| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
1 නමො තස්ස භගවතො අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්ස त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धाला माझा नमस्कार असो. සංයුත්තනිකායෙ संयुत्तनिकायामध्ये මහාවග්ග-අට්ඨකථා महावग्ग-अट्ठकथा 1. මග්ගසංයුත්තං १. मग्गसंयुत्त 1. අවිජ්ජාවග්ගො १. अविज्जावग्ग 1-2. අවිජ්ජාසුත්තාදිවණ්ණනා १-२. अविज्जासुत्तआदि वण्णना 1-2. මහාවග්ගස්ස [Pg.153] පඨමෙ පුබ්බඞ්ගමාති සහජාතවසෙන ච උපනිස්සයවසෙන චාති ද්වීහාකාරෙහි පුබ්බඞ්ගමා. සමාපත්තියාති සමාපජ්ජනාය සභාවපටිලාභාය, උප්පත්තියාති අත්ථො. අන්වදෙව අහිරිකං අනොත්තප්පන්ති සා පනෙසා යදෙතං අලජ්ජනාකාරසණ්ඨිකං අහිරිකං, අභායනාකාරසණ්ඨිතඤ්ච අනොත්තප්පං, එතං අනුදෙව සහෙව එකතොව, න විනා තෙන උප්පජ්ජතීති අත්ථො. අවිජ්ජාගතස්සාති අවිජ්ජාය උපගතස්ස සමන්නාගතස්ස. මිච්ඡාදිට්ඨීති අයාථාවදිට්ඨි අනිය්යානිකදිට්ඨි. පහොතීති හොති උප්පජ්ජති. මිච්ඡාසඞ්කප්පාදීසුපි අයාථාවඅනිය්යානිකවසෙනෙව මිච්ඡාභාවො වෙදිතබ්බො. ඉති ඉමානි අට්ඨපි අකුසලධම්මසමාපත්තියා මිච්ඡත්තඅඞ්ගානි නාම හොන්ති. තානි පන න එකක්ඛණෙ සබ්බානි ලබ්භන්ති, නානක්ඛණෙ ලබ්භන්ති. १-२. महावग्गाच्या पहिल्या सुत्तात 'पुब्बङ्गमा' (अग्रगामी) म्हणजे सहजात शक्तीने आणि उपनिस्सय शक्तीने अशा दोन प्रकारांनी अग्रगामी असणे होय. 'समापत्तिया' म्हणजे प्राप्त होण्यासाठी, स्वतःचा स्वभाव प्राप्त करण्यासाठी, उत्पन्न होण्यासाठी; असा अर्थ समजावा. 'अन्वदेव अहिरिकं अनोत्तप्पं' म्हणजे, ती ही पूर्वी सांगितलेली अकुशल धर्मांची अग्रगामी असणारी अविज्जा (अविद्या) होय; जे पापाची लाज न वाटण्याच्या रूपाने दृढ असलेले 'अहिरिक' (निर्लज्जपणा) आहे आणि पापाची भीती वाटण्याच्या रूपाने दृढ असलेले 'अनोत्तप्प' (भयशून्यता) आहे, ते या अविज्जेच्या मागोमाग, सोबतच, एकत्रच उत्पन्न होते; तिच्याशिवाय उत्पन्न होत नाही, असा अर्थ समजावा. 'अविज्जागतस्स' म्हणजे अविज्जेने ग्रासलेल्या, अविज्जेने युक्त असलेल्या. 'मिच्छादिट्ठि' म्हणजे अयथाभूत दृष्टी (चुकीची दृष्टी), अनिय्यानिक दृष्टी (संसारातून मुक्त न करणारी दृष्टी). 'पहोति' म्हणजे उत्पन्न होते, निर्माण होते. मिच्छासंकप्प (मिथ्या संकल्प) इत्यादींमध्ये सुद्धा अयथाभूत आणि अनिय्यानिक भावानेच मिथ्यात्व समजावे. अशा प्रकारे हे आठही अकुशल धर्मांच्या प्राप्तीसाठी 'मिथ्यात्व अंग' (मिच्छत्त अंगे) म्हणून ओळखले जातात. परंतु, ती सर्व एकाच क्षणी प्राप्त होत नाहीत, तर वेगवेगळ्या क्षणी प्राप्त होतात. කථං? යදා හි දිට්ඨිසම්පයුත්තචිත්තං කායවිඤ්ඤත්තිං සමුට්ඨාපෙන්තං උප්පජ්ජති, තදා මිච්ඡාදිට්ඨි මිච්ඡාසඞ්කප්පො මිච්ඡාවායාමො මිච්ඡාසති මිච්ඡාසමාධි [Pg.154] මිච්ඡාකම්මන්තොති ඡ අඞ්ගානි හොන්ති. යදා දිට්ඨිවිප්පයුත්තං, තදා මිච්ඡාදිට්ඨිවජ්ජානි පඤ්ච. යදා තානෙව ද්වෙ වචීවිඤ්ඤත්තිං සමුට්ඨාපෙන්ති, තදා මිච්ඡාකම්මන්තට්ඨානෙ මිච්ඡාවාචාය සද්ධිං තානෙව ඡ වා පඤ්ච වා. අයං ආජීවො නාම කුප්පමානො කායවචීද්වාරෙසුයෙව අඤ්ඤතරස්මිං කුප්පති, න මනොද්වාරෙ. තස්මා යදා ආජීවසීසෙන තානෙව චිත්තානි කායවචීවිඤ්ඤත්තියො සමුට්ඨාපෙන්ති, තදා කායකම්මං මිච්ඡාජීවො නාම හොති, තථා වචීකම්මන්ති මිච්ඡාජීවස්ස වසෙන තානෙව ඡ වා පඤ්ච වා. යදා පන විඤ්ඤත්තිං අසමුට්ඨාපෙත්වා තානි චිත්තානි උප්පජ්ජන්ති, තදා මිච්ඡාදිට්ඨිමිච්ඡාසඞ්කප්පමිච්ඡාවායාමමිච්ඡාසතිමිච්ඡාසමාධිවසෙන පඤ්ච වා, මිච්ඡාසඞ්කප්පාදිවසෙන චත්තාරි වා හොන්තීති එවං න එකක්ඛණෙ සබ්බානි ලබ්භන්ති, නානක්ඛණෙ ලබ්භන්තීති. कसे? कारण जेव्हा दृष्टीसंप्रयुक्त चित्त (मिच्छादिट्ठियुक्त चित्त) कायविज्ञप्तीला (शारीरिक हालचालींना) उत्पन्न करत उत्पन्न होते, तेव्हा मिच्छादिट्ठि, मिच्छासंकप्प, मिच्छावायाम, मिच्छासति, मिच्छासमाधी आणि मिच्छाकम्मन्त अशी सहा अंगे असतात. जेव्हा दृष्टीविप्रयुक्त (मिच्छादिट्ठिरहित) चित्त असते, तेव्हा मिच्छादिट्ठि वगळून पाच अंगे असतात. जेव्हा तीच दोन्ही चित्ते वचीविज्ञप्तीला (वाचेच्या हालचालींना) उत्पन्न करतात, तेव्हा मिच्छाकम्मन्ताच्या जागी मिच्छावाचेसह तीच सहा किंवा पाच अंगे असतात. हा 'आजीव' (उपजीविका) जेव्हा बिघडतो, तेव्हा तो कायद्वार किंवा वचीद्वार यांपैकी एकाच द्वारात बिघडतो, मनोध्वारात बिघडत नाही. म्हणून जेव्हा आजीविकेला मुख्य करून तीच चित्ते कायविज्ञप्ती आणि वचीविज्ञप्ती उत्पन्न करतात, तेव्हा कायकर्म हे 'मिच्छाआजीव' (मिथ्या आजीव) होते, तसेच वचीकर्म देखील. अशा प्रकारे मिच्छाआजीवाच्या रूपाने तीच सहा किंवा पाच अंगे असतात. परंतु जेव्हा कोणतीही विज्ञप्ती उत्पन्न न करता ती चित्ते उत्पन्न होतात, तेव्हा मिच्छादिट्ठि, मिच्छासंकप्प, मिच्छावायाम, मिच्छासति, मिच्छासमाधी यांच्या रूपाने पाच अंगे असतात, किंवा मिच्छासंकप्प इत्यादींच्या रूपाने चार अंगे असतात. अशा प्रकारे, ती सर्व एकाच क्षणी प्राप्त होत नाहीत, तर वेगवेगळ्या क्षणी प्राप्त होतात. සුක්කපක්ඛෙ විජ්ජාති කම්මස්සකතඤාණං. ඉහාපි සහජාතවසෙන ච උපනිස්සයවසෙන චාති ද්වීහාකාරෙහි පුබ්බඞ්ගමතා වෙදිතබ්බා. හිරොත්තප්පන්ති හිරී ච ඔත්තප්පඤ්ච. තත්ථ ලජ්ජනාකාරසණ්ඨිතා හිරී, භායනාකාරසණ්ඨිතං ඔත්තප්පං. අයමෙත්ථ සඞ්ඛෙපො, විත්ථාරො පන විසුද්ධිමග්ගෙ වුත්තොව. විජ්ජාගතස්සාති විජ්ජාය උපගතස්ස සමන්නාගතස්ස. විද්දසුනොති විදුනො පණ්ඩිතස්ස. සම්මාදිට්ඨීති යාථාවදිට්ඨි නිය්යානිකදිට්ඨි. සම්මාකම්මන්තාදීසුපි එසෙව නයො. ඉති කුසලධම්මසමාපත්තියා ඉමානි අට්ඨඞ්ගානි හොන්ති, තානි ලොකියමග්ගක්ඛණෙ න එකතො සබ්බානි ලබ්භන්ති, ලොකුත්තරමග්ගක්ඛණෙ පන ලබ්භන්ති. තානි ච ඛො පඨමජ්ඣානිකමග්ගෙ, දුතියජ්ඣානිකාදීසු පන සම්මාසඞ්කප්පවජ්ජානි සත්තෙව හොන්ති. सुक्कपक्षात (चांगल्या पक्षात) 'विज्जा' (विद्या) म्हणजे कम्मस्सकता ज्ञान (कर्मस्वकीयता ज्ञान) होय. येथेही सहजात शक्तीने आणि उपनिस्सय शक्तीने अशा दोन प्रकारांनी विज्जेची अग्रगामी असण्याची स्थिती समजावी. 'हिरोत्तप्प' म्हणजे हिरी आणि ओत्तप्प. त्यापैकी, पापाची लाज वाटण्याच्या रूपाने दृढ असणे म्हणजे 'हिरी' होय, आणि पापाची भीती वाटण्याच्या रूपाने दृढ असणे म्हणजे 'ओत्तप्प' होय. हा येथे संक्षेप आहे, विस्तारपूर्वक अर्थ तर विसुद्धिमग्गात सांगितलेलाच आहे. 'विज्जागतस्स' म्हणजे विज्जेने युक्त असलेल्या, विज्जेला प्राप्त झालेल्या. 'विद्दसुनो' म्हणजे विद्वानाचे, पंडिताचे. 'सम्मादिट्ठि' म्हणजे यथाभूत दृष्टी (योग्य दृष्टी), निय्यानिक दृष्टी (संसारातून मुक्त करणारी दृष्टी). सम्माकम्मन्त इत्यादींमध्ये सुद्धा हाच नियम लागू होतो. अशा प्रकारे कुशल धर्मांच्या प्राप्तीसाठी ही आठ अंगे असतात. ती लौकिक मार्गक्षणी एकत्र सर्व प्राप्त होत नाहीत, परंतु लोकोत्तर मार्गक्षणी प्राप्त होतात. आणि ती प्रथमध्यानयुक्त लोकोत्तर मार्गात प्राप्त होतात, परंतु द्वितीय ध्यान इत्यादींमध्ये सम्मासंकप्प वगळून सातच अंगे असतात. තත්ථ යො එවං වදෙය්ය ‘‘යස්මා මජ්ඣිමනිකායම්හි මහාසළායතනිකසුත්තෙ (ම. නි. 3.431) ‘යා තථාභූතස්ස දිට්ඨි, සාස්ස හොති සම්මාදිට්ඨි. යො තථාභූතස්ස, සඞ්කප්පො, ස්වාස්ස හොති සම්මාසඞ්කප්පො. යො තථාභූතස්ස වායාමො, ස්වාස්ස හොති සම්මාවායාමො. යා තථාභූතස්ස සති, ස්වාස්ස හොති සම්මාසති. යො තථාභූතස්ස සමාධි, ස්වාස්ස හොති සම්මාසමාධි. පුබ්බෙව ඛො පනස්ස කායකම්මං වචීකම්මං ආජීවො ච සුපරිසුද්ධො’ති වුත්තං තස්මා පඤ්චඞ්ගිකොපි ලොකුත්තරමග්ගො හොතී’’ති සො වත්තබ්බො – තස්මිංයෙව සුත්තෙ ‘‘එවමස්සායං අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො භාවනාපාරිපූරිං ගච්ඡතී’’ති ඉදං කස්මා න පස්සසි[Pg.155]? යං පනෙතං ‘‘පුබ්බෙව ඛො පනස්සා’’ති වුත්තං, තං පබ්බජිතදිවසතො පට්ඨාය පරිසුද්ධභාවදස්සනත්ථං. පබ්බජිතදිවසතො පට්ඨාය හි පරිසුද්ධානි කායකම්මාදීනි ලොකුත්තරමග්ගක්ඛණෙ අතිපරිසුද්ධානි හොන්තීති අයමත්ථො දීපිතො. त्याविषयी जर कोणी असे म्हणेल की, 'ज्याअर्थी मज्झिमनिकायाच्या महासळायतनिक सुत्तात असे म्हटले आहे की—तथाभूत (यथार्थ जाणणाऱ्या) व्यक्तीची जी दृष्टी असते, ती तिची सम्मादिट्ठि असते. तथाभूत व्यक्तीचा जो संकल्प असतो, तो तिचा सम्मासंकप्प असतो. तथाभूत व्यक्तीचा जो व्यायाम (प्रयत्न) असतो, तो तिचा सम्मावायाम असतो. तथाभूत व्यक्तीची जी सती (स्मृती) असते, ती तिची सम्मासती असते. तथाभूत व्यक्तीची जी समाधी असते, ती तिची सम्मासमाधी असते. आणि पूर्वीच तिचे कायकर्म, वचीकर्म आणि आजीव अत्यंत शुद्ध झालेले असते—म्हणून लोकोत्तर मार्ग पाच अंगांचाच (पंचंगिक) असतो.' तर त्याला असे सांगावे—'त्याच सुत्तात—अशा प्रकारे हा आर्य अष्टांगिक मार्ग भावनेच्या परिपूर्णतेला प्राप्त होतो—हे तू का पाहत नाहीस?' आणि जे हे 'पूर्वीच त्याचे...' असे म्हटले आहे, ते प्रव्रजित झाल्याच्या दिवसापासून चारित्र्य शुद्ध असल्याचे दर्शवण्यासाठी म्हटले आहे. कारण प्रव्रजित झाल्याच्या दिवसापासून शुद्ध असलेले कायकर्म इत्यादी लोकोत्तर मार्गक्षणी अत्यंत शुद्ध होतात, हा अर्थ येथे स्पष्ट केला आहे. යම්පි අභිධම්මෙ වුත්තං ‘‘තස්මිං ඛො පන සමයෙ පඤ්චඞ්ගිකො මග්ගො හොතී’’ති (විභ. 212), තං එකං කිච්චන්තරං දස්සෙතුං වුත්තං. යස්මිඤ්හි කාලෙ මිච්ඡාකම්මන්තං පහාය සම්මාකම්මන්තං පූරෙති, තස්මිං කාලෙ මිච්ඡාවාචා වා මිච්ඡාජීවො වා න හොති, දිට්ඨි සඞ්කප්පො වායාමො සති සමාධීති ඉමෙසුයෙව පඤ්චසු කාරකඞ්ගෙසු සම්මාකම්මන්තො පූරති. විරතිවසෙන හි සම්මාකම්මන්තො පූරති නාම. සම්මාවාචාසම්මාආජීවෙසුපි එසෙව නයො. ඉති ඉමං කිච්චන්තරං දස්සෙතුං එවං වුත්තං. ලොකියමග්ගක්ඛණෙ ච පඤ්චෙව හොන්ති, විරති පන අනියතා. තස්මා ‘‘ඡඅඞ්ගිකො’’ති අවත්වා ‘‘පඤ්චඞ්ගිකො’’ත්වෙව වුත්තං. ‘‘යා ච, භික්ඛවෙ, අරියචිත්තස්ස අනාසවචිත්තස්ස අරියමග්ගසමඞ්ගිනො අරියමග්ගං භාවයතො තීහි කායදුච්චරිතෙහි ආරති විරති පටිවිරති වෙරමණී අකිරියා අකරණං, අයං භික්ඛවෙ සම්මාකම්මන්තො අරියො අනාසවො ලොකුත්තරමග්ගො’’ති (ම. නි. 3.139). එවං පන මහාචත්තාලීසකසුත්තාදීසු අනෙකෙසු සුත්තෙසු සම්මාකම්මන්තාදීනඤ්ච ලොකුත්තරමග්ගස්ස අඞ්ගභාවසිද්ධිතො අට්ඨඞ්ගිකොව ලොකුත්තරමග්ගො හොතීති වෙදිතබ්බොති. ඉමස්මිං සුත්තෙ අයං අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො ලොකියලොකුත්තරමිස්සකොව කථිතො. දුතියං කොසලසංයුත්තෙ වුත්තමෙව. अभिधम्मातही जे म्हटले आहे की, 'त्या वेळी पाच अंगांचा मार्ग (पंचंगिक मार्ग) असतो', ते एका विशिष्ट कार्याचा फरक दर्शवण्यासाठी म्हटले आहे. कारण ज्या वेळी मनुष्य मिच्छाकम्मन्त सोडून सम्माकम्मन्त पूर्ण करतो, त्या वेळी मिच्छावाचा किंवा मिच्छाआजीव नसतो, तर दृष्टी, संकल्प, व्यायाम, सती आणि समाधी या पाच कारक अंगांच्या उपस्थितीतच सम्माकम्मन्त पूर्ण होतो. कारण विरतीच्या (अलिप्ततेच्या) प्रभावानेच सम्माकम्मन्त पूर्ण होतो. सम्मावाचा आणि सम्माआजीव यांच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. अशा प्रकारे हा कार्याचा फरक दर्शवण्यासाठी असे म्हटले आहे. आणि लौकिक मार्गक्षणी पाचच अंगे असतात, कारण विरती ही अनियत (अनिश्चित) असते. म्हणून 'सहा अंगांचा' (षडंगिक) असे न म्हणता 'पाच अंगांचा' (पंचंगिक) असेच म्हटले आहे. 'भिक्खूहो, आर्यचित्त असलेल्या, अनासव (आसवरहित) चित्त असलेल्या, आर्यमार्गाने युक्त असलेल्या आणि आर्यमार्गाची भावना करणाऱ्या व्यक्तीची जी तीन कायदुश्चरित्रांपासून आरती (विरक्ती), विरती, प्रतिविरती, वेरमणी (परहेज), अक्रिया आणि अकरण आहे; भिक्खूहो, यालाच सम्माकम्मन्त नावाचा आर्य, अनासव, लोकोत्तर मार्ग म्हणतात.' अशा प्रकारे महाचत्तालीसक सुत्त इत्यादी अनेक सुत्तांमध्ये सम्माकम्मन्त इत्यादींचे लोकोत्तर मार्गाचे अंग असणे सिद्ध होत असल्यामुळे, लोकोत्तर मार्ग हा अष्टांगिकच असतो, असे समजावे. या सुत्तात हा अष्टांगिक मार्ग लौकिक आणि लोकोत्तर मिश्रित असाच सांगितला आहे. दुसरे सुत्त कोसलसंयुत्तात सांगितल्याप्रमाणेच आहे. 3. සාරිපුත්තසුත්තවණ්ණනා ३. सारिपुत्तसुत्त वण्णना 3. තතියෙ සකලමිදං භන්තෙති ආනන්දත්ථෙරො සාවකපාරමීඤාණස්ස මත්ථකං අප්පත්තතාය සකලම්පි මග්ගබ්රහ්මචරියං කල්යාණමිත්තසන්නිස්සයෙන ලබ්භතීති න අඤ්ඤාසි, ධම්මසෙනාපති පන සාවකපාරමීඤාණස්ස මත්ථකෙ ඨිතත්තා අඤ්ඤාසි, තස්මා එවමාහ. තෙනෙවස්ස භගවා සාධු සාධූති සාධුකාරමදාසි. ३. तिसऱ्या सुत्तात 'सकलमिदं भन्ते' (हे सर्व, भंते) याविषयी—थेर आनंद हे श्रावकपारमी ज्ञानाच्या शिखरावर पोहोचले नसल्यामुळे, संपूर्ण मार्गब्रह्मचर्य हे कल्याणमित्राच्या आश्रयानेच प्राप्त होते, हे जाणू शकले नाहीत. परंतु धम्मसेनापती (सारिपुत्त थेर) हे श्रावकपारमी ज्ञानाच्या शिखरावर स्थित असल्यामुळे हे जाणत होते, म्हणून त्यांनी असे म्हटले. म्हणूनच भगवंतांनी त्यांना 'साधू, साधू' म्हणून साधुकार (प्रशंसा) दिला. 4. ජාණුස්සොණිබ්රාහ්මණසුත්තවණ්ණනා ४. जाणुस्सोणिब्राह्मणसुत्ताचे स्पष्टीकरण (वण्णना) 4. චතුත්ථෙ [Pg.156] සබ්බසෙතෙන වළවාභිරථෙනාති සකලසෙතෙන චතූහි වළවාහි යුත්තරථෙන. සො කිර සබ්බො සචක්කපඤ්ජරකුබ්බරො රජතපරික්ඛිත්තො හොති. රථො ච නාමෙස දුවිධො හොති – යොධරථො, අලඞ්කාරරථොති. තත්ථ යොධරථො චතුරස්සසණ්ඨානො හොති නාතිමහා ද්වින්නං තිණ්ණං වා ජනානං ගහණසමත්ථො. අලඞ්කාරරථො මහා හොති දීඝතො දීඝො පුථුලතො පුථුලො ච, තත්ථ ඡත්තග්ගාහකො වාලබීජනිග්ගාහකො තාලවණ්ටග්ගාහකොති එවං අට්ඨ වා දස වා සුඛෙනෙව ඨාතුං වා නිසීදිතුං වා නිපජ්ජිතුං වා සක්කොන්ති. අයම්පි අලඞ්කාරරථොයෙව. ४. चौथ्या सुत्तात 'सब्बसेतेन वळवाभिरथेन' म्हणजे पूर्णपणे पांढऱ्या रंगाच्या चार घोडींनी जोडलेल्या रथाने. तो संपूर्ण रथ, चाके, सांगाडा आणि जू यांसह चांदीने मढवलेला होता असे म्हणतात. रथ हे दोन प्रकारचे असतात - युद्धरथ आणि अलंकाररथ. त्यापैकी, युद्धरथ हा चौकोनी आकाराचा असतो, फार मोठा नसतो आणि दोन किंवा तीन लोकांना वाहून नेण्यास सक्षम असतो. अलंकाररथ हा मोठा असतो, लांबीने लांब आणि रुंदीने रुंद असतो. त्यामध्ये छत्री धरणारा, चवरी ढाळणारा आणि पंखा धरणारा असे आठ किंवा दहा लोक सहजपणे उभे राहू शकतात, बसू शकतात किंवा झोपू शकतात. हा रथ देखील अलंकाररथच होता. සෙතා සුදං අස්සාති තා වළවා පකතියා සෙතවණ්ණාව. සෙතාලඞ්කාරාති පසාධනං තාසං රජතමයං අහොසි. සෙතො රථොති රථොපි වුත්තනයෙනෙව රජතපරික්ඛිත්තත්තා තත්ථ තත්ථ දන්තකම්මඛචිතත්තා ච සෙතොව. සෙතපරිවාරොති යථා අඤ්ඤෙ රථා සීහචම්මපරිවාරාපි හොන්ති, බ්යග්ඝචම්මපරිවාරාපි පණ්ඩුකම්බලපරිවාරාපි හොන්ති, න එවං එස. එස පන ඝනදුකූලෙන පරිවාරිතො අහොසි. සෙතා රස්මියොති රස්මියොපි රජතපනාළිසුපරික්ඛිත්තා. සෙතා පතොදලට්ඨීති පතොදලට්ඨිපි රජතපරික්ඛිත්තා. 'सेता सुदं अस्सा' म्हणजे त्या घोडी नैसर्गिकरीत्याच पांढऱ्या रंगाच्या होत्या. 'सेतालंकारा' म्हणजे त्यांचे अलंकार चांदीचे बनलेले होते. 'सेतो रथो' म्हणजे रथ देखील वर सांगितल्याप्रमाणे चांदीने मढवलेला असल्यामुळे आणि जागोजागी हस्तिदंताच्या कामाने सुशोभित केलेला असल्यामुळे पांढराच दिसत होता. 'सेतपरिवारो' म्हणजे जसे इतर रथ सिंहाच्या कातडीने, वाघाच्या कातडीने किंवा लाल घोंगडीने वेढलेले असतात, तसा हा रथ नव्हता. तर हा रथ दाट पांढऱ्या रेशमी कापडाने वेढलेला होता. 'सेता रस्मियो' म्हणजे लगाम देखील चांदीच्या तारांनी गुंफलेल्या होत्या. 'सेता पतोदलट्ठी' म्हणजे चाबकाची काठी देखील चांदीने मढवलेली होती. සෙතං ඡත්තන්ති රථමජ්ඣෙ උස්සාපිතඡත්තම්පි සෙතමෙව අහොසි. සෙතං උණ්හීසන්ති අට්ඨඞ්ගුලවිත්ථාරො රජතමයො උණ්හීසපට්ටො සෙතො. සෙතානි වත්ථානීති වත්ථානිපි සෙතානි ඵෙණපුඤ්ජවණ්ණානි. තෙසු නිවාසනං පඤ්චසතග්ඝනකං, උත්තරාසඞ්ගො සහස්සග්ඝනකො. සෙතා උපාහනාති උපාහනා නාම මග්ගාරුළ්හස්ස වා හොන්ති අටවිං වා පවිසන්තස්ස. අයං පන රථං අභිරුළ්හො, තෙනස්ස තදනුච්ඡවිකො රජතපටිසෙවිතො පාදාලඞ්කාරො නාම එස එවං වුත්තොති වෙදිතබ්බො. සෙතාය සුදං වාලබීජනියාති ඵලිකමයදණ්ඩාය සෙතචමරවාලබීජනියා. න කෙවලඤ්ච එත්තකමෙවස්ස සෙතං අහොසි, සො පන බ්රාහ්මණො සෙතවිලෙපනං විලිම්පි, සෙතමාලං පිළන්ධි, දසසු අඞ්ගුලීසු අඞ්ගුලිමුද්දිකා කණ්ණෙසු කුණ්ඩලානීති එවමාදි අලඞ්කාරොපිස්ස රජතමයොව අහොසි[Pg.157]. පරිවාරබ්රාහ්මණාපිස්ස දසසහස්සමත්තා තථෙව සෙතවත්ථවිලෙපනමාලාලඞ්කාරා අහෙසුං. 'सेतं छत्तं' म्हणजे रथाच्या मध्यभागी उभारलेली छत्री देखील पांढरीच होती. 'सेतं उण्हीसं' म्हणजे आठ बोटे रुंद असलेली, चांदीची बनलेली पगडी पांढरी होती. 'सेतानि वत्थानि' म्हणजे वस्त्रे देखील फेसाच्या पुंजासारखी शुभ्र पांढरी होती. त्यांपैकी नेसण्याचे वस्त्र पाचशे कार्षापण मूल्याचे होते आणि पांघरण्याचे वस्त्र एक हजार कार्षापण मूल्याचे होते. 'सेता उपाहना' म्हणजे पादत्राणे ही सहसा प्रवासाला निघालेल्या किंवा जंगलात प्रवेश करणाऱ्या व्यक्तीसाठी असतात. परंतु हा ब्राह्मण रथात बसलेला असल्यामुळे, त्याला साजेसा चांदीने सुशोभित केलेला पायांचा अलंकार येथे 'पांढरी पादत्राणे' या शब्दाने दर्शवला आहे, असे समजावे. 'सेताय सुदं वालबीजनिया' म्हणजे स्फटिकाची दांडी असलेली पांढऱ्या चवरीची पंखा. केवळ एवढ्याच गोष्टी त्याच्या पांढऱ्या नव्हत्या, तर त्या ब्राह्मणाने पांढरे विलेपन लावले होते, पांढऱ्या फुलांची माळ परिधान केली होती, आणि त्याच्या दहाही बोटांतील अंगठ्या, कानातील कुंडले इत्यादी सर्व अलंकार चांदीचेच बनलेले होते. त्याचे सुमारे दहा हजार अनुयायी ब्राह्मण देखील त्याचप्रमाणे पांढरी वस्त्रे, पांढरे विलेपन, पांढऱ्या माळा आणि पांढरे अलंकार धारण केलेले होते. යං පනෙතං සාවත්ථියා නිය්යායන්තන්ති වුත්තං, තත්රායං නිය්යායනවිභාවනා – සො කිර ඡන්නං ඡන්නං මාසානං එකවාරං නගරං පදක්ඛිණං කරොති – ‘‘ඉතො එත්තකෙහි දිවසෙහි නගරං පදක්ඛිණං කරිස්සතී’’ති පුරෙතරමෙව ඝොසනා කයිරති. තං සුත්වා යෙ නගරතො න පක්කන්තා, තෙ න පක්කමන්ති. යෙපි පක්කන්තා, තෙපි ‘‘පුඤ්ඤවතො සිරිසම්පත්තිං පස්සිස්සාමා’’ති ආගච්ඡන්ති. යං දිවසං බ්රාහ්මණො නගරං අනුවිචරති, තදා පාතොව නගරවීථියො සම්මජ්ජිත්වා වාලිකං ඔකිරිත්වා ලාජපඤ්චමෙහි පුප්ඵෙහි විප්පකිරිත්වා පුණ්ණඝටෙ ඨපෙත්වා කදලියො ච ධජෙ ච උස්සාපෙත්වා සකලනගරං ධූපිතවාසිතං කරොන්ති. आणि जे 'सावत्थिया निय्यायन्तं' (श्रावस्तीतून बाहेर पडताना) असे म्हटले आहे, त्या प्रवासाचे स्पष्टीकरण असे आहे - तो ब्राह्मण दर सहा महिन्यांनी एकदा नगराला प्रदक्षिणा घालत असे. 'आजपासून इतक्या दिवसांनी तो नगराला प्रदक्षिणा घालेल,' अशी दवंडी आधीच पिटवली जात असे. ती दवंडी ऐकून जे लोक नगराबाहेर गेले नव्हते, ते बाहेर जात नसत. आणि जे बाहेर गेले होते, ते देखील 'पुण्यवान पुरुषाचे वैभव आणि ऐश्वर्य पाहू या' म्हणून परत येत असत. ज्या दिवशी तो ब्राह्मण नगरात फिरणार असे, त्या दिवशी सकाळीच नगरातील रस्ते झाडून, त्यावर वाळू पसरवून, लाह्या आणि पाच प्रकारच्या सुगंधी फुलांची उधळण करून, पाण्याचे पूर्ण कलश ठेवून, केळीचे खांब आणि ध्वज उभारून संपूर्ण नगर सुवासिक धूपाने सुवासित केले जात असे. බ්රාහ්මණො පාතොව සීසං න්හායිත්වා පුරෙභත්තං භුඤ්ජිත්වා වුත්තනයෙනෙව සෙතවත්ථාදීහි අත්තානං අලඞ්කරිත්වා පාසාදා ඔරුය්හ රථං අභිරුහති. අථ නං තෙ බ්රාහ්මණා සබ්බසෙතවත්ථවිලෙපනමාලාලඞ්කාරා සෙතච්ඡත්තානි ගහෙත්වා පරිවාරෙන්ති. තතො මහාජනස්ස සන්නිපාතත්ථං පඨමංයෙව තරුණදාරකානං ඵලාඵලානි විකිරන්ති, තදනන්තරං මාසකරූපාදීනි, තදනන්තරං කහාපණෙ විකිරන්ති. මහාජනො සන්නිපතති, උක්කුට්ඨියො චෙව චෙලුක්ඛෙපා ච වත්තන්ති. අථ බ්රාහ්මණො මඞ්ගලිකසොවත්ථිකාදීසු මඞ්ගලානි චෙව සුවත්ථියො ච කරොන්තෙසු මහාසම්පත්තියා නගරං අනුවිචරති. පුඤ්ඤවන්තා මනුස්සා එකභූමිකාදිපාසාදෙ ආරුය්හ සුකපත්තසදිසානි වාතපානකවාටානි විවරිත්වා ඔලොකෙන්ති. බ්රාහ්මණොපි අත්තනො යසසිරිසම්පත්තියා නගරං අජ්ඣොත්ථරන්තො විය දක්ඛිණද්වාරාභිමුඛො හොති. තං සන්ධායෙතං වුත්තං. तो ब्राह्मण सकाळीच डोक्यावरून स्नान करून, दुपारच्या जेवणापूर्वी भोजन करून, वर सांगितल्याप्रमाणे पांढरी वस्त्रे इत्यादींनी स्वतःला सुशोभित करून, महालातून खाली उतरून रथावर आरूढ होत असे. त्यानंतर, पांढरी वस्त्रे, विलेपन, माळा आणि अलंकार धारण केलेले ते इतर ब्राह्मण हातात पांढरी छत्रे घेऊन त्याला वेढून उभे राहत. त्यानंतर, जनसमुदाय गोळा करण्यासाठी, सर्वात आधी लहान मुलांसाठी विविध फळे फेकली जात असत. त्यानंतर माषक (तांब्याची नाणी) इत्यादी आणि त्यानंतर कार्षापण (चांदीची नाणी) फेकली जात असत. मोठा जनसमुदाय एकत्र येत असे, लोक आनंदाने ओरडत आणि आपली वस्त्रे हवेत उडवत असत. मग, मंगल आणि कल्याणकारी घोषणा करणाऱ्या लोकांच्या जयघोषात तो ब्राह्मण मोठ्या वैभवाने नगरात फिरत असे. भाग्यवान लोक एकमजली किंवा बहुमजली महालांवर चढून, पोपटाच्या पंखांसारख्या हिरव्या रंगाच्या खिडक्यांची दारे उघडून पाहत असत. तो ब्राह्मण देखील आपल्या कीर्ती आणि वैभवाने संपूर्ण नगराला व्यापून टाकल्यासारखा दक्षिण दाराकडे जात असे. हेच लक्षात घेऊन ते म्हटले आहे. තමෙනං ජනො දිස්වාති මහාජනො තං රථං දිස්වා. බ්රහ්මන්ති සෙට්ඨාධිවචනමෙතං. බ්රහ්මං වත භො යානන්ති සෙට්ඨයානසදිසං වත භො යානන්ති අයමෙත්ථ අත්ථො. ඉමස්සෙව ඛො එතන්ති, ආනන්ද, මනුස්සා නාම වණ්ණභාණකානං ධනං දත්වා අත්තනො දාරිකානං වණ්ණගීතං ගායාපෙන්ති ‘‘අභිරූපො හොති දස්සනීයො මහද්ධනො මහාභොගො’’ති, න ච තෙන වණ්ණභණනමත්තෙන අභිරූපා වා හොන්ති මහද්ධනා වා, එවමෙව මහාජනො [Pg.158] බ්රාහ්මණස්ස රථං දිස්වා – ‘‘බ්රහ්මං වත භො යාන’’න්ති කිඤ්චාපි එවං වණ්ණං භණති, න පනෙතං යානං වණ්ණභණනමත්තෙනෙව බ්රහ්මයානං නාම හොති. ලාමකඤ්හි එතං ඡවං. පරමත්ථෙන පන ඉමස්සෙව ඛො එතං, ආනන්ද, අරියස්ස අට්ඨඞ්ගිකස්ස මග්ගස්ස අධිවචනං. අයඤ්හි සබ්බදොසවිගමෙන සෙට්ඨො, ඉමිනා ච අරියා නිබ්බානං යන්තීති බ්රහ්මයානං ඉතිපි, ධම්මභූතත්තා යානත්තා ච ධම්මයානං ඉතිපි, අනුත්තරත්තා කිලෙසසඞ්ගාමස්ස ච විජිතත්තා අනුත්තරො සඞ්ගාමවිජයො ඉතිපි වත්තුං වට්ටති. 'तमेनं जनो दिस्वा' म्हणजे जनसमुदायाने त्या रथाला पाहून. 'ब्रह्म' हा श्रेष्ठत्वाचा वाचक शब्द आहे. 'ब्रह्मं वत भो यानं' म्हणजेच 'अरे वा! हे वाहन खरोखरच एका श्रेष्ठ वाहनासारखे आहे!' असा येथे अर्थ आहे. 'इमस्सेव खो एतं' म्हणजे 'हे आनंदा! लोक भाटांना पैसे देऊन आपल्या मुलाबाळांची स्तुती करणारी गाणी गाऊन घेतात की, हा अतिशय रूपवान, दर्शनीय, महाधनी आणि महाभोगी आहे.' परंतु केवळ त्या स्तुतीपाठामुळे ते खरोखर रूपवान किंवा महाधनी बनत नाहीत. त्याचप्रमाणे, लोक त्या ब्राह्मणाचा रथ पाहून 'अरे वा! हे ब्रह्म वाहन आहे!' अशी जरी स्तुती करत असले, तरी केवळ त्या स्तुतीमुळे हा रथ खरोखर 'ब्रह्मयान' बनत नाही. कारण हे वाहन तुच्छ आणि नश्वर आहे. परंतु परमार्थतः, हे आनंदा! हे 'ब्रह्मयान' हे 'आर्य अष्टांगिक मार्गाचेच' नाव आहे. कारण हा मार्ग सर्व दोषांपासून मुक्त असल्यामुळे श्रेष्ठ आहे, आणि या मार्गाने चालून आर्य निर्वाणाला प्राप्त होतात, म्हणून याला 'ब्रह्मयान' असे म्हणणे योग्य आहे. धर्मरूप असल्यामुळे आणि वाहन असल्यामुळे याला 'धम्मयान' असे म्हणणे देखील योग्य आहे. सर्वोत्तम असल्यामुळे आणि क्लेशांच्या युद्धावर विजय मिळवून देणारे असल्यामुळे याला 'अनुत्तर संग्रामविजय' असे म्हणणे देखील योग्य आहे. ඉදානිස්ස නිද්දොසභාවඤ්චෙව සඞ්ගාමවිජයභාවඤ්ච දස්සෙන්තො රාගවිනයපරියොසානාතිආදිමාහ. තත්ථ රාගං විනයමානා පරියොසාපෙති පරියොසානං ගච්ඡති නිප්ඵජ්ජතීති රාගවිනයපරියොසානා. එස නයො සබ්බත්ථ. आता, या मार्गाची निर्दोषता आणि क्लेशांवरील विजय दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी 'रागविनयपरियोसाना' (रागाचा नाश हाच ज्याचा शेवट आहे) इत्यादी शब्द सांगितले आहेत. त्यामध्ये, रागाचा समूळ नाश करून जो अंतिम ध्येयाप्रत पोहोचवतो, पूर्णत्वास नेतो, तो 'रागविनयपरियोसान' होय. हाच नियम सर्व ठिकाणी लागू होतो असे समजावे. යස්ස සද්ධා ච පඤ්ඤා චාති යස්ස අරියමග්ගයානස්ස සද්ධානුසාරිවසෙන සද්ධා, ධම්මානුසාරිවසෙන පඤ්ඤාති ඉමෙ ද්වෙ ධම්මා සදා ධුරං යුත්තා, තත්රමජ්ඣත්තතායුගෙ යුත්තාති අත්ථො. හිරී ඊසාති අත්තනා සද්ධිං අධිවිට්ඨෙන බහිද්ධාසමුට්ඨානෙන ඔත්තප්පෙන සද්ධිං අජ්ඣත්තසමුට්ඨානා හිරී යස්ස මග්ගරථස්ස ඊසා. මනො යොත්තන්ති විපස්සනාචිත්තඤ්ච මග්ගචිත්තඤ්ච යොත්තං. යථා හි රථස්ස වාකාදිමයං යොත්තං ගොණෙ එකාබද්ධෙ කරොති එකසඞ්ගහිතෙ, එවං මග්ගරථස්ස ලොකියවිපස්සනාචිත්තං අතිරෙකපඤ්ඤාස, ලොකුත්තරවිපස්සනාචිත්තං අතිරෙකසට්ඨි කුසලධම්මෙ එකාබද්ධෙ එකසඞ්ගහෙ කරොති. තෙන වුත්තං ‘‘මනො යොත්ත’’න්ති. සති ආරක්ඛසාරථීති මග්ගසම්පයුත්තා සති ආරක්ඛසාරථි. යථා හි රථස්ස ආරක්ඛො සාරථි නාම යොග්ගියො. ධුරං වාහෙති යොජෙති අක්ඛං අබ්භඤ්ජති රථං පෙසෙති රථයුත්තකෙ නිබ්බිසෙවනෙ කරොති, එවං මග්ගරථස්ස සති. අයඤ්හි ආරක්ඛපච්චුපට්ඨානා චෙව කුසලාකුසලානඤ්ච ධම්මානං ගතියො සමන්වෙසතීති වුත්තා. "ज्याची श्रद्धा आणि प्रज्ञा" म्हणजे ज्या आर्यमार्ग रूपी रथाची श्रद्धानुसारि-पुद्गलाच्या सामर्थ्याने 'श्रद्धा' आणि धम्मानुसारि-पुद्गलाच्या सामर्थ्याने 'प्रज्ञा' हे दोन धर्म नेहमी धुरा (जू) मध्ये जोडलेले असतात; 'तत्रमज्झत्तता' (तटस्थता/समता) रूपी जू मध्ये जोडलेले आहेत, असा अर्थ आहे. "ह्री (लज्जा) ही ईषा (रथाची दांडी) आहे" म्हणजे स्वतःशी संलग्न असलेल्या, बाह्य-समुत्थान (बाह्य कारणांनी उत्पन्न होणाऱ्या) ओत्तप्प (पापभिरुता) सोबत, आध्यात्मिक/अंतर्गत-समुत्थान (अंतर्गत कारणांनी उत्पन्न होणारी) ह्री (लज्जा) ही ज्या मार्ग-रथाची ईषा (दांडी) आहे. "मन हे योत्त (दोरी) आहे" म्हणजे विपश्यना चित्त आणि मार्ग चित्त हेच योत्त (दोरी) आहे. ज्याप्रमाणे रथाची वल्कलादी (झाडाच्या साली इत्यादींपासून बनवलेली) दोरी बैलांना एकाच जू मध्ये एकत्र बांधून ठेवते, त्याचप्रमाणे मार्ग-रथाचे लौकिक विपश्यना चित्त पन्नासपेक्षा अधिक आणि लोकोत्तर विपश्यना चित्त साठपेक्षा अधिक कुशल धर्मांना एकाच आरंभावर (ध्येयावर) एकत्र बांधून ठेवते. म्हणून 'मन हे योत्त (दोरी) आहे' असे म्हटले आहे. "स्मृती (सती) ही आरक्षक सारथी आहे" म्हणजे मार्गाशी संप्रयुक्त असलेली स्मृती हीच आरक्षक सारथी आहे. ज्याप्रमाणे रथाचा रक्षक असलेला सारथी हा कुशल असतो, तो धुरा वाहून नेतो, जोडतो, अक्षाला (धुरीला) तेल लावतो, रथाला चालवतो आणि रथाला जोडलेल्या बैलांना अडथळ्यांशिवाय (सरळ मार्गाने) चालवतो, त्याचप्रमाणे मार्ग-रथासाठी स्मृती (सती) कार्य करते. कारण ही (स्मृती) रक्षण करण्याच्या रूपाने उपस्थित राहते आणि कुशल-अकुशल धर्मांच्या गतीचा शोध घेते, असे म्हटले आहे. රථොති අරියඅට්ඨඞ්ගිකමග්ගරථො. සීලපරික්ඛාරොති චතුපාරිසුද්ධිසීලාලඞ්කාරො. ඣානක්ඛොති විපස්සනාසම්පයුත්තානං පඤ්චන්නං ඣානඞ්ගානං වසෙන ඣානමයඅක්ඛො. චක්කවීරියොති වීරියචක්කො, කායිකචෙතසිකසඞ්ඛාතානි ද්වෙ වීරියානි අස්ස චක්කානීති අත්ථො. උපෙක්ඛා ධුරසමාධීති [Pg.159] ධුරස්ස සමාධි, උන්නතොනතාකාරස්ස අභාවෙන ද්වින්නම්පි යුගපදෙසානං සමතාති අත්ථො. අයඤ්හි තත්රමජ්ඣත්තුපෙක්ඛා චිත්තුප්පාදස්ස ලීනුද්ධච්චභාවං හරිත්වා පයොගමජ්ඣත්තෙ චිත්තං ඨපෙති, තස්මා ඉමස්ස මග්ගරථස්ස ‘‘ධුරසමාධී’’ති වුත්තා. අනිච්ඡා පරිවාරණන්ති බාහිරකරථස්ස සීහචම්මාදීනි විය ඉමස්සාපි අරියමග්ගරථස්ස අලොභසඞ්ඛාතා අනිච්ඡා පරිවාරණං නාම. "रथ" म्हणजे आर्य अष्टांगिक मार्ग रूपी रथ. "शील-परिकार" म्हणजे चतुपारिसुद्धि शील रूपी अलंकार. "ध्यान-अक्ष" म्हणजे विपश्यनेशी संप्रयुक्त असलेल्या पाच ध्यान-अंगांच्या सामर्थ्याने ध्यानमय अक्ष (धुरी). "चक्र-वीर्य" म्हणजे वीर्य रूपी चाके; कायिक आणि चैतसिक असे म्हटलेले दोन प्रकारचे वीर्य हे या रथाची चाके आहेत, असा अर्थ आहे. "उपेक्षा धुर-समाधी" म्हणजे धुरेची समता; चढ-उताराचा अभाव असल्यामुळे दोन्ही बाजूंच्या जूच्या भागांची समता असणे, असा अर्थ आहे. कारण ही तत्रमज्झत्तुपेक्षा चित्ताच्या उत्पत्तीमधील लीनता (आळस) आणि उद्धच्च (चंचलता) दूर करून चित्ताला प्रयोगाच्या मध्यस्थतेत (संतुलनात) स्थापित करते, म्हणून या मार्ग-रथासाठी 'धुर-समाधी' असे म्हटले आहे. "अनिच्छा परिवारण" म्हणजे ज्याप्रमाणे बाह्य रथाला सिंहाचे चामडे इत्यादींचे आवरण असते, त्याचप्रमाणे या आर्यमार्ग रूपी रथाला अलोभ रूपी अनिच्छा (इच्छा नसणे) हे आवरण (संरक्षण) आहे. අබ්යාපාදොති මෙත්තා ච මෙත්තාපුබ්බභාගො ච. අවිහිංසාති කරුණා ච කරුණාපුබ්බභාගො ච. විවෙකොති කායවිවෙකාදි තිවිධවිවෙකො. යස්ස ආවුධන්ති යස්ස අරියමග්ගරථෙ ඨිතස්ස කුලපුත්තස්ස එතං පඤ්චවිධං ආවුධං. යථා හි රථෙ ඨිතො පඤ්චහි ආවුධෙහි සපත්තෙ විජ්ඣති, එවං යොගාවචරොපි ඉමස්මිං ලොකියලොකුත්තරමග්ගරථෙ ඨිතො මෙත්තාය දොසං විජ්ඣති, කරුණාය විහිංසං, කායවිවෙකෙන ගණසඞ්ගණිකං, චිත්තවිවෙකෙන කිලෙසසඞ්ගණිකං, උපධිවිවෙකෙන සබ්බාකුසලං විජ්ඣති. තෙනස්සෙතං පඤ්චවිධං ‘‘ආවුධ’’න්ති වුත්තං. තිතික්ඛාති දුරුත්තානං දුරාගතානං වචනපථානං අධිවාසනක්ඛන්ති. චම්මසන්නාහොති සන්නද්ධචම්මො. යථා හි රථෙ ඨිතො රථිකො පටිමුක්කචම්මො ආගතාගතෙ සරෙ ඛමති, න නං තෙ විජ්ඣන්ති, එවං අධිවාසනක්ඛන්තිසමන්නාගතො භික්ඛු ආගතාගතෙ වචනපථෙ ඛමති, න නං තෙ විජ්ඣන්ති. තස්මා ‘‘තිතික්ඛා චම්මසන්නාහො’’ති වුත්තො. යොගක්ඛෙමාය වත්තතීති චතූහි යොගෙහි ඛෙමාය නිබ්බානාය වත්තති, නිබ්බානාභිමුඛො ගච්ඡතියෙව, න තිට්ඨති න භිජ්ජතීති අත්ථො. "अव्यापाद" म्हणजे मैत्री आणि मैत्रीचा पूर्वभाग (उपचार ध्यान). "अविहिंसा" म्हणजे करुणा आणि करुणेचा पूर्वभाग. "विवेक" म्हणजे काय-विवेक इत्यादी तीन प्रकारचे विवेक. "ज्याचे शस्त्र" म्हणजे ज्या आर्यमार्ग रूपी रथावर आरूढ झालेल्या कुलपुत्राचे हे पाच प्रकारचे शस्त्र आहे. ज्याप्रमाणे रथावर आरूढ झालेला योद्धा पाच शस्त्रांनी शत्रूंना वेधतो (पराभूत करतो), त्याचप्रमाणे योगावचर देखील या लौकिक व लोकोत्तर मार्ग-रथावर आरूढ होऊन मैत्रीने द्वेषाला वेधतो (नष्ट करतो), करुणेने हिंसेला, काय-विवेकाने समूहाच्या आसक्तीला, चित्त-विवेकाने क्लेशांच्या आसक्तीला आणि उपधी-विवेकाने सर्व अकुशलाला वेधतो. म्हणून त्याचे हे पाच प्रकारचे 'शस्त्र' आहे असे म्हटले आहे. "तितिक्षा" म्हणजे वाईट रीतीने बोललेल्या आणि चुकीच्या पद्धतीने आलेल्या वचनांना सहन करण्याची क्षमा (सहनशीलता). "चर्म-सन्नाह" म्हणजे चामड्याचे कवच धारण करणे. ज्याप्रमाणे रथावर आरूढ झालेला योद्धा चामड्याचे कवच परिधान करून आलेल्या बाणांना सहन करतो आणि ते बाण त्याला वेधू शकत नाहीत, त्याचप्रमाणे सहनशीलतेने युक्त असलेला भिक्खू आलेल्या कटू वचनांना सहन करतो आणि ती वचने त्याला वेधू (दुखावू) शकत नाहीत. म्हणून 'तितिक्षा हे चर्म-कवच आहे' असे म्हटले आहे. "योगक्षेमासाठी प्रवृत्त होतो" म्हणजे चार योगांपासून (बंधनांपासून) मुक्त अशा निर्वाणासाठी प्रवृत्त होतो; तो निर्वाणाभिमुख होऊन पुढेच जातो, थांबत नाही आणि विचलित होत नाही, असा अर्थ आहे. එතදත්තනි සම්භූතන්ති එතං මග්ගයානං අත්තනො පුරිසකාරං නිස්සාය ලද්ධත්තා අත්තනි සම්භූතං නාම හොති. බ්රහ්මයානං අනුත්තරන්ති අසදිසං සෙට්ඨයානං. නිය්යන්ති ධීරා ලොකම්හාති යෙසං එතං යානං අත්ථි, තෙ ධීරා පණ්ඩිතපුරිසා ලොකම්හා නිය්යන්ති ගච්ඡන්ති. අඤ්ඤදත්ථූති එකංසෙන. ජයං ජයන්ති රාගාදයො සපත්තෙ ජිනන්තා ජිනන්තා. "हे स्वतःमध्ये उत्पन्न झालेले" म्हणजे हे मार्ग-यान स्वतःच्या पुरुषार्थाचा (प्रयत्नाचा) आश्रय घेऊन प्राप्त झाल्यामुळे 'स्वतःमध्ये उत्पन्न झालेले' असे म्हटले जाते. "अनुत्तर ब्रह्मयान" म्हणजे अतुलनीय आणि श्रेष्ठ यान (वाहन). "धीर लोक जगातून बाहेर पडतात" म्हणजे ज्यांच्याकडे हे यान आहे, ते धीर आणि पंडित पुरुष या जगातून बाहेर पडतात (मुक्त होतात). "अञ्ञदत्थु" म्हणजे निश्चितपणे. "विजय मिळवतात" म्हणजे राग इत्यादी शत्रूंवर वारंवार विजय मिळवून ते विजयी होतात. 5-6. කිමත්ථියසුත්තාදිවණ්ණනා ५-६. किमत्यिय-सुत्त इत्यादींचे वर्णन. 5-6. පඤ්චමෙ අයමෙවාති එවසද්දො නියමත්ථො. තෙන අඤ්ඤං මග්ගං පටික්ඛිපති. ඉමස්මිං සුත්තෙ වට්ටදුක්ඛඤ්චෙව මිස්සකමග්ගො ච කථිතො. ඡට්ඨං උත්තානමෙව. ५-६. पाचव्या सुत्तात 'अयमेव' मधील 'एव' शब्द नियमार्थक (निश्चयवाचक) आहे. त्याद्वारे इतर मार्गाचा निषेध केला जातो. या सुत्तात संसार-दुःख आणि मिश्र-मार्ग दोन्ही सांगितले आहेत. सहावे सुत्त अगदी स्पष्टच आहे. 7. දුතියඅඤ්ඤතරභික්ඛුසුත්තවණ්ණනා ७. दुसऱ्या अञ्ञतरभिक्खू-सुत्ताचे वर्णन. 7. සත්තමෙ [Pg.160] නිබ්බානධාතුයා ඛො එතං භික්ඛු අධිවචනන්ති අසඞ්ඛතාය අමතාය නිබ්බානධාතුයා එතං අධිවචනං. ආසවානං ඛයො තෙන වුච්චතීති අපිච තෙන රාගාදිවිනයෙන ආසවානං ඛයොතිපි වුච්චති. ආසවක්ඛයො නාම අරහත්තං, අරහත්තස්සාපි එතං රාගවිනයොතිආදි නාමමෙවාති දීපෙති. එතදවොචාති ‘‘සත්ථාරා නිබ්බානධාතූති වදන්තෙන අමතං නිබ්බානං කථිතං, මග්ගො පනස්ස න කථිතො. තං කථාපෙස්සාමී’’ති අනුසන්ධිකුසලතාය පුච්ඡන්තො එතං අවොච. ७. सातव्या सुत्तात "हे भिक्खू, हे निर्वाणधातूचे नाव आहे" म्हणजे असंस्कृत आणि अमृत अशा निर्वाणधातूचे हे नाव (अधिवाचन) आहे. "त्याद्वारे आसवांचा क्षय असे म्हटले जाते" म्हणजे, शिवाय, त्या राग-विनय (रागाचा नाश) इत्यादी शब्दांद्वारे आसवांचा क्षय देखील म्हटला जातो. आसव-क्षय म्हणजे अर्हत्त्व होय; अर्हत्त्वाचे देखील 'राग-विनय' इत्यादी हे नावच आहे, असे स्पष्ट केले आहे. "असे म्हणाले" म्हणजे शास्त्यांनी (बुद्धांनी) 'निर्वाणधातू' असे सांगताना अमृत निर्वाण तर सांगितले, परंतु त्याचा मार्ग सांगितला नाही. 'तो मार्ग मी त्यांना विचारायला लावीन' अशा प्रकारे अनुसंधी (संदर्भ जोडण्यात) कुशल असल्यामुळे विचारताना त्यांनी असे म्हटले. 8. විභඞ්ගසුත්තවණ්ණනා ८. विभंग-सुत्ताचे वर्णन. 8. අට්ඨමෙ කතමා ච භික්ඛවෙ සම්මාදිට්ඨීති එකෙන පරියායෙන අට්ඨඞ්ගිකමග්ගං විභජිත්වා පුන අපරෙන පරියායෙන විභජිතුකාමො ඉදං දෙසනං ආරභි. තත්ථ දුක්ඛෙ ඤාණන්ති සවනසම්මසනපටිවෙධපච්චවෙක්ඛණවසෙන චතූහාකාරෙහි උප්පන්නං ඤාණං. සමුදයෙපි එසෙව නයො. සෙසෙසු පන ද්වීසු සම්මසනස්ස අභාවා තිවිධමෙව වට්ටති. එවමෙතං ‘‘දුක්ඛෙ ඤාණ’’න්තිආදිනා චතුසච්චකම්මට්ඨානං දස්සිතං. ८. आठव्या सुत्तात "आणि भिक्खूहो, सम्यक दृष्टी कोणती?" म्हणजे एका पर्यायाने अष्टांगिक मार्गाचे विभाजन करून, पुन्हा दुसऱ्या पर्यायाने त्याचे विभाजन करण्याची इच्छा धरून ही देशना सुरू केली. त्यात "दुःखाविषयीचे ज्ञान" म्हणजे श्रवण, संमर्शन (चिंतन), प्रतिवेध (साक्षात्कार) आणि प्रत्यवेक्षण (पुनरावलोकन) यांच्याद्वारे चार प्रकारे उत्पन्न झालेले ज्ञान होय. समुदयाच्या (दुःखसमुदयाच्या) बाबतीतही हाच नियम आहे. परंतु उर्वरित दोन (निरोध आणि मार्ग) मध्ये संमर्शन (चिंतन) नसल्यामुळे केवळ तीनच प्रकार योग्य ठरतात. अशा प्रकारे, 'दुःखाविषयीचे ज्ञान' इत्यादींद्वारे चार आर्यसत्यांचे कर्मस्थान (ध्यानविषय) दर्शवले आहे. තත්ථ පුරිමානි ද්වෙ සච්චානි වට්ටං, පච්ඡිමානි විවට්ටං. තෙසු භික්ඛුනො වට්ටෙ කම්මට්ඨානාභිනිවෙසො හොති, විවට්ටෙ නත්ථි අභිනිවෙසො. පුරිමානි හි ද්වෙ සච්චානි ‘‘පඤ්චක්ඛන්ධා දුක්ඛං, තණ්හා සමුදයො’’ති එවං සඞ්ඛෙපෙන ච, ‘‘කතමෙ පඤ්චක්ඛන්ධා රූපක්ඛන්ධො’’තිආදිනා නයෙන විත්ථාරෙන ච ආචරියසන්තිකෙ උග්ගණ්හිත්වා වාචාය පුනප්පුනං පරිවත්තෙන්තො යොගාවචරො කම්මං කරොති. ඉතරෙසු පන ද්වීසු සච්චෙසු – ‘‘නිරොධසච්චං ඉට්ඨං කන්තං මනාපං, මග්ගසච්චං ඉට්ඨං කන්තං මනාප’’න්ති එවං සවනෙනෙව කම්මං කරොති. සො එවං කරොන්තො චත්තාරි සච්චානි එකපටිවෙධෙන පටිවිජ්ඣති, එකාභිසමයෙන අභිසමෙති. දුක්ඛං පරිඤ්ඤාපටිවෙධෙන පටිවිජ්ඣති, සමුදයං පහානපටිවෙධෙන, නිරොධං සච්ඡිකිරියපටිවෙධෙන, මග්ගං භාවනාපටිවෙධෙන පටිවිජ්ඣති. දුක්ඛං පරිඤ්ඤාභිසමයෙන…පෙ… මග්ගං භාවනාභිසමයෙන අභිසමෙති. त्या चार सत्यांपैकी पहिली दोन सत्ये 'वट्ट' (संसारचक्र) आहेत आणि नंतरची दोन 'विवट्ट' (संसारमुक्ती) आहेत. त्यामध्ये, भिक्खूचा वट्टामध्ये कम्मट्ठान-अभिनिवेश (कर्मस्थान-मनोयोग) असतो, विवट्टामध्ये अभिनिवेश नसतो. कारण पहिली दोन सत्ये 'पाच स्कंध हे दुःख आहे, तण्हा (तृष्णा) हा समुदाय आहे' अशा प्रकारे संक्षेपाने, आणि 'पाच स्कंध कोणते? रूपस्कंध...' इत्यादी पद्धतीने विस्ताराने आचार्यांच्या सन्निध शिकून, वाणीने वारंवार त्याची उजळणी करत योगावचर (साधक) अभ्यास करतो. परंतु इतर दोन सत्यांच्या बाबतीत—'निरोधसत्य हे इष्ट, कांत आणि मनाप (मनोहर) आहे; मार्गसत्य हे इष्ट, कांत आणि मनाप आहे' अशा प्रकारे केवळ ऐकण्यानेच (श्रवणानेच) तो अभ्यास करतो. तो अशा प्रकारे करत असताना चार सत्यांना एकाच प्रतिवेधाने (साक्षात्काराने) जाणतो, एकाच अभिसमयाने (पूर्ण ज्ञानाने) प्राप्त करतो. तो दुःखाला परिज्ञा-प्रतिवेधाने (पूर्ण आकलनाने) जाणतो, समुदायाला प्रहाण-प्रतिवेधाने (त्यागाने), निरोधाला सच्चिकिरिया-प्रतिवेधाने (प्रत्यक्ष साक्षात्काराने) आणि मार्गाला भावना-प्रतिवेधाने (अभ्यासाने) जाणतो. तो दुःखाला परिज्ञा-अभिसमयाने... पे... मार्गाला भावना-अभिसमयाने प्राप्त करतो. එවමස්ස පුබ්බභාගෙ ද්වීසු සච්චෙසු උග්ගහපරිපුච්ඡාසවනධාරණසම්මසනපටිවෙධො හොති, ද්වීසු සවනපටිවෙධොයෙව. අපරභාගෙ තීසු [Pg.161] කිච්චතො පටිවෙධො හොති, නිරොධෙ ආරම්මණපටිවෙධො. පච්චවෙක්ඛණා පන පත්තසච්චස්ස හොති. ඉමස්ස භික්ඛුනො පුබ්බෙ පරිග්ගහතො – ‘‘දුක්ඛං පරිජානාමි, සමුදයං පජහාමි, නිරොධං සච්ඡිකරොමි, මග්ගං භාවෙමී’’ති ආභොගසමන්නාහාරමනසිකාරපච්චවෙක්ඛණා නත්ථි, පරිග්ගහතො පට්ඨාය හොති. අපරභාගෙ පන දුක්ඛං පරිඤ්ඤාතමෙව හොති…පෙ… මග්ගො භාවිතොව හොති. अशा प्रकारे, त्या साधकाच्या पूर्वभागात (प्रारंभिक अवस्थेत) दोन सत्यांच्या (दुःख आणि समुदाय) बाबतीत उद्ग्रह (शिकणे), परिपृच्छा (विचारणे), श्रवण (ऐकणे), धारण (लक्षात ठेवणे), संमसन (परीक्षण) आणि प्रतिवेध होतो; आणि इतर दोन सत्यांच्या बाबतीत केवळ श्रवण-प्रतिवेधच होतो. नंतरच्या भागात (मार्गक्षणी) तीन सत्यांच्या बाबतीत कृत्याद्वारे (कार्याद्वारे) प्रतिवेध होतो, आणि निरोध सत्याच्या बाबतीत आलंबन-प्रतिवेध (आलंबन म्हणून साक्षात्कार) होतो. परंतु प्रत्यवेक्षण (पुनरावलोकन) हे सत्य प्राप्त केलेल्या (आर्य) व्यक्तीचेच होते. या भिक्खूच्या बाबतीत, कम्मट्ठान ग्रहण करण्यापूर्वी—'मी दुःख परिज्ञात करतो, समुदायाचा त्याग करतो, निरोधाचा साक्षात्कार करतो, मार्गाची भावना करतो'—असा आभोग (लक्ष देणे), समन्नाहार (मनात आणणे), मनसिकार आणि प्रत्यवेक्षण नसते; परंतु कम्मट्ठान ग्रहण केल्यापासून ते होते. नंतरच्या भागात मात्र दुःख हे परिज्ञातच असते... पे... मार्ग हा भावितच (अभ्यासिलेलाच) असतो. තත්ථ ද්වෙ සච්චානි දුද්දසත්තා ගම්භීරානි, ද්වෙ ගම්භීරත්තා දුද්දසානි. දුක්ඛසච්චඤ්හි උප්පත්තිතො පාකටං, ඛාණුකණ්ටකපහාරාදීසු ‘‘අහො දුක්ඛ’’න්ති වත්තබ්බතම්පි ආපජ්ජති. සමුදයම්පි ඛාදිතුකාමතාභුඤ්ජිතුකාමතාදිවසෙන උප්පත්තිතො පාකටං. ලක්ඛණපටිවෙධතො පන උභයම්පි ගම්භීරං. ඉති තානි දුද්දසත්තා ගම්භීරානි. ඉතරෙසං ද්වින්නං දස්සනත්ථාය පයොගො භවග්ගග්ගහණත්ථං හත්ථපසාරණං විය අවීචිඵුසනත්ථං පාදපසාරණං විය සතධා භින්නස්ස වාලස්ස කොටියා කොටිං පටිපාදනං විය ච හොති. ඉති තානි ගම්භීරත්තා දුද්දසානි. එවං දුද්දසත්තා ගම්භීරෙසු ගම්භීරත්තා ච දුද්දසෙසු චතූසු සච්චෙසු උග්ගහාදිවසෙන ඉදං ‘‘දුක්ඛෙ ඤාණ’’න්තිආදි වුත්තං. පටිවෙධක්ඛණෙ පන එකමෙව තං ඤාණං හොති. त्या सत्यांपैकी दोन सत्ये (दुःख आणि समुदाय) ही दुर्दर्श (पाहण्यास कठीण) असल्यामुळे गंभीर (खोल) आहेत, आणि दोन सत्ये (निरोध आणि मार्ग) ही गंभीर असल्यामुळे दुर्दर्श आहेत. कारण दुःखसत्य हे उत्पत्तीच्या (अनुभवाच्या) दृष्टीने प्रकट आहे; खुंट किंवा काटा टोचणे इत्यादी प्रसंगी 'अरेरे, काय हे दुःख!' असे बोलले जाण्याला ते प्राप्त होते. समुदायसत्य देखील खाण्याची इच्छा, भोगण्याची इच्छा इत्यादींच्या रूपाने उत्पत्तीच्या दृष्टीने प्रकट आहे. परंतु लक्षणाच्या प्रतिवेधाच्या (साक्षात्काराच्या) दृष्टीने ही दोन्ही सत्ये गंभीर आहेत. म्हणून ती दुर्दर्श असल्यामुळे गंभीर आहेत. इतर दोन सत्यांच्या दर्शनासाठी केलेला प्रयत्न हा भवाग्र (संसाराचे सर्वोच्च टोक) पकडण्यासाठी हात पसरण्यासारखा, किंवा अवीची नरकाला स्पर्श करण्यासाठी पाय पसरण्यासारखा, आणि शंभर तुकडे केलेल्या केसाच्या एका टोकावर दुसरे टोक ठेवण्यासारखा असतो. म्हणून ती गंभीर असल्यामुळे दुर्दर्श आहेत. अशा प्रकारे, दुर्दर्श असल्यामुळे गंभीर आणि गंभीर असल्यामुळे दुर्दर्श असलेल्या चार सत्यांच्या बाबतीत उद्ग्रह इत्यादींच्या द्वारे 'हे दुःखाचे ज्ञान आहे' इत्यादी सांगितले गेले आहे. परंतु प्रतिवेधक्षणी (साक्षात्काराच्या क्षणी) ते ज्ञान एकच असते. නෙක්ඛම්මසඞ්කප්පාදීසු කාමපච්චනීකට්ඨෙන කාමතො නිස්සටභාවෙන වා, කාමං සම්මසන්තස්ස උප්පන්නොති වා, කාමපදඝාතං කාමවූපසමං කරොන්තො උප්පන්නොති වා, කාමවිවිත්තන්තෙ උප්පන්නොති වා නෙක්ඛම්මසඞ්කප්පො. සෙසපදද්වයෙපි එසෙව නයො. සබ්බෙපි ච තෙ නෙක්ඛම්මසඞ්කප්පාදයො කාමබ්යාපාදවිහිංසාවිරමණසඤ්ඤානං නානත්තා පුබ්බභාගෙ නානා, මග්ගක්ඛණෙ පන ඉමෙසු තීසු ඨානෙසු උප්පන්නස්ස අකුසලසඞ්කප්පස්ස පදච්ඡෙදතො අනුප්පත්තිසාධනවසෙන මග්ගඞ්ගං පූරයමානො එකොව කුසලසඞ්කප්පො උප්පජ්ජති. අයං සම්මාසඞ්කප්පො නාම. नेक्खम्मसंकल्प (नैष्क्रम्य संकल्प) इत्यादींमध्ये—कामाच्या (वासनेच्या) विरुद्ध स्वरूपाचे असल्यामुळे किंवा कामापासून मुक्त होण्याच्या भावाने, किंवा कामाचे (वासनेचे) परीक्षण करणाऱ्याला उत्पन्न होतो म्हणून, किंवा कामाचा नाश व कामाचा उपशम करताना उत्पन्न होतो म्हणून, किंवा कामापासून विविक्त (मुक्त) अवस्थेत उत्पन्न होतो म्हणून तो 'नेक्खम्मसंकल्प' होय. उर्वरित दोन पदांच्या (अव्यापाद संकल्प आणि अविहिंसा संकल्प) बाबतीतही हाच नियम समजावा. आणि ते सर्व नेक्खम्मसंकल्प इत्यादी, काम, व्यापाद आणि विहिंसेपासून विरती घेणाऱ्या संज्ञांच्या भिन्नतेमुळे पूर्वभागात (प्रारंभिक अवस्थेत) भिन्न असतात; परंतु मार्गक्षणी या तीन स्थानांमध्ये उत्पन्न होणाऱ्या अकुशल संकल्पाचा मूलोच्छेद करून, ते पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या सिद्धतेद्वारे मार्गांगाची पूर्तता करत एकच कुशल संकल्प उत्पन्न होतो. याला 'सम्मासंकल्प' (सम्यक् संकल्प) असे म्हणतात. මුසාවාදා වෙරමණීආදයොපි මුසාවාදාදීහි විරමණසඤ්ඤානං නානත්තා පුබ්බභාගෙ නානා, මග්ගක්ඛණෙ පන ඉමෙසු චතූසු ඨානෙසු උප්පන්නාය [Pg.162] අකුසලදුස්සීල්යචෙතනාය පදච්ඡෙදතො අනුප්පත්තිසාධනවසෙන මග්ගඞ්ගං පූරයමානා එකාව කුසලවෙරමණී උප්පජ්ජති. අයං සම්මාවාචා නාම. मुसावादा (असत्य बोलणे) पासून विरती इत्यादी देखील, मुसावादा इत्यादींपासून विरती घेणाऱ्या संज्ञांच्या भिन्नतेमुळे पूर्वभागात भिन्न असतात; परंतु मार्गक्षणी या चार स्थानांमध्ये उत्पन्न होणाऱ्या अकुशल दुःशील चेतनेचा मूलोच्छेद करून, ती पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या सिद्धतेद्वारे मार्गांगाची पूर्तता करत एकच कुशल विरती उत्पन्न होते. याला 'सम्मावाचा' (सम्यक् वाचा) असे म्हणतात. පාණාතිපාතා වෙරමණී ආදයොපි පාණාතිපාතාදීහි විරමණසඤ්ඤානං නානත්තා පුබ්බභාගෙ නානා, මග්ගක්ඛණෙ පන ඉමෙසු තීසු ඨානෙසු උප්පන්නාය අකුසලදුස්සීල්යචෙතනාය අකිරියතො පදච්ඡෙදතො අනුප්පත්තිසාධනවසෙන මග්ගඞ්ගං පූරයමානා එකාව කුසලවෙරමණී උප්පජ්ජති. අයං සම්මාකම්මන්තො නාම. पाणातिपाता (प्राणघाता) पासून विरती इत्यादी देखील, पाणातिपाता इत्यादींपासून विरती घेणाऱ्या संज्ञांच्या भिन्नतेमुळे पूर्वभागात भिन्न असतात; परंतु मार्गक्षणी या तीन स्थानांमध्ये उत्पन्न होणाऱ्या अकुशल दुःशील चेतनेचा अक्रियात्मकतेने मूलोच्छेद करून, ती पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या सिद्धतेद्वारे मार्गांगाची पूर्तता करत एकच कुशल विरती उत्पन्न होते. याला 'सम्माकम्मंत' (सम्यक् कर्मान्त) असे म्हणतात. මිච්ඡාආජීවන්ති ඛාදනීයභොජනීයාදීනං අත්ථාය පවත්තිතං කායවචීදුච්චරිතං. පහායාති වජ්ජෙත්වා. සම්මාආජීවෙනාති බුද්ධපසත්ථෙන ආජීවෙන. ජීවිකං කප්පෙතීති ජීවිතවුත්තිං පවත්තෙති. සම්මාජීවොපි කුහනාදීහි විරමණසඤ්ඤානං නානත්තා පුබ්බභාගෙ නානා. මග්ගක්ඛණෙ පන ඉමෙසුයෙව සත්තසු ඨානෙසු උප්පන්නාය මිච්ඡාජීවදුස්සීල්යචෙතනාය පදච්ඡෙදතො අනුප්පත්තිසාධනවසෙන මග්ගඞ්ගං පූරයමානා එකාව කුසලවෙරමණී උප්පජ්ජති. අයං සම්මාආජීවො නාම. 'मिच्छाआजीव' (मिथ्या आजीव) म्हणजे खाद्य, भोज्य इत्यादींच्या प्राप्तीसाठी केलेले कायिक व वाचिक दुश्चरित. 'पहाय' म्हणजे वर्ज्य करून. 'सम्माआजीवेन' म्हणजे बुद्धांनी प्रशंसिलेल्या उपजीविकेने. 'जीविकं कप्पेति' म्हणजे उपजीविका चालवणे. सम्माआजीव देखील कुहना (ढोंग) इत्यादींपासून विरती घेणाऱ्या संज्ञांच्या भिन्नतेमुळे पूर्वभागात भिन्न असतो. परंतु मार्गक्षणी या सात स्थानांमध्येच उत्पन्न होणाऱ्या मिथ्या आजीव व दुःशील चेतनेचा मूलोच्छेद करून, ती पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या सिद्धतेद्वारे मार्गांगाची पूर्तता करत एकच कुशल विरती उत्पन्न होते. याला 'सम्माआजीव' (सम्यक् आजीव) असे म्हणतात. අනුප්පන්නානන්ති එකස්මිං භවෙ තථාරූපෙ වා ආරම්මණෙ අත්තනො න උප්පන්නානං, පරස්ස පන උප්පජ්ජමානෙ දිස්වා – ‘‘අහො වත මෙ එවරූපා පාපකා ධම්මා න උප්පජ්ජෙය්යු’’න්ති එවං අනුප්පන්නානං පාපකානං අකුසලානං ධම්මානං අනුප්පාදාය. ඡන්දන්ති තෙසං අකුසලානං අනුප්පාදකපටිපත්තිසාධකං වීරියච්ඡන්දං ජනෙති. වායමතීති වායාමං කරොති. වීරියං ආරභතීති වීරියං පවත්තෙති. චිත්තං පග්ගණ්හාතීති වීරියෙන චිත්තං පග්ගහිතං කරොති. පදහතීති ‘‘කාමං තචො ච න්හාරු ච අට්ඨි ච අවසිස්සතූ’’ති (ම. නි. 2.184) පධානං පවත්තෙති. උප්පන්නානන්ති සමුදාචාරවසෙන අත්තනො උප්පන්නපුබ්බානං. ඉදානි තාදිසෙ න උප්පාදෙස්සාමීති තෙසං පහානාය ඡන්දං ජනෙති. 'अनुप्पन्नानं' (अनुत्पन्नानां) म्हणजे एका जन्मात किंवा तशा प्रकारच्या आलंबनात स्वतःला उत्पन्न न झालेल्या, परंतु इतरांमध्ये ते उत्पन्न होताना पाहून—'अरेरे! माझ्यामध्ये अशा प्रकारचे पापमय धर्म उत्पन्न होऊ नयेत'—अशा प्रकारे अनुत्पन्न असलेल्या पापमय अकुशल धर्मांच्या अनुत्पादासाठी (उत्पन्न न होण्यासाठी). 'छंदं' (छंद) म्हणजे त्या अकुशल धर्मांना उत्पन्न न करणाऱ्या प्रतिपत्तीची (साधनेची) सिद्धी करणारा वीर्य-छंद (प्रयत्नाची तीव्र इच्छा) उत्पन्न करतो. 'वायमति' म्हणजे व्यायाम (प्रयत्न) करतो. 'वीरियं आरभति' म्हणजे वीर्य (प्रयत्न) प्रवृत्त करतो. 'चित्तं पग्गण्हाति' म्हणजे वीर्याने चित्ताला प्रगृहीत (उत्साहित) करतो. 'पदहति' म्हणजे 'भले माझी त्वचा, शिरा आणि हाडेच शिल्लक राहोत' अशा प्रकारे प्रधान (दृढ प्रयत्न) प्रवृत्त करतो. 'उप्पन्नानं' (उत्पन्नानां) म्हणजे वारंवार आचरण केल्यामुळे स्वतःमध्ये पूर्वी उत्पन्न झालेल्या. 'आता मी तशा प्रकारच्या अकुशल धर्मांना उत्पन्न होऊ देणार नाही' अशा प्रकारे त्यांच्या प्रहाणासाठी (त्यागासाठी) छंद उत्पन्न करतो. අනුප්පන්නානං කුසලානන්ති අපටිලද්ධානං පඨමජ්ඣානාදීනං. උප්පන්නානන්ති තෙසංයෙව පටිලද්ධානං. ඨිතියාති පුනප්පුනං උප්පත්තිපබන්ධවසෙන ඨිතත්ථං. අසම්මොසායාති අවිනාසත්ථං. භිය්යොභාවායාති උපරිභාවාය. වෙපුල්ලායාති විපුලභාවාය. පාරිපූරියාති භාවනාය පරිපූරණත්ථං. අයම්පි සම්මාවායාමො [Pg.163] අනුප්පන්නානං අකුසලානං අනුප්පාදනාදිචිත්තනානත්තා පුබ්බභාගෙ නානා. මග්ගක්ඛණෙ පන ඉමෙසුයෙව චතූසු ඨානෙසු කිච්චසාධනවසෙන මග්ගඞ්ගං පූරයමානං එකමෙව කුසලවීරියං උප්පජ්ජති. අයං සම්මාවායාමො නාම. अनुत्पन्न कुशल धर्मांच्या (अनुप्पन्नानं कुसलानं) म्हणजे प्राप्त न झालेल्या प्रथम ध्यान इत्यादींच्या. उत्पन्न झालेल्यांच्या (उप्पन्नानं) म्हणजे प्राप्त झालेल्या त्याच कुशल धर्मांच्या. टिकून राहण्यासाठी (ठितिया) म्हणजे पुन्हा पुन्हा उत्पन्न होण्याच्या प्रवाहाने टिकून राहण्याच्या हेतूने. नष्ट न होण्यासाठी (असंमोसाय) म्हणजे विनाशापासून वाचवण्यासाठी. अधिक वृद्धीसाठी (भिय्योभावाय) म्हणजे उत्तरोत्तर वृद्धीसाठी. विपुलतेसाठी (वेपुल्लाय) म्हणजे विपुल भावासाठी. परिपूर्णतेसाठी (पारिपूरिया) म्हणजे भावनेच्या परिपूर्णतेसाठी. हा सम्यक् व्यायाम देखील अनुत्पन्न अकुशल धर्मांना उत्पन्न न होऊ देणे इत्यादी चित्तांच्या भिन्नतेमुळे पूर्वभागात (प्रारंभिक अवस्थेत) भिन्न-भिन्न असतो. परंतु मार्गक्षणी (मार्गाच्या क्षणी) याच चार स्थानांमध्ये कृत्याचे साधन करण्याच्या रूपाने मार्गांगाला पूर्ण करत एकच कुशल वीर्य उत्पन्न होते. याला सम्यक् व्यायाम म्हणतात. සම්මාසතිපි කායාදිපරිග්ගාහකචිත්තානං නානත්තා පුබ්බභාගෙ නානා, මග්ගක්ඛණෙ පන ඉමෙසු චතූසු ඨානෙසු කිච්චසාධනවසෙන මග්ගඞ්ගං පූරයමානා එකා සති උප්පජ්ජති. අයං සම්මාසති නාම. सम्यक् स्मृती देखील काया इत्यादींचे ग्रहण करणाऱ्या चित्तांच्या भिन्नतेमुळे पूर्वभागात भिन्न असते, परंतु मार्गक्षणी या चार स्थानांमध्ये कृत्याचे साधन करण्याच्या रूपाने मार्गांगाला पूर्ण करत एकच स्मृती उत्पन्न होते. याला सम्यक् स्मृती म्हणतात. ඣානාදීනි පුබ්බභාගෙපි මග්ගක්ඛණෙපි නානා, පුබ්බභාගෙ සමාපත්තිවසෙන නානා, මග්ගක්ඛණෙ නානාමග්ගවසෙන. එකස්ස හි පඨමමග්ගො පඨමජ්ඣානිකො හොති, දුතියමග්ගාදයොපි පඨමජ්ඣානිකා වා දුතියාදීසු අඤ්ඤතරජ්ඣානිකා වා. එකස්ස පඨමමග්ගො දුතියාදීනං අඤ්ඤතරජ්ඣානිකො හොති, දුතියාදයොපි දුතියාදීනං අඤ්ඤතරජ්ඣානිකා වා පඨමජ්ඣානිකා වා. එවං චත්තාරොපි මග්ගා ඣානවසෙන සදිසා වා අසදිසා වා එකච්චසදිසා වා හොන්ති. ध्यान इत्यादी पूर्वभागात देखील आणि मार्गक्षणी देखील भिन्न असतात; पूर्वभागात समापत्तीच्या रूपाने भिन्न असतात, तर मार्गक्षणी वेगवेगळ्या मार्गांच्या रूपाने भिन्न असतात. कारण एका व्यक्तीचा प्रथम मार्ग प्रथम ध्यानाचा असतो, आणि द्वितीय मार्ग इत्यादी देखील प्रथम ध्यानाचे किंवा द्वितीयादी ध्यानांपैकी कोणत्याही एका ध्यानाचे असतात. दुसऱ्या एका व्यक्तीचा प्रथम मार्ग द्वितीयादी ध्यानांपैकी कोणत्याही एका ध्यानाचा असतो, आणि द्वितीय मार्ग इत्यादी देखील द्वितीयादी ध्यानांपैकी कोणत्याही एका ध्यानाचे किंवा प्रथम ध्यानाचे असतात. अशा प्रकारे चारही मार्ग ध्यानाच्या रूपाने समान किंवा असमान किंवा काही प्रमाणात समान असतात. අයං පනස්ස විසෙසො පාදකජ්ඣානනියමෙන හොති. පාදකජ්ඣානනියමෙන හි පඨමජ්ඣානලාභිනො පඨමජ්ඣානා වුට්ඨාය විපස්සන්තස්ස උප්පන්නමග්ගො පඨමජ්ඣානිකො හොති, මග්ගඞ්ගබොජ්ඣඞ්ගානි පනෙත්ථ පරිපුණ්ණානෙව හොන්ති. දුතියජ්ඣානතො වුට්ඨාය විපස්සන්තස්ස උප්පන්නො දුතියජ්ඣානිකො හොති, මග්ගඞ්ගානි පනෙත්ථ සත්ත හොන්ති. තතියජ්ඣානතො වුට්ඨාය විපස්සන්තස්ස උප්පන්නො තතියජ්ඣානිකො, මග්ගඞ්ගානි පනෙත්ථ සත්ත, බොජ්ඣඞ්ගානි ඡ හොන්ති. එස නයො චතුත්ථජ්ඣානතො පට්ඨාය යාව නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනා. परंतु हा विशेष (भेद) पादक ध्यानाच्या नियमाने होतो. कारण पादक ध्यानाच्या नियमाने, प्रथम ध्यान प्राप्त केलेल्या व्यक्तीने प्रथम ध्यानातून उठून विपश्यना केल्यावर उत्पन्न होणारा मार्ग प्रथम ध्यानाचा असतो, आणि येथे मार्गांगे व बोज्झंग पूर्णच असतात. द्वितीय ध्यानातून उठून विपश्यना करणाऱ्याला उत्पन्न होणारा मार्ग द्वितीय ध्यानाचा असतो, आणि येथे मार्गांगे सात असतात. तृतीय ध्यानातून उठून विपश्यना करणाऱ्याला उत्पन्न होणारा मार्ग तृतीय ध्यानाचा असतो, येथे मार्गांगे सात आणि बोज्झंग सहा असतात. हाच नियम चतुर्थ ध्यानापासून सुरू करून नैवसंज्ञानासंज्ञायतन ध्यानापर्यंत लावावा. ආරුප්පෙ චතුක්කපඤ්චකජ්ඣානං උප්පජ්ජති, තඤ්ච ලොකුත්තරං, නො ලොකියන්ති වුත්තං. එත්ථ කථන්ති? එත්ථාපි පඨමජ්ඣානාදීසු යතො වුට්ඨාය සොතාපත්තිමග්ගං පටිලභිත්වා අරූපසමාපත්තිං භාවෙත්වා සො ආරුප්පෙ උප්පන්නො, තංඣානිකාවස්ස තත්ථ තයො මග්ගා උප්පජ්ජන්ති. එවං පාදකජ්ඣානමෙව නියමෙති. කෙචි පන ථෙරා – ‘‘විපස්සනාය ආරම්මණභූතා ඛන්ධා නියමෙන්තී’’ති වදන්ති[Pg.164]. කෙචි ‘‘පුග්ගලජ්ඣාසයො නියමෙතී’’ති වදන්ති. කෙචි ‘‘වුට්ඨානගාමිනීවිපස්සනා නියමෙතී’’ති වදන්ති. තෙසං වාදවිනිච්ඡයො විසුද්ධිමග්ගෙ වුට්ඨානගාමිනීවිපස්සනාධිකාරෙ වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බො. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, සම්මාසමාධීති අයං පුබ්බභාගෙ ලොකියො, අපරභාගෙ ලොකුත්තරො සම්මාසමාධීති වුච්චති. अरूप भूमीत चतुर्थ व पंचम ध्यान उत्पन्न होते, आणि ते लोकोत्तर असते, लौकिक नाही, असे म्हटले आहे. येथे हे कसे समजावे? येथे देखील, प्रथम ध्यान इत्यादींपैकी ज्या ध्यानातून उठून, स्रोतापत्ती मार्ग प्राप्त करून, अरूप समापत्तीची भावना करून तो अरूप भूमीत उत्पन्न झाला आहे, त्या ध्यानाचेच त्याचे तेथील तीन (वरचे) मार्ग उत्पन्न होतात. अशा प्रकारे पादक ध्यानच नियमन करते. परंतु काही थेर म्हणतात की, 'विपश्यनेचे आलंबन बनलेले स्कंध नियमन करतात.' काही म्हणतात की, 'पुद्गलाचा (व्यक्तीचा) आशय नियमन करतो.' काही म्हणतात की, 'वुत्थानगामिनी विपश्यना नियमन करते.' त्यांच्या मताचा निर्णय विसुद्धिमग्ग मधील 'वुत्थानगामिनी विपश्यना' अधिकारात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा. 'भिक्खूहो, याला सम्यक् समाधी म्हणतात' - हा पूर्वभागात लौकिक आणि उत्तरभागात लोकोत्तर सम्यक् समाधी म्हटला जातो. 9. සූකසුත්තවණ්ණනා ९. सूक सुत्त वर्णन 9. නවමෙ මිච්ඡාපණිහිතන්ති සූකං නාම උද්ධග්ගං කත්වා ඨපිතං හත්ථං වා පාදං වා භින්දති, තථා අට්ඨපිතං පන මිච්ඡාපණිහිතං නාම. මිච්ඡාපණිහිතාය දිට්ඨියාති මිච්ඡාඨපිතාය කම්මස්සකතපඤ්ඤාය. අවිජ්ජං භින්දිස්සතීති චතුසච්චපටිච්ඡාදකං අවිජ්ජං භින්දිස්සති. විජ්ජං උප්පාදෙස්සතීති අරහත්තමග්ගවිජ්ජං උප්පාදෙස්සති. මිච්ඡාපණිහිතත්තා, භික්ඛවෙ, දිට්ඨියාති කම්මස්සකතපඤ්ඤාය චෙව මග්ගභාවනාය ච මිච්ඡා ඨපිතත්තා, අප්පවත්තිතත්තාති අත්ථො. ඉමස්මිං සුත්තෙ කම්මස්සකතඤාණං මග්ගනිස්සිතං කත්වා මිස්සකමග්ගො කථිතො. ९. नवव्या सुत्तात 'मिच्छापणिहितं' (चुकीच्या पद्धतीने ठेवलेले) म्हणजे: सूक (धान्याचा काटा किंवा टोक) जर वरच्या दिशेने टोक करून ठेवले तर ते हाताला किंवा पायाला टोचते (भेदते), परंतु तसे न ठेवल्यास त्याला 'मिच्छापणिहित' म्हणतात. 'मिच्छापणिहिताय दिट्ठिया' म्हणजे चुकीच्या पद्धतीने स्थापित केलेल्या कम्मस्सकता प्रज्ञेने (कर्म-स्वकीयता प्रज्ञेने). 'अविज्जं भिन्दिस्सति' म्हणजे चार आर्य सत्यांना झाकणाऱ्या अविद्येचा नाश करेल. 'विज्जं उप्पादेस्सति' म्हणजे अर्हत् मार्गाच्या विद्येला उत्पन्न करेल. 'मिच्छापणिहितत्ता, भिक्खवे, दिट्ठिया' म्हणजे कर्म-स्वकीयता प्रज्ञा आणि मार्गभावना चुकीच्या पद्धतीने स्थापित केल्यामुळे व प्रवृत्त न केल्यामुळे, असा अर्थ आहे. या सुत्तात कम्मस्सकता ज्ञानाला मार्गाश्रित करून मिश्रक मार्ग (लौकिक व लोकोत्तर मिश्रित मार्ग) सांगितला आहे. 10. නන්දියසුත්තවණ්ණනා १०. नंदिय सुत्त वर्णन 10. දසමෙ පරිබ්බාජකොති ඡන්නපරිබ්බාජකො. සෙසමෙත්ථ උත්තානමෙවාති. १०. दहाव्या सुत्तात 'परिव्राजक' म्हणजे छन्नपरिव्राजक (वस्त्राने अंग झाकणारा परिव्राजक). येथील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. අවිජ්ජාවග්ගො පඨමො. पहिला अविद्या वर्ग समाप्त. 2. විහාරවග්ගො २. विहार वर्ग 1. පඨමවිහාරසුත්තවණ්ණනා १. प्रथम विहार सुत्त वर्णन 11. දුතියවග්ගස්ස පඨමෙ ඉච්ඡාමහං, භික්ඛවෙ, අඩ්ඪමාසං පටිසල්ලීයිතුන්ති අහං, භික්ඛවෙ, එකං අඩ්ඪමාසං පටිසල්ලීයිතුං නිලීයිතුං එකොව හුත්වා විහරිතුං ඉච්ඡාමීති අත්ථො. නම්හි කෙනචි උපසඞ්කමිතබ්බො අඤ්ඤත්ර එකෙන පිණ්ඩපාතනීහාරකෙනාති යො අත්තනා පයුත්තවාචං අකත්වා මමත්ථාය [Pg.165] සද්ධෙසු කුලෙසු පටියත්තං පිණ්ඩපාතං නීහරිත්වා මය්හං උපනාමෙය්ය, තං පිණ්ඩපාතනීහාරකං එකං භික්ඛුං ඨපෙත්වා නම්හි අඤ්ඤෙන කෙනචි භික්ඛුනා වා ගහට්ඨෙන වා උපසඞ්කමිතබ්බොති. ११. दुसऱ्या वर्गाच्या पहिल्या सुत्तात 'इच्छामहं, भिक्खवे, अढमासं पटिसल्लीयितुं' म्हणजे: 'भिक्खूहो, मी अर्धा महिना (पंधरा दिवस) एकांतात राहण्याची, ध्यानस्थ होण्याची आणि एकटेच राहण्याची इच्छा करतो', असा अर्थ आहे. 'नम्हि केनचि उपसंकमितब्बो अञ्ञत्र एकेन पिण्डपातनीहारकेना' म्हणजे: ज्या भिक्खूने स्वतः याचना न करता माझ्यासाठी श्रद्धाळू कुळांमध्ये तयार केलेले अन्न (पिंडपात) आणून मला अर्पण करावे, त्या पिंडपात आणणाऱ्या एका भिक्खूला सोडून इतर कोणत्याही भिक्खूने किंवा गृहस्थाने माझ्याकडे येऊ नये, असा अर्थ आहे. කස්මා පන එවමාහාති? තස්මිං කිර අඩ්ඪමාසෙ විනෙතබ්බො සත්තො නාහොසි. අථ සත්ථා – ‘‘ඉමං අඩ්ඪමාසං ඵලසමාපත්තිසුඛෙනෙව වීතිනාමෙස්සාමි, ඉති මය්හඤ්චෙව සුඛවිහාරො භවිස්සති, අනාගතෙ ච පච්ඡිමා ජනතා ‘සත්ථාපි ගණං විහාය එකකො විහාසි, කිමඞ්ගං පන මය’න්ති දිට්ඨානුගතිං ආපජ්ජිස්සති, තදස්සා භවිස්සති දීඝරත්තං හිතාය සුඛායා’’ති ඉමිනා කාරණෙන එවමාහ. භික්ඛුසඞ්ඝොපි සත්ථු වචනං සම්පටිච්ඡිත්වා එකං භික්ඛුං අදාසි. සො පාතොව ගන්ධකුටිපරිවෙණසම්මජ්ජනමුඛොදකදන්තකට්ඨදානාදීනි සබ්බකිච්චානි තස්මිං ඛණෙ කත්වා අපගච්ඡති. पण त्यांनी असे का म्हटले? असे ऐकिवात आहे की, त्या पंधरा दिवसांत उपदेश करून सन्मार्गावर आणण्याजोगा कोणताही प्राणी नव्हता. त्यामुळे शास्त्यांनी विचार केला की, 'हा अर्धा महिना मी फलसमापत्तीच्या सुखातच घालवीन, याने मला देखील सुखविहार लाभेल, आणि भविष्यातील येणारी पिढी देखील 'शास्ते सुद्धा संघाचा त्याग करून एकटेच राहिले, मग आपण का नाही?' असे म्हणून त्यांचे अनुकरण करेल, आणि ते त्यांच्या दीर्घकालीन हितासाठी व सुखासाठी होईल.' या कारणाने त्यांनी असे म्हटले. भिक्खू संघाने देखील शास्त्यांचे वचन शिरसावंद्य मानून एका भिक्खूला नियुक्त केले. तो भिक्खू पहाटेच उठून गंधकुटी व तिच्या परिसराची झाडलोट करणे, मुखप्रक्षालनासाठी पाणी देणे, दंतकाष्ठ देणे इत्यादी सर्व कामे त्या वेळी करून तेथून निघून जात असे. යෙන ස්වාහන්ති යෙන සො අහං. පඨමාභිසම්බුද්ධොති අභිසම්බුද්ධො හුත්වා පඨමංයෙව එකූනපඤ්ඤාසදිවසබ්භන්තරෙ. විහරාමීති ඉදං අතීතත්ථෙ වත්තමානවචනං. තස්ස පදෙසෙන විහාසින්ති තස්ස පඨමාභිසම්බුද්ධවිහාරස්ස පදෙසෙන. තත්ථ පදෙසො නාම ඛන්ධපදෙසො ආයතනධාතුසච්චඉන්ද්රියපච්චයාකාරසතිපට්ඨානඣානනාමරූපපදෙසො ධම්මපදෙසොති නානාවිධො. තං සබ්බම්පි සන්ධාය – ‘‘තස්ස පදෙසෙන විහාසි’’න්ති ආහ. භගවා හි පඨමබොධියං එකූනපඤ්ඤාසදිවසබ්භන්තරෙ යථා නාම පත්තරජ්ජො රාජා අත්තනො විභවසාරදස්සනත්ථං තං තං ගබ්භං විවරාපෙත්වා සුවණ්ණරජතමුත්තාමණිආදීනි රතනානි පච්චවෙක්ඛන්තො විහරෙය්ය, එවමෙව පඤ්චක්ඛන්ධෙ නිප්පදෙසෙ කත්වා සම්මසන්තො පච්චවෙක්ඛන්තො විහාසි. ඉමස්මිං පන අඩ්ඪමාසෙ තෙසං ඛන්ධානං පදෙසං වෙදනාක්ඛන්ධමෙව පච්චවෙක්ඛන්තො විහාසි. තස්ස ‘‘ඉමෙ සත්තා එවරූපං නාම සුඛං පටිසංවෙදෙන්ති, එවරූපං දුක්ඛ’’න්ති ඔලොකයතො යාව භවග්ගා පවත්තා සුඛවෙදනා, යාව අවීචිතො පවත්තා දුක්ඛවෙදනා, සබ්බා සබ්බාකාරෙන උපට්ඨාසි. අථ නං ‘‘මිච්ඡාදිට්ඨිපච්චයාපි වෙදයිත’’න්තිආදිනා නයෙන පරිග්ගණ්හන්තො විහාසි. ‘येन स्वाहं’ म्हणजे ‘येन सो अहं’ (ज्या अर्थी तो मी). ‘पठमाभिसम्बुद्धो’ (प्रथम अभिसंबुद्ध) म्हणजे पूर्णपणे प्रबुद्ध होऊन पहिल्याच एकोणपन्नास (४९) दिवसांच्या आत. ‘विहरामि’ (मी विहार करतो) हे भूतकाळाच्या अर्थी वापरलेले वर्तमानकाळाचे रूप आहे. ‘तस्स पदेसेन विहासिं’ (त्याच्या एका अंशाने मी विहार केला) म्हणजे त्या प्रथम अभिसंबुद्ध विहाराच्या एका अंशाने. तेथे ‘अंश’ (पदेस) म्हणजे स्कंध-अंश, आयतन-धातू-सत्य-इंद्रिय-प्रत्ययाकार (प्रतीत्यसमुत्पाद)-स्मृतिप्रस्थान-ध्यान-नामरूप-अंश आणि धर्म-अंश अशा विविध प्रकारचा आहे. या सर्वांना उद्देशूनच—'त्याच्या एका अंशाने विहार केला' असे म्हटले आहे. कारण, ज्याप्रमाणे नुकतेच राज्य मिळालेला एखादा राजा (पत्तराज्जो राजा) आपल्या वैभवाचे सार पाहण्यासाठी निरनिराळी भांडारगृहे उघडून सोने, चांदी, मोती, मणी इत्यादी रत्नांचे निरीक्षण करत विहार करतो; त्याचप्रमाणे भगवंतांनी पहिल्या बोधीच्या वेळी एकोणपन्नास दिवसांच्या आत पाचही स्कंधांचे निःशेषपणे (संपूर्णपणे) मनन व निरीक्षण करत विहार केला. परंतु या पंधरवड्यात (अर्ध्या महिन्यात) त्यांनी त्या स्कंधांपैकी केवळ 'वेदनास्कंध' या अंशाचेच निरीक्षण करत विहार केला. त्यांनी 'हे प्राणी अशा प्रकारचे सुख अनुभवतात, अशा प्रकारचे दुःख अनुभवतात' असे पाहत असताना, भवाग्रापर्यंत (सर्वोच्च अस्तित्वापर्यंत) पसरलेली सुखसंवेदना आणि अवीची (नरक) पर्यंत पसरलेली दुःखसंवेदना, सर्व प्रकारांनी त्यांच्यासमोर प्रकट झाली. त्यानंतर त्यांनी 'मिथ्यादृष्टीच्या प्रत्ययाने (कारणाने) देखील वेदयित (संवेदना) होते' इत्यादी पद्धतीने त्याचे परिग्रहण (ज्ञानपूर्वक ग्रहण) करत विहार केला. තථා පඨමබොධියං ද්වාදසායතනානි නිප්පදෙසානෙව කත්වා විහාසි, ඉමස්මිං පන අඩ්ඪමාසෙ තෙසං ආයතනානං පදෙසං වෙදනාවසෙන ධම්මායතනෙකදෙසං, ධාතූනං පදෙසං වෙදනාවසෙන ධම්මධාතුඑකදෙසං, සච්චානං පදෙසං වෙදනාක්ඛන්ධවසෙනෙව දුක්ඛසච්චෙකදෙසං, පච්චයානං පදෙසං ඵස්සපච්චයා [Pg.166] වෙදනාවසෙන පච්චයෙකදෙසං ඣානානං පදෙසං වෙදනාවසෙනෙව ඣානඞ්ගෙකදෙසං, නාමරූපානං පදෙසං වෙදනාවසෙනෙව නාමෙකදෙසං පච්චවෙක්ඛන්තො විහාසි. පඨමබොධියඤ්හි එකූනපඤ්ඤාසදිවසබ්භන්තරෙ කුසලාදිධම්මෙ නිප්පදෙසෙ කත්වා අනන්තනයානි සත්ත පකරණානි පච්චවෙක්ඛන්තො විහාසි. ඉමස්මිං පන අඩ්ඪමාසෙ සබ්බධම්මානං පදෙසං වෙදනාත්තිකමෙව පච්චවෙක්ඛන්තො විහාසි. තස්මිං තස්මිං ඨානෙ සා සා ච විහාරසමාපත්ති වෙදනානුභාවෙන ජාතා. त्याचप्रमाणे पहिल्या बोधीच्या वेळी त्यांनी बारा आयतनांचे निःशेषपणे मनन करत विहार केला, परंतु या पंधरवड्यात त्यांनी त्या आयतनांच्या एका अंशाचे—वेदनेच्या द्वारे धर्मायनाचा एक देश (भाग); धातूंच्या एका अंशाचे—वेदनेच्या द्वारे धर्मधातूचा एक देश; सत्यांच्या एका अंशाचे—वेदनास्कंधाच्या द्वारेच दुःखसत्याचा एक देश; प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) एका अंशाचे—स्पर्शप्रत्ययाने होणाऱ्या वेदनेच्या द्वारे प्रत्ययाचा एक देश; ध्यानांच्या एका अंशाचे—वेदनेच्या द्वारेच ध्यान-अंगाचा एक देश; नामरूपांच्या एका अंशाचे—वेदनेच्या द्वारेच नामाचा एक देश, यांचे निरीक्षण करत विहार केला. कारण पहिल्या बोधीच्या वेळी एकोणपन्नास दिवसांच्या आत कुशल इत्यादी धर्मांचे निःशेषपणे मनन करत, अनंत नय (पद्धती) असलेल्या सात ग्रंथांचे (अभिधम्माचे सात ग्रंथ) निरीक्षण करत त्यांनी विहार केला. परंतु या पंधरवड्यात त्यांनी सर्व धर्मांच्या एका अंशाचे, म्हणजेच केवळ 'वेदना-त्रिक' (वेदनात्तिक) चेच निरीक्षण करत विहार केला. त्या त्या ठिकाणी ती ती विहार-समापत्ती वेदनेच्या प्रभावाने (अनुभावाने) उत्पन्न झाली. ඉදානි යෙනාකාරෙන විහාසි, තං දස්සෙන්තො මිච්ඡාදිට්ඨිපච්චයාපීතිආදිමාහ. තත්ථ මිච්ඡාදිට්ඨිපච්චයාපීති දිට්ඨිසම්පයුත්තා වෙදනාපි වට්ටති. දිට්ඨිං උපනිස්සයං කත්වා උප්පන්නා කුසලාකුසලවෙදනාපි වට්ටති විපාකවෙදනාපි. තත්ථ මිච්ඡාදිට්ඨිසම්පයුත්තා අකුසලාව හොති, දිට්ඨිං පන උපනිස්සාය කුසලාපි උප්පජ්ජන්ති අකුසලාපි. මිච්ඡාදිට්ඨිකා හි දිට්ඨිං උපනිස්සාය පක්ඛදිවසෙසු යාගුභත්තාදීනි දෙන්ති, අද්ධිකාදීනං වට්ටං පට්ඨපෙන්ති, චතුමහාපථෙ සාලං කරොන්ති, පොක්ඛරණිඤ්ච ඛණාපෙන්ති, දෙවකුලාදීසු මාලාගච්ඡං රොපෙන්ති, නදීවිදුග්ගාදීසු සෙතුං අත්ථරන්ති, විසමං සමං කරොන්ති, ඉති නෙසං කුසලවෙදනා උප්පජ්ජති. මිච්ඡාදිට්ඨිං පන නිස්සාය සම්මාදිට්ඨිකෙ අක්කොසන්ති පරිභාසන්ති, වධබන්ධනාදීනි කරොන්ති, පාණං වධිත්වා දෙවතානං උපහාරං උපහරන්ති, ඉති නෙසං අකුසලවෙදනා උප්පජ්ජති. විපාකවෙදනා පන භවන්තරගතානංයෙව හොති. आता ज्या प्रकारे त्यांनी विहार केला, ते दर्शवण्यासाठी 'मिथ्यादृष्टीच्या प्रत्ययाने देखील...' (मिच्छादिट्ठिपच्चयापि) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'मिथ्यादृष्टीच्या प्रत्ययाने देखील' म्हणजे दृष्टी-संप्रयुक्त (मिथ्यादृष्टीने युक्त) वेदना देखील घेतली जाते. मिथ्यादृष्टीचा उपनिष्रय (आश्रय) करून उत्पन्न झालेली कुशल-अकुशल वेदना आणि विपाक वेदना देखील घेतली जाते. त्यात मिथ्यादृष्टी-संप्रयुक्त वेदना ही केवळ अकुशलच असते. परंतु मिथ्यादृष्टीचा आश्रय घेऊन कुशल वेदना देखील उत्पन्न होतात आणि अकुशल देखील. कारण, मिथ्यादृष्टी असलेले लोक आपल्या दृष्टीचा आश्रय घेऊन पक्षाच्या दिवशी (पौर्णिमा, अमावस्या इत्यादी तिथींना) यवागू (पेज), भात इत्यादी दान करतात; वाटसरूंसाठी सेवा-नियम सुरू करतात; चौकात धर्मशाळा बांधतात; तलाव खोदतात; देवकुळ (मंदिरे) इत्यादी ठिकाणी फुलांची झाडे लावतात; नद्या व दुर्गम ठिकाणी पूल बांधतात; विषम (खडबडीत) रस्ते सम (सपाट) करतात. अशा प्रकारे त्यांना कुशल वेदना उत्पन्न होते. परंतु मिथ्यादृष्टीचा आश्रय घेऊन ते सम्यग्दृष्टी असलेल्यांचा अपमान करतात, त्यांना धमकावतात, वध-बंधन (मारणे, बांधणे) इत्यादी करतात, प्राण्यांची हत्या करून देवतांना बळी (उपहार) अर्पण करतात. अशा प्रकारे त्यांना अकुशल वेदना उत्पन्न होते. विपाक वेदना तर दुसऱ्या भवात गेलेल्यांनाच (पुढील जन्मात) प्राप्त होते. සම්මාදිට්ඨිපච්චයාති එත්ථාපි සම්මාදිට්ඨිසම්පයුත්තා වෙදනාපි වට්ටති, සම්මාදිට්ඨිං උපනිස්සයං කත්වා උප්පන්නා කුසලාකුසලවෙදනාපි විපාකවෙදනාපි. තත්ථ සම්මාදිට්ඨිසම්පයුත්තා කුසලාව හොති, සම්මාදිට්ඨිං පන උපනිස්සාය බුද්ධපූජං දීපමාලං මහාධම්මස්සවනං අප්පතිට්ඨිතෙ දිසාභාගෙ චෙතියපතිට්ඨාපනන්ති එවමාදීනි පුඤ්ඤානි කරොන්ති, ඉති නෙසං කුසලා වෙදනා උප්පජ්ජති. සම්මාදිට්ඨිංයෙව නිස්සාය මිච්ඡාදිට්ඨිකෙ අක්කොසන්ති පරිභාසන්ති, අත්තානං උක්කංසෙන්ති, පරං වම්භෙන්ති, ඉති නෙසං අකුසලවෙදනා උප්පජ්ජති. විපාකවෙදනා පන භවන්තරගතානංයෙව හොති. මිච්ඡාසඞ්කප්පපච්චයාතිආදීසුපි එසෙව නයො. ඡන්දපච්චයාතිආදීසු පන ඡන්දපච්චයා අට්ඨලොභසහගතචිත්තසම්පයුත්තා වෙදනා වෙදිතබ්බා, විතක්කපච්චයා [Pg.167] පඨමජ්ඣානවෙදනාව. සඤ්ඤා පච්චයා ඨපෙත්වා පඨමජ්ඣානං සෙසා ඡ සඤ්ඤාසමාපත්තිවෙදනා. ‘सम्यग्दृष्टीच्या प्रत्ययाने’ (सम्मादिट्ठिपच्चया) यात देखील सम्यग्दृष्टी-संप्रयुक्त वेदना देखील घेतली जाते. सम्यग्दृष्टीचा आश्रय करून उत्पन्न झालेली कुशल-अकुशल वेदना आणि विपाक वेदना देखील घेतली जाते. त्यात सम्यग्दृष्टी-संप्रयुक्त वेदना ही केवळ कुशलच असते. परंतु सम्यग्दृष्टीचा आश्रय घेऊन बुद्धपूजा, दीपमाळ (दिवे लावणे), महाधर्मश्रवण, ज्या भागात पूर्वी अस्तित्वात नव्हते अशा ठिकाणी चैत्य (स्तूप) स्थापन करणे इत्यादी पुण्ये करतात. अशा प्रकारे त्यांना कुशल वेदना उत्पन्न होते. तसेच सम्यग्दृष्टीचाच आश्रय घेऊन ते मिथ्यादृष्टी असलेल्यांचा अपमान करतात, त्यांना धमकावतात, स्वतःची प्रशंसा करतात, इतरांना तुच्छ लेखतात. अशा प्रकारे त्यांना अकुशल वेदना उत्पन्न होते. विपाक वेदना तर दुसऱ्या भवात गेलेल्यांनाच प्राप्त होते. ‘मिथ्यासंकल्पाच्या प्रत्ययाने’ (मिच्छासङ्कप्पपच्चया) इत्यादींमध्ये देखील हाच नियम लावावा. परंतु ‘छंदाच्या प्रत्ययाने’ (छन्दपच्चया) इत्यादींमध्ये छंदाच्या प्रत्ययाने आठ प्रकारच्या लोभसहगत चित्ताशी संप्रयुक्त असलेली वेदना समजावी. वितर्काच्या प्रत्ययाने केवळ प्रथम ध्यान वेदनाच समजावी. संज्ञेच्या प्रत्ययाने म्हणजे प्रथम ध्यान सोडून उर्वरित सहा संज्ञा-समापत्तीशी संबंधित वेदना समजावी. ඡන්දො ච අවූපසන්තොතිආදීසු තිණ්ණං අවූපසමෙ අට්ඨලොභසහගතචිත්තසම්පයුත්තා වෙදනා හොති, ඡන්දමත්තස්ස වූපසමෙ පඨමජ්ඣානවෙදනාව. ඡන්දවිතක්කානං වූපසමෙ දුතියජ්ඣානාදිවෙදනා අධිප්පෙතා, තිණ්ණම්පි වූපසමෙ නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනවෙදනා. අප්පත්තස්ස පත්තියාති අරහත්තඵලස්ස පත්තත්ථාය. අත්ථි ආයාමන්ති අත්ථි වීරියං. තස්මිම්පි ඨානෙ අනුප්පත්තෙති තස්ස වීරියාරම්භස්ස වසෙන තස්ස අරහත්තඵලස්ස කාරණෙ අනුප්පත්තෙ. තප්පච්චයාපි වෙදයිතන්ති අරහත්තස්ස ඨානපච්චයා වෙදයිතං. එතෙන චතුමග්ගසහජාතා නිබ්බත්තිතලොකුත්තරවෙදනාව ගහිතා. ‘छंद आणि शांत न झालेला...’ (छन्दो च अवूपसन्तो) इत्यादींमध्ये तिन्हींच्या (छंद, वितर्क, संज्ञा) अशांततेत (शांत न होण्यात) आठ प्रकारच्या लोभसहगत चित्ताशी संप्रयुक्त वेदना होते. केवळ छंदाच्या शांत होण्याने प्रथम ध्यान वेदनाच होते. छंद आणि वितर्काच्या शांत होण्याने द्वितीय ध्यानापासून (आकिंचन्यायतन ध्यानापर्यंतच्या) वेदना अभिप्रेत आहेत. तिन्हींच्याही शांत होण्याने नैवसंज्ञानासंज्ञायतन वेदना अभिप्रेत आहे. ‘अप्राप्ताच्या प्राप्तीसाठी’ (अप्पत्तस्स पत्तिया) म्हणजे अर्हत्वफलाच्या प्राप्तीसाठी. ‘प्रयत्न आहे’ (अत्थि आयामं) म्हणजे वीर्य (उत्साह/प्रयत्न) आहे. ‘त्या पदाची प्राप्ती झाल्यावर’ (तस्मिम्पि ठाने अनुप्पत्ते) म्हणजे त्या वीर्यारंभाच्या प्रभावाने त्या अर्हत्वफलाच्या कारणाची (मार्गाची) प्राप्ती झाल्यावर. ‘त्याच्या प्रत्ययाने वेदयित’ (तप्पच्चयापि वेदयितं) म्हणजे अर्हत्वाच्या स्थान-प्रत्ययाने (कारणाने) अनुभवलेली वेदना. याने चार मार्गांसोबत उत्पन्न झालेली (सहजात) आणि निर्माण झालेली लोकोत्तर वेदनाच ग्रहण केली आहे. 2. දුතියවිහාරසුත්තවණ්ණනා २. द्वितीय विहार सूत्राची वर्णना (टीका) समाप्त. 12. දුතියෙ පටිසල්ලානකාරණං වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බං. මිච්ඡාදිට්ඨිවූපසමපච්චයාති මිච්ඡාදිට්ඨිවූපසමො නාම සම්මාදිට්ඨි. තස්මා යං සම්මාදිට්ඨිපච්චයා වෙදයිතං වුත්තං, තදෙව මිච්ඡාදිට්ඨිවූපසමපච්චයා වෙදිතබ්බං. ඉමස්මිං පන සුත්තෙ විපාකවෙදනං අතිදූරෙති මඤ්ඤමානා න ගණ්හන්තීති වුත්තං. ඉමිනා නයෙන සබ්බත්ථ අත්ථො වෙදිතබ්බො. යස්ස යස්ස හි වූපසමපච්චයාති වුච්චති, තස්ස තස්ස පටිපක්ඛධම්මපච්චයාව තං තං වෙදයිතං අධිප්පෙතං. ඡන්දවූපසමපච්චයාතිආදීසු පන ඡන්දවූපසමපච්චයා තාව පඨමජ්ඣානවෙදනා වෙදිතබ්බා. විතක්කවූපසමපච්චයා දුතියජ්ඣානවෙදනා. සඤ්ඤාපච්චයා ඡසමාපත්තිවෙදනා. සඤ්ඤාවූපසමපච්චයා නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනවෙදනා. ඡන්දො ච වූපසන්තොතිආදීනි වුත්තත්ථානෙව. १२. दुसऱ्या सुत्तात एकांताचे (पठिसल्लानचे) कारण पहिल्या सुत्तात सांगितलेल्या पद्धतीनेच जाणावे. 'मिच्छादिट्ठिवूपसमपच्चया' (मिथ्यादृष्टीच्या उपशमनाच्या प्रत्ययाने) या पाठात मिथ्यादृष्टीचा उपशम म्हणजेच सम्यक् दृष्टी होय. म्हणून जे सम्यक् दृष्टीच्या प्रत्ययाने उत्पन्न झालेले वेदन म्हटले आहे, त्यालाच मिथ्यादृष्टीच्या उपशमनाच्या प्रत्ययाने उत्पन्न झालेले वेदन म्हणून जाणावे. परंतु या सुत्तात विपाक-वेदना अतिशय दूर आहे असे मानून ती ग्रहण केली जात नाही, असे अट्ठाकथेत म्हटले आहे. या पद्धतीने सर्व ठिकाणी अर्थ जाणावा. कारण ज्या ज्या (धम्माच्या) उपशमनाच्या प्रत्ययाने असे म्हटले जाते, त्या त्या धम्माच्या प्रतिपक्ष (विरुद्ध) धम्माच्या प्रत्ययानेच ते ते वेदन अभिप्रेत आहे. 'छन्दवूपसमपच्चया' (छंदाच्या उपशमनाच्या प्रत्ययाने) इत्यादींमध्ये तर, प्रथम छंदाच्या (कामच्छंदाच्या) उपशमनाच्या प्रत्ययाने प्रथम ध्यान-वेदना जाणावी. वितर्काच्या उपशमनाच्या प्रत्ययाने द्वितीय ध्यान-वेदना जाणावी. संज्ञेच्या प्रत्ययाने सहा समापत्तींची वेदना आणि संज्ञेच्या उपशमनाच्या प्रत्ययाने नैवसंज्ञानासंज्ञायतन-वेदना जाणावी. 'छन्दो च वूपसन्तो' इत्यादी पदांचे अर्थ पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच आहेत. 3-7. සෙක්ඛසුත්තාදිවණ්ණනා ३-७. सेक्खसुत्त इत्यादींचे वर्णन 13-17. තතියෙ සෙක්ඛොති සික්ඛනසීලො. කිං සික්ඛතීති? තිස්සො සික්ඛා. සෙක්ඛායාති තීහි ඵලෙහි චතූහි ච මග්ගෙහි සද්ධිං උප්පන්නාය. සාපි හි අනිට්ඨිතකිච්චත්තා අත්තනො කිච්චං සික්ඛතෙවාති සෙක්ඛා. චතුත්ථපඤ්චමඡට්ඨසත්තමානි උත්තානත්ථානෙවාති. १३-१७. तिसऱ्या सुत्तात 'सेक्खो' (शैक्ष) म्हणजे शिकण्याचा (तीन शिक्षांचा अभ्यास करण्याचा) स्वभाव असलेला. तो काय शिकतो? तीन शिक्षा (अधिशील, अधिचित्त, अधिपज्ञा) शिकतो. 'सेक्खाय' म्हणजे तीन फले आणि चार मार्गांसह उत्पन्न झालेल्या सम्यक् दृष्टीने युक्त असलेला. ती (सम्यक् दृष्टी) सुद्धा कार्य पूर्ण न झाल्यामुळे आपले कार्य (मार्गकृत्य) शिकतच (पूर्ण करतच) असते, म्हणून तिला 'सेक्खा' म्हणतात. चौथे, पाचवे, सहावे आणि सातवे सुत्त स्पष्ट अर्थाचेच आहेत. 8-10. පඨමකුක්කුටාරාමසුත්තාදිවණ්ණනා ८-१०. प्रथम कुक्कुटारामसुत्त इत्यादींचे वर्णन 18-20. අට්ඨමෙ [Pg.168] උම්මඞ්ගොති පඤ්ඤාඋම්මඞ්ගො, පඤ්ඤාවීමංසනං, පඤ්ඤාගවෙසනන්ති අත්ථො. එවඤ්හි ත්වං ආවුසොති ඉදං තස්ස පුච්ඡාපතිට්ඨාපනත්ථාය ආහ. නවමදසමානි උත්තානත්ථාමෙවාති. १८-२०. आठव्या सुत्तात 'उम्मङ्गो' म्हणजे प्रज्ञा-उम्मंग (प्रज्ञेचा भेदक स्वभाव), प्रज्ञा-विमंसन (प्रज्ञेचे परीक्षण) and प्रज्ञा-गवेषण (प्रज्ञेचा शोध) असा अर्थ आहे. 'एवं हि त्वं आवुसो' हे वाक्य त्या (भद्द थेरांच्या) प्रश्नाची स्थापना करण्यासाठी म्हटले आहे. नववे आणि दहावे सुत्त स्पष्ट अर्थाचेच आहेत. විහාරවග්ගො දුතියො. विहारवग्गो दुसरा समाप्त. 3. මිච්ඡත්තවග්ගවණ්ණනා ३. मिच्छत्तवग्ग (मिथ्यात्व वर्ग) चे वर्णन 21-30. තතියවග්ගස්ස පඨමෙ මිච්ඡත්තන්ති මිච්ඡාසභාවං. සම්මත්තන්ති සම්මාසභාවං. මිච්ඡාපටිපත්තාධිකරණහෙතූති මිච්ඡාපටිපත්තිකරණහෙතු. යස්මා මිච්ඡාපටිපත්තිං කරොති, තස්මාති අත්ථො. නාරාධකොති න සම්පාදකො. ඤායං ධම්මන්ති අරියමග්ගධම්මං. මිච්ඡාඤාණීති මිච්ඡාවිඤ්ඤාණො මිච්ඡාපච්චවෙක්ඛණො. මිච්ඡාවිමුත්තීති අයාථාවවිමුත්ති, අනිය්යානිකවිමුත්ති. ඉමෙසු තතියාදීසු චතූසු සුත්තෙසු වට්ටවිවට්ටං කථිතං, පච්ඡිමෙසු පනෙත්ථ ද්වීසු පුග්ගලො පුච්ඡිතො ධම්මො විභත්තො, එවං ධම්මෙන පුග්ගලො දස්සිතොති. සුප්පවත්තියොති සුප්පවත්තනියො. යථා ඉච්ඡිතිච්ඡිතං දිසං පවත්තෙන්තො ධාවති, එවං පවත්තෙතුං සක්කා හොතීති අත්ථො. සඋපනිසං සපරික්ඛාරන්ති සප්පච්චයං සපරිවාරං. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානත්ථමෙවාති. २१-३०. तिसऱ्या वर्गाच्या पहिल्या सुत्तात 'मिच्छत्तं' म्हणजे मिथ्या स्वभाव. 'सम्मत्तं' म्हणजे सम्यक् स्वभाव. 'मिच्छापटिपत्ताधिकरणहेतु' म्हणजे मिथ्या प्रतिपत्ती (चुकीचे आचरण) करण्याच्या कारणाने; ज्या कारणाने तो मिथ्या प्रतिपत्ती करतो, त्या कारणाने, असा अर्थ आहे. 'नाराधको' म्हणजे साध्य न करणारा. 'न्यायं धम्मं' म्हणजे आर्यमार्ग रूपी धम्म. 'मिच्छाञाणी' म्हणजे मिथ्या ज्ञान असलेला, मिथ्या प्रत्यवेक्षण करणारा. 'मिच्छाविमुत्ती' म्हणजे अयोग्य विमुक्ती, अनिय्यानिक (संसारातून मुक्त न करणारी) विमुक्ती. या तिसऱ्या इत्यादी चार सुत्तांमध्ये वट्ट (संसारचक्र) आणि विवट्ट (संसारमुक्ती) सांगितले आहे. परंतु यातील शेवटच्या दोन सुत्तांमध्ये पुद्गलाविषयी विचारले आहे आणि धम्माचे विभाजन केले आहे; अशा प्रकारे धम्माद्वारे पुद्गल दर्शविला आहे. 'सुप्पवत्तियो' म्हणजे सुखाने प्रवृत्त करता येण्याजोगा; ज्याप्रमाणे इच्छिलेल्या दिशेला वळवून धावता येते, त्याप्रमाणे प्रवृत्त करणे शक्य होते, असा अर्थ आहे. 'सउपनिसां सपरिक्खारं' म्हणजे सप्रत्यय (कारणासह) आणि सपरिवार (साधनांसह). उर्वरित भाग सर्व ठिकाणी स्पष्ट अर्थाचाच आहे. මිච්ඡත්තවග්ගො තතියො. मिच्छत्तवग्ग (मिथ्यात्व वर्ग) तिसरा समाप्त. 4. පටිපත්තිවග්ගවණ්ණනා ४. पठिपत्तिवग्ग (प्रतिपत्ती वर्ग) चे वर्णन 31-40. චතුත්ථෙ මිච්ඡාපටිපත්තින්ති අයාථාවපටිපත්තිං. මිච්ඡාපටිපන්නන්ති අයාථාවපටිපන්නං. ඉති එකං සුත්තං ධම්මවසෙන කථිතං, එකං පුග්ගලවසෙන. අපාරා පාරන්ති වට්ටතො නිබ්බානං. පාරගාමිනොති එත්ථ යෙපි පාරඞ්ගතා, යෙපි ගච්ඡන්ති, යෙපි ගමිස්සන්ති, සබ්බෙ පාරගාමිනොත්වෙව වෙදිතබ්බා. ३१-४०. चौथ्या वर्गात 'मिच्छापठिपत्तिं' म्हणजे अयोग्य आचरण. 'मिच्छापठिपन्नं' म्हणजे अयोग्य आचरण करणारा. अशा प्रकारे एक सुत्त धम्माच्या दृष्टीने सांगितले आहे आणि एक सुत्त पुद्गलाच्या (व्यक्तीच्या) दृष्टीने सांगितले आहे. 'अपारा पारं' म्हणजे संसारातून निर्वाणाकडे. 'पारगामिनो' या पाठात, जे निर्वाणरूपी पलीकडच्या तीरावर पोहोचले आहेत, जे जात आहेत आणि जे जातील, ते सर्व 'पारगामी' (पलीकडे जाणारे) म्हणूनच जाणावे. තීරමෙවානුධාවතීති වට්ටමෙව අනුධාවති, වට්ටෙ විචරති. කණ්හන්ති අකුසලධම්මං. සුක්කන්ති කුසලධම්මං. ඔකා අනොකන්ති වට්ටතො නිබ්බානං. ආගම්මාති [Pg.169] ආරබ්භ සන්ධාය පටිච්ච. පරියොදපෙය්යාති පරිසුද්ධං කරෙය්ය. චිත්තක්ලෙසෙහීති චිත්තං කිලිස්සාපෙන්තෙහි නීවරණෙහි. සම්බොධියඞ්ගෙසූති සත්තසු බොජ්ඣඞ්ගෙසු. 'तीरमेवानुधावति' म्हणजे संसाराच्या मागेच धावतो, संसारातच फिरतो. 'कण्हं' म्हणजे अकुशल धम्म. 'सुक्कं' म्हणजे कुशल धम्म. 'ओका अनोकं' म्हणजे संसारातून निर्वाणाकडे. 'आगम्म' म्हणजे आरंभ करून, उद्देशून किंवा अवलंबून. 'परियोदपेय्य' म्हणजे परिशुद्ध करावे. 'चित्तक्लेसेहि' म्हणजे चित्ताला क्लेश देणाऱ्या नीवरणांपासून. 'संबोधियङ्गेसु' म्हणजे सात बोध्यंगांमध्ये. සාමඤ්ඤත්ථන්ති නිබ්බානං. තඤ්හි සාමඤ්ඤෙන උපගන්තබ්බතො සාමඤ්ඤත්ථොති වුච්චති. බ්රහ්මඤ්ඤන්ති සෙට්ඨභාවං. බ්රහ්මඤ්ඤත්ථන්ති නිබ්බානං බ්රහ්මඤ්ඤෙන උපගන්තබ්බතො. යත්ථ යත්ථ පන හෙට්ඨා ච ඉමෙසු ච තීසු සුත්තෙසු ‘‘රාගක්ඛයො’’ති ආගතං, තත්ථ තත්ථ අරහත්තම්පි වට්ටතියෙවාති වදන්ති. 'सामञ्ञत्थं' म्हणजे निर्वाण. कारण ते निर्वाण श्रामण्याने (आर्यमार्गाने) प्राप्त करण्याजोगे असल्यामुळे त्याला 'सामञ्ञत्थ' (श्रामण्यार्थ) म्हटले जाते. 'ब्रह्मञ्ञं' म्हणजे श्रेष्ठ भाव (आर्यमार्ग). 'ब्रह्मञ्ञत्थं' म्हणजे निर्वाण, कारण ते ब्रह्मण्याने (आर्यमार्गाने) प्राप्त करण्याजोगे आहे. परंतु खालील सुत्तांमध्ये आणि या तीन सुत्तांमध्ये जिथे जिथे 'रागक्खयो' (रागाचा क्षय) असा शब्द आला आहे, तिथे तिथे अर्हत्त्व देखील योग्यच आहे, असे आचार्य म्हणतात. පටිපත්තිවග්ගො චතුත්ථො. पठिपत्तिवग्ग (प्रतिपत्ती वर्ग) चौथा समाप्त. 5. අඤ්ඤතිත්ථියපෙය්යාලවග්ගවණ්ණනා ५. अञ्ञतित्थियपेय्यालवग्ग (अन्यतीर्थिक पेय्याल वर्ग) चे वर्णन 41-48. අඤ්ඤතිත්ථියපෙය්යාලෙ අද්ධානපරිඤ්ඤත්ථන්ති සංසාරද්ධානං නිබ්බානං පත්වා පරිඤ්ඤාතං නාම හොති. තස්මා නිබ්බානං ‘‘අද්ධානපරිඤ්ඤා’’ති වුච්චති, තදත්ථන්ති අත්ථො. අනුපාදාපරිනිබ්බානත්ථන්ති අපච්චයපරිනිබ්බානත්ථං. ඉති ඉමස්මිං පෙය්යාලෙ විජ්ජාවිමුත්තිඵලෙන අරහත්තං කථිතං. ඤාණදස්සනෙන පච්චවෙක්ඛණා, සෙසෙහි නිබ්බානන්ති. ४१-४८. अन्यतीर्थिक पेय्यालामध्ये 'अद्धानपरिञ्ञत्थं' या पदात, निर्वाणाला प्राप्त केल्यामुळे संसाररूपी मार्ग परिज्ञात (पूर्णपणे जाणलेला) होतो. म्हणून निर्वाणाला 'अद्धानपरिञ्ञा' (संसारमार्गाचे परिज्ञान) म्हटले जाते, त्याच्या प्राप्तीसाठी, असा अर्थ आहे. 'अनुपादापरिनिब्बानत्थं' म्हणजे पुन्हा पुनर्जन्माचे कारण नसलेल्या परिनिर्वाणाच्या प्राप्तीसाठी. अशा प्रकारे या पेय्यालामध्ये 'विज्जाविमुत्तिफल' या पदाने अर्हत्त्व सांगितले आहे. 'ञाणदस्सन' या पदाने प्रत्यवेक्षण सांगितले आहे, आणि उर्वरित पदांनी निर्वाण सांगितले आहे. අඤ්ඤතිත්ථියපෙය්යාලවග්ගො. अञ्ञतित्थियपेय्यालवग्ग समाप्त. 6. සූරියපෙය්යාලවග්ගවණ්ණනා ६. सूरियपेय्यालवग्ग (सूर्य पेय्याल वर्ग) चे वर्णन 49-62. සූරියපෙය්යාලෙ අරුණුග්ගං විය කල්යාණමිත්තත්තා, කල්යාණමිත්තතාය ඨත්වා නිබ්බත්තිතො සවිපස්සනඅරියමග්ගො සූරියපාතුභාවො වියාති එවං සබ්බත්ථ අත්ථො වෙදිතබ්බො. සීලසම්පදාති චතුපාරිසුද්ධිසීලං. ඡන්දසම්පදාති කුසලකත්තුකම්යතාඡන්දො. අත්තසම්පදාති සම්පන්නචිත්තතා. දිට්ඨිසම්පදාති ඤාණසම්පත්ති. අප්පමාදසම්පදාති කාරාපකඅප්පමාදසම්පත්ති. යොනිසොමනසිකාරසම්පදාති උපායමනසිකාරසම්පත්ති. පුන කල්යාණමිත්තතාතිආදීනි සම්මාදිට්ඨිආදීනං අඤ්ඤෙනපි ආකාරෙන [Pg.170] භාවදස්සනත්ථං වුත්තානි. සබ්බානෙව චෙතානි සුත්තානි පාටියෙක්කං පුග්ගලජ්ඣාසයවසෙන වුත්තානීති. ४९-६२. सूर्य पेय्याल सुत्तात, अरुणोदयाप्रमाणे कल्याणमित्रता जाणावी. त्या कल्याणमित्रतेमध्ये स्थित होऊन उत्पन्न झालेला, विपश्यनेसह असलेला आर्यमार्ग हा सूर्योदयाप्रमाणे जाणावा; अशा प्रकारे सर्व ठिकाणी अर्थ जाणावा. 'सीलसम्पदा' म्हणजे चतुपारिसुद्धिशील. 'छन्दसम्पदा' म्हणजे कुशल कृत्य करण्याची इच्छा. 'अत्तसम्पदा' म्हणजे समृद्ध चित्त असणे. 'दिट्ठिसम्पदा' म्हणजे ज्ञानसंपत्ती. 'अप्पमादसम्पदा' म्हणजे सत्यप्रतिवेध ज्ञान घडवून आणणारी अप्रमादसंपत्ती. 'योनिसोमनसिकारसम्पदा' म्हणजे योग्य उपायाने मनसिकार करण्याची संपत्ती. पुन्हा 'कल्याणमित्तता' इत्यादी शब्द सम्यक् दृष्टी इत्यादींच्या दुसऱ्या प्रकारे देखील उत्पत्ती दर्शवण्यासाठी म्हटले आहेत. आणि ही सर्व सुत्ते स्वतंत्रपणे पुद्गलाच्या (व्यक्तीच्या) अध्यशयानुसार सांगितली आहेत. සූරියපෙය්යාලවග්ගො. सूरियपेय्यालवग्ग समाप्त. 7. එකධම්මපෙය්යාලවග්ගාදිවණ්ණනා ७. एकधम्मपेय्यालवग्ग इत्यादींचे वर्णन 63-138. එකධම්මපෙය්යාලොපි ගඞ්ගාපෙය්යාලොපි පාටියෙක්කං පුග්ගලජ්ඣාසයවසෙනෙව තථා තථා වුත්තෙ බුජ්ඣනකානං අජ්ඣාසයවසෙන කථිතො. ६३-१३८. एकधम्म पेय्याल आणि गंगा पेय्याल देखील स्वतंत्रपणे पुद्गलाच्या अध्यशयानुसारच त्या त्या प्रकारे सांगितले असता, सत्य जाणू शकणाऱ्या पुद्गलांच्या अध्यशयानुसार सांगितले आहेत. 8. අප්පමාදපෙය්යාලවග්ගො ८. अप्पमादपेय्यालवग्ग समाप्त. 1. තථාගතසුත්තවණ්ණනා १. तथागतसुत्ताचे वर्णन 139. අප්පමාදපෙය්යාලෙ එවමෙව ඛොති එත්ථ යථා සබ්බසත්තානං සම්මාසම්බුද්ධො අග්ගො, එවං සබ්බෙසං කුසලධම්මානං කාරාපකඅප්පමාදො අග්ගොති දට්ඨබ්බො. නනු චෙස ලොකියොව, කුසලධම්මා පන ලොකුත්තරාපි. අයඤ්ච කාමාවචරොව, කුසලධම්මා පන චතුභූමකා. කථමෙස තෙසං අග්ගොති? පටිලාභකට්ඨෙන. අප්පමාදෙන හි තෙ පටිලබ්භන්ති, තස්මා සො තෙසං අග්ගො. තෙනෙතං වුත්තං සබ්බෙ තෙ අප්පමාදමූලකාතිආදි. १३९. अप्रमाद पेय्यालामध्ये 'एवमेव खो' या पाठात, ज्याप्रमाणे सर्व प्राण्यांमध्ये सम्यक्संबुद्ध श्रेष्ठ आहेत, त्याप्रमाणे सर्व कुशल धम्मांमध्ये (ते कुशल धम्म) घडवून आणणारा अप्रमाद श्रेष्ठ आहे, असे जाणावे. शंका: हा अप्रमाद तर केवळ लौकिकच आहे, परंतु कुशल धम्म तर लोकोत्तर देखील आहेत. तसेच हा अप्रमाद केवळ कामावचरच आहे, परंतु कुशल धम्म तर चारही भूमींमधील आहेत. मग हा अप्रमाद त्या सर्व कुशल धम्मांमध्ये श्रेष्ठ कसा? उत्तर: प्राप्ती करून देण्याच्या अर्थाने. कारण अप्रमादानेच ते (चारही भूमींमधील कुशल धम्म) प्राप्त केले जातात, म्हणून तो अप्रमाद त्या सर्वांमध्ये श्रेष्ठ आहे. म्हणूनच असे म्हटले आहे - 'सब्बे ते अप्पमादमूलका' (ते सर्व अप्रमादमूलक आहेत) इत्यादी. 2. පදසුත්තවණ්ණනා २. पदसुत्ताचे वर्णन 140. ජඞ්ගලානන්ති පථවීතලවාසීනං. පාණානන්ති සපාදකපාණානං. පදජාතානීති පදානි. සමොධානං ගච්ඡන්තීති ඔධානං උපක්ඛෙපං ගච්ඡන්ති. අග්ගමක්ඛායතීති සෙට්ඨං අක්ඛායති. යදිදං මහන්තත්තෙනාති මහන්තභාවෙන අග්ගමක්ඛායති, න ගුණවසෙනාති අත්ථො. १४०. जंगलांनन्ति (jaṅgalānaṃ) म्हणजे पृथ्वीच्या पाठीवर राहणाऱ्या (किंवा संचार करणाऱ्या). पाणांनन्ति (pāṇānaṃ) म्हणजे पाय असणाऱ्या प्राण्यांचे. पदजातानीति (padajātāni) म्हणजे पावले. समोधानं गच्छन्तीति (samodhānaṃ gacchanti) म्हणजे समाविष्ट होतात (किंवा एकत्र येतात). अग्गमक्खायतीति (aggamakkhāyati) म्हणजे श्रेष्ठ म्हटले जाते. यदिदं महन्तत्तेnaति (yadidaṃ mahantattena) म्हणजे मोठेपणामुळे श्रेष्ठ म्हटले जाते, गुणांमुळे नाही, असा अर्थ आहे. 3-10. කූටසුත්තාදිවණ්ණනා ३-१०. कूटसुत्त आदिंचे वर्णन. 141-148. වස්සිකන්ති සුමනපුප්ඵං. ඉමං කිර සුත්තං සුත්වා භාතියමහාරාජා වීමංසිතුකාමතාය එකස්මිං ගබ්භෙ චතුජාතිගන්ධෙහි පරිභණ්ඩං කාරෙත්වා [Pg.171] සුගන්ධානි පුප්ඵානි ආහරාපෙත්වා එකස්ස සමුග්ගස්ස මජ්ඣෙ සුමනපුප්ඵමුට්ඨිං ඨපෙත්වා සෙසානි තස්ස සමන්තතො මුට්ඨිමුට්ඨිං කත්වා ඨපෙත්වා ද්වාරං පිධාය බහි නික්ඛන්තො. අථස්ස මුහුත්තං වීතිනාමෙත්වා ද්වාරං විවරිත්වා පවිසන්තස්ස සබ්බපඨමං සුමනපුප්ඵගන්ධො ඝානං පහරි. සො මහාතලස්මිංයෙව මහාචෙතියාභිමුඛො නිපජ්ජිත්වා – ‘‘වස්සිකං තෙසං අග්ගන්ති කථෙන්තෙන සුකථිතං සම්මාසම්බුද්ධෙනා’’ති චෙතියං වන්දි. කුට්ටරාජානොති ඛුද්දකරාජානො. ‘‘ඛුද්දරාජානො’’තිපි පාඨො. තන්තාවුතානන්ති තන්තෙ ආවුතානං, තන්තං ආරොපෙත්වා වායිතානන්ති අත්ථො. ඉදඤ්ච පච්චත්තෙ සාමිවචනං. යානි කානිචි තන්තාවුතානි වත්ථානීති අයඤ්හෙත්ථ අත්ථො. අථ වා තන්තාවුතානං වත්ථානං යානි කානිචි වත්ථානීති එවං සාවසෙසපාඨනයෙනපෙත්ථ අත්ථො දට්ඨබ්බො. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. १४१-१४८. वस्सिकांति (vassikaṃ) म्हणजे मोगऱ्याचे फूल (सुमनपुप्फ). असे म्हटले जाते की, हे सुत्त ऐकून भातिय महाराजांनी त्याची परीक्षा घेण्याच्या इच्छेने एका खोलीत चार प्रकारच्या सुवासांचे लेपन करवून घेतले आणि सुगंधी फुले मागवून एका करंडकाच्या मध्यभागी एक मूठ मोगऱ्याची फुले ठेवली. त्यानंतर इतर फुले त्या मोगऱ्याच्या फुलांच्या सभोवताली एकेक मूठ करून ठेवली, दरवाजा बंद केला आणि ते बाहेर गेले. त्यानंतर काही वेळ घालवून त्यांनी दरवाजा उघडला आणि आत प्रवेश केला असता, सर्वप्रथम मोगऱ्याच्या फुलांच्या सुवासाने त्यांच्या नाकाला स्पर्श केला. त्यांनी महाप्रासादाच्या छतावरच महाचेतियाकडे (महास्तूप) तोंड करून लोटांगण घातले आणि 'त्या फुलांमध्ये मोगरा श्रेष्ठ आहे असे सांगणाऱ्या सम्यक्संबुद्धांनी किती सुंदर उपदेश केला आहे!' असे म्हणून महाचेतियाची वंदना केली. कुट्टराजानो (kuṭṭarājāno) म्हणजे लहान राजे (खुद्दकराजानो). 'खुद्दराजानो' असाही पाठ आहे. तन्तावुतानन्ति (tantāvutānaṃ) म्हणजे मागावर विणलेले, मागावर चढवून विणलेले असा अर्थ आहे. आणि हे प्रथमा विभक्तीच्या अर्थात षष्ठी विभक्तीचे रूप आहे. 'जी काही मागावर विणलेली वस्त्रे आहेत' असा येथे अर्थ आहे. अथवा, 'मागावर विणलेल्या वस्त्रांपैकी जी काही वस्त्रे आहेत' अशा प्रकारे उर्वरित पाठाच्या पद्धतीनेही येथे अर्थ समजून घ्यावा. उर्वरित भाग सर्वत्र स्पष्टच आहे. අප්පමාදවග්ගො අට්ඨමො. अप्पमादवग्गो (अप्रमाद वर्ग) आठवा समाप्त. 9. බලකරණීයවග්ගො ९. बलकरणीयवग्गो (बलकरणीय वर्ग). 1. බලසුත්තවණ්ණනා १. बलसुत्तवर्णना. 149. බලකරණීයවග්ගෙ බලකරණීයාති ඌරුබලබාහුබලෙන කත්තබ්බා ධාවනලඞ්ඝනතාපනවහනාදයො කම්මන්තා. සීලෙ පතිට්ඨායාති චතුපාරිසුද්ධිසීලෙ ඨත්වා. අට්ඨඞ්ගිකං මග්ගන්ති සහවිපස්සනං අරියමග්ගං. १४९. बलकरणीयवग्गात 'बलकरणीया' म्हणजे मांडीच्या आणि हाताच्या बळाने करावयाची धावणे, उडी मारणे, कष्ट करणे, ओझे वाहणे इत्यादी कामे. 'सीले पतिट्ठाया' म्हणजे चतुपारिसुद्धिशीलामध्ये (चार प्रकारच्या परिशुद्ध शीलांमध्ये) प्रतिष्ठित होऊन. 'अट्ठङ्गिकं मग्गं' म्हणजे विपश्यनेसह असणारा आर्य अष्टांगिक मार्ग. 2. බීජසුත්තවණ්ණනා २. बीजसुत्तवर्णना. 150. බීජගාමභූතගාමාති එත්ථ පඤ්චවිධම්පි බීජං බීජගාමො නාම, තදෙව පණ්ණසම්පන්නං නීලභාවතො පට්ඨාය භූතගාමොති වෙදිතබ්බං. १५०. बीजगाम-भूतगामा या संदर्भात, पाचही प्रकारच्या बीजांना 'बीजगाम' असे म्हणतात. तेच बीज जेव्हा पानांनी युक्त होऊन हिरवेगार होते, तेव्हापासून त्याला 'भूतगाम' असे समजावे. 3. නාගසුත්තවණ්ණනා ३. नागसुत्तवर्णना. 151. බලං ගාහෙන්තීති බලං ගණ්හන්ති, ගහිතබලා ථිරසරීරා හොන්ති. කුසොබ්භෙ ඔතරන්තීතිආදීසු අයමනුපුබ්බිකථා – නාගිනියො කිර උතුසමයෙ [Pg.172] පතිට්ඨිතගබ්භා චින්තෙන්ති – ‘‘සචෙ මයං ඉධ විජායිස්සාම, එවං නො දාරකා ඌමිවෙගඤ්ච සුපණ්ණස්ස ච පක්ඛන්දිත්වා ආගතස්ස වෙගං සහිතුං න සක්ඛිස්සන්තී’’ති තා මහාසමුද්දෙ නිමුජ්ජිත්වා සම්භජ්ජමුඛද්වාරං පත්වා පඤ්ච මහානදියො පවිසිත්වා හිමවන්තං ගච්ඡන්ති. තත්ථ සුපණ්ණෙහි අපක්ඛන්දනීයාසු සුවණ්ණරජතමණිගුහාසු වසමානා විජායිත්වා නාගපොතකෙ ගොප්ඵකාදිපමාණෙසු උදකෙසු ඔතාරෙත්වා උදකතරණං සික්ඛාපෙන්ති. १५१. बलं गाहेन्तीति (balaṃ gāhenti) म्हणजे बळ मिळवतात, बळ मिळाल्यावर त्यांचे शरीर दृढ होते. 'कुसोब्भे ओतरन्ति' (kusobbhe otaranti) इत्यादींमध्ये ही अनुक्रमिक कथा आहे – असे म्हटले जाते की, नागिणी ऋतुकाळात गर्भधारणा झाल्यावर असा विचार करतात की, 'जर आम्ही येथेच प्रसूती केली, तर आमची पिल्ले लाटांचा वेग आणि झेप घेऊन येणाऱ्या गरुडाचा (सुपण्ण) वेग सहन करू शकणार नाहीत.' म्हणून त्या महासागरात बुडी मारून, नद्यांच्या मुखाशी पोहोचून, पाच महाप्रवाहांमध्ये (पाच महा नद्यांमध्ये) प्रवेश करून हिमालयात जातात. तिथे गरुडांना झेप घेता येणार नाही अशा सोन्याच्या, चांदीच्या आणि रत्नांच्या गुहांमध्ये राहून त्या प्रसूती होतात आणि नवजात नागपुत्रांना (नागपिल्लांना) घोट्याएवढ्या पाण्यात उतरवून पोहायला शिकवतात. අථ යදා අනුක්කමෙන තෙ නාගා ගඞ්ගාදීනං නදීනං ඔරිමතීරතො පරතීරං, පරතීරතො ඔරිමතීරන්ති තරණපටිතරණං කාතුං සක්කොන්ති, තදා ‘‘ඉදානි නො දාරකා ඌමිවෙගඤ්ච ගරුළවෙගඤ්ච සහිතුං සක්ඛිස්සන්තී’’ති ඤත්වා අත්තනො ආනුභාවෙන මහාමෙඝං සමුට්ඨාපෙත්වා සකලහිමවන්තං එකොදකං විය කුරුමානා දෙවං වස්සාපෙත්වා සුවණ්ණරජතාදිමයා නාවා මාපෙත්වා උපරි සුවණ්ණතාරකවිචිත්තං සමොසරිතගන්ධපුප්ඵදාමං චෙලවිතානං බන්ධිත්වා සුරභිචන්දනගන්ධපුප්ඵාදීනි ආදාය තාහි නාවාහි පඤ්ච මහානදියො ඔගාහිත්වා අනුක්කමෙන මහාසමුද්දං පාපුණන්ති. තත්ථ ච වසන්තා දසබ්යාම-සතබ්යාම-සහස්සබ්යාම-සතසහස්සබ්යාම-පමාණතං ආපජ්ජන්තා මහන්තත්තං වෙපුල්ලත්තං ආපජ්ජන්ති නාම. त्यानंतर जेव्हा ते नागपुत्र हळूहळू गंगा इत्यादी नद्यांच्या या काठावरून त्या काठावर आणि त्या काठावरून या काठावर पोहत ये-जा करण्यास समर्थ होतात, तेव्हा 'आता आमची पिल्ले लाटांचा वेग आणि गरुडाचा वेग सहन करू शकतील' हे जाणून, आपल्या प्रभावाने महामेघ निर्माण करून, संपूर्ण हिमालयाला एकाच जलमय प्रदेशासारखे बनवून पाऊस पाडतात. सोन्या-चांदीच्या नौका तयार करून, त्यावर सोन्याच्या ताऱ्यांनी सुशोभित केलेले आणि सुगंधी फुलांच्या माळा सोडलेले कापडी छत (चंदवा) बांधतात. सुगंधी चंदन, गंध, फुले इत्यादी घेऊन त्या नौकांद्वारे पाच महानद्यांमध्ये उतरतात आणि अनुक्रमाने महासागरात पोहोचतात. तिथे राहून ते दहा वाव (व्याम), शंभर वाव, हजार वाव, लाख वाव एवढ्या विशाल आकाराचे होऊन मोठेपणा आणि विपुलता प्राप्त करतात. එවමෙව ඛොති එත්ථ හිමවන්තපබ්බතො විය චතුපාරිසුද්ධිසීලං දට්ඨබ්බං, නාගපොතකා විය යොගාවචරා, කුසොබ්භාදයො විය අරියමග්ගො, මහාසමුද්දො විය නිබ්බානං. යථා නාගපොතකා හිමවන්තෙ පතිට්ඨාය කුසොබ්භාදීහි මහාසමුද්දං පත්වා කායමහන්තත්තං ආපජ්ජන්ති, එවං යොගිනො සීලං නිස්සාය සීලෙ පතිට්ඨාය අරියමග්ගෙන නිබ්බානං පත්වා අරහත්තමග්ගෙනෙව ආගතෙසු ඡසු අභිඤ්ඤාධම්මෙසු ගුණසරීරමහන්තත්තං පාපුණන්තීති. त्याचप्रमाणे (एवमेव खो) येथे हिमालय पर्वतासारखे चतुपारिसुद्धिशील (चार प्रकारच्या परिशुद्ध शीलांना) समजावे, नागपुत्रांसारखे योगाचार (योगसाधक) समजावे, लहान ओढ्यांसारखा आर्य मार्ग समजावे आणि महासागरासारखे निर्वाण (निब्बान) समजावे. ज्याप्रमाणे नागपुत्र हिमालयाचा आश्रय घेऊन लहान ओढ्यांच्या माध्यमातून महासागरात पोहोचून शरीराचा विशाल आकार प्राप्त करतात, त्याचप्रमाणे योगसाधक शीलाचा आश्रय घेऊन, शीलामध्ये प्रतिष्ठित होऊन, आर्य मार्गाने निर्वाणाला प्राप्त करून, अर्हत्त्वाच्या मार्गानेच प्राप्त होणाऱ्या सहा अभिज्ञा रूपी गुणांच्या शरीराचा मोठेपणा (विशालता) प्राप्त करतात. 5. කුම්භසුත්තවණ්ණනා ५. कुंभसुत्तवर्णना. 153. කුම්භොති උදකඝටො. නො පච්චාවමතීති න පතිආවමති, න අන්තො පවෙසෙතීති අත්ථො. १५३. कुम्भो (kumbho) म्हणजे पाण्याचा घडा (उदकघटो). नो पच्चावमतीति (no paccāvamati) म्हणजे उलटून पडत नाही (किंवा पाणी बाहेर टाकत नाही), आत प्रवेश करू देत नाही असा अर्थ आहे. 7. ආකාසසුත්තවණ්ණනා ७. आकाससुत्तवर्णना. 155. පුරත්ථිමාති [Pg.173] පුරත්ථිමදිසතො ආගතවාතා. පච්ඡිමදිසාදීසුපි එසෙව නයො. චත්තාරොපි සතිපට්ඨානාති යථෙව හි එතෙසං පුරත්ථිමාදිභෙදානං වාතානං සන්නිපාතො ආකාසෙ ඉජ්ඣති, එවං ඉධාපි ‘‘චත්තාරො සතිපට්ඨානා’’තිආදිනා නයෙන වුත්තා බොධිපක්ඛියධම්මා සහවිපස්සනස්ස අරියමග්ගස්ස භාවනාය ඉජ්ඣන්ති, තෙනෙතං වුත්තං. १५५. पुरत्थिमा (puratthimā) म्हणजे पूर्व दिशेकडून येणारे वारे. पश्चिम दिशा इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. 'चत्तारोपि सतिपट्ठाना' (चारही स्मृतिप्रस्थान) या संदर्भात – ज्याप्रमाणे पूर्व इत्यादी दिशांच्या या वेगवेगळ्या वाऱ्यांचा मिलाफ आकाशात घडून येतो, त्याचप्रमाणे येथेही 'चत्तारो सतिपट्ठाना' इत्यादी पद्धतीने सांगितलेले बोधिपक्षीय धर्म, विपश्यनेसह असणाऱ्या आर्य मार्गाच्या भावनेने परिपूर्ण होतात, म्हणूनच असे म्हटले आहे. 8-9. පඨමමෙඝසුත්තාදිවණ්ණනා ८-९. पठममेघसुत्त आदिंचे वर्णन. 156-157. ගිම්හානං පච්ඡිමෙ මාසෙති ආසාළ්හමාසෙ. ඌහතන්ති ද්විපදචතුප්පදානං පාදප්පහාරෙන පථවීතලෙ උට්ඨහිත්වා උද්ධං ගතං වට්ටිවට්ටි හුත්වා ආකාසෙ පක්ඛන්තං. රජොජල්ලන්ති පංසුරජොජල්ලං. १५६-१५७. गिम्हानं पच्छिमे मासे (gimhānaṃ pacchime māse) म्हणजे आषाढ महिन्यात (आसाळ्हमासे). ऊहतं (ūhataṃ) म्हणजे द्विपद (दोन पायांचे) आणि चतुष्पद (चार पायांचे) प्राण्यांच्या पायांच्या आघाताने जमिनीवरून उडून वर गेलेली, गोल गोल फिरत आकाशात पसरलेली धूळ. रजोझल्लन्ति (rajojallaṃ) म्हणजे मातीची धूळ आणि मळी. 10. නාවාසුත්තවණ්ණනා १०. नावासुत्तवर्णना. 158. සාමුද්දිකාය නාවායාතිආදි හෙට්ඨා වාණිජකොපමෙ විත්ථාරිතමෙව. १५८. सामुद्दिकाया नावायात (sāmuddikāya nāvāya) इत्यादींचे स्पष्टीकरण खाली वाणिज्यकोपम सुत्तात सविस्तर दिलेलेच आहे. 11-12. ආගන්තුකසුත්තාදිවණ්ණනා ११-१२. आगंतुकसुत्त आदिंचे वर्णन. 159-160. ආගන්තුකාගාරන්ති පුඤ්ඤත්ථිකෙහි නගරමජ්ඣෙ කතං ආගන්තුකඝරං, යත්ථ රාජරාජමහාමත්තෙහිපි සක්කා හොති නිවාසං උපගන්තුං. අභිඤ්ඤා පරිඤ්ඤෙය්යාති යථෙව හි තෙසං පුරත්ථිමදිසාදීහි ආගතානං ඛත්තියාදීනං වාසො ආගන්තුකාගාරෙ ඉජ්ඣති, එවං ඉමෙසං අභිඤ්ඤාපරිඤ්ඤෙය්යාතිආදීනං ධම්මානං අභිඤ්ඤාපරිජානනාදීහි සහවිපස්සනස්ස අරියමග්ගස්ස භාවනාය ඉජ්ඣන්ති, තෙනෙතං වුත්තං. නදීසුත්තං හෙට්ඨා වුත්තනයමෙවාති. १५९-१६०. आगन्तुकागारं (āgantukāgāraṃ) म्हणजे पुण्याची इच्छा करणाऱ्या लोकांनी शहराच्या मध्यभागी बांधलेली धर्मशाळा (किंवा अतिथीगृह), जिथे राजे आणि राजांचे महाअमात्य देखील मुक्काम करू शकतात. अभिञ्ञาपरिञ्ञेय्या (abhiññāpariññeyyā) – ज्याप्रमाणे पूर्व इत्यादी दिशांतून आलेल्या क्षत्रिय इत्यादींचा मुक्काम अतिथीगृहात सुकर होतो, त्याचप्रमाणे या 'अभिज्ञा व परिज्ञेय' (विशेष ज्ञानाने जाणण्यायोग्य) इत्यादी धर्मांच्या बाबतीत, विशेष ज्ञानाने जाणणे इत्यादी कार्यांसह विपश्यनेने युक्त अशा आर्य मार्गाच्या भावनेने ते परिपूर्ण होतात, म्हणूनच असे म्हटले आहे. नदीसुत्त खाली सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावे. බලකරණීයවග්ගො නවමො. बलकरणीयवग्गो (बलकरणीय वर्ग) नववा समाप्त. 10. එසනාවග්ගො १०. एसनावग्गो (एसना वर्ग). 1. එසනාසුත්තවණ්ණනා १. एसनासुत्तवर्णना. 161. එසනාවග්ගෙ [Pg.174] කාමෙසනාති කාමානං එසනා ගවෙසනා මග්ගනා පත්ථනා. භවෙසනාති භවානං එසනා. බ්රහ්මචරියෙසනාති මිච්ඡාදිට්ඨිසඞ්ඛාතස්ස බ්රහ්මචරියස්ස එසනා. १६१. एसनावग्गात 'कामेसना' म्हणजे कामांची (इंद्रियभोगांची) इच्छा करणे, शोध घेणे, मार्ग शोधणे आणि प्रार्थना करणे. 'भवेसना' म्हणजे भवांचा (अस्तित्वाचा) शोध घेणे. 'ब्रह्मचरियेसना' म्हणजे मिथ्यादृष्टी म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या ब्रह्मचर्याचा शोध घेणे. 2-11. විධාසුත්තාදිවණ්ණනා २-११. विधासुत्त इत्यादींचे स्पष्टीकरण. 162-171. විධාති මානකොට්ඨාසා මානඨපනා වා. සෙය්යොහමස්මීති විධාති අහමස්මි සෙය්යොති එවං මානකොට්ඨාසො මානඨපනා වා. නීඝාති දුක්ඛා. වචනත්ථො පනෙත්ථ යස්ස උප්පජ්ජන්ති, තං පුරිසං නීහනන්තීති නීඝා. සෙසමෙත්ථ උත්තානමෙවාති. १६२-१७१. ‘विधा’ म्हणजे मानाचे प्रकार किंवा मान (अभिमान) प्रस्थापित करणे. ‘मी श्रेष्ठ आहे’ (सेय्योहमस्मीति) अशी विधा म्हणजे ‘मी श्रेष्ठ आहे’ अशा प्रकारचा मानाचा भाग किंवा मान प्रस्थापित करणे होय. ‘नीघ’ म्हणजे दुःख. येथे शब्दाचा अर्थ असा जाणावा की, ज्या व्यक्तीमध्ये (रागादी क्लेश) उत्पन्न होतात, त्या पुरुषाला ते पीडित करतात (नष्ट करतात), म्हणून त्यांना ‘नीघ’ म्हणतात. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. එසනාවග්ගො දසමො. एसनावग्ग दहावा समाप्त झाला. 11. ඔඝවග්ගො ११. ओघवग्ग 1-2. ඔඝසුත්තාදිවණ්ණනා १-२. ओघसुत्त इत्यादींचे स्पष्टीकरण. 172-173. ඔඝවග්ගෙ කාමොඝොති පඤ්චසු කාමගුණෙසු ඡන්දරාගො. භවොඝොති රූපාරූපභවෙසු ඡන්දරාගො. දිට්ඨොඝොති ද්වාසට්ඨි දිට්ඨියො. අවිජ්ජොඝොති චතූසු සච්චෙසු අඤ්ඤාණං. කාමයොගාදීසුපි එසෙව නයො. १७२-१७३. ओघवग्गात, ‘कामोघ’ म्हणजे पाच कामगुणांमधील छंदराग (आसक्ती) होय. ‘भवौघ’ म्हणजे रूप आणि अरूप भवांमधील छंदराग होय. ‘दिट्ठौघ’ म्हणजे बासष्ट प्रकारच्या मिथ्या दृष्टी होत. ‘अविज्जाओघ’ म्हणजे चार आर्य सत्यांविषयीचे अज्ञान होय. कामयोग इत्यादींमध्ये सुद्धा हाच नियम जाणावा. 3-4. උපාදානසුත්තාදිවණ්ණනා ३-४. उपादानसुत्त इत्यादींचे स्पष्टीकरण. 174-175. කාමුපාදානන්ති කාමග්ගහණං. දිට්ඨුපාදානාදීසුපි එසෙව නයො. ගන්ථාති ගන්ථනා ඝටනා. කායගන්ථොති නාමකායස්ස ගන්ථො ගන්ථනඝටනකිලෙසො. ඉදංසච්චාභිනිවෙසොති අන්තග්ගාහිකදිට්ඨිවසෙන උප්පන්නො ‘‘ඉදමෙව සච්ච’’න්ති එවං අභිනිවෙසො. १७४-१७५. ‘कामुपादान’ म्हणजे कामगुणांचे (आसक्तीने) ग्रहण करणे. दिट्ठुपादान इत्यादींमध्ये सुद्धा हाच नियम आहे. ‘गंथ’ म्हणजे बांधणे किंवा जोडणे. ‘कायगंथ’ म्हणजे नामकायाला बांधून ठेवणारा क्लेश होय. ‘इदंसच्चाभिनिवेश’ म्हणजे अंतग्ग्राहिक दृष्टीमुळे उत्पन्न झालेला ‘हेच सत्य आहे’ (इतर सर्व व्यर्थ आहे) असा अभिनिवेश (दुराग्रह) होय. 5-10. අනුසයසුත්තාදිවණ්ණනා ५-१०. अनुसयसुत्त इत्यादींचे स्पष्टीकरण. 176-181. කාමරාගානුසයොති [Pg.175] ථාමගතට්ඨෙන කාමරාගොව අනුසයො කාමරාගානුසයො. සෙසෙසුපි එසෙව නයො. ඔරම්භාගියානීති හෙට්ඨාකොට්ඨාසියානි. සංයොජනානීති බන්ධනානි. උද්ධම්භාගියානීති උපරිකොට්ඨාසියානි. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානත්ථමෙවාති. १७६-१८१. ‘कामरागानुसय’ म्हणजे दृढतेने (चित्तसंतानामध्ये) सुप्त अवस्थेत राहिल्यामुळे कामरागच अनुसय (कामरागानुसय) बनतो. उर्वरित (पटिघानुसय इत्यादींमध्ये) सुद्धा हाच नियम आहे. ‘ओरंभागिय’ म्हणजे खालच्या भागातील (खालच्या लोकांमध्ये उत्पन्न करणारे). ‘संयोजन’ म्हणजे बंधने. ‘उद्धंभागिय’ म्हणजे वरच्या भागातील (वरच्या लोकांमध्ये उत्पन्न करणारे). उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. ඔඝවග්ගො එකාදසමො. अकरावा ओघवग्ग समाप्त झाला. මග්ගසංයුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. मग्गसंयुत्ताचे स्पष्टीकरण समाप्त झाले. 2. බොජ්ඣඞ්ගසංයුත්තං २. बोज्झंगसंयुत्त 1. පබ්බතවග්ගො १. पब्बतवग्ग 1. හිමවන්තසුත්තවණ්ණනා १. हिमवंतसुत्ताचे स्पष्टीकरण 182. බොජ්ඣඞ්ගසංයුත්තස්ස [Pg.176] පඨමෙ නාගාති ඉමෙපි මහාසමුද්දපිට්ඨෙ ඌමිඅන්තරවාසිනොව, න විමානට්ඨකනාගා. තෙසං හිමවන්තං නිස්සාය කායවඩ්ඪනාදිසබ්බං හෙට්ඨා වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බං. බොජ්ඣඞ්ගෙති එත්ථ බොධියා, බොධිස්ස වා අඞ්ගාති බොජ්ඣඞ්ගා. කිං වුත්තං හොති? යා හි අයං ධම්මසාමග්ගී, යාය ලොකියලොකුත්තරමග්ගක්ඛණෙ උප්පජ්ජමානාය ලීනුද්ධච්චපතිට්ඨානායූහන කාමසුඛත්තකිලමථානුයොගඋච්ඡෙදසස්සතාභිනිවෙසාදීනං අනෙකෙසං උපද්දවානං පටිපක්ඛභූතාය සතිධම්මවිචයවීරියපීතිපස්සද්ධිසමාධිඋපෙක්ඛාසඞ්ඛාතාය ධම්මසාමග්ගියා අරියසාවකො බුජ්ඣතීති කත්වා බොධීති වුච්චති. බුජ්ඣතීති කිලෙසසන්තානනිද්දාය උට්ඨහති, චත්තාරි වා අරියසච්චානි පටිවිජ්ඣති, නිබ්බානමෙව වා සච්ඡිකරොතීති වුත්තං හොති. යථාහ ‘‘සත්ත බොජ්ඣඞ්ගෙ භාවෙත්වා අනුත්තරං සම්මාසම්බොධිං අභිසම්බුද්ධො’’ති (සං. නි. 5.378; දී. නි. 3.143). තස්සා ධම්මසාමග්ගිසඞ්ඛාතාය බොධියා අඞ්ගාති බොජ්ඣඞ්ගා ඣානඞ්ගමග්ගඞ්ගාදයො විය. යොපෙස යථාවුත්තප්පකාරාය එතාය ධම්මසාමග්ගියා බුජ්ඣතීති කත්වා අරියසාවකො බොධීති වුච්චති, තස්ස බොධිස්ස අඞ්ගාතිපි බොජ්ඣඞ්ගා සෙනඞ්ගරථඞ්ගාදයො විය. තෙනාහු අට්ඨකථාචරියා – ‘‘බුජ්ඣනකස්ස පුග්ගලස්ස අඞ්ගාති වා බොජ්ඣඞ්ගා’’ති. १८२. बोज्झंगसंयुत्ताच्या पहिल्या सुत्तात, ‘नाग’ म्हणजे हे नाग सुद्धा महासागराच्या पृष्ठभागावर लाटांच्या दरम्यान राहणारेच आहेत, विमानांमध्ये राहणारे नाग नव्हेत. त्यांचे हिमालयाचा आश्रय घेऊन शरीराची वाढ इत्यादी सर्व काही खाली सांगितलेल्या पद्धतीनेच जाणावे. ‘बोज्झंग’ या शब्दात, बोधीचे किंवा बोध प्राप्त करणाऱ्याचे अंग आहेत म्हणून ते ‘बोज्झंग’ होत. काय सांगितले आहे? जी ही धम्मसामग्री आहे, जिच्याद्वारे लौकिक व लोकोत्तर मार्गक्षणी उत्पन्न होणाऱ्या—लीनता (आळस), उद्धच्च (चंचलता), क्लेशांमुळे थांबणे, अभिसंस्कारांमुळे प्रयत्न करणे, कामसुखाचा उपभोग घेणे, आत्मक्लेश करणे, उच्छेदवाद व शाश्वतवाद यांसारख्या चुकीच्या अभिनिवेशांमध्ये पडणे इत्यादी अनेक उपद्रवांच्या (संकटांच्या) विरोधी असणाऱ्या—सती, धम्मविचय, वीरिय, पीती, पस्सद्धि, समाधी आणि उपेक्खा या नावांनी ओळखल्या जाणाऱ्या धम्मसामग्रीच्या एकत्र येण्याने आर्य श्रावक जागृत होतो (जाणून घेतो), म्हणून तिला ‘बोधी’ असे म्हटले जाते. ‘जागृत होतो’ म्हणजे क्लेशरूपी झोपेतून उठतो, किंवा चार आर्य सत्यांचा साक्षात्कार करतो, किंवा निर्वाणाचाच प्रत्यक्ष अनुभव घेतो, असे सांगितले आहे. जसे भगवंतांनी म्हटले आहे—‘सात बोज्झंगांची भावना करून मी अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त केली आहे.’ त्या धम्मसामग्री नावाच्या बोधीचे अंग आहेत म्हणून ते ‘बोज्झंग’ होत, जसे ध्यानाचे अंग (झानांग) किंवा मार्गाचे अंग (मग्गांग) इत्यादी असतात. किंवा जो वर सांगितलेल्या प्रकारच्या या धम्मसामग्रीद्वारे जाणतो म्हणून त्या आर्य श्रावकाला ‘बोधी’ म्हटले जाते, त्या बोध प्राप्त करणाऱ्या आर्य श्रावकाचे अंग (कारण) आहेत म्हणूनही ते ‘बोज्झंग’ होत, जसे सेनेचे अंग किंवा रथाचे अंग इत्यादी असतात. म्हणूनच अट्ठकथाचार्यांनी म्हटले आहे—‘बोध प्राप्त करणाऱ्या पुद्गलाचे (व्यक्तीचे) अंग आहेत म्हणून ते बोज्झंग होत.’ අපිච ‘‘බොජ්ඣඞ්ගාති කෙනට්ඨෙන බොජ්ඣඞ්ගා? බොධාය සංවත්තන්තීති බොජ්ඣඞ්ගා, බුජ්ඣන්තීති බොජ්ඣඞ්ගා, අනුබුජ්ඣන්තීති බොජ්ඣඞ්ගා, පටිබුජ්ඣන්තීති බොජ්ඣඞ්ගා, සම්බුජ්ඣන්තීති බොජ්ඣඞ්ගා’’ඉච්චාදිනා (පටි. ම. 2.17) පටිසම්භිදානයෙනාපි බොජ්ඣඞ්ගත්ථො වෙදිතබ්බො. शिवाय, ‘बोज्झंग कोणत्या अर्थाने बोज्झंग आहेत? बोधीसाठी कारणीभूत ठरतात म्हणून बोज्झंग, जाणतात म्हणून बोज्झंग, अनुबोध करतात (मागाहून जाणतात) म्हणून बोज्झंग, प्रतिबोध करतात म्हणून बोज्झंग, संबोध करतात (पूर्णपणे जाणतात) म्हणून बोज्झंग होत’ इत्यादी प्रकारे पटिसम्भिदामग्ग ग्रंथाच्या पद्धतीने सुद्धा बोज्झंग शब्दाचा अर्थ जाणावा. සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගන්තිආදීසු පන පසත්ථො සුන්දරො ච බොජ්ඣඞ්ගොති සම්බොජ්ඣඞ්ගො. සතියෙව සම්බොජ්ඣඞ්ගොති සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගො, තං සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගන්ති එවං සබ්බත්ථ අත්ථො වෙදිතබ්බො. භාවෙතීති වඩ්ඪෙති, අත්තනො [Pg.177] චිත්තසන්තානෙ පුනප්පුනං ජනෙති, අභිනිබ්බත්තෙතීති අත්ථො. විවෙකනිස්සිතන්තිආදීනි කොසලසංයුත්තෙ ‘‘සම්මාදිට්ඨිං භාවෙති විවෙකනිස්සිත’’න්ති එත්ථ වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බානි. ‘सतिसम्बोज्झंग’ इत्यादी पदांमध्ये, प्रशंसनीय आणि उत्कृष्ट असलेला बोज्झंग म्हणजे ‘सम्बोज्झंग’ होय. सती (स्मृती) म्हणजेच सम्बोज्झंग होय, म्हणून ‘सतिसम्बोज्झंग’ होय; त्या सतिसम्बोज्झंगाचा असा अर्थ सर्व पदांमध्ये जाणावा. ‘भावेति’ म्हणजे वाढवणे, स्वतःच्या चित्तसंतानामध्ये पुन्हा पुन्हा उत्पन्न करणे, विशिष्ट रूपाने निर्माण करणे असा अर्थ जाणावा. ‘विवेकिनिस्सित’ इत्यादी शब्दांचे अर्थ कोसलसंयुत्तातील ‘सम्मादिट्ठि भावेति विवेकिनिस्सितं’ या पाठात स्पष्ट केलेल्या पद्धतीनेच जाणावे. අයං පන විසෙසො – තත්ථ තදඞ්ගවිවෙකනිස්සිතං, සමුච්ඡෙදවිවෙකනිස්සිතං, නිස්සරණවිවෙකනිස්සිතන්ති, විවෙකත්තයමෙව වුත්තං, බොජ්ඣඞ්ගභාවනං පත්වා පන පඤ්චවිධවිවෙකනිස්සිතම්පි එකෙ වණ්ණයන්ති. තෙ හි න කෙවලං බලවවිපස්සනාමග්ගඵලක්ඛණෙසු එව බොජ්ඣඞ්ගෙ උද්ධරන්ති විපස්සනාපාදක-කසිණජ්ඣාන-ආනාපානාසුභ-බ්රහ්මවිහාරජ්ඣානෙසුපි උද්ධරන්ති, න ච පටිසිද්ධා අට්ඨකථාචරියෙහි. තස්මා තෙසං මතෙන එතෙසං ඣානානං පවත්තික්ඛණෙ කිච්චතො එව වික්ඛම්භනවිවෙකනිස්සිතං. යථා ච විපස්සනාක්ඛණෙ ‘‘අජ්ඣාසයතො නිස්සරණවිවෙකනිස්සිත’’න්ති වුත්තං, එවං පටිපස්සද්ධිවිවෙකනිස්සිතම්පි භාවෙතීති වත්තුං වට්ටති. සෙසමෙත්ථ හෙට්ඨා වුත්තනයමෙව. परंतु हा विशेष (फरक) आहे—तेथे (कोसलसंयुत्तात) तदंगविवेकिनिस्सित, समुच्छेदविवेकिनिस्सित आणि निस्सरणविवेकिनिस्सित असे threeच विवेक सांगितले आहेत; परंतु बोज्झंगभावनेच्या संदर्भात आल्यावर मात्र काही आचार्य पाच प्रकारच्या विवेकिनिस्सितांचे सुद्धा वर्णन करतात. कारण ते केवळ प्रबळ विपश्यना, मार्ग आणि फल यांच्या क्षणांमध्येच बोज्झंगांना उद्धृत करत नाहीत, तर विपश्यनेचा पाया असलेल्या कसिणध्यान, आनापानध्यान, अशुमध्यान आणि ब्रह्मविहारध्यानांमध्ये सुद्धा उद्धृत करतात; आणि अट्ठकथाचार्यांनी याचा निषेधही केलेला नाही. म्हणून त्यांच्या मतानुसार, या ध्यानांच्या उत्पत्तीच्या क्षणी कार्याच्या दृष्टीनेच ‘विक्खम्भनविवेकिनिस्सित’ बोज्झंगाची भावना करतो. आणि जसे विपश्यनेच्या क्षणी आशयानुसार ‘निस्सरणविवेकिनिस्सित’ बोज्झंगाची भावना करतो असे सांगितले आहे, त्याचप्रमाणे ‘पटिप्पस्सद्धिविवेकिनिस्सित’ बोज्झंगाची सुद्धा भावना करतो असे म्हणणे योग्य आहे. येथे उर्वरित भाग पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीचाच आहे. 2. කායසුත්තවණ්ණනා २. कायसुत्ताचे स्पष्टीकरण 183. දුතියෙ ආහාරට්ඨිතිකොති පච්චයට්ඨිතිකො. ආහාරං පටිච්චාති පච්චයං පටිච්ච. සුභනිමිත්තන්ති සුභම්පි සුභනිමිත්තං, සුභස්ස ආරම්මණම්පි සුභනිමිත්තං. අයොනිසොමනසිකාරොති අනුපායමනසිකාරො උප්පථමනසිකාරො අනිච්චෙ ‘‘නිච්ච’’න්ති වා, දුක්ඛෙ ‘‘සුඛ’’න්ති, අනත්තනි ‘‘අත්තා’’ති වා, අසුභෙ ‘‘සුභ’’න්ති වා, මනසිකාරො. තං තස්මිං සුභාරම්මණෙ බහුලං පවත්තයතො කාමච්ඡන්දො උප්පජ්ජති. තෙන වුත්තං ‘‘අත්ථි, භික්ඛවෙ, සුභනිමිත්ත’’න්තිආදි. එවං සබ්බනීවරණෙසු යොජනා වෙදිතබ්බා. १८३. दुसऱ्या सुत्तात, ‘आहारट्ठितिको’ म्हणजे प्रत्ययस्थितिक (प्रत्ययांवर टिकून राहणारा). ‘आहारं पटिच्च’ म्हणजे प्रत्ययाचा आश्रय करून. ‘सुभनिमित्त’ म्हणजे शुभ स्वतःच शुभनिमित्त आहे, आणि शुभाचे आलंबन (विषय) सुद्धा शुभनिमित्त आहे. ‘अयोनिसोमनसिकार’ म्हणजे अयोग्य मनसिकार, चुकीच्या मार्गाने केलेला मनसिकार; म्हणजेच अनित्य गोष्टीमध्ये ‘नित्य’ असा, दुःखात ‘सुख’ असा, अनात्म्यामध्ये ‘आत्मा’ असा, आणि अशुभा मध्ये ‘शुभ’ असा केलेला मनसिकार होय. त्या शुभ आलंबनावर वारंवार चित्त प्रवृत्त करणाऱ्या व्यक्तीमध्ये कामच्छंद उत्पन्न होतो. म्हणूनच भगवंतांनी ‘भिक्खूहो, शुभनिमित्त आहे...’ इत्यादी वचन सांगितले आहे. अशा प्रकारे सर्व नीवरणांच्या बाबतीत योजना जाणावी. පටිඝනිමිත්තන්තිආදීසු පන පටිඝොපි පටිඝනිමිත්තං පටිඝාරම්මණම්පි. අරතීති උක්කණ්ඨිතා. යං සන්ධාය වුත්තං – ‘‘තත්ථ කතමා අරති? පන්තෙසු වා සෙනාසනෙසු අඤ්ඤතරඤ්ඤතරෙසු වා අධිකුසලෙසු ධම්මෙසු අරති අරතිතා අනභිරති අනභිරමනා උක්කණ්ඨිතා පරිතස්සිතා, අයං වුච්චති අරතී’’ති (විභ. 856). ‘पटिघनिमित्त’ इत्यादींमध्ये, द्वेष स्वतःच पटिघनिमित्त आहे आणि द्वेषाचे आलंबन सुद्धा पटिघनिमित्त आहे. ‘अरती’ म्हणजे कंटाळा येणे (असमाधान). ज्याला उद्देशून विभंग ग्रंथात म्हटले आहे—‘तेथे अरती कोणती? निर्जन अशा शयनासनांमध्ये (अरण्यातील विहारांमध्ये) किंवा इतर कोणत्याही उच्च कुशल धम्मांमध्ये अरती (न रमणे), अरतीची अवस्था, अनभिरती, न रमण्याची प्रवृत्ती, कंटाळा येणे, अस्वस्थता; याला अरती म्हणतात.’ තන්දීති අතිසීතාදිපච්චයා උප්පන්නං ආගන්තුකකායාලසියං. යස්මිං උප්පන්නෙ ‘‘අතිසීතං අතිඋණ්හං අතිච්ඡාතොස්මි අතිධාතොස්මි අතිදූරමග්ගං ගතොස්මී’’ති වදති, යං සන්ධාය වුත්තං ‘‘තත්ථ කතමා තන්දි[Pg.178], යා තන්දී තන්දියනා තන්දිමනකතා ආලස්යං ආලස්යායනා ආලස්යායිතත්තං, අයං වුච්චති තන්දී’’ති (විභ. 857). ‘तंदी’ म्हणजे अतिशय थंडी इत्यादी कारणांमुळे उत्पन्न झालेला नामकायाचा आगंतुक आळस. जो उत्पन्न झाल्यावर मनुष्य म्हणतो—‘खूप थंडी आहे, खूप उष्णता आहे, मी खूप भुकेला आहे, मी खूप तृप्त (जेवलेला) आहे, मी खूप लांबचा रस्ता चालून आलो आहे.’ ज्याला उद्देशून विभंग ग्रंथात म्हटले आहे—‘तेथे तंदी कोणती? जी तंदी (आळस), आळसाची अवस्था, आळसाने ग्रासलेले मन, आळस, आळसाची प्रवृत्ती, आळशीपणा; याला तंदी म्हणतात.’ විජම්භිතාති කිලෙසවසෙන කායවිනමනා. යං සන්ධාය වුත්තං – ‘‘තත්ථ කතමා විජම්භිතා? යා කායස්ස ජම්භනා විජම්භනා ආනමනා විනමනා සන්නමනා පණමනා බ්යාධියකං, අයං වුච්චති විජම්භිතා’’ති (විභ. 858). ‘विजम्भिता’ (जांभई देणे किंवा अंग ताणणे) म्हणजे क्लेशांच्या प्रभावामुळे शरीराचे वाकणे किंवा ताणले जाणे. ज्याला अनुसरून असे म्हटले आहे – ‘तेथे ‘विजम्भिता’ कोणती? शरीराचे जे ताणणे, जांभई देणे, पुढे वाकणे, मागे वाकणे, बाजूला वाकणे, सरळ ताणणे किंवा आजारी माणसाप्रमाणे शरीराचे पिळवटणे आहे, याला ‘विजम्भिता’ असे म्हणतात.’ භත්තසම්මදොති භත්තපරිළාහො. යං සන්ධාය වුත්තං – ‘‘තත්ථ කතමො භත්තසම්මදො? යා භුත්තාවිස්ස භත්තමුච්ඡා භත්තකිලමථො භත්තපරිළාහො කායදුට්ඨුල්ලං, අයං වුච්චති භත්තසම්මදො’’ති (විභ. 859). ‘भत्तसम्मदो’ (भोजनमद किंवा अन्नाचा आळस) म्हणजे जेवणानंतर शरीरात होणारा दाह किंवा थकवा. ज्याला अनुसरून असे म्हटले आहे – ‘तेथे ‘भत्तसम्मदो’ कोणता? भोजन केलेल्या व्यक्तीला येणारी अन्नाची ग्लानी, अन्नामुळे होणारा थकवा, अन्नाचा दाह किंवा शरीराचा जडपणा (अस्वस्थता), याला ‘भत्तसम्मदो’ असे म्हणतात.’ චෙතසො ච ලීනත්තන්ති චිත්තස්ස ලීයනාකාරො, යං සන්ධාය වුත්තං – ‘‘තත්ථ කතමං චෙතසො ලීනත්තං? යා චිත්තස්ස අකල්යතා අකම්මඤ්ඤතා ඔලීයනා සල්ලීයනා ලීනං ලීයනා ලීයිතත්තං ථිනං ථියනා ථියිතත්තං චිත්තස්ස, ඉදං වුච්චති චෙතසො ලීනත්ත’’න්ති (විභ. 860). ‘चेतसो लीनत्तं’ (चित्ताची संकुचितता किंवा सुस्ती) म्हणजे चित्ताची संकोच पावणारी अवस्था. ज्याला अनुसरून असे म्हटले आहे – ‘तेथे ‘चेतसो लीनत्तं’ कोणते? चित्ताची जी अस्वस्थता (अकल्याता), अकर्मण्यता (अकम्मञ्ञता), संकोचणे (ओलीयना), पूर्णपणे आक्रसणे (सल्लीयना), सुस्ती (लीनं), सुस्तावलेली अवस्था (लीयना), सुस्तावलेपण (लीयितत्तं), जडत्व (थिनं), जड होण्याची प्रक्रिया (थियना), चित्ताची जडता (थियितत्तं) आहे, याला ‘चेतसो लीनत्तं’ असे म्हणतात.’ චෙතසො අවූපසමොති යථා නාම වීතච්චිකොපි අඞ්ගාරො නෙව තාව සන්නිසීදති පතාපං කරොතියෙව, යථා ච පත්තපචනට්ඨානෙ නෙව තාව සන්නිසීදති පතාපං කරොතියෙව, එවං චිත්තස්ස අවූපසන්තාකාරො, අත්ථතො පනෙතං උද්ධච්චකුක්කුච්චමෙව හොති. ‘चेतसो अवूपसमो’ (चित्ताची अशांती) म्हणजे – ज्याप्रमाणे ज्वाला नसलेला निखारा देखील पूर्णपणे शांत (थंड) होत नाही, तर तो उष्णता देतच राहतो; आणि ज्याप्रमाणे भांडे शिजवण्याची जागा लगेच थंड होत नाही, तर ती उष्णता देतच राहतो; त्याचप्रमाणे चित्ताची ही अशांत अवस्था असते. वास्तविक पाहता, हे ‘उद्धच्च-कुक्कुच्च’ (उद्धतपणा आणि पश्चात्ताप/चिंता) च आहे. විචිකිච්ඡට්ඨානීයා ධම්මාති විචිකිච්ඡාය ආරම්මණධම්මා. අයොනිසොමනසිකාරො සබ්බත්ථ වුත්තනයොව. එවමෙත්ථ කාමච්ඡන්දො විචිකිච්ඡාති ඉමෙ ද්වෙ ධම්මා ආරම්මණෙන කථිතා, බ්යාපාදො ආරම්මණෙන ච උපනිස්සයෙන ච, සෙසා සහජාතෙන ච උපනිස්සයෙන චාති. ‘विचिकिच्छाठानीय धम्मा’ (संशयाला कारणीभूत असणारे धम्म) म्हणजे संशयाचे आलंबन (विषय) असणारे धम्म. ‘अयोनिसोमनसिकार’ (अयोग्य मनन) चा अर्थ सर्व ठिकाणी आधी सांगितल्याप्रमाणेच आहे. अशा प्रकारे, येथे ‘कामच्छंद’ (इंद्रियसुखाची इच्छा) आणि ‘विचिकिच्छा’ (संशय) हे दोन धम्म आलंबनाच्या (विषयाच्या) रूपाने सांगितले आहेत; ‘ब्यापाद’ (द्वेष/क्रोध) हा आलंबन आणि उपनिस्सय (प्रबळ आश्रय) या दोन्ही रूपांनी सांगितला आहे; आणि उर्वरित धम्म (थीण-मिद्ध आणि उद्धच्च-कुक्कुच्च) हे सहजात (एकत्र उत्पन्न होणारे) आणि उपनिस्सय या रूपांनी सांगितले आहेत. සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගට්ඨානීයා ධම්මාති සතියා ආරම්මණධම්මා සත්තතිංස බොධිපක්ඛියා ච නව ලොකුත්තරධම්මා ච. තත්ථ යොනිසොමනසිකාරබහුලීකාරොති තත්ථ උපායමනසිකාරස්ස පුනප්පුනං කරණං. ‘सतिसम्बोज्झङ्गठानीया धम्मा’ (स्मृती-संबोध्यंगाला कारणीभूत असणारे धम्म) म्हणजे स्मृतीचे आलंबन असणारे सदतीस बोधीपाक्षिक धम्म आणि नऊ लोकोत्तर धम्म. तेथे ‘योनिसोमनसिकारबहुलीकारो’ (योग्य मननाचा वारंवार अभ्यास करणे) म्हणजे त्या धम्मांवर योग्य प्रकारे (उपायाने) वारंवार मनन करणे होय. කුසලාකුසලා ධම්මාතිආදීසු කුසලාති කොසල්ලසම්භූතා අනවජ්ජසුඛවිපාකා. අකුසලාති අකොසල්ලසම්භූතා සාවජ්ජදුක්ඛවිපාකා. සාවජ්ජාති අකුසලා. අනවජ්ජාති කුසලා. හීනපණීතකණ්හසුක්කෙසුපි එසෙව නයො. සප්පටිභාගාති කණ්හසුක්කායෙව. කණ්හා හි කණ්හවිපාකදානතො[Pg.179], සුක්කා ච සුක්කවිපාකදානතො සප්පටිභාගා නාම, සදිසවිපාකකොට්ඨාසාති අත්ථො. පටිපක්ඛභූතස්ස වා භාගස්ස අත්ථිතාය සප්පටිභාගා. කණ්හානඤ්හි සුක්කා පටිපක්ඛභාගා, සුක්කානඤ්ච කණ්හා පටිපක්ඛභාගාති එවම්පි සප්පටිභාගා. සප්පටිබාහිතට්ඨෙන වා සප්පටිභාගා. අකුසලඤ්හි කුසලං පටිබාහිත්වා අත්තනො විපාකං දෙති, කුසලඤ්ච අකුසලං පටිබාහිත්වාති එවම්පි කණ්හසුක්කා සප්පටිභාගා. ‘कुसलाकुसला धम्मा’ (कुशल आणि अकुशल धम्म) इत्यादी वाक्यांमध्ये: ‘कुसला’ (कुशल) म्हणजे प्रज्ञेपासून उत्पन्न झालेले, दोषरहित आणि सुखद विपाक (परिणाम) देणारे धम्म. ‘अकुसला’ (अकुशल) म्हणजे अज्ञानापासून उत्पन्न झालेले, सदोष आणि दुःखद विपाक देणारे धम्म. ‘सावज्जा’ (सदोष) म्हणजे अकुशल. ‘अनवज्जा’ (दोषरहित) म्हणजे कुशल. ‘हीन’ (कनिष्ठ), ‘पणीत’ (उत्कृष्ट), ‘कण्ह’ (कृष्ण/काळे) आणि ‘सुक्क’ (शुक्ल/पांढरे) या शब्दांच्या बाबतीतही हाच नियम लागू होतो. ‘सप्पटिभागा’ (परस्परांशी संबंधित किंवा प्रतिरूप असणारे) म्हणजे कृष्ण आणि शुक्ल धम्मच होत. कारण कृष्ण धम्म हे कृष्ण (वाईट) विपाक देत असल्यामुळे आणि शुक्ल धम्म हे शुक्ल (चांगले) विपाक देत असल्यामुळे त्यांना ‘सप्पटिभागा’ म्हणतात; याचा अर्थ ‘समान विपाक देणारे गट’ असा आहे. किंवा, विरोधी बाजू (प्रतिपक्ष) अस्तित्वात असल्यामुळे त्यांना ‘सप्पटिभागा’ म्हटले जाते. कारण कृष्ण धम्मांची विरोधी बाजू शुक्ल धम्म आहेत आणि शुक्ल धम्मांची विरोधी बाजू कृष्ण धम्म आहेत; या दृष्टीनेही ते ‘सप्पटिभागा’ आहेत. किंवा, परस्परांना रोखण्याच्या अर्थाने ते ‘सप्पटिभागा’ आहेत. कारण अकुशल धम्म कुशल धम्माला रोखून स्वतःचा विपाक देतात, आणि कुशल धम्म अकुशल धम्माला रोखून स्वतःचा विपाक देतात; या दृष्टीनेही कृष्ण आणि शुक्ल धम्म ‘सप्पटिभागा’ आहेत. ආරම්භධාතූති පඨමාරම්භවීරියං. නික්කමධාතූති කොසජ්ජතො නික්ඛන්තත්තා තතො බලවතරං. පරක්කමධාතූති පරං පරං ඨානං අක්කමනතාය තතොපි බලවතරන්ති තීහිපි පදෙහි වීරියමෙව කථිතං. ‘आरम्भधातू’ म्हणजे सुरुवातीला केलेले वीर्य (प्रयत्न). ‘निक्कमधातू’ म्हणजे आळसातून बाहेर पडल्यामुळे त्या (सुरुवातीच्या प्रयत्नापेक्षा) अधिक बलवान असणारे वीर्य. ‘परक्कमधातू’ म्हणजे उत्तरोत्तर उच्च अवस्था प्राप्त करण्याच्या क्षमतेमुळे त्यापेक्षाही अधिक बलवान असणारे वीर्य. अशा प्रकारे, या तिन्ही पदांद्वारे ‘वीर्य’ (प्रयत्न/ऊर्जा) च सांगितले गेले आहे. පීතිසම්බොජ්ඣඞ්ගට්ඨානීයාති පීතියා ආරම්මණධම්මා. කායපස්සද්ධීති තිණ්ණං ඛන්ධානං දරථපස්සද්ධි. චිත්තපස්සද්ධීති විඤ්ඤාණක්ඛන්ධස්ස දරථපස්සද්ධි. සමථනිමිත්තන්ති සමථොපි සමථනිමිත්තං, ආරම්මණම්පි. අබ්යග්ගනිමිත්තන්ති තස්සෙව වෙවචනං. ‘पीतिसम्बोज्झङ्गठानीया’ (प्रीती-संबोध्यंगाला कारणीभूत असणारे धम्म) म्हणजे प्रीतीचे आलंबन असणारे धम्म. ‘कायपस्सद्धि’ (कायाची शांतता) म्हणजे तीन स्कंधांच्या (वेदना, संज्ञा, संस्कार) तापाचा/थकव्याचा शम होणे. ‘चित्तपस्सद्धि’ (चित्ताची शांतता) म्हणजे विज्ञानस्कंधाच्या तापाचा शम होणे. ‘समथनिमित्तं’ (शमथाचे निमित्त) म्हणजे शमथ (एकाग्रता) स्वतः देखील शमथाचे निमित्त आहे आणि त्याचे आलंबन (विषय) देखील शमथाचे निमित्त आहे. ‘अब्यग्गनिमित्तं’ (विक्षेपविरहिततेचे निमित्त) हा त्याचाच समानार्थी शब्द आहे. උපෙක්ඛාසම්බොජ්ඣඞ්ගට්ඨානීයාති උපෙක්ඛාය ආරම්මණධම්මා, අත්ථතො පන මජ්ඣත්තාකාරො උපෙක්ඛාට්ඨානීයා ධම්මොති වෙදිතබ්බො. එවමෙත්ථ සතිධම්මවිචයඋපෙක්ඛාසම්බොජ්ඣඞ්ගා ආරම්මණෙන කථිතා, සෙසා ආරම්මණෙනපි උපනිස්සයෙනපි. ‘उपेक्खासम्बोज्झङ्गठानीया’ (उपेक्षा-संबोध्यंगाला कारणीभूत असणारे धम्म) म्हणजे उपेक्षेचे आलंबन असणारे धम्म; परंतु वास्तविक पाहता, उपेक्षेला कारणीभूत असणारे धम्म हे तटस्थतेच्या (मध्यस्थतेच्या) स्वरूपाचे असतात, असे समजावे. अशा प्रकारे, येथे सती (स्मृती), धम्मविचय आणि उपेक्खा (उपेक्षा) हे संबोध्यंग आलंबनाच्या रूपाने सांगितले आहेत; आणि उर्वरित संबोध्यंग आलंबन आणि उपनिस्सय या दोन्ही रूपांनी सांगितले आहेत. 3. සීලසුත්තවණ්ණනා ३. शीलसुत्तवण्णना (शील सूत्राचे स्पष्टीकरण) 184. තතියෙ සීලසම්පන්නාති එත්ථ ඛීණාසවස්ස ලොකියලොකුත්තරසීලං කථිතං, තෙන සම්පන්නාති අත්ථො. සමාධිපඤ්ඤාසුපි එසෙව නයො. විමුත්ති පන ඵලවිමුත්තියෙව. විමුත්තිඤාණදස්සනං පච්චවෙක්ඛණඤාණං. එවමෙත්ථ සීලාදයො තයො ලොකියලොකුත්තරා, විමුත්ති ලොකුත්තරාව, විමුත්තිඤාණදස්සනං ලොකියමෙව. १८४. तिसऱ्या सूत्रात, ‘सीलसम्पन्ना’ (शीलाने संपन्न) या पाठात अरिहंतांच्या (क्षीणासवांच्या) लौकिक आणि लोकोत्तर शीलाविषयी सांगितले आहे; ‘त्या शीलाने युक्त असणे’ असा याचा अर्थ आहे. समाधी आणि प्रज्ञा यांच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. परंतु ‘विमुत्ती’ (विमुक्ती) म्हणजे केवळ फलविमुक्तीच (फलप्राप्तीची विमुक्ती) समजावी. ‘विमुत्तिञाणदस्सनं’ (विमुक्तीचे ज्ञान आणि दर्शन) म्हणजे प्रत्यवेक्षण ज्ञान (पच्चवेक्खणञाण) होय. अशा प्रकारे, येथे शील इत्यादी तीन (शील, समाधी, प्रज्ञा) हे लौकिक आणि लोकोत्तर दोन्ही आहेत; विमुक्ती ही केवळ लोकोत्तरच आहे; आणि विमुक्तीचे ज्ञान-दर्शन हे केवळ लौकिकच आहे. දස්සනම්පාහන්ති දස්සනම්පි අහං. තං පනෙතං දස්සනං – චක්ඛුදස්සනං, ඤාණදස්සනන්ති දුවිධං. තත්ථ පසන්නෙහි චක්ඛූහි අරියානං දස්සනං ඔලොකනං චක්ඛුදස්සනං නාම. අරියෙහි පන දිට්ඨස්ස ලක්ඛණස්ස දස්සනං, පටිවිද්ධස්ස ච පටිවිජ්ඣනං ඣානෙන වා විපස්සනාය වා මග්ගඵලෙහි වා ඤාණදස්සනං නාම. ඉමස්මිං පනෙත්ථ චක්ඛුදස්සනං අධිප්පෙතං. අරියානඤ්හි පසන්නෙහි චක්ඛූහි ඔලොකනම්පි [Pg.180] බහුකාරමෙව. සවනන්ති ‘‘අසුකො නාම ඛීණාසවො අසුකස්මිං නාම රට්ඨෙ වා ජනපදෙ වා ගාමෙ වා නිගමෙ වා විහාරෙ වා ලෙණෙ වා වසතී’’ති කථෙන්තානං සොතෙන සවනං, එතම්පි බහුකාරමෙව. උපසඞ්කමනන්ති ‘‘දානං වා දස්සාමි, පඤ්හං වා පුච්ඡිස්සාමි, ධම්මං වා සොස්සාමි, සක්කාරං වා කරිස්සාමී’’ති එවරූපෙන චිත්තෙන අරියානං උපසඞ්කමනං. පයිරුපාසනන්ති පඤ්හාපයිරුපාසනං. අරියානං ගුණෙ සුත්වා තෙ උපසඞ්කමිත්වා නිමන්තෙත්වා දානං දත්වා ‘‘කිං, භන්තෙ, කුසල’’න්තිආදිනා නයෙන පඤ්හපුච්ඡනන්ති අත්ථො. ‘दस्सनम्पाहं’ म्हणजे ‘मी (तथागत) असे म्हणतो की, (अरिहंतांचे) दर्शन घेणे देखील अत्यंत उपकारक आहे.’ ते दर्शन दोन प्रकारचे आहे – चक्षुदर्शन (डोळ्यांनी पाहणे) आणि ज्ञानदर्शन (ज्ञानाने पाहणे). त्यापैकी, श्रद्धायुक्त डोळ्यांनी आर्यांचे (अरिहंतांचे) दर्शन घेणे किंवा त्यांना पाहणे म्हणजे ‘चक्षुदर्शन’ होय. परंतु, आर्यांनी पाहिलेल्या लक्षणांचे दर्शन घेणे आणि त्यांनी जाणलेल्या सत्याचा ध्यान, विपश्यना किंवा मार्ग-फलांद्वारे साक्षात्कार करणे म्हणजे ‘ज्ञानदर्शन’ होय. येथे मात्र ‘चक्षुदर्शन’ अभिप्रेत आहे. कारण, आर्यांना श्रद्धायुक्त डोळ्यांनी पाहणे देखील अत्यंत उपकारक आहे. ‘सवणं’ (श्रवण) म्हणजे – ‘अमुक नावाचे अरिहंत अमुक देशात, जनपदात, गावात, नगरात, विहारात किंवा गुहेत राहत आहेत,’ असे सांगणाऱ्यांचे शब्द कानांनी ऐकणे; हे देखील अत्यंत उपकारक आहे. ‘उपसङ्कमनं’ (जवळ जाणे/भेटणे) म्हणजे – ‘मी दान देईन, किंवा प्रश्न विचारीन, किंवा धम्म ऐकेन, किंवा आदर-सत्कार करीन,’ अशा विचाराने आर्यांच्या जवळ जाणे. ‘पयिरुपासनं’ (सेवा करणे/जवळ बसणे) म्हणजे प्रश्न विचारण्याच्या उद्देशाने जवळ बसणे. आर्यांचे गुण ऐकून, त्यांच्याजवळ जाऊन, त्यांना आमंत्रित करून, दान देऊन ‘भन्ते, कुशल काय आहे?’ इत्यादी प्रकारे प्रश्न विचारणे, असा याचा अर्थ आहे. අනුස්සතින්ති රත්තිට්ඨානදිවාට්ඨානෙසු නිසින්නස්ස ‘‘ඉදානි අරියා ලෙණගුහමණ්ඩපාදීසු ඣානවිපස්සනාමග්ගඵලසුඛෙහි වීතිනාමෙන්තී’’ති අනුස්සරණං. යො වා තෙසං සන්තිකෙ ඔවාදො ලද්ධො හොති, තං ආවජ්ජිත්වා ‘‘ඉමස්මිං ඨානෙ සීලං කථිතං, ඉමස්මිං සමාධි, ඉමස්මිං විපස්සනා, ඉමස්මිං මග්ගො, ඉමස්මිං ඵල’’න්ති එවං අනුස්සරණං. අනුපබ්බජ්ජන්ති අරියෙසු චිත්තං පසාදෙත්වා ඝරා නික්ඛම්ම තෙසං සන්තිකෙ පබ්බජ්ජං. අරියානඤ්හි සන්තිකෙ චිත්තං පසාදෙත්වා තෙසංයෙව සන්තිකෙ පබ්බජිත්වා තෙසංයෙව ඔවාදානුසාසනිං පච්චාසීසමානස්ස චරතොපි පබ්බජ්ජා අනුපබ්බජ්ජා නාම. අරියෙසු පසාදෙන අඤ්ඤත්ථ පබ්බජිත්වා අරියානං සන්තිකෙ ඔවාදානුසාසනිං පච්චාසීසමානස්ස චරතො පබ්බජ්ජාපි අනුපබ්බජ්ජා නාම. අඤ්ඤෙසු පන පසාදෙන අඤ්ඤෙසංයෙව සන්තිකෙ පබ්බජිත්වා අඤ්ඤෙසංයෙව ඔවාදානුසාසනිං පච්චාසීසමානස්ස චරතො පබ්බජ්ජා අනුපබ්බජ්ජා නාම න හොති. अनुस्सति (अनुस्मृती) म्हणजे रात्रीच्या व दिवसाच्या निवासस्थानी बसलेल्या व्यक्तीने 'या वेळी आर्य लोक गुहा, मंडप इत्यादी ठिकाणी ध्यान, विपश्यना, मार्ग आणि फल यांच्या सुखाने काळ घालवत आहेत' असे स्मरण करणे होय. किंवा त्यांच्याकडून जो उपदेश प्राप्त झाला आहे, त्याचे चिंतन करून 'या ठिकाणी शील सांगितले आहे, येथे समाधी, येथे विपश्यना, येथे मार्ग आणि येथे फल सांगितले आहे' असे वारंवार स्मरण करणे होय. अनुपब्बज्जा (अनुप्रव्रज्या) म्हणजे आर्यांच्या ठायी चित्त प्रसन्न करून, घरातून बाहेर पडून त्यांच्या सन्निध प्रव्रज्या घेणे होय. कारण, आर्यांच्या सन्निध चित्त प्रसन्न करून, त्यांच्याच जवळ प्रव्रजित होऊन, त्यांच्याच उपदेश व अनुशासनाची आकांक्षा ठेवून आचरण करणाऱ्याची प्रव्रज्या ही 'अनुपब्बज्जा' म्हटली जाते. आर्यांच्या ठायी श्रद्धा ठेवून इतर ठिकाणी प्रव्रजित होऊनही, आर्यांच्याच जवळ उपदेश व अनुशासनाची आकांक्षा ठेवून आचरण करणाऱ्याची प्रव्रज्या देखील 'अनुपब्बज्जा' म्हटली जाते. परंतु, इतरांच्या ठायी श्रद्धा ठेवून, इतरांच्याच जवळ प्रव्रजित होऊन, इतरांच्याच उपदेश व अनुशासनाची आकांक्षा ठेवून आचरण करणाऱ्याची प्रव्रज्या 'अनुपब्बज्जा' म्हटली जात नाही. එවං පබ්බජිතෙසු පන මහාකස්සපත්ථෙරස්ස තාව අනුපබ්බජ්ජං පබ්බජිතා සතසහස්සමත්තා අහෙසුං, තථා ථෙරස්සෙව සද්ධිවිහාරිකස්ස ච චන්දගුත්තත්ථෙරස්ස, තස්සාපි සද්ධිවිහාරිකස්ස සූරියගුත්තත්ථෙරස්ස, තස්සාපි සද්ධිවිහාරිකස්ස අස්සගුත්තත්ථෙරස්ස, තස්සාපි සද්ධිවිහාරිකස්ස යොනකධම්මරක්ඛිතත්ථෙරස්ස, තස්ස පන සද්ධිවිහාරිකො අසොකරඤ්ඤො කනිට්ඨභාතා තිස්සත්ථෙරො නාම අහොසි, තස්ස අනුපබ්බජ්ජං පබ්බජිතා අඩ්ඪතෙය්යකොටිසඞ්ඛා අහෙසුං. මහින්දත්ථෙරස්ස අනුපබ්බජිතානං ගණනපරිච්ඡෙදො නත්ථි. යාවජ්ජදිවසා ලඞ්කාදීපෙ සත්ථරි පසාදෙන පබ්බජන්තා මහින්දත්ථෙරස්සෙව පබ්බජ්ජං අනුපබ්බජන්ති නාම. अशा प्रकारे प्रव्रजित झालेल्यांमध्ये, सर्वप्रथम महाकस्सप थेरांच्या अनुप्रव्रज्येचे अनुकरण करून प्रव्रजित झालेले सुमारे एक लाख होते. तसेच, त्या थेरांचे सद्धिविहारिक (शिष्य) चंदगुत्त थेरांच्या अनुप्रव्रज्येचे अनुकरण करून प्रव्रजित झालेले देखील सुमारे एक लाख होते. त्यांच्याही सद्धिविहारिक सूरियगुत्त थेरांच्या, त्यांच्याही सद्धिविहारिक अस्सगुत्त थेरांच्या आणि त्यांच्याही सद्धिविहारिक योनकधम्मरक्खित थेरांच्या अनुप्रव्रज्येचे अनुकरण करून प्रव्रजित झालेले प्रत्येकी सुमारे एक लाख होते. त्या योनकधम्मरक्खित थेरांचे सद्धिविहारिक सम्राट अशोकांचे धाकटे बंधू तिस्स थेर नावाचे होते; त्यांच्या अनुप्रव्रज्येचे अनुकरण करून प्रव्रजित झालेल्यांची संख्या अडीच कोटी होती. महिन्द थेरांच्या अनुप्रव्रज्येचे अनुकरण करणाऱ्यांच्या संख्येची तर मर्यादाच नाही. आजतागायत लंकाद्वीपामध्ये शास्त्यांच्या ठायी श्रद्धा ठेवून जे प्रव्रजित होतात, ते महिन्द थेरांच्याच प्रव्रज्येचे अनुकरण करतात असे म्हटले जाते. තං [Pg.181] ධම්මන්ති තං තෙසං ඔවාදානුසාසනීධම්මං. අනුස්සරතීති සරති. අනුවිතක්කෙතීති විතක්කාහතං කරොති. ආරද්ධො හොතීති පරිපුණ්ණො හොති. පවිචිනතීතිආදි සබ්බං තත්ථ ඤාණචාරවසෙනෙව වුත්තං. අථ වා පවිචිනතීති තෙසං තෙසං ධම්මානං ලක්ඛණං විචිනති. පවිචරතීති තත්ථ ඤාණං චරාපෙති. පරිවීමංසමාපජ්ජතීති වීමංසනං ඔලොකනං ගවෙසනං ආපජ්ජති. 'तं धम्मं' म्हणजे त्यांचा तो उपदेश व अनुशासनाचा धर्म. 'अनुस्सरति' म्हणजे स्मरण करतो. 'अनुवितक्केति' म्हणजे वितर्काने विचार करतो. 'आरद्धो होति' म्हणजे परिपूर्ण होतो. 'पविचिनति' इत्यादी सर्व शब्द तेथे ज्ञानाच्या संचाराच्या प्रभावानेच सांगितले आहेत. अथवा, 'पविचिनति' म्हणजे त्या त्या धर्मांच्या लक्षणांचा शोध घेतो. 'पविचरति' म्हणजे त्यामध्ये ज्ञानाचा संचार करतो. 'परिवीमंसमापज्जति' म्हणजे मीमांसा, अवलोकन आणि गवेषणा करतो. සත්ත ඵලා සත්තානිසංසාති උභයම්පෙතං අත්ථතො එකං. දිට්ඨෙව ධම්මෙ පටිකච්ච අඤ්ඤං ආරාධෙතීති අරහත්තං ආරාධෙන්තො ඉමස්මිංයෙව අත්තභාවෙ ආරාධෙති, තඤ්ච ඛො පටිකච්ච, අසම්පත්තෙයෙව මරණකාලෙති අත්ථො. අථ මරණකාලෙති අථ මරණස්ස ආසන්නකාලෙ. 'सत्त फला सत्तानिसंसा' (सात फळे आणि सात फायदे) हे दोन्ही शब्द अर्थाच्या दृष्टीने एकच आहेत. 'दिट्ठेव धम्मे पटिकच्च अञ्ञं आराधेति' म्हणजे अर्हत्त्व प्राप्त करताना याच जन्मात प्राप्त करतो, आणि ते देखील आधीच, मृत्यूची वेळ येण्यापूर्वीच प्राप्त करतो, असा अर्थ आहे. 'अथ मरणकाले' म्हणजे अथवा मृत्यूच्या अगदी जवळच्या वेळी (मरणासन्न काळात). අන්තරාපරිනිබ්බායීති යො ආයුවෙමජ්ඣං අනතික්කමිත්වා පරිනිබ්බායති, සො තිවිධො හොති. කප්පසහස්සායුකෙසු තාව අවිහෙසු නිබ්බත්තිත්වා එකො නිබ්බත්තදිවසෙයෙව අරහත්තං පාපුණාති. නො චෙ නිබ්බත්තදිවසෙ පාපුණාති, පඨමස්ස පන කප්පසතස්ස මත්ථකෙ පාපුණාති. අයමෙකො අන්තරාපරිනිබ්බායී. අපරො එවං අසක්කොන්තො ද්වින්නං කප්පසතානං මත්ථකෙ පාපුණාති, අයං දුතියො. අපරො එවම්පි අසක්කොන්තො චතුන්නං කප්පසතානං මත්ථකෙ පාපුණාති, අයං තතියො අන්තරාපරිනිබ්බායී. 'अंतरापरिनिब्बायी' म्हणजे जो आयुष्याचा मध्यभाग ओलांडण्यापूर्वीच परिनिर्वाण प्राप्त करतो. तो तीन प्रकारचा असतो. सर्वप्रथम, एक हजार कल्प आयुष्य असलेल्या 'अविह' लोकामध्ये उत्पन्न होऊन, एक अनागामी पुद्गल उत्पन्न झाल्याच्या दिवशीच अर्हत्त्व प्राप्त करतो. जर उत्पन्न झाल्याच्या दिवशी प्राप्त करू शकला नाही, तर पहिल्या शंभर कल्पांच्या समाप्तीनंतर प्राप्त करतो. हा पहिला 'अंतरापरिनिब्बायी' होय. दुसरा, अशा प्रकारे असमर्थ ठरल्यास, दोनशे कल्पांच्या समाप्तीनंतर अर्हत्त्व प्राप्त करतो, हा दुसरा होय. तिसरा, अशा प्रकारेही असमर्थ ठरल्यास, चारशे कल्पांच्या समाप्तीनंतर अर्हत्त्व प्राप्त करतो, हा तिसरा 'अंतरापरिनिब्बायी' होय. පඤ්චමං පන කප්පසතං අතික්කමිත්වා අරහත්තං පත්තො උපහච්චපරිනිබ්බායී නාම හොති. අතප්පාදීසුපි එසෙව නයො. යත්ථ කත්ථචි උප්පන්නො පන සසඞ්ඛාරෙන සප්පයොගෙන අරහත්තං පත්තො සසඞ්ඛාරපරිනිබ්බායී නාම, අසඞ්ඛාරෙන අප්පයොගෙන පත්තො අසඞ්ඛාරපරිනිබ්බායී නාම. අවිහාදීසුපි නිබ්බත්තො තත්ථ යාවතායුකං ඨත්වා උපරූපරි නිබ්බත්තිත්වා අකනිට්ඨං පත්තො උද්ධංසොතො අකනිට්ඨගාමී නාම. परंतु पाचशे कल्प ओलांडून अर्हत्त्व प्राप्त करणारा 'उपहच्चपरिनिब्बायी' म्हटला जातो. 'अतप्प' इत्यादी लोकांमध्येही हाच नियम समजून घ्यावा. परंतु कोणत्याही एका लोकामध्ये उत्पन्न होऊन, ससंस्काराने (प्रयत्नासह) अर्हत्त्व प्राप्त करणारा 'ससंखारपरिनिब्बायी' म्हटला जातो; आणि असंस्काराने (प्रयत्नाशिवाय) अर्हत्त्व प्राप्त करणारा 'असंखारपरिनिब्बायी' म्हटला जातो. 'अविह' इत्यादी लोकांमध्ये उत्पन्न होऊन, तेथे पूर्ण आयुष्यभर राहून, वरवरच्या लोकांमध्ये उत्पन्न होत होत शेवटी 'अकनिठ्ठ' लोकामध्ये पोहोचणारा 'उद्धंसोत अकनिठ्ठगामी' म्हटला जातो. ඉමස්මිං පන ඨානෙ අට්ඨචත්තාරීස අනාගාමිනො කථෙතබ්බා. අවිහෙසු හි තයො අන්තරාපරිනිබ්බායී, එකො උපහච්චපරිනිබ්බායී, එකො උද්ධංසොතො අකනිට්ඨගාමීති පඤ්ච හොන්ති. තෙ අසඞ්ඛාරපරිනිබ්බායිනො පඤ්ච, සසඞ්ඛාරපරිනිබ්බායිනො පඤ්චාති දස හොන්ති, තථා අතප්පාදීසු. අකනිට්ඨෙසු පන උද්ධංසොතො නත්ථි, තස්මා තත්ථ චත්තාරො සසඞ්ඛාරපරිනිබ්බායී, චත්තාරො අසඞ්ඛාරපරිනිබ්බායීති අට්ඨාති එවං අට්ඨචත්තාලීස හොන්ති. තෙසං උද්ධංසොතො අකනිට්ඨගාමී සබ්බජෙට්ඨො චෙව හොති [Pg.182] සබ්බකනිට්ඨො ච. කථං? සො හි සොළසකප්පසහස්සායුකත්තා ආයුනා සබ්බෙසං ජෙට්ඨො, සබ්බපච්ඡා අරහත්තං පාපුණීති සබ්බෙසං කනිට්ඨො. ඉමස්මිං සුත්තෙ අපුබ්බං අචරිමං එකචිත්තක්ඛණිකා නානාලක්ඛණා අරහත්තමග්ගස්ස පුබ්බභාගවිපස්සනා බොජ්ඣඞ්ගා කථිතා. परंतु या ठिकाणी अठ्ठेचाळीस प्रकारचे अनागामी सांगितले पाहिजेत. कारण 'अविह' लोकामध्ये तीन अंतरापरिनिब्बायी, एक उपहच्चपरिनिब्बायी आणि एक उद्धंसोत अकनिठ्ठगामी असे पाच अनागामी असतात. ते असंखारपरिनिब्बायी पाच आणि ससंखारपरिनिब्बायी पाच मिळून दहा होतात; याचप्रमाणे अतप्प इत्यादी लोकांमध्येही (अतप्प, सुदस्स, सुदस्सी या तिन्हींमध्ये प्रत्येकी दहा-दहा) होतात. परंतु 'अकनिठ्ठ' लोकामध्ये उद्धंसोत नसतो, म्हणून तेथे चार ससंखारपरिनिब्बायी आणि चार असंखारपरिनिब्बायी असे आठ असतात; अशा प्रकारे एकूण अठ्ठेचाळीस अनागामी होतात. त्यांच्यामध्ये 'उद्धंसोत अकनिठ्ठगामी' हा सर्वांत मोठा देखील असतो आणि सर्वांत लहान देखील असतो. ते कसे? कारण तो सोळा हजार कल्प आयुष्य असलेला असल्याने आयुष्याने सर्वांत मोठा असतो, आणि सर्वांत शेवटी अर्हत्त्व प्राप्त करत असल्याने तो सर्वांत लहान असतो. या सूत्तात एकाच चित्तक्षणात उत्पन्न होणारे, भिन्न लक्षणे असलेले, अर्हत्त्वमार्गाच्या पूर्वभागातील विपश्यनेचे बोज्झंग सांगितले आहेत. 4. වත්ථසුත්තවණ්ණනා ४. वत्थसुत्तवण्णना (वत्थ सुत्ताचे स्पष्टीकरण) 185. චතුත්ථෙ සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගො ඉති චෙ මෙ හොතීති සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගොති එවං චෙ මය්හං හොති. අප්පමාණොති මෙ හොතීති අප්පමාණොති එවං මෙ හොති. සුසමාරද්ධොති සුපරිපුණ්ණො. තිට්ඨතීති එත්ථ අට්ඨහාකාරෙහි සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගො තිට්ඨති – උප්පාදං අනාවජ්ජිතත්තා අනුප්පාදං ආවජ්ජිතත්තා සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගො තිට්ඨති, පවත්තං, අප්පවත්තං, නිමිත්තං, අනිමිත්තං සඞ්ඛාරෙ අනාවජ්ජිතත්තා, විසඞ්ඛාරං ආවජ්ජිතත්තා සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගො තිට්ඨතීති. ඉමෙහි අට්ඨහාකාරෙහි තිට්ඨතීති ථෙරො ජානාති, වුත්තාකාරවිපරීතෙහෙව අට්ඨහාකාරෙහි චවන්තං චවතීති පජානාති. සෙසබොජ්ඣඞ්ගෙසුපි එසෙව නයො. १८५. चौथ्या सूत्तात, 'satisambojjhaṅgo iti ce me hotīti' म्हणजे 'माझ्या ठायी सतिसंबोज्जंग (स्मृती-संबोध्यंग) आहे' असे जर मला वाटते. 'appamāṇoti me hotīti' म्हणजे 'तो अमर्याद आहे' असे मला वाटते. 'susamāraddhoti' म्हणजे चांगल्या प्रकारे परिपूर्ण झालेला. 'tiṭṭhatīti' म्हणजे येथे आठ कारणांनी सतिसंबोज्जंग टिकून राहतो – (१) उत्पत्तीचा विचार न केल्यामुळे आणि (२) अनुत्पाद (निर्वाण) चा विचार केल्यामुळे सतिसंबोज्जंग टिकून राहतो; (३) प्रवृत्तीचा विचार न केल्यामुळे आणि (४) अप्रवृत्तीचा विचार केल्यामुळे; (५) निमित्ताचा विचार न केल्यामुळे आणि (६) अनिमित्ताचा विचार केल्यामुळे; (७) संस्कारांचा विचार न केल्यामुळे आणि (८) विसंस्काराचा विचार केल्यामुळे सतिसंबोज्जंग टिकून राहतो. या आठ कारणांनी तो टिकून राहतो, असे थेर जाणतात; आणि सांगितलेल्या कारणांच्या अगदी उलट असलेल्या आठ कारणांनी तो नष्ट होतो, हे देखील ते चांगल्या प्रकारे जाणतात. उर्वरित बोज्झंगांच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. ඉති ඉමස්මිං සුත්තෙ ථෙරස්ස ඵලබොජ්ඣඞ්ගා කථිතා. යදා හි ථෙරො සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගං සීසං කත්වා ඵලසමාපත්තිං සමාපජ්ජති, තදා ඉතරෙ ඡ තදන්වයා හොන්ති. යදා ධම්මවිචයාදීසු අඤ්ඤතරං, තදාපි සෙසා තදන්වයා හොන්තීති එවං ඵලසමාපත්තියං අත්තනො චිණ්ණවසිතං දස්සෙන්තො ථෙරො ඉමං සුත්තං කථෙසීති. अशा प्रकारे या सूत्तात, थेरांचे फल-समापत्तीशी संबंधित बोज्झंग सांगितले आहेत. कारण जेव्हा थेर सतिसंबोज्जंगाला मुख्य करून फल-समापत्तीमध्ये प्रवेश करतात, तेव्हा इतर सहा बोज्झंग त्याचे अनुकरण करतात. जेव्हा धम्मविचय इत्यादींपैकी कोणत्याही एकाला मुख्य करतात, तेव्हाही उर्वरित बोज्झंग त्याचे अनुकरण करतात. अशा प्रकारे फल-समापत्तीमध्ये स्वतःच्या अंगीकारलेल्या वशित्वाचे (प्रभुत्वाचे) प्रदर्शन करण्यासाठी थेरांनी हे सूत्त सांगितले आहे. 5. භික්ඛුසුත්තවණ්ණනා ५. भिक्खुसुत्तवण्णना (भिक्खु सुत्ताचे स्पष्टीकरण) 186. පඤ්චමෙ බොධාය සංවත්තන්තීති බුජ්ඣනත්ථාය සංවත්තන්ති. කිං බුජ්ඣනත්ථාය? මග්ගෙන අසඞ්ඛතං නිබ්බානං, පච්චවෙක්ඛණාය කතකිච්චතං, මග්ගෙන වා කිලෙසනිද්දාතො පබුජ්ඣනත්ථාය, ඵලෙන පබුජ්ඣනභාවත්ථායාතිපි වුත්තං හොති. තෙනෙවෙත්ථ නිබ්බානසච්ඡිකිරියා කිලෙසපහානපච්චවෙක්ඛණාති සබ්බං දස්සිතං. १८६. पाचव्या सुत्तात, 'बोधाय संवत्तन्तीति' म्हणजे बोधासाठी (जाणण्यासाठी) प्रवृत्त होतात. काय जाणण्यासाठी? मार्गाने (अरिअमग्ग) असंखत (असंस्कृत) निर्वाण जाणण्यासाठी, प्रत्यवेक्षणेने (पच्चवेक्खणा) कृतकृत्यता (केलेले कार्य) जाणण्यासाठी, किंवा मार्गाने क्लेशांच्या निद्रेतून जागृत होण्यासाठी, आणि फलाने निर्वाण साक्षात्काराच्या अवस्थेला प्राप्त होण्यासाठी - असेही म्हटले आहे. म्हणूनच येथे निर्वाण-साक्षात्कार, क्लेश-प्रहाण आणि प्रत्यवेक्षणा हे सर्व दर्शविले आहे. 6-7. කුණ්ඩලියසුත්තාදිවණ්ණනා ६-७. कुंडलिय सुत्त इत्यादींचे वर्णन. 187-188. ඡට්ඨෙ [Pg.183] ආරාමනිස්සයීති ආරාමං නිස්සාය වසනභාවෙන ආරාමනිස්සයී. පරිසාවචරොති පරිසාය අවචරො. පරිසං නාම බාලාපි, පණ්ඩිතාපි ඔසරන්ති, යො පන පරප්පවාදං මද්දිත්වා අත්තනො වාදං දීපෙතුං සක්කොති, අයං පරිසාවචරො නාම. ආරාමෙන ආරාමන්ති ආරාමෙනෙව ආරාමං අනුචඞ්කමාමි, න බාහිරෙනාති අත්ථො. උය්යානෙන උය්යානන්ති එත්ථාපි එසෙව නයො. අඤ්ඤෙන වා ආරාමෙන පවිසිත්වා අඤ්ඤං ආරාමං, අඤ්ඤෙන උය්යානෙන අඤ්ඤං උය්යානන්ති අයමෙත්ථ අත්ථො. ඉතිවාදප්පමොක්ඛානිසංසන්ති ‘‘එවං පුච්ඡා හොති, එවං විස්සජ්ජනං, එවං ගහණං, එවං නිබ්බෙඨන’’න්ති ඉමිනා නයෙන ඉතිවාදො හොති ඉතිවාදප්පමොක්ඛොති එතං ආනිසංසං. උපාරම්භානිසංසන්ති ‘‘අයං පුච්ඡාය දොසො, අයං විස්සජ්ජනෙ’’ති එවං වාදදොසානිසංසං. १८७-१८८. सहाव्या सुत्तात, 'आरामनिस्सयी' म्हणजे आरामाचा (विहाराचा) आश्रय घेऊन राहण्याच्या स्वभावामुळे 'आरामनिस्सयी' म्हटले जाते. 'परिसावचरो' म्हणजे परिषदेमध्ये वावरणारा. परिषदेमध्ये मूर्ख आणि पंडित दोन्ही एकत्र येतात, परंतु जो दुसऱ्याच्या चुकीच्या वादाचे खंडन करून स्वतःचा वाद (मत) सिद्ध करू शकतो, त्याला 'परिसावचरो' (परिषद-प्रवीण) म्हणतात. 'आरामेन आरामं' म्हणजे एका आरामातून दुसऱ्या आरामातच मी चंक्रमण करतो (फिरतो), बाहेर नाही, असा अर्थ आहे. 'उय्यानेन उय्यानं' (उद्यानातून उद्यानात) यामध्येही हाच नियम समजावा. किंवा दुसऱ्या आरामात प्रवेश करून अन्य आरामात, आणि दुसऱ्या उद्यानातून अन्य उद्यानात चंक्रमण करतो, असा येथे अर्थ आहे. 'इतिवादप्पमोक्खानिंसं' म्हणजे 'असा प्रश्न असतो, असे उत्तर असते, असे ग्रहण असते, असे खंडन असते' या पद्धतीने वाद होतो आणि वादातून मुक्ती मिळते, हा त्याचा फायदा (आनिसंस) आहे. 'उपालम्भानिसंसं' म्हणजे 'हा प्रश्नातील दोष आहे, हा उत्तरातील दोष आहे' अशा प्रकारे वादातील दोषांचे प्रतिपादन करण्याचा फायदा होय. කථං භාවිතො ච, කුණ්ඩලිය, ඉන්ද්රියසංවරොති සත්ථා ‘‘එත්තකං ඨානං පරිබ්බාජකෙන පුච්ඡිතං, ඉදානි පුච්ඡිතුං න සක්කොතී’’ති ඤත්වා ‘‘න තාව අයං දෙසනා යථානුසන්ධිං ගතා. ඉදානි නං යථානුසන්ධිං පාපෙස්සාමී’’ති සයමෙව පුච්ඡන්තො ඉමං දෙසනං ආරභි. තත්ථ මනාපං නාභිජ්ඣතීති ඉට්ඨාරම්මණං නාභිජ්ඣායති. නාභිහංසතීති න සාමිසාය තුට්ඨියා අභිහංසති. තස්ස ඨිතො ච කායො හොති, ඨිතං චිත්තං අජ්ඣත්තන්ති තස්ස නාමකායො ච චිත්තඤ්ච ගොචරජ්ඣත්තෙ ඨිතං හොති. සුසණ්ඨිතන්ති කම්මට්ඨානවසෙන සුට්ඨු සණ්ඨිතං. සුවිමුත්තන්ති කම්මට්ඨානවිමුත්තියා සුවිමුත්තං. අමනාපන්ති අනිට්ඨාරම්මණං. න මඞ්කු හොතීති තස්මිං න මඞ්කු හොති. අප්පතිට්ඨිතචිත්තොති කිලෙසවසෙන අට්ඨිතචිත්තො. අදීනමානසොති දොමනස්සවසෙන අදීනචිත්තො. අබ්යාපන්නචෙතසොති දොසවසෙන අපූතිචිත්තො. 'हे कुंडलिय, इंद्रियसंवर कसा भावित केला जातो?' असे शास्त्यांनी (बुद्धांनी) विचारले. 'इतका भाग परिव्राजकाने विचारला आहे, आता तो विचारू शकत नाही' हे जाणून, 'अजून ही देशना योग्य अनुसंधीला (योग्य निष्कर्षाला) पोहोचली नाही. आता मी स्वतःच या देशनेला योग्य अनुसंधीला पोहोचवीन' असे म्हणून स्वतःच प्रश्न विचारत त्यांनी या देशनेची सुरुवात केली. त्यामध्ये, 'मनापं नाभिञ्जतीति' म्हणजे इष्ट आलंबनाची अभिलाषा करत नाही. 'नाभिहंसतीति' म्हणजे सामिष (क्लेशांसह) आनंदाने हर्षित होत नाही. 'तस्स ठितो च कायो होति, ठितं चित्तं अज्झत्तं' म्हणजे त्याचा नामकाय आणि चित्त गोचर-अध्यात्म (कर्मस्थान आलंबन) मध्ये स्थिर असते. 'सुसण्ठितं' म्हणजे कर्मस्थानाच्या प्रभावाने चांगल्या प्रकारे स्थिर झालेले. 'सुविमुत्तं' म्हणजे कर्मस्थान-विमुक्तीने चांगल्या प्रकारे मुक्त झालेले. 'अमनापं' म्हणजे अनिष्ट आलंबन. 'न मंकु होति' म्हणजे त्यात तो खिन्न (चेहरा मलूल) होत नाही. 'अप्पतिट्ठितचित्तो' म्हणजे क्लेशांच्या प्रभावाने विचलित न होणारे चित्त असलेला. 'अदीनमानसो' म्हणजे दौर्मनस्याच्या (दुःखाच्या) प्रभावाने दीन चित्त नसलेला. 'अब्यापन्नचेतसो' म्हणजे द्वेषाच्या प्रभावाने अपूतचित्त (कलुषित चित्त नसलेला) होय. එවං භාවිතො ඛො, කුණ්ඩලිය, ඉන්ද්රියසංවරො එවං බහුලීකතො තීණි සුචරිතානි පරිපූරෙතීති එත්ථ එවං සුචරිතපූරණං වෙදිතබ්බං – ඉමෙසු තාව ඡසු ද්වාරෙසු අට්ඨාරස දුච්චරිතානි හොන්ති. කථං? චක්ඛුද්වාරෙ තාව [Pg.184] ඉට්ඨාරම්මණෙ ආපාථගතෙ කායඞ්ගවාචඞ්ගානි අචොපෙත්වා තස්මිං ආරම්මණෙ ලොභං උප්පාදෙන්තස්ස මනොදුච්චරිතං හොති. ලොභසහගතෙන චිත්තෙන ‘‘අහො වතිදං ඉට්ඨං කන්තං මනාප’’න්ති භණන්තස්ස වචීදුච්චරිතං, තදෙව හත්ථෙන පරාමසන්තස්ස කායදුච්චරිතං. සෙසද්වාරෙසුපි එසෙව නයො. 'हे कुंडलिय, अशा प्रकारे भावित केलेला आणि बहुलीकृत (पुन्हा पुन्हा अभ्यासलेला) इंद्रियसंवर तीन सुचरितांना परिपूर्ण करतो' येथे सुचरितांची परिपूर्ती अशा प्रकारे समजावी - प्रथम या सहा द्वारांमध्ये अठरा दुश्चरिते होतात. कशी? प्रथम चक्षुद्वारावर इष्ट आलंबन आले असता, कायांग आणि वागंग (शरीर व वाणीचे अवयव) न हलवता त्या आलंबनाविषयी लोभ उत्पन्न करणाऱ्याचे 'मनोदुश्चरित' होते. लोभयुक्त चित्ताने 'अहाहा! हे किती इष्ट, प्रिय आणि मनपसंत आहे' असे बोलणाऱ्याचे 'वचीदुश्चरित' (वाणीचे दुश्चरित) होते, आणि त्यालाच हाताने स्पर्श करणाऱ्याचे 'कायदुश्चरित' (शारीरिक दुश्चरित) होते. इतर द्वारांच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. අයං පන විසෙසො – සොතද්වාරස්මිඤ්හි සද්දාරම්මණස්ස වත්ථුභූතං සඞ්ඛපණවාදිතූරියභණ්ඩං අනාමාසං ආමසන්තස්ස, ඝානද්වාරෙ ගන්ධාරම්මණස්ස වත්ථුභූතං ගන්ධමාලාදිං, ජිව්හාද්වාරෙ රසාරම්මණස්ස වත්ථුභූතං මච්ඡමංසාදිං, කායද්වාරෙ ඵොට්ඨබ්බාරම්මණස්ස වත්ථුභූතං වත්ථතූලකපාවාරාදිං, මනොද්වාරෙ පඤ්ඤත්තිවසෙන ධම්මාරම්මණභූතං සප්පිතෙලමධුඵාණිතාදිං ආමසන්තස්ස කායදුච්චරිතං වෙදිතබ්බං. සඞ්ඛෙපතො පනෙත්ථ ඡසු ද්වාරෙසු කායවීතික්කමො කායදුච්චරිතං, වචීවීතික්කමො වචීදුච්චරිතං, මනොවීතික්කමො මනොදුච්චරිතන්ති තීණෙව දුච්චරිතානි හොන්ති. परंतु हा विशेष आहे - श्रोतद्वारावर (कान) शब्दालंबनाचे वस्तू रूप असलेले शंख, पणव इत्यादी वाद्ये (जी भिक्खूंनी स्पर्श न करण्याजोगी आहेत) त्यांना स्पर्श करणाऱ्याचे; घ्राणद्वारावर (नाक) गंधालंबनाचे वस्तू रूप असलेले गंध, पुष्प इत्यादींना स्पर्श करणाऱ्याचे; जिव्हाद्वारावर (जीभ) रसांलबनाचे वस्तू रूप असलेले मासे, मांस इत्यादींचे सेवन करणाऱ्याचे; कायद्वारावर (त्वचा) स्प्रष्टव्यालंबनाचे वस्तू रूप असलेले वस्त्र, कापूस, पांघरूण इत्यादींना स्पर्श करणाऱ्याचे; आणि मनोद्वारावर प्रज्ञप्तीच्या प्रभावाने धर्मालंबन रूप असलेले तूप, तेल, मध, गुळ इत्यादींना स्पर्श करणाऱ्याचे 'कायदुश्चरित' समजावे. संक्षेपाने सांगायचे तर, येथे सहा द्वारांमध्ये कायेने उल्लंघन करणे म्हणजे 'कायदुश्चरित', वाणीने उल्लंघन करणे म्हणजे 'वचीदुश्चरित' आणि मनाने उल्लंघन करणे म्हणजे 'मनोदुश्चरित' - अशी तीनच दुश्चरिते होतात. අයං පන භික්ඛු අත්තනො භාවනාපටිසඞ්ඛානෙ ඨිතො ඉමානි දුච්චරිතානි සුචරිතං කත්වා විපරිණාමෙති. කථං? චක්ඛුද්වාරෙ තාව ඉට්ඨාරම්මණෙ ආපාථගතෙ කායඞ්ගවාචඞ්ගානි අචාලෙත්වා රූපාරම්මණං විපස්සනං පට්ඨාපයතො මනොසුචරිතං හොති, විපස්සනාසහගතෙන චිත්තෙන ඛයධම්මං වයධම්මන්ති භණන්තස්ස වචීසුචරිතං, ‘‘අනාමාසභණ්ඩං එත’’න්ති අනාමසන්තස්ස කායසුචරිතං. සෙසද්වාරෙසුපි එසෙව නයො. එවං ඉමානි විත්ථාරතො අට්ඨාරස සුචරිතානි හොන්ති. සඞ්ඛෙපතො පනෙත්ථාපි ඡසු ද්වාරෙසු කායසංවරො කායසුචරිතං, වචීසංවරො වචීසුචරිතං, මනොසංවරො මනොසුචරිතන්ති තීණෙව සුචරිතානි හොන්ති. එවං ඉන්ද්රියසංවරො තීණි සුචරිතානි පරිපූරෙතීති වෙදිතබ්බො. එත්තාවතා සීලානුරක්ඛිතං ඉන්ද්රියසංවරසීලං කථිතං. परंतु हा भिक्खू आपल्या भावना-प्रत्यवेक्षणामध्ये (चिंतनात) स्थित राहून या दुश्चरितांना सुचरितात बदलतो. कसे? प्रथम चक्षुद्वारावर इष्ट आलंबन आले असता, कायांग आणि वागंग न हलवता रूपाला आलंबन बनवून विपश्यना (विपस्सना) प्रवृत्त करणाऱ्याचे 'मनोसुचरित' होते. विपश्यनायुक्त चित्ताने 'हे क्षयधर्मी आहे, व्ययधर्मी आहे' असे चिंतन करणाऱ्याचे 'वचीसुचरित' होते. 'ही स्पर्श न करण्याजोगी वस्तू आहे' असे समजून स्पर्श न करणाऱ्याचे 'कायसुचरित' होते. इतर द्वारांच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. अशा प्रकारे विस्ताराने ही अठरा सुचरिते होतात. संक्षेपाने येथेही सहा द्वारांमध्ये कायसंवर म्हणजे 'कायसुचरित', वचीसंवर म्हणजे 'वचीसुचरित' आणि मनःसंवर म्हणजे 'मनोसुचरित' - अशी तीनच सुचरिते होतात. अशा प्रकारे इंद्रियसंवर तीन सुचरितांना परिपूर्ण करतो, असे समजावे. एवढ्याने शीलाचे रक्षण करणारा 'इंद्रियसंवर शील' सांगितला आहे. කායදුච්චරිතං පහායාතිආදීසු තිවිධං කායදුච්චරිතං, චතුබ්බිධං වචීදුච්චරිතං, තිවිධං මනොදුච්චරිතං. තස්ස පටිපක්ඛවසෙන කායසුචරිතාදීනි වෙදිතබ්බානි. එත්තාවතා කායසංවරවචීසංවරෙහි පාතිමොක්ඛසීලං, මනොසංවරෙන තීණි සීලානීති චතුපාරිසුද්ධිසීලං කථිතං හොති. සකලෙ පන ඉමස්මිං සුත්තෙ සුචරිතමූලකා සතිපට්ඨානා ලොකුත්තරමිස්සකා, සත්තන්නං බොජ්ඣඞ්ගානං [Pg.185] මූලභූතා සතිපට්ඨානා පුබ්බභාගා, තෙපි සතිපට්ඨානමූලකා බොජ්ඣඞ්ගා පුබ්බභාගාව. විජ්ජාවිමුත්තිමූලකා පන ලොකුත්තරාව කථිතාති වෙදිතබ්බා. සත්තමං උත්තානමෙව. 'कायदुश्चरितं पहाय' इत्यादींमध्ये तीन प्रकारचे कायदुश्चरित, चार प्रकारचे वचीदुश्चरित आणि तीन प्रकारचे मनोदुश्चरित असतात. त्याच्या विरुद्ध (प्रतिपक्षाने) कायसुचरित इत्यादी समजावे. एवढ्याने कायसंवर आणि वचीसंवराने 'पातिमोक्ख शील' (प्रातिमोक्ष शील), आणि मनःसंवराने तीन शील (इंद्रियसंवर शील, प्रत्ययसन्निश्रित शील, आजीवपारिशुद्धि शील) मिळून 'चतुपारिसुद्धि शील' (चतुष्पारिशुद्धि शील) सांगितले आहे. परंतु या संपूर्ण सुत्तात सुचरित-मूलक सतिपट्ठान (स्मृतिप्रस्थान) हे लोकोत्तर-मिश्रित आहेत. सात बोध्यंगांचे (बोज्झंग) मूळ असलेले सतिपट्ठान हे पूर्वभागातील (पूर्वगामी) आहेत, आणि सतिपट्ठान-मूलक बोध्यंग देखील पूर्वभागातीलच आहेत. परंतु विद्या-विमुक्तीचे मूळ असलेले बोध्यंग हे लोकोत्तरच सांगितले आहेत, असे समजावे. सातवे सुत्त स्पष्ट अर्थाचेच आहे. 8. උපවානසුත්තවණ්ණනා ८. उपवान सुत्ताचे वर्णन. 189. අට්ඨමෙ පච්චත්තන්ති අත්තනාව. යොනිසොමනසිකාරාති යොනිසො මනසිකාරෙන. ආරබ්භමානොවාති කුරුමානොයෙව. සුවිමුත්තන්ති කම්මට්ඨානවිමුත්තියා සුට්ඨු විමුත්තං. අට්ඨිංකත්වාති අත්ථං කරිත්වා, අත්ථිකො හුත්වාති වුත්තං හොති. १८९. आठव्या सुत्तात, 'पच्चत्तं' म्हणजे स्वतःच. 'योनिसोमनसिकारा' म्हणजे योनिसो मनसिकाराने (योग्य प्रकारे विचार करण्याने). 'आरब्भमानोवा' म्हणजे करत असतानाच (उत्पन्न करत असतानाच). 'सुविमुत्तं' म्हणजे कर्मस्थान-विमुक्तीने चांगल्या प्रकारे मुक्त झालेले. 'अट्ठिंकत्वा' म्हणजे अर्थ (कल्याण) करून, अर्थी (इच्छुक) होऊन, असे म्हटले आहे. 9. පඨමඋප්පන්නසුත්තවණ්ණනා ९. प्रथम उप्पन्न सुत्ताचे वर्णन. 190. නවමෙ නාඤ්ඤත්ර තථාගතස්ස පාතුභාවාති තථාගතස්ස පාතුභාවං විනා න අඤ්ඤස්මිං කාලෙ උප්පජ්ජන්තීති අත්ථො. १९०. नव्या सुत्तात, 'नाञ्ञत्र तथागतस्स पातुभावा' म्हणजे तथागतांच्या प्रादुर्भावाशिवाय (प्रकटीकरणाशिवाय) इतर कोणत्याही काळात ते उत्पन्न होत नाहीत, असा अर्थ आहे. 10. දුතියඋප්පන්නසුත්තවණ්ණනා १०. द्वितीय उप्पन्न सुत्ताचे वर्णन. 191. දසමෙ නාඤ්ඤත්ර සුගතවිනයාති සුගතොවාදං විනා න උප්පජ්ජන්තීති. १९१. दहाव्या सुत्तात, 'नाञ्ञत्र सुगतविनया' म्हणजे सुगतांच्या (बुद्धांच्या) उपदेशाशिवाय (विनयाशिवाय) ते उत्पन्न होत नाहीत, असा अर्थ आहे. පබ්බතවග්ගො. पब्बत वग्ग (पर्वत वर्ग). 2. ගිලානවග්ගො २. गिलाण वग्ग (ग्लान वर्ग). 1-3. පාණසුත්තාදිවණ්ණනා १-३. पाण सुत्त इत्यादींचे वर्णन. 192-194. දුතියවග්ගස්ස පඨමෙ චත්තාරො ඉරියාපථෙ කප්පෙන්තීති යෙසං චත්තාරො ඉරියාපථා අත්ථි, තෙසංයෙව වසෙනෙතං වුත්තං. සීලං නිස්සායාති චතුපාරිසුද්ධිසීලං නිස්සයං කත්වා. සත්ත බොජ්ඣඞ්ගෙති සහවිපස්සනකෙ මග්ගබොජ්ඣඞ්ගෙ. දුතියතතියානි උත්තානත්ථානෙව. १९२-१९४. दुसऱ्या वर्गाच्या पहिल्या सुत्तात 'चत्तारो इरियापथे कप्पेन्ति' (चारही ईर्यापथ पाळतात) म्हणजे ज्या प्राण्यांना चार ईर्यापथ (चालणे, उभे राहणे, बसणे, झोपणे) आहेत, त्यांच्याच संदर्भात हे म्हटले आहे. 'सीलं निस्साय' (शीलाचा आश्रय घेऊन) म्हणजे चतुपारिसुद्धिशीलाचा आश्रय घेऊन. 'सत्त बोज्झङ्गे' (सात बोध्यंग) म्हणजे विपश्यनेसह असणारे मार्ग-बोध्यंग. दुसरे व तिसरे सुत्त स्पष्ट अर्थाचेच आहेत. 4-10. පඨමගිලානසුත්තාදිවණ්ණනා ४-१०. प्रथम गिलाण सुत्त इत्यादींचे वर्णन. 195-201. චතුත්ථෙ තථා පහීනො චායස්මතො මහාකස්සපස්ස සො ආබාධො අහොසීති ථෙරස්ස කිර ඉමං බොජ්ඣඞ්ගභාවනං සාධුකං [Pg.186] සුණන්තස්ස එතදහොසි ‘‘මය්හං පබ්බජිතදිවසතො සත්තමෙ දිවසෙ සච්චානි පටිවිජ්ඣන්තස්ස ඉමෙ බොජ්ඣඞ්ගා පාතුභූතා’’ති. අථස්ස ‘‘නිය්යානිකං වත සත්ථුසාසන’’න්ති චින්තයතො ලොහිතං පසීදි, උපාදාරූපං විසුද්ධං අහොසි, පොක්ඛරපත්තෙ පතිතඋදකබින්දු විය සරීරතො රොගො විනිවත්තිත්වා ගතො. තෙන වුත්තං ‘‘තථා පහීනො චායස්මතො මහාකස්සපස්ස සො ආබාධො අහොසී’’ති. පඤ්චමඡට්ඨෙසුපි එසෙව නයො. ඉමෙසං පන තිණ්ණම්පි ජනානං පබ්බතපාදෙ පුප්ඵිතවිසරුක්ඛවාතසම්ඵස්සෙන උප්පන්නො මන්දසීතජරො ආබාධොති වෙදිතබ්බො. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. १९५-२०१. चौथ्या सुत्तात 'तथा पहीनो चायस्मतो महाकस्सपस्स सो आबाधो अहोसि' (त्याचप्रमाणे आयुष्यमान महाकश्यप यांचा तो आजार नाहीसा झाला) म्हणजे असे म्हटले जाते की, जेव्हा थेर (महाकश्यप) या बोध्यंग-भावनेचे लक्षपूर्वक श्रवण करत होते, तेव्हा त्यांच्या मनात असा विचार आला: 'माझ्या प्रव्रज्या घेतलेल्या दिवसापासून सातव्या दिवशी, चार आर्यसत्यांचे आकलन करत असताना हे बोध्यंग प्रकट झाले होते.' त्यानंतर, 'शास्त्यांचे (बुद्धांचे) शासन खरोखरच संसारातून मुक्त करणारे (नैर्याणिक) आहे' असा विचार करत असताना त्यांचे रक्त शुद्ध झाले, उपादा-रूप शुद्ध झाले आणि कमळाच्या पानावर पडलेल्या पाण्याच्या थेंबाप्रमाणे त्यांच्या शरीरातून तो आजार निघून गेला. म्हणूनच असे म्हटले आहे: 'तथा पहीनो चायस्मतो महाकस्सपस्स सो आबाधो अहोसि'. पाचव्या आणि सहाव्या सुत्तातही हाच नियम आहे. परंतु, या तिन्ही व्यक्तींना डोंगराच्या पायथ्याशी फुललेल्या विषारी झाडांच्या वाऱ्याच्या स्पर्शाने आलेला सौम्य थंडीचा ताप (मन्दशीतज्वर) हा आजार झाला होता, असे समजावे. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. ගිලානවග්ගො. गिलाण वर्ग समाप्त. 3. උදායිවග්ගො ३. उदायि वर्ग 1-2. බොධායසුත්තාදිවණ්ණනා १-२. बोधाय सुत्त इत्यादींचे वर्णन. 202-203. තතියවග්ගස්ස පඨමෙ කිත්තාවතා නු ඛො, භන්තෙ, බොජ්ඣඞ්ගාති වුච්චන්තීති භන්තෙ, කිත්තකෙන නු ඛො බුජ්ඣනකඅඞ්ගා නාම වුච්චන්තීති පුච්ඡති. බොධාය සංවත්තන්තීති බුජ්ඣනත්ථාය සංවත්තන්ති. ඉමස්මිං සුත්තෙ මිස්සකබොජ්ඣඞ්ගා කථිතා. දුතියෙ ධම්මපරිච්ඡෙදො කථිතො. २०२-२०३. तिसऱ्या वर्गाच्या पहिल्या सुत्तात 'कित्तावता नु खो, भन्ते, बोज्झङ्गाति वुच्चन्ति' (भन्ते, किती कारणांनी बोध्यंग म्हटले जाते?) म्हणजे 'भन्ते, कोणत्या कारणाने जाणणाऱ्या व्यक्तीचे अंग (बोध्यंग) म्हटले जाते?' असा प्रश्न विचारला आहे. 'बोधाय संवत्तन्ति' म्हणजे जाणण्यासाठी (बोधासाठी) कारणीभूत ठरतात. या सुत्तात मिश्रक-बोध्यंग (विपश्यना व मार्ग मिश्रित) सांगितले आहेत. दुसऱ्या सुत्तात धम्माचे वर्गीकरण (धम्मपरिच्छेद) सांगितले आहे. 3-5. ඨානියසුත්තාදිවණ්ණනා ३-५. ठानीय सुत्त इत्यादींचे वर्णन. 204-206. තතියෙ කාමරාගට්ඨානියානන්ති කාමරාගස්ස කාරණභූතානං ආරම්මණධම්මානං. බ්යාපාදට්ඨානියාදීසුපි එසෙව නයො. සකලඤ්හි ඉදං සුත්තං ආරම්මණෙනෙව කථිතං. පඨමවග්ගස්ස දුතියසුත්තෙ වුත්තපරිච්ඡෙදොපෙත්ථ ලබ්භතෙව. චතුත්ථෙ මිස්සකබොජ්ඣඞ්ගා කථිතා. පඤ්චමෙ අපරිහානියෙ ධම්මෙති අපරිහානිකරෙ සභාවධම්මෙ. २०४-२०६. तिसऱ्या सुत्तात 'कामरागठ्ठानीयानं' म्हणजे कामरागाला कारणीभूत ठरणाऱ्या आलंबन-धर्मांचे. 'ब्यापादठ्ठानीयादीसु' (व्यापाद-स्थानिय इत्यादींमध्ये) देखील हाच नियम समजावा. कारण हे संपूर्ण सुत्त आलंबनाच्या (विषयाच्या) आधारेच सांगितले आहे. पहिल्या वर्गाच्या दुसऱ्या सुत्तात सांगितलेले वर्गीकरण येथेही प्राप्त होतेच. चौथ्या सुत्तात मिश्रक-बोध्यंग सांगितले आहेत. पाचव्या सुत्तात 'अपरीहानिये धम्मे' म्हणजे (तीन शिक्षांमधून) ऱ्हास न होऊ देणारे स्वभावधर्म. 6-7. තණ්හක්ඛයසුත්තාදිවණ්ණනා ६-७. तण्हाक्खय (तृष्णाक्षय) सुत्त इत्यादींचे वर्णन. 207-208. ඡට්ඨෙ එතදවොචාති ‘‘ඉමිස්සං පරිසති නිසින්නො උදායිත්ථෙරො නාම අනුසන්ධිකුසලො භික්ඛු අත්ථි, සො මං පුච්ඡිස්සතීති භගවතා [Pg.187] ඔසාපිතදෙසනං ඤත්වා දෙසනානුසන්ධිං ඝටෙස්සාමී’’ති පුච්ඡන්තො එතං අවොච. විපුලන්තිආදි සබ්බං සුභාවිතත්තං සන්ධාය වුත්තං. සුභාවිතො හි සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගො විපුලො ච මහග්ගතො ච අප්පමාණො ච අබ්යාපජ්ජො ච නාම හොති. සො හි පත්ථටත්තා විපුලො, මහන්තභාවං ගතත්තා මහග්ගතො, වඩ්ඪිපමාණත්තා අප්පමාණො, නීවරණානං දූරීභාවෙන බ්යාපාදරහිතත්තා අබ්යාපජ්ඣො නාම හොති. තණ්හාය පහානා කම්මං පහීයතීති යං තණ්හාමූලකං කම්මං උප්පජ්ජෙය්ය, තං තණ්හාපහානෙන පහීයති. කම්මස්ස පහානා දුක්ඛන්ති යම්පි කම්මමූලකං වට්ටදුක්ඛං උප්පජ්ජෙය්ය, තං කම්මපහානෙන පහීයති. තණ්හක්ඛයාදයො තණ්හාදීනංයෙව ඛයා, අත්ථතො පනෙතෙහි නිබ්බානං කථිතන්ති වෙදිතබ්බං. සත්තමං උත්තානමෙව. २०७-२०८. सहाव्या सुत्तात 'एतदवोच' (असे म्हणाले) म्हणजे 'या परिषदेत बसलेले उदायि थेर नावाचे अनुसंधीमध्ये (धर्माच्या सुसंगतीमध्ये) कुशल भिक्खू आहेत, ते मला विचारतील' या हेतूने भगवंतांनी संपवलेला उपदेश जाणून, 'मी उपदेशाची सुसंगती सांधेन' या इच्छेने विचारत त्यांनी हे विचारले. 'विपुलं' इत्यादी सर्व काही चांगल्या प्रकारे भावना (विकास) केलेल्याच्या संदर्भात म्हटले आहे. कारण चांगल्या प्रकारे विकसित केलेले सति-संबोध्यंग हे विपुल, महग्गत (महान), अप्रमाण (असीम) आणि अव्यापज्ज (व्यापादरहित) असते. ते पसरलेले असल्यामुळे 'विपुल', मोठेपणाला प्राप्त झाल्यामुळे 'महग्गत', वृद्धीच्या प्रमाणामुळे 'अप्रमाण' आणि नीवरणांच्या दूर होण्याने व्यापादरहित झाल्यामुळे 'अव्यापज्ज' म्हटले जाते. 'तण्हाय पहाना कम्मं पहीयति' म्हणजे जे तृष्णामूलक कर्म उत्पन्न होऊ शकते, ते तृष्णेच्या प्रहाणाने नष्ट होते. 'कम्मस्स पहाना दुक्खं' म्हणजे जे कर्ममूलक संसार-दुःख उत्पन्न होऊ शकते, ते कर्माच्या प्रहाणाने नष्ट होते. 'तण्हाक्खय' (तृष्णाक्षय) इत्यादी शब्द तृष्णा इत्यादींच्या क्षयामुळे आहेत, परंतु वास्तविक अर्थाने या शब्दांद्वारे 'निब्बाण' (निर्वाण) सांगितले आहे, असे समजावे. सातवे सुत्त स्पष्ट अर्थाचेच आहे. 8. නිබ්බෙධභාගියසුත්තවණ්ණනා ८. निब्बेधभागिय सुत्ताचे वर्णन. 209. අට්ඨමෙ නිබ්බෙධභාගියන්ති නිබ්බිජ්ඣනකොට්ඨාසියං. සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගං භාවිතෙනාති සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගෙන භාවිතෙන, සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගං වා භාවෙත්වා ඨිතෙන, එවමෙත්ථ මග්ගබොජ්ඣඞ්ගා මිස්සකා. තෙහි භාවිතං, තෙ වා භාවෙත්වා ඨිතං චිත්තං නිබ්බත්තිතලොකුත්තරමෙව. තම්පි පන මග්ගනිස්සිතං කත්වා මිස්සකමෙව කථෙතුං වට්ටති. २०९. आठव्या सुत्तात 'निब्बेधभागियं' म्हणजे भेदून जाणाऱ्या (ज्ञानाच्या) भागाशी संबंधित. 'सतिसम्बोज्झङ्गं भावितेन' म्हणजे सति-संबोध्यंगाची भावना केल्याने, किंवा सति-संबोध्यंगाची भावना करून स्थित असलेल्या चित्ताने; अशा प्रकारे येथे मार्ग-बोध्यंग हे मिश्रित आहेत. त्यांच्याद्वारे भावित झालेले किंवा त्यांची भावना करून स्थित असलेले चित्त हे निश्चितच लोकोत्तर (फलचित्त) असते. परंतु, त्यालाही मार्गावर आश्रित करून मिश्रित स्वरूपातच सांगणे योग्य आहे. 9. එකධම්මසුත්තවණ්ණනා ९. एकधम्म सुत्ताचे वर्णन. 210. නවමෙ සංයොජනවිනිබන්ධාති සංයොජනසඞ්ඛාතා විනිබන්ධා. අජ්ඣොසානාති පරිනිට්ඨපෙත්වා ගහණා. २१०. नवव्या सुत्तात 'संयोजनविनिबन्धा' म्हणजे संयोजनाच्या रूपातील बंधने. 'अज्झोसाना' म्हणजे पूर्णपणे आसक्त होऊन ग्रहण करणे. 10. උදායිසුත්තවණ්ණනා १०. उदायि सुत्ताचे वर्णन. 211. දසමෙ අබහුකතොති අකතබහුමානො. උක්කුජ්ජාවකුජ්ජන්ති එත්ථ උක්කුජ්ජං වුච්චති උදයො, අවකුජ්ජං වයොති උදයබ්බයවසෙන පරිවත්තෙන්තො සම්මසන්තොති දීපෙති. ධම්මො ච මෙ, භන්තෙ, අභිසමිතොති විපස්සනාධම්මො අභිසමාගතො. මග්ගොති විපස්සනාමග්ගොව. සචෙ හි ථෙරො තස්මිං සමයෙ සොතාපන්නො, උපරි තිණ්ණං මග්ගානං අත්ථාය, සචෙ [Pg.188] අනාගාමී, අරහත්තමග්ගස්ස අත්ථාය අයං විපස්සනා වෙදිතබ්බා. තථා තථා විහරන්තන්ති තෙන තෙනාකාරෙන විහරන්තං. තථත්තායාති තථාභාවාය. ඛීණා ජාතීතිආදීහි තථත්තායාති අධිප්පෙතං තථාභාවං දස්සෙති. පච්චවෙක්ඛණත්ථාය උපනීයතීති හි එත්ථ අධිප්පායො, තං දස්සෙන්තො එවමාහ. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. २११. दहाव्या सुत्तात 'अबहुकतो' म्हणजे आदर न केलेला (बहुमान न केलेला). 'उक्कुज्जावकुज्जं' यामध्ये 'उक्कुज्ज' म्हणजे उदय (उत्पत्ती) आणि 'अवकुज्ज' म्हणजे वय (नाश) असे म्हटले जाते; अशा प्रकारे उदय आणि व्यय यांच्याद्वारे उलटसुलट करत, विपश्यना ज्ञानाने वारंवार विचार करत असल्याचे दर्शवले आहे. 'धम्मो च मे, भन्ते, अभिसमितो' म्हणजे विपश्यना धर्म प्रत्यक्ष जाणला आहे. 'मग्गो' म्हणजे विपश्यना मार्गच होय. जर ते थेर (उदायि) त्या वेळी सोतापन्न (श्रोतआपन्न) होते, तर वरील तीन मार्गांच्या प्राप्तीसाठी, आणि जर अनागामी होते, तर अरहत्त मार्गाच्या प्राप्तीसाठी ही विपश्यना समजावी. 'तथा तथा विहरन्तं' म्हणजे त्या त्या प्रकारे विपश्यना विहाराने राहणाऱ्या मला. 'तथत्ताय' म्हणजे त्या भावासाठी (क्षीणास्रव होण्यासाठी). 'खीणा जाती' इत्यादींद्वारे 'तथत्ताय' या शब्दाने अभिप्रेत असलेला तो भाव (क्षीणास्रव भाव) दर्शवला आहे. येथे 'प्रत्यवेक्षण ज्ञानासाठी प्रवृत्त केले जाते' हाच अभिप्राय आहे, तो दर्शवताना उदायि थेरांनी असे म्हटले. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. උදායිවග්ගො. उदायि वर्ग समाप्त. 4. නීවරණවග්ගො ४. नीवरण वर्ग 3-4. උපක්කිලෙසසුත්තාදිවණ්ණනා ३-४. उपक्किलेस (उपक्लेश) सुत्त इत्यादींचे वर्णन. 214-215. චතුත්ථවග්ගස්ස තතියෙ න ච පභස්සරන්ති න ච පභාවන්තං. පභඞ්ගු චාති පභිජ්ජනසභාවං. අයොති කාළලොහං. ඨපෙත්වා ඉධ වුත්තානි චත්තාරි අවසෙසං ලොහං නාම. සජ්ඣූති රජතං. චිත්තස්සාති චතුභූමකචිත්තස්ස. ලොකියස්ස තාව උපක්කිලෙසො හොතු, ලොකුත්තරස්ස කථං හොතීති? උප්පජ්ජිතුං අප්පදානෙන. යදග්ගෙන හි උප්පජ්ජිතුං න දෙන්ති, තදග්ගෙනෙව තෙ ලොකියස්සාපි ලොකුත්තරස්සාපි උපක්කිලෙසා නාම හොන්ති. පභඞ්ගු චාති ආරම්මණෙ චුණ්ණවිචුණ්ණභාවූපගමනෙන භිජ්ජනසභාවං. අනාවරණා අනීවරණාති කුසලධම්මෙ න ආවරන්තීති අනාවරණා, න නීවරන්ති න පටිච්ඡාදෙන්තීති අනීවරණා. චෙතසො අනුපක්කිලෙසාති චතුභූමකචිත්තස්ස අනුපක්කිලෙසා. २१४-२१५. चौथ्या वर्गाच्या तिसऱ्या सुत्तात 'न च पभस्सरं' म्हणजे तेजस्वी किंवा प्रकाशमान नसलेले. 'पभङ्गु च' म्हणजे नष्ट होण्याच्या स्वभावाचे. 'अयो' म्हणजे काळे लोखंड. येथे सांगितलेले चार धातू सोडून उर्वरित धातूंना 'लोह' (तांबे इत्यादी) म्हटले जाते. 'सज्झु' म्हणजे चांदी. 'चित्तस्स' म्हणजे चार भूमींमधील (चित्ताचे). लौकिक चित्ताचा उपक्लेश असू द्या, पण लोकोत्तर चित्ताचा उपक्लेश कसा असू शकतो? तर, उत्पन्न होण्यास वाव न दिल्यामुळे. कारण ज्या प्रमाणात ते उत्पन्न होऊ देत नाहीत, त्याच प्रमाणात ते लौकिक आणि लोकोत्तर दोन्ही चित्तांचे उपक्लेश ठरतात. 'पभङ्गु च' म्हणजे आलंबनामध्ये विखुरल्यामुळे चूर्ण-विचूर्ण होऊन नष्ट होण्याच्या स्वभावाचे. 'अनावरणा अनीवरणा' म्हणजे कुशल धर्मांना उत्पन्न होण्यापासून रोखत नाहीत म्हणून 'अनावरण', आणि झाकून टाकत नाहीत म्हणून 'अनीवरण'. 'चेतसो अनुपक्किलेसा' म्हणजे चार भूमींमधील कुशल चित्ताला मलीन न करणारे. 8. ආවරණනීවරණසුත්තවණ්ණනා ८. आवरणनीवरण सुत्ताचे वर्णन. 219. අට්ඨමෙ පඤ්ඤාය දුබ්බලීකරණාති පඤ්ඤාය මන්දභාවකරා. නීවරණානඤ්හි අභිණ්හුප්පාදෙ සති අන්තරන්තරා උප්පජ්ජමානා පඤ්ඤා දුබ්බලා හොති මන්දා අවිසදා. २१९. आठव्या सुत्तात 'पञ्ञाय दुब्बलीकरणं' म्हणजे प्रज्ञेला दुर्बळ (मंद) करणारे. कारण नीवरणांचे वारंवार प्रकटीकरण होत असताना, मध्ये-मध्ये उत्पन्न होणारी प्रज्ञा दुर्बळ, मंद आणि अस्पष्ट होते. පඤ්ච නීවරණා තස්මිං සමයෙ න හොන්ති. සත්තබොජ්ඣඞ්ගා තස්මිං සමයෙ භාවනාපාරිපූරිං ගච්ඡන්තීති අරියසාවකස්ස හි සප්පායධම්මස්සවනං සුණන්තස්ස [Pg.189] පඤ්ච නීවරණා දූරෙ හොන්ති. සො සචෙ තස්මිංයෙව ඨානෙ විසෙසං නිබ්බත්තෙතුං සක්කොති, එවමස්ස සත්ත බොජ්ඣඞ්ගා භාවනාපාරිපූරිං ගච්ඡන්ති. නො චෙ සක්කොති, තතො වුට්ඨාය රත්තිට්ඨානදිවාට්ඨානං ගතො තමෙව පීතිං අවිජහන්තො පඤ්ච නීවරණෙ වික්ඛම්භෙත්වා විසෙසං නිබ්බත්තෙස්සති. තත්ථ අසක්කොන්තොපි යාව සත්තදිවසබ්භන්තරා තමෙව පීතිං අවිජහන්තො නීවරණෙ වික්ඛම්භෙත්වා විසෙසං නිබ්බත්තෙස්සතීති ඉදං සන්ධායෙතං වුත්තං. ධම්මස්සවනවසෙන සකිං පීතිපාමොජ්ජපක්ඛියා පටිලද්ධබොජ්ඣඞ්ගා හි කම්මාරාමතාදීනි ආගම්ම නස්සන්ති, තථාරූපං පන උතුසප්පායාදිං ලභිත්වා පුන උප්පජ්ජන්තාපි තස්මිං සමයෙ භාවනාපාරිපූරිං ගච්ඡන්ති ඉච්චෙව වුච්චති. त्या वेळी पाच नीवरणे नसतात. त्या वेळी सात बोज्झंग भावनेच्या परिपूर्तीला जातात, कारण अनुकूल सद्धम्म ऐकणाऱ्या आर्यश्रावकापासून पाच नीवरणे दूर असतात. जर तो त्याच ठिकाणी विशिष्ट (मार्ग-फल) प्राप्त करण्यास समर्थ झाला, तर अशा प्रकारे त्याचे सात बोज्झंग भावनेच्या परिपूर्तीला जातात. जर तो समर्थ झाला नाही, तर तेथून उठून रात्रीच्या किंवा दिवसाच्या विश्रांतीच्या ठिकाणी जाऊन, त्या (धम्मश्रवणाने उत्पन्न झालेल्या) प्रीतीचा त्याग न करता, पाच नीवरणांचा विष्कंभन (दमन) करून विशिष्ट गुण प्राप्त करेल. तेथे समर्थ न झाल्यासही, सात दिवसांच्या आत त्याच प्रीतीचा त्याग न करता, नीवरणांचा विष्कंभन करून विशिष्ट गुण प्राप्त करेल, हे लक्षात घेऊन हे सांगितले आहे. धम्मश्रवणाच्या प्रभावाने एकदा प्रीती व प्रामोद्याशी संबंधित बोज्झंग प्राप्त झाले तरी, कम्मारामादी (कामात रममाण होणे इत्यादी) कारणांमुळे ते नष्ट होतात; परंतु अनुकूल ऋतू इत्यादी प्राप्त करून पुन्हा उत्पन्न झाल्यावरही 'त्या वेळी ते भावनेच्या परिपूर्तीला जातात' असेच म्हटले जाते. 9. රුක්ඛසුත්තවණ්ණනා ९. रुक्खसुत्तवण्णना (वृक्षसुत्ताचे स्पष्टीकरण) 220. නවමෙ අජ්ඣාරුහාති අභිරුහනකා. කච්ඡකොති අට්ඨිකච්ඡකො. කපිත්ථනොති මක්කටථනසදිසඵලො විජාතපිලක්ඛො. २२०. नवव्या सुत्तात - 'अज्झारूहा' म्हणजे (इतर वृक्षांवर) चढणारे (परजीवी वृक्ष). 'कच्छको' म्हणजे अठ्ठिकच्छक (एक प्रकारचा चिकट डिंक असलेला वृक्ष). 'कपित्थन' म्हणजे माकडाच्या स्तनासारखे फळ असलेला, दुसऱ्या जातीच्या वृक्षावर उगवणारा पिंपळ (किंवा नांदुरकी). 10. නීවරණසුත්තවණ්ණනා १०. नीवरणसुत्तवण्णना (नीवरणसुत्ताचे स्पष्टीकरण) 221. දසමෙ අන්ධකරණාති අන්ධභාවකරණා. අචක්ඛුකරණාති පඤ්ඤාචක්ඛුස්ස අකරණා. පඤ්ඤානිරොධිකාති පඤ්ඤාය නිරොධනා. විඝාතපක්ඛියාති දුක්ඛපක්ඛිකා. අනිබ්බානසංවත්තනිකාති නිබ්බානත්ථාය අසංවත්තනිකා. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානත්ථමෙව. සකලෙපි ඉමස්මිං වග්ගෙ මිස්සකබොජ්ඣඞ්ගාව කථිතාති. २२१. दहाव्या सुत्तात - 'अन्धकरणा' म्हणजे अंधत्व आणणारे (प्रज्ञाचक्षू नष्ट करणारे). 'अचक्खूकरणा' म्हणजे प्रज्ञाचक्षू उत्पन्न न करणारे. 'पञ्ञानिरोधिका' म्हणजे प्रज्ञेचा निरोध (नाश) करणारे. 'विघातपक्खिया' म्हणजे दुःखाच्या बाजूचे (त्रासदायक). 'अनिब्बानसंवत्तनिका' म्हणजे निर्वाण प्राप्तीसाठी कारणीभूत न ठरणारे. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ अगदी स्पष्टच आहे. या संपूर्ण वग्गात केवळ मिश्र बोज्झंगांचेच (लौकिक व लोकोत्तर) वर्णन केले आहे. නීවරණවග්ගො. नीवरणवग्गो (नीवरण वर्ग समाप्त) 5. චක්කවත්තිවග්ගො ५. चक्कवत्तिवग्गो (चक्रवर्ती वर्ग) 1. විධාසුත්තවණ්ණනා १. विधासुत्तवण्णना (विधासुत्ताचे स्पष्टीकरण) 222. පඤ්චමවග්ගස්ස පඨමෙ තිස්සො විධාති තයො මානකොට්ඨාසා, මානොයෙව වා. තථා තථා විදහනතො හි මානොව විධාති වුච්චති. २२२. पाचव्या वग्गाच्या पहिल्या सुत्तात - 'तिस्सो विधा' म्हणजे मानाचे तीन प्रकार (किंवा भाग), किंवा मान स्वतःच होय. वेगवेगळ्या प्रकारे स्वतःला प्रस्थापित (किंवा तुलना) करत असल्यामुळे मानालाच 'विधा' असे म्हटले जाते. 2. චක්කවත්තිසුත්තවණ්ණනා २. चक्कवत्तिसुत्तवण्णना (चक्रवर्तीसुत्ताचे स्पष्टीकरण) 223. දුතියෙ [Pg.190] රඤ්ඤො, භික්ඛවෙ, චක්කවත්තිස්සාති එත්ථ අත්තනො සිරිසම්පත්තියා රාජති, චතූහි වා සඞ්ගහවත්ථූහි ලොකං රඤ්ජෙතීති රාජා, තස්ස රඤ්ඤො. ‘‘පවත්තතු භවං චක්කරතන’’න්ති පුඤ්ඤානුභාවෙන අබ්භුග්ගතාය වාචාය චොදෙන්තො චක්කං වත්තෙතීති චක්කවත්තී, තස්ස චක්කවත්තිස්ස. පාතුභාවාති පාතුභාවෙන. සත්තන්නන්ති ගණනපරිච්ඡෙදො. රතනානන්ති පරිච්ඡින්නඅත්ථදස්සනං. වචනත්ථො පනෙත්ථ රතිජනනට්ඨෙන රතනං. අපිච – २२३. दुसऱ्या सुत्तात - 'रञ्ञो, भिक्खवे, चक्कवत्तिस्स' (भिक्खूंनो, चक्रवर्ती राजाच्या...) यामध्ये: जो आपल्या वैभव-संपत्तीने शोभून दिसतो किंवा चार संग्रहवस्तूंनी (दान, प्रियवचन, अर्थचर्या, समानार्थता) लोकांना आनंदित करतो, तो 'राजा' होय; त्या राजाचा. 'चक्ररत्न प्रवृत्त होवो' अशा पुण्याच्या प्रभावाने निघालेल्या शब्दाने प्रेरित होऊन जो चक्र फिरवतो, तो 'चक्रवर्ती' होय; त्या चक्रवर्तीचा. 'पातुभावा' म्हणजे प्रकट होण्याने. 'सत्तन्नं' हा संख्या दर्शवणारा शब्द आहे. 'रतनानं' हा विशिष्ट अर्थ दर्शवणारा शब्द आहे. येथे शब्दाचा अर्थ असा आहे की, जो आनंद (रती) उत्पन्न करतो ते 'रत्न' होय. शिवाय - ‘‘චිත්තීකතං මහග්ඝඤ්ච, අතුලං දුල්ලභදස්සනං; අනොමසත්තපරිභොගං, රතනං තෙන වුච්චතී’’ති. 'जे आदरणीय (पूजनीय) आहे, अत्यंत मौल्यवान आहे, अतुलनीय आहे, ज्याचे दर्शन दुर्मिळ आहे आणि जे केवळ श्रेष्ठ प्राण्यांच्याच उपभोगाचे साधन आहे, त्याला 'रत्न' म्हटले जाते.' චක්කරතනස්ස ච නිබ්බත්තකාලතො පට්ඨාය අඤ්ඤං දෙවට්ඨානං නාම න හොති, සබ්බෙව ගන්ධපුප්ඵාදීහි තස්සෙව පූජඤ්ච අභිවාදනාදීනි ච කරොන්තීති චිත්තීකතට්ඨෙන රතනං. චක්කරතනස්ස ච ‘‘එත්තකං නාම ධනං අග්ඝතී’’ති අග්ඝො නත්ථි, ඉති මහග්ඝට්ඨෙනාපි රතනං. චක්කරතනඤ්ච අඤ්ඤෙහි ලොකෙ විජ්ජමානරතනෙහි අසදිසන්ති අතුලට්ඨෙන රතනං. යස්මා පන යස්මිං කප්පෙ බුද්ධා උප්පජ්ජන්ති, තස්මිංයෙව චක්කවත්තිනො, බුද්ධා ච කදාචි කරහචි උප්පජ්ජන්ති, තස්මා දුල්ලභදස්සනට්ඨෙන රතනං. තදෙතං ජාතිරූපකුලඉස්සරියාදීහි අනොමස්ස උළාරසත්තස්සෙව උප්පජ්ජති, න අඤ්ඤස්සාති අනොමසත්තපරිභොගට්ඨෙනාපි රතනං. යථා ච චක්කරතනං, එවං සෙසානිපීති. තෙන වුත්තං – चक्ररत्न उत्पन्न झाल्यापासून इतर कोणतेही देवस्थान (पूजेचे ठिकाण) उरत नाही, सर्व लोक गंध-पुष्प इत्यादींनी त्याचीच पूजा व अभिवादन करतात, म्हणून आदरणीय (पूजनीय) असल्यामुळे ते 'रत्न' आहे. चक्ररत्नाची किंमत 'एवढी संपत्ती' अशी ठरवता येत नाही, म्हणून अत्यंत मौल्यवान असल्यामुळेही ते 'रत्न' आहे. चक्ररत्न हे जगातील इतर विद्यमान रत्नांसारखे नसते, म्हणून अतुलनीय असल्यामुळे ते 'रत्न' आहे. ज्या कल्पामध्ये बुद्ध उत्पन्न होतात, त्याच कल्पामध्ये बहुधा चक्रवर्तीही उत्पन्न होतात, आणि बुद्ध कधीतरीच उत्पन्न होतात, म्हणून दर्शन दुर्मिळ असल्यामुळे ते 'रत्न' आहे. ते चक्ररत्न जात, रूप, कुल, ऐश्वर्य इत्यादींनी युक्त अशा श्रेष्ठ व महान प्राण्यालाच प्राप्त होते, इतरांना नाही, म्हणून श्रेष्ठ प्राण्यांच्या उपभोगाचे असल्यामुळेही ते 'रत्न' आहे. जसे चक्ररत्न आहे, तसेच इतर (सहा) रत्नेही आहेत. म्हणूनच म्हटले आहे - ‘‘චිත්තීකතං මහග්ඝඤ්ච, අතුලං දුල්ලභදස්සනං; අනොමසත්තපරිභොගං, රතනං තෙන වුච්චතී’’ති. 'जे आदरणीय (पूजनीय) आहे, अत्यंत मौल्यवान आहे, अतुलनीय आहे, ज्याचे दर्शन दुर्मिळ आहे आणि जे केवळ श्रेष्ठ प्राण्यांच्याच उपभोगाचे साधन आहे, त्याला 'रत्न' म्हटले जाते.' පාතුභාවො හොතීති නිබ්බත්ති හොති. තත්රායං යොජනා – චක්කවත්තිස්ස පාතුභාවා සත්තන්නං රතනානං පාතුභාවොති අයුත්තං. උප්පන්නඤ්හි චක්කං වත්තෙත්වා සො චක්කවත්තී නාම හොතීති නායුත්තං. කස්මා? චක්කවත්තනනියමාපෙක්ඛතාය. යො හි නියමෙන චක්කං වත්තෙස්සති, සො පටිසන්ධිතො පභුති ‘‘චක්කවත්ති පාතුභූතො’’ති වත්තබ්බතං ආපජ්ජති. ලද්ධනාමස්ස ච පුරිසස්ස මූලුප්පත්තිවචනතොපි යුත්තමෙවෙතං. යො හි එස චක්කවත්තීති [Pg.191] ලද්ධනාමො සත්තවිසෙසො, තස්ස පටිසන්ධිසඞ්ඛාතො පාතුභාවොති අයමෙත්ථ අත්ථො. තස්ස හි පාතුභාවා රතනානි පාතුභවන්ති. පාතුභූතෙහි පන තෙහි සද්ධිං පරිපක්කෙ පුඤ්ඤසම්භාරෙ සො සංයුජ්ජති, තදා ලොකස්ස තෙසු පාතුභාවචිත්තං උප්පජ්ජති. බහුලවචනතො චාපි යුත්තමෙවෙතං. යදා හි ලොකස්ස තෙසු පාතුභාවසඤ්ඤා උප්පජ්ජති, තදා එකමෙව පඨමං, පච්ඡා ඉතරානි ඡ පාතුභවන්තීති බහුලවචනතො චාපි එතං යුත්තං. පාතුභාවස්ස ච අත්ථභෙදතොපි යුත්තමෙවෙතං. න කෙවලඤ්හි පාතුභූතමෙව පාතුභාවො, පාතුභාවයතීති පාතුභාවො. අයං පාතුභාවස්ස අත්ථභෙදො. යස්මා යො සො පුඤ්ඤසම්භාරො රාජානං චක්කවත්තිං පටිසන්ධිවසෙන පාතුභාවයති, තස්මා රඤ්ඤො චක්කවත්තිස්ස පාතුභාවා. න කෙවලඤ්හි චක්කවත්තියෙව, ඉමානි පන සත්ත රතනානිපි පාතුභවන්තීති අයමෙත්ථ අත්ථො. යථෙව හි සො පුඤ්ඤසම්භාරො රඤ්ඤො ජනකහෙතු, එවං රතනානම්පි පරියායෙන උපනිස්සයහෙතූති යුත්තමෙවෙතං ‘‘රඤ්ඤො, භික්ඛවෙ, චක්කවත්තිස්ස පාතුභාවා සත්තන්නං රතනානං පාතුභාවො හොතී’’ති. 'पातुभावो होति' म्हणजे उत्पत्ती होते. येथे संबंध असा आहे - 'चक्रवर्तीच्या प्रकट होण्याने सात रत्नांचे प्रकट होणे होते' हे अयोग्य आहे (अशी शंका घेतल्यास), ते अयोग्य नाही; कारण उत्पन्न झालेल्या चक्राला फिरवून तो 'चक्रवर्ती' या नावाला पात्र होतो. का? कारण चक्र फिरवण्याच्या नियमाच्या अपेक्षेमुळे. जो निश्चितपणे चक्र फिरवणार आहे, तो प्रतिसंधीपासूनच (गर्भाधान काळापासूनच) 'चक्रवर्ती प्रकट झाला' असे म्हणण्यास पात्र ठरतो. हे नाव प्राप्त झालेल्या पुरुषाच्या मूळ उत्पत्तीच्या कथनावरूनही हे योग्यच आहे. जो हा 'चक्रवर्ती' नाव प्राप्त झालेला विशिष्ट प्राणी आहे, त्याचा प्रतिसंधी नावाचा प्रादुर्भाव (प्रकट होणे) हाच येथे अर्थ आहे. त्याच्या प्रकट होण्यानेच रत्ने प्रकट होतात. प्रकट झालेल्या त्या रत्नांसह पुण्याचा संभार परिपक्व झाल्यावर तो त्यांच्याशी जोडला जातो, तेव्हा लोकांच्या मनात त्या रत्नांविषयी प्रकट झाल्याची जाणीव (चित्त) उत्पन्न होते. बहुवचनाच्या प्रयोगावरूनही हे योग्यच आहे. कारण जेव्हा लोकांच्या मनात त्या रत्नांविषयी प्रकट झाल्याची संज्ञा उत्पन्न होते, तेव्हा आधी केवळ एकच (चक्ररत्न) प्रकट होते, नंतर इतर सहा प्रकट होतात, म्हणून बहुवचनाच्या दृष्टीनेही हे योग्य आहे. 'पातुभाव' या शब्दाच्या अर्थभेदावरूनही हे योग्यच आहे. केवळ प्रकट झालेलेच 'पातुभाव' नव्हे, तर जे प्रकट करते ते 'पातुभाव' होय. हा 'पातुभाव' शब्दाचा अर्थभेद आहे. ज्या पुण्याच्या संभारामुळे राजा चक्रवर्ती प्रतिसंधीच्या रूपाने प्रकट होतो, म्हणून 'चक्रवर्ती राजाच्या प्रकट होण्याने' असे म्हटले आहे. केवळ चक्रवर्तीच प्रकट होत नाही, तर ही सात रत्नेही प्रकट होतात, हा येथे अर्थ आहे. जसा तो पुण्यसंभार राजाचा जनक हेतू (उत्पत्तीचे कारण) आहे, तसेच तो रत्नांचाही पर्यायाने उपनिषय हेतू (सहाय्यक कारण) आहे, म्हणून 'भिक्खूंनो, चक्रवर्ती राजाच्या प्रकट होण्याने सात रत्नांचे प्रकट होणे होते' हे म्हणणे अगदी योग्यच आहे. ඉදානි තෙසං රතනානං සරූපවසෙන දස්සනත්ථං කතමෙසං සත්තන්නං චක්කරතනස්සාතිආදිමාහ. තත්ථ චක්කරතනස්සාතිආදීසු අයං සඞ්ඛෙපාධිප්පායො – ද්විසහස්සදීපපරිවාරානං චතුන්නං මහාදීපානං සිරිවිභවං ගහෙත්වා දාතුං සමත්ථස්ස චක්කරතනස්ස පාතුභාවො හොති, තථා පුරෙභත්තමෙව සාගරපරියන්තං පථවිං අනුපරියායනසමත්ථස්ස වෙහාසඞ්ගමස්ස හත්ථිරතනස්ස, තාදිසස්සෙව අස්සරතනස්ස, චතුරඞ්ගසමන්නාගතෙපි අන්ධකාරෙ යොජනප්පමාණං අන්ධකාරං විධමිත්වා ආලොකදස්සනසමත්ථස්ස මණිරතනස්ස, ඡබ්බිධං දොසං විවජ්ජෙත්වා මනාපචාරිනො ඉත්ථිරතනස්ස, යොජනප්පමාණෙ පදෙසෙ අන්තොපථවිගතානං නිධීනං දස්සනසමත්ථස්ස ගහපතිරතනස්ස, අග්ගමහෙසියා කුච්ඡිම්හි නිබ්බත්තිත්වා සකලරජ්ජානුසාසනසමත්ථස්ස ජෙට්ඨපුත්තසඞ්ඛාතස්ස පරිණායකරතනස්ස ච පාතුභාවො හොතීති. අයමෙත්ථ සඞ්ඛෙපො. විත්ථාරතො පන තෙසං චක්කරතනාදීනං පාතුභාවවිධානං මහාසුදස්සනාදීසු සුත්තෙසු ආගතමෙව. අත්ථොපිස්ස තෙසං වණ්ණනාය සංවණ්ණිතොයෙව. आता त्या रत्नांचे स्वरूप दाखवण्यासाठी 'कतमेसं सत्तन्नं चक्क्रतनस्स' (कोणत्या सात चक्ररत्नांचे...) इत्यादी म्हणाले. त्यामध्ये 'चक्क्रतनस्स' इत्यादी शब्दांचा हा संक्षिप्त अर्थ आहे - दोन हजार लहान बेटांनी वेढलेल्या चार मोठ्या महाद्वीपांचे ऐश्वर्य प्राप्त करून देण्यास समर्थ असलेल्या चक्ररत्नाचा प्रादुर्भाव होतो. तसेच, दुपारच्या जेवणापूर्वीच समुद्रापर्यंतच्या संपूर्ण पृथ्वीची प्रदक्षिणा करण्यास समर्थ असलेल्या, आकाशातून उडणाऱ्या हत्तीरत्नाचा (प्रादुर्भाव होतो). त्याचप्रमाणे तशाच प्रभावाने युक्त असलेल्या अश्वरत्नाचा (प्रादुर्भाव होतो). चार अंगांनी युक्त असलेल्या अंधारातही एक योजन प्रमाणातील अंधार दूर करून प्रकाश दाखवण्यास समर्थ असलेल्या मणिरत्नाचा (प्रादुर्भाव होतो). सहा प्रकारचे दोष टाळून पतीच्या मनाप्रमाणे वागणाऱ्या स्त्रीरत्नाचा (प्रादुर्भाव होतो). एक योजन प्रमाणाच्या प्रदेशात पृथ्वीच्या आत असलेल्या गुप्त धनाचे दर्शन घेण्यास समर्थ असलेल्या गृहपतीरत्नाचा (प्रादुर्भाव होतो). आणि पट्टराणीच्या उदरात जन्म घेऊन संपूर्ण राज्याचे शासन करण्यास समर्थ असलेल्या, ज्येष्ठ पुत्राच्या रूपातील परिणायकरत्नाचा (सेनापतीरत्नाचा) प्रादुर्भाव होतो. हा येथे संक्षिप्त अर्थ आहे. परंतु विस्ताराने त्या चक्ररत्न इत्यादींच्या प्रादुर्भावाची पद्धत महासुदस्सन इत्यादी सूत्तांमध्ये आलेलीच आहे. आणि त्याचा अर्थही त्यांच्या अट्ठकथेत स्पष्ट केलेलाच आहे. සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගරතනස්සාතිආදීසු [Pg.192] සරික්ඛකතා එවං වෙදිතබ්බා – යථෙව හි චක්කවත්තිනො චක්කරතනං සබ්බරතනානං පුරෙචරං, එවං සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගරතනං සබ්බෙසං චතුභූමකධම්මානං පුරෙචරන්ති, පුරෙචරණට්ඨෙන චක්කවත්තිරඤ්ඤො චක්කරතනසදිසං හොති. චක්කවත්තිනො ච රතනෙසු මහාකායූපපන්නං අච්චුග්ගතං විපුලං මහන්තං හත්ථිරතනං, ඉදම්පි ධම්මවිචයසම්බොජ්ඣඞ්ගරතනං මහන්තං ධම්මකායූපපන්නං අච්චුග්ගතං විපුලං මහන්තන්ති හත්ථිරතනසදිසං හොති. චක්කවත්තිනො අස්සරතනං සීඝං ලහු ජවං, ඉදම්පි වීරියසම්බොජ්ඣඞ්ගරතනං සීඝං ලහු ජවන්ති ඉමාය සීඝලහුජවතාය අස්සරතනසදිසං හොති. චක්කවත්තිනො මණිරතනං අන්ධකාරං විධමති, ආලොකං දස්සෙති, ඉදම්පි පීතිසම්බොජ්ඣඞ්ගරතනං තාය එකන්තකුසලත්තා කිලෙසන්ධකාරං විධමති, සහජාතපච්චයාදිවසෙන ඤාණාලොකං දස්සෙතීති ඉමිනා අන්ධකාරවිධමනආලොකදස්සනභාවෙන මණිරතනසදිසං හොති. 'सतिसम्बोज्झङ्गरतनस्स' (स्मृति-संबोध्यंग रत्न) इत्यादींमध्ये समानता या प्रकारे समजून घ्यावी - ज्याप्रमाणे चक्रवर्ती राजाचे चक्ररत्न हे सर्व रत्नांमध्ये अग्रगामी (पुढे चालणारे) असते, त्याचप्रमाणे सतिसम्बोज्झङ्गरत्न हे सर्व चार भूमींमधील (चार स्तरांतील) धर्मांमध्ये अग्रगामी असते. अग्रगामी असण्याच्या अर्थाने ते चक्रवर्ती राजाच्या चक्ररत्नासारखे असते. चक्रवर्ती राजाच्या रत्नांमध्ये विशाल शरीराने युक्त, अत्यंत उंच, भव्य आणि मोठे हत्तीरत्न असते; हे धम्मविचयसम्बोज्झङ्गरत्न देखील महान धम्मकायाने युक्त, अत्यंत उंच, भव्य आणि मोठे असल्यामुळे हत्तीरत्नासारखे असते. चक्रवर्ती राजाचे अश्वरत्न हे वेगवान, हलके आणि चपळ असते; हे वीरियसम्बोज्झङ्गरत्न देखील वेगवान, हलके आणि चपळ असल्यामुळे, या शीघ्र व चपळ गतीमुळे अश्वरत्नासारखे असते. चक्रवर्ती राजाचे मणिरत्न अंधार दूर करते आणि प्रकाश दाखवते; हे पीतिसम्बोज्झङ्गरत्न देखील एकांत कुशल (पूर्णपणे कुशल) असल्यामुळे क्लेशांचा अंधार दूर करते आणि सहजात-प्रत्यय इत्यादींच्या प्रभावाने ज्ञानप्रकाश दाखवते. अशा प्रकारे, अंधार दूर करणे आणि प्रकाश दाखवणे या स्वभावामुळे ते मणिरत्नासारखे असते. චක්කවත්තිනො ඉත්ථිරතනං කායචිත්තදරථං පටිපස්සම්භෙති, පරිළාහං වූපසමෙති. ඉදම්පි පස්සද්ධිසම්බොජ්ඣඞ්ගරතනං කායචිත්තදරථං පටිපස්සම්භෙති, පරිළාහං වූපසමෙතීති ඉත්ථිරතනසදිසං හොති. චක්කවත්තිනො ගහපතිරතනං ඉච්ඡිතිච්ඡිතක්ඛණෙ ධනදානෙන වික්ඛෙපං පච්ඡින්දිත්වා චිත්තං එකග්ගං කරොති, ඉදම්පි සමාධිසම්බොජ්ඣඞ්ගරතනං යථිච්ඡිතාදිවසෙන අප්පනං සම්පාදෙති, වික්ඛෙපං පච්ඡින්දිත්වා චිත්තං එකග්ගං කරොතීති ගහපතිරතනසදිසං හොති. චක්කවත්තිනො ච පරිණායකරතනං සබ්බත්ථකිච්චසම්පාදනෙන අප්පොස්සුක්කතං කරොති. ඉදම්පි උපෙක්ඛාසම්බොජ්ඣඞ්ගරතනං චිත්තුප්පාදං ලීනුද්ධච්චතො මොචෙත්වා පයොගමජ්ඣත්තෙ ඨපයමානං අප්පොස්සුක්කතං කරොතීති පරිණායකරතනසදිසං හොති. ඉති ඉමස්මිං සුත්තෙ චතුභූමකො සබ්බසඞ්ගාහිකධම්මපරිච්ඡෙදො කථිතොති වෙදිතබ්බො. चक्रवर्ती राजाचे स्त्रीरत्न हे शरीर आणि मनाचा थकवा (दाह) शांत करते, परिदाह पूर्णपणे शमवते. हे पस्सद्धिसम्बोज्झङ्गरत्न देखील शरीर आणि मनाचा थकवा शांत करते, परिदाह शमवते, म्हणून ते स्त्रीरत्नासारखे असते. चक्रवर्ती राजाचे गृहपतीरत्न हे इच्छिलेल्या क्षणी धन देऊन मनाचा विक्षेप (भटकणे) थांबवून चित्त एकाग्र करते; हे समाधिसम्बोज्झङ्गरत्न देखील इच्छेनुसार अप्पना (अर्पणा समाधी) प्राप्त करून देते, विक्षेप दूर करून चित्त एकाग्र करते, म्हणून ते गृहपतीरत्नासारखे असते. चक्रवर्ती राजाचे परिणायकरत्न (सेनापतीरत्न) सर्व कामांची पूर्तता करून राजाला चिंतामुक्त (निश्चिंत) करते. हे उपेक्खासम्बोज्झङ्गरत्न देखील चित्ताच्या उत्पत्तीला आळस (लीन) आणि उद्धतपणा (उद्धच्च) यांपासून मुक्त करून मध्यस्थ प्रयत्नात प्रस्थापित करते आणि निश्चिंत करते, म्हणून ते परिणायकरत्नासारखे असते. अशा प्रकारे, या सूत्तात चार भूमींमधील सर्वसमावेशक धम्म-विभागाचे वर्णन केले आहे, असे समजावे. 4-10. දුප්පඤ්ඤසුත්තාදිවණ්ණනා ४-१०. दुप्पञ्ञसुत्त (दुर्बुद्धी सूत्त) इत्यादींचे वर्णन. 225-231. චතුත්ථෙ එළමූගොති මුඛෙන වාචං නිච්ඡාරෙතුං සක්කොන්තොපි දොසෙහි මූගො අසම්පන්නවචනො. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානත්ථමෙවාති. २२५-२३१. चौथ्या सूत्तात 'एळमूगो' म्हणजे मुखाने शब्द उच्चारण्यास समर्थ असूनही दोषांमुळे मुक्यासारखा, अपूर्ण किंवा अस्पष्ट बोलणारा होय. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. චක්කවත්තිවග්ගො. चक्कवत्तिवग्गो (चक्रवर्ती वर्ग) समाप्त. 6. සාකච්ඡවග්ගො ६. साकच्छवग्गो (साकच्छ वर्ग). 1. ආහාරසුත්තවණ්ණනා १. आहारसुत्त वर्णन. 232. ඡට්ඨවග්ගස්ස [Pg.193] පඨමෙ අයමාහාරො අනුප්පන්නස්ස වා සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගස්ස උප්පාදායාතිආදීසු අයං පුරිමනයතො විසෙසො. න කෙවලඤ්හි සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගාදීනං එතෙ වුත්තප්පකාරාව උප්පාදාය, උප්පන්නානං වා භාවනාය පාරිපූරියා පච්චයා හොන්ති, අඤ්ඤෙපි පන එවං වෙදිතබ්බා. අපරෙපි හි චත්තාරො ධම්මා සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගස්ස උප්පාදාය සංවත්තන්ති සතිසම්පජඤ්ඤං මුට්ඨස්සතිපුග්ගලපරිවජ්ජනතා උපට්ඨිතස්සතිපුග්ගලසෙවනතා තදධිමුත්තතාති. අභික්කන්තාදීසු හි සත්තසු ඨානෙසු සතිසම්පජඤ්ඤෙන, භත්තනික්ඛිත්තකාකසදිසෙ මුට්ඨස්සතිපුග්ගලෙ පරිවජ්ජනෙන, තිස්සදත්තත්ථෙරඅභයත්ථෙරාදිසදිසෙ උපට්ඨිතස්සතිපුග්ගලෙ සෙවනෙන, ඨානනිසජ්ජාදීසු සතිසමුට්ඨාපනත්ථං නින්නපොණපබ්භාරචිත්තතාය ච සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගො උප්පජ්ජති. එවං චතූහි කාරණෙහි උප්පන්නස්ස පනස්ස අරහත්තමග්ගෙන භාවනාපාරිපූරී හොති. २३२. सहाव्या वर्गाच्या पहिल्या सूत्तात 'अयमाहारो अनुप्पन्नस्स वा सतिसम्बोज्झङ्गस्स उप्पादाय' (उत्पन्न न झालेल्या स्मृति-संबोध्यंगाच्या उत्पत्तीसाठी हा आहार आहे) इत्यादींमध्ये पूर्वीच्या पद्धतीपेक्षा हा विशेष फरक आहे. केवळ वर सांगितलेले प्रकारच सतिसम्बोज्झङ्ग इत्यादींच्या उत्पत्तीसाठी किंवा उत्पन्न झालेल्यांच्या भावनेच्या परिपूर्तीसाठी प्रत्यय (कारण) ठरत नाहीत, तर इतरही या प्रकारे समजून घ्यावेत. इतर चार धम्म देखील सतिसम्बोज्झङ्गाच्या उत्पत्तीसाठी कारणीभूत ठरतात - सतिसम्पजञ्ञ (स्मृति-संप्रजन्य), मुट्ठस्सतिपुग्गलपरिवज्जनता (स्मृतिभ्रष्ट व्यक्तींना टाळणे), उपट्ठितस्सतिपुग्गलसेवनता (स्मृतिमान व्यक्तींची सेवा करणे) आणि तदधिमुत्तता (त्यातच मग्न असणे). पुढे जाणे इत्यादी सात प्रसंगांमध्ये सतिसम्पजञ्ञाद्वारे, अन्नाच्या पात्रावर नजर ठेवणाऱ्या कावळ्यासारख्या स्मृतिभ्रष्ट व्यक्तींना टाळण्याद्वारे, तिस्सदत्त थेर आणि अभय थेर इत्यादींसारख्या स्मृतिमान व्यक्तींच्या सेवेद्वारे, आणि उभे राहणे, बसणे इत्यादींमध्ये स्मृति जागृत करण्यासाठी त्याकडेच झुकलेल्या, प्रवृत्त झालेल्या व लीन झालेल्या चित्तामुळे सतिसम्बोज्झङ्ग उत्पन्न होतो. अशा प्रकारे, चार कारणांनी उत्पन्न झालेल्या या सतिसम्बोज्झङ्गाची अरहत्त मार्गाने भावना-परिपूर्ती होते. සත්ත ධම්මා ධම්මවිචයසම්බොජ්ඣඞ්ගස්ස උප්පාදාය සංවත්තන්ති – පරිපුච්ඡකතා වත්ථුවිසදකිරියා ඉන්ද්රියසමත්තපටිපාදනා දුප්පඤ්ඤපුග්ගලපරිවජ්ජනා පඤ්ඤවන්තපුග්ගලසෙවනා ගම්භීරඤාණචරියපච්චවෙක්ඛණා තදධිමුත්තතාති. තත්ථ පරිපුච්ඡකතාති ඛන්ධධාතුආයතනඉන්ද්රියබලබොජ්ඣඞ්ගමග්ගඞ්ගඣානඞ්ගසමථවිපස්සනානං අත්ථසන්නිස්සිතපරිපුච්ඡාබහුලතා. सात धम्म धम्मविचयसम्बोज्झङ्गाच्या उत्पत्तीसाठी कारणीभूत ठरतात - परिपुच्छकता (वारंवार प्रश्न विचारणे), वत्थुविसदकिरिया (वस्तूंची स्वच्छता राखणे), इन्द्रियसमत्तपटिपादना (इंद्रियांचे संतुलन राखणे), दुप्पञ्ञपुग्गलपरिवज्जना (दुर्बुद्धी व्यक्तींना टाळणे), पञ्ञवन्तपुग्गलसेवना (बुद्धिमान व्यक्तींची सेवा करणे), गम्भीरञाणचरियपच्चवेक्खणा (गहन ज्ञान आणि आचरणाचे वारंवार चिंतन करणे) आणि तदधिमुत्तता (त्यातच मग्न असणे). त्यामध्ये 'परिपुच्छकता' म्हणजे स्कंध, धातू, आयतन, इंद्रिय, बल, बोध्यंग, मार्गंग, ध्यानांग, शमथ आणि विपश्यना यांच्या अर्थावर आधारित वारंवार प्रश्न विचारण्याची प्रवृत्ती होय. වත්ථුවිසදකිරියාති අජ්ඣත්තිකබාහිරානං වත්ථූනං විසදභාවකරණං. යදා හිස්ස කෙසනඛලොමානි දීඝානි හොන්ති, සරීරං වා උස්සන්නදොසඤ්චෙව සෙදමලමක්ඛිතඤ්ච, තදා අජ්ඣත්තිකවත්ථු අවිසදං හොති අපරිසුද්ධං. යදා පන චීවරං ජිණ්ණං කිලිට්ඨං දුග්ගන්ධං හොති, සෙනාසනං වා උක්ලාපං, තදා බාහිරවත්ථු අවිසදං හොති අපරිසුද්ධං. තස්මා කෙසාදිඡෙදනෙන උද්ධංවිරෙචනඅධොවිරෙචනාදීහි සරීරසල්ලහුකභාවකරණෙන උච්ඡාදනනහාපනෙන ච අජ්ඣත්තිකවත්ථු විසදං කාතබ්බං. සූචිකම්මධොවනරජනපරිභණ්ඩකරණාදීහි බාහිරවත්ථු විසදං කාතබ්බං. එතස්මිඤ්හි අජ්ඣත්තිකබාහිරෙ වත්ථුම්හි අවිසදෙ උප්පන්නෙසු චිත්තචෙතසිකෙසු ඤාණම්පි අවිසදං අපරිසුද්ධං හොති අපරිසුද්ධානි දීපකපල්ලකවට්ටිතෙලානි නිස්සාය උප්පන්නදීපසිඛාය ඔභාසො [Pg.194] විය. විසදෙ පන අජ්ඣත්තිකබාහිරෙ වත්ථුම්හි උප්පන්නෙසු චිත්තචෙතසිකෙසු ඤාණම්පි විසදං හොති පරිසුද්ධානි දීපකපල්ලකවට්ටිතෙලානි නිස්සාය උප්පන්නදීපසිඛාය ඔභාසො විය. තෙන වුත්තං – ‘‘වත්ථුවිසදකිරියා ධම්මවිචයසම්බොජ්ඣඞ්ගස්ස උප්පාදාය සංවත්තතී’’ති. वस्तूंची स्वच्छता करणे म्हणजे अंतर्गत आणि बाह्य वस्तूंची स्वच्छता करणे होय. कारण जेव्हा एखाद्याचे केस, नखे आणि शरीरावरील केस लांब होतात, किंवा शरीर दोषांनी (वात-पित्त-कफ) युक्त आणि घामाच्या मळाने माखलेले असते, तेव्हा अंतर्गत वस्तू (शरीर) अस्वच्छ आणि अपवित्र असते. पण जेव्हा चीवर जुने, मळकट आणि दुर्गंधीयुक्त असते, किंवा शयनासन (निवासस्थान) कचऱ्याने भरलेले असते, तेव्हा बाह्य वस्तू अस्वच्छ आणि अपवित्र असते. म्हणून, केस इत्यादी कापण्याद्वारे, वमन आणि विरेचन इत्यादींद्वारे शरीर हलके करण्याद्वारे, आणि उटणे लावणे व स्नान करण्याद्वारे अंतर्गत वस्तू स्वच्छ केली पाहिजे. शिवणकाम, धुणे, रंगवणे आणि डागडुजी करणे इत्यादींद्वारे बाह्य वस्तू स्वच्छ केली पाहिजे. कारण या अंतर्गत आणि बाह्य वस्तू अस्वच्छ असताना, उत्पन्न होणाऱ्या चित्त आणि चैतसिकांमध्ये ज्ञान देखील अस्वच्छ आणि अपवित्र होते; जसे अस्वच्छ दिवा, वात आणि तेलाच्या आधारे उत्पन्न झालेल्या दिव्याच्या ज्योतीचा प्रकाश अस्वच्छ असतो. परंतु अंतर्गत आणि बाह्य वस्तू स्वच्छ असताना, उत्पन्न होणाऱ्या चित्त आणि चैतसिकांमध्ये ज्ञान देखील स्वच्छ आणि पवित्र होते; जसे स्वच्छ दिवा, वात आणि तेलाच्या आधारे उत्पन्न झालेल्या दिव्याच्या ज्योतीचा प्रकाश स्वच्छ असतो. म्हणूनच म्हटले आहे – 'वस्तूंची स्वच्छता करणे हे धम्मविचय-संबोज्झंगाच्या उत्पत्तीसाठी कारणीभूत ठरते.' ඉන්ද්රියසමත්තපටිපාදනා නාම සද්ධාදීනං ඉන්ද්රියානං සමභාවකරණං. සචෙ හිස්ස සද්ධින්ද්රියං බලවං හොති, ඉතරානි මන්දානි, තතො වීරියින්ද්රියං පග්ගහකිච්චං, සතින්ද්රියං උපට්ඨානකිච්චං, සමාධින්ද්රියං අවික්ඛෙපකිච්චං, පඤ්ඤින්ද්රියං දස්සනකිච්චං කාතුං න සක්කොති. තස්මා තං ධම්මසභාවපච්චවෙක්ඛණෙන වා, යථා වා මනසිකරොතො බලවං ජාතං, තථා අමනසිකරණෙන හාපෙතබ්බං. වක්කලිත්ථෙරවත්ථු චෙත්ථ නිදස්සනං. සචෙ පන වීරියින්ද්රියං බලවං හොති, අථ නෙව සද්ධින්ද්රියං අධිමොක්ඛකිච්චං කාතුං සක්කොති, න ඉතරානි ඉතරකිච්චභෙදං. තස්මා තං පස්සද්ධාදිභාවනාය හාපෙතබ්බං. තත්ථාපි සොණත්ථෙරස්ස වත්ථු දස්සෙතබ්බං. එවං සෙසෙසුපි එකස්ස බලවභාවෙ සති ඉතරෙසං අත්තනො කිච්චෙසු අසමත්ථතා වෙදිතබ්බා. 'इंद्रियांचे संतुलन साधणे' म्हणजे श्रद्धा इत्यादी इंद्रियांना समतोल स्थितीत आणणे होय. जर एखाद्याचे श्रद्धा-इंद्रिय (सद्धिंद्रिय) प्रबळ असेल आणि इतर इंद्रिये दुर्बळ असतील, तर वीर्य-इंद्रिय (वीरियिंद्रिय) आपले प्रग्रहणाचे (उत्साह देण्याचे) कार्य, सती-इंद्रिय (सतींद्रिय) आपले उपस्थानाचे (जागरूकतेचे) कार्य, समाधी-इंद्रिय (समाधींद्रिय) आपले अविक्षेपाचे (एकाग्रतेचे) कार्य, आणि प्रज्ञा-इंद्रिय (पञ्ञिंद्रिय) आपले दर्शनाचे (यथार्थ पाहण्याचे) कार्य करण्यास असमर्थ ठरते. म्हणून, त्या श्रद्धा-इंद्रियाला धम्माच्या स्वभावाचे चिंतन करून, किंवा ज्या प्रकारे मनसिकार केल्याने ते प्रबळ झाले होते, त्या प्रकारे मनसिकार न करून (अमनसिकाराने) कमी केले पाहिजे. या बाबतीत वक्कलि स्थविरांचे उदाहरण दिले जाते. पण जर वीर्य-इंद्रिय प्रबळ असेल, तर श्रद्धा-इंद्रिय आपले अधिमोक्षाचे (निश्चयाचे) कार्य करू शकत नाही, आणि इतर इंद्रिये देखील आपापली विशिष्ट कार्ये करू शकत नाहीत. म्हणून, त्याला प्रश्श्रब्धी (शांती) इत्यादींच्या भावनेने कमी केले पाहिजे. या बाबतीत सोण स्थविरांचे उदाहरण दिले पाहिजे. याचप्रमाणे, उर्वरित इंद्रियांच्या बाबतीतही एका इंद्रियाच्या अतिप्रबळतेमुळे इतरांना आपापली कार्ये करण्यात असमर्थता येते, असे जाणावे. විසෙසතො පනෙත්ථ සද්ධාපඤ්ඤානං සමාධිවීරියානඤ්ච සමතං පසංසන්ති. බලවසද්ධො හි මන්දපඤ්ඤො මුධප්පසන්නො හොති, අවත්ථුස්මිං පසීදති. බලවපඤ්ඤො පන මන්දසද්ධො කෙරාටිකපක්ඛං භජති, භෙසජ්ජසමුට්ඨිතො විය රොගො අතෙකිච්ඡො හොති. චිත්තුප්පාදමත්තෙනෙව කුසලං හොතීති අතිධාවිත්වා දානාදීනි අකරොන්තො නිරයෙ උප්පජ්ජති. උභින්නං සමතාය වත්ථුස්මිංයෙව පසීදති. බලවසමාධිං පන මන්දවීරියං සමාධිස්ස කොසජ්ජපක්ඛත්තා කොසජ්ජං අභිභවති. බලවවීරියං මන්දසමාධිං වීරියස්ස උද්ධච්චපක්ඛත්තා උද්ධච්චං අභිභවති. සමාධි පන වීරියෙන සංයොජිතො කොසජ්ජෙ පතිතුං න ලභති, වීරියං සමාධිනා සංයොජිතං උද්ධච්චෙ පතිතුං න ලභති. තස්මා තදුභයං සමං කාතබ්බං. උභයසමතාය හි අප්පනා හොති. विशेषतः, येथे आचार्य श्रद्धा व प्रज्ञा आणि समाधी व वीर्य यांच्या समतेची (संतुलनाची) प्रशंसा करतात. कारण ज्याची श्रद्धा प्रबळ आणि प्रज्ञा मंद असते, तो अंधश्रद्धाळू (मूढप्रसन्न) होतो आणि अयोग्य गोष्टींवर श्रद्धा ठेवतो. परंतु ज्याची प्रज्ञा प्रबळ आणि श्रद्धा मंद असते, तो कुटिल पक्षाकडे (संशयाकडे) झुकतो, आणि औषधामुळे उद्भवलेल्या रोगाप्रमाणे तो असाध्य होतो. 'केवळ चित्ताच्या उत्पत्तीनेच (विचारानेच) कुशल कर्म होते' असा अतिविचार करून दान इत्यादी कर्मे न करता तो नरकात उत्पन्न होतो. या दोन्हीच्या (श्रद्धा व प्रज्ञा) समतेमुळे तो योग्य गोष्टीवरच श्रद्धा ठेवतो. परंतु प्रबळ समाधी आणि मंद वीर्य असलेल्या व्यक्तीला, समाधी आळसाच्या बाजूची असल्याने, आळस (कोसज्ज) ग्रासून टाकतो. प्रबळ वीर्य आणि मंद समाधी असलेल्या व्यक्तीला, वीर्य उद्धच्चाच्या (चंचलतेच्या) बाजूचे असल्याने, उद्धच्च (चंचलता) ग्रासून टाकते. परंतु समाधी जेव्हा वीर्याशी जोडली जाते, तेव्हा ती आळसात पडू देत नाही, आणि वीर्य जेव्हा समाधीशी जोडले जाते, तेव्हा ते उद्धच्चात (चंचलतेत) पडू देत नाही. म्हणून, त्या दोन्हीला समान केले पाहिजे. कारण दोन्हीच्या समतेमुळेच अर्पणा (अप्पना) समाधी प्राप्त होते. අපි ච සමාධිකම්මිකස්ස බලවතීපි සද්ධා වට්ටති. එවං සද්දහන්තො ඔකප්පෙන්තො අප්පනං පාපුණිස්සති. සමාධිපඤ්ඤාසු පන සමාධිකම්මිකස්ස එකග්ගතා බලවතී වට්ටති. එවඤ්හි සො අප්පනං පාපුණාති. විපස්සනාකම්මිකස්ස පඤ්ඤා බලවතී වට්ටති. එවඤ්හි සො ලක්ඛණපටිවෙධං පාපුණාති. උභින්නං [Pg.195] පන සමතායපි අප්පනා හොතියෙව. සති පන සබ්බත්ථ බලවතී වට්ටති. සති හි චිත්තං උද්ධච්චපක්ඛිකානං සද්ධාවීරියපඤ්ඤානං වසෙන උද්ධච්චපාතතො, කොසජ්ජපක්ඛිකෙන ච සමාධිනා කොසජ්ජපාතතො රක්ඛති. තස්මා සා ලොණධූපනං විය සබ්බබ්යඤ්ජනෙසු, සබ්බකම්මිකඅමච්චො විය ච සබ්බරාජකිච්චෙසු සබ්බත්ථ ඉච්ඡිතබ්බා. තෙනාහ ‘‘සති ච පන සබ්බත්ථිකා වුත්තා භගවතා. කිං කාරණා? චිත්තඤ්හි සතිපටිසරණං, ආරක්ඛපච්චුපට්ඨානා ච සති, න විනා සතියා චිත්තස්ස පග්ගහනිග්ගහො හොතී’’ති. शिवाय, समाधीचा अभ्यास करणाऱ्यासाठी (समथ कर्मस्थानिकासाठी) प्रबळ श्रद्धा देखील योग्य असते. अशा प्रकारे श्रद्धा ठेवणारा आणि चित्त एकाग्र करणारा अर्पणा समाधी प्राप्त करतो. समाधी आणि प्रज्ञा यांमध्ये, समाधीचा अभ्यास करणाऱ्यासाठी एकाग्रता प्रबळ असणे योग्य आहे. कारण यामुळे तो अर्पणा समाधी प्राप्त करतो. विपश्यनेचा अभ्यास करणाऱ्यासाठी प्रज्ञा प्रबळ असणे योग्य आहे. कारण यामुळे तो लक्षणांचा वेध घेतो (साक्षात्कार करतो). परंतु दोन्हीच्या समतेने देखील अर्पणा समाधी प्राप्त होतेच. पण सती (स्मृती) सर्व ठिकाणी प्रबळ असणे योग्य आहे. कारण सती चित्ताला उद्धच्चाच्या बाजूच्या असलेल्या श्रद्धा, वीर्य आणि प्रज्ञा यांच्या प्रभावाने उद्धच्चात (चंचलतेत) पडण्यापासून वाचवते, आणि आळसाच्या बाजूच्या असलेल्या समाधीमुळे आळसात पडण्यापासून वाचवते. म्हणून, जसे सर्व व्यंजनांमध्ये (पदार्थांमध्ये) मीठ आवश्यक असते, आणि राजाच्या सर्व कामांमध्ये सर्वकार्यकारी मंत्री आवश्यक असतो, तशी सती सर्व ठिकाणी आवश्यक आहे. म्हणूनच म्हटले आहे – 'भगवंतांनी सतीला सर्व ठिकाणी उपयुक्त (सर्वार्थिक) म्हटले आहे. याचे कारण काय? कारण चित्त हे सतीच्या आश्रयाने राहणारे आहे, आणि सती ही संरक्षणाच्या रूपाने उपस्थित राहते. सतीशिवाय चित्ताचा प्रग्रह (उत्साह वाढवणे) किंवा निग्रह (नियंत्रण) होऊ शकत नाही.' දුප්පඤ්ඤපුග්ගලපරිවජ්ජනා නාම ඛන්ධාදිභෙදෙ අනොගාළ්හපඤ්ඤානං දුම්මෙධපුග්ගලානං ආරකා පරිවජ්ජනං. පඤ්ඤවන්තපුග්ගලසෙවනා නාම සමපඤ්ඤාසලක්ඛණපරිග්ගාහිකාය උදයබ්බයපඤ්ඤාය සමන්නාගතපුග්ගලසෙවනා. ගම්භීරඤාණචරියපච්චවෙක්ඛණා නාම ගම්භීරෙසු ඛන්ධාදීසු පවත්තාය ගම්භීරපඤ්ඤාය පභෙදපච්චවෙක්ඛණා. තදධිමුත්තතා නාම ඨානනිසජ්ජාදීසු ධම්මවිචයසම්බොජ්ඣඞ්ගසමුට්ඨාපනත්ථං නින්නපොණපබ්භාරචිත්තතා. එවං උප්පන්නස්ස පනස්ස අරහත්තමග්ගෙන භාවනාපාරිපූරී හොති. 'दुर्बुद्धी व्यक्तींचा त्याग करणे' म्हणजे स्कंध इत्यादींच्या विभागात प्रवेश न करू शकणाऱ्या मंदबुद्धी व्यक्तींपासून दूर राहणे (त्यांचा त्याग करणे) होय. 'प्रज्ञावान व्यक्तींची सेवा करणे' म्हणजे पन्नास लक्षणांचे ग्रहण करणाऱ्या उदय-व्यय (उत्पत्ती आणि विनाश) प्रज्ञेने युक्त असलेल्या व्यक्तींची संगत करणे होय. 'गंभीर ज्ञानचर्येचे चिंतन करणे' म्हणजे स्कंध इत्यादी गंभीर विषयांमध्ये प्रवृत्त असणाऱ्या गंभीर प्रज्ञेने त्यांच्या भेदांचे (विभागांचे) चिंतन करणे होय. 'त्यातच तल्लीन असणे' म्हणजे उभे राहणे, बसणे इत्यादी अवस्थांमध्ये धम्मविचय-संबोज्झंग उत्पन्न करण्यासाठी चित्ताला तिकडेच झुकवणे, प्रवृत्त करणे व लीन करणे होय. अशा प्रकारे उत्पन्न झालेल्या या संबोज्झंगाची अर्हतमार्गाने भावना परिपूर्ण होते. එකාදස ධම්මා වීරියසම්බොජ්ඣඞ්ගස්ස උප්පාදාය සංවත්තන්ති – අපායභයපච්චවෙක්ඛණතා, ආනිසංසදස්සාවිතා, ගමනවීථිපච්චවෙක්ඛණතා, පිණ්ඩපාතාපචායනතා, දායජ්ජමහත්තපච්චවෙක්ඛණතා, සත්ථුමහත්තපච්චවෙක්ඛණතා, ජාතිමහත්තපච්චවෙක්ඛණතා, සබ්රහ්මචාරිමහත්තපච්චවෙක්ඛණතා, කුසීතපුග්ගලපරිවජ්ජනතා, ආරද්ධවීරියපුග්ගලසෙවනතා, තදධිමුත්තතාති. अकरा धम्म वीर्य-संबोज्झंगाच्या उत्पत्तीसाठी कारणीभूत ठरतात – अपाय (दुर्गती) च्या भयाचे चिंतन करणे, (वीर्याच्या) फायद्यांचे दर्शन करणे, गमनमार्गाचे चिंतन करणे, पिंडपाताचा आदर करणे, दायादाच्या (धर्माच्या वारशाच्या) महानतेचे चिंतन करणे, शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) महानतेचे चिंतन करणे, जातीच्या (कुळाच्या) महानतेचे चिंतन करणे, सब्रह्मचाऱ्यांच्या महानतेचे चिंतन करणे, आळशी व्यक्तींचा त्याग करणे, उद्योगी व्यक्तींची संगत करणे आणि त्यातच (वीर्य-संबोज्झंगातच) तल्लीन असणे. තත්ථ ‘‘නිරයෙසු පඤ්චවිධබන්ධනකම්මකාරණතො පට්ඨාය මහාදුක්ඛං අනුභවනකාලෙපි, තිරච්ඡානයොනියං ජාලඛිපනකුමීනාදීහි ගහිතකාලෙපි, පාජනකණ්ටකාදිප්පහාරතුන්නස්ස පන සකටවහනාදිකාලෙපි, පෙත්තිවිසයෙ අනෙකානිපි වස්සසහස්සානි එකං බුද්ධන්තරම්පි ඛුප්පිපාසාහි ආතුරීභූතකාලෙපි, කාලකඤ්චිකඅසුරෙසු සට්ඨිහත්ථඅසීතිහත්ථප්පමාණෙන අට්ඨිචම්මමත්තෙනෙව අත්තභාවෙන වාතාතපාදිදුක්ඛානුභවනකාලෙපි න සක්කා වීරියසම්බොජ්ඣඞ්ගං උප්පාදෙතුං. අයමෙව තෙ භික්ඛු කාලො’’ති එවං අපායභයං පච්චවෙක්ඛන්තස්සාපි වීරියසම්බොජ්ඣඞ්ගො උප්පජ්ජති. त्यामध्ये "नरकामध्ये पाच प्रकारच्या बंधनांच्या कर्म-यातनांपासून सुरू होणारे मोठे दुःख भोगत असताना, प्राणीयोनित (तिर्यक योनीत) जाळे, फासे, पिंजरे इत्यादींनी पकडले गेले असताना, किंवा टोचणी व चाबकाचे फटके खात गाडी ओढत असताना, प्रेतलोकात अनेक हजार वर्षे किंवा दोन बुद्धांच्या मधील काळापर्यंत भूक व तहानेने व्याकुळ झाले असताना, आणि कालकंजिक असुरांमध्ये साठ किंवा ऐंशी हात आकाराच्या केवळ हाडे आणि कातडे उरलेल्या शरीराने वारा, ऊन इत्यादींचे दुःख भोगत असताना वीरियसम्बोज्झङ्ग (वीर्य-संबोध्यंग) उत्पन्न करणे शक्य नाही. हे भिक्खू! हाच तुझा (वीर्य वाढवण्याचा) योग्य काळ आहे," अशा प्रकारे अपाय-भयाचे (दुर्गतीच्या भयाचे) वारंवार चिंतन करणाऱ्या व्यक्तीमध्ये देखील वीरियसम्बोज्झङ्ग उत्पन्न होतो. ‘‘න සක්කා කුසීතෙන නවලොකුත්තරධම්මං ලද්ධුං, ආරද්ධවීරියෙනෙව සක්කා අයමානිසංසො වීරියස්සා’’ති එවං ආනිසංසදස්සාවිනොපි උප්පජ්ජති. ‘‘සබ්බබුද්ධ-පච්චෙකබුද්ධ-මහාසාවකෙහෙව [Pg.196] ගතමග්ගො තෙ ගන්තබ්බො. සො ච න සක්කා කුසීතෙන ගන්තු’’න්ති එවං ගමනවීථිං පච්චවෙක්ඛන්තස්සාපි උප්පජ්ජති. “आळशी माणसाला नऊ लोकोत्तर धर्म (नवलोकोत्तरधम्म) प्राप्त करणे शक्य नाही, केवळ वीर्यवान (प्रयत्नशील) व्यक्तीलाच ते शक्य आहे, हा वीर्याचा (प्रयत्नाचा) फायदा आहे,” असे वीर्याचे फायदे पाहणाऱ्यालाही (वीर्य संबोझंग) उत्पन्न होते. “सर्व बुद्ध, प्रत्येकबुद्ध आणि महाश्रावकांनी ज्या मार्गाने गमन केले आहे, त्याच मार्गाने तुला जायचे आहे. आणि तो मार्ग आळशी माणसाला चालणे शक्य नाही,” अशा प्रकारे गमनाच्या मार्गाचे (गमनवीथी) प्रत्यवेक्षण करणाऱ्यालाही ते उत्पन्न होते. ‘‘යෙ තං පිණ්ඩපාතාදීහි උපට්ඨහන්ති, ඉමෙ තෙ මනුස්සා නෙව ඤාතකා, න දාසකම්මකරා, නාපි ‘තං නිස්සාය ජීවිස්සාමා’ති තෙ පණීතානි පිණ්ඩපාතාදීනි දෙන්ති. අථ ඛො අත්තනො කාරානං මහප්ඵලතං පච්චාසීසමානා දෙන්ති. සත්ථාරාපි ‘‘අයං ඉමෙ පච්චයෙ පරිභුඤ්ජිත්වා කායදළ්හිබහුලො සුඛං විහරිස්සතී’’ති න එවං සම්පස්සතා තුය්හං පච්චයා අනුඤ්ඤාතා, අථ ඛො ‘‘අයං ඉමෙ පරිභුඤ්ජමානොව සමණධම්මං කත්වා වට්ටදුක්ඛතො මුච්චිස්සතී’ති තෙ පච්චයා අනුඤ්ඤාතා, සො දානි ත්වං කුසීතො විහරන්තො න තං පිණ්ඩං අපචායිස්සසි, ආරද්ධවීරියස්සෙව හි පිණ්ඩපාතාපචායනං නාම හොතී’’ති එවං පිණ්ඩපාතාපචායනං පච්චවෙක්ඛන්තස්සාපි උප්පජ්ජති මහාමිත්තත්ථෙරස්ස විය. “जे तुला पिंडपात (भिक्षा) इत्यादींनी उपस्थान (सेवा) करतात, ते लोक तुझे नातेवाईक नाहीत, तुझे दास किंवा नोकरही नाहीत, आणि 'त्याच्यावर अवलंबून आपण जगू' अशा विचाराने ते तुला उत्तम पिंडपात इत्यादी देत नाहीत. तर ते स्वतःच्या कर्माचे महाफळ मिळण्याच्या आशेने देतात. शास्त्यांनी (बुद्धांनी) देखील 'हा या प्रत्ययांचा (साधनांचा) उपभोग घेऊन शरीर बळकट करून सुखाने विहरेल' अशा दृष्टीने तुला हे प्रत्यय अनुज्ञापित (मान्य) केलेले नाहीत, तर 'हा यांचा उपभोग घेत श्रमणधर्म करून संसारदुःखातून (वट्टदुःखातून) मुक्त होईल' या हेतूने हे प्रत्यय अनुज्ञापित केले आहेत. मग आता तू आळशी राहून त्या पिंडपाताचा आदर करत नाहीस. कारण पिंडपाताचा आदर करणे केवळ वीर्यवानालाच (प्रयत्नशीलालाच) शक्य असते,” अशा प्रकारे पिंडपाताच्या आदराचे प्रत्यवेक्षण करणाऱ्यालाही (वीर्य संबोझंग) उत्पन्न होते, जसे महामित्त स्थविरांच्या (महामित्तत्थेर) बाबतीत घडले. ථෙරො කිර කස්සකලෙණෙ නාම පටිවසති. තස්සෙව ගොචරගාමෙ එකා මහාඋපාසිකා ථෙරං පුත්තං කත්වා පටිජග්ගති. සා එකදිවසං අරඤ්ඤං ගච්ඡන්තී ධීතරං ආහ – ‘‘අම්ම, අසුකස්මිං ඨානෙ පුරාණතණ්ඩුලා, අසුකස්මිං ඛීරං, අසුකස්මිං සප්පි, අසුකස්මිං ඵාණිතං, තව භාතිකස්ස අය්යමිත්තස්ස ආගතකාලෙ භත්තං පචිත්වා ඛීරසප්පිඵාණිතෙහි සද්ධිං දෙහි, ත්වඤ්ච භුඤ්ජෙය්යාසි, අහං පන හිය්යො පක්කං පාරිවාසිකභත්තං කඤ්ජියෙන භුත්තාම්හී’’ති. ‘‘දිවා කිං භුඤ්ජිස්සසි, අම්මා’’ති? ‘‘සාකපණ්ණං පක්ඛිපිත්වා කණතණ්ඩුලෙහි අම්බිලයාගුං පචිත්වා ඨපෙහි, අම්මා’’ති. असे म्हटले जाते की, ते स्थविर 'कस्सकलेण' नावाच्या गुहेत राहत असत. त्यांच्याच गोचरग्रामात (भिक्षेच्या गावात) एक महाउपासिका स्थविरांना आपला मुलगा मानून त्यांची काळजी घेत असे. ती एके दिवशी जंगलात जाताना आपल्या मुलीला म्हणाली – “बाळ, अमक्या ठिकाणी जुने तांदूळ आहेत, अमक्या ठिकाणी दूध आहे, अमक्या ठिकाणी तूप आहे, अमक्या ठिकाणी गूळ (फाणित) आहे. तुझा भाऊ आर्य मित्त (अय्यमित्त) आल्यावर भात शिजवून दूध, तूप आणि गुळासह त्यांना दे आणि तूही खा. मी तर कालचा उरलेला शिळा भात कांजीसोबत खाल्ला आहे.” “आई, तू दुपारी काय खाणार?” “पालेभाज्या टाकून, कण्यांच्या तांदळाची आंबट पेज (आंबिलयागू) शिजवून ठेव, बाळ.” ථෙරො චීවරං පාරුපිත්වා පත්තං නීහරන්තොව තං සද්දං සුත්වා අත්තානං ඔවදි ‘‘මහාඋපාසිකා කිර කඤ්ජියෙන පාරිවාසිකභත්තං භුඤ්ජිත්වා දිවාපි කණපණ්ණම්බිලයාගුං භුඤ්ජිස්සති, තුය්හං අත්ථාය පන පුරාණතණ්ඩුලාදීනි ආචික්ඛති, තං නිස්සාය ඛො පනෙසා නෙව ඛෙත්තං න වත්ථුං න භත්තං න වත්ථං පච්චාසීසති, තිස්සො පන සම්පත්තියො පත්ථයමානා දෙති, ත්වං එතිස්සා තා සම්පත්තියො දාතුං සක්ඛිස්සසි, න සක්ඛිස්සසීති, අයං ඛො පන පිණ්ඩපාතො තයා සරාගෙන සදොසෙන සමොහෙන න සක්කා ගණ්හිතු’’න්ති පත්තං ථවිකාය පක්ඛිපිත්වා ගණ්ඨිකං මුඤ්චිත්වා නිවත්තිත්වා කස්සකලෙණමෙව ගන්ත්වා පත්තං හෙට්ඨාමඤ්චෙ, චීවරං චීවරවංසෙ ඨපෙත්වා ‘‘අරහත්තං [Pg.197] අපාපුණිත්වා න නික්ඛමිස්සාමී’’ති වීරියං අධිට්ඨහිත්වා නිසීදි. දීඝරත්තං අප්පමත්තො හුත්වා නිවුත්ථභික්ඛු විපස්සනං වඩ්ඪෙත්වා පුරෙභත්තමෙව අරහත්තං පත්වා විකසමානමිව පදුමං මහාඛීණාසවො සිතං කරොන්තොව නික්ඛමි. ලෙණද්වාරෙ රුක්ඛම්හි අධිවත්ථා දෙවතා – स्थविरांनी चीवर परिधान करून, पात्र (भिक्षापात्र) बाहेर काढत असतानाच ते शब्द ऐकले आणि स्वतःलाच उपदेश केला – “ती महाउपासिका कालचा शिळा भात कांजीसोबत खाऊन, दुपारीही कण्या व पालेभाज्यांची आंबट पेज खाणार आहे, पण तुझ्यासाठी मात्र जुने तांदूळ इत्यादी सांगत आहे. तुझ्यावर अवलंबून ती शेत, मालमत्ता, अन्न किंवा वस्त्र यांची अपेक्षा करत नाही, तर ती तीन संपत्तींची (मनुष्य, देव आणि निर्वाण संपत्तीची) इच्छा धरून दान देत आहे. तू तिला त्या संपत्ती देण्यास समर्थ होशील की नाही? आणि हा पिंडपात तू राग, द्वेष व मोहाने ग्रहण करू शकत नाहीस.” असे म्हणून त्यांनी पात्र पिशवीत टाकले, कंबरपट्टा सोडला, मागे फिरून कस्सकलेण गुहेतच गेले. पात्र खाटेखाली आणि चीवर चीवर-दांड्यावर ठेवून, “अर्हत्त्व प्राप्त केल्याशिवाय मी बाहेर पडणार नाही,” असा वीर्याचा (प्रयत्नाचा) अधिष्ठान करून ते बसले. दीर्घकाळ अप्रमत्त राहून, त्या गुहेत राहणाऱ्या भिक्खूने विपश्यना वाढवून, दुपारच्या जेवणापूर्वीच अर्हत्त्व प्राप्त केले आणि उमललेल्या कमळाप्रमाणे ते महाक्षणीस्रव (अर्हत) स्मितहास्य करत बाहेर पडले. गुहेच्या दारापाशी असलेल्या झाडावरील अधिष्ठात्री देवतेने – ‘‘නමො තෙ පුරිසාජඤ්ඤ, නමො තෙ පුරිසුත්තම; යස්ස තෙ ආසවා ඛීණා, දක්ඛිණෙය්යොසි මාරිසා’’ති. – “हे पुरुषश्रेष्ठ (पुरिसाजञ्ञ), आपल्याला नमस्कार असो! हे पुरुषोत्तम, आपल्याला नमस्कार असो! ज्यांचे आसव (क्लेश) क्षीण झाले आहेत, हे पूजनीय (मारीस), आपण दक्षिणेय्य (दानास पात्र) आहात.” උදානං උදානෙත්වා ‘‘භන්තෙ, පිණ්ඩාය පවිට්ඨානං තුම්හාදිසානං අරහන්තානං භික්ඛං දත්වා මහල්ලකිත්ථියො දුක්ඛා මුච්චිස්සන්තී’’ති ආහ. ථෙරො උට්ඨහිත්වා ද්වාරං විවරිත්වා කාලං ඔලොකෙන්තො ‘‘පාතොයෙවා’’ති ඤත්වා පත්තචීවරං ආදාය ගාමං පාවිසි. असे उदान (आनंदोद्गार) व्यक्त करून ती म्हणाली, “भंते, भिक्षेसाठी प्रवेश केलेल्या आपल्यासारख्या अर्हतांना भिक्षा देऊन वृद्ध स्त्रिया दुःखातून मुक्त होतील.” स्थविरांनी उठून दार उघडले आणि वेळेकडे पाहत “अजून सकाळच आहे” हे जाणून पात्र-चीवर घेऊन गावात प्रवेश केला. දාරිකාපි භත්තං සම්පාදෙත්වා ‘‘ඉදානි මෙ භාතා ආගමිස්සති, ඉදානි ආගමිස්සතී’’ති ද්වාරං ඔලොකයමානා නිසීදි. සා ථෙරෙ ඝරද්වාරං සම්පත්තෙ පත්තං ගහෙත්වා සප්පිඵාණිතයොජිතස්ස ඛීරපිණ්ඩපාතස්ස පූරෙත්වා හත්ථෙ ඨපෙසි. ථෙරො ‘‘සුඛං හොතූ’’ති අනුමොදනං කත්වා පක්කාමි. සාපි තං ඔලොකයමානාව අට්ඨාසි. ථෙරස්ස හි තදා අතිවිය පරිසුද්ධො ඡවිවණ්ණො අහොසි, විප්පසන්නානි ඉන්ද්රියානි, මුඛං බන්ධනා මුත්තතාලපක්කං විය අතිවිය විරොචිත්ථ. त्या मुलीनेही भात तयार करून, “आता माझे बंधू येतील, आता ते येतील,” असे म्हणत दाराकडे पाहत वाट पाहिली. स्थविर घराच्या दारापाशी पोहोचल्यावर तिने पात्र घेतले आणि तूप व गुळाने युक्त असलेल्या खीर-पिंडपाताने (दूध-भाताने) ते भरून त्यांच्या हातात ठेवले. स्थविरांनी “सुखी व्हा” (सुखं होतु) असे म्हणून अनुमोदन केले आणि ते निघून गेले. ती देखील त्यांच्याकडे पाहतच उभी राहिली. कारण त्यावेळी स्थविरांचा शरीरवर्ण अत्यंत शुद्ध झाला होता, इंद्रिये अत्यंत प्रसन्न होती आणि त्यांचे मुख बंधनातून मुक्त झालेल्या पिकलेल्या ताडफळाप्रमाणे अत्यंत शोभून दिसत होते. මහාඋපාසිකා අරඤ්ඤතො ආගන්ත්වා ‘‘කිං, අම්ම, භාතිකො තෙ ආගතො’’ති පුච්ඡි. සා සබ්බං තං පවත්තිං ආරොචෙසි. උපාසිකා ‘‘අජ්ජ මෙ පුත්තස්ස පබ්බජිතකිච්චං මත්ථකං පත්ත’’න්ති ඤත්වා ‘‘අභිරමති තෙ, අම්ම, භාතා බුද්ධසාසනෙ, න උක්කණ්ඨතී’’ති ආහ. ती महाउपासिका जंगलातून परत आल्यावर तिने विचारले, “बाळ, काय तुझे बंधू आले होते?” तिने ती सर्व हकीकत सांगितली. “आज माझ्या पुत्राच्या प्रव्रजित-कर्तव्याची (भिक्खूच्या कर्तव्याची) पूर्तता झाली आहे,” हे जाणून उपासिका म्हणाली, “बाळ, तुझे बंधू बुद्धशासनात अत्यंत रममाण आहेत, ते अजिबात कंटाळलेले (उत्कंठित) नाहीत.” ‘‘මහන්තං ඛො පනෙතං සත්ථුදායජ්ජං, යදිදං සත්ත අරියධනානි නාම, තං න සක්කා කුසීතෙන ගහෙතුං. යථා හි විප්පටිපන්නං පුත්තං මාතාපිතරො ‘අයං අම්හාකං අපුත්තො’ති පරිබාහිරං කරොන්ති, සො තෙසං අච්චයෙන දායජ්ජං න ලභති, එවං කුසීතොපි ඉදං අරියධනදායජ්ජං න ලභති, ආරද්ධවීරියොව ලභතී’’ති දායජ්ජමහත්තං පච්චවෙක්ඛතොපි උප්පජ්ජති. “शास्त्यांचे (बुद्धांचे) हे दायित्व (वारसा) अत्यंत महान आहे, ज्याला 'सात आर्यधन' असे म्हणतात. ते आळशी माणसाला प्राप्त करणे शक्य नाही. ज्याप्रमाणे गैरवर्तन करणाऱ्या पुत्राला आई-वडील 'हा आमचा पुत्र नाही' असे म्हणून घराबाहेर काढतात आणि त्यांच्या मृत्यूनंतर त्याला वारसा मिळत नाही, त्याचप्रमाणे आळशी माणसालाही हे आर्यधनाचे दायित्व (वारसा) मिळत नाही, केवळ वीर्यवानालाच (प्रयत्नशीलालाच) ते मिळते,” अशा प्रकारे दायित्वाच्या (वारशाच्या) महानतेचे प्रत्यवेक्षण करणाऱ्यालाही (वीर्य संबोझंग) उत्पन्न होते. ‘‘මහා [Pg.198] ඛො පන තෙ සත්ථා, සත්ථුනො හි තෙ මාතුකුච්ඡිස්මිං පටිසන්ධිග්ගහණකාලෙපි අභිනික්ඛමනෙපි අභිසම්බොධියම්පි ධම්මචක්කප්පවත්තන-යමකපාටිහාරිය-දෙවොරොහන-ආයුසඞ්ඛාරවොස්සජ්ජනෙසුපි පරිනිබ්බානකාලෙපි දසසහස්සිලොකධාතු අකම්පිත්ථ. යුත්තං නු ඛො තෙ එවරූපස්ස සත්ථු සාසනෙ පබ්බජිත්වා කුසීතෙන භවිතු’’න්ති එවං සත්ථුමහත්තං පච්චවෙක්ඛතොපි උප්පජ්ජති. “शिवाय, तुमचे शास्ते महान आहेत. कारण तुमच्या शास्त्यांच्या मातृकुशीत प्रतिसंधी ग्रहण करतेवेळी, महाभिनिष्क्रमण करतेवेळी, अभिसंबोधिला (पूर्ण ज्ञान) प्राप्त करतेवेळी, धम्मचक्कप्पवत्तन (धम्मचक्रप्रवर्तन), यमकपाटिहारिय (यमकप्रातिहार्य), देवोरोहण (देवांच्या लोकांतून अवतरण), आयुष्यसंस्काराचा त्याग करतेवेळी आणि परिनिर्वाणसमयी देखील दहा हजारांची लोकधातू कंपित झाली होती. अशा शास्त्यांच्या शासनात प्रव्रजित होऊन तुम्ही आळशी राहणे योग्य आहे काय?” अशा प्रकारे शास्त्यांच्या महानतेचे चिंतन करणाऱ्यालाही वीर्यसंबोज्झंग उत्पन्न होतो. ‘‘ජාතියාපි ත්වං ඉදානි න ලාමකජාතිකො, අසම්භින්නාය මහාසම්මතපවෙණියා ආගතඋක්කාකරාජවංසෙ ජාතොසි, සුද්ධොදනමහාරාජස්ස ච මහාමායාදෙවියා ච නත්තා, රාහුලභද්දස්ස කනිට්ඨො, තයා නාම එවරූපෙන ජිනපුත්තෙන හුත්වා න යුත්තං කුසීතෙන විහරිතු’’න්ති එවං ජාතිමහත්තං පච්චවෙක්ඛතොපි උප්පජ්ජති. “जन्माने देखील तुम्ही आता हीन कुळातील नाही आहात. तुम्ही अखंडित अशा महासंमत परंपरेतून आलेल्या ओक्काक राजवंशामध्ये जन्मला आहात. तुम्ही महाराज शुद्धोधन आणि महामाया देवी यांचे नातू आहात, आणि भदंत राहुल यांचे धाकटे बंधू आहात. तुमच्यासारख्या जिनपुत्राने (बुद्धपुत्राने) आळशी होऊन राहणे योग्य नाही.” अशा प्रकारे कुळाच्या महानतेचे चिंतन करणाऱ्यालाही वीर्यसंबोज्झंग उत्पन्न होतो. ‘‘සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානා චෙව අසීති මහාසාවකා ච වීරියෙනෙව ලොකුත්තරධම්මං පටිවිජ්ඣිංසු. ත්වං පන එතෙසං සබ්රහ්මචාරීනං මග්ගං පටිපජ්ජසි, න පටිපජ්ජසී’’ති එවං සබ්රහ්මචාරිමහත්තං පච්චවෙක්ඛතොපි උප්පජ්ජති. “सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान तसेच ऐंशी महाश्रावकांनी वीर्यानेच (प्रयत्नानेच) लोकोत्तर धम्माचा साक्षात्कार केला. मग तुम्ही या सब्रह्मचाऱ्यांच्या मार्गाचे अनुसरण करता की नाही?” अशा प्रकारे सब्रह्मचाऱ्यांच्या महानतेचे चिंतन करणाऱ्यालाही वीर्यसंबोज्झंग उत्पन्न होतो. කුච්ඡිං පූරෙත්වා ඨිතඅජගරසදිසෙ විස්සට්ඨකායිකචෙතසිකවීරියෙ කුසීතපුග්ගලෙ පරිවජ්ජෙන්තස්සාපි, ආරද්ධවීරියෙ පහිතත්තෙ පුග්ගලෙ සෙවන්තස්සාපි ඨානනිසජ්ජාදීසු වීරියුප්පාදනත්ථං නින්නපොණපබ්භාරචිත්තස්සාපි උප්පජ්ජති. එවං උප්පන්නස්ස පනස්ස අරහත්තමග්ගෙන භාවනාපාරිපූරී හොති. पोट भरून पडून राहणाऱ्या अजगरासारख्या, शारीरिक व मानसिक वीर्य (प्रयत्न) सोडून दिलेल्या आळशी व्यक्तींना टाळल्याने; आरब्धवीर्य (प्रयत्नशील) आणि दृढनिश्चयी व्यक्तींची संगत केल्याने; आणि उभे राहणे, बसणे इत्यादींमध्ये वीर्य उत्पन्न करण्यासाठी मन कललेले, झुकलेले व प्रवण ठेवल्याने देखील वीर्यसंबोज्झंग उत्पन्न होतो. अशा प्रकारे उत्पन्न झालेल्या या वीर्यसंबोज्झंगाची अर्हत् मार्गाने भावना-परिपूरी होते. එකාදස ධම්මා පීතිසම්බොජ්ඣඞ්ගස්ස උප්පාදාය සංවත්තන්ති – බුද්ධානුස්සති ධම්මො, සඞ්ඝො, සීලං, චාගො, දෙවතානුස්සති, උපසමානුස්සති, ලූඛපුග්ගලපරිවජ්ජනතා, සිනිද්ධපුග්ගලසෙවනතා, පසාදනීයසුත්තන්තපච්චවෙක්ඛණතා, තදධිමුත්තතාති. अकरा गोष्टी पीतिसंबोज्झंगाच्या उत्पत्तीला कारणीभूत ठरतात – बुद्धानुस्सती, धम्मानुस्सती, संघानुस्सती, शीलानुस्सती, चागानुस्सती (त्यागाचे अनुस्मरण), देवदानुस्सती, उपसमानुस्सती (शांतीचे अनुस्मरण), रूक्ष व्यक्तींना टाळणे, स्निग्ध व्यक्तींची संगत करणे, प्रसन्नता देणाऱ्या सुत्तांचे चिंतन करणे आणि त्याकडेच मन प्रवण ठेवणे. බුද්ධගුණෙ අනුස්සරන්තස්සාපි හි යාව උපචාරා සකලසරීරං ඵරමානො පීතිසම්බොජ්ඣඞ්ගො උප්පජ්ජති, ධම්මසඞ්ඝගුණෙ අනුස්සරන්තස්සාපි, දීඝරත්තං අඛණ්ඩං කත්වා රක්ඛිතං චතුපාරිසුද්ධිසීලං පච්චවෙක්ඛන්තස්සාපි, ගිහිනො දසසීලපඤ්චසීලානි පච්චවෙක්ඛන්තස්සාපි, දුබ්භික්ඛභයාදීසු පණීතං භොජනං සබ්රහ්මචාරීනං දත්වා ‘‘එවං නාම අදම්හා’’ති චාගං පච්චවෙක්ඛන්තස්සාපි, ගිහිනොපි එවරූපෙ කාලෙ සීලවන්තානං දින්නදානං පච්චවෙක්ඛන්තස්සාපි, යෙහි ගුණෙහි සමන්නාගතා දෙවත්තං පත්තා, තථාරූපානං අත්තනි අත්ථිතං පච්චවෙක්ඛන්තස්සාපි, සමාපත්තියා වික්ඛම්භිතා කිලෙසා සට්ඨිපි සත්තතිපි වස්සානි [Pg.199] න සමුදාචරන්තීති පච්චවෙක්ඛන්තස්සාපි, චෙතියදස්සනබොධිදස්සනථෙරදස්සනෙසු අසක්කච්චකිරියාය සංසූචිතලූඛභාවෙ බුද්ධාදීසු පසාදසිනෙහාභාවෙන ගද්රභපිට්ඨරජසදිසෙ ලූඛපුග්ගලෙ පරිවජ්ජෙන්තස්සාපි, බුද්ධාදීසු පසාදබහුලෙ මුදුචිත්තෙ සිනිද්ධපුග්ගලෙ සෙවන්තස්සාපි, රතනත්තයගුණපරිදීපකෙ පසාදනීයෙ සුත්තන්තෙ පච්චවෙක්ඛන්තස්සාපි, ඨානනිසජ්ජාදීසු පීතිඋප්පාදනත්ථං නින්නපොණපබ්භාරචිත්තස්සාපි උප්පජ්ජති. එවං උප්පන්නස්ස පනස්ස අරහත්තමග්ගෙන භාවනාපාරිපූරී හොති. कारण, बुद्धांच्या गुणांचे अनुस्मरण करणाऱ्याला देखील उपचारापर्यंत संपूर्ण शरीराला व्यापून टाकणारा पीतिसंबोज्झंग उत्पन्न होतो. तसेच धम्म आणि संघाच्या गुणांचे अनुस्मरण करणाऱ्याला; दीर्घकाळ अखंडपणे रक्षण केलेल्या चतुपारिसुद्धिशीलाचे चिंतन करणाऱ्याला; गृहस्थाने दहा शील किंवा पाच शीलांचे चिंतन केल्याने; दुष्काळाच्या भयादी प्रसंगी सब्रह्मचाऱ्यांना उत्तम भोजन देऊन 'आम्ही असे दान दिले' अशा प्रकारे आपल्या त्यागाचे चिंतन करणाऱ्याला; गृहस्थाने देखील अशा कठीण काळात शीलवंतांना दिलेल्या दानाचे चिंतन केल्याने; ज्या गुणांनी युक्त होऊन देवत्व प्राप्त होते, तशा प्रकारचे गुण स्वतःमध्ये असल्याचे चिंतन करणाऱ्याला; समापत्तीने दाबले गेलेले क्लेश साठ किंवा सत्तर वर्षे देखील डोके वर काढत नाहीत, असे चिंतन करणाऱ्याला; चैत्यदर्शन, बोधिदर्शन आणि महास्थविरांच्या दर्शनावेळी आदर न दाखवल्याने ज्यांचा रूक्षपणा स्पष्ट होतो, ज्यांच्या मनात बुद्धादींविषयी आदर व स्नेहाचा अभाव असल्याने जे गाढवाच्या पाठीवरील धुळीसारखे कोरडे आहेत, अशा रूक्ष व्यक्तींना टाळल्याने; बुद्धादींविषयी अत्यंत श्रद्धा असणाऱ्या, मृदू मनाच्या व स्निग्ध व्यक्तींची संगत केल्याने; त्रिरत्नांचे गुण प्रकट करणाऱ्या व प्रसन्नता देणाऱ्या सुत्तांचे चिंतन करणाऱ्याला; आणि उभे राहणे, बसणे इत्यादींमध्ये प्रीती उत्पन्न करण्यासाठी मन कललेले, झुकलेले व प्रवण ठेवल्याने देखील पीतिसंबोज्झंग उत्पन्न होतो. अशा प्रकारे उत्पन्न झालेल्या या पीतिसंबोज्झंगाची अर्हत् मार्गाने भावना-परिपूरी होते. සත්ත ධම්මා පස්සද්ධිසම්බොජ්ඣඞ්ගස්ස උප්පාදාය සංවත්තන්ති – පණීතභොජනසෙවනතා, උතුසුඛසෙවනතා, ඉරියාපථසුඛසෙවනතා, මජ්ඣත්තපයොගතා, සාරද්ධකායපුග්ගලපරිවජ්ජනතා, පස්සද්ධකාය-පුග්ගලසෙවනතා, තදධිමුත්තතාති. सात गोष्टी पस्सद्धिसंबोज्झंगाच्या उत्पत्तीला कारणीभूत ठरतात – उत्तम भोजनाचे सेवन करणे, सुखकारक ऋतूचे सेवन करणे, सुखकारक इरियापथाचे सेवन करणे, मध्यस्थ प्रयोग, अशांत शरीर असणाऱ्या व्यक्तींना टाळणे, शांत शरीर असणाऱ्या व्यक्तींची संगत करणे आणि त्याकडेच मन प्रवण ठेवणे. පණීතඤ්හි සිනිද්ධං භොජනං භුඤ්ජන්තස්සාපි, සීතුණ්හෙසු උතූසු ඨානාදීසු ච ඉරියාපථෙසු සප්පායං උතුඤ්ච ඉරියාපථඤ්ච සෙවන්තස්සාපි පස්සද්ධි උප්පජ්ජති. යො පන මහාපුරිසජාතිකො සබ්බඋතුඉරියාපථක්ඛමොව හොති, න තං සන්ධායෙතං වුත්තං. යස්ස සභාගවිසභාගතා අත්ථි, තස්සෙව විසභාගෙ උතුඉරියාපථෙ වජ්ජෙත්වා සභාගෙ සෙවන්තස්ස උප්පජ්ජති. මජ්ඣත්තපයොගො වුච්චති අත්තනො ච පරස්ස ච කම්මස්සකතපච්චවෙක්ඛණා. ඉමිනා මජ්ඣත්තපයොගෙන උප්පජ්ජති. යො ලෙඩ්ඩුදණ්ඩාදීහි පරං විහෙඨයමානොව විචරති, එවරූපං සාරද්ධකායපුග්ගලං පරිවජ්ජෙන්තස්සාපි, සංයතපාදපාණිං පස්සද්ධකායං පුග්ගලං සෙවන්තස්සාපි, ඨානනිසජ්ජාදීසු පස්සද්ධිඋප්පාදනත්ථාය නින්නපොණපබ්භාරචිත්තස්සාපි උප්පජ්ජති. එවං උප්පන්නස්ස පනස්ස අරහත්තමග්ගෙන භාවනාපාරිපූරී හොති. कारण, उत्तम व स्निग्ध अनुकूल भोजनाचे सेवन करणाऱ्याला, तसेच थंडी-उष्णतेच्या ऋतूंमध्ये आणि उभे राहणे इत्यादी इरियापथांमध्ये अनुकूल ऋतू व अनुकूल इरियापथाचे सेवन करणाऱ्याला पस्सद्धि उत्पन्न होते. परंतु, जो महापुरुष जन्माचा असून सर्व ऋतू व सर्व इरियापथ सहन करण्यास समर्थ असतो, त्याला उद्देशून हे बोलले गेलेले नाही. ज्याच्यासाठी अनुकूल-प्रतिकूलता असते, त्यानेच प्रतिकूल ऋतू व इरियापथ टाळून अनुकूल गोष्टींचे सेवन केले असता पस्सद्धि उत्पन्न होते; त्याला उद्देशूनच हे म्हटले आहे. स्वतःच्या आणि इतरांच्या 'कर्मस्वकता' (कर्म हेच स्वतःचे धन आहे या सिद्धांताचे) चिंतन करणे याला 'मध्यस्थ प्रयोग' म्हणतात. या मध्यस्थ प्रयोगाने पस्सद्धि उत्पन्न होते. जो दगड, काठी इत्यादींनी इतरांना त्रास देतच फिरतो, अशा अशांत शरीर असणाऱ्या व्यक्तीला टाळल्याने; हात-पाय संयमित असणाऱ्या, शांत शरीर असलेल्या व्यक्तीची संगत केल्याने; आणि उभे राहणे, बसणे इत्यादींमध्ये पस्सद्धि उत्पन्न करण्यासाठी मन कललेले, झुकलेले व प्रवण ठेवल्याने देखील पस्सद्धि उत्पन्न होते. अशा प्रकारे उत्पन्न झालेल्या या पस्सद्धिसंबोज्झंगाची अर्हत् मार्गाने भावना-परिपूरी होते. දස ධම්මා සමාධිසම්බොජ්ඣඞ්ගස්ස උප්පාදාය සංවත්තන්ති – වත්ථුවිසදකිරියතා, ඉන්ද්රියසමත්තපටිපාදනතා, නිමිත්තකුසලතා, සමයෙ චිත්තස්ස පග්ගණ්හනතා, සමයෙ චිත්තස්ස නිග්ගණ්හනතා, සමයෙ සම්පහංසනතා, සමයෙ අජ්ඣුපෙක්ඛනතා, අසමාහිතපුග්ගලපරිවජ්ජනතා, සමාහිතපුග්ගලසෙවනතා, තදධිමුත්තතාති. තත්ථ වත්ථුවිසදකිරියතා ච ඉන්ද්රියසමත්තපටිපාදනතා ච වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බා. दहा गोष्टी समाधिसंबोज्झंगाच्या उत्पत्तीला कारणीभूत ठरतात – वस्तूंची स्वच्छता राखणे, इंद्रियांचे संतुलन राखणे, निमित्तामध्ये कुशल असणे, योग्य वेळी मनाला प्रगतीपथावर आणणे, योग्य वेळी मनाचे दमन करणे, योग्य वेळी मनाला हर्षित करणे, योग्य वेळी मनाकडे तटस्थतेने पाहणे, असमाहित व्यक्तींना टाळणे, समाहित व्यक्तींची संगत करणे आणि त्याकडेच मन प्रवण ठेवणे. त्यामध्ये, वस्तूंची स्वच्छता राखणे आणि इंद्रियांचे संतुलन राखणे हे पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावे. නිමිත්තකුසලතා [Pg.200] නාම කසිණනිමිත්තස්ස උග්ගහණකුසලතා. සමයෙ චිත්තස්ස පග්ගණ්හනතාති යස්මිං සමයෙ අතිසිථිලවීරියතාදීහි ලීනං චිත්තං හොති, තස්මිං සමයෙ ධම්මවිචයවීරියපීතිසම්බොජ්ඣඞ්ගසමුට්ඨාපනෙන තස්ස පග්ගණ්හනං. සමයෙ චිත්තස්ස නිග්ගණ්හනතාති යස්මිං සමයෙ අච්චාරද්ධවීරියතාදීහි උද්ධතං චිත්තං හොති, තස්මිං සමයෙ පස්සද්ධිසමාධිඋපෙක්ඛාසම්බොජ්ඣඞ්ගසමුට්ඨාපනෙන තස්ස නිග්ගණ්හනං. සමයෙ සම්පහංසනතාති යස්මිං සමයෙ චිත්තං පඤ්ඤාපයොගමන්දතාය වා උපසමසුඛානං විගමෙන වා නිරස්සාදං හොති, තස්මිං සමයෙ අට්ඨසංවෙගවත්ථුපච්චවෙක්ඛණෙන සංවෙජෙති. අට්ඨ සංවෙගවත්ථූනි නාම ජාතිජරාබ්යාධිමරණානි චත්තාරි, අපායදුක්ඛං පඤ්චමං, අතීතෙ වට්ටමූලකං දුක්ඛං, අනාගතෙ වට්ටමූලකං දුක්ඛං, පච්චුප්පන්නෙ ආහාරපරියෙට්ඨිමූලකං දුක්ඛන්ති. රතනත්තයගුණානුස්සරණෙන ච පසාදං ජනෙති, අයං වුච්චති ‘‘සමයෙ සම්පහංසනතා’’ති. निमित्तकुशलता म्हणजे कसिण-निमित्ताचे ग्रहण करण्यात (शिकण्यात) कुशल असणे होय. 'योग्य वेळी चित्ताचा प्रग्रह (उत्साहित करणे)' म्हणजे ज्या वेळी अतिशय शिथिल वीर्य (प्रयत्न) इत्यादींमुळे चित्त आळशी किंवा संकुचित झालेले असते, त्या वेळी धम्मविचय-संबोज्झंग, वीर्य-संबोज्झंग आणि पीती-संबोज्झंग यांना चांगल्या प्रकारे जागृत करून त्या चित्ताला प्रग्रहित (उत्साहित) करणे होय. 'योग्य वेळी चित्ताचा निग्रह (नियंत्रण करणे)' म्हणजे ज्या वेळी अतिशय तीव्र वीर्य (अति-प्रयत्न) इत्यादींमुळे चित्त चंचल (उद्धत) झालेले असते, त्या वेळी पस्सद्धि-संबोज्झंग, समाधी-संबोज्झंग आणि उपेक्खा-संबोज्झंग यांना चांगल्या प्रकारे जागृत करून त्या चित्ताचा निग्रह करणे होय. 'योग्य वेळी चित्ताला हर्षित करणे' म्हणजे ज्या वेळी प्रज्ञेच्या प्रयोगाच्या मंदतेमुळे किंवा उपशम सुखाच्या अभावामुळे चित्त नीरस (सुख-सोमनस्यरहित) होते, त्या वेळी आठ संवेगवस्तूंच्या प्रत्यवेक्षणाने (चिंतनाने) संवेग उत्पन्न करणे होय. आठ संवेगवस्तू म्हणजे— १. जन्म (जाती), २. जरा (वृद्धत्व), ३. व्याधी (आजारपण), ४. मरण हे चार; पाचवे अपाय-दुःख; भूतकाळातील संसारमूलक दुःख; भविष्यकाळातील संसारमूलक दुःख; आणि वर्तमानकाळातील आहाराच्या शोधाशी संबंधित असणारे दुःख. तसेच त्रिरत्नांच्या गुणांच्या अनुस्मरणाने चित्तात प्रसन्नता (श्रद्धा) उत्पन्न करणे, याला 'योग्य वेळी चित्ताला हर्षित करणे' (समये संपहंसनता) असे म्हणतात. සමයෙ අජ්ඣුපෙක්ඛනතා නාම යස්මිං සමයෙ සම්මාපටිපත්තිං ආගම්ම අලීනං අනුද්ධතං අනිරස්සාදං ආරම්මණෙ සමප්පවත්තං සමථවීථිපටිපන්නං චිත්තං හොති, තදාස්ස පග්ගහනිග්ගහසම්පහංසනෙසු න බ්යාපාරං ආපජ්ජති සාරථි විය සමප්පවත්තෙසු අස්සෙසු. අයං වුච්චති ‘‘සමයෙ අජ්ඣුපෙක්ඛනතා’’ති. අසමාහිතපුග්ගලපරිවජ්ජනතා නාම උපචාරං වා අප්පනං වා අප්පත්තානං වික්ඛිත්තචිත්තානං පුග්ගලානං ආරකා පරිවජ්ජනං. සමාහිතපුග්ගලසෙවනතා නාම උපචාරෙන වා අප්පනාය වා සමාහිතචිත්තානං සෙවනා භජනා පයිරුපාසනා. තදධිමුත්තතා නාම ඨානනිසජ්ජාදීසු සමාධිඋප්පාදනත්ථමෙව නින්නපොණපබ්භාරචිත්තතා. එවඤ්හි පටිපජ්ජතො එස උප්පජ්ජති. එවං උප්පන්නස්ස පනස්ස අරහත්තමග්ගෙන භාවනාපාරිපූරී හොති. 'योग्य वेळी उपेक्षा (तटस्थता) करणे' म्हणजे ज्या वेळी सम्यक प्रतिपत्तीचा (योग्य साधनेचा) आश्रय घेऊन चित्त आळशी नसलेले, चंचल नसलेले, नीरस नसलेले, आलंबनात समतोलपणे प्रवृत्त असणारे आणि शमथाच्या मार्गावर चालणारे असते; त्या वेळी, जसा सारथी समतोलपणे धावणाऱ्या घोड्यांच्या बाबतीत कोणताही अतिरिक्त प्रयत्न करत नाही (तटस्थ राहतो), त्याप्रमाणे त्या चित्ताला प्रग्रहित करणे, निग्रहित करणे किंवा हर्षित करणे यांमध्ये कोणताही व्यापार (प्रयत्न) न करणे होय. याला 'योग्य वेळी उपेक्षा करणे' (समये अज्झुपेक्खनता) असे म्हणतात. 'असमाहित व्यक्तींचे वर्जन करणे' म्हणजे उपचार किंवा अप्पना समाधी प्राप्त न झालेल्या, विक्षिप्त चित्त असलेल्या व्यक्तींना दूरूनच टाळणे होय. 'समाहित व्यक्तींचे सेवन करणे' म्हणजे उपचार किंवा अप्पना समाधीने समाहित चित्त असलेल्या व्यक्तींची सेवा करणे, संगत करणे आणि त्यांच्याजवळ बसणे होय. 'त्या समाधीप्रती अधिमुक्त असणे' म्हणजे उभे राहणे, बसणे इत्यादी क्रियांच्या वेळी समाधी उत्पन्न करण्याच्या उद्देशानेच चित्ताची प्रवृत्ती तिकडेच झुकलेली, वळलेली आणि प्रवण असणे होय. अशा प्रकारे आचरण करणाऱ्या साधकाला हा (समाधी संबोज्झंग) उत्पन्न होतो. आणि अशा प्रकारे उत्पन्न झालेल्या या समाधी संबोज्झंगाची अर्हतमार्गाने भावनेची परिपूर्णता होते. පඤ්ච ධම්මා උපෙක්ඛාසම්බොජ්ඣඞ්ගස්ස උප්පාදාය සංවත්තන්ති – සත්තමජ්ඣත්තතා, සඞ්ඛාරමජ්ඣත්තතා, සත්තසඞ්ඛාරකෙලායනපුග්ගලපරිවජ්ජනතා, සත්තසඞ්ඛාරමජ්ඣත්තපුග්ගලසෙවනතා, තදධිමුත්තතාති. තත්ථ ද්වීහාකාරෙහි සත්තමජ්ඣත්තතං සමුට්ඨාපෙති – ‘‘ත්වං අත්තනොව කම්මෙන ආගන්ත්වා අත්තනොව කම්මෙන ගමිස්සසි, එසොපි අත්තනො කම්මෙන ආගන්ත්වා අත්තනොව කම්මෙන ගමිස්සති, ත්වං කං කෙලායසී’’ති එවං කම්මස්සකතපච්චවෙක්ඛණෙන ච – ‘‘පරමත්ථතො සත්තොයෙව නත්ථි, සො ත්වං කං කෙලායසී’’ති එවං නිස්සත්තපච්චවෙක්ඛණෙන ච. ද්වීහෙවාකාරෙහි සඞ්ඛාරමජ්ඣත්තතං සමුට්ඨාපෙති – ‘‘ඉදං [Pg.201] චීවරං අනුපුබ්බෙන වණ්ණවිකාරතඤ්චෙව ජිණ්ණභාවඤ්ච උපගන්ත්වා පාදපුඤ්ඡනචොළකං හුත්වා යට්ඨිකොටියා ඡඩ්ඩනීයං භවිස්සති, සචෙ පනස්ස සාමිකො භවෙය්ය, නායං එවං විනස්සිතුං දදෙය්යා’’ති එවං අස්සාමිකභාවපච්චවෙක්ඛණෙන ච, ‘‘අනද්ධනියං ඉදං තාවකාලික’’න්ති එවං තාවකාලිකභාවපච්චවෙක්ඛණෙන ච. යථා ච චීවරෙ, එවං පත්තාදීසුපි යොජනා කාතබ්බා. पाच धर्म उपेक्खा-संबोज्झंगाच्या उत्पत्तीसाठी कारणीभूत ठरतात— १. सत्त्वांच्या (प्राण्यांच्या) बाबतीत तटस्थता (सत्तमज्झत्तता), २. संस्कारांच्या (निर्जीव वस्तूंच्या) बाबतीत तटस्थता (संखारमज्झत्तता), ३. सत्त्व आणि संस्कार यांच्यावर अति-ममत्व ठेवणाऱ्या व्यक्तींचे वर्जन करणे, ४. सत्त्व आणि संस्कार यांच्या बाबतीत तटस्थ असणाऱ्या व्यक्तींचे सेवन करणे, आणि ५. त्या उपेक्खा-संबोज्झंगाप्रती अधिमुक्त असणे. त्यामध्ये, दोन प्रकारांनी सत्त्वांच्या बाबतीत तटस्थता उत्पन्न केली जाते— 'तू स्वतःच्याच कर्माने आला आहेस आणि स्वतःच्याच कर्माने जाशील; हा (दुसरा) देखील स्वतःच्या कर्माने आला आहे आणि स्वतःच्याच कर्माने जाईल; मग तू कोणावर ममत्व करत आहेस?' अशा प्रकारे कम्मस्सकता (कर्माचे स्वकीयत्व) प्रत्यवेक्षणाने; आणि 'परमार्थतः कोणताही सत्त्व (प्राणी) अस्तित्वातच नाही; असे असताना तू कोणावर ममत्व करत आहेस?' अशा प्रकारे निःसत्त्व (सत्त्वरहित) प्रत्यवेक्षणाने. दोन प्रकारांनी संस्कारांच्या बाबतीत तटस्थता उत्पन्न केली जाते— 'हे चीवर हळूहळू विवर्ण (रंगहीन) आणि जीर्ण होऊन, पाय पुसण्याचे फडके (पादपुंछनचोळक) बनून शेवटी काठीच्या टोकाने फेकून देण्यायोग्य होईल; जर याचा कोणी खरा मालक असता, तर त्याने याला अशा प्रकारे नष्ट होऊ दिले नसते,' अशा प्रकारे अस्वामिकत्व (मालक नसणे) प्रत्यवेक्षणाने; आणि 'हे चिरकाल टिकणारे नाही, हे तात्कालिक आहे,' अशा प्रकारे तात्कालिकतेच्या प्रत्यवेक्षणाने. ज्याप्रमाणे चीवराच्या बाबतीत योजना केली आहे, त्याचप्रमाणे पात्र (भिक्षापात्र) इत्यादींच्या बाबतीतही योजना करावी. සත්තසඞ්ඛාරකෙලායනපුග්ගලපරිවජ්ජනතාති එත්ථ යො පුග්ගලො ගිහි වා අත්තනො පුත්තධීතාදිකෙ, පබ්බජිතො වා අත්තනො අන්තෙවාසිකසමානුපජ්ඣායකාදිකෙ මමායති, සහත්ථාව නෙසං කෙසච්ඡෙදන-සූචිකම්ම-චීවරධොවන-රජන-පත්තපචනාදීනි කරොති, මුහුත්තම්පි අපස්සන්තො ‘‘අසුකො සාමණෙරො කුහිං, අසුකො දහරො කුහි’’න්ති භන්තමිගො විය ඉතො චිතො ච ආලොකෙති, අඤ්ඤෙන කෙසච්ඡෙදනාදීනං අත්ථාය ‘‘මුහුත්තං තාව අසුකං පෙසෙථා’’ති යාචියමානොපි ‘‘අම්හෙපි තං අත්තනො කම්මං න කාරෙම, තුම්හෙ නං ගහෙත්වා කිලමෙස්සථා’’ති න දෙති, අයං සත්තකෙලායනො නාම. යො පන චීවරපත්තථාලකකත්තරයට්ඨිආදීනි මමායති, අඤ්ඤස්ස හත්ථෙන පරාමසිතුම්පි න දෙති, තාවකාලිකං යාචිතොපි ‘‘මයම්පි ඉමං ධනායන්තා න පරිභුඤ්ජාම, තුම්හාකං කිං දස්සාමා’’ති වදති, අයං සඞ්ඛාරකෙලායනො නාම. යො පන තෙසු ද්වීසුපි වත්ථූසු මජ්ඣත්තො උදාසිනො, අයං සත්තසඞ්ඛාරමජ්ඣත්තො නාම. ඉති අයං උපෙක්ඛාසම්බොජ්ඣඞ්ගො එවරූපං සත්තසඞ්ඛාරකෙලායනපුග්ගලං ආරකා පරිවජ්ජෙන්තස්සාපි, සත්තසඞ්ඛාරමජ්ඣත්තපුග්ගලං සෙවන්තස්සාපි, ඨානනිසජ්ජාදීසු තදුප්පාදනත්ථං නින්නපොණපබ්භාරචිත්තස්සාපි උප්පජ්ජති. එවං උප්පන්නස්ස පනස්ස අරහත්තමග්ගෙන භාවනාපාරිපූරී හොති. 'सत्त्व आणि संस्कार यांच्यावर अति-ममत्व ठेवणाऱ्या व्यक्तींचे वर्जन करणे' या संदर्भात— जी व्यक्ती गृहस्थ असो आणि आपल्या मुला-मुलींवर इत्यादींवर ममत्व ठेवत असो, किंवा प्रव्रजित (भिक्खू) असो आणि आपल्या अंतेवासी (शिष्य), समान उपाध्याय असलेल्या सतीर्थ्यांवर इत्यादींवर ममत्व ठेवत असो; आणि स्वतःच्या हातानेच त्यांच्यासाठी केस कापणे, शिवणकाम करणे, चीवर धुणे, रंगवणे, पात्र भाजणे इत्यादी कामे करत असो; क्षणभरही त्यांना न पाहिल्यास 'अमुक सामणेर कुठे आहे? अमुक तरुण भिक्खू कुठे आहे?' असे म्हणत घाबरलेल्या हरणाप्रमाणे इकडे तिकडे पाहत असो; आणि दुसऱ्या कोणाद्वारे केस कापण्यासाठी इत्यादी कामांसाठी 'क्षणभर अमुक व्यक्तीला पाठवा' अशी विनंती केली असता, 'आम्ही स्वतः देखील त्याच्याकडून आमचे काम करून घेत नाही, तुम्ही त्याला नेऊन त्रास द्याल (थकवाल)' असे म्हणून त्याला पाठवत नसो; अशा व्यक्तीला 'सत्त्वांवर अति-ममत्व ठेवणारी' (सत्तकेळायन) असे म्हणतात. आणि जो चीवर, पात्र, थाळी, कात्री, काठी इत्यादी वस्तूंवर ममत्व ठेवतो, दुसऱ्याला हाताने स्पर्श देखील करू देत नाही, आणि तात्पुरते मागितले तरी 'आम्ही स्वतः देखील याला मौल्यवान संपत्ती मानून वापरत नाही, मग तुम्हाला कसे काय देऊ?' असे म्हणतो, त्याला 'संस्कारांवर (वस्तूंवर) अति-ममत्व ठेवणारी' (संखारकेळायन) असे म्हणतात. परंतु जो या दोन्ही गोष्टींच्या बाबतीत तटस्थ आणि उदासीन असतो, त्याला 'सत्त्व आणि संस्कार यांच्या बाबतीत तटस्थ' (सत्तसंखारमज्झत्त) असे म्हणतात. अशा प्रकारे, हा उपेक्खा-संबोज्झंग अशा प्रकारच्या सत्त्व आणि संस्कारांवर अति-ममत्व ठेवणाऱ्या व्यक्तीला दूरूनच टाळणाऱ्या साधकाला, सत्त्व आणि संस्कारांच्या बाबतीत तटस्थ असणाऱ्या व्यक्तीचे सेवन करणाऱ्या साधकाला, आणि उभे राहणे, बसणे इत्यादी क्रियांच्या वेळी तो उत्पन्न करण्यासाठी तिकडेच झुकलेले, वळलेले आणि प्रवण चित्त असणाऱ्या साधकाला उत्पन्न होतो. आणि अशा प्रकारे उत्पन्न झालेल्या या उपेक्खा-संबोज्झंगाची अर्हतमार्गाने भावनेची परिपूर्णता होते. අසුභනිමිත්තන්ති උද්ධුමාතකාදිභෙදා දස අසුභාරම්මණා ධම්මා. යොනිසොමනසිකාරබහුලීකාරොති එත්ථ පන යොනිසොමනසිකාරො නාම උපායමනසිකාරො, පථමනසිකාරො, උප්පාදකමනසිකාරො. අපිච ඡ ධම්මා කාමච්ඡන්දස්ස පහානාය සංවත්තන්ති – අසුභනිමිත්තස්ස උග්ගහො, අසුභභාවනානුයොගො, ඉන්ද්රියෙසු ගුත්තද්වාරතා, භොජනෙ මත්තඤ්ඤුතා, කල්යාණමිත්තතා, සප්පායකථාති. 'अशुभनिमित्त' म्हणजे फुगलेले प्रेत (उद्धुमातक) इत्यादी भेद असलेले दहा अशुभ आलंबन असणारे विषय होत. 'योनिसो मनसिकार आणि बहुलीकार' या संदर्भात, 'योनिसो मनसिकार' म्हणजे योग्य उपायाने मनन करणे, योग्य मार्गाने मनन करणे आणि (कुशल धर्मांना) उत्पन्न करणारे मनन होय. शिवाय, सहा धर्म कामच्छंदाच्या प्रहाणासाठी (नाशासाठी) कारणीभूत ठरतात— १. अशुभनिमित्ताचे ग्रहण (शिकणे), २. अशुभ भावनेचा अभ्यास (साधना), ३. इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवणे (इंद्रिय संवर), ४. भोजनात मात्रा जाणणे (मित आहार), ५. कल्याणमित्राची संगत, आणि ६. अनुकूल (अशुभाशी संबंधित) चर्चा करणे. දසවිධඤ්හි අසුභනිමිත්තං උග්ගණ්හන්තස්සාපි කාමච්ඡන්දො පහීයති, භාවෙන්තස්සාපි, ඉන්ද්රියෙසු ගුත්තද්වාරස්සාපි, චතුන්නං පඤ්චන්නං ආලොපානං ඔකාසෙ [Pg.202] සති උදකං පිවිත්වා යාපනසීලතාය භොජනෙ මත්තඤ්ඤුනොපි. තෙනෙතං වුත්තං – दहा प्रकारच्या अशुभनिमित्ताचे ग्रहण करणाऱ्या साधकाचा देखील कामच्छंद नष्ट होतो; त्याची साधना करणाऱ्याचा देखील; इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवणाऱ्याचा देखील; आणि चार किंवा पाच घास खाण्याची भूक棲 शिल्लक असतानाच जेवण थांबवून पाणी पिऊन शरीरयात्रा चालवण्याचा स्वभाव असल्यामुळे भोजनात मात्रा जाणणाऱ्याचा देखील कामच्छंद नष्ट होतो. म्हणूनच असे म्हटले आहे— ‘‘චත්තාරො පඤ්ච ආලොපෙ, අභුත්වා උදකං පිවෙ; අලං ඵාසුවිහාරාය, පහිතත්තස්ස භික්ඛුනො’’ති. (ථෙරගා. 983); 'चार किंवा पाच घास कमी खाऊन पाणी प्यावे; दृढनिश्चयी (निर्वाणाकडे चित्त लावलेल्या) भिक्खूच्या सुखपूर्वक विहरण्यासाठी हे पुरेसे आहे.' (थेरगाथा ९८३) අසුභකම්මිකතිස්සත්ථෙරසදිසෙ අසුභභාවනාරතෙ කල්යාණමිත්තෙ සෙවන්තස්සාපි කාමච්ඡන්දො පහීයති, ඨානනිසජ්ජාදීසු දසඅසුභනිමිත්තාය-සප්පායකථායපි පහීයති. තෙන වුත්තං ‘‘ඡ ධම්මා කාමච්ඡන්දස්ස පහානාය සංවත්තන්තී’’ති. ඉමෙහි පන ඡහි ධම්මෙහි පහීනස්ස කාමච්ඡන්දස්ස අරහත්තමග්ගෙන ආයතිං අනුප්පාදො හොති. अशुभकर्मिक तिस्स थेरांसारख्या अशुभ भावनेत रममाण असणाऱ्या कल्याणमित्रांची संगत केल्याने देखील कामच्छंद नष्ट होतो. उभे राहणे, बसणे इत्यादी वेळी दहा अशुभ निमित्तांशी संबंधित अनुकूल (सप्पाय) चर्चा केल्याने देखील तो नष्ट होतो. म्हणूनच म्हटले आहे - "सहा धर्म कामच्छंदाच्या प्रहाणासाठी कारणीभूत ठरतात." या सहा धर्मांच्या द्वारे प्रहीण (नष्ट) झालेल्या कामच्छंदाचा अर्हतमार्गाने भविष्यात पुन्हा अनुत्पाद होतो. මෙත්තා චෙතොවිමුත්තීති එත්ථ මෙත්තාති වුත්තෙ අප්පනාපි උපචාරොපි වට්ටති, චෙතොවිමුත්තීති අප්පනායෙව. යොනිසොමනසිකාරො වුත්තලක්ඛණොව. අපිච ඡ ධම්මා බ්යාපාදස්ස පහානාය සංවත්තන්ති – මෙත්තානිමිත්තස්ස උග්ගහො, මෙත්තාභාවනානුයොගො, කම්මස්සකතාපච්චවෙක්ඛණතා, පටිසඞ්ඛානබහුලතා, කල්යාණමිත්තතා, සප්පායකථාති. 'मेत्ता चेतोविमुत्ती' (मैत्री चेतोविमुक्ती) यामध्ये 'मेत्ता' (मैत्री) असे म्हटले असता अर्पणा आणि उपचार दोन्ही योग्य ठरतात. 'चेतोविमुत्ती' असे म्हटले असता केवळ अर्पणाच योग्य ठरते. योनिसोमनसिकार हा पूर्वी सांगितलेल्या लक्षणांप्रमाणेच आहे. आणखीही, सहा धर्म व्यापादाच्या (द्वेषाच्या) प्रहाणासाठी कारणीभूत ठरतात - मैत्रीच्या निमित्ताचे ग्रहण करणे, मैत्री भावनेचा अभ्यास करणे, कर्मस्वकीयतेचे प्रत्यवेक्षण करणे, वारंवार विचार करणे (प्रतिसंख्यान बहुलता), कल्याणमित्रता आणि अनुकूल चर्चा. ඔදිස්සකඅනොදිස්සකදිසාඵරණානඤ්හි අඤ්ඤතරවසෙන මෙත්තං උග්ගණ්හන්තස්සාපි බ්යාපාදො පහීයති, තථා ඔධිසොඅනොධිසොදිසාඵරණවසෙන මෙත්තං භාවෙන්තස්සාපි. ‘‘ත්වං එතස්ස කුද්ධො කිං කරිස්සසි? කිමස්ස සීලාදීනි නාසෙතුං සක්ඛිස්සසි? නනු ත්වං අත්තනො කම්මෙන ආගන්ත්වා අත්තනො කම්මෙනෙව ගමිස්සසි? පරස්ස කුජ්ඣනං නාම වීතච්චිකඞ්ගාරතත්තඅයසලාකගූථාදීනි ගහෙත්වා පරං පහරිතුකාමතාසදිසං හොති. එසොපි තව කුද්ධො කිං කරිස්සති? කිං තෙ සීලාදීනි විනාසෙතුං සක්ඛිස්සති? එස අත්තනො කම්මෙන ආගන්ත්වා අත්තනො කම්මෙනෙව ගමිස්සති? අප්පටිච්ඡිතපහෙණකං විය පටිවාතං ඛිත්තරජොමුට්ඨි විය ච එතස්සෙවෙස කොධො මත්ථකෙ පතිස්සතී’’ති එවං අත්තනො ච පරස්ස ච කම්මස්සකතං පච්චවෙක්ඛතොපි, උභයකම්මස්සකතං පච්චවෙක්ඛිත්වා පටිසඞ්ඛානෙ ඨිතස්සාපි, අස්සගුත්තත්ථෙරසදිසෙ මෙත්තාභාවනාරතෙ කල්යාණමිත්තෙ සෙවන්තස්සාපි බ්යාපාදො පහීයති, ඨානනිසජ්ජාදීසු මෙත්තානිස්සිතසප්පායකථායපි පහීයති. තෙන වුත්තං ‘‘ඡ ධම්මා බ්යාපාදස්ස පහානාය සංවත්තන්තී’’ති[Pg.203]. ඉමෙහි පන ඡහි ධම්මෙහි පහීනස්ස බ්යාපාදස්ස අනාගාමිමග්ගෙන ආයතිං අනුප්පාදො හොති. ओदिस्सक (विशिष्ट) आणि अनोदिस्सक (अमर्यादित) किंवा दिशांच्या पसरवण्याच्या कोणत्याही एका पद्धतीने मैत्रीचे ग्रहण करणाऱ्याचा देखील व्यापाद नष्ट होतो, तसेच ओधिस, अनोधिस आणि दिशांच्या पसरवण्याच्या पद्धतीने मैत्रीची भावना करणाऱ्याचा देखील. 'तू याच्यावर रागावला आहेस, तर काय करणार? तू त्याचे शील इत्यादी नष्ट करू शकशील का? तू स्वतःच्या कर्माने आला आहेस आणि स्वतःच्या कर्मानेच जाणार नाहीस का? दुसऱ्यावर रागावणे म्हणजे निखारे नसलेला जळणारा कोळसा, तापलेली लोखंडी सळई किंवा विष्ठा इत्यादी हातात घेऊन दुसऱ्याला मारण्याची इच्छा करण्यासारखे आहे. हा देखील तुझ्यावर रागावला तर काय करेल? तो तुझे शील इत्यादी नष्ट करू शकेल का? हा स्वतःच्या कर्माने आला आहे आणि स्वतःच्या कर्मानेच जाईल. स्वीकार न केलेल्या भेटीप्रमाणे किंवा वाऱ्याच्या विरुद्ध दिशेने फेकलेल्या धुळीच्या मुठीप्रमाणे, हा राग त्याच्याच डोक्यावर पडेल' - अशा प्रकारे स्वतःच्या आणि दुसऱ्याच्या कर्मस्वकीयतेचे प्रत्यवेक्षण करणाऱ्याचे, आणि दोन्ही बाजूंच्या कर्मस्वकीयतेचे प्रत्यवेक्षण करून प्रतिसंख्यानात स्थिर असणाऱ्याचे देखील, अस्सगुत्त थेरांसारख्या मैत्री भावनेत रममाण असणाऱ्या कल्याणमित्रांची संगत करणाऱ्याचा देखील व्यापाद नष्ट होतो, तसेच उभे राहणे, बसणे इत्यादी वेळी मैत्रीशी संबंधित अनुकूल चर्चेने देखील तो नष्ट होतो. म्हणूनच म्हटले आहे - 'सहा धर्म व्यापादाच्या प्रहाणासाठी कारणीभूत ठरतात.' या सहा धर्मांच्या द्वारे प्रहीण झालेल्या व्यापादाचा अनागामी मार्गाने भविष्यात पुन्हा अनुत्पाद होतो. අත්ථි භික්ඛවෙ අරතීතිආදි වුත්තත්ථමෙව. අපි ච ඡ ධම්මා ථිනමිද්ධස්ස පහානාය සංවත්තන්ති – අතිභොජනෙ නිමිත්තග්ගාහො, ඉරියාපථසම්පරිවත්තනතා, ආලොකසඤ්ඤාමනසිකාරො, අබ්භොකාසවාසො, කල්යාණමිත්තතා, සප්පායකථාති. 'अत्थि भिक्खवे अरती' (भिक्खूंनो, अरती आहे) इत्यादींचे अर्थ पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच आहेत. आणखीही, सहा धर्म थिनमिद्धाच्या (आळस आणि तंद्रेच्या) प्रहाणासाठी कारणीभूत ठरतात - अतिभोजनामध्ये निमित्त ग्रहण करणे, इरियापथात (शारीरिक स्थितीत) बदल करणे, आलोकसंज्ञेचे मनन करणे, उघड्या जागेत राहणे (अब्भोकासवासो), कल्याणमित्रता आणि अनुकूल चर्चा. ආහරහත්ථකං, භුත්තවමිතකං, තත්රවට්ටකං, අලංසාටකං, කාකමාසකභොජනං භුඤ්ජිත්වා රත්තිට්ඨානදිවාට්ඨානෙ නිසින්නස්ස හි සමණධම්මං කරොතො ථිනමිද්ධං මහාහත්ථී විය ඔත්ථරන්තං ආගච්ඡති, චතුපඤ්චආලොපඔකාසං පන ඨපෙත්වා පානීයං පිවිත්වා යාපනසීලස්ස භික්ඛුනො තං න හොතීති එවං අතිභොජනෙ නිමිත්තං ගණ්හන්තස්සපි ථිනමිද්ධං පහීයති. යස්මිං ඉරියාපථෙ ථිනමිද්ධං ඔක්කමති, තතො අඤ්ඤං පරිවත්තෙන්තස්සාපි, රත්තිං චන්දාලොකදීපාලොකඋක්කාලොකෙ දිවා සූරියාලොකං මනසිකරොන්තස්සාපි, අබ්භොකාසෙ වසන්තස්සාපි, මහාකස්සපත්ථෙරසදිසෙ පහීනථිනමිද්ධෙ කල්යාණමිත්තෙ සෙවන්තස්සාපි ථිනමිද්ධං පහීයති, ඨානනිසජ්ජාදීසු ධුතඞ්ගනිස්සිතසප්පායකථායපි පහීයති. තෙන වුත්තං ‘‘ඡ ධම්මා ථිනමිද්ධස්ස පහානාය සංවත්තන්තී’’ති. ඉමෙහි පන ඡහි ධම්මෙහි පහීනස්ස ථිනමිද්ධස්ස අරහත්තමග්ගෙන ආයතිං අනුප්පාදො හොති. आहरहत्थक (हात धरून उठवावे लागेल इतके खाणे), भुत्तवमितक (उलटी होईपर्यंत खाणे), तत्रवट्टक (खाऊन तिथेच लोळणे), अलंसाटक (वस्त्र सांभाळता येणार नाही इतके खाणे), काकमासक भोजन (कावळ्याला तोंड घालता येईल इतके तोंड भरून खाणे) असे अतिभोजन करून रात्रीच्या किंवा दिवसाच्या ध्यानस्थानी बसून श्रमणधर्म करणाऱ्याला थिनमिद्ध (आळस व तंद्रा) एखाद्या मोठ्या हत्तीप्रमाणे चिरडत येते. परंतु, चार-पाच घास कमी खाऊन, पाणी पिऊन जीवन जगण्याची सवय असणाऱ्या भिक्खूला ते होत नाही. अशा प्रकारे अतिभोजनामध्ये निमित्त ग्रहण करणाऱ्याचा देखील थिनमिद्ध नष्ट होतो. ज्या इरियापथात थिनमिद्ध येते, त्यातून दुसऱ्या इरियापथात बदल करणाऱ्याचा देखील, रात्री चंद्रप्रकाश, दिव्याचा प्रकाश किंवा मशालीचा प्रकाश आणि दिवसा सूर्यप्रकाशाचे मनन करणाऱ्याचा देखील, उघड्या जागेत राहणाऱ्याचा देखील, महाकस्सप थेरांसारख्या थिनमिद्ध नष्ट केलेल्या कल्याणमित्रांची संगत करणाऱ्याचा देखील थिनमिद्ध नष्ट होतो, तसेच उभे राहणे, बसणे इत्यादी वेळी धुतंगाशी संबंधित अनुकूल चर्चेने देखील तो नष्ट होतो. म्हणूनच म्हटले आहे - 'सहा धर्म थिनमिद्धाच्या प्रहाणासाठी कारणीभूत ठरतात.' या सहा धर्मांच्या द्वारे प्रहीण झालेल्या थिनमिद्धाचा अर्हतमार्गाने भविष्यात पुन्हा अनुत्पाद होतो. අත්ථි භික්ඛවෙ චෙතසො වූපසමොතිආදීනි වුත්තත්ථානෙව. අපිච ඡ ධම්මා උද්ධච්චකුක්කුච්චස්ස පහානාය සංවත්තන්ති – බහුස්සුතතා, පරිපුච්ඡකතා, විනයෙ පකතඤ්ඤුතා, වුද්ධසෙවිතතා, කල්යාණමිත්තතා, සප්පායකථාති. 'अत्थि भिक्खवे चेतसो वूपसमो' (भिक्खूंनो, चित्ताचा उपशम आहे) इत्यादींचे अर्थ पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच आहेत. आणखीही, सहा धर्म उद्धच्च-कुक्कुच्चाच्या (उद्धतपणा आणि पश्चात्तापाच्या) प्रहाणासाठी कारणीभूत ठरतात - बहुश्रुतता, परिपृच्छा, विनयामध्ये निपुणता, वृद्धांची सेवा करणे, कल्याणमित्रता आणि अनुकूल चर्चा. බාහුසච්චෙනපි හි එකං වා ද්වෙ වා තයො වා චත්තාරො වා පඤ්ච වා නිකායෙ පාළිවසෙන ච අත්ථවසෙන ච උග්ගණ්හන්තස්සාපි උද්ධච්චකුක්කුච්චං පහීයති, කප්පියාකප්පියපරිපුච්ඡාබහුලස්සාපි, විනයපඤ්ඤත්තියං චිණ්ණවසීභාවතාය පකතඤ්ඤුනොපි, වුද්ධෙ මහල්ලකත්ථෙරෙ උපසඞ්කමන්තස්සාපි, උපාලිත්ථෙරසදිසෙ විනයධරෙ කල්යාණමිත්තෙ සෙවන්තස්සාපි, උද්ධච්චකුක්කුච්චං පහීයති, ඨානනිසජ්ජාදීසු කප්පියාකප්පියනිස්සිතසප්පායකථායපි පහීයති. තෙන වුත්තං ‘‘ඡ ධම්මා උද්ධච්චකුක්කුච්චස්ස පහානාය සංවත්තන්තී’’ති. ඉමෙහි [Pg.204] පන ඡහි ධම්මෙහි පහීනෙ උද්ධච්චකුක්කුච්චෙ උද්ධච්චස්ස අරහත්තමග්ගෙන, කුක්කුච්චස්ස අනාගාමිමග්ගෙන ආයතිං අනුප්පාදො හොතීති. बहुश्रुततेने देखील, एक, दोन, तीन, चार किंवा पाच निकायांचे पाळी आणि अर्थाच्या दृष्टीने अध्ययन करणाऱ्याचा देखील उद्धच्च-कुक्कुच्च नष्ट होतो, कप्पिय (योग्य) आणि अकप्पिय (अयोग्य) याविषयी वारंवार विचारणाऱ्याचा देखील, विनय नियमांमध्ये सराव करून वशित्व मिळवलेल्या निपुण व्यक्तीचा देखील, वृद्ध आणि ज्येष्ठ थेरांकडे जाणाऱ्याचा देखील, उपाली थेरांसारख्या विनयधर कल्याणमित्रांची संगत करणाऱ्याचा देखील उद्धच्च-कुक्कुच्च नष्ट होतो, तसेच उभे राहणे, बसणे इत्यादी वेळी कप्पिय-अकप्पिय यावर आधारित अनुकूल चर्चेने देखील तो नष्ट होतो. म्हणूनच म्हटले आहे - 'सहा धर्म उद्धच्च-कुक्कुच्चाच्या प्रहाणासाठी कारणीभूत ठरतात.' या सहा धर्मांच्या द्वारे प्रहीण झालेल्या उद्धच्च-कुक्कुच्चापैकी, उद्धच्चाचा अर्हतमार्गाने आणि कुक्कुच्चाचा अनागामी मार्गाने भविष्यात पुन्हा अनुत्पाद होतो, असे समजावे. කුසලාකුසලා ධම්මාතිආදීනිපි වුත්තත්ථානෙව. අපිච ඡ ධම්මා විචිකිච්ඡාය පහානාය සංවත්තන්ති – බහුස්සුතතා, පරිපුච්ඡකතා, විනයෙ පකතඤ්ඤුතා, අධිමොක්ඛබහුලතා, කල්යාණමිත්තතා, සප්පායකථාති. 'कुसलाकुसला धम्मा' (कुशल आणि अकुशल धर्म) इत्यादींचे अर्थ देखील पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच आहेत. आणखीही, सहा धर्म विचिकित्सेच्या (संशयाच्या) प्रहाणासाठी कारणीभूत ठरतात - बहुश्रुतता, परिपृच्छा, विनयामध्ये निपुणता, अधिमोक्षबहुलता (दृढ श्रद्धा असणे), कल्याणमित्रता आणि अनुकूल चर्चा. බාහුසච්චෙනපි හි එකං වා…පෙ… පඤ්ච වා නිකායෙ පාළිවසෙන ච අත්ථවසෙන ච උග්ගණ්හන්තස්සාපි විචිකිච්ඡා පහීයති, තීණි රතනානි ආරබ්භ පරිපුච්ඡාබහුලස්සාපි, විනයෙ චිණ්ණවසීභාවස්සාපි, තීසු රතනෙසු ඔකප්පනියසද්ධාසඞ්ඛාතඅධිමොක්ඛබහුලස්සාපි, සද්ධාධිමුත්තෙ වක්කලිත්ථෙරසදිසෙ කල්යාණමිත්තෙ සෙවන්තස්සාපි විචිකිච්ඡා පහීයති, ඨානනිසජ්ජාදීසු තිණ්ණං රතනානං ගුණනිස්සිතසප්පායකථායපි පහීයති. තෙන වුත්තං ‘‘ඡ ධම්මා විචිකිච්ඡාය පහානාය සංවත්තන්තී’’ති. ඉමෙහි පන ඡහි ධම්මෙහි පහීනාය විචිකිච්ඡාය සොතාපත්තිමග්ගෙන ආයතිං අනුප්පාදො හොති. ඉති භගවා ඉමස්මිං සුත්තෙ දෙසනං තීහි භවෙහි නිවත්තෙත්වා අරහත්තෙන කූටං ගණ්හි. දෙසනාපරියොසානෙ පඤ්චසතා භික්ඛූ අරහත්තං පාපුණිංසු. बहुश्रुततेने देखील, एक... पे... पाच निकायांचे पाळी आणि अर्थाच्या दृष्टीने अध्ययन करणाऱ्याची देखील विचिकित्सा नष्ट होते, त्रिरत्नांविषयी वारंवार प्रश्न विचारणाऱ्याची देखील, विनयामध्ये सराव करून वशित्व मिळवलेल्याची देखील, त्रिरत्नांवर दृढ श्रद्धा असणाऱ्या अधिमोक्षबहुलाची देखील, श्रद्धाविमुक्त वक्कलि थेरांसारख्या कल्याणमित्रांची संगत करणाऱ्याची देखील विचिकित्सा नष्ट होते, तसेच उभे राहणे, बसणे इत्यादी वेळी त्रिरत्नांच्या गुणांवर आधारित अनुकूल चर्चेने देखील ती नष्ट होते. म्हणूनच म्हटले आहे - 'सहा धर्म विचिकित्सेच्या प्रहाणासाठी कारणीभूत ठरतात.' या सहा धर्मांच्या द्वारे प्रहीण झालेल्या विचिकित्सेचा स्रोतापत्ती मार्गाने भविष्यात पुन्हा अनुत्पाद होतो. अशा प्रकारे भगवंतांनी या सुत्तात तीन भवांपासून परावृत्त करून अर्हत्त्वाने शिखर गाठले. देशनेच्या शेवटी पाचशे भिक्खूंनी अर्हत्त्व प्राप्त केले. 2. පරියායසුත්තවණ්ණනා २. पर्यायसुत्तवण्णना (पर्याय सुत्त वर्णन समाप्त). 233. දුතියෙ සම්බහුලාති විනයපරියායෙන තයො ජනා සම්බහුලාති වුච්චන්ති, තතො පරං සඞ්ඝො. සුත්තන්තපරියායෙන තයො තයො එව, තතො උද්ධං සම්බහුලා. ඉධ සුත්තන්තපරියායෙන සම්බහුලාති වෙදිතබ්බා. පිණ්ඩාය පවිසිංසූති පිණ්ඩාය පවිට්ඨා. තෙ පන න තාව පවිට්ඨා, ‘‘පවිසිස්සාමා’’ති නික්ඛන්තත්තා පන පවිසිංසූති වුත්තා. යථා කිං? යථා ‘‘ගාමං ගමිස්සාමී’’ති නික්ඛන්තපුරිසො තං ගාමං අපත්තොපි ‘‘කහං ඉත්ථන්නාමො’’ති වුත්තෙ ‘‘ගාමං ගතො’’ති වුච්චති, එවං. පරිබ්බාජකානං ආරාමොති ජෙතවනස්ස අවිදූරෙ අඤ්ඤතිත්ථියානං පරිබ්බාජකානං ආරාමො අත්ථි, තං සන්ධායෙතං වුත්තං. සමණො ආවුසොති ආවුසො තුම්හාකං සත්ථා සමණො ගොතමො. २३३. दुसऱ्या सुत्तात, 'सम्बहुला' (अनेक भिक्षू) या शब्दाचा अर्थ विनय नियमांनुसार तीन व्यक्तींना 'सम्बहुला' म्हटले जाते, आणि त्याहून अधिक असल्यास 'संघ' म्हटले जाते. सुत्तंत नियमांनुसार तीन व्यक्तींना 'तीन'च म्हटले जाते, आणि त्याहून अधिक असल्यास 'सम्बहुला' म्हटले जाते. येथे सुत्तंत नियमांनुसार 'सम्बहुला' असा अर्थ समजावा. 'पिंडाय पवििसंसु' म्हणजे भिक्षेसाठी प्रवेश केला. परंतु त्यांनी अद्याप प्रवेश केला नव्हता, तर 'आम्ही प्रवेश करू' या उद्देशाने ते बाहेर पडले असल्यामुळे 'प्रवेश केला' असे म्हटले आहे. ते कशाप्रमाणे? जसे 'मी गावात जाईन' असे म्हणून निघालेला मनुष्य त्या गावात पोहोचला नसला तरी, 'अमुक मनुष्य कुठे गेला?' असे विचारले असता 'गावात गेला' असे म्हटले जाते, त्याप्रमाणेच हे आहे. 'परिब्बाजकानं आरामो' म्हणजे जेतवनाच्या जवळच इतर पंथांच्या परिव्राजकांचा आराम (आश्रम) होता, त्याला उद्देशून हे म्हटले आहे. 'समणो आवुसो' म्हणजे 'हे आयुष्यमान, तुमचे शास्ता श्रमण गौतम.' මයම්පි ඛො ආවුසො සාවකානං එවං ධම්මං දෙසෙමාති තිත්ථියානං සමයෙ ‘‘පඤ්ච නීවරණා පහාතබ්බා, සත්ත බොජ්ඣඞ්ගා භාවෙතබ්බා’’ති එතං නත්ථි[Pg.205]. තෙ පන ආරාමං ගන්ත්වා පරිසපරියන්තෙ ඨත්වා අඤ්ඤං ඔලොකෙන්තො විය අඤ්ඤවිහිතකා විය හුත්වා භගවතො ධම්මදෙසනං සුණන්ති. තතො ‘‘සමණො ගොතමො ‘ඉදං පජහථ ඉදං භාවෙථා’ති වදතී’’ති සල්ලක්ඛෙත්වා අත්තනො ආරාමං ගන්ත්වා ආරාමමජ්ඣෙ ආසනං පඤ්ඤාපෙත්වා උපට්ඨායකඋපට්ඨායිකාහි පරිවුතා සීසං උක්ඛිපිත්වා කායං උන්නාමෙත්වා අත්තනො සයම්භූඤාණෙන පටිවිද්ධාකාරං දස්සෙන්තා – ‘‘පඤ්ච නීවරණා නාම පහාතබ්බා, සත්ත බොජ්ඣඞ්ගා නාම භාවෙතබ්බා’’ති කථෙන්ති. 'हे आयुष्यमान, आम्हीही आमच्या श्रावकांना असाच धम्म उपदेशितो' या वाक्यात—तित्थियांच्या (इतर पंथीयांच्या) सिद्धांतात 'पाच नीवरण नष्ट केले पाहिजेत, सात बोज्झंग विकसित केले पाहिजेत' असे काहीही नाही. परंतु ते आरामात जाऊन, परिषदेच्या कडेला उभे राहून, जणू काही दुसरीकडे पाहत असल्यासारखे किंवा इतर कामात व्यस्त असल्यासारखे भासवून भगवंतांचा धम्मोपदेश ऐकतात. त्यानंतर 'श्रमण गौतम हे त्यागण्यास आणि हे विकसित करण्यास सांगतात' हे लक्षात घेऊन, ते आपल्या आरामात परत जातात. तिथे आरामाच्या मध्यभागी आसन मांडून, उपासक-उपासिकांनी वेढलेले असताना, आपले डोके वर करून, शरीर ताठ करून, जणू काही स्वतःच्या स्वयंभू ज्ञानानेच हे सत्य जाणले आहे असे दाखवत—'पाच नीवरण नष्ट केले पाहिजेत, सात बोज्झंग विकसित केले पाहिजेत' असा उपदेश करतात. ඉධ නො ආවුසොති එත්ථ ඉධාති ඉමස්මිං පඤ්ඤාපනෙ. කො විසෙසොති කිං අධිකං? කො අධිප්පයාසොති කො අධිකප්පයොගො? කිං නානාකරණන්ති කිං නානත්තං? ධම්මදෙසනාය වා ධම්මදෙසනන්ති යදිදං සමණස්ස වා ගොතමස්ස ධම්මදෙසනාය සද්ධිං අම්හාකං ධම්මදෙසනං, අම්හාකං වා ධම්මදෙසනාය සද්ධිං සමණස්ස ගොතමස්ස ධම්මදෙසනං ආරබ්භ නානාකරණං වුච්චෙය්ය, තං කින්නාමාති වදන්ති. දුතියපදෙපි එසෙව නයො. 'इध नो आवुसो' (येथे आमच्यात, हे आयुष्यमान) या वाक्यात—'इध' म्हणजे या प्रज्ञापनात (शिकवणीत). 'को विसेसो' म्हणजे काय अधिक किंवा विशेष आहे? 'को अधिप्यासो' म्हणजे काय अधिक प्रयत्न किंवा उद्देश आहे? 'किं नानाकरणं' म्हणजे काय फरक किंवा भिन्नता आहे? 'धम्मदेसनाय वा धम्मदेसनं' म्हणजे श्रमण गौतमांच्या धम्मोपदेशाशी आमच्या धम्मोपदेशाची, किंवा आमच्या धम्मोपदेशाशी श्रमण गौतमांच्या धम्मोपदेशाची तुलना करता जो फरक किंवा भिन्नता सांगितली जाईल, ती कोणती? असे ते विचारतात. दुसऱ्या पदातही हाच नियम समजावा. නෙව අභිනන්දිංසූති ‘‘එවමෙව’’න්ති න සම්පටිච්ඡිංසු. නප්පටික්කොසිංසූති ‘‘නයිදං එව’’න්ති න පටිසෙධිංසු. කිං පන තෙ පහොන්තා එවං අකංසු, උදාහු අප්පහොන්තාති? පහොන්තා. න හි තෙ එත්තකං කථං කථෙතුං න සක්කොන්ති ‘‘ආවුසො තුම්හාකං සමයෙ පඤ්ච නීවරණා පහාතබ්බා නාම නත්ථි, සත්ත බොජ්ඣඞ්ගා භාවෙතබ්බා නාම නත්ථී’’ති. එවං පන තෙසං අහොසි – ‘‘අත්ථි නො එතං කථාපාභතං, මයං එතං සත්ථු ආරොචෙස්සාම, අථ නො සත්ථා මධුරධම්මදෙසනං දෙසෙස්සතී’’ති. 'नेव अभिनन्दिंसु' म्हणजे 'हे असेच आहे' असे म्हणून त्यांनी स्वीकार केला नाही. 'नप्पटिक्कोसिंसु' म्हणजे 'हे असे नाही' असे म्हणून त्यांनी निषेध केला नाही. मग काय ते समर्थ असून त्यांनी असे केले, की असमर्थ असल्यामुळे? ते समर्थ होते. कारण 'हे आयुष्यमान, तुमच्या सिद्धांतात पाच नीवरण नष्ट करणे असे काही नाही, आणि सात बोज्झंग विकसित करणे असे काही नाही' एवढे बोलण्यास ते असमर्थ नव्हते; ते नक्कीच समर्थ होते. परंतु त्यांच्या मनात असा विचार आला—'आम्हाला ही संभाषणाची एक उत्तम भेट (चर्चेचा विषय) मिळाली आहे, आम्ही हे शास्त्यांना सांगू, आणि मग शास्ते आम्हाला मधुर धम्मोपदेश देतील.' පරියායොති කාරණං. න චෙව සම්පායිස්සන්තීති සම්පාදෙත්වා කථෙතුං න සක්ඛිස්සන්ති. උත්තරිඤ්ච විඝාතන්ති අසම්පායනතො උත්තරිම්පි දුක්ඛං ආපජ්ජිස්සන්ති. සම්පාදෙත්වා කථෙතුං අසක්කොන්තානඤ්හි දුක්ඛං උප්පජ්ජති. යථා තං, භික්ඛවෙ, අවිසයස්මින්ති එත්ථ තන්ති නිපාතමත්තං, යථාති කාරණවචනං, යස්මා අවිසයෙ පඤ්හො පුච්ඡිතොති අත්ථො. සදෙවකෙති සහ දෙවෙහි සදෙවකෙ. සමාරකාදීසුපි එසෙව නයො. එවං තීණි ඨානානි ලොකෙ පක්ඛිපිත්වා ද්වෙ පජායාති, පඤ්චහිපි සත්තලොකමෙව පරියාදියිත්වා එතස්මිං සදෙවකාදිභෙදෙ ලොකෙ [Pg.206] දෙවං වා මනුස්සං වා න සමනුපස්සාමීති දීපෙති. ඉතො වා පන සුත්වාති ඉතො වා පන මම සාසනතො සුත්වා. ඉතො සුත්වා හි තථාගතො තථාගතසාවකොපි ආරාධෙය්ය, පරිතොසෙය්ය, අඤ්ඤථා ආරාධනා නාම නත්ථීති දස්සෙති. 'परियायो' म्हणजे कारण. 'न चेव सम्पायिस्सन्ति' म्हणजे ते पूर्णपणे स्पष्ट करून उत्तर देऊ शकणार नाहीत. 'उत्तरिञ्च विघातं' म्हणजे उत्तर देण्यास असमर्थ ठरल्यामुळे ते अधिकच दुःख आणि त्रासाला प्राप्त होतील. कारण जे पूर्णपणे स्पष्ट करून सांगू शकत नाहीत, त्यांना दुःख प्राप्त होते. 'यथा तं, भिक्खवे, अविसायस्मिं' यामध्ये 'तं' हा केवळ एक निपात (अव्यय) आहे. 'यथा' हा कारणाचा वाचक आहे; ज्या अर्थी अयोग्य विषयात प्रश्न विचारला गेला आहे, असा याचा अर्थ आहे. 'सदेवके' म्हणजे देवांसह. समारक (मारासह), सब्रह्मक (ब्रह्मासह) इत्यादींमध्येही हाच नियम समजावा. अशा प्रकारे जगात देव, मार आणि ब्रह्म या तीन स्थानांचा समावेश करून, आणि 'प्रजा' या शब्दात श्रमण व ब्राह्मण या दोन वर्गांचा समावेश करून, या पाच पदांद्वारे संपूर्ण सत्वलोकाला व्यापून, 'या सदेवक इत्यादी भेद असलेल्या लोकात मी असा कोणताही देव किंवा मनुष्य पाहत नाही (जो या प्रश्नाचे उत्तर देऊ शकेल)' हे स्पष्ट केले आहे. 'इतो वा पन सुत्वा' म्हणजे येथून, माझ्या या शासनातून (धम्मातून) ऐकून. येथून ऐकूनच तथागत किंवा तथागतांचे श्रावक संतुष्ट करू शकतात, आनंदित करू शकतात; याशिवाय दुसरी कोणतीही संतुष्टी असू शकत नाही, हे दर्शविले आहे. ඉදානි අත්තනො තෙසං පඤ්හානං වෙය්යාකරණෙන චිත්තාරාධනං දස්සෙන්තො කතමො ච භික්ඛවෙ පරියායොතිආදිමාහ. තත්ථ අජ්ඣත්තං කාමච්ඡන්දොති අත්තනො පඤ්චක්ඛන්ධෙ ආරබ්භ උප්පන්නඡන්දරාගො. බහිද්ධා කාමච්ඡන්දොති පරෙසං පඤ්චක්ඛන්ධෙ ආරබ්භ උප්පන්නඡන්දරාගො. උද්දෙසං ගච්ඡතීති ගණනං ගච්ඡති. අජ්ඣත්තං බ්යාපාදොති අත්තනො හත්ථපාදාදීසු උප්පන්නපටිඝො. බහිද්ධා බ්යාපාදොති පරෙසං තෙසු උප්පන්නපටිඝො. අජ්ඣත්තං ධම්මෙසු විචිකිච්ඡාති අත්තනො ඛන්ධෙසු විමති. බහිද්ධා ධම්මෙසු විචිකිච්ඡාති බහිද්ධා අට්ඨසු ඨානෙසු මහාවිචිකිච්ඡා. අජ්ඣත්තං ධම්මෙසු සතීති අජ්ඣත්තිකෙ සඞ්ඛාරෙ පටිග්ගණ්හන්තස්ස උප්පන්නා සති. බහිද්ධා ධම්මෙසු සතීති බහිද්ධා සඞ්ඛාරෙ පරිග්ගණ්හන්තස්ස උප්පන්නා සති. ධම්මවිචයසම්බොජ්ඣඞ්ගෙපි එසෙව නයො. आता स्वतः त्या प्रश्नांचे स्पष्टीकरण करून त्यांचे चित्त संतुष्ट करण्यासाठी भगवंतांनी 'कतमो च भिक्खवे परियायो' (हे भिक्षूंनो, तो कोणता पर्याय आहे?) इत्यादी म्हटले. त्यामध्ये 'अज्झत्तं कामच्छन्दो' (अंतर्गत कामच्छंद) म्हणजे स्वतःच्या पंचस्कंधांना अनुसरून उत्पन्न झालेला छंदराग (आसक्ती). 'बहिद्धा कामच्छन्दो' (बाह्य कामच्छंद) म्हणजे इतरांच्या पंचस्कंधांना अनुसरून उत्पन्न झालेला छंदराग. 'उद्देसं गच्छति' म्हणजे गणनेत येतो. 'अज्झत्तं ब्यापादो' (अंतर्गत व्यापाद) म्हणजे स्वतःच्या हात-पाय इत्यादींवर उत्पन्न झालेला प्रतिघ (क्रोध). 'बहिद्धा ब्यापादो' (बाह्य व्यापाद) म्हणजे इतरांच्या हात-पाय इत्यादींवर उत्पन्न झालेला प्रतिघ. 'अज्झत्तं धम्मेसु विचिकिच्छा' (अंतर्गत धम्मांविषयी शंका) म्हणजे स्वतःच्या स्कंधांविषयी असलेली शंका. 'बहिद्धा धम्मेसु विचिकिच्छा' (बाह्य धम्मांविषयी शंका) म्हणजे बाह्य आठ स्थानांविषयी (बुद्ध, धम्म, संघ इत्यादींविषयी) असलेली मोठी शंका. 'अज्झत्तं धम्मेसु सती' (अंतर्गत धम्मांविषयी स्मृती) म्हणजे स्वतःच्या अंतर्गत संस्कारांचे ग्रहण करणाऱ्या भिक्षूमध्ये उत्पन्न झालेली स्मृती. 'बहिद्धा धम्मेसु सती' (बाह्य धम्मांविषयी स्मृती) म्हणजे बाह्य संस्कारांचे ग्रहण करणाऱ्या भिक्षूमध्ये उत्पन्न झालेली स्मृती. धम्मविचय संबोज्झंगातही हाच नियम समजावा. කායිකන්ති චඞ්කමං අධිට්ඨහන්තස්ස උප්පන්නවීරියං. චෙතසිකන්ති – ‘‘න තාවාහං ඉමං පල්ලඞ්කං භින්දිස්සාමි, යාව මෙ අනුපාදාය ආසවෙහි චිත්තං විමුච්චිස්සතී’’ති එවං කායපයොගං විනා උප්පන්නවීරියං. කායප්පස්සද්ධීති තිණ්ණං ඛන්ධානං දරථපස්සද්ධි. චිත්තප්පස්සද්ධීති විඤ්ඤාණක්ඛන්ධස්ස දරථපස්සද්ධි. උපෙක්ඛාසම්බොජ්ඣඞ්ගෙ සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගසදිසොව විනිච්ඡයො. 'कायिकं' (शारीरिक वीर्य) म्हणजे चंक्रमण करणाऱ्या भिक्षूमध्ये उत्पन्न झालेले वीर्य (प्रयत्न). 'चेतसिकं' (मानसिक वीर्य) म्हणजे 'जोपर्यंत माझे चित्त उपादानरहित होऊन आसवांपासून (आसवांतून) मुक्त होत नाही, तोपर्यंत मी हे आसन सोडणार नाही' अशा प्रकारे शारीरिक हालचालींशिवाय उत्पन्न झालेले वीर्य. 'कायपस्सद्धि' म्हणजे तीन स्कंधांच्या (वेदना, संज्ञा, संस्कार) त्रासाचे शमन होणे. 'चित्तपस्सद्धि' म्हणजे विज्ञानस्कंधाच्या त्रासाचे शमन होणे. उपेक्षा संबोज्झंगात सती संबोज्झंगाप्रमाणेच निर्णय समजावा. ඉමස්මිං සුත්තෙ මිස්සකසම්බොජ්ඣඞ්ගා කථිතා. එතෙසු හි අජ්ඣත්තධම්මෙසු සති, පවිචයො, උපෙක්ඛාති ඉමෙ අත්තනො ඛන්ධාරම්මණත්තා ලොකියාව හොන්ති, තථා මග්ගං අපත්තං කායිකවීරියං. අවිතක්කඅවිචාරා පන පීතිසමාධී කිඤ්චාපි රූපාවචරා හොන්ති, රූපාවචරෙ පන බොජ්ඣඞ්ගා න ලබ්භන්තීති ලොකුත්තරාව හොන්ති. යෙ ච ථෙරා බ්රහ්මවිහාරවිපස්සනාපාදකජ්ඣානාදීසු බොජ්ඣඞ්ගෙ උද්ධරන්ති, තෙසං මතෙන රූපාවචරාපි අරූපාවචරාපි හොන්ති. බොජ්ඣඞ්ගෙසු හි අරූපාවචරෙ පීතියෙව එකන්තෙන න ලබ්භති, සෙසා ඡ මිස්සකාව හොන්තීති. දෙසනාපරියොසානෙ කෙචි භික්ඛූ සොතාපන්නා ජාතා, කෙචි සකදාගාමී, කෙචි අනාගාමී, කෙචි අරහන්තොති. या सुत्तात मिश्र संबोज्झंग (लौकिक आणि लोकोत्तर दोन्ही) सांगितले आहेत. कारण या सात बोज्झंगांमध्ये, अंतर्गत धम्मांविषयी सती (स्मृती), पविचय (धम्मविचय) आणि उपेक्षा हे स्वतःच्या स्कंधांना आलंबन बनवत असल्यामुळे लौकिकच असतात; त्याचप्रमाणे मार्गाला प्राप्त न झालेले शारीरिक वीर्यही लौकिकच असते. परंतु वितर्क आणि विचार नसलेले प्रीती व समाधी हे जरी रूपावचर असले, तरी रूपावचरात मुख्य बोज्झंग प्राप्त होत नसल्यामुळे ते लोकोत्तरच असतात. आणि जे थेर ब्रह्मविहार व विपश्यनेचे आधार असलेल्या ध्यानादींमध्ये बोज्झंग मानतात, त्यांच्या मते ते रूपावचर आणि अरूपावचर दोन्ही असतात. कारण बोज्झंगांमध्ये अरूपावचरात प्रीती निश्चितपणे मिळत नाही, उर्वरित सहा मिश्रच असतात. उपदेशाच्या शेवटी काही भिक्षू सोतापन्न झाले, काही सकदागामी, काही अनागामी, तर काही अरहंत झाले. 3. අග්ගිසුත්තවණ්ණනා ३. अग्गिसुत्तवण्णना 234. තතියෙ [Pg.207] සතිඤ්ච ඛ්වාහං, භික්ඛවෙ, සබ්බත්ථිකං වදාමීති ලොණධූපනං විය සබ්බකම්මිකාමච්චං විය ච සබ්බත්ථ ඉච්ඡිතබ්බං වදාමීති අත්ථො. යථා හි ලොණධූපනං සබ්බබ්යඤ්ජනෙසුපි නිවිසති, යථා ච සබ්බකම්මිකො අමච්චො යොධකම්මම්පි කරොති මන්තකම්මම්පි පටිහාරකම්මම්පීති සබ්බකිච්චානි සාධෙති, එවං උද්ධතස්ස චිත්තස්ස නිග්ගණ්හනං, ලීනස්ස පග්ගණ්හනන්ති සබ්බමෙතං සතියා ඉජ්ඣති, න සක්කා විනා සතියා එතං සම්පාදෙතුං, තස්මා එවමාහ. ඉමස්මිං සුත්තෙ පුබ්බභාගවිපස්සනා බොජ්ඣඞ්ගාව කථිතා. २३४. तिसऱ्या सुत्तात, "हे भिक्खूंनो, मी सतीला (स्मृतीला) सर्वोपयोगी म्हणतो" याचा अर्थ असा की, ज्याप्रमाणे सर्व व्यंजनांमध्ये भाजलेले मीठ आवश्यक असते आणि सर्व राजकार्यात चतुर अमात्य आवश्यक असतो, त्याचप्रमाणे सर्व ठिकाणी (चित्ताच्या निग्रहात व प्रग्रहात) सतीची आवश्यकता आहे, असे मी सांगतो. कारण ज्याप्रमाणे भाजलेले मीठ सर्व व्यंजनांमध्ये मिसळते, आणि ज्याप्रमाणे सर्व कामांत कुशल असलेला अमात्य युद्धाचे कामही करतो, सल्ला देण्याचे कामही करतो आणि द्वारपालाचे कामही करतो, अशा प्रकारे सर्व कार्ये पूर्ण करतो; त्याचप्रमाणे चंचल चित्ताचे दमन करणे आणि आळशी चित्ताचा प्रग्रह करणे, हे सर्व सतीच्या साहाय्यानेच साध्य होते. सतीशिवाय हे सर्व साध्य करणे शक्य नाही, म्हणून भगवंतांनी असे म्हटले आहे. या सुत्तात पूर्वभाग-विपश्यना बोज्झंगच सांगितले आहेत। 4. මෙත්තාසහගතසුත්තවණ්ණනා ४. मेत्तासहगतसुत्तवण्णना (मैत्रीसहगत सुत्ताचे स्पष्टीकरण) 235. චතුත්ථෙ මෙත්තාසහගතෙන චෙතසාතිආදි සබ්බං සබ්බාකාරෙන විසුද්ධිමග්ගෙ (විසුද්ධි. 1.240-241) විත්ථාරිතමෙව. මයම්පි ඛො, ආවුසො, සාවකානං එවං ධම්මං දෙසෙමාති ඉදම්පි තෙ පුරිමනයෙනෙව සත්ථු ධම්මදෙසනං සුත්වා වදන්ති. තිත්ථියානඤ්හි සමයෙ පඤ්චනීවරණප්පහානං වා මෙත්තාදිබ්රහ්මවිහාරභාවනා වා නත්ථි. කිං ගතිකා හොතීති කිං නිප්ඵත්ති හොති. කිං පරමාති කිං උත්තමා. කිං ඵලාති කිං ආනිසංසා. කිං පරියොසානාති කිං නිට්ඨා. මෙත්තාසහගතන්ති මෙත්තාය සහගතං සංසට්ඨං සම්පයුත්තං. එසෙව නයො සබ්බත්ථ. විවෙකනිස්සිතාදීනි වුත්තත්ථානෙව. २३५. चौथ्या सुत्तात, "मेत्तासहगतेन चेतसा" (मैत्रीपूर्ण चित्ताने) इत्यादी सर्व बाबी सर्व प्रकारे विसुद्धिमग्गात सविस्तर स्पष्ट केल्या आहेत. "हे आवुसो, आम्ही देखील आमच्या श्रावकांना असाच धम्म उपदेशितो" हे वचन देखील ते (तीर्थक) पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच शास्त्यांची धम्मदेशना ऐकून बोलतात. कारण खरोखरच, तीर्थकांच्या सिद्धांतात पाच नीवरणांचे प्रहाण करणे किंवा मैत्री इत्यादी ब्रह्मविहार भावना करणे अस्तित्वातच नाही. "किं गतिका होति" म्हणजे त्याची काय निष्पत्ती (परिणाम) होते? "किं परमा" म्हणजे त्याचे सर्वोच्च (उत्तम) काय आहे? "किं फला" म्हणजे त्याचे काय फळ (अनुशंस) आहे? "किं परियोसाना" म्हणजे त्याचा अंत (शेवट) काय आहे? "मेत्तासहगतं" म्हणजे मैत्रीने युक्त, संसृष्ट आणि संप्रयुक्त. हाच नियम सर्व ठिकाणी (इतर ब्रह्मविहारांच्या बाबतीत) समजावा. "विवेकनिस्सित" इत्यादी शब्दांचे अर्थ पूर्वीच स्पष्ट केले आहेत। අප්පටිකූලන්ති දුවිධං අප්පටිකූලං – සත්තඅප්පටිකූලඤ්ච, සඞ්ඛාරඅප්පටිකූලඤ්ච. තස්මිං අප්පටිකූලෙ ඉට්ඨෙ වත්ථුස්මින්ති අත්ථො. පටිකූලසඤ්ඤීති අනිට්ඨසඤ්ඤී. කථං පනෙත්ථ එවං විහරති? අසුභඵරණං වා අනිච්චන්ති මනසිකාරං වා කරොන්තො. වුත්තඤ්හෙතං පටිසම්භිදායං ‘‘කථං අප්පටිකූලෙ පටිකූලසඤ්ඤී විහරති. ඉට්ඨස්මිං වත්ථුස්මිං අසුභාය වා ඵරති, අනිච්චතො වා උපසංහරතී’’ති. පටිකූලෙ පන අනිට්ඨෙ වත්ථුස්මිං මෙත්තාඵරණං වා ධාතුමනසිකාරං වා කරොන්තො අප්පටිකූලසඤ්ඤී විහරති නාම. යථාහ ‘‘කථං පටිකූලෙ අප්පටිකූලසඤ්ඤී විහරති. අනිට්ඨස්මිං වත්ථුස්මිං මෙත්තාය වා ඵරති, ධාතුතො වා උපසංහරතී’’ති (පටි. ම. 2.17). උභයමිස්සකපදෙසුපි එසෙව නයො. අප්පටිකූලප්පටිකූලෙසු හි තදෙව අසුභඵරණං වා අනිච්චන්ති මනසිකාරං [Pg.208] වා කරොන්තො පටිකූලසඤ්ඤී විහරති නාම. පටිකූලාපටිකූලෙසු ච තදෙව මෙත්තාඵරණං වා ධාතුමනසිකාරං වා කරොන්තො අප්පටිකූලසඤ්ඤී විහරති නාම. ‘‘චක්ඛුනා රූපං දිස්වා නෙව සුමනො හොතී’’තිආදිනා (පටි. ම. 2.17) නයෙන වුත්තං පන ඡළඞ්ගුපෙක්ඛං පවත්තයමානො ‘‘අප්පටිකූලෙ ච පටිකූලෙ ච තදුභයං අභිනිවජ්ජෙත්වා උපෙක්ඛකො තත්ථ විහරති සතො සම්පජානො’’ති වෙදිතබ්බො. "अप्पटिकूल" (प्रतिकूल नसलेले/अनुकूल) हे दोन प्रकारचे आहे – सत्त्व-अप्पटिकूल आणि संस्कार-अप्पटिकूल. त्या अप्पटिकूल म्हणजे इष्ट (प्रिय) वस्तूमध्ये, हा अर्थ आहे. "पतिकूलसञ्ञी" म्हणजे अनिष्ट संज्ञा असलेला (प्रतिकूल समजणारा). येथे तो कशा प्रकारे विहरतो? अनुकूल सत्त्वामध्ये अशुभाची भावना पसरवून किंवा अनुकूल संस्कारांमध्ये अनित्यतेचा मनसिकार करून तो विहरतो. पटिसम्भिदामग्गात असे म्हटले आहे – "कशा प्रकारे अनुकूल वस्तूमध्ये प्रतिकूल संज्ञा ठेवून विहरतो? इष्ट वस्तूमध्ये अशुभाची भावना पसरवतो किंवा अनित्यतेने मनसिकार करतो." परंतु, प्रतिकूल (अनिष्ट) वस्तूमध्ये मैत्रीची भावना पसरवून किंवा धातू-मनसिकार करून तो अनुकूल संज्ञा ठेवून (अप्पटिकूलसञ्ञी) विहरतो. ज्याप्रमाणे म्हटले आहे – "कशा प्रकारे प्रतिकूल वस्तूमध्ये अनुकूल संज्ञा ठेवून विहरतो? अनिष्ट वस्तूमध्ये मैत्रीची भावना पसरवतो किंवा धातू रूपाने मनसिकार करतो." दोन्ही मिश्र पदांच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. कारण अनुकूल आणि प्रतिकूल अशा दोन्ही वस्तूंमध्ये अशुभाची भावना पसरवून किंवा अनित्यतेचा मनसिकार करून तो प्रतिकूल संज्ञा ठेवून विहरतो. आणि प्रतिकूल व अनुकूल अशा दोन्ही वस्तूंमध्ये मैत्रीची भावना पसरवून किंवा धातू-मनसिकार करून तो अनुकूल संज्ञा ठेवून विहरतो. "डोळ्यांनी रूप पाहून तो आनंदी होत नाही" इत्यादी पद्धतीने सांगितलेली 'छळंगुपेक्खा' (सहा इंद्रियांच्या बाबतीत तटस्थता) प्रस्थापित करणारा अर्हत "अनुकूल आणि प्रतिकूल या दोन्ही गोष्टींना टाळून, तिथे उपेक्षक, स्मृतिमान आणि संप्रजन्ययुक्त होऊन विहरतो," असे समजावे। එත්තාවතා ච ඉමස්ස භික්ඛුනො මෙත්තාය තිකචතුක්කජ්ඣානං නිබ්බත්තෙත්වා තදෙව පාදකං කත්වා විපස්සනං වඩ්ඪෙත්වා අරහත්තං පත්තස්ස සහ විපස්සනාය මග්ගසම්බොජ්ඣඞ්ගානං අරියිද්ධියා ච දස්සිතත්තා දෙසනා විනිවට්ටෙතබ්බා සියා. ඉදං පන මෙත්තාඣානං පාදකං කත්වා සඞ්ඛාරෙ සම්මසන්තොපි යො අරහත්තං පාපුණිතුං න සක්කොති, යස්මා තස්ස අරහත්තපරමා මෙත්තා න හොති. යංපරමා පන හොති, තං දස්සෙතබ්බං. තස්මා තස්ස දස්සනත්ථං අයං දෙසනා ආරද්ධා. පරතො සබ්බසො වා පන රූපසඤ්ඤානං සමතික්කමාතිආදීසුපි ඉමිනා නයෙන පුන දෙසනාරම්භපයොජනං වෙදිතබ්බං. आणि एवढ्या उपदेशाने, ज्या भिक्खूने मैत्री भावनेद्वारे त्रिक-ध्यान किंवा चतुष्क-ध्यान उत्पन्न करून, त्यालाच आधार बनवून, विपश्यना वाढवून अर्हत्त्व प्राप्त केले आहे, त्याच्या विपश्यनेसोबत मार्ग-संबोज्झंग आणि आर्य-ऋद्धी दर्शविली गेल्यामुळे ही देशना येथेच समाप्त व्हायला हवी होती. परंतु, या मैत्री ध्यानाला आधार बनवून संस्कारांचे परीक्षण करत असतानाही जो अर्हत्त्व प्राप्त करू शकत नाही, कारण त्याची मैत्री अर्हत्त्व-परम नसते; तर तिची अंतिम सीमा जी काही असेल, ती दर्शविली पाहिजे. म्हणून ती दर्शविण्यासाठी ही देशना पुढे सुरू ठेवली आहे. पुढे "सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांचे अतिक्रमण करून" इत्यादी वाक्यांमध्ये देखील याच पद्धतीने पुन्हा देशना सुरू करण्यामागील प्रयोजन समजून घ्यावे। සුභපරමන්ති සුභනිට්ඨං, සුභකොටිකං, සුභනිප්ඵත්තිං. ඉධපඤ්ඤස්සාති ඉධෙව පඤ්ඤා අස්ස, නයිමං ලොකං අතික්කමතීති ඉධපඤ්ඤො, තස්ස ඉධපඤ්ඤස්ස, ලොකියපඤ්ඤස්සාති අත්ථො. උත්තරිවිමුත්තිං අප්පටිවිජ්ඣතොති ලොකුත්තරධම්මං අප්පටිවිජ්ඣන්තස්ස. යො පන පටිවිජ්ඣිතුං සක්කොති, තස්ස අරහත්තපරමාව මෙත්තා හොතීති අත්ථො. කරුණාදීසුපි එසෙව නයො. "सुभपरमं" म्हणजे शुभविमोक्ष हाच जिचा अंत, शिखर आणि निष्पत्ती आहे अशी. "इधपञ्ञस्स" म्हणजे ज्याची प्रज्ञा याच लोकात राहते, या लोकाचे अतिक्रमण करत नाही, तो 'इधपञ्ञो' (इहप्रज्ञ); त्या इहप्रज्ञ भिक्खूची, म्हणजेच लौकिक प्रज्ञा असलेल्या भिक्खूची, हा अर्थ आहे. "उत्तरिविमुत्तिं अप्पटिविज्झतो" म्हणजे लोकोत्तर धम्माचा (विमुक्तीचा) वेध न घेणाऱ्याचा. परंतु जो वेध घेण्यास समर्थ आहे, त्याची मैत्री अर्हत्त्व-परमच असते, हा अर्थ आहे. करुणा इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा। කස්මා පනෙතාසං මෙත්තාදීනං සුභපරමාදිතා වුත්තා භගවතාති? සභාගවසෙන තස්ස තස්ස උපනිස්සයත්තා. මෙත්තාවිහාරිස්ස හි සත්තා අප්පටිකූලා හොන්ති, අථස්ස අප්පටිකූලපරිචයා අප්පටිකූලෙසු පරිසුද්ධවණ්ණෙසු නීලාදීසු චිත්තං උපසංහරතො අප්පකසිරෙනෙව තත්ථ චිත්තං පක්ඛන්දති. ඉති මෙත්තා සුභවිමොක්ඛස්ස උපනිස්සයො හොති, න තතො පරං, තස්මා සුභපරමාති වුත්තා. परंतु भगवंतांनी या मैत्री इत्यादी भावनांची 'शुभपरम' इत्यादी अंतिम सीमा का सांगितली आहे? समान स्वभावामुळे (सभागतेमुळे) त्या त्या अवस्थांसाठी ती उपनिषय (बलवान कारण) ठरत असल्यामुळे. कारण मैत्री विहरणाऱ्या भिक्खूला सर्व प्राणी अनुकूल वाटतात. त्यामुळे त्याला अनुकूलतेचा सराव होतो आणि अनुकूल अशा अत्यंत शुद्ध निळ्या इत्यादी रंगांवर चित्त एकाग्र करताना त्याचे चित्त विनासायास सहजपणे त्यामध्ये प्रविष्ट होते. अशा प्रकारे मैत्री ही शुभविमोक्षासाठी उपनिषय ठरते, त्यापलीकडे नाही; म्हणून तिला 'शुभपरम' म्हटले आहे। කරුණාවිහාරිස්ස උණ්හාභිඝාතාදිරූපනිමිත්තං සත්තදුක්ඛං සමනුපස්සන්තස්ස කරුණාය පවත්තිසම්භවතො රූපෙ ආදීනවො පරිවිදිතො හොති[Pg.209], අථස්ස පරිවිදිතරූපාදීනවත්තා පථවීකසිණාදීසු අඤ්ඤතරං උග්ඝාටෙත්වා රූපනිස්සරණෙ ආකාසෙ චිත්තං උපසංහරතො අප්පකසිරෙනෙව තත්ථ චිත්තං පක්ඛන්දති. ඉති කරුණා ආකාසානඤ්චායතනස්ස උපනිස්සයො හොති, න තතො පරං, තස්මා ආකාසානඤ්චායතනපරමාති වුත්තා. करुणा विहरणाऱ्या भिक्खूला, उष्णतेचा आघात इत्यादी रूप-निमित्तांमुळे प्राण्यांना होणारे दुःख पाहताना करुणा उत्पन्न होत असल्यामुळे, रूपातील दोष चांगल्या प्रकारे ज्ञात होतो. रूपातील दोष चांगल्या प्रकारे ज्ञात झाल्यामुळे, तो पृथ्वी कसिण इत्यादींपैकी एकाचा त्याग करून, रूपापासून मुक्त करणाऱ्या आकाशावर चित्त एकाग्र करतो, तेव्हा त्याचे चित्त विनासायास सहजपणे त्यामध्ये प्रविष्ट होते. अशा प्रकारे करुणा ही आकासानंचायतनासाठी उपनिषय ठरते, त्यापलीकडे नाही; म्हणून तिला 'आकासानंचायतनपरम' म्हटले आहे। මුදිතාවිහාරිස්ස පන තෙන තෙන පාමොජ්ජකාරණෙන උප්පන්නපාමොජ්ජසත්තානං විඤ්ඤාණං සමනුපස්සන්තස්ස මුදිතාය පවත්තිසම්භවතො විඤ්ඤාණග්ගහණපරිචිතං හොති, අථස්ස අනුක්කමාධිගතං ආකාසානඤ්චායතනං අතික්කම්ම ආකාසනිමිත්තගොචරෙ විඤ්ඤාණෙ චිත්තං උපසංහරතො අප්පකසිරෙනෙව තත්ථ චිත්තං පක්ඛන්දති. ඉති මුදිතා විඤ්ඤාණඤ්චායතනස්ස උපනිස්සයො හොති, න තතො පරං, තස්මා විඤ්ඤාණඤ්චායතනපරමාති වුත්තා. परंतु मुदिता विहरणाऱ्या भिक्खूला, त्या त्या आनंदाच्या कारणांमुळे आनंदित झालेल्या प्राण्यांच्या विज्ञानाचे अवलोकन करताना मुदिता उत्पन्न होत असल्यामुळे, विज्ञानाचे ग्रहण करण्याचा सराव होतो. त्यानंतर, अनुक्रमाने प्राप्त केलेल्या आकासानंचायतनाचे अतिक्रमण करून, आकाश-निमित्त हेच जिचे आलंबन आहे अशा विज्ञानावर चित्त एकाग्र करताना त्याचे चित्त विनासायास सहजपणे त्यामध्ये प्रविष्ट होते. अशा प्रकारे मुदिता ही विज्ञाणंचायतनासाठी उपनिषय ठरते, त्यापलीकडे नाही; म्हणून तिला 'विज्ञाणंचायतनपरम' म्हटले आहे। උපෙක්ඛාවිහාරිස්ස පන ‘‘සත්තා සුඛිතා වා හොන්තු, දුක්ඛතො වා විමුච්චන්තු, සම්පත්තසුඛතො වා මා විගච්ඡන්තූ’’ති ආභොගාභාවතො සුඛදුක්ඛාදිපරමත්ථගාහවිමුඛසම්භවතො අවිජ්ජමානග්ගහණදුක්ඛචිත්තං හොති. අථස්ස පරමත්ථගාහතො විමුඛභාවපරිචිතචිත්තස්ස පරමත්ථතො අවිජ්ජමානග්ගහණදුක්ඛචිත්තස්ස ච අනුක්කමාධිගතං විඤ්ඤාණාඤ්චායතනං සමතික්කම්මසම්භවතො අවිජ්ජමානෙ පරමත්ථභූතස්ස විඤ්ඤාණස්ස අභාවෙ චිත්තං උපසංහරතො අප්පකසිරෙනෙව තත්ථ චිත්තං පක්ඛන්දති. ඉති උපෙක්ඛා ආකිඤ්චඤ්ඤායතනස්ස උපනිස්සයො හොති, න තතො පරං, තස්මා ආකිඤ්චඤ්ඤායතනපරමාති වුත්තා. දෙසනාපරියොසානෙ පඤ්චසතා භික්ඛූ අරහත්තං පත්තාති. शिवाय, उपेक्षा ब्रह्मविहार विहरणाऱ्या पुद्गलाचे चित्त 'प्राणी सुखी होवोत, किंवा दुःखातून मुक्त होवोत, किंवा प्राप्त सुखापासून वंचित न होवोत' अशा प्रकारे सुख इत्यादींच्या रूपाने मन लावून विचार न करण्यामुळे आणि सुख-दुःख इत्यादी परमार्थ धर्माचे ग्रहण करण्यापासून पराङ्मुख होणे शक्य असल्यामुळे, परमार्थतः विद्यमान नसलेल्या (प्राणी) प्रज्ञप्तीचे ग्रहण करण्यात कुशल असते. त्यानंतर, परमार्थ ग्रहणापासून पराङ्मुख होण्यात सरावलेले चित्त असलेल्या आणि परमार्थतः विद्यमान नसलेल्या प्रज्ञप्तीचे ग्रहण करण्यात कुशल चित्त असलेल्या त्या उपेक्षा ब्रह्मविहारी पुद्गलाचे, अनुक्रमाने प्राप्त झालेल्या विज्ञाणाञ्चायतन ध्यानाचे अतिक्रमण करणे शक्य असल्यामुळे, परमार्थभूत असलेल्या पहिल्या आरूप्य विज्ञानाच्या अभावरूप (नास्तीभाव) प्रज्ञप्तीमध्ये चित्त एकाग्र केले असता, अगदी सहजतेने (विनासायास) त्याचे चित्त त्यामध्ये (अर्पणा समाधीच्या द्वारे) प्रवेश करते. अशा प्रकारे उपेक्षा ही आकिञ्चञ्ञायतन ध्यानाचा उपनिषय (बलवान हेतू) होते, त्याहून पुढे नाही; म्हणूनच 'आकिञ्चञ्ञायतन-परमा' असे म्हटले आहे. देशनेच्या शेवटी पाचशे भिक्खूंनी अर्हतपद प्राप्त केले. 5. සඞ්ගාරවසුත්තවණ්ණනා ५. सङ्गारवसुत्तवण्णना 236. පඤ්චමෙ පගෙවාති පඨමඤ්ඤෙව. කාමරාගපරියුට්ඨිතෙනාති කාමරාගගහිතෙන. කාමරාගපරෙතෙනාති කාමරාගානුගතෙන. නිස්සරණන්ති තිවිධං කාමරාගස්ස නිස්සරණං වික්ඛම්භනනිස්සරණං තදඞ්ගනිස්සරණං සමුච්ඡෙදනිස්සරණන්ති[Pg.210]. තත්ථ අසුභෙ පඨමජ්ඣානං වික්ඛම්භනනිස්සරණං නාම, විපස්සනා තදඞ්ගනිස්සරණං නාම, අරහත්තමග්ගො සමුච්ඡෙදනිස්සරණං නාම. තං තිවිධම්පි නප්පජානාතීති අත්ථො. අත්තත්ථම්පීතිආදීසු අරහත්තසඞ්ඛාතො අත්තනො අත්ථො අත්තත්ථො නාම, පච්චයදායකානං අත්ථො පරත්ථො නාම, ස්වෙව දුවිධොපි උභයත්ථො නාම. ඉමිනා නයෙන සබ්බවාරෙසු අත්ථො වෙදිතබ්බො. २३६. पाचव्या सूत्रात, 'पगेव' म्हणजे अगदी सुरुवातीलाच. 'कामरागपरियुट्ठितेन' म्हणजे कामरागाने ग्रासलेला. 'कामरागपरेतेन' म्हणजे कामरागाच्या आहारी गेलेला. 'निस्सरण' म्हणजे कामरागाचे तीन प्रकारचे निस्सरण (मुक्ती) - विष्कंभन-निस्सरण, तदंग-निस्सरण आणि समुच्छेद-निस्सरण होय. त्यापैकी, अशुभाच्या आधारे मिळवलेले प्रथम ध्यान म्हणजे 'विष्कंभन-निस्सरण' होय, विपश्यना म्हणजे 'तदंग-निस्सरण' होय आणि अर्हत् मार्ग म्हणजे 'समुच्छेद-निस्सरण' होय. तो या तिन्ही प्रकारच्या निस्सरणाला जाणत नाही, असा अर्थ आहे. 'अत्तत्थम्पि' इत्यादी शब्दांमध्ये, अर्हत्त्व नावाचा स्वतःचा हित (अर्थ) म्हणजे 'आत्मार्थ' होय; प्रत्ययदायकांचा (दान देणाऱ्यांचा) हित म्हणजे 'परार्थ' होय; आणि हे दोन्ही प्रकारचे हित मिळून 'उभयार्थ' म्हटले जाते. या पद्धतीने सर्व प्रकरणांमध्ये अर्थ समजून घ्यावा. අයං පන විසෙසො – බ්යාපාදස්ස නිස්සරණන්තිආදීසු හි ද්වෙව නිස්සරණානි වික්ඛම්භනනිස්සරණඤ්ච සමුච්ඡෙදනිස්සරණඤ්ච. තත්ථ බ්යාපාදස්ස තාව මෙත්තාය පඨමජ්ඣානං වික්ඛම්භනනිස්සරණං, අනාගාමිමග්ගො සමුච්ඡෙදනිස්සරණං. ථිනමිද්ධස්ස ආලොකසඤ්ඤා වික්ඛම්භනනිස්සරණං, අරහත්තමග්ගො සමුච්ඡෙදනිස්සරණං. උද්ධච්චකුක්කුච්චස්ස යො කොචි සමථො වික්ඛම්භනනිස්සරණං, උද්ධච්චස්ස පනෙත්ථ අරහත්තමග්ගො, කුක්කුච්චස්ස අනාගාමිමග්ගො සමුච්ඡෙදනිස්සරණං. විචිකිච්ඡාය ධම්මවවත්ථානං වික්ඛම්භනනිස්සරණං, පඨමමග්ගො සමුච්ඡෙදනිස්සරණං. हा विशेष फरक आहे - कारण 'व्यापादाचे निस्सरण' इत्यादींमध्ये केवळ दोनच निस्सरणे आहेत: विष्कंभन-निस्सरण आणि समुच्छेद-निस्सरण. त्यापैकी, व्यापादाचे (द्वेषाचे) मैत्रिचे प्रथम ध्यान हे 'विष्कंभन-निस्सरण' होय, आणि अनागामी मार्ग हे 'समुच्छेद-निस्सरण' होय. स्त्यान-मृद्धाचे (आळस व डुलकीचे) आलोकसंज्ञा हे 'विष्कंभन-निस्सरण' होय, आणि अर्हत् मार्ग हे 'समुच्छेद-निस्सरण' होय. औद्धत्य-कौकृत्याचे (उद्वेग व पश्चात्तापाचे) कोणताही शमथ हे 'विष्कंभन-निस्सरण' होय; परंतु येथे, औद्धत्याचे अर्हत् मार्ग हे 'समुच्छेद-निस्सरण' होय आणि कौकृत्याचे अनागामी मार्ग हे 'समुच्छेद-निस्सरण' होय. विचिकित्सेचे (संशयाचे) धर्मव्यवस्थान (परमार्थ धर्माचे निर्धारण) हे 'विष्कंभन-निस्सरण' होय, आणि प्रथम मार्ग (स्रोतापत्ती मार्ग) हे 'समुच्छेद-निस्सरण' होय. යා පනෙත්ථ සෙය්යථාපි බ්රාහ්මණ උදපත්තො සංසට්ඨො ලාඛාය වාතිආදිකා උපමා වුත්තා, තාසු උදපත්තොති උදකභරිතා පාති. සංසට්ඨොති වණ්ණභෙදකරණවසෙන සංසට්ඨො. පක්කුථිතොති කුථිතො. උස්මුදකජාතොති උසුමජාතො. සෙවාලපණකපරියොනද්ධොති තිලබීජකාදිභෙදෙන සෙවාලෙන වා නීලමණ්ඩූකපිට්ඨිවණ්ණෙන වා උදකපිට්ඨිං ඡාදෙත්වා නිබ්බත්තපණකෙන පරියොනද්ධො. වාතෙරිතොති වාතෙන එරිතො කම්පිතො. ආවිලොති අප්පසන්නො. ලුළිතොති අසන්නිසින්නො. කලලීභූතොති කද්දමීභූතො. අන්ධකාරෙ නික්ඛිත්තොති කොට්ඨන්තරාදිභෙදෙ අනාලොකට්ඨානෙ ඨපිතො. ඉමස්මිං සුත්තෙ භගවා තීහි භවෙහි දෙසනං නිවත්තෙත්වා අරහත්තනිකූටෙන දෙසනං නිට්ඨාපෙසි, බ්රාහ්මණො පන සරණමත්තෙ පතිට්ඨිතො. येथे 'हे ब्राह्मणा, जसे लाखेने मिश्रित पाण्याचे भांडे...' इत्यादी ज्या उपमा दिल्या आहेत, त्या उपमांमध्ये, 'उदपत्त' म्हणजे पाण्याने भरलेले भांडे. 'संसट्ठ' म्हणजे रंगात बदल करण्याच्या हेतूने मिश्रित केलेले. 'पक्कुथित' म्हणजे उकळणारे. 'उस्मुदकजात' म्हणजे वाफ निर्माण झालेले (गरम पाणी). 'सेवाळपणकपरियोनद्ध' म्हणजे शेवाळाने किंवा पाण्याच्या पृष्ठभागाला झाकून टाकणाऱ्या हिरव्या रंगाच्या पाणवनस्पतीने वेढलेले. 'वातेरित' म्हणजे वाऱ्याने हलवलेले, कंपित केलेले. 'आvil' म्हणजे गढूळ (अस्वच्छ). 'लुलित' म्हणजे खाली न बसलेले (गढूळपणामुळे स्थिर न झालेले). 'कललीभूत' म्हणजे चिखलमय झालेले. 'अन्धकारे निक्खित्त' म्हणजे अंधाऱ्या खोलीत किंवा विहिरीसारख्या प्रकाश नसलेल्या ठिकाणी ठेवलेले. या सूत्रात भगवंतांनी तीन सत्यांच्या (किंवा तीन भवांच्या) द्वारे देशनेचे प्रवर्तन करून अर्हत्त्वाच्या शिखरावर नेऊन देशनेची समाप्ती केली; परंतु तो ब्राह्मण केवळ शरणगमनातच प्रतिष्ठित झाला. 6. අභයසුත්තවණ්ණනා ६. अभयसुत्तवण्णना 237. ඡට්ඨෙ අඤ්ඤාණාය අදස්සනායාති අඤ්ඤාණත්ථාය අදස්සනත්ථාය. තග්ඝ භගවා නීවරණාති එකංසෙන භගවා නීවරණා. කායකිලමථොති [Pg.211] කායදරථො. චිත්තකිලමථොති චිත්තදරථො. සොපි මෙ පටිප්පස්සද්ධොති තස්ස කිර සත්ථු සන්තිකෙ සීතලං උතුසප්පායට්ඨානං පවිසිත්වා නිසින්නස්ස කායදරථො පටිපස්සම්භි, තස්මිං පටිපස්සද්ධෙ තදන්වයෙනෙව චිත්තදරථොපි. අපිච මග්ගෙනෙවස්ස එතං උභයම්පි පස්සද්ධන්ති වෙදිතබ්බං. २३७. सहाव्या सूत्रात, 'अञ्ञाणाय अदस्सनाय' म्हणजे अज्ञानासाठी आणि अदर्शनासाठी. 'तग्ध भगवा नीवरणा' म्हणजे भगवंतांनी निश्चितपणे अडथळा आणणारे (नीवरण) म्हटले आहे. 'कायकिलमथ' म्हणजे शरीराचा त्रास (दाह). 'चित्तकिलमथ' म्हणजे चित्ताचा त्रास (दाह). 'सोपि मे पटिप्पस्सद्धो' म्हणजे असे म्हटले जाते की, त्या अभय राजकुमाराने शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) जवळ थंड व अनुकूल वातावरणाच्या ठिकाणी प्रवेश करून बसले असता, त्यांच्या शरीराचा त्रास शांत झाला; आणि तो शरीराचा त्रास शांत झाल्यावर, त्याच अनुषंगाने चित्ताचा त्रासही शांत झाला. किंवा असेही समजले पाहिजे की, मार्गाच्या प्रभावानेच त्याचे हे दोन्ही त्रास शांत झाले. 7. ආනාපානවග්ගො ७. आनापानवग्गो 1. අට්ඨිකමහප්ඵලසුත්තාදිවණ්ණනා १. अट्ठिकमहप्फलसुत्तादिवण्णना 238. සත්තමාදීසු අට්ඨිකසඤ්ඤාති අට්ඨිකං අට්ඨිකන්ති භාවෙන්තස්ස උප්පන්නසඤ්ඤා. තං පනෙතං භාවයතො යාව නිමිත්තං න උප්පජ්ජති, තාව ඡවිපි චම්මම්පි උපට්ඨාති. නිමිත්තෙ පන උප්පන්නෙ ඡවිචම්මානි නෙව උපට්ඨහන්ති, සඞ්ඛවණ්ණො සුද්ධඅට්ඨිකසඞ්ඝාටොව උපට්ඨාති හත්ථික්ඛන්ධගතං ධම්මිකතිස්සරාජානං ඔලොකෙන්තස්ස සාමණෙරස්ස විය, පටිමග්ගෙ හසමානං ඉත්ථිං ඔලොකෙන්තස්ස චෙතියපබ්බතවාසිනො තිස්සත්ථෙරස්ස විය චාති. වත්ථූනි විසුද්ධිමග්ගෙ (විසුද්ධි. 1.15) විත්ථාරිතානි. සති වා උපාදිසෙසෙති ගහණසෙසෙ උපාදානසෙසෙ විජ්ජමානම්හි. २३८. सातव्या इत्यादी सूत्रांमध्ये, 'अट्ठिकसंज्ञा' म्हणजे 'हाडांचा सांगाडा, हाडांचा सांगाडा' अशा प्रकारे भावना करणाऱ्या भिक्खूच्या मनात उत्पन्न झालेली संज्ञा होय. आणि तिची भावना करणाऱ्या भिक्खूला जोपर्यंत निमित्त उत्पन्न होत नाही, तोपर्यंत बाह्य त्वचा आणि अंतस्त्वचा देखील दिसून येते. परंतु निमित्त उत्पन्न झाल्यावर बाह्य त्वचा आणि अंतस्त्वचा मुळीच दिसून येत नाही, तर केवळ शंखासारखा पांढरा शुभ्र असलेला हाडांचा सांगाडाच दिसून येतो; जसे हत्तीच्या पाठीवर बसलेल्या धार्मिक तिस्स राजाला पाहणाऱ्या सामणेराला दिसून आले होते, किंवा समोरून येणाऱ्या हसणाऱ्या स्त्रीला पाहणाऱ्या चेतियपर्वतनिवासी तिस्स स्थविरांना दिसून आले होते. या कथा विसुद्धिमग्गात सविस्तर सांगितल्या आहेत. 'सति वा उपादिसेसे' म्हणजे ग्रहण करण्याचे किंवा उपादानाचे काही अंश शिल्लक राहिले असता. 2-10. පුළවකසුත්තාදිවණ්ණනා २-१०. पुळवकसुत्तादिवण्णना 239-247. පුළවකසඤ්ඤාති පුළවං පුළවන්ති භාවෙන්තස්ස උප්පන්නසඤ්ඤා. විනීලකසඤ්ඤාදීසුපි එසෙව නයො. විනිච්ඡයකථා පනෙත්ථ සද්ධිං භාවනානයෙන විසුද්ධිමග්ගෙ (විසුද්ධි. 1.102) වුත්තා. මෙත්තාදයො තිකචතුක්කජ්ඣානවසෙන වෙදිතබ්බා, උපෙක්ඛා චතුත්ථජ්ඣානවසෙනෙව. २३९-२४७. 'पुळवकसंज्ञा' म्हणजे 'किडे-मुंग्यांनी भरलेले प्रेत, किडे-मुंग्यांनी भरलेले प्रेत' अशा प्रकारे भावना करणाऱ्या भिक्खूच्या मनात उत्पन्न झालेली संज्ञा होय. विनीलकसंज्ञा इत्यादींमध्ये देखील हाच नियम समजून घ्यावा. या विषयावरील सविस्तर चर्चा आणि भावना करण्याची पद्धत विसुद्धिमग्गात सांगितली आहे. मैत्री इत्यादी ध्यान हे त्रिक आणि चतुष्क ध्यानाच्या पद्धतीने समजून घ्यावे, तर उपेक्षा ध्यान हे केवळ चतुर्थ ध्यानाच्या पद्धतीनेच समजून घ्यावे. 8. නිරොධවග්ගො ८. निरोधवग्गो 1-10. අසුභසුත්තාදිවණ්ණනා १-१०. असुभसुत्तादिवण्णना 248-257. අසුභසඤ්ඤාති අසුභෙ පඨමජ්ඣානසඤ්ඤා. මරණසඤ්ඤාති ‘‘අවස්සං මරිතබ්බං, මරණපටිබද්ධං මෙ ජීවිත’’න්ති අභිණ්හං පච්චවෙක්ඛන්තස්ස උප්පන්නසඤ්ඤා[Pg.212]. ආහාරෙ පටිකූලසඤ්ඤාති ඔදනකුම්මාසාදිම්හි අජ්ඣොහරණීයෙ පටිකූලසඤ්ඤා. සබ්බලොකෙ අනභිරතිසඤ්ඤාති සකලලොකස්මිං අනභිරතිං උප්පාදෙන්තස්ස උප්පන්නසඤ්ඤා. පහානසඤ්ඤාවිරාගසඤ්ඤාති ද්වෙ පුබ්බභාගා. නිරොධසඤ්ඤා මිස්සකා. එවමෙතානි අට්ඨිකසඤ්ඤාදීනි වීසති කම්මට්ඨානානි නිද්දිට්ඨානි. තෙසං නවසු අප්පනා හොන්ති, එකාදස උපචාරජ්ඣානිකා. සෙසා පනෙත්ථ විනිච්ඡයකථා විසුද්ධිමග්ගෙ (විසුද්ධි. 1.294) ආගතාව. ගඞ්ගාපෙය්යාලාදයො මග්ගසංයුත්තෙ වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බා. २४८-२५७. 'अशुभसंज्ञा' म्हणजे अशुभाच्या आधारे उत्पन्न झालेली प्रथम ध्यान संज्ञा होय. 'मरणसंज्ञा' म्हणजे 'मला नक्कीच मरायचे आहे, माझे जीवन मरणाशी जोडलेले आहे' अशा प्रकारे सतत विचार करणाऱ्या भिक्खूच्या मनात उत्पन्न झालेली संज्ञा होय. 'आहारे प्रतिकूलसंज्ञा' म्हणजे भात, सातूचे पीठ इत्यादी गिळण्यायोग्य आहाराविषयी वाटणारी प्रतिकूलतेची (किळसवाणी) भावना होय. 'सर्वलोके अनभिरतिसंज्ञा' म्हणजे संपूर्ण जगाविषयी अनासक्ती (अरुची) उत्पन्न करणाऱ्या भिक्खूच्या मनात उत्पन्न झालेली संज्ञा होय. प्रहाणसंज्ञा आणि विरागसंज्ञा या दोन्ही पूर्वभागातील (मार्गाच्या आधीच्या अवस्थेतील) आहेत. निरोधसंज्ञा ही मिश्रित (लौकिक आणि लोकोत्तर दोन्ही) आहे. अशा प्रकारे, अट्ठिकसंज्ञा इत्यादी वीस कर्मस्थान या संयुत्तात दाखवले आहेत. त्यापैकी नऊ कर्मस्थानांमध्ये अर्पणा समाधी होते, आणि अकरा कर्मस्थाने उपचार ध्यानाशी संबंधित आहेत. या विषयावरील उर्वरित चर्चा विसुद्धिमग्गात आलेलीच आहे. गंगापेय्याला इत्यादींचा अर्थ मग्गसंयुत्तात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा. බොජ්ඣඞ්ගසංයුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. बोझङ्गसंयुत्तवण्णना निट्ठिता। 3. සතිපට්ඨානසංයුත්තං ३. सतिपट्ठानसंयुत्तं 1. අම්බපාලිවග්ගො १. अम्बपालिवग्गो 1. අම්බපාලිසුත්තවණ්ණනා १. अम्बपालिसुत्तवण्णना 367. සතිපට්ඨානසංයුත්තස්ස [Pg.213] පඨමෙ අම්බපාලිවනෙති අම්බපාලියා නාම රූපූපජීවිනියා රොපිතෙ අම්බවනෙ. තං කිර තස්සා උය්යානං අහොසි. සා සත්ථු ධම්මදෙසනං සුත්වා පසන්නචිත්තා තත්ථ විහාරං කාරෙත්වා තථාගතස්ස නිය්යාතෙසි. තං සන්ධායෙතං වුත්තං. එකායන්වායන්ති එකායනො අයං. තත්ථ එකායනොති එකමග්ගො. මග්ගස්ස හි – ३६७. सतिपट्ठानसंयुत्ताच्या पहिल्या सुत्तात 'अम्बपालिवने' (अम्बपालिच्या वनात) असे म्हटले आहे. अम्बपालि नावाच्या रूपोपजीवनीने (सौंदर्यावर उपजीविका करणाऱ्या गणिकेने) लावलेल्या आंब्याच्या बागेत (ते वन होते). ते तिचे उद्यान होते असे म्हणतात. तिने शास्त्यांची (बुद्धांची) धम्मदेशना ऐकून प्रसन्नचित्त होऊन, तिथे विहार बांधून तो तथागतांना अर्पण केला. त्याला उद्देशून हे म्हटले आहे. 'एकायनो अयं' असा पदच्छेद करावा. त्यात 'एकायनो' म्हणजे एकच मार्ग. कारण मार्गाचे — ‘‘මග්ගො පන්ථො පථො පජ්ජො, අඤ්ජසං වටුමායනං; නාවා උත්තරසෙතූ ච, කුල්ලො ච භිසි සඞ්කමො’’ති. (චූළනි. පාරායනත්ථුතිගාථානිද්දෙසො 101) – “मग्गो पन्थो पथो पज्जो, अञ्जसं वटुमायनं। नावा उत्तरसेतू च, कुल्लो च भिसि सङ्कमो”ति। (चुळनिद्देस, पारायणत्थुतिगाथानिद्देस १०१) — බහූනි නාමානි. ස්වායං ඉධ අයනනාමෙන වුත්තො. තස්මා එකායන්වායං, භික්ඛවෙ, මග්ගොති එත්ථ එකමග්ගො. අයං, භික්ඛවෙ, මග්ගො, න ද්වෙධාපථභූතොති එවමත්ථො දට්ඨබ්බො. මග්ගොති කෙනට්ඨෙන මග්ගො? නිබ්බානගමනට්ඨෙන, නිබ්බානත්ථිකෙහි මග්ගනීයට්ඨෙන ච. अशी अनेक नावे आहेत. तोच हा मार्ग येथे 'अयन' या नावाने सांगितला आहे. म्हणून 'एकायनो अयं, भिक्खवे, मग्गो' (हे भिक्खूहो, हा एकायन मार्ग आहे) यामध्ये 'एकच मार्ग' असा अर्थ आहे. 'हे भिक्खूहो, हा मार्ग दुभंगलेला (दोन फाटे असलेला) मार्ग नाही', असा अर्थ येथे समजावा. 'मग्गो' (मार्ग) हा कोणत्या अर्थाने मार्ग आहे? निर्वाणाकडे जाण्याचा मार्ग असल्यामुळे आणि निर्वाणाची इच्छा करणाऱ्या मुमुक्षूंद्वारे शोधला जाण्यायोग्य असल्यामुळे याला मार्ग म्हणतात. සත්තානං විසුද්ධියාති රාගාදීහි මලෙහි අභිජ්ඣාවිසමලොභාදීහි ච උපක්කිලෙසෙහි සංකිලිට්ඨචිත්තානං සත්තානං විසුද්ධත්ථාය. සොකපරිදෙවානං සමතික්කමායාති සොකස්ස ච පරිදෙවස්ස ච සමතික්කමාය, පහානායාති අත්ථො. දුක්ඛදොමනස්සානං අත්ථඞ්ගමායාති කායිකදුක්ඛස්ස ච චෙතසිකදොමනස්සස්ස චාති ඉමෙසං ද්වින්නං අත්ථඞ්ගමාය, නිරොධායාති අත්ථො. ඤායස්ස අධිගමායාති ඤායො වුච්චති අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො, තස්ස අධිගමාය පත්තියාති වුත්තං හොති. අයඤ්හි පුබ්බභාගෙ ලොකියො සතිපට්ඨානමග්ගො භාවිතො ලොකුත්තරමග්ගස්ස අධිගමාය සංවත්තති. තෙනාහ ‘‘ඤායස්ස අධිගමායා’’ති. නිබ්බානස්ස සච්ඡිකිරියායාති තණ්හාවානවිරහිතත්තා නිබ්බානන්ති ලද්ධනාමස්ස අමතස්ස සච්ඡිකිරියාය, අත්තපච්චක්ඛායාති වුත්තං හොති. අයඤ්හි මග්ගො භාවිතො අනුපුබ්බෙන නිබ්බානසච්ඡිකිරියං සාධෙති. තෙනාහ ‘‘නිබ්බානස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති. 'सत्तानं विसुद्धिया' (प्राण्यांच्या शुद्धीसाठी) म्हणजे राग इत्यादी मळांमुळे आणि अभिध्या (लोभ), विषमलोभ इत्यादी उपक्किलेशांमुळे (उपक्लेशांमुळे) मलीन चित्त झालेल्या प्राण्यांच्या विशुद्धीसाठी. 'सोकपरिदेवानं समtिक्कमाय' (शोक आणि आक्रंदन यांच्या अतिक्रमणासाठी) म्हणजे शोक आणि परिदेव (रडणे-ओरडणे) ओलांडून जाण्यासाठी, म्हणजेच त्यांच्या प्रहाणासाठी (नाशासाठी) असा अर्थ आहे. 'दुक्खदोमनस्सानं अत्थङ्गमाय' (दुःख आणि दौर्मनस्य यांच्या अस्तासाठी) म्हणजे कायिक दुःख (शारीरिक वेदना) आणि चैतसिक दौर्मनस्य (मानसिक दुःख) या दोन्हीच्या अस्तासाठी, म्हणजेच त्यांच्या निरोधासाठी असा अर्थ आहे. 'ञायस्स अधिगमाय' (न्यायाच्या अधिगमासाठी) यामध्ये 'ञाय' म्हणजे आर्य अष्टांगिक मार्ग होय; त्याच्या अधिगमासाठी म्हणजेच प्राप्तीसाठी असे म्हटले आहे. कारण पूर्वभागात (सुरुवातीला) हा लौकिक सतिपट्ठान मार्ग भावित (अभ्यासित) केला असता, तो लोकोत्तर मार्गाच्या अधिगमासाठी कारणीभूत ठरतो. म्हणून 'ञायस्स अधिगमाय' असे म्हटले आहे. 'निब्बानस्स सच्छिकिरियाय' (निर्वाणाच्या साक्षात्कारासाठी) म्हणजे तृष्णारूपी विणकामापासून (वाण) विरहित असल्यामुळे 'निर्वाण' असे नाव मिळालेल्या अमृत तत्त्वाचा साक्षात्कार करण्यासाठी, स्वतः प्रत्यक्ष अनुभवण्यासाठी असे म्हटले आहे. कारण हा मार्ग भावित केला असता, तो अनुक्रमाने निर्वाणाचा साक्षात्कार घडवून आणतो. म्हणून 'निब्बानस्स सच्छिकिरियाय' असे म्हटले आहे. එවං [Pg.214] භගවතා සත්තහි පදෙහි එකායනමග්ගස්ස වණ්ණො භාසිතො, සො කස්මාති චෙ? භික්ඛූනං උස්සාහජනනත්ථං. වණ්ණභාසනඤ්හි සුත්වා තෙ භික්ඛූ – ‘‘අයං කිර මග්ගො හදයසන්තාපභූතං සොකං, වාචාවිප්පලාපභූතං පරිදෙවං, කායිකඅසාතභූතං දුක්ඛං, චෙතසිකඅසාතභූතං දොමනස්සන්ති චත්තාරො උපද්දවෙ හරති. විසුද්ධිං, ඤායං, නිබ්බානන්ති තයො විසෙසෙ ආවහතී’’ති උස්සාහජාතා ඉමං දෙසනං උග්ගහෙතබ්බං පරියාපුණිතබ්බං, ධාරෙතබ්බං, ඉමඤ්ච මග්ගං භාවෙතබ්බං මඤ්ඤිස්සන්ති. ඉති තෙසං භික්ඛූනං උස්සාහජනනත්ථං වණ්ණං අභාසි කම්බලවාණිජාදයො කම්බලාදීනං වණ්ණං විය. अशा प्रकारे भगवंतांनी सात पदांद्वारे एकायन मार्गाची प्रशंसा (गुणवर्णन) केली आहे. ती कशासाठी केली आहे? भिक्खूंच्या मनात उत्साह निर्माण करण्यासाठी. कारण गुणांची प्रशंसा ऐकून ते भिक्खू विचार करतील की—'हा मार्ग खरोखरच हृदय संतापवून टाकणारा शोक, वाणीच्या विलापरूप असलेला परिदेव (आक्रंदन), शारीरिक वेदनेरूप असलेले दुःख आणि मानसिक वेदनेरूप असलेले दौर्मनस्य या चार उपद्रवांचे हरण करतो; तसेच विशुद्धी, न्याय (आर्य मार्ग) आणि निर्वाण या तीन विशेष गुणांना प्राप्त करून देतो.' अशा प्रकारे उत्साही होऊन ते 'ही देशना ग्रहण करण्यायोग्य, अभ्यासण्यायोग्य, धारण करण्यायोग्य आहे आणि या मार्गाची भावना (अभ्यास) करणे आवश्यक आहे' असे मानतील. अशा प्रकारे त्या भिक्खूंच्या मनात उत्साह निर्माण करण्यासाठी भगवंतांनी गुणांचे वर्णन केले, जसे एखादा घोंगड्या (कंबली) विकणारा व्यापारी घोंगड्यांच्या गुणांचे वर्णन करतो त्याप्रमाणे. යදිදන්ති නිපාතො, යෙ ඉමෙති අයමස්ස අත්ථො. චත්තාරොති ගණනපරිච්ඡෙදො. තෙන ‘‘න තතො හෙට්ඨා, න උද්ධ’’න්ති සතිපට්ඨානපරිච්ඡෙදං දීපෙති. සතිපට්ඨානාති තයො සතිපට්ඨානා සතිගොචරොපි, තිධා පටිපන්නෙසු සාවකෙසු සත්ථුනො පටිඝානුනයවීතිවත්තතාපි, සතිපි. ‘‘චතුන්නං, භික්ඛවෙ, සතිපට්ඨානානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච දෙසෙස්සාමි තං සුණාථ. කො ච, භික්ඛවෙ, කායස්ස සමුදයො? ආහරසමුදයා කායසමුදයො’’තිආදීසු (සං. නි. 5.408) හි සතිගොචරො සතිපට්ඨානන්ති වුත්තො. තථා ‘‘කායො උපට්ඨානං, නො සති, සති උපට්ඨානඤ්චෙව සති චා’’තිආදීසුපි (පටි. ම. 2.35). තස්ස අත්ථො – පතිට්ඨාති අස්මින්ති පට්ඨානං. කා පතිට්ඨාති? සති. සතියා පට්ඨානං සතිපට්ඨානං. පධානං ඨානන්ති වා පට්ඨානං. සතියා පට්ඨානං සතිපට්ඨානං හත්ථිට්ඨානඅස්සට්ඨානාදීනි විය. 'यदिदं' हा निपात आहे. 'जे हे' असा याचा अर्थ आहे. 'चत्तारो' (चार) हा संख्यावाचक शब्द आहे. त्याद्वारे 'त्यापेक्षा कमी नाही आणि जास्तही नाही' अशी सतिपट्ठानाची मर्यादा दर्शविली आहे. 'सतिपट्ठान' चे तीन प्रकार आहेत: सतीचा गोचर (विषय) देखील सतिपट्ठान आहे; तीन प्रकारे आचरण करणाऱ्या श्रावकांमध्ये शास्त्यांचे (बुद्धांचे) राग आणि अनुनय (आसक्ती आणि द्वेष) यांपासून विरहित असणे देखील सतिपट्ठान आहे; आणि सती (स्मृती) स्वतः देखील सतिपट्ठान आहे. 'हे भिक्खूहो, मी चार सतिपट्ठानांचा उदय आणि अस्त सांगेन, तो ऐका. हे भिक्खूहो, कायाचा उदय कोणता? आहाराच्या उदयामुळे कायाचा उदय होतो...' इत्यादी वचनांमध्ये सतीचा गोचर (विषय) याला 'सतिपट्ठान' म्हटले आहे. तसेच 'काय हे उपस्थान (उपस्थिती) आहे, सती नाही; सती ही उपस्थान देखील आहे आणि सती देखील आहे' इत्यादी वचनांमध्येही (सतीचा गोचर हाच सतिपट्ठान सांगितला आहे). त्याचा अर्थ असा—ज्यामध्ये (सती) प्रतिष्ठित होते, ते 'पट्ठान' (प्रतिष्ठान) होय. काय प्रतिष्ठित होते? सती. सतीचे प्रतिष्ठान म्हणजे 'सतिपट्ठान'. किंवा micron स्थान म्हणजे 'पट्ठान'. सतीचे प्रधान स्थान म्हणजे 'सतिपट्ठान', जसे हत्तीचे स्थान (हत्तीशाळा), घोड्याचे स्थान (पागा) इत्यादी. ‘‘තයො සතිපට්ඨානා, යදරියො සෙවති, යදරියො සෙවමානො සත්ථා ගණමනුසාසිතුමරහතී’’ති (ම. නි. 3.311) එත්ථ තිධා පටිපන්නෙසු සාවකෙසු සත්ථුනො පටිඝානුනයවීතිවත්තතා සතිපට්ඨානන්ති වුත්තා. තස්සත්ථො – පට්ඨපෙතබ්බතො පට්ඨානං, පවත්තයිතබ්බතොති අත්ථො. කෙන පට්ඨපෙතබ්බොති? සතියා. සතියා පට්ඨානං සතිපට්ඨානන්ති. “तीन सतिपट्ठान आहेत, ज्यांचे आर्य (बुद्ध) सेवन करतात, ज्यांचे सेवन करत शास्ते (बुद्ध) संघाला उपदेश करण्यास पात्र ठरतात” (मज्झिम निकाय ३.३११) येथे, तीन प्रकारे आचरण करणाऱ्या श्रावकांमध्ये शास्त्यांचे राग आणि अनुनय (द्वेष आणि आसक्ती) यांपासून विरहित असणे याला 'सतिपट्ठान' म्हटले आहे. त्याचा अर्थ असा—प्रस्थापित करण्यायोग्य असल्यामुळे 'पट्ठान', म्हणजेच प्रवृत्त (सुरू) करण्यायोग्य असा अर्थ आहे. कशाद्वारे प्रस्थापित करण्यायोग्य? सतीद्वारे (स्मृतीद्वारे). सतीद्वारे प्रस्थापित करणे म्हणजे 'सतिपट्ठान'. ‘‘චත්තාරො සතිපට්ඨානා භාවිතා බහුලීකතා සත්ත බොජ්ඣඞ්ගෙ පරිපූරෙන්තී’’තිආදීසු (ම. නි. 3.147; සං. නි. 5.989) පන සතියෙව සතිපට්ඨානන්ති වුත්තා. තස්සත්ථො – පතිට්ඨාතීති පට්ඨානං, උපට්ඨාති ඔක්කන්දිත්වා පක්ඛන්දිත්වා පවත්තතීති අත්ථො. සතියෙව [Pg.215] පට්ඨානං සතිපට්ඨානං. අථ වා සරණට්ඨෙන සති, උපට්ඨානට්ඨෙන පට්ඨානං, ඉති සති ච සා පට්ඨානඤ්චාතිපි සතිපට්ඨානං. ඉදමිධ අධිප්පෙතං. परंतु 'चार सतिपट्ठान भावित आणि बहुलीकृत केले असता सात बोज्झंगांना (बोध्यंगांना) परिपूर्ण करतात' इत्यादी वचनांमध्ये सतीलाच (स्मृतीलाच) 'सतिपट्ठान' म्हटले आहे. त्याचा अर्थ असा—प्रतिष्ठित होते म्हणून 'पट्ठान', म्हणजेच (आलंबनात) प्रवेश करून, झेप घेऊन प्रवृत्त होते असा अर्थ आहे. सती स्वतःच प्रतिष्ठान आहे म्हणून 'सतिपट्ठान'. अथवा, स्मरण करण्याच्या अर्थाने 'सती' आणि उपस्थित राहण्याच्या अर्थाने 'पट्ठान', अशा प्रकारे जी सती आहे तीच पट्ठान देखील आहे, म्हणून 'सतिपट्ठान'. येथे (या सुत्तात) हाच अर्थ अभिप्रेत आहे. යදි එවං කස්මා ‘‘සතිපට්ඨානා’’ති බහුවචනං කතන්ති? සතීනං බහුත්තා. ආරම්මණභෙදෙන හි බහුකා සතියො. අථ ‘‘මග්ගො’’ති කස්මා එකවචනන්ති? මග්ගනට්ඨෙන එකත්තා. චතස්සොපි හි එතා සතියො මග්ගනට්ඨෙන එකත්තං ගච්ඡන්ති. වුතඤ්හෙතං ‘‘මග්ගොති කෙනට්ඨෙන මග්ගො? නිබ්බානමග්ගනට්ඨෙන, නිබ්බානත්ථිකෙහි මග්ගනීයට්ඨෙන චා’’ති. චතස්සොපි චෙතා අපරභාගෙ කායාදීසු ආරම්මණෙසු කිච්චං සාධයමානා නිබ්බානං ගච්ඡන්ති, ආදිතො පට්ඨාය ච නිබ්බානත්ථිකෙහි මග්ගියන්තීති තස්මා චතස්සොපි එකො මග්ගොති වුත්තා. එවඤ්ච සති වචනානුසන්ධිනා සානුසන්ධිකාව දෙසනා හොති. जर असे आहे, तर 'सतिपट्ठाना' असे bahuvacana का केले आहे? सती अनेक असल्यामुळे. कारण आलंबनांच्या (विषयांच्या) भेदांमुळे सती अनेक प्रकारच्या होतात. तर मग 'मग्गो' (मार्ग) असे एकवचन का केले आहे? मार्गक्रमणाच्या (निर्वाणाकडे जाण्याच्या) अर्थाने एकच असल्यामुळे. कारण या चारही सती मार्गक्रमणाच्या अर्थाने एकत्वाला प्राप्त होतात. कारण हे म्हटलेच आहे—'मग्गो हा कोणत्या अर्थाने मार्ग आहे? निर्वाणाकडे जाण्याच्या अर्थाने आणि निर्वाणाची इच्छा करणाऱ्यांद्वारे शोधला जाण्याच्या अर्थाने.' या चारही सती नंतरच्या काळात काय इत्यादी आलंबनांवर आपले कार्य साधत निर्वाणाप्रत जातात, आणि सुरुवातीपासूनच निर्वाणाची इच्छा करणाऱ्यांद्वारे शोधल्या जातात; म्हणून या चारही मिळून 'एकच मार्ग' आहेत असे म्हटले आहे. आणि असे असताना, वचनांच्या परस्पर संबंधामुळे ही देशना सुसंगत (संबद्ध) ठरते. කතමෙ චත්තාරොති කථෙතුකම්යතාපුච්ඡා. කායෙති රූපකායෙ. කායානුපස්සීති කායං අනුපස්සනසීලො, කායං වා අනුපස්සමානො. අයඤ්හි භික්ඛු ඉමං කායං අනිච්චානුපස්සනාදීනං සත්තන්නං අනුපස්සනානං වසෙන අනිච්චතො අනුපස්සති, නො නිච්චතො, දුක්ඛතො අනුපස්සති, නො සුඛතො, අනත්තතො අනුපස්සති, නො අත්තතො, නිබ්බින්දති, නො නන්දති, විරජ්ජති, නො රජ්ජති, නිරොධෙති, නො සමුදෙති, පටිනිස්සජ්ජති, නො ආදියති. සො තං අනිච්චතො අනුපස්සන්තො නිච්චසඤ්ඤං පජහති, දුක්ඛතො අනුපස්සන්තො සුඛසඤ්ඤං පජහති, අනත්තතො අනුපස්සන්තො අත්තසඤ්ඤං පජහති, නිබ්බින්දන්තො නන්දිං පජහති, විරජ්ජන්තො රාගං පජහති, නිරොධෙන්තො සමුදයං පජහති, පටිනිස්සජ්ජන්තො ආදානං පජහතීති වෙදිතබ්බො. कोणते चार? (कतमे चत्तारो) हा प्रश्न सांगण्याच्या इच्छेने विचारलेला प्रश्न (कथेतुकम्यतापुच्छा) आहे. 'काये' म्हणजे रूपकायामध्ये. 'कायानुपस्सी' म्हणजे कायेचे (शरीराचे) वारंवार अनुदर्शन (अवलोकन) करण्याचा स्वभाव असलेला, किंवा कायेचे अनुदर्शन करणारा. कारण हा भिक्खू या कायेला अनित्यानुपश्यना इत्यादी सात अनुपश्यनांच्या द्वारे अनित्य म्हणून पाहतो, नित्य म्हणून नाही; दुःख म्हणून पाहतो, सुख म्हणून नाही; अनात्म म्हणून पाहतो, आत्म म्हणून नाही; कंटाळतो (निर्वेद पावतो), आनंद मानत नाही; विरक्त होतो, आसक्त होत नाही; निरोध करतो, समुदय करत नाही; त्याग करतो, ग्रहण करत नाही. तो त्याला अनित्य म्हणून पाहत असताना नित्यसंज्ञेचा त्याग करतो, दुःख म्हणून पाहत असताना सुखसंज्ञेचा त्याग करतो, अनात्म म्हणून पाहत असताना आत्मसंज्ञेचा त्याग करतो, निर्वेद पावत असताना नंदीचा (आनंदाचा) त्याग करतो, विरक्त होत असताना रागाचा त्याग करतो, निरोध करत असताना समुदयाचा त्याग करतो, त्याग करत असताना ग्रहणाचा (आदानाचा) त्याग करतो, असे जाणावे. විහරතීති ඉරීයති. ආතාපීති තීසු භවෙසු කිලෙසෙ ආතපතීති ආතාපො, වීරියස්සෙතං නාමං. ආතාපො අස්ස අත්ථීති ආතාපී. සම්පජානොති සම්පජඤ්ඤසඞ්ඛාතෙන ඤාණෙන සමන්නාගතො. සතිමාති කායපරිග්ගාහිකාය සතියා සමන්නාගතො. අයං පන යස්මා සතියා ආරම්මණං පරිග්ගහෙත්වා පඤ්ඤාය අනුපස්සති. න හි සතිවිරහිතස්ස අනුපස්සනා නාම අත්ථි, තෙනෙවාහ ‘‘සතිඤ්ච ඛ්වාහං, භික්ඛවෙ, සබ්බත්ථිකං වදාමී’’ති (සං. නි. 5.234). තස්මා එත්ථ ‘‘කායෙ කායානුපස්සී විහරතී’’ති එත්තාවතා කායානුපස්සනාසතිපට්ඨානං වුත්තං හොති. අථ වා යස්මා අනාතාපිනො [Pg.216] අන්තොසඞ්ඛෙපො අන්තරායකරො හොති, අසම්පජානො උපායපරිග්ගහෙ අනුපායපරිවජ්ජනෙ ච සම්මුය්හති, මුට්ඨස්සති උපායාපරිච්චාගෙ අනුපායාපරිග්ගහෙ ච අසමත්ථො හොති, තෙනස්ස තං කම්මට්ඨානං න සම්පජ්ජති. තස්මා යෙසං ධම්මානං ආනුභාවෙන තං සම්පජ්ජති, තෙසං දස්සනත්ථං ‘‘ආතාපී සම්පජානො සතිමා’’ති ඉදං වුත්තන්ති වෙදිතබ්බං. 'विहरति' म्हणजे विहार करतो (इरियापथ चालवतो). 'आतापी' म्हणजे तीन भवांमध्ये क्लेशांना चांगल्या प्रकारे जाळणारा तो 'आताप' होय; हे वीर्याचे (प्रयत्नाचे) नाव आहे. ज्याच्याकडे हा आताप आहे तो 'आतापी' होय. 'संपजानो' म्हणजे संप्रजन नावाच्या ज्ञानाने (प्रज्ञेने) युक्त असलेला. 'सतिमा' म्हणजे कायेचे ग्रहण करणाऱ्या स्मृतीने (सतीने) युक्त असलेला. परंतु हा भिक्खू ज्याअर्थी स्मृतीच्या द्वारे आलंबन ग्रहण करून प्रज्ञेने अनुदर्शन करतो. कारण स्मृतीशिवाय अनुदर्शन असूच शकत नाही, म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे— 'भिक्खूंनो, मी स्मृतीला सर्वार्थसाधक (सब्बत्थिक) म्हणतो.' म्हणून येथे 'काये कायानुपस्सी विहरति' एवढ्याने कायानुपश्यना सतिपट्ठान सांगितले गेले आहे. अथवा, ज्याअर्थी आळशी (अनातापी) माणसाचा आळस हा अंतरायकारक (अडथळा आणणारा) ठरतो, संप्रजन्य नसलेला मनुष्य योग्य उपायांचे ग्रहण करण्यात आणि अयोग्य उपायांचे वर्जन करण्यात गोंधळात पडतो, आणि स्मृतिभ्रष्ट (मुट्ठस्सती) मनुष्य योग्य उपायांचा त्याग न करण्यात आणि अयोग्य उपायांचे ग्रहण न करण्यात असमर्थ ठरतो, त्यामुळे त्याचे ते कम्मट्ठान सिद्ध होत नाही. म्हणून ज्या धर्मांच्या प्रभावाने ते कम्मट्ठान सिद्ध होते, ते दाखवण्यासाठी 'आतापी संपजानो सतिमा' हे तीन शब्द सांगितले आहेत, असे जाणावे. ඉති කායානුපස්සනාසතිපට්ඨානං සම්පයොගඞ්ගඤ්ජස්ස දස්සෙත්වා ඉදානි පහානඞ්ගං දස්සෙතුං විනෙය්ය ලොකෙ අභිජ්ඣාදොමනස්සන්ති වුත්තං. තත්ථ විනෙය්යාති තදඞ්ගවිනයෙන වා වික්ඛම්භනවිනයෙන වා විනයිත්වා. ලොකෙති තස්මිංයෙව කායෙ. කායො හි ඉධ ලුජ්ජනපලුජ්ජනට්ඨෙන ලොකොති අධිප්පෙතො. යස්මා පනස්ස න කායමත්තෙයෙව අභිජ්ඣාදොමනස්සං පහීයති, වෙදනාදීසුපි පහීයති එව. තස්මා ‘‘පඤ්චපි උපාදානක්ඛන්ධා ලොකො’’ති විභඞ්ගෙ (විභ. 362) වුත්තං. ලොකසඞ්ඛාතත්තා වා තෙසං ධම්මානං අත්ථුද්ධාරනයෙනෙතං වුත්තං. යං පනාහ ‘‘තත්ථ කතමො ලොකො, ස්වෙව කායො ලොකො’’ති, අයමෙවෙත්ථ අත්ථො. තස්මිං ලොකෙ අභිජ්ඣාදොමනස්සං විනෙය්යාති එවං සම්බන්ධො දට්ඨබ්බො. अशा प्रकारे कायानुपश्यना सतिपट्ठान आणि त्याचे संप्रयुक्त अंग दाखवून, आता प्रहाण-अंग (त्याग करण्याचे अंग) दाखवण्यासाठी 'विनेय्य लोके अभिज्झादोमनस्सं' (लोकातील अभिज्झा आणि दोमनस्स दूर करून) असे म्हटले आहे. तेथे 'विनेय्य' म्हणजे तदंग-विनयाने किंवा विष्कंभन-विनयाने दूर करून. 'लोके' म्हणजे त्याच कायेमध्ये. कारण येथे नष्ट होणे आणि विखुरणे (लुज्जन-पलुज्जन) या अर्थाने कायेलाच 'लोक' म्हटले गेले आहे. परंतु ज्याअर्थी केवळ कायेमध्येच अभिज्झा (लोभ) आणि दोमनस्स (दौर्मनस्य) नष्ट होत नाही, तर वेदना इत्यादींमध्येही ते नष्ट होतेच. म्हणूनच विभंगामध्ये 'पाचही उपादानस्कंध म्हणजे लोक होय' असे म्हटले आहे. किंवा त्या वेदना इत्यादी धर्मांना 'लोक' म्हटले गेल्यामुळे, अर्थ काढण्याच्या पद्धतीने हे सांगितले आहे. परंतु जे म्हटले आहे की— 'तेथे लोक कोणता? ती काया म्हणजेच लोक होय', हाच अर्थ येथे अभिप्रेत आहे. त्या लोकरूपी कायेमध्ये अभिज्झा आणि दोमनस्स दूर करून, असा संबंध येथे समजला पाहिजे. වෙදනාසූති එත්ථ තිස්සො වෙදනා, තා ච ලොකියා එව, චිත්තම්පි ලොකියං, තථා ධම්මා. යථා පන වෙදනා අනුපස්සිතබ්බා, තථා අනුපස්සන්තො එස වෙදනානුපස්සීති වෙදිතබ්බො. එස නයො චිත්තධම්මෙසු. කථඤ්ච වෙදනා අනුපස්සිතබ්බාති? සුඛා තාව වෙදනා දුක්ඛතො, දුක්ඛා සල්ලතො, අදුක්ඛමසුඛා අනිච්චතො. යථාහ – 'वेदनासू' (वेदनांमध्ये) येथे तीन वेदना अभिप्रेत आहेत, आणि त्या लौकिकच आहेत. चित्तही लौकिक आहे, तसेच धर्मही. ज्या प्रकारे वेदनांचे अनुदर्शन केले पाहिजे, त्या प्रकारे अनुदर्शन करणारा हा 'वेदनानुपस्सी' (वेदनांचे अनुदर्शन करणारा) आहे असे जाणावे. हाच नियम चित्त आणि धर्मांच्या बाबतीतही लागू होतो. आणि वेदनांचे अनुदर्शन कसे करावे? सुखद वेदनेचे दुःख म्हणून, दुःखद वेदनेचे शल्य (काटा) म्हणून, आणि अदुःख-असुख (उपेक्षा) वेदनेचे अनित्य म्हणून अनुदर्शन करावे. जसे म्हटले आहे— ‘‘යො සුඛං දුක්ඛතො අද්ද, දුක්ඛමද්දක්ඛි සල්ලතො; අදුක්ඛමසුඛං සන්තං, අද්දක්ඛි නං අනිච්චතො; ස වෙ සම්මද්දසො භික්ඛු, උපසන්තො චරිස්සතී’’ති. “ज्याने सुखाला दुःख म्हणून पाहिले, दुःखाला शल्य (काटा) म्हणून पाहिले; आणि शांत अशा अदुःख-असुख (उपेक्षा) वेदनेला अनित्य म्हणून पाहिले; तोच योग्य प्रकारे पाहणारा (सम्यग्दर्शी) भिक्खू शांत होऊन विहरेल।” සබ්බා එව චෙතා දුක්ඛාතිපි අනුපස්සිතබ්බා. වුත්තඤ්හෙතං ‘‘යංකිඤ්චි වෙදයිතං, සබ්බං තං දුක්ඛස්මින්ති වදාමී’’ති (සං. නි. 4.259). සුඛදුක්ඛතොපි ච අනුපස්සිතබ්බා, යථාහ [Pg.217] – ‘‘සුඛා ඛො, ආවුසො විසාඛ, වෙදනා ඨිතිසුඛා විපරිණාමදුක්ඛා’’ති (ම. නි. 1.465) සබ්බං විත්ථාරෙතබ්බං. අපිච අනිච්චාදිසත්තඅනුපස්සනාවසෙනපි අනුපස්සිතබ්බා. या सर्वच वेदना 'दुःख' म्हणूनही अनुदर्शन कराव्यात. कारण असे म्हटले आहे— 'जे काही अनुभवले जाते, ते सर्व दुःखात समाविष्ट आहे असे मी सांगतो.' आणि सुख-दुःख रूपानेही अनुदर्शन करावे, जसे म्हटले आहे— 'हे आवुसो विशाख, सुखद वेदना ही टिकून असेपर्यंत सुखद असते आणि तिचा विपरिणाम (बदल) दुःखद असतो.' हे सर्व सविस्तर जाणावे. शिवाय, अनित्य इत्यादी सात अनुपश्यनांच्या द्वारेही त्यांचे अनुदर्शन करावे. චිත්තධම්මෙසුපි චිත්තං තාව ආරම්මණාධිපතිසහජාතභූමිකම්මවිපාකකිරියාදිනානත්තභෙදානං අනිච්චාදිඅනුපස්සනානං සරාගාදීනඤ්ච භෙදානං වසෙන අනුපස්සිතබ්බං. ධම්මා සලක්ඛණසාමඤ්ඤලක්ඛණානං සුඤ්ඤතධම්මස්ස අනිච්චාදිසත්තඅනුපස්සනානං ‘‘සන්තං වා අජ්ඣත්තං කාමච්ඡන්ද’’න්තිආදීනඤ්ච පභෙදානං වසෙන අනුපස්සිතබ්බා. සෙසං වුත්තනයමෙව. අයමෙත්ථ සඞ්ඛෙපො, විත්ථාරො පන දීඝමජ්ඣිමට්ඨකථාසු (දී. නි. අට්ඨ. 2.373 ආදයො; ම. නි. අට්ඨ. 1.105 ආදයො) සතිපට්ඨානවණ්ණනායං වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බො. चित्त आणि धर्मांमध्येही, प्रथम चित्ताचे— आलंबन, अधिपती, सहजात, भूमी, कर्म, विपाक, क्रिया इत्यादी विविध भेदांच्या द्वारे, अनित्य इत्यादी अनुपश्यनांच्या द्वारे आणि सरागादी (रागयुक्त इत्यादी) भेदांच्या द्वारे अनुदर्शन करावे. धर्मांचे— स्वलक्षण आणि सामान्यलक्षण, शून्यताधर्म, अनित्य इत्यादी सात अनुपश्यना, आणि 'अध्यात्मिक कामच्छंद शांत आहे' इत्यादी भेदांच्या द्वारे अनुदर्शन करावे. उर्वरित भाग आधी सांगितलेल्या पद्धतीनेच आहे. हा येथे संक्षेप आहे, परंतु सविस्तर वर्णन दीघनिकाय आणि मज्झिमनिकायाच्या अट्ठकथांमधील सतिपट्ठानसुत्ताच्या वर्णनात सांगितलेल्या पद्धतीनेच जाणावे. 2. සතිසුත්තවණ්ණනා २. सतिसुत्तवण्णना (सति सूत्राचे स्पष्टीकरण) 368. දුතියෙ සතොති කායාදිඅනුපස්සනාසතියා සමන්නාගතො. සම්පජානොති චතුසම්පජඤ්ඤපඤ්ඤාය සමන්නාගතො. අභික්කන්තෙ පටික්කන්තෙති එත්ථ අභික්කන්තං වුච්චති ගමනං, පටික්කන්තං නිවත්තනං, තදුභයම්පි චතූසු ඉරියාපථෙසු ලබ්භති. ගමනෙ තාව පුරතො කායං අභිහරන්තො අභික්කමති නාම, පටිනිවත්තන්තො පටික්කමති නාම. ඨානෙපි ඨිතකොව කායං පුරතො ඔනමන්තො අභික්කමති නාම, පච්ඡතො අපනාමෙන්තො පටික්කමති නාම. නිසජ්ජායපි නිසින්නකොව ආසනස්ස පුරිමඅඞ්ගාභිමුඛො සංසරන්තො අභික්කමති නාම, පච්ඡිමඅඞ්ගප්පදෙසං පච්චාසංසරන්තො පටික්කමති නාම. නිපජ්ජනෙපි එසෙව නයො. ३६८. दुसऱ्या सूत्रात, 'सतो' म्हणजे काया इत्यादींचे अनुदर्शन करणाऱ्या स्मृतीने (सतीने) युक्त असलेला. 'संपजानो' म्हणजे चार प्रकारच्या संप्रजन-प्रज्ञेने युक्त असलेला. 'अभिक्कंते पटिक्कंते' येथे पुढे जाण्याला 'अभिक्कांत' म्हणतात आणि मागे फिरण्याला 'पटिक्कांत' म्हणतात. हे दोन्ही चारही इरियापथांमध्ये (शारीरिक स्थितींमध्ये) आढळतात. प्रथम चालताना, शरीराला पुढे नेणारा 'अभिक्कमति' (पुढे जातो) असे म्हटले जाते, आणि मागे फिरणारा 'पटिक्कमति' (मागे फिरतो) असे म्हटले जाते. उभे राहण्याच्या स्थितीतही, उभे राहूनच शरीराला पुढे झुकवणारा 'अभिक्कमति' आणि मागे झुकवणारा 'पटिक्कमति' असे म्हटले जाते. बसण्याच्या स्थितीतही, बसूनच आसनाच्या पुढच्या भागाकडे सरकणारा 'अभिक्कमति' आणि मागच्या भागाकडे सरकणारा 'पटिक्कमति' असे म्हटले जाते. झोपण्याच्या स्थितीतही हाच नियम आहे. සම්පජානකාරී හොතීති සම්පජඤ්ඤෙන සබ්බකිච්චකාරී, සම්පජඤ්ඤස්සෙව වා කාරී. සො හි අභික්කන්තාදීසු සම්පජඤ්ඤං කරොතෙව, න කත්ථචි සම්පජඤ්ඤවිරහිතො හොති. 'संपजानकारी होती' म्हणजे संप्रजनपूर्वक सर्व कार्ये करणारा, किंवा संप्रजनच आचरणारा. कारण तो पुढे जाणे इत्यादी क्रियांमध्ये संप्रजनच करतो, कधीही संप्रजनरहित होत नाही. තත්ථ සාත්ථකසම්පජඤ්ඤං, සප්පායසම්පජඤ්ඤං, ගොචරසම්පජඤ්ඤං, අසම්මොහසම්පජඤ්ඤන්ති චතුබ්බිධං සම්පජඤ්ඤං. තත්ථ අභික්කමනචිත්තෙ උප්පන්නෙ චිත්තවසෙනෙව අගන්ත්වා ‘‘කිං නු මෙ එත්ථ ගතෙන අත්ථො අත්ථි, නත්ථී’’ති අත්ථානත්ථං පරිග්ගණ්හිත්වා අත්ථපරිග්ගණ්හනං සාත්ථකසම්පජඤ්ඤං. තත්ථ ච අත්ථොති චෙතියදස්සනබොධිදස්සනසඞ්ඝදස්සනථෙරදස්සනඅසුභදස්සනාදිවසෙන ධම්මතො වඩ්ඪි[Pg.218]. චෙතියං දිස්වාපි හි බුද්ධාරම්මණං, සඞ්ඝදස්සනෙන සඞ්ඝාරම්මණං පීතිං උප්පාදෙත්වා තදෙව ඛයතො සම්මසන්තො අරහත්තං පාපුණාති. මහාවිහාරස්මිඤ්හි දක්ඛිණද්වාරෙ ඨත්වා මහාචෙතියං ඔලොකෙන්තා තිංසසහස්සභික්ඛූ අරහත්තං පාපුණිංසු, තථා පච්ඡිමද්වාරෙ උත්තරද්වාරෙ පාචීනද්වාරෙ ච, තථා පඤ්හමණ්ඩපට්ඨානෙ අභයවාපිපාළියං, ථූපාරාමද්වාරෙ නගරස්ස දක්ඛිණද්වාරෙ අනුරාධවාපිපාළියං. त्यामध्ये सार्थकसंपजन्य (सात्थकसम्पजञ्ञ), सप्पायसंपजन्य (सप्पायसम्पजञ्ञ), गोचरसंपजन्य (गोचरसम्पजञ्ञ) आणि असंमोहसंपजन्य (असम्मोहसम्पजञ्ञ) असे चार प्रकारचे संपजन्य (सम्पजञ्ञ - सम्यक् ज्ञान) आहे. त्यामध्ये, पुढे जाण्याचा विचार मनात आल्यावर केवळ मनाच्या ओघाने न जाता, “येथे गेल्याने माझा काही फायदा (हित) आहे की नाही?” अशा प्रकारे हिताहिताचा विचार करून हिताचे ग्रहण करणे म्हणजे 'सार्थकसंपजन्य' होय. आणि तेथे 'हित' (अत्थ) म्हणजे चैत्यदर्शन (चेतियदस्सन), बोधिवृक्षदर्शन, संघदर्शन, स्थविरदर्शन, अशुभाचे दर्शन इत्यादींद्वारे धर्मात वृद्धी होणे होय. कारण चैत्य पाहून बुद्धारंभी (बुद्धाला आळवून) प्रीती उत्पन्न करून, किंवा संघदर्शनाने संघारंभी प्रीती उत्पन्न करून, त्याच प्रीतीचा क्षय आणि व्यय या रूपाने विचार (विपश्यना) करत मनुष्य अर्हत्त्व प्राप्त करतो. महाविहाराच्या दक्षिण दारापाशी उभे राहून महाचैत्याचे दर्शन घेताना तीस हजार भिक्खूंनी अर्हत्त्व प्राप्त केले होते; तसेच पश्चिम दारापाशी, उत्तर दारापाशी आणि पूर्व दारापाशी; तसेच प्रश्नमंडपाच्या ठिकाणी, अभय तलावाच्या काठावर (अभयवापिपाळि), थूपाराम दारापाशी, नगराच्या दक्षिण दारापाशी आणि अनुराध तलावाच्या काठावर (अनुराधवापिपाळि). මහාඅරියවංසභාණකත්ථෙරො පනාහ ‘‘කිං තුම්හෙ වදථ, මහාචෙතියස්ස සමන්තා කුච්ඡිවෙදිකාය හෙට්ඨිමභාගතො පට්ඨාය පඤ්ඤායනට්ඨානෙ යත්ථ යත්ථ ද්වෙ පාදා සක්කා හොන්ති සමං පතිට්ඨාපෙතුං, තත්ථ තත්ථ එකපදුද්ධාරෙ තිංසතිංස භික්ඛුසහස්සානි අරහත්තං පාපුණිංසූති සක්කා වතු’’න්ති. අපරො පන මහාථෙරො ආහ – ‘‘මහාචෙතියතලෙ ආකිණ්ණවාලිකාය බහුතරා භික්ඛූ අරහත්තං පත්තා’’ති. ථෙරෙ දිස්වා තෙසං ඔවාදෙ පතිට්ඨාය අසුභං දිස්වා තත්ථ පඨමං ඣානං උප්පාදෙත්වා තදෙව ඛයතො සම්මසන්තො අරහත්තං පාපුණාති. තස්මා එතෙසං දස්සනං සාත්ථං. කෙචි පන – ‘‘ආමිසතොපි වඩ්ඪි අත්ථොයෙව, තං නිස්සාය බ්රහ්මචරියානුග්ගහාය පටිපන්නත්තා’’ති වදන්ති. महाअरियवंसभाणक थेर म्हणाले, "तुम्ही काय म्हणता? महास्तूपाच्या सभोवतालच्या कुच्छिवेदिकेच्या (मध्यवेदिकेच्या) खालच्या भागापासून सुरू करून, डोळ्यांना दिसणाऱ्या अशा ज्या ज्या ठिकाणी दोन्ही पाय समान रीतीने ठेवता येणे शक्य आहे, त्या त्या ठिकाणी पाऊल टाकण्याच्या प्रत्येक एका जागेवर तीस-तीस हजार भिक्खूंनी अरहंतपद प्राप्त केले, असे म्हणता येणे शक्य आहे." दुसऱ्या एका महाथेरांनी म्हटले, "महास्तूपाच्या प्रांगणात पसरलेल्या वाळूवर अनेक भिक्खूंनी अरहंतपद प्राप्त केले आहे." थेरांचे दर्शन घेऊन, त्यांच्या उपदेशात प्रतिष्ठित होऊन, अशुभाचे दर्शन घेऊन, तिथे प्रथम ध्यान उत्पन्न करून आणि त्याच ध्यानाला क्षयशील मानून विपश्यना करत तो अरहंतपद प्राप्त करतो. म्हणून त्यांचे दर्शन सार्थ आहे. परंतु काही आचार्य म्हणतात, "आमिषाच्या (भौतिक वस्तूंच्या) दृष्टीनेही वृद्धी होतेच, कारण त्याचा आश्रय घेऊन ब्रह्मचर्याला साहाय्य करण्यासाठी ते प्रवृत्त झाले आहेत." තස්මිං පන ගමනෙ සප්පායාසප්පායං පරිග්ගණ්හිත්වා සප්පායපරිග්ගණ්හනං සප්පායසම්පජඤ්ඤං. සෙය්යථිදං? චෙතියදස්සනං තාව සාත්ථං. සචෙ පන චෙතියස්ස මහාපූජාය දසද්වාදසයොජනන්තරෙ පරිසා සන්නිපතන්ති, අත්තනො විභවානුරූපා ඉත්ථියොපි පුරිසාපි අලඞ්කතපටියත්තා චිත්තකම්මරූපකානි විය සඤ්චරන්ති. තත්ර චස්ස ඉට්ඨෙ ආරම්මණෙ ලොභො, අනිට්ඨෙ පටිඝො, අසමපෙක්ඛනෙ මොහො උප්පජ්ජති, කායසංසග්ගෙ කායසංසග්ගාපත්තිං ආපජ්ජති, ජීවිතබ්රහ්මචරියානං වා අන්තරායො ච හොති. එවං තං ඨානං අසප්පායං හොති, වුත්තප්පකාරඅන්තරායාභාවෙ සප්පායං. සඞ්ඝදස්සනම්පි සාත්ථං. සචෙ පන අන්තොගාමෙ මහාමණ්ඩපං කාරෙත්වා සබ්බරත්තිං ධම්මස්සවනං කාරෙන්තෙසු මනුස්සෙසු වුත්තප්පකාරෙනෙව ජනසන්නිපාතො චෙව අන්තරායො ච හොති, එවං තං ඨානං අසප්පායං, අන්තරායාභාවෙ සප්පායං. මහාපරිවාරානං ථෙරානං දස්සනෙපි එසෙව නයො. त्या जाण्याच्या क्रियेमध्ये अनुकूल व प्रतिकूल गोष्टींचा विचार करून अनुकूल गोष्टींचे ग्रहण करणे म्हणजे 'सप्पायसंपजञ्ञ' (अनुकूलतेचे संप्रजन्य) होय. ते कसे? प्रथम तर चेतियदर्शन (स्तूपाचे दर्शन) सार्थ आहे. परंतु जर स्तूपाच्या महापूजेच्या वेळी दहा-बारा योजनांच्या परिघात लोक एकत्र येत असतील, आणि आपापल्या वैभवानुसार स्त्रिया व पुरुष नटूनथटून चित्रविचित्र बाहुल्यांप्रमाणे इकडेतिकडे फिरत असतील, तर तिथे त्या भिक्खूच्या मनात इष्ट आलंबनाविषयी लोभ, अनिष्ट आलंबनाविषयी प्रतिघ (द्वेष) आणि अयोग्य विचारामुळे मोह उत्पन्न होतो, कायसंसर्गामुळे कायसंसर्ग आपत्ती ओढवून घेतो, किंवा जीवन आणि ब्रह्मचर्याला अंतराय (धोका) निर्माण होतो. अशा प्रकारे ते स्थान 'असप्पाय' (प्रतिकूल) ठरते; आणि वर सांगितलेल्या अंतरायांचा अभाव असल्यास ते 'सप्पाय' (अनुकूल) ठरते. संघदर्शनही सार्थ आहे. परंतु जर गावाच्या आत मोठा मंडप उभारून लोक रात्रभर धम्मश्रवण करत असतील आणि वर सांगितल्याप्रमाणेच लोकांची गर्दी व अंतराय निर्माण होत असतील, तर ते स्थान 'असप्पाय' (प्रतिकूल) ठरते; आणि अंतराय नसतील तर 'सप्पाय' (अनुकूल) ठरते. मोठा परिवार असलेल्या थेरांच्या दर्शनाबाबतही हाच नियम लागू होतो. අසුභදස්සනම්පි [Pg.219] සාත්ථං. තදත්ථදීපනත්ථඤ්ච ඉදං වත්ථු – එකො කිර දහරභික්ඛු සාමණෙරං ගහෙත්වා දන්තකට්ඨත්ථාය ගතො. සාමණෙරො මග්ගා ඔක්කමිත්වා පුරතො ගච්ඡන්තො අසුභං දිස්වා පඨමජ්ඣානං නිබ්බත්තෙත්වා තදෙව පාදකං කත්වා සඞ්ඛාරෙ සම්මසන්තො තීණි ඵලානි සච්ඡිකත්වා උපරිමග්ගත්ථාය කම්මට්ඨානං පරිග්ගහෙත්වා අට්ඨාසි. දහරො තං අපස්සන්තො ‘‘සාමණෙරා’’ති පක්කොසි. සො – ‘‘මයා පබ්බජිතදිවසතො පට්ඨාය භික්ඛුනා සද්ධිං ද්වෙ කථා නාම න කථිතපුබ්බා, අඤ්ඤස්මිම්පි දිවසෙ උපරිවිසෙසං නිබ්බත්තෙස්සාමී’’ති චින්තෙත්වා ‘‘කිං, භන්තෙ,’’ති පටිවචනං අදාසි. ‘‘එහී’’ති වුත්තෙ එකවචනෙනෙව ආගන්ත්වා – ‘‘භන්තෙ, ඉමිනා තාව මග්ගෙන ගන්ත්වා මයා ඨිතොකාසෙ මුහුත්තං පුරත්ථාභිමුඛා හුත්වා ඔලොකෙථා’’ති ආහ. සො තථා කත්වා තෙන පත්තවිසෙසමෙව පාපුණි. එවං එකං අසුභං ද්වින්නං ජනානං අත්ථාය ජාතං. එවං සාත්ථම්පි පනෙතං පුරිසස්ස මාතුගාමාසුභං අසප්පායං, මාතුගාමස්ස ච පුරිසාසුභං, සභාගමෙව සප්පායන්ති එවං සප්පායපරිග්ගණ්හනං සප්පායසම්පජඤ්ඤං. अशुभदर्शन (अशुभाचे ध्यान करणे) देखील सार्थ आहे. त्याचा अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी ही कथा आहे—असे ऐकिवात आहे की, एक तरुण भिक्खू एका सामणेराला सोबत घेऊन दंतकाष्ठ (दात घासण्याच्या काड्या) आणण्यासाठी गेला. तो सामणेर वाटेवरून बाजूला होऊन पुढे जात असताना, त्याला एक अशुभ (मृतदेह) दिसला. त्याने तिथे प्रथम ध्यान उत्पन्न केले आणि त्याच ध्यानाला आधार बनवून संस्कारांचे चिंतन करत तीन फळे साक्षात केली. त्यानंतर पुढील मार्गासाठी (अरहंत मार्गासाठी) कम्मट्ठानाचे ग्रहण करून तो तिथेच उभा राहिला. तरुण भिक्खूला तो न दिसल्यामुळे त्याने "सामणेरा!" अशी हाक मारली. त्याने विचार केला, "मी प्रव्रजित झाल्याच्या दिवसापासून भिक्खूंसोबत कधीही दोन शब्द बोललो नाही. दुसऱ्या दिवशी मी पुढील विशेष गुण प्राप्त करेन." असा विचार करून त्याने "काय, भंते?" असे उत्तर दिले. "इकडे ये" असे म्हटल्यावर तो एका शब्दासरशी आला आणि म्हणाला, "भंते, या मार्गाने जाऊन मी ज्या ठिकाणी उभा होतो, तिथे क्षणभर पूर्वेकडे तोंड करून पहा." त्या तरुण भिक्खूने तसेच केले आणि त्यानेही सामणेराने प्राप्त केलेल्या विशेष गुणालाच प्राप्त केले. अशा प्रकारे एक अशुभ दोन व्यक्तींच्या कल्याणासाठी कारणीभूत ठरले. अशा प्रकारे हे सार्थ असले तरी, पुरुषासाठी स्त्रीचे अशुभ असप्पाय (प्रतिकूल) असते आणि स्त्रीसाठी पुरुषाचे अशुभ असप्पाय असते. केवळ सजातीय अशुभच सप्पाय (अनुकूल) असते. अशा प्रकारे अनुकूलतेचे ग्रहण करणे म्हणजे 'सप्पायसंपजञ्ञ' होय. එවං පරිග්ගහිතසාත්ථසප්පායස්ස පන අට්ඨතිංසකම්මට්ඨානෙසු අත්තනො චිත්තරුචිකං කම්මට්ඨානසඞ්ඛාතං ගොචරං උග්ගහෙත්වා භික්ඛාචාරගොචරෙ තං ගහෙත්වාව ගමනං ගොචරසම්පජඤ්ඤං නාම. अशा प्रकारे सार्थ आणि अनुकूल गोष्टींचे ग्रहण केलेल्या भिक्खूने, अडतीस कम्मट्ठानांपैकी आपल्या मनाला आवडणारे कम्मठ्ठान नावाचे गोचर (आलंबन) ग्रहण करून, भिक्षाटनाच्या गावात ते कम्मठ्ठान मनात बाळगूनच जाणे म्हणजे 'गोचरसंपजञ्ञ' (गोचर संप्रजन्य) होय. තස්සාවිභාවත්ථං ඉදං චතුක්කං වෙදිතබ්බං – ඉධෙකච්චො භික්ඛු හරති න පච්චාහරති, එකච්චො පච්චාහරති න හරති, එකච්චො පන නෙව හරති න පච්චාහරති, එකච්චො හරති ච පච්චාහරති ච. ते स्पष्ट करण्यासाठी हा चतुष्क (चार प्रकार) समजून घेतला पाहिजे—येथे एखादा भिक्खू (जाताना कम्मठ्ठान) घेऊन जातो, पण (येताना) परत आणत नाही; एखादा भिक्खू (येताना कम्मठ्ठान) परत आणतो, पण (जाताना) घेऊन जात नाही; एखादा भिक्खू (जाताना) घेऊनही जात नाही आणि (येताना) परतही आणत नाही; आणि एखादा भिक्खू (जाताना) घेऊनही जातो आणि (येताना) परतही आणतो. තත්ථ යො භික්ඛු දිවසං චඞ්කමෙන නිසජ්ජාය ච ආවරණීයෙහි ධම්මෙහි චිත්තං පරිසොධෙත්වා තථා රත්තියා පඨමං යාමං මජ්ඣිමයාමෙ සෙය්යං කප්පෙත්වා, පච්ඡිමයාමෙපි නිසජ්ජාචඞ්කමෙහි වීතිනාමෙත්වා, පගෙව චෙතියඞ්ගණබොධියඞ්ගණවත්තං කත්වා බොධිරුක්ඛෙ උදකං ආසිඤ්චිත්වා පානීයං පරිභොජනීයං පච්චුපට්ඨපෙත්වා ආචරියුපජ්ඣායවත්තාදීනි සමාදාය වත්තති. සො සරීරපරිකම්මං කත්වා සෙනාසනං පවිසිත්වා ද්වෙ තයො පල්ලඞ්කෙ උසුමං ගාහාපෙන්තො කම්මට්ඨානමනුයුඤ්ජිත්වා භික්ඛාචාරවෙලාය උට්ඨහිත්වා කම්මට්ඨානසීසෙනෙව පත්තචීවරමාදාය සෙනාසනතො නික්ඛමිත්වා කම්මට්ඨානං මනසිකරොන්තොව චෙතියඞ්ගණං ගන්ත්වා සචෙ බුද්ධානුස්සතිකම්මට්ඨානං හොති, තං අවිස්සජ්ජෙත්වාව චෙතියඞ්ගණං පවිසති. අඤ්ඤං චෙ කම්මට්ඨානං හොති, සොපානපාදමූලෙ ඨත්වා හත්ථෙන ගහිතභණ්ඩං විය තං ඨපෙත්වා බුද්ධාරම්මණං [Pg.220] පීතිං ගහෙත්වා චෙතියඞ්ගණං ආරුය්හ මහන්තං චෙතියං චෙ, තික්ඛත්තුං පදක්ඛිණං කත්වා චතූසු ඨානෙසු වන්දිතබ්බං, ඛුද්දකං චෙ, තථෙව පදක්ඛිණං කත්වා අට්ඨසු ඨානෙසු වන්දිතබ්බං. චෙතියං වන්දිත්වා බොධියඞ්ගණං පත්තෙනාපි බුද්ධස්ස භගවතො සම්මුඛා විය නිපච්චකාරං දස්සෙත්වා බොධි වන්දිතබ්බා. සො එවං චෙතියඤ්ච බොධිඤ්ච වන්දිත්වා පටිසාමිතට්ඨානං ගන්ත්වා පටිසාමිතභණ්ඩකං හත්ථෙන ගණ්හන්තො විය නික්ඛිත්තකම්මට්ඨානං ගහෙත්වා ගාමසමීපෙ කම්මට්ඨානසීසෙනෙව චීවරං පාරුපිත්වා ගාමං පිණ්ඩාය පවිසති. त्यापैकी जो भिक्खू दिवसा चंक्रमणाने आणि बसून राहण्याने आवरणीय धर्मांपासून (नीवरणांपासून) आपले चित्त शुद्ध करतो, तसेच रात्रीच्या पहिल्या प्रहरात आणि शेवटच्या प्रहरात बसून व चंक्रमण करून वेळ घालवतो, आणि मध्यम प्रहरात विश्रांती घेतो; पहाटेच उठून चेतिय-प्रांगण आणि बोधी-प्रांगणाची कर्तव्ये पूर्ण करतो, बोधिवृक्षाला पाणी घालतो, पिण्याचे व वापरण्याचे पाणी आणून ठेवतो आणि आचार्य व उपाध्यायांचे कर्तव्य पूर्ण करतो. तो शरीराची स्वच्छता करून, आपल्या विहारात प्रवेश करतो आणि दोन-तीन वेळा मांडी घालून शरीराला उष्णता देत कम्मठ्ठनाचा अभ्यास करतो. भिक्षाटनाच्या वेळी उठून, कम्मठ्ठनालाच मुख्य मानून, पात्र व चीवर घेऊन विहारातून बाहेर पडतो आणि कम्मठ्ठनाचे मनन करतच चेतिय-प्रांगणाकडे जातो. जर त्याचे कम्मठ्ठान बुद्धानुस्मृती असेल, तर ते न सोडताच तो चेतिय-प्रांगणात प्रवेश करतो. जर दुसरे कम्मठ्ठान असेल, तर पायऱ्यांच्या पायथ्याशी उभे राहून, हातात घेतलेल्या वस्तूंप्रमाणे ते कम्मठ्ठान बाजूला ठेवून, बुद्धालंबनाची प्रीती ग्रहण करून तो चेतिय-प्रांगणात चढतो. जर स्तूप मोठा असेल, तर तीन वेळा प्रदक्षिणा करून चार ठिकाणी वंदन करावे; जर स्तूप लहान असेल, तर त्याचप्रमाणे प्रदक्षिणा करून आठ ठिकाणी वंदन करावे. स्तूपाला वंदन करून बोधी-प्रांगणात पोहोचल्यावरही, भगवान बुद्धांच्या प्रत्यक्ष समोर असल्याप्रमाणे अत्यंत नम्रता दाखवून बोधिवृक्षाला वंदन करावे. अशा प्रकारे स्तूपाला आणि बोधिवृक्षाला वंदन करून, तो कम्मठ्ठान ठेवलेल्या ठिकाणी जातो आणि सुरक्षित ठेवलेली वस्तू हातात घ्यावी त्याप्रमाणे बाजूला ठेवलेले कम्मठ्ठान पुन्हा ग्रहण करतो. गावाजवळ पोहोचल्यावर कम्मठ्ठनालाच मुख्य मानून चीवर परिधान करतो आणि भिक्षेसाठी गावात प्रवेश करतो. අථ නං මනුස්සා දිස්වා ‘‘අය්යො නො ආගතො’’ති පච්චුග්ගන්ත්වා පත්තං ගහෙත්වා ආසනසාලාය වා ගෙහෙ වා නිසීදාපෙත්වා යාගුං දත්වා යාව භත්තං න නිට්ඨාති, තාව පාදෙ ධොවිත්වා මක්ඛෙත්වා පුරතො නිසීදිත්වා පඤ්හං වා පුච්ඡන්ති, ධම්මං වා සොතුකාමා හොන්ති. සචෙපි න කථාපෙන්ති, ජනසඞ්ගහණත්ථං ධම්මකථා නාම කාතබ්බායෙවාති අට්ඨකථාචරියා වදන්ති. ධම්මකථා හි කම්මට්ඨානවිනිමුත්තා නාම නත්ථි, තස්මා කම්මට්ඨානසීසෙනෙව ධම්මං කථෙත්වා කම්මට්ඨානසීසෙනෙව ආහාරං පරිභුඤ්ජිත්වා අනුමොදනං කත්වා නිවත්තියමානෙහිපි මනුස්සෙහි අනුගතොව ගාමතො නික්ඛමිත්වා තත්ථ තෙ නිවත්තෙත්වා මග්ගං පටිපජ්ජති. त्यानंतर, त्या भिक्खूला पाहून लोक "आमचे आर्य (स्वामी) आले आहेत" असे म्हणून सामोरे जातात, त्यांचे भिक्षापात्र हाती घेतात, त्यांना आसनशाळेत किंवा घरात बसवून पेज (यागू) देतात. जोपर्यंत भोजन तयार होत नाही, तोपर्यंत त्यांचे पाय धुवून, त्यांना तेल लावून, समोर बसून ते प्रश्न विचारतात किंवा धम्म ऐकण्याची इच्छा व्यक्त करतात. जरी त्यांनी धम्म सांगण्यास सांगितले नाही, तरी लोकांवर अनुग्रह करण्यासाठी धम्मकथा (धम्मचर्चा) केलीच पाहिजे, असे अट्ठकथाचार्य म्हणतात. कारण कम्मट्ठानापासून (कर्मस्थानापासून) मुक्त अशी कोणतीही धम्मकथा नसते. म्हणून, कम्मट्ठानालाच मुख्य ठेवून धम्माचा उपदेश करून, कम्मट्ठानालाच मुख्य ठेवून आहाराचे सेवन करून आणि अनुमोदन करून, गावातून बाहेर पडताना सोबत येणाऱ्या लोकांना तेथूनच परत पाठवून ते आपल्या मार्गाने मार्गस्थ होतात। අථ නං පුරෙතරං නික්ඛමිත්වා බහිගාමෙ කතභත්තකිච්චා සාමණෙරදහරභික්ඛූ දිස්වා පච්චුග්ගන්ත්වා පත්තචීවරමස්ස ගණ්හන්ති. පොරාණකභික්ඛූ කිර න ‘‘අම්හාකං උපජ්ඣායො ආචරියො’’ති මුඛං ඔලොකෙත්වා වත්තං කරොන්ති, සම්පත්තපරිච්ඡෙදෙනෙව කරොන්ති. තෙ තං පුච්ඡන්ති – ‘‘භන්තෙ, එතෙ මනුස්සා තුම්හාකං කිං හොන්ති, මාතිපක්ඛතො සම්බන්ධා පිතිපක්ඛතො’’ති? කිං දිස්වා පුච්ඡථාති? තුම්හෙසු එතෙසං පෙමං බහුමානන්ති. ‘‘ආවුසො, යං මාතාපිතූහිපි දුක්කරතරං, තං එතෙ අම්හාකං කරොන්ති, පත්තචීවරම්පි නො එතෙසං සන්තකමෙව, එතෙසං ආනුභාවෙන නෙව භයෙ භයං, න ඡාතකෙ ඡාතකං ජානාම, එදිසා නාම අම්හාකං උපකාරිනො නත්ථී’’ති තෙසං ගුණෙ කථයන්තො ගච්ඡති. අයං වුච්චති හරති න පච්චාහරතීති. त्यानंतर, आधीच बाहेर पडून गावाबाहेर भोजन आटोपलेले सामणेर आणि तरुण भिक्खू त्या भिक्खूला पाहून सामोरे जातात आणि त्यांचे पात्र व चीवर हाती घेतात. प्राचीन काळातील भिक्खू "हे आमचे उपाज्झाय (उपाध्याय) किंवा आचार्य आहेत" असे तोंड पाहून (पक्षपात करून) कर्तव्य करत नसत, तर जो कोणी समोर येईल त्याच्याशी योग्य मर्यादेनेच कर्तव्य पार पाडत असत. ते त्यांना विचारतात, "भंते, हे लोक आपले कोण लागतात? मातृपक्षाकडील नातेवाईक आहेत की पितृपक्षाकडील?" मथेरांनी विचारले, "तुम्ही काय पाहून असे विचारत आहात?" तेव्हा ते म्हणतात, "आपल्याबद्दल त्यांचे प्रेम आणि आदर पाहून." मथेर म्हणतात, "आयुष्यमानांनो! जे आई-वडिलांना करणे देखील अत्यंत कठीण असते, ते हे लोक आमच्यासाठी करतात. आमचे पात्र आणि चीवर देखील यांचेच दिलेले आहे. यांच्याच प्रभावाने भीतीचा प्रसंग आला तरी आम्हाला भीती वाटत नाही, आणि दुष्काळ पडला तरी आम्हाला दुष्काळाची जाणीव होत नाही. यांच्यासारखे आमचे उपकारकर्ते दुसरे कोणीही नाहीत." अशा प्रकारे त्यांच्या गुणांचे वर्णन करत ते जातात. या भिक्खूला "घेऊन जाणारा, पण परत न आणणारा" असे म्हटले जाते। යස්ස පන පගෙව වුත්තප්පකාරං වත්තපටිපත්තිං කරොන්තස්ස කම්මජතෙජො පජ්ජලති, අනුපාදිණ්ණකං මුඤ්චිත්වා උපාදිණ්ණකං ගණ්හාති, සරීරතො සෙදා මුච්චන්ති, කම්මට්ඨානවීථිං නාරොහති, සො පගෙව පත්තචීවරමාදාය වෙගසාව චෙතියං [Pg.221] වන්දිත්වා ගොරූපානං නික්ඛමනවෙලායමෙව ගාමං යාගුභික්ඛාය පවිසිත්වා යාගුං ලභිත්වා ආසනසාලං ගන්ත්වා පිවති. අථස්ස ද්විත්තික්ඛත්තුං අජ්ඣොහරණමත්තෙනෙව කම්මජතෙජො උපාදිණ්ණකං මුඤ්චිත්වා අනුපාදිණ්ණකං ගණ්හාති, ඝටසතෙන න්හාතො විය තෙජොධාතුපරිළාහනිබ්බානං පත්වා කම්මට්ඨානසීසෙන යාගුං පරිභුඤ්ජිත්වා පත්තඤ්ච මුඛඤ්ච ධොවිත්වා අන්තරාභත්තෙ කම්මට්ඨානං මනසිකත්වා අවසෙසට්ඨානෙ පිණ්ඩාය චරිත්වා කම්මට්ඨානසීසෙන ආහාරං පරිභුඤ්ජිත්වා තතො පට්ඨාය පොඞ්ඛානුපොඞ්ඛං උපට්ඨහමානං කම්මට්ඨානං ගහෙත්වාව ආගච්ඡති. අයං වුච්චති පච්චාහරති න හරතීති. එදිසා ච භික්ඛූ යාගුං පිවිත්වා විපස්සනං ආරභිත්වා බුද්ධසාසනෙ අරහත්තං පත්තා නාම ගණනපථං වීතිවත්තා. සීහළදීපෙයෙව තෙසු තෙසු ගාමෙසු ආසනසාලායං න තං ආසනමත්ථි, යත්ථ යාගුං පිවිත්වා අරහත්තං පත්තා භික්ඛූ නත්ථීති. परंतु, ज्या भिक्खूची पहाटेच पूर्वोक्त प्रकारे कर्तव्याचे पालन करत असताना पचनक्रिया (कर्मज तेज) प्रदीप्त होते, आणि ती अनुपदिन्नक (अचेतन धातू) सोडून उपादिन्नक (शरीरातील जिवंत धातू) जाळू लागते, शरीरातून घाम सुटू लागतो आणि कम्मट्ठान (ध्यान) मार्गावर आरूढ होत नाही; तो भिक्खू पहाटेच पात्र व चीवर घेऊन वेगाने चैत्याची वंदना करतो आणि गाई गोठ्यातून बाहेर पडण्याच्या वेळीच पेजेच्या (यागूच्या) भिक्षेसाठी गावात प्रवेश करतो. पेज मिळवून तो आसनशाळेत जाऊन ती पितो. त्यानंतर, केवळ दोन-तीन घोट गिळल्यानेच त्याची पचनक्रिया उपादिन्नकाला सोडून अनुपदिन्नकाला (पेजेला) ग्रहण करते. जणू शंभर घड्यांनी स्नान केल्याप्रमाणे तेजोधातूच्या दाहशमनाला प्राप्त होऊन, कम्मट्ठानालाच मुख्य ठेवून पेजेचे सेवन करून, पात्र आणि तोंड धुवून, भोजनाच्या मधल्या काळात कम्मट्ठानाचे मनन करून, उर्वरित ठिकाणी भिक्षेसाठी फिरून, कम्मट्ठानालाच मुख्य ठेवून आहाराचे सेवन करून, त्यानंतर एकामागून एक निरंतर प्रकट होणाऱ्या कम्मट्ठानाला ग्रहण करूनच तो परत येतो. या भिक्खूला "परत आणणारा, पण घेऊन न जाणारा" असे म्हटले जाते. आणि अशा प्रकारे पेज पिऊन, विपस्सना सुरू करून बुद्धशासनात अरहंतपद प्राप्त केलेल्या भिक्खूंची संख्या अगणित आहे. केवळ सिंहलद्विपातच वेगवेगळ्या गावांतील आसनशाळांमध्ये असे एकही आसन नाही, जिथे पेज पिऊन भिक्खूंनी अरहंतपद प्राप्त केले नसेल। යො පන පමාදවිහාරී හොති නික්ඛිත්තධුරො, සබ්බවත්තානි භින්දිත්වා පඤ්චවිධචෙතොවිනිබන්ධබද්ධචිත්තො විහරන්තො ‘‘කම්මට්ඨානං නාම අත්ථී’’තිපි සඤ්ඤං අකත්වා ගාමං පිණ්ඩාය පවිසිත්වා අනනුලොමිකෙන ගිහිසංසග්ගෙන සංසට්ඨො චරිත්වා ච භුඤ්ජිත්වා ච තුච්ඡො නික්ඛමති. අයං වුච්චති නෙව හරති න පච්චාහරතීති. परंतु, जो भिक्खू प्रमादी जीवन जगतो, ज्याने आपले कर्तव्य (धुरा) सोडून दिले आहे, सर्व कर्तव्यांचा भंग करून पाच प्रकारच्या चेतोविनिबंधांनी (मनाच्या बंधनांनी) बद्ध चित्त असलेला होऊन राहतो, "कम्मट्ठान नावाची काही गोष्ट आहे" अशी जाणीवही न ठेवता भिक्षेसाठी गावात प्रवेश करतो, आणि अयोग्य अशा गृहस्थांच्या संसर्गाने युक्त होऊन फिरतो व भोजन करून रिक्त (कम्मट्ठानरहित) होऊन बाहेर पडतो; या भिक्खूला "घेऊनही न जाणारा आणि परतही न आणणारा" असे म्हटले जाते। යො පනායං හරති ච පච්චාහරති චාති වුත්තො, සො ගතපච්චාගතිකවත්තවසෙන වෙදිතබ්බො. අත්තකාමා හි කුලපුත්තා සාසනෙ පබ්බජිත්වා දසපි වීසම්පි තිංසම්පි චත්තාලීසම්පි පඤ්ඤාසම්පි සතම්පි එකතො වසන්තා කතිකවත්තං කත්වා විහරන්ති ‘‘ආවුසො, තුම්හෙ න ඉණට්ටා, න භයට්ටා, න ජීවිකාපකතා පබ්බජිතා, දුක්ඛා මුච්චිතුකාමා පනෙත්ථ පබ්බජිතා, තස්මා ගමනෙ උප්පන්නකිලෙසං ගමනෙයෙව නිග්ගණ්හථ, ඨානෙ, නිසජ්ජාය, සයනෙ උප්පන්නකිලෙසං සයනෙයෙව නිග්ගණ්හථා’’ති. තෙ එවං කතිකවත්තං කත්වා භික්ඛාචාරං ගච්ඡන්තා අඩ්ඪඋසභඋසභඅඩ්ඪගාවුතගාවුතන්තරෙසු පාසාණා හොන්ති, තාය සඤ්ඤාය කම්මට්ඨානං මනසිකරොන්තාව ගච්ඡන්ති. සචෙ කස්සචි ගමනෙ කිලෙසො උප්පජ්ජති, තත්ථෙව නං නිග්ගණ්හාති. තථා අසක්කොන්තො තිට්ඨති. අථස්ස පච්ඡතො ආගච්ඡන්තොපි තිට්ඨති, සො ‘‘අයං භික්ඛු තුය්හං උප්පන්නවිතක්කං ජානාති, අනනුච්ඡවිකං තෙ එත’’න්ති අත්තානං පටිචොදෙත්වා විපස්සනං වඩ්ඪෙත්වා තත්ථෙව අරියභූමිං ඔක්කමති, තථා [Pg.222] අසක්කොන්තො නිසීදතීති සො එව නයො. අරියභූමිං ඔක්කමිතුං අසක්කොන්තොපි, තං කිලෙසං වික්ඛම්භෙත්වා කම්මට්ඨානං මනසිකරොන්තොව ගච්ඡති, න කම්මට්ඨානවිප්පයුත්තෙන චිත්තෙන පාදං උද්ධරති. උද්ධරති චෙ, පටිනිවත්තිත්වා පුරිමපදෙසංයෙව එති ආලින්දකවාසී මහාඵුස්සදෙවත්ථෙරො විය. पण, ज्याला 'जो नेतो आणि परत आणतो' असे म्हटले जाते, त्याला 'गतप्रत्यागतिक व्रत' (जाण्या-येण्याचे व्रत) पाळणारा म्हणून ओळखले पाहिजे. कारण, स्वतःचे कल्याण इच्छिणारे कुलपुत्र शासनात (बुद्ध शासनात) प्रव्रजित होऊन, दहा, वीस, तीस, चाळीस, पन्नास किंवा शंभर जण एकत्र राहून असा नियम करून राहतात: "मित्रांनो, तुम्ही कर्जाने पीडित होऊन प्रव्रजित झालेले नाही, भयाने पीडित होऊन प्रव्रजित झालेले नाही, उपजीविकेच्या साधनांअभावी प्रव्रजित झालेले नाही; तर या संसाराच्या दुःखातून मुक्त होण्याच्या इच्छेने या शासनात प्रव्रजित झाला आहात. त्यामुळे चालताना उत्पन्न होणाऱ्या क्लेशांचे चालतानाच दमन करा; उभे असताना, बसताना आणि झोपताना उत्पन्न होणाऱ्या क्लेशांचे त्या त्या स्थितीतच दमन करा." ते असा नियम करून भिक्षेसाठी जात असताना, अर्धा उसभ, एक उसभ, अर्धा गावुत किंवा एक गावुत अंतरावर असणाऱ्या दगडांच्या खुणांवरून, त्या खुणांच्या साहाय्याने कम्मट्ठान मनात ठेवूनच चालतात. जर चालताना कोणाच्या मनात क्लेश उत्पन्न झाला, तर तो तिथेच त्याचे दमन करतो. तसे करण्यास असमर्थ ठरल्यास तो थांबतो. त्यानंतर त्याच्या मागून येणारा भिक्षूही थांबतो. तो स्वतःलाच दोष देत विचार करतो, "हा भिक्षू तुझ्या मनात उत्पन्न झालेले वितर्क जाणतो, हे तुला शोभणारे नाही." असे स्वतःला ताकीद देऊन, विपश्यना वाढवून तिथेच अरियभूमीमध्ये प्रवेश करतो. तसे करण्यास असमर्थ ठरल्यास तो बसतो; हाच नियम उभे राहणे आणि बसणे या बाबतीतही लागू होतो. आर्य भूमीत प्रवेश करण्यास असमर्थ ठरला तरी, तो त्या क्लेशाचा उपशम करून, कम्मट्ठान मनात ठेवूनच पुढे जातो. कम्मट्ठानापासून विलग झालेल्या चित्ताने तो पाऊल उचलत नाही. जर त्याने तसे पाऊल उचललेच, तर तो मागे फिरून आधीच्याच पावलावर परत येतो, जसे आलिंदकवासी महाफुस्स थेर करत असत. සො කිර එකූනවීසති වස්සානි ගතපච්චාගතිකවත්තං පූරෙන්තො එව විහාසි. මනුස්සාපි සුදං අන්තරාමග්ගෙ කසන්තා ච වපන්තා ච මද්දන්තා ච කම්මානි ච කරොන්තා ථෙරං තථා ගච්ඡන්තං දිස්වා – ‘‘අයං ථෙරො පුනප්පුනං නිවත්තිත්වා ගච්ඡති, කිං නු ඛො මග්ගමූළ්හො, උදාහු කිඤ්චි පමුට්ඨො’’ති සමුල්ලපන්ති. සො තං අනාදියිත්වා කම්මට්ඨානයුත්තචිත්තෙනෙව සමණධම්මං කරොන්තො වීසතිවස්සබ්භන්තරෙ අරහත්තං පාපුණි. අරහත්තප්පත්තදිවසෙ චස්ස චඞ්කමනකොටියං අධිවත්ථා දෙවතා අඞ්ගුලීහි දීපං උජ්ජාලෙත්වා අට්ඨාසි. චත්තාරොපි මහාරාජානො සක්කො ච දෙවානමින්දො බ්රහ්මා ච සහම්පති උපට්ඨානං ආගමංසු. තඤ්ච ඔභාසං දිස්වා වනවාසීමහාතිස්සත්ථෙරො තං දුතියදිවසෙ පුච්ඡි – ‘‘රත්තිභාගෙ ආයස්මතො සන්තිකෙ ඔභාසො අහොසි, කිං සො ඔභාසො’’ති? ථෙරො වික්ඛෙපං කරොන්තො ‘‘ඔභාසො නාම දීපොභාසොපි හොති, මණිඔභාසොපී’’ති එවමාදිමාහ. තතො ‘‘පටිච්ඡාදෙථ තුම්හෙ’’ති නිබද්ධො ආමාති පටිජානිත්වා ආරොචෙසි. असे ऐकिवात आहे की, ते एकोणीस वर्षांपर्यंत 'गतप्रत्यागतिक व्रत' पूर्ण करतच राहिले. रस्त्याच्या कडेला नांगरणी करणारे, पेरणी करणारे, मळणी करणारे आणि इतर कामे करणारे लोक थेरांना अशा प्रकारे ये-जा करताना पाहून आपसात बोलत असत – "हे थेर वारंवार मागे फिरून का जात आहेत? ते रस्ता चुकले आहेत की काही विसरले आहेत?" त्यांनी लोकांच्या त्या बोलण्याकडे दुर्लक्ष करून, कम्मट्ठायुक्त चित्तानेच श्रमणधर्माचे आचरण करत विसाव्या वर्षात अरहंतपद प्राप्त केले. त्यांना अरहंतपद प्राप्त झाले त्या दिवशी, चंक्रमणाच्या टोकावर राहणाऱ्या देवतेने आपल्या बोटांनी दिवा पेटवून उभे राहिले. चारही महाराज, देवांचा राजा सक्क आणि महाब्रह्मा सहम्पती त्यांच्या सेवेसाठी आले. तो प्रकाश पाहून वनवासी महातिस्स थेरांनी दुसऱ्या दिवशी त्यांना विचारले – "रात्रीच्या वेळी आपल्याजवळ प्रकाश दिसत होता, तो कसला प्रकाश होता?" थेरांनी आपली प्राप्ती लपवण्यासाठी विषय टाळत म्हटले, "प्रकाश तर दिव्याचाही असू शकतो किंवा मणीचाही असू शकतो." त्यानंतर, "तुम्ही हे लपवत आहात" असा आग्रह धरल्यावर त्यांनी होकार देऊन खरी गोष्ट सांगितली. කාළවල්ලිමණ්ඩපවාසීමහානාගත්ථෙරො විය ච. සොපි කිර ගතපච්චාගතිකවත්තං පූරෙන්තො පඨමං තාව ‘‘භගවතො මහාපධානං පූජෙස්සාමී’’ති සත්ත වස්සානි ඨානචඞ්කමමෙව අධිට්ඨාසි. පුන සොළස වස්සානි ගතපච්චාගතිකවත්තං පූරෙත්වා අරහත්තං පාපුණි. සො කම්මට්ඨානයුත්තෙනෙව චිත්තෙන පාදං උද්ධරන්තො විප්පයුත්තෙන උද්ධටෙ පටිනිවත්තන්තො ගාමසමීපං ගන්ත්වා ‘‘ගාවී නු පබ්බජිතො නූ’’ති ආසඞ්කනීයපදෙසෙ ඨත්වා චීවරං පාරුපිත්වා කච්ඡකරකතො උදකෙන පත්තං ධොවිත්වා උදකගණ්ඩූසං කරොති. කිං කාරණා? ‘‘මා මෙ භික්ඛං දාතුං වා වන්දිතුං වා ආගතෙ මනුස්සෙ ‘දීඝායුකා හොථා’ති වචනමත්තෙනාපි කම්මට්ඨානවික්ඛෙපො අහොසී’’ති ‘‘අජ්ජ, භන්තෙ, කතිමී’’ති දිවසං වා භික්ඛුගණනං වා පඤ්හං වා පුච්ඡිතො [Pg.223] පන උදකං ගිලිත්වා ආරොචෙති. සචෙ දිවසාදිපුච්ඡකා න හොන්ති, නික්ඛමනවෙලායං ගාමද්වාරෙ නිට්ඨුභිත්වා යාති. तसेच काळवल्लीमंडपवासी महानाग थेरांप्रमाणे. असे ऐकिवात आहे की, त्यांनीही गतप्रत्यागतिक व्रत पूर्ण करताना, सुरुवातीला "भगवंतांच्या महाप्रधानाचा (कठोर तपश्चर्येचा) आदर करीन" असे म्हणून सात वर्षे केवळ उभे राहून आणि चंक्रमण करून घालवण्याचा निश्चय केला. त्यानंतर सोळा वर्षे गतप्रत्यागतिक व्रत पूर्ण करून त्यांनी अरहंतपद प्राप्त केले. ते कम्मट्ठायुक्त चित्तानेच पाऊल उचलत असत; कम्मट्ठायुक्त नसलेल्या चित्ताने पाऊल उचलले गेल्यास ते मागे फिरत असत. गावाच्या जवळ पोहोचल्यावर, "ही गाय आहे की प्रव्रजित भिक्षू?" अशी शंका येऊ शकेल अशा ठिकाणी उभे राहून, चीवर परिधान करून, काखेतील पात्रातून पाणी काढून पात्र धुवून, तोंडात पाण्याचा घोट धरत असत. याचे कारण काय? "मला भिक्षा देण्यासाठी किंवा वंदन करण्यासाठी आलेल्या लोकांना 'दीर्घायुषी व्हा' असे म्हणण्यानेही माझ्या कम्मट्ठानात विक्षेप येऊ नये," असा विचार करून ते असे करत असत. पण जर कोणी त्यांना "भंते, आज कोणती तिथी आहे?" असा दिवस, भिक्षूंची संख्या किंवा एखादा प्रश्न विचारला, तर ते तोंडातले पाणी गिळून उत्तर देत असत. जर दिवस इत्यादी विचारणारे कोणी नसेल, तर गावातून बाहेर पडताना वेशीवर ते पाणी थुंकून निघून जात असत. කලම්බතිත්ථවිහාරෙ වස්සූපගතා පඤ්ඤාස භික්ඛූ විය ච. තෙ කිර ආසාළ්හිපුණ්ණමියං කතිකවත්තං අකංසු – ‘‘අරහත්තං අපත්වා අඤ්ඤමඤ්ඤං නාලපිස්සාමා’’ති. ගාමඤ්ච පිණ්ඩාය පවිසන්තා උදකගණ්ඩූසං කත්වා පවිසිංසු. දිවසාදීසු පුච්ඡිතෙසු වුත්තනයෙනෙව පටිපජ්ජිංසු. තත්ථ මනුස්සා නිට්ඨුභනං දිස්වා ජානිංසු – ‘‘අජ්ජෙකො ආගතො, අජ්ජ ද්වෙ’’ති. එවඤ්ච චින්තෙසුං – ‘‘කිං නු ඛො එතෙ අම්හෙහෙව සද්ධිං න සල්ලපන්ති, උදාහු අඤ්ඤමඤ්ඤම්පි. යදි අඤ්ඤමඤ්ඤං න සල්ලපන්ති, අද්ධා විවාදජාතා භවිස්සන්ති. එථ නෙ අඤ්ඤමඤ්ඤං ඛමාපෙස්සාමා’’ති සබ්බෙ විහාරං ගන්ත්වා පඤ්ඤාසාය භික්ඛූසු ද්වෙපි භික්ඛූ එකොකාසෙ නාද්දසංසු. තතො යො තෙසු චක්ඛුමා පුරිසො, සො ආහ – ‘‘න භො කලහකාරකානං ඔකාසො ඊදිසො හොති, සුසම්මට්ඨං චෙතියඞ්ගණං බොධියඞ්ගණං, සුනික්ඛිත්තා සම්මජ්ජනියො, සුපට්ඨිතං පානීයං පරිභොජනීය’’න්ති. තෙ තතොව නිවත්තා. තෙපි භික්ඛූ අන්තොතෙමාසෙයෙව අරහත්තං පත්වා මහාපවාරණායං විසුද්ධිපවාරණං පවාරෙසුං. तसेच कलंबतित्थ विहारात वर्षावास घालवणाऱ्या पन्नास भिक्षूंप्रमाणे. असे ऐकिवात आहे की, त्यांनी आषाढ पौर्णिमेला असा नियम केला – "अरहंतपद प्राप्त केल्याशिवाय आम्ही आपसात बोलणार नाही." आणि गावात भिक्षेसाठी प्रवेश करताना ते तोंडात पाण्याचा घोट धरून प्रवेश करत असत. दिवस इत्यादी विचारले असता, वर सांगितलेल्या पद्धतीनेच ते वागत असत. तिथे लोकांनी थुंकलेले पाणी पाहून ओळखले – "आज एक भिक्षू आले आहेत, आज दोन आले आहेत." आणि त्यांनी असा विचार केला – "हे भिक्षू केवळ आमच्याशीच बोलत नाहीत की आपसातही बोलत नाहीत? जर ते आपसात बोलत नसतील, तर नक्कीच त्यांच्यात काही वाद झाला असेल. चला, आपण त्यांच्यातील वाद मिटवून त्यांना क्षमा मागायला लावूया." असे म्हणून सर्व जण विहारात गेले, पण त्या पन्नास भिक्षूंपैकी दोन भिक्षूही त्यांना एका ठिकाणी एकत्र दिसले नाहीत. तेव्हा त्यांच्यातील एका समजूतदार माणसाने म्हटले – "मित्रांनो, भांडण करणाऱ्या लोकांची जागा अशी नसते. बघा, चेतियंगण आणि बोधियंगण किती स्वच्छ झाडलेले आहे, केरसुण्या व्यवस्थित ठेवलेल्या आहेत, पिण्याचे आणि वापरण्याचे पाणी उत्तम प्रकारे ठेवलेले आहे." ते तिथूनच परत फिरले. त्या भिक्षूंनीही वर्षावासाच्या तीन महिन्यांच्या आतच अरहंतपद प्राप्त केले आणि महाप्रवारणेच्या दिवशी विशुद्ध प्रवारणा केली. එවං කාළවල්ලිමණ්ඩපවාසී මහානාගත්ථෙරො විය, කලම්බතිත්ථවිහාරෙ වස්සූපගතා භික්ඛූ විය ච කම්මට්ඨානයුත්තෙනෙව චිත්තෙන පාදං උද්ධරන්තො ගාමසමීපං ගන්ත්වා උදකගණ්ඩූසං කත්වා වීථියො සල්ලක්ඛෙත්වා යත්ථ සුරාසොණ්ඩධුත්තාදයො කලහකාරකා චණ්ඩහත්ථිඅස්සාදයො වා නත්ථි, තං වීථිං පටිපජ්ජති. තත්ථ ච පිණ්ඩාය චරමානො න තුරිතතුරිතො විය ජවෙන ගච්ඡති. න හි ජවෙන පිණ්ඩපාතිකධුතඞ්ගං නාම කිඤ්චි අත්ථි. විසමභූමිභාගපත්තං පන උදකසකටං විය නිච්චලො හුත්වා ගච්ඡති. අනුඝරං පවිට්ඨො ච දාතුකාමං වා අදාතුකාමං වා සල්ලක්ඛෙතුං තදනුරූපං කාලං ආගමෙන්තො භික්ඛං ගහෙත්වා අන්තොගාමෙ වා බහිගාමෙ වා විහාරමෙව වා ආගන්ත්වා යථාඵාසුකෙ පතිරූපෙ ඔකාසෙ නිසීදිත්වා කම්මට්ඨානං මනසිකරොන්තො ආහාරෙ පටිකූලසඤ්ඤං උපට්ඨපෙත්වා අක්ඛබ්භඤ්ජනවණලෙපනපුත්තමංසූපමාවසෙන පච්චවෙක්ඛන්තො අට්ඨඞ්ගසමන්නාගතං ආහාරං ආහාරෙති, නෙව දවාය න මදාය න මණ්ඩනාය න විභූසනාය…පෙ… භුත්තාවී ච උදකකිච්චං කත්වා මුහුත්තං භත්තකිලමථං පටිපස්සම්භෙත්වා යථා පුරෙභත්තං[Pg.224], එවං පච්ඡාභත්තං පුරිමයාමං පච්ඡිමයාමඤ්ච කම්මට්ඨානමෙව මනසිකරොති. අයං වුච්චති හරති ච පච්චාහරති චාති. कालवल्लीमंडप येथे राहणारे महानाग थेर यांच्याप्रमाणे, आणि कलंबतित्थ विहारात वर्षावास घालवलेल्या भिक्खूंप्रमाणे, कम्मट्ठानाशी युक्त अशाच चित्ताने पाऊल उचलत गावाच्या जवळ जाऊन, पाण्याचा गुळणा करून आणि रस्त्यांचे निरीक्षण करून, जेथे मद्यपी, जुगारी इत्यादी भांडखोर लोक किंवा मत्त हत्ती, घोडे इत्यादी नसतील, त्या मार्गाने तो जातो. आणि तेथे पिंडाचारासाठी फिरताना तो घाईघाईने किंवा वेगाने जात नाही. कारण वेगाने जाणे असे 'पिंडपातिक धुतंग' नावाचे कोणतेही धुतंग नाही. उलट, विषम जमिनीवर चालणाऱ्या पाण्याने भरलेल्या गाडीप्रमाणे निश्चल होऊन तो चालतो. आणि घराघरांमध्ये प्रवेश केल्यावर, दान देण्याची इच्छा असणाऱ्या किंवा नसणाऱ्या व्यक्तीचे निरीक्षण करण्यासाठी योग्य वेळेची वाट पाहत, भिक्षा ग्रहण करून गावातच किंवा गावाबाहेर किंवा विहारातच परत येऊन, अनुकूल आणि योग्य अशा ठिकाणी बसून, कम्मट्ठानाचे मनन करत, आहाराविषयी प्रतिकूलसंज्ञा प्रस्थापित करून, गाडीच्या अक्षाला तेल लावणे, जखमेवर मलम लावणे किंवा स्वतःच्या पुत्राचे मांस खाणे या उपमांच्या आधारे विचार करत, आठ अंगांनी युक्त असलेला आहार ग्रहण करतो; मौजमजेसाठी नाही, मदासाठी नाही, शरीराच्या सुशोभिततेसाठी नाही, सौंदर्यासाठी नाही... इत्यादी. आणि भोजन झाल्यावर पाण्याचे कार्य करून, काही वेळ भोजनामुळे आलेला थकवा दूर करून, ज्याप्रमाणे भोजनापूर्वी, त्याचप्रमाणे भोजनानंतर, रात्रीच्या पहिल्या प्रहरात आणि शेवटच्या प्रहरात कम्मट्ठानाचेच मनन करतो. या भिक्खूला 'जातानाही नेणारा आणि परत येतानाही आणणारा' असे म्हणतात. ඉමං පන හරණපච්චාහරණසඞ්ඛාතං ගතපච්චාගතිකවත්තං පූරෙන්තො යදි උපනිස්සයසම්පන්නො හොති, පඨමවයෙ එව අරහත්තං පාපුණාති. නො චෙ පඨමවයෙ පාපුණාති, අථ මජ්ඣිමවයෙ පාපුණාති. නො චෙ මජ්ඣිමවයෙ පාපුණාති, අථ පච්ඡිමවයෙ පාපුණාති, නො චෙ පච්ඡිමවයෙ පාපුණාති, අථ මරණසමයෙ. නො චෙ මරණසමයෙ පාපුණාති, අථ දෙවපුත්තො හුත්වා. නො චෙ දෙවපුත්තො හුත්වා පාපුණාති, අනුප්පන්නෙ බුද්ධෙ නිබ්බත්තො පච්චෙකබොධිං සච්ඡිකරොති. නො චෙ පච්චෙකබොධිං සච්ඡිකරොති, අථ බුද්ධානං සම්මුඛීභාවෙ ඛිප්පාභිඤ්ඤො වා හොති, සෙය්යථාපි ථෙරො බාහියො දාරුචීරියො මහාපඤ්ඤො වා, සෙය්යථාපි ථෙරො සාරිපුත්තො, මහිද්ධිකො වා, සෙය්යථාපි ථෙරො මහාමොග්ගල්ලානො, ධුතවාදො වා, සෙය්යථාපි ථෙරො මහාකස්සපො, දිබ්බචක්ඛුකො වා, සෙය්යථාපි ථෙරො අනුරුද්ධො, විනයධරො වා, සෙය්යථාපි ථෙරො උපාලි, ධම්මකථිකො වා, සෙය්යථාපි ථෙරො පුණ්ණො මන්තාණිපුත්තො, ආරඤ්ඤිකො වා, සෙය්යථාපි ථෙරො රෙවතො, බහුස්සුතො වා, සෙය්යථාපි ථෙරො ආනන්දො, සික්ඛාකාමො වා, සෙය්යථාපි ථෙරො රාහුලො බුද්ධපුත්තොති. ඉති ඉමස්මිං චතුක්කෙ ය්වායං හරති පච්චාහරති ච, තස්ස ගොචරසම්පජඤ්ඤං සිඛාපත්තං හොති. परंतु, 'जाणे आणि परत येणे' या स्वरूपातील या 'गतप्रत्यागतिक व्रताचे' पालन करणारा साधक जर उपनिसय-संपन्न असेल, तर तो पहिल्या वयातच अरहंतपद प्राप्त करतो. जर पहिल्या वयात प्राप्त करू शकला नाही, तर मध्यम वयात प्राप्त करतो. जर मध्यम वयात प्राप्त करू शकला नाही, तर अंतिम वयात प्राप्त करतो. जर अंतिम वयात प्राप्त करू शकला नाही, तर मरणसमयी प्राप्त करतो. जर मरणसमयी प्राप्त करू शकला नाही, तर देवपुत्र होऊन प्राप्त करतो. जर देवपुत्र होऊनही प्राप्त करू शकला नाही, तर बुद्ध उत्पन्न झाले नसताना जन्म घेऊन प्रत्येकबोधी साक्षात करतो. जर प्रत्येकबोधी साक्षात करू शकला नाही, तर बुद्धांच्या संमुख येऊन 'खिप्पाभिञ्ञ' होतो; जसे की बाहिय दारुचीरिय थेर. किंवा 'महापञ्ञ' होतो; जसे की सारिपुत्त थेर. किंवा 'महिद्धिक' होतो; जसे की महामोग्गल्लान थेर. किंवा 'धुतवादो' होतो; जसे की महाकस्सप थेर. किंवा 'दिब्बचक्खुक' होतो; जसे की अनुरुद्ध थेर. किंवा 'विनयधर' होतो; जसे की उपालि थेर. किंवा 'धम्मकथिक' होतो; जसे की पुण्ण मंताणिपुत्त थेर. किंवा 'आरञ्ञिक' होतो; जसे की रेवत थेर. किंवा 'bahussuto' (बहुश्रुत) होतो; जसे की आनंद थेर. किंवा 'सिक्खाकाम' होतो; जसे की बुद्धपुत्र राहुल थेर. अशा प्रकारे, या चतुष्कात जो 'जातो आणि परत येतो', त्याचे 'गोचरसंपजञ्ञ' शिखरेवर पोहोचलेले असते. අභික්කමාදීසු පන අසම්මුය්හනං අසම්මොහසම්පජඤ්ඤං. තං එවං වෙදිතබ්බං – ඉධ භික්ඛු අභික්කමන්තො වා පටික්කමන්තො වා යථා අන්ධපුථුජ්ජනා අභික්කමාදීසු – ‘‘අත්තා අභික්කමති, අත්තනා අභික්කමො නිබ්බත්තිතො’’ති වා ‘‘අහං අභික්කමාමි, මයා අභික්කමො නිබ්බත්තිතො’’ති වා සම්මුය්හන්ති, තථා අසම්මුය්හන්තො අභික්කමාමීති චිත්තෙ උප්පජ්ජමානෙ තෙනෙව චිත්තෙන සද්ධිං චිත්තසමුට්ඨානා වායොධාතු විඤ්ඤත්තිං ජනයමානා උප්පජ්ජති, ඉති චිත්තකිරියවායොධාතුවිප්ඵාරවසෙන අයං කායසම්මතො අට්ඨිසඞ්ඝාටො අභික්කමති. තස්සෙවං අභික්කමතො එකෙකපාදුද්ධරණෙ පථවීධාතු ආපොධාතූති ද්වෙ ධාතුයො ඔමත්තා හොන්ති මන්දා, ඉතරා ද්වෙ අධිමත්තා හොන්ති බලවතියො, තථා අතිහරණවීතිහරණෙසු, වොස්සජ්ජනෙ තෙජොධාතු වායොධාතූති ද්වෙ ධාතුයො ඔමත්තා හොන්ති [Pg.225] මන්දා, ඉතරා ද්වෙ අධිමත්තා හොන්ති බලවතියො, තථා සන්නික්ඛෙපනසන්නිරුම්භනෙසු. परंतु, पुढे जाणे इत्यादी क्रियांमध्ये संभ्रमित न होणे म्हणजे 'असंमोहसंपजञ्ञ' होय. ते या प्रकारे समजून घ्यावे – येथे एखादा भिक्खू पुढे जाताना किंवा मागे वळताना, ज्याप्रमाणे अंध पृथग्जन पुढे जाणे इत्यादी क्रियांमध्ये – 'आत्मा पुढे जातो, आत्म्याद्वारे पुढे जाण्याची क्रिया घडवून आणली जाते' किंवा 'मी पुढे जातो, माझ्याद्वारे पुढे जाण्याची क्रिया घडवून आणली जाते' अशा प्रकारे संभ्रमित होतात, त्याप्रमाणे संभ्रमित न होता, 'मी पुढे जात आहे' असे चित्त उत्पन्न झाल्यावर, त्याच चित्तासोबत चित्तसमुत्थान वायूधातू कायविज्ञप्ती निर्माण करत उत्पन्न होते. अशा प्रकारे, चित्ताच्या क्रियेमुळे वायूधातूच्या प्रसरणाने हा शरीर नावाचा हाडांचा सांगाडा पुढे सरकतो. त्याच्या अशा प्रकारे पुढे जाताना, प्रत्येक पाऊल उचलण्याच्या क्रियेत पथवीधातू आणि आपोधातू हे दोन धातू कमी प्रमाणात आणि मंद असतात, तर इतर दोन धातू अधिक प्रमाणात आणि बलवान असतात. पुढे नेण्याच्या आणि बाजूला नेण्याच्या क्रियांमध्येही तसेच होते. पाऊल सोडण्याच्या क्रियेत तेजोधातू आणि वायोधातू हे दोन धातू कमी प्रमाणात आणि मंद असतात, तर इतर दोन धातू अधिक प्रमाणात आणि बलवान असतात. पाऊल खाली ठेवण्याच्या आणि जमिनीवर दाबण्याच्या क्रियांमध्येही तसेच होते. තත්ථ උද්ධරණෙ පවත්තා රූපාරූපධම්මා අතිහරණං න පාපුණන්ති, තථා අතිහරණෙ පවත්තා වීතිහරණං, වීතිහරණෙ පවත්තා වොස්සජ්ජනං, වොස්සජ්ජනෙ පවත්තා සන්නික්ඛෙපනං, සන්නික්ඛෙපනෙ පවත්තා සන්නිරුම්භනං න පාපුණන්ති, තත්ථ තත්ථෙව පබ්බපබ්බං සන්ධිසන්ධි ඔධිඔධි හුත්වා තත්තකපාලෙ පක්ඛිත්තතිලානි විය තටතටායන්තා භිජ්ජන්ති. තත්ථ කො එකො අභික්කමති, කස්ස වා එකස්ස අභික්කමනං? පරමත්ථතො හි ධාතූනංයෙව ගමනං, ධාතූනං ඨානං, ධාතූනං නිසජ්ජා, ධාතූනං සයනං. තස්මිං තස්මිඤ්හි කොට්ඨාසෙ සද්ධිං රූපෙන – त्यामध्ये, पाऊल उचलण्याच्या क्षणी उत्पन्न झालेले रूप आणि अरूप धर्म पाऊल पुढे नेण्याच्या क्षणापर्यंत पोहोचत नाहीत. तसेच पुढे नेण्याच्या क्षणी उत्पन्न झालेले धर्म बाजूला नेण्याच्या क्षणापर्यंत, बाजूला नेण्याच्या क्षणी उत्पन्न झालेले धर्म पाऊल सोडण्याच्या क्षणापर्यंत, पाऊल सोडण्याच्या क्षणी उत्पन्न झालेले धर्म पाऊल खाली ठेवण्याच्या क्षणापर्यंत आणि पाऊल खाली ठेवण्याच्या क्षणी उत्पन्न झालेले धर्म पाऊल जमिनीवर दाबण्याच्या क्षणापर्यंत पोहोचत नाहीत. ते तिथेच, प्रत्येक भागात, प्रत्येक सांध्यात आणि प्रत्येक मर्यादेत, तापलेल्या तव्यावर टाकलेल्या तिळांप्रमाणे तडतड असा आवाज न करताही नष्ट पावतात. अशा स्थितीत कोण पुढे जातो? किंवा कोणा एकाची ही पुढे जाण्याची क्रिया आहे? कारण परमार्थतः केवळ धातूंचेच जाणे, धातूंचेच उभे राहणे, धातूंचेच बसणे आणि धातूंचेच निजणे होत असते. कारण त्या त्या भागात रूपाच्या सोबत – ‘‘අඤ්ඤං උප්පජ්ජතෙ චිත්තං, අඤ්ඤං චිත්තං නිරුජ්ඣති; අවීචිමනුසම්බන්ධො, නදීසොතොව වත්තතී’’ති. – "एक चित्त उत्पन्न होते आणि दुसरे चित्त निरुद्ध होते; हा प्रवाह न थांबता अखंडपणे नदीच्या प्रवाहासारखा वाहत राहतो." එවං අභික්කමාදීසු අසම්මුය්හනං අසම්මොහසම්පජඤ්ඤං නාමාති. अशा प्रकारे, पुढे जाणे इत्यादी क्रियांमध्ये संभ्रमित न होणे यालाच 'असंमोहसंपजञ्ञ' असे म्हणतात. නිට්ඨිතො ‘‘අභික්කන්තෙ පටික්කන්තෙ සම්පජානකාරී හොතී’’තිපදස්ස අත්ථො. 'पुढे जाताना आणि मागे वळताना संप्रजन्यपूर्वक क्रिया करणारा होतो' या पदाचा अर्थ समाप्त झाला. ආලොකිතෙ විලොකිතෙති එත්ථ පන ආලොකිතං නාම පුරතො පෙක්ඛනං, විලොකිතං නාම අනුදිසාපෙක්ඛනං. අඤ්ඤානිපි හෙට්ඨා උපරි පච්ඡතො අනුපෙක්ඛනවසෙන ඔලොකිතඋල්ලොකිතාපලොකිතානි නාම හොන්ති. තානි ඉධ න ගහිතානි, සාරුප්පවසෙන පන ඉමානෙව ද්වෙ ගහිතානි. ඉමිනා වා මුඛෙන සබ්බානිපි තානි ගහිතානෙවාති. परंतु, 'आलोकिते विलोकिते' यामध्ये 'आलोकित' म्हणजे समोर पाहणे आणि 'विलोकित' म्हणजे बाजूला पाहणे होय. याशिवाय खाली पाहणे, वर पाहणे आणि मागे वळून पाहणे यानुसार अनुक्रमे 'ओलोकित', 'उल्लोकित' आणि 'अपलोकित' असेही प्रकार असतात. ते येथे घेतलेले नाहीत, परंतु योग्यतेच्या आधारे हे दोनच प्रकार घेतले आहेत. किंवा या दोन प्रकारांच्या माध्यमातून ते सर्व प्रकार देखील समाविष्ट केले गेले आहेत, असे समजावे. තත්ථ ‘‘ආලොකෙස්සාමී’’ති චිත්තෙ උප්පන්නෙ චිත්තවසෙනෙව අනොලොකෙත්වා අත්ථපරිග්ගණ්හනං සාත්ථකසම්පජඤ්ඤං. තං ආයස්මන්තං නන්දං කායසක්ඛිං කත්වා වෙදිතබ්බං. වුත්තඤ්හෙතං භගවතා – त्यामध्ये, 'मी पाहीन' असे चित्त उत्पन्न झाल्यावर केवळ चित्ताच्या आहारी न जाता, पाहण्याच्या फायद्या-तोट्यांचे परीक्षण करणे म्हणजे 'सात्थक-संपजञ्ञ' होय. ते आयुष्यमान नंदांना प्रत्यक्ष साक्षी मानून समजून घेतले पाहिजे. कारण भगवंतांनी असे म्हटले आहे – ‘‘සචෙ, භික්ඛවෙ, නන්දස්ස පුරත්ථිමා දිසා ආලොකෙතබ්බා හොති, සබ්බං චෙතසා සමන්නාහරිත්වා නන්දො පුරත්ථිමං දිසං ආලොකෙති ‘එවං මෙ පුරත්ථිමං දිසං ආලොකයතො නාභිජ්ඣාදොමනස්සා [Pg.226] පාපකා අකුසලා ධම්මා අන්වාසවිස්සන්තී’ති. ඉතිහ තත්ථ සම්පජානො හොති. සචෙ, භික්ඛවෙ, නන්දස්ස පච්ඡිමා දිසා, උත්තරා දිසා, දක්ඛිණා දිසා, උද්ධං, අධො, අනුදිසා ආලොකෙතබ්බා හොති, සබ්බං චෙතසා සමන්නාහරිත්වා නන්දො අනුදිසං ආලොකෙති ‘එවං මෙ අනුදිසං ආලොකයතො’…පෙ… සම්පජානො හොතී’’ති (අ. නි. 8.9). भगवान म्हणाले, 'भिक्खूहो, जर नंदाला पूर्व दिशेकडे पाहायचे असेल, तर तो मनात पूर्ण विचार करून पूर्व दिशेकडे पाहतो: "मी पूर्व दिशेकडे पाहत असताना माझ्यामध्ये अभिज्झा (लोभ) आणि दोमनस्स (दौर्मनस्य) हे पापी अकुशल धर्म उत्पन्न होणार नाहीत." अशा प्रकारे तो तेथे संपजानी (जागृत) असतो. भिक्खूहो, जर नंदाला पश्चिम दिशा, उत्तर दिशा, दक्षिण दिशा, वर, खाली किंवा उपदिशांकडे पाहायचे असेल, तर तो मनात पूर्ण विचार करून त्या उपदिशेकडे पाहतो: "मी उपदिशेकडे पाहत असताना माझ्यामध्ये..." ... अशा प्रकारे तो संपजानी असतो.' අපිච ඉධාපි පුබ්බෙ වුත්තචෙතියදස්සනාදිවසෙනෙව සාත්ථකතා ච සප්පායතා ච වෙදිතබ්බා. කම්මට්ඨානස්ස පන අවිජහනමෙව ගොචරසම්පජඤ්ඤං, තස්මා ඛන්ධධාතුආයතනකම්මට්ඨානිකෙහි අත්තනො කමට්ඨානවසෙනෙව කසිණාදිකම්මට්ඨානිකෙහි වා පන කම්මට්ඨානසීසෙනෙව ආලොකනවිලොකනං කාතබ්බං. शिवाय, येथेही पूर्वी सांगितल्याप्रमाणे चैत्यदर्शन इत्यादींच्या आधारेच आलोकित (समोर पाहणे) आणि विलोकित (आजूबाजूला पाहणे) यांची सार्थकता (सात्थकता) आणि अनुकूलता (सप्पायता) समजून घेतली पाहिजे. परंतु, कम्मट्ठानाचा (कर्मस्थानाचा) त्याग न करणे म्हणजेच गोचरसंपजञ्ञ (गोचरसंप्रजन्य) होय. म्हणून, स्कंध, धातू आणि आयतन या कम्मट्ठानांचा अभ्यास करणाऱ्या भिक्खूंनी आपापल्या कम्मट्ठानाच्या आधारेच, किंवा कसिण इत्यादी कम्मट्ठानांचा अभ्यास करणाऱ्यांनी कम्मट्ठानालाच मुख्य मानून आलोकित आणि विलोकित केले पाहिजे. ‘‘අබ්භන්තරෙ අත්තා නාම ආලොකෙතා වා විලොකෙතා වා නත්ථි, ‘ආලොකෙස්සාමී’ති පන චිත්තෙ උප්පජ්ජමානෙ තෙනෙව චිත්තෙන සද්ධිං චිත්තසමුට්ඨානා වායොධාතු විඤ්ඤත්තිං ජනයමානා උප්පජ්ජති. ඉති චිත්තකිරියවායොධාතුවිප්ඵාරවසෙන හෙට්ඨිමං අක්ඛිදලං අධො සීදති, උපරිමං උද්ධං ලඞ්ඝෙති, කොචි යන්තකෙන විවරන්තො නාම නත්ථි, තතො චක්ඛුවිඤ්ඤාණං දස්සනකිච්චං සාධෙන්තං උප්පජ්ජතී’’ති එවං පජානනං පනෙත්ථ අසම්මොහසම්පජඤ්ඤං නාම. शरीराच्या आत पाहणारा किंवा आजूबाजूला पाहणारा 'आत्मा' नावाचा कोणीही नाही. परंतु, 'मी पाहीन' असे चित्त उत्पन्न झाले असता, त्याच चित्तासोबत चित्तसमुत्थान (चित्तापासून उत्पन्न होणारी) वायोधातू कायविज्ञप्तीला उत्पन्न करत उत्पन्न होते. अशा प्रकारे, चित्तक्रिया आणि वायोधातूच्या प्रसरणामुळे खालची पापणी खाली जाते आणि वरची पापणी वर उचलली जाते. यंत्राद्वारे डोळे उघडणारा असा कोणीही (कर्ता) नाही. त्यानंतर पाहण्याचे कार्य पूर्ण करत चक्खुविञ्ञाण (चक्षुर्विज्ञान) उत्पन्न होते. अशा प्रकारे जाणणे म्हणजेच येथे 'असंमोहसंपजञ्ञ' (असंमोहसंप्रजन्य) होय. අපිච මූලපරිඤ්ඤාආගන්තුකතාවකාලිකභාවවසෙනපෙත්ථ අසම්මොහසම්පජඤ්ඤං වෙදිතබ්බං. මූලපරිඤ්ඤාවසෙන තාව – शिवाय, मूळपरिज्ञा (मूळ कारणाचे ज्ञान), आगंतुकता (पाहुणे असणे) आणि तावकालिकता (क्षणिक असणे) यांच्या आधारेही येथे असंमोहसंपजञ्ञ समजून घेतले पाहिजे. त्यापैकी प्रथम मूळपरिज्ञेच्या आधारे – ‘‘භවඞ්ගාවජ්ජනඤ්චෙව, දස්සනං සම්පටිච්ඡනං; සන්තීරණං වොට්ඨබ්බනං, ජවනං භවති සත්තමං’’. 'भवंग, आवज्जन, दस्सन (दर्शन), संपटिच्छन, संतीरण, वोट्ठब्बन आणि सातवे जवन होते.' තත්ථ භවඞ්ගං උපපත්තිභවස්ස අඞ්ගකිච්චං සාධයමානං පවත්තති, තං ආවට්ටෙත්වා කිරියමනොධාතු ආවජ්ජනකිච්චං සාධයමානා, තන්නිරොධා චක්ඛුවිඤ්ඤාණං දස්සනකිච්චං සාධයමානං, තන්නිරොධා විපාකමනොධාතු සම්පටිච්ඡනකිච්චං සාධයමානා, තන්නිරොධා විපාකමනොවිඤ්ඤාණධාතු සන්තීරණකිච්චං සාධයමානා, තන්නිරොධා කිරියමනොවිඤ්ඤාණධාතු වොට්ඨබ්බනකිච්චං සාධයමානා, තන්නිරොධා සත්තක්ඛත්තුං ජවනං ජවති. තත්ථ පඨමජවනෙපි ‘‘අයං [Pg.227] ඉත්ථී, අයං පුරිසො’’ති රජ්ජනදුස්සනමුය්හනවසෙන ආලොකිතවිලොකිතං න හොති, දුතියජවනෙපි…පෙ… සත්තමජවනෙපි. එතෙසු පන යුද්ධමණ්ඩලෙ යොධෙසු විය හෙට්ඨුපරියවසෙන භිජ්ජිත්වා පතිතෙසු ‘‘අයං ඉත්ථී, අයං පුරිසො’’ති රජ්ජනාදිවසෙන ආලොකිතවිලොකිතං හොති. එවං තාවෙත්ථ මූලපරිඤ්ඤාවසෙන අසම්මොහසම්පජඤ්ඤං වෙදිතබ්බං. त्यामध्ये, भवंग हे उत्पत्तीच्या भवाचे अंगकृत्य (मुख्य कार्य) पूर्ण करत प्रवृत्त होते. त्याला वळवून क्रिया-मनोधातू आवज्जनकृत्य पूर्ण करत प्रवृत्त होते. त्याच्या निरोधाने (नाशाने) चक्खुविञ्ञाण दर्शनकृत्य पूर्ण करत प्रवृत्त होते. त्याच्या निरोधाने विपाक-मनोधातू संपटिच्छनकृत्य पूर्ण करत प्रवृत्त होते. त्याच्या निरोधाने विपाक-मनोविञ्ञाणधातू संतीरणकृत्य पूर्ण करत प्रवृत्त होते. त्याच्या निरोधाने क्रिया-मनोविञ्ञाणधातू वोट्ठब्बनकृत्य पूर्ण करत प्रवृत्त होते. त्याच्या निरोधाने सात वेळा जवन वेगाने धावते (कार्य करते). त्या जवनांमध्ये, पहिल्या जवनातही 'ही स्त्री आहे, हा पुरुष आहे' अशा प्रकारे राग, द्वेष किंवा मोहाच्या प्रभावाने आलोकित-विलोकित होत नाही; दुसऱ्या जवनातही... तसेच सातव्या जवनातही होत नाही. परंतु, जेव्हा हे चित्त युद्धभूमीवरील सैनिकांप्रमाणे एकामागून एक नष्ट होऊन पडतात, तेव्हा 'ही स्त्री आहे, हा पुरुष आहे' अशा प्रकारे राग इत्यादींच्या प्रभावाने आलोकित-विलोकित होते. अशा प्रकारे, सर्वप्रथम येथे मूळपरिज्ञेच्या आधारे असंमोहसंपजञ्ञ समजून घेतले पाहिजे. චක්ඛුද්වාරෙ පන රූපෙ ආපාථමාගතෙ භවඞ්ගචලනතො උද්ධං සකකිච්චනිප්ඵාදනවසෙන ආවජ්ජනාදීසු උප්පජ්ජිත්වා නිරුද්ධෙසු අවසානෙ ජවනං උප්පජ්ජති, තං පුබ්බෙ උප්පන්නානං ආවජ්ජනාදීනං ගෙහභූතෙ චක්ඛුද්වාරෙ ආගන්තුකපුරිසො විය හොති. තස්ස යථා පරගෙහෙ කිඤ්චි යාචිතුං පවිට්ඨස්ස ආගන්තුකපුරිසස්ස ගෙහසාමිකෙසු තුණ්හීමාසිනෙසු ආණාකරණං න යුත්තං, එවං ආවජ්ජනාදීනං ගෙහභූතෙ චක්ඛුද්වාරෙ ආවජ්ජනාදීසුපි අරජ්ජන්තෙසු අදුස්සන්තෙසු අමුය්හන්තෙසු ච රජ්ජනදුස්සනමුය්හනං අයුත්තන්ති එවං ආගන්තුකභාවවසෙන අසම්මොහසම්පජඤ්ඤං වෙදිතබ්බං. परंतु, चक्षुद्वारावर रूप समोर आले असता, भवंगचलनानंतर आपापले कार्य पूर्ण करण्याच्या हेतूने आवज्जन इत्यादी चित्त उत्पन्न होऊन निरुद्ध (नष्ट) झाल्यावर शेवटी जवन उत्पन्न होते. ते जवन पूर्वी उत्पन्न झालेल्या आवज्जन इत्यादींच्या घरासारख्या असलेल्या चक्षुद्वारावर एखाद्या आगंतुक (पाहुण्या) माणसासारखे असते. ज्याप्रमाणे दुसऱ्याच्या घरात काही मागण्यासाठी गेलेल्या आगंतुक माणसाने, घराचे मालक शांत बसलेले असताना, स्वतःची सत्ता गाजवणे योग्य नाही; त्याचप्रमाणे आवज्जन इत्यादींच्या घरासारख्या असलेल्या चक्षुद्वारावर आवज्जन इत्यादी चित्त स्वतः राग, द्वेष किंवा मोहाने युक्त नसताना, त्या जवनाने राग, द्वेष किंवा मोहात पडणे अयोग्य आहे. अशा प्रकारे, आगंतुकभावाच्या (पाहुण्या असण्याच्या) आधारे असंमोहसंपजञ्ञ समजून घेतले पाहिजे. යානි පනෙතානි චක්ඛුද්වාරෙ වොට්ඨබ්බනපරියොසානානි චිත්තානි උප්පජ්ජන්ති, තානි සද්ධිං සම්පයුත්තධම්මෙහි තත්ථ තත්ථෙව භිජ්ජන්ති, අඤ්ඤමඤ්ඤං න පස්සන්ති, ඉත්තරානි තාවකාලිකානි හොන්ති. තත්ථ යථා එකස්මිං ඝරෙ සබ්බෙසු මානුසකෙසු මතෙසු අවසෙසස්ස එකස්ස තඞ්ඛණංයෙව මරණධම්මස්ස න යුත්තා නච්චගීතාදීසු අභිරති නාම, එවමෙව එකද්වාරෙ සසම්පයුත්තෙසු ආවජ්ජනාදීසු තත්ථ තත්ථෙව මතෙසු අවසෙසස්ස තඞ්ඛණංයෙව මරණධම්මස්ස ජවනස්සාපි රජ්ජනදුස්සනමුය්හනවසෙන අභිරති නාම න යුත්තාති එවං තාවකාලිකභාවවසෙන අසම්මොහසම්පජඤ්ඤං වෙදිතබ්බං. परंतु, चक्षुद्वारावर वोट्ठब्बनपर्यंत जी चित्ते उत्पन्न होतात, ती आपापल्या संप्रयुक्त धर्मांसह तिथेच नष्ट होतात, ती एकमेकांना पाहत नाहीत; ती अत्यंत अल्पकाळ टिकणारी आणि तात्कालिक असतात. त्याविषयी ही उपमा आहे – ज्याप्रमाणे एकाच घरात सर्व लोक मरण पावले असता, शिल्लक राहिलेल्या आणि स्वतःही त्याच क्षणी मरणार असलेल्या एका व्यक्तीला नाच-गाणे इत्यादींमध्ये रममाण होणे योग्य नाही; त्याचप्रमाणे एकाच द्वारावर संप्रयुक्त धर्मांसह आवज्जन इत्यादी चित्त तिथेच नष्ट झाले असता, शिल्लक राहिलेल्या आणि स्वतःही त्याच क्षणी नष्ट होणार असलेल्या जवनाला देखील राग, द्वेष किंवा मोहाच्या रूपाने रममाण होणे योग्य नाही. अशा प्रकारे, तावकालिकतेच्या (क्षणिकतेच्या) आधारे असंमोहसंपजञ्ञ समजून घेतले पाहिजे. අපිච ඛන්ධායතනධාතුපච්චයපච්චවෙක්ඛණවසෙනපෙතං වෙදිතබ්බං. එත්ථ හි චක්ඛු චෙව රූපා ච රූපක්ඛන්ධො, දස්සනං විඤ්ඤාණක්ඛන්ධො, තංසම්පයුත්තා වෙදනා වෙදනාක්ඛන්ධො, සඤ්ඤා සඤ්ඤාක්ඛන්ධො, ඵස්සාදිකා සඞ්ඛාරා සඞ්ඛාරක්ඛන්ධො, එවමෙතෙසං පඤ්චන්නං ඛන්ධානං සමවායෙ ආලොකනවිලොකනං පඤ්ඤායති. තත්ථ කො එකො ආලොකෙති, කො විලොකෙති? තථා චක්ඛු චක්ඛායතනං, රූපං රූපායතනං, දස්සනං මනායතනං, වෙදනාදයො සම්පයුත්තධම්මා ධම්මායතනං, එවමෙතෙසං චතුන්නං ආයතනානං සමවායෙ ආලොකනවිලොකනං පඤ්ඤායති. තත්ථ කො එකො ආලොකෙති, කො [Pg.228] විලොකෙති? තථා චක්ඛු චක්ඛුධාතු, රූපං රූපධාතු, දස්සනං චක්ඛුවිඤ්ඤාණධාතු, තංසම්පයුත්තා වෙදනාදයො ධම්මා ධම්මධාතු, එවමෙතෙසං චතුන්නං ධාතූනං සමවායෙ ආලොකනවිලොකනං පඤ්ඤායති. තත්ථ කො එකො ආලොකෙති, කො විලොකෙති? තථා චක්ඛු නිස්සයපච්චයො, රූපං ආරම්මණපච්චයො, ආවජ්ජනං අනන්තරසමනන්තරූපනිස්සයනත්ථිවිගතපච්චයො, ආලොකො උපනිස්සයපච්චයො, වෙදනාදයො සහජාතපච්චයො. එවමෙතෙසං පච්චයානං සමවායෙ ආලොකනවිලොකනං පඤ්ඤායති. තත්ථ කො එකො ආලොකෙති, කො විලොකෙතීති එවමෙත්ථ ඛන්ධායතනධාතුපච්චයපච්චවෙක්ඛණවසෙනපි අසම්මොහසම්පජඤ්ඤං වෙදිතබ්බං. शिवाय, स्कंध, आयतन, धातू आणि प्रत्यय यांच्या प्रत्यवेक्षणाच्या (चिंतनाच्या) आधारेही हे असंमोहसंपजञ्ञ समजून घेतले पाहिजे. येथे चक्षू आणि रूप हे 'रूपस्कंध' आहेत; दर्शन (चक्षुर्विज्ञान) हा 'विज्ञानस्कंध' आहे; त्याच्याशी संप्रयुक्त असलेली वेदना हा 'वेदनास्कंध' आहे; संज्ञा हा 'संज्ञास्कंध' आहे; आणि फस्स (स्पर्श) इत्यादी संस्कार हा 'संस्कारस्कंध' आहे. अशा प्रकारे, या पाच स्कंधांच्या एकत्र येण्याने (सामग्रीने) आलोकित-विलोकित होणे दिसून येते. तेथे असा कोणता एक (कर्ता) आहे जो आलोकित करतो किंवा विलोकित करतो? तसेच, चक्षू हे 'चक्षुरायतन' आहे, रूप हे 'रूपायतन' आहे, दर्शन हे 'मनायतन' आहे, आणि वेदना इत्यादी संप्रयुक्त धर्म हे 'धम्मायतन' आहेत. अशा प्रकारे, या चार आयतनांच्या एकत्र येण्याने आलोकित-विलोकित होणे दिसून येते. तेथे असा कोणता एक आहे जो आलोकित करतो किंवा विलोकित करतो? तसेच, चक्षू ही 'चक्षुधातू' आहे, रूप ही 'रूपधातू' आहे, दर्शन ही 'चक्षुर्विज्ञानधातू' आहे, आणि त्याच्याशी संप्रयुक्त असलेले वेदना इत्यादी धर्म ही 'धम्मधातू' आहेत. अशा प्रकारे, या चार धातूंच्या एकत्र येण्याने आलोकित-विलोकित होणे दिसून येते. तेथे असा कोणता एक आहे जो आलोकित करतो किंवा विलोकित करतो? तसेच, चक्षू हा 'निस्सयप्रत्यय' (आश्रयप्रत्यय) आहे, रूप हा 'आरम्मणप्रत्यय' (आलंबनप्रत्यय) आहे, आवज्जन हा 'अनन्तर-समनन्तर-उपनिस्सय-नत्थि-विगतप्रत्यय' आहे, आलोक (प्रकाश) हा 'उपनिस्सयप्रत्यय' आहे, आणि वेदना इत्यादी 'सहजातप्रत्यय' आहेत. अशा प्रकारे, या प्रत्ययांच्या एकत्र येण्याने आलोकित-विलोकित होणे दिसून येते. तेथे असा कोणता एक आहे जो आलोकित करतो किंवा विलोकित करतो? अशा प्रकारे, येथे स्कंध, आयतन, धातू आणि प्रत्यय यांच्या प्रत्यवेक्षणाच्या आधारेही असंमोहसंपजञ्ञ समजून घेतले पाहिजे. සමිඤ්ජිතෙ පසාරිතෙති පබ්බානං සමිඤ්ජනපසාරණෙ. තත්ථ චිත්තවසෙනෙව සමිඤ්ජනපසාරණං අකත්වා හත්ථපාදානං සමිඤ්ජනපසාරණපච්චයා අත්ථානත්ථං පරිග්ගණ්හිත්වා අත්ථපරිග්ගණ්හනං සාත්ථකසම්පජඤ්ඤං. තත්ථ හත්ථපාදෙ අතිචිරං සමිඤ්ජිත්වා වා පසාරෙත්වා වා ඨිතස්ස ඛණෙ ඛණෙ වෙදනා උප්පජ්ජන්ති, චිත්තං එකග්ගං න ලභති, කම්මට්ඨානං පරිපතති, විසෙසං නාධිගච්ඡති. කාලෙ සමිඤ්ජන්තස්ස කාලෙ පසාරෙන්තස්ස පන තා වෙදනා නුප්පජ්ජන්ති, චිත්තං එකග්ගං හොති, කම්මට්ඨානං ඵාතිං ගච්ඡති, විසෙසමධිගච්ඡතීති එවං අත්ථානත්ථපරිග්ගණ්හනං වෙදිතබ්බං. ‘समिञ्जिते पसारिते’ (हात-पाय आखडणे व पसरवणे) म्हणजे सांध्यांचे आकुंचन व प्रसरण करणे होय. त्यामध्ये केवळ मनाच्या इच्छेनुसारच हात-पाय न आखडता किंवा न पसरवता, हात आणि पाय आखडण्याच्या व पसरवण्याच्या कारणाने होणारे हित आणि अहित (अथ-अनथ) जाणून घेऊन, हिताचे ग्रहण करणे म्हणजे ‘सार्थक-संपजन्य’ (सात्थकसम्पजञ्ञ) होय. त्यामध्ये, हात किंवा पाय अतिशय दीर्घकाळ आखडून किंवा पसरवून ठेवणाऱ्या व्यक्तीला क्षणाक्षणाला वेदना उत्पन्न होतात, चित्त एकाग्र होत नाही, कम्मट्ठान (कर्मस्थान/ध्यान) नष्ट होते आणि विशेषाची (विशिष्ट ज्ञानाची) प्राप्ती होत नाही. परंतु, योग्य वेळी हात-पाय आखडणाऱ्या आणि योग्य वेळी ते पसरवणाऱ्या व्यक्तीला त्या वेदना उत्पन्न होत नाहीत, चित्त एकाग्र होते, कम्मट्ठान वृद्धिंगत होते आणि विशेषाची प्राप्ती होते. अशा प्रकारे हित आणि अहिताचे आकलन करून घेणे समजावे. අත්ථෙ පන සතිපි සප්පායාසප්පායං පරිග්ගණ්හිත්වා සප්පායපරිග්ගණ්හනං සප්පායසම්පජඤ්ඤං. තත්රායං නයො – මහාචෙතියඞ්ගණෙ කිර දහරභික්ඛූ සජ්ඣායං ගණ්හන්ති. තෙසං පිට්ඨිපස්සෙ දහරභික්ඛුනියො ධම්මං සුණන්ති. තත්ථෙකො දහරො හත්ථං පසාරෙන්තො කායසංසග්ගං පත්වා තෙනෙව කාරණෙන ගිහී ජාතො. අපරො භික්ඛු පාදං පසාරෙන්තො අග්ගිම්හි පසාරෙසි, අට්ඨිං ආහච්ච පාදො ඣායි. අපරො වම්මිකෙ පසාරෙසි, සො ආසීවිසෙන දට්ඨො. අපරො චීවරකුටිදණ්ඩකෙ පසාරෙසි, තං මණිසප්පො ඩංසි. තස්මා එවරූපෙ අසප්පායෙ අපසාරෙත්වා සප්පායෙ පසාරෙතබ්බං. ඉදමෙත්ථ සප්පායසම්පජඤ්ඤං. परंतु हित (उद्देश) असूनही, काय अनुकूल (सप्पाय) आहे आणि काय प्रतिकूल (असप्पाय) आहे याचा विचार करून अनुकूलतेचे ग्रहण करणे म्हणजे ‘सप्पाय-संपजन्य’ होय. याविषयी हा नियम (किंवा उदाहरण) आहे – असे ऐकिवात आहे की, महाचैत्याच्या अंगणात तरुण भिक्खू पाठांतर (सज्झाय) करत होते. त्यांच्या पाठीमागे तरुण भिक्खुनी धम्म ऐकत होत्या. तिथे एका तरुण भिक्खूने हात पसरवताना (एका भिक्खुनीशी) शारीरिक स्पर्श झाला आणि त्याच कारणामुळे तो गृहस्थ (संसारी) बनला. दुसऱ्या एका भिक्खूने पाय पसरवताना तो आगीत पसरवला, त्यामुळे हाडापर्यंत त्याचा पाय जळाला. दुसऱ्या एकाने वारुळात पाय पसरवला, त्याला विषारी सापाने चावा घेतला. आणखी एकाने चीवर-कुटीच्या दांडक्यावर (कपडे वाळत घालण्याच्या बांबूवर) हात पसरवला, त्याला मणिसर्पाने (हिरव्या विषारी सापाने) दंश केला. म्हणून, अशा प्रकारच्या प्रतिकूल ठिकाणी हात-पाय न पसरवता अनुकूल ठिकाणीच ते पसरवावेत. यालाच येथे ‘सप्पाय-संपजन्य’ असे म्हणतात. ගොචරසම්පජඤ්ඤං පන මහාථෙරවත්ථුනා දීපෙතබ්බං – මහාථෙරො කිර දිවාට්ඨානෙ නිසින්නො අන්තෙවාසිකෙහි සද්ධිං කථයමානො සහසා හත්ථං [Pg.229] සමිඤ්ජිත්වා පුන යථාඨානෙ ඨපෙත්වා සණිකං සමිඤ්ජෙසි. තං අන්තෙවාසිකා පුච්ඡිංසු – ‘‘කස්මා, භන්තෙ, සහසා හත්ථං සමිඤ්ජිත්වා පුන යථාඨානෙ ඨපෙත්වා සණිකං සමිඤ්ජිත්ථා’’ති. යතො පට්ඨායාහං, ආවුසො, කම්මට්ඨානං මනසිකාතුං ආරද්ධො, න මෙ කම්මට්ඨානං මුඤ්චිත්වා හත්ථො සමිඤ්ජිතපුබ්බො, ඉදානි පන තුම්හෙහි සද්ධිං කථයමානෙන කම්මට්ඨානං මුඤ්චිත්වා සමිඤ්ජිතො, තස්මා පුන යථාඨානෙ ඨපෙත්වා සමිඤ්ජෙසින්ති. සාධු, භන්තෙ, භික්ඛුනා නාම එවරූපෙන භවිතබ්බන්ති. එවමෙත්ථාපි කම්මට්ඨානාවිජහනමෙව ගොචරසම්පජඤ්ඤන්ති වෙදිතබ්බං. परंतु ‘गोचर-संपजन्य’ हे महाथेरांच्या कथेवरून स्पष्ट केले पाहिजे – असे ऐकिवात आहे की, महाथेर दिवसा विश्रांतीच्या ठिकाणी बसले असताना आपल्या शिष्यांशी (अंतेवासिकांशी) संभाषण करत होते. संभाषण करत असताना त्यांनी अचानक आपला हात आखडला, आणि पुन्हा तो पहिल्या जागी ठेवून हळूच आखडला. त्यांच्या शिष्यांनी त्यांना विचारले – “भंते! आपण अचानक हात आखडून पुन्हा तो पहिल्या जागी ठेवून हळूच का आखडलात?” महाथेरांनी उत्तर दिले – “आयुष्यमानांनो! मी जेव्हापासून कम्मट्ठानाचे (कर्मस्थानाचे) मनन करण्यास प्रारंभ केला आहे, तेव्हापासून कम्मट्ठान सोडून मी कधीही हात आखडलेला नाही. परंतु आता तुमच्याशी बोलत असताना कम्मट्ठान सुटून माझ्याकडून हात आखडला गेला. म्हणून मी पुन्हा हात पहिल्या जागी ठेवून (स्मृती जागृत करून) हळूच आखडला.” शिष्य म्हणाले – “भंते, साधू! भिक्खूने खरोखर असेच असायला हवे.” अशा प्रकारे, येथेही कम्मट्ठान न सोडणे म्हणजेच ‘गोचर-संपजन्य’ होय, असे समजावे. අබ්භන්තරෙ අත්තා නාම කොචි සමිඤ්ජන්තො වා පසාරෙන්තො වා නත්ථි, වුත්තප්පකාරචිත්තකිරියවායොධාතුවිප්ඵාරෙන පන සුත්තාකඩ්ඪනවසෙන දාරුයන්තස්ස හත්ථපාදලළනං විය සමිඤ්ජනපසාරණං හොතීති පරිජානනං පනෙත්ථ අසම්මොහසම්පජඤ්ඤන්ති වෙදිතබ්බං. शरीराच्या आत ‘आत्मा’ नावाचा असा कोणीही नाही जो हात-पाय आखडतो किंवा पसरवतो. परंतु, पूर्वोक्त चित्त-क्रियेमुळे उत्पन्न होणाऱ्या वायोधातूच्या प्रसारामुळे (हालचालीमुळे), दोरीने ओढल्या जाणाऱ्या लाकडी बाहुलीच्या (कठपुतळीच्या) हात-पायांच्या हालचालीप्रमाणेच हे आखडणे व पसरवणे होत असते – असे स्पष्टपणे जाणून घेणे म्हणजेच येथे ‘असंमोह-संपजन्य’ होय, असे समजावे. සඞ්ඝාටිපත්තචීවරධාරණෙති එත්ථ සඞ්ඝාටිචීවරානං නිවාසනපාරුපනවසෙන, පත්තස්ස භික්ඛාපටිග්ගහණාදිවසෙන පරිභොගො ධාරණං නාම. තත්ථ සඞ්ඝාටිචීවරධාරණෙ තාව නිවාසෙත්වා පාරුපිත්වා ච පිණ්ඩාය චරතො ආමිසලාභො, ‘‘සීතස්ස පටිඝාතායා’’තිආදිනා නයෙන භගවතා වුත්තප්පකාරොයෙව ච අත්ථො අත්ථො නාම. තස්ස වසෙන සාත්ථකසම්පජඤ්ඤං වෙදිතබ්බං. ‘संघाटी, पात्र आणि चीवर धारण करणे’ या वाक्यात – संघाटी व चीवर नेसणे व पांघरण्याच्या रूपाने, आणि पात्राचा (भिक्षापात्राचा) भिक्षा ग्रहण करणे इत्यादी रूपाने उपयोग करणे म्हणजे ‘धारण करणे’ होय. त्यामध्ये, संघाटी व चीवर धारण करण्याच्या बाबतीत – प्रथम ते नेसून व पांघरून भिक्षेसाठी जाणाऱ्या भिक्खूला आमिषाचा (अन्नादींचा) लाभ होतो, आणि भगवंतांनी “थंडीच्या निवारणासाठी” इत्यादी प्रकारे सांगितलेला जो उद्देश आहे, तोच खरा उद्देश (हित) होय. त्याच्या आधारे ‘सार्थक-संपजन्य’ समजावे. උණ්හපකතිකස්ස පන දුබ්බලස්ස ච චීවරං සුඛුමං සප්පායං, සීතාලුකස්ස ඝනං දුපට්ටං. විපරීතං අසප්පායං. යස්ස කස්සචි ජිණ්ණං අසප්පායමෙව. අග්ගළාදිදානෙන හිස්ස තං පලිබොධකරං හොති. තථා පට්ටුණ්ණදුකූලාදිභෙදං ලොභනීයචීවරං. තාදිසඤ්හි අරඤ්ඤෙ එකකස්ස නිවාසන්තරායකරං, ජීවිතන්තරායකරඤ්චාපි හොති. නිප්පරියායෙන පන යං නිමිත්තකම්මාදිමිච්ඡාජීවවසෙන උප්පන්නං, යඤ්චස්ස සෙවමානස්ස අකුසලා ධම්මා අභිවඩ්ඪන්ති, කුසලා ධම්මා පරිහායන්ති, තං අසප්පායං. විපරීතං සප්පායං, තස්ස වසෙනෙත්ථ සප්පායසම්පජඤ්ඤං, කම්මට්ඨානාවිජහනවසෙනෙව ච ගොචරසම්පජඤ්ඤං වෙදිතබ්බං. परंतु, उष्ण प्रकृती असलेल्या आणि दुर्बल व्यक्तीसाठी सुती व तलम (बारीक) चीवर अनुकूल असते; तर थंडी सहन न होणाऱ्या व्यक्तीसाठी जाड व दुहेरी (दुपट्टा) चीवर अनुकूल असते. याच्या उलट असणारे चीवर प्रतिकूल असते. कोणत्याही भिक्खूसाठी जीर्ण (फाटलेले) चीवर प्रतिकूलच असते. कारण, त्याला ठिगळ इत्यादी जोडण्यातच त्याचा वेळ वाया जातो आणि ते ध्यानात अडथळा निर्माण करणारे ठरते. तसेच, रेशीम किंवा तलम कापडाचे बनलेले लोभ उत्पन्न करणारे मौल्यवान चीवरही प्रतिकूलच असते. कारण, जंगलात एकट्या राहणाऱ्या भिक्खूसाठी तसे चीवर त्याच्या ब्रह्मचर्याला (वास्तव्याला) आणि प्राणालाही धोका निर्माण करणारे ठरू शकते. परंतु मुख्यत्वेकरून, जे चीवर निमित्त-कर्म (इशारे करणे) इत्यादी चुकीच्या उपजीविकेने (मिच्छा-आजीव) प्राप्त झाले असेल, आणि ज्याचा उपयोग केल्याने अकुशल धर्म वाढतात व कुशल धर्म नष्ट होतात, ते चीवर पूर्णपणे प्रतिकूल होय. याच्या उलट असणारे चीवर अनुकूल होय. त्याच्या आधारे येथे ‘सप्पाय-संपजन्य’ आणि कम्मट्ठान न सोडण्याच्या आधारे ‘गोचर-संपजन्य’ समजावे. අබ්භන්තරෙ අත්තා නාම කොචි චීවරං පාරුපන්තො නත්ථි, වුත්තප්පකාරචිත්තකිරියවායොධාතුවිප්ඵාරෙනෙව පන චීවරපාරුපනං හොති. තත්ථ චීවරම්පි [Pg.230] අචෙතනං, කායොපි අචෙතනො. චීවරං න ජානාති ‘‘මයා කායො පාරුපිතො’’ති. කායොපි න ජානාති ‘‘අහං චීවරෙන පාරුපිතො’’ති. ධාතුයොව ධාතුසමූහං පටිච්ඡාදෙන්ති පටපිලොතිකාය පොත්ථකරූපපටිච්ඡාදනෙ විය. තස්මා නෙව සුන්දරං චීවරං ලභිත්වා සොමනස්සං කාතබ්බං, න අසුන්දරං ලභිත්වා දොමනස්සං. නාගවම්මිකචෙතියරුක්ඛාදීසු හි කෙචි මාලාගන්ධධූමවත්ථාදීහි සක්කාරං කරොන්ති, කෙචි ගූථමුත්තකද්දමදණ්ඩසත්ථපහාරාදීහි අසක්කාරං. න තෙහි නාගවම්මිකරුක්ඛාදයො සොමනස්සං වා කරොන්ති දොමනස්සං වා. එවමෙවං නෙව සුන්දරං චීවරං ලභිත්වා සොමනස්සං කාතබ්බං, න අසුන්දරං ලභිත්වා දොමනස්සන්ති එවං පවත්තපටිසඞ්ඛානවසෙනෙත්ථ අසම්මොහසම්පජඤ්ඤං වෙදිතබ්බං. शरीराच्या आत ‘आत्मा’ नावाचा असा कोणीही नाही जो चीवर पांघरतो. परंतु, पूर्वोक्त चित्त-क्रियेमुळे उत्पन्न होणाऱ्या वायोधातूच्या प्रसारामुळेच चीवर पांघरले जाते. त्यामध्ये चीवरही अचेतन (जड) आहे आणि शरीरही अचेतन आहे. चीवर हे जाणत नाही की, “मी शरीराला झाकले आहे.” शरीरही हे जाणत नाही की, “मला चीवराने झाकले आहे.” जसे कापडाच्या तुकड्याने लाकडी बाहुलीला झाकावे, तसेच येथे केवळ धातूच धातूंच्या समूहाला झाकत आहेत. म्हणून, सुंदर चीवर मिळाल्यास आनंद (सोमनस्य) मानू नये आणि वाईट चीवर मिळाल्यास दुःख (दोमनस्य) मानू नये. कारण, काही लोक नागाचे वारूळ, चैत्य, वृक्ष इत्यादींची फुले, गंध, धूप, वस्त्र इत्यादींनी पूजा करतात; तर काही लोक विष्ठा, मूत्र, चिखल, काठी व शस्त्रांचे प्रहार इत्यादींनी त्यांचा अनादर करतात. परंतु, त्या पूजेने किंवा अनादराने ते नागाचे वारूळ, वृक्ष इत्यादी आनंदित किंवा दुःखी होत नाहीत. त्याचप्रमाणे, सुंदर चीवर मिळाल्यास आनंद मानू नये आणि वाईट चीवर मिळाल्यास दुःख मानू नये. अशा प्रकारे चिंतन करण्याच्या आधारे येथे ‘असंमोह-संपजन्य’ समजावे. පත්තධාරණෙපි පත්තං සහසාව අග්ගහෙත්වා – ‘‘ඉමං ගහෙත්වා පිණ්ඩාය චරමානො භික්ඛං ලභිස්සාමී’’ති එවං පත්තග්ගහණපච්චයා පටිලභිතබ්බඅත්ථවසෙන සාත්ථකසම්පජඤ්ඤං වෙදිතබ්බං. කිසදුබ්බලසරීරස්ස පන ගරුපත්තො අසප්පායො. යස්ස කස්සචි චතුපඤ්චගණ්ඨිකාහතො දුබ්බිසොධනීයො අසප්පායොව. දුද්ධොතපත්තො හි න වට්ටති, තං ධොවන්තස්සෙව චස්ස පලිබොධො හොති. මණිවණ්ණපත්තො පන ලොභනීයො චීවරෙ වුත්තනයෙනෙව අසප්පායො. නිමිත්තකම්මාදිවසෙන ලද්ධො, පන යඤ්චස්ස සෙවමානස්ස අකුසලා ධම්මා අභිවඩ්ඪන්ති, කුසලා ධම්මා පරිහායන්ති, අයං එකන්තඅසප්පායොව. විපරීතො සප්පායො. තස්ස වසෙනෙත්ථ සප්පායසම්පජඤ්ඤං, කම්මට්ඨානාවිජහනවසෙනෙව ච ගොචරසම්පජඤ්ඤං වෙදිතබ්බං. पात्र (भिक्षापात्र) धारण करण्याच्या बाबतीतही, अचानक पात्र हातात न घेता – “हे घेऊन भिक्षेसाठी फिरताना मला भिक्षा मिळेल,” अशा प्रकारे पात्र घेण्याच्या कारणाने प्राप्त होणाऱ्या हिताच्या आधारे ‘सार्थक-संपजन्य’ समजावे. परंतु, कृश आणि दुर्बल शरीर असलेल्या भिक्खूसाठी जड पात्र प्रतिकूल असते. ज्या पात्राला चार-पाच ठिकाणी सांधे (ठिगळे) जोडलेले आहेत आणि जे स्वच्छ करणे कठीण आहे, ते पात्र प्रतिकूलच होय. कारण जे पात्र नीट धुता येत नाही ते अयोग्य असते, आणि ते धुण्यातच भिक्खूचा वेळ वाया जातो (अडथळा निर्माण होतो). मण्यासारखा रंग असलेले आकर्षक पात्र चीवराच्या बाबतीत सांगितलेल्या नियमाप्रमाणेच प्रतिकूल असते. तसेच, जे पात्र निमित्त-कर्म इत्यादींद्वारे प्राप्त झाले असेल, आणि ज्याचा उपयोग केल्याने अकुशल धर्म वाढतात व कुशल धर्म नष्ट होतात, ते पात्र पूर्णपणे प्रतिकूलच होय. याच्या उलट असणारे पात्र अनुकूल होय. त्याच्या आधारे येथे ‘सप्पाय-संपजन्य’ आणि कम्मट्ठान न सोडण्याच्या आधारे ‘गोचर-संपजन्य’ समजावे. අබ්භන්තරෙ අත්තා නාම කොචි පත්තං ගණ්හන්තො නත්ථි, වුත්තප්පකාරචිත්තකිරියවායොධාතුවිප්ඵාරෙනෙව පත්තග්ගහණං නාම හොති. තත්ථ පත්තොපි අචෙතනො, හත්ථාපි අචෙතනා. පත්තො න ජානාති ‘‘අහං හත්ථෙහි ගහිතො’’ති. හත්ථාපි න ජානන්ති ‘‘පත්තො අම්හෙහි ගහිතො’’ති. ධාතුයොව ධාතුසමූහං ගණ්හන්ති, සණ්ඩාසෙන අග්ගිවණ්ණපත්තග්ගහණෙ වියාති එවං පවත්තපටිසඞ්ඛානවසෙනෙත්ථ අසම්මොහසම්පජඤ්ඤං වෙදිතබ්බං. शरीराच्या आत 'आत्मा' नावाचा पात्र पकडणारा कोणीही (कर्ता) नाही. पूर्वोक्त प्रकारच्या चित्त-क्रियाजन्य वायूधातूच्या प्रसरणामुळेच 'पात्र ग्रहण करणे' (पात्र पकडणे) घडते. त्यामध्ये पात्रही अचेतन आहे आणि हातही अचेतन आहेत. पात्राला हे माहीत नसते की, 'मला हातांनी पकडले आहे', आणि हातांनाही हे माहीत नसते की, 'आम्ही पात्राला पकडले आहे'. केवळ धातूच धातूंच्या समूहाला पकडतात; जसे लोहाराच्या सांडशीने लालभडक तापलेले पात्र पकडले जाते, त्याप्रमाणे. अशा प्रकारे घडणाऱ्या या प्रक्रियेच्या विचारपूर्वक चिंतनाद्वारे येथे 'असंमोह-संपजन्य' (मोहविरहित स्पष्ट ज्ञान) समजून घ्यावे. අපිච යථා ඡින්නහත්ථපාදෙ වණමුඛෙහි පග්ඝරිතපුබ්බලොහිතකිමිකුලෙ නීලමක්ඛිකසම්පරිකිණ්ණෙ අනාථසාලාය අනාථමනුස්සෙ දිස්වා දයාලුකා පුරිසා තෙසං වණපට්ටචොළකානි චෙව කපාලාදීහි භෙසජ්ජානි ච උපනාමෙන්ති. තත්ථ චොළකානිපි කෙසඤ්චි සණ්හානි, කෙසඤ්චි ථූලානි පාපුණන්ති, භෙසජ්ජකපාලානිපි කෙසඤ්චි සුසණ්ඨානානි, කෙසඤ්චි [Pg.231] දුස්සණ්ඨානානි පාපුණන්ති, න තෙ තත්ථ සුමනා වා දුම්මනා වා හොන්ති. වණපටිච්ඡාදනමත්තෙනෙව හි චොළකෙන භෙසජ්ජපටිග්ගහමත්තෙනෙව ච කපාලකෙන තෙසං අත්ථො. එවමෙව යො භික්ඛු වණචොළකං විය චීවරං, භෙසජ්ජකපාලකං විය ච පත්තං, කපාලෙ භෙසජ්ජමිව ච පත්තෙ ලද්ධභික්ඛං සල්ලක්ඛෙති. අයං සඞ්ඝාටිපත්තචීවරධාරණෙ අසම්මොහසම්පජඤ්ඤෙන උත්තමසම්පජානකාරීති වෙදිතබ්බො. आणखी एक उदाहरण म्हणजे, ज्यांचे हात-पाय कापले गेले आहेत, जखमांमधून पू आणि रक्त वाहत आहे, जे किड्यांनी भरलेले आहेत आणि ज्यांच्यावर निळ्या माशा घोंगावत आहेत, अशा अनाथालयात बसलेल्या अनाथ लोकांना पाहून दयाळू लोक त्यांच्या जखमा बांधण्यासाठी कापडाचे तुकडे आणि खापराच्या तुकड्यांमध्ये औषधे आणून देतात. त्या अनाथ लोकांपैकी काहींना मऊ (बारीक) कापड मिळते, तर काहींना जाडेभरडे कापड मिळते. तसेच औषध ठेवण्याची खापरेही काहींना चांगल्या आकाराची मिळतात, तर काहींना वाईट आकाराची मिळतात. परंतु, ते लोक त्यामुळे आनंदी किंवा दुःखी होत नाहीत. कारण केवळ जखम झाकण्यासाठी कापडाची आणि औषध घेण्यासाठी खापराचीच त्यांना गरज असते. त्याचप्रमाणे, जो भिक्खू चीवराला जखम झाकणाऱ्या कापडासारखे, पात्राला औषध ठेवण्याच्या खापरासारखे आणि पात्रात मिळालेल्या भिक्षेला (अन्नाला) खापरामधील औषधासारखे मानतो; तो भिक्खू संघात, पात्र आणि चीवर धारण करण्याच्या बाबतीत 'असंमोह-संपजन्या'ने युक्त असलेला 'उत्तम संपजानकारी' (उत्कृष्ट सजगतेने कार्य करणारा) आहे असे समजावे. අසිතාදීසු අසිතෙති පිණ්ඩපාතභොජනෙ. පීතෙති යාගුආදිපානෙ. ඛායිතෙති පිට්ඨඛජ්ජකාදිඛාදනෙ. සායිතෙති මධුඵාණිතාදිසායනෙ. තත්ථ ‘‘නෙව දවායා’’තිආදිනා නයෙන වුත්තො අට්ඨවිධොපි අත්ථො අත්ථො නාම, තස්ස වසෙන සාත්ථකසම්පජඤ්ඤං වෙදිතබ්බං. 'अशित' इत्यादी शब्दांमध्ये—'अशित' म्हणजे भोजन (पिंडपात) ग्रहण करणे. 'पीत' म्हणजे कांजी इत्यादी पेय पिणे. 'खायित' म्हणजे पिठाचे खाद्यपदार्थ इत्यादी खाणे. 'सायित' म्हणजे मध, काकवी इत्यादी चाखणे. त्यामध्ये 'नेव दवाय' (मजेसाठी नाही) इत्यादी सूत्रात सांगितलेला आठ प्रकारचा हेतू म्हणजेच 'अर्थ' होय; त्याच्या आधारे 'सार्थक-संपजन्य' (हेतूचे स्पष्ट ज्ञान) समजून घ्यावे. ලූඛපණීතතිත්තමධුරාදීසු පන යෙන භොජනෙන යස්ස අඵාසු හොති, තං තස්ස අසප්පායං. යං පන නිමිත්තකම්මාදිවසෙන පටිලද්ධං, යඤ්චස්ස භුඤ්ජතො අකුසලා ධම්මා අභිවඩ්ඪන්ති, කුසලා ධම්මා පරිහායන්ති, තං එකන්තඅසප්පායමෙව. විපරීතං සප්පායං. තස්ස වසෙනෙත්ථ සප්පායසම්පජඤ්ඤං, කම්මට්ඨානාවිජහනවසෙනෙව ච ගොචරසම්පජඤ්ඤං වෙදිතබ්බං. परंतु, जाडेभरडे, उत्तम, कडू, गोड इत्यादी अन्नांपैकी ज्या भोजनाने ज्या भिक्खूला अस्वस्थता निर्माण होते, ते भोजन त्याच्यासाठी अयोग्य (असात्त्विक) आहे. तसेच, जे भोजन 'निमित्तकर्म' (इशारे करणे) इत्यादी अयोग्य मार्गाने मिळवले गेले आहे, आणि जे ग्रहण केल्याने भिक्खूचे अकुशल धर्म वाढतात व कुशल धर्म नष्ट होतात, ते भोजन पूर्णपणे अयोग्यच आहे. याच्या उलट असलेले भोजन योग्य (सात्त्विक) आहे. त्याच्या आधारे येथे 'सप्पाय-संपजन्य' (योग्यतेचे स्पष्ट ज्ञान) समजून घ्यावे, आणि कर्मस्थान (ध्यानविषय) न सोडता भोजन करण्याच्या आधारे 'गोचर-संपजन्य' समजून घ्यावे. අබ්භන්තරෙ අත්තා නාම කොචි භුඤ්ජකො නත්ථි, වුත්තප්පකාරචිත්තකිරියවායොධාතුවිප්ඵාරෙනෙව පත්තපටිග්ගහණං නාම හොති, චිත්තකිරියවායොධාතුවිප්ඵාරෙනෙව හත්ථස්ස පත්තෙ ඔතාරණං නාම හොති, චිත්තකිරියවායොධාතුවිප්ඵාරෙනෙව ආලොපකරණං ආලොපුද්ධරණං මුඛවිවරණඤ්ච හොති. න කොචි කුඤ්චිකාය න යන්තකෙන හනුකට්ඨීනි විවරති, චිත්තකිරියවායොධාතුවිප්ඵාරෙනෙව ආලොපස්ස මුඛෙ ඨපනං උපරිදන්තානං මුසලකිච්චසාධනං හෙට්ඨාදන්තානං උදුක්ඛලකිච්චසාධනං ජිව්හාය හත්ථකිච්චසාධනඤ්ච හොති. ඉති නං තත්ථ අග්ගජිව්හාය තනුකඛෙළො, මූලජිව්හාය බහලඛෙළො මක්ඛෙති. තං හෙට්ඨාදන්තඋදුක්ඛලෙ ජිව්හාහත්ථපරිවත්තිතං ඛෙළඋදකතෙමිතං උපරිදන්තමුසලසඤ්චුණ්ණිතං කොචි කටච්ඡුනා වා දබ්බියා වා අන්තො පවෙසෙන්තො නාම නත්ථි, වායොධාතුයාව පවිසති. පවිට්ඨං පවිට්ඨං කොචි පලාලසන්ථරං කත්වා ධාරෙන්තො නාම නත්ථි, වායොධාතුවසෙනෙව තිට්ඨති. ඨිතං ඨිතං කොචි උද්ධනං කත්වා අග්ගිං ජාලෙත්වා පචන්තො නාම නත්ථි, තෙජොධාතුයාව පච්චති. පක්කං පක්කං කොචි දණ්ඩකෙන වා යට්ඨියා වා බහි නීහරකො නාම නත්ථි, වායොධාතුයෙව නීහරති. ඉති වායොධාතු අතිහරති ච වීතිහරති ච [Pg.232] ධාරෙති ච පරිවත්තෙති ච සඤ්චුණ්ණෙති ච විසොසෙති ච නීහරති ච; පථවීධාතු ධාරෙති ච පරිවත්තෙති ච සඤ්චුණ්ණෙති ච විසොසෙති ච; ආපොධාතු සිනෙහෙති ච අල්ලත්තඤ්ච අනුපාලෙති; තෙජොධාතු අන්තොපවිට්ඨං පරිපාචෙති; ආකාසධාතු අඤ්ජසො හොති; විඤ්ඤාණධාතු තත්ථ තත්ථ සම්මාපයොගමන්වාය ආභුජතීති එවං පවත්තපටිසඞ්ඛානවසෙනෙත්ථ අසම්මොහසම්පජඤ්ඤං වෙදිතබ්බං. शरीराच्या आत 'आत्मा' नावाचा भोजन करणारा कोणीही नाही. पूर्वोक्त प्रकारच्या चित्त-क्रियाजन्य वायूधातूच्या प्रसरणामुळेच 'पात्र स्वीकारणे' घडते. चित्त-क्रियाजन्य वायूधातूच्या प्रसरणामुळेच हात पात्रात खाली नेणे घडते. चित्त-क्रियाजन्य वायूधातूच्या प्रसरणामुळेच घासाचा गोळा करणे, घास वर उचलणे आणि तोंड उघडणे घडते. कोणीही चावीने किंवा यंत्राने जबड्याची हाडे उघडत नाही. केवळ चित्त-क्रियाजन्य वायूधातूच्या प्रसरणामुळेच घास तोंडात ठेवणे, वरच्या दातांचे मुसळासारखे (कुटण्याचे) कार्य होणे, खालच्या दातांचे उखळासारखे (धारण करण्याचे) कार्य होणे आणि जिभेचे हातासारखे (अन्न फिरवण्याचे) कार्य होणे घडते. अशा प्रकारे, तेथे जिभेच्या शेंड्यावरील पातळ लाळ आणि जिभेच्या मुळाशी असलेली दाट लाळ अन्नाला माखते. खालच्या दातांच्या उखळात जिभेच्या हाताने फिरवलेले, लाळरूपी पाण्याने ओले झालेले आणि वरच्या दातरूपी मुसळाने बारीक कुटलेले ते अन्न आत ढकलणारा चमचा किंवा पळी घेऊन बसलेला कोणीही नाही; ते केवळ वायूधातूमुळेच आत प्रवेश करते. आत गेलेल्या अन्नाला पेंढ्याची चटई अंथरून धरून ठेवणारा कोणीही नाही; ते केवळ वायूधातूच्या प्रभावानेच तेथे राहते. तेथे राहिलेल्या अन्नाला चूल मांडून, अग्नी पेटवून शिजवणारा कोणीही नाही; ते केवळ तेजोधातूमुळेच पचते. पचलेले अन्न काठीने किंवा दांडक्याने बाहेर काढणारा कोणीही नाही; केवळ वायूधातूच ते बाहेर काढतो. अशा प्रकारे, वायूधातू अन्न आत नेतो, पुढे ढकलतो, धरून ठेवतो, फिरवतो, बारीक करतो, सुकवतो आणि बाहेर काढतो; पृथ्वीधातू अन्नाला आधार देतो, फिरवतो, बारीक करतो आणि सुकवतो; आपोधातू अन्नाला स्निग्ध करतो आणि त्याचा ओलावा टिकवून ठेवतो; तेजोधातू आत गेलेल्या अन्नाला पचवतो; आकाशधातू हा अन्नाचा मार्ग बनतो; आणि विज्ञानधातू त्या त्या ठिकाणी योग्य प्रयोगाच्या आधारे जाणीव ठेवतो. अशा प्रकारे घडणाऱ्या या प्रक्रियेच्या विचारपूर्वक चिंतनाद्वारे येथे 'असंमोह-संपजन्य' समजून घ्यावे. අපිච ගමනතො, පරියෙසනතො, පරිභොගතො, ආසයතො, නිධානතො, අපරිපක්කතො, පරිපක්කතො, ඵලතො, නිස්සන්දතො, සම්මක්ඛනතොති එවං දසවිධං පටිකූලභාවං පච්චවෙක්ඛණතොපෙත්ථ අසම්මොහසම්පජඤ්ඤං වෙදිතබ්බං. විත්ථාරකථා පනෙත්ථ විසුද්ධිමග්ගෙ (විසුද්ධි. 1.294 ආදයො) ආහාරපටිකූලසඤ්ඤානිද්දෙසතො ගහෙතබ්බා. शिवाय, जाण्याच्या दृष्टीने, शोधण्याच्या दृष्टीने, उपभोग घेण्याच्या दृष्टीने, आशयाच्या (साठवणुकीच्या जागेच्या) दृष्टीने, साठवणुकीच्या दृष्टीने, न पचलेल्या अन्नाच्या दृष्टीने, पचलेल्या अन्नाच्या दृष्टीने, परिणामाच्या दृष्टीने, स्रावाच्या दृष्टीने आणि माखण्याच्या दृष्टीने—अशा दहा प्रकारच्या प्रतिकूलतेचे (अशुचितेचे) चिंतन करण्याद्वारेही येथे 'असंमोह-संपजन्य' समजून घ्यावे. याविषयीचे सविस्तर वर्णन 'विसुद्धिमग्ग' ग्रंथातील 'आहारपटिकूलसञ्ञानिद्देस' मधून घ्यावे. උච්චාරපස්සාවකම්මෙති උච්චාරස්ස ච පස්සාවස්ස ච කරණෙ. තත්ථ පත්තකාලෙ උච්චාරපස්සාවං අකරොන්තස්ස සකලසරීරතො සෙදා මුච්චන්ති, අක්ඛීනි භමන්ති, චිත්තං න එකග්ගං හොති, අඤ්ඤෙ ච රොගා උප්පජ්ජන්ති. කරොන්තස්ස පන සබ්බං තං න හොතීති අයමෙත්ථ අත්ථො. තස්ස වසෙන සාත්ථකසම්පජඤ්ඤං වෙදිතබ්බං. අට්ඨානෙ උච්චාරපස්සාවං කරොන්තස්ස පන ආපත්ති හොති, අයසො වඩ්ඪති, ජීවිතන්තරායොපි හොති. පතිරූපෙ ඨානෙ කරොන්තස්ස සබ්බං තං න හොතීති ඉදමෙත්ථ සප්පායං. තස්ස වසෙන සප්පායසම්පජඤ්ඤං, කම්මට්ඨානාවිජහනවසෙන ච ගොචරසම්පජඤ්ඤං වෙදිතබ්බං. 'उच्चारपस्सावकम्म' म्हणजे मलमूत्र विसर्जन करणे. त्यामध्ये, योग्य वेळ आली असता मलमूत्र विसर्जन न करणाऱ्या व्यक्तीच्या संपूर्ण शरीरातून घाम सुटतो, डोळे गरगरतात, चित्त एकाग्र होत नाही आणि इतर रोग उत्पन्न होतात. परंतु, ते विसर्जन करणाऱ्याला हे सर्व त्रास होत नाहीत; हाच येथे 'अर्थ' (फायदा) आहे. त्याच्या आधारे 'सार्थक-संपजन्य' समजून घ्यावे. अयोग्य ठिकाणी मलमूत्र विसर्जन करणाऱ्या भिक्खूला 'आपत्ती' (विनय नियमांचा भंग) येते, अपकीर्ती वाढते आणि जीविताला धोकाही निर्माण होऊ शकतो. योग्य ठिकाणी विसर्जन करणाऱ्याला हे सर्व त्रास होत नाहीत; हेच येथे 'सप्पाय' (योग्य) आहे. त्याच्या आधारे 'सप्पाय-संपजन्य' समजून घ्यावे, आणि कर्मस्थान न सोडता मलमूत्र विसर्जन करण्याच्या आधारे 'गोचर-संपजन्य' समजून घ्यावे. අබ්භන්තරෙ අත්තා නාම කොචි උච්චාරපස්සාවකම්මං කරොන්තො නත්ථි, චිත්තකිරියවායොධාතුවිප්ඵාරෙනෙව පන උච්චාරපස්සාවකම්මං හොති. යථා පන පක්කෙ ගණ්ඩෙ ගණ්ඩභෙදෙන පුබ්බලොහිතං අකාමතාය නික්ඛමති, යථා ච අතිභරිතා උදකභාජනා උදකං අකාමතාය නික්ඛමති, එවං පක්කාසයමුත්තවත්ථීසු සන්නිචිතා උච්චාරපස්සාවා වායුවෙගසමුප්පීළිතා අකාමතායපි නික්ඛමන්ති. සො පනායං එවං නික්ඛමන්තො උච්චාරපස්සාවො නෙව තස්ස භික්ඛුනො අත්තනො හොති න පරස්ස, කෙවලං සරීරනිස්සන්දොව හොති. යථා කිං? යථා උදකතුම්බතො පුරාණඋදකං ඡඩ්ඩෙන්තස්ස නෙව තං අත්තනො හොති න පරෙසං, කෙවලං පටිජග්ගනමත්තමෙව හොති. එවං පවත්තපටිසඞ්ඛානවසෙනෙත්ථ අසම්මොහසම්පජඤ්ඤං වෙදිතබ්බං. स्वतःच्या शरीराच्या आत मल-मूत्र विसर्जनाची क्रिया करणारा 'आत्मा' नावाचा कोणीही नाही, तर केवळ चित्त-क्रियाजन्य वायूधातूच्या प्रसरणामुळेच मल-मूत्र विसर्जनाची क्रिया होते. ज्याप्रमाणे पिकलेला गळू फुटल्यावर, कोणतीही इच्छा नसतानाही पू आणि रक्त बाहेर पडते, आणि ज्याप्रमाणे पाण्याने काठोकाठ भरलेल्या भांड्यातून पाणी इच्छेशिवाय बाहेर पडते; त्याचप्रमाणे पक्वाशय आणि मूत्राशयात साठलेले मल आणि मूत्र, वायूच्या वेगाने ढकलले गेल्यामुळे, कोणतीही इच्छा नसतानाही बाहेर पडतात. अशा प्रकारे बाहेर पडणारे मल-मूत्र त्या भिक्खूच्या स्वतःच्या उपयोगाचे नसते आणि इतरांच्याही उपयोगाचे नसते, तो केवळ शरीराचा एक स्राव असतो. हे कशासारखे आहे? ज्याप्रमाणे पाण्याच्या पात्रातून जुने पाणी फेकून देणाऱ्या भिक्खूसाठी ते पाणी स्वतःच्या उपयोगाचे नसते आणि इतरांच्याही उपयोगाचे नसते, ती केवळ एक स्वच्छता करण्याची क्रिया असते. अशा प्रकारे, घडणाऱ्या प्रक्रियेच्या योग्य चिंतनाद्वारे येथे 'असंमोह-संपजन्य' (भ्रमरहित स्पष्ट ज्ञान) समजून घ्यावे. ගතාදීසු [Pg.233] ගතෙති ගමනෙ. ඨිතෙති ඨානෙ. නිසින්නෙති නිසජ්ජාය. සුත්තෙති සයනෙ. ජාගරිතෙ ති ජාගරණෙ. භාසිතෙති කථනෙ. තුණ්හීභාවෙති අකථනෙ. එත්ථ ච යො චිරං ගන්ත්වා වා චඞ්කමිත්වා වා අපරභාගෙ ඨිතො ඉති පටිසඤ්චික්ඛති ‘‘චඞ්කමනකාලෙ පවත්තා රූපාරූපධම්මා එත්ථෙව නිරුද්ධා’’ති, අයං ගතෙ සම්පජානකාරී නාම. 'गत' इत्यादी शब्दांमध्ये—'गत' म्हणजे चालताना, 'ठित' म्हणजे उभे असताना, 'निसिन्न' म्हणजे बसलेले असताना, 'सुत्त' म्हणजे निद्रिस्त असताना, 'जागरित' म्हणजे जागे असताना, 'भासित' म्हणजे बोलताना आणि 'तुण्हीभावे' म्हणजे मौन बाळगताना. आणि येथे, जो भिक्खू बराच वेळ चालून किंवा चंक्रमण करून, त्यानंतर उभा राहून असा विचार करतो की, 'चंक्रमणाच्या वेळी उत्पन्न झालेले रूप आणि अरूप धर्म (भौतिक व मानसिक घटक) येथेच निरुद्ध झाले आहेत', तो चालण्याच्या क्रियेत 'संपजन्यपूर्वक कार्य करणारा' (संपजानकारी) म्हटला जातो. යො සජ්ඣායං වා කරොන්තො පඤ්හං වා විස්සජ්ජෙන්තො කම්මට්ඨානං වා මනසිකරොන්තො චිරං ඨත්වා අපරභාගෙ නිසින්නො ඉති පටිසඤ්චික්ඛති ‘‘ඨිතකාලෙ පවත්තා රූපාරූපධම්මා එත්ථෙව නිරුද්ධා’’ති, අයං ඨිතෙ සම්පජානකාරී නාම. जो भिक्खू सज्झाय (सस्वर पाठ) करत असताना, किंवा प्रश्नांची उत्तरे देत असताना, किंवा कम्मट्ठान (ध्यानविषय) मननात आणत असताना, बराच वेळ उभा राहून, त्यानंतर बसल्यावर असा विचार करतो की, 'उभे राहण्याच्या वेळी उत्पन्न झालेले रूप आणि अरूप धर्म येथेच निरुद्ध झाले आहेत', तो उभे राहण्याच्या क्रियेत 'संपजन्यपूर्वक कार्य करणारा' म्हटला जातो. යො සජ්ඣායාදිකරණවසෙනෙව චිරං නිසීදිත්වා අපරභාගෙ නිපන්නො ඉති පටිසඤ්චික්ඛති – ‘‘නිසින්නකාලෙ පවත්තා රූපාරූපධම්මා එත්ථෙව නිරුද්ධා’’ති, අයං නිසින්නෙ සම්පජානකාරී නාම. जो भिक्खू सज्झाय (सस्वर पाठ) इत्यादी करण्याच्या कारणाने बराच वेळ बसून, त्यानंतर आडवा झाल्यावर असा विचार करतो की, 'बसण्याच्या वेळी उत्पन्न झालेले रूप आणि अरूप धर्म येथेच निरुद्ध झाले आहेत', तो बसण्याच्या क्रियेत 'संपजन्यपूर्वक कार्य करणारा' म्हटला जातो. යො පන නිපන්නකොව සජ්ඣායං කරොන්තො කම්මට්ඨානං වා මනසිකරොන්තො නිද්දං ඔක්කමිත්වා අපරභාගෙ උට්ඨාය ඉති පටිසඤ්චික්ඛති – ‘‘සයනකාලෙ පවත්තා රූපාරූපධම්මා එත්ථෙව නිරුද්ධා’’ති, අයං සුත්තෙ ච ජාගරිතෙ ච සම්පජානකාරී නාම. කිරියමයචිත්තානඤ්හි අප්පවත්තං සුත්තං නාම, පවත්තං ජාගරිතං නාමාති. पण जो भिक्खू आडवा असतानाच सज्झाय करत किंवा कम्मट्ठान मननात आणत असताना झोपी जातो, आणि नंतर उठल्यावर असा विचार करतो की, 'झोपण्याच्या वेळी उत्पन्न झालेले रूप आणि अरूप धर्म येथेच निरुद्ध झाले आहेत', तो निद्रेत आणि जागृतावस्थेत 'संपजन्यपूर्वक कार्य करणारा' म्हटला जातो. कारण, क्रियाशील चित्ताची अप्रवृत्ती (कार्य न करणे) म्हणजे 'झोप' आणि त्याची प्रवृत्ती (कार्य करणे) म्हणजे 'जागृती' असे समजावे. යො පන භාසමානො – ‘‘අයං සද්දො නාම ඔට්ඨෙ ච පටිච්ච දන්තෙ ච ජිව්හඤ්ච තාලුඤ්ච පටිච්ච චිත්තස්ස ච තදනුරූපං පයොගං පටිච්ච ජායතී’’ති සතො සම්පජානො භාසති, චිරං වා පන කාලං සජ්ඣායං කත්වා ධම්මං වා කථෙත්වා කම්මට්ඨානං වා පරිවත්තෙත්වා පඤ්හං වා විස්සජ්ජෙත්වා අපරභාගෙ තුණ්හීභූතො ඉති පටිසඤ්චික්ඛති ‘‘භාසිතකාලෙ උප්පන්නා රූපාරූපධම්මා එත්ථෙව නිරුද්ධා’’ති අයං භාසිතෙ සම්පජානකාරී නාම. पण जो भिक्खू बोलताना—'हा ध्वनी ओठ, दात, जीभ, टाळू आणि मनाच्या तदनुरूप प्रयत्नावर अवलंबून उत्पन्न होतो'—अशा प्रकारे स्मृती आणि संपजन्याने युक्त होऊन बोलतो; किंवा बराच वेळ सज्झाय करून, धम्मदेशना देऊन, कम्मट्ठानाचा सराव करून किंवा प्रश्नांची उत्तरे देऊन, त्यानंतर मौन धारण करून असा विचार करतो की, 'बोलण्याच्या वेळी उत्पन्न झालेले रूप आणि अरूप धर्म येथेच निरुद्ध झाले आहेत', तो बोलण्याच्या क्रियेत 'संपजन्यपूर्वक कार्य करणारा' म्हटला जातो. යො තුණ්හීභූතො චිරං ධම්මං වා කම්මට්ඨානං වා මනසිකත්වා අපරභාගෙ ඉති පටිසඤ්චික්ඛති – ‘‘තුණ්හීභූතකාලෙ පවත්තා රූපාරූපධම්මා එත්ථෙව නිරුද්ධා’’ති. උපාදාරූපපවත්තියා සති භාසති නාම, අසති තුණ්හී භවති නාමාති, අයං තුණ්හීභාවෙ සම්පජානකාරී නාමාති. එවමෙත්ථ අසම්මොහසම්පජඤ්ඤං තස්ස වසෙන සම්පජානකාරිතා වෙදිතබ්බා. ඉමස්මිං සුත්තෙ සතිපට්ඨානමිස්සකසම්පජඤ්ඤං පුබ්බභාගං කථිතං. जो मौन राहून बराच वेळ धम्माचे किंवा कम्मट्ठानाचे मनन करतो आणि त्यानंतर असा विचार करतो की, 'मौन बाळगण्याच्या वेळी उत्पन्न झालेले रूप आणि अरूप धर्म येथेच निरुद्ध झाले आहेत'; उपादाय रूपाची (ध्वनीची) प्रवृत्ती असताना त्याला 'बोलणे' म्हणतात, आणि ती नसताना 'मौन बाळगणे' म्हणतात, असे समजावे. तो मौन बाळगण्याच्या क्रियेत 'संपजन्यपूर्वक कार्य करणारा' म्हटला जातो. अशा प्रकारे, येथे 'असंमोह-संपजन्य' आणि त्याच्या प्रभावाने संपजन्यपूर्वक कार्य करणे समजून घ्यावे. या सुत्तात, सतिपट्ठानाने युक्त असलेल्या पूर्वभागातील संपजन्याविषयी सांगितले आहे. 3. භික්ඛුසුත්තවණ්ණනා ३. भिक्खू सुत्त वर्णन 369. තතියෙ [Pg.234] එවමෙව පනිධෙකච්චෙති සො කිර භික්ඛු කම්මට්ඨානං කථාපෙත්වා ඉතො චිතො ච ආහිණ්ඩති, කායවිවෙකං නානුයුඤ්ජති. තෙන නං භගවා නිග්ගණ්හන්තො එවමාහ. තස්මාති යස්මා සංඛිත්තෙන දෙසනං යාචසි, තස්මා. දිට්ඨීති කම්මස්සකතාදිට්ඨි. ३६९. तिसऱ्या सुत्तात—'एवमेव पनिधेकच्चे' (तसेच येथे काही...) म्हणजे, तो भिक्खू कम्मट्ठान शिकून घेऊन इकडे तिकडे भटकत राहतो आणि काय-विवेक (शारीरिक एकांत) साधण्याचा प्रयत्न करत नाही. म्हणूनच, भगवान त्या भिक्खूला ताकीद देण्यासाठी असे म्हणाले. 'तस्मा' (म्हणून) म्हणजे 'ज्याअर्थी तू संक्षेपात धम्मदेशनेची याचना करत आहेस, म्हणून...'. 'दिट्ठि' (दृष्टी) म्हणजे कम्मस्सकता दिट्ठि (कर्म-स्वकीयता दृष्टी). 4. සාලසුත්තවණ්ණනා ४. साल सुत्त वर्णन 370. චතුත්ථෙ ධම්මවිනයොති ධම්මොති වා විනයොති වා උභයමෙතං සත්ථුසාසනස්සෙව නාමං. සමාදපෙතබ්බාති ගණ්හාපෙතබ්බා. එකොදිභූතාති ඛණිකසමාධිනා එකග්ගභූතා. සමාහිතා එකග්ගචිත්තාති උපචාරප්පනාවසෙන සම්මා ඨපිතචිත්තා ච එකග්ගචිත්තා ච. ඉමස්මිං සුත්තෙ නවකභික්ඛූහි චෙව ඛීණාසවෙහි ච භාවිතසතිපට්ඨානා පුබ්බභාගා, සත්තහි සෙඛෙහි භාවිතා මිස්සකා. ३७०. चौथ्या सुत्तात—'धम्मविनय' म्हणजे 'धम्म' किंवा 'विनय', हे दोन्ही शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) शासनाचेच नाव आहे. 'समादपेतब्बा' म्हणजे ग्रहण करायला लावणे. 'एकोदिभूता' म्हणजे क्षणिक समाधीद्वारे एकाग्र झालेले. 'समाहिता एकग्गचित्ता' म्हणजे उपचार आणि अप्पना समाधीच्या प्रभावाने चांगल्या प्रकारे स्थिर झालेले आणि एकाग्र झालेले चित्त. या सुत्तात, नवीन भिक्खू आणि क्षीणास्रव (अर्हत) यांच्याद्वारे विकसित केलेले सतिपट्ठान हे पूर्वभागातील (लौकिक) आहे, तर सात प्रकारच्या शैक्ष (सेख) पुद्गलांद्वारे विकसित केलेले सतिपट्ठान हे मिश्र आहे. 6. සකුණග්ඝිසුත්තවණ්ණනා ६. सकुणग्घि सुत्त वर्णन 372. ඡට්ඨෙ සකුණග්ඝීති සකුණං හනතීති සකුණග්ඝි, සෙනස්සෙතං අධිවචනං. සහසා අජ්ඣපත්තාති ලොභසාහසෙන පත්තා. අලක්ඛිකාති නිස්සිරිකා. අප්පපුඤ්ඤාති පරිත්තපුඤ්ඤා. සචෙජ්ජ මයන්ති සචෙ අජ්ජ මයං. නඞ්ගලකට්ඨකරණන්ති නඞ්ගලෙන කසිකරණං, අධුනා කට්ඨං ඛෙත්තට්ඨානන්ති අත්ථො. ලෙඩ්ඩුට්ඨානන්ති ලෙඩ්ඩූනං ඨානං. සංවදමානාති සම්මා වදමානා, අත්තනො බලස්ස සුට්ඨු වණ්ණං වදමානාති අත්ථො. මහන්තං ලෙඩ්ඩුං අභිරුහිත්වාති උද්ධනසණ්ඨානෙන ඨිතෙසු තීසු ලෙඩ්ඩූසු ‘‘ඉතො සෙනෙ ආගච්ඡන්තෙ ඉතො නික්ඛමිස්සාමි, ඉතො ආගච්ඡන්තෙ ඉතො’’ති සල්ලක්ඛෙත්වා තෙසු එකං ලෙඩ්ඩුං අභිරුහිත්වා අට්ඨාසි අවදමානො. සන්නය්හාති ඛුරප්පං සන්නය්හමානො විය සන්නය්හිත්වා සුට්ඨු ඨපෙත්වා. බහුආගතො ඛො ම්යායන්ති ‘‘මය්හං අත්ථාය අයං බහුතං ඨානං ආගතො, අප්පං අවසිට්ඨං, ඉදානි මං ගණ්හිස්සතී’’ති ඤත්වා දාරුගුළො විය විනිවත්තිත්වා තස්සෙව ලෙඩ්ඩුස්ස අන්තරෙ පච්චුපාදි, පටිපන්නො පවිට්ඨොති අත්ථො. උරං පච්චතාළෙසීති ‘‘එකප්පහාරෙනෙව ලාපස්ස සීසං ඡින්දිත්වා ගහෙස්සාමී’’ති [Pg.235] පක්ඛන්දත්තා වෙගං සන්ධාරෙතුං අසක්කොන්තො තස්මිං ලෙඩ්ඩුස්මිං උරං පතාළෙසි. තාවදෙවස්ස හදයමංසං ඵාලියිත්ථ. අථ ලාපො ‘‘දිට්ඨා වත සත්තුනො පිට්ඨී’’ති හට්ඨතුට්ඨො තස්ස හදයෙ අපරාපරං චඞ්කමි. ३७२. सहाव्या सुत्तात—'सकुणग्घि' म्हणजे 'पक्ष्यांची शिकार करणारा'; हे ससाण्याचे नाव आहे. 'सहसा अज्झपत्ता' म्हणजे लोभ आणि बळजबरीने पकडलेले. 'अलक्खिका' म्हणजे दुर्दैवी/शोभाहीन. 'अप्पपुञ्ञा' म्हणजे अल्पपुण्य असलेले. 'सचेज्ज मयं' म्हणजे 'जर आज आम्ही...'. 'नंगलकट्ठकरणं' म्हणजे नांगराने नांगरणी करणे, नुकतेच नांगरलेले शेत असा अर्थ आहे. 'लेड्डुट्ठानं' म्हणजे मातीच्या ढेकळांची जागा. 'संवदमाना' म्हणजे स्वतःच्या शक्तीची स्तुती करत आव्हान देणे असा अर्थ आहे. 'महन्तं लेड्डुं अभिरुहित्वा' म्हणजे चुलीच्या रचनेसारख्या असलेल्या तीन ढेकळांवर, 'जर ससाणा इकडून आला तर मी इकडे पळेन, आणि तिकडून आला तर तिकडे पळेन' असा विचार करून, त्यांपैकी एका ढेकळावर चढून तो काहीही न बोलता उभा राहिला. 'सन्नय्हा' म्हणजे तीक्ष्ण बाणाला सज्ज केल्याप्रमाणे, स्वतःला सज्ज करून (पंख) व्यवस्थित स्थिर करून. 'बहुआगतो खो म्यायं' म्हणजे 'माझ्या शिकारीसाठी हा ससाणा खूप लांबून आला आहे, आता थोडेच अंतर उरले आहे, आता तो मला पकडेल' हे ओळखून, मागे वळून तो त्याच ढेकळाच्या फटीत शिरला असा अर्थ आहे. 'उरं पच्चताळेसि' म्हणजे 'एकाच फटक्यात या लाव्हा पक्ष्याचे डोके उडवून त्याला पकडेन' या विचाराने वेगाने झेप घेतल्यामुळे, स्वतःचा वेग आवरता न आल्याने त्याने त्या ढेकळावर आपली छाती जोरात आपटली. त्याच क्षणी त्याचे हृदय फाटले. तेव्हा तो लाव्हा पक्षी 'शत्रूचा पराभव मी पाहिला आहे!' अशा आनंदाने प्रफुल्लित होऊन त्याच्या छातीवर इकडे तिकडे फिरू लागला. 7. මක්කටසුත්තවණ්ණනා ७. मक्कट सुत्त वर्णन 373. සත්තමෙ දුග්ගාති දුග්ගමා. චාරීති සඤ්චාරො. ලෙපං ඔඩ්ඩෙන්තීති වටරුක්ඛඛීරාදීහි යොජෙත්වා ලෙපං කරොන්ති, තං මක්කටානං ධුවගමනට්ඨානන්ති සල්ලක්ඛෙත්වා රුක්ඛසාඛාදීසු ඨපෙන්ති. පඤ්චොඩ්ඩිතොති පඤ්චසු ඨානෙසු කාජදණ්ඩකං පවෙසෙත්වා ගහෙතබ්බා කාජසික්කා විය ඔඩ්ඩිතො. ථුනං සෙතීති ථුනන්තො සයති. ३७३. सातव्या सुत्तात, 'दुग्गा' म्हणजे दुर्गम (जाण्यास कठीण). 'चारी' म्हणजे संचार (फिरणे). 'लेपं ओड्डेन्ति' म्हणजे वडाच्या झाडाचा चीक इत्यादी एकत्र करून लेप (चिकट डिंक) तयार करतात आणि माकडांच्या नेहमी येण्या-जाण्याची ही जागा आहे असे ओळखून तो झाडांच्या फांद्या इत्यादींवर ठेवतात. 'पञ्चोड्डितो' म्हणजे पाच ठिकाणी कावड अडकवून धरून ठेवलेल्या कावडीच्या शिक्याप्रमाणे अडकलेला. 'थुनं सेति' म्हणजे कण्हत (विव्हळत) पडून राहतो. 8. සූදසුත්තවණ්ණනා ८. सूदसुत्तवण्णना (सूद सुत्ताचे स्पष्टीकरण). 374. අට්ඨමෙ සූදොති භත්තකාරකො. නානච්චයෙහීති නානාචයෙහි, නානාවිධෙහීති අත්ථො. අයමෙව වා පාඨො. අම්බිලග්ගෙහීති අම්බිලකොට්ඨාසෙහි. එසෙව නයො සබ්බත්ථ. අභිහරතීති ගහණත්ථාය හත්ථං පසාරෙති. බහුං ගණ්හාතීති එකග්ගහණෙන බහුං ගණ්හන්තොපි පුනප්පුනං ගණ්හන්තොපි බහුං ගණ්හතෙව. අභිහාරානන්ති සතං වා සහස්සං වා උක්ඛිපිත්වා අභිහටානං දායානං. උපක්කිලෙසාති පඤ්ච නීවරණා. නිමිත්තං න උග්ගණ්හාතීති ‘‘ඉමං මෙ කම්මට්ඨානං අනුලොමං වා ගොත්රභුං වා ආහච්ච ඨිත’’න්ති න ජානාති, අත්තනො චිත්තස්ස නිමිත්තං ගණ්හිතුං න සක්කොති. ඉමස්මිං සුත්තෙ පුබ්බභාගවිපස්සනා සතිපට්ඨානාව කථිතා. ३७४. आठव्या सुत्तात, 'सूदो' म्हणजे आचारी (स्वयंपाकी). 'नानाच्चयेहि' म्हणजे विविध प्रकारच्या चवींचे, असा अर्थ आहे. किंवा हाच मूळ पाठ आहे. 'अम्बिलग्गेहि' म्हणजे आंबट भागांनी (आंबट चवीच्या पदार्थांनी). सर्व ठिकाणी हाच नियम समजावा. 'अभिहरति' म्हणजे घेण्यासाठी हात पुढे पसरवणे. 'बहुं गण्हाति' म्हणजे एकाच वेळी पुष्कळ घेत असला किंवा वारंवार घेत असला तरी पुष्कळच घेतो. 'अभिहारानं' म्हणजे शंभर किंवा हजार नाणी उचलून आणून दिलेल्या राजाच्या भेटी (बक्षिसे). 'उपक्किलेसा' म्हणजे पाच नीवरणे. 'निमित्तं न उग्गण्हाति' म्हणजे 'माझे हे कर्मस्थान अनुलोम किंवा गोत्रभू ज्ञानापर्यंत पोहोचून स्थिरावले आहे' हे तो जाणत नाही, आपल्या चित्ताचे निमित्त ग्रहण करण्यास तो असमर्थ ठरतो. या सुत्तात पूर्वभागातील विपश्यना आणि सतिपट्ठान यांविषयीच सांगितले आहे. 9. ගිලානසුත්තවණ්ණනා ९. गिलानासुत्तवण्णना (गिलाण सुत्ताचे स्पष्टीकरण). 375. නවමෙ බෙළුවගාමකෙති වෙසාලියා සමීපෙ එවංනාමකො පාදගාමො අත්ථි, තස්මිං. යථාමිත්තන්තිආදීසු මිත්තාති මිත්තාව. සන්දිට්ඨාති තත්ථ තත්ථ සඞ්ගම්ම දිට්ඨමත්තා නාතිදළ්හමිත්තා. සම්භත්තාති සුට්ඨු භත්තා සිනෙහවන්තො දළ්හමිත්තා. යෙසං යත්ථ යත්ථ එවරූපා භික්ඛූ අත්ථි, තෙ තත්ථ තත්ථ වස්සං උපෙථාති අත්ථො. කස්මා එවමාහ? තෙසං ඵාසුවිහාරත්ථාය. තෙසං කිර බෙළුවගාමකෙ සෙනාසනං නප්පහොති, භික්ඛාපි [Pg.236] මන්දා. සමන්තා වෙසාලියා පන බහූනි සෙනාසනානි, භික්ඛාපි සුලභා. තස්මා එවමාහ. ३७५. नवव्या सुत्तात, 'बेळुवगामके' म्हणजे वैशालीच्या जवळ या नावाचे एक उपनगर (खेडेगाव) आहे, त्यामध्ये. 'यथामित्तं' इत्यादी शब्दांमध्ये 'मित्ता' म्हणजे मित्रच. 'सन्दिट्ठा' म्हणजे तिथे तिथे एकत्र yeun केवळ पाहिलेले (परिचित), जे फार घट्ट मित्र नसतात. 'सम्भत्ता' म्हणजे अत्यंत विश्वासू, स्नेही आणि घट्ट मित्र. ज्यांचे जिथे जिथे असे भिक्खू (मित्र) आहेत, त्यांनी तिथे तिथे वर्षावास करावा, असा अर्थ आहे. भगवंतांनी असे का म्हटले? त्यांच्या सुखावह विहारासाठी. कारण असे ऐकिवात आहे की, त्या बेळुवगाममध्ये त्यांच्यासाठी पुरेशी सेनासने (निवासस्थाने) नव्हती आणि भिक्षाही कमी मिळत असे. परंतु वैशालीच्या सभोवताली अनेक सेनासने आहेत आणि भिक्षाही सहज उपलब्ध आहे. म्हणून त्यांनी असे म्हटले. අථ කස්මා ‘‘යථාසුඛං ගච්ඡථා’’ති න විස්සජ්ජෙසි? තෙසං අනුකම්පාය. එවං කිරස්ස අහොසි – ‘‘අහං දසමාසමත්තං ඨත්වා පරිනිබ්බායිස්සාමි. සචෙ ඉමෙ දූරං ගච්ඡිස්සන්ති, මං පරිනිබ්බානකාලෙ දට්ඨුං න සක්ඛිස්සන්ති. අථ නෙසං ‘සත්ථා පරිනිබ්බායන්තො අම්හාකං සතිමත්තම්පි න අදාසි. සචෙ ජානෙය්යාම, න එවං දූරෙ වසෙය්යාමා’ති විප්පටිසාරො භවෙය්ය. වෙසාලියා සමන්තා පන වස්සං වසන්තා මාසස්ස අට්ඨ වාරෙ ආගන්ත්වා ධම්මං සුණිස්සන්ති, සුගතොවාදං ලභිස්සන්තී’’ති න විස්සජ්ජෙසි. तर मग त्यांनी 'तुम्ही तुमच्या सुखाप्रमाणे जा' असे म्हणून त्यांना का पाठवून दिले नाही? त्यांच्यावरील अनुकंपेमुळे. त्यांच्या मनात असा विचार आला होता की – 'मी आणखी सुमारे दहा महिने राहून परिनिर्वाण पावेन. जर हे भिक्खू दूर निघून गेले, तर माझ्या परिनिर्वाणाच्या वेळी ते माझे दर्शन घेऊ शकणार नाहीत. मग त्यांच्या मनात असा पश्चात्ताप होईल की, शास्त्यांनी परिनिर्वाण पावताना आम्हाला साधी आठवणही केली नाही. जर आम्हाला ठाऊक असते, तर आम्ही अशा प्रकारे दूर राहिलो नसतो.' परंतु वैशालीच्या सभोवताली वर्षावास करत राहिल्यास, ते महिन्यातून आठ वेळा येऊन धम्म ऐकतील आणि सुगतांचा उपदेश प्राप्त करतील. या विचाराने त्यांनी त्यांना पाठवून दिले नाही. ඛරොති ඵරුසො. ආබාධොති විසභාගරොගො. බාළ්හාති බලවතියො. මාරණන්තිකාති මරණන්තං මරණසන්තිකං පාපනසමත්ථා. සතො සම්පජානො අධිවාසෙසීති සතිං සූපට්ඨිතං කත්වා ඤාණෙන පරිච්ඡින්දිත්වා අධිවාසෙසි. අවිහඤ්ඤමානොති වෙදනානුවත්තනවසෙන අපරාපරං පරිවත්තනං අකරොන්තො අපීළියමානො අදුක්ඛියමානො ච අධිවාසෙසි. අනාමන්තෙත්වාති අජානාපෙත්වා. අනපලොකෙත්වාති අජානාපෙත්වාව ඔවාදානුසාසනිං අදත්වාති වුත්තං හොති. වීරියෙනාති පුබ්බභාගවීරියෙන චෙව ඵලසමාපත්තිවීරියෙන ච. පටිපණාමෙත්වාති වික්ඛම්භෙත්වා. ජීවිතසඞ්ඛාරන්ති එත්ථ ජීවිතම්පි ජීවිතසඞ්ඛාරො. යෙන ජීවිතං සඞ්ඛරීයති ඡිජ්ජමානං ඝටෙත්වා ඨපීයති, සො ඵලසමාපත්තිධම්මොපි ජීවිතසඞ්ඛාරො. සො ඉධ අධිප්පෙතො. අධිට්ඨායාති අධිට්ඨහිත්වා පවත්තෙත්වා ජීවිතඨපනසමත්ථං ඵලසමාපත්තිං සමාපජ්ජෙය්යන්ති අයමෙත්ථ සඞ්ඛෙපත්ථො. 'खरो' म्हणजे तीव्र (कठोर). 'आबाधो' म्हणजे विसभागरोग (शारीरिक व्याधी). 'बाळ्हा' म्हणजे अत्यंत बलवान (तीव्र). 'मारणन्तिका' म्हणजे मरणापर्यंत किंवा मरणाच्या समीप पोहोचवण्यास समर्थ असणारी. 'सतो सम्पजानो अधिवासेसि' म्हणजे स्मृतीला चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित करून, ज्ञानाने (वेदनेचे स्वरूप) ओळखून त्यांनी ती सहन केली. 'अविहञ्ञमानो' म्हणजे वेदनेच्या आहारी जाऊन इकडेतिकडे न तळमळता, पीडित न होता आणि दुःखी न होता त्यांनी ती सहन केली. 'अनामन्तेत्वा' म्हणजे न कळवता. 'अनपलोकेत्वा' म्हणजे न कळवताच, अंतिम उपदेश न देता, असा अर्थ सांगितले आहे. 'वीरियेन' म्हणजे पूर्वभागातील वीर्य आणि फलसमापत्तीचे वीर्य या दोन्हीद्वारे. 'पटिपणामेत्वा' म्हणजे दूर सारून (दाबून ठेवून). 'जीवितसङ्खारं' या संदर्भात, येथे जीवन (जीवितेंद्रिय) हाच जीवितसंस्कार आहे. ज्याच्याद्वारे जीवन टिकवून ठेवले जाते, नष्ट होण्यापासून रोखून जोडले जाते, तो फलसमापत्तीचा धम्म देखील जीवितसंस्कार आहे. तोच येथे अभिप्रेत आहे. 'अधिट्ठाय' म्हणजे अधिष्ठान करून, प्रवृत्त करून, जीवन टिकवून ठेवण्यास समर्थ अशा फलसमापत्तीमध्ये समापन्न व्हावे, हा येथे थोडक्यात अर्थ आहे. කිං පන භගවා ඉතො පුබ්බෙ ඵලසමාපත්තිං න සමාපජ්ජතීති? සමාපජ්ජති. සා පන ඛණිකසමාපත්ති. ඛණිකසමාපත්ති ච අන්තොසමාපත්තියංයෙව වෙදනං වික්ඛම්භෙති, සමාපත්තිතො වුට්ඨිතමත්තස්ස කට්ඨපාතෙන වා කඨලපාතෙන වා ඡින්නසෙවාලො විය උදකං, පුන සරීරං වෙදනා අජ්ඣොත්ථරති. යා පන රූපසත්තකං අරූපසත්තකඤ්ච නිග්ගුම්බං නිජ්ජටං කත්වා මහාවිපස්සනාවසෙන සමාපන්නා සමාපත්ති, සා සුට්ඨු වික්ඛම්භෙති. යථා නාම පුරිසෙන පොක්ඛරණිං ඔගාහෙත්වා හත්ථෙහි ච පාදෙහි ච සුට්ඨු අපබ්යුළ්හසෙවාලො [Pg.237] චිරෙන උදකං ඔත්ථරති, එවමෙව තතො වුට්ඨිතස්ස චිරෙන වෙදනා උප්පජ්ජති. ඉති භගවා තංදිවසං මහාබොධිපල්ලඞ්කෙ අභිනවං විපස්සනං පට්ඨපෙන්තො විය රූපසත්තකං අරූපසත්තකඤ්ච නිග්ගුම්බං නිජ්ජටං කත්වා චුද්දසහාකාරෙහි සන්නෙත්වා මහාවිපස්සනාය වෙදනං වික්ඛම්භෙත්වා ‘‘දසමාසෙ මා උප්පජ්ජිත්ථා’’ති සමාපත්තිං සමාපජ්ජි, සමාපත්තිවික්ඛම්භිතා වෙදනා දස මාසෙ න උප්පජ්ජියෙව. तर मग काय भगवंत यापूर्वी फलसमापत्तीमध्ये समापन्न होत नव्हते का? ते समापन्न होत असत. परंतु ती क्षणिक समापत्ती होती. आणि क्षणिक समापत्ती केवळ समापत्तीच्या आतच वेदनेला दूर सारते; समापत्तीमधून उठल्याबरोबर, लाकूड किंवा खापर पडल्याने बाजूला झालेली शेवाळ जशी पुन्हा पाण्यावर पसरते, त्याप्रमाणे शरीराला वेदना पुन्हा व्यापून टाकते. परंतु जी रूपसप्तक आणि अरूपसप्तक यांना अडथळामुक्त व गुंतागुंतविरहित करून महाविपश्यनेच्या द्वारे प्राप्त केलेली समापत्ती असते, ती वेदनेला चांगल्या प्रकारे दूर सारते. ज्याप्रमाणे एखाद्या माणसाने तळ्यात उतरून हातांनी आणि पायांनी शेवाळ चांगल्या प्रकारे बाजूला केल्यावर ती शेवाळ पाण्याला व्यापण्यास बराच वेळ घेते, त्याचप्रमाणे त्या समापत्तीमधून उठलेल्या भगवंतांना बऱ्याच वेळाने वेदना उत्पन्न होते. अशा प्रकारे भगवंतांनी त्या दिवशी महाबोधीच्या आसनावर जणू नवीन विपश्यना प्रस्थापित करत असल्यासारखे रूपसप्तक आणि अरूपसप्तक यांना अडथळामुक्त व गुंतागुंतविरहित करून, चौदा प्रकारांनी एकत्र करून, महाविपश्यनेद्वारे वेदनेला दूर सारून 'दहा महिने वेदना उत्पन्न होऊ नये' असा संकल्प करून ते समापत्तीमध्ये समापन्न झाले. समापत्तीद्वारे दूर सारलेली वेदना दहा महिने उत्पन्न झालीच नाही. ගිලානා වුට්ඨිතොති ගිලානො හුත්වා පුන වුට්ඨිතො. මධුරකජාතො වියාති සඤ්ජාතගරුභාවො සඤ්ජාතථද්ධභාවො සූලෙ උත්තාසිතපුරිසො විය. න පක්ඛායන්තීති න පකාසන්ති, නානාකාරතො න උපට්ඨහන්ති. ධම්මාපි මං නප්පටිභන්තීති සතිපට්ඨානධම්මා මය්හං පාකටා න හොන්තීති දීපෙති. තන්තිධම්මා පන ථෙරස්ස සුප්පගුණා. න උදාහරතීති පච්ඡිමඔවාදං න දෙති, තං සන්ධාය වදති. 'गिलाना वुट्ठितो' म्हणजे आजारी होऊन पुन्हा उठलेला (आजारपणातून बरा झालेला). 'मधुरकजातो विय' म्हणजे शरीरात जडपणा आणि ताठरपणा निर्माण झालेला, जणू सुळावर चढवलेला माणूस. 'न पक्खायन्ति' म्हणजे स्पष्ट दिसत नाहीत, विविध रूपांनी समोर उपस्थित होत नाहीत. 'धम्मापि मं नप्पटिभन्ति' म्हणजे 'सतिपट्ठान धम्म मला स्पष्ट जाणवत नाहीत' हे दर्शवते. परंतु तन्तिधम्म (परियत्ति धम्म) थेरांना (आयुष्यमान आनंदांना) चांगल्या प्रकारे अवगत होते. 'न उदाहरति' म्हणजे अंतिम उपदेश देत नाहीत, याला अनुसरून म्हटले आहे. අනන්තරං අබාහිරන්ති ධම්මවසෙන වා පුග්ගලවසෙන වා උභයං අකත්වා. ‘‘එත්තකං ධම්මං පරස්ස න දෙසෙස්සාමී’’ති හි චින්තෙන්තො ධම්මං අබ්භන්තරං කරොති නාම, ‘‘එත්තකං පරස්ස දෙසෙස්සාමී’’ති චින්තෙන්තො බාහිරං කරොති නාම. ‘‘ඉමස්ස පුග්ගලස්ස දෙසෙස්සාමී’’ති චින්තෙන්තො පන පුග්ගලං අබ්භන්තරං කරොති නාම, ‘‘ඉමස්ස න දෙසෙස්සාමී’’ති චින්තෙන්තො පුග්ගලං බාහිරං කරොති නාම. එවං අකත්වා දෙසිතොති අත්ථො. ආචරියමුට්ඨීති යථා බාහිරකානං ආචරියමුට්ඨි නාම හොති, දහරකාලෙ කස්සචි අකථෙත්වා පච්ඡිමකාලෙ මරණමඤ්චෙ නිපන්නා පියමනාපස්ස අන්තෙවාසිකස්ස කථෙන්ති, එවං තථාගතස්ස ‘‘ඉදං මහල්ලකකාලෙ පච්ඡිමඨානෙ කථෙස්සාමී’’ති මුට්ඨිං කත්වා පරිහරිත්වා ඨපිතං කිඤ්චි නත්ථීති දස්සෙති. "अनंतरं अबाहिरं" (आत किंवा बाहेर भेद न करता) म्हणजे धम्माच्या दृष्टीने किंवा पुद्गलाच्या (व्यक्तीच्या) दृष्टीने दोन्हीमध्ये भेद न करणे होय. "एवढा धम्म मी दुसऱ्याला शिकवणार नाही" असा विचार करणे म्हणजे धम्माला 'अभ्यंतर' (गुप्त) करणे होय, आणि "एवढा धम्म मी दुसऱ्याला शिकवेन" असा विचार करणे म्हणजे त्याला 'बाह्य' करणे होय. "या व्यक्तीला मी शिकवेन" असा विचार करणे म्हणजे पुद्गलाला 'अभ्यंतर' (आपला) करणे होय, आणि "या व्यक्तीला मी शिकवणार नाही" असा विचार करणे म्हणजे पुद्गलाला 'बाह्य' (परका) करणे होय. असा कोणताही भेद न करता उपदेश केला आहे, असा याचा अर्थ आहे. "आचरियमुट्ठि" (गुरुमुष्टी) म्हणजे ज्याप्रमाणे बाहेरील (इतर संप्रदायांच्या) गुरूंची गुरुमुष्टी असते, जे आपल्या तरुण वयात कोणालाही न सांगता, शेवटी मृत्यूशय्येवर पडलेले असताना आपल्या प्रिय व आवडत्या शिष्याला सांगतात; त्याप्रमाणे तथागतांजवळ "हे मी वृद्धपकाळी किंवा शेवटच्या वेळी सांगेन" असे मूठ दाबून (गुपित ठेवून) किंवा लपवून ठेवलेले काहीही नाही, हे दर्शविते. අහං භික්ඛුසඞ්ඝන්ති අහමෙව භික්ඛුසඞ්ඝං පරිහරිස්සාමීති වා, මමුද්දෙසිකොති අහං උද්දිසිතබ්බට්ඨෙන උද්දෙසො අස්සාති මමුද්දෙසිකො, මමෙව උද්දිස්සිත්වා මං පච්චාසීසමානො භික්ඛුසඞ්ඝො හොතු මම අච්චයෙන මා වා අහොසි, යං වා තං වා හොතූති ඉති වා පන යස්ස අස්සාති අත්ථො. න එවං හොතීති බොධිපල්ලඞ්කෙයෙව ඉස්සාමච්ඡෙරානං විගතත්තා [Pg.238] එවං න හොති. ස කින්ති සො කිං. ආසීතිකොති අසීතිසංවච්ඡරිකො, ඉදං පච්ඡිමවයං අනුප්පත්තභාවදීපනත්ථං වුත්තං. වෙඨමිස්සකෙනාති බාහබන්ධචක්කබන්ධාදිනා පටිසඞ්ඛරණෙන වෙඨමිස්සකෙන. මඤ්ඤෙති ජරසකටං විය වෙඨමිස්සකෙන මඤ්ඤෙ යාපෙති, අරහත්තඵලවෙඨනෙන චතුඉරියාපථකප්පනං තථාගතස්ස හොතීති දස්සෙති. "मी भिक्खू संघाचे..." म्हणजे "मीच भिक्खू संघाचे नेतृत्व (पालन) करीन" असे, किंवा "ममुद्देसिको" म्हणजे "मी त्यांचा मार्गदर्शक (शास्ता) आहे" या अर्थाने 'ममुद्देसिको' होय. "भिक्खू संघाने केवळ माझ्यावरच अवलंबून राहावे, माझ्या मृत्यूनंतर तो नष्ट होऊ नये किंवा काहीही होवो" असा विचार ज्याच्या मनात येतो, असा याचा अर्थ आहे. "असे होत नाही" कारण बोधिपर्यंकावरच (बोधीवृक्षाखालीच) ईर्ष्या आणि मत्सर नष्ट झाल्यामुळे तथागतांच्या मनात असा विचार येत नाही. "स किन्ति" म्हणजे "तो काय". "आसीतिको" म्हणजे ऐंशी वर्षांचा; हे शेवटच्या वयाला (वृद्धावस्थेला) प्राप्त झाल्याचे दर्शवण्यासाठी म्हटले आहे. "वेठमिस्सकेन" म्हणजे बांबूच्या पट्ट्या किंवा चाकांचे पट्टे बांधून दुरुस्त केलेल्या गाडीप्रमाणे. "माझ्या मते" म्हणजे एखादी जुनी जीर्ण गाडी दुरुस्त करून चालवावी, त्याप्रमाणे तथागतांचे शरीर अर्हत्त्वफलाच्या समापत्तीच्या साहाय्याने चारही इरियापथांचे (हालचालींचे) नियंत्रण करते, हे दर्शविते. ඉදානි තමත්ථං පකාසෙන්තො යස්මිං ආනන්ද සමයෙතිආදිමාහ. තත්ථ සබ්බනිමිත්තානන්ති රූපනිමිත්තාදීනං. එකච්චානං වෙදනානන්ති ලොකියානං වෙදනානං. තස්මාතිහානන්දාති යස්මා ඉමිනා ඵලසමාපත්තිවිහාරෙන ඵාසු හොති, තස්මා තුම්හෙපි තදත්ථාය එවං විහරථාති දස්සෙති. අත්තදීපාති මහාසමුද්දගතා දීපං විය අත්තානං දීපං පතිට්ඨං කත්වා විහරථ. අත්තසරණාති අත්තගතිකාව හොථ, මා අඤ්ඤගතිකා. ධම්මදීපධම්මසරණපදෙසුපි එසෙව නයො. එත්ථ ච ධම්මොති නවවිධො ලොකුත්තරධම්මො වෙදිතබ්බො. තමතග්ගෙති තමඅග්ගෙ, මජ්ඣෙ ත-කාරො පදසන්ධිවසෙන වුත්තො. ඉදං වුත්තං හොති – ඉමෙ අග්ගතමාති තමතග්ගාති. එවං සබ්බං තමසොතං ඡින්දිත්වා අතිවිය අග්ගෙ උත්තමභාවෙ එතෙ, ආනන්ද, මම භික්ඛූ භවිස්සන්ති, තෙසං අග්ගෙ භවිස්සන්ති. යෙ කෙචි සික්ඛාකාමා, සබ්බෙසං තෙසං චතුසතිපට්ඨානගොචරාව භික්ඛූ අග්ගෙ භවිස්සන්තීති අරහත්තනිකූටෙන දෙසනං ගණ්හීති. आता तोच अर्थ स्पष्ट करताना "ज्या वेळी, आनंदा..." इत्यादी म्हणाले. तेथे "सब्बनिमित्तानं" म्हणजे रूप-निमित्त इत्यादींचे. "एकच्चानं वेदनानं" म्हणजे लौकिक वेदनांचे. "तस्मातिहानन्द" म्हणजे "म्हणूनच, आनंदा!" कारण या फल-समापत्तीच्या विहाराने सुख लाभते, म्हणून तुम्हीही त्याच हेतूने असेच विहार करा, हे दर्शविते. "अत्तदीपा" म्हणजे महासागरातील बेटाप्रमाणे स्वतःलाच दीप (बेट) व आधार बनवून विहार करा. "अत्तसरणा" म्हणजे स्वतःलाच शरण जा, दुसऱ्या कोणाला शरण जाऊ नका. "धम्मदीपा" आणि "धम्मसरणा" या पदांच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. आणि येथे "धम्म" म्हणजे नऊ प्रकारचा लोकोत्तर धम्म समजावा. "तमतग्गे" म्हणजे "तम्-अग्गे" (ते सर्वश्रेष्ठ होतील), मधील 'त' हा वर्ण पदसंधीमुळे आला आहे. याचा अर्थ असा आहे की - "हे सर्वात श्रेष्ठ आहेत" म्हणून त्यांना 'तमतग्गा' म्हटले आहे. अशा प्रकारे अज्ञानाचा सर्व प्रवाह तोडून, हे माझे भिक्खू अत्यंत श्रेष्ठ अशा उत्तम अवस्थेला प्राप्त होतील, आनंदा! ते त्यांच्यात सर्वश्रेष्ठ होतील. जे कोणी शिक्षेची (सिक्खेची) इच्छा बाळगणारे आहेत, त्या सर्वांमध्ये चार स्मृतिप्रस्थानांचे (सतिपट्ठानांचे) आचरण करणारे भिक्खूच सर्वश्रेष्ठ होतील, अशा प्रकारे अर्हत्त्वाच्या शिखरावर या उपदेशाची सांगता केली आहे. 10. භික්ඛුනුපස්සයසුත්තවණ්ණනා १०. भिक्खुनुपस्सयसुत्तवण्णना (भिक्षुणी निवास सुत्ताचे स्पष्टीकरण) 376. දසමෙ තෙනුපසඞ්කමීති තස්මිං උපස්සයෙ කම්මට්ඨානකම්මිකා භික්ඛුනියො අත්ථි, තාසං උස්සුක්කාපෙත්වා කම්මට්ඨානං කථෙස්සාමීති උපසඞ්කමි. උළාරං පුබ්බෙනාපරං විසෙසන්ති පුබ්බවිසෙසතො අපරං උළාරවිසෙසං. තත්ථ මහාභූතපරිග්ගහො පුබ්බවිසෙසො, උපාදාරූපපරිග්ගහො අපරවිසෙසො නාම. තථා සකලරූපපරිග්ගහො පුබ්බවිසෙසො, අරූපපරිග්ගහො අපරවිසෙසො නාම. රූපාරූපපරිග්ගහො පුබ්බවිසෙසො, පච්චයපරිග්ගහො [Pg.239] අපරවිසෙසො නාම සප්පච්චයනාමරූපදස්සනං පුබ්බවිසෙසො, තිලක්ඛණාරොපනං අපරවිසෙසො නාම. එවං පුබ්බෙනාපරං උළාරවිසෙසං ජානාතීති අත්ථො. ३७६. दहाव्या सुत्तात "तेनुपसंकमि" (तेथे गेले) म्हणजे त्या भिक्षुणी-निवासात (उपाश्रयात) कम्मट्ठान (ध्यान) साधना करणाऱ्या भिक्षुणी होत्या, त्यांना प्रोत्साहित करून कम्मट्ठान शिकवावे या उद्देशाने ते तेथे गेले. "उळारं पुब्बेनापरं विसेसं" म्हणजे पूर्वीच्या विशेषापेक्षा नंतरचा अधिक श्रेष्ठ विशेष. त्यामध्ये, महाभूतांचे ग्रहण (समजून घेणे) हा 'पूर्व विशेष' आहे, आणि उपादाय रूपांचे ग्रहण हा 'अपर (नंतरचा) विशेष' आहे. त्याचप्रमाणे, संपूर्ण रूपाचे ग्रहण हा 'पूर्व विशेष' आणि अरूपाचे (नामाचे) ग्रहण हा 'अपर विशेष' आहे. रूप आणि अरूप या दोन्हीचे ग्रहण हा 'पूर्व विशेष' आणि प्रत्ययांचे (कारणांचे) ग्रहण हा 'अपर विशेष' आहे. सप्रत्यय (कारणासहित) नाम-रूपाचे दर्शन हा 'पूर्व विशेष' आणि त्रिलक्षणांचे (अनित्य, दुःख, अनात्म) आरोपण करणे हा 'अपर विशेष' आहे. अशा प्रकारे पूर्वीचा आणि नंतरचा श्रेष्ठ विशेष जाणतो, असा याचा अर्थ आहे. කායාරම්මණොති යං කායං අනුපස්සති, තමෙව ආරම්මණං කත්වා උප්පජ්ජති කිලෙසපරිළාහො. බහිද්ධා වා චිත්තං වික්ඛිපතීති බහිද්ධා වා පුථුත්තාරම්මණෙ චිත්තුප්පාදො වික්ඛිපති. කිස්මිඤ්චිදෙව පසාදනීයෙ නිමිත්තෙ චිත්තං පණිදහිතබ්බන්ති එවං කිලෙසපරිළාහෙ ච ලීනත්තෙ ච බහිද්ධාවික්ඛෙපෙ ච උප්පන්නෙ කිලෙසානුරඤ්ජිතෙන න වත්තිතබ්බං, කිස්මිඤ්චිදෙව පසාදනීයෙ පසාදාවහෙ බුද්ධාදීසු අඤ්ඤතරස්මිං ඨානෙ කම්මට්ඨානචිත්තං ඨපෙතබ්බං. චිත්තං සමාධියතීති ආරම්මණෙ සම්මා ආධියති සුට්ඨු ඨපිතං ඨපියති. පටිසංහරාමීති පසාදනීයට්ඨානතො පටිසංහරාමි, මූලකම්මට්ඨානාභිමුඛංයෙව නං කරොමීති අත්ථො. සො පටිසංහරති චෙවාති මූලකම්මට්ඨානාභිමුඛඤ්ච පෙසෙති. න ච විතක්කෙති න ච විචාරෙතීති කිලෙසවිතක්කං න විතක්කෙති, කිලෙසවිචාරං න විචාරෙති. අවිතක්කොම්හි අවිචාරොති කිලෙසවිතක්කවිචාරෙහි අවිතක්කාවිචාරො. අජ්ඣත්තං සතිමා සුඛමස්මීති ගොචරජ්ඣත්තෙ පවත්තාය සතියා ‘‘සතිමාහමස්මි සුඛිතො චා’’ති පජානාති. "कायारम्मणो" म्हणजे ज्या कायेचे (शरीराचे) तो अनुदर्शन करतो, त्यालाच आलंबन (विषय) बनवून क्लेशांचा परिदाह (दाह) उत्पन्न होतो. "बहिद्धा वा चित्तं विक्खिपति" म्हणजे कम्मट्ठानाच्या बाहेर विविध बाह्य आलंबनांवर चित्त विचलित होते. "कोणत्यातरी प्रसन्नता देणाऱ्या निमित्तावर चित्त एकाग्र करावे" म्हणजे अशा प्रकारे क्लेशांचा परिदाह, आळस (लीनता) आणि बाह्य विक्षेप (चित्ताचे विचलित होणे) उत्पन्न झाले असता, क्लेशांनी रंगलेल्या चित्ताने वागू नये, तर बुद्ध इत्यादींपैकी कोणत्याही एका प्रसन्नता देणाऱ्या विषयावर कम्मट्ठान-चित्त स्थिर करावे. "चित्तं समाधियति" म्हणजे आलंबनावर चित्त चांगल्या प्रकारे स्थिर होते, उत्तम प्रकारे प्रस्थापित केले जाते. "पटिसंहरामि" म्हणजे प्रसन्नता देणाऱ्या विषयावरून चित्त परत वळवून मूळ कम्मट्ठानाकडेच लावतो, असा याचा अर्थ आहे. "सो पटिसंहरति चेव" म्हणजे तो साधक चित्त परत वळवतो आणि मूळ कम्मट्ठानाकडेच भावना-चित्त लावतो. "न च वितक्केति न च विचारेति" म्हणजे क्लेशयुक्त वितर्क करत नाही आणि क्लेशयुक्त विचार करत नाही. "अवितक्कोम्हि विचारो" म्हणजे क्लेशयुक्त वितर्क आणि विचारांपासून मुक्त झाल्यामुळे मी वितर्करहित व विचाररहित झालो आहे. "अज्झत्तं सतिमा सुखमस्मि" म्हणजे कम्मट्ठानरूपी गोचरात (विषयात) प्रवृत्त झालेल्या स्मृतीमुळे "मी स्मृतिमान आणि सुखी आहे" असे तो जाणतो. එවං ඛො, ආනන්ද, පණිධාය භාවනා හොතීති එවං, ආනන්ද, ඨපෙත්වා භාවනා හොති. ඉමස්ස හි භික්ඛුනො යථා නාම පුරිසස්ස මහන්තං උච්ඡුභාරං උක්ඛිපිත්වා යන්තසාලං නෙන්තස්ස කිලන්තකිලන්තකාලෙ භූමියං ඨපෙත්වා උච්ඡුඛණ්ඩං ඛාදිත්වා පුන උක්ඛිපිත්වා ගමනං හොති; එවමෙව අරහත්තං පාපුණිතුං උග්ගහිතකම්මට්ඨානස්ස කායපරිළාහාදීසු උප්පන්නෙසු තං කම්මට්ඨානං ඨපෙත්වා බුද්ධගුණාදිඅනුස්සරණෙන චිත්තං පසාදෙත්වා කම්මනියං කත්වා භාවනා පවත්තා, තස්මා ‘‘පණිධාය භාවනා හොතී’’ති වුත්තං. තස්ස පන පුරිසස්ස උච්ඡුභාරං යන්තසාලං නෙත්වා පීළෙත්වා රසපානං විය ඉමස්ස භික්ඛුනො කම්මට්ඨානං මත්ථකං පාපෙත්වා අරහත්තං පත්තස්ස ඵලසමාපත්තිසුඛානුභවනං වෙදිතබ්බං. "अशा प्रकारे, आनंदा! प्रणिधान करून भावना होते" म्हणजे, हे आनंदा! (मूळ कम्मट्ठान) बाजूला ठेवून भावना करणे होय. कारण या भिक्खूच्या बाबतीत, ज्याप्रमाणे एखादा माणूस उसाची मोठी मोळी उचलून गुऱ्हाळाकडे (यंत्रशाळेकडे) घेऊन जात असताना, थकवा आल्यावर ती मोळी जमिनीवर ठेवतो, उसाचा तुकडा खातो आणि पुन्हा ती मोळी उचलून पुढे जातो; त्याचप्रमाणे, अर्हत्त्व प्राप्त करण्यासाठी कम्मट्ठान शिकलेल्या या भिक्खूला शारीरिक परिदाह इत्यादी उत्पन्न झाले असता, ते कम्मट्ठान बाजूला ठेवून, बुद्धगुणांचे अनुस्मरण करून चित्त प्रसन्न करतो, त्याला कार्यक्षम बनवतो आणि पुन्हा मूळ कम्मट्ठानाची भावना करतो. म्हणूनच 'प्रणिधान करून भावना होते' असे म्हटले आहे. आणि त्या माणसाने उसाची मोळी गुऱ्हाळात नेऊन, ती पिळून उसाचा रस पिण्याप्रमाणे, या भिक्खूने कम्मट्ठान शिखरावर (पूर्णत्वास) पोहोचवून अर्हत्त्व प्राप्त केल्यावर फल-समापत्तीच्या सुखाचा अनुभव घेणे होय, असे समजावे. බහිද්ධාති මූලකම්මට්ඨානං පහාය බහි අඤ්ඤස්මිං ආරම්මණෙ. අප්පණිධායාති අට්ඨපෙත්වා. අථ පච්ඡා පුරෙ අසංඛිත්තං විමුත්තං අප්පණිහිතන්ති පජානාතීති එත්ථ කම්මට්ඨානවසෙන වා සරීරවසෙන වා දෙසනාවසෙන වා අත්ථො වෙදිතබ්බො. "बहिद्धा" म्हणजे मूळ कम्मट्ठान सोडून बाहेरील दुसऱ्या आलंबनावर. "अप्पणिधाय" म्हणजे चित्त एकाग्र न करता (चित्त न लावता). "नंतर मागे व पुढे असंक्षिप्त, विमुक्त आणि अप्रणिहित आहे असे जाणतो" यामध्ये कम्मट्ठानाच्या दृष्टीने, शरीराच्या दृष्टीने किंवा उपदेशाच्या (देशनेच्या) दृष्टीने अर्थ समजून घ्यावा. තත්ථ [Pg.240] කම්මට්ඨානෙ තාව කම්මට්ඨානස්ස අභිනිවෙසො පුරෙ නාම, අරහත්තං පච්ඡා නාම. තත්ථ යො භික්ඛු මූලකම්මට්ඨානං ගහෙත්වා කිලෙසපරිළාහස්ස වා ලීනත්තස්ස වා බහිද්ධාවික්ඛෙපස්ස වා උප්පජ්ජිතුං ඔකාසං අදෙන්තො සුදන්තගොණෙ යොජෙත්වා සාරෙන්තො විය චතුරස්සච්ඡිද්දෙ සුතච්ඡිතං චතුරස්සඝටිකං පක්ඛිපන්තො විය විපස්සනං පට්ඨපෙත්වා අතිට්ඨන්තො අලග්ගන්තො අරහත්තං පාපුණාති, සො පුරෙසඞ්ඛාතස්ස කම්මට්ඨානාභිනිවෙසස්ස පච්ඡාසඞ්ඛාතස්ස අරහත්තස්ස ච වසෙන පච්ඡා පුරෙ අසංඛිත්තං විමුත්තං අප්පණිහිතන්ති පජානාති නාම. त्या कम्मट्ठानामध्ये सर्वप्रथम कम्मट्ठानावर चित्त एकाग्र करणे याला 'पूर्व' (आधीचे) म्हटले जाते आणि अरहत्तपदाला 'पश्चात' (नंतरचे) म्हटले जाते. तेथे जो भिक्खू मूळ कम्मट्ठानाला ग्रहण करून, क्लेशांच्या संतापाला किंवा चित्ताच्या संकोचाला (आळसाला) किंवा बाह्य विषयांमध्ये चित्ताच्या विखुरण्याला उत्पन्न होण्यास संधी न देता, चांगल्या प्रकारे प्रशिक्षित केलेल्या बैलांना जुंपून गाडी हाकणाऱ्या सारथ्याप्रमाणे, किंवा चौकोनी छिद्रामध्ये चांगल्या प्रकारे तासलेली चौकोनी मेख बसवण्याप्रमाणे विपश्यनेला प्रस्थापित करून, न थांबता व आसक्त न होता अरहत्तपदाला प्राप्त करतो; तो भिक्खू 'पूर्व' म्हटलेल्या कम्मट्ठानावरील चित्ताच्या एकाग्रतेच्या आणि 'पश्चात' म्हटलेल्या अरहत्तपदाच्या सामर्थ्याने 'माझे चित्त मागे व पुढे विखुरलेले नाही, मुक्त आहे आणि प्रणिधीरहित (आकांक्षारहित) आहे' असे जाणतो. සරීරෙ පන පාදඞ්ගුලීනං අග්ගපබ්බානි පුරෙ නාම, සීසකටාහං පච්ඡා නාම. තත්ථ යො භික්ඛු පාදඞ්ගුලීනං අග්ගපබ්බඅට්ඨිකෙසු අභිනිවිසිත්වා බ්යාභඞ්ගියා යවකලාපං මොචෙන්තො විය වණ්ණසණ්ඨානදිසොකාසපරිච්ඡෙදවසෙන අට්ඨීනි පරිග්ගණ්හන්තො අන්තරා කිලෙසපරිළාහාදීනං උප්පත්තිං වාරෙත්වා යාව සීසකටාහා භාවනං පාපෙති, සො පුරෙසඞ්ඛාතානං අග්ගපාදඞ්ගුලිපබ්බානං පච්ඡාසඞ්ඛාතස්ස සීසකටාහස්ස ච වසෙන පච්ඡා පුරෙ අසංඛිත්තං විමුත්තං අප්පණිහිතන්ති පජානාති නාම. शरीरामध्ये तर पायांच्या बोटांचे अग्रभाग याला 'पूर्व' म्हटले जाते आणि कवटीला 'पश्चात' म्हटले जाते. तेथे जो भिक्खू पायांच्या बोटांच्या अग्रभागाच्या हाडांवर चित्त एकाग्र करून, कावडीने यवाच्या (सातूच्या) पेंढ्या मोकळ्या करण्याप्रमाणे, वर्ण (रंग), संस्थान (आकार), दिशा, अवकाश आणि परिच्छेद यांच्या सामर्थ्याने हाडांचे ग्रहण करत (त्यांना जाणत), दरम्यानच्या काळात क्लेशांचा संताप इत्यादींच्या उत्पत्तीला रोखून कवटीपर्यंत ध्यानभावनेला पोहोचवतो; तो भिक्खू 'पूर्व' म्हटलेल्या पायांच्या बोटांच्या अग्रभागांच्या आणि 'पश्चात' म्हटलेल्या कवटीच्या सामर्थ्याने 'माझे चित्त मागे व पुढे विखुरलेले नाही, मुक्त आहे आणि प्रणिधीरहित आहे' असे जाणतो. දෙසනායපි ද්වත්තිංසාකාරදෙසනාය කෙසා පුරෙ නාම, මත්ථලුඞ්ගං පච්ඡා නාම. තත්ථ යො භික්ඛු කෙසෙසු අභිනිවිසිත්වා වණ්ණසණ්ඨානදිසොකාසවසෙන කෙසාදයො පරිග්ගණ්හන්තො අන්තරා කිලෙසපරිළාහාදීනං උප්පත්තිං වාරෙත්වා යාව මත්ථලුඞ්ගා භාවනං පාපෙති. සො පුරෙසඞ්ඛාතානං කෙසානං පච්ඡාසඞ්ඛාතස්ස මත්ථලුඞ්ගස්ස ච වසෙන පච්ඡා පුරෙ අසංඛිත්තං විමුත්තං අප්පණිහිතන්ති පජානාති නාම. उपदेशात (देशनेमध्ये) सुद्धा, बत्तीस आकारांच्या (द्वत्तिंसाकार) उपदेशात केसांना 'पूर्व' म्हटले जाते आणि मेंदूला 'पश्चात' म्हटले जाते. तेथे जो भिक्खू केसांवर चित्त एकाग्र करून, वर्ण, संस्थान, दिशा आणि अवकाशाच्या सामर्थ्याने केस इत्यादींचे ग्रहण करत, दरम्यानच्या काळात क्लेशांचा संताप इत्यादींच्या उत्पत्तीला रोखून मेंदूपर्यंत ध्यानभावनेला पोहोचवतो; तो भिक्खू 'पूर्व' म्हटलेल्या केसांच्या आणि 'पश्चात' म्हटलेल्या मेंदूच्या सामर्थ्याने 'माझे चित्त मागे व पुढे विखुरलेले नाही, मुक्त आहे आणि प्रणिधीरहित आहे' असे जाणतो. එවං ඛො, ආනන්ද, අප්පණිධාය භාවනා හොතීති එවං, ආනන්ද, අට්ඨපෙත්වා භාවනා හොති. ඉමස්ස හි භික්ඛුනො යථා නාම පුරිසස්ස ගුළභාරං ලභිත්වා අත්තනො ගාමං අතිහරන්තස්ස අන්තරා අට්ඨපෙත්වාව උච්චඞ්ගෙ පක්ඛිත්තානි ගුළඛණ්ඩාදීනි ඛාදනීයානි ඛාදන්තස්ස අත්තනො ගාමෙයෙව ඔතරණං හොති, එවමෙව අරහත්තං පාපුණිතුං ආරද්ධභාවනස්ස කායපරිළාහාදීනං උප්පත්තිං වාරෙත්වා කම්මට්ඨානභාවනා පවත්තා, තස්මා ‘‘අප්පණිධාය භාවනා’’ති වුත්තා. තස්ස පන පුරිසස්ස තං ගුළභාරං අත්තනො ගාමං නෙත්වා ඤාතීහි සද්ධිං පරිභොගො විය ඉමස්ස භික්ඛුනො [Pg.241] කම්මට්ඨානං මත්ථකං පාපෙත්වා අරහත්තං පත්තස්ස ඵලසමාපත්තිසුඛානුභවනං වෙදිතබ්බං. ඉමස්මිං සුත්තෙ පුබ්බභාගවිපස්සනා කථිතා. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. “आनंदा, अशा प्रकारे अप्पणिधाय भावना (प्रणिधीरहित भावना) होते” याचा अर्थ असा की, हे आनंदा, न थांबता ध्यानभावना होते. कारण की, ज्याप्रमाणे एखाद्या माणसाला गुळाचे ओझे मिळून ते आपल्या गावी घेऊन जात असताना, वाटेत न थांबताच पदरात ठेवलेले गुळाचे तुकडे इत्यादी खाण्याचे पदार्थ खात खात आपल्या गावातच ओझे उतरवणे होते; त्याचप्रमाणे अरहत्तपद प्राप्त करण्यासाठी वीर्यपूर्वक भावना सुरू केलेल्या या भिक्खूची, शरीराचा संताप इत्यादींची उत्पत्ती रोखून कम्मट्ठानाची भावना प्रवृत्त होते, म्हणून तिला “अप्पणिधाय भावना” असे म्हटले आहे. आणि त्या माणसाने ते गुळाचे ओझे आपल्या गावी नेऊन नातेवाईकांसह त्याचा उपभोग घेण्याप्रमाणे, या भिक्खूने कम्मट्ठानाला शेवटास पोहोचवून अरहत्तपद प्राप्त केल्यावर फलसमापत्तीच्या सुखाचा अनुभव घेणे, असे समजले पाहिजे. या सुत्तात पूर्वभाग-विपश्यना सांगितली आहे. उर्वरित भाग सर्वत्र स्पष्टच आहे. අම්බපාලිවග්ගො පඨමො. पहिला अंबपालिवग्ग समाप्त. 2. නාලන්දවග්ගො २. नालंदवग्ग 2. නාලන්දසුත්තවණ්ණනා २. नालंदसुत्तवण्णना (नालंद सुत्ताचे स्पष्टीकरण) 378. දුතියවග්ගස්ස දුතියෙ නාලන්දායන්ති නාලන්දාති එවංනාමකෙ නගරෙ, තං නගරං ගොචරගාමං කත්වා. පාවාරිකම්බවනෙති දුස්සපාවාරිකසෙට්ඨිනො අම්බවනෙ. තං කිර තස්ස උය්යානං අහොසි. සො භගවතො ධම්මදෙසනං සුත්වා භගවති පසන්නො තස්මිං උය්යානෙ කුටිලෙණමණ්ඩපාදිපටිමණ්ඩිතං භගවතො විහාරං කත්වා නිය්යාතෙසි. සො විහාරො ජීවකම්බවනං විය පාවාරිකම්බවනන්ත්වෙව සඞ්ඛං ගතො. තස්මිං පාවාරිකම්බවනෙ විහරතීති අත්ථො. ३७८. दुसऱ्या वग्गच्या दुसऱ्या सुत्तात 'नालंदायं' म्हणजे नालंदा नावाच्या नगरात, त्या नगराला गोचरग्राम (भिक्षेचे गाव) करून. 'पावारिकम्बवने' म्हणजे दुस्स-पावारिक (वस्त्र व्यापारी) श्रेष्ठीच्या आंब्याच्या बागेत. ती खरोखर त्यांची बाग (उद्यान) होती. त्यांनी भगवंतांची धम्मदेशना ऐकून भगवंतांवर प्रसन्न होऊन, त्या उद्यानात कुटी, लेण (गुहा), मंडप इत्यादींनी सुशोभित केलेला विहार भगवंतांसाठी बनवून तो अर्पण केला. तो विहार जीवक-अम्बवनाप्रमाणे 'पावारिक-अम्बवन' या नावानेच प्रसिद्ध झाला. 'त्या पावारिक-अम्बवनात विहार करत होते' असा अर्थ आहे. එවංපසන්නොති එවං උප්පන්නසද්ධො, එවං සද්දහාමීති අත්ථො. භිය්යොභිඤ්ඤතරොති භිය්යතරො අභිඤ්ඤාතො භිය්යතරාභිය්යො වා, උත්තරිතරඤාණොති අත්ථො. සම්බොධියන්ති සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණෙ අරහත්තමග්ගඤාණෙ වා අරහත්තමග්ගෙනෙව හි බුද්ධගුණා නිප්පදෙසා ගහිතා හොන්ති, ද්වෙපි අග්ගසාවකා අරහත්තමග්ගෙනෙව සාවකපාරමීඤාණං පටිලභන්ති, පච්චෙකබුද්ධා පච්චෙකබොධිඤාණං, බුද්ධා සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණඤ්චෙව සකලෙ ච බුද්ධගුණෙ. සබ්බම්පි නෙසං අරහත්තමග්ගෙනෙව ඉජ්ඣති. තස්මා අරහත්තමග්ගඤාණං සම්බොධි නාම හොති. තෙන උත්තරිතරො ච භගවතා නත්ථි. තෙනාහ ‘‘භගවතා භිය්යොභිඤ්ඤතරො, යදිදං සම්බොධිය’’න්ති. 'एवं पसन्नो' म्हणजे अशा प्रकारे श्रद्धा उत्पन्न झालेला, 'अशा प्रकारे मी श्रद्धा ठेवतो' असा अर्थ आहे. 'भिय्योभिञ्ञतरो' म्हणजे अधिक प्रख्यात किंवा अधिक ज्ञानी, किंवा अधिक श्रेष्ठ प्रज्ञा असलेला, म्हणजेच अधिक श्रेष्ठ ज्ञान असलेला, असा अर्थ आहे. 'संबोधियं' म्हणजे सर्वज्ञता-ज्ञानामध्ये किंवा अरहत्तमग्ग-ज्ञानामध्ये. कारण की अरहत्तमग्गानेच सर्व बुद्धगुण पूर्णपणे ग्रहण केले जातात; दोन्ही अग्रश्रावक सुद्धा अरहत्तमग्गानेच श्रावकपारमी-ज्ञान प्राप्त करतात, प्रत्येकबुद्ध प्रत्येकबोधी-ज्ञान प्राप्त करतात, आणि बुद्ध सर्वज्ञता-ज्ञान व सर्व बुद्धगुण प्राप्त करतात. त्यांचे हे सर्व गुण अरहत्तमग्गानेच सिद्ध होतात. म्हणून अरहत्तमग्ग-ज्ञानाला 'संबोधी' म्हटले जाते. त्याच्यापेक्षा श्रेष्ठ कोणीही नाही. म्हणूनच स्थविरांनी (सारिपुत्तांनी) म्हटले, 'भगवंतांपेक्षा अधिक ज्ञानी कोणी नाही, म्हणजेच संबोधीच्या बाबतीत.' උළාරාති සෙට්ඨා. අයඤ්හි උළාරසද්දො ‘‘උළාරානි ඛාදනීයානි ඛාදන්තී’’තිආදීසු (ම. නි. 1.366) මධුරෙ ආගච්ඡති. ‘‘උළාරාය ඛලු භවං වච්ඡායනො සමණං ගොතමං පසංසාය පසංසතී’’තිආදීසු (ම. නි. 1.288) සෙට්ඨෙ. ‘‘අප්පමාණො උළාරො [Pg.242] ඔභාසො’’තිආදීසු (දී. නි. 2.32; ම. නි. 3.201) විපුලෙ. ස්වායමිධ සෙට්ඨෙ ආගතො. තෙන වුත්තං ‘‘උළාරාති සෙට්ඨා’’ති. ආසභීති උසභස්ස වාචාසදිසී අචලා අසම්පවෙධී. එකංසො ගහිතොති අනුස්සවෙන වා ආචරියපරම්පරාය වා ඉතිකිරාය වා පිටකසම්පදානෙන වා ආකාරපරිවිතක්කෙන වා දිට්ඨිනිජ්ඣානක්ඛන්තියා වා තක්කහෙතු වා නයහෙතු වා අකථෙත්වා පච්චක්ඛතො ඤාණෙන පටිවිජ්ඣිත්වා විය එකංසො ගහිතො, සන්නිට්ඨානකථාව කථිතාති අත්ථො. සීහනාදොති සෙට්ඨනාදො, වනෙ උන්නාදයන්තෙන සීහෙන විය උත්තමනාදො නදිතොති අත්ථො. 'उळारा' म्हणजे श्रेष्ठ. कारण की हा 'उळार' शब्द 'उळार (उत्कृष्ट/मधुर) खाण्याचे पदार्थ खातात' इत्यादी वाक्यांमध्ये 'मधुर' (चवदार) या अर्थाने येतो. 'पूजनीय वच्छायन खरोखरच श्रमण गोतमांची उळार (श्रेष्ठ) प्रशंसेने प्रशंसा करतात' इत्यादी वाक्यांमध्ये 'श्रेष्ठ' या अर्थाने येतो. 'अप्रमाण उळार (विस्तीर्ण) प्रकाश' इत्यादी वाक्यांमध्ये 'विस्तीर्ण' (विपुल) या अर्थाने येतो. तो येथे 'श्रेष्ठ' या अर्थाने आला आहे. म्हणूनच 'उळारा म्हणजे श्रेष्ठ' असे म्हटले आहे. 'आसभी' म्हणजे वृषभाच्या (बैलाच्या) गर्जनेसारखी निर्भय, अचल आणि अकंपित. 'एकंसो गहितो' म्हणजे ऐकीव माहितीने, किंवा आचार्य परंपरेने, किंवा 'असे ऐकिवात आहे' अशा अफवेने, किंवा पिटक-परंपरेच्या ज्ञानाने, किंवा तर्काने विचार करून, किंवा स्वतःच्या दृष्टीने चिंतन करून पटलेल्या मताने, किंवा केवळ तर्काच्या आधाराने, किंवा अनुमानाच्या आधाराने असे न सांगता, प्रत्यक्ष ज्ञानाने साक्षात्कार केल्याप्रमाणे निश्चितपणे ग्रहण केले आहे; केवळ निश्चित स्वरूपाचेच बोलणे बोलले आहे, असा अर्थ आहे. 'सिंहनाद' म्हणजे श्रेष्ठ गर्जना; जंगलात गर्जना करणाऱ्या सिंहाप्रमाणे श्रेष्ठ गर्जना केली आहे, असा अर्थ आहे. කිං නු තෙ සාරිපුත්තාති ඉමං දෙසනං කස්මා ආරභි? අනුයොගදාපනත්ථං. එකච්චො හි සීහනාදං නදිත්වා අත්තනො සීහනාදෙ අනුයොගං දාතුං න සක්කොති, නිඝංසනං න ඛමති, සිලෙසෙ පතිතමක්කටො විය හොති. යථා ධමමානං අපරිසුද්ධං ලොහං ඣායිත්වා අඞ්ගාරො හොති, එවං ඣාමඞ්ගාරො විය හොති. එකො සීහනාදෙ අනුයොගං දාපියමානො දාතුං සක්කොති, නිඝංසනං ඛමති, ධමමානං නිද්දොසජාතරූපං විය අධිකතරං සොභති, තාදිසො ථෙරො. තෙන නං භගවා ‘‘අනුයොගක්ඛමො අය’’න්ති ඤත්වා සීහනාදෙ අනුයොගදාපනත්ථං ඉමං දෙසනං ආරභි. “हे सारिपुत्त, तुला काय...” हा उपदेश भगवंतांनी कशासाठी सुरू केला? परीक्षेस (चौकशीस) प्रवृत्त करण्यासाठी. कारण की एखादा माणूस सिंहनाद करून आपल्या सिंहनादाची परीक्षा देण्यास असमर्थ ठरतो, तो कसोटी सहन करू शकत नाही, डिंकात अडकलेल्या माकडासारखा तो होतो. ज्याप्रमाणे फुंकले असता अशुद्ध धातू जळून कोळसा बनतो, त्याप्रमाणे तो जळालेल्या कोळशासारखा होतो. पण दुसरा एखादा सिंहनादाची परीक्षा घेतली असता ती देण्यास समर्थ असतो, तो कसोटी सहन करतो, फुंकले असता निर्दोष सोन्याप्रमाणे तो अधिकच चमकतो; स्थवीर (सारिपुत्त) तशा प्रकारचे आहेत. म्हणूनच भगवंतांनी 'हा परीक्षेस पात्र आहे' असे जाणून त्यांच्या सिंहनादाची परीक्षा घेण्यासाठी हा उपदेश सुरू केला. තත්ථ සබ්බෙ තෙති සබ්බෙ තෙ තයා. එවංසීලාති මග්ගසීලෙන ඵලසීලෙන ලොකියලොකුත්තරසීලෙන එවංසීලා. එවංධම්මාති එත්ථ සමාධිපක්ඛා ධම්මා අධිප්පෙතා, මග්ගසමාධිනා ඵලසමාධිනා ලොකියලොකුත්තරෙන සමාධිනා එවංසමාධීති අත්ථො. එවංපඤ්ඤාති මග්ගපඤ්ඤාදිවසෙනෙව එවංපඤ්ඤා. එවංවිහාරිනොති එත්ථ පන හෙට්ඨා සමාධිපක්ඛානං ධම්මානං ගහිතත්තා විහාරො ගහිතොපි පුන කස්මා ගහිතමෙව ගණ්හතීති චෙ. ථෙරෙන ඉදං ගහිතමෙව. ඉදඤ්හි නිරොධසමාපත්තිදීපනත්ථං වුත්තං. තස්මා එවං නිරොධසමාපත්තිවිහාරිනො තෙ භගවන්තො අහෙසුන්ති එවමෙත්ථ අත්ථො දට්ඨබ්බො. त्यात, 'सब्बे ते' (ते सर्व) म्हणजे तुझ्याद्वारे ते सर्व (भूतकाळातील बुद्ध). 'एवंसीला' (अशा शीलाचे) म्हणजे मार्गशील, फलशील आणि लौकिक-लोकोत्तर शीलाने युक्त असणारे. 'एवंधम्मा' (अशा धर्माचे) यात समाधीच्या पक्षातील (वीर्य, स्मृती इत्यादी) धर्म अभिप्रेत आहेत; मार्गसमाधी, फलसमाधी आणि लौकिक-लोकोत्तर समाधीने युक्त असणारे (एवंसमाधी), असा अर्थ आहे. 'एवंपञ्ञा' (अशा प्रज्ञेचे) म्हणजे मार्गप्रज्ञा इत्यादींच्या प्रभावाने अशा प्रज्ञेचे असणारे. 'एवंविहारिनो' (अशा विहाराचे) यात जर असे विचारले की, खाली समाधीच्या पक्षातील धर्मांचे ग्रहण केल्यामुळे विहाराचे ग्रहण झाले असतानाही पुन्हा ग्रहण केलेलेच का ग्रहण केले जात आहे? तर स्थविरांनी (सारिपुत्तांनी) हे ग्रहण करणे योग्यच आहे. कारण हे निरोधसमापत्ती दर्शवण्यासाठी म्हटले आहे. म्हणून, ते भगवंत अशा निरोधसमापत्ती विहाराने युक्त होते, असा येथे अर्थ समजला पाहिजे। එවංවිමුත්තාති එත්ථ වික්ඛම්භනවිමුත්ති, තදඞ්ගවිමුත්ති, සමුච්ඡෙදවිමුත්ති, පටිපස්සද්ධිවිමුත්ති, නිස්සරණවිමුත්තීති පඤ්චවිධා විමුත්ති. තත්ථ අට්ඨ සමාපත්තියො සයං වික්ඛම්භිතෙහි නීවරණාදීහි විමුත්තත්තා වික්ඛම්භනවිමුත්තීති සඞ්ඛං ගච්ඡන්ති. අනිච්චානුපස්සනාදිකා [Pg.243] සත්ත අනුපස්සනා සයං තස්ස තස්ස පච්චනීකවසෙන පරිච්චත්තාහි නිච්චසඤ්ඤාදීහි විමුත්තත්තා තදඞ්ගවිමුත්තීති සඞ්ඛං ගච්ඡන්ති. චත්තාරො අරියමග්ගා සයං සමුච්ඡින්නෙහි කිලෙසෙහි විමුත්තත්තා සමුච්ඡෙදවිමුත්තීති සඞ්ඛං ගච්ඡන්ති. චත්තාරි සාමඤ්ඤඵලානි මග්ගානුභාවෙන කිලෙසානං පටිපස්සද්ධන්තෙ උප්පන්නත්තා පටිපස්සද්ධිවිමුත්තීති සඞ්ඛං ගච්ඡන්ති. නිබ්බානං සබ්බකිලෙසෙහි නිස්සටත්තා අපගතත්තා දූරෙ ඨිතත්තා නිස්සරණවිමුත්තීති සඞ්ඛං ගතං. ඉති ඉමාසං පඤ්චන්නං විමුත්තීනං වසෙන එවං විමුත්තාති එත්ථ අත්ථො දට්ඨබ්බො. 'एवंविमुत्ता' (अशा विमुक्तीचे) यात विष्कंभनविमुक्ती, तदंगविमुक्ती, समुच्छेदविमुक्ती, प्रतिप्रस्रब्धिविमुक्ती आणि निःसरणविमुक्ती अशी पाच प्रकारची विमुक्ती आहे. त्यात, आठ समापत्ती स्वतः दूर केलेल्या नीवरण इत्यादींपासून मुक्त असल्यामुळे 'विष्कंभनविमुक्ती' या संज्ञेस प्राप्त होतात. अनित्यानुपश्यना इत्यादी सात अनुपश्यना स्वतः त्यांच्या त्यांच्या विरोधी अशा त्यागलेल्या नित्यसंज्ञा इत्यादींपासून मुक्त असल्यामुळे 'तदंगविमुक्ती' या संज्ञेस प्राप्त होतात. चार आर्यमार्ग स्वतः समूळ नष्ट केलेल्या क्लेशांपासून मुक्त असल्यामुळे 'समुच्छेदविमुक्ती' या संज्ञेस प्राप्त होतात. चार श्रामण्यफळे मार्गाच्या प्रभावाने क्लेशांच्या शांततेच्या अंती उत्पन्न झाल्यामुळे 'प्रतिप्रस्रब्धिविमुक्ती' या संज्ञेस प्राप्त होतात. निर्वाण सर्व क्लेशांपासून मुक्त, अलिप्त आणि दूर स्थित असल्यामुळे 'निःसरणविमुक्ती' या संज्ञेस प्राप्त झाले आहे. अशा प्रकारे, या पाच विमुक्तींच्या प्रभावाने 'अशा विमुक्तीचे' होते, असा येथे अर्थ समजला पाहिजे। කිං පන තෙ සාරිපුත්ත යෙ තෙ භවිස්සන්තීති අතීතා තාව නිරුද්ධා අපණ්ණත්තිකභාවං ගතා දීපසිඛා විය නිබ්බුතා, එවං නිරුද්ධෙ අපණ්ණත්තිකභාවං ගතෙ ත්වං කථං ජානිස්සසි, අනාගතබුද්ධානං පන ගුණා කිං තයා අත්තනො චිත්තෙන පරිච්ඡින්දිත්වා විදිතාති පුච්ඡන්තො එවමාහ. 'पण हे सारिपुत्त, जे भविष्यात बुद्ध होतील त्यांच्याविषयी काय?' यात प्रथम तर, भूतकाळातील बुद्ध निरुद्ध झाले आहेत, प्रज्ञप्ती नसलेल्या अवस्थेला (अस्तित्वहीनतेला) प्राप्त झाले आहेत, दिव्याच्या ज्योतीप्रमाणे विझून गेले आहेत. अशा प्रकारे निरुद्ध झालेल्या आणि प्रज्ञप्ती नसलेल्या अवस्थेला प्राप्त झालेल्या भूतकाळातील बुद्धांना तू कसे जाणणार? आणि भविष्यातील बुद्धांचे गुण काय तू तुझ्या स्वतःच्या चित्ताने मर्यादा निश्चित करून जाणले आहेत? असे विचारताना भगवंतांनी असे म्हटले। කිං පන ත්යාහං සාරිපුත්ත එතරහීති අනාගතාපි බුද්ධා අජාතා අනිබ්බත්තා අනුප්පන්නා, තෙ කථං ජානිස්සසි. තෙසඤ්හි ජානනං අපදෙ ආකාසෙ පදදස්සනං විය හොති. ඉදානි මයා සද්ධිං එකවිහාරෙ වසසි, එකතො භික්ඛාය චරසි, ධම්මදෙසනාකාලෙ දක්ඛිණපස්සෙ නිසීදසි, කිං පන මය්හං ගුණා අත්තනො චෙතසා පරිච්ඡින්දිත්වා විදිතා තයාති අනුයුඤ්ජන්තො එවමාහ. ථෙරො පන පුච්ඡිතපුච්ඡිතෙ ‘‘නො හෙතං භන්තෙ’’ති පටික්ඛිපති. 'पण हे सारिपुत्त, सध्या माझ्याविषयी काय?' यात भविष्यातील बुद्ध अजून जन्मलेले नाहीत, उत्पन्न झालेले नाहीत, प्रकट झालेले नाहीत; त्यांना तू कसे जाणणार? कारण त्यांना जाणणे हे पाऊलखुणा नसलेल्या आकाशात पाऊलखुणा शोधण्यासारखे आहे. आता तू माझ्यासोबत एकाच विहारात राहतोस, एकत्र भिक्षेसाठी फिरतोस, धर्मदेशनेच्या वेळी उजव्या बाजूला बसतोस; पण माझे गुण काय तू तुझ्या स्वतःच्या चित्ताने मर्यादा निश्चित करून जाणले आहेत? अशी चौकशी करताना भगवंतांनी असे म्हटले. परंतु स्थविरांनी (सारिपुत्तांनी) प्रत्येक विचारलेल्या प्रश्नावर 'असे नाही, भंते!' असे म्हणून नकार दिला। ථෙරස්ස ච විදිතම්පි අත්ථි, අවිදිතම්පි. කිං සො අත්තනො විදිතට්ඨානෙ පටික්ඛෙපං කරොති, අවිදිතට්ඨානෙති? විදිතට්ඨානෙ න කරොති, අවිදිතට්ඨානෙයෙව කරොති. ථෙරො කිර අනුයොගෙ ආරද්ධෙ එවං අඤ්ඤාසි ‘‘නායං අනුයොගො සාවකපාරමීඤාණෙ, සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණෙ පන අයං අනුයොගො’’ති අත්තනො සාවකපාරමීඤාණෙ පටික්ඛෙපං අකත්වාව අවිදිතට්ඨානෙ සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණෙ පටික්ඛෙපං කරොති. තෙන ඉදම්පි දීපෙති – භගවා මය්හං අතීතානාගතපච්චුප්පන්නානං බුද්ධානං සීලසමාධිපඤ්ඤාවිමුත්තිකාරණජානනසමත්ථං සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණං නත්ථීති. स्थविरांना काही गोष्टी ज्ञातही होत्या आणि काही अज्ञातही होत्या. ते आपल्या ज्ञात असलेल्या विषयात नकार देतात की अज्ञात असलेल्या विषयात? ते ज्ञात असलेल्या विषयात नकार देत नाहीत, तर केवळ अज्ञात असलेल्या विषयातच नकार देतात. जेव्हा चौकशी सुरू झाली, तेव्हा स्थविरांनी असे जाणले की, 'ही चौकशी श्रावकपारमीज्ञानाविषयी नाही, तर ही चौकशी सर्वज्ञताज्ञानाविषयी आहे.' म्हणून आपल्या श्रावकपारमीज्ञानाचा नकार न करताच, अज्ञात असलेल्या सर्वज्ञताज्ञानाच्या विषयात ते नकार देतात. त्याद्वारे हे देखील स्पष्ट होते की—'हे भगवंत, माझ्याकडे भूतकाळ, भविष्यकाळ आणि वर्तमानकाळातील बुद्धांच्या शील, समाधी, प्रज्ञा आणि विमुक्तीची कारणे जाणण्यास समर्थ असणारे सर्वज्ञताज्ञान नाही।' එත්ථාති එතෙසු අතීතාදිභෙදෙසු බුද්ධෙසු. අථ කිඤ්චරහීති අථ කස්මා එවං ඤාණෙ අසති තයා එවං කථිතන්ති වදති. ධම්මන්වයොති ධම්මස්ස පච්චක්ඛතො ඤාණස්ස අනුයොගං අනුගන්ත්වා උප්පන්නං අනුමානඤාණං නයග්ගාහො [Pg.244] විදිතො, සාවකපාරමීඤාණෙ ඨත්වාව ඉමිනා ආකාරෙන ජානාමි භගවාති වදති. ථෙරස්ස හි නයග්ගාහො අප්පමාණො අපරියන්තො. යථා ච සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණස්ස පමාණං වා පරියන්තො වා නත්ථි, එවං ධම්මසෙනාපතිනො නයග්ගාහස්ස. තෙන සො – ‘‘ඉමිනා එවංවිධො ඉමිනා එවංවිධො, ඉමිනා අනුත්තරො ඉමිනා අනුත්තරො සත්ථා’’ති ජානාති. ථෙරස්ස හි නයග්ගාහො සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණගතිකො එව. 'येथे' (एत्थ) म्हणजे भूतकाळ इत्यादी भेदांनी युक्त असलेल्या बुद्धांच्या बाबतीत. 'तर मग आता काय?' (अथ किंचरहि) म्हणजे 'असे ज्ञान नसतानाही तुझ्याद्वारे असे का म्हटले गेले?' असे भगवंत विचारतात. 'धम्मान्वय' (धम्मान्वयो) म्हणजे प्रत्यक्ष धर्मज्ञानाच्या अनुषंगाने उत्पन्न झालेले अनुमानज्ञान, ज्याद्वारे नयग्राह (पद्धतीचे ग्रहण) ज्ञात झाले आहे. 'हे भगवंत, मी श्रावकपारमीज्ञानात स्थित राहूनच या प्रकारे जाणतो,' असे ते म्हणतात. कारण स्थविरांचा नयग्राह अमर्याद आणि अनंत आहे. आणि ज्याप्रमाणे सर्वज्ञताज्ञानाला मर्यादा किंवा अंत नाही, त्याचप्रमाणे धर्मसेनापतींच्या (सारिपुत्तांच्या) नयग्राहालाही नाही. त्यामुळे ते जाणतात की—'या कारणाने शास्ते अशा प्रकारचे आहेत, या कारणाने ते अनुत्तर (सर्वश्रेष्ठ) आहेत.' कारण स्थविरांचा नयग्राह सर्वज्ञताज्ञानाच्या गतीसारखाच आहे। ඉදානි තං නයග්ගාහං පාකටං කාතුං උපමං දස්සෙන්තො සෙය්යථාපි භන්තෙතිආදිමාහ. තත්ථ යස්මා මජ්ඣිමදෙසෙ නගරස්ස උද්ධාපපාකාරාදීනි ථිරානි වා හොන්තු දුබ්බලානි වා, සබ්බසො වා පන මා හොන්තු, චොරානං ආසඞ්කා න හොති. තස්මා තං අග්ගහෙත්වා පච්චන්තිමං නගරන්ති ආහ. දළ්හුද්ධාපන්ති ථිරමූලපාකාරං. දළ්හපාකාරතොරණන්ති ථිරපාකාරඤ්චෙව ථිරපිට්ඨසඞ්ඝාටඤ්ච. එකද්වාරන්ති කස්මා ආහ? බහුද්වාරෙ හි නගරෙ බහූහි පණ්ඩිතදොවාරිකෙහි භවිතබ්බං, එකද්වාරෙව එකො වට්ටති. ථෙරස්ස ච පඤ්ඤාය සදිසො අඤ්ඤො නත්ථි, තස්මා අත්තනො පණ්ඩිතභාවස්ස ඔපම්මත්ථං එකංයෙව දොවාරිකං දස්සෙතුං ‘‘එකද්වාර’’න්ති ආහ. आता तो नयग्राह स्पष्ट करण्यासाठी उपमा दर्शवताना 'जसे की भंते!' इत्यादी म्हणाले. त्यात, कारण मध्यदेशातील नगराचे कोट-किल्ले आणि तटबंदी मजबूत असो वा कमकुवत असो, किंवा अजिबात नसो, चोरांची भीती नसते. म्हणून त्याचे ग्रहण न करता 'सीमावर्ती नगर' (पच्चन्तिमं नगरं) असे म्हटले. 'दृढ पाया असलेली तटबंदी' (दळ्हुद्धापं) म्हणजे मजबूत पाया असलेली भिंत. 'दृढ तटबंदी आणि तोरण' (दळ्हपाकारतोरणं) म्हणजे मजबूत तटबंदी आणि मजबूत दाराची चौकट. 'एकच द्वार असलेले' (एकद्वारं) असे का म्हटले? कारण अनेक द्वारे असलेल्या नगरात अनेक चतुर द्वारपालांची आवश्यकता असते, तर एकच द्वार असलेल्या नगरात एकच द्वारपाल पुरेसा असतो. आणि स्थविरांच्या प्रज्ञेसारखा दुसरा कोणी नाही, म्हणून आपल्या चतुरपणाच्या (पांडित्याच्या) उपमेसाठी एकाच द्वारपालाला दर्शवण्यासाठी 'एकद्वार' असे म्हटले। පණ්ඩිතොති පණ්ඩිච්චෙන සමන්නාගතො. බ්යත්තොති වෙය්යත්තියෙන සමන්නාගතො විසදඤාණො. මෙධාවීති ඨානුප්පත්තිකපඤ්ඤාසඞ්ඛාතාය මෙධාය සමන්නාගතො. අනුපරියායපථන්ති අනුපරියායනාමකං පාකාරමග්ගං. පාකාරසන්ධින්ති ද්වින්නං ඉට්ඨකානං අපගතට්ඨානං. පාකාරවිවරන්ති පාකාරස්ස ඡින්නට්ඨානං. චෙතසො උපක්කිලෙසෙති පඤ්චනීවරණා චිත්තං උපක්කිලිස්සන්ති කිලිට්ඨං කරොන්ති උපතාපෙන්ති විහෙඨෙන්ති, තස්මා ‘‘චෙතසො උපක්කිලෙසා’’ති වුච්චන්ති. පඤ්ඤාය දුබ්බලීකරණෙති නීවරණා උප්පජ්ජමානා අනුප්පන්නාය පඤ්ඤාය උප්පජ්ජිතුං න දෙන්ති, තස්මා ‘‘පඤ්ඤාය දුබ්බලීකරණා’’ති වුච්චන්ති. සුපතිට්ඨිතචිත්තාති චතූසු සතිපට්ඨානෙසු සුට්ඨු ඨපිතචිත්තා හුත්වා. සත්ත බොජ්ඣඞ්ගෙ යථාභූතන්ති සත්ත බොජ්ඣඞ්ගෙ යථාසභාවෙන භාවෙත්වා. අනුත්තරං සම්මාසම්බොධින්ති අරහත්තං සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණං පටිවිජ්ඣිංසූති දස්සෙති. 'पंडित' (पण्डितो) म्हणजे पांडित्याने (प्रज्ञेने) युक्त असणारा. 'व्यस्त' (ब्यत्तो - चतुर) म्हणजे विविध कर्तव्यांमध्ये कुशल असणारा, स्पष्ट ज्ञान असणारा. 'मेधावी' (मेधावी) म्हणजे प्रसंगानुरूप उत्पन्न होणाऱ्या प्रज्ञेने युक्त असणारा. 'अनुपरियायपथ' (अनुपरियायपथं) म्हणजे तटबंदीच्या कडेने जाणारा रस्ता. 'तटबंदीची सांधा' (पाकारसन्धिं) म्हणजे दोन विटांमधील मोकळी जागा. 'तटबंदीचे छिद्र' (पाकारविवरं) म्हणजे तटबंदीचा तुटलेला भाग. 'चित्ताचे उपक्लेश' (चेतसो उपक्किलेसे) म्हणजे पाच नीवरणे चित्ताला मलीन करतात, क्लेश देतात, ताप देतात आणि पीडा देतात, म्हणून त्यांना 'चित्ताचे उपक्लेश' म्हटले जाते. 'प्रज्ञेला दुर्बळ करणारे' (पञ्ञाय दुब्बलीकरणे) म्हणजे नीवरणे उत्पन्न झाल्यावर अनुत्पन्न प्रज्ञेला उत्पन्न होऊ देत नाहीत, म्हणून त्यांना 'प्रज्ञेला दुर्बळ करणारे' म्हटले जाते. 'सुप्रतिष्ठित चित्त असणारे' (सुपतिट्ठितचित्ता) म्हणजे चार स्मृतिप्रस्थानांमध्ये चित्त चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित करून. 'सात बोध्यंगांना यथार्थपणे' (सत्त बोज्झङ्गे यथाभूतं) म्हणजे सात बोध्यंगांची त्यांच्या मूळ स्वभावानुसार भावना (विकास) करून 'अनुत्तर सम्यक्संबोधिला' (अनुत्तरं सम्मासम्बोधिं) म्हणजे अर्हत्त्व आणि सर्वज्ञताज्ञान प्राप्त केले, हे दर्शवते। අපිචෙත්ථ සතිපට්ඨානාති විපස්සනා, බොජ්ඣඞ්ගා මග්ගො, අනුත්තරසම්මාසම්බොධි අරහත්තං. සතිපට්ඨානාති වා විපස්සනා, බොජ්ඣඞ්ගාමිස්සකා, සම්මාසම්බොධි [Pg.245] අරහත්තමෙව. දීඝභාණකමහාසීවත්ථෙරො පනාහ ‘‘සතිපට්ඨානෙ විපස්සනං ගහෙත්වා බොජ්ඣඞ්ගෙ මග්ගො ච සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණඤ්චාති ගහිතෙ සුන්දරො පඤ්හො භවෙය්ය, න පනෙවං ගහිත’’න්ති. ඉති ථෙරො සබ්බබුද්ධානං නීවරණප්පහානෙ සතිපට්ඨානභාවනාය සම්බොධියඤ්ච මජ්ඣෙ භින්නසුවණ්ණරජතානං විය නානත්තාභාවං දස්සෙති. शिवाय, येथे (या सूत्रात) असे म्हटले आहे की, 'सतिपट्ठान' या शब्दाने विपस्सना (विपश्यना) घेतली जाते, 'बोझ्झंग' (बोध्यंग) म्हणजे मार्ग आहे आणि 'अनुत्तर सम्मासंबोधी' म्हणजे अर्हत्त्व फल आहे. किंवा, 'सतिपट्ठान' या शब्दाने विपस्सना घेतली जाते, 'बोझ्झंग' म्हणजे समथ व विपस्सना मिश्रित मार्ग आहेत आणि 'सम्मासंबोधी' म्हणजे अर्हत्त्व फलच आहे. परंतु, दीघभाणक (दीघनिकाय पाठ करणारे) महासीव थेर म्हणतात— 'सतिपट्ठामध्ये विपस्सना घेऊन आणि बोझ्झंगामध्ये मार्ग व सर्वज्ञता-ज्ञान (सब्बञ्ञुतञ्ञाण) हे दोन्ही घेतले असता हा प्रश्न अधिक चांगला होईल, परंतु प्राचीन आचार्यांनी असे घेतलेले नाही.' अशा प्रकारे, थेर (सारिपुत्त) सर्व बुद्धांच्या नीवरण-प्रहाणामध्ये (नीवरणांचा त्याग करण्यात), सतिपट्ठान-भावनेमध्ये आणि संबोधीमध्ये, मध्यभागी कापलेल्या सोने व चांदीमध्ये जसा काही भेद नसतो, तसा कोणताही भेद (भिन्नता) नाही हे दर्शवितात. ඉධ ඨත්වා උපමා සංසන්දෙතබ්බා – ආයස්මා හි සාරිපුත්තො පච්චන්තනගරං දස්සෙසි, පාකාරං දස්සෙසි, අනුපරියායපථං දස්සෙසි, ද්වාරං දස්සෙසි, පණ්ඩිතදොවාරිකං දස්සෙසි, නගරං පවිසනකනික්ඛමනකෙ ඔළාරිකෙ පාණෙ දස්සෙසි, දොවාරිකස්ස තෙසං පාණානං පාකටභාවං දස්සෙසි. තත්ථ කිං කෙන සදිසන්ති චෙ? නගරං විය හි නිබ්බානං, පාකාරො විය සීලං, අනුපරියායපථො විය හිරී, ද්වාරං විය අරියමග්ගො, පණ්ඩිතදොවාරිකො විය ධම්මසෙනාපති, නගරං පවිසනකනික්ඛමනකා ඔළාරිකපාණා විය අතීතානාගතපච්චුප්පන්නා බුද්ධා, දොවාරිකස්ස තෙසං පාණානං පාකටභාවො විය ආයස්මතො සාරිපුත්තස්ස අතීතානාගතපච්චුප්පන්නානං බුද්ධානං සීලසමථාදීහි පාකටභාවො. එත්තාවතා ථෙරෙන භගවතො – ‘‘එවමහං සාවකපාරමීඤාණෙ ඨත්වා ධම්මන්වයෙන නයග්ගාහෙන ජානාමී’’ති අත්තනො සීහනාදස්ස අනුයොගො දින්නො හොති. येथे थांबून उपमेची तुलना केली पाहिजे— कारण आयुष्यमान सारिपुत्त यांनी सीमावर्ती नगर दर्शविले आहे, तटबंदी दर्शविली आहे, नगराभोवतीचा रस्ता दर्शविला आहे, द्वार दर्शविले आहे, बुद्धिमान द्वारपाल दर्शविला आहे, नगरात प्रवेश करणारे व बाहेर पडणारे मोठे प्राणी दर्शविले आहेत, आणि द्वारपालास त्या प्राण्यांचे स्पष्टपणे दिसणे दर्शविले आहे. त्यामध्ये कोण कशासारखे आहे? असे विचारल्यास— नगर हे निब्बाणासारखे (निर्वाणासारखे) आहे, तटबंदी ही शीलासारखी आहे, नगराभोवतीचा रस्ता हा 'हिरी' (पापभिरुता) सारखा आहे, द्वार हे आर्यमार्गासारखे आहे, बुद्धिमान द्वारपाल हा धम्मसेनापतींसारखा (सारिपुत्तांसारखा) आहे, नगरात प्रवेश करणारे व बाहेर पडणारे मोठे प्राणी हे भूत, भविष्य आणि वर्तमानकाळातील बुद्धांसारखे आहेत, आणि द्वारपालास त्या प्राण्यांचे स्पष्टपणे दिसणे हे आयुष्यमान सारिपुत्तांना भूत, भविष्य व वर्तमानकाळातील बुद्धांचे शील, समाधी इत्यादींद्वारे स्पष्टपणे जाणण्यासारखे आहे. एवढ्या विवंचनेने थेरांनी भगवंतांना सांगितले की— 'अशा प्रकारे मी श्रावकपारमी-ज्ञानामध्ये प्रतिष्ठित होऊन, धम्मान्वयाने (अनुमान ज्ञानाने) आणि नयाच्या ग्रहणाने (पद्धतीने) जाणतो.' अशा प्रकारे त्यांनी आपल्या सिंहनादाचे स्पष्टीकरण दिले आहे. තස්මාති යස්මා ‘‘න ඛො මෙතං, භන්තෙ, අතීතානාගතපච්චුප්පන්නෙසු අරහන්තෙසු සම්මාසම්බුද්ධෙසු චෙතොපරියඤාණං අත්ථි, අපිච ධම්මන්වයො විදිතො’’ති වදති, තස්මා. අභික්ඛණං භාසෙය්යාසීති පුනප්පුනං භාසෙය්යාසි, ‘‘පුබ්බණ්හෙ මෙ කථිත’’න්ති මා මජ්ඣන්හිකාදීසු න කථයිත්ථ, ‘‘අජ්ජ වා මෙ කථිත’’න්ති මා පරදිවසාදීසු න කථයිත්ථාති අත්ථො. සා පහීයිස්සතීති ‘‘සාරිපුත්තසදිසොපි නාම ඤාණජවනසම්පන්නො සාවකො බුද්ධානං චිත්තාචාරං ජානිතුං න සක්කොති, එවං අප්පමෙය්යා තථාගතා’’ති චින්තෙන්තානං යා තථාගතෙ කඞ්ඛා වා විමති වා, සා පහීයිස්සතීති. 'तस्मा' (त्यामुळे) म्हणजे ज्या अर्थी तू म्हणालास की, 'भन्ते, भूत, भविष्य व वर्तमानकाळातील अर्हत सम्यक्संबुद्धांचे चेतोपरिय-ज्ञान मला नाही, परंतु मला धम्मान्वय (अनुमान ज्ञान) ज्ञात आहे,' म्हणून. 'अभिक्खणं भासेय्यासि' म्हणजे पुन्हा पुन्हा सांगावे (उपदेश करावा); 'मी सकाळी सांगितले आहे' म्हणून दुपारी किंवा संध्याकाळी सांगण्याचे सोडू नका, किंवा 'मी आज सांगितले आहे' म्हणून दुसऱ्या दिवशी सांगण्याचे सोडू नका, असा अर्थ आहे. 'सा पहीयिस्सति' (ती नष्ट होईल) म्हणजे 'सारिपुत्तांसारखा तीव्र प्रज्ञा असलेला श्रावकही बुद्धांच्या चित्ताची गती जाणू शकत नाही, असे तथागत अमर्याद गुणांनी युक्त आहेत,' असा विचार करणाऱ्यांच्या मनात तथागतांबद्दल जी काही शंका (कंखा) किंवा संभ्रम (विमती) असेल, ती नष्ट होईल. 3. චුන්දසුත්තවණ්ණනා ३. चुन्दसुत्तवण्णना (चुन्द सूत्राचे स्पष्टीकरण) 379. තතියෙ මගධෙසූති එවංනාමකෙ ජනපදෙ. නාලකගාමකෙති රාජගහස්ස අවිදූරෙ අත්තනො කුලසන්තකෙ එවංනාමකෙ ගාමෙ. චුන්දො සමණුද්දෙසොති [Pg.246] අයං ථෙරො ධම්මසෙනාපතිස්ස කනිට්ඨභාතිකො, තං භික්ඛූ අනුපසම්පන්නකාලෙ ‘‘චුන්දො සමණුද්දෙසො’’ති සමුදාචරිත්වා ථෙරකාලෙපි තථෙව සමුදාචරිංසු. තෙන වුත්තං ‘‘චුන්දො සමණුද්දෙසො’’ති. උපට්ඨාකො හොතීති මුඛොදකදන්තකට්ඨදානෙන චෙව පරිවෙණසම්මජ්ජන-පිට්ඨිපරිකම්මකරණ-පත්තචීවරග්ගහණෙන ච උපට්ඨානකරො හොති. පරිනිබ්බායීති අනුපාදිසෙසාය නිබ්බානධාතුයා පරිනිබ්බුතො. කතරස්මිං කාලෙති? භගවතො පරිනිබ්බානසංවච්ඡරෙ. ३७९. तिसऱ्या सूत्रात, 'मगधेसु' म्हणजे या नावाच्या जनपदात. 'नाळकगामके' म्हणजे राजगृहाच्या जवळ असलेल्या, स्वतःच्या कुळाच्या मालकीच्या 'नाळक' नावाच्या गावात. 'चुन्द समणुद्देस' म्हणजे हे थेर धम्मसेनापतींचे (सारिपुत्तांचे) धाकटे भाऊ होते. भिक्खू त्यांना उपसंपदा मिळण्यापूर्वी (श्रामणेर असताना) 'चुन्द समणुद्देस' म्हणून हाक मारत असत, आणि थेर (भिक्खू) झाल्यावरही त्यांना त्याच नावाने हाक मारत राहिले. म्हणून 'चुन्द समणुद्देस' असे म्हटले आहे. 'उपट्ठाको होति' म्हणजे मुखोदक (तोंड धुण्याचे पाणी) व दंतकाष्ठ (दातून) देणे, तसेच विहार झाडणे, पाठीची मालिश करणे, आणि पात्र व चीवर सांभाळणे यांद्वारे ते सेवा करत असत. 'परिनिब्बायी' म्हणजे अनुपधिशेष निब्बानधातूने परिनिर्वाण पावले. कोणत्या काळात? भगवंतांच्या परिनिर्वाणाच्याच वर्षी. තත්රායං අනුපුබ්බිකථා – භගවා කිර වුත්ථවස්සො වෙළුවගාමකා නික්ඛමිත්වා ‘‘සාවත්ථිං ගමිස්සාමී’’ති ආගතමග්ගෙනෙව පටිනිවත්තන්තො අනුපුබ්බෙන සාවත්ථිං පත්වා ජෙතවනං පාවිසි. ධම්මසෙනාපති භගවතො වත්තං දස්සෙත්වා දිවාට්ඨානං ගතො, සො තත්ථ අන්තෙවාසිකෙසු වත්තං දස්සෙත්වා පටික්කන්තෙසු දිවාට්ඨානං සම්මජ්ජිත්වා චම්මඛණ්ඩං පඤ්ඤාපෙත්වා පාදෙ පක්ඛාලෙත්වා පල්ලඞ්කං ආභුජිත්වා ඵලසමාපත්තිං පාවිසි. අථස්ස යථා පරිච්ඡෙදෙන තතො වුට්ඨිතස්ස අයං පරිවිතක්කො උදපාදි ‘‘බුද්ධා නු ඛො පඨමං පරිනිබ්බායන්ති, උදාහු අග්ගසාවකාති, තතො ‘‘අග්ගසාවකා පඨම’’න්ති ඤත්වා අත්තනො ආයුසඞ්ඛාරං ඔලොකෙසි. සො ‘‘සත්තාහමෙව මෙ ආයුසඞ්ඛාරා පවත්තිස්සන්තී’’ති ඤත්වා ‘‘කත්ථ පරිනිබ්බායිස්සාමී’’ති චින්තෙසි. त्याविषयीची ही अनुक्रमिक कथा आहे— असे ऐकिवात आहे की, भगवंत वर्षावास संपवून वेळुवगाम येथून निघाले आणि 'मी सावत्थीला जाईन' असे म्हणून ज्या मार्गाने आले होते त्याच मार्गाने परत फिरले. अनुक्रमाने सावत्थीला पोहोचून त्यांनी जेतवनात प्रवेश केला. धम्मसेनापती (सारिपुत्त) भगवंतांची सेवा करून दिवसा विश्रांती घेण्याच्या ठिकाणी गेले. तेथे त्यांच्या शिष्यांनी त्यांची सेवा केली आणि ते निघून गेल्यावर, त्यांनी विश्रांतीची जागा झाडली, चामड्याचे आसन पसरले, पाय धुवून, पद्मासन घालून ते फलसमापत्तीमध्ये लीन झाले. त्यानंतर, ठराविक वेळेनंतर त्या समाधीतून उठल्यावर त्यांच्या मनात असा विचार आला— 'बुद्ध आधी परिनिर्वाण पावतात की अग्रश्रावक?' तेव्हा 'अग्रश्रावक आधी परिनिर्वाण पावतात' हे जाणून त्यांनी आपल्या आयुष्य-संस्काराकडे (उर्वरित आयुष्याकडे) पाहिले. 'माझे आयुष्य केवळ सात दिवसच उरले आहे' हे जाणून त्यांनी विचार केला, 'मी कोठे परिनिर्वाण पावावे?' තතො ‘‘රාහුලො තාවතිංසෙසු පරිනිබ්බුතො, අඤ්ඤාසිකොණ්ඩඤ්ඤත්ථෙරො ඡද්දන්තදහෙ, අහං කත්ථ පරිනිබ්බායිස්සාමී’’ති පුනප්පුනං චින්තෙන්තො මාතරං ආරබ්භ සතිං උප්පාදෙසි – ‘‘මය්හං මාතා සත්තන්නං අරහන්තානං මාතා හුත්වාපි බුද්ධධම්මසඞ්ඝෙසු අප්පසන්නා, අත්ථි නු ඛො තස්සා උපනිස්සයො, නත්ථි නු ඛො’’ති. සොතාපත්තිමග්ගස්ස උපනිස්සයං දිස්වා ‘‘කස්ස දෙසනාය අභිසමයො භවිස්සතී’’ති ඔලොකෙන්තො ‘‘මමෙව ධම්මදෙසනාය භවිස්සති, න අඤ්ඤස්ස. සචෙ ඛො පනාහං අප්පොස්සුක්කො භවෙය්යං, භවිස්සන්ති මෙ වත්තාරො – ‘‘සාරිපුත්තත්ථෙරො අවසෙසජනානම්පි අවස්සයො හොති. තථා හිස්ස සමචිත්තසුත්තන්තදෙසනාදිවසෙ (අ. නි. 2.33-37) කොටිසතසහස්සදෙවතා අරහත්තං පත්තා, තයො මග්ගෙ පටිවිද්ධදෙවතානං ගණනා නත්ථි, අඤ්ඤෙසු ච ඨානෙසු අනෙකා අභිසමයා [Pg.247] දිස්සන්ති, ථෙරෙ ච චිත්තං පසාදෙත්වා සග්ගෙ නිබ්බත්තානෙව අසීති කුලසහස්සානි, සො දානි සකමාතුමිච්ඡාදස්සනමත්තම්පි හරිතුං නාසක්ඛී’’ති. තස්මා මාතරං මිච්ඡාදස්සනා මොචෙත්වා ජාතොවරකෙයෙව පරිනිබ්බායිස්සාමී’’ති සන්නිට්ඨානං කත්වා ‘‘අජ්ජෙව භගවන්තං අනුජානාපෙත්වා නික්ඛමිස්සාමී’’ති චුන්දත්ථෙරං ආමන්තෙසි – ‘‘ආවුසො, චුන්ද, අම්හාකං පඤ්චසතාය භික්ඛුපරිසාය සඤ්ඤං දෙහි. ‘ගණ්හථාවුසො පත්තචීවරානි, ධම්මසෙනාපති නාලකගාමං ගන්තුකාමො’’’ති. ථෙරො තථා අකාසි. त्यानंतर, 'राहूल तावतिंस देवलोकात परिनिर्वाण पावले, अञ्ञासि-कोण्डञ्ञ थेर छद्दन्त सरोवरात परिनिर्वाण पावले, मी कोठे परिनिर्वाण पावावे?' असा वारंवार विचार करत असताना, त्यांनी आपल्या मातेचे स्मरण केले— 'माझी माता सात अर्हतांची माता असूनही बुद्ध, धम्म आणि संघ यांच्यावर श्रद्धा ठेवत नाही. तिच्यामध्ये (धर्माचा) काही उपनिषय (पात्रता) आहे की नाही?' तिला सोतापत्तिमार्गाची पात्रता असल्याचे पाहून, 'कोणाच्या उपदेशाने तिला धम्माचा साक्षात्कार (अभिसमय) होईल?' असा विचार केला असता त्यांना दिसले की— 'केवळ माझ्याच धम्मोपदेशाने होईल, इतरांच्या नाही. जर मी याविषयी उदासीन राहिलो, तर लोक माझी निंदा करतील की— 'सारिपुत्त थेर इतर सर्व लोकांसाठी आश्रयस्थान बनले. कारण त्यांच्या 'समचित्त सुत्तंत' उपदेशाच्या दिवशी एक लाख कोटी देव अर्हत्त्वाला पोहोचले, खालच्या तीन मार्गांचे ज्ञान प्राप्त करणाऱ्या देवांची तर गणनाच नाही, इतर ठिकाणीही अनेक लोकांना धम्मसाक्षात्कार झाल्याचे दिसते, आणि थेरांवर श्रद्धा ठेवून स्वर्गात उत्पन्न झालेल्या कुळांची संख्या ऐंशी हजार आहे; परंतु ते आता स्वतःच्या मातेची साधी मिथ्या दृष्टी देखील दूर करू शकले नाहीत!' म्हणून मातेला मिथ्या दृष्टीपासून मुक्त करून, ज्या खोलीत माझा जन्म झाला होता तेथेच मी परिनिर्वाण पावेन, असा निश्चय करून, 'आजच भगवंतांची परवानगी घेऊन मी निघेन,' असे ठरवून त्यांनी चुन्द थेरांना बोलावले आणि म्हटले— 'आवुस चुन्द, आमच्या पाचशे भिक्खूंच्या संघाला सूचना दे की— 'आवुसहो, आपले पात्र व चीवर घ्या, धम्मसेनापती नाळक गावाला जाऊ इच्छितात.'' थेरांनी तसेच केले. භික්ඛූ සෙනාසනං සංසාමෙත්වා පත්තචීවරමාදාය ථෙරස්ස සන්තිකං අගමංසු. ථෙරො සෙනාසනං සංසාමෙත්වා දිවාට්ඨානං සම්මජ්ජිත්වා දිවාට්ඨානද්වාරෙ ඨත්වා දිවාට්ඨානං ඔලොකෙත්වා ‘‘ඉදං දානි පච්ඡිමදස්සනං, පුන ආගමනං නත්ථී’’ති පඤ්චසතභික්ඛූහි පරිවුතො භගවන්තං උපසඞ්කමිත්වා වන්දිත්වා භගවන්තං එතදවොච ‘‘අනුජානාතු මෙ භන්තෙ භගවා, අනුජානාතු සුගතො. පරිනිබ්බානකාලො මෙ, ඔස්සට්ඨො මෙ ආයුසඞ්ඛාරො’’ති. බුද්ධා පන යස්මා ‘‘පරිනිබ්බාහී’’ති වුත්තෙ මරණවණ්ණං සංවණ්ණෙන්තීති, ‘‘මා පරිනිබ්බාහී’’ති වුත්තෙ වට්ටස්ස ගුණං කථෙන්තීති මිච්ඡාදිට්ඨිකා දොසං ආරොපෙස්සන්ති, තස්මා තදුභයම්පි න වදන්ති. තෙන නං භගවා – ‘‘කත්ථ පරිනිබ්බායිස්සසි සාරිපුත්තා’’ති වත්වා – ‘‘අත්ථි, භන්තෙ, මගධෙසු නාලකගාමෙ ජාතොවරකො, තත්ථාහං පරිනිබ්බායිස්සාමී’’ති වුත්තෙ – ‘‘යස්ස දානි ත්වං, සාරිපුත්ත, කාලං මඤ්ඤසි, ඉදානි පන තෙ ජෙට්ඨකනිට්ඨභාතිකානං තාදිසස්ස භික්ඛුනො දස්සනං දුල්ලභං භවිස්සති, දෙසෙහි නෙසං ධම්ම’’න්ති ආහ. भिक्खूंनी आपले शयनासन आवरून, पात्र व चीवर घेऊन स्थवीर सारिपुत्तांच्या जवळ गेले. स्थविरांनी आपले शयनासन आवरून, दिवास्थान (दिवस घालवण्याची जागा) झाडून, दिवास्थानाच्या दाराशी उभे राहून आणि दिवास्थानाकडे पाहून, "हे आता शेवटचे दर्शन आहे, पुन्हा येणे होणार नाही," असे म्हणून पाचशे भिक्खूंसह परिवृत होऊन भगवंतांकडे जाऊन, वंदन करून भगवंतांना असे म्हणाले, "भंते, भगवंतांनी मला अनुमती द्यावी, सुगतांनी मला अनुमती द्यावी. माझा परिनिर्वाणकाळ जवळ आला आहे, मी आयुष्यसंस्काराचा त्याग केला आहे." परंतु बुद्ध कधीही "परिनिर्वाण कर" असे म्हटले असता मरणाची प्रशंसा करतात आणि "परिनिर्वाण करू नकोस" असे म्हटले असता संसारचक्राच्या गुणांचे वर्णन करतात, असा मिथ्यादृष्टी लोक दोषारोप करतील, म्हणून ते या दोन्ही गोष्टी बोलत नाहीत. त्यामुळे भगवंतांनी त्यांना विचारले, "सारिपुत्ता, तू कोठे परिनिर्वाण करणार आहेस?" तेव्हा त्यांनी उत्तर दिले, "भंते, मगध देशातील नालक गावात माझी जन्मखोली आहे, तेथे मी परिनिर्वाण पावेन." असे म्हटले असता भगवंतांनी म्हटले, "सारिपुत्ता, ज्याची तू आता वेळ योग्य समजतोस (ते कर). परंतु आता तुझ्या थोरल्या व धाकट्या भावांना तुझ्यासारख्या भिक्खूचे दर्शन मिळणे कठीण होईल, म्हणून त्यांना धम्म उपदेश कर." ථෙරො – ‘‘සත්ථා මය්හං ඉද්ධිවිකුබ්බනපුබ්බඞ්ගමං ධම්මදෙසනං පච්චාසීසතී’’ති ඤත්වා භගවන්තං වන්දිත්වා තාලප්පමාණං ආකාසං අබ්භුග්ගන්ත්වා ඔරුය්හ දසබලස්ස පාදෙ වන්දි, පුන ද්විතාලප්පමාණං අබ්භුග්ගන්ත්වා ඔරුය්හ දසබලස්ස පාදෙ වන්දි, එතෙනුපායෙන සත්තතාලප්පමාණං අබ්භුග්ගන්ත්වා අනෙකානි පාටිහාරියසතානි දස්සෙන්තො ධම්මකථං ආරභි. දිස්සමානෙනපි කායෙන කථෙති, අදිස්සමානෙනපි. උපරිමෙන වා හෙට්ඨිමෙන වා උපඩ්ඪකායෙන කථෙති අදිස්සමානෙනපි දිස්සමානෙනපි, කාලෙන චන්දවණ්ණං දස්සෙති, කාලෙන සූරියවණ්ණං, කාලෙන පබ්බතවණ්ණං, කාලෙන සමුද්දවණ්ණං, කාලෙන චක්කවත්තිරාජා හොති, කාලෙන වෙස්සවණමහාරාජා, කාලෙන සක්කො [Pg.248] දෙවරාජා, කාලෙන මහාබ්රහ්මාති එවං අනෙකානි පාටිහාරියසතානි දස්සෙන්තො ධම්මකථං කථෙසි. සකලනගරං සන්නිපති. ථෙරො ඔරුය්හ දසබලස්ස පාදෙ වන්දිත්වා අට්ඨාසි. අථ නං සත්ථා ආහ – ‘‘කො නාමො අයං සාරිපුත්ත ධම්මපරියායො’’ති. සීහවිකීළිතො නාම, භන්තෙති. තග්ඝ, සාරිපුත්ත, සීහවිකීළිතො තග්ඝ, සාරිපුත්ත, සීහවිකීළිතොති. स्थविरांनी, "शास्ता माझ्याकडून ऋद्धी-प्रातिहार्ययुक्त धम्मदेशनेची अपेक्षा करत आहेत," असे जाणून भगवंतांना वंदन केले आणि एका ताडझाडाच्या उंचीएवढ्या आकाशात उडून, खाली उतरून दशबलांच्या चरणांना वंदन केले. पुन्हा दोन ताडझाडांच्या उंचीवर आकाशात उडून, खाली उतरून दशबलांच्या चरणांना वंदन केले. याच पद्धतीने सात ताडझाडांच्या उंचीपर्यंत आकाशात उडून, अनेक शेकडो प्रातिहार्ये दाखवत त्यांनी धम्मकथा सांगण्यास प्रारंभ केला. ते दृश्य शरीरानेही उपदेश करत होते आणि अदृश्य शरीरानेही. शरीराच्या वरच्या किंवा खालच्या अर्ध्या भागाने, अदृश्य आणि दृश्य रूपानेही ते उपदेश करत होते. कधी ते चंद्राचे रूप दाखवत होते, कधी सूर्याचे रूप, कधी पर्वताचे रूप, तर कधी समुद्राचे रूप दाखवत होते. कधी ते चक्रवर्ती राजा बनत होते, कधी वैश्रवण महाराज, कधी देवराज शक्र, तर कधी महाब्रह्मा बनत होते. अशा प्रकारे अनेक शेकडो प्रातिहार्ये दाखवत त्यांनी धम्मकथा सांगितली. संपूर्ण नगर एकत्र जमले. स्थवीर खाली उतरून दशबलांच्या चरणांना वंदन करून उभे राहिले. तेव्हा शास्त्यांनी त्यांना विचारले, "सारिपुत्ता, या धम्मपर्यायाचे नाव काय आहे?" त्यांनी उत्तर दिले, "भंते, याचे नाव 'सिंहविक्रीडित' आहे." भगवंतांनी म्हटले, "निश्चयच सारिपुत्ता, हे सिंहविक्रीडितच आहे; निश्चयच सारिपुत्ता, हे सिंहविक्रीडितच आहे." ථෙරො අලත්තකවණ්ණෙ හත්ථෙ පසාරෙත්වා සත්ථු සුවණ්ණකච්ඡපසදිසෙ පාදෙ ගොප්ඵකෙසු ගහෙත්වා – ‘‘භන්තෙ, ඉමෙසං පාදානං වන්දනත්ථාය කප්පසතසහස්සාධිකං අසඞ්ඛ්යෙය්යං පාරමියො පූරිතා, සො මෙ මනොරථො මත්ථකං පත්තො, ඉතො දානි පට්ඨාය පටිසන්ධිවසෙන න පුන එකට්ඨානෙ සන්නිපාතො සමාගමො අත්ථි, ඡින්නො එස විස්සාසො, අනෙකෙහි බුද්ධසතසහස්සෙහි පවිට්ඨං අජරං අමරං ඛෙමං සුඛං සීතලං අභයං නිබ්බානපුරං පවිසිස්සාමි, සචෙ මෙ කිඤ්චි කායිකං වා වාචසිකං වා න රොචෙථ, ඛමථ තං භගවා, ගමනකාලො මය්හ’’න්ති. ඛමාමි තෙ, සාරිපුත්ත, න ඛො පන තෙ කිඤ්චි කායිකං වා වාචසිකං වා මය්හං අරුච්චනකං අත්ථි, යස්ස දානි ත්වං, සාරිපුත්ත, කාලං මඤ්ඤසීති. स्थविरांनी आपले लाखेच्या रसासारखे लाल हात पसरवून, शास्त्यांच्या सोन्याच्या कासवासारख्या पाठीच्या चरणांना घोट्यापाशी धरून म्हटले, "भंते, या चरणांना वंदन करण्यासाठी मी एक लाख कल्प अधिक एक असंख्येय काळापर्यंत पारमिता पूर्ण केल्या आहेत. माझी ती मनोकामना पूर्ण झाली आहे. आतापासून पुढे पुनर्जन्माच्या रूपाने पुन्हा एका ठिकाणी एकत्र येणे किंवा भेटणे होणार नाही. हा संबंध आता कायमचा संपला आहे. अनेक लाख बुद्धांनी प्रवेश केलेल्या, जरा-मरणरहित, क्षेमकारक, सुखी, शीतल आणि अभय अशा निर्वाणपुरात मी प्रवेश करणार आहे. जर माझे काही कायिक किंवा वाचिक कर्म आपल्याला आवडले नसेल, तर हे भगवंता, मला क्षमा करावी, माझी जाण्याची वेळ झाली आहे." भगवंतांनी म्हटले, "सारिपुत्ता, मी तुला क्षमा करतो. तुझे कोणतेही कायिक किंवा वाचिक कर्म मला नापसंत नव्हते. सारिपुत्ता, ज्याची तू आता वेळ योग्य समजतोस (ते कर)." ඉති භගවතා අනුඤ්ඤාතසමනන්තරං සත්ථු පාදෙ වන්දිත්වා උට්ඨිතමත්තෙ ආයස්මන්තෙ සාරිපුත්තෙ සිනෙරුචක්කවාළහිමවන්තපරිභණ්ඩපබ්බතෙ ධාරයමානාපි – ‘‘අජ්ජ ඉමං ගුණරාසිං ධාරෙතුං න සක්කොමී’’ති වදන්තී විය එකප්පහාරෙනෙව විරවමානා මහාපථවී යාව උදකපරියන්තා අකම්පි, ආකාසෙ දෙවදුන්දුභියො ඵලිංසු, මහාමෙඝො උට්ඨහිත්වා පොක්ඛරවස්සං වස්සි. अशा प्रकारे भगवंतांनी अनुमती दिल्यानंतर लगेचच, शास्त्यांच्या चरणांना वंदन करून आयुष्यमान सारिपुत्त उभे राहिले असता, सुमेरू, चक्रवाळ, हिमालय आणि इतर पर्वत धारण करणारी असूनही, "आज मी या गुणराशीला धारण करण्यास असमर्थ आहे," असे म्हणत असल्यासारखी, एकदम प्रचंड आवाज करत महापृथ्वी पाण्याने वेढलेल्या मर्यादेपर्यंत थरथर कापली. आकाशात देवदुंदुभी कडाडल्या आणि मोठे ढग दाटून येऊन पुष्करवृष्टी झाली. සත්ථා – ‘‘ධම්මසෙනාපතිං පටිපාදෙස්සාමී’’ති ධම්මාසනා වුට්ඨාය ගන්ධකුටිඅභිමුඛො ගන්ත්වා මණිඵලකෙ අට්ඨාසි. ථෙරො තික්ඛත්තුං පදක්ඛිණං කත්වා චතූසු ඨානෙසු වන්දිත්වා – ‘‘භගවා ඉතො කප්පසතසහස්සාධිකස්ස අසඞ්ඛ්යෙය්යස්ස උපරි අනොමදස්සීසම්මාසම්බුද්ධස්ස පාදමූලෙ නිපජ්ජිත්වා තුම්හාකං දස්සනං පත්ථෙසිං, සා මෙ පත්ථනා සමිද්ධා, දිට්ඨා තුම්හෙ, තං පඨමදස්සනං, ඉදං පච්ඡිමදස්සනං. පුන තුම්හාකං දස්සනං නත්ථී’’ති වත්වා දසනඛසමොධානසමුජ්ජලං අඤ්ජලිං පග්ගය්හ යාව දස්සනවිසයා අභිමුඛොව පටික්කමිත්වා [Pg.249] වන්දිත්වා පක්කාමි. පුන මහාපථවී ධාරෙතුං අසක්කොන්තී උදකපරියන්තං කත්වා අකම්පි. शास्त्यांनी, "मी धम्मसेनापतींना निरोप देईन," असा विचार करून धम्मासनातून उठून, गंधकुटीकडे जाऊन मणीच्या पाटावर उभे राहिले. स्थविरांनी तीन वेळा प्रदक्षिणा करून, चार ठिकाणी वंदन करून म्हटले, "भगवंता, या कल्पाच्या एक लाख कल्प अधिक एक असंख्येय काळापूर्वी अनोमदस्सी सम्यक्संबुद्धांच्या चरणांशी लीन होऊन मी आपल्या दर्शनाची प्रार्थना केली होती. माझी ती प्रार्थना पूर्ण झाली आहे, मी आपल्याला पाहिले आहे. ते पहिले दर्शन होते, हे शेवटचे दर्शन आहे. पुन्हा आपले दर्शन होणार नाही." असे म्हणून, दहा नखांच्या कांतीने उजळलेले हात जोडून, जोपर्यंत दृष्टीपथात होते तोपर्यंत भगवंतांकडे तोंड करूनच मागे पावले टाकत, वंदन करून ते निघून गेले. पुन्हा महापृथ्वी हा गुणांचा भार सहन करण्यास असमर्थ होऊन पाण्याने वेढलेल्या मर्यादेपर्यंत थरथर कापली. භගවා පරිවාරෙත්වා ඨිතෙ භික්ඛූ ආහ – ‘‘අනුගච්ඡථ, භික්ඛවෙ, තුම්හාකං ජෙට්ඨභාතික’’න්ති. තස්මිං ඛණෙ චතස්සොපි පරිසා සම්මාසම්බුද්ධං එකකංයෙව ජෙතවනෙ ඔහාය නිරවසෙසා නික්ඛමිංසු. සාවත්ථිනගරවාසිනොපි – ‘‘සාරිපුත්තත්ථෙරො කිර සම්මාසම්බුද්ධං ආපුච්ඡිත්වා පරිනිබ්බායිතුකාමො නික්ඛන්තො, පස්සිස්සාම න’’න්ති නගරද්වාරානි නිරොකාසානි කරොන්තා නික්ඛමිත්වා ගන්ධමාලාදිහත්ථා කෙසෙ විකිරිත්වා – ‘‘ඉදානි මයං කහං මහාපඤ්ඤො නිසින්නො, කහං ධම්මසෙනාපති නිසින්නො’’ති පුච්ඡන්තා – ‘‘කස්ස සන්තිකං ගමිස්සාම, කස්ස හත්ථෙ සත්ථාරං ඨපෙත්වා ථෙරො පක්කන්තො’’තිආදිනා නයෙන පරිදෙවන්තා රොදන්තා ථෙරං අනුබන්ධිංසු. भगवंतांनी सभोवताली उभ्या असलेल्या भिक्खूंना म्हटले, "भिक्खूंनो, तुमच्या थोरल्या भावाच्या मागे जा (त्यांना निरोप द्या)." त्याच क्षणी चारही परिषदा सम्यक्संबुद्धांना जेतवनात एकटेच सोडून सर्वच्या सर्व बाहेर पडल्या. श्रावस्ती नगरातील रहिवासीसुद्धा, "स्थवीर सारिपुत्त सम्यक्संबुद्धांचा निरोप घेऊन परिनिर्वाण करण्यासाठी निघाले आहेत, चला आपण त्यांना पाहू या," असे म्हणत नगराच्या दारांवर प्रचंड गर्दी करत बाहेर पडले. हातात गंध, पुष्प इत्यादी घेऊन आणि आपले केस विस्कटून, "आता महाप्रज्ञावान कोठे बसले आहेत? धम्मसेनापती कोठे बसले आहेत?" असे विचारत, "आता आपण कोणाकडे जाणार? शास्त्यांना कोणाच्या हाती सोपवून स्थवीर निघून गेले?" अशा प्रकारे विलाप करत आणि रडत ते स्थविरांच्या मागे गेले. ථෙරො මහාපඤ්ඤාය ඨිතත්තා – ‘‘සබ්බෙසං අනතික්කමනීයො එස මග්ගො’’ති මහාජනං ඔවදිත්වා – ‘‘තුම්හෙපි, ආවුසො, තිට්ඨථ, මා දසබලෙ පමාදං ආපජ්ජිත්ථා’’ති භික්ඛුසඞ්ඝම්පි නිවත්තෙත්වා අත්තනො පරිසායෙව සද්ධිං පක්කාමි. යෙපි මනුස්සා – ‘‘පුබ්බෙ අය්යො පච්චාගමනචාරිකං චරති, ඉදං ඉදානි ගමනං න පුන පච්චාගමනායා’’ති පරිදෙවන්තා අනුබන්ධිංසුයෙව. තෙපි – ‘‘අප්පමත්තා, ආවුසො, හොථ, එවංභාවිනො නාම සඞ්ඛාරා’’ති නිවත්තෙසි. स्थवीर महाप्रज्ञेमध्ये प्रतिष्ठित असल्यामुळे, "हा मार्ग सर्वांसाठीच अटळ आहे," असे सांगून त्यांनी लोकांना उपदेश केला आणि "मित्रांनो, तुम्हीही येथेच थांबा, दशबलांच्या प्रति गाफील राहू नका," असे सांगून भिक्खू संघालाही परत पाठवले आणि केवळ आपल्या स्वतःच्या परिषदेसह ते पुढे निघाले. जे लोक, "पूर्वी आर्य परत येण्यासाठी चारिका करत असत, परंतु आताचे जाणे पुन्हा परत येण्यासाठी नाही," असा विलाप करत मागे येतच राहिले, त्यांनाही, "मित्रांनो, अप्रमत्त राहा, संस्कारांचा स्वभावच असा अनित्य आहे," असे सांगून त्यांनी परत पाठवले. අථ ඛො ආයස්මා සාරිපුත්තො සබ්බත්ථ එකරත්තිවාසෙන අන්තරාමග්ගෙ සත්තාහං මනුස්සානං සඞ්ගහං කරොන්තො සායං නාලකගාමං පත්වා ගාමද්වාරෙ නිග්රොධරුක්ඛමූලෙ අට්ඨාසි. අථ උපරෙවතො නාම ථෙරස්ස භාගිනෙය්යො බහිගාමං ගච්ඡන්තො ථෙරං දිස්වා උපසඞ්කමිත්වා වන්දිත්වා අට්ඨාසි. ථෙරො තං ආහ – ‘‘අත්ථි ගෙහෙ තෙ අය්යිකා’’ති. ආම භන්තෙති. ගච්ඡ අම්හාකං ඉධාගතභාවං ආරොචෙහි. ‘‘කස්මා ආගතො’’ති ච වුත්තෙ – ‘‘අජ්ජ කිර එකදිවසං අන්තොගාමෙ වසිස්සති, ජාතොවරකං පටිජග්ගථ, පඤ්චන්නඤ්ච කිර භික්ඛුසතානං වසනට්ඨානං ජානාථා’’ති. සො ගන්ත්වා – ‘‘අය්යිකෙ මය්හං මාතුලො ආගතො’’ති ආහ. ඉදානි කුහින්ති? ගාමද්වාරෙති. එකකොව, අඤ්ඤොපි කොචි අත්ථීති? අත්ථි පඤ්චසතා භික්ඛූති. කිංකාරණා ආගතොති? සො තං පවත්තිං ආරොචෙසි. බ්රාහ්මණී – ‘‘කිං නු ඛො එත්තකානං වසනට්ඨානං පටිජග්ගාපෙති[Pg.250], දහරකාලෙ පබ්බජිත්වා මහල්ලකකාලෙ ගිහී හොතුකාමො’’ති චින්තෙන්තී ජාතොවරකං පටිජග්ගාපෙත්වා පඤ්චසතානං වසනට්ඨානං කාරෙත්වා දණ්ඩදීපිකා ජාලෙත්වා ථෙරස්ස පාහෙසි. त्यानंतर आयुष्यमान सारिपुत्त प्रत्येक ठिकाणी केवळ एकच रात्र मुक्काम करत, वाटेत सात दिवस लोकांवर अनुग्रह करत (लोकांचे कल्याण करत), संध्याकाळी नालक गावी पोहोचले आणि गावच्या वेशीवर एका वडाच्या झाडाखाली थांबले. तेव्हा थेरांचे भाचे उपरेवत नावाचे, गावाबाहेर जात असताना त्यांनी थेरांना पाहिले आणि त्यांच्याजवळ जाऊन, वंदन करून ते उभे राहिले. थेर त्यांना म्हणाले, "तुझी आजी घरात आहे का?" तो म्हणाला, "होय, भंते." "जा आणि आम्ही येथे आल्याचे त्यांना सांग." आणि "ते कशासाठी आले आहेत?" असे विचारल्यास सांग की, "आज म्हणे ते एक दिवस गावात राहतील. त्यांचे जन्मगृह (ज्या खोलीत त्यांचा जन्म झाला ती खोली) स्वच्छ करा आणि पाचशे भिक्खूंच्या राहण्याची सोय करा." त्याने जाऊन सांगितले, "आजी, माझे मामा आले आहेत." "आता ते कुठे आहेत?" "गावच्या वेशीवर." "ते एकटेच आहेत की आणखी कोणी सोबत आहे?" "पाचशे भिक्खू सोबत आहेत." "ते कशासाठी आले आहेत?" त्याने ती सर्व हकीकत सांगितली. त्या ब्राह्मण स्त्रीने विचार केला, "ते एवढ्या लोकांच्या राहण्याची सोय का करायला सांगत आहेत? तरुणपणी प्रव्रज्या घेऊन आता म्हातारपणी त्यांना गृहस्थ व्हायचे आहे की काय?" असा विचार करून तिने जन्मगृह स्वच्छ करवून घेतले, पाचशे भिक्खूंच्या राहण्याची व्यवस्था केली, मशाली पेटवून घेतल्या आणि थेरांना बोलावणे पाठवले. ථෙරො භික්ඛූහි සද්ධිං පාසාදං ආරුය්හ ජාතොවරකං පවිසිත්වා නිසීදි, නිසීදිත්වා ‘‘තුම්හාකං වසනට්ඨානං ගච්ඡථා’’ති භික්ඛූ උය්යොජෙසි. තෙසු ගතමත්තෙසුයෙව ථෙරස්ස ඛරො ආබාධො උප්පජ්ජි, ලොහිතපක්ඛන්දිකා මාරණන්තිකා වෙදනා වත්තන්ති. එකං භාජනං පවිසති, එකං නික්ඛමති. බ්රාහ්මණී – ‘‘මම පුත්තස්ස පවත්ති මය්හං න රුච්චතී’’ති අත්තනො වසනගබ්භද්වාරං නිස්සාය අට්ඨාසි. थेर भिक्खूंसह प्रासादावर चढले आणि जन्मगृहात प्रवेश करून बसले. बसल्यावर त्यांनी भिक्खूंना निरोप दिला, "तुम्ही आपापल्या राहण्याच्या ठिकाणी जा." ते जाताच थेरांना तीव्र आजार उद्भवला, आणि रक्तातिसारामुळे प्राणघातक वेदना सुरू झाल्या. एक भांडे आत आणले जात होते आणि दुसरे बाहेर नेले जात होते. त्या ब्राह्मण स्त्रीने "माझ्या मुलाची ही अवस्था मला ठीक वाटत नाही," असा विचार करून आपल्या खोलीच्या दाराचा आश्रय घेऊन ती उभी राहिली. චත්තාරො මහාරාජානො ‘‘ධම්මසෙනාපති කුහිං විහරතී’’ති ඔලොකෙන්තා නාලකගාමෙ ජාතොවරකෙ පරිනිබ්බානමඤ්චෙ නිපන්නො, පච්ඡිමදස්සනං ගමිස්සාමා’’ති ආගම්ම වන්දිත්වා අට්ඨංසු. කෙ තුම්හෙති? මහාරාජානො භන්තෙති. කස්මා ආගතත්ථාති? ගිලානුපට්ඨාකා භවිස්සාමාති. ‘‘හොතු, අත්ථි ගිලානුපට්ඨාකො, ගච්ඡථ තුම්හෙ’’ති උය්යොජෙසි. තෙසං ගතාවසානෙ තෙනෙව නයෙන සක්කො දෙවානමින්දො. තස්මිං ගතෙ මහාබ්රහ්මා ච ආගමිංසු. තෙපි තථෙව ථෙරො උය්යොජෙසි. चार महाराजांनी "धम्मसेनापती कुठे राहत आहेत?" असे पाहत असताना, त्यांना नालक गावातील जन्मगृहात परिनिर्वाण-शय्येवर निजलेले पाहिले. "आम्ही अंतिम दर्शनासाठी जाऊ," असा विचार करून ते आले, त्यांनी वंदन केले आणि ते उभे राहिले. "तुम्ही कोण आहात?" "भंते, आम्ही चार महाराज आहोत." "तुम्ही कशासाठी आला आहात?" "आम्ही आपले रुग्णसेवक होऊ." "असू द्या, माझ्याकडे रुग्णसेवक आहे. तुम्ही जा," असे सांगून त्यांनी त्यांना निरोप दिला. त्यांच्या जाण्यानंतर त्याच पद्धतीने देवांचा राजा सक्क आला. तो गेल्यावर महाब्रह्मा देखील आले. थेरांनी त्यांनाही त्याच प्रकारे निरोप दिला. බ්රාහ්මණී දෙවතානං ආගමනඤ්ච ගමනඤ්ච දිස්වා ‘‘කෙ නු ඛො එතෙ මම පුත්තං වන්දිත්වා ගච්ඡන්තී’’ති ථෙරස්ස ගබ්භද්වාරං ගන්ත්වා ‘‘තාත, චුන්ද, කා පවත්තී’’ති පුච්ඡි. සො තං පවත්තිං ආචික්ඛිත්වා ‘‘මහාඋපාසිකා, භන්තෙ, ආගතා’’ති ආහ. ථෙරො ‘‘කස්මා අවෙලාය ආගතා’’ති පුච්ඡි. සා ‘‘තුය්හං, තාත, දස්සනත්ථායා’’ති වත්වා ‘‘තාත, පඨමං කෙ ආගතා’’ති පුච්ඡි. චත්තාරො මහාරාජානො උපාසිකෙති. තාත, ත්වං චතූහි මහාරාජෙහි මහන්තතරොති? ආරාමිකසදිසා එතෙ උපාසිකෙ, අම්හාකං සත්ථු පටිසන්ධිග්ගහණතො පට්ඨාය ඛග්ගහත්ථා හුත්වා ආරක්ඛං අකංසූති. තෙසං තාත ගතාවසානෙ කො ආගතොති? සක්කො දෙවානමින්දොති. දෙවරාජතොපි ත්වං තාත මහන්තතරොති? භණ්ඩග්ගාහකසාමණෙරසදිසො එස උපාසිකෙ, අම්හාකං සත්ථු තාවතිංසතො ඔතරණකාලෙ පත්තචීවරං ගහෙත්වා ඔතිණ්ණොති. තස්ස තාත ගතාවසානෙ ජොතයමානො විය කො ආගතොති? උපාසිකෙ, තුය්හං භගවා ච සත්ථා ච මහාබ්රහ්මා නාම එසොති. මය්හං භගවතො [Pg.251] මහාබ්රහ්මතොපි ත්වං, තාත, මහන්තතරොති? ආම උපාසිකෙ, එතෙ නාම කිර අම්හාකං සත්ථු ජාතදිවසෙ චත්තාරො මහාබ්රහ්මානො මහාපුරිසං සුවණ්ණජාලෙන පටිග්ගණ්හිංසූති. त्या ब्राह्मण स्त्रीने देवतेचे येणे-जाणे पाहून विचार केला, "माझ्या मुलाला वंदन करून जाणारे हे कोण आहेत?" ती थेरांच्या खोलीच्या दारापाशी गेली आणि विचारले, "बाळ चुंद, काय चालले आहे?" त्याने ती हकीकत सांगितली आणि थेरांना म्हटले, "भंते, महाउपासिका आल्या आहेत." थेरांनी विचारले, "अवेळी का आलात?" ती म्हणाली, "बाळा, तुझ्या दर्शनासाठी आले आहे." आणि विचारले, "बाळा, सर्वात आधी आलेले ते कोण होते?" "उपासिके, ते चार महाराज होते." "बाळा, तू त्या चार महाराजांपेक्षाही मोठा आहेस का?" "उपासिके, ते आमच्या शास्त्यांच्या आरामातील सेवकांसारखे आहेत. आमच्या शास्त्यांनी गर्भधारणा केल्यापासून ते हातात तलवार घेऊन त्यांचे रक्षण करत असत." "त्यांच्या जाण्यानंतर, बाळा, कोण आले होते?" "देवांचा राजा सक्क." "बाळा, तू देवराजापेक्षाही मोठा आहेस का?" "उपासिके, तो पात्र आणि चीवर वाहून नेणाऱ्या एखाद्या सामणेरासारखा आहे. आमचे शास्ते तावतिंस स्वर्गातून खाली उतरत असताना, त्याने पात्र आणि चीवर हातात धरून सोबत केली होती." "त्याच्या जाण्यानंतर, बाळा, अग्नीसारखा प्रज्वलित होऊन आलेला तो कोण होता?" "उपासिके, तो महाब्रह्मा होता, ज्याला तू तुझा भगवान आणि शास्ता मानतेस." "बाळा, तू माझ्या भगवंतापेक्षा, महाब्रह्मदेवापेक्षाही मोठा आहेस का?" "होय उपासिके, आमच्या शास्त्यांच्या जन्माच्या दिवशी या चार महाब्रह्मदेवांनी महापुरुषाला सोन्याच्या जाळीत झेलले होते." අථ බ්රාහ්මණියා – ‘‘පුත්තස්ස තාව මෙ අයං ආනුභාවො, කීදිසො වත මය්හං පුත්තස්ස භගවතො සත්ථු ආනුභාවො භවිස්සතී’’ති චින්තයන්තියා සහසා පඤ්චවණ්ණා පීති උප්පජ්ජිත්වා සකලසරීරං ඵරි. ථෙරො – ‘‘උප්පන්නං මෙ මාතු පීතිසොමනස්සං, අයං දානි කාලො ධම්මදෙසනායා’’ති චින්තෙත්වා ‘‘කිං චින්තෙසි මහාඋපාසිකෙ’’ති ආහ. සා ‘‘පුත්තස්ස තාව මෙ අයං ගුණො, සත්ථු පනස්ස කීදිසො භවිස්සතීති ඉදං, තාත, චින්තෙමී’’ති ආහ. මහාඋපාසිකෙ, මය්හං සත්ථුජාතක්ඛණෙ මහාභිනික්ඛමනෙ සම්බොධියං ධම්මචක්කප්පවත්තනෙ ච දසසහස්සිලොකධාතු කම්පිත්ථ. සීලෙන සමාධිනා පඤ්ඤාය විමුත්තියා විමුත්තිඤාණදස්සනෙන සමො නාම නත්ථි, ඉතිපි සො භගවාති විත්ථාරෙත්වා බුද්ධගුණපටිසංයුත්තං ධම්මදෙසනං කථෙසි. तेव्हा, "माझ्या मुलाचाच जर एवढा प्रभाव आहे, तर माझ्या मुलाचे शास्ते असलेल्या भगवंतांचा प्रभाव किती मोठा असेल!" असा विचार करत असताना, त्या ब्राह्मण स्त्रीच्या मनात अचानक पंचवर्णीय प्रीती उत्पन्न झाली आणि ती तिच्या संपूर्ण शरीरात पसरली. थेरांनी विचार केला, "माझ्या मातेच्या मनात प्रीती आणि आनंद उत्पन्न झाला आहे; आता धम्मदेशनेची हीच योग्य वेळ आहे." त्यांनी विचारले, "महाउपासिके, तू काय विचार करत आहेस?" ती म्हणाली, "बाळा, मी विचार करत आहे की, जर माझ्या मुलाचे गुण एवढे महान आहेत, तर त्यांच्या शास्त्यांचे गुण किती महान असतील!" "महाउपासिके, माझ्या शास्त्यांच्या जन्माच्या वेळी, महाभिनिष्क्रमणाच्या वेळी, संबोधीच्या वेळी आणि धम्मचक्कपवत्तनाच्या वेळी दहा हजार लोकधातू कंपित झाले होते. शील, समाधी, प्रज्ञा, विमुक्ती आणि विमुक्तीज्ञानदर्शनात त्यांच्या तोडीचा कोणीही नाही. इतिपि सो भगवा..." अशा प्रकारे त्यांनी बुद्धगुणांशी संबंधित धम्मदेशना सविस्तरपणे सांगितली. බ්රාහ්මණී පියපුත්තස්ස ධම්මදෙසනාපරියොසානෙ සොතාපත්තිඵලෙ පතිට්ඨාය පුත්තං ආහ – ‘‘තාත උපතිස්ස, කස්මා එවමකාසි, එවරූපං නාම අමතං මය්හං එත්තකං කාලං න අදාසී’’ති. ථෙරො – ‘‘දින්නං දානි මෙ මාතු රූපසාරියා බ්රාහ්මණියා පොසාවනිකමූලං, එත්තකෙන වට්ටිස්සතී’’ති චින්තෙත්වා – ‘‘ගච්ඡ මහාඋපසිකෙ’’ති බ්රාහ්මණිං උය්යොජෙත්වා – ‘‘චුන්ද කා වෙලා’’ති ආහ. බලවපච්චූසකාලො, භන්තෙති. භික්ඛුසඞ්ඝං සන්නිපාතෙහීති. සන්නිපතිතො භන්තෙ භික්ඛුසඞ්ඝොති. ‘‘මං උක්ඛිපිත්වා නිසීදාපෙහි චුන්දා’’ති උක්ඛිපිත්වා නිසීදාපෙසි. प्रिय पुत्राच्या धम्मदेशनेच्या शेवटी ती ब्राह्मण स्त्री सोतापत्तिफलावर प्रतिष्ठित झाली आणि आपल्या मुलाला म्हणाली, "बाळा उपतिस्स, तू असे का केलेस? एवढा काळ तू मला हे अमृत का दिले नाहीस?" थेरांनी विचार केला, "आता मी माझी माता रूपसारी ब्राह्मण स्त्रीला तिच्या पालनाचे ऋण फेडले आहे. एवढे पुरेसे होईल." त्यांनी "जा, महाउपासिके," असे म्हणून तिला निरोप दिला आणि विचारले, "चुंद, काय वेळ झाली आहे?" "भंते, पहाटेची वेळ झाली आहे." "भिक्खूसंघाला एकत्र कर." "भंते, भिक्खूसंघ एकत्र आला आहे." "चुंद, मला उचलून बसव." त्याने त्यांना उचलून बसवले. ථෙරො භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘ආවුසො චතුචත්තාලීසං වො වස්සානි මයා සද්ධිං විචරන්තානං යං මෙ කායිකං වා වාචසිකං වා න රොචෙථ, තං ඛමථ ආවුසො’’ති. එත්තකං, භන්තෙ, අම්හාකං ඡායා විය තුම්හෙ අමුඤ්චිත්වා විචරන්තානං අරුච්චනකං නාම නත්ථි, තුම්හෙ පන අම්හාකං ඛමථාති. අථ ථෙරො මහාචීවරං සඞ්කඩ්ඪිත්වා මුඛං පිධාය දක්ඛිණෙන පස්සෙන නිපන්නො සත්ථා විය නව අනුපුබ්බසමාපත්තියො අනුලොමපටිලොමතො සමාපජ්ජිත්වා පුන පඨමජ්ඣානං ආදිං කත්වා යාව චතුත්ථජ්ඣානා සමාපජ්ජි[Pg.252]. තතො වුට්ඨාය අනන්තරංයෙව මහාපථවිං උන්නාදෙන්තො අනුපාදිසෙසාය නිබ්බානධාතුයා පරිනිබ්බායි. थेरांनी भिक्खूंना संबोधित केले, "आवुसो, तुम्ही चौरेचाळीस वर्षे माझ्यासोबत फिरत आहात. माझी कोणतीही कायिक किंवा वाचिक कृती तुम्हाला आवडली नसेल, तर मला क्षमा करा, आवुसो." "भंते, एवढा काळ आम्ही सावलीसारखे आपल्यासोबत राहिलो, आपल्याला कधीही सोडले नाही. आम्हाला न आवडण्यासारखे काहीही घडले नाही. उलट आपणच आम्हाला क्षमा करावी." त्यानंतर थेरांनी आपले महाचीवर ओढून घेतले, चेहरा झाकला आणि उजव्या कुशीवर निजून, शास्त्यांप्रमाणे नऊ अनुक्रमिक समापत्तींमध्ये अनुलोम-प्रतिलोम क्रमाने प्रवेश केला. पुन्हा प्रथम ध्यानापासून सुरुवात करून चतुर्थ ध्यानापर्यंत समापत्ती प्राप्त केली. त्यातून बाहेर पडताच, तत्काळ महापृथ्वीला कंपित करत, ते अनुपादिशेष निर्वाणधातूमध्ये परिनिर्वाण पावले. උපාසිකා – ‘‘කිං නු ඛො මෙ පුත්තො, න කිඤ්චි කථෙතී’’ති උට්ඨාය පිට්ඨිපාදෙ පරිමජ්ජන්තී පරිනිබ්බුතභාවං ඤත්වා මහාසද්දං කුරුමානා පාදෙසු නිපතිත්වා – ‘‘තාත මයං ඉතො පුබ්බෙ තව ගුණං න ජානිම්හා, ඉදානි පන තං ආදිං කත්වා අනෙකසතෙ අනෙකසහස්සෙ අනෙකසතසහස්සෙ භික්ඛූ ඉමස්මිං නිවෙසනෙ නිසීදාපෙත්වා භොජෙතුං න ලභිම්හා, චීවරෙහි අච්ඡාදෙතුං න ලභිම්හා, විහාරසතං විහාරසහස්සං කාරෙතුං න ලභිම්හා’’ති යාව අරුණුග්ගමනා පරිදෙවි. අරුණෙ උග්ගතමත්තෙයෙව සුවණ්ණකාරෙ පක්කොසාපෙත්වා සුවණ්ණගබ්භං විවරාපෙත්වා සුවණ්ණඝටියො මහාතුලාය තුලාපෙත්වා – ‘‘පඤ්ච කූටාගාරසතානි පඤ්ච අග්ඝිකසතානි කරොථා’’ති දාපෙති. उपासिका (सारिपुत्तांची माता) – “माझा मुलगा काहीच का बोलत नाही?” असे म्हणून उठली आणि त्यांच्या पाऊलांवर हात फिरवू लागली. ते परिनिर्वाण पावले आहेत हे जाणून तिने मोठा आक्रोश केला आणि त्यांच्या पायांवर पडून ती रडू लागली – “बाळा, यापूर्वी आम्ही तुझे गुण जाणले नाहीत. आता मात्र, तुझ्यापासून सुरुवात करून शेकडो, हजारो, लाखो भिक्खूंना या घरात बसवून भोजन देण्याची संधी आम्हाला मिळाली नाही, त्यांना चीवर अर्पण करण्याची संधी मिळाली नाही, शंभर किंवा हजार विहार बांधण्याची संधी आम्हाला मिळाली नाही.” अशा प्रकारे तिने पहाटेपर्यंत विलाप केला. अरुणोदय होताच तिने सुवर्णकारांना बोलावले, सोन्याचे भांडार उघडले आणि मोठ्या तराजूने सोन्याचे घट तोलून दिले आणि सांगितले – “पाचशे कुटागार (शिखरयुक्त प्रासाद) आणि पाचशे अर्घ्य-स्तंभ तयार करा.” සක්කොපි දෙවරාජා විස්සකම්මදෙවපුත්තං ආමන්තෙත්වා – ‘‘තාත ධම්මසෙනාපති පරිනිබ්බුතො, පඤ්ච කූටාගාරසතානි පඤ්ච අග්ඝිකසතානි ච මාපෙහී’’ති ආහ. ඉති උපාසිකාය කාරිතානි ච විස්සකම්මෙන නිම්මිතානි ච සබ්බානිපි ද්වෙසහස්සානි අහෙසුං. තතො නගරමජ්ඣෙ සාරමයං මහාමණ්ඩපං කාරෙත්වා මණ්ඩපමජ්ඣෙ මහාකූටාගාරං ඨපෙත්වා සෙසානි පරිවාරසඞ්ඛෙපෙන ඨපෙත්වා සාධුකීළිකං ආරභිංසු. දෙවානං අන්තරෙ මනුස්සා, මනුස්සානං අන්තරෙ දෙවා අහෙසුං. देवराज शक्राने देखील विश्वकर्म देवपुत्राला बोलावून म्हटले – “प्रिय विश्वकर्म, धर्मसेनापती परिनिर्वाण पावले आहेत. तू पाचशे कुटागार आणि पाचशे अर्घ्य-स्तंभ निर्माण कर.” अशा प्रकारे, उपासिकेने बनवलेले आणि विश्वकर्माने निर्माण केलेले मिळून एकूण दोन हजार प्रासाद झाले. त्यानंतर शहराच्या मध्यभागी मजबूत लाकडाचा एक मोठा मंडप तयार करून, त्या मंडपाच्या मध्यभागी एक मोठा मुख्य कुटागार ठेवला आणि उर्वरित कुटागार त्याच्या सभोवताली रचले आणि त्यांनी ‘साधुकीळन’ (धार्मिक उत्सव) सुरू केला. देवांच्या मध्ये मनुष्य आणि मनुष्यांच्या मध्ये देव वावरत होते. රෙවතී නාම එකා ථෙරස්ස උපට්ඨායිකා – ‘‘අහං ථෙරස්ස පූජං කරිස්සාමී’’ති සුවණ්ණපුප්ඵානං තයො කුම්භෙ කාරෙසි. ‘‘ථෙරස්ස පූජං කරිස්සාමී’’ති සක්කො දෙවරාජා අඩ්ඪතෙය්යකොටිනාටකෙහි පරිවාරිතො ඔතරි. ‘‘සක්කො ඔතරතී’’ති මහාජනො පච්ඡාමුඛො පටික්කමි. තත්ථ සාපි උපාසිකා පටික්කමමානා ගරුභාරත්තා එකමන්තං අපසක්කිතුං අසක්කොන්තී මනුස්සානං අන්තරෙ පති. මනුස්සා අපස්සන්තා තං මද්දිත්වා අගමිංසු. සා තත්ථෙව කාලං කත්වා තාවතිංසභවනෙ කනකවිමානෙ නිබ්බත්ති. නිබ්බත්තක්ඛණෙයෙවස්සා රතනක්ඛන්ධො විය තිගාවුතප්පමාණො අත්තභාවො අහොසි සට්ඨිසකටපූරප්පමාණඅලඞ්කාරපටිමණ්ඩිතා අච්ඡරාසහස්සපරිවාරිතා. අථස්සා දිබ්බං සබ්බකායිකාදාසං පුරතො ඨපයිංසු[Pg.253]. සා අත්තනො සිරිසම්පත්තිං දිස්වා – ‘‘උළාරා අයං සම්පත්ති, කිං නු ඛො මෙ කම්මං කත’’න්ති චින්තයමානා අද්දස – ‘‘මයා සාරිපුත්තත්ථෙරස්ස පරිනිබ්බුතට්ඨානෙ තීහි සුවණ්ණපුප්ඵකුම්භෙහි පූජා කතා, මහාජනො මං මද්දිත්වා ගතො, සාහං තත්ථ කාලං කත්වා ඉධූපපන්නා, ථෙරං නිස්සාය ලද්ධං ඉදානි පුඤ්ඤවිපාකං මනුස්සානං කථෙස්සාමී’’ති සහ විමානෙනෙව ඔතරි. रेवती नावाची स्थविरांची एक उपासिका होती. “मी स्थविरांची पूजा करीन,” असा विचार करून तिने सोन्याच्या फुलांचे तीन घट तयार करवून घेतले. “मी स्थविरांची पूजा करीन,” असे म्हणून देवराज शक्र अडीच कोटी देव-नर्तकांसह खाली उतरला. “शक्र खाली उतरत आहे!” हे पाहून जनसमुदाय मागे सरकू लागला. तिथे ती उपासिका देखील मागे सरकत असताना, जड वजनामुळे एका बाजूला होण्यास असमर्थ ठरल्याने लोकांच्या गर्दीत पडली. लोकांनी न पाहिल्यामुळे तिला तुडवून पुढे निघून गेले. ती तिथेच काळवश झाली आणि तावतिंस देवलोकात सुवर्ण विमानामध्ये उत्पन्न झाली. उत्पन्न झाल्याच्या क्षणीच तिचे शरीर सोन्याच्या ढिगाऱ्यासारखे तीन गाऊत आकाराचे झाले, जे साठ बैलगाड्या भरतील एवढ्या दिव्य अलंकारांनी नटलेले होते आणि ती हजार अप्सरांनी वेढलेली होती. त्यानंतर तिच्यासमोर संपूर्ण शरीर दिसणारा एक दिव्य आरसा ठेवण्यात आला. तिने स्वतःचे वैभव पाहून विचार केला – “हे वैभव किती महान आहे! मी असे कोणते पुण्यकर्म केले होते?” विचार करत असताना तिला आठवले – “मी स्थवीर सारिपुत्तांच्या परिनिर्वाणाच्या ठिकाणी सोन्याच्या फुलांच्या तीन घटांनी पूजा केली होती. जनसमुदाय मला तुडवून निघून गेला, आणि मी तिथे मृत्यू पावून येथे उत्पन्न झाले. आता स्थविरांच्या प्रभावाने मिळालेल्या या पुण्यविपाकाविषयी (पुण्याच्या फळाविषयी) मी मनुष्यांना सांगेन.” असा विचार करून ती आपल्या विमानासह खाली उतरली. මහාජනො දූරතොව දිස්වා – ‘‘කිං නු ඛො ද්වෙ සූරියා උට්ඨිතා’’ති? ඔලොකෙන්තො – ‘‘විමානෙ ආගච්ඡන්තෙ කූටාගාරසණ්ඨානං පඤ්ඤායති, නායං සූරියො, විමානමෙතං එක’’න්ති ආහ. තම්පි විමානං තාවදෙව ආගන්ත්වා ථෙරස්ස දාරුචිතකමත්ථකෙ වෙහාසං අට්ඨාසි. දෙවධීතා විමානං ආකාසෙයෙව ඨපෙත්වා පථවිං ඔතරි. මහාජනො – ‘‘කා ත්වං, අය්යෙ’’ති? පුච්ඡි. ‘‘න මං තුම්හෙ ජානාථ, රෙවතී නාමාහං, තීහි සුවණ්ණපුප්ඵකුම්භෙහි ථෙරං පූජං කත්වා මනුස්සෙහි මද්දිතා කාලං කත්වා තාවතිංසභවනෙ නිබ්බත්තා, පස්සථ මෙ සිරිසම්පත්තිං, තුම්හෙපි දානි දානානි දෙථ, පුඤ්ඤානි කරොථා’’ති කුසලකිරියාය වණ්ණං කථෙත්වා ථෙරස්ස චිතකං පදක්ඛිණං කත්වා වන්දිත්වා අත්තනො දෙවට්ඨානංයෙව ගතා. जनसमुदायाने दुरूनच ते पाहून विचार केला – “काय दोन सूर्य उगवले आहेत की काय?” निरखून पाहताना, विमान जवळ आल्यावर त्याचा शिखरयुक्त प्रासादासारखा आकार दिसू लागला. लोक म्हणाले – “हा सूर्य नाही, हे तर एक विमान आहे.” ते विमान लगेचच तिथे आले आणि स्थविरांच्या लाकडी चितेच्या वर आकाशात स्थिरावले. ती देवकन्या विमान आकाशातच ठेवून पृथ्वीवर उतरली. लोकांनी विचारले – “आर्ये, आपण कोण आहात?” तिने उत्तर दिले – “तुम्ही मला ओळखत नाही का? मी रेवती आहे. सोन्याच्या फुलांच्या तीन घटांनी स्थविरांची पूजा करून, लोकांच्या पायांखाली तुडवली गेल्याने मृत्यू पावून मी तावतिंस देवलोकात उत्पन्न झाले आहे. माझे हे वैभव पहा! तुम्ही देखील आता दान द्या आणि पुण्यकर्मे करा.” अशा प्रकारे कुशल कर्मांच्या महत्त्वाची प्रशंसा करून, स्थविरांच्या चितेला प्रदक्षिणा घालून व वंदन करून ती आपल्या देवलोकात परत गेली. මහාජනොපි සත්තාහං සාධුකීළිකං කීළිත්වා සබ්බගන්ධෙහි චිතකං අකාසි, චිතකා එකූනරතනසතිකා අහොසි. ථෙරස්ස සරීරං චිතකං ආරොපෙත්වා උසීරකලාපකෙහි ආලිම්පෙසුං. ආළාහනෙ සබ්බරත්තිං ධම්මස්සවනං පවත්ති. අනුරුද්ධත්ථෙරො සබ්බගන්ධොදකෙන ථෙරස්ස චිතකං නිබ්බාපෙසි. චුන්දත්ථෙරො ධාතුයො පරිස්සාවනෙ පක්ඛිපිත්වා – ‘‘න දානි මයා ඉධෙව සක්කා ඨාතුං, මය්හං ජෙට්ඨභාතිකස්ස ධම්මසෙනාපතිසාරිපුත්තත්ථෙරස්ස පරිනිබ්බුතභාවං සම්මාසම්බුද්ධස්ස ආරොචෙස්සාමී’’ති ධාතුපරිස්සාවනං ථෙරස්ස ච පත්තචීවරං ගහෙත්වා සාවත්ථිං අගමාසි. එකට්ඨානෙපි ච ද්වෙ රත්තියො අවසිත්වා සබ්බත්ථ එකරත්තිවාසෙනෙව සාවත්ථිං පාපුණි. තමත්ථං දස්සෙතුං අථ ඛො චුන්දො සමණුද්දෙසොතිආදි වුත්තං. जनसमुदायाने देखील सात दिवस ‘साधुकीळन’ साजरा करून सर्व प्रकारच्या सुगंधी द्रव्यांनी चिता तयार केली. ती चिता नव्व्याण्णव हात उंच होती. स्थविरांचे शरीर चितेवर ठेवून त्यांनी वाळ्याच्या जुड्यांनी ती पेटवली. स्मशानभूमीत रात्रभर धम्मश्रवण सुरू राहिले. स्थवीर अनुरुद्धांनी सर्व प्रकारच्या सुगंधी जलाने स्थविरांची चिता शांत केली. स्थवीर चुंदांनी धातू जलगाळणीत ठेवून विचार केला – “आता मी येथे थांबू शकत नाही. माझे थोरले बंधू धर्मसेनापती स्थवीर सारिपुत्तांच्या परिनिर्वाणाची वार्ता मी सम्यक संबुद्धांना सांगेन.” असे म्हणून ते धातू असलेली जलगाळणी आणि स्थविरांचे पात्र व चीवर घेऊन सावत्थीकडे निघाले. वाटेत कोणत्याही एका ठिकाणी दोन रात्री न थांबता, प्रत्येक ठिकाणी केवळ एकच रात्र मुक्काम करत ते सावत्थीला पोहोचले. हाच अर्थ दर्शवण्यासाठी ‘अथ खो चुन्दो समणुद्देसो’ (त्यानंतर श्रमणोद्देश चुंद...) इत्यादी शब्द म्हटले गेले आहेत. තත්ථ යෙනායස්මා ආනන්දොති යෙන අත්තනො උපජ්ඣායො ධම්මභණ්ඩාගාරිකො ආයස්මා ආනන්දො, තෙනුපසඞ්කමි. කස්මා පනෙස උජුකං [Pg.254] සත්ථු සන්තිකං අගන්ත්වා ථෙරස්ස සන්තිකං අගමාසීති? සත්ථරි ච ථෙරෙ ච ගාරවෙන. ජෙතවනමහාවිහාරෙ පොක්ඛරණියං කිරස්ස න්හත්වා පච්චුත්තරිත්වා සුනිවත්ථසුපාරුතස්ස එතදහොසි – ‘‘බුද්ධා නාම මහාපාසාණච්ඡත්තං විය ගරුනො, ඵණකතසප්ප සීහබ්යග්ඝමත්තවරවාරණාදයො විය ච දුරාසදා, න සක්කා මයා උජුකමෙව සත්ථු සන්තිකං ගන්ත්වා කථෙතුං, කස්ස නු ඛො සන්තිකං ගන්තබ්බ’’න්ති. තතො චින්තෙසි – ‘‘උපජ්ඣායො මෙ ධම්මභණ්ඩාගාරිකො ජෙට්ඨභාතිකත්ථෙරස්ස උත්තමසහායො, තස්ස සන්තිකං ගන්ත්වා තං ආදාය සත්ථාරා සද්ධිං කථෙස්සාමී’’ති සත්ථරි චෙව ථෙරෙ ච ගාරවෙන උපසඞ්කමි. त्या वचनात ‘येनायस्मा आनन्दो’ (जिथे आयुष्यमान आनंद होते) याचा अर्थ असा की, जेथे त्यांचे स्वतःचे उपाध्याय आणि धम्मभांडागारिक आयुष्यमान आनंद होते, तेथे ते गेले. पण ते थेट शास्त्यांच्या जवळ न जाता स्थविरांच्या जवळ का गेले? शास्ते आणि स्थवीर या दोघांबद्दलच्या आदरामुळे. जेतवन महाविहारात एका पुष्करणीत स्नान करून, बाहेर येऊन, चीवर नीट परिधान केल्यावर त्यांच्या मनात असा विचार आला – “बुद्ध हे एखाद्या मोठ्या पाषाण-छत्रासारखे अत्यंत गंभीर असतात, आणि फणा काढलेला सर्प, सिंह, बिबट्या किंवा मदमस्त हत्ती यांच्याप्रमाणे त्यांच्याजवळ जाणे कठीण असते. मी थेट शास्त्यांच्या जवळ जाऊन बोलू शकत नाही. मग मी कोणाकडे जावे?” त्यानंतर त्यांनी विचार केला – “माझे उपाध्याय धम्मभांडागारिक आहेत आणि ते माझ्या थोरल्या बंधूंचे (स्थवीर सारिपुत्तांचे) परम मित्र आहेत. मी त्यांच्याकडे जाईन आणि त्यांना सोबत घेऊन शास्त्यांशी बोलेन.” अशा प्रकारे शास्ते आणि स्थवीर या दोघांबद्दलच्या आदरापोटी ते त्यांच्याकडे गेले. ඉදමස්ස පත්තචීවරන්ති ‘‘අයමස්ස පරිභොගපත්තො, ඉදං ධාතුපරිස්සාවන’’න්ති එවං එකෙකං ආචික්ඛි. පාළියං පන ‘‘ඉදමස්ස පත්තචීවර’’න්ති එත්තකමෙව වුත්තං. කථාපාභතන්ති කථාමූලං. මූලඤ්හි පාභතන්ති වුච්චති. යථාහ – “इदमस्स पत्तचीवरं” (हे त्यांचे पात्र आणि चीवर आहे) याचा अर्थ असा की, “हे त्यांचे वैयक्तिक पात्र आहे आणि हे धातू ठेवलेले परिस्रावन आहे,” अशा प्रकारे त्यांनी एकेक करून सांगितले. पाळीमध्ये मात्र “इदमस्स पत्तचीवरं” एवढेच म्हटले आहे. “कथापाभत” म्हणजे संभाषणाचा आरंभ (कथामूल). कारण भांडवलाला ‘पाभत’ असे म्हटले जाते. जसे की म्हटले आहे – ‘‘අප්පකෙනපි මෙධාවී, පාභතෙන විචක්ඛණො; සමුට්ඨාපෙති අත්තානං, අණුං අග්ගිංව සන්ධම’’න්ති. (ජා. 1.1.4); “ज्याप्रमाणे हुशार माणूस अगदी लहान अग्नीला फुंकर मारून मोठा करतो, त्याचप्रमाणे बुद्धिमान आणि चतुर मनुष्य अगदी थोड्या भांडवलाने स्वतःला स्थापित करतो (स्वतःची प्रगती करतो).” භගවන්තං දස්සනායාති භගවන්තං දස්සනත්ථාය. කිං පනිමිනා භගවා න දිට්ඨපුබ්බොති? නො න දිට්ඨපුබ්බො. අයඤ්හි ආයස්මා දිවා නව වාරෙ, රත්තිං නව වාරෙති එකාහං අට්ඨාරස වාරෙ උපට්ඨානමෙව ගච්ඡති. දිවසස්ස පන සතවාරං වා සහස්සවාරං වා ගන්තුකාමො සමානොපි න අකාරණා ගච්ඡති, එකං පඤ්හද්වාරං ගහෙත්වාව ගච්ඡති. සො තංදිවසං තෙන කථාපාභතෙන ගන්තුකාමො එවමාහ. ඉදමස්ස පත්තචීවරන්ති ථෙරොපි – ‘‘ඉදං තස්ස පත්තචීවරං, ඉදඤ්ච ධාතුපරිස්සාවන’’න්ති පාටියෙක්කංයෙව දස්සෙත්වා ආචික්ඛි. "भगवंतांच्या दर्शनासाठी" म्हणजे भगवंतांच्या दर्शनाच्या हेतूने. "पण काय या (आनंदाने) भगवंतांना पूर्वी पाहिले नव्हते का?" असे विचारल्यास, "नाही, असे नाही की त्यांनी पाहिले नव्हते (तर त्यांनी पाहिलेच होते)." कारण हे आयुष्यमान आनंद दिवसा नऊ वेळा आणि रात्री नऊ वेळा, अशा प्रकारे एका दिवसात अठरा वेळा केवळ उपस्थानासाठी (सेवेसाठी) भगवंतांकडे जात असत. दिवसातून शंभर वेळा किंवा हजार वेळा जाण्याची इच्छा असूनही ते कारणाशिवाय जात नसत, एखादा प्रश्न घेऊनच जात असत. त्या दिवशी त्या संभाषणाच्या निमित्ताने जाण्याची इच्छा असल्याने त्यांनी असे म्हटले. "हे त्यांचे पात्र आणि चीवर आहे" यावर स्थविरांनी (आनंदांनी) देखील - "हे त्यांचे पात्र आणि चीवर आहे, आणि हे धातू-परिस्रावण (पाणी गाळणी) आहे" असे वेगवेगळे दाखवून सांगितले. සත්ථා හත්ථං පසාරෙත්වා ධාතුපරිස්සාවනං ගහෙත්වා හත්ථතලෙ ඨපෙත්වා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘යො සො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු පුරිමදිවසෙ අනෙකානි පාටිහාරියසතානි කත්වා පරිනිබ්බානං අනුජානාපෙසි, තස්ස ඉදානි ඉමා සඞ්ඛවණ්ණසන්නිභා ධාතුයොව පඤ්ඤායන්ති, කප්පසතසහස්සාධිකං අසඞ්ඛ්යෙය්යං පූරිතපාරමී එස, භික්ඛවෙ, භික්ඛු, මයා පවත්තිතං ධම්මචක්කං [Pg.255] අනුපවත්තකො එස භික්ඛු, පටිලද්ධදුතියආසනො එස භික්ඛු, පූරිතසාවකසන්නිපාතො එස භික්ඛු, ඨපෙත්වා මං දසසු චක්කවාළසහස්සෙසු පඤ්ඤාය අසදිසො එස භික්ඛු, මහාපඤ්ඤො එස භික්ඛු, පුථුපඤ්ඤො හාසපඤ්ඤො ජවනපඤ්ඤො තික්ඛපඤ්ඤො නිබ්බෙධිකපඤ්ඤො එස භික්ඛු, අප්පිච්ඡො එස භික්ඛු, සන්තුට්ඨො පවිවිත්තො අසංසට්ඨො ආරද්ධවීරියො චොදකො පාපගරහී එස භික්ඛු, පඤ්ච ජාතිසතානි පටිලද්ධමහාසම්පත්තියො පහාය පබ්බජිතො එස භික්ඛු, මම සාසනෙ පථවීසමඛන්තිකො එස භික්ඛු, ඡින්නවිසාණඋසභසදිසො එස භික්ඛු, චණ්ඩාලපුත්තසදිසනීචචිත්තො එස භික්ඛු. පස්සථ, භික්ඛවෙ, මහාපඤ්ඤස්ස ධාතුයො, පස්සථ, භික්ඛවෙ, පුථුපඤ්ඤස්ස හාසපඤ්ඤස්ස ජවනපඤ්ඤස්ස තික්ඛපඤ්ඤස්ස නිබ්බෙධිකපඤ්ඤස්ස අප්පිච්ඡස්ස සන්තුට්ඨස්ස පවිවිත්තස්ස අසංසට්ඨස්ස ආරද්ධවීරියස්ස, චොදකස්ස, පස්සථ, භික්ඛවෙ, පාපගරහිස්ස ධාතුයොති. शास्त्यांनी आपला हात पुढे करून, धातू-परिस्रावण हातात घेतले आणि ते आपल्या तळहातावर ठेवून भिक्खूंना संबोधित केले – "भिक्खूंनो, ज्या भिक्खूने आदल्या दिवशी अनेक शेकडो प्रातिहार्ये करून परिनिब्बानाची अनुमती घेतली होती, आता त्यांचे हे शंखाच्या रंगासारखे पांढरे शुभ्र धातू (अस्थी-अवशेष) दिसत आहेत. भिक्खूंनो, हा तो भिक्खू आहे ज्याने एक असंख्येय आणि एक लाख कप्पांपेक्षा अधिक काळ पारमिता पूर्ण केल्या आहेत. हा तो भिक्खू आहे ज्याने माझ्याद्वारे प्रवर्तित केलेले धम्मचक्क अनुप्रवर्तित केले. हा तो भिक्खू आहे ज्याने द्वितीय आसन प्राप्त केले होते. हा तो भिक्खू आहे ज्याने श्रावक-संघाची सभा परिपूर्ण केली. हा तो भिक्खू आहे जो मला सोडून दहा हजार चक्रवाळांमध्ये प्रज्ञेच्या बाबतीत अतुलनीय आहे. हा भिक्खू महाप्रज्ञ आहे, पृथुप्रज्ञ, हास्यप्रज्ञ, जवनप्रज्ञ, तीक्ष्णप्रज्ञ आणि निर्वेधिकप्रज्ञ आहे. हा भिक्खू अल्पेच्छ, संतुष्ट, प्रविविक्त, असंसृष्ट, आरब्धवीर्य, चोदक आणि पापाची निंदा करणारा आहे. हा भिक्खू पाचशे जन्मांमध्ये प्राप्त झालेली महासंपत्ती सोडून प्रव्रजित झालेला आहे. हा भिक्खू माझ्या शासनात पृथ्वीसारखा क्षमाशील आहे. हा भिक्खू शिंगे तुटलेल्या बैलासारखा आहे. हा भिक्खू चांडाळ पुत्रासारखा नम्र चित्त असलेला आहे. भिक्खूंनो, पहा या महाप्रज्ञाच्या धातूंना; भिक्खूंनो, पहा या पृथुप्रज्ञ, हास्यप्रज्ञ, जवनप्रज्ञ, तीक्ष्णप्रज्ञ, निर्वेधिकप्रज्ञ, अल्पेच्छ, संतुष्ट, प्रविविक्त, असंसृष्ट, आरब्धवीर्य, चोदक आणि पापाची निंदा करणाऱ्याच्या धातूंना." ‘‘යො පබ්බජී ජාතිසතානි පඤ්ච,පහාය කාමානි මනොරමානි; තං වීතරාගං සුසමාහිතින්ද්රියං,පරිනිබ්බුතං වන්දථ සාරිපුත්තං. "ज्यांनी पाचशे जन्मांमध्ये मनोहारी कामभोगांचा त्याग करून प्रव्रज्या घेतली; त्या वीतराग, सुसमाहित इंद्रिये असलेल्या आणि परिनिर्वृत झालेल्या सारिपुत्तांना वंदन करा." ‘‘ඛන්තිබලො පථවිසමො න කුප්පති,න චාපි චිත්තස්ස වසෙන වත්තති; අනුකම්පකො කාරුණිකො ච නිබ්බුතො,පරිනිබ්බුතං වන්දථ සාරිපුත්තං. "जे क्षमाशील, पृथ्वीसारखे सहनशील आहेत आणि कधीही क्रोधित होत नाहीत, जे आपल्या चित्ताच्या अधीन होऊन वागत नाहीत; जे अनुकंपक, कारुणिक आणि शांत आहेत, त्या परिनिर्वृत झालेल्या सारिपुत्तांना वंदन करा." ‘‘චණ්ඩාලපුත්තො යථා නගරං පවිට්ඨො,නීචමනො චරති කළොපිහත්ථො; තථා අයං විහරති සාරිපුත්තො,පරිනිබ්බුතං වන්දථ සාරිපුත්තං. "ज्याप्रमाणे एखादा चांडाळ पुत्र नगरात प्रवेश केल्यावर हातात भिक्षेचे पात्र घेऊन अत्यंत नम्र भावाने वावरतो; त्याचप्रमाणे हे सारिपुत्त विहरत असत. त्या परिनिर्वृत झालेल्या सारिपुत्तांना वंदन करा." ‘‘උසභො යථා ඡින්නවිසාණකො,අහෙඨයන්තො චරති පුරන්තරෙ වනෙ; තථා අයං විහරති සාරිපුත්තො,පරිනිබ්බුතං වන්දථ සාරිපුත්ත’’න්ති. "ज्याप्रमाणे शिंगे तुटलेला बैल कोणालाही त्रास न देता नगरात किंवा वनात वावरतो; त्याचप्रमाणे हे सारिपुत्त विहरत असत. त्या परिनिर्वृत झालेल्या सारिपुत्तांना वंदन करा." ඉති [Pg.256] භගවා පඤ්චහි ගාථාසතෙහි ථෙරස්ස වණ්ණං කථෙසි. යථා යථා භගවා ථෙරස්ස වණ්ණං කථෙසි, තථා තථා ආනන්දත්ථෙරො සන්ධාරෙතුං න සක්කොති, බිළාරමුඛෙ පක්ඛන්තකුක්කුටො විය පවෙධති. තෙනාහ අපිච මෙ, භන්තෙ, මධුරකජාතො විය කායොති සබ්බං විත්ථාරෙතබ්බං. තත්ථ මධුරකජාතොතිආදීනං අත්ථො වුත්තොයෙව. ඉධ පන ධම්මාති උද්දෙසපරිපුච්ඡාධම්මා අධිප්පෙතා. තස්ස හි උද්දෙසපරිපුච්ඡාධම්මෙ අගහිතෙ වා ගහෙතුං, ගහිතෙ වා සජ්ඣායං කාතුං චිත්තං න පවත්තති. අථ සත්ථා පඤ්චපසාදවිචිත්රානි අක්ඛීනි උම්මීලෙත්වා ථෙරං ඔලොකෙන්තො ‘‘අස්සාසෙස්සාමි න’’න්ති අස්සාසෙන්තො කිං නු ඛො තෙ, ආනන්ද, සාරිපුත්තොතිආදිමාහ. अशा प्रकारे भगवंतांनी पाचशे गाथांद्वारे स्थविरांच्या गुणांचे वर्णन केले. जसजसे भगवंत स्थविरांच्या गुणांचे वर्णन करत होते, तसतसे स्थविर आनंद स्वतःला सावरू शकले नाहीत आणि मांजराच्या तोंडात सापडलेल्या कोंबडीच्या पिल्लासारखे थरथर कापू लागले. म्हणूनच त्यांनी म्हटले – "भंते, माझे शरीर जणू जड झाले आहे..." हे सर्व सविस्तर समजून घ्यावे. तेथे 'मधुरकजातो' इत्यादी शब्दांचा अर्थ आधीच सांगितला आहे. परंतु येथे 'धम्मा' या शब्दाने उद्देश-परिपृच्छा-धम्म अभिप्रेत आहे. कारण, न शिकलेला धम्म शिकण्यासाठी किंवा शिकलेल्या धम्माचे सज्झाय करण्यासाठी त्यांचे चित्त प्रवृत्त होत नव्हते. तेव्हा शास्त्यांनी पाच प्रकारच्या प्रसन्नतेने युक्त असलेले आपले नेत्र उघडून स्थविरांकडे पाहत, "मी यांना धीर देईन" अशा विचाराने त्यांना सांत्वन देत विचारले – "आनंदा, काय सारिपुत्तांनी [तुझा शीलस्कंध... इत्यादी हिरावून घेतला आहे का]?" තත්ථ සීලක්ඛන්ධන්ති ලොකියලොකුත්තරසීලං. සමාධිපඤ්ඤාසුපි එසෙව නයො. විමුත්ති පන ලොකුත්තරාව. විමුත්තිඤාණදස්සනං පච්චවෙක්ඛණඤාණං, තං ලොකියමෙව. ඔවාදකොති ඔවාදදායකො. ඔතිණ්ණොති ඔතිණ්ණෙසු වත්ථූසු නානප්පකාරෙන ඔතරණසීලො. විඤ්ඤාපකොති ධම්මකථාකාලෙ අත්ථඤ්ච කාරණඤ්ච විඤ්ඤාපෙතා. සන්දස්සකොති ඛන්ධධාතුආයතනවසෙන තෙසං තෙසං ධම්මානං දස්සෙතා. සමාදපකොති ‘‘ඉදඤ්චිදඤ්ච ගණ්හථා’’ති එවං ගණ්හාපකො. සමුත්තෙජකොති අබ්භුස්සාහකො. සම්පහංසකොති පටිලද්ධගුණෙහි මොදාපකො ජොතාපකො. तेथे 'शीलस्कंध' म्हणजे लौकिक आणि लोकोत्तर शील. समाधी आणि प्रज्ञेच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. परंतु 'विमुक्ती' ही केवळ लोकोत्तरच असते. 'विमुक्ती-ज्ञानदर्शन' म्हणजे प्रत्यवेक्षण-ज्ञान, जे केवळ लौकिकच असते. 'ओवादको' म्हणजे उपदेश देणारे. 'ओतिण्णो' म्हणजे विविध विषयांमध्ये वेगवेगळ्या प्रकारे उतरणारे. 'विञ्ञापको' म्हणजे धम्मचर्चेच्या वेळी अर्थ आणि कारण समजावून सांगणारे. 'संदस्सको' म्हणजे स्कंध, धातू आणि आयतनांच्या माध्यमातून त्या-त्या धम्मांचे दर्शन घडवणारे. 'समादपको' म्हणजे "हे आणि हे ग्रहण करा" असे सांगून ग्रहण करायला लावणारे. 'समुत्तेजको' म्हणजे अत्यंत उत्साहित करणारे. 'संपहंसको' म्हणजे प्राप्त झालेल्या गुणांमुळे आनंदित करणारे आणि प्रकाशित करणारे. අකිලාසු ධම්මදෙසනායාති ධම්මදෙසනං ආරභිත්වා ‘‘සීසං වා මෙ රුජ්ජති, හදයං වා කුච්ඡි වා පිට්ඨි වා’’ති එවං ඔසක්කනාකාරවිරහිතො නික්කිලාසු විසාරදො එකස්සාපි ද්වින්නම්පි සීහවෙගෙනෙව පක්ඛන්දති. අනුග්ගාහකො සබ්රහ්මචාරීනන්ති පදස්ස අත්ථො ඛන්ධකවග්ගෙ විත්ථාරිතොව. ධම්මොජං ධම්මභොගන්ති උභයෙනපි ධම්මපරිභොගොව කථිතො. ධම්මානුග්ගහන්ති ධම්මෙන අනුග්ගහණං. "धम्मदेशनेत थकवा न जाणवणारे" म्हणजे धम्मदेशना सुरू केल्यावर "माझे डोके दुखत आहे, किंवा हृदय, किंवा पोट, किंवा पाठ दुखत आहे" असे म्हणून मागे न हटणारे, थकवा नसलेले, विशारद असून एका किंवा दोघांनाही सिंहाच्या वेगाने धम्म सांगणारे. 'अनुग्गाहको सब्रह्मचारीनं' या पदाचा अर्थ खंधक-वग्गात सविस्तर सांगितला आहे. 'धम्मोजं' आणि 'धम्मभोगं' या दोन्ही शब्दांनी धम्माचा उपभोग घेणेच सांगितले आहे. 'धम्मानुग्गह' म्हणजे धम्माद्वारे अनुग्रह करणे. සත්ථා ‘‘අතිවිය අයං භික්ඛු කිලමතී’’ති පුන තං අස්සාසෙන්තො නනු තං, ආනන්ද, මයාතිආදිමාහ. තත්ථ පියෙහි මනාපෙහීති මාතාපිතාභාතාභගිනීආදිකෙහි ජාතියා නානාභාවො, මරණෙන විනාභාවො, භවෙන අඤ්ඤථාභාවො. තං කුතෙත්ථ, ආනන්ද, ලබ්භාති තන්ති [Pg.257] තස්මා. යස්මා සබ්බෙහි පියෙහි මනාපෙහි නානාභාවො, තස්මා දස පාරමියො පූරෙත්වාපි සම්බොධිං පත්වාපි ධම්මචක්කං පවත්තෙත්වාපි යමකපාටිහාරියං දස්සෙත්වාපි දෙවොරොහනං කත්වාපි යං තං ජාතං භූතං සඞ්ඛතං පලොකධම්මං, තං තථාගතස්සාපි සරීරං මා පලුජ්ජීති නෙතං ඨානං විජ්ජති, රොදන්තෙනපි කන්දන්තෙනපි න සක්කා තං කාරණං ලද්ධුන්ති. සො පලුජ්ජෙය්යාති සො භිජ්ජෙය්ය. शास्त्यांनी "हा भिक्खू अत्यंत थकला आहे" असा विचार करून, पुन्हा त्यांना धीर देत "आनंदा, मी तुला आधीच सांगितले नव्हते का..." इत्यादी म्हटले. तेथे 'प्रियेहि मनापेहि' म्हणजे माता, पिता, भाऊ, बहीण इत्यादी प्रिय व मनपसंत व्यक्तींपासून जन्माने वेगळे होणे, मृत्यूने ताटातूट होणे आणि अस्तित्वाच्या बदलामुळे अन्य अवस्था प्राप्त होणे. "आनंदा, ते येथे कसे मिळू शकेल?" यात 'तं' म्हणजे 'त्यामुळे'. ज्याअर्थी सर्व प्रिय आणि मनपसंत गोष्टींपासून ताटातूट होणे निश्चित आहे, त्याअर्थी दहा पारमिता पूर्ण करूनही, संबोधी प्राप्त करूनही, धम्मचक्क प्रवर्तित करूनही, यमक-प्रातिहार्य दाखवूनही आणि देवलोकातून अवतरण करूनही, जे काही उत्पन्न झाले आहे, अस्तित्वात आले आहे, संस्कृत आहे आणि नाशवंत स्वभावाचे आहे, त्या तथागतांच्या शरीराच्या बाबतीतही "ते नष्ट होऊ नये" अशी इच्छा करणे शक्य नाही. रडून किंवा आक्रोश करूनही ती गोष्ट प्राप्त करणे शक्य नाही. 'सो पलुज्जेय्य' म्हणजे 'ते तुटून नष्ट व्हावे' (जसे झाडाची मोठी फांदी तुटते). එවමෙව ඛොති එත්ථ යොජනසතුබ්බෙධො මහාජම්බුරුක්ඛො විය භික්ඛුසඞ්ඝො තස්ස දක්ඛිණදිසං ගතො පඤ්ඤාසයොජනිකො මහාඛන්ධො විය ධම්මසෙනාපති. තස්මිං මහාඛන්ධෙ භින්නෙ තතො පට්ඨාය අනුපුබ්බෙන වඩ්ඪිත්වා පුප්ඵඵලාදීහි තං ඨානං පූරෙතුං සමත්ථස්ස අඤ්ඤස්ස ඛන්ධස්ස අභාවො විය ථෙරෙ පරිනිබ්බුතෙ සොළසන්නං පඤ්ඤානං මත්ථකං පත්තස්ස අඤ්ඤස්ස දක්ඛිණාසනෙ නිසීදනසමත්ථස්ස සාරිපුත්තසදිසස්ස භික්ඛුනො අභාවො. තාය පරිභින්නාය සො රුක්ඛො විය භික්ඛුසඞ්ඝො ඛන්ධොත්වෙව ජාතොති වෙදිතබ්බො. තස්මාති යස්මා සබ්බං සඞ්ඛතං පලොකධම්මං, තං මා පලුජ්ජීති න සක්කා ලද්ධුං, තස්මා. त्याचप्रमाणे, येथे शंभर योजन उंच असलेल्या जांभळाच्या मोठ्या वृक्षाप्रमाणे भिक्खू संघ समजावा. त्या वृक्षाच्या दक्षिण दिशेला गेलेल्या पन्नास योजन लांब असलेल्या मोठ्या फांदीप्रमाणे धम्मसेनापती (सारिपुत्त थेर) समजावे. ती मोठी फांदी तुटली असता, तिथून पुढे अनुक्रमे वाढून फुले व फळे इत्यादींनी ती जागा भरून काढण्यास समर्थ असणाऱ्या दुसऱ्या फांदीचा जसा अभाव असतो, तसेच थेर (सारिपुत्त) परिनिर्वाण पावले असता, सोळा प्रकारच्या प्रज्ञांच्या शिखरावर पोहोचलेल्या आणि उजव्या आसनावर बसण्यास समर्थ असणाऱ्या सारिपुत्तांसारख्या दुसऱ्या भिक्खूचा अभाव जाणावा. ती मोठी फांदी तुटली असता तो वृक्ष जसा खंडित (तुटलेला) होतो, त्याचप्रमाणे सारिपुत्त थेर परिनिर्वाण पावले असता भिक्खू संघ खंडित झाला आहे, असे जाणावे. 'तस्मा' (म्हणून) म्हणजे ज्या कारणाने सर्व संस्कृत (संखत) धर्म नाशवंत स्वभावाचे आहेत, 'ते नष्ट होऊ नयेत' अशी इच्छा पूर्ण करणे शक्य नाही, म्हणून. 4-5. උක්කචෙලසුත්තාදිවණ්ණනා ४-५. उक्कचेल सुत्त इत्यादींचे वर्णन 380-381. චතුත්ථෙ අචිරපරිනිබ්බුතෙසු සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානෙසූති නචිරපරිනිබ්බුතෙසු ද්වීසු අග්ගසාවකෙසු. තෙසඤ්හි ධම්මසෙනාපති කත්තිකමාසපුණ්ණමාය පරිනිබ්බුතො, මහාමොග්ගල්ලානො තතො අඩ්ඪමාසං අතික්කම්ම අමාවසුපොසථෙ. සත්ථා ද්වීසු අග්ගසාවකෙසු පරිනිබ්බුතෙසු මහාභික්ඛුසඞ්ඝපරිවාරො මහාමණ්ඩලෙ චාරිකං චරමානො අනුපුබ්බෙන උක්කචෙලනගරං පත්වා තත්ථ පිණ්ඩාය චරිත්වා ගඞ්ගාපිට්ඨෙ රජතපට්ටවණ්ණවාලිකාපුලිනෙ විහාසි. තෙන වුත්තං ‘‘අචිරපරිනිබ්බුතෙසු සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානෙසූ’’ති. යෙ මහන්තතරා ඛන්ධා තෙ පලුජ්ජෙය්යුන්ති ඉධාපි යොජනසතුබ්බෙධො මහාජම්බුරුක්ඛො විය භික්ඛුසඞ්ඝො, තස්ස දක්ඛිණතො ච උත්තරතො ච ගතා පණ්ණාසයොජනිකා ද්වෙ මහාඛන්ධා විය ද්වෙ අග්ගසාවකාති. සෙසං පුරිමනයෙනෙව යොජෙතබ්බං. පඤ්චමෙ දිට්ඨීති කම්මස්සකදිට්ඨි. ३८०-३८१. चौथ्या सुत्तात, 'अचिरपरिनिब्बुतेसु सारिपुत्तमोग्गल्लानेसु' म्हणजे दोन्ही अग्रश्रावक परिनिर्वाण पावून फार काळ झाला नसताना. कारण त्यांच्यापैकी धम्मसेनापती (सारिपुत्त) कार्तिकी पौर्णिमेला परिनिर्वाण पावले आणि महामोग्गल्लान त्यानंतर अर्धा महिना उलटून गेल्यावर अमावस्येच्या उपोसथ दिवशी परिनिर्वाण पावले. दोन्ही अग्रश्रावक परिनिर्वाण पावले असता, शास्ता (भगवान बुद्ध) मोठ्या भिक्खू संघाच्या परिवारासह महामंडळात चारिका करत असताना अनुक्रमे उक्कचेल नगरात पोहोचले आणि तिथे पिंडपातासाठी चारिका करून गंगेच्या काठावरील चांदीच्या पटासारख्या पांढऱ्या वाळूच्या पुळणीवर (किनाऱ्यावर) राहिले. म्हणून 'अचिरपरिनिब्बुतेसु सारिपुत्तमोग्गल्लानेसु' असे म्हटले आहे. 'ye mahantatarā khandhā te palujjeyyuṃ' (ज्या मोठ्या फांद्या आहेत त्या नष्ट व्हाव्यात) या पाठात देखील शंभर योजन उंच असलेल्या जांभळाच्या मोठ्या वृक्षाप्रमाणे भिक्खू संघ समजावा आणि त्याच्या दक्षिण व उत्तर दिशेला गेलेल्या पन्नास योजन लांब असलेल्या दोन मोठ्या फांद्यांप्रमाणे दोन अग्रश्रावक समजावेत. उर्वरित भाग पूर्वीच्या पद्धतीनुसारच जुळवून घ्यावा. पाचव्या सुत्तात, 'दिट्ठि' म्हणजे कम्मस्सकता दृष्टी (कर्म हेच स्वतःचे धन आहे ही सम्यक दृष्टी). 6. උත්තියසුත්තවණ්ණනා ६. उत्तिय सुत्ताचे वर्णन 382. ඡට්ඨෙ [Pg.258] මච්චුධෙය්යස්ස පාරන්ති තෙභූමකවට්ටස්ස පාරභූතං, නිබ්බානං. ३८२. सहाव्या सुत्तात, 'मच्चुधेय्यस्स पारं' म्हणजे त्रिभूमिक संसाराच्या (मृत्यूच्या राज्याच्या) पलीकडचे असलेले निर्वाण. 8. බ්රහ්මසුත්තවණ්ණනා ८. ब्रह्म सुत्ताचे वर्णन 384. අට්ඨමෙ කායෙ වා භික්ඛූති තස්මිං කාලෙ භික්ඛුයෙව නත්ථි, එවං සන්තෙපි යො සතිපට්ඨානෙ භාවෙති, සො කිලෙසභින්දනෙන භික්ඛුයෙවාති දස්සෙන්තො එවමාහ. එකායනන්ති එකමග්ගං. ජාතික්ඛයන්තදස්සීති ජාතියා ඛයොති ච අන්තොති ච නිබ්බානං, තං පස්සතීති අත්ථො. මග්ගං පජානාතීති එකායනසඞ්ඛාතං එකමග්ගභූතං මග්ගං පජානාති. එකායනමග්ගො වුච්චති පුබ්බභාගසතිපට්ඨානමග්ගො, තං පජානාතීති අත්ථො. ३८४. आठव्या सुत्तात, 'काये वा भिक्खू' म्हणजे त्या (प्रथम अभिसंबोधीच्या) काळात भिक्खूच नव्हते, तरीही जो सतिपट्ठानाची भावना करतो, तो क्लेशांचा नाश करत असल्यामुळे भिक्खूच आहे, हे दर्शवण्यासाठी असे म्हटले आहे. 'एकायनं' म्हणजे एकमेव मार्ग. 'जातिक्खयन्तदस्सी' म्हणजे जातीचा (जन्माचा) क्षय आणि संसाराचा अंत म्हणजेच निर्वाण होय, ते जो पाहतो तो, असा अर्थ आहे. 'मग्गं पजानाति' म्हणजे एकायन संज्ञक असलेला, एकमेव मार्ग असलेला मार्ग जाणतो. पूर्वभागातील सतिपट्ठान मार्गाला 'एकायन मार्ग' म्हटले जाते, तो मार्ग जाणतो, असा अर्थ आहे. 9. සෙදකසුත්තවණ්ණනා ९. सेदक सुत्ताचे वर्णन 385. නවමෙ සුම්භෙසූති එවංනාමකෙ ජනපදෙ. මෙදකථාලිකාති එවං ඉත්ථිලිඞ්ගවසෙන ලද්ධනාමං. මමං රක්ඛ, අහං තං රක්ඛිස්සාමීති එත්ථ අයං තස්ස ලද්ධි – ආචරියො උක්ඛිත්තවංසං සුග්ගහිතං අගණ්හන්තො, අන්තෙවාසිකෙන පක්ඛන්තපක්ඛන්තදිසං අගච්ඡන්තො, සබ්බකාලඤ්ච වංසග්ගං අනුල්ලොකෙන්තො අන්තෙවාසිකං න රක්ඛති නාම, එවං අරක්ඛිතො අන්තෙවාසිකො පතිත්වා චුණ්ණවිචුණ්ණං හොති. වංසං පන සුග්ගහිතං ගණ්හන්තො, තෙන පක්ඛන්තපක්ඛන්තදිසං ගච්ඡන්තො, සබ්බකාලඤ්ච වංසග්ගං උල්ලොකෙන්තො තං රක්ඛති නාම. අන්තෙවාසිකොපි ඉතො චිතො ච පක්ඛන්දිත්වා මිගො විය කීළන්තො ආචරියං න රක්ඛති නාම. එවඤ්හි සති තිඛිණවංසකොටි ආචරියස්ස ගලවාටකෙ වා නලාටෙ වා ඨපිතා ඨිතට්ඨානං භින්දිත්වා ගච්ඡෙය්ය. ආචාරසම්පන්නතාය පන යතො වංසො නමති, තතො අනාමෙන්තො තං ආකඩ්ඪෙන්තො විය එකතොභාගියං කත්වා වාතූපථම්භං ගාහාපෙත්වා සතිං සූපට්ඨිතං කත්වා නිච්චලොව නිසීදන්තො ආචරියං රක්ඛති නාමාති. ३८५. नवव्या सुत्तात, 'सुम्भेसु' म्हणजे या नावाच्या जनपदात. 'मेदकथालिका' हे स्त्रीलिंगी रूपाने मिळालेले (शिष्याचे) नाव आहे. 'माझे रक्षण कर, मी तुझे रक्षण करीन' यात हे त्या आचार्यांचे मत आहे – आचार्य वर उचललेला बांबू नीट घट्ट न पकडता, शिष्य ज्या ज्या दिशेला धावतो तिथे त्याच्यासोबत न जाता आणि सर्व वेळ बांबूच्या टोकाकडे न पाहता शिष्याचे रक्षण करत नाहीत; अशा प्रकारे रक्षण न केलेला शिष्य खाली पडून चक्काचूर होतो. परंतु बांबू नीट घट्ट पकडून, तो ज्या ज्या दिशेला धावतो तिथे त्याच्यासोबत जात आणि सर्व वेळ बांबूच्या टोकाकडे पाहत राहिल्यास तो त्याचे रक्षण करतो. शिष्य देखील इकडे तिकडे उड्या मारून हरणासारखा खेळत राहिला, तर तो आचार्यांचे रक्षण करत नाही. कारण असे झाले असता, आचार्यांच्या गळ्यावर किंवा कपाळावर ठेवलेले बांबूचे तीक्ष्ण टोक ती जागा भेदून आत जाईल. परंतु योग्य कौशल्याने, ज्या बाजूला बांबू झुकतो त्या बाजूला न झुकू देता, त्याला मागे ओढल्यासारखे करून एका बाजूला संतुलित ठेवून, वाऱ्याचा रोध घेऊन, स्मृती चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित करून निश्चलपणे बसून राहिल्यास तो आचार्यांचे रक्षण करतो. ත්වං ආචරිය අත්තානං රක්ඛ, අහං අත්තානං රක්ඛිස්සාමීති එත්ථ අයමධිප්පායො – ආචරියො වංසං සුග්ගහිතං ගණ්හන්තො, අන්තෙවාසිකෙන පක්ඛන්තපක්ඛන්තදිසංගච්ඡන්තො[Pg.259], සබ්බකාලඤ්ච වංසග්ගං උල්ලොකෙන්තො, අත්තානමෙව රක්ඛති, න අන්තෙවාසිකං. අන්තෙවාසිකොපි කායම්පි එකතොභාගියං කත්වා වාතූපථම්භං ගාහාපෙත්වා සතිං සූපට්ඨිතං කත්වා නිච්චලොව නිසීදමානො අත්තානංයෙව රක්ඛති නාම, න ආචරියං. 'हे आचार्य, तुम्ही स्वतःचे रक्षण करा, मी स्वतःचे रक्षण करीन' यात हा शिष्याचा अभिप्राय आहे – आचार्य बांबू नीट घट्ट पकडून, शिष्य ज्या ज्या दिशेला धावतो तिथे त्याच्यासोबत जात आणि सर्व वेळ बांबूच्या टोकाकडे पाहत राहिल्यास ते स्वतःचेच रक्षण करतात, शिष्याचे नाही. शिष्य देखील शरीराला एका बाजूला संतुलित करून, वाऱ्याचा रोध घेऊन, स्मृती चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित करून निश्चलपणे बसून राहिला, तर तो स्वतःचेच रक्षण करतो, आचार्यांचे नाही. සො තත්ථ ඤායොති යං මෙදකථාලිකා ආහ. සො තත්ථ ඤායො, සො උපායො, තං කාරණන්ති අත්ථො. සතිපට්ඨානං සෙවිතබ්බන්ති චතුබ්බිධං සතිපට්ඨානං සෙවිතබ්බං. ආසෙවනායාති කම්මට්ඨානාසෙවනාය. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, අත්තානං රක්ඛන්තො පරං රක්ඛතීති යො භික්ඛු කම්මාරාමතාදීනි පහාය රත්තිට්ඨානදිවාට්ඨානෙසු මූලකම්මට්ඨානං ආසෙවන්තො භාවෙන්තො අරහත්තං පාපුණාති, අථ නං පරො දිස්වා – ‘‘භද්දකො වතායං, භික්ඛු, සම්මාපටිපන්නො’’ති තස්මිං චිත්තං පසාදෙත්වා සග්ගපරායණො හොති. අයං අත්තානං රක්ඛන්තො පරං රක්ඛති නාම. 'सो तत्थ ञायो' (तो तिथे योग्य मार्ग आहे) म्हणजे जे मेदकथालिकाने (शिष्याने) म्हटले. तो तिथे योग्य मार्ग आहे, तोच उपाय आहे, तेच योग्य कारण आहे, असा अर्थ आहे. 'सतिपट्ठानं सेवितब्बं' म्हणजे चार प्रकारच्या सतिपट्ठानाचे सेवन (अभ्यास) करावे. 'आसेवनाय' म्हणजे कर्मस्थानाचा (कम्मट्ठानाचा) वारंवार अभ्यास करण्याने. 'अशा प्रकारे, भिक्खूंनो, स्वतःचे रक्षण करणारा दुसऱ्याचे रक्षण करतो' म्हणजे जो भिक्खू कामातील आसक्ती इत्यादींचा त्याग करून, रात्रीच्या व दिवसाच्या निवासस्थानी मूळ कर्मस्थानाचा अभ्यास व भावना करत अर्हत्त्व पदाला प्राप्त होतो; नंतर त्याला दुसरा कोणी पाहून 'हा भिक्खू खरोखरच चांगला आहे, योग्य मार्गाने आचरण करणारा आहे' असे त्याच्याविषयी मनात श्रद्धा निर्माण करून स्वर्गलोकाला प्राप्त होतो. हा स्वतःचे रक्षण करत दुसऱ्याचे रक्षण करतो, असे म्हटले जाते. ඛන්තියාති අධිවාසනඛන්තියා. අවිහිංසායාති සපුබ්බභාගාය කරුණාය. මෙත්තචිත්තතායාති සපුබ්බභාගාය මෙත්තාය. අනුදයතායාති අනුවඩ්ඪියා, සපුබ්බභාගාය මුදිතායාති අත්ථො. පරං රක්ඛන්තො අත්තානං රක්ඛතීති එත්ථ යො භික්ඛු රත්තිට්ඨානදිවාට්ඨානං ගතො තීසු බ්රහ්මවිහාරෙසු තිකචතුක්කජ්ඣානානි නිබ්බත්තෙත්වා ඣානං පාදකං කත්වා සඞ්ඛාරෙ සම්මසන්තො විපස්සනං වඩ්ඪෙත්වා අරහත්තං පාපුණාති. අයං පරං රක්ඛන්තො අත්තානං රක්ඛති නාමාති වෙදිතබ්බො. 'खन्तिया' म्हणजे सहनशीलतेच्या क्षमेने (अधिवासन क्षमेने). 'अविहिंसाय' म्हणजे पूर्वभागासह असलेल्या करुणेने. 'मेत्तचित्तताय' म्हणजे पूर्वभागासह असलेल्या मैत्रीने. 'अनुदयताय' म्हणजे अनुवृद्धीने, पूर्वभागासह असलेल्या मुदितेने, असा अर्थ आहे. 'दुसऱ्याचे रक्षण करणारा स्वतःचे रक्षण करतो' यात जो भिक्खू रात्रीच्या व दिवसाच्या निवासस्थानी जाऊन, तीन ब्रह्मविहारांमध्ये त्रिक आणि चतुष्क ध्यानांची उत्पत्ती करून, ध्यानाला आधार बनवून, संस्कारांचे चिंतन करत विपश्यना वाढवून अर्हत्त्व पदाला प्राप्त होतो; हा दुसऱ्याचे रक्षण करत स्वतःचे रक्षण करतो, असे जाणावे. 10. ජනපදකල්යාණීසුත්තවණ්ණනා १०. जनपदकल्याण सुत्ताचे वर्णन 386. දසමෙ ජනපදකල්යාණීති ජනපදම්හි කල්යාණී උත්තමා ඡසරීරදොසරහිතා පඤ්චකල්යාණසමන්නාගතා. සා හි යස්මා නාතිදීඝා නාතිරස්සා, නාතිකිසා නාතිථූලා, නාතිකාළා නාච්චොදාතා, අතික්කන්තා, මානුසවණ්ණං අප්පත්තා දිබ්බවණ්ණං, තස්මා ඡසරීරදොසරහිතා. ඡවිකල්යාණං, මංසකල්යාණං, න්හාරුකල්යාණං, අට්ඨිකල්යාණං, වයකල්යාණන්ති ඉමෙහි පන කල්යාණෙහි සමන්නාගතත්තා පඤ්චකල්යාණෙහි සමන්නාගතා නාම. තස්සා හි ආගන්තුකොභාසකිච්චං නත්ථි, අත්තනො සරීරොභාසෙනෙව ද්වාදසහත්ථට්ඨානෙ ආලොකං කරොති, පියඞ්ගුසාමා වා හොති, සුවණ්ණසාමා වා, අයමස්සා ඡවිකල්යාණතා. චත්තාරො පනස්සා හත්ථපාදා [Pg.260] මුඛපරියොසානඤ්ච ලාඛාරසපරිකම්මකතං විය රත්තපවාළරත්තකම්බලසදිසං හොති, අයමස්සා මංසකල්යාණතා. වීසති පන නඛපත්තානි මංසතො අමුත්තට්ඨානෙ ලාඛාරසපූරිතානි විය, මුත්තට්ඨානෙ ඛීරධාරාසදිසානි, හොන්ති අයමස්සා න්හාරුකල්යාණකතා. ද්වත්තිංස දන්තා සුඵුසිතා සුධොතවජිරපන්ති විය ඛායන්ති, අයමස්සා අට්ඨිකල්යාණතා. වීසතිවස්සසතිකාපි පන සමානා සොළසවස්සුද්දෙසිකා විය හොති නිප්පලිතා, අයමස්සා වයකල්යාණතා. ३८६. दहाव्या सुत्तात, 'जनपदकल्याणी' म्हणजे संपूर्ण जनपदातील रूप व स्वराने सुंदर, उत्तम, शरीराच्या सहा दोषांनी रहित आणि पाच कल्याणांनी (सौंदर्यांनी) युक्त असणारी स्त्री होय. कारण ती अतिशय उंच नाही, अतिशय बुटकी नाही, अतिशय कृश (बारीक) नाही, अतिशय स्थूल (जाड) नाही, अतिशय काळी नाही आणि अतिशय गोरीही नाही; ती मानवी सौंदर्याच्या पलीकडे गेलेली परंतु दिव्य (देवतांच्या) सौंदर्यापर्यंत न पोहोचलेली असते, म्हणून ती शरीराच्या सहा दोषांनी रहित असते. त्वचा-कल्याण, मांस-कल्याण, स्नायू-कल्याण, अस्थि-कल्याण आणि वय-कल्याण या पाच कल्याणांनी युक्त असल्यामुळे तिला 'पंचकल्याणी' म्हटले जाते. तिला कोणत्याही बाह्य प्रकाशाची गरज नसते, ती स्वतःच्या शरीराच्या प्रकाशानेच बारा हातांच्या अंतरापर्यंत प्रकाश पसरवते. ती प्रियंगूच्या फुलासारखी किंवा सुवर्णासारखी पिवळसर-गोऱ्या रंगाची असते; हे तिचे 'त्वचा-कल्याण' (छविकल्याण) होय. तिचे दोन्ही हात व पाय आणि ओठ लाक्षा रसाने रंगवल्यासारखे, लाल प्रवाळ किंवा लाल कंबलासारखे (घोंगडीसारखे) लाल असतात; हे तिचे 'मांस-कल्याण' होय. तिची वीस नखे मांसाला जोडलेल्या भागात लाक्षा रसाने भरल्यासारखी लाल असतात आणि पुढील भागात दुधाच्या धारेसारखी पांढरीशुभ्र असतात; हे तिचे 'स्नायू-कल्याण' (नख-कल्याण) होय. तिचे बत्तीस दात अत्यंत दाट आणि स्वच्छ घासलेल्या हिऱ्यांच्या ओळीसारखे चमकतात; हे तिचे 'अस्थि-कल्याण' होय. ती १२० वर्षांची झाली तरी १६ वर्षांच्या तरुणीसारखी दिसते, तिचे केस पांढरे होत नाहीत व त्वचेवर सुरकुत्या पडत नाहीत; हे तिचे 'वय-कल्याण' होय. පරමපාසාවිනීති එත්ථ පසවනං පසාවො, පවත්තීති අත්ථො. පසාවො එව පාසාවො. පරමො පාසාවො පරමපාසාවො, සො අස්සා අත්ථීති පරමපාසාවිනී. නච්චෙ ච ගීතෙ ච උත්තමපවත්ති සෙට්ඨකිරියා, උත්තමමෙව නච්චං නච්චති, ගීතං වා ගායතීති වුත්තං හොති. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානත්ථමෙව. ඉමෙසු පන ද්වීසු සුත්තෙසු පුබ්බභාගවිපස්සනාව කථිතාති. 'परमपासाविनी' या पदात 'पसवन' म्हणजे 'पसाव' (शरीराची हालचाल किंवा प्रवृत्ती) असा अर्थ आहे. 'पसाव' म्हणजेच 'पासाव' होय. उत्कृष्ट हालचाल किंवा हावभाव म्हणजे 'परमपासाव', आणि तो जिच्याकडे आहे ती 'परमपासाविनी' होय. नृत्य आणि गायन यांमध्ये तिची प्रवृत्ती अत्यंत श्रेष्ठ असते; ती अत्यंत उत्कृष्ट नृत्य करते किंवा उत्कृष्ट गाणे गाते, असा याचा अर्थ आहे. उर्वरित सर्व भाग सर्वत्र स्पष्ट अर्थाचाच आहे. या दोन सुत्तांमध्ये पूर्वभागीय विपश्यनेचेच वर्णन केले आहे. නාලන්දවග්ගො දුතියො. दुसरा नालंदा वर्ग समाप्त. 3. සීලට්ඨිතිවග්ගො ३. शीलठिती वर्ग 1-2. සීලසුත්තාදිවණ්ණනා १-२. शील सुत्त इत्यादींचे वर्णन 387-388. තතියවග්ගස්ස පඨමෙ සීලානීති චතුපාරිසුද්ධිසීලානි. දුතියෙ උම්මඞ්ගොති පඤ්හමග්ගො පඤ්හගවෙසනං. ३८७-३८८. तिसऱ्या वर्गाच्या पहिल्या सुत्तात 'शीलानि' म्हणजे चतुष्पारिशुद्धि शील होय. दुसऱ्या सुत्तात 'उम्मग्गो' म्हणजे प्रश्नांचा मार्ग किंवा प्रश्नांचे संशोधन (शोध घेणे) होय. 3-5. පරිහානසුත්තාදිවණ්ණනා ३-५. परिहान सुत्त इत्यादींचे वर्णन 389-391. තතියෙ පරිහානං හොතීති පුග්ගලවසෙන පරිහානං හොති. යො හි බුද්ධෙසු ධරන්තෙසුපි චත්තාරො සතිපට්ඨානෙ න භාවෙති, තස්ස සද්ධම්මො අන්තරහිතො නාම හොති දෙවදත්තාදීනං විය. ඉති ඉමස්මිං සුත්තෙ තස්ස පුග්ගලස්සෙව ධම්මන්තරධානං කථිතං. චතුත්ථපඤ්චමෙසු සබ්බං උත්තානමෙව. ३८९-३९१. तिसऱ्या सुत्तात 'परिहानं होति' (ऱ्हास होतो) म्हणजे पुद्गलाच्या (व्यक्तीच्या) दृष्टीने ऱ्हास होतो. कारण जो मनुष्य बुद्ध हयात असतानाही चार स्मृतिप्रस्थानांची (सतिपट्ठानांची) भावना करत नाही, त्याच्यासाठी सद्धम्म अंतर्हित (नष्ट) झाल्यासारखाच असतो, जसे की देवदत्त इत्यादींच्या बाबतीत झाले. अशा प्रकारे, या सुत्तात केवळ त्या पुद्गलाच्या (व्यक्तीच्या) बाबतीतच सद्धम्माचे अंतर्धान होणे सांगितले आहे. चौथ्या आणि पाचव्या सुत्तात सर्व काही स्पष्ट अर्थाचेच आहे. 6. පදෙසසුත්තවණ්ණනා ६. पदेस सुत्त वर्णन 392. ඡට්ඨෙ [Pg.261] පදෙසං භාවිතත්තාති පදෙසතො භාවිතත්තා. චත්තාරො හි මග්ගෙ තීණි ච ඵලානි නිබ්බත්තෙන්තෙන සතිපට්ඨානා පදෙසං භාවිතා නාම හොන්ති. ३९२. सहाव्या सुत्तात 'पदेसं भावितत्ता' म्हणजे अंशतः (एका भागाने) भावना केल्यामुळे होय. कारण चार मार्ग आणि तीन फळे उत्पन्न करणाऱ्या योग्याने स्मृतिप्रस्थानांची अंशतः भावना केलेली असते. 7. සමත්තසුත්තවණ්ණනා ७. समत्त सुत्त वर्णन 393. සත්තමෙ සමත්තං භාවිතත්තාති සමත්තා භාවිතත්තා. අරහත්තඵලං උප්පාදෙන්තෙන හි සතිපට්ඨානා සමත්තං භාවිතා නාම හොන්ති. ३९३. सातव्या सुत्तात 'समत्तं भावितत्ता' म्हणजे पूर्णपणे भावना केल्यामुळे होय. कारण अर्हत्त्वफळ उत्पन्न करणाऱ्या योग्याने स्मृतिप्रस्थानांची पूर्णपणे भावना केलेली असते. 8-10. ලොකසුත්තාදිවණ්ණනා ८-१०. लोक सुत्त इत्यादींचे वर्णन 394-396. අට්ඨමෙ මහාභිඤ්ඤතන්ති ඡන්නං අභිඤ්ඤානං වසෙන වුත්තං. සහස්සං ලොකං අභිජානාමීති සතතවිහාරවසෙනෙව වුත්තං. ථෙරො කිර පාතොව උට්ඨාය මුඛං ධොවිත්වා සෙනාසනෙ නිසින්නො අතීතෙ කප්පසහස්සං, අනාගතෙ කප්පසහස්සං අනුස්සරති, පච්චුප්පන්නෙපි සහස්සං චක්කවාළානං තස්සාවජ්ජනස්ස ගතිං අනුබන්ධති. ඉති සො දිබ්බෙන චක්ඛුනා සහස්සං ලොකං අභිජානාති, අයමස්ස සතතවිහාරො. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානත්ථමෙවාති. ३९४-३९६. आठव्या सुत्तात 'महाभिञ्ञतं' हे सहा अभिज्ञांच्या संदर्भात म्हटले आहे. 'सहस्स लोकं अभिजानामि' (मी हजार लोकाला जाणतो) हे त्यांच्या सतत विहाराच्या (नेहमीच्या वास्तव्याच्या) प्रभावाने म्हटले आहे. असे ऐकिवात आहे की, स्थविर (अनुरुद्ध) पहाटेच उठून, मुखप्रक्षालन करून, आपल्या आसनावर बसून भूतकाळातील एक हजार कल्प आणि भविष्यकाळातील एक हजार कल्प यांचे स्मरण करत असत. तसेच वर्तमानकाळातील एक हजार चक्रवाळांचेही स्मरण करत असत, त्यांच्या आवर्तनाची गती त्यांच्या अनुसरणात असे. अशा प्रकारे ते दिव्य चक्षूने हजार लोकाला जाणत असत. हा त्यांचा 'सतत विहार' होय. उर्वरित सर्व भाग सर्वत्र स्पष्ट अर्थाचाच आहे. සීලට්ඨිතිවග්ගො තතියො. तिसरा शीलठिती वर्ग समाप्त. 4. අනනුස්සුතවග්ගවණ්ණනා ४. अननुस्सुत वर्ग वर्णन 401-406. චතුත්ථවග්ගස්ස පඤ්චමෙ විදිතා වෙදනාති යා වෙදනා සම්මසිත්වා අරහත්තං පත්තො තාවස්ස විදිතා උප්පජ්ජන්ති, විදිතා උපට්ඨහන්ති, විදිතා අබ්භත්ථං ගච්ඡන්ති නාම. යා ච පන පරිග්ගහිතෙසු වත්ථාරම්මණෙසු පවත්තා වෙදනා, තාපි විදිතා උප්පජ්ජන්ති, විදිතා උපට්ඨහන්ති, විදිතා අබ්භත්ථං ගච්ඡන්ති නාම. විතක්කාදීසුපි එසෙව නයො. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. ४०१-४०६. चौथ्या वर्गाच्या पाचव्या सुत्तात 'विदिता वेदना' म्हणजे ज्या वेदनांचे मनन (परीक्षण) करून एखादा अर्हत्त्व पदाला प्राप्त होतो, त्या वेदना त्याला ज्ञात होऊन उत्पन्न होतात, ज्ञात होऊन उपस्थित राहतात आणि ज्ञात होऊनच नष्ट होतात. तसेच, ग्रहण केलेल्या वस्तू आणि आलंबनांमध्ये ज्या वेदना उत्पन्न होतात, त्या देखील ज्ञात होऊन उत्पन्न होतात, ज्ञात होऊन उपस्थित राहतात आणि ज्ञात होऊनच नष्ट होतात. वितर्क इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. उर्वरित सर्व भाग सर्वत्र स्पष्ट अर्थाचाच आहे. අනනුස්සුතවග්ගො චතුත්ථො. चौथा अननुस्सुत वर्ग समाप्त. 5. අමතවග්ගො ५. अमत वर्ग 2. සමුදයසුත්තවණ්ණනා २. समुदय सुत्त वर्णन 408. පඤ්චමවග්ගස්ස [Pg.262] දුතියෙ ආහාරසමුදයා කායස්ස සමුදයොති ආහාරසමුදයෙන කායසමුදයො. එසෙව නයො සෙසෙසු. මනසිකාරසමුදයාති එත්ථ පන යොනිසොමනසිකාරසමුදයා බොජ්ඣඞ්ගධම්මානං සමුදයො, අයොනිසොමනසිකාරසමුදයා නීවරණධම්මානං. ඉති ඉමස්මිං සුත්තෙ සාරම්මණසතිපට්ඨානා කථිතා. ४०८. पाचव्या वर्गाच्या दुसऱ्या सुत्तात 'आहारसमुदया कायस्स समुदयो' म्हणजे आहाराच्या उत्पत्तीमुळे (समुदयामुळे) रूपाचा (कायाचा) उदय होतो. इतर पदांच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. परंतु 'मनसिकारसमुदया' या पदात, योनिशो मनसिकाराच्या (योग्य विचाराच्या) उत्पत्तीमुळे बोध्यंगांची उत्पत्ती होते आणि अयोनिशो मनसिकाराच्या (अयोग्य विचाराच्या) उत्पत्तीमुळे नीवरणांची उत्पत्ती होते. अशा प्रकारे, या सुत्तात आलंबनासह स्मृतिप्रस्थानांचे (सतिपट्ठानांचे) वर्णन केले आहे. 4. සතිසුත්තවණ්ණනා ४. सति सुत्त वर्णन 410. චතුත්ථං සුද්ධිකං කත්වා සමුදයෙ කථිතෙ බුජ්ඣනකානං අජ්ඣාසයෙන වුත්තං. ४१०. चौथ्या सुत्तात केवळ शुद्ध (संप्रजन्य विरहित) रूपाने समुदयाचे वर्णन केले आहे, ते समजून घेणाऱ्यांच्या (विनेय जनांच्या) आशयानुसार सांगितले आहे. 6. පාතිමොක්ඛසංවරසුත්තවණ්ණනා ६. पातिमोक्खसंवर सुत्त वर्णन 412. ඡට්ඨෙ පාතිමොක්ඛසංවරසංවුතොති චතුන්නං සීලානං ජෙට්ඨකසීලං දස්සෙන්තො එවමාහ. තිපිටකචූළනාගත්ථෙරො පනාහ – ‘‘පාතිමොක්ඛසංවරොව සීලං, ඉතරානි තීණි සීලන්ති වුත්තට්ඨානං නාම නත්ථී’’ති. වත්වා තං අනුජානන්තො ආහ – ‘‘ඉන්ද්රියසංවරො නාම ඡද්වාරරක්ඛණමත්තමෙව, ආජීවපාරිසුද්ධි ධම්මෙනෙව සමෙන පච්චයුප්පත්තිමත්තකං, පච්චයසන්නිස්සිතං පටිලද්ධපච්චයෙ ඉදමත්ථන්ති පච්චවෙක්ඛිත්වා පරිභුඤ්ජනමත්තකං. නිප්පරියායෙන පාතිමොක්ඛසංවරොව සීලං. යස්ස සො භින්නො, අයං ඡින්නසීසො විය පුරිසො හත්ථපාදෙ, සෙසානි රක්ඛිස්සතීති න වත්තබ්බො. යස්ස පන සො අරොගො, අයං අච්ඡින්නසීසො විය පුරිසො ජීවිතං, සෙසානි පුන පාකතිකානි කත්වා රක්ඛිතුම්පි සක්කොතී’’ති. තස්මා පාතිමොක්ඛසංවරොව සීලං, තෙන පාතිමොක්ඛසංවරෙන සංවුතොති පාතිමොක්ඛසංවරසංවුතො, උපෙතො සමන්නාගතොති අත්ථො. ४१२. सहाव्या सुत्तात 'पातिमोक्खसंवरसंवुतो' हे चार शीलांपैकी सर्वात मुख्य (श्रेष्ठ) शील दर्शवण्यासाठी म्हटले आहे. परंतु त्रिपिटक चुलनाग स्थविरांनी म्हटले आहे की - 'पातिमोक्ख संवर हेच खरे शील आहे, इतर तीन (इंद्रियसंवर इत्यादी) शीलांना शील म्हटले गेले आहे असे कोणतेही स्थान नाही.' असे म्हणून, त्याचा स्वीकार करत ते म्हणतात - 'इंद्रियसंवर म्हणजे केवळ सहा इंद्रियद्वारांचे रक्षण करणे होय. आजीवपारिशुद्धि म्हणजे केवळ धम्म आणि समतेने प्रत्ययांची (साधनांची) प्राप्ती करणे होय. प्रत्ययसन्निश्रित म्हणजे प्राप्त झालेल्या प्रत्ययांचे 'हे या उपयोगासाठी आहे' असे चिंतन करून केवळ उपभोग घेणे होय. मुख्य अर्थाने पातिमोक्ख संवर हेच खरे शील आहे. ज्याचे हे शील भंग पावले आहे, तो शिरच्छेद झालेल्या माणसासारखा आहे; तो आपले हातपाय किंवा इतर शीलांचे रक्षण करू शकेल असे म्हणता येत नाही. परंतु ज्याचे हे शील निरोगी (अखंड) आहे, तो शिरच्छेद न झालेल्या माणसासारखा आहे, जो आपल्या प्राणांचे रक्षण करू शकतो आणि इतर शीलांना पुन्हा पूर्ववत करून त्यांचे रक्षण करण्यासही समर्थ असतो.' म्हणून पातिमोक्ख संवर हेच खरे शील आहे, त्या पातिमोक्ख संवराने जो संवृत (सुरक्षित) आहे तो 'पातिमोक्खसंवरसंवुतो' होय, म्हणजेच तो त्याने युक्त व संपन्न आहे असा अर्थ आहे. ආචාරගොචරසම්පන්නොති ආචාරෙන ච ගොචරෙන ච සම්පන්නො. අණුමත්තෙසූති අප්පමත්තකෙසු. වජ්ජෙසූති අකුසලධම්මෙසු. භයදස්සාවීති භයදස්සී. සමාදායාති සම්මා ආදියිත්වා. සික්ඛස්සු සික්ඛාපදෙසූති සික්ඛාපදෙසු තං තං සික්ඛාපදං සමාදියිත්වා සික්ඛ, යං [Pg.263] යං පන කිඤ්චි සික්ඛාපදෙසු සික්ඛාකොට්ඨාසෙසු සික්ඛිතබ්බං කායිකං වා වාචසිකං වා, තං තං සබ්බං සම්මා ආදාය සික්ඛස්සූති අයමෙත්ථ සඞ්ඛෙපත්ථො. විත්ථාරො පන විසුද්ධිමග්ගෙ (විසුද්ධි. 1.14) වුත්තො. ඉති ඉමස්මිං සුත්තෙ පාතිමොක්ඛසංවරසීලමෙව කථිතං. ‘आचारगोचरसंपन्न’ म्हणजे आचार आणि गोचर यांनी युक्त असणे. ‘अणुमात्रेषु’ म्हणजे अगदी लहान किंवा सूक्ष्म अशा. ‘वज्जेसु’ (दोषेषु) म्हणजे अकुशल धर्मांमध्ये. ‘भयदस्सावी’ म्हणजे भय पाहणारा. ‘समादाय’ म्हणजे चांगल्या प्रकारे ग्रहण करून. ‘सिक्खस्सु सिक्खापदेसु’ म्हणजे शिक्षापदांमध्ये त्या त्या शिक्षापदाचे चांगल्या प्रकारे ग्रहण करून अभ्यास कर; किंवा शिक्षापदांच्या समूहांमध्ये जे काही कायिक किंवा वाचिक शिकण्यासारखे आहे, त्या सर्वांचे चांगल्या प्रकारे ग्रहण करून अभ्यास कर, असा येथे संक्षेपार्थ आहे. सविस्तर वर्णन तर विसुद्धिमग्गात (विशुद्धिमार्गात) सांगितले आहे. अशा प्रकारे या सुत्तात केवळ पातिमोक्खसंवरशीलच सांगितले आहे। 7. දුච්චරිතසුත්තවණ්ණනා ७. दुच्चरितसुत्तवण्णना (दुश्चरितसूत्रवर्णन) 413. සත්තමෙ කායසුචරිතවචීසුචරිතානි පාතිමොක්ඛසංවරසීලං, මනොසුචරිතං ඉතරානි තීණි සීලානීති චතුපාරිසුද්ධිසීලං කථිතං හොති. ඉමිනා නයෙන පඤ්චසත්තනවදසසු කුසලකම්මපථෙසු පච්ඡිමාපි තයො සීලං හොතීති වෙදිතබ්බා. සෙසං උත්තානමෙවාති. ඡට්ඨසත්තමෙසු හෙට්ඨා වුත්තනයෙනෙව අත්ථො වෙදිතබ්බො. ४१३. सातव्या सुत्तात कायसुचरित आणि वचीसुचरित हे पातिमोक्खसंवरशील आहे, आणि मनःसुचरित हे इतर तीन शील आहेत; अशा प्रकारे चतुपारिसुद्धिशील सांगितले आहे. या पद्धतीने पाच, सात, नऊ आणि दहा कुशल कर्मपथांमध्ये शेवटचे तीन (अनभिध्या, अव्यापाद आणि सम्मादिट्ठि) देखील शीलच आहेत, असे जाणावे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. सहाव्या आणि सातव्या सुत्तांमध्ये पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच अर्थ जाणावा। අමතවග්ගො පඤ්චමො. अमतवग्गो पंचमो (अमृतवर्ग पाचवा समाप्त)। සතිපට්ඨානසංයුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. सतिपट्ठानसंयुत्तवण्णना (स्मृतिप्रस्थानसंयुक्तवर्णन) समाप्त झाली। 4. ඉන්ද්රියසංයුත්තං ४. इंद्रियसंयुत्तं (इंद्रियसंयुक्त) 1. සුද්ධිකවග්ගො १. सुद्धिकवग्गो (शुद्धकवर्ग) 1. සුද්ධිකසුත්තවණ්ණනා १. सुद्धिकसुत्तवण्णना (शुद्धकसूत्रवर्णन) 471. ඉන්ද්රියසංයුත්තස්ස [Pg.264] පඨමෙ සද්ධින්ද්රියං සතින්ද්රියං පඤ්ඤින්ද්රියන්ති ඉමානි තීණි චතුභූමකකුසලවිපාකෙසු චෙව කිරියාසු ච ලබ්භන්ති. වීරියින්ද්රියසමාධින්ද්රියානි චතුභූමකකුසලෙ අකුසලෙ විපාකෙ කිරියායාති සබ්බත්ථ ලබ්භන්ති. ඉති ඉදං සුත්තං චතුභූමකසබ්බසඞ්ගාහකධම්මපරිච්ඡෙදවසෙන වුත්තන්ති වෙදිතබ්බං. ४७१. इंद्रियसंयुक्ताच्या पहिल्या सुत्तात सद्धिंद्रिय, सतिंद्रिय आणि पञ्ञिंद्रिय हे तीन (इंद्रिय) चतुर्भूमिक कुशल, विपाक आणि क्रिया चित्तांमध्ये प्राप्त होतात. वीरियिंद्रिय आणि समाधिंद्रिय हे चतुर्भूमिक कुशल, अकुशल, विपाक आणि क्रिया चित्तांमध्ये - अशा सर्व ठिकाणी प्राप्त होतात. अशा प्रकारे हे सुत्त चतुर्भूमिक सर्वसंग्राहक धर्मांच्या वर्गीकरणाच्या आधारे सांगितले आहे, असे जाणावे। 7. දුතියසමණබ්රාහ්මණසුත්තවණ්ණනා ७. दुतियसमणब्राह्मणसुत्तवण्णना (द्वितीय श्रमणब्राह्मणसूत्रवर्णन) 477. සත්තමෙ සද්ධින්ද්රියං නප්පජානන්තීති දුක්ඛසච්චවසෙන න පජානන්ති. සද්ධින්ද්රියසමුදයං නප්පජානන්තීති සමුදයසච්චවසෙන න පජානන්ති. එවං නිරොධං නිරොධසච්චවසෙන, පටිපදං මග්ගසච්චවසෙනාති. සෙසෙසුපි එසෙව නයො. ४७७. सातव्या सुत्तात ‘सद्धिंद्रिय जाणत नाहीत’ म्हणजे दुःखसत्याच्या रूपाने जाणत नाहीत. ‘सद्धिंद्रियाचा समुदय जाणत नाहीत’ म्हणजे समुदयसत्याच्या रूपाने जाणत नाहीत. त्याचप्रमाणे निरोधाला निरोधसत्याच्या रूपाने आणि प्रतिपदेला मार्गसत्याच्या रूपाने जाणत नाहीत. उर्वरित इंद्रियांच्या बाबतीतही हाच नियम जाणावा। සුක්කපක්ඛෙ පන අධිමොක්ඛවසෙන ආවජ්ජනසමුදයා සද්ධින්ද්රියසමුදයො හොති, පග්ගහවසෙන ආවජ්ජනසමුදයා වීරියින්ද්රියසමුදයො, උපට්ඨානවසෙන ආවජ්ජනසමුදයා සතින්ද්රියසමුදයො, අවික්ඛෙපවසෙන ආවජ්ජනසමුදයා සමාධින්ද්රියසමුදයො, දස්සනවසෙන ආවජ්ජනසමුදයා පඤ්ඤින්ද්රියසමුදයො හොති. තථා ඡන්දවසෙන ආවජ්ජනසමුදයා සද්ධින්ද්රියසමුදයො හොති, ඡන්දවසෙන ආවජ්ජනසමුදයා වීරියසතිසමාධිපඤ්ඤින්ද්රියසමුදයො හොති. මනසිකාරවසෙන ආවජ්ජනසමුදයා සද්ධින්ද්රියසමුදයො හොති. මනසිකාරවසෙන ආවජ්ජනසමුදයා වීරියසතිසමාධිපඤ්ඤින්ද්රියසමුදයො හොතීති එවම්පි අත්ථො වෙදිතබ්බො. ඉමෙසු පටිපාටියා ඡසු සුත්තෙසු චතුසච්චමෙව කථිතං. परंतु शुक्लपक्षात (चांगल्या बाजूने) अधिमोक्षाच्या (निश्चयाच्या) प्रभावाने आवर्जनाचा (मनाचा कल) समुदय झाल्यामुळे सद्धिंद्रियाचा समुदय होतो; प्रग्रहाच्या (उत्साहाच्या) प्रभावाने आवर्जनाचा समुदय झाल्यामुळे वीरियिंद्रियाचा समुदय होतो; उपस्थानाच्या (स्मृतीच्या जागृतीच्या) प्रभावाने आवर्जनाचा समुदय झाल्यामुळे सतिंद्रियाचा समुदय होतो; अविक्षेपाच्या (एकाग्रतेच्या) प्रभावाने आवर्जनाचा समुदय झाल्यामुळे समाधिंद्रियाचा समुदय होतो; आणि दर्शनाच्या (यथार्थ दर्शनाच्या) प्रभावाने आवर्जनाचा समुदय झाल्यामुळे पञ्ञिंद्रियाचा समुदय होतो. तसेच छंदाच्या (इच्छेच्या) प्रभावाने आवर्जनाचा समुदय झाल्यामुळे सद्धिंद्रियाचा समुदय होतो, आणि छंदाच्या प्रभावाने आवर्जनाचा समुदय झाल्यामुळे वीरिय, सति, समाधी व पञ्ञिंद्रियाचा समुदय होतो. मनसिकाराच्या (लक्ष देण्याच्या) प्रभावाने आवर्जनाचा समुदय झाल्यामुळे सद्धिंद्रियाचा समुदय होतो, आणि मनसिकाराच्या प्रभावाने आवर्जनाचा समुदय झाल्यामुळे वीरिय, सति, समाधी व पञ्ञिंद्रियाचा समुदय होतो, अशा प्रकारे देखील अर्थ जाणावा. या अनुक्रमे आलेल्या सहा सुत्तांमध्ये केवळ चार आर्यसत्यांचेच प्रतिपादन केले आहे। 8. දට්ඨබ්බසුත්තවණ්ණනා ८. दट्ठब्बसुत्तवण्णना (द्रष्टव्यसूत्रवर्णन) 478. අට්ඨමෙ කත්ථ ච, භික්ඛවෙ, සද්ධින්ද්රියං දට්ඨබ්බං, චතූසු සොතාපත්තියඞ්ගෙසූතිආදි ඉමෙසං ඉන්ද්රියානං සවිසයෙ ජෙට්ඨකභාවදස්සනත්ථං වුත්තං. යථා හි චත්තාරො සෙට්ඨිපුත්තා රාජාති රාජපඤ්චමෙසු සහායෙසු ‘‘නක්ඛත්තං [Pg.265] කීළිස්සාමා’’ති වීථිං ඔතිණ්ණෙසු එකස්ස සෙට්ඨිපුත්තස්ස ගෙහං ගතකාලෙ ඉතරෙ චත්තාරො තුණ්හී නිසීදන්ති, ගෙහසාමිකොව – ‘‘ඉමෙසං ඛාදනීයං භොජනීයං දෙථ, ගන්ධමාලාලඞ්කාරාදීනි දෙථා’’ති ගෙහෙ විචාරෙති. දුතියස්ස, තතියස්ස, චතුත්ථස්ස ගෙහං ගතකාලෙ ඉතරෙ චත්තාරො තුණ්හී නිසීදන්ති, ගෙහසාමිකොව – ‘‘ඉමෙසං ඛාදනීයං භොජනීයං දෙථ, ගන්ධමාලාලඞ්කාරාදීනි දෙථා’’ති ගෙහෙ විචාරෙති. අථ සබ්බපච්ඡා රඤ්ඤො ගෙහං ගතකාලෙ කිඤ්චාපි රාජා සබ්බත්ථ ඉස්සරො, ඉමස්මිං පන කාලෙ අත්තනො ගෙහෙයෙව – ‘‘ඉමෙසං ඛාදනීයං භොජනීයං දෙථ, ගන්ධමාලාලඞ්කාරාදීනි දෙථා’’ති ගෙහෙ විචාරෙති. එවමෙව සද්ධාපඤ්චමකෙසු ඉන්ද්රියෙසු තෙසු සහායෙසු එකතො වීථිං ඔතරන්තෙසු විය එකාරම්මණෙ උප්පජ්ජමානෙසුපි යථා පඨමස්ස ගෙහෙ ඉතරෙ චත්තාරො තුණ්හී නිසීදන්ති, ගෙහසාමිකොව විචාරෙති, එවං සොතාපත්තියඞ්ගානි පත්වා අධිමොක්ඛලක්ඛණං සද්ධින්ද්රියමෙව ජෙට්ඨකං හොති පුබ්බඞ්ගමං, සෙසානි තදන්වයානි හොන්ති. යථා දුතියස්ස ගෙහෙ ඉතරෙ චත්තාරො තුණ්හී නිසීදන්ති, ගෙහසාමිකොව විචාරෙති, එවං සම්මප්පධානානි පත්වා පග්ගහලක්ඛණං වීරියින්ද්රියමෙව ජෙට්ඨකං හොති පුබ්බඞ්ගමං, සෙසානි තදන්වයානි හොන්ති. යථා තතියස්ස ගෙහෙ ඉතරෙ චත්තාරො තුණ්හී නිසීදන්ති, ගෙහසාමිකොව විචාරෙති, එවං සතිපට්ඨානානි පත්වා උපට්ඨානලක්ඛණං සතින්ද්රියමෙව ජෙට්ඨකං හොති පුබ්බඞ්ගමං, සෙසානි තදන්වයානි හොන්ති. යථා චතුත්ථස්ස ගෙහෙ ඉතරෙ චත්තාරො තුණ්හී නිසීදන්ති, ගෙහසාමිකොව විචාරෙති, එවං ඣානවිමොක්ඛෙ පත්වා අවික්ඛෙපලක්ඛණං සමාධින්ද්රියමෙව ජෙට්ඨකං හොති පුබ්බඞ්ගමං, සෙසානි තදන්වයානි හොන්ති. සබ්බපච්ඡා රඤ්ඤො ගෙහං ගතකාලෙ පන යථා ඉතරෙ චත්තාරො තුණ්හී නිසීදන්ති, රාජාව ගෙහෙ විචාරෙති, එවමෙව අරියසච්චානි පත්වා පජානනලක්ඛණං පඤ්ඤින්ද්රියමෙව ජෙට්ඨකං හොති පුබ්බඞ්ගමං, සෙසානි තදන්වයානි හොන්තීති. ४७८. आठव्या सुत्तात ‘भिक्खूहो, सद्धिंद्रिय कोठे पाहावे? चार सोतापत्तियंगांमध्ये...’ इत्यादी वचन या इंद्रियांचे आपापल्या विषयात श्रेष्ठत्व दाखवण्यासाठी सांगितले आहे. जसे की, चार श्रेष्ठिपुत्र आणि राजा, अशा पाच मित्रांनी ‘नक्षत्र क्रीडा (उत्सव) खेळू या’ असे म्हणून रस्त्यावर उतरले असता, एका श्रेष्ठिपुत्राच्या घरी गेल्यावर इतर चार जण शांत बसतात आणि केवळ घराचा मालकच घरात व्यवस्था करतो की, ‘यांना खाण्याचे, जेवणाचे पदार्थ द्या, सुगंधी द्रव्ये, पुष्पमाला आणि अलंकार इत्यादी द्या.’ दुसऱ्या, तिसऱ्या आणि चौथ्या श्रेष्ठिपुत्राच्या घरी गेल्यावर देखील इतर चार जण शांत बसतात आणि केवळ घराचा मालकच घरात व्यवस्था करतो की, ‘यांना खाण्याचे, जेवणाचे पदार्थ द्या, सुगंधी द्रव्ये, पुष्पमाला आणि अलंकार इत्यादी द्या.’ त्यानंतर सर्वात शेवटी राजाच्या महालात गेल्यावर, जरी राजा सर्व ठिकाणी स्वामी असला, तरीही या वेळी तो आपल्याच महालात व्यवस्था करतो की, ‘यांना खाण्याचे, जेवणाचे पदार्थ द्या, सुगंधी द्रव्ये, पुष्पमाला आणि अलंकार इत्यादी द्या.’ याचप्रमाणे श्रद्धा इत्यादी पाच इंद्रिये त्या मित्रांप्रमाणे एकत्र रस्त्यावर उतरल्यासारखे एकाच आलंबनात उत्पन्न होत असले तरी, ज्याप्रमाणे पहिल्याच्या घरी इतर चार जण शांत बसतात आणि घराचा मालकच व्यवस्था करतो, त्याचप्रमाणे सोतापत्तियंगे प्राप्त झाल्यावर अधिमोक्ष-लक्षण (निश्चय-लक्षण) असलेले सद्धिंद्रियच श्रेष्ठ आणि अग्रगामी असते, आणि इतर इंद्रिये त्याचे अनुकरण करणारी असतात. ज्याप्रमाणे दुसऱ्याच्या घरी इतर चार जण शांत बसतात आणि घराचा मालकच व्यवस्था करतो, त्याचप्रमाणे सम्मप्पधान प्राप्त झाल्यावर प्रग्रह-लक्षण (उत्साह-लक्षण) असलेले वीरियिंद्रियच श्रेष्ठ आणि अग्रगामी असते, आणि इतर इंद्रिये त्याचे अनुकरण करणारी असतात. ज्याप्रमाणे तिसऱ्याच्या घरी इतर चार जण शांत बसतात आणि घराचा मालकच व्यवस्था करतो, त्याचप्रमाणे सतिपट्ठान प्राप्त झाल्यावर उपस्थान-लक्षण (जागृती-लक्षण) असलेले सतिंद्रियच श्रेष्ठ आणि अग्रगामी असते, आणि इतर इंद्रिये त्याचे अनुकरण करणारी असतात. ज्याप्रमाणे चौथ्याच्या घरी इतर चार जण शांत बसतात आणि घराचा मालकच व्यवस्था करतो, त्याचप्रमाणे ध्यान आणि विमोक्ष प्राप्त झाल्यावर अविक्षेप-लक्षण (एकाग्रता-लक्षण) असलेले समाधिंद्रियच श्रेष्ठ आणि अग्रगामी असते, आणि इतर इंद्रिये त्याचे अनुकरण करणारी असतात. परंतु सर्वात शेवटी राजाच्या महालात गेल्यावर ज्याप्रमाणे इतर चार जण शांत बसतात आणि राजाच महालात व्यवस्था करतो, त्याचप्रमाणे आर्यसत्ये प्राप्त झाल्यावर प्रजानन-लक्षण (विशेष ज्ञान-लक्षण) असलेले पञ्ञिंद्रियच श्रेष्ठ आणि अग्रगामी असते, आणि इतर इंद्रिये त्याचे अनुकरण करणारी असतात। 9-10. පඨමවිභඞ්ගසුත්තාදිවණ්ණනා ९-१०. पठमविभंगसुत्तादिवण्णना (प्रथमविभंगसूत्रादिवर्णन) 479-480. නවමෙ සතිනෙපක්කෙනාති එත්ථ නිපකස්ස භාවො නෙපක්කං, පඤ්ඤායෙතං නාමං. කස්මා පන සතිභාජනෙ පඤ්ඤා වුත්තාති? සතියා බලවභාවදස්සනත්ථං. බලවසති හි ඉධ අධිප්පෙතා. සා ච පඤ්ඤාසම්පයුත්තාව බලවතී හොති, න විප්පයුත්තාති පඤ්ඤාසම්පයුත්තසතිං දස්සෙන්තො [Pg.266] එවමාහ. චිරකතන්ති චිරකාලං කතං දානං වා සීලං වා උපොසථකම්මං වා. චිරභාසිතන්ති ‘‘අසුකස්මිං ඨානෙ අසුකං නාම භාසිත’’න්ති එවං චිරකාලෙ භාසිතං. වොස්සග්ගාරම්මණං කත්වාති නිබ්බානාරම්මණං කත්වා. උදයත්ථගාමිනියාති උදයඤ්ච අත්ථඤ්ච ගච්ඡන්තියා, උදයබ්බයපරිග්ගහිකායාති අත්ථො. ඉමස්මිං සුත්තෙ සද්ධාසතිපඤ්ඤින්ද්රියානි පුබ්බභාගානි, වීරියින්ද්රියං මිස්සකං, සමාධින්ද්රියං නිබ්බත්තිතලොකුත්තරමෙව කථිතං. දසමෙපි අයමෙව ධම්මපරිච්ඡෙදොති. ४७९-४८०. नवव्या सुत्तात 'सतिनेपक्केन' या पदात 'निपक' (प्रज्ञावंत) असण्याचा भाव म्हणजे 'नेपक्क' (नैपुण्य/प्रज्ञा) होय. हे प्रज्ञेचेच नाव आहे. पण स्मृतीच्या विभागात प्रज्ञा का सांगितली आहे? स्मृतीचे बलवान असणे दाखवण्यासाठी. कारण येथे बलवान स्मृती अभिप्रेत आहे. ती प्रज्ञेशी संप्रयुक्त (युक्त) असेल तरच बलवान होते, विप्रयुक्त (विरहित) असेल तर नाही; म्हणून प्रज्ञासंप्रयुक्त स्मृती दर्शवण्यासाठी असे म्हटले आहे. 'चिरकतं' म्हणजे दीर्घकाळापूर्वी केलेले दान, शील किंवा उपोसथ कर्म होय. 'चिरभासितं' म्हणजे "अमुक ठिकाणी अमुक बोलले गेले" अशा प्रकारे दीर्घकाळापूर्वी बोललेले होय. 'वोस्सग्गारम्मणं कत्वा' म्हणजे निर्वाणाला आलंबन करून. 'उदयत्थगामिनिया' म्हणजे उदय (उत्पत्ती) आणि अस्त (विनाश) जाणणारी, म्हणजेच उदय-व्यय ग्रहण करणारी, असा अर्थ आहे. या सुत्तात श्रद्धा, स्मृती आणि प्रज्ञा ही इंद्रिये पूर्वभागीय (प्रारंभिक) आहेत, वीर्येंद्रिय मिश्रित आहे आणि समाधींद्रिय केवळ उत्पन्न झालेल्या लोकोत्तर भूमीचेच सांगितले आहे. दहाव्या सुत्तातही हाच धर्म-निश्चय (धम्मपरिच्छेद) समजावा. සුද්ධිකවග්ගො පඨමො. शुद्धिकवर्ग पहिला समाप्त. 2. මුදුතරවග්ගො २. मुदुतरवर्ग 1. පටිලාභසුත්තවණ්ණනා १. पटिलाभसुत्तवर्णना 481. දුතියවග්ගස්ස පඨමෙ සම්මප්පධානෙ ආරබ්භාති සම්මප්පධානෙ පටිච්ච, සම්මප්පධානෙ භාවෙන්තොති අත්ථො. සතින්ද්රියෙපි එසෙව නයො. ४८१. दुसऱ्या वर्गाच्या पहिल्या सुत्तात 'सम्मदप्पधाने आरब्भ' म्हणजे सम्यक् प्रधानाचा (सम्यक् व्यायामाचा) आश्रय घेऊन, सम्यक् प्रधानाचा विकास (भावना) करत, असा अर्थ आहे. स्मृतींद्रियाच्या बाबतीतही हाच नियम (नय) समजावा. 2. පඨමසංඛිත්තසුත්තවණ්ණනා २. प्रथमसंखित्तसुत्तवर्णना 482. දුතියෙ තතොති විපස්සනාමග්ගඵලවසෙන නිස්සක්කං වෙදිතබ්බං. සමත්තානි හි පරිපුණ්ණානි පඤ්චින්ද්රියානි අරහත්තමග්ගස්ස විපස්සනින්ද්රියානි නාම හොන්ති. තතො මුදුතරෙහීති තෙහි අරහත්තමග්ගස්ස විපස්සනින්ද්රියෙහි මුදුතරානි අනාගාමිමග්ගස්ස විපස්සනින්ද්රියානි නාම හොන්ති, තතො මුදුතරානි සකදාගාමිමග්ගස්ස, තතො මුදුතරානි සොතාපත්තිමග්ගස්ස විපස්සනින්ද්රියානි නාම හොන්ති, තතො මුදුතරානි ධම්මානුසාරිමග්ගස්ස, තතො මුදුතරානි සද්ධානුසාරිමග්ගස්ස විපස්සනින්ද්රියානි නාම හොන්ති. ४८२. दुसऱ्या सुत्तात 'ततो' (त्यापेक्षा) हे पद विपश्यना, मार्ग आणि फल यांच्या अपेक्षेने पंचमी विभक्तीत (निसक्क/अपादान अर्थाने) समजावे. कारण परिपूर्ण आणि समृद्ध अशी पाच इंद्रिये ही अर्हत् मार्गाची 'विपश्यना-इंद्रिये' असतात. 'ततो मुदुतरेहि' म्हणजे त्या अर्हत् मार्गाच्या विपश्यना-इंद्रियांपेक्षा मृदू (सौम्य) असणारी इंद्रिये ही अनागामी मार्गाची विपश्यना-इंद्रिये असतात; त्यापेक्षा मृदू असणारी सकदागामी मार्गाची; त्यापेक्षा मृदू असणारी स्रोतापत्ती मार्गाची विपश्यना-इंद्रिये असतात; त्यापेक्षा मृदू असणारी धम्मानुसारी मार्गाची; आणि त्यापेक्षा मृदू असणारी सद्धानुसारी मार्गाची विपश्यना-इंद्रिये असतात. තථා සමත්තානි පරිපුණ්ණානි පඤ්චින්ද්රියානි අරහත්තමග්ගින්ද්රියානි නාම හොන්ති, තතො මුදුතරානි අනාගාමිමග්ගින්ද්රියානි නාම හොන්ති, තතො මුදුතරානි සකදාගාමිමග්ගින්ද්රියානි නාම හොන්ති, තතො මුදුතරානි සොතාපත්තිමග්ගින්ද්රියානි නාම හොන්ති, තතො මුදුතරානි ධම්මානුසාරිමග්ගින්ද්රියානි, තතො මුදුතරානි සද්ධානුසාරිමග්ගින්ද්රියානි නාම හොන්ති. त्याचप्रमाणे, परिपूर्ण अशी पाच इंद्रिये ही अर्हत् मार्गेंद्रिये असतात; त्यापेक्षा मृदू असणारी अनागामी मार्गेंद्रिये असतात; त्यापेक्षा मृदू असणारी सकदागामी मार्गेंद्रिये असतात; त्यापेक्षा मृदू असणारी स्रोतापत्ती मार्गेंद्रिये असतात; त्यापेक्षा मृदू असणारी धम्मानुसारी मार्गेंद्रिये; आणि त्यापेक्षा मृदू असणारी सद्धानुसारी मार्गेंद्रिये असतात. සමත්තානි [Pg.267] පරිපුණ්ණානි පඤ්චින්ද්රියානි අරහත්තඵලින්ද්රියානි නාම හොන්ති, තතො මුදුතරානි අනාගාමිඵලින්ද්රියානි, තතො මුදුතරානි සකදාගාමිඵලින්ද්රියානි, තතො මුදුතරානි සොතාපත්තිඵලින්ද්රියානි නාම හොන්ති. ධම්මානුසාරිසද්ධානුසාරිනො පන ද්වෙපි සොතාපත්තිමග්ගට්ඨපුග්ගලා, මග්ගට්ඨපුග්ගලවසෙන නෙසං නානත්තං ජාතන්ති ආගමනෙනපි මග්ගෙනපි. සද්ධානුසාරී පුග්ගලො හි උද්දිසාපෙන්තො පරිපුච්ඡන්තො අනුපුබ්බෙන මග්ගං පාපුණාති, ධම්මානුසාරී එකෙන වා ද්වීහි වා සවනෙහි. එවං තාව නෙසං ආගමනෙන නානත්තං වෙදිතබ්බං. परिपूर्ण अशी पाच इंद्रिये ही अर्हत् फलेंद्रिये असतात; त्यापेक्षा मृदू असणारी अनागामी फलेंद्रिये; त्यापेक्षा मृदू असणारी सकदागामी फलेंद्रिये; आणि त्यापेक्षा मृदू असणारी स्रोतापत्ती फलेंद्रिये असतात. धम्मानुसारी आणि सद्धानुसारी हे दोन्हीही स्रोतापत्ती मार्गस्थ पुद्गल (व्यक्ती) आहेत. मार्गस्थ पुद्गलांच्या अपेक्षेने त्यांच्यातील भिन्नता (नानात्व) आगम (अध्ययन) आणि मार्ग या दोन्ही कारणांनी निर्माण होते. सद्धानुसारी पुद्गल हा उपदेश ग्रहण करत आणि प्रश्न विचारत अनुक्रमाने मार्गाला प्राप्त करतो, तर धम्मानुसारी पुद्गल हा एकदा किंवा दोनदा ऐकल्यानेच मार्गाला प्राप्त करतो. अशा प्रकारे, प्रथम आगमाच्या (अध्ययनाच्या) आधारे त्यांच्यातील भिन्नता समजून घ्यावी. ධම්මානුසාරිස්ස පන මග්ගො තික්ඛො හොති, සූරං ඤාණං වහති, අසඞ්ඛාරෙන අප්පයොගෙන කිලෙසෙ ඡින්දති කදලික්ඛන්ධං විය තිඛිණා අසිධාරා. සද්ධානුසාරිස්ස න තස්ස විය මග්ගො තික්ඛො හොති, න සූරං ඤාණං වහති, සසඞ්ඛාරෙන සප්පයොගෙන කිලෙසෙ ඡින්දති කදලික්ඛන්ධං විය අතිඛිණා අසිධාරා. කිලෙසක්ඛයෙ පන තෙසං නානත්තං නත්ථි. අවසෙසා ච කිලෙසා ඛීයන්ති. धम्मानुसारी पुद्गलाचा मार्ग तीक्ष्ण असतो, तो शूर (प्रबळ) ज्ञान वहन करतो, आणि जशी तीक्ष्ण तलवारीची धार केळीचा खांब सहज कापून टाकते, तसा तो कोणत्याही संस्काराशिवाय (असंखारेन) व प्रयत्नाशिवाय क्लेशांचा छेद करतो. सद्धानुसारी पुद्गलाचा मार्ग त्याच्यासारखा तीक्ष्ण नसतो, तो प्रबळ ज्ञान वहन करत नाही, आणि जशी बोथट तलवारीची धार केळीचा खांब कापते, तसा तो संस्कारासह (ससंखारेन) व प्रयत्नासह क्लेशांचा छेद करतो. परंतु, क्लेशांच्या क्षय होण्याच्या बाबतीत त्यांच्यात काहीही भिन्नता नसते. उर्वरित क्लेशही नष्ट होतात. 3. දුතියසංඛිත්තසුත්තවණ්ණනා ३. द्वितीयसंखित्तसुत्तवर्णना 483. තතියෙ තතොති ඵලවසෙන නිස්සක්කං වෙදිතබ්බං. සමත්තානි හි පරිපුණ්ණානි පඤ්චින්ද්රියානි අරහත්තඵලින්ද්රියානි නාම හොන්ති, අරහත්තඵලෙන සමන්නාගතො පුග්ගලො අරහා නාම හොති. අරහත්තඵලතො මුදුතරානි අනාගාමිඵලින්ද්රියානි නාම හොන්ති, තතො මුදුතරානි සකදාගාමිඵලින්ද්රියානි, තතො මුදුතරානි සොතාපත්තිඵලින්ද්රියානි, සොතාපත්තිඵලෙන සමන්නාගතො පුග්ගලො සොතාපන්නො නාම හොති. ඉන්ද්රියවෙමත්තතා ඵලවෙමත්තතා හොතීති ඉන්ද්රියනානත්තෙන ඵලනානත්තං, ඵලනානත්තෙන පුග්ගලනානත්තන්ති. ४८३. तिसऱ्या सुत्तात 'ततो' (त्यापेक्षा) हे पद फलाच्या अपेक्षेने पंचमी विभक्तीत (निसक्क/अपादान अर्थाने) समजावे. परिपूर्ण अशी पाच इंद्रिये ही अर्हत् फलेंद्रिये असतात; अर्हत् फलाने युक्त असलेला पुद्गल 'अर्हत्' (अरिहंत) होतो. अर्हत् फलापेक्षा मृदू असणारी अनागामी फलेंद्रिये असतात; त्यापेक्षा मृदू असणारी सकदागामी फलेंद्रिये; त्यापेक्षा मृदू असणारी स्रोतापत्ती फलेंद्रिये असतात; आणि स्रोतापत्ती फलाने युक्त असलेला पुद्गल 'स्रोतापन्न' होतो. 'इंद्रियवेमत्तता फलवेमत्तता होती' म्हणजे इंद्रियांच्या भिन्नतेमुळे फलांची भिन्नता होते आणि फलांच्या भिन्नतेमुळे पुद्गलांची (व्यक्तींची) भिन्नता होते. 4. තතියසංඛිත්තසුත්තවණ්ණනා ४. तृतीयसंखित्तसुत्तवर्णना 484. චතුත්ථෙ පරිපූරං පරිපූරකාරී ආරාධෙතීති පරිපූරං අරහත්තමග්ගං කරොන්තො අරහත්තඵලං ආරාධෙති. පදෙසං පදෙසකාරීති අවසෙසෙ තයො පදෙසමග්ගෙ කරොන්තො පදෙසං ඵලත්තයමත්තමෙව ආරාධෙති. ඉති ඉමෙසු චතූසුපි සුත්තෙසු මිස්සකානෙව ඉන්ද්රියානි කථිතානි. ४८४. चौथ्या सुत्तात 'परिपूरं परिपूरकारी आराधति' म्हणजे परिपूर्ण अर्हत् मार्गाचे आचरण करणारा अर्हत् फलाची प्राप्ती करतो. 'पदेसं पदेसकारी' म्हणजे उर्वरित तीन प्रादेशिक (अंशतः) मार्गांचे आचरण करणारा केवळ प्रादेशिक अशा तीन खालच्या फलांचीच प्राप्ती करतो. अशा प्रकारे, या चारही सुत्तांमध्ये मिश्रित इंद्रियांचेच वर्णन केले आहे. 5-7. පඨමවිත්ථාරසුත්තාදිවණ්ණනා ५-७. प्रथमवित्थारसुत्तादिवर्णना 485-487. පඤ්චමෙ [Pg.268] තතො මුදුතරෙහීති විපස්සනාවසෙන නිස්සක්කං වෙදිතබ්බං. පරිපුණ්ණානි හි පඤ්චින්ද්රියානි අරහත්තමග්ගස්ස විපස්සනින්ද්රියානි හොන්ති, තතො මුදුතරානි අන්තරාපරිනිබ්බායිස්ස විපස්සනින්ද්රියානි, තතො මුදුතරානි උපහච්චපරිනිබ්බායිස්ස, තතො මුදුතරානි අසඞ්ඛාරපරිනිබ්බායිස්ස, තතො මුදුතරානි සසඞ්ඛාරපරිනිබ්බායිස්ස, තතො මුදුතරානි උද්ධංසොතඅකනිට්ඨගාමිස්ස විපස්සනින්ද්රියානි නාම හොන්ති. ४८५-४८७. पाचव्या सुत्तात 'ततो मुदुतरेहि' हे पद विपश्यनेच्या अपेक्षेने पंचमी विभक्तीत समजावे. परिपूर्ण अशी पाच इंद्रिये ही अर्हत् मार्गाची विपश्यना-इंद्रिये असतात; त्यापेक्षा मृदू असणारी अंतरा-परिनिब्बायी (अंतरा-परिनिर्वाणगामी) पुद्गलाची विपश्यना-इंद्रिये असतात; त्यापेक्षा मृदू असणारी उपहच्च-परिनिब्बायीची; त्यापेक्षा मृदू असणारी असंखार-परिनिब्बायीची; त्यापेक्षा मृदू असणारी ससंखार-परिनिब्बायीची; आणि त्यापेक्षा मृदू असणारी उद्धंसोत-अकनिठ्ठगामी (उर्ध्वस्रोत-अकनिष्ठगामी) पुद्गलाची विपश्यना-इंद्रिये असतात. ඉමස්මිං පන ඨානෙ අරහත්තමග්ගෙයෙව ඨත්වා පඤ්ච නිස්සක්කානි නීහරිතබ්බානි. අරහත්තමග්ගස්ස හි විපස්සනින්ද්රියෙහි මුදුතරානි පඨමඅන්තරාපරිනිබ්බායිස්ස විපස්සනින්ද්රියානි, තතො මුදුතරානි දුතියඅන්තරාපරිනිබ්බායිස්ස, තතො මුදුතරානි තතියඅන්තරාපරිනිබ්බායිස්ස, තතො මුදුතරානි උපහච්චපරිනිබ්බායිස්ස, තතො මුදුතරානි උද්ධංසොතඅකනිට්ඨගාමිස්ස විපස්සනින්ද්රියානි. අසඞ්ඛාරපරිනිබ්බායිස්ස සසඞ්ඛාරපරිනිබ්බායිනොපි එතෙව පඤ්ච ජනා. परंतु या ठिकाणी अर्हत् मार्गावरच स्थित राहून पाच अपादाने (निसक्क) बाहेर काढली पाहिजेत. अर्हत् मार्गाच्या विपश्यना-इंद्रियांपेक्षा मृदू असणारी इंद्रिये ही पहिल्या अंतरा-परिनिब्बायीची विपश्यना-इंद्रिये असतात; त्यापेक्षा मृदू असणारी दुसऱ्या अंतरा-परिनिब्बायीची; त्यापेक्षा मृदू असणारी तिसऱ्या अंतरा-परिनिब्बायीची; त्यापेक्षा मृदू असणारी उपहच्च-परिनिब्बायीची; आणि त्यापेक्षा मृदू असणारी उद्धंसोत-अकनिठ्ठगामीची विपश्यना-इंद्रिये असतात. असंखार-परिनिब्बायी आणि ससंखार-परिनिब्बायी हे देखील हेच पाच पुद्गल (व्यक्ती) आहेत. ඉදානි තීණි නිස්සක්කානි. සකදාගාමිමග්ගස්ස හි ඉන්ද්රියෙහි මුදුතරානි සොතාපත්තිමග්ගින්ද්රියානි, සොතාපත්තිමග්ගෙයෙව ඉන්ද්රියෙහි මුදුතරානි ධම්මානුසාරිමග්ගින්ද්රියානි. තෙහිපි මුදුතරානි සද්ධානුසාරිමග්ගින්ද්රියානි. ඡට්ඨසත්තමානි වුත්තනයානෙව. ඉමෙසු පන තීසුපි සුත්තෙසු පුබ්බභාගවිපස්සනින්ද්රියානෙව කථිතානි. आता तीन अपादाने (निसक्क) आहेत. सकदागामी मार्गाच्या इंद्रियांपेक्षा मृदू असणारी स्रोतापत्ती मार्गेंद्रिये असतात; स्रोतापत्ती मार्गाच्याच इंद्रियांपेक्षा मृदू असणारी धम्मानुसारी मार्गेंद्रिये असतात; आणि त्यापेक्षाही मृदू असणारी सद्धानुसारी मार्गेंद्रिये असतात. सहावे आणि सातवे सुत्त पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावे. परंतु या तिन्ही सुत्तांमध्ये केवळ पूर्वभागीय विपश्यना-इंद्रियांचेच वर्णन केले आहे. 8. පටිපන්නසුත්තවණ්ණනා ८. प्रतिपन्नसुत्तवण्णना (प्रतिपन्न सुत्ताचे स्पष्टीकरण) 488. අට්ඨමෙ තතො මුදුතරෙහීති මග්ගඵලවසෙන නිස්සක්කං වෙදිතබ්බං. තං පාළියං වුත්තමෙව. බාහිරොති ඉමෙහි අට්ඨහි පුග්ගලෙහි බහිභූතො. පුථුජ්ජනපක්ඛෙ ඨිතොති පුථුජ්ජනකොට්ඨාසෙ ඨිතො. ඉමස්මිං සුත්තෙ ලොකුත්තරානෙව ඉන්ද්රියානි කථිතානි. ४८८. आठव्या सूत्रात, 'ततो मुदुतरेहि' (त्यापेक्षा अधिक मृदू इंद्रिये असणाऱ्यांद्वारे) हे पद मार्ग आणि फळाच्या संबंधाने अपादान अर्थाने जाणावे. ते पाळीमध्ये (मूळ पाठात) 'अरहत्तफलसच्छिकिरियाय पटिपन्नो होति' (अर्हत्वफलाच्या साक्षात्कारासाठी प्रतिपन्न असलेला होतो) इत्यादी प्रकारे सांगितलेच आहे. 'बाहिरो' (बाह्य) म्हणजे या आठ पुद्गलांच्या (चार मार्ग आणि चार फळ प्राप्त व्यक्तींच्या) बाहेर असलेला. 'पुथुज्जनपक्खे ठितो' (पृथग्जन पक्षात स्थित) म्हणजे पृथग्जन समूहात स्थित असलेला. या सूत्रात केवळ लोकोत्तर इंद्रियेच सांगितली आहेत. 9-10. සම්පන්නසුත්තාදිවණ්ණනා ९-१०. संपन्नसुत्तादिवण्णना (संपन्न सुत्त इत्यादींचे स्पष्टीकरण) 489-490. නවමෙ [Pg.269] ඉන්ද්රියසම්පන්නොති පරිපුණ්ණින්ද්රියො. දසමං උත්තානමෙව. ඉමස්මිං සුත්තද්වයෙ මිස්සකානි ඉන්ද්රියානි කථිතානීති. ४८९-४९०. नवव्या सूत्रात, 'इन्द्रिय सम्पन्नो' म्हणजे परिपूर्ण इंद्रिये असलेला. दहावे सूत्र स्पष्टच आहे. या दोन्ही सूत्रांमध्ये मिश्र इंद्रिये सांगितली आहेत. මුදුතරවග්ගො දුතියො. दुसरा मुदुतर वर्ग समाप्त. 3. ඡළින්ද්රියවග්ගො ३. छळिन्द्रियवग्गो (सहा इंद्रियांचा वर्ग) 2. ජීවිතින්ද්රියසුත්තවණ්ණනා २. जीवितिन्द्रियसुत्तवण्णना (जीवितिन्द्रिय सुत्ताचे स्पष्टीकरण) 492. තතියවග්ගස්ස දුතියෙ ඉත්ථින්ද්රියන්තිආදීසු ඉත්ථිභාවෙ ඉන්දට්ඨං කරොතීති ඉත්ථින්ද්රියං. පුරිසභාවෙ ඉන්දට්ඨං කරොතීති පුරිසින්ද්රියං. ජීවිතෙ ඉන්දට්ඨං කරොතීති ජීවිතින්ද්රියං. අත්ථුප්පත්තිකං කිරෙතං සුත්තං. සඞ්ඝමජ්ඣස්මිඤ්හි ‘‘කති නු ඛො වට්ටින්ද්රියානී’’ති කථා උදපාදි, අථ භගවා වට්ටින්ද්රියානි දස්සෙන්තො තීණිමානි භික්ඛවෙතිආදිමාහ. ४९२. तिसऱ्या वर्गाच्या दुसऱ्या सूत्रात, 'इत्थिन्द्रियं' इत्यादी पदांमध्ये—स्त्रीत्वाच्या बाबतीत जे प्रभूत्व गाजवते, ते 'इत्थिन्द्रिय' (स्त्री-इंद्रिय) होय. पुरुषत्वाच्या बाबतीत जे प्रभूत्व गाजवते, ते 'पुरिसिन्द्रिय' (पुरुष-इंद्रिय) होय. जीवनाच्या (अस्तित्वाच्या) बाबतीत जे प्रभूत्व गाजवते, ते 'जीवितिन्द्रिय' (जीवित-इंद्रिय) होय. हे सूत्र एका विशिष्ट प्रसंगावरून उपदेशिले गेले आहे. कारण, संघामध्ये 'संसारचक्राची इंद्रिये किती आहेत बरे?' अशी चर्चा सुरू झाली होती. तेव्हा भगवंतांनी संसारचक्राची इंद्रिये दर्शवण्यासाठी 'तीणिमानि भिक्खवे' (भिक्खूंनो, ही तीन इंद्रिये आहेत) इत्यादी उपदेश केला. 3. අඤ්ඤින්ද්රියසුත්තවණ්ණනා ३. अञ्ञिन्द्रियसुत्तवण्णना (अञ्ञिन्द्रिय सुत्ताचे स्पष्टीकरण) 493. තතියෙ අනඤ්ඤාතඤ්ඤස්සාමීතින්ද්රියන්ති ‘‘අනමතග්ගෙ සංසාරෙ අජානිතපුබ්බං ධම්මං ජානිස්සාමී’’ති පටිපන්නස්ස සොතාපත්තිමග්ගක්ඛණෙ උප්පන්නං ඉන්ද්රියං. අඤ්ඤින්ද්රියන්ති තෙසංයෙව ඤාතධම්මානං ආජානනාකාරෙන සොතාපත්තිඵලාදීසු ඡසු ඨානෙසු උප්පන්නං ඉන්ද්රියං. අඤ්ඤාතාවින්ද්රියන්ති අඤ්ඤාතාවීසු අරහත්තඵලධම්මෙසු උප්පන්නං ඉන්ද්රියං. තත්ථ තත්ථ තෙන තෙනාකාරෙන උප්පන්නස්ස ඤාණස්සෙවෙතං අධිවචනං. ඉදම්පි සුත්තං අත්ථුප්පත්තිකමෙව. සඞ්ඝමජ්ඣස්මිඤ්හි ‘‘කති නු ඛො ලොකුත්තරින්ද්රියානී’’ති කථා උදපාදි, අථ භගවා තානි දස්සෙන්තො තීණිමානි, භික්ඛවෙ, ඉන්ද්රියානීතිආදිමාහ. ४९३. तिसऱ्या सूत्रात, 'अनञ्ञातञ्ञस्samītiन्द्रियं' (अज्ञात गोष्टीला जाणण्याची इच्छा असणाऱ्याचे इंद्रिय) म्हणजे अनादी संसारात पूर्वी कधीही न जाणलेल्या (चार आर्यसत्य रूप) धर्माला 'मी जाणीन' अशा इच्छेने साधना करणाऱ्या पुद्गलाच्या स्रोतापत्ती मार्गक्षणी उत्पन्न झालेले इंद्रिय होय. 'अञ्ञिन्द्रियं' (आज्ञा-इंद्रिय) म्हणजे त्याच आधीच जाणलेल्या धर्मांना जाणण्याच्या प्रक्रियेने स्रोतापत्ती फळापासून सुरू होणाऱ्या सहा अवस्थांमध्ये उत्पन्न झालेले इंद्रिय होय. 'अञ्ञाताविन्द्रियं' (पूर्णपणे जाणलेल्याचे इंद्रिय) म्हणजे ज्यांनी सत्य पूर्णपणे जाणले आहे अशा अर्हत्वफलाच्या धर्मांमध्ये उत्पन्न झालेले इंद्रिय होय. त्या त्या अवस्थेत त्या त्या रूपाने उत्पन्न झालेल्या ज्ञानाचेच हे नाव (अधिवाचन) आहे. हे सूत्र देखील विशिष्ट प्रसंगावरूनच उपदेशिले गेले आहे. कारण, संघामध्ये 'लोकोत्तर इंद्रिये किती आहेत बरे?' अशी चर्चा सुरू झाली होती. तेव्हा भगवंतांनी ती दर्शवण्यासाठी 'तीणिमानि, भिक्खवे, इन्द्रियानि' (भिक्खूंनो, ही तीन इंद्रिये आहेत) इत्यादी उपदेश केला. 4. එකබීජීසුත්තවණ්ණනා ४. एकबीजीसुत्तवण्णना (एकबीजी सुत्ताचे स्पष्टीकरण) 494. චතුත්ථෙ තතො මුදුතරෙහීති විපස්සනතො නිස්සක්කං වෙදිතබ්බං. සමත්තානි හි පඤ්චින්ද්රියානි අරහත්තමග්ගස්ස විපස්සනින්ද්රියානි නාම හොන්ති, තතො මුදුතරානි [Pg.270] අන්තරාපරිනිබ්බායිස්ස විපස්සනින්ද්රියානි, තතො මුදුතරානි උපහච්චපරිනිබ්බායිස්ස, තතො මුදුතරානි අසඞ්ඛාරපරිනිබ්බායිස්ස, තතො මුදුතරානි සසඞ්ඛාරපරිනිබ්බායිස්ස, තතො මුදුතරානි උද්ධංසොතඅකනිට්ඨගාමිස්ස විපස්සනින්ද්රියානි නාම. ඉධාපි පුරිමනයෙනෙව අරහත්තමග්ගෙ ඨත්වා පඤ්ච නිස්සක්කානි නීහරිතබ්බානි. ४९४. चौथ्या सूत्रात, 'ततो मुदुतरेहि' हे पद विपश्यना इंद्रियांच्या अपेक्षेने अपादान अर्थाने जाणावे. कारण, परिपूर्ण असलेली पाच इंद्रिये अर्हत् मार्गाची 'विपश्यना इंद्रिये' म्हटली जातात; त्यापेक्षा मृदू असलेली इंद्रिये अंतरापरिनिब्बायी (अनागामी) पुद्गलाची विपश्यना इंद्रिये असतात; त्यापेक्षा मृदू असलेली इंद्रिये उपहच्चपरिनिब्बायीची; त्यापेक्षा मृदू असलेली इंद्रिये असंखारपरिनिब्बायीची; त्यापेक्षा मृदू असलेली इंद्रिये ससंखारपरिनिब्बायीची; आणि त्यापेक्षा मृदू असलेली इंद्रिये उद्धंसोत-अकनिठ्ठगामीची विपश्यना इंद्रिये म्हटली जातात. येथेही पूर्वीच्याच पद्धतीने अर्हत् मार्गावर स्थित राहून पाच अपादान पदे स्पष्ट करावीत. යථා පන පුරිමනයෙ සකදාගාමිමග්ගෙ ඨත්වා තීණි නිස්සක්කානි, එවමිධ පඤ්ච නීහරිතබ්බානි. සකදාගාමිමග්ගස්ස හි විපස්සනින්ද්රියෙහි මුදුතරානි සොතාපත්තිමග්ගස්ස විපස්සනින්ද්රියානි, සොතාපත්තිමග්ගස්ස ච තෙහි විපස්සනින්ද්රියෙහි මුදුතරානි එකබීජිආදීනං මග්ගස්ස විපස්සනින්ද්රියානි. परंतु, ज्याप्रमाणे पूर्वीच्या पद्धतीमध्ये सकदागामी मार्गावर स्थित राहून तीन अपादान पदे काढली जातात, त्याचप्रमाणे येथे पाच अपादान पदे स्पष्ट करावीत. कारण, सकदागामी मार्गाच्या विपश्यना इंद्रियांपेक्षा मृदू असलेली इंद्रिये स्रोतापत्ती मार्गाची विपश्यना इंद्रिये असतात; आणि स्रोतापत्ती मार्गाच्या त्या विपश्यना इंद्रियांपेक्षा मृदू असलेली इंद्रिये एकबीजी इत्यादी (स्रोतापन्नांच्या) मार्गाची विपश्यना इंद्रिये असतात. එත්ථ ච එකබීජීතිආදීසු යො සොතාපන්නො හුත්වා එකමෙව අත්තභාවං ජනෙත්වා අරහත්තං පාපුණාති, අයං එකබීජී නාම. යථාහ ‘‘කතමො ච පුග්ගලො එකබීජී, ඉධෙකච්චො පුග්ගලො තිණ්ණං සංයොජනානං පරික්ඛයා සොතාපන්නො හොති අවිනිපාතධම්මො නියතො සම්බොධිපරායණො, සො එකඤ්ඤෙව මානුසකං භවං සන්ධාවිත්වා සංසරිත්වා දුක්ඛස්සන්තං කරොති. අයං වුච්චති පුග්ගලො එකබීජී’’ති (පු. ප. 33). आणि येथे 'एकबीजी' इत्यादींमध्ये, जो स्रोतापन्न होऊन केवळ एकच जन्म (आत्मभाव) घेऊन अर्हत्त्वाला प्राप्त होतो, तो 'एकबीजी' होय. जसे की म्हटले आहे—'कोणता पुद्गल एकबीजी असतो? येथे एखादा पुद्गल तीन संयोजनांच्या क्षयामुळे स्रोतापन्न होतो, अपाय गतीला न जाण्याचा स्वभाव असणारा, नियत आणि संबोधीकडे वाटचाल करणारा होतो. तो केवळ एकाच मानवी जन्मात जन्म घेऊन आणि संसार करून दुःखाचा अंत करतो. या पुद्गलाला एकबीजी असे म्हटले जाते.' යො පන ද්වෙ තයො භවෙ සංසරිත්වා දුක්ඛස්සන්තං කරොති, අයං කොලංකොලො නාම. යථාහ ‘‘කතමො ච පුග්ගලො කොලංකොලො. ඉධෙකච්චො පුග්ගලො තිණ්ණං සංයොජනානං පරික්ඛයා සොතාපන්නො හොති අවිනිපාතධම්මො නියතො සම්බොධිපරායණො, සො ද්වෙ වා තීණි වා කුලානි සන්ධාවිත්වා සංසරිත්වා දුක්ඛස්සන්තං කරොති. අයං වුච්චති පුග්ගලො කොලංකොලො’’ති (පු. ප. 32). තත්ථ කුලානීති භවා වෙදිතබ්බා. ‘‘ද්වෙ වා තීණි වා’’ති ඉදං දෙසනාමත්තමෙව, යාව ඡට්ඨභවා සංසරන්තො පන කොලංකොලොව හොති. परंतु जो दोन किंवा तीन जन्मांमध्ये संसार करून दुःखाचा अंत करतो, तो 'कोलंकुल' होय. जसे की म्हटले आहे—'कोणता पुद्गल कोलंकुल असतो? येथे एखादा पुद्गल तीन संयोजनांच्या क्षयामुळे स्रोतापन्न होतो, अपाय गतीला न जाण्याचा स्वभाव असणारा, नियत आणि संबोधीकडे वाटचाल करणारा होतो. तो दोन किंवा तीन कुलांमध्ये जन्म घेऊन आणि संसार करून दुःखाचा अंत करतो. या पुद्गलाला कोलंकुल असे म्हटले जाते.' तेथे 'कुलानि' म्हणजे 'भव' (जन्म) असे जाणावे. 'दोन किंवा तीन' हे केवळ देशनामात्र (उदाहरणादाखल) आहे; परंतु सहाव्या जन्मापर्यंत संसार करणारा देखील कोलंकुलच असतो. යස්ස සත්තක්ඛත්තුං පරමා උපපත්ති, අට්ඨමං භවං නාදියති, අයං සත්තක්ඛත්තුපරමො නාම. යථාහ ‘‘කතමො ච පුග්ගලො සත්තක්ඛත්තුපරමො. ඉධෙකච්චො පුග්ගලො තිණ්ණං සංයොජනානං පරික්ඛයා සොතාපන්නො හොති අවිනිපාතධම්මො නියතො සම්බොධිපරායණො, සො සත්තක්ඛත්තුං දෙවෙ ච මනුස්සෙ ච සන්ධාවිත්වා සංසරිත්වා දුක්ඛස්සන්තං කරොති, අයං වුච්චති පුග්ගලො සත්තක්ඛත්තුපරමො’’ති (පු. ප. 31). ज्याचा जास्तीत जास्त सात वेळा जन्म होतो आणि जो आठवा जन्म घेत नाही, तो 'सत्तक्खत्तुपरम' होय. जसे की म्हटले आहे—'कोणता पुद्गल सत्तक्खत्तुपरम असतो? येथे एखादा पुद्गल तीन संयोजनांच्या क्षयामुळे स्रोतापन्न होतो, अपाय गतीला न जाण्याचा स्वभाव असणारा, नियत आणि संबोधीकडे वाटचाल करणारा होतो. तो जास्तीत जास्त सात वेळा देवलोकात आणि मनुष्यलोकात जन्म घेऊन आणि संसार करून दुःखाचा अंत करतो. या पुद्गलाला सत्तक्खत्तुपरम असे म्हटले जाते.' භගවතා [Pg.271] ගහිතනාමවසෙනෙව චෙතානි තෙසං නාමානි. ‘‘එත්තකඤ්හි ඨානං ගතො එකබීජී නාම හොති, එත්තකං කොලංකොලො, එත්තකං සත්තක්ඛත්තුපරමො’’ති භගවතා එතෙසං නාමං ගහිතං. නියමතො පන ‘‘අයං එකබීජී, අයං කොලංකොලො, අයං සත්තක්ඛත්තුපරමො’’ති නත්ථි. भगवंतांनी स्वीकारलेल्या नावांच्या आधारेच ही त्यांची नावे पडली आहेत. 'कारण, इतक्या मर्यादेपर्यंत गेलेला एकबीजी होतो, इतक्या मर्यादेपर्यंत गेलेला कोलंकुल होतो, आणि इतक्या मर्यादेपर्यंत गेलेला सत्तक्खत्तुपरम होतो,' असे भगवंतांनी त्यांचे नामकरण केले आहे. परंतु निश्चित नियमाने 'हाच एकबीजी, हाच कोलंकुल, हाच सत्तक्खत्तुपरम' असा कोणताही कठोर नियम नाही. කො පන නෙසං එතං පභෙදං නියමෙතීති? කෙචි පන ථෙරා ‘‘පුබ්බහෙතු නියමෙතී’’ති වදන්ති, කෙචි ‘‘පඨමමග්ගො’’, කෙචි ‘‘උපරිම තයො මග්ගා’’, කෙචි ‘‘තිණ්ණං මග්ගානං විපස්සනා’’ති. තත්ථ ‘‘පුබ්බහෙතු නියමෙතී’’ති වාදෙ පඨමමග්ගස්ස උපනිස්සයො කතො නාම හොති, උපරි තයො මග්ගා අනුපනිස්සයා උප්පන්නාති වචනං ආපජ්ජති. ‘‘පඨමමග්ගො නියමෙතී’’ති වාදෙ උපරි තිණ්ණං මග්ගානං නිරත්ථකතා ආපජ්ජති. ‘‘උපරි තයො මග්ගා නියමෙන්තී’’ති වාදෙ පඨමමග්ගෙ අනුප්පන්නෙව උපරි තයො මග්ගා උප්පන්නාති ආපජ්ජති. ‘‘තිණ්ණං මග්ගානං විපස්සනා නියමෙතී’’ති වාදො පන යුජ්ජති. සචෙ හි උපරි තිණ්ණං මග්ගානං විපස්සනා බලවතී හොති, එකබීජී නාම හොති, තතො මන්දතරාය කොලංකොලො, තතො මන්දතරාය සත්තක්ඛත්තුපරමොති. परंतु त्यांच्यातील हा भेद कोण निश्चित करतो? काही थेर म्हणतात की, 'पूर्वहेतू (पूर्वीचे कारण) हा भेद निश्चित करतो.' काही म्हणतात, 'प्रथम मार्ग निश्चित करतो.' काही म्हणतात, 'वरचे तीन मार्ग निश्चित करतात.' तर काही म्हणतात, 'वरच्या तीन मार्गांची विपश्यना निश्चित करते.' त्यापैकी, 'पूर्वहेतू निश्चित करतो' या वादात—प्रथम मार्गाचा प्रबळ आधार (उपनिस्सय) घेतला गेला आहे आणि वरचे तीन मार्ग प्रबळ आधाराशिवाय उत्पन्न झाले, असे म्हणण्याची पाळी येते. 'प्रथम मार्ग निश्चित करतो' या वादात—वरच्या तीन मार्गांची निरर्थकता सिद्ध होते. 'वरचे तीन मार्ग निश्चित करतात' या वादात—प्रथम मार्ग उत्पन्न न होताच वरचे तीन मार्ग उत्पन्न झाले, असे मानावे लागते. परंतु, 'वरच्या तीन मार्गांची विपश्यना निश्चित करते' हा वाद योग्य वाटतो. कारण जर वरच्या तीन मार्गांची विपश्यना प्रबळ असेल, तर तो 'एकबीजी' होतो; त्यापेक्षा मंद विपश्यनेने 'कोलंकुल' होतो; आणि त्यापेक्षाही मंद विपश्यनेने 'सत्तक्खत्तुपरम' होतो. එකච්චො හි සොතාපන්නො වට්ටජ්ඣාසයො හොති වට්ටාභිරතො පුනප්පුනං වට්ටස්මිංයෙව විචරති සන්දිස්සති. අනාථපිණ්ඩිකො සෙට්ඨි, විසාඛා උපාසිකා, චූළරථමහාරථා දෙවපුත්තා, අනෙකවණ්ණො දෙවපුත්තො, සක්කො දෙවරාජා, නාගදත්තො දෙවපුත්තොති ඉමෙ හි එත්තකා ජනා වට්ටජ්ඣාසයා වට්ටාභිරතා ආදිතො පට්ඨාය ඡ දෙවලොකෙ සොධෙත්වා අකනිට්ඨෙ ඨත්වා පරිනිබ්බායිස්සන්ති, ඉමෙ ඉධ න ගහිතා. න කෙවලඤ්චිමෙ, යොපි මනුස්සෙසුයෙව සත්තක්ඛත්තුං සංසරිත්වා අරහත්තං පාපුණාති, යොපි දෙවලොකෙ නිබ්බත්තො දෙවෙසුයෙව සත්තක්ඛත්තුං අපරාපරං සංසරිත්වා අරහත්තං පාපුණාති, ඉමෙපි ඉධ න ගහිතා. කාලෙන දෙවෙ, කාලෙන මනුස්සෙ සංසරිත්වා පන අරහත්තං පාපුණන්තොව ඉධ ගහිතො. තස්මා සත්තක්ඛත්තුපරමොති ඉදං ඉධට්ඨකවොකිණ්ණසුක්ඛවිපස්සකස්ස නාමං කථිතන්ති වෙදිතබ්බං. काही सोतापन्न संसारात (वट्ट) राहण्याची इच्छा असणारे आणि संसारात रमणारे असतात, ते वारंवार संसारातच फिरत राहतात, असे दिसून येते. अनाथपिंडिक श्रेष्ठी, विशाखा उपासिका, चूळरथ व महारथ देवपुत्र, अनेकवण्ण देवपुत्र, सक्क देवराज आणि नागदत्त देवपुत्र - हे सर्व लोक संसारात राहण्याची इच्छा असणारे व संसारात रमणारे असून, सुरुवातीपासून सहा देवलोकांमध्ये विहार करून (शुद्ध होऊन), शेवटी अकनिठ्ठ देवलोकात राहून परिनिर्वाण प्राप्त करतील. हे सोतापन्न येथे (या निर्देशात) घेतलेले नाहीत. केवळ हेच नव्हे, तर जो सोतापन्न केवळ मनुष्यांमध्येच सात वेळा जन्म घेऊन अर्हत्त्व प्राप्त करतो, किंवा जो देवलोकात उत्पन्न होऊन केवळ देवांमध्येच सात वेळा वारंवार जन्म घेऊन अर्हत्त्व प्राप्त करतो, ते देखील येथे घेतलेले नाहीत. परंतु, जो कधी देवलोकात तर कधी मनुष्यलोकात जन्म घेऊन अर्हत्त्व प्राप्त करतो, तोच येथे घेतला आहे. म्हणून, 'सत्तक्खत्तुपरम' हे नाव येथे कामभवात राहून ध्यान-समापत्ती न मिळवलेल्या कोरड्या विपश्यना करणाऱ्या (सुक्खविपस्सक) सोतापन्नाच्या संदर्भात भगवंतांनी सांगितले आहे, असे जाणावे. ධම්මානුසාරී සද්ධානුසාරීති එත්ථ පන ඉමස්මිං සාසනෙ ලොකුත්තරධම්මං නිබ්බත්තෙන්තස්ස ද්වෙ ධුරානි, ද්වෙ සීසානි, ද්වෙ අභිනිවෙසා – සද්ධාධුරං, පඤ්ඤාධුරං[Pg.272], සද්ධාසීසං, පඤ්ඤාසීසං, සද්ධාභිනිවෙසො, පඤ්ඤාභිනිවෙසොති. තත්ථ යො භික්ඛු ‘‘සචෙ සද්ධාය සක්කා නිබ්බත්තෙතුං, නිබ්බත්තෙස්සාමි ලොකුත්තරමග්ග’’න්ති සද්ධං ධුරං කත්වා සොතාපත්තිමග්ගං නිබ්බත්තෙති, සො මග්ගක්ඛණෙ සද්ධානුසාරී නාම හොති. ඵලක්ඛණෙ පන සද්ධාවිමුත්තො නාම හුත්වා එකබීජී කොලංකොලො සත්තක්ඛත්තුපරමොති තිවිධො හොති. තත්ථ එකෙකො දුක්ඛාපටිපදාදිවසෙන චතුබ්බිධභාවං ආපජ්ජතීති සද්ධාධුරෙන ද්වාදස ජනා හොන්ති. आता, 'धम्मानुसारी' आणि 'सद्धानुसारी' या संदर्भात, या शासनात लोकोत्तर धर्म उत्पन्न करणाऱ्या व्यक्तीचे दोन धुर (भार), दोन शीस (प्रमुख मार्गदर्शक) आणि दोन अभिनिवेश (मनोवृत्ती) असतात - श्रद्धाधुर व प्रज्ञाधुर, श्रद्धासीस व प्रज्ञासीस, श्रद्धाभिनिवेश व प्रज्ञाभिनिवेश. त्यात, जो भिक्खू 'जर श्रद्धेने लोकोत्तर मार्ग उत्पन्न करणे शक्य असेल, तर मी तो उत्पन्न करीन' असा विचार करून श्रद्धेला मुख्य (धुर) करून सोतापत्तिमार्ग उत्पन्न करतो, तो मार्गक्षणी 'सद्धानुसारी' ठरतो. परंतु फलक्षणी तो 'सद्धाविमुक्त' होऊन एकबीजी, कोलंकोल आणि सत्तक्खत्तुपरम असा तीन प्रकारचा होतो. त्यात प्रत्येक जण दुःखद प्रतिपदा (दुक्खापटिपदा) इत्यादींच्या आधारे चार प्रकारचा होतो, अशा प्रकारे श्रद्धाधुराने बारा प्रकारचे सोतापन्न होतात. යො පන ‘‘සචෙ පඤ්ඤාය සක්කා නිබ්බත්තෙතුං, නිබ්බත්තෙස්සාමි ලොකුත්තරමග්ග’’න්ති පඤ්ඤං ධුරං කත්වා සොතාපත්තිමග්ගං නිබ්බත්තෙති, සො මග්ගක්ඛණෙ ධම්මානුසාරී නාම හොති. ඵලක්ඛණෙ පන පඤ්ඤාවිමුත්තො නාම හුත්වා එකබීජිආදිභෙදෙන ද්වාදසභෙදොව හොති. එවං ද්වෙ මග්ගට්ඨා ඵලක්ඛණෙ චතුවීසති සොතාපන්නා හොන්තීති. परंतु, जो 'जर प्रज्ञेने लोकोत्तर मार्ग उत्पन्न करणे शक्य असेल, तर मी तो उत्पन्न करीन' असा विचार करून प्रज्ञेला मुख्य (धुर) करून सोतापत्तिमार्ग उत्पन्न करतो, तो मार्गक्षणी 'धम्मानुसारी' ठरतो. परंतु फलक्षणी तो 'पञ्ञाविमुक्त' होऊन एकबीजी इत्यादी भेदांमुळे पूर्वोक्त पद्धतीने बारा प्रकारचा होतो. अशा प्रकारे दोन मार्गस्थ आणि फलक्षणी चोवीस प्रकारचे सोतापन्न होतात. තිපිටකතිස්සත්ථෙරො කිර ‘‘තීණි පිටකානි සොධෙස්සාමී’’ති පරතීරං ගතො. තං එකො කුටුම්බිකො චතූහි පච්චයෙහි උපට්ඨාසි, ථෙරො ආගමනකාලෙ ‘‘ගච්ඡාමි උපාසකා’’ති ආහ. ‘‘කහං භන්තෙ’’ති? ‘‘අම්හාකං ආචරියුපජ්ඣායානං සන්තික’’න්ති. ‘‘න සක්කා, භන්තෙ, මයා ගන්තුං, භද්දන්තං පන නිස්සාය මයා සාසනස්ස ගුණො ඤාතො, තුම්හාකං පරම්මුඛා කීදිසං භික්ඛුං උපසඞ්කමාමී’’ති? අථ නං ථෙරො ආහ – ‘‘යො භික්ඛු චතුවීසති සොතාපන්නෙ ද්වාදස සකදාගාමී අට්ඨචත්තාලීස අනාගාමී ද්වාදස අරහන්තෙ දස්සෙත්වා ධම්මකථං කථෙතුං සක්කොති, එවරූපං භික්ඛුං උපට්ඨාතුං වට්ටතී’’ති. ඉමස්මිං සුත්තෙ විපස්සනා කථිතාති. असे ऐकिवात आहे की, तिपिटक तिस्स थेर 'मी तीन पिटकांचे संशोधन करीन' असा विचार करून दुसऱ्या तीरावर गेले. एका गृहपतीने चार प्रत्ययांनी त्यांची सेवा केली. परत येण्याच्या वेळी थेर म्हणाले, 'उपासका, मी आता जातो.' 'भंते, कुठे जात आहात?' 'आमच्या आचार्य आणि उपाध्यायांच्या सन्निध.' 'भंते, माझ्यासाठी येणे शक्य नाही. परंतु आपल्या आश्रयाने मला शासनाचे गुण समजले आहेत. आपल्या अनुपस्थितीत मी कशा प्रकारच्या भिक्खूंची सेवा करावी?' तेव्हा थेर त्याला म्हणाले, 'जो भिक्खू चोवीस सोतापन्न, बारा सकदागामी, अठ्ठेचाळीस अनागामी आणि बारा अर्हत स्पष्ट करून धम्मकथा सांगण्यास समर्थ आहे, अशा भिक्खूची सेवा करणे योग्य आहे.' या सूत्तात विपश्यना सांगितली आहे. 5-10. සුද්ධකසුත්තාදිවණ්ණනා ५-१०. शुद्धकसुत्त इत्यादींचे वर्णन 495-500. පඤ්චමෙ චක්ඛු ච තං චක්ඛුද්වාරෙ නිබ්බත්තානං ධම්මානං ආධිපතෙය්යසඞ්ඛාතෙන ඉන්දට්ඨෙන ඉන්ද්රියඤ්චාති චක්ඛුන්ද්රියං. සොතින්ද්රියාදීසුපි එසෙව නයො. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙව. ඉමස්මිං වග්ගෙ පඨමසුත්තඤ්චෙව ඡට්ඨාදීනි ච පඤ්චාති ඡ සුත්තානි චතුසච්චවසෙන කථිතානීති. ४९५-५००. पाचव्या सूत्तात, डोळा (चक्खू) आणि चक्खू-द्वारात उत्पन्न होणाऱ्या धर्मांवर अधिपत्य गाजवण्याच्या अर्थाने इंद्रिय असल्यामुळे त्याला 'चक्खुन्द्रिय' म्हणतात. सोतिन्द्रिय इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम जाणावा. उर्वरित भाग सर्वत्र स्पष्टच आहे. या वर्गात पहिले सूत्त आणि सहाव्या सूत्तापासून पुढील पाच सूत्ते, अशी सहा सूत्ते चार आर्यसत्यांच्या आधारे सांगितली आहेत. ඡළින්ද්රියවග්ගො තතියො. सळिन्द्रियवग्ग तिसरा समाप्त. 4. සුඛින්ද්රියවග්ගො ४. सुखिन्द्रियवग्ग 1-5. සුද්ධිකසුත්තාදිවණ්ණනා १-५. शुद्धिकसुत्त इत्यादींचे वर्णन 501-505. චතුත්ථවග්ගස්ස [Pg.273] පඨමෙ සුඛඤ්ච තං සහජාතානං ආධිපතෙය්යසඞ්ඛාතෙන ඉන්දට්ඨෙන ඉන්ද්රියඤ්චාති සුඛින්ද්රියං. දුක්ඛින්ද්රියාදීසුපි එසෙව නයො. එත්ථ ච සුඛින්ද්රියදුක්ඛින්ද්රියදොමනස්සින්ද්රියානි කාමාවචරානෙව, සොමනස්සින්ද්රියං ඨපෙත්වා අරූපාවචරං සෙසං තෙභූමකං, උපෙක්ඛින්ද්රියං චතුභූමකං. දුතියාදීනි චත්තාරි චතුසච්චවසෙනෙව කථිතානි. ५०१-५०५. चौथ्या वर्गाच्या पहिल्या सूत्तात, सुख आणि सहजात धर्मांवर अधिपत्य गाजवण्याच्या अर्थाने इंद्रिय असल्यामुळे त्याला 'सुखिन्द्रिय' म्हणतात. दुक्खिन्द्रिय इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम जाणावा. आणि येथे सुखिन्द्रिय, दुक्खिन्द्रिय आणि दोमनस्सिन्द्रिय हे केवळ कामावचरच आहेत. सोमनस्सिन्द्रिय हे अरूपावचर वगळता उर्वरित तीन भूमींमध्ये असते, तर उपेक्खिन्द्रिय हे चारही भूमींमध्ये असते. दुसऱ्या सूत्तापासून पुढील चार सूत्ते चार आर्यसत्यांच्या आधारेच सांगितली आहेत. 6. පඨමවිභඞ්ගසුත්තවණ්ණනා ६. प्रथमविभंगसुत्तवर्णन 506. ඡට්ඨෙ කායිකන්ති කායපසාදවත්ථුකං. සුඛන්ති අයමස්ස සරූපනිද්දෙසො. සාතන්ති තස්සෙව වෙවචනං, මධුරන්ති වුත්තං හොති. කායසම්ඵස්සජන්ති කායසම්ඵස්සතො ජාතං. සුඛං සාතන්ති වුත්තනයමෙව. වෙදයිතන්ති අයමස්ස සබ්බවෙදනාසාධාරණො අඤ්ඤධම්මවිසිට්ඨො සභාවනිද්දෙසො. ඉමිනා නයෙන සෙසෙසුපි අත්ථො වෙදිතබ්බො. කායිකං වා චෙතසිකං වාති එත්ථ පන චක්ඛාදයො චත්තාරො පසාදකායෙ වත්ථුං කත්වා උප්පත්තිවසෙන කායිකන්ති වුත්තං. කායපසාදවත්ථුකං පන අදුක්ඛමසුඛං නාම නත්ථි. ५०६. सहाव्या सूत्तात, 'कायिक' म्हणजे कायप्रसाद-वस्तूवर आधारित असणारे. 'सुख' हा त्याचा स्वरूपनिर्देश आहे. 'सातं' हा त्याचाच समानार्थी शब्द आहे, ज्याचा अर्थ 'मधुर' (सुखद) असा आहे. 'कायसम्फस्सज' म्हणजे काय-संस्पर्शापासून उत्पन्न झालेले. 'सुखं सातं' हे पूर्वोक्त पद्धतीनेच जाणावे. 'वेदयित' हा शब्द सर्व वेदनांसाठी साधारण असणारा, परंतु स्पर्श इत्यादी इतर धर्मांपेक्षा वेगळा असा त्याचा स्वभावनिर्देश आहे. याच पद्धतीने उर्वरित पदांचाही अर्थ जाणावा. 'कायिक किंवा चैतसिक' या संदर्भात, चक्खू इत्यादी चार प्रसाद-कायांना आधार करून उत्पन्न होण्याच्या अर्थाने 'कायिक' असे म्हटले आहे. परंतु कायप्रसादावर आधारित असणारी 'अदुक्खमसुख' नावाची वेदना नसते. 9. කට්ඨොපමසුත්තවණ්ණනා ९. कट्ठोपमसुत्तवर्णन 509. නවමෙ ද්වින්නං කට්ඨානන්ති ද්වින්නං අරණීනං. සඞ්ඝට්ටනසමොධානාති සඞ්ඝට්ටනෙන චෙව සමොධානෙන ච. උස්මාති උසුමාකාරො. තෙජොති අග්ගිධූමො. එත්ථ ච අධරාරණී විය වත්ථාරම්මණං, උත්තරාරණී විය ඵස්සො, සඞ්ඝට්ටො විය ඵස්සසඞ්ඝට්ටනං, අග්ගි විය වෙදනා දට්ඨබ්බා. වත්ථාරම්මණං වා උත්තරාරණී විය, ඵස්සො අධරාරණී විය දට්ඨබ්බො. ५०९. नवव्या सूत्तात, 'दोन लाकडांचे' म्हणजे दोन अरणींचे (मंथन काष्ठांचे). 'संघट्टन-समोधान' म्हणजे घासण्याने आणि एकत्र येण्याने. 'उस्मा' म्हणजे उष्णता. 'तेजो' म्हणजे अग्नी. आणि येथे खालच्या अरणीप्रमाणे वस्तू-आलंबन जाणावे, वरच्या अरणीप्रमाणे स्पर्श (फस्स) जाणावा, घासण्याप्रमाणे स्पर्श-संघट्टन जाणावे आणि अग्नीप्रमाणे वेदना जाणावी. अथवा, वस्तू-आलंबन वरच्या अरणीप्रमाणे आणि स्पर्श खालच्या अरणीप्रमाणे जाणावा. 10. උප්පටිපාටිකසුත්තවණ්ණනා १०. उप्पटिपार्टिकसुत्तवर्णन 510. දසමං යථාධම්මරසෙන පටිපාටියා වුත්තම්පි ඉමස්මිං ඉන්ද්රියවිභඞ්ගෙ සෙසසුත්තානි විය අදෙසිතත්තා උප්පටිපාටිකසුත්තං නාමාති වෙදිතබ්බං. තත්ථ නිමිත්තන්තිආදීනි සබ්බානි පච්චයවෙවචනානෙව. දුක්ඛින්ද්රියඤ්ච පජානාතීති දුක්ඛසච්චවසෙනෙව පජානාති. දුක්ඛින්ද්රියසමුදයන්ති කණ්ටකෙන වා විද්ධස්ස මඞ්කුලෙන [Pg.274] වා දට්ඨස්ස පච්චත්ථරණෙ වා වලියා ඵුට්ඨස්ස දුක්ඛසහගතං කායවිඤ්ඤාණං උප්පජ්ජති, තං එතස්ස සමුදයොති පජානාති. ५१०. दहावे सूत्त जरी धर्मरसानुसार अनुक्रमाने सांगितले असले, तरी या इंद्रियविभंगात इतर सूत्तांप्रमाणे न सांगितल्यामुळे, त्याला 'उप्पटिपार्टिकसुत्त' (अनुक्रमरहित सूत्त) असे म्हणतात, हे जाणावे. त्यात 'निमित्त' इत्यादी सर्व शब्द प्रत्ययाचेच (कारणाचेच) समानार्थी शब्द आहेत. 'दुक्खिन्द्रियं च पजानाति' म्हणजे दुक्खिन्द्रियाला दुःखसत्याच्या रूपानेच जाणतो. 'दुक्खिन्द्रिय-समुदय' म्हणजे काट्याने टोचले असता, किंवा ढेकणाने चावले असता, किंवा अंथरुणाच्या सुरकुतीमुळे पीडा झाली असता दुःखसहगत कायविज्ञान उत्पन्न होते, त्याला या दुक्खिन्द्रियाचा समुदय म्हणून जाणतो. පරතො දොමනස්සින්ද්රියසමුදයන්තිආදීසුපි තෙසං තෙසං කාරණවසෙනෙව සමුදයො වෙදිතබ්බො. පත්තචීවරාදීනං වා හි සඞ්ඛාරානං සද්ධිවිහාරිකාදීනං වා සත්තානං විනාසෙන දොමනස්සින්ද්රියං උප්පජ්ජතීති තෙසං විනාසං තස්ස සමුදයොති පජානාති. සුභොජනං භුඤ්ජිත්වා වරසයනෙ නිපන්නස්ස හත්ථපාදසම්බාහනතාලවණ්ටවාතාදිසම්ඵස්සෙන සුඛින්ද්රියං උප්පජ්ජති, තං ඵස්සං තස්ස සමුදයොති පජානාති. වුත්තප්පකාරානං පන සත්තසඞ්ඛාරානං මනාපානං පටිලාභවසෙන සොමනස්සින්ද්රියං උප්පජ්ජති, තං පටිලාභං තස්ස සමුදයොති පජානාති. මජ්ඣත්තාකාරෙන පන උපෙක්ඛින්ද්රියං උප්පජ්ජති, තං සත්තසඞ්ඛාරෙසු මජ්ඣත්තාකාරං තස්ස සමුදයොති පජානාති. पुढे 'दौर्मनस्येन्द्रियाचा उदय' इत्यादींमध्ये देखील त्या त्या कारणांच्या प्रभावानेच त्यांचा उदय (उत्पत्ती) समजावा. कारण, पात्र-चीवर इत्यादी संस्कारांच्या (वस्तूंच्या) किंवा सद्धिविहारिक (शिष्य) इत्यादी प्राण्यांच्या विनाशाने दौर्मनस्येन्द्रिय उत्पन्न होते; म्हणून 'त्यांचा विनाश हाच त्याचा उदय आहे' असे तो जाणतो. उत्तम भोजन करून श्रेष्ठ शय्येवर निजलेल्या व्यक्तीला हात-पाय दाबणे, पंख्याचा मंद वारा इत्यादींच्या स्पर्शाने सुखेन्द्रिय उत्पन्न होते; 'तो स्पर्श हाच त्याचा उदय आहे' असे तो जाणतो. परंतु, पूर्वोक्त प्रकारच्या प्रिय प्राणी व संस्कारांच्या प्राप्तीमुळे सौमनस्येन्द्रिय उत्पन्न होते; 'ती प्राप्ती हाच त्याचा उदय आहे' असे तो जाणतो. आणि तटस्थ भावाने उपेक्षेन्द्रिय उत्पन्न होते; 'प्राणी व संस्कारांविषयीचा तो तटस्थ भाव हाच त्याचा उदय आहे' असे तो जाणतो. කත්ථ චුප්පන්නං දුක්ඛින්ද්රියං අපරිසෙසං නිරුජ්ඣති, ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු විවිච්චෙව කාමෙහීතිආදීසු පන අයං එකතොව විනිච්ඡයකථා – දුක්ඛින්ද්රියඤ්හි පඨමජ්ඣානස්ස උපචාරක්ඛණෙයෙව නිරුජ්ඣති පහීනං හොති, දොමනස්සාදීනි දුතියජ්ඣානාදීනං. එවං සන්තෙපි තෙසං අතිසයනිරොධත්තා අයං ඣානෙසුයෙව නිරොධො වුත්තො. අතිසයනිරොධො හි තෙසං පඨමජ්ඣානාදීසු, න නිරොධොයෙව, නිරොධොයෙව පන උපචාරක්ඛණෙ, නාතිසයනිරොධො. තථා හි නානාවජ්ජනෙ පඨමජ්ඣානුපචාරෙ නිරුද්ධස්සාපි දුක්ඛින්ද්රියස්ස ඩංසමකසාදිසම්ඵස්සෙන වා විසමාසනුපතාපෙන වා සියා උප්පත්ති, න ත්වෙව අන්තොඅප්පනායං. උපචාරෙ වා නිරුද්ධම්පෙතං න සුට්ඨු නිරුද්ධං හොති පටිපක්ඛෙන අවිහතත්තා. අන්තොඅප්පනායං පන පීතිඵරණෙන සබ්බො කායො සුඛොක්කන්තො හොති, සුඛොක්කන්තකායස්ස ච සුට්ඨු නිරුද්ධං හොති දුක්ඛින්ද්රියං පටිපක්ඛෙන විහතත්තා. නානාවජ්ජනෙයෙව ච දුතියජ්ඣානුපචාරෙ පහීනස්ස දොමනස්සින්ද්රියස්ස යස්මා එතං විතක්කවිචාරපච්චයෙපි කායකිලමථෙ චිත්තුපඝාතෙ ච සති උප්පජ්ජති, විතක්කවිචාරාභාවෙ නෙව උප්පජ්ජති. යත්ථ පන උප්පජ්ජති, තත්ථ විතක්කවිචාරභාවෙ, අප්පහීනා එව ච දුතියජ්ඣානුපචාරෙ විතක්කවිචාරාති තත්ථස්ස සියා උප්පත්ති. න ත්වෙව දුතියජ්ඣානෙ පහීනපච්චයත්තා. තථා තතියජ්ඣානුපචාරෙ පහීනස්සාපි සුඛින්ද්රියස්ස පීතිසමුට්ඨානපණීතරූපඵුට්ඨකායස්ස සියා උප්පත්ති, න ත්වෙව තතියජ්ඣානෙ. තතියජ්ඣානෙ හි සුඛස්ස පච්චයභූතා [Pg.275] පීති සබ්බසො නිරුද්ධා. තථා චතුත්ථජ්ඣානුපචාරෙ පහීනස්සාපි සොමනස්සින්ද්රියස්ස ආසන්නත්තා අප්පනාප්පත්තාය උපෙක්ඛාය අභාවෙන සම්මා අනතික්කන්තත්තා ච සියා උප්පත්ති, න ත්වෙව චතුත්ථජ්ඣානෙ. තස්මා ‘‘එත්ථ චුප්පන්නං දුක්ඛින්ද්රියං අපරිසෙසං නිරුජ්ඣතී’’ති තත්ථ තත්ථ අපරිසෙසග්ගහණං කතං. उत्पन्न झालेले दुःखेन्द्रिय कोठे निरवशेष निरुद्ध होते? 'येथे, भिक्खूहो, भिक्खू कामांपासून अलिप्त होऊन...' इत्यादी पाठांमध्ये हा एकत्रितपणे केलेला निर्णय आहे. कारण, दुःखेन्द्रिय हे प्रथम ध्यानाच्या उपचार क्षणीच निरुद्ध होते, प्रहीण होते; आणि दौर्मनस्येन्द्रिय इत्यादी द्वितीय ध्यान इत्यादींच्या उपचार क्षणी निरुद्ध होतात. असे असले तरी, त्यांचा अत्यंत निरोध होत असल्यामुळे ध्यानांमध्येच हा निरोध सांगितला आहे. कारण, प्रथम ध्यान इत्यादींमध्ये त्यांचा अत्यंत निरोध होतो, केवळ निरोध नव्हे; परंतु उपचार क्षणी केवळ निरोध होतो, अत्यंत निरोध होत नाही. तसेच, विविध आवर्जनांनी युक्त अशा प्रथम ध्यानाच्या उपचारात दुःखेन्द्रिय निरुद्ध झाले तरी डास-माशांच्या स्पर्शाने किंवा विषम आसनाच्या त्रासाने त्याची उत्पत्ती होऊ शकते, परंतु अर्पणा (ध्यान) अवस्थेच्या आत ती मुळीच होऊ शकत नाही. किंवा उपचारात निरुद्ध झालेले हे दुःखेन्द्रिय विरोधी धर्माचा नाश न झाल्यामुळे चांगल्या प्रकारे निरुद्ध झालेले नसते. परंतु अर्पणा अवस्थेच्या आत प्रीतीच्या पसरण्याने सर्व शरीर सुखाने व्यापलेले असते, आणि सुखाने व्यापलेल्या शरीरामध्ये विरोधी धर्माचा नाश झाल्यामुळे दुःखेन्द्रिय चांगल्या प्रकारे निरुद्ध झालेले असते. आणि विविध आवर्जनांनी युक्त अशा द्वितीय ध्यानाच्या उपचारात प्रहीण झालेल्या दौर्मनस्येन्द्रियाची उत्पत्ती, वितर्क व विचार हे प्रत्यय (कारण) असताना, शारीरिक थकवा आणि चित्ताचा आघात असताना होऊ शकते; वितर्क व विचारांच्या अभावी ती मुळीच होत नाही. परंतु जेथे ते उत्पन्न होते, तेथे वितर्क व विचारांचे अस्तित्व असते, आणि द्वितीय ध्यानाच्या उपचारात वितर्क व विचार प्रहीण झालेले नसतात, म्हणून तेथे त्याची उत्पत्ती होऊ शकते. परंतु द्वितीय ध्यानात कारण प्रहीण झाल्यामुळे त्याची उत्पत्ती मुळीच होत नाही. त्याचप्रमाणे, तृतीय ध्यानाच्या उपचारात प्रहीण झालेल्या सुखेन्द्रियाची उत्पत्ती, प्रीतीमुळे उत्पन्न झालेल्या प्रणीत रूपाने स्पर्शलेल्या शरीरामध्ये होऊ शकते, परंतु तृतीय ध्यानात मुळीच होत नाही. कारण तृतीय ध्यानात सुखाचे कारण असलेली प्रीती पूर्णपणे निरुद्ध झालेली असते. त्याचप्रमाणे, चतुर्थ ध्यानाच्या उपचारात प्रहीण झालेल्या सौमनस्येन्द्रियाची उत्पत्ती, (सौमनस्याच्या) जवळ असल्यामुळे, अर्पणा प्राप्त उपेक्षेचा अभाव असल्यामुळे आणि त्याचे चांगल्या प्रकारे अतिक्रमण न झाल्यामुळे होऊ शकते, परंतु चतुर्थ ध्यानात मुळीच होत नाही. म्हणूनच, 'येथे उत्पन्न झालेले दुःखेन्द्रिय निरवशेष निरुद्ध होते' अशा प्रकारे त्या त्या ठिकाणी 'निरवशेष' (अपरिसेंस) हा शब्द ग्रहण केला आहे. යං පනෙත්ථ තදත්ථාය චිත්තං උපසංහරතීති වුත්තං, තත්ථ අලාභී සමානො උප්පාදනත්ථාය චිත්තං උපසංහරති, ලාභී සමානො සමාපජ්ජනත්ථායාති එවමත්ථො වෙදිතබ්බො. ඉමෙසු ද්වීසුපි සුත්තෙසු සම්මසනවාරොව කථිතොති. येथे जे 'त्या हेतूसाठी चित्त एकाग्र करतो' असे म्हटले आहे, त्यामध्ये, ज्याला ध्यान प्राप्त झालेले नाही तो ध्यानाच्या उत्पत्तीसाठी चित्त लावतो, आणि ज्याला ध्यान प्राप्त झाले आहे तो समापत्तीसाठी (ध्यानात प्रवेश करण्यासाठी) चित्त लावतो, असा अर्थ समजावा. या दोन्ही सूत्रांमध्ये केवळ संमसनवार (परीक्षण मार्ग) सांगितला आहे. සුඛින්ද්රියවග්ගො චතුත්ථො. चौथा सुखेन्द्रियवर्ग समाप्त. 5. ජරාවග්ගො ५. जरावर्ग 1. ජරාධම්මසුත්තවණ්ණනා १. जराधम्मसुत्तवर्णना 511. පඤ්චමවග්ගස්ස පඨමෙ පච්ඡාතපෙති පාසාදච්ඡායාය පුරත්ථිමදිසං පටිච්ඡන්නත්තා පාසාදස්ස පච්ඡිමදිසාභාගෙ ආතපො හොති, තස්මිං ඨානෙ පඤ්ඤත්තවරබුද්ධාසනෙ නිසින්නොති අත්ථො. පිට්ඨිං ඔතාපයමානොති යස්මා සම්මාසම්බුද්ධස්සපි උපාදින්නකසරීරෙ උණ්හකාලෙ උණ්හං හොති, සීතකාලෙ සීතං, අයඤ්ච හිමපාතසීතසමයො. තස්මා මහාචීවරං ඔතාරෙත්වා සූරියරස්මීහි පිට්ඨිං ඔතාපයමානො නිසීදි. ५११. पाचव्या वर्गाच्या पहिल्या सूत्रात, 'पाठीवर ऊन घेणे' म्हणजे प्रासादाच्या (महालाच्या) छायेने पूर्व दिशा झाकलेली असल्यामुळे प्रासादाच्या पश्चिम भागात ऊन पडले होते, त्या ठिकाणी मांडलेल्या श्रेष्ठ बुद्ध आसनावर भगवान बसले होते, असा अर्थ आहे. 'पाठीवर ऊन घेत' म्हणजे कारण सम्यक्संबुद्धांच्या देखील उपादिन्नक (कर्मजन्य) शरीरात उष्ण काळात उष्णता जाणवते आणि शीत काळात थंडी जाणवते, आणि हा काळ हिमवृष्टीचा व थंडीचा होता. म्हणून त्यांनी महाचीवर बाजूला सारून सूर्यकिरणांनी पाठीवर ऊन घेत ते बसले होते. කිං පන බුද්ධරස්මියො මද්දිත්වා සූරියරස්මි අන්තො පවිසිතුං සක්කොතීති? න සක්කොති. එවං සන්තෙ කිං තාපෙතීති? රස්මිතෙජං. යථෙව හි ඨිතමජ්ඣන්හිකෙ පරිමණ්ඩලාය ඡායාය රුක්ඛමූලෙ නිසින්නස්ස කිඤ්චාපි සූරියරස්මියො සරීරං න ඵුසන්ති, සබ්බදිසාසු පන තෙජො ඵරති, අග්ගිජාලාහි පරික්ඛිත්තො විය හොති, එවං සූරියරස්මීසු බුද්ධරස්මියො මද්දිත්වා අන්තො පවිසිතුං අසක්කුණන්තීසුපි සත්ථා තෙජං තාපෙන්තො නිසින්නොති වෙදිතබ්බො. पण काय बुद्धांच्या रश्मींना (प्रभेला) भेदून सूर्यकिरण आत प्रवेश करू शकतात? नाही, करू शकत नाहीत. असे असताना भगवान कशाचे सेवन (ऊन घेणे) करत होते? किरणांच्या तेजाचे (उष्णतेचे). कारण ज्याप्रमाणे ऐन दुपारी वर्तुळाकार छायेत झाडाच्या मुळाशी बसलेल्या माणसाला जरी सूर्यकिरण थेट शरीराला स्पर्श करत नसले, तरी सर्व दिशांना उष्णता पसरते आणि तो अग्नीच्या ज्वाळांनी वेढल्यासारखा होतो; त्याचप्रमाणे सूर्यकिरण बुद्धांच्या रश्मींना भेदून आत प्रवेश करण्यास असमर्थ असले तरी, शास्ता (बुद्ध) त्या तेजाचे सेवन करत बसले होते, असे समजावे. අනොමජ්ජන්තොති පිට්ඨිපරිකම්මකරණවසෙන අනුමජ්ජන්තො. අච්ඡරියං භන්තෙති ථෙරො භගවතො පිට්ඨිතො මහාචීවරං ඔතාරෙත්වා නිසින්නස්ස ද්වින්නං [Pg.276] අංසකූටානං අන්තරෙ සුවණ්ණාවට්ටං විය කෙසග්ගප්පමාණං වලියාවට්ටං දිස්වා – ‘‘එවරූපෙපි නාම සරීරෙ ජරා පඤ්ඤායතී’’ති සඤ්ජාතසංවෙගො ජරං ගරහන්තො එවමාහ. ගරහනච්ඡරියං නාම කිරෙතං. 'अनोमज्जन्तो' म्हणजे पाठीची सेवा करण्याच्या (मसाज करण्याच्या) उद्देशाने हळूवारपणे हात फिरवत. 'आश्चर्य आहे, भंते!' असे स्थविरांनी (आनंद थेरांनी) म्हटले. स्थविरांनी भगवंतांच्या पाठीवरून महाचीवर बाजूला सारून बसलेल्या भगवंतांच्या दोन्ही खांद्यांच्या मध्ये सोन्याच्या पट्टीवरील रेघेप्रमाणे केसाच्या अग्राएवढी सुरकुतीची वळी पाहून, 'अशा शरीरावर देखील जरा (वृद्धत्व) दिसून येत आहे!' अशा प्रकारे संवेग उत्पन्न झाल्यामुळे जरेची (वृद्धत्वाची) निंदा करत त्यांनी असे म्हटले. हे खरोखर निंदात्मक आश्चर्य आहे. න චෙවං දානි, භන්තෙ, භගවතො තාව පරිසුද්ධොති යථා පකතියා ඡවිවණ්ණො පරිසුද්ධො, න එවමෙතරහීති දීපෙන්තො එවමාහ. තථාගතස්ස හි දහරකාලෙ සඞ්කුසතසමබ්භාහතං උසභචම්මං විය විහතවලිකො කායො හොති, තස්මිං ඨපිතො හත්ථො භස්සතෙව, න සන්තිට්ඨති, තෙලපුඤ්ඡනාකාරප්පත්තො විය හොති. මහල්ලකකාලෙ පන සිරාජාලා මිලායන්ති, සන්ධිපබ්බානි සිථිලානි හොන්ති, මංසං අට්ඨිතො මුච්චිත්වා සිථිලභාවං ආපජ්ජිත්වා තත්ථ තත්ථ ඔලම්බති. බුද්ධානං පන එවරූපං න හොති. අඤ්ඤෙසං අපාකටං, සන්තිකාවචරත්තා ආනන්දත්ථෙරස්සෙව පාකටං හොති, තස්මා එවමාහ. 'भंते, आता भगवंतांची त्वचा पूर्वीसारखी तेजस्वी राहिलेली नाही' हे जशी सामान्यतः त्वचा तेजस्वी असते, तशी ती आता राहिलेली नाही, हे दर्शवण्यासाठी त्यांनी असे म्हटले. कारण तथागतांचे तरुणपणी शंभर खिळ्यांनी ताणलेल्या बैलाच्या कातड्याप्रमाणे सुरकुत्या नसलेले शरीर असते, त्यावर ठेवलेला हात घसरतोच, थांबत नाही; ते तेल लावलेल्या गुळगुळीत पात्रासारखे असते. परंतु वृद्धपणी शिरांचे जाळे कोमेजून जाते, सांधे शिथिल होतात, मांस हाडांपासून सुटून शिथिल होते आणि जागोजागी लोंबकळू लागते. परंतु बुद्धांच्या बाबतीत असे (इतर सामान्य माणसांसारखे) होत नाही. इतरांना हे स्पष्ट दिसत नाही, परंतु सतत जवळ राहिल्यामुळे आनंद थेरांनाच हे स्पष्ट जाणवले, म्हणून त्यांनी असे म्हटले. සිථිලානි ච ගත්තානීති අඤ්ඤෙසං මුඛෙ අංසකූටන්තරෙහි තෙසු තෙසු ඨානෙසු වලියො සන්තිට්ඨන්ති, සත්ථු පනෙතං නත්ථි, ථෙරො ච ද්වින්නං අංසකූටානං අන්තරෙ වලියාවට්ටකං දිස්වා එවමාහ. සබ්බානි වලියජාතානීති ඉදම්පි අත්තනො පාකටවසෙන එවමාහ – සත්ථු පන අඤ්ඤෙසං විය වලියො නාම නත්ථි. පුරතො පබ්භාරො ච කායොති සත්ථා බ්රහ්මුජුගත්තො, දෙවනගරෙ සමුස්සිතසුවණ්ණතොරණං වියස්ස කායො උජුකමෙව උග්ගතො. මහල්ලකකාලෙ පන කායො පුරතො වඞ්කො හොති, ස්වායං අඤ්ඤෙසං අපාකටො, සන්තිකාවචරත්තා පන ථෙරස්සෙව පාකටො, තස්මා එවමාහ. දිස්සති ච ඉන්ද්රියානං අඤ්ඤථත්තන්ති ඉන්ද්රියානි නාම න චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යානි. යතො පන පකතියා පරිසුද්ධො ඡවිවණ්ණො, ඉදානි න තථා පරිසුද්ධො, අංසකූටන්තරෙ වලි පඤ්ඤායති, බ්රහ්මුජුකායො පුරතො වඞ්කො, ඉමිනාව කාරණෙන චක්ඛාදීනඤ්ච ඉන්ද්රියානං අඤ්ඤථත්තෙන භවිතබ්බන්ති නයග්ගාහතො එවමාහ. ධී තං ජම්මි ජරෙ අත්ථූති ලාමකෙ ජරෙ ධී තං තුය්හං හොතු, ධික්කාරො තං ඵුසතු. බිම්බන්ති අත්තභාවො. ‘शिथिल आणि सुरकुतलेले शरीर’ (सिथिलानि च गत्तानि) म्हणजे इतर सामान्य प्राण्यांच्या चेहऱ्यावर, खांद्यांच्या मध्यभागी आणि इतर विविध ठिकाणी सुरकुत्या स्पष्ट दिसतात, परंतु शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) बाबतीत असे नसते. स्थविरांनी (आनंदांनी) दोन्ही खांद्यांच्या मध्यभागी केसाच्या प्रमाणाची एक लहानशी सुरकुती पाहून असे म्हटले. ‘सर्व शरीरावर सुरकुत्या पडल्या आहेत’ (सब्बानि वलियजातानि) हे देखील त्यांनी स्वतःला स्पष्ट दिसल्यामुळे म्हटले - परंतु शास्त्यांना इतरांप्रमाणे स्पष्ट दिसणाऱ्या सुरकुत्या नसतात. ‘शरीर पुढे झुकलेले आहे’ (पुरतो पब्भारो च कायो) म्हणजे शास्ते हे ब्रह्माप्रमाणे सरळ शरीराचे आहेत. देवलोकातील नगरात उभारलेल्या सुवर्णतोरणाप्रमाणे त्यांचे शरीर सरळ उन्नत आहे. परंतु वृद्धपकाळात शरीर थोडे पुढे झुकते. ते इतरांना स्पष्ट दिसत नाही, परंतु सतत जवळ राहिल्यामुळे केवळ स्थविरांनाच (आनंदांनाच) ते स्पष्ट दिसले, म्हणून त्यांनी असे म्हटले. ‘इंद्रियांमध्ये बदल दिसून येत आहे’ (दिस्सति च इन्द्रियानं अञ्ञथत्तं) म्हणजे इंद्रिये ही डोळ्यांनी पाहता येण्यासारखी नसतात. परंतु स्वभावतः अत्यंत शुद्ध असणारा शरीराचा वर्ण आता तसा शुद्ध राहिलेला नाही, खांद्यांच्या मध्यभागी सुरकुती दिसत आहे, ब्रह्मासारखे सरळ असणारे शरीर पुढे झुकले आहे; याच कारणाने चक्षू इत्यादी इंद्रियांमध्येही बदल झाला असावा, अशा अनुमानाने त्यांनी असे म्हटले. ‘धिक्कार असो तुला, हे नीच जरे!’ (धी तं जम्मि जरे अत्थु) म्हणजे हे हीन जरे, तुझा धिक्कार असो, धिक्कार तुला प्राप्त होवो. ‘बिम्ब’ (बिम्बं) म्हणजे आत्मभाव (शरीर). 2. උණ්ණාභබ්රාහ්මණසුත්තවණ්ණනා २. उण्णाभ ब्राह्मण सुत्ताची वर्णना. 512. දුතියෙ [Pg.277] ගොචරවිසයන්ති ගොචරභූතං විසයං. අඤ්ඤමඤ්ඤස්සාති චක්ඛු සොතස්ස, සොතං වා චක්ඛුස්සාති එවං එකං එකස්ස ගොචරවිසයං න පච්චනුභොති. සචෙ හි නීලාදිභෙදං රූපාරම්මණං සමොධානෙත්වා සොතින්ද්රියස්ස උපනෙය්ය – ‘‘ඉඞ්ඝ ත්වං තාව නං වවත්ථපෙහි විභාවෙහි ‘කින්නාමෙතං ආරම්මණ’’’න්ති. චක්ඛුවිඤ්ඤාණං විනාපි මුඛෙන අත්තනො ධම්මතාය එවං වදෙය්ය – ‘‘අරෙ, අන්ධබාල, වස්සසතම්පි වස්සසහස්සම්පි වස්සසතසහස්සම්පි පරිධාවමානො අඤ්ඤත්ර මයා කුහිං එතස්ස ජානනකං ලභිස්සසි, තං ආහර, චක්ඛුපසාදෙ උපනෙහි, අහමෙතං ආරම්මණං ජානිස්සාමි – යදි වා නීලං, යදි වා පීතකං. න හි එසො අඤ්ඤස්ස විසයො, මය්හමෙවෙසො විසයො’’ති. සෙසද්වාරෙසුපි එසෙව නයො. එවමෙතානි අඤ්ඤමඤ්ඤස්ස ගොචරවිසයං න පච්චනුභොන්ති නාම. ५१२. दुसऱ्या सुत्तात, ‘गोचरविषय’ (गोचरविसयं) म्हणजे गोचर असणारा विषय (आलंबन). ‘एकमेकांचे’ (अञ्ञमञ्ञस्स) म्हणजे चक्षू श्रोत्राचा किंवा श्रोत्र चक्षूचा, अशा प्रकारे एक इंद्रिय दुसऱ्या इंद्रियाच्या गोचरविषयाचा अनुभव घेऊ शकत नाही. जर निळे इत्यादी भेद असणारे रूपारंमण एकत्र करून श्रोत्रेंद्रियाजवळ आणले आणि म्हटले - 'चल, तू आधी याला निश्चित कर, स्पष्ट कर की हे कोणते आलंबन आहे?' तर चक्षूविज्ञान बोलण्यासाठी तोंड नसतानाही आपल्या स्वभावधर्माने असे म्हणेल - 'अरे अंधमूर्खा! तू शंभर वर्षे, हजार वर्षे किंवा लाख वर्षे जरी इकडेतिकडे धावलास, तरी माझ्याशिवाय तुला या रूपाला जाणणारा दुसरा कोण कोठे मिळणार? ते रूप इकडे आण, चक्षुप्रसादाजवळ आण, मी त्या आलंबनाला जाणीन - मग ते निळे असो वा पिवळे. कारण हा इतरांचा विषय नाही, हा केवळ माझाच विषय आहे.' इतर द्वारांच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. अशा प्रकारे ही इंद्रिये एकमेकांच्या गोचरविषयाचा अनुभव घेत नाहीत. කිං පටිසරණන්ති එතෙසං කිං පටිසරණං, කිං එතානි පටිසරන්තීති පුච්ඡති. මනො පටිසරණන්ති ජවනමනො පටිසරණං. මනොව නෙසන්ති මනොද්වාරිකජවනමනොව එතෙසං ගොචරවිසයං රජ්ජනාදිවසෙන අනුභොති. චක්ඛුවිඤ්ඤාණඤ්හි රූපදස්සනමත්තමෙව, එත්ථ රජ්ජනං වා දුස්සනං වා මුය්හනං වා නත්ථි. එකස්මිං පන ද්වාරෙ ජවනං රජ්ජති වා දුස්සති වා මුය්හති වා. සොතවිඤ්ඤාණාදීසුපි එසෙව නයො. ‘शरण काय आहे?’ (किं पटिसरणं) म्हणजे यांचे शरण काय आहे, ही इंद्रिये कशाचा आश्रय घेतात, असा प्रश्न विचारला आहे. ‘मन हे शरण आहे’ (मनो पटिसरणं) म्हणजे जवन-मन हे शरण आहे. ‘मनच त्यांचे...’ (मनोव नेसं) म्हणजे मनोध्वारिक जवन-मनच या इंद्रियांच्या गोचरविषयाचा राग (आसक्ती) इत्यादींच्या द्वारे अनुभव घेते. कारण चक्षूविज्ञान हे केवळ रूप पाहण्यापुरतेच असते, त्यात राग, द्वेष किंवा मोह नसतो. परंतु त्या एकाच द्वारात जवन हे आसक्त होते, द्वेष करते किंवा मोहित होते. श्रोत्रविज्ञानादींच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. තත්රායං උපමා – පඤ්ච කිර දුබ්බලභොජකා රාජානං සෙවිත්වා කිච්ඡෙන කසිරෙන එකස්මිං පඤ්චකුලිකෙ ගාමෙ පරිත්තකං ආයං ලභිංසු. තෙසං තත්ථ මච්ඡභාගො මංසභාගො, අද්දුකහාපණො වා යොත්තකහාපණො වා මාසකහාපණො වා අට්ඨකහාපණො වා සොළසකහාපණො වා චතුසට්ඨිකහාපණො වා දණ්ඩොති එත්තකමත්තමෙව පාපුණාති, සතවත්ථුකං පඤ්චසතවත්ථුකං සහස්සවත්ථුකං මහාබලිං රාජාව ගණ්හාති. याविषयी ही उपमा आहे - पाच दुर्बळ जहागीरदार राजाची सेवा करून मोठ्या कष्टाने आणि परिश्रमाने केवळ पाच कुटुंबे असलेल्या एका लहान गावातून थोडासा कर मिळवत असत. त्यांना तेथे माशाचा वाटा, मांसाचा वाटा, अर्धा कहापण, दोरीचा कहापण, मासा कहापण, आठ कहापण, सोळा कहापण किंवा चौसष्ट कहापण किंवा दंड या स्वरूपात केवळ एवढेच मिळत असे. परंतु शंभर मूल्य असणारा, पाचशे मूल्य असणारा किंवा हजार मूल्य असणारा मोठा कर राजा स्वतःच घेत असे. තත්ථ පඤ්චකුලිකගාමා විය පඤ්චපසාදා දට්ඨබ්බා, පඤ්ච දුබ්බලභොජකා විය පඤ්චවිඤ්ඤාණානි; රාජා විය ජවනං, දුබ්බලභොජකානං පරිත්තකආයපාපුණනං විය චක්ඛුවිඤ්ඤාණාදීනං රූපදස්සනාදිමත්තං, රජ්ජනාදි පන එතෙසු නත්ථි[Pg.278]. රඤ්ඤො මහාබලිග්ගහණං විය තෙසු ද්වාරෙසු ජවනස්ස රජ්ජනාදීනි වෙදිතබ්බානි. එවමෙත්ථ මනොති කුසලාකුසලජවනං වුත්තං. त्या उपमेत, पाच कुटुंबे असलेल्या गावाप्रमाणे पाच इंद्रियप्रसाद समजावेत; पाच दुर्बळ जहागीरदारांप्रमाणे पाच विज्ञाने समजावीत; राजाप्रमाणे जवन समजावे. दुर्बळ जहागीरदारांना मिळणाऱ्या थोड्या कराप्रमाणे चक्षूविज्ञानादींचे केवळ रूप पाहणे इत्यादी समजावे, परंतु त्यांच्यामध्ये राग इत्यादी नसतात. राजाने मोठा कर घेण्याप्रमाणे त्या द्वारांमध्ये जवनाची आसक्ती इत्यादी समजावीत. अशा प्रकारे येथे ‘मन’ म्हणजे कुशल आणि अकुशल जवन म्हटले आहे. සති පටිසරණන්ති මග්ගසති පටිසරණං. ජවනමනො හි මග්ගසතිං පටිසරති. විමුත්තීති ඵලවිමුත්ති. පටිසරණන්ති ඵලවිමුත්තියා නිබ්බානං පටිසරණං. තඤ්හි සා පටිසරති. නාසක්ඛි පඤ්හස්ස පරියන්තං ගහෙතුන්ති පඤ්හස්ස පරිච්ඡෙදං පමාණං ගහෙතුං නාසක්ඛි, අප්පටිසරණං ධම්මං ‘‘සප්පටිසරණ’’න්ති පුච්ඡි. නිබ්බානං නාමෙතං අප්පටිසරණං, න කිඤ්චි පටිසරති. නිබ්බානොගධන්ති නිබ්බානබ්භන්තරං නිබ්බානං අනුපවිට්ඨං. බ්රහ්මචරියන්ති මග්ගබ්රහ්මචරියං. නිබ්බානපරායණන්ති නිබ්බානං පරං අයනමස්ස පරා ගති, න තතො පරං ගච්ඡතීති අත්ථො. නිබ්බානං පරියොසානං අවසානං අස්සාති නිබ්බානපරියොසානං. ‘स्मृती हे शरण आहे’ (सति पटिसरणं) म्हणजे मार्गस्मृती हे शरण आहे. कारण जवन-मन हे मार्गस्मृतीचा आश्रय घेते. ‘विमुक्ती’ (विमुत्ति) म्हणजे फलविमुक्ती. ‘शरण’ (पटिसरणं) म्हणजे फलविमुक्तीचे शरण निर्वाण आहे. कारण ती निर्वाणाचा आश्रय घेते. ‘प्रश्नाची मर्यादा ग्रहण करू शकला नाही’ (नासक्खि पञ्हस्स परियन्तं गहेतुं) म्हणजे प्रश्नाची मर्यादा किंवा प्रमाण समजून घेण्यास तो असमर्थ ठरला; ज्याला दुसरे कोणतेही शरण नाही अशा निर्वाण धर्माला ‘शरण असणारा’ मानून त्याने प्रश्न विचारला. निर्वाण हे स्वतः अशरण आहे, ते इतर कशाचाही आश्रय घेत नाही. ‘निर्वाणात बुडालेले’ (निब्बानोगधं) म्हणजे निर्वाणाच्या अंतर्गत असणारे, निर्वाणात प्रवेश केलेले. ‘ब्रह्मचर्य’ (ब्रह्मचरियं) म्हणजे मार्ग-ब्रह्मचर्य. ‘निर्वाणपरायण’ (निब्बानपरायणं) म्हणजे निर्वाण हेच ज्याचे परम अयन (आश्रय) किंवा परम गती आहे, त्यापलीकडे काहीही जात नाही, असा अर्थ आहे. ‘निर्वाणपर्यवसान’ (निब्बानपरियोसानं) म्हणजे निर्वाण हाच ज्याचा शेवट किंवा अंत आहे. මූලජාතා පතිට්ඨිතාති මග්ගෙන ආගතසද්ධා වුච්චති. ඉමම්හි චෙ, භික්ඛවෙ, සමයෙති කිං සන්ධායාහ? ඣානඅනාගාමිතං. තස්මිඤ්හි සමයෙ බ්රාහ්මණස්ස පඨමමග්ගෙන පඤ්ච අකුසලචිත්තානි පහීනානි, පඨමජ්ඣානෙන පඤ්ච නීවරණානීති ඣානඅනාගාමිට්ඨානෙ ඨිතො. සො අපරිහීනජ්ඣානො කාලං කත්වා තත්ථෙව පරිනිබ්බායෙය්ය. සචෙ පනස්ස පුත්තදාරං අනුසාසන්තස්ස කම්මන්තෙ විචාරෙන්තස්ස ඣානං නස්සති, නට්ඨෙ ඣානෙ ගති අනිබද්ධා හොති, අනට්ඨෙ පන නිබද්ධාති ඉමං ඣානඅනාගාමිතං සන්ධාය එවමාහ. ‘मूळ धरलेली आणि प्रस्थापित झालेली’ (मूलजाता पतिट्ठिता) याद्वारे मार्गामुळे प्राप्त झालेली श्रद्धा म्हटली आहे. ‘हे भिक्खूहो, जर या समयी...’ (इमम्हि चे, भिक्खवे, समये) हे कशाला उद्देशून म्हटले आहे? ध्यान-अनागामी अवस्थेला उद्देशून म्हटले आहे. कारण त्या समयी त्या ब्राह्मणाने प्रथम मार्गाने (स्रोतापत्ती मार्गाने) पाच अकुशल चित्ते नष्ट केली होती आणि प्रथम ध्यानाने पाच नीवरण नष्ट केले होते, म्हणून तो ध्यान-अनागामीच्या स्थानावर स्थित होता. तो ध्यानापासून भ्रष्ट न होता काळ करून तेथेच परिनिर्वाण प्राप्त करेल. परंतु जर आपल्या मुलाबाळांना उपदेश करताना किंवा कामाचा विचार करताना त्याचे ध्यान नष्ट झाले, तर ध्यान नष्ट झाल्यावर गती अनिश्चित होते; ध्यान नष्ट न झाल्यास गती निश्चित असते. या ध्यान-अनागामी अवस्थेला उद्देशून त्यांनी असे म्हटले आहे. 3. සාකෙතසුත්තවණ්ණනා ३. साकेत सुत्ताची वर्णना. 513. තතියෙ අඤ්ජනවනෙති අඤ්ජනවණ්ණපුප්ඵානං රුක්ඛානං රොපිතවනෙ. යං, භික්ඛවෙ, සද්ධින්ද්රියං, තං සද්ධාබලන්ති තඤ්හි අධිමොක්ඛලක්ඛණෙ ඉන්දට්ඨෙන සද්ධින්ද්රියං, අස්සද්ධියෙ අකම්පනෙන සද්ධාබලං. ඉතරෙසං පග්ගහඋපට්ඨානඅවික්ඛෙපපජානනලක්ඛණෙසු ඉන්දට්ඨෙන ඉන්ද්රියභාවො, කොසජ්ජමුට්ඨසච්චවික්ඛෙපාවිජ්ජාසු අකම්පනෙන බලභාවො වෙදිතබ්බො. එවමෙව ඛොති තස්සා නදියා එකසොතං විය සද්ධාවීරියසතිසමාධිපඤ්ඤාවසෙන එතෙසං නින්නානාකරණං වෙදිතබ්බං, ද්වෙ සොතානි විය ඉන්දට්ඨඅකම්පනට්ඨෙහි ඉන්ද්රියබලවසෙන නානාකරණං වෙදිතබ්බං. ५१३. तिसऱ्या सुत्तात, ‘अंजनवनात’ (अञ्जनवने) म्हणजे काजळाच्या रंगाची फुले असणाऱ्या वृक्षांच्या लावलेल्या वनात. ‘हे भिक्खूहो, जे श्रद्धेंद्रिय आहे, तेच श्रद्धाबल आहे’ कारण ते अधिमोक्ष (दृढ विश्वास) लक्षणात अधिपती भावाने ‘श्रद्धेंद्रिय’ आहे, आणि अश्रद्धेच्या बाबतीत अकंपन (अविचल) राहण्याच्या भावाने ‘श्रद्धाबल’ आहे. इतरांच्या (वीर्य, स्मृती, समाधी, प्रज्ञा यांच्या) बाबतीत प्रग्रह (उत्साह), उपस्थान (जागरूकता), अविक्षेप (एकाग्रता) आणि प्रजानन (विशेष ज्ञान) या लक्षणांमध्ये अधिपती भावाने ‘इंद्रियभाव’ समजावा; आणि आळस, विस्मृती, विक्षेप व अविद्या यांच्या बाबतीत अकंपन राहण्याच्या भावाने ‘बलभाव’ समजावा. ‘त्याचप्रमाणे’ (एवमेव खो) म्हणजे त्या नदीच्या एकाच प्रवाहाप्रमाणे श्रद्धा, वीर्य, स्मृती, समाधी आणि प्रज्ञा यांच्या प्रभावाने त्यांच्यात कोणताही भेद नसणे समजावे, आणि दोन प्रवाहांप्रमाणे अधिपती भाव आणि अकंपन भाव यांच्यामुळे इंद्रिय व बल यांच्या प्रभावाने त्यांच्यातील भेद समजावा. 4. පුබ්බකොට්ඨකසුත්තවණ්ණනා ४. पुब्बकोट्ठक सुत्ताची वर्णना. 514. චතුත්ථෙ [Pg.279] අමතොගධන්ති අමතබ්භන්තරං. අමතපරායණන්ති අමතනිබ්බත්තිකං. අමතපරියොසානන්ති අමතනිට්ඨං. සාධු සාධූති ථෙරස්ස බ්යාකරණං පසංසන්තො සාධුකාරං දෙති. ५१४. चौथ्या सूत्तात, 'अमतोग्धं' म्हणजे अमतात (निर्वाणात) अंतर्भूत असलेले. 'अमतपरायणं' म्हणजे अमतात (निर्वाणात) पर्यवसान असणारे. 'अमतपरियोसानं' म्हणजे अमतात (निर्वाणात) शेवट असणारे. 'साधु साधु' म्हणजे स्थेरांच्या (सारिपुत्तांच्या) उत्तराची प्रशंसा करत साधुकार देणे होय. 5. පඨමපුබ්බාරාමසුත්තවණ්ණනා ५. प्रथम पुब्बाराम सुत्तवर्णन. 515. පඤ්චමෙ තදන්වයාති තං අනුගච්ඡමානා, අනුවත්තමානාති අත්ථො. පුබ්බකොට්ඨකං ආදිං කත්වා පටිපාටියා ඡසු සුත්තෙසු ඵලින්ද්රියානෙව කථිතානි. ५१५. पाचव्या सूत्तात, 'तदन्वया' म्हणजे त्याचे अनुकरण करणारे किंवा त्याच्या मागे जाणारे, असा अर्थ आहे. 'पुब्बकोट्ठक' सुत्तापासून सुरुवात करून अनुक्रमे सहा सूत्तांमध्ये फळेंद्रियांचेच वर्णन केले आहे. 10. ආපණසුත්තවණ්ණනා १०. आपण सुत्तवर्णन. 520. දසමෙ ඉමෙ ඛො තෙ ධම්මාති උපරි සහ විපස්සනාය තයො මග්ගා. යෙ මෙ පුබ්බෙ සුතාව අහෙසුන්ති යෙ ධම්මා මයා පුබ්බෙ ‘‘අරහත්තඵලින්ද්රියං නාම අත්ථී’’ති කථෙන්තානංයෙව සුතා අහෙසුං. කායෙන ච ඵුසිත්වාති නාමකායෙන ච ඵුසිත්වා පටිලභිත්වා. පඤ්ඤාය ච අතිවිජ්ඣ පස්සාමීති පච්චවෙක්ඛණපඤ්ඤාය ච අතිවිජ්ඣිත්වා පස්සාමි. යා හිස්ස, භන්තෙ, සද්ධාති අයං කතරසද්ධා? චතූහි ඉන්ද්රියෙහි සම්පයුත්තා සද්ධා හෙට්ඨා කථිතාව, අයං පන පච්චවෙක්ඛණසද්ධා. සම්පයුත්තසද්ධා හි මිස්සකා, පච්චවෙක්ඛණසද්ධා ලොකියාව. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. ५२०. दहाव्या सूत्तात, 'इमे खो ते धम्मा' म्हणजे (सोतापत्तिमग्गच्या) वर विपश्यनेसह असणारे तीन मार्ग. 'ये मे पुब्बे सुतावा अहेसुं' म्हणजे जे धर्म मी पूर्वी 'अरहत्तफळेंद्रिय नावाचे काही आहे' असे सांगणाऱ्यांकडूनच ऐकले होते. 'कायेन च फुसित्वा' म्हणजे नामकायाने स्पर्श करून (अनुभवून) प्राप्त करून घेणे. 'पञ्ञाय च अतिविज्झ पस्सामि' म्हणजे प्रत्यवेक्षण प्रज्ञेने भेदून पाहणे (यथार्थ पाहणे). 'या हिस्स, भन्ते, सद्धा' यामध्ये ही कोणती श्रद्धा आहे? चार इंद्रियांशी संप्रयुक्त असणारी श्रद्धा खाली सांगितलीच आहे, परंतु ही प्रत्यवेक्षण श्रद्धा आहे. संप्रयुक्त श्रद्धा ही मिश्र (लौकिक व लोकोत्तर दोन्ही) असते, तर प्रत्यवेक्षण श्रद्धा केवळ लौकिकच असते. उर्वरित सर्व भाग सर्वत्र स्पष्टच आहे. ජරාවග්ගො පඤ්චමො. जरावग्ग पाचवा समाप्त. 6. සූකරඛතවග්ගො ६. सूकरखतवग्ग 1. සාලසුත්තවණ්ණනා १. साल सुत्तवर्णन. 521. ඡට්ඨවග්ගස්ස පඨමෙ සූරෙනාති සූරභාවෙන. බොධායාති බුජ්ඣනත්ථාය. ५२१. सहाव्या वग्गाच्या पहिल्या सूत्तात, 'सूरेन' म्हणजे शूरभावाने (वीरतेने). 'बोधाय' म्हणजे (चार आर्यसत्यांच्या) बोधासाठी (जाणून घेण्यासाठी). 2. මල්ලිකසුත්තවණ්ණනා २. मल्लिक सुत्तवर्णन. 522. දුතියෙ [Pg.280] මල්ලෙසූති එවංනාමකෙ ජනපදෙ. ඉමස්මිං සුත්තෙ චත්තාරි ඉන්ද්රියානි මිස්සකානි, අරියඤාණං ලොකුත්තරං. තම්පි පන චතුක්කින්ද්රියනිස්සිතං කත්වා මිස්සකන්ති භාජෙතුං වට්ටති. ५२२. दुसऱ्या सूत्तात, 'मल्लेसु' म्हणजे या नावाच्या जनपदातील लोकांमध्ये. या सूत्तात चार इंद्रिये मिश्र (लौकिक व लोकोत्तर) आहेत, आणि आर्य ज्ञान लोकोत्तर आहे. परंतु त्यालाही इतर चार इंद्रियांवर आश्रित करून मिश्र म्हणून विभागणे योग्य आहे. 3. සෙඛසුත්තවණ්ණනා ३. सेख सुत्तवर्णन. 523. තතියෙ න හෙව ඛො කායෙන ඵුසිත්වා විහරතීති න නාමකායෙන ඵුසිත්වා පටිලභිත්වා විහරති, ඵුසිතුං පටිලභිතුං න සක්කොති. පඤ්ඤාය ච අතිවිජ්ඣ පස්සතීති පච්චවෙක්ඛණපඤ්ඤාය පන ‘‘උපරි අරහත්තඵලින්ද්රියං නාම අත්ථී’’ති පජානාති. අසෙඛභූමියං ඵුසිත්වා විහරතීති පටිලභිත්වා විහරති. පඤ්ඤායාති පච්චවෙක්ඛණපඤ්ඤාය ‘‘අරහත්තඵලින්ද්රියං නාම අත්ථී’’ති පජානාති. න කුහිඤ්චි කිස්මිඤ්චීති ද්වෙපි අඤ්ඤමඤ්ඤවෙවචනානෙව, කිස්මිඤ්චි භවෙ න උප්පජ්ජිස්සන්තීති අත්ථො. ඉමස්මිං සුත්තෙ පඤ්චින්ද්රියානි ලොකුත්තරානි, ඡ ලොකිකානි වට්ටනිස්සිතානෙව කථිතානි. ५२३. तिसऱ्या सूत्तात, 'न हेव खो कायेन फुसित्वा विहरति' म्हणजे नामकायाने स्पर्श करून, प्राप्त करून घेऊन विहरत नाही; इंद्रियांच्या अपरिपक्वतेमुळे स्पर्श करण्यास किंवा प्राप्त करण्यास तो असमर्थ असतो. 'पञ्ञाय च अतिविज्झ पस्सति' म्हणजे प्रत्यवेक्षण प्रज्ञेने 'वर अरहत्तफळेंद्रिय नावाचे काही आहे' असे जाणतो. 'असेखभूमियं फुसित्वा विहरति' म्हणजे (असेख भूमीत) प्राप्त करून घेऊन विहरतो. 'पञ्ञाय' म्हणजे प्रत्यवेक्षण प्रज्ञेने 'अरहत्तफळेंद्रिय नावाचे काही आहे' असे जाणतो. 'न कुहिञ्चि किस्मिञ्चि' हे दोन्ही शब्द एकमेकांचे समानार्थीच आहेत, कोणत्याही भवात उत्पन्न होणार नाहीत असा याचा अर्थ आहे. या सूत्तात पाच इंद्रिये लोकोत्तर आहेत आणि सहा इंद्रिये लौकिक असून संसारावर (वट्टावर) आश्रित आहेत असे सांगितले आहे. 4-5. පදසුත්තාදිවණ්ණනා ४-५. पद सुत्त इत्यादींचे वर्णन. 524-525. චතුත්ථෙ යානි කානිචි පදානි බොධාය සංවත්තන්තීති යානි කානිචි ධම්මපදානි, යෙ කෙචි ධම්මකොට්ඨාසා, බුජ්ඣනත්ථාය සංවත්තන්ති. පඤ්චමං උත්තානමෙව. ५२४-५२५. चौथ्या सूत्तात, 'यानि कानिचि पदानि बोधाय संवत्तन्ति' म्हणजे जी काही धम्मपदे किंवा जे काही धम्मसमूह (धर्माचे भाग) बोधासाठी (सत्याच्या साक्षात्कारासाठी) कारणीभूत ठरतात. पाचवे सूत्त स्पष्टच आहे. 6-7. පතිට්ඨිතසුත්තාදිවණ්ණනා ६-७. पतिट्ठित सुत्त इत्यादींचे वर्णन. 526-527. ඡට්ඨෙ චිත්තං රක්ඛති ආසවෙසු ච සාසවෙසු ච ධම්මෙසූති තෙභූමකධම්මෙ ආරබ්භ ආසවුප්පත්තිං වාරෙන්තො ආසවෙසු ච සාසවෙසු ච ධම්මෙසු චිත්තං රක්ඛති නාම. සත්තමං උත්තානමෙව. ५२६-५२७. सहाव्या सूत्तात, 'चित्तं रक्खति आसवेसु च सासवेसु च धम्मेसु' म्हणजे तिन्ही भूमींमधील (तेभूमिक) धर्मांना आलंबन करून आसवांची उत्पत्ती रोखत, आसवयुक्त आणि अनासव (सासवेसु च धम्मेसु - आसवांचे आलंबन असणाऱ्या) धर्मांपासून चित्ताचे रक्षण करतो. सातवे सूत्त स्पष्टच आहे. 8. සූකරඛතසුත්තවණ්ණනා ८. सूकरखत सुत्तवर्णन. 528. අට්ඨමෙ සූකරඛතායන්ති සූකරඛතලෙණෙ. කස්සපබුද්ධකාලෙ කිර තං ලෙණං එකස්මිං බුද්ධන්තරෙ පථවියා වඩ්ඪමානාය අන්තොභූමිගතං ජාතං. අථෙකදිවසං එකො සූකරො තස්ස ඡදනපරියන්තසමීපෙ පංසුං ඛණි. දෙවෙ වුට්ඨෙ පංසු ධොතා, ඡදනපරියන්තො පාකටො [Pg.281] අහොසි. එකො වනචරකො දිස්වා ‘‘පුබ්බෙ සීලවන්තෙහි පරිභුත්තට්ඨානෙන භවිතබ්බං, පටිජග්ගිස්සාමි න’’න්ති සමන්තතො පංසුං අපනෙත්වා ලෙණං සොධෙත්වා කුටිපරික්ඛෙපං කත්වා ද්වාරවාතපානං යොජෙත්වා සුපරිනිට්ඨිතසුධාකම්මචිත්තකම්මං රජතපට්ටසදිසාය වාලිකාය සන්ථරිතං පරිවෙණං කත්වා මඤ්චපීඨං පඤ්ඤාපෙත්වා භගවතො වසනත්ථාය අදාසි, ලෙණං ගම්භීරං අහොසි ඔතරිත්වා ආරුහිතබ්බං. තං සන්ධායෙතං වුත්තං. පරමනිපච්චකාරන්ති භාවනපුංසකං, පරමනිපච්චකාරී හුත්වා පවත්තමානො පවත්තතීති වුත්තං හොති. අනුත්තරං යොගක්ඛෙමන්ති අරහත්තං. සප්පතිස්සොති සජෙට්ඨකො. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානත්ථමෙවාති. ५२८. आठव्या सूत्तात, 'सूकरखतायं' म्हणजे डुकराने खोदलेल्या गुहेत (सूकरखत लेणामध्ये). असे ऐकिवात आहे की, कस्सप बुद्धांच्या काळात दोन बुद्धांच्या मधील काळात (बुद्धंतरात) पृथ्वीची उंची वाढल्यामुळे ती गुहा जमिनीखाली गाडली गेली होती. नंतर एका दिवशी एका डुकराने त्या गुहेच्या छताच्या कडेला माती खोदली. पाऊस पडल्यावर ती माती वाहून गेली आणि छताचा कडा उघडा पडला. एका वनविहार करणाऱ्या माणसाने (व्याधाने) ते पाहून विचार केला, 'पूर्वी शीलवान भिक्खूंनी वापरलेली ही जागा असावी, मी हिची डागडुजी करतो.' असा उत्साह निर्माण झाल्यावर त्याने सभोवतालची माती काढून गुहा स्वच्छ केली, कुटीची भिंत बांधली, दरवाजे व खिडक्या बसवल्या, त्यावर उत्तम प्रकारे गिलावा व चित्रकाम केले, चांदीसारखी पांढरी वाळू पसरवून अंगण तयार केले, पलंग व आसने मांडली आणि भगवंतांच्या निवासासाठी ती दान केली. ती गुहा खोल होती, खाली उतरून वर चढावे लागत असे. त्याला उद्देशून हे म्हटले आहे. 'परमनिपच्चकारं' हे क्रियाविशेषण नपुंसकलिंगी पद आहे, अत्यंत नम्र व आदरयुक्त होऊन वागणे असा याचा अर्थ होतो. 'अनुत्तरं योगक्खेमं' म्हणजे अरहत्तपद. 'सप्पतिस्सो' म्हणजे ज्येष्ठांचा आदर करणारा. उर्वरित सर्व भाग सर्वत्र स्पष्ट अर्थाचाच आहे. සූකරඛතවග්ගො ඡට්ඨො. सूकरखतवग्ग सहावा समाप्त. 7. බොධිපක්ඛියවග්ගො ७. बोधिपक्खियवग्ग 531-650. සත්තමවග්ගෙ සත්ත ඵලානි පුබ්බභාගානි, තෙසං හෙට්ඨා ද්වෙ ඵලානි ආදිං කත්වා මිස්සකානි. සෙසමෙත්ථ ඉතො පරඤ්ච සබ්බං උත්තානමෙවාති. ५३१-६५०. सातव्या वग्गात सात फळे पूर्वभागातील (मग्गच्या आधीची) आहेत, त्यांच्या खालील दोन फळांपासून सुरुवात करून ती मिश्र आहेत. या वग्गातील उर्वरित भाग आणि यापुढील सर्व भाग स्पष्टच आहे. ඉන්ද්රියසංයුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. इंद्रियसंयुत्त वर्णन समाप्त. 5. සම්මප්පධානසංයුත්තවණ්ණනා ५. सम्मप्पधानसंयुत्त वर्णन. 651-704. සම්මප්පධානසංයුත්තෙ සකලෙපි පුබ්බභාගවිපස්සනාව කථිතාති. ६५१-७०४. सम्मप्पधानसंयुत्तात संपूर्ण वग्गात पूर्वभागातील विपश्यनेचेच वर्णन केले आहे. සම්මප්පධානසංයුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. सम्मप्पधानसंयुत्त वर्णन समाप्त. 6. බලසංයුත්තවණ්ණනා ६. बलसंयुत्त वर्णन. 705-812. බලසංයුත්තෙ බලානි මිස්සකානෙව කථිතානි. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. ७०५-८१२. बलसंयुत्तात बलांचे वर्णन मिश्र (लौकिक व लोकोत्तर) स्वरूपातच केले आहे. उर्वरित सर्व भाग सर्वत्र स्पष्टच आहे. බලසංයුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. बलसंयुत्त वर्णन समाप्त. 7. ඉද්ධිපාදසංයුත්තං ७. इद्धिपादसंयुत्त 1. චාපාලවග්ගො १. चापालवग्ग 1. අපාරසුත්තවණ්ණනා १. अपार सुत्तवर्णन. 813. ඉද්ධිපාදසංයුත්තස්ස [Pg.282] පඨමෙ ඡන්දං නිස්සාය පවත්තො සමාධි ඡන්දසමාධි. පධානභූතා සඞ්ඛාරා පධානසඞ්ඛාරා. සමන්නාගතන්ති තෙහි ධම්මෙහි උපෙතං. ඉද්ධියා පාදං, ඉද්ධිභූතං වා පාදන්ති ඉද්ධිපාදං. සෙසෙසුපි එසෙව නයො. අයමෙත්ථ සඞ්ඛෙපො, විත්ථාරො පන ඉද්ධිපාදවිභඞ්ගෙ (විභ. 431 ආදයො) ආගතොව. විසුද්ධිමග්ගෙ (විසුද්ධි. 2.3.69 ආදයො) පනස්ස අත්ථො දීපිතො. තථා මග්ගබොජ්ඣඞ්ගසතිපට්ඨානසංයුත්තෙසු චෙව ඉධ ච එකපරිච්ඡෙදොව. ८१३. इद्धिपादसंयुत्ताच्या पहिल्या सूत्तात, छंदावर (इच्छेवर) आश्रित असणारा समाधी म्हणजे 'छंदसमाधी' होय. प्रधान (मुख्य) असणारे संस्कार म्हणजे 'प्रधानसंस्कार' (पधानसंखार) होत. 'समन्नागतं' म्हणजे या धर्मांनी युक्त असणे. ऋद्धीचा (इद्धीचा) पाया किंवा ऋद्धीरूप असणारा पाया म्हणजे 'इद्धिपाद' होय. उर्वरित (वीर्य समाधी इत्यादी) मध्येही हाच नियम समजावा. हा येथे संक्षेप (थोडक्यात अर्थ) आहे, परंतु याचा सविस्तर विस्तार 'इद्धिपादविभंग' मध्ये आलेलाच आहे. 'विसुद्धिमग्ग' मध्ये देखील याचा अर्थ स्पष्ट केला आहे. तसेच मग्गसंयुत्त, बोज्झंगसंयुत्त, सतिपट्ठानसंयुत्त आणि येथे (इद्धिपादसंयुत्तात) देखील एकच समान अर्थनिर्देश समजावा. 5. ඉද්ධිපදෙසසුත්තවණ්ණනා ५. इद्धिपदेस सुत्तवर्णन. 817. පඤ්චමෙ ඉද්ධිපදෙසන්ති තයො ච මග්ගෙ තීණි ච ඵලානි. ८१७. पाचव्या सूत्तात, 'इद्धिपदेसं' म्हणजे तीन मार्ग आणि तीन फळे असे समजावे. 6. සමත්තසුත්තවණ්ණනා ६. समत्त सुत्तवर्णन. 818. ඡට්ඨෙ සමත්තං ඉද්ධින්ති අරහත්තඵලමෙව. ආදිතො පට්ඨාය පන නවසුපි සුත්තෙසු විවට්ටපාදකා එව ඉද්ධිපාදා කථිතා. ८१८. सहाव्या सूत्तात, 'समत्तं इद्धिं' म्हणजे केवळ अरहत्तफळच समजावे. सुरुवातीपासून नऊ सूत्तांमध्ये विवट्ट (लोकोत्तर) धर्माचा पाया असणारेच इद्धिपाद सांगितले आहेत. 10. චෙතියසුත්තවණ්ණනා १०. चेतिय सुत्तवर्णन. 822. දසමෙ නිසීදනන්ති චම්මඛණ්ඩං අධිප්පෙතං. උදෙනං චෙතියන්ති උදෙනයක්ඛස්ස චෙතියට්ඨානෙ කතවිහාරො වුච්චති. ගොතමකාදීසුපි එසෙව නයො. භාවිතාති වඩ්ඪිතා. බහුලීකතාති පුනප්පුනං කතා. යානීකතාති යුත්තයානං විය කතා. වත්ථුකතාති පතිට්ඨානට්ඨෙන වත්ථු විය කතා. අනුට්ඨිතාති අධිට්ඨිතා. පරිචිතාති සමන්තතො චිතා සුවඩ්ඪිතා. සුසමාරද්ධාති සුට්ඨු සමාරද්ධා. ८२२. दहाव्या सुत्तात, 'निसीदन' म्हणजे चामड्याचे आसन (चर्मखंड) अभिप्रेत आहे. 'उदेन चैत्य' म्हणजे उदेन यक्षाच्या चैत्यस्थानावर बांधलेला विहार होय. गोतमक इत्यादी चैत्यांच्या बाबतीतही हाच नियम जाणावा. 'भावित' म्हणजे विकसित केलेले (वाढवलेले). 'बहुलीकृत' म्हणजे पुन्हा पुन्हा केलेले. 'यानीकृत' म्हणजे जोडलेल्या रथाप्रमाणे (वाहन बनवल्याप्रमाणे) उपयोगात आणलेले. 'वस्तुकृत' म्हणजे अधिष्ठानाच्या अर्थाने वस्तू (पाया) प्रमाणे दृढ केलेले. 'अनुष्ठित' म्हणजे अधिष्ठित केलेले (दृढ केलेले). 'परिचित' म्हणजे सर्व बाजूंनी संचित केलेले आणि चांगल्या प्रकारे वाढवलेले. 'सुसमारब्ध' म्हणजे चांगल्या प्रकारे आरंभ केलेले (उत्कृष्टपणे आचरलेले)। ඉති අනියමෙන කථෙත්වා පුන නියමෙත්වා දස්සෙන්තො තථාගතස්ස ඛොතිආදිමාහ. එත්ථ ච කප්පන්ති ආයුකප්පං, තස්මිං තස්මිං කාලෙ යං මනුස්සානං [Pg.283] ආයුප්පමාණං, තං පරිපුණ්ණං කරොන්තො තිට්ඨෙය්ය. කප්පාවසෙසං වාති ‘‘අප්පං වා භිය්යො’’ති වුත්තවස්සසතතො අතිරෙකං වා. මහාසීවත්ථෙරො පනාහ ‘‘බුද්ධානං අට්ඨානෙ ගජ්ජිතං නාම නත්ථි. යථෙව හි වෙළුවගාමකෙ උප්පන්නං මාරණන්තිකවෙදනං දස මාසෙ වික්ඛම්භෙසි, එවං පුනප්පුනං තං සමාපත්තිං සමාපජ්ජිත්වා දස දස මාසෙපි වික්ඛම්භෙන්තො ඉමං භද්දකප්පමෙව තිට්ඨෙය්යා’’ති. अशा प्रकारे सामान्यपणे सांगून, पुन्हा निश्चित करून दाखवताना भगवंतांनी 'तथागतस्स खो' इत्यादी म्हटले. येथे 'कल्प' म्हणजे आयु-कल्प होय; त्या त्या काळात मनुष्यांचे जे आयुष्यमान असते, ते परिपूर्ण करत तथागतांनी राहावे. 'कल्पापेक्षा काही अधिक काळ' म्हणजे 'काहीसे कमी किंवा अधिक' असे म्हटलेल्या शंभर वर्षांपेक्षा अधिक काळ जगणे होय. परंतु महासीव थेर म्हणतात: 'बुद्धांच्या बाबतीत अशक्य अशी कोणतीही गोष्ट नसते. कारण ज्याप्रमाणे वेळुवगामकात उत्पन्न झालेली मरणान्तिक वेदना भगवंतांनी दहा महिने रोखून धरली होती, त्याचप्रमाणे वारंवार त्या समापत्तीला प्राप्त करून (समाधीत लीन होऊन) दहा-दहा महिने वेदना रोखून धरत ते याच भद्रकल्पापर्यंत राहू शकले असते।' කස්මා පන න ඨිතොති? උපාදිණ්ණකසරීරං නාම ඛණ්ඩිච්චාදීහි අභිභුය්යති, බුද්ධා නාම ඛණ්ඩිච්චාදිභාවං අපත්වාව පඤ්චමෙ ආයුකොට්ඨාසෙ බහුජනස්ස පියමනාපකාලෙයෙව පරිනිබ්බායන්ති. බුද්ධානුබුද්ධෙසු ච මහාසාවකෙසු පරිනිබ්බුතෙසු එකකෙන ඛාණුකෙන විය ඨාතබ්බං හොති, දහරසාමණෙරපරිවාරිතෙන වා, තතො – ‘‘අහො බුද්ධානං පරිසා’’ති හීළෙතබ්බතං ආපජ්ජෙය්ය, තස්මා න ඨිතොති. එවං වුත්තෙපි සො පන න රුච්චති, ‘‘ආයුකප්පො’’ති ඉදමෙව අට්ඨකථායං නියමිතං. परंतु ते का राहिले नाहीत? उपादिन्नक शरीर (कर्म-गृहीत शरीर) हे दात पडणे, केस पांढरे होणे इत्यादींनी ग्रस्त होते. बुद्ध हे दात पडणे इत्यादी अवस्थेला प्राप्त न होताच, आयुष्याच्या पाचव्या भागात, बहुजनांना प्रिय आणि आवडत्या अशा वयातच परिनिर्वाण प्राप्त करतात. तसेच, बुद्धांनंतर सत्य जाणणारे महाश्रावक परिनिर्वाण पावले असताना, भगवंतांना एखाद्या सुकलेल्या झाडाच्या खुंटाप्रमाणे एकट्यानेच राहावे लागले असते, किंवा केवळ तरुण श्रामणेरांच्या परिवारासह राहावे लागले असते. त्यामुळे 'अहा! बुद्धांची परिषद अशी आहे का!' असा लोकांकडून उपहास ओढवून घेतला गेला असता; म्हणून ते राहिले नाहीत. असे म्हटले गेले असले तरी, हे मत मान्य केले जात नाही. अट्ठकथेत 'आयु-कल्प' हाच अर्थ निश्चित केला आहे। යථා තං මාරෙන පරියුට්ඨිතචිත්තොති එත්ථ තන්ති නිපාතමත්තං. යථා මාරෙන පරියුට්ඨිතචිත්තො අජ්ඣොත්ථටචිත්තො අඤ්ඤොපි කොචි පුථුජ්ජනො පටිවිජ්ඣිතුං න සක්කුණෙය්ය, එවමෙව නාසක්ඛි පටිවිජ්ඣිතුන්ති අත්ථො. මාරො හි යස්ස සබ්බෙන සබ්බං ද්වාදස විපල්ලාසා අප්පහීනා, තස්ස චිත්තං පරියුට්ඨාති. ථෙරස්ස ච චත්තාරො විපල්ලාසා අප්පහීනා, තෙනස්ස මාරො චිත්තං පරියුට්ඨාසි. සො පන චිත්තපරියුට්ඨානං කරොන්තො කිං කරොතීති? භෙරවං රූපාරම්මණං වා දස්සෙති, සද්දාරම්මණං වා සාවෙති, තතො සත්තා තං දිස්වා වා සුත්වා වා සතිං විස්සජ්ජෙත්වා විවටමුඛා හොන්ති, තෙසං මුඛෙන හත්ථං පවෙසෙත්වා හදයං මද්දති, තෙ විසඤ්ඤී හුත්වා තිට්ඨන්ති. ථෙරස්ස පනෙස මුඛෙ හත්ථං පවෙසෙතුං කිං සක්ඛිස්සති? භෙරවාරම්මණං පන දස්සෙති, තං දිස්වා ථෙරො නිමිත්තොභාසං න පටිවිජ්ඣි. ජානන්තොයෙව භගවා කිමත්ථං යාවතතියකං ආමන්තෙසීති. පරතො ‘‘තිට්ඨතු, භන්තෙ, භගවා’’ති යාචිතෙ ‘‘තුය්හෙවෙතං දුක්කටං, තුය්හෙවෙතං අපරද්ධ’’න්ති දොසාරොපනෙන සොකතනුකරණත්ථං. 'यथा तं मारेन परियुट्ठितचित्तो' यामध्ये 'तं' हा केवळ एक निपात आहे. ज्याप्रमाणे माराने वश केलेल्या आणि ग्रासलेल्या चित्ताचा इतर कोणताही पृथग्जन (सामान्य माणूस) सत्य जाणू शकत नाही, त्याचप्रमाणे थेर आनंद सुद्धा सत्य जाणू शकले नाहीत, असा याचा अर्थ आहे. कारण मार हा ज्याच्या चित्तातील बाराही विपर्यास पूर्णपणे नष्ट झालेले नसतात, त्याच्या चित्तावर ताबा मिळवतो. थेरांचे (आनंदांचे) चार विपर्यास नष्ट झालेले नव्हते, म्हणून माराने त्यांच्या चित्तावर ताबा मिळवला. तो मार चित्तावर ताबा मिळवताना काय करतो? तो भयानक रूप-आलंबन दाखवतो किंवा भयानक शब्द-आलंबन ऐकवतो. त्यामुळे लोक ते पाहून किंवा ऐकून स्मृती गमावून तोंड उघडे टाकतात (आ वासून राहतात). त्यांच्या तोंडात हात घालून तो त्यांचे हृदय चिरडतो आणि ते बेशुद्ध होऊन पडतात. पण थेरांच्या तोंडात हात घालणे त्याला कसे शक्य होईल? तो केवळ भयानक आलंबन दाखवतो. ते पाहून थेरांनी भगवंतांनी दिलेल्या संकेताला (निमित्त-ओभासाला) ओळखले नाही. सर्व काही माहीत असूनही भगवंतांनी तीन वेळा का विचारले? नंतर जेव्हा थेरांनी 'भंते, भगवंतांनी राहावे' अशी याचना केली, तेव्हा 'हा तुझाच दोष आहे, ही तुझीच चूक आहे' असे दोषारोप करून त्यांचा शोक कमी करण्यासाठी भगवंतांनी तीन वेळा विचारले। මාරො පාපිමාති එත්ථ සත්තෙ අනත්ථෙ නියොජෙන්තො මාරෙතීති මාරො. පාපිමාති තස්සෙව වෙවචනං. සො හි පාපධම්මසමන්නාගතත්තා ‘‘පාපිමා’’ති [Pg.284] වුච්චති. කණ්හො, අන්තකො, නමුචි, පමත්තබන්ධූතිපි තස්සෙව නාමානි. භාසිතා ඛො පනෙසාති අයඤ්හි භගවතො සම්බොධිපත්තියා අට්ඨමෙ සත්තාහෙ බොධිමණ්ඩංයෙව ආගන්ත්වා – ‘‘භගවා යදත්ථං තුම්හෙහි පාරමියො පූරිතා, සො වො අත්ථො අනුප්පත්තො, පටිවිද්ධං සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණං, කිං වො ලොකවිචරණෙනා’’ති වත්වා යථා අජ්ජ, එවමෙව – ‘‘පරිනිබ්බාතු දානි, භන්තෙ, භගවා, පරිනිබ්බාතු, සුගතො,’’ති යාචි. භගවා චස්ස ‘‘න තාවාහ’’න්තිආදීනි වත්වා පටික්ඛිපි. තං සන්ධාය ‘‘භාසිතා ඛො පනෙසා, භන්තෙ,’’තිආදිමාහ. 'मारो पापिमा' यामध्ये प्राण्यांना अनर्थात प्रवृत्त करून मारतो म्हणून तो 'मार' होय. 'पापिमा' हा त्याचाच समानार्थी शब्द आहे. तो पापधर्माने युक्त असल्यामुळे त्याला 'पापिमा' म्हटले जाते. कण्ण (कृष्ण), अंतक, नमुची, प्रमत्तबंधू ही सुद्धा त्याचीच नावे आहेत. 'भासिता खो पनेसा' म्हणजे, हा मार भगवंतांना संबोधी प्राप्त झाल्यानंतरच्या आठव्या आठवड्यात बोधिमंडळावरच आला आणि म्हणाला, 'भगवंतांनी ज्यासाठी पारमिता पूर्ण केल्या होत्या, तो हेतू आपण प्राप्त केला आहे, सर्वज्ञता-ज्ञान प्राप्त केले आहे, आता आपल्याला जगात फिरण्याची काय गरज?' असे म्हणून, ज्याप्रमाणे आज याचना केली, त्याचप्रमाणे तेव्हाही त्याने 'भंते, भगवंतांनी आता परिनिर्वाण प्राप्त करावे, सुगतांनी आता परिनिर्वाण प्राप्त करावे' अशी याचना केली होती. भगवंतांनी त्याला 'मी तोपर्यंत परिनिर्वाण प्राप्त करणार नाही...' इत्यादी सांगून नकार दिला होता. त्याचा संदर्भ देऊन 'भासिता खो पनेसा, भंते' इत्यादी म्हटले आहे। තත්ථ වියත්තාති මග්ගවසෙන බ්යත්තා. තථෙව විනීතා. තථා විසාරදා. බහුස්සුතාති තෙපිටකවසෙන බහු සුතමෙතෙසන්ති බහුස්සුතා. තදෙව ධම්මං ධාරෙන්තීති ධම්මධරා. අථ වා පරියත්තිබහුස්සුතා චෙව පටිවෙධබහුස්සුතා ච, පරියත්තිපටිවෙධධම්මානංයෙව ධාරණතො ධම්මධරාති එවමෙත්ථ අත්ථො දට්ඨබ්බො. ධම්මානුධම්මප්පටිපන්නාති අරියධම්මස්ස අනුධම්මභූතං විපස්සනාධම්මං පටිපන්නා. සාමීචිප්පටිපන්නාති අනුච්ඡවිකපටිපදං පටිපන්නා. අනුධම්මචාරිනොති අනුධම්මචරණසීලා. සකං ආචරියකන්ති අත්තනො ආචරියවාදං. ආචික්ඛිස්සන්තීතිආදීනි සබ්බානි අඤ්ඤමඤ්ඤස්සෙව වෙවචනානි. සහධම්මෙනාති සහෙතුකෙන සකාරණෙන වචනෙන. සප්පාටිහාරියන්ති යාව නිය්යානිකං කත්වා ධම්මං දෙසෙස්සන්ති. त्यामध्ये 'वियत्त' म्हणजे मार्गाच्या प्रभावाने चतुर (कुशल). तसेच 'विनीत' म्हणजे सुशिक्षित. तसेच 'विशारद' म्हणजे आत्मविश्वासू. 'बहुश्रुत' म्हणजे त्रिपिटकाच्या अभ्यासाने ज्यांनी पुष्कळ ऐकले (शिकले) आहे ते. त्याच धर्माचे धारण करतात म्हणून 'धम्मधर' (धर्मधर). अथवा, परियत्ती-बहुश्रुत आणि पटिवेध-बहुश्रुत असून, परियत्ती आणि पटिवेध धर्मांचे धारण करत असल्यामुळे ते 'धम्मधर' होत, असा येथे अर्थ जाणावा. 'धम्मानुधम्मप्पटिपन्न' म्हणजे आर्यधर्माच्या (लोकोत्तर धर्माच्या) अनुकूल असलेल्या विपश्यना धर्माचे आचरण करणारे. 'सामीचिप्पटिपन्न' म्हणजे योग्य प्रतिपदेचे आचरण करणारे. 'अनुधम्मचारिनो' म्हणजे अनुकूल धर्माचे आचरण करण्याचा स्वभाव असलेले. 'सकं आचरियकं' म्हणजे स्वतःच्या आचार्यांचा सिद्धांत (उपदेश). 'आचिक्खिस्सन्ति' इत्यादी सर्व शब्द एकमेकांचे समानार्थी शब्द आहेत. 'सहधम्मेन' म्हणजे हेतू आणि कारणासहित असलेल्या वचनाने. 'सप्रातिहार्य' (सप्पाटिहारियं) म्हणजे जोपर्यंत ते संसारातून मुक्त करणारे बनवून धर्माचा उपदेश करतील। බ්රහ්මචරියන්ති සික්ඛත්තයසඞ්ගහිතං සකලං සාසනබ්රහ්මචරියං. ඉද්ධන්ති සමිද්ධං ඣානස්සාදවසෙන. ඵීතන්ති වුඩ්ඪිපත්තං සබ්බපාලිඵුල්ලං විය අභිඤ්ඤාසම්පත්තිවසෙන. විත්ථාරිකන්ති විත්ථතං තස්මිං තස්මිං දිසාභාගෙ පතිට්ඨිතවසෙන. බාහුජඤ්ඤන්ති බහූහි ඤාතං පටිවිද්ධං මහාජනාභිසමයවසෙන. පුථුභූතන්ති සබ්බාකාරෙන පුථුලභාවපත්තං. කථං? යාව දෙවමනුස්සෙහි සුප්පකාසිතං, යත්තකා විඤ්ඤුජාතිකා දෙවා චෙව මනුස්සා ච අත්ථි, සබ්බෙහි සුට්ඨු පකාසිතන්ති අත්ථො. 'ब्रह्मचर्य' म्हणजे तीन शिक्षांनी (शील, समाधी, प्रज्ञा) युक्त असलेले संपूर्ण शासन-ब्रह्मचर्य. 'ऋद्ध' म्हणजे ध्यानाच्या आस्वादाच्या (प्राप्तीच्या) प्रभावाने समृद्ध झालेले. 'स्फीत' म्हणजे सर्व बाजूंनी फुललेल्या वृक्षाप्रमाणे अभिज्ञा-संपत्तीच्या प्रभावाने वृद्धीला प्राप्त झालेले. 'विस्तारित' म्हणजे त्या त्या दिशांमध्ये प्रस्थापित झाल्यामुळे विस्तारलेले. 'बहुजन्य' म्हणजे महाजनांच्या सत्य साक्षात्काराच्या प्रभावाने अनेकांनी जाणलेले आणि अनुभवलेले. 'पृथग्भूत' म्हणजे सर्व प्रकारे विस्ताराला प्राप्त झालेले. कसे? जोपर्यंत देव आणि मनुष्यांद्वारे चांगल्या प्रकारे प्रकाशित केले गेले आहे, म्हणजेच जितके बुद्धिमान देव आणि मनुष्य आहेत, त्या सर्वांद्वारे चांगल्या प्रकारे प्रकाशित केले गेले आहे, असा अर्थ आहे। අප්පොස්සුක්කොති නිරාලයො. ත්වඤ්හි පාපිම අට්ඨමසත්තාහතො පට්ඨාය ‘‘පරිනිබ්බාතු දානි, භන්තෙ, භගවා, පරිනිබ්බාතු සුගතො’’ති විරවන්තො ආහිණ්ඩිත්ථ, අජ්ජ දානි පට්ඨාය විගතුස්සාහො හොහි, මා මය්හං පරිනිබ්බානත්ථං වායාමං කරොහීති වදති. 'अल्पोत्सुक' म्हणजे अनासक्त (आलयरहित). 'हे पापी मारा! तू खरोखर माझ्या संबोधी प्राप्तीच्या आठव्या आठवड्यापासून घेऊन 'भंते, भगवंतांनी आता परिनिर्वाण प्राप्त करावे, सुगतांनी आता परिनिर्वाण प्राप्त करावे' अशी ओरड करत फिरत होतास. आजपासून तू निरुत्साही हो (प्रयत्न सोडून दे), माझ्या परिनिर्वाणासाठी घाई करण्याचा प्रयत्न करू नकोस,' असे भगवंत म्हणतात। සතො [Pg.285] සම්පජානො ආයුසඞ්ඛාරං ඔස්සජීති සතිං සූපට්ඨිතං කත්වා ඤාණෙන පරිච්ඡින්දිත්වා ආයුසඞ්ඛාරං විස්සජි පජහි. තත්ථ න භගවා හත්ථෙන ලෙඩ්ඩුං විය ආයුසඞ්ඛාරං ඔස්සජි, තෙමාසමත්තමෙව පන ඵලසමාපත්තිං සමාපජ්ජිත්වා තතො පරං න සමාපජ්ජිස්සාමීති චිත්තං උප්පාදෙසි. තං සන්ධාය වුත්තං ‘‘ඔස්සජී’’ති. උස්සජීතිපි පාඨො. මහාභූමිචාලොති මහන්තො පථවිකම්පො. තදා කිර දසසහස්සිලොකධාතු අකම්පිත්ථ. භිංසනකොති භයජනකො. දෙවදුන්දුභියො ච ඵලිංසූති දෙවභෙරියො ඵලිංසු, දෙවො සුක්ඛගජ්ජිතං ගජ්ජි, අකාලවිජ්ජුලතා නිච්ඡරිංසු, ඛණිකවස්සං වස්සීති වුත්තං හොති. "सतो सम्पजानो आयुसंखारं ओस्सजी" (स्मृतिमान व संप्रजन्यशील होऊन त्यांनी आयुष्यसंस्काराचा त्याग केला) याचा अर्थ असा की, स्मृतीला (सति) सुप्रतिष्ठित करून, ज्ञानाने असा निश्चय करून की, "माझे स्वतःचे हित बोधीवृक्षाखाली पूर्ण झाले आहे आणि इतरांच्या कल्याणाचे कार्य तीन महिन्यांत पूर्ण होईल; म्हणून येत्या वैशाख पौर्णिमेला मी निर्वाण प्राप्त करीन", त्यांनी आयुष्यसंस्काराचा (जीवन टिकवून ठेवणाऱ्या फलसमापत्तीचा) त्याग केला. येथे भगवंतांनी हाताने मातीचे ढेकूळ फेकावे तसा आयुष्यसंस्काराचा त्याग केला नाही, तर "मी केवळ तीन महिन्यांपर्यंतच फलसमापत्तीत प्रवेश करीन आणि त्यानंतर प्रवेश करणार नाही" असा चित्तात संकल्प केला. या संदर्भाने "ओस्सजि" (त्याग केला) असे म्हटले आहे. "उस्सजि" असाही पाठ आढळतो. "महाभूमिचालो" म्हणजे मोठा भूकंप. त्यावेळी दहा हजार लोकधातू कंपित झाले. "भिंसनको" म्हणजे भय निर्माण करणारा. "देवदुन्दुभियो च फळिंसु" म्हणजे देवांचे दुंदुभी (नगारे) वाजले, कोरडे ढग गडगडले, अकाली विजा चमकल्या आणि क्षणभर पाऊस पडला, असा याचा अर्थ आहे. උදානං උදානෙසීති කස්මා උදානෙසි? කොචි නාම වදෙය්ය ‘‘භගවා පච්ඡතො පච්ඡතො අනුබන්ධිත්වා – ‘පරිනිබ්බායථ, භන්තෙ, පරිනිබ්බායථ, භන්තෙ’ති උපද්දුතො භයෙන ආයුසඞ්ඛාරං විස්සජ්ජෙසී’’ති. තස්සොකාසො මා හොතූති. භීතස්ස හි උදානං නාම නත්ථීති පීතිවෙගවිස්සට්ඨං උදානෙසි. "उदानं उदानेसि" (उद्गार काढले) म्हणजे त्यांनी हे उद्गार का काढले? कोणी असे म्हणू नये की, "भगवंतांच्या मागे मागे लागून 'भन्ते, परिनिर्वाण प्राप्त करा, भन्ते, परिनिर्वाण प्राप्त करा' असे म्हणून मार याने त्रास दिल्यामुळे, भगवंतांनी भीतीने आयुष्यसंस्काराचा त्याग केला." अशी शंका घेण्यास वाव मिळू नये म्हणून त्यांनी हे उद्गार काढले. कारण, घाबरलेल्या व्यक्तीच्या मुखातून कधीही 'उदान' (आनंदाचे उद्गार) निघत नाही. म्हणून त्यांनी [लवकरच हा स्कंधांचा मोठा भार खाली ठेवणार या] प्रीतीच्या वेगाने हे उदान प्रकट केले. තත්ථ සබ්බෙසං සොණසිඞ්ගාලාදීනම්පි පච්චක්ඛභාවතො තුලිතං පරිච්ඡින්නන්ති තුලං. කිං තං? කාමාවචරකම්මං. න තුලං, න වා තුලං සදිසමස්ස අඤ්ඤං ලොකියකම්මං අත්ථීති අතුලං. කිං තං? මහග්ගතකම්මං. අථ වා කාමාවචරං රූපාවචරඤ්ච තුලං, අරූපාවචරං අතුලං. අප්පවිපාකං තුලං, බහුවිපාකං අතුලං. සම්භවන්ති සම්භවහෙතුභූතං, පිණ්ඩකාරකං රාසිකාරකන්ති අත්ථො. භවසඞ්ඛාරන්ති පුනබ්භවස්ස සඞ්ඛාරං. අවස්සජීති විස්සජ්ජෙසි. මුනීති බුද්ධමුනි. අජ්ඣත්තරතොති නියකජ්ඣත්තරතො. සමාහිතොති උපචාරප්පනාසමාධිවසෙන සමාහිතො. අභින්දි කවචමිවාති කවචං විය අභින්දි. අත්තසම්භවන්ති අත්තනි ජාතකිලෙසං. ඉදං වුත්තං හොති – සවිපාකට්ඨෙන සම්භවං භවාභිසඞ්ඛණට්ඨෙන භවසඞ්ඛාරන්ති ච ලද්ධනාමං තුලාතුලසඞ්ඛාතං ලොකියකම්මඤ්ච ඔස්සජි, සඞ්ගාමසීසෙ මහායොධො කවචං විය අත්තසම්භවං කිලෙසඤ්ච අජ්ඣත්තරතො සමාහිතො හුත්වා අභින්දීති. त्यामध्ये, कुत्रे आणि कोल्हे इत्यादी सर्वांनाही प्रत्यक्ष दिसत असल्यामुळे जे मोजता येण्याजोगे किंवा मर्यादित आहे, ते 'तुल' होय. ते काय आहे? कामावचर कर्म. ज्याच्या समान किंवा मोजता येईल असे इतर कोणतेही लौकिक कर्म नाही, ते 'अतुल' होय. ते काय आहे? महग्गत कर्म. किंवा कामावचर आणि रूपावचर हे 'तुल' आहेत, आणि अरूपावचर हे 'अतुल' आहे. अल्प विपाक देणारे 'तुल' आहे, आणि बहु विपाक देणारे 'अतुल' आहे. 'संभवं' म्हणजे जन्माचे कारण असणारे, म्हणजेच संचय करणारे किंवा राशी करणारे. 'भवसंखारं' म्हणजे पुनर्जन्माचा संस्कार. 'अवस्सजि' म्हणजे त्याग केला. 'मुनि' म्हणजे बुद्धमुनी. 'अज्झत्तरतो' म्हणजे स्वतःच्या अंतर्भागात रममाण असणारे. 'समाहितो' म्हणजे उपचार आणि अप्पणा समाधीच्या द्वारे एकाग्र झालेले. 'अभिन्दि कवचमिव' म्हणजे कवचाप्रमाणे भेदून टाकले. 'अत्तसंभवं' म्हणजे स्वतःमध्ये उत्पन्न झालेले क्लेश. येथे हे सांगितले आहे की – विपाकाच्या अर्थाने 'संभव' आणि भवाच्या निर्मितीच्या अर्थाने 'भवसंस्कार' असे नाव मिळालेल्या, 'तुल' आणि 'अतुल' संज्ञक लौकिक कर्माचा त्यांनी त्याग केला; आणि अंतर्भागात रममाण व समाधिस्थ होऊन, युद्धभूमीवरील महायोद्ध्याने कवचाचा भेद करावा, त्याप्रमाणे स्वतःमध्ये उत्पन्न झालेल्या क्लेशांचा त्यांनी भेद केला. අථ වා තුලන්ති තුලෙන්තො තීරෙන්තො. අතුලඤ්ච සම්භවන්ති නිබ්බානඤ්චෙව භවඤ්ච. භවසඞ්ඛාරන්ති භවගාමිකම්මං. අවස්සජි මුනීති ‘‘පඤ්චක්ඛන්ධා අනිච්චා, පඤ්චන්නං [Pg.286] ඛන්ධානං නිරොධො නිබ්බානං නිච්ච’’න්තිආදිනා නයෙන තුලයන්තො බුද්ධමුනි භවෙ ආදීනවං නිබ්බානෙ චානිසංසං දිස්වා තං ඛන්ධානං මූලභූතං භවසඞ්ඛාරං ‘‘කම්මක්ඛයාය සංවත්තතී’’ති එවං වුත්තෙන කම්මක්ඛයකරෙන අරියමග්ගෙන අවස්සජි. කථං? අජ්ඣත්තරතො සමාහිතො අභින්දි කවචමිවත්තසම්භවං. සො හි විපස්සනාවසෙන අජ්ඣත්තරතො, සමථවසෙන සමාහිතොති එවං පුබ්බභාගතො පට්ඨාය සමථවිපස්සනාබලෙන කවචමිව අත්තභාවං පරියොනන්ධිත්වා ඨිතං, අත්තනි සම්භවත්තා අත්තසම්භවන්ති ලද්ධනාමං සබ්බං කිලෙසජාතං අභින්දි. කිලෙසාභාවෙන ච කම්මං අප්පටිසන්ධිකත්තා අවස්සට්ඨං නාම හොතීති එවං කිලෙසප්පහානෙන කම්මං ජහි. පහීනකිලෙසස්ස භයං නාම නත්ථි. තස්මා අභීතොව ආයුසඞ්ඛාරං ඔස්සජි. අභීතභාවඤාපනත්ථඤ්ච උදානං උදානෙසීති වෙදිතබ්බො. किंवा, 'तुलं' म्हणजे तुलना (मूल्यमापन) करणारे, निश्चित करणारे. 'अतुलं च संभवं' म्हणजे निर्वाण आणि भव (अस्तित्व). 'भवसंखारं' म्हणजे भवाकडे नेणारे कर्म. 'अवस्सजि मुनि' म्हणजे – "पाच स्कंध अनित्य आहेत, पाच स्कंधांचा निरोध म्हणजेच निर्वाण नित्य आहे" इत्यादी पद्धतीने तुलना (विचार) करत, बुद्धमुनींनी भवामधील दोष आणि निर्वाणामधील गुण पाहून, त्या स्कंधांचे मूळ असलेल्या भवसंस्काराचा, "हा कर्माच्या क्षयाला कारणीभूत ठरतो" अशा प्रकारे सांगितलेल्या कर्मक्षय करणाऱ्या आर्यमार्गाने त्याग केला. कसे? 'अज्झत्तरतो समाहितो अभिन्दि कवचमिवत्तसंभवं' (अंतर्भागात रममाण व समाधिस्थ होऊन त्यांनी स्वतःमध्ये उत्पन्न झालेल्या क्लेशांचा कवचाप्रमाणे भेद केला). ते विपश्यनेच्या द्वारे अंतर्भागात रममाण आणि शमथाच्या द्वारे समाधिस्थ होऊन, अशा प्रकारे पूर्वभागापासूनच शमथ व विपश्यनेच्या बलाने, कवचाप्रमाणे आत्मभावाला (व्यक्तिमत्त्वाला) वेढून राहिलेल्या, स्वतःमध्ये उत्पन्न झाल्यामुळे 'अत्तसंभव' असे नाव मिळालेल्या सर्व क्लेशांचा त्यांनी भेद केला. क्लेशांच्या अभावामुळे कर्म पुनर्जन्म घडवून आणण्यास असमर्थ ठरते, म्हणून त्याला 'त्यागलेले' म्हटले जाते; अशा प्रकारे क्लेशांच्या प्रहाणाने त्यांनी कर्माचा त्याग केला. ज्याचे क्लेश नष्ट झाले आहेत त्याला कोणतीही भीती नसते. म्हणून त्यांनी निर्भयपणेच आयुष्यसंस्काराचा त्याग केला. आणि आपली निर्भयता प्रकट करण्यासाठीच त्यांनी हे उदान (उद्गार) काढले, असे समजावे. චාපාලවග්ගො පඨමො. चापालवर्ग पहिला. 2. පාසාදකම්පනවග්ගො २. प्रासादकंपनवर्ग. 1-2. පුබ්බසුත්තාදිවණ්ණනා १-२. पूर्वसूत्रादींचे वर्णन. 823-824. දුතියවග්ගස්ස පඨමෙ න ච අතිලීනොතිආදීනි පරතො ආවි භවිස්සන්ති. ඉමස්මිං සුත්තෙ ඡඅභිඤ්ඤාපාදකා ඉද්ධිපාදා කථිතා, තථා දුතියෙ ච. ८२३-८२४. दुसऱ्या वर्गाच्या पहिल्या सूत्रातील "न च अतिलीनो" इत्यादी गोष्टी पुढे स्पष्ट होतील. या सूतामध्ये सहा अभिज्ञांचे आधार असणारे इद्धिपाद (ऋद्धिपाद) सांगितले आहेत, आणि त्याचप्रमाणे दुसऱ्या सूत्रातही. 3. ඡන්දසමාධිසුත්තවණ්ණනා ३. छंदसमाधिसूत्राचे वर्णन. 825. තතියෙ ඡන්දන්ති කත්තුකම්යතාඡන්දං. නිස්සායාති නිස්සයං කත්වා, අධිපතිං කත්වාති අත්ථො. පධානසඞ්ඛාරාති පධානභූතා සඞ්ඛාරා, චතුකිච්චසාධකසම්මප්පධානවීරියස්සෙතං අධිවචනං. ඉති අයඤ්ච ඡන්දොතිආදීසු ඡන්දො ඡන්දසමාධිනා චෙව පධානසඞ්ඛාරෙහි ච, ඡන්දසමාධි ඡන්දෙන චෙව පධානසඞ්ඛාරෙහි ච, පධානසඞ්ඛාරාපි ඡන්දෙන චෙව ඡන්දසමාධිනා ච සමන්නාගතා. තස්මා සබ්බෙ තෙ ධම්මෙ එකතො කත්වා අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, ඡන්දසමාධිප්පධානසඞ්ඛාරසමන්නාගතො ඉද්ධිපාදොති වුත්තං. ඉද්ධිපාදවිභඞ්ගෙ (විභ. 437) පන ‘‘යො තථාභූතස්ස වෙදනාක්ඛන්ධො තිආදිනා නයෙන [Pg.287] ඉමෙහි ධම්මෙහි සමන්නාගතා සෙසඅරූපිනො ධම්මා ඉද්ධිපාදාති වුත්තා. ८२५. तिसऱ्या सूत्रात, 'छन्द' म्हणजे करण्याची इच्छा (कत्तुकम्यताछंद). 'निस्साय' म्हणजे आश्रय करून, किंवा अधिपती (प्रमुख) करून असा अर्थ आहे. 'पधानसंखारा' म्हणजे प्रधान असलेले संस्कार; चार प्रकारच्या कर्तव्यांचे साधन करणाऱ्या सम्यक्प्रधान वीर्याचेच हे नाव आहे. अशा प्रकारे "अयञ्च छन्दो" इत्यादींमध्ये, छंद हा छंदसमाधी आणि प्रधानसंस्कारांनी युक्त असतो; छंदसमाधी ही छंद आणि प्रधानसंस्कारांनी युक्त असते; आणि प्रधानसंस्कार देखील छंद आणि छंदसमाधीने युक्त असतात. म्हणून, त्या सर्व धर्मांना एकत्र करून "भिक्खूंनो, याला छंदसमाधी आणि प्रधानसंस्कारांनी युक्त असलेला इद्धिपाद (ऋद्धिपाद) असे म्हणतात" असे म्हटले आहे. परंतु, इद्धिपादविभंगात (विभंग ४३७) "जो तशा प्रकारचा वेदनास्कंध आहे..." इत्यादी पद्धतीने या धर्मांनी युक्त असलेल्या उर्वरित अरूप धर्मांना 'इद्धिपाद' म्हटले आहे. අපිච ඉමෙපි තයො ධම්මා ඉද්ධීපි හොන්ති ඉද්ධිපාදාපි. කථං? ඡන්දඤ්හි භාවයතො ඡන්දො ඉද්ධි නාම හොති, සමාධිප්පධානසඞ්ඛාරා ඡන්දිද්ධිපාදො නාම. සමාධිං භාවෙන්තස්ස සමාධි ඉද්ධි නාම හොති, ඡන්දප්පධානසඞ්ඛාරා සමාධිද්ධියා පාදො නාම. පධානසඞ්ඛාරෙ භාවෙන්තස්ස පධානසඞ්ඛාරා ඉද්ධි නාම හොති, ඡන්දසමාධි පධානසඞ්ඛාරිද්ධියා පාදො නාම, සම්පයුත්තධම්මෙසු හි එකස්මිං ඉජ්ඣමානෙ සෙසාපි ඉජ්ඣන්තියෙව. शिवाय, हे तीन धर्म 'इद्धि' (ऋद्धी) देखील आहेत आणि 'इद्धिपाद' देखील आहेत. ते कसे? छंदाची भावना (विकास) करणाऱ्यासाठी छंद हा 'इद्धि' आहे, आणि समाधी व प्रधानसंस्कार हे 'छंद-इद्धिपाद' आहेत. समाधीची भावना करणाऱ्यासाठी समाधी ही 'इद्धि' आहे, आणि छंद व प्रधानसंस्कार हे 'समाधि-इद्धिपाद' आहेत. प्रधानसंस्कारांची भावना करणाऱ्यासाठी प्रधानसंस्कार हे 'इद्धि' आहेत, आणि छंद व समाधी हे 'प्रधानसंस्कार-इद्धिपाद' आहेत. कारण, संप्रयुक्त (एकत्रित) धर्मांमध्ये एकाची सिद्धी झाली की इतरांचीही सिद्धी होतेच. අපිච තෙසං තෙසං ධම්මානං පුබ්බභාගවසෙනාපි එතෙසං ඉද්ධිපාදතා වෙදිතබ්බා. පඨමජ්ඣානඤ්හි ඉද්ධි නාම, පඨමජ්ඣානස්ස පුබ්බභාගපරිකම්මසම්පයුත්තා ඡන්දාදයො ඉද්ධිපාදො නාම. එතෙනුපායෙන යාව නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනා, ඉද්ධිවිධං ආදිං කත්වා යාව දිබ්බචක්ඛුඅභිඤ්ඤා, සොතාපත්තිමග්ගං ආදිං කත්වා යාව අරහත්තමග්ගා නයො නෙතබ්බො. සෙසිද්ධිපාදෙසුපි එසෙව නයො. शिवाय, त्या त्या धर्मांच्या पूर्वभागाच्या (प्रारंभिक अवस्थेच्या) दृष्टीनेही त्यांचे 'इद्धिपादत्व' समजून घेतले पाहिजे. कारण, प्रथम ध्यान हे 'इद्धि' आहे, आणि प्रथम ध्यानाच्या पूर्वभाग-परिकर्माशी (तयारीशी) संप्रयुक्त असलेले छंद इत्यादी 'इद्धिपाद' आहेत. याच पद्धतीने नैवसंज्ञानासंज्ञायतनापर्यंत; ऋद्धिविधापासून (विविध ऋद्धींच्या चमत्कारांपासून) सुरू करून दिव्यचक्षू अभिज्ञेपर्यंत; आणि स्रोतापत्तीमार्गापासून सुरू करून अर्हत्तमार्गापर्यंत हाच नियम लावावा. उर्वरित इद्धिपादांच्या बाबतीतही हाच नियम लागू होतो. කෙචි පන ‘‘අනිබ්බත්තො ඡන්දො ඉද්ධිපාදො’’ති වදන්ති. ඉධ තෙසං වාදමද්දනත්ථාය අභිධම්මෙ උත්තරචූළවාරො නාම ආගතො – परंतु काही लोक म्हणतात की, "अनुत्पन्न (उत्पन्न न झालेला) छंद हा इद्धिपाद आहे." त्यांच्या या मताचे खंडन करण्यासाठी येथे अभिधम्मामध्ये 'उत्तरचूळवार' नावाचा भाग आला आहे – ‘‘චත්තාරො ඉද්ධිපාදා – ඡන්දිද්ධිපාදො, වීරියිද්ධිපාදො, චිත්තිද්ධිපාදො, වීමංසිද්ධිපාදො. තත්ථ කතමො ඡන්දිද්ධිපාදො? ඉධ, භික්ඛු, යස්මිං සමයෙ ලොකුත්තරං ඣානං භාවෙති නිය්යානිකං අපචයගාමිං දිට්ඨිගතානං පහානාය පඨමාය භූමියා පත්තියා විවිච්චෙව කාමෙහි…පෙ… පඨමං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරති දුක්ඛාපටිපදං දන්ධාභිඤ්ඤං, යො තස්මිං සමයෙ ඡන්දො ඡන්දිකතා කත්තුකම්යතා කුසලො ධම්මච්ඡන්දො, අයං වුච්චති ඡන්දිද්ධිපාදො. අවසෙසා ධම්මා ඡන්දිද්ධිපාදසම්පයුත්තා’’ති (විභ. 457-458). “चार ऋद्धिपाद आहेत – छंद-ऋद्धिपाद, वीर्य-ऋद्धिपाद, चित्त-ऋद्धिपाद, आणि मीमांसा-ऋद्धिपाद. त्यातील छंद-ऋद्धिपाद कोणता? येथे, भिक्खूहो, ज्या वेळी (भिक्खू) संसारातून मुक्त करणारे (नैर्याणिक), क्लेशांचा क्षय करणारे (अपचयगामी), चुकीच्या दृष्टींचा (दृष्टिगतांचा) नाश करण्यासाठी, पहिल्या भूमीच्या (सोतापत्ती मार्गाच्या) प्राप्तीसाठी, कामांपासून अलिप्त होऊन... पे... पहिल्या ध्यानात प्रवेश करून विहरतो, जे दुःखद प्रतिपदा आणि मंद अभिज्ञा (दुक्खापटिपदं दन्धाभिञ्ञं) युक्त असते; त्या वेळी जो छंद (इच्छा), छंदभाव, करण्याची इच्छा (कर्तुकम्यता), कुशल धर्मच्छंद असतो, त्याला 'छंद-ऋद्धिपाद' असे म्हणतात. उर्वरित धर्म हे छंद-ऋद्धिपादाशी संप्रयुक्त असतात.” (विभङ्ग. ४५७-४५८) ඉමෙ පන ලොකුත්තරවසෙනෙව ආගතා. परंतु हे (ऋद्धिपाद) केवळ लोकोत्तर (मार्गाच्या) दृष्टीनेच आले आहेत. තත්ථ රට්ඨපාලත්ථෙරො ඡන්දං ධුරං කත්වා ලොකුත්තරධම්මං නිබ්බත්තෙසි. සොණත්ථෙරො වීරියං ධුරං කත්වා; සම්භුතත්ථෙරො චිත්තං ධුරං කත්වා, ආයස්මා මොඝරාජා වීමංසං ධුරං කත්වාති. තත්ථ යථා චතූසු අමච්චපුත්තෙසු [Pg.288] ඨානන්තරං පත්ථෙත්වා රාජානං උපනිස්සාය විහරන්තෙසු එකො උපට්ඨානෙ ඡන්දජාතො රඤ්ඤො අජ්ඣාසයඤ්ච රුචිඤ්ච ඤත්වා දිවා ච රත්තො ච උපට්ඨහන්තො රාජානං ආරාධෙත්වා ඨානන්තරං පාපුණි. එවං ඡන්දධුරෙන ලොකුත්තරධම්මනිබ්බත්තකො වෙදිතබ්බො. त्यामध्ये, राष्ट्रपाल थेरांनी छंदाला (तीव्र इच्छेला) मुख्य (धुरा) करून लोकोत्तर धर्माची उत्पत्ती केली. सोण थेरांनी वीर्याला मुख्य करून; संभूत थेरांनी चित्ताला मुख्य करून, आणि आयुष्यमान मोघराजांनी मीमांसेला मुख्य करून (लोकोत्तर धर्म उत्पन्न केला). त्याविषयी, जसे चार मंत्र्यांचे पुत्र उच्च पदाची इच्छा धरून राजाच्या आश्रयाने राहत असताना, त्यातील एकाने सेवेमध्ये तीव्र इच्छा (छंद) बाळगून, राजाचा अभिप्राय आणि आवड जाणून घेऊन, दिवस-रात्र सेवा करून राजाला संतुष्ट केले आणि उच्च पद प्राप्त केले. त्याचप्रमाणे, छंद-धुरेने लोकोत्तर धर्म उत्पन्न करणारा (भिक्खू) समजावा. එකො පන – ‘‘දිවසෙ දිවසෙ උපට්ඨාතුං න සක්කොමි, උප්පන්නෙ කිච්චෙ පරක්කමෙන ආරාධෙස්සාමී’’ති කුපිතෙ පච්චන්තෙ රඤ්ඤා පහිතො පරක්කමෙන සත්තුමද්දනං කත්වා පාපුණි. යථා සො, එවං වීරියධුරෙන ලොකුත්තරධම්මනිබ්බත්තකො වෙදිතබ්බො. එකො ‘‘දිවසෙ දිවසෙ උපට්ඨානම්පි උරෙන සත්තිසරසම්පටිච්ඡනම්පි භාරොයෙව, මන්තබලෙන ආරාධෙස්සාමී’’ති ඛත්තවිජ්ජාය කතපරිචයත්තා මන්තසංවිධානෙන රාජානං ආරාධෙත්වා පාපුණි. යථා සො, එවං චිත්තධුරෙන ලොකුත්තරධම්මනිබ්බත්තකො වෙදිතබ්බො. दुसरा एक (अमात्यपुत्र) म्हणाला – 'मी दररोज सेवा करण्यास असमर्थ आहे, परंतु जेव्हा काही कार्य उद्भवेल तेव्हा मी पराक्रमाने राजाला संतुष्ट करीन.' जेव्हा सीमाभागात बंड झाले, तेव्हा राजाने त्याला पाठवले, आणि त्याने आपल्या पराक्रमाने शत्रूचे मर्दन करून उच्च पद प्राप्त केले. जसा तो, त्याचप्रमाणे वीर्य-धुरेने लोकोत्तर धर्म उत्पन्न करणारा समजावा. तिसरा एक म्हणाला – 'दररोज सेवा करणे आणि छातीवर भाले व बाण झेलणे हा केवळ एक भारच आहे, मी मंत्रबलाने राजाला संतुष्ट करीन.' क्षत्रियविद्येचा (नीतिशास्त्राचा) अभ्यास असल्यामुळे, त्याने मंत्रयोजनेने राजाला संतुष्ट करून पद प्राप्त केले. जसा तो, त्याचप्रमाणे चित्त-धुरेने लोकोत्तर धर्म उत्पन्न करणारा समजावा. අපරො – ‘‘කිං ඉමෙහි උපට්ඨානාදීහි, රාජානො නාම ජාතිසම්පන්නස්ස ඨානන්තරං දෙන්ති, තාදිසස්ස දෙන්තො මය්හං දස්සතී’’ති ජාතිසම්පත්තිමෙව නිස්සාය ඨානන්තරං පාපුණි. යථා සො, එවං සුපරිසුද්ධං වීමංසං නිස්සාය වීමංසධුරෙන ලොකුත්තරධම්මනිබ්බත්තකො වෙදිතබ්බොති. ඉමස්මිං සුත්තෙ විවට්ටපාදකඉද්ධි කථිතා. चौथा म्हणाला – 'या सेवा इत्यादींचा काय उपयोग? राजे लोक उच्च कुळात जन्मलेल्यालाच उच्च पद देतात, आणि जर ते अशा व्यक्तीला देत असतील तर मलाही नक्कीच देतील.' अशा प्रकारे केवळ आपल्या उच्च कुळकुलीनतेचा आश्रय घेऊन त्याने उच्च पद प्राप्त केले. जसा तो, त्याचप्रमाणे अत्यंत शुद्ध अशा मीमांसेचा आश्रय घेऊन मीमांसा-धुरेने लोकोत्तर धर्म उत्पन्न करणारा समजावा. या सुत्तात विवर्त-पादक ऋद्धी (लोकोत्तर मार्गाचा पाया असणारी ऋद्धी) सांगितली आहे. 4. මොග්ගල්ලානසුත්තවණ්ණනා ४. मोग्गllानसुत्तवण्णना (मोग्गल्लान सुत्ताची अट्ठकथा) 826. චතුත්ථෙ උද්ධතාති උද්ධච්චපකතිකා විප්ඵන්දමානචිත්තා. උද්ධච්චෙන හි එකාරම්මණෙ චිත්තං විප්ඵන්දති ධජයට්ඨියං වාතෙන පහතධජො විය. උන්නළාති උග්ගතනළා, උට්ඨිතතුච්ඡමානාති වුත්තං හොති. චපලාති පත්තචීවරමණ්ඩනාදිචාපල්ලෙන යුත්තා. මුඛරාති මුඛඛරා, ඛරවචනාති වුත්තං හොති. විකිණ්ණවාචාති අසංයතවචනා දිවසම්පි නිරත්ථකවචනප්පලාපිනො. මුට්ඨස්සතීති නට්ඨස්සතිනො. අසම්පජානාති පඤ්ඤාරහිතා. අසමාහිතාති උපචාරප්පනාසමාධිවිරහිතා. භන්තචිත්තාති උබ්භන්තචිත්තා සමාධිවිරහෙන ලද්ධොකාසෙන උද්ධච්චෙන. පාකතින්ද්රියාති අසංවුතින්ද්රියා. ඉද්ධාභිසඞ්ඛාරන්ති ආපොකසිණං සමාපජ්ජිත්වා වුට්ඨාය පාසාදපතිට්ඨිතං පථවිභාගං ‘‘උදක’’න්ති අධිට්ඨාය, උදකපිට්ඨෙ ඨිතපාසාදං වෙහාසං අබ්භුග්ගන්ත්වා අඞ්ගුට්ඨකෙන පහරි. ගම්භීරනෙමොති ගම්භීරආවාටො, ගම්භීරභූමිභාගං අනුපවිට්ඨොති අත්ථො[Pg.289]. සුනිඛාතොති සුට්ඨු නිඛාතො, කොට්ටෙත්වා සුට්ඨු ඨපිතො. ඉධ අභිඤ්ඤාපාදකිද්ධි කථිතා. ८२६. चौथ्या सुत्तात, 'उद्धता' म्हणजे उद्धच्च (औद्धत्य/चंचलता) स्वभावाचे, चंचल चित्त असलेले. कारण उद्धच्चामुळे (चंचलतेमुळे) चित्त एकाच आलंबनावर स्थिर न राहता तडफडते, जसे वाऱ्याने हलणाऱ्या ध्वजस्तंभावरील ध्वजाप्रमाणे. 'उन्नळा' म्हणजे उन्नत नळ (गर्व) केलेले, म्हणजेच ज्यांच्यामध्ये पोकळ मान (अभिमान) उत्पन्न झाला आहे, असे म्हटले आहे. 'चपला' म्हणजे पात्र, चीवर इत्यादी सुशोभित करण्याच्या चंचलतेने युक्त असलेले. 'मुखरा' म्हणजे कठोर मुख असलेले, म्हणजेच कठोर बोलणारे, असे म्हटले आहे. 'विकीर्णवाचा' म्हणजे असंयत बोलणारे, जे दिवसभर निरर्थक बडबड करतात. 'मुट्ठस्सती' म्हणजे नष्ट-स्मृती असलेले. 'असंपजाना' म्हणजे प्रज्ञारहित (विवेकबुद्धी नसलेले). 'असमाहिता' म्हणजे उपचार आणि अप्पना समाधीने रहित असलेले. 'भन्तचित्ता' म्हणजे समाधीच्या अभावामुळे संधी मिळालेल्या उद्धच्चामुळे (चंचलतेमुळे) अत्यंत चंचल चित्त झालेले. 'पाकतइन्द्रिया' म्हणजे असंयत इंद्रिये असलेले. 'इद्धाभिसङ्खारं' म्हणजे आपो-कसिण (जल-कसिण) समाधीत प्रवेश करून, त्यातून उठून, प्रासादाच्या (महालाच्या) पायाभूत असलेल्या पृथ्वीच्या भागाला 'पाणी' असा अधिष्ठान करून, पाण्यावर उभ्या असलेल्या प्रासादाला आकाशात उडवून पायाच्या अंगठ्याने प्रहार केला. 'गम्भीरनेमो' म्हणजे खोल खड्डा असलेला, खोल भूमीच्या भागात प्रवेश केलेला असा अर्थ आहे. 'सुनिखातो' म्हणजे चांगल्या प्रकारे रोवलेला, ठोकून ठोकून चांगल्या प्रकारे स्थापित केलेला. येथे अभिज्ञा-पादक ऋद्धी (अभिज्ञेचा पाया असणारी ऋद्धी) सांगितली आहे. 5. උණ්ණාභබ්රාහ්මණසුත්තවණ්ණනා ५. उण्णाभब्राह्मणसुत्तवण्णना (उण्णाभ ब्राह्मण सुत्ताची अट्ठकथा) 827. පඤ්චමෙ ඡන්දප්පහානත්ථන්ති තණ්හාඡන්දස්ස පහානත්ථං. ඉධාපි විවට්ටපාදකිද්ධි කථිතා. ८२७. पाचव्या सुत्तात, 'छन्दप्पहानत्थं' म्हणजे तृष्णारूपी छंदाचा प्रहाण (नाश) करण्यासाठी. येथेही विवर्त-पादक ऋद्धी सांगितली आहे. 9. ඉද්ධාදිදෙසනාසුත්තවණ්ණනා ९. इद्धादिदेसनासुत्तवण्णना (इद्धादि देसना सुत्ताची अट्ठकथा) 831. නවමෙ යො සො භික්ඛවෙ මග්ගොති අභිඤ්ඤාපාදකං චතුත්ථජ්ඣානං අධිප්පෙතං. ८३१. नवव्या सुत्तात, 'यो सो भिक्खवे मग्गो' या वाक्यात अभिज्ञेचा पाया असणारे चौथे ध्यान अभिप्रेत आहे. 10. විභඞ්ගසුත්තවණ්ණනා १०. विभङ्गसुत्तवण्णना (विभंग सुत्ताची अट्ठकथा) 832. දසමෙ කොසජ්ජසහගතොති ඉධ භික්ඛු ඡන්දං උප්පාදෙත්වා කම්මට්ඨානං මනසිකරොන්තො නිසීදති. අථස්ස චිත්තෙ ලීනාකාරො ඔක්කමති, සො ‘‘ලීනාකාරො මෙ ඔක්කන්තො’’ති ඤත්වා අපායභයෙන චිත්තං තජ්ජෙත්වා පුන ඡන්දං උප්පාදෙත්වා කම්මට්ඨානං මනසි කරොති. අථස්ස පුන ලීනාකාරො ඔක්කමති. සො පුන අපායභයෙන චිත්තං තජ්ජෙත්වා ඡන්දං උප්පාදෙත්වා කම්මට්ඨානං මනසි කරොතීති එවමස්ස කොසජ්ජෙන වොකිණ්ණත්තා ඡන්දො කොසජ්ජසහගතො නාම හොති. කොසජ්ජසම්පයුත්තොති තස්සෙව වෙවචනං. ८३२. दहाव्या सुत्तात, 'कोसज्जसहगतो' (आळसाने युक्त) म्हणजे: येथे भिक्खू छंद उत्पन्न करून कम्मट्ठानाचे (कर्मस्थानाचे) मनसिकार करत बसतो. तेव्हा त्याच्या चित्तात लीनाकार (आळस/शिथिलता) प्रवेश करतो. तो 'माझ्या चित्तात लीनाकार प्रवेशला आहे' असे जाणून, अपायाच्या (दुर्गतीच्या) भयाने चित्ताला ताकीद देऊन (धमकावून) पुन्हा छंद उत्पन्न करतो आणि कम्मट्ठानाचे मनसिकार करतो. तेव्हा त्याला पुन्हा लीनाकार ग्रासतो. तो पुन्हा अपायभयाने चित्ताला ताकीद देऊन छंद उत्पन्न करतो आणि कम्मट्ठानाचे मनसिकार करतो. अशा प्रकारे, आळसाने (कोसज्जाने) मिश्रित असल्यामुळे त्याचा छंद 'कोसज्जसहगत' (आळसयुक्त छंद) म्हटला जातो. 'कोसज्जसम्पयुत्तो' हा त्याचाच समानार्थी शब्द आहे. උද්ධච්චසහගතොති ඉධ භික්ඛු ඡන්දං උප්පාදෙත්වා කම්මට්ඨානං මනසිකරොන්තො නිසීදති. අථස්ස චිත්තං උද්ධච්චෙ පතති. සො බුද්ධධම්මසඞ්ඝගුණෙ ආවජ්ජෙත්වා චිත්තං හාසෙත්වා තොසෙත්වා කම්මනියං කත්වා පුන ඡන්දං උප්පාදෙත්වා කම්මට්ඨානං මනසි කරොති. අථස්ස පුන චිත්තං උද්ධච්චෙ පතති. සො පුන බුද්ධධම්මසඞ්ඝගුණෙ ආවජ්ජෙත්වා චිත්තං හාසෙත්වා තොසෙත්වා කම්මනියං කත්වා ඡන්දං උප්පාදෙත්වා කම්මට්ඨානං මනසි කරොතීති එවමස්ස උද්ධච්චෙන වොකිණ්ණත්තා ඡන්දො උද්ධච්චසහගතො නාම හොති. ‘उद्धच्चसहगतो’ (चंचलतेने युक्त) म्हणजे: येथे भिक्खू छंद उत्पन्न करून कम्मट्ठानाचे मनसिकार करत बसतो. तेव्हा त्याचे चित्त उद्धच्चात (चंचलतेत) पडते. तो बुद्ध, धम्म आणि संघाच्या गुणांचे स्मरण करून, चित्ताला प्रफुल्लित व संतुष्ट करून, त्याला कम्मट्ठानासाठी कर्मक्षम (कर्मण्य) बनवतो आणि पुन्हा छंद उत्पन्न करून कम्मट्ठानाचे मनसिकार करतो. तेव्हा त्याचे चित्त पुन्हा उद्धच्चात पडते. तो पुन्हा बुद्ध, धम्म आणि संघाच्या गुणांचे स्मरण करून, चित्ताला प्रफुल्लित व संतुष्ट करून, कर्मक्षम बनवून, छंद उत्पन्न करून कम्मट्ठानाचे मनसिकार करतो. अशा प्रकारे, उद्धच्चाने (चंचलतेने) मिश्रित असल्यामुळे त्याचा छंद 'उद्धच्चसहगत' (चंचलतायुक्त छंद) म्हटला जातो. ථිනමිද්ධසහගතොති ඉධ භික්ඛු ඡන්දං උප්පාදෙත්වා කම්මට්ඨානං මනසිකරොන්තො නිසීදති. අථස්ස ථිනමිද්ධං උප්පජ්ජති. සො ‘‘උප්පන්නං මෙ ථිනමිද්ධ’’න්ති ඤත්වා උදකෙන මුඛං පුඤ්ඡිත්වා, කණ්ණෙ ආකඩ්ඪිත්වා පගුණං ධම්මං සජ්ඣායිත්වා දිවා ගහිතං වා ආලොකසඤ්ඤං මනසිකරිත්වා ථිනමිද්ධං විනොදෙත්වා [Pg.290] පුන ඡන්දං උප්පාදෙත්වා කම්මට්ඨානං මනසි කරොති. අථස්ස පුන ථිනමිද්ධං උප්පජ්ජති. සො වුත්තනයෙනෙව පුන ථිනමිද්ධං විනොදෙත්වා ඡන්දං උප්පාදෙත්වා කම්මට්ඨානං මනසි කරොතීති එවමස්ස ථිනමිද්ධෙන වොකිණ්ණත්තා ඡන්දො ථිනමිද්ධසහගතො නාම හොති. ‘थीनमिद्धसहगतो’ (स्त्यान-मिद्धयुक्त / आळस व ग्लानीने युक्त) म्हणजे: येथे भिक्खू छंद उत्पन्न करून कम्मट्ठानाचे मनसिकार करत बसतो. तेव्हा त्याला थीनमिद्ध (आळस व ग्लानी) उत्पन्न होते. तो 'मला थीनमिद्ध उत्पन्न झाले आहे' असे जाणून, पाण्याने तोंड धुवून, कान ओढून, पाठांतर असलेला धम्म (ग्रंथ) सज्झाय (सज्झायन/पठण) करून, दिवसा घेतलेल्या आलोकसंज्ञेचे (प्रकाशाच्या कल्पनेचे) मनसिकार करून, थीनमिद्ध दूर करतो आणि पुन्हा छंद उत्पन्न करून कम्मट्ठानाचे मनसिकार करतो. तेव्हा त्याला पुन्हा थीनमिद्ध उत्पन्न होते. तो पूर्वोक्त पद्धतीनेच पुन्हा थीनमिद्ध दूर करून, छंद उत्पन्न करून कम्मट्ठानाचे मनसिकार करतो. अशा प्रकारे, थीनमिद्धाने मिश्रित असल्यामुळे त्याचा छंद 'थीनमिद्धसहगत' (स्त्यान-मिद्धयुक्त छंद) म्हटला जातो. අනුවික්ඛිත්තොති ඉධ භික්ඛු ඡන්දං උප්පාදෙත්වා කම්මට්ඨානං මනසිකරොන්තො නිසීදති. අථස්ස කාමගුණාරම්මණෙ චිත්තං වික්ඛිපති. සො ‘‘බහිද්ධා වික්ඛිත්තං මෙ චිත්ත’’න්ති ඤත්වා අනමතග්ග (සං. නි. 2.124-125) දෙවදූත- (ම. නි. 3.261) චෙලොපම (සං. නි. 5.1104) අනාගතභයසුත්තාදීනි (අ. නි. 5.77) ආවජ්ජෙන්තො සුත්තදණ්ඩෙන චිත්තං තජ්ජෙත්වා කම්මනියං කත්වා පුන ඡන්දං උප්පාදෙත්වා කම්මට්ඨානං මනසි කරොති. අථස්ස පුන චිත්තං වික්ඛිපති. සො පුන සුත්තදණ්ඩෙන චිත්තං කම්මනියං කත්වා ඡන්දං උප්පාදෙත්වා කම්මට්ඨානං මනසි කරොතීති එවමස්ස කාමවිතක්කවොකිණ්ණත්තා ඡන්දො බහිද්ධා පඤ්ච කාමගුණෙ ආරබ්භ අනුවික්ඛිත්තො අනුවිසටො හොති. ‘अनुविक्खित्त’ (विक्षिप्त) म्हणजे काय? या शासनात भिक्खू छंद (उत्साह) उत्पन्न करून कम्मट्ठानाचे (कर्मस्थानाचे) मनन (मनसिकार) करत बसतो. तेव्हा त्याचे चित्त कामगुणांच्या आलंबनामध्ये विक्षिप्त होते. तो 'माझे चित्त बाहेर विक्षिप्त झाले आहे' असे जाणून, अनमतग्गसुत्त, देवदूतसुत्त, सेलोपमसुत्त, अनागतभयसुत्त इत्यादी सूत्रांचे चिंतन करत, सुत्त-दंडाने (सूत्रांच्या उपदेशरूपी दंडाने) चित्ताला ताकीद देऊन, त्याला कर्मक्षम बनवून पुन्हा छंद उत्पन्न करतो आणि कम्मट्ठानाचा मनसिकार करतो. पुन्हा त्याचे चित्त विक्षिप्त होते. तो पुन्हा सुत्त-दंडाने चित्ताला कर्मक्षम करून, छंद उत्पन्न करून कम्मट्ठानाचा मनसिकार करतो. अशा प्रकारे, कामवितर्कांनी मिश्रित असल्यामुळे त्याचा छंद बाहेर पाच कामगुणांना आलंबन करून अनुविक्षिप्त (पुन्हा पुन्हा विक्षिप्त) आणि अनुविसृत (पुन्हा पुन्हा पसरलेला) होतो. යථා පුරෙ තථා පච්ඡාති කම්මට්ඨානවසෙනපි දෙසනාවසෙනපි පුරිමපච්ඡිමතා වෙදිතබ්බා. කථං? කම්මට්ඨානෙ තාව කම්මට්ඨානස්ස අභිනිවෙසො පුරෙ නාම, අරහත්තං පච්ඡා නාම. තත්ථ යො භික්ඛු මූලකම්මට්ඨානෙ අභිනිවිසිත්වා අතිලීනාදීසු චතූසු ඨානෙසු චිත්තස්ස ඔක්කමනං පටිසෙධෙත්වා, දුට්ඨගොණෙ යොජෙත්වා සාරෙන්තො විය චතුරස්සඝටිකං ඔතාරෙන්තො විය චතුන්නං ඨානානං එකට්ඨානෙපි අසජ්ජන්තො සඞ්ඛාරෙ සම්මසිත්වා අරහත්තං පාපුණාති. අයම්පි යථා පුරෙ තථා පච්ඡා විහරති නාම. අයං කම්මට්ඨානවසෙන පුරිමපච්ඡිමතා. දෙසනාවසෙන පන කෙසා පුරෙ නාම, මත්ථලුඞ්ගං පච්ඡා නාම. තත්ථ යො භික්ඛු කෙසෙසු අභිනිවිසිත්වා වණ්ණසණ්ඨානාදිවසෙන කෙසාදයො පරිග්ගණ්හන්තො චතූසු ඨානෙසු අසජ්ජන්තො යාව මත්ථලුඞ්ගා භාවනං පාපෙති, අයම්පි යථා පුරෙ තථා පච්ඡා විහරති නාම. එවං දෙසනාවසෙන පුරිමපච්ඡිමතා වෙදිතබ්බා. යථා පච්ඡා තථා පුරෙති ඉදං පුරිමස්සෙව වෙවචනං. ‘जसे आधी तसे नंतर’ (यथा पुरे तथा पच्छा) यामध्ये कम्मट्ठानाच्या (कर्मस्थानाच्या) दृष्टीने आणि देशनेच्या दृष्टीने पूर्व-अपरता (आधी आणि नंतर असणे) जाणून घ्यावी. कसे? कम्मट्ठानाच्या बाबतीत, कम्मट्ठानात चित्त एकाग्र करणे म्हणजे ‘आधी’ (पुरे) आणि अरहत्त (अर्हत्त्व) म्हणजे ‘नंतर’ (पच्छा). त्यामध्ये जो भिक्खू आपल्या मूळ कम्मट्ठानात चित्त एकाग्र करून, अतिलीन इत्यादी चार स्थानांमध्ये चित्ताचे जाणे रोखून, उनाड बैलांना जुंपून गाडी हाकणाऱ्या सारथ्याप्रमाणे किंवा चौकोनी वज्र खाली उतरवणाऱ्याप्रमाणे, चार स्थानांपैकी एकाही स्थानात न अडकता, संस्कारांचे परीक्षण (संमसन) करून अरहत्तपद प्राप्त करतो. हा भिक्खू देखील ‘जसा आधी तसे नंतर विहरतो’ असे म्हटले जाते. ही कम्मट्ठानाच्या दृष्टीने पूर्व-अपरता आहे. देशनेच्या दृष्टीने मात्र, केस (केसा) म्हणजे ‘आधी’ आणि मेंदू (मत्थलुंग) म्हणजे ‘नंतर’. त्यामध्ये जो भिक्खू केसांवर चित्त एकाग्र करून, रंग, आकार इत्यादींच्या द्वारे केसादींचे ग्रहण करतो आणि चार स्थानांमध्ये न अडकता मेंदूपर्यंत भावनेला पोहोचवतो, हा देखील ‘जसा आधी तसे नंतर विहरतो’ असे म्हटले जाते. अशा प्रकारे देशनेच्या दृष्टीने पूर्व-अपरता जाणून घ्यावी. ‘जसे नंतर तसे आधी’ (यथा पच्छा तथा पुरे) हा आधीच्याच वाक्याचा समानार्थी शब्द आहे. යථා අධො තථා උද්ධන්ති ඉදං සරීරවසෙන වෙදිතබ්බං. තෙනෙවාහ ‘‘උද්ධං පාදතලා අධො කෙසමත්ථකා’’ති. තත්ථ යො භික්ඛු පාදතලතො පට්ඨාය යාව කෙසමත්ථකා ද්වත්තිංසාකාරවසෙන වා පාදඞ්ගුලිඅග්ගපබ්බට්ඨිතො යාව සීසකටාහං, සීසකටාහතො යාව පාදඞ්ගුලීනං අග්ගපබ්බට්ඨීනි[Pg.291], තාව අට්ඨිවසෙන වා භාවනං පාපෙති චතූසු ඨානෙසු එකට්ඨානෙපි අසජ්ජන්තො. අයං යථා උද්ධං තථා අධො, යථා අධො තථා උද්ධං විහරති නාම. ‘जसे खाली तसे वर’ (यथा अधो तथा उद्धं) हे शरीराच्या दृष्टीने जाणून घ्यावे. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘पावलांच्या तळव्यापासून वर आणि केसांच्या टोकापासून खाली’. त्यामध्ये जो भिक्खू पावलांच्या तळव्यापासून सुरू करून केसांच्या टोकापर्यंत बत्तीस प्रकारच्या अवयवांच्या (द्वत्तिंसाकार) दृष्टीने, किंवा पायाच्या बोटांच्या टोकांच्या हाडांपासून डोक्याच्या कवटीपर्यंत आणि डोक्याच्या कवटीपासून पायाच्या बोटांच्या टोकांच्या हाडांपर्यंत, हाडांच्या दृष्टीने, चार स्थानांपैकी एकाही स्थानात न अडकता भावनेला पोहोचवतो, तो ‘जसे वर तसे खाली, जसे खाली तसे वर विहरतो’ असे म्हटले जाते. යෙහි ආකාරෙහීති යෙහි කොට්ඨාසෙහි. යෙහි ලිඞ්ගෙහීති යෙහි සණ්ඨානෙහි. යෙහි නිමිත්තෙහීති යෙහි උපට්ඨානෙහි. ආලොකසඤ්ඤා සුග්ගහිතා හොතීති යො භික්ඛු අඞ්ගණෙ නිසීදිත්වා ආලොකසඤ්ඤං මනසි කරොති, කාලෙන නිමීලෙති, කාලෙන උම්මීලෙති. අථස්ස යදා නිමීලෙන්තස්සාපි උම්මීලෙත්වා ඔලොකෙන්තස්ස විය එකසදිසමෙව උපට්ඨාති, තදා ආලොකසඤ්ඤා ජාතා නාම හොති. ‘‘දිවාසඤ්ඤා’’තිපි තස්සෙව නාමං. සා ච පන රත්තිං උප්පජ්ජමානා සුග්ගහිතා නාම හොති. ස්වාධිට්ඨිතාතිපි තස්සෙව වෙවචනං. සුට්ඨු අධිට්ඨිතා සුට්ඨු ඨපිතා ස්වාධිට්ඨිතා නාම වුච්චති. සා අත්ථතො සුග්ගහිතායෙව. යො වා ආලොකෙන ථිනමිද්ධං විනොදෙත්වා ඡන්දං උප්පාදෙත්වා කම්මට්ඨානං මනසි කරොති, තස්ස දිවාපි ආලොකසඤ්ඤා සුග්ගහිතා ස්වාධිට්ඨිතා නාම. රත්ති වා හොතු දිවා වා යෙන ආලොකෙන ථිනමිද්ධං විනොදෙත්වා කම්මට්ඨානං මනසි කරොති, තස්මිං ථිනමිද්ධවිනොදනෙ ආලොකෙ උප්පන්නා සඤ්ඤා සුග්ගහිතායෙව නාම. වීරියාදීසුපි එසෙව නයො. ඉමස්මිං සුත්තෙ ඡන්නං අභිඤ්ඤානං පාදකිද්ධි කථිතා. ‘ज्या आकारांनी’ (येहि आकारेहि) म्हणजे ज्या भागांनी (कोठ्ठासांनी). ‘ज्या लिंगांनी’ (येहि लिंगेहि) म्हणजे ज्या आकारांनी (संस्थानांनी). ‘ज्या निमित्तांनी’ (येहि निमित्तेहि) म्हणजे ज्या प्रकट होणाऱ्या चिन्हांनी (उपस्थानांनी). ‘आलोकसंज्ञा चांगल्या प्रकारे ग्रहण केली आहे’ (आलोकसञ्ञा सुग्गहिता होति) म्हणजे जो भिक्खू अंगणात बसून आलोकसंज्ञेचा (प्रकाशाच्या संज्ञेचा) मनसिकार करतो, वेळोवेळी डोळे मिटतो आणि वेळोवेळी डोळे उघडतो. त्यानंतर जेव्हा डोळे मिटलेले असतानाही डोळे उघडून पाहिल्यासारखाच एकसारखा प्रकाश प्रकट होतो, तेव्हा ‘आलोकसंज्ञा उत्पन्न झाली’ असे म्हटले जाते. ‘दिवा-संज्ञा’ (दिवासञ्ञा) हे देखील त्याचेच नाव आहे. आणि ती रात्रीच्या वेळी देखील उत्पन्न झाली तर ‘चांगल्या प्रकारे ग्रहण केली’ असे म्हटले जाते. ‘स्वाधिष्ठित’ (स्वाधिट्ठिता) हा देखील त्याचाच समानार्थी शब्द आहे. चांगल्या प्रकारे अधिष्ठित केलेली, चांगल्या प्रकारे स्थापित केलेली ती ‘स्वाधिष्ठित’ म्हटली जाते. ती अर्थाच्या दृष्टीने ‘चांगल्या प्रकारे ग्रहण केलेलीच’ असते. किंवा जो प्रकाशाच्या साहाय्याने थिनमिद्ध (आळस आणि डुलकी) दूर करून, छंद उत्पन्न करून कम्मट्ठानाचा मनसिकार करतो, त्याच्यासाठी दिवसा देखील आलोकसंज्ञा चांगल्या प्रकारे ग्रहण केलेली आणि स्वाधिष्ठित असते. रात्र असो वा दिवस, ज्या प्रकाशाने थिनमिद्ध दूर करून कम्मट्ठानाचा मनसिकार केला जातो, त्या थिनमिद्ध दूर करणाऱ्या प्रकाशात उत्पन्न झालेली संज्ञा ‘चांगल्या प्रकारे ग्रहण केलेलीच’ असते. वीर्य (प्रयत्न) इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम लावावा. या सुत्तात सहा अभिज्ञांची पादक-इद्धी (पायाभूत ऋद्धी) सांगितली आहे. පාසාදකම්පනවග්ගො දුතියො. दुसरा पासादकंपन वर्ग समाप्त. 3. අයොගුළවග්ගො ३. अयोगुळ वर्ग 2. අයොගුළසුත්තවණ්ණනා २. अयोगुळ सुत्त वर्णन 834. තතියවග්ගස්ස දුතියෙ ඉමිනා චාතුමහාභූතිකෙනාති ඉමිනා චතුමහාභූතමයෙන එවං භාරිකෙන ගරුකෙන සමානෙනාපි. ඔමාතීති පහොති සක්කොති, ඉදං තෙපිටකෙ බුද්ධවචනෙ අසම්භින්නපදං. කායම්පි චිත්තෙ සමොදහතීති කායං ගහෙත්වා චිත්තෙ ආරොපෙති, චිත්තසන්නිස්සිතං කරොති, චිත්තගතියා පෙසෙති. චිත්තං නාම මහග්ගතචිත්තං, චිත්තගතිගමනං ලහුකං හොති. චිත්තම්පි කායෙ සමොදහතීති චිත්තං ගහෙත්වා [Pg.292] කායෙ ආරොපෙති, කායසන්නිස්සිතං කරොති, කායගතියා පෙසෙති, කායො නාම කරජකායො, කායගතිගමනං දන්ධං හොති. සුඛසඤ්ඤඤ්ච ලහුසඤ්ඤඤ්චාති අභිඤ්ඤාචිත්තසහජාතසඤ්ඤා. සා හි සන්තසුඛසමන්නාගතත්තා සුඛසඤ්ඤා නාම හොති, කිලෙසදන්ධායිතත්තස්ස ච අභාවා ලහුසඤ්ඤා නාම. ८३४. तिसऱ्या वर्गाच्या दुसऱ्या सुत्तात— ‘या चार महाभूतांनी बनलेल्या’ (इमिना चातुमहाभूतिकेन) म्हणजे या चार महाभूतांनी बनलेल्या, अशा प्रकारे जड आणि वजनदार असूनही. ‘ओमाति’ म्हणजे समर्थ असणे, शक्य असणे; हे त्रिपिटकातील बुद्धवचनात न मिसळलेले (असंभिन्न) पद आहे. ‘काया देखील चित्तात समाविष्ट करतो’ (कायम्पि चित्ते समोदहति) म्हणजे काया घेऊन चित्तावर आरूढ करतो, चित्ताश्रित करतो, चित्ताच्या गतीने पाठवतो. चित्त म्हणजे महग्गत चित्त; चित्ताच्या गतीने जाणे हलके (जलद) असते. ‘चित्त देखील कायेत समाविष्ट करतो’ (चित्तम्पि काये समोदहति) म्हणजे चित्त घेऊन कायेवर आरूढ करतो, कायाश्रित करतो, कायेच्या गतीने पाठवतो. काया म्हणजे करजकाया (भौतिक शरीर); कायेच्या गतीने जाणे मंद (हळूवार) असते. ‘सुखसंज्ञा आणि लघुसंज्ञा’ (सुखसञ्ञञ्च लहुसञ्ञञ्च) म्हणजे अभिज्ञा-चित्तासोबत उत्पन्न झालेली संज्ञा. कारण ती शांत सुखाने युक्त असल्यामुळे ‘सुखसंज्ञा’ म्हटली जाते, आणि क्लेशांमुळे होणाऱ्या मंदतेचा अभाव असल्यामुळे ‘लघुसंज्ञा’ म्हटली जाते. අයොගුළො දිවසං සන්තත්තො ලහුතරො චෙව හොතීති සො හි ද්වීහි තීහි ජනෙහි උක්ඛිපිත්වා කම්මාරුද්ධනෙ පක්ඛිත්තොපි දිවසං පච්චමානො විවරානුපවිට්ඨෙන තෙජෙන චෙව වායෙන ච වායොසහගතො ච උස්මාසහගතො ච තෙජොසහගතො ච හුත්වා එවං ලහුකො හොති, යථා නං කම්මාරො මහාසණ්ඩාසෙන ගහෙත්වා එකතො පරිවත්තෙති උක්ඛිපති බහි නීහරති. එවං පන මුදු ච හොති කම්මනියො ච. යථා නං සො ඛණ්ඩං ඛණ්ඩං විච්ඡින්දති, කූටෙන හනන්තො දීඝචතුරස්සාදිභෙදං කරොති. ඉමස්මිං සුත්තෙ විකුබ්බනිද්ධි කථිතා. ‘दिवसभर तापलेला लोखंडाचा गोळा अत्यंत हलका होतो’ (अयोगुळो दिवसं सन्तत्तो लहुतरो चेव होति) म्हणजे तो लोखंडाचा गोळा दोन-तीन माणसांनी उचलून लोहाराच्या भट्टीत टाकला असता, दिवसभर तापत राहिल्याने, छिद्रांमधून प्रवेश केलेल्या तेज आणि वायूमुळे, वायूने युक्त, उष्णतेने युक्त आणि तेजाने युक्त होऊन इतका हलका होतो की, लोहार त्याला मोठ्या सांडशीने पकडून एका बाजूला वळवू शकतो, उचलू शकतो आणि बाहेर काढू शकतो. अशा प्रकारे तो मऊ आणि कार्यक्षम (घडवण्यायोग्य) होतो, ज्यायोगे तो लोहार त्याचे तुकडे-तुकडे करू शकतो, हातोड्याने ठोकून त्याला लांब, चौकोनी इत्यादी आकार देऊ शकतो. या सुत्तात विकुब्बन-इद्धी (विविध रूपे धारण करण्याची ऋद्धी) सांगितली आहे. 3-10. භික්ඛුසුත්තාදිවණ්ණනා ३-१०. भिक्खू सुत्त इत्यादींचे वर्णन 835-842. තතියෙ විවට්ටපාදකිද්ධි කථිතා, තථා චතුත්ථෙ. අපිච ද්වෙ ඵලානි ආදිං කත්වා හෙට්ඨා මිස්සකිද්ධිපාදා කථිතා, සත්තසු ඵලෙසු පුබ්බභාගා. සත්තමාදීනි චත්තාරි හෙට්ඨා කථිතනයානෙව. ८३५-८४२. तिसऱ्या सुत्तात विवट्ट-पादक-इद्धी (विवर्त पायाभूत ऋद्धी) सांगितली आहे, तसेच चौथ्या सुत्तातही. शिवाय, ‘द्वे फलानि’ सुत्ताला आरंभ करून खाली मिश्रक-इद्धिपाद सांगितले आहेत, जे सात फलांमध्ये पूर्वभाग (पुब्बभाग) आहेत. सातव्या सुत्तापासून सुरू होणारी चार सुत्ते खाली सांगितलेल्या पद्धतीनेच आहेत. 11-12. මොග්ගල්ලානසුත්තාදිවණ්ණනා ११-१२. मोग्गल्लान सुत्त इत्यादींचे वर्णन 843-844. එකාදසමද්වාදසමෙසු ඡ අභිඤ්ඤා කථිතා. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානත්ථමෙවාති. ८४३-८४४. अकराव्या आणि बाराव्या सुत्तात सहा अभिज्ञा सांगितल्या आहेत. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. ඉද්ධිපාදසංයුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. इद्धिपाद संयुत्त वर्णन समाप्त. 8. අනුරුද්ධසංයුත්තං ८. अनुरुद्ध संयुत्त 1. රහොගතවග්ගො १. रहोगत वर्ग 1-2. පඨමරහොගතසුත්තාදිවණ්ණනා १-२. प्रथम रहोगत सुत्त इत्यादींचे वर्णन 899-900. අනුරුද්ධසංයුත්තස්ස [Pg.293] පඨමෙ ආරද්ධාති පරිපුණ්ණා. සඞ්ඛෙපතො පනෙත්ථ ඡත්තිංසාය ඨානෙසු අරහත්තං පාපෙත්වා විපස්සනා කථිතා, දුතියෙ ද්වාදසසු ඨානෙසු අරහත්තං පාපෙත්වා විපස්සනා කථිතා. ८९९-९००. अनुरुद्धसंयुत्ताच्या पहिल्या सुत्तात 'आरद्धा' म्हणजे परिपूर्ण (पूर्ण झालेले). थोडक्यात सांगायचे तर, येथे छत्तीस स्थानांमध्ये अरहंतपद प्राप्त करून देऊन विपस्सना सांगितली आहे; दुसऱ्या सुत्तात बारा स्थानांमध्ये अरहंतपद प्राप्त करून देऊन विपस्सना सांगितली आहे. 3. සුතනුසුත්තවණ්ණනා ३. सुतनुसुत्तवण्णना 901. තතියෙ මහාභිඤ්ඤතන්ති ඡඅභිඤ්ඤාභාවං. හීනං ධම්මන්තිආදීසු ඉමාය පාළියා අත්ථො වෙදිතබ්බො – ९०१. तिसऱ्या सुत्तात 'महाभिञ्ञातं' म्हणजे सहा अभिञ्ञा (अभिज्ञा) असण्याची अवस्था. 'हीनं धम्मं' इत्यादींमध्ये या पाळीच्या (पाठाच्या) आधारे अर्थ समजून घ्यावा – ‘‘කතමෙ ධම්මා හීනා? ද්වාදස අකුසලචිත්තුප්පාදා, ඉමෙ ධම්මා හීනා. කතමෙ ධම්මා මජ්ඣිමා? තීසු භූමීසු කුසලං, තීසු භූමීසු විපාකො, තීසු භූමීසු කිරියාබ්යාකතං සබ්බඤ්ච රූපං, ඉමෙ ධම්මා මජ්ඣිමා. කතමෙ ධම්මා පණීතා? චත්තාරො මග්ගා අපරියාපන්නා, චත්තාරි ච සාමඤ්ඤඵලානි නිබ්බානඤ්ච, ඉමෙ ධම්මා පණීතා’’ති (ධ. ස. 1423-1425). “हीन धम्म कोणते आहेत? बारा अकुशल चित्तोत्पाद (अकुशल चित्ताचे उत्पन्न होणे), हे धम्म हीन आहेत. मध्यम धम्म कोणते आहेत? तीन भूमींमधील कुशल, तीन भूमींमधील विपाक, three भूमींमधील क्रिया-अव्याकृत आणि सर्व रूप, हे धम्म मध्यम आहेत. प्रणीत (उत्कृष्ट) धम्म कोणते आहेत? अपरियापन्न (लोकोत्तर) चार मार्ग, चार सामञ्ञफल (श्रामण्यफळे) आणि निब्बान, हे धम्म प्रणीत आहेत.” (ध. सं. १४२३-१४२५). 4-7. පඨමකණ්ඩකීසුත්තාදිවණ්ණනා ४-७. पठमकण्डकीसुत्त-आदींचे स्पष्टीकरण 902-905. චතුත්ථෙ කණ්ඩකීවනෙති මහාකරමන්දවනෙ. ඡට්ඨෙ සහස්සං ලොකන්ති ඉමිනා ථෙරස්ස සතත විහාරො දස්සිතො. ථෙරො හි පාතොව මුඛං ධොවිත්වා අතීතානාගතෙ කප්පසහස්සං අනුස්සරති. පච්චුප්පන්නෙ පන දසචක්කවාළසහස්සං එකාවජ්ජනස්ස ආපාථමාගච්ඡති. සත්තමං උත්තානමෙව. ९०२-९०५. चौथ्या सुत्तात 'कण्डकीवने' म्हणजे मोठ्या करमंदाच्या वनात (करवंदाच्या वनात). सहाव्या सुत्तात 'सहस्सं लोकं' या शब्दांद्वारे थेरांचा सततचा विहार (नेहमी राहण्याची अवस्था) दर्शविला आहे. कारण थेर सकाळीच मुखप्रक्षालन करून भूतकाळ व भविष्यकाळातील एक हजार कप्पांचे (कल्पांचे) स्मरण करतात. वर्तमानकाळात मात्र, दहा हजार चक्रवाळ त्यांच्या एकाच आवर्तनात (चित्ताच्या एकाच आवर्जनात) स्पष्टपणे समोर येतात. सातवे सुत्त अगदी स्पष्टच आहे. 8. සලළාගාරසුත්තවණ්ණනා ८. सलळागारसुत्तवण्णना 906. අට්ඨමෙ සලළාගාරෙති සලළරුක්ඛමයාය පණ්ණසාලාය, සලළරුක්ඛස්ස වා ද්වාරෙ ඨිතත්තා එවංනාමකෙ අගාරෙ. ඉමස්මිං සුත්තෙ විපස්සනාය සද්ධිං විපස්සකපුග්ගලො කථිතො. ९०६. आठव्या सुत्तात 'सलळागारे' म्हणजे देवदारूच्या (सरळ/पाईनच्या) लाकडापासून बनवलेल्या पर्णकुटीत, किंवा देवदारूच्या वृक्षाच्या दाराजवळ असल्यामुळे या नावाच्या विहारात. या सुत्तात विपस्सनेसोबतच विपस्सना करणाऱ्या पुग्गलाविषयी (व्यक्तीविषयी) सांगितले आहे. 9. අම්බපාලිවනසුත්තවණ්ණනා ९. अम्बपालिवनसुत्तवण्णना 907. නවමෙ [Pg.294] ආසභිං වාචන්ති අත්තනො අරහත්තභාවදීපකං උත්තමවාචං. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානත්ථමෙවාති. ९०७. नवव्या सुत्तात 'आसभिं वाचं' म्हणजे स्वतःच्या अरहंतपदाला प्रकट करणारी उत्तम वाणी. उर्वरित सर्व भागाचा अर्थ सर्वत्र स्पष्टच आहे. රහොගතවග්ගො පඨමො. रहुगतवग्गो पठमो. 2. දුතියවග්ගවණ්ණනා २. दुतियवग्गवण्णना 909-922. දුතියවග්ගෙ ඨානඤ්ච ඨානතොතිආදීහි ථෙරො දසබලඤාණං පටිජානාති. කිම්පනෙතං සාවකානං හොතීති? එකදෙසෙන හොති, සබ්බඤ්ඤුබුද්ධානං පනෙතං නිප්පදෙසං සබ්බාකාරපරිපූරන්ති. ९०९-९२२. दुसऱ्या वर्गात 'ठाणञ्च ठाणतो' इत्यादी पाठांद्वारे थेरांनी दसबलञाण (दशबलज्ञान) स्वीकारले आहे (घोषित केले आहे). 'पण हे सावकांना (श्रावकांना) प्राप्त होते का?' असे विचारल्यास, अंशतः (काही प्रमाणात) सावकांनाही त्यांच्या प्रणिधानाच्या (संकल्पाच्या) अनुरूप प्राप्त होते; परंतु सब्बञ्ञू बुद्धांचे (सर्वज्ञ बुद्धांचे) हे दसबलञाण अनंत विषय असल्यामुळे सर्व प्रकारे परिपूर्ण असते. අනුරුද්ධසංයුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. अनुरुद्धसंयुत्तवण्णना निट्ठिता. 9. ඣානසංයුත්තවණ්ණනා ९. झानसंयुत्तवण्णना 923. ඣානසංයුත්තං උත්තානත්ථමෙව. ९२३. झानसंयुत्त (ध्यान संयुत्त) स्पष्ट अर्थाचेच आहे. ඣානසංයුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. झानसंयुत्तवण्णना niट्ठिता. 10. ආනාපානසංයුත්තං १०. आनापानसंयुत्तं 1. එකධම්මවග්ගො १. एकधम्मवग्गो 1. එකධම්මසුත්තවණ්ණනා १. एकधम्मसुत्तवण्णना 977. ආනාපානසංයුත්තස්ස [Pg.295] පඨමෙ එකධම්මොති එකො ධම්මො. සෙසමෙත්ථ යං වත්තබ්බං සියා, තං සබ්බං සබ්බාකාරෙන විසුද්ධිමග්ගෙ (විසුද්ධි. 1.215) ආනාපානස්සතිකම්මට්ඨානනිද්දෙසෙ වුත්තමෙව. ९७७. आनापानसंयुत्ताच्या पहिल्या सुत्तात 'एकधम्मो' म्हणजे एक धम्म. येथे जे काही उर्वरित सांगण्यासारखे आहे, ते सर्व विसुद्धिमग्ग (विशुद्धिमार्ग १.२१५) मधील 'आनापानस्सतिकम्मट्ठाननिद्देस' (आनापानस्मृति कर्मस्थान निर्देश) मध्ये सर्व प्रकारे सांगितलेच आहे. 6. අරිට්ඨසුත්තවණ්ණනා ६. अरिट्ठसुत्तवण्णना 982. ඡට්ඨෙ භාවෙථ නොති භාවෙථ නු. කාමච්ඡන්දොති පඤ්චකාමගුණිකරාගො. අජ්ඣත්තං බහිද්ධා ච ධම්මෙසූති අජ්ඣත්තිකබාහිරෙසු ද්වාදසසු ආයතනධම්මෙසු. පටිඝසඤ්ඤා සුප්පටිවිනීතාති පටිඝසම්පයුත්තසඤ්ඤා සුට්ඨු පටිවිනීතා, සමුච්ඡින්නාති අත්ථො. ඉමිනා අත්තනො අනාගාමිමග්ගං කථෙති. ඉදානි අරහත්තමග්ගස්ස විපස්සනං දස්සෙන්තො සො සතොව අස්සසිස්සාමීතිආදිමාහ. ९८२. सहाव्या सुत्तात 'भावेथ नो' म्हणजे 'तुम्ही भावना करता का?' (भावेथ नु). 'कामच्छन्दो' म्हणजे पाच कामगुणांमधील राग (आसक्ती). 'अज्झत्तं बहिद्धा च धम्मेसू' म्हणजे आंतरिक आणि बाह्य अशा बारा आयतन धम्मांमध्ये. 'पटिघसञ्ञा सुप्पटिविनीता' म्हणजे प्रतिघाशी (द्वेषाशी) संप्रयुक्त असलेली संज्ञा चांगल्या प्रकारे दूर केली आहे, समूळ नष्ट केली आहे, असा अर्थ आहे. याद्वारे ते स्वतःच्या अनागामी मार्गाविषयी सांगतात. आता अरहंतमार्गाची विपस्सना दर्शविताना त्यांनी 'सो सतो व अस्ससिस्सामि' (तो जागरूक राहूनच श्वास घेईल) इत्यादी म्हटले आहे. 7. මහාකප්පිනසුත්තවණ්ණනා ७. महाकप्पिनसुत्तवण्णना 983. සත්තමෙ ඉඤ්ජිතත්තං වා ඵන්දිතත්තං වාති උභයෙනපි චලනමෙව කථිතං. ९८३. सातव्या सुत्तात 'इञ्जितत्तं वा फन्दितत्तं वा' या दोन्ही शब्दांद्वारे केवळ हालचाल (कंपन) सांगितले आहे. 8. පදීපොපමසුත්තවණ්ණනා ८. पदीपोपमसुत्तवण्णना 984. අට්ඨමෙ නෙව කායොපි කිලමති න චක්ඛූනීති අඤ්ඤෙසු හි කම්මට්ඨානෙසු කම්මං කරොන්තස්ස කායොපි කිලමති, චක්ඛූනිපි විහඤ්ඤන්ති. ධාතුකම්මට්ඨානස්මිඤ්හි කම්මං කරොන්තස්ස කායො කිලමති, යන්තෙ පක්ඛිපිත්වා පීළනාකාරප්පත්තො විය හොති. කසිණකම්මට්ඨානෙ කම්මං කරොන්තස්ස චක්ඛූනි ඵන්දන්ති කිලමන්ති, නික්ඛමිත්වා පතනාකාරප්පත්තානි විය හොන්ති. ඉමස්මිං පන කම්මට්ඨානෙ කම්මං කරොන්තස්ස නෙව කායො කිලමති, න අක්ඛීනි විහඤ්ඤන්ති. තස්මා එවමාහ. ९८४. आठव्या सुत्तात 'नेव कायोपि किलमति न चक्खूनि' (शरीरही थकत नाही आणि डोळेही दुखत नाहीत) असे म्हटले आहे, कारण इतर कम्मट्ठानांमध्ये (कर्मस्थानांमध्ये) साधना करणाऱ्या भिक्खूचे शरीरही थकते आणि डोळेही पीडित होतात. धातुकम्मट्ठानात साधना करणाऱ्याचे शरीर थकते, जणू काही त्याला पिळण्याच्या यंत्रात टाकून दाबले जात आहे असे होते. कसिणकम्मट्ठाने (कृत्स्नकर्मस्थानात) साधना करणाऱ्याचे डोळे थरथरतात आणि थकतात, जणू काही ते बाहेर येऊन पडणार आहेत असे होते. परंतु या (आनापान) कम्मट्ठानात साधना करणाऱ्याचे शरीरही थकत नाही आणि डोळेही पीडित होत नाहीत. म्हणूनच असे म्हटले आहे. සබ්බසො [Pg.296] රූපසඤ්ඤානන්තිආදි කස්මා වුත්තං, කිං ආනාපානෙ කසිණුග්ඝාටනං ලබ්භතීති? තිපිටකචූළාභයත්ථෙරො පනාහ – ‘‘යස්මා ආනාපානනිමිත්තං තාරකරූපමුත්තාවලිකාදිසදිසං හුත්වා පඤ්ඤායති, තස්මා තත්ථ කසිණුග්ඝාටනං ලබ්භතී’’ති. තිපිටකචූළනාගත්ථෙරො ‘‘න ලබ්භතෙවා’’ති ආහ. අලබ්භන්තෙ අයං අරියිද්ධිආදිකො පභෙදො කස්මා ගහිතොති? ආනිසංසදස්සනත්ථං. අරියං වා හි ඉද්ධිං චත්තාරි වා රූපාවචරජ්ඣානානි චතස්සො වා අරූපසමාපත්තියො නිරොධසමාපත්තිං වා පත්ථයමානෙන භික්ඛුනා අයං ආනාපානස්සතිසමාධි සාධුකං මනසිකාතබ්බො. යථා හි නගරෙ ලද්ධෙ යං චතූසු දිසාසු උට්ඨානකභණ්ඩං, තං චතූහි ද්වාරෙහි නගරමෙව පවිසතීති, ජනපදො ලද්ධො ච හොති. නගරස්සෙව හෙසො ආනිසංසො. එවං ආනාපානස්සතිසමාධිභාවනාය ආනිසංසො එස අරියිද්ධිආදිකො පභෙදො, සබ්බාකාරෙන භාවිතෙ ආනාපානස්සතිසමාධිස්මිං සබ්බමෙතං යොගිනො නිප්ඵජ්ජතීති ආනිසංසදස්සනත්ථං වුත්තං. සුඛඤ්චෙති එත්ථ සොති කස්මා න වුත්තං? යස්මා භික්ඛූති ඉමස්මිං වාරෙ නාගතං. 'सब्बसो रूपसञ्ञानं' (सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांचे...) इत्यादी का म्हटले आहे? आनापानामध्ये कसिणुग्घाटन (कृत्स्न-उद्घाटन/कसिण निमित्त दूर करणे) प्राप्त होते का? असा प्रश्न आहे. यावर त्रिपिटक चूळाभय थेर म्हणतात – 'ज्याअर्थी आनापान निमित्त हे ताऱ्यांच्या समूहासारखे किंवा मोत्यांच्या माळेसारखे दिसून येते, त्याअर्थी तेथे कसिणुग्घाटन प्राप्त होते.' त्रिपिटक चूळनाग थेर म्हणतात – 'ते प्राप्त होतच नाही.' जर ते प्राप्त होत नसेल, तर हा अरिय-इद्धि (आर्य ऋद्धी) इत्यादी प्रकार कशासाठी घेतला आहे? आनानिसंस (फायदा/आनुशंस) दर्शवण्यासाठी तो घेतला आहे. कारण आर्य ऋद्धी, किंवा चार रूपावचर ध्यान, किंवा चार अरूप समापत्ती, किंवा निरोध समापत्तीची इच्छा करणाऱ्या भिक्खूने या आनापानस्सति समाधीचे चांगल्या प्रकारे मनन (मनसिकार) केले पाहिजे. जसे एखादे नगर हस्तगत झाल्यावर, चारही दिशांकडून येणारा महसूल (कर) चारही दारांतून नगरातच प्रवेश करतो, आणि त्यामुळे संपूर्ण जनपद (प्रदेश) हस्तगत होतो. हा जसा नगराचाच फायदा आहे, त्याचप्रमाणे आनापानस्सति समाधीच्या भावनेचा हा अरिय-इद्धि इत्यादी प्रकार हा फायदा (आनुशंस) आहे. आनापानस्सति समाधीची सर्व प्रकारे भावना केली असता, हे सर्व योगी भिक्खूला प्राप्त होते, हे फायदे दर्शवण्यासाठी असे म्हटले आहे. 'सुखञ्च' या पाठात 'सो' (तो) हा शब्द का वापरला नाही? कारण 'भिक्खू' हा शब्द या भागात आलेला नाही, म्हणून 'सो' हा शब्द वापरला नाही. 9. වෙසාලීසුත්තවණ්ණනා ९. वेसालीसुत्तवण्णना 985. නවමෙ වෙසාලියන්ති එවංනාමකෙ ඉත්ථිලිඞ්ගවසෙන පවත්තවොහාරෙ නගරෙ. තඤ්හි නගරං තික්ඛත්තුං පාකාරපරික්ඛෙපවඩ්ඪනෙන විසාලීභූතත්තා වෙසාලීති වුච්චති. ඉදම්පි ච නගරං සබ්බඤ්ඤුතං පත්තෙයෙව සම්මාසම්බුද්ධෙ සබ්බාකාරවෙපුල්ලතං පත්තන්ති වෙදිතබ්බං. එවං ගොචරගාමං දස්සෙත්වා නිවාසට්ඨානමාහ මහාවනෙ කූටාගාරසාලායන්ති. තත්ථ මහාවනං නාම සයංජාතං අරොපිමං සපරිච්ඡෙදං මහන්තං වනං. කපිලවත්ථුසාමන්තා පන මහාවනං හිමවන්තෙන සහ එකාබද්ධං අපරිච්ඡෙදං හුත්වා මහාසමුද්දං ආහච්ච ඨිතං. ඉදං තාදිසං න හොති, සපරිච්ඡෙදං මහන්තං වනන්ති මහාවනං. කූටාගාරසාලා පන මහාවනං නිස්සාය කතෙ ආරාමෙ කූටාගාරං අන්තොකත්වා හංසවට්ටකච්ඡන්නෙන කතා සබ්බාකාරසම්පන්නා බුද්ධස්ස භගවතො ගන්ධකුටීති වෙදිතබ්බා. ९८५. नवव्या सुत्तात 'वेसाळियं' म्हणजे या नावाच्या, स्त्रीलिंगी प्रयोगाने प्रसिद्ध असलेल्या नगरात. ते नगर तीन वेळा तटबंदी वाढवून विस्तीर्ण (विशाल) केल्यामुळे त्याला 'वेसाली' (वैशाली) असे म्हटले जाते. आणि हे नगर सुद्धा, जेव्हा सम्मासम्बुद्ध (सम्यक्संबुद्ध) सर्वज्ञतेप्रत पोहोचले, तेव्हाच सर्व प्रकारे समृद्धीला प्राप्त झाले, असे समजावे. अशा प्रकारे गोचरगाम (भिक्षेचे गाव) दर्शवून, राहण्याचे ठिकाण सांगताना 'महावने कूटगारसालायं' (महावनातील कूटगारशाळेत) असे म्हटले आहे. तेथे 'महावन' म्हणजे स्वतः निर्माण झालेले, न लावले गेलेले, मर्यादित आणि मोठे वन. कपिलवस्तूच्या जवळील महावन मात्र हिमालयाशी जोडलेले, अमर्याद असून महासागरापर्यंत पसरलेले आहे. हे (वैशालीचे) महावन तसे नाही, तर ते मर्यादित आणि मोठे वन आहे, म्हणून त्याला 'महावन' म्हणतात. 'कूटगारसाला' म्हणजे महावनाचा आश्रय घेऊन बनवलेल्या आरामात (विहारात) कूटगार (शिखरयुक्त गृह) आत घेऊन, हंसाच्या पाठीच्या आकाराचे छप्पर बनवून तयार केलेली, सर्व प्रकारे संपन्न अशी भगवान बुद्धांची 'गंधकुटी' होय, असे समजावे. අනෙකපරියායෙන අසුභකථං කථෙතීති අනෙකෙහි කාරණෙහි අසුභාකාරසන්දස්සනප්පවත්තං කායවිච්ඡන්දනීයකථං කථෙති. සෙය්යථිදං – අත්ථි [Pg.297] ඉමස්මිං කායෙ කෙසා ලොමා නඛා දන්තා…පෙ… මුත්තන්ති. කිං වුත්තං හොති? භික්ඛවෙ, ඉමස්මිං බ්යාමමත්තෙ කළෙවරෙ සබ්බාකාරෙනපි විචිනන්තො න කොචි කිඤ්චි මුත්තං වා මණිං වා වෙළුරියං වා අගරුං වා චන්දනං වා කුඞ්කුමං වා කප්පුරං වා වාසචුණ්ණාදිං වා අණුමත්තම්පි සුචිභාවං පස්සති, අථ ඛො පරමදුග්ගන්ධං ජෙගුච්ඡඅස්සිරිකදස්සනං කෙසලොමාදිනානප්පකාරං අසුචිමෙව පස්සති, තස්මා න එත්ථ ඡන්දො වා රාගො වා කරණීයො. යෙපි උත්තමඞ්ගෙ සිරසි ජාතා කෙසා නාම, තෙපි අසුභා චෙව අසුචිනො ච පටිකූලා ච. සො ච නෙසං අසුභාසුචිපටිකූලභාවො වණ්ණතොපි සණ්ඨානතොපි ගන්ධතොපි ආසයතොපි ඔකාසතොපීති පඤ්චහාකාරෙහි වෙදිතබ්බො. එවං ලොමාදීනම්පීති අයමෙත්ථ සඞ්ඛෙපො, විත්ථාරො පන විසුද්ධිමග්ගෙ (විසුද්ධි. 1.307) වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බො. ඉති භගවා එකමෙකස්මිං කොට්ඨාසෙ පඤ්චපඤ්චප්පභෙදෙන අනෙකපරියායෙන අසුභකථං කථෙති. "अनेक पर्यायांनी (पद्धतींनी) अशुभकथा सांगतात" याचा अर्थ अनेक कारणांनी अशुभाचे स्वरूप सर्व बाजूंनी दर्शविणारी आणि शरीराचे पृथक्करण करणारी (वैराग्य उत्पन्न करणारी) कथा सांगतात. जसे की - "या शरीरात केस, रोम (अंगावरील केस), नखे, दात... इत्यादी... मूत्र आहे." याचा काय अर्थ होतो? भिक्खूंनो, या एक वाव प्रमाण असलेल्या शरीरात (कलेवरात) सर्व प्रकारे शोध घेतला असता, कोणत्याही सुज्ञ व्यक्तीला यात मोती, मणी, वैडूर्य, अगरू, चंदन, कुंकू, कापूर किंवा सुगंधी चूर्ण इत्यादींपैकी कशाचीही अणुमात्रही शुद्धता दिसून येत नाही. उलटपक्षी, अत्यंत दुर्गंधीयुक्त, घृणास्पद, शोभाहीन दिसणारे केस, रोम इत्यादी विविध प्रकारचे अशुद्ध पदार्थच केवळ दिसून येतात. म्हणून, या शरीराविषयी कोणतीही इच्छा (छंद) किंवा राग (आसक्ती) बाळगू नये. जे शरीराचा उत्तम अवयव असलेल्या डोक्यावर उगवणारे केस आहेत, ते देखील अशुभ, अशुद्ध आणि प्रतिकूल (घृणास्पद) आहेत. आणि त्यांचा हा अशुभ, अशुद्ध व प्रतिकूल भाव १. रंगावरून (वर्ण), २. आकारावरून (संस्थान), ३. गंधावरून, ४. आशयावरून (उत्पत्तीचे कारण) आणि ५. स्थानावरून अशा पाच प्रकारांनी जाणून घेतला पाहिजे. याचप्रमाणे रोम इत्यादींच्या बाबतीतही जाणून घ्यावे. हा येथे संक्षेप (थोडक्यात सारांश) आहे. सविस्तर वर्णन तर 'विसुद्धिमग्ग' (विशुद्धिमार्ग) ग्रंथात सांगितलेल्या पद्धतीनेच जाणून घ्यावे. अशा प्रकारे भगवान प्रत्येक अवयवाच्या बाबतीत पाच-पाच प्रकारच्या भेदांनी अनेक पर्यायांनी अशुभकथा सांगतात. අසුභාය වණ්ණං භාසතීති උද්ධුමාතකාදිවසෙන අසුභමාතිකං නික්ඛිපිත්වා පදභාජනීයෙන තං විභජන්තො වණ්ණෙන්තො අසුභාය වණ්ණං භාසති. අසුභභාවනාය වණ්ණං භාසතීති යා අයං කෙසාදීසු වා උද්ධුමාතකාදීසු වා අජ්ඣත්තබහිද්ධාවත්ථූසු අසුභාකාරං ගහෙත්වා පවත්තස්ස චිත්තස්ස භාවනා වඩ්ඪනා ඵාතිකම්මං, තස්සා අසුභභාවනාය ආනිසංසං දස්සෙන්තො වණ්ණං භාසති, ගුණං පරිකිත්තෙති. සෙය්යථිදං – ‘‘අසුභභාවනාභියුත්තො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු කෙසාදීසු වා වත්ථූසු උද්ධුමාතකාදීසු වා පඤ්චඞ්ගවිප්පහීනං පඤ්චඞ්ගසමන්නාගතං තිවිධකල්යාණං දසලක්ඛණසම්පන්නං පඨමජ්ඣානං පටිලභති. සො තං පඨමජ්ඣානසඞ්ඛාතං චිත්තමඤ්ජූසං නිස්සාය විපස්සනං වඩ්ඪෙත්වා උත්තමත්ථං අරහත්තං පාපුණාතී’’ති. "अशुभाची प्रशंसा (गुणवर्णन) करतात" याचा अर्थ फुगलेले प्रेत (उद्धुमातक) इत्यादींच्या द्वारे अशुभ-मातृका मांडून, 'पदभाजनीय' (पदांचे विश्लेषण) द्वारे त्याचे विभाजन व स्पष्टीकरण करत अशुभाचे गुणवर्णन करतात. "अशुभ-भावनेची प्रशंसा करतात" याचा अर्थ केस इत्यादींमध्ये किंवा फुगलेले प्रेत इत्यादींमध्ये, अंतर्गत व बाह्य वस्तूंमध्ये अशुभाचे स्वरूप ग्रहण करून प्रवृत्त झालेल्या चित्ताची जी ही भावना, वृद्धी आणि वारंवार अभ्यास आहे, त्या अशुभ-भावनेचे फायदे दर्शवत तिची प्रशंसा करतात, गुणांचे कीर्तन करतात. जसे की - "भिक्खूंनो, अशुभ-भावनेत मग्न असलेला भिक्खू केस इत्यादी वस्तूंमध्ये किंवा फुगलेले प्रेत इत्यादींमध्ये पाच अंगांनी विप्रहीन (नीवरणरहित), पाच अंगांनी समन्वागत (युक्त), तीन प्रकारच्या कल्याणाने युक्त आणि दहा लक्षणांनी संपन्न असलेले प्रथम ध्यान प्राप्त करतो. तो त्या प्रथम ध्यान नावाच्या 'चित्त-मंजूषेचा' (चित्तपेटीचा) आश्रय घेऊन, विपश्यनेची वाढ करून, उत्तम अर्थ असलेल्या अरहत्त्व पदाला प्राप्त करतो." ඉච්ඡාමහං, භික්ඛවෙ, අඩ්ඪමාසං පටිසල්ලීයිතුන්ති අහං, භික්ඛවෙ, එකං අඩ්ඪමාසං පටිසල්ලීයිතුං නිලීයිතුං එකකොව හුත්වා විහරිතුං ඉච්ඡාමීති අත්ථො. නාම්හි කෙනචි උපසඞ්කමිතබ්බො අඤ්ඤත්ර එකෙන පිණ්ඩපාතනීහාරකෙනාති යො අත්තනා පයුත්තවාචං අකත්වා මමත්ථාය සද්ධෙසු කුලෙසු පටියත්තපිණ්ඩපාතං නීහරිත්වා මය්හං උපනාමෙති, තං පිණ්ඩපාතනීහාරකං එකං භික්ඛුං ඨපෙත්වා නාම්හි අඤ්ඤෙන කෙනචි භික්ඛුනා වා ගහට්ඨෙන වා උපසඞ්කමිතබ්බොති. "भिक्खूंनो, माझी पंधरवड्यासाठी (अर्ध्या महिन्यासाठी) एकांतात राहण्याची इच्छा आहे" याचा अर्थ "भिक्खूंनो, मी एक पंधरवडा एकांतात राहण्यासाठी, गुप्त राहण्यासाठी, एकटाच होऊन विहार करण्याची इच्छा करतो," असा आहे. "पिंडपात (भिक्षा) आणून देणाऱ्या एका भिक्खूशिवाय इतर कोणीही माझ्याकडे येऊ नये" याचा अर्थ जो स्वतः (पिंडपाताविषयी) कोणतीही याचना न करता, माझ्यासाठी श्रद्धाळू कुळांमध्ये तयार केलेला पिंडपात आणून मला अर्पण करतो, त्या पिंडपात आणणाऱ्या एका भिक्खूला वगळता, इतर कोणत्याही भिक्खूने किंवा गृहस्थाने माझ्याकडे येऊ नये, असा आहे. කස්මා [Pg.298] පන එවමාහාති? අතීතෙ කිර පඤ්චසතා මිගලුද්දකා මහතීහි දණ්ඩවාගුරාදීහි අරඤ්ඤං පරික්ඛිපිත්වා හට්ඨතුට්ඨා එකතොයෙව යාවජීවං මිගපක්ඛිඝාතකම්මෙන ජීවිකං කප්පෙත්වා නිරයෙ උප්පන්නා. තෙ තත්ථ පච්චිත්වා පුබ්බෙ කතෙන කෙනචිදෙව කුසලකම්මෙන මනුස්සෙසු උප්පන්නා කල්යාණූපනිස්සයවසෙන සබ්බෙපි භගවතො සන්තිකෙ පබ්බජ්ජඤ්ච උපසම්පදඤ්ච ලභිංසු. තෙසං තතො මූලාකුසලකම්මතො අවිපක්කවිපාකා අපරාපරචෙතනා තස්මිං අඩ්ඪමාසබ්භන්තරෙ අත්තූපක්කමෙන ච පරූපක්කමෙන ච ජීවිතූපච්ඡෙදාය ඔකාසමකාසි. තං භගවා අද්දස. කම්මවිපාකො ච නාම න සක්කා කෙනචි පටිබාහිතුං. තෙසු ච භික්ඛූසු පුථුජ්ජනාපි අත්ථි, සොතාපන්නසකදාගාමිඅනාගාමිඛීණාසවාපි. තත්ථ ඛීණාසවා අප්පටිසන්ධිකා, ඉතරෙ අරියසාවකා නියතගතිකා සුගතිපරායණා, පුථුජ්ජනානං ගති අනියතා. पण भगवंतांनी असे का म्हटले? असे सांगितले जाते की, भूतकाळात पाचशे शिकारी काठ्या, जाळी इत्यादींनी जंगलाला वेढा घालून, अत्यंत आनंदी व संतुष्ट होऊन एकत्रपणे आयुष्यभर पशू-पक्ष्यांची हत्या करून आपली उपजीविका करत असत. मृत्यूनंतर ते नरकात उत्पन्न झाले. ते तिथे दुःख भोगून, पूर्वी केलेल्या कोणत्यातरी कुशल कर्मामुळे मनुष्यलोकात जन्माला आले. कल्याणकारी उपनिषय (प्रबळ आधार) असल्यामुळे ते सर्व भगवंतांच्या चरणी प्रव्रज्या आणि उपसंपदा प्राप्त करते झाले. त्यांच्या त्या मूळ अकुशल कर्माचा विपाक अजून शिल्लक असल्यामुळे, त्यांच्या 'अपरापर चेतनेने' त्या पंधरवड्याच्या काळात स्वतःच्या किंवा इतरांच्या प्रयत्नाने त्यांच्या प्राणांचा अंत करण्यासाठी संधी निर्माण केली. भगवंतांनी हे पाहिले. आणि कर्मविपाक हा कोणालाही टाळता येणे शक्य नाही. त्या भिक्खूंमध्ये पृथग्जन (सामान्य लोक) देखील होते, आणि सोतापन्न, सकदागामी, अनागामी व क्षीणास्रव (अर्हत) देखील होते. त्यापैकी क्षीणास्रव हे पुनर्जन्मरहित होते; इतर आर्यश्रावक हे निश्चित गती असलेले व सुगतीकडे जाणारे होते; परंतु पृथग्जनांची गती अनिश्चित होती. අථ භගවා චින්තෙසි – ‘‘ඉමෙ අත්තභාවෙ ඡන්දරාගෙන මරණභයභීතා න සක්ඛිස්සන්ති ගතිං විසොධෙතුං, හන්ද නෙසං ඡන්දරාගප්පහානාය අසුභකථං කථෙමි. තං සුත්වා අත්තභාවෙ විගතච්ඡන්දරාගතාය ගතිවිසොධනං කත්වා සග්ගෙ පටිසන්ධිං ගණ්හිස්සන්ති, එවං තෙසං මම සන්තිකෙ පබ්බජ්ජා සාත්ථිකා භවිස්සතී’’ති. තතො තෙසං අනුග්ගහාය අසුභකථං කථෙසි කම්මට්ඨානසීසෙන, නො මරණවණ්ණසංවණ්ණනාධිප්පායෙන. කථෙත්වා ච පනස්ස එතදහොසි – ‘‘සචෙ ඉමං අඩ්ඪමාසං මං භික්ඛූ පස්සිස්සන්ති, ‘අජ්ජ එකො භික්ඛු මතො, අජ්ජ ද්වෙ…පෙ… අජ්ජ දසා’ති ආගන්ත්වා ආරොචෙස්සන්ති, අයඤ්ච කම්මවිපාකො න සක්කා මයා වා අඤ්ඤෙන වා පටිබාහිතුං, ස්වාහං තං සුත්වාපි කිං කරිස්සාමි, කිං මෙ අනත්ථකෙන අනයබ්යසනෙන සුතෙන, හන්දාහං භික්ඛූනං අදස්සනං උපගච්ඡාමී’’ති. තස්මා එවමාහ – ‘‘ඉච්ඡාමහං, භික්ඛවෙ, අඩ්ඪමාසං පටිසල්ලීයිතුං, නාම්හි කෙනචි උපසඞ්කමිතබ්බො අඤ්ඤත්ර එකෙන පිණ්ඩපාතනීහාරකෙනා’’ති. तेव्हा भगवंतांनी विचार केला - "हे (पृथग्जन भिक्खू) शरीरावरील छंद-रागामुळे मृत्यूच्या भयाने भीत होऊन आपली गती शुद्ध करू शकणार नाहीत. चला, मी त्यांच्या छंद-रागाचा नाश करण्यासाठी त्यांना अशुभकथा सांगतो. ती ऐकून, शरीरावरील छंद-राग नष्ट झाल्यामुळे ते आपली गती शुद्ध करतील आणि स्वर्गात प्रतिसंधी (जन्म) घेतील. अशा प्रकारे त्यांची माझ्या जवळील प्रव्रज्या सार्थक होईल." त्यानंतर त्यांच्यावर अनुग्रह करण्यासाठी भगवंतांनी कर्मस्थानाच्या मुख्य उद्देशाने अशुभकथा सांगितली, मृत्यूच्या गुणांचे वर्णन करण्याच्या हेतूने नाही. आणि ती सांगितल्यानंतर भगवंतांच्या मनात असा विचार आला - "जर या पंधरवड्यात भिक्खू मला भेटतील, तर ते माझ्याकडे येऊन सांगतील की, 'आज एक भिक्खू मरण पावला, आज दोन... आज दहा भिक्खू मरण पावले.' आणि हा कर्मविपाक माझ्याद्वारे किंवा इतर कोणाद्वारेही टाळता येणे शक्य नाही. मग मी ते ऐकून तरी काय करणार? अशा निरर्थक आणि विनाशाच्या गोष्टी ऐकण्याने मला काय लाभ? चला, मी भिक्खूंना न दिसता (एकांतात) राहतो." म्हणूनच भगवंतांनी असे म्हटले - "भिक्खूंनो, माझी पंधरवड्यासाठी एकांतात राहण्याची इच्छा आहे, पिंडपात आणून देणाऱ्या एका भिक्खूशिवाय इतर कोणीही माझ्याकडे येऊ नये." අපරෙ පනාහු – ‘‘පරූපවාදවිවජ්ජනත්ථං එවං වත්වා පටිසල්ලීනො’’ති. පරෙ කිර භගවන්තං උපවදිස්සන්ති – ‘‘අයං ‘සබ්බඤ්ඤූ අහං සද්ධම්මවරචක්කවත්තී’ති පටිජානමානො අත්තනොපි සාවකෙ අඤ්ඤමඤ්ඤං ඝාතෙන්තෙ නිවාරෙතුං න සක්කොති, කිං අඤ්ඤං සක්ඛිස්සතී’’ති? තත්ර පණ්ඩිතා වක්ඛන්ති – ‘‘භගවා පටිසල්ලානමනුයුත්තො න ඉමං පවත්තිං ජානාති, කොචිස්ස ආරොචයිතාපි නත්ථි[Pg.299], සචෙ ජානෙය්ය අද්ධා නිවාරෙය්යා’’ති. ඉදං පන ඉච්ඡාමත්තං, පඨමමෙවෙත්ථ කාරණං. නාස්සුධාති එත්ථ අස්සුධාති පදපූරණමත්තෙ අවධාරණත්ථෙ වා නිපාතො, නෙව කොචි භගවන්තං උපසඞ්කමීති අත්ථො. परंतु इतर आचार्य म्हणतात - "इतरांच्या निंदेपासून वाचण्यासाठी भगवंतांनी असे सांगून एकांतवास पत्करला." कारण इतर लोक भगवंतांची अशी निंदा करतील की - "हे स्वतःला 'मी सर्वज्ञ आहे, मी सद्धर्माचा श्रेष्ठ चक्रवर्ती आहे' असे घोषित करतात, परंतु स्वतःच्याच श्रावकांना एकमेकांची हत्या करण्यापासून रोखू शकत नाहीत, तर मग इतरांना काय रोखणार?" त्यावर सुज्ञ लोक म्हणतील - "भगवान एकांतवासात मग्न असल्यामुळे त्यांना या घटनेची माहिती नाही. त्यांना हे सांगणारे देखील कोणी नाही. जर त्यांना हे समजले असते, तर त्यांनी नक्कीच त्यांना रोखले असते." परंतु हे केवळ (त्या आचार्यांचे) मत आहे; येथे पहिलेच कारण योग्य आहे. "नास्सुध" यातील "अस्सुध" हा शब्द केवळ पदपूर्तीसाठी किंवा निश्चय दर्शवण्यासाठी वापरलेला निपात आहे. "कोणीही भगवंतांकडे गेले नाही" असा याचा अर्थ आहे. අනෙකෙහි වණ්ණසණ්ඨානාදීහි කාරණෙහි වොකාරො අස්සාති අනෙකාකාරවොකාරො. අනෙකාකාරවොකිණ්ණො අනෙකාකාරෙන සම්මිස්සොති වුත්තං හොති. කො සො? අසුභභාවනානුයොගො, තං අනෙකාකාරවොකාරං. අසුභභාවනානුයොගමනුයුත්තා විහරන්තීති යුත්තප්පයුත්තා විහරන්ති. අට්ටීයමානාති තෙන කායෙන අට්ටා දුක්ඛිතා හොන්ති. හරායමානාති ලජ්ජමානා. ජිගුච්ඡමානාති ජිගුච්ඡං උප්පාදයමානා. සත්ථහාරකං පරියෙසන්තීති ජීවිතහරණකසත්ථං පරියෙසන්ති. න කෙවලඤ්ච තෙ සත්ථං පරියෙසිත්වා අත්තනා වා අත්තානං ජීවිතා වොරොපෙන්ති, මිගලණ්ඩිකම්පි පන සමණකුත්තකං උපසඞ්කමිත්වා, ‘‘සාධු නො, ආවුසො, ජීවිතා වොරොපෙහී’’ති වදන්ති. එත්ථ ච අරියා නෙව පාණාතිපාතං කරිංසු, න සමාදපෙසුං, න සමනුඤ්ඤා අහෙසුං. පුථුජ්ජනා පන සබ්බමකංසු. अनेक प्रकारच्या वर्ण (रंग), संस्थान (आकार) इत्यादी कारणांनी संमिश्रित असणे म्हणजे 'अनेकाकारवोकार' होय. अनेक प्रकारांनी संमिश्रित किंवा अनेक कारणांनी युक्त असा याचा अर्थ आहे. तो काय आहे? तो अशुभभावनानुयोग (अशुभाच्या भावनेचा अभ्यास) आहे, त्या अनेक प्रकारच्या संमिश्रित अशा अशुभभावनानुयोगाला. 'अशुभभावनानुयोगात युक्त होऊन विहार करतात' म्हणजे अत्यंत तत्परतेने युक्त होऊन विहार करतात. 'अट्टीयमान' म्हणजे त्या शरीरामुळे पीडित व दुःखी झालेले असतात. 'हरायमान' म्हणजे लज्जित होणारे. 'जिगुच्छमान' म्हणजे घृणा उत्पन्न करणारे. 'शस्त्रहारक शोधतात' म्हणजे जीव घेणारे शस्त्र शोधतात. आणि केवळ ते स्वतःच शस्त्र शोधून स्वतःला जीवितापासून मुक्त करत नव्हते, तर 'मिगलंडिक' नावाच्या श्रमणवेषधारी (श्रमणकुत्तक) व्यक्तीकडे जाऊन, 'हे आवुसो, बरे होईल तू आम्हाला जीवितापासून मुक्त करशील' असे म्हणत असत. आणि येथे जे आर्य होते, त्यांनी प्राणातिपात केला नाही, इतरांना प्रवृत्त केले नाही आणि संमतीही दिली नाही. परंतु पृथग्जनांनी मात्र हे सर्व केले. පටිසල්ලානා වුට්ඨිතොති තෙසං පඤ්චන්නං භික්ඛුසතානං ජීවිතක්ඛයප්පත්තභාවං ඤත්වා තතො එකීභාවතො වුට්ඨිතො ජානන්තොපි අජානන්තො විය කථාසමුට්ඨාපනත්ථං ආයස්මන්තං ආනන්දං ආමන්තෙසි. කිං නු ඛො, ආනන්ද, තනුභූතො විය භික්ඛුසඞ්ඝොති ඉතො, ආනන්ද, පුබ්බෙ බහූ භික්ඛූ එකතො උපට්ඨානං ආගච්ඡන්ති, උද්දෙසං පරිපුච්ඡං ගණ්හන්ති, සජ්ඣායන්ති, එකපජ්ජොතො විය ආරාමො දිස්සති. ඉදානි පන අඩ්ඪමාසමත්තස්ස අච්චයෙන තනුභූතො විය තනුකො මන්දො අප්පකො විරළො විය ජාතො භික්ඛුසඞ්ඝො. කිං නු ඛො කාරණං? කිං දිසාසු පක්කන්තා භික්ඛූති? ‘प्रतिसंलयनातून उठलेले’ म्हणजे त्या पाचशे भिक्षूंच्या जीवितक्षयाची (मृत्यूची) अवस्था जाणून, त्या एकांतवासातून उठून, सर्व काही जाणत असूनही न जाणल्यासारखे संभाषण सुरू करण्यासाठी त्यांनी आयुष्यमान आनंदांना विचारले. 'हे आनंदा, भिक्षुसंघ विरळ का वाटत आहे?' कारण, 'हे आनंदा, यापूर्वी अनेक भिक्षू एकत्र येऊन उपस्थानाला येत असत, उद्देश (पाठ) आणि परिपृच्छा (प्रश्न विचारणे) ग्रहण करत असत, सज्झाय (पठण) करत असत, त्यामुळे हा आराम एका दिव्याप्रमाणे प्रकाशमान दिसत असे. परंतु आता अर्ध्या महिन्यानंतर भिक्षुसंघ विरळ, कमी, मंद आणि तुरळक झाल्यासारखा वाटत आहे. याचे काय कारण असावे? भिक्षू वेगवेगळ्या दिशांना निघून गेले आहेत काय?' අථායස්මා ආනන්දො කම්මවිපාකෙන තෙසං ජීවිතක්ඛයප්පත්තිං අසල්ලක්ඛෙන්තො අසුභකම්මට්ඨානානුයොගපච්චයා පන සල්ලක්ඛෙන්තො තථා හි පන, භන්තෙ භගවාතිආදිං වත්වා භික්ඛූනං අරහත්තප්පත්තියා අඤ්ඤං කම්මට්ඨානං යාචන්තො, සාධු, භන්තෙ, භගවාතිආදිමාහ. තස්සත්ථො – සාධු, භන්තෙ, භගවා අඤ්ඤං කාරණං ආචික්ඛතු, යෙන භික්ඛුසඞ්ඝො අරහත්තෙ පතිට්ඨහෙය්ය[Pg.300]. මහාසමුද්දං ඔරොහණතිත්ථානි විය අඤ්ඤානිපි දසානුස්සති, දසකසිණ, චතුධාතුවවත්ථාන, බ්රහ්මවිහාර, ආනාපානස්සතිපභෙදානි බහූනි නිබ්බානොරොහණකම්මට්ඨානානි සන්ති, තෙසු භගවා භික්ඛූ සමස්සාසෙත්වා අඤ්ඤතරං කම්මට්ඨානං ආචික්ඛතූති අධිප්පායො. तेव्हा आयुष्यमान आनंदांनी, कर्मविपाकामुळे त्या भिक्षूंच्या जीवितक्षयाचे (मृत्यूचे) कारण न ओळखता, परंतु अशुभकर्मस्थानच्या अभ्यासाच्या कारणामुळे ते ओळखले. म्हणून त्यांनी 'कारण, भन्ते, भगवान...' इत्यादी म्हणून भिक्षूंच्या अर्हत्त्वप्राप्तीसाठी दुसऱ्या कर्मस्थानाची याचना करत 'साधु, भन्ते, भगवा...' इत्यादी म्हटले. त्याचा अर्थ असा आहे – 'भन्ते, भगवान! बरे होईल जर भगवंतांनी दुसरे एखादे कारण (कर्मस्थान) सांगावे, ज्याने भिक्षुसंघ अर्हत्त्वात प्रतिष्ठित होईल. महासागरात उतरण्याच्या घाटांप्रमाणे इतरही अनेक निर्वाणात उतरवणारी कर्मस्थाने आहेत, जसे की दहा अनुस्मृती, दहा कसिण, चार धातुव्यवस्थान, ब्रह्मविहार, आणि आनापानसतीचे विविध प्रकार. त्यांपैकी भगवंतांनी भिक्षूंना आश्वस्त करून कोणतेतरी एक कर्मस्थान सांगावे', असा अभिप्राय आहे. අථ භගවා තථා කාතුකාමො ථෙරං උය්යොජෙන්තො තෙනහානන්දාතිආදිමාහ. තත්ථ වෙසාලිං උපනිස්සායාති වෙසාලියං උපනිස්සාය සමන්තා ගාවුතෙපි අඩ්ඪයොජනෙපි යාවතිකා විහරන්ති, තෙ සබ්බෙ සන්නිපාතෙහීති අත්ථො. සබ්බෙ උපට්ඨානසාලායං සන්නිපාතෙත්වාති අත්තනා ගන්තුං යුත්තට්ඨානං සයං ගන්ත්වා අඤ්ඤත්ථ දහරභික්ඛූ පහිණිත්වා මුහුත්තෙනෙව අනවසෙසෙ භික්ඛූ උපට්ඨානසාලායං සමූහං කත්වා. යස්සදානි, භන්තෙ, භගවා කාලං මඤ්ඤතීති එත්ථ අයමධිප්පායො – භගවා භික්ඛුසඞ්ඝො සන්නිපතිතො, එස කාලො භික්ඛූනං ධම්මකථං කාතුං, අනුසාසනිං දාතුං, ඉදානි යස්ස තුම්හෙ කාලං ජානාථ, තං කාතබ්බන්ති. तेव्हा भगवंतांनी तसे करण्याची इच्छा धरून, स्थविरांना उद्युक्त करत 'तर मग आनंदा...' इत्यादी म्हटले. तेथे 'वैशालीच्या आश्रयाने' म्हणजे वैशालीच्या आश्रयाने सभोवताली एक गाऊत किंवा अर्ध्या योजनेच्या अंतरावर जेवढे भिक्षू विहार करत आहेत, त्या सर्वांना एकत्रित कर, असा अर्थ आहे. 'सर्वांना उपस्थानशाळेत एकत्रित करून' म्हणजे स्वतः जाणे योग्य असलेल्या ठिकाणी स्वतः जाऊन आणि इतर ठिकाणी तरुण भिक्षूंना पाठवून, एका क्षणातच सर्वच्या सर्व भिक्षूंना उपस्थानशाळेत एकत्र करून. 'भन्ते, आता भगवंतांना ज्याची योग्य वेळ वाटते...' यात हा अभिप्राय आहे – 'भगवंता! भिक्षुसंघ एकत्रित झाला आहे. ही भिक्षूंना धम्मकथा सांगण्याची, अनुशासन देण्याची वेळ आहे. आता ज्याची वेळ आपण योग्य मानता, ते करावे.' අථ ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි, අයම්පි ඛො, භික්ඛවෙති. ආමන්තෙත්වා ච පන භික්ඛූනං අරහත්තප්පත්තියා පුබ්බෙ ආචික්ඛිතඅසුභකම්මට්ඨානතො අඤ්ඤං පරියායං ආචික්ඛන්තො ආනාපානස්සතිසමාධීතිආදිමාහ. තත්ථ ආනාපානස්සතිසමාධීති ආනාපානපරිග්ගාහිකාය සතියා සද්ධිං සම්පයුත්තො සමාධි, ආනාපානස්සතියං වා සමාධි, ආනාපානස්සතිසමාධි. භාවිතොති උප්පාදිතො වඩ්ඪිතො වා. බහුලීකතොති පුනප්පුනං කතො. සන්තො චෙව පණීතො චාති සන්තො චෙව පණීතො චෙව. උභයත්ථ එවසද්දෙන නියමො වෙදිතබ්බො. කිං වුත්තං හොති? අයඤ්හි යථා අසුභකම්මට්ඨානං කෙවලං පටිවෙධවසෙන සන්තඤ්ච පණීතඤ්ච, ඔළාරිකාරම්මණත්තා පන පටිකූලාරම්මණත්තා ච ආරම්මණවසෙන නෙව සන්තං න පණීතං, න එවං කෙනචි පරියායෙන අසන්තො වා අප්පණීතො වා, අපිච ඛො ආරම්මණසන්තතායපි සන්තො වූපසන්තො නිබ්බුතො, පටිවෙධසඞ්ඛාතාය අඞ්ගසන්තතායපි, ආරම්මණපණීතතාය පණීතො අතිත්තිකරො, අඞ්ගපණීතතායපීති. තෙන වුත්තං ‘‘සන්තො චෙව පණීතො චා’’ති. तेव्हा भगवंतांनी भिक्षूंना संबोधित केले, 'हे भिक्षूंनो, हा देखील...' संबोधित करून भिक्षूंच्या अर्हत्त्वप्राप्तीसाठी पूर्वी सांगितलेल्या अशुभकर्मस्थानापेक्षा वेगळा पर्याय सांगताना 'आनापानसती समाधी' इत्यादी म्हटले. तेथे 'आनापानसती समाधी' म्हणजे श्वास आत घेणे आणि बाहेर सोडणे ग्रहण करणाऱ्या सतीसोबत (स्मृतीसोबत) संप्रयुक्त असलेली समाधी, किंवा आनापानसतीवर आधारित असलेली समाधी म्हणजे आनापानसती समाधी होय. 'भावित' म्हणजे उत्पन्न केलेली किंवा वाढवलेली. 'बहुलीकृत' म्हणजे वारंवार केलेली. 'शांत आणि प्रणीत' म्हणजे शांतच आणि प्रणीतच. दोन्ही ठिकाणी 'एव' शब्दाने नियम समजावा. काय म्हटले आहे? कारण, जसे अशुभकर्मस्थान केवळ प्रतिवेधाच्या (ज्ञानाच्या) दृष्टीने शांत आणि प्रणीत असते, परंतु स्थूल आलंबन असल्यामुळे आणि प्रतिकूल आलंबन असल्यामुळे आलंबनाच्या दृष्टीने ते शांतही नसते आणि प्रणीतही नसते; तसे ही आनापानसती समाधी कोणत्याही प्रकारे अशांत किंवा अप्रणीत नसते. उलट, आलंबनाच्या शांततेमुळे ती शांत, उपशांत आणि निवृत्त असते; प्रतिवेध नावाच्या अंगांच्या शांततेमुळेही ती शांत असते; आलंबनाच्या प्रणीततेमुळे ती प्रणीत आणि अतृप्तिकर असते, आणि अंगांच्या प्रणीततेमुळेही ती प्रणीत असते. म्हणूनच 'शांत आणि प्रणीत' असे म्हटले आहे. අසෙචනකො [Pg.301] ච සුඛො ච විහාරොති එත්ථ පන නාස්ස සෙචනන්ති අසෙචනකො, අනාසිත්තකො අබ්බොකිණ්ණො පාටියෙක්කො ආවෙණිකො, නත්ථි එත්ථ පරිකම්මෙන වා උපචාරෙන වා සන්තතා, ආදිසමන්නාහාරතො පභුති අත්තනො සභාවෙනෙව සන්තො ච පණීතො චාති අත්ථො. කෙචි ‘‘අසෙචනකො’’ති අනාසිත්තකො ඔජවන්තො, සභාවෙනෙව මධුරො’’ති වදන්ති. එවමයං අසෙචනකො ච අප්පිතප්පිතක්ඛණෙ කායිකචෙතසිකසුඛප්පටිලාභාය සංවත්තනතො සුඛො ච විහාරොති වෙදිතබ්බො. ‘असेचनक आणि सुखकारक विहार’ यात ‘असेचनक’ म्हणजे ज्याला वरून काही शिंपडावे लागत नाही, जे अनसिक्त (मिश्रण नसलेले), असंकीर्ण, स्वतंत्र आणि आवेणिक असते. येथे परिकर्माने किंवा उपचाराने शांतता येत नाही, तर सुरुवातीच्या मनस्कारापासूनच ते स्वतःच्या स्वभावानेच शांत आणि प्रणीत असते, असा अर्थ आहे. काही आचार्य ‘असेचनक’ म्हणजे अनसिक्त, ओजस्वी आणि स्वभावानेच मधुर असे म्हणतात. अशा प्रकारे, हे असेचनक आहे आणि प्रत्येक समापत्तीच्या क्षणी कायिक व चैतसिक सुखाच्या प्राप्तीसाठी कारणीभूत ठरत असल्यामुळे ते ‘सुखकारक विहार’ आहे, असे समजावे. උප්පන්නුප්පන්නෙති අවික්ඛම්භිතෙ. පාපකෙති ලාමකෙ. අකුසලෙ ධම්මෙති අකොසල්ලසම්භූතෙ ධම්මෙ. ඨානසො අන්තරධාපෙතීති ඛණෙනෙව අන්තරධාපෙති වික්ඛම්භෙති. වූපසමෙතීති සුට්ඨු උපසමෙති, නිබ්බෙධභාගියත්තා අනුපුබ්බෙන අරියමග්ගවුද්ධිප්පත්තො සමුච්ඡින්දති, පටිප්පස්සම්භෙතීති වුත්තං හොති. ගිම්හානං පච්ඡිමෙ මාසෙති ආසාළ්හමාසෙ. ඌහතං රජොජල්ලන්ති අට්ඨ මාසෙ වාතාතපසුක්ඛාය ගොමහිංසාදිපාදප්පහාරසම්භින්නාය පථවියා උද්ධං හතං ඌහතං ආකාසෙ සමුට්ඨිතං රජඤ්ච රෙණුඤ්ච. මහා අකාලමෙඝොති සබ්බං නභං අජ්ඣොත්ථරිත්වා උට්ඨිතො ආසාළ්හජුණ්හපක්ඛෙ සකලං අඩ්ඪමාසං වස්සනකමෙඝො. සො හි අසම්පත්තෙ වස්සකාලෙ උප්පන්නත්තා අකාලමෙඝොති ඉධ අධිප්පෙතො. ඨානසො අන්තරාධාපෙති වූපසමෙතීති ඛණෙනෙව අදස්සනං නෙති පථවියං සන්නිසීදාපෙති. එවමෙව ඛොති ඔපම්මනිදස්සනමෙතං. තතො පරං වුත්තනයමෙව. ‘उत्पन्न झालेल्या’ म्हणजे जे अजून दूर केले गेले नाहीत. ‘पापक’ म्हणजे हीन, वाईट. ‘अकुशल धर्म’ म्हणजे अकुशलतेमुळे उत्पन्न झालेले धर्म. ‘तत्काळ नाहीसे करते’ म्हणजे एका क्षणातच नाहीसे करते, दूर करते. ‘शांत करते’ म्हणजे चांगल्या प्रकारे शांत करते. निर्वेधभागीय असल्यामुळे अनुक्रमाने आर्यमार्गाच्या वृद्धीला प्राप्त होऊन ते समूळ नष्ट करते आणि प्रतिप्रश्रब्ध (शांत) करते, असा अर्थ आहे. ‘उन्हाळ्याच्या शेवटच्या महिन्यात’ म्हणजे आषाढ महिन्यात. ‘उडालेली धूळ आणि मळ’ म्हणजे आठ महिने वारा आणि उन्हामुळे सुकलेल्या, गायी-म्हशी इत्यादींच्या पायांच्या खुरांमुळे विदीर्ण झालेल्या जमिनीवरून वर उडालेली, आकाशात पसरलेली धूळ आणि बारीक कण. ‘मोठा अकाल मेघ’ म्हणजे संपूर्ण आकाश व्यापून उठलेला, आषाढ महिन्याच्या शुक्ल पक्षात संपूर्ण पंधरवडाभर बरसणारा पावसाचा ढग. कारण पावसाळा सुरू होण्यापूर्वीच तो आल्यामुळे त्याला येथे ‘अकाल मेघ’ असे म्हटले आहे. ‘तत्काळ नाहीसे करतो आणि शांत करतो’ म्हणजे एका क्षणातच अदृश्य करतो आणि जमिनीवर बसवतो. ‘त्याचप्रमाणे’ हे उपमेचे प्रदर्शन आहे. यापुढील भाग पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. 10. කිමිලසුත්තවණ්ණනා १०. किमिलसुत्त-वर्णना 986. දසමෙ කිමිලායන්ති එවංනාමකෙ නගරෙ. එතදවොචාති ථෙරො කිර චින්තෙසි – ‘‘අයං දෙසනා න යථානුසන්ධිකා කතා, යථානුසන්ධිං ගමෙස්සාමී’’ති දෙසනානුසන්ධිං ඝටෙන්තො එතං අවොච. කායඤ්ඤතරන්ති පථවීආදීසු කායෙසු අඤ්ඤතරං වදාමි වායොකායං වදාමීති අත්ථො. අථ වා චක්ඛායතනං…පෙ… කබළීකාරො ආහාරොති පඤ්චවීසති රූපකොට්ඨාසා රූපකායො නාම, තෙසු ආනාපානං ඵොට්ඨබ්බායතනෙ [Pg.302] සඞ්ගහිතත්තා කායඤ්ඤතරං හොති, තස්මාපි එවමාහ. තස්මාතිහාති යස්මා චතූසු කායෙසු අඤ්ඤතරං වායොකායං, පඤ්චවීසති කොට්ඨාසෙ වා රූපකායෙ අඤ්ඤතරං ආනාපානං අනුපස්සති, තස්මා කායෙ කායානුපස්සීති අත්ථො. එවං සබ්බත්ථ අත්ථො වෙදිතබ්බො. වෙදනාඤ්ඤතරන්ති තීසු වෙදනාසු අඤ්ඤතරං, සුඛවෙදනං සන්ධායෙතං වුත්තං. ९८६. दहाव्या (किमिल) सुत्तात, 'किमिलायम्' नावाच्या नगरात. 'हे म्हणाले' (एतदवोच) म्हणजे स्थविरांनी (आयुष्यमान आनंदांनी) असा विचार केला की—'हा उपदेश अनुसंधीनुसार (योग्य संदर्भाने) केलेला नाही, मी अनुसंधी जुळवून उपदेश करीन' असा विचार करून उपदेशाची अनुसंधी जोडत त्यांनी हे म्हटले. 'कायांपैकी एक' (कायञ्ञतरं) म्हणजे पृथ्वी इत्यादी कायांपैकी एक असे मी म्हणतो, किंवा 'वायूकाय' असे मी म्हणतो, असा अर्थ आहे. किंवा चक्षुआयतन...पे... कवळीकार आहार हे पंचवीस रूप-भाग मिळून 'रूपकाय' नावाचा होतो. त्यांपैकी आनापान (श्वासोच्छ्वास) हे स्प्रष्टव्यायतनात (स्पर्श-आयतन) समाविष्ट असल्यामुळे ते 'कायांपैकी एक' होते, म्हणूनही असे म्हटले आहे. 'म्हणून' (तस्मातिह) कारण की चार कायांपैकी एक असलेल्या वायूकायरूप आनापानाचे, किंवा पंचवीस भागांच्या रूपकायातील एक भाग असलेल्या आनापानाचे तो अनुदर्शन करतो, म्हणून 'कायात कायानुपस्सी' (कायानुपश्यी) असा अर्थ आहे. अशा प्रकारे सर्व ठिकाणी अर्थ समजून घ्यावा. 'वेदनांपैकी एक' (वेदनाञ्ञतरं) म्हणजे तीन वेदनांपैकी एक, सुखवेदनेला उद्देशून हे म्हटले आहे। සාධුකං මනසිකාරන්ති පීතිපටිසංවෙදිතාදිවසෙන උප්පන්නං සුන්දරං මනසිකාරං. කිං පන මනසිකාරො සුඛා වෙදනා හොතීති? න හොති, දෙසනාසීසං පනෙතං. යථෙව හි ‘‘අනිච්චසඤ්ඤාභාවනානුයොගමනුයුත්තා’’ති (ම. නි. 3.147) එත්ථ සඤ්ඤානාමෙන පඤ්ඤා වුත්තා, එවමිධාපි මනසිකාරනාමෙන ඣානවෙදනා වුත්තාති වෙදිතබ්බා. එතස්මිඤ්හි චතුක්කෙ පඨමපදෙ පීතිසීසෙන වෙදනා වුත්තා, දුතියපදෙ සුඛන්ති සරූපෙනෙව වුත්තා. චිත්තසඞ්ඛාරපදද්වයෙ ‘‘සඤ්ඤා ච වෙදනා ච චෙතසිකා එතෙ ධම්මා චිත්තප්පටිබද්ධා චිත්තසඞ්ඛාරා’’ති (පටි. ම. 1.174) වචනතො ‘‘විතක්කවිචාරෙ ඨපෙත්වා සබ්බෙපි චිත්තසම්පයුත්තකා ධම්මා චිත්තසඞ්ඛාරෙ සඞ්ගහිතා’’ති වචනතො චිත්තසඞ්ඛාරනාමෙන වෙදනා වුත්තා. තං සබ්බං මනසිකාරනාමෙන සඞ්ගහෙත්වා ඉධ ‘‘සාධුකං මනසිකාර’’න්ති ආහ. 'चांगल्या प्रकारे मनसिकार' (साधुकं मनसिकारं) म्हणजे प्रीतीचा अनुभव घेणे इत्यादींच्या द्वारे उत्पन्न झालेला उत्तम मनसिकार. पण मनसिकार म्हणजे सुखवेदना आहे काय? नाही, पण हे उपदेशाचे मुख्य अंग (देसनासीस) आहे. कारण ज्याप्रमाणे 'अनित्यसंज्ञा भावनेच्या अभ्यासात युक्त' येथे 'संज्ञा' या नावाने 'प्रज्ञा' म्हटली आहे, त्याचप्रमाणे येथेही 'मनसिकार' या नावाने 'ध्यान-वेदना' म्हटली आहे, असे समजावे. कारण या चतुष्कात पहिल्या पदात 'प्रीती'च्या मुख्यतेने वेदना सांगितली आहे, दुसऱ्या पदात 'सुख' या स्वरूपातच वेदना सांगितली आहे. चित्तसंस्काराच्या दोन पदांमध्ये 'संज्ञा आणि वेदना हे चैतसिक धर्म चित्ताशी बद्ध असल्यामुळे चित्तसंस्कार आहेत' या वचनावरून, आणि 'वितर्क-विचारांना सोडून सर्वच चित्तसंप्रयुक्त धर्म चित्तसंस्कारात समाविष्ट होतात' या वचनावरून 'चित्तसंस्कार' या नावाने वेदना सांगितली आहे. त्या सर्वांना 'मनसिकार' या नावाने एकत्रित करून येथे 'चांगल्या प्रकारे मनसिकार' असे म्हटले आहे। එවං සන්තෙපි යස්මා එසා වෙදනා ආරම්මණං න හොති, තස්මා වෙදනානුපස්සනා න යුජ්ජතීති. නො න යුජ්ජති, මහාසතිපට්ඨානාදීසුපි හි තං තං සුඛාදීනං වත්ථුං ආරම්මණං කත්වා වෙදනා වෙදයති, තං පන වෙදනාපවත්තිං උපාදාය ‘‘අහං වෙදයාමී’’ති වොහාරමත්තං හොති, තං සන්ධාය ‘‘සුඛං වෙදනං වෙදයමානො සුඛං වෙදනං වෙදයාමී’’තිආදි වුත්තං. අපිච ‘‘පීතිප්පටිසංවෙදී’’තිආදීනං අත්ථවණ්ණනායමෙතස්ස පරිහාරො වුත්තොයෙව. වුත්තඤ්හෙතං විසුද්ධිමග්ගෙ – असे असूनही, ज्याअर्थी ही वेदना आलंबन होत नाही, त्याअर्थी वेदनानुपश्यना योग्य ठरत नाही (असे जर म्हटले तर)? असे नाही की ती योग्य ठरत नाही. कारण महासतिपट्ठान इत्यादींमध्येही त्या त्या सुखादींच्या वस्तूला आलंबन करून वेदनेचा अनुभव घेतला जातो. परंतु, त्या वेदनेच्या प्रवृत्तीला अनुसरून 'मी अनुभवत आहे' असा केवळ व्यवहार होतो. त्याला उद्देशूनच 'सुखद वेदनेचा अनुभव घेत असताना मी सुखद वेदनेचा अनुभव घेत आहे असे जाणतो' इत्यादी म्हटले आहे. शिवाय, 'प्रीतीचा अनुभव घेणारा' (पीतिपटिसंवेदी) इत्यादींच्या अर्थस्पष्टीकरणातच याचे उत्तर दिलेले आहे. विसुद्धिमग्गात हे म्हटलेच आहे— ‘‘ද්වීහාකාරෙහි පීති පටිසංවිදිතා හොති – ආරම්මණතො ච අසම්මොහතො ච. කථං ආරම්මණතො පීති පටිසංවිදිතා හොති? සප්පීතිකෙ ද්වෙ ඣානෙ සමාපජ්ජති, තස්ස සමාපත්තික්ඛණෙ ඣානපටිලාභෙන ආරම්මණතො පීති පටිසංවිදිතා හොති ආරම්මණස්ස පටිසංවිදිතත්තා. කථං අසම්මොහතො පීති පටිසංවිදිතා හොති? සප්පීතිකෙ ද්වෙ ඣානෙ සමාපජ්ජිත්වා වුට්ඨාය ඣානසම්පයුත්තපීතිං ඛයතො වයතො සම්මසති, තස්ස විපස්සනාක්ඛණෙ ලක්ඛණප්පටිවෙධෙන අසම්මොහතො [Pg.303] පීති පටිසංවිදිතා හොති. වුත්තඤ්හෙතං පටිසම්භිදායං (පටි. ම. 1.172) ‘‘‘දීඝං අස්සාසවසෙන චිත්තස්ස එකග්ගතං අවික්ඛෙපං පජානතො සති උපට්ඨිතා හොති, තාය සතියා තෙන ඤාණෙන සා පීති පටිසංවිදිතා හොතී’ති. එතෙනෙව නයෙන අවසෙසපදානිපි අත්ථතො වෙදිතබ්බානී’’ති. “दोन प्रकारांनी प्रीतीचा अनुभव घेतला जातो—आलंबनतः (आलंबनाच्या द्वारे) आणि असंमोहतः (असंमोहाच्या द्वारे). आलंबनतः प्रीतीचा अनुभव कसा घेतला जातो? प्रीतीसह वर्तमान असलेल्या दोन ध्यानांमध्ये (प्रथम व द्वितीय ध्यान) तो समापन्न होतो. त्या समापत्तीच्या क्षणी ध्यानप्राप्तीमुळे आलंबनतः प्रीतीचा अनुभव घेतला जातो, कारण आलंबनाचा अनुभव घेतलेला असतो. असंमोहतः प्रीतीचा अनुभव कसा घेतला जातो? प्रीतीसह वर्तमान असलेल्या दोन ध्यानांमध्ये समापन्न होऊन, त्यातून उठून, ध्यानसंप्रयुक्त प्रीतीचे क्षय व व्यय (नाश) या रूपाने तो परीक्षण करतो. त्याच्या विपश्यनेच्या क्षणी लक्षणांच्या आकलनाने (लक्खणप्पटिवेधेन) असंमोहतः प्रीतीचा अनुभव घेतला जातो. पटिसम्भिदामग्गात हे म्हटलेच आहे—'दीर्घ श्वासाच्या द्वारे चित्ताची एकाग्रता व अविक्षेप जाणणाऱ्याची स्मृती उपस्थित होते, त्या स्मृतीच्या द्वारे आणि त्या ज्ञानाच्या द्वारे ती प्रीती अनुभवली जाते.' याच पद्धतीने उर्वरित पदांचेही अर्थ समजून घ्यावेत.” ඉති යථෙව ඣානපටිලාභෙන ආරම්මණතො පීතිසුඛචිත්තසඞ්ඛාරා පටිසංවිදිතා හොන්ති, එවං ඉමිනාපි ඣානසම්පයුත්තෙන වෙදනාසඞ්ඛාතමනසිකාරපටිලාභෙන ආරම්මණතො වෙදනා පටිසංවිදිතා හොති. තස්මා සුවුත්තමෙතං ‘‘වෙදනාසු වෙදනානුපස්සී භික්ඛු තස්මිං සමයෙ විහරතී’’ති. अशा प्रकारे, ज्याप्रमाणे ध्यानप्राप्तीमुळे आलंबनतः प्रीती, सुख आणि चित्तसंस्कार अनुभवले जातात, त्याचप्रमाणे या ध्यानसंप्रयुक्त वेदना नावाच्या मनसिकारप्राप्तीमुळे आलंबनतः वेदनेचा अनुभव घेतला जातो. म्हणून 'त्या वेळी भिक्खू वेदनांमध्ये वेदनानुपश्यी होऊन विहरतो' हे योग्यच म्हटले आहे। නාහං, ආනන්ද, මුට්ඨස්සතිස්ස අසම්පජානස්සාති එත්ථ අයමධිප්පායො – යස්මා ‘‘චිත්තපටිසංවෙදී අස්සාසිස්සාමී’’තිආදිනා නයෙන පවත්තො භික්ඛු කිඤ්චාපි අස්සාසපස්සාසනිමිත්තමාරම්මණං කරොති, තස්ස පන චිත්තස්ස ආරම්මණෙ සතිඤ්ච සම්පජඤ්ඤඤ්ච උපට්ඨාපෙත්වා පවත්තනතො චිත්තෙ චිත්තානුපස්සීයෙව නාමෙස හොති. න හි මුට්ඨස්සතිස්ස අසම්පජානස්ස ආනාපානස්සතිසමාධිභාවනා අත්ථි, තස්මා ආරම්මණතො චිත්තපටිසංවිදිතවසෙන ‘‘චිත්තෙ චිත්තානුපස්සී භික්ඛු තස්මිං සමයෙ විහරතී’’ති. 'आनंदा, मी स्मृतिभ्रष्ट आणि असं प्रज्ञावान (असंप्रजन्य) असलेल्याला...' येथे हा अभिप्राय आहे—ज्याअर्थी 'चित्ताचा अनुभव घेत मी श्वास घेईन' इत्यादी पद्धतीने प्रवृत्त झालेला भिक्खू जरी श्वासोच्छ्वासाच्या निमित्ताला आलंबन करतो, तरी त्या चित्ताच्या आलंबनावर स्मृती आणि संप्रजन्य प्रस्थापित करून प्रवृत्त होत असल्यामुळे, तो चित्तात चित्तानुपश्यीच ठरतो. कारण स्मृतिभ्रष्ट आणि संप्रजन्य नसलेल्या व्यक्तीला आनापानस्मृती समाधीची भावना शक्य नाही. म्हणून आलंबनतः चित्ताचा अनुभव घेण्याच्या दृष्टीने 'त्या वेळी भिक्खू चित्तात चित्तानुपश्यी होऊन विहरतो' असे म्हटले आहे। සො යං තං හොති අභිජ්ඣාදොමනස්සානං පහානං, තං පඤ්ඤාය දිස්වා සාධුකං අජ්ඣුපෙක්ඛිතා හොතීති එත්ථ අභිජ්ඣා කාමච්ඡන්දනීවරණමෙව, දොමනස්සවසෙන බ්යාපාදනීවරණං දස්සිතං. ඉදඤ්හි චතුක්කං විපස්සනාවසෙනෙව වුත්තං, ධම්මානුපස්සනා ච නීවරණපබ්බාදිවසෙන පඤ්චවිධා හොති, තස්සා නීවරණපබ්බං ආදි, තස්සාපි ඉදං නීවරණද්වයං ආදි. ඉති ධම්මානුපස්සනාය ආදිං දස්සෙතුං අභිජ්ඣාදොමනස්සානන්ති ආහ. පහානන්ති අනිච්චානුපස්සනාය නිච්චසඤ්ඤං පජහතීති එවං පහානකරඤාණං අධිප්පෙතං. තං පඤ්ඤාය දිස්වාති තං අනිච්චවිරාගනිරොධපටිනිස්සග්ගඤාණසඞ්ඛාතං පහානඤාණං අපරාය විපස්සනාපඤ්ඤාය, තම්පි අපරායාති එවං විපස්සනාපරම්පරං දස්සෙති[Pg.304]. අජ්ඣුපෙක්ඛිතා හොතීති යඤ්චස්ස පථපටිපන්නං අජ්ඣුපෙක්ඛති, යඤ්ච එකතො උපට්ඨානං අජ්ඣුපෙක්ඛතීති ද්විධා අජ්ඣුපෙක්ඛති නාම. තත්ථ සහජාතානම්පිඅජ්ඣුපෙක්ඛනා හොති ආරම්මණස්සාපි අජ්ඣුපෙක්ඛනා. ඉධ ආරම්මණ අජ්ඣුපෙක්ඛනා අධිප්පෙතා. තස්මාතිහානන්දාති යස්මා ‘‘අනිච්චානුපස්සී අස්සාසිස්සාමී’’තිආදිනා නයෙන පවත්තො න කෙවලං නීවරණාදිධම්මෙ, අභිජ්ඣාදොමනස්සසීසෙන පන වුත්තානං ධම්මානං පහානකරඤාණම්පි පඤ්ඤාය දිස්වා අජ්ඣුපෙක්ඛිතා හොති, තස්මා ධම්මෙසු ධම්මානුපස්සී භික්ඛු තස්මිං සමයෙ විහරතීති වෙදිතබ්බො. 'अभिज्झा (लोभ) आणि दोमनस्स (दौर्मनस्य) यांचे जे प्रहाण (त्याग) आहे, त्याला प्रज्ञेने पाहून चांगल्या प्रकारे उपेक्षक (तटस्थ) होतो' येथे 'अभिज्झा' म्हणजे कामच्छंद नीवरणच होय, आणि 'दोमनस्स'च्या द्वारे व्यापाद नीवरण दर्शविले आहे. कारण हे चतुष्क केवळ विपश्यनेच्या दृष्टीनेच सांगितले आहे. आणि धर्मानुपश्यना ही नीवरणपर्व इत्यादींच्या द्वारे पाच प्रकारची असते. तिचे नीवरणपर्व हे आदि (सुरुवात) आहे, आणि त्याचेही हे नीवरणद्वय (कामच्छंद व व्यापाद) आदि आहे. अशा प्रकारे धर्मानुपश्यनेची सुरुवात दर्शवण्यासाठी 'अभिज्झा-दोमनस्स' असे म्हटले आहे. 'प्रहाण' (पहानं) म्हणजे अनित्यानुपश्यनेच्या द्वारे नित्यसंज्ञेचा त्याग करतो, अशा प्रकारे प्रहाण घडवून आणणारे ज्ञान अभिप्रेत आहे. 'त्याला प्रज्ञेने पाहून' (तं पञ्ञाय दिस्वा) म्हणजे त्या अनित्य-विराग-निरोध-प्रतिनिसर्ग-ज्ञान नावाच्या प्रहाणज्ञानाला दुसऱ्या विपश्यना प्रज्ञेने पाहून, आणि त्यालाही दुसऱ्या प्रज्ञेने पाहून, अशा प्रकारे विपश्यनेची परंपरा दर्शविली आहे. 'उपेक्षक होतो' (अज्झुपेक्खिता होति) म्हणजे जो मार्गावर आरूढ झालेल्या चित्ताची उपेक्षा करतो, आणि जो एकाग्रतेने उपस्थित झालेल्याची उपेक्षा करतो, अशा दोन प्रकारे उपेक्षा करणे होय. त्यात सहजात धर्मांचीही उपेक्षा होते आणि आलंबनाचीही उपेक्षा होते. येथे आलंबनाची उपेक्षा अभिप्रेत आहे. 'म्हणूनच, आनंदा!' (तस्मातिहानन्द) कारण 'अनित्यानुपश्यी होऊन मी श्वास घेईन' इत्यादी पद्धतीने प्रवृत्त झालेला भिक्खू केवळ नीवरणादी धर्मांचीच नव्हे, तर अभिज्झा व दोमनस्स यांच्या मुख्यतेने सांगितलेल्या धर्मांच्या प्रहाणकारक ज्ञानालाही प्रज्ञेने पाहून उपेक्षक होतो, म्हणून 'त्या वेळी भिक्खू धर्मांमध्ये धर्मानुपश्यी होऊन विहरतो' असे समजावे। එවමෙව ඛොති එත්ථ චතුමහාපථො විය ඡ ආයතනානි දට්ඨබ්බානි. තස්මිං පංසුපුඤ්ජො විය ඡසු ආයතනෙසු කිලෙසා. චතූහි දිසාහි ආගච්ඡන්තා සකටරථා විය චතූසු ආරම්මණෙසු පවත්තා චත්තාරො සතිපට්ඨානා. එකෙන සකටෙන වා රථෙන වා පංසුපුඤ්ජස්ස උපහනනං විය කායානුපස්සනාදීහි පාපකානං අකුසලානං ධම්මානං උපඝාතො වෙදිතබ්බොති. त्याचप्रमाणे, येथे चार रस्त्यांच्या चौकाप्रमाणे सहा आयतनांना समजले पाहिजे. त्या चौकातील धुळीच्या ढिगाऱ्याप्रमाणे सहा आयतनांमधील क्लेश आहेत. चार दिशांनी येणाऱ्या बैलगाड्या किंवा रथांप्रमाणे चार आरंमणांमध्ये (आलंबनांमध्ये - काया, वेदना, चित्त, धम्म) प्रवृत्त होणारे चार सतिपट्ठान आहेत. एखाद्या बैलगाडीने किंवा रथाने धुळीचा ढिगारा चिरडण्याप्रमाणे, कायानुपस्सना इत्यादींद्वारे पापी अकुशल धम्मांचा विनाश होतो, असे जाणावे. එකධම්මවග්ගො පඨමො. पहिला एकधम्मवग्गो (एकधम्म वर्ग) समाप्त झाला. 2. දුතියවග්ගො २. दुसरा वग्गो (दुसरा वर्ग). 1-2. ඉච්ඡානඞ්ගලසුත්තාදිවණ්ණනා १-२. इच्छानंगलसुत्त इत्यादींचे वर्णन. 987-988. දුතියවග්ගස්ස පඨමෙ එවං බ්යාකරෙය්යාථාති කස්මා අත්තනො විහාරසමාපත්තිං ආචික්ඛති? උපාරම්භමොචනත්ථං. සචෙ හි තෙ ‘‘න ජානාමා’’ති වදෙය්යුං, අථ නෙසං තිත්ථියා ‘‘තුම්හෙ ‘අසුකසමාපත්තියා නාම නො සත්ථා තෙමාසං විහාසී’තිපි න ජානාථ, අථ කස්මා නං උපට්ඨහන්තා විහරථා’’ති උපාරම්භං ආරොපෙය්යුං, තතො මොචනත්ථං එවමාහ. ९८७-९८८. दुसऱ्या वर्गाच्या पहिल्या सुत्तात 'असे उत्तर द्यावे' (evaṃ byākareyyātha) असे म्हणून भगवंतांनी स्वतःच्या विहारसमापत्तीविषयी का सांगितले? तीर्थकांच्या आक्षेपांपासून मुक्त होण्यासाठी त्यांनी हे सांगितले. कारण जर त्या भिक्खूंनी 'आम्हाला माहीत नाही' असे म्हटले असते, तर तीर्थक त्यांच्यावर असा आक्षेप घेते की, 'तुमचे शास्ता अमुक समापत्तीमध्ये तीन महिने राहिले, हेही तुम्हाला माहीत नाही; मग तुम्ही त्यांची सेवा करत का राहता?' या आक्षेपापासून भिक्खूंना मुक्त करण्यासाठी भगवंतांनी असे म्हटले. අථ කස්මා යථා අඤ්ඤත්ථ ‘‘සතොව අස්සසති, දීඝං වා අස්සසන්තො’’ති (දී. නි. 2.374; ම. නි. 1.107; සං. නි. 5.977) එව-වාකාරො වුත්තො. එවං ඉධ න වුත්තොති? එකන්තසන්තත්තා. අඤ්ඤෙසඤ්හි [Pg.305] අස්සාසො වා පාකටො හොති පස්සාසො වා, භගවතො උභයම්පෙතං පාකටමෙව නිච්චං උපට්ඨිතස්සතිතායාති එකන්තසන්තත්තා න වුත්තො. අථ ‘‘සික්ඛාමී’’ති අවත්වා කස්මා ‘‘අස්සසාමී’’ති එත්තකමෙව වුත්තන්ති? සික්ඛිතබ්බාභාවා. සත්ත හි සෙඛා සික්ඛිතබ්බභාවා සෙඛා නාම, ඛීණාසවා සික්ඛිතබ්බාභාවා අසෙඛා නාම, තථාගතා අසික්ඛිතබ්බා අසෙක්ඛා නාම නත්ථි තෙසං සික්ඛිතබ්බකිච්චන්ති සික්ඛිතබ්බාභාවා න වුත්තං. දුතියං උත්තානමෙව. तर मग, इतर सुत्तांमध्ये जसे 'सतो व अस्ससति, दीघं वा अस्ससंतो' (तो सजग राहूनच श्वास घेतो, किंवा दीर्घ श्वास घेताना...) असे 'एव' किंवा 'वा' हे शब्द वापरले आहेत, तसे येथे का वापरले नाहीत? अत्यंत शांत मनसिकार असल्यामुळे ते वापरले नाहीत. कारण इतरांना एकतर श्वास घेणे किंवा श्वास सोडणे स्पष्ट जाणवते, परंतु भगवंतांची सती (स्मृती) नेहमी प्रस्थापित असल्यामुळे त्यांना हे दोन्हीही नेहमी स्पष्टपणे जाणवत असतात; म्हणून अत्यंत शांत मनसिकार असल्यामुळे ते शब्द वापरले नाहीत. तसेच, 'सिक्खामि' (मी शिकतो) असे न म्हणता केवळ 'अस्ससामि' (मी श्वास घेईन) एवढेच का म्हटले आहे? कारण आता काहीही शिकणे किंवा अभ्यास करणे शिल्लक राहिलेले नाही. सात प्रकारचे सेख (ज्यांना अजून शिकायचे आहे) हे शिकण्याच्या अवस्थेत असल्यामुळे त्यांना 'सेख' म्हणतात. खीणासव (ज्यांचे आसव नष्ट झाले आहेत) हे शिकण्याच्या अवस्थेच्या पलीकडे गेल्यामुळे त्यांना 'असेख' म्हणतात. तथागतांचे सर्व शिक्षण पूर्ण झालेले असल्यामुळे त्यांच्यासाठी कोणतेही कर्तव्य किंवा अभ्यास शिल्लक राहिलेला नाही; म्हणून 'सिक्खामि' असे म्हटले नाही. दुसरे सुत्त अगदी स्पष्ट आहे. 3-10. පඨමආනන්දසුත්තාදිවණ්ණනා ३-१०. प्रथम आनंदसुत्त इत्यादींचे वर्णन. 989-996. තතියෙ පවිචිනතීති අනිච්චාදිවසෙන පවිචිනති. ඉතරං පදද්වයං එතස්සෙව වෙවචනං. නිරාමිසාති නික්කිලෙසා කායිකචෙතසිකදරථපටිපස්සද්ධියා කායොපි චිත්තම්පි පස්සම්භති. සමාධියතීති සම්මා ඨපියති, අප්පනාචිත්තං විය හොති. අජ්ඣුපෙක්ඛිතා හොතීති සහජාතඅජ්ඣුපෙක්ඛනාය අජ්ඣුපෙක්ඛිතා හොති. ९८९-९९६. तिसऱ्या सुत्तात, 'पविचिनति' म्हणजे अनित्य इत्यादी रूपाने विश्लेषण करणे. इतर दोन पदे याच पदाचे समानार्थी आहेत. 'निरामिसा' म्हणजे क्लेशरहित. शारीरिक आणि मानसिक त्रासाच्या शांततेमुळे शरीर आणि चित्त दोन्ही शांत होतात. 'समाधियति' म्हणजे चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित होणे, हे अप्पनाचित्तासारखे होते. 'अज्झुपेक्खिता होति' म्हणजे सहजात तटस्थतेने उपेक्षा करणे (तटस्थ राहणे). එවං චුද්දසවිධෙන කායපරිග්ගාහකස්ස භික්ඛුනො තස්මිං කායෙ සති සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගො, තාය සතියා සම්පයුත්තඤාණං ධම්මවිචයසම්බොජ්ඣඞ්ගො, තංසම්පයුත්තමෙව කායිකචෙතසිකවීරියං වීරියසම්බොජ්ඣඞ්ගො, පීතිපස්සද්ධිචිත්තෙකග්ගතා පීතිපස්සද්ධිසමාධිසම්බොජ්ඣඞ්ගා, ඉමෙසං ඡන්නං බොජ්ඣඞ්ගානං අනොසක්කනඅනතිවත්තනසඞ්ඛාතො මජ්ඣත්තාකාරො උපෙක්ඛාසම්බොජ්ඣඞ්ගො. යථෙව හි සමප්පවත්තෙසු අස්සෙසු සාරථිනො ‘‘අයං ඔලීයතී’’ති තුදනං වා, ‘‘අයං අතිධාවතී’’ති ආකඩ්ඪනං වා නත්ථි, කෙවලං එවං පස්සමානස්ස ඨිතාකාරොව හොති, එවමෙව ඉමෙසං ඡන්නං බොජ්ඣඞ්ගානං අනොසක්කනඅනතිවත්තනසඞ්ඛාතො මජ්ඣත්තාකාරො උපෙක්ඛාසම්බොජ්ඣඞ්ගො නාම හොති. එත්තාවතා කිං කථිතං? එකචිත්තක්ඛණිකා නානාසරසලක්ඛණා විපස්සනාබොජ්ඣඞ්ගා නාම කථිතා. अशा प्रकारे, चौदा प्रकारांनी कायेचे ग्रहण करणाऱ्या भिक्खूची त्या कायेवर जी सती (स्मृती) असते, तो सतिसम्बोज्झंगो (सति-संबोध्यंग) होय. त्या सतीशी संप्रयुक्त असणारे ज्ञान म्हणजे धम्मविचयसम्बोज्झंगो होय. त्याच्याशी संप्रयुक्त असणारे कायिक व मानसिक वीर्य म्हणजे वीरियसम्बोज्झंगो होय. पीती, पस्सद्धि आणि चित्त-एकाग्रता हे अनुक्रमे पीति-, पस्सद्धि- आणि समाधिसम्बोज्झंगो आहेत. या सहा बोध्यंगांचे मागे न हटणे आणि पुढे न जाणे या स्वरूपाची जी तटस्थता आहे, ती opu-उपेक्खासम्बोज्झंगो (उपेक्षा-संबोध्यंग) होय. जसे, समान गतीने धावणाऱ्या घोड्यांच्या बाबतीत सारथ्याला 'हा घोडा मागे पडत आहे' म्हणून चाबूक मारण्याची किंवा 'हा घोडा वेगाने धावत आहे' म्हणून लगाम खेचण्याची गरज नसते, तो केवळ तटस्थपणे पाहत राहतो; त्याचप्रमाणे या सहा बोध्यंगांचे मागे न हटणे आणि पुढे न जाणे या स्वरूपाची जी तटस्थता आहे, ती उपेक्खासम्बोज्झंगो होय. यावरून काय सांगितले गेले आहे? एकाच चित्तक्षणात उत्पन्न होणारे आणि विविध कार्य-लक्षणे असणारे विपस्सना-बोध्यंग सांगितले गेले आहेत. විවෙකනිස්සිතන්තිආදීනි වුත්තත්ථානෙව. එත්ථ පන සොළසක්ඛත්තුකා ආනාපානස්සති මිස්සකා කථිතා, ආනාපානමූලකා සතිපට්ඨානා පුබ්බභාගා[Pg.306], තෙසං මූලභූතා ආනාපානස්සති පුබ්බභාගා. බොජ්ඣඞ්ගමූලකා සතිපට්ඨානා පුබ්බභාගා, තෙපි බොජ්ඣඞ්ගා පුබ්බභාගාව. විජ්ජාවිමුත්තිපූරකා පන බොජ්ඣඞ්ගා නිබ්බත්තිතලොකුත්තරා, විජ්ජාවිමුත්තියො අරියඵලසම්පයුත්තා. විජ්ජා වා චතුත්ථමග්ගසම්පයුත්තා, විමුත්ති ඵලසම්පයුත්තාති. චතුත්ථපඤ්චමඡට්ඨානිපි ඉමිනාව සමානපරිච්ඡෙදානි. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. 'विवेकिनिस्सितं' इत्यादी पदांचे अर्थ पूर्वीच स्पष्ट केले आहेत. परंतु येथे सोळा प्रकारांनी युक्त असणारी आनापानसती संमिश्र स्वरूपात सांगितली आहे. आनापान-मूलक सतिपट्ठान हे पूर्वभागातील (सुरुवातीच्या अवस्थेतील) आहेत, आणि त्यांचे मूळ असणारी आनापानसती देखील पूर्वभागातील आहे. बोध्यंग-मूलक सतिपट्ठान हे पूर्वभागातील आहेत, आणि ते बोध्यंग देखील पूर्वभागातीलच आहेत. परंतु विज्जा-विमुत्ती पूर्ण करणारे बोध्यंग हे लोकोत्तर आहेत, आणि विज्जा-विमुत्ती या अरियफलाशी संप्रयुक्त आहेत. किंवा विज्जा ही चौथ्या मग्गशी संप्रयुक्त आहे आणि विमुत्ती ही फलप्राप्तीशी संप्रयुक्त आहे. चौथे, पाचवे आणि सहावे सुत्त देखील याच तिसऱ्या सुत्ताप्रमाणे समान मर्यादा असणारे आहेत. उर्वरित सर्व भाग सर्वत्र स्पष्टच आहे. ආනාපානසංයුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. आनापानसंयुत्त वर्णन समाप्त झाले. 11. සොතාපත්තිසංයුත්තං ११. सोतापत्तिसंयुत्तं (सोतापत्ति संयुत्त). 1. වෙළුද්වාරවග්ගො १. वेळुद्वारवग्गो (वेळुद्वार वर्ग). 1. චක්කවත්තිරාජසුත්තවණ්ණනා १. चक्कवत्तिराजसुत्त वर्णन. 997. සොතාපත්තිසංයුත්තස්ස [Pg.307] පඨමෙ කිඤ්චාපීති අනුග්ගහගරහණෙසු නිපාතො. චතුන්නඤ්හි මහාදීපානං ඉස්සරියාධිපච්චං රජ්ජං අනුග්ගණ්හන්තො චතුන්නඤ්ච අපායානං අප්පහීනභාවං ගරහන්තො සත්ථා ‘‘කිඤ්චාපි, භික්ඛවෙ, රාජා චක්කවත්තී’’තිආදිමාහ. තත්ථ චතුන්නං දීපානන්ති ද්විසහස්සදීපපරිවාරානං චතුන්නං මහාදීපානං. ඉස්සරියාධිපච්චන්ති ඉස්සරභාවො ඉස්සරියං, අධිපතිභාවො ආධිපච්චං, ඉස්සරියං ආධිපච්චං එතස්මිං රජ්ජෙ, න ඡෙදනභෙදනන්ති ඉස්සරියාධිපච්චං. කාරෙත්වාති එවරූපං රජ්ජං පවත්තාපෙත්වා. කිඤ්චාපි, භික්ඛවෙ, අරියසාවකොති එත්ථ අනුග්ගහපසංසාසු නිපාතො. පිණ්ඩියාලොපෙන හි යාපනං අනුග්ගහන්තො චතුන්නඤ්ච අපායානං පහීනභාවං පසංසන්තො සත්ථා ‘‘කිඤ්චාපි, භික්ඛවෙ, අරියසාවකො’’තිආදිමාහ. තත්ථ නන්තකානීති අනන්තකානි. තෙරසහත්ථොපි හි වත්ථසාටකො දසච්ඡෙදනතො පට්ඨාය නන්තකන්තෙව සඞ්ඛං ගච්ඡති. ९९७. सोतापत्तिसंयुत्ताच्या पहिल्या सुत्तात 'किञ्चापि' (जरी काही असले तरी) हा शब्द प्रशंसा आणि निंदा या दोन्ही अर्थांनी वापरलेला निपात (अव्यय) आहे. चार महाद्वीपांचे आधिपत्य असणाऱ्या चक्रवर्ती राजाच्या राज्याची प्रशंसा करताना आणि चार अपायांचे क्लेश नष्ट न झाल्याबद्दल खेद व्यक्त करताना शास्त्यांनी 'किञ्चापि, भिक्खवे, राजा चक्कवत्ती' (भिक्खूंनो, जरी चक्रवर्ती राजा...) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'चतुन्नं दीपानं' म्हणजे दोन हजार लहान बेटांनी वेढलेली चार महाद्वीपे. 'इस्सरियाधिပစ္စံ' म्हणजे ईश्वरभाव (प्रभुत्व) हे ऐश्वर्य होय, आणि अधिपती असणे हे आधिपत्य होय. या राज्यात ऐश्वर्य आणि आधिपत्य असते, परंतु कोणाचेही अंग कापले जाणे किंवा शिक्षा होणे नसते, म्हणून याला 'इस्सरियाधिपच्चं' म्हटले आहे. 'कारित्वा' म्हणजे अशा प्रकारच्या राज्याचे संचालन करून. 'किञ्चापि, भिक्खवे, अरियसावको' येथे 'किञ्चापि' हा शब्द प्रशंसा आणि सन्मान या अर्थाने वापरलेला निपात आहे. भिक्षेच्या अन्नावर जीवन जगणाऱ्याची प्रशंसा करताना आणि चार अपायांचा नाश झाल्याबद्दल गौरव करताना शास्त्यांनी 'किञ्चापि, भिक्खवे, अरियसावको' इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'नन्तकानि' म्हणजे फाटलेले किंवा काठ नसलेले वस्त्र. जरी वस्त्र तेरा हात लांब असले, तरी त्याचे काठ कापल्यापासून त्याला 'नन्तक' (फाटलेले कापड) असेच म्हटले जाते. අවෙච්චප්පසාදෙනාති අචලප්පසාදෙන. සො පනායං පසාදො කිං එකො, අනෙකොති? එකොව, සො මග්ගෙන ආගතප්පසාදො. යෙසු පන වත්ථූසු අපුබ්බං අචරිමං රුහති, තෙසං වසෙන ‘‘බුද්ධෙ අවෙච්චප්පසාදෙනා’’තිආදිනා නයෙන තිධා වුත්තො. යස්මා ච එකො, තස්මාව නින්නානාකරණො හොති. අරියසාවකස්ස හි බුද්ධෙයෙව පසාදො ච පෙමඤ්ච ගාරවඤ්ච මහන්තං, න ධම්මෙ වා සඞ්ඝෙ වා, ධම්මෙයෙව වා මහන්තං, න බුද්ධෙ වා සඞ්ඝෙ වා, සඞ්ඝෙයෙව වා මහන්තං, න බුද්ධෙ වා ධම්මෙ වාති එතං නත්ථි. ඉතිපි සො භගවාතිආදීනි විසුද්ධිමග්ගෙ විත්ථාරිතානෙව. 'अवेच्चप्पसादेन' म्हणजे अचल (दृढ) श्रद्धेने. पण ही श्रद्धा एक आहे की अनेक? ती एकच आहे, जी आर्यमार्गाने प्राप्त होते. परंतु बुद्ध, धम्म आणि संघ या तीन रत्नांवर ती एकाच वेळी दृढ होत असल्यामुळे, तिच्या प्रभावाने 'बुद्धे अवेच्चप्पसादेन' (बुद्धावर अचल श्रद्धा) इत्यादी रूपाने तीन प्रकारे सांगितली आहे. ती एकच असल्यामुळे तिच्यात कोणताही भेद नसतो. आर्यश्रावकाची केवळ बुद्धावरच मोठी श्रद्धा, प्रेम आणि आदर असतो आणि धम्म किंवा संघावर नसतो, किंवा केवळ धम्मावरच मोठा आदर असतो आणि बुद्ध किंवा संघावर नसतो, किंवा केवळ संघावरच मोठा आदर असतो आणि बुद्ध किंवा धम्मावर नसतो, असा कोणताही भेद नसतो. 'इतिपि सो भगवा' इत्यादी पदांचे सविस्तर वर्णन विसुद्धिमग्ग ग्रंथात केलेलेच आहे. අරියකන්තෙහීති අරියානං කන්තෙහි පියෙහි මනාපෙහි. පඤ්ච හි සීලානි භවන්තරගතාපි අරියා න කොපෙන්ති, එවං තෙසං පියානි. තානි සන්ධායෙතං වුත්තං. අඛණ්ඩෙහීතිආදි සදිසවසෙන වුත්තං. මුඛවට්ටියඤ්හි ඡින්නෙකදෙසා පාති ඛණ්ඩාති වුච්චති, මජ්ඣෙ භින්නා ඡිද්දාති, එකස්මිං පදෙසෙ විසභාගවණ්ණා ගාවී සබලාති, නානාබින්දුචිත්තා කම්මාසාති, එවමෙව පටිපාටියා [Pg.308] ආදිම්හි වා අන්තෙ වා භින්නං සීලං ඛණ්ඩං නාම, මජ්ඣෙ භින්නං ඡිද්දං, යත්ථ කත්ථචි ද්වින්නං වා තිණ්ණං වා පටිපාටියා භින්නත්තා සබලං, එකන්තරං භින්නං කම්මාසං. තෙසං දොසානං අභාවෙන අඛණ්ඩාදිතා වෙදිතබ්බා. භුජිස්සෙහීති භුජිස්සභාවකරෙහි. විඤ්ඤුප්පසත්ථෙහීති බුද්ධාදීහි විඤ්ඤූහි පසංසිතෙහි. අපරාමට්ඨෙහීති ‘‘ඉදං නාම තයා කතං, ඉදං වීතික්කන්ත’’න්ති එවං පරාමසිතුං අසක්කුණෙය්යෙහි. සමාධිසංවත්තනිකෙහීති අප්පනාසමාධිං උපචාරසමාධිං වා සංවත්තෙතුං සමත්ථෙහි. 'अरियकन्तेहि' म्हणजे आर्यांना प्रिय, आवडणारे आणि मनाला आनंद देणारे. कारण आर्य लोक दुसऱ्या जन्मात गेले तरी पाच शीलांचा भंग करत नाहीत, अशा प्रकारे ती त्यांना प्रिय असतात. त्यांना उद्देशून हे म्हटले आहे. 'अखण्ड' इत्यादी शब्द सादृश्यावरून म्हटले आहेत. कारण भांड्याच्या काठावर एका बाजूला तडा गेला असेल तर त्याला 'खण्ड' (खंडित) भांडे म्हणतात, मध्यभागी छिद्र पडले असेल तर त्याला 'छिद्र' (छिद्रयुक्त) म्हणतात, एखाद्या ठिकाणी विसंगत रंगाची गाय असेल तर तिला 'शबल' (ठिपके असलेली) गाय म्हणतात, आणि विविध रंगांच्या ठिपक्यांनी युक्त असलेल्या गाईला 'कम्मास' (कबरट) म्हणतात; त्याचप्रमाणे, अनुक्रमे सुरुवातीला किंवा शेवटी भंग पावलेल्या शीलाला 'खण्ड' (खंडित) म्हणतात, मध्यभागी भंग पावलेल्या शीलाला 'छिद्र' (छिद्रयुक्त) म्हणतात, कुठेही दोन किंवा तीन शील लागोपाठ भंग पावले तर त्याला 'शबल' (चितकबरे) म्हणतात, आणि एक सोडून एक भंग पावलेल्या शीलाला 'कम्मास' (कबरट) म्हणतात. या दोषांच्या अभावामुळे शीलाची 'अखण्डता' इत्यादी अवस्था जाणावी. 'भुजिस्सेहि' म्हणजे स्वतंत्र (मुक्त) करणारी. 'विञ्ञुप्पसत्थेहि' म्हणजे बुद्ध इत्यादी विज्ञांनी (विद्वानांनी) प्रशंसिलेली. 'अपरामट्ठेहि' म्हणजे "तुझ्याकडून हे कृत्य केले गेले, याचे उल्लंघन झाले" अशा प्रकारे कोणालाही आक्षेप घेता येणार नाही अशी. 'समाधिसंवत्तनिकेहि' म्हणजे अर्पणा समाधी किंवा उपचार समाधी प्राप्त करून देण्यास समर्थ असणारी. 2. බ්රහ්මචරියොගධසුත්තවණ්ණනා २. ब्रह्मचरियोगधसुत्तवण्णना (ब्रह्मचरियोगध सूत्राचे स्पष्टीकरण). 998. දුතියෙ යෙසං සද්ධාති පදෙන බුද්ධෙ පසාදො ගහිතො. සීලන්ති පදෙන අරියකන්තානි සීලානි ගහිතානි. පසාදොති පදෙන සඞ්ඝෙ පසාදො ගහිතො. ධම්මදස්සනන්ති පදෙන ධම්මෙ පසාදො ගහිතොති එවං චත්තාරි සොතාපත්තියඞ්ගානි වුත්තානි. කාලෙන පච්චෙන්තීති කාලෙන පාපුණන්ති. බ්රහ්මචරියොගධං සුඛන්ති බ්රහ්මචරියං ඔගාහිත්වා ඨිතං උපරිමග්ගත්තයසම්පයුත්තං සුඛං. යො පනෙස ගාථාය ආගතො පසාදො, සො කතරපසාදො හොතීති. තිපිටකචූළාභයත්ථෙරො තාව ‘‘මග්ගපසාදො’’ති ආහ, තිපිටකචූළනාගත්ථෙරො ‘‘ආගතමග්ගස්ස පච්චවෙක්ඛණප්පසාදො’’ති. උභොපි ථෙරා පණ්ඩිතා බහුස්සුතා, උභින්නං සුභාසිතං. මිස්සකප්පසාදො එසොති. ९९८. दुसऱ्या सूत्रात, 'येसं सद्धा' (ज्यांची श्रद्धा) या पदाने बुद्धांवरील प्रसन्नता (प्रसाद) घेतली आहे. 'सीलं' या पदाने आर्यांना प्रिय असलेली शीले घेतली आहेत. 'पसादो' या पदाने संघावरील प्रसन्नता घेतली आहे. 'धम्मदस्सनं' या पदाने धम्मावरील प्रसन्नता घेतली आहे; अशा प्रकारे चार सोतापत्तिअंगे सांगितली आहेत. 'कालेन पच्चेन्ति' म्हणजे योग्य वेळी प्राप्त करतात. 'ब्रह्मचरियोगधं सुखं' म्हणजे ब्रह्मचर्यात (मार्गात) प्रवेश करून राहिलेले, वरील तीन मार्गांशी संबंधित असलेले सुख. गाथेमध्ये आलेली जी प्रसन्नता (प्रसाद) आहे, ती कोणती प्रसन्नता आहे? प्रथम त्रिपिटकचूळाभय थेरांनी "मार्गप्रसाद" (मार्गाशी संबंधित प्रसन्नता) असे म्हटले आहे, तर त्रिपिटकचूळनाग थेरांनी "प्राप्त झालेल्या मार्गाचा प्रत्यवेक्षणप्रसाद" असे म्हटले आहे. दोन्ही थेर पंडित आणि बहुश्रुत होते, दोघांचेही म्हणणे सुभाषित (योग्य) आहे. हा 'मिस्सकप्रसाद' (मिश्र प्रसाद) आहे असे समजावे. 3. දීඝාවුඋපාසකසුත්තවණ්ණනා ३. दीघावूपासकसुत्तवण्णना (दीघावू उपासक सूत्राचे स्पष्टीकरण). 999. තතියෙ තස්මාති යස්මා චතූසු සොතාපත්තියඞ්ගෙසු සන්දිස්සසි, තස්මා. විජ්ජාභාගියෙති විජ්ජාකොට්ඨාසිකෙ. සබ්බසඞ්ඛාරෙසූති සබ්බෙසු තෙභූමකසඞ්ඛාරෙසු. එවමස්ස උපරි තිණ්ණං මග්ගානං විපස්සනා කථිතා. විඝාතන්ති දුක්ඛං. ९९९. तिसऱ्या सूत्रात, 'तस्मा' म्हणजे ज्या कारणाने चार सोतापत्तिअंगांमध्ये दिसून येते, त्या कारणाने. 'विज्जाभागिये' म्हणजे विद्येच्या भागातील (विद्येशी संबंधित). 'सब्बसंखारेसु' म्हणजे सर्व त्रिभूमिक संस्कारांमध्ये. अशा प्रकारे, त्यांना वरील तीन मार्गांची विपश्यना सांगितली आहे. 'विघातं' म्हणजे दुःख. 4-5. පඨමසාරිපුත්තසුත්තාදිවණ්ණනා ४-५. पठमसारिपुत्तसुत्तादिवण्णना (प्रथम सारिपुत्त सूत्रादींचे स्पष्टीकरण). 1000-1001. චතුත්ථ උත්තානමෙව. පඤ්චමෙ සොතාපත්තියඞ්ගන්ති සොතාපත්තියා පුබ්බභාගපටිලාභඞ්ගං. බුද්ධෙ අවෙච්චප්පසාදාදයො පන පටිලද්ධගුණා [Pg.309] සොතාපන්නස්ස අඞ්ගා නාම, තෙපි පන සොතාපත්තියඞ්ගන්ති ආගතා. තත්රායං ද්වින්නම්පි වචනත්ථො – සප්පුරිසෙ සෙවන්තො භජන්තො පයිරුපාසන්තො ධම්මං සුණන්තො යොනිසො මනසිකරොන්තො ධම්මානුධම්මං පුබ්බභාගපටිපදං පටිපජ්ජන්තො සොතාපත්තිං පටිලභතීති සප්පුරිසසංසෙවාදයො සොතාපත්තිඅත්ථාය අඞ්ගන්ති සොතාපත්තියඞ්ගං නාම, ඉතරෙ පඨමමග්ගසඞ්ඛාතාය සොතාපත්තියා අඞ්ගන්තිපි සොතාපත්තියඞ්ගං, පටිවිද්ධසොතාපත්තිමග්ගස්ස සොතාපත්තිමග්ගො අඞ්ගන්තිපි සොතාපත්තියඞ්ගං. १०००-१००१. चौथे सूत्र स्पष्टच आहे. पाचव्या सूत्रात, 'सोतापत्तियङ्गं' म्हणजे सोतापत्तिमार्ग प्राप्त करण्याच्या पूर्वभागातील अंग. बुद्धांवरील अचल श्रद्धा (अवेच्चप्पसाद) इत्यादी गुण प्राप्त झालेल्या सोतापन्नाची अंगे आहेत, ती देखील 'सोतापत्तिअंग' म्हणून आली आहेत. तेथे या दोन्ही अर्थांचे स्पष्टीकरण असे आहे – सत्पुरुषांची सेवा करणारा, त्यांच्याशी संगत करणारा, त्यांची उपासना करणारा, धम्म ऐकणारा, योनिशो मनसिकार करणारा, धम्मानुधम्म पूर्वभाग प्रतिपदेचे आचरण करणारा सोतापत्ति प्राप्त करतो; म्हणून सत्पुरुष संसेवा इत्यादी सोतापत्तीच्या प्राप्तीसाठी अंग आहेत, म्हणून त्यांना 'सोतापत्तियंग' म्हणतात. इतर (बुद्धांवरील अचल श्रद्धा इत्यादी) पहिल्या मार्गाच्या स्वरूपातील सोतापत्तीचे अंग असल्यामुळे त्यांनाही 'सोतापत्तियंग' म्हणतात. तसेच, अधिगत केलेल्या सोतापत्तिमार्गासाठी सोतापत्तिमार्ग हे अंग असल्यामुळे त्यालाही 'सोतापत्तियंग' म्हणतात. 6. ථපතිසුත්තවණ්ණනා ६. थपतिसुत्तवण्णना (थपति सूत्राचे स्पष्टीकरण). 1002. ඡට්ඨෙ සාධුකෙ පටිවසන්තීති සාධුකනාමකෙ අත්තනො භොගගාමකෙ වසන්ති. තෙසු ඉසිදත්තො සකදාගාමී, පුරාණො සොතාපන්නො සදාරසන්තුට්ඨො. මග්ගෙ පුරිසං ඨපෙසුන්ති තෙසං කිර ගාමද්වාරෙන භගවතො ගමනමග්ගො. තස්මා ‘‘භගවා කාලෙ වා අකාලෙ වා අම්හාකං සුත්තානං වා පමත්තානං වා ගච්ඡෙය්ය, අථ පස්සිතුං න ලභෙය්යාමා’’ති මග්ගමජ්ඣෙ පුරිසං ඨපෙසුං. १००२. सहाव्या सूत्रात, 'साधुके पटिवसन्ति' म्हणजे 'साधुक' नावाच्या स्वतःच्या भोगगावात (महसुली गावात) राहत होते. त्यांच्यामध्ये इसिदत्त हा सकदागामी होता आणि पुराण हा सोतापन्न होता, जे केवळ स्वतःच्या पत्नीनेच संतुष्ट (सदारसंतुष्ट) होते. 'मग्गे पुरिसं ठपेसुं' म्हणजे त्यांच्या गावाच्या दारातून भगवंतांच्या जाण्याचा मार्ग होता. म्हणून, "भगवान योग्य वेळी किंवा अवेळी, आम्ही झोपलेले असताना किंवा गाफील असताना निघून जातील आणि आम्हाला त्यांचे दर्शन घेता येणार नाही," असा विचार करून त्यांनी रस्त्याच्या मध्यभागी एका माणसाला पहारा देण्यासाठी ठेवले होते. අනුබන්ධිංසූති න දූරතොව පිට්ඨිතො පිට්ඨිතො අනුබන්ධිංසු, භගවා පන සකටමග්ගස්ස මජ්ඣෙ ජඞ්ඝමග්ගෙන අගමාසි, ඉතරෙ උභොසු පස්සෙසු අනුගච්ඡන්තා අගමංසු. මග්ගා ඔක්කම්මාති බුද්ධානඤ්හි කෙනචි සද්ධිං ගච්ඡන්තානංයෙව පටිසන්ථාරං කාතුං වට්ටති කෙනචි සද්ධිං ඨිතකානං, කෙනචි සද්ධිං දිවසභාගං නිසින්නානං. තස්මා භගවා චින්තෙසි – ‘‘ඉමෙහි මෙ සද්ධිං ගච්ඡන්තස්ස පටිසන්ථාරං කාතුං අයුත්තං, ඨිතකෙනපි කාතුං න යුත්තං, ඉමෙ හි මය්හං සාසනෙ සාමිනො ආගතඵලා. ඉමෙහි සද්ධිං නිසීදිත්වාව දිවසභාගං පටිසන්ථාරං කරිස්සාමී’’ති මග්ගා ඔක්කම්ම යෙන අඤ්ඤතරං රුක්ඛමූලං තෙනුපසඞ්කමි. 'अनुबन्धिंसु' म्हणजे ते दूरून नव्हे तर अगदी मागून मागे चालत गेले. भगवान मात्र गाडीच्या रस्त्याच्या मध्यभागी पायी चालत गेले, आणि इतर दोघे दोन्ही बाजूंनी त्यांच्या मागे मागे गेले. 'मग्गा ओकम्मा' म्हणजे बुद्धांना कोणासोबत चालतानाच कुशलमंगल विचारणे (प्रतिसंथार करणे) योग्य असते, किंवा कोणासोबत उभे असताना, किंवा कोणासोबत दिवसाचा काही भाग बसलेले असताना. म्हणून भगवंतांनी विचार केला – "यांच्यासोबत चालत असताना कुशलमंगल विचारणे योग्य नाही, उभे राहून विचारणेही योग्य नाही. हे माझ्या शासनामध्ये स्वामी (अधिकारी) आहेत आणि त्यांनी फल प्राप्त केले आहे. यांच्यासोबत बसूनच दिवसाचा काही भाग कुशलमंगल विचारण्यात घालवीन." असा विचार करून ते रस्त्यावरून बाजूला होऊन एका झाडाच्या मुळाशी (वृक्षमूलाजवळ) गेले. පඤ්ඤත්තෙ ආසනෙ නිසීදීති තෙ කිර ඡත්තුපාහනං කත්තරදණ්ඩං පාදබ්භඤ්ජනතෙලාදීනි චෙව අට්ඨවිධඤ්ච පානකං සරභපාදපල්ලඞ්කඤ්ච ගාහාපෙත්වා අගමංසු, ආභතං පල්ලඞ්කම්පි පඤ්ඤාපෙත්වා අදංසු, සත්ථා තස්මිං නිසීදි. එකමන්තං නිසීදිංසූති සෙසානි ඡත්තුපාහනාදීනි භික්ඛුසඞ්ඝස්ස දෙථාති වත්වා සයම්පි භගවන්තං වන්දිත්වා එකමන්තං නිසීදිංසු. 'पञ्ञत्ते आसने निसीदि' म्हणजे ते छत्री, पादत्राणे, काठी, पायाला लावायचे तेल इत्यादी आणि आठ प्रकारचे पेय तसेच शरभ-पादाचा (हरणाच्या पायासारखे पाय असलेला) पलंग घेऊन आले होते. त्यांनी आणलेला पलंग मांडून दिला, शास्ता (बुद्ध) त्यावर बसले. 'एकमन्तं निसीदिंसु' म्हणजे उरलेली छत्री, पादत्राणे इत्यादी वस्तू "भिक्खू संघाला द्या" असे सांगून, स्वतः देखील भगवंतांना वंदन करून एका बाजूला बसले. සාවත්ථියා [Pg.310] කොසලෙසු චාරිකං පක්කමිස්සතීතිආදි සබ්බං මජ්ඣිමපදෙසවසෙනව වුත්තං. කස්මා? නියතත්තා. භගවතො හි චාරිකාචරණම්පි අරුණුට්ඨාපනම්පි නියතං, මජ්ඣිමපදෙසෙයෙව චාරිකං චරති, මජ්ඣිමදෙසෙ අරුණං උට්ඨපෙතීති නියතත්තා මජ්ඣිමදෙසවසෙන වුත්තං. ආසන්නෙ නො භගවා භවිස්සතීති එත්ථ න කෙවලං ආසන්නත්තායෙව තෙසං සොමනස්සං හොති, අථ ඛො ‘‘ඉදානි දානං දාතුං ගන්ධමාලාදීහි පූජං කාතුං ධම්මං සොතුං පඤ්හං පුච්ඡිතුං ලභිස්සාමා’’ති තෙසං සොමනස්සං හොති. 'सावत्थिया कोसलेसु चारिकं पक्कमिस्सति' इत्यादी सर्व मध्यम देशाच्या संदर्भानेच म्हटले आहे. का? कारण ते निश्चित आहे. भगवंतांचे चारिका करणे आणि अरुणोदय (पहाट) करणे हे निश्चित आहे; ते मध्यम देशातच चारिका करतात आणि मध्यम देशातच अरुणोदय करतात, म्हणून निश्चित असल्यामुळे मध्यम देशाच्या संदर्भाने म्हटले आहे. 'आसन्ने नो भगवा भविस्सति' यामध्ये केवळ भगवंतांच्या जवळ असण्यानेच त्यांना आनंद (सोमनस्य) झाला नाही, तर "आता आम्हाला दान देण्याची, गंध-पुष्प इत्यादींनी पूजा करण्याची, धम्म ऐकण्याची आणि प्रश्न विचारण्याची संधी मिळेल," या विचाराने त्यांना आनंद झाला. තස්මාතිහ ථපතයො සම්බාධො ඝරාවාසොති ථපතයො යස්මා තුම්හාකං මයි දූරීභූතෙ අනප්පකං දොමනස්සං, ආසන්නෙ අනප්පකං සොමනස්සං හොති, තස්මාපි වෙදිතබ්බමෙතං ‘‘සම්බාධො ඝරාවාසො’’ති. ඝරාවාසස්ස හි දොසෙන තුම්හාකං එවං හොති. සචෙ පන ඝරාවාසං පහාය පබ්බජිතා, අථ එවං වො මයා සද්ධිංයෙව ගච්ඡන්තානඤ්ච ආගච්ඡන්තානඤ්ච තං න භවෙය්යාති ඉමමත්ථං දීපෙන්තො එවමාහ. තත්ථ සකිඤ්චනසපලිබොධට්ඨෙන සම්බාධතා වෙදිතබ්බා. මහාවාසෙ වසන්තස්සපි හි සකිඤ්චනසපලිබොධට්ඨෙන ඝරාවාසො සම්බාධොව. රජාපථොති රාගදොසමොහරජානං ආපථො, ආගමනට්ඨානන්ති අත්ථො. අබ්භොකාසො පබ්බජ්ජාති පබ්බජ්ජා පන අකිඤ්චනඅපලිබොධට්ඨෙන අබ්භොකාසො. චතුරතනිකෙපි හි ගබ්භෙ ද්වින්නං භික්ඛූනං පල්ලඞ්කෙන පල්ලඞ්කං ඝටෙත්වා නිසින්නානම්පි අකිඤ්චනඅපලිබොධට්ඨෙන පබ්බජ්ජා අබ්භොකාසො නාම හොති. අලඤ්ච පන වො ථපතයො අප්පමාදායාති එවං සම්බාධෙ ඝරාවාසෙ වසන්තානං තුම්හාකං අප්පමාදමෙව කාතුං යුත්තන්ති අත්ථො. म्हणूनच, हे स्थपतींनो! ‘गृहस्थाश्रम संकुचित आहे’ असे म्हटले आहे. हे स्थपतींनो, कारण मी तुमच्यापासून दूर गेल्यावर तुम्हाला मोठे दुःख (दौर्मनस्य) होते आणि जवळ आल्यावर मोठा आनंद (सौमनस्य) होतो, म्हणूनच ‘गृहस्थाश्रम संकुचित आहे’ हे जाणावे. गृहस्थाश्रमाच्या दोषामुळेच तुम्हाला असे होते. परंतु, जर तुम्ही गृहस्थाश्रम सोडून प्रव्रजित झालात, तर माझ्यासोबत जाताना किंवा येताना तुम्हाला असे दुःख होणार नाही, हा अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी भगवंतांनी असे म्हटले आहे. तेथे, क्लेश (किंचन) आणि अडथळे (पलिबोध) यांच्या अस्तित्वामुळे संकुचितपणा जाणावा. मोठ्या घरात राहणाऱ्या व्यक्तीसाठीही क्लेश आणि अडथळ्यांमुळे गृहस्थाश्रम संकुचितच असतो. ‘रजापथ’ म्हणजे राग, द्वेष आणि मोह या धुळीचा मार्ग किंवा येण्याचे स्थान असा अर्थ आहे. ‘प्रव्रज्या म्हणजे मोकळे आकाश’ कारण प्रव्रज्या ही क्लेशरहित आणि अडथळामुक्त असल्यामुळे मोकळ्या आकाशासारखी असते. चार हात रुंद अशा लहान खोलीतही जर दोन भिक्खू मांडी घालून एकमेकांना स्पर्श करून बसले असतील, तरीही क्लेश आणि अडथळे नसल्यामुळे प्रव्रज्या ही मोकळे आकाशच ठरते. ‘परंतु हे स्थपतींनो, तुम्हाला अप्रमादासाठी हे पुरेसे आहे’ म्हणजेच अशा संकुचित गृहस्थाश्रमात राहणाऱ्या तुम्ही केवळ अप्रमादाचेच (जागरूकतेचेच) आचरण करणे योग्य आहे, असा अर्थ आहे। එකං පුරතො එකං පච්ඡතො නිසීදාපෙමාති තෙ කිර ද්වෙපි ජනා සබ්බාලඞ්කාරපටිමණ්ඩිතෙසු ද්වීසු නාගෙසු තා ඉත්ථියො එවං නිසීදාපෙත්වා රඤ්ඤො නාගං මජ්ඣෙ කත්වා උභොසු පස්සෙසු ගච්ඡන්ති, තස්මා එවමාහංසු. නාගොපි රක්ඛිතබ්බොති යථා කිඤ්චි විසෙවිතං න කරොති, එවං රක්ඛිතබ්බො හොති. තාපි භගිනියොති යථා පමාදං නාපජ්ජන්ති, එවං රක්ඛිතබ්බා හොන්ති. අත්තාපීති සිතහසිතකථිතවිපෙක්ඛිතාදීනි අකරොන්තෙහි [Pg.311] අත්තාපි රක්ඛිතබ්බො හොති. (තෙහි තථා කරොන්තෙහි න අත්තාපි රක්ඛිතබ්බො හොති). තථා කරොන්තො හි ‘‘සාමිදුබ්භො එසො’’ති නිග්ගහෙතබ්බො හොති. තස්මාතිහ ථපතයොති යස්මා තුම්හෙ රාජා නිච්චං රාජභණ්ඩං පටිච්ඡාපෙති, තස්මාපි සම්බාධො ඝරාවාසො රජාපථො. යස්මා පන පංසුකූලිකභික්ඛුං එවං පටිච්ඡාපෙන්තො නත්ථි, තස්මා අබ්භොකාසො පබ්බජ්ජා. එවං සබ්බත්ථාපි අලඤ්ච පන වො ථපතයො අප්පමාදාය අප්පමාදමෙව කරොථාති දස්සෙති. ‘आम्ही एका स्त्रीला पुढे आणि एका स्त्रीला मागे बसवतो’ कारण ते दोन्ही लोक (इशिदत्त आणि पुराण) सर्व अलंकारांनी सजवलेल्या दोन हत्तींवर त्या स्त्रियांना अशा प्रकारे बसवून, राजाच्या हत्तीला मध्यभागी ठेवून दोन्ही बाजूंनी जात असत, म्हणून त्यांनी असे म्हटले. ‘हत्तीचेही रक्षण केले पाहिजे’ म्हणजे हत्तीने कोणताही विपरित व्यवहार करू नये म्हणून त्याचे रक्षण करावे लागते. ‘त्या भगिनींचेही (स्त्रियांचेही)’ म्हणजे त्या प्रमादाला (असावधपणाला) प्राप्त होऊ नयेत म्हणून त्यांचेही रक्षण करावे लागते. ‘स्वतःचेही’ म्हणजे स्मितहास्य, मोठ्याने हसणे, बोलणे, इकडेतिकडे पाहणे इत्यादी न करता स्वतःचेही रक्षण करावे लागते. (तसे करणाऱ्यांचे स्वतःचे रक्षण होत नाही). कारण तसे करणारा मनुष्य ‘हा स्वामीचा द्रोह करणारा आहे’ म्हणून शिक्षेस पात्र ठरतो. ‘म्हणूनच, हे स्थपतींनो!’ कारण राजा तुम्हाला नेहमी राजेशाही संपत्ती सोपवतो, म्हणूनच गृहस्थाश्रम संकुचित आणि रजापथ (धुळीचा मार्ग) आहे. परंतु पांसुकुलिक भिक्खूला असे काही सोपवणारे कोणी नसल्यामुळे, प्रव्रज्या ही मोकळे आकाश आहे. अशा प्रकारे सर्व ठिकाणी ‘परंतु हे स्थपतींनो, तुम्हाला अप्रमादासाठी हे पुरेसे आहे, तुम्ही अप्रमादाचेच आचरण करा’ हे दर्शविले आहे। මුත්තචාගොති විස්සට්ඨචාගො. පයතපාණීති ආගතාගතානං දානත්ථාය ධොතහත්ථො. වොස්සග්ගරතොති වොස්සග්ගසඞ්ඛාතෙ චාගෙ රතො. යාචයොගොති යාචිතබ්බකයුත්තො. දානසංවිභාගරතොති දානෙන චෙව අප්පමත්තකම්පි කිඤ්චි ලද්ධා තතොපි සංවිභාගෙ රතො. අප්පටිවිභත්තන්ති ‘‘ඉදං අම්හාකං භවිස්සති, ඉදං භික්ඛූන’’න්ති එවං අකතවිභාගං, සබ්බං දාතබ්බමෙව හුත්වා ඨිතන්ති අත්ථො. ‘मुक्तचाग’ म्हणजे मुक्तहस्ताने दान देणारा. ‘पयतपाणि’ म्हणजे आलेल्या याचकांना दान देण्यासाठी ज्याने आपले हात धुतले आहेत असा. ‘वोस्सग्गरतो’ म्हणजे त्यागरूपी दानात रमणारा. ‘याचयोगो’ म्हणजे ज्याच्याकडे याचना केली जाऊ शकते असा. ‘दानसंविभागरतो’ म्हणजे दान देण्यात आणि अगदी थोडे काही मिळाले तरी त्यातूनही इतरांना वाटा देण्यात रमणारा. ‘अप्पटिविभत्तं’ म्हणजे ‘हे आमच्यासाठी असेल, हे भिक्खूंसाठी असेल’ अशी वाटणी न करता, सर्व काही देण्यायोग्यच मानून राहणे असा अर्थ आहे। 7. වෙළුද්වාරෙය්යසුත්තවණ්ණනා ७. वेळुद्वारेय्य सुत्ताचे स्पष्टीकरण (वण्णना)। 1003. සත්තමෙ වෙළුද්වාරන්ති ගාමද්වාරෙ පවෙණිආගතස්ස වෙළුගච්ඡස්ස අත්ථිතාය එවංලද්ධනාමො ගාමො. අත්තුපනායිකන්ති අත්තනි උපනෙතබ්බං. සම්ඵභාසෙනාති අමන්තභාසෙන. සම්ඵප්පලාපභාසෙනාති සම්ඵප්පලාපසම්භාසෙන නිරත්ථකෙන අඤ්ඤාණවචනෙනාති අත්ථො. १००३. सातव्या सुत्तात, ‘वेळुद्वार’ म्हणजे गावाच्या वेशीवर पिढ्यानपिढ्या चालत आलेल्या बांबूच्या बेटाच्या अस्तित्वामुळे हे नाव मिळालेले गाव. ‘अत्तुपनायिक’ म्हणजे स्वतःवर लागू करण्यासारखे (स्वतःशी तुलना करून पाहण्यासारखे). ‘सम्फभासेन’ म्हणजे निरर्थक भाषणाने. ‘सम्फप्पलापभासेन’ म्हणजे निरर्थक बडबडीने, निरुपयोगी आणि अज्ञानाच्या शब्दांनी असा अर्थ आहे। 8-9. පඨමගිඤ්ජකාවසථසුත්තාදිවණ්ණනා ८-९. पहिले गिंजकावसथ सुत्त इत्यादींचे स्पष्टीकरण (वण्णना)। 1004-5. අට්ඨමෙ ඤාතිකෙති එකං තළාකං නිස්සාය ද්වින්නං චූළපිතිමහාපිතිපුත්තානං ද්වෙ ගාමා, තෙසු එකස්මිං ගාමකෙ. ගිඤ්ජකාවසථෙති ඉට්ඨකාමයෙ ආවසථෙ. ඔරම්භාගියානන්ති හෙට්ඨාභාගියානං, කාමභවෙයෙව පටිසන්ධිග්ගාහාපකානන්ති අත්ථො. ඔරන්ති ලද්ධනාමෙහි වා තීහි මග්ගෙහි පහාතබ්බානීතිපි ඔරම්භාගියානි. තත්ථ කාමච්ඡන්දො බ්යාපාදොති ඉමානි ද්වෙ සමාපත්තියා වා අවික්ඛම්භිතානි මග්ගෙන වා අසමුච්ඡින්නානි නිබ්බත්තිවසෙන උද්ධං භාගං රූපභවං අරූපභවං වා ගන්තුං න දෙන්ති. සක්කායදිට්ඨිආදීනි [Pg.312] තීණි තත්ථ නිබ්බත්තම්පි ආනෙත්වා පුන ඉධෙව නිබ්බත්තාපෙන්තීති සබ්බානිපි ඔරම්භාගියානෙව. අනාවත්තිධම්මොති පටිසන්ධිවසෙන අනාගමනසභාවො. १००४-५. आठव्या सुत्तात, ‘न्यातिक’ म्हणजे एका तलावाच्या आश्रयाने वसलेली चुलत भावांची दोन गावे, त्यांपैकी एका गावात. ‘गिंजकावसथ’ म्हणजे विटांनी बांधलेल्या विहारात. ‘ओरंभागिय’ म्हणजे खालच्या पातळीवरील (कामलोकात) पुनर्जन्म घडवून आणणारे असा अर्थ आहे. किंवा ‘ओर’ (खालचे) असे नाव असलेल्या पहिल्या तीन मार्गांनी नष्ट करण्यायोग्य असल्यामुळे त्यांना ‘ओरंभागिय’ म्हणतात. त्यामध्ये कामच्छंद आणि व्यापाद हे दोन (संयोजन) जर समापत्तीने दाबले गेले नसतील किंवा मार्गाने समूळ नष्ट केले नसतील, तर ते पुनर्जन्माच्या रूपाने वरच्या भागात म्हणजेच रूपभव किंवा अरूपभवात जाऊ देत नाहीत. सत्कायदिट्ठी इत्यादी तीन संयोजने तेथे (वरच्या भवात) जन्मलेल्या व्यक्तीलाही परत खेचून आणून याच कामभवात जन्म घ्यायला लावतात, म्हणून हे सर्वच ‘ओरंभागिय’ आहेत. ‘अनावत्तिधम्मो’ म्हणजे पुनर्जन्माच्या दृष्टीने या कामलोकात परत न यायचा स्वभाव असणारा। රාගදොසමොහානං තනුත්තාති එත්ථ කදාචි උප්පත්තියා ච පරියුට්ඨානමන්දතාය චාති ද්වෙධාපි තනුභාවො වෙදිතබ්බො. සකදාගාමිස්ස හි පුථුජ්ජනානං විය අභිණ්හං රාගාදයො න උප්පජ්ජන්ති, කදාචි කරහචි උප්පජ්ජන්ති. උප්පජ්ජමානා ච න පුථුජ්ජනානං විය බහලබහලා උප්පජ්ජන්ති, මක්ඛිපත්තං විය තනුකා උප්පජ්ජන්ති. දීඝභාණකතිපිටකමහාසීවත්ථෙරො පනාහ – ‘‘යස්මා සකදාගාමිස්ස පුත්තධීතරො හොන්ති, ඔරොධා ච හොන්ති, තස්මා බහලා කිලෙසා. ඉදං පන භවතනුකවසෙන කථිත’’න්ති. තං අට්ඨකථායං ‘‘සොතාපන්නස්ස සත්ත භවෙ ඨපෙත්වා අට්ඨමෙ භවෙ භවතනුකං නත්ථි, සකදාගාමිස්ස ද්වෙ භවෙ ඨපෙත්වා පඤ්චසු භවෙසු භවතනුකං නත්ථි, අනාගාමිස්ස රූපාරූපභවං ඨපෙත්වා කාමභවෙ භවතනුකං නත්ථි, ඛීණාසවස්ස කිස්මිඤ්චි භවෙ භවතනුකං නත්ථී’’ති වුත්තත්තා පටික්ඛිත්තං හොති. ‘राग, द्वेष आणि मोह यांचे मंद होणे’ येथे कधीतरी उत्पन्न होणे आणि क्लेशांचा वेग मंद असणे अशा दोन प्रकारे हे मंद होणे जाणावे. कारण सकदागामी व्यक्तीला पृथग्जनांप्रमाणे वारंवार राग इत्यादी उत्पन्न होत नाहीत, तर कधीतरीच उत्पन्न होतात. आणि उत्पन्न झाले तरी ते पृथग्जनांप्रमाणे अत्यंत तीव्र नसतात, तर माशीच्या पंखासारखे अत्यंत सूक्ष्म असतात. परंतु दीघभाणक तिपिटक महासीव थेर म्हणतात— “ज्याअर्थी सकदागामी व्यक्तीला मुले-मुली असतात आणि अंतःपुरातील स्त्रियाही असतात, त्याअर्थी त्यांचे क्लेश तीव्र असतात. हे विधान केवळ ‘भव-तनुक’ (पुनर्जन्म कमी होणे) या अर्थाने म्हटले आहे.” अठ्ठकथेत त्याचे खंडन केले गेले आहे, कारण तेथे म्हटले आहे की— “सोतापन्नाला सात जन्म सोडून आठव्या जन्मात भव-तनुकता नसते; सकदागामीला दोन जन्म सोडून पाच जन्मांमध्ये भव-तनुकता नसते; अनागामीला रूप-अरूप भव सोडून कामभवात भव-तनुकता नसते; आणि क्षीणासवाला (अर्हताला) कोणत्याही भवात भव-तनुकता नसते.” असे म्हटल्यामुळे ते मत नाकारले गेले आहे। ඉමං ලොකන්ති ඉමං කාමාවචරලොකං සන්ධාය වුත්තං. අයඤ්හෙත්ථ අධිප්පායො – සචෙ හි මනුස්සෙසු සකදාගාමිඵලං පත්තො දෙවෙසු නිබ්බත්තිත්වා අරහත්තං සච්ඡිකරොති, ඉච්චෙතං කුසලං. අසක්කොන්තො පන අවස්සං මනුස්සලොකං ආගන්ත්වා සච්ඡිකරොති. දෙවෙසු සකදාගාමිඵලං පත්තොපි සචෙ මනුස්සෙසු නිබ්බත්තිත්වා අරහත්තං සච්ඡිකරොති, ඉච්චෙතං කුසලං. අසක්කොන්තො පන අවස්සං දෙවලොකං ගන්ත්වා සච්ඡිකරොතීති. ‘या लोकाला’ हे या कामावचर लोकाला उद्देशून म्हटले आहे. येथे हा अभिप्राय आहे— जर मनुष्यांमध्ये सकदागामी फल प्राप्त झालेली व्यक्ती देवलोकात जन्म घेऊन तेथे अर्हतपद साक्षात करते, तर ते उत्तमच आहे. परंतु जर तेथे शक्य झाले नाही, तर ती व्यक्ती नक्कीच मनुष्यलोकात परत येऊन अर्हतपद साक्षात करते. तसेच, देवलोकात सकदागामी फल प्राप्त झालेली व्यक्ती जर मनुष्यलोकात जन्म घेऊन अर्हतपद साक्षात करते, तर ते उत्तमच आहे. परंतु जर येथे शक्य झाले नाही, तर ती व्यक्ती नक्कीच देवलोकात जाऊन अर्हतपद साक्षात करते। විනිපතනං විනිපාතො, නාස්ස විනිපාතො ධම්මොති අවිනිපාතධම්මො, චතූසු අපායෙසු අවිනිපාතනසභාවොති අත්ථො. නියතොති ධම්මනියාමෙන නියතො. සම්බොධිපරායණොති උපරිමග්ගත්තයසඞ්ඛාතා සම්බොධි පරං අයනං අස්ස ගති පටිසරණං අවස්සං පත්තබ්බාති සම්බොධිපරායණො. විහෙසාවෙසාති තෙසං තෙසං ඤාණගතිං ඤාණූපපත්තිං ඤාණාභිසම්පරායං ඔලොකෙන්තස්ස කායකිලමථොව එස, ආනන්ද, තථාගතස්සාති දීපෙති. චිත්තවිහෙසා පන බුද්ධානං නත්ථි. ‘विनिपातनं विनिपातो’ म्हणजे अपायलोकात पडणे. ‘नास्स विनिपातो धम्मो’ (त्याचा अपायलोकात पडण्याचा स्वभाव नसतो) म्हणून तो ‘अविनिपातधम्मो’ होय; चार अपायलोकांमध्ये न पडण्याचा स्वभाव असणे, असा याचा अर्थ आहे. ‘नियतो’ म्हणजे धम्मनियमाने निश्चित (स्थिर) झालेला. ‘संबोधिपरायणो’ म्हणजे वरील तीन मार्गांनी युक्त अशी संबोधी (ज्ञान) हेच ज्याचे परम अयन (आश्रय), गती आणि शरण आहे, जे त्याला अवश्य प्राप्त होणार आहे, म्हणून तो ‘संबोधिपरायण’ होय. ‘विहेसावेसा’ या शब्दाने हे दर्शवले आहे की, ‘हे आनंदा, त्या त्या व्यक्तींची गती, पुनर्जन्म आणि परलोक आपल्या ज्ञानचक्षूने पाहत असताना, तथागतांना केवळ शारीरिक थकवाच जाणवतो.’ परंतु बुद्धांना मानसिक थकवा (चित्ताचा क्लेश) कधीही होत नाही. ධම්මාදාසන්ති [Pg.313] ධම්මමයං ආදාසං. යෙනාති යෙන ධම්මාදාසෙන සමන්නාගතො. ඛීණාපායදුග්ගතිවිනිපාතොති ඉදං නිරයාදීනංයෙව වෙවචනවසෙනෙව වුත්තං. නිරයාදයො හි වඩ්ඪිසඞ්ඛාතතො අයතො අපෙතත්තා අපායො, දුක්ඛස්ස ගති පටිසරණන්ති. දුග්ගති, දුක්කටකාරිනො එත්ථ විවසා නිපතන්තීති විනිපාතො. නවමං උත්තානමෙව. ‘धम्मादासं’ म्हणजे धम्ममयी आरसा. ‘येन’ म्हणजे ज्या धम्ममयी आरशाने युक्त असलेला. ‘खीणापायदुग्गतिविनिपातो’ हे निरय (नरक) इत्यादींचेच समानार्थी शब्द म्हणून सांगितले आहे. कारण, निरय इत्यादी हे वृद्धी नावाच्या कल्याणापासून दूर असल्यामुळे ‘अपाय’ आहेत; दुःखाची गती आणि शरण असल्यामुळे ‘दुग्गती’ आहेत; आणि येथे दुष्कृत्य करणारे लोक स्वतःच्या इच्छेविरुद्ध विवश होऊन पडतात, म्हणून ‘विनिपात’ आहेत. नववे सुत्त अगदी स्पष्टच आहे. 10. තතියගිඤ්ජකාවසථසුත්තවණ්ණනා १०. तिसऱ्या गिंजकावसथ सुत्ताची वर्णना (टीका). 1006. දසමෙ පරොපඤ්ඤාසාති අතිරෙකපඤ්ඤාස. සාධිකනවුතීති අතිරෙකනවුති. ඡාතිරෙකානීති ඡහි අධිකානි. සො කිර ගාමො කිඤ්චාපි නාතිමහා අහොසි, අරියසාවකා පනෙත්ථ බහූ. තත්ථ තත්ථ අහිවාතරොගෙන එකප්පහාරෙනෙව චතුවීසති පාණසතසහස්සානි කාලමකංසු, තෙසු අරියසාවකා එත්තකා නාම අහෙසුං. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. १००६. दहाव्या सुत्तात, ‘परोपञ्ञासा’ म्हणजे पन्नासपेक्षा अधिक. ‘साधिकनवुती’ म्हणजे नव्वदपेक्षा अधिक. ‘छातिरेकानि’ म्हणजे सहाने अधिक (पाचशे सहा). तो न्यातिक गाव जरी फार मोठा नव्हता, तरी तेथे या गावात आर्यश्रावक पुष्कळ होते. तेथे वेगवेगळ्या ठिकाणी ‘अहिवात’ रोगाने (महामारीने) एकाच वेळी चोवीस लाख प्राणी मरण पावले; त्यांच्यामध्ये इतके आर्यश्रावक होते. उर्वरित सर्व भाग सर्वत्र स्पष्टच आहे. වෙළුද්වාරවග්ගො පඨමො. वेळुद्वारवग्गो पहिला समाप्त. 2. රාජකාරාමවග්ගො २. राजकारामवग्गो (दुसरा वर्ग). 1. සහස්සභික්ඛුනිසඞ්ඝසුත්තවණ්ණනා १. सहस्सभिक्खुनीसंघ सुत्ताची वर्णना (टीका). 1007. දුතියස්ස පඨමෙ රාජකාරාමෙති රඤ්ඤා කාරිතත්තා එවං ලද්ධනාමෙ ආරාමෙ, තං රඤ්ඤා පසෙනදිකොසලෙන කතං. පඨමබොධියං කිර ලාභග්ගයසග්ගපත්තං සත්ථාරං දිස්වා තිත්ථියා චින්තයිංසු – ‘‘සමණො ගොතමො ලාභග්ගයසග්ගපත්තො, න ඛො පනෙස අඤ්ඤං කිඤ්චි සීලං වා සමාධිං වා නිස්සාය එවං ලාභග්ගයසග්ගපත්තො. භූමිසීසං පන තෙන ගහිතං, සචෙ මයම්පි ජෙතවනසමීපෙ ආරාමං කාරාපෙතුං සක්කුණෙය්යාම, ලාභග්ගයසග්ගපත්තා භවෙය්යාමා’’ති. තෙ අත්තනො අත්තනො උපට්ඨාකෙ සමාදපෙත්වා සතසහස්සමත්තෙ කහාපණෙ ලභිත්වා තෙ ආදාය රඤ්ඤො සන්තිකං අගමංසු. රාජා ‘‘කිං එත’’න්ති? පුච්ඡි. මයං ජෙතවනසමීපෙ තිත්ථියාරාමං කරොම, සචෙ සමණො ගොතමො වා සමණස්ස ගොතමස්ස සාවකා වා ආගන්ත්වා වාරෙස්සන්ති, වාරෙතුං මා අදත්ථාති ලඤ්ජං අදංසු. රාජා ලඤ්ජං ගහෙත්වා ‘‘ගච්ඡථ කාරෙථා’’ති ආහ. १००७. दुसऱ्या वर्गाच्या पहिल्या सुत्तात, ‘राजकारामे’ म्हणजे राजाने बांधल्यामुळे हे नाव मिळालेल्या आरामात; तो राजा पसेनदी कोसलाने बांधला होता. प्रथम बोधीच्या काळात शास्त्यांना (बुद्धांना) परम लाभ आणि यशाप्रत पोहोचलेले पाहून तीर्थिकांनी विचार केला— “श्रमण गौतम परम लाभ आणि यशाप्रत पोहोचले आहेत. परंतु ते काही इतर शील किंवा समाधीच्या बळावर असे लाभ-यशाप्रत पोहोचलेले नाहीत. त्यांनी तर भूमीचे श्रेष्ठ स्थान (जेतवन) हस्तगत केले आहे. जर आपणही जेतवनाच्या जवळ एखादा आराम बांधू शकलो, तर आपणही परम लाभ आणि यशाप्रत पोहोचू.” त्यांनी आपापल्या उपासकांना प्रवृत्त करून सुमारे एक लाख कहापण मिळवले आणि ते घेऊन ते राजाकडे गेले. राजाने विचारले, “हे काय आहे?” त्यांनी राजाला लाच दिली आणि म्हटले, “आम्ही जेतवनाजवळ तीर्थिकांचा आराम बांधत आहोत. जर श्रमण गौतम किंवा श्रमण गौतमाचे श्रावक येऊन आम्हाला अडवतील, तर तुम्ही त्यांना अडवू देऊ नका.” राजाने लाच स्वीकारून सांगितले, “जा, आराम बांधा.” තෙ [Pg.314] ගන්ත්වා, අත්තනො උපට්ඨාකෙහි දබ්බසම්භාරෙ ආහරාපෙත්වා, ථම්භුස්සාපනාදීනි කරොන්තා, උච්චාසද්දා මහාසද්දා එකකොලාහලං අකංසු. සත්ථා ගන්ධකුටිතො නික්ඛම්ම පමුඛෙ ඨත්වා ‘‘කෙ පන තෙ, ආනන්ද, උච්චාසද්දා මහාසද්දා කෙවට්ටා මඤ්ඤෙ මච්ඡවිලොපෙ’’ති?, පුච්ඡි. තිත්ථියා, භන්තෙ, ජෙතවනසමීපෙ තිත්ථියාරාමං කරොන්තීති. ආනන්ද, ඉමෙ සාසනෙන පටිවිරුද්ධා භික්ඛුසඞ්ඝස්ස අඵාසුවිහාරං කරිස්සන්ති, රඤ්ඤො ආරොචෙත්වා වාරාපෙහීති. त्यांनी जाऊन, आपल्या उपासकांकडून बांधकाम साहित्य आणवून, खांब उभे करणे इत्यादी कामे करताना मोठा आवाज व गोंधळ केला. शास्ते गंधकुटीतून बाहेर पडून प्रवेशद्वाराजवळ उभे राहिले आणि त्यांनी विचारले, “आनंदा, मासे पकडणाऱ्या कोळ्यांप्रमाणे हा मोठा आवाज आणि गोंधळ कोणाचा आहे?” आनंदाने उत्तर दिले, “भंते, तीर्थिक जेतवनाजवळ तीर्थिकांचा आराम बांधत आहेत.” भगवान म्हणाले, “आनंदा, हे शासनाचे विरोधी लोक भिक्खू संघाला त्रासदायक ठरतील. राजाला सांगून त्यांना अडव.” ථෙරො භික්ඛුසඞ්ඝෙන සද්ධිං ගන්ත්වා රාජද්වාරෙ අට්ඨාසි. රඤ්ඤො ‘‘ථෙරා, දෙව, ආගතා’’ති නිවෙදයිංසු. රාජා ලඤ්ජස්ස ගහිතත්තා න නික්ඛමි. ථෙරා ගන්ත්වා සත්ථු ආරොචයිංසු. සත්ථා සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානෙ පෙසෙසි. රාජා තෙසම්පි දස්සනං න අදාසි. තෙ ආගන්ත්වා සත්ථු ආරොචයිංසු ‘‘න, භන්තෙ, රාජා නික්ඛන්තො’’ති. සත්ථා තඞ්ඛණංයෙව බ්යාකාසි – ‘‘අත්තනො රජ්ජෙ ඨත්වා කාලං කාතුං න ලභිස්සතී’’ති. स्थवीर (आनंद) भिक्खू संघासह जाऊन राजद्वारी उभे राहिले. सेवकांनी राजाला सांगितले, “महाराज, स्थवीर आले आहेत.” राजाने लाच घेतलेली असल्यामुळे तो बाहेर आला नाही. स्थविरांनी परत जाऊन शास्त्यांना हे सांगितले. शास्त्यांनी सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान यांना पाठवले. राजाने त्यांनाही भेट दिली नाही. त्यांनी परत येऊन शास्त्यांना सांगितले, “भंते, राजा बाहेर आला नाही.” शास्त्यांनी त्याच क्षणी भाकीत केले— “हा राजा स्वतःच्या राज्यात राहून मृत्यू पावणार नाही.” දුතියදිවසෙ ච සාමංයෙව භික්ඛුසඞ්ඝපරිවාරො ගන්ත්වා රාජද්වාරෙ අට්ඨාසි. රාජා ‘‘සත්ථා ආගතො’’ති සුත්වා නික්ඛමිත්වා, නිවෙසනං පවෙසෙත්වා, සාරපල්ලඞ්කෙ නිසීදාපෙත්වා, යාගුඛජ්ජකං අදාසි. සත්ථා පරිභුත්තයාගුඛාදනීයො ‘‘යාව භත්තං නිට්ඨාති, තාව සත්ථු සන්තිකෙ නිසීදිස්සාමී’’ති ආගන්ත්වා නිසින්නං රාජානං ‘‘තයා, මහාරාජ, ඉදං නාම කත’’න්ති අවත්වා, ‘‘කාරණෙනෙව නං සඤ්ඤාපෙස්සාමී’’ති ඉදං අතීතකාරණං ආහරි – මහාරාජ, පබ්බජිතෙ නාම අඤ්ඤමඤ්ඤං යුජ්ඣාපෙතුං න වට්ටති. අතීතෙපි ඉසයො අඤ්ඤමඤ්ඤං යුජ්ඣාපෙත්වා සහ රට්ඨෙන රාජා සමුද්දං පවිට්ඨොති. කදා භගවාති? दुसऱ्या दिवशी भगवान स्वतः भिक्खू संघासह राजद्वारी गेले. “शास्ते आले आहेत” हे ऐकून राजा बाहेर आला, त्यांना महालात घेऊन गेला, श्रेष्ठ आसनावर बसवले आणि पेज व खाद्यपदार्थ दिले. शास्त्यांनी पेज व खाद्याचे सेवन केल्यानंतर, “जोपर्यंत भोजन संपत नाही, तोपर्यंत शास्त्यांच्या जवळ बसेन” असे म्हणून जवळ येऊन बसलेल्या राजाला, “महाराज, तुम्ही असे कृत्य केले आहे” असे थेट न सांगता, “एखाद्या उदाहरणानेच त्याला समजावून सांगेन” असा विचार करून भूतकाळातील ही कथा सांगितली— “महाराज, प्रवृज्जितांना (संन्याशांना) परस्परांशी भांडायला लावणे योग्य नाही. भूतकाळातही ऋषींना परस्परांशी भांडायला लावून एक राजा आपल्या राष्ट्रासह समुद्रात बुडाला होता.” राजाने विचारले, “भंते, हे कधी घडले?” අතීතෙ, මහාරාජ, භරුරට්ඨෙ භරුරාජා නාම රජ්ජං කාරෙති. පඤ්චසතා පඤ්චසතා ද්වෙ ඉසිගණා පබ්බතපාදතො ලොණම්බිලසෙවනත්ථාය භරුනගරං ගන්ත්වා නගරස්ස අවිදූරෙ ද්වෙ රුක්ඛා අත්ථි, පඨමං ආගතො ඉසිගණො එකස්ස රුක්ඛස්ස මූලෙ නිසීදි, පච්ඡාගතොපි එකස්සාති. තෙ යථාභිරන්තං විහරිත්වා පබ්බතපාදං එව අගමංසු. තෙ පුන ආගච්ඡන්තාපි අත්තනො රුක්ඛමූලෙයෙව නිසීදන්ති. අද්ධානෙ ගච්ඡන්තෙ එකො රුක්ඛො සුක්ඛි, තස්මිං සුක්ඛෙ ආගතා තාපසා ‘‘අයං රුක්ඛො මහා, අම්හාකම්පි තෙසම්පි [Pg.315] පහොස්සතී’’ති ඉතරෙසං රුක්ඛමූලස්ස එකපදෙසෙ නිසීදිංසු. තෙ පච්ඡා ආගච්ඡන්තා රුක්ඛමූලං අපවිසිත්වා බහි ඨිතාව ‘‘කස්මා තුම්හෙ එත්ථ නිසීදථා’’ති ආහංසු. ආචරියා අම්හාකං රුක්ඛො සුක්ඛො, අයං රුක්ඛො මහා, තුම්හෙපි පවිසථ, තුම්හාකම්පි අම්හාකම්පි පහොස්සතීති. තෙ ‘‘න මයං පවිසාම, නික්ඛමථ තුම්හෙ’’ති කථං වඩ්ඪෙත්වා ‘‘න තුම්හෙ අත්තනොව මනෙන නික්ඛමිස්සථා’’ති හත්ථාදීසු ගහෙත්වා නික්කඩ්ඪිංසු. තෙ ‘‘හොතු සික්ඛාපෙස්සාම නෙ’’ති ඉද්ධියා සොවණ්ණමයානි ද්වෙ චක්කානි රජතමයඤ්ච අක්ඛං මාපෙත්වා පවට්ටෙන්තා රාජද්වාරං අගමිංසු. රඤ්ඤො ‘‘එවරූපං, දෙව, තාපසා පණ්ණාකාරං ගහෙත්වා ඨිතා’’ති නිවෙදයිංසු. රාජා තුට්ඨො ‘‘පක්කොසථා’’ති තෙ පක්කොසාපෙත්වා ‘‘මහාකම්මං තුම්හෙහි කතං, අත්ථි වො කිඤ්චි මයා කත්තබ්බ’’න්ති ආහ. ආම, මහාරාජ, අම්හාකං නිසින්නට්ඨානං එකරුක්ඛමූලං අත්ථි, තං අඤ්ඤෙහි ඉසීහි ගහිතං, තං නො දාපෙහීති. රාජා පුරිසෙ පෙසෙත්වා තාපසෙ නික්කඩ්ඪාපෙසි. भूतकाळात, हे महाराज, भरू देशात भरू नावाचा राजा राज्य करत होता. पाचशे-पाचशे जणांचे दोन ऋषींचे संघ हिमालयाच्या पायथ्यापासून आंबट व खारट पदार्थांचे सेवन करण्यासाठी भरू नगरात गेले. नगराच्या जवळच दोन वृक्ष होते. आधी आलेल्या ऋषींच्या संघाने एका वृक्षाच्या मुळाशी आसन ग्रहण केले, आणि नंतर आलेल्या संघाने दुसऱ्या वृक्षाच्या खाली. ते आपल्या इच्छेनुसार राहून पुन्हा हिमालयाच्या पायथ्याशी निघून गेले. जेव्हा ते पुन्हा आले, तेव्हाही ते आपापल्या वृक्षाच्या खालीच बसले. काळ सरत गेला तसा एक वृक्ष सुकला. तो सुकल्यावर तिथे आलेल्या तपस्वींनी विचार केला, 'हा वृक्ष मोठा आहे, हा आम्हांला आणि त्यांनाही पुरेसा होईल.' असे म्हणून ते दुसऱ्या ऋषींच्या वृक्षाच्या एका भागात बसले. नंतर आलेले ऋषी वृक्षाच्या खाली प्रवेश न करता बाहेरच उभे राहिले आणि म्हणाले, 'तुम्ही येथे का बसला आहात?' (तेव्हा ते म्हणाले) 'आचार्य, आमचा वृक्ष सुकला आहे. हा वृक्ष मोठा आहे, तुम्हीही यात या, हा तुम्हांला आणि आम्हांलाही पुरेसा होईल.' ते म्हणाले, 'आम्ही प्रवेश करणार नाही, तुम्ही बाहेर पडा.' अशा प्रकारे वाद वाढवून, 'तुम्ही स्वतःच्या इच्छेने बाहेर पडणार नाही का?' असे म्हणत त्यांनी त्यांचे हात इत्यादी पकडून त्यांना बाहेर ओढले. ते (बाहेर काढलेले ऋषी) म्हणाले, 'असू द्या, आम्ही यांना धडा शिकवू.' त्यांनी ऋद्धीने (अलौकिक शक्तीने) सोन्याची दोन चाके आणि चांदीचा कणा निर्माण केला आणि तो फिरवत राजद्वारी गेले. राजाला सांगण्यात आले, 'हे देवा, तपस्वी असा उपहार घेऊन उभे आहेत.' राजा प्रसन्न झाला आणि म्हणाला, 'त्यांना बोलवा.' त्यांना बोलावून राजा म्हणाला, 'तुम्ही मोठे कार्य केले आहे. माझ्याकडून आपल्यासाठी काही करण्यासारखे आहे का?' ते म्हणाले, 'होय, महाराज, आमचे बसण्याचे ठिकाण असलेला एक वृक्ष आहे, तो इतर ऋषींनी बळकावला आहे. तो आम्हांला मिळवून द्या.' राजाने आपल्या माणसांना पाठवून त्या तपस्वींना तिथून बाहेर काढले. තෙ බහි ඨිතා ‘‘කිං නු ඛො දත්වා ලභිංසූ’’ති ඔලොකයමානා ‘‘ඉදං නාමා’’ති දිස්වා ‘‘මයම්පි ලඤ්ජං දත්වා පුන ගණ්හිස්සාමා’’ති ඉද්ධියා සොවණ්ණමයං රථපඤ්ජරං මාපෙත්වා ආදාය අගමංසු. රාජා දිස්වා තුට්ඨො – ‘‘කිං, භන්තෙ, කාතබ්බ’’න්ති?, ආහ. මහාරාජ අම්හාකං රුක්ඛමූලෙ අඤ්ඤො ඉසිගණො නිසින්නො, තං නො රුක්ඛමූලං දාපෙහීති. රාජා පුරිසෙ පෙසෙත්වා තෙ නික්කඩ්ඪාපෙසි. තාපසා අඤ්ඤමඤ්ඤං කලහං කත්වා, ‘‘අනනුච්ඡවිකං අම්හෙහි කත’’න්ති විප්පටිසාරිනො හුත්වා පබ්බතපාදමෙව අගමංසු. තතො දෙවතා ‘‘අයං රාජා ද්වින්නං ඉසිගණානං හත්ථතො ලඤ්ජං ගහෙත්වා අඤ්ඤමඤ්ඤං කලහං කාරාපෙසී’’ති කුජ්ඣිත්වා මහාසමුද්දං උබ්බට්ටෙත්වා තස්ස රඤ්ඤො විජිතං යොජනසහස්සමත්තට්ඨානං සමුද්දමෙව අකංසූති. ते बाहेर उभे राहून, 'त्यांनी नक्की काय देऊन हे मिळवले?' असे पाहू लागले. 'हे (सोन्याची चाके व चांदीचा कणा) दिले आहे' हे पाहून ते म्हणाले, 'आम्हीही लाच देऊन ते पुन्हा मिळवू.' त्यांनी ऋद्धीने सोन्याचा रथपिंजरा निर्माण केला आणि तो घेऊन ते गेले. राजा ते पाहून प्रसन्न झाला आणि म्हणाला, 'भंते, काय करावे?' ते म्हणाले, 'महाराज, आमच्या वृक्षाच्या खाली दुसरा ऋषींचा संघ बसला आहे, तो वृक्ष आम्हांला मिळवून द्या.' राजाने माणसांना पाठवून त्यांना बाहेर काढले. अशा प्रकारे त्या तपस्वींनी आपापसात कलह केला आणि नंतर 'आम्ही हे अयोग्य कार्य केले' असे म्हणून पश्चात्ताप करत ते हिमालयाच्या पायथ्याशी निघून गेले. त्यानंतर, 'या राजाने दोन्ही ऋषींच्या संघांकडून लाच घेऊन त्यांच्यात आपापसात कलह घडवून आणला,' या विचाराने क्रुद्ध होऊन देवतेने महासमुद्राला उधाण आणले आणि त्या राजाचे एक हजार योजन विस्तीर्ण असलेले राज्य समुद्रात बुडवून टाकले. ‘‘ඉසීනමන්තරං කත්වා, භරුරාජාති මෙ සුතං; උච්ඡින්නො සහ රට්ඨෙහි, ස රාජා විභවඞ්ගතො’’ති. (ජා. 1.2.125) – 'ऋषींमध्ये कलह निर्माण करून भरू राजा आपल्या राष्ट्रासह नष्ट झाला आणि तो राजा विनाशाला प्राप्त झाला, असे मी ऐकले आहे.' එවං භගවතා ඉමස්මිං අතීතෙ දස්සිතෙ යස්මා බුද්ධානං නාම කථා ඔකප්පනියා හොති, ‘‘තස්මා රාජා අත්තනො කිරියං සල්ලක්ඛෙත්වා අනුපධාරෙත්වා [Pg.316] මයා අකත්තබ්බං කම්මං කත’’න්ති ‘‘ගච්ඡථ, භණෙ, තිත්ථියෙ නික්කඩ්ඪථා’’ති නික්කඩ්ඪාපෙත්වා චින්තෙසි – ‘‘මයා කාරිතො විහාරො නාම නත්ථි, තස්මිංයෙව ඨානෙ විහාරං කාරෙස්සාමී’’ති තෙසං දබ්බසම්භාරෙපි අදත්වා විහාරං කාරෙසි. තං සන්ධායෙතං වුත්තං. अशा प्रकारे भगवंतांनी हा भूतकाळातील प्रसंग दाखवून दिला असता, बुद्धवचन हे अत्यंत विश्वासार्ह व श्रद्धा ठेवण्याजोगे असल्याने, राजाने स्वतःच्या कृत्याचा विचार केला आणि विचार न करता 'माझ्याकडून न करण्याजोगे कृत्य घडले आहे' असे समजून संवेग प्राप्त केला. तो म्हणाला, 'अरे लोकांनो, जा आणि त्या तिर्थिकांना बाहेर काढा.' त्यांना बाहेर काढून त्याने विचार केला, 'मी बांधलेला कोणताही विहार अस्तित्वात नाही, म्हणून मी त्याच ठिकाणी विहार बांधेन.' त्याने त्या तिर्थिकांचे बांधकाम साहित्यही न देता तिथे विहार बांधला. याच संदर्भाने हे म्हटले गेले आहे. 2-3. බ්රාහ්මණසුත්තාදිවණ්ණනා २-३. ब्राह्मणसुत्त इत्यादींचे वर्णन. 1008-9. දුතියෙ උදයගාමිනින්ති අත්තනො සමයෙ වඩ්ඪිගාමිනිං. මරණං ආගමෙය්යාසීති මරණං ඉච්ඡෙය්යාසි, පත්ථෙය්යාසි වා. තතියං උත්තානමෙව. १००८-९. दुसऱ्या सुत्तात, 'उदयगामिनीं' म्हणजे स्वतःच्या सिद्धांतात वृद्धी घडवून आणणारी (प्रगतीकडे नेणारी साधना). 'मरणं आगमेय्यासि' म्हणजे मृत्यूची इच्छा करावी किंवा मृत्यूची आकांक्षा करावी. तिसरे सुत्त अगदी स्पष्ट आहे. 4. දුග්ගතිභයසුත්තවණ්ණනා ४. दुग्गतिभयसुत्ताचे वर्णन. 1010. චතුත්ථෙ සබ්බදුග්ගතිභයං සමතික්කන්තොති මනුස්සදොභග්ගං පටික්ඛිත්තං. १०१०. चौथ्या सुत्तात, 'सब्बदुग्गतिभयं समतिक्कंतो' या पदाने मानवी जीवनातील दुर्भाग्य किंवा दरिद्री अवस्था नाकारली आहे. 5. දුග්ගතිවිනිපාතභයසුත්තවණ්ණනා ५. दुग्गतिविनिपातभयसुत्ताचे वर्णन. 1011. පඤ්චමෙ සබ්බදුග්ගතිවිනිපාතභයං සමතික්කන්තොති මනුස්සදොභග්ගෙන සද්ධිං චත්තාරො අපායා පටික්ඛිත්තා. १०११. पाचव्या सुत्तात, 'सब्बदुग्गतिविनिपातभयं समतिक्कंतो' या पदाने मानवी दुर्भाग्यासोबतच चार अपाय नाकारले आहेत. 6. පඨමමිත්තාමච්චසුත්තවණ්ණනා ६. प्रथम मित्तआमच्चसुत्ताचे वर्णन. 1012. ඡට්ඨෙ මිත්තාති අඤ්ඤමඤ්ඤස්ස ගෙහෙ ආමිසපරිභොගවසෙන වොහාරමිත්තා. අමච්චාති ආමන්තනපටිමන්තනඉරියාපථාදීසු එකතො පවත්තකිච්චා. ඤාතීති සස්සුසසුරපක්ඛිකා. සාලොහිතාති සමානලොහිතා භාතිභගිනිමාතුලාදයො. १०१२. सहाव्या सुत्तात, 'मित्ता' म्हणजे एकमेकांच्या घरी आमिष उपभोगण्याच्या व्यवहाराने जोडलेले मित्र. 'अमच्चा' म्हणजे संभाषण, प्रत्युत्तर आणि हालचाली इत्यादींमध्ये एकत्र काम करणारे सहकारी. 'ज्ञाती' म्हणजे सासू-सासऱ्यांच्या बाजूचे नातेवाईक. 'सालोहिता' म्हणजे समान रक्ताचे नातेवाईक, जसे की भाऊ, बहीण, मामा इत्यादी. 7. දුතියමිත්තාමච්චසුත්තවණ්ණනා ७. द्वितीय मित्तआमच्चसुत्ताचे वर्णन. 1013. සත්තමෙ අඤ්ඤථත්තං නාම පසාදඤ්ඤථත්තං භාවඤ්ඤථත්තං ගතිඅඤ්ඤථත්තං ලක්ඛණඤ්ඤථත්තං විපරිණාමඤ්ඤථත්තන්ති අනෙකවිධං. තත්ථ මහාභූතෙසු භාවඤ්ඤථත්තං අධිප්පෙතං. සුවණ්ණාදිභාවෙන හි ඝනසණ්ඨිතාය පථවිධාතුයා විලීයිත්වා උදකභාවං ආපජ්ජමානාය පුරිමභාවො විගච්ඡති, භාවඤ්ඤථත්තං පඤ්ඤායති. ලක්ඛණං පන න විගච්ඡති, කක්ඛළලක්ඛණාව හොති. උච්ඡුරසාදිභාවෙන ච යූසාකාරසණ්ඨිතාය ආපොධාතුයා [Pg.317] සුස්සිත්වා ඝනපථවිභාවං ආපජ්ජමානාය පුරිමභාවො විගච්ඡති, භාවඤ්ඤථත්තං පඤ්ඤායති. ලක්ඛණං පන න විගච්ඡති, ආබන්ධනලක්ඛණාව හොති. තත්රිදං අඤ්ඤථත්තන්ති එත්ථ පන ගතිඅඤ්ඤථත්තං අධිප්පෙතං, තඤ්හි අරියසාවකස්ස නත්ථි. පසාදඤ්ඤථත්තම්පි නත්ථියෙව, ඉධ පන පසාදඵලං පකාසෙතුං ගතිඅඤ්ඤථත්තමෙව දස්සිතං. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. १०१३. सातव्या सुत्तात, 'अञ्ञथत्तं' (अन्यथाभाव) म्हणजे प्रसादाचा अन्यथाभाव, भावाचा अन्यथाभाव, गतीचा अन्यथाभाव, लक्षणाचा अन्यथाभाव आणि विपरिणामाचा अन्यथाभाव अशा अनेक प्रकारचा आहे. त्यापैकी, महाभूतांच्या संदर्भात 'भावाचा अन्यथाभाव' अभिप्रेत आहे. कारण सोन्यासारख्या घन स्वरूपात असलेल्या पृथ्वीधातूचा वितळवून द्रव स्वरूपात बदल झाल्यावर त्याचा पूर्वीचा घनभाव नष्ट होतो आणि भावाचा अन्यथाभाव दिसून येतो. परंतु त्याचे लक्षण नष्ट होत नाही, ते कठीणपणाचे लक्षण (कक्खळलक्खण) तसेच राहते. तसेच, उसाच्या रसासारख्या द्रव स्वरूपात असलेल्या आपोधातूचे सुकवून घन पृथ्वीधातूच्या स्वरूपात रूपांतर झाल्यावर त्याचा पूर्वीचा द्रवभाव नष्ट होतो आणि भावाचा अन्यथाभाव दिसून येतो. परंतु त्याचे लक्षण नष्ट होत नाही, ते बंधनाचे लक्षण (आबंधनलक्खण) तसेच राहते. 'तत्रिदं अञ्ञथत्तं' या वाक्यात मात्र 'गतीचा अन्यथाभाव' अभिप्रेत आहे, जो आर्यश्रावकाच्या बाबतीत नसतो. त्यांच्यात प्रसादाचा अन्यथाभावही नसतोच. परंतु येथे प्रसादाचे फळ प्रकट करण्यासाठी केवळ गतीचा अन्यथाभाव दाखवला आहे. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. රාජකාරාමවග්ගො දුතියො. राजकारामवग्गो दुसरा समाप्त. 3. සරණානිවග්ගො ३. सरळानीवग्गो (शरणानीवर्ग). 1-2. පඨමමහානාමසුත්තාදිවණ්ණනා १-२. प्रथम महानामसुत्त इत्यादींचे वर्णन. 1017-18. තතියස්ස පඨමෙ ඉද්ධන්ති තෙලමධුඵාණිතාදීහි සමිද්ධං. ඵීතන්ති හත්ථූපගසීසූපගගීවූපගාදිඅලඞ්කාරවසෙන සුපුප්ඵිතං. ආකිණ්ණමනුස්සන්ති නිරන්තරමනුස්සං. සම්බාධබ්යූහන්ති බ්යූහා වුච්චන්ති අවිනිබ්බිද්ධරච්ඡායො, යා පවිට්ඨමග්ගෙනෙව නිග්ගච්ඡන්ති, තා සම්බාධා බ්යූහා බහුකා එත්ථාති සම්බාධබ්යූහං. ඉමිනාපි නගරස්ස ඝනවාසමෙව දීපෙති. භන්තෙනාති ඉතො චිතො ච පරිබ්භමන්තෙන උද්ධතචාරිනා. දුතියං උත්තානමෙව. १०१७-१८. तिसऱ्या वर्गाच्या पहिल्या सुत्तात, 'इद्धं' म्हणजे तेल, मध, गूळ इत्यादींनी समृद्ध. 'फीतं' म्हणजे हातातील, डोक्यावरील, गळ्यातील इत्यादी अलंकारांमुळे चांगल्या प्रकारे फुललेल्या फुलासारखे शोभिवंत. 'आकिण्णमनुस्सं' म्हणजे माणसांनी गच्च भरलेले. 'सम्बाधब्यूहं' या पदात, ज्या गल्ल्यांमधून प्रवेश केला त्याच मार्गाने बाहेर पडावे लागते अशा बंद गल्ल्यांना 'ब्यूह' म्हणतात. अशा अरुंद आणि अनेक बंद गल्ल्या या नगरात असल्याने त्याला 'सम्बाधब्यूह' म्हटले आहे. या पदाने देखील कपिलवस्तू नगराची दाट वस्तीच दर्शवली आहे. 'भंतेन' म्हणजे इकडे तिकडे भटकणाऱ्या चंचल वृत्तीच्या माणसाने. दुसरे सुत्त अगदी स्पष्ट आहे. 3. ගොධසක්කසුත්තවණ්ණනා ३. गोधसक्कसुत्ताचे वर्णन. 1019. තතියෙ භගවාව එතං ජානෙය්ය එතෙහි ධම්මෙහි සමන්නාගතං වා අසමන්නාගතං වාති ඉදං සො සක්කො තීහි ධම්මෙහි සමන්නාගතස්ස පුග්ගලස්ස සොතාපන්නභාවං, චතූහි වා ධම්මෙහි සමන්නාගතස්ස සොතාපන්නභාවං භගවාව ජානාතීති අධිප්පායෙන ආහ. १०१९. तिसऱ्या सूत्तात, 'भगवंतांनीच हे जाणावे की तो या धर्मांनी युक्त आहे की अयुक्त आहे' हे वाक्य त्या शाक्य गोधाने या अभिप्रायाने म्हटले की, तीन धर्मांनी (रत्नत्रयावरील प्रसादाने) युक्त असलेल्या पुद्गलाची सोतापन्न अवस्था किंवा चार धर्मांनी युक्त असलेल्या पुद्गलाची सोतापन्न अवस्था केवळ भगवानच जाणतात. කොචිදෙව ධම්මසමුප්පාදො උප්පජ්ජෙය්යාති කිඤ්චිදෙව කාරණං උප්පජ්ජෙය්ය. එකතො අස්ස භගවා, එකතො භික්ඛුසඞ්ඝොති යස්මිං කාරණෙ උප්පන්නෙ භගවා භික්ඛුසඞ්ඝෙන නානාලද්ධිකො හුත්වා එකං වාදං වදන්තො එකතො අස්ස, භික්ඛුසඞ්ඝොපි එකං වදන්තො එකතොති [Pg.318] අත්ථො. තෙනෙවාහන්ති යං වාදං තුම්හෙ වදෙථ, තමෙවාහං ගණ්හෙය්යන්ති. නනු ච අරියසාවකස්ස රතනත්තයෙ පසාදනානත්තං නත්ථි, අථ කස්මා එස එවමාහාති? භගවතො සබ්බඤ්ඤුතාය. එවඤ්හිස්ස හොති ‘‘භික්ඛුසඞ්ඝො අත්තනො අසබ්බඤ්ඤුතාය අජානිත්වාපි කථෙය්ය, සත්ථු පන අඤ්ඤාණං නාම නත්ථී’’ති. තස්මා එවමාහ. අඤ්ඤත්ර කල්යාණා අඤ්ඤත්ර කුසලාති කල්යාණමෙව කුසලමෙව වදාමි, න කල්යාණකුසලවිමුත්තන්ති. අපිචස්ස අනවජ්ජනදොසො එසොති. 'कोचिदेव धम्मसमुप्पादो उप्पज्जेय्या' म्हणजे एखादे कारण उत्पन्न व्हावे. 'एकतो अस्स भगवा, एकतो भिक्खुसंघो' याचा अर्थ असा की, ज्या कारणाच्या उपस्थितीत भगवान भिक्खू संघापेक्षा भिन्न मत ठेवून एका बाजूला असतील आणि भिक्खू संघही आपले एक मत मांडत दुसऱ्या बाजूला असेल. 'तेनेवाहं' म्हणजे 'जे मत आपण मांडाल, तेच मी स्वीकारेन' असा अभिप्राय समजावा. 'पण आर्य श्रावकाची रत्नत्रयावरील श्रद्धेमध्ये भिन्नता नसते, मग याने असे का म्हटले?' भगवंतांच्या सर्वज्ञतेमुळे. त्याच्या मनात असा विचार येतो की, 'भिक्खू संघ आपल्या असर्वज्ञतेमुळे न जाणताही बोलू शकेल, परंतु शास्त्यांचे (बुद्धांचे) अज्ञान असे काही नसते.' म्हणून त्याने असे म्हटले. 'अञ्ञत्र कल्याणा अञ्ञत्र कुसला' म्हणजे मी केवळ कल्याणकारक आणि कुशलच बोलतो, कल्याण व कुशल यांपासून मुक्त असे बोलत नाही. शिवाय, हा त्याचा दोष निर्दोष (दोषरहित) मानला पाहिजे. 4. පඨමසරණානිසක්කසුත්තවණ්ණනා ४. प्रथम सरणानि सक्क सुत्त वर्णन. 1020. චතුත්ථෙ ඉධ මහානාම එකච්චො පුග්ගලොති ඉදං න කෙවලං සරණානි එව අපායතො මුත්තො, ඉමෙපි පුග්ගලා මුත්තාති දස්සෙතුං ආරද්ධං. මත්තසො නිජ්ඣානං ඛමන්තීති පමාණෙන ච ඔලොකනං ඛමන්ති. ඉමිනා ධම්මානුසාරිමග්ගට්ඨපුග්ගලං දස්සෙති. අගන්තා නිරයන්ති මග්ගට්ඨපුග්ගලො හි අපායතො පරිමුත්තොති වා පරිමුච්චිස්සතීති වා වත්තුං න වට්ටති, පරිමුච්චතීති පන වත්තුං වට්ටති. යස්මා ච පරිමුච්චති, තස්මා ගන්තා නාම න හොතීති, ‘‘අගන්තා’’ති වුත්තො, න ගච්ඡතීති අත්ථො. සද්ධාමත්තං පෙමමත්තන්ති ඉමිනා සද්ධානුසාරිමග්ගට්ඨපුග්ගලං දස්සෙති. මහාසාලාති සමීපෙ ඨිතෙව චත්තාරො මහාසාරරුක්ඛෙ දස්සෙන්තො ආහ. මරණකාලෙ සික්ඛං සමාදියීති මරණසමයෙ තීසු සික්ඛාසු පරිපූරකාරී අහොසීති දස්සෙති. १०२०. चौथ्या सूत्तात, 'इध महानाम एकच्चो पुग्गलो' हे केवळ सरणानि (शाक्य) च दुर्गतीपासून मुक्त झाला आहे असे नाही, तर हे पुद्गलही मुक्त झाले आहेत, हे दर्शवण्यासाठी सुरू केले आहे. 'मत्तसो निज्झानं खमन्ति' म्हणजे मर्यादित प्रमाणाने सत्याचे अवलोकन करणे त्यांना रुचते. याद्वारे 'धम्मानुसारी' मार्गस्थ पुद्गलाला दर्शवले आहे. 'अगन्ता निरयं' कारण मार्गस्थ पुद्गल दुर्गतीपासून पूर्णपणे मुक्त झाला आहे किंवा मुक्त होईल असे म्हणणे योग्य नाही, तर तो 'मुक्त होत आहे' असे म्हणणे योग्य आहे. आणि ज्याअर्थी तो मुक्त होत आहे, त्याअर्थी तो (नरकात) जाणारा नसतो, म्हणून त्याला 'अगन्ता' (न जाणारा) म्हटले आहे, म्हणजेच तो जात नाही असा अर्थ आहे. 'सद्धापत्तं पेममत्तं' याद्वारे 'सद्धानुसारी' मार्गस्थ पुद्गलाला दर्शवले आहे. 'महासाला' असे जवळच असलेल्या चार मोठ्या साल वृक्षांना दर्शवत म्हटले आहे. 'मरणकाले सिक्खं समादियी' म्हणजे मरणसमयी तो तीन शिक्षांमध्ये परिपूर्णता आणणारा झाला, हे दर्शवले आहे. 5. දුතියසරණානිසක්කසුත්තවණ්ණනා ५. द्वितीय सरणानि सक्क सुत्त वर्णन. 1021. පඤ්චමෙ දුක්ඛෙත්තන්ති විසමඛෙත්තං. දුබ්භූමන්ති ඌසරභූමිං ලොණූපහතං. ඛණ්ඩානීති පරිභින්නානි. පූතීනීති උදකෙන තෙමෙත්වා පූතිභාවං ආපන්නානි. වාතාතපහතානීති වාතාතපෙන හතත්තා නිරොජභාවං ගතානි. අසාරාදානීති අනාදින්නසාරානි අගහිතසාරානි. අසුඛසයිතානීති න කොට්ඨාදීසු පක්ඛිපිත්වා සුට්ඨු ඨපිතානි. සුඛසයිතානීති ඨපිතට්ඨානතො චත්තාරො මාසෙ අචලිතානි. १०२१. पाचव्या सूत्तात, 'दुक्खेत्तं' म्हणजे विषम (नापीक) शेत. 'दुब्भूमं' म्हणजे खारट किंवा नापीक जमीन (उषर भूमी). 'खण्डानि' म्हणजे तुकडे झालेले (तुटलेले). 'पूतीनि' म्हणजे पाण्याने भिजून सडलेले. 'वातातपहातानि' म्हणजे वारा आणि ऊन यांच्यामुळे नष्ट होऊन सत्त्वहीन झालेले. 'असारादानि' म्हणजे ज्यांचे सार (गाभा) घेतले गेले नाही किंवा जे निरुपयोगी आहेत. 'असुखसयितानि' म्हणजे जे कोठारांमध्ये व्यवस्थित ठेवलेले नाहीत. 'सुखसयितानि' म्हणजे ठेवलेल्या जागेवरून चार महिने न हलवलेले. 6. පඨමඅනාථපිණ්ඩිකසුත්තවණ්ණනා ६. प्रथम अनाथपिंडिक सुत्त वर्णन. 1022. ඡට්ඨෙ [Pg.319] ඨානසො වෙදනා පටිප්පස්සම්භෙය්යාති ඛණෙන වෙදනා පටිප්පස්සම්භෙය්ය. මිච්ඡාඤාණෙනාති මිච්ඡාපච්චවෙක්ඛණෙන මිච්ඡාවිමුත්තියාති අනිය්යානිකවිමුත්තියා. තස්මා සද්ධඤ්ච සීලඤ්චාති ගාථා වුත්තත්ථා එව. යත්ර හි නාමාති යො නාම. १०२२. सहाव्या सूत्तात, 'ठाणसो वेदना पटिप्पस्सम्भေय्युं' म्हणजे एका क्षणात वेदना शांत व्हाव्यात. 'मिच्छाञाणेन' म्हणजे चुकीच्या प्रत्यवेक्षणाने (चिंतनाने). 'मिच्छाविमुत्तिया' म्हणजे संसारमुक्त न करणाऱ्या विमुक्तीने. 'तस्मा सद्धञ्च सीलञ्च' ही गाथा पूर्वीच स्पष्ट केलेल्या अर्थाची आहे. 'यत्र हि नाम' म्हणजे जे काही. 7. දුතියඅනාථපිණ්ඩිකසුත්තවණ්ණනා ७. द्वितीय अनाथपिंडिक सुत्त वर्णन. 1023. සත්තමෙ සම්පරායිකං මරණභයන්ති සම්පරායහෙතුකං මරණභයං ගිහිසාමීචිකානීති ගිහීනං අනුච්ඡවිකානි. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. १०२३. सातव्या सूत्तात, 'सम्परायिकं मरणभयं' म्हणजे परलोकाशी संबंधित मरणभय. 'गिहिसामीचिकानि' म्हणजे गृहस्थांना अनुरूप असणारे. उर्वरित सर्व भाग सर्व सूत्तांमध्ये स्पष्टच आहे. සරණානිවග්ගො තතියො. सरणानि वर्ग तिसरा. 4. පුඤ්ඤාභිසන්දවග්ගො ४. पुण्याभिसंद वर्ग. 1. පඨමපුඤ්ඤාභිසන්දසුත්තවණ්ණනා १. प्रथम पुण्याभिसंद सुत्त वर्णन. 1027. චතුත්ථස්ස පඨමෙ පුඤ්ඤාභිසන්දා කුසලාභිසන්දාති පුඤ්ඤනදියො කුසලනදියො. සුඛස්සාහාරාති සුඛස්ස පච්චයා. १०२७. चौथ्या वर्गाच्या पहिल्या सूत्तात, 'पुञ्ञाभिसन्दा कुसलाभिसन्दा' म्हणजे पुण्याची नदी आणि कुशलाची नदी. 'सुखस्साहारा' म्हणजे सुखाचे प्रत्यय (कारण). 4. පඨමදෙවපදසුත්තවණ්ණනා ४. प्रथम देवपद सुत्त वर्णन. 1030. චතුත්ථෙ දෙවපදානීති දෙවානං ඤාණෙන, දෙවස්ස වා ඤාණෙන අක්කන්තපදානි. විසුද්ධියාති විසුජ්ඣනත්ථාය. පරියොදපනායාති පුරියොදපනත්ථාය ජොතනත්ථාය. ඉමස්මිං සුත්තෙ චත්තාරොපි ඵලට්ඨපුග්ගලා විසුද්ධට්ඨෙන දෙවා නාම ජාතා. १०३०. चौथ्या सूत्तात, 'देवपदानि' म्हणजे देवांच्या (बुद्धांच्या) ज्ञानाने किंवा देवाच्या ज्ञानाने आक्रमलेले (चाललेले) मार्ग. 'विसुद्धिया' म्हणजे विशुद्धीसाठी (क्लेशांच्या शुद्धीसाठी). 'परियोदपनाय' म्हणजे सर्व बाजूंनी उजळण्यासाठी (स्वच्छतेसाठी). या सूत्तात चारही फलस्थ पुद्गल विशुद्धतेच्या अर्थाने 'देव' या संज्ञेस पात्र ठरतात. 8. වස්සසුත්තවණ්ණනා ८. वस्स सुत्त वर्णन. 1034. අට්ඨමෙ පාරංගන්ත්වාති පාරං වුච්චති නිබ්බානං, තං පත්වාති අත්ථො. ආසවානං ඛයාය සංවත්තන්තීති න පඨමං නිබ්බානං ගන්ත්වා පච්ඡා සංවත්තන්ති, ගච්ඡමානා එව සංවත්තන්ති. දෙසනා පන එවං කතා. १०३४. आठव्या सूत्तात, 'पारंगन्त्वा' म्हणजे पार (पलीकडचा तीर) निर्वाणाला म्हटले आहे, तिथे पोहोचून असा अर्थ आहे. 'आसवानं खयाय संवत्तन्ति' म्हणजे आधी निर्वाणाला जाऊन नंतर आसवांचा क्षय होतो असे नाही, तर जात असतानाच आसवांचा क्षय होतो. परंतु देशना अशा प्रकारे केली गेली आहे. 10. නන්දියසක්කසුත්තවණ්ණනා १०. नंदिय शाक्य सुत्त वर्णन. 1036. දසමෙ [Pg.320] දිවා පවිවෙකාය රත්තිං පටිසල්ලානායාති දිවා පවිවෙකත්ථාය රත්තිං පටිසල්ලානත්ථාය. ධම්මා න පාතුභවන්තීති සමථවිපස්සනා ධම්මා න උප්පජ්ජන්ති. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. १०३६. दहाव्या सूत्तात, 'दिवा पविवेकाय रत्तिं पटिसल्लानाय' म्हणजे दिवसा प्रविवेकासाठी (एकांतात सुखासाठी) आणि रात्री प्रतिसंलयनासाठी (चित्त एकाग्र करण्यासाठी). 'धम्मा न पातुभवन्ति' म्हणजे समथ आणि विपश्यना धर्म उत्पन्न होत नाहीत. उर्वरित सर्व भाग सर्व सूत्तांमध्ये स्पष्टच आहे. පුඤ්ඤාභිසන්දවග්ගො චතුත්ථො. पुण्याभिसंद वर्ग चौथा समाप्त. 5. සගාථකපුඤ්ඤාභිසන්දවග්ගො ५. सगाथक पुण्याभिसंद वर्ग. 1. පඨමඅභිඅසන්දසුත්තවණ්ණනා १. प्रथम अभिसंद सुत्त वर्णन. 1037. පඤ්චමස්ස පඨමෙ අසඞ්ඛ්යෙය්යොති ආළ්හකගණනාය අසඞ්ඛ්යෙය්යො, යොජනවසෙන පනස්ස සඞ්ඛ්යා අත්ථි. බහුභෙරවන්ති සවිඤ්ඤාණකඅවිඤ්ඤාණකානං භෙරවාරම්මණානං වසෙන බහුභෙරවං. පුථූති බහු. සවන්තීති සන්දමානා. උපයන්තීති උපගච්ඡන්ති. १०३७. पाचव्या वर्गाच्या पहिल्या सूत्तात, 'असंख्येय्यो' म्हणजे आढक (माप) च्या गणनेने असंख्येय, परंतु योजनांच्या दृष्टीने त्याची संख्या मोजता येते. 'बहुभेरवं' म्हणजे सविज्ञाणक आणि अविज्ञाणक अशा भयानक आरंभांच्या (भयानक प्राण्यांच्या) प्रभावाने अत्यंत भयानक. 'पुथू' म्हणजे पुष्कळ. 'सवन्ति' म्हणजे वाहणाऱ्या. 'उपयन्ति' म्हणजे जवळ जाणाऱ्या. 2. දුතියඅභිසන්දසුත්තවණ්ණනා २. द्वितीय अभिसंद सुत्त वर्णन. 1038. දුතියෙ යත්ථිමා මහානදියො සංසන්දන්ති සමෙන්තීති යස්මිං සංභජ්ජෙ එතා මහානදියො එකීභවන්ති, නිරන්තරා භවන්තීති අත්ථො. १०३८. दुसऱ्या सूत्तात, 'यत्थिमा महानदियो संसन्दन्ति समेन्ति' म्हणजे ज्या संगमावर या महानद्या एकत्र येतात, निरंतर वाहतात असा अर्थ आहे. 3. තතියඅභිසන්දසුත්තවණ්ණනා ३. तृतीय अभिसंद सुत्त वर्णन. 1039. තතියෙ පුඤ්ඤකාමොති පුඤ්ඤත්ථිකො. කුසලෙ පතිට්ඨිතොති මග්ගකුසලෙ පතිට්ඨිතො. භාවෙති මග්ගං අමතස්ස පත්තියාති නිබ්බානස්ස පාපුණනත්ථං අරහත්තමග්ගං භාවෙති. ධම්මසාරාධිගමොති ධම්මසාරො වුච්චති අරියඵලං ධම්මසාරො, අධිගමො අස්සාති ධම්මසාරාධිගමො, අධිගතඵලොති අත්ථො. ඛයෙ රතොති කිලෙසක්ඛයෙ රතො. १०३९. तिसऱ्या सूत्तात, 'पुञ्ञकामो' म्हणजे पुण्याची इच्छा करणारा. 'कुसले पतिट्ठितो' म्हणजे मार्गकुशलामध्ये प्रतिष्ठित असलेला. 'भावेति मग्गं अमतस्स पत्तिया' म्हणजे निर्वाण प्राप्तीसाठी अर्हत् मार्गाची भावना (अभ्यास) करतो. 'धम्मसाराधिगमो' म्हणजे धर्मसार आर्यफलाला म्हटले आहे, ज्याला हा धर्मसार प्राप्त झाला आहे तो 'धम्मसाराधिगमो' (फलप्राप्त) होय. 'खये रतो' म्हणजे क्लेशांच्या क्षयामध्ये (निर्वाणामध्ये) रममाण असणारा. 4. පඨමමහද්ධනසුත්තවණ්ණනා ४. प्रथम महद्धन सुत्त वर्णन. 1040. චතුත්ථෙ [Pg.321] අඩ්ඪො මහද්ධනොති සත්තවිධෙන අරියධනෙන අඩ්ඪො චෙව මහද්ධනො ච. තෙනෙව භොගෙන මහාභොගො. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. १०४०. चौथ्या सूत्तात, 'अड्ढो महद्धनो' म्हणजे सात प्रकारच्या आर्यधनाने समृद्ध आणि महाधनी. त्याच भोगाने (आर्यधनाच्या उपभोगाने) महाभोगी. उर्वरित सर्व भाग सर्व सूत्तांमध्ये स्पष्टच आहे. සගාථකපුඤ්ඤාභිසන්දවග්ගො පඤ්චමො. सगाथक पुण्याभिसंद वर्ग पाचवा समाप्त. 6. සප්පඤ්ඤවග්ගො ६. सप्पञ्ञ वर्ग. 2. වස්සංවුත්තසුත්තවණ්ණනා २. वस्संवुत्त सुत्त वर्णन. 1048. ඡට්ඨස්ස දුතියෙ අයමධිප්පායො – සොතාපන්නො භික්ඛු එත්තකෙන වොසානං අනාපජ්ජිත්වා තානෙව ඉන්ද්රියබලබොජ්ඣඞ්ගානි සමොධානෙත්වා විපස්සනං වඩ්ඪෙත්වා සකදාගාමිමග්ගං පාපුණිස්සති, සකදාගාමී අනාගාමිමග්ගං, අනාගාමී අරහත්තමග්ගන්ති ඉමමත්ථං සන්ධාය භගවතා ඉමස්මිං සුත්තෙ සාසනෙ තන්ති පවෙණී කථිතාති. १०४८. सहाव्या (वर्गाच्या) दुसऱ्या सूत्तात हा अभिप्राय आहे – सोतापन्न भिक्खू एवढ्यानेच प्रयत्न न सोडता (उत्साह कमी न करता), त्याच इंद्रिय, बल आणि बोज्झंगांना एकत्रित करून, विपश्यना वाढवून सकदागामी मार्गाला प्राप्त होईल; सकदागामी अनागामी मार्गाला प्राप्त होईल; अनागामी अरहत्त मार्गाला प्राप्त होईल. या अर्थाचा संदर्भ घेऊन भगवंतांनी या सूत्तात शासनातील (धम्मातील) परंपरा (तन्तिपवेणी) सांगितली आहे. 3. ධම්මදින්නසුත්තවණ්ණනා ३. धम्मदिन्नसुत्तवण्णना (धम्मदिन्न सूत्ताची व्याख्या). 1049. තතියෙ ධම්මදින්නොති සත්තසු ජනෙසු එකො. බුද්ධකාලස්මිඤ්හි ධම්මදින්නො උපාසකො, විසාඛො උපාසකො, උග්ගො ගහපති, චිත්තො ගහපති, හත්ථකො ආළවකො, චූළඅනාථපිණ්ඩිකො, මහාඅනාථපිණ්ඩිකොති ඉමෙ සත්ත ජනා පඤ්චසතඋපාසකපරිවාරා අහෙසුං. එතෙසු එස අඤ්ඤතරො. १०४९. तिसऱ्या सूत्तात 'धम्मदिन्न' म्हणजे सात व्यक्तींपैकी एक. बुद्धकाळात धम्मदिन्न उपासक, विसाख उपासक, उग्ग गृहपती, चित्त गृहपती, हत्थक आळवक, चुळ-अनाथपिंडिक आणि महा-अनाथपिंडिक या सात व्यक्तींपैकी प्रत्येकाला पाचशे-पाचशे उपासकांचा परिवार होता. यांच्यामध्ये हा (धम्मदिन्न) एक होता. ගම්භීරාති ධම්මගම්භීරා සල්ලසුත්තාදයො. ගම්භීරත්ථාති අත්ථගම්භීරා චෙතනාසුත්තන්තාදයො. ලොකුත්තරාති ලොකුත්තරත්ථදීපකා අසඞ්ඛතසංයුත්තාදයො. සුඤ්ඤතප්පටිසංයුත්තාති සත්තසුඤ්ඤතාදීපකා ඛජ්ජනිකසුත්තන්තාදයො. උපසම්පජ්ජ විහරිස්සාමාති පටිලභිත්වා විහරිස්සාම. එවඤ්හි වො, ධම්මදින්න, සික්ඛිතබ්බන්ති එවං තුම්හෙහි චන්දොපමපටිපදං රථවිනීතපටිපදං මොනෙය්යපටිපදං මහාඅරියවංසපටිපදං පූරෙන්තෙහි සික්ඛිතබ්බං. ඉති සත්ථා ඉමෙසං උපාසකානං අසය්හභාරං ආරොපෙසි. කස්මා[Pg.322]? එතෙ කිර න අත්තනො භූමියං ඨත්වා ඔවාදං යාචිංසු, අවිසෙසෙන පන සබ්බභාරං උක්ඛිපිතුං සමත්ථා විය ‘‘ඔවදතු නො, භන්තෙ, භගවා’’ති යාචිංසු. තෙන තෙසං සත්ථා අසය්හභාරං ආරොපෙන්තො එවමාහ. න ඛො නෙතන්ති න ඛො එතං. නකාරො පනෙත්ථ බ්යඤ්ජනසන්ධිමත්තමෙවාති වෙදිතබ්බො. තස්මාති යස්මා ඉදානි අත්තනො භූමියං ඨත්වා ඔවාදං යාචථ, තස්මා. 'गंभीरा' म्हणजे धम्माच्या दृष्टीने गंभीर असलेले सल्लसुत्त इत्यादी. 'गंभीरत्था' म्हणजे अर्थाच्या दृष्टीने गंभीर असलेले चेतनासुत्तंत इत्यादी. 'लोकुत्तरा' म्हणजे लोकोत्तर अर्थ प्रकाशित करणारे असंखतसंयुत्त इत्यादी. 'सुञ्ञतप्पटिसंयुत्ता' म्हणजे जीवाच्या शून्यतेचा (अनात्मतेचा) बोध करून देणारे खज्जनिकसुत्तंत इत्यादी. 'उपसम्पज्ज विहरिस्साम' म्हणजे प्राप्त करून विहरणार (राहणार). 'एवं हि वो, धम्मदिन्न, सिक्खितब्बं' म्हणजे तुम्ही चंदोपम-प्रतिपदा (चंद्रासारखे आचरण), रथविनीत-प्रतिपदा, मोनेय्य-प्रतिपदा आणि महाअरियवंस-प्रतिपदा पूर्ण करत अशा प्रकारे शिकले पाहिजे (अभ्यास केला पाहिजे). अशा प्रकारे शास्त्यांनी (बुद्धांनी) या उपासकांवर एक असह्य भार टाकला. का? कारण असे म्हटले जाते की, त्यांनी स्वतःच्या भूमीवर (मर्यादेत) राहून उपदेश मागितला नाही, तर जणू काही सर्व भार उचलण्यास समर्थ असल्यासारखे 'भन्ते, भगवंत आम्हाला उपदेश करोत' अशी सरसकट विनंती केली. म्हणून शास्त्यांनी त्यांच्यावर असह्य भार टाकताना असे म्हटले. 'न खो नेतं' म्हणजे 'न खो एतं'. येथे 'न' हा केवळ व्यंजनसंधी आहे, असे समजावे. 'तस्मा' म्हणजे कारण आता तुम्ही स्वतःच्या भूमीवर (मर्यादेत) राहून उपदेश मागत आहात, म्हणून. 4. ගිලානසුත්තවණ්ණනා ४. गिलाणसुत्तवण्णना (आजारी माणसासंबंधीच्या सूत्ताची व्याख्या). 1050. චතුත්ථෙ න ඛො පනෙතන්ති න ඛො අම්හෙහි එතං. සප්පඤ්ඤො උපාසකොති සොතාපන්නො අධිප්පෙතො. අස්සාසනීයෙහි ධම්මෙහීති අස්සාසකරෙහි ධම්මෙහි. අස්සාසතායස්මාති අස්සාසතු ආයස්මා. මාරිසොති මරණපටිබද්ධො. මරණධම්මොති මරණසභාවො. අධිමොචෙහීති ඨපෙහි. අධිමොචිතන්ති ඨපිතං. එවං විමුත්තචිත්තස්සාති එවං අරහත්තඵලවිමුත්තියා විමුත්තචිත්තස්ස. යදිදං විමුත්තියා විමුත්තන්ති යං ඉදං විමුත්තිං ආරබ්භ විමුත්තියා නානාකරණං වත්තබ්බං සියා, න තං වදාමි. භික්ඛුසඞ්ඝස්ස හි චෙතියඞ්ගණබොධියඞ්ගණවත්තෙසු චෙව අසීතික්ඛන්ධකවත්තෙසු චාති ආගමනීයගුණෙසු පමාණං නාම නත්ථි, පටිවිද්ධෙ පන මග්ගෙ වා ඵලෙ වා උපාසකානඤ්ච භික්ඛූනඤ්ච නානාකරණං නත්ථි. १०५०. चौथ्या सूत्तात 'न खो पनेतं' म्हणजे 'आमच्याद्वारे हे (ऐकले गेले नाही)'. 'सप्पञ्ञो उपासको' म्हणजे सोतापन्न अभिप्रेत आहे. 'अस्सासनीयेहि धम्मेहि' म्हणजे आश्वासन देणाऱ्या (दिलासा देणाऱ्या) धम्मांद्वारे. 'अस्सासतायस्मा' म्हणजे आयुष्यमानाने (आयुष्मंताने) आश्वासन द्यावे. 'मारिसो' म्हणजे मृत्यूशी संबंधित. 'मरणधम्मो' म्हणजे मरणशील स्वभावाचा. 'अधिमोचेहि' म्हणजे स्थापित कर (मन लाव). 'अधिमोचितं' म्हणजे स्थापित केलेले. 'एवं विमुत्तचित्तस्स' म्हणजे अशा प्रकारे अरहत्तफल-विमुक्तीने विमुक्त चित्त असलेल्याचे. 'यदिदं विमुत्तिया विमुत्तं' म्हणजे विमुक्तीच्या संदर्भात विमुक्त झालेल्यामध्ये जर काही फरक सांगायचा असेल, तर मी तसे म्हणत नाही. कारण भिक्खू संघासाठी चेतियंगण (स्तूपाचे अंगण), बोधियंगण (बोधीवृक्षाचे अंगण) यांमधील कर्तव्ये आणि ऐंशी खन्धक कर्तव्ये यांसारख्या प्राथमिक गुणांमध्ये (आगमनीय गुणांमध्ये) कोणतेही मोजमाप नाही; परंतु जेव्हा मार्ग किंवा फल साध्य केले जाते, तेव्हा उपासक आणि भिक्खू यांच्यात कोणताही फरक उरत नाही. 9. පඤ්ඤාපටිලාභසුත්තවණ්ණනා ९. पञ्ञापटिलाभसुत्तवण्णना (प्रज्ञाप्राप्ती सूत्ताची व्याख्या). 1055. නවමෙ පඤ්ඤාපටිලාභාය සංවත්තන්තීති එත්ථ සත්ත සෙක්ඛා පඤ්ඤං පටිලභන්ති නාම, ඛීණාසවො පටිලද්ධපඤ්ඤො නාමාති වෙදිතබ්බො. පරතො පඤ්ඤාබුද්ධියාතිආදීසුපි එසෙව නයො. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. १०५५. नवव्या सूत्तात 'पञ्ञापटिलाभाय संवत्तन्ति' (प्रज्ञाप्राप्तीसाठी कारणीभूत ठरतात) – येथे सात सेख (शिकाऊ/साधक) प्रज्ञा प्राप्त करत आहेत असे समजावे, आणि खीणसव (अरहंत) हा प्रज्ञा प्राप्त केलेला आहे असे समजावे. पुढे 'पञ्ञाबुद्धिया' (प्रज्ञेच्या वाढीसाठी) इत्यादींमध्येही हाच नियम लागू होतो. उर्वरित सर्व भाग सर्वत्र स्पष्टच आहे. සප්පඤ්ඤවග්ගො ඡට්ඨො. सप्पञ्ञवग्गो छट्ठो (सहावा सप्रज्ञ वर्ग समाप्त). 7. මහාපඤ්ඤවග්ගො ७. महापञ्ञवग्गो (महाप्रज्ञा वर्ग). 1. මහාපඤ්ඤාසුත්තවණ්ණනා १. महापञ्ञासुत्तवण्णना (महाप्रज्ञा सूत्ताची व्याख्या). 1058. සත්තමෙ [Pg.323] මහාපඤ්ඤතාය සංවත්තන්තීතිආදීසු ‘‘මහන්තෙ අත්ථෙ පරිග්ගණ්හාතීති මහාපඤ්ඤා’’තිආදිනා පටිසම්භිදායං (පටි. ම. 2.4) වුත්තනයෙනෙව සබ්බත්ථ සබ්බපදෙසු අත්ථො වෙදිතබ්බො. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. १०५८. सातव्या (वर्गात) 'महापञ्ञताय संवत्तन्ति' (महाप्रज्ञेसाठी कारणीभूत ठरतात) इत्यादींमध्ये, 'मोठ्या अर्थांचे (सत्य, पटिच्चसमुप्पाद इत्यादींचे) ग्रहण करते म्हणून ती महाप्रज्ञा होय' अशा प्रकारे पटिसम्भिदामग्गात सांगितलेल्या पद्धतीनेच सर्व ठिकाणी सर्व पदांचा अर्थ समजून घ्यावा. उर्वरित सर्व भाग सर्वत्र स्पष्टच आहे. සොතාපත්තිසංයුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. सोतापत्तिसंयुत्तवण्णना निट्ठिता (सोतापत्ति संयुत्ताची व्याख्या समाप्त झाली). 12. සච්චසංයුත්තං १२. सच्चसंयुत्तं (सत्य संयुत्त). 1. සමාධිවග්ගො १. समाधिवग्गो (समाधी वर्ग). 1. සමාධිසුත්තවණ්ණනා १. समाधिसुत्तवण्णना (समाधी सूत्ताची व्याख्या). 1071. සච්චසංයුත්තස්ස [Pg.324] පඨමෙ සමාධිං, භික්ඛවෙති තෙ කිර භික්ඛූ චිත්තෙකග්ගතාය පරිහායන්ති, අථ නෙසං සත්ථා – ‘‘එවමෙතෙ චිත්තෙකග්ගතං ලභිත්වා, කම්මට්ඨානං වඩ්ඪෙත්වා, විසෙසං පාපුණිස්සන්තී’’ති ඉමං දෙසනං ආරභි. තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, ‘‘ඉදං දුක්ඛ’’න්ති යොගො කරණීයොති එත්ථ යථාභූතාදිවසෙන කාරණච්ඡෙදො වෙදිතබ්බො. ඉදඤ්හි වුත්තං හොති – භික්ඛවෙ, යස්මා සමාහිතො භික්ඛු චත්තාරි සච්චානි යථාභූතං පජානාති, තස්මා තුම්හෙහි ච සමාහිතෙහි චතුන්නං සච්චානං යථාභූතං පජානනත්ථාය ‘‘ඉදං දුක්ඛ’’න්ති යොගො කරණීයො. තථා යස්මා චත්තාරි සච්චානි තථාගතස්සෙව පාතුභාවා පාකටානි හොන්ති, යස්මා ච තථාගතෙන සුවිභත්තානි, යස්මා ච තෙසු අපරිමාණා වණ්ණා අපරිමාණානි පදබ්යඤ්ජනානි, යස්මා ච තෙසං අප්පටිවිද්ධත්තා වට්ටං වඩ්ඪති, තෙසං පටිවිද්ධකාලතො පට්ඨාය න වඩ්ඪති, තස්මා ‘‘එවං නො වට්ටං න වඩ්ඪිස්සතී’’ති තුම්හෙහි ‘‘ඉදං දුක්ඛ’’න්ති යොගො කරණීයො. १०७१. सच्चसंयुत्ताच्या पहिल्या सूत्तात 'समाधिं, भिक्खवे' (भिक्खूंनो, समाधीची भावना करा) – असे म्हटले जाते की ते भिक्खू चित्ताच्या एकाग्रतेपासून भ्रष्ट होत होते. तेव्हा शास्त्यांनी (बुद्धांनी) – 'अशा प्रकारे हे चित्ताची एकाग्रता प्राप्त करून, कर्मस्थान (ध्यानविषय) वाढवून, विशेष गुणाला (मार्ग-फलाला) प्राप्त करतील' असा विचार करून या देशनेला प्रारंभ केला. 'तस्मातिह, भिक्खवे, इदं दुक्खन्ति योगो करणीयो' (म्हणून भिक्खूंनो, 'हे दुःख आहे' असा प्रयत्न केला पाहिजे) – येथे यथाभूत इत्यादींच्या आधारे कारणांचे वर्गीकरण समजून घ्यावे. येथे हे सांगितले आहे – भिक्खूंनो, ज्याअर्थी समाहित (एकाग्रचित्त) भिक्खू चार आर्य सत्यांना यथाभूत (आहे तसे) जाणतो, म्हणून तुम्हीही समाहित होऊन, चार आर्य सत्यांना यथाभूत जाणण्यासाठी 'हे दुःख आहे' असा प्रयत्न (योग) केला पाहिजे. तसेच, ज्याअर्थी चार आर्य सत्ये तथागतांच्या प्रादुर्भावामुळेच प्रकट होतात, आणि ज्याअर्थी तथागतांनी त्यांचे उत्तम प्रकारे वर्गीकरण केले आहे, आणि ज्याअर्थी त्यांमध्ये अमर्याद अक्षरे आणि अमर्याद पद-व्यंजने आहेत, आणि ज्याअर्थी ते न समजल्यामुळे संसारचक्र (वट्ट) वाढते आणि ते समजल्याच्या काळापासून संसारचक्र वाढत नाही, म्हणून 'अशा प्रकारे आमचे संसारचक्र वाढणार नाही' असा विचार करून तुम्ही 'हे दुःख आहे' असा प्रयत्न केला पाहिजे. 2. පටිසල්ලානසුත්තවණ්ණනා २. पटिसल्लानसुत्तवण्णना (एकांतवासासंबंधीच्या सूत्ताची व्याख्या). 1072. දුතියං කායවිවෙකවිකලානං කායවිවෙකපටිලාභත්ථාය වුත්තං. १०७२. दुसरे सूत्त कायविवेक (शारीरिक एकांत) नसलेल्यांना कायविवेक प्राप्त व्हावा यासाठी सांगितले आहे. 3. පඨමකුලපුත්තසුත්තාදිවණ්ණනා ३. पठमकुलपुत्तसुत्तादिवण्णना (पहिल्या कुलपुत्र सूत्तादींची व्याख्या). 1073-75. තතියෙ අභිසමයායාති අභිසමයත්ථාය. සමණබ්රාහ්මණාති චෙත්ථ සාසනාවචරා අධිප්පෙතා. තථා චතුත්ථපඤ්චමෙසු, තෙන තෙන අභිලාපෙන බුජ්ඣනකානං පන අජ්ඣාසයෙනෙතානි වුත්තානි. १०७३-७५. तिसऱ्या सूत्तात 'अभिसमयाय' म्हणजे अभिसमयासाठी (सत्याच्या साक्षात्कारासाठी). 'समणब्राह्मणा' या पदाने येथे शासनात (धम्मात) वावरणारे श्रमण-ब्राह्मण अभिप्रेत आहेत. चौथ्या आणि पाचव्या सूत्तातही तसेच समजावे. परंतु, त्या त्या विशिष्ट शब्दांनी समजून घेणाऱ्यांच्या आशयानुसार (मानसिकतेनुसार) ही सूत्ते सांगितली आहेत. 6. දුතියසමණබ්රාහ්මණසුත්තවණ්ණනා ६. दुतियसमणब्राह्मणसुत्तवण्णना (दुसऱ्या श्रमण-ब्राह्मण सूत्ताची व्याख्या). 1076. ඡට්ඨෙ [Pg.325] අභිසම්බුද්ධං පකාසෙසුන්ති අභිසම්බුද්ධො අහන්ති එවං අත්තානං අභිසම්බුද්ධං පකාසයිංසු. ඉමස්මිඤ්හි සුත්තෙ සබ්බඤ්ඤුබුද්ධා ච සමණගහණෙන ගහිතා. १०७६. सहाव्या सूत्तात 'अभिसम्बुद्धं पकासेसुं' म्हणजे 'मी अभिसंबुद्ध (पूर्णपणे प्रबुद्ध) आहे' अशा प्रकारे त्यांनी स्वतःला अभिसंबुद्ध म्हणून घोषित केले. कारण या सूत्तात 'समण' या शब्दाने सर्वज्ञ बुद्धांचेही ग्रहण केले आहे (त्यांचाही समावेश केला आहे). 10. තිරච්ඡානකථාසුත්තවණ්ණනා १०. तिरच्छानकथासुत्तवण्णना (तिरश्चानकथा सूत्ताची व्याख्या). 1080. දසමෙ අනෙකවිහිතන්ති අනෙකවිධං. තිරච්ඡානකථන්ති අනිය්යානිකත්තා සග්ගමොක්ඛමග්ගානං තිරච්ඡානභූතං කථං. රාජකථන්තිආදීසු රාජානං ආරබ්භ ‘‘මහාසම්මතො මන්ධාතා ධම්මාසොකො එවං මහානුභාවො’’තිආදිනා නයෙන පවත්තකථා රාජකථා. එස නයො චොරකථාදීසු. තෙසු ‘‘අසුකො රාජා අභිරූපො දස්සනීයො’’තිආදිනා නයෙන ගෙහසිතකථාව තිරච්ඡානකථා හොති. ‘‘සොපි නාම එවං මහානුභාවො ඛයං ගතො’’ති එවං පවත්තා පන කම්මට්ඨානභාවෙ තිට්ඨති. චොරෙසුපි ‘‘මූලදෙවො එවං මහානුභාවො මෙඝමාලො එවං මහානුභාවො’’ති තෙසං කම්මං පටිච්ච ‘‘අහො සූරා’’ති ගෙහසිතකථාව තිරච්ඡානකථා. යුද්ධෙපි භාරතයුද්ධාදීසු ‘‘අසුකෙන අසුකො එවං මාරිතො එවං විද්ධො’’ති කාමස්සාදවසෙනෙව කථා තිරච්ඡානකථා, ‘‘තෙපි නාම ඛයං ගතා’’ති එවං පවත්තා පන සබ්බත්ථ කම්මට්ඨානමෙව හොති. අපිච අන්නාදීසු ‘‘එවං වණ්ණවන්තං ගන්ධවන්තං රසවන්තං ඵස්සසම්පන්නං ඛාදිම්හ භුඤ්ජිම්හ පිවිම්හ පරිභුඤ්ජිම්හා’’ති කාමස්සාදවසෙන කථෙතුං න වට්ටති. සාත්ථකං පන කත්වා ‘‘පුබ්බෙ එවං වණ්ණාදිසම්පන්නං අන්නං පානං වත්ථං සයනං මාලං ගන්ධං විලෙපනං සීලවන්තානං අදම්හ, චෙතියෙ පූජං අකරිම්හා’’ති කථෙතුං වට්ටති. १०८०. दहाव्या सुत्तात, ‘अनेकविहितं’ म्हणजे अनेक प्रकारचे (विविध प्रकारचे). ‘तिरच्छानकथा’ म्हणजे संसारातून किंवा दुर्गतीतून मुक्त न करणारी, स्वर्ग आणि मोक्षाच्या मार्गात आडवी येणारी (अडथळा आणणारी) निरर्थक चर्चा होय. ‘राजकथा’ इत्यादींमध्ये, राजांना उद्देशून "महासम्मत, मन्धाता, धर्माशोक हे असे महान प्रभावशाली होते" अशा प्रकारे चालणारी चर्चा म्हणजे ‘राजकथा’ होय. हाच नियम चोरकथा इत्यादींनाही लागू होतो. त्यामध्ये "अमुक राजा रूपवान व दर्शनीय आहे" अशा प्रकारे चालणारी घरगुती किंवा कामभोगाशी संबंधित चर्चा हीच ‘तिरच्छानकथा’ (हीनकथा) ठरते. परंतु, "ते इतके महान प्रभावशाली असूनही विनाशाला प्राप्त झाले" अशी चर्चा मात्र कर्मस्थान (विपश्यना/ध्यान) भावनेमध्ये साहाय्यक ठरते. चोरांच्या बाबतीतही "मूलदेव असा महाप्रभावशाली होता, मेघमाल असा महाप्रभावशाली होता" अशा प्रकारे त्यांच्या कृत्यांचा संदर्भ घेऊन "अहा, किती शूर!" अशी कामभोगाश्रित चर्चा हीच ‘तिरच्छानकथा’ आहे. युद्धाच्या बाबतीतही, भारत-युद्ध इत्यादींमध्ये "अमुकाने अमुकाला असे मारले, असे जखमी केले" अशी कामभोगाच्या आस्वादाने केलेली चर्चा ही ‘तिरच्छानकथा’ आहे, परंतु, "ते देखील नाशाला प्राप्त झाले" अशी चर्चा सर्व ठिकाणी कर्मस्थानच ठरते. तसेच, अन्न इत्यादींच्या बाबतीत "आम्ही अशा वर्ण, गंध, रस आणि स्पर्शाने युक्त असलेल्या अन्नाचे खाणे, जेवणे, पिणे व उपभोग घेतला" अशा प्रकारे कामभोगाच्या आस्वादाने बोलणे योग्य नाही. परंतु, त्याला अर्थपूर्ण करून "पूर्वी आम्ही अशा वर्ण इत्यादींनी युक्त अन्न, पेय, वस्त्र, शयन, माला, गंध व विलेपन शीलवानांना दान दिले, चैत्याची पूजा केली" असे बोलणे योग्य आहे. ඤාතිකථාදීසුපි ‘‘අම්හාකං ඤාතකා සූරා සමත්ථා’’ති වා, ‘‘පුබ්බෙ මයං එවං විචිත්රෙහි යානෙහි විචරිම්හා’’ති වා අස්සාදවසෙන වත්තුං න වට්ටති. සාත්ථකං පන කත්වා ‘‘තෙපි නො ඤාතකා ඛයං ගතා’’ති වා, ‘‘පුබ්බෙ මයං එවරූපා උපාහනා සඞ්ඝස්ස අදම්හා’’ති වා කථෙතබ්බා. ගාමකථාදීසුපි සුනිවිට්ඨදුන්නිවිට්ඨසුභික්ඛදුබ්භික්ඛාදිවසෙන වා ‘‘අසුකගාමවාසිනො සූරා සමත්ථා’’ති වා එවං අස්සාදවසෙන වත්තුං න වට්ටති, සාත්ථකං පන කත්වා ‘‘සද්ධා පසන්නා’’ති වා, ‘‘ඛයං ගතා’’ති වා වත්තුං වට්ටති. නිගමනගරජනපදකථාසුපි එසෙව නයො. नातेवाईक (ज्ञाती) कथा इत्यादींमध्येही "आमचे नातेवाईक शूर व समर्थ आहेत" किंवा "पूर्वी आम्ही अशा विविध वाहनांतून फिरलो" अशा प्रकारे आस्वादाच्या वश होऊन बोलणे योग्य नाही. परंतु, त्याला अर्थपूर्ण करून "ते आमचे नातेवाईक देखील नाशाला प्राप्त झाले" किंवा "पूर्वी आम्ही अशा प्रकारच्या उपाहन (पादत्राणे) संघाला दान दिल्या होत्या" असे बोलावे. ग्रामकथा (गावाविषयीची चर्चा) इत्यादींमध्येही गाव चांगले वसलेले आहे की वाईट वसलेले आहे, सुभिक्ष (सुकाळ) आहे की दुर्भिक्ष (दुकाळ) आहे इत्यादींच्या आधारे किंवा "अमुक गावातील लोक शूर व समर्थ आहेत" अशा प्रकारे आस्वादाच्या वश होऊन बोलणे योग्य नाही, परंतु, त्याला अर्थपूर्ण करून "ते श्रद्धावान व प्रसन्न आहेत" किंवा "ते नाशाला प्राप्त झाले" असे बोलणे योग्य आहे. निगम (कस्बा), नगर आणि जनपद (देश) यांच्या कथांमध्येही हाच नियम आहे. ඉත්ථිකථාපි [Pg.326] වණ්ණසණ්ඨානාදීනි පටිච්ච අස්සාදවසෙන වත්තුං න වට්ටති, ‘‘සද්ධා පසන්නා ඛයං ගතා’’ති එවමෙව වට්ටති. සූරකථාපි ‘‘නන්දිමිත්තො නාම යොධො සූරො අහොසී’’ති අස්සාදවසෙන වත්තුං න වට්ටති, ‘‘සද්ධො පසන්නො අහොසි, ඛයං ගතො’’ති එවමෙව වට්ටති. සුරාකථාතිපි පාඨො. සාපි චෙසා සුරාකථා ‘‘එවරූපා නාම සුරා පීතා රතිජනනී හොතී’’ති අස්සාදවසෙනෙව න වට්ටති, ආදීනවවසෙන පන ‘‘උම්මත්තකසංවත්තනිකා’’තිආදිනා නයෙන වට්ටති. විසිඛාකථාපි ‘‘අසුකවිසිඛා සුනිවිට්ඨා දුන්නිවිට්ඨා’’ති වා, ‘‘අසුකවිසිඛාය වාසිනො සූරා සමත්ථා’’ති වා අස්සාදවසෙනෙව වත්තුං න වට්ටති, ‘‘සද්ධා පසන්නා ඛයං ගතා’’ති එච්චෙවං වට්ටති. කුම්භට්ඨානකථාති උදකතිත්ථකථා වුච්චති, කුම්භදාසිකථා වා. සාපි ‘‘පාසාදිකා නච්චිතුං ගායිතුං ඡෙකා’’ති අස්සාදවසෙන න වට්ටති, ‘‘සද්ධා පසන්නා’’තිආදිනා නයෙනෙව වට්ටති. स्त्रीकथा (स्त्रियांविषयीची चर्चा) देखील त्यांच्या वर्ण, रूप इत्यादींच्या आधारे आस्वादाच्या वश होऊन करणे योग्य नाही; "त्या श्रद्धावान, प्रसन्न होत्या आणि नाशाला प्राप्त झाल्या" अशा प्रकारेच बोलणे योग्य आहे. शूरकथा (वीरांच्या गोष्टी) देखील "नंदिमित्त नावाचा योद्धा शूर होता" अशा प्रकारे आस्वादाच्या वश होऊन बोलणे योग्य नाही; "तो श्रद्धावान, प्रसन्न होता आणि नाशाला प्राप्त झाला" अशा प्रकारेच बोलणे योग्य आहे. ‘सुराकथा’ (मद्याविषयीची चर्चा) असाही पाठ आहे. ती सुराकथा देखील "अशा प्रकारची सुरा (मद्य) प्यायल्याने आनंद मिळतो" अशा प्रकारे आस्वादाच्या वश होऊन बोलणे योग्य नाही, परंतु तिच्यातील दोषांच्या (आदीनव) दृष्टीने "ती उन्माद (वेडेपणा) निर्माण करणारी आहे" अशा प्रकारे बोलणे योग्य आहे. वीथीकथा (गल्ली किंवा रस्त्याविषयीची चर्चा) देखील "अमुक गल्ली चांगली वसलेली आहे किंवा वाईट वसलेली आहे" किंवा "अमुक गल्लीत राहणारे लोक शूर व समर्थ आहेत" अशा प्रकारे आस्वादाच्या वश होऊन बोलणे योग्य नाही; "ते श्रद्धावान, प्रसन्न आहेत आणि नाशाला प्राप्त झाले" अशा प्रकारेच बोलणे योग्य आहे. ‘कुंभस्थानकथा’ म्हणजे पाणवठ्यावरील (पाण्याच्या घाटावरील) चर्चा किंवा पाणी भरणार्या दासींविषयीची चर्चा असे म्हटले जाते. ती देखील "ती अत्यंत आकर्षक आहे, नाचण्यात व गाण्यात चतुर आहे" अशा प्रकारे आस्वादाच्या वश होऊन बोलणे योग्य नाही; "ती श्रद्धावान व प्रसन्न आहे" अशा प्रकारे बोलणे योग्य आहे. පුබ්බපෙතකථාති අතීතඤාතිකථා. තත්ථ වත්තමානඤාතිකථාසදිසොව විනිච්ඡයො. නානත්තකථාති පුරිමපච්ඡිමකථාහි විමුත්තා අවසෙසා නානාසභාවා නිරත්ථකකථා. ලොකක්ඛායිකාති ‘‘අයං ලොකො කෙන නිම්මිතො, අසුකෙන නාම නිම්මිතො, කාකො සෙතො අට්ඨීනං සෙතත්තා, බලාකා රත්තා ලොහිතස්ස රත්තත්තා’’ති එවමාදිකා ලොකායතවිතණ්ඩසල්ලාපකථා. සමුද්දක්ඛායිකා නාම ‘‘කස්මා සමුද්දො සාගරො, සාගරදෙවෙන ඛනිතත්තා සාගරො, ඛතො මෙති හත්ථමුද්දාය නිවෙදිතත්තා සමුද්දො’’ති එවමාදිකා නිරත්ථකසමුද්දක්ඛායිකකථා. ඉති භවො ඉති අභවොති යං වා තං වා නිරත්ථකකාරණං වත්වා පවත්තිතකථා ඉතිභවාභවකථා. එත්ථ ච භවොති සස්සතං, අභවොති උච්ඡෙදං. භවොති වුද්ධි, අභවොති හානි. භවොති කාමසුඛං, අභවොති අත්තකිලමථො. ඉති ඉමාය ඡබ්බිධාය ඉතිභවාභවකථාය සද්ධිං බාත්තිංස තිරච්ඡානකථා නාම හොන්ති. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානත්ථමෙවාති. ‘पुब्बपेतकथा’ (पूर्वप्रेतकथा) म्हणजे मृत नातेवाईकांविषयीची चर्चा. त्यामध्ये वर्तमान नातेवाईकांच्या चर्चेसारखाच निर्णय समजावा. ‘नानत्तकथा’ (नानात्वकथा) म्हणजे पूर्व आणि उत्तर कथांमधून सुटलेली, उरलेली विविध प्रकारची निरर्थक चर्चा. ‘लोकाख्यायिका’ म्हणजे "हा लोक (जग) कोणी निर्माण केला? अमुक देवाने निर्माण केला; कावळा पांढरा असतो कारण त्याची हाडे पांढरी असतात; बगळे तांबडे असतात कारण त्यांचे रक्त तांबडे असते" इत्यादी प्रकारची लोकायत व वितंडवादाची निरर्थक चर्चा होय. ‘समुद्राख्यायिका’ म्हणजे "समुद्राला सागर का म्हणतात? सागर नावाच्या राजाने तो खणल्यामुळे तो सागर झाला; 'हा मी खणला आहे' असे हाताच्या मुद्रेने दाखवल्यामुळे तो समुद्र झाला" इत्यादी प्रकारची निरर्थक समुद्राख्यायिका कथा होय. ‘इति भवो इति अभवो’ (असे अस्तित्व आहे, असे नास्तित्व आहे) म्हणजे कोणतेही निरर्थक कारण सांगून केलेली चर्चा म्हणजे ‘इतिभवाभवकथा’ होय. येथे ‘भव’ म्हणजे शाश्वतवाद (सस्सत) आणि ‘अभव’ म्हणजे उच्छेदवाद. किंवा ‘भव’ म्हणजे वृद्धी (उन्नती) आणि ‘अभव’ म्हणजे हानी (अवनती). किंवा ‘भव’ म्हणजे कामसुख आणि ‘अभव’ म्हणजे आत्मक्लेश (अत्तकिलमथ). अशा प्रकारे, या सहा प्रकारच्या ‘इतिभवाभवकथा’ मिळून एकूण बत्तीस (३२) प्रकारच्या ‘तिरच्छानकथा’ (हीनकथा) होतात. उर्वरित भाग सर्व ठिकाणी स्पष्ट अर्थाचाच आहे. පඨමො වග්ගො. पहिला वग्ग (वर्ग) समाप्त. 2. ධම්මචක්කප්පවත්තනවග්ගො २. धम्मचक्कप्पवत्तनवग्ग (धम्मचक्रप्रवर्तन वर्ग) 1. ධම්මචක්කප්පවත්තනසුත්තවණ්ණනා १. धम्मचक्कप्पवत्तनसुत्तवण्णना (धम्मचक्रप्रवर्तनसूत्र वर्णन) 1081. දුතියස්ස [Pg.327] පඨමෙ බාරාණසියන්ති එවංනාමකෙ නගරෙ. ඉසිපතනෙ මිගදායෙති ඉසීනං පතනුප්පතනවසෙන එවංලද්ධනාමෙ මිගානං අභයදානවසෙන දින්නත්තා මිගදායසඞ්ඛාතෙ ආරාමෙ. එත්ථ හි උප්පන්නුප්පන්නා සබ්බඤ්ඤුඉසයො පතන්ති, ධම්මචක්කප්පවත්තනත්ථං නිසීදන්තීති අත්ථො. නන්දමූලකපබ්භාරතො සත්තාහච්චයෙන නිරොධසමාපත්තිතො වුට්ඨිතා අනොතත්තදහෙ කතමුඛධොවනාදිකිච්චා ආකාසෙන ආගන්ත්වා පච්චෙකබුද්ධඉසයොපෙත්ථ ඔතරණවසෙන පතන්ති, උපොසථත්ථඤ්ච අනුපොසථත්ථඤ්ච සන්නිපතන්ති, ගන්ධමාදනං පටිගච්ඡන්තාපි තතොව උප්පතන්තීති ඉමිනා ඉසීනං පතනුප්පතනවසෙන තං ‘‘ඉසිපතන’’න්ති වුච්චති. १०८१. दुसऱ्या वर्गाच्या पहिल्या सुत्तात, ‘बाराणसियं’ म्हणजे या नावाच्या नगरात. ‘इसिपतने मिगदाये’ म्हणजे ऋषींच्या उतरण्यामुळे व उडण्यामुळे (पतन आणि उत्पतन) हे नाव मिळालेल्या आणि मृगांना (हरणांना) अभयदान दिल्यामुळे ‘मिगदाय’ (मृगदाय) म्हटल्या गेलेल्या आरामात (उद्यानात). कारण येथे वेळोवेळी उत्पन्न होणारे सर्वज्ञ ऋषी (बुद्ध) उतरतात आणि धम्मचक्र प्रवर्तनासाठी बसतात, असा अर्थ आहे. नंदमूलक पर्वताच्या गुहेतून सात दिवसांनंतर निरोधसमापत्तीतून उठून, अनोतत्त सरोवरात मुखप्रक्षालन इत्यादी कार्ये करून आकाशाने येऊन प्रत्येकबुद्ध ऋषी देखील येथे उतरण्याच्या रूपाने येतात (पतन पावतात), उपोसथासाठी आणि अनूपोसथासाठी एकत्र येतात, आणि गंधमादन पर्वताकडे परत जाताना येथूनच उड्डाण करतात (उत्पतन पावतात); म्हणून ऋषींच्या या पतन व उत्पतनामुळे त्याला ‘इसिपतन’ (ऋषिपतन) असे म्हटले जाते. ආමන්තෙසීති දීපඞ්කරපාදමූලෙ කතාභිනීහාරතො පට්ඨාය පාරමියො පූරෙන්තො අනුපුබ්බෙන පච්ඡිමභවෙ කතාභිනික්ඛමනො අනුපුබ්බෙන බොධිමණ්ඩං පත්වා තත්ථ අපරාජිතපල්ලඞ්කෙ නිසින්නො මාරබලං භින්දිත්වා පඨමයාමෙ පුබ්බෙනිවාසං අනුස්සරිත්වා මජ්ඣිමයාමෙ දිබ්බචක්ඛුං විසොධෙත්වා පච්ඡිමයාමාවසානෙ දසසහස්සිලොකධාතුං උන්නාදෙන්තො සබ්බඤ්ඤුතං පත්වා සත්ත සත්තාහානි බොධිමණ්ඩෙ වීතිනාමෙත්වා මහාබ්රහ්මුනා ආයාචිතධම්මදෙසනො බුද්ධචක්ඛුනා ලොකං වොලොකෙත්වා ලොකානුග්ගහෙන බාරාණසිං ගන්ත්වා පඤ්චවග්ගියෙ සඤ්ඤාපෙත්වා ධම්මචක්කං පවත්තෙතුකාමො ආමන්තෙසි. ‘आमंतेसि’ (आमंत्रित केले / संबोधित केले) म्हणजे दीपंकर बुद्धांच्या चरणांशी केलेल्या संकल्पापासून (अभिनीहार) प्रारंभ करून पारमिता पूर्ण करत, अनुक्रमाने अंतिम भवात येऊन, अंतिम भवात महाभिनिष्क्रमण करून, अनुक्रमाने बोधिमंडाला प्राप्त होऊन, तेथे अपराजित पलंगावर (आसनावर) बसून, मारसेनेचा पराभव करून, रात्रीच्या पहिल्या प्रहरात (प्रथमयाम) पूर्वनिवास (पूर्वजन्मांचे) स्मरण करून, मध्यम प्रहरात दिव्यचक्षू विशुद्ध करून, अंतिम प्रहराच्या शेवटी दहा हजार लोकधातूंना गुंजवून टाकत सर्वज्ञता प्राप्त करून, बोधिमंडावर सात आठवडे (सत्तसप्ताह) व्यतीत करून, महाब्रह्मदेवांनी (सहाम्पती ब्रह्मदेवाने) धर्मदेशनेसाठी याचना केल्यावर, बुद्धचक्षूने जगाकडे पाहून, जगावरील अनुकंपाबुद्धीने वाराणसीला जाऊन, पंचवर्गीय भिक्खूंना (आपण बुद्ध झाल्याचे) पटवून देऊन, धम्मचक्र प्रवर्तन करण्याची इच्छा धरून त्यांनी संबोधित केले. ද්වෙමෙ, භික්ඛවෙ, අන්තාති ද්වෙ ඉමෙ, භික්ඛවෙ, කොට්ඨාසා. ඉමස්ස පන පදස්ස සහ සමුදාහාරෙන සමුදාහාරනිග්ඝොසො හෙට්ඨා අවීචිං උපරි භවග්ගං පත්වා දසසහස්සිලොකධාතුං පත්ථරිත්වා අට්ඨාසි. තස්මිංයෙව සමයෙ අට්ඨාරසකොටිසඞ්ඛා බ්රහ්මානො සමාගච්ඡිංසු, පච්ඡිමදිසාය සූරියො අත්ථමෙති, පාචීනදිසාය ආසාළ්හනක්ඛත්තෙන යුත්තො පුණ්ණචන්දො උග්ගච්ඡති. තස්මිං සමයෙ භගවා ඉමං ධම්මචක්කප්පවත්තනසුත්තං ආරභන්තො ‘‘ද්වෙමෙ, භික්ඛවෙ, අන්තා’’තිආදිමාහ. "द्वेमे, भिक्खवे, अन्ता" म्हणजे "हे भिक्खूंनो, हे दोन अंत (भाग) आहेत." या शब्दाच्या उच्चाराबरोबरच, तो उच्चारित ध्वनी खाली अवीची नरकापर्यंत आणि वर भवाग्रापर्यंत पोहोचून, दहा हजार लोकधातूंमध्ये पसरून राहिला. त्याच वेळी अठरा कोटी ब्रह्मा एकत्र आले; पश्चिम दिशेला सूर्य मावळत होता आणि पूर्व दिशेला आषाढी नक्षत्राने युक्त असलेला पूर्ण चंद्र उगवत होता. त्या वेळी भगवान या धम्मचक्कपवत्तन सुत्ताचा आरंभ करताना "द्वेमे, भिक्खवे, अन्ता" इत्यादी म्हणाले. තත්ථ [Pg.328] පබ්බජිතෙනාති ගිහිසංයොජනං ඡින්දිත්වා පබ්බජ්ජුපගතෙන. න සෙවිතබ්බාති න වළඤ්ජෙතබ්බා. යො චායං කාමෙසු කාමසුඛල්ලිකානුයොගොති යො ච අයං වත්ථුකාමෙසු කිලෙසකාමසුඛස්ස අනුයොගො. හීනොති ලාමකො. ගම්මොති ගාමවාසීනං සන්තකො. පොථුජ්ජනිකොති අන්ධබාලජනෙන ආචිණ්ණො. අනරියොති න අරියො න විසුද්ධො න උත්තමො න වා අරියානං සන්තකො. අනත්ථසංහිතොති න අත්ථසංහිතො, හිතසුඛාවහකාරණං අනිස්සිතොති අත්ථො. අත්තකිලමථානුයොගොති අත්තනො කිලමථස්ස අනුයොගො, අත්තනො දුක්ඛකරණන්ති අත්ථො. දුක්ඛොති කණ්ටකාපස්සයසෙය්යාදීහි අත්තමාරණෙහි දුක්ඛාවහො. तेथे 'पब्बजितेन' (प्रव्रजिताने) म्हणजे गृहस्थांचे बंधन तोडून प्रव्रज्येला प्राप्त झालेल्याने. 'न सेवितब्बा' म्हणजे सेवन करू नये. 'यो चायं कामेसु कामसुखल्लिकानुयोगो' म्हणजे जो हा वस्तूकामांमध्ये क्लेशयुक्त कामसुखाचा उपभोग घेणे आहे. 'हीनो' म्हणजे हीन (हलका). 'गम्मो' म्हणजे ग्राम्य (ग्रामवासीयांचा). 'पोथुज्जनिको' म्हणजे पृथग्जनांचा (अज्ञानी व अंध लोकांद्वारे आचरलेला). 'अनरियो' म्हणजे जो आर्य नाही, विशुद्ध नाही, उत्तम नाही किंवा आर्यांचा नाही. 'अनत्थसंहितो' म्हणजे अनर्थकारक, म्हणजेच हित आणि सुख देणाऱ्या कारणांवर आधारित नसलेला. 'अत्तकिलमथानुयोगो' म्हणजे स्वतःला क्लेश देण्याचा अभ्यास, म्हणजेच स्वतःला दुःख देणे. 'दुक्खो' म्हणजे दुःखकारक, जो काट्यांच्या शय्येवर निजणे इत्यादी स्वतःला छळणाऱ्या कृतींनी दुःख आणणारा आहे. පඤ්ඤාචක්ඛුං කරොතීති චක්ඛුකරණී. දුතියපදං තස්සෙව වෙවචනං. උපසමායාති කිලෙසූපසමත්ථාය. අභිඤ්ඤායාති චතුන්නං සච්චානං අභිජානනත්ථාය. සම්බොධායාති තෙසංයෙව සම්බුජ්ඣනත්ථාය. නිබ්බානායාති නිබ්බානසච්ඡිකිරියාය. සෙසමෙත්ථ යං වත්තබ්බං සියා, තං හෙට්ඨා තත්ථ තත්ථ වුත්තමෙව. සච්චකථාපි සබ්බාකාරෙනෙව විසුද්ධිමග්ගෙ (විසුද්ධි. 2.529) විත්ථාරිතා. 'चक्खुकरणी' म्हणजे प्रज्ञाचक्षू निर्माण करणारी. दुसरे पद (ञाणकरणी) हे त्याचेच समानार्थी आहे. 'उपसमाय' म्हणजे क्लेशांच्या उपशमनासाठी. 'अभिञ्ञाय' म्हणजे चार आर्य सत्यांच्या विशेष ज्ञानासाठी. 'सम्बोधाय' म्हणजे त्यांच्याच सम्यक् संबोधासाठी. 'निब्बानाय' म्हणजे निर्वाण साक्षात्कारासाठी. येथे जे काही उरलेले सांगण्यासारखे आहे, ते खाली ठिकठिकाणी सांगितलेच आहे. सत्यकथा (सच्चकथा) देखील सर्व प्रकारे 'विसुद्धिमग्ग' ग्रंथात सविस्तर सांगितली आहे. තිපරිවට්ටන්ති සච්චඤාණකිච්චඤාණකතඤාණසඞ්ඛාතානං තිණ්ණං පරිවට්ටානං වසෙන තිපරිවට්ටං. එත්ථ හි ‘‘ඉදං දුක්ඛං අරියසච්චං, ඉදං දුක්ඛසමුදය’’න්ති එවං චතූසු සච්චෙසු යථාභූතං ඤාණං සච්චඤාණං නාම. තෙසුයෙව ‘‘පරිඤ්ඤෙය්යං පහාතබ්බ’’න්ති එවං කත්තබ්බකිච්චජානනඤාණං කිච්චඤාණං නාම. ‘‘පරිඤ්ඤාතං පහීන’’න්ති එවං තස්ස තස්ස කිච්චස්ස කතභාවජානනඤාණං කතඤාණං නාම. ද්වාදසාකාරන්ති තෙසංයෙව එකෙකස්මිං සච්චෙ තිණ්ණං තිණ්ණං ආකාරානං වසෙන ද්වාදසාකාරං. ඤාණදස්සනන්ති එතෙසං තිපරිවට්ටානං ද්වාදසන්නං ආකාරානං වසෙන උප්පන්නඤාණසඞ්ඛාතං දස්සනං. ධම්මචක්ඛුන්ති අඤ්ඤත්ථ තයො මග්ගා තීණි ච ඵලානි ධම්මචක්ඛු නාම හොන්ති, ඉධ පඨමමග්ගොව. 'तिपरिवट्टं' म्हणजे सच्चज्ञान, कृत्यज्ञान आणि कृतज्ञान नावाच्या तीन आवर्तनांच्या (फेऱ्यांच्या) द्वारे तीन आवर्तने असलेले. येथे "हे दुःख आर्यसत्य आहे, हा दुःखसमुदय आहे" अशा प्रकारे चार सत्यांचे यथार्थ ज्ञान म्हणजे 'सच्चज्ञान' होय. त्यांच्यातच "हे परिज्ञेय (जाणून घेण्याजोगे) आहे, हे प्रहातव्य (त्यागण्याजोगे) आहे" अशा प्रकारे कर्तव्य कृत्य जाणणारे ज्ञान म्हणजे 'कृत्यज्ञान' होय. "हे परिज्ञात (जाणून घेतले) आहे, हे प्रहीण (त्यागले) आहे" अशा प्रकारे त्या त्या कृत्याच्या पूर्णत्वाचे ज्ञान म्हणजे 'कृतज्ञान' होय. 'द्वादसाकारं' म्हणजे त्या चार सत्यांपैकी प्रत्येकात तीन-तीन आकारांच्या भेदाने बारा प्रकारांचे. 'ञाणदस्सनं' म्हणजे या तीन आवर्तनांच्या आणि बारा आकारांच्या द्वारे उत्पन्न झालेले ज्ञानरूपी दर्शन. 'धम्मचक्खुं' म्हणजे इतर ठिकाणी तीन मार्ग आणि तीन फळे यांना धम्मचक्षू म्हटले जाते, परंतु येथे केवळ प्रथम मार्ग (सोतापत्तिमग्ग) अभिप्रेत आहे. ධම්මචක්කෙති පටිවෙධඤාණෙ චෙව දෙසනාඤාණෙ ච. බොධිපල්ලඞ්කෙ නිසින්නස්ස හි චතූසු සච්චෙසු උප්පන්නං ද්වාදසාකාරං පටිවෙධඤාණම්පි, ඉසිපතනෙ නිසින්නස්ස ද්වාදසාකාරාය සච්චදෙසනාය පවත්තිතං දෙසනාඤාණම්පි ධම්මචක්කං නාම. උභයම්පි හෙතං දසබලස්ස උරෙ පවත්තඤාණමෙව. ඉමාය [Pg.329] දෙසනාය පකාසෙන්තෙන භගවතා ධම්මචක්කං පවත්තිතං නාම. තං පනෙතං ධම්මචක්කං යාව අඤ්ඤාසිකොණ්ඩඤ්ඤත්ථෙරො අට්ඨාරසහි බ්රහ්මකොටීහි සද්ධිං සොතාපත්තිඵලෙ පතිට්ඨාති, තාව නං භගවා පවත්තෙති නාම, පතිට්ඨිතෙ ච පවත්තිතං නාම. තං සන්ධාය පවත්තිතෙ ච පන භගවතා ධම්මචක්කෙ භුම්මා දෙවා සද්දමනුස්සාවෙසුන්තිආදි වුත්තං. 'धम्मचक्के' म्हणजे प्रतिवेधज्ञान (साक्षात्कार ज्ञान) आणि देशनाज्ञान (उपदेश ज्ञान) या दोन्हीमध्ये. बोधिवृक्षाखालील वज्रासनावर बसलेल्या भगवंतांचे चार सत्यांविषयीचे बारा आकारांचे प्रतिवेधज्ञान आणि इसिपतन येथे बसलेल्या भगवंतांचे बारा आकारांच्या सत्यदेशनेद्वारे प्रवृत्त केलेले देशनाज्ञान, या दोन्हीला 'धम्मचक्क' म्हणतात. हे दोन्हीही दशबलांच्या (भगवंतांच्या) हृदयात प्रवृत्त झालेले ज्ञानच आहे. या देशनेद्वारे ते प्रकट करणाऱ्या भगवंतांनी धम्मचक्क प्रवृत्त केले असे म्हटले जाते. जोपर्यंत आयुष्मान अञ्ञाकोण्डञ्ञ थेर अठरा कोटी ब्रह्मांसह सोतापत्तिफलावर प्रतिष्ठित झाले नाहीत, तोपर्यंत भगवंतांनी ते प्रवृत्त केले असे म्हटले जाते, आणि ते प्रतिष्ठित झाल्यावर ते प्रवृत्त झाले असे म्हटले जाते. त्याला अनुसरूनच "भगवंतांनी धम्मचक्क प्रवृत्त केले असता भूमीवरील देवांनी घोष केला" इत्यादी म्हटले आहे. තත්ථ භුම්මාති භූමට්ඨකදෙවතා. සද්දමනුස්සාවෙසුන්ති එකප්පහාරෙනෙව සාධුකාරං දත්වා – ‘‘එතං භගවතා’’තිආදීනි වදන්තා අනුසාවයිංසු. ඔභාසොති සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණොභාසො. සො හි තදා දෙවානං දෙවානුභාවං අතික්කමිත්වා විරොචිත්ථ. අඤ්ඤාසි වත, භො, කොණ්ඩඤ්ඤොති ඉමස්සපි උදානස්ස උදාහාරනිග්ඝොසො දසසහස්සිලොකධාතුං ඵරිත්වා අට්ඨාසි. तेथे 'भुम्मा' म्हणजे भूमीवर राहणारे देव. 'सद्दमनुस्सावेसुं' म्हणजे एकाच वेळी साधुकार देऊन "हे भगवंतांनी..." इत्यादी म्हणत त्यांनी घोष केला. 'ओभासो' म्हणजे सर्वज्ञता ज्ञानाचा प्रकाश. तो त्या वेळी देवांच्या प्रभावाला ओलांडून चमकला. "कोण्डञ्ञने खरोखर जाणले!" या उदान शब्दाचा प्रतिध्वनी देखील दहा हजार लोकधातूंमध्ये पसरून राहिला. 9. සඞ්කාසනසුත්තවණ්ණනා ९. संकासनसुत्तवर्णना (संकासन सुत्ताचे स्पष्टीकरण). 1089. නවමෙ අපරිමාණා වණ්ණාති අප්පමාණානි අක්ඛරානි. බ්යඤ්ජනාති තෙසංයෙව වෙවචනං, වණ්ණානං වා එකදෙසා යදිදං බ්යඤ්ජනා නාම. සඞ්කාසනාති විභත්තියො. එකමෙකස්මිඤ්හි සච්චෙ සබ්බාකාරෙන විත්ථාරියමානෙ වණ්ණාදීනං අන්තො නාම නත්ථි. තස්මා එවමාහ. १०८९. नवव्या सुत्तात, 'अपरिमाणा वण्णा' म्हणजे अमर्याद अक्षरे. 'ब्यञ्जना' म्हणजे त्याचेच समानार्थी, किंवा वर्णांचा एक भाग ज्याला व्यंजन म्हणतात. 'संकासना' म्हणजे विभक्ती (अर्थाचे विभाजन करणारे शब्द). कारण प्रत्येक सत्याचे सर्व प्रकारे सविस्तर वर्णन केले असता, वर्ण इत्यादींचा अंत नसतो. म्हणून भगवंतांनी असे म्हटले आहे. 10. තථසුත්තවණ්ණනා १०. तथसुत्तवर्णना (तथ सुत्ताचे स्पष्टीकरण). 1090. දසමෙ සභාවාවිජහනට්ඨෙන තථං. දුක්ඛඤ්හි දුක්ඛමෙව වුත්තං. සභාවස්ස අමොඝතාය අවිතථං. න හි දුක්ඛං අදුක්ඛං නාම හොති. අඤ්ඤභාවානුපගමෙන අනඤ්ඤථං. න හි දුක්ඛං සමුදයාදිභාවං උපගච්ඡති. සමුදයාදීසුපි එසෙව නයොති. १०९०. दहाव्या सुत्तात, स्वतःचा स्वभाव न सोडण्याच्या अर्थाने 'तथ' (सत्य/तथ्य) म्हटले आहे. कारण दुःख हे दुःखच सांगितले आहे. स्वभावाच्या अमोघतेमुळे (अव्यर्थतेमुळे) ते 'अवितथ' (अचूक) आहे. कारण दुःख हे कधीही अ-दुःख होत नाही. दुसऱ्या स्वभावाला प्राप्त न होण्यामुळे ते 'अनञ्ञथ' (अनन्यथा/दुसऱ्या प्रकारे न होणारे) आहे. कारण दुःख हे कधीही समुदय इत्यादींच्या स्वभावाला प्राप्त होत नाही. समुदय इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम समजून घ्यावा. ධම්මචක්කප්පවත්තනවග්ගො දුතියො. धम्मचक्कपवत्तनवग्गो दुसरा समाप्त. 3. කොටිගාමවග්ගො ३. कोटिगामवग्गो (कोटिग्राम वर्ग). 1. කොටිගාමසුත්තවණ්ණනා १. कोटिगामसुत्तवर्णना (कोटिग्राम सुत्ताचे स्पष्टीकरण). 1091. තතියස්ස පඨමෙ අනනුබොධාති අනනුබුජ්ඣනෙන. අප්පටිවෙධාති අප්පටිවිජ්ඣනෙන. १०९१. तिसऱ्या वर्गाच्या पहिल्या सुत्तात, 'अननुबोधा' म्हणजे अनुबोध न झाल्यामुळे (यथायोग्य न समजल्यामुळे). 'अप्पटिवेधा' म्हणजे प्रतिवेध न झाल्यामुळे (थेट साक्षात्कार न झाल्यामुळे). 2. දුතියකොටිගාමසුත්තවණ්ණනා २. दुतियकोटिगामसुत्तवर्णना (दुसऱ्या कोटिग्राम सुत्ताचे स्पष्टीकरण). 1092. දුතියෙ [Pg.330] චෙතොවිමුත්ති පඤ්ඤාවිමුත්තීති ඵලසමාපත්තිඵලපඤ්ඤානං නාමං. १०९२. दुसऱ्या सुत्तात, 'चेतोविमुत्ति पञ्ञाविमुत्ति' हे फलसमाधी आणि फलप्रज्ञा यांचे नाव आहे. 7. තථසුත්තවණ්ණනා ७. तथसुत्तवर्णना (तथ सुत्ताचे स्पष्टीकरण). 1097. සත්තමෙ තස්මා අරියසච්චානීති යස්මා තථානි අවිතථානි අනඤ්ඤථානි, තස්මා අරියානං සච්චානීති වුච්චන්ති. න හි විතථානි අරියා අරියසච්චතො පටිවිජ්ඣන්ති. १०९७. सातव्या सुत्तात, 'तस्मा अरियसच्चानि' म्हणजे कारण ती तथ्य, अवितथ आणि अनन्यथा आहेत, म्हणून त्यांना आर्यांची सत्ये (आर्यसत्ये) म्हणतात. कारण आर्य लोक असत्य गोष्टींना आर्यसत्य म्हणून जाणत नाहीत. 8. ලොකසුත්තවණ්ණනා ८. लोकसुत्तवर्णना (लोक सुत्ताचे स्पष्टीकरण). 1098. අට්ඨමෙ තථාගතො අරියො, තස්මා ‘‘අරියසච්චානී’’ති යස්මා අරියෙන තථාගතෙන පටිවිද්ධත්තා දෙසිතත්තා ච තානි අරියසන්තකානි හොන්ති, තස්මා අරියස්ස සච්චත්තා අරියසච්චානීති අත්ථො. १०९८. आठव्या सुत्तात, तथागत हे आर्य आहेत, म्हणून त्यांना 'आर्यसत्ये' म्हणतात. कारण आर्य अशा तथागतांनी त्यांचा साक्षात्कार केला आहे आणि उपदेश केला आहे, म्हणून ती आर्यांची संपत्ती आहेत. म्हणून आर्यांची सत्ये असल्यामुळे त्यांना 'आर्यसत्ये' म्हणतात, असा अर्थ आहे. 10. ගවම්පතිසුත්තවණ්ණනා १०. गवम्पतिसुत्तवर्णना (गवम्पति सुत्ताचे स्पष्टीकरण). 1100. දසමෙ සහඤ්චනිකෙති සහඤ්චනියනගරෙ. යො, භික්ඛවෙ, දුක්ඛං පස්සති, දුක්ඛසමුදයම්පි සො පස්සතීතිආදි එකපටිවෙධවසෙන වුත්තං, ඉමස්මිඤ්හි සුත්තෙ එකපටිවෙධොව කථිතො. ११००. दहाव्या सुत्तात, 'सहञ्जनिके' म्हणजे सहञ्जनिय नगरात. "हे भिक्खूंनो, जो दुःखाला पाहतो, तो दुःखसमुदयालाही पाहतो" इत्यादी एकाच प्रतिवेधाच्या (साक्षात्काराच्या) द्वारे सांगितले आहे. कारण या सुत्तात एकाच प्रतिवेधाचा उपदेश केला आहे. කොටිගාමවග්ගො තතියො. कोटिगामवग्गो तिसरा समाप्त. 4. සීසපාවනවග්ගො ४. सीसपावनवग्गो (शिसवीच्या पानाचा वर्ग). 1. සීසපාවනසුත්තවණ්ණනා १. सीसपावनसुत्तवर्णना (सीसपावन सुत्ताचे स्पष्टीकरण). 1101. චතුත්ථස්ස පඨමෙ යදිදං උපරීති යානි ඉමානි උපරි. සීසපාවනෙති සීසපාරුක්ඛෙ. ११०१. चौथ्या वर्गाच्या पहिल्या सुत्तात, 'यदिदं उपरि' म्हणजे जे हे वर आहेत. 'सीसपावने' म्हणजे शिसवीच्या वृक्षावर. 2. ඛදිරපත්තසුත්තවණ්ණනා २. खदिरपत्तसुत्तवर्णना (खदिरपत्त सुत्ताचे स्पष्टीकरण). 1102. දුතියෙ අනභිසමෙච්චාති ඤාණෙන අනභිසමාගන්ත්වා, අප්පටිවිජ්ඣිත්වාති අත්ථො. ११०२. दुसऱ्या सुत्तात, 'अनभिसमेच्च' म्हणजे ज्ञानाने प्राप्त न होता, म्हणजेच साक्षात्कार न करता, असा अर्थ आहे. 3. දණ්ඩසුත්තවණ්ණනා ३. दण्डसुत्तवर्णना (दण्ड सुत्ताचे स्पष्टीकरण). 1103. තතියෙ [Pg.331] අස්මා ලොකා පරං ලොකන්ති ඉමම්හා මනුස්සලොකා පරං නිරයම්පි, තිරච්ඡානයොනිම්පි, පෙත්තිවිසයම්පි, මනුස්සලොකම්පි, දෙවලොකම්පි, ගච්ඡන්ති, පුනප්පුනං වට්ටස්මිංයෙව නිබ්බත්තන්තීති අත්ථො. ११०३. तिसऱ्या सूत्तात, 'अस्मा लोका परं लोकं' (या लोकातून परलोकात) म्हणजे या मनुष्यलोकातून दुसऱ्या नरकात, तिर्यक योनीत (प्राणी योनीत), प्रेतलोकात, मनुष्यलोकात किंवा देवलोकात जातात आणि चार आर्यसत्यांचे दर्शन न झाल्यामुळे पुन्हा पुन्हा संसारातच (वट्टातच) जन्म घेतात, असा अर्थ आहे. 5. සත්තිසතසුත්තවණ්ණනා ५. सत्तिसतसुत्तवण्णना (शंभर भाल्यांच्या सूत्ताचे वर्णन). 1105. පඤ්චමෙ එවඤ්චෙතං, භික්ඛවෙ, අස්සාති, භික්ඛවෙ, එවං චෙ එතං භවෙය්ය, නිරන්තරං සත්තිසතෙහි හඤ්ඤමානස්ස දුක්ඛදොමනස්සෙහි සහෙවෙස සච්චාභිසමයො භවෙය්ය චෙති අත්ථො. ११०५. पाचव्या सूत्तात, 'एवञ्चेतं, भिक्खवे, अस्स' म्हणजे 'हे भिक्खूहो, जर असे झाले तर' - सतत शंभर भाल्यांनी मारल्या जाणाऱ्या माणसाला होणाऱ्या दुःख आणि दौर्मनस्यासह (मानसिक त्रासासह) देखील जर सत्य-अभिसमय (सत्याचा साक्षात्कार) होत असेल, तर ते पत्करावे, असा अर्थ आहे. 9. ඉන්දඛීලසුත්තවණ්ණනා ९. इन्दखीलसुत्तवण्णना (इंद्रखील सूत्ताचे वर्णन). 1109. නවමෙ මුඛං ඔලොකෙන්තීති අජ්ඣාසයං ඔලොකෙන්ති. අජ්ඣාසයො ඉධ මුඛන්ති අධිප්පෙතො. ११०९. नवव्या सूत्तात, 'मुखं ओलोकेन्ति' म्हणजे आशय (अज्झासय - स्वभाव किंवा दृष्टिकोन) पाहतात. येथे 'मुख' या शब्दाने 'अज्झासय' (आशय) अभिप्रेत आहे. 10. වාදත්ථිකසුත්තවණ්ණනා १०. वादत्थिकसुत्तवण्णना (वादविवाद करणाऱ्यांच्या सूत्ताचे वर्णन). 1110. දසමෙ සිලායූපොති සිලාථම්භො. සොළසකුක්කුකොති සොළසහත්ථො. සොළසකුක්කූතිපි පාඨො. හෙට්ඨා නෙමඞ්ගමාති හෙට්ඨා ආවාටං පවිට්ඨා. අට්ඨ කුක්කු උපරිනෙමස්සාති අට්ඨ හත්ථා ආවාටස්ස උපරි උග්ගන්ත්වා ඨිතා භවෙය්යුං. භුසාති බලවතී. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. १११०. दहाव्या सूत्तात, 'सिलायूपो' म्हणजे दगडाचा खांब (शिलास्तंभ). 'सोळसकुक्कुको' म्हणजे सोळा हात लांबीचा. 'सोळसकुक्कू' असाही पाठ आढळतो. 'हेट्ठा नेमङ्गमा' म्हणजे खड्ड्यात खाली पुरलेला भाग. 'अट्ठ कुक्कु उपरि नेमस्स' म्हणजे आठ हात खड्ड्याच्या वर आलेला असावा. 'भुसा' म्हणजे अत्यंत मजबूत किंवा बलवान. उर्वरित सर्व भाग सर्वत्र स्पष्टच आहे. සීසපාවනවග්ගො චතුත්ථො. सीसपावनवग्गो चौथा समाप्त. 5. පපාතවග්ගො ५. पपातवग्गो (पपात वर्ग). 1. ලොකචින්තාසුත්තවණ්ණනා १. लोकचिंतासुत्तवण्णना (लोकचिंता सूत्ताचे वर्णन). 1111. පඤ්චමස්ස පඨමෙ සුමාගධාය පොක්ඛරණියාති එවංනාමිකාය පොක්ඛරණියා. ලොකචින්තං චින්තෙන්තොති, ‘‘කෙන නු ඛො චන්දිමසූරියා කතා, කෙන මහාපථවී, කෙන මහාසමුද්දො, කෙන සත්තා උප්පාදිතා, කෙන පබ්බතා, කෙන අම්බතාලනාළිකෙරාදයො’’ති එවරූපං ලොකචින්තං චින්තෙන්තො නිසීදි. ११११. पाचव्या वर्गाच्या पहिल्या सूत्तात, 'सुमागधाय पोक्खरणीया' म्हणजे या नावाच्या तलावाच्या काठावर. 'लोकचिन्तं चिन्तेन्तो' म्हणजे 'चंद्र आणि सूर्य कोणी बनवले असतील? पृथ्वी कोणी बनवली असेल? महासागर कोणी बनवला असेल? प्राणी कोणी निर्माण केले असतील? पर्वत कोणी निर्माण केले असतील? आंबा, ताड, नारळ इत्यादी झाडे कोणी निर्माण केली असतील?' अशा प्रकारचा जगाच्या उत्पत्तीविषयीचा विचार (लोकचिंता) करत बसला. විචෙතොති [Pg.332] විගතචිත්තො වික්ඛිත්තචිත්තො වා. භූතංයෙව අද්දසාති තෙ කිර අසුරා සම්බරිමායං සම්පරිවත්තෙත්වා යථා නෙ සො පුරිසො හත්ථිඅස්සාදීසු ආරුහන්තෙ උක්ඛිපිත්වා, භිසමුළාලච්ඡිද්දෙහි පවිසන්තෙ පස්සති, එවං අධිට්ඨහිංසු. තං සන්ධාය සත්ථා ‘‘භූතංයෙව අද්දසා’’ති ආහ. දෙවානංයෙව මොහයමානාති දෙවානං චිත්තං මොහයන්තා. තස්මාති යස්මා ලොකචින්තං චින්තෙන්තො උම්මත්තකොපි හොති, තස්මා. 'विचेतो' म्हणजे शुद्ध हरपलेला किंवा विचलित चित्त असलेला. 'भूतंयेव अद्दसा' (त्याने जे पाहिले ते खरेच होते) म्हणजे असे म्हणतात की, त्या असुरांनी शंबर नावाच्या असुराच्या मायेचा (जादूचा) प्रयोग करून, त्या माणसाला हत्ती, घोडे इत्यादींवर स्वार होऊन कमळाच्या देठाच्या छिद्रातून आत शिरताना दिसावे असा संकल्प केला होता. त्याला उद्देशून शास्त्यांनी (बुद्धांनी) 'त्याने जे पाहिले ते खरेच होते' असे म्हटले. 'देवानाम्येव मोहयमाना' म्हणजे देवांच्या मनाला मोहित (भ्रमित) करत असुरनगरीत प्रवेश केला. 'तस्मा' म्हणजे ज्या अर्थी जगाच्या उत्पत्तीचा विचार करणारा माणूस वेडा देखील होऊ शकतो, म्हणून. 2-3. පපාතසුත්තාදිවණ්ණනා २-३. पपातसुत्त आदींचे वर्णन. 1112-13. දුතියෙ පටිභානකූටොති එකො මහන්තො පබ්බතසදිසො මරියාදපාසාණො. තතියෙ අනිට්ඨරූපන්ති අනිට්ඨසභාවං. १११२-१३. दुसऱ्या सूत्तात, 'पतिभानकूटो' म्हणजे पर्वतासारखा एक मोठा सीमा निश्चित करणारा कडा (खडक). तिसऱ्या सूत्तात, 'अनिठ्ठरूपं' म्हणजे अप्रिय किंवा अनिष्ट स्वरूपाचे. 4. කූටාගාරසුත්තවණ්ණනා ४. कूटागारसुत्तवण्णना (कूटागार सूत्ताचे वर्णन). 1114. චතුත්ථෙ හෙට්ඨිමං ඝරං අකරිත්වාති ථම්භභිත්තිපාදුස්සාපනාදිනා ඝරස්ස හෙට්ඨිමභාගං අකත්වා. १११४. चौथ्या सूत्तात, 'हेट्ठिमं घरं अकरित्वा' म्हणजे खांब, भिंती आणि पाया न उभारता घराचा खालचा मजला किंवा पाया न बनवता. 5. වාලසුත්තවණ්ණනා ५. वालसुत्तवण्णना (केसाच्या सूत्ताचे वर्णन). 1115. පඤ්චමෙ සන්ථාගාරෙති සිප්පුග්ගණ්හනසාලායං. උපාසනං කරොන්තෙති කණ්ඩඛිපනසිප්පං කරොන්තෙ. අසනං අතිපාතෙන්තෙති කණ්ඩං අතික්කමෙන්තෙ. පොඞ්ඛානුපොඞ්ඛන්ති එකං කණ්ඩං ඛිපිත්වා යථා අස්ස සරස්ස පොඞ්ඛං විජ්ඣති, අපරං අනුපොඞ්ඛං නාම දුතියස්ස පොඞ්ඛං, පුන අපරං තස්ස පොඞ්ඛන්ති එවං අතිපාතෙන්තෙ අද්දස. යත්ර හි නාමාති යෙ නාම. දුරභිසම්භවතරන්ති දුක්කරතරං. සත්තධා භින්නස්ස වාලස්ස කොටියා කොටිං පටිවිජ්ඣෙය්යාති එකං වාලං සත්තධා භින්දිත්වා, තස්ස එකං භෙදං ගහෙත්වා, වාතිඞ්ගණමජ්ඣෙ බන්ධිත්වා, අපරං භෙදං කණ්ඩස්ස අග්ගකොටියං බන්ධිත්වා, උසභමත්තෙ ඨිතො කණ්ඩබද්ධාය කොටියා තං වාතිඞ්ගණබද්ධකොටිං පටිවිජ්ඣෙය්යාති අත්ථො. තස්මාති යස්මා එවං දුප්පටිවිජ්ඣානි චත්තාරි සච්චානි, තස්මා. १११५. पाचव्या सूत्तात, 'सन्थागारे' म्हणजे कला किंवा विद्या शिकण्याच्या सभागृहात. 'उपासनं करोन्ते' म्हणजे धनुर्विद्या किंवा बाण मारण्याची कला शिकत असताना. 'असनं अतिपातेन्ते' म्हणजे बाण वेगाने सोडत असताना. 'पोंखानुपोंखं' म्हणजे एक बाण मारल्यानंतर, पहिल्या बाणाच्या टोकाला (पुच्छाला) दुसरा बाण अचूक वेधतो, आणि दुसऱ्याच्या पुच्छाला तिसरा बाण वेधतो, अशा प्रकारे एकामागून एक अचूक बाण मारताना पाहिले. 'यत्र हि नाम' म्हणजे जे खरोखर. 'दुरभिसम्भवतरं' म्हणजे अत्यंत कठीण काम. 'सत्तधा भिन्नस्स वालस्स कोटिया कोटिं पटिविज्झेय्या' म्हणजे घोड्याचा एक केस सात भागांत उभा चिरून, त्याचा एक भाग घेऊन तो वांग्याच्या मध्यभागी बांधावा, आणि दुसरा भाग बाणाच्या टोकाला बांधून, एका उसभ (सुमारे १४० फूट) अंतरावर उभे राहून बाणाच्या टोकावरील केसाने वांग्याला बांधलेल्या केसाच्या टोकाचा अचूक वेध घेणे, असा अर्थ आहे. 'तस्मा' म्हणजे ज्या अर्थी चार आर्यसत्ये समजून घेणे याहूनही कठीण आहे, म्हणून. 7. පඨමඡිග්ගළයුගසුත්තවණ්ණනා ७. पठमछिग्गळयुगसुत्तवण्णना (पहिल्या जू आणि छिद्र सूत्ताचे वर्णन). 1117. සත්තමෙ [Pg.333] අඤ්ඤමඤ්ඤඛාදිකාති අඤ්ඤමඤ්ඤං ඛාදනං. දුබ්බලඛාදිකාති බලවන්තෙහි මච්ඡාදීහි දුබ්බලානං මච්ඡාදීනං ඛාදනං. १११७. सातव्या सूत्तात, 'अञ्ञमञ्ञखादिका' म्हणजे एकमेकांना खाणे. 'दुब्बलखादिका' म्हणजे बलवान माशांनी दुर्बल माशांना खाणे. 8. දුතියඡිග්ගළයුගසුත්තවණ්ණනා ८. दुतियछिग्गळयुगसुत्तवण्णना (दुसऱ्या जू आणि छिद्र सूत्ताचे वर्णन). 1118. අට්ඨමෙ මහාපථවීති චක්කවාළගබ්භන්තරා මහාපථවී. අධිච්චමිදං, භන්තෙති ඉදං අධිච්චුප්පත්තිකං සචෙ තං යුගං න පූති භවෙය්ය, සමුද්දෙ උදකං න සුස්සෙය්ය, සො ච කච්ඡපො න මරෙය්ය, අපි නාම යදිච්ඡාවසෙන සියාති අත්ථො. १११८. आठव्या सूत्तात, 'महापथवी' म्हणजे चक्रवाळाच्या आतील संपूर्ण पृथ्वी. 'अधिच्चमिदं, भन्ते' म्हणजे हे योगायोगाने घडणारे आहे; जर ते जू सडले नाही, समुद्रातील पाणी सुकले नाही आणि तो कासवही मरत नसेल, तर कदाचित योगायोगाने (इच्छेनुसार) असे घडू शकेल, असा अर्थ आहे. එවං අධිච්චමිදං, භික්ඛවෙති එත්ථ මහාසීවත්ථෙරො චත්තාරි යුගානි දස්සෙති – පුරත්ථිමචක්කවාළමුඛවට්ටියං ඨිතෙන පුරිසෙන පක්ඛිත්තයුගස්ස හි ඡිග්ගළෙන තස්ස අන්ධකච්ඡපස්ස ගීවාය පවෙසනං විය මනුස්සපටිලාභො අධිච්චපටිලාභී. දක්ඛිණචක්කවාළමුඛවට්ටියං ඨිතෙන පක්ඛිත්තස්ස පන පරිබ්භමන්තස්ස පුරිමයුගං පත්වා ඡිග්ගළෙන ඡිග්ගළුපරි ආරුළ්හස්ස ඡිග්ගළෙන ගීවප්පවෙසනං විය තථාගතුප්පාදො අධිච්චතරසම්භවො. පච්ඡිමචක්කවාළමුඛවට්ටියං ඨිතෙන පක්ඛිත්තස්ස පන පරිබ්භමන්තස්ස පුරිමයුගද්වයං පත්වා ඡිග්ගළෙන ඡිග්ගළුපරි ආරුළ්හස්ස ඡිග්ගළෙන ගීවප්පවෙසනං විය තථාගතප්පවෙදිතස්ස ධම්මවිනයස්ස දීපනං අධිච්චතරසම්භවං. උත්තරචක්කවාළමුඛවට්ටියං ඨිතෙන පක්ඛිත්තස්ස පන පරිබ්භමන්තස්ස පුරිමයුගත්තයං පත්වා ඡිග්ගළෙන ඡිග්ගළුපරි ආරුළ්හස්ස ඡිග්ගළෙන ගීවප්පවෙසනං විය චතුසච්චපටිවෙධො අතිවිය අධිච්චතරසම්භවො වෙදිතබ්බො. නවමාදීනි අභිසමයසංයුත්තෙ වුත්තනයානෙවාති. अशा प्रकारे 'एवं अधिच्चमिदं, भिक्खवे' या संदर्भात महासीव थेर चार जू दाखवतात - पूर्व चक्रवाळाच्या काठावर उभ्या असलेल्या माणसाने टाकलेल्या जूच्या छिद्रात त्या अंध कासवाची मान अडकण्यासारखे मनुष्यत्व प्राप्त होणे हे अत्यंत दुर्मिळ (योगायोगाने मिळणारे) आहे. दक्षिण चक्रवाळाच्या काठावर टाकलेल्या आणि फिरत फिरत पूर्व दिशेच्या जूजवळ पोहोचलेल्या छिद्रातून मान अडकण्यासारखे तथागतांचा जन्म होणे हे त्याहूनही अधिक दुर्मिळ आहे. पश्चिम चक्रवाळाच्या काठावर टाकलेल्या आणि फिरत फिरत पूर्व दिशेच्या दोन जूजवळ पोहोचलेल्या छिद्रातून मान अडकण्यासारखे तथागतांनी उपदेशिलेल्या धम्म-विनयाचा प्रकाश पसरणे हे त्याहूनही अधिक दुर्मिळ आहे. उत्तर चक्रवाळाच्या काठावर टाकलेल्या आणि फिरत फिरत पूर्व दिशेच्या तीन जूजवळ पोहोचलेल्या छिद्रातून मान अडकण्यासारखे चार आर्यसत्यांचा साक्षात्कार होणे हे अत्यंत दुर्मिळ समजले पाहिजे. नववे इत्यादी सूत्ते अभिसमयसंयुत्तात सांगितलेल्या पद्धतीनुसारच आहेत. පපාතවග්ගො පඤ්චමො. पाचवा पपातवग्गो समाप्त. 6. අභිසමයවග්ගවණ්ණනා ६. अभिसमयवग्गवण्णना (अभिसमय वर्गाचे वर्णन). 1121. අභිසමයවග්ගො නිදානවග්ගෙ අභිසමයසංයුත්තෙ විත්ථාරිතොව. ११२१. अभिसमयवग्गो निदानवग्गातील अभिसमयसंयुत्तात सविस्तर स्पष्ट केला आहे. 7. පඨමආමකධඤ්ඤපෙය්යාලවග්ගො ७. पहिला आमकधञ्ञपेय्या लवग्गो (कच्च्या धान्याचा पेय्याल वर्ग). 3. පඤ්ඤාසුත්තවණ්ණනා ३. पञ्ञासुत्तवण्णना (प्रज्ञा सूत्ताचे वर्णन). 1133. ආමකධඤ්ඤපෙය්යාලෙ [Pg.334] අරියෙන පඤ්ඤාචක්ඛුනාති විපස්සනං ආදිං කත්වා ලොකියලොකුත්තරෙන ඤාණචක්ඛුනා. ११३३. आमकधञ्ञपेय्यालात, 'अरियेन पञ्ञाचक्खुना' म्हणजे विपश्यना ज्ञानापासून सुरुवात करून लौकिक आणि लोकोत्तर ज्ञानचक्षूने. 4. සුරාමෙරයසුත්තවණ්ණනා ४. सुरामेरयसुत्तवण्णना (सुरा आणि मेरय सूत्ताचे वर्णन). 1134. සුරාමෙරයමජ්ජප්පමාදට්ඨානා පටිවිරතාති එත්ථ සුරා නාම පිට්ඨසුරා, ඔදනසුරා, පූවසුරා, කිණ්ණපක්ඛිත්තා, සම්භාරසංයුත්තාති පඤ්චවිධා. මෙරයං නාම පුප්ඵාසවො, ඵලාසවොති, එවං වුත්තො යො කොචි ආසවො. මජ්ජන්ති තදෙව උභයං, යං වා පනඤ්ඤම්පි සුරාසවවිනිමුත්තං මදනීයං. යාය චෙතනාය තං පිවන්ති, සා පමාදස්ස කාරණත්තා පමාදට්ඨානං නාම, තතො පටිවිරතාති අත්ථො. ११३४. 'सुरामेरयमज्जप्पमादट्ठाना पटिविरता' या संदर्भात, 'सुरा' पाच प्रकारची असते: पिठ्ठसुरा (पिठापासून बनवलेली), ओदनसुरा (भातापासून बनवलेली), पूवसुरा (पिठाच्या केक किंवा पुऱ्यांपासून बनवलेली), किण्णपक्खित्ता (किण्वन किंवा यीस्ट टाकून बनवलेली) आणि संभारसंयुत्ता (मसाले किंवा इतर घटक मिसळून बनवलेली). 'मेरय' म्हणजे फुलांचा अर्क (पुप्फासव), फळांचा अर्क (फलासव) इत्यादी कोणत्याही प्रकारची दारू. 'मज्ज' म्हणजे हे दोन्ही प्रकार, याशिवाय सुरा आणि मेरय व्यतिरिक्त इतर कोणतीही नशा आणणारी गोष्ट. ज्या चेतनेने (इच्छेने) लोक त्याचे प्राशन करतात, ती चेतना प्रमादाचे (अविचाराचे किंवा गाफीलपणाचे) कारण असल्यामुळे तिला 'प्रमादस्थान' म्हणतात; त्यापासून अलिप्त राहणे, असा अर्थ आहे. 6-7. මත්තෙය්යසුත්තාදිවණ්ණනා ६-७. मत्तेय्यसुत्त आदींचे वर्णन. 1136-37. මත්තෙය්යාති මාතුහිතා, මාතරි සම්මාපටිපන්නාති අත්ථො. පෙත්තෙය්යාදීසු පිතුහිතා පෙත්තෙය්යා. ११३६-३७. 'मत्तेय्या' म्हणजे आईचे कल्याण करणारे, आईशी योग्य प्रकारे वर्तन करणारे, असा अर्थ आहे. 'पेत्तेय्य' इत्यादींमध्ये वडिलांचे कल्याण करणारे ते 'पेत्तेय्या' होत. 8-9. සාමඤ්ඤසුත්තාදිවණ්ණනා ८-९. सामञ्ञसुत्त आदींचे वर्णन. 1138-39. සමණානං හිතා සාමඤ්ඤා. බ්රාහ්මණානං හිතා බ්රහ්මඤ්ඤා. තෙසු තෙසු සම්මා පටිපන්නානංයෙවෙතං අධිවචනං. ११३८-३९. श्रमणांचे हित साधणारे ते श्रमणत्व (सामञ्ञ) होय. ब्राह्मणांचे (पापरहित अरहंतांचे) हित साधणारे ते ब्राह्मणत्व (ब्रह्मञ्ञ) होय. त्या त्या (माता-पिता, श्रमण, ब्राह्मण) यांच्याशी योग्य प्रकारे आचरण करणाऱ्यांचेच हे नाव (अधिवाचन) आहे. 10. පචායිකසුත්තවණ්ණනා १०. पचायिकसुत्तवण्णना (आदर दाखवण्याविषयीच्या सूत्राचे स्पष्टीकरण) 1140. කුලෙ ජෙට්ඨාපචායිනොති කුලෙ ජෙට්ඨානං අපචායිනො, නීචවුත්තිනොති අත්ථො. ११४०. 'कुले जेट्ठापचायिनो' म्हणजे कुळातील ज्येष्ठांचा (मोठे काका, भाऊ, बहीण इत्यादींचा) आदर करणारे, नम्र वर्तन असणारे; असा अर्थ आहे. 8. දුතියආමකධඤ්ඤපෙය්යාලවග්ගො ८. दुतियआमकधञ्ञपेय्यालवग्गो (दुसरा कच्च्या धान्याचा पेय्याल वर्ग) 8. බීජගාමසුත්තවණ්ණනා ८. बीजगामसुत्तवण्णना (बीजसमूहाविषयीच्या सूत्राचे स्पष्टीकरण) 1148. බීජගාමභූතගාමසමාරම්භාති [Pg.335] මූලබීජං, ඛන්ධබීජං, ඵළුබීජං, අග්ගබීජං, බීජබීජන්ති පඤ්චවිධස්ස බීජගාමස්ස චෙව යස්ස කස්සචි නීලතිණරුක්ඛාදිකස්ස භූතගාමස්ස ච සමාරම්භා, ඡෙදනපචනාදිභාවෙන විකොපනා පටිවිරතාති අත්ථො. ११४८. 'बीजगामभूतगामसमारेम्भा' म्हणजे मूळ-बीज, खोड-बीज, पेर-बीज, शेंडा-बीज आणि बियाणे अशा पाच प्रकारच्या बीजसमूहांचे (बीजगाम) तसेच कोणत्याही हिरवे गवत, झाडे इत्यादी वनस्पतीसमूहांचे (भूतगाम) तोडणे, शिजवणे इत्यादी प्रकारे नुकसान करण्यापासून विरत राहणे; असा अर्थ आहे. 9. විකාලභොජනසුත්තවණ්ණනා ९. विकालभोजनसुत्तवण्णना (अवेळी भोजन करण्याविषयीच्या सूत्राचे स्पष्टीकरण) 1149. විකාලභොජනාති කාලාතික්කන්තභොජනා, මජ්ඣන්හිකාතික්කමතො පට්ඨාය යාවකාලිකපරිභොගාති අත්ථො. ११४९. 'विकालभोजना' म्हणजे योग्य वेळ निघून गेल्यावर भोजन करणे; म्हणजेच मध्यान्ह (दुपारची वेळ) उलटून गेल्यापासून ते दुसऱ्या दिवशी अरुणोदयापर्यंतच्या काळात यावकालिक (अन्न) ग्रहण करण्यापासून विरत राहणे; असा अर्थ आहे. 10. ගන්ධවිලෙපනසුත්තවණ්ණනා १०. गंधविलेपनसुत्तवण्णना (गंध आणि विलेपन लावण्याविषयीच्या सूत्राचे स्पष्टीकरण) 1150. මාලාදීසු මාලාති යං කිඤ්චි පුප්ඵං. ගන්ධන්ති යං කිඤ්චි ගන්ධජාතං. විලෙපනන්ති ඡවිරාගකරණං. තත්ථ පිළන්ධන්තා ධාරෙන්ති නාම, ඌනට්ඨානං පූරෙන්තා මණ්ඩෙන්ති නාම, ගන්ධවසෙන ඡවිරාගවසෙන ච සාදියන්තා විභූසෙන්ති නාම. ඨානං වුච්චති කාරණං. තස්මා යාය දුස්සීල්යචෙතනාය තානි මාලාධාරණාදීනි මහාජනො කරොති, තතො පටිවිරතාති අත්ථො. ११५०. 'माला' इत्यादी शब्दांमध्ये, कोणतेही फूल म्हणजे 'माला' होय. कोणतेही सुगंधी द्रव्य म्हणजे 'गंध' होय. त्वचेला सुशोभित करणारे द्रव्य म्हणजे 'विलेपन' होय. त्यामध्ये, फुले परिधान करणाऱ्यांना 'धारण करणे' म्हणतात; उणिवा भरून काढत प्रसाधन करणाऱ्यांना 'सजवणे' (मंडन) म्हणतात; आणि सुवास व त्वचेच्या सौंदर्याचा आस्वाद घेणाऱ्यांना 'सुशोभित करणे' (विभूषण) म्हणतात. 'स्थान' म्हणजे कारण होय. म्हणून, ज्या दुःशील चेतनेने (अनैतिक इच्छेने) सामान्य लोक ही माला धारण करणे इत्यादी गोष्टी करतात, त्यापासून विरत राहणे; असा अर्थ आहे. 9. තතියආමකධඤ්ඤපෙය්යාලවග්ගො ९. ततियआमकधञ्ञपेय्यालवग्गो (तिसरा कच्च्या धान्याचा पेय्याल वर्ग) 1. නච්චගීතසුත්තවණ්ණනා १. नच्चगीतसुत्तवण्णना (नृत्य आणि गायनाविषयीच्या सूत्राचे स्पष्टीकरण) 1151. සාසනස්ස අනනුලොමත්තා විසූකං පටාණීභූතං දස්සනන්ති විසූකදස්සනං. අත්තනා නච්චනනච්චාපනාදිවසෙන නච්චා ච ගීතා ච වාදිතා ච අන්තමසො මයූරනච්චාදිවසෙනාපි පවත්තානං නච්චාදීනං විසූකභූතා දස්සනා චාති නච්චගීතවාදිතවිසූකදස්සනා. නච්චාදීනි හි අත්තනා පයොජෙතුං වා පරෙහි පයොජාපෙතුං වා පයුත්තානි පස්සිතුං වා නෙව භික්ඛූනං, න භික්ඛුනීනං වට්ටන්ති. ११५१. बुद्धशासनाला अनुकूल नसल्यामुळे अडथळा किंवा काट्यासारखे असणारे जे पाहणे, त्याला 'विसूकदस्सन' (विपरीत दर्शन) म्हणतात. स्वतः नाचणे किंवा इतरांना नाचवायला लावणे इत्यादी प्रकारे नृत्य, गीत आणि वादनापासून, तसेच अगदी मोराच्या नृत्यासारखे नृत्य पाहण्यापासून विरत राहणे, याला 'नच्चगीतवादितविसूकदस्सन' म्हणतात. कारण नृत्यादी गोष्टी स्वतः सादर करणे, इतरांकडून सादर करून घेणे किंवा सादर केलेल्या गोष्टी पाहणे, हे भिक्खूंना तसेच भिक्खुनींनाही अजिबात कल्प्य (योग्य) नाही. 2. උච්චාසයනසුත්තවණ්ණනා २. उच्चाशयनसुत्तवण्णना (उच्च आसनाविषयीच्या सूत्राचे स्पष्टीकरण) 1152. උච්චාසයනං [Pg.336] වුච්චති පමාණාතික්කන්තං. මහාසයනං අකප්පියත්ථරණං, තතො පටිවිරතාති අත්ථො. ११५२. प्रमाणाबाहेर असणाऱ्या आसनाला 'उच्चाशयन' म्हणतात. अकल्प्य (अयोग्य) अंथरूण असणाऱ्या आसनाला 'महाशयन' म्हणतात. त्यांपासून विरत राहणे; असा अर्थ आहे. 3. ජාතරූපසුත්තවණ්ණනා ३. जातरूपसुत्तवण्णना (सोने-चांदी स्वीकारण्याविषयीच्या सूत्राचे स्पष्टीकरण) 1153. ජාතරූපන්ති සුවණ්ණං. රජතන්ති කහාපණො – ලොහමාසකො, ජතුමාසකො, දාරුමාසකොති යෙ වොහාරං ගච්ඡන්ති, තස්ස උභයස්සාපි පටිග්ගහණා පටිවිරතා. නෙව නං උග්ගණ්හන්ති න උග්ගණ්හාපෙන්ති, න උපනික්ඛිත්තං සාදියන්තීති අත්ථො. ११५३. 'जातरूप' म्हणजे सोने होय. 'रजत' म्हणजे कहापण (नाणे), तांब्याचे माषक, लाखेचे माषक, लाकडाचे माषक इत्यादी जे व्यवहारात वापरले जातात ते होय. त्या दोन्हीचा स्वीकार करण्यापासून विरत राहणे; म्हणजेच ते स्वतः न स्वीकारणे, इतरांना स्वीकारायला न लावणे आणि जवळ ठेवलेल्याचा स्वीकार न करणे; असा अर्थ आहे. 4. ආමකධඤ්ඤසුත්තවණ්ණනා ४. आमकधञ्ञसुत्तवण्णना (कच्चे धान्य स्वीकारण्याविषयीच्या सूत्राचे स्पष्टीकरण) 1154. ආමකධඤ්ඤපටිග්ගහණාති සාලි-වීහි-යව-ගොධුම-කඞ්ගු-වරක-කුද්රූසකසඞ්ඛාතස්ස සත්තවිධස්සාපි ආමකධඤ්ඤස්ස පටිග්ගහණා. න කෙවලඤ්ච එතෙසං පටිග්ගහණමෙව, ආමසනම්පි භික්ඛූනං න වට්ටතියෙව. ११५४. 'आमकधञ्ञपटिग्गहणा' म्हणजे साळी, भात, जव, गहू, कांगणी, वरक आणि कोद्रू अशा सात प्रकारच्या कच्च्या धान्याचा स्वीकार करण्यापासून विरत राहणे. केवळ या धान्यांचा स्वीकार करणेच नव्हे, तर त्यांना स्पर्श करणे देखील भिक्खूंसाठी अकल्प्यच (अयोग्यच) आहे. 5. ආමකමංසසුත්තවණ්ණනා ५. आमकमांससुत्तवण्णना (कच्चे मांस स्वीकारण्याविषयीच्या सूत्राचे स्पष्टीकरण) 1155. ආමකමංසපටිග්ගහණාති එත්ථ අඤ්ඤත්ර උද්දිස්ස අනුඤ්ඤාතා ආමකමංසමච්ඡානං පටිග්ගහණමෙව භික්ඛූනං න වට්ටති, නො ආමසනං. ११५५. 'आमकमांसपटिग्गहणा' या वाक्यात, उद्देशून अनुमती दिलेल्या गोष्टींशिवाय इतर कच्चे मांस आणि मासे यांचा केवळ स्वीकार करणेच भिक्खूंसाठी अकल्प्य (अयोग्य) आहे, स्पर्श करणे अकल्प्य नाही. 6. කුමාරිකසුත්තවණ්ණනා ६. कुमारिकसुत्तवण्णना (कुमारींचा स्वीकार करण्याविषयीच्या सूत्राचे स्पष्टीकरण) 1156. ඉත්ථිකුමාරිකපටිග්ගහණාති එත්ථ ඉත්ථීති පුරිසන්තරගතා, ඉතරා කුමාරිකා නාම. තාසං පටිග්ගහණම්පි ආමසනම්පි අකප්පියමෙව. ११५६. 'इत्थिकुमारिकपटिग्गहणा' या वाक्यात, 'स्त्री' म्हणजे विवाहित स्त्री आणि इतर ती 'कुमारी' (अविवाहित मुलगी) होय. त्यांचा स्वीकार करणे आणि त्यांना स्पर्श करणे देखील भिक्खूंसाठी अकल्प्यच (अयोग्यच) आहे. 7. දාසිදාසසුත්තවණ්ණනා ७. दासिदाससुत्तवण्णना (दासी आणि दासांचा स्वीकार करण्याविषयीच्या सूत्राचे स्पष्टीकरण) 1157. දාසිදාසපටිග්ගහණාති එත්ථ දාසිදාසවසෙනෙව තෙසං පටිග්ගහණං න වට්ටති, ‘‘කප්පියකාරකං දම්මි, ආරාමිකං දම්මී’’ති එවං වුත්තෙ පන වට්ටති. ११५७. 'दासिदासपटिग्गहणा' या वाक्यात, दासी किंवा दासाच्या रूपाने त्यांचा स्वीकार करणे अकल्प्य (अयोग्य) आहे. परंतु, 'मी कल्प्यकारक (सेवा करणारा) देतो' किंवा 'मी आरामिक (विहाराची काळजी घेणारा) देतो' अशा कल्प्य शब्दांत दात्यांनी म्हटले असता, ते स्वीकारणे कल्प्य (योग्य) आहे. 10. චතුත්ථආමකධඤ්ඤපෙය්යාලවග්ගො १०. चतुत्थआमकधञ्ञपेय्यालवग्गो (चौथा कच्च्या धान्याचा पेय्याल वर्ग) 1. ඛෙත්තවත්ථුසුත්තවණ්ණනා १. खेत्तवत्थुसुत्तवण्णना (शेत आणि जमिनीविषयीच्या सूत्राचे स्पष्टीकरण) 1161. අජෙළකාදීසු [Pg.337] ඛෙත්තවත්ථුපරියොසානෙසු කප්පියාකප්පියනයො විනයවසෙන උපපරික්ඛිතබ්බො. තත්ථ ඛෙත්තං නාම යස්මිං පුබ්බණ්ණං රුහති. වත්ථු නාම යස්මිං අපරණ්ණං රුහති. යත්ථ වා උභයං රුහති, තං ඛෙත්තං. තදත්ථාය අකතභූමිභාගො වත්ථු. ඛෙත්තවත්ථුසීසෙන චෙත්ථ වාපිතළාකාදීනිපි සඞ්ගහිතානෙව. ११६१. शेळ्या-मेंढ्यांपासून ते शेत आणि जमिनीपर्यंतच्या सर्व वस्तूंमध्ये कल्प्य आणि अकल्प्य असण्याचा नियम विनयाच्या नियमांनुसार तपासून पाहिला पाहिजे. त्यामध्ये, ज्या जमिनीवर मुख्य धान्य (तांदूळ इत्यादी) उगवते, तिला 'शेत' (खेत्त) म्हणतात. ज्या जमिनीवर दुय्यम धान्य (कडधान्ये इत्यादी) उगवते, तिला 'वास्तू' (वत्थु/जमीन) म्हणतात. किंवा जेथे दोन्ही प्रकारची धान्ये उगवतात, ते 'शेत' होय; आणि त्या शेतीसाठी अद्याप पेरणी न केलेला जमिनीचा भाग म्हणजे 'वास्तू' होय. येथे 'शेत आणि जमीन' या मुख्य शब्दांद्वारे विहिरी, तलाव इत्यादींचा देखील समावेश होतोच. 2-3. කයවික්කයසුත්තාදිවණ්ණනා २-३. कयविक्कयसुत्तादिवण्णना (खरेदी-विक्री इत्यादी सूत्रांचे स्पष्टीकरण) 1162-63. කයවික්කයාති කයා ච වික්කයා ච. දූතෙය්යං වුච්චති දූතකම්මං, ගිහීනං පණ්ණං වා සාසනං වා ගහෙත්වා තත්ථ තත්ථ ගමනං. පහිණගමනං වුච්චති ඝරා ඝරං පෙසිතස්ස ඛුද්දකගමනං. අනුයොගො නාම තදුභයකරණං. තස්මා දූතෙය්යපහිණගමනානුයොගාති එවමෙත්ථ අත්ථො වෙදිතබ්බො. ११६२-६३. 'कयविक्कय' म्हणजे खरेदी आणि विक्री करणे. गृहस्थांचे पत्र किंवा निरोप घेऊन त्या त्या ठिकाणी जाणे या दूतकर्मास 'दुतेय्य' (दूतकर्म) म्हणतात. एका घरापासून दुसऱ्या घरापर्यंत निरोप घेऊन जाण्याच्या छोट्या प्रवासास 'पहिणगमन' म्हणतात. त्या दोन्ही गोष्टी करणे म्हणजे 'अनुयोग' (त्यात गुंतणे) होय. म्हणून, 'दुतेय्यपहिणगमनानुयोग' म्हणजे दूतकर्म आणि निरोप घेऊन जाणे यात गुंतण्यापासून विरत राहणे; असा अर्थ येथे समजला पाहिजे. 4. තුලාකූටසුත්තවණ්ණනා ४. तुलाकूटसुत्तवण्णना (खोट्या वजनाविषयीच्या सूत्राचे स्पष्टीकरण) 1164. තුලාකූටාදීසු කූටන්ති වඤ්චනං. තත්ථ තුලාකූටං තාව රූපකූටං, අඞ්ගකූටං, ගහණකූටං, පටිච්ඡන්නකූටන්ති චතුබ්බිධං හොති. තත්ථ රූපකූටං නාම ද්වෙ තුලා සමරූපා කත්වා ගණ්හන්තො මහතියා ගණ්හාති, දදන්තො ඛුද්දිකාය දෙති. අඞ්ගකූටං නාම ගණ්හන්තො පච්ඡාභාගෙ හත්ථෙන තුලං අක්කමති, දදන්තො පුබ්බභාගෙ. ගහණකූටං නාම ගණ්හන්තො මූලෙ රජ්ජුං ගණ්හාති, දදන්තො අග්ගෙ. පටිච්ඡන්නකූටං නාම තුලං සුසිරං කත්වා අන්තො අයචුණ්ණං පක්ඛිපිත්වා ගණ්හන්තො තං පච්ඡාභාගෙ කරොති, දදන්තො අග්ගභාගෙ. ११६४. 'तुलाकूट' इत्यादींमध्ये फसवणुकीला 'कूट' म्हणतात. त्यामध्ये, वजनातील फसवणूक (तुलाकूट) चार प्रकारची असते: रूपकूट, अंगकूट, ग्रहणकूट आणि पटिच्छन्नकूट (गुप्तकूट). त्यामध्ये, 'रूपकूट' म्हणजे दोन समान तराजू बनवून दुसऱ्याचे घेताना मोठ्या वजनाने घेणे आणि स्वतःचे देताना लहान वजनाने देणे. 'अंगकूट' म्हणजे घेताना तराजूच्या मागच्या बाजूला हाताने दाबणे आणि देताना पुढच्या बाजूला दाबणे. 'ग्रहणकूट' म्हणजे घेताना दोरीच्या मुळाशी पकडणे आणि देताना शेंड्याकडे पकडणे. 'पटिच्छन्नकूट' म्हणजे तराजू पोकळ करून त्यात लोखंडाची पूड भरणे आणि घेताना ती पूड मागच्या बाजूला करणे व देताना पुढच्या बाजूला करणे. කංසො වුච්චති සුවණ්ණපාති, තාය වඤ්චනං කංසකූටං. කථං? එකං සුවණ්ණපාතිං කත්වා අඤ්ඤා ද්වෙ තිස්සො ලොහපාතියො සුවණ්ණවණ්ණා කරොන්ති. තතො ජනපදං ගන්ත්වා, කිඤ්චිදෙව අඩ්ඪකුලං පවිසිත්වා, ‘‘සුවණ්ණභාජනානි කිණථා’’ති වත්වා, අග්ඝෙ පුච්ඡිතෙ සමග්ඝතරං දාතුකාමා හොන්ති, තතො තෙහි ‘‘කථං ඉමෙසං සුවණ්ණභාවො ජානිතබ්බො’’ති [Pg.338] වුත්තෙ ‘‘වීමංසිත්වා ගණ්හථා’’ති සුවණ්ණපාතිං පාසාණෙ ඝංසිත්වා සබ්බපාතියො දත්වා ගච්ඡන්ති. सोन्याच्या पात्राला 'कंस' म्हणतात, आणि त्या पात्राद्वारे फसवणूक करणे म्हणजे 'कंसकूट' होय. ते कसे? एक सोन्याचे खरे पात्र बनवून इतर दोन-तीन तांब्याची पात्रे सोन्याच्या रंगाची बनवतात. त्यानंतर गावात जाऊन एखाद्या श्रीमंत कुटुंबात प्रवेश करतात आणि 'सोन्याची भांडी खरेदी करा' असे म्हणतात. किंमत विचारली असता, ते ती स्वस्त दरात देण्यास तयार होतात. त्यानंतर त्यांनी 'हे सोने खरे आहे हे कसे ओळखावे?' असे विचारले असता, 'तपासून घ्या' असे सांगून सोन्याचे खरे पात्र दगडावर घासून दाखवतात आणि नंतर तांब्याची खोटी पात्रे देऊन निघून जातात. මානකූටං හදයභෙද-සිඛාභෙද-රජ්ජුභෙදවසෙන තිවිධං හොති. තත්ථ හදයභෙදො සප්පිතෙලාදිමිනනකාලෙ ලබ්භති. තානි හි ගණ්හන්තො හෙට්ඨාඡිද්දෙන මානෙන ‘‘සණිකං ආසිඤ්චා’’ති වත්වා අන්තොභාජනෙ බහුං පග්ඝරාපෙත්වා ගණ්හාති, දදන්තො ඡිද්දං පිධාය සීඝං පූරෙත්වා දෙති. සිඛාභෙදො තිලතණ්ඩුලාදිමිනනකාලෙ ලබ්භති. තානි හි ගණ්හන්තො සණිකං සිඛං උස්සාපෙත්වා ගණ්හාති, දදන්තො වෙගෙන සිඛං භින්දන්තො දෙති. රජ්ජුභෙදො ඛෙත්තවත්ථුමිනනකාලෙ ලබ්භති. ලඤ්ජං අලභන්තා හි ඛෙත්තං අමහන්තං මහන්තං කත්වා මිනන්ති. 'मानकूट' (मापातील फसवणूक) हृदयभेद, शिखाभेद आणि रज्जूभेद या रूपाने तीन प्रकारची असते. त्यामध्ये, 'हृदयभेद' तूप, तेल इत्यादी मोजताना पाहायला मिळतो. ते कसे? स्वतः घेताना खाली छिद्र असलेल्या मापाने 'हळूहळू ओता' असे सांगून आपल्या खालच्या भांड्यात बरेचसे गळू देऊन घेतो; आणि दुसऱ्याला देताना छिद्र बंद करून भराभर माप भरून देतो. 'शिखाभेद' तीळ, तांदूळ इत्यादी मोजताना पाहायला मिळतो. ते कसे? स्वतः घेताना हळूहळू वरचा ढीग (शिखा) उंच करून घेतो; आणि दुसऱ्याला देताना वेगाने माप भरून वरचा ढीग सपाट करून देतो. 'रज्जूभेद' शेत आणि जमीन मोजताना पाहायला मिळतो. लाच न मिळाल्यास ते लहान शेत मोठे करून किंवा मोठे शेत लहान करून मोजतात. 5. උක්කොටනසුත්තවණ්ණනා ५. उक्कोटनसुत्तवण्णना (लाचखोरी किंवा फसवणुकीविषयीच्या सूत्राचे स्पष्टीकरण) 1165. උක්කොටනාදීසු උක්කොටනන්ති සාමිකෙ අස්සාමිකෙ කාතුං ලඤ්ජග්ගහණං. වඤ්චනන්ති තෙහි තෙහි උපායෙහි පරෙසං වඤ්චනං. තත්රිදමෙකංවත්ථු – එකො කිර ලුද්දකො මිගඤ්ච මිගපොතකඤ්ච ගහෙත්වා ආගච්ඡති. තමෙකො ධුත්තො ‘‘කිං, භො, මිගො අග්ඝති, කිං මිගපොතකො’’ති?, ආහ. ‘‘මිගො ද්වෙ කහාපණෙ, මිගපොතකො එක’’න්ති ච වුත්තෙ කහාපණං දත්වා, මිගපොතකං ගහෙත්වා ථොකං ගන්ත්වා නිවත්තො ‘‘න මෙ, භො, මිගපොතකෙන අත්ථො, මිගං මෙ දෙහී’’ති ආහ. තෙන හි ද්වෙ කහාපණෙ දෙහීති. නනු, භො, මයා පඨමං එකො කහාපණො දින්නොති. ආම දින්නොති. ඉමම්පි මිගපොතකං ගණ්හ, එවං සො ච කහාපණො, අයඤ්ච කහාපණග්ඝනකො මිගපොතකොති ද්වෙ කහාපණා භවිස්සන්තීති. සො ‘‘කාරණං වදතී’’ති සල්ලක්ඛෙත්වා මිගපොතකං ගහෙත්වා මිගං අදාසීති. ११६५. उक्कोटन (लाचलुचपत) इत्यादींमध्ये, खऱ्या मालकाला अ-मालक (मालक नसलेला) करण्यासाठी लाच घेणे म्हणजे 'उक्कोटन' होय. 'वंचना' (फसवणूक) म्हणजे वेगवेगळ्या उपायांनी इतरांना फसवणे होय. या फसवणुकीच्या संदर्भात ही एक कथा ऐकिवात आहे— एक शिकारी एका मोठ्या हरणाला आणि हरणाच्या पाडसाला घेऊन येत होता. एका धूर्ताने त्याला विचारले, 'हे मित्रा, मोठ्या हरणाची किंमत काय आहे आणि पाडसाची किंमत काय आहे?' शिकाऱ्याने उत्तर दिले, 'मोठे हरण दोन कहापण आणि पाडस एक कहापण.' तेव्हा त्या धूर्ताने एक कहापण देऊन पाडस घेतले, तो थोडा दूर गेला आणि परत फिरून म्हणाला, 'मित्रा, मला पाडसाची गरज नाही, मला मोठे हरण दे.' शिकारी म्हणाला, 'तर मग मला दोन कहापण दे.' धूर्त म्हणाला, 'मित्रा, मी आधीच तुला एक कहापण दिला आहे की नाही?' शिकारी म्हणाला, 'होय, दिला आहे.' धूर्त म्हणाला, 'हे पाडस सुद्धा परत घे. अशा प्रकारे तो आधी दिलेला एक कहापण आणि हा एक कहापण किमतीचा पाडस मिळून दोन कहापण होतील.' शिकाऱ्याने 'हा योग्य तर्क मांडत आहे' असा विचार करून पाडस परत घेतले आणि त्याला मोठे हरण दिले. නිකතීති යොගවසෙන වා මායාවසෙන වා අපාමඞ්ගං පාමඞ්ගන්ති අමණිං මණින්ති, අසුවණ්ණං සුවණ්ණන්ති කත්වා පතිරූපකෙන වඤ්චනං. සාචියොගොති කුටිලයොගො. එතෙසංයෙව උක්කොටනාදීනමෙතං නාමං. තස්මා උක්කොටනසාචියොගා වඤ්චනසාචියොගා නිකතිසාචියොගාති එවමෙත්ථ අත්ථො දට්ඨබ්බො. කෙචි අඤ්ඤං දස්සෙත්වා අඤ්ඤස්ස පරිවත්තනං සාචියොගොති වදන්ති. තං පන වඤ්චනෙනෙව සඞ්ගහිතං. 'निकति' (कपट) म्हणजे मंत्र-तंत्राच्या किंवा मायेच्या (जादूच्या) प्रभावाने जे आभूषण नाही त्याला आभूषण भासवणे, जे रत्न नाही त्याला रत्न भासवणे, आणि जे सोने नाही त्याला सोने भासवून बनावट वस्तूने फसवणे होय. 'साचियोग' म्हणजे कुटिल (कपटी) व्यवहार होय. हे उक्कोटन इत्यादींचेच दुसरे नाव आहे. म्हणून, येथे 'उक्कोटन-साचियोग', 'वंचना-साचियोग' आणि 'निकति-साचियोग' असा अर्थ समजला पाहिजे. काही आचार्य एक वस्तू दाखवून दुसरी वस्तू बदलून देणे याला 'साचियोग' म्हणतात; परंतु त्याचा समावेश 'वंचना' (फसवणूक) यामध्येच होतो. 6-11. ඡෙදනසුත්තාදිවණ්ණනා ६-११. छेदन सूत्त इत्यादींचे स्पष्टीकरण. 1166-71. ඡෙදනාදීසු [Pg.339] ඡෙදනන්ති හත්ථච්ඡෙදනාදි. වධොති මරණං. බන්ධොති රජ්ජුබන්ධනාදීහි බන්ධනං. විපරාමොසොති හිමවිපරාමොසො, ගුම්බවිපරාමොසොති දුවිධො. යං හිමපාතසමයෙ හිමෙන පටිච්ඡන්නා හුත්වා මග්ගපටිපන්නං ජනං මුසන්ති, අයං හිමවිපරාමොසො. යං ගුම්බාදිපටිච්ඡන්නා මුසන්ති, අයං ගුම්බවිපරාමොසො. ११६६-७१. 'छेदन' इत्यादींमध्ये 'छेदन' म्हणजे हात-पाय इत्यादी तोडणे होय. 'वध' म्हणजे मारणे (हत्या करणे) होय. 'बंध' म्हणजे दोरी इत्यादींनी बांधणे होय. 'विपरामोस' (लूटमार) चे दोन प्रकार आहेत— 'हिम-विपरामोस' आणि 'गुम्ब-विपरामोस'. बर्फवृष्टी किंवा धुक्याच्या वेळी धुक्यामध्ये स्वतःला लपवून जे प्रवाशांना लुटतात, त्याला 'हिम-विपरामोस' म्हणतात. जे झुडपे इत्यादींमध्ये लपून लुटतात, त्याला 'गुम्ब-विपरामोस' म्हणतात. ආලොපො වුච්චති ගාමනිගමාදීනං විලොපකරණං. සහසාකාරොති සාහසකිරියා, ගෙහං පවිසිත්වා, මනුස්සානං උරෙ සත්ථං ඨපෙත්වා, ඉච්ඡිතභණ්ඩග්ගහණං. එවමෙතස්මා ඡෙදනවධබන්ධනවිපරාමොසආලොපසහසාකාරා පටිවිරතා. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානත්ථමෙවාති. 'आलोप' म्हणजे गावे, शहरे इत्यादींची लूटमार करणे होय. 'सहसाकार' म्हणजे बळजबरीचे कृत्य होय, जसे की घरात शिरून, लोकांच्या छातीवर शस्त्र ठेवून, इच्छित वस्तू बळजबरीने हिरावून घेणे. अशा प्रकारे, या छेदन, वध, बंध, विपरामोस, आलोप आणि sahsaakaar यांपासून विरत (दूर) राहावे. उर्वरित सर्व भागाचा अर्थ स्पष्टच आहे. ආමකධඤ්ඤපෙය්යාලවණ්ණනා නිට්ඨිතා. आमधान्य-पेय्यालचे स्पष्टीकरण समाप्त झाले. ඉති සාරත්ථප්පකාසිනියා සංයුත්තනිකාය-අට්ඨකථාය अशा प्रकारे, सारत्थप्पकासिनी नावाच्या संयुत्तनिकाय-अठ्ठकथेतील මහාවග්ගවණ්ණනා නිට්ඨිතා. महावग्गचे स्पष्टीकरण समाप्त झाले. නිගමනකථා निगमनकथा (उपसंहार). එත්තාවතා [Pg.340] හි – येथपर्यंत खरोखर— ‘‘බහුකාරස්ස යතීනං විපස්සනාචාරනිපුණබුද්ධීනං,සංයුත්තවරනිකායස්ස අත්ථසංවණ්ණනං කාතුං. विपश्यना मार्गात निपुण बुद्धी असलेल्या आणि संयमी जीवन जगणाऱ्या भिक्खूंसाठी अत्यंत उपकारक अशा या श्रेष्ठ संयुत्तनिकाय ग्रंथाचे अर्थ-स्पष्टीकरण करण्यासाठी, ‘‘සද්ධම්මස්ස චිරට්ඨිතිමාසිසමානෙන යා මයා; නිපුණා අට්ඨකථා ආරද්ධා සාරත්ථපකාසිනී නාම. सद्धम्माच्या चिरंतन अस्तित्वाची आकांक्षा बाळगून माझ्याद्वारे जी 'सारत्थप्पकासिनी' नावाची सखोल अठ्ठकथा लिहिण्यास प्रारंभ करण्यात आली होती, ‘‘සා හි මහාඅට්ඨකථාය සාරමාදාය නිට්ඨිතා එසා; අට්ඨසත්තතිමත්තාය පාළියා භාණවාරෙහි. ती महा-अठ्ठकथेतील सार ग्रहण करून आणि अठ्ठ्याहत्तर (७८) भाणवारांच्या प्रमाणात असलेल्या पालि ग्रंथाच्या आधारे पूर्ण झाली आहे. ‘‘එකූනසට්ඨිමත්තො විසුද්ධිමග්ගොපි භාණවාරෙහි; අත්ථප්පකාසනත්ථාය ආගමානං කතො යස්මා. ज्याअर्थी मी चारही निकायांच्या (आगमांच्या) अर्थ-स्पष्टीकरणासाठी एकोणसाठ (५९) भाणवारांचा 'विसुद्धिमग्ग' हा ग्रंथ देखील रचला आहे, ‘‘තස්මා තෙන සහායං අට්ඨකථා භාණවාරගණනාය; ථොකෙන අපරිපූරං සත්තතිංසසතං හොති. त्यामुळे, त्या (विसुद्धिमग्ग) ग्रंथासह ही अठ्ठकथा भाणवारांच्या गणनेनुसार थोडी कमी एकशे सदतीस (१३७) भाणवारांची होते. ‘‘සත්තතිංසාධිකසත-පරිමාණං භාණවාරතො එවං; සමයං පකාසයන්තිං මහාවිහාරාධිවාසීනං. अशा प्रकारे, भाणवारांच्या गणनेनुसार एकशे सदतीस भाणवारांच्या प्रमाणात असलेली आणि महाविहारवासी थेरांच्या सिद्धांतांचे प्रतिपादन करणारी, ‘‘මූලට්ඨකථාය සාරමාදාය මයා ඉමං කරොන්තෙන; යං පුඤ්ඤමුපචිතං තෙන හොතු සබ්බො සුඛී ලොකො. मूळ अठ्ठकथेतील सार ग्रहण करून ही अठ्ठकथा रचताना मी जे काही पुण्य संचित केले आहे, त्या पुण्याच्या प्रभावाने सर्व जग सुखी होवो. ‘‘එතිස්සා කරණත්ථං ථෙරෙන භදන්තජොතිපාලෙන; සුචිසීලෙන සුභාසිතස්ස පකාසයන්තඤාණෙන. या अठ्ठकथेच्या रचनेसाठी, पवित्र शील असलेले आणि सुभाषित वचनांचे स्पष्टीकरण करण्याचे ज्ञान बाळगणारे थेर भदंत जोतिपाल यांनी, ‘‘සාසනවිභූතිකාමෙන යාචමානෙන මං සුභගුණෙන; යං සමධිගතං පුඤ්ඤං තෙනාපි ජනො සුඛී භවතූ’’ති. शासनाच्या (बुद्ध शासनाच्या) वैभवाची आकांक्षा बाळगून मला आदरपूर्वक विनंती केली होती. या ग्रंथलेखनामुळे मला जे काही पुण्य प्राप्त झाले आहे, त्याने देखील सर्व लोक सुखी होवोत. පරමවිසුද්ධසද්ධාබුද්ධිවීරියප්පටිමණ්ඩිතෙන සීලාචාරජ්ජවමද්දවාදිගුණසමුදයසමුදිතෙන සකසමයසමයන්තරගහනජ්ඣොගාහණසමත්ථෙන පඤ්ඤාවෙය්යත්තියසමන්නාගතෙන තිපිටකපරියත්තිප්පභෙදෙ සාට්ඨකථෙ සත්ථුසාසනෙ අප්පටිහතඤාණප්පභාවෙන මහාවෙය්යාකරණෙන කරණසම්පත්තිජනිතසුඛවිනිග්ගතමධුරොදාරවචනලාවණ්ණයුත්තෙන යුත්තමුත්තවාදිනා වාදීවරෙන මහාකවිනා පභින්නපටිසම්භිදාපරිවාරෙ ඡළභිඤ්ඤාදිප්පභෙදගුණප්පටිමණ්ඩිතෙ උත්තරිමනුස්සධම්මෙ [Pg.341] සුප්පතිට්ඨිතබුද්ධීනං ථෙරවංසප්පදීපානං ථෙරානං මහාවිහාරවාසීනං වංසාලඞ්කාරභූතෙන විපුලවිසුද්ධබුද්ධිනා බුද්ධඝොසොති ගරූහි ගහිතනාමධෙය්යෙන ථෙරෙන කතා අයං සාරත්ථප්පකාසිනී නාම සංයුත්තනිකායට්ඨකථා. परम विशुद्ध श्रद्धा, प्रज्ञा आणि वीर्याने सुशोभित असलेल्या; शील, सदाचार, ऋजुता (सरळपणा), मृदुता इत्यादी गुणांच्या समूहाने युक्त असलेल्या; स्व-सिद्धांत आणि पर-सिद्धांतांच्या गहन अभ्यासात प्रवेश करण्यास समर्थ असलेल्या; प्रज्ञेच्या प्रगल्भतेने युक्त असलेल्या; अठ्ठकथेसह त्रिपिटक रूपी परियत्तीने युक्त अशा शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) शासनामध्ये अबाधित ज्ञानप्रकाशाने युक्त असलेल्या; महान व्याकरणकार असलेल्या; उच्चारणाच्या परिपूर्णतेमुळे निर्माण झालेल्या, सहज, मधुर आणि उदात्त अशा वाणीच्या सौंदर्याने युक्त असलेल्या; योग्य आणि स्पष्ट बोलणाऱ्या; वादविवाद करणाऱ्यांमध्ये श्रेष्ठ असलेल्या; महाकवी असलेल्या; प्रतिसंभिदांच्या परिवाराने युक्त, सहा अभिज्ञा इत्यादी गुणांनी सुशोभित अशा उत्तरमनुष्यधर्मामध्ये (ध्यान-मार्ग-फलांमध्ये) ज्यांची बुद्धी दृढ प्रतिष्ठित आहे अशा, थेरवंशाचे दीप असलेल्या महाविहारवासी थेरांच्या वंशाचे भूषण असलेल्या; विशाल आणि विशुद्ध बुद्धी असलेल्या आणि पूज्य गुरूंनी ज्यांना 'बुद्धघोष' हे नाव दिले आहे, अशा थेरांनी रचलेली ही 'सारत्थप्पकासिनी' नावाची संयुत्तनिकाय-अठ्ठकथा होय. ‘‘තාව තිට්ඨතු ලොකස්මිං, ලොකනිත්ථරණෙසිනං; දස්සෙන්තී කුලපුත්තානං, නයං සීලවිසුද්ධියා. संसारातून मुक्त होऊ इच्छिणाऱ्या कुलपुत्रांना शील-विशुद्धीचा मार्ग दाखवणारी ही अठ्ठकथा या जगात तोपर्यंत टिकून राहो, ‘‘යාව බුද්ධොති නාමම්පි, සුද්ධචිත්තස්ස තාදිනො; ලොකම්හි ලොකජෙට්ඨස්ස, පවත්තති මහෙසිනො’’ති. जोपर्यंत विशुद्ध चित्त असलेल्या, अष्टलोकधर्माने कंपित न होणाऱ्या, जगातील ज्येष्ठ आणि महान गुणांचा शोध घेणाऱ्या अशा त्या 'बुद्ध' या महामुनींचे नाव देखील या जगात अस्तित्वात आहे. සාරත්ථප්පකාසිනී නාම सारत्थप्पकासिनी नावाची සංයුත්තනිකාය-අට්ඨකථා සබ්බාකාරෙන නිට්ඨිතා. संयुत्तनिकाय-अठ्ठकथा सर्व प्रकारे समाप्त झाली. | |||
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
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| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |