमध्ये अनित्यसंज्ञा नष्ट केली जाते, परंतु आत्मसंज्ञा नाही. यालाच 'चित्त', 'मन' किंवा 'विज्ञान' असे म्हटले जाते, जे दीर्घकाळापासून 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' अशा प्रकारे दृढ झाले आहे. तेथे चैतसिक धर्मांचे अनुपश्यन (धम्मानुपस्सना) ही देखील धर्मसंज्ञा (धम्मसञ्ञा) आहे. त्याचा हेतू काय आणि प्रत्यय काय? अहंकार हा हेतू आहे आणि ममकार हा प्रत्यय आहे. ตตฺถ กตโม สมาโรปโน? อยํ โลโก สนฺตาปชาโตติ อกุสลํ มนฺเตติ วิญฺญาณํ นามรูปสฺส ปจฺจโย ยาว ชรามรณนฺติ, อยํ สมาโรปโน. तेथे समारोपन हार कोणता? 'हा लोक संतापयुक्त (तप्त) आहे' असे अकुशल चिंतन करणे, आणि 'विज्ञान हे नामरूपाचे कारण आहे, जे जरा-मरणापर्यंत चालते' असे मानणे, हा समारोपन हार आहे. ๑๑๒. เอวเมตํ ยถาภูตํ, สมฺมปฺปญฺญาย ปสฺสติ อกุสลมูลานํ ปหานํ. ตตฺถ อวิชฺชานิโรโธ อวิชฺชานิโรธา ยาว ชรามรณนิโรโธ, อยํ สมาโรปโน. ११२. अशा प्रकारे, मनुष्य यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने अकुशल मुळांचा प्रहाण (नाश) पाहतो. तेथे अविद्येचा निरोध होतो आणि अविद्येच्या निरोधाने जरा-मरणापर्यंत सर्वांचा निरोध होतो; हा समारोपन हार आहे. จตฺตาโร ปุคฺคลา – อนุโสตคามี ปฏิโสตคามี ฐิตตฺโต, ติณฺโณ ปารงฺคโต ถเล ติฏฺฐติ พฺราหฺมโณติ. चार प्रकारचे पुद्गल (व्यक्ती) असतात – अनुसोतगामी (प्रवाहाच्या दिशेने जाणारा), पटिसोतगामी (प्रवाहाच्या विरुद्ध जाणारा), ठितत्त (स्थिरचित्त असलेला), आणि पार गेलेला जो किनाऱ्यावर (थले) उभा आहे असा ब्राह्मण (अर्हत). ตตฺถ โย อนุโสตคามี อยํ กาเม เสวติ. ปาปญฺจ กมฺมํ กโรติ ยาว กาเม ปฏิเสวติ. อิทํ โลโภ อกุสลมูลํ, โส เยว ตณฺหา, โส เตหิ กาเมหิ วุยฺหติ อนุโสตคามีติ วุจฺจติ. โย ปุคฺคโล ตาหิ คมิโต ตปฺปจฺจยา ตสฺส เหตุ อกุสลกมฺมํ กโรติ กาเยน จ วาจาย จ, อยํ วุจฺจติ ปาปกมฺมํ กโรตีติ. ตสฺส ตีณิ โสตานิ สกฺกายทิฏฺฐิ วิจิกิจฺฉา สีลพฺพตปรามาโส. อิเมหิ ตีหิ โสเตหิ [Pg.318] ติวิธธาตุยํ อุปฺปชฺชติ กามธาตุยํ รูปธาตุยํ อรูปธาตุยํ. เตน ปฏิปกฺเขน โย กาเม น ปฏิเสวติ. โย สีลวตํ น ปรามสติ. โย สกฺกายทิฏฺฐีนํ ปหานาย กาเมสุ ยถาภูตํ อาทีนวํ ปสฺสติ. เยน จ เต ธมฺเม ปฏิเสวติ. ยญฺจ ตปฺปจฺจยา ติฏฺฐติ พฺราหฺมโณติ อรหํ กิร. ตตฺถ อรหํ ตสฺส ปารงฺคโต โหติ, ปารงฺคตสฺส ถเล ติฏฺฐติ โสปาทิเสสา นิพฺพานธาตุ. อนุโสตคามินีติ ทสฺสนปฺปหาตพฺพานํ สํโยชนานํ อปฺปหานมาห. ปฏิโสตคามินีติ ผเล ทิฏฺเฐกฏฺฐานญฺจ กิเลสานํ ปหานมาห, ฐิตตฺเตน ปญฺจนฺนํ โอรมฺภาคิยานํ สํโยชนานํ ปหานมาห. ตตฺถ อนุโสตคามินา มคฺครูปิมาห. ปฏิโสตคามินา ฐิตตฺเตน จ มคฺคมิติมาห. ปารงฺคเตน สาวกา อเสกฺขา จ สมฺมาสมฺพุทฺธา จ วุตฺตา. อนุโสตคามินา สกฺกายสมุทยคามินึ ปฏิปทมาห. ปฏิโสตคามินา ฐิตตฺเตน สกฺกายนิโรธคามินึ ปฏิปทมาห. ปารงฺคเตน ทส อเสกฺขา อรหนฺตา ธมฺมา วุตฺตา. อยํ สุตฺตตฺโถ. तेथे जो अनुसोतगामी (प्रवाहाच्या दिशेने जाणारा) आहे, तो कामांचे (भोगविलासांचे) सेवन करतो. आणि जोपर्यंत तो कामांचे सेवन करतो, तोपर्यंत तो पापकर्म करतो. हे लोभ नावाचे अकुशल मूळ आहे, तीच तृष्णा आहे. तो त्या कामांमुळे वाहून जातो, म्हणून त्याला 'अनुसोतगामी' म्हटले जाते. जो पुद्गल त्या तृष्णेने वाहून नेला जातो आणि त्या प्रत्ययामुळे (कारणामुळे) काया व वाचेने अकुशल कर्म करतो, त्याला 'पापकर्म करणारा' म्हटले जाते. त्याचे तीन प्रवाह (सोत) आहेत: सत्कायदृष्टी (सक्कायदिट्ठि), विचिकित्सा (विचीकिच्छा) आणि शीलव्रतपरामर्श (सीलब्बतपरामासो). या तीन प्रवाहांद्वारे तो तीन धातूंमध्ये उत्पन्न होतो: कामधातू, रूपधातू आणि अरूपधातू. त्याच्या विरुद्ध (प्रतिपक्षाने) जो कामांचे सेवन करत नाही, जो शील आणि व्रतांचा चुकीचा परामर्श करत नाही, जो सत्कायदृष्टीच्या प्रहाणासाठी कामांमधील यथार्थ दोष (आदीनव) पाहतो, आणि ज्या कारणाने तो त्या धर्मांचे सेवन करतो, आणि ज्या प्रत्ययामुळे तो स्थिर राहतो, तो 'ब्राह्मण' म्हणजेच खरोखर 'अर्हत' होय. तेथे अर्हत हा पार गेलेला (पारंगत) असतो. पार गेलेल्यासाठी किनाऱ्यावर (थले) उभे राहणे म्हणजे सोपादिशेष निर्वाणधातू (सोपादिसेस निब्बानधातु) होय. 'अनुसोतगामी' द्वारे दर्शन-प्रहातव्य (दर्शनाने नष्ट होणाऱ्या) संयोजनांचे अप्रहाण (नष्ट न करणे) सांगितले आहे. 'पटिसोतगामी' द्वारे फळ प्राप्त झाल्यावर क्लेशांचे प्रहाण सांगितले आहे. 'ठितत्त' (स्थिरचित्त) द्वारे पाच ओरामभागीय (खालच्या स्तरातील) संयोजनांचे प्रहाण सांगितले आहे. तेथे 'अनुसोतगामी' द्वारे मार्गाचे रूप (अंधपुथुज्जन अवस्था) सांगितले आहे. 'पटिसोतगामी' आणि 'ठितत्त' द्वारे मार्गाची स्थिरता सांगितली आहे. 'पारंगत' द्वारे अशैक्ष (असेक्ख) श्रावक आणि सम्यक संबुद्ध सांगितले आहेत. 'अनुसोतगामी' द्वारे सत्काय-समुदयगामी प्रतिपदेचा (मार्गाचा) निर्देश केला आहे. 'पटिसोतगामी' आणि 'ठितत्त' द्वारे सत्काय-निरोधगामी प्रतिपदेचा निर्देश केला आहे. 'पारंगत' द्वारे दहा अशैक्ष अर्हत धर्म सांगितले आहेत. हा सूत्राचा अर्थ आहे. ๑๑๓. ตตฺถ กตมา เทสนา? อิมสฺมึ หิ สุตฺเต จตฺตาริ อริยสจฺจานิ เทสิตานิ. เตธาตุกโลกสมติกฺกมนญฺจ. ११३. तेथे देसना हार (देशना हार) कोणता? या सूत्रात चार आर्यसत्ये उपदेशिली आहेत, आणि तिन्ही धातूंमधील लोकांचे अतिक्रमण (पार जाणे) देखील उपदेशिले आहे. ตตฺถ กตโม วิจโย หาโร? โย กาเม ปฏิเสวติ ปาปํ กเรยฺยาติ โย จ กาเม น ปฏิเสวติ โส ปาปกมฺมํ น กเรยฺยาติ โย จ อิเมหิ ทฺวีหิ ภูมีหิ อุตฺติณฺโณ ปารงฺคโตติ ยา วีมํสา อยํ วิจโย. तेथे विचय हार कोणता? 'जो कामांचे सेवन करतो तो पापकर्म करतो', 'जो कामांचे सेवन करत नाही तो पापकर्म करत नाही', आणि 'जो या दोन्ही भूमींमधून पार जाऊन पलीकडच्या किनाऱ्याला पोहोचला आहे' अशी जी मीमांसा (तपासणी) आहे, तो विचय हार आहे. ยุตฺตีติ ยุชฺชติ สุตฺเตสุ, นายุชฺชตีติ ยา วีมํสาย, อยํ ยุตฺติ. ปทฏฺฐาโนติ อนุโสตคามินา สตฺตนฺนํ สํโยชนานํ ปทฏฺฐานํ. อกุสลสฺส กิริยา อกุสลสฺส มูลานํ ปทฏฺฐานํ. ปฏิโสตคามินา ยถาภูตทสฺสนสฺส ปทฏฺฐานํ. ฐิตตฺเตน อสํหาริยาย ปทฏฺฐานํ. ปารงฺคโตติ กทาจิ ภูมิยา ปทฏฺฐานํ. 'युक्ती' म्हणजे सूत्रांमध्ये काय जुळते आणि काय जुळत नाही, अशी जी मीमांसा आहे, तो युक्ती हार आहे. 'पदस्थान' (पदट्ठान) म्हणजे: अनुसोतगामी द्वारे सात संयोजनांचे पदस्थान (जवळचे कारण) आहे; अकुशल क्रिया हे अकुशल मुळांचे पदस्थान आहे; पटिसोतगामी द्वारे यथाभूत दर्शनाचे (यथार्थ ज्ञानाचे) पदस्थान आहे; ठितत्त द्वारे असंहार्यतेचे (अविचलतेचे) पदस्थान आहे; आणि 'पारंगत' हे काही भूमींचे पदस्थान आहे. ตตฺถ กตโม ลกฺขโณ หาโร? โย อนุโสตํ คจฺฉติ ตณฺหาวเสน. สพฺเพสมฺปิ กิเลสานํ วเสน คจฺฉติ. โย ปฏิโสตํ วายมติ. ตณฺหาย สพฺเพสมฺปิ โส กิเลสานํ วายมติ ปฏิโสตํ. โย [Pg.319] อตฺตนา ฐิโต กาเยนปิ โส ฐิโต วาจาจิตฺเตนปิ โส ฐิโต. อยํ ลกฺขโณ หาโร. तेथे लक्षण हार कोणता? जो तृष्णेच्या प्रभावाने प्रवाहाच्या दिशेने (अनुसोत) जातो, तो सर्व क्लेशांच्या प्रभावाने जातो. जो तृष्णेच्या विरुद्ध प्रवाहाच्या विरुद्ध (पटिसोत) जाण्याचा प्रयत्न करतो, तो सर्व क्लेशांच्या विरुद्ध प्रवाहाच्या विरुद्ध जाण्याचा प्रयत्न करतो. जो स्वतः कायेने स्थिर आहे, तो वाचा आणि चित्ताने देखील स्थिर आहे. हा लक्षण हार आहे. ตตฺถ กตโม จตุพฺยูโห? อิธ สุตฺเต ภควโต โก อธิปฺปาโย? เย อนุโสตคามินิยา ปฏิปทาย นาภิรมิสฺสนฺติ, เต ปฏิโสตํ วายมิสฺสนฺตีติ ยาว กทาจิ ภูมิยํ, อยํ อธิปฺปาโย. อาวฏฺโฏติ อิธ สุตฺเต จตฺตาริ สุตฺตานิ เทสิตานิ. तेथे चतुब्यूह हार कोणता? या सूत्रात भगवंतांचा काय अभिप्राय आहे? 'जे अनुसोतगामी प्रतिपदेमध्ये (मार्गात) रममाण होणार नाहीत, ते प्रवाहाच्या विरुद्ध (पटिसोत) जाण्याचा प्रयत्न करतील', काही भूमींपर्यंत प्रयत्न करतील, हा अभिप्राय आहे. 'आवृत्त' (आवट) म्हणजे या सूत्रात चार सूत्रांचा उपदेश केला आहे. ตตฺถ กตโม วิภตฺติ หาโร? โย กาเม ปฏิเสวติ ปาปญฺจ กมฺมํ กโรติ. โส อนุโสตคามีติ น เอกํเสน โสตาปนฺโนปิ กาเม ปฏิเสวติ. ตํ ภาคิยญฺจ ปาปกมฺมํ กโรติ. กิญฺจาปิ เสกฺโขปิ กเรยฺย ปาปํ ยถา สุตฺเต นิทฺทิฏฺโฐ น จ โส อนุโสตคามี, อิทํ วิภชฺชพฺยากรณียํ. น จ กาเม ปฏิเสวติ น จ ปาปกมฺมํ กโรติ ปฏิโสตคามี น จ เอกํเสน สพฺเพ พาหิรโก กาเมสุ วีตราโค น จ กาเม ปฏิเสวติ, เตน จ ปาปกมฺมํ กโรติ อนุโสตคามี ปฏิโสตคามี, อยํ วิภตฺติ. तेथे विभक्ती हार कोणता? 'जो कामांचे सेवन करतो आणि पापकर्म करतो, तो अनुसोतगामी आहे' असे एकांताने (निश्चितपणे) म्हणता येत नाही; कारण स्रोतापन्न देखील कामांचे सेवन करतो आणि त्या भागाचे पापकर्म करतो. जरी शैक्ष (सेक्ख) देखील पापकर्म करू शकतो, जसे सूत्रात दाखवले आहे, तरी तो अनुसोतगामी नाही. हे विभज्य-व्याकरणीय (विश्लेषण करून उत्तर देण्याजोगे) आहे. 'जो कामांचे सेवन करत नाही आणि पापकर्म करत नाही, तो पटिसोतगामी आहे', परंतु एकांताने सर्व बाह्य कामांमध्ये वीतराग नसतात आणि कामांचे सेवन करत नाहीत असे नाही. आणि त्यामुळे अनुसोतगामी आणि पटिसोतगामी दोघेही पापकर्म करू शकतात. हा विभक्ती हार आहे. ตตฺถ กตโม ปริวตฺตโน หาโร? นิทฺทิฏฺโฐ ปฏิปกฺโข. เววจโนติ กาเมสุ วตฺถุกามาปิ กิเลสกามาปิ รูปสทฺทคนฺธรสผสฺสปุตฺตทารทาสกมฺมกรโปริสญฺจ ปริคฺคหา. तेथे परिवर्तन हार कोणता? जेथे प्रतिपक्षाचा (विरोधी बाजूचा) निर्देश केला जातो. 'वेवचन' (वेवचन हार) म्हणजे: कामांमध्ये वस्तुकॉम आणि क्लेशकाम देखील आहेत; रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श, पुत्र, पत्नी, दास, कामगार आणि पुरुष यांचा परिग्रह (संग्रह) होय. ปญฺญตฺตีติ สพฺเพ ปุถุชฺชนา เอกตฺตาย ปญฺญตฺตา. อนุโสตคามีติ กิเลสสมุทาจารปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตา. เย ปน เสกฺขา ปุคฺคลา, เต นิพฺพานปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตา. เย ปน อนาคามี, เต อสํหาริย ปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตา, อยํ ปญฺญตฺติ. 'प्रज्ञप्ती' (पञ्ञत्ति) म्हणजे: सर्व पृथग्जन एकात्मतेने प्रज्ञप्त केले आहेत. 'अनुसोतगामी' हे क्लेशांच्या निरंतर प्रवृत्तीच्या प्रज्ञप्तीने प्रज्ञप्त केले आहेत. जे शैक्ष पुद्गल आहेत, ते निर्वाण-प्रज्ञप्तीने प्रज्ञप्त केले आहेत. जे अनागामी आहेत, ते असंहार्य-प्रज्ञप्तीने प्रज्ञप्त केले आहेत. हा प्रज्ञप्ती हार आहे. โอตรโณติ โย อนุโสตคามี, โส ทุกฺขํ. เย ตสฺส ธมฺมา, เต ทุกฺขสฺส สมุทโย. ยํ รูปํ, อยํ รูปกฺขนฺโธ, เอวํ ปญฺจปิ ขนฺธา ปฏิจฺจสมุปฺปาโท, เต กิเลสา สงฺขารกฺขนฺธปริยาปนฺนา ธมฺมายตนํ ธมฺมธาตุ อินฺทฺริเยสุ จ ปญฺญตฺตา. 'ओतरण' (ओतरण हार) म्हणजे: जो अनुसोतगामी आहे, तो दुःख आहे. त्याचे जे धर्म आहेत, ते दुःखाचा समुदय आहेत. जे रूप आहे, तो रूपस्कंध आहे. अशा प्रकारे पाचही स्कंध आणि प्रतीत्यसमुत्पाद आहेत. ते क्लेश संस्कारस्कंधात समाविष्ट आहेत, आणि ते धर्मायतन, धर्मधातू व इंद्रियांमध्ये प्रज्ञप्त केले आहेत. โสธโนติ เยนารมฺเภน อิทํ สุตฺตํ เทสิตํ, โส อารมฺโภ สพฺโพ สุทฺโธ. शोधन (शुद्धीकरण) म्हणजे ज्या प्रयत्नाने (आरंभाने) हे सुत्त देशित केले गेले आहे, तो सर्व प्रयत्न शुद्ध आहे. อธิฏฺฐาโนติ [Pg.320] ปฏิโสตคามินา สพฺเพ โสตาปนฺนา เอกตฺเตน วา นิทฺทิฏฺฐา ราคานุสยปฏิโสตคามิโน เสกฺขาว มคฺโค จ เสกฺโข จ ปุคฺคโล ฐิตตฺโตติ. अधिट्ठान (अधिष्ठान) म्हणजे: प्रवाहाच्या विरुद्ध जाणाऱ्या (पटिसोतगामी) साधकाद्वारे सर्व सोतापन्न (स्रोतापन्न) व्यक्ती एकत्वभावाने निर्देशित केल्या जातात. रागानुशय (रागाची सुप्त प्रवृत्ती) असूनही प्रवाहाच्या विरुद्ध जाणाऱ्या शैक्ष (सेक्ख - शिकणारे) व्यक्तीसाठी मार्ग आणि शैक्ष पुद्गल (व्यक्ती) हे आत्म-स्थित (ठितत्त) असतात. วีตราโค เอกตฺตาย ปญฺญตฺโต. ปารงฺคโตติ สพฺเพ อรหนฺโต สพฺเพ ปจฺเจกพุทฺธา สมฺมาสมฺพุทฺธา จ เอกตฺตาย ปญฺญตฺตา. वीतराग (अर्हत) हे एकत्वभावाने प्रज्ञप्त (दर्शविले) केले आहेत. 'पारंगत' म्हणजे सर्व अर्हत, सर्व प्रत्येकबुद्ध आणि सम्यक्संबुद्ध हे एकत्वभावाने प्रज्ञप्त केले आहेत. ปริกฺขาโรติ อนุโสตคามิโน ปาปมิตฺตปจฺจโย กามปริยุฏฺฐานํ เหตุ. ปฏิโสตคามิโน ทฺเว เหตู ทฺเว ปจฺจยา จ ยาว สมฺมาทิฏฺฐิยา อุปฺปาทายทิฏฺฐิ, ตสฺส ปฏิลทฺธมคฺโค เหตุ อารมฺโภ ปจฺจโย กายิโก เจตสิกสฺส โกฏฺฐาโส จ. สมาโรปโนติ วิภตฺติ อิทํ สุตฺตํ นตฺถิ สมาโรปนาย ภูมิ. परिक्खार (परिकार) म्हणजे: प्रवाहाच्या दिशेने जाणाऱ्या (अनुसोतगामी - अंध पृथग्जन) व्यक्तीसाठी पापमित्र हा प्रत्यय (कारण) असतो आणि काम-परियुत्थान (कामाची तीव्र इच्छा) हे हेतू (जनक कारण) असते. प्रवाहाच्या विरुद्ध जाणाऱ्या (पटिसोतगामी) व्यक्तीसाठी दोन हेतू आणि दोन प्रत्यय असतात. सम्यक् दृष्टीच्या उत्पत्तीपर्यंत जी दृष्टी असते, तिच्यासाठी प्राप्त झालेला मार्ग हा हेतू आहे आणि शारीरिक व चैतसिक भागांचा आरंभ (प्रयत्न) हा प्रत्यय आहे. समारोपना म्हणजे या सुत्ताचे विश्लेषण (विभत्ती) होय; समारोपनासाठी येथे कोणतीही भूमी (स्थान) नाही. ๑๑๔. ปญฺจานิสํสา โสตานุคตานํ ธมฺมานํ ยาว ทิฏฺฐิยา สุปฺปฏิวิทฺธานํ สุตฺตํ วิตฺถาเรน กาตพฺพํ. ยุญฺชโต ฆเฏนฺตสฺส วายมโต คิลาโน มรณกาเล เทวภูโต ปจฺเจกโพธึ ปาปุณาติ. โสตานุคตาติ สทฺธมฺมสฺสวเนน กตํ โหติ. น จ อธิปญฺญาธมฺมวิปสฺสนาย ตสฺส จิตฺตํ ตสิตํ โหติ, น จ อนิพฺพิทฺธตฺตํ, อิทํ จ สุตฺตํ ปญฺจนฺนํ ปุคฺคลานํ เทสิตํ, สทฺธานุสาริโน มุทินฺทฺริยสฺส ติกฺขินฺทฺริยสฺส จ ธมฺมานุสาริโน ติกฺขินฺทฺริยสฺส มุทินฺทฺริยสฺส จ. โย ปน โมหจริโต ปุคฺคโล น สกฺโกติ ยุญฺชิตุํ ฆฏิตุํ วายมิตุํ ยถาภูตํ ยถาสมาธิกา วิมุตฺติ ตํ ขณํ ตํ ลยํ ตํ มุหุตฺตํ ผลํ ทสฺเสติ. สาธุ ปริหายติ ปโร ตํ ทุยฺหติ, โน ตุ สุขอวิปากินี ภวติ. ตสฺส ทิฏฺเฐ เยว จ ธมฺเม อุปปชฺชอปราปริยเวทนียํ. ตตฺถ โย ปุคฺคโล ธมฺมานุสารี ตสฺส ยทิ โสตานุคตา ธมฺมา โหนฺติ โส ยุญฺชนฺโต ปาปุณาติ. โย ธมฺมานุสารี มุทินฺทฺริโย, โส คิลาโน ปาปุณาติ. โย สทฺธานุสารี ติกฺขินฺทฺริโย, โส มรณกาลสมเย ปาปุณาติ. โย มุทินฺทฺริโย, โส เทวภูโต ปาปุณาติ. ยทา เทวภูโต น ปาปุณาติ, น โส เตเนว ธมฺมราเคน ตาย ธมฺมนนฺทิยา ปจฺเจกโพธึ ปาปุณาติ. โย โสตานุคเตสุ ยุญฺชติ ฆเฏติ วายมติ, โส ปุพฺพาปนฺเนน วิเสสํ สญฺชานาติ, สญฺชานนฺโต ปาปุณาติ. สเจ ปน คิลานสฺส มนสิกาโร โหติ, ตตฺถ ยุญฺชนฺโต ปาปุณาติ. สเจ ปนสฺส มรณกาเล สํวิคฺโค โหติ, ตตฺถ [Pg.321] ยุญฺชนฺโต ปาปุณาติ. สเจ ปน น กตฺถจิ สํเวโค โหติ, ตสฺส เทวภูตสฺส สุขิโน ธมฺมภูตา ปาทา เอวํ อวิลปติ. โส เอวํ ชานาติ ‘‘อยํ โส ธมฺมวินโย ยตฺถ มยํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูตา พฺรหฺมจริยํ จริมฺหา’’ติ. อถ เทวภูโต ปาปุณาติ. ทิพฺเพสุ วา ปญฺจสุ กามคุเณสุ อชฺโฌสิโต โหติ ปมาทวิหารี, โส เตน กุสลมูเลน ปจฺเจกโพธึ ปาปุณาติ. ११४. स्रोतानुगत (ऐकलेल्या) धम्मांचे पाच अनिसंस (फायदे) आहेत; दृष्टीने चांगल्या प्रकारे भेदलेल्या धम्मांपर्यंतचे सुत्त विस्ताराने सांगितले पाहिजे. प्रयत्न करणाऱ्या, उद्योग करणाऱ्या आणि वीर्य (परिश्रम) करणाऱ्या आजारी व्यक्तीला, मरणाच्या वेळी किंवा देव बनल्यावर प्रत्येकबोधी प्राप्त होते. 'स्रोतानुगत' म्हणजे सद्धम्म-श्रवणाने जे ग्रहण केले जाते. अधिप्रज्ञा-धम्म-विपश्यनेमुळे त्याचे चित्त भयभीत होत नाही आणि कंटाळतही नाही. हे सुत्त पाच प्रकारच्या पुद्गलांसाठी (व्यक्तींसाठी) देशित केले आहे: मृदू इंद्रिये व तीक्ष्ण इंद्रिये असलेले सद्धानुसारी (श्रद्धानुसारी), आणि तीक्ष्ण इंद्रिये व मृदू इंद्रिये असलेले धम्मानुसारी. परंतु जो मोहचरित (मोहाने ग्रासलेला) पुद्गल आहे, जो प्रयत्न करण्यास, उद्योग करण्यास आणि वीर्य करण्यास असमर्थ आहे, त्याला समाधीतून मिळणारी विमुक्ती त्याच क्षणी, त्याच लयात, त्याच मुहूर्ताला फळ दाखवते. तो चांगल्या प्रकारे घसरतो (पतन पावतो), दुसरा त्याचा नाश करतो, परंतु ते सुखावह विपाक देणारे ठरत नाही. त्याला या जन्मातच (दिट्ठधम्म), किंवा पुढील जन्मात (उपपज्ज) किंवा त्यानंतरच्या जन्मात (अपरापरिय) त्याचे फळ मिळते. तेथे जो पुद्गल धम्मानुसारी आहे, जर त्याचे धम्म स्रोतानुगत असतील, तर तो प्रयत्न करत (मार्ग) प्राप्त करतो. जो मृदू इंद्रिय असलेला धम्मानुसारी आहे, तो आजारी असताना प्राप्त करतो. जो तीक्ष्ण इंद्रिय असलेला सद्धानुसारी आहे, तो मरणसमयी प्राप्त करतो. जो मृदू इंद्रिय असलेला आहे, तो देव बनून प्राप्त करतो. जेव्हा देव बनूनही तो प्राप्त करत नाही, तेव्हा तो त्याच धम्मरागाने आणि धम्मानंदाने प्रत्येकबोधी प्राप्त करतो. जो स्रोतानुगत धम्मांमध्ये प्रयत्न करतो, उद्योग करतो आणि वीर्य करतो, तो पूर्वी प्राप्त केलेल्या विशेषाला जाणतो आणि जाणत असतानाच (ध्येय) प्राप्त करतो. जर आजारी व्यक्तीला मनसिकार (स्मरण) असेल, तर तो तेथे प्रयत्न करत प्राप्त करतो. जर त्याला मरणसमयी संवेग (आध्यात्मिक संवेग) उत्पन्न झाला, तर तो तेथे प्रयत्न करत प्राप्त करतो. जर त्याला कुठेही संवेग उत्पन्न झाला नाही, तर देव बनलेल्या त्या सुखी व्यक्तीला धम्म-पदे प्रकट होतात आणि तो विलाप करत नाही. तो असे जाणतो: 'हा तोच धम्म-विनय आहे, ज्यामध्ये आम्ही पूर्वी मनुष्य असताना ब्रह्मचर्य पाळले होते.' मग तो देव बनून प्राप्त करतो. किंवा जर तो पाच दिव्य कामगुणांमध्ये आसक्त होऊन प्रमादविहारी (असावध) बनला, तरी तो त्या कुशलमुळामुळे प्रत्येकबोधी प्राप्त करतो. ยา ปรโตโฆเสน วจสา สุปริจิตา, อยํ สุตมยี ปญฺญา. เย ปน ธมฺมา โหนฺติ มนสา อนุเปกฺขิตา, อยํ จินฺตามยี ปญฺญา. ยํ ทิฏฺฐิยา สุปฺปฏิวิทฺธา, อยํ ภาวนามยี ปญฺญา. ยํ โสตานุคตา วจสา ปริจิตา โหนฺติ, โส จ ทิฏฺเฐ เยว ธมฺเม ปรินิพฺพายี, อยํ อรหํ ปุคฺคโล. โย อุปปชฺชติ เทวภูโต ปาปุณาติ, ตตฺถ จ ปรินิพฺพายติ, อยํ อนาคามี. โย เตน กุสลมูเลน ปจฺเจกโพธึ ปาปุณาติ, อยํ ปุพฺพโยคสมฺภารสมฺภูโต ปุคฺคโล. जी परतोघोषामुळे (इतरांकडून ऐकून) वाणीने चांगल्या प्रकारे परिचित झाली आहे, ती 'श्रुतमयी प्रज्ञा' (सुतमयी पञ्ञा) होय. जे धम्म मनाने अनुपेक्षित (चिंतन केलेले) असतात, ती 'चिंतामयी प्रज्ञा' होय. जे दृष्टीने चांगल्या प्रकारे भेदले (अनुभवले) गेले आहेत, ती 'भावनामयी प्रज्ञा' होय. जे धम्म स्रोतानुगत असून वाणीने परिचित असतात, आणि तो याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतो, तो 'अर्हत पुद्गल' (व्यक्ती) होय. जो उत्पन्न होऊन देव बनतो, तेथे (ध्येय) प्राप्त करतो आणि तेथेच परिनिर्वाण प्राप्त करतो, तो 'अनागामी' होय. जो त्या कुशलमुळामुळे प्रत्येकबोधी प्राप्त करतो, तो 'पूर्वयोगसंभारसंभूत' (पूर्वीच्या पुण्याचा संचय असलेला) पुद्गल होय. โสตานุคตา ธมฺมาติ ปฐมํ วิมุตฺตายตนํ, วจสา ปริจิตาติ ทุติยํ ตติยญฺจ วิมุตฺตายตนํ, มนสา อนุเปกฺขิตาติ จตุตฺถํ วิมุตฺตายตนํ ทิฏฺฐิยา สุปฺปฏิวิทฺธาติ ปญฺจมํ วิมุตฺตายตนํ. 'स्रोतानुगत धम्मा' या पदाने पहिले विमुक्तायतन (विमुक्तीचे स्थान) दर्शविले आहे. 'वाणीने परिचित' (वचसा परिचिता) या पदाने दुसरे आणि तिसरे विमुक्तायतन दर्शविले आहे. 'मनाने अनुपेक्षित' (मनसा अनुपेक्खिता) या पदाने चौथे विमुक्तायतन दर्शविले आहे. 'दृष्टीने चांगल्या प्रकारे भेदलेले' (दिट्ठिया सुप्पटिविद्धा) या पदाने पाचवे विमुक्तायतन दर्शविले आहे. โสตานุคตาย วิมุตฺติยา วจสา ยา วาจา สุปฺปฏิวิทฺธา อนุปุพฺพธมฺมสฺส โสเตน สุตฺวา สีลกฺขนฺเธ ปริปูเรติ, มนสา อนุเปกฺขิตา สมาธิกฺขนฺธํ ปริปูเรติ, ทิฏฺฐิยา สุปฺปฏิวิทฺธา ปญฺญากฺขนฺธํ ปริปูเรติ. स्रोतानुगत विमुक्तीसाठी, जी वाणीद्वारे चांगल्या प्रकारे भेदलेली वाणी आहे, ती अनुक्रमिक धम्माला कानाने ऐकून शीलस्कंध पूर्ण करते; मनाने अनुपेक्षित (चिंतन केलेली) समाधिस्कंध पूर्ण करते; आणि दृष्टीने चांगल्या प्रकारे भेदलेली प्रज्ञास्कंध पूर्ण करते. โสตานุคตา ธมฺมา พหุสฺสุตา โหนฺตีติ วิตฺถาเรน กาตพฺพํ. อิทํ ปฐมํ สทฺธาปทานํ มนสา อนุเปกฺขิตาติ ปฏิสลฺลานพหุโล วิหรติ, วิตฺถาเรน กาตพฺพํ. อิทํ ทุติยํ สทฺธาปทานํ ทิฏฺฐิยา สุปฺปฏิวิทฺธาติ อนาสวา เจโตวิมุตฺติยา นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตีติ. อิทํ ตติยํ สทฺธาปทานํ. 'स्रोतानुगत धम्म बहुश्रुत असतात' हे विस्ताराने सांगितले पाहिजे. हे पहिले श्रद्धा-पद (श्रद्धापद) आहे. 'मनाने अनुपेक्षित' म्हणजे तो एकांतात (प्रतिसंलयनात) अधिक काळ विहरतो; हे विस्ताराने सांगितले पाहिजे. हे दुसरे श्रद्धा-पद आहे. 'दृष्टीने चांगल्या प्रकारे भेदलेले' म्हणजे तो जाणतो की: 'अनास्रव चेतोविमुक्तीमुळे या अस्तित्वासाठी (पुनर्जन्मासाठी) आता काही उरलेले नाही.' हे तिसरे श्रद्धा-पद आहे. โสตานุคตา ธมฺมาติ เสกฺขํ สตฺถา ทสฺเสติ. มนสา อนุเปกฺขิตาติ อรหตฺตํ สตฺถา ทสฺเสติ. ทิฏฺฐิยา สุปฺปฏิวิทฺธาติ ตถาคตํ อรหนฺตํ สมฺมาสมฺพุทฺธํ สตฺถา ทสฺเสติ. 'स्रोतानुगत धम्मा' या पदाने शास्ता (बुद्ध) शैक्षाला (सेक्ख) दर्शवितात. 'मनाने अनुपेक्षित' या पदाने शास्ता अर्हत्त्वाला दर्शवितात. 'दृष्टीने चांगल्या प्रकारे भेदलेले' या पदाने शास्ता तथागत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांना दर्शवितात. โสตานุคตา [Pg.322] ธมฺมาติ กามานํ นิสฺสรณํ ทสฺเสติ. มนสา อนุเปกฺขิตาติ รูปธาตุยา นิสฺสรณํ ทสฺเสติ. ทิฏฺฐิยา สุปฺปฏิวิทฺธาติ เตธาตุกานํ นิสฺสรณํ ทสฺเสติ. อยํ สุตฺตตฺโถ. 'स्रोतानुगत धम्मा' या पदाने कामांमधून (कामलोकातून) निस्सरण (मुक्त होणे) दर्शविले आहे. 'मनाने अनुपेक्षित' या पदाने रूपधातू मधून निस्सरण दर्शविले आहे. 'दृष्टीने चांगल्या प्रकारे भेदलेले' या पदाने तिन्ही धातूंमधून (तेधातुक - काम, रूप, अरूप) निस्सरण दर्शविले आहे. हा सुत्ताचा अर्थ (सुत्तत्थ) आहे. ๑๑๕. ตตฺถ กตโม เทสนาหาโร? อิมมฺหิ สุตฺเต ตโย เอสนา เทสิตา โสตานุคเตหิ ธมฺเมหิ วจสา ปริจิเตหิ กาเมสนาย สมถมคฺโค. ทิฏฺฐิยา สุปฺปฏิวิทฺเธหิ พฺรหฺมจริเยสนาย สมถมคฺโค. ११५. तेथे देसनाहार (देशनाहार) कोणता आहे? या सुत्तात तीन प्रकारच्या एषणा (शोध/इच्छा) देशित केल्या आहेत. स्रोतानुगत धम्मांद्वारे आणि वाणीने परिचित असलेल्या धम्मांद्वारे कामैषणा (काम-शोध) साठी शमथ-मार्ग (समथमग्गो) होतो. दृष्टीने चांगल्या प्रकारे भेदलेल्या धम्मांद्वारे ब्रह्मचर्यैषणा (ब्रह्मचर्य-शोध) साठी शमथ-मार्ग होतो. วิจโยติ ยถา สุตฺตํ มนสิกโรนฺโต วิจินนฺโต สุตมยิปญฺญํ ปฏิลภติ. ยถา จ โส มนสิกโรตีติ ยถา สุตธมฺมา ตทา จินฺตามยิปญฺญํ ปฏิลภติ. ยถา ทิฏฺเฐว ธมฺเม มนสิกโรติ ตทา ภาวนามยิปญฺญํ ปฏิลภติ. อยํ วิจโย. विचय (विचयहार) म्हणजे: सुत्तानुसार मनसिकार (चिंतन) करत आणि शोध घेत असताना मनुष्य श्रुतमयी प्रज्ञा प्राप्त करतो. आणि जसा तो ऐकलेल्या धम्मांचा मनसिकार करतो, तेव्हा तो चिंतामयी प्रज्ञा प्राप्त करतो. जसा तो या प्रत्यक्ष जन्मातच (दिट्ठधम्म) मनसिकार करतो, तेव्हा तो भावनामयी प्रज्ञा प्राप्त करतो. हा विचय होय. สุเตน สุตมยิปญฺญํ ปฏิลภติ. จินฺตาย จินฺตามยิปญฺญํ ภาวนาย ภาวนามยิปญฺญํ ปฏิลภติ. อตฺถิ เอสา ยุตฺติ. श्रवणाने (ऐकण्याने) श्रुतमयी प्रज्ञा प्राप्त होते. चिंतनाने चिंतामयी प्रज्ञा आणि भावनेने (विपश्यनेने) भावनामयी प्रज्ञा प्राप्त होते. ही युक्ती (तर्कसंगती) आहे. ปทฏฺฐาโนติ โสตานุคตา ธมฺมาติ ธมฺมสฺสวนสฺส ปทฏฺฐานํ. วจสา ปริจิตาติ ยุญฺชนาย ปทฏฺฐานํ. มนสา อนุเปกฺขิตาติ ธมฺมานุธมฺมาย วิปสฺสนาย ปทฏฺฐานํ. ทิฏฺฐิยา อนุเปกฺขิตาติ ปญฺญายปิ อนุเปกฺขิตา ทิฏฺฐิยาปิ อนุเปกฺขิตา. पदट्ठान (पदस्थान/निकटचे कारण) म्हणजे: 'स्रोतानुगत धम्मा' हे धम्मश्रवणाचे निकटचे कारण आहे. 'वाणीने परिचित' हे योगाचे (प्रयत्नाचे) निकटचे कारण आहे. 'मनाने अनुपेक्षित' हे धम्मानुधम्म विपश्यनेचे निकटचे कारण आहे. 'दृष्टीने अनुपेक्षित' (किंवा भेदलेले) हे प्रज्ञेने आणि दृष्टीने देखील अनुपेक्षित (अवलोकन केलेले) असण्याचे निकटचे कारण आहे. จตุพฺยูโหติ อิมมฺหิ สุตฺเต ภควโต โก อธิปฺปาโย? เย อิมาหิ ทฺวีหิ ปญฺญาหิ สมนฺนาคตา เตหิ…. चतुब्यूह (चतुर्व्यूहहार) म्हणजे: या सुत्तात भगवंतांचा काय अभिप्राय आहे? जे या दोन प्रज्ञांनी संपन्न आहेत, त्यांच्याद्वारे... ส นิพฺพุโตติ มคฺคผลํ อนุปาทิเสสญฺจ นิพฺพานธาตุํ มนฺเตติ, ทาเนน โอฬาริกานํ กิเลสานํ ปหานํ มนฺเตติ. สีเลน มชฺฌิมานํ, ปญฺญาย สุขุมกิเลสานํ มนฺเตติ, ราคโทสโมหกฺขยา ส นิพฺพุโตติ กตา จ ภูมิ. ‘तो शांत झाला’ (स निब्बुतो) याने मार्गफल आणि अनुपधिशेष निर्वाणधातू सूचित होते. दानाने स्थूल क्लेशांचे प्रहाण सूचित होते. शील पाळल्याने मध्यम क्लेशांचे आणि प्रज्ञेने सूक्ष्म क्लेशांचे प्रहाण सूचित होते. ‘राग, द्वेष आणि मोहाचा क्षय झाल्यामुळे तो शांत झाला’ याने ती भूमी सिद्ध होते। ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒติ, สํยมโต เวรํ น จียติ; กุสโล จ ชหาติ ปาปกนฺติ มคฺโค วุตฺโต; ราคโทสโมหกฺขยา ส นิพฺพุโตติ มคฺคผลมาห. ‘दान देणाऱ्याचे पुण्य वाढते, संयम राखणाऱ्याचे वैर साचत नाही; आणि कुशल मनुष्य पापाचा त्याग करतो’ याने मार्ग सांगितला आहे. ‘राग, द्वेष आणि मोहाचा क्षय झाल्यामुळे तो शांत झाला’ याने मार्गफल सांगितले आहे। ททโต [Pg.323] ปุญฺญํ ปวฑฺฒติ, สํยมโตติ ตีหิ ปเทหิ โลกิกํ กุสลมูลํ วุตฺตํ. ราคโทสโมหกฺขยา ส นิพฺพุโตติ โลกุตฺตรํ กุสลมูลํ วุตฺตํ. ‘दान देणाऱ्याचे पुण्य वाढते, संयम राखणाऱ्याचे...’ या तीन पदांनी लौकिक कुशलमूळ सांगितले आहे. ‘राग, द्वेष आणि मोहाचा क्षय झाल्यामुळे तो शांत झाला’ याने लोकोत्तर कुशलमूळ सांगितले आहे। ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒติ, สํยมโต เวรํ น จียตีติ ปุถุชฺชนภูมึ มนฺเตติ. กุสโล จ ชหาติ ปาปกนฺติ เสกฺขภูมึ มนฺเตติ. ราคโทสโมหกฺขยา ส นิพฺพุโตติ อเสกฺขภูมิ วุตฺตา. ‘दान देणाऱ्याचे पुण्य वाढते, संयम राखणाऱ्याचे वैर साचत नाही’ याने पृथग्जनभूमी सूचित होते. ‘कुशल मनुष्य पापाचा त्याग करतो’ याने शैक्षभूमी सूचित होते. ‘राग, द्वेष आणि मोहाचा क्षय झाल्यामुळे तो शांत झाला’ याने अशैक्षभूमी सांगितली आहे। ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒติ, สํยมโต เวรํ น จียตีติ มคฺคนิยา ปฏิปทา วุตฺตา. กุสโล จ ชหาติ ปาปกนฺติ เสกฺขวิมุตฺติ. ราคโทสโมหกฺขยา ส นิพฺพุโตติ อเสกฺขวิมุตฺติ. ‘दान देणाऱ्याचे पुण्य वाढते, संयम राखणाऱ्याचे वैर साचत नाही’ याने मार्गाकडे नेणारी प्रतिपदा (आचरण) सांगितली आहे. ‘कुशल मनुष्य पापाचा त्याग करतो’ याने शैक्षविमुक्ती सांगितली आहे. ‘राग, द्वेष आणि मोहाचा क्षय झाल्यामुळे तो शांत झाला’ याने अशैक्षविमुक्ती सांगितली आहे। ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒติ, สํยมโต เวรํ น จียตีติ ทานกถํ สีลกถํ มคฺคกถํ โลกิกานํ ธมฺมานํ เทสนมาห. กุสโล จ ชหาติ ปาปกนฺติ โลเก อาทีนวานุปสฺสนา. ราคโทสโมหกฺขยา ส นิพฺพุโตติ สามุกฺกํสิกาย ธมฺมเทสนายปิ ปฏิวิทฺธา. ‘दान देणाऱ्याचे पुण्य वाढते, संयम राखणाऱ्याचे वैर साचत नाही’ याने दानकथा, शीलकथा, मार्गकथा आणि लौकिक धर्मांची देशना सांगितली आहे. ‘कुशल मनुष्य पापाचा त्याग करतो’ याने जगातील आदीनवानुपश्यना (दोषांचे दर्शन) सांगितली आहे. ‘राग, द्वेष आणि मोहाचा क्षय झाल्यामुळे तो शांत झाला’ याने भगवंतांच्या स्वतःच्या विशिष्ट धर्मदेशनेचे आकलन (प्रतिवेध) सांगितले आहे। ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒตีติ ปาณานํ อภยทาเนน ปาณาติปาตา เวรมณิสตฺตานํ อภยํ เทติ. เอวํ สพฺพานิ สิกฺขาปทานิ กาตพฺพานิ. สํยมโต เวรํ น จียตีติ สีเล ปติฏฺฐาย จิตฺตํ สํยเมติ, ตสฺส สํยมโต ปาริปูรึ คจฺฉติ. ราคโทสโมหกฺขยา ส นิพฺพุโตติ ทฺเว วิมุตฺติโย. อยํ สุตฺตนิทฺเทโส. ‘दान देणाऱ्याचे पुण्य वाढते’ याने प्राण्यांना अभयदान देऊन, प्राणातिपातापासून (हिंसेपासून) विरत राहणाऱ्या प्राण्यांना अभय दिले जाते. अशा प्रकारे सर्व शिक्षापदांचे पालन केले पाहिजे. ‘संयम राखणाऱ्याचे वैर साचत नाही’ याने शीलामध्ये प्रतिष्ठित होऊन चित्ताचा संयम केला जातो; त्या संयम राखणाऱ्याची परिपूर्ती होते. ‘राग, द्वेष आणि मोहाचा क्षय झाल्यामुळे तो शांत झाला’ याने दोन विमुक्ती (चेतोविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्ती) सांगितल्या आहेत. हा ‘सुत्तनिर्देश’ होय। ๑๑๖. ตตฺถ กตมา เทสนา? อิมมฺหิ สุตฺเต กึ เทสิตํ? ทฺเว สุคติโย เทวา จ มนุสฺสา จ, ทิพฺพา จ ปญฺจกามคุณา, มานุสฺสกา จ. ทฺวีหิ ปเทหิ นิทฺเทโส. ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒติ, สํยมโต เวรํ น จียติ, กุสโล จ ชหาติ ปาปกนฺติ มคฺโค วุตฺโต. ราคโทสโมหกฺขยา ส นิพฺพุโตติ ทฺเว นิพฺพานธาตุโย เทสิตา โสปาทิเสสา จ อนุปาทิเสสา จ. อยํ เทสนา. ११६. त्यात ‘देशना’ कोणती? या सुत्तात काय उपदेशिले आहे? देव आणि मनुष्य या दोन सुगती, तसेच दिव्य आणि मानुषी असे पाच कामगुण उपदेशिले आहेत. दोन पदांनी हा निर्देश केला आहे. ‘दान देणाऱ्याचे पुण्य वाढते, संयम राखणाऱ्याचे वैर साचत नाही, आणि कुशल मनुष्य पापाचा त्याग करतो’ याने मार्ग सांगितला आहे. ‘राग, द्वेष आणि मोहाचा क्षय झाल्यामुळे तो शांत झाला’ याने सोपाधिशेष आणि अनुपधिशेष अशा दोन निर्वाणधातू उपदेशिल्या आहेत. हा ‘देशना हार’ होय। วิจโยติ ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒตีติ อิมินา ปฐเมน ปเทน ทานมยิกปุญฺญกิริยวตฺถุ วุตฺตํ. เตนสฺส อานนฺตริยานํ กุสลานํ ธมฺมานํ. ทุติเยน ปเทน… ยนฺติ, นิยฺยานิกํ สาสนนฺติ, อยํ อธิปฺปาโย. อสฺสวเนน จ อมนสิกาเรน จ อปฺปฏิเวเธน จ สกฺกายสมุทยคามินี ปฏิปทา วุตฺตา. สวเนน [Pg.324] จ มนสิกาเรน จ ปฏิเวเธน จ สกฺกายนิโรธคามินี ปฏิปทา วุตฺตา. อยํ อาวฏฺโฏ. ‘विचय’ म्हणजे ‘दान देणाऱ्याचे पुण्य वाढते’ या पहिल्या पदाने दानमय पुण्यक्रियावस्तू सांगितली आहे. त्यामुळे त्याला अनंतर (लगेचच) कुशल धर्म प्राप्त होतात. दुसऱ्या पदाने... ते जातात, हे शासन मोक्षाकडे नेणारे आहे, हा अभिप्राय आहे. धर्म न ऐकल्याने, मनसिकार न केल्याने आणि प्रतिवेध (आकलन) न केल्याने सत्काय-समुदयाकडे नेणारी प्रतिपदा सांगितली आहे. धर्म ऐकल्याने, मनसिकार केल्याने आणि प्रतिवेध केल्याने सत्काय-निरोधाकडे नेणारी प्रतिपदा सांगितली आहे. हा ‘आवर्त हार’ होय। วิภตฺตีติ เอกํสพฺยากรณีโย. นตฺถิ ตตฺถ วิภตฺติยา ภูมิ. ปริวตฺตนาติ เย ปญฺจานิสํสา, เต ปญฺจาทินา ปฏิปกฺเขน เตเนว ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปาปุณาติ, ตํ อุปปชฺชมานา อปโร ปริยาโย. ‘विभक्ती’ म्हणजे एकांशव्याकरणीय (निश्चित उत्तर देण्यायोग्य). तिथे विभक्तीला (विभाजनाला) वाव नाही. ‘परिवर्तना’ म्हणजे जे पाच आनिशंस (फायदे) आहेत, ते पाच इत्यादी विरोधी पक्षांद्वारे याच प्रत्यक्ष जीवनात प्राप्त होतात; ते उत्पन्न झाल्यावर प्राप्त होणे हा दुसरा पर्याय आहे। เววจนนฺติ โสตานุคตา ธมฺมาติ ยํ สุตฺตํ ทิฏฺฐมฺปิ ปญฺญินฺทฺริยํ วิญฺญตฺตมฺปิ ทิฏฺฐิยา สุปฺปฏิวิทฺธมฺปิ วิภาวิตมฺปิ. ‘वेवचन’ (समानार्थी शब्द) म्हणजे ‘स्रोतानुगत धर्म’ होय, जे सुत्त पाहिले गेले आहे, प्रज्ञेंद्रियात विज्ञापित झाले आहे, प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे प्रतिवेध केले गेले आहे आणि स्पष्ट झाले आहे। ปญฺญตฺตีติ โสตานุคตาธมฺมาติ เทสนา อวิชฺชาปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ. มนสิกาโร ปาโมชฺชปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺโต, ทิฏฺฐธมฺมาปิ อานิสํสปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตา. ‘प्रज्ञप्ती’ म्हणजे ‘स्रोतानुगत धर्म’ ही देशना अविद्या-प्रज्ञप्तीमध्ये प्रज्ञप्त (स्पष्ट) केली आहे. मनसिकार हा प्रामोद्य-प्रज्ञप्तीमध्ये प्रज्ञप्त केला आहे, आणि प्रत्यक्ष पाहिलेले धर्म देखील आनिशंस-प्रज्ञप्तीमध्ये प्रज्ञप्त केले आहेत। โอตรโณติ ติสฺโส ปญฺญา วจสา ปริจิเตสุ สุตมยีปญฺญา มนสา อนุเปกฺขิเตสุ จินฺตามยีปญฺญา ทิฏฺฐิยา สุปฺปฏิวิทฺธาสุ ภาวนามยีปญฺญา. อิมานิ อริยสจฺจานิ อินฺทฺริยานิ วิชฺชุปฺปาทา อวิชฺชานิโรโธ ปฏิจฺจสมุปฺปาโท อินฺทฺริเยสุ ตีณิ อินฺทฺริยานิ, อายตเนสุ ธมฺมายตนปริยาปนฺนา ธาตูสุ ธมฺมธาตุปริยาปนฺนาติ. โสธโนติ โย อารมฺโภ สุตฺตสฺส ปเวโส นิยุตฺโต. ‘अवतरण’ म्हणजे तीन प्रकारच्या प्रज्ञा आहेत: वाणीने अभ्यासलेल्या विषयांमध्ये ‘श्रुतमयी प्रज्ञा’, मनाने चिंतन केलेल्या विषयांमध्ये ‘चिंतामयी प्रज्ञा’ आणि प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे प्रतिवेध केलेल्या विषयांमध्ये ‘भावनामयी प्रज्ञा’. ही आर्यसत्ये, इंद्रिये, विद्येचा उत्पाद, अविद्येचा निरोध, प्रतीत्यसमुत्पाद, इंद्रियांमध्ये तीन इंद्रिये, आयतनांमध्ये धर्मायतन-अंतर्गत आणि धातूंमध्ये धर्मधातू-अंतर्गत आहेत. ‘शोधन’ म्हणजे सुत्ताचा जो आरंभ आणि प्रवेश योग्य प्रकारे जोडला गेला आहे. อธิฏฺฐาโนติ ปญฺจานิสํสาติ เวมตฺตตาย ปญฺญตฺตา อานิสํสา โสตา อนุคตาติ เวมตฺตตาย อริยโวหาโร ปญฺญตฺโต, ธมฺเม จ สวนนฺติ เอกตฺตตาย ปญฺญตฺตํ. ‘अधिष्ठान’ म्हणजे पाच आनिशंस हे भिन्नतेने (वेमत्तता) प्रज्ञप्त केले आहेत. ‘स्रोतानुगत आनिशंस’ हे भिन्नतेने आर्य-व्यवहार म्हणून प्रज्ञप्त केले आहेत, आणि ‘धर्माचे श्रवण’ हे एकतेने (समानतेने) प्रज्ञप्त केले आहे। ปริกฺขาโรติ ธมฺมสฺสวนสฺส ปยิรุปาสนา ปจฺจโย, สทฺธา เหตุ. มนสา อนุเปกฺขิตาติ อตฺถปฺปฏิสํเวทิตา ปจฺจโย, ธมฺมปฺปฏิสํเวทิตา เหตุ, ทิฏฺฐิยา สุปฺปฏิวิทฺธาติ สทฺธมฺมสฺสวนญฺจ มนสิกาโร จ ปจฺจโย, สุตมยี จินฺตามยี ปญฺญา เหตุ. สมาโรปโนติ วิภตฺตํ สุตฺตํ อปโร ปริยาโย นิพฺพตฺติ พเล นตฺถิ. ตตฺถ สมาโรปนาย ภูมิ. ‘परिकार’ म्हणजे धर्मश्रवणासाठी (सज्जनांची) उपासना हा प्रत्यय (कारण) आहे आणि श्रद्धा हा हेतू आहे. ‘मनाने चिंतन करणे’ यासाठी अर्थ-प्रतिसंवेदिता हा प्रत्यय आहे आणि धर्म-प्रतिसंवेदिता हा हेतू आहे. ‘प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे प्रतिवेध करणे’ यासाठी सद्धर्मश्रवण आणि मनसिकार हे प्रत्यय आहेत, तर श्रुतमयी व चिंतामयी प्रज्ञा हा हेतू आहे. ‘समारोपण’ म्हणजे विभाजित केलेले सुत्त हा दुसरा पर्याय आहे, जो उत्पत्तीच्या सामर्थ्यात नाही. तिथे समारोपणाला वाव नाही। ๑๑๗. ตตฺถ กตมํ วาสนาภาคิยญฺจ นิพฺเพธภาคิยญฺจ สุตฺตํ? ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒตีติ คาถา. ททโตติ ทานมยิกปุญฺญกิริยวตฺถุ วุตฺตํ. สํยมโต เวรํ น จียตีติ สีลมยิกปุญฺญกิริยวตฺถุ วุตฺตํ. กุสโล จ ชหาติ ปาปกนฺติ โลภสฺส จ โมหสฺส จ พฺยาปาทสฺส จ ปหานมาห. ราคโทสโมหกฺขยา ส นิพฺพุโตติ โลภสฺส จ โมหสฺส จ พฺยาปาทสฺส [Pg.325] จ ฉนฺทราควินยมาหาติ. ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒตีติ คาถา อโลโภ กุสลมูลํ ภวติ. สํยมโต เวรํ น จียตีติ อโทโส กุสลมูลํ ภวติ. สํยมโต เวรํ น จียตีติ อเวรา อสปตฺตา อพฺยาปาทตาย สทา. กุสโล จ ชหาติ ปาปกนฺติ ญาณุปฺปาทา อญฺญาณนิโรโธ. จตุตฺถปเทน ราคโทสโมหกฺขเยน ราควิราคา เจโตวิมุตฺติโมหกฺขเยน อวิชฺชาวิราคา ปญฺญาวิมุตฺติ, อยํ วิจโย. ११७. त्यामध्ये वासनाभागीय आणि निर्वेधभागीय सुत्त कोणते? 'देणाऱ्याचे पुण्य वाढते' ही गाथा होय. 'देणाऱ्याचे' (ददतो) याने दानमय पुण्यक्रियावस्तू सांगितली आहे. 'संयम राखणाऱ्याचे वैर साठत नाही' याने शीलमय पुण्यक्रियावस्तू सांगितली आहे. 'कुशल पापाचा त्याग करतो' याने लोभ, मोह आणि व्यापादाचा प्रहाण (त्याग) सांगितला आहे. 'राग, द्वेष आणि मोहाच्या क्षयाने तो निवृत्त होतो' याने लोभ, मोह आणि व्यापादाच्या छंदरागाचे नियंत्रण (विनय) सांगितले आहे. 'देणाऱ्याचे पुण्य वाढते' या गाथेनुसार अलोभ हे कुशलमूळ होते. 'संयम राखणाऱ्याचे वैर साठत नाही' यानुसार अद्वेष हे कुशलमूळ होते. 'संयम राखणाऱ्याचे वैर साठत नाही' म्हणजे अव्यापादतेमुळे नेहमी वैररहित व शत्रूरहित असणे होय. 'कुशल पापाचा त्याग करतो' म्हणजे ज्ञानाच्या उत्पत्तीने अज्ञानाचा निरोध होणे होय. चौथ्या पदाने, 'राग, द्वेष आणि मोहाच्या क्षयाने' - रागाच्या विरागामुळे चेतोविमुक्ती आणि मोहाच्या क्षयाने (अविद्येच्या विरागामुळे) प्रज्ञाविमुक्ती होते; हा 'विचय' (विचयहार) होय. ยุตฺตีติ ทาเน ฐิโต อุภยํ หิ ปริปูเรติ. มจฺฉริยญฺจ ปชหติ. ปุญฺญญฺจ ปวฑฺฒติ. อตฺถิ เอสา ยุตฺติ. युक्ती (युक्तिहार) म्हणजे: दानात स्थित असलेला मनुष्य दोन्ही गोष्टी पूर्ण करतो; तो मत्सराचा त्याग करतो आणि त्याचे पुण्य वाढते. ही 'युक्ती' आहे. ปทฏฺฐานนฺติ ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒตีติ จาคาธิฏฺฐานสฺส ปทฏฺฐานํ. สํยมโต เวรํ น จียตีติ ปญฺญาธิฏฺฐานสฺส ปทฏฺฐานํ กุสโล จ ชหาติ ปาปกนฺติ สจฺจาธิฏฺฐานสฺส ปทฏฺฐานํ. ราคโทสโมหกฺขยา ส นิพฺพุโตติ อุปสมาธิฏฺฐานสฺส ปทฏฺฐานํ. อยํ ปทฏฺฐาโน. पदस्थान (पदट्ठानहार) म्हणजे: 'देणाऱ्याचे पुण्य वाढते' हे त्याग-अधिष्ठानाचे पदस्थान (जवळचे कारण) आहे. 'संयम राखणाऱ्याचे वैर साठत नाही' हे प्रज्ञा-अधिष्ठानाचे पदस्थान आहे. 'कुशल पापाचा त्याग करतो' हे सत्य-अधिष्ठानाचे पदस्थान आहे. 'राग, द्वेष आणि मोहाच्या क्षयाने तो निवृत्त होतो' हे उपशम-अधिष्ठानाचे पदस्थान आहे. हा 'पदस्थान' (पदट्ठानहार) होय. ตตฺถ กตโม ลกฺขโณ? ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒติ สํยมโต เวรํ น จียติ. ททโตปิ เวรํ น กริยาติ กุสโล จ ชหาติ ปาปกํ ราคโทสโมหกฺขยา ส นิพฺพุโต รูปกฺขยาปิ เวทนกฺขยาปิ, เยน รูเปน ทิฏฺฐํ, เตน ตถาคโต ปญฺญเปนฺโต ปญฺญเปยฺย รูปสฺส ขยา วิราคนิโรธาติ เอวํ ปญฺจกฺขนฺธา. त्यामध्ये लक्षण हार कोणता आहे? 'दान देणाऱ्याचे पुण्य वाढते, संयम राखणाऱ्याचे वैर साठत नाही.' दान देणाऱ्याने देखील वैर करू नये. तसेच कुशल (धर्म) पापाचा (अकुशलाचा) त्याग करतो. राग, द्वेष आणि मोहाचा क्षय झाल्यामुळे तो शांत (परिनिर्वृत) होतो; रूपाच्या क्षयामुळे आणि वेदनेच्या क्षयामुळे देखील तो शांत होतो. ज्या रूपाने (ते) पाहिले गेले आहे, त्या रूपाने प्रज्ञापित करताना तथागत प्रज्ञापित करतील. रूपाच्या क्षयामुळे, विरागामुळे आणि निरोधाने; अशा प्रकारे पाचही स्कंध (निरुद्ध होतात). จตุพฺยูโห อิธ ภควโต โก อธิปฺปาโย? เย มหาโภคานํ ปตฺถยิสฺสนฺติ? เต ทานํ ทสฺสนฺติ ปริสฺสยปหานาย, เย อเวราภิฉนฺทกา, เต ปญฺจ เวรานิ ปชหิสฺสนฺติ, เย กุสลาภิฉนฺทกา, เต อฏฺฐงฺคิกํ มคฺคํ ภาเวสฺสนฺติ อฏฺฐนฺนํ มิจฺฉตฺตานํ ปหานาย. เย นิพฺพายิตุกามา, เต ราคโทสโมหํ ปชหิสฺสนฺตีติ อยํ ภควโต อธิปฺปาโย. चतुब्यूह हार: येथे भगवंतांचा काय अभिप्राय आहे? जे महाभोगांची (मोठ्या संपत्तीची) इच्छा करतील, ते संकटांच्या प्रहाणासाठी दान देतील. ज्यांना वैररहित होण्याची तीव्र इच्छा आहे, ते पाच वैरांचा त्याग करतील. ज्यांना कुशलाची तीव्र इच्छा आहे, ते आठ मिथ्यात्वांच्या प्रहाणासाठी अष्टांगिक मार्गाची भावना करतील. ज्यांना निर्वाण प्राप्त करण्याची इच्छा आहे, ते राग, द्वेष आणि मोहाचा त्याग करतील; हा भगवंतांचा अभिप्राय आहे. อาวฏฺโฏติ ยญฺจ อททโต มจฺฉริยํ ยญฺจ อสํยมโต เวรํ ยญฺจ อกุสลสฺส ปาปสฺส อปฺปหานํ, อยํ ทุกฺขนิทฺเทโส น สมุทโย. อโลเภน จ อโทเสน จ อโมเหน จ กุสเลน อิมานิ ตีณิ กุสลมูลานิ. เตสํ ปจฺจโย อฏฺฐ สมฺมตฺตานิ, อยํ มคฺโค. เตสํ ราคโทสโมหานํ ขยา, อยํ นิโรโธ. आवट्ट हार: दान न देणाऱ्याचा जो मत्सर (कंजूषपणा) आहे, संयम न राखणाऱ्याचे जे वैर आहे आणि अकुशल पापाचा जो त्याग न करणे आहे; हा दुःखाचा निर्देश आहे, समुदयाचा नाही. अलोभ, अद्वेष आणि अमोहाने युक्त असलेले हे तीन कुशलमुळे आहेत. आठ सम्यक्त्व हे त्यांचे प्रत्यय (कारण) आहेत, हा मार्ग आहे. त्या राग, द्वेष आणि मोहाचा क्षय होणे, हा निरोध आहे. วิภตฺตีติ ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒตีติ น เอกํเสน โย ราชทณฺฑภเยน เทติ, โย จ อกปฺปิยสฺส ปริโภเคน สีลวนฺเตสุ เทติ, น ตสฺส ปุญฺญํ [Pg.326] ปวฑฺฒตีติ โส เจตํ ทานํ อกุสเลน เทติ, ทณฺฑทานํ สตฺถทานํ อปุญฺญมยํ ปวฑฺฒติ, น ปุญฺญํ. สํยมโต เวรํ น จียตีติ น เอกํเสน กึ การณํ ยญฺจ โย ปทํ ทิฏฺฐธมฺมิกํ ปสฺสติ ยทิ มม ราชาโน คเหตฺวา หตฺถํ วา ฉินฺเทยฺย…เป… น เตน สํยเมน เวรํ น กโรติ. โย ตุ เอวํ สมาทิยติ ปาณาติปาตสฺส ปาปโก วิปาโกติ, ทิฏฺเฐ เยว ธมฺเม อภิสมฺปราเย จ เอวํ สพฺพสฺส อกุสลสฺส เหตุโต อารติ. อิมินา สํยเมน เวรํ น จียติ. विभत्ती हार: 'दान देणाऱ्याचे पुण्य वाढते' हे एकांताने (निश्चितपणे) खरे नाही. जो राजाच्या दंडाच्या भयाने दान देतो, आणि जो अकल्पनीय (अयोग्य) वस्तूंच्या उपभोगाने शीलवानांना दान देतो, त्याचे पुण्य वाढत नाही; कारण तो ते दान अकुशल चित्ताने देतो. दंडाचे दान, शस्त्राचे दान हे अपुण्यमय (पाप) वाढवते, पुण्य नाही. 'संयम राखणाऱ्याचे वैर साठत नाही' हे देखील एकांताने खरे नाही. कारण काय? जो या प्रत्यक्ष जीवनात (दृष्टधर्मात) हे पाहतो की, 'जर राजांनी मला पकडून माझा हात कापला... इत्यादी', त्या संयमाने तो वैर करत नाही असे नाही. परंतु जो 'प्राणातिपाताचा (जीवहत्येचा) परिणाम या जन्मात आणि परलोकात देखील वाईट असतो' असे समजून समादान करतो, आणि अशा प्रकारे सर्व अकुशलाच्या कारणांपासून दूर राहतो; या संयमाने वैर साठत नाही. ปริวตฺตนาติ ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒตีติ อททโต ปุญฺญํ น ปวฑฺฒติ. ยํ ทานมยํ, ตํ สํยมโต เวรํ น จียติ, อสํยมโต เวรํ กรียติ. กุสโล จ ชหาติ ปาปกํ อกุสโล น ชหาติ. ราคโทสโมหกฺขยา สนิพฺพุโตติ ทูตํ เปเสตฺวา ปณีตํ เปเสตฺวาปิ น ปกฺโกสามิ, โส สยเมว ปน มหาภิกฺขุสงฺฆปริวาโร อมฺหากํ วสนฏฺฐานํ สมฺปตฺโต อมฺเหหิ จ สนฺถาคารสาลา การิตา, เอตฺถ มยํ ทสพลํ อาเนตฺวา มงฺคลํ ภณาเปมาติ จินฺเตตฺวา อุปสงฺกมึสุ. เยน สนฺถาคารํ เตนุปสงฺกมึสูติ ตํ ทิวสํ กิร สนฺถาคาเร จิตฺตกมฺมํ นิฏฺฐาเปตฺวา อฏฺฏกา มุตฺตมตฺตา โหนฺติ. พุทฺธา นาม อรญฺญชฺฌาสยา อรญฺญารามา อนฺโตคาเม วเสยฺยุํ วา โน วาติ ตสฺมา ภควโต มนํ ชานิตฺวาว ปฏิชคฺคิสฺสามาติ จินฺเตตฺวา เต ภควนฺตํ อุปสงฺกมึสุ. อิทานิ ปน มนํ ลภิตฺวา ปฏิชคฺคิตุกามา เยน สนฺถาคารํ, เตนุปสงฺกมึสุ. สพฺพสนฺถรินฺติ ยถา สพฺพํ สนฺถตํ โหติ เอวํ เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสูติ. เอตฺถ ปน เต มลฺลราชาโน สนฺถาคารํ ปฏิชคฺคิตฺวา นครวีถิโยปิ สมฺมชฺชาเปตฺวา ธเช อุสฺสาเปตฺวา สุวณฺณฆฏิกทลิโย จ ฐปาเปตฺวา สกลนครํ ทีปมาลาหิ วิปฺปกิณฺณตารกํ วิย กตฺวา ขีรปเก ทารเก ขีรํ ปาเยถ, ทหเร กุมาเร ลหุํ ลหุํ โภชาเปตฺวา สยาเปถ, อุจฺจาสทฺทํ มากริ, อชฺช เอกรตฺตึ สตฺถา อนฺโตคาเมว วสิสฺสติ, พุทฺธา นาม อปฺปสทฺทกามา โหนฺตีติ เภรึ จราเปตฺวา สยํ ทณฺฑกทีปิกา อาทาย เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ. ภควนฺตํ เยว ปุรกฺขตฺวาติ ภควนฺตํ ปุรโต กตฺวา, ตตฺถ ภควา ภิกฺขูนญฺเจว อุปาสกานญฺจ มชฺเฌ นิสินฺโน อติวิย วิโรจติ. สมนฺตปาสาทิโก สุวณฺณวณฺโณ อภิรูโป ทสฺสนีโย ปุรตฺถิมกายโต [Pg.327] สุวณฺณวณฺณา รสฺมิ อุฏฺฐหิตฺวา คคนตเล อสีติหตฺถํ ฐานํ คณฺหาติ. ปจฺฉิมกายโต ทกฺขิณหตฺถโต วามหตฺถโต สุวณฺณวณฺณา เหฏฺฐา ปาทตเลหิ ปวาฬวณฺณรสฺมิ อุฏฺฐหิตฺวา ฆนปถวิยํ อสีติหตฺถํ ฐานํ คณฺหาติ, เอวํ สมนฺตา อสีติหตฺถมตฺตํ ฐานํ ฉพฺพณฺณพุทฺธรสฺมิโย วิชฺโชตมานา วิตณฺฑมานา วิธาวนฺติ, สพฺเพ ทิสาภาคา สุวณฺณจมฺปกปุปฺเผหิ วิกิริยมานา วิย สุวณฺณฆฏโต นิกฺขนฺตสุวณฺณรสธาราหิ สิญฺจมานา วิย ปสาริตสุวณฺณปฏปริกฺขิตฺตา วฺวิย เวรมฺภวาตสมุฏฺฐิตกึสุกกึสุการกณิการปุปฺผจุณฺณสโมกิณฺณา วิย วิปฺปกสนฺตํ อสีติอนุพฺยญฺชนพฺยามปฺปภา ทฺวตฺตึสวรลกฺขณสมุชฺชลํ สรีรํ สมุคฺคตตารกํ วิย คคนตลํ วิกสิตมิว ปทุมวนํ สพฺพผาลิผุลฺโล วิย โยชนสติโก ปาริจฺฉตฺตโก ปฏิปาฏิยา ฐปิตานํ ทฺวตฺตึสจนฺทานํ ทฺวตฺตึสสูริยานํ ทฺวตฺตึสจกฺกวตฺตีนํ ทฺวตฺตึสเทวราชานํ ทฺวตฺตึสมหาพฺรหฺมานํ นิพฺพุโต อเสกฺขสฺส นตฺถิ นิพฺพุติ. परिवर्तना हार: 'दान देणाऱ्याचे पुण्य वाढते' या वाक्यात, दान न देणाऱ्याचे पुण्य वाढत नाही. जे दानमय (पुण्य) आहे, ते संयम राखणाऱ्याचे वैर साठू देत नाही, तर असंयम राखणाऱ्याचे वैर निर्माण करते. कुशल पापाचा त्याग करतो, अकुशल त्याग करत नाही. 'राग, द्वेष आणि मोहाचा क्षय झाल्यामुळे तो शांत होतो' या संदर्भात, 'मी दूत पाठवून किंवा उत्तम वस्तू पाठवूनही त्यांना बोलावणार नाही, ते स्वतःच महाभिक्षुसंघाच्या परिवारासह आमच्या निवासस्थानी आले आहेत आणि आम्ही संथागार शाळा (सभागृह) तयार केली आहे; येथे आम्ही दशबलांना (बुद्धांना) आणून मंगल पाठ म्हणवून घेऊ' असा विचार करून ते जवळ गेले. 'जेथे संथागार होते, तेथे ते गेले' कारण त्या दिवशी संथागारातील चित्रकाम पूर्ण करून ते मंचावरून नुकतेच उतरले होते. 'बुद्ध हे अरण्यात राहण्याची इच्छा असणारे, अरण्यात रमणारे असतात; ते गावात राहतील की नाही (नक्की नाही)' म्हणून भगवंतांचे मन जाणूनच आम्ही त्यांची सेवा करू असा विचार करून ते भगवंताकडे गेले. आता मात्र भगवंतांची संमती मिळवून, सेवा करण्याच्या इच्छेने जेथे संथागार होते, तेथे ते गेले. 'सर्वसंथरी' म्हणजे जसे सर्व काही अंथरलेले (सजविलेले) असते, तसे जेथे भगवान होते, तेथे ते गेले. येथे त्या मल्ल राजांनी संथागार स्वच्छ करून, नगराचे रस्ते झाडून, ध्वज उभारून, सोन्याचे कलश व केळीचे खांब लावून, संपूर्ण नगर दिव्यांच्या माळांनी आकाशातील ताऱ्यांप्रमाणे प्रकाशित केले आणि 'स्तनपान करणाऱ्या बालकांना दूध पाजा, लहान मुलांना लवकर जेवण देऊन झोपवा, मोठा आवाज करू नका; आज एका रात्रीसाठी शास्ता (बुद्ध) गावातच राहतील, बुद्ध हे शांतताप्रिय असतात' अशी दवंडी पिटवून, स्वतः मशाली हातात घेऊन जेथे भगवान होते, तेथे ते गेले. 'भगवंतांनाच पुढे करून' म्हणजे भगवंतांना पुढे ठेवून; तेथे भगवान भिक्षूंच्या आणि उपासकांच्या मध्ये बसलेले अत्यंत शोभून दिसत होते. ते सर्व बाजूंनी प्रसन्न करणारे, सुवर्णवर्णी, अत्यंत रूपवान आणि दर्शनीय होते. त्यांच्या शरीराच्या पूर्वभागातून सुवर्णवर्णी रश्मी निघून आकाशात ऐंशी हातांच्या अंतरापर्यंत पसरत होत्या. शरीराच्या मागील भागातून, उजव्या हातातून, डाव्या हातातून सुवर्णवर्णी आणि पायांच्या तळव्यांतून प्रवाळवर्णी रश्मी निघून घन पृथ्वीमध्ये ऐंशी हातांच्या अंतरापर्यंत पसरत होत्या. अशा प्रकारे चहूबाजूंनी ऐंशी हातांच्या अंतरापर्यंत बुद्धांचे षड्वर्णी किरण तळपत, थरथरत आणि धावत होते. सर्व दिशा जणू सुवर्ण चाफ्याच्या फुलांनी विखुरल्यासारख्या, सोन्याच्या कलशातून निघणाऱ्या सुवर्णरसाच्या धारांनी सिंचित केल्यासारख्या, पसरलेल्या सुवर्णवस्त्राने वेढल्यासारख्या, आणि वेरंभ वाऱ्याने उडविलेल्या पळस, कांचन व कण्हेर फुलांच्या परागकणांनी भरल्यासारख्या शोभत होत्या. ऐंशी अनुव्यंजने आणि व्यामप्रभेने युक्त, बत्तीस महापुरुष लक्षणांनी देदीप्यमान असलेले त्यांचे शरीर ताऱ्यांनी भरलेल्या आकाशमंडळाप्रमाणे, उमललेल्या कमळांच्या वनाप्रमाणे, किंवा शंभर योजने पसरलेल्या आणि पूर्णपणे बहरलेल्या पारिजात वृक्षाप्रमाणे शोभत होते. ते एका ओळीत ठेवलेल्या बत्तीस चंद्रांच्या, बत्तीस सूर्यांच्या, बत्तीस चक्रवर्ती राजांच्या, बत्तीस देवराजांच्या आणि बत्तीस महाब्रह्मांच्या तेजाप्रमाणे देदीप्यमान होते. बत्तीस लक्षणांनी युक्त असलेले ते महापरिनिर्वृत झाले होते. अशैक्षाला (अर्हताला) पुन्हा शांत होणे (पुनर्जन्म) नसते. เววจนนฺติ ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒติ, อนุโมทโตปิ ปุญฺญํ ปวฑฺฒติ. จิตฺตสฺส สมาทหโตปิ เวยฺยาวจฺจกิริยายปิ ปุญฺญํ ปวฑฺฒตีติ. वेवचन (पर्यायवाची) हार: 'दान देणाऱ्याचे पुण्य वाढते', अनुमोदन करणाऱ्याचे देखील पुण्य वाढते. चित्त एकाग्र करणाऱ्याचे आणि वैयावृत्य (सेवाकार्य) करणाऱ्याचे देखील पुण्य वाढते. ปญฺญตฺตีติ ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒติ, อโลภสฺส ปฏินิสฺสยฆาตปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ. สํยมโต เวรํ น จียตีติ อโทสสฺส ปฏินิสฺสยฆาตปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ กุสโล จ ชหาติ ปาปกนฺติ อโมหสฺส ปฏินิสฺสยฆาตปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ. पण्णत्ती (प्रज्ञप्ती) हार: 'दान देणाऱ्याचे पुण्य वाढते', हे अलोभाच्या प्रतिनिसर्ग (त्याग) आणि प्रहाणाच्या प्रज्ञप्तीमध्ये प्रज्ञप्त केले आहे. 'संयम राखणाऱ्याचे वैर साठत नाही', हे अद्वेषाच्या प्रतिनिसर्ग आणि प्रहाणाच्या प्रज्ञप्तीमध्ये प्रज्ञप्त केले आहे. 'कुशल पापाचा त्याग करतो', हे अमोहाच्या प्रतिनिसर्ग आणि प्रहाणाच्या प्रज्ञप्तीमध्ये प्रज्ञप्त केले आहे. โอตรโณติ ปญฺจสุ อินฺทฺริเยสุ ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒติ, สํยมโต เวรํ น จียติ สํยเมน สีลกฺขนฺโธ. โอติณฺโณ ฉสุ อินฺทฺริเยสุ สํวโร, อยํ สมาธิกฺขนฺโธ, ยํ กุสโล จ ชหาติ ปาปกํ, อยํ ปญฺญากฺขนฺโธ, ราคโทสโมหกฺขยา ส นิพฺพุโตติ วิมุตฺติกฺขนฺโธ. ธาตูสุ ธมฺมธาตุ, อายตเนสุ มนายตนํ. ओतरण (अवतरण) हार म्हणजे: पाच इंद्रियांमध्ये दान देणाऱ्याचे पुण्य वाढते; संयम राखणाऱ्याचे वैर साचत नाही; संयमाने शीलस्कंध जाणावा. पार गेलेल्याचा सहा इंद्रियांमधील संवर हा समाधिस्कंध होय. कुशल धर्माने जे पाप त्यागले जाते, तो प्रज्ञास्कंध होय. राग, द्वेष आणि मोहाच्या क्षयाने जो शांत (निर्वृत) होतो, तो विमुक्तिस्कंध होय. धातूंमध्ये धम्मधातू आणि आयतनांमध्ये मनायतन होय. โสธโนติ เยนารมฺเภน อิทํ สุตฺตํ เทสิตํ โส อารมฺโภ สุทฺโธ. शोधन हार म्हणजे: ज्या आरंभाने (प्रयत्नाने) हे सुत्त उपदेशिले गेले आहे, तो आरंभ शुद्ध आहे. อธิฏฺฐาโน ทานนฺติ เอกตฺตตาย ปญฺญตฺตํ. จาโค ปริจฺจาโค ธมฺมทานํ อามิสทานํ, อฏฺฐ ทานานิ วิตฺถาเรน กาตพฺพานิ, อยํ เวมตฺตตา. น จ ททโต [Pg.328] เอกตฺตปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ. ขนฺตี อนวชฺชนฺติ ปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตํ. ราคโทสโมหกฺขยา ส นิพฺพุโตติ โรธวีริยปญฺญตฺติยา ปญฺญตฺตา. अधिष्ठान हार म्हणजे: 'दान' हे एकत्वभावाने प्रज्ञप्त केले आहे. त्याग, परित्याग, धम्मदान, आमिषदान, ही आठ दाने विस्ताराने जाणावीत; ही विविधता (वेमत्तता) होय. परंतु दान देणाऱ्याला एकत्वप्रज्ञप्तीने प्रज्ञप्त केलेले नाही. क्षमा ही अनवद्य (दोषरहित) प्रज्ञप्तीने प्रज्ञप्त केली आहे. 'राग, द्वेष आणि मोहाच्या क्षयाने जो शांत होतो' हे वीर्याने क्लेशांचा निरोध करण्याच्या प्रज्ञप्तीने प्रज्ञप्त केले आहे. ปริกฺขาโรติ ทานสฺส ปาโมชฺชํ ปจฺจโย, อโลโภ เหตุ. สํยมโต โยนิโส มนสิกาโร เหตุ, ปริจฺจาโค ปจฺจโย. กุสโล จ ชหาติ ปาปกนฺติ ยถาภูตทสฺสนํ ปจฺจโย, ญาณปฺปฏิลาโภ เหตุ. ราคโทสโมหกฺขยา ส นิพฺพุโตติ ปรโต จ โฆโส อชฺฌตฺตญฺจ โยนิโส มนสิกาโร มคฺโค จ เหตุ จ ปจฺจโย จ. परिकार हार म्हणजे: दानाचा प्रत्यय प्रमोद आहे, अलोभ हा हेतू आहे. संयम राखणाऱ्याचा योनिशो मनसिकार हा हेतू आहे, परित्याग हा प्रत्यय आहे. 'कुशल धर्माने पाप त्यागले जाते' यामध्ये यथाभूतदर्शन हा प्रत्यय आहे, ज्ञानप्राप्ती हा हेतू आहे. 'राग, द्वेष आणि मोहाच्या क्षयाने जो शांत होतो' यामध्ये परतोघोष (दुसऱ्याकडून ऐकलेला उपदेश), अध्यात्मिक योनिशो मनसिकार आणि मार्ग हे हेतू आणि प्रत्यय दोन्ही आहेत. สมาโรปโนติ ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒตีติ คาถา ตสฺส สีลมฺปิ วฑฺฒติ. สํยโมปิ วฑฺฒติ. สํยมโต เวรํ น จียตีติ. อญฺเญปิ กิเลสา น จียนฺติ เยปิสฺส ตปฺปจฺจยา อุปฺปชฺเชยฺยุํ อาสวา วิฆาตา, เตปิสฺส น อุปฺปชฺชนฺติ. ราคโทสโมหกฺขยา ส นิพฺพุโตติ ราคโทสสฺสาปิ ขยา ราคานุสยสฺสปิ ขยา โทสสฺส โมหสฺสาปิ ส นิพฺพุโตติ โสปาทิเสสา นิพฺพานธาตุ อนุปาทิเสสาปิ. อยํ สมาโรปโน. समारोपन हार म्हणजे: 'दान देणाऱ्याचे पुण्य वाढते' ही गाथा आहे; त्याचे शीलही वाढते, संयमही वाढतो. 'संयम राखणाऱ्याचे वैर साचत नाही' असे जाणावे. इतर क्लेशही साचत नाहीत; आणि त्या क्लेशांच्या प्रत्ययाने जे आसव व विघात (त्रास) उत्पन्न होऊ शकले असते, तेही त्याला उत्पन्न होत नाहीत. 'राग, द्वेष आणि मोहाच्या क्षयाने जो शांत होतो' म्हणजे राग-द्वेषाच्या क्षयामुळे, रागाच्या अनुशायाच्या क्षयामुळे, तसेच द्वेष आणि मोहाच्या क्षयामुळे तो शांत होतो. ही सोपादिशेष निर्वाणधातू आणि अनुपपादिशेष निर्वाणधातू देखील होते. हा समारोपन हार होय. เถรสฺส มหากจฺจายนสฺส เปฏโกปเทเส स्थवीर महाकात्यायनांच्या पेटकोपदेशामध्ये... หารสฺส สมฺปาตภูมิ สมตฺตา. हारांची संपातभूमी समाप्त झाली. ๘. สุตฺตเวภงฺคิยํ ८. सुत्तविभंग. ๑๑๘. ปุพฺพา โกฏิ น ปญฺญายติ อวิชฺชาย จ ภวตณฺหาย จ. ตตฺถ อวิชฺชานีวรณานํ ตณฺหาสํโยชนานํ สตฺตานํ ปุพฺพโกฏิ น ปญฺญายติ. ตตฺถ เย สตฺตา ตณฺหาสํโยชนา, เต อชฺโฌสานพหุลา มนฺทวิปสฺสกา. เย ปน อุสฺสนฺนทิฏฺฐิกา สตฺตา, เต วิปสฺสนาพหุลา มนฺทชฺโฌสานา. ११८. अविद्या आणि भवतृष्णेची पूर्व कोटी (सुरुवात) समजत नाही. त्यामध्ये, अविद्येचे आवरण असलेल्या आणि तृष्णेचे संयोजन असलेल्या प्राण्यांची पूर्व कोटी समजत नाही. त्यामध्ये जे प्राणी तृष्णा-संयोजनयुक्त आहेत, ते अध्यवसानबहुल (विषयांमध्ये अत्यंत आसक्त) आणि मंदविपश्यना असणारे असतात. परंतु जे प्राणी प्रबळ दृष्टी असणारे असतात, ते विपश्यनाबहुल आणि मंदअध्यवसान असणारे असतात. ตตฺถ ตณฺหาจริตา สตฺตา สตฺตสญฺญาภินิวิฏฺฐา อนุปฺปาทวยทสฺสิโน. เต ปญฺจสุ ขนฺเธสุ อตฺตานํ สมนุปสฺสนฺติ ‘‘รูปวนฺตํ วา อตฺตานํ, อตฺตนิ วา รูปํ, รูปสฺมึ วา อตฺตาน’’นฺติ. เอวํ ปญฺจกฺขนฺธา. อญฺเญหิ ขนฺเธหิ อตฺตานํ สมนุปสฺสนฺติ ตสฺส อุสฺสนฺนทิฏฺฐิกา สตฺตา วิปสฺสมานา ขนฺเธ อุชุํ อตฺตโต สมนุปสฺสนฺติ. เต รูปํ อตฺตโก สมนุปสฺสนฺติ. ยํ รูปํ, โส อตฺตา. โย อหํ, ตํ รูปํ. โส รูปวินาสํ ปสฺสติ, อยํ อุจฺเฉทวาที[Pg.329]. อิติ ปญฺจนฺนํ ขนฺธานํ ปฐมาภินิปาตา สกฺกายทิฏฺฐิโย ปญฺจ อุจฺเฉทํ ภชนฺติ ‘‘ตํ ชีวํ ตํ สรีร’’นฺติ. เอกเมกมฺหิ ขนฺเธ ตีหิ ปเทหิ ปจฺฉิมเกหิ สสฺสตํ ภชติ ‘‘อญฺญํ ชีวํ อญฺญํ สรีร’’นฺติ. อิโต พหิทฺธาเต ปพฺพชิตา ตณฺหาจริตา กามสุขลฺลิกานุโยคมนุยุตฺตา วิหรนฺติ. เตน เย จ นิสฺสนฺเทน ทิฏฺฐิจริตา อตฺตกิลมถานุโยคมนุยุตฺตา วิหรนฺติ. เตน เยว ทิฏฺฐิสุเขน เอตฺตาวตา พาหิรโก ปโยโค. त्यामध्ये तृष्णाचरित प्राणी 'प्राणी' अशा संज्ञेमध्ये अभिनिविष्ट असतात आणि उत्पाद व व्यय न पाहणारे असतात. ते पाच स्कंधांमध्ये आत्म्याला पाहतात—'आत्मा रूपवान आहे, किंवा आत्म्यामध्ये रूप आहे, किंवा रूपामध्ये आत्मा आहे' असे. याप्रमाणे पाचही स्कंधांच्या बाबतीत इतर स्कंधांद्वारे आत्म्याला पाहतात. त्या प्रबळ दृष्टी असणाऱ्या प्राण्यांना पाहताना, ते स्कंधांना थेट आत्मा म्हणून पाहतात. ते रूपाला आत्मा म्हणून पाहतात—'जे रूप आहे, तोच आत्मा आहे; जो मी आहे, तेच रूप आहे.' तो रूपाचा विनाश पाहतो, हा उच्छेदवादी होय. अशा प्रकारे पाच स्कंधांच्या पहिल्या अभिनिपाताने पाच सत्कायदृष्टी उच्छेदाचा आश्रय घेतात की, 'तोच जीव आणि तेच शरीर आहे.' प्रत्येक स्कंधामध्ये मागील तीन पदांनी ते शाश्वतवादाचा आश्रय घेतात की, 'जीव वेगळा आणि शरीर वेगळे आहे.' या शासनाबाहेर प्रव्रजित झालेले तृष्णाचरित लोक कामसुखल्लिकानुयोगात मग्न होऊन राहतात. आणि त्याच्याच परिणामाने जे दृष्टीचरित लोक आहेत, ते आत्मक्लेशानुयोगात मग्न होऊन राहतात. त्याच दृष्टीसुखाने एवढाच बाह्य प्रयत्न होतो. ตตฺถ ทิฏฺฐิจริตา สตฺตา เย อริยธมฺมวินยํ โอตรนฺติ, เต ธมฺมานุสาริโน โหนฺติ. เย ตณฺหาจริตา สตฺตา อริยํ ธมฺมวินยํ โอตรนฺติ, เต สทฺธานุสาริโน โหนฺติ. त्यामध्ये जे दृष्टीचरित प्राणी आर्य धम्म-विनयात प्रवेश करतात, ते धम्मानुसारी होतात. जे तृष्णाचरित प्राणी आर्य धम्म-विनयात प्रवेश करतात, ते सद्धानुसारी होतात. ตตฺถ เย ทิฏฺฐิจริตา สตฺตา, เต กาเมสุ โทสทิฏฺฐี, น จ เย กาเมสุ อนุสยา สมูหตา, เต อตฺตกิลมถานุโยคมนุยุตฺตา วิหรนฺติ. เตสํ สตฺถา ธมฺมํ เทเสติ. อญฺโญ วา สาวโก กาเมหิ นตฺถิ อตฺโถติ เต จ ปุพฺเพเยว กาเมหิ อนตฺถิกา อิติ กาเม อปฺปกสิเรน ปฏินิสฺสชฺชนฺติ. เต เจตสิเกน ทุกฺเขน อนชฺโฌสิตา. เตน วุจฺจติ ‘‘สุขา ปฏิปทา’’ติ. เย ปน ตณฺหาจริตา สตฺตา, เต กาเมสุ อชฺโฌสิตา, เตสํ สตฺถา วา ธมฺมํ เทเสติ. อญฺญตโร วา ภิกฺขุ กาเมหิ นตฺถิ อตฺโถติ, เต ปิยรูปํ ทุกฺเขน ปฏินิสฺสชฺชนฺติ. เตน วุจฺจติ ‘‘ทุกฺขา ปฏิปทา’’ติ. อิติ อิเม สพฺพสตฺตา ทฺวีสุ ปฏิปทาสุ สโมสรณํ คจฺฉนฺติ ทุกฺขายญฺจ สุขายญฺจ. त्यामध्ये जे दृष्टीचरित प्राणी आहेत, ते कामभोगांमध्ये दोष पाहणारे असतात; परंतु कामभोगांमधील अनुशय पूर्णपणे नष्ट झालेले नसतात, म्हणून ते आत्मक्लेशानुयोगात मग्न होऊन राहतात. त्यांना शास्ता (भगवान बुद्ध) किंवा इतर श्रावक 'कामभोगांमध्ये काही हित नाही' असा धम्म उपदेशितात. ते पूर्वीच कामभोगांमध्ये अनर्थ पाहत असल्याने, कामभोगांचा विनासायास (सहजपणे) त्याग करतात. ते मानसिक दुःखाने आसक्त होत नाहीत, म्हणून त्याला 'सुखा प्रतिपदा' (सुकर मार्ग) म्हटले जाते. परंतु जे तृष्णाचरित प्राणी आहेत, ते कामभोगांमध्ये आसक्त असतात. त्यांना शास्ता किंवा एखादा भिक्खू 'कामभोगांमध्ये काही हित नाही' असा धम्म उपदेशितात, तेव्हा ते प्रिय रूपाचा दुःखाने (कष्टाने) त्याग करतात. म्हणून त्याला 'दुःखा प्रतिपदा' (कठीण मार्ग) म्हटले जाते. अशा प्रकारे हे सर्व प्राणी दुःखा आणि सुखा या दोन प्रतिपदांमध्ये समाविष्ट होतात. ตตฺถ เย ทิฏฺฐิจริตา สตฺตา, เต ทฺวิธา มุทินฺทฺริยา จ ติกฺขินฺทฺริยา จ. ตตฺถ เย ทิฏฺฐิจริตา สตฺตา ติกฺขินฺทฺริยา สุเขน ปฏินิสฺสชฺชนฺติ, ขิปฺปญฺจ อภิสเมนฺติ, เตน วุจฺจติ ‘‘ขิปฺปาภิญฺญา สุขา ปฏิปทา’’ติ. ตตฺถ เย ทิฏฺฐิจริตา สตฺตา มุทินฺทฺริยา ปฐมํ ติกฺขินฺทฺริยํ อุปาทาย ทนฺธตรํ อภิสเมนฺติ, เต สุเขน ปฏินิสฺสชฺชนฺติ, ทนฺธญฺจ อภิสเมนฺติ. เตน วุจฺจติ ‘‘สุขา ปฏิปทา ทนฺธาภิญฺญา’’ติ. ตตฺถ ตณฺหาจริตา สตฺตา ทฺวิธา ติกฺขินฺทฺริยา จ มุทินฺทฺริยา จ. ตตฺถ เย ตณฺหาจริตา สตฺตา ติกฺขินฺทฺริยา ทุกฺเขน ปฏินิสฺสชฺชนฺติ, ขิปฺปญฺจ อภิสเมนฺติ. เตน วุจฺจติ ‘‘ทุกฺขา ปฏิปทา ขิปฺปาภิญฺญา’’ติ. ตตฺถ เย ตณฺหาจริตา สตฺตา มุทินฺทฺริยา ปฐมํ ติกฺขินฺทฺริยํ อุปาทาย ทนฺธตรํ อภิสเมนฺติ, เต ทุกฺเขน ปฏินิสฺสชฺชนฺติ, ทนฺธญฺจ อภิสเมนฺติ. เตน วุจฺจติ ‘‘ทุกฺขา ปฏิปทา ทนฺธาภิญฺญา’’ติ. อิมา จตสฺโส ปฏิปทาโย อปญฺจมา อฉฏฺฐา. เย หิ เกจิ นิพฺพุตา นิพฺพายิสฺสนฺติ [Pg.330] วา อิมาหิ จตูหิ ปฏิปทาหิ อนญฺญาหิ อยํ ปฏิปทาจตุกฺเกน กิเลเส นิทฺทิสติ. ยา จตุกฺกมคฺเคน อริยธมฺเมสุ นิทฺทิสิตพฺพา, อยํ วุจฺจติ สีหวิกฺกีฬิโต นาม นโย. त्यामध्ये जे दृष्टीचरित प्राणी आहेत, ते दोन प्रकारचे असतात: मृदू-इंद्रिय आणि तीक्ष्ण-इंद्रिय. त्यामध्ये जे दृष्टीचरित तीक्ष्ण-इंद्रिय प्राणी आहेत, ते सहजपणे त्याग करतात आणि वेगाने ज्ञान प्राप्त करतात; म्हणून त्याला 'सुखा प्रतिपदा क्षिप्रामिज्ञा' म्हटले जाते. त्यामध्ये जे दृष्टीचरित मृदू-इंद्रिय प्राणी आहेत, ते प्रथम तीक्ष्ण इंद्रियाचा आश्रय घेऊन हळूहळू ज्ञान प्राप्त करतात; ते सहजपणे त्याग करतात आणि हळूहळू ज्ञान प्राप्त करतात; म्हणून त्याला 'सुखा प्रतिपदा दंधाभिज्ञा' म्हटले जाते. त्यामध्ये तृष्णाचरित प्राणी देखील दोन प्रकारचे असतात: तीक्ष्ण-इंद्रिय आणि मृदू-इंद्रिय. त्यामध्ये जे तृष्णाचरित तीक्ष्ण-इंद्रिय प्राणी आहेत, ते कष्टाने त्याग करतात आणि वेगाने ज्ञान प्राप्त करतात; म्हणून त्याला 'दुःखा प्रतिपदा क्षिप्रामिज्ञा' म्हटले जाते. त्यामध्ये जे तृष्णाचरित मृदू-इंद्रिय प्राणी आहेत, ते प्रथम तीक्ष्ण इंद्रियाचा आश्रय घेऊन हळूहळू ज्ञान प्राप्त करतात; ते कष्टाने त्याग करतात आणि हळूहळू ज्ञान प्राप्त करतात; म्हणून त्याला 'दुःखा प्रतिपदा दंधाभिज्ञा' म्हटले जाते. या चारच प्रतिपदा आहेत, पाचवी किंवा सहावी नाही. जे कोणी शांत झाले आहेत किंवा शांत होतील, ते या चारच प्रतिपदांद्वारे होतील, इतर कोणत्याही मार्गाने नाही. हा प्रतिपदा-चतुष्काद्वारे क्लेशांचा निर्देश करतो. जो चतुष्कमार्गाने आर्य धम्मांमध्ये निर्देशित केला पाहिजे, याला 'सीहविक्किळित' नावाचा नय (पद्धत) म्हटले जाते. ๑๑๙. ตตฺริเม จตฺตาโร อาหารา. จตฺตาโร วิปลฺลาสา อุปาทานา โยคา คนฺถา อาสวา โอฆา สลฺลา วิญฺญาณฏฺฐิติโย อคติคมนาติ, เอวํ อิมานิ สพฺพานิ ทส ปทานิ. อยํ สุตฺตสฺส สํสนฺทนา. ११९. त्यामध्ये हे चार आहार आहेत. चार विपर्यास, उपादान, योग, ग्रंथ, आसव, ओघ, शल्य, विज्ञाणस्थिती आणि अगतिगमन; याप्रमाणे हे सर्व दहा पदे आहेत. ही सुत्ताची संसंदना (मेळ) होय. จตฺตาโร อาหารา. ตตฺถ โย จ กพฬีกาโร อาหาโร โย จ ผสฺโส อาหาโร, อิเม ตณฺหาจริเตน ปหาตพฺพา. ตตฺถ โย จ มโนสญฺเจตนาหาโร โย จ วิญฺญาณาหาโร, อิเม ทิฏฺฐิจริเตน ปหาตพฺพา. चार आहार आहेत. त्यांपैकी जो कवळिकार आहार आणि जो स्पर्श आहार आहे, हे दोन्ही तृष्णाचरित (तृष्णाप्रधान स्वभाव असलेल्या) व्यक्तीने प्रहाण करावेत (त्याग करावेत). त्यांपैकी जो मनोसंचेतना आहार आणि जो विज्ञान आहार आहे, हे दोन्ही दृष्टीचरित (दृष्टीप्रधान स्वभाव असलेल्या) व्यक्तीने प्रहाण करावेत. ปฐโม อาหาโร ปฐโม วิปลฺลาโส, ทุติโย อาหาโร ทุติโย วิปลฺลาโส, ตติโย อาหาโร ตติโย วิปลฺลาโส, จตุตฺโถ อาหาโร จตุตฺโถ วิปลฺลาโส. อิเม จตฺตาโร วิปลฺลาสา อปญฺจมา อฉฏฺฐา. อิทญฺจ ปมาณา จตฺตาโร อาหารา. पहिला आहार हा पहिला विपरितभाव (विपल्लास) आहे, दुसरा आहार हा दुसरा विपरितभाव आहे, तिसरा आहार हा तिसरा विपरितभाव आहे, आणि चौथा आहार हा चौथा विपरितभाव आहे. हे चार विपरितभाव आहेत, पाचवा किंवा सहावा नाही. आणि हेच चार आहारांचे प्रमाण (मर्यादा) आहे. ตตฺถ ปฐเม วิปลฺลาเส ฐิโต กาเม อุปาทิยติ, อิทํ กามุปาทานํ. ทุติเย วิปลฺลาเส ฐิโต อนาคตํ ภวํ อุปาทิยติ, อิทํ สีลพฺพตุปาทานํ. ตติเย วิปลฺลาเส ฐิโต วิปรีโต ทิฏฺฐึ อุปาทิยติ, อิทํ ทิฏฺฐุปาทานํ. จตุตฺเถ วิปลฺลาเส ฐิโต ขนฺเธ อตฺตโต อุปาทิยติ, อิทํ อตฺตวาทุปาทานํ. त्यात, पहिल्या विपरितभावात स्थित असलेला कामांचे (इंद्रियभोगांचे) उपादान करतो (त्यांच्यात आसक्त होतो), याला 'कामोपादान' (कामुपादान) म्हणतात. दुसऱ्या विपरितभावात स्थित असलेला अनागत (भविष्यातील) भवाचे उपादान करतो, याला 'शीलव्रत-उपादान' (सीलब्बतउपादान) म्हणतात. तिसऱ्या विपरितभावात स्थित असलेला विपरित दृष्टीचे उपादान करतो, याला 'दृष्टी-उपादान' (दिट्ठुपादान) म्हणतात. चौथ्या विपरितभावात स्थित असलेला स्कंधांना 'आत्मा' मानून उपादान करतो, याला 'आत्मवाद-उपादान' (अत्तवादुपादान) म्हणतात. ตตฺถ กามุปาทาเน ฐิโต กาเม อภิชฺฌายติ คนฺถติ, อยํ อภิชฺฌากายคนฺโถ. สีลพฺพตุปาทาเน ฐิโต พฺยาปาทํ คนฺถติ, อยํ พฺยาปาทกายคนฺโถ. ทิฏฺฐุปาทาเน ฐิโต ปรามาสํ คนฺถติ, อยํ ปรามาสกายคนฺโถ. อตฺตวาทุปาทาเน ฐิโต ปปญฺจนฺโต คนฺถติ, อยํ อิทํสจฺจาภินิเวโส กายคนฺโถ. त्यात, कामोपादानात स्थित असलेला कामांचे (इंद्रियभोगांचे) अभिध्यान (अभिलाषा) करतो आणि स्वतःला बांधून घेतो, हा 'अभिध्यान-कायग्रंथ' (अभिज्झाकायगंथ) होय. शीलव्रत-उपादानात स्थित असलेला व्यापादाला (द्वेषाला) बांधून घेतो, हा 'व्यापाद-कायग्रंथ' (ब्यापादकायगंथ) होय. दृष्टी-उपादानात स्थित असलेला परामर्शाला (चुकीच्या धारणेला) बांधून घेतो, हा 'परामर्श-कायग्रंथ' (परामासकायगंथ) होय. आत्मवाद-उपादानात स्थित असलेला प्रपंच (विस्तार) करत स्वतःला बांधून घेतो, हा 'इदंसच्चाभिनिवेश-कायग्रंथ' (हाच एकमेव सत्य आहे असा अभिनिवेश असणारा कायग्रंथ) होय. ตสฺส คนฺถิตา กิเลสา อาสวนฺติ. กิญฺจิ ปน วุจฺจติ วิปฺปฏิสาโร. เย วิปฺปฏิสารา เต อนุสยา. ตตฺถ อภิชฺฌากายคนฺเถน กามาสโว, พฺยาปาทกายคนฺเถน ภวาสโว, ปรามาสกายคนฺเถน ทิฏฺฐาสโว, อิทํ สจฺจาภินิเวสกายคนฺเถน อวิชฺชาสโว. त्या ग्रंथांमुळे (बंधनांमुळे) त्याचे क्लेश पाझरतात (आसवतात). काही प्रमाणात याला विप्रतिसार (पश्चात्ताप/खंत) असेही म्हणतात. जे विप्रतिसार आहेत, ते अनुशय (सुप्त क्लेश) आहेत. त्यात, अभिध्यान-कायग्रंथाने कामासव होतो, व्यापाद-कायग्रंथाने भवासव होतो, परामर्श-कायग्रंथाने दृष्टीआसव होतो, आणि इदंसच्चाभिनिवेश-कायग्रंथाने अविद्यासव होतो. เต [Pg.331] จตฺตาโร อาสวา เวปุลฺลภาวํ คตา โอฆา โหนฺติ, เตน วุจฺจนฺติ ‘‘โอฆา’’ติ. ตตฺถ กามาสโว กาโมโฆ, ภวาสโว ภโวโฆ, อวิชฺชาสโว อวิชฺโชโฆ, ทิฏฺฐาสโว ทิฏฺโฐโฆ. ते चार आसव जेव्हा विपुलतेला (पूर्णत्वाला) प्राप्त होतात, तेव्हा ते 'ओघ' (पूर/प्रवाह) बनतात; म्हणूनच त्यांना 'ओघ' असे म्हटले जाते. त्यांत, कामासव हा कामौघ आहे, भवासव हा भवौघ आहे, अविद्यासव हा अविद्याौघ आहे, आणि दृष्टीआसव हा दृष्टीौघ आहे. เต จตฺตาโร โอฆา อาสยมนุปวิฏฺฐา อนุสยสหคตา วุจฺจนฺติ. สลฺลาติ หทยมาหจฺจ ติฏฺฐนฺตา. ตตฺถ กาโมโฆ ราคสลฺลํ, ภโวโฆ โทสสลฺลํ, อวิชฺโชโฆ โมหสลฺลํ, ทิฏฺโฐโฆ ทิฏฺฐิสลฺลํ. ते चार ओघ आशयात (चित्ताच्या सुप्त भागात) प्रवेश करून अनुशायांसह राहतात, म्हणून त्यांना 'अनुशयसहगत' म्हटले जाते. 'शल्य' (बाण/काटा) म्हणजे जे हृदयाला भेदून तिथेच राहतात. त्यांत, कामौघ हे 'रागशल्य' (आसक्तीचा काटा) आहे, भवौघ हे 'द्वेषशल्य' (द्वेषाचा काटा) आहे, अविद्याौघ हे 'मोहशल्य' (मोहाचा काटा) आहे, आणि दृष्टीौघ हे 'दृष्टीशल्य' (चुकीच्या मताचा काटा) आहे. อิเมหิ จตูหิ สลฺเลหิ ปริยาทินฺนํ วิญฺญาณํ จตูสุ ธมฺเมสุ ติฏฺฐติ รูเป เวทนาย สญฺญาย สงฺขาเรสุ. อิมา จตสฺโส วิญฺญาณฏฺฐิติโย. ตตฺถ ราคสลฺเลน นนฺทูปเสจนํ รูปูปคํ วิญฺญาณํ ติฏฺฐติ. โทสสลฺเลน เวทนูปคํ โมหสลฺเลน สญฺญูปคํ ทิฏฺฐิสลฺเลน นนฺทูปเสจนํ สงฺขารูปคํ วิญฺญาณํ ติฏฺฐติ. या चार शल्यांनी ग्रासलेले विज्ञान चार धर्मांमध्ये (स्कंधांमध्ये) स्थित होते—रूप, वेदना, संज्ञा आणि संस्कार यांमध्ये. या चार 'विज्ञानस्थिती' (विञ्ञाणट्ठिती) आहेत. त्यांत, रागशल्यामुळे नंदीने (आनंदाने) सिंचित झालेले आणि रूपाप्रत गेलेले विज्ञान स्थित होते. द्वेषशल्यामुळे वेदनेप्रत गेलेले, मोहशल्यामुळे संज्ञेप्रत गेलेले, आणि दृष्टीशल्यामुळे नंदीने सिंचित झालेले व संस्काराप्रत गेलेले विज्ञान स्थित होते. จตูหิ วิญฺญาณฏฺฐิตีหิ จตุพฺพิธํ อคตึ คจฺฉนฺติ ฉนฺทา โทสา ภยา โมหา. ราเคน ฉนฺทา อคตึ คจฺฉติ, โทเสน โทสา อคตึ คจฺฉติ, โมเหน โมหา อคตึ คจฺฉติ, ทิฏฺฐิยา ภยา อคตึ คจฺฉติ. อิติ อิทญฺจ กมฺมํ อิเม จ กิเลสา. อยํ สํสารสฺส เหตุ. चार विज्ञानस्थितींमुळे लोक छंद (आसक्ती), द्वेष, भय आणि मोह या scars (चार प्रकारच्या) अगतीला (चुकीच्या मार्गाला) जातात. रागामुळे छंदाने अगतीला जातो, द्वेषामुळे द्वेषाने अगतीला जातो, मोहामुळे मोहाने अगतीला जातो, आणि दृष्टीमुळे भयाने अगतीला जातो. अशा प्रकारे हे कर्म आणि हे क्लेश आहेत. हाच संसाराचा हेतू (कारण) आहे. ๑๒๐. ตตฺถิมา จตสฺโส ทิสา กพฬีการาหาโร ‘‘อสุเภ สุภ’’นฺติ วิปลฺลาโส กามุปาทานํ กามโยโค อภิชฺฌากายคนฺโถ กามาสโว กาโมโฆ ราคสลฺลํ รูปูปคา วิญฺญาณฏฺฐิติ ฉนฺทา อคติคมนํ. อยํ ปฐมา ทิสา. १२०. त्यात या चार दिशा आहेत: कवळिकार आहार, 'अशुभाला शुभ' मानणारा विपरितभाव, कामोपादान, कामयोग, अभिध्यान-कायग्रंथ, कामासव, कामौघ, रागशल्य, रूपाप्रत गेलेली विज्ञानस्थिती, आणि छंदाने अगतीला जाणे. ही पहिली दिशा होय. ผสฺโส อาหาโร ‘‘ทุกฺเข สุข’’นฺติ วิปลฺลาโส สีลพฺพตุปาทานํ ภวโยโคพฺยาปาโท กายคนฺโถ ภวาสโว ภโวโฆ โทสสลฺลํ เวทนูปคา วิญฺญาณฏฺฐิติ โทสา อคติคมนํ, อยํ ทุติยา ทิสา. स्पर्श आहार, 'दुःखाला सुख' मानणारा विपरितभाव, शीलव्रत-उपादान, भवयोग, व्यापाद-कायग्रंथ, भवासव, भवौघ, द्वेषशल्य, वेदनेप्रत गेलेली विज्ञानस्थिती, आणि द्वेषाने अगतीला जाणे. ही दुसरी दिशा होय. มโนสญฺเจตนาหาโร ‘‘อนตฺตนิ อตฺตา’’ติ วิปลฺลาโส ทิฏฺฐุปาทานํ ทิฏฺฐิโยโค ปรามาสกายคนฺโถ ทิฏฺฐาสโว ทิฏฺโฐโฆ ทิฏฺฐิสลฺลํ สญฺญูปคา วิญฺญาณฏฺฐิติ ภยา อคติคมนํ. อยํ ตติยา ทิสา. मनोसंचेतना आहार, 'अनात्म्याला आत्मा' मानणारा विपरितभाव, दृष्टी-उपादान, दृष्टीयोग, परामर्श-कायग्रंथ, दृष्टीआसव, दृष्टीौघ, दृष्टीशल्य, संज्ञेप्रत गेलेली विज्ञानस्थिती, आणि भयाने अगतीला जाणे. ही तिसरी दिशा होय. วิญฺญาณาหาโร ‘‘อนิจฺเจ นิจฺจ’’นฺติ วิปลฺลาโส อตฺตวาทุปาทานํ อวิชฺชาโยโค อิทํสจฺจาภินิเวโส กายคนฺโถ อวิชฺชาสโว อวิชฺโชโฆ โมหสลฺลํ สงฺขารูปคา วิญฺญาณฏฺฐิติ โมหา อคติคมนํ, อยํ [Pg.332] จตุตฺถี ทิสา. อิติ อิเมสํ ทสนฺนํ สุตฺตานํ ปฐเมน ปเทน ปฐมาย ทิสาย อาโลกนํ. อยํ วุจฺจติ ทิสาโลกนา. विज्ञान आहार, 'अनित्याला नित्य' मानणारा विपरितभाव, आत्मवाद-उपादान, अविद्यायोग, इदंसच्चाभिनिवेश-कायग्रंथ, अविद्यासव, अविद्याौघ, mohasalla (मोहशल्य), संस्काराप्रत गेलेली विज्ञानस्थिती, आणि मोहाने अगतीला जाणे. ही चौथी दिशा होय. अशा प्रकारे, या दहा सूत्रांमधील पहिल्या पदाने पहिल्या दिशेचे जे अवलोकन होते, त्याला 'दिशालोकन' (दिसालोकना) असे म्हटले जाते. จตูหิ วิปลฺลาเสหิ อกุสลปกฺเข ทิสาวิโลกนา กิเลสํ สํโยเชตฺวา อยํ อกุสลปกฺเข ทิสาวิโลกนาย ภูมิ ปญฺจนฺนํ ทสนฺนํ สุตฺตานํ ยานิ ปฐมานิ ปทานิ อิเมสํ ธมฺมานํ โก อตฺโถ? เอโก อตฺโถ, พฺยญฺชนเมว นานํ. เอวํ ทุติยา เอวํ ตติยา เอวํ จตุตฺถี. อยํ ปฐมา สํสนฺทนา. चार विपरितभावांद्वारे अकुशल पक्षात क्लेशांना जोडून जी दिशांचे विलोकन (अवलोकन) होते, ती अकुशल पक्षात 'दिशाविलोकन' करण्याची भूमी (स्थान) आहे. पंधरा सूत्रांमध्ये जी पहिली पदे आहेत, त्या धर्मांचा अर्थ काय आहे? अर्थ एकच आहे, केवळ व्यंजन (शब्दरचना) भिन्न आहे. याचप्रमाणे दुसरी, तिसरी आणि चौथी पदे समजावीत. ही पहिली 'संसंदना' (तुलना/मेळ) होय. อิมินา เปยฺยาเลน สพฺเพ กิเลสา จตูสุ ปเทสุ ปกฺขิปิตพฺพา. ตโต กุสลปกฺเข จตสฺโส ปฏิปทา จตฺตาริ ฌานานิ จตฺตาโร สติปฏฺฐานา จตฺตาโร วิหารา ทิพฺโพ พฺรหฺมา อริโย อาเนญฺโช จตฺตาโร สมฺมปฺปธานา จตฺตาโร อจฺฉริยา อพฺภุตธมฺมา จตฺตาโร อธิฏฺฐานา จตฺตาโร สมาธโย ฉนฺทสมาธิ วีริยสมาธิ จิตฺตสมาธิ วีมํสาสมาธิ. จตฺตาโร ธมฺมา สุขภาคิยา นาญฺญตฺร โพชฺฌงฺคา นาญฺญตฺร ตปสา นาญฺญตินฺทฺริยสํวรา นาญฺญตฺร สพฺพนิสฺสคฺคา จตฺตาริ อปฺปมาณานิ. या पेयालाने (संक्षेपाने) सर्व क्लेश चार पदांमध्ये समाविष्ट केले पाहिजेत. त्यानंतर कुशल पक्षात चार प्रतिपदा (मार्ग), चार ध्यान, चार स्मृतिप्रस्थान (सतिपट्ठान), चार विहार—दिव्य, ब्रह्म, आर्य आणि आणेञ्ज (अकंपित), चार सम्यक्प्रधान (सम्मप्पधान), चार आश्चर्यकारक व अद्भुत धर्म, चार अधिष्ठान, चार समाधी—छंदसमाधी, वीर्यसमाधी, चित्तसमाधी आणि विमंसासमाधी (मीमांसासमाधी) कडे नेले पाहिजे. सुखाचे भागीदार असणारे चार धर्म आहेत—बोध्यंगांशिवाय (बोज्झंगांशिवाय) सुख नाही, तपाशिवाय सुख नाही, इंद्रिय संवराशिवाय सुख नाही, आणि सर्व-निसर्गाशिवाय (सर्व आसक्तींच्या त्यागाशिवाय/सब्बनिस्सग्ग) सुख नाही; आणि चार अप्रमाण (अप्पमाण) आहेत. ตตฺถ ทุกฺขา ปฏิปทา ทนฺธาภิญฺญา ภาวิยมานา พหุลีกริยมานา ปฐมํ ฌานํ ปริปูเรติ, ปฐมํ ฌานํ ปริปุณฺณํ ปฐมํ สติปฏฺฐานํ ปริปูเรติ, ปฐมํ สติปฏฺฐานํ ปริปุณฺณํ ปฐมํ วิหารํ ปริปูเรติ, ปฐโม วิหาโร ปริปุณฺโณ ปฐมํ สมฺมปฺปธานํ ปริปูเรติ, ปฐมํ สมฺมปฺปธานํ ปริปุณฺณํ ปฐมํ อจฺฉริยํ อพฺภุตธมฺมํ ปริปูเรติ, ปฐโม อจฺฉริโย อพฺภุโต ธมฺโม ปริปุณฺโณ ปฐมํ อธิฏฺฐานํ ปริปูเรติ, ปฐมํ อธิฏฺฐานํ ปริปุณฺณํ ฉนฺทสมาธึ ปริปูเรติ, ฉนฺทสมาธิ ปริปุณฺโณ อินฺทฺริยสํวรํ ปริปูเรติ, อินฺทฺริยสํวโร ปริปุณฺโณ ปฐมํ เมตฺตาอปฺปมาณํ ปริปูเรติ. เอวํ ยาว สพฺพนิสฺสคฺโค จตุตฺถํ อปฺปมาณํ ปริปูเรติ. त्यात, 'दुःखा प्रतिपदा दंधाभिज्ञा' (कष्टकर सराव आणि संथ ज्ञान) हिची भावना केली असता, वारंवार सराव केला असता, ती पहिल्या ध्यानाला परिपूर्ण करते. पहिले ध्यान परिपूर्ण झाले असता, ते पहिल्या स्मृतिप्रस्थानाला परिपूर्ण करते. पहिले स्मृतिप्रस्थान परिपूर्ण झाले असता, ते पहिल्या विहाराला परिपूर्ण करते. पहिला विहार परिपूर्ण झाला असता, तो पहिल्या सम्यक्प्रधानाला परिपूर्ण करतो. पहिले सम्यक्प्रधान परिपूर्ण झाले असता, ते पहिल्या आश्चर्यकारक व अद्भुत धर्माला परिपूर्ण करते. पहिला आश्चर्यकारक व अद्भुत धर्म परिपूर्ण झाला असता, तो पहिल्या अधिष्ठानाला परिपूर्ण करतो. पहिले अधिष्ठान परिपूर्ण झाले असता, ते छंदसमाधीला परिपूर्ण करते. छंदसमाधी परिपूर्ण झाली असता, ती इंद्रिय संवराला परिपूर्ण करते. इंद्रिय संवर परिपूर्ण झाला असता, तो पहिल्या मैत्री-अप्रमाणाला (मेत्ता-अप्पमाण) परिपूर्ण करतो. याचप्रमाणे, सर्व-निसर्गापर्यंत (सर्व आसक्तींच्या त्यागापर्यंत) चौथे अप्रमाण परिपूर्ण होते. ตตฺถ ปฐมา จ ปฏิปทา ปฐมญฺจ ฌานํ ปฐมญฺจ สติปฏฺฐานํ ปฐโม จ วิหาโร ปฐมญฺจ สมฺมปฺปธานํ ปฐโม จ อจฺฉริโย อพฺภุโต ธมฺโม สจฺจาธิฏฺฐานญฺจ ฉนฺทสมาธิ จ อินฺทฺริยสํวโร จ เมตฺตา จ อปฺปมาณํ. อยํ ปฐมา ทิสา. तेथे पहिली प्रतिपदा, पहिले ध्यान, पहिले सतिपट्ठान, पहिला विहार, पहिले सम्मप्पधान, पहिला अच्छरिय-अब्भुत धम्म, सच्चअधिट्ठान, छंदसमाधी, इंद्रियसंवर आणि मेत्ता अप्पमाण हे आहेत. ही पहिली दिशा होय. ทุกฺขา จ ปฏิปทา ขิปฺปาภิญฺญา ทุติยํ ฌานํ ทุติยญฺจ สติปฏฺฐานํ ทุติโย จ วิหาโร ทุติยญฺจ สมฺมปฺปธานํ ทุติโย จ อจฺฉริโย อพฺภุโต [Pg.333] ธมฺโม จาคาธิฏฺฐานํ จิตฺตสมาธิ จตฺตาโร อิทฺธิปาทา กรุณา จ อปฺปมาณํ, อยํ ทุติยา ทิสา. दुःख प्रतिपदा क्षिप्राभिज्ञा, दुसरे ध्यान, दुसरे सतिपट्ठान, दुसरा विहार, दुसरे सम्मप्पधान, दुसरा अच्छरिय-अब्भुत धम्म, चागाधिट्ठान, चित्तसमाधी, चार इद्धिपाद आणि करुणा अप्पमाण हे आहेत. ही दुसरी दिशा होय. สุขา จ ปฏิปทา ทนฺธาภิญฺญา ตติยญฺจ ฌานํ ตติยญฺจ สติปฏฺฐานํ ตติโย จ วิหาโร ตติยญฺจ สมฺมปฺปธานํ ตติโย จ อจฺฉริโย อพฺภุโต ธมฺโม ปญฺญาธิฏฺฐานญฺจ วีริยสมาธิ จ โพชฺฌงฺคา จ มุทิตา จ อปฺปมาณํ. อยํ ตติยา ทิสา. सुख प्रतिपदा दंधाभिज्ञा, तिसरे ध्यान, तिसरे सतिपट्ठान, तिसरा विहार, तिसरे सम्मप्पधान, तिसरा अच्छरिय-अब्भुत धम्म, पञ्ञाधिट्ठान, वीरियसमाधी, बोज्झंग आणि मुदिता अप्पमाण हे आहेत. ही तिसरी दिशा होय. สุขา จ ปฏิปทา ขิปฺปาภิญฺญา จตุตฺถํ ฌานํ จตุตฺถญฺจ สติปฏฺฐานํ จตุตฺโถ จ วิหาโร จตุตฺถญฺจ สมฺมปฺปธานํ จตุตฺโถ จ อจฺฉริโย อพฺภุโต ธมฺโม อุปสมาธิฏฺฐานญฺจ วีมํสาสมาธิ จ สพฺพนิสฺสคฺโค จ อุเปกฺขา อปฺปมาณญฺจ. อยํ จตุตฺถี ทิสา. อิมาสํ จตสฺสนฺนํ ทิสานํ อาโลกนา. อยํ วุจฺจติ ทิสาโลกโน นาม นโย. सुख प्रतिपदा क्षिप्राभिज्ञा, चौथे ध्यान, चौथे सतिपट्ठान, चौथा विहार, चौथे सम्मप्पधान, चौथा अच्छरिय-अब्भुत धम्म, उपसमाधिट्ठान, वीमंसासमाधी, सब्बनिस्सग्ग आणि उपेक्खा अप्पमाण हे आहेत. ही चौथी दिशा होय. या चार दिशांचे जे अवलोकन आहे, त्याला 'दिसालोकन' नावाचा नय असे म्हटले जाते. ตตฺถายํ โยชนา. จตฺตาโร จ อาหารา จตสฺโส จ ปฏิปทา, จตฺตาโร จ วิปลฺลาสา จตฺตาโร จ สติปฏฺฐานา, จตฺตาริ จ อุปาทานานิ จตฺตาริ จ ฌานานิ จตฺตาโร จ โยคา วิหารา จ, คนฺถา จ สมฺมปฺปธานา จ, อาสวา จ อจฺฉริยา อพฺภุตธมฺมา จ, โอฆา จ อธิฏฺฐานานิ จ, สลฺลา จ สมาธโย, วิญฺญาณฏฺฐิติโย จตฺตาโร จ สุขภาคิยา ธมฺมา, จตฺตาริ จ อคติคมนานิ จตฺตาริ จ อปฺปมาณานิ อิติ กุสลากุสลานํ ปฏิปกฺขวเสน โยชนา, อยํ วุจฺจติ ทิสาโลกโน นโย. तेथे ही योजना आहे: चार आहार आणि चार प्रतिपदा, चार विपल्लास आणि चार सतिपट्ठान, चार उपादान आणि चार ध्यान, चार योग आणि विहार, गंथ आणि सम्मप्पधान, आसव आणि अच्छरिय-अब्भुत धम्म, ओघ आणि अधिट्ठान, सल्ल आणि समाधी, विञ्ञाणट्ठिती आणि चार सुखभागीय धम्म, चार अगतिगमन आणि चार अप्पमाण - अशा प्रकारे कुशल आणि अकुशल धर्मांची त्यांच्या परस्परविरोधी भावाने केलेली जुळणी म्हणजे 'दिसालोकन नय' म्हटले जाते. ตสฺส จตฺตาริ สามญฺญผลานิ ปริโยสานํ, โย จ ธมฺโม กุสลากุสลนิทฺเทเส ปฐโม ทิสานิทฺเทโส, อิมสฺส โสตาปตฺติผลํ ปริโยสานํ ทุติยํ สกทาคามิผลํ, ตติยํ อนาคามิผลํ, จตุตฺถํ อรหตฺตผลํ. या पद्धतीचा शेवट चार सामञ्ञफल हा आहे. कुशल आणि अकुशल धर्मांच्या निर्देशामध्ये जो पहिला दिशा-निर्देश आहे, त्याचा शेवट सोतापत्तिफल हा आहे; दुसऱ्याचा सकदागामिफल, तिसऱ्याचा अनागामिफल आणि चौथ्याचा अरहत्तफल हा शेवट आहे. ตตฺถ กตโม ติปุกฺขโล นโย? เย จ ทุกฺขาย ปฏิปทาย ทนฺธาภิญฺญาย ขิปฺปาภิญฺญาย จ นิยฺยนฺติ ทฺเว ปุคฺคลา, เย จ สุขาย ปฏิปทาย ทนฺธาภิญฺญาย ขิปฺปาภิญฺญาย จ นิยฺยนฺติ ทฺเว ปุคฺคลา. तेथे 'तिपुक्खल नय' कोणता आहे? जे दुःख प्रतिपदेने, दंधाभिज्ञेने आणि क्षिप्राभिज्ञेने मुक्त होतात, ते दोन पुद्गल; आणि जे सुख प्रतिपदेने, दंधाभिज्ञेने आणि क्षिप्राभिज्ञेने मुक्त होतात, ते दोन पुद्गल. อิเมสํ จตุนฺนํ ปุคฺคลานํ โย ปุคฺคโล สุขาย ปฏิปทาย ทนฺธาภิญฺญาย นิยฺยาติ, โย จ ปุคฺคโล ทุกฺขาย ปฏิปทาย ขิปฺปาภิญฺญาย นิยฺยาติ. อิเม ทฺเว ปุคฺคลา ภวนฺติ. ตตฺถ โย สุขาย ปฏิปทาย ขิปฺปาภิญฺญาย นิยฺยาติ[Pg.334], อยํ อุคฺฆฏิตญฺญู. โย ปจฺฉิโม ปุคฺคโล สาธารโณ, อยํ วิปญฺจิตญฺญู. โย ปุคฺคโล ทนฺธาภิญฺญาย ทุกฺขาย ปฏิปทาย นิยฺยาติ, อยํ เนยฺโย. อิเม จตฺตาโร ภวิตฺวา ตีณิ โหนฺติ, ตตฺถ อุคฺฆฏิตญฺญุสฺส สมถปุพฺพงฺคมา วิปสฺสนา, เนยฺยสฺส วิปสฺสนาปุพฺพงฺคโม สมโถ, วิปญฺจิตญฺญุสฺส สมถวิปสฺสนา ยุคนทฺธา. อุคฺฆฏิตญฺญุสฺส มุทุกา เทสนา, เนยฺยสฺส ติกฺขา เทสนา, วิปญฺจิตญฺญุสฺส ติกฺขมุทุกา เทสนา. या चार पुद्गलांपैकी, जो पुद्गल सुख प्रतिपदेने व दंधाभिज्ञेने मुक्त होतो, आणि जो पुद्गल दुःख प्रतिपदेने व क्षिप्राभिज्ञेने मुक्त होतो, हे दोन पुद्गल होतात. त्यापैकी, जो सुख प्रतिपदेने व क्षिप्राभिज्ञेने मुक्त होतो, तो 'उग्घटितञ्ञू' होय. जो शेवटचा सामान्य पुद्गल आहे, तो 'विपञ्चितञ्ञू' होय. जो पुद्गल दंधाभिज्ञेने व दुःख प्रतिपदेने मुक्त होतो, तो 'नेय्य' होय. हे चार पुद्गल विकसित होऊन तीन होतात. त्यामध्ये, उग्घटितञ्ञू पुद्गलासाठी समथ-पूर्वांगम विपस्सना असते; नेय्य पुद्गलासाठी विपस्सना-पूर्वांगम समथ असतो; आणि विपञ्चितञ्ञू पुद्गलासाठी समथ-विपस्सना युगबद्ध असतात. उग्घटितञ्ञू पुद्गलासाठी मृदू देशना असते; नेय्य पुद्गलासाठी तीक्ष्ण देशना असते; आणि विपञ्चितञ्ञू पुद्गलासाठी तीक्ष्ण-मृदू देशना असते. อุคฺฆฏิตญฺญุสฺส อธิปญฺญาสิกฺขา, เนยฺยสฺส อธิจิตฺตสิกฺขา, วิปญฺจิตญฺญุสฺส อธิสีลสิกฺขา. อิติ อิเมสํ ปุคฺคลานํ จตูหิ ปฏิปทาหิ นิยฺยานํ. उग्घटितञ्ञू पुद्गलासाठी अधिपञ्ञा-सिक्खा असते, नेय्य पुद्गलासाठी अधिचित्त-सिक्खा असते, आणि विपञ्चितञ्ञू पुद्गलासाठी अधिसील-सिक्खा असते. अशा प्रकारे, या पुद्गलांचे चार प्रतिपदांद्वारे होणारे निय्यान समजून घ्यावे. ตตฺถ อยํ สํกิเลโส, ตีณิ อกุสลมูลานิ ตโย ผสฺสา ติสฺโส เวทนา ตโย อุปวิจารา ตโย สํกิเลสา ตโย วิตกฺกา ตโย ปริฬาหา ตีณิ สงฺขตลกฺขณานิ ติสฺโส ทุกฺขตาติ. तेथे हा संकिलेस आहे: तीन अकुशलमुळे, three फस्स, तीन वेदना, तीन उपविचार, तीन संकिलेस, तीन वितक्क, तीन परिळाह, तीन संखत-लक्षणे आणि तीन दुःखता. ตีณิ อกุสลมูลานีติ โลโภ อกุสลมูลํ, โทโส อกุสลมูลํ, โมโห อกุสลมูลํ. ตโย ผสฺสาติ สุขเวทนีโย ผสฺโส, ทุกฺขเวทนีโย ผสฺโส, อทุกฺขมสุขเวทนีโย ผสฺโส. ติสฺโส เวทนาติ สุขา เวทนา ทุกฺขา เวทนา อทุกฺขมสุขา เวทนา. ตโย อุปวิจาราติ โสมนสฺโสปวิจาโร โทมนสฺโสปวิจาโร อุเปกฺโขปวิจาโร. ตโย สํกิเลสาติ ราโค โทโส โมโห. ตโย วิตกฺกาติ กามวิตกฺโก พฺยาปาทวิตกฺโก วิหึสาวิตกฺโก. ตโย ปริฬาหาติ ราคโช โทสโช โมหโช. ตีณิ สงฺขตลกฺขณานีติ อุปฺปาโท ฐิติ วโย. ติสฺโส ทุกฺขตาติ ทุกฺขทุกฺขตา วิปริณามทุกฺขตา สงฺขตทุกฺขตา. 'तीन अकुशलमुळे' म्हणजे: लोभ अकुशलमूळ, दोस अकुशलमूळ आणि मोह अकुशलमूळ. 'तीन फस्स' म्हणजे: सुखवेदनीय फस्स, दुःखवेदनीय फस्स आणि अदुःखमसुखवेदनीय फस्स. 'तीन वेदना' म्हणजे: सुख वेदना, दुःख वेदना आणि अदुःखमसुख वेदना. 'तीन उपविचार' म्हणजे: सोमनस्स-उपविचार, दोमनस्स-उपविचार आणि उपेक्खा-उपविचार. 'तीन संकिलेस' म्हणजे: राग, दोस आणि मोह. 'तीन वितक्क' म्हणजे: कामवितक्क, ब्यापादवितक्क आणि विहिंसावितक्क. 'तीन परिळाह' म्हणजे: रागजन्य परिळाह, दोसजन्य परिळाह आणि मोहजन्य परिळाह. 'तीन संखत-लक्षणे' म्हणजे: उप्पाद, ठिती आणि वय. 'तीन दुःखता' म्हणजे: दुःखदुःखता, विपरिणामदुःखता आणि संखतदुःखता. ตตฺถ โลโภ อกุสลมูลํ กุโต สมุฏฺฐิตํ? ติวิธํ อารมฺมณํ มนาปิกํ อมนาปิกํ อุเปกฺขาฐานิยญฺจ. ตตฺถ มนาปิเกน อารมฺมเณน โลโภ อกุสลมูลํ สมุฏฺฐหติ. อิติ มนาปิกา อารมฺมณา สุขเวทนีโย ผสฺโส, สุขเวทนียํ ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต สุขเวทนา, สุขเวทนํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต โสมนสฺสูปวิจาโร, โสมนสฺสูปวิจารํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต ราโค, ราคํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต กามวิตกฺโก, กามวิตกฺกํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต ราคโช ปริฬาโห ราคชํ ปริฬาหํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต อุปฺปาโท สงฺขตลกฺขโณ, อุปฺปาทํ สงฺขตลกฺขณํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต วิปริณามทุกฺขตา. त्या अकुशलमुळांमध्ये, loभ अकुशलमूळ कशापासून उत्पन्न होते? मनापिक, अमनापिक आणि उपेक्खाठानीय असे तीन प्रकारचे आरम्मण असतात. त्यापैकी, मनापिक आरम्मणामुळे लोभ अकुशलमूळ उत्पन्न होते. अशा प्रकारे, मनापिक आरम्मणापासून सुखवेदनीय फस्स उत्पन्न होतो; सुखवेदनीय फस्सावर अवलंबून सुख वेदना उत्पन्न होते; सुख वेदनेवर अवलंबून सोमनस्स-उपविचार उत्पन्न होतो; सोमनस्स-उपविचारावर अवलंबून राग उत्पन्न होतो; रागावर अवलंबून कामवितक्क उत्पन्न होतो; कामवितक्कावर अवलंबून रागजन्य परिळाह उत्पन्न होतो; रागजन्य परिळाहावर अवलंबून उप्पाद संखत-लक्षण उत्पन्न होते; आणि उप्पाद संखत-लक्षणावर अवलंबून विपरिणामदुःखता उत्पन्न होते. โทโส [Pg.335] อกุสลมูลํ กุโต สมุฏฺฐิตํ? อมนาปิเกน อารมฺมเณน โทโส อกุสลมูลํ สมุฏฺฐิตํ. อิติ อมนาปิกา อารมฺมณา ทุกฺขเวทนีโย ผสฺโส, ทุกฺขเวทนียํ ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต ทุกฺขเวทนา, ทุกฺขเวทนํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต โทมนสฺสูปวิจาโร, โทมนสฺสูปวิจารํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต โทโส, โทสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต พฺยาปาทวิตกฺโก, พฺยาปาทวิตกฺกํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต โทสโช ปริฬาโห, โทสชํ ปริฬาหํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต ฐิตสฺส อญฺญถตฺตํ สงฺขตลกฺขณํ, ฐิตสฺส อญฺญถตฺตํ สงฺขตลกฺขณํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต ทุกฺขทุกฺขตา เวทนา. दोस अकुशलमूळ कशापासून उत्पन्न होते? अमनापिक आरम्मणामुळे दोस अकुशलमूळ उत्पन्न होते. अशा प्रकारे, अमनापिक आरम्मणापासून दुःखवेदनीय फस्स उत्पन्न होतो; दुःखवेदनीय फस्सावर अवलंबून दुःख वेदना उत्पन्न होते; दुःख वेदनेवर अवलंबून दोमनस्स-उपविचार उत्पन्न होतो; दोमनस्स-उपविचारावर अवलंबून दोस उत्पन्न होतो; दोसावर अवलंबून ब्यापादवितक्क उत्पन्न होतो; ब्यापादवितक्कावर अवलंबून दोसजन्य परिळाह उत्पन्न होतो; दोसजन्य परिळाहावर अवलंबून ठितीचे अन्यथात्व संखत-लक्षण उत्पन्न होते; आणि ठितीच्या अन्यथात्व संखत-लक्षणावर अवलंबून दुःखदुःखता वेदना उत्पन्न होते. โมโห อกุสลมูลํ กุโต สมุฏฺฐิตํ? อุเปกฺขาฐานิเยน อารมฺมเณน โมโห อกุสลมูลํ สมุฏฺฐิตํ. อิติ อุเปกฺขาฐานิยา อารมฺมณา อทุกฺขมสุขเวทนีโย ผสฺโส, อทุกฺขมสุขเวทนียํ ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต อทุกฺขมสุขา เวทนา, อทุกฺขมสุขเวทนํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต อุเปกฺขูปวิจาโร, อุเปกฺขูปวิจารํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต โมโห, โมหํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต วิหึสาวิตกฺโก, วิหึสาวิตกฺกํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต โมหโช ปริฬาโห, โมหชํ ปริฬาหํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต วโย สงฺขตลกฺขณํ, วยํ สงฺขตลกฺขณํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชเต สงฺขตทุกฺขตา, อิติ อยํ ติณฺณํ กิเลสานํ นิทฺเทโส, อยํ วุจฺจเต กุสลปกฺเข ติปุกฺขโล นโย. मोह हे अकुशलमूळ कशापासून उत्पन्न होते? उपेक्षा-स्थानिय (उपेक्षेचे स्थान असलेल्या) आलंबनामुळे मोह हे अकुशलमूळ उत्पन्न होते. अशा प्रकारे, उपेक्षा-स्थानिय आलंबनामुळे अदुःख-असुख-वेदनीय स्पर्श उत्पन्न होतो; अदुःख-असुख-वेदनीय स्पर्शावर अवलंबून अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होते; अदुःख-असुख वेदनेवर अवलंबून उपेक्षोपविचार उत्पन्न होतो; उपेक्षोपविचारावर अवलंबून मोह उत्पन्न होतो; मोहावर अवलंबून विहिंसा-वितर्क उत्पन्न होतो; विहिंसा-वितर्कावर अवलंबून मोहजन्य परिदाह उत्पन्न होतो; मोहजन्य परिदाहावर अवलंबून 'वय' (क्षय) हे संस्कृत-लक्षण उत्पन्न होते; आणि 'वय' या संस्कृत-लक्षणावर अवलंबून संस्कृत-दुःखता उत्पन्न होते. हा तीन क्लेशांचा निर्देश आहे. याला कुशल पक्षातील 'तिपुक्खल नय' (त्रिपौद्गलिक पद्धत) असे म्हटले जाते. อิติ ตีณิ อกุสลมูลานิ น จตุตฺถานิ น ปญฺจมานิ, ตโย ผสฺสาติ ติสฺโส เวทนา ยาว สงฺขตทุกฺขตาติ, โย โกจิ อกุสลปกฺโข, สพฺโพ โส ตีสุ อกุสลมูเลสุ สโมสรติ. अशा प्रकारे, अकुशलमुळे तीनच आहेत, चौथे किंवा पाचवे नाही. तीन स्पर्श, तीन वेदना, आणि संस्कृत-दुःखतेपर्यंत सर्व काही तीनच आहेत. जो काही अकुशल पक्ष आहे, तो सर्व या तीन अकुशलमुळांमध्येच समाविष्ट होतो. ตตฺถ กตโม กุสลปกฺโข? ตีณิ กุสลมูลานิ, ติสฺโส ปญฺญา สุตมยี ปญฺญา จินฺตามยี ปญฺญา ภาวนามยี ปญฺญา. ตโย สมาธี สวิตกฺกสวิจาโร…เป… ติสฺโส สิกฺขา อธิสีลสิกฺขา…เป… สิกฺขา. ตีณิ นิมิตฺตานิ สมถนิมิตฺตํ ปคฺคหนิมิตฺตํ อุเปกฺขานิมิตฺตํ. ตโย วิตกฺกา เนกฺขมฺมวิตกฺโก…เป… อวิหึสาวิตกฺโก. ตีณิ อินฺทฺริยานิ อนญฺญาตญฺญสฺสามีตินฺทฺริยนฺติ วิตฺถาโร. ตโย อุปวิจารา เนกฺขมฺมูปวิจาโร อพฺยาปาทูปวิจาโร อวิหึสูปวิจาโร. ติสฺโส เอสนา กาเมสนา ภเวสนา พฺรหฺมจริเยสนา. ตโย ขนฺธา สีลกฺขนฺโธ สมาธิกฺขนฺโธ ปญฺญากฺขนฺโธ. तेथे कुशल पक्ष कोणता आहे? तीन कुशलमुळे; तीन प्रज्ञा: श्रुतमयी प्रज्ञा, चिंतामयी प्रज्ञा आणि भावनामयी प्रज्ञा; तीन समाधी: सवितर्क-सविचार समाधी... इत्यादी...; तीन शिक्षा: अधिसील-शिक्षा... इत्यादी... शिक्षा; तीन निमित्ते: शमथ-निमित्त, प्रग्रह-निमित्त आणि उपेक्षा-निमित्त; तीन वितर्क: नैष्क्रम्य-वितर्क... इत्यादी... अविहिंसा-वितर्क; तीन इंद्रिये: 'अनाज्ञातमज्ञास्यामीतीन्द्रिय' इत्यादी विस्तार; तीन उपविचार: नैष्क्रम्य-उपविचार, अव्यापाद-उपविचार आणि अविहिंसा-उपविचार; तीन एषणा (शोध): कामैषणा, भवैषणा आणि ब्रह्मचर्यैषणा; तीन स्कंध: शीलस्कंध, समाधिस्कंध आणि प्रज्ञास्कंध. ตตฺถ [Pg.336] ยํ อโลโภ กุสลมูลํ, ตํ สุตมยิปญฺญํ ปริปูเรติ, สุตมยี ปญฺญา ปริปุณฺณา สวิตกฺกํ สวิจารํ สมาธึ ปริปูเรติ, สวิตกฺโก สวิจาโร สมาธิ ปริปุณฺโณ อธิจิตฺตสิกฺขํ ปริปูเรติ, อธิจิตฺตสิกฺขา ปริปุณฺณา สมถนิมิตฺตํ ปริปูเรติ, สมถนิมิตฺตํ ปริปุณฺณํ เนกฺขมฺมวิตกฺกํ ปริปูเรติ, เนกฺขมฺมวิตกฺโก ปริปุณฺโณ อนญฺญาตญฺญสฺสามีตินฺทฺริยํ ปริปูเรติ, อนญฺญาตญฺญสฺสามีตินฺทฺริยํ ปริปุณฺณํ เนกฺขมฺมูปวิจารํ ปริปูเรติ, เนกฺขมฺมูปวิจาโร ปริปุณฺโณ กาเมสนํ ปชหติ, กาเมสนปฺปหานํ สมาธิกฺขนฺธํ ปริปูเรติ. त्यामध्ये जे अलोभ कुशलमूळ आहे, ते श्रुतमयी प्रज्ञेला परिपूर्ण करते; श्रुतमयी प्रज्ञा परिपूर्ण झाली असता, ती सवितर्क-सविचार समाधीला परिपूर्ण करते; सवितर्क-सविचार समाधी परिपूर्ण झाली असता, ती अधिचित्त-शिक्षेला परिपूर्ण करते; अधिचित्त-शिक्षा परिपूर्ण झाली असता, ती शमथ-निमित्ताला परिपूर्ण करते; शमथ-निमित्त परिपूर्ण झाले असता, ते नैष्क्रम्य-वितर्काला परिपूर्ण करते; नैष्क्रम्य-वितर्क परिपूर्ण झाला असता, तो 'अनाज्ञातमज्ञास्यामीतीन्द्रिय' या इंद्रियाला परिपूर्ण करतो; 'अनाज्ञातमज्ञास्यामीतीन्द्रिय' परिपूर्ण झाले असता, ते नैष्क्रम्य-उपविचाराला परिपूर्ण करते; नैष्क्रम्य-उपविचार परिपूर्ण झाला असता, तो कामैषणेचा त्याग करतो; आणि कामैषणेचा त्याग समाधिस्कंधाला परिपूर्ण करतो. อโทโส กุสลมูลํ จินฺตามยิปญฺญํ ปริปูเรติ, จินฺตามยี ปญฺญา ปริปุณฺณา อวิตกฺกวิจารมตฺตํ สมาธึ ปริปูเรติ. อวิตกฺกวิจารมตฺโต สมาธิ ปริปุณฺโณ อธิสีลสิกฺขํ ปริปูเรติ, อธิสีลสิกฺขา ปริปุณฺณา อุเปกฺขานิมิตฺตํ ปริปูเรติ, อุเปกฺขานิมิตฺตํ ปริปุณฺณํ อพฺยาปาทวิตกฺกํ ปริปูเรติ, อพฺยาปาทวิตกฺโก ปริปุณฺโณ อญฺญินฺทฺริยํ ปริปูเรติ, อญฺญินฺทฺริยํ ปริปุณฺณํ อพฺยาปาทูปวิจารํ ปริปูเรติ, อพฺยาปาทูปวิจาโร ปริปุณฺโณ ภเวสนํ ปชหติ, ภเวสนปฺปหานํ สีลกฺขนฺธํ ปริปูเรติ. अद्वेष कुशलमूळ चिंतामयी प्रज्ञेला परिपूर्ण करते; चिंतामयी प्रज्ञा परिपूर्ण झाली असता, ती अवितर्क-विचारमात्र समाधीला परिपूर्ण करते; अवितर्क-विचारमात्र समाधी परिपूर्ण झाली असता, ती अधिसील-शिक्षेला परिपूर्ण करते; अधिसील-शिक्षा परिपूर्ण झाली असता, ती उपेक्षा-निमित्ताला परिपूर्ण करते; उपेक्षा-निमित्त परिपूर्ण झाले असता, ते अव्यापाद-वितर्काला परिपूर्ण करते; अव्यापाद-वितर्क परिपूर्ण झाला असता, तो 'आज्ञेंद्रिय' याला परिपूर्ण करतो; 'आज्ञेंद्रिय' परिपूर्ण झाले असता, ते अव्यापाद-उपविचाराला परिपूर्ण करते; अव्यापाद-उपविचार परिपूर्ण झाला असता, तो भवैषणेचा त्याग करतो; आणि भवैषणेचा त्याग शीलस्कंधाला परिपूर्ण करतो. อโมโห กุสลมูลํ ภาวนามยิปญฺญํ ปริปูเรติ, ภาวนามยีปญฺญา ปริปุณฺณา อวิตกฺกอวิจารํ สมาธึ ปริปูเรติ, อวิตกฺโก อวิจาโร สมาธิ ปริปุณฺโณ อธิปญฺญาสิกฺขํ ปริปูเรติ, อธิปญฺญาสิกฺขา ปริปุณฺณา ปคฺคหนิมิตฺตํ ปริปูเรติ, ปคฺคหนิมิตฺตํ ปริปุณฺณํ อญฺญาตาวิโน อินฺทฺริยํ ปริปูเรติ, อญฺญาตาวิโน อินฺทฺริยํ ปริปุณฺณํ อวิหึสูปวิจารํ ปริปูเรติ, อวิหึสูปวิจาโร ปริปุณฺโณ พฺรหฺมจริเยสนํ ปริปูเรติ, พฺรหฺมจริเยสนา ปริปุณฺณา ปญฺญากฺขนฺธํ ปริปูเรติ. अमोह कुशलमूळ भावनामयी प्रज्ञेला परिपूर्ण करते; भावनामयी प्रज्ञा परिपूर्ण झाली असता, ती अवितर्क-अविचार समाधीला परिपूर्ण करते; अवितर्क-अविचार समाधी परिपूर्ण झाली असता, ती अधिपज्ञा-शिक्षेला परिपूर्ण करते; अधिपज्ञा-शिक्षा परिपूर्ण झाली असता, ती प्रग्रह-निमित्ताला परिपूर्ण करते; प्रग्रह-निमित्त परिपूर्ण झाले असता, ते 'आज्ञातावींद्रिय' याला परिपूर्ण करते; 'आज्ञातावींद्रिय' परिपूर्ण झाले असता, ते अविहिंसा-उपविचाराला परिपूर्ण करते; अविहिंसा-उपविचार परिपूर्ण झाला असता, तो ब्रह्मचर्यैषणेला परिपूर्ण करतो; आणि ब्रह्मचर्यैषणा परिपूर्ण झाली असता, ती प्रज्ञास्कंधाला परिपूर्ण करते. อิติ อิเม ตโย ธมฺมา กุสลปกฺขิกา สพฺเพ กุสลา ธมฺมา ตีหิ ติกนิทฺเทเสหิ นิทฺทิสิยนฺติ ตีณิ วิโมกฺขมุขานิ ตสฺส ปริโยสานํ. ตตฺถ ปฐเมน อปฺปณิหิตํ, ทุติเยน สุญฺญตํ, ตติเยน อนิมิตฺตํ. อยํ วุจฺจติ ทุติโย ติปุกฺขโล นาม นโย. अशा प्रकारे, हे तीन धर्म कुशल पक्षाचे आहेत. सर्व कुशल धर्म तीन त्रिक-निर्देशांद्वारे निर्देशित केले जातात. तीन विमोक्षमुखे हा त्याचा शेवट (पर्यवसान) आहे. त्यामध्ये पहिल्याने अप्रणिहित, दुसऱ्याने शून्यत, आणि तिसऱ्याने अनिमित्त विमोक्षमुख प्राप्त होते. याला दुसरा 'तिपुक्खल नय' (त्रिपौद्गलिक पद्धत) असे म्हटले जाते. ตตฺถ เย อิเม ตโย ปุคฺคลา อุคฺฆฏิตญฺญู วิปญฺจิตญฺญู เนยฺโยติ. อิเมสํ ติณฺณํ ปุคฺคลานํ เย จ ปุคฺคลา สุขาย ปฏิปทาย ขิปฺปาภิญฺญาย, สุขาย ปฏิปทาย ทนฺธาภิญฺญาย จ นิยฺยนฺติ, เต ทฺเว ปุคฺคลา. เย จ ทฺเว ปุคฺคลา ทุกฺขาย ปฏิปทาย ขิปฺปาภิญฺญาย, ทุกฺขาย ปฏิปทาย ทนฺธาภิญฺญาย จ นิยฺยนฺติ[Pg.337], อิเม จตฺตาโร เตน วิเสเสน ทฺเว ภวนฺติ ทิฏฺฐิจริโต จ ตณฺหาจริโต จ. อิเม จตฺตาโร ภวิตฺวา ตโย ภวนฺติ, ตโย ภวิตฺวา ทฺเว ภวนฺติ. อิเมสํ ทฺวินฺนํ ปุคฺคลานํ อยํ สํกิเลโส, อวิชฺชา จ ตณฺหา จ, อหิริกญฺจ อโนตฺตปฺปญฺจ, อสฺสติ จ อสมฺปชญฺญญฺจ, นีวรณานิ จ สํโยชนานิ จ, อชฺโฌสานญฺจ อภินิเวโส จ, อหํกาโร จ มมํกาโร จ, อสฺสทฺธิยญฺจ โทวจสฺสญฺจ, โกสชฺชญฺจ อโยนิโส จ มนสิกาโร, วิจิกิจฺฉา จ อภิชฺฌา จ, อสทฺธมฺมสฺสวนญฺจ อสมาปตฺติ จ. तेथे हे तीन प्रकारचे पुद्गल (व्यक्ती) आहेत: उद्घटितज्ञू, विपंचितज्ञू आणि नेय्य. या तीन पुद्गलांपैकी जे पुद्गल सुख-प्रतिपदा क्षिप्राभिज्ञाने (सुखकर मार्गाने व जलद ज्ञानाने) आणि सुख-प्रतिपदा दंधाभिज्ञाने (सुखकर मार्गाने व संथ ज्ञानाने) संसारातून मुक्त होतात, ते दोन पुद्गल आहेत. आणि जे दोन पुद्गल दुःख-प्रतिपदा क्षिप्राभिज्ञाने (कठीण मार्गाने व जलद ज्ञानाने) आणि दुःख-प्रतिपदा दंधाभिज्ञाने (कठीण मार्गाने व संथ ज्ञानाने) मुक्त होतात, असे हे चार पुद्गल होतात. त्या वैशिष्ट्यामुळे ते दोन होतात: दृष्टिचरित आणि तृष्णाचरित. हे चार होऊन तीन होतात, आणि तीन होऊन दोन होतात. या दोन पुद्गलांचा हा संक्लेश (अशुद्धता) आहे: अविद्या आणि तृष्णा, अहीरिक (लज्जाहीनता) आणि अनोत्तप्प (भयहीनता), असंस्मरण (स्मृतीचा अभाव) आणि असंप्रजन्य (प्रज्ञेचा अभाव), नीवरणे आणि संयोजने, अध्यवसान (आसक्ती) आणि अभिनिवेश, अहंकार आणि ममकार, अश्रद्धा आणि दौर्वचस्य (हट्टीपणा), आळस आणि अयोनिशो मनसिकार, विचिकित्सा आणि अभिध्या, असद्धर्म-श्रवण आणि असमापत्ती. ตตฺถ อวิชฺชา จ อหิริกญฺจ อสฺสติ จ นีวรณานิ จ อชฺโฌสานญฺจ อหํกาโร จ อสฺสทฺธิยญฺจ โกสชฺชญฺจ วิจิกิจฺฉา จ อสทฺธมฺมสฺสวนญฺจ, อยํ เอกา ทิสา. त्यामध्ये अविद्या, अहीरिक (लज्जाहीनता), असंस्मरण (स्मृतीचा अभाव), नीवरणे, अध्यवसान (आसक्ती), अहंकार, अश्रद्धा, आळस, विचिकित्सा आणि असद्धर्म-श्रवण, ही पहिली दिशा (बाजू) आहे. ตณฺหา จ อโนตฺตปฺปญฺจ อสมฺปชญฺญญฺจ สํโยชนานิ จ อภินิเวโส จ มมํกาโร จ โทวจสฺสตา จ อโยนิโส มนสิกาโร จ อภิชฺฌา จ อสมาปตฺติ จ, อยํ ทุติยา ทิสา. ทสนฺนํ ทุกานํ ทส ปทานิ ปฐมานิ กาตพฺพานิ. สํขิตฺเตน อตฺถํ ญาเปนฺติ ปฏิปกฺเข กณฺหปกฺขสฺส สพฺเพสํ ทุกานํ ทส ปทานิ ทุติยกานิ, อยํ ทุติยา ทิสา. तृष्णा, अनोत्तप्प (भयहीनता), असंप्रजन्य (प्रज्ञेचा अभाव), संयोजने, अभिनिवेश, ममकार, दौर्वचस्य (हट्टीपणा), अयोनिशो मनसिकार, अभिध्या आणि असमापत्ती, ही दुसरी दिशा आहे. दहा द्विकांपैकी पहिली दहा पदे घेतली पाहिजेत. ती संक्षेपाने कृष्णपक्षाच्या (अकुशल पक्षाच्या) प्रतिपक्षाचा अर्थ स्पष्ट करतात. सर्व द्विकांमधील दुसरी दहा पदे ही दुसरी दिशा आहे. อิติ อกุสลานํ ธมฺมานํ ทุกฺขนิทฺเทโส, อยํ สมุทโย. ยํ ตํ ธมฺมํ อชฺฌาวสติ นามญฺจ รูปญฺจ อิทํ ทุกฺขํ อิติ อยญฺจ สมุทโย, อิทญฺจ ทุกฺขํ, อิมานิ ทฺเว สจฺจานิ ทุกฺขญฺจ สมุทโย จ นนฺทิยาวฏฺฏสฺส นยสฺส ปฐมนิทฺเทโส. अशा प्रकारे, अकुशल धर्मांचा हा दुःख-निर्देश आहे, हा 'समुदय' (दुःखाचे कारण) आहे. ज्या धर्मामध्ये जीव आसक्त होतो, ते नाम आणि रूप हे 'दुःख' आहे. अशा प्रकारे, हा समुदय आणि हे दुःख, ही दुःख आणि समुदय ही दोन सत्ये आहेत. हा 'नंदियावट्ट नय' (नंद्यावर्त पद्धत) चा पहिला निर्देश आहे. ตตฺถ กตโม กุสลปกฺโข? สมโถ จ วิปสฺสนา จ, วิชฺชา จ จรณญฺจ, สติ จ สมฺปชญฺญญฺจ, หิรี จ โอตฺตปฺปญฺจ, อหํการปฺปหานญฺจ มมํการปฺปหานญฺจ, สมฺมาวายาโม จ โยนิโส จ มนสิกาโร, สมฺมาสติ จ สมฺมาสมาธิ จ, ปญฺญา จ นิพฺพิทา จ, สมาปตฺติ จ สทฺธมฺมสฺสวนญฺจ, โสมนสฺสญฺจ ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปตฺติ จ. तेथे कुशलपक्ष कोणता? समथ आणि विपस्सना, विज्जा आणि चरण, सति आणि सम्पजञ्ञ, हिरि आणि ओत्तप्प, अहंकार-प्रहाण आणि ममंकार-प्रहाण, सम्मावायाम आणि योनिसो मनसिकार, सम्मासति आणि सम्मासमाधि, पञ्ञा आणि निब्बिदा, समापत्ति आणि सद्धम्मसवण, सोमनस्स आणि धम्मानुधम्मपटिपत्ति हे होय. ตตฺถ สมโถ จ วิชฺชา จ สติ จ หิรี จ อหํการปฺปหานญฺจ สมฺมาวายาโม จ สมฺมาสติ จ ปญฺญา จ สมาปตฺติ จ โสมนสฺสญฺจ, อิเม ธมฺมา เอกา ทิสา. วิปสฺสนา จ จรณญฺจ สมฺปชญฺญญฺจ โอตฺตปฺปญฺจ มมํการปฺปหานญฺจ โยนิโส มนสิกาโร จ สมฺมาสมาธิ จ นิพฺพิทา จ สทฺธมฺมสฺสวนญฺจ ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปตฺติ จ, อยํ ทุติยา ทิสา. อิติ กุสลปกฺเข จ อกุสลปกฺเข จ นนฺทิยาวฏฺฏสฺส ปน นยสฺส จตสฺโส ทิสา. त्यामध्ये समथ, विज्जा, सति, हिरि, अहंकार-प्रहाण, सम्मावायाम, सम्मासति, पञ्ञा, समापत्ति आणि सोमनस्स—हे धर्म पहिली दिशा आहेत. विपस्सना, चरण, सम्पजञ्ञ, ओत्तप्प, ममंकार-प्रहाण, योनिसो मनसिकार, सम्मासमाधि, niब्बिदा, सद्धम्मसवण आणि धम्मानुधम्मपटिपत्ति—ही दुसरी दिशा आहे. अशा प्रकारे, कुशलपक्षात आणि अकुशलपक्षात नन्दियावट्ट नयाच्या चार दिशा होतात. ตาสุ [Pg.338] ยานิ อกุสลปกฺขสฺส ปฐมานิ ปทานิ อกุสลานิ กุสเลหิ ปหานํ คจฺฉนฺติ, ตานิ กุสลปกฺเข ทุติเยหิ ปเทหิ ปหานํ คจฺฉนฺติ. เตสํ ปหานา ราควิราคา เจโตวิมุตฺติ ยานิ อกุสลปกฺขสฺส ทุติยานิ อกุสลปทานิ ปหานํ คจฺฉนฺติ, ตานิ กุสลปกฺขสฺส ปฐเมหิ ปเทหิ ปหานํ คจฺฉนฺติ. เตสํ ปหานา อวิชฺชาวิราคา ปญฺญาวิมุตฺติ ปริโยสานํ. อิเมสํ ติณฺณํ นยานํ ปฐโม นโย สีหวิกฺกีฬิโต นาม. อฏฺฐ ปทานิ จตฺตาริ จ กุสลานิ จตฺตาริ จ อกุสลานิ อิมานิ อฏฺฐ ปทานิ มูลปทานิ, อตฺถนเยน ทุติโย ติปุกฺขโล. โส ฉหิ ธมฺเมหิ เนติ กุสลมูลานิ จ เนติ อกุสลมูลานิ จ, อิติ อิมานิ ฉ ปทานิ ปุริมกานิ จ อฏฺฐ มูลปทานิ อิมานิ จุทฺทส ปทานิ อฏฺฐารสนฺนํ มูลปทานํ. ตตฺถ โย ปจฺฉิมโก นโย นนฺทิยาวฏฺโฏ, โส จตูหิ ธมฺเมหิ เนติ. อวิชฺชาย จ ตณฺหาย จ สมเถน จ วิปสฺสนาย จ, อิเม จตฺตาโร ธมฺมา อิมานิ อฏฺฐารส มูลปทานิ ตีสุ นเยสุ นิทฺทิฏฺฐานิ. त्यांच्यामध्ये, अकुशलपक्षाची जी पहिली अकुशल पदे आहेत, जी कुशलांद्वारे प्रहाणास प्राप्त होतात, ती कुशलपक्षातील दुसऱ्या पदांद्वारे प्रहाणास प्राप्त होतात. त्यांच्या प्रहाणाने रागविरागा चेतोविमुत्ति होते. अकुशलपक्षाची जी दुसरी अकुशल पदे प्रहाणास प्राप्त होतात, ती कुशलपक्षाच्या पहिल्या पदांद्वारे प्रहाणास प्राप्त होतात. त्यांच्या प्रहाणाने अविज्जाविरागा पञ्ञाविमुत्ति हा अंतिम निष्कर्ष होतो. या तीन नयांपैकी पहिला नय 'सीहविक्कीळित' नावाचा आहे. आठ पदे—चार कुशल आणि चार अकुशल—ही आठ पदे मूळ पदे आहेत. अर्थनयानुसार दुसरा नय 'तिपुक्खल' आहे. तो सहा धर्मांद्वारे नेतो—कुशल मुळांना नेतो आणि अकुशल मुळांना नेतो; अशा प्रकारे ही सहा पदे आणि पूर्वीची आठ मूळ पदे मिळून ही चौदा पदे अठरा मूळ पदांपैकी होतात. त्यामध्ये जो शेवटचा नय 'नन्दियावट्ट' आहे, तो चार धर्मांद्वारे नेतो—अविज्जा, तण्हा, समथ आणि विपस्सना द्वारे. हे चार धर्म आणि ही अठरा मूळ पदे तीन नयांमध्ये निर्देशित केली आहेत. ตตฺถ ยานิ นว ปทานิ กุสลานิ, ตตฺถ สพฺพํ กุสลํ สโมสรติ. เตสญฺจ นวนฺนํ มูลานํ จตฺตาริ ปทานิ สีหวิกฺกีฬิตนเย ตีณิ ติปุกฺขเล ทฺเว นนฺทิยาวฏฺเฏ, อิจฺเจเต กุสลสฺส ปกฺขา. ตตฺถ ยานิ นว ปทานิ กุสลานิ, ตตฺถ สพฺพํ กุสลํ ยุชฺชติ. ตตฺถ สีหวิกฺกีฬิเต นเย จตฺตาริ ปทานิ ตีณิ ติปุกฺขเล ทฺเว นนฺทิยาวฏฺเฏ อิมานิ นว ปทานิ กุสลานิ นิทฺทิฏฺฐานิ. त्यामध्ये जी नऊ कुशल पदे आहेत, त्यामध्ये सर्व कुशल समाविष्ट होते. आणि त्या नऊ मूळ पदांपैकी चार पदे सीहविक्कीळित नयामध्ये, तीन तिपुक्खल नयामध्ये आणि दोन नन्दियावट्ट नयामध्ये आहेत; हे कुशलाचे पक्ष आहेत. तेथे जी नऊ कुशल पदे आहेत, त्यामध्ये सर्व कुशल जुळते. तेथे सीहविक्कीळित नयामध्ये चार पदे, तिपुक्खल नयामध्ये तीन आणि नन्दियावट्ट नयामध्ये दोन, अशी ही नऊ कुशल पदे निर्देशित केली आहेत. ตตฺถ ยานิ นนฺทิยาวฏฺเฏ นเย จตฺตาริ ปทานิ, ตตฺถ อฏฺฐารส มูลปทานิ สโมสรนฺติ. ยถา กถํ, สมโถ จ อโลโภ จ อโทโส จ อสุภสญฺญา จ ทุกฺขสญฺญา จ อิมานิ กุสลปกฺเข ปญฺจ ปทานิ สมถํ ภชนฺติ. วิปสฺสนา จ อโมโห จ อนิจฺจสญฺญา จ อนตฺตสญฺญา จ อิมานิ จตฺตาริ ปทานิ วิปสฺสนํ ภชนฺติ. อิมานิ นว ปทานิ กุสลานิ ทฺวีสุ ปเทสุ โยชิตานิ, ตตฺถ อกุสลปกฺเข นวนฺนํ อกุสลมูลปทานํ ยา จ ตณฺหา โย จ โลโภ โย จ โทโส ยา จ สุภสญฺญา ยา จ สุขสญฺญา, อิมานิ ปญฺจ ปทานิ ตณฺหํ ภชนฺติ. ยา จ อวิชฺชา โย จ โมโห ยา จ นิจฺจสญฺญา ยา จ อตฺตสญฺญา, อิมานิ จตฺตาริ ปทานิ อวิชฺชํ ภชนฺติ. เอตานิ นว ปทานิ อกุสลานิ สุสํขิตฺตานิ. อิติ ตโย นยา เอกํ นยํ น ปวิฏฺฐา. เอวํ อฏฺฐารส มูลปทานิ นนฺทิยาวฏฺฏนเย นิทฺทิสิตพฺพานิ. त्यामध्ये, नन्दियावट्ट नयामध्ये जी चार पदे आहेत, त्यामध्ये अठरा मूळ पदे एकत्र येतात. ते कसे? समथ, अलोभ, अदोस, असुभसञ्ञा आणि दुक्खसञ्ञा—ही कुशलपक्षातील पाच पदे समथाचा आश्रय घेतात. विपस्सना, अमोह, अनिच्चसञ्ञा आणि अनत्तसञ्ञा—ही चार पदे विपस्सनाचा आश्रय घेतात. ही नऊ कुशल पदे दोन पदांमध्ये जोडली जातात. तेथे अकुशलपक्षामध्ये, नऊ अकुशल मूळ पदांपैकी जी तण्हा, जो लोभ, जो दोस, जी सुभसञ्ञा आणि जी सुखसञ्ञा आहे—ही पाच पदे तण्हाचा आश्रय घेतात. आणि जी अविज्जा, जो मोह, जी निच्चसञ्ञा आणि जी अत्तसञ्ञा आहे—ही चार पदे अविज्जेचा आश्रय घेतात. ही नऊ अकुशल पदे सुसंक्षिप्त केली आहेत. अशा प्रकारे, हे तीन नय एकाच नयामध्ये समाविष्ट होत नाहीत. याप्रमाणे, अठरा मूळ पदे नन्दियावट्ट नयामध्ये निर्देशित करावीत. กถํ [Pg.339] อฏฺฐารส มูลปทานิ, ติปุกฺขเล นเย ยุชฺชนฺติ? นวนฺนํ ปทานํ กุสลานํ, วิปสฺสนา จ อโมโห จ อนิจฺจสญฺญา จ อนตฺตสญฺญา จ, อิมานิ จตฺตาริ ปทานิ; อโมโห จ สมโถ จ อโลโภ จ อสุภสญฺญา จ, อิมานิ จตฺตาริ ปทานิ; โลโภ จ โทโส จ, เอวํ อิมานิ นว ปทานิ ตีสุ กุสเลสุ โยเชตพฺพานิ. ตตฺถ นวนฺนํ ปทานํ อกุสลานํ ตณฺหา จ โลโภ จ สุภสญฺญา จ สุขสญฺญา จ, อิมานิ จตฺตาริ ปทานิ โลโภ อกุสลมูลํ; อวิชฺชา จ โมโห จ นิจฺจสญฺญา จ อตฺตสญฺญา จ อยํ โมโห อยํ โทโส, เย จ อิมานิ นว ปทานิ ตีสุ อกุสเลสุ โยชิตานิ. เอวํ อฏฺฐารส มูลปทานิ กุสลมูเลสุ จ โยเชตฺวา ติปุกฺขเลน นเยน นิทฺทิสิตพฺพานิ. अठरा मूळ पदे तिपुक्खल नयामध्ये कशी जुळतात? नऊ कुशल पदांपैकी—विपस्सना, अमोह, अनिच्चसञ्ञा आणि अनत्तसञ्ञा ही चार पदे; अमोह, समथ, अलोभ आणि असुभसञ्ञा ही चार पदे; आणि लोभ व दोस—अशा प्रकारे ही नऊ पदे तीन कुशलांमध्ये जोडली जावीत. तेथे नऊ अकुशल पदांपैकी—तण्हा, लोभ, सुभसञ्ञा आणि सुखसञ्ञा ही चार पदे 'लोभ' या अकुशलमुळात; अविज्जा, मोह, निच्चसञ्ञा आणि अत्तसञ्ञा ही चार पदे, आणि हा मोह व हा दोस—अशा प्रकारे ही नऊ पदे तीन अकुशलांमध्ये जोडली जातात. अशा प्रकारे, अठरा मूळ पदे कुशलमुळांमध्ये जोडून तिपुक्खल नयाद्वारे निर्देशित करावीत. กถํ อฏฺฐารส มูลปทานิ สีหวิกฺกีฬิเต นเย ยุชฺชนฺติ? ตณฺหา จ สุภสญฺญา จ, อยํ ปฐโม วิปลฺลาโส. โลโภ จ สุขสญฺญา จ, อยํ ทุติโย วิปลฺลาโส. อวิชฺชา จ นิจฺจสญฺญา จ, อยํ ตติโย วิปลฺลาโส. โมโห จ อตฺตสญฺญา จ, อยํ จตุตฺโถ วิปลฺลาโส. อิติ นว ปทานิ อกุสลมูลานิ จตูสุ ปเทสุ โยชิตานิ. ตตฺถ นวนฺนํ มูลปทานํ กุสลานํ สมโถ จ อสุภสญฺญา จ, อิทํ ปฐมํ สติปฏฺฐานํ. อโลโภ จ ทุกฺขสญฺญา จ, อิทํ ทุติยํ สติปฏฺฐานํ. วิปสฺสนา จ อนิจฺจสญฺญา จ, อิทํ ตติยํ สติปฏฺฐานํ. อโมโห จ อนตฺตสญฺญา จ, อิทํ จตุตฺถํ สติปฏฺฐานํ. อิมานิ อฏฺฐารส มูลปทานิ สีหวิกฺกีฬิตนยํ อนุปวิฏฺฐานิ. อิเมสํ ติณฺณํ นยานํ ยา ภูมิ จ โย ราโค จ โย โทโส จ เอกํ นยํ ปวิสติ. เอกสฺส นยสฺส อกุสเล วา ธมฺเม กุสเล วา ธมฺเม วิญฺญาเต ปฏิปกฺโข อนฺเวสิตพฺโพ, ปฏิปกฺเข อนฺเวสิตฺวา โส นโย นิทฺทิสิตพฺโพ, ตมฺหิ นเย นิทฺทิฏฺโฐ. ยถา เอกมฺหิ นเย สพฺเพ นยา ปวิฏฺฐา ตถา นิทฺทิสิตพฺพา. เอกมฺหิ จ นเย อฏฺฐารส มูลปทานิ ปวิฏฺฐานิ, ตมฺหิ ธมฺเม วิญฺญาเต สพฺเพ ธมฺมา วิญฺญาตา โหนฺติ. อิเมสํ ติณฺณํ นยานํ สีหวิกฺกีฬิตนยสฺส จตฺตาริ ผลานิ ปริโยสานํ. ปฐมาย ทิสาย ปฐมํ ผลํ, ทุติยาย ทิสาย ทุติยํ ผลํ, ตติยาย ทิสาย ตติยํ ผลํ, จตุตฺถาย ทิสาย จตุตฺถํ ผลํ. ติปุกฺขลสฺส นยสฺส ตีณิ วิโมกฺขมุขานิ ปริโยสานํ. ปฐมาย ทิสาย อปฺปณิหิตํ, ทุติยาย ทิสาย สุญฺญตํ, ตติยาย ทิสาย อนิมิตฺตํ. นนฺทิยาวฏฺฏสฺส นยสฺส ราควิราคา เจโตวิมุตฺติ อวิชฺชาวิราคา จ ปญฺญาวิมุตฺติ ปริโยสานํ[Pg.340]. ปฐมาย ทิสาย ราควิราคา เจโตวิมุตฺติ, ทุติยาย ทิสาย อวิชฺชาวิราคา ปญฺญาวิมุตฺติ. อิเม ตโย นยา อิเมสํ ติณฺณํ นยานํ อฏฺฐารสนฺนํ มูลปทานํ อาโลกนา, อยํ วุจฺจติ ทิสาโลกโน นโย. อาโลเกตฺวาน ชานาติ ‘‘อยํ ธมฺโม อิมํ ธมฺมํ ภชตี’’ติ สมฺมา โยชนา. กุสลปกฺเข อกุสลปกฺเข จ อยํ นโย องฺกุโส นาม. อิเม ปญฺจ นยา. कशा प्रकारे अठरा मूळ पदे सीहविक्कीळित नयामध्ये (सिंहविक्रीडित पद्धतीमध्ये) जोडली जातात? तृष्णा आणि शुभसंज्ञा, हा पहिला विपर्यास (विपल्लास) आहे. लोभ आणि सुखसंज्ञा, हा दुसरा विपर्यास आहे. अविद्या आणि नित्यसंज्ञा, हा तिसरा विपर्यास आहे. मोह आणि आत्मसंज्ञा, हा चौथा विपर्यास आहे. अशा प्रकारे ही नऊ अकुशल-मूळ पदे चार पदांमध्ये जोडली आहेत. त्यामध्ये, नऊ कुशल मूळ पदांपैकी: शमथ आणि अशुभसंज्ञा, हे पहिले स्मृतिप्रस्थान (सतिपट्ठान) आहे. अलोभ आणि दुःखसंज्ञा, हे दुसरे स्मृतिप्रस्थान आहे. विपश्यना आणि अनित्यसंज्ञा, हे तिसरे स्मृतिप्रस्थान आहे. अमोह आणि अनात्मसंज्ञा, हे चौथे स्मृतिप्रस्थान आहे. ही अठरा मूळ पदे सीहविक्कीळित नयामध्ये समाविष्ट होतात. या तीन नयांची जी भूमी, जो राग आणि जो द्वेष आहे, तो एका नयामध्ये प्रवेश करतो. एका नयाच्या अकुशल किंवा कुशल धर्मांचे ज्ञान झाल्यावर, त्याच्या प्रतिपक्षाचा शोध घेतला पाहिजे; प्रतिपक्षाचा शोध घेऊन तो नय निर्देशित केला पाहिजे, आणि त्या नयामध्ये तो निर्देशित केला जातो. ज्याप्रमाणे एका नयामध्ये सर्व नय समाविष्ट होतात, त्याप्रमाणे ते निर्देशित केले पाहिजेत. आणि एका नयामध्ये अठरा मूळ पदे समाविष्ट होतात; त्या धर्माचे ज्ञान झाल्यावर सर्व धर्म ज्ञात होतात. या तीन नयांपैकी, सीहविक्कीळित नयाचा शेवट चार फळांमध्ये होतो. पहिल्या दिशेने पहिले फळ, दुसऱ्या दिशेने दुसरे फळ, तिसऱ्या दिशेने तिसरे फळ, आणि चौथ्या दिशेने चौथे फळ प्राप्त होते. तिपुक्खल नयाचा शेवट तीन विमोक्षमुखांमध्ये होतो. पहिल्या दिशेने अप्रणिहित, दुसऱ्या दिशेने शून्यता, आणि तिसऱ्या दिशेने अनिमित्त प्राप्त होते. नन्दियावट्ट नयाचा शेवट रागविरागा चेतोविमुक्ती आणि अविद्याविरागा प्रज्ञाविमुक्तीमध्ये होतो. पहिल्या दिशेने रागविरागा चेतोविमुक्ती, आणि दुसऱ्या दिशेने अविद्याविरागा प्रज्ञाविमुक्ती प्राप्त होते. हे तीन नय या तीन नयांच्या अठरा मूळ पदांचे अवलोकन करतात; याला 'दिसालोकन नय' (दिशा-अवलोकन पद्धती) असे म्हटले जाते. अवलोकन करून तो जाणतो की, 'हा धर्म या धर्माचे सेवन करतो', हीच सम्यक योजना होय. कुशल पक्षात आणि अकुशल पक्षात असणारा हा नय 'अंकुश नय' म्हणून ओळखला जातो. हे पाच नय आहेत. ตตฺถิมา อุทฺทานคาถา त्यावर या संग्रह-गाथा (उद्दान-गाथा) आहेत: ตณฺหา จ อวิชฺชาปิ จ, โลโภ โทโส ตเถว โมโห จ; จตฺตาโร จ วิปลฺลาสา, กิเลสภูมี นว ปทานิ. तृष्णा आणि अविद्या, तसेच लोभ, द्वेष आणि मोह; आणि चार विपर्यास – ही क्लेशभूमीची नऊ पदे आहेत. เย จ สติปฏฺฐานา, สมโถ จ วิปสฺสนา กุสลมูลา; เอตํ สพฺพํ กุสลํ, อินฺทฺริยภูมี นว ปทานิ. जे स्मृतिप्रस्थान, शमथ, विपश्यना आणि कुशलमुळे आहेत; हे सर्व कुशल असून, ही इंद्रियभूमीची नऊ पदे आहेत. สพฺพกุสลํ นวหิ ปเทหิ ยุชฺชติ, นวหิ เจว อกุสลํ; เอเต เต มูลปทา, อุภโต อฏฺฐารส ปทานิ. सर्व कुशल नऊ पदांशी जोडले जाते, आणि अकुशल देखील नऊ पदांशीच जोडले जाते; ही ती मूळ पदे आहेत, जी दोन्ही बाजूने मिळून अठरा पदे होतात. ตณฺหา เจว อวิชฺชา จ, สมโถ จ วิปสฺสนา; โย เนติ สพฺเพสุ โยคยุตฺโต, อยํ นโย นนฺทิยาวฏฺโฏ. तृष्णा आणि अविद्या, तसेच शमथ आणि विपश्यना; जो सर्व नयांमध्ये योगाशी युक्त होऊन धर्मांना नेतो, तो 'नन्दियावट्ट नय' होय. ยํ กุสลมูเลหิ, นยติ กุสลอกุสลมูเลหิ; ภูตํ ตถํ อวิตถํ, ติปุกฺขลํ ตํ นยํ อาหุ. जो कुशलमुळांद्वारे आणि कुशल-अकुशलमुळांद्वारे धर्मांना नेतो; जे सत्य, यथार्थ आणि अवितथ आहे, त्याला 'तिपुक्खल नय' असे म्हणतात. โส เนติ วิปลฺลาเสหิ, กิเลสอินฺทฺริเยหิ จ; ธมฺเม ตํ นยํ วินยมาหุ, สีหวิกฺกีฬิตํ นาม. जो विपर्यासांद्वारे आणि क्लेश-इंद्रियांद्वारे धर्मांना नेतो, त्या नयाला 'सीहविक्कीळित' नावाचा नय म्हणतात. เวยฺยากรเณ วุตฺเต, กุสลตาหิ อกุสลตาหิ จ; ตโย อาโลกยติ, อยํ นโย ทิสาโลจโน นาม. व्याकरण (स्पष्टीकरण) सांगितले असता, कुशलतेने आणि अकुशलतेने जो तीन दिशांचे अवलोकन करतो, तो 'दिसालोकन' नावाचा नय होय. โอโลเกตฺวา ทิสาโลจเนน, อุกฺขิปิย ยํ สมาเนติ; สพฺเพ กุสลากุสเล, อยํ นโย องฺกุโส นาม. दिसालोकनाने पाहून, जे वर उचलून सर्व कुशल आणि अकुशल धर्मांना एकत्र आणते, तो 'अंकुश' नावाचा नय होय. นยสมุฏฺฐานํ. नय-समुत्थान (नयांची उत्पत्ती). เปฏโกปเทเส มหากจฺจายนสฺส เถรสฺส สุตฺตวิภงฺคสฺส पेटकोपदेशातील महाकात्यायन स्थविरांचे सुत्तविभंग (सूत्रांचे विश्लेषण) ทสฺสนํ สมตฺตํ. दर्शन समाप्त झाले. ยานิ [Pg.341] จตุกฺกานิ อกุสลานิ กุสลานิ จ สีหวิกฺกีฬิเต นเย นิทฺทิฏฺฐานิ, ติกานิ กุสลานิ จ อกุสลานิ จ ติปุกฺขเล นเย นิทฺทิฏฺฐานิ, ทุกานิ กุสลานิ จ อกุสลานิ จ นนฺทิยาวฏฺเฏ นเย นิทฺทิฏฺฐานิ. เยสุ ทฺวีสุ ธมฺเมสุ กุสเลสุ โส อตฺโถ ติเกสุ วิภชฺชมานสฺส ภวภูมิ, อถ จ สพฺโพ จ อตฺโถ ตีหิ พฺยญฺชเนหิ นิทฺทิสติ. ตตฺตกานิ วุจฺจติ. โย อตฺโถ จตูหิ ปเทหิ อฏฺฐวีสติภาเคหิ นตฺถิภูมิ นิทฺทิสิตุํ, อวจรนฺโตว จตูหิ ปเทหิ นิทฺทิสติ. อิติ ยํ ยถานิทฺทิฏฺฐสฺส อวิโกสนา อิทํ ปมาณํ. ยถา สพฺเพ สมาธโย ตีสุ สมาธีสุ ปริเยสิตพฺพา, สวิตกฺกสวิจาเร อวิตกฺกวิจารมตฺเต อวิตกฺกอวิจาเร อิทํ ปมาณํ, นตฺถิ จตุตฺโถ สมาธิ. ตถา ติสฺโส ปญฺญา จินฺตามยี สุตมยี ภาวนามยี สพฺพาสุ ปญฺญาสุ นิทฺทิสติ, นตฺถิ จตุตฺถี ปญฺญา น จินฺตามยี น สุตมยี น ภาวนามยี, ปญฺญา นาสฺส อตฺถิ อิเมสํ ธมฺมานํ ยา อวิกฺเขปนา, อิทํ วุจฺจติ ปมาณนฺติ. जे अकुशल आणि कुशल चतुष्क सीहविक्कीळित नयामध्ये निर्देशित केले आहेत, जे कुशल आणि अकुशल त्रिक तिपुक्खल नयामध्ये निर्देशित केले आहेत, आणि जे कुशल आणि अकुशल द्विक नन्दियावट्ट नयामध्ये निर्देशित केले आहेत. ज्या दोन कुशल धर्मांमध्ये तो अर्थ त्रिकांमध्ये विभागला जातो, ती 'भवभूमी' होय. आणि तसेच सर्व अर्थ तीन व्यंजनांद्वारे निर्देशित केले जातात. त्यांना 'तत्तक' असे म्हटले जाते. जो अर्थ चार पदांद्वारे आणि अठ्ठावीस भागांद्वारे 'नित्तिभूमी' निर्देशित करण्यासाठी प्रवृत्त होतो, तो चार पदांद्वारेच निर्देशित केला जातो. अशा प्रकारे, जसे निर्देशित केले आहे तसा विनाश न होणे, हे 'प्रमाण' आहे. ज्याप्रमाणे सर्व समाधींचा शोध तीन समाधींमध्ये घेतला पाहिजे – सवितर्क-सविचार समाधी, अवितर्क-विचारमात्र समाधी आणि अवितर्क-अविचार समाधी; हेच प्रमाण आहे, चौथी समाधी अस्तित्वात नाही. त्याचप्रमाणे, तीन प्रकारच्या प्रज्ञा – चिंतामयी प्रज्ञा, श्रुतमयी प्रज्ञा आणि भावनामयी प्रज्ञा – सर्व प्रज्ञांमध्ये निर्देशित केल्या जातात, चौथी प्रज्ञा अस्तित्वात नाही. जर चिंतामयी नाही, श्रुतमयी नाही आणि भावनामयी नाही, तर त्या व्यक्तीकडे प्रज्ञाच नसते. या धर्मांचे जे अविक्षेपण (विचलित न होणे) आहे, त्याला 'प्रमाण' असे म्हटले जाते. เถรสฺส มหากจฺจายนสฺส ชมฺพุวนวาสิโน เปฏโกปเทโส जंबूवनात राहणाऱ्या महाकात्यायन स्थविरांचा पेटकोपदेश สมตฺโต. समाप्त. เปฏโกปเทสปกรณํ นิฏฺฐิตํ. पेटकोपदेश प्रकरण समाप्त झाले. | |||
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |