| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
နမော တဿ ဘဂဝတော အရဟတော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांना नमस्कार असो. သံယုတ္တနိကာယေ संयुत्तनिकायामध्ये သဠာယတနဝဂ္ဂ-အဋ္ဌကထာ सळायतनवर्गाची अट्ठकथा ၁. သဠာယတနသံယုတ္တံ १. सळायतनसंयुत्त ၁. အနိစ္စဝဂ္ဂေါ १. अनिच्चवर्ग ၁. အဇ္ဈတ္တာနိစ္စသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. अज्झत्त-अनिच्चसुत्त वर्णन ၁. သဠာယတနဝဂ္ဂဿ [Pg.1] ပဌမေ စက္ခုန္တိ ဒွေ စက္ခူနိ – ဉာဏစက္ခု စေဝ မံသစက္ခု စ. တတ္ထ ဉာဏစက္ခု ပဉ္စဝိဓံ – ဗုဒ္ဓစက္ခု, ဓမ္မစက္ခု, သမန္တစက္ခု, ဒိဗ္ဗစက္ခု, ပညာစက္ခူတိ. တေသု ဗုဒ္ဓစက္ခု နာမ အာသယာနုသယဉာဏဉ္စေဝ ဣန္ဒြိယပရောပရိယတ္တဉာဏဉ္စ, ယံ – ‘‘ဗုဒ္ဓစက္ခုနာ လောကံ ဝေါလောကေန္တော’’တိ (မဟာဝ. ၉; မ. နိ. ၁.၂၈၃; ၂.၃၃၈) အာဂတံ. ဓမ္မစက္ခု နာမ ဟေဋ္ဌိမာ တယော မဂ္ဂါ တီဏိ စ ဖလာနိ, ယံ – ‘‘ဝိရဇံ ဝီတမလံ ဓမ္မစက္ခုံ ဥဒပါဒီ’’တိ (မဟာဝ. ၁၆; မ. နိ. ၂.၃၉၅) အာဂတံ. သမန္တစက္ခု နာမ သဗ္ဗညုတညာဏံ, ယံ – ‘‘ပါသာဒမာရုယှ သမန္တစက္ခူ’’တိ (မဟာဝ. ၈; မ. နိ. ၁.၂၈၂; ၂.၃၃၈) အာဂတံ. ဒိဗ္ဗစက္ခု နာမ အာလောကဖရဏေန ဥပ္ပန္နံ ဉာဏံ, ယံ – ‘‘ဒိဗ္ဗေန စက္ခုနာ ဝိသုဒ္ဓေနာ’’တိ (ပါရာ. ၁၃; မ. နိ. ၂.၃၄၁) အာဂတံ. ပညာစက္ခု နာမ စတုသစ္စပရိစ္ဆေဒကဉာဏံ, ယံ – ‘‘စက္ခုံ ဥဒပါဒီ’’တိ (သ. နိ. ၅.၁၀၈၁; မဟာဝ. ၁၅) အာဂတံ. १. सळायतनवर्गाच्या पहिल्या सूत्रात 'चक्खु' (डोळा) म्हणजे दोन प्रकारचे डोळे आहेत - ज्ञानचक्षु आणि मांसचक्षु. त्यापैकी ज्ञानचक्षु पाच प्रकारचे आहेत - बुद्धचक्षु, धम्मचक्षु, समंतचक्षु, दिव्यचक्षु आणि प्रज्ञाचक्षु. त्यापैकी 'बुद्धचक्षु' म्हणजे प्राण्यांचे आशय आणि अनुशय जाणणारे ज्ञान आणि त्यांच्या इंद्रियांची परिपक्वता जाणणारे ज्ञान होय, जे "बुद्धचक्षूने जगाकडे पाहताना" या वाक्यात आले आहे. 'धम्मचक्षु' म्हणजे खालचे तीन मार्ग आणि तीन फळे होत, जे "विरज, विमल धम्मचक्षु उत्पन्न झाले" या वाक्यात आले आहे. 'समंतचक्षु' म्हणजे सर्वज्ञता-ज्ञान होय, जे "प्रासादावर चढून समंतचक्षूने..." या वाक्यात आले आहे. 'दिव्यचक्षु' म्हणजे प्रकाशाच्या प्रसाराने उत्पन्न झालेले ज्ञान होय, जे "परिशुद्ध दिव्यचक्षूने..." या वाक्यात आले आहे. 'प्रज्ञाचक्षु' म्हणजे चार आर्यसत्यांचे परिच्छेद करणारे ज्ञान होय, जे "चक्षु उत्पन्न झाले" या वाक्यात आले आहे. မံသစက္ခုပိ [Pg.2] ဒုဝိဓံ – သသမ္ဘာရစက္ခု, ပသာဒစက္ခူတိ. တေသု ယွာယံ အက္ခိကူပကေ အက္ခိပဋလေဟိ ပရိဝါရိတော မံသပိဏ္ဍော, ယတ္ထ စတဿော ဓာတုယော ဝဏ္ဏဂန္ဓရသောဇာ သမ္ဘဝေါ ဇီဝိတံ ဘာဝေါ စက္ခုပသာဒေါ ကာယပသာဒေါတိ သင်္ခေပတော တေရသ သမ္ဘာရာ ဟောန္တိ. ဝိတ္ထာရတော ပန စတဿော ဓာတုယော ဝဏ္ဏဂန္ဓရသောဇာ သမ္ဘဝေါတိ ဣမေ နဝ စတုသမုဋ္ဌာနဝသေန ဆတ္တိံသ, ဇီဝိတံ ဘာဝေါ စက္ခုပသာဒေါ ကာယပသာဒေါတိ ဣမေ ကမ္မသမုဋ္ဌာနာ တာဝ စတ္တာရောတိ စတ္တာရီသ သမ္ဘာရာ ဟောန္တိ. ဣဒံ သသမ္ဘာရစက္ခု နာမ. ယံ ပနေတ္ထ သေတမဏ္ဍလပရိစ္ဆိန္နေန ကဏှမဏ္ဍလေန ပရိဝါရိတေ ဒိဋ္ဌိမဏ္ဍလေ သန္နိဝိဋ္ဌံ ရူပဒဿနသမတ္ထံ ပသာဒမတ္တံ, ဣဒံ ပသာဒစက္ခု နာမ. တဿ တတော ပရေသဉ္စ သောတာဒီနံ ဝိတ္ထာရကထာ ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂေ ဝုတ္တာဝ. मांसचक्षु देखील दोन प्रकारचे आहेत - ससंभारचक्षु आणि प्रसादचक्षु. त्यापैकी, जो हा डोळ्यांच्या खोबणीत पापण्यांनी वेढलेला मांसाचा गोळा आहे, ज्यामध्ये चार महाभूत (धातू), वर्ण (रंग), गंध (वास), रस (चव), ओज (पोषक घटक), संभव (शुक्र), जीवित (जीवनेंद्रिय), भाव (स्त्री/पुरुष भाव), चक्षुप्रसाद आणि कायप्रसाद असे संक्षेपाने तेरा संभार (घटक) असतात. विस्ताराने सांगायचे तर, चार महाभूत, वर्ण, गंध, रस, ओज आणि संभव हे नऊ घटक चार समुत्थानांच्या (कर्म, चित्त, ऋतु, आहार) प्रभावाने छत्तीस होतात; आणि जीवित, भाव, चक्षुप्रसाद व कायप्रसाद हे कर्मापासून उत्पन्न होणारे चार घटक मिळून एकूण चाळीस संभार होतात. याला 'ससंभारचक्षु' म्हणतात. परंतु, यामध्ये पांढऱ्या मंडळाने वेढलेल्या काळ्या मंडळाच्या मध्यभागी असलेल्या दृष्टीमंडळात स्थित असलेले, रूप पाहण्यास समर्थ असलेले जे केवळ संवेदनक्षम रूप (प्रसाद) आहे, त्याला 'प्रसादचक्षु' म्हणतात. त्याचे आणि त्यानंतरच्या श्रोत्र इत्यादींचे सविस्तर वर्णन विसुद्धिमग्गात केलेलेच आहे. တတ္ထ ယဒိဒံ ပသာဒစက္ခု, တံ ဂဟေတွာ ဘဂဝါ – စက္ခုံ, ဘိက္ခဝေ, အနိစ္စန္တိအာဒိမာဟ. တတ္ထ – ‘‘စတူဟိ ကာရဏေဟိ အနိစ္စံ ဥဒယဗ္ဗယဝန္တတာယာ’’တိအာဒိနာ နယေန ဝိတ္ထာရကထာ ဟေဋ္ဌာ ပကာသိတာယေဝ. သောတမ္ပိ ပသာဒသောတမေဝ အဓိပ္ပေတံ, တထာ ဃာနဇိဝှာကာယာ. မနောတိ တေဘူမကသမ္မသနစာရစိတ္တံ. ဣတိ ဣဒံ သုတ္တံ ဆသု အဇ္ဈတ္တိကာယတနေသု တီဏိ လက္ခဏာနိ ဒဿေတွာ ကထိတေ ဗုဇ္ဈနကာနံ အဇ္ဈာသယေန ဝုတ္တံ. त्यापैकी, जे हे प्रसादचक्षु आहे, ते लक्षात घेऊन भगवंतांनी "भिक्खूहो, चक्षु अनित्य आहे" इत्यादी उपदेश केला. तेथे - "चार कारणांमुळे अनित्य, उदय आणि व्यय असणारे" इत्यादी पद्धतीने सविस्तर वर्णन खाली स्पष्ट केले आहे. श्रोत्र देखील केवळ प्रसादश्रोत्रच अभिप्रेत आहे, तसेच घ्राण, जिव्हा आणि काय यांच्या बाबतीतही समजावे. 'मन' म्हणजे तिन्ही भूमींमधील विदर्शनाचे (विपश्यनेचे) आलंबन घेणारे चित्त होय. अशा प्रकारे, हे सूत्र सहा आध्यात्मिक आयतनांमध्ये तीन लक्षणे दर्शवून, सत्य जाणण्यास पात्र असलेल्या व्यक्तींच्या आशयानुसार सांगितले गेले आहे. ၂-၃. အဇ္ဈတ္တဒုက္ခသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ २-३. अज्झत्त-दुक्खसुत्त इत्यादींचे वर्णन ၂-၃. ဒုတိယံ ဒွေ လက္ခဏာနိ, တတိယံ ဧကလက္ခဏံ ဒဿေတွာ ကထိတေ ဗုဇ္ဈနကာနံ အဇ္ဈာသယေန ဝုတ္တံ. သေသာနိ ပန တေဟိ သလ္လက္ခိတာနိ ဝါ ဧတ္တကေနေဝ ဝါ သလ္လက္ခေဿန္တီတိ. २-३. दुसरे सूत्र दोन लक्षणे आणि तिसरे सूत्र एक लक्षण दर्शवून, सत्य जाणण्यास पात्र असलेल्यांच्या आशयानुसार सांगितले गेले आहे. उर्वरित लक्षणे एकतर त्यांनी स्वतःच ओळखली आहेत किंवा एवढ्यावरूनच ते ती ओळखतील. ၄-၆. ဗာဟိရာနိစ္စသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ४-६. बाहिर-अनिच्चसुत्त इत्यादींचे वर्णन ၄-၆. စတုတ္ထေ ရူပဂန္ဓရသဖောဋ္ဌဗ္ဗာ စတုသမုဋ္ဌာနာ, သဒ္ဒေါ ဒွိသမုဋ္ဌာနော, ဓမ္မာတိ တေဘူမကဓမ္မာရမ္မဏံ. ဣဒမ္ပိ ဗာဟိရေသု ဆသု အာယတနေသု တိလက္ခဏံ ဒဿေတွာ ကထိတေ ဗုဇ္ဈနကာနံ ဝသေန ဝုတ္တံ. ပဉ္စမေ ဆဋ္ဌေ စ ဒုတိယတတိယေသု ဝုတ္တသဒိသောဝ နယော. ४-६. चौथ्या सूत्रात रूप, गंध, रस आणि स्प्रष्टव्य हे चार कारणांपासून उत्पन्न होणारे आहेत; शब्द हा दोन कारणांपासून उत्पन्न होणारा आहे; आणि 'धम्म' म्हणजे तिन्ही भूमींमधील धर्मांचे आलंबन होय. हे देखील बाह्य सहा आयतनांमध्ये तीन लक्षणे दर्शवून, सत्य जाणण्यास पात्र असलेल्यांच्या क्षमतेनुसार सांगितले गेले आहे. पाचव्या आणि सहाव्या सूत्रात देखील दुसऱ्या व तिसऱ्या सूत्रात सांगितल्याप्रमाणेच पद्धत समजावी. ၇-၁၂. အဇ္ဈတ္တာနိစ္စာတီတာနာဂတသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ७-१२. अज्झत्त-अनिच्च-अतीत-अनागतसुत्त इत्यादींचे वर्णन ၇-၁၂. သတ္တမာဒီနိ [Pg.3] အတီတာနာဂတေသု စက္ခာဒီသု အနိစ္စလက္ခဏာဒီနိ သလ္လက္ခေတွာ ပစ္စုပ္ပန္နေသု ဗလဝဂါဟေန ကိလမန္တာနံ ဝသေန ဝုတ္တာနိ. သေသံ သဗ္ဗတ္ထ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တနယမေဝါတိ. ७-१२. सातवे इत्यादी सूत्रे, भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील चक्षु इत्यादींमध्ये अनित्य लक्षण इत्यादींचे निरीक्षण करून, वर्तमानकाळातील चक्षु इत्यादींमध्ये तीव्र आसक्तीमुळे त्रस्त असणाऱ्यांच्या कल्याणासाठी सांगितले गेले आहे. उर्वरित सर्व ठिकाणी पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनुसारच समजावे. အနိစ္စဝဂ္ဂေါ ပဌမော. पहिला अनिच्चवर्ग समाप्त. ၂. ယမကဝဂ္ဂေါ २. यमकवर्ग ၁-၄. ပဌမပုဗ္ဗေသမ္ဗောဓသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ १-४. प्रथम पुब्बेसंबोधसुत्त इत्यादींचे वर्णन ၁၃-၁၆. ယမကဝဂ္ဂဿ ပဌမဒုတိယေသု အဇ္ဈတ္တိကာနန္တိ အဇ္ဈတ္တဇ္ဈတ္တဝသေန အဇ္ဈတ္တိကာနံ. သော ပန နေသံ အဇ္ဈတ္တိကဘာဝေါ ဆန္ဒရာဂဿ အဓိမတ္တဗလဝတာယ ဝေဒိတဗ္ဗော. မနုဿာနဉှိ အန္တောဃရံ ဝိယ ဆ အဇ္ဈတ္တိကာယတနာနိ, ဃရူပစာရံ ဝိယ ဆ ဗာဟိရာယတနာနိ. ယထာ နေသံ ပုတ္တဒါရဓနဓညပုဏ္ဏေ အန္တောဃရေ ဆန္ဒရာဂေါ အဓိမတ္တဗလဝါ ဟောတိ, တတ္ထ ကဿစိ ပဝိသိတုံ န ဒေန္တိ, အပ္ပမတ္တေန ဘာဇနသဒ္ဒမတ္တေနာပိ ‘‘ကိံ ဧတ’’န္တိ? ဝတ္တာရော ဘဝန္တိ. ဧဝမေဝံ ဆသု အဇ္ဈတ္တိကေသု အာယတနေသု အဓိမတ္တဗလဝဆန္ဒရာဂေါတိ. ဣတိ ဣမာယ ဆန္ဒရာဂဗလဝတာယ တာနိ ‘‘အဇ္ဈတ္တိကာနီ’’တိ ဝုတ္တာနိ. ဃရူပစာရေ ပန နော တထာ ဗလဝါ ဟောတိ, တတ္ထ စရန္တေ မနုဿေပိ စတုပ္ပဒါနိပိ န သဟသာ နိဝါရေန္တိ. ကိဉ္စာပိ န နိဝါရေန္တိ, အနိစ္ဆန္တာ ပန ပသုပစ္ဆိမတ္တမ္ပိ ဂဟိတုံ န ဒေန္တိ. ဣတိ နေသံ တတ္ထ န အဓိမတ္တဗလဝဆန္ဒရာဂေါ ဟောတိ. ရူပါဒီသုပိ တထေဝ န အဓိမတ္တဗလဝဆန္ဒရာဂေါ, တသ္မာ တာနိ ‘‘ဗာဟိရာနီ’’တိ ဝုတ္တာနိ. ဝိတ္ထာရတော ပန အဇ္ဈတ္တိကဗာဟိရကထာ ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂေ ဝုတ္တာဝ. သေသံ ဒွီသုပိ သုတ္တေသု ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တနယမေဝ. တထာ တတိယစတုတ္ထေသု. १३-१६. यमकवर्गाच्या पहिल्या व दुसऱ्या सूत्रात 'आध्यात्मिक' म्हणजे स्वतःच्या अंतर्गत असणाऱ्या अध्यात्मभावामुळे आध्यात्मिक आयतने होय. त्यांचा हा आध्यात्मिक भाव त्यांच्यातील तीव्र इच्छा-आसक्तीच्या (छंदराग) प्रबळतेमुळे समजून घेतला पाहिजे. कारण माणसांच्या घराच्या आतील भागाप्रमाणे सहा आध्यात्मिक आयतने आहेत आणि घराच्या अंगणाप्रमाणे सहा बाह्य आयतने आहेत. ज्याप्रमाणे त्यांच्या पत्नी, मुले, धन आणि धान्याने भरलेल्या घराच्या आतील भागात तीव्र इच्छा-आसक्ती प्रबळ असते, तिथे ते कोणालाही प्रवेश करू देत नाहीत, आणि भांड्याचा अगदी लहानसा आवाज झाला तरी "हे काय आहे?" असे विचारतात. त्याचप्रमाणे सहा आध्यात्मिक आयतनांमध्ये अत्यंत प्रबळ इच्छा-आसक्ती असते. म्हणून, या इच्छा-आसक्तीच्या प्रबळतेमुळे त्यांना 'आध्यात्मिक' म्हटले गेले आहे. परंतु घराच्या अंगणात तशी प्रबळ आसक्ती नसते, तिथे फिरणाऱ्या माणसांना किंवा प्राण्यांना ते लगेच अडवत नाहीत. जरी ते त्यांना अडवत नसले, तरी इच्छा नसताना ते तिथून मातीची टोपली देखील नेऊ देत नाहीत. अशा प्रकारे, तिथे त्यांची तीव्र इच्छा-आसक्ती नसते. रूप इत्यादी बाह्य विषयांमध्ये देखील तशीच तीव्र इच्छा-आसक्ती नसते, म्हणून त्यांना 'बाह्य' म्हटले गेले आहे. विस्ताराने सांगायचे तर, आध्यात्मिक आणि बाह्य विषयांवरील चर्चा विसुद्धिमग्गात केलेलीच आहे. दोन्ही सूत्रांमधील उर्वरित भाग पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीप्रमाणेच आहे. तिसऱ्या आणि चौथ्या सूत्रातही तसेच समजावे. ၅-၆. ပဌမနောစေအဿာဒသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ५-६. प्रथम नोचेअस्सादसुत्त इत्यादींचे वर्णन ၁၇-၁၈. ပဉ္စမေ နိဿဋာတိ နိက္ခန္တာ. ဝိသညုတ္တာတိ နောသံယုတ္တာ. ဝိပ္ပမုတ္တာတိ နော အဓိမုတ္တာ ဝိမရိယာဒီကတေန စေတသာတိ နိမ္မရိယာဒီကတေန စေတသာ. ယဉှိ ကိလေသဇာတံ ဝါ ဝဋ္ဋံ ဝါ အပ္ပဟီနံ ဟောတိ, တေန [Pg.4] သေခါနံ စိတ္တံ သမရိယာဒီကတံ နာမ. ယံ ပဟီနံ, တေန ဝိမရိယာဒီကတံ. ဣဓ ပန သဗ္ဗသော ကိလေသာနဉ္စေဝ ဝဋ္ဋဿ စ ပဟီနတ္တာ ဝိမရိယာဒီကတေန ကိလေသဝဋ္ဋမရိယာဒံ အတိက္ကန္တေန စိတ္တေန ဝိဟရိံသူတိ အတ္ထော. ဆဋ္ဌေပိ ဧသေဝ နယော. ဆသုပိ ပနေတေသု သုတ္တေသု စတုသစ္စမေဝ ကထိတန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. १७-१८. पाचव्या सूत्रात 'निस्सट' म्हणजे बाहेर पडलेले. 'विसंयुत्त' म्हणजे अयुक्त. 'विप्पमुत्त' म्हणजे पूर्णपणे मुक्त झालेले. 'मर्यादामुक्त झालेल्या चित्ताने' म्हणजे सीमारहित चित्ताने. कारण जे क्लेश किंवा संसारचक्र नष्ट झालेले नसते, त्यामुळे शैक्ष व्यक्तींचे चित्त मर्यादित असते. जे क्लेश नष्ट झाले आहेत, त्यामुळे चित्त मर्यादामुक्त होते. परंतु येथे, सर्व प्रकारे क्लेश आणि संसारचक्र नष्ट झाल्यामुळे, क्लेश व संसाराच्या मर्यादा ओलांडून मर्यादामुक्त झालेल्या चित्ताने ते विहरतात, असा अर्थ आहे. सहाव्या सूत्रात देखील हाच नय समजावा. आणि या सहाही सूत्रांमध्ये केवळ चार आर्यसत्यांचेच प्रतिपादन केले आहे, असे समजावे. ၇-၁၀. ပဌမာဘိနန္ဒသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ७-१०. प्रथम अभिनंदसुत्त इत्यादींचे वर्णन ၁၉-၂၂. သတ္တမာဒီသု စတူသု ဝဋ္ဋဝိဝဋ္ဋမေဝ ကထိတံ. အနုပုဗ္ဗကထာ ပန နေသံ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗာတိ. १९-२२. सातव्या इत्यादी चार सूत्रांमध्ये केवळ संसार आणि संसाराचा निरोध यांचेच प्रतिपादन केले आहे. त्यांचे अनुक्रमिक स्पष्टीकरण पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनुसारच समजून घ्यावी. ယမကဝဂ္ဂေါ ဒုတိယော. दुसरा यमकवर्ग समाप्त. ၃. သဗ္ဗဝဂ္ဂေါ ३. सब्बवर्ग ၁. သဗ္ဗသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. सब्बसुत्त वर्णन ၂၃. သဗ္ဗဝဂ္ဂဿ ပဌမေ သဗ္ဗံ ဝေါ, ဘိက္ခဝေတိ သဗ္ဗံ နာမ စတုဗ္ဗိဓံ – သဗ္ဗသဗ္ဗံ, အာယတနသဗ္ဗံ, သက္ကာယသဗ္ဗံ, ပဒေသသဗ္ဗန္တိ. တတ္ထ – २३. 'सब्बवग्ग' च्या पहिल्या सुत्तात, 'सब्बं वो, भिक्खवे' (भिक्खूंनो, मी तुम्हांला सर्व काही उपदेशीन) या पाठातील 'सब्ब' (सर्व) हे चार प्रकारचे आहे – सब्बसब्ब (सर्व-सर्व), आयतनसब्ब (आयतन-सर्व), सक्कायसब्ब (सत्काय-सर्व) आणि पदेससब्ब (प्रदेश-सर्व). त्यामध्ये – ‘‘န တဿ အဒ္ဒိဋ္ဌမိဓအတ္ထိ ကိဉ္စိ,အထော အဝိညာတမဇာနိတဗ္ဗံ; သဗ္ဗံ အဘိညာသိ ယဒတ္ထိ နေယျံ,တထာဂတော တေန သမန္တစက္ခူ’’တိ. (မဟာနိ. ၁၅၆; စူဠနိ. ဓောတကမာဏဝပုစ္ဆာနိဒ္ဒေသော ၃၂; ပဋိ. မ. ၁.၁၂၁) – या जगात त्यांचे (तथागतांचे) काहीही न पाहिलेले नाही, तसेच न जाणलेले किंवा न समजण्याजोगे काहीही नाही; जे काही ज्ञेय (जाणण्याजोगे) आहे, ते सर्व तथागतांनी अभिज्ञाने (विशिष्ट ज्ञानाने) जाणले आहे, म्हणूनच ते 'समन्तचक्खू' (समंतचक्षु - सर्वदर्शी) आहेत. ဣဒံ သဗ္ဗသဗ္ဗံ နာမ. ‘‘သဗ္ဗံ ဝေါ, ဘိက္ခဝေ, ဒေသေဿာမိ, တံ သုဏာထာ’’တိ (သံ. နိ. ၄.၂၄) ဣဒံ အာယတနသဗ္ဗံ နာမ. ‘‘သဗ္ဗဓမ္မမူလပရိယာယံ ဝေါ, ဘိက္ခဝေ, ဒေသေဿာမီ’’တိ (မ. နိ. ၁.၁) ဣဒံ သက္ကာယသဗ္ဗံ နာမ. ‘‘သဗ္ဗဓမ္မေသု ဝါ ပန ပဌမသမန္နာဟာရော ဥပ္ပဇ္ဇတိ စိတ္တံ မနော မာနသံ…ပေ… တဇ္ဇာမနောဓာတူ’’တိ ဣဒံ ပဒေသသဗ္ဗံ နာမ. ဣတိ ပဉ္စာရမ္မဏမတ္တံ ပဒေသသဗ္ဗံ. တေဘူမကဓမ္မာ သက္ကာယသဗ္ဗံ. စတုဘူမကဓမ္မာ အာယတနသဗ္ဗံ. ယံကိဉ္စိ နေယျံ သဗ္ဗသဗ္ဗံ. ပဒေသသဗ္ဗံ သက္ကာယသဗ္ဗံ [Pg.5] န ပါပုဏာတိ, သက္ကာယသဗ္ဗံ အာယတနသဗ္ဗံ န ပါပုဏာတိ, အာယတနသဗ္ဗံ သဗ္ဗသဗ္ဗံ န ပါပုဏာတိ. ကသ္မာ? သဗ္ဗညုတညာဏဿ အယံ နာမ ဓမ္မော အာရမ္မဏံ န ဟောတီတိ နတ္ထိတာယ. ဣမသ္မိံ ပန သုတ္တေ အာယတနသဗ္ဗံ အဓိပ္ပေတံ. हे 'सब्बसब्ब' (सर्व-सर्व) होय. 'भिक्खूंनो, मी तुम्हांला सर्व काही उपदेशीन, ते लक्षपूर्वक ऐका' (संयुत्त निकाय ४.२४) हे 'आयतनसब्ब' होय. 'भिक्खूंनो, मी तुम्हांला सर्व धर्मांच्या मुळाचा पर्याय उपदेशीन' (मज्झिम निकाय १.१) हे 'सक्कायसब्ब' होय. 'सर्व धर्मांमध्ये पहिला समन्नाहार (मनोयोग) उत्पन्न होतो, चित्त, मन, मानस... पे... तज्जा (त्यापासून उत्पन्न होणारी) मनोधातू' हे 'पदेससब्ब' (प्रदेश-सर्व) होय. अशा प्रकारे, केवळ पाच आळंबने (पंचारंमण) हे 'पदेससब्ब' आहे. तेभूमक धर्म (त्रैभूमिक धर्म) हे 'सक्कायसब्ब' आहे. चतुभूमक धर्म (चतुर्भूमिक धर्म) हे 'आयतनसब्ब' आहे. जे काही ज्ञेय आहे, ते 'सब्बसब्ब' आहे. पदेससब्ब हे सक्कायसब्बापर्यंत पोहोचू शकत नाही, सक्कायसब्ब हे आयतनसब्बापर्यंत पोहोचू शकत नाही, आयतनसब्ब हे सब्बसब्बापर्यंत पोहोचू शकत नाही. असे का? कारण 'सर्वज्ञता-ज्ञानाचा (सब्बञ्ञुतञ्ञाण) हा अमुक एक धर्म आळंबन (विषय) होत नाही' असे काहीही अस्तित्वात नाही. परंतु, या सुत्तात 'आयतनसब्ब' अभिप्रेत आहे. ပစ္စက္ခာယာတိ ပဋိက္ခိပိတွာ. ဝါစာဝတ္ထုကမေဝဿာတိ, ဝါစာယ ဝတ္တဗ္ဗဝတ္ထုမတ္တကမေဝ ဘဝေယျ. ဣမာနိ ပန ဒွါဒသာယတနာနိ အတိက္ကမိတွာ အယံ နာမ အညော သဘာဝဓမ္မော အတ္ထီတိ ဒဿေတုံ န သက္ကုဏေယျ. ပုဋ္ဌော စ န သမ္ပာယေယျာတိ, ‘‘ကတမံ အညံ သဗ္ဗံ နာမာ’’တိ? ပုစ္ဆိတော, ‘‘ဣဒံ နာမာ’’တိ ဝစနေန သမ္ပာဒေတုံ န သက္ကုဏေယျ. ဝိဃာတံ အာပဇ္ဇေယျာတိ ဒုက္ခံ အာပဇ္ဇေယျ. ယထာ တံ, ဘိက္ခဝေ, အဝိသယသ္မိန္တိ ဧတ္ထ တန္တိ နိပါတမတ္တံ. ယထာတိ ကာရဏဝစနံ, ယသ္မာ အဝိသယေ ပုဋ္ဌောတိ အတ္ထော. အဝိသယသ္မိဉှိ သတ္တာနံ ဝိဃာတောဝ ဟောတိ, ကူဋာဂါရမတ္တံ သိလံ သီသေန ဥက္ခိပိတွာ ဂမ္ဘီရေ ဥဒကေ တရဏံ အဝိသယော, တထာ စန္ဒိမသူရိယာနံ အာကဍ္ဎိတွာ ပါတနံ, တသ္မိံ အဝိသယေ ဝါယမန္တော ဝိဃာတမေဝ အာပဇ္ဇတိ, ဧဝံ ဣမသ္မိမ္ပိ အဝိသယေ ဝိဃာတမေဝ အာပဇ္ဇေယျာတိ အဓိပ္ပာယော. 'पच्चक्खाय' म्हणजे नाकारून (प्रत्याख्यान करून). 'वाचावत्थुकमेवस्स' म्हणजे केवळ वाणीने बोलण्याचा विषय मात्र होईल. या बारा आयतनांचे उल्लंघन करून 'हा दुसरा अमुक एक स्वभावधर्म अस्तित्वात आहे' असे दाखवण्यास कोणी समर्थ होणार नाही. 'पुट्ठो च न सम्पायेय्य' म्हणजे 'दुसरे कोणते सर्व आहे?' असे विचारले असता, 'हे अमुक आहे' अशा शब्दांत उत्तर देऊन सिद्ध करण्यास तो समर्थ होणार नाही. 'विघातं आपज्जेय्य' म्हणजे दुःखाला प्राप्त होईल. 'यथा तं, भिक्खवे, अविषयस्मिं' यामध्ये 'तं' हा केवळ निपात आहे. 'यथा' हा कारणाचा वाचक शब्द आहे, कारण 'अविषयात (अयोग्य विषयात) विचारले गेले आहे' असा याचा अर्थ आहे. अयोग्य विषयात प्रयत्न करणाऱ्या प्राण्यांना केवळ दुःखच प्राप्त होते; जसे की कुटागार (शिखरयुक्त गृह) एवढा मोठा दगड डोक्यावर घेऊन खोल पाण्यात पोहणे हा अविषय (अशक्य गोष्ट) आहे, तसेच चंद्र आणि सूर्य यांना ओढून खाली पाडणे हाही अविषय आहे; त्या अविषयात प्रयत्न करणारा मनुष्य जसा केवळ दुःखालाच प्राप्त होतो, त्याचप्रमाणे या अविषयात (दुसऱ्या 'सर्व'ची प्रज्ञापना करण्याच्या बाबतीत) प्रयत्न करणारा मनुष्य केवळ दुःखालाच प्राप्त होईल, असा याचा अभिप्राय आहे. ၂. ပဟာနသုတ္တဝဏ္ဏနာ २. पहाणसुत्त-वर्णना (प्रहाणसुत्र-वर्णन) ၂၄. ဒုတိယေ သဗ္ဗပ္ပဟာနာယာတိ သဗ္ဗဿ ပဟာနာယ. စက္ခုသမ္ဖဿပစ္စယာ ဥပ္ပဇ္ဇတိ ဝေဒယိတန္တိ စက္ခုသမ္ဖဿံ မူလပစ္စယံ ကတွာ ဥပ္ပန္နာ သမ္ပဋိစ္ဆနသန္တီရဏဝေါဋ္ဌဗ္ဗနဇဝနဝေဒနာ. စက္ခုဝိညာဏသမ္ပယုတ္တာယ ပန ဝတ္တဗ္ဗမေဝ နတ္ထိ. သောတဒွါရာဒိဝေဒနာပစ္စယာဒီသုပိ ဧသေဝ နယော. ဧတ္ထ ပန မနောတိ ဘဝင်္ဂစိတ္တံ. ဓမ္မာတိ အာရမ္မဏံ. မနောဝိညာဏန္တိ သဟာဝဇ္ဇနကဇဝနံ. မနောသမ္ဖဿောတိ ဘဝင်္ဂသဟဇာတော သမ္ဖဿော. ဝေဒယိတန္တိ သဟာဝဇ္ဇနဝေဒနာယ ဇဝနဝေဒနာ. ဘဝင်္ဂသမ္ပယုတ္တာယ ပန ဝတ္တဗ္ဗမေဝ နတ္ထိ. အာဝဇ္ဇနံ ဘဝင်္ဂတော အမောစေတွာ မနောတိ သဟာဝဇ္ဇနေန ဘဝင်္ဂံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ဓမ္မာတိ အာရမ္မဏံ. မနောဝိညာဏန္တိ ဇဝနဝိညာဏံ. မနောသမ္ဖဿောတိ ဘဝင်္ဂသဟဇာတော သမ္ဖဿော. ဝေဒယိတန္တိ ဇဝနသဟဇာတာ ဝေဒနာ. သဟာဝဇ္ဇနေန ဘဝင်္ဂသဟဇာတာပိ ဝဋ္ဋတိယေဝ. ယာ ပနေတ္ထ ဒေသနာ အနုသိဋ္ဌိအာဏာ, အယံ ပဏ္ဏတ္တိ နာမာတိ. २४. दुसऱ्या सुत्तात, 'सब्बप्पहानाय' म्हणजे सर्वांच्या प्रहाणासाठी (त्यागासाठी). 'चक्खुसम्फस्सपच्चया उप्पज्जति वेदयितं' म्हणजे चक्षु-संस्पर्श हा मूळ हेतू (मूलप्रत्यय) करून उत्पन्न झालेली संपटिच्छन, सन्तीरण, वोट्ठब्बन आणि जवन वेदना होय. चक्षु-विज्ञानाशी संप्रयुक्त असलेल्या वेदनेबद्दल तर काही बोलण्याची गरजच नाही. श्रोत-द्वारादींच्या वेदनांच्या प्रत्ययादींच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. येथे 'मन' म्हणजे भवंगचित्त होय. 'धम्मा' म्हणजे आळंबन (विषय). 'मनोविञ्ञाणं' म्हणजे आवज्जनासह (मनोद्वारावज्जनासह) असणारे जवन. 'मनोसम्फस्सो' म्हणजे भवंगासोबत उत्पन्न होणारा संस्पर्श. 'वेदयितं' म्हणजे आवज्जन-वेदनेसोबत असणारी जवन-वेदना. भवंगाशी संप्रयुक्त असलेल्या वेदनेबद्दल तर काही बोलण्याची गरजच नाही. आवज्जनाला भवंगापासून वेगळे न करता 'मन' म्हणजे आवज्जनासह असणारे भवंग समजावे. 'धम्मा' म्हणजे आळंबन. 'मनोविञ्ञाणं' म्हणजे जवन-विज्ञान. 'मनोसम्फस्सो' म्हणजे भवंगासोबत उत्पन्न होणारा संस्पर्श. 'वेदयितं' म्हणजे जवनासोबत उत्पन्न होणारी वेदना. आवज्जनासह भवंगासोबत उत्पन्न होणारी वेदना देखील येथे योग्यच ठरते. येथे जी देशना (उपदेश) आहे, ती तथागतांची अनुशासनात्मक आज्ञा (अनुसिट्ठिआणा) आहे, हिलाच 'पण्ञत्ति' (प्रज्ञप्ती) असे म्हणतात. ၃. အဘိညာပရိညာပဟာနသုတ္တဝဏ္ဏနာ ३. अभिञ्ञा-परिञ्ञा-पहाणसुत्त-वर्णना (अभिज्ञा-परिज्ञा-प्रहाणसुत्र-वर्णन) ၂၅. တတိယေ [Pg.6] သဗ္ဗံ အဘိညာ ပရိညာ ပဟာနာယာတိ သဗ္ဗံ အဘိဇာနိတွာ ပရိဇာနိတွာ ပဇဟနတ္ထာယ. အဘိညာ ပရိညာ ပဟာတဗ္ဗန္တိ အဘိဇာနိတွာ ပရိဇာနိတွာ ပဟာတဗ္ဗံ. သေသံ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗံ. २५. तिसऱ्या सुत्तात, 'सब्बं अभिञ्ञा परिञ्ञा पहानाय' म्हणजे सर्व काही अभिज्ञाने (विशिष्ट ज्ञानाने) जाणून, परिज्ञाने (पूर्ण ज्ञानाने) निश्चित करून, प्रहाण करण्यासाठी (त्याग करण्यासाठी). 'अभिञ्ञा परिञ्ञा पहातब्बं' म्हणजे अभिज्ञाने जाणून आणि परिज्ञाने निश्चित करून प्रहाण करण्यायोग्य (त्याग करण्यायोग्य). उर्वरित भाग पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. ၄. ပဌမအပရိဇာနနသုတ္တဝဏ္ဏနာ ४. प्रथम अपरिजाननसुत्त-वर्णना (प्रथम अपरिज्ञानसुत्र-वर्णन) ၂၆. စတုတ္ထေ အနဘိဇာနံ အပရိဇာနံ အဝိရာဇယံ အပ္ပဇဟန္တိ အနဘိဇာနန္တော အပရိဇာနန္တော အဝိရာဇေန္တော အပ္ပဇဟန္တော. ဧတ္ထ စ အဝိရာဇေန္တောတိ အဝိဂစ္ဆာပေန္တော. ဣတိ ဣမသ္မိံ သုတ္တေ တိဿောပိ ပရိညာ ကထိတာ ဟောန္တိ. ‘‘အဘိဇာန’’န္တိ ဟိ ဝစနေန ဉာတပရိညာ ကထိတာ, ‘‘ပရိဇာန’’န္တိ ဝစနေန တီရဏပရိညာ, ‘‘ဝိရာဇယံ ပဇဟ’’န္တိ ဒွီဟိ ပဟာနပရိညာတိ. २६. चौथ्या सुत्तात, 'अनभिजानं अपरिजानं अविराजयं अप्पजहं' म्हणजे अभिज्ञाने न जाणणारा, परिज्ञाने निश्चित न करणारा, विराग न प्राप्त करणारा आणि प्रहाण न करणारा. येथे 'अविराजेन्तो' म्हणजे राग दूर न करणारा. अशा प्रकारे, या सुत्तात तिन्ही परिज्ञा सांगितल्या आहेत. कारण 'अभिजानं' या शब्दाने 'ञातपरिञ्ञा' (ज्ञातपरिज्ञा) सांगितली आहे, 'परिजानं' या शब्दाने 'तीरणपरिञ्ञा' (तीरणपरिज्ञा) सांगितली आहे, आणि 'विराजयं' व 'पजहं' या दोन शब्दांनी 'पहाणपरिञ्ञा' (प्रहाणपरिज्ञा) सांगितली आहे. ၅. ဒုတိယအပရိဇာနနသုတ္တဝဏ္ဏနာ ५. द्वितीय अपरिजाननसुत्त-वर्णना (द्वितीय अपरिज्ञानसुत्र-वर्णन) ၂၇. ပဉ္စမေ စက္ခုဝိညာဏဝိညာတဗ္ဗာ ဓမ္မာတိ ဟေဋ္ဌာ ဂဟိတရူပမေဝ ဂဟေတွာ ဒဿေတိ. ဟေဋ္ဌာ ဝါ အာပါထဂတံ ဂဟိတံ, ဣဓ အနာပါထဂတံ. ဣဒံ ပနေတ္ထ သန္နိဋ္ဌာနံ – ဟေဋ္ဌာ အာပါထဂတမ္ပိ အနာပါထဂတမ္ပိ ဂဟိတမေဝ, ဣဓ ပန စက္ခုဝိညာဏသမ္ပယုတ္တာ တယော ခန္ဓာ. တေ ဟိ စက္ခုဝိညာဏေန သဟ ဝိညာတဗ္ဗတ္တာ ‘‘စက္ခုဝိညာဏဝိညာတဗ္ဗာ’’တိ ဝုတ္တာ. သေသပဒေသုပိ ဧသေဝ နယော. २७. पाचव्या सुत्तात, 'चक्खुविञ्ञाणविञ्ञातब्बा धम्मा' या पदाने खाली (पूर्वी) ग्रहण केलेले रूपच पुन्हा ग्रहण करून दाखवले आहे. किंवा खाली चक्षु-प्रसादाच्या कक्षेत आलेले (आपाथगत) रूप ग्रहण केले होते, येथे कक्षेत न आलेले (अनापाथगत) रूप ग्रहण केले आहे. परंतु येथे हाच निष्कर्ष आहे – खाली आपाथगत आणि अनापाथगत दोन्ही रूपे ग्रहण केलीच होती, परंतु येथे चक्षु-विज्ञानाशी संप्रयुक्त असलेले तीन स्कंध (वेदना, संज्ञा, संस्कार) अभिप्रेत आहेत. कारण ते चक्षु-विज्ञानासोबत जाणले जात असल्यामुळे त्यांना 'चक्खुविञ्ञाणविञ्ञातब्बा' (चक्षु-विज्ञानाने जाणण्याजोगे) असे म्हटले आहे. उर्वरित पदांच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. ၆. အာဒိတ္တသုတ္တဝဏ္ဏနာ ६. आदित्तसुत्त-वर्णना (आदित्यसुत्र-वर्णन) ၂၈. ဆဋ္ဌေ ဂယာသီသေတိ ဂယာဂါမဿ ဟိ အဝိဒူရေ ဂယာတိ ဧကာ ပေါက္ခရဏီပိ အတ္ထိ နဒီပိ, ဂယာသီသနာမကော ဟတ္ထိကုမ္ဘသဒိသော ပိဋ္ဌိပါသာဏောပိ, ယတ္ထ ဘိက္ခုသဟဿဿပိ ဩကာသော ပဟောတိ, ဘဂဝါ တတ္ထ ဝိဟရတိ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘ဂယာသီသေ’’တိ. ဘိက္ခူ အာမန္တေသီတိ တေသံ သပ္ပာယဓမ္မဒေသနံ ဝိစိနိတွာ တံ ဒေသေဿာမီတိ အာမန္တေသိ. २८. सहाव्या सुत्तात, 'गयासीसे' म्हणजे गया नावाच्या गावाच्या जवळ 'गया' नावाची एक पुष्करणी (तलाव) आणि नदी देखील आहे. तसेच हत्तीच्या कुंभासारखा 'गयासीस' नावाचा एक मोठा सपाट दगड (शिलापट) आहे, जिथे एक हजार भिक्खूंना बसण्यासाठी पुरेशी जागा आहे; भगवान तिथे विहार करत असत. म्हणूनच 'गयासीसे' असे म्हटले आहे. 'भिक्खू आमंतेसि' म्हणजे त्या भिक्खूंसाठी योग्य अशा धर्मदेशनेची निवड करून, 'मी ती उपदेशीन' या हेतूने त्यांनी भिक्खूंना आमंत्रित केले (संबोधित केले). တတြာယံ အနုပုဗ္ဗိကထာ – ဣတော ကိရ ဒွါနဝုတိကပ္ပေ မဟိန္ဒော နာမ ရာဇာ အဟောသိ. တဿ ဇေဋ္ဌပုတ္တော ဖုဿော နာမ. သော ပူရိတပါရမီ ပစ္ဆိမဘဝိကသတ္တော, ပရိပါကဂတေ ဉာဏေ ဗောဓိမဏ္ဍံ အာရုယှ သဗ္ဗညုတံ ပဋိဝိဇ္ဈိ[Pg.7]. ရညော ကနိဋ္ဌပုတ္တော တဿ အဂ္ဂသာဝကော အဟောသိ, ပုရောဟိတပုတ္တော ဒုတိယသာဝကော. ရာဇာ စိန္တေသိ – ‘‘မယှံ ဇေဋ္ဌပုတ္တော နိက္ခမိတွာ ဗုဒ္ဓေါ ဇာတော, ကနိဋ္ဌပုတ္တော အဂ္ဂသာဝကော, ပုရောဟိတပုတ္တော ဒုတိယသာဝကော’’တိ. သော ‘‘အမှာကံယေဝ ဗုဒ္ဓေါ, အမှာကံ ဓမ္မော, အမှာကံ သံဃော’’တိ ဝိဟာရံ ကာရေတွာ ဝိဟာရဒွါရကောဋ္ဌကတော ယာဝ အတ္တနော ဃရဒွါရာ ဥဘတော ဝေဠုဘိတ္တိကုဋိကာဟိ ပရိက္ခိပိတွာ မတ္ထကေ သုဝဏ္ဏတာရကခစိတသမောသရိတဂန္ဓဒါမမာလာဒါမဝိတာနံ ဗန္ဓာပေတွာ ဟေဋ္ဌာ ရဇတဝဏ္ဏံ ဝါလုကံ သန္ထရိတွာ ပုပ္ဖာနိ ဝိကိရာပေတွာ တေန မဂ္ဂေန ဘဂဝတော အာဂမနံ ကာရေသိ. त्याविषयी ही अनुक्रमिक कथा (अनुपुब्बिकथा) आहे – असे ऐकिवात आहे की, या कल्पाहून ब्याण्णव (९२) कल्प मागे महिंद नावाचा राजा होता. त्याचा ज्येष्ठ पुत्र फुस्स नावाचा होता. तो पारमी पूर्ण केलेला, अंतिम जन्मातील सत्त्व (बोधिसत्त्व) होता. त्याचे ज्ञान परिपक्व झाल्यावर तो बोधिमंडळावर आरूढ झाला आणि त्याने सर्वज्ञता प्राप्त केली. राजाचा धाकटा मुलगा त्याचा अग्रश्रावक झाला आणि पुरोहितपुत्र द्वितीय श्रावक झाला. राजाने विचार केला – “माझा ज्येष्ठ मुलगा गृहत्याग करून बुद्ध झाला आहे, धाकटा मुलगा अग्रश्रावक झाला आहे आणि पुरोहितपुत्र द्वितीय श्रावक झाला आहे.” त्याने “आमचेच बुद्ध, आमचाच धम्म आणि आमचाच संघ” असा विचार करून एक विहार बांधला. विहाराच्या प्रवेशद्वारापासून आपल्या राजवाड्याच्या दारापर्यंत दोन्ही बाजूंनी बांबूच्या भिंतींच्या कुटींनी वेढून घेतले. वरच्या बाजूला सोन्याच्या ताऱ्यांनी जडवलेले आणि सुगंधी फुलांच्या माळा लटकवलेले चांदवे बांधले, खाली चांदीच्या रंगाची वाळू पसरवून त्यावर फुले उधळली आणि त्या मार्गाने भगवंतांचे आगमन घडवून आणले. သတ္ထာ ဝိဟာရသ္မိံယေဝ ဌိတော စီဝရံ ပါရုပိတွာ အန္တောသာဏိယာဝ သဒ္ဓိံ ဘိက္ခုသံဃေန ရာဇဂေဟံ အာဂစ္ဆတိ, ကတဘတ္တကိစ္စော အန္တောသာဏိယာဝ ဂစ္ဆတိ. ကောစိ ကဋစ္ဆုဘိက္ခာမတ္တမ္ပိ ဒါတုံ န လဘတိ. တတော နာဂရာ ဥဇ္ဈာယိံသု, ‘‘ဗုဒ္ဓေါ လောကေ ဥပ္ပန္နော, န စ မယံ ပုညာနိ ကာတုံ လဘာမ. ယထာ ဟိ စန္ဒိမသူရိယာ သဗ္ဗေသံ အာလောကံ ကရောန္တိ, ဧဝံ ဗုဒ္ဓါ နာမ သဗ္ဗေသံ ဟိတတ္ထာယ ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ, အယံ ပန ရာဇာ သဗ္ဗေသံ ပုညစေတနံ အတ္တနောယေဝ အန္တော ပဝေသေတီ’’တိ. शास्ते विहारातच राहून, चीवर परिधान करून, कनातींच्या (पडद्यांच्या) आतूनच भिक्खू संघासह राजवाड्याकडे येत असत आणि भोजनविधी आटोपल्यावर कनातींच्या आतूनच परत जात असत. कोणालाही पळीभर भिक्षा देण्याचीही संधी मिळत नसे. त्यामुळे नगरवासीयांनी नाराजी व्यक्त केली, “जगात बुद्ध उत्पन्न झाले आहेत, पण आम्हाला पुण्यकर्म करण्याची संधी मिळत नाही. ज्याप्रमाणे चंद्र आणि सूर्य सर्वांना प्रकाश देतात, त्याचप्रमाणे बुद्ध हे सर्वांच्या कल्याणासाठीच जन्माला येतात. परंतु हा राजा सर्वांच्या पुण्यभावनेला केवळ स्वतःपुरताच मर्यादित ठेवत आहे.” တဿ စ ရညော အညေ တယော ပုတ္တာ အတ္ထိ. နာဂရာ တေဟိ သဒ္ဓိံ ဧကတော ဟုတွာ သမ္မန္တယိံသု, ‘‘ရာဇကုလေဟိ သဒ္ဓိံ အဋ္ဋော နာမ နတ္ထိ, ဧကံ ဥပါယံ ကရောမာ’’တိ. တေ ပစ္စန္တေ စောရေ ဥဋ္ဌာပေတွာ, ‘‘ကတိပယာ ဂါမာ ပဟဋာ’’တိ သာသနံ အာဟရာပေတွာ ရညော အာရောစယိံသု. ရာဇာ ပုတ္တေ ပက္ကောသာပေတွာ‘‘တာတာ, အဟံ မဟလ္လကော, ဂစ္ဆထ စောရေ ဝူပသမေထာ’’တိ ပေသေသိ. ပယုတ္တစောရာ ဣတော စိတော စ အဝိပ္ပကိရိတွာ တေသံ သန္တိကမေဝ အာဂစ္ဆိံသု. တေ အနာဝါသေ ဂါမေ ဝါသေတွာ ‘‘ဝူပသမိတာ စောရာ’’တိ အာဂန္တွာ ရာဇာနံ ဝန္ဒိတွာ အဋ္ဌံသု. त्या राजाला इतर तीन मुलगे होते. नगरवासीयांनी त्यांच्याशी एकत्र येऊन सल्लामसलत केली, “राजघराण्याशी थेट वाद घालणे शक्य नाही, आपण एखादी युक्ती करूया.” त्यांनी सीमावर्ती भागात चोरांना बंड करण्यास प्रवृत्त केले आणि “काही गावांवर दरोडा पडला आहे” असा निरोप राजाकडे पाठवला. राजाने पुत्रांना बोलावून घेतले आणि म्हटले, “बाळांनो, मी आता वृद्ध झालो आहे. तुम्ही जा आणि चोरांचा बंदोबस्त करा,” असे सांगून त्यांना पाठवले. आधीच ठरवून ठेवलेले चोर इकडेतिकडे न पळता थेट त्यांच्याकडेच आले. त्यांनी ओसाड पडलेल्या गावांना पुन्हा वसवले आणि “चोरांचा बंदोबस्त झाला आहे” असे सांगून परत येऊन राजाला वंदन करून ते उभे राहिले. ရာဇာ တုဋ္ဌော ‘‘တာတာ, ဝရံ ဝေါ ဒေမီ’’တိ အာဟ. တေ အဓိဝါသေတွာ ဂန္တွာ နာဂရေဟိ သဒ္ဓိံ မန္တယိံသု, ‘‘ရညာ အမှာကံ ဝရော ဒိန္နော. ကိံ ဂဏှာမာ’’တိ? အယျပုတ္တာ, တုမှာကံ ဟတ္ထိအဿာဒယော န ဒုလ္လဘာ, ဗုဒ္ဓရတနံ ပန ဒုလ္လဘံ, န သဗ္ဗကာလံ ဥပ္ပဇ္ဇတိ, တုမှာကံ ဇေဋ္ဌဘာတိကဿ ဖုဿဗုဒ္ဓဿ ပဋိဇဂ္ဂနဝရံ ဂဏှထာတိ. တေ ‘‘ဧဝံ ကရိဿာမာ’’တိ နာဂရာနံ ပဋိဿုဏိတွာ [Pg.8] ကတမဿုကမ္မာ သုနှာတာ သုဝိလိတ္တာ ရညော သန္တိကံ ဂန္တွာ, ‘‘ဒေဝ, နော ဝရံ ဒေထာ’’တိ ယာစိံသု. ကိံ ဂဏှိဿထ တာတာတိ? ဒေဝ, အမှာကံ ဟတ္ထိအဿာဒီဟိ အတ္ထော နတ္ထိ, ဇေဋ္ဌဘာတိကဿ နော ဖုဿဗုဒ္ဓဿ ပဋိဇဂ္ဂနဝရံ ဒေထာတိ. ‘‘အယံ ဝရော န သက္ကာ မယာ ဇီဝမာနေန ဒါတု’’န္တိ ဒွေ ကဏ္ဏေ ပိဒဟိ. ‘‘ဒေဝ, န တုမှေ အမှေဟိ ဗလက္ကာရေန ဝရံ ဒါပိတာ, တုမှေဟိ အတ္တနော ရုစိယာ တုဋ္ဌေဟိ ဒိန္နော. ကိံ, ဒေဝ, ရာဇကုလဿ ဒွေ ကထာ ဝဋ္ဋန္တီ’’တိ? သစ္စဝါဒိတာယ ဘဏိံသု. राजाने प्रसन्न होऊन म्हटले, “बाळांनो, मी तुम्हाला वर देतो.” त्यांनी ते मान्य केले आणि नगरवासीयांकडे जाऊन चर्चा केली, “राजाने आम्हाला वर दिला आहे. आम्ही काय मागावे?” (नगरवासी म्हणाले,) “हे राजपुत्रांनो! तुम्हाला हत्ती, घोडे इत्यादी मिळणे कठीण नाही. परंतु बुद्धरत्न मिळणे अत्यंत दुर्मिळ आहे, ते नेहमी उत्पन्न होत नाही. म्हणून तुम्ही तुमचे थोरले बंधू फुस्स बुद्ध यांची सेवा करण्याचा वर मागा.” त्यांनी “आम्ही तसेच करू” असे नगरवासीयांना आश्वासन दिले. मग त्यांनी आपले केस व दाढी व्यवस्थित केली, स्नान केले, सुगंधी द्रव्ये लावली आणि राजाकडे जाऊन विनंती केली, “महाराज, आम्हाला आमचा वर द्या.” “बाळांनो, तुम्ही काय मागणार आहात?” (राजाने विचारले). “महाराज, आम्हाला हत्ती, घोड्यांची काही गरज नाही. आम्हाला आमचे थोरले बंधू फुस्स बुद्ध यांची सेवा करण्याचा वर द्या.” “मी जिवंत असेपर्यंत हा वर देणे मला शक्य नाही,” असे म्हणून राजाने आपले दोन्ही कान बंद केले. “महाराज, आम्ही तुमच्यावर जबरदस्ती करून वर मागितलेला नाही. तुम्ही स्वतःच्या इच्छेने प्रसन्न होऊन तो दिला आहे. महाराज, राजघराण्याला दोन प्रकारची भाषा (वचनभंग) शोभते का?” असे त्यांनी सत्यवचनाचा हवाला देत म्हटले. ရာဇာ ဝိနိဝတ္တိတုံ အလဘန္တော – ‘‘တာတာ, သတ္တ သံဝစ္ဆရေ သတ္တ မာသေ သတ္တ စ ဒိဝသေ ဥပဋ္ဌဟိတွာ တုမှာကံ ဒဿာမီ’’တိ အာဟ. ‘‘သုန္ဒရံ, ဒေဝ, ပါဋိဘောဂံ ဒေထာ’’တိ. ‘‘ကိဿ ပါဋိဘောဂံ တာတာ’’တိ? ‘‘ဧတ္တကံ ကာလံ အမရဏပါဋိဘောဂံ ဒေဝါ’’တိ. ‘‘တာတာ, အယုတ္တံ ပါဋိဘောဂံ ဒါပေထ, န သက္ကာ ဧဝံ ပါဋိဘောဂံ ဒါတုံ, တိဏဂ္ဂေ ဥဿာဝဗိန္ဒုသဒိသံ သတ္တာနံ ဇီဝိတ’’န္တိ. ‘‘နော စေ, ဒေဝ, ပါဋိဘောဂံ ဒေထ, မယံ အန္တရာ မတာ ကိံ ကုသလံ ကရိဿာမာ’’တိ? ‘‘တေန ဟိ, တာတာ, ဆ သံဝစ္ဆရာနိ ဒေထာ’’တိ. ‘‘န သက္ကာ, ဒေဝါ’’တိ. ‘‘တေန ဟိ ပဉ္စ, စတ္တာရိ, တီဏိ, ဒွေ, ဧကံ သံဝစ္ဆရံ ဒေထ’’. ‘‘သတ္တ, ဆ မာသေ ဒေထ…ပေ… မာသဍ္ဎမတ္တံ ဒေထာ’’တိ. ‘‘န သက္ကာ, ဒေဝါ’’တိ. ‘‘တေန ဟိ သတ္တဒိဝသမတ္တံ ဒေထာ’’တိ. ‘‘သာဓု, ဒေဝါတိ သတ္တ ဒိဝသေ သမ္ပဋိစ္ဆိံသု’’. ရာဇာ သတ္တ သံဝစ္ဆရေ သတ္တ မာသေ သတ္တ ဒိဝသေ ကတ္တဗ္ဗသက္ကာရံ သတ္တသုယေဝ ဒိဝသေသု အကာသိ. राजाला आपल्या वचनापासून मागे फिरता आले नाही, म्हणून तो म्हणाला – “बाळांनो, मी सात वर्षे, सात महिने आणि सात दिवस सेवा करून मगच ते तुम्हाला सोपवीन.” “उत्तम आहे महाराज, पण आम्हाला याची हमी द्या.” “बाळांनो, कसली हमी हवी आहे?” “महाराज, एवढ्या काळापर्यंत आम्ही मरणार नाही, अशी मृत्यू न येण्याची हमी द्या.” “बाळांनो, तुम्ही अयोग्य humi मागत आहात. अशी हमी देणे शक्य नाही. प्राण्यांचे जीवन हे गवताच्या पात्यावरील दवबिंदूसारखे क्षणभंगुर असते.” “महाराज, जर तुम्ही आम्हाला अशी हमी देत नसाल, आणि यादरम्यान जर आम्ही मरण पावलो, तर आम्ही कोणते कुशल कर्म करू शकू?” “तर मग बाळांनो, सहा वर्षे द्या.” “शक्य नाही, महाराज.” “तर मग पाच, चार, तीन, दोन किंवा एक वर्ष द्या.” “सात महिने, सहा महिने द्या... (इत्यादी)... किंवा अर्धा महिना द्या.” “शक्य नाही, महाराज.” “तर मग केवळ सात दिवस द्या.” “ठीक आहे, महाराज,” असे म्हणून त्यांनी सात दिवसांची मुदत मान्य केली. राजाने सात वर्षे, सात महिने आणि सात दिवसांत जो सत्कार करायचा होता, तो सर्व सत्कार केवळ सात दिवसांतच पूर्ण केला. တတော ပုတ္တာနံ ဝသနဋ္ဌာနံ သတ္ထာရံ ပေသေတုံ အဋ္ဌဥသဘဝိတ္ထတံ မဂ္ဂံ အလင်္ကာရာပေသိ, မဇ္ဈဋ္ဌာနေ စတုဥသဘပ္ပမာဏံ ပဒေသံ ဟတ္ထီဟိ မဒ္ဒါပေတွာ ကသိဏမဏ္ဍလသဒိသံ ကတွာ ဝါလုကာယ သန္ထရာပေတွာ ပုပ္ဖာဘိကိဏ္ဏမကာသိ, တတ္ထ တတ္ထ ကဒလိယော စ ပုဏ္ဏဃဋေ စ ဌပါပေတွာ ဓဇပဋာကာ ဥက္ခိပါပေသိ. ဥသဘေ ဥသဘေ ပေါက္ခရဏိံ ခဏာပေသိ, အပရဘာဂေ ဒွီသု ပဿေသု ဂန္ဓမာလာပုပ္ဖာပဏေ ပသာရာပေသိ. မဇ္ဈဋ္ဌာနေ စတုဥသဘဝိတ္ထာရဿ အလင်္ကတမဂ္ဂဿ ဥဘောသု ပဿေသု ဒွေ ဒွေ ဥသဘဝိတ္ထာရေ မဂ္ဂေ ခါဏုကဏ္ဋကေ ဟရာပေတွာ ဒဏ္ဍဒီပိကာယော ကာရာပေသိ. ရာဇပုတ္တာပိ အတ္တနော အာဏာပဝတ္တိဋ္ဌာနေ သောဠသဥသဘမဂ္ဂံ တထေဝ အလင်္ကာရာပေသုံ. त्यानंतर, शास्त्यांना आपल्या पुत्रांच्या निवासस्थानी पाठवण्यासाठी त्याने आठ उसभ रुंदीचा रस्ता सजवून घेतला. रस्त्याच्या मध्यभागी चार उसभ रुंदीची जागा हत्तींकडून तुडवून घेऊन कसिण-मंडळासारखी सपाट केली, त्यावर वाळू पसरवून फुलांची उधळण केली. जागोजागी केळीचे खांब आणि पूर्णघट ठेवून ध्वज व पताका उभारल्या. प्रत्येक उसभ अंतरावर तलाव खणून घेतले. रस्त्याच्या दोन्ही बाजूंना सुगंधी द्रव्ये, फुलांचे हार आणि फुलांची दुकाने थाटली. मध्यभागी असलेल्या चार उसभ रुंदीच्या सुशोभित रस्त्याच्या दोन्ही बाजूंना प्रत्येकी दोन उसभ रुंदीच्या मार्गावरील खुंट्या व काटे काढून टाकले आणि तेथे मशाली लावल्या. राजपुत्रांनीही आपल्या अधिकाराखालील क्षेत्रात सोळा उसभ रुंदीचा रस्ता अशाच प्रकारे सुशोभित केला. ရာဇာ [Pg.9] အတ္တနော အာဏာပဝတ္တိဋ္ဌာနဿ ကေဒါရသီမံ ဂန္တွာ သတ္ထာရံ ဝန္ဒိတွာ ပရိဒေဝမာနော, ‘‘တာတာ, မယှံ ဒက္ခိဏက္ခိံ ဥပ္ပာဋေတွာ ဂဏှန္တာ ဝိယ ဂစ္ဆထ, ဧဝံ ဂဏှိတွာ ဂတာ ပန ဗုဒ္ဓါနံ အနုစ္ဆဝိကံ ကရေယျာထ. မာ သုရာသောဏ္ဍာ ဝိယ ပမတ္တာ ဝိစရိတ္ထာ’’တိ အာဟ. တေ ‘‘ဇာနိဿာမ မယံ, ဒေဝါ’’တိ သတ္ထာရံ ဂဟေတွာ ဂတာ, ဝိဟာရံ ကာရေတွာ သတ္ထု နိယျာတေတွာ တတ္ထ သတ္ထာရံ ပဋိဇဂ္ဂန္တာ ကာလေန ထေရာသနေ, ကာလေန မဇ္ဈိမာသနေ, ကာလေန သံဃနဝကာသနေ တိဋ္ဌန္တိ. ဒါနံ ဥပပရိက္ခမာနာနံ တိဏ္ဏမ္ပိ ဇနာနံ ဧကသဒိသမေဝ အဟောသိ. တေ ဥပကဋ္ဌာယ ဝဿူပနာယိကာယ စိန္တယိံသု – ‘‘ကထံ နု ခေါ သတ္ထု အဇ္ဈာသယံ ဂဏှေယျာမာ’’တိ? အထ နေသံ ဧတဒဟောသိ – ‘‘ဗုဒ္ဓါ နာမ ဓမ္မဂရုနော, န အာမိသဂရုနော, သီလေ ပတိဋ္ဌမာနာ မယံ သတ္ထု အဇ္ဈာသယံ ဂဟေတုံ သက္ခိဿာမာ’’တိ ဒါနသံဝိဓာယကေ မနုဿေ ပက္ကောသာပေတွာ, ‘‘တာတာ, ဣမိနာဝ နီဟာရေန ယာဂုဘတ္တခါဒနီယာဒီနိ သမ္ပာဒေန္တာ ဒါနံ ပဝတ္တေထာ’’တိ ဝတွာ ဒါနသံဝိဒဟနပလိဗောဓံ ဆိန္ဒိံသု. राजा आपल्या आज्ञाप्रसार क्षेत्राच्या सीमेपर्यंत गेला आणि शास्त्यांना वंदन करून विलाप करत म्हणाला, "बाळांनो, तुम्ही माझे उजवे डोळे उपटून घेऊन जात असल्यासारखे जात आहात. असे घेऊन गेल्यानंतर मात्र बुद्धांना जे योग्य असेल तेच करा. मद्यपींप्रमाणे प्रमादी होऊन फिरू नका." ते "महाराज, आम्ही हे लक्षात ठेवू" असे म्हणून शास्त्यांना सोबत घेऊन गेले. त्यांनी विहार बांधून तो शास्त्यांना समर्पित केला आणि तिथे शास्त्यांची सेवा-शुश्रूषा करत कधी ज्येष्ठ थेरांच्या आसनाजवळ, कधी मध्यम आसनाजवळ, तर कधी नवशिक्या भिक्खूंच्या आसनाजवळ उभे राहत असत. दानाचे निरीक्षण केले असता, त्या तिन्ही जणांचे दान अगदी एकसारखेच होते. वर्षावास जवळ आला असता त्यांनी विचार केला – "आम्ही शास्त्यांचा अभिप्राय कसा काय जाणून घेऊ शकू?" तेव्हा त्यांच्या मनात असा विचार आला – "बुद्ध हे धर्माला महत्त्व देणारे असतात, आमिषाला (भौतिक वस्तूंना) नाही. शीलामध्ये प्रतिष्ठित होऊनच आम्ही शास्त्यांचा अभिप्राय ग्रहण करण्यास समर्थ होऊ." त्यांनी दान व्यवस्थापक माणसांना बोलावून घेतले आणि सांगितले, "बाळांनो, याच पद्धतीने यागू, भात, खाद्यपदार्थ इत्यादी तयार करून दान चालू ठेवा." असे सांगून त्यांनी दानाच्या व्यवस्थेची चिंता (अडथळा) तोडून टाकली. အထ နေသံ ဇေဋ္ဌဘာတာ ပဉ္စသတေ ပုရိသေ အာဒါယ ဒသသု သီလေသု ပတိဋ္ဌာယ ဒွေ ကာသာယာနိ အစ္ဆာဒေတွာ ကပ္ပိယံ ဥဒကံ ပရိဘုဉ္ဇမာနော ဝါသံ ကပ္ပေသိ. မဇ္ဈိမော တီဟိ, ကနိဋ္ဌော ဒွီဟိ ပုရိသသတေဟိ သဒ္ဓိံ တထေဝ ပဋိပဇ္ဇိ. တေ ယာဝဇီဝံ သတ္ထာရံ ဥပဋ္ဌဟိံသု. သတ္ထာ တေသံယေဝ သန္တိကေ ပရိနိဗ္ဗာယိ. त्यानंतर त्यांच्यातील मोठ्या भावाने पाचशे पुरुषांना सोबत घेऊन, दहा शीलांमध्ये प्रतिष्ठित होऊन, दोन काषाय वस्त्रे परिधान करून आणि कल्पिय पाण्याचा वापर करत वास्तव्य केले. मधल्या भावाने तीनशे पुरुषांसह आणि धाकट्या भावाने दोनशे पुरुषांसह तसेच आचरण केले. त्यांनी आयुष्यभर शास्त्यांची सेवा केली. शास्ते त्यांच्याच सानिध्यात परिनिर्वाण पावले. တေပိ ကာလံ ကတွာ တတော ပဋ္ဌာယ ဒွါနဝုတိကပ္ပေ မနုဿလောကတော ဒေဝလောကံ, ဒေဝလောကတော စ မနုဿလောကံ သံသရန္တာ အမှာကံ သတ္ထုကာလေ ဒေဝလောကာ စဝိတွာ မနုဿလောကေ နိဗ္ဗတ္တိံသု. တေသံ ဒါနဂ္ဂေ ဗျာဝဋော မဟာအမစ္စော အင်္ဂမဂဓာနံ ရာဇာ ဗိမ္ဗိသာရော ဟုတွာ နိဗ္ဗတ္တိ. တေ တဿေဝ ရညော ရဋ္ဌေ ဗြာဟ္မဏမဟာသာလကုလေ နိဗ္ဗတ္တိံသု. ဇေဋ္ဌဘာတာ ဇေဋ္ဌောဝ ဇာတော, မဇ္ဈိမကနိဋ္ဌာ မဇ္ဈိမကနိဋ္ဌာယေဝ. ယေပိ တေသံ ပရိဝါရမနုဿာ, တေ ပရိဝါရမနုဿာဝ ဇာတာ. တေ ဝုဒ္ဓိမနွာယ တယောပိ ဇနာ တံ ပုရိသသဟဿံ အာဒါယ နိက္ခမိတွာ တာပသာ ဟုတွာ ဥရုဝေလာယံ နဒီတီရေယေဝ ဝသိံသု. အင်္ဂမဂဓဝါသိနော မာသေ မာသေ တေသံ မဟာသက္ကာရံ အဘိဟရန္တိ. ते देखील मृत्यू पावून, तेव्हापासून ब्याण्णव कल्पपर्यंत मनुष्यलोकातून देवलोकात आणि देवलोकातून मनुष्यलोकात संसरण करत राहिले. आमच्या शास्त्यांच्या काळात ते देवलोकातून च्युत होऊन मनुष्यलोकात जन्मले. त्यांच्या दानशाळेत कार्यरत असलेला महाअमात्य अंग आणि मगध देशाचा राजा बिंबिसार म्हणून जन्मला. ते त्याच राजाच्या राज्यात श्रीमंत ब्राह्मण कुळात जन्मले. मोठा भाऊ मोठाच म्हणून जन्मला, आणि मधला व धाकटा भाऊ अनुक्रमे मधला व धाकटा म्हणूनच जन्मले. जे त्यांचे सेवक होते, ते सेवक म्हणूनच जन्मले. ते मोठे झाल्यावर, ते तिघेही जण त्या एक हजार पुरुषांना सोबत घेऊन गृहत्याग करून बाहेर पडले आणि तपस्वी बनून उरुवेला येथील नदीकाठी राहू लागले. अंग आणि मगध देशातील रहिवासी दरमहा त्यांचा मोठा सत्कार करत असत. အထ [Pg.10] အမှာကံ ဗောဓိသတ္တော ကတာဘိနိက္ခမနော အနုပုဗ္ဗေန သဗ္ဗညုတံ ပတွာ ပဝတ္တိတဝရဓမ္မစက္ကော ယသာဒယော ကုလပုတ္တေ ဝိနေတွာ သဋ္ဌိ အရဟန္တေ ဓမ္မဒေသနတ္ထာယ ဒိသာသု ဥယျောဇေတွာ သယံ ပတ္တစီဝရမာဒါယ – ‘‘တေ တယော ဇဋိလဘာတိကေ ဒမေဿာမီ’’တိ ဥရုဝေလံ ဂန္တွာ အနေကေဟိ ပါဋိဟာရိယသတေဟိ တေသံ ဒိဋ္ဌိံ ဘိန္ဒိတွာ တေ ပဗ္ဗာဇေသိ. သော တံ ဣဒ္ဓိမယပတ္တစီဝရဓရံ သမဏသဟဿံ အာဒါယ ဂယာသီသံ ဂန္တွာ တေဟိ ပရိဝါရိတော နိသီဒိတွာ, – ‘‘ကတရာ နု ခေါ ဧတေသံ ဓမ္မကထာ သပ္ပာယာ’’တိ စိန္တေန္တော, ‘‘ဣမေ သာယံပါတံ အဂ္ဂိံ ပရိစရန္တိ. ဣမေသံ ဒွါဒသာယတနာနိ အာဒိတ္တာနိ သမ္ပဇ္ဇလိတာနိ ဝိယ ကတွာ ဒေသေဿာမိ, ဧဝံ ဣမေ အရဟတ္တံ ပါပုဏိတုံ သက္ခိဿန္တီ’’တိ သန္နိဋ္ဌာနမကာသိ. အထ နေသံ တထာ ဓမ္မံ ဒေသေတုံ ဣမံ အာဒိတ္တပရိယာယံ အဘာသိ. တေန ဝုတ္တံ – ‘‘ဘိက္ခူ အာမန္တေသီတိ တေသံ သပ္ပာယဓမ္မဒေသနံ ဝိစိနိတွာ တံ ဒေသေဿာမီတိ အာမန္တေသီ’’တိ. တတ္ထ အာဒိတ္တန္တိ ပဒိတ္တံ သမ္ပဇ္ဇလိတံ. သေသံ ဝုတ္တနယမေဝ. ဣတိ ဣမသ္မိံ သုတ္တေ ဒုက္ခလက္ခဏံ ကထိတံ. त्यानंतर आमच्या बोधिसत्त्वांनी महाभिनिष्क्रमण करून अनुक्रमे सर्वज्ञता प्राप्त केली, श्रेष्ठ धम्मचक्र प्रवर्तित केले, यशादी कुलपुत्रांना विनीत केले आणि साठ अरहंतांना धम्मदेशनेसाठी दिशादिशांना पाठवून दिले. स्वतः पात्र आणि चीवर घेऊन, "मी त्या तीन जटिल भावांना सुमार्गावर आणीन" या विचाराने ते उरुवेला येथे गेले आणि शेकडो प्रातिहार्यांनी त्यांची मिथ्या दृष्टी नष्ट करून त्यांना प्रव्रजित केले. त्यांनी ऋद्धीने प्राप्त पात्र-चीवर धारण करणाऱ्या त्या एक हजार श्रमणांना सोबत घेऊन गयासीस येथे गेले आणि त्यांच्याकडून वेढलेले असताना बसून, "यांच्यासाठी कोणती धम्मकथा योग्य ठरेल?" असा विचार करू लागले. "हे लोक सकाळ-संध्याकाळ अग्नीची पूजा करतात. म्हणून मी यांच्या बारा आयतनांना प्रदीप्त आणि प्रज्वलित झाल्यासारखे करून धम्मदेशना देईन, जेणेकरून हे अरहंतपद प्राप्त करण्यास समर्थ होतील," असा त्यांनी निश्चय केला. त्यानंतर त्यांना तशा प्रकारे धम्म उपदेश करण्यासाठी त्यांनी हा 'आदित्तपरियाय' (आदित्तपरियाय सुत्त) सांगितला. म्हणूनच म्हटले आहे – "भिक्खूंना आमंत्रित केले म्हणजे त्यांच्यासाठी योग्य धम्मदेशनेची निवड करून ती देईन, या हेतूने आमंत्रित केले." तिथे 'आदित्तं' म्हणजे प्रदीप्त, प्रज्वलित. उर्वरित भाग आधी सांगितल्याप्रमाणेच आहे. अशा प्रकारे या सुत्तात दुःखलक्षण सांगितले आहे. ၇. အဒ္ဓဘူတသုတ္တဝဏ္ဏနာ ७. अद्धभूत सुत्ताचे स्पष्टीकरण (अद्धभूतसुuttवण्णना) ၂၉. သတ္တမေ အဒ္ဓဘူတန္တိ အဓိဘူတံ အဇ္ဈောတ္ထဋံ, ဥပဒ္ဒုတန္တိ အတ္ထော. ဣမသ္မိမ္ပိ သုတ္တေ ဒုက္ခလက္ခဏမေဝ ကထိတံ. २९. सातव्या सुत्तात, 'अद्धभूतं' म्हणजे पीडित, व्यापलेले, उपद्रुत असा अर्थ आहे. या सुत्तात देखील दुःखलक्षणच सांगितले आहे. ၈. သမုဂ္ဃာတသာရုပ္ပသုတ္တဝဏ္ဏနာ ८. समुग्घातसारुप्पसुत्ताचे स्पष्टीकरण (समुग्घातसारुप्पसुत्तवण्णना) ၃၀. အဋ္ဌမေ သဗ္ဗမညိတသမုဂ္ဃာတသာရုပ္ပန္တိ သဗ္ဗေသံ တဏှာမာနဒိဋ္ဌိမညိတာနံ သမုဂ္ဃာတာယ အနုစ္ဆဝိကံ. ဣဓာတိ ဣမသ္မိံ သာသနေ. စက္ခုံ န မညတီတိ စက္ခုံ အဟန္တိ ဝါ မမန္တိ ဝါ ပရောတိ ဝါ ပရဿာတိ ဝါ န မညတိ. စက္ခုသ္မိံ န မညတီတိ အဟံ စက္ခုသ္မိံ, မမ ကိဉ္စနပလိဗောဓော စက္ခုသ္မိံ ပရော စက္ခုသ္မိံ, ပရဿ ကိဉ္စနပလိဗောဓော စက္ခုသ္မိန္တိ န မညတိ. စက္ခုတော န မညတီတိ အဟံ စက္ခုတော နိဂ္ဂတော, မမ ကိဉ္စနပလိဗောဓော စက္ခုတော နိဂ္ဂတော, ပရော စက္ခုတော နိဂ္ဂတော, ပရဿ ကိဉ္စနပလိဗောဓော စက္ခုတော နိဂ္ဂတောတိ ဧဝမ္ပိ န မညတိ, တဏှာမာနဒိဋ္ဌိမညနာနံ ဧကမ္ပိ န ဥပ္ပာဒေတီတိ အတ္ထော. စက္ခုံ မေတိ န မညတီတိ မမ စက္ခူတိ န မညတိ, မမတ္တဘူတံ တဏှာမညနံ န ဥပ္ပာဒေတီတိ အတ္ထော. သေသံ ဥတ္တာနမေဝါတိ. ဣမသ္မိံ သုတ္တေ စတုစတ္တာလီသာယ ဌာနေသု အရဟတ္တံ ပါပေတွာ ဝိပဿနာ ကထိတာ. ३०. आठव्या सुत्तात, 'सब्बमञ्ञितसमुग्घातसारुप्पं' म्हणजे सर्व प्रकारच्या तृष्णा, मान आणि दृष्टी यांच्या कल्पनांचे समूळ उच्चाटन करण्यासाठी जे योग्य आहे ते. 'इध' म्हणजे या शासनात. 'चक्खुं न मञ्ञति' म्हणजे डोळ्याला 'मी', 'माझे', 'दुसरा' किंवा 'दुसऱ्याचे' असे मानत नाही. 'चक्खुस्मिं न मञ्ञति' म्हणजे 'मी डोळ्यात आहे', 'माझा क्लेशकारक अडथळा डोळ्यात आहे', 'दुसरा डोळ्यात आहे', 'दुसऱ्याचा क्लेशकारक अडथळा डोळ्यात आहे' असे मानत नाही. 'चक्खुतो न मञ्ञति' म्हणजे 'मी डोळ्यातून बाहेर पडलो आहे', 'माझा क्लेशकारक अडथळा डोळ्यातून बाहेर पडला आहे', 'दुसरा डोळ्यातून बाहेर पडला आहे', 'दुसऱ्याचा क्लेशकारक अडथळा डोळ्यातून बाहेर पडला आहे' असेही मानत नाही; तृष्णा, मान आणि दृष्टी यांच्या कल्पनांपैकी एकही कल्पना उत्पन्न करत नाही, असा अर्थ आहे. 'चक्खुं मे' असे मानत नाही म्हणजे 'हा माझा डोळा आहे' असे मानत नाही; ममत्व निर्माण करणारी तृष्णेची कल्पना उत्पन्न करत नाही, असा अर्थ आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. या सुत्तात चव्वेचाळीस स्थानांवर अरहंतपद प्राप्त करून देणारी विपश्यना सांगितली आहे. ၉. ပဌမသမုဂ္ဃာတသပ္ပာယသုတ္တဝဏ္ဏနာ ९. प्रथमसमुग्घातसप्पायसुत्ताचे स्पष्टीकरण (पठमसमुग्घातसप्पायसुत्तवण्णना) ၃၁. နဝမေ [Pg.11] သမုဂ္ဃာတသပ္ပာယာတိ သမုဂ္ဃာတဿ ဥပကာရဘူတာ. တတော တံ ဟောတိ အညထာတိ တတော တံ အညေနာကာရေန ဟောတိ. အညထာဘာဝီ ဘဝသတ္တော လောကော ဘဝမေဝါဘိနန္ဒတီတိ အညထာဘာဝံ ဝိပရိဏာမံ ဥပဂမနေန အညထာဘာဝီ ဟုတွာပိ ဘဝေသု သတ္တော လဂ္ဂေါ လဂိတော ပလိဗုဒ္ဓေါ အယံ လောကော ဘဝံယေဝ အဘိနန္ဒတိ. ယာဝတာ, ဘိက္ခဝေ, ခန္ဓဓာတုအာယတနန္တိ, ဘိက္ခဝေ, ယတ္တကံ ဣဒံ ခန္ဓာ စ ဓာတုယော စ အာယတနာနိ စာတိ ခန္ဓဓာတုအာယတနံ. တမ္ပိ န မညတီတိ သဗ္ဗမ္ပိ န မညတီတိ ဟေဋ္ဌာ ဂဟိတမေဝ သံကဍ္ဎိတွာ ပုန ဒဿေတိ. ဣမသ္မိံ သုတ္တေ အဋ္ဌစတ္တာလီသာယ ဌာနေသု အရဟတ္တံ ပါပေတွာ ဝိပဿနာ ကထိတာ. ३१. नवव्या सुत्तात, 'समुग्घातसप्पाय' म्हणजे समूळ उच्चाटनासाठी उपकारक असणारी. 'ततो तं होति अञ्ञथा' म्हणजे त्या कल्पनेच्या स्वरूपापेक्षा वेगळ्या स्वरूपाचे ते होते. 'अञ्ञथाभावी भवसत्तो लोको भवमेवाभिनन्दति' म्हणजे अन्यथाभाव (बदल) आणि विपरिणाम प्राप्त झाल्यामुळे अन्यथाभावी होऊनही, भवांमध्ये आसक्त, अडकलेला आणि क्लेशग्रस्त असलेला हा लोक भवाचेच अभिनंदन करतो. "भिक्खूंनो, जे काही हे स्कंध, धातू आणि आयतने आहेत, तेच स्कंध-धातू-आयतन होय." 'ते देखील मानत नाही' म्हणजे 'सर्व काही मानत नाही'; खाली ग्रहण केलेल्या गोष्टींनाच एकत्रित करून भगवान पुन्हा दाखवून देतात. या सुत्तात अठ्ठेचाळीस स्थानांवर अरहंतपद प्राप्त करून देणारी विपश्यना सांगितली आहे. ၁၀. ဒုတိယသမုဂ္ဃာတသပ္ပာယသုတ္တဝဏ္ဏနာ १०. द्वितीयसमुग्घातसप्पायसुत्ताचे स्पष्टीकरण (दुतियसमुग्घातसप्पायसुत्तवण्णना) ၃၂. ဒသမေ ဧတံ မမာတိအာဒီဟိ တီဟိ တီဟိ ပဒေဟိ တဏှာမာနဒိဋ္ဌိဂါဟေ ဒဿေတွာ တိပရိဝဋ္ဋနယေန ဒေသနာ ကတာ. ပဋိပါဋိယာ ပန တီသုပိ ဣမေသု သုတ္တေသု သဟ ဝိပဿနာယ စတ္တာရောပိ မဂ္ဂါ ကထိတာတိ. ३२. दहाव्या सुत्तात, 'एतं मम' इत्यादी तीन-तीन पदांद्वारे तृष्णा-ग्राह, मान-ग्राह आणि दृष्टी-ग्राह दाखवून, तीन आवर्तनांच्या पद्धतीने देशना केली आहे. आणि अनुक्रमे, या तिन्ही सुत्तांमध्ये विपश्यनेसह चारही मार्ग सांगितले आहेत. သဗ္ဗဝဂ္ဂေါ တတိယော. तिसरा सब्बवग्ग समाप्त. ၄. ဇာတိဓမ္မဝဂ္ဂဝဏ္ဏနာ ४. जातिधम्मवग्गचे स्पष्टीकरण (जातिधम्मवग्गवण्णना) ၃၃-၄၂. ဇာတိဓမ္မဝဂ္ဂေ ဇာတိဓမ္မန္တိ ဇာယနဓမ္မံ နိဗ္ဗတ္တနသဘာဝံ. ဇရာဓမ္မန္တိ ဇီရဏသဘာဝံ. ဗျာဓိဓမ္မန္တိ ဗျာဓိနော ဥပ္ပတ္တိပစ္စယဘာဝေန ဗျာဓိသဘာဝံ. မရဏဓမ္မန္တိ မရဏသဘာဝံ. သောကဓမ္မန္တိ သောကဿ ဥပ္ပတ္တိပစ္စယဘာဝေန သောကသဘာဝံ. သံကိလေသိကဓမ္မန္တိ သံကိလေသိကသဘာဝံ. ခယဓမ္မန္တိ ခယဂမနသဘာဝံ. ဝယဓမ္မာဒီသုပိ ဧသေဝ နယောတိ. ३३-४२. 'जातिधम्मवग्ग' (जातिधर्मवर्ग) मध्ये, 'जातिधम्म' म्हणजे जन्म घेण्याचा किंवा उत्पन्न होण्याचा स्वभाव असणे. 'जराधम्म' म्हणजे जीर्ण होण्याचा (वृद्ध होण्याचा) स्वभाव असणे. 'व्याधिधम्म' म्हणजे व्याधीच्या (आजाराच्या) उत्पत्तीच्या कारणांमुळे आजारी पडण्याचा स्वभाव असणे. 'मरणधम्म' म्हणजे मरणाचा (विनाशाचा) स्वभाव असणे. 'सोकधम्म' म्हणजे शोकाच्या उत्पत्तीच्या कारणांमुळे शोक करण्याचा स्वभाव असणे. 'संकिलेसिकधम्म' म्हणजे (तृष्णा इत्यादींच्या प्रभावाने) संक्लेशित (मलिन) होण्याचा स्वभाव असणे. 'खयधम्म' म्हणजे क्षय (नाश) पावण्याचा स्वभाव असणे. 'वयधम्म' (व्ययधर्म) इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम समजून घ्यावा. ဇာတိဓမ္မဝဂ္ဂေါ စတုတ္ထော. चौथा जातिधम्मवग्ग समाप्त झाला. ၅. သဗ္ဗအနိစ္စဝဂ္ဂဝဏ္ဏနာ ५. सव्वअनिच्चवग्गवण्णना (सर्व अनित्यवर्ग वर्णन). ၄၃-၅၂. အနိစ္စဝဂ္ဂေ [Pg.12] အဘိညေယျန္တိ ပဒေ ဉာတပရိညာ အာဂတာ, ဣတရာ ပန ဒွေ ဂဟိတာယေဝါတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ပရိညေယျပဟာတဗ္ဗပဒေသုပိ တီရဏပဟာနပရိညာဝ အာဂတာ, ဣတရာပိ ပန ဒွေ ဂဟိတာယေဝါတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. သစ္ဆိကာတဗ္ဗန္တိ ပစ္စက္ခံ ကာတဗ္ဗံ. အဘိညာပရိညေယျန္တိ ဣဓာပိ ပဟာနပရိညာ အဝုတ္တာပိ ဂဟိတာယေဝါတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ဥပဒ္ဒုတန္တိ အနေကဂ္ဂဋ္ဌေန. ဥပဿဋ္ဌန္တိ ဥပဟတဋ္ဌေန. သေသံ ဥတ္တာနမေဝါတိ. ४३-५२. 'अनिच्चवग्ग' (अनित्यवर्ग) मध्ये, 'अभिञ्ञेय्य' (अभिज्ञेय) या पदात 'ञातपरिञ्ञा' (ज्ञातपरिज्ञा) आली आहे, परंतु इतर दोन (तीरणपरिज्ञा आणि पहानपरिज्ञा) देखील त्यात समाविष्ट आहेत असे समजावे. 'परिञ्ञेय्य' (परिज्ञेय) आणि 'पहातब्ब' (प्रहातव्य) या पदांमध्ये देखील 'तीरणपरिज्ञा' व 'पहानपरिज्ञा' आली आहे, परंतु इतर दोन देखील समाविष्ट आहेत असेच समजावे. 'सच्छिकातब्ब' (साक्षात्कर्तव्य) म्हणजे प्रत्यक्ष करणे. 'अभिञ्ञापरिञ्ञेय्य' या पाठात देखील 'पहानपरिज्ञा' स्पष्टपणे सांगितली नसली तरी ती समाविष्ट आहे असेच समजावे. 'उपद्दुत' (उपद्रुत) म्हणजे अनेक प्रकारच्या अस्थिरतेच्या अर्थाने (विविध संकटांनी ग्रासलेले). 'उपस्सट्ठ' (उपसृष्ट) म्हणजे उपहत (पीडित किंवा आघात झालेल्या) अर्थाने. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. သဗ္ဗအနိစ္စဝဂ္ဂေါ ပဉ္စမော. पाचवा सव्वअनिच्चवग्ग समाप्त झाला. ပဌမော ပဏ္ဏာသကော. पहिला पण्णासक (पन्नास सुत्तांचा समूह) समाप्त झाला. ၆. အဝိဇ္ဇာဝဂ္ဂဝဏ္ဏနာ ६. अविज्जावग्गवण्णना (अविद्यावर्ग वर्णन). ၅၃-၆၂. အဝိဇ္ဇာဝဂ္ဂေ အဝိဇ္ဇာတိ စတူသု သစ္စေသု အညာဏံ. ဝိဇ္ဇာတိ အရဟတ္တမဂ္ဂဝိဇ္ဇာ. အနိစ္စတော ဇာနတော ပဿတောတိ ဒုက္ခာနတ္တဝသေနာပိ ဇာနတော ပဿတော ပဟီယတိယေဝ, ဣဒံ ပန အနိစ္စဝသေန ကထိတေ ဗုဇ္ဈနကပုဂ္ဂလဿ အဇ္ဈာသယေန ဝုတ္တံ. ဧသေဝ နယော သဗ္ဗတ္ထ. အပိ စေတ္ထ သံယောဇနာတိ ဒသ သံယောဇနာနိ. အာသဝါတိ စတ္တာရော အာသဝါ. အနုသယာတိ သတ္တ အနုသယာ. သဗ္ဗုပါဒါနပရိညာယာတိ သဗ္ဗေသံ စတုန္နမ္ပိ ဥပါဒါနာနံ တီဟိ ပရိညာဟိ ပရိဇာနနတ္ထာယ. ပရိယာဒါနာယာတိ ခေပနတ္ထာယ. သေသံ သဗ္ဗတ္ထ ဥတ္တာနမေဝါတိ. ५३-६२. 'अविज्जावग्ग' (अविद्यावर्ग) मध्ये, 'अविज्जा' (अविद्या) म्हणजे चार आर्यसत्यांविषयीचे अज्ञान. 'विज्जा' (विद्या) म्हणजे अरहत्तमार्गाशी संबंधित असणारे ज्ञान. 'अनित्यतेने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्या' (अनिच्चतो जानतो पस्सतो) या पाठात, दुःख आणि अनात्म भावाने देखील जाणणाऱ्या व पाहणाऱ्या व्यक्तीची अविद्या नष्ट होतेच. परंतु, हे सुत्त अनित्यतेच्या दृष्टीने सांगितले गेले आहे, कारण ते बुद्धत्व प्राप्त करणाऱ्या (बोध प्राप्त करणाऱ्या) व्यक्तीच्या आशयानुसार (मानसिकतेनुसार) उपदेशिले गेले आहे. सर्व ठिकाणी हाच नियम समजून घ्यावा. तसेच येथे 'संयोजनानि' म्हणजे दहा संयोजने (बंधने). 'आसवा' म्हणजे चार आसव (आस्रव). 'अनुसया' म्हणजे सात अनुशय (सुप्त प्रवृत्ती). 'सब्बुपादानपरिञ्ञाय' (सर्व उपादान परिज्ञेय) म्हणजे चारही उपादानांना तीन परिज्ञांच्या (ज्ञात, तीरण आणि पहान परिज्ञा) माध्यमातून पूर्णपणे जाणण्यासाठी. 'परियादानाय' म्हणजे पूर्णपणे नष्ट करण्यासाठी (क्षय करण्यासाठी). सर्व ठिकाणी उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. အဝိဇ္ဇာဝဂ္ဂေါ ဆဋ္ဌော. सहावा अविज्जावग्ग समाप्त झाला. ၇. မိဂဇာလဝဂ္ဂေါ ७. मिगजाळवग्ग (मृगशालवर्ग). ၁. ပဌမမိဂဇာလသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. पठममिगजाळसुत्तवण्णना (प्रथम मृगशालसुत्त वर्णन). ၆၃. မိဂဇာလဝဂ္ဂဿ ပဌမေ စက္ခုဝိညေယျာတိ စက္ခုဝိညာဏေန ပဿိတဗ္ဗာ. သောတဝိညေယျာဒီသုပိ ဧသေဝ နယော. ဣဋ္ဌာတိ ပရိယိဋ္ဌာ ဝါ ဟောန္တု [Pg.13] မာ ဝါ, ဣဋ္ဌာရမ္မဏဘူတာတိ အတ္ထော. ကန္တာတိ ကမနီယာ. မနာပါတိ မနဝဍ္ဎနကာ. ပိယရူပါတိ ပိယဇာတိကာ. ကာမူပသံဟိတာတိ အာရမ္မဏံ ကတွာ ဥပ္ပဇ္ဇမာနေန ကာမေန ဥပသံဟိတာ ရဇနီယာတိ ရဉ္ဇနီယာ, ရာဂုပ္ပတ္တိကာရဏဘူတာတိ အတ္ထော. နန္ဒီတိ တဏှာနန္ဒီ. သံယောဂေါတိ သံယောဇနံ. နန္ဒိသံယောဇနသံယုတ္တောတိ နန္ဒီဗန္ဓနေန ဗဒ္ဓေါ. အရညဝနပတ္ထာနီတိ အရညာနိ စ ဝနပတ္ထာနိ စ. တတ္ထ ကိဉ္စာပိ အဘိဓမ္မေ နိပ္ပရိယာယေန ‘‘နိက္ခမိတွာ ဗဟိ ဣန္ဒခီလာ သဗ္ဗမေတံ အရည’’န္တိ (ဝိဘ. ၅၂၉) ဝုတ္တံ, တထာပိ ယံ တံ ‘‘ပဉ္စဓနုသတိကံ ပစ္ဆိမ’’န္တိ (ပါရာ. ၆၅၄) အရညကင်္ဂနိပ္ဖာဒကံ သေနာသနံ ဝုတ္တံ, တဒေဝ အဓိပ္ပေတန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ဝနပတ္ထန္တိ ဂါမန္တံ အတိက္ကမိတွာ မနုဿာနံ အနုပစာရဋ္ဌာနံ, ယတ္ထ န ကသီယတိ န ဝပီယတိ. ဝုတ္တမ္ပိ စေတံ – ६३. 'मिगजाळवग्ग' (मृगशालवर्ग) च्या पहिल्या सुत्तात, 'चक्खुविञ्ञेय्य' (चक्षुर्विज्ञेय) म्हणजे चक्षुविज्ञानाने (डोळ्यांच्या विज्ञानाने) पाहिले जाणारे विषय. 'सोतविञ्ञेय्य' (श्रोत्रविज्ञेय) इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम समजून घ्यावा. 'इट्ठ' (इष्ट) म्हणजे ते शोधले गेले असो वा नसो, जे इष्ट (प्रिय) आलंबन (विषय) बनले आहे असा अर्थ आहे. 'कन्त' (कांत) म्हणजे कामना करण्यायोग्य (प्रिय). 'मनाप' (मनाप) म्हणजे मनाला आनंद देणारे (मनाचे रंजन करणारे). 'पियरूप' (प्रियरूप) म्हणजे प्रिय वाटणाऱ्या स्वभावाचे. 'कामूपसंहित' (कामोपसंहित) म्हणजे विषयाला आलंबन बनवून उत्पन्न होणाऱ्या कामवासनेशी संबंधित असणारे. 'रजनीय' (रंजनीय) म्हणजे राग (आसक्ती) उत्पन्न करण्यास कारणीभूत असणारे असा अर्थ आहे. 'नन्दि' म्हणजे तृष्णारूपी नंदी (आनंद). 'संयोग' म्हणजे संयोजन (बंधन). 'नन्दिसंयोजनसंयुत्त' म्हणजे नंदीच्या (तृष्णेच्या) बंधनाने बांधलेला. 'अरञ्ञवनपत्थानि' (अरण्यवनप्रस्थान) म्हणजे अरण्ये आणि वनातील निर्जन ठिकाणे. तेथे जरी अभिधम्मात थेटपणे (मुख्य अर्थाने) "नगरद्वाराच्या (इंद्रखिलाच्या) बाहेर गेल्यावर हे सर्व अरण्यच आहे" असे म्हटले असले, तरी येथे "किमान पाचशे धनुष्ये दूर असलेले" जे अरण्यक अंगाची पूर्तता करणारे सेनासन (निवासस्थान) सांगितले आहे, तेच अभिप्रेत आहे असे समजावे. 'वनपत्थ' म्हणजे गावाच्या सीमा ओलांडून गेलेले, माणसांची वर्दळ नसलेले असे ठिकाण, जेथे नांगरणी केली जात नाही आणि पेरणीही केली जात नाही. आणि असेही म्हटले आहे की - ‘‘ဝနပတ္ထန္တိ ဒူရာနမေတံ သေနာသနာနံ အဓိဝစနံ. ဝနပတ္ထန္တိ ဝနသဏ္ဍာနမေတံ, ဝနပတ္ထန္တိ ဘိံသနကာနမေတံ, ဝနပတ္ထန္တိ သလောမဟံသာနမေတံ, ဝနပတ္ထန္တိ ပရိယန္တာနမေတံ, ဝနပတ္ထန္တိ အမနုဿူပစာရာနံ သေနာသနာနမေတံ အဓိဝစန’’န္တိ (ဝိဘ. ၅၃၁). "वनपत्थ हे दूरवर असलेल्या सेनासनांचे (निवासस्थानांचे) नाव आहे. वनपत्थ हे दाट जंगलात असलेल्या सेनासनांचे नाव आहे, वनपत्थ हे भयकारक सेनासनांचे नाव आहे, वनपत्थ हे अंगावर काटा आणणाऱ्या (रोमहर्षक) सेनासनांचे नाव आहे, वनपत्थ हे सीमावर्ती भागातील सेनासनांचे नाव आहे, वनपत्थ हे मानवी वर्दळ नसलेल्या सेनासनांचे नाव आहे." ဧတ္ထ စ ပရိယန္တာနန္တိ ဣမံ ဧကံ ပရိယာယံ ဌပေတွာ သေသပရိယာယေဟိ ဝနပတ္ထာနိ ဝေဒိတဗ္ဗာနိ. ပန္တာနီတိ ပရိယန္တာနိ အတိဒူရာနိ. အပ္ပသဒ္ဒါနီတိ ဥဒုက္ခလမုသလဒါရကသဒ္ဒါဒီနံ အဘာဝေန အပ္ပသဒ္ဒါနိ. အပ္ပနိဂ္ဃောသာနီတိ တေသံ တေသံ နိန္နာဒမဟာနိဂ္ဃောသဿ အဘာဝေန အပ္ပနိဂ္ဃောသာနိ. ဝိဇနဝါတာနီတိ သဉ္စရဏဇနဿ သရီရဝါတဝိရဟိတာနိ. မနုဿရာဟဿေယျကာနီတိ မနုဿာနံ ရဟောကမ္မဿ အနုစ္ဆဝိကာနိ. ပဋိသလ္လာနသာရုပ္ပာနီတိ နိလီယနသာရုပ္ပာနိ. आणि येथे 'परियन्तानं' हा एक पर्याय वगळता, उर्वरित पर्यायांद्वारे 'वनपत्थ' समजून घ्यावे, कारण तो 'पन्तानि' या पदाने आधीच समाविष्ट केला आहे. 'पन्तानि' म्हणजे सीमावर्ती किंवा अत्यंत दूर असलेले. 'अप्पसद्दानि' (अल्पशब्दानि) म्हणजे उखळ-मुसळ, लहान मुले इत्यादींच्या आवाजाचा अभाव असल्याने शांत असणारे. 'अप्पनिग्घोसानि' (अल्पनिर्घोषानि) म्हणजे विविध प्राण्यांच्या मोठ्या आवाजाचा किंवा प्रतिध्वनीचा अभाव असल्याने कोलाहल नसलेले. 'विजनवातानि' म्हणजे ये-जा करणाऱ्या लोकांच्या शारीरिक संपर्कापासून (वाऱ्यापासून) मुक्त असलेले. 'मनुस्सराहासेय्यकानि' म्हणजे माणसांच्या एकांतातील कृत्यांसाठी (साधनेसाठी) योग्य असलेले. 'पटिसल्लानसारुप्पानि' (प्रतिसंलयनसारूप्याणि) म्हणजे एकांतात ध्यान करण्यासाठी (लपण्यासाठी) योग्य असलेले. ၂. ဒုတိယမိဂဇာလသုတ္တဝဏ္ဏနာ २. दुतियमिगजाळसुत्तवण्णना (द्वितीय मृगशालसुत्त वर्णन). ၆၄. ဒုတိယေ နန္ဒိနိရောဓာ ဒုက္ခနိရောဓောတိ တဏှာနန္ဒိယာ နိရောဓေန ဝဋ္ဋဒုက္ခဿ နိရောဓော. ६४. दुसऱ्या सुत्तात, 'नंदिनिरोधा दुक्खनिरोधो' (नंदीच्या निरोधाने दुःखाचा निरोध होतो) म्हणजे तृष्णारूपी नंदीच्या (आनंदाच्या) निरोधाने संसारदुःखाचा (वटदुःखाचा) निरोध होतो. ၃-၅. ပဌမသမိဒ္ဓိမာရပဉှာသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ३-५. पठमसमिद्धिमारपञ्हसुत्तादिवण्णना (प्रथम समिद्धि मारप्रश्न सुत्त इत्यादींचे वर्णन). ၆၅-၆၇. တတိယေ [Pg.14] သမိဒ္ဓီတိ အတ္တဘာဝဿ သမိဒ္ဓတာယ ဧဝံ လဒ္ဓနာမော. တဿ ကိရ ထေရဿ အတ္တဘာဝေါ အဘိရူပေါ အဟောသိ ပါသာဒိကော, ဥက္ခိတ္တမာလာပုဋော ဝိယ အလင်္ကတမာလာဂဗ္ဘော ဝိယ စ သဗ္ဗာကာရပါရိပူရိယာ သမိဒ္ဓေါ. တသ္မာ သမိဒ္ဓိတွေဝ သင်္ခံ ဂတော. မာရောတိ မရဏံ ပုစ္ဆတိ. မာရပညတ္တီတိ မာရောတိ ပညတ္တိ နာမံ နာမဓေယျံ. အတ္ထိ တတ္ထ မာရော ဝါ မာရပညတ္တိ ဝါတိ တတ္ထ မရဏံ ဝါ မရဏန္တိ ဣဒံ နာမံ ဝါ အတ္ထီတိ ဒဿေတိ. စတုတ္ထံ ဥတ္တာနမေဝ, တထာ ပဉ္စမံ. ६५-६७. तिसऱ्या सुत्तात, 'समिद्धि' म्हणजे स्वतःच्या शरीराच्या (अत्तभाव) समृद्धतेमुळे (पूर्णतेमुळे) असे नाव मिळालेले. त्या थेरांचे शरीर अत्यंत देखणे, प्रसन्न करणारे, जणू काही वर उचललेली फुलांची टोपली किंवा सजवलेली फुलांची खोली असल्यासारखे सर्व प्रकारे परिपूर्ण व समृद्ध होते. म्हणूनच त्यांना 'समिद्धि' या नावाने ओळखले गेले. 'मार' म्हणजे मरणाविषयी विचारत आहेत. 'मारपञ्ञत्ति' (मारप्रज्ञप्ति) म्हणजे 'मार' अशी संज्ञा, नाव किंवा अभिधान. "तेथे मार आहे किंवा मारप्रज्ञप्ति आहे" याचा अर्थ तेथे मरण आहे किंवा 'मरण' हे नाव आहे, हे दर्शविणे होय. चौथे सुत्त स्पष्टच आहे, तसेच पाचवे देखील. ၆. သမိဒ္ဓိလောကပဉှာသုတ္တဝဏ္ဏနာ ६. समिद्धिलोकपञ्हसुत्तवण्णना (समिद्धि लोकप्रश्न सुत्त वर्णन). ၆၈. ဆဋ္ဌေ လောကောတိ လုဇ္ဇနပလုဇ္ဇနဋ္ဌေန လောကော. ဣတိ မိဂဇာလတ္ထေရဿ အာယာစနသုတ္တတော ပဋ္ဌာယ ပဉ္စသုပိ သုတ္တေသု ဝဋ္ဋဝိဝဋ္ဋမေဝ ကထိတံ. ६८. सहाव्या सुत्तात, 'लोको' (लोक) म्हणजे झिजण्याच्या आणि नष्ट होण्याच्या स्वभावामुळे त्याला 'लोक' म्हटले जाते. अशा प्रकारे, थेर मिगजाल यांच्या विनंतीच्या सुत्तापासून (दुसऱ्या सुत्तापासून) सुरू करून पाचही सुत्तांमध्ये केवळ संसार (वट्ट) आणि संसारातून मुक्ती (विवट्ट) याविषयीच उपदेश केला आहे. ၇. ဥပသေနအာသီဝိသသုတ္တဝဏ္ဏနာ ७. उपसेनआसीविससुत्तवण्णना (उपसेन आसीविससुत्त वर्णन). ၆၉. သတ္တမေ သီတဝနေတိ ဧဝံနာမကေ သုသာနဝနေ. သပ္ပသောဏ္ဍိကပဗ္ဘာရေတိ သပ္ပဖဏသဒိသတာယ ဧဝံလဒ္ဓနာမေ ပဗ္ဘာရေ. ဥပသေနဿာတိ ဓမ္မသေနာပတိနော ကနိဋ္ဌဘာတိကဥပသေနတ္ထေရဿ. အာသီဝိသော ပတိတော ဟောတီတိ ထေရော ကိရ ကတဘတ္တကိစ္စော မဟာစီဝရံ ဂဟေတွာ လေဏစ္ဆာယာယ မန္ဒမန္ဒေန ဝါတပါနဝါတေန ဗီဇိယမာနော နိသီဒိတွာ ဒုပဋ္ဋနိဝါသနေ သူစိကမ္မံ ကရောတိ. တသ္မိံ ခဏေ လေဏစ္ဆဒနေ ဒွေ အာသီဝိသပေါတကာ ကီဠန္တိ. တေသု ဧကော ပတိတွာ ထေရဿ အံသကူဋေ အဝတ္ထာသိ. သော စ ဖုဋ္ဌဝိသော ဟောတိ. တသ္မာ ပတိတဋ္ဌာနတော ပဋ္ဌာယ ထေရဿ ကာယေ ဒီပသိခါ ဝိယ ဝဋ္ဋိံ ပရိယာဒိယမာနမေဝဿ ဝိသံ ဩတိဏ္ဏံ. ထေရော ဝိသဿ တထာဂမနံ ဒိသွာ ကိဉ္စာပိ တံ ပတိတမတ္တမေဝ ယထာပရိစ္ဆေဒေန ဂတံ, အတ္တနော ပန ဣဒ္ဓိဗလေန ‘‘အယံ အတ္တဘာဝေါ လေဏေ မာ ဝိနဿတူ’’တိ အဓိဋ္ဌဟိတွာ ဘိက္ခူ အာမန္တေသိ. ပုရာယံ ကာယော ဣဓေဝ ဝိကိရတီတိ ယာဝ န ဝိကိရတိ, တာဝ နံ ဗဟိဒ္ဓါ နီဟရထာတိ အတ္ထော. အညထတ္တန္တိ အညထာဘာဝံ. ဣန္ဒြိယာနံ ဝါ ဝိပရိဏာမန္တိ စက္ခုသောတာဒီနံ ဣန္ဒြိယာနံ [Pg.15] ပကတိဝိဇဟနဘာဝံ. တတ္ထေဝ ဝိကိရီတိ ဗဟိ နီဟရိတွာ ဌပိတဋ္ဌာနေ မဉ္စကသ္မိံယေဝ ဝိကိရိ. ६९. सातव्या सूत्तात, 'सीतवने' म्हणजे या नावाच्या स्मशानवनात. 'सप्पसोण्डिकपब्भारे' म्हणजे सापाच्या फण्यासारखा आकार असल्यामुळे हे नाव मिळालेल्या डोंगराच्या कपारीत (गुहेत). 'उपसेनस्स' म्हणजे धम्मसेनापतींचे धाकटे बंधू उपसेन थेर यांचे. 'आसीविसो पतितो होति' म्हणजे असे म्हटले जाते की, थेरांनी आपले भोजन आटोपून, महाचीवर घेऊन, गुहेच्या छायेत खिडकीतून येणाऱ्या मंद मंद वाऱ्याचा आस्वाद घेत बसून, दुपदरी अंतर्वासाला शिवणकाम करत होते. त्या क्षणी गुहेच्या छतावर सापाची दोन पिल्ले खेळत होती. त्यांपैकी एक पिल्लू खाली पडून थेरांच्या खांद्यावर पडले. आणि तो 'फुठ्ठविस' (स्पर्शमात्रेने विष पसरवणारा) साप होता. त्यामुळे, पडल्या जागेपासून थेरांच्या शरीरात, दिव्याच्या ज्योतीने वात जळत जावी त्याप्रमाणे, विष पसरू लागले. थेरांनी विषाचा असा संचार पाहून, जरी ते पडल्या पडल्याच आपापल्या मर्यादेनुसार पसरले होते, तरी आपल्या ऋद्धीबलाने 'हा देह गुहेतच नष्ट होऊ नये' असा अधिष्ठान करून भिक्खूंना बोलावले. 'पुरायं कायो इधेव विकिरति' म्हणजे जोपर्यंत हा देह विखुरत (नष्ट होत) नाही, तोपर्यंत याला बाहेर काढा, असा अर्थ आहे. 'अञ्ञथत्तं' म्हणजे अन्यथाभाव (बदल). 'इन्द्रियानं वा विपरिणामं' म्हणजे चक्षु, श्रोत्र इत्यादी इंद्रियांचा आपला नैसर्गिक स्वभाव सोडणे. 'तत्थेव विकिरी' म्हणजे बाहेर काढून ठेवलेल्या जागी, मंचकावरच (खाटेवरच) तो देह विखुरला (नष्ट झाला). ၈. ဥပဝါဏသန္ဒိဋ္ဌိကသုတ္တဝဏ္ဏနာ ८. उपवाणसन्दिट्ठिकसुत्तवण्णना. ၇၀. အဋ္ဌမေ ရူပပ္ပဋိသံဝေဒီတိ နီလပီတာဒိဘေဒံ အာရမ္မဏံ ဝဝတ္ထာပေန္တော ရူပံ ပဋိသံဝိဒိတံ ကရောတိ, တသ္မာ ရူပပ္ပဋိသံဝေဒီ နာမ ဟောတိ. ရူပရာဂပ္ပဋိသံဝေဒီတိ ကိလေသဿ အတ္ထိဘာဝေနေဝ ပန ရူပရာဂံ ပဋိသံဝိဒိတံ ကရောတိ နာမ, တသ္မာ ရူပရာဂပ္ပဋိသံဝေဒီတိ ဝုစ္စတိ. သန္ဒိဋ္ဌိကောတိအာဒီနိ ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂေ ဝုတ္တတ္ထာနေဝ. နော စ ရူပရာဂပ္ပဋိသံဝေဒီတိ ကိလေသဿ နတ္ထိဘာဝေနေဝ န ရူပရာဂံ ပဋိသံဝိဒိတံ ကရောတိ နာမ, တသ္မာ ‘‘နော စ ရူပရာဂပ္ပဋိသံဝေဒီ’’တိ ဝုစ္စတိ. ဣမသ္မိံ သုတ္တေ သေခါသေခါနံ ပစ္စဝေက္ခဏာ ကထိတာ. ७०. आठव्या सूत्तात, 'रूपप्पटिसंवेदी' म्हणजे निळा, पिवळा इत्यादी भेद असलेल्या आलंबनाला (विषयाला) निश्चित करत रूपाचा अनुभव घेतो, म्हणून त्याला 'रूपप्रतिसंवेदी' म्हटले जाते. 'रूपरागप्पटिसंवेदी' म्हणजे क्लेशांच्या अस्तित्वामुळेच रूपावरील रागाचा (आसक्तीचा) अनुभव घेतो, म्हणून त्याला 'रूपरागप्रतिसंवेदी' असे म्हटले जाते. 'सन्दिट्ठिको' इत्यादी शब्दांचे अर्थ विशुद्धिमग्गात सांगितल्याप्रमाणेच आहेत. 'नो च रूपरागप्पटिसंवेदी' म्हणजे क्लेशांच्या अभावामुळेच रूपावरील रागाचा अनुभव न घेणे, म्हणून त्याला 'नो च रूपरागप्रतिसंवेदी' असे म्हटले जाते. या सूत्तात शैक्ष आणि अशैक्ष (सेख आणि असेख) पुद्गलांच्या प्रत्यवेक्षणाचे (चिंतनाचे) वर्णन केले आहे. ၉. ပဌမဆဖဿာယတနသုတ္တဝဏ္ဏနာ ९. पठमछफस्सायतनसुत्तवण्णना. ၇၁. နဝမေ ဖဿာယတနာနန္တိ ဖဿာကရာနံ. အဝုသိတန္တိ အဝုဋ္ဌံ. အာရကာတိ ဒူရေ. ဧတ္ထာဟံ, ဘန္တေ, အနဿသန္တိ, ဘန္တေ, အဟံ ဧတ္ထ အနဿသိံ, နဋ္ဌော နာမ အဟန္တိ ဝဒတိ. ဘဂဝါ – ‘‘အယံ ဘိက္ခု ‘အဟံ နာမ ဣမသ္မိံ သာသနေ နဋ္ဌော’တိ ဝဒတိ, ကိန္နု ခွဿ အညေသု ဓာတုကမ္မဋ္ဌာန-ကသိဏကမ္မဋ္ဌာနာဒီသု အဘိယောဂေါ အတ္ထီ’’တိ စိန္တေတွာ, တမ္ပိ အပဿန္တော – ‘‘ကတရံ နု ခေါ ကမ္မဋ္ဌာနံ ဣမဿ သပ္ပာယံ ဘဝိဿတီ’’တိ စိန္တေသိ. တတော ‘‘အာယတနကမ္မဋ္ဌာနမေဝ သပ္ပာယ’’န္တိ ဒိသွာ တံ ကထေန္တော တံ ကိံ မညသိ ဘိက္ခူတိအာဒိမာဟ. သာဓူတိ တဿ ဗျာကရဏေ သမ္ပဟံသနံ. ဧသေဝန္တော ဒုက္ခဿာတိ အယမေဝ ဝဋ္ဋဒုက္ခဿန္တော ပရိစ္ဆေဒေါ, နိဗ္ဗာနန္တိ အတ္ထော. ७१. नवव्या सूत्तात, 'फस्सायतनानं' म्हणजे स्पर्शाच्या आयतनांचे (सहा प्रकारच्या स्पर्शाच्या उत्पत्तीस्थानांचे). 'अवुसितं' म्हणजे आचरण न केलेले. 'आरका' म्हणजे दूर. 'एत्थाहं, भन्ते, अनस्ससं' म्हणजे 'भन्ते, मी येथे नष्ट झालो आहे, मी पूर्णपणे पतित झालो आहे' असे तो म्हणतो. भगवंतांनी विचार केला - 'हा भिक्खू मी या शासनात नष्ट झालो आहे असे म्हणत आहे. काय याचे इतर धातू-कर्मस्थान किंवा कसिण-कर्मस्थान इत्यादींमध्ये काही प्रयत्न आहे का?' असा विचार करून, त्यातही काही न दिसल्यामुळे, 'या भिक्खूसाठी कोणते कर्मस्थान अनुकूल ठरेल?' असा विचार केला. त्यानंतर 'आयतन-कर्मस्थानच याच्यासाठी अनुकूल आहे' असे पाहून, ते सांगताना भगवंतांनी 'तं किं मञ्ञसि भिक्खु' (भिक्खू, तुला काय वाटते?) इत्यादी विचारले. 'साधू' म्हणजे त्याच्या उत्तरावर आनंद व्यक्त करणे. 'एसेवन्तो दुक्खस्स' म्हणजे हाच संसारदुःखाचा अंत (मर्यादा) आहे, म्हणजेच निर्वाण असा अर्थ आहे. ၁၀. ဒုတိယဆဖဿာယတနသုတ္တဝဏ္ဏနာ १०. दुतियछफस्सायतनसुत्तवण्णना. ၇၂. ဒသမေ အနဿသန္တိ နဿသိံ, နဋ္ဌော နာမမှိ ဣစ္စေဝ အတ္ထော. အာယတိံ အပုနဗ္ဘဝါယာတိ ဧတ္ထ အာယတိံ အပုနဗ္ဘဝေါ နာမ နိဗ္ဗာနံ, နိဗ္ဗာနတ္ထာယ ပဟီနံ ဘဝိဿတီတိ အတ္ထော. ७२. दहाव्या सूत्तात, 'अनस्ससं' म्हणजे मी नष्ट झालो, मी पतित झालो, असाच अर्थ घ्यावा. 'आयतिं अपुनब्भवाय' यात 'आयतिं अपुनब्भवो' म्हणजे निर्वाण; निर्वाणाच्या प्राप्तीसाठी ते प्रहीन (नष्ट) होईल, असा अर्थ आहे. ၁၁. တတိယဆဖဿာယတနသုတ္တဝဏ္ဏနာ ११. ततियछफस्सायतनसुत्तवण्णना. ၇၃. ဧကာဒသမေ [Pg.16] အနဿသန္တိ နဋ္ဌော, ပနဿသန္တိ အတိနဋ္ဌော. သေသံ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗန္တိ. ७३. अकराव्या सूत्तात, 'अनस्ससं' म्हणजे नष्ट झालो, 'पनस्ससं' म्हणजे अत्यंत नष्ट झालो. उर्वरित भाग आधी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा. မိဂဇာလဝဂ္ဂေါ သတ္တမော. मिगजालवग्गो सत्तो. ၈. ဂိလာနဝဂ္ဂေါ ८. गिलाणवग्गो. ၁-၅. ပဌမဂိလာနသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ १-५. पठमगिलाणसुत्तादिवण्णना. ၇၄-၇၈. ဂိလာနဝဂ္ဂဿ ပဌမေ အမုကသ္မိန္တိ အသုကသ္မိံ. အယမေဝ ဝါ ပါဌော. အပ္ပညာတောတိ အညာတော အပါကဋော. နဝေါပိ ဟိ ကောစိ ပညာတော ဟောတိ ရာဟုလတ္ထေရော ဝိယ သုမနသာမဏေရော ဝိယ စ, အယံ ပန နဝေါ စေဝ အပညာတော စ. သေသမေတ္ထ ဝုတ္တနယမေဝါတိ. တထာ ဣတော ပရေသု စတူသု. ७४-७८. गिलाण वर्गाच्या पहिल्या सूत्तात, 'अमुकस्मिं' म्हणजे अमुक ठिकाणी. किंवा हाच पाठ आहे. 'अप्पञ्ञातो' म्हणजे अज्ञात, अप्रसिद्ध. कारण नवीन भिक्खू असूनही कोणी राहुल थेरांसारखा किंवा सुमन सामणेरासारखा प्रसिद्ध असू शकतो, परंतु हा भिक्खू नवीनही आहे आणि अप्रसिद्धही आहे. या सूत्तातील उर्वरित भाग आधी सांगितलेल्या पद्धतीनेच आहे. यापुढील चार सूत्तांमध्येही याचप्रमाणे समजावे. ၆. ပဌမအဝိဇ္ဇာပဟာနသုတ္တဝဏ္ဏနာ ६. पठमअविज्जापहानसुत्तवण्णना. ၇၉. ဆဋ္ဌေ အနိစ္စတော ဇာနတောတိ ဒုက္ခာနတ္တဝသေန ဇာနတောပိ ပဟီယတိယေဝ, ဣဒံ ပန အနိစ္စလက္ခဏံ ဒဿေတွာ ဝုတ္တေ ဗုဇ္ဈနကဿ အဇ္ဈာသယေန ဝုတ္တံ. ७९. सहाव्या सूत्तात, 'अनिच्चतो जानतो' म्हणजे अनित्य रूपाने जाणणाऱ्याचे (दुःख आणि अनात्म रूपाने जाणणाऱ्याचेही अविद्या नष्ट होतेच). परंतु, हे सूत्त अनित्य लक्षण दाखवून सांगितले गेले आहे, ते सत्य जाणू इच्छिणाऱ्याच्या (बोध प्राप्त करू इच्छिणाऱ्याच्या) आशयानुसार सांगितले आहे. ၇. ဒုတိယအဝိဇ္ဇာပဟာနသုတ္တဝဏ္ဏနာ ७. दुतियअविज्जापहानसुत्तवण्णना. ၈၀. သတ္တမေ သဗ္ဗေ ဓမ္မာတိ သဗ္ဗေ တေဘူမကဓမ္မာ. နာလံ အဘိနိဝေသာယာတိ အဘိနိဝေသပရာမာသဂ္ဂါဟေန ဂဏှိတုံ န ယုတ္တာ. သဗ္ဗနိမိတ္တာနီတိ သဗ္ဗာနိ သင်္ခါရနိမိတ္တာနိ. အညတော ပဿတီတိ ယထာ အပရိညာတာဘိနိဝေသော ဇနော ပဿတိ, တတော အညတော ပဿတိ. အပရိညာတာဘိနိဝေသော ဟိ ဇနော သဗ္ဗနိမိတ္တာနိပိ အတ္တတော ပဿတိ. ပရိညာတာဘိနိဝေသော ပန အနတ္တတော ပဿတိ, နော အတ္တတောတိ ဧဝံ ဣမသ္မိံ သုတ္တေ အနတ္တလက္ခဏမေဝ ကထိတံ. ८०. सातव्या सूत्तात, 'सब्बे धम्मा' म्हणजे सर्व त्रैभूमिक धर्म. 'नालं अभिनिवेसाय' म्हणजे अभिनिवेश आणि परामाशाच्या (चुकीच्या धारणेच्या) ग्रहणाने ग्रहण करण्यास योग्य नाहीत. 'सब्बनिमित्तानि' म्हणजे सर्व संस्कारनिमित्त. 'अञ्ञतो पस्सति' म्हणजे ज्याप्रमाणे अपरिज्ञात अभिनिवेश असलेला मनुष्य पाहतो, त्यापेक्षा वेगळ्या (अनात्म) रूपाने पाहतो. कारण अपरिज्ञात अभिनिवेश असलेला मनुष्य सर्व निमित्तांना 'आत्मा' म्हणून पाहतो. परंतु, परिज्ञात अभिनिवेश असलेला मनुष्य त्यांना 'अनात्मा' म्हणून पाहतो, 'आत्मा' म्हणून नाही. अशा प्रकारे या सूत्तात अनात्म लक्षणच सांगितले आहे. ၈. သမ္ဗဟုလဘိက္ခုသုတ္တဝဏ္ဏနာ ८. सम्बहुलभिक्खुसुत्तवण्णna. ၈၁. အဋ္ဌမေ [Pg.17] ဣဓ နောတိ ဧတ္ထ နော-ကာရော နိပါတမတ္တမေဝ. သေသံ ဥတ္တာနတ္ထမေဝ. ကေဝလံ ဣဓ ဒုက္ခလက္ခဏံ ကထိတန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ८१. आठव्या सूत्तात, 'इध नो' यात 'नो' हा शब्द केवळ निपात (अव्यय) आहे. उर्वरित भाग स्पष्ट अर्थाचाच आहे. येथे केवळ दुःख लक्षण सांगितले आहे, असे समजावे. ၉. လောကပဉှာသုတ္တဝဏ္ဏနာ ९. लोकपञ्हासुत्तवण्णना. ၈၂. နဝမေ လုဇ္ဇတီတိ ပလုဇ္ဇတိ ဘိဇ္ဇတိ. ဣဓ အနိစ္စလက္ခဏံ ကထိတံ. ८२. नवव्या सूत्तात, 'लुज्जति' म्हणजे नष्ट होते, विखुरते. येथे अनित्य लक्षण सांगितले आहे. ၁၀. ဖဂ္ဂုနပဉှာသုတ္တဝဏ္ဏနာ १०. फग्गुनपञ्हासुत्तवण्णना. ၈၃. ဒသမေ ဆိန္နပပဉ္စေတိ တဏှာပပဉ္စဿ ဆိန္နတ္တာ ဆိန္နပပဉ္စေ. ဆိန္နဝဋုမေတိ တဏှာဝဋုမဿေဝ ဆိန္နတ္တာ ဆိန္နဝဋုမေ. ကိံ ပုစ္ဆာမီတိ ပုစ္ဆတိ? အတိက္ကန္တဗုဒ္ဓေဟိ ပရိဟရိတာနိ စက္ခုသောတာဒီနိ ပုစ္ဆာမီတိ ပုစ္ဆတိ. အထ ဝါ သစေ မဂ္ဂေ ဘာဝိတေပိ အနာဂတေ စက္ခုသောတာဒိဝဋ္ဋံ ဝဍ္ဎေယျ, တံ ပုစ္ဆာမီတိ ပုစ္ဆတီတိ. ८३. दहाव्या सूत्तात, 'छिन्नपपञ्चे' म्हणजे तृष्णा-प्रपंचाचा छेद केल्यामुळे 'छिन्नप्रपंच'. 'छिन्नवटुमे' म्हणजे तृष्णारूपी संसाराचा छेद केल्यामुळे 'छिन्नमार्ग'. 'मी काय विचारू?' असे का विचारतो? भूतकाळातील बुद्धांनी त्यागलेले चक्षु, श्रोत्र इत्यादींविषयी विचारण्यासाठी तो विचारतो. अथवा, जरी मार्गाची भावना केली असली, तरी भविष्यात चक्षु, श्रोत्र इत्यादींचे संसारचक्र चालू राहील का, हे विचारण्यासाठी तो विचारतो. ဂိလာနဝဂ္ဂေါ အဋ္ဌမော. गिलाणवग्गो अट्ठमो. ၉. ဆန္နဝဂ္ဂေါ ९. छन्नवग्गो. ၁. ပလောကဓမ္မသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. पलोकधम्मसुत्तवण्णना. ၈၄. ဆန္နဝဂ္ဂဿ ပဌမေ ပလောကဓမ္မန္တိ ဘိဇ္ဇနကသဘာဝံ. ဧဝမေတ္ထ အနိစ္စလက္ခဏမေဝ ကထိတံ. ८४. छन्न वर्गाच्या पहिल्या सूत्तात, 'पलोकधम्मं' म्हणजे नाश पावणारा स्वभाव असलेला. अशा प्रकारे येथे अनित्य लक्षणच सांगितले आहे. ၂. သုညတလောကသုတ္တဝဏ္ဏနာ २. सुञ्ञतलोकसुत्तवण्णना. ၈၅. ဒုတိယေ အတ္တနိယေနာတိ အတ္တနော သန္တကေန ပရိက္ခာရေန. ဧဝမေတ္ထ အနတ္တလက္ခဏမေဝ ကထိတံ. ८५. दुसऱ्या सूत्तात, 'अत्तनियेन' म्हणजे स्वतःच्या मालकीच्या परिष्काराने (साधनाने). अशा प्रकारे येथे अनात्म लक्षणच सांगितले आहे. ၃. သံခိတ္တဓမ္မသုတ္တဝဏ္ဏနာ ३. संखित्तधम्मसुत्तवण्णना. ၈၆. တတိယံ ခန္ဓိယဝဂ္ဂေ အာနန္ဒောဝါဒေ (သံ. နိ. ၃.၈၃) ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ८६. तिसरे सूत्त, खंधवग्गमधील 'आनन्दोवाद' सूत्तात (सं. नि. ३.८३) सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावे. ၄. ဆန္နသုတ္တဝဏ္ဏနာ ४. छन्नसुत्तवण्णना. ၈၇. စတုတ္ထေ [Pg.18] ဆန္နောတိ ဧဝံနာမကော ထေရော, န အဘိနိက္ခမနံ နိက္ခန္တထေရော. ပဋိသလ္လာနာတိ ဖလသမာပတ္တိတော. ဂိလာနပုစ္ဆကာတိ ဂိလာနုပဋ္ဌာကာ. ဂိလာနုပဋ္ဌာနံ နာမ ဗုဒ္ဓပသတ္ထံ ဗုဒ္ဓဝဏ္ဏိတံ, တသ္မာ ဧဝမာဟ. သီသဝေဌံ ဒဒေယျာတိ သီသေ ဝေဌနံ သီသဝေဌံ, တဉ္စ ဒဒေယျ. သတ္ထန္တိ ဇီဝိတဟာရကသတ္ထံ. နာဝကင်္ခါမီတိ န ဣစ္ဆာမိ. ပရိစိဏ္ဏောတိ ပရိစရိတော. မနာပေနာတိ မနဝဍ္ဎနကေန ကာယကမ္မာဒိနာ. ဧတ္ထ စ သတ္တ သေခါ ပရိစရန္တိ နာမ, အရဟာ ပရိစာရီ နာမ, ဘဂဝါ ပရိစိဏ္ဏော နာမ. ८७. चौथ्या सूत्तात, 'छन्नो' म्हणजे या नावाचे थेर; महाभिनिष्क्रमणात सोबत गेलेले छन्न थेर नव्हेत. 'पटिसल्लाना' म्हणजे फलसमापत्तीपासून. 'गिलाणपुच्छका' म्हणजे आजारी व्यक्तीची सेवा करणारे. आजारी व्यक्तीची सेवा करणे हे बुद्धांनी प्रशंसिलेले व वाखाणलेले आहे, म्हणून असे म्हटले आहे. 'सीसवेठं ददेय्य' म्हणजे डोक्याला वेढणे (बांधणे) ते 'सीसवेठ', आणि ते द्यावे. 'सत्थं' म्हणजे प्राण घेणारे शस्त्र. 'नावकङ्खामि' म्हणजे माझी इच्छा नाही. 'परिचिण्णो' म्हणजे सेवा केली. 'मनापेन' म्हणजे मनाला आनंद देणाऱ्या कायकर्मादींद्वारे. आणि येथे सात शैक्ष (सेख) हे सेवा करणारे आहेत, अर्हत हे सेवा करून झालेले आहेत, आणि भगवान हे सेवा स्वीकारलेले आहेत. ဧတဉှိ, အာဝုသော, သာဝကဿ ပတိရူပန္တိ, အာဝုသော, သာဝကဿ နာမ ဧတံ အနုစ္ဆဝိကံ. အနုပဝဇ္ဇန္တိ အပ္ပဝတ္တိကံ အပ္ပဋိသန္ဓိကံ. ပုစ္ဆာဝုသော သာရိပုတ္တ, သုတွာ ဝေဒိဿာမာတိ အယံ သာဝကပဝါရဏာ နာမ. ဧတံ မမာတိအာဒီနိ တဏှာမာနဒိဋ္ဌိဂ္ဂါဟဝသေန ဝုတ္တာနိ. နိရောဓံ ဒိသွာတိ ခယဝယံ ဉတွာ. နေတံ မမ, နေသောဟမသ္မိ, န မေသော အတ္တာတိ သမနုပဿာမီတိ အနိစ္စံ ဒုက္ခံ အနတ္တာတိ သမနုပဿာမိ. ဧတ္တကေသု ဌာနေသု ဆန္နတ္ထေရော သာရိပုတ္တတ္ထေရေန ပုစ္ဆိတံ ပဉှံ အရဟတ္တေ ပက္ခိပိတွာ ကထေသိ. သာရိပုတ္တတ္ထေရော ပန တဿ ပုထုဇ္ဇနဘာဝံ ဉတွာပိ တံ ‘‘ပုထုဇ္ဇနော’’တိ ဝါ ‘‘ခီဏာသဝေါ’’တိ ဝါ အဝတွာ တုဏှီယေဝ အဟောသိ. စုန္ဒတ္ထေရော ပနဿ ပုထုဇ္ဇနဘာဝံ သညာပေဿာမီတိ စိန္တေတွာ ဩဝါဒံ အဒါသိ. 'एतं हि आवुसो सावकस्स पतिरूपं' म्हणजे, हे आवुसो, श्रावकासाठी हे अनुरूप (योग्य) आहे. 'अनुपवज्जं' म्हणजे पुन्हा जन्म न देणारे, प्रतिसंधी न घडवणारे. 'पुच्छावुसो सारिपुत्त सुत्वा वेदिस्साम' हे श्रावकांचे आमंत्रण (पवारणा) होय. 'एतं मम' इत्यादी तृष्णा, मान आणि दृष्टी यांच्या ग्रहणामुळे (पकडीमुळे) म्हटले गेले आहे. 'निरोधं दिस्वा' म्हणजे क्षय आणि व्यय जाणून. 'नेतं मम, नेसोहमस्मि, न मेसो अत्ता' असे पाहतो म्हणजे अनित्य, दुःख आणि अनात्म असे पाहतो. या सर्व ठिकाणी छन्न थेरांनी सारिपुत्त थेरांनी विचारलेल्या प्रत्येक प्रश्नाचे उत्तर अर्हत्त्वाच्या भूमिकेतून दिले. परंतु सारिपुत्त थेरांनी त्यांचे पृथग्जनत्व (पुथुज्जनपण) जाणूनही त्यांना 'तू पृथग्जन आहेस' किंवा 'तू क्षीणासव (अर्हत) आहेस' असे न म्हणता केवळ मौन बाळगले. परंतु चुन्द थेरांनी त्यांना त्यांच्या पृथग्जनत्वाची जाणीव करून द्यावी असा विचार करून उपदेश केला. တတ္ထ တသ္မာတိ ယသ္မာ မာရဏန္တိကံ ဝေဒနံ အဓိဝါသေတုံ အသက္ကောန္တော သတ္ထံ အာဟရာမီတိ ဝဒတိ, တသ္မာ ပုထုဇ္ဇနော အာယသ္မာ, တေန ဣဒမ္ပိ မနသိကရောဟီတိ ဒီပေတိ. ယသ္မာ ဝါ ဆန္နံ အာယတနာနံ နိရောဓံ ဒိသွာ စက္ခာဒီနိ တိဏ္ဏံ ဂါဟာနံ ဝသေန န သမနုပဿာမီတိ ဝဒသိ. တသ္မာ ဣဒမ္ပိ တဿ ဘဂဝတော သာသနံ အာယသ္မတာ မနသိကာတဗ္ဗန္တိပိ ပုထုဇ္ဇနဘာဝမေဝ ဒီပေန္တော ဝဒတိ. နိစ္စကပ္ပန္တိ နိစ္စကာလံ. နိဿိတဿာတိ တဏှာမာနဒိဋ္ဌီဟိ နိဿိတဿ. စလိတန္တိ ဝိပ္ဖန္ဒိတံ ဟောတိ. ယထယိဒံ အာယသ္မတော ဥပ္ပန္နံ ဝေဒနံ အဓိဝါသေတုံ အသက္ကောန္တဿ ‘‘အဟံ ဝေဒယာမိ, မမ ဝေဒနာ’’တိ အပ္ပဟီနဂ္ဂါဟဿ ဣဒါနိ ဝိပ္ဖန္ဒိတံ ဟောတိ, ဣမိနာပိ နံ ‘‘ပုထုဇ္ဇနောဝ တွ’’န္တိ ဝဒတိ. तेथे 'तस्मा' (त्यामुळे) म्हणजे: ज्याअर्थी मरणान्तिक वेदना सहन करण्यास असमर्थ असल्याने 'मी शस्त्र घेत आहे' असे आयुष्यमान म्हणतात, त्याअर्थी आयुष्यमान हे पृथग्जन आहेत; म्हणून 'याचाही मनात विचार करा' असे ते दर्शवितात. किंवा ज्याअर्थी 'सहा आयतनांचा निरोध पाहून मी चक्षू इत्यादींना तीन ग्रहणांच्या (तृष्णा, मान, दृष्टी) वशाने पाहत नाही' असे आपण म्हणता, त्याअर्थी 'भगवंतांच्या या उपदेशाचेही आयुष्यमानांनी मनन केले पाहिजे' असे सांगून ते त्यांचे पृथग्जनत्वच दर्शवत आहेत. 'निच्चकप्पं' म्हणजे नेहमी (सर्वकाळ). 'निस्सितस्स' म्हणजे तृष्णा, मान आणि दृष्टी यांचा आश्रय घेतलेल्याचे. 'चलितं' म्हणजे कंपित (चंचल) होणे. ज्याप्रमाणे उत्पन्न झालेली वेदना सहन करण्यास असमर्थ असलेल्या आणि 'मी अनुभवत आहे, ही माझी वेदना आहे' अशी पकड (ग्रहण) न सुटलेल्या आयुष्यमानांचे हे जे कंपन (चंचलता) होत आहे, यावरूनही ते त्यांना 'तू पृथग्जनच आहेस' असे म्हणतात. ပဿဒ္ဓီတိ [Pg.19] ကာယစိတ္တပဿဒ္ဓိ, ကိလေသပဿဒ္ဓိ နာမ ဟောတီတိ အတ္ထော. နတိယာတိ တဏှာနတိယာ. အသတီတိ ဘဝတ္ထာယ အာလယနိကန္တိပရိယုဋ္ဌာနေ အသတိ. အာဂတိဂတိ န ဟောတီတိ ပဋိသန္ဓိဝသေန အာဂတိ နာမ, စုတိဝသေန ဂမနံ နာမ န ဟောတိ. စုတူပပါတောတိ စဝနဝသေန စုတိ, ဥပပဇ္ဇနဝသေန ဥပပါတော. နေဝိဓ န ဟုရံ န ဥဘယမန္တရေနာတိ န ဣဓလောကေ န ပရလောကေ န ဥဘယတ္ထ ဟောတိ. ဧသေဝန္တော ဒုက္ခဿာတိ ဝဋ္ဋဒုက္ခကိလေသဒုက္ခဿ အယမေဝ အန္တော အယံ ပရိစ္ဆေဒေါ ပရိဝဋုမဘာဝေါ ဟောတိ. အယမေဝ ဟိ ဧတ္ထ အတ္ထော. ယေ ပန ‘‘ဥဘယမန္တရေနာ’’တိ ဝစနံ ဂဟေတွာ အန္တရာဘဝံ ဣစ္ဆန္တိ, တေသံ ဝစနံ နိရတ္ထကံ. အန္တရာဘဝဿ ဟိ ဘာဝေါ အဘိဓမ္မေ ပဋိက္ခိတ္တောယေဝ. ‘‘အန္တရေနာ’’တိ ဝစနံ ပန ဝိကပ္ပန္တရဒီပနံ. တသ္မာ အယမေတ္ထ အတ္ထော – နေဝ ဣဓ န ဟုရံ, အပရော ဝိကပ္ပော န ဥဘယန္တိ. 'प्रश्रब्धी' (पस्सद्धि) म्हणजे कायप्रश्रब्धी आणि चित्तप्रश्रब्धी, म्हणजेच क्लेशांचे शांत होणे असा अर्थ आहे. 'नति' म्हणजे तृष्णेचे झुकणे. 'असति' म्हणजे नवीन भवासाठी आसक्ती, निकान्ती (इच्छा) आणि पर्युत्थान नसताना. 'आगतिगति न होति' म्हणजे प्रतिसंधीच्या रूपाने येणे म्हणजे 'आगती', आणि च्युतीच्या रूपाने जाणे म्हणजे 'गती', हे दोन्ही होत नाही. 'चुतूपपातो' म्हणजे च्युत होण्याच्या रूपाने च्युती, आणि उत्पन्न होण्याच्या रूपाने उपपात. 'नेविध न हुरं न उभयमन्तरेन' म्हणजे या लोकात नाही, परलोकात नाही आणि दोन्हीच्या मध्येही नाही. 'एसेवन्तो दुक्खस्स' म्हणजे संसारदुःख आणि क्लेशदुःखाचा हाच अंत, हीच मर्यादा आणि संसारचक्राचा (वट्टाचा) अभाव होय. हाच येथे खरा अर्थ आहे. परंतु जे 'उभयमन्तरेन' हा शब्द घेऊन 'अंतराभव' (मध्यवर्ती अस्तित्व) मानतात, त्यांचे म्हणणे निरर्थक आहे. कारण अंतराभवाचे अस्तित्व अभिधम्मात नाकारलेच गेले आहे. 'अन्तरेन' हा शब्द केवळ दुसऱ्या पर्यायाचे (विकल्पाचे) सूचक आहे. म्हणून येथे हाच अर्थ आहे - या लोकात नाही, परलोकात नाही, आणि दुसरा पर्याय म्हणजे दोन्हीमध्येही नाही. သတ္ထံ အာဟရေသီတိ ဇီဝိတဟာရကသတ္ထံ အာဟရိ, အာဟရိတွာ ကဏ္ဌနာဠံ ဆိန္ဒိ. အထဿ တသ္မိံ ခဏေ မရဏဘယံ ဩက္ကမိ, ဂတိနိမိတ္တံ ဥပဋ္ဌာသိ. သော အတ္တနော ပုထုဇ္ဇနဘာဝံ ဉတွာ, သံဝိဂ္ဂစိတ္တော ဝိပဿနံ ပဋ္ဌပေတွာ, သင်္ခါရေ ပရိဂ္ဂဏှန္တော အရဟတ္တံ ပတွာ, သမသီသီ ဟုတွာ ပရိနိဗ္ဗုတော. သမ္မုခါယေဝ အနုပဝဇ္ဇတာ ဗျာကတာတိ ကိဉ္စာပိ ဣဒံ ထေရဿ ပုထုဇ္ဇနကာလေ ဗျာကရဏံ ဟောတိ; ဧတေန ပန ဗျာကရဏေန အနန္တရာယမဿ ပရိနိဗ္ဗာနံ အဟောသိ. တသ္မာ ဘဂဝါ တဒေဝ ဗျာကရဏံ ဂဟေတွာ ကထေသိ. 'सत्थं आहरेसि' म्हणजे प्राण घेणारे शस्त्र घेतले आणि त्याने गळ्याची नळी कापली. तेव्हा त्यांना त्या क्षणी मरणभय उत्पन्न झाले आणि गतीनिमित्त समोर आले. त्यांनी स्वतःचे पृथग्जनत्व जाणून, संविग्नचित्त होऊन विपश्यना सुरू केली, संस्कारांचे ग्रहण करत अर्हत्त्व प्राप्त केले आणि 'समसीसी' होऊन परिनिर्वाण प्राप्त केले. 'सम्मुखा येव अनुपवज्जता ब्याकता' म्हणजे: जरी ही थेरांच्या पृथग्जन काळात केलेली घोषणा होती, तरीही या घोषणेमुळे त्यांचे परिनिर्वाण कोणत्याही अडथळ्याशिवाय झाले. म्हणून भगवंतांनी तीच घोषणा गृहीत धरून उपदेश केला. ဥပဝဇ္ဇကုလာနီတိ ဥပသင်္ကမိတဗ္ဗကုလာနိ. ဣမိနာ ထေရော, ‘‘ဘန္တေ, ဧဝံ ဥပဋ္ဌာကေသု စ ဥပဋ္ဌာယိကာသု စ ဝိဇ္ဇမာနာသု သော ဘိက္ခု တုမှာကံ သာသနေ ပရိနိဗ္ဗာယိဿတီ’’တိ ပုဗ္ဗဘာဂပဋိပတ္တိယံ ကုလသံသဂ္ဂဒေါသံ ဒဿေန္တော ပုစ္ဆတိ. အထဿ ဘဂဝါ ကုလေသု သံသဂ္ဂါဘာဝံ ဒီပေန္တော ဟောန္တိ ဟေတေ သာရိပုတ္တာတိအာဒိမာဟ. ဣမသ္မိံ ကိရ ဌာနေ ထေရဿ ကုလေသု အသံသဋ္ဌဘာဝေါ ပါကဋော အဟောသိ. သေသံ သဗ္ဗတ္ထ ဥတ္တာနမေဝ. 'उपवज्जकुलानि' म्हणजे ज्यांच्याकडे जाणे योग्य आहे अशी कुटुंबे. याने थेर, 'भंते, अशा प्रकारे उपासक आणि उपासिका (सेवक आणि सेविका) असताना तो भिक्खू आपल्या शासनात कसा परिनिर्वाण पावेल?' असे विचारून पूर्वभागाच्या प्रतिपत्तीमध्ये (साधनेच्या सुरुवातीच्या टप्प्यात) कुलांशी संसर्गाचा दोष दर्शवत विचारतात. त्यावर भगवंतांनी त्यांचे कुलांशी संसर्ग नसणे दर्शवत 'होन्ति हेते सारिपुत्त' इत्यादी म्हटले. या प्रसंगी थेरांचे कुलांशी अलिप्त राहणे (असंसर्ग) स्पष्ट झाले. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. ၅-၆. ပုဏ္ဏသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ५-६. पुण्णसुत्त इत्यादींचे वर्णन. ၈၈-၈၉. ပဉ္စမေ တဉ္စေတိ တံ စက္ခုဉ္စေဝ ရူပဉ္စ. နန္ဒိသမုဒယာ ဒုက္ခသမုဒယောတိ တဏှာယ သမောဓာနေန ပဉ္စက္ခန္ဓဒုက္ခဿ သမောဓာနံ ဟောတိ. ဣတိ [Pg.20] ဆသု ဒွါရေသု ‘‘နန္ဒိသမုဒယာ ဒုက္ခသမုဒယော’’တိ ဣမိနာ ဒွိန္နံ သစ္စာနံ ဝသေန ဝဋ္ဋံ မတ္ထကံ ပါပေတွာ ဒဿေသိ. ဒုတိယနယေ နိရောဓော မဂ္ဂေါတိ ဒွိန္နံ သစ္စာနံ ဝသေန ဝိဝဋ္ဋံ မတ္ထကံ ပါပေတွာ ဒဿေသိ. ဣမိနာ တွံ ပုဏ္ဏာတိ ပါဋိယေက္ကော အနုသန္ဓိ. ဧဝံ တာဝ ဝဋ္ဋဝိဝဋ္ဋဝသေန ဒေသနံ အရဟတ္တေ ပက္ခိပိတွာ ဣဒါနိ ပုဏ္ဏတ္ထေရံ သတ္တသု ဌာနေသု သီဟနာဒံ နဒါပေတုံ ဣမိနာ တွန္တိအာဒိမာဟ. ८८-८९. पाचव्या सूत्तात, 'तंचे' म्हणजे ते चक्षू आणि ते रूप. 'नन्दिसमुदया दुक्खसमुदयो' म्हणजे तृष्णेच्या संयोगाने पंचस्कंधरूप दुःखाचा संयोग होतो. अशा प्रकारे सहा द्वारांमध्ये 'नंदीसमुदया दुःखसमुदयो' याद्वारे दोन सत्यांच्या (दुःख आणि समुदय) वशाने संसाराला (वट्टाला) शिखरावर पोहोचवून दर्शविले आहे. दुसऱ्या पद्धतीमध्ये निरोध आणि मार्ग या दोन सत्यांच्या वशाने विवट्टाला (संसारमुक्तीला) शिखरावर पोहोचवून दर्शविले आहे. 'इमिना त्वं पुण्ण' हा एक स्वतंत्र अनुसंधी (संबंध) आहे. अशा प्रकारे प्रथम वट्ट आणि विवट्टाच्या वशाने देशनेला अर्हत्त्वात समाविष्ट करून, आता पुण्ण थेरांना सात ठिकाणी सिंहनाद करण्यासाठी 'इमिना त्वं' इत्यादी म्हटले आहे. စဏ္ဍာတိ ဒုဋ္ဌာ ကိဗ္ဗိသာ. ဖရုသာတိ ကက္ခဠာ အက္ကောသိဿန္တီတိ ဒသဟိ အက္ကောသဝတ္ထူဟိ အက္ကောသိဿန္တိ. ပရိဘာသိဿန္တီတိ ‘‘ကိံ သမဏော နာမ တွံ, ဣဒဉ္စိဒဉ္စ တေ ကရိဿာမာ’’တိ တဇ္ဇေဿန္တိ. ဧဝမေတ္ထာတိ ဧဝံ မယှံ ဧတ္ထ ဘဝိဿတိ. ဒဏ္ဍေနာတိ စတုဟတ္ထဒဏ္ဍေန ဝါ ခဒိရဒဏ္ဍေန ဝါ ဃဋိကမုဂ္ဂရေန ဝါ. သတ္ထေနာတိ ဧကတောဓာရာဒိနာ သတ္ထေန. သတ္ထဟာရကံ ပရိယေသန္တီတိ ဇီဝိတဟာရကသတ္ထံ ပရိယေသန္တိ. ဣဒံ ထေရော တတိယပါရာဇိကဝတ္ထုသ္မိံ အသုဘကထံ သုတွာ အတ္တဘာဝေန ဇိဂုစ္ဆန္တာနံ ဘိက္ခူနံ သတ္ထဟာရကပရိယေသနံ သန္ဓာယာဟ. ဒမူပသမေနာတိ ဧတ္ထ ဒမောတိ ဣန္ဒြိယသံဝရာဒီနံ ဧတံ နာမံ. 'चण्डा' म्हणजे दुष्ट, पापी. 'फरुसा' म्हणजे कठोर (क्रूर). 'अक्कोसिस्सन्ति' म्हणजे दहा आक्रोशाच्या (शिवीगाळीच्या) कारणांनी शिवीगाळ करतील. 'परिभासिस्सन्ति' म्हणजे 'तू कसला श्रमण आहेस? आम्ही तुला हे आणि हे करू' असे धमकावतील. 'एवमेत्थ' म्हणजे माझ्या मनात येथे असा विचार येईल. 'दण्डेन' म्हणजे चार हात लांबीच्या काठीने किंवा खैराच्या लाकडाच्या काठीने किंवा मुद्गराने (धोपटण्याने). 'सत्थेन' म्हणजे एका बाजूला धार असलेल्या इत्यादी शस्त्राने. 'सत्थहारकं परियेसन्ति' म्हणजे प्राण घेणारे शस्त्र शोधतात. हे थेरांनी तिसऱ्या पाराजिकाच्या प्रसंगात अशुभाची कथा ऐकून स्वतःच्या शरीराचा कंटाळा आलेल्या भिक्खूंच्या प्राण घेणारे शस्त्र शोधण्याच्या संदर्भाने म्हटले आहे. 'दमूपसमेन' यामध्ये 'दम' हे इंद्रियसंयम इत्यादींचे नाव आहे. ‘‘သစ္စေန ဒန္တော ဒမသာ ဥပေတော,ဝေဒန္တဂူ ဝုသိတဗြဟ္မစရိယော’’တိ. (သံ. နိ. ၁.၁၉၅; သု. နိ. ၄၆၇) – “सत्याने दमन केलेला, इंद्रिय संयमाने युक्त, वेदांतगू (निर्वाणरूपी अंताप्रत पोहोचलेला) आणि ब्रह्मचर्य पूर्ण केलेला.” ဧတ္ထ ဟိ ဣန္ဒြိယသံဝရော ဒမောတိ ဝုတ္တော. ‘‘ယဒိ သစ္စာ ဒမာ စာဂါ, ခန္တျာ ဘိယျောဓ ဝိဇ္ဇတီ’’တိ (သု. နိ. ၁၉၁; သံ. နိ. ၁.၂၄၆) ဧတ္ထ ပညာ ဒမောတိ ဝုတ္တာ. ‘‘ဒါနေန ဒမေန သံယမေန သစ္စဝဇ္ဇေနာ’’တိ (ဒီ. နိ. ၁.၁၆၅; မ. နိ. ၂.၂၂၆) ဧတ္ထ ဥပေါသထကမ္မံ ဒမောတိ ဝုတ္တံ. ဣမသ္မိံ ပန သုတ္တေ ခန္တိ ဒမောတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. ဥပသမောတိ တဿေဝ ဝေဝစနံ. येथे 'दम' म्हणजे इंद्रियसंयम (इंद्रियसंवर) असे म्हटले आहे. 'जर या जगात सत्य, दम (प्रज्ञा), त्याग आणि क्षमा यापेक्षा श्रेष्ठ काही असेल तर...' या गाथेत प्रज्ञेला 'दम' म्हटले आहे. 'दानाने, दमाने (उपोसथ कर्माने), संयमाने आणि सत्यवचनाने...' येथे उपोसथ कर्माला 'दम' म्हटले आहे. परंतु या सूत्तात 'दम' म्हणजे 'क्षमा' (खन्ति) असे जाणावे. 'उपशम' हा त्याचाच समानार्थी शब्द आहे. အထ ခေါ အာယသ္မာ ပုဏ္ဏောတိ ကော ပနေသ ပုဏ္ဏော, ကသ္မာ စ ပနေတ္ထ ဂန္တုကာမော အဟောသီတိ? သုနာပရန္တဝါသိကော ဧဝ ဧသ, သာဝတ္ထိယံ ပန အသပ္ပာယဝိဟာရံ သလ္လက္ခေတွာ တတ္ထ ဂန္တုကာမော အဟောသိ. आता 'आयुष्यमान पुण्ण' या संदर्भात—हे पुण्ण कोण आहेत आणि ते येथे (सुनापरंत जनपदात) का जाऊ इच्छित होते? ते सुनापरंतचेच रहिवासी होते, परंतु सावत्थीमधील विहार अनुकूल (असुखकर) नसल्याचे पाहून ते तेथे (सुनापरंत येथे) जाऊ इच्छित होते. တတြာယံ [Pg.21] အနုပ္ပုဗ္ဗိကထာ – သုနာပရန္တရဋ္ဌေ ကိရ ဧကသ္မိံ ဝါဏိဇဂါမေ ဧတေ ဒွေ ဘာတရော. တေသု ကဒါစိ ဇေဋ္ဌော ပဉ္စ သကဋသတာနိ ဂဟေတွာ ဇနပဒံ ဂန္တွာ ဘဏ္ဍံ အာဟရတိ, ကဒါစိ ကနိဋ္ဌော. ဣမသ္မိံ ပန သမယေ ကနိဋ္ဌံ ဃရေ ဌပေတွာ, ဇေဋ္ဌဘာတိကော ပဉ္စ သကဋသတာနိ ဂဟေတွာ, ဇနပဒစာရိကံ စရန္တော အနုပုဗ္ဗေန သာဝတ္ထိံ ပတွာ, ဇေတဝနဿ နာတိဒူရေ သကဋသတ္ထံ နိဝေသေတွာ ဘုတ္တပါတရာသော ပရိဇနပရိဝုတော ဖာသုကဋ္ဌာနေ နိသီဒိ. त्याविषयीची ही अनुक्रमिक कथा (अनुपुब्बिकथा) आहे—असे ऐकिवात आहे की सुनापरंत देशातील एका व्यापारी गावात हे दोन भाऊ राहत होते. त्यांच्यापैकी कधी मोठा भाऊ पाचशे गाड्या घेऊन जनपदात जाऊन माल आणत असे, तर कधी लहान भाऊ. परंतु या वेळी लहान भावाला घरी ठेवून, मोठ्या भावाने पाचशे गाड्या घेतल्या आणि जनपदात प्रवास करत करत तो सावत्थीला पोहोचला. जेतवनापासून फार दूर नसलेल्या ठिकाणी गाड्यांचा ताफा थांबवून, सकाळचे भोजन केल्यावर तो आपल्या सेवकांसह एका सुखकर ठिकाणी बसला. တေန စ သမယေန သာဝတ္ထိဝါသိနော ဘုတ္တပါတရာသာ ဥပေါသထင်္ဂါနိ အဓိဋ္ဌာယ သုဒ္ဓုတ္တရာသင်္ဂါ ဂန္ဓပုပ္ဖာဒိဟတ္ထာ ယေန ဗုဒ္ဓေါ, ယေန ဓမ္မော, ယေန သံဃော, တန္နိန္နာ တပ္ပောဏာ တပ္ပဗ္ဘာရာ ဟုတွာ, ဒက္ခိဏဒွါရေန နိက္ခမိတွာ ဇေတဝနံ ဂစ္ဆန္တိ. သော တေ ဒိသွာ ‘‘ကဟံ ဣမေ ဂစ္ဆန္တီ’’တိ ဧကံ မနုဿံ ပုစ္ဆိ. ကိံ တွံ, အယျော, န ဇာနာသိ? လောကေ ဗုဒ္ဓဓမ္မသံဃရတနာနိ နာမ ဥပ္ပန္နာနိ, ဣစ္စေသော မဟာဇနော သတ္ထု သန္တိကံ ဓမ္မကထံ သောတုံ ဂစ္ဆတီတိ. တဿ ‘‘ဗုဒ္ဓေါ’’တိ ဝစနံ ဆဝိစမ္မာဒီနိ ဆိန္ဒိတွာ အဋ္ဌိမိဉ္ဇံ အာဟစ္စ အဋ္ဌာသိ. သော အတ္တနော ပရိဇနပရိဝုတော တာယ ပရိသာယ သဒ္ဓိံ ဝိဟာရံ ဂန္တွာ, သတ္ထု မဓုရဿရေန ဓမ္မံ ဒေသေန္တဿ ပရိသပရိယန္တေ ဌိတော, ဓမ္မံ သုတွာ ပဗ္ဗဇ္ဇာယ စိတ္တံ ဥပ္ပာဒေသိ. အထ တထာဂတေန ကာလံ ဝိဒိတွာ ပရိသာယ ဥယျောဇိတာယ သတ္ထာရံ ဥပသင်္ကမိတွာ, ဝန္ဒိတွာ, သွာတနာယ နိမန္တေတွာ, ဒုတိယဒိဝသေ မဏ္ဍပံ ကာရေတွာ, အာသနာနိ ပညာပေတွာ, ဗုဒ္ဓပ္ပမုခဿ သံဃဿ မဟာဒါနံ ဒတွာ, ဘုတ္တပါတရာသော ဥပေါသထင်္ဂါနိ အဓိဋ္ဌာယ ဘဏ္ဍာဂါရိကံ ပက္ကောသာပေတွာ, ‘‘ဧတ္တကံ ဓနံ ဝိဿဇ္ဇိတံ, ဧတ္တကံ ဓနံ န ဝိဿဇ္ဇိတ’’န္တိ သဗ္ဗံ အာစိက္ခိတွာ, ‘‘ဣမံ သာပတေယျံ မယှံ ကနိဋ္ဌဿ ဒေဟီ’’တိ သဗ္ဗံ နိယျာတေတွာ, သတ္ထု သန္တိကေ ပဗ္ဗဇိတွာ, ကမ္မဋ္ဌာနပရာယဏော အဟောသိ. त्याच वेळी सावत्थीचे रहिवासी सकाळचे भोजन करून, उपोसथ अंगांचे अधिष्ठान करून, स्वच्छ उत्तरासंग (खांद्यावरील वस्त्र) परिधान करून आणि हातात गंध-पुष्प इत्यादी घेऊन, जेथे बुद्ध आहेत, जेथे धम्म आहे, जेथे संघ आहे, त्याकडेच प्रवृत्त, झुकलेले व उन्मुख होऊन, दक्षिण दाराने बाहेर पडून जेतवनाकडे जात होते. त्याने त्यांना पाहून एका माणसाला विचारले, 'हे लोक कोठे जात आहेत?' 'हे आर्य, तुम्हाला माहीत नाही का? जगात बुद्ध, धम्म आणि संघ नावाचे रत्न उत्पन्न झाले आहेत. म्हणूनच हा जनसमुदाय शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) सन्निध धम्मप्रवचन ऐकण्यासाठी जात आहे.' त्याच्यासाठी 'बुद्ध' हा शब्द त्वचा, चर्म इत्यादी भेदून थेट हाडांच्या मज्जेपर्यंत जाऊन भिडला. तो आपल्या सेवकांसह त्या जनसमुदायासोबत विहारात गेला. शास्त्यांच्या मधुर स्वरातील धम्मदेशना ऐकत तो समुदायाच्या एका कोपऱ्यात उभा राहिला. धम्म ऐकून त्याच्या मनात प्रव्रज्या घेण्याचा विचार आला. त्यानंतर तथागतांनी वेळ ओळखून समुदायाला निरोप दिल्यावर, त्याने शास्त्यांजवळ जाऊन, त्यांना वंदन केले आणि दुसऱ्या दिवशीच्या भोजनासाठी आमंत्रित केले. दुसऱ्या दिवशी त्याने मंडप उभारून, आसने मांडून, बुद्धप्रमुख संघाला महादान दिले. सकाळचे भोजन झाल्यावर त्याने उपोसथ अंगांचे अधिष्ठान केले आणि आपल्या खजिनदाराला बोलावून, 'एवढी संपत्ती खर्च झाली आहे आणि एवढी संपत्ती खर्च झालेली नाही' असे सर्व काही सांगितले. 'ही सर्व संपत्ती माझ्या लहान भावाला दे' असे सांगून सर्व काही सुपूर्द केले आणि शास्त्यांच्या सन्निध प्रव्रज्या घेऊन तो कर्मस्थानपरायण (विपश्यना साधनेत मग्न) झाला. အထဿ ကမ္မဋ္ဌာနံ မနသိကရောန္တဿ ကမ္မဋ္ဌာနံ န ဥပဋ္ဌာတိ. တတော စိန္တေသိ – ‘‘အယံ ဇနပဒေါ မယှံ အသပ္ပာယော, ယံနူနာဟံ သတ္ထု သန္တိကေ ကမ္မဋ္ဌာနံ ဂဟေတွာ သကရဋ္ဌမေဝ ဂစ္ဆေယျ’’န္တိ. အထ ပုဗ္ဗဏှသမယေ ပိဏ္ဍာယ စရိတွာ, သာယနှေ ပဋိသလ္လာနာ ဝုဋ္ဌဟိတွာ, ဘဂဝန္တံ ဥပသင်္ကမိတွာ, ကမ္မဋ္ဌာနံ ကထာပေတွာ, သတ္တ သီဟနာဒေ နဒိတွာ, ပက္ကာမိ. တေန ဝုတ္တံ, ‘‘အထ ခေါ အာယသ္မာ ပုဏ္ဏော…ပေ… ဝိဟရတီ’’တိ. त्यानंतर, कर्मस्थानाचे (साधनेचे) मनन करत असतानाही त्याला कर्मस्थान स्पष्ट होत नव्हते (साधनेत प्रगती जाणवत नव्हती). तेव्हा त्याने विचार केला—'हा जनपद माझ्यासाठी अनुकूल नाही. मी शास्त्यांच्या सन्निध कर्मस्थान ग्रहण करून माझ्या स्वतःच्याच देशात (सुनापरंत येथे) का जाऊ नये?' मग सकाळी पिंडपातासाठी फिरून, संध्याकाळी ध्यानातून उठून तो भगवंतांकडे गेला, कर्मस्थानाविषयी विचारले (उपदेश घेतला), सात सिंहनाद केले आणि तेथून निघाला. म्हणूनच म्हटले आहे—'त्यानंतर आयुष्यमान पुण्ण... पे... विहार करू लागले.' ကတ္ထ [Pg.22] ပနာယံ ဝိဟာသီတိ? စတူသု ဌာနေသု ဝိဟာသိ. သုနာပရန္တရဋ္ဌံ တာဝ ပဝိသိတွာ စ အဗ္ဗုဟတ္ထပဗ္ဗတံ နာမ ပတွာ ဝါဏိဇဂါမံ ပိဏ္ဍာယ ပါဝိသိ. အထ နံ ကနိဋ္ဌဘာတာ သဉ္ဇာနိတွာ ဘိက္ခံ ဒတွာ, ‘‘ဘန္တေ, အညတ္ထ အဂန္တွာ ဣဓေဝ ဝသထာ’’တိ ပဋိညံ ကာရေတွာ တတ္ထေဝ ဝသာပေသိ. परंतु ते कोठे राहिले? ते चार ठिकाणी राहिले. प्रथम सुनापरंत देशात प्रवेश करून आणि 'अब्बुहत्थ' नावाच्या पर्वतावर पोहोचून ते पिंडपातासाठी व्यापारी गावात गेले. तेव्हा त्यांच्या लहान भावाने त्यांना ओळखले आणि भिक्षा देऊन, 'भंते, इतर कोठेही न जाता येथेच राहावे' असे वचन घेऊन त्यांना तेथेच राहण्यास सांगितले. တတော သမုဒ္ဒဂိရိဝိဟာရံ နာမ အဂမာသိ. တတ္ထ အယကန္တပါသာဏေဟိ ပရိစ္ဆိန္ဒိတွာ ကတစင်္ကမော အတ္ထိ, ကောစိ တံ စင်္ကမိတုံ သမတ္ထော နာမ နတ္ထိ. တတ္ထ သမုဒ္ဒဝီစိယော အာဂန္တွာ အယကန္တပါသာဏေသု ပဟရိတွာ မဟာသဒ္ဒံ ကရောန္တိ. ထေရော ‘‘ကမ္မဋ္ဌာနံ မနသိကရောန္တာနံ ဖာသုဝိဟာရော ဟောတူ’’တိ သမုဒ္ဒံ နိဿဒ္ဒံ ကတွာ အဓိဋ္ဌာသိ. तेथून ते 'समुद्रगिरी विहार' नावाच्या ठिकाणी गेले. तेथे लोहचुंबकासारख्या कठीण दगडांनी (अयकांत पाषाण) वेढलेला एक चंक्रमण मार्ग (चंकम) होता, ज्यावर चंक्रमण करण्यास कोणीही समर्थ नव्हते. तेथे समुद्राच्या लाटा येऊन त्या दगडांवर आदळत आणि मोठा आवाज करत असत. स्थविरांनी 'कर्मस्थानाचे मनन करणाऱ्या भिक्खूंना सुखकर विहार मिळावा' असा विचार करून समुद्राला शांत (निशब्द) करण्याचा संकल्प (अधिष्ठान) केला. တတော မာတုလဂိရိံ နာမ အဂမာသိ. တတ္ထပိ သကုဏသံဃော ဥဿန္နော ရတ္တိဉ္စ ဒိဝါ စ သဒ္ဒေါ ဧကာဗဒ္ဓေါဝ အဟောသိ. ထေရော ‘‘ဣဒံ ဌာနံ န ဖာသုက’’န္တိ တတော မကုလကာရာမဝိဟာရံ နာမ ဂတော. သော ဝါဏိဇဂါမဿ နာတိဒူရော နစ္စာသန္နော ဂမနာဂမနသမ္ပန္နော ဝိဝိတ္တော အပ္ပသဒ္ဒေါ. ထေရော ‘‘ဣမံ ဌာနံ ဖာသုက’’န္တိ တတ္ထ ရတ္တိဋ္ဌာနဒိဝါဋ္ဌာနစင်္ကမနာဒီနိ ကာရေတွာ ဝဿံ ဥပဂစ္ဆိ. ဧဝံ စတူသု ဌာနေသု ဝိဟာသိ. तेथून ते 'मातुलगिरी' नावाच्या ठिकाणी गेले. तेथेही पक्ष्यांचा थवा खूप मोठा होता आणि रात्री-दिवस त्यांचा सतत कलकलाट सुरू असे. स्थविरांनी विचार केला, 'हे स्थान सुखकर नाही,' आणि तेथून ते 'मकुलकाराम विहार' नावाच्या ठिकाणी गेले. तो विहार व्यापारी गावापासून फार दूरही नव्हता आणि अतिशय जवळही नव्हता, येण्या-जाण्यासाठी सोयीचा, एकांत आणि शांत होता. स्थविरांनी 'हे स्थान सुखकर आहे' असा विचार करून तेथे रात्री राहण्याची जागा, दिवसा राहण्याची जागा आणि चंक्रमण मार्ग इत्यादी तयार करून घेतले आणि वर्षावास घालवला. अशा प्रकारे ते चार ठिकाणी राहिले. အထေကဒိဝသံ တသ္မိံယေဝ အန္တောဝဿေ ပဉ္စ ဝါဏိဇသတာနိ ‘‘ပရသမုဒ္ဒံ ဂစ္ဆာမာ’’တိ နာဝါယ ဘဏ္ဍံ ပက္ခိပိံသု. နာဝါရောဟနဒိဝသေ ထေရဿ ကနိဋ္ဌဘာတာ ထေရံ ဘောဇေတွာ, ထေရဿ သန္တိကေ သိက္ခာပဒါနိ ဂဟေတွာ, ဝန္ဒိတွာ, ‘‘ဘန္တေ, သမုဒ္ဒေါ နာမ အသဒ္ဓေယျော အနေကန္တရာယော, အမှေ အာဝဇ္ဇေယျာထာ’’တိ ဝတွာ နာဝံ အာရုဟိ. နာဝါ ဥတ္တမဇဝေန ဂစ္ဆမာနာ အညတရံ ဒီပကံ ပါပုဏိ. မနုဿာ ‘‘ပါတရာသံ ကရိဿာမာ’’တိ ဒီပကေ ဥတ္တိဏ္ဏာ. တသ္မိံ ပန ဒီပကေ အညံ ကိဉ္စိ နတ္ထိ, စန္ဒနဝနမေဝ အဟောသိ. त्यानंतर एका दिवशी, त्याच वर्षावासाच्या दरम्यान, पाचशे व्यापाऱ्यांनी 'परसमुद्रात (समुद्रापलीकडे) जाऊ या' असे ठरवून जहाजावर माल चढवला. जहाजावर चढण्याच्या दिवशी स्थविरांच्या लहान भावाने स्थविरांना भोजन दिले, त्यांच्याकडून पंचशील (सिक्खापदे) ग्रहण केले, त्यांना वंदन केले आणि म्हणाला, 'भंते, समुद्र हा अविश्वसनीय आणि अनेक संकटांनी युक्त असतो, कृपया आमचे स्मरण ठेवावे (आमच्यावर लक्ष ठेवावे).' असे सांगून तो जहाजावर चढला. जहाज अत्यंत वेगाने जात असताना एका बेटावर पोहोचले. लोक 'सकाळचे भोजन करू या' असे म्हणून बेटावर उतरले. परंतु त्या बेटावर चंदनाच्या वनाशिवाय दुसरे काहीही नव्हते. အထေကော ဝါသိယာ ရုက္ခံ အာကောဋေတွာ လောဟိတစန္ဒနဘာဝံ ဉတွာ အာဟ – ‘‘ဘော, မယံ လာဘတ္ထာယ ပရသမုဒ္ဒံ ဂစ္ဆာမ, ဣတော စ ဥတ္တရိ လာဘော နာမ နတ္ထိ, စတုရင်္ဂုလမတ္တာ ဃဋိကာ သတသဟဿံ အဂ္ဃတိ. ဟာရေတဗ္ဗယုတ္တကံ ဘဏ္ဍံ ဟာရေတွာ စန္ဒနဿ ပူရေဿာမာ’’တိ တေ တထာ ကရိံသု[Pg.23]. စန္ဒနဝနေ အဓိဝတ္ထာ အမနုဿာ ကုဇ္ဈိတွာ, ‘‘ဣမေဟိ အမှာကံ စန္ဒနဝနံ နာသိတံ ဃာတေဿာမ နေ’’တိ စိန္တေတွာ – ‘‘ဣဓေဝ ဃာတိတေသု သဗ္ဗံ ဧကကုဏပံ ဘဝိဿတိ, သမုဒ္ဒမဇ္ဈေ နေသံ နာဝံ ဩသီဒေဿာမာ’’တိ အာဟံသု. အထ နေသံ နာဝံ အာရုယှ မုဟုတ္တံ ဂတကာလေယေဝ ဥပ္ပာတိကံ ဥဋ္ဌပေတွာ သယမ္ပိ တေ အမနုဿာ ဘယာနကာနိ ရူပါနိ ဒဿယိံသု. ဘီတာ မနုဿာ အတ္တနော အတ္တနော ဒေဝတာနံ နမဿန္တိ. ထေရဿ ကနိဋ္ဌော စူဠပုဏ္ဏကုဋုမ္ဗိကော ‘‘မယှံ ဘာတာ အဝဿယော ဟောတူ’’တိ ထေရဿ နမဿမာနော အဋ္ဌာသိ. त्यानंतर एका माणसाने कुऱ्हाडीने झाडावर प्रहार करून ते रक्तचंदन असल्याचे जाणून म्हटले – “हे मित्रांनो, आपण नफ्यासाठी परसमुद्रात जात आहोत. यापेक्षा अधिक मोठा नफा दुसरा कोणताही नाही. केवळ चार बोटे लांबीचा चंदनाचा तुकडा एक लाख मोलाचा आहे. टाकून देण्याजोगे सामान टाकून देऊन आपण नाव चंदनाने भरूया.” त्यांनी तसेच केले. चंदनवनात राहणारे अमनुष्य संतप्त झाले आणि “या लोकांनी आमचे चंदनवन नष्ट केले आहे, आम्ही यांना मारून टाकू,” असा विचार करून ते म्हणाले – “जर यांना येथेच मारले, तर हे संपूर्ण बेट प्रेतांनी भरून जाईल. आपण समुद्राच्या मध्यभागी त्यांची नाव बुडवून टाकू.” त्यानंतर, त्यांनी नावेत बसून प्रवास सुरू केल्यावर काही वेळातच अमनुष्यांनी एक भयानक वादळ निर्माण केले आणि त्या अमनुष्यांनी स्वतः देखील भयानक रूपे दाखवली. भीत झालेले लोक आपापल्या देवतांची प्रार्थना करू लागले. थेरांचे धाकटे बंधू चुलपुण्ण गृहपती “माझे बंधू माझे रक्षक होवोत,” असे म्हणून थेरांचे स्मरण करत उभे राहिले. ထေရောပိ ကိရ တသ္မိံယေဝ ခဏေ အာဝဇ္ဇေတွာ, တေသံ ဗျသနုပ္ပတ္တိံ ဉတွာ, ဝေဟာသံ ဥပ္ပတိတွာ, အဘိမုခေါ အဋ္ဌာသိ. အမနုဿာ ထေရံ ဒိသွာဝ ‘‘အယျော ပုဏ္ဏတ္ထေရော ဧတီ’’တိ အပက္ကမိံသု, ဥပ္ပာတိကံ သန္နိသီဒိ. ထေရော ‘‘မာ ဘာယထာ’’တိ တေ အဿာသေတွာ ‘‘ကဟံ ဂန္တုကာမတ္ထာ’’တိ ပုစ္ဆိ. ဘန္တေ, အမှာကံ သကဋ္ဌာနမေဝ ဂစ္ဆာမာတိ. ထေရော နာဝင်္ဂဏေ အက္ကမိတွာ ‘‘ဧတေသံ ဣစ္ဆိတဋ္ဌာနံ ဂစ္ဆတူ’’တိ အဓိဋ္ဌာသိ. ဝါဏိဇာ သကဋ္ဌာနံ ဂန္တွာ, တံ ပဝတ္တိံ ပုတ္တဒါရဿ အာရောစေတွာ, ‘‘ဧထ ထေရံ သရဏံ ဂစ္ဆာမာ’’တိ ပဉ္စသတာပိ အတ္တနော ပဉ္စဟိ မာတုဂါမသတေဟိ သဒ္ဓိံ တီသု သရဏေသု ပတိဋ္ဌာယ ဥပါသကတ္တံ ပဋိဝေဒေသုံ. တတော နာဝါယ ဘဏ္ဍံ ဩတာရေတွာ ထေရဿ ဧကံ ကောဋ္ဌာသံ ကတွာ, ‘‘အယံ, ဘန္တေ, တုမှာကံ ကောဋ္ဌာသော’’တိ အာဟံသု. ထေရော မယှံ ဝိသုံ ကောဋ္ဌာသကိစ္စံ နတ္ထိ. သတ္ထာ ပန တုမှေဟိ ဒိဋ္ဌပုဗ္ဗောတိ. န ဒိဋ္ဌပုဗ္ဗော, ဘန္တေတိ. တေန ဟိ ဣမိနာ သတ္ထု မဏ္ဍလမာဠံ ကရောထ. ဧဝံ သတ္ထာရံ ပဿိဿထာတိ. တေ သာဓု, ဘန္တေတိ. တေန စ ကောဋ္ဌာသေန အတ္တနော စ ကောဋ္ဌာသေဟိ မဏ္ဍလမာဠံ ကာတုံ အာရဘိံသု. थेरांनीही त्याच क्षणी ध्यान करून त्यांच्यावर ओढवलेले संकट जाणले आणि आकाशात उडून ते त्यांच्यासमोर उभे राहिले. अमनुष्यांनी थेरांना पाहताच, “आर्य पुण्ण थेर येत आहेत!” असे म्हणून ते निघून गेले आणि ते वादळ शांत झाले. थेरांनी “भिऊ नका” असे सांगून त्यांचे सांत्वन केले आणि विचारले, “तुम्हाला कोठे जायचे आहे?” “भंते, आम्ही आमच्या स्वतःच्या ठिकाणी जात आहोत,” असे ते म्हणाले. थेरांनी नावेच्या पृष्ठभागावर पाऊल ठेवून असा संकल्प केला की, “या लोकांची नाव त्यांच्या इच्छित स्थळी जावो.” व्यापाऱ्यांनी आपापल्या ठिकाणी पोहोचून ही हकीकत आपल्या पत्नी व मुलांना सांगितली आणि “चला, आपण थेरांना शरण जाऊया,” असे म्हणून ते पाचशे व्यापारी आपल्या पाचशे पत्नींसह त्रिशरणात प्रतिष्ठित झाले आणि त्यांनी उपासकत्व स्वीकारले. त्यानंतर नावेतील माल उतरवून त्यांनी थेरांसाठी एक वाटा बाजूला काढला आणि म्हणाले, “भंते, हा आपला वाटा आहे.” थेर म्हणाले, “मला स्वतंत्र वाट्याची काही गरज नाही. पण तुम्ही कधी शास्त्यांना पूर्वी पाहिले आहे का?” “नाही भंते, आम्ही कधी पाहिलेले नाही,” असे ते म्हणाले. “तसे असेल तर या चंदनाने शास्त्यांसाठी एक मण्डळमाळ तयार करा. अशा प्रकारे तुम्ही शास्त्यांचे दर्शन घेऊ शकाल.” त्यांनी “खूप चांगले, भंते” असे म्हटले आणि त्या वाट्याने व स्वतःच्या वाट्यांनी मण्डळमाळ बांधण्यास सुरुवात केली. သတ္ထာပိ ကိရ တံ အာရဒ္ဓကာလတော ပဋ္ဌာယ ပရိဘောဂံ အကာသိ. အာရက္ခမနုဿာ ရတ္တိံ ဩဘာသံ ဒိသွာ, ‘‘မဟေသက္ခာ ဒေဝတာ အတ္ထီ’’တိ သညံ ကရိံသု. ဥပါသကာ မဏ္ဍလမာဠဉ္စ ဘိက္ခုသံဃဿ စ သေနာသနာနိ နိဋ္ဌာပေတွာ ဒါနသမ္ဘာရံ သဇ္ဇေတွာ, ‘‘ကတံ, ဘန္တေ, အမှေဟိ အတ္တနော ကိစ္စံ, သတ္ထာရံ ပက္ကောသထာ’’တိ ထေရဿ အာရောစေသုံ. ထေရော သာယနှသမယေ ဣဒ္ဓိယာ သာဝတ္ထိံ ဂန္တွာ, ‘‘ဘန္တေ, ဝါဏိဇဂါမဝါသိနော တုမှေ ဒဋ္ဌုကာမာ[Pg.24], တေသံ အနုကမ္ပံ ကရောထာ’’တိ ဘဂဝန္တံ ယာစိ. ဘဂဝါ အဓိဝါသေသိ. ထေရော သကဋ္ဌာနမေဝ ပစ္စာဂတော. शास्त्यांनीही त्याचे बांधकाम सुरू झाल्यापासूनच तिथे समापत्तीमध्ये प्रवेश करून त्याचा उपभोग घेतला. रात्रीच्या वेळी तिथला प्रकाश पाहून रक्षकांनी असा समज करून घेतला की, “येथे कोणीतरी महान तेजस्वी देवता आहे.” उपासकांनी मण्डळमाळ आणि भिक्खू संघासाठी निवासस्थाने पूर्ण केली आणि दानाची तयारी करून थेरांना सांगितले, “भंते, आम्ही आमचे कर्तव्य पूर्ण केले आहे, आता आपण शास्त्यांना आमंत्रित करावे.” संध्याकाळच्या वेळी थेरांनी ऋद्धीने सावत्थीला जाऊन भगवंतांना प्रार्थना केली, “भंते, व्यापारी गावातील रहिवासी आपले दर्शन घेऊ इच्छितात. कृपया त्यांच्यावर अनुकंपा करावी.” भगवंतांनी ती विनंती स्वीकारली. थेर आपल्या जागी परत आले. ဘဂဝါပိ အာနန္ဒတ္ထေရံ အာမန္တေသိ, ‘‘အာနန္ဒ, သွေ သုနာပရန္တေ ဝါဏိဇဂါမေ ပိဏ္ဍာယ စရိဿာမ, တွံ ဧကူနပဉ္စသတာနံ ဘိက္ခူနံ သလာကံ ဒေဟီ’’တိ. ထေရော ‘‘သာဓု, ဘန္တေ’’တိ ဘိက္ခုသံဃဿ တမတ္ထံ အာရောစေတွာ, ‘‘အာကာသစာရီ ဘိက္ခူ သလာကံ ဂဏှန္တူ’’တိ အာဟ. တံဒိဝသံ ကုဏ္ဍဓာနတ္ထေရော ပဌမံ သလာကံ အဂ္ဂဟေသိ. ဝါဏိဇဂါမဝါသိနောပိ ‘‘သွေ ကိရ သတ္ထာ အာဂမိဿတီ’’တိ ဂါမမဇ္ဈေ မဏ္ဍပံ ကတွာ ဒါနဂ္ဂံ သဇ္ဇယိံသု. ဘဂဝါ ပါတောဝ သရီရပဋိဇဂ္ဂနံ ကတွာ, ဂန္ဓကုဋိံ ပဝိသိတွာ, ဖလသမာပတ္တိံ အပ္ပေတွာ, နိသီဒိ. သက္ကဿ ပဏ္ဍုကမ္ဗလသိလာသနံ ဥဏှံ အဟောသိ. သော ‘‘ကိံ ဣဒ’’န္တိ အာဝဇ္ဇေတွာ သတ္ထု သုနာပရန္တဂမနံ ဒိသွာ, ဝိဿကမ္မံ အာမန္တေသိ, ‘‘တာတ, အဇ္ဇ ဘဂဝါ တိံသမတ္တာနိ ယောဇနသတာနိ ပိဏ္ဍစာရံ ဂမိဿတိ. ပဉ္စ ကူဋာဂါရသတာနိ မာပေတွာ ဇေတဝနဒွါရကောဋ္ဌကမတ္ထကေ ဂမနသဇ္ဇာနိ ကတွာ ဌပေဟီ’’တိ. သော တထာ အကာသိ. ဘဂဝတော ကူဋာဂါရံ စတုမုခံ အဟောသိ, ဒွိန္နံ အဂ္ဂသာဝကာနံ ဒွိမုခါနိ, သေသာနိ ဧကမုခါနိ, သတ္ထာ ဂန္ဓကုဋိတော နိက္ခမိတွာ ပဋိပါဋိယာ ဌပိတကူဋာဂါရေသု ဓုရကူဋာဂါရံ ပါဝိသိ. ဒွေ အဂ္ဂသာဝကေ အာဒိံ ကတွာ ဧကူနပဉ္စဘိက္ခုသတာနိပိ ကူဋာဂါရဂတာနိ အဟေသုံ. ဧကံ တုစ္ဆံ ကူဋာဂါရံ အဟောသိ, ပဉ္စပိ ကူဋာဂါရသတာနိ အာကာသေ ဥပ္ပတ္တိံသု. भगवंतांनीही थेर आनंदांना बोलावून म्हटले, “आनंदा, उद्या आपण सुणापरंत देशातील व्यापारी गावात भिक्षेसाठी जाणार आहोत. तू एकाने कमी पाचशे भिक्खूंना शलाका वाटून दे.” थेरांनी “खूप चांगले, भंते” असे म्हणून भिक्खू संघाला ही गोष्ट सांगितली आणि म्हटले, “जे भिक्खू आकाशातून प्रवास करू शकतात, त्यांनी शलाका ग्रहण कराव्यात.” त्या दिवशी थेर कुण्डधान यांनी पहिली शलाका घेतली. व्यापारी गावातील लोकांनीही “उद्या शास्ते येणार आहेत” असे ऐकून गावाच्या मध्यभागी एक मंडप उभारला आणि दानाची तयारी केली. भगवंतांनी पहाटेच शरीरकृत्ये आटोपून गंधकुटीत प्रवेश केला आणि फलसमापत्तीमध्ये लीन होऊन बसले. शक्राचे पांडुकंबल शिलासन गरम झाले. त्याने “हे काय आहे?” असा विचार करून ध्यान लावले आणि शास्त्यांचे सुणापरंत देशाकडे जाणे पाहून विश्वकर्म्याला बोलावून म्हटले, “प्रिय विश्वकर्मा, आज भगवान भिक्षेसाठी सुमारे तीनशे योजन दूर जाणार आहेत. तू पाचशे कुटागार निर्माण करून ते जेतवन महाविहाराच्या प्रवेशद्वारावर प्रवासासाठी सज्ज करून ठेव.” त्याने तसेच केले. भगवंतांचे कुटागार चार मुखांचे होते, दोन अग्रश्रावकांचे कुटागार दोन मुखांचे होते आणि उर्वरित सर्व एक मुखांचे होते. शास्ते गंधकुटीतून बाहेर आले आणि ओळीने ठेवलेल्या कुटागारांपैकी मुख्य कुटागारात प्रवेश करते झाले. दोन अग्रश्रावकांपासून सुरुवात करून, एकाने कमी पाचशे भिक्खू देखील आपापल्या कुटागारात बसले. एक कुटागार रिकामे राहिले. ती पाचशेही कुटागारे आकाशात उडाली. သတ္ထာ သစ္စဗန္ဓပဗ္ဗတံ နာမ ပတွာ ကူဋာဂါရံ အာကာသေ ဌပေသိ. တသ္မိံ ပဗ္ဗတေ သစ္စဗန္ဓော နာမ မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိကတာပသော မဟာဇနံ မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိံ ဥဂ္ဂဏှာပေန္တော လာဘဂ္ဂယသဂ္ဂပ္ပတ္တော ဟုတွာ ဝသတိ, အဗ္ဘန္တရေ စဿ အန္တောစာဋိယံ ပဒီပေါ ဝိယ အရဟတ္တဖလဿ ဥပနိဿယော ဇလတိ. တံ ဒိသွာ ‘‘ဓမ္မမဿ ကထေဿာမီ’’တိ ဂန္တွာ ဓမ္မံ ဒေသေသိ. တာပသော ဒေသနာပရိယောသာနေ အရဟတ္တံ ပါပုဏိ. မဂ္ဂေနေဝဿ အဘိညာ အာဂတာ. သော ဧဟိဘိက္ခု ဟုတွာ ဣဒ္ဓိမယပတ္တစီဝရဓရော တုစ္ဆကူဋာဂါရံ ပါဝိသိ. शास्ते सच्चबंध नावाच्या पर्वतावर पोहोचले आणि त्यांनी ती कुटागारे आकाशातच थांबवली. त्या पर्वतावर सच्चबंध नावाचा एक मिथ्यादृष्टी तपस्वी राहत होता, जो लोकांना मिथ्यादृष्टीची शिकवण देत असे आणि ज्याला खूप मोठा लाभ व कीर्ती मिळाली होती. त्याच्या अंतरात, एखाद्या मातीच्या घागरीत ठेवलेल्या दिव्याप्रमाणे, अर्हतफलाची पात्रता प्रज्वलित होती. त्याला पाहून, “मी याला धम्म उपदेश करीन,” असा विचार करून शास्ते तिथे गेले आणि त्यांनी त्याला धम्म देशना दिली. देशनेच्या शेवटी त्या तपस्व्याने अर्हतपद प्राप्त केले. मार्गासोबतच त्याला अभिज्ञा प्राप्त झाली. तो एहि भिक्खू बनून, ऋद्धीने प्राप्त झालेले पात्र आणि चीवर धारण करून, त्या रिकाम्या राहिलेल्या कुटागारात बसला. ဘဂဝါ [Pg.25] ကူဋာဂါရဂတေဟိ ပဉ္စဟိ ဘိက္ခုသတေဟိ သဒ္ဓိံ ဝါဏိဇဂါမံ ဂန္တွာ, ကူဋာဂါရာနိ အဒိဿမာနကာနိ ကတွာ, ဝါဏိဇဂါမံ ပါဝိသိ. ဝါဏိဇာ ဗုဒ္ဓပ္ပမုခဿ သံဃဿ မဟာဒါနံ ဒတွာ သတ္ထာရံ မကုလကာရာမံ နယိံသု. သတ္ထာ မဏ္ဍလမာဠံ ပါဝိသိ. မဟာဇနော ယာဝ သတ္ထာ ဘတ္တဒရထံ ပဋိပ္ပဿမ္ဘေတိ, တာဝ ပါတရာသံ ကတွာ ဥပေါသထင်္ဂါနိ သမာဒါယ ဗဟုံ ဂန္ဓဉ္စ ပုပ္ဖဉ္စ အာဒါယ ဓမ္မဿဝနတ္ထာယ အာရာမံ ပစ္စာဂမာသိ. သတ္ထာ ဓမ္မံ ဒေသေသိ. မဟာဇနဿ ဗန္ဓနမောက္ခော ဇာတော, မဟန္တံ ဗုဒ္ဓကောလာဟလံ အဟောသိ. भगवंतांनी कुटागारात बसलेल्या पाचशे भिक्खूंसह व्यापारी गावात जाऊन, ती कुटागारे अदृश्य केली आणि व्यापारी गावात प्रवेश केला. व्यापाऱ्यांनी बुद्धप्रमुख भिक्खू संघाला महादान दिले आणि शास्त्यांना मकुलकाराम विहारामध्ये घेऊन गेले. शास्त्यांनी मण्डळमाळात प्रवेश केला. शास्ते जोपर्यंत प्रवासाचा थकवा दूर करत होते, तोपर्यंत लोकांनी सकाळचे भोजन केले, उपोसथ अंगांचे ग्रहण केले आणि भरपूर गंध व फुले घेऊन धम्म ऐकण्यासाठी ते विहारामध्ये परत आले. शास्त्यांनी धम्म देशना दिली. लोकांची संसाराच्या बंधनातून मुक्ती झाली आणि तेथे मोठा बुद्धकोलाहल झाला. သတ္ထာ မဟာဇနဿ သင်္ဂဟတ္ထာယ သတ္တာဟံ တတ္ထေဝ ဝသိ, အရုဏံ ပန မဟာဂန္ဓကုဋိယံယေဝ ဥဋ္ဌပေသိ. သတ္တာဟမ္ပိ ဓမ္မဒေသနာပရိယောသာနေ စတုရာသီတိယာ ပါဏသဟဿာနံ ဓမ္မာဘိသမယော အဟောသိ. တတ္ထ သတ္တာဟံ ဝသိတွာ, ဝါဏိဇဂါမေ ပိဏ္ဍာယ စရိတွာ, ‘‘တွံ ဣဓေဝ ဝသာဟီ’’တိ ပုဏ္ဏတ္ထေရံ နိဝတ္တေတွာ အန္တရေ နမ္မဒါနဒီ နာမ အတ္ထိ, တဿာ တီရံ အဂမာသိ. နမ္မဒါ နာဂရာဇာ သတ္ထု ပစ္စုဂ္ဂမနံ ကတွာ, နာဂဘဝနံ ပဝေသေတွာ, တိဏ္ဏံ ရတနာနံ သက္ကာရံ အကာသိ. သတ္ထာ တဿ ဓမ္မံ ကထေတွာ နာဂဘဝနာ နိက္ခမိ. သော ‘‘မယှံ, ဘန္တေ, ပရိစရိတဗ္ဗံ ဒေထာ’’တိ ယာစိ. ဘဂဝါ နမ္မဒါနဒီတီရေ ပဒစေတိယံ ဒဿေသိ. တံ ဝီစီသု အာဂတာသု ပိဓီယတိ, ဂတာသု ဝိဝရီယတိ. မဟာသက္ကာရပတ္တံ အဟောသိ. သတ္ထာ တတော နိက္ခမိတွာ သစ္စဗန္ဓပဗ္ဗတံ ဂန္တွာ သစ္စဗန္ဓံ အာဟ – ‘‘တယာ မဟာဇနော အပါယမဂ္ဂေ ဩတာရိတော. တွံ ဣဓေဝ ဝသိတွာ, ဧတေသံ လဒ္ဓိံ ဝိဿဇ္ဇာပေတွာ, နိဗ္ဗာနမဂ္ဂေ ပတိဋ္ဌာပေဟီ’’တိ. သောပိ ပရိစရိတဗ္ဗံ ယာစိ. သတ္ထာ ဃနပိဋ္ဌိပါသာဏေ အလ္လမတ္တိကပိဏ္ဍမှိ လဉ္ဆနံ ဝိယ ပဒစေတိယံ ဒဿေသိ. တတော ဇေတဝနမေဝ ဂတော. ဧတမတ္ထံ သန္ဓာယ တေနေဝ အန္တရဝဿေနာတိအာဒိ ဝုတ္တံ. शास्ते (बुद्ध) बहुजनांच्या कल्याणासाठी सात दिवस तिथेच राहिले, परंतु पहाटे मात्र महागंधकुटीतच उगवू दिली (म्हणजे पहाटेपर्यंत ते महागंधकुटीत परतले). सात दिवसांच्या शेवटी धम्मदेशनेच्या समाप्तीनंतर चौऱ्याऐंशी हजार प्राण्यांना धम्माभिसमय (धम्मज्ञान) प्राप्त झाला. तिथे सात दिवस राहून, वाणिज्यग्रामात पिंडाचारासाठी (भिक्षेसाठी) चारिका करून, 'तू इथेच राहा' असे सांगून पुण्ण थेरांना परत पाठवले आणि वाटेत नर्मदा नावाची नदी आहे, तिच्या तीरावर ते गेले. नर्मदा नागराजाने शास्त्यांचे स्वागत केले, त्यांना नागभवनात नेले आणि त्रिरत्नांचा सत्कार केला. शास्त्यांनी त्याला धम्म उपदेश करून नागभवनातून प्रस्थान केले. त्याने 'भंते, मला पूजनीय असे काहीतरी द्या' अशी याचना केली. भगवंतांनी नर्मदा नदीच्या तीरावर आपल्या पाऊलांची खूण (पदचेतिय) दाखवली. लाटा आल्यावर ती झाकली जाते आणि लाटा गेल्यावर उघडी पडते. त्याला मोठा सत्कार प्राप्त झाला. शास्ते तिथून निघून सच्चबंध पर्वतावर गेले आणि सच्चबंधाला म्हणाले – 'तू बहुजनांना अपायमार्गावर (दुर्गतीवर) नेले आहेस. तू इथेच राहून, त्यांचे चुकीचे मत (लद्धि) सोडवून त्यांना निर्वाणमार्गावर प्रस्थापित कर.' त्यानेही पूजनीय वस्तूची याचना केली. शास्त्यांनी एका कठीण खडकावर ओल्या मातीच्या गोळ्यावर शिक्का उमटवावा तशी आपल्या पाऊलांची खूण (पदचेतिय) दाखवली. तिथून ते जेतवनालाच गेले. याच अर्थाचा संदर्भ घेऊन 'तेनेव अंतरवस्सेन' इत्यादी म्हटले आहे। ပရိနိဗ္ဗာယီတိ အနုပါဒိသေသာယ နိဗ္ဗာနဓာတုယာ ပရိနိဗ္ဗာယိ. မဟာဇနော ထေရဿ သတ္တ ဒိဝသာနိ သရီရပူဇံ ကတွာ, ဗဟူနိ ဂန္ဓကဋ္ဌာနိ သမောဓာနေတွာ, သရီရံ ဈာပေတွာ ဓာတုယော အာဒါယ စေတိယံ အကာသိ. သမ္ဗဟုလာ ဘိက္ခူတိ ထေရဿ အာဠာဟနဋ္ဌာနေ ဌိတဘိက္ခူ. သေသံ သဗ္ဗတ္ထ ဥတ္တာနမေဝ. ဆဋ္ဌံ ဥတ္တာနမေဝ. 'परिनिब्बायि' म्हणजे अनुपादिशेष निर्वाणधातूने परिनिर्वाण पावले. बहुजनांनी थेरांच्या शरीराची सात दिवस पूजा (अंत्यसंस्काराची तयारी) केली, पुष्कळ सुगंधी लाकडे एकत्र करून शरीराचा दाह केला आणि धातू (अस्थी) घेऊन स्तूप (चेतिय) बांधला. 'संबहुला भिक्खू' म्हणजे थेरांच्या स्मशानभूमीत उपस्थित असलेले भिक्खू. उर्वरित सर्व भाग स्पष्टच आहे. सहावे (सुत्त) स्पष्टच आहे। ၇-၈. ပဌမဧဇာသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ७-८. प्रथम एज सुत्त इत्यादींचे वर्णन। ၉၀-၉၁. သတ္တမေ [Pg.26] ဧဇာတိ တဏှာ. သာ ဟိ စလနဋ္ဌေန ဧဇာတိ ဝုစ္စတိ. သာဝ အာဗာဓနဋ္ဌေန ရောဂေါ, အန္တော ဒုဿနဋ္ဌေန ဂဏ္ဍော, နိကန္တနဋ္ဌေန သလ္လံ. တသ္မာတိ ယသ္မာ ဧဇာ ရောဂေါ စေဝ ဂဏ္ဍော စ သလ္လဉ္စ, တသ္မာ. စက္ခုံ န မညေယျာတိအာဒိ ဝုတ္တနယမေဝ, ဣဓာပိ သဗ္ဗံ ဟေဋ္ဌာ ဂဟိတမေဝ သံကဍ္ဎိတွာ ဒဿိတံ. အဋ္ဌမံ ဝုတ္တနယမေဝ. ९०-९१. सातव्या सुत्तात 'एजा' म्हणजे तृष्णा. कारण ती चंचलतेच्या स्वभावामुळे 'एजा' म्हटली जाते. तीच पीडा देण्याच्या अर्थाने 'रोग', आतून दूषित करण्याच्या अर्थाने 'गंड' (फोड) आणि टोचण्याच्या अर्थाने 'शल्य' (बाण) म्हटली जाते. 'तस्मा' म्हणजे ज्या कारणाने एजा हा रोग, गंड आणि शल्य आहे, त्या कारणाने. 'चक्खुं न मञ्ञेय्य' इत्यादी पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच आहे, इथेही खाली घेतलेले सर्व एकत्र करून दाखवले आहे. आठवे सुत्त पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच आहे। ၉-၁၀. ပဌမဒွယသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ९-१०. प्रथम द्वय सुत्त इत्यादींचे वर्णन। ၉၂-၉၃. နဝမေ ဒွယန္တိ ဒွေ ဒွေ ကောဋ္ဌာသေ. ဒသမေ ဣတ္ထေတံ ဒွယန္တိ ဧဝမေတံ ဒွယံ. စလဉ္စေဝ ဗျထဉ္စာတိ အတ္တနော သဘာဝေန အသဏ္ဌဟနတော စလတိ စေဝ ဗျထတိ စ. ယောပိ ဟေတု ယောပိ ပစ္စယောတိ စက္ခုဝိညာဏဿ ဝတ္ထာရမ္မဏံ ဟေတု စေဝ ပစ္စယော စ. ကုတော နိစ္စံ ဘဝိဿတီတိ ကေန ကာရဏေန နိစ္စံ ဘဝိဿတိ. ယထာ ပန ဒါသဿ ဒါသိယာ ကုစ္ဆိသ္မိံ ဇာတော ပုတ္တော ပရောဝ ဒါသော ဟောတိ, ဧဝံ အနိစ္စမေဝ ဟောတီတိ အတ္ထော. သင်္ဂတီတိ သဟဂတိ. သန္နိပါတောတိ ဧကတော သန္နိပတနံ. သမဝါယောတိ ဧကတော သမာဂမော. အယံ ဝုစ္စတိ စက္ခုသမ္ဖဿောတိ ဣမိနာ သင်္ဂတိသန္နိပါတသမဝါယသင်္ခါတေန ပစ္စယေန ဥပ္ပန္နတ္တာ ပစ္စယနာမေနေဝ သင်္ဂတိ သန္နိပါတော သမဝါယောတိ အယံ ဝုစ္စတိ စက္ခုသမ္ဖဿော. ९२-९३. नवव्या सुत्तात 'द्वयं' म्हणजे दोन-दोन भाग. दहाव्यात 'इत्थेतं द्वयं' म्हणजे अशा प्रकारे हे द्वय (दोन). 'चलं चेव व्यथञ्च' म्हणजे स्वतःच्या स्वभावाने स्थिर न राहिल्यामुळे चंचल होते आणि पीडित होते. 'योपि हेतु योपि पच्चयो' म्हणजे चक्षुविज्ञानाचा आधार आणि आलंबन हेच हेतू आणि प्रत्यय (कारण) आहेत. 'कुतो निच्चं भविस्सति' म्हणजे कोणत्या कारणाने ते नित्य होईल? जसे दासाच्या आणि दासीच्या गर्भातून जन्मलेला मुलगा हा दासच असतो, तसेच ते अनित्यच असते, असा अर्थ आहे. 'संगति' म्हणजे सहगती (एकत्र होणे). 'सन्निपातो' म्हणजे एकत्र येणे. 'समवायो' म्हणजे एकत्र मिलाप. 'अयं वुच्चति चक्खुसम्फस्सो' म्हणजे या संगती, सन्निपात आणि समवाय नावाच्या प्रत्ययाने (कारणाने) उत्पन्न झाल्यामुळे, प्रत्ययाच्या नावानेच संगती, सन्निपात आणि समवाय याला 'चक्षुसंस्पर्श' म्हटले जाते। သောပိ ဟေတူတိ ဖဿဿ ဝတ္ထု အာရမ္မဏံ သဟဇာတာ တယော ခန္ဓာတိ အယံ ဟေတု. ဖုဋ္ဌောတိ ဥပယောဂတ္ထေ ပစ္စတ္တံ, ဖဿေန ဖုဋ္ဌမေဝ ဂေါစရံ ဝေဒနာ ဝေဒေတိ, စေတနာ စေတေတိ, သညာ သဉ္ဇာနာတီတိ အတ္ထော. ဖုဋ္ဌောတိ ဝါ ဖဿသမင်္ဂီပုဂ္ဂလော, ဖဿေန ဖုဋ္ဌာရမ္မဏမေဝ ဝေဒနာဒီဟိ ဝေဒေတိ စေတေတိ သဉ္ဇာနာတီတိပိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဣတိ ဣမသ္မိံ သုတ္တေ သမတိံသက္ခန္ဓာ ကထိတာ ဟောန္တိ. ကထံ? စက္ခုဒွါရေ တာဝ ဝတ္ထု စေဝ အာရမ္မဏဉ္စ ရူပက္ခန္ဓော, ဖုဋ္ဌော ဝေဒေတီတိ ဝေဒနာက္ခန္ဓော, စေတေတီတိ သင်္ခါရက္ခန္ဓော, သဉ္ဇာနာတီတိ သညာက္ခန္ဓော, ဝိဇာနာတီတိ ဝိညာဏက္ခန္ဓောတိ. သေသဒွါရေသုပိ ဧသေဝ နယော. မနောဒွါရေပိ ဟိ ဝတ္ထုရူပံ ဧကန္တတော ရူပက္ခန္ဓော, ရူပေ ပန အာရမ္မဏေ သတိ အာရမ္မဏမ္ပိ ရူပက္ခန္ဓောတိ ဆ ပဉ္စကာတိံသ ဟောန္တိ. သင်္ခေပေန ပနေတေ ဆသုပိ ဒွါရေသု ပဉ္စေဝ [Pg.27] ခန္ဓာတိ သပစ္စယေ ပဉ္စက္ခန္ဓေ အနိစ္စာတိ ဝိတ္ထာရေတွာ ဝုစ္စမာနေ ဗုဇ္ဈနကာနံ အဇ္ဈာသယေန ဣဒံ သုတ္တံ ဒေသိတန္တိ. 'सोपि हेतू' म्हणजे स्पर्शाचा आधार, आलंबन आणि सहजात तीन स्कंध, हा हेतू आहे. 'फुट्ठो' म्हणजे कर्म अर्थात प्रथमा विभक्ती आहे; स्पर्शाने स्पर्श केलेल्या विषयालाच वेदना अनुभवते, चेतना चेतित करते आणि संज्ञा जाणते, असा अर्थ आहे. किंवा 'फुट्ठो' म्हणजे स्पर्शाने युक्त असलेला पुद्गल, स्पर्शाने स्पर्श केलेल्या आलंबनालाच वेदना इत्यादींद्वारे अनुभवतो, चेतित करतो आणि जाणतो, असेही म्हटले आहे. अशा प्रकारे या सुत्तात तीस स्कंध सांगितले आहेत. कसे? चक्षुद्वाराच्या ठिकाणी आधी आधार आणि आलंबन हा 'रूपस्कंध' आहे, स्पर्श करून अनुभवते म्हणून 'वेदनास्कंध', चेतित करते म्हणून 'संस्कारस्कंध', जाणते म्हणून 'संज्ञास्कंध' आणि विशेष जाणते म्हणून 'विज्ञानस्कंध' आहे. इतर द्वारांच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. मनद्वाराच्या ठिकाणी देखील हृदयवस्तूचे रूप हे निश्चितपणे 'रूपस्कंध' आहे, परंतु रूप आलंबन असताना आलंबन देखील 'रूपस्कंध' होते, अशा प्रकारे सहा पंचक मिळून तीस होतात. संक्षेपाने सांगायचे तर, सहाही द्वारांच्या ठिकाणी हे पाचच स्कंध आहेत. म्हणून सप्रत्यय (कारणासहित) पाच स्कंध अनित्य आहेत, असे सविस्तर सांगताना, सत्य जाणण्यास योग्य असलेल्यांच्या आशयानुसार हे सुत्त देशित केले आहे। ဆန္နဝဂ္ဂေါ နဝမော. छन्नवग्ग नववा समाप्त। ၁၀. သဠဝဂ္ဂေါ १०. सळवग्ग (सहावा वर्ग) ၁. အဒန္တအဂုတ္တဝဏ္ဏနာ १. अदंत-अगुत्त (अदमित आणि अरक्षित) वर्णन। ၉၄. သဠဝဂ္ဂဿ ပဌမေ အဒန္တာတိ အဒမိတာ. အဂုတ္တာတိ အဂေါပိတာ. အရက္ခိတာတိ န ရက္ခိတာ. အသံဝုတာတိ အပိဟိတာ. ဒုက္ခာဓိဝါဟာ ဟောန္တီတိ နေရယိကာဒိဘေဒံ အဓိကဒုက္ခံ အာဝဟနကာ ဟောန္တိ. သုခါဓိဝါဟာ ဟောန္တီတိ ဈာနမဂ္ဂဖလပဘေဒံ အဓိကသုခံ အာဝဟနကာ ဟောန္တိ. အဓိဝဟာတိပိ ပါဌော, ဧသေဝတ္ထော. ९४. सळवग्गाच्या पहिल्या सुत्तात 'अदंता' म्हणजे अदमित (न आवरलेले). 'अगुत्ता' म्हणजे अगोपित (सुरक्षित न केलेले). 'अरक्खिता' म्हणजे रक्षण न केलेले. 'असंवुता' म्हणजे संयमित न केलेले (बंद न केलेले). 'दुक्खाधिवाहा होन्ति' म्हणजे नरक इत्यादी अनेक प्रकारचे तीव्र दुःख वाहून आणणारे होतात. 'सुखाधिवाहा होन्ति' म्हणजे ध्यान, मार्ग आणि फल या स्वरूपाचे महान सुख वाहून आणणारे होतात. 'अधिवहा' असाही पाठ आहे, त्याचा अर्थ हाच आहे। သဠေဝါတိ ဆ ဧဝ. အသံဝုတော ယတ္ထ ဒုက္ခံ နိဂစ္ဆတီတိ ယေသု အာယတနေသု သံဝရဝိရဟိတော ဒုက္ခံ ပါပုဏာတိ. တေသဉ္စ ယေ သံဝရဏံ အဝေဒိသုန္တိ ယေ တေသံ အာယတနာနံ သံဝရံ ဝိန္ဒိံသု ပဋိလဘိံသု. ဝိဟရန္တာနဝဿုတာတိ ဝိဟရန္တိ အနဝဿုတာ အတိန္တာ. 'सळेव' म्हणजे सहाच. 'असंवुतो यत्थ दुक्खं निगच्छति' म्हणजे ज्या आयतनांच्या ठिकाणी संवराचा (संयमाचा) अभाव असल्यामुळे मनुष्य दुःखाला प्राप्त होतो. 'तेसञ्च ये संवरणं अवेदिसुं' म्हणजे ज्यांनी त्या आयतनांचा संवर (संयम) जाणला किंवा प्राप्त केला. 'विहरन्तानवस्सुता' म्हणजे रागाने ओले न होता (अनासक्त होऊन) विहरतात। အသာဒိတဉ္စ သာဒုန္တိ အဿာဒဝန္တဉ္စ မဓုရဉ္စ. ဖဿဒွယံ သုခဒုက္ခေ ဥပေက္ခေတိ သုခဖဿဉ္စ ဒုက္ခဖဿဉ္စာတိ ဣဒံ ဖဿဒွယံ ဥပေက္ခေ, ဥပေက္ခာမေဝေတ္ထ ဥပ္ပာဒေယျာတိ အတ္ထော. ဖဿဒွယံ သုခဒုက္ခံ ဥပေက္ခောတိ ဝါ ပါဌော, ဖဿဟေတုကံ သုခဒုက္ခံ ဥပေက္ခော, သုခေ အနုရောဓံ ဒုက္ခေ စ ဝိရောဓံ အနုပ္ပာဒေန္တော ဥပေက္ခကော ဘဝေယျာတိပိ အတ္ထော. အနာနုရုဒ္ဓေါ အဝိရုဒ္ဓေါ ကေနစီတိ ကေနစိ သဒ္ဓိံ နေဝ အနုရုဒ္ဓေါ န ဝိရုဒ္ဓေါ ဘဝေယျ. 'असादितञ्च सादुं' म्हणजे आस्वादयुक्त आणि मधुर. 'फस्सद्वयं सुखदुक्खे उपेक्खेति' म्हणजे सुखस्पर्श आणि दुःखस्पर्श या दोन्ही स्पर्शांच्या बाबतीत उपेक्षा करावी, इथे उपेक्षाच उत्पन्न करावी, असा अर्थ आहे. 'फस्सद्वयं सुखदुक्खं उपेक्खो' असाही पाठ आहे, स्पर्शाने उत्पन्न होणाऱ्या सुख-दुःखात उपेक्षक असावे; सुखात आसक्ती (अनुरोध) आणि दुःखात द्वेष (विरोध) उत्पन्न न करता उपेक्षक व्हावे, असाही अर्थ आहे. 'अनानुरुद्धो अविरुद्धो केनचि' म्हणजे कोणाशीही आसक्त किंवा विरुद्ध नसावे। ပပဉ္စသညာတိ ကိလေသသညာယ ပပဉ္စသညာ နာမ ဟုတွာ. ဣတရီတရာ နရာတိ လာမကသတ္တာ ပပဉ္စယန္တာ ဥပယန္တီတိ ပပဉ္စယမာနာ ဝဋ္ဋံ ဥပဂစ္ဆန္တိ. သညိနောတိ သသညာ သတ္တာ. မနောမယံ ဂေဟသိတဉ္စ သဗ္ဗန္တိ သဗ္ဗမေဝ ပဉ္စကာမဂုဏဂေဟနိဿိတံ မနောမယံ ဝိတက္ကံ. ပနုဇ္ဇာတိ ပနုဒိတွာ နီဟရိတွာ. နေက္ခမ္မသိတံ ဣရီယတီတိ ဒဗ္ဗဇာတိကော ဘိက္ခု နေက္ခမ္မသိတံ ဣရိယေန ဣရီယတိ. 'पपञ्चसञ्ञा' म्हणजे क्लेशसंज्ञेमुळे प्रपंचसंज्ञा असलेले होऊन. 'इतरीतरा नरा' म्हणजे हीन प्राणी प्रपंच करत संसारात जातात, प्रपंच करत संसाराला (वट्टाला) प्राप्त होतात. 'सञ्ञिनो' म्हणजे संज्ञायुक्त प्राणी. 'मनोमयं gehasitañca sabbanti' म्हणजे पाच कामगुणांच्या घराचा आश्रय घेतलेले सर्व मनोमय विचार (वितर्क). 'पनुज्ज' म्हणजे दूर करून, बाहेर काढून. 'नेक्खम्मसितं इरीयति' म्हणजे बुद्धिमान भिक्खू निष्क्रमण (नैष्क्रम्य) आश्रित आचरणाने आचरण करतो। ဆဿု ယဒါ [Pg.28] သုဘာဝိတောတိ ဆသု အာရမ္မဏေသု ယဒါ သုဋ္ဌု ဘာဝိတော. ဖုဋ္ဌဿ စိတ္တံ န ဝိကမ္ပတေ ကွစီတိ သုခဖဿေန ဝါ ဒုက္ခဖဿေန ဝါ ဖုဋ္ဌဿ ကိသ္မိဉ္စိ စိတ္တံ န ကမ္ပတိ န ဝေဓတိ. ဘဝတ္ထ ဇာတိမရဏဿ ပါရဂါတိ ဇာတိမရဏာနံ ပါရံ နိဗ္ဗာနံ ဂမကာ ဟောထ. ‘छस्सु यदा सुभावितो’ म्हणजे सहा आलंबनांमध्ये (विषयांमध्ये) जेव्हा चांगल्या प्रकारे भावना केली जाते (विकसित केली जाते). ‘फुट्ठस्स चित्तं न विकम्पते क्वचि’ म्हणजे सुखकारक स्पर्शाने किंवा दुःखकारक स्पर्शाने प्रभावित झालेल्याचे चित्त कशातही कंपित होत नाही, थरथरत नाही. ‘भवथ जातिमरणस्स पारगा’ म्हणजे जन्म आणि मरणाच्या पलीकडच्या तीरावर असलेल्या निर्वाणाप्रत जाणारे व्हा. ၂. မာလုကျပုတ္တသုတ္တဝဏ္ဏနာ २. मालुक्यपुत्तसुत्तवण्णना (मालुक्यपुत्त सूत्राचे स्पष्टीकरण) ၉၅. ဒုတိယေ မာလုကျပုတ္တောတိ မာလုကျဗြာဟ္မဏိယာ ပုတ္တော. ဧတ္ထာတိ ဧတသ္မိံ တဝ ဩဝါဒါယာစနေ. ဣမိနာ ထေရံ အပသာဒေတိပိ ဥဿာဒေတိပိ. ကထံ? အယံ ကိရ ဒဟရကာလေ ရူပါဒီသု ပမဇ္ဇိတွာ ပစ္ဆာ မဟလ္လကကာလေ အရညဝါသံ ပတ္ထေန္တော ကမ္မဋ္ဌာနံ ယာစတိ. အထ ဘဂဝါ ‘‘ဧတ္ထ ဒဟရေ ကိံ ဝက္ခာမ? မာလုကျပုတ္တော ဝိယ တုမှေပိ တရုဏကာလေ ပမဇ္ဇိတွာ မဟလ္လကကာလေ အရညံ ပဝိသိတွာ သမဏဓမ္မံ ကရေယျာထာ’’တိ ဣမိနာ အဓိပ္ပာယေန ဘဏန္တော ထေရံ အပသာဒေတိ နာမ. ९५. दुसऱ्या सूत्रात, ‘मालुक्यपुत्तो’ म्हणजे मालुक्य नावाच्या ब्राह्मणीचा मुलगा. ‘एत्थ’ म्हणजे तुझ्या या उपदेशाच्या याचना करण्यामध्ये. याद्वारे भगवान थेरांना (स्थविरांना) फटकारतातही आणि प्रोत्साहितही करतात. कसे? असे म्हटले जाते की, हा (भिक्खू) तरुण वयात रूपादी विषयांमध्ये प्रमत्त (गाफील) राहिला आणि नंतर वृद्ध झाल्यावर अरण्यवासाची इच्छा धरून कम्मट्ठानाची (कर्मस्थानाची) याचना करत आहे. तेव्हा भगवान म्हणतात, "येथे (या प्रसंगी) आम्ही तरुण भिक्खूंना काय सांगावे? मालुक्यपुत्ताप्रमाणे तुम्हीही तरुण वयात प्रमत्त राहून वृद्ध झाल्यावर अरण्यात प्रवेश करून श्रमणधर्माचे आचरण करावे काय?" या अभिप्रायाने बोलताना भगवान थेरांना फटकारतात. ယသ္မာ ပန ထေရော မဟလ္လကကာလေပိ အရညံ ပဝိသိတွာ သမဏဓမ္မံ ကာတုကာမော, တသ္မာ ဘဂဝါ ‘‘ဧတ္ထ ဒဟရေ ကိံ ဝက္ခာမ? အယံ အမှာကံ မာလုကျပုတ္တော မဟလ္လကကာလေပိ အရညံ ပဝိသိတွာ သမဏဓမ္မံ ကတ္တုကာမော ကမ္မဋ္ဌာနံ ယာစတိ, တုမှေ နာမ တရုဏကာလေပိ ဝီရိယံ န ကရောထာ’’တိ ဣမိနာ အဓိပ္ပာယေန ဘဏန္တော ထေရံ ဥဿာဒေတိ နာမ. परंतु, ज्याअर्थी थेर वृद्धपणीही अरण्यात प्रवेश करून श्रमणधर्माचे आचरण करण्याची इच्छा बाळगतात, त्याअर्थी भगवान म्हणतात, "येथे आम्ही तरुण भिक्खूंना काय सांगावे? हा आमचा मालुक्यपुत्त वृद्धपणीही अरण्यात प्रवेश करून श्रमणधर्माचे आचरण करण्याची इच्छा ठेवून कम्मट्ठानाची याचना करत आहे, आणि तुम्ही मात्र तरुण वयातही वीर्य (प्रयत्न) करत नाही!" या अभिप्रायाने बोलताना भगवान थेरांना प्रोत्साहित करतात. ယတြ ဟိ နာမာတိ ယော နာမ. ကိဉ္စာပါဟန္တိ ကိဉ္စာပိ ‘‘အဟံ မဟလ္လကော’’တိ ဉာတံ. ယဒိ အဟံ မဟလ္လကော, မဟလ္လကော သမာနောပိ သက္ခိဿာမိ သမဏဓမ္မံ ကာတုံ, ဒေသေတု မေ, ဘန္တေ, ဘဂဝါတိ အဓိပ္ပာယေန မဟလ္လကဘာဝံ အနုဂ္ဂဏှန္တော ဩဝါဒဉ္စ ပသံသန္တော ဧဝမာဟ. ‘यत्र हि नामा’ म्हणजे जो कोणी. ‘किञ्चापाहं’ मध्ये ‘किञ्चापि अहं’ अशी संधी सोडवावी. ‘मी वृद्ध आहे’ हे मला ठाऊक आहे. ‘जरी मी वृद्ध असलो, तरी वृद्ध असूनही मी श्रमणधर्माचे आचरण करण्यास समर्थ होईन. भंते, भगवंतांनी मला उपदेश द्यावा,’ या अभिप्रायाने आपल्या वृद्धत्वाचा स्वीकार करत आणि उपदेशाची प्रशंसा करत त्यांनी असे म्हटले. အဒိဋ္ဌာ အဒိဋ္ဌပုဗ္ဗာတိ ဣမသ္မိံ အတ္တဘာဝေ အဒိဋ္ဌာ အတီတေပိ အဒိဋ္ဌပုဗ္ဗာ. န စ ပဿသီတိ ဧတရဟိပိ န ပဿသိ. န စ တေ ဟောတိ ပဿေယျန္တိ ဧဝံ သမန္နာဟာရောပိ တေ ယတ္ထ နတ္ထိ, အပိ နု တေ တတ္ထ ဆန္ဒာဒယော ဥပ္ပဇ္ဇေယျုန္တိ ပုစ္ဆတိ. ‘अदिट्ठा अदिट्ठपुब्बा’ म्हणजे या आत्मभावात (या जन्मात) न पाहिलेले आणि भूतकाळातही कधी न पाहिलेले. ‘न च पस्ससि’ म्हणजे आताही तू पाहत नाहीस. ‘न च ते होति पस्सेय्यं’ म्हणजे ‘मी ते पाहावे’ असा विचार (मनस्कार) देखील जेथे तुला येत नाही, अशा रूपांच्या बाबतीत तुझ्या मनात छंद (इच्छा) इत्यादी उत्पन्न होतील काय? असे भगवान विचारतात. ဒိဋ္ဌေ ဒိဋ္ဌမတ္တန္တိ ရူပါယတနေ စက္ခုဝိညာဏေန ဒိဋ္ဌေ ဒိဋ္ဌမတ္တံ ဘဝိဿတိ. စက္ခုဝိညာဏဉှိ ရူပေ ရူပမတ္တမေဝ ပဿတိ, န နိစ္စာဒိသဘာဝံ, ဣတိ သေသဝိညာဏေဟိပိ မေ ဧတ္ထ ဒိဋ္ဌမတ္တမေဝ စိတ္တံ ဘဝိဿတီတိ အတ္ထော. အထ ဝါ [Pg.29] ဒိဋ္ဌေ ဒိဋ္ဌံ နာမ စက္ခုဝိညာဏံ, ရူပေ ရူပဝိဇာနနန္တိ အတ္ထော. မတ္တာတိ ပမာဏံ, ဒိဋ္ဌံ မတ္တာ အဿာတိ ဒိဋ္ဌမတ္တံ, စိတ္တံ, စက္ခုဝိညာဏမတ္တမေဝ မေ စိတ္တံ ဘဝိဿတီတိ အတ္ထော. ဣဒံ ဝုတ္တံ ဟောတိ – ယထာ အာပါထဂတရူပေ စက္ခုဝိညာဏံ န ရဇ္ဇတိ န ဒုဿတိ န မုယှတိ, ဧဝံ ရာဂါဒိဝိရဟေန စက္ခုဝိညာဏမတ္တမေဝ ဇဝနံ ဘဝိဿတိ, စက္ခုဝိညာဏပမာဏေနေဝ ဇဝနံ ဌပေဿာမီတိ. အထ ဝါ ဒိဋ္ဌံ နာမ စက္ခုဝိညာဏေန ဒိဋ္ဌရူပံ, ဒိဋ္ဌေ ဒိဋ္ဌမတ္တံ နာမ တတ္ထေဝ ဥပ္ပန္နံ သမ္ပဋိစ္ဆနသန္တီရဏဝေါဋ္ဌဗ္ဗနသင်္ခါတံ စိတ္တတ္တယံ. ယထာ တံ န ရဇ္ဇတိ, န ဒုဿတိ, န မုယှတိ, ဧဝံ အာပါထဂတေ ရူပေ တေနေဝ သမ္ပဋိစ္ဆနာဒိပ္ပမာဏေန ဇဝနံ ဥပ္ပာဒေဿာမိ, နာဟံ တံ ပမာဏံ အတိက္ကမိတွာ ရဇ္ဇနာဒိဝသေန ဥပ္ပဇ္ဇိတုံ ဒဿာမီတိ အယမေတ္ထ အတ္ထော. ဧသေဝ နယော သုတမုတေသု. ‘दिट्ठे दिट्ठमत्तं’ म्हणजे रूपायतनामध्ये चक्षुविज्ञानाने पाहिले असता केवळ पाहिले गेल्याचे प्रमाण (दर्शनमात्र) होईल. चक्षुविज्ञान हि रूपात केवळ रूपमात्र पाहते, त्याचे नित्यत्व इत्यादी स्वभाव पाहत नाही. म्हणून इतर विज्ञानांच्या बाबतीतही माझे चित्त येथे केवळ दर्शनमात्रच होईल, असा अर्थ आहे. किंवा ‘दिट्ठे’ म्हणजे पाहिलेल्या रूपात, ‘दिट्ठं’ म्हणजे चक्षुविज्ञान, आणि रूपात रूपाचे विशेष ज्ञान असा अर्थ आहे. ‘मत्ता’ म्हणजे प्रमाण (मर्यादा), ज्याचे प्रमाण केवळ दर्शन आहे ते ‘दिट्ठमत्तं’ चित्त होय; म्हणजेच माझे चित्त केवळ चक्षुविज्ञानमात्रच होईल, असा अर्थ आहे. येथे हे सांगितले आहे – ज्याप्रमाणे गोचर झालेल्या (दिसणाऱ्या) रूपात चक्षुविज्ञान आसक्त होत नाही, द्वेष करत नाही, मोहित होत नाही, त्याचप्रमाणे रागादी क्लेशांच्या अभावामुळे माझे जवन (चित्तवीथीतील जवनचित्त) केवळ चक्षुविज्ञानमात्रच होईल, मी जवनाला केवळ चक्षुविज्ञानाच्या मर्यादेतच ठेवीन. किंवा ‘दिट्ठं’ म्हणजे चक्षुविज्ञानाने पाहिलेले रूप, आणि ‘दिट्ठे दिट्ठमत्तं’ म्हणजे त्याच पाहिलेल्या रूपात उत्पन्न झालेले संपटिच्छन, संतीरण आणि वोट्ठब्बन नावाचे चित्तत्रय (तीन चित्ते). ज्याप्रमाणे ते आसक्त होत नाही, द्वेष करत नाही, मोहित होत नाही, त्याचप्रमाणे गोचर झालेल्या रूपात मी त्याच संपटिच्छन इत्यादींच्या मर्यादेत जवन उत्पन्न करीन, मी त्या मर्यादेचे उल्लंघन करून राग इत्यादींच्या प्रभावाने चित्त उत्पन्न होऊ देणार नाही, असा येथे अर्थ घ्यावा. हाच नियम सुत (ऐकलेले), मुत (वास घेतलेले, चव घेतलेले, स्पर्श केलेले) यांच्या बाबतीतही जाणावा. ဝိညာတေ ဝိညာတမတ္တန္တိ ဧတ္ထ ပန ဝိညာတံ နာမ မနောဒွါရာဝဇ္ဇနေန ဝိညာတာရမ္မဏံ, တသ္မိံ ဝိညာတေ ဝိညာတမတ္တန္တိ အာဝဇ္ဇနပမာဏံ. ယထာ အာဝဇ္ဇနေန န ရဇ္ဇတိ န ဒုဿတိ န မုယှတိ, ဧဝံ ရဇ္ဇနာဒိဝသေန ဥပ္ပဇ္ဇိတုံ အဒတွာ အာဝဇ္ဇနပမာဏေနေဝ စိတ္တံ ဌပေဿာမီတိ အယမေတ္ထ အတ္ထော. ‘विञ्ञाते विञ्ञातमत्तं’ या वाक्यात ‘विञ्ञातं’ म्हणजे मनोद्वारावर्जनाने जाणलेले आलंबन (धम्मारंमण). त्या जाणलेल्या आलंबनात ‘विञ्ञातमत्तं’ म्हणजे आवर्जनाचे प्रमाण (मर्यादा). ज्याप्रमाणे आवर्जनाने चित्त आसक्त होत नाही, द्वेष करत नाही, मोहित होत नाही, त्याचप्रमाणे राग इत्यादींच्या वशाने चित्त उत्पन्न होऊ न देता, मी चित्ताला केवळ आवर्जनाच्या मर्यादेतच ठेवीन, असा येथे अर्थ आहे. ယတောတိ ယဒါ. တတောတိ တဒါ. န တေနာတိ တေန ရာဂေန ဝါ ရတ္တော, ဒေါသေန ဝါ ဒုဋ္ဌော, မောဟေန ဝါ မူဠှော န ဘဝိဿတိ. တတော တွံ မာလုကျပုတ္တ န တတ္ထာတိ ယဒါ တွံ တေန ရာဂေန ဝါ ဒေါသမောဟေဟိ ဝါ ရတ္တော ဝါ ဒုဋ္ဌော ဝါ မူဠှော ဝါ န ဘဝိဿသိ, တဒါ တွံ န တတ္ထ တသ္မိံ ဒိဋ္ဌေ ဝါ သုတမုတဝိညာတေ ဝါ ပဋိဗဒ္ဓေါ အလ္လီနော ပတိဋ္ဌိတော နာမ ဘဝိဿသိ. နေဝိဓာတိအာဒိ ဝုတ္တတ္ထမေဝ. ‘यतो’ म्हणजे जेव्हा. ‘ततो’ म्हणजे तेव्हा. ‘न तेन’ म्हणजे त्या रागाने आसक्त, द्वेषाने प्रदुष्ट किंवा मोहाने मूढ होणार नाही. ‘ततो त्वं मालुक्यपुत्त न तत्थ’ म्हणजे जेव्हा तू त्या रागाने किंवा द्वेष-मोहाने आसक्त, प्रदुष्ट किंवा मूढ होणार नाहीस, तेव्हा तू त्या पाहिलेल्या, ऐकलेल्या, वास घेतलेल्या/चव घेतलेल्या/स्पर्श केलेल्या किंवा जाणलेल्या विषयांमध्ये बद्ध, आसक्त किंवा प्रतिष्ठित होणार नाहीस. ‘नेविध’ इत्यादी शब्दांचा अर्थ आधीच सांगितल्याप्रमाणेच आहे. သတိ မုဋ္ဌာတိ သတိ နဋ္ဌာ. တဉ္စ အဇ္ဈောသာတိ တံ အာရမ္မဏံ ဂိလိတွာ. အဘိဇ္ဈာ စ ဝိဟေသာ စာတိ အဘိဇ္ဈာယ စ ဝိဟိံသာယ စ. အထ ဝါ ‘‘တဿ ဝဍ္ဎန္တီ’’တိ ပဒေနာပိ သဒ္ဓိံ ယောဇေတဗ္ဗံ, အဘိဇ္ဈာ စ ဝိဟေသာ စာတိ ဣမေပိ ဒွေ ဓမ္မာ တဿ ဝဍ္ဎန္တီတိ အတ္ထော. ‘सति मुट्ठा’ म्हणजे स्मृती नष्ट झाली असता. ‘तञ्च अज्झोसा’ म्हणजे त्या आलंबनाला गिळून (त्यात गढून जाऊन). ‘अभिज्झा च विहेसा च’ म्हणजे अभिज्श्या (लोभ) आणि विहिंसा (हिंसा/त्रास देणे). किंवा ‘तस्स वड्ढन्ति’ या पदाशी देखील याचा संबंध जोडावा, म्हणजेच अभिज्श्या आणि विहेसा हे दोन्ही धर्म त्याचे वाढतात, असा अर्थ आहे. စိတ္တမဿူပဟညတီတိ အဘိဇ္ဈာဝိဟေသာဟိ အဿ စိတ္တံ ဥပဟညတိ. အာစိနတောတိ အာစိနန္တဿ. အာရာ နိဗ္ဗာန ဝုစ္စတီတိ ဧဝရူပဿ ပုဂ္ဂလဿ နိဗ္ဗာနံ နာမ ဒူရေ ပဝုစ္စတိ. ဃတွာတိ ဃာယိတွာ. ဘောတွာတိ ဘုတွာ သာယိတွာ [Pg.30] လေဟိတွာ. ဖုဿာတိ ဖုသိတွာ. ပဋိဿတောတိ ပဋိဿတိသင်္ခါတာယ သတိယာ ယုတ္တော. သေဝတော စာပိ ဝေဒနန္တိ စတုမဂ္ဂသမ္ပယုတ္တံ နိဗ္ဗတ္တိတလောကုတ္တရဝေဒနံ သေဝန္တဿ. ခီယတီတိ ခယံ ဂစ္ဆတိ. ကိံ တံ? ဒုက္ခမ္ပိ ကိလေသဇာတမ္ပိ. အညတရောတိ အသီတိယာ မဟာသာဝကာနံ အဗ္ဘန္တရော ဧကော. ဣတိ ဣမသ္မိံ သုတ္တေ ဂါထာဟိပိ ဝဋ္ဋဝိဝဋ္ဋမေဝ ကထိတံ. ‘चित्तमस्सूपहञ्ञती’ म्हणजे अभिज्श्या आणि विहेसा यांच्याद्वारे त्याचे चित्त उपहत (पीडित) होते. ‘आचिनतो’ म्हणजे संचय करणाऱ्याचे (संसार वाढवणाऱ्याचे). ‘आरा निब्बानं वुच्चती’ म्हणजे अशा प्रकारच्या पुद्गलासाठी (व्यक्तीसाठी) निर्वाण दूर आहे असे म्हटले जाते. ‘घत्वा’ म्हणजे वास घेऊन. ‘भुत्वा’ म्हणजे खाऊन, चाखून, चाटून. ‘फुस्सा’ म्हणजे स्पर्श करून. ‘पटिस्सतो’ म्हणजे प्रतिस्मृती नावाच्या स्मृतीने युक्त असलेला. ‘सेवतो चापि वेदनं’ म्हणजे चार मार्गांशी संप्रयुक्त अशा उत्पन्न झालेल्या लोकोत्तर वेदनेचे sensory organ द्वारे सेवन करणाऱ्याचे. ‘खीयती’ म्हणजे क्षयाला जाते. ते काय? दुःख देखील आणि क्लेशसमूह देखील क्षयाला जातो. ‘अञ्ञतरो’ म्हणजे ऐंशी महाश्रावकांपैकी एक. अशा प्रकारे या सूत्रात गाथांद्वारे देखील केवळ वट्ट (संसार) आणि विवट्ट (निर्वाण) यांचेच वर्णन केले आहे. ၃. ပရိဟာနဓမ္မသုတ္တဝဏ္ဏနာ ३. परिहानधम्मसुत्तवण्णना (परिहानधम्म सूत्राचे स्पष्टीकरण) ၉၆. တတိယေ ပရိဟာနဓမ္မန္တိ ပရိဟာနသဘာဝံ. အဘိဘာယတနာနီတိ အဘိဘဝိတာနိ အာယတနာနိ. သရသင်္ကပ္ပာတိ ဧတ္ထ သရန္တီတိ သရာ, ဓာဝန္တီတိ အတ္ထော. သရာ စ တေ သင်္ကပ္ပာ စ သရသင်္ကပ္ပာ. သံယောဇနိယာတိ ဗန္ဓနိယာ ဗန္ဓနဿ ပစ္စယဘူတာ. တဉ္စေ ဘိက္ခူတိ တံ ဧဝံ ဥပ္ပန္နံ ကိလေသဇာတံ, တံ ဝါ အာရမ္မဏံ. အဓိဝါသေတီတိ စိတ္တေ အာရောပေတွာ ဝါသေတိ. နပ္ပဇဟတီတိ ဆန္ဒရာဂပ္ပဟာနေန န ပဇဟတိ. ဧဝံ သဗ္ဗပဒေဟိ ယောဇေတဗ္ဗံ. အဘိဘာယတနဉှေတံ ဝုတ္တံ ဘဂဝတာတိ ဧတံ ဗုဒ္ဓေန ဘဂဝတာ အဘိဘဝိတံ အာယတနန္တိ ကထိတံ. ဣဓ ဓမ္မံ ပုစ္ဆိတွာ ဝိဘဇန္တေန ပုဂ္ဂလေန ဓမ္မော ဒဿိတော. ९६. तिसऱ्या सूत्रात, ‘परिहानधम्मं’ म्हणजे ऱ्हास पावणारा स्वभाव (ऱ्हास पावण्याची प्रवृत्ती). ‘अभिभायतनानि’ म्हणजे पराभूत केलेली (वश केलेली) आयतने. ‘सरसङ्कप्पा’ या शब्दातील ‘सरन्ति’ म्हणजे जे धावतात (विषयांकडे धाव घेतात) ते ‘सरा’ होत. जे धावतात असा याचा अर्थ आहे. जे धावणारे आहेत आणि जे संकल्प (मिथ्या विचार) आहेत ते ‘सरसङ्कप्पा’ होत. ‘संयोजनिया’ म्हणजे बंधनात टाकणारे, बंधनाचे कारण बनणारे. ‘तञ्चे भिक्खू’ म्हणजे त्या प्रकारे उत्पन्न झालेल्या क्लेशसमूहाला किंवा त्या आलंबनाला. ‘अधिवासेति’ म्हणजे चित्तात ठेवून देतो (त्याचा स्वीकार करतो). ‘नप्पजहति’ म्हणजे छंदरागाचा त्याग न केल्यामुळे त्याचा त्याग करत नाही. अशा प्रकारे सर्व पदांशी संबंध जोडावा. ‘अभिभायतनञ्हेतं वृत्तं भगवता’ म्हणजे हे भगवान बुद्धांनी ‘अभिभूत केलेले (वश केलेले) आयतन’ असे म्हटले आहे. येथे भगवंतांनी धर्माविषयी विचारले असता, त्याचे वर्गीकरण करताना पुद्गलाधिष्ठानाने (व्यक्तीच्या संदर्भाने) धर्म दर्शवला आहे. ၄. ပမာဒဝိဟာရီသုတ္တဝဏ္ဏနာ ४. पमादविहारीसुत्तवण्णना (प्रमादविहारी सूत्राचे स्पष्टीकरण) ၉၇. စတုတ္ထေ အသံဝုတဿာတိ အပိဟိတဿ န ပိဒဟိတွာ သဉ္ဆာဒိတွာ ဌပိတဿ. ဗျာသိဉ္စတီတိ ဝိအာသိဉ္စတိ, ကိလေသတိန္တံ ဟုတွာ ဝတ္တတိ. ပါမောဇ္ဇန္တိ ဒုဗ္ဗလပီတိ. ပီတီတိ ဗလဝပီတိ. ပဿဒ္ဓီတိ ဒရထပဿဒ္ဓိ. ဓမ္မာ န ပါတုဘဝန္တီတိ သမထဝိပဿနာဓမ္မာ န ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ. ဣမသ္မိံ သုတ္တေ ပုဂ္ဂလံ ပုစ္ဆိတွာ ဝိဘဇန္တေန ဓမ္မေန ပုဂ္ဂလော ဒဿိတော. ९७. चौथ्या सुत्तात, 'असंवुतस्स' (असंयमित व्यक्तीचे) म्हणजे ज्याने (स्मृतीरूपी) दारे बंद केली नाहीत, झाकली नाहीत, तर ती उघडीच ठेवली आहेत अशा व्यक्तीचे. 'ब्यासिंचति' म्हणजे विशेष रूपाने सिंचन करतो, क्लेशरूपी जलाने ओले करतो (किंवा क्लेशरूपी ओलावा होऊन राहतो). 'पामोज्जं' म्हणजे दुर्बल प्रीती (मंद आनंद). 'पीति' म्हणजे बलवान प्रीती (तीव्र आनंद). 'पस्सद्धि' म्हणजे क्लेश-दाहाचा उपशम (दरथ-पस्सद्धि). 'धम्मा न पातुभवन्ति' म्हणजे समथ आणि विपश्यना हे धर्म उत्पन्न होत नाहीत. या सुत्तात पुद्गलाविषयी (व्यक्तीविषयी) विचारून त्याचे विश्लेषण करणाऱ्या भगवंतांनी धर्माच्या माध्यमातून पुद्गल दर्शविला आहे. ၅. သံဝရသုတ္တဝဏ္ဏနာ ५. संवरसुत्तवण्णना (संवर सुत्ताचे स्पष्टीकरण) ၉၈. ပဉ္စမေ ကထဉ္စ, ဘိက္ခဝေ, အသံဝရောတိ ဣဒံ မဂ္ဂကုသလဿ ဝါမံ မုဉ္စိတွာ ဒက္ခိဏံ ဂဏှေယျာသီတိ ပဌမံ ပဟာတဗ္ဗမဂ္ဂက္ခာနံ ဝိယ ဥဒ္ဒေသက္ကမေန အဝတွာ ဒေသနာကုသလတာယ ပဌမံ ပဟာတဗ္ဗဓမ္မက္ခာနဝသေန ဝုတ္တန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ဣဓ ဓမ္မံ ပုစ္ဆိတွာ ဓမ္မောဝ ဝိဘတ္တော. ९८. पाचव्या सुत्तात, 'कथञ्च, भिक्खवे, असंवरो' (हे भिक्खूंनो, असंवर कसा असतो?) हे वचन, मार्गामध्ये कुशल असलेल्या व्यक्तीने 'डावा मार्ग सोडून उजवा मार्ग स्वीकारावा' असे सांगताना प्रथम त्याज्य (टाळायच्या) मार्गाचे निर्देश केल्याप्रमाणे आहे. उद्देश-क्रमाने न सांगता, देशना-कौशल्यामुळे (उपदेश करण्याच्या कौशल्यामुळे) प्रथम त्याज्य धर्मांचे (नष्ट करायच्या गोष्टींचे) वर्णन करण्याच्या उद्देशाने हे म्हटले आहे, असे जाणावे. येथे धर्माविषयी विचारून धर्माचेच विश्लेषण केले आहे. ၆. သမာဓိသုတ္တဝဏ္ဏနာ ६. समाधिसुत्तवण्णना (समाधि सुत्ताचे स्पष्टीकरण) ၉၉. ဆဋ္ဌေ [Pg.31] သမာဓိန္တိ စိတ္တေကဂ္ဂတံ. ဣဒဉှိ သုတ္တံ စိတ္တေကဂ္ဂတာယ ပရိဟာယမာနေ ဒိသွာ, ‘‘ဣမေသံ စိတ္တေကဂ္ဂတံ လဘန္တာနံ ကမ္မဋ္ဌာနံ ဖာတိံ ဂမိဿတီ’’တိ ဉတွာ ကထိတံ. ९९. सहाव्या सुत्तात, 'समाधिं' म्हणजे चित्ताची एकाग्रता (चित्तैकग्गता). हे सुत्त खरोखर चित्ताच्या एकाग्रतेपासून (समथापासून) च्युत होत असलेल्या भिक्खूंना पाहून, 'या भिक्खूंना चित्ताची एकाग्रता प्राप्त झाल्यावर त्यांचे (विपश्यना) कर्मस्थान वृद्धिंगत होईल' हे जाणून भगवंतांनी उपदेशिले आहे. ၇. ပဋိသလ္လာနသုတ္တဝဏ္ဏနာ ७. पटिसल्लानसुत्तवण्णना (प्रतिसंलयन सुत्ताचे स्पष्टीकरण) ၁၀၀. သတ္တမေ ပဋိသလ္လာနန္တိ ကာယဝိဝေကံ. ဣဒဉှိ သုတ္တံ ကာယဝိဝေကေန ပရိဟာယမာနေ ဒိသွာ, ‘‘ဣမေသံ ကာယဝိဝေကံ လဘန္တာနံ ကမ္မဋ္ဌာနံ ဖာတိံ ဂမိဿတီ’’တိ ဉတွာ ကထိတံ. १००. सातव्या सुत्तात, 'पटिसल्लानं' म्हणजे कायविवेक (शारीरिक एकांत). हे सुत्त खरोखर कायविवेकापासून च्युत होत असलेल्या भिक्खूंना पाहून, 'या भिक्खूंना कायविवेक प्राप्त झाल्यावर त्यांचे कर्मस्थान वृद्धिंगत होईल' हे जाणून भगवंतांनी उपदेशिले आहे. ၈-၉. ပဌမနတုမှာကံသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ८-९. पठमनतुम्हाकं सुत्तादिवण्णना (प्रथम न तुम्हाकं सुत्त इत्यादींचे स्पष्टीकरण) ၁၀၁-၁၀၂. အဋ္ဌမံ ဥပမာယ ပရိဝါရေတွာ ကထိတေ ဗုဇ္ဈနကာနံ, နဝမံ သုဒ္ဓိကဝသေနေဝ ဗုဇ္ဈနကာနံ အဇ္ဈာသယဝသေန ဝုတ္တံ. အတ္ထော ပန ဥဘယတ္ထာပိ ခန္ဓိယဝဂ္ဂေ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. १०१-१०२. आठवे सुत्त उपमेच्या साहाय्याने उपदेशिले असता समजून घेणाऱ्यांच्या आशयानुसार (इच्छेनुसार) सांगितले आहे, आणि नववे सुत्त केवळ शुद्ध (उपमेशिवाय थेट) स्वरूपात उपदेशिले असता समजून घेणाऱ्यांच्या आशयानुसार सांगितले आहे. परंतु दोन्ही सुत्तांचा अर्थ खंधियवग्गात (स्कंध वर्गात) सांगितलेल्या पद्धतीनेच जाणावा. ၁၀. ဥဒကသုတ္တဝဏ္ဏနာ १०. उदकसुत्तवण्णना (उदक सुत्ताचे स्पष्टीकरण) ၁၀၃. ဒသမေ ဥဒကော သုဒန္တိ ဧတ္ထ သုဒန္တိ နိပါတမတ္တံ. ဥဒကောတိ တဿ နာမံ. ဣဒံ ဇာတု ဝေဒဂူတိ ဧတ္ထ ဣဒန္တိ နိပါတမတ္တံ. အထ ဝါ ဣဒံ မမ ဝစနံ သုဏာထာတိ ဒီပေန္တော ဧဝမာဟ. ဇာတု ဝေဒဂူတိ အဟံ ဧကံသေနေဝ ဝေဒဂူ, ဝေဒသင်္ခါတေန ဉာဏေန နေယျေသု ဂတော, ဝေဒံ ဝါ ဂတော အဓိဂတော, ပဏ္ဍိတောဟမသ္မီတိ အတ္ထော. သဗ္ဗဇီတိ ဧကံသေန သဗ္ဗဝဋ္ဋံ ဇိနိတွာ အဘိဘဝိတွာ ဌိတောသ္မီတိ ဝဒတိ. အပလိခတံ ဂဏ္ဍမူလန္တိ အပလိခတံ ဒုက္ခမူလံ. ပလိခဏိန္တိ ပလိခတံ မယာ, ခနိတွာ ဌိတောသ္မီတိ ဒီပေတိ. १०३. दहाव्या सुत्तात, 'उदको सुदं' यामध्ये 'सुदं' हा केवळ निपात (अव्यय) आहे. 'उदक' हे त्याचे (रामपुत्त ऋषीचे) नाव आहे. 'इदं जातु वेदगू' यामध्ये 'इदं' हा केवळ निपात आहे. किंवा 'माझे हे वचन ऐका' असे दर्शवत त्यांनी असे म्हटले आहे. 'जातु वेदगू' म्हणजे 'मी निश्चितपणे वेदगू (ज्ञानाचा पारगामी) आहे, वेद संज्ञक ज्ञानाने जाणण्यायोग्य गोष्टींपर्यंत पोहोचलो आहे, किंवा ज्ञानाला प्राप्त झालो आहे, मी पंडित आहे' असा अर्थ आहे. 'सब्बजी' म्हणजे 'मी निश्चितपणे संपूर्ण संसारचक्राला (वट्टाला) जिंकून, त्यावर मात करून स्थित आहे' असे ते म्हणतात. 'अपलिखतं गण्डमूलं' म्हणजे न खणलेले दुःख-मूळ (संसारदुःखाचे मूळ). 'पलिखणिं' म्हणजे 'मी ते सर्व बाजूंनी खणून काढले आहे, खणून मी स्थित आहे' असे ते दर्शवतात. မာတာပေတ္တိကသမ္ဘဝဿာတိ မာတိတော စ ပိတိတော စ နိဗ္ဗတ္တေန မာတာပေတ္တိကေန သုက္ကသောဏိတေန သမ္ဘူတဿ. ဩဒနကုမ္မာသူပစယဿာတိ ဩဒနေန စေဝ ကုမ္မာသေန စ ဥပစိတဿ ဝဍ္ဎိတဿ. အနိစ္စုစ္ဆာဒနပရိမဒ္ဒနဘေဒနဝိဒ္ဓံသနဓမ္မဿာတိ ဧတ္ထ အယံ ကာယော ဟုတွာ အဘာဝဋ္ဌေန အနိစ္စဓမ္မော, ဒုဂ္ဂန္ဓဝိဃာတတ္ထာယ တနုဝိလေပနေန ဥစ္ဆာဒနဓမ္မော, အင်္ဂပစ္စင်္ဂါဗာဓဝိနောဒနတ္ထာယ ခုဒ္ဒကသမ္ဗာဟနေန ပရိမဒ္ဒနဓမ္မော, ဒဟရကာလေ [Pg.32] ဝါ ဦရူသု သယာပေတွာ ဂဗ္ဘဝါသေန ဒုဿဏ္ဌိတာနံ တေသံ တေသံ အင်္ဂါနံ သဏ္ဌာနသမ္ပာဒနတ္ထံ အဉ္ဆနပီဠနာဒီနံ ဝသေန ပရိမဒ္ဒနဓမ္မော, ဧဝံ ပရိဟရိတောပိ စ ဘေဒနဝိဒ္ဓံသနဓမ္မော ဘိဇ္ဇတိ စေဝ ဝိကိရတိ စ, ဧဝံ သဘာဝေါတိ အတ္ထော. 'मातापेत्तिकसम्भवस्स' म्हणजे माता आणि पिता यांच्यापासून उत्पन्न झालेल्या, माता-पित्यांच्या शुक्र आणि शोणितापासून (रक्तापासून) बनलेल्या. 'ओदनकुम्मासूपचयस्स' म्हणजे भात आणि कण्या (कुम्मास) यांनी पोषित झालेल्या, वाढलेल्या. 'अनिच्चुच्छादनपरिमद्दनभेदनविद्धंसनधम्मस्स' यामध्ये हा शरीररूपी देह उत्पन्न होऊन नष्ट होणारा असल्यामुळे 'अनित्य स्वभाव असलेला' (अनिच्चधम्मो) आहे; दुर्गंधी दूर करण्यासाठी सुगंधी द्रव्यांचे लेपन करावा लागणारा (उच्छादनधम्मो) आहे; अंग-प्रत्यंगांची वेदना दूर करण्यासाठी हलक्या हाताने दाबून घ्यावा लागणारा, चोळावा लागणारा (परिमद्दनधम्मो) आहे; किंवा बालपणी मांडीवर निजवून, गर्भावासातील संकुचितपणामुळे वेडेवाकडे झालेल्या त्या त्या अवयवांना सुबक आकार देण्यासाठी ओढणे, दाबणे इत्यादींद्वारे मालिश करावा लागणारा (परिमद्दनधम्मो) आहे. अशा प्रकारे सांभाळ केला तरीही तो भेद पावणारा आणि नष्ट होणारा (भेदनविद्धंसनधम्मो) आहे, तो फुटतो आणि विखुरतो, असा स्वभाव असलेला आहे, हा अर्थ आहे. တတ္ထ မာတာပေတ္တိကသမ္ဘဝဩဒနကုမ္မာသူပစယပရိမဒ္ဒနပဒေဟိ ဝဍ္ဎိ ကထိတာ, အနိစ္စဘေဒနဝိဒ္ဓံသနပဒေဟိ ပရိဟာနိ. ပုရိမေဟိ ဝါ တီဟိ သမုဒယော, ပစ္ဆိမေဟိ အတ္ထင်္ဂမောတိ. ဧဝံ စာတုမဟာဘူတိကဿ ကာယဿ ဝဍ္ဎိပရိဟာနိနိဗ္ဗတ္တိဘေဒါ ဒဿိတာ. သေသံ ဥတ္တာနတ္ထမေဝါတိ. त्यामध्ये 'मातापेत्तिकसम्भव', 'ओदनकुम्मासूपचय' आणि 'परिमद्दन' या पदांनी वृद्धी (वाढ) सांगितली आहे, तर 'अनिच्च', 'भेदन' आणि 'विद्धंसन' या पदांनी हानी (ऱ्हास) सांगितली आहे. किंवा पूर्वोक्त तीन पदांनी उत्पत्ती (समुदय) आणि नंतरच्या पदांनी अस्त (नाश) सांगितला आहे. अशा प्रकारे चार महाभूतांनी बनलेल्या शरीराची वृद्धी, हानी, उत्पत्ती आणि विनाश दर्शविले आहेत. उर्वरित भाग स्पष्ट अर्थाचाच आहे. သဠဝဂ္ဂေါ ဒသမော. सळवग्गो (सहावा वर्ग) समाप्त. ဒုတိယော ပဏ္ဏာသကော. दुतियो पण्णासको (दुसरा पन्नास सुत्तांचा समूह समाप्त). ၁၁. ယောဂက္ခေမိဝဂ္ဂေါ ११. योगक्खेमिवग्गो (योगक्षेमी वर्ग) ၁. ယောဂက္ခေမိသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. योगक्खेमिसुत्तवण्णना (योगक्षेमी सुत्ताचे स्पष्टीकरण) ၁၀၄. ယောဂက္ခေမိဝဂ္ဂဿ ပဌမေ ယောဂက္ခေမိပရိယာယန္တိ စတူဟိ ယောဂေဟိ ခေမိနော ကာရဏဘူတံ. ဓမ္မပရိယာယန္တိ ဓမ္မကာရဏံ. အက္ခာသိ ယောဂန္တိ ယုတ္တိံ ကထေသိ. တသ္မာတိ ကသ္မာ? ကိံ အက္ခာတတ္တာ, ဥဒါဟု ပဟီနတ္တာတိ? ပဟီနတ္တာ. န ဟိ အက္ခာနေန ယောဂက္ခေမိ နာမ ဟောတိ. १०४. योगक्षेमी वर्गाच्या पहिल्या सुत्तात, 'योगक्खेमिपरियायं' म्हणजे चार योगांपासून (कामयोग इत्यादींपासून) मुक्त (क्षेम) होण्याचे कारण केलेले. 'धम्मपरियायं' म्हणजे धर्माचे कारण. 'अक्खासि योगं' म्हणजे योग्य उपाय (समथ-विपश्यना रूपी उपाय) सांगितला. 'तस्मा' म्हणजे कशामुळे? काय उपदेशिल्यामुळे (योगक्षेमी म्हटले जाते), की (क्लेश) प्रहीण (नष्ट) केल्यामुळे? (उत्तर आहे:) प्रहीण केल्यामुळे. कारण केवळ उपदेश केल्याने कोणी योगक्षेमी होत नाही. ၂-၁၀. ဥပါဒါယသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ २-१०. उपादायसुत्तादिवण्णना (उपादाय सुत्त इत्यादींचे स्पष्टीकरण) ၁၀၅-၁၁၃. ဒုတိယေ ဝေဒနာသုခဒုက္ခံ ကထိတံ, တံ ပန ဝိပါကသုခဒုက္ခံ ဝဋ္ဋတိ. တတိယေ ဒုက္ခဿာတိ ဝဋ္ဋဒုက္ခဿ. စတုတ္ထေ လောကဿာတိ သင်္ခါရလောကဿ. ပဉ္စမာဒီသု ယံ ဝတ္တဗ္ဗံ သိယာ, တံ ခန္ဓိယဝဂ္ဂေ ဝုတ္တနယမေဝ. १०५-११३. दुसऱ्या सुत्तात वेदनेचे सुख-दुःख सांगितले आहे, ते विपाक सुख-दुःख म्हणून घेणे योग्य आहे. तिसऱ्या सुत्तात 'दुक्खस्स' म्हणजे संसारचक्राच्या (वट्टाच्या) दुःखाचे. चौथ्या सुत्तात 'लोकस्स' म्हणजे संस्कारलोकाचे (संखारलोकाचे). पाचव्या इत्यादी सुत्तांमध्ये जे काही सांगण्यासारखे आहे, ते खंधियवग्गात (स्कंध वर्गात) सांगितलेल्या पद्धतीनेच आहे. ယောဂက္ခေမိဝဂ္ဂေါ ဧကာဒသမော. योगक्खेमिवग्गो एकादसमो (योगक्षेमी वर्ग अकरावा समाप्त). ၁၂. လောကကာမဂုဏဝဂ္ဂေါ १२. लोककामगुणवग्गो (लोककामगुण वर्ग) ၁-၂. ပဌမမာရပါသသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ १-२. पठममारपाससुत्तादिवण्णना (प्रथम मारपास सुत्त इत्यादींचे स्पष्टीकरण) ၁၁၄-၁၁၅. လောကကာမဂုဏဝဂ္ဂဿ [Pg.33] ပဌမေ အာဝါသဂတောတိ ဝသနဋ္ဌာနံ ဂတော. မာရဿ ဝသံ ဂတောတိ တိဝိဓဿာပိ မာရဿ ဝသံ ဂတော. ပဋိမုက္က’ဿ မာရပါသောတိ အဿ ဂီဝါယ မာရပါသော ပဋိမုက္ကော ပဝေသိတော. ဒုတိယံ ဥတ္တာနမေဝ. ११४-११५. लोककामगुण वर्गाच्या पहिल्या सुत्तात, 'आवासगतो' म्हणजे (माराच्या) निवासस्थानी गेलेला. 'मारस्स वसं गतो' म्हणजे तिन्ही प्रकारच्या माराच्या अधीन झालेला. 'पटिमुक्कस्स मारपासो' म्हणजे त्याच्या गळ्यात माराचा पाश (तृष्णारूपी फास) अडकवला आहे, घातला आहे. दुसरे सुत्त स्पष्ट अर्थाचेच आहे. ၃. လောကန္တဂမနသုတ္တဝဏ္ဏနာ ३. लोकांतगमनसुत्तवण्णना (लोकांतगमन सुत्ताचे स्पष्टीकरण) ၁၁၆. တတိယေ လောကဿာတိ စက္ကဝါဠလောကဿ. လောကဿ အန္တန္တိ သင်္ခါရလောကဿ အန္တံ. ဝိဟာရံ ပါဝိသီတိ ‘‘မယိ ဝိဟာရံ ပဝိဋ္ဌေ ဣမေ ဘိက္ခူ, ဣမံ ဥဒ္ဒေသံ အာနန္ဒံ ပုစ္ဆိဿန္တိ, သော စ တေသံ မမ သဗ္ဗညုတညာဏေန သံသန္ဒိတွာ ကထေဿတိ. တတော နံ ထောမေဿာမိ, မမ ထောမနံ သုတွာ ဘိက္ခူ အာနန္ဒံ ဥပသင်္ကမိတဗ္ဗံ, ဝစနဉ္စဿ သောတဗ္ဗံ သဒ္ဓါတဗ္ဗံ မညိဿန္တိ, တံ နေသံ ဘဝိဿတိ ဒီဃရတ္တံ ဟိတာယ သုခါယာ’’တိ စိန္တေတွာ သံခိတ္တေန ဘာသိတဿ ဝိတ္ထာရေန အတ္ထံ အဝိဘဇိတွာဝ နိသိန္နာသနေ အန္တရဟိတော ဂန္ဓကုဋိယံ ပါတုရဟောသိ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘ဥဋ္ဌာယာသနာ ဝိဟာရံ ပါဝိသီ’’တိ. ११६. तिसऱ्या सुत्तात, 'लोकस्स' म्हणजे चक्रवाळ लोकाचे (अवकाश लोकाचे). 'लोकस्स अन्त' म्हणजे संस्कारलोकाचा (संखारलोकाचा) अंत. 'विहारं पाविसी' म्हणजे "मी विहारात (गंधकुटीत) प्रवेश केल्यावर हे भिक्खू आनंदाला या उद्देशाविषयी विचारतील, आणि तो माझ्या सर्वज्ञता-ज्ञानाशी सुसंगत करून त्यांना उपदेश करेल. त्यानंतर मी त्याची प्रशंसा करीन, माझी प्रशंसा ऐकून भिक्खू आनंदाला आदरणीय मानतील आणि त्याचे वचन ऐकण्यायोग्य व विश्वास ठेवण्यायोग्य मानतील, जे त्यांच्या दीर्घकालीन हितासाठी आणि सुखासाठी होईल," असा विचार करून, संक्षेपाने सांगितलेल्या वचनाचा सविस्तर अर्थ न सांगताच, बसलेल्या आसनावरून अंतर्धान पावून भगवान गंधकुटीत प्रकट झाले. म्हणूनच "आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला" असे म्हटले आहे. သတ္ထု စေဝ သံဝဏ္ဏိတောတိ သတ္ထာရာ စ ပသတ္ထော. ဝိညူနန္တိ ဣဒမ္ပိ ကရဏတ္ထေ သာမိဝစနံ, ပဏ္ဍိတေဟိ သဗြဟ္မစာရီဟိ စ သမ္ဘာဝိတောတိ အတ္ထော. ပဟောတီတိ သက္ကောတိ. အတိက္ကမ္မေဝ မူလံ အတိက္ကမ္မေဝ ခန္ဓန္တိ သာရော နာမ မူလေ ဝါ ခန္ဓေ ဝါ ဘဝေယျ, တမ္ပိ အတိက္ကမိတွာတိ အတ္ထော. ဧဝံသမ္ပဒမိဒန္တိ ဧဝံသမ္ပတ္တိကံ, ဤဒိသန္တိ အတ္ထော. အတိသိတွာတိ အတိက္ကမိတွာ. ဇာနံ ဇာနာတီတိ ဇာနိတဗ္ဗမေဝ ဇာနာတိ. ပဿံ ပဿတီတိ ပဿိတဗ္ဗမေဝ ပဿတိ. ယထာ ဝါ ဧကစ္စော ဝိပရီတံ ဂဏှန္တော ဇာနန္တောပိ န ဇာနာတိ, ပဿန္တောပိ န ပဿတိ, န ဧဝံ ဘဂဝါ. ဘဂဝါ ပန ဇာနန္တော ဇာနာတိ, ပဿန္တော ပဿတိယေဝ. သွာယံ ဒဿနပရိဏာယကဋ္ဌေန စက္ခုဘူတော. ဝိဒိတကရဏဋ္ဌေန ဉာဏဘူတော. အဝိပရီတသဘာဝဋ္ဌေန ပရိယတ္တိဓမ္မပဝတ္တနတော ဝါ ဟဒယေန စိန္တေတွာ ဝါစာယ နိစ္ဆာရိတဓမ္မမယောတိ ဓမ္မဘူတော. သေဋ္ဌဋ္ဌေန ဗြဟ္မဘူတော. အထ ဝါ စက္ခု ဝိယ ဘူတောတိ စက္ခုဘူတော. ဧဝမေတေသု ပဒေသု အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. သွာယံ ဓမ္မဿ [Pg.34] ဝတ္တနတော ဝတ္တာ. ပဝတ္တနတော ပဝတ္တာ. အတ္ထံ နီဟရိတွာ နီဟရိတွာ ဒဿနသမတ္ထတာယ အတ္ထဿ နိန္နေတာ. အမတာဓိဂမာယ ပဋိပတ္တိံ ဒေသေတီတိ အမတဿ ဒါတာ. ‘सत्थु चेव संवण्णितो’ (शास्त्याद्वारे प्रशंसित) म्हणजे शास्त्यांनी (बुद्धांनी) प्रशंसा केलेले. ‘विञ्ञूनं’ हे पद देखील तृतीया विभक्तीच्या अर्थात षष्ठी विभक्तीचे रूप आहे, म्हणजेच पंडितांद्वारे आणि सब्रह्मचाऱ्यांद्वारे सन्मानित (प्रशंसित) असा अर्थ आहे. ‘पहोति’ म्हणजे समर्थ असणे (शक्य असणे). ‘अतिक्कम्मेव मूलं अतिक्कम्मेव खन्धं’ म्हणजे सार (गाभा) हा मुळात किंवा खोडात असू शकतो, त्यालाही ओलांडून जाणे असा अर्थ आहे. ‘एवंसम्पदमिदं’ म्हणजे अशा संपत्तीने युक्त, अशा स्वरूपाचे असा अर्थ आहे. ‘अतिसित्वा’ म्हणजे ओलांडून. ‘जानं जानाति’ म्हणजे जे जाणण्यायोग्य आहे तेच जाणतात. ‘पस्सं पस्सति’ म्हणजे जे पाहण्यायोग्य आहे तेच पाहतात. किंवा जसा एखादा विपरीत (भ्रमित) धारणा बाळगणारा मनुष्य जाणत असूनही यथार्थपणे जाणत नाही, पाहत असूनही यथार्थपणे पाहत नाही, तसे भगवान नाहीत. भगवान तर जाणत असतानाच यथार्थपणे जाणतात, पाहत असतानाच यथार्थपणे पाहतात. ते सत्याचे दर्शन घडवण्याचे नेतृत्व करत असल्यामुळे ‘चक्षुभूत’ (जगाचे नेत्र) आहेत. सत्य जाणवून देण्याचे कार्य करत असल्यामुळे ‘ज्ञानभूत’ आहेत. अविपरीत (यथार्थ) स्वभावामुळे किंवा परियत्ति धर्माचे प्रवर्तन करत असल्यामुळे, हृदयात चिंतन करून वाणीने उच्चारलेल्या धर्ममय स्वरूपाचे असल्यामुळे ते ‘धर्मभूत’ आहेत. श्रेष्ठत्वाच्या अर्थाने ते ‘ब्रह्मभूत’ आहेत. किंवा डोळ्यांसारखे बनले असल्यामुळे ते ‘चक्षुभूत’ आहेत. अशा प्रकारे या पदांचा अर्थ समजून घ्यावा. ते धर्माचे कथन करत असल्यामुळे ‘वक्ता’ आहेत. धर्माचे प्रवर्तन करत असल्यामुळे ‘प्रवर्तक’ आहेत. अर्थाला स्पष्ट करून दाखवण्यास समर्थ असल्यामुळे ते अर्थाचे ‘मार्गदर्शक’ (नेते) आहेत. अमृत-प्राप्तीसाठी (निर्वाण-प्राप्तीसाठी) प्रतिपदेचा (मार्गाचा) उपदेश करत असल्यामुळे ते ‘अमृताचे दाते’ आहेत. အဂရုံ ကရိတွာတိ ပုနပ္ပုနံ ယာစာပေန္တောပိ ဟိ ဂရုံ ကရောတိ နာမ. အတ္တနော သေက္ခပဋိသမ္ဘိဒါဉာဏေ ဌတွာ သိနေရုပါဒတော ဝါလိကံ ဥဒ္ဓရမာနော ဝိယ ဒုဗ္ဗိညေယျံ ကတွာ ကထေန္တောပိ ဂရုံ ကရောတိယေဝ နာမ. ဧဝံ အကတွာ အမှေ ပုနပ္ပုနံ အယာစာပေတွာ သုဝိညေယျမ္ပိ နော ကတွာ ကထေဟီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ‘अगारुं करित्वा’ (कठीण न करता/भार न बनवता) म्हणजे: वारंवार याचना करायला लावणारा देखील कठीण (भार) करतो. आपल्या शैक्ष-प्रतिसंभिदा ज्ञानात स्थित राहून, सुमेरू पर्वताच्या पायथ्याशी वाळूचे कण उपसल्याप्रमाणे कठीण (दुर्बोध) करून सांगणारा देखील कठीणच (भार) करतो. असे न करता, आम्हाला वारंवार याचना करायला न लावता, आमच्यासाठी ते सुबोध (सहज समजणारे) करून सांगावे, असा अर्थ आहे. ယံ ခေါ ဝေါတိ ယံ ခေါ တုမှာကံ. စက္ခုနာ ခေါ, အာဝုသော, လောကသ္မိံ လောကသညီ ဟောတိ လောကမာနီတိ စက္ခုဉှိ လောကေ အပ္ပဟီနဒိဋ္ဌိ ပုထုဇ္ဇနော သတ္တလောကဝသေန လောကောတိ သဉ္ဇာနာတိ စေဝ မညတိ စ, တထာ စက္ကဝါဠလောကဝသေန. န ဟိ အညတြ စက္ခာဒီဟိ ဒွါဒသာယတနေဟိ တဿ သာ သညာ ဝါ မာနော ဝါ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. တေန ဝုတ္တံ, ‘‘စက္ခုနာ ခေါ, အာဝုသော, လောကသ္မိံ လောကသညီ ဟောတိ လောကမာနီ’’တိ. ဣမဿ စ လောကဿ ဂမနေန အန္တော နာမ ဉာတုံ ဝါ ဒဋ္ဌုံ ဝါ ပတ္တုံ ဝါ န သက္ကာ. လုဇ္ဇနဋ္ဌေန ပန တဿေဝ စက္ခာဒိဘေဒဿ လောကဿ နိဗ္ဗာနသင်္ခါတံ အန္တံ အပ္ပတွာ ဝဋ္ဋဒုက္ခဿ အန္တကိရိယာ နာမ နတ္ထီတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ‘यं खो वो’ म्हणजे जे तुमच्यासाठी. ‘चक्खुना खो, आवुसो, लोकस्मिं लोकसञ्ञी होति लोकमानी’ म्हणजे: हे आवुसो, डोळ्यांमुळेच जगात लोकसंज्ञी (जगाची संज्ञा असणारा) आणि लोकमान्य (जगाचा अभिमान बाळगणारा) होतो. कारण जगात ज्याची मिथ्यादृष्टी नष्ट झाली नाही असा पृथग्जन (अज्ञानी मनुष्य) डोळ्यालाच सत्त्वलोकाच्या दृष्टीने ‘लोक’ (जग) म्हणून ओळखतो आणि मानतो, तसेच चक्रवाळलोकाच्या दृष्टीनेही. कारण डोळे इत्यादी बारा आयतनांशिवाय त्याची ती संज्ञा किंवा मान (अभिमान) उत्पन्न होत नाही. म्हणूनच म्हटले आहे, ‘हे आवुसो, डोळ्यांमुळेच जगात लोकसंज्ञी आणि लोकमान्य होतो.’ आणि या जगाच्या प्रवासाने (शारीरिक प्रवासाने) जगाचा अंत जाणणे, पाहणे किंवा तिथे पोहोचणे शक्य नाही. परंतु, नष्ट होण्याच्या (क्षय होण्याच्या) स्वभावामुळे, डोळे इत्यादी भेदांनी युक्त असलेल्या या जगाच्या निर्वाण नावाच्या अंताला पोहोचल्याशिवाय, संसारदुःखाचा अंत करणे शक्य नाही, असे समजून घ्यावे. ဧဝံ ပဉှံ ဝိဿဇ္ဇေတွာ ဣဒါနိ ‘‘သာဝကေန ပဉှော ကထိတောတိ မာ နိက္ကင်္ခါ အဟုဝတ္ထ, အယံ ဘဂဝါ သဗ္ဗညုတညာဏတုလံ ဂဟေတွာ နိသိန္နော. ဣစ္ဆမာနာ တမေဝ ဥပသင်္ကမိတွာ နိက္ကင်္ခါ ဟောထာ’’တိ ဥယျောဇေန္တော အာကင်္ခမာနာ ပနာတိအာဒိမာဟ. अशा प्रकारे प्रश्नाचे उत्तर देऊन आता, ‘श्रावकाने प्रश्नाचे उत्तर दिले आहे म्हणून तुम्ही संशयरहित होऊ नका. हे भगवान सर्वज्ञता-ज्ञानरूपी तराजू घेऊन बसले आहेत. जर तुमची इच्छा असेल तर त्यांच्याकडेच जाऊन संशयरहित व्हा,’ असे प्रोत्साहित करत (आयुष्यमान आनंदांनी) ‘आकङ्खमाना पन’ (परंतु इच्छा असल्यास) इत्यादी म्हटले. ဣမေဟိ အာကာရေဟီတိ ဣမေဟိ ကာရဏေဟိ စက္ကဝါဠလောကဿ အန္တာဘာဝကာရဏေဟိ စေဝ သင်္ခါရလောကဿ အန္တာပတ္တိကာရဏေဟိ စ. ဣမေဟိ ပဒေဟီတိ ဣမေဟိ အက္ခရသမ္ပိဏ္ဍနေဟိ. ဗျဉ္ဇနေဟီတိ ပါဋိယေက္ကအက္ခရေဟိ. ‘इमेहि आकारेहि’ म्हणजे या कारणांनी—चक्रवाळलोकाचा अंत नसण्याच्या कारणांनी आणि संस्कारलोकाच्या अंताला (निर्वाणाला) पोहोचण्याच्या कारणांनी. ‘इमेहि पदेहि’ म्हणजे या अक्षरांच्या समूहाने (पदांनी). ‘व्यञ्जनेहि’ म्हणजे वेगवेगळ्या अक्षरांनी. ပဏ္ဍိတောတိ ပဏ္ဍိစ္စေန သမန္နာဂတော. စတူဟိ ကာရဏေဟိ ပဏ္ဍိတော ဓာတုကုသလော အာယတနကုသလော ပစ္စယာကာရကုသလော ကာရဏာကာရဏကုသလောတိ. မဟာပညောတိ မဟန္တေ အတ္ထေ မဟန္တေ ဓမ္မေ မဟန္တာ [Pg.35] နိရုတ္တိယော မဟန္တာနိ ပဋိဘာနာနိ ပဋိဂ္ဂဏှနသမတ္ထတာယ မဟာပညာယ သမန္နာဂတော. ယထာ တံ အာနန္ဒေနာတိ ယထာ အာနန္ဒေန ဗျာကတံ, တံ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ. ယထာ အာနန္ဒေန တံ ဗျာကတံ, အဟမ္ပိ တံ ဧဝမေဝ ဗျာကရေယျန္တိ အတ္ထော. ‘पण्डितो’ म्हणजे पांडित्याने (प्रज्ञेने) युक्त असलेला. चार कारणांमुळे पंडित: धातू-कुशल (धातूंचे ज्ञान असलेला), आयतन-कुशल, प्रत्ययाकार-कुशल (प्रतीत्यसमुत्पाद जाणणारा), आणि कारण-अकारण-कुशल (योग्य आणि अयोग्य कारण जाणणारा). ‘महापञ्ञो’ म्हणजे महान अर्थ, महान धर्म, महान निरुक्ती आणि महान प्रतिभान ग्रहण करण्यास समर्थ असल्यामुळे महाप्रज्ञेने युक्त असलेला. ‘यथा तं आनन्देन’ म्हणजे जसे आनंदाने स्पष्ट केले, त्याला उद्देशून म्हटले आहे. ‘जसे आनंदाने ते स्पष्ट केले, मी देखील ते तसेच स्पष्ट करेन,’ असा अर्थ आहे. ၄. ကာမဂုဏသုတ္တဝဏ္ဏနာ ४. कामगुणसुत्तवण्णना (कामगुण सूत्राचे स्पष्टीकरण) ၁၁၇. စတုတ္ထေ ယေ မေတိ ယေ မမ. စေတသော သမ္ဖုဋ္ဌပုဗ္ဗာတိ စိတ္တေန အနုဘူတပုဗ္ဗာ. တတြ မေ စိတ္တံ ဗဟုလံ ဂစ္ဆမာနံ ဂစ္ဆေယျာတိ တေသု ပါသာဒတ္တယတိဝိဓနာဋကာဒိဘေဒသမ္ပတ္တိဝသေန အနုဘူတပုဗ္ဗေသု ပဉ္စသု ကာမဂုဏေသု ဗဟူသု ဝါရေသု ဥပ္ပဇ္ဇမာနံ ဥပ္ပဇ္ဇေယျာတိ ဒီပေတိ. ပစ္စုပ္ပန္နေသု ဝါတိ ဣဓ ပဓာနစရိယကာလေ ဆဗ္ဗဿာနိ သုပုပ္ဖိတဝနသဏ္ဍဇာတာနံ ဒိဇဂဏာဒီနံ ဝသေန ဒိဋ္ဌသုတာဒိဘေဒံ မနောရမာရမ္မဏံ ကာမဂုဏံ ကတွာ ဒဿေန္တော ‘‘ဧဝရူပေသု ပစ္စုပ္ပန္နေသု ဝါ ဗဟုလံ ဥပ္ပဇ္ဇေယျာ’’တိ ဒဿေတိ. အပ္ပံ ဝါ အနာဂတေသူတိ အနာဂတေ ‘‘မေတ္တေယျော နာမ ဗုဒ္ဓေါ ဘဝိဿတိ, သင်္ခေါ နာမ ရာဇာ, ကေတုမတီ နာမ ရာဇဓာနီ’’တိအာဒိဝသေန (ဒီ. နိ. ၃.၁၀၆) ပရိတ္တကမေဝ အနာဂတေသု ကာမဂုဏေသု ဥပ္ပဇ္ဇေယျာတိ ဒဿေတိ. တတြ မေ အတ္တရူပေနာတိ တတြ မယာ အတ္တနော ဟိတကာမဇာတိကေန. အပ္ပမာဒေါတိ သာတစ္စကိရိယာ ပဉ္စသု ကာမဂုဏေသု စိတ္တဿ အဝေါဿဂ္ဂေါ. သတီတိ အာရမ္မဏပရိဂ္ဂဟိတသတိ. အာရက္ခောတိ အယံ အပ္ပမာဒေါ စ သတိ စ စေတသော အာရက္ခော ကရဏီယော, ဧဝံ မေ အဟောသီတိ ဒဿေတိ, အာရက္ခတ္ထာယ ဣမေ ဒွေ ဓမ္မာ ကာတဗ္ဗာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ११७. चौथ्या सूत्रात, ‘ये मे’ म्हणजे जे माझे. ‘चेतसो सम्फुट्ठपुब्बा’ म्हणजे चित्ताने पूर्वी अनुभवलेले. ‘तेथे माझे चित्त वारंवार धावू शकते’ म्हणजे तीन प्रासाद (ऋतूंनुसार तीन महाल), विविध प्रकारचे नाटक इत्यादी ऐश्वर्याच्या रूपाने पूर्वी अनुभवलेल्या त्या पाच कामगुणांकडे अनेक वेळा उत्पन्न होणारे चित्त धावू शकते, हे दर्शवले आहे. ‘पच्चुप्पन्नेसु वा’ म्हणजे येथे प्रधानचर्या (दुष्करचर्या) करण्याच्या काळात, सहा वर्षे चांगल्या प्रकारे फुललेल्या वनखंडात राहणाऱ्या पक्ष्यांच्या समूहादींच्या द्वारे पाहिलेल्या आणि ऐकलेल्या विविध प्रकारच्या मनोरम आलंबनांना कामगुण बनवून दाखवताना, ‘अशा प्रकारच्या वर्तमान कामगुणांमध्ये देखील चित्त वारंवार उत्पन्न होऊ शकते,’ हे दर्शवले आहे. ‘अप्पं वा अनागतेसू’ म्हणजे भविष्यात ‘मेत्तेय्य नावाचे बुद्ध होतील, संख नावाचा राजा होईल, केतुमती नावाची राजधानी होईल’ इत्यादींच्या द्वारे अगदी थोड्या प्रमाणात भविष्यातील कामगुणांमध्ये चित्त उत्पन्न होऊ शकते, हे दर्शवले आहे. ‘तत्र मे अत्तरूपेन’ म्हणजे तेथे स्वतःचे हित इच्छिणाऱ्या माझ्याद्वारे. ‘अप्पमादो’ म्हणजे सातत्यपूर्ण क्रिया (कुशल धर्मात तत्परता) आणि पाच कामगुणांमध्ये चित्ताला मोकळे न सोडणे. ‘सती’ म्हणजे आलंबनाला ग्रहण करणारी स्मृती. ‘आरक्खो’ म्हणजे हा अप्रमाद आणि स्मृती हा चित्ताचा रक्षक (आरक्षक) केला पाहिजे. ‘असा माझा विचार झाला,’ हे दर्शवले आहे. रक्षणासाठी हे दोन धर्म उत्पन्न केले पाहिजेत, असे म्हटले आहे. တသ္မာတိဟ, ဘိက္ခဝေ, သေ အာယတနေ ဝေဒိတဗ္ဗေတိ ယသ္မာ စေတသော အာရက္ခတ္ထာယ အပ္ပမာဒေါ စ သတိ စ ကာတဗ္ဗာ, ယသ္မာ တသ္မိံ အာယတနေ ဝိဒိတေ အပ္ပမာဒေန ဝါ သတိယာ ဝါ ကာတဗ္ဗံ နတ္ထိ, တသ္မာ သေ အာယတနေ ဝေဒိတဗ္ဗေ, တံ ကာရဏံ ဇာနိတဗ္ဗန္တိ အတ္ထော. သဠာယတနနိရောဓန္တိ သဠာယတနနိရောဓော ဝုစ္စတိ နိဗ္ဗာနံ, တံ သန္ဓာယ ဘာသိတန္တိ အတ္ထော. နိဗ္ဗာနသ္မိဉှိ စက္ခုအာဒီနိ စေဝ နိရုဇ္ဈန္တိ ရူပသညာဒယော စ နိရုဇ္ဈန္တီတိ. သေသံ ဝုတ္တနယမေဝ. ‘म्हणूनच, भिक्खूंनो, ते आयतन जाणले पाहिजे’ म्हणजे: ज्याअर्थी चित्ताच्या रक्षणासाठी अप्रमाद आणि स्मृती उत्पन्न केली पाहिजे, आणि ज्याअर्थी त्या आयतनाचा बोध झाल्यावर अप्रमादाने किंवा स्मृतीने काहीही करणे उरत नाही, म्हणूनच ते आयतन जाणले पाहिजे, ते कारण जाणले पाहिजे असा अर्थ आहे. ‘सळायतननिरोधं’ म्हणजे षडायतन-निरोध ज्याला निर्वाण म्हटले जाते, त्याला उद्देशून हे म्हटले आहे असा अर्थ आहे. कारण निर्वाणामध्ये डोळे इत्यादी देखील निरुद्ध होतात आणि रूपसंज्ञा इत्यादी देखील निरुद्ध होतात. उर्वरित भाग पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच आहे. ၅-၆. သက္ကပဉှသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ५-६. सक्कपञ्हसुत्तादिवण्णना (शक्रप्रश्न सूत्रादींचे स्पष्टीकरण) ၁၁၈-၁၁၉. ပဉ္စမေ [Pg.36] ဒိဋ္ဌေဝ ဓမ္မေတိ ဣမသ္မိံယေဝ အတ္တဘာဝေ. ပရိနိဗ္ဗာယန္တီတိ ကိလေသပရိနိဗ္ဗာနေန ပရိနိဗ္ဗာယန္တိ. တန္နိဿိတံ ဝိညာဏံ ဟောတီတိ တဏှာနိဿိတံ ကမ္မဝိညာဏံ ဟောတိ. တဒုပါဒါနန္တိ တံဂဟဏံ, တဏှာဂဟဏေန သဟဂတံ ဝိညာဏံ ဟောတီတိ အတ္ထော. ဆဋ္ဌံ ဥတ္တာနမေဝ. ११८-११९. पाचव्या सूत्रात, ‘दिट्ठेव धम्मे’ म्हणजे याच आत्मभावात (याच जन्मात). ‘परिनिब्बायन्ति’ म्हणजे क्लेश-परिनिर्वाणाने परिनिर्वाण पावतात (शांत होतात). ‘तन्निस्सितं विञ्ञाणं होति’ म्हणजे तृष्णेवर आश्रित असलेले कर्म-विज्ञान असते. ‘तदुपादानं’ म्हणजे ते ग्रहण करणे, तृष्णेच्या ग्रहणाने युक्त असलेले विज्ञान असते असा अर्थ आहे. सहावे सूत्र स्पष्टच आहे. ၇. သာရိပုတ္တသဒ္ဓိဝိဟာရိကသုတ္တဝဏ္ဏနာ ७. सारिपुत्तसद्धिविहारिकसुत्तवण्णना (सारिपुत्त सार्धविहारिक सूत्राचे स्पष्टीकरण) ၁၂၀. သတ္တမေ သန္တာနေဿတီတိ ဃဋေဿတိ, ယောဂဝိစ္ဆေဒမဿ ပါပုဏိတုံ န ဒဿတိ. १२०. सातव्या सूत्रात, ‘सन्तानेस्सति’ म्हणजे जोडेल (प्रयत्न करेल), त्याच्या योगाचा (साधनेचा) विच्छेद होऊ देणार नाही. ၈. ရာဟုလောဝါဒသုတ္တဝဏ္ဏနာ ८. राहुलोवादसुत्तवण्णना (राहुलोवाद सूत्राचे स्पष्टीकरण) ၁၂၁. အဋ္ဌမေ ဝိမုတ္တိပရိပါစနိယာတိ ဝိမုတ္တိံ ပရိပါစေန္တီတိ ဝိမုတ္တိပရိပါစနိယာ. ဓမ္မာတိ ပန္နရသ ဓမ္မာ, တေ သဒ္ဓိန္ဒြိယာဒီနံ ဝိသုဒ္ဓိကရဏဝသေန ဝေဒိတဗ္ဗာ. ဝုတ္တဉှေတံ – १२१. आठव्या सुत्तात, 'विमुत्तिपरिपचनीया' (विमुक्तिपरिपचनीया) म्हणजे जे विमुक्तीला (अर्हत्त्वाला) परिपक्व करतात ते 'विमुत्तिपरिपचनीया' होत. 'धम्मा' (धर्माः) म्हणजे पंधरा धर्म (किंवा तत्त्वे); ते सद्धिन्द्रिय (श्रद्धेंद्रिय) इत्यादींच्या विशुद्धीकरणाच्या कारणाने जाणावेत. कारण असे म्हटले आहे - ‘‘အဿဒ္ဓေ ပုဂ္ဂလေ ပရိဝဇ္ဇယတော, သဒ္ဓေ ပုဂ္ဂလေ သေဝတော ဘဇတော ပယိရုပါသတော, ပသာဒနီယေ သုတ္တန္တေ ပစ္စဝေက္ခတော, ဣမေဟိ တီဟာကာရေဟိ သဒ္ဓိန္ဒြိယံ ဝိသုဇ္ဈတိ. ကုသီတေ ပုဂ္ဂလေ ပရိဝဇ္ဇယတော, အာရဒ္ဓဝီရိယေ ပုဂ္ဂလေ သေဝတော ဘဇတော ပယိရုပါသတော, သမ္မပ္ပဓာနေ ပစ္စဝေက္ခတော, ဣမေဟိ တီဟာကာရေဟိ ဝီရိယိန္ဒြိယံ ဝိသုဇ္ဈတိ. မုဋ္ဌဿတီ ပုဂ္ဂလေ ပရိဝဇ္ဇယတော, ဥပဋ္ဌိတဿတီ ပုဂ္ဂလေ သေဝတော ဘဇတော ပယိရုပါသတော, သတိပဋ္ဌာနေ ပစ္စဝေက္ခတော, ဣမေဟိ တီဟာကာရေဟိ သတိန္ဒြိယံ ဝိသုဇ္ဈတိ. အသမာဟိတေ ပုဂ္ဂလေ ပရိဝဇ္ဇယတော, သမာဟိတေ ပုဂ္ဂလေ သေဝတော ဘဇတော ပယိရုပါသတော, ဈာနဝိမောက္ခေ ပစ္စဝေက္ခတော, ဣမေဟိ တီဟာကာရေဟိ သမာဓိန္ဒြိယံ ဝိသုဇ္ဈတိ. ဒုပ္ပညေ ပုဂ္ဂလေ ပရိဝဇ္ဇယတော, ပညဝန္တေ ပုဂ္ဂလေ သေဝတော ဘဇတော ပယိရုပါသတော, ဂမ္ဘီရဉာဏစရိယံ ပစ္စဝေက္ခတော, ဣမေဟိ တီဟာကာရေဟိ ပညိန္ဒြိယံ ဝိသုဇ္ဈတိ. ဣတိ ဣမေ ပဉ္စ ပုဂ္ဂလေ ပရိဝဇ္ဇယတော, ပဉ္စ ပုဂ္ဂလေ သေဝတော ဘဇတော ပယိရုပါသတော[Pg.37], ပဉ္စ သုတ္တန္တေ ပစ္စဝေက္ခတော, ဣမေဟိ ပန္နရသဟိ အာကာရေဟိ ဣမာနိ ပဉ္စိန္ဒြိယာနိ ဝိသုဇ္ဈန္တီ’’တိ (ပဋိ. မ. ၁.၁၈၄). “अश्रद्ध (श्रद्धा नसलेल्या) व्यक्तींना टाळल्याने, श्रद्धाळू व्यक्तींचे सेवन (संगती), भजन (सेवा) व उपासना केल्याने, आणि चित्त प्रसन्न करणाऱ्या सुत्तांचे प्रत्यवेक्षण (चिंतन) केल्याने - या तीन कारणांमुळे सद्धिन्द्रिय (श्रद्धेंद्रिय) विशुद्ध होते. आळशी व्यक्तींना टाळल्याने, आरब्धवीर्य (प्रयत्नशील) व्यक्तींचे सेवन, भजन व उपासना केल्याने, आणि सम्मप्पधान (सम्यक् प्रधानाचा) विचार करणाऱ्या सुत्तांचे प्रत्यवेक्षण केल्याने - या तीन कारणांमुळे वीरियिन्द्रिय (वीर्येन्द्रिय) विशुद्ध होते. विस्मरणशील (स्मृती नसलेल्या) व्यक्तींना टाळल्याने, उपट्टितस्सती (जागरूक स्मृती असलेल्या) व्यक्तींचे सेवन, भजन व उपासना केल्याने, आणि सतिपट्ठान (स्मृतिप्रस्थान) सुत्तांचे प्रत्यवेक्षण केल्याने - या तीन कारणांमुळे सतिन्द्रिय (स्मृतीन्द्रिय) विशुद्ध होते. समाधी नसलेल्या (असमाहित) व्यक्तींना टाळल्याने, समाहित (एकाग्र चित्त असलेल्या) व्यक्तींचे सेवन, भजन व उपासना केल्याने, आणि ध्यान व विमोक्षांचे प्रत्यवेक्षण केल्याने - या तीन कारणांमुळे समाधिन्द्रिय (समाधीन्द्रिय) विशुद्ध होते. दुर्बुद्धी (प्रज्ञा नसलेल्या) व्यक्तींना टाळल्याने, प्रज्ञावान व्यक्तींचे सेवन, भजन व उपासना केल्याने, आणि गंभीर ज्ञानचर्येचे (गंभीर ज्ञानाच्या विषयांचे) प्रत्यवेक्षण केल्याने - या तीन कारणांमुळे पञ्ञिन्द्रिय (प्रज्ञेन्द्रिय) विशुद्ध होते. अशा प्रकारे, या पाच प्रकारच्या व्यक्तींना टाळल्याने, पाच प्रकारच्या व्यक्तींचे सेवन, भजन व उपासना केल्याने, आणि पाच सुत्तांचे प्रत्यवेक्षण केल्याने - या पंधरा कारणांमुळे ही पाच इंद्रिये विशुद्ध होतात.” (पटिसम्भिदामग्ग १.१८४) အပရေပိ ပန္နရသ ဓမ္မာ ဝိမုတ္တိပရိပါစနိယာ – သဒ္ဓါပဉ္စမာနိ ဣန္ဒြိယာနိ, အနိစ္စသညာ, အနိစ္စေ ဒုက္ခသညာ, ဒုက္ခေ အနတ္တသညာ, ပဟာနသညာ, ဝိရာဂသညာတိ ဣမာ ပဉ္စ နိဗ္ဗေဓဘာဂိယာ သညာ, မေဃိယတ္ထေရဿ ကထိတာ ကလျာဏမိတ္တတာဒယော ပဉ္စ ဓမ္မာတိ (ဥဒါ. ၃၁). ကာယ ပန ဝေလာယ ဘဂဝတော ဧတဒဟောသီတိ? ပစ္စူသသမယေ လောကံ ဝေါလောကေန္တဿ. इतरही पंधरा धर्म विमुक्तीला परिपक्व करणारे आहेत - श्रद्धा हे पाचवे असणारी इंद्रिये (श्रद्धा, वीर्य, स्मृती, समाधी, प्रज्ञा ही पाच इंद्रिये), अनित्यसंज्ञा, अनित्यात दुःखसंज्ञा, दुःखात अनात्मसंज्ञा, प्रहाणसंज्ञा, आणि विरागसंज्ञा या पाच निब्बेधभागिय (सत्यभेदक) संज्ञा, आणि मेघिय थेरांना सांगितलेले कल्याणमित्रता इत्यादी पाच धर्म (उदान ३१). पण भगवंतांच्या मनात हा विचार कोणत्या वेळी आला? पहाटेच्या वेळी (प्रत्युषसमयी) जगाचे अवलोकन करत असताना. အနေကာနိ ဒေဝတာသဟဿာနီတိ အာယသ္မတာ ရာဟုလေန ပဒုမုတ္တရဿ ဘဂဝတော ပါဒမူလေ ပါလိတနာဂရာဇကာလေ ပတ္ထနံ ပဋ္ဌပေန္တေန သဒ္ဓိံ ပတ္ထနံ ပဋ္ဌပိတဒေဝတာသု ပန ကာစိ ဘူမဋ္ဌကာ ဒေဝတာ, ကာစိ အန္တလိက္ခဋ္ဌကာ, ကာစိ စာတုမဟာရာဇိကာ, ကာစိ ဒေဝလောကေ, ကာစိ ဗြဟ္မလောကေ နိဗ္ဗတ္တာ. ဣမသ္မိံ ပန ဒိဝသေ သဗ္ဗာပိ တာ ဧကဋ္ဌာနေ အန္ဓဝနသ္မိံယေဝ သန္နိပတိတာ, တာ သန္ဓာယာဟ – ‘‘အနေကာနိ ဒေဝတာသဟဿာနီ’’တိ. ဓမ္မစက္ခုန္တိ ဣမသ္မိံ သုတ္တေ စတ္တာရော စ မဂ္ဂါ စတ္တာရိ စ ဖလာနိ ဓမ္မစက္ခုန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗာနိ. တတ္ထ ဟိ ကာစိ ဒေဝတာ သောတာပန္နာ အဟေသုံ, ကာစိ သကဒါဂါမီ, အနာဂါမီ, ခီဏာသဝါ. တာသဉ္စ ပန ဒေဝတာနံ ဧတ္တကာတိ ဂဏနဝသေန ပရိစ္ဆေဒေါ နတ္ထိ. သေသံ သဗ္ဗတ္ထ ဥတ္တာနမေဝ. ‘अनेक देवतापैकी हजारो’ (अनेकानि देवतासहस्सानी) म्हणजे - आयुष्यमान राहुलांनी जेव्हा पदुमुत्तर भगवंतांच्या चरणांशी पालित नागराज असताना प्रणिधान (प्रार्थना) केले होते, तेव्हा त्यांच्यासोबत प्रणिधान केलेल्या देवतांपैकी काही भूमीवर राहणाऱ्या (भूमाठक) देवता, काही अंतरीक्षात राहणाऱ्या (अन्तलिक्खठक) देवता, काही चातुमहाराजिका देवलोकात, काही उच्च देवलोकात, तर काही ब्रह्मलोकात उत्पन्न झाल्या होत्या. परंतु आजच्या दिवशी त्या सर्व एकाच ठिकाणी अंधवनातच एकत्र आल्या होत्या; त्यांना उद्देशून भगवंतांनी “अनेक हजारो देवता” असे म्हटले. 'धम्मचक्खु' (धर्मचक्षु) म्हणजे या सुत्तात चार मार्ग आणि चार फळे 'धम्मचक्खु' म्हणून जाणावीत. कारण तेथे काही देवता सोतापन्न (श्रोतापन्न) झाल्या, काही सकदागामी (सकृदागामी), अनागामी आणि काही खीणआसव (क्षीणास्रव/अर्हत) झाल्या. त्या देवतांची संख्या एवढीच आहे, अशी मोजणी करता येत नाही. उर्वरित भाग सर्वत्र स्पष्टच आहे. ၉-၁၀. သံယောဇနိယဓမ္မသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ९-१०. संयोजनीयधम्मसुत्त इत्यादींचे वर्णन ၁၂၂-၁၂၃. နဝမဒသမာနိ ဣဋ္ဌာရမ္မဏဝသေန ကထိယမာနေ ဗုဇ္ဈနကာနံ ဝသေန ဝုတ္တာနီတိ. १२२-१२३. नववे आणि दहावे सुत्त इष्ट आलंबनाच्या स्वरूपात सांगितले जात असताना, जे बोध प्राप्त करण्यास (सत्य जाणण्यास) योग्य आहेत अशा व्यक्तींच्या उद्देशाने सांगितले गेले आहे. လောကကာမဂုဏဝဂ္ဂေါ ဒွါဒသမော. लोककामगुणवग्गो (लोककामगुणवर्ग) बारावा समाप्त. ၁၃. ဂဟပတိဝဂ္ဂေါ १३. गहपतिवग्गो (गृहपतिवर्ग) ၁-၃. ဝေသာလီသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ १-३. वेसालीसुत्त (वैशालीसुत्त) इत्यादींचे वर्णन ၁၂၄-၁၂၆. ဂဟပတိဝဂ္ဂဿ ပဌမေ ဥဂ္ဂေါတိ ပဏီတဒါယကာနံ အဂ္ဂဥဂ္ဂေါ, သော ဘဂဝတာ ‘‘ဧတဒဂ္ဂံ, ဘိက္ခဝေ, မမ သာဝကာနံ ပဏီတဒါယကာနံ ယဒိဒံ [Pg.38] ဥဂ္ဂေါ ဂဟပတီ’’တိ ဧဝံ ဧတဒဂ္ဂေ ဌပိတော. သေသမေတေသု စေဝ ဒွီသု, တတိယေ စ ဝုတ္တတ္ထမေဝ. १२४-१२६. गृहपतिवर्गाच्या पहिल्या सुत्तात 'उग्गो' (उग्ग) म्हणजे उत्तम दान देणाऱ्यांमध्ये श्रेष्ठ असलेला उग्ग गृहपती होय. भगवंतांनी त्यांना “भिक्खूहो, माझ्या श्रावकांमध्ये जे उत्तम दान देणारे आहेत, त्यांत उग्ग गृहपती श्रेष्ठ आहे” अशा शब्दांत एतदग्ग (सर्वश्रेष्ठ) पदावर प्रस्थापित केले होते. या दोन्ही सुत्तांमधील आणि तिसऱ्या सुत्तातील उर्वरित भागाचा अर्थ आधी सांगितल्याप्रमाणेच आहे. ၄-၅. ဘာရဒွါဇသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ४-५. भारद्वाजसुत्त इत्यादींचे वर्णन ၁၂၇-၁၂၈. စတုတ္ထေ ပိဏ္ဍံ ဥလမာနော ပရိယေသမာနော ပဗ္ဗဇိတောတိ ပိဏ္ဍောလော. သော ကိရ ပရိဇိဏ္ဏဘောဂေါ ဗြာဟ္မဏော အဟောသိ. အထ ဘိက္ခုသံဃဿ လာဘသက္ကာရံ ဒိသွာ ပိဏ္ဍတ္ထာယ နိက္ခမိတွာ ပဗ္ဗဇိတော. သော မဟန္တံ ကပလ္လပတ္တံ ဂဟေတွာ စရတိ, တေန ကပလ္လပူရံ ယာဂုံ ပိဝတိ, ကပလ္လပူရေ ပူဝေ ခါဒတိ, ကပလ္လပူရံ ဘတ္တံ ဘုဉ္ဇတိ. အထဿ မဟဂ္ဃသဘာဝံ သတ္ထု အာရောစယိံသု. သတ္ထာ တဿ ပတ္တတ္ထဝိကံ နာနုဇာနိ. ဟေဋ္ဌာမဉ္စေ ပတ္တံ နိက္ကုဇ္ဇိတွာ ဌပေတိ. သော ဌပေန္တောပိ ဃံသန္တောဝ ပဏာမေတွာ ဌပေတိ, ဂဏှန္တောပိ ဃံသန္တောဝ အာကဍ္ဎိတွာ ဂဏှာတိ. တံ ဂစ္ဆန္တေ ကာလေ ဓံသနေန ပရိက္ခီဏံ နာဠိကောဒနမတ္တမေဝ ဂဏှနကံ ဇာတံ. တတော သတ္ထု အာရောစေသုံ, အထဿ သတ္ထာ ပတ္တတ္ထဝိကံ အနုဇာနိ. ထေရော အပရေန သမယေန ဣန္ဒြိယဘာဝနံ ဘာဝေတွာ အဂ္ဂဖလေ အရဟတ္တေ ပတိဋ္ဌာသိ. ဣတိ သော ပိဏ္ဍတ္ထာယ ပဗ္ဗဇိတတ္တာ ပိဏ္ဍောလော, ဂေါတ္တေန ပန ဘာရဒွါဇောတိ ဥဘယံ ဧကတော ကတွာ ပိဏ္ဍောလဘာရဒွါဇောတိ ဝုစ္စတိ. १२७-१२८. चौथ्या सुत्तात, 'पिंड' (भिक्षा) शोधत व मिळवण्याच्या उद्देशाने प्रव्रजित झालेला तो 'पिंडोल' होय. असे म्हणतात की, तो एक दरिद्री (संपत्ती नष्ट झालेला) ब्राह्मण होता. नंतर भिक्खू संघाला मिळणारा लाभ आणि सत्कार पाहून, केवळ भिक्षेसाठी (उदरनिर्वाहासाठी) घर सोडून तो प्रव्रजित झाला. तो एक मोठे खापर-पात्र (मोठी भिक्षापात्र) घेऊन फिरत असे. त्या पात्राने तो पात्रभर कांजी प्यायचा, पात्रभर पुऱ्या (खाद्यपदार्थ) खायचा आणि पात्रभर भात जेवायचा. नंतर त्याच्या या अतिखादाड स्वभावाविषयी भिक्खूंनी शास्त्यांना (बुद्धांना) सांगितले. शास्त्यांनी त्याला सुरुवातीला पात्र-थैली (पात्र ठेवण्याची पिशवी) वापरण्याची अनुमती दिली नाही. तो आपले पात्र खाटेखाली पालथे करून ठेवत असे. ते ठेवतानाही तो जमिनीवर घासूनच सरकवून ठेवायचा, आणि काढतानाही जमिनीवर घासूनच ओढून काढायचा. काही काळानंतर, सतत घासल्या गेल्यामुळे ते पात्र झिजले आणि केवळ एक नाळी (एक माप) भात मावेल एवढेच लहान झाले. त्यानंतर भिक्खूंनी शास्त्यांना ही गोष्ट सांगितली, तेव्हा शास्त्यांनी त्याला पात्र-थैली वापरण्याची अनुमती दिली. नंतरच्या काळात, त्या थेरांनी इंद्रियभावना विकसित करून सर्वश्रेष्ठ फळ अशा अर्हत्त्व पदाची प्राप्ती केली. अशा प्रकारे, भिक्षेसाठी प्रव्रजित झाल्यामुळे त्यांना 'पिंडोल' म्हटले गेले आणि गोत्राने ते 'भारद्वाज' होते; या दोन्ही नावांना एकत्र करून त्यांना 'पिंडोलभारद्वाज' असे म्हटले जाते. ဥပသင်္ကမီတိ ဥဂ္ဂတုဂ္ဂတေဟိ မဟာအမစ္စေဟိ ပရိဝုတော ဥပသင်္ကမိ. ထေရော ကိရ ဧကဒိဝသံ သာဝတ္ထိယံ ပိဏ္ဍာယ စရိတွာ ကတဘတ္တကိစ္စော နိဒါဃသမယေ သီတဌာနေ ဒိဝါဝိဟာရံ နိသီဒိဿာမီတိ အာကာသေန ဂန္တွာ ဂင်္ဂါတီရေ ဥဒေနဿ ရညော ဥဒပါနံ နာမ ဥယျာနံ အတ္ထိ, တတ္ထ ပဝိသိတွာ အညတရသ္မိံ ရုက္ခမူလေ ဒိဝါဝိဟာရံ နိသီဒိ သီတေန ဥဒကဝါတေန ဗီဇိယမာနော. ‘उपसंकमि’ (जवळ गेले) म्हणजे अत्यंत प्रतिष्ठित अशा महा-अमात्यांनी (मंत्र्यांनी) वेढलेले असून जवळ गेले. असे म्हणतात की, एक दिवस ते थेर सावत्थीमध्ये भिक्षेसाठी फिरून, भोजन आटोपल्यावर, उन्हाळ्याच्या दिवसांत एखाद्या थंड ठिकाणी दिवाविहार (दुपारची विश्रांती) करण्यासाठी आकाशमार्गाने गेले. गंगा नदीच्या तीरावर राजा उदेनाचा 'उदपान' नावाचा उद्यान (बगीचा) होता. तेथे प्रवेश करून, एका झाडाच्या खाली, थंड पाण्याच्या वाऱ्याच्या झुळुकीचा आनंद घेत ते दिवाविहारासाठी बसले. ဥဒေနောပိ ခေါ နာမ ရာဇာ သတ္တာဟံ မဟာပါနံ ပိဝိတွာ သတ္တမေ ဒိဝသေ ဥယျာနံ ပဋိဇဂ္ဂါပေတွာ မဟာဇနပရိဝါရော ဥယျာနံ ဂန္တွာ မင်္ဂလသိလာပဋ္ဋေ အတ္ထတာယ သေယျာယ နိပဇ္ဇိ. တဿ ဧကာ ပရိစာရိကာ ပါဒေ သမ္ဗာဟမာနာ နိသိန္နာ. ရာဇာ ကမေန နိဒ္ဒံ ဩက္ကမိ. တသ္မိံ နိဒ္ဒံ ဩက္ကန္တေ နာဋကိတ္ထိယော ‘‘ယဿတ္ထာယ မယံ ဂီတာဒီနိ ပယောဇေယျာမ, သော နိဒ္ဒံ ဥပဂတော, န စ နိဒ္ဒါကာလေ [Pg.39] မဟာသဒ္ဒံ ကာတုံ ဝဋ္ဋတီ’’တိ အတ္တနော အတ္တနော တူရိယာနိ ဌပေတွာ ဥယျာနံ ပက္ကန္တာ. တာ တတ္ထ တတ္ထ ဖလာဖလာနိ ခါဒမာနာ ပုပ္ဖာနိ ပိဠန္ဓမာနာ ဝိစရန္တိယော ထေရံ ဒိသွာ ‘‘မာ သဒ္ဒံ ကရိတ္ထာ’’တိ အညမညံ နိဝါရယမာနာ ဝန္ဒိတွာ နိသီဒိံသု. ထေရော ‘‘ဣဿာ ပဟာတဗ္ဗာ, မစ္ဆေရံ ဝိနောဒေတဗ္ဗ’’န္တိအာဒိနာ နယေန တာသံ အနုရူပံ ဓမ္မကထံ ကထေသိ. राजा उदेन देखील सात दिवस सतत मद्यपान करून, सातव्या दिवशी उद्यान स्वच्छ करायला सांगून, मोठ्या जनसमुदायासह उद्यानात गेला आणि तेथील एका मंगल शिलापट्टावर (शुभ दगडी पाटावर) अंथरलेल्या बिछान्यावर झोपला. त्याची एक दासी त्याचे पाय चेपत बसली होती. राजा हळूहळू झोपी गेला. तो झोपल्यावर नर्तकींनी विचार केला, “ज्यांच्यासाठी आपण गायन-वादन करत होतो, ते तर झोपी गेले आहेत; आणि ते झोपलेले असताना मोठा आवाज करणे योग्य नाही.” असे म्हणून त्यांनी आपापली वाद्ये बाजूला ठेवली आणि त्या उद्यानात फिरू लागल्या. त्या इकडेतिकडे विविध फळे खात आणि फुले माळत फिरत असताना त्यांनी थेरांना पाहिले. “आवाज करू नका!” असे एकमेकींना बजावत, त्यांनी थेरांना वंदन केले आणि त्या तेथे बसल्या. थेरांनी त्यांना “ईर्ष्या (मत्सर) सोडली पाहिजे, कृपणता (कंजूषपणा) दूर केली पाहिजे” इत्यादी उपदेशांद्वारे त्यांच्यासाठी योग्य अशी धम्मकथा (धर्माचा उपदेश) सांगितली. သာပိ ခေါ ရညော ပါဒေ သမ္ဗာဟမာနာ နိသိန္နာ ဣတ္ထီ ပါဒေ စာလေတွာ ရာဇာနံ ပဗောဓေသိ. သော ‘‘ကဟံ တာ ဂတာ’’တိ ပုစ္ဆိ. ကိံ တာသံ တုမှေဟိ? တာ ဧကံ သမဏံ ပရိဝါရေတွာ နိသိန္နာတိ. ရာဇာ ကုဒ္ဓေါ ဥဒ္ဓနေ ပက္ခိတ္တလောဏံ ဝိယ တဋတဋာယမာနော ဥဋ္ဌဟိတွာ ‘‘တမ္ဗကိပိလ္လိကာဟိ နံ ခါဒါပေဿာမီ’’တိ ဂစ္ဆန္တော ဧကသ္မိံ အသောကရုက္ခေ တမ္ဗကိပိလ္လိကာနံ ပုဋံ ဒိသွာ ဟတ္ထေနာကဍ္ဎိတွာ သာခံ ဂဏှိတုံ နာသက္ခိ. ကိပိလ္လိကပုဋော ဆိဇ္ဇိတွာ ရညော သီသေ ပတိ, သကလသရီရံ သာလိထုသေဟိ ပရိကိဏ္ဏံ ဝိယ ဒဏ္ဍဒီပိကာဟိ ဍယှမာနံ ဝိယ စ အဟောသိ. ထေရော ရညော ပဒုဋ္ဌဘာဝံ ဉတွာ ဣဒ္ဓိယာ အာကာသံ ပက္ခန္ဒိ. တာပိ ဣတ္ထိယော ဥဋ္ဌာယ ရညော သန္တိကံ ဂန္တွာ သရီရံ ပုဉ္ဆန္တိယော ဝိယ ဘူမိယံ ပတိတပတိတာ ကိပိလ္လိကာယော ဂဟေတွာ သရီရေ ခိပမာနာ သဗ္ဗာ မုခသတ္တီဟိ ဝိဇ္ဈိံသု – ‘‘ကိံ နာမေတံ, အညေ ရာဇာနော ပဗ္ဗဇိတေ ဒိသွာ ဝန္ဒန္တိ, ပဉှံ ပုစ္ဆန္တိ, အယံ ပန ရာဇာ ကိပိလ္လိကပုဋံ သီသေ ဘိန္ဒိတုကာမော ဇာတော’’တိ. राजाचे पाय चेपत बसलेल्या त्या स्त्रीने पाय हलवून राजाला जागे केले. त्या राजाने विचारले, "त्या (स्त्रिया) कोठे गेल्या?" (ती म्हणाली,) "तुम्हाला त्यांच्याशी काय करायचे आहे? त्या एका श्रमणाला वेढून बसल्या आहेत." राजा क्रोधाने चुलीत टाकलेल्या मिठासारखा तडतडत उठला आणि "मी त्याला तांबड्या मुंग्यांकडून चावून घेईन" असे म्हणत जात असताना, एका अशोक वृक्षावर तांबड्या मुंग्यांचे घरटे पाहून हाताने ओढून फांदी पकडण्याचा प्रयत्न करू लागला, पण तो असमर्थ ठरला. मुंग्यांचे घरटे तुटून राजाच्या डोक्यावर पडले, ज्यामुळे त्याचे संपूर्ण शरीर तांबड्या साळीच्या कोंड्याने माखल्यासारखे आणि मशालींनी जळत असल्यासारखे झाले. थेरांनी राजाचा दुष्ट हेतू जाणून ऋद्धीने आकाशात उड्डाण केले. त्या स्त्रियाही उठून राजाजवळ गेल्या आणि त्याचे शरीर पुसल्यासारखे करत जमिनीवर पडलेल्या मुंग्या उचलून त्याच्या अंगावर टाकू लागल्या आणि सर्वजणी आपल्या वाक्-बाणांनी टोचून बोलू लागल्या, "हे काय आहे? इतर राजे प्रव्रजितांना पाहून वंदन करतात, प्रश्न विचारतात; पण हा राजा मात्र मुंग्यांचे घरटे डोक्यावर फोडू इच्छितो!" ရာဇာ အတ္တနော အပရာဓံ ဒိသွာ ဥယျာနပါလံ ပက္ကောသာပေတွာ ပုစ္ဆိ – ‘‘ကိံ ဧသ ပဗ္ဗဇိတော? အညေသုပိ ဒိဝသေသု ဣဓ အာဂစ္ဆတီ’’တိ? အာမ, ဒေဝါတိ. ဣဓ တွံ အာဂတဒိဝသေ မယှံ အာရောစေယျာသီတိ. ထေရောပိ ကတိပါဟေနေဝ ပုန အာဂန္တွာ ရုက္ခမူလေ နိသီဒိ. ဥယျာနပါလော ဒိသွာ – ‘‘မဟန္တော မေ အယံ ပဏ္ဏာကာရော’’တိ ဝေဂေန ဂန္တွာ ရညော အာရောစေသိ. ရာဇာ ဥဋ္ဌဟိတွာ သင်္ခပဏဝါဒိသဒ္ဒံ နိဝါရေတွာ ဥဂ္ဂတုဂ္ဂတေဟိ အမစ္စေဟိ သဒ္ဓိံ ဥယျာနံ အဂမာသိ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘ဥပသင်္ကမီ’’တိ. राजाने स्वतःची चूक जाणून उद्यानपालाला बोलावून विचारले, "हा प्रव्रजित इतर दिवशीही येथे येतो का?" उद्यानपाल म्हणाला, "होय, महाराज." (राजा म्हणाला,) "तो येथे आल्याच्या दिवशी तू मला कळवावे." थेर देखील काही दिवसांनी पुन्हा येऊन एका झाडाखाली बसले. उद्यानपालाने त्यांना पाहून, "हा माझ्यासाठी मोठा नजराणा आहे" असे समजून वेगाने जाऊन राजाला कळवले. राजा उठला आणि शंख-मृदंग इत्यादी वाद्यांचा आवाज बंद करून, थोर थोर अमात्यांसह उद्यानात गेला. म्हणूनच "जवळ गेला" (उपसंक्रमी) असे म्हटले आहे. အနိကီဠိတာဝိနော ကာမေသူတိ ယာ ကာမေသု ကာမကီဠာ, တံ အကီဠိတပုဗ္ဗာ, အပရိဘုတ္တကာမာတိ အတ္ထော. အဒ္ဓါနဉ္စ အာပါဒေန္တီတိ ပဝေဏိံ ပဋိပါဒေန္တိ, ဒီဃရတ္တံ အနုဗန္ဓာပေန္တိ. မာတုမတ္တီသူတိ မာတုပမာဏာသု. လောကသ္မိဉှိ မာတာ ဘဂိနီ ဓီတာတိ ဣဒံ တိဝိဓံ ဂရုကာရမ္မဏံ နာမ[Pg.40], ဣတိ ဂရုကာရမ္မဏေ ဥပနိဗန္ဓံ စိတ္တံ ဝိမောစေတုံ န လဘတီတိ ဒဿေန္တော ဧဝမာဟ. အထဿ တေန ပဉှေန စိတ္တံ အနောတရန္တံ ဒိသွာ ဘဂဝတာ ပဋိကူလမနသိကာရဝသေန စိတ္တူပနိဗန္ဓနတ္ထံ ဝုတ္တံ ဒွတ္တိံသာကာရကမ္မဋ္ဌာနံ ကထေသိ. 'अनिकीळिताविनो कामेसु' म्हणजे कामभोगांमध्ये जी कामक्रीडा असते, ती पूर्वी कधीही न खेळलेले, कामभोगांचा उपभोग न घेतलेले, असा अर्थ आहे. 'अद्धानञ्च आपादेन्ति' म्हणजे परंपरेचे पालन करतात, दीर्घकाळापर्यंत सातत्य राखतात. 'मातु मत्तीसु' म्हणजे आईच्या वयाच्या स्त्रियांमध्ये. जगात आई, बहीण आणि मुलगी हे तीन प्रकारचे आदरणीय आलंबन मानले जातात. अशा आदरणीय आलंबनाशी बांधलेले मन विचलित होऊ दिले जात नाही, हे दर्शवण्यासाठी असे म्हटले आहे. त्यानंतर, त्या प्रश्नाने राजाचे मन प्रसन्न होत नाही असे पाहून, भगवंतांनी प्रतिकूलमनसिकाराच्या आधारे मनाला एकाग्र करण्यासाठी सांगितलेले 'द्वात्रिंशदाकार कर्मस्थान' (३२ अवयवांचे ध्यान) थेरांनी सांगितले. အဘာဝိတကာယာတိ အဘာဝိတပဉ္စဒွါရိကကာယာ. တေသံ တံ ဒုက္ကရံ ဟောတီတိ တေသံ တံ အသုဘကမ္မဋ္ဌာနံ ဘာဝေတုံ ဒုက္ကရံ ဟောတိ. ဣတိဿ ဣမိနာပိ စိတ္တံ အနောတရန္တံ ဒိသွာ ဣန္ဒြိယသံဝရသီလံ ကထေသိ. ဣန္ဒြိယသံဝရသ္မိဉှိ ဥပနိဗန္ဓစိတ္တံ ဝိဟေဌေတုံ န လဘတိ. ရာဇာ တံ သုတွာ တတ္ထ ဩတိဏ္ဏစိတ္တော အစ္ဆရိယံ, ဘော ဘာရဒွါဇာတိအာဒိမာဟ. 'अभावितकाया' म्हणजे ज्यांनी पाच इंद्रियद्वारांच्या कायेची भावना केलेली नाही. 'तेसं तं दुक्करं होति' म्हणजे त्यांच्यासाठी त्या अशुभ कर्मस्थानाची भावना करणे कठीण असते. अशा प्रकारे, यानेही राजाचे मन प्रसन्न होत नाही असे पाहून, थेरांनी इंद्रियसंवरशील सांगितले. कारण इंद्रियसंवरशीलामध्ये बांधलेले मन विचलित करता येत नाही. राजाने ते ऐकून, त्यात त्याचे मन स्थिर झाले आणि तो म्हणाला, "आश्चर्य आहे, हे भारद्वाज!" इत्यादी. အရက္ခိတေနေဝ ကာယေနာတိအာဒီသု ဟတ္ထပါဒေ ကီဠာပေန္တော ဂီဝံ ပရိဝတ္တေန္တော ကာယံ န ရက္ခတိ နာမ, နာနပ္ပကာရံ ဒုဋ္ဌုလ္လံ ကထေန္တော ဝစနံ န ရက္ခတိ နာမ, ကာမဝိတက္ကာဒယော ဝိတက္ကေန္တော စိတ္တံ န ရက္ခတိ နာမ. ရက္ခိတေနေဝ ကာယေနာတိအာဒီသု ဝုတ္တဝိပရိယာယေန အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. 'अरक्खितेनेव कायेन' इत्यादींमध्ये, हात-पाय हलवणारा आणि मान इकडेतिकडे फिरवणारा कायेचे रक्षण करत नाही असे म्हटले जाते; विविध प्रकारचे वाईट शब्द बोलणारा वाणीचे रक्षण करत नाही असे म्हटले जाते; आणि कामवितर्क इत्यादींचे चिंतन करणारा मनाचे रक्षण करत नाही असे म्हटले जाते. 'रक्खितेनेव कायेन' इत्यादींमध्ये याच्या उलट अर्थ समजून घ्यावा. အတိဝိယ မံ တသ္မိံ သမယေ လောဘဓမ္မာ ပရိသဟန္တီတိ မံ တသ္မိံ သမယေ အတိက္ကမိတွာ လောဘော အဓိဘဝတီတိ အတ္ထော. ဥပဋ္ဌိတာယ သတိယာတိ ကာယဂတာယ သတိယာ သုပဋ္ဌိတာယ. န မံ တထာ တသ္မိံ သမယေတိ တသ္မိံ သမယေ မံ ယထာ ပုဗ္ဗေ, န တထာ လောဘော အတိက္ကမိတွာ ဥပ္ပဇ္ဇတီတိ အတ္ထော. ပရိသဟန္တီတိ ပဒဿ ဥပ္ပဇ္ဇန္တီတိပိ အတ္ထောယေဝ. ဣတိ ဣမသ္မိံ သုတ္တေ တယော ကာယာ ကထိတာ. ကထံ? ‘‘ဣမမေဝ ကာယ’’န္တိ ဧတ္ထ ဟိ ကရဇကာယော ကထိတော, ‘‘ဘာဝိတကာယော’’တိ ဧတ္ထ ပဉ္စဒွါရိကကာယော, ‘‘ရက္ခိတေနေဝ ကာယေနာ’’တိ ဧတ္ထ စောပနကာယော, ကာယဝိညတ္တီတိ အတ္ထော. ပဉ္စမံ ဥတ္တာနမေဝ. 'अतिविय मं तस्मिं समये लोभधम्मा परिसहन्ति' म्हणजे त्या वेळी माझ्यावर मात करून लोभ माझ्यावर ताबा मिळवतो, असा अर्थ आहे. 'उपट्टिताय सतिया' म्हणजे कायागत स्मृती चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित झाल्यामुळे. 'न मं तथा तस्मिं समये' म्हणजे त्या वेळी पूर्वीप्रमाणे लोभ माझ्यावर मात करून उत्पन्न होत नाही, असा अर्थ आहे. 'परिसहन्ति' या पदाचा अर्थ 'उत्पन्न होतात' असाच आहे. अशा प्रकारे या सूत्तात तीन काया सांगितल्या आहेत. कशा? "इममेव कायं" यामध्ये 'करजकाय' (भौतिक शरीर) सांगितली आहे, "भावितकायो" यामध्ये 'पंचद्वारिक काय' (पाच इंद्रियद्वारांची काया) सांगितली आहे, आणि "रक्खितेनेव कायेन" यामध्ये 'चोपनकाय' (क्रियाशील काया) सांगितली आहे, ज्याचा अर्थ 'कायविज्ञप्ती' असा आहे. पाचवे सूत्त अगदी स्पष्ट आहे. ၆. ဃောသိတသုတ္တဝဏ္ဏနာ ६. घोषितसुत्तवण्णना (घोषित सूत्ताचे वर्णन). ၁၂၉. ဆဋ္ဌေ ရူပါ စ မနာပါတိ ရူပါ စ မနာပါ သံဝိဇ္ဇန္တိ. စက္ခုဝိညာဏဉ္စာတိ စက္ခုဝိညာဏဉ္စ သံဝိဇ္ဇတိ. သုခဝေဒနိယံ ဖဿန္တိ စက္ခုဝိညာဏသမ္ပယုတ္တံ ဥပနိဿယဝသေန ဇဝနကာလေ သုခဝေဒနာယ ပစ္စယဘူတံ ဖဿံ. သုခါ ဝေဒနာတိ ဧကံ ဖဿံ ပဋိစ္စ ဇဝနဝသေန သုခဝေဒနာ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. သေသပဒေသုပိ ဧသေဝ နယော. १२९. सहाव्या सूत्तात, 'रूपा च मनापा' म्हणजे मनोहर रूपे देखील विद्यमान असतात. 'चक्खुविञ्ञाणञ्च' म्हणजे चक्षुविज्ञान देखील विद्यमान असते. 'सुखवेदनीयं फस्सं' म्हणजे चक्षुविज्ञानाशी संप्रयुक्त असलेला, उपनिश्रय प्रभावाने जवनकाळात सुखवेदनेला कारणीभूत ठरणारा स्पर्श. 'सुखा वेदना' म्हणजे एका स्पर्शावर अवलंबून जवनाच्या प्रभावाने सुखवेदना उत्पन्न होते. उर्वरित पदांमध्येही हाच नियम समजून घ्यावा. ဣတိ [Pg.41] ဣမသ္မိံ သုတ္တေ တေဝီသတိ ဓာတုယော ကထိတာ. ကထံ? ဧတ္ထ ဟိ စက္ခုပသာဒေါ စက္ခုဓာတု, တဿ အာရမ္မဏံ ရူပဓာတု, စက္ခုဝိညာဏံ ဝိညာဏဓာတု, စက္ခုဝိညာဏဓာတုယာ သဟဇာတာ တယော ခန္ဓာ ဓမ္မဓာတု, ဧဝံ ပဉ္စသု ဒွါရေသု စတုန္နံ စတုန္နံ ဝသေန ဝီသတိ. မနောဒွါရေ ‘‘မနောဓာတူ’’တိ အာဝဇ္ဇနစိတ္တံ ဂဟိတံ, အာရမ္မဏဉ္စေဝ ဟဒယဝတ္ထု စ ဓမ္မဓာတု, ဝတ္ထုနိဿိတံ မနောဝိညာဏဓာတူတိ ဧဝံ တေဝီသတိ ဟောန္တိ. ဧဝံ တေဝီသတိယာ ဓာတူနံ ဝသေန ဓာတုနာနတ္တံ ဝုတ္တံ ဘဂဝတာတိ ဒဿေတိ. अशा प्रकारे या सूत्तात तेवीस धातू सांगितले आहेत. कसे? येथे चक्षुप्रसाद हा 'चक्षुधातू' आहे, त्याचे आलंबन हा 'रूपधातू' आहे, चक्षुविज्ञान हा 'विज्ञानधातू' आहे, आणि चक्षुविज्ञानधातूशी सहजात असलेले तीन स्कंध हे 'धर्मधातू' आहेत. अशा प्रकारे पाच द्वारांमध्ये प्रत्येकी चार-चार मिळून वीस धातू होतात. मनोध्वारात 'मनोधातू' म्हणून आवर्जन चित्त घेतले आहे, आलंबन आणि हृदयवस्तू हे 'धर्मधातू' आहेत, आणि वस्तूवर आश्रित असलेले चित्त हे 'मनोविज्ञानधातू' आहे. अशा प्रकारे तेवीस धातू होतात. अशा प्रकारे तेवीस धातूंच्या आधारे भगवंतांनी 'धातूनानात्व' (धातूंची विविधता) सांगितले आहे, हे दर्शवले आहे. ၇-၈. ဟာလိဒ္ဒိကာနိသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ७-८. हालिद्दिकानिसुत्तआदिवण्णना (हालिद्दिकानि सूत्त इत्यादींचे वर्णन). ၁၃၀-၁၃၁. သတ္တမေ မနာပံ ဣတ္ထေတန္တိ ပဇာနာတီတိ ယံ အနေန မနာပံ ရူပံ ဒိဋ္ဌံ, တံ ဣတ္ထေတန္တိ ဧဝမေတံ မနာပမေဝ တန္တိ ပဇာနာတိ. စက္ခုဝိညာဏံ သုခဝေဒနိယဉ္စ ဖဿံ ပဋိစ္စာတိ စက္ခုဝိညာဏဉ္စေဝ, ယော စ ဥပနိဿယကောဋိယာ ဝါ အနန္တရကောဋိယာ ဝါ သမနန္တရကောဋိယာ ဝါ သမ္ပယုတ္တကောဋိယာ ဝါ သုခဝေဒနာယ ပစ္စယော ဖဿော, တံ သုခဝေဒနိယံ ဖဿဉ္စ ပဋိစ္စ ဥပ္ပဇ္ဇတိ သုခဝေဒနာတိ. ဧသ နယော သဗ္ဗတ္ထ. ဣတိ ဣမေသု ဒွီသု သုတ္တေသု ကိရိယာမနောဝိညာဏဓာတု အာဝဇ္ဇနကိစ္စာ, မနောဓာတုယေဝ ဝါ သမာနာ မနောဓာတုနာမေန ဝုတ္တာတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. အဋ္ဌမံ ဥတ္တာနမေဝ. १३०-१३१. सातव्या सूत्तात, 'मनापं इत्थेतन्ति पजानाति' म्हणजे त्याने जे मनोहर रूप पाहिले आहे, ते मनोहरच आहे अशा प्रकारे तो जाणतो. 'चक्खुविञ्ञाणं सुखवेदनीयञ्च फस्सं पटिच्च' म्हणजे चक्षुविज्ञान आणि जो उपनिश्रय कोटीने, अनंतर कोटीने, समनंतर कोटीने किंवा संप्रयुक्त कोटीने सुखवेदनेचा प्रत्यय असणारा स्पर्श आहे, त्या सुखवेदनीय स्पर्शावर अवलंबून सुखवेदना उत्पन्न होते. हाच नियम सर्वत्र लागू होतो. अशा प्रकारे या दोन्ही सूत्तांमध्ये, आवर्जन कार्य करणारी क्रिया-मनोविज्ञानधातू किंवा मनोधातूच असताना तिला 'मनोधातू' या नावाने म्हटले गेले आहे, असे समजावे. आठवे सूत्त अगदी स्पष्ट आहे. ၉. လောဟိစ္စသုတ္တဝဏ္ဏနာ ९. लोहिच्चसुत्तवण्णना (लोहिच्च सूत्ताचे वर्णन). ၁၃၂. နဝမေ မက္ကရကတေတိ ဧဝံနာမကေ နဂရေ အရညကုဋိကာယန္တိ အရညေ ကတာယ ပါဋိယေက္ကာယ ကုဋိယံ, န ဝိဟာရပစ္စန္တကုဋိယံ. မာဏဝကာတိ ယေပိ တတ္ထ မဟလ္လကာ, တေ မဟလ္လကကာလေပိ အန္တေဝါသိကတာယ မာဏဝကာတွေဝ ဝုတ္တာ. တေနုပသင်္ကမိံသူတိ ပါတော သိပ္ပံ ဥဂ္ဂဏှိတွာ သာယံ ‘‘အာစရိယဿ ကဋ္ဌာနိ အာဟရိဿာမာ’’တိ အရညံ ပဝိသိတွာ ဝိစရန္တာ ယေန သာ ကုဋိကာ, တေနုပသင်္ကမိံသု. ပရိတော ပရိတော ကုဋိကာယာတိ တဿာ ကုဋိကာယ သမန္တတော သမန္တတော. သေလေယျကာနီတိ အညမညဿ ပိဋ္ဌိံ ဂဟေတွာ လင်္ဃိတွာ ဣတော စိတော စင်္ကမနကီဠနာနိ. १३२. नवव्या सूत्तात, 'मक्करकते' म्हणजे या नावाच्या नगरात. 'अरञ्ञकुटिकांय' म्हणजे अरण्यात बांधलेल्या एका स्वतंत्र कुटीत, मुख्य विहाराच्या शेजारील कुटीत नव्हे. 'माणवका' म्हणजे तिथे जे वयाने मोठे होते, त्यांनाही जवळ राहणारे शिष्य (अन्तेवासिक) असल्यामुळे 'माणवक' (तरुण/शिष्य) असेच म्हटले आहे. 'तेनुपसङ्कमिंसु' म्हणजे सकाळी विद्या ग्रहण करून संध्याकाळी 'आचार्यांसाठी लाकडे घेऊन येऊ' असे म्हणून अरण्यात प्रवेश करून फिरत असताना, जिथे ती कुटी होती, तिथे ते गेले. 'परितो परितो कुटिकाय' म्हणजे त्या कुटीच्या सभोवताली. 'सेलेय्यकानि' म्हणजे एकमेकांच्या पाठीवर चढून, उड्या मारून इकडे तिकडे धावणे व खेळणे. မုဏ္ဍကာတိအာဒီသု [Pg.42] မုဏ္ဍေ မုဏ္ဍာတိ, သမဏေ စ သမဏာတိ ဝတ္တုံ ဝဋ္ဋေယျ, ဣမေ ပန ဟီဠေန္တာ ‘‘မုဏ္ဍကာ သမဏကာ’’တိ အာဟံသု. ဣဗ္ဘာတိ ဂဟပတိကာ. ကဏှာတိ ကဏှာ, ကာဠကာတိ အတ္ထော. ဗန္ဓုပါဒါပစ္စာတိ ဧတ္ထ ဗန္ဓူတိ ဗြဟ္မာ အဓိပ္ပေတော. တဉှိ ဗြာဟ္မဏာ ပိတာမဟောတိ ဝေါဟရန္တိ. ပါဒါနံ အပစ္စာ ပါဒါပစ္စာ, ဗြဟ္မုနော ပိဋ္ဌိပါဒတော ဇာတာတိ အဓိပ္ပာယော. တေသံ ကိရ အယံ လဒ္ဓိ ‘‘ဗြာဟ္မဏာ ဗြဟ္မုနော မုခတော နိက္ခန္တာ, ခတ္တိယာ ဥရတော, ဝေဿာ နာဘိတော, သုဒ္ဒါ ဇာဏုတော, သမဏာ ပိဋ္ဌိပါဒတော’’တိ. ဘရတကာနန္တိ ကုဋိမ္ဗိကာနံ. ကုဋိမ္ဗိကာ ဟိ ယသ္မာ ရဋ္ဌံ ဘရန္တိ, တသ္မာ ဘရတာတိ ဝုစ္စန္တိ. ဣမေ ပန ပရိဘဝံ ကတွာ ဝဒမာနာ ‘‘ဘရတကာန’’န္တိ အာဟံသု. 'मुण्डका' इत्यादी शब्दांमध्ये, मुंडित डोके असलेल्याला 'मुंड' आणि श्रमणाला 'श्रमण' असे म्हणणे योग्य ठरले असते, परंतु हे (माणवक) त्यांचा अपमान करण्याच्या इच्छेने 'मुण्डका समणका' (भिकार मुंडके आणि तुच्छ श्रमण) असे म्हणाले. 'इब्भा' म्हणजे गृहपती. 'कण्हा' म्हणजे काळे किंवा हीन वर्णाचे, असा अर्थ आहे. 'बन्धुपादापच्चा' येथे 'बन्धु' म्हणजे ब्रह्मा अभिप्रेत आहे. कारण ब्राह्मण त्याला 'पितामह' (आजोबा) म्हणतात. पायांचे अपत्य म्हणजे 'पादापच्चा', म्हणजेच ब्रह्माच्या पाऊलावरून जन्मलेले, असा अभिप्राय आहे. त्यांची अशी समजूत आहे की—'ब्राह्मण ब्रह्माच्या मुखातून निघाले, क्षत्रिय छातीतून, वैश्य नाभीतून, शूद्र गुडघ्यातून आणि श्रमण पाऊलावरून निघाले.' 'भरतकानं' म्हणजे कुटुंबिकांचे (गृहपतींचे). कारण कुटुंबिक राष्ट्राचे भरण-पोषण करतात, म्हणून त्यांना 'भरत' म्हणतात. परंतु हे (माणवक) त्यांचा अनादर करून बोलताना 'भरतकानं' असे म्हणाले. ဝိဟာရာ နိက္ခမိတွာတိ ‘‘ရတ္တိဋ္ဌကာပရိစ္ဆန္နေ ရဇတပဋ္ဋသန္နိဘသမဝိပ္ပကိဏ္ဏဝါလိကေ ရမဏီယေ ပရိဝေဏေ ကဋ္ဌကလာပေ ဗန္ဓိတွာ ခိပမာနာ ဝါလိကံ အာလုဠေတွာ, ဟတ္ထေန ဟတ္ထံ အာဒါယ ပဏ္ဏကုဋိံ ပရိယာယန္တာ ‘ဣမေ ဣမေသံ ဘရတကာနံ သက္ကတာ, ဣမေ ဣမေသံ ဘရတကာနံ သက္ကတာ’တိ ပုနပ္ပုနံ ဝိရဝန္တာ အတိဝိယ ဣမေ မာဏဝကာ ကီဠံ ကရောန္တိ, ဝိဟာရေ ဘိက္ခူနံ အတ္ထိဘာဝမ္ပိ န ဇာနန္တိ, ဒဿေဿာမိ နေသံ ဘိက္ခူနံ အတ္ထိဘာဝ’’န္တိ စိန္တေတွာ ပဏ္ဏကုဋိတော နိက္ခမိ. 'विहारा निक्खमित्वा' म्हणजे—'लाल विटांनी वेढलेल्या, चांदीच्या पत्र्यासारखी पांढरी वाळू पसरलेल्या सुंदर अंगणात लाकडाच्या मोळ्या बांधून फेकत, वाळू विस्कटत, एकमेकांचे हात धरून पर्णकुटीभोवती प्रदक्षिणा घालत 'हे या भरतकांचे (तुच्छ गृहपतींचे) पूजनीय आहेत, हे या भरतकांचे पूजनीय आहेत' असे वारंवार ओरडत हे माणवक अत्यंत खोडकरपणा करत आहेत. विहारात भिक्खू आहेत हे देखील त्यांना माहीत नाही. मी त्यांना भिक्खूंच्या असण्याची जाणीव करून देतो,' असा विचार करून ते पर्णकुटीतून बाहेर पडले. သီလုတ္တမာ ပုဗ္ဗတရာ အဟေသုန္တိ ဂုဏဝန္တာနံ ဂုဏေ ကထိတေ နိဂ္ဂုဏာနံ ဂုဏာဘာဝေါ ပါကဋောဝ ဘဝိဿတီတိ ပေါရာဏကဗြာဟ္မဏာနံ ဂုဏေ ကထေန္တော ဧဝမာဟ. တတ္ထ သီလုတ္တမာတိ သီလဇေဋ္ဌကာ. သီလဉှိ တေသံ ဥတ္တမံ, န ဇာတိဂေါတ္တံ. ယေ ပုရာဏံ သရန္တီတိ ယေ ပေါရာဏကံ ဗြာဟ္မဏဓမ္မံ သရန္တိ. အဘိဘုယျ ကောဓန္တိ ကောဓံ အဘိဘဝိတွာ တေသံ ဒွါရာနိ သုဂုတ္တာနိ သုရက္ခိတာနိ အဟေသုံ. ဓမ္မေ စ ဈာနေ စ ရတာတိ ဒသဝိဓေ ကုသလကမ္မပထဓမ္မေ အဋ္ဌသမာပတ္တိဈာနေသု စ ရတာ. 'सीलुत्तमा पुब्बतरा अहेसुं' म्हणजे गुणवंतांच्या गुणांचे वर्णन केल्यावर गुणहीनांचा गुणहीनपणा आपოआपच स्पष्ट होईल, या विचाराने प्राचीन ब्राह्मणांच्या गुणांचे वर्णन करताना भगवान असे म्हणाले. तिथे 'सीलुत्तमा' म्हणजे शीलामध्ये श्रेष्ठ असणारे. कारण त्यांचे शील श्रेष्ठ होते, त्यांची जात किंवा गोत्र नव्हे. 'ye पुराणं सरन्ति' म्हणजे जे प्राचीन ब्राह्मणधर्माचे (उत्कृष्ट आचरणाचे) स्मरण करतात. 'अभिभुय्य कोधं' म्हणजे क्रोधावर विजय मिळवून, त्यांची इंद्रियद्वारे चांगल्या प्रकारे संयमित व सुरक्षित होती. 'धम्मे च झाने च रता' म्हणजे दहा प्रकारच्या कुशल कर्मपथ धर्मात आणि आठ समापत्ती ध्यानांमध्ये रममाण असणारे. ဧဝံ ပေါရာဏာနံ ဂုဏံ ကထေတွာ အထေတရဟိ ဗြာဟ္မဏာနံ မာနံ နိမ္မဒ္ဒေန္တော ဣမေ စ ဝေါက္ကမ္မ ဇပါမသေတိအာဒိမာဟ. တတ္ထ ဝေါက္ကမ္မာတိ ဧတေဟိ ဂုဏေဟိ အပက္ကမိတွာ. ဇပါမသေတိ မယံ ဇပါမ သဇ္ဈာယာမာတိ ဧတ္တကေနေဝ ဗြာဟ္မဏမှာတိ မညမာနာ ဗြာဟ္မဏာ မယန္တိ ဣမိနာ ဂေါတ္တေန မတ္တာ ဟုတွာ ဝိသမံ စရန္တိ, ဝိသမာနိ ကာယကမ္မာဒီနိ ကရောန္တီတိ အတ္ထော. ပုထုအတ္တဒဏ္ဍာတိ [Pg.43] ပုထု အတ္တာ ဒဏ္ဍာ ဧတေဟီတိ ပုထုအတ္တဒဏ္ဍာ, ဂဟိတနာနာဝိဓဒဏ္ဍာတိ အတ္ထော. သတဏှာတဏှေသူတိ သတဏှနိတ္တဏှေသု. အဂုတ္တဒွါရဿ ဘဝန္တိ မောဃာတိ အသံဝုတဒွါရဿ သဗ္ဗေပိ ဝတသမာဒါနာ မောဃာ ဘဝန္တီတိ ဒီပေတိ. ယထာ ကိန္တိ? သုပိနေဝ လဒ္ဓံ ပုရိသဿ ဝိတ္တန္တိ ယထာ သုပိနေ ပုရိသဿ လဒ္ဓံ မဏိမုတ္တာဒိနာနာဝိဓံ ဝိတ္တံ မောဃံ ဟောတိ, ပဗုဇ္ဈိတွာ ကိဉ္စိ န ပဿတိ, ဧဝံ မောဃာ ဘဝန္တီတိ အတ္ထော. अशा प्रकारे प्राचीन ब्राह्मणांच्या गुणांचे वर्णन करून, आताच्या ब्राह्मणांचा अहंकार नष्ट करण्यासाठी 'इमे च वोक्कम्म जपामसे' इत्यादी म्हणाले. तिथे 'वोक्कम्म' म्हणजे या गुणांपासून दूर जाऊन (भ्रष्ट होऊन). 'जपामसे' म्हणजे 'आम्ही जप करतो, स्वाध्याय करतो' एवढ्यावरूनच 'आम्ही ब्राह्मण आहोत' असे मानणारे, 'आम्ही ब्राह्मण आहोत' या गोत्राच्या अभिमानाने उन्मत्त होऊन विषम आचरण करतात, म्हणजेच चुकीची कायिक कर्मे इत्यादी करतात, असा अर्थ आहे. 'पुथुअत्तदण्डा' म्हणजे ज्यांनी स्वतःसाठी विविध प्रकारचे दंड (शस्त्रे) धारण केले आहेत, असा अर्थ आहे. 'सतण्हातण्हेसू' म्हणजे तृष्णा असणारे आणि तृष्णारहित असणारे यांच्यामध्ये. 'अगुत्तद्वारस्स भवन्ति मोघा' म्हणजे ज्यांची इंद्रियद्वारे असंयत आहेत, त्यांचे सर्व व्रत-नियम व्यर्थ ठरतात, हे दर्शवितात. कशाप्रमाणे? 'सुपिनेव लद्धं पुरिसस्स वित्तं' म्हणजे जसे स्वप्नात माणसाला मिळालेले हिरे-मोती इत्यादी विविध प्रकारचे धन व्यर्थ असते, जागे झाल्यावर काहीही दिसत नाही, त्याचप्रमाणे त्यांचे व्रत-नियम व्यर्थ ठरतात, असा अर्थ आहे. အနာသကာတိ ဧကာဟဒွီဟာဒိဝသေန အနာဟာရကာ. ထဏ္ဍိလသာယိကာ စာတိ ဟရိတကုသသန္ထတေ ဘူမိဘာဂေ သယနံ, ပါတော သိနာနဉ္စ တယော စ ဝေဒါတိ ပါတောဝ ဥဒကံ ပဝိသိတွာ နှာနဉ္စေဝ တယော စ ဝေဒါ. ခရာဇိနံ ဇဋာ ပင်္ကောတိ ခရသမ္ဖဿံ အဇိနစမ္မဉ္စေဝ ဇဋာကလာပေါ စ ပင်္ကော စ, ပင်္ကော နာမ ဒန္တမလံ. မန္တာ သီလဗ္ဗတံ တပေါတိ မန္တာ စ အဇသီလဂေါသီလသင်္ခါတံ သီလံ အဇဝတဂေါဝတသင်္ခါတံ ဝတဉ္စ. အယံ ဣဒါနိ ဗြာဟ္မဏာနံ တပေါတိ ဝဒတိ. ကုဟနာ ဝင်္ကဒဏ္ဍာ စာတိ ပဋိစ္ဆန္နကူပေါ ဝိယ ပဋိစ္ဆန္နဒေါသံ ကောဟညဉ္စေဝ ဝင်္ကဒဏ္ဍော, စ ဥဒုမ္ဗရပလာသဗေဠုဝရုက္ခာနံ အညတရတော ဂဟိတံ ဝင်္ကဒဏ္ဍဉ္စာတိ အတ္ထော. ဥဒကာစမနာနိ စာတိ ဥဒကေန မုခပရိမဇ္ဇနာနိ. ဝဏ္ဏာ ဧတေ ဗြာဟ္မဏာနန္တိ ဧတေ ဗြာဟ္မဏာနံ ပရိက္ခာရဘဏ္ဍကဝဏ္ဏာတိ ဒဿေတိ. ကတ ကိဉ္စိက္ခဘာဝနာတိ ကတာ ကိဉ္စိက္ခဘာဝနာ. အယမေဝ ဝါ ပါဌော, အာမိသကိဉ္စိက္ခဿ ဝဍ္ဎနတ္ထာယ ကတန္တိ အတ္ထော. 'अनासका' म्हणजे एक-दोन दिवस अन्न न घेता उपवास करणे. 'थण्डिलसायिका चा' म्हणजे हिरव्या कुशाच्या गवताने अंथरलेल्या जमिनीवर झोपणे. 'पातो सिनानञ्च तयो च वेदा' म्हणजे सकाळीच पाण्यात उतरून स्नान करणे आणि तीन वेद. 'खराजिनं जटा पङ्को' म्हणजे खरखरीत स्पर्शाचे काळवीटाचे चामडे, जटांचा समूह आणि मळ (पांक); मळ म्हणजे दातांचा मळ. 'मन्ता सीलब्बतं तपो' म्हणजे मंत्र, शेळी किंवा गाईसारखे आचरण (अजशील-गोशील) आणि शेळी किंवा गाईसारखे व्रत (अजव्रत-गोव्रत). हे सध्याच्या ब्राह्मणांचे तप आहे, असे म्हणतात. 'कुहना वङ्कदण्डा चा' म्हणजे झाकलेल्या विहिरीप्रमाणे आपले दोष लपवून ढोंग करणे आणि वाकडी काठी; उदुंबर (उंबर), पळस किंवा बेल यांपैकी एका झाडाची घेतलेली वाकडी काठी, असा अर्थ आहे. 'उदकाचमनानि चा' म्हणजे पाण्याने तोंड धुणे. 'वण्णा एते ब्राह्मणानं' म्हणजे हे ब्राह्मणांच्या उपकरणांचे (परिकारांचे) गुण आहेत, असे दर्शवितात. 'कत किञ्चिक्खभावना' म्हणजे थोड्याशा आमिषाच्या (लाभाच्या) वृद्धीसाठी केलेले आचरण, असा अर्थ आहे. ဧဝံ ဧတရဟိ ဗြာဟ္မဏာနံ မာနံ နိမ္မဒ္ဒိတွာ ပုန ပေါရာဏကဗြာဟ္မဏာနံ ဝဏ္ဏံ ကထေန္တော စိတ္တဉ္စ သုသမာဟိတန္တိအာဒိမာဟ. တတ္ထ သုသမာဟိတန္တိ တေသံ ဗြာဟ္မဏာနံ စိတ္တံ ဥပစာရပ္ပနာသမာဓီဟိ သုသမာဟိတံ အဟောသီတိ ဒဿေတိ. အခိလန္တိ မုဒု အထဒ္ဓံ. သော မဂ္ဂေါ ဗြဟ္မပတ္တိယာတိ သော သေဋ္ဌပတ္တိယာ မဂ္ဂေါ, တုမှေ ပန ကိံ ဗြာဟ္မဏာ နာမာတိ ဒီပေန္တော ဧဝမာဟ. अशा प्रकारे सध्याच्या ब्राह्मणांचा अहंकार नष्ट करून, पुन्हा प्राचीन ब्राह्मणांच्या गुणांचे वर्णन करताना 'चित्तञ्च सुसमाहितं' इत्यादी म्हणाले. तिथे 'सुसमाहितं' म्हणजे त्या ब्राह्मणांचे चित्त उपचार आणि अर्पणा समाधीने चांगल्या प्रकारे एकाग्र (सुसमाहित) झाले होते, हे दर्शवितात. 'अखिलं' म्हणजे मृदू, ताठर नसलेले (कोमल). 'सो मग्गो ब्रह्मपत्तिया' म्हणजे तो श्रेष्ठ अवस्था (ब्रह्मत्व) प्राप्त करण्याचा मार्ग आहे. 'परंतु तुम्ही कसले ब्राह्मण?' हे दर्शविताना भगवान असे म्हणाले. အာဂမံသု နု ခွိဓာတိ အာဂမံသု နု ခေါ ဣဓ. အဓိမုစ္စတီတိ ကိလေသဝသေန အဓိမုတ္တော ဂိဒ္ဓေါ ဟောတိ. ဗျာပဇ္ဇတီတိ ဗျာပါဒဝသေန ပူတိစိတ္တံ ဟောတိ. ပရိတ္တစေတသောတိ အနုပဋ္ဌိတသတိတာယ သံကိလေသစိတ္တေန ပရိတ္တစိတ္တော. စေတောဝိမုတ္တိန္တိ ဖလသမာဓိံ. ပညာဝိမုတ္တိန္တိ ဖလပညံ. အပ္ပမာဏစေတသောတိ ဥပဋ္ဌိတသတိတာယ နိက္ကိလေသစိတ္တေန အပ္ပမာဏစိတ္တော. 'आगमंसु नु खिधा' म्हणजे 'आगमंसु नु खो इध' असा पदच्छेद करावा. 'अधिमुच्चती' म्हणजे क्लेशांच्या वशतेमुळे आसक्त किंवा लोभी असणे. 'ब्यापज्जती' म्हणजे व्यापादामुळे (द्वेषामुळे) चित्त दूषित होणे. 'परित्तचेतसो' म्हणजे स्मृती जागृत नसल्यामुळे संक्लिष्ट चित्ताने संकुचित चित्त असणे. 'चेतोविमुत्तिं' म्हणजे फल-समाधी. 'पञ्ञाविमुत्तिं' म्हणजे फल-प्रज्ञा. 'अप्पमाणचेतसो' म्हणजे स्मृती जागृत असल्यामुळे निष्क्लेश चित्ताने अमर्याद (असीम) चित्त असणे. ၁၀. ဝေရဟစ္စာနိသုတ္တဝဏ္ဏနာ १०. वेरहच्चानि सुत्ताची वर्णना (टीका). ၁၃၃. ဒသမေ [Pg.44] ကာမဏ္ဍာယန္တိ ဧဝံနာမကေ နဂရေ. ယဂ္ဃေတိ စောဒနတ္ထေ နိပါတော. သေသံ ဥတ္တာနမေဝါတိ. १३३. दहाव्या सूत्तात, 'कामण्डायं' म्हणजे या नावाच्या नगरात. 'यग्घे' हा शब्द प्रेरणा देण्याच्या अर्थातील निपात आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ဂဟပတိဝဂ္ဂေါ တေရသမော. तेरावा गृहपती वर्ग समाप्त. ၁၄. ဒေဝဒဟဝဂ္ဂေါ १४. देवदह वर्ग. ၁. ဒေဝဒဟသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. देवदह सुत्ताची वर्णना (टीका). ၁၃၄. ဒေဝဒဟဝဂ္ဂဿ ပဌမေ ဒေဝဒဟန္တိ နပုံသကလိင်္ဂေန လဒ္ဓနာမော နိဂမော. မနောရမာတိ မနံ ရမယန္တာ, မနာပါတိ အတ္ထော. အမနောရမာတိ အမနာပါ. १३४. देवदह वर्गाच्या पहिल्या सूत्तात, 'देवदहं' म्हणजे नपुंसकलिंगी नाम असलेला 'देवदह' नावाचा निगम (कस्बा). 'मनोरमा' म्हणजे मनाला आनंद देणारे, म्हणजेच प्रिय, असा अर्थ आहे. 'अमनोरमा' म्हणजे अप्रिय. ၂. ခဏသုတ္တဝဏ္ဏနာ २. खण सुत्ताची वर्णना (टीका). ၁၃၅. ဒုတိယေ ဆဖဿာယတနိကာ နာမာတိ ဝိသုံ ဆဖဿာယတနိကာ နာမ နိရယာ နတ္ထိ. သဗ္ဗေသုပိ ဟိ ဧကတိံသမဟာနိရယေသု ဆဒွါရဖဿာယတနပညတ္တိ ဟောတိယေဝ. ဣဒံ ပန အဝီစိမဟာနိရယံ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ. သဂ္ဂါတိ ဣဓာပိ တာဝတိံသပုရမေဝ အဓိပ္ပေတံ. ကာမာဝစရဒေဝလောကေ ပန ဧကသ္မိမ္ပိ ဆဖဿာယတနပညတ္တိယာ အဘာဝေါ နာမ နတ္ထိ. ဣမိနာ ကိံ ဒီပေတိ? နိရယေ ဧကန္တဒုက္ခသမပ္ပိတဘာဝေန, ဒေဝလောကေ စ ဧကန္တသုခသမပ္ပိတတ္တာ ဧကန္တခိဍ္ဍာရတိဝသေန ဥပ္ပန္နပမာဒေန မဂ္ဂဗြဟ္မစရိယဝါသံ ဝသိတုံ န သက္ကာ. မနုဿလောကော ပန ဝေါကိဏ္ဏသုခဒုက္ခော, ဣဓေဝ အပါယောပိ သဂ္ဂေါပိ ပညာယတိ. အယံ မဂ္ဂဗြဟ္မစရိယဿ ကမ္မဘူမိ နာမ, သာ တုမှေဟိ လဒ္ဓါ. တသ္မာ ယေ ဝေါ ဣမေ မာနုဿကာ ခန္ဓာ လဒ္ဓါ, တေ ဝေါ လာဘာ. ယဉ္စ ဝေါ ဣဒံ မနုဿတ္တံ လဒ္ဓံ, ပဋိလဒ္ဓေါ ဝေါ ဗြဟ္မစရိယဝါသဿ ခဏော သမယောတိ. ဝုတ္တမ္ပိ ဟေတံ ပေါရာဏေဟိ – १३५. दुसऱ्या सुत्तात, 'छफस्सायतनिक' (सहा स्पर्श-आयतन असलेले) नावाचे स्वतंत्र नरक नाहीत. कारण सर्व एकतीस महानरकांमध्ये सहा द्वारांवर आधारित स्पर्श-आयतनाची प्रज्ञप्ती (अनुभूती) असतेच. परंतु हे अवीची महानरकाला उद्देशून म्हटले आहे. 'स्वर्ग' या शब्दाने येथेही तावतिंस देवलोकच अभिप्रेत आहे. परंतु कामावचर देवलोकांपैकी एकाही देवलोकात सहा स्पर्श-आयतन प्रज्ञप्तीचा अभाव नाही. याने काय दर्शविले जाते? नरकात केवळ दुःखाने युक्त असल्यामुळे, आणि देवलोकात केवळ सुखाने युक्त असल्यामुळे व केवळ क्रीडारतीमध्ये मग्न राहून उत्पन्न झालेल्या प्रमादामुळे मार्ग-ब्रह्मचर्याचे आचरण करणे शक्य नाही. परंतु मनुष्यलोक हा सुख आणि दुःखाने मिश्रित आहे, येथेच दुर्गती (अपाय) आणि स्वर्ग दोन्ही दिसून येतात. ही मार्ग-ब्रह्मचर्याची 'कर्मभूमी' आहे, ती तुम्हास प्राप्त झाली आहे. म्हणून, तुम्हाला जे हे मानवी स्कंध प्राप्त झाले आहेत, तो तुमचा मोठा लाभ आहे. आणि तुम्हाला जे हे मनुष्यत्व प्राप्त झाले आहे, त्यामुळे तुम्हाला ब्रह्मचर्यवासाचा (आचरणाचा) क्षण आणि योग्य वेळ (संधी) प्राप्त झाली आहे. प्राचीन आचार्यांनीही असे म्हटले आहे – ‘‘အယံ ကမ္မဘူမိ ဣဓ မဂ္ဂဘာဝနာ,ဌာနာနိ သံဝေဇနိယာ ဗဟူ ဣဓ; သံဝေဂသံဝေဇနိယေသု ဝတ္ထုသု,သံဝေဂဇာတောဝ ပယုဉ္စ ယောနိသော’’တိ. “ही कर्मभूमी आहे, येथे मार्गभावना (मार्गाची साधना) होते. येथे संवेग उत्पन्न करणारी अनेक स्थाने आहेत. संवेग उत्पन्न करणाऱ्या वस्तूंमध्ये संवेग उत्पन्न करून (तीव्र संवेगाने युक्त होऊन) योग्य प्रकारे (योनिशो) प्रयत्न करावा.” ၃. ပဌမရူပါရာမသုတ္တဝဏ္ဏနာ ३. प्रथम रूपाराम सुत्ताची वर्णना. ၁၃၆. တတိယေ [Pg.45] ရူပသမ္မုဒိတာတိ ရူပေ သမ္မုဒိတာ ပမောဒိတာ. ဒုက္ခာတိ ဒုက္ခိတာ. သုခေါတိ နိဗ္ဗာနသုခေန သုခိတော. ကေဝလာတိ သကလာ. ယာဝတတ္ထီတိ ဝုစ္စတီတိ ယတ္တကာ အတ္ထီတိ ဝုစ္စတိ. ဧတေ ဝေါတိ ဧတ္ထ ဝေါ-ကာရော နိပါတမတ္တံ. ပစ္စနီကမိဒံ ဟောတိ, သဗ္ဗလောကေန ပဿတန္တိ ယံ ဣဒံ ပဿန္တာနံ ပဏ္ဍိတာနံ ဒဿနံ, တံ သဗ္ဗလောကေန ပစ္စနီကံ ဟောတိ ဝိရုဒ္ဓံ. လောကော ဟိ ပဉ္စက္ခန္ဓေ နိစ္စာ သုခါ အတ္တာ သုဘာတိ မညတိ, ပဏ္ဍိတာ အနိစ္စာ ဒုက္ခာ အနတ္တာ အသုဘာတိ. သုခတော အာဟူတိ သုခန္တိ ကထေန္တိ. သုခတော ဝိဒူတိ သုခန္တိ ဇာနန္တိ. သဗ္ဗမေတံ နိဗ္ဗာနမေဝ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ. १३६. तिसऱ्या सुत्तात, 'रूपसमुदिता' म्हणजे रूपात अत्यंत आनंदित, प्रमुदित झालेले. 'दुःखा' म्हणजे दुःखित झालेले. 'सुखो' म्हणजे निर्वाणसुखाने सुखी झालेले. 'केवला' म्हणजे संपूर्ण. 'यावतत्थीति वुच्चती' म्हणजे जितके काही 'आहे' असे म्हटले जाते. 'एते वो' येथे 'वो' हा शब्द केवळ निपात (अव्यय) आहे. 'पच्चनीकमिदं होति, सब्बलोकेन पस्सतं' म्हणजे जे हे पाहणाऱ्या पंडितांचे दर्शन (ज्ञान) आहे, ते संपूर्ण जगाच्या विरुद्ध (प्रतिकूल) असते. कारण जग पाच स्कंधांना नित्य, सुखकारक, आत्मा आणि शुभ मानतात, तर पंडित त्यांना अनित्य, दुःखद, अनात्मा आणि अशुभ मानतात. 'सुखतो आहु' म्हणजे सुख असे म्हणतात. 'सुखतो विदू' म्हणजे सुख असे जाणतात. हे सर्व निर्वाणालाच उद्देशून म्हटले आहे. သမ္မူဠှေတ္ထာတိ ဧတ္ထ နိဗ္ဗာနေ သမ္မူဠှာ. အဝိဒ္ဒသူတိ ဗာလာ. သဗ္ဗေပိ ဟိ ဆန္နဝုတိပါသဏ္ဍိနော ‘‘နိဗ္ဗာနံ ပါပုဏိဿာမာ’’တိ သညိနော ဟောန္တိ, တေ ပန ‘‘နိဗ္ဗာနံ နာမ ဣဒ’’န္တိပိ န ဇာနန္တိ. နိဝုတာနန္တိ ကိလေသနီဝရဏေန နိဝုတာနံ ပရိယောနဒ္ဓါနံ. အန္ဓကာရော အပဿတန္တိ အပဿန္တာနံ အန္ဓကာရော ဟောတိ. ကိံ တံ ဧဝံ ဟောတိ? နိဗ္ဗာနံ ဝါ နိဗ္ဗာနဒဿနံ ဝါ အပဿန္တာနဉှိ ဗာလာနံ နိဗ္ဗာနမ္ပိ နိဗ္ဗာနဒဿနမ္ပိ ကာဠမေဃအဝစ္ဆာဒိတံ ဝိယ စန္ဒမဏ္ဍလံ ကဋာဟေန ပဋိကုဇ္ဇိတပတ္တော ဝိယ စ နိစ္စကာလံ တမော စေဝ အန္ဓကာရော စ သမ္ပဇ္ဇတိ. 'सम्मूळ्हेत्थ' म्हणजे या निर्वाणात संमोहित (भ्रमित) झालेले. 'अविद्दसू' म्हणजे अज्ञानी (मूर्ख). कारण सर्व शहाण्णव पाखंडी (परधर्मीय) 'आम्ही निर्वाण प्राप्त करू' अशी संज्ञा (समजूत) बाळगतात, परंतु ते 'निर्वाण म्हणजे हे आहे' हे देखील जाणत नाहीत. 'निवुतानं' म्हणजे क्लेशरूप नीवरणाने झाकलेले, वेढलेले. 'अन्धकारो अपस्सतं' म्हणजे न पाहणाऱ्यांना अंधकार वाटतो. ते असे का होते? कारण निर्वाण किंवा निर्वाणदर्शन न पाहणाऱ्या अज्ञानी लोकांना निर्वाण आणि निर्वाणदर्शन हे काळ्या ढगांनी झाकलेल्या चंद्रमंडळाप्रमाणे किंवा कढईने पालथ्या घातलेल्या पात्राप्रमाणे नेहमी अंधकारमय आणि काळोखयुक्त वाटते. သတဉ္စ ဝိဝဋံ ဟောတိ, အာလောကော ပဿတာမိဝါတိ သတဉ္စ သပ္ပုရိသာနံ ပညာဒဿနေန ပဿန္တာနံ နိဗ္ဗာနံ အာလောကော ဝိယ ဝိဝဋံ ဟောတိ. သန္တိကေ န ဝိဇာနန္တိ, မဂါ ဓမ္မဿ အကောဝိဒါတိ ယံ အတ္တနော သရီရေ ကေသေ ဝါ လောမာဒီသု ဝါ အညတရကောဋ္ဌာသံ ပရိစ္ဆိန္ဒိတွာ အနန္တရမေဝ အဓိဂန္တဗ္ဗတော အတ္တနော ဝါ ခန္ဓာနံ နိရောဓမဂ္ဂတော သန္တိကေ နိဗ္ဗာနံ. တံ ဧဝံ သန္တိကေ သမာနမ္ပိ မဂ္ဂဘူတာ ဇနာ မဂ္ဂါမဂ္ဂဓမ္မဿ စတုသစ္စဓမ္မဿ ဝါ အကောဝိဒါ န ဇာနန္တိ. 'सतञ्च विवटं होति, आलोको पस्सतामिव' म्हणजे प्रज्ञाचक्षूने पाहणाऱ्या सत्पुरुषांना (आर्यांना) निर्वाण हे प्रकाशाप्रमाणे उघडे (स्पष्ट) असते. 'सन्तिके न विजानन्ति, मगा धम्मस्स अकोविदा' म्हणजे आपल्या शरीरातील केश किंवा रोम इत्यादींपैकी एखाद्या भागाचे पृथक्करण करून लगेचच प्राप्त करण्यायोग्य असल्यामुळे किंवा स्वतःच्या स्कंधांच्या निरोधमार्गामुळे निर्वाण अत्यंत जवळ आहे. असे जवळ असूनही, मृगासारखे (अज्ञानी) लोक मार्ग-अमार्ग धर्माचे किंवा चतुरार्यसत्य धर्माचे अकोविद (अज्ञानी) असल्यामुळे ते जाणत नाहीत. မာရဓေယျာနုပန္နေဟီတိ တေဘူမကဝဋ္ဋံ မာရဿ နိဝါသဋ္ဌာနံ အနုပန္နေဟိ. ကော နု အညတြ အရိယေဘီတိ ဌပေတွာ အရိယေ ကော နု အညော နိဗ္ဗာနပဒံ ဇာနိတုံ အရဟတိ. သမ္မဒညာယ ပရိနိဗ္ဗန္တီတိ အရဟတ္တပညာယ သမ္မာ ဇာနိတွာ အနန္တရမေဝ အနာသဝါ ဟုတွာ ကိလေသပရိနိဗ္ဗာနေန ပရိနိဗ္ဗန္တိ. အထ ဝါ သမ္မဒညာယ အနာသဝါ ဟုတွာ အန္တေ ခန္ဓပရိနိဗ္ဗာနေန ပရိနိဗ္ဗာယန္တိ. 'मारधेय्यानुपन्नेहि' म्हणजे तिन्ही भूमींमधील संसारचक्र रूपी माराच्या निवासस्थानात वारंवार जाणाऱ्यांनी (किंवा न सोडणाऱ्यांनी). 'को नु अञ्ञत्र अरियेभि' म्हणजे आर्यांना सोडून दुसरा कोण निर्वाणपदाला जाणण्यास समर्थ आहे? 'सम्मदञ्ञाय परिनिब्बन्ति' म्हणजे अर्हत्त्वाच्या प्रज्ञेने योग्य प्रकारे जाणून, लगेचच अनास्रव (आसवरहित) होऊन क्लेश-परिनिर्वाणाने परिनिर्वाण प्राप्त करतात. किंवा, योग्य प्रकारे जाणून अनास्रव होऊन शेवटी स्कंध-परिनिर्वाणाने परिनिर्वाण (शांत) पावतात. ၄-၁၂. ဒုတိယရူပါရာမသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ४-१२. द्वितीय रूपाराम सुत्तादींची वर्णना. ၁၃၇-၁၄၅. စတုတ္ထံ [Pg.46] သုဒ္ဓိကံ ကတွာ ဒေသိယမာနေ ဗုဇ္ဈနကာနံ အဇ္ဈာသယေန ဝုတ္တံ. ပဉ္စမာဒီနိ တထာ တထာ ဗုဇ္ဈန္တာနံ အဇ္ဈာသယေန ဝုတ္တာနိ. အတ္ထော ပန တေသံ ပါကဋောယေဝါတိ. १३७-१४५. चौथे सुत्त केवळ (शुद्ध) उपदेश रूपाने दिले गेले असून ते समजून घेणाऱ्यांच्या आशयानुसार (इच्छेनुसार) सांगितले आहे. पाचवे इत्यादी सुत्ते त्या त्या प्रकारे समजून घेणाऱ्यांच्या आशयानुसार सांगितली आहेत. त्यांचा अर्थ तर स्पष्टच आहे. ဒေဝဒဟဝဂ္ဂေါ စုဒ္ဒသမော. देवदहवर्ग चौदावा समाप्त. ၁၅. နဝပုရာဏဝဂ္ဂေါ १५. नवपुराणवर्ग. ၁. ကမ္မနိရောဓသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. कर्मनिरोध सुत्ताची वर्णना. ၁၄၆. နဝပုရာဏဝဂ္ဂဿ ပဌမေ နဝပုရာဏာနီတိ နဝါနိ စ ပုရာဏာနိ စ. စက္ခု, ဘိက္ခဝေ, ပုရာဏကမ္မန္တိ န စက္ခု ပုရာဏံ, ကမ္မမေဝ ပုရာဏံ, ကမ္မတော ပန နိဗ္ဗတ္တတ္တာ ပစ္စယနာမေန ဧဝံ ဝုတ္တံ. အဘိသင်္ခတန္တိ ပစ္စယေဟိ အဘိသမာဂန္တွာ ကတံ. အဘိသဉ္စေတယိတန္တိ စေတနာယ ပကပ္ပိတံ. ဝေဒနိယံ ဒဋ္ဌဗ္ဗန္တိ ဝေဒနာယ ဝတ္ထူတိ ပဿိတဗ္ဗံ. နိရောဓာ ဝိမုတ္တိံ ဖုသတီတိ ဣမဿ တိဝိဓဿ ကမ္မဿ နိရောဓေန ဝိမုတ္တိံ ဖုသတိ. အယံ ဝုစ္စတီတိ အယံ တဿာ ဝိမုတ္တိယာ အာရမ္မဏဘူတော နိရောဓော ကမ္မနိရောဓောတိ ဝုစ္စတိ. ဣတိ ဣမသ္မိံ သုတ္တေ ပုဗ္ဗဘာဂဝိပဿနာ ကထိတာ. १४६. नवपुराणवर्गाच्या पहिल्या सुत्तात, 'नवपुराणानि' म्हणजे नवीन आणि जुने (कर्म). 'चक्खु, भिक्खवे, पुराणकम्मं' यात डोळा (चक्षू) जुना नाही, तर कर्मच जुने आहे; परंतु कर्मापासून उत्पन्न झाल्यामुळे प्रत्ययाच्या (कारणाच्या) नावाने असे म्हटले आहे. 'अभिसङ्खतं' म्हणजे प्रत्ययांनी (कारणांनी) एकत्र येऊन बनवलेले (संस्कृत). 'अभिसञ्चेतयितं' म्हणजे चेतनेने कल्पिलेले (नियोजित केलेले). 'वेदनीयं दट्टब्बं' म्हणजे वेदनेचे स्थान म्हणून पाहिले पाहिजे. 'निरोधा विमुत्तिं फुसति' म्हणजे या त्रिविध कर्माच्या निरोधाने विमुक्तीला स्पर्श करतो (प्राप्त करतो). 'अयं वुच्चति' म्हणजे हा त्या विमुक्तीचा आलंबन असलेला निरोध 'कर्मनिरोध' असे म्हटले जाते. अशा प्रकारे या सुत्तात पूर्वभाग-विपश्यना सांगितली आहे. ၂-၅. အနိစ္စနိဗ္ဗာနသပ္ပာယသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ २-५. अनित्यनिर्वाणसप्पाय सुत्तादींची वर्णना. ၁၄၇-၁၅၀. ဒုတိယေ နိဗ္ဗာနသပ္ပာယန္တိ နိဗ္ဗာနဿ သပ္ပာယံ ဥပကာရပဋိပဒံ. တတိယာဒီသုပိ ဧသေဝ နယော. ပဋိပါဋိယာ ပန စတူသုပိ ဧတေသု သုတ္တေသု သဟ ဝိပဿနာယ စတ္တာရော မဂ္ဂါ ကထိတာ. १४७-१५०. दुसऱ्या सुत्तात, 'निर्वाणसप्पायं' म्हणजे निर्वाण प्राप्तीसाठी अनुकूल, उपकारक अशी प्रतिपदा (मार्ग). तिसऱ्या इत्यादी सुत्तांमध्येही हाच नियम समजावा. अनुक्रमाने असलेल्या या चारही सुत्तांमध्ये विपश्यनेसह चार मार्ग सांगितले आहेत. ၆-၇. အန္တေဝါသိကသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ६-७. अंतेवासिक सुत्तादींची वर्णना. ၁၅၁-၁၅၂. ဆဋ္ဌေ အနန္တေဝါသိကန္တိ အန္တော ဝသနကကိလေသဝိရဟိတံ. အနာစရိယကန္တိ အာစရဏကကိလေသဝိရဟိတံ. အန္တဿ ဝသန္တီတိ အန္တော အဿ ဝသန္တိ. တေ နံ သမုဒါစရန္တီတိ တေ ဧတံ အဓိဘဝန္တိ အဇ္ဈောတ္ထရန္တိ သိက္ခာပေန္တိ ဝါ. ‘‘ဧဝံ ဝေဇ္ဇကမ္မံ ကရောဟိ, ဧဝံ ဒူတကမ္မ’’န္တိ ဣတိ သိက္ခာပနသင်္ခါတေန သမုဒါစရဏတ္ထေနဿ တေ အာစရိယာ နာမ ဟောန္တိ, တေဟိ [Pg.47] အာစရိယေဟိ သာစရိယကောတိ ဝုစ္စတိ. သေသမေတ္ထ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗံ. သတ္တမံ ဟေဋ္ဌာ ကထိတနယမေဝ. १५१-१५२. सहाव्या सुत्तात, 'अनन्तेवासिकं' म्हणजे आत राहणाऱ्या क्लेशरूपी वाईट शिष्यापासून रहित. 'अनाचरियकं' म्हणजे स्वतःवर अधिकार गाजवून शिकवणाऱ्या क्लेशरूपी वाईट आचार्यापासून रहित. 'अन्तस्स वसन्ति' म्हणजे त्याच्या आत राहतात. 'ते नं समुदाचरन्ति' म्हणजे ते याच्यावर ताबा मिळवतात, व्यापून टाकतात किंवा शिकवतात. "असे वैद्यकीय काम कर, असे दूताचे काम कर" अशा प्रकारे शिकवण्याच्या स्वरूपात सतत प्रवृत्त करण्याच्या अर्थाने ते त्याचे 'आचार्य' होतात, आणि त्या आचार्यांमुळे त्याला 'साचरियक' (आचार्य असलेला) म्हटले जाते. उर्वरित भाग येथे सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. सातवे सुत्त खाली (पूर्वी) सांगितलेल्या पद्धतीनेच आहे. ၈. အတ္ထိနုခေါပရိယာယသုတ္တဝဏ္ဏနာ ८. अत्थिनुखोपरियाय सुत्ताची वर्णना. ၁၅၃. အဋ္ဌမေ ယံ ပရိယာယံ အာဂမ္မာတိ ယံ ကာရဏံ အာဂမ္မ. အညတြေဝ သဒ္ဓါယာတိ ဝိနာ သဒ္ဓါယ သဒ္ဓံ အပနေတွာ. ဧတ္ထ စ သဒ္ဓါတိ န ပစ္စက္ခာ သဒ္ဓါ. ယော ပန ပရဿ ဧဝံ ကိရ ဧဝံ ကိရာတိ ကထေန္တဿ သုတွာ ဥပ္ပန္နော သဒ္ဒဟနာကာရော, တံ သန္ဓာယေတံ ဝုတ္တံ. ရုစိအာဒီသုပိ ရုစာပေတွာ ခမာပေတွာ အတ္ထေတန္တိ ဂဟဏာကာရော ရုစိ နာမ, ဧဝံ ကိရ ဘဝိဿတီတိ အနုဿဝနံ အနုဿဝေါ, နိသီဒိတွာ ဧကံ ကာရဏံ စိန္တေန္တဿ ကာရဏံ ဥပဋ္ဌာတိ, ဧဝံ ဥပဋ္ဌိတဿ အတ္ထေတန္တိ ဂဟဏံ အာကာရပရိဝိတက္ကော နာမ, ကာရဏဝိတက္ကောတိ အတ္ထော. ကာရဏံ စိန္တေန္တဿ ပါပိကာ လဒ္ဓိ ဥပ္ပဇ္ဇတိ, တံ အတ္ထေသာတိ ဂဟဏာကာရော ဒိဋ္ဌိနိဇ္ဈာနက္ခန္တိ နာမ. အညံ ဗျာကရေယျာတိ ဣမာနိ ပဉ္စ ဌာနာနိ မုဉ္စိတွာ အရဟတ္တံ ဗျာကရေယျ. ဣမသ္မိံ သုတ္တေ သေခါသေခါနံ ပစ္စဝေက္ခဏာ ကထိတာ. १५३. आठव्या सुत्तात 'यं परियायं आगम्म' म्हणजे 'ज्या कारणाचा आश्रय घेऊन'. 'अञ्ञत्रेव सद्धाय' म्हणजे 'श्रद्धेशिवाय, श्रद्धा बाजूला ठेवून'. आणि येथे 'श्रद्धा' म्हणजे प्रत्यक्ष श्रद्धा नव्हे. तर दुसऱ्याचे 'असे म्हणे, असे म्हणे' हे बोलणे ऐकून जो विश्वास ठेवण्याचा भाव उत्पन्न होतो, त्याला उद्देशून हे म्हटले आहे. 'रुचि' इत्यादींमध्ये देखील, स्वतःच्या बुद्धीने आवडवून, मनाला पटवून 'हे असे आहे' असा स्वीकार करण्याचा भाव म्हणजे 'रुचि' होय. 'असे म्हणे होईल' असे ऐकत राहणे म्हणजे 'अनुस्सव' (अनुश्रुती) होय. एकांतात बसून एखाद्या कारणाचा (युक्तीचा) विचार करणाऱ्याला जे कारण स्पष्ट होते, अशा स्पष्ट झालेल्या कारणावरून 'हे असे आहे' असे ग्रहण करणे म्हणजे 'आकारपरिवितक्क' होय; याचा अर्थ 'कारणवितर्क' (युक्तीचा विचार) असा आहे. विचार करणाऱ्याला जी चुकीची दृष्टी (पापी मत) उत्पन्न होते, आणि 'हेच माझे मत आहे' असे ग्रहण करण्याचा जो भाव, त्याला 'दिट्ठिनिज्झानक्खन्ति' (दृष्टिनिध्यानक्षान्ती) म्हणतात. 'अञ्ञं ब्याकरेय्य' (दुसरे काही घोषित करावे) म्हणजे या पाच गोष्टी सोडून अर्हत्त्व घोषित करावे. या सुत्तात शैक्ष आणि अशैक्ष यांच्या प्रत्यवेक्षणाचे (पच्चवेक्खणा) वर्णन केले आहे. ၉-၁၀. ဣန္ဒြိယသမ္ပန္နသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ९-१०. इन्द्रियसम्पन्नसुत्त इत्यादींचे वर्णन. ၁၅၄-၁၅၅. နဝမေ ဣန္ဒြိယသမ္ပန္နောတိ ပရိပုဏ္ဏိန္ဒြိယော. တတ္ထ ယေန ဆ ဣန္ဒြိယာနိ သမ္မသိတွာ အရဟတ္တံ ပတ္တံ, သော တေဟိ နိဗ္ဗိသေဝနေဟိ ဣန္ဒြိယေဟိ သမန္နာဂတတ္တာ, စက္ခာဒီနိ ဝါ ဆ ဣန္ဒြိယာနိ သမ္မသန္တဿ ဥပ္ပန္နေဟိ သဒ္ဓါဒီဟိ ဣန္ဒြိယေဟိ သမန္နာဂတတ္တာ ပရိပုဏ္ဏိန္ဒြိယော နာမ ဟောတိ, တံ သန္ဓာယ ဘဂဝါ စက္ခုန္ဒြိယေ စေတိအာဒိနာ နယေန ဒေသနံ ဝိတ္ထာရေတွာ ဧတ္တာဝတာ ခေါ ဘိက္ခု ဣန္ဒြိယသမ္ပန္နော ဟောတီတိ အာဟ. ဒသမံ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တနယမေဝါတိ. १५४-१५५. नवव्या सुत्तात 'इन्द्रियसम्पन्नो' म्हणजे परिपूर्ण इंद्रिये असलेला. त्यामध्ये, ज्या भिक्खूने सहा इंद्रियांचे परीक्षण करून अर्हत्त्व प्राप्त केले आहे, तो त्या निष्कलंक इंद्रियांनी युक्त असल्यामुळे 'परिपूर्ण इंद्रिय' असलेला ठरतो. किंवा चक्षू इत्यादी सहा इंद्रियांचे परीक्षण करताना उत्पन्न झालेल्या श्रद्धा इत्यादी इंद्रियांनी युक्त असल्यामुळे तो 'परिपूर्ण इंद्रिय' असलेला होतो. त्यालाच उद्देशून भगवंतांनी 'चक्खुन्द्रिये च' इत्यादी पद्धतीने उपदेशाचा विस्तार करून 'एवढ्यानेच, भिक्खू हा इंद्रियसंपन्न होतो' असे म्हटले आहे. दहावे सुत्त खाली सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावे. နဝပုရာဏဝဂ္ဂေါ ပဉ္စဒသမော. नवपुराणवर्ग पंधरावा समाप्त. တတိယော ပဏ္ဏာသကော. तिसरा पण्णासक समाप्त. ၁၆. နန္ဒိက္ခယဝဂ္ဂေါ १६. नन्दिक्खयवर्ग. ၁-၄. အဇ္ဈတ္တနန္ဒိက္ခယသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ १-४. अज्झत्त नन्दिक्खयसुत्त इत्यादींचे वर्णन. ၁၅၆-၁၅၉. နန္ဒိက္ခယဝဂ္ဂဿ [Pg.48] ပဌမေ နန္ဒိက္ခယာ ရာဂက္ခယော, ရာဂက္ခယာ နန္ဒိက္ခယောတိ နန္ဒိယာ စ ရာဂဿ စ အတ္ထတော ဧကတ္တာ ဝုတ္တံ. သုဝိမုတ္တန္တိ အရဟတ္တဖလဝိမုတ္တိဝသေန သုဋ္ဌု ဝိမုတ္တံ. သေသမေတ္ထ ဒုတိယာဒီသု စ ဥတ္တာနမေဝ. १५६-१५९. नंदिक्षयवर्गाच्या पहिल्या सुत्तात 'नंदीच्या (आसक्तीच्या) क्षयाने रागाचा क्षय होतो, आणि रागाच्या क्षयाने नंदीचा क्षय होतो' असे म्हटले आहे, कारण अर्थाच्या दृष्टीने 'नंदी' आणि 'राग' हे एकच आहेत. 'सुविमुत्तं' म्हणजे अर्हत्त्वफलाच्या विमुक्तीच्या द्वारे चांगल्या प्रकारे मुक्त झालेला. येथे आणि दुसऱ्या इत्यादी सुत्तांमधील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ၅-၆. ဇီဝကမ္ဗဝနသမာဓိသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ५-६. जीवकम्बवनसमाधिसुत्त इत्यादींचे वर्णन. ၁၆၀-၁၆၁. ပဉ္စမံ သမာဓိဝိကလာနံ, ဆဋ္ဌံ ပဋိသလ္လာနဝိကလာနံ စိတ္တေကဂ္ဂတဉ္စ ကာယဝိဝေကဉ္စ လဘန္တာနံ ဧတေသံ ကမ္မဋ္ဌာနံ ဖာတိံ ဂမိဿတီတိ ဉတွာ ကထိတံ. တတ္ထ ဩက္ခာယတီတိ (ပစ္စက္ခာယတိ) ပညာယတိ ပါကဋံ ဟောတိ. ဣတိ ဒွီသုပိ ဧတေသု သဟ ဝိပဿနာယ စတ္တာရော မဂ္ဂါ ကထိတာ. १६०-१६१. पाचवे सुत्त समाधीची कमतरता असलेल्यांसाठी आहे, सहावे सुत्त प्रतिसंलयनाची (एकांतात राहण्याची) कमतरता असलेल्यांसाठी आहे. चित्ताची एकाग्रता आणि कायविवेक (शारीरिक एकांत) प्राप्त करणाऱ्या या भिक्खूंचे कर्मस्थान (ध्यान) वृद्धीस जाईल, हे जाणून हे सांगितले आहे. तेथे 'ओक्खायति' म्हणजे प्रत्यक्ष दिसते, समजते, स्पष्ट होते. अशा प्रकारे या दोन्ही सुत्तांमध्ये विपश्यनेसह चार मार्गांचे वर्णन केले आहे. ၇-၉. ကောဋ္ဌိကအနိစ္စသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ७-९. कोट्ठिकअनिच्चसुत्त इत्यादींचे वर्णन. ၁၆၂-၁၆၄. သတ္တမာဒီသု တီသု ထေရဿ ဝိမုတ္တိပရိပါစနိယာ ဓမ္မာဝ ကထိတာ. १६२-१६४. सातव्या इत्यादी तीन सुत्तांमध्ये थेरांच्या (कोट्ठिक थेरांच्या) विमुक्तीला परिपक्व करणारे धर्मच सांगितले आहेत. ၁၀-၁၂. မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိပဟာနသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ १०-१२. मिच्छादिट्ठिपहानसुत्त इत्यादींचे वर्णन. ၁၆၅-၁၆၇. ဒသမာဒီနိ တီဏိ ပါဋိယေက္ကေန ပုဂ္ဂလဇ္ဈာသယဝသေန ဝုတ္တာနိ. တေသံ အတ္ထော ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗောတိ. १६५-१६७. दहावे इत्यादी तीन सुत्ते वेगवेगळ्या व्यक्तींच्या आशयानुसार सांगितली आहेत. त्यांचा अर्थ पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा. နန္ဒိက္ခယဝဂ္ဂေါ သောလသမော. नन्दिक्खयवर्ग सोळावा समाप्त. ၁၇. သဋ္ဌိပေယျာလဝဂ္ဂေါ १७. सट्ठिपेय्याळवर्ग. ၁-၆၀. အဇ္ဈတ္တအနိစ္စဆန္ဒသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ १-६०. अज्झत्तअनिच्चछन्दसुत्त इत्यादींचे वर्णन. ၁၆၈-၂၂၇. တဒနန္တရော သဋ္ဌိပေယျာလော နာမ ဟောတိ, သော ဥတ္တာနတ္ထောဝ. ယာနိ ပနေတ္ထ သဋ္ဌိ သုတ္တာနိ ဝုတ္တာနိ, တာနိ ‘‘ဆန္ဒော ပဟာတဗ္ဗော’’တိ [Pg.49] ဧဝံ တဿ တဿေဝ ပဒဿ ဝသေန ဗုဇ္ဈနကာနံ အဇ္ဈာသယဝသေန ဝုတ္တာနိ. ဣတိ သဗ္ဗာနိ တာနိ ပါဋိယေက္ကေန ပုဂ္ဂလဇ္ဈာသယဝသေန ကထိတာနိ. ဧကေကသုတ္တပရိယောသာနေ စေတ္ထ သဋ္ဌိ သဋ္ဌိ ဘိက္ခူ အရဟတ္တံ ပတ္တာတိ. १६८-२२७. त्यानंतरचा वर्ग 'सट्ठिपेय्याळ' नावाचा आहे, त्याचा अर्थ स्पष्टच आहे. येथे जी साठ सुत्ते सांगितली आहेत, ती 'छंद (इच्छा) सोडून दिला पाहिजे' अशा प्रकारे त्या-त्या पदाच्या आधारे समजून घेणाऱ्यांच्या आशयानुसार सांगितली आहेत. अशा प्रकारे ती सर्व सुत्ते वेगवेगळ्या व्यक्तींच्या आशयानुसार सांगितली आहेत. आणि येथे प्रत्येक सुत्ताच्या शेवटी साठ-साठ भिक्खूंनी अर्हत्त्व प्राप्त केले. သဋ္ဌိပေယျာလဝဂ္ဂေါ. सट्ठिपेय्याळवर्ग समाप्त. ၁၈. သမုဒ္ဒဝဂ္ဂေါ १८. समुद्रवर्ग. ၁. ပဌမသမုဒ္ဒသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. पहिल्या समुद्रसुत्ताचे वर्णन. ၂၂၈. သမုဒ္ဒဝဂ္ဂဿ ပဌမေ စက္ခု, ဘိက္ခဝေ, ပုရိသဿ သမုဒ္ဒေါတိ ယဒိ ဒုပ္ပူရဏဋ္ဌေန ယဒိ ဝါ သမုဒ္ဒနဋ္ဌေန သမုဒ္ဒေါ, စက္ခုမေဝ သမုဒ္ဒေါ. တဿ ဟိ ပထဝိတော ယာဝ အကနိဋ္ဌဗြဟ္မလောကာ နီလာဒိအာရမ္မဏံ သမောသရန္တံ ပရိပုဏ္ဏဘာဝံ ကာတုံ န သက္ကောတိ, ဧဝံ ဒုပ္ပူရဏဋ္ဌေနပိ သမုဒ္ဒေါ. စက္ခု စ တေသု တေသု နီလာဒီသု အာရမ္မဏေသု သမုဒ္ဒတိ, အသံဝုတံ ဟုတွာ ဩသရမာနံ ကိလေသုပ္ပတ္တိယာ ကာရဏဘာဝေန သဒေါသဂမနေန ဂစ္ဆတီတိ သမုဒ္ဒနဋ္ဌေနပိ သမုဒ္ဒေါ. တဿ ရူပမယော ဝေဂေါတိ သမုဒ္ဒဿ အပ္ပမာဏော ဦမိမယော ဝေဂေါ ဝိယ တဿာပိ စက္ခုသမုဒ္ဒဿ သမောသရန္တဿ နီလာဒိဘေဒဿ အာရမ္မဏဿ ဝသေန အပ္ပမေယျော ရူပမယော ဝေဂေါ ဝေဒိတဗ္ဗော. ယော တံ ရူပမယံ ဝေဂံ သဟတီတိ ယော တံ စက္ခုသမုဒ္ဒေ သမောသဋံ ရူပမယံ ဝေဂံ, မနာပေ ရူပေ ရာဂံ, အမနာပေ ဒေါသံ, အသမပေက္ခိတေ မောဟန္တိ ဧဝံ ရာဂါဒိကိလေသေ အနုပ္ပာဒေန္တော ဥပေက္ခကဘာဝေန သဟတိ. २२८. समुद्रवर्गाच्या पहिल्या सुत्तात 'भिक्खूंनो, चक्षू हा माणसाचा समुद्र आहे.' जर अपूर्ण राहण्याच्या (भरता न येण्याच्या) अर्थाने किंवा 'समुद्रण' (दोषयुक्त गतीने जाणे) या अर्थाने समुद्र म्हटले, तर चक्षू हाच समुद्र आहे. कारण, पृथ्वीपासून अकनिष्ठ ब्रह्मलोकापर्यंतचे निळे इत्यादी आरंभाचे (रूपाचे) विषय त्यात प्रवेश करत असले तरी ते त्याला पूर्ण करू शकत नाहीत; अशा प्रकारे अपूर्ण राहण्याच्या अर्थानेही तो समुद्र आहे. आणि चक्षू त्या-त्या निळ्या इत्यादी आरंभाच्या विषयांमध्ये वाहून जातो (समुद्रण करतो), असंयत होऊन धावताना क्लेशांच्या उत्पत्तीचे कारण बनून सदोष गतीने जातो, म्हणून 'समुद्रण' या अर्थानेही तो समुद्र आहे. 'त्याचा रूपमय वेग' म्हणजे समुद्राच्या अमर्याद लाटांच्या वेगाप्रमाणे, या चक्षू-समुद्रात प्रवेश करणाऱ्या निळ्या इत्यादी विविध रूपांच्या विषयांच्या प्रभावामुळे निर्माण होणारा अमर्याद रूपमय वेग समजून घ्यावा. 'जो त्या रूपमय वेगाला सहन करतो' म्हणजे जो भिक्खू चक्षू-समुद्रात आलेल्या त्या रूपमय वेगाला, प्रिय रूपात राग, अप्रिय रूपात द्वेष आणि उपेक्षिलेल्या रूपात मोह अशा प्रकारे राग इत्यादी क्लेशांना उत्पन्न न करता उपेक्षक भावाने (तटस्थतेने) सहन करतो. သဦမိန္တိအာဒီသု ကိလေသဦမီဟိ သဦမိံ. ကိလေသာဝဋ္ဋေဟိ သာဝဋ္ဋံ. ကိလေသဂါဟေဟိ သဂါဟံ. ကိလေသရက္ခသေဟိ သရက္ခသံ. ကောဓူပါယာသဿ စ ဝသေန သဦမိံ. ဝုတဉှေတံ ‘‘ဦမိဘယန္တိ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, ကောဓူပါယာသဿေတံ အဓိဝစန’’န္တိ (ဣတိဝု. ၁၀၉; မ. နိ. ၂.၁၆၂; အ. နိ. ၄.၁၂၂). ကာမဂုဏဝသေန သာဝဋ္ဋံ. ဝုတဉှေတံ ‘‘အာဝဋ္ဋဂ္ဂါဟောတိ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, ပဉ္စန္နေတံ ကာမဂုဏာနံ အဓိဝစန’’န္တိ (သံ. နိ. ၄.၂၄၁). မာတုဂါမဝသေန သဂါဟံ သရက္ခသံ. ဝုတ္တဉှေတံ ‘‘ဂါဟရက္ခသောတိ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, မာတုဂါမဿေတံ အဓိဝစန’’န္တိ (ဣတိဝု. ၁၀၉). သေသဝါရေသုပိ ဧသေဝ [Pg.50] နယော. သဘယံ ဒုတ္တရံ အစ္စတရီတိ ဦမိဘယေန သဘယံ ဒုရတိက္ကမံ အတိက္ကမိ. လောကန္တဂူတိ သင်္ခါရလောကဿ အန္တံ ဂတော. ပါရဂတောတိ ဝုစ္စတီတိ နိဗ္ဗာနံ ဂတောတိ ကထီယတိ. 'सऊमिं' (तरंगांसह) इत्यादी शब्दांमध्ये, क्लेशांच्या लाटांमुळे 'सऊमि' (लाटांसह असलेला). क्लेशांच्या भोवऱ्यांमुळे 'सावट्टं' (भोवऱ्यांसह असलेला). क्लेशांच्या सुसरींमुळे 'सगाहं' (सुसरींसह असलेला). क्लेशांच्या राक्षसांमुळे 'सरक्खसं' (राक्षसांसह असलेला). किंवा क्रोध आणि उपायास (संताप) यांच्या प्रभावामुळे 'सऊमि' (लाटांसह असलेला). कारण असे म्हटले आहे की, 'भिक्खूंनो, तरंगभय (लाटांचे भय) हे क्रोध आणि उपायासाचेच नाव आहे.' कामगुणांच्या प्रभावामुळे 'सावट्टं' (भोवऱ्यांसह असलेला). कारण असे म्हटले आहे की, 'भिक्खूंनो, भोवरा आणि सुसर हे पाच कामगुणांचेच नाव आहे.' मातृग्रामाच्या (स्त्रीच्या) प्रभावामुळे 'सगाहं' आणि 'सरक्खसं' (सुसर आणि राक्षसांसह असलेला). कारण असे म्हटले आहे की, 'भिक्खूंनो, सुसर आणि राक्षस हे मातृग्रामाचे (स्त्रीचे) नाव आहे.' उर्वरित प्रकरणांमध्येही हाच नियम समजावा. 'सभयं दुत्तरं अच्चतरी' म्हणजे लाटांच्या भयाने युक्त असलेल्या आणि पार करण्यास कठीण असलेल्या समुद्राला पार केले. 'लोकन्तगू' म्हणजे संस्कार-लोकाच्या अंताला गेलेला. 'पारगतो' असे म्हटले जाते म्हणजे निर्वाणाला प्राप्त झालेला असे म्हटले जाते. ၂-၃. ဒုတိယသမုဒ္ဒသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ २-३. दुसऱ्या समुद्रसुत्ताचे इत्यादींचे वर्णन. ၂၂၉-၂၃၀. ဒုတိယေ သမုဒ္ဒေါတိ သမုဒ္ဒနဋ္ဌေန သမုဒ္ဒေါ, ကိလေဒနဋ္ဌေန တေမနဋ္ဌေနာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ယေဘုယျေနာတိ ဌပေတွာ အရိယသာဝကေ. သမုန္နာတိ ကိလိန္နာ တိန္တာ နိမုဂ္ဂါ. တန္တာကုလကဇာတာတိအာဒိ ဟေဋ္ဌာ ဝိတ္ထာရိတမေဝ. မစ္စုဇဟောတိ တယော မစ္စူ ဇဟိတွာ ဌိတော. နိရုပဓီတိ တီဟိ ဥပဓီဟိ အနုပဓိ. အပုနဗ္ဘဝါယာတိ နိဗ္ဗာနတ္ထာယ. အမောဟယီ မစ္စုရာဇန္တိ ယထာ တဿ ဂတိံ န ဇာနာတိ, ဧဝံ မစ္စုရာဇာနံ မောဟေတွာ ဂတော. တတိယံ ဝုတ္တနယမေဝ. २२९-२३०. दुसऱ्या सुत्तात 'समुद्र' म्हणजे समुद्रण (वाहून जाणे) या अर्थाने समुद्र, किंवा क्लेशांनी ओले करणे, भिजवणे या अर्थाने समुद्र असे म्हटले आहे. 'येभुय्येन' (बहुतांश करून) म्हणजे आर्यश्रावकांना सोडून. 'समुन्ना' म्हणजे ओले झालेले, भिजलेले, बुडालेले. 'तन्ताकुलकजाता' (तंतूंप्रमाणे गुंतागुंत झालेले) इत्यादींचे स्पष्टीकरण खाली सविस्तर दिलेच आहे. 'मच्चुजहो' म्हणजे तीन मृत्यूंना सोडून स्थित असलेला. 'निरुपधी' म्हणजे तीन उपाधींनी रहित (अनुपाधी). 'अपुनब्भवाय' म्हणजे पुनर्जन्म न होण्यासाठी, निर्वाणासाठी. 'अमोहयी मच्चुराजं' म्हणजे ज्याप्रमाणे मृत्यूचा राजा त्याची गती जाणू शकत नाही, अशा प्रकारे मृत्यूच्या राजाला मोहित करून (चकवून) गेलेला. तिसरे सुत्त पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावे. ၄-၆. ခီရရုက္ခောပမသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ४-६. खीररुक्खोपमसुत्त इत्यादींचे वर्णन. ၂၃၁-၂၃၃. စတုတ္ထေ အပ္ပဟီနဋ္ဌေန အတ္ထိ, တေနေဝါဟ သော အပ္ပဟီနောတိ. ပရိတ္တာတိ, ပဗ္ဗတမတ္တမ္ပိ ရူပံ အနိဋ္ဌံ အရဇနီယံ ပရိတ္တံ နာမ ဟောတိ, ဧဝရူပါပိဿ ရူပါ စိတ္တံ ပရိယာဒိယန္တီတိ ဒဿေတိ. ကော ပန ဝါဒေါ အဓိမတ္တာနန္တိ ဣဋ္ဌာရမ္မဏံ ပနဿ ရဇနီယံ ဝတ္ထု စိတ္တံ ပရိယာဒိယတီတိ ဧတ္ထ ကာ ကထာ? ဧတ္ထ စ နခပိဋ္ဌိပမာဏမ္ပိ မဏိမုတ္တာဒိ ရဇနီယံ ဝတ္ထု အဓိမတ္တာရမ္မဏမေဝါတိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ဒဟရောတိအာဒီနိ တီဏိပိ အညမညဝေဝစနာနေဝ. အာဘိန္ဒေယျာတိ ပဟရေယျ ပဒါလေယျ ဝါ. ပဉ္စမေ တဒုဘယန္တိ တံ ဥဘယံ. ဆဋ္ဌံ ဥတ္တာနမေဝ. २३१-२३३. चौथ्या सूत्तात, (मग्गाने/मार्गाने क्लेश) नष्ट न केल्यामुळे (अस्तित्वात) आहे, म्हणूनच त्यांनी 'तो नष्ट न झालेला' (अप्पहीनो) असे म्हटले आहे. 'परित्त' (अल्प) म्हणजे - पर्वताएवढे मोठे रूप असले तरी जर ते अनिष्ट (अप्रिय) आणि अरागणीय (आकर्षक नसलेले) असेल, तर त्याला 'परित्त' (अल्प) म्हटले जाते. अशा प्रकारची रूपे देखील (क्लेश नष्ट न झालेल्या व्यक्तीचे) चित्त पूर्णपणे व्यापून टाकतात, हे ते दर्शवितात. 'को पन वादो अधिमत्तानं' (मग मोठ्या रूपांबद्दल काय सांगावे?) म्हणजे - प्रिय आणि आकर्षक असणारी वस्तू त्याच्या चित्ताला व्यापून टाकते, याबद्दल काय बोलावे? (यात काही शंकाच नाही). आणि येथे नखाच्या आकाराएवढी लहान असलेली मणी, मोती इत्यादी आकर्षक वस्तू देखील 'अधिमत्त आरम्मण' (तीव्र आलंबन) च समजावी. 'दहरो' (तरुण/लहान) इत्यादी तिन्ही शब्द एकमेकांचे समानार्थीच आहेत. 'आभिन्देय्य' म्हणजे प्रहार करावा किंवा फोडून टाकावे. पाचव्या सूत्तात 'तदुभयं' म्हणजे ते दोन्ही. सहावे सूत्त अगदी स्पष्टच आहे. ၇. ဥဒါယီသုတ္တဝဏ္ဏနာ ७. उदायी सूत्ताचे स्पष्टीकरण ၂၃၄. သတ္တမေ အနေကပရိယာယေနာတိ အနေကေဟိ ကာရဏေဟိ. ဣတိပါယန္တိ ဣတိပိ အယံ. ဣမသ္မိံ သုတ္တေ အနိစ္စေန အနတ္တလက္ခဏံ ကထိတံ. २३४. सातव्या सूत्तात, 'अनेकपरियायेन' म्हणजे अनेक कारणांनी (अनेक प्रकारे). 'इतिपायं' म्हणजे 'इति पि अयं' (अशा प्रकारे हा). या सूत्तात अनित्यता दर्शवून अनात्म लक्षण सांगितले आहे. ၈. အာဒိတ္တပရိယာယသုတ္တဝဏ္ဏနာ ८. आदित्तपरियाय सूत्ताचे स्पष्टीकरण ၂၃၅. အဋ္ဌမေ အနုဗျဉ္ဇနသော နိမိတ္တဂ္ဂါဟောတိ ‘‘ဟတ္ထာ သောဘနာ ပါဒါ သောဘနာ’’တိ ဧဝံ အနုဗျဉ္ဇနဝသေန နိမိတ္တဂ္ဂါဟော. နိမိတ္တဂ္ဂါဟောတိ ဟိ [Pg.51] သံသန္ဒေတွာ ဂဟဏံ, အနုဗျဉ္ဇနဂ္ဂါဟောတိ ဝိဘတ္တိဂဟဏံ. နိမိတ္တဂ္ဂါဟော ကုမ္ဘီလသဒိသော သဗ္ဗမေဝ ဂဏှာတိ, အနုဗျဉ္ဇနဂ္ဂါဟော ရတ္တပါသဒိသော ဝိဘဇိတွာ ဟတ္ထပါဒါဒီသု တံ တံ ကောဋ္ဌာသံ. ဣမေ ပန ဒွေ ဂါဟာ ဧကဇဝနဝါရေပိ လဗ္ဘန္တိ, နာနာဇဝနဝါရေ ဝတ္တဗ္ဗမေဝ နတ္ထိ. २३५. आठव्या सूत्तात, 'अनुब्यञ्जनसो निमित्तग्गाहो' म्हणजे - 'हात सुंदर आहेत, पाय सुंदर आहेत' अशा प्रकारे अनुव्यंजनांच्या (अवयवांच्या) आधारे निमित्त ग्रहण करणे. 'निमित्तग्राह' म्हणजे सर्व अवयव एकत्र करून (एकसंधपणे) ग्रहण करणे, तर 'अनुव्यंजनग्राह' म्हणजे विभागून (वेगवेगळे करून) ग्रहण करणे होय. निमित्तग्राह हा मगरीसारखा असतो, जो संपूर्णपणे पकडतो. अनुव्यंजनग्राह हा जळूसारखा असतो, जो हात, पाय इत्यादींमध्ये विभागून त्या-त्या भागाला ग्रहण करतो. हे दोन्ही प्रकारचे ग्रहण एकाच जवन-वारात देखील घडू शकतात, मग वेगवेगळ्या जवन-वारांबद्दल तर बोलण्याची गरजच नाही. နိမိတ္တဿာဒဂထိတန္တိ နိမိတ္တဿာဒေန ဂန္ထိတံ ဗဒ္ဓံ. ဝိညာဏန္တိ ကမ္မဝိညာဏံ. တသ္မိံ စေ သမယေ ကာလံ ကရေယျာတိ န ကောစိ သံကိလိဋ္ဌေန စိတ္တေန ကာလံ ကရောန္တော နာမ အတ္ထိ. သဗ္ဗသတ္တာနဉှိ ဘဝင်္ဂေနေဝ ကာလကိရိယာ ဟောတိ. ကိလေသဘယံ ပန ဒဿေန္တော ဧဝမာဟ. သမယဝသေန ဝါ ဧဝံ ဝုတ္တံ. စက္ခုဒွါရသ္မိဉှိ အာပါထဂတေ အာရမ္မဏေ ရတ္တစိတ္တံ ဝါ ဒုဋ္ဌစိတ္တံ ဝါ မူဠှစိတ္တံ ဝါ အာရမ္မဏရသံ အနုဘဝိတွာ ဘဝင်္ဂံ ဩတရတိ, ဘဝင်္ဂေ ဌတွာ ကာလကိရိယံ ကရောတိ. တသ္မိံ သမယေ ကာလံ ကရောန္တဿ ဒွေဝ ဂတိယော ပါဋိကင်္ခါ, ဣမဿ သမယဿ ဝသေနေတံ ဝုတ္တံ. ‘निमित्तस्सादगथितं’ म्हणजे निमित्ताच्या आस्वादाने बांधलेले किंवा जखडलेले. ‘विञ्ञाणं’ म्हणजे कर्मविज्ञान. ‘तस्मिं चे समये कालं करेय्य’ (आणि जर तो त्या वेळी मरण पावला तर) याविषयी - संक्लिष्ट (मलीन) चित्ताने कोणीही मरण पावत नाही. कारण सर्व प्राण्यांचा मृत्यू हा भवांगानेच (भवांग चित्तानेच) होतो. परंतु, क्लेशांचे भयानक भय दाखवण्यासाठी (भगवंतांनी) असे म्हटले आहे. किंवा मृत्यूच्या वेळेच्या प्रभावावरून असे म्हटले आहे. कारण चक्षुद्वारासमोर आलंबन आले असता, रागीट (आसक्त) चित्त, द्वेषयुक्त चित्त किंवा मोहित चित्त आलंबनाचा आस्वाद घेऊन भवांगात उतरते आणि भवांगात राहूनच मृत्यू पावते. त्या वेळी मरण पावणाऱ्या व्यक्तीला दोनच गती प्राप्त होण्याची शक्यता असते, या वेळेच्या प्रभावामुळेच असे म्हटले गेले आहे. ဣမံ ခွာဟံ, ဘိက္ခဝေ, အာဒီနဝန္တိ ဣမံ အနေကာနိ ဝဿသတသဟဿာနိ နိရယေ အနုဘဝိတဗ္ဗံ ဒုက္ခံ သမ္ပဿမာနော ဧဝံ ဝဒါမိ တတ္တာယ အယောသလာကာယ အက္ခီနိ အဉ္ဇာပေတုကာမောတိ. ဣမိနာ နယေန သဗ္ဗတ္ထ အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. အယောသင်္ကုနာတိ အယသူလေန. သမ္ပလိမဋ္ဌန္တိ ဒွေပိ ကဏ္ဏစ္ဆိဒ္ဒါနိ ဝိနိဝိဇ္ဈိတွာ ပထဝိယံ အာကောဋနဝသေန သမ္ပလိမဋ္ဌံ. ‘भिक्खूंनो, मी हा दोष...’ म्हणजे नरकात अनेक लाखो वर्षे भोगावे लागणारे हे दुःख चांगल्या प्रकारे पाहून, ‘तप्त लोखंडी सळईने डोळे टोचून घेणे बरे’ असे मी म्हणतो. या पद्धतीने सर्व ठिकाणी अर्थ समजून घ्यावा. ‘अयोशंकुना’ म्हणजे लोखंडी सुळाने. ‘सम्पलिमट्ठं’ म्हणजे दोन्ही कानांचे छिद्र आरपार टोचून जमिनीवर ठोकून अत्यंत पीडित करणे. တတိယဝါရေ သမ္ပလိမဋ္ဌန္တိ နခစ္ဆေဒနံ ပဝေသေတွာ ဥက္ခိပိတွာ သဟဓုနဋ္ဌေန ဆိန္ဒိတွာ ပါတနဝသေန သမ္ပလိမဋ္ဌံ. စတုတ္ထဝါရေ သမ္ပလိမဋ္ဌန္တိ ဗန္ဓနမူလံ ဆေတွာ ပါတနဝသေန သမ္ပလိမဋ္ဌံ. ပဉ္စမဝါရေ သမ္ပလိမဋ္ဌန္တိ တိခိဏာယ သတ္တိယာ ကာယပသာဒံ ဥပ္ပာဋေတွာ ပတနဝသေန သမ္ပလိမဋ္ဌံ. သတ္တိယာတိ ဧတ္ထ မဟတီ ဒဏ္ဍကဝါသိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. သောတ္တန္တိ နိပဇ္ဇိတွာ နိဒ္ဒေါက္ကမနံ. ယထာရူပါနံ ဝိတက္ကာနံ ဝသံ ဂတော သံဃံ ဘိန္ဒေယျာတိ ဣမိနာ ဝိတက္ကာနံ ယာဝ သံဃဘေဒါ ပါပကမ္မာဝဟနတာ ဒဿိတာ. သေသမေတ္ထ ဥတ္တာနမေဝ. तिसऱ्या वेळी ‘सम्पलिमट्ठं’ म्हणजे नख कापण्याचे लहान हत्यार आत घालून, वर उचलून, नाकाच्या दोन्ही छिद्रांमधील पडद्यासह कापून खाली पाडण्याच्या क्रियेद्वारे अत्यंत पीडित करणे. चौथ्या वेळी ‘सम्पलिमट्ठं’ म्हणजे जिभेचे मूळ कापून खाली पाडण्याच्या क्रियेद्वारे अत्यंत पीडित करणे. पाचव्या वेळी ‘सम्पलिमट्ठं’ म्हणजे तीक्ष्ण भाल्याने कायप्रसाद (त्वचेची संवेदनशीलता) सोलून काढून खाली पाडण्याच्या क्रियेद्वारे अत्यंत पीडित करणे. ‘सत्ती’ म्हणजे येथे मोठी सुरी किंवा दांडा असलेली कुऱ्हाड/भाला समजावा. ‘सोत्तं’ म्हणजे झोपून निद्राधीन होणे. ‘ज्या प्रकारच्या वितर्कांच्या आहारी जाऊन संघभेद करावा...’ याद्वारे वितर्कांमुळे संघभेदापर्यंतचे पाप कृत्य घडवून आणण्याची क्षमता दर्शविली आहे. येथील उर्वरित भाग अगदी स्पष्टच आहे. ၉-၁၀. ပဌမဟတ္ထပါဒေါပမသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ९-१०. प्रथम हस्त-पाद उपमा सूत्त इत्यादींचे स्पष्टीकरण ၂၃၆-၂၃၇. နဝမေ [Pg.52] ဟတ္ထေသု, ဘိက္ခဝေ, သတီတိ ဟတ္ထေသု ဝိဇ္ဇမာနေသု. ဒသမေ န ဟောတီတိ ဝုစ္စမာနေ ဗုဇ္ဈနကာနံ အဇ္ဈာသယဝသေန ဝုတ္တံ. ဒွီသုပိ စေတေသု ဝိပါကသုခဒုက္ခမေဝ ဒဿေတွာ ဝဋ္ဋဝိဝဋ္ဋံ ကထိတန္တိ. २३६-२३७. नवव्या सूत्तात 'भिक्खूंनो, हात असताना...' म्हणजे हात अस्तित्वात असताना. दहाव्या सूत्तात 'होत नाही' असे म्हटले असता, (सत्य) जाणू इच्छिणाऱ्यांच्या आशयानुसार हे म्हटले आहे. या दोन्ही सूत्तांमध्ये विपाक सुख-दुःखच दर्शवून संसारचक्र (वट्ट) आणि संसारमुक्ती (विवट्ट) यांविषयी सांगितले आहे. သမုဒ္ဒဝဂ္ဂေါ နိဋ္ဌိတော. समुद्र वर्ग समाप्त झाला। ၁၉. အာသီဝိသဝဂ္ဂေါ १९. आसीविस वर्ग ၁. အာသီဝိသောပမသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. आसीविसोपम सूत्ताचे स्पष्टीकरण ၂၃၈. အာသီဝိသဝဂ္ဂဿ ပဌမေ ဘိက္ခူ အာမန္တေသီတိ ဧကစာရိကဒွိစာရိကတိစာရိကစတုစာရိကပဉ္စစာရိကေ သဘာဂဝုတ္တိနော ကာရကေ ယုတ္တပယုတ္တေ သဗ္ဗေပိ ဒုက္ခလက္ခဏကမ္မဋ္ဌာနိကေ ပရိဝါရေတွာ နိသိန္နေ ယောဂါဝစရေ ဘိက္ခူ အာမန္တေသိ. ဣဒဉှိ သုတ္တံ ပုဂ္ဂလဇ္ဈာသယေန ဝုတ္တံ. ပုဂ္ဂလေသုပိ ဝိပဉ္စိတညူနံ ဒိသာဝါသိကာနံ ဒုက္ခလက္ခဏကမ္မဋ္ဌာနိကာနံ ဥပဋ္ဌာနဝေလာယ အာဂန္တွာ သတ္ထာရံ ပရိဝါရေတွာ နိသိန္နာနံ ဝသေန ဝုတ္တံ. ဧဝံ သန္တေပိ ဥဂ္ဃဋိတညူအာဒီနံ စတုန္နမ္ပိ ပုဂ္ဂလာနံ ပစ္စယဘူတမေဝေတံ. ဥဂ္ဃဋိတညူ ပုဂ္ဂလော ဟိ ဣမဿ သုတ္တဿ မာတိကာနိက္ခေပေနေဝ အရဟတ္တံ ပါပုဏိဿတိ, ဝိပဉ္စိတညူ မာတိကာယ ဝိတ္ထာရဘာဇနေန, နေယျပုဂ္ဂလော ဣမမေဝ သုတ္တံ သဇ္ဈာယန္တော ပရိပုစ္ဆန္တော ယောနိသော မနသိကရောန္တော ကလျာဏမိတ္တေ သေဝန္တော ဘဇန္တော ပယိရုပါသန္တော အရဟတ္တံ ပါပုဏိဿတိ. ပဒပရမဿေတံ သုတ္တံ အနာဂတေ ဝါသနာ ဘဝိဿတီတိ ဧဝံ သဗ္ဗေသမ္ပိ ဥပကာရဘာဝံ ဉတွာ ဘဂဝါ သိနေရုံ ဥက္ခိပန္တော ဝိယ အာကာသံ ဝိတ္ထာရေန္တော ဝိယ စက္ကဝါဠပဗ္ဗတံ ကမ္ပေန္တော ဝိယ စ မဟန္တေန ဥဿာဟေန သေယျထာပိ, ဘိက္ခဝေတိ ဣမံ အာသီဝိသောပမသုတ္တံ အာရဘိ. २३८. आसीविस वर्गाच्या पहिल्या सूत्तात, 'भिक्खूंना संबोधित केले' म्हणजे - एकटेच विहार करणारे, दोघे मिळून विहार करणारे, तिघे, चौघे किंवा पाच जण मिळून विहार करणारे, समान आचरण असणारे, (साधनेत) तत्पर व प्रयत्नशील असणारे, सर्वच जण दुःखलक्षणावर आधारित कर्मस्थान (साधना) करणारे आणि सभोवताली वेढून बसलेल्या योगावचर भिक्खूंना संबोधित केले. कारण हे सूत्त व्यक्तींच्या आशयानुसार सांगितले गेले आहे. व्यक्तींमध्ये देखील, जे 'विपञ्चितञ्ञू' (विस्ताराने सांगताच समजणारे) आहेत, जे वेगवेगळ्या दिशांना राहणारे आहेत, जे दुःखलक्षणावर आधारित कर्मस्थान साधना करणारे आहेत, आणि जे उपस्थानाच्या (दर्शनाच्या) वेळी येऊन शास्त्यांना वेढून बसले होते, त्यांच्या उद्देशाने हे सांगितले गेले आहे. असे असले तरी, 'उग्घटितञ्ञू' (थोडक्यात सांगताच समजणारे) इत्यादी चारही प्रकारच्या व्यक्तींसाठी हे सूत्त उपकारक ठरणारेच आहे. कारण उग्घटितञ्ञू व्यक्ती या सूत्ताच्या केवळ मातृका (थोडक्यात मांडणी) ऐकूनच अर्हत्त्व प्राप्त करेल, व विपञ्चितञ्ञू व्यक्ती मातृकेच्या सविस्तर स्पष्टीकरणाने, 'नेय्य' (मार्गदर्शनाने समजणारा) व्यक्ती याच सूत्ताचे पठण करत, प्रश्न विचारत, योग्य प्रकारे मनन करत, कल्याणमित्रांची सेवा करत, त्यांच्याशी संगत करत आणि त्यांची उपासना करत अर्हत्त्व प्राप्त करेल. 'पदपरम' व्यक्तीसाठी हे सूत्त भविष्यात संस्कार म्हणून उपयुक्त ठरेल. अशा प्रकारे सर्वांसाठीच याचे उपकारकत्व जाणून, भगवंतांनी जणू सुमेरू पर्वत उचलल्याप्रमाणे, जणू आकाशाचा विस्तार केल्याप्रमाणे आणि जणू चक्रवाळ पर्वताला कंपित केल्याप्रमाणे मोठ्या उत्साहाने 'सेय्यथापि, भिक्खवे' (जसे की, भिक्खूंनो...) असे म्हणून या 'आसीविसोपम सूत्ता'ची सुरुवात केली। တတ္ထ စတ္တာရော အာသီဝိသာတိ ကဋ္ဌမုခေါ, ပူတိမုခေါ, အဂ္ဂိမုခေါ, သတ္ထမုခေါတိ ဣမေ စတ္တာရော. တေသု ကဋ္ဌမုခေန ဒဋ္ဌဿ သကလသရီရံ သုက္ခကဋ္ဌံ ဝိယ ထဒ္ဓံ ဟောတိ, သန္ဓိပဗ္ဗေသု အဓိမတ္တံ အယသူလသမပ္ပိတံ ဝိယ တိဋ္ဌတိ. ပူတိမုခေန ဒဋ္ဌဿ ပက္ကပူတိပနသံ ဝိယ ဝိပုဗ္ဗကဘာဝံ အာပဇ္ဇိတွာ ပဂ္ဃရတိ[Pg.53], စင်္ဂဝါရေ ပက္ခိတ္တဥဒကံ ဝိယ ဟောတိ. အဂ္ဂိမုခေန ဒဋ္ဌဿ သကလသရီရံ ဈာယိတွာ ဘသ္မမုဋ္ဌိ ဝိယ ထုသမုဋ္ဌိ ဝိယ စ ဝိပ္ပကိရီယတိ. သတ္တမုခေန ဒဋ္ဌဿ သကလသရီရံ ဘိဇ္ဇတိ, အသနိပါတဋ္ဌာနံ ဝိယ မဟာနိခါဒနေန ခတသန္ဓိမုခံ ဝိယ စ ဟောတိ. ဧဝံ ဝိသဝသေန ဝိဘတ္တာ စတ္တာရော အာသီဝိသာ. तेथे 'चार विषारी सर्प' म्हणजे - काष्ठमुख, पूतिमुख, अग्निमुख आणि शस्त्रमुख हे चार सर्प होत. त्यांपैकी काष्ठमुख सर्पाने चावलेल्या व्यक्तीचे संपूर्ण शरीर सुकलेल्या लाकडासारखे कडक होते, आणि सांध्यासांध्यांमध्ये जणू लोखंडी सुळ आरपार घुसल्यासारखी तीव्र वेदना होते. पूतिमुख सर्पाने चावलेल्या व्यक्तीचे संपूर्ण शरीर पिकलेल्या व सडलेल्या फणसासारखे पू आणि रक्ताने भरून वाहू लागते, आणि ते जणू गाळणीत टाकलेल्या पाण्यासारखे होते. अग्निमुख सर्पाने चावलेल्या व्यक्तीचे संपूर्ण शरीर जळून राख होते आणि मुठभर राखेसारखे किंवा मुठभर कोंड्यासारखे विखुरले जाते. शस्त्रमुख सर्पाने चावलेल्या व्यक्तीचे संपूर्ण शरीर छिन्नविच्छिन्न होते, जणू वीज पडलेली जागा किंवा मोठ्या छिन्नीने सांधे तोडल्यासारखी त्याची अवस्था होते. अशा प्रकारे विषाच्या प्रभावावरून हे चार विषारी सर्प विभागले गेले आहेत। ဝိသဝေဂဝိကာရေန ပနေတေ သောဠသ ဟောန္တိ. ကဋ္ဌမုခေါ ဟိ ဒဋ္ဌဝိသော, ဒိဋ္ဌဝိသော, ဖုဋ္ဌဝိသော, ဝါတဝိသောတိ စတုဗ္ဗိဓော ဟောတိ. တေန ဟိ ဒဋ္ဌမ္ပိ ဒိဋ္ဌမ္ပိ ဖုဋ္ဌမ္ပိ တဿ ဝါတေန ပဟဋမ္ပိ သရီရံ ဝုတ္တပ္ပကာရေန ထဒ္ဓံ ဟောတိ. သေသေသုပိ ဧသေဝ နယောတိ. ဧဝံ ဝိသဝေဂဝိကာရဝသေန သောဠသ ဟောန္တိ. शिवाय, विषाच्या वेगाच्या विकाराने हे सोळा प्रकार होतात। कट्टमुख (काष्ठमुख) साप हा चावल्याने विष चढणारा (दट्ठविस), पाहण्याने विष चढणारा (दिट्ठविस), स्पर्शाने विष चढणारा (फुट्ठविस) आणि श्वासाच्या हवेने विष चढणारा (वातविस) अशा चार प्रकारचा असतो। त्यामुळे, त्याने चावल्यास, पाहिले असता, स्पर्श केल्यास किंवा त्याच्या श्वासाच्या हवेचा स्पर्श झाल्यास देखील शरीर पूर्वोक्त प्रकारे ताठ (कडक) होते। उर्वरित सापांच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा। अशा प्रकारे, विषाच्या वेगाच्या विकाराने हे सोळा प्रकार होतात। ပုန ပုဂ္ဂလပဏ္ဏတ္တိဝသေန စတုသဋ္ဌိ ဟောန္တိ. ကထံ? ကဋ္ဌမုခေသု တာဝ ဒဋ္ဌဝိသော စ အာဂတဝိသော နော ဃောရဝိသော, ဃောရဝိသော နော အာဂတဝိသော, အာဂတဝိသော စေဝ ဃောရဝိသော စ, နေဝါဂတဝိသော န ဃောရဝိသောတိ စတုဗ္ဗိဓော ဟောတိ. တတ္ထ ယဿ ဝိသံ သမ္ပဇ္ဇလိတတိဏုက္ကာယ အဂ္ဂိ ဝိယ သီဃံ အဘိရုဟိတွာ အက္ခီနိ ဂဟေတွာ ခန္ဓံ ဂဟေတွာ သီသံ ဂဟေတွာ ဌိတန္တိ ဝတ္တဗ္ဗတံ အာပဇ္ဇတိ မဏိသပ္ပာဒီနံ ဝိသံ ဝိယ, မန္တံ ပန ပရိဝတ္တေတွာ ကဏ္ဏဝါတံ ဒတွာ ဒဏ္ဍကေန ပဟဋမတ္တေ ဩတရိတွာ ဒဋ္ဌဋ္ဌာနေယေဝ တိဋ္ဌတိ, အယံ အာဂတဝိသော နော ဃောရဝိသော နာမ. ယဿ ပန ဝိသံ သဏိကံ အဘိရုဟတိ, အာရုဠှာရုဠှဋ္ဌာနေ ပန အယံ သီတဥဒကံ ဝိယ ဟောတိ ဥဒကသပ္ပာဒီနံ ဝိသံ ဝိယ, ဒွါဒသဝဿစ္စယေနာပိ ကဏ္ဏပိဋ္ဌိခန္ဓပိဋ္ဌိကာဒီသု ဂဏ္ဍပိဠကာဒိဝသေန ပညာယတိ, မန္တပရိဝတ္တနာဒီသု စ ကယိရမာနာသု သီဃံ န ဩတရတိ, အယံ ဃောရဝိသော နော အာဂတဝိသော နာမ. ယဿ ပန ဝိသံ သီဃံ အဘိရုဟတိ, န သီဃံ ဩတရတိ အနေဠကသပ္ပာဒီနံ ဝိသံ ဝိယ, အယံ အာဂတဝိသော စေဝ ဃောရဝိသော စ. ယဿ ပန ဝိသံ မန္ဒံ ဟောတိ, ဩတာရိယမာနမ္ပိ သုခေနေဝ ဩတရတိ နီလသပ္ပဓမ္မနိသပ္ပာဒီနံ ဝိသံ ဝိယ, အယံ နေဝါဂတဝိသော န ဃောရဝိသော နာမ. ဣမိနာ ဥပါယေန ကဋ္ဌမုခေ ဒဋ္ဌဝိသာဒယော ပူတိမုခါဒီသု စ ဒဋ္ဌဝိသာဒယော ဝေဒိတဗ္ဗာတိ. ဧဝံ ပုဂ္ဂလပဏ္ဏတ္တိဝသေန စတုသဋ္ဌိ. पुन्हा, पुग्गलपण्णत्ति (व्यक्ति-प्रज्ञप्ती) च्या पद्धतीने हे चौसष्ट प्रकार होतात। ते कसे? कट्टमुख सापांमध्ये प्रथम, चावल्याने विष चढणारा (दट्ठविस) साप चार प्रकारचा असतो: वेगाने चढणारे पण तीव्र नसलेले विष (आगतविस नो घोरविस), तीव्र पण वेगाने न चढणारे विष (घोरविस नो आगतविस), वेगाने चढणारे आणि तीव्र असलेले विष (आगतविस चेव घोरविस च), आणि वेगाने न चढणारे व तीव्रही नसलेले विष (नेवागतविस न घोरविस)। त्यापैकी, ज्याचे विष पेटवलेल्या गवताच्या मशालीच्या अग्नीप्रमाणे वेगाने चढून, डोळे जकडून, खांदे जकडून, डोके जकडून स्थिर होते असे म्हटले जाते—जसे की मणिसर्प (हिरवे साप) इत्यादींचे विष असते; परंतु मंत्रांचे पठण करून, कानात फुंकर मारून आणि केवळ काठीने मारल्याबरोबर ते उतरून फक्त चावलेल्या ठिकाणीच स्थिर राहते, त्याला 'वेगाने चढणारे पण तीव्र नसलेले विष' (आगतविस नो घोरविस) म्हणतात। परंतु, ज्याचे विष हळूहळू चढते, पण चढलेल्या ठिकाणी ते थंड पाण्यासारखे वाटते—जसे की पाणसर्प इत्यादींचे विष असते; बारा वर्षांनंतरही कानाच्या मागे, खांद्याच्या मागे इत्यादी ठिकाणी गळू किंवा पुळ्यांच्या रूपाने ते दिसून येते, आणि मंत्रपठण इत्यादी उपचार केले तरी वेगाने उतरत नाही, त्याला 'तीव्र पण वेगाने न चढणारे विष' (घोरविस नो आगतविस) म्हणतात। परंतु, ज्याचे विष वेगाने चढते आणि वेगाने उतरत नाही—जसे की अजगरासारख्या सापांचे विष असते, त्याला 'वेगाने चढणारे आणि तीव्र असलेले विष' (आगतविस चेव घोरविस च) म्हणतात। परंतु, ज्याचे विष मंद असते आणि उतरवले असता सहजपणे उतरते—जसे की निळे साप, धामण इत्यादी सापांचे विष असते, त्याला 'वेगाने न चढणारे आणि तीव्रही नसलेले विष' (नेवागतविस न घोरविस) म्हणतात। याच पद्धतीने कट्टमुख सापांमधील चावल्याने विष चढणारे इत्यादी प्रकार आणि पूतिमुख इत्यादी सापांमधील चावल्याने विष चढणारे इत्यादी प्रकार समजून घ्यावेत। अशा प्रकारे, पुग्गलपण्णत्तीच्या पद्धतीने हे चौसष्ट प्रकार होतात। တေသု [Pg.54] ‘‘အဏ္ဍဇာ နာဂါ’’တိအာဒိနာ (သံ. နိ. ၃.၃၄၂-၃၄၄) ယောနိဝသေန ဧကေကံ စတုဓာ ဝိဘဇိတွာ ဆပဏ္ဏာသာဓိကာနိ ဒွေ သတာနိ ဟောန္တိ. တေ ဇလဇာထလဇာတိ ဒွိဂုဏိတာ ဒွါဒသာဓိကာနိ ပဉ္စသတာနိ ဟောန္တိ, တေ ကာမရူပအကာမရူပါနံ ဝသေန ဒွိဂုဏိတာ စတုဝီသာဓိကသဟဿသင်္ခါ ဟောန္တိ. ပုန ဂတမဂ္ဂဿ ပဋိလောမတော သံခိပ္ပမာနာ ကဋ္ဌမုခါဒိဝသေန စတ္တာရောဝ ဟောန္တီတိ. တေ သန္ဓာယ ဘဂဝါ ‘‘သေယျထာပိ, ဘိက္ခဝေ, စတ္တာရော အာသီဝိသာ’’တိ အာဟ. ကုလဝသေန ဟိ ဧတေ ဂဟိတာ. त्यांच्यामध्ये, 'अंडज नाग' इत्यादी योनीच्या (उत्पत्तीच्या) पद्धतीने प्रत्येकाला चार भागांत विभागून दोनशे छप्पन्न (२५६) प्रकार होतात। जलज (पाण्यात राहणारे) आणि थलज (जमिनीवर राहणारे) या दोन प्रकारांनी त्यांना गुणिले असता ते पाचशे बारा (५१२) होतात। इच्छेनुसार रूप बदलू शकणारे (कामरूप) आणि रूप बदलू न शकणारे (अकामरूप) या दोन प्रकारांनी त्यांना गुणिले असता त्यांची संख्या एक हजार चोवीस (१०२४) होते। पुन्हा, आधी सांगितलेल्या संख्येच्या उलट क्रमाने संक्षेप केला असता, कट्टमुख इत्यादींच्या रूपाने ते केवळ चारच होतात। त्यांनाच उद्देशून भगवान म्हणाले, 'भिक्खून्नों, ज्याप्रमाणे चार विषारी साप (आसीविस) असतात...' कारण, हे कुळाच्या (वंशाच्या) पद्धतीने घेतले गेले आहेत। တတ္ထ အာသီဝိသာတိ အာသိတ္တဝိသာတိပိ အာသီဝိသာ, အသိတဝိသာတိပိ အာသီဝိသာ, အသိသဒိသဝိသာတိပိ အာသီဝိသာ. အာသိတ္တဝိသာတိ သကလကာယေ အာသိဉ္စိတွာ ဝိယ ဌပိတဝိသာ, ပရဿ စ အတ္တနော သရီရေ စ အာသိဉ္စနဝိသာတိ အတ္ထော. အသိတဝိသာတိ ယံ ယံ ဧတေဟိ အသိတံ ဟောတိ ပရိဘုတ္တံ, တံ တံ ဝိသမေဝ သမ္ပဇ္ဇတိ, တသ္မာ အသိတံ ဝိသံ ဟောတိ ဧတေသန္တိ အာသီဝိသာ. အသိသဒိသဝိသာတိ အသိဝိယ တိခိဏံ ပရမမ္မစ္ဆေဒနသမတ္ထံ ဝိသံ ဧတေသန္တိ အာသီဝိသာတိ ဧဝမေတ္ထ ဝစနတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. ဥဂ္ဂတေဇာတိ ဥဂ္ဂတတေဇာ ဗလဝတေဇာ. ဃောရဝိသာတိ ဒုန္နိမ္မဒ္ဒနဝိသာ. त्यामध्ये, 'आसीविस' (विषारी साप) या शब्दाचा अर्थ असा समजावा: 'आसित्तविस' (अंगावर ओतल्यासारखे विष असणारे) म्हणूनही ते 'आसीविस' आहेत; 'असितविस' (खाल्लेले अन्न विष बनणारे) म्हणूनही ते 'आसीविस' आहेत; 'असिसादिसविस' (तलवारीसारखे तीक्ष्ण विष असणारे) म्हणूनही ते 'आसीविस' आहेत। 'आसित्तविस' म्हणजे संपूर्ण शरीरावर ओतल्याप्रमाणे विष असलेले, म्हणजेच दुसऱ्याच्या शरीरात आणि स्वतःच्या शरीरात विष ओतणारे, असा अर्थ आहे। 'असितविस' म्हणजे त्यांनी जे काही अन्न खाल्ले किंवा सेवन केले असेल, ते सर्व विषच बनते; म्हणून ज्यांचे खाल्लेले अन्न विष बनते, ते 'आसीविस' होत। 'असिसादिसविस' म्हणजे ज्यांचे विष तलवारीप्रमाणे तीक्ष्ण आणि मर्मस्थानांचा छेद करण्यास समर्थ असते, ते 'आसीविस' होत; अशा प्रकारे येथील शब्दाचा अर्थ (वचनत्थ) समजावा। 'उग्गतेजा' म्हणजे तीव्र प्रभाव असलेले (उग्गततेजा) किंवा बलवान प्रभाव असलेले (बलवतेजा)। 'घोरविसा' म्हणजे मंत्र किंवा औषधांनी सहजपणे दूर न करता येणारे विष असलेले (दुन्निम्मदद्विस)। ဧဝံ ဝဒေယျုန္တိ ပဋိဇဂ္ဂါပနတ္ထံ ဧဝံ ဝဒေယျုံ. ရာဇာနော ဟိ အာသီဝိသေ ဂါဟာပေတွာ – ‘‘တထာရူပေ စောရေ ဝါ ဧတေဟိ ဍံသာပေတွာ မာရေဿာမ, နဂရူပရောဓကာလေ ပရသေနာယ ဝါ တံ ခိပိဿာမ, ပရဗလံ နိမ္မဒ္ဒေတုံ အသက္ကောန္တာ သုဘောဇနံ ဘုဉ္ဇိတွာ ဝရသယနံ အာရုယှ ဧတေဟိ အတ္တာနံ ဍံသာပေတွာ သတ္တူနံ ဝသံ အနာဂစ္ဆန္တာ အတ္တနော ရုစိယာ မရိဿာမာ’’တိ အာသီဝိသေ ဇဂ္ဂါပေန္တိ. တေ ယံ စောရံ သဟသာဝ မာရေတုံ န ဣစ္ဆန္တိ, ‘‘ဧဝမေတေ ဒီဃရတ္တံ ဒုက္ခပ္ပတ္တော ဟုတွာ မရိဿန္တီ’’တိ ဣစ္ဆန္တာ တံ ပုရိသံ ဧဝံ ဝဒန္တိ ဣမေ တေ အမ္ဘော ပုရိသ စတ္တာရော အာသီဝိသာတိ. 'असे म्हणावे' म्हणजे त्यांचे संगोपन करण्यासाठी असे म्हणावे। राजे लोक विषारी सापांना पकडून आणून त्यांचे संगोपन करतात, या विचाराने की—'अशा (मृत्युदंडास पात्र) चोरांना आम्ही यांच्याकडून चावून घेऊन मारू, किंवा शहराला वेढा पडला असता शत्रूच्या सैन्यावर त्यांना फेकू, किंवा शत्रूच्या सैन्याचा पराभव करण्यास असमर्थ ठरल्यास, उत्तम भोजन करून आणि श्रेष्ठ शय्येवर आरूढ होऊन यांच्याकडून स्वतःला चावून घेऊ आणि शत्रूच्या स्वाधीन न होता स्वतःच्या इच्छेने मरू।' ते राजे ज्या चोराला तात्काळ मारू इच्छित नाहीत, तर 'अशा प्रकारे हा दीर्घकाळ दुःख भोगून मरेल' अशी इच्छा धरून त्या माणसाला असे म्हणतात—'अरे माणसा, हे तुझे चार विषारी साप आहेत (ज्यांचे तुला संगोपन करायचे आहे)।' တတ္ထ ကာလေန ကာလန္တိ ကာလေ ကာလေ. သံဝေသေတဗ္ဗာတိ နိပဇ္ဇာပေတဗ္ဗာ. အညတရော ဝါ အညတရော ဝါတိ ကဋ္ဌမုခါဒီသု ယော ကောစိ. ယံ တေ အမ္ဘော ပုရိသ ကရဏီယံ, တံ ကရောဟီတိ ဣဒံ အတ္ထစရကဿ ဝစနံ ဝေဒိတဗ္ဗံ. တဿ ကိရ ပုရိသဿ ဧဝံ အာသီဝိသေ ပဋိပါဒေတွာ ‘အယံ ဝေါ ဥပဋ္ဌာကော’တိ စတူသု ပေဠာသု ဌပိတာနံ အာသီဝိသာနံ အာရောစေန္တိ. အထေကော နိက္ခမိတွာ အာဂမ္မ တဿ ပုရိသဿ ဒက္ခိဏပါဒါနုသာရေန အဘိရုဟိတွာ [Pg.55] ဒက္ခိဏဟတ္ထံ မဏိဗန္ဓတော ပဋ္ဌာယ ဝေဌေတွာ ဒက္ခိဏကဏ္ဏသောတမူလေ ဖဏံ ကတွာ သုသူတိ ကရောန္တော နိပဇ္ဇိ. အပရော ဝါမပါဒါနုသာရေန အဘိရုဟိတွာ တထေဝ ဝါမဟတ္ထံ ဝေဌေတွာ ဝါမကဏ္ဏသောတမူလေ ဖဏံ ကတွာ သုသူတိ ကရောန္တော နိပဇ္ဇိ, တတိယော နိက္ခမိတွာ အဘိမုခံ အဘိရုဟိတွာ ကုစ္ဆိံ ဝေဌေတွာ ဂလဝါဋကမူလေ ဖဏံ ကတွာ သုသူတိ ကရောန္တော နိပဇ္ဇိ, စတုတ္ထော ပိဋ္ဌိဘာဂေန အဘိရုဟိတွာ ဂီဝံ ဝေဌေတွာ ဥပရိမုဒ္ဓနိ ဖဏံ ဌပေတွာ သုသူတိ ကရောန္တော နိပဇ္ဇိ. त्यामध्ये, 'कालेन कालं' म्हणजे वेळोवेळी। 'संवेसेतब्बा' म्हणजे झोपवावे। 'अञ्ञतरो वा अञ्ञतरो वा' म्हणजे कट्टमुख इत्यादी सापांपैकी कोणताही एक। 'अरे माणसा, तुला जे काही करायचे आहे ते कर' हे वाक्य हितचिंतकाचे (अत्थचरक) शब्द म्हणून समजावे। त्या माणसाला अशा प्रकारे विषारी साप सोपवून, चार पेट्यांमध्ये ठेवलेल्या विषारी सापांना ते सांगतात की, 'हा तुमचा सेवक (उपट्ठाक) आहे।' त्यानंतर एक साप बाहेर येऊन, त्या माणसाच्या उजव्या पायावरून वर चढला आणि मनगटापासून उजव्या हाताला विळखा घालून, उजव्या कानाच्या छिद्राजवळ फणा काढून 'फुसफुस' (सुसू) असा आवाज करत झोपला। दुसरा साप डाव्या पायावरून वर चढून, त्याचप्रमाणे डाव्या हाताला विळखा घालून, डाव्या कानाच्या छिद्राजवळ फणा काढून 'फुसफुस' असा आवाज करत झोपला। तिसरा साप बाहेर येऊन, समोरून वर चढला आणि पोटाला विळखा घालून, कंठाच्या मुळाशी फणा काढून 'फुसफुस' असा आवाज करत झोपला। चौथा साप पाठीमागून वर चढला आणि गळ्याला विळखा घालून, डोक्याच्या वर फणा ठेवून 'फुसफुस' असा आवाज करत झोपला। ဧဝံ စတူသု အာသီဝိသေသု သရီရဋ္ဌကေသုယေဝ ဇာတေသု ဧကော တဿ ပုရိသဿ အတ္ထစရကပုရိသော တံ ဒိသွာ ‘‘ကိံ တေ, ဘော ပုရိသ, လဒ္ဓ’’န္တိ, ပုစ္ဆိ. တတော တေန ‘‘ဣမေ မေ, ဘော, ဟတ္ထေသု ဟတ္ထကဋကံ ဝိယ ဗာဟာသု ကေယူရံ ဝိယ ကုစ္ဆိမှိ ကုစ္ဆိဝေဌနသာဋကော ဝိယ ကဏ္ဏေသု ကဏ္ဏစူဠိကာ ဝိယ ဂလေ မုတ္တာဝလိယော ဝိယ သီသေ သီသပသာဓနံ ဝိယ ကေစိ အလင်္ကာရဝိသေသာ ရညာ ဒိန္နာ’’တိ ဝုတ္တေ သော အာဟ – ‘‘ဘော အန္ဓဗာလ, မာ ဧဝံ မညိတ္ထ ‘ရညာ မေ တုဋ္ဌေနေတံ ပသာဓနံ ဒိန္န’န္တိ. တွံ ရညော အာဂုစာရီ စောရော, ဣမေ စ စတ္တာရော အာသီဝိသာ ဒုရုပဋ္ဌာဟာ ဒုပ္ပဋိဇဂ္ဂိယာ, ဧကသ္မိံ ဥဋ္ဌာတုကာမေ ဧကော နှာယိတုကာမော ဟောတိ, ဧကသ္မိံ နှာယိတုကာမေ ဧကော ဘုဉ္ဇိတုကာမော, ဧကသ္မိံ ဘုဉ္ဇိတုကာမေ ဧကော နိပဇ္ဇိတုကာမော. တေသု ယဿေဝ ဣစ္ဆာ န ပူရတိ, သော တတ္ထေဝ ဍံသိတွာ မာရေတီ’’တိ. အတ္ထိ ပန, ဘော, ဧဝံ သန္တေ ကောစိ သောတ္ထိမဂ္ဂေါတိ? အာမ, ရာဇပုရိသာနံ ဝိက္ခိတ္တဘာဝံ ဉတွာ ပလာယနံ သောတ္ထိဘာဝေါတိ ဝတွာ ‘‘ယံ တေ ကရဏီယံ, တံ ကရောဟီ’’တိ ဝဒေယျ. अशा प्रकारे चार विषारी साप शरीरावरच स्थित असताना, त्या माणसाचे हित इच्छिणारा एक माणूस त्याला पाहून म्हणाला, “हे माणसा, तुला काय मिळाले आहे?” त्यावर त्याने म्हटले, “हे मित्रा, माझ्या हातातील कड्याप्रमाणे, दंडावरील बाजूबंदाप्रमाणे, पोटावरील कंबरपट्ट्याप्रमाणे, कानावरील कर्णभूषणाप्रमाणे, गळ्यातील मोतीहाराप्रमाणे आणि डोक्यावरील शिरोभूषणाप्रमाणे हे काही विशेष अलंकार मला राजाने दिले आहेत.” तेव्हा तो हितचिंतक म्हणाला, “हे अंधमूर्खा! ‘राजाने प्रसन्न होऊन मला हे अलंकार दिले आहेत’ असे मानू नकोस. तू राजाचा अपराध करणारा चोर आहेस. आणि हे चार विषारी साप अत्यंत कठीण सेवा आणि संगोपन करायला हवेत असे आहेत. जेव्हा एकाला उठण्याची इच्छा होते, तेव्हा दुसऱ्याला स्नान करण्याची इच्छा होते; एकाला स्नान करण्याची इच्छा होते, तेव्हा दुसऱ्याला जेवण्याची इच्छा होते; एकाला जेवण्याची इच्छा होते, तेव्हा दुसऱ्याला झोपण्याची इच्छा होते. त्यांच्यापैकी ज्याची इच्छा पूर्ण होत नाही, तो तिथेच तुला डसून ठार मारेल.” त्यावर त्याने विचारले, “हे महाशया, असे असताना काही कल्याणाचा मार्ग आहे का?” तो म्हणाला, “होय, राजपुरुषांची बेसावधता जाणून पळून जाणे हाच सुरक्षिततेचा उपाय आहे. तुला जे करायचे आहे ते तू कर.” တံ သုတွာ ဣတရော စတုန္နံ အာသီဝိသာနံ ပမာဒက္ခဏံ ရာဇပုရိသေဟိ စ ပဝိဝိတ္တံ ဒိသွာ, ဝါမဟတ္ထေန ဒက္ခိဏဟတ္ထံ ဝေဌေတွာ, ဒက္ခိဏကဏ္ဏစူဠိကာယ ဖဏံ ဌပေတွာ, သယိတာသီဝိသဿ သရီရံ ပရိမဇ္ဇန္တော ဝိယ သဏိကံ တံ အပနေတွာ, ဧတေနေဝ ဥပါယေန သေသေပိ အပနေတွာ တေသံ ဘီတော ပလာယေယျ. အထ နံ တေ အာသီဝိသာ ‘‘အယံ အမှာကံ ရညာ ဥပဋ္ဌာကော ဒိန္နော’’တိ အနုဗန္ဓမာနာ အာဂစ္ဆေယျုံ. ဣဒံ သန္ဓာယ အထ ခေါ သော, ဘိက္ခဝေ, ပုရိသော ဘီတော စတုန္နံ အာသီဝိသာနံ…ပေ… ပလာယေထာတိ ဝုတ္တံ. ते ऐकून तो दुसरा (चोर) चार विषारी सापांची बेसावधतेची वेळ आणि राजपुरुषांपासून निर्जन असलेली ती जागा पाहून, डाव्या हाताने उजवा हात वेढून, उजव्या कानाच्या पाळीवर फणा ठेवून, झोपलेल्या सापाच्या शरीराला कुरवाळल्यासारखे हळूच त्याला बाजूला करून, याच उपायाने उरलेल्या सापांनाही बाजूला करून, त्यांना घाबरून पळून गेला. तेव्हा ते साप “हा आपल्याला राजाने सेवक म्हणून दिला आहे” असे मानून त्याच्या मागे मागे जाऊ लागले. हेच लक्षात घेऊन, “भिक्खूहो, तो मनुष्य घाबरून त्या चार विषारी सापांपासून... पे... पळून गेला,” असे भगवंतांनी म्हटले आहे. တသ္မိံ ပန ပုရိသေ ဧဝံ အာဂတမဂ္ဂံ ဩလောကေတွာ ဩလောကေတွာ ပလာယန္တေ ရာဇာ ‘‘ပလာတော သော ပုရိသော’’တိ သုတွာ ‘‘ကော နု ခေါ တံ အနုဗန္ဓိတွာ ဃာတေတုံ သက္ခိဿတီ’’တိ ဝိစိနန္တော တဿေဝ ပစ္စတ္ထိကေ ပဉ္စ [Pg.56] ဇနေ လဘိတွာ ‘‘ဂစ္ဆထ နံ အနုဗန္ဓိတွာ ဃာတေထာ’’တိ ပေသေယျ. အထဿ အတ္ထစရာ ပုရိသာ တံ ပဝတ္တိံ ဉတွာ အာရောစေယျုံ. သော ဘိယျောသောမတ္တာယ ဘီတော ပလာယေထ. ဣမမတ္ထံ သန္ဓာယ တမေနံ ဧဝံ ဝဒေယျုန္တိအာဒိ ဝုတ္တံ. परंतु तो मनुष्य अशा प्रकारे आलेल्या मार्गाकडे मागे वळून वळून पाहत पळत असताना, “तो मनुष्य पळून गेला आहे” असे राजाने ऐकले. “त्याचा पाठलाग करून त्याला मारण्यास कोण समर्थ होईल?” असा विचार करत राजाने त्याचेच शत्रू असलेल्या पाच माणसांना मिळवून, “जा, त्याचा पाठलाग करून त्याला ठार मारा,” असे सांगून पाठवले. तेव्हा त्याच्या हितचिंतक माणसांनी ही हकीकत जाणून त्याला सांगितली. तो पूर्वीपेक्षाही अधिक प्रमाणात घाबरून पळू लागला. हाच अर्थ लक्षात घेऊन “त्याला असे म्हणावे” इत्यादी म्हटले आहे. ဆဋ္ဌော အန္တရစရော ဝဓကောတိ ‘‘ပဌမံ အာသီဝိသေဟိ အနုဗဒ္ဓေါ ဣတော စိတော စ တေ ဝဉ္စေန္တော ပလာယိ, ဣဒါနိ ပဉ္စဟိ ပစ္စတ္ထိကေဟိ အနုဗဒ္ဓေါ သုဋ္ဌုတရံ ပလာယတိ, န သက္ကာ သော ဧဝံ ဂဟေတုံ, ဥပလာဠနာယ ပန သက္ကာ, တသ္မာ ဒဟရကာလတော ပဋ္ဌာယ ဧကတော ခါဒိတွာ စ ပိဝိတွာ စ သန္ထဝံ အန္တရစရံ ဝဓကမဿ ပေသေထာ’’တိ အမစ္စေဟိ ဝုတ္တေန ရညာ ပရိယေသိတွာ ပေသိတော အန္တရစရော ဝဓကော. “सहावा गुप्त मारेकरी (अंतरचर वधक)” म्हणजे— आधी सापांनी पाठलाग केला असता, त्यांना इकडे तिकडे हुलकावणी देत तो पळाला; आता पाच शत्रूंनी पाठलाग केला असता तो अधिक वेगाने पळत आहे. त्याला अशा प्रकारे पकडणे शक्य नाही, परंतु गोड बोलून (फसवून) पकडणे शक्य आहे. म्हणून बालपणापासून एकत्र खाणे-पिणे करून ज्याचा त्याच्याशी परिचय आहे अशा त्याच्या विश्वासातील गुप्त मारेकऱ्याला त्याच्याकडे पाठवावे, असे मंत्र्यांनी सांगितल्यावर राजाने शोध घेऊन पाठवलेला तो गुप्त मारेकरी होय. သော ပဿေယျ သုညံ ဂါမန္တိ နိဝတ္တိတွာ ဩလောကေန္တော ပဒံ ဃာယိတွာ ဃာယိတွာ ဝေဂေနာဂစ္ဆန္တေ စတ္တာရော အာသီဝိသေ ပဉ္စ ဝဓကေ ပစ္စတ္ထိကေ ဆဋ္ဌဉ္စ အန္တရစရံ ဝဓကံ ‘‘နိဝတ္တ ဘော, မာ ပလာယိ, ပုတ္တဒါရေန သဒ္ဓိံ ကာမေ ပရိဘုဉ္ဇန္တော သုခံ ဝသိဿသီ’’တိ ဝတွာ အာဂစ္ဆန္တံ ဒိသွာ, ဘိယျောသောမတ္တာယ ယေန ဝါ တေန ဝါ ပလာယန္တော ပစ္စန္တရဋ္ဌေ အဘိမုခဂတံ ဧကံ ဆကုဋိကံ သုညံ ဂါမံ ပဿေယျ. ရိတ္တကညေဝ ပဝိသေယျာတိ ဓနဓညမဉ္စပီဌာဒီဟိ ဝိရဟိတတ္တာ ရိတ္တကညေဝ ပဝိသေယျ. တုစ္ဆကံ သုညကန္တိ ဧတဿေဝ ဝေဝစနံ. ပရိမသေယျာတိ ‘‘သစေ ပါနီယံ ဘဝိဿတိ, ပိဝိဿာမိ, သစေ ဘတ္တံ ဘဝိဿတိ, ဘုဉ္ဇိဿာမီ’’တိ ဘာဇနံ ဝိဝရိတွာ ဟတ္ထံ အန္တော ပဝေသေတွာ ပရိမသေယျ. “त्याला एक ओसाड गाव दिसेल” म्हणजे— मागे वळून पाहत असताना, पाऊलखुणांचा माग काढत वेगाने येणारे चार विषारी साप, पाच शत्रू मारेकरी आणि सहावा गुप्त मारेकरी “हे मित्रा, मागे फिर, पळू नकोस, पत्नी आणि मुलांसह कामभोगांचा उपभोग घेत सुखाने राहा,” असे म्हणत येताना पाहून, अत्यंत भयभीत होऊन सैरावैरा पळत सुटलेला तो सीमावर्ती प्रदेशात समोर आलेले एक सहा घरे असलेले ओसाड गाव पाहील. “रिकाम्या घरातच प्रवेश करेल” म्हणजे— धनधान्य, पलंग, पाट इत्यादींनी रहित असल्यामुळे तो केवळ रिकाम्या घरातच प्रवेश करेल. ‘तुच्छक’ (रिकामे) आणि ‘शून्यक’ (ओसाड) हे याचेच समानार्थी शब्द आहेत. “चाचपून पाहील” म्हणजे— “जर पिण्याचे पाणी असेल तर पिईन, जर अन्न असेल तर जेवीन,” या आशेने भांडे उघडून आत हात घालून चाचपून पाहील. တမေနံ ဧဝံ ဝဒေယျုန္တိ ဆန္နံ ဃရာနံ ဧကဃရေပိ ကိဉ္စိ အလဘိတွာ ဂါမမဇ္ဈေ ဧကော သန္ဒစ္ဆာယော ရုက္ခော အတ္ထိ, တတ္ထ ဝင်္ကဖလကံ အတ္ထတံ ဒိသွာ, ‘‘ဣဓ တာဝ နိသီဒိဿာမီ’’တိ ဂန္တွာ, တတ္ထ နိသိန္နံ မန္ဒမန္ဒေန ဝါတေန ဗီဇိယမာနံ တတ္တကမတ္တမ္ပိ သုခံ သန္တတော အဿာဒယမာနံ, တမေနံ ပုရိသံ ကေစိဒေဝ အတ္ထစရကာ ဗဟိ ပဝတ္တိံ ဉတွာ အာဂတာ ဧဝံ ဝဒေယျုံ. ဣဒါနိ အမ္ဘော ပုရိသာတိ အမ္ဘော, ပုရိသ, ဣဒါနိ. စောရာ ဂါမဃာတကာတိ ‘‘ယဒေဝေတ္ထ လဘိဿာမ, တံ ဂဏှိဿာမ ဝါ ဃာတေဿာမ ဝါ’’တိ အာဂတာ ဆ ဂါမဃာတကစောရာ. “त्याला असे म्हणावे” म्हणजे— सहा घरांपैकी एकाही घरात काहीही न मिळाल्यामुळे गावाच्या मध्यभागी एक दाट सावली असलेले झाड आहे, तिथे बसण्यासाठी टाकलेला एक बाकडा पाहून, “इथे थोडा वेळ बसेन” असे म्हणून तिथे जाऊन बसलेल्या आणि मंद वाऱ्याच्या झुळुकीने सुखावणारे, त्या अल्पशा सुखाचा शांतपणे आस्वाद घेणाऱ्या त्या मनुष्याला, बाहेरची परिस्थिती जाणून आलेले काही हितचिंतक असे म्हणतील. “आता हे माणसा” म्हणजे— हे माणसा, आता या वेळी. “गाव लुटणारे चोर” म्हणजे— “इथे जे काही मिळेल ते आम्ही हिरावून घेऊ किंवा त्यांना ठार मारू,” या विचाराने आलेले सहा गाव लुटणारे चोर होत. ဥဒကဏ္ဏဝန္တိ [Pg.57] ဂမ္ဘီရံ ပုထုလံ ဥဒကံ. ဂမ္ဘီရမ္ပိ ဟိ အပုထုလံ, ပုထုလံ ဝါ အဂမ္ဘီရံ, န အဏ္ဏဝေါတိ ဝုစ္စတိ, ယမ္ပန ဂမ္ဘီရဉ္စ ပုထုလဉ္စ, တဿေဝေတံ နာမံ. သာသင်္ကံ သပ္ပဋိဘယန္တိ စတုန္နံ အာသီဝိသာနံ ပဉ္စန္နံ ဝဓကာနံ ဆဋ္ဌဿ အန္တရစရဿ ဆန္နဉ္စ ဂါမဃာတကစောရာနံ ဝသေန သာသင်္ကံ သပ္ပဋိဘယံ. ခေမံ အပ္ပဋိဘယန္တိ တေသံယေဝ အာသီဝိသာဒီနံ အဘာဝေန ခေမဉ္စ နိဗ္ဘယဉ္စ ဝိစိတြဥယျာနဝရံ ဗဟွန္နပါနံ ဒေဝနဂရသဒိသံ. န စဿ နာဝါ သန္တာရဏီတိ ‘‘ဣမာယ နာဝါယ ဩရိမတီရတော ပရတီရံ ဂမိဿန္တီ’’တိ ဧဝံ ဌပိတာ စ သန္တာရဏီ နာဝါ န ဘဝေယျ. ဥတ္တရသေတု ဝါတိ ရုက္ခသေတု-ဇင်္ဃသေတု-သကဋသေတူနံ အညတရော ဥတ္တရသေတု ဝါ န ဘဝေယျ. တိဋ္ဌတိ ဗြာဟ္မဏောတိ န ခေါ ဧသ ဗြာဟ္မဏော. ကသ္မာ နံ ဗြာဟ္မဏောတိ အာဟ? ဧတ္တကာနံ ပစ္စတ္ထိကာနံ ဗာဟိတတ္တာ, ဒေသနံ ဝါ ဝိနိဝတ္တေန္တော ဧကံ ခီဏာသဝဗြာဟ္မဏံ ဒဿေတုမ္ပိ ဧဝမာဟ. “जलसागर (उदक अर्णव)” म्हणजे खोल आणि विस्तीर्ण पाणी. कारण खोल असूनही विस्तीर्ण नसलेले, किंवा विस्तीर्ण असूनही खोल नसलेले पाणी ‘अर्णव’ (सागर) म्हटले जात नाही. परंतु जे खोल आणि विस्तीर्ण दोन्ही आहे, त्यालाच हे नाव दिले जाते. “शंकास्पद आणि भययुक्त” म्हणजे— चार विषारी साप, पाच मारेकरी, सहावा गुप्त मारेकरी आणि सहा गाव लुटणारे चोर यांच्यामुळे शंकास्पद आणि अत्यंत भययुक्त असलेले. “क्षेम (सुरक्षित) आणि भयरहित” म्हणजे— त्या साप इत्यादींच्या अभावामुळे सुरक्षित, भयरहित, सुंदर उद्यानांनी युक्त, विपुल अन्न-पाणी असलेले आणि देवलोकासारखे असलेले. “आणि पार नेणारी नौका नसेल” म्हणजे— “या नौकेने या तीरावरून पलीकडच्या तीरावर जातील” अशा हेतूने ठेवलेली पार नेणारी नौका नसेल. “किंवा पूल” म्हणजे— लाकडी पूल, पादचारी पूल किंवा गाड्या जाण्याचा पूल यांपैकी कोणताही पार करण्याचा पूल नसेल. “ब्राह्मण उभा आहे” म्हणजे— तो खरोखर (जन्मजात) ब्राह्मण नाही. मग त्याला ‘ब्राह्मण’ का म्हटले आहे? एवढ्या सर्व शत्रूंना दूर सारल्यामुळे (बाहित केल्यामुळे) त्याला ‘ब्राह्मण’ म्हटले आहे. किंवा उपदेशाची सांगता करताना एका क्षीणासव (अर्हत) ब्राह्मणाला दर्शवण्यासाठीही असे म्हटले आहे. တသ္မိံ ပန ဧဝံ ဥတ္တိဏ္ဏေ စတ္တာရော အာသီဝိသာ ‘‘န လဒ္ဓေါ ဝတာသိ အမှေဟိ, အဇ္ဇ တေ မုရုမုရာယ ဇီဝိတံ ခါဒိတွာ ဆဍ္ဍေယျာမ’’. ပဉ္စ ပစ္စတ္ထိကာ ‘‘န လဒ္ဓေါ ဝတာသိ အမှေဟိ, အဇ္ဇ တေ ပရိဝါရေတွာ အင်္ဂမင်္ဂါနိ ဆိန္ဒိတွာ ရညော သန္တိကံ ဂတာ သတံ ဝါ သဟဿံ ဝါ လဘေယျာမ’’. ဆဋ္ဌော အန္တရစရော ‘‘န လဒ္ဓေါ ဝတာသိ မယာ, အဇ္ဇ တေ ဖလိကဝဏ္ဏေန အသိနာ သီသံ ဆိန္ဒိတွာ, သေနာပတိဋ္ဌာနံ လဘိတွာ သမ္ပတ္တိံ အနုဘဝေယျံ’’. ဆ စောရာ ‘‘န လဒ္ဓေါ ဝတာသိ အမှေဟိ, အဇ္ဇ တေ ဝိဝိဓာနိ ကမ္မကာရဏာနိ ကာရေတွာ ဗဟုဓနံ အာဟရာပေဿာမာ’’တိ စိန္တေတွာ, ဥဒကဏ္ဏဝံ ဩတရိတုံ အသက္ကောန္တာ ရညော အာဏာယ ကောပိတတ္တာ ပရတော ဂန္တုမ္ပိ အဝိသဟန္တာ တတ္ထေဝ သုဿိတွာ မရေယျုံ. परंतु, तो मनुष्य अशा प्रकारे पलीकडे निघून गेल्यावर, ते चार विषारी साप विचार करू लागले, 'अरेरे! तू आमच्या हाती लागला नाहीस. जर मिळाला असतास, तर आज आम्ही तुझे जीवन कुरतडून खाऊन टाकले असते.' ते पाच शत्रू विचार करू लागले, 'अरेरे! तू आमच्या हाती लागला नाहीस. जर मिळाला असतास, तर आज आम्ही तुला वेढून, तुझे अंगप्रत्यंग तोडून राजाकडे गेलो असतो आणि शंभर किंवा हजार (मुद्रांचे) बक्षीस मिळवले असते.' तो सहावा गुप्त मारेकरी विचार करू लागला, 'अरेरे! तू माझ्या हाती लागला नाहीस. जर मिळाला असतास, तर आज मी स्फटिकासारख्या चकाकणाऱ्या तलवारीने तुझे डोके कापून, सेनापतीपद मिळवून वैभवाचा उपभोग घेतला असता.' आणि ते सहा चोर विचार करू लागले, 'अरेरे! तू आमच्या हाती लागला नाहीस. जर मिळाला असतास, तर आज आम्ही तुला विविध प्रकारच्या यातना देऊन पुष्कळ धन मिळवले असते.' परंतु, त्या अथांग पाण्यात उतरण्यास असमर्थ असल्यामुळे आणि राजाच्या आज्ञेमुळे पुढे जाण्याचे धाडस न करू शकल्याने, ते तिथेच सुकून मरून जातील. ဥပမာ ခေါ မျာယန္တိ ဧတ္ထ ဧဝံ အာဒိတော ပဋ္ဌာယ ဩပမ္မသံသန္ဒနံ ဝေဒိတဗ္ဗံ – ရာဇာ ဝိယ ဟိ ကမ္မံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ, ရာဇာပရာဓိကပုရိသော ဝိယ ဝဋ္ဋနိဿိတော ပုထုဇ္ဇနော. စတ္တာရော အာသီဝိသာ ဝိယ စတ္တာရိ မဟာဘူတာနိ, ရညော တဿ စတ္တာရော အာသီဝိသေ ပဋိစ္ဆာပိတကာလော ဝိယ ကမ္မုနာ ပုထုဇ္ဇနဿ ပဋိသန္ဓိက္ခဏေယေဝ စတုန္နံ မဟာဘူတာနံ ဒိန္နကာလော. ‘‘ဣမေသံ အာသီဝိသာနံ ပမာဒက္ခဏေ ရာဇပုရိသာနဉ္စ ဝိဝိတ္တက္ခဏေ နိက္ခမိတွာ ယံ တေ အမ္ဘော, ပုရိသ, ကရဏီယံ, တံ ကရောဟီ’’တိ ဝစနေန ‘‘ပလာယဿူ’’တိ ဝုတ္တကာလော ဝိယ သတ္ထာရာ ဣမဿ ဘိက္ခုနော မဟာဘူတကမ္မဋ္ဌာနံ ကထေတွာ [Pg.58] ‘‘ဣမေသု စတူသု မဟာဘူတေသု နိဗ္ဗိန္ဒ ဝိရဇ္ဇ, ဧဝံ ဝဋ္ဋတော ပရိမုစ္စိဿသီ’’တိ ကထိတကာလော, တဿ ပုရိသဿ အတ္ထစရကဝစနံ သုတွာ စတုန္နံ အာသီဝိသာနံ ပမာဒက္ခဏေ ရာဇပုရိသာနဉ္စ ဝိဝိတ္တက္ခဏေ နိက္ခမိတွာ ယေန ဝါ တေန ဝါ ပလာယနံ ဝိယ ဣမဿ ဘိက္ခုနော သတ္ထု သန္တိကေ ကမ္မဋ္ဌာနံ လဘိတွာ မဟာဘူတာသီဝိသေဟိ ပရိမုစ္စနတ္ထာယ ဉာဏပလာယနေန ပလာယနံ. 'ही माझी उपमा आहे' या वाक्यात सुरुवातीपासून उपमेची तुलना खालीलप्रमाणे समजून घ्यावी— राजाप्रमाणे कर्माला समजावे. राजाचा गुन्हेगार असलेल्या मनुष्याप्रमाणे संसारात अडकलेल्या पृथग्जनाला (सामान्य मनुष्याला) समजावे. चार विषारी सापांप्रमाणे चार महाभूतांना समजावे. राजाने त्या गुन्हेगाराला चार विषारी साप सोपवण्याच्या काळाप्रमाणे, कर्माने पृथग्जनाला प्रतिसंधीच्या क्षणीच चार महाभूते प्रदान केल्याचा काळ समजावा. 'हे मनुष्या! या सापांच्या गाफील क्षणी आणि राजपुरुषांच्या अनुपस्थितीच्या क्षणी येथून निघून जा आणि तुला जे काही करायचे आहे ते कर' या हितचिंतकाच्या शब्दांनी 'पळून जा' असे सांगितलेल्या काळाप्रमाणे, शास्त्यांनी (बुद्धांनी) या भिक्खूला महाभूत-कर्मस्थान सांगून 'या चार महाभूतांबद्दल निर्वेद (वैराग्य) प्राप्त कर, विरक्त हो, अशा प्रकारे तू संसारातून मुक्त होशील' असे उपदेशिलेल्या काळाला समजावे. त्या मनुष्याने हितचिंतकाचे बोलणे ऐकून, चार सापांच्या गाफील क्षणी आणि राजपुरुषांच्या अनुपस्थितीच्या क्षणी बाहेर पडून कोणत्याही दिशेने पळ काढण्याप्रमाणे, या भिक्खूने शास्त्यांच्या सन्निध कम्मट्ठान (कर्मस्थान) प्राप्त करून, महाभूतरूपी सापांपासून मुक्त होण्यासाठी ज्ञानरूपी पलायनाने पळून जाणे समजावे. ဣဒါနိ စတုန္နေတံ မဟာဘူတာနံ အဓိဝစနံ ပထဝီဓာတုယာ အာပေါဓာတုယာတိအာဒီသု စတုမဟာဘူတကထာ စ ပဉ္စုပါဒါနက္ခန္ဓကထာ စ အာယတနကထာ စ ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂေ ဝိတ္ထာရိတနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ဧတ္ထ စ ကဋ္ဌမုခအာသီဝိသော ဝိယ ပထဝီဓာတု ဒဋ္ဌဗ္ဗာ, ပူတိမုခအဂ္ဂိမုခသတ္ထမုခါ ဝိယ သေသဓာတုယော. ယထေဝ ဟိ ကဋ္ဌမုခေန ဒဋ္ဌဿ သကလကာယော ထဒ္ဓေါ ဟောတိ, ဧဝံ ပထဝီဓာတုပကောပေနာပိ. ယထာ စ ပူတိမုခါဒီဟိ ဒဋ္ဌဿ ပဂ္ဃရတိ စေဝ ဈာယတိ စ ဆိဇ္ဇတိ စ, ဧဝံ အာပေါဓာတုတေဇောဓာတုဝါယောဓာတုပကောပေနာပီတိ. တေနာဟု အဋ္ဌကထာစရိယာ – आता, 'चार महाभूतांचे नाव म्हणजे पठवीधातू, आपोधातू इत्यादी' या संदर्भातील चार महाभूतांची चर्चा, पाच उपादानस्कंधांची चर्चा आणि आयतनांची चर्चा विसुद्धिमग्गात (विशुद्धिमार्गात) सविस्तरपणे सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावी. आणि येथे, 'कट्ठमुख' (काष्ठमुख) नावाच्या विषारी सापाप्रमाणे पठवीधातू (पृथ्वीतत्त्व) समजावी, आणि 'पूतिमुख' (पूतिमुख), 'अग्गिमुख' (अग्निमुख) व 'सत्थमुख' (शस्त्रमुख) या सापांप्रमाणे उर्वरित धातू समजाव्यात. कारण ज्याप्रमाणे काष्ठमुख सापाने चावलेल्या मनुष्याचे संपूर्ण शरीर कडक (ताठ) होते, त्याचप्रमाणे पठवीधातूच्या प्रकोपानेही होते. आणि ज्याप्रमाणे पूतिमुख इत्यादी सापांनी चावलेल्या मनुष्याचे शरीर सडते (द्रव वाहते), जळते आणि छिन्नविच्छिन्न होते, त्याचप्रमाणे अनुक्रमे आपोधातू, तेजोधातू आणि वायोधातूच्या प्रकोपानेही होते. म्हणूनच अट्ठकथाचार्यांनी म्हटले आहे— ‘‘ပတ္ထဒ္ဓေါ ဘဝတီ ကာယော, ဒဋ္ဌော ကဋ္ဌမုခေန ဝါ; ပထဝီဓာတုပကောပေန, ဟောတိ ကဋ္ဌမုခေဝ သော. काष्ठमुख सापाने चावल्यास शरीर कडक (ताठ) होते; त्याचप्रमाणे पठवीधातूच्या प्रकोपानेही ते शरीर काष्ठमुख सापाने चावल्यासारखेच कडक होते. ‘‘ပူတိကော ဘဝတီ ကာယော, ဒဋ္ဌော ပူတိမုခေန ဝါ; အာပေါဓာတုပကောပေန, ဟောတိ ပူတိမုခေဝ သော. पूतिमुख सापाने चावल्यास शरीर सडते (कुजते); त्याचप्रमाणे आपोधातूच्या प्रकोपानेही ते शरीर पूतिमुख सापाने चावल्यासारखेच सडते. ‘‘သန္တတ္တော ဘဝတီ ကာယော, ဒဋ္ဌော အဂ္ဂိမုခေန ဝါ; တေဇောဓာတုပကောပေန, ဟောတိ အဂ္ဂိမုခေဝ သော. अग्निमुख सापाने चावल्यास शरीर अत्यंत तप्त (जळजळीत) होते; त्याचप्रमाणे तेजोधातूच्या प्रकोपानेही ते शरीर अग्निमुख सापाने चावल्यासारखेच तप्त होते. ‘‘သဉ္ဆိန္နော ဘဝတီ ကာယော, ဒဋ္ဌော သတ္ထမုခေန ဝါ; ဝါယောဓာတုပကောပေန, ဟောတိ သတ္ထမုခေဝ သော’’တိ. – शस्त्रमुख सापाने चावल्यास शरीर छिन्नविच्छिन्न होते; त्याचप्रमाणे वायोधातूच्या प्रकोपानेही ते शरीर शस्त्रमुख सापाने चावल्यासारखेच छिन्नविच्छिन्न होते. ဧဝံ တာဝေတ္ထ ဝိသေသတော သဒိသဘာဝေါ ဝေဒိတဗ္ဗော. अशा प्रकारे, येथे विशेष रूपाने (साप आणि धातूंमधील) समानता समजून घ्यावी. အဝိသေသတော ပန အာသယတော ဝိသဝေဂဝိကာရတော အနတ္ထဂ္ဂဟဏတော ဒုရုပဋ္ဌာနတော ဒုရာသဒတော အကတညုတတော အဝိသေသကာရိတော အနန္တဒေါသူပဒ္ဒဝတောတိ ဣမေဟိ ကာရဏေဟိ ဧတေသံ အာသီဝိသသဒိသတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. တတ္ထ အာသယတောတိ အာသီဝိသာနဉှိ ဝမ္မိကော အာသယော, တတ္ထေဝ တေ ဝသန္တိ. မဟာဘူတာနမ္ပိ ကာယဝမ္မိကော အာသယော[Pg.59]. အာသီဝိသာနဉ္စ ရုက္ခသုသိရတိဏပဏ္ဏဂဟနသင်္ကာရဋ္ဌာနာနိပိ အာသယော. ဧတေသုပိ ဟိ တေ ဝသန္တိ. မဟာဘူတာနမ္ပိ ကာယသုသိရံ ကာယဂဟနံ ကာယသင်္ကာရဋ္ဌာနံ အာသယောတိ. ဧဝံ တာဝ အာသယတော သဒိသတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. सामान्य रूपाने विचार केल्यास, आश्रय (राहण्याचे ठिकाण), विषवेगाचा विकार, अनर्थाचे ग्रहण, सेवा-शुश्रूषा करण्यास कठीण असणे, जवळ जाण्यास कठीण असणे, कृतघ्नता, भेदभाव न करता हानी पोहोचवणे आणि अनंत दोष व उपद्रव या कारणांमुळे या महाभूतांची विषारी सापांशी असलेली समानता समजून घ्यावी. त्यामध्ये 'आश्रय' म्हणजे: विषारी सापांचे राहण्याचे ठिकाण वारूळ असते, ते तिथेच राहतात. महाभूतांचे राहण्याचे ठिकाणही शरीररूपी वारूळच आहे. तसेच विषारी सापांचे राहण्याचे ठिकाण झाडाची ढोली, गवत, पानांची झाडी आणि कचऱ्याची जागा हे देखील असते; ते तिथेही राहतात. महाभूतांचे राहण्याचे ठिकाणही शरीरातील पोकळी (ढोली), शरीराची झाडी (रोम इत्यादी) आणि शरीरातील मलमूत्राची जागा (कचऱ्याची जागा) हेच आहे. अशा प्रकारे, प्रथम आश्रयाच्या दृष्टीने त्यांची समानता समजून घ्यावी. ဝိသဝေဂဝိကာရတောတိ အာသီဝိသာ ဟိ ကုလဝသေန ကဋ္ဌမုခါဒိဘေဒတော စတ္တာရော. တတ္ထ ဧကေကော ဝိသဝိကာရတော ဝိဘဇ္ဇမာနော ဒဋ္ဌဝိသာဒိဝသေန စတုဗ္ဗိဓော ဟောတိ. မဟာဘူတာနိပိ ပစ္စတ္တလက္ခဏဝသေန ပထဝီအာဒိဘေဒတော စတ္တာရိ. ဧတ္ထ ဧကေကံ ကမ္မသမုဋ္ဌာနာဒိဝသေန စတုဗ္ဗိဓံ ဟောတိ. ဧဝံ ဝိသဝေဂဝိကာရတော သဒိသတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. 'विषवेगाचा विकार' म्हणजे: विषारी साप त्यांच्या कुळानुसार काष्ठमुख इत्यादी भेदांनी चार प्रकारचे असतात. त्यातील प्रत्येक सापाच्या विषाचा विकार पाहिला तर तो चावलेले विष (दट्ठविस), स्पर्श केलेले विष (फुट्ठविस) इत्यादी भेदांनी चार प्रकारचा होतो. महाभूते देखील आपापल्या लक्षणांनुसार पठवी इत्यादी भेदांनी चार आहेत. त्यातील प्रत्येक महाभूत कर्मसमुत्थान (कर्मजन्य) इत्यादी भेदांनी चार प्रकारचे असते. अशा प्रकारे, विषवेगाच्या विकाराच्या दृष्टीने त्यांची समानता समजून घ्यावी. အနတ္ထဂ္ဂဟဏတောတိ အာသီဝိသေ ဂဏှန္တာ ပဉ္စ အနတ္ထေ ဂဏှန္တိ – ဒုဂ္ဂန္ဓံ ဂဏှန္တိ, အသုစိံ ဂဏှန္တိ, ဗျာဓိံ ဂဏှန္တိ, ဝိသံ ဂဏှန္တိ, မရဏံ ဂဏှန္တိ. မဟာဘူတာနိပိ ဂဏှန္တာ ပဉ္စ အနတ္ထေ ဂဏှန္တိ – ဒုဂ္ဂန္ဓံ ဂဏှန္တိ, အသုစိံ ဂဏှန္တိ, ဗျာဓိံ ဂဏှန္တိ, ဇရံ ဂဏှန္တိ, မရဏံ ဂဏှန္တိ. တေနာဟု ပေါရာဏာ – 'अनर्थाचे ग्रहण' म्हणजे: जे सापाला पकडतात ते पाच अनर्थांना ग्रहण करतात—ते दुर्गंधी ग्रहण करतात, अशुची ग्रहण करतात, व्याधी ग्रहण करतात, विष ग्रहण करतात आणि मृत्यू ग्रहण करतात. महाभूतांना ग्रहण करणारे (त्यांच्यात आसक्त होणारे) देखील पाच अनर्थांना ग्रहण करतात—ते दुर्गंधी ग्रहण करतात, अशुची ग्रहण करतात, व्याधी ग्रहण करतात, जरा (वृद्धत्व) ग्रहण करतात आणि मृत्यू ग्रहण करतात. म्हणूनच प्राचीन आचार्यांनी म्हटले आहे— ‘‘ယေကေစိ သပ္ပံ ဂဏှန္တိ, မီဠှလိတ္တံ မဟာဝိသံ; ပဉ္စ ဂဏှန္တုနတ္ထာနိ, လောကေ သပ္ပာဘိနန္ဒိနော. या जगात जे कोणी सापाची आवड बाळगणारे लोक विष्ठेने माखलेल्या, अत्यंत विषारी सापाला पकडतात, ते पाच अनर्थांनाच ग्रहण करतात. ‘‘ဒုဂ္ဂန္ဓံ အသုစိံ ဗျာဓိံ, ဝိသံ မရဏပဉ္စမံ; အနတ္ထာ ဟောန္တိ ပဉ္စေတေ, မီဠှလိတ္တေ ဘုဇင်္ဂမေ. दुर्गंधी, अशुची, व्याधी, विष आणि पाचवा मृत्यू; विष्ठेने माखलेल्या सापाच्या बाबतीत हे पाच अनर्थ घडतात. ‘‘ဧဝမေဝံ အကုသလာ, အန္ဓဗာလပုထုဇ္ဇနာ; ပဉ္စ ဂဏှန္တုနတ္ထာနိ, ဘဝေ ဇာတာဘိနန္ဒိနော. त्याचप्रमाणे, संसारात जन्माला येण्याची आवड बाळगणारे अकुशल, अंध आणि अज्ञानी पृथग्जन पाच अनर्थांनाच ग्रहण करतात. ‘‘ဒုဂ္ဂန္ဓံ အသုစိံ ဗျာဓိံ, ဇရံ မရဏပဉ္စမံ; အနတ္ထာ ဟောန္တိ ပဉ္စေတေ, မီဠှလိတ္တေဝ ပန္နဂေ’’တိ. – दुर्गंधी, अशुची, व्याधी, जरा (वृद्धत्व) आणि पाचवा मृत्यू; विष्ठेने माखलेल्या सापाप्रमाणेच हे पाच अनर्थ (संसारात) घडतात. ဧဝံ အနတ္ထဂ္ဂဟဏတော သဒိသတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. अशा प्रकारे, अनर्थाच्या ग्रहणाच्या दृष्टीने त्यांची समानता समजून घ्यावी. ဒုရုပဋ္ဌာနတောတိ တေ အာသီဝိသာ ဒုရုပဋ္ဌာနာ, ဧကသ္မိံ ဥဋ္ဌာတုကာမေ ဧကော နှာယိတုကာမော ဟောတိ, တသ္မိံ နှာယိတုကာမေ အပရော ဘုဉ္ဇိတုကာမော, တသ္မိံ ဘုဉ္ဇိတုကာမေ အညော နိပဇ္ဇိတုကာမော ဟောတိ. တေသု ယဿ ယဿေဝ အဇ္ဈာသယော န ပူရတိ, သော တတ္ထေဝ ဍံသိတွာ မာရေတိ. ဣမေဟိ ပန အာသီဝိသေဟိ ဘူတာနေဝ ဒုရုပဋ္ဌာနတရာနိ. ပထဝီဓာတုယာ ဟိ ဘေသဇ္ဇေ ကယိရမာနေ အာပေါဓာတု ကုပ္ပတိ, တဿေဝ ဘေသဇ္ဇံ ကရောန္တဿ တေဇောဓာတူတိ [Pg.60] ဧဝံ ဧကိဿာ ဘေသဇ္ဇေ ကယိရမာနေ အပရာ ကုပ္ပန္တီတိ. ဧဝံ ဒုရုပဋ္ဌာနတော သဒိသတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. 'सेवा-शुश्रूषा करण्यास कठीण असणे' म्हणजे: त्या सापांची सेवा करणे अत्यंत कठीण असते. जेव्हा एक साप उठू इच्छितो, तेव्हा दुसऱ्याला स्नान करण्याची इच्छा असते; जेव्हा तो स्नान करू इच्छितो, तेव्हा तिसऱ्याला खाण्याची इच्छा असते; जेव्हा तो खाऊ इच्छितो, तेव्हा चौथ्याला झोपण्याची इच्छा असते. त्यांच्यापैकी ज्याची इच्छा पूर्ण होत नाही, तो तिथेच चावून मारून टाकतो. परंतु, या सापांपेक्षाही महाभूतांची सेवा-शुश्रूषा करणे अधिक कठीण आहे. कारण जेव्हा पठवीधातूवर औषधोपचार केला जातो, तेव्हा आपोधातू प्रकुपित होते; आणि जेव्हा तिच्यावर उपचार केला जातो, तेव्हा तेजोधातू प्रकुपित होते. अशा प्रकारे, एका धातूवर उपचार केला असता दुसरी प्रकुपित होते. अशा प्रकारे, सेवा-शुश्रूषा करण्यास कठीण असण्याच्या दृष्टीने त्यांची समानता समजून घ्यावी. ဒုရာသဒတောတိ ဒုရာသဒါ ဟိ အာသီဝိသာ, ဂေဟဿ ပုရိမဘာဂေ အာသီဝိသံ ဒိသွာ ပစ္ဆိမဘာဂေန ပလာယန္တိ, ပစ္ဆိမဘာဂေ ဒိသွာ ပုရိမဘာဂေန, ဂေဟမဇ္ဈေ ဒိသွာ ဂဗ္ဘံ ပဝိသန္တိ, ဂဗ္ဘေ ဒိသွာ မဉ္စပီဌံ အဘိရုဟန္တိ. မဟာဘူတာနိ တတောပိ ဒုရာသဒတရာနိ. တထာရူပေန ဟိ ကုဋ္ဌရောဂေန ဖုဋ္ဌဿ ကဏ္ဏနာသာဒီနိ ဆိန္ဒိတွာ ပတန္တိ, သရီရံ သမ္ဖုဋတိ နီလမက္ခိကာ ပရိဝါရေန္တိ, သရီရဂန္ဓော ဒူရတောဝ ဥဗ္ဗာဟတိ. တံ ပုရိသံ အက္ကောသမာနမ္ပိ ပရိဒေဝမာနမ္ပိ နေဝ ရောသဝသေန, န ကာရုညေန, ဥပသင်္ကမိတုံ သက္ကောန္တိ, နာသိကံ ပိဒဟိတွာ ခေဠံ ပါတေန္တာ ဒူရတောဝ နံ ဝိဝဇ္ဇေန္တိ. ဧဝံ အညေသမ္ပိ ဘဂန္ဒရကုစ္ဆိရောဂဝါတရောဂါဒီနံ ဗီဘစ္ဆဇေဂုစ္ဆဘာဝကရာနဉ္စ ရောဂါနံ ဝသေန အယမေဝတ္ထော ဝိဘာဝေတဗ္ဗောတိ. ဧဝံ ဒုရာသဒတော သဒိသတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. दुर्आसदत्वाच्या (जवळ जाण्यास कठीण असण्याच्या) बाबतीत सांगायचे तर, विषारी साप खरोखरच दुर्आसद असतात. घराच्या पुढच्या भागात साप पाहून लोक मागच्या भागाने पळून जातात; मागच्या भागात पाहून पुढच्या भागाने पळून जातात; घराच्या मध्यभागी पाहून खोलीत प्रवेश करतात; आणि खोलीत पाहून पलंग किंवा पाटावर चढतात. महाभूते तर त्यापेक्षाही अधिक दुर्आसद (भयानक) आहेत. कारण तशा प्रकारच्या कुष्ठरोगाने ग्रस्त झालेल्या व्यक्तीचे कान, नाक इत्यादी गळून पडतात, शरीर विदीर्ण होते, निळ्या माश्या भोवती घोंगावतात आणि शरीराचा दुर्गंध दुरूनच त्रास देतो. त्या माणसाला, तो आक्रोश करत असला किंवा रडत-कढत असला तरी, क्रोधाने किंवा करुणेनेही कोणी त्याच्या जवळ जाऊ शकत नाही. लोक नाक दाबून आणि थुंकत दुरूनच त्याला टाळतात. याचप्रमाणे इतरही भगंदर, उदररोग, वातविकार इत्यादी बीभत्स आणि घृणास्पद रूप देणाऱ्या रोगांच्या बाबतीत हाच अर्थ स्पष्ट करून घ्यावा. अशा प्रकारे, दुर्आसदत्वाच्या बाबतीत समानता जाणून घ्यावी. အကတညုတတောတိ အာသီဝိသာ ဟိ အကတညုနော ဟောန္တိ, နှာပိယမာနာပိ ဘောဇိယမာနာပိ ဂန္ဓမာလာဒီဟိ ပူဇိယမာနာပိ ပေဠာယံ ပက္ခိပိတွာ ပရိဟရိယမာနာပိ ဩတာရမေဝ ဂဝေသန္တိ. ယတ္ထ ဩတာရံ လဘန္တိ, တတ္ထေဝ နံ ဍံသိတွာ မာရေန္တိ. အာသီဝိသေဟိပိ မဟာဘူတာနေဝ အကတညုတရာနိ. ဧတေသဉှိ ကတံ နာမ နတ္ထိ, သီတေန ဝါ ဥဏှေန ဝါ နိမ္မလေန ဇလေန နှာပိယမာနာနိပိ ဂန္ဓမာလာဒီဟိ သက္ကရိယမာနာနိပိ မုဒုဝတ္ထမုဒုသယနမုဒုယာနာဒီဟိ ပရိဟရိယမာနာနိပိ, ဝရဘောဇနံ ဘောဇိယမာနာနိပိ, ဝရပါနံ ပါယာပိယမာနာနိပိ ဩတာရမေဝ ဂဝေသန္တိ. ယတ္ထ ဩတာရံ လဘန္တိ, တတ္ထေဝ ကုပ္ပိတွာ အနယဗျသနံ ပါပေန္တီတိ. ဧဝံ အကတညုတတော သဒိသတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. अकृतज्ञतेच्या बाबतीत सांगायचे तर, विषारी साप खरोखरच अकृतज्ञ असतात. त्यांना अंघोळ घातली तरी, खाऊ घातले तरी, गंध-पुष्पादींनी त्यांची पूजा केली तरी, किंवा करंडीत ठेवून त्यांचे जतन केले तरी, ते केवळ दंश करण्याची संधीच शोधत असतात. जिथे त्यांना संधी मिळते, तिथेच ते दंश करून मारून टाकतात. सापांपेक्षाही महाभूतेच अधिक अकृतज्ञ आहेत. कारण त्यांच्यासाठी केलेले कोणतेही उपकार अस्तित्वात नसतात. थंड किंवा गरम अशा स्वच्छ पाण्याने त्यांना अंघोळ घातली तरी, गंध-पुष्पादींनी त्यांचा सत्कार केला तरी, मऊ वस्त्रे, मऊ बिछाने, मऊ वाहने इत्यादींनी त्यांचे संगोपन केले तरी, उत्तम भोजन दिले तरी, उत्तम पेय पाजले तरी, ते केवळ बिघडण्याची (नाश करण्याची) संधीच शोधत असतात. जिथे त्यांना संधी मिळते, तिथेच ते कुपित होऊन अनर्थ आणि विनाशाप्रत पोहोचवतात. अशा प्रकारे, अकृतज्ञतेच्या बाबतीत समानता जाणून घ्यावी. အဝိသေသကာရိတောတိ အာသီဝိသာ ဟိ ‘‘အယံ ခတ္တိယော ဝါ ဗြာဟ္မဏော ဝါ ဝေဿော ဝါ သုဒ္ဒေါ ဝါ ဂဟဋ္ဌော ဝါ ပဗ္ဗဇိတော ဝါ’’တိ ဝိသေသံ န ကရောန္တိ, သမ္ပတ္တသမ္ပတ္တမေဝ ဍံသိတွာ မာရေန္တိ. မဟာဘူတာနိပိ ‘‘အယံ ခတ္တိယော ဝါ ဗြာဟ္မဏော ဝါ ဝေဿော ဝါ သုဒ္ဒေါ ဝါ ဂဟဋ္ဌော ဝါ ပဗ္ဗဇိတော ဝါ ဒေဝေါ ဝါ မနုဿော ဝါ မာရော ဝါ ဗြဟ္မာ ဝါ နိဂ္ဂုဏော ဝါ သဂုဏော ဝါ’’တိ ဝိသေသံ န ကရောန္တိ. ယဒိ ဟိ နေသံ ‘‘အယံ ဂုဏဝါ’’တိ လဇ္ဇာ [Pg.61] ဥပ္ပဇ္ဇေယျ, သဒေဝကေ လောကေ အဂ္ဂပုဂ္ဂလေ တထာဂတေ လဇ္ဇံ ဥပ္ပာဒေယျုံ. အထာပိ နေသံ ‘‘အယံ မဟာပညော အယံ မဟိဒ္ဓိကော အယံ ဓုတဝါဒေါ’’တိအာဒိနာ နယေန လဇ္ဇာ ဥပ္ပဇ္ဇေယျ, ဓမ္မသေနာပတိသာရိပုတ္တတ္ထေရာဒီသု လဇ္ဇံ ဥပ္ပာဒေယျုံ. အထာပိ နေသံ ‘‘အယံ နိဂ္ဂုဏော ဒါရုဏော ထဒ္ဓေါ’’တိ ဘယံ ဥပ္ပဇ္ဇေယျ, သဒေဝကေ လောကေ နိဂ္ဂုဏထဒ္ဓဒါရုဏာနံ အဂ္ဂဿ ဒေဝဒတ္တဿ ဆန္နံ ဝါ သတ္ထာရာနံ ဘာယေယျုံ, န စ လဇ္ဇန္တိ န စ ဘာယန္တိ, ကုပ္ပိတွာ ယံကိဉ္စိ အနယဗျသနံ အာပါဒေန္တိယေဝ. ဧဝံ အဝိသေသကာရိတော သဒိသတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. भेदभाव न करण्याच्या बाबतीत सांगायचे तर, विषारी साप खरोखरच 'हा क्षत्रिय आहे, ब्राह्मण आहे, वैश्य आहे, शूद्र आहे, गृहस्थ आहे की प्रव्रजित आहे' असा कोणताही भेद करत नाहीत; जो कोणी समोर येईल त्यालाच दंश करून मारून टाकतात. महाभूते देखील 'हा क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र, गृहस्थ, प्रव्रजित, देव, मनुष्य, मार, ब्रह्मा, निर्गुणी किंवा सगुणी आहे' असा कोणताही भेद करत नाहीत. जर खरोखरच त्यांना 'हा गुणवान आहे' अशी लाज (संकोच) वाटली असती, तर त्यांनी देवलोकासहित या विश्वातील सर्वश्रेष्ठ पुरुष असलेल्या तथागतांच्या बाबतीत संकोच बाळगला असता. किंवा जर त्यांना 'हा महाज्ञानी आहे, हा महाऋद्धिवान आहे, हा धुतवादी आहे' अशा प्रकारे संकोच वाटला असता, तर त्यांनी धम्मसेनापती सारिपुत्त थेर इत्यादींच्या बाबतीत संकोच बाळगला असता. किंवा जर त्यांना 'हा निर्गुणी, क्रूर आणि उद्धट आहे' अशी भीती वाटली असती, तर देवलोकासहित या जगात निर्गुणी, उद्धट आणि क्रूर लोकांमध्ये अग्रगण्य असलेल्या देवदत्ताला किंवा सहा तीर्थंकर शास्त्यांना ते भ्याले असते. परंतु ते लाजतही नाहीत आणि भीतही नाहीत; ते कुपित होऊन कोणाचाही अनर्थ आणि विनाशच घडवून आणतात. अशा प्रकारे, भेदभाव न करण्याच्या बाबतीत समानता जाणून घ्यावी. အနန္တဒေါသူပဒ္ဒဝတောတိ အာသီဝိသေ နိဿာယ ဥပ္ပဇ္ဇနကာနဉှိ ဒေါသူပဒ္ဒဝါနံ ပမာဏံ နတ္ထိ. တထာ ဟေတေ ဍံသိတွာ ကာဏမ္ပိ ကရောန္တိ ခုဇ္ဇမ္ပိ ပီဌသပ္ပိမ္ပိ ဧကပက္ခလမ္ပီတိ ဧဝံ အပရိမာဏံ ဝိပ္ပကာရံ ဒဿေန္တိ. ဘူတာနိပိ ကုပ္ပိတာနိ န ကာဏာဒိဘာဝေသု န ကိဉ္စိ ဝိပ္ပကာရံ န ကရောန္တိ, အပ္ပမာဏော ဧတေသံ ဒေါသူပဒ္ဒဝေါတိ. ဧဝံ အနန္တဒေါသူပဒ္ဒဝတော သဒိသတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. अनंत दोष आणि उपद्रवांच्या बाबतीत सांगायचे तर, सापांच्या आश्रयाने निर्माण होणाऱ्या दोषांना आणि उपद्रवांना काही मर्यादा नाही. कारण ते दंश करून माणसाला आंधळा करतात, कुबडा करतात, पांगळा करतात, किंवा अर्धांगवायूने ग्रस्त करतात; अशा प्रकारे ते अपरिमित विकृती दाखवतात. महाभूते देखील कुपित झाली असता, आंधळेपणा इत्यादी विकृतींपैकी कोणतीही विकृती निर्माण करत नाहीत असे नाही (म्हणजे ती नक्कीच करतात). त्यांचा दोष आणि उपद्रव हा अमर्याद असतो. अशा प्रकारे, अनंत दोष आणि उपद्रवांच्या बाबतीत समानता जाणून घ्यावी. ဣဒါနေတ္ထ စတုမဟာဘူတဝသေန ယာဝ အရဟတ္တာ ကမ္မဋ္ဌာနံ ကထေတဗ္ဗံ သိယာ, တံ ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂေ စတုဓာတုဝဝတ္ထာနနိဒ္ဒေသေ ကထိတမေဝ. आता येथे चार महाभूतांच्या आधारे अर्हतपदापर्यंतच्या कर्मस्थानाचे वर्णन केले पाहिजे. ते विसुद्धिमग्ग मधील 'चतुधातुव्यवस्थान निर्देश' मध्ये आधीच सांगितले गेले आहे. ပဉ္စ ဝဓကာ ပစ္စတ္ထိကာတိ ခေါ ဘိက္ခဝေ ပဉ္စန္နေတံ ဥပါဒါနက္ခန္ဓာနံ အဓိဝစနန္တိ ဧတ္ထ ဒွီဟိ အာကာရေဟိ ခန္ဓာနံ ဝဓကပစ္စတ္ထိကသဒိသတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ခန္ဓာ ဟိ အညမညဉ္စ ဝဓေန္တိ, တေသု စ သန္တေသု ဝဓော နာမ ပညာယတိ. ကထံ? ရူပံ တာဝ ရူပမ္ပိ ဝဓေတိ အရူပမ္ပိ, တထာ အရူပံ အရူပမ္ပိ ဝဓေတိ ရူပမ္ပိ. ကထံ? အယဉှိ ပထဝီဓာတု ဘိဇ္ဇမာနာ ဣတရာ တိဿော ဓာတုယော ဂဟေတွာဝ ဘိဇ္ဇတိ, အာပေါဓာတုအာဒီသုပိ ဧသေဝ နယော, ဧဝံ တာဝ ရူပံ ရူပမေဝ ဝဓေတိ. ရူပက္ခန္ဓော ပန ဘိဇ္ဇမာနော စတ္တာရော အရူပက္ခန္ဓေ ဂဟေတွာဝ ဘိဇ္ဇတိ, ဧဝံ ရူပံ အရူပမ္ပိ ဝဓေတိ. ဝေဒနာက္ခန္ဓောပိ ဘိဇ္ဇမာနော သညာသင်္ခါရဝိညာဏက္ခန္ဓေ ဂဟေတွာဝ ဘိဇ္ဇတိ. သညာက္ခန္ဓာဒီသုပိ ဧသေဝ နယော. ဧဝံ အရူပံ အရူပမေဝ ဝဓေတိ. စုတိက္ခဏေ ပန စတ္တာရော အရူပက္ခန္ဓာ ဘိဇ္ဇမာနာ ဝတ္ထုရူပမ္ပိ ဂဟေတွာဝ ဘိဇ္ဇန္တိ, ဧဝံ အရူပံ ရူပမ္ပိ ဝဓေတိ. ဧဝံ တာဝ အညမညံ ဝဓေန္တီတိ ဝဓကာ. ယတ္ထ ပန ခန္ဓာ အတ္ထိ, တတ္ထ ဆေဒနဘေဒနဝဓဗန္ဓနာဒယော ဟောန္တိ, န အညတ္ထာတိ. ဧဝံ ခန္ဓေသု သန္တေသု ဝဓော ပညာယတီတိပိ ဝဓကာ. भिक्खूहो! 'पाच वधक शत्रू' हे पाच उपादानस्कंधांचेच नाव आहे. येथे दोन कारणांनी स्कंधांची वधक-शत्रूंशी असणारी समानता जाणून घ्यावी. कारण स्कंध हे परस्परांचा नाश करतात, आणि ते अस्तित्वात असतानाच वध (नाश) दिसून येतो. कसे? प्रथम, रूप हे रूपाचाही नाश करते आणि अरूपाचाही नाश करते; त्याचप्रमाणे, अरूप हे अरूपाचाही नाश करते आणि रूपाचाही नाश करते. कसे? कारण ही पृथ्वीधातू नष्ट होताना इतर तीन धातूंना सोबत घेऊनच नष्ट होते. आपधातू इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. अशा प्रकारे, प्रथम रूप हे रूपाचाच नाश करते. परंतु रूपस्कंध नष्ट होताना चार अरूपस्कंधांना सोबत घेऊनच नष्ट होतो; अशा प्रकारे, रूप हे अरूपाचाही नाश करते. वेदनास्कंध देखील नष्ट होताना संज्ञा, संस्कार आणि विज्ञान स्कंधांना सोबत घेऊनच नष्ट होतो. संज्ञास्कंध इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. अशा प्रकारे, अरूप हे अरूपाचाही नाश करते. परंतु च्युती क्षणी चार अरूपस्कंध नष्ट होताना वस्तुरूपाला सोबत घेऊनच नष्ट होतात; अशा प्रकारे, अरूप हे रूपाचा नाश करते. अशा प्रकारे, ते परस्परांचा नाश करतात म्हणून त्यांना 'वधक' म्हणतात. शिवाय, जिथे स्कंध असतात, तिथेच छेदन, भेदन, वध, बंधन इत्यादी घडतात, इतर कोठेही नाही. अशा प्रकारे, स्कंध अस्तित्वात असतानाच वध दिसून येतो, म्हणूनही त्यांना 'वधक' म्हणतात. ဣဒါနိ [Pg.62] ပဉ္စက္ခန္ဓေ ရူပါရူပဝသေန ဒွေ ကောဋ္ဌာသေ ကတွာ, ရူပဝသေန ဝါ နာမဝသေန ဝါ ရူပပရိဂ္ဂဟံ အာဒိံ ကတွာ, ယာဝ အရဟတ္တာ ကမ္မဋ္ဌာနံ ကထေတဗ္ဗံ သိယာ တမ္ပိ ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂေ ကထိတမေဝ. आता पाच स्कंधांचे रूप आणि अरूपाच्या आधारे दोन भाग करून, रूपाच्या आधारे किंवा नामाच्या आधारे रूप-परिग्रह करण्यापासून सुरुवात करून, अर्हतपदापर्यंतच्या कर्मस्थानाचे वर्णन केले पाहिजे. ते देखील विसुद्धिमग्ग मध्ये आधीच सांगितले गेले आहे. ဆဋ္ဌော အန္တရစရော ဝဓကော ဥက္ခိတ္တာသိကောတိ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, နန္ဒီရာဂဿေတံ အဓိဝစနန္တိ ဧတ္ထ ဒွီဟာကာရေဟိ နန္ဒီရာဂဿ ဥက္ခိတ္တာသိကဝဓကသဒိသတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ ပညာသိရပါတနတော စ ယောနိသမ္ပဋိပါဒနတော စ. ကထံ? စက္ခုဒွါရသ္မိဉှိ ဣဋ္ဌာရမ္မဏေ အာပါထဂတေ တံ အာရမ္မဏံ နိဿာယ လောဘော ဥပ္ပဇ္ဇတိ, ဧတ္တာဝတာ ပညာသီသံ ပတိတံ နာမ ဟောတိ, သောတဒွါရာဒီသုပိ ဧသေဝ နယော. ဧဝံ တာဝ ပညာသိရပါတနတော သဒိသတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. နန္ဒီရာဂေါ ပနေသ အဏ္ဍဇာဒိဘေဒါ စတဿော ယောနိယော ဥပနေတိ. တဿ ယောနိဥပဂမနမူလကာနိ ပဉ္စဝီသတိ မဟာဘယာနိ ဒွတ္တိံသ ကမ္မကာရဏာနိ စ အာဂတာနေဝ ဟောန္တီတိ ဧဝံ ယောနိသမ္ပဋိပါဒနတောပိဿ ဥက္ခိတ္တာသိကဝဓကသဒိသတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. भिक्खूहो! 'उगारलेली तलवार घेतलेला सहावा गुप्त वधक' हे नंदीरागाचेच (आसक्तीचेच) नाव आहे. येथे दोन कारणांनी नंदीरागाची उगारलेली तलवार घेतलेल्या वधकाशी असणारी समानता जाणून घ्यावी: प्रज्ञा रूपी मस्तक धडावेगळे करण्यामुळे आणि योनीमध्ये वारंवार पाडण्यामुळे. कसे? कारण चक्षुद्वारामध्ये प्रिय विषय आल्यावर, त्या विषयाचा आश्रय घेऊन लोभ उत्पन्न होतो. एवढ्यानेच प्रज्ञा रूपी मस्तक कापले गेले असे होते. श्रोत्रद्वार इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. अशा प्रकारे, प्रथम प्रज्ञा रूपी मस्तक कापण्याच्या बाबतीत समानता जाणून घ्यावी. आणि हा नंदीराग अंडज इत्यादी भेद असलेल्या चार योनींमध्ये घेऊन जातो. त्या योनीमध्ये जाण्यामुळे उत्पन्न होणारी पंचवीस महाभये आणि बत्तीस प्रकारच्या कर्माच्या यातना त्याच्या वाट्याला येतातच. अशा प्रकारे, योनीमध्ये वारंवार पाडण्याच्या बाबतीतही त्याची उगारलेली तलवार घेतलेल्या वधकाशी असणारी समानता जाणून घ्यावी. ဣတိ နန္ဒီရာဂဝသေနာပိ ဧကဿ ဘိက္ခုနော ကမ္မဋ္ဌာနံ ကထိတမေဝ ဟောတိ. ကထံ? အယဉှိ နန္ဒီရာဂေါ သင်္ခါရက္ခန္ဓော, တံ သင်္ခါရက္ခန္ဓောတိ ဝဝတ္ထပေတွာ တံသမ္ပယုတ္တာ ဝေဒနာ ဝေဒနာက္ခန္ဓော, သညာ သညာက္ခန္ဓော, စိတ္တံ ဝိညာဏက္ခန္ဓော, တေသံ ဝတ္ထာရမ္မဏံ ရူပက္ခန္ဓောတိ, ဧဝံ ပဉ္စက္ခန္ဓေ ဝဝတ္ထပေတိ. ဣဒါနိ တေ ပဉ္စက္ခန္ဓေ နာမရူပဝသေန ဝဝတ္ထပေတွာ, တေသံ ပစ္စယပရိယေသနတော ပဋ္ဌာယ ဝိပဿနံ ဝဍ္ဎေတွာ, အနုပုဗ္ဗေန ဧကော အရဟတ္တံ ပါပုဏာတီတိ ဧဝံ နန္ဒီရာဂဝသေန ကမ္မဋ္ဌာနံ ကထိတံ ဟောတိ. अशा प्रकारे, नंदीराग (आसक्ती आणि राग) च्या पद्धतीने देखील एका भिक्खूचे कम्मट्ठान (कर्मस्थान/ध्यानविषय) सांगितले गेलेच आहे। ते कसे? हा नंदीराग म्हणजेच 'संस्कारस्कंध' (सङ्खारक्खन्ध) होय। त्याला 'संस्कारस्कंध' म्हणून निश्चित करून, त्याच्याशी संप्रयुक्त (संबंधित) असलेली वेदना म्हणजे 'वेदनास्कंध' (वेदनाक्खन्ध), संज्ञा म्हणजे 'संज्ञास्कंध' (सञ्ञाक्खन्ध), चित्त म्हणजे 'विज्ञानस्कंध' (विञ्ञाणक्खन्ध) आणि त्यांचा आश्रय व आलंबन (विषय) म्हणजे 'रूपस्कंध' (रूपक्खन्ध) होय; अशा प्रकारे तो पाच स्कंधांचे (पञ्चक्खन्ध) निर्धारण करतो। आता, त्या पाच स्कंधांना नाम-रूपाच्या पद्धतीने निश्चित करून, त्यांच्या प्रत्ययांचा (कारणांचा) शोध घेण्यापासून सुरुवात करून, विपश्यना (विपस्सना) वाढवून, अनुक्रमाने तो अर्हत्त्व (अरहत्त) प्राप्त करतो। अशा प्रकारे, नंदीरागाच्या पद्धतीने कम्मट्ठान सांगितले गेले आहे। ဆန္နံ အဇ္ဈတ္တိကာယတနာနံ သုညဂါမေန သဒိသတာ ပါဠိယံယေဝ အာဂတာ. အယံ ပနေတ္ထ ကမ္မဋ္ဌာနနယော – ယထာ စ တေ ဆ စောရာ ဆကုဋိကံ သုညံ ဂါမံ ပဝိသိတွာ အပရာပရံ ဝိစရန္တာ ကိဉ္စိ အလဘိတွာ ဂါမေန အနတ္ထိကာ ဟောန္တိ, ဧဝမေဝံ ဘိက္ခု ဆသု အဇ္ဈတ္တိကာယတနေသု အဘိနိဝိသိတွာ ဝိစိနန္တော ‘‘အဟ’’န္တိ ဝါ ‘‘မမ’’န္တိ ဝါ ဂဟေတဗ္ဗံ ကိဉ္စိ အဒိသွာ တေဟိ အနတ္ထိကော ဟောတိ. သော ‘‘ဝိပဿနံ ပဋ္ဌပေဿာမီ’’တိ ဥပါဒါရူပကမ္မဋ္ဌာနဝသေန စက္ခုပသာဒါဒယော ပရိဂ္ဂဟေတွာ ‘‘အယံ ရူပက္ခန္ဓော’’တိ ဝဝတ္ထပေတိ, မနာယတနံ ‘‘အရူပက္ခန္ဓော’’တိ. ဣတိ သဗ္ဗာနိပေတာနိ နာမဉ္စေဝ ရူပဉ္စာတိ နာမရူပဝသေန ဝဝတ္ထပေတွာ, တေသံ ပစ္စယံ ပရိယေသိတွာ ဝိပဿနံ ဝဍ္ဎေတွာ[Pg.63], သင်္ခါရေ သမ္မသန္တော အနုပုဗ္ဗေန အရဟတ္တေ ပတိဋ္ဌာတိ. ဣဒံ ဧကဿ ဘိက္ခုနော ယာဝ အရဟတ္တာ ကမ္မဋ္ဌာနံ ကထိတံ ဟောတိ. सहा अध्यात्मिक आयतनांची ओसाड गावाशी असलेली समानता पाळीमध्येच (मूळ पाठातच) आली आहे. येथे हा कर्मस्थान-मार्ग आहे – ज्याप्रमाणे ते सहा चोर सहा घरे असलेल्या ओसाड गावात प्रवेश करून, इकडेतिकडे फिरताना काहीही न मिळाल्यामुळे त्या गावाविषयी उदासीन (इच्छारहित) होतात, त्याचप्रमाणे भिक्खू सहा अध्यात्मिक आयतनांवर लक्ष केंद्रित करून शोध घेत असताना, "मी" किंवा "माझे" असे ग्रहण करण्यासारखे काहीही न पाहिल्यामुळे त्यांच्याविषयी उदासीन होतो. तो "मी विपश्यना सुरू करेन" असे म्हणून उपादाय-रूप कर्मस्थानाच्या द्वारे चक्षुप्रसाद इत्यादींचे ग्रहण करून "हा रूपस्कंध आहे" असे निश्चित करतो, आणि मनायतन हे "अरूपस्कंध" आहे असे निश्चित करतो. अशा प्रकारे या सर्व अध्यात्मिक आयतनांना नाम आणि रूप या नाम-रूपाच्या स्वरूपात निश्चित करून, त्यांच्या प्रत्ययाचा (कारणाचा) शोध घेऊन, विपश्यना वाढवून, संस्कारांचे परीक्षण करत अनुक्रमाने अर्हत्त्वामध्ये प्रतिष्ठित होतो. हे एका भिक्खूचे अर्हत्त्वापर्यंतचे कर्मस्थान सांगितले आहे. ဣဒါနိ ဗာဟိရာနံ ဂါမဃာတကစောရေဟိ သဒိသတံ ဒဿေန္တော စောရာ ဂါမဃာတကာတိ ခေါတိအာဒိမာဟ. တတ္ထ မနာပါမနာပေသူတိ ကရဏတ္ထေ ဘုမ္မံ, မနာပါမနာပေဟီတိ အတ္ထော. တတ္ထ စောရေသု ဂါမံ ဟနန္တေသု ပဉ္စ ကိစ္စာနိ ဝတ္တန္တိ – စောရာ တာဝ ဂါမံ ပရိဝါရေတွာ ဌိတာ အဂ္ဂိံ ဒတွာ ကဋကဋသဒ္ဒံ ဥဋ္ဌာပေန္တိ, တတော မနုဿာ ဟတ္ထသာရံ ဂဟေတွာ ဗဟိ နိက္ခမန္တိ. တတော တေဟိ သဒ္ဓိံ ဘဏ္ဍကဿ ကာရဏာ ဟတ္ထပရာမာသံ ကရောန္တိ. ကေစိ ပနေတ္ထ ပဟာရံ ပါပုဏန္တိ, ကေစိ ပဟာရဋ္ဌာနေ ပတန္တိ, အဝသေသေ ပန အရောဂဇနေ ဗန္ဓိတွာ အတ္တနော ဝသနဋ္ဌာနံ နေတွာ ရဇ္ဇုဗန္ဓနာဒီဟိ ဗန္ဓိတွာ ဒါသပရိဘောဂေန ပရိဘုဉ္ဇန္တိ. आता बाह्य आयतनांची गाव लुटणाऱ्या चोरांशी असलेली समानता दाखवताना "चोरा गामघातका ति खो" इत्यादी भगवान म्हणाले. तेथे 'मनापामनापेसु' यामध्ये सप्तमी विभक्ती ही कारणाच्या अर्थात आहे, 'मनापामनापेहि' (मनोरंजक आणि अमनोरंजक रूपांद्वारे) असा याचा अर्थ आहे. तेथे चोरांनी गावावर हल्ला केला असता पाच गोष्टी घडतात – प्रथम चोर गावाला वेढा घालून उभे राहतात, आग लावतात आणि 'कटकट' असा आवाज निर्माण करतात, त्यानंतर लोक हातातील मौल्यवान संपत्ती घेऊन बाहेर पडतात. त्यानंतर मालाच्या कारणावरून त्यांच्याशी झटापट करतात. येथे काही जण मार खातात, काही जण मार लागलेल्या ठिकाणी कोसळतात, आणि उरलेल्या निरोगी लोकांना बांधून आपल्या राहण्याच्या ठिकाणी नेतात आणि दोरीने बांधून गुलाम म्हणून त्यांचा वापर करतात. တတ္ထ ဂါမဃာတကစောရာနံ ဂါမံ ပရိဝါရေတွာ အဂ္ဂိဒါနံ ဝိယ ဆသု ဒွါရေသု အာရမ္မဏေ အာပါထဂတေ ကိလေသပရိဠာဟုပ္ပတ္တိ ဝေဒိတဗ္ဗာ, ဟတ္ထသာရံ အာဒါယ ဗဟိ နိက္ခမနံ ဝိယ. တင်္ခဏေ ကုသလဓမ္မံ ပဟာယ အကုသလသမင်္ဂိတာ, ဘဏ္ဍကဿ ကာရဏာ ဟတ္ထပရာမသနာပဇ္ဇနံ ဝိယ ဒုက္ကဋဒုဗ္ဘာသိတပါစိတ္တိယထုလ္လစ္စယာနံ အာပဇ္ဇနကာလော, ပဟာရလဒ္ဓကာလော ဝိယ သံဃာဒိသေသံ အာပဇ္ဇနကာလော, ပဟာရံ လဒ္ဓါ ပန ပဟာရဋ္ဌာနေ ပတိတကာလော ဝိယ ပါရာဇိကံ အာပဇ္ဇိတွာ အဿမဏကာလော, အဝသေသဇနဿ ဗန္ဓိတွာ ဝသနဋ္ဌာနံ နေတွာ ဒါသပရိဘောဂေန ပရိဘုဉ္ဇနကာလော ဝိယ တမေဝ အာရမ္မဏံ နိဿာယ သဗ္ဗေသံ ပဿန္တာနံယေဝ စူဠသီလမဇ္ဈိမသီလမဟာသီလာနိ ဘိန္ဒိတွာ သိက္ခံ ပစ္စက္ခာယ ဂိဟိဘာဝံ အာပဇ္ဇနကာလော. တတြဿ ပုတ္တဒါရံ ပေါသေန္တဿ သန္ဒိဋ္ဌိကော ဒုက္ခက္ခန္ဓော ဝေဒိတဗ္ဗော, ကာလံ ကတွာ အပါယေ နိဗ္ဗတ္တဿ သမ္ပရာယိကော. तेथे, गाव लुटणाऱ्या चोरांनी गावाला वेढा घालून आग लावण्याप्रमाणे, सहा द्वारांवर आलंबन समोर आले असता क्लेशांचा दाह उत्पन्न होणे समजावे. हातातील मौल्यवान संपत्ती घेऊन बाहेर पडण्याप्रमाणे, त्या क्षणी कुशल धर्माचा त्याग करून अकुशलाने युक्त होणे समजावे. मालाच्या कारणावरून झटापटीत पडण्याप्रमाणे, दुक्कट, दुब्भासित, पाचित्तिय आणि थुल्लच्चय या आपत्तींमध्ये पडण्याचा काळ समजावा. मार खाण्याच्या काळाप्रमाणे, संघादिसेस आपत्तीत पडण्याचा काळ समजावा. मार खाऊन मार लागलेल्या ठिकाणी कोसळण्याप्रमाणे, पाराजिक आपत्तीत पडून श्रमण नसण्याचा काळ समजावा. उरलेल्या लोकांना बांधून राहण्याच्या ठिकाणी नेऊन गुलाम म्हणून वापरण्याच्या काळाप्रमाणे, त्याच आलंबनाचा आश्रय घेऊन, सर्वांच्या देखतच चुलशील, मज्झिमशील आणि महाशील यांचा भंग करून, शिक्षेचा (दीक्षेचा) त्याग करून गृहस्थभावाला प्राप्त होण्याचा काळ समजावा. तेथे, पत्नी आणि मुलांचे पालनपोषण करणाऱ्या त्या गृहस्थाला या जन्मात दिसणारा दुःखसमूह समजावा, आणि मृत्यूनंतर अपाय लोकांत उत्पन्न झाल्यावर परलोकातील दुःखसमूह समजावा. ဣမာနိပိ ဗာဟိရာယတနာနိ ဧကဿ ဘိက္ခုနော ကမ္မဋ္ဌာနဝသေနေဝ ကထိတာနိ. ဧတ္ထ ဟိ ရူပါဒီနိ စတ္တာရိ ဥပါဒါရူပါနိ, ဖောဋ္ဌဗ္ဗာယတနံ တိဿော ဓာတုယော, ဓမ္မာယတနေ အာပေါဓာတုယာ သဒ္ဓိံ တာ စတဿောတိ ဣမာနိ စတ္တာရိ ဘူတာနိ, တေသံ ပရိစ္ဆေဒဝသေန အာကာသဓာတု, လဟုတာဒိဝသေန လဟုတာဒယောတိ ဧဝမိဒံ သဗ္ဗမ္ပိ ဘူတုပါဒါယရူပံ ရူပက္ခန္ဓော, တဒါရမ္မဏာ ဝေဒနာဒယော စတ္တာရော အရူပက္ခန္ဓာ. တတ္ထ ‘‘ရူပက္ခန္ဓော ရူပံ, စတ္တာရော အရူပိနော [Pg.64] ခန္ဓာ နာမ’’န္တိ. နာမရူပံ ဝဝတ္ထပေတွာ ပုရိမနယေနေဝ ပဋိပဇ္ဇန္တဿ ယာဝ အရဟတ္တာ ကမ္မဋ္ဌာနံ ကထိတံ ဟောတိ. ही बाह्य आयतने देखील एका भिक्खूच्या कर्मस्थानाच्या दृष्टीनेच सांगितली आहेत. कारण येथे रूप इत्यादी चार उपादाय-रूप आहेत, फोठ्ठब्बायतन हे तीन धातू आहेत, आणि धर्मायतनात आपोधातूच्या सोबत ते चार महाभूत आहेत. त्यांच्या परिच्छेदाच्या रूपाने आकाशधातू आहे, आणि लघुता इत्यादींच्या रूपाने लघुता इत्यादी आहेत. अशा प्रकारे हे सर्व भूत आणि उपादाय रूप मिळून रूपस्कंध होतो. त्याला आलंबन करणारे वेदना इत्यादी चार अरूपस्कंध आहेत. तेथे "रूपस्कंध हे रूप आहे, आणि चार अरूप स्कंध हे नाम आहेत." अशा प्रकारे नाम-रूपाचे निर्धारण करून, पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच आचरण करणाऱ्यासाठी अर्हत्त्वापर्यंतचे कर्मस्थान सांगितले आहे. ဩဃာနန္တိ ဧတ္ထ ဒုရုတ္တရဏဋ္ဌော ဩဃဋ္ဌော. ဧတေ ဟိ ‘‘သီလသံဝရံ ပူရေတွာ အရဟတ္တံ ပါပုဏိဿာမီ’’တိ အဇ္ဈာသယံ သမုဋ္ဌာပေတွာ ကလျာဏမိတ္တေ နိဿာယ သမ္မာ ဝါယမန္တေန တရိတဗ္ဗာ, ယေန ဝါ တေန ဝါ ဒုရုတ္တရာ. ဣမိနာ ဒုရုတ္တရဏဋ္ဌေန ဩဃာတိ ဝုစ္စန္တိ. တေပိ ဧကဿ ဘိက္ခုနော ကမ္မဋ္ဌာနဝသေန ကထိတာ. စတ္တာရောပိ ဟိ ဧတေ ဧကော သင်္ခါရက္ခန္ဓော ဝါတိ. သေသံ နန္ဒီရာဂေ ဝုတ္တနယေနေဝ ယောဇေတွာ ဝိတ္ထာရေတဗ္ဗံ. ‘ओघानां’ यामध्ये पार करण्यास कठीण असणे हा 'ओघ' चा अर्थ आहे. कारण, "शीलसंवर पूर्ण करून मी अर्हत्त्व प्राप्त करेन" असा दृढ संकल्प करून, कल्याणमित्राचा आश्रय घेऊन योग्य प्रकारे प्रयत्न करणाऱ्या भिक्खूने हे पार केले पाहिजेत; इतर कोणत्याही सामान्य मार्गाने ते पार करणे कठीण आहे. पार करण्यास कठीण असण्याच्या या अर्थामुळे त्यांना 'ओघ' असे म्हणतात. ते देखील एका भिक्खूच्या कर्मस्थानाच्या दृष्टीने सांगितले आहेत. कारण हे चारही ओघ मिळून एक संस्कारस्कंधच आहेत. उर्वरित भाग 'नंदीराग' मध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच जोडून सविस्तर स्पष्ट करावा. သက္ကာယဿေတံ အဓိဝစနန္တိ, သက္ကာယောပိ ဟိ အာသီဝိသာဒီဟိ ဥဒကဏ္ဏဝဿ ဩရိမတီရံ ဝိယ စတုမဟာဘူတာဒီဟိ သာသင်္ကော သပ္ပဋိဘယော, သောပိ ဧကဿ ဘိက္ခုနော ကမ္မဋ္ဌာနဝသေနေဝ ကထိတော. သက္ကာယော ဟိ တေဘူမကပဉ္စက္ခန္ဓာ, တေ စ သမာသတော နာမရူပမေဝါတိ. ဧဝမေတ္ထ နာမရူပဝဝတ္ထာနံ အာဒိံ ကတွာ ယာဝ အရဟတ္တာ ကမ္မဋ္ဌာနံ ဝိတ္ထာရေတဗ္ဗန္တိ. ‘सत्काय (सक्काय) चे हे नाव आहे’, कारण सत्काय देखील, विषारी सर्प इत्यादींनी युक्त असलेल्या महासागराच्या अलीकडच्या किनाऱ्याप्रमाणे, चार महाभूत इत्यादींमुळे भययुक्त आणि संकटमय आहे. तो देखील एका भिक्खूच्या कर्मस्थानाच्या दृष्टीनेच सांगितला आहे. कारण सत्काय म्हणजे तीन भूमींमधील पंचस्कंध आहेत, आणि ते संक्षेपाने नाम-रूपच आहेत. अशा प्रकारे येथे नाम-रूपाच्या निर्धारणापासून सुरुवात करून अर्हत्त्वापर्यंतच्या कर्मस्थानाचा विस्तार करावा. နိဗ္ဗာနဿေတံ အဓိဝစနန္တိ နိဗ္ဗာနဉှိ ဥဒကဏ္ဏဝဿ ပါရိမတီရံ ဝိယ စတုမဟာဘူတာဒီဟိ ခေမံ အပ္ပဋိဘယံ. ဝီရိယာရမ္ဘဿေတံ အဓိဝစနန္တိ ဧတ္ထ စိတ္တကိရိယဒဿနတ္ထံ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တဝါယာမမေဝ ဝီရိယန္တိ ဂဏှိတွာ ဒဿေတိ. တိဏ္ဏော ပါရင်္ဂတောတိ တရိတွာ ပါရံ ဂတော. ‘निर्वाणाचे हे नाव आहे’, कारण निर्वाण हे महासागराच्या पलीकडच्या किनाऱ्याप्रमाणे, चार महाभूत इत्यादींपासून मुक्त, सुरक्षित आणि भयरहित आहे. ‘वीर्यारंभाचे हे नाव आहे’, येथे चित्ताची क्रिया दाखवण्यासाठी खाली सांगितलेल्या व्यायामालाच 'वीर्य' म्हणून ग्रहण करून दाखवले आहे. ‘तिण्णो पारंगतो’ म्हणजे पार करून पलीकडच्या किनाऱ्याला गेलेला. တတ္ထ ယထာ သာသင်္ကဩရိမတီရေ ဌိတေန ဥဒကဏ္ဏဝံ တရိတုကာမေန ကတိပါဟံ ဝသိတွာ သဏိကံ နာဝံ သဇ္ဇေတွာ ဥဒကကီဠံ ကီဠန္တေန ဝိယ န နာဝါ အဘိရုဟိတဗ္ဗာ. ဧဝံ ကရောန္တော ဟိ အနာရုဠှောဝ ဗျသနံ ပါပုဏာတိ. ဧဝမေဝ ကိလေသဏ္ဏဝံ တရိတုကာမေန ‘‘တရုဏော တာဝမှိ, မဟလ္လကကာလေ အဋ္ဌင်္ဂိကမဂ္ဂကုလ္လံ ဗန္ဓိဿာမီ’’တိ ပပဉ္စော န ကာတဗ္ဗော. ဧဝံ ကရောန္တော ဟိ မဟလ္လကကာလံ အပတွာပိ ဝိနာသံ ပါပုဏာတိ, ပတွာပိ ကာတုံ န သက္ကောတိ. ဘဒ္ဒေကရတ္တာဒီနိ ပန အနုဿရိတွာ ဝေဂေနေဝ အယံ အရိယမဂ္ဂကုလ္လော ဗန္ဓိတဗ္ဗော. तेथे, ज्याप्रमाणे भययुक्त अलीकडच्या किनाऱ्यावर राहिलेल्या आणि महासागर पार करू इच्छिणाऱ्या माणसाने काही दिवस थांबून, हळूहळू नौका तयार करून, पाण्यात जलक्रीडा खेळणाऱ्याप्रमाणे नौकेवर चढू नये. असे करणारा माणूस नौकेवर न चढताच विनाशाला प्राप्त होतो. त्याचप्रमाणे क्लेशरूपी महासागर पार करू इच्छिणाऱ्याने "मी अजून तरुण आहे, वृद्ध झाल्यावर अष्टांगिक मार्गरूपी तराफा बांधीन" असा प्रपंच (विलंब) करू नये. कारण असे करणारा माणूस वृद्धत्वापर्यंत न पोहोचताच विनाशाला प्राप्त होतो, आणि वृद्धत्व आले तरी ते करण्यास असमर्थ ठरतो. म्हणून 'भद्देकरत्त सुत्त' इत्यादींचे स्मरण करून वेगानेच हा आर्यमार्गरूपी तराफा बांधला पाहिजे. ယထာ စ ကုလ္လံ ဗန္ဓန္တဿ ဟတ္ထပါဒပါရိပူရိ ဣစ္ဆိတဗ္ဗာ. ကုဏ္ဌပါဒေါ ဟိ ခဉ္ဇပါဒေါ ဝါ ပတိဋ္ဌာတုံ န သက္ကောတိ, ဖဏဟတ္ထကာဒယော တိဏပဏ္ဏာဒီနိ ဂဟေတုံ န သက္ကောန္တိ. ဧဝမိမမ္ပိ အရိယမဂ္ဂကုလ္လံ ဗန္ဓန္တဿ သီလပါဒါနဉ္စေဝ သဒ္ဓါဟတ္ထဿ [Pg.65] စ ပါရိပူရိ ဣစ္ဆိတဗ္ဗာ. န ဟိ ဒုဿီလော အဿဒ္ဓေါ သာသနေ အပ္ပတိဋ္ဌိတော ပဋိပတ္တိံ အဿဒ္ဒဟန္တော အရိယမဂ္ဂကုလ္လံ ဗန္ဓိတုံ သက္ကောတိ. ယထာ စ ပရိပုဏ္ဏဟတ္ထပါဒေါပိ ဒုဗ္ဗလော ဗျာဓိပီဠိတော ကုလ္လံ ဗန္ဓိတုံ န သက္ကောတိ, ထာမသမ္ပန္နောဝ သက္ကောတိ, ဧဝံ သီလဝါ သဒ္ဓေါပိ အလသော ကုသီတော ဣမံ မဂ္ဂကုလ္လံ ဗန္ဓိတုံ န သက္ကောတိ, အာရဒ္ဓဝီရိယောဝ သက္ကောတီတိ ဣမံ ဗန္ဓိတုကာမေန အာရဒ္ဓဝီရိယေန ဘဝိတဗ္ဗံ. ယထာ သော ပုရိသော ကုလ္လံ ဗန္ဓိတွာ တီရေ ဌတွာ ယောဇနဝိတ္ထာရံ ဥဒကဏ္ဏဝံ ‘‘အယံ မယာ ပစ္စတ္တပုရိသကာရံ နိဿာယ နိတ္ထရိတဗ္ဗော’’တိ မာနသံ ဗန္ဓတိ, ဧဝံ ယောဂိနာပိ စင်္ကမာ ဩရုယှ ‘‘အဇ္ဇ မယာ စတုမဂ္ဂဝဇ္ဈံ ကိလေသဏ္ဏဝံ တရိတွာ အရဟတ္တေ ပတိဋ္ဌာတဗ္ဗ’’န္တိ မာနသံ ဗန္ဓိတဗ္ဗံ. ज्याप्रमाणे तराफा बांधणाऱ्याला हात आणि पायांची परिपूर्णता आवश्यक असते. कारण पांगळा किंवा लंगडा मनुष्य उभा राहू शकत नाही, आणि हात नसलेले किंवा लुळे हात असलेले लोक गवत, पाने इत्यादी पकडू शकत नाहीत. याचप्रमाणे, या आर्यमार्ग रूपी तराफ्याला बांधणाऱ्यासाठी शीलरूपी पायांची आणि श्रद्धारूपी हाताची परिपूर्णता आवश्यक आहे. कारण दुःशील, अश्रद्ध, शासनात अप्रतिष्ठित असलेला आणि प्रतिपत्तीवर (साधनेवर) अविश्वास ठेवणारा मनुष्य आर्यमार्ग रूपी तराफा बांधू शकत नाही. आणि ज्याप्रमाणे हात-पाय पूर्ण असूनही दुर्बळ आणि आजाराने ग्रस्त असलेला मनुष्य तराफा बांधू शकत नाही, तर केवळ बलवान मनुष्यच तो बांधू शकतो; त्याचप्रमाणे, शीलवान आणि श्रद्धावान असूनही आळशी व निरुद्योगी मनुष्य हा मार्ग रूपी तराफा बांधू शकत नाही, तर केवळ आरद्धवीर्य (प्रयत्नशील) मनुष्यच तो बांधू शकतो; म्हणून हा तराफा बांधण्याची इच्छा असणाऱ्याने आरद्धवीर्य (प्रयत्नशील) बनले पाहिजे. ज्याप्रमाणे तो मनुष्य तराफा बांधून, तीरावर उभा राहून, एक योजन रुंद असलेल्या जलसमूहाकडे पाहून मनात असा निश्चय करतो की, 'हा जलसमूह मला स्वतःच्या पुरुषार्थाच्या (प्रयत्नांच्या) बळावर पार करायचा आहे', त्याचप्रमाणे योग्यानेही (साधकानेही) चंक्रमणावरून उतरून मनात असा निश्चय केला पाहिजे की, 'आज मला चार मार्गांनी नष्ट होणाऱ्या क्लेशरूपी समुद्राला पार करून अर्हतपदामध्ये प्रतिष्ठित व्हायचे आहे'. ယထာ စ သော ပုရိသော ကုလ္လံ နိဿာယ ဥဒကဏ္ဏဝံ တရန္တော ဂါဝုတမတ္တံ ဂန္တွာ နိဝတ္တိတွာ ဩလောကေန္တော ‘‘ဧကကောဋ္ဌာသံ အတိက္ကန္တောမှိ, အညေ တယော သေသာ’’တိ ဇာနာတိ, အပရမ္ပိ ဂါဝုတမတ္တံ ဂန္တွာ နိဝတ္တိတွာ ဩလောကေန္တော ‘‘ဒွေ အတိက္ကန္တောမှိ, ဒွေ သေသာ’’တိ ဇာနာတိ, အပရမ္ပိ ဂါဝုတမတ္တံ ဂန္တွာ နိဝတ္တိတွာ ဩလောကေန္တော ‘‘တယော အတိက္ကန္တောမှိ, ဧကော သေသော’’တိ ဇာနာတိ, တမ္ပိ အတိက္ကမ္မ နိဝတ္တိတွာ ဩလောကေန္တော ‘‘စတ္တာရောပိ မေ ကောဋ္ဌသာ အတိက္ကန္တာ’’တိ ဇာနာတိ, တဉ္စ ကုလ္လံ ပါဒေန အက္ကမိတွာ သောတာဘိမုခံ ခိပိတွာ ဥတ္တရိတွာ တီရေ တိဋ္ဌတိ. ဧဝံ အယမ္ပိ ဘိက္ခု အရိယမဂ္ဂကုလ္လံ နိဿာယ ကိလေသဏ္ဏဝံ တရန္တော သောတာပတ္တိမဂ္ဂေန ပဌမမဂ္ဂဝဇ္ဈေ ကိလေသေ တရိတွာ မဂ္ဂါနန္တရေ ဖလေ ဌိတော ပစ္စဝေက္ခဏဉာဏေန နိဝတ္တိတွာ ဩလောကေန္တော ‘‘စတုမဂ္ဂဝဇ္ဈာနံ မေ ကိလေသာနံ ဧကော ကောဋ္ဌာသော ပဟီနော, ဣတရေ တယော သေသာ’’တိ ဇာနာတိ. ပုန တထေဝ ဣန္ဒြိယဗလဗောဇ္ဈင်္ဂါနိ သမောဓာနေတွာ သင်္ခါရေ သမ္မသန္တော သကဒါဂါမိမဂ္ဂေန ဒုတိယမဂ္ဂဝဇ္ဈေ ကိလေသေ တရိတွာ မဂ္ဂါနန္တရေ ဖလေ ဌိတော ပစ္စဝေက္ခဏဉာဏေန နိဝတ္တိတွာ, ဩလောကေန္တော ‘‘စတုမဂ္ဂဝဇ္ဈာနံ မေ ကိလေသာနံ ဒွေ ကောဋ္ဌာသာ ပဟီနာ[Pg.66], ဣတရေ ဒွေ သေသာ’’တိ ဇာနာတိ. ပုန တထေဝ ဣန္ဒြိယဗလဗောဇ္ဈင်္ဂါနိ သမောဓာနေတွာ သင်္ခါရေ သမ္မသန္တော အနာဂါမိမဂ္ဂေန တတိယမဂ္ဂဝဇ္ဈေ ကိလေသေ တရိတွာ မဂ္ဂါနန္တရေ ဖလေ ဌိတော ပစ္စဝေက္ခဏဉာဏေန နိဝတ္တိတွာ ဩလောကေန္တော ‘‘စတုမဂ္ဂဝဇ္ဈာနံ မေ ကိလေသာနံ တယော ကောဋ္ဌာသာ ပဟီနာ, ဧကော သေသော’’တိ ဇာနာတိ. ပုန တထေဝ ဣန္ဒြိယဗလဗောဇ္ဈင်္ဂါနိ သမောဓာနေတွာ သင်္ခါရေ သမ္မသန္တော အရဟတ္တမဂ္ဂေန စတုတ္ထမဂ္ဂဝဇ္ဈေ ကိလေသေ တရိတွာ မဂ္ဂါနန္တရေ ဖလေ ဌိတော ပစ္စဝေက္ခဏဉာဏေန နိဝတ္တိတွာ ဩလောကေန္တော ‘‘သဗ္ဗကိလေသာ မေ ပဟီနာ’’တိ ဇာနာတိ. आणि ज्याप्रमाणे तो मनुष्य तराफ्याचा आश्रय घेऊन जलसमूह पार करत असताना, सुमारे एक गावुत (कोसभर) अंतर गेल्यावर मागे वळून पाहतो आणि जाणतो की, 'मी एक भाग पार केला आहे, इतर तीन भाग शिल्लक आहेत'; आणखी एक गावुत गेल्यावर मागे वळून पाहतो आणि जाणतो की, 'मी दोन भाग पार केले आहेत, दोन शिल्लक आहेत'; आणखी एक गावुत गेल्यावर मागे वळून पाहतो आणि जाणतो की, 'मी तीन भाग पार केले आहेत, एक भाग शिल्लक आहे'; तो भागही पार करून मागे वळून पाहतो आणि जाणतो की, 'माझे चारही भाग पार झाले आहेत'; आणि त्या तराफ्याला पायाने लोटून, प्रवाहाच्या दिशेने फेकून देऊन, तो पलीकडे जाऊन तीरावर उभा राहतो. याचप्रमाणे, हा भिक्खूही आर्यमार्ग रूपी तराफ्याचा आश्रय घेऊन क्लेशरूपी समुद्राला पार करत असताना, स्रोतापत्ती मार्गाने पहिल्या मार्गाने नष्ट होणाऱ्या क्लेशांना पार करून, मार्गाच्या लगेचच नंतर मिळणाऱ्या फलामध्ये (स्रोतापत्ती फल) स्थित होऊन, प्रत्यवेक्षण ज्ञानाने मागे वळून पाहताना जाणतो की, 'चार मार्गांनी नष्ट होणाऱ्या माझ्या क्लेशांपैकी एक भाग नष्ट झाला आहे, आणि इतर तीन भाग शिल्लक आहेत'. पुन्हा त्याचप्रमाणे, इंद्रिये, बल आणि बोध्यंग एकत्र करून, संस्कारांचे चिंतन करत असताना, सकदागामी मार्गाने दुसऱ्या मार्गाने नष्ट होणाऱ्या क्लेशांना पार करून, मार्गाच्या लगेचच नंतर मिळणाऱ्या फलामध्ये स्थित होऊन, प्रत्यवेक्षण ज्ञानाने मागे वळून पाहताना जाणतो की, 'चार मार्गांनी नष्ट होणाऱ्या माझ्या क्लेशांपैकी दोन भाग नष्ट झाले आहेत, आणि इतर दोन भाग शिल्लक आहेत'. पुन्हा त्याचप्रमाणे, इंद्रिये, बल आणि बोध्यंग एकत्र करून, संस्कारांचे चिंतन करत असताना, अनागामी मार्गाने तिसऱ्या मार्गाने नष्ट होणाऱ्या क्लेशांना पार करून, मार्गाच्या लगेचच नंतर मिळणाऱ्या फलामध्ये स्थित होऊन, प्रत्यवेक्षण ज्ञानाने मागे वळून पाहताना जाणतो की, 'चार मार्गांनी नष्ट होणाऱ्या माझ्या क्लेशांपैकी तीन भाग नष्ट झाले आहेत, आणि एक भाग शिल्लक आहे'. पुन्हा त्याचप्रमाणे, इंद्रिये, बल आणि बोध्यंग एकत्र करून, संस्कारांचे चिंतन करत असताना, अर्हत मार्गाने चौथ्या मार्गाने नष्ट होणाऱ्या क्लेशांना पार करून, मार्गाच्या लगेचच नंतर मिळणाऱ्या फलामध्ये (अर्हत फल) स्थित होऊन, प्रत्यवेक्षण ज्ञानाने मागे वळून पाहताना जाणतो की, 'माझे सर्व क्लेश नष्ट झाले आहेत'. ယထာ သော ပုရိသော တံ ကုလ္လံ သောတေ ပဝါဟေတွာ ဥတ္တရိတွာ ထလေ ဌိတော နဂရံ ပဝိသိတွာ ဥပရိပါသာဒဝရဂတော ‘‘ဧတ္တကေန ဝတမှိ အနတ္ထေန မုတ္တော’’တိ ဧကဂ္ဂစိတ္တော တုဋ္ဌမာနသော နိသီဒတိ, ဧဝံ တသ္မိံယေဝ ဝါ အာသနေ အညေသု ဝါ ရတ္တိဋ္ဌာနဒိဝါဋ္ဌာနာဒီသု ယတ္ထ ကတ္ထစိ နိသိန္နော ‘‘ဧတ္တကေန ဝတမှိ အနတ္ထေန မုတ္တော’’တိ နိဗ္ဗာနာရမ္မဏံ ဖလသမာပတ္တိံ အပ္ပေတွာ ဧကဂ္ဂစိတ္တော တုဋ္ဌမာနသော နိသီဒတိ. ဣဒံ ဝါ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ တိဏ္ဏော ပါရင်္ဂတော ထလေ တိဋ္ဌတိ ဗြာဟ္မဏောတိ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, အရဟတော ဧတံ အဓိဝစနန္တိ. ဧဝံ တာဝေတ္ထ နာနာကမ္မဋ္ဌာနာနိ ကထိတာနိ, သမောဓာနေတွာ ပန သဗ္ဗာနိပိ ဧကမေဝ ကတွာ ဒဿေတဗ္ဗာနိ. ဧကံ ကတွာ ဒဿေန္တေနာပိ ပဉ္စက္ခန္ဓဝသေနေဝ ဝိနိဝတ္တေတဗ္ဗာနိ. ज्याप्रमाणे तो मनुष्य त्या तराफ्याला प्रवाहामध्ये वाहून देऊन, पलीकडे जाऊन कोरड्या जमिनीवर उभा राहून, नगरात प्रवेश करतो आणि एका श्रेष्ठ प्रासादाच्या वरच्या मजल्यावर जाऊन, 'अहो! मी एवढ्या मोठ्या अनर्थातून (संकटातून) मुक्त चालू आहे!' असे म्हणून एकाग्र चित्ताने आणि आनंदी मनाने बसतो; त्याचप्रमाणे, (अर्हत झालेला भिक्खू) त्याच आसनावर किंवा रात्रीच्या व दिवसाच्या विश्रांतीच्या इतर कोणत्याही ठिकाणी बसून, 'मी एवढ्या मोठ्या अनर्थातून मुक्त झालो आहे!' असे म्हणून निर्वाणाला आलंबन बनवून फलसमापत्तीमध्ये प्रविष्ट होऊन एकाग्र चित्ताने आणि आनंदी मनाने बसतो. हेच लक्षात घेऊन भगवान म्हणाले आहेत - 'हे भिक्खूंनो! जो पार झाला आहे, पलीकडच्या तीराला पोहोचला आहे आणि कोरड्या जमिनीवर उभा आहे असा ब्राह्मण, हे अर्हताचेच नाव (अधिवाचन) आहे.' अशा प्रकारे, येथे विविध कर्मस्थाने (ध्यानविषय) सांगितले आहेत; परंतु त्या सर्वांना एकत्रित करून एकच करून दाखवले पाहिजे. आणि एक करून दाखवतानाही, पंचस्कंधांच्या आधारेच त्यांचे विश्लेषण केले पाहिजे. ကထံ? ဧတ္ထ ဟိ စတ္တာရိ မဟာဘူတာနိ အဇ္ဈတ္တိကာနိ ပဉ္စာယတနာနိ ဗာဟိရာနိ ပဉ္စာယတနာနိ ဓမ္မာယတနေ ပန္နရသ သုခုမရူပါနိ သက္ကာယဿ ဧကဒေသောတိ အယံ ရူပက္ခန္ဓော, မနာယတနံ ဝိညာဏက္ခန္ဓော ဓမ္မာယတနေကဒေသော စတ္တာရော ဩဃာ သက္ကာယေကဒေသောတိ ဣမေ စတ္တာရော အရူပိနော ခန္ဓာ. တတ္ထ ရူပက္ခန္ဓော ရူပံ, စတ္တာရော အရူပိနော ခန္ဓာ နာမန္တိ ဣဒံ နာမရူပံ. တဿ နန္ဒီရာဂေါ ကာမောဃော ဘဝေါဃော ဓမ္မာယတနေကဒေသော သက္ကာယေကဒေသောတိ ဣမေ ပစ္စယာ. ဣတိ သပ္ပစ္စယံ နာမရူပံ ဝဝတ္ထပေတိ နာမ. သပ္ပစ္စယံ နာမရူပံ ဝဝတ္ထပေတွာ တိလက္ခဏံ အာရောပေတွာ ဝိပဿနံ ဝဍ္ဎေတွာ သင်္ခါရေ သမ္မသန္တော အရဟတ္တံ ပါပုဏာတီတိ ဣဒံ ဧကဿ ဘိက္ခုနော နိယျာနမုခံ. कसे? येथे चार महाभूते, पाच आध्यात्मिक (अंतर्गत) आयतने, पाच बाह्य आयतने, धर्मायतनातील पंधरा सूक्ष्म रूपे आणि सत्कायाचा (सक्काय) एक भाग - हा 'रूपस्कंध' होय. मनायतन हा 'विज्ञानस्कंध' होय; धर्मायतनाचा एक भाग, चार ओघ आणि सत्कायाचा एक भाग - हे चार 'अरूप (नाम) स्कंध' आहेत. त्यामध्ये रूपस्कंध म्हणजे 'रूप' आणि चार अरूप स्कंध म्हणजे 'नाम' होय; हेच 'नामरूप' आहे. त्याचे नंदीराग (आनंद व आसक्ती), कामौघ, भवाौघ, धर्मायतनाचा एक भाग आणि सत्कायाचा एक भाग - हे 'प्रत्यय' (कारण) आहेत. अशा प्रकारे, कारणांसह नामरूपाचे निर्धारण केले जाते. कारणांसह नामरूपाचे निर्धारण करून, त्यावर त्रिलक्षण (अनित्य, दुःख, अनात्मा) आरोपित करून, विपश्यना वाढवून आणि संस्कारांचे चिंतन करत असताना मनुष्य अर्हतपद प्राप्त करतो; हे एका भिक्खूच्या मुक्तीचे द्वार (निर्याणमुख) आहे. တတ္ထ စတ္တာရော မဟာဘူတာ ပဉ္စုပါဒါနက္ခန္ဓာ အဇ္ဈတ္တိကဗာဟိရာနိ ဧကာဒသာယတနာနိ ဓမ္မာယတနေကဒေသော ဒိဋ္ဌောဃော အဝိဇ္ဇောဃော သက္ကာယေကဒေသောတိ ဣဒံ ဒုက္ခသစ္စံ, နန္ဒီရာဂေါ ဓမ္မာယတနေကဒေသော ကာမောဃော ဘဝေါဃော သက္ကာယေကဒေသောတိ ဣဒံ သမုဒယသစ္စံ, ပါရိမတီရသင်္ခါတံ [Pg.67] နိဗ္ဗာနံ နိရောဓသစ္စံ, အရိယမဂ္ဂေါ မဂ္ဂသစ္စံ. တတ္ထ ဒွေ သစ္စာနိ ဝဋ္ဋံ, ဒွေ ဝိဝဋ္ဋံ, ဒွေ လောကိယာနိ, ဒွေ လောကုတ္တရာနီတိ စတ္တာရိ သစ္စာနိ သောဠသဟာကာရေဟိ သဋ္ဌိနယသဟဿေဟိ ဝိဘဇိတွာ ဒဿေတဗ္ဗာနီတိ. ဒေသနာပရိယောသာနေ ဝိပဉ္စိတညူ ပဉ္စသတာ ဘိက္ခူ အရဟတ္တေ ပတိဋ္ဌဟိံသု. သုတ္တံ ပန ဒုက္ခလက္ခဏဝသေန ကထိတံ. त्यामध्ये चार महाभूते, पाच उपादानस्कंध, अकरा आध्यात्मिक व बाह्य आयतने (धम्मायतन वगळून), धम्मायतनाचा एक भाग (अरिहंत मार्ग व निर्वाण वगळून), दिट्ठोघ (दृष्टीचा ओघ), अविज्जोघ (अविद्येचा ओघ) आणि सक्कायचा एक भाग (तृष्णा वगळून) – हे सर्व 'दुःखसत्य' होय. नंदीराग (आनंद व आसक्ती), धम्मायतनाचा एक भाग असलेली तृष्णा, कामोघ (कामाचा ओघ), भवोघ (भवाचा ओघ) आणि सक्कायचा एक भाग असलेली तृष्णा – हे सर्व 'समुदयसत्य' होय. पलीकडचा तीर म्हणून ओळखले जाणारे निर्वाण हे 'निरोधसत्य' होय. आर्य अष्टांगिक मार्ग हा 'मार्गसत्य' होय. त्या चार सत्यांपैकी दोन सत्ये (दुःख व समुदय) 'वट्ट' (संसारचक्र) आहेत, दोन सत्ये (निरोध व मार्ग) 'विवट्ट' (संसारचक्रातून मुक्ती) आहेत, दोन सत्ये लौकिक आहेत आणि दोन सत्ये लोकोत्तर आहेत. अशी ही चार सत्ये सोळा आकारांनी आणि साठ हजार नयांनी (पद्धतींनी) विभागून दाखवावीत. देशनेच्या शेवटी, विपंचितज्ञू असलेले पाचशे भिक्खू अर्हत पदावर प्रतिष्ठित झाले. हे सुत्त मात्र दुःखलक्षणाच्याद्वारे सांगितले गेले आहे. ၂. ရထောပမသုတ္တဝဏ္ဏနာ २. रथोपमसुत्तवण्णना (रथोपम सुत्ताचे स्पष्टीकरण) ၂၃၉. ဒုတိယေ သုခသောမနဿဗဟုလောတိ ကာယိကသုခဉ္စေဝ စေတသိကသောမနဿဉ္စ ဗဟုလံ အဿာတိ သုခသောမနဿဗဟုလော. ယောနိ စဿ အာရဒ္ဓါ ဟောတီတိ ကာရဏဉ္စဿ ပရိပုဏ္ဏံ ဟောတိ. အာသဝါနံ ခယာယာတိ ဣဓ အာသဝက္ခယောတိ အရဟတ္တမဂ္ဂေါ အဓိပ္ပေတော, တဒတ္ထာယာတိ အတ္ထော. ဩဓသ္တပတောဒေါတိ ရထမဇ္ဈေ တိရိယံ ဌပိတပတောဒေါ. ယေနိစ္ဆကန္တိ ယေန ဒိသာဘာဂေန ဣစ္ဆတိ. ယဒိစ္ဆကန္တိ ယံ ယံ ဂမနံ ဣစ္ဆတိ. သာရေယျာတိ ပေသေယျ. ပစ္စာသာရေယျာတိ ပဋိဝိနိဝတ္တေယျ. အာရက္ခာယာတိ ရက္ခဏတ္ထာယ. သံယမာယာတိ ဝေဂနိဂ္ဂဟဏတ္ထာယ. ဒမာယာတိ နိဗ္ဗိသေဝနတ္ထာယ. ဥပသမာယာတိ ကိလေသူပသမတ္ထာယ. २३९. दुसऱ्या सुत्तात, 'सुखसोमनस्सबाहुल' म्हणजे ज्याला कायिक सुख आणि चैतसिक सोमनस्य (मानसिक आनंद) प्रचुर प्रमाणात मिळते, तो 'सुखसोमनस्सबाहुल' होय. 'योनि चस्स आरद्धा होति' म्हणजे त्याचे कारण परिपूर्ण असते. 'आसवांना खयाय' (आसवांच्या क्षयासाठी) यामध्ये 'आसवक्खय' शब्दाने अर्हतमार्ग अभिप्रेत आहे, 'त्याच्या प्राप्तीसाठी' असा याचा अर्थ आहे. 'ओधस्तपतोद' म्हणजे रथाच्या मध्यभागी आडवा ठेवलेला चाबूक. 'येनिच्छकं' म्हणजे ज्या दिशेने त्याला जाण्याची इच्छा असेल. 'यदिच्छकं' म्हणजे ज्या ज्या गतीने जाण्याची इच्छा असेल. 'सारेय्य' म्हणजे हाकावे. 'पच्चासारेय्य' म्हणजे मागे फिरवावे. 'आरक्खाय' म्हणजे रक्षणासाठी (क्लेशांपासून रक्षणासाठी). 'संयमाय' म्हणजे संयमासाठी (इंद्रियांच्या वेगावर नियंत्रण ठेवण्यासाठी). 'दमाय' म्हणजे दमनासाठी (प्रतिकूल गोष्टींचे सेवन न करण्यासाठी). 'उपसमाय' म्हणजे उपशमासाठी (क्लेशांच्या शांततेसाठी). ဧဝမေဝ ခေါတိ ဧတ္ထ ယထာ အကုသလဿ သာရထိနော အဒန္တေ သိန္ဓဝေ ယောဇေတွာ ဝိသမမဂ္ဂေန ရထံ ပေသေန္တဿ စက္ကာနိပိ ဘိဇ္ဇန္တိ, အက္ခောပိ သိန္ဓဝါနဉ္စ ခုရာ, အတ္တနာပိ အနယဗျသနံ ပါပုဏာတိ, န စ ဣစ္ဆိတိစ္ဆိတေန ဂမနေန သာရေတုံ သက္ကောတိ; ဧဝံ ဆသု ဣန္ဒြိယေသု အဂုတ္တဒွါရော ဘိက္ခု န ဣစ္ဆိတိစ္ဆိတံ သမဏရတိံ အနုဘဝိတုံ သက္ကောတိ. ယထာ ပန ဆေကော သာရထိ ဒန္တေ သိန္ဓဝေ ယောဇေတွာ, သမေ ဘူမိဘာဂေ ရထံ ဩတာရေတွာ ရသ္မိယော ဂဟေတွာ, သိန္ဓဝါနံ ခုရေသု သတိံ ဌပေတွာ, ပတောဒံ အာဒါယ နိဗ္ဗိသေဝနေ ကတွာ, ပေသေန္တော ဣစ္ဆိတိစ္ဆိတေန ဂမနေန သာရေတိ. ဧဝမေဝ ဆသု ဣန္ဒြိယေသု ဂုတ္တဒွါရော ဘိက္ခု ဣမသ္မိံ သာသနေ ဣစ္ဆိတိစ္ဆိတံ သမဏရတိံ အနုဘောတိ, သစေ အနိစ္စာနုပဿနာဘိမုခံ ဉာဏံ ပေသေတုကာမော ဟောတိ, တဒဘိမုခံ ဉာဏံ ဂစ္ဆတိ. ဒုက္ခာနုပဿနာဒီသုပိ ဧသေဝ နယော. त्याचप्रमाणे, येथे ज्याप्रमाणे एखाद्या अकुशल सारथ्याने न शिकवलेल्या (अदम्य) सिंधू घोड्यांना रथाला जुंपून खडबडीत मार्गाने रथ हाकला असता, चाकेही तुटतात, कणा (अक्ष) देखील तुटतो आणि घोड्यांचे खूरही तुटतात; तो स्वतःही अनर्थ आणि विनाशाला प्राप्त होतो आणि इच्छित गतीने रथ हाकण्यास समर्थ होत नाही; त्याचप्रमाणे, सहा इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित न ठेवणारा भिक्खू इच्छित अशा श्रमण-रतीचा (श्रमणाच्या आनंदाचा) अनुभव घेण्यास समर्थ होत नाही. परंतु, ज्याप्रमाणे एखादा चतुर सारथी शिकवलेल्या (दमित) सिंधू घोड्यांना जुंपून, सपाट जमिनीवर रथ आणून, लगाम हातात धरून, घोड्यांच्या खुरांवर लक्ष ठेवून, चाबूक हातात घेऊन आणि प्रतिकूल गोष्टी टाळून रथ हाकताना इच्छित गतीने चालवतो; त्याचप्रमाणे, सहा इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवणारा भिक्खू या शासनात इच्छित अशा श्रमण-रतीचा अनुभव घेतो. जर त्याला आपले ज्ञान अनित्यानुपश्यनेकडे वळवायचे असेल, तर त्याचे ज्ञान तिकडेच जाते. दुःखानुपश्यना इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. ဘောဇနေ မတ္တညူတိ ဘောဇနမှိ ပမာဏညူ. တတ္ထ ဒွေ ပမာဏာနိ – ပဋိဂ္ဂဟဏပမာဏဉ္စ ပရိဘောဂပမာဏဉ္စ. တတ္ထ ပဋိဂ္ဂဟဏပမာဏေ ဒါယကဿ ဝသော [Pg.68] ဝေဒိတဗ္ဗော, ဒေယျဓမ္မဿ ဝသော ဝေဒိတဗ္ဗော, အတ္တနော ထာမော ဇာနိတဗ္ဗော. ဧဝရူပေါ ဟိ ဘိက္ခု သစေ ဒေယျဓမ္မော ဗဟုကော ဟောတိ, ဒါယကော အပ္ပံ ဒါတုကာမော, ဒါယကဿ ဝသေန အပ္ပံ ဂဏှာတိ. ဒေယျဓမ္မော အပ္ပော, ဒါယကော ဗဟုံ ဒါတုကာမော, ဒေယျဓမ္မဿ ဝသေန အပ္ပံ ဂဏှာတိ. ဒေယျဓမ္မောပိ ဗဟု, ဒါယကောပိ ဗဟုံ ဒါတုကာမော, အတ္တနော ထာမံ ဉတွာ ပမာဏေန ဂဏှာတိ. သော တာယ ပဋိဂ္ဂဟဏေ မတ္တညုတာယ အနုပ္ပန္နဉ္စ လာဘံ ဥပ္ပာဒေတိ, ဥပ္ပန္နဉ္စ ထာဝရံ ကရောတိ ဓမ္မိကတိဿမဟာရာဇကာလေ သတ္တဝဿိကော သာမဏေရော ဝိယ. 'भोजने मत्तञ्ञू' म्हणजे भोजनाच्या बाबतीत प्रमाणाचे ज्ञान असणारा. त्यामध्ये दोन प्रमाणे आहेत – ग्रहण करण्याचे प्रमाण आणि उपभोग घेण्याचे प्रमाण. त्यापैकी ग्रहण करण्याच्या प्रमाणात दात्याची इच्छा समजून घेतली पाहिजे, दानवस्तूचे प्रमाण समजून घेतले पाहिजे आणि स्वतःची क्षमता जाणून घेतली पाहिजे. असा भिक्खू जर दानवस्तू भरपूर असेल, पण दाता थोडीच देण्यास इच्छुक असेल, तर दात्याच्या इच्छेनुसार थोडेच ग्रहण करतो. जर दानवस्तू थोडी असेल, पण दाता भरपूर देण्यास इच्छुक असेल, तर दानवस्तूच्या प्रमाणानुसार थोडेच ग्रहण करतो. जर दानवस्तूही भरपूर असेल आणि दाताही भरपूर देण्यास इच्छुक असेल, तर स्वतःची क्षमता जाणून योग्य प्रमाणातच ग्रहण करतो. तो त्या ग्रहण करण्याच्या मितप्रमाणतेमुळे न मिळालेला लाभ मिळवतो आणि मिळालेला लाभ टिकवून ठेवतो; ज्याप्रमाणे धम्मिकतिस्स महाराजांच्या काळात सात वर्षांचा श्रामणेर होता, त्याप्रमाणे. ရညော ကိရ ပဉ္စဟိ သကဋသတေဟိ ဂုဠံ အာဟရိံသု. ရာဇာ ‘‘မနာပေါ ပဏ္ဏာကာရော, အယျေဟိ ဝိနာ န ခါဒိဿာမာ’’တိ အဍ္ဎတေယျာနိ သကဋသတာနိ မဟာဝိဟာရံ ပေသေတွာ သယမ္ပိ ဘုတ္တပါတရာသော အဂမာသိ. ဘေရိယာ ပဟဋာယ ဒွါဒသ ဘိက္ခုသဟဿာနိ သန္နိပတိံသု. ရာဇာ ဧကမန္တေ ဌိတော အာရာမိကံ ပက္ကောသာပေတွာ အာဟ – ‘‘ရညော နာမ ဒါနေ ပတ္တပူရောဝ ပမာဏံ, ဂဟိတဘာဇနံ ပူရေတွာဝ ဒေဟိ, သစေ ကောစိ မတ္တပဋိဂ္ဂဟဏေ ဌိတော န ဂဏှာတိ, မယှံ အာရောစေယျာသီ’’တိ. असे ऐकिवात आहे की, राजासाठी पाचशे गाड्यांमधून गूळ आणला गेला. राजा म्हणाला, 'हा उत्तम नजराणा आहे, आर्यजनांशिवाय (भिक्खूंशिवाय) मी हा खाणार नाही.' असे म्हणून त्याने अडीचशे गाड्या महाविहाराकडे पाठवल्या आणि स्वतःही सकाळचे भोजन करून तो विहाराकडे गेला. नगारा वाजवल्यावर बारा हजार भिक्खू एकत्र जमले. राजा एका बाजूला उभा राहिला आणि त्याने आरामिकाला (विहाराच्या सेवकाला) बोलावून म्हटले, 'राजाच्या दानात पात्र भरून देणे हेच प्रमाण असते. आणलेले पात्र पूर्ण भरूनच दे. जर कोणी मितप्रमाणतेवर ठाम राहून पूर्ण पात्र भरून घेत नसेल, तर मला येऊन सांग.' အထေကော မဟာထေရော ‘‘မဟာဗောဓိမဟာစေတိယာနိ ဝန္ဒိဿာမီ’’တိ စေတိယပဗ္ဗတာ အာဂန္တွာ, ဝိဟာရံ ပဝိသန္တော မဟာမဏ္ဍပဋ္ဌာနေ ဘိက္ခူ ဂုဠံ ဂဏှန္တေ ဒိသွာ ပစ္ဆတော အာဂစ္ဆန္တံ သာမဏေရံ အာဟ, ‘‘နတ္ထိ တေ ဂုဠေန အတ္ထော’’တိ. ‘‘အာမ, ဘန္တေ, နတ္ထီ’’တိ. သာမဏေရ မယံ မဂ္ဂကိလန္တာ, ဧကေန ကပိဋ္ဌဖလမတ္တေန ပိဏ္ဍကေန အမှာကံ အတ္ထောတိ. သာမဏေရော ထာလကံ နီဟရိတွာ ထေရဿ ဝဿဂ္ဂပဋိပါဋိယံ အဋ္ဌာသိ. အာရာမိကော ဂဟဏမာနံ ပူရေတွာ ဥက္ခိပိ, သာမဏေရော အင်္ဂုလိံ စာလေသိ. တာတ သာမဏေရ, ရာဇကုလာနံ ဒါနေ ဘာဇနပူရမေဝ ပမာဏံ, ထာလကပူရံ ဂဏှာဟီတိ. အာမ, ဥပါသက, ရာဇာနော နာမ မဟဇ္ဈာသယာ ဟောန္တိ, အမှာကံ ပန ဥပဇ္ဈာယဿ ဧတ္တကေနေဝ အတ္ထောတိ. तेव्हा एक महाथेर 'महाबोधी आणि महाचेतीला वंदन करीन' असे म्हणून चेतियपब्बत पर्वतावरून आले. विहारात प्रवेश करताना महामंडपाच्या ठिकाणी भिक्खूंना गूळ घेताना पाहून ते आपल्या मागे येणाऱ्या श्रामणेराला म्हणाले, 'तुला गुळाची गरज नाही का?' श्रामणेराने उत्तर दिले, 'होय, भंते! मला गरज नाही.' महाथेर म्हणाले, 'श्रामणेरा, आपण प्रवासाने थकलो आहोत. आपल्याला कवठाच्या फळाएवढ्या गुळाच्या तुकड्याची गरज आहे.' तेव्हा श्रामणेराने आपले पात्र बाहेर काढले आणि महाथेरांच्या ज्येष्ठतेच्या क्रमानुसार तो उभा राहिला. आरामिकाने माप भरून गूळ उचलला, तेव्हा श्रामणेराने आपले बोट हलवून नकार दिला. आरामिक म्हणाला, 'बाळ श्रामणेरा! राजघराण्याच्या दानात पात्र भरून देणे हेच प्रमाण असते, म्हणून पात्र भरून घे.' श्रामणेराने उत्तर दिले, 'होय उपासका, राजे हे मोठ्या मनाचे असतात, परंतु आमच्या उपाध्यायांना एवढ्याशा गुळाचीच गरज आहे.' ရာဇာ တဿ ကထံ သုတွာ, ‘‘ကိံ ဘော သာမဏေရော ဘဏတီ’’တိ? တဿ သန္တိကံ ဂတော. အာရာမိကော အာဟ – ‘‘သာမိ, သာမဏေရဿ ဘာဇနံ ခုဒ္ဒကံ, ဗဟုံ န ဂဏှာတီ’’တိ. ရာဇာ အာဟ, ‘‘အာနီတဘာဇနံ ပူရေတွာ ဂဏှထ, ဘန္တေ’’တိ. မဟာရာဇ, ရာဇာနော နာမ မဟဇ္ဈာသယာ ဟောန္တိ[Pg.69], ဥက္ခိတ္တဘာဇနံ ပူရေတွာဝ ဒါတုကာမာ, အမှာကံ ပန ဥပဇ္ဈာယဿ ဧတ္တကေနေဝ အတ္ထောတိ. ရာဇာ စိန္တေသိ – ‘‘အယံ သတ္တဝဿိကဒါရကော, အဇ္ဇာပိဿ မုခတော ခီရဂန္ဓော န မုစ္စတိ, ဂဟေတွာ ကုဋေ ဝါ ကုဋုမ္ဗေ ဝါ ပူရေတွာ သွေပိ ပုနဒိဝသေပိ ခါဒိဿာမာတိ န ဝဒတိ, သက္ကာ ဗုဒ္ဓသာသနံ ပရိဂ္ဂဟေတု’’န္တိ ပုရိသေ အာဏာပေသိ, ‘‘ဘော, ပသန္နောမှိ သာမဏေရဿ, ဣတရာနိပိ အဍ္ဎတေယျာနိ သကဋသတာနိ အာနေတွာ သဃံဿ ဒေထာ’’တိ. राजाने त्याचे बोलणे ऐकून, 'हा श्रामणेर काय म्हणत आहे?' असे विचारत तो त्याच्याजवळ गेला. आरामिकाने सांगितले, 'स्वामी! श्रामणेराचे पात्र लहान आहे, तो जास्त घेत नाही.' राजा म्हणाला, 'भंते, आणलेले पात्र पूर्ण भरून घ्या.' श्रामणेराने उत्तर दिले, 'महाराज, राजे हे मोठ्या मनाचे असतात आणि ते उचललेले पात्र पूर्ण भरूनच देऊ इच्छितात, परंतु आमच्या उपाध्यायांना एवढ्याशा गुळाचीच गरज आहे.' राजाने विचार केला, 'हा केवळ सात वर्षांचा बालक आहे, अजूनही याच्या मुखातून दुधाचा वास गेलेला नाही. तरीही तो 'हा गूळ घेऊन घागरीत किंवा भांड्यात भरून ठेवू आणि उद्या किंवा परवा खाऊ' असे म्हणत नाही. खरोखरच बुद्धशासनाचा सांभाळ करण्यास हा समर्थ आहे.' त्याने आपल्या सेवकांना आज्ञा दिली, 'अहो, मी या श्रामणेरावर अत्यंत प्रसन्न झालो आहे. उरलेल्या अडीचशे गाड्याही आणून संघाला दान करा.' သောယေဝ ပန ရာဇာ ဧကဒိဝသံ တိတ္တိရမံသံ ခါဒိတုကာမော စိန္တေသိ – ‘‘သစေ အဟံ အင်္ဂါရပက္ကံ တိတ္တိရမံသံ ခါဒိတုကာမောသ္မီတိ အညဿ ကထေဿာမိ, သမန္တာ ယောဇနဋ္ဌာနေ တိတ္တိရသမုဂ္ဃာတံ ကရိဿန္တီ’’တိ ဥပ္ပန္နံ ပိပါသံ အဓိဝါသေန္တော တီဏိ သံဝစ္ဆရာနိ ဝီတိနာမေသိ. အထဿ ကဏ္ဏေသု ပုဗ္ဗော သဏ္ဌာသိ, သော အဓိဝါသေတုံ အသက္ကောန္တော ‘‘အတ္ထိ နု ခေါ, ဘော, အမှာကံ ကောစိ ဥပဋ္ဌာကုပါသကော သီလရက္ခကော’’တိ ပုစ္ဆိ. အာမ, ဒေဝ, အတ္ထိ, တိဿော နာမ သော အခဏ္ဍသီလံ ရက္ခတီတိ. အထ နံ ဝီမံသိတုကာမော ပက္ကောသာပေသိ. သော အာဂန္တွာ ရာဇာနံ ဝန္ဒိတွာ အဋ္ဌာသိ. တတော နံ အာဟ – ‘‘တွံ, တာတ, တိဿော နာမာ’’တိ? ‘‘အာမ ဒေဝါ’’တိ. တေန ဟိ ဂစ္ဆာတိ. တသ္မိံ ဂတေ ဧကံ ကုက္ကုဋံ အာဟရာပေတွာ ဧကံ ပုရိသံ အာဏာပေသိ, ‘‘ဂစ္ဆ တိဿံ ဝဒါဟိ, ဣမံ တီဟိ ပါကေဟိ ပစိတွာ အမှာကံ ဥပဋ္ဌာပေဟီ’’တိ. သော ဂန္တွာ တထာ အဝေါစ. သော အာဟ – ‘‘သစေ, ဘော, အယံ မတကော အဿ, ယထာ ဇာနာမိ, တထာ ပစိတွာ ဥပဋ္ဌဟေယျံ. ပါဏာတိပါတံ ပနာဟံ န ကရောမီ’’တိ. သော အာဂန္တွာ ရညော အာရောစေသိ. तोच रक्षक राजा एका दिवशी तितराचे मांस खाण्याची इच्छा धरून विचार करू लागला – “जर मी कोळशावर भाजलेले तितराचे मांस खाण्याची इच्छा बाळगतो असे दुसऱ्या कोणाला सांगितले, तर ते सभोवतालच्या एक योजन परिसरात सर्व तितरांचा संहार करतील.” अशा प्रकारे मनात उत्पन्न झालेली तीव्र लालसा सहन करत त्याने तीन वर्षे घालवली. त्यानंतर त्याच्या कानात पू साचला. तो ते सहन करण्यास असमर्थ ठरल्याने त्याने विचारले, “अरे मित्रांनो, आपला असा कोणी शीलवान सेवक उपासक आहे का?” त्यांनी सांगितले, “होय, महाराज, आहे. तिस्स नावाचा तो तरुण अखंड शीलाचे रक्षण करतो.” तेव्हा त्याची परीक्षा घेण्याच्या इच्छेने राजाने त्याला बोलावून घेतले. तो आला आणि राजाला वंदन करून उभा राहिला. त्यानंतर राजाने त्याला विचारले, “बाळा, तुझे नाव तिस्स आहे का?” “होय, महाराज.” “तर मग जा.” तो गेल्यावर राजाने एक कोंबडा आणवला आणि एका सेवकाला आज्ञा दिली, “जा आणि तिस्सला सांग की, हा कोंबडा तीन प्रकारच्या पाककृतींनी शिजवून आमच्यासाठी सादर कर.” त्याने जाऊन तसेच सांगितले. तो म्हणाला, “अरे मित्रा, जर हा कोंबडा आधीच मृत असता, तर मला जसे ठाऊक आहे तसे शिजवून मी ते सादर केले असते. परंतु मी प्राणातिपात करणार नाही.” त्याने परत येऊन राजाला हे सांगितले। ရာဇာ ပုန ‘‘ဧကဝါရံ ဂစ္ဆာ’’တိ ပေသေသိ. သော ဂန္တွာ, ‘‘ဘော, ရာဇုပဋ္ဌာနံ နာမ ဘာရိယံ, မာ ဧဝံ ကရိ, ပုနပိ သီလံ သက္ကာ သမာဒါတုံ, ပစေတ’’န္တိ အာဟ. အထ နံ တိဿော အဝေါစ, ‘‘ဘော, ဧကသ္မိံ နာမ အတ္တဘာဝေ ဓုဝံ ဧကံ မရဏံ, နာဟံ ပါဏာတိပါတံ ကရိဿာမီ’’တိ. သော ပုနပိ ရညော အာရောစေသိ. ရာဇာ တတိယမ္ပိ ပေသေတွာ အသမ္ပဋိစ္ဆန္တံ ပက္ကောသာပေတွာ အတ္တနာ ပုစ္ဆိ. ရညောပိ တထေဝ ပဋိဝစနံ အဒါသိ. အထ ရာဇာ ပုရိသေ အာဏာပေသိ, ‘‘အယံ ရညော အာဏံ ကောပေတိ, ဂစ္ဆထေတဿ အာဃာတနဘဏ္ဍိကာယံ ဌပေတွာ, သီသံ ဆိန္ဒထာ’’တိ. ရဟော [Pg.70] စ ပန နေသံ သညမဒါသိ – ‘‘ဣမံ သန္တဇ္ဇယမာနာ နေတွာ သီသမဿ အာဃာတနဘဏ္ဍိကာယံ ဌပေတွာ အာဂန္တွာ မယှံ အာရောစေထာ’’တိ. राजाने पुन्हा “एकदा जाऊन ये” असे सांगून त्याला पाठवले. त्याने जाऊन म्हटले, “अरे मित्रा, राजाची सेवा करणे कठीण काम आहे. असे करू नकोस. पुन्हा शील ग्रहण करता येऊ शकते, हा कोंबडा शिजव.” तेव्हा तिस्स त्याला म्हणाला, “अरे मित्रा, एका जन्मात एकदाच मरणे निश्चित आहे. मी प्राणातिपात करणार नाही.” त्याने पुन्हा राजाला हे सांगितले. राजाने तिसऱ्यांदाही पाठवले, पण त्याने नकार दिल्यावर त्याला बोलावून स्वतः विचारले. राजालाही त्याने तसेच उत्तर दिले. तेव्हा राजाने सेवकांना आज्ञा दिली, “हा राजाच्या आज्ञेचा भंग करत आहे. जा, याला वधशिळेवर ठेवून याचे मस्तक धडावेगळे करा.” परंतु गुप्तपणे त्याने त्यांना इशारा दिला, “याला केवळ घाबरवत घेऊन जा आणि याचे मस्तक वधशिळेवर ठेवून परत येऊन मला सांगा.” တေ တံ အာဃာတနဘဏ္ဍိကာယံ နိပဇ္ဇာပေတွာ တမဿ ကုက္ကုဋံ ဟတ္ထေသု ဌပယိံသု. သော တံ ဟဒယေ ဌပေတွာ ‘‘အဟံ, တာတ, မမ ဇီဝိတံ တုယှံ ဒေမိ, တဝ ဇီဝိတံ အဟံ ဂဏှာမိ, တွံ နိဗ္ဘယော ဂစ္ဆာ’’တိ ဝိဿဇ္ဇေသိ. ကုက္ကုဋော ပက္ခေ ပပ္ဖောဋေတွာ အာကာသေန ဂန္တွာ ဝဋရုက္ခေ နိလီယိ. တဿ ကုက္ကုဋဿ အဘယဒိန္နဋ္ဌာနံ ကုက္ကုဋဂိရိ နာမ ဇာတံ. त्यांनी त्याला वधशिळेवर झोपवले आणि तो कोंबडा त्याच्या हातात दिला. त्याने त्या कोंबड्याला आपल्या छातीशी धरले आणि म्हटले, “बाळा, मी माझे जीवन तुला देतो आणि तुझे जीवन मी घेतो. तू निर्भय होऊन जा,” असे म्हणून त्याला सोडून दिले. कोंबड्याने पंख फडफडवले, आकाशात उडाला आणि एका वडाच्या झाडावर जाऊन बसला. त्या कोंबड्याला अभय मिळालेले ते ठिकाण ‘कुक्कुटगिरी’ या नावाने प्रसिद्ध झाले। ရာဇာ တံ ပဝတ္တိံ သုတွာ အမစ္စပုတ္တံ ပက္ကောသာပေတွာ သဗ္ဗာဘရဏေဟိ အလင်္ကရိတွာ အာဟ – ‘‘တာတ, မယာ တွံ ဧတဒတ္ထမေဝ ဝီမံသိတော, မယှံ တိတ္တိရမံသံ ခါဒိတုကာမဿ တီဏိ သံဝစ္ဆရာနိ အတိက္ကန္တာနိ, သက္ခိဿသိ မေ တိကောဋိပရိသုဒ္ဓံ ကတွာ ဥပဋ္ဌာပေတု’’န္တိ. ‘‘ဧတံ နာမ, ဒေဝ, မယှံ ကမ္မ’’န္တိ နိက္ခမိတွာ ဒွါရန္တရေ ဌိတော ဧကံ ပုရိသံ ပါတောဝ တယော တိတ္တိရေ ဂဟေတွာ ပဝိသန္တံ ဒိသွာ, ဒွေ ကဟာပဏေ ဒတွာ တိတ္တိရေ အာဒါယ ပရိသောဓေတွာ, ဇီရကာဒီဟိ ဝါသေတွာ, အင်္ဂါရေသု သုပက္ကေ ပစိတွာ ရညော ဥပဋ္ဌာပေသိ. ရာဇာ မဟာတလေ သိရီပလ္လင်္ကေ နိသိန္နောဝ ဧကံ ဂဟေတွာ ထောကံ ဆိန္ဒိတွာ မုခေ ပက္ခိပိ, တာဝဒေဝဿ သတ္တရသဟရဏီသဟဿာနိ ဖရိတွာ အဋ္ဌာသိ. राजाने ती हकीकत ऐकली आणि त्या अमात्यपुत्राला बोलावून सर्व अलंकारांनी विभूषित केले आणि म्हटले – “बाळा, मी केवळ याच कारणासाठी तुझी परीक्षा घेतली. मला तितराचे मांस खाण्याची इच्छा होऊन तीन वर्षे उलटून गेली आहेत. तू माझ्यासाठी त्रिकोटीपरिशुद्ध करून ते सादर करू शकशील का?” “महाराज, हे तर माझेच काम आहे,” असे म्हणून तो बाहेर पडला. प्रवेशद्वाराजवळ उभे असताना, त्याने पहाटेच एका माणसाला तीन मृत तितर घेऊन येताना पाहिले. त्याने त्याला दोन कहापण दिले, ते तितर घेतले, ते स्वच्छ केले, जिरे इत्यादी मसाल्यांनी सुवासित केले, कोळशावर चांगले भाजून शिजवले आणि राजाला सादर केले. राजाने महालाच्या वरच्या मजल्यावर राजसिंहासनावर बसूनच एक तुकडा घेतला, तो थोडा कापला आणि तोंडात टाकला. त्याच क्षणी त्याची चव त्याच्या सतरा हजार रसवाहिन्यांमध्ये पसरली। တသ္မိံ သမယေ ဘိက္ခုသံဃံ သရိတွာ, ‘‘မာဒိသော နာမ ပထဝိဿရော ရာဇာ တိတ္တိရမံသံ ခါဒိတုကာမော တီဏိ သံဝစ္ဆရာနိ န လဘိ, အပစ္စမာနော ဘိက္ခုသံဃော ကုတော လဘိဿတီ’’တိ? မုခေ ပက္ခိတ္တက္ခဏ္ဍံ ဘူမိယံ ဆဍ္ဍေသိ. အမစ္စပုတ္တော ဇဏ္ဏုကေဟိ ပတိတွာ မုခေန ဂဏှိ. ရာဇာ ‘‘အပေဟိ, တာတ, ဇာနာမဟံ တဝ နိဒ္ဒေါသဘာဝံ, ဣမိနာ နာမ ကာရဏေန မယာ ဧတံ ဆဍ္ဍိတ’’န္တိ ကထေတွာ, ‘‘သေသကံ တထေဝ သင်္ဂေါပေတွာ ဌပေဟီ’’တိ အာဟ. त्या वेळी भिक्खू संघाचे स्मरण करून राजा विचार करू लागला, “माझ्यासारख्या पृथ्वीपती राजाला तितराचे मांस खाण्याची इच्छा असूनही तीन वर्षे ते मिळाले नाही, तर स्वतः स्वयंपाक न करणाऱ्या भिक्खू संघाला ते कोठून मिळणार?” असे म्हणून त्याने तोंडात टाकलेला तो तुकडा जमिनीवर थुंकला. अमात्यपुत्राने गुडघे टेकून तो तुकडा आपल्या तोंडाने झेलला. राजा म्हणाला, “बाळा, बाजूला हो. मला तुझा निर्दोषपणा ठाऊक आहे. मी केवळ या कारणामुळे तो तुकडा टाकला आहे.” असे सांगून तो म्हणाला, “उरलेले मांस तसेच सुरक्षित ठेवून दे।” ပုနဒိဝသေ ရာဇကုလူပကော ထေရော ပိဏ္ဍာယ ပါဝိသိ. အမစ္စပုတ္တော တံ ဒိသွာ ပတ္တံ ဂဟေတွာ ရာဇဂေဟံ ပဝေသေသိ. အညတရော ဝုဍ္ဎပဗ္ဗဇိတောပိ ထေရဿ ပစ္ဆာသမဏော ဝိယ ဟုတွာ အနုဗန္ဓန္တော ပါဝိသိ. ထေရော ‘‘ရညာ ပက္ကောသာပိတဘိက္ခု ဘဝိဿတီ’’တိ ပမဇ္ဇိ. အမစ္စပုတ္တောပိ ‘‘ထေရဿ ဥပဋ္ဌာကော ဘဝိဿတီ’’တိ ပမာဒံ အာပဇ္ဇိ. တေသံ နိသီဒါပေတွာ ယာဂုံ အဒံသု. ယာဂုယာ ပီတာယ ရာဇာ တိတ္တိရေ ဥပနေသိ. ထေရော ဧကံ ဂဏှိ, ဣတရောပိ [Pg.71] ဧကံ ဂဏှိ. ရာဇာ ‘‘အနုဘာဂေါ အတ္ထိ, အနာပုစ္ဆိတွာ ခါဒိတုံ န ယုတ္တ’’န္တိ မဟာထေရံ အာပုစ္ဆိ. ထေရော ဟတ္ထံ ပိဒဟိ, မဟလ္လကတ္ထေရော သမ္ပဋိစ္ဆိ. ရာဇာ အနတ္တမနော ဟုတွာ ကတဘတ္တကိစ္စံ ထေရံ ပတ္တံ အာဒါယ အနုဂစ္ဆန္တော အာဟ – ‘‘ဘန္တေ, ကုလဂေဟံ အာဂစ္ဆန္တေဟိ ဥဂ္ဂဟိတဝတ္တံ ဘိက္ခုံ ဂဟေတွာ အာဂန္တုံ ဝဋ္ဋတီ’’တိ. ထေရော တသ္မိံ ခဏေ အညာသိ ‘‘န ဧသ ရညာ ပက္ကောသာပိတော’’တိ. दुसऱ्या दिवशी राजघराण्याचे आदरणीय थेर पिंडाचारासाठी महालात आले. अमात्यपुत्राने त्यांना पाहून त्यांचे पात्र घेतले आणि त्यांना राजवाड्यात प्रवेश दिला. एक वृद्धपब्बजित देखील त्या थेरांच्या पाठीमागे त्यांचा पच्छासमण असल्यासारखा मागे मागे राजवाड्यात शिरला. थेरांनी विचार केला की, “हा राजाने बोलावलेला भिक्खू असावा,” आणि त्यांनी दुर्लक्ष केले. अमात्यपुत्रानेही विचार केला की, “हा थेरांचा सेवक असावा,” आणि त्यानेही दुर्लक्ष केले. त्यांना बसवून त्यांनी पेज दिली. पेज पिऊन झाल्यावर राजाने तितराचे मांस सादर केले. थेरांनी एक घेतला आणि दुसऱ्यानेही एक घेतला. राजाने विचार केला, “अजून वाटा嬉 शिल्लक आहे, न विचारता खाणे योग्य नाही,” म्हणून त्याने महाथेरांना विचारले. थेरांनी आपला हात पात्रावर ठेवून नकार दिला, पण त्या वृद्ध थेरांनी तो स्वीकारला. राजा अप्रसन्न झाला. भोजन आटोपल्यावर थेरांचे पात्र घेऊन त्यांच्या मागे जात राजा म्हणाला – “भंते, कुलीन घराण्यात येताना योग्य विनय आणि नियम शिकलेल्या भिक्खूला सोबत घेऊन येणे योग्य ठरते.” थेरांना त्याच क्षणी समजले की, “या भिक्खूला राजाने बोलावलेले नव्हते.” ပုနဒိဝသေ ဥပဋ္ဌာကသာမဏေရံ ဂဟေတွာ ပါဝိသိ. ရာဇာ တဒါပိ ယာဂုယာ ပီတာယ တိတ္တိရေ ဥပနာမေသိ. ထေရော ဧကံ အဂ္ဂဟေသိ, သာမဏေရော အင်္ဂုလိံ စာလေတွာ မဇ္ဈေ ဆိန္ဒာပေတွာ ဧကကောဋ္ဌာသမေဝ အဂ္ဂဟေသိ. ရာဇာ တံ ကောဋ္ဌာသံ မဟာထေရဿ ဥပနာမေသိ. မဟာထေရော ဟတ္ထံ ပိဒဟိ, သာမဏေရောပိ ပိဒဟိ. ရာဇာ အဝိဒူရေ နိသီဒိတွာ ခဏ္ဍာခဏ္ဍံ ဆိန္ဒိတွာ ခါဒန္တော ‘‘ဥဂ္ဂဟိတဝတ္တေ နိဿာယ ဒိယဍ္ဎတိတ္တိရေ ခါဒိတုံ လဘိမှာ’’တိ အာဟ. တဿ မံသေ ခါဒိတမတ္တေဝ ကဏ္ဏေဟိ ပုဗ္ဗော နိက္ခမိ. တတော မုခံ ဝိက္ခာလေတွာ သာမဏေရံ ဥပသင်္ကမိတွာ, ‘‘ပသန္နောသ္မိ, တာတ, အဋ္ဌ တေ ဓုဝဘတ္တာနိ ဒေမီ’’တိ အာဟ. အဟံ, မဟာရာဇ, ဥပဇ္ဈာယဿ ဒမ္မီတိ. အပရာနိ အဋ္ဌ ဒေမီတိ. တာနိ အမှာကံ အာစရိယဿ ဒမ္မီတိ. အပရာနိပိ အဋ္ဌ ဒေမီတိ. တာနိ သမာနုပဇ္ဈာယာနံ ဒမ္မီတိ. အပရာနိပိ အဋ္ဌ ဒေမီတိ. တာနိ ဘိက္ခုသံဃဿ ဒမ္မီတိ. အပရာနိပိ အဋ္ဌ ဒေမီတိ. သာမဏေရော အဓိဝါသေသိ. ဧဝံ ပဋိဂ္ဂဟဏမတ္တံ ဇာနန္တော အနုပ္ပန္နဉ္စေဝ လာဘံ ဥပ္ပာဒေတိ, ဥပ္ပန္နဉ္စ ထာဝရံ ကရောတိ. ဣဒံ ပဋိဂ္ဂဟဏပမာဏံ နာမ. တတ္ထ ပရိဘောဂပမာဏံ ပစ္စဝေက္ခဏပယောဇနံ, ‘‘ဣဒမတ္ထိယံ ဘောဇနံ ဘုဉ္ဇာမီ’’တိ ပန ပစ္စဝေက္ခိတပရိဘောဂဿေဝ ပယောဇနတ္တာ ပရိဘောဂပမာဏံယေဝ နာမ, တံ ဣဓ အဓိပ္ပေတံ. တေနေဝ ပဋိသင်္ခါ ယောနိသောတိအာဒိမာဟ, ဣတရမ္ပိ ပန ဝဋ္ဋတိယေဝ. दुसऱ्या दिवशी उपस्थायक (सेवाभावी) सामणेराला सोबत घेऊन त्यांनी प्रवेश केला. राजाने तेव्हाही पेज प्यायल्यानंतर तितर पक्षी अर्पण केले. थेरांनी एक स्वीकारला, सामणेराने बोट हलवून मध्यभागी विभागून केवळ एकच हिस्सा स्वीकारला. राजाने तो हिस्सा महाथेरांना अर्पण केला. महाथेरांनी हात झाकला (नकार दिला), सामणेरानेही हात झाकला. राजाने जवळच बसून, तुकडे-तुकडे करून खाताना म्हटले, “आम्ही विनय शिकलेल्यांच्या आश्रयाने दीड तितर खाण्यास मिळवले.” त्याचे मांस खाताच त्याच्या कानातून पू बाहेर पडला. त्यानंतर तोंड धुवून सामणेराजवळ जाऊन तो म्हणाला, “बाळा, मी प्रसन्न झालो आहे, मी तुला आठ नित्य-भोजन (धुवभत्त) देतो.” सामणेर म्हणाला, “महाराज, मी ते माझ्या उपाध्यायांना देतो.” राजा म्हणाला, “मी आणखी आठ देतो.” सामणेर म्हणाला, “ते मी आमच्या आचार्यांना देतो.” राजा म्हणाला, “मी आणखीही आठ देतो.” सामणेर म्हणाला, “ते मी समान-उपाध्याय असणाऱ्यांना देतो.” राजा म्हणाला, “मी आणखीही आठ देतो.” सामणेर म्हणाला, “ते मी भिक्खू संघाला देतो.” राजा म्हणाला, “मी आणखीही आठ देतो.” सामणेराने ते स्वीकारले. अशा प्रकारे प्रतिग्रहणाचे (स्वीकारण्याचे) प्रमाण जाणणारा न मिळालेला लाभ मिळवतो आणि मिळालेला लाभ चिरस्थायी करतो. याला ‘प्रतिग्रहण-प्रमाण’ असे म्हणतात. त्यामध्ये परिभोग-प्रमाण (वापरण्याचे प्रमाण) हे प्रत्यवेक्षणाच्या प्रयोजनासाठी असते. “मी या प्रयोजनासाठी भोजन ग्रहण करत आहे” अशा प्रकारे प्रत्यवेक्षण करून परिभोग घेण्याचेच प्रयोजन असल्यामुळे, याला ‘परिभोग-प्रमाण’ असे म्हणतात; आणि तेच येथे अभिप्रेत आहे. म्हणूनच “पटिसङ्खा योनिसो...” इत्यादी म्हटले आहे, परंतु दुसरे (प्रतिग्रहण-प्रमाण) देखील योग्यच आहे. သီဟသေယျန္တိ ဧတ္ထ ကာမဘောဂိသေယျာ, ပေတသေယျာ, သီဟသေယျာ, တထာဂတသေယျာတိ စတဿော သေယျာ. တတ္ထ ‘‘ယေဘုယျေန, ဘိက္ခဝေ, ကာမဘောဂီ ဝါမေန ပဿေန သေန္တီ’’တိ (အ. နိ. ၄.၂၄၆) အယံ ကာမဘောဂိသေယျာ. တေသဉှိ ယေဘုယျေန ဒက္ခိဏပဿေန သယာနော နာမ နတ္ထိ. ‘सिंहशय्या’ या संदर्भात—कामभोगी शय्या, प्रेत शय्या, सिंह शय्या आणि तथागत शय्या अशा चार प्रकारच्या शय्या आहेत. त्यामध्ये, “भिक्खूहो, बहुतांश कामभोगी लोक डाव्या कुशीवर झोपतात” ही ‘कामभोगी शय्या’ आहे. कारण त्यांच्यामध्ये बहुतांश उजव्या कुशीवर झोपणे आढळत नाही. ‘‘ယေဘုယျေန[Pg.72], ဘိက္ခဝေ, ပေတာ ဥတ္တာနာ သေန္တီ’’တိ (အ. နိ. ၄.၂၄၆) အယံ ပေတသေယျာ. ပေတာ ဟိ အပ္ပမံသလောဟိတတ္တာ အဋ္ဌိသံဃာဋဇဋိတာ ဧကေန ပဿေန သယိတုံ န သက္ကောန္တိ, ဥတ္တာနာဝ သယန္တိ. “भिक्खूहो, बहुतांश प्रेत उताणे झोपतात” ही ‘प्रेत शय्या’ आहे. कारण प्रेत हे अल्प मांस व रक्त असल्यामुळे आणि केवळ अस्थिपंजराने वेढलेले असल्यामुळे एका कुशीवर झोपू शकत नाहीत, ते उताणेच झोपतात. ‘‘ယေဘုယျေန, ဘိက္ခဝေ, သီဟော မိဂရာဇာ နင်္ဂုဋ္ဌံ အန္တရသတ္ထိမှိ အနုပက္ခိပိတွာ ဒက္ခိဏေန ပဿေန သယတီ’’တိ အယံ သီဟသေယျာ. တေဇုဿဒတ္တာ ဟိ သီဟော မိဂရာဇာ ဒွေ ပုရိမပါဒေ ဧကသ္မိံ, ပစ္ဆိမပါဒေ ဧကသ္မိံ ဌာနေ ဌပေတွာ နင်္ဂုဋ္ဌံ အန္တရသတ္ထိမှိ ပက္ခိပိတွာ ပုရိမပါဒပစ္ဆိမပါဒနင်္ဂုဋ္ဌာနံ ဌိတောကာသံ သလ္လက္ခေတွာ ဒွိန္နံ ပုရိမပါဒါနံ မတ္ထကေ သီသံ ဌပေတွာ သယတိ, ဒိဝသမ္ပိ သယိတွာ ပဗုဇ္ဈမာနော န ဥတြသန္တော ပဗုဇ္ဈတိ, သီသံ ပန ဥက္ခိပိတွာ ပုရိမပါဒါဒီနံ ဌိတောကာသံ သလ္လက္ခေတိ. သစေ ကိဉ္စိ ဌာနံ ဝိဇဟိတွာ ဌိတံ ဟောတိ, ‘‘နယိဒံ တုယှံ ဇာတိယာ သူရဘာဝဿ စ အနုရူပ’’န္တိ အနတ္တမနော ဟုတွာ တတ္ထေဝ သယတိ, န ဂေါစရာယ ပက္ကမတိ. အဝိဇဟိတွာ ဌိတေ ပန ‘‘တုယှံ ဇာတိယာ စ သူရဘာဝဿ စ အနုရူပမိဒ’’န္တိ ဟဋ္ဌတုဋ္ဌော ဥဋ္ဌာယ သီဟဝိဇမ္ဘိတံ ဝိဇမ္ဘိတွာ ကေသရဘာရံ ဝိဓုနိတွာ တိက္ခတ္တုံ သီဟနာဒံ နဒိတွာ ဂေါစရာယ ပက္ကမတိ. “भिक्खूहो, बहुतांश पशूंचा राजा सिंह आपली शेपूट मांड्यांच्या मध्ये ठेवून उजव्या कुशीवर झोपतो” ही ‘सिंह शय्या’ आहे. तेजस्वी असल्यामुळे पशूंचा राजा सिंह आपले दोन्ही पुढचे पाय एका ठिकाणी आणि दोन्ही मागचे पाय एका ठिकाणी ठेवून, शेपूट मांड्यांच्या मध्ये घालून, पुढच्या पायांच्या, मागच्या पायांच्या आणि शेपटाच्या स्थितीची नोंद घेऊन, दोन्ही पुढच्या पायांवर आपले डोके ठेवून झोपतो. दिवसभर झोपून जेव्हा तो जागा होतो, तेव्हा तो न घाबरता जागा होतो. डोके वर करून तो पुढच्या पायांच्या इत्यादींच्या स्थितीची तपासणी करतो. जर एखादा अवयव आपली जागा सोडून हलला असेल, तर “हे तुझ्या जातीला आणि शौर्याला साजेसे नाही” असे म्हणून तो अप्रसन्न होऊन तिथेच पुन्हा झोपून राहतो, शिकारीसाठी जात नाही. परंतु, जर ते न हलले असेल, तर “हे तुझ्या जातीला आणि शौर्याला साजेसे आहे” असे म्हणून अत्यंत आनंदित होऊन, उठून, सिंहासारखी जांभई देऊन, आपली आयाळ झटकून, तीन वेळा सिंहगर्जना करून शिकारीसाठी निघून जातो. စတုတ္ထဇ္ဈာနသေယျာ ပန တထာဂတသေယျာတိ ဝုစ္စတိ. တာသု ဣဓ သီဟသေယျာ အာဂတာ. အယဉှိ တေဇုဿဒဣရိယာပထတ္တာ ဥတ္တမသေယျာ နာမ. चौथ्या ध्यानाची शय्या ही ‘तथागत शय्या’ म्हणून ओळखली जाते. त्यापैकी येथे ‘सिंह शय्या’ आली आहे. कारण ही तेजस्वी ईर्यापथाची असल्यामुळे ‘उत्तम शय्या’ मानली जाते. ပါဒေ ပါဒန္တိ ဒက္ခိဏပါဒေ ဝါမပါဒံ. အစ္စာဓာယာတိ အတိအာဓာယ, ဤသကံ အတိက္ကမ္မ ဌပေတွာ. ဂေါပ္ဖကေန ဟိ ဂေါပ္ဖကေ, ဇာဏုနာ ဝါ ဇာဏုမှိ သံဃဋ္ဋိယမာနေ အဘိဏှံ ဝေဒနာ ဥပ္ပဇ္ဇတိ, စိတ္တံ ဧကဂ္ဂံ န ဟောတိ, သေယျာ အဖာသုကာ ဟောတိ. ယထာ ပန န သံဃံဋ္ဋေတိ, ဧဝံ အတိက္ကမ္မ ဌပိတေ ဝေဒနာ နုပ္ပဇ္ဇတိ, စိတ္တံ ဧကဂ္ဂံ ဟောတိ, သေယျာ ဖာသုကာ ဟောတိ. တသ္မာ ဧဝံ သေယျံ ကပ္ပေတိ. ‘पायावर पाय’ म्हणजे उजव्या पायावर डावा पाय. ‘अच्चाधाय’ म्हणजे थोडे पुढे सरकवून ठेवणे. कारण घोट्यावर घोटा किंवा गुडघ्यावर गुडघा घासल्यास वारंवार वेदना उत्पन्न होते, चित्त एकाग्र होत नाही आणि झोप असुखकर होते. परंतु, ज्या प्रकारे ते एकमेकांवर घासणार नाहीत अशा प्रकारे थोडे पुढे सरकवून ठेवल्यास वेदना होत नाही, चित्त एकाग्र होते आणि झोप सुखकर होते. म्हणून तो अशा प्रकारे शयन करतो. သတော သမ္ပဇာနောတိ သတိယာ စေဝ သမ္ပဇညေန စ သမန္နာဂတော. ကထံ နိဒ္ဒါယန္တော သတော သမ္ပဇာနော ဟောတီတိ? သတိသမ္ပဇညဿ အပ္ပဟာနေန. အယဉှိ ဒိဝသဉ္စေဝ သကလယာမဉ္စ အာဝရဏီယေဟိ ဓမ္မေဟိ စိတ္တံ ပရိသောဓေတွာ ပဌမယာမာဝသာနေ စင်္ကမာ ဩရုယှ ပါဒေ ဓောဝန္တောပိ မူလကမ္မဋ္ဌာနံ အဝိဇဟန္တောဝ ဓောဝတိ, တံ အဝိဇဟန္တောဝ ဒွါရံ [Pg.73] ဝိဝရတိ, မဉ္စေ နိသီဒတိ, အဝိဇဟန္တောဝ နိဒ္ဒံ ဩက္ကမတိ. ပဗုဇ္ဈန္တော ပန မူလကမ္မဋ္ဌာနံ ဂဟေတွာဝ ပဗုဇ္ဈတိ. ဧဝံ နိဒ္ဒံ ဩက္ကမန္တောပိ သတော သမ္ပဇာနော ဟောတိ. ဧဝံ ပန ဉာဏဓာတုကန္တိ န ရောစယိံသု. ‘सतो संपजानो’ म्हणजे स्मृती आणि प्रज्ञा यांनी युक्त असणे. झोपताना मनुष्य स्मृतिमान व प्रज्ञावान कसा राहू शकतो? स्मृती आणि प्रज्ञेचा त्याग न केल्याने. हा (योगी भिक्खू) दिवसभर आणि संपूर्ण पहिल्या प्रहरात अडथळा आणणाऱ्या धर्मांपासून चित्त शुद्ध करून, पहिल्या प्रहराच्या शेवटी चंक्रमणावरून उतरून पाय धुतानाही मूळ कम्मट्ठानाचा त्याग न करताच पाय धुतो, त्याचा त्याग न करताच दार उघडतो, मंचावर बसतो आणि त्याचा त्याग न करताच झोपेच्या अधीन होतो. जागा होतानाही तो मूळ कम्मट्ठानाला धरूनच जागा होतो. अशा प्रकारे झोपतानाही तो स्मृतिमान व प्रज्ञावान असतो. परंतु, प्राचीन आचार्यांनी याला ‘ज्ञानधातू’ (झोपेच्या वेळीही ज्ञान असणे) म्हणून स्वीकारले नाही. ဝုတ္တနယေန ပနေသ စိတ္တံ ပရိသောဓေတွာ ပဌမယာမာဝသာနေ ‘‘ဥပါဒိန္နကံ သရီရံ နိဒ္ဒါယ သမဿာသေဿာမီ’’တိ စင်္ကမာ ဩရုယှ မူလကမ္မဋ္ဌာနံ အဝိဇဟန္တောဝ ပါဒေ ဓောဝတိ, ဒွါရံ ဝိဝရတိ, မဉ္စေ ပန နိသီဒိတွာ မူလကမ္မဋ္ဌာနံ ပဟာယ, ‘‘ခန္ဓာဝ ခန္ဓေသု, ဓာတုယောဝ ဓာတူသု ပဋိဟညန္တီ’’တိ သေနာသနံ ပစ္စဝေက္ခန္တော ကမေန နိဒ္ဒံ ဩက္ကမတိ, ပဗုဇ္ဈန္တော ပန မူလကမ္မဋ္ဌာနံ ဂဟေတွာဝ ပဗုဇ္ဈတိ. ဧဝံ နိဒ္ဒံ ဩက္ကမန္တောပိ သတော သမ္ပဇာနော နာမ ဟောတီတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. परंतु, सांगितलेल्या पद्धतीने हा चित्त शुद्ध करून, पहिल्या प्रहराच्या शेवटी “मी या उपादिण्णक शरीराला झोपेद्वारे विश्रांती देईन” असा विचार करून चंक्रमणावरून उतरतो, मूळ कम्मट्ठानाचा त्याग न करताच पाय धुतो, दार उघडतो; परंतु मंचावर बसल्यावर मूळ कम्मट्ठानाचा त्याग करून, “स्कंधच स्कंधांवर आणि धातूच धातूंवर आदळत आहेत” अशा प्रकारे शयनासनाचा विचार करत हळूहळू झोपेच्या अधीन होतो, आणि जागा होताना मात्र मूळ कम्मट्ठानाला धरूनच जागा होतो. अशा प्रकारे झोपतानाही तो स्मृतिमान व प्रज्ञावान असतो, असे जाणावे. ဣတိ ဣမသ္မိံ သုတ္တေ တိဝင်္ဂိကာ ပုဗ္ဗဘာဂဝိပဿနာဝ ကထိတာ. ဧတ္တကေနေဝ ပန ဝေါသာနံ အနာပဇ္ဇိတွာ တာနေဝ ဣန္ဒြိယဗလဗောဇ္ဈင်္ဂါနိ သမောဓာနေတွာ ဝိပဿနံ ဝဍ္ဎေတွာ ဘိက္ခု အရဟတ္တံ ပါပုဏာတီတိ. ဧဝံ ယာဝ အရဟတ္တာ ဒေသနာ ကထေတဗ္ဗာ. अशा प्रकारे, या सुत्तात तीन अंगांनी युक्त असणारी पूर्वभाग-विपश्यनाच सांगितली आहे. परंतु केवळ एवढ्यावरच प्रयत्न न थांबवता, त्याच इंद्रिय, बल आणि बोध्यंगांना एकत्रित करून, विपश्यना वाढवून भिक्खू अर्हत्त्व प्राप्त करतो. अशा प्रकारे अर्हत्त्वापर्यंत ही देशना सांगितली पाहिजे. ၃. ကုမ္မောပမသုတ္တဝဏ္ဏနာ ३. कुम्मोपमसुत्त-वण्णना (कुम्मोपम सुत्ताची व्याख्या) ၂၄၀. တတိယေ ကုမ္မောတိ အဋ္ဌိကုမ္မော. ကစ္ဆပေါတိ တဿေဝ ဝေဝစနံ. အနုနဒီတီရေတိ နဒိယာ အနုတီရေ. ဂေါစရပသုတောတိ ‘‘သစေ ကိဉ္စိ ဖလာဖလံ လဘိဿာမိ, ခါဒိဿာမီ’’တိ ဂေါစရတ္ထာယ ပသုတော ဥဿုက္ကော တန္နိဗန္ဓော. သမောဒဟိတွာတိ သမုဂ္ဂေ ဝိယ ပက္ခိပိတွာ. သင်္ကသာယတီတိ အစ္ဆတိ. သမောဒဟန္တိ သမောဒဟန္တော ဌပေန္တော. ဣဒံ ဝုတ္တံ ဟောတိ – ယထာ ကုမ္မော အင်္ဂါနိ သကေ ကပါလေ သမောဒဟန္တော သိင်္ဂါလဿ ဩတာရံ န ဒေတိ, န စ နံ သိင်္ဂါလော ပသဟတိ, ဧဝံ ဘိက္ခု အတ္တနော မနောဝိတက္ကေ သကေ အာရမ္မဏကပါလေ သမောဒဟန္တော ကိလေသမာရဿ ဩတာရံ န ဒေတိ, န စ နံ မာရော ပသဟတိ. २४०. तिसऱ्या सुत्तात 'कुम्मो' (कासव) म्हणजे 'अट्ठिकुम्मो' (हाडाचे किंवा कठीण कवच असलेले कासव). 'कच्छपो' हा त्याचाच (कासवाचाच) समानार्थी शब्द आहे. 'अनुनदीतीरे' म्हणजे नदीच्या काठाकाठाने (नदीच्या तीरावर). 'गोचरपसुतो' म्हणजे "जर मला काही लहान-मोठी फळे मिळतील, तर मी ती खाईन" असा विचार करून आहाराच्या शोधात (गोचरासाठी) उत्सुक, प्रयत्नशील आणि त्यातच मग्न असलेला. 'समोदहित्वा' म्हणजे एखाद्या पेटीत ठेवल्याप्रमाणे (आपल्या कवचात) सुरक्षितपणे आत ओढून घेऊन. 'सङ्कसायति' म्हणजे राहतो (बसून राहतो). 'समोदहन्ति' म्हणजे (आपल्या मनात) चांगल्या प्रकारे ठेवून (गोळा करून). याचा अर्थ असा आहे - ज्याप्रमाणे कासव आपले अवयव स्वतःच्या कवचात सुरक्षितपणे आत ओढून घेतो आणि कोल्ह्याला हल्ला करण्याची संधी देत नाही, आणि कोल्हा त्यावर ताबा मिळवू शकत नाही; त्याचप्रमाणे भिक्खूने आपल्या मनातील विचारांना (मनोवितक्क) स्वतःच्या आरंभीच्या (आरम्मण) कवचात (म्हणजेच ध्यान किंवा चार स्मृतीप्रस्थानांमध्ये) सुरक्षित ठेवून क्लेशरूपी माराला संधी देऊ नये, आणि मार देखील त्याच्यावर ताबा मिळवू शकत नाही. အနိဿိတောတိ တဏှာဒိဋ္ဌိနိဿယေဟိ အနိဿိတော. အညမဟေဌယာနောတိ အညံ ကဉ္စိ ပုဂ္ဂလံ အဝိဟေဌေန္တော. ပရိနိဗ္ဗုတောတိ ကိလေသပရိနိဗ္ဗာနေန ပရိနိဗ္ဗုတော. နူပဝဒေယျ ကဉ္စီတိ အညံ ကဉ္စိ ပုဂ္ဂလံ သီလဝိပတ္တိယာ ဝါ အာစာရဝိပတ္တိယာ ဝါ အတ္တာနံ ဥက္ကံသေတုကာမတာယ ဝါ [Pg.74] ပရံ ဝမ္ဘေတုကာမတာယ ဝါ န ဥပဝဒေယျ, အညဒတ္ထု ပဉ္စ ဓမ္မေ အဇ္ဈတ္တံ ဥပဋ္ဌပေတွာ, ‘‘ကာလေန ဝက္ခာမိ, နော အကာလေန, ဘူတေန ဝက္ခာမိ, နော အဘူတေန, သဏှေန ဝက္ခာမိ, နော ဖရုသေန, အတ္ထသံဟိတေန ဝက္ခာမိ, နော အနတ္ထသံဟိတေန, မေတ္တစိတ္တော ဝက္ခာမိ, နော ဒေါသန္တရော’’တိ ဧဝံ ဥလ္လုမ္ပနသဘာဝသဏ္ဌိတေနေဝ စိတ္တေန ဝိဟရတိ. 'अनिस्सितो' म्हणजे तृष्णा आणि दृष्टी यांच्या आधारापासून मुक्त (आश्रय न घेणारा). 'अञ्ञमहेठयानो' म्हणजे इतर कोणत्याही व्यक्तीला त्रास न देता (पीडा न पोहोचवता). 'परिनिब्बुतो' म्हणजे क्लेशांच्या परिनिर्वाणाने (शांत होण्याने) पूर्णपणे शांत झालेला. 'नूपवदेय्य कञ्चि' म्हणजे इतर कोणत्याही व्यक्तीला त्याच्या शील-विपत्तीमुळे (शीलाचा नाश) किंवा आचार-विपत्तीमुळे (आचरणाचा नाश), स्वतःची प्रशंसा करण्याच्या इच्छेने किंवा दुसऱ्याची निंदा करण्याच्या इच्छेने दोष देऊ नये (आरोप करू नये). उलटपक्षी, स्वतःच्या अंतःकरणात पाच धर्म प्रस्थापित करून: "मी योग्य वेळी बोलेन, अयोग्य वेळी नाही; सत्याने बोलेन, असत्याने नाही; मृदुतेने बोलेन, कठोरतेने नाही; कल्याणाचे (अर्थपूर्ण) बोलेन, निरर्थक नाही; मैत्रीपूर्ण चित्ताने बोलेन, द्वेषाने नाही" - अशा प्रकारे दुसऱ्याचा उद्धार करण्याच्या स्वभावाने युक्त असलेल्या चित्ताने विहार करतो. ၄. ပဌမဒါရုက္ခန္ဓောပမသုတ္တဝဏ္ဏနာ ४. प्रथम दारुक्खन्धोपम सुत्ताचे वर्णन (टीका). ၂၄၁. စတုတ္ထေ အဒ္ဒသာတိ ဂင်္ဂါတီရေ ပညတ္တဝရဗုဒ္ဓါသနေ နိသိန္နော အဒ္ဒသ. ဝုယှမာနန္တိ စတုရဿံ တစ္ဆေတွာ ပဗ္ဗတန္တရေ ဌပိတံ ဝါတာတပေန သုပရိသုက္ခံ ပါဝုဿကေ မေဃေ ဝဿန္တေ ဥဒကေန ဥပ္လဝိတွာ အနုပုဗ္ဗေန ဂင်္ဂါယ နဒိယာ သောတေ ပတိတံ တေန သောတေန ဝုယှမာနံ. ဘိက္ခူ အာမန္တေသီတိ ‘‘ဣမိနာ ဒါရုက္ခန္ဓေန သဒိသံ ကတွာ မမ သာသနေ သဒ္ဓါပဗ္ဗဇိတံ ကုလပုတ္တံ ဒဿေဿာမီ’’တိ ဓမ္မံ ဒေသေတုကာမတာယ အာမန္တေသိ. အမုံ မဟန္တံ ဒါရုက္ခန္ဓံ ဂင်္ဂါယ နဒိယာ သောတေန ဝုယှမာနန္တိ ဣဒံ ပန အဋ္ဌဒေါသဝိမုတ္တတ္တာ သောတပဋိပန္နဿ ဒါရုက္ခန္ဓဿ အပရေ သမုဒ္ဒပတ္တိယာ အန္တရာယကရေ အဋ္ဌ ဒေါသေ ဒဿေတုံ အာရဘိ. २४१. चौथ्या सुत्तात 'अद्दस' (पाहिले) म्हणजे गंगा नदीच्या काठावर मांडलेल्या श्रेष्ठ बुद्ध-आसनावर बसलेले असताना पाहिले. 'वुय्हमानं' (वाहत जाणारे) म्हणजे चौकोनी कापून, तासून डोंगराच्या दरीत ठेवलेले, वारा आणि उन्हाने चांगले वाळलेले, पावसाळ्याच्या सुरुवातीला मोठा पाऊस पडल्यावर पाण्याच्या प्रवाहाने तरंगत वाहत येऊन हळूहळू गंगा नदीच्या प्रवाहात पडलेले आणि त्या प्रवाहाने वाहून नेले जाणारे (लाकूड). 'भिक्खू आमन्तेसि' (भिक्खूंना संबोधित केले) म्हणजे "या लाकडाच्या ओंडक्याशी तुलना करून माझ्या शासनात श्रद्धेने प्रवज्जित झालेल्या कुलपुत्राला उपदेश करीन" या हेतूने, धम्म उपदेश करण्याच्या इच्छेने संबोधित केले. "गंगा नदीच्या प्रवाहात वाहून जाणारा तो मोठा लाकडाचा ओंडका" हे सांगून, आठ दोषांपासून मुक्त असलेल्या आणि प्रवाहामध्ये पडलेल्या लाकडाच्या ओंडक्याला समुद्रापर्यंत पोहोचण्यात अडथळा आणणारे इतर आठ दोष दाखवण्यासाठी (भगवंतांनी) सुरुवात केली. တတြဿ ဧဝံ အဋ္ဌဒေါသဝိမုတ္တတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ – ဧကော ဟိ ဂင်္ဂါယ နဒိယာ အဝိဒူရေ ပဗ္ဗတတလေ ဇာတော နာနာဝလ္လီဟိ ပလိဝေဌိတော ပဏ္ဍုပလာသတံ အာပဇ္ဇိတွာ ဥပစိကာဒီဟိ ခဇ္ဇမာနော တသ္မိံယေဝ ဌာနေ အပဏ္ဏတ္တိကဘာဝံ ဂစ္ဆတိ, အယံ ဒါရုက္ခန္ဓော ဂင်္ဂံ ဩတရိတွာ ဝင်္ကဋ္ဌာနေသု ဝိလာသမာနော သာဂရံ ပတွာ မဏိဝဏ္ဏေ ဦမိပိဋ္ဌေ သောဘိတုံ န လဘတိ. त्या आठ दोषांपासून मुक्त असणे या प्रकारे समजून घ्यावे - एखादा लाकडाचा ओंडका गंगा नदीच्या जवळच डोंगराच्या माथ्यावर उगवलेला असतो, विविध वेलींनी वेढलेला असतो, पिवळी पाने पडून जीर्ण झालेला असतो आणि वाळवी इत्यादींनी खाल्लेला असतो. तो त्याच ठिकाणी नष्ट होऊन जातो (लाकूड म्हणून त्याचे अस्तित्व उरत नाही). हा लाकडाचा ओंडका गंगेत उतरून, तिच्या वळणावळणाच्या ठिकाणी विहार करत महासागरापर्यंत पोहोचून, मण्यासारख्या रंगाच्या लाटांवर शोभून दिसण्याचे भाग्य मिळवू शकत नाही. အပရော ဂင်္ဂါတီရေ ဗဟိမူလော အန္တောသာခေါ ဟုတွာ ဇာတော, အယံ ကိဉ္စာပိ ကာလေန ကာလံ ဩလမ္ဗိနီဟိ သာခါဟိ ဥဒကံ ဖုသတိ, ဗဟိမူလတ္တာ ပန ဂင်္ဂံ ဩတရိတွာ ဝင်္ကဋ္ဌာနေသု ဝိလာသမာနော သာဂရံ ပတွာ မဏိဝဏ္ဏေ ဦမိပိဋ္ဌေ သောဘိတုံ န လဘတိ. दुसरा एखादा लाकडाचा ओंडका (झाड) गंगा नदीच्या काठावर उगवलेला असतो, ज्याची मुळे बाहेर (जमिनीवर) असतात आणि फांद्या नदीच्या आत झुकलेल्या असतात. हा जरी वेळोवेळी आपल्या लोंबकळणाऱ्या फांद्यांनी पाण्याला स्पर्श करत असला, तरी त्याची मुळे बाहेर असल्यामुळे तो गंगेत उतरून, तिच्या वळणावळणाच्या ठिकाणी विहार करत महासागरापर्यंत पोहोचून, मण्यासारख्या रंगाच्या लाटांवर शोभून दिसण्याचे भाग्य मिळवू शकत नाही. အပရော မဇ္ဈေ ဂင်္ဂါယ ဇာတော, ဒဠှမူလေန ပန သုပ္ပတိဋ္ဌိတော, ဗဟိ စဿ ဂတာ ဝင်္ကသာခါ နာနာဝလ္လီဟိ အာဗဒ္ဓါ, အယမ္ပိ ဒဠှမူလတ္တာ ဗဟိဒ္ဓါ ဝလ္လီဟိ အာဗဒ္ဓတ္တာ စ ဂင်္ဂံ ဩတရိတွာ…ပေ… သောဘိတုံ န လဘတိ. तिसरा एखादा लाकडाचा ओंडका गंगेच्या मध्यभागी उगवलेला असतो आणि मजबूत मुळांमुळे चांगला स्थिर असतो. त्याच्या बाहेर गेलेल्या वाकड्या फांद्या विविध वेलींनी घट्ट बांधलेल्या असतात. हा देखील मजबूत मुळांमुळे आणि बाहेरून वेलींनी बांधलेला असल्यामुळे गंगेत उतरून... (पूर्ववत)... शोभून दिसण्याचे भाग्य मिळवू शकत नाही. အပရော [Pg.75] ပတိတဋ္ဌာနေယေဝ ဝါလိကာယ ဩတ္ထဋော ပူတိဘာဝံ အာပဇ္ဇတိ, အယမ္ပိ ဂင်္ဂံ ဩတရိတွာ…ပေ… န လဘတိ. चौथा एखादा लाकडाचा ओंडका पडलेल्या ठिकाणीच वाळूने झाकला जातो आणि सडून नष्ट होतो. हा देखील गंगेत उतरून... (पूर्ववत)... भाग्य मिळवू शकत नाही. အပရော ဒွိန္နံ ပါသာဏာနံ အန္တရေ ဇာတတ္တာ, သုနိခါတော ဝိယ နိစ္စလော ဌိတော, အာဂတာဂတံ ဥဒကံ ဒွိဓာ ဖာလေတိ, အယံ ပါသာဏန္တရေ သုဋ္ဌု ပတိဋ္ဌိတတ္တာ ဂင်္ဂံ ဩတရိတွာ…ပေ… န လဘတိ. पाचवा एखादा लाकडाचा ओंडका दोन मोठ्या खडकांच्या मध्ये अडकल्यामुळे, जणू जमिनीत घट्ट रोवल्यासारखा निश्चल उभा राहतो आणि येणाऱ्या पाण्याला दोन भागांत विभागून टाकतो. हा खडकांच्या मध्ये घट्ट अडकल्यामुळे गंगेत उतरून... (पूर्ववत)... भाग्य मिळवू शकत नाही. အပရော အဗ္ဘောကာသဋ္ဌာနေ နဘံ ပူရေတွာ ဝလ္လီဟိ အာဗဒ္ဓေါ ဌိတော. ဧကံ ဒွေ သံဝစ္ဆရေ အတိက္ကမိတွာ အာဂတေ မဟောဃေ သကိံ ဝါ ဒွိက္ခတ္တုံ ဝါ တေမေတိ, အယမ္ပိ နဘံ ပူရေတွာ ဌိတတာယ စေဝ ဧကဿ ဝါ ဒွိန္နံ ဝါ သံဝစ္ဆရာနံ အစ္စယေန သကိံ ဝါ ဒွိက္ခတ္တုံ ဝါ တေမနတာယ စ ဂင်္ဂံ ဩတရိတွာ…ပေ… န လဘတိ. सहावा एखादा लाकडाचा ओंडका मोकळ्या जागेत आकाशाकडे तोंड करून वेलींनी घट्ट बांधलेला उभा असतो. एक-दोन वर्षे उलटून गेल्यावर जेव्हा मोठा पूर आता येतो, तेव्हा तो एकदा किंवा दोनदा ओला होतो. हा देखील आकाशाकडे तोंड करून उभा असल्यामुळे आणि एक किंवा दोन वर्षांनंतर केवळ एकदा किंवा दोनदा ओला होत असल्यामुळे गंगेत उतरून... (पूर्ववत)... भाग्य मिळवू शकत नाही. အပရောပိ မဇ္ဈေ ဂင်္ဂါယ ဒီပကေ ဇာတော မုဒုက္ခန္ဓသာခေါ ဩဃေ အာဂတေ အနုသောတံ နိပဇ္ဇိတွာ, ဥဒကေ ဂတေ သီသံ ဥက္ခိပိတွာ, နစ္စန္တော ဝိယ တိဋ္ဌတိ. ယဿတ္ထာယ သာဂရော ဂင်္ဂံ ဧဝံ ဝိယ ဝဒတိ, ‘‘ဘောတိ ဂင်္ဂေ တွံ မယှံ စန္ဒနသာရသလဠသာရာဒီနိ နာနာဒါရူနိ အာဟရသိ, ဒါရုက္ခန္ဓံ ပန နာဟရသီ’’တိ. သုလဘော ဧသ, ဒေဝ, ပုနဝါရေ ဇာနိဿာမီတိ. ပုနဝါရေ တမ္ဗဝဏ္ဏေန ဥဒကေန အာလိင်္ဂမာနာ ဝိယ အာဂစ္ဆတိ. သောပိ တထေဝ အနုသောတံ နိပဇ္ဇိတွာ, ဥဒကေ ဂတေ သီသံ ဥက္ခိပိတွာ, နစ္စန္တော ဝိယ တိဋ္ဌတိ. အယံ အတ္တနော မုဒုတာယ ဂင်္ဂံ ဩတရိတွာ…ပေ… န လဘတိ. सातवा एखादा लाकडाचा ओंडका गंगेच्या मध्यभागी असलेल्या एका लहान बेटावर उगवलेला असतो, ज्याचे खोड आणि फांद्या अत्यंत मऊ व लवचिक असतात. पाण्याचा प्रवाह आल्यावर तो प्रवाहाच्या देशाने झुकतो आणि पाणी निघून गेल्यावर आपले डोके वर काढून जणू नाचत असल्यासारखा उभा राहतो. ज्याच्यासाठी महासागर गंगेला असे म्हणतो, "हे गंगे! तू माझ्यासाठी चंदनाचे सार, देवदाराचे सार इत्यादी विविध प्रकारची मौल्यवान लाकडे वाहून आणतेस, पण हा मऊ लाकडाचा ओंडका का आणत नाहीस?" तेव्हा गंगा उत्तर देते, "हे देवा (समुद्रा)! हा मिळवणे सोपे आहे, पुढच्या वेळी मी पाहीन." पुढच्या वेळी जेव्हा तांबूस रंगाचे पाणी येते, तेव्हा ती जणू त्याला मिठी मारून खेचून आणते. तो देखील पूर्वीप्रमाणेच प्रवाहाच्या दिशेने झुकतो आणि पाणी निघून गेल्यावर आपले डोके वर काढून जणू नाचत असल्यासारखा उभा राहतो. हा आपल्या मऊ आणि लवचिक स्वभावामुळे गंगेत उतरून... (पूर्ववत)... भाग्य मिळवू शकत नाही. အပရော ဂင်္ဂါယ နဒိယာ တိရိယံ ပတိတော ဝါလိကာယ ဩတ္ထရိတော အန္တရသေတု ဝိယ ဗဟူနံ ပစ္စယော ဇာတော, ဥဘောသု တီရေသု ဝေဠုနဠကရဉ္ဇကကုဓာဒယော ဥပ္လဝိတွာ တတ္ထေဝ လဂ္ဂန္တိ. တထာ နာနာဝိဓာ ဂစ္ဆာ ဝုယှမာနာ ဘိန္နမုသလဘိန္နသုပ္ပအဟိကုက္ကုရဟတ္ထိအဿာဒိကုဏပါနိပိ တတ္ထေဝ လဂ္ဂန္တိ. မဟာဂင်္ဂါပိ နံ အာသဇ္ဇ ဘိဇ္ဇိတွာ ဒွိဓာ ဂစ္ဆတိ, မစ္ဆကစ္ဆပကုမ္ဘီလမကရာဒယောပိ တတ္ထေဝ ဝါသံ ကပ္ပေန္တိ. အယမ္ပိ တိရိယံ ပတိတွာ မဟာဇနဿ ပစ္စယတ္တကတဘာဝေန ဂင်္ဂံ ဩတရိတွာ ဝင်္ကဋ္ဌာနေသု ဝိလာသမာနော သာဂရံ ပတွာ မဏိဝဏ္ဏေ ဦမိပိဋ္ဌေ သောဘိတုံ န လဘတိ. आठवा एखादा लाकडाचा ओंडका गंगा नदीत आडवा पडलेला असतो आणि वाळूने झाकलेला असतो. तो बेटांच्या दरम्यान पुलासारखा बनून अनेकांसाठी उपकारक ठरतो. दोन्ही काठांवरील बांबू, लव्हाळे, करंज, ककुध इत्यादी झाडे तरंगत येऊन तिथेच अडकतात. तसेच विविध प्रकारचे वाहून येणारे कचरे, तुटलेले मुसळ, तुटलेले सूप, साप, कुत्रे, हत्ती, घोडे इत्यादींचे मृतदेह देखील तिथेच अडकतात. मोठी गंगा नदी देखील त्याला धडकून दोन भागांत विभागून वाहू लागते. मासे, कासव, सुसर, मगरी इत्यादी प्राणी देखील तिथेच आश्रय घेतात. हा देखील आडवा पडल्यामुळे आणि लोकांच्या उपयोगासाठी पुलासारखा बनल्यामुळे गंगेत उतरून, तिच्या वळणावळणाच्या ठिकाणी विहार करत महासागरापर्यंत पोहोचून, मण्यासारख्या रंगाच्या लाटांवर शोभून दिसण्याचे भाग्य मिळवू शकत नाही. ဣတိ ဘဂဝါ ဣမေဟိ အဋ္ဌဟိ ဒေါသေဟိ ဝိမုတ္တတ္တာ သောတပဋိပန္နဿ ဒါရုက္ခန္ဓဿ အပရေ သမုဒ္ဒပတ္တိယာ အန္တရာယကရေ အဋ္ဌ ဒေါသေ ဒဿေတုံ အမုံ [Pg.76] မဟန္တံ ဒါရုက္ခန္ဓံ ဂင်္ဂါယ နဒိယာ သောတေန ဝုယှမာနန္တိအာဒိမာဟ. တတ္ထ န ထလေ ဥဿီဒိဿတီတိ ထလံ နာဘိရုဟိဿတိ. န မနုဿဂ္ဂါဟော ဂဟေဿတီတိ ‘‘မဟာ ဝတာယံ ဒါရုက္ခန္ဓော’’တိ ဒိသွာ, ဥဠုမ္ပေန တရမာနာ ဂန္တွာ, ဂေါပါနသီအာဒီနံ အတ္ထာယ မနုဿာ န ဂဏှိဿန္တိ. န အမနုဿဂ္ဂါဟော ဂဟေဿတီတိ ‘‘မဟဂ္ဃော အယံ စန္ဒနသာရော, ဝိမာနဒွါရေ နံ ဌပေဿာမာ’’တိ မညမာနာ န အမနုဿာ ဂဏှိဿန္တိ. अशा प्रकारे, या आठ दोषांपासून मुक्त असलेल्या आणि प्रवाहामध्ये वाहून जाणाऱ्या लाकडी ओंडक्याला समुद्रात पोहोचण्यापासून रोखणारे इतर आठ दोष दाखवण्यासाठी भगवंतांनी 'तो मोठा लाकडी ओंडका गंगा नदीच्या प्रवाहात वाहून जात आहे' इत्यादी वचन सांगितले. त्यात, 'तो जमिनीवर अडकणार नाही' (न थले उस्सीदिस्सति) म्हणजे तो जमिनीवर चढणार नाही. 'माणसे त्याला पकडणार नाहीत' (न मनुस्सग्गाहो गहेस्सति) म्हणजे 'हा लाकडी ओंडका खरोखरच मोठा आहे' असे पाहून, तराफ्याने प्रवास करणारे लोक तिथे जाऊन घराच्या वाशांसाठी किंवा इतर उपयोगासाठी तो घेणार नाहीत. 'अमानुष त्याला पकडणार नाहीत' (न अमनुस्सग्गाहो गहेस्सति) म्हणजे 'हा चंदनाचा गाभा अत्यंत मौल्यवान आहे, आम्ही तो आमच्या विमानाच्या (भवनाच्या) दारावर ठेवू' असा विचार करून अमानुष (यक्ष किंवा देव) त्याला घेणार नाहीत। ဧဝမေဝ ခေါတိ ဧတ္ထ သဒ္ဓိံ ဗာဟိရေဟိ အဋ္ဌဟိ ဒေါသေဟိ ဧဝံ ဩပမ္မသံသန္ဒနံ ဝေဒိတဗ္ဗံ – ဂင်္ဂါယ အဝိဒူရေ ပဗ္ဗတတလေ ဇာတော တတ္ထေဝ ဥပစိကာဒီဟိ ခဇ္ဇမာနော အပဏ္ဏတ္တိကဘာဝံ ဂတဒါရုက္ခန္ဓော ဝိယ ဟိ ‘‘နတ္ထိ ဒိန္န’’န္တိအာဒိကာယ မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိယာ သမန္နာဂတော ပုဂ္ဂလော ဝေဒိတဗ္ဗော. အယဉှိ သာသနဿ ဒူရီဘူတတ္တာ အရိယမဂ္ဂံ ဩရုယှ သမာဓိကုလ္လေ နိသိန္နော နိဗ္ဗာနသာဂရံ ပါပုဏိတုံ န သက္ကောတိ. त्याचप्रमाणे, येथे बाह्य आठ दोषांसह उपमेची तुलना अशा प्रकारे समजून घेतली पाहिजे – गंगा नदीच्या जवळच असलेल्या डोंगराळ जमिनीवर वाढलेला आणि तिथेच वाळवी इत्यादींनी खाल्ला गेल्यामुळे अस्तित्वहीन (कुजलेल्या) अवस्थेला पोहोचलेल्या लाकडी ओंडक्याप्रमाणे, 'दिलेल्या दानाचे काही फळ मिळत नाही' इत्यादी मिथ्या दृष्टीने युक्त असलेला मनुष्य समजला पाहिजे. कारण हा मनुष्य बुद्ध शासनापासून दूर असल्यामुळे आर्यमार्गावर आरूढ होऊन, समाधीच्या तराफ्यावर बसून निर्वाणरूपी समुद्रात पोहोचू शकत नाही। ဂင်္ဂါတီရေ ဗဟိမူလော အန္တောသာခေါ ဟုတွာ ဇာတော ဝိယ အစ္ဆိန္နဂိဟိဗန္ဓနော သမဏကုဋိမ္ဗိကပုဂ္ဂလော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. အယဉှိ ‘‘စိတ္တံ နာမေတံ အနိဗဒ္ဓံ, ‘သမဏောမှီ’တိ ဝဒန္တောဝ ဂိဟီ ဟောတိ, ‘ဂိဟီမှီ’တိ ဝဒန္တောဝ သမဏော ဟောတိ. ကော ဇာနိဿတိ, ကိံ ဘဝိဿတီ’’တိ? မဟလ္လကကာလေ ပဗ္ဗဇန္တောပိ ဂိဟိဗန္ဓနံ န ဝိဿဇ္ဇေတိ. မဟလ္လကပဗ္ဗဇိတာနဉ္စ သမ္ပတ္တိ နာမ နတ္ထိ. တဿ သစေ စီဝရံ ပါပုဏာတိ, အန္တစ္ဆိန္နကံ ဝါ ဇိဏ္ဏဒုဗ္ဗဏ္ဏံ ဝါ ပါပုဏာတိ. သေနာသနမ္ပိ ဝိဟာရပစ္စန္တေ ပဏ္ဏသာလာ ဝါ မဏ္ဍပေါ ဝါ ပါပုဏာတိ. ပိဏ္ဍာယ စရန္တေနာပိ ပုတ္တနတ္တကာနံ ဒါရကာနံ ပစ္ဆတော စရိတဗ္ဗံ ဟောတိ, ပရိယန္တေ နိသီဒိတဗ္ဗံ ဟောတိ. တေန သော ဒုက္ခီ ဒုမ္မနော အဿူနိ မုဉ္စန္တော, ‘‘အတ္ထိ မေ ကုလသန္တကံ ဓနံ, ကပ္ပတိ နု ခေါ တံ ခါဒန္တေန ဇီဝိတု’’န္တိ စိန္တေတွာ ဧကံ ဝိနယဓရံ ပုစ္ဆတိ – ‘‘ကိံ, ဘန္တေ အာစရိယ, အတ္တနော သန္တကံ ဝိစာရေတွာ ခါဒိတုံ ကပ္ပတိ, နော ကပ္ပတီ’’တိ? ‘‘နတ္ထေတ္ထ ဒေါသော, ကပ္ပတေတ’’န္တိ. သော အတ္တနော ဘဇမာနကေ ကတိပယေ ဒုဗ္ဗစေ ဒုရာစာရေ ဘိက္ခူ ဂဟေတွာ, သာယနှသမယေ အန္တောဂါမံ ဂန္တွာ, ဂါမမဇ္ဈေ ဌိတော ဂါမိကေ ပက္ကောသာပေတွာ, ‘‘အမှာကံ ပယောဂတော ဥဋ္ဌိတံ အာယံ ကဿ ဒေထာ’’တိ အာဟ. ဘန္တေ, တုမှေ ပဗ္ဗဇိတာ, မယံ ကဿ ဒဿာမာတိ? ကိံ ပဗ္ဗဇိတာနံ အတ္တနော သန္တကံ န ဝဋ္ဋတီတိ? ကုဒ္ဒါလ-ပိဋကံ ဂဟေတွာ, ခေတ္တမရိယာဒဗန္ဓနာဒီနိ ကရောန္တော နာနာပ္ပကာရံ ပုဗ္ဗဏ္ဏာပရဏ္ဏဉ္စေဝ [Pg.77] ဖလာဖလေ စ သင်္ဂဏှိတွာ, ဟေမန္တဂိမှဝဿာနေသု ယံ ယံ ဣစ္ဆတိ, တံ တံ ပစာပေတွာ ခါဒန္တော သမဏကုဋုမ္ဗိကော ဟုတွာ ဇီဝတိ. ကေဝလမဿ ပဉ္စစူဠကေန ဒါရကေန သဒ္ဓိံ ပါဒပရိစာရိကာဝ ဧကာ နတ္ထိ. အယံ ပုဂ္ဂလော ကိဉ္စာပိ ဩလမ္ဗိနီဟိ သာခါဟိ ဥဒကံ ဖုသမာနော အန္တောသာခေါ ရုက္ခော ဝိယ စေတိယင်္ဂဏဗောဓိယင်္ဂဏာဒီသု ဘိက္ခူနံ ကာယသာမဂ္ဂိံ ဒေတိ, ဂိဟိဗန္ဓနဿ ပန အစ္ဆိန္နတာယ ဗဟိမူလတ္တာ အရိယမဂ္ဂံ ဩတရိတွာ သမာဓိကုလ္လေ နိသိန္နော နိဗ္ဗာနသာဂရံ ပါပုဏိတုံ န သက္ကောတိ. गंगा नदीच्या काठावर वाढलेल्या अशा झाडाप्रमाणे ज्याची मुळे बाहेर पसरलेली आहेत आणि फांद्या नदीच्या आत झुकलेल्या आहेत, गृहस्थाश्रमाचे बंधन न तोडलेला 'श्रमण-कुटुंबिक' (भिक्षू असूनही गृहस्थासारखा राहणारा) मनुष्य समजला पाहिजे. कारण हा मनुष्य विचार करतो: 'हे मन खरोखरच चंचल आहे. 'मी श्रमण आहे' असे म्हणता म्हणताच तो गृहस्थ बनतो, आणि 'मी गृहस्थ आहे' असे म्हणता म्हणताच तो श्रमण बनतो. कोण जाणे पुढे काय होईल?' वृद्धपणी प्रवज्जा घेतली तरी तो गृहस्थाश्रमाचे बंधन सोडत नाही. आणि वृद्धपणी प्रवज्जित झालेल्यांना कोणतीही समृद्धी मिळत नाही. त्याला जर चीवर मिळालेच, तर ते कडा फाटलेले, जुने किंवा विवर्ण मिळते. शयन-आसन मिळालेच, तर विहाराच्या कोपऱ्यात पानांची झोपडी किंवा मांडव मिळतो. पिंडपातासाठी फिरतानाही त्याला आपल्या मुला-नातवांच्या वयाच्या तरुण भिक्षूंच्या मागे चालावे लागते आणि सर्वात शेवटी बसावे लागते. त्यामुळे तो दुःखी व खिन्न होऊन, डोळ्यातून अश्रू ढाळत विचार करतो: 'माझ्याकडे माझ्या कुटुंबाची संपत्ती आहे. तिचा उपभोग घेत जगणे मला योग्य ठरेल का?' असा विचार करून तो एका विनयधराला विचारतो - 'भंते आचार्य, स्वतःच्या संपत्तीची व्यवस्था लावून तिचा उपभोग घेणे योग्य आहे की अयोग्य?' 'यात काही दोष नाही, हे योग्य आहे' असे विनयधराने सांगितल्यावर, तो स्वतःचे अनुसरण करणाऱ्या काही हट्टी आणि दुराचारी भिक्षूंना सोबत घेऊन संध्याकाळच्या वेळी गावात जातो, गावाच्या मध्यभागी उभा राहून गावकऱ्यांना बोलावतो आणि विचारतो: 'आमच्या शेती इत्यादी उद्योगातून मिळणारे उत्पन्न तुम्ही कोणाला देता?' 'भंते, तुम्ही तर प्रवज्जित झाला आहात, आम्ही ते कोणाला देणार?' 'प्रवज्जितांना स्वतःची संपत्ती बाळगणे योग्य नाही का?' असे म्हणून, तो कुदळ आणि टोपली घेऊन, शेताचे बांध घालणे इत्यादी कामे करतो, विविध प्रकारची धान्ये आणि फळे गोळा करतो, आणि हिवाळा, उन्हाळा व पावसाळ्यात जे जे हवे ते ते शिजवून खात 'श्रमण-कुटुंबिक' बनून जगतो. त्याच्याकडे फक्त पाच शेंड्या असलेल्या मुलासह सेवा करणारी एक पत्नीच काय ती नसते. हा मनुष्य जरी खाली झुकलेल्या फांद्यांनी पाण्याला स्पर्श करणाऱ्या आणि आत झुकलेल्या फांद्या असलेल्या झाडाप्रमाणे चैत्य-अंगण, बोधी-अंगण इत्यादी ठिकाणी भिक्षूंसोबत शारीरिक एकता दर्शवत असला, तरी गृहस्थाश्रमाचे बंधन न तुटल्यामुळे आणि त्याची मुळे बाहेर असल्यामुळे, तो आर्यमार्गावर आरूढ होऊन, समाधीच्या तराफ्यावर बसून निर्वाणरूपी समुद्रात पोहोचू शकत नाही। ဂင်္ဂါယ မဇ္ဈေ ဇာတော ဗဟိဒ္ဓါ ဝလ္လီဟိ အာဗဒ္ဓဝင်္ကသာခါ ဝိယ သံဃသန္တကံ နိဿာယ ဇီဝမာနော ဘိန္နာဇီဝပုဂ္ဂလော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ဧကစ္စော ဂိဟိဗန္ဓနံ ပဟာယ ပဗ္ဗဇန္တောပိ သာရုပ္ပဋ္ဌာနေ ပဗ္ဗဇ္ဇံ န လဘတိ. ပဗ္ဗဇ္ဇာ ဟိ နာမေသာ ပဋိသန္ဓိဂ္ဂဟဏသဒိသာ. ယထာ မနုဿာ ယတ္ထ ပဋိသန္ဓိံ ဂဏှန္တိ, တေသံယေဝ ကုလာနံ အာစာရံ သိက္ခန္တိ, ဧဝံ ဘိက္ခူပိ ယေသံ သန္တိကေ ပဗ္ဗဇန္တိ, တေသံယေဝ အာစာရံ ဂဏှန္တိ. တသ္မာ ဧကစ္စော အသာရုပ္ပဋ္ဌာနေ ပဗ္ဗဇိတွာ ဩဝါဒါနုသာသနီဥဒ္ဒေသပရိပုစ္ဆာဒီဟိ ပရိဗာဟိရော ဟုတွာ ပါတောဝ မုဏ္ဍဃဋံ ဂဟေတွာ ဥဒကတိတ္ထံ ဂစ္ဆတိ, အာစရိယုပဇ္ဈာယာနံ ဘတ္တတ္ထာယ ခန္ဓေ ပတ္တံ ကတွာ ဘတ္တသာလံ ဂစ္ဆတိ, ဒုဗ္ဗစသာမဏေရေဟိ သဒ္ဓိံ နာနာကီဠံ ကီဠတိ, အာရာမိကဒါရကေဟိ သံသဋ္ဌော ဝိဟရတိ. गंगा नदीच्या मध्यभागी वाढलेल्या आणि बाहेरून वेलींनी घट्ट बांधलेल्या वाकड्या फांद्या असलेल्या झाडाप्रमाणे, संघाच्या संपत्तीवर उपजीविका करणारा, भ्रष्ट आजीविका असलेला मनुष्य समजला पाहिजे. काही लोक गृहस्थाश्रमाचे बंधन सोडून प्रवज्जा घेत असले, तरी त्यांना योग्य ठिकाणी प्रवज्जा मिळत नाही. कारण प्रवज्जा ही पुनर्जन्म (प्रतिसंधी) घेण्यासारखीच असते. जसे लोक ज्या कुळात जन्म घेतात, त्याच कुळाचे आचार-विचार शिकतात, तसेच भिक्षू देखील ज्यांच्याकडे प्रवज्जा घेतात, त्याच आचार्यांचे आचरण शिकतात. म्हणूनच, एखादा भिक्षू अयोग्य ठिकाणी प्रवज्जित झाल्यामुळे ओवाद (उपदेश), अनुशासनी (शिकवण), उद्देस (पाठ) आणि परिपुच्छा (प्रश्न विचारणे) इत्यादींपासून वंचित राहतो. तो सकाळीच तुटलेल्या काठाचा मातीचा घडा घेऊन पाणवठ्यावर जातो, आचार्य आणि उपाध्यायांच्या भोजनासाठी खांद्यावर भिक्षापात्र अडकवून भोजनशाळेत जातो, हट्टी आणि उद्धट श्रामणेरांसोबत विविध खेळ खेळतो आणि आरामातील मुलांशी संधान साधून राहतो। သော ဒဟရဘိက္ခုကာလေ အတ္တနော အနုရူပေဟိ ဒဟရဘိက္ခူဟိ စေဝ အာရာမိကေဟိ စ သဒ္ဓိံ သံဃဘောဂံ ဂန္တွာ, ‘‘အယံ ခီဏာသဝေဟိ အသုကရညော သန္တိကာ ပဋိဂ္ဂဟိတသံဃဘောဂေါ, တုမှေ သံဃဿ ဣဒဉ္စိဒဉ္စ န ဒေထ, န ဟိ တုမှာကံ ပဝတ္တိံ သုတွာ ရာဇာ ဝါ ရာဇမဟာမတ္တာ ဝါ အတ္တမနာ ဘဝိဿန္တိ, ဧထ ဒါနိ ဣဒဉ္စိဒဉ္စ ကရောထာ’’တိ ကုဒ္ဒါလ-ပိဋကာနိ ဂါဟာပေတွာ ဟေဋ္ဌာ တဠာကမာတိကာသု ကတ္တဗ္ဗကိစ္စာနိ ကာရာပေတွာ ဗဟုံ ပုဗ္ဗဏ္ဏာပရဏ္ဏံ ဝိဟာရံ ပဝေသေတွာ အာရာမိကေဟိ အတ္တနော ဥပကာရဘာဝံ သံဃဿ အာရောစာပေတိ. သံဃော ‘‘အယံ ဒဟရော ဗဟူပကာရော, ဣမဿ သတံ ဝါ ဒွိသတံ ဝါ ဒေထာ’’တိ ဒါပေတိ. ဣတိ သော ဣတော စိတော စ သံဃသန္တကေနေဝ ဝဍ္ဎန္တော ဗဟိဒ္ဓါ ဧကဝီသတိဝိဓာဟိ အနေသနာဟိ ဗဒ္ဓေါ အရိယမဂ္ဂံ ဩတရိတွာ သမာဓိကုလ္လေ နိသိန္နော နိဗ္ဗာနသာဂရံ ပါပုဏိတုံ န သက္ကောတိ. तो तरुण भिक्षू असताना स्वतःसारख्याच तरुण भिक्षूंशी आणि आरामातील सेवकांशी संगनमत करून संघाच्या मालमत्तेचा ताबा घेतो आणि म्हणतो, 'ही जमीन क्षीणासवांनी (अर्हतांनी) अमुक राजाकडून संघाच्या उपभोगासाठी स्वीकारलेली आहे. तुम्ही संघाला हे आणि ते देत नाही. तुमच्या या वागणुकीबद्दल ऐकून राजा किंवा राजामहामात्र आनंदी होणार नाहीत. चला आता, हे आणि ते काम करा.' असे सांगून तो त्यांच्या हातात कुदळ आणि टोपल्या देतो, तलावाच्या खालच्या कालव्यांमध्ये करायची कामे करून घेतो, पुष्कळ धान्य विहारात आणतो आणि आरामातील सेवकांद्वारे स्वतःच्या उपकाराची माहिती संघाला कळवतो. संघ म्हणतो, 'हा तरुण भिक्षू खूप उपकारी आहे, याला शंभर किंवा दोनशे द्या' आणि आरामातील सेवकांकडून त्याला ते देववतो. अशा प्रकारे, तो इकडून तिकडून संघाच्याच संपत्तीने स्वतःची भरभराट करतो आणि बाहेरील एकवीस प्रकारच्या अयोग्य उपजीविकेच्या मार्गांनी (अनेसना) बद्ध होऊन, आर्यमार्गावर आरूढ होऊन, समाधीच्या तराफ्यावर बसून निर्वाणरूपी समुद्रात पोहोचू शकत नाही। ပတိတဋ္ဌာနေယေဝ [Pg.78] ဝါလိကာယ ဩတ္ထရိတွာ ပူတိဘာဝံ အာပါဒိတရုက္ခော ဝိယ အာလသိယမဟဂ္ဃသော ဝေဒိတဗ္ဗော. ဧဝရူပဉှိ ပုဂ္ဂလံ အာမိသစက္ခုံ ပစ္စယလောလံ ဝိဿဋ္ဌအာစရိယုပဇ္ဈာယဝတ္တံ ဥဒ္ဒေသပရိပုစ္ဆာယောနိသောမနသိကာရဝဇ္ဇိတံ သန္ဓာယ ပဉ္စ နီဝရဏာနိ အတ္ထတော ဧဝံ ဝဒန္တိ – ‘‘ဘော, ကဿ သန္တိကံ ဂစ္ဆာမာ’’တိ? အထ ထိနမိဒ္ဓံ ဥဋ္ဌာယ ဧဝမာဟ – ‘‘ကိံ န ပဿထ? ဧသော အသုကဝိဟာရဝါသီ ကုသီတပုဂ္ဂလော အသုကံ နာမ ဂါမံ ဂန္တွာ ယာဂုမတ္ထကေ ယာဂုံ, ပူဝမတ္ထကေ ပူဝံ, ဘတ္တမတ္ထကေ ဘတ္တံ အဇ္ဈောဟရိတွာ ဝိဟာရံ အာဂမ္မ ဝိဿဋ္ဌသဗ္ဗဝတ္တော ဥဒ္ဒေသာဒိဝိရဟိတော မဉ္စံ ဥပဂစ္ဆန္တော မယှံ ဩကာသံ ကရောတီ’’တိ. ज्याप्रमाणे पडलेल्या ठिकाणीच वाळूने झाकले गेल्यामुळे कुजलेल्या झाडाप्रमाणे, त्या आळशी आणि खादाड भिक्खूला समजावे. अशा प्रकारच्या व्यक्तीला उद्देशून—जो आमिषावर डोळा ठेवणारा, प्रत्ययांवर (साधनांवर) लोलुप असणारा, आचार्य आणि उपाध्यायांप्रती असलेली कर्तव्ये सोडून दिलेला, आणि उद्देस (पाठ करणे), परिपुच्छा (चर्चा/प्रश्न विचारणे) व योनिसोमनसिकार (योग्य चिंतन) यांपासून विरहित आहे—पाच नीवरणे अर्थतः असे म्हणतात, "हे मित्रांनो! आपण कोणाकडे जावे?" तेव्हा थिनमिद्ध (आळस आणि सुस्ती) उठून असे म्हणाले, "तुम्हाला दिसत नाही का? हा अमुक विहारात राहणारा आळशी माणूस अमुक नावाच्या गावात जाऊन, पेजवर पेज, पुऱ्यावर पुऱ्या आणि भातावर भात गिळून (भरपेट खाऊन) विहारात परत येतो, आणि सर्व कर्तव्ये सोडून देऊन, अभ्यास इत्यादींपासून विरहित होऊन पलंगाकडे जात असताना माझ्यासाठीच जागा (संधी) तयार करतो." တတော ကာမစ္ဆန္ဒနီဝရဏံ ဥဋ္ဌာယာဟ – ‘‘ဘော, တဝ ဩကာသေ ကတေ မယှံ ကတောဝ ဟောတိ, ဣဒါနေဝ သော နိဒ္ဒါယိတွာ ကိလေသာနုရဉ္ဇိတောဝ ပဗုဇ္ဈိတွာ ကာမဝိတက္ကံ ဝိတက္ကေဿတီ’’တိ. တတော ဗျာပါဒနီဝရဏံ ဥဋ္ဌာယာဟ – ‘‘တုမှာကံ ဩကာသေ ကတေ မယှံ ကတောဝ ဟောတိ. ဣဒါနေဝ နိဒ္ဒါယိတွာ ဝုဋ္ဌိတော ‘ဝတ္တပဋိဝတ္တံ ကရောဟီ’တိ ဝုစ္စမာနော, ‘ဘော, ဣမေ အတ္တနော ကမ္မံ အကတွာ အမှေသု ဗျာဝဋာ’တိ နာနပ္ပကာရံ ဖရုသဝစနံ ဝဒန္တော အက္ခီနိ နီဟရိတွာ ဝိစရိဿတီ’’တိ. တတော ဥဒ္ဓစ္စနီဝရဏံ ဥဋ္ဌာယာဟ – ‘‘တုမှာကံ ဩကာသေ ကတေ မယှံ ကတောဝ ဟောတိ, ကုသီတော နာမ ဝါတာဟတော အဂ္ဂိက္ခန္ဓော ဝိယ ဥဒ္ဓတော ဟောတီ’’တိ. အထ ကုကုစ္စနီဝရဏံ ဥဋ္ဌာယာဟ – ‘‘တုမှာကံ ဩကာသေ ကတေ မယှံ ကတောဝ ဟောတိ, ကုသီတော နာမ ကုက္ကုစ္စပကတောဝ ဟောတိ, အကပ္ပိယေ ကပ္ပိယသညံ ကပ္ပိယေ စ အကပ္ပိယသညံ ဥပ္ပာဒေတီ’’တိ. အထ ဝိစိကိစ္ဆာနီဝရဏံ ဥဋ္ဌာယာဟ – ‘‘တုမှာကံ ဩကာသေ ကတေ မယှံ ကတောဝ ဟောတိ. ဧဝရူပေါ ဟိ အဋ္ဌသု ဌာနေသု မဟာဝိစိကိစ္ဆံ ဥပ္ပာဒေသီ’’တိ. ဧဝံ အာလသိယမဟဂ္ဃသံ ပဉ္စ နီဝရဏာနိ စဏ္ဍသုနခါဒယော ဝိယ သိင်္ဂစ္ဆိန္နံ ဇရဂ္ဂဝံ အဇ္ဈောတ္ထရိတွာ ဂဏှန္တိ. သောပိ အရိယမဂ္ဂသောတံ ဩတရိတွာ သမာဓိကုလ္လေ နိသိန္နော နိဗ္ဗာနသာဂရံ ပါပုဏိတုံ န သက္ကောတိ. त्यानंतर कामच्छंद नीवरण उठून म्हणाले, "हे मित्रा, तुला संधी दिली की मला संधी दिल्यासारखेच होते. आताच तो झोपून, क्लेशांनी रंजित होऊनच जागा होईल आणि कामवितर्कांचा (कामोत्तेजक विचारांचा) विचार करेल." त्यानंतर व्यापाद नीवरण उठून म्हणाले, "तुम्हाला संधी दिली की मला संधी दिल्यासारखेच होते. आताच झोपेतून उठल्यावर जेव्हा त्याला 'कर्तव्ये व आदर-सत्कार कर' असे सांगितले जाईल, तेव्हा 'अरे, हे लोक स्वतःचे काम न करता आमच्यातच ढवळाढवळ करत आहेत' असे म्हणून, विविध प्रकारचे कठोर शब्द बोलत, डोळे मोठे करून (रागाने) फिरेल." त्यानंतर उद्धच्च नीवरण उठून म्हणाले, "तुम्हाला संधी दिली की मला संधी दिल्यासारखेच होते. आळशी माणूस हा वाऱ्याने पेटलेल्या आगीच्या ढिगाऱ्याप्रमाणे चंचल असतो." त्यानंतर कुक्कुच्च नीवरण उठून म्हणाले, "तुम्हाला संधी दिली की मला संधी दिल्यासारखेच होते. आळशी माणूस हा कुक्कुच्च (पश्चात्ताप/शंका) ग्रस्तच असतो. तो अयोग्य गोष्टीला योग्य समजतो आणि योग्य गोष्टीला अयोग्य समजतो." त्यानंतर विचिकित्सा नीवरण उठून म्हणाले, "तुम्हाला संधी दिली की मला संधी दिल्यासारखेच होते. असा माणूस आठ स्थानांवर मोठी विचिकित्सा (शंका) निर्माण करतो." अशा प्रकारे, त्या आळशी आणि खादाड भिक्खूला पाच नीवरणे, ज्याप्रमाणे हिंस्र कुत्रे शिंगे तुटलेल्या म्हाताऱ्या बैलावर हल्ला करून त्याला पकडतात, त्याप्रमाणे ग्रासून टाकतात. तो देखील आर्यमार्गाच्या प्रवाहात उतरून, समाधीच्या नौकेवर बसूनही निर्वाणरूपी समुद्रात पोहोचू शकत नाही. ဒွိန္နံ ပါသာဏာနံ အန္တရေ နိခါတမူလာကာရေန ဌိတရုက္ခော ဝိယ ဒိဋ္ဌိံ ဥပ္ပာဒေတွာ ဌိတော ဒိဋ္ဌိဂတိကော ဝေဒိတဗ္ဗော. သော ဟိ ‘‘အရူပဘဝေ ရူပံ အတ္ထိ, အသညီဘဝေ စိတ္တံ ပဝတ္တတိ, ဗဟုစိတ္တက္ခဏိကော လောကုတ္တရမဂ္ဂေါ, အနုသယော [Pg.79] စိတ္တဝိပ္ပယုတ္တော, တေ စ သတ္တာ သန္ဓာဝန္တိ သံသရန္တီ’’တိ ဝဒန္တော အရိဋ္ဌော ဝိယ ကဏ္ဋကသာမဏေရော ဝိယ စ ဝိစရတိ. ပိသုဏဝါစော ပန ဟောတိ, ဥပဇ္ဈာယာဒယော သဒ္ဓိဝိဟာရိကာဒီဟိ ဘိန္ဒန္တော ဝိစရတိ. သောပိ အရိယမဂ္ဂသောတံ ဩတရိတွာ သမာဓိကုလ္လေ နိသိန္နော နိဗ္ဗာနသာဂရံ ပါပုဏိတုံ န သက္ကောတိ. दोन खडकांच्या मध्ये घट्ट रुतलेल्या मुळांच्या झाडाप्रमाणे, मिथ्या दृष्टी उत्पन्न करून त्यावर ठाम राहिलेला 'दिट्ठिगतिक' (मिथ्यादृष्टी असलेला) समजावे. कारण तो "अरूप भवात रूप असते, असज्ञी भवात चित्त प्रवृत्त होते, लोकोत्तर मार्ग हा अनेक चित्तक्षणांचा असतो, अनुशय हा चित्तापासून विप्रयुक्त (वेगळा) असतो, आणि ते प्राणीच संसरण करतात व एका भवातून दुसऱ्या भवात धावतात" असे म्हणत, अरिट्ठ भिक्खूप्रमाणे किंवा कण्ठक सामणेराप्रमाणे वागत फिरतो. शिवाय तो चहाडखोर असतो, आणि उपाध्याय इत्यादींना त्यांच्या सद्धि विहारिकांपासून (शिष्यांपासून) विभक्त करत (त्यांच्यात फूट पाडत) फिरतो. तो देखील आर्यमार्गाच्या प्रवाहात उतरून, समाधीच्या नौकेवर बसूनही निर्वाणरूपी समुद्रात पोहोचू शकत नाही. အဗ္ဘောကာသေ နဘံ ပူရေတွာ ဝလ္လီဟိ အာဗဒ္ဓေါ ဌိတော ဧကံ ဒွေ သံဝစ္ဆရေ အတိက္ကမိတွာ အာဂတေ မဟောဃေ သကိံ ဝါ ဒွိက္ခတ္တုံ ဝါ တေမနရုက္ခော ဝိယ မဟလ္လကကာလေ ပဗ္ဗဇိတွာ ပစ္စန္တေ ဝသမာနော ဒုလ္လဘသံဃဒဿနော စေဝ ဒုလ္လဘဓမ္မဿဝနော စ ပုဂ္ဂလော ဝေဒိတဗ္ဗော. ဧကစ္စော ဟိ ဝုဍ္ဎကာလေ ပဗ္ဗဇိတော ကတိပါဟေန ဥပသမ္ပဒံ လဘိတွာ ပဉ္စဝဿကာလေ ပါတိမောက္ခံ ပဂုဏံ ကတွာ ဒသဝဿကာလေ ဝိနယဓရတ္ထေရဿ သန္တိကေ ဝိနယကထာကာလေ မရိစံ ဝါ ဟရီတကခဏ္ဍံ ဝါ မုခေ ဌပေတွာ ဗီဇနေန မုခံ ပိဓာယ နိဒ္ဒါယန္တော နိသီဒိတွာ လေသကပ္ပေန ကတဝိနယော နာမ ဟုတွာ ပတ္တစီဝရံ အာဒါယ ပစ္စန္တံ ဂစ္ဆတိ. တတြ နံ မနုဿာ သက္ကရိတွာ ဘိက္ခုဒဿနဿ ဒုလ္လဘတာယ ‘‘ဣဓေဝ, ဘန္တေ, ဝသထာ’’တိ ဝိဟာရံ ကာရေတွာ ပုပ္ဖူပဂဖလူပဂရုက္ခေ ရောပေတွာ တတ္ထ ဝါသေန္တိ. उघड्या मैदानावर आकाशापर्यंत पसरलेल्या आणि वेलींनी घट्ट बांधलेल्या, एक-दोन वर्षे उलटून गेल्यावर आलेल्या मोठ्या पुरात एकदा किंवा दोनदाच ओल्या होणाऱ्या झाडाप्रमाणे, वृद्धपकाळात प्रव्रजित होऊन सीमावर्ती (दुर्गम) भागात राहणारा, ज्याला संघाचे दर्शन आणि धम्मश्रवण दुर्मिळ आहे, असा मनुष्य समजावे. कारण एखादा मनुष्य वृद्धपकाळात प्रव्रजित होतो, काही दिवसांतच उपसंपदा मिळवतो, पाच वर्षांचा झाल्यावर पातिमोक्खाचा अभ्यास करतो, आणि दहा वर्षांचा झाल्यावर विनयधर स्थविरांच्या सन्निध विनय कथेच्या वेळी तोंडात मिरी किंवा हिरड्याचा तुकडा ठेवून, पंख्याने तोंड झाकून, डुलक्या घेत बसून, केवळ देखाव्यापुरता विनय शिकलेला भिक्खू बनून पात्र आणि चीवर घेऊन सीमावर्ती भागात निघून जातो. तिथे लोक त्याचा आदर-सत्कार करतात, आणि भिक्खूंचे दर्शन दुर्मिळ असल्यामुळे, "भंते, आपण इथेच राहावे" असे म्हणून विहार बांधून देतात, आणि फुले व फळे देणारी झाडे लावून त्याला तिथे ठेवतात. အထ မဟာဝိဟာရသဒိသဝိဟာရာ ဗဟုဿုတာ ဘိက္ခူ, ‘‘ဇနပဒေ စီဝရရဇနာဒီနိ ကတွာ အာဂမိဿာမာ’’တိ တတ္ထ ဂစ္ဆန္တိ. သော တေ ဒိသွာ, ဟဋ္ဌတုဋ္ဌော ဝတ္တပဋိဝတ္တံ ကတွာ, ပုနဒိဝသေ အာဒါယ ဘိက္ခာစာရဂါမံ ပဝိသိတွာ, ‘‘အသုကော ထေရော သုတ္တန္တိကော, အသုကော အဘိဓမ္မိကော, အသုကော ဝိနယဓရော, အသုကော တေပိဋကော, ဧဝရူပေ ထေရေ ကဒါ လဘိဿထ, ဓမ္မသဝနံ ကာရေထာ’’တိ ဝဒတိ. ဥပါသကာ ‘‘ဓမ္မဿဝနံ ကာရေဿာမာ’’တိ ဝိဟာရမဂ္ဂံ သောဓေတွာ, သပ္ပိတေလာဒီနိ အာဒါယ, မဟာထေရံ ဥပသင်္ကမိတွာ, ‘‘ဘန္တေ, ဓမ္မဿဝနံ ကာရေဿာမ, ဓမ္မကထိကာနံ ဝိစာရေထာ’’တိ ဝတွာ ပုနဒိဝသေ အာဂန္တွာ ဓမ္မံ သုဏန္တိ. त्यानंतर महाविहारासारख्या मोठ्या विहारांमधून बहुश्रुत भिक्खू, "जनपदात (ग्रामीण भागात) चीवर रंगवणे इत्यादी कामे करून परत येऊ" असा विचार करून तिथे जातात. तो त्यांना पाहून अत्यंत आनंदी होतो, त्यांची सेवा-शुश्रूषा करतो, आणि दुसऱ्या दिवशी त्यांना सोबत घेऊन भिक्षेसाठी गावात प्रवेश करून म्हणतो, "हे स्थवीर सुत्तंतिक आहेत, हे अभिधम्मिक आहेत, हे विनयधर आहेत, हे त्रिपिटकाचे जाणकार आहेत. अशा स्थविरांचा लाभ तुम्हाला कधी मिळणार? तुम्ही धम्मश्रवण करून घ्या." उपासक "आम्ही धम्मश्रवण करू" असे म्हणून विहाराचा मार्ग स्वच्छ करतात, आणि तूप, तेल इत्यादी घेऊन महास्थविरांकडे जाऊन म्हणतात, "भंते, आम्ही धम्मश्रवण करू इच्छितो, आपण धम्मकथिकांची व्यवस्था करावी." असे सांगून ते दुसऱ्या दिवशी येऊन धम्म ऐकतात. နေဝါသိကတ္ထေရော အာဂန္တုကာနံ ပတ္တစီဝရာနိ ပဋိသာမေန္တော အန္တောဂဗ္ဘေယေဝ ဒိဝသဘာဂံ ဝီတိနာမေတိ. ဒိဝါကထိကော ဥဋ္ဌိတော သရဘာဏကော ဃဋေန ဥဒကံ ဝမေန္တော ဝိယ သရဘာဏံ ဘဏိတွာ ဥဋ္ဌိတော, တမ္ပိ [Pg.80] သော န ဇာနာတိ. ရတ္တိကထိကော သာဂရံ ခေါဘေန္တော ဝိယ ရတ္တိံ ကထေတွာ ဥဋ္ဌိတော, တမ္ပိ သော န ဇာနာတိ. ပစ္စူသကထိကော ကထေတွာ ဥဋ္ဌာသိ, တမ္ပိ သော န ဇာနာတိ. ပါတောဝ ပန ဥဋ္ဌာယ မုခံ ဓောဝိတွာ, ထေရာနံ ပတ္တစီဝရာနိ ဥပနာမေတွာ, ဘိက္ခာစာရံ ဥပဂစ္ဆန္တော မဟာထေရံ အာဟ – ‘‘ဘန္တေ, ဒိဝါကထိကော ကတရံ ဇာတကံ နာမ ကထေသိ, သရဘာဏကော ကတရံ သုတ္တံ နာမ ဘဏိ, ရတ္တိကထိကော ကတရံ ဓမ္မကထံ နာမ ကထေသိ, ပစ္စူသကထိကော ကတရံ ဇာတကံ နာမ ကထေသိ, ခန္ဓာ နာမ ကတိ, ဓာတုယော နာမ ကတိ, အာယတနာ နာမ ကတီ’’တိ. ဧဝရူပေါ ဧကံ ဒွေ သံဝစ္ဆရာနိ အတိက္ကမိတွာ ဘိက္ခုဒဿနဉ္စေဝ ဓမ္မဿဝနဉ္စ လဘန္တောပိ ဩဃေ အာဂတေ ဥဒကေန သကိံ ဝါ ဒွိက္ခတ္တုံ ဝါ တေမိတရုက္ခသဒိသော ဟောတိ. သော ဧဝံ သံဃဒဿနတော စ ဓမ္မဿဝနတော စ ပဋိက္ကမ္မ ဒူရေ ဝသန္တော အရိယမဂ္ဂံ ဩတရိတွာ သမာဓိကုလ္လေ နိသိန္နော နိဗ္ဗာနသာဂရံ ပါပုဏိတုံ န သက္ကောတိ. तो निवासी स्थवीर पाहुण्या भिक्खूंचे पात्र आणि चीवर आवरून ठेवण्यातच खोलीच्या आत संपूर्ण दिवस घालवतो. दिवसा प्रवचन देणारे स्थवीर प्रवचन देऊन उठतात; सुस्वर पाठांतर करणारे (सरभाणक) घड्याने पाणी ओतल्याप्रमाणे सुस्वर गाथा म्हणून उठतात, तेही त्याला समजत नाही. रात्री प्रवचन देणारे समुद्र घुसळल्याप्रमाणे रात्रभर प्रवचन देऊन उठतात, तेही त्याला समजत नाही. पहाटे प्रवचन देणारे प्रवचन देऊन उठतात, तेही त्याला समजत नाही. परंतु सकाळीच उठून, तोंड धुवून, स्थविरांचे पात्र व चीवर आणून देऊन, भिक्षेसाठी जात असताना तो महास्थविरांना विचारतो, "भंते, दिवसा प्रवचन देणाऱ्यांनी कोणती जातक कथा सांगितली? सुस्वर पाठ करणाऱ्यांनी कोणते सुत्त म्हटले? रात्री प्रवचन देणाऱ्यांनी कोणती धम्मकथा सांगितली? पहाटे प्रवचन देणाऱ्यांनी कोणती जातक कथा सांगितली? स्कंध किती आहेत? धातू किती आहेत? आयतने किती आहेत?" असा मनुष्य एक-दोन वर्षे उलटून गेल्यावर भिक्खूंचे दर्शन आणि धम्मश्रवण मिळत असूनही, पूर आल्यावर पाण्याने एकदा किंवा दोनदाच ओल्या होणाऱ्या झाडासारखा असतो. तो अशा प्रकारे संघदर्शनापासून आणि धम्मश्रवणापासून दूर राहून, आर्यमार्गाच्या प्रवाहात उतरून, समाधीच्या नौकेवर बसूनही निर्वाणरूपी समुद्रात पोहोचू शकत नाही. မဇ္ဈေ ဂင်္ဂါယ ဒီပကေ ဇာတော မုဒုရုက္ခော ဝိယ မဓုရဿရဘာဏကပုဂ္ဂလော ဝေဒိတဗ္ဗော. သော ဟိ အဘိညာတာနိ အဘိညာတာနိ ဝေဿန္တရာဒီနိ ဇာတကာနိ ဥဂ္ဂဏှိတွာ, ဒုလ္လဘဘိက္ခုဒဿနံ ပစ္စန္တံ ဂန္တွာ, တတ္ထ ဓမ္မကထာယ ပသာဒိတဟဒယေန ဇနေန ဥပဋ္ဌိယမာနော အတ္တာနံ ဥဒ္ဒိဿ ကတေ သမ္ပန္နပုပ္ဖဖလရုက္ခေ နန္ဒနဝနာဘိရာမေ ဝိဟာရေ ဝသတိ. အထဿ ဘာရဟာရဘိက္ခူ တံ ပဝတ္တိံ သုတွာ, ‘‘အသုကော ကိရ ဧဝံ ဥပဋ္ဌာကေသု ပဋိဗဒ္ဓစိတ္တော ဝိဟရတိ. ပဏ္ဍိတော ဘိက္ခု ပဋိဗလော ဗုဒ္ဓဝစနံ ဝါ ဥဂ္ဂဏှိတုံ, ကမ္မဋ္ဌာနံ ဝါ မနသိကာတုံ, အာနေတွာ တေန သဒ္ဓိံ အသုကတ္ထေရဿ သန္တိကေ ဓမ္မံ ဥဂ္ဂဏှိဿာမ, အသုကတ္ထေရဿ သန္တိကေ ကမ္မဋ္ဌာန’’န္တိ တတ္ထ ဂစ္ဆန္တိ. गंगेच्या मध्यभागी असलेल्या बेटावर उगवलेल्या मऊ (कोमल) वृक्षाप्रमाणे मधुर स्वरात धर्म सांगणारा (भाणक) व्यक्ती समजावा. कारण तो (भिक्खू) सुप्रसिद्ध अशा वेस्सन्तर इत्यादी जातक कथा शिकून, जेथे भिक्खूंचे दर्शन दुर्मिळ आहे अशा सीमावर्ती भागात जाऊन, तेथे धर्मोपदेशाने प्रसन्न चित्त झालेल्या लोकांद्वारे सेवा-शुश्रूषा मिळवत, स्वतःसाठी बांधलेल्या, फुले व फळांनी बहरलेल्या वृक्षांनी युक्त अशा नंदनवनासारख्या रमणीय विहारात राहतो. त्यानंतर, त्याचे दायित्व वाहणाऱ्या भिक्खूंनी ही बातमी ऐकून, "अमुक भिक्खू अशा प्रकारे आपल्या उपस्थायकांमध्ये आसक्त चित्त होऊन राहत आहे. तो बुद्धिमान भिक्खू बुद्धवचन शिकण्यास किंवा कम्मट्ठानाचे मनन करण्यास समर्थ आहे. त्याला परत आणून, त्याच्यासोबत आम्ही अमुक थेरांच्या सन्निध धम्माचे अध्ययन करू आणि अमुक थेरांच्या सन्निध कम्मट्ठानाचे ग्रहण करू," असा विचार करून ते तेथे जातात. သော တေသံ ဝတ္တံ ကတွာ သာယနှသမယံ ဝိဟာရစာရိကံ နိက္ခန္တေဟိ တေဟိ ‘‘ဣမံ, အာဝုသော, စေတိယံ တယာ ကာရိတ’’န္တိ ပုဋ္ဌော, ‘‘အာမ, ဘန္တေ’’တိ ဝဒတိ. ‘‘အယံ ဗောဓိ, အယံ မဏ္ဍပေါ, ဣဒံ ဥပေါသထာဂါရံ, ဧသာ အဂ္ဂိသာလာ, အယံ စင်္ကမော တယာ ကာရိတော. ဣမေ ရုက္ခေ ရောပါပေတွာ တယာ နန္ဒနဝနာဘိရာမော ဝိဟာရော ကာရိတော’’တိ. ‘‘အာမ, ဘန္တေ’’တိ, ဝဒတိ. ने त्यांची कर्तव्ये पूर्ण केली. संध्याकाळच्या वेळी विहारात फेरफटका मारण्यासाठी निघालेल्या त्या भिक्खूंनी, "आयुष्यमान, हे चैत्य तू बांधले आहेस का?" असे विचारले असता, तो म्हणाला, "होय, भंते." "हा बोधिवृक्ष, हा मंडप, हे उपोसथागार, ही अग्निशाला, हा चंक्रमण मार्ग तूच बनवला आहेस का? हे वृक्ष लावून तूच हा नंदनवनासारखा रमणीय विहार तयार केला आहेस का?" असे विचारले असता, तो म्हणाला, "होय, भंते." သော သာယံ ထေရုပဋ္ဌာနံ ဂန္တွာ ဝန္ဒိတွာ ပုစ္ဆတိ – ‘‘ကသ္မာ, ဘန္တေ, အာဂတတ္ထာ’’တိ? ‘‘အာဝုသော, တံ အာဒါယ ဂန္တွာ, အသုကတ္ထေရဿ သန္တိကေ [Pg.81] ဓမ္မံ ဥဂ္ဂဏှိတွာ, အသုကတ္ထေရဿ သန္တိကေ ကမ္မဋ္ဌာနံ, အသုကသ္မိံ နာမ အရညေ သမဂ္ဂါ သမဏဓမ္မံ ကရိဿာမာတိ ဣမိနာ ကာရဏေန အာဂတမှာ’’တိ. သာဓု, ဘန္တေ, တုမှေ နာမ မယှံ အတ္ထာယ အာဂတာ, အဟမ္ပိ စိရနိဝါသေန ဣဓ ဥက္ကဏ္ဌိတော ဂစ္ဆာမိ, ပတ္တစီဝရံ ဂဏှာမိ, ဘန္တေတိ. အာဝုသော, သာမဏေရဒဟရာ မဂ္ဂကိလန္တာ, အဇ္ဇ ဝသိတွာ သွေ ပစ္ဆာဘတ္တံ ဂမိဿာမာတိ. သာဓု, ဘန္တေတိ ပုနဒိဝသေ တေဟိ သဒ္ဓိံ ပိဏ္ဍာယ ပဝိသတိ. ဂါမဝါသိနော ‘‘အမှာကံ အယျော ဗဟူ အာဂန္တုကေ ဘိက္ခူ ဂဟေတွာ အာဂတော’’တိ အာသနာနိ ပညာပေတွာ ယာဂုံ ပါယေတွာ သုခနိသိန္နကထံ သုတွာ ဘတ္တံ အဒံသု. ထေရာ ‘‘တွံ, အာဝုသော, အနုမောဒနံ ကတွာ နိက္ခမ, မယံ ဥဒကဖာသုကဋ္ဌာနေ ဘတ္တကိစ္စံ ကရိဿာမာ’’တိ နိက္ခန္တာ. ने संध्याकाळी थेरांच्या सेवेसाठी जाऊन, त्यांना वंदन करून विचारले, "भंते, आपण कोणत्या कारणासाठी आला आहात?" थेर म्हणाले, "आयुष्यमान, तुला सोबत घेऊन जाऊन, अमुक थेरांच्या सन्निध धम्माचे अध्ययन करून, अमुक थेरांच्या सन्निध कम्मट्ठानाचे ग्रहण करून, अमुक नावाच्या अरण्यात एकत्र येऊन आपण श्रमणधर्माचे आचरण करू, या कारणासाठी आम्ही आलो आहोत." तो म्हणाला, "खूप छान, भंते! आपण माझ्या कल्याणासाठी आला आहात. मीसुद्धा येथे दीर्घकाळ राहिल्यामुळे कंटाळलो आहे. भंते, मी चाललो, माझे पात्र व चीवर घेतो." थेर म्हणाले, "आयुष्यमान, तरुण सामणेर प्रवासाने थकले आहेत. आज येथेच मुक्काम करून, उद्या भोजनानंतर आपण जाऊ." "ठीक आहे, भंते," असे म्हणून दुसऱ्या दिवशी तो त्यांच्यासोबत पिंडपातासाठी गावात प्रवेश करतो. ग्रामस्थ "आमचे पूज्य भिक्खू अनेक पाहुण्या भिक्खूंना सोबत घेऊन आले आहेत" असे म्हणून, आसने मांडून, पेज पाजून, सुखाने बसून केलेल्या संभाषणातील धर्मोपदेश ऐकून त्यांना भोजन दिले. थेर "आयुष्यमान, तू अनुमोदन करून निघून ये. आम्ही पाण्याच्या सुविधेच्या ठिकाणी भोजन करू," असे सांगून बाहेर पडले. ဂါမဝါသိနော အနုမောဒနံ သုတွာ ပုစ္ဆိံသု, ‘‘ကုတော, ဘန္တေ, ထေရာ အာဂတာ’’တိ? ဧတေ အမှာကံ အာစရိယုပဇ္ဈာယာ သမာနုပဇ္ဈာယာ သန္ဒိဋ္ဌာ သမ္ဘတ္တာတိ. ကသ္မာ အာဂတာတိ? မံ ဂဟေတွာ ဂန္တုကာမတာယာတိ. တုမှေ ပန ဂန္တုကာမာတိ? အာမာဝုသောတိ. ကိံ ဝဒေထ, ဘန္တေ, အမှေဟိ ကဿ ဥပေါသထာဂါရံ ကာရိတံ, ကဿ ဘောဇနသာလာ, ကဿ အဂ္ဂိသာလာဒယော ကာရိတာ, မယံ မင်္ဂလာမင်္ဂလေသု ကဿ သန္တိကံ ဂမိဿာမာတိ? မဟာဥပါသိကာယောပိ တတ္ထေဝ နိသီဒိတွာ အဿူနိ ပဝတ္တယိံသု. ဒဟရော ‘‘တုမှေသု ဧဝံ ဒုက္ခိတေသု အဟံ ဂန္တွာ ကိံ ကရိဿာမိ? ထေရေ ဥယျောဇေဿာမီ’’တိ ဝိဟာရံ ဂတော. ग्रामस्थांनी अनुमोदन ऐकल्यानंतर विचारले, "भंते, हे थेर कोठून आले आहेत?" तो म्हणाला, "हे आमचे आचार्य, उपाध्याय, समान-उपाध्याय आणि स्नेही मित्र आहेत." "ते कशासाठी आले आहेत?" "मला सोबत घेऊन जाण्याच्या इच्छेने ते आले आहेत." "पण आपली जाण्याची इच्छा आहे का?" "होय, मित्रांनो," असे त्याने सांगितले. ग्रामस्थ म्हणाले, "भंते, हे आपण काय बोलत आहात? आम्ही कोणासाठी उपोसथागार बांधले? कोणासाठी भोजनशाळा आणि अग्निशाला इत्यादी बांधले? आमच्या सुख-दुःखाच्या प्रसंगी आम्ही कोणाकडे जाणार?" महाउपासिका देखील तेथेच बसून अश्रू ढाळू लागल्या. तो तरुण भिक्खू "तुम्ही सर्वजण अशा प्रकारे दुःखी असताना मी जाऊन काय करू? मी थेरांनाच निरोप देतो," असे म्हणून विहारात गेला. ထေရာပိ ကတဘတ္တကိစ္စာ ပတ္တစီဝရာနိ ဂဟေတွာ နိသိန္နာ တံ ဒိသွာဝ, ‘‘ကိံ, အာဝုသော, စိရာယသိ, ဒိဝါ ဟောတိ, ဂစ္ဆာမာ’’တိ အာဟံသု. အာမ, ဘန္တေ, တုမှေ သုခိတာ, အသုကဂေဟဿ ဣဋ္ဌကာမူလံ ဌိတသဏ္ဌာနေနေဝ ဌိတံ, အသုကဂေဟာဒီနံ စိတ္တကမ္မမူလာဒီနိ အတ္ထိ, ဂတဿာပိ မေ စိတ္တဝိက္ခေပေါ ဘဝိဿတိ, တုမှေ ပုရတော ဂန္တွာ အသုကဝိဟာရေ စီဝရဓောဝနရဇနာဒီနိ ကရောထ, အဟံ တတ္ထ သမ္ပာပုဏိဿာမီတိ. တေ တဿ ဩသက္ကိတုကာမတံ ဉတွာ တွံ ပစ္ဆာ အာဂစ္ဆေယျာသီတိ ပက္ကမိံသု. थेर देखील भोजन आटोपून, आपले पात्र व चीवर घेऊन बसले होते. त्याला पाहताच ते म्हणाले, "आयुष्यमान, उशीर का करत आहेस? दिवस वर आला आहे, चल निघूया." तो म्हणाला, "होय भंते, आपण सुखाने जावे. अमुक घराचा विटांचा पाया जसा आहे तसाच आहे, अमुक घराचे चित्रकाम इत्यादी कामे अजून बाकी आहेत. मी गेलो तरी माझे चित्त विचलित राहील. आपण पुढे जावे आणि अमुक विहारात चीवर धुणे, रंगवणे इत्यादी कामे करावीत, मी तेथे नंतर येऊन पोहोचेन." त्याची मागे राहण्याची इच्छा जाणून ते "तू नंतर ये," असे म्हणून निघून गेले. သော ထေရေ အနုဂန္တွာ နိဝတ္တော ဝိဟာရမေဝ အာဂန္တွာ ဘောဇနသာလာဒီနိ ဩလောကေန္တော ဝိဟာရံ ရာမဏေယျကံ ဒိသွာ စိန္တေသိ – ‘‘သာဓု ဝတမှိ န ဂတော. သစေ အဂမိဿံ, ကောစိ, ဒေဝ, ဓမ္မကထိကော အာဂန္တွာ[Pg.82], သဗ္ဗေသံ မနံ ဘိန္ဒိတွာ, ဝိဟာရံ အတ္တနော နိကာယသန္တကံ ကရေယျ, အထ မယာ ပစ္ဆာ အာဂန္တွာ ဧတဿ ပစ္ဆတော လဒ္ဓပိဏ္ဍံ ဘုဉ္ဇန္တေန စရိတဗ္ဗံ ဘဝိဿတီ’’တိ. तो थेरांना निरोप देऊन परत विहारातच आला. भोजनशाळा इत्यादींकडे पाहत आणि विहाराची रमणीयता पाहून त्याने विचार केला – "मी गेलो नाही हे खरोखरच चांगले झाले. जर मी गेलो असतो, तर कोणीतरी धर्मकथक येथे आला असता, सर्वांचे मन वळवून या विहाराला स्वतःच्या संप्रदायाचा बनवून घेतला असता. आणि नंतर मला परत आल्यावर त्याच्या मागे राहून, त्याने दिलेल्या भिक्षेवर गुजराण करावी लागली असती." သော အပရေန သမယေန သုဏာတိ, ‘‘တေ ကိရ ဘိက္ခူ ဂတဋ္ဌာနေ ဧကနိကာယဒွေနိကာယဧကပိဋကဒွေပိဋကာဒိဝသေန ဗုဒ္ဓဝစနံ ဥဂ္ဂဏှိတွာ အဋ္ဌကထာစရိယာ ဇာတာ ဝိနယဓရာ ဇာတာ သတပရိဝါရာပိ သဟဿပရိဝါရာပိ စရန္တိ. ယေ ပနေတ္ထ သမဏဓမ္မံ ကာတုံ ဂတာ, တေ ဃဋေန္တာ ဝါယမန္တာ သောတာပန္နာ ဇာတာ, သကဒါဂါမိနော အနာဂါမိနော အရဟန္တော ဇာတာ, မဟာသက္ကာရေန ပရိနိဗ္ဗုတာ’’တိ. သော စိန္တေသိ – ‘‘သစေ အဟမ္ပိ အဂမိဿံ, မယှမ္ပေသာ သမ္ပတ္တိ အဘဝိဿ, ဣမံ ပန ဌာနံ မုဉ္စိတုံ အသက္ကောန္တော အတိဝိယ ပရိဟီနမှီ’’တိ. အယံ ပုဂ္ဂလော အတ္တနော မုဒုတာယ တံ ဌာနံ အမုဉ္စန္တော အရိယမဂ္ဂံ ဩတရိတွာ သမာဓိကုလ္လေ နိသိန္နော နိဗ္ဗာနသာဂရံ ပါပုဏိတုံ န သက္ကောတိ. काही काळानंतर त्याने ऐकले, "ते भिक्खू गेलेल्या ठिकाणी एक-निकाय, दोन-निकाय, एक-पिटक, दोन-पिटक इत्यादींच्या क्रमाने बुद्धवचन शिकून, अट्ठकथाचार्य झाले आहेत, विनयधर झाले आहेत आणि शेकडो किंवा हजारो अनुयायांसह वावरत आहेत. आणि जे तेथे श्रमणधर्माचे आचरण करण्यासाठी गेले होते, त्यांनी प्रयत्न व परिश्रम करून सोतापन्न, सकदागामी, अनागामी आणि अरहंत पद प्राप्त केले आहे आणि मोठ्या आदराने ते परिनिर्वाण पावले आहेत." त्याने विचार केला – "जर मीसुद्धा गेलो असतो, तर मलाही हे ऐश्वर्य प्राप्त झाले असते. परंतु या जागेचा त्याग करण्यास असमर्थ ठरल्यामुळे मी अत्यंत हानी सोसली आहे." हा मनुष्य आपल्या कोमलतेमुळे त्या जागेचा त्याग न करू शकल्याने, आर्यमार्गात प्रवेश करून, समाधीरूपी नौकेवर बसून निर्वाणरूपी सागरापर्यंत पोहोचू शकत नाही. ဂင်္ဂါယ နဒိယာ တိရိယံ ပတိတွာ, ဝါလိကာယ ဩတ္ထဋဘာဝေန အန္တရသေတု ဝိယ ဟုတွာ, ဗဟူနံ ပစ္စယော ဇာတရုက္ခော ဝိယ ရထဝိနီတမဟာအရိယဝံသစန္ဒောပမာဒိပဋိပဒါသု အညတရံ ပဋိပဒံ ဥဂ္ဂဟေတွာ ဌိတော ဩလီနဝုတ္တိကော ပုဂ္ဂလော ဝေဒိတဗ္ဗော. သော ဟိ တံ ပဋိပတ္တိနိဿိတံ ဓမ္မံ ဥဂ္ဂဟေတွာ ပကတိယာ မဉ္ဇုဿရော စိတ္တလပဗ္ဗတာဒိသဒိသံ မဟန္တံ ဌာနံ ဂန္တွာ စေတိယင်္ဂဏဝတ္တာဒီနိ ကရောတိ. အထ နံ ဓမ္မဿဝနဂ္ဂံ ပတ္တံ အာဂန္တုကာ ဒဟရာ ‘‘ဓမ္မံ ကထေဟီ’’တိ ဝဒန္တိ. သော သမ္မာ ဥဂ္ဂဟိတံ ဓမ္မံ ပဋိပဒံ ဒီပေတွာ ကထေတိ. အထဿ ပံသုကူလိကပိဏ္ဍပါတိကာဒယော သဗ္ဗေ ထေရနဝမဇ္ဈိမာ ဘိက္ခူ ‘‘အဟော သပ္ပုရိသော’’တိ အတ္တမနာ ဘဝန္တိ. गंगा नदीत आडवे पडून, वाळूने झाकले गेल्यामुळे मध्यवर्ती पुलासारखे होऊन, अनेकांसाठी उपकारक ठरलेल्या वृक्षाप्रमाणे, रथविनीत, महाआर्यवंश, चन्दोपम इत्यादी प्रतिपदांपैकी एका प्रतिपदेचे ग्रहण करून राहिलेला, परंतु संकुचित वृत्तीचा मनुष्य समजावा. कारण तो त्या प्रतिपदेवर आधारित धम्माचे अध्ययन करून, निसर्गतःच मधुर आवाजाचा असल्याने, चित्तलपर्वत इत्यादींसारख्या मोठ्या ठिकाणी जाऊन, चैत्य-अंगणाची स्वच्छता इत्यादी कर्तव्ये करतो. त्यानंतर, धर्मश्रवण मंडपात आलेल्या त्याला, पाहुणे तरुण भिक्खू "धम्म उपदेश करा" असे म्हणतात. तो चांगल्या प्रकारे शिकलेला धम्म आणि प्रतिपदा स्पष्ट करून सांगतो. तेव्हा पांसुकुलिक, पिंडपातिक इत्यादी सर्व स्थवीर, नवशिक्या व मध्यम भिक्खू "अहो! काय हा सत्पुरुष!" असे म्हणून अत्यंत आनंदित होतात. သော ကဿစိ နိဒါနမတ္တံ, ကဿစိ ဥပဍ္ဎဂါထံ, ကဿစိ ဂါထံ ဥပဋ္ဌာပေန္တော အယပဋ္ဋကေန အာဗန္ဓန္တော ဝိယ ဒဟရသာမဏေရေ သင်္ဂဏှိတွာ မဟာထေရေ ဥပသင်္ကမိတွာ, ‘‘ဘန္တေ, အယံ ပေါရာဏကဝိဟာရော အတ္ထိ, ဧတ္ထ ကောစိ တတြုပ္ပာဒေါ’’တိ?, ပုစ္ဆတိ. ထေရာ – ‘‘ကိံ ဝဒေသိ, အာဝုသော, စတုဝီသတိ ကရီသသဟဿာနိ တတြုပ္ပာဒေါ’’တိ. ဘန္တေ, တုမှေ ဧဝံ ဝဒေထ, ဥဒ္ဓနေ ပန အဂ္ဂိပိ န ဇလတီတိ. အာဝုသော, မဟာဝိဟာရဝါသီဟိ လဒ္ဓါ [Pg.83] နာမ ဧဝမေဝ နဿန္တိ, န ကောစိ သဏ္ဌပေတီတိ. ဘန္တေ, ပေါရာဏကရာဇူဟိ ဒိန္နံ ခီဏာသဝေဟိ ပဋိဂ္ဂဟိတံ ကသ္မာ ဧတေ နာသေန္တီတိ? အာဝုသော, တာဒိသေန ဓမ္မကထိကေန သက္ကာ ဘဝေယျ လဒ္ဓုန္တိ. ဘန္တေ, မာ ဧဝံ ဝဒေထ, အမှေ ပဋိပတ္တိဒီပကဓမ္မကထိကာ နာမ, တုမှေ မံ ‘‘သံဃကုဋုမ္ဗိကော ဝိဟာရုပဋ္ဌာကော’’တိ မညမာနာ ကာတုကာမာတိ. ကိံ နု ခေါ, အာဝုသော, အကပ္ပိယမေတံ, တုမှာဒိသေဟိ ပန ကထိတေ အမှာကံ ဥပ္ပဇ္ဇေယျာတိ? တေန ဟိ, ဘန္တေ, အာရာမိကေသု အာဂတေသု အမှာကံ ဘာရံ ကရောထ, ဧကံ ကပ္ပိယဒွါရံ ကထေဿာမာတိ. तो कोणाला केवळ निदान (प्रस्तावना), कोणाला अर्धी गाथा, तर कोणाला पूर्ण गाथा शिकवत, जणू काही लोखंडाच्या पट्टीने बांधून ठेवत असल्याप्रमाणे तरुण सामणेरांना आपल्या बाजूने करून घेऊन महाथेरांकडे गेला आणि विचारू लागला, "भन्ते, हा प्राचीन विहार आहे; येथे काही 'तत्रुप्पाद' (या विहाराच्या मालकीची शेतजमीन किंवा उत्पन्न) आहे का?" थेर म्हणाले, "आयुष्यमान, तू काय बोलत आहेस? चोवीस हजार करीस (जमीन मोजण्याचे माप) एवढी जमीन हे येथील उत्पन्न आहे." तो म्हणाला, "भन्ते, आपण असे म्हणता, पण चुलीत अग्नी देखील जळत नाही." थेर म्हणाले, "आयुष्यमान, महाविहारवासीयांना मिळालेले उत्पन्न अशाच प्रकारे नष्ट होते, कोणीही त्याची नीट व्यवस्था लावत नाही." तो म्हणाला, "भन्ते, प्राचीन राजांनी दिलेले आणि क्षीणासवांनी (अर्हतांनी) स्वीकारलेले हे उत्पन्न का नष्ट होऊ दिले जाते?" थेर म्हणाले, "आयुष्यमान, तुझ्यासारख्या कुशल धम्मकथिकाने उपदेश केला तर ते पुन्हा मिळवणे शक्य होईल." तो म्हणाला, "भन्ते, असे बोलू नका. आम्ही केवळ प्रतिपत्ती (आचरणाचा मार्ग) दाखवणारे धम्मकथिक आहोत. आपण मला 'संघाचा गृहपती' किंवा 'विहाराचा सेवक' समजून माझ्याकडून काम करून घेऊ इच्छिता काय?" थेर म्हणाले, "आयुष्यमान, हे काय अकल्पनीय (अयोग्य) आहे का? तुझ्यासारख्यांनी उपदेश केला तर आम्हाला लाभ होईल." तो म्हणाला, "भन्ते, जर असे असेल तर, जेव्हा आरामिक (विहाराचे सेवक) यातील, तेव्हा आमची जबाबदारी स्वीकारा, आम्ही त्यांना एक कप्पियद्वार (दान देण्याचा योग्य मार्ग) सांगू." သော ပါတောဝ ဂန္တွာ, သန္နိပါတသာလာယံ ဌတွာ, အာရာမိကေသု အာဂတေသု ‘‘ဥပါသကာ အသုကခေတ္တေ ဘာဂေါ ကုဟိံ, အသုကခေတ္တေ ကဟာပဏံ ကုဟိ’’န္တိအာဒီနိ ဝတွာ, အညဿ ခေတ္တံ ဂဟေတွာ, အညဿ ဒေတိ. ဧဝံ အနုက္ကမေန တံ တံ ပဋိသေဓေန္တော တဿ တဿ ဒေန္တော တထာ အကာသိ, ယထာ ယာဂုဟတ္ထာ ပူဝဟတ္ထာ ဘတ္တဟတ္ထာ တေလမဓုဖာဏိတဃတာဒိဟတ္ထာ စ အတ္တနောဝ သန္တိကံ အာဂစ္ဆန္တိ. သကလဝိဟာရော ဧကကောလာဟလော ဟောတိ, ပေသလာ ဘိက္ခူ နိဗ္ဗိဇ္ဇ အပက္ကမိံသု. तो सकाळीच जाऊन सभा मंडपात उभा राहिला आणि आरामिक आले असता, "उपासकांनो, अमुक शेतातील हिस्सा कुठे आहे? अमुक शेतातील कहापण (नाणी) कुठे आहेत?" इत्यादी बोलून, एकाचे शेत काढून घेऊन दुसऱ्याला देऊ लागला. अशा प्रकारे अनुक्रमाने त्या त्या व्यक्तीला मनाई करत आणि दुसऱ्याला देत त्याने अशी व्यवस्था केली की, ज्यायोगे हातात पेज, हातात पूप (खाद्यपदार्थ), हातात भात आणि हातात तेल, मध, गुळ, तूप इत्यादी घेतलेले लोक केवळ त्याच्याच जवळ येऊ लागले. संपूर्ण विहार एकच कोलाहल बनला, आणि शीलप्रिय भिक्खू कंटाळून तेथून निघून गेले. သောပိ အာစရိယုပဇ္ဈာယေဟိ ဝိဿဋ္ဌကာနံ ဗဟူနံ ဒုဗ္ဗစပုဂ္ဂလာနံ ဥပဇ္ဈံ ဒေန္တော ဝိဟာရံ ပူရေတိ. အာဂန္တုကာ ဘိက္ခူ ဝိဟာရဒွါရေ ဌတွာဝ ‘‘ဝိဟာရေ ကေ ဝသန္တီ’’တိ, ပုစ္ဆိတွာ, ‘‘ဧဝရူပါ နာမ ဘိက္ခူ’’တိ သုတွာ ဗာဟိရေနေဝ ပက္ကမန္တိ. အယံ ပုဂ္ဂလော သာသနေ တိရိယံ နိပန္နတာယ မဟာဇနဿ ပစ္စယဘာဝံ ဥပဂတော အရိယမဂ္ဂံ ဩတရိတွာ သမာဓိကုလ္လေ နိသိန္နော နိဗ္ဗာနသာဂရံ ပါပုဏိတုံ န သက္ကောတိ. तो देखील आचार्य आणि उपाध्यायांनी सोडून दिलेल्या अनेक दुर्वचनी (अनाज्ञधारक) व्यक्तींना दीक्षा (उपाध्यायत्व) देऊन विहाराला भरून टाकता झाला. बाहेरून आलेले आगंतुक भिक्खू विहाराच्या दारापाशीच उभे राहून, "विहारात कोण राहतात?" असे विचारत आणि "अशा प्रकारचे भिक्खू राहतात" हे ऐकून बाहेरूनच निघून जात. हा मनुष्य बुद्धशासनात आडवा पडल्यामुळे (आडकाठी निर्माण केल्यामुळे) जरी महाजनांच्या प्रत्ययभावाला (आश्रयाला) प्राप्त झाला असला, तरी आर्यमार्गात न उतरल्यामुळे समाधीरूपी तराफ्यावर बसूनही निर्वाणरूपी सागराला प्राप्त करू शकत नाही. ဘဂဝန္တံ ဧတဒဝေါစာတိ ‘‘နိဗ္ဗာနပဗ္ဘာရာ’’တိ ပဒေန ဩသာပိတံ ဓမ္မဒေသနံ ဉတွာ အနုသန္ဓိကုသလတာယ ဧတံ ‘‘ကိံ နု ခေါ, ဘန္တေ’’တိအာဒိဝစနံ အဝေါစ. တထာဂတောပိ ဟိ ဣမိဿံ ပရိသတိ နိသိန္နော ‘‘အနုသန္ဓိကုသလော ဘိက္ခု အတ္ထိ, သော မံ ပဉှံ ပုစ္ဆိဿတီ’’တိ တဿေဝ ဩကာသကရဏတ္ထာယ ဣမသ္မိံ ဌာနေ ဒေသနံ နိဋ္ဌာပေသိ. "भगवंतांना असे म्हणाला" हे वाक्य, "निर्वाणप्रवण" या पदाने समाप्त झालेली धम्मदेशना जाणून, अनुसंधी (प्रसंग) जोडण्यात कुशल असल्यामुळे, "भन्ते, हे काय आहे?" इत्यादी वचन बोलला. कारण तथागत देखील या परिषदेत बसलेल्या "अनुसंधी जोडण्यात कुशल भिक्खू आहे, तो मला प्रश्न विचारणार" असे जाणून, त्यालाच संधी देण्यासाठी या ठिकाणी देशना समाप्त करते झाले. ဣဒါနိ ဩရိမံ တီရန္တိအာဒိနာ နယေန ဝုတ္တေသု အဇ္ဈတ္တိကာယတနာဒီသု ဧဝံ ဥပဂမနာနုပဂမနာဒီနိ ဝေဒိတဗ္ဗာနိ. ‘‘မယှံ စက္ခု-ပသန္နံ, အဟံ အပ္ပမတ္တကမ္ပိ ရူပါရမ္မဏံ [Pg.84] ပဋိဝိဇ္ဈိတုံ သက္ကောမီ’’တိ ဧတံ နိဿာယ စက္ခုံ အဿာဒေန္တောပိ တိမိရကဝါတာဒီဟိ ဥပဟတပသာဒေါ ‘‘အမနာပံ မယှံ စက္ခု, မဟန္တမ္ပိ ရူပါရမ္မဏံ ဝိဘာဝေတုံ န သက္ကောမီ’’တိ ဒေါမနဿံ အာပဇ္ဇန္တောပိ စက္ခာယတနံ ဥပဂစ္ဆတိ နာမ. အနိစ္စံ ဒုက္ခံ အနတ္တာတိ တိဏ္ဏံ လက္ခဏာနံ ဝသေန ဝိပဿန္တော ပန န ဥပဂစ္ဆတိ နာမ. သောတာဒီသုပိ ဧသေဝ နယော. आता "अलीकडचा तीर" इत्यादी पद्धतीने सांगितलेल्या अध्यात्मिक आयतनांमध्ये अशा प्रकारे जवळ जाणे (आसक्त होणे) आणि जवळ न जाणे (अनासक्त होणे) इत्यादी समजून घ्यावे. "माझे चक्षू (डोळे) उत्कृष्ट आहेत, मी अगदी सूक्ष्म रूपाला देखील स्पष्टपणे जाणू शकतो," याचा आश्रय घेऊन चक्षूंचे आस्वादन घेणारा (त्यात आनंद मानणारा) देखील, आणि मोतीबिंदू, वारा इत्यादींमुळे दृष्टी बाधित झाली असता, "माझे चक्षू अप्रिय आहेत, मी मोठ्या रूपाला देखील स्पष्टपणे पाहू शकत नाही," असे म्हणून दौर्मनस्य (दुःख) प्राप्त होणारा देखील चक्षायतनाच्या जवळ जातो (त्यात आसक्त होतो) असे म्हटले जाते. परंतु, अनित्य, दुःख आणि अनात्म या तीन लक्षणांच्या द्वारे विपश्यना करणारा मनुष्य जवळ जात नाही (आसक्त होत नाही) असे म्हटले जाते. श्रोत्र (कान) इत्यादी आयतनांच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. မနာယတနေ ပန ‘‘မနာပံ ဝတ မေ မနော, ကိဉ္စိ ဝါမတော အဂ္ဂဟေတွာ သဗ္ဗံ ဒက္ခိဏတောဝ ဂဏှာတီ’’တိ ဝါ ‘‘မနေန မေ စိန္တိတစိန္တိတဿ အလာဘော နာမ နတ္ထီ’’တိ ဝါ ဧဝံ အဿာဒေန္တောပိ, ‘‘ဒုစိန္တိတစိန္တိတဿ မေ မနော အပ္ပဒက္ခိဏဂ္ဂါဟီ’’တိ ဧဝံ ဒေါမနဿံ ဥပ္ပာဒေန္တောပိ မနာယတနံ ဥပဂစ္ဆတိ နာမ. ဣဋ္ဌေ ပန ရူပေ ရာဂံ, အနိဋ္ဌေ ပဋိဃံ ဥပ္ပာဒေန္တော ရူပါယတနံ ဥပဂစ္ဆတိ နာမ. သဒ္ဒါယတနာဒီသုပိ ဧသေဝ နယော. परंतु मनायतनाच्या बाबतीत, "माझे मन खरोखरच सुंदर आहे, ते कोणत्याही गोष्टीचा चुकीचा अर्थ न घेता सर्व काही योग्य प्रकारेच ग्रहण करते," किंवा "माझ्या मनाने विचार केलेल्या गोष्टीचा मला लाभ होणार नाही असे कधीच घडत नाही," अशा प्रकारे आस्वादन घेणारा देखील, आणि "वाईट विचार केल्यामुळे माझे मन चुकीच्या गोष्टीच ग्रहण करते," अशा प्रकारे दौर्मनस्य उत्पन्न करणारा देखील मनायतनाच्या जवळ जातो (त्यात आसक्त होतो) असे म्हटले जाते. परंतु प्रिय रूपात राग (आसक्ती) आणि अप्रिय रूपात प्रतिघ (द्वेष) उत्पन्न करणारा मनुष्य रूपायतनाच्या जवळ जातो (त्यात आसक्त होतो) असे म्हटले जाते. शब्दायतन इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. နန္ဒီရာဂဿေတံ အဓိဝစနန္တိ ယထာ ဟိ မဇ္ဈေ သံသီဒိတွာ ထလံ ပတ္တံ ဒါရုက္ခန္ဓံ သဏှထူလဝါလိကာ ပိဒဟတိ, သော ပုန သီသံ ဥက္ခိပိတုံ န သက္ကောတိ, ဧဝံ နန္ဒီရာဂေန အာဗဒ္ဓေါ ပုဂ္ဂလော စတူသု မဟာအပါယေသု ပတိတော မဟာဒုက္ခေန ပိဓီယတိ, သော အနေကေဟိပိ ဝဿသဟဿေဟိ ပုန သီသံ ဥက္ခိပိတုံ န သက္ကောတိ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘နန္ဒီရာဂဿေတံ အဓိဝစန’’န္တိ. "नंदीराग (आनंद आणि आसक्ती) याचे हे नाव आहे" या वाक्याचा अर्थ असा आहे की, ज्याप्रमाणे नदीच्या मध्यभागी बुडून कोरड्या जमिनीवर (वाळूच्या ढिगाऱ्यावर) पोहोचलेल्या लाकडाच्या ओंडक्याला बारीक आणि जाड वाळू झाकून टाकते, आणि तो पुन्हा आपले डोके वर काढू शकत नाही, त्याचप्रमाणे नंदीरागाने बांधलेला मनुष्य चार महाअपायांमध्ये पडतो आणि महादुःखाने झाकला जातो, तो अनेक हजार वर्षांनंतरही पुन्हा आपले डोके वर काढू शकत नाही. म्हणूनच म्हटले आहे, "नंदीराग याचे हे नाव आहे." အသ္မိမာနဿေတံ အဓိဝစနန္တိ ယထာ ဟိ ထလေ အာရုဠှော ဒါရုက္ခန္ဓော ဟေဋ္ဌာ ဂင်္ဂေါဒကေန စေဝ ဥပရိ ဝဿေန စ တေမေန္တော အနုက္ကမေန သေဝါလပရိယောနဒ္ဓေါ ‘‘ပါသာဏော နု ခေါ ဧသ ခါဏုကော’’တိ ဝတ္တဗ္ဗတံ အာပဇ္ဇတိ, ဧဝမေဝ အသ္မိမာနေန ဥန္နတော ပုဂ္ဂလော ပံသုကူလိကဋ္ဌာနေ ပံသုကူလိကော ဟောတိ, ဓမ္မကထိကဋ္ဌာနေ ဓမ္မကထိကော, ဘဏ္ဍနကာရကဋ္ဌာနေ ဘဏ္ဍနကာရကော, ဝေဇ္ဇဋ္ဌာနေ ဝေဇ္ဇော, ပိသုဏဋ္ဌာနေ ပိသုဏော. သော နာနပ္ပကာရံ အနေသနံ အာပဇ္ဇန္တော တာဟိ တာဟိ အာပတ္တီဟိ ပလိဝေဌိတော ‘‘အတ္ထိ နု ခေါ အဿ အဗ္ဘန္တရေ ကိဉ္စိ သီလံ, ဥဒါဟု နတ္ထီ’’တိ ဝတ္တဗ္ဗတံ အာပဇ္ဇတိ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘အသ္မိမာနဿေတံ အဓိဝစန’’န္တိ. "अस्मिमान (अहंकार) याचे हे नाव आहे" या वाक्याचा अर्थ असा आहे की, ज्याप्रमाणे जमिनीवर पडलेला लाकडाचा ओंडका खाली गंगेच्या पाण्याने आणि वरून पावसाच्या पाण्याने ओला होत राहिल्यामुळे अनुक्रमाने शेवाळाने वेढला जातो आणि "हा दगड आहे की लाकडाचा खुंट?" अशा संशयास्पद स्थितीला प्राप्त होतो, त्याचप्रमाणे अस्मिमानाने (अहंकाराने) उन्मत्त झालेला मनुष्य पांसुकूलिकांच्या ठिकाणी पांसुकूलिक बनतो, धम्मकथिकांच्या ठिकाणी धम्मकथिक बनतो, भांडण करणाऱ्यांच्या ठिकाणी भांडखोर बनतो, वैद्यांच्या ठिकाणी वैद्य बनतो आणि चहाडी करणाऱ्यांच्या ठिकाणी चहाडखोर बनतो. तो विविध प्रकारच्या अनेशना (अयोग्य उपजीविका) प्राप्त करत, त्या त्या आपत्तींनी (नियमांच्या उल्लंघनाने) वेढला जातो आणि "याच्या अंतरात काही शील शिल्लक आहे की नाही?" अशा संशयास्पद स्थितीला प्राप्त होतो. म्हणूनच म्हटले आहे, "अस्मिमान याचे हे नाव आहे." ပဉ္စန္နေတံ ကာမဂုဏာနံ အဓိဝစနန္တိ ယထာ ဟိ အာဝဋ္ဋေ ပတိတဒါရုခန္ဓော အန္တောယေဝ ပါသာဏာဒီသု အာဟတသမဗ္ဘာဟတော ဘိဇ္ဇိတွာ စုဏ္ဏဝိစုဏ္ဏံ ဟောတိ, ဧဝံ ပဉ္စကာမဂုဏာဝဋ္ဋေ ပတိတပုဂ္ဂလော စတူသု [Pg.85] အပါယေသု ကမ္မကာရဏခုပ္ပိပါသာဒိဒုက္ခေဟိ အာဟတသမဗ္ဘာဟတော ဒီဃရတ္တံ စုဏ္ဏဝိစုဏ္ဏတံ အာပဇ္ဇတိ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘ပဉ္စန္နေတံ ကာမဂုဏာနံ အဓိဝစန’’န္တိ. "पाच कामगुणांचे हे नाव आहे" या वाक्याचा अर्थ असा आहे की, ज्याप्रमाणे पाण्याच्या भोवऱ्यात पडलेला लाकडाचा ओंडका आतल्या आतच दगडांवर आदळून आणि आपटून फुटतो आणि त्याचे तुकडे-तुकडे होतात, त्याचप्रमाणे पाच कामगुणांच्या भोवऱ्यात पडलेला मनुष्य चार अपायांमध्ये कर्माच्या शिक्षा, भूक, तहान इत्यादी दुःखांनी आदळला-आपटला जाऊन दीर्घकाळापर्यंत विनाश पावतो. म्हणूनच म्हटले आहे, "पाच कामगुणांचे हे नाव आहे." ဒုဿီလောတိ နိဿီလော. ပါပဓမ္မောတိ လာမကဓမ္မော. အသုစီတိ န သုစိ. သင်္ကဿရသမာစာရောတိ ‘‘ဣမဿ မညေ ဣမဿ မညေ ဣဒံ ကမ္မ’’န္တိ ဧဝံ ပရေဟိ သင်္ကာယ သရိတဗ္ဗသမာစာရော. သင်္ကာယ ဝါ ပရေသံ သမာစာရံ သရတီတိပိ သင်္ကဿရသမာစာရော. တဿ ဟိ ဒွေ တယော ဇနေ ကထေန္တေ ဒိသွာ, ‘‘မမ ဒေါသံ မညေ ကထေန္တီ’’တိ တေသံ သမာစာရံ သင်္ကဿရတိ ဓာဝတီတိ သင်္ကဿရသမာစာရော. 'दुश्शील' म्हणजे शील नसलेला (शीलहीन). 'पापधर्मी' म्हणजे हीन स्वभावाचा. 'अशुची' म्हणजे अपवित्र (अशुद्ध). 'शंकस्वर-समाचार' म्हणजे "हे कर्म बहुधा या भिक्खूचेच असावे," अशा प्रकारे इतरांनी संशयाने ज्याच्या आचरणाचे स्मरण करावे असा. किंवा संशयाने जो इतरांच्या आचरणाचे स्मरण करतो (त्याच्या मनात शंका येते) तो देखील 'शंकस्वर-समाचार' होय. कारण, दोन-तीन लोकांना बोलताना पाहून, "हे लोक बहुधा माझ्याच दोषांबद्दल बोलत आहेत," असे समजून त्यांच्या आचरणाबद्दल संशय घेतो आणि त्याचे मन तिकडे धावते, म्हणून तो 'शंकस्वर-समाचार' होय. သမဏပဋိညောတိ သလာကဂ္ဂဟဏာဒီသု ‘‘ကိတ္တကာ ဝိဟာရေ သမဏာ’’တိ ဂဏနာယ အာရဒ္ဓါယ ‘‘အဟမ္ပိ သမဏော, အဟမ္ပိ သမဏော’’တိ ပဋိညံ ဒေတိ, သလာကဂ္ဂဟဏာဒီနိ ကရောတိ. ဗြဟ္မစာရိပဋိညောတိ ဥပေါသထပဝါရဏာဒီသု ‘‘အဟမ္ပိ ဗြဟ္မစာရီ’’တိ ပဋိညာယ တာနိ ကမ္မာနိ ပဝိသတိ. အန္တောပူတီတိ ဝက္ကဟဒယာဒီသု အပူတိကဿပိ ဂုဏာနံ ပူတိဘာဝေန, အန္တောပူတိ. အဝဿုတောတိ ရာဂေန တိန္တော. ကသမ္ဗုဇာတောတိ ရာဂါဒီဟိ ကိလေသေဟိ ကစဝရဇာတော. श्रमणप्रतिज्ञा (समणप्पटिञ्ञा) म्हणजे शलाका-ग्रहण (मोजणीसाठी काठ्या घेणे) इत्यादी प्रसंगी, 'विहारात किती श्रमण आहेत?' अशी मोजणी सुरू झाली असता, 'मीसुद्धा श्रमण आहे, मीसुद्धा श्रमण आहे' अशी प्रतिज्ञा (कबुली) देणे आणि शलाका-ग्रहण इत्यादी करणे होय. ब्रह्मचारीप्रतिज्ञा (ब्रह्मचारिप्पटिञ्ञा) म्हणजे उपोसथ, पवारणा इत्यादी प्रसंगी 'मीसुद्धा ब्रह्मचारी आहे' अशी प्रतिज्ञा करून त्या कर्मांमध्ये प्रवेश करणे होय. अंतोपूती (अंतोपूति) म्हणजे मूत्रपिंड, हृदय इत्यादी अवयव सडलेले नसले तरी, गुणांच्या सडण्यामुळे (शीलादी गुणांचा नाश झाल्यामुळे) आतून सडलेला असणे. अवस्सुत (अवस्सुतो) म्हणजे रागाने (आसक्तीने) ओला झालेला (भिजलेला). कसम्बुजात (कसम्बुजातो) म्हणजे रागादी क्लेशांमुळे अंतःकरणात कचरा निर्माण झालेला. ဧတဒဝေါစာတိ ဂေါဂဏံ ဂင်္ဂါတီရာဘိမုခံ ကတွာ ပရိသပရိယန္တေ ဌိတော အာဒိတော ပဋ္ဌာယ ယာဝ ပရိယောသာနာ သတ္ထု ဓမ္မဒေသနံ သုတွာ, ‘‘သတ္ထာ ဩရိမတီရာဒီနံ အနုပဂစ္ဆန္တာဒိဝသေန သက္ကာ ပဋိပတ္တိံ ပူရေတုန္တိ ဝဒတိ. ယဒိ ဧဝံ ပူရေတုံ သက္ကာ, အဟံ ပဗ္ဗဇိတွာ ပူရေဿာမီ’’တိ စိန္တေတွာ ဧတံ ‘‘အဟံ ခေါ, ဘန္တေ’’တိအာဒိဝစနံ အဝေါစ. एतदवोच (असे म्हणाले) म्हणजे गायींच्या कळपाला गंगा नदीच्या तीराकडे तोंड करून उभे करून, परिषदेच्या कडेला उभे राहून, सुरुवातीपासून शेवटपर्यंत शास्त्यांची (बुद्धांची) धम्मदेशना ऐकून, 'शास्ते अलीकडच्या तीरावर न जाणे इत्यादी प्रकारे प्रतिपत्ती (साधना) पूर्ण करणे शक्य आहे असे सांगतात. जर हे पूर्ण करणे शक्य असेल, तर मी प्रव्रजित होऊन ते पूर्ण करीन' असा विचार करून त्यांनी 'मी खरोखर, भंते...' इत्यादी वचन म्हटले. ဝစ္ဆဂိဒ္ဓိနိယောတိ ဝစ္ဆေသု သသ္နေဟာ ထနေဟိ ခီရံ ပဂ္ဃရန္တေဟိ ဝစ္ဆကသ္နေဟေန သယမေဝ ဂမိဿန္တီတိ. နိယျာတေဟေဝါတိ နိယျာတေဟိယေဝ. ဂါဝီသု ဟိ အနိယျာတိတာသု ဂေါသာမိကာ အာဂန္တွာ, ‘‘ဧကာ ဂါဝီ န ဒိဿတိ, ဧကော ဂေါဏော, ဧကော ဝစ္ဆကော န ဒိဿတီ’’တိ တုယှံ ပိဋ္ဌိတော ပိဋ္ဌိတော ဝိစရိဿန္တိ, ဣတိ တေ အဖာသုကံ ဘဝိဿတိ. ပဗ္ဗဇ္ဇာ စ နာမေသာ သဣဏဿ န ရုဟတိ, အဏဏာ ပဗ္ဗဇ္ဇာ စ ဗုဒ္ဓါဒီဟိ သံဝဏ္ဏိတာတိ ဒဿနတ္ထံ ဧဝမာဟ. နိယျာတာတိ နိယျာတိတာ. ဣမသ္မိံ သုတ္တေ ဝဋ္ဋဝိဝဋ္ဋံ ကထိတံ. वच्छगिद्धिनीयो (वासरांच्या ओढीने असणाऱ्या गायी) म्हणजे वासरांवर प्रेम असल्यामुळे, सडातून दूध पाझरत असताना, वासरांच्या स्नेहामुळे स्वतःहूनच जाणाऱ्या गायी. निय्यातेहेव म्हणजे सोपवूनच (स्वाधीन करूनच). कारण गायी सोपवल्या नाहीत तर गायींचे मालक येऊन, 'एक गाय दिसत नाही, एक बैल दिसत नाही, एक वासरू दिसत नाही' असे म्हणत तुमच्या मागे मागे फिरतील, ज्यामुळे तुम्हाला त्रास (अस्वस्थता) होईल. आणि ही प्रव्रज्या कर्जबाजारी माणसाला शोभत नाही (किंवा फलदायी ठरत नाही), तर कर्जमुक्त माणसाच्या प्रव्रज्येचीच बुद्ध इत्यादींनी प्रशंसा केली आहे, हे दर्शवण्यासाठी असे म्हटले आहे. निय्याता म्हणजे सोपवलेल्या (स्वाधीन केलेल्या). या सूत्तात वट्ट (संसारचक्र) आणि विवट्ट (संसारमुक्ती) सांगितले आहे. ၅. ဒုတိယဒါရုက္ခန္ဓောပမသုတ္တဝဏ္ဏနာ ५. द्वितीय दारुक्खन्धोपम सुत्त वर्णन ၂၄၂. ပဉ္စမေ [Pg.86] ကိမိလာယန္တိ ကိမိလာနာမကေ နဂရေ. သံကိလိဋ္ဌန္တိ ပဋိစ္ဆန္နကာလတော ပဋ္ဌာယ အသံကိလိဋ္ဌာ နာမ အာပတ္တိ နတ္ထိ, ဧဝရူပံ သံကိလိဋ္ဌံ အာပတ္တိံ. န ဝုဋ္ဌာနံ ပညာယတီတိ ပရိဝါသမာနတ္တအဗ္ဘာနေဟိ ဝုဋ္ဌာနံ န ဒိဿတိ. २४२. पाचव्या सूत्तात, किमिलाय म्हणजे किमिला नावाच्या नगरात. संकिळिट्ठं (मलीन) म्हणजे आपत्ती (नियमभंग) लपवून ठेवल्याच्या काळापासून मलीन नसलेली अशी कोणतीही आपत्ती नसते, अशा प्रकारची मलीन आपत्ती. 'न वुट्ठानं पञ्ञायति' (निवारण दिसून येत नाही) म्हणजे परिवास, मानत्त आणि अब्भान या विधींद्वारे शुद्धी (निवारण) दिसून येत नाही. ၆. အဝဿုတပရိယာယသုတ္တဝဏ္ဏနာ ६. अवस्सुतपरियाय सुत्त वर्णन ၂၄၃. ဆဋ္ဌေ နဝံ သန္ထာဂါရန္တိ အဓုနာ ကာရိတံ သန္ထာဂါရံ, ဧကာ မဟာသာလာတိ အတ္ထော. ဥယျောဂကာလာဒီသု ဟိ ရာဇာနော တတ္ထ ဌတွာ, ‘‘ဧတ္တကာ ပုရတော ဂစ္ဆန္တု, ဧတ္တကာ ပစ္ဆာ, ဧတ္တကာ ဥဘောဟိ ပဿေဟိ, ဧတ္တကာ ဟတ္ထီ အဘိရုဟန္တု, ဧတ္တကာ အဿေ, ဧတ္တကာ ရထေသု တိဋ္ဌန္တူ’’တိ ဧဝံ သန္ထံ ကရောန္တိ, မရိယာဒံ ဗန္ဓန္တိ, တသ္မာ တံ ဌာနံ သန္ထာဂါရန္တိ ဝုစ္စတိ. ဥယျောဂဋ္ဌာနတော စ အာဂန္တွာ ယာဝ ဂေဟေသု အလ္လဂေါမယပရိဘဏ္ဍာဒီနိ ကာရေန္တိ, တာဝ ဒွေ တီဏိ ဒိဝသာနိ တေ ရာဇာနော တတ္ထ သန္ထရန္တီတိပိ သန္ထာဂါရံ. တေသံ ရာဇူနံ သဟ အတ္ထာနုသာသနံ အဂါရန္တိပိ သန္ထာဂါရံ. ဂဏရာဇာနော ဟိ တေ, တသ္မာ ဥပ္ပန္နံ ကိစ္စံ ဧကဿ ဝသေန န ဆိဇ္ဇတိ, သဗ္ဗေသံ ဆန္ဒောပိ လဒ္ဓုံ ဝဋ္ဋတိ, တသ္မာ သဗ္ဗေ တတ္ထ သန္နိပတိတွာ အနုသာသန္တိ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘သဟ အတ္ထာနုသာသနံ အဂါရန္တိပိ သန္ထာဂါရ’’န္တိ. ယသ္မာ ပန တေ တတ္ထ သန္နိပတိတွာ, ‘‘ဣမသ္မိံ ကာလေ ကသိတုံ ဝဋ္ဋတိ, ဣမသ္မိံ ကာလေ ဝပိတု’’န္တိ ဧဝမာဒိနာ နယေန ဃရာဝါသကိစ္စာနိ သမ္မန္တယန္တိ, တသ္မာ ဆိဒ္ဒါဝဆိဒ္ဒံ ဃရာဝါသံ တတ္ထ သန္ထရန္တီတိပိ, သန္ထာဂါရံ. အစိရကာရိတံ ဟောတီတိ ဣဋ္ဌကကမ္မသုဓာကမ္မစိတ္တကမ္မာဒိဝသေန သုသဇ္ဇိတံ ဒေဝဝိမာနံ ဝိယ အဓုနာ နိဋ္ဌာပိတံ. သမဏေန ဝါတိ ဧတ္ထ ယသ္မာ ဃရဝတ္ထုပရိဂ္ဂဟဏကာလေယေဝ ဒေဝတာ အတ္တနော ဝသနဋ္ဌာနံ ဂဏှန္တိ, တသ္မာ ‘‘ဒေဝေန ဝါ’’တိ အဝတွာ, ‘‘သမဏေန ဝါ ဗြာဟ္မဏေန ဝါ ကေနစိ ဝါ မနုဿဘူတေနာ’’တိ ဝုတ္တံ. २४३. सहाव्या सूत्तात, नवं सन्थागारं (नवीन संस्थागार) म्हणजे नुकतेच बांधलेले सभागृह, एक मोठे सभागृह असा अर्थ आहे. कारण युद्धाच्या वेळी इत्यादी प्रसंगी राजे तिथे उभे राहून, 'एवढे सैनिक पुढे जावोत, एवढे मागे, एवढे दोन्ही बाजूंनी, एवढे हत्तींवर स्वार होवोत, एवढे घोड्यांवर, एवढे रथांमध्ये उभे राहोत' अशा प्रकारे योजना करतात, मर्यादा (नियम) ठरवतात, म्हणून त्या ठिकाणाला संस्थागार म्हटले जाते. तसेच युद्धभूमीवरून परत आल्यावर जोपर्यंत घरांमध्ये ओल्या शेणाने सारवणे इत्यादी कामे करून घेत नाहीत, तोपर्यंत दोन-तीन दिवस ते राजे तिथे विश्रांती घेतात, म्हणूनही त्याला संस्थागार म्हणतात. त्या राजांचे एकत्र येऊन राज्यकारभाराचे काम करण्याचे गृह म्हणूनही ते संस्थागार आहे. कारण ते गणराजे होते, त्यामुळे उद्भवलेले कार्य एकाच्या निर्णयाने सुटत नाही, तर सर्वांचे मत मिळवणे आवश्यक असते, म्हणून सर्वजण तिथे एकत्र येऊन सल्लामसलत करतात. म्हणूनच म्हटले आहे - 'एकत्र येऊन राज्यकारभाराचे काम करण्याचे गृह म्हणजे संस्थागार'. आणि कारण ते तिथे एकत्र येऊन, 'या काळात नांगरणी करणे योग्य आहे, या काळात पेरणी करणे योग्य आहे' अशा प्रकारे गृहस्थाश्रमाच्या कामांविषयी चर्चा करतात, म्हणून गृहस्थाश्रमातील त्रुटी तिथे दूर करतात (सांधतात), म्हणूनही ते संस्थागार आहे. 'अचिरकारितं होति' (नुकतेच बांधलेले) म्हणजे विटांचे काम, चुन्याचे काम, चित्रकाम इत्यादींद्वारे देवविमानाप्रमाणे सुशोभित केलेले, नुकतेच पूर्ण झालेले. 'श्रमणाने वा...' या संदर्भात, कारण घराची जागा ताब्यात घेण्याच्या वेळीच देवता स्वतःचे राहण्याचे ठिकाण निश्चित करतात, म्हणून 'देवतेने वा...' असे न म्हणता, 'श्रमणाने वा, ब्राह्मणाने वा, किंवा कोणत्याही मनुष्याने...' असे म्हटले आहे. ယေန [Pg.87] ဘဂဝါ တေနုပသင်္ကမိံသူတိ သန္ထာဂါရံ နိဋ္ဌိတန္တိ သုတွာ ‘‘ဂစ္ဆာမ နံ ပဿိဿာမာ’’တိ ဂန္တွာ ဒွါရကောဋ္ဌကတော ပဋ္ဌာယ သဗ္ဗံ ဩလောကေတွာ ‘‘ဣဒံ သန္ထာဂါရံ အတိဝိယ မနောရမံ သဿိရိကံ. ကေန ပဌမံ ပရိဘုတ္တံ အမှာကံ ဒီဃရတ္တံ ဟိတာယ သုခါယ အဿာ’’တိ စိန္တေတွာ – ‘‘အမှာကံ ဉာတိသေဋ္ဌဿ ပဌမံ ဒိယျမာနေပိ သတ္ထုနောဝ အနုစ္ဆဝိကံ, ဒက္ခိဏေယျဝသေန ဒိယျမာနေပိ သတ္ထုနောဝ အနုစ္ဆဝိကံ, တသ္မာ သတ္ထာရံ ပဌမံ ပရိဘုဉ္ဇာပေဿာမ, ဘိက္ခုသံဃဿ စ အာဂမနံ ကရိဿာမ, ဘိက္ခုသံဃေ အာဂတေ တေပိဋကံ ဗုဒ္ဓဝစနံ အာဂတမေဝ ဘဝိဿတိ, သတ္ထာရံ တိယာမရတ္တိံ အမှာကံ ဓမ္မကထံ ကထာပေဿာမ, ဣတိ တီဟိ ရတနေဟိ ပရိဘုတ္တံ ပစ္ဆာ မယံ ပရိဘုဉ္ဇိဿာမ, ဧဝံ နော ဒီဃရတ္တံ ဟိတာယ သုခါယ ဘဝိဿတီ’’တိ သန္နိဋ္ဌာနံ ကတွာ ဥပသင်္ကမိံသု. येन भगवा तेनुपसङ्कमिंसु (जिथे भगवान होते, तिथे ते गेले) म्हणजे संस्थागार पूर्ण झाले आहे असे ऐकून, 'चला, आपण ते पाहू या' असे म्हणून गेले आणि प्रवेशद्वारापासून सर्व काही पाहून, 'हे संस्थागार अत्यंत मनमोहक आणि वैभवशाली आहे. कोणी याचा सर्वप्रथम वापर केला असता आमच्या दीर्घकालीन हितासाठी आणि सुखासाठी होईल?' असा विचार करून - 'आमच्या श्रेष्ठ नातेवाईकाला सर्वप्रथम दिले तरी ते शास्त्यांनाच योग्य आहे, दान स्वीकारण्यास योग्य या नात्याने दिले तरी ते शास्त्यांनाच योग्य आहे. म्हणून आपण शास्त्यांनाच याचा सर्वप्रथम वापर करू देऊ या, आणि भिक्खू संघाला आमंत्रित करू या. भिक्खू संघ आल्यावर त्रिपिटक बुद्धवचन आलेलेच असेल. शास्त्यांकडून रात्रीच्या तिन्ही प्रहरांत आपल्यासाठी धम्मकथा ऐकू या. अशा प्रकारे त्रिरत्नांनी वापर केल्यानंतर नंतर आपण त्याचा वापर करू. असे केल्याने ते आमच्या दीर्घकालीन हितासाठी आणि सुखासाठी होईल' असा निश्चय करून ते भगवंतांकडे गेले. ယေန နဝံ သန္ထာဂါရံ တေနုပသင်္ကမိံသူတိ တံဒိဝသံ ကိရ သန္ထာဂါရံ ကိဉ္စာပိ ရာဇကုလာနံ ဒဿနတ္ထာယ ဒေဝဝိမာနံ ဝိယ သုသဇ္ဇိတံ ဟောတိ သုပဋိဇဂ္ဂိတံ, ဗုဒ္ဓါရဟံ ပန ကတွာ အပညတ္တံ. ဗုဒ္ဓါ ဟိ နာမ အရညဇ္ဈာသယာ အရညာရာမာ အန္တောဂါမေ ဝသေယျုံ ဝါ နော ဝါ, တသ္မာ ‘‘ဘဂဝတော မနံ ဇာနိတွာဝ, ပညာပေဿာမာ’’တိ စိန္တေတွာ, တေ ဘဂဝန္တံ ဥပသင်္ကမိံသု, ဣဒါနိ ပန မနံ လဘိတွာ ပညာပေတုကာမာ ယေန သန္ထာဂါရံ တေနုပသင်္ကမိံသု. येन नवं सन्थागारं तेनुपसङ्कमिंसु (जिथे नवीन संस्थागार होते, तिथे ते गेले) म्हणजे त्या दिवशी म्हणे संस्थागार जरी राजपरिवाराला दाखवण्यासाठी देवविमानाप्रमाणे सुसज्ज आणि स्वच्छ केलेले होते, तरी बुद्धांच्या योग्यतेनुसार आसन मांडलेले नव्हते. कारण बुद्ध हे अरण्यात राहण्याची इच्छा असणारे, अरण्यात रमणारे असतात; ते गावाच्या आत राहतील की नाही (हे निश्चित नसते). म्हणून 'भगवंतांचे मन जाणूनच आसन मांडू या' असा विचार करून ते भगवंतांकडे गेले. आता मात्र संमती मिळाल्यामुळे आसन मांडण्याची इच्छा असणारे ते, जिथे संस्थागार होते तिथे गेले. သဗ္ဗသန္ထရိံ သန္ထာဂါရံ သန္ထရိတွာတိ ယထာ သဗ္ဗမေဝ သန္ထတံ ဟောတိ, ဧဝံ တံ သန္ထရာပေတွာ. သဗ္ဗပဌမံ တာဝ ‘‘ဂေါမယံ နာမ သဗ္ဗမင်္ဂလေသု ဝဋ္ဋတီ’’တိ သုဓာပရိကမ္မကတမ္ပိ ဘူမိံ အလ္လဂေါမယေန ဩပုဉ္ဇာပေတွာ, ပရိသုက္ခဘာဝံ ဉတွာ, ယထာ အက္ကန္တဋ္ဌာနေ ပဒံ ပညာယတိ, ဧဝံ စတုဇ္ဇာတိယဂန္ဓေဟိ လိမ္ပာပေတွာ ဥပရိ နာနာဝဏ္ဏကဋသာရကေ သန္ထရိတွာ တေသံ ဥပရိ မဟာပိဋ္ဌိကကောဇဝေ အာဒိံ ကတွာ ဟတ္ထတ္ထရအဿတ္ထရသီဟတ္ထရဗျဂ္ဃတ္ထရစန္ဒတ္ထရကသူရိယတ္ထရကစိတ္တတ္ထရကာဒီဟိ နာနာဝဏ္ဏေဟိ အတ္ထရကေဟိ သန္ထရိတဗ္ဗယုတ္တကံ သဗ္ဗောကာသံ သန္ထရာပေသုံ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘သဗ္ဗသန္ထရိံ သန္ထာဂါရံ သန္ထရိတွာ’’တိ. सब्बसन्थरिं सन्थागारं सन्थरित्वा (सर्व बाजूंनी संस्थागार आच्छादित करून) म्हणजे ज्या प्रकारे सर्व जागा आच्छादित होईल, त्या प्रकारे ते आच्छादित करून घेऊन. सर्वात आधी तर 'शेण हे सर्व मंगल प्रसंगी योग्य असते' असे मानून, चुन्याचे काम केलेल्या जमिनीला सुद्धा ओल्या शेणाने सारवून घेऊन, ती पूर्णपणे सुकल्याचे जाणून, ज्या प्रकारे पाय ठेवलेल्या जागी पाऊल उमटणार नाही, अशा प्रकारे चार प्रकारच्या सुगंधी द्रव्यांनी ती लिंपून घेऊन, त्यावर विविध रंगांच्या चटया अंथरून, त्यावर मोठे गालिचे इत्यादी ठेवून, हत्तीचे पांघरूण, घोड्याचे पांघरूण, सिंहाच्या कातड्याचे आसन, वाघाच्या कातड्याचे आसन, चंद्राच्या आकाराचे आसन, सूर्याच्या आकाराचे आसन, चित्रविचित्र आसन इत्यादी विविध रंगांच्या आसनांनी अंथरण्यास योग्य अशी सर्व जागा अंथरून घेतली. म्हणूनच म्हटले आहे - 'सर्व बाजूंनी संस्थागार आच्छादित करून'. အာသနာနိ ပညာပေတွာတိ မဇ္ဈဋ္ဌာနေ တာဝ မင်္ဂလထမ္ဘံ နိဿာယ မဟာရဟံ ဗုဒ္ဓါသနံ ပညာပေတွာ, တတ္ထ တတ္ထ ယံ ယံ မုဒုကဉ္စ မနောရမဉ္စ ပစ္စတ္ထရဏံ[Pg.88], တံ တံ ပစ္စတ္ထရိတွာ ဥဘတောလောဟိတကံ မနုညဒဿနံ ဥပဓာနံ ဥပဒဟိတွာ ဥပရိ သုဝဏ္ဏရဇတတာရကဝိစိတ္တဝိတာနံ ဗန္ဓိတွာ ဂန္ဓဒါမပုပ္ဖဒါမပတ္တဒါမာဒီဟိ အလင်္ကရိတွာ သမန္တာ ဒွါဒသဟတ္ထေ ဌာနေ ပုပ္ဖဇာလံ ကာရေတွာ, တိံသဟတ္ထမတ္တံ ဌာနံ ပဋသာဏိယာ ပရိက္ခိပါပေတွာ ပစ္ဆိမဘိတ္တိံ နိဿာယ ဘိက္ခုသံဃဿ ပလ္လင်္ကပီဌအပဿယပီဌမုဏ္ဍပီဌာနိ ပညာပေတွာ ဥပရိ သေတပစ္စတ္ထရဏေဟိ ပစ္စတ္ထရာပေတွာ ပါစီနဘိတ္တိံ နိဿာယ အတ္တနော အတ္တနော မဟာပိဋ္ဌိကကောဇဝေ ပညာပေတွာ မနောရမာနိ ဟံသလောမာဒိပူရိတာနိ ဥပဓာနာနိ ဌပါပေသုံ ‘‘ဧဝံ အကိလမမာနာ သဗ္ဗရတ္တိံ ဓမ္မံ သုဏိဿာမာ’’တိ. ဣဒံ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ ‘‘အာသနာနိ ပညာပေတွာ’’တိ. "आसने मांडून (किंवा तयार करून)" याचा अर्थ असा की, सर्वप्रथम मध्यभागी असलेल्या मंगल स्तंभाला (खांबाला) लागून अत्यंत मौल्यवान असे बुद्ध-आसन मांडले. त्यावर जे जे मऊ आणि मनमोहक आच्छादन होते, ते ते पसरवून, दोन्ही बाजूंनी लाल रंगाची व दिसायला सुंदर अशी उशी ठेवली. वरच्या बाजूला सोने आणि चांदीच्या ताऱ्यांनी सुशोभित केलेले छत (चंदवा) बांधले. सुगंधी माळा, फुलांच्या माळा, पानांच्या माळा इत्यादींनी ते सुशोभित केले. चहूबाजूंनी बारा हातांच्या अंतरावर फुलांचे जाळे तयार केले आणि तीस हात प्रमाणाच्या जागेला कापडी पडद्याने वेढले. पश्चिम भिंतीला लागून भिक्षुसंघासाठी पलंग-पीठ (आसन), टेकण असलेले पीठ आणि टेकण नसलेले साधे पीठ मांडले आणि त्यावर पांढरी शुभ्र आच्छादने पसरवली. पूर्व भिंतीला लागून आपापल्या मोठ्या लोकरीच्या चटया (गालिचे) पसरवून त्यावर मनमोहक अशा हंसाच्या पिसांनी भरलेल्या उश्या ठेवल्या. "अशा प्रकारे आम्ही न थकता संपूर्ण रात्रभर धम्म ऐकू शकू" या विचाराने त्यांनी त्या ठेवल्या. हेच लक्षात घेऊन "आसने मांडून" असे म्हटले आहे. ဥဒကမဏိကံ ပတိဋ္ဌာပေတွာတိ မဟာကုစ္ဆိကံ ဥဒကစာဋိံ ပတိဋ္ဌာပေတွာ ‘‘ဧဝံ ဘဂဝါ စ ဘိက္ခုသံဃော စ ယထာရုစိယာ ဟတ္ထေ ဝါ ဓောဝိဿန္တိ ပါဒေ ဝါ, မုခံ ဝါ ဝိက္ခာလေဿန္တီ’’တိ တေသု တေသု ဌာနေသု မဏိဝဏ္ဏဿ ဥဒကဿ ပူရာပေတွာ ဝါသတ္ထာယ နာနာပုပ္ဖာနိ စေဝ ဥဒကဝါသစုဏ္ဏာနိ စ ပက္ခိပိတွာ ကဒလိပဏ္ဏေဟိ ပိဒဟိတွာ ပတိဋ္ဌာပေသုံ. ဣဒံ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ ‘‘ဥဒကမဏိကံ ပတိဋ္ဌာပေတွာ’’တိ. "जलपात्र ठेवले" याचा अर्थ असा की, मोठे पोट असलेले पाण्याचे मोठे भांडे (रांजण) ठेवले. "अशा प्रकारे भगवान आणि भिक्षुसंघ आपल्या इच्छेनुसार हात किंवा पाय धुतील, अथवा मुख प्रक्षालन करतील" असा विचार करून त्यांनी त्या त्या ठिकाणी मण्यासारख्या स्वच्छ पाण्याने ते भांडे भरले. ते पाणी सुवासिक करण्यासाठी त्यात विविध प्रकारची फुले आणि सुगंधी चूर्ण टाकले आणि केळीच्या पानांनी ते झाकून ठेवले. हेच लक्षात घेऊन "जलपात्र ठेवले" असे म्हटले आहे. တေလပ္ပဒီပံ အာရောပေတွာတိ ရဇတသုဝဏ္ဏာဒိမယဒဏ္ဍဒီပိကာသု ယောနကရူပကိရာတရူပကာဒီနံ ဟတ္ထေ ဌပိတသုဝဏ္ဏရဇတာဒိမယကပလ္လိကာသု စ တေလပ္ပဒီပံ ဇာလာပေတွာတိ အတ္ထော. ယေန ဘဂဝါ တေနုပသင်္ကမိံသူတိ ဧတ္ထ ပန တေ သကျရာဇာနော န ကေဝလံ သန္ထာဂါရမေဝ, အထ ခေါ ယောဇနာဝဋ္ဋေ ကပိလဝတ္ထုသ္မိံ နဂရဝီထိယောပိ သမ္မဇ္ဇာပေတွာ ဓဇေ ဥဿာပေတွာ ဂေဟဒွါရေသု ပုဏ္ဏဃဋေ စ ကဒလိယော စ ဌပါပေတေဝါ သကလနဂရံ ဒီပမာလာဒီဟိ ဝိပ္ပကိဏ္ဏတာရကံ ဝိယ ကတွာ ‘‘ခီရူပဂေ ဒါရကေ ခီရံ ပါယေထ, ဒဟရေ ကုမာရေ လဟုံ လဟုံ ဘောဇေတွာ သယာပေထ, ဥစ္စာသဒ္ဒံ မာ ကရိတ္ထ, အဇ္ဇ ဧကရတ္တိံ သတ္ထာ အန္တောဂါမေ ဝသိဿတိ, ဗုဒ္ဓါ နာမ အပ္ပသဒ္ဒကာမာ ဟောန္တီ’’တိ ဘေရိံ စရာပေတွာ သယံ ဒဏ္ဍဒီပိကာ အာဒါယ ယေန ဘဂဝါ တေနုပသင်္ကမိံသု. "तेलाचे दिवे लावणे" याचा अर्थ असा की, सोने आणि चांदीच्या बनवलेल्या मशाल-स्तंभांवर, तसेच यवन व किरातांच्या मूर्तींच्या हातांत ठेवलेल्या सोने-चांदीच्या दिव्यांच्या वाट्यांमध्ये तेलाचे दिवे पेटवणे. "जिथे भगवान होते, तिथे ते गेले" या संदर्भात, त्या शाक्य राजांनी केवळ संथागारालाच (सभागृहालाच) सुशोभित केले नाही, तर एक योजन परिघाच्या कपिलवस्तू नगरातील रस्तेही झाडून स्वच्छ केले, ध्वज-पताका उभारल्या, घरांच्या दारांवर पूर्णघट आणि केळीची झाडे ठेवली. संपूर्ण नगर दिव्यांच्या माळांनी आकाशातील चमचमणाऱ्या ताऱ्यांसारखे प्रकाशित केले. "दूध पिणाऱ्या बालकांना दूध पाजा, लहान मुलांना लवकर जेवण देऊन झोपवा, मोठा आवाज करू नका; आज एका रात्रीसाठी शास्ता (बुद्ध) नगरामध्ये मुक्काम करणार आहेत आणि बुद्ध हे शांतताप्रिय असतात," अशी दवंडी पिटवून ते स्वतः हातात मशाली घेऊन जिथे भगवान होते, तिथे गेले. အထ [Pg.89] ခေါ ဘဂဝါ နိဝါသေတွာ ပတ္တစီဝရမာဒါယ သဒ္ဓိံ ဘိက္ခုသံဃေန ယေန နဝံ သန္ထာဂါရံ တေနုပသင်္ကမီတိ ‘‘ယဿ ဒါနိ, ဘန္တေ, ဘဂဝါ ကာလံ မညတီ’’တိ ဧဝံ ကိရ ကာလေ အာရောစိတေ ဘဂဝါ လာခါရသတိန္တရတ္တကောဝိဠာရပုပ္ဖဝဏ္ဏံ ရတ္တဒုပဋ္ဋံ ကတ္တရိယာ ပဒုမံ ကန္တေန္တော ဝိယ, သံဝိဓာယ တိမဏ္ဍလံ ပဋိစ္ဆာဒေန္တော နိဝါသေတွာ သုဝဏ္ဏပါမင်္ဂေန ပဒုမကလာပံ ပရိက္ခိပန္တော ဝိယ, ဝိဇ္ဇုလတာသဿိရိကံ ကာယဗန္ဓနံ ဗန္ဓိတွာ ရတ္တကမ္ဗလေန ဂဇကုမ္ဘံ ပရိယောနန္ဓန္တော ဝိယ, ရတနသတုဗ္ဗေဓေ သုဝဏ္ဏဂ္ဃိကေ ပဝါဠဇာလံ ခိပမာနော ဝိယ သုဝဏ္ဏစေတိယေ ရတ္တကမ္ဗလကဉ္စုကံ ပဋိမုဉ္စန္တော ဝိယ, ဂစ္ဆန္တံ ပုဏ္ဏစန္ဒံ ရတ္တဝဏ္ဏဝလာဟကေန ပဋိစ္ဆာဒယမာနော ဝိယ, ကဉ္စနပဗ္ဗတမတ္ထကေ သုပက္ကလာခါရသံ ပရိသိဉ္စန္တော ဝိယ, စိတ္တကူဋပဗ္ဗတမတ္ထကံ ဝိဇ္ဇုလတာယ ပရိက္ခိပန္တော ဝိယ စ သစက္ကဝါဠသိနေရုယုဂန္ဓရံ မဟာပထဝိံ သဉ္စာလေတွာ ဂဟိတံ နိဂြောဓပလ္လဝသမာနဝဏ္ဏံ ရတ္တဝရပံသုကူလံ ပါရုပိတွာ, ဂန္ဓကုဋိဒွါရတော နိက္ခမိ ကဉ္စနဂုဟတော သီဟော ဝိယ ဥဒယပဗ္ဗတကူဋတော ပုဏ္ဏစန္ဒော ဝိယ စ. နိက္ခမိတွာ ပန ဂန္ဓကုဋိပမုခေ အဋ္ဌာသိ. "त्यानंतर भगवान वस्त्र परिधान करून, पात्र आणि चीवर घेऊन भिक्षुसंघासह नवीन संथागाराकडे गेले." जेव्हा "भंते, आता भगवान ज्याची योग्य वेळ समजतात (ते करावे)" अशी वेळ कळवली गेली, तेव्हा भगवंतांनी लाखेच्या रसाने भिजवलेल्या तांबड्या कोविळार पुष्पासारखे अत्यंत लाल रंगाचे दुहेरी अंतर्वस्त्र, कात्रीने कमळ कापल्याप्रमाणे व्यवस्थितपणे तीन मंडले (गुडघे व नाभी) झाकतील अशा रीतीने परिधान केले. सोन्याच्या साखळीने कमळांचा जुडगा बांधावा त्याप्रमाणे, विजेच्या वेलीसारखा चमकणारा कटिबंध (कमरपट्टा) त्यांनी बांधला. लाल रंगाच्या वस्त्राने हत्तीचे मस्तक झाकावे त्याप्रमाणे, शंभर रत्ने उंच असलेल्या सुवर्ण स्तूपावर पोवळ्यांचे जाळे फेकावे त्याप्रमाणे, सुवर्ण चैत्यावर लाल वस्त्राचे कवच चढवावे त्याप्रमाणे, चालणाऱ्या पूर्ण चंद्राला लाल रंगाच्या ढगाने झाकावे त्याप्रमाणे, सुवर्ण पर्वताच्या शिखरावर चांगला शिजवलेला लाखेचा रस ओतावा त्याप्रमाणे, आणि चित्तकूट पर्वताच्या शिखराला विजेच्या वेलीने वेढावे त्याप्रमाणे, चक्रवाळ, सुमेरू आणि युगंधर पर्वतांसह संपूर्ण पृथ्वीला कंपित करून, वडाच्या कोवळ्या पानांसारखा रंग असलेले, लाल रंगाचे श्रेष्ठ पांसुकूल चीवर पांघरून, सुवर्ण गुहेतून सिंह बाहेर पडावा त्याप्रमाणे किंवा उदयाचलाच्या शिखरावरून पूर्ण चंद्र अथवा बालसूर्य उगवावा त्याप्रमाणे ते गंधकुटीच्या दारातून बाहेर पडले. बाहेर पडून ते गंधकुटीच्या समोर उभे राहिले. အထဿ ကာယတော မေဃမုခေဟိ ဝိဇ္ဇုကလာပါ ဝိယ ရသ္မိယော နိက္ခမိတွာ သုဝဏ္ဏရသဓာရာပရိသေကပိဉ္ဇရပတ္တပုပ္ဖဖလဝိဋပေ ဝိယ အာရာမရုက္ခေ ကရိံသု. တာဝဒေဝ စ အတ္တနော အတ္တနော ပတ္တစီဝရမာဒါယ မဟာဘိက္ခုသံဃော ဘဂဝန္တံ ပရိဝါရေသိ. တေ ပန ပရိဝါရေတွာ ဌိတာ ဘိက္ခူ ဧဝရူပါ အဟေသုံ – အပ္ပိစ္ဆာ သန္တုဋ္ဌာ ပဝိဝိတ္တာ အသံသဋ္ဌာ အာရဒ္ဓဝီရိယာ ဝတ္တာရော ဝစနက္ခမာ စောဒကာ ပါပဂရဟိနော သီလသမ္ပန္နာ သမာဓိသမ္ပန္နာ ပညာဝိမုတ္တိဝိမုတ္တိဉာဏဒဿနသမ္ပန္နာ. တေဟိ ပရိဝါရိတော ဘဂဝါ ရတ္တကမ္ဗလပရိက္ခိတ္တော ဝိယ သုဝဏ္ဏက္ခန္ဓော, ရတ္တပဒုမသဏ္ဍမဇ္ဈဂတာ ဝိယ သုဝဏ္ဏနာဝါ, ပဝါဠဝေဒိကာပရိက္ခိတ္တော ဝိယ သုဝဏ္ဏပါသာဒေါ ဝိရောစိတ္ထ. သာရိပုတ္တမောဂ္ဂလ္လာနာဒယော မဟာထေရာပိ နံ မေဃဝဏ္ဏံ ပံသုကူလံ ပါရုပိတွာ မဏိဝမ္မဝမ္မိကာ ဝိယ မဟာနာဂါ ပရိဝါရယိံသု ဝန္တရာဂါ ဘိန္နကိလေသာ ဝိဇဋိတဇဋာ ဆိန္နဗန္ဓနာ ကုလေ ဝါ ဂဏေ ဝါ အလဂ္ဂါ. त्यानंतर त्यांच्या शरीरातून, काळ्या ढगांतून विजेचे लोळ बाहेर पडावेत त्याप्रमाणे, रश्मी (किरण) बाहेर पडले. सोन्याच्या साखळीसारख्या असणाऱ्या त्या किरणांनी चहूबाजूंच्या बागेतील झाडांना जणू सोन्याची पाने, फुले, फळे आणि फांद्या असलेले बनवले. त्याच क्षणी आपापले पात्र आणि चीवर घेऊन मोठ्या भिक्षुसंघाने भगवंतांना वेढले. भगवंतांच्या भोवती उभे राहिलेले ते भिक्षू अशा गुणांचे होते – अल्पेच्छ, संतुष्ट, एकांतप्रिय, असंसृष्ट (लोकात न मिसळणारे), उद्योगी, उपदेश करणारे, सहनशील, दोष दाखवून देणारे, पापाची निंदा करणारे, शीलसंपन्न, समाधिसंपन्न आणि प्रज्ञाविमुक्त व विमुक्तीज्ञानदर्शनसंपन्न. त्या भिक्षूंनी वेढलेले भगवान, लाल वस्त्राने वेढलेल्या सोन्याच्या खांबाप्रमाणे, लाल कमळांच्या वनातून जाणाऱ्या सोन्याच्या नौकेप्रमाणे किंवा पोवळ्यांच्या वेदीने वेढलेल्या सुवर्ण प्रासादाप्रमाणे शोभून दिसत होते. सारिपुत्त, मोग्गलान इत्यादी महाथेरसुद्धा काळ्या ढगांच्या रंगाचे पांसुकूल चीवर पांघरून, मण्यांच्या चिलखताने सुसज्ज असलेल्या मोठ्या हत्तींप्रमाणे, रागमुक्त, क्लेश नष्ट केलेले, तृष्णेचे जाळे तोडलेले, बंधने तोडलेले आणि कुळात वा गणात आसक्त न राहता त्या भगवंतांच्या भोवती वेढून उभे राहिले. ဣတိ ဘဂဝါ သယံ ဝီတရာဂေါ ဝီတရာဂေဟိ, ဝီတဒေါသော ဝီတဒေါသေဟိ, ဝီတမောဟော ဝီတမောဟေဟိ, နိတ္တဏှော နိတ္တဏှေဟိ, နိက္ကိလေသော နိက္ကိလေသေဟိ, သယံ ဗုဒ္ဓေါ ဗဟုဿုတဗုဒ္ဓေဟိ ပရိဝါရိတော ပတ္တပရိဝါရိတံ ဝိယ [Pg.90] ကေသရံ, ကေသရပရိဝါရိတာ ဝိယ ကဏ္ဏိကာ, အဋ္ဌနာဂသဟဿပရိဝါရိတော ဝိယ ဆဒ္ဒန္တော နာဂရာဇာ, နဝုတိဟံသသဟဿပရိဝါရိတော ဝိယ ဓတရဋ္ဌော ဟံသရာဇာ, သေနင်္ဂပရိဝါရိတော ဝိယ စက္ကဝတ္တိရာဇာ, မရုဂဏပရိဝါရိတော ဝိယ သက္ကော ဒေဝရာဇာ, ဗြဟ္မဂဏပရိဝါရိတော ဝိယ ဟာရိတမဟာဗြဟ္မာ, တာရာဂဏပရိဝါရိတော ဝိယ ပုဏ္ဏစန္ဒော အသမေန ဗုဒ္ဓဝေသေန အပရိမာဏေန ဗုဒ္ဓဝိလာသေန ကပိလဝတ္ထုဂါမိမဂ္ဂံ ပဋိပဇ္ဇိ. अशा प्रकारे भगवान स्वतः रागमुक्त असून रागमुक्तांद्वारे, स्वतः द्वेषमुक्त असून द्वेषमुक्तांद्वारे, स्वतः मोहमुक्त असून मोहमुक्तांद्वारे, स्वतः तृष्णामुक्त असून तृष्णामुक्तांद्वारे, स्वतः क्लेशमुक्त असून क्लेशमुक्तांद्वारे आणि स्वतः बुद्ध असून बहुश्रुत बुद्धांद्वारे (अर्हतांद्वारे) वेढलेले होते. पाकळ्यांनी वेढलेल्या परागकणांप्रमाणे, परागकणांनी वेढलेल्या कमळाच्या कर्णिकेप्रमाणे, आठ हजार हत्तींनी वेढलेल्या छद्दंत हत्तींच्या राजाप्रमाणे, नव्वद हजार हंसांनी वेढलेल्या धृतराष्ट्र हंसराजाप्रमाणे, चतुरंग सैन्याने वेढलेल्या चक्रवर्ती राजाप्रमाणे, देवगणांनी वेढलेल्या देवराज शक्राप्रमाणे, ब्रह्मगणांनी वेढलेल्या हारित महाब्रह्माप्रमाणे आणि तारागणांनी वेढलेल्या पूर्ण चंद्राप्रमाणे, ते अतुलनीय अशा बुद्धवेषात आणि अमर्याद बुद्धवैभवाने कपिलवस्तूकडे जाणाऱ्या मार्गावर मार्गस्थ झाले. အထဿ ပုရတ္ထိမကာယတော သုဝဏ္ဏဝဏ္ဏာ ရသ္မိ ဥဋ္ဌဟိတွာ အသီတိဟတ္ထဋ္ဌာနံ အဂ္ဂဟေသိ ပစ္ဆိမ-ကာယတော, ဒက္ခိဏဟတ္ထတော, ဝါမဟတ္ထတော သုဝဏ္ဏဝဏ္ဏာ ရသ္မိ ဥဋ္ဌဟိတွာ အသီတိဟတ္ထဋ္ဌာနံ အဂ္ဂဟေသိ. ဥပရိ ကေသန္တတော ပဋ္ဌာယ သဗ္ဗကေသာဝဋ္ဋေဟိ မောရဂီဝဝဏ္ဏာ ရသ္မိ ဥဋ္ဌဟိတွာ ဂဂနတလေ အသီတိဟတ္ထဋ္ဌာနံ အဂ္ဂဟေသိ. ဟေဋ္ဌာ ပါဒတလေဟိ ပဝါဠဝဏ္ဏာ ရသ္မိ ဥဋ္ဌဟိတွာ ဃနပထဝိံ အသီတိဟတ္ထဋ္ဌာနံ အဂ္ဂဟေသိ. ဧဝံ သမန္တာ အသီတိဟတ္ထဋ္ဌာနံ ဆဗ္ဗဏ္ဏာ ဗုဒ္ဓရသ္မိယော ဝိဇ္ဇောတမာနာ ဝိပ္ဖန္ဒမာနာ ကဉ္စနဒဏ္ဍဒီပိကာဟိ နိစ္ဆရိတွာ အာကာသံ ပက္ခန္ဒဇာလာ ဝိယ စာတုဒ္ဒီပိကမဟာမေဃတော နိက္ခန္တဝိဇ္ဇုလတာ ဝိယ ဝိဓာဝိံသု. သဗ္ဗဒိသာဘာဂါ သုဝဏ္ဏစမ္ပကပုပ္ဖေဟိ ဝိကိရိယမာနာ ဝိယ, သုဝဏ္ဏဃဋတော နိက္ခန္တသုဝဏ္ဏရသဓာရာဟိ သိဉ္စမာနာ ဝိယ, ပသာရိတသုဝဏ္ဏပဋပရိက္ခိတ္တာ ဝိယ, ဝေရမ္ဘဝါတသမုဋ္ဌိတကိံသုကကဏိကာရပုပ္ဖစုဏ္ဏသမောကိဏ္ဏာ ဝိယ ဝိပ္ပဘာသိံသု. त्यानंतर त्यांच्या शरीराच्या पुढील भागातून सुवर्णवर्णी प्रकाशकिरण निघून ऐंशी हात जागेत पसरला. तसेच मागील भागातून, उजव्या हातातून आणि डाव्या हातातून सुवर्णवर्णी प्रकाशकिरण निघून ऐंशी हात जागेत पसरला. वर केसांच्या टोकापासून सुरू करून सर्व केसांच्या कुरळांमधून मोराच्या मानेच्या रंगासारखा प्रकाशकिरण निघून आकाशात ऐंशी हात जागेत पसरला. खाली पाऊलांच्या तळव्यांमधून प्रवाळाच्या रंगासारखा प्रकाशकिरण निघून घनदाट पृथ्वीला भेदून ऐंशी हात जागेत पसरला. अशा प्रकारे चहूबाजूंनी ऐंशी हात जागेत चमकणारे आणि थरथरणारे सहा रंगांचे बुद्ध-किरण सोन्याच्या मशालींमधून निघणाऱ्या ज्वाळांप्रमाणे आकाशात धावले, जणू चारही द्वीपांवर पसरलेल्या महामेघातून चमकणारी वीजच धावत असावी. सर्व दिशांचे भाग जणू सोन्याच्या चाफ्याच्या फुलांनी विखुरल्यासारखे, सोन्याच्या घागरीतून निघणाऱ्या सुवर्णरसाच्या धारांनी सिंचन केल्यासारखे, पसरलेल्या सुवर्णवस्त्राने वेढल्यासारखे आणि वेरुंभ वाऱ्याने उडवलेल्या पळसाच्या व कण्हेरीच्या फुलांच्या चूर्णाने चहूबाजूंनी भरल्यासारखे सुशोभित झाले. ဘဂဝတောပိ အသီတိအနုဗျဉ္ဇနဗျာမပ္ပဘာဒွတ္တိံသဝရလက္ခဏသမုဇ္ဇလသရီရံ သမုဂ္ဂတတာရကံ ဝိယ ဂဂနတလံ, ဝိကသိတမိဝ ပဒုမဝနံ, သဗ္ဗပါလိဖုလ္လော ဝိယ ယောဇနသတိကော ပါရိစ္ဆတ္တကော, ပဋိပါဋိယာ ဌပိတာနံ ဒွတ္တိံသစန္ဒာနံ ဒွတ္တိံသသူရိယာနံ ဒွတ္တိံသစက္ကဝတ္တီနံ ဒွတ္တိံသဒေဝရာဇာနံ ဒွတ္တိံသမဟာဗြဟ္မာနံ သိရိယာ သိရိံ အဘိဘဝမာနံ ဝိယ ဝိရောစိတ္ထ, ယထာ တံ ဒသဟိ ပါရမီဟိ ဒသဟိ ဥပပါရမီဟိ ဒသဟိ ပရမတ္ထပါရမီဟိ သမ္မဒေဝ ပူရိတာဟိ သမတိံသပါရမိတာဟိ အလင်္ကတံ. ကပ္ပသတသဟဿာဓိကာနိ စတ္တာရိ အသင်္ချေယျာနိ ဒိန္နဒါနံ ရက္ခိတသီလံ ကတကလျာဏကမ္မံ ဧကသ္မိံ အတ္တဘာဝေ ဩတရိတွာ ဝိပါကံ ဒါတုံ ဌာနံ အလဘမာနံ သမ္ဗာဓပတ္တံ ဝိယ အဟောသိ. နာဝါသဟဿဘဏ္ဍံ ဧကနာဝံ အာရောပနကာလော ဝိယ, သကဋသဟဿဘဏ္ဍံ ဧကသကဋံ အာရောပနကာလော ဝိယ, ပဉ္စဝီသတိယာ ဂင်္ဂါနံ [Pg.91] ဩဃဿ သမ္ဘိဇ္ဇ မုခဒွါရေ ဧကတော ရာသိဘူတကာလော ဝိယ အဟောသိ. भगवंतांचे ऐंशी अनुव्यंजने, व्यामप्रभा आणि बत्तीस महापुरुष लक्षणांनी देदीप्यमान असलेले शरीर, जणू ताऱ्यांनी युक्त असलेले आकाशमंडळ, किंवा उमललेले कमळवन, किंवा शंभर योजने विस्तारलेले आणि पूर्णपणे बहरलेले पारिजातकाचे झाड यांसारखे शोभून दिसत होते. एका ओळीत ठेवलेल्या बत्तीस चंद्रांची, बत्तीस सूर्यांची, बत्तीस चक्रवर्ती राजांची, बत्तीस देवराजांची आणि बत्तीस महाब्रह्मांची शोभा आपल्या एकाच तेजाने पराभूत करत असल्यासारखे ते शोभून दिसत होते; जसे दहा पारमिता, दहा उपपारमिता आणि दहा परमार्थ पारमिता अशा पूर्णपणे पूर्ण केलेल्या तीस पारमितांनी सुशोभित केलेले शरीर शोभून दिसते. एक लाख कल्प अधिक चार असंख्येय काळापर्यंत दिलेले दान, रक्षिलेले शील आणि केलेले कल्याणकारी कर्म एकाच जन्मात एकत्र येऊन फळ देण्यासाठी जागा न मिळाल्यामुळे जणू संकोचात पडल्यासारखे झाले होते. जणू हजार नौकांचे सामान एकाच नौकेत चढवण्याची वेळ आली असावी, किंवा हजार गाड्यांचे सामान एकाच गाडीत चढवण्याची वेळ आली असावी, किंवा पंचवीस गंगा नद्यांचे प्रवाह एकत्र येऊन समुद्राच्या मुखाशी एकाच ठिकाणी साचल्यासारखे झाले होते. ဣမာယ ဗုဒ္ဓသိရိယာ ဩဘာသမာနဿာပိ စ ဘဂဝတော ပုရတော အနေကာနိ ဒဏ္ဍဒီပိကာသဟဿာနိ ဥက္ခိပိံသု, တထာ ပစ္ဆတော, ဝါမပဿေ, ဒက္ခိဏပဿေ. ဇာတိသုမနစမ္ပကဝနမလ္လိကာရတ္တုပ္ပလ-နီလုပ္ပလ-ဗကုလသိန္ဒုဝါရပုပ္ဖာနိ စေဝ နီလပီတာဒိဝဏ္ဏသုဂန္ဓဂန္ဓစုဏ္ဏာနိ စ စာတုဒ္ဒီပိကမေဃဝိဿဋ္ဌာ ဥဒကဝုဋ္ဌိယော ဝိယ ဝိပ္ပကိရိယိံသု. ပဉ္စင်္ဂိကတူရိယနိဂ္ဃောသာ စေဝ ဗုဒ္ဓဓမ္မသံဃဂုဏပဋိသံယုတ္တာ ထုတိဃောသာ စ သဗ္ဗာ ဒိသာ ပူရယိံသု. ဒေဝမနုဿနာဂသုပဏ္ဏဂန္ဓဗ္ဗယက္ခာဒီနံ အက္ခီနိ အမတပါနံ ဝိယ လဘိံသု. ဣမသ္မိံ ပန ဌာနေ ဌတွာ ပဒသဟဿေန ဂမနဝဏ္ဏံ ဝတ္တုံ ဝဋ္ဋတိ. တတြိဒံ မုခမတ္တံ – या बुद्धशोभेने भगवंत प्रकाशमान होत असतानाही, त्यांच्या पुढे हजारो मशाली उंचावल्या गेल्या; तसेच मागे, डाव्या बाजूला आणि उजव्या बाजूलाही उंचावल्या गेल्या. जाई, चाफा, रानमोगरा, मोगरा, लाल कमळ, निळे कमळ, बकुळ आणि निर्गुडीची फुले, तसेच निळ्या, पिवळ्या इत्यादी रंगांचे सुगंधी गंधचूर्ण, चारही द्वीपांवर बरसणाऱ्या महामेघाच्या जलवृष्टीप्रमाणे चहूबाजूला विखुरले गेले. पाच अंगांनी युक्त असलेल्या वाद्यांचे आवाज आणि बुद्ध, धम्म व संघ यांच्या गुणांशी संबंधित स्तुतीघोष यांनी सर्व दिशा भरून गेल्या. देव, मनुष्य, नाग, गरुड, गंधर्व, यक्ष इत्यादींच्या डोळ्यांना जणू अमृतपानाचा लाभ झाला. आता या ठिकाणी थांबून हजार पदांनी भगवंतांच्या गमनाची प्रशंसा करणे योग्य ठरेल. त्याविषयी हे केवळ थोडक्यात सांगणे आहे – ‘‘ဧဝံ သဗ္ဗင်္ဂသမ္ပန္နော, ကမ္ပယန္တော ဝသုန္ဓရံ; အဟေဌယန္တော ပါဏာနိ, ယာတိ လောကဝိနာယကော. “अशा प्रकारे सर्व अंगांनी संपन्न असलेले, पृथ्वीला कंपित करणारे आणि प्राण्यांना पीडा न देता, जगाचे मार्गदर्शक असलेले बुद्ध चालतात. ‘‘ဒက္ခိဏံ ပဌမံ ပါဒံ, ဥဒ္ဓရန္တော နရာသဘောဂစ္ဆန္တော သိရိသမ္ပန္နော, သောဘတေ ဒွိပဒုတ္တမော. “प्रथम उजवे पाऊल उचलणारे, मनुष्यांमध्ये श्रेष्ठ, शोभासंपन्न आणि द्विपदांमध्ये उत्तम असलेले बुद्ध चालताना शोभून दिसतात. ‘‘ဂစ္ဆတော ဗုဒ္ဓသေဋ္ဌဿ, ဟေဋ္ဌာပါဒတလံ မုဒု; သမံ သမ္ဖုသတေ ဘူမိံ, ရဇသာ နုပလိပ္ပတိ. “चालत असलेल्या बुद्धश्रेष्ठांचे मऊ पाऊलतळ जमिनीला समतोलपणे स्पर्श करते आणि ते धुळीने माखत नाही. ‘‘နိန္နဋ္ဌာနံ ဥန္နမတိ, ဂစ္ဆန္တေ လောကနာယကေ; ဥန္နတဉ္စ သမံ ဟောတိ, ပထဝီ စ အစေတနာ. “जगाचे नायक चालत असताना सखल जागा उंच होते आणि उंच जागा सपाट होते; आणि ही अचेतन पृथ्वी देखील त्यांच्यासाठी अनुकूल होते. ‘‘ပါသာဏာ သက္ခရာ စေဝ, ကထလာ ခါဏုကဏ္ဋကာ; သဗ္ဗေ မဂ္ဂါ ဝိဝဇ္ဇန္တိ, ဂစ္ဆန္တေ လောကနာယကေ. “जगाचे नायक चालत असताना दगड, गोटे, खापरे, खुंट आणि काटे हे सर्व त्यांच्या मार्गातून दूर होतात. ‘‘နာတိဒူရေ ဥဒ္ဓရတိ, နစ္စာသန္နေ စ နိက္ခိပံ; အဃဋ္ဋယန္တော နိယျာတိ, ဥဘော ဇာဏူ စ ဂေါပ္ဖကေ. “ते आपले पाऊल फार लांब टाकत नाहीत आणि फार जवळही ठेवत नाहीत; दोन्ही गुडघे आणि घोटे एकमेकांना न घासता ते पुढे जातात. ‘‘နာတိသီဃံ ပက္ကမတိ, သမ္ပန္နစရဏော မုနိ; န စာပိ သဏိကံ ယာတိ, ဂစ္ဆမာနော သမာဟိတော. “चरणसंपन्न मुनी फार वेगाने चालत नाहीत आणि फार हळूहळूही जात नाहीत; ते एकाग्र चित्ताने चालतात. ‘‘ဥဒ္ဓံ အဓော စ တိရိယဉ္စ, ဒိသဉ္စ ဝိဒိသံ တထာ; န ပေက္ခမာနော သော ယာတိ, ယုဂမတ္တဉှိ ပေက္ခတိ. “ते वर, खाली, तिरके, मुख्य दिशा किंवा उपदिशांकडे न पाहता चालतात; ते केवळ एका जू अंतरावरच समोर पाहतात. ‘‘နာဂဝိက္ကန္တစာရော [Pg.92] သော, ဂမနေ သောဘတေ ဇိနော; စာရုံ ဂစ္ဆတိ လောကဂ္ဂေါ, ဟာသယန္တော သဒေဝကေ. “हत्तीसारखी चाल असलेले ते जिन चालताना शोभून दिसतात; जगामध्ये सर्वश्रेष्ठ असलेले बुद्ध देवांसह संपूर्ण जगाला आनंदित करत सुंदर रीतीने चालतात. ‘‘ဥဠုရာဇာဝ သောဘန္တော, စတုစာရီဝ ကေသရီ; တောသယန္တော ဗဟူ သတ္တေ, ပုရံ သေဋ္ဌံ ဥပါဂမီ’’တိ. “चंद्राप्रमाणे शोभणारे, चार पायांनी चालणाऱ्या सिंहराजाप्रमाणे चालणारे आणि अनेक प्राण्यांना संतुष्ट करणारे बुद्ध श्रेष्ठ नगरात प्रवेश करते झाले.” हे केवळ थोडक्यात सांगणे आहे. ဝဏ္ဏကာလော နာမ ကိရေသ, ဧဝံဝိဓေသု ကာလေသု ဗုဒ္ဓဿ သရီရဝဏ္ဏေ ဝါ ဂုဏဝဏ္ဏေ ဝါ ဓမ္မကထိကဿ ထာမောယေဝ ပမာဏံ. စုဏ္ဏိယပဒေဟိ ဝါ ဂါထာဗန္ဓေန ဝါ ယတ္တကံ သက္ကောတိ, တတ္တကံ ဝတ္တဗ္ဗံ. ဒုက္ကထိတန္တိ န ဝတ္တဗ္ဗံ. အပ္ပမာဏဝဏ္ဏာ ဟိ ဗုဒ္ဓါ. တေသံ ဗုဒ္ဓါပိ အနဝသေသတော ဝဏ္ဏံ ဝတ္တုံ အသမတ္ထာ, ပဂေဝ ဣတရာ ပဇာတိ. ဣမိနာ သိရိဝိလာသေန အလင်္ကတပဋိယတ္တံ သကျရာဇကုလံ ပဝိသိတွာ ဘဂဝါ ပသန္နစိတ္တေန ဇနေန ဂန္ဓဓူမဝါသစုဏ္ဏာဒီဟိ ပူဇိယမာနော သန္ထာဂါရံ ပါဝိသိ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘အထ ခေါ ဘဂဝါ နိဝါသေတွာ ပတ္တစီဝရမာဒါယ သဒ္ဓိံ ဘိက္ခုသံဃေန ယေန နဝံ သန္ထာဂါရံ တေနုပသင်္ကမီ’’တိ. खरोखर, हा स्तुतीचा काळ आहे. अशा प्रसंगी बुद्धांच्या शरीराच्या सौंदर्याचे किंवा गुणांचे वर्णन करताना धम्मकथिकाचे सामर्थ्यच प्रमाण असते. गद्य पदांनी किंवा पद्य रचनेने जितके शक्य असेल तितके वर्णन करावे. “हे अपूर्ण किंवा वाईट रीतीने सांगितले गेले” असे म्हणू नये. कारण बुद्ध हे अमर्याद गुणांचे धनी आहेत. त्यांचे गुण पूर्णपणे सांगण्यास स्वतः बुद्धही असमर्थ आहेत, मग इतर लोकांची काय कथा! या शोभा-विलासाने सुशोभित व सज्ज होऊन शाक्य राजांच्या नगरात प्रवेश करून, प्रसन्न चित्त असलेल्या लोकांकडून गंध, धूप, सुगंधी चूर्ण इत्यादींनी पूजिले जात भगवंत सभागृहात प्रवेश करते झाले. म्हणूनच म्हटले आहे: “त्यानंतर भगवंतांनी चीवर परिधान करून, पात्र व चीवर घेऊन भिक्खू संघासह जेथे नवीन सभागृह होते, तेथे प्रयाण केले.” ဘဂဝန္တံယေဝ ပုရက္ခတွာတိ ဘဂဝန္တံ ပုရတော ကတွာ. တတ္ထ ဘဂဝါ ဘိက္ခူနဉ္စေဝ ဥပါသကာနဉ္စ မဇ္ဈေ နိသိန္နော ဂန္ဓောဒကေန နှာပေတွာ ဒုကူလစုမ္ဗဋကေန ဝေါဒကံ ကတွာ ဇာတိဟိင်္ဂုလကေန မဇ္ဇိတွာ ရတ္တကမ္ဗလပလိဝေဌိတေ ပီဌေ ဌပိတရတ္တသုဝဏ္ဏဃနပဋိမာ ဝိယ အတိဝိရောစိတ္ထ. အယံ ပနေတ္ထ ပေါရာဏာနံ ဝဏ္ဏဘဏနမဂ္ဂေါ – “भगवंतांनाच पुढे करून” म्हणजे भगवंतांना अग्रभागी ठेवून. तेथे भिक्खू आणि उपासकांच्या मध्ये बसलेले भगवंत, सुगंधी पाण्याने स्नान घातलेल्या, रेशमी वस्त्राने पाणी पुसून कोरडे केलेल्या, शुद्ध हिंगुळाने घासून लाल घोंगडीने वेढलेल्या आसनावर ठेवलेल्या शुद्ध सोन्याच्या मूर्तीप्रमाणे अत्यंत शोभून दिसत होते. प्राचीन आचार्यांची गुणांचे वर्णन करण्याची ही पद्धत आहे – ‘‘ဂန္တွာန မဏ္ဍလမာဠံ, နာဂဝိက္ကန္တစာရဏော; ဩဘာသယန္တော လောကဂ္ဂေါ, နိသီဒိ ဝရမာသနေ. “हत्तीसारखी चाल असलेले, जगामध्ये सर्वश्रेष्ठ असलेले बुद्ध सभागृहात जाऊन, ते प्रकाशित करत श्रेष्ठ आसनावर बसले. ‘‘တဟိံ နိသိန္နော နရဒမ္မသာရထိ,ဒေဝါတိဒေဝေါ သတပုညလက္ခဏော; ဗုဒ္ဓါသနေ မဇ္ဈဂတော ဝိရောစတိ,သုဝဏ္ဏနေက္ခံ ဝိယ ပဏ္ဍုကမ္ဗလေ. “तेथे बुद्ध आसनावर बसलेले, दमन करण्यास योग्य असलेल्या मनुष्यांचे सारथी, देवांचेही देव, शेकडो पुण्याच्या लक्षणांनी युक्त असलेले बुद्ध, पांडुकंबळ शिलाखंडावर ठेवलेल्या सोन्याच्या निष्काप्रमाणे मध्यभागी शोभून दिसत होते. ‘‘နေက္ခံ ဇမ္ဗောနဒဿေဝ, နိက္ခိတ္တံ ပဏ္ဍုကမ္ဗလေ; ဝိရောစတိ ဝီတမလော, မဏိဝေရောစနော ယထာ. “पांडुकंबळ शिलाखंडावर ठेवलेल्या जांबूनद सोन्याच्या निष्काप्रमाणे, मळरहित असलेले बुद्ध वैरोचन मण्याप्रमाणे शोभून दिसत होते. ‘‘မဟာသာလောဝ [Pg.93] သမ္ဖုလ္လော, နေရုရာဇာဝ’လင်္ကတော; သုဝဏ္ဏယူပသင်္ကာသော, ပဒုမော ကောကနဒေါ ယထာ. “पूर्णपणे बहरलेल्या मोठ्या साल वृक्षाप्रमाणे, सुशोभित मेरू पर्वताप्रमाणे, सोन्याच्या यूपासारखे आणि लाल कमळाप्रमाणे ते दिसत होते. ‘‘ဇလန္တော ဒီပရုက္ခောဝ, ပဗ္ဗတဂ္ဂေ ယထာ သိခီ; ဒေဝါနံ ပါရိစ္ဆတ္တောဝ, သဗ္ဗဖုလ္လော ဝိရောစတီ’’တိ. “तेजस्वी दीपवृक्षाप्रमाणे, पर्वताच्या शिखरावरील अग्नीप्रमाणे आणि देवांच्या पूर्णपणे बहरलेल्या पारिजातकाप्रमाणे ते शोभून दिसत होते.” हे गुणांचे वर्णन आहे. ကာပိလဝတ္ထဝေ သကျေ ဗဟုဒေဝ ရတ္တိံ ဓမ္မိယာ ကထာယာတိ ဧတ္ထ ဓမ္မကထာ နာမ သန္ထာဂါရာနုမောဒနာပဋိသံယုတ္တာ ပကိဏ္ဏကကထာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. တဒါ ဟိ ဘဂဝါ အာကာသဂင်္ဂံ ဩတာရေန္တော ဝိယ ပထဝေါဇံ အာကဍ္ဎန္တော ဝိယ မဟာဇမ္ဗုံ မတ္ထကေ ဂဟေတွာ စာလေန္တော ဝိယ ယောဇနိကံ မဓုဘဏ္ဍံ စက္ကယန္တေန ပီဠေတွာ မဓုပါနံ ပါယမာနော ဝိယ ကပိလဝတ္ထုဝါသီနံ သကျာနံ ဟိတသုခါဝဟံ ပကိဏ္ဏကကထံ ကထေသိ. ‘‘အာဝါသဒါနံ နာမေတံ, မဟာရာဇ, မဟန္တံ, တုမှာကံ အာဝါသော မယာ ပရိဘုတ္တော, ဘိက္ခုသံဃေန စ ပရိဘုတ္တော, မယာ စ ဘိက္ခုသံဃေန စ ပရိဘုတ္တော ပန ဓမ္မရတနေန ပရိဘုတ္တောယေဝါတိ တီဟိ ရတနေဟိ ပရိဘုတ္တော နာမ ဟောတိ. အာဝါသဒါနသ္မိဉှိ ဒိန္နေ သဗ္ဗဒါနံ ဒိန္နမေဝ ဟောတိ. ဘုမ္မဋ္ဌကပဏ္ဏသာလာယ ဝါ သာခါမဏ္ဍပဿ ဝါပိ အာနိသံသော နာမ ပရိစ္ဆိန္ဒိတုံ န သက္ကာ. အာဝါသဒါနာနုဘာဝေန ဟိ ဘဝေ ဘဝေ နိဗ္ဗတ္တဿာပိ သမ္ဗာဓိတဂဗ္ဘဝါသော န ဟောတိ, ဒွါဒသဟတ္ထော ဩဝရကော ဝိယ မာတုကုစ္ဆိ အသမ္ဗာဓောဝ ဟောတီ’’တိ. ဧဝံ နာနာနယဝိစိတ္တံ ဗဟုံ ဓမ္မိံ ကထံ ကထေတွာ – कपिलवस्तूतील शाक्यांना रात्रीच्या वेळी बऱ्याच वेळपर्यंत केलेल्या धम्मकथेच्या संदर्भात येथे 'धम्मकथा' म्हणजे संथागाराच्या (सभेच्या) अनुमोदनाशी संबंधित असलेली संकीर्ण (विविध) कथा असे समजावे. कारण त्यावेळी भगवंतांनी, जणू काही आकाशातील गंगेला खाली उतरवावे त्याप्रमाणे, किंवा पृथ्वीचा रस वर खेचून घ्यावा त्याप्रमाणे, किंवा एका मोठ्या जांभळाच्या झाडाला शेंड्याला धरून हलवावे त्याप्रमाणे, किंवा योजनेभर पसरलेल्या मधाच्या पोळ्याला यंत्राने पिळून मधाचे पेय पाजावे त्याप्रमाणे, कपिलवस्तूमध्ये राहणाऱ्या शाक्यांना हित आणि सुख देणारी संकीर्ण धम्मकथा सांगितली. ते म्हणाले, 'हे महाराजा, हे आवासदान अत्यंत महान आहे. तुमचा हा आवास मी स्वतः वापरला आहे, भिक्खू संघाने वापरला आहे, आणि माझ्याद्वारे व भिक्खू संघाद्वारे वापरला गेल्यामुळे तो धम्मरत्नाने देखील वापरला गेला आहे; अशा प्रकारे तो तिन्ही रत्नांनी वापरला गेला आहे असे होते. आवासदान दिले असता सर्वच दाने दिल्यासारखे होते. जमिनीवर बांधलेल्या पानांच्या कुटीचे किंवा फांद्यांच्या मंडपाचे देखील जे पुण्य असते, त्याचे मोजमाप करणे शक्य नाही. आवासदानाच्या प्रभावाने प्रत्येक जन्मात जन्म घेताना गर्भाशयात संकुचितपणे राहावे लागत नाही, तर बारा हातांच्या खोलीप्रमाणे मातेचे गर्भाशय अरुंद न राहता प्रशस्तच राहते.' अशा प्रकारे विविध पद्धती आणि वैचित्र्यांनी युक्त अशी पुष्कळ धम्मकथा सांगून – ‘‘သီတံ ဥဏှံ ပဋိဟန္တိ, တတော ဝါဠမိဂါနိ စ; သိရီသပေ စ မကသေ, သိသိရေ စာပိ ဝုဋ္ဌိယော. तो थंडी आणि उष्णतेचे निवारण करतो, तसेच हिंस्त्र श्वापदे, सरपटणारे प्राणी, डास, हिवाळ्यातील थंडी आणि पाऊस यांचेही निवारण करतो. ‘‘တတော ဝါတာတပေါ ဃောရော, သဉ္ဇာတော ပဋိဟညတိ; လေဏတ္ထဉ္စ သုခတ္ထဉ္စ, ဈာယိတုဉ္စ ဝိပဿိတုံ. त्याचप्रमाणे निर्माण होणारा तीव्र वारा आणि ऊन यांचेही निवारण विहाराद्वारे केले जाते. ध्यान करण्यासाठी, विपश्यना करण्यासाठी, सुखासाठी आणि सुरक्षित आश्रयासाठी तो उपयुक्त ठरतो. ‘‘ဝိဟာရဒါနံ သံဃဿ, အဂ္ဂံ ဗုဒ္ဓေန ဝဏ္ဏိတံ; တသ္မာ ဟိ ပဏ္ဍိတော ပေါသော, သမ္ပဿံ အတ္ထမတ္တနော. संघाला विहारदान देणे हे बुद्धांनी सर्वश्रेष्ठ दान म्हणून प्रशंसिले आहे. म्हणूनच, स्वतःचे हित पाहणाऱ्या सुज्ञ मनुष्याने... ‘‘ဝိဟာရေ ကာရယေ ရမ္မေ, ဝါသယေတ္ထ ဗဟုဿုတေ; တေသံ အန္နဉ္စ ပါနဉ္စ, ဝတ္ထသေနာသနာနိ စ. रमणीय विहारांची निर्मिती करावी आणि त्यामध्ये बहुश्रुत भिक्खूंना निवास द्यावा. त्यांना अन्न, पेय, वस्त्र आणि शय्या-आसने द्यावीत. ‘‘ဒဒေယျ [Pg.94] ဥဇုဘူတေသု, ဝိပ္ပသန္နေန စေတသာ; တေ တဿ ဓမ္မံ ဒေသေန္တိ, သဗ္ဗဒုက္ခာပနူဒနံ; ယံ သော ဓမ္မံ ဣဓညာယ, ပရိနိဗ္ဗာတိ အနာသဝေါ’’တိ. (စူဠဝ. ၂၉၅) – सरळ मार्गाने चालणाऱ्या भिक्खूंना प्रसन्न चित्ताने दान द्यावे. ते भिक्खू त्याला सर्व दुःखांचे निवारण करणाऱ्या धम्माचा उपदेश करतात, ज्या धम्माला या लोकात जाणून घेऊन तो मनुष्य आसवमुक्त होऊन परिनिर्वाण प्राप्त करतो. ဧဝံ ‘‘အယမ္ပိ အာဝါသေ အာနိသံသော, အယမ္ပိ အာဝါသေ အာနိသံသော’’တိ ဗဟုဒေဝ ရတ္တိံ အတိရေကတရံ ဒိယဍ္ဎယာမံ အာဝါသာနိသံသကထံ ကထေသိ. တတ္ထ ဣမာ တာဝ ဂါထာဝ သင်္ဂဟံ အာရုဠှာ, ပကိဏ္ဏကဓမ္မဒေသနာ ပန သင်္ဂဟံ နာရောဟတိ. သန္ဒဿေတွာတိအာဒီနိ ဝုတ္တတ္ထာနေဝ. अशा प्रकारे, 'हा देखील विहाराचा फायदा आहे, हा देखील विहाराचा फायदा आहे' असे सांगत रात्रीच्या वेळी दीड प्रहरापेक्षाही अधिक काळ विहाराच्या फायद्यांविषयी कथा सांगितली. त्यापैकी या गाथा संगीतीमध्ये समाविष्ट केल्या गेल्या आहेत, परंतु संकीर्ण धम्मदेशना संगीतीमध्ये समाविष्ट केली गेली नाही. 'सन्दस्सेत्वा' इत्यादी शब्दांचे अर्थ पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच आहेत. အဘိက္ကန္တာတိ အတိက္ကန္တာ ဒွေ ယာမာ ဂတာ. ယဿ ဒါနိ ကာလံ မညထာတိ ယဿ တုမှေ ဂမနဿ ကာလံ မညထ, ဂမနကာလော တုမှာကံ, ဂစ္ဆထာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ကသ္မာ ပန ဘဂဝါ တေ ဥယျောဇေသီတိ? အနုကမ္ပာယ. သုခုမာလာ ဟိ တေ, တိယာမရတ္တိံ နိသီဒိတွာ ဝီတိနာမေန္တာနံ သရီရေ အာဗာဓော ဥပ္ပဇ္ဇေယျ. ဘိက္ခုသံဃောပိ မဟာ, တဿ ဌာနနိသဇ္ဇာနံ ဩကာသော လဒ္ဓုံ ဝဋ္ဋတီတိ ဥဘယာနုကမ္ပာယ ဥယျောဇေသိ. 'अभिक्कन्ता' म्हणजे दोन प्रहर निघून गेले आहेत, संपले आहेत. 'यस्स दानि कालं मञ्ञथ' म्हणजे 'तुम्ही ज्या जाण्याची वेळ योग्य मानता, ती तुमच्या जाण्याची वेळ झाली आहे, आता तुम्ही जावे' असा अर्थ होतो. पण भगवंतांनी त्यांना का पाठवून दिले? अनुकंपेपोटी. कारण ते सुकुमार होते, रात्रीचे तिन्ही प्रहर बसून घालवल्यास त्यांच्या शरीराला व्याधी होऊ शकली असती. तसेच भिक्खू संघही मोठा होता, त्यांना उभे राहण्यासाठी व बसण्यासाठी जागा मिळणे आवश्यक होते. म्हणून दोन्ही पक्षांवर अनुकंपा करून भगवंतांनी त्यांना पाठवून दिले. ဝိဂတထိနမိဒ္ဓေါတိ တတြ ကိရ ဘိက္ခူ ယာမဒွယံ ဌိတာပိ နိသိန္နာပိ အစာလယိံသု, ပစ္ဆိမယာမေ ပန အာဟာရော ပရိဏမတိ, တဿ ပရိဏတတ္တာ ဘိက္ခုသံဃော ဝိဂတထိနမိဒ္ဓေါ ဇာတောတိ အကာရဏမေတံ. ဗုဒ္ဓါနဉှိ ကထံ သုဏန္တဿ ကာယိကစေတသိကဒရထာ န ဟောန္တိ, ကာယစိတ္တလဟုတာဒယော ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ, တေန တေသံ ဒွေ ယာမေ ဌိတာနမ္ပိ နိသိန္နာနမ္ပိ ဓမ္မံ သုဏန္တာနံ ထိနမိဒ္ဓံ ဝိဂတံ, ပစ္ဆိမယာမေပိ သမ္ပတ္တေ တထာ ဝိဂတမေဝ ဇာတံ. တေနာဟ ‘‘ဝိဂတထိနမိဒ္ဓေါ’’တိ. 'विगतथिनमिद्धो' (आळस व ग्लानी दूर झालेला) या संदर्भात असे म्हटले जाते की, तेथे भिक्खू दोन प्रहर उभे राहून किंवा बसून अजिबात हलले नाहीत. शेवटच्या प्रहरात अन्न पचते, आणि अन्न पचल्यामुळे भिक्खू संघाचा आळस व ग्लानी दूर झाली, पण हे खरे कारण नाही. कारण बुद्धांचा उपदेश ऐकणाऱ्या व्यक्तीला शारीरिक किंवा मानसिक थकवा जाणवत नाही, उलट शरीर आणि मनाचा हलकेपणा इत्यादी अवस्था निर्माण होतात. त्यामुळे दोन प्रहर उभे राहून किंवा बसून धम्म ऐकणाऱ्या त्या भिक्खूंचा आळस व ग्लानी दूर झाली होती, आणि शेवटचा प्रहर आला तरी ती तशीच दूर राहिली. म्हणूनच 'विगतथिनमिद्धो' असे म्हटले आहे. ပိဋ္ဌိ မေ အာဂိလာယတီတိ ကသ္မာ အာဂိလာယတိ? ဘဂဝတော ဟိ ဆဗ္ဗဿာနိ မဟာပဓာနံ ပဒဟန္တဿ မဟန္တံ ကာယဒုက္ခံ အဟောသိ, အထဿ အပရဘာဂေ မဟလ္လကကာလေ ပိဋ္ဌိဝါတော ဥပ္ပဇ္ဇီတိ. အကာရဏံ ဝါ ဧတံ. ပဟောတိ ဟိ ဘဂဝါ ဥပ္ပန္နံ ဝေဒနံ ဝိက္ခမ္ဘေတွာ ဧကမ္ပိ ဒွေပိ သတ္တာဟာနိ ဧကပလ္လင်္ကေန နိသီဒိတုံ. သန္ထာဂါရသာလံ ပန စတူဟိ ဣရိယာပထေဟိ ပရိဘုဉ္ဇိတုကာမော အဟောသိ. တတ္ထ ပါဒဓောဝနဋ္ဌာနတော ယာဝ ဓမ္မာသနာ အဂမာသိ, ဧတ္တကေ ဌာနေ ဂမနံ နိပ္ဖန္နံ. ဓမ္မာသနံ ပတ္တံ ထောကံ ဌတွာ နိသီဒိ, ဧတ္တကေ ဌာနေ ဌာနံ နိပ္ဖန္နံ. ဒွေယာမံ ဓမ္မာသနေ နိသီဒိ, ဧတ္တကေ ဌာနေ [Pg.95] နိသဇ္ဇာ နိပ္ဖန္နာ. ဣဒါနိ ဒက္ခိဏေန ပဿေန ထောကံ နိပန္နေ သယနံ နိပ္ဖဇ္ဇိဿတီတိ ဧဝံ စတူဟိ ဣရိယာပထေဟိ ပရိဘုဉ္ဇိတုကာမော အဟောသိ. ဥပါဒိန္နကသရီရဉ္စ နာမ ‘‘နော အာဂိလာယတီ’’တိ န ဝတ္တဗ္ဗံ, တသ္မာ စိရနိသဇ္ဇာယ သဉ္ဇာတံ အပ္ပကမ္ပိ အာဂိလာယနံ ဂဟေတွာ ဧဝမာဟ. 'माझी पाठ दुखत आहे' असे का म्हटले? भगवंतांनी सहा वर्षे कठोर तपश्चर्या केली होती, त्यामुळे त्यांच्या शरीराला मोठे कष्ट झाले होते, आणि नंतरच्या काळात, वृद्धत्वाच्या वेळी त्यांना पाठीचा वात उद्भवला होता. पण हे देखील खरे कारण नाही. कारण भगवंत उद्भवलेली वेदना दाबून ठेवून एक किंवा दोन आठवडे एकाच आसनावर बसून राहण्यास समर्थ होते. परंतु त्यांना संथागार शालेचा चारही इरियापथांनी (शारीरिक स्थितींनी) उपभोग घ्यायचा होता. तेथे पाय धुण्याच्या जागेपासून धम्मासनापर्यंत ते चालत गेले, याने 'चालणे' हा इरियापथ पूर्ण झाला. धम्मासनावर पोहोचून ते थोडे वेळ उभे राहिले, याने 'उभे राहणे' हा इरियापथ पूर्ण झाला. दोन प्रहर ते धम्मासनावर बसले, याने 'बसणे' हा इरियापथ पूर्ण झाला. आता उजव्या कुशीवर थोडे वेळ निजल्याने 'निजणे' हा इरियापथ पूर्ण होईल; अशा प्रकारे चारही इरियापथांनी उपभोग घेण्याची त्यांची इच्छा होती. आणि भौतिक शरीराला 'दुखत नाही' असे म्हणता येत नाही, म्हणून दीर्घकाळ बसल्यामुळे निर्माण झालेली थोडीशी पाठदुखी लक्षात घेऊन त्यांनी असे म्हटले. သံဃာဋိံ ပညာပေတွာတိ သန္ထာဂါရဿ ကိရ ဧကပဿေ တေ ရာဇာနော ပဋသာဏိံ ပရိက္ခိပါပေတွာ ကပ္ပိယမဉ္စကံ ပညာပေတွာ ကပ္ပိယပစ္စတ္ထရဏေန အတ္ထရိတွာ ဥပရိ သုဝဏ္ဏတာရကဂန္ဓမာလာဒိဒါမပဋိမဏ္ဍိတံ ဝိတာနံ ဗန္ဓိတွာ ဂန္ဓတေလပ္ပဒီပံ အာရောပယိံသု, ‘‘အပ္ပေဝ နာမ သတ္ထာ ဓမ္မာသနတော ဝုဋ္ဌာယ ထောကံ ဝိဿမန္တော ဣဓ နိပဇ္ဇေယျ, ဧဝံ နော ဣမံ သန္ထာဂါရံ ဘဂဝတာ စတူဟိ ဣရိယာပထေဟိ ပရိဘုတ္တံ ဒီဃရတ္တံ ဟိတာယ သုခါယ ဘဝိဿတီ’’တိ. သတ္ထာပိ တဒေဝ သန္ဓာယ တတ္ထ သံဃာဋိံ ပညာပေတွာ နိပဇ္ဇိ. ဥဋ္ဌာနသညံ မနသိ ကရိတွာတိ ‘‘ဧတ္တကံ ကာလံ အတိက္ကမိတွာ ဝုဋ္ဌဟိဿာမီ’’တိ ဝုဋ္ဌာနသညံ စိတ္တေ ဌပေတွာ, တဉ္စ ခေါ အနိဒ္ဒါယန္တောဝ ထေရဿ ဓမ္မကထံ သုဏမာနော. 'संघाटी अंथरून' या संदर्भात: संथागाराच्या एका बाजूला त्या राजांनी कापडी पडदा लावून घेतला, योग्य असा पलंग अंथरला, त्यावर योग्य बिछाना घातला, आणि वर सोन्याचे तारे, सुगंधी फुलांच्या माळा इत्यादींनी सुशोभित केलेले छत बांधले आणि सुगंधी तेलाचा दिवा लावला. 'कदाचित शास्ता धम्मासनावरून उठून, थोडी विश्रांती घेण्यासाठी येथे निजतील. अशा प्रकारे भगवंतांनी चारही इरियापथांनी वापरलेले हे संथागार आमच्यासाठी दीर्घकाळ हित आणि सुखाचे ठरेल,' असा विचार करून त्यांनी हे केले. शास्त्यांनी देखील तोच हेतू मनात ठेवून तेथे आपली संघाटी अंथरून विश्रांती घेतली. 'उठण्याची संज्ञा मनात ठेवून' म्हणजे 'इतका वेळ निघून गेल्यावर मी उठेन' अशी उठण्याची संज्ञा मनात ठेवून, आणि ते देखील न झोपता, थेरांचा धम्मोपदेश ऐकत त्यांनी विश्रांती घेतली. အဝဿုတပရိယာယန္တိ အဝဿုတဿ ပရိယာယံ, အဝဿုတဿ ကာရဏန္တိ အတ္ထော. အဓိမုစ္စတီတိ ကိလေသာဓိမုစ္စနေန အဓိမုစ္စတိ, ဂိဒ္ဓေါ ဟောတိ. ဗျာပဇ္ဇတီတိ ဗျာပါဒဝသေန ပူတိစိတ္တော ဟောတိ. စက္ခုတောတိ စက္ခုဘာဝေန. မာရောတိ ကိလေသမာရောပိ ဒေဝပုတ္တမာရောပိ. ဩတာရန္တိ ဝိဝရံ. အာရမ္မဏန္တိ ပစ္စယံ. နဠာဂါရတိဏာဂါရံ ဝိယ ဟိ သဝိသေဝနာနိ အာယတနာနိ, တိဏုက္ကာ ဝိယ ကိလေသုပ္ပတ္တိရဟံ အာရမ္မဏံ, တိဏုက္ကာယ ဌပိတဌပိတဋ္ဌာနေ အင်္ဂါရဿုဇ္ဇလနံ ဝိယ အာရမ္မဏေ အာပါထမာဂတေ ကိလေသာနံ ဥပ္ပတ္တိ. တေန ဝုတ္တံ လဘေထ မာရော ဩတာရန္တိ. 'अवस्सुतपरियायं' म्हणजे अवस्सुत (रागाने ओले झालेले किंवा आसक्त) असण्याची पद्धत किंवा त्याचे कारण असा अर्थ समजावा. 'अधिमुच्चति' म्हणजे क्लेशांच्या प्रभावामुळे आसक्त होणे, लोभी होणे. 'ब्यापज्जति' म्हणजे व्यापादाच्या (द्वेषाच्या) प्रभावाने मन कलुषित होणे. 'चक्खुतो' म्हणजे डोळ्यांच्या माध्यमातून. 'मारो' म्हणजे क्लेशमार आणि देवपुत्रमार दोन्ही. 'ओतारं' म्हणजे संधी (छिद्र). 'आरम्मणं' म्हणजे प्रत्यय (कारण). कारण, लव्हाळ्यांचे घर किंवा गवताचे घर याप्रमाणे इंद्रिये असतात; गवताच्या मशालीप्रमाणे क्लेश उत्पन्न करणारे आलंबन असते; आणि गवताची मशाल ज्या ज्या ठिकाणी ठेवली जाते तिथे घर जळू लागते, त्याप्रमाणे आलंबन समोर आल्यावर क्लेशांची उत्पत्ती होते. म्हणूनच 'माराला संधी मिळेल' असे म्हटले आहे. သုက္ကပက္ခေ ဗဟလမတ္တိကပိဏ္ဍာဝလေပနံ ကူဋာဂါရံ ဝိယ နိဗ္ဗိသေဝနာနိ အာယတနာနိ, တိဏုက္ကာ ဝိယ ဝုတ္တပကာရာရမ္မဏံ, တိဏုက္ကာယ ဌပိတဌပိတဋ္ဌာနေ နိဗ္ဗာပနံ ဝိယ နိဗ္ဗိသေဝနာနံ အာယတနာနံ အာရမ္မဏေ အာပါထမာဂတေ ကိလေသပရိဠာဟဿ အနုပ္ပတ္တိ. တေန ဝုတ္တံ နေဝ လဘေထ မာရော ဩတာရန္တိ. शुक्लपक्षात दाट मातीचा लेप लावलेल्या कुटागाराप्रमाणे (शिखरयुक्त घराप्रमाणे) सेवन न करणारी (विषयांपासून अलिप्त असणारी) आयतने जाणावीत. गवताच्या मशालीप्रमाणे पूर्वोक्त प्रकारचे आलंबन जाणावे. ज्याप्रमाणे गवताची मशाल ज्या ज्या ठिकाणी ठेवली जाते, तिथे तिथे ती विझून जाते, त्याचप्रमाणे सेवन न करणाऱ्या आयतनांच्या समोर आलंबन आले असता, क्लेशरूपी संतापाची अनुत्पत्ती (उत्पन्न न होणे) होते, असे जाणावे. म्हणूनच, 'माराला प्रवेश मिळता कामा नये' असे म्हटले आहे. ၇. ဒုက္ခဓမ္မသုတ္တဝဏ္ဏနာ ७. दुःखधम्मसुत्ताची वर्णना (टीका). ၂၄၄. သတ္တမေ [Pg.96] ဒုက္ခဓမ္မာနန္တိ ဒုက္ခသမ္ဘဝဓမ္မာနံ. ပဉ္စသု ဟိ ခန္ဓေသု သတိ ဆေဒနဝဓဗန္ဓနာဒိဘေဒံ ဒုက္ခံ သမ္ဘဝတိ, တသ္မာ တေ ဒုက္ခသမ္ဘဝဓမ္မတ္တာ ဒုက္ခဓမ္မာတိ ဝုစ္စန္တိ. တထာ ခေါ ပနဿာတိ တေနာကာရေနဿ. ယထာဿ ကာမေ ပဿတောတိ ယေနာကာရေနဿ ကာမေ ပဿန္တဿ. ယထာ စရန္တန္တိ ယေနာကာရေန စာရဉ္စ ဝိဟာရဉ္စ အနုဗန္ဓိတွာ စရန္တံ. အင်္ဂါရကာသူပမာ ကာမာ ဒိဋ္ဌာ ဟောန္တီတိ ပရိယေဋ္ဌိမူလကဿ စေဝ ပဋိသန္ဓိမူလကဿ စ ဒုက္ခဿ ဝသေန အင်္ဂါရကာသု ဝိယ မဟာပရိဠာဟာတိ ဒိဋ္ဌာ ဟောန္တိ. ကာမေ ပရိယေသန္တာနဉှိ နာဝါယ မဟာသမုဒ္ဒေါဂါဟနအဇပထသင်္ကုပထပဋိပဇ္ဇနဥဘတောဗျူဠှသင်္ဂါမပက္ခန္ဒနာဒိဝသေန ပရိယေဋ္ဌိမူလကမ္ပိ, ကာမေ ပရိဘုဉ္ဇန္တာနံ ကာမပရိဘောဂစေတနာယ စတူသု အပါယေသု ဒိန္နပဋိသန္ဓိမူလကမ္ပိ မဟာပရိဠာဟဒုက္ခံ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. ဧဝမေတဿ ဒုဝိဓဿာပိ ဒုက္ခဿ ဝသေန အင်္ဂါရကာသု ဝိယ မဟာပရိဠာဟာတိ ဒိဋ္ဌာ ဟောန္တိ. २४४. सातव्या सुत्तात, 'दुःखधम्मानं' म्हणजे दुःखाला कारणीभूत असणाऱ्या (धर्मांचे/पंचस्कंधांचे). कारण पाच स्कंध विद्यमान असताना अंगच्छेद, वध, बंधन इत्यादी विविध प्रकारचे दुःख उत्पन्न होते; म्हणून दुःखाच्या उत्पत्तीचे कारण असल्यामुळे त्यांना 'दुःखधम्म' असे म्हटले जाते. 'तथा खो पनस्स' म्हणजे त्या प्रकारे असणाऱ्या त्या भिक्खूंचे. 'यथास्स कामे पस्सतो' म्हणजे ज्या प्रकारे कामभोगाकडे पाहणाऱ्या त्या भिक्खूंचे. 'यथा चरन्तं' म्हणजे ज्या प्रकारे (मनाच्या) विचरण्याला आणि (पंचद्वारांतील) विहाराला अनुसरून विरणारा. 'अङ्गारकासूपमा कामा दिट्ठा होन्ति' म्हणजे शोध घेण्यामुळे उत्पन्न होणाऱ्या आणि प्रतिसंधीमुळे उत्पन्न होणाऱ्या दुःखाच्या प्रभावाने कामभोग हे धगधगत्या कोळशाच्या खड्ड्याप्रमाणे अत्यंत दाहक आहेत, असे दिसून येते. कारण कामभोगांचा शोध घेणाऱ्यांना नौकेने महासागरात जाणे, शेळ्यांच्या वाटेने जाणे, शंकूच्या मार्गाने जाणे, दोन्ही बाजूंनी सैन्याच्या लढाईत उडी घेणे इत्यादींमुळे शोध घेण्यामुळे उत्पन्न होणारे दुःख होते; आणि कामभोगांचा उपभोग घेणाऱ्यांच्या कामोपभोगाच्या चेतनेमुळे चार अपायांमध्ये मिळणाऱ्या प्रतिसंधीमुळे उत्पन्न होणारे तीव्र संतापरूपी दुःख उत्पन्न होते. अशा प्रकारे या दोन्ही प्रकारच्या दुःखांमुळे कामभोग हे धगधगत्या कोळशाच्या खड्ड्याप्रमाणे अत्यंत दाहक आहेत, असे दिसून येते. ဒါယန္တိ အဋဝိံ. ပုရတောပိ ကဏ္ဋကောတိ ပုရိမပဿေ ဝိဇ္ဈိတုကာမော ဝိယ အာသန္နဋ္ဌာနေယေဝ ဌိတကဏ္ဋကော. ပစ္ဆတောတိအာဒီသုပိ ဧသေဝ နယော. ဟေဋ္ဌာ ပန ပါဒေဟိ အက္ကန္တဋ္ဌာနဿ သန္တိကေ, န အက္ကန္တဋ္ဌာနေယေဝ. ဧဝံ သော ကဏ္ဋကဂဗ္ဘံ ပဝိဋ္ဌော ဝိယ ဘဝေယျ. မာ မံ ကဏ္ဋကောတိ မာ မံ ကဏ္ဋကော ဝိဇ္ဈီတိ ကဏ္ဋကဝေဓံ ရက္ခမာနော. 'दायं' म्हणजे अरण्य. 'पुरतोपि कण्टको' म्हणजे समोरच्या बाजूला टोचू इच्छिणाऱ्याप्रमाणे अगदी जवळच असलेला काटा. 'पच्छतो' (मागे) इत्यादी शब्दांमध्येही हाच न्याय लावावा. खाली पायांनी तुडवलेल्या जागेच्या जवळ, केवळ तुडवलेल्या जागेवरच नव्हे. अशा प्रकारे तो मनुष्य काट्यांच्या जाळ्यात शिरल्यासारखा होईल. 'मा मं कण्टको' म्हणजे 'मला काटा टोचू नये' असे म्हणून काट्या टोचण्यापासून स्वतःचे रक्षण करत. ဒန္ဓော, ဘိက္ခဝေ, သတုပ္ပာဒေါတိ သတိယာ ဥပ္ပာဒေါယေဝ ဒန္ဓော, ဥပ္ပန္နမတ္တာယ ပန တာယ ကာစိ ကိလေသာ နိဂ္ဂဟိတာဝ ဟောန္တိ, န သဏ္ဌာတုံ သက္ကောန္တိ. စက္ခုဒွါရသ္မိဉှိ ရာဂါဒီသု ဥပ္ပန္နေသု ဒုတိယဇဝနဝါရေန ‘‘ကိလေသာ မေ ဥပ္ပန္နာ’’တိ ဉတွာ တတိယေ ဇဝနဝါရေ သံဝရဇဝနံယေဝ ဇဝတိ. အနစ္ဆရိယဉ္စေတံ, ယံ ဝိပဿကော တတိယဇဝနဝါရေ ကိလေသေ နိဂ္ဂဏှေယျ. စက္ခုဒွါရေ ပန ဣဋ္ဌာရမ္မဏေ အာပါထဂတေ ဘဝင်္ဂံ အာဝဋ္ဋေတွာ အာဝဇ္ဇနာဒီသု ဥပ္ပန္နေသု ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနာနန္တရံ သမ္ပတ္တကိလေသဇဝနဝါရံ နိဝတ္တေတွာ ကုသလမေဝ ဥပ္ပာဒေတိ. အာရဒ္ဓဝိပဿကာနဉှိ အယမာနိသံသော ဘာဝနာပဋိသင်္ခါနေ ပတိဋ္ဌိတဘာဝဿ. हे भिक्खूहो! 'दन्धो, भिक्खवे, सतुप्पादो' म्हणजे स्मृतीचा (सतीचा) उत्पादच मंद असतो; परंतु ती स्मृती उत्पन्न होताच काही क्लेश दडपलेच जातात, ते टिकून राहू शकत नाहीत. कारण चक्षुद्वारावर राग इत्यादी क्लेश उत्पन्न झाले असता, दुसऱ्या जवनवाराने 'मला क्लेश उत्पन्न झाले आहेत' असे जाणून, तिसऱ्या जवनवारात संवर-जवनच उत्पन्न होते. विपश्यकांनी तिसऱ्या जवनवारात क्लेशांचे दमन करावे, यात काही आश्चर्य नाही. परंतु चक्षुद्वारावर इष्ट आलंबन आले असता, भवांग आवर्तित होऊन आवर्जन इत्यादी चित्त उत्पन्न झाले असता, वोठ्ठब्बनानंतर (निश्चितीकरणाच्या नंतर) प्राप्त होणाऱ्या क्लेशयुक्त जवनवाराला रोखून ते केवळ कुशल जवनच उत्पन्न करतात. कारण हा उद्योगी विपश्यकांचा, भावनेच्या प्रत्यवेक्षणात दृढ प्रतिष्ठित असण्याचा सुफळ परिणाम (आशंस) आहे. အဘိဟဋ္ဌုံ [Pg.97] ပဝါရေယျုန္တိ သုဒိန္နတ္ထေရဿ ဝိယ ရဋ္ဌပါလကုလပုတ္တဿ ဝိယ စ ကာယေန ဝါ သတ္တ ရတနာနိ အဘိဟရိတွာ ဝါစာယ ဝါ ‘‘အမှာကံ ဓနတော ယတ္တကံ ဣစ္ဆသိ, တတ္တကံ ဂဏှာ’’တိ ဝဒန္တာ ပဝါရေယျုံ. အနုဒဟန္တီတိ သရီရေ ပလိဝေဌိတတ္တာ ဥဏှပရိဠာဟံ ဇနေတွာ အနုဒဟန္တိ. သဉ္ဇာတသေဒေ ဝါ သရီရေ လဂ္ဂန္တာ အနုသေန္တီတိပိ အတ္ထော. ယဉှိ တံ, ဘိက္ခဝေ, စိတ္တန္တိ ဣဒံ ယသ္မာ စိတ္တေ အနာဝဋ္ဋန္တေ ပုဂ္ဂလဿ အာဝဋ္ဋနံ နာမ နတ္ထိ. ဧဝရူပဉှိ စိတ္တံ အနာဝဋ္ဋန္တိ, တသ္မာ ဝုတ္တံ. ဣတိ ဣမသ္မိံ သုတ္တေ ဝိပဿနာဗလမေဝ ဒီပိတံ. 'अभिहट्ठुं पवारेय्युं' म्हणजे सुदिन्न थेरांप्रमाणे किंवा राष्ट्रपाल कुलपुत्राप्रमाणे शरीराने (प्रत्यक्षात) सात रत्ने समोर आणून किंवा वाणीने 'आमच्या धनातून तुला जितके हवे असेल तितके घे' असे म्हणत निमंत्रित करावे. 'अनुदहन्ति' म्हणजे शरीराला वेढल्यामुळे उष्णतेचा संताप निर्माण करून जाळतात. किंवा घाम आलेल्या शरीराला चिकटून राहतात, असाही अर्थ आहे. 'यं हि तं, भिक्खवे, चित्तं' हे वचन यासाठी म्हटले आहे कारण चित्त संसाराकडे परत फिरले नाही, तर पुद्गलाचे परत फिरणे (गृहस्थ होणे) शक्य नसते. कारण अशा प्रकारचे चित्त परत फिरत नाही, म्हणून असे म्हटले आहे. अशा प्रकारे या सुत्तात विपश्यनेचे बलच प्रकाशित केले आहे. ၈. ကိံသုကောပမသုတ္တဝဏ္ဏနာ ८. किंसुकोपमसुत्ताची वर्णना (टीका). ၂၄၅. အဋ္ဌမေ ဒဿနန္တိ ပဌမမဂ္ဂဿေတံ အဓိဝစနံ. ပဌမမဂ္ဂေါ ဟိ ကိလေသပဟာနကိစ္စံ သာဓေန္တော ပဌမံ နိဗ္ဗာနံ ပဿတိ, တသ္မာ ဒဿနန္တိ ဝုစ္စတိ. ဂေါတြဘုဉာဏံ ပန ကိဉ္စာပိ မဂ္ဂတော ပဌမတရံ ပဿတိ, ပဿိတွာ ပန ကတ္တဗ္ဗကိစ္စဿ ကိလေသပဟာနဿ အဘာဝေန န ဒဿနန္တိ ဝုစ္စတိ. အပိစ စတ္တာရောပိ မဂ္ဂါ ဒဿနမေဝ. ကသ္မာ? သောတာပတ္တိမဂ္ဂက္ခဏေ ဒဿနံ ဝိသုဇ္ဈတိ, ဖလက္ခဏေ ဝိသုဒ္ဓံ. သကဒါဂါမိအနာဂါမိအရဟတ္တမဂ္ဂက္ခဏေ ဝိသုဇ္ဈတိ, ဖလက္ခဏေ ဝိသုဒ္ဓန္တိ ဧဝံ ကထေန္တာနံ ဘိက္ခူနံ သုတွာ သော ဘိက္ခု ‘‘အဟမ္ပိ ဒဿနံ ဝိသောဓေတွာ အရဟတ္တဖလေ ပတိဋ္ဌိတော ဒဿနဝိသုဒ္ဓိကံ နိဗ္ဗာနံ သစ္ဆိကတွာ ဝိဟရိဿာမီ’’တိ တံ ဘိက္ခုံ ဥပသင်္ကမိတွာ ဧဝံ ပုစ္ဆိ. သော ဖဿာယတနကမ္မဋ္ဌာနိကော ဆန္နံ ဖဿာယတနာနံ ဝသေန ရူပါရူပဓမ္မေ ပရိဂ္ဂဟေတွာ အရဟတ္တံ ပတ္တော. ဧတ္ထ ဟိ ပုရိမာနိ ပဉ္စ အာယတနာနိ ရူပံ, မနာယတနံ အရူပံ. ဣတိ သော အတ္တနာ အဓိဂတမဂ္ဂမေဝ ကထေသိ. २४५. आठव्या सुत्तात, 'दस्सनं' हे प्रथम मार्गाचे (सोतापत्ती मार्गाचे) नाव आहे. कारण प्रथम मार्ग क्लेशांच्या प्रहाणाचे कार्य साधत असताना सर्वप्रथम निर्वाण पाहतो; म्हणून त्याला 'दस्सन' (दर्शन) असे म्हटले जाते. गोट्रभू ज्ञान जरी मार्गाच्या आधीच (निर्वाण) पाहते, तरी ते पाहूनही क्लेशप्रहाण हे कर्तव्यकर्म करत नसल्यामुळे त्याला 'दस्सन' म्हटले जात नाही. शिवाय, चारही मार्ग हे 'दस्सन'च आहेत. का? सोतापत्ती मार्गक्षणी दर्शन शुद्ध होत असते, फलक्षणी ते शुद्ध झालेले असते. सकदागामी, अनागामी आणि अरहत्त मार्गक्षणी ते शुद्ध होत असते, फलक्षणी ते शुद्ध झालेले असते. असे सांगणाऱ्या भिक्खूंचे ऐकून त्या भिक्खूंनी 'मीसुद्धा दर्शनाला शुद्ध करून अरहत्तफलात प्रतिष्ठित होऊन, दर्शनविशुद्धियुक्त निर्वाणाचा साक्षात करून विहरेन' (असा विचार करून) त्या भिक्खूंकडे जाऊन असे विचारले. ते स्पर्शायतन-कर्मस्थानिक (भिक्खू) सहा स्पर्शायतनांच्या द्वारे रूप आणि अरूप (नाम) धर्मांचे ग्रहण करून अरहत्त्वाला प्राप्त झाले होते. कारण येथे पहिली पाच आयतने रूप आहेत आणि मनायतन अरूप (नाम) आहे. अशा प्रकारे त्यांनी स्वतः प्राप्त केलेल्या मार्गाविषयीच सांगितले. အသန္တုဋ္ဌောတိ ပဒေသသင်္ခါရေသု ဌတွာ ကထိတတ္တာ အသန္တုဋ္ဌော. ဧဝံ ကိရဿ အဟောသိ – ‘‘အယံ ပဒေသသင်္ခါရေသု ဌတွာ ကထေသိ. သက္ကာ နု ခေါ ပဒေသသင်္ခါရေသု ဌတွာ ဒဿနဝိသုဒ္ဓိကံ နိဗ္ဗာနံ ပါပုဏိတု’’န္တိ? တတော နံ ပုစ္ဆိ – ‘‘အာဝုသော, တွံယေဝ နု ခေါ ဣဒံ ဒဿနဝိသုဒ္ဓိကံ နိဗ္ဗာနံ ဇာနာသိ, ဥဒါဟု အညေပိ ဇာနန္တာ အတ္ထီ’’တိ. အတ္ထာဝုသော, အသုကဝိဟာရေ အသုကတ္ထေရော နာမာတိ. သော တမ္ပိ ဥပသင်္ကမိတွာ ပုစ္ဆိ. ဧတေနုပါယေန အညမ္ပိ အညမ္ပီတိ. 'असन्तुट्ठो' म्हणजे (त्या भिक्खूंनी) एकदेशीय (अपूर्ण) संस्कारांवर राहून सांगितल्यामुळे असंतुष्ट झालेले. त्यांच्या मनात असा विचार आला—'हे एकदेशीय संस्कारांवर राहून सांगत आहेत. एकदेशीय संस्कारांवर राहून दर्शनविशुद्धियुक्त निर्वाण प्राप्त करणे शक्य आहे काय?' त्यानंतर त्यांनी त्यांना विचारले—'आयुष्यमान, केवळ तुम्हीच हे दर्शनविशुद्धियुक्त निर्वाण जाणता की इतरही जाणणारे कोणी आहेत?' 'आहेत आयुष्यमान, अमुक विहारात अमुक थेर नावाचे आहेत.' त्यांनी त्यांच्याकडेही जाऊन विचारले. या पद्धतीने त्यांनी दुसऱ्याला आणि आणखी दुसऱ्यालाही विचारले. ဧတ္ထ [Pg.98] စ ဒုတိယော ပဉ္စက္ခန္ဓကမ္မဋ္ဌာနိကော ရူပက္ခန္ဓဝသေန ရူပံ, သေသက္ခန္ဓဝသေန နာမန္တိ နာမရူပံ ဝဝတ္ထပေတွာ အနုက္ကမေန အရဟတ္တံ ပတ္တော. တသ္မာ သောပိ အတ္တနာ အဓိဂတမဂ္ဂမေဝ ကထေသိ. အယံ ပန ‘‘ဣမေသံ အညမညံ န သမေတိ, ပဌမေန သပ္ပဒေသသင်္ခါရေသု ဌတွာဝ ကထိတံ, ဣမိနာ နိပ္ပဒေသေသူ’’တိ အသန္တုဋ္ဌော ဟုတွာ တထေဝ တံ ပုစ္ဆိတွာ ပက္ကာမိ. आणि येथे दुसरे भिक्खू पंचस्कंध-कर्मस्थानिक होते, ज्यांनी रूपस्कंधाच्या द्वारे रूप आणि उर्वरित स्कंधांच्या द्वारे नाम, अशा प्रकारे नाम-रूपाचे निर्धारण करून अनुक्रमाने अरहत्त्व प्राप्त केले होते. म्हणून त्यांनीही स्वतः प्राप्त केलेल्या मार्गाविषयीच सांगितले. परंतु हे (विचारणारे भिक्खू)—'यांचे सांगणे परस्परांशी जुळत नाही; पहिल्याने सप्रदेश (एकदेशीय) संस्कारांवर राहूनच सांगितले आणि याने निष्प्रदेश (पूर्ण) संस्कारांवर राहून सांगितले'—असे असंतुष्ट होऊन, त्याचप्रमाणे त्यांना विचारून निघून गेले. တတိယော မဟာဘူတကမ္မဋ္ဌာနိကော စတ္တာရိ မဟာဘူတာနိ သင်္ခေပတော စ ဝိတ္ထာရတော စ ပရိဂ္ဂဟေတွာ အရဟတ္တံ ပတ္တော, တသ္မာ အယမ္ပိ အတ္တနာ အဓိဂတမဂ္ဂမေဝ ကထေသိ. အယံ ပန ‘‘ဣမေသံ အညမညံ န သမေတိ, ပဌမေန သပ္ပဒေသသင်္ခါရေသု ဌတွာ ကထိတံ, ဒုတိယေန နိပ္ပဒေသေသု, တတိယေန အတိသပ္ပဒေသေသူ’’တိ အသန္တုဋ္ဌော ဟုတွာ တထေဝ တံ ပုစ္ဆိတွာ ပက္ကာမိ. तिसरे भिक्खू महाभूत-कर्मस्थानिक होते, ज्यांनी चार महाभूतांचे संक्षेपाने आणि विस्ताराने ग्रहण करून अरहत्त्व प्राप्त केले होते; म्हणून त्यांनीही स्वतः प्राप्त केलेल्या मार्गाविषयीच सांगितले. परंतु हे (विचारणारे भिक्खू)—'यांचे सांगणे परस्परांशी जुळत नाही; पहिल्याने सप्रदेश (एकदेशीय) संस्कारांवर राहून सांगितले, दुसऱ्याने निष्प्रदेश (पूर्ण) संस्कारांवर आणि तिसऱ्याने अति-सप्रदेश (अति-एकदेशीय) संस्कारांवर राहून सांगितले'—असे असंतुष्ट होऊन, त्याचप्रमाणे त्यांना विचारून निघून गेले. စတုတ္ထော တေဘူမကကမ္မဋ္ဌာနိကော. တဿ ကိရ သမပ္ပဝတ္တာ ဓာတုယော အဟေသုံ, ကလ္လသရီရံ ဗလပတ္တံ, ကမ္မဋ္ဌာနာနိပိဿ သဗ္ဗာနေဝ သပ္ပာယာနိ, အတီတာ ဝါ သင်္ခါရာ ဟောန္တု အနာဂတာ ဝါ ပစ္စုပ္ပန္နာ ဝါ ကာမာဝစရာ ဝါ ရူပါဝစရာ ဝါ အရူပါဝစရာ ဝါ, သဗ္ဗေပိ သပ္ပာယာဝ. အသပ္ပာယကမ္မဋ္ဌာနံ နာမ နတ္ထိ. ကာလေသုပိ ပုရေဘတ္တံ ဝါ ဟောတု ပစ္ဆာဘတ္တံ ဝါ ပဌမယာမာဒယော ဝါ, အသပ္ပာယော ကာလော နာမ နတ္ထိ. ယထာ နာမ စာရိဘူမိံ ဩတိဏ္ဏော မဟာဟတ္ထီ ဟတ္ထေန ဂဟေတဗ္ဗံ ဟတ္ထေနေဝ လုဉ္စိတွာ ဂဏှာတိ, ပါဒေဟိ ပဟရိတွာ ဂဟေတဗ္ဗံ ပါဒေဟိ ပဟရိတွာ ဂဏှာတိ, ဧဝမေဝ သကလေ တေဘူမကဓမ္မေ ကလာပဂ္ဂါဟေန ဂဟေတွာ သမ္မသန္တော အရဟတ္တံ ပတ္တော, တသ္မာ ဧသောပိ အတ္တနာ အဓိဂတမဂ္ဂမေဝ ကထေသိ. အယံ ပန ‘‘ဣမေသံ အညမညံ န သမေတိ. ပဌမေန သပ္ပဒေသသင်္ခါရေသု ဌတွာ ကထိတံ, ဒုတိယေန နိပ္ပဒေသေသု, ပုန တတိယေန သပ္ပဒေသေသု, စတုတ္ထေန နိပ္ပဒေသေသုယေဝါ’’တိ အသန္တုဋ္ဌော ဟုတွာ တံ ပုစ္ဆိ – ‘‘ကိံ နု ခေါ, အာဝုသော, ဣဒံ ဒဿနဝိသုဒ္ဓိကံ နိဗ္ဗာနံ တုမှေဟိ အတ္တနောဝ ဓမ္မတာယ ဉာတံ, ဥဒါဟု ကေနစိ ဝေါ အက္ခာတ’’န္တိ? အာဝုသော, မယံ ကိံ ဇာနာမ? အတ္ထိ ပန သဒေဝကေ လောကေ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ, တံ နိဿာယေတံ အမှေဟိ ဉာတန္တိ. သော စိန္တေသိ – ‘‘ဣမေ ဘိက္ခူ မယှံ အဇ္ဈာသယံ ဂဟေတွာ ကထေတုံ န သက္ကောန္တိ, အဟံ သဗ္ဗညုဗုဒ္ဓမေဝ ပုစ္ဆိတွာ နိက္ကင်္ခေါ ဘဝိဿာမီ’’တိ ယေန ဘဂဝါ တေနုပသင်္ကမိ. चौथा भिक्खू तेभूमक कम्मट्ठान (त्रैभूमिक कर्मस्थान) चा अभ्यास करणारा होता. असे म्हणतात की, त्याचे धातू समप्रमाणात संतुलित झाले होते, त्याचे शरीर निरोगी व बलवान झाले होते आणि त्याच्यासाठी सर्वच कम्मट्ठान अनुकूल (सप्पाय) होते. संस्कार भूतकाळातील असोत, भविष्यकाळातील असोत वा वर्तमानकाळातील असोत, कामावचर असोत, रूपावचर असोत वा अरूपावचर असोत, सर्वच त्याच्यासाठी अनुकूल होते. प्रतिकूल कम्मट्ठान असे काही नव्हतेच. काळाच्या बाबतीतही, जेवणापूर्वी असो वा जेवणानंतर, किंवा रात्रीचा पहिला प्रहर असो, प्रतिकूल काळ असा काही नव्हता. ज्याप्रमाणे आपल्या चराईच्या भूमीत उतरलेला एक महाहत्ती सोंडेने पकडण्याजोगे गवत सोंडेनेच उपटून घेतो आणि पायाने तुडवून घेण्याजोगे पायाने तुडवून घेतो, त्याचप्रमाणे यानेही संपूर्ण तेभूमक धर्मांना कलापग्गाह (समूह-ग्रहण) पद्धतीने ग्रहण करून, मनन करत अर्हत्त्व प्राप्त केले; म्हणूनच त्याने स्वतः प्राप्त केलेल्या मार्गाविषयीच सांगितले. परंतु या (जिज्ञासू) भिक्खूने "यांचे बोलणे एकमेकांशी जुळत नाही. पहिल्याने सप्पदेस (सावशेष) संस्कारांमध्ये राहून सांगितले, दुसऱ्याने निप्पदेस (निरवशेष) संस्कारांमध्ये, तिसऱ्याने पुन्हा सप्पदेस संस्कारांमध्ये आणि चौथ्याने केवळ निप्पदेस संस्कारांमध्येच राहून सांगितले" असे वाटून असंतुष्ट होत त्यांना विचारले – "हे आवुसो, हे दस्सनविसुद्धीचे (दर्शनविशुद्धीचे) निर्वाण तुम्ही स्वतःच्याच प्रज्ञेने जाणले आहे की तुम्हाला ते कोणी सांगितले आहे?" "आवुसो, आम्ही काय जाणणार? परंतु या देवलोकासह संपूर्ण जगात सम्यक्संबुद्ध आहेत, त्यांच्या आश्रयानेच आम्ही हे जाणले आहे." त्याने विचार केला – "हे भिक्खू माझा आशय समजून सांगू शकत नाहीत. मी सम्यक्संबुद्धांनाच विचारून शंकारहित होईन." असे विचार करून जेथे भगवान होते, तेथे तो गेला. ဘဂဝါ [Pg.99] တဿ ဝစနံ သုတွာ ‘‘ယေဟိ တေ ပဉှော ကထိတော, တေ စတ္တာရောပိ ခီဏာသဝါ, သုကထိတံ တေဟိ, တွံ ပန အတ္တနော အန္ဓဗာလတာယ တံ န သလ္လက္ခေသီ’’တိ န ဧဝံ ဝိဟေသေသိ. ကာရကဘာဝံ ပနဿ ဉတွာ ‘‘အတ္ထဂဝေသကော ဧသ, ဓမ္မဒေသနာယ ဧဝ နံ ဗုဇ္ဈာပေဿာမီ’’တိ ကိံသုကောပမံ အာဟရိ. တတ္ထ ဘူတံ ဝတ္ထုံ ကတွာ ဧဝမတ္ထော ဝိဘာဝေတဗ္ဗော – ဧကသ္မိံ ကိရ မဟာနဂရေ ဧကော သဗ္ဗဂန္ထဓရော ဗြာဟ္မဏဝေဇ္ဇော ပဏ္ဍိတော ပဋိဝသတိ. အထေကော နဂရဿ ပါစီနဒွါရဂါမဝါသီ ပဏ္ဍုရောဂပုရိသော တဿ သန္တိကံ အာဂန္တွာ တံ ဝန္ဒိတွာ အဋ္ဌာသိ. ဝေဇ္ဇပဏ္ဍိတော တေန သဒ္ဓိံ သမ္မောဒိတွာ ‘‘ကေနတ္ထေန အာဂတောသိ ဘဒြမုခါ’’တိ, ပုစ္ဆိ. ရောဂေနမှိ, အယျ, ဥပဒ္ဒုတော, ဘေသဇ္ဇံ မေ ကထေဟီတိ. တေန ဟိ, ဘော, ဂစ္ဆ, ကိံသုကရုက္ခံ ဆိန္ဒိတွာ, သောသေတွာ ဈာပေတွာ, တဿ ခါရောဒကံ ဂဟေတွာ ဣမိနာ စိမိနာ စ ဘေသဇ္ဇေန ယောဇေတွာ, အရိဋ္ဌံ ကတွာ ပိဝ, တေန တေ ဖာသုကံ ဘဝိဿတီတိ. သော တထာ ကတွာ နိရောဂေါ ဗလဝါ ပါသာဒိကော ဇာတော. भगवंतांनी त्याचे बोलणे ऐकून, "ज्यांनी तुझ्या प्रश्नाचे उत्तर दिले, ते चारीही क्षीणासव (अर्हत) आहेत. त्यांनी योग्यच सांगितले आहे, परंतु तू स्वतःच्या अज्ञानामुळे ते समजू शकला नाहीस," असे बोलून त्यांना दुखावले नाही. परंतु, तो साधना करणारा आहे हे जाणून, "हा अर्थाचा शोध घेणारा आहे, मी याला धम्मदेशनेनेच समजावून सांगेन," असे विचार करून त्यांनी पळसाच्या झाडाची (किंसुक) उपमा दिली. त्या उपमेतील सत्य घटना सांगून अशा प्रकारे अर्थ स्पष्ट केला पाहिजे – एका महानगरात सर्व ग्रंथांचे ज्ञान असलेला एक विद्वान ब्राह्मण वैद्य राहत होता. तेव्हा नगराच्या पूर्व वेशीजवळील गावात राहणारा एक पांडुरोगी माणूस त्याच्याकडे आला आणि त्यांना वंदन करून उभा राहिला. वैद्य पंडिताने त्याच्याशी कुशलमंगल विचारून विचारले, "हे भद्रमुखा, कोणत्या कारणासाठी आला आहेस?" "हे आर्य, मी रोगाने पीडित आहे, मला औषध सांगा." "तर मग, हे गृहस्था, जा, पळसाचे झाड तोडून, ते सुकवून, जाळून, त्याच्या राखेचे पाणी घेऊन, या आणि त्या औषधांशी मिसळून, अरिष्ट (काढा) तयार करून पी. त्याने तुला आराम पडेल." त्याने तसेच केले आणि तो निरोगी, बलवान व प्रसन्न झाला. အထညော ဒက္ခိဏဒွါရဂါမဝါသီ ပုရိသော တေနေဝ ရောဂေန အာတုရော ‘‘အသုကော ကိရ ဘေသဇ္ဇံ ကတွာ အရောဂေါ ဇာတော’’တိ သုတွာ တံ ဥပသင်္ကမိတွာ ပုစ္ဆိ – ‘‘ကေန တေ, သမ္မ, ဖာသုကံ ဇာတ’’န္တိ. ကိံသုကာရိဋ္ဌေန နာမ, ဂစ္ဆ တွမ္ပိ ကရောဟီတိ. သောပိ တထာ ကတွာ တာဒိသောဝ ဇာတော. त्यानंतर, नगराच्या दक्षिण वेशीजवळील गावात राहणारा दुसरा एक माणूस त्याच रोगाने पीडित होता. "अमुक एका माणसाने औषधोपचार करून रोगमुक्त झाला आहे" असे ऐकून तो त्याच्याकडे गेला आणि त्याने विचारले – "मित्रा, तुला कशाने आराम पडला?" "किंसुक-अरिष्टाने (पळसाच्या काढ्याने). जा, तूही तसेच कर." त्यानेही तसेच केले आणि तोही तसाच निरोगी झाला. အထညော ပစ္ဆိမဒွါရဂါမဝါသီ…ပေ… ဥတ္တရဒွါရဂါမဝါသီ ပုရိသော တေနေဝ ရောဂေန အာတုရော ‘‘အသုကော ကိရ ဘေသဇ္ဇံ ကတွာ အရောဂေါ ဇာတော’’တိ တံ ဥပသင်္ကမိတွာ ပုစ္ဆိ ‘‘ကေန တေ, သမ္မ, ဖာသုကံ ဇာတ’’န္တိ? ကိံသုကာရိဋ္ဌေန နာမ, ဂစ္ဆ တွမ္ပိ ကရောဟီတိ. သောပိ တထာ ကတွာ တာဒိသောဝ ဇာတော. त्यानंतर, नगराच्या पश्चिम वेशीजवळील गावात राहणारा... पे... उत्तर वेशीजवळील गावात राहणारा माणूस त्याच रोगाने पीडित होता. "अमुक एका माणसाने औषधोपचार करून रोगमुक्त झाला आहे" असे ऐकून तो त्याच्याकडे गेला आणि त्याने विचारले – "मित्रा, तुला कशाने आराम पडला?" "किंसुक-अरिष्टाने (पळसाच्या काढ्याने). जा, तूही तसेच कर." त्यानेही तसेच केले आणि तोही तसाच निरोगी झाला. အထညော ပစ္စန္တဝါသီ အဒိဋ္ဌပုဗ္ဗကိံသုကော ဧကော ပုရိသော တေနေဝ ရောဂေန အာတုရော စိရံ တာနိ တာနိ ဘေသဇ္ဇာနိ ကတွာ ရောဂေ အဝူပသမမာနေ ‘‘အသုကော ကိရ နဂရဿ ပါစီနဒွါရဂါမဝါသီ ပုရိသော ဘေသဇ္ဇံ ကတွာ အရောဂေါ ဇာတော’’တိ သုတွာ ‘‘ဂစ္ဆာမဟမ္ပိ, တေန ကတဘေသဇ္ဇံ ကရိဿာမီ’’တိ ဒဏ္ဍမောလုဗ္ဘ အနုပုဗ္ဗေန တဿ သန္တိကံ ဂန္တွာ, ‘‘ကေန တေ, သမ္မ, ဖာသုကံ ဇာတ’’န္တိ ပုစ္ဆိ. ကိံသုကာရိဋ္ဌေန သမ္မာတိ. ကီဒိသော [Pg.100] ပန သော ကိံသုကောတိ. ဈာပိတဂါမေ ဌိတဈာမထူဏော ဝိယာတိ. ဣတိ သော ပုရိသော အတ္တနာ ဒိဋ္ဌာကာရေနဝ ကိံသုကံ အာစိက္ခိ. တေန ဟိ ဒိဋ္ဌကာလေ ကိံသုကော ပတိတပတ္တော ခါဏုကကာလေ ဒိဋ္ဌတ္တာ တာဒိသောဝ ဟောတိ. त्यानंतर, सीमावर्ती भागात राहणारा, ज्याने कधीही पळसाचे झाड पाहिले नव्हते असा एक माणूस त्याच रोगाने पीडित होता. बऱ्याच काळापर्यंत विविध औषधोपचार करूनही रोग बरा न झाल्याने, "नगराच्या पूर्व वेशीजवळील गावात राहणारा अमुक माणूस औषधोपचार करून रोगमुक्त झाला आहे" असे ऐकून, "मीही जाईन आणि त्याने केलेले औषध घेईन" असे ठरवून, काठीचा आधार घेत हळूहळू तो त्याच्याकडे गेला आणि त्याने विचारले – "मित्रा, तुला कशाने आराम पडला?" "मित्रा, किंसुक-अरिष्टाने." "पण ते पळसाचे झाड कसे असते?" "ते जळालेल्या गावातील जळालेल्या खांबासारखे असते." अशा प्रकारे त्या माणसाने स्वतः पाहिलेल्या रूपावरून पळसाच्या झाडाचे वर्णन केले. कारण, त्याने ज्या वेळी ते पाहिले होते, त्या वेळी पळसाची पाने गळून गेली होती आणि केवळ खोडच शिल्लक होते, त्यामुळे ते तशाच जळालेल्या खांबासारखे दिसत होते. သော ပန ပုရိသော သုတမင်္ဂလိကတ္တာ ‘‘အယံ ‘ဈာပိတဂါမေ ဈာမထူဏော ဝိယာ’တိ အာဟ, အမင်္ဂလမေတံ. ဧတသ္မိဉှိ မေ ဘေသဇ္ဇေ ကတေပိ ရောဂေါ န ဝူပသမိဿတီ’’တိ တဿ ဝေယျာကရဏေန အသန္တုဋ္ဌော တံ ပုစ္ဆိ – ‘‘ကိံ နု ခေါ, ဘော, တွညေဝ ကိံသုကံ ဇာနာသိ, ဥဒါဟု အညောပိ အတ္ထီ’’တိ. အတ္ထိ, ဘော, ဒက္ခိဏဒွါရဂါမေ အသုကော နာမာတိ. သော တံ ဥပသင်္ကမိတွာ ပုစ္ဆိ, သွာဿ ပုပ္ဖိတကာလေ ဒိဋ္ဌတ္တာ အတ္တနော ဒဿနာနုရူပေန ‘‘လောဟိတကော ကိံသုကော’’တိ အာဟ. သော ‘‘အယံ ပုရိမေန ဝိရုဒ္ဓံ အာဟ, ကာဠကော လောဟိတကတော သုဝိဒူရဒူရေ’’တိ တဿပိ ဝေယျာကရဏေန အသန္တုဋ္ဌော ‘‘အတ္ထိ ပန, ဘော, အညောပိ ကောစိ ကိံသုကဒဿာဝီ, ယေန ကိံသုကော ဒိဋ္ဌပုဗ္ဗော’’တိ? ပုစ္ဆိတွာ, ‘‘အတ္ထိ ပစ္ဆိမဒွါရဂါမေ အသုကော နာမာ’’တိ ဝုတ္တေ တမ္ပိ ဥပသင်္ကမိတွာ ပုစ္ဆိ. သွာဿ ဖလိတကာလေ ဒိဋ္ဌတ္တာ အတ္တနော ဒဿနာနုရူပေန ‘‘ဩစိရကဇာတော အာဒိန္နသိပါဋိကော’’တိ အာဟ. ဖလိတကာလသ္မိဉှိ ကိံသုကော ဩလမ္ဗမာနစီရကော ဝိယ အဓောမုခံ ကတွာ ဂဟိတအသိကောသော ဝိယ စ သိရီသရုက္ခော ဝိယ စ လမ္ဗမာနဖလော ဟောတိ. သော ‘‘အယံ ပုရိမေဟိ ဝိရုဒ္ဓံ အာဟ, န သက္ကာ ဣမဿ ဝစနံ ဂဟေတု’’န္တိ တဿပိ ဝေယျာကရဏေန အသန္တုဋ္ဌော ‘‘အတ္ထိ ပန, ဘော, အညောပိ ကောစိ ကိံသုကဒဿာဝီ, ယေန ကိံသုကော ဒိဋ္ဌပုဗ္ဗော’’တိ? ပုစ္ဆိတွာ, ‘‘အတ္ထိ ဥတ္တရဒွါရဂါမေ အသုကော နာမာ’’တိ ဝုတ္တေ တမ္ပိ ဥပသင်္ကမိတွာ ပုစ္ဆိ. သော အဿ သဉ္ဆန္နပတ္တကာလေ ဒိဋ္ဌတ္တာ အတ္တနော ဒဿနာနုရူပေန ‘‘ဗဟလပတ္တပလာသော သန္ဒစ္ဆာယော’’တိ အာဟ. သန္ဒစ္ဆာယော နာမ သံသန္ဒိတွာ ဌိတစ္ဆာယော. परंतु तो माणूस ऐकलेल्या गोष्टींनाच शुभ मानणारा (सुतमंगलिक) असल्यामुळे त्याने विचार केला, "हा म्हणतोय की 'जळालेल्या गावातील जळालेल्या खांबासारखे', हे तर अमंगल आहे. हे औषध घेतल्यावरही माझा रोग बरा होणार नाही." अशा प्रकारे त्याच्या उत्तराने असंतुष्ट होऊन त्याने त्याला विचारले – "हे गृहस्था, काय केवळ तूच पळसाचे झाड ओळखतोस की आणखी कोणी आहे?" "आहे ना, दक्षिण वेशीजवळील गावात अमुक नावाचा माणूस आहे." तो त्याच्याकडे गेला आणि त्याने विचारले. त्याने ते झाड फुलांच्या बहराच्या काळात पाहिले असल्यामुळे, स्वतःच्या अनुभवानुसार सांगितले, "पळसाचे झाड लाल रंगाचे असते." त्याने विचार केला, "हा तर पहिल्या माणसाच्या अगदी विरुद्ध सांगत आहे. काळा रंग आणि लाल रंग यात तर जमीन-अस्मानाचा फरक आहे." त्याच्याही उत्तराने असंतुष्ट होऊन त्याने विचारले, "हे गृहस्था, पळसाचे झाड पाहिलेला आणखी कोणी माणूस आहे का, ज्याने ते पूर्वी पाहिले असेल?" असे विचारल्यावर, "पश्चिम वेशीजवळील गावात अमुक नावाचा माणूस आहे" असे सांगण्यात आले. तो त्याच्याकडेही गेला आणि त्याने विचारले. त्याने ते झाड फळे लागण्याच्या काळात पाहिले असल्यामुळे, स्वतःच्या अनुभवानुसार सांगितले, "ते लोंबणाऱ्या शेंगांसारखे आणि उघड्या पडलेल्या सालीसारखे असते." कारण फळे लागण्याच्या काळात पळसाचे झाड लोंबणाऱ्या चिंध्यांसारखे किंवा उलटी धरलेली तलवारीची म्यान किंवा शिरीषाच्या झाडासारखे लोंबणाऱ्या फळांनी युक्त असते. त्याने विचार केला, "हा तर आधीच्या दोघांच्याही विरुद्ध सांगत आहे, याचे बोलणे स्वीकारता येणार नाही." त्याच्याही उत्तराने असंतुष्ट होऊन त्याने विचारले, "हे गृहस्था, पळसाचे झाड पाहिलेला आणखी कोणी माणूस आहे का, ज्याने ते पूर्वी पाहिले असेल?" असे विचारल्यावर, "उत्तर वेशीजवळील गावात अमुक नावाचा माणूस आहे" असे सांगण्यात आले. तो त्याच्याकडेही गेला आणि त्याने विचारले. त्याने ते झाड पानांनी डवरलेल्या काळात पाहिले असल्यामुळे, स्वतःच्या अनुभवानुसार सांगितले, "ते दाट पानांनी युक्त आणि घनदाट सावली देणारे असते." 'सन्दच्छाय' म्हणजे एकमेकांत मिसळून दाट झालेली सावली. သော ‘‘အယမ္ပိ ပုရိမေဟိ ဝိရုဒ္ဓံ အာဟ, န သက္ကာ ဣမဿ ဝစနံ ဂဟေတု’’န္တိ တဿပိ ဝေယျာကရဏေန အသန္တုဋ္ဌော တံ အာဟ, ‘‘ကိံ နု ခေါ, ဘော, တုမှေ အတ္တနောဝ ဓမ္မတာယ ကိံသုကံ ဇာနာထ, ဥဒါဟု ကေနစိ ဝေါ အက္ခာတော’’တိ? ကိံ, ဘော, မယံ ဇာနာမ? အတ္ထိ ပန မဟာနဂရဿ မဇ္ဈေ [Pg.101] အမှာကံ အာစရိယော ဝေဇ္ဇပဏ္ဍိတော, တံ နိဿာယ အမှေဟိ ဉာတန္တိ. ‘‘တေန ဟိ အဟမ္ပိ အာစရိယမေဝ ဥပသင်္ကမိတွာ နိက္ကင်္ခေါ ဘဝိဿာမီ’’တိ တဿ သန္တိကံ ဥပသင်္ကမိတွာ တံ ဝန္ဒိတွာ အဋ္ဌာသိ. ဝေဇ္ဇပဏ္ဍိတော တေန သဒ္ဓိံ သမ္မောဒိတွာ, ‘‘ကေနတ္ထေန အာဂတောသိ ဘဒြမုခါ’’တိ ပုစ္ဆိ. ရောဂေနမှိ, အယျ, ဥပဒ္ဒုတော, ဘေသဇ္ဇံ မေ ကထေထာတိ. တေန ဟိ, ဘော, ဂစ္ဆ, ကိံသုကရုက္ခံ ဆိန္ဒိတွာ သောသေတွာ ဈာပေတွာ တဿ ခါရောဒကံ ဂဟေတွာ ဣမိနာ စိမိနာ စ ဘေသဇ္ဇေန ယောဇေတွာ အရိဋ္ဌံ ကတွာ ပိဝ, ဧတေန တေ ဖာသုကံ ဘဝိဿတီတိ. သော တထာ ကတွာ နိရောဂေါ ဗလဝါ ပါသာဒိကော ဇာတော. तो विचार करू लागला, "हा (चौथा माणूस) देखील आधीच्या तिघांपेक्षा वेगळे (विरुद्ध) सांगत आहे, याचे बोलणे स्वीकारता येणार नाही." अशा प्रकारे त्याच्याही उत्तराने असंतुष्ट होऊन तो त्यांना म्हणाला, "हे मित्रांनो, तुम्ही पळसाच्या झाडाला (किंशुक वृक्षाला) स्वतःच्या अनुभवाने ओळखता की तुम्हाला कोणी सांगितले आहे?" ते म्हणाले, "हे मित्रा, आम्ही स्वतः काय जाणणार? पण या महानगराच्या मध्यभागी आमचे आचार्य वैद्यपंडित आहेत, त्यांच्या आधारेच आम्हाला हे ठाऊक झाले आहे." तो म्हणाला, "तसे असेल तर मी स्वतः आचार्यांकडेच जाऊन शंकारहित होईन." असे म्हणून तो त्यांच्याकडे गेला आणि त्यांना वंदन करून उभा राहिला. वैद्यपंडितांनी त्याच्याशी कुशलमंगल संभाषण करून विचारले, "हे भद्रमुखा, तू कोणत्या कारणासाठी आला आहेस?" तो म्हणाला, "हे पूज्य आचार्या, मी रोगाने पीडित आहे, मला औषध सांगावे." वैद्यपंडित म्हणाले, "तर मग हे मित्रा, जा, पळसाचे झाड कापून, ते सुकवून, जाळून त्याची राख (क्षारयुक्त पाणी) घे आणि या व त्या औषधासोबत मिसळून अरिष्ट (औषधी काढा) तयार करून पी. याने तुला बरे वाटेल." त्याने तसेच केले आणि तो निरोगी, बलवान व प्रसन्न झाला. တတ္ထ မဟာနဂရံ ဝိယ နိဗ္ဗာနနဂရံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ဝေဇ္ဇပဏ္ဍိတော ဝိယ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ. ဝုတ္တမ္ပိ စေ တံ ‘‘ဘိသက္ကော သလ္လကတ္တောတိ ခေါ, သုနက္ခတ္တ, တထာဂတဿေတံ အဓိဝစနံ အရဟတော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿာ’’တိ (မ. နိ. ၃.၆၅) စတူသု ဒွါရဂါမေသု စတ္တာရော ဝေဇ္ဇန္တေဝါသိကာ ဝိယ စတ္တာရော ဒဿနဝိသုဒ္ဓိပတ္တာ ခီဏာသဝါ. ပစ္စန္တဝါသီ ပဌမပုရိသော ဝိယ ပဉှပုစ္ဆကော ဘိက္ခု. ပစ္စန္တဝါသိနော စတုန္နံ ဝေဇ္ဇန္တေဝါသိကာနံ ကထာယ အသန္တုဋ္ဌဿ အာစရိယမေဝ ဥပသင်္ကမိတွာ ပုစ္ဆနကာလော ဝိယ ဣမဿ ဘိက္ခုနော စတုန္နံ ဒဿနဝိသုဒ္ဓိပတ္တာနံ ခီဏာသဝါနံ ကထာယ အသန္တုဋ္ဌဿ သတ္ထာရံ ဥပသင်္ကမိတွာ ပုစ္ဆနကာလော. येथे, महानगराप्रमाणे निर्वाणनगर समजावे. वैद्यपंडिताप्रमाणे सम्यक्संबुद्ध समजावेत. तसेच हे म्हटलेही आहे— "हे सुनक्षत्रा, 'भिषक' (वैद्य) आणि 'शल्यकर्ता' (शल्यचिकित्सक) हे अर्हत सम्यक्संबुद्ध तथागतांचेच नाव आहे." चारही वेशींवर राहणाऱ्या चार वैद्य-शिष्यांप्रमाणे दर्शनविशुद्धी प्राप्त केलेले चार क्षीणास्रव (अर्हत) समजावेत. सीमावर्ती प्रदेशातील पहिल्या माणसाप्रमाणे प्रश्न विचारणारा भिक्खू समजावा. सीमावर्ती माणसाने चार वैद्य-शिष्यांच्या बोलण्याने असंतुष्ट होऊन आचार्यांकडेच जाऊन विचारण्याच्या प्रसंगाप्रमाणे, या भिक्खूने दर्शनविशुद्धी प्राप्त केलेल्या चार क्षीणास्रवांच्या बोलण्याने असंतुष्ट होऊन शास्त्यांकडे (बुद्धांकडे) जाऊन विचारण्याचा प्रसंग समजावा. ယထာ ယထာ အဓိမုတ္တာနန္တိ ယေန ယေနာကာရေန အဓိမုတ္တာနံ. ဒဿနံ သုဝိသုဒ္ဓန္တိ နိဗ္ဗာနဒဿနံ သုဋ္ဌု ဝိသုဒ္ဓံ. တထာ တထာ ခေါ တေဟိ သပ္ပုရိသေဟိ ဗျာကတန္တိ တေန တေနေဝါကာရေန တုယှံ တေဟိ သပ္ပုရိသေဟိ ကထိတံ. ယထာ ဟိ ‘‘ကာဠကော ကိံသုကော’’တိ ကထေန္တော န အညံ ကထေသိ, အတ္တနာ ဒိဋ္ဌနယေန ကိံသုကမေဝ ကထေသိ, ဧဝမေဝ ဆဖဿာယတနာနံ ဝသေန ဒဿနဝိသုဒ္ဓိပတ္တခီဏာသဝေါပိ ဣမံ ပဉှံ ကထေန္တော န အညံ ကထေသိ, အတ္တနာ အဓိဂတမဂ္ဂေန ဒဿနဝိသုဒ္ဓိကံ နိဗ္ဗာနမေဝ ကထေသိ. 'यथा यथा अधिमुत्तानं' म्हणजे ज्या ज्या प्रकारे (विपश्यनेत) प्रवृत्त झालेल्यांचे. 'दस्सनं सुविसुद्धं' म्हणजे निर्वाणाचे दर्शन चांगल्या प्रकारे विशुद्ध झाले आहे. 'तथा तथा खो तेहि सप्पुरिसेहि ब्याकतं' म्हणजे त्या त्या प्रकारे तुला त्या सत्पुरुषांनी सांगितले आहे. ज्याप्रमाणे 'पळसाचे झाड काळे असते' असे सांगणाऱ्याने दुसरे काही सांगितले नाही, तर स्वतः पाहिलेल्या पद्धतीने पळसाच्या झाडाविषयीच सांगितले; त्याचप्रमाणे, षडायतनांच्या आधारे दर्शनविशुद्धी प्राप्त केलेल्या क्षीणास्रवाने देखील या प्रश्नाचे उत्तर देताना दुसरे काही सांगितले नाही, तर स्वतः प्राप्त केलेल्या मार्गाने दर्शनविशुद्धीचे कारण असलेल्या निर्वाणाविषयीच सांगितले. ယထာ စ ‘‘လောဟိတကော ဩစိရကဇာတော ဗဟလပတ္တပလာသော ကိံသုကော’’တိ ကထေန္တောပိ န အညံ ကထေသိ, အတ္တနာ ဒိဋ္ဌနယေန ကိံသုကမေဝ ကထေသိ, ဧဝမေဝ ပဉ္စုပါဒါနက္ခန္ဓဝသေန စတုမဟာဘူတဝသေန တေဘူမကဓမ္မဝသေန ဒဿနဝိသုဒ္ဓိပတ္တခီဏာသဝေါပိ ဣမံ ပဉှံ ကထေန္တော [Pg.102] န အညံ ကထေသိ, အတ္တနာ အဓိဂတမဂ္ဂေန ဒဿနဝိသုဒ္ဓိကံ နိဗ္ဗာနမေဝ ကထေသိ. आणि ज्याप्रमाणे "पळसाचे झाड लाल रंगाचे असते, खाली लटकणाऱ्या शेंगांसारखी फळे असणारे असते, दाट पानांनी युक्त असते" असे सांगणाऱ्याने देखील दुसरे काही सांगितले नाही, तर स्वतः पाहिलेल्या पद्धतीने पळसाच्या झाडाविषयीच सांगितले; त्याचप्रमाणे, पंच उपादानस्कंधांच्या आधारे, चार महाभूतांच्या आधारे किंवा त्रिभूमिक धर्मांच्या आधारे दर्शनविशुद्धी प्राप्त केलेल्या क्षीणास्रवाने देखील या प्रश्नाचे उत्तर देताना दुसरे काही सांगितले नाही, तर स्वतः प्राप्त केलेल्या मार्गाने दर्शनविशुद्धीचे कारण असलेल्या निर्वाणाविषयीच सांगितले. တတ္ထ ယထာ ကာဠကကာလေ ကိံသုကဒဿာဝိနောပိ တံ ဒဿနံ ဘူတံ တစ္ဆံ န တေန အညံ ဒိဋ္ဌံ, ကိံသုကောဝ ဒိဋ္ဌော, ဧဝမေဝ ဆဖဿာယတနဝသေန ဒဿနဝိသုဒ္ဓိပတ္တဿာပိ ခီဏာသဝဿ ဒဿနံ ဘူတံ တစ္ဆံ, န တေန အညံ ကထိတံ, အတ္တနာ အဓိဂတမဂ္ဂေန ဒဿနဝိသုဒ္ဓိကံ နိဗ္ဗာနမေဝ ကထိတံ. ယထာ စ လောဟိတကာလေ ဩစိရကဇာတကာလေ ဗဟလပတ္တပလာသကာလေ ကိံသုကဒဿာဝိနောပိ တံ ဒဿနံ ဘူတံ တစ္ဆံ, န တေန အညံ ဒိဋ္ဌံ, ကိံသုကောဝ ဒိဋ္ဌော, ဧဝမေဝ ပဉ္စုပါဒါနက္ခန္ဓဝသေန စတုမဟာဘူတဝသေန တေဘူမကဓမ္မဝသေန ဒဿနဝိသုဒ္ဓိပတ္တဿာပိ ခီဏာသဝဿ ဒဿနံ ဘူတံ တစ္ဆံ, န တေန အညံ ကထိတံ, အတ္တနာ အဓိဂတမဂ္ဂေန ဒဿနဝိသုဒ္ဓိကံ နိဗ္ဗာနမေဝ ကထိတံ. येथे, ज्याप्रमाणे पळसाचे झाड काळे (पाने गळलेले) असताना ते पाहणाऱ्याचे ते दर्शन सत्य व यथार्थ होते, त्याने दुसरे काही पाहिले नव्हते तर पळसाचे झाडच पाहिले होते; त्याचप्रमाणे, षडायतनांच्या आधारे दर्शनविशुद्धी प्राप्त केलेल्या क्षीणास्रवाचे दर्शन देखील सत्य व यथार्थ आहे, त्याने दुसरे काही सांगितले नाही, तर स्वतः प्राप्त केलेल्या मार्गाने दर्शनविशुद्धीचे कारण असलेल्या निर्वाणाविषयीच सांगितले. आणि ज्याप्रमाणे पळसाचे झाड लाल रंगाचे असताना, खाली लटकणाऱ्या शेंगांसारखी फळे असताना किंवा दाट पानांनी युक्त असताना ते पाहणाऱ्याचे ते दर्शन सत्य व यथार्थ होते, त्याने दुसरे काही पाहिले नव्हते तर पळसाचे झाडच पाहिले होते; त्याचप्रमाणे, पंच उपादानस्कंधांच्या आधारे, चार महाभूतांच्या आधारे किंवा त्रिभूमिक धर्मांच्या आधारे दर्शनविशुद्धी प्राप्त केलेल्या क्षीणास्रवाचे दर्शन देखील सत्य व यथार्थ आहे, त्याने दुसरे काही सांगितले नाही, तर स्वतः प्राप्त केलेल्या मार्गाने दर्शनविशुद्धीचे कारण असलेल्या निर्वाणाविषयीच सांगितले. သေယျထာပိ, ဘိက္ခု ရညော ပစ္စန္တိမံ နဂရန္တိ ဣဒံ ကသ္မာ အာရဒ္ဓံ? သစေ တေန ဘိက္ခုနာ တံ သလ္လက္ခိတံ, အထဿ ဓမ္မဒေသနတ္ထံ အာရဒ္ဓံ. သစေ န သလ္လက္ခိတံ, အထဿ ဣမိနာ နဂရောပမေန တဿေဝတ္ထဿ ဒီပနတ္ထာယ အာဝိဘာဝနတ္ထာယ အာရဒ္ဓံ. တတ္ထ ယသ္မာ မဇ္ဈိမပဒေသေ နဂရဿ ပါကာရာဒီနိ ထိရာနိ ဝါ ဟောန္တု ဒုဗ္ဗလာနိ ဝါ, သဗ္ဗသော ဝါ မာ ဟောန္တု, စောရာသင်္ကာ န ဟောန္တိ, တသ္မာ တံ အဂ္ဂဟေတွာ ‘‘ပစ္စန္တိမံ နဂရ’’န္တိ အာဟ. ဒဠှုဒ္ဓါပန္တိ ထိရပါကာရံ. ဒဠှပါကာရတောရဏန္တိ ထိရပါကာရဉ္စေဝ ထိရတောရဏဉ္စ. တောရဏာနိ နာမ ဟိ ပုရိသုဗ္ဗေဓာနိ နဂရဿ အလင်္ကာရတ္ထံ ကရီယန္တိ, စောရနိဝါရဏတ္ထာနိပိ ဟောန္တိယေဝ. အထ ဝါ တောရဏန္တိ ပိဋ္ဌသံဃာဋဿေတံ နာမံ, ထိရပိဋ္ဌသံဃာဋန္တိပိ အတ္ထော. ဆဒွါရန္တိ နဂရဒွါရံ နာမ ဧကမ္ပိ ဟောတိ ဒွေပိ သတမ္ပိ သဟဿမ္ပိ, ဣဓ ပန သတ္ထာ ဆဒွါရိကနဂရံ ဒဿေန္တော ဧဝမာဟ. ပဏ္ဍိတောတိ ပဏ္ဍိစ္စေန သမန္နာဂတော. ဗျတ္တောတိ ဝေယျတ္တိယေန သမန္နာဂတော ဝိသဒဉာဏော. မေဓာဝီတိ ဌာနုပ္ပတ္တိကပညာသင်္ခါတာယ မေဓာယ သမန္နာဂတော. "हे भिक्खू, 'ज्याप्रमाणे राजाचे एखादे सीमावर्ती नगर असते' हे उपमान कशासाठी सुरू केले गेले? जर त्या भिक्खूने तो (पळसाच्या झाडाचा) अर्थ समजून घेतला असेल, तर त्याला धर्मोपदेश करण्यासाठी हे सुरू केले गेले. जर त्याने तो अर्थ समजून घेतला नसेल, तर त्याला या नगराच्या उपमेद्वारे त्याच अर्थाचे स्पष्टीकरण करण्यासाठी व तो अर्थ प्रकट करण्यासाठी हे सुरू केले गेले. येथे, ज्या अर्थी मध्यदेशातील नगराचे तट मजबूत असोत वा कमकुवत असोत, किंवा अजिबात नसोत, तिथे चोरांचे भय नसते, म्हणून ते नगर न घेता 'सीमावर्ती नगर' असे म्हटले आहे. 'दळ्हुद्धापं' म्हणजे मजबूत अंतर्गत तट. 'दळ्हपाकारतोरणं' म्हणजे मजबूत बाह्य तट आणि मजबूत तोरण (द्वार). तोरण हे तीन पुरुषांच्या उंचीचे असून नगराच्या शोभेसाठी बनवले जाते, तसेच ते चोरांना रोखण्यासाठी देखील असतेच. अथवा 'तोरण' हे दरवाजाच्या चौकटीचे नाव आहे, म्हणून 'मजबूत चौकट असणारे' असाही अर्थ होतो. 'षडद्वार' म्हणजे नगराला एक, दोन, शंभर किंवा हजार दरवाजे देखील असू शकतात, परंतु येथे शास्त्यांनी सहा दरवाजे असणारे नगर दाखवण्यासाठी असे म्हटले आहे. 'पंडित' म्हणजे प्रज्ञेने युक्त. 'व्यस्त' (चतुर) म्हणजे चातुर्याने युक्त आणि स्पष्ट ज्ञान असणारा. 'मेधावी' म्हणजे प्रसंगानुरूप त्वरित उत्पन्न होणाऱ्या बुद्धीने (मेधेने) युक्त." ပုရတ္ထိမာယ ဒိသာယာတိအာဒိမှိ ဘူတမတ္ထံ ကတွာ ဧဝမတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော – သမိဒ္ဓေ ကိရ မဟာနဂရေ သတ္တရတနသမ္ပန္နော ရာဇာ စက္ကဝတ္တိ ရဇ္ဇံ အနုသာသတိ, တဿေတံ ပစ္စန္တနဂရံ ရာဇာယုတ္တဝိရဟိတံ, အထ ပုရိသာ အာဂန္တွာ [Pg.103] ‘‘အမှာကံ, ဒေဝ, နဂရေ အာယုတ္တကော နတ္ထိ, ဒေဟိ နော ကိဉ္စိ အာယုတ္တက’’န္တိ အာဟံသု. ရာဇာ ဧကံ ပုတ္တံ ဒတွာ ‘‘ဂစ္ဆထ, ဧတံ အာဒါယ တတ္ထ အဘိသိဉ္စိတွာ ဝိနိစ္ဆယဋ္ဌာနာဒီနိ ကတွာ ဝသထာ’’တိ. တေ တထာ အကံသု. ရာဇပုတ္တော ပါပမိတ္တသံသဂ္ဂေန ကတိပါဟေယေဝ သုရာသောဏ္ဍော ဟုတွာ, သဗ္ဗာနိ ဝိနိစ္ဆယဋ္ဌာနာဒီနိ ဟာရေတွာ, နဂရမဇ္ဈေ ဓုတ္တေဟိ ပရိဝါရိတော သုရံ ပိဝန္တော နစ္စဂီတာဒိရတိယာ ဝီတိနာမေတိ. အထ ရညော အာဂန္တွာ အာရောစယိံသု. "पूर्व दिशेकडून" इत्यादी वाक्यांमध्ये वास्तविक अर्थ लक्षात घेऊन असा अर्थ समजून घ्यावा— असे ऐकिवात आहे की, एका समृद्ध महानगरात सप्त रत्नांनी संपन्न असलेला चक्रवर्ती राजा राज्य करत होता. त्याचे हे सीमावर्ती नगर राजाने नियुक्त केलेल्या अधिकाऱ्याशिवाय होते. तेव्हा तिथले लोक राजाकडे आले आणि म्हणाले, "हे देव, आमच्या नगरात कोणी अधिकारी नाही, आम्हाला एखादा अधिकारी द्यावा." राजाने आपल्या एका पुत्राला त्यांच्यासोबत दिले आणि म्हटले, "जा, याला घेऊन तिथे त्याचा राज्याभिषेक करा आणि न्यायसभा इत्यादींची स्थापना करून राहा." त्यांनी तसेच केले. परंतु तो राजपुत्र वाईट मित्रांच्या संगतीमुळे काही दिवसांतच मद्यपी झाला. त्याने न्यायसभा इत्यादी सर्व कामे बंद केली आणि नगराच्या मध्यभागी धूर्तांनी वेढलेला राहून, मद्यपान करत आणि नाच-गाणे इत्यादी भोगांमध्ये वेळ घालवू लागला. त्यानंतर लोकांनी राजाकडे येऊन ही माहिती दिली। ရာဇာ ဧကံ ပဏ္ဍိတံ အမစ္စံ အာဏာပေသိ – ‘‘ဂစ္ဆ ကုမာရံ ဩဝဒိတွာ, ဝိနိစ္ဆယဋ္ဌာနာဒီနိ ကာရေတွာ, ပုန အဘိသေကံ ကတွာ, ဧဟီ’’တိ. န သက္ကာ, ဒေဝ, ကုမာရံ ဩဝဒိတုံ, စဏ္ဍော ကုမာရော ဃာတေယျာပိ မန္တိ. အထေကံ ဗလသမ္ပန္နံ ယောဓံ အာဏာပေသိ – ‘‘တွံ ဣမိနာ သဒ္ဓိံ ဂန္တွာ သစေ သော ဩဝါဒေ န တိဋ္ဌတိ, သီသမဿ ဆိန္ဒာဟီ’’တိ. ဣတိ သော အမစ္စော ယောဓော စာတိ ဣဒံ သီဃံ ဒူတယုဂံ တတ္ထ ဂန္တွာ ဒေါဝါရိကံ ပုစ္ဆိ – ‘‘ကဟံ, ဘော, နဂရဿ သာမိ ကုမာရော’’တိ. ဧသ မဇ္ဈေသိင်္ဃာဋကေ သုရံ ပိဝန္တော ဓုတ္တပရိဝါရိတော ဂီတာဒိရတိံ အနုဘောန္တော နိသိန္နောတိ. အထ တံ ဒူတယုဂံ ဂန္တွာ အမစ္စော တာဝေတ္ထ, ‘‘သာမိ, ဝိနိစ္ဆယဋ္ဌာနာဒီနိ ကိရ ကာရေတွာ သာဓုကံ ရဇ္ဇံ အနုသာသာ’’တိ အာဟ. ကုမာရော အသုဏန္တော ဝိယ နိသီဒိ. အထ နံ ယောဓော သီသေ ဂဟေတွာ, ‘‘သစေ ရညော အာဏံ ကရောသိ, ကရ, နော စေ, ဧတ္ထေဝ တေ သီသံ ပါတေဿာမီ’’တိ ခဂ္ဂံ အဗ္ဗာဟိ. ပရိစာရကာ ဓုတ္တာ တာဝဒေဝ ဒိသာသု ပလာယိံသု. ကုမာရော ဘီတော သာသနံ သမ္ပဋိစ္ဆိ. အထဿ တေ တတ္ထေဝ အဘိသေကံ ကတွာ သေတစ္ဆတ္တံ ဥဿာပေတွာ ‘‘သမ္မာ ရဇ္ဇံ အနုသာသာဟီ’’တိ ရညာ ဝုတ္တံ ယထာဘူတဝစနံ နိယျာတေတွာ ယထာဂတမဂ္ဂမေဝ ပဋိပဇ္ဇိံသု. ဣမမတ္ထံ အာဝိကရောန္တော ဘဂဝါ ‘‘ပုရတ္ထိမာယ ဒိသာယာ’’တိ အာဟ. राजाने एका बुद्धिमान अमात्याला आज्ञा दिली – “जा, राजकुमाराला उपदेश कर, न्यायनिवाड्याची कामे इत्यादी करवून घे, आणि पुन्हा त्याचा राज्याभिषेक करून परत ये.” (अमात्य म्हणाला) – “हे देवा (महाराज), राजकुमाराला उपदेश करणे शक्य नाही. तो अत्यंत क्रूर राजकुमार माझा वधही करू शकतो.” त्यानंतर राजाने एका बलवान योद्ध्याला आज्ञा दिली – “तू याच्यासोबत जा आणि जर तो उपदेश ऐकत नसेल, तर त्याचे मस्तक धडावेगळे कर.” अशा प्रकारे तो अमात्य आणि तो योद्धा हे दोन वेगवान दूत तिथे गेले आणि त्यांनी द्वारपाळाला विचारले – “हे भल्या माणसा, या नगराचा स्वामी असलेला राजकुमार कुठे आहे?” (द्वारपाळ म्हणाला) – “तो शहराच्या मध्यभागी असलेल्या चौकात मद्यपान करत, धूर्तांनी वेढलेला, गायन इत्यादी मनोरंजनाचा आनंद घेत बसला आहे.” त्यानंतर ते दोन्ही दूत तिथे गेले आणि अमात्याने प्रथम म्हटले – “स्वामी, न्यायनिवाड्याची कामे इत्यादी करवून घेऊन राज्याचा कारभार चांगल्या प्रकारे चालवावा, असा राजाचा संदेश आहे.” राजकुमार न ऐकल्यासारखाच बसून राहिला. त्यानंतर त्या योद्ध्याने त्याचे मस्तक (केस) पकडले आणि “जर तू राजाची आज्ञा पाळणार असशील तर पाळ, नाहीतर मी इथेच तुझे मस्तक उडवीन,” असे म्हणून तलवार उपसली. त्याचे सेवक आणि धूर्त मित्र लगेचच दिशादिशांना पळून गेले. राजकुमार घाबरला आणि त्याने राजाचा संदेश स्वीकारला. त्यानंतर त्यांनी तिथेच त्याचा राज्याभिषेक केला, श्वेतछत्र उभारले आणि “राज्याचा कारभार योग्य प्रकारे चालवावा” हा राजाने दिलेला खरा संदेश त्याला सोपवून ते ज्या मार्गाने आले होते त्याच मार्गाने परत गेले. हाच अर्थ स्पष्ट करताना भगवान “पुरत्थिमाय दिसाय” (पूर्व दिशेला) इत्यादी म्हणाले. တတြိဒံ ဩပမ္မသံသန္ဒနံ – သမိဒ္ဓမဟာနဂရံ ဝိယ ဟိ နိဗ္ဗာနနဂရံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ, သတ္တရတနသမန္နာဂတော ရာဇာ စက္ကဝတ္တိ ဝိယ သတ္တဗောဇ္ဈင်္ဂရတနသမန္နာဂတော ဓမ္မရာဇာ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ, ပစ္စန္တိမနဂရံ ဝိယ သက္ကာယနဂရံ, တသ္မိံ နဂရေ ကူဋရာဇပုတ္တော ဝိယ ဣမဿ ဘိက္ခုနော ကူဋစိတ္တုပ္ပာဒေါ, ကူဋရာဇပုတ္တဿ ဓုတ္တေဟိ ပရိဝါရိတကာလော ဝိယ ဣမဿ ဘိက္ခုနော ပဉ္စဟိ နီဝရဏေဟိ သမင်္ဂိကာလော, ဒွေ သီဃဒူတာ ဝိယ သမထကမ္မဋ္ဌာနဉ္စ ဝိပဿနာကမ္မဋ္ဌာနဉ္စ, မဟာယောဓေန သီသေ ဂဟိတကာလော ဝိယ ဥပ္ပန္နပဌမဇ္ဈာနသမာဓိနာ [Pg.104] နိစ္စလံ ကတွာ စိတ္တဂ္ဂဟိတကာလော, ယောဓေန သီသေ ဂဟိတမတ္တေ ဓုတ္တာနံ ဒိသာသု ပလာယိတွာ ဒူရီဘာဝေါ ဝိယ ပဌမဇ္ဈာနမှိ ဥပ္ပန္နမတ္တေ နီဝရဏာနံ ဒူရီဘာဝေါ, ‘‘ကရိဿာမိ ရညော သာသန’’န္တိ သမ္ပဋိစ္ဆိတမတ္တေ ဝိဿဋ္ဌကာလော ဝိယ ဈာနတော ဝုဋ္ဌိတကာလော, အမစ္စေန ရညော သာသနံ အာရောစိတကာလော ဝိယ သမာဓိနာ စိတ္တံ ကမ္မနိယံ ကတွာ ဝိပဿနာကမ္မဋ္ဌာနဿ ဝဍ္ဎိတကာလော, တတ္ထေဝဿ တေဟိ ဒွီဟိ ဒူတေဟိ ကတာဘိသေကဿ သေတစ္ဆတ္တဥဿာပနံ ဝိယ သမထဝိပဿနာကမ္မဋ္ဌာနံ နိဿာယ အရဟတ္တပ္ပတ္တဿ ဝိမုတ္တိသေတစ္ဆတ္တုဿာပနံ ဝေဒိတဗ္ဗံ. येथे उपमेची तुलना (संगती) खालीलप्रमाणे आहे – समृद्ध महानगराप्रमाणेच निर्वाणनगर समजले पाहिजे. सप्त रत्नांनी युक्त असलेल्या चक्रवर्ती राजाप्रमाणेच सप्त बोज्झंग (बोध्यंग) रत्नांनी युक्त असलेले धर्मराज सम्यक्संबुद्ध समजले पाहिजेत. सीमावर्ती नगराप्रमाणेच सक्काय (सत्काय) नगर समजले पाहिजे. त्या नगरातील कपटी राजकुमाराप्रमाणेच या भिक्खूचा कपटी चित्तोत्पाद (कुटिल विचार) समजला पाहिजे. कपटी राजकुमाराला धूर्तांनी वेढलेला काळ जसा, तसाच या भिक्खूचा पाच नीवरणांनी युक्त असलेला काळ समजला पाहिजे. दोन वेगवान दूतांप्रमाणेच समथ कम्मट्ठान आणि विपस्सना कम्मट्ठान समजले पाहिजे. महावीर योद्ध्याने मस्तक पकडल्याचा काळ जसा, तसाच उत्पन्न झालेल्या प्रथम ध्यान समाधीद्वारे चित्ताला निश्चल करून त्यावर नियंत्रण मिळवण्याचा काळ समजला पाहिजे. योद्ध्याने मस्तक पकडताच धूर्त लोक दिशादिशांना पळून दूर जाणे जसे, तसेच प्रथम ध्यान उत्पन्न होताच नीवरणांचे दूर जाणे समजले पाहिजे. “मी राजाची आज्ञा पाळीन” असे स्वीकारताच (योद्ध्याने राजकुमाराला) सोडून देण्याचा काळ जसा, तसाच ध्यानातून व्युत्थान करण्याचा (बाहेर पडण्याचा) काळ समजला पाहिजे. अमात्याने राजाचा संदेश ऐकवण्याचा काळ जसा, तसाच समाधीद्वारे चित्ताला कर्मक्षम करून विपस्सना कम्मट्ठानाचा विकास करण्याचा काळ समजला पाहिजे. त्याच ठिकाणी त्या दोन दूतांनी त्याचा राज्याभिषेक करून श्वेतछत्र उभारणे जसे, तसेच समथ आणि विपस्सना कम्मट्ठानाचा आश्रय घेऊन अरहत्त्व प्राप्त केलेल्या भिक्खूसाठी विमुक्तीचे श्वेतछत्र उभारणे समजले पाहिजे. နဂရန္တိ ခေါ ဘိက္ခု ဣမဿေတံ စာတုမဟာဘူတိကဿ ကာယဿ အဓိဝစနန္တိအာဒီသု ပန စာတုမဟာဘူတိကဿာတိအာဒီနံ ပဒါနံ အတ္ထော ဟေဋ္ဌာ ဝိတ္ထာရိတောဝ. ကေဝလံ ပန ဝိညာဏရာဇပုတ္တဿ နိဝါသဋ္ဌာနတ္တာ ဧတ္ထ ကာယော ‘‘နဂရ’’န္တိ ဝုတ္တော, တဿေဝ ဒွါရဘူတတ္တာ ဆ အာယတနာနိ ‘‘ဒွါရာနီ’’တိ, တေသု ဒွါရေသု နိစ္စံ သုပ္ပတိဋ္ဌိတတ္တာ သတိ ‘‘ဒေါဝါရိကော’’တိ, ကမ္မဋ္ဌာနံ အာစိက္ခန္တေန ဓမ္မရာဇေန ပေသိတတ္တာ သမထဝိပဿနာ ‘‘သီဃံ ဒူတယုဂ’’န္တိ. ဧတ္ထ မဟာယောဓော ဝိယ သမထော, ပဏ္ဍိတာမစ္စော ဝိယ ဝိပဿနာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. “भिक्खूहो, नगर हे या चार महाभूतांनी बनलेल्या शरीराचे नाव आहे” इत्यादी वाक्यांमध्ये “चातुमहाभूतिकस्स” (चार महाभूतांनी बनलेल्या) इत्यादी पदांचा अर्थ खाली सविस्तरपणे स्पष्ट केलाच आहे. परंतु केवळ विज्ञानरूपी राजकुमाराचे निवासस्थान असल्यामुळे येथे शरीराला “नगर” म्हटले आहे. त्याच नगराचे दरवाजे असल्यामुळे सहा आयतनांना “द्वारे” म्हटले आहे. त्या द्वारांवर नेहमी चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित असल्यामुळे सतीला (स्मृतीला) “द्वारपाळ” म्हटले आहे. कम्मट्ठान शिकवणाऱ्या धर्मराजांनी पाठवलेले असल्यामुळे समथ आणि विपस्सना यांना “वेगवान दूतांची जोडी” म्हटले आहे. येथे महायोद्ध्याप्रमाणे समथ आणि बुद्धिमान अमात्याप्रमाणे विपस्सना समजली पाहिजे. မဇ္ဈေ သိင်္ဃာဋကောတိ နဂရမဇ္ဈေ သိင်္ဃာဋကော. မဟာဘူတာနန္တိ ဟဒယဝတ္ထုဿ နိဿယဘူတာနံ မဟာဘူတာနံ. ဝတ္ထုရူပဿ ဟိ ပစ္စယဒဿနတ္ထမေဝေတံ စတုမဟာဘူတဂ္ဂဟဏံ ကတံ. နဂရမဇ္ဈေ ပန သော ရာဇကုမာရော ဝိယ သရီရမဇ္ဈေ ဟဒယရူပသိင်္ဃာဋကေ နိသိန္နော သမထဝိပဿနာဒူတေဟိ အရဟတ္တာဘိသေကေန အဘိသိဉ္စိတဗ္ဗော ဝိပဿနာဝိညာဏရာဇပုတ္တော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. နိဗ္ဗာနံ ပန ယထာဘူတသဘာဝံ အကုပ္ပံ အဓိကာရီတိ ကတွာ ယထာဘူတံ ဝစနန္တိ ဝုတ္တံ. အရိယမဂ္ဂေါ ပန ယာဒိသောဝ ပုဗ္ဗဘာဂဝိပဿနာမဂ္ဂေါ, အယမ္ပိ အဋ္ဌင်္ဂသမန္နာဂတတ္တာ တာဒိသောယေဝါတိ ကတွာ ယထာဂတမဂ္ဂေါတိ ဝုတ္တော. ဣဒံ တာဝေတ္ထ ဓမ္မဒေသနတ္ထံ အာဘတာယ ဥပမာယ သံသန္ဒနံ. “मज्झे सिंग्घाटको” म्हणजे नगराच्या मध्यभागी असलेला चौक (चार रस्ते एकत्र येण्याचे ठिकाण). “महाभूतांचे” म्हणजे हृदयवस्तूचा आश्रय असलेल्या महाभूतांचे. कारण वस्तुरूपाचा प्रत्यय (कारणभाव) दाखवण्यासाठीच हे चार महाभूतांचे ग्रहण केले आहे. परंतु नगराच्या मध्यभागी असलेल्या त्या राजकुमाराप्रमाणेच, शरीराच्या मध्यभागी असलेल्या हृदयरूपरूपी चौकात बसलेला आणि समथ-विपस्सनारूपी दूतांद्वारे अरहत्त्वरूपी अभिषेकाने अभिषिक्त होणारा “विपस्सना-विज्ञानरूपी राजकुमार” समजला पाहिजे. निर्वाण हे यथार्थ स्वभावाचे आणि अपरिवर्तनीय असल्यामुळे त्याला “यथाभूत वचन” (सत्य संदेश) म्हटले आहे. आणि आर्यमार्ग जसा पूर्वभाग-विपस्सनामार्ग आहे, तसाच हा देखील अष्टांगिक असल्यामुळे त्याला “यथागत मार्ग” म्हटले आहे. येथे धर्मदेशनेसाठी आणलेल्या उपमेची ही संगती (तुलना) आहे. တဿေဝတ္ထဿ ပါကဋီကရဏတ္ထံ အာဘတပက္ခေ ပန ဣဒံ သံသန္ဒနံ – ဧတ္ထ ဟိ ဆဒွါရူပမာ ဆဖဿာယတနဝသေန ဒဿနဝိသုဒ္ဓိပတ္တံ ခီဏာသဝံ ဒဿေတုံ [Pg.105] အာဘတာ, နဂရသာမိဥပမာ ပဉ္စက္ခန္ဓဝသေန, သိင်္ဃာဋကူပမာ စတုမဟာဘူတဝသေန, နဂရူပမာ တေဘူမကဓမ္မဝသေန ဒဿနဝိသုဒ္ဓိပတ္တံ ခီဏာသဝံ ဒဿေတုံ အာဘတာ. သင်္ခေပတော ပနိမသ္မိံ သုတ္တေ စတုသစ္စမေဝ ကထိတံ. သကလေနပိ ဟိ နဂရသမ္ဘာရေန ဒုက္ခသစ္စမေဝ ကထိတံ, ယထာဘူတဝစနေန နိရောဓသစ္စံ, ယထာဂတမဂ္ဂေန မဂ္ဂသစ္စံ, ဒုက္ခဿ ပန ပဘာဝိကာ တဏှာ သမုဒယသစ္စံ. ဒေသနာပရိယောသာနေ ပဉှပုစ္ဆကော ဘိက္ခု သောတာပတ္တိဖလေ ပတိဋ္ဌိတောတိ. त्याच अर्थाचे स्पष्टीकरण करण्यासाठी मांडलेल्या बाजूची संगती खालीलप्रमाणे आहे – येथे सहा द्वारांची उपमा सहा स्पर्शायतनांच्या द्वारे दर्शनविशुद्धी प्राप्त केलेल्या क्षीणासवाला दर्शवण्यासाठी दिली आहे. नगरस्वामीची उपमा पंचस्कंधांच्या द्वारे, चौकाची उपमा चार महाभूतांच्या द्वारे, आणि नगराची उपमा त्रिभूमिक धर्मांच्या द्वारे दर्शनविशुद्धी प्राप्त केलेल्या क्षीणासवाला दर्शवण्यासाठी दिली आहे. थोडक्यात सांगायचे तर, या सुत्तात केवळ चार आर्यसत्यांचेच प्रतिपादन केले आहे. कारण संपूर्ण नगरसामग्रीद्वारे केवळ दुःखसत्यच सांगितले आहे, यथाभूत वचनाद्वारे निरोधसत्य, यथागत मार्गाद्वारे मार्गसत्य, आणि दुःखाला उत्पन्न करणारी तृष्णा हे समुदयसत्य आहे. देशनेच्या शेवटी प्रश्न विचारणारा भिक्खू स्रोतापत्ती फलावर प्रतिष्ठित झाला. ၉. ဝီဏောပမသုတ္တဝဏ္ဏနာ ९. वीणोपमसुत्तवण्णना ၂၄၆. နဝမေ ယဿ ကဿစိ, ဘိက္ခဝေ, ဘိက္ခုဿ ဝါ ဘိက္ခုနိယာ ဝါတိ ဣဒံ သတ္ထာ ယထာ နာမ မဟာကုဋုမ္ဗိကော မဟန္တံ ကသိကမ္မံ ကတွာ, နိပ္ဖန္နသဿော ဃရဒွါရေ မဏ္ဍပံ ကတွာ, ဥဘတောသံဃဿ ဒါနံ ပဝတ္တေယျ. ကိဉ္စာပိ တေန ဥဘတောသံဃဿ ဒါနံ ပဋ္ဌပိတံ, ဒွီသု ပန ပရိသာသု သန္တပ္ပိတာသု သေသဇနမ္ပိ သန္တပ္ပေတိယေဝ, ဧဝမေဝ ဘဂဝါ သမဓိကာနိ စတ္တာရိ အသင်္ချေယျာနိ ပါရမိယော ပူရေတွာ ဗောဓိမဏ္ဍေ သဗ္ဗညုတညာဏံ အဓိဂန္တွာ ပဝတ္တိတဝရဓမ္မစက္ကော ဇေတဝနမဟာဝိဟာရေ နိသိန္နော ဘိက္ခုပရိသာယ စေဝ ဘိက္ခုနိပရိသာယ စ မဟာဓမ္မယာဂံ ယဇန္တော ဝီဏောပမသုတ္တံ အာရဘိ. တံ ပေနေတံ ကိဉ္စာပိ ဒွေ ပရိသာ သန္ဓာယ အာရဒ္ဓံ, စတုန္နမ္ပိ ပန ပရိသာနံ အဝါရိတံ. တသ္မာ သဗ္ဗေဟိပိ သောတဗ္ဗဉ္စေဝ သဒ္ဓါတဗ္ဗဉ္စ, ပရိယောဂါဟိတွာ စဿ အတ္ထရသော ဝိန္ဒိတဗ္ဗောတိ. २४६. नवव्या सुत्तामध्ये, 'हे भिक्खूंनो, ज्या कोणा भिक्खूचे किंवा भिक्खुणीचे...' हे वाक्य शास्त्यांनी (बुद्धांनी) या उदाहरणाने स्पष्ट केले आहे: ज्याप्रमाणे एखाद्या मोठ्या कुटुंबिकाने (श्रीमंत गृहस्थाने) मोठी शेती करून, पीक तयार झाल्यावर घराच्या दारात मांडव उभारून दोन्ही संघांना (भिक्खू आणि भिक्खुणी संघाला) महादान दिले. जरी त्याने दोन्ही संघांसाठी दान सुरू केले असले, तरी त्या दोन परिषदांना संतुष्ट करण्यासोबतच तो इतर लोकांनाही संतुष्ट करतोच. त्याचप्रमाणे भगवंतांनी एक लाख कल्प अधिक चार असंख्येय कल्पपर्यंत पारमिता पूर्ण करून, बोधिमंडळावर सर्वज्ञता-ज्ञान प्राप्त केले आणि श्रेष्ठ धम्मचक्र प्रवर्तित केले. जेतवन महाविहारात विराजमान असताना, भिक्खू आणि भिक्खुणी परिषदेला महान धम्मदान देण्याच्या उद्देशाने त्यांनी 'विणोपम सुत्त' सांगण्यास सुरुवात केली. जरी हे सुत्त दोन्ही परिषदांना उद्देशून सुरू केले गेले असले, तरी ते चारही परिषदांसाठी प्रतिबंधित नाही (खुले आहे). म्हणून सर्वांनीच ते ऐकले पाहिजे, त्यावर श्रद्धा ठेवली पाहिजे आणि त्यात खोलवर प्रवेश करून त्याच्या अर्थरसाचा अनुभव घेतला पाहिजे. တတ္ထ ဆန္ဒောတိအာဒီသု ဆန္ဒော နာမ ပုဗ္ဗုပ္ပတ္တိကာ ဒုဗ္ဗလတဏှာ, သော ရဉ္ဇေတုံ န သက္ကောတိ. အပရာပရံ ဥပ္ပဇ္ဇမာနာ ပန ဗလဝတဏှာ ရာဂေါ နာမ, သော ရဉ္ဇေတုံ သက္ကောတိ. ဒဏ္ဍာဒါနာဒီနိ ကာတုံ အသမတ္ထော ပုဗ္ဗုပ္ပတ္တိကော ဒုဗ္ဗလကောဓော ဒေါသော နာမ. တာနိ ကာတုံ သမတ္ထော အပရာပရုပ္ပတ္တိကော ဗလဝကောဓော ပဋိဃံ နာမ. မောဟော ပန မောဟနသမ္မောဟနဝသေန ဥပ္ပန္နံ အညာဏံ. ဧဝမေတ္ထ ပဉ္စဟိပိ ပဒေဟိ တီဏိ အကုသလမူလာနိ ဂဟိတာနိ. တေသု ဂဟိတေသု သဗ္ဗေပိ တမ္မူလကာ ကိလေသာ ဂဟိတာဝ ဟောန္တိ. ‘‘ဆန္ဒော ရာဂေါ’’တိ ဝါ ပဒဒွယေန အဋ္ဌလောဘသဟဂတစိတ္တုပ္ပာဒါ, ‘‘ဒေါသော [Pg.106] ပဋိဃ’’န္တိ ပဒဒွယေန ဒွေ ဒေါမနဿသဟဂတစိတ္တုပ္ပာဒါ, မောဟပဒေန လောဘဒေါသရဟိတာ ဒွေ ဥဒ္ဓစ္စဝိစိကိစ္ဆာသဟဂတစိတ္တုပ္ပာဒါ ဂဟိတာတိ. ဧဝံ သဗ္ဗေပိ ဒွါဒသ စိတ္တုပ္ပာဒါ ဒဿိတာဝ ဟောန္တိ. त्या सुत्तात 'छंद' इत्यादी शब्दांमध्ये—'छंद' म्हणजे सुरुवातीला उत्पन्न होणारी दुर्बळ तृष्णा (तण्हा), जी चित्ताला आसक्त करण्यास असमर्थ असते. परंतु, वारंवार उत्पन्न होणारी बलवान तृष्णा म्हणजे 'राग' होय, जी चित्ताला आसक्त करण्यास समर्थ असते. दंड (काठी) उचलणे इत्यादी हिंसक कृती करण्यास असमर्थ असलेला, सुरुवातीला उत्पन्न होणारा दुर्बळ क्रोध म्हणजे 'दोस' (द्वेष) होय. आणि त्या कृती करण्यास समर्थ असलेला, वारंवार उत्पन्न होणारा बलवान क्रोध म्हणजे 'पटिघ' (प्रतिघ) होय. 'मोह' म्हणजे संभ्रमित करणाऱ्या अवस्थेमुळे उत्पन्न झालेले अज्ञान होय. अशा प्रकारे, येथे या पाच पदांद्वारे तीन अकुशलमुळे ग्रहण केली गेली आहेत. ती ग्रहण केली असता, त्यांवर आधारित असणारे सर्व क्लेशही ग्रहण केले जातातच. किंवा, 'छंद' आणि 'राग' या दोन पदांनी लोभयुक्त असणारे आठ चित्तोत्पाद (चित्तुप्पाद) ग्रहण केले जातात; 'दोस' आणि 'पटिघ' या दोन पदांनी दौर्मनस्ययुक्त (दोमनस्स) असणारे दोन चित्तोत्पाद ग्रहण केले जातात; आणि 'मोह' या पदाने लोभ व द्वेषापासून विरहित असणारे औद्धत्य (उद्धच्च) आणि शंका (विचिकिच्छा) युक्त असणारे दोन चित्तोत्पाद ग्रहण केले जातात. अशा प्रकारे, सर्व बारा अकुशल चित्तोत्पाद दर्शवले गेले आहेत. သဘယောတိ ကိလေသစောရာနံ နိဝါသဋ္ဌာနတ္တာ သဘယော. သပ္ပဋိဘယောတိ ဝဓဗန္ဓနာဒီနံ ကာရဏတ္တာ သပ္ပဋိဘယော. သကဏ္ဋကောတိ ရာဂါဒီဟိ ကဏ္ဋကေဟိ သကဏ္ဋကော. သဂဟနောတိ ရာဂဂဟနာဒီဟိ သဂဟနော. ဥမ္မဂ္ဂေါတိ ဒေဝလောကံ ဝါ မနုဿလောကံ ဝါ နိဗ္ဗာနံ ဝါ ဂစ္ဆန္တဿ အမဂ္ဂေါ. ကုမ္မဂ္ဂေါတိ ကုစ္ဆိတဇေဂုစ္ဆိဘူတဋ္ဌာနဂမနဧကပဒိကမဂ္ဂေါ ဝိယ အပါယသမ္ပာပကတ္တာ ကုမ္မဂ္ဂေါ. ဒုဟိတိကောတိ ဧတ္ထ ဣဟိတီတိ ဣရိယနာ, ဒုက္ခာ ဣဟိတိ ဧတ္ထာတိ, ဒုဟိတိကော. ယသ္မိဉှိ မဂ္ဂေ မူလဖလာဒိခါဒနီယံ ဝါ သာယနီယံ ဝါ နတ္ထိ, တသ္မိံ ဣရိယနာ ဒုက္ခာ ဟောတိ, န သက္ကာ တံ ပဋိပဇ္ဇိတွာ ဣစ္ဆိတဋ္ဌာနံ ဂန္တုံ. ကိလေသမဂ္ဂမ္ပိ ပဋိပဇ္ဇိတွာ န သက္ကာ သမ္ပတ္တိဘဝံ ဂန္တုန္တိ ကိလေသမဂ္ဂေါ ဒုဟိတိကောတိ ဝုတ္တော. ဒွီဟိတိကောတိပိ ပါဌော, ဧသေဝတ္ထော. အသပ္ပုရိသသေဝိတောတိ ကောကာလိကာဒီဟိ အသပ္ပုရိသေဟိ သေဝိတော. ‘सभयो’ (भययुक्त) म्हणजे क्लेशरूपी चोरांचे निवासस्थान असल्यामुळे भययुक्त. ‘सप्पटिभयो’ (धोकादायक) म्हणजे वध, बंधन इत्यादींचे कारण असल्यामुळे धोकादायक. ‘सकण्टको’ (काटेरी) म्हणजे रागादी क्लेशरूपी काट्यांनी युक्त असल्यामुळे काटेरी. ‘सगहनो’ (गहन/दाट) म्हणजे रागादी गहन अरण्यासारखा असल्यामुळे गहन. ‘उम्मग्गो’ (उन्मार्ग) म्हणजे देवलोक, मनुष्यलोक किंवा निर्वाणाकडे जाणाऱ्या प्रवाशासाठी तो योग्य मार्ग नसणे (अमार्ग). ‘कुम्मग्गो’ (कुमार्ग) म्हणजे निंदनीय व घृणास्पद ठिकाणी नेणारा, एखाद्या अरुंद पाऊलवाटेप्रमाणे दुर्गतीकडे (अपाय) नेणारा असल्यामुळे कुमार्ग. ‘दुहितिको’ या शब्दाचा अर्थ असा आहे: ‘इहिती’ म्हणजे गमन (प्रवास करणे). जेथे प्रवास करणे अत्यंत दुःखदायक असते, तो ‘दुहितिक’ होय. कारण ज्या मार्गावर कंदमुळे, फळे इत्यादी खाण्यासारखे किंवा आस्वाद घेण्यासारखे काही नसते, त्या मार्गावर प्रवास करणे अत्यंत कष्टदायक असते आणि त्यावरून प्रवास करून इच्छित स्थळी पोहोचणे शक्य नसते. त्याचप्रमाणे, क्लेशांच्या मार्गावरून चालून सुगती किंवा कल्याणकारी अवस्थेला पोहोचणे शक्य नसते, म्हणून क्लेशांच्या मार्गाला ‘दुहितिक’ म्हटले आहे. ‘द्वीहितिको’ असाही पाठ आढळतो, त्याचा अर्थही हाच आहे. ‘असप्पुरिससेवितो’ (असत-पुरुषांनी सेवलेला) म्हणजे कोकालिक इत्यादी असत-पुरुषांनी (दुर्जनांनी) आचरलेला. တတော စိတ္တံ နိဝါရယေတိ တေဟိ စက္ခုဝိညေယျေဟိ ရူပေဟိ တံ ဆန္ဒာဒိဝသေန ပဝတ္တစိတ္တံ အသုဘာဝဇ္ဇနာဒီဟိ ဥပါယေဟိ နိဝါရယေ. စက္ခုဒွါရသ္မိဉှိ ဣဋ္ဌာရမ္မဏေ ရာဂေ ဥပ္ပန္နေ အသုဘတော အာဝဇ္ဇန္တဿ စိတ္တံ နိဝတ္တတိ, အနိဋ္ဌာရမ္မဏေ ဒေါသေ ဥပ္ပန္နေ မေတ္တတော အာဝဇ္ဇန္တဿ စိတ္တံ နိဝတ္တတိ, မဇ္ဈတ္တာရမ္မဏေ မောဟေ ဥပ္ပန္နေ ဥဒ္ဒေသပရိပုစ္ဆံ ဂရုဝါသံ အာဝဇ္ဇန္တဿ စိတ္တံ နိဝတ္တတိ. ဧဝံ အသက္ကောန္တေန ပန သတ္ထုမဟတ္တတံ ဓမ္မဿ သွာက္ခာတတာ သံဃဿ သုပ္ပဋိပတ္တိ စ အာဝဇ္ဇိတဗ္ဗာ. သတ္ထုမဟတ္တတံ ပစ္စဝေက္ခတောပိ ဟိ ဓမ္မဿ သွာက္ခာတတံ သံဃဿ သုပ္ပဋိပတ္တိံ ပစ္စဝေက္ခတောပိ စိတ္တံ နိဝတ္တတိ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘အသုဘာဝဇ္ဇနာဒီဟိ ဥပါယေဟိ နိဝါရယေ’’တိ. ‘त्यापासून चित्त परावृत्त करावे’ (ततो चित्तं निवारये) याचा अर्थ असा की, डोळ्यांनी पाहता येणाऱ्या त्या रूपांमध्ये छंद इत्यादींच्या प्रभावाने प्रवृत्त होणाऱ्या चित्ताला अशुभाचे चिंतन इत्यादी उपायांनी परावृत्त करावे. कारण चक्षुद्वारामध्ये (डोळ्यांसमोर) प्रिय आलंबन आल्यावर जर राग उत्पन्न झाला, तर अशुभाचे चिंतन करणाऱ्याचे चित्त त्या रागापासून परावृत्त होते; अप्रिय आलंबन आल्यावर जर द्वेष उत्पन्न झाला, तर मैत्रीचे चिंतन करणाऱ्याचे चित्त त्या द्वेषापासून परावृत्त होते; आणि तटस्थ आलंबन आल्यावर जर मोह उत्पन्न झाला, तर धम्मग्रंथांचे वाचन, प्रश्न विचारणे आणि गुरूंच्या सानिध्यात राहणे यांचे चिंतन करणाऱ्याचे चित्त त्या मोहापासून परावृत्त होते. परंतु, जर कोणी अशा प्रकारे चित्त परावृत्त करण्यास असमर्थ असेल, तर त्याने शास्त्यांचे (बुद्धांचे) मोठेपण, धम्माचे सुव्याख्यात असणे आणि संघाचे सुप्रतिपन्न असणे यांचे चिंतन करावे. कारण शास्त्यांच्या मोठेपणाचे, धम्माच्या सुव्याख्यात असण्याचे किंवा संघाच्या सुप्रतिपन्न असण्याचे वारंवार चिंतन केल्यानेही चित्त अकुशलापासून परावृत्त होते. म्हणूनच म्हटले आहे—‘अशुभाचे चिंतन इत्यादी उपायांनी चित्त परावृत्त करावे.’ ကိဋ္ဌန္တိ ကိဋ္ဌဋ္ဌာနေ ဥပ္ပန္နသဿံ. သမ္ပန္နန္တိ ပရိပုဏ္ဏံ သုနိပ္ဖန္နံ. ကိဋ္ဌာဒေါတိ သဿခါဒကော. ဧဝမေဝ ခေါတိ ဧတ္ထ သမ္ပန္နကိဋ္ဌံ ဝိယ ပဉ္စ ကာမဂုဏာ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ, ကိဋ္ဌာဒေါ ဂေါဏော ဝိယ ကူဋစိတ္တံ, ကိဋ္ဌာရက္ခဿ ပမာဒကာလော ဝိယ ဘိက္ခုနော ဆသု ဒွါရေသု သတိံ ပဟာယ ဝိစရဏကာလော, ကိဋ္ဌာရက္ခဿ ပမာဒမာဂမ္မ ဂေါဏေန ဂဟိတဂဗ္ဘဿ ကိဋ္ဌဿ ခါဒိတတ္တာ သဿသာမိနော [Pg.107] သဿဖလာနဓိဂမော ဝိယ ဆဒွါရရက္ခိကာယ သတိယာ ဝိပ္ပဝါသမာဂမ္မ ပဉ္စကာမဂုဏံ အဿာဒေန္တေန စိတ္တေန ကုသလပက္ခဿ နာသိတတ္တာ ဘိက္ခုနော သာမညဖလာဓိဂမာဘာဝေါ ဝေဒိတဗ္ဗော. ‘किट्ठं’ म्हणजे शेतात उगवलेले पीक. ‘सम्पन्नं’ म्हणजे परिपूर्ण, चांगल्या प्रकारे पिकलेले. ‘किट्ठादो’ म्हणजे पीक खाणारा (बैल). ‘त्याचप्रमाणे’ (एवमेव खो) यामध्ये—पिकलेल्या पिकाप्रमाणे पाच कामगुण समजले पाहिजेत; पीक खाणाऱ्या बैलाप्रमाणे चंचल व कपटी चित्त समजले पाहिजे; पीक राखणाऱ्याच्या बेसावधपणाच्या (प्रमाद) काळाप्रमाणे भिक्खूचा सहा इंद्रियद्वारांवर सती (स्मृती) सोडून वावरण्याचा काळ समजला पाहिजे; आणि पीक राखणाऱ्याच्या बेसावधपणामुळे बैलाने दाण्यांनी भरलेले पीक खाऊन टाकल्यामुळे शेतकऱ्याला पिकाचे फळ न मिळण्याप्रमाणे, सहा द्वारांचे रक्षण करणाऱ्या सतीच्या अभावामुळे पाच कामगुणांचा आस्वाद घेणाऱ्या चित्ताने कुशल पक्षाचा नाश केल्यामुळे भिक्खूला श्रामण्यफळ (सामञ्ञफल) प्राप्त न होणे, असे समजले पाहिजे. ဥပရိဃဋာယန္တိ ဒွိန္နံ သိင်္ဂါနံ အန္တရေ. သုနိဂ္ဂဟိတံ နိဂ္ဂဏှေယျာတိ ဃဋာယံ ပတိဋ္ဌိတေ နာသာရဇ္ဇုကေ သုဋ္ဌု နိဂ္ဂဟိတံ ကတွာ နိဂ္ဂဏှေယျ. ဒဏ္ဍေနာတိ မုဂ္ဂရသဒိသေန ထူလဒဏ္ဍကေန. ဧဝဉှိ သော ဘိက္ခဝေ ဂေါဏောတိ ဧဝံ သော ကိဋ္ဌာရက္ခဿ ပမာဒမနွာယ ယသ္မိံ ယသ္မိံ ခဏေ ကိဋ္ဌံ ဩတရိတုကာမော ဟောတိ, တသ္မိံ တသ္မိံ ခဏေ ဧဝံ နိဂ္ဂဏှိတွာ တာဠေတွာ ဩသဇ္ဇနေန နိဗ္ဗိသေဝနဘာဝံ ဥပနီတော ဂေါဏော. ‘उपरिघटायं’ म्हणजे दोन शिंगांच्या मध्ये. ‘चांगल्या प्रकारे नियंत्रित करून शिक्षा करावी’ (सुनिग्गहितं निग्गण्हेय्य) म्हणजे शिंगांच्या मध्ये असलेल्या नासिका-रज्जूला (नथणीच्या दोरीला) घट्ट पकडून नियंत्रित करावे. ‘दंडेन’ म्हणजे मुद्गरासारख्या जाड काठीने. ‘हे भिक्खूंनो, अशा प्रकारे तो बैल...’ याचा अर्थ असा की, पीक राखणाऱ्याच्या बेसावधपणाचा फायदा घेऊन ज्या ज्या क्षणी तो बैल पिकात उतरू इच्छितो, त्या त्या क्षणी त्याला अशा प्रकारे नियंत्रित करून, मार देऊन आणि हाकलून देऊन पिकापासून दूर राहण्याच्या सवयीचा बनवलेला तो बैल होय. ဧဝမေဝ ခေါတိ ဣဓာပိ သမ္ပန္နကိဋ္ဌမိဝ ပဉ္စ ကာမဂုဏာ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ, ကိဋ္ဌာဒေါ ဝိယ ကူဋစိတ္တံ, ကိဋ္ဌာရက္ခဿ အပ္ပမာဒေါ ဝိယ ဣမဿ ဘိက္ခုနော ဆသု ဒွါရေသု သတိယာ အဝိဿဇ္ဇနံ, ဒဏ္ဍော ဝိယ သုတ္တန္တော, ဂေါဏဿ ကိဋ္ဌာဘိမုခကာလေ ဒဏ္ဍေန တာဠနံ ဝိယ စိတ္တဿ ဗဟိဒ္ဓါ ပုထုတ္တာရမ္မဏာဘိမုခကာလေ အနမတဂ္ဂိယဒေဝဒူတအာဒိတ္တအာသီဝိသူပမအနာဂတဘယာဒီသု တံ တံ သုတ္တံ အာဝဇ္ဇေတွာ စိတ္တုပ္ပာဒဿ ပုထုတ္တာရမ္မဏတော နိဝါရေတွာ မူလကမ္မဋ္ဌာနေ ဩတာရဏံ ဝေဒိတဗ္ဗံ. တေနာဟု ပေါရာဏာ – ‘त्याचप्रमाणे’ (एवमेव खो) येथेही पिकलेल्या पिकाप्रमाणे पाच कामगुण समजले पाहिजेत; पीक खाणाऱ्या बैलाप्रमाणे चंचल व कपटी चित्त समजले पाहिजे; पीक राखणाऱ्याच्या जागरूकतेप्रमाणे (अप्रमाद) या भिक्खूने सहा इंद्रियद्वारांवर सती (स्मृती) न सोडणे समजले पाहिजे; काठीप्रमाणे सुत्तंत (सुत्त) समजले पाहिजे; आणि बैल पिकाकडे धावतो तेव्हा त्याला काठीने मारण्याप्रमाणे, चित्त जेव्हा बाहेरील विविध आलंबनांकडे धाव घेते, तेव्हा अनमतग्गिय सुत्त, देवदूत सुत्त, आदित्त सुत्त, आसीविसूपम सुत्त, अनागतभय सुत्त इत्यादींपैकी त्या त्या सुत्ताचे चिंतन करून, चित्तोत्पादाला विविध आलंबनांपासून परावृत्त करून मूळ कम्मट्ठानात (कर्मस्थानात) स्थिर करणे, असे समजले पाहिजे. म्हणूनच प्राचीन आचार्यांनी म्हटले आहे— ‘‘သုဘာသိတံ သုတွာ မနော ပသီဒတိ,ဒမေတိ နံ ပီတိသုခဉ္စ ဝိန္ဒတိ; တဒဿ အာရမ္မဏေ တိဋ္ဌတေ မနော,ဂေါဏောဝ ကိဋ္ဌာဒကော ဒဏ္ဍတဇ္ဇိတော’’တိ. ‘सुभाषित (सुवचन) ऐकून मन प्रसन्न होते, ते मनाला दमित करते आणि प्रीती व सुख प्राप्त करून देते; तेव्हा त्याचे मन आलंबनावर स्थिर होते, ज्याप्रमाणे काठीने ताडन केलेला पीक खाणारा बैल शांत उभा राहतो.’ ဥဒုဇိတန္တိ တဇ္ဇိတံ. သုဒုဇိတန္တိ သုတဇ္ဇိတံ, သုဇိတန္တိပိ အတ္ထော. ဥဒု, သုဒူတိ ဣဒံ ပန နိပါတမတ္တမေဝ. အဇ္ဈတ္တန္တိ ဂေါစရဇ္ဈတ္တံ. သန္တိဋ္ဌတီတိအာဒီသု ပဌမဇ္ဈာနဝသေန သန္တိဋ္ဌတိ, ဒုတိယဇ္ဈာနဝသေန သန္နိသီဒတိ, တတိယဇ္ဈာနဝသေန ဧကောဒိ ဟောတိ, စတုတ္ထဇ္ဈာနဝသေန သမာဓိယတိ. သဗ္ဗမ္ပိ ဝါ ဧတံ ပဌမဇ္ဈာနဝသေန ဝေဒိတဗ္ဗံ. ဧတ္တာဝတာ ဟိ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေန သမထာနုရက္ခဏဣန္ဒြိယသံဝရသီလံ နာမ ကထိတံ. ‘उदुजितं’ म्हणजे ताडन केलेले (धमकावलेले). ‘सुदुजितं’ म्हणजे चांगल्या प्रकारे ताडन केलेले; ‘सुजितं’ असाही याचा अर्थ आहे. ‘उदु’ आणि ‘सुदु’ हे केवळ निपात (अव्यय) आहेत. ‘अज्झत्तं’ (अध्यात्म) म्हणजे गोचर-अध्यात्म (कर्मस्थानाचा आंतरिक विषय). ‘सन्तिट्ठति’ इत्यादी शब्दांमध्ये—प्रथम ध्यानाच्या प्रभावाने स्थिर होतो (सन्तिट्ठति), द्वितीय ध्यानाच्या प्रभावाने शांत होतो (सन्निसिदति), तृतीय ध्यानाच्या प्रभावाने एकाग्र होतो (एकोदि होति) आणि चतुर्थ ध्यानाच्या प्रभावाने समाधीस्त होतो (समाधियति). किंवा हे सर्व प्रथम ध्यानाच्या प्रभावानेच समजून घ्यावे. कारण एवढ्या विवरणाने सम्यक्संबुद्धांनी शमथाने रक्षिलेले ‘इंद्रियसंवरशील’ सांगितले आहे. ရညော ဝါတိ ကဿစိဒေဝ ပစ္စန္တရညော ဝါ. သဒ္ဒံ သုဏေယျာတိ ပစ္စူသကာလေ ပဗုဒ္ဓေါ ကုသလေန ဝီဏာဝါဒကေန ဝါဒိယမာနာယ မဓုရသဒ္ဒံ သုဏေယျ. ရဇနီယောတိအာဒီသု စိတ္တံ ရဉ္ဇေတီတိ ရဇနီယော. ကာမေတဗ္ဗတာယ [Pg.108] ကမနီယော. စိတ္တံ မဒယတီတိ မဒနီယော. စိတ္တံ မုစ္ဆိတံ ဝိယ ကရဏတော မုစ္ဆိယတီတိ မုစ္ဆနီယော. အာဗန္ဓိတွာ ဝိယ ဂဟဏတော ဗန္ဓတီတိ ဗန္ဓနီယော. အလံ မေ, ဘောတိ ဝီဏာယ သဏ္ဌာနံ ဒိသွာ တံ အနိစ္ဆန္တော ဧဝမာဟ. ဥပဓာရဏေတိ ဝေဋ္ဌကေ. ကောဏန္တိ စတုရဿံ သာရဒဏ္ဍကံ. ‘रञ्ञो वा’ म्हणजे कोणत्याही एका सीमावर्ती (प्रत्यंत) राजाचा. ‘सद्दं सुणेय्य’ म्हणजे पहाटेच्या वेळी झोपेतून उठल्यावर, कुशल वीणावादकाने वाजवलेल्या वीणेचा मधुर आवाज ऐकावा. ‘रजनीयो’ इत्यादी शब्दांमध्ये—जे चित्ताला अनुरक्त (आकर्षित) करते, म्हणून ते ‘रजनीय’ होय. इच्छेच्या योग्य असल्यामुळे ते ‘कमनीय’ होय. जे चित्ताला मदमस्त (मोहित) करते, म्हणून ते ‘मदनीय’ होय. जे चित्ताला मूर्च्छित केल्यासारखे करते, म्हणून ते ‘मुच्छनीय’ होय. जे बांधून ठेवल्यासारखे पकडून ठेवते, म्हणून ते ‘बंधनीय’ होय. ‘अलं मे, भो’ (हे महाशया, मला हे पुरे!) असे वीणेचा आकार पाहून, ती नकोशी वाटल्यामुळे तो म्हणाला. ‘उपधारणे’ म्हणजे वीणेच्या तारा गुंडाळण्याच्या खुंट्या (वेठक). ‘कोण’ म्हणजे चौकोनी, कठीण लाकडाचा वीणा वाजवण्याचा दांडा. သော တံ ဝီဏန္တိ သော ရာဇာ ‘‘အာဟရထ နံ ဝီဏံ, အဟမဿာ သဒ္ဒံ ပသိဿာမီ’’တိ တံ ဝီဏံ ဂဟေတွာ. ဒသဓာ ဝါတိအာဒီသု ပဌမံ တာဝ ဒသဓာ ဖာလေယျ, အထဿာ သဒ္ဒံ အပဿန္တော သတဓာ ဖာလေယျ, တထာပိ အပဿန္တော သကလိကံ သကလိကံ ကရေယျ, တထာပိ အပဿန္တော ‘‘သကလိကာ ဈာယိဿန္တိ, သဒ္ဒေါ ပန နိက္ခမိတွာ ပလာယိဿတိ, တဒါ နံ ပဿိဿာမီ’’တိ အဂ္ဂိနာ ဍဟေယျ. တထာပိ အပဿန္တော ‘‘သလ္လဟုကာနိ မသိစုဏ္ဏာနိ ဝါတေန ဘဿိဿန္တိ, သဒ္ဒေါ သာရဓညံ ဝိယ ပါဒမူလေ ပတိဿတိ, တဒါ နံ ပဿိဿာမီ’’တိ မဟာဝါတေ ဝါ ဩဖုနေယျ. တထာပိ အပဿန္တော ‘‘မသိစုဏ္ဏာနိ ယထောဒကံ ဂမိဿန္တိ, သဒ္ဒေါ ပန ပါရံ ဂစ္ဆန္တော ပုရိသော ဝိယ နိက္ခမိတွာ တရိဿတိ, တဒါ နံ ပဿိဿာမီ’’တိ နဒိယာ ဝါ သီဃသောတာယ ပဝါဟေယျ. ‘सो तं वीणं’ म्हणजे त्या राजाने ‘ती वीणा आणा, मी तिचा आवाज पाहीन’ असे म्हणून ती वीणा हातात घेतली. ‘दसधा वा’ इत्यादी शब्दांमध्ये—प्रथम त्याने ती दहा तुकड्यांत चिरावी. तरीही तिचा आवाज न दिसल्यास शंभर तुकड्यांत चिरावी. तरीही न दिसल्यास तिचे बारीक बारीक तुकडे करावेत. तरीही न दिसल्यास ‘हे तुकडे जळतील आणि आवाज बाहेर पडून पळून जाईल, तेव्हा मी त्याला पाहीन’ असे म्हणून त्याने ती अग्नीने जाळावी. तरीही न दिसल्यास ‘हलकी राख वाऱ्याने उडून जाईल आणि आवाज एखाद्या भरीव धान्यासारखा माझ्या पायाशी पडेल, तेव्हा मी त्याला पाहीन’ असे म्हणून त्याने ती मोठ्या वाऱ्यात उडवावी (पाखडावी). तरीही न दिसल्यास ‘राख पाण्याच्या प्रवाहाबरोबर वाहून जाईल, पण आवाज पलीकडे जाणाऱ्या माणसासारखा बाहेर पडून तरंगत जाईल, तेव्हा मी त्याला पाहीन’ असे म्हणून त्याने ती वेगवान प्रवाहाच्या नदीत वाहून द्यावी. ဧဝံ ဝဒေယျာတိ သဗ္ဗေဟိပိမေဟိ ဥပါယေဟိ အပဿန္တော တေ မနုဿေ ဧဝံ ဝဒေယျ. အသတီ ကိရာယန္တိ အသတီ ကိရ အယံ ဝီဏာ, လာမိကာတိ အတ္ထော. အသတီတိ လာမကာဓိဝစနမေတံ. ယထာဟ – ‘एवं वदेय्य’ म्हणजे या सर्व उपायांनीही आवाज न दिसल्यामुळे तो त्या माणसांना असे म्हणाला. ‘असती किरायं’ म्हणजे ‘ही वीणा खरोखरच निरुपयोगी (तुच्छ) आहे’ असा अर्थ आहे. ‘असती’ हा तुच्छ (वाईट) गोष्टीचाच वाचक शब्द आहे. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे— ‘‘အသာ လောကိတ္ထိယော နာမ, ဝေလာ တာသံ န ဝိဇ္ဇတိ; သာရတ္တာ စ ပဂဗ္ဘာ စ, သိခီ သဗ္ဗဃသော ယထာ’’တိ. (ဇာ. ၁.၁.၆၁); ‘जगातील स्त्रिया खरोखरच असती (अविश्वासू) असतात, त्यांना कोणतीही मर्यादा नसते; त्या अत्यंत आसक्त आणि उद्धट असतात, जसा सर्व काही गिळंकृत करणारा अग्नी असतो.’ ယထေဝံ ယံကိဉ္စိ ဝီဏာ နာမာတိ န ကေဝလဉ္စ ဝီဏာယေဝ လာမိကာ, ယထေဝ ပန အယံ ဝီဏာ နာမ, ဧဝံ ယံကိဉ္စိ အညမ္ပိ တန္တိဗဒ္ဓံ, သဗ္ဗံ တံ လာမကမေဝါတိ အတ္ထော. ဧဝမေဝ ခေါတိ ဧတ္ထ ဝီဏာ ဝိယ ပဉ္စက္ခန္ဓာ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ, ရာဇာ ဝိယ ယောဂါဝစရော. ယထာ သော ရာဇာ တံ ဝီဏံ ဒသဓာ ဖာလနတော ပဋ္ဌာယ ဝိစိနန္တော သဒ္ဒံ အဒိသွာ ဝီဏာယ အနတ္ထိကော ဟောတိ, ဧဝံ ယောဂါဝစရော ပဉ္စက္ခန္ဓေ သမ္မသန္တော အဟန္တိ ဝါ မမန္တိ ဝါ ဂဟေတဗ္ဗံ အပဿန္တော ခန္ဓေဟိ အနတ္ထိကော ဟောတိ. တေနဿ တံ ခန္ဓသမ္မသနံ [Pg.109] ဒဿေန္တော ရူပံ သမနွေသတိ ယာဝတာ ရူပဿ ဂတီတိအာဒိမာဟ. ‘यथेवं यंकिंचि वीणा नाम’ म्हणजे केवळ ही वीणाच वाईट आहे असे नाही, तर जशी ही वीणा आहे, तसेच इतर कोणतेही तंतूने बांधलेले (तंतुवाद्य) वाद्य असेल, ते सर्व तुच्छच आहे, असा अर्थ आहे. ‘एवमेव खो’ यामध्ये—वीणेप्रमाणे पाच स्कंध समजावेत आणि राजाप्रमाणे योगावाचर समजावा. ज्याप्रमाणे तो राजा त्या वीणेचे दहा तुकडे करण्यापासून शोधत असताना आवाज न मिळाल्यामुळे वीणेविषयी अनासक्त (इच्छारहित) होतो; त्याचप्रमाणे योगावाचर पाच स्कंधांचे परीक्षण करताना ‘मी’ किंवा ‘माझे’ असे ग्रहण करण्यासारखे काहीही न पाहिल्यामुळे स्कंधांविषयी अनासक्त होतो. म्हणूनच, त्याला ते स्कंध-परीक्षण दाखवण्यासाठी भगवंतांनी ‘रूपं समन्वेसति यावता रूपस्स गती’ (तो रूपाचा शोध घेतो, जिथपर्यंत रूपाची गती आहे) इत्यादी वचन सांगितले. တတ္ထ သမနွေသတီတိ ပရိယေသတိ. ယာဝတာ ရူပဿ ဂတီတိ ယတ္တကာ ရူပဿ ဂတိ. တတ္ထ ဂတီတိ ဂတိဂတိ, သဉ္ဇာတိဂတိ, သလက္ခဏဂတိ, ဝိဘဝဂတိ, ဘေဒဂတီတိ ပဉ္စဝိဓာ ဟောန္တိ. တတ္ထ ဣဒံ ရူပံ နာမ ဟေဋ္ဌာ အဝီစိပရိယန္တံ ကတွာ ဥပရိ အကနိဋ္ဌဗြဟ္မလောကံ အန္တော ကတွာ ဧတ္ထန္တရေ သံသရတိ ဝတ္တတိ, အယမဿ ဂတိဂတိ နာမ. तेथे ‘समन्वेसति’ म्हणजे शोध घेतो. ‘यावता रूपस्स गती’ म्हणजे रूपाची जितकी गती (व्याप्ती) आहे. तेथे ‘गती’ चे पाच प्रकार आहेत—गतिगती, संजातिगती, सलक्षणगती, विभवगती आणि भेदगती. तेथे ‘रूप’ नावाचे हे तत्त्व खाली अवीची नरकापर्यंत आणि वर अकनिष्ठ ब्रह्मलोकापर्यंतच्या मर्यादेत संसार करते व अस्तित्वात राहते; ही याची ‘गतिगती’ होय. အယံ ပန ကာယော နေဝ ပဒုမဂဗ္ဘေ, န ပုဏ္ဍရီကနီလုပ္ပလာဒီသု သဉ္ဇာယတိ, အာမာသယပက္ကာသယာနံ ပန အန္တရေ ဗဟလန္ဓကာရေ ဒုဂ္ဂန္ဓပဝနဝိစရိတေ ပရမဇေဂုစ္ဆေ ဩကာသေ ပူတိမစ္ဆာဒီသု ကိမိ ဝိယ သဉ္ဇာယတိ, အယံ ရူပဿ သဉ္ဇာတိဂတိ နာမ. परंतु हे शरीर कमळाच्या गर्भात किंवा पांढऱ्या व निळ्या कमळांमध्ये उत्पन्न होत नाही; तर आमाशय आणि पक्वाशय यांच्या दरम्यान, दाट अंधारात, दुर्गंधीयुक्त वायूने युक्त अशा अत्यंत घृणास्पद ठिकाणी, सडलेल्या माशांमधील किड्याप्रमाणे ते उत्पन्न होते; ही रूपाची ‘संजातिगती’ (उत्पत्तीची गती) होय. ဒုဝိဓံ ပန ရူပဿ လက္ခဏံ, ‘‘ရုပ္ပတီတိ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, တသ္မာ ရူပ’’န္တိ (သံ. နိ. ၃.၇၉) ဧဝံ ဝုတ္တ ရုပ္ပနသင်္ခါတံ ပစ္စတ္တလက္ခဏဉ္စ အနိစ္စာဒိဘေဒံ သာမညလက္ခဏဉ္စ, အယမဿ သလက္ခဏဂတိ နာမ. रूपाचे लक्षण दोन प्रकारचे आहे: ‘भिक्खूहो, ते बाधित (विकृत) होते, म्हणून त्याला रूप म्हणतात’ अशा प्रकारे सांगितलेले, बाधेने युक्त असलेले स्वतःचे वैयक्तिक लक्षण (पच्चत्तलक्खण) आणि अनित्यता इत्यादी भेदांनी युक्त असलेले सामान्य लक्षण (सामञ्ञलक्खण). ही याची ‘सलक्षणगती’ होय. ‘‘ဂတိ မိဂါနံ ပဝနံ, အာကာသော ပက္ခိနံ ဂတိ; ဝိဘဝေါ ဂတိ ဓမ္မာနံ, နိဗ္ဗာနံ အရဟတော ဂတီ’’တိ. (ပရိ. ၃၃၉) – ‘वने ही श्वापदांची गती आहे, आकाश ही पक्ष्यांची गती आहे; विभव (निरोध) ही धर्मांची गती आहे आणि निर्वाण ही अर्हंतांची गती आहे.’ ဧဝံ ဝုတ္တော ရူပဿ အဘာဝေါ ဝိဘဝဂတိ နာမ. ယော ပနဿ ဘေဒေါ, အယံ ဘေဒဂတိ နာမ. ဝေဒနာဒီသုပိ ဧသေဝ နယော. ကေဝလဉှေတ္ထ ဥပရိ ယာဝ ဘဝဂ္ဂါ တေသံ သဉ္ဇာတိဂတိ, သလက္ခဏဂတိယဉ္စ ဝေဒယိတသဉ္ဇာနနအဘိသင်္ခရဏဝိဇာနနဝသေန ပစ္စတ္တလက္ခဏံ ဝေဒိတဗ္ဗံ. अशा प्रकारे सांगितलेला रूपाचा अभाव (विनाश) म्हणजे ‘विभवगती’ होय. आणि त्याचा जो भेद (विघटन) आहे, ती ‘भेदगती’ होय. वेदना इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम समजून घ्यावा. विशेषतः येथे, वर भवाग्रापर्यंत (भवाच्या शिखरापर्यंत) त्यांची ‘संजातिगती’ समजावी. आणि ‘सलक्षणगती’ मध्ये—अनुभव घेणे (वेदन), संज्ञान घेणे (संजनन), संस्कार करणे (अभिसंस्करण) आणि विशेष जाणणे (विजानन) यानुसार त्यांचे वैयक्तिक लक्षण समजून घ्यावे. တမ္ပိ တဿ န ဟောတီတိ ယဒေတံ ရူပါဒီသု အဟန္တိ ဝါ မမန္တိ ဝါ အသ္မီတိ ဝါ ဧဝံ နိဒ္ဒိဋ္ဌံ ဒိဋ္ဌိတဏှာမာနဂ္ဂါဟတ္တယံ, တမ္ပိ တဿ ခီဏာသဝဿ န ဟောတီတိ ယထာနုသန္ဓိနာဝ သုတ္တာဂတံ. တေန ဝုတ္တံ မဟာအဋ္ဌကထာယံ – ‘तम्पि तस्स न होति’ म्हणजे रूपादींमध्ये ‘मी’, ‘माझे’ किंवा ‘मी आहे’ अशा प्रकारे दर्शविलेले जे दृष्टी, तृष्णा आणि मान यांचे त्रिविध ग्रहण (आसक्ती) आहे, ते त्या क्षीणासवाला (अर्हंताला) नसते; अशा प्रकारे अनुसंधानानुसारच हे सूत्र आले आहे. म्हणूनच महाअट्ठकथेमध्ये म्हटले आहे— ‘‘အာဒိမှိ သီလံ ကထိတံ, မဇ္ဈေ သမာဓိဘာဝနာ; ပရိယောသာနေ စ နိဗ္ဗာနံ, ဧသာ ဝီဏောပမာ ကထာ’’တိ. ‘आरंभी शील सांगितले आहे, मध्ये समाधीची भावना सांगितली आहे आणि शेवटी निर्वाण सांगितले आहे; ही वीणेची उपमा असलेली देशना होय.’ ၁၀. ဆပ္ပာဏကောပမသုတ္တဝဏ္ဏနာ १०. षट्प्राणकोपमसूत्रवर्णना (सहा प्राण्यांच्या उपमेच्या सूत्राचे वर्णन) ၂၄၇. ဒသမေ [Pg.110] အရုဂတ္တောတိ ဝဏသရီရော. တေသံယေဝ အရူနံ ပက္ကတ္တာ ပက္ကဂတ္တော. သရဝနန္တိ ကဏ္ဍဝနံ. ဧဝမေဝ ခေါတိ အရုဂတ္တော ပုရိသော ဝိယ ဒုဿီလပုဂ္ဂလော ဝေဒိတဗ္ဗော. တဿ ကုသကဏ္ဋကေဟိ ဝိဒ္ဓဿ သရပတ္တေဟိ စ အသိဓာရူပမေဟိ ဝိလိခိတဂတ္တဿ ဘိယျောသောမတ္တာယ ဒုက္ခဒေါမနဿံ ဝိယ တတ္ထ တတ္ထ သဗြဟ္မစာရီဟိ ‘‘အယံ သော ဣမေသဉ္စ ဣမေသဉ္စ ကမ္မာနံ ကာရကော’’တိ ဝုစ္စမာနဿ ဥပ္ပဇ္ဇနဒုက္ခံ ဝေဒိတဗ္ဗံ. २४७. दहाव्या सूत्रात—‘अरुगत्तो’ म्हणजे जखमांनी (व्रणांनी) भरलेले शरीर असलेला. त्या जखमा पिकल्यामुळे पू-युक्त शरीर असलेला म्हणजे ‘पक्कगत्तो’. ‘सरवनं’ म्हणजे बाणांसारख्या तीक्ष्ण काट्यांचे रान (कांडेवन). ‘एवमेव खो’ यामध्ये—जखमी शरीराच्या माणसाप्रमाणे दुःशील (शील नसलेला) मनुष्य समजावा. ज्याप्रमाणे कुशाच्या तीक्ष्ण काट्यांनी टोचलेल्या आणि तलवारीच्या धारेसारख्या तीक्ष्ण पानांनी ओरबाडलेल्या शरीराच्या त्या माणसाला अत्यंत तीव्र दुःख आणि दौर्मनस्य होते; तसेच, येथे-तेथे सब्रह्मचाऱ्यांनी ‘हा भिक्खू अशा अशा कर्मांचा कर्ता आहे’ असे म्हटल्यावर, त्या दुःशील भिक्खूला उत्पन्न होणारे दुःख समजून घ्यावे. လဘတိ ဝတ္တာရန္တိ လဘတိ စောဒကံ. ဧဝံကာရီတိ ဧဝရူပါနံ ဝေဇ္ဇကမ္မဒူတကမ္မာဒီနံ ကာရကော. ဧဝံသမာစာရောတိ ဝိဓဝါ ဂေါစရာဒိဝသေန ဧဝရူပဂေါစရော. အသုစိဂါမကဏ္ဋကောတိ အသုဒ္ဓဋ္ဌေန အသုစိ, ဂါမဝါသီနံ ဝိဇ္ဈနဋ္ဌေန ကဏ္ဋကောတိ ဂါမကဏ္ဋကော. ‘लभति वत्तारं’ म्हणजे त्याला दोष देणारा मिळतो. ‘एवंकारी’ म्हणजे अशा प्रकारची वैद्यकीय कामे, दूतगिरीची कामे इत्यादी निषिद्ध कामे करणारा. ‘एवंसमाचारो’ म्हणजे विधवांच्या घरी जाणे-येणे इत्यादींद्वारे अशा प्रकारचा अयोग्य संपर्क ठेवणारा. ‘असुचिगामकण्टको’ म्हणजे अशुद्धतेच्या अर्थाने ‘अशुचि’ (घाण) आणि गावकऱ्यांना त्रास देण्याच्या (टोचण्याच्या) अर्थाने ‘काटा’ (कण्टक), म्हणून तो ‘गामकाण्टक’ (गावातील काटा) होय. ပက္ခိန္တိ ဟတ္ထိသောဏ္ဍသကုဏံ. ဩဿဇ္ဇေယျာတိ ဝိဿဇ္ဇေယျ. အာဝိဉ္ဆေယျုန္တိ အာကဍ္ဎေယျုံ. ပဝေက္ခာမီတိ ပဝိသိဿာမိ. အာကာသံ ဍေဿာမီတိ အာကာသံ ဥပ္ပတိဿာမိ. "पक्खी" म्हणजे हत्तीच्या सोंडेसारखी चोच असलेला पक्षी (हत्थिसाँडसकुण). "ओस्सज्जेय्य" म्हणजे मुक्त करावे (विसज्जेय्य). "आविञ्छेय्युं" म्हणजे ओढावे (आकड्ढेय्युं). "पवेक्खामि" म्हणजे मी प्रवेश करेन (पविसिस्सामि). "आकासं डेस्सामि" म्हणजे मी आकाशात उडेन (आकासं उप्पतिस्सामि). ဧတေသု ပန အဟိ ‘‘ဘောဂေဟိ မဏ္ဍလံ ဗန္ဓိတွာ သုပိဿာမီ’’တိ ဝမ္မိကံ ပဝိသိတုကာမော ဟောတိ. သုသုမာရော ‘‘ဒူရေ ဗိလံ ပဝိသိတွာ နိပဇ္ဇိဿာမီ’’တိ ဥဒကံ ပဝိသိတုကာမော ဟောတိ. ပက္ခီ ‘‘အဇဋာကာသေ သုခံ ဝိစရိဿာမီ’’တိ အာကာသံ ဍေတုကာမော ဟောတိ. ကုက္ကုရော ‘‘ဥဒ္ဓနဋ္ဌာနေ ဆာရိကံ ဗျူဟိတွာ ဥသုမံ ဂဏှန္တော နိပဇ္ဇိဿာမီ’’တိ ဂါမံ ပဝိသိတုကာမော ဟောတိ. သိင်္ဂါလော ‘‘မနုဿမံသံ ခါဒိတွာ ပိဋ္ဌိံ ပသာရေတွာ သယိဿာမီ’’တိ အာမကသုသာနံ ပဝိသိတုကာမော ဟောတိ. မက္ကဋော ‘‘ဥစ္စေ ရုက္ခေ အဘိရုဟိတွာ ဒိသာဒိသံ ပက္ခန္ဒိဿာမီ’’တိ ဝနံ ပဝိသိတုကာမော ဟောတိ. त्या सहा प्राण्यांपैकी, साप "आपल्या शरीराचे वेटोळे करून मी झोपेन" असे म्हणून वारुळात प्रवेश करण्याची इच्छा करतो. मगर "खोल पाण्यात बिळात प्रवेश करून मी पडून राहीन" असे म्हणून पाण्यात प्रवेश करण्याची इच्छा करतो. पक्षी "मुक्त आकाशात मी सुखाने विहरेन" असे म्हणून आकाशात उडण्याची इच्छा करतो. कुत्रा "चुलीच्या जागी राख बाजूला सारून, उब घेत मी पडून राहीन" असे म्हणून गावात प्रवेश करण्याची इच्छा करतो. कोल्हा "मानवी मांस खाऊन, पाठ पसरून मी झोपेन" असे म्हणून स्मशानात प्रवेश करण्याची इच्छा करतो. माकड "उंच झाडावर चढून मी वेगवेगळ्या दिशांना उड्या मारेन" असे म्हणून अरण्यात प्रवेश करण्याची इच्छा करतो. အနုဝိဓာယေယျုန္တိ အနုဂစ္ဆေယျုံ, အနုဝိဓိယေယျုန္တိပိ ပါဌော, အနုဝိဓာနံ အာပဇ္ဇေယျုန္တိ အတ္ထော. ယတ္ထ သော ယာတိ, တတ္ထေဝ ဂစ္ဆေယျုန္တိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဧဝမေဝါတိ ဧတ္ထ ဆ ပါဏကာ ဝိယ ဆာယတနာနိ ဒဋ္ဌဗ္ဗာနိ, ဒဠှရဇ္ဇု ဝိယ တဏှာ, မဇ္ဈေ ဂဏ္ဌိ ဝိယ အဝိဇ္ဇာ. ယသ္မိံ ယသ္မိံ ဒွါရေ အာရမ္မဏံ ဗလဝံ ဟောတိ, တံ တံ အာယတနံ တသ္မိံ တသ္မိံ အာရမ္မဏေ အာဝိဉ္ဆတိ. "अनुविधायेय्युं" म्हणजे अनुसरण करावे (अनुगच्छेय्युं). "अनुविधीयेय्युं" असाही पाठ आहे. अनुसरण करण्याच्या अवस्थेला प्राप्त व्हावे, असा याचा अर्थ आहे. तो (बलवान प्राणी) जिथे जातो, तिथेच त्यांनी जावे, असे म्हटले आहे. त्याचप्रमाणे, येथे सहा प्राण्यांप्रमाणे सहा आयतने समजावीत, घट्ट दोरीप्रमाणे तृष्णा समजावी आणि मध्यभागातील गाठीप्रमाणे अविद्या समजावी. ज्या ज्या द्वारात आलंबन (विषय) बलवान असते, ते ते आयतन त्या व्यक्तीला त्या त्या आलंबनाकडे ओढते. ဣမံ [Pg.111] ပန ဥပမံ ဘဂဝါ သရိက္ခကေန ဝါ အာဟရေယျ အာယတနာနံ ဝါ နာနတ္တဒဿနဝသေန. တတ္ထ သရိက္ခကေန တာဝ ဝိသုံ အပ္ပနာကိစ္စံ နတ္ထိ, ပါဠိယံယေဝ အပ္ပိတာ. အာယတနာနံ နာနတ္တဒဿနေန ပန အယံ အပ္ပနာ – အဟိ နာမေသ ဗဟိ သိတ္တသမ္မဋ္ဌေ ဌာနေ နာဘိရမတိ, သင်္ကာရဋ္ဌာနတိဏပဏ္ဏဂဟနဝမ္မိကာနိယေဝ ပန ပဝိသိတွာ နိပန္နကာလေ အဘိရမတိ, ဧကဂ္ဂတံ အာပဇ္ဇတိ. ဧဝမေဝ စက္ခုပေတံ ဝိသမဇ္ဈာသယံ, မဋ္ဌာသု သုဝဏ္ဏဘိတ္တိအာဒီသု နာဘိရမတိ, ဩလောကေတုမ္ပိ န ဣစ္ဆတိ, ရူပစိတ္တပုပ္ဖလတာဒိဝိစိတ္တေသုယေဝ ပန အဘိရမတိ. တာဒိသေသု ဟိ ဌာနေသု စက္ခုမှိ အပ္ပဟောန္တေ မုခမ္ပိ ဝိဝရိတွာ ဩလောကေတုကာမော ဟောတိ. ही उपमा भगवंतांनी सादृश्याच्या आधारे दिली असावी किंवा आयतनांच्या विविधतेचे दर्शन घडवण्यासाठी दिली असावी. त्यापैकी, सादृश्याच्या बाबतीत स्वतंत्रपणे जोडण्याचे काम नाही, कारण पाळीमध्येच (मूळ पाठातच) ते जोडलेले आहे. परंतु आयतनांच्या विविधतेच्या दर्शनाच्या बाबतीत ही योजना आहे - हा साप नावाचा प्राणी बाहेर पाणी शिंपडून स्वच्छ केलेल्या गुळगुळीत जागी रमत नाही; तर कचऱ्याची जागा, गवत, पाने यांनी यापलेली दाट जागा आणि वारूळ यातच प्रवेश करून पडून राहण्याच्या वेळी तो रमत असतो आणि एकाग्रतेला प्राप्त होतो. त्याचप्रमाणे हे चक्षु (डोळा) देखील विषम विषयांकडे झुकणारे असते; ते गुळगुळीत अशा सोन्याच्या भिंती इत्यादींवर रमत नाही, पाहण्याची देखील इच्छा करत नाही, परंतु चित्रे, फुले, वेली इत्यादींनी युक्त अशा विविधरंगी रूपांमध्येच रमते. कारण अशा ठिकाणी डोळे पुरेसे पडत नसताना, तोंड उघडून देखील पाहण्याची इच्छा होते. သုသုမာရောပိ ဗဟိ နိက္ခန္တော ဂဟေတဗ္ဗံ န ပဿတိ, အက္ခိံ နိမီလေတွာ စရတိ. ယဒါ ပန ဗျာမသတမတ္တံ ဥဒကံ ဩဂါဟိတွာ ဗိလံ ပဝိသိတွာ နိပန္နော ဟောတိ, တဒါ တဿ စိတ္တံ ဧကဂ္ဂံ ဟောတိ, သုခံ သုပတိ. ဧဝမေဝ သောတမ္ပေတံ ဗိလဇ္ဈာသယံ အာကာသသန္နိဿိတံ, ကဏ္ဏစ္ဆိဒ္ဒကူပကေယေဝ အဇ္ဈာသယံ ကရောတိ, ကဏ္ဏစ္ဆိဒ္ဒါကာသောယေဝ တဿ သဒ္ဒသဝနေ ပစ္စယော ဟောတိ. အဇဋာကာသောပိ ဝဋ္ဋတိယေဝ. အန္တောလေဏသ္မိဉှိ သဇ္ဈာယေ ကယိရမာနေ န လေဏစ္ဆဒနံ ဘိန္ဒိတွာ သဒ္ဒေါ ဗဟိ နိက္ခမတိ, ဒွါရဝါတပါနဆိဒ္ဒေဟိ ပန နိက္ခမိတွာ ဓာတုပရမ္ပရာ ဃဋ္ဋေန္တော အာဂန္တွာ သောတပသာဒံ ဃဋ္ဋေတိ. အထ တသ္မိံ ကာလေ ‘‘အသုကံ နာမ သဇ္ဈာယတီ’’တိ လေဏပိဋ္ဌေ နိသိန္နာ ဇာနန္တိ. मगर देखील बाहेर पडल्यावर पकडण्यासारखे काही पाहत नाही, ती डोळे मिटून फिरते. परंतु जेव्हा ती शंभर वाव खोल पाण्यात उतरून, बिळात प्रवेश करून पडून राहते, तेव्हा तिचे चित्त एकाग्र होते आणि ती सुखाने झोपते. त्याचप्रमाणे हे श्रोत्र (कान) देखील बिळासारख्या पोकळीकडे झुकणारे आणि आकाशधातूवर आश्रित असते; ते कानाच्या छिद्ररूपी पोकळीतच आपली आवड निर्माण करते. कानाच्या छिद्रातील आकाशच त्याला शब्द ऐकण्यासाठी प्रत्यय (कारण) ठरते. मुक्त आकाश देखील योग्यच ठरते. कारण गुहेच्या आत सज्झाय (सस्वर पठण) केले जात असताना, आवाज गुहेचे छप्पर फोडून बाहेर पडत नाही, तर तो दरवाजा आणि खिडक्यांच्या छिद्रांतून बाहेर पडून, वायूच्या कणांना (धातूंच्या परंपरेला) धक्का देत येऊन श्रोत्रप्रसादाला स्पर्श करतो. मग त्या वेळी, "अमुक एका ग्रंथाचे पठण केले जात आहे" असे गुहेच्या बाहेर बसलेले लोक जाणतात. ဧဝံ သန္တေ သမ္ပတ္တဂေါစရတာ ဟောတိ, ကိံ ပနေတံ သမ္ပတ္တဂေါစရန္တိ? အာမ သမ္ပတ္တဂေါစရံ. ယဒိ ဧဝံ ဒူရေ ဘေရိအာဒီသု ဝဇ္ဇမာနေသု ‘‘ဒူရေ သဒ္ဒေါ’’တိ ဇာနနံ န ဘဝေယျာတိ. နော န ဘဝတိ. သောတပသာဒသ္မိဉှိ ဃဋ္ဋိတေ ‘‘ဒူရေ သဒ္ဒေါ, အာသန္နေ သဒ္ဒေါ, ပရတီရေ ဩရိမတီရေ’’တိ တထာ တထာ ဇာနနာကာရော ဟောတိ, ဓမ္မတာ ဧသာတိ. ကိံ ဧတာယ ဓမ္မတာယ? ယတော ယတော ဆိဒ္ဒံ, တတော တတော သဝနံ ဟောတိ စန္ဒိမသူရိယာဒီနံ ဒဿနံ ဝိယာတိ အသမ္ပတ္တဂေါစရမေဝေတံ. असे असताना, श्रोत्र हे प्राप्त झालेल्या विषयाला ग्रहण करणारे (संपत्तगोचर) ठरते. "पण हे संपत्तगोचर आहे का?" "होय, हे संपत्तगोचर आहे." "जर असे असेल तर, दूरवर नगारे इत्यादी वाजवले जात असताना 'दूरवर आवाज होत आहे' असे ज्ञान होणार नाही." "असे नाही की ज्ञान होत नाही, ज्ञान होतेच. कारण श्रोत्रप्रसादाला स्पर्श झाल्यावर 'दूरवर आवाज आहे, जवळ आवाज आहे, पलीकडच्या तीरावर आहे, अलीकडच्या तीरावर आहे' अशा प्रकारे त्या त्या रूपाने जाणण्याची पद्धत निर्माण होते. हा स्वभाव (नियम) आहे," असे महाअट्ठकथेत म्हटले आहे. "या स्वभावाचे काय प्रयोजन? जिथून जिथून छिद्र असेल, तिथून तिथून ऐकू येते." चंद्र-सूर्य इत्यादींच्या दर्शनाप्रमाणे, हे (श्रोत्र) असंपत्तगोचरच (प्राप्त न झालेल्या विषयाला ग्रहण करणारेच) आहे. ပက္ခီပိ ရုက္ခေ ဝါ ဘူမိယံ ဝါ န ရမတိ. ယဒါ ပန ဧကံ ဝါ ဒွေ ဝါ လေဍ္ဍုပါတေ အတိက္ကမ္မ အဇဋာကာသံ ပက္ခန္ဒော ဟောတိ, တဒါ ဧကဂ္ဂစိတ္တတံ အာပဇ္ဇတိ. ဧဝမေဝ ဃာနမ္ပိ အာကာသဇ္ဈာသယံ ဝါတူပနိဿယဂန္ဓဂေါစရံ. တထာ [Pg.112] ဟိ ဂါဝေါ နဝဝုဋ္ဌေ ဒေဝေ ဘူမိံ ဃာယိတွာ ဃာယိတွာ အာကာသာဘိမုခေါ ဟုတွာ ဝါတံ အာကဍ္ဎန္တိ. အင်္ဂုလီဟိ ဂန္ဓပိဏ္ဍံ ဂဟေတွာပိ စ ဥပသိင်္ဃနကာလေ ဝါတံ အနာကဍ္ဎန္တော နေဝ တဿ ဂန္ဓံ ဇာနာတိ. पक्षी देखील झाडावर किंवा जमिनीवर रमत नाही. परंतु जेव्हा तो एक किंवा दोन ढेकूळफेकीचे अंतर ओलांडून मुक्त आकाशात उडतो, तेव्हा तो चित्ताच्या एकाग्रतेला प्राप्त होतो. त्याचप्रमाणे घ्राण (नाक) देखील आकाशाकडे झुकणारे आणि वायूच्या आश्रयाने गंध हाच ज्याचा विषय आहे असे असते. तसेच, गायी नवीन पाऊस पडल्यावर जमिनीचा वास वारंवार घेऊन, आकाशाकडे तोंड करून वारा आत ओढतात. आणि बोटांनी सुगंधी गोळा धरून देखील, वास घेण्याच्या वेळी वारा आत न ओढल्यास त्याचा गंध समजत नाही. ကုက္ကုရောပိ ဗဟိ စရန္တော ခေမဋ္ဌာနံ န ပဿတိ, လေဍ္ဍုဒဏ္ဍာဒီဟိ ဥပဒ္ဒုတော ဟောတိ. အန္တောဂါမံ ပဝိသိတွာ ဥဒ္ဓနဋ္ဌာနေ ဆာရိကံ ဗျူဟိတွာ နိပန္နဿ ပနဿ ဖာသု ဟောတိ. ဧဝမေဝ ဇိဝှာပိ ဂါမဇ္ဈာသယာ အာပေါသန္နိဿိတရသာရမ္မဏာ. တထာ ဟိ တိယာမရတ္တိံ သမဏဓမ္မံ ကတွာပိ ပါတောဝ ပတ္တစီဝရမာဒါယ ဂါမံ ပဝိသိတဗ္ဗံ ဟောတိ. သုက္ခခါဒနီယဿ စ န သက္ကာ ခေဠေန အတေမိတဿ ရသံ ဇာနိတုံ. कुत्रा देखील बाहेर फिरताना सुरक्षित जागा पाहत नाही, तो ढेकूळ, काठी इत्यादींनी त्रासलेला असतो. गावात प्रवेश करून चुलीच्या जागी राख बाजूला सारून पडून राहिल्यावरच त्याला आराम मिळतो. त्याचप्रमाणे जिव्हा (जीभ) देखील गावाकडे झुकणारी आणि आपधातूवर (लाळेवर) आश्रित असून रस हाच जिचा विषय आहे अशी असते. तसेच, रात्रीच्या तिन्ही प्रहरांत श्रमणधर्माचे आचरण करून देखील सकाळीच पात्र आणि चीवर घेऊन गावात प्रवेश करावा लागतो. आणि सुक्या खाद्यपदार्थाचा लाळेने ओला केल्याशिवाय रस (चव) जाणणे शक्य नसते. သိင်္ဂါလောပိ ဗဟိ စရန္တော ရတိံ န ဝိန္ဒတိ, အာမကသုသာနေ မနုဿမံသံ ခါဒိတွာ နိပန္နဿေဝ ပနဿ ဖာသု ဟောတိ. ဧဝမေဝ ကာယောပိ ဥပါဒိဏ္ဏကဇ္ဈာသယော ပထဝီသန္နိဿိတဖောဋ္ဌဗ္ဗာရမ္မဏော. တထာ ဟိ အညံ ဥပါဒိဏ္ဏကံ အလဘမာနာ သတ္တာ အတ္တနောဝ ဟတ္ထတလေ သီသံ ကတွာ နိပဇ္ဇန္တိ. အဇ္ဈတ္တိကဗာဟိရာ စဿ ပထဝီ အာရမ္မဏဂ္ဂဟဏေ ပစ္စယော ဟောတိ. သုသန္ထတဿာပိ ဟိ သယနဿ ဟေဋ္ဌာဌိတာနမ္ပိ ဝါ ဖလကာနံ န သက္ကာ အနိသီဒန္တေန ဝါ အနုပ္ပီဠန္တေန ဝါ ထဒ္ဓမုဒုဘာဝေါ ဇာနိတုန္တိ အဇ္ဈတ္တိကဗာဟိရာ ပထဝီ ဧတဿ ဖောဋ္ဌဗ္ဗဇာနနေ ပစ္စယော ဟောတိ. कोल्हा देखील बाहेर फिरताना आनंद मिळवत नाही. कच्च्या स्मशानात मानवी मांस खाऊन पडून राहिल्यावरच त्याला आराम मिळतो. त्याचप्रमाणे काय (शरीर) देखील उपादिन्नक (सजीव शरीराकडे) झुकणारे आणि पृथ्वीधातूवर आश्रित असून स्प्रष्टव्य (स्पर्श) हाच ज्याचा विषय आहे असे असते. तसेच, दुसरे सजीव शरीर न मिळाल्यास प्राणी स्वतःच्याच हाताच्या तळव्यावर डोके ठेवून झोपतात. आणि आध्यात्मिक (अंतर्गत) व बाह्य पृथ्वीधातू त्याच्या आलंबन ग्रहणात प्रत्यय (कारण) ठरतो. कारण चांगल्या प्रकारे अंथरलेल्या बिछान्यावर किंवा खाली असलेल्या फळ्यांवर न बसता किंवा न दाबता कठीणपणा किंवा मऊपणा जाणणे शक्य नसते. म्हणून आध्यात्मिक व बाह्य पृथ्वीधातू या कायाला स्पर्शाचे ज्ञान होण्यासाठी प्रत्यय ठरतो. မက္ကဋောပိ ဘူမိယံ ဝိစရန္တော နာဘိရမတိ, ဟတ္ထသတုဗ္ဗေဓံ ပနဿ ရုက္ခံ အာရုယှ ဝိဋပပိဋ္ဌေ နိသီဒိတွာ ဒိသာဝိဒိသာ ဩလောကေန္တဿေဝ ဖာသုကော ဟောတိ. ဧဝံ မနောပိ နာနဇ္ဈာသယော ဘဝင်္ဂပစ္စယော, ဒိဋ္ဌပုဗ္ဗေပိ နာနာရမ္မဏဇ္ဈာသယံ ကရောတိယေဝ မူလဘဝင်္ဂံ ပနဿ ပစ္စယော ဟောတီတိ အယမေတ္ထ သင်္ခေပေါ, ဝိတ္ထာရေန ပန အာယတနာနံ နာနတ္တံ ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂေ အာယတနနိဒ္ဒေသေ ဝုတ္တမေဝ. माकड देखील जमिनीवर फिरताना रमत नाही. परंतु शंभर हात उंच असलेल्या झाडावर चढून, फांदीच्या शेंड्यावर बसून दिशा-उपदिशांकडे पाहतानाच त्याला आराम मिळतो. त्याचप्रमाणे मन देखील विविध विषयांकडे झुकणारे आणि भवांग प्रत्यय असणारे असते; पूर्वी पाहिलेल्या विविध आलंबनांमध्ये देखील ते रस घेतेच आणि मूळ भवांग हेच त्याचे कारण ठरते. हा येथे संक्षेप आहे. परंतु विस्ताराने आयतनांची विविधता विसुद्धिमग्ग मधील 'आयतननिद्देस' मध्ये सांगितलेलीच आहे. တံ စက္ခု နာဝိဉ္ဆတီတိ တဏှာရဇ္ဇုကာနံ အာယတနပါဏကာနံ ကာယဂတာသတိထမ္ဘေ ဗဒ္ဓါနံ နိဗ္ဗိသေဝနဘာဝံ အာပန္နတ္တာ နာကဍ္ဎတီတိ ဣမသ္မိံ သုတ္တေ ပုဗ္ဗဘာဂဝိပဿနာဝ ကထိတာ. "ते चक्षु ओढत नाही" याचा अर्थ असा की, तृष्णारूपी दोरीने बांधलेल्या आयतनरूपी प्राण्यांना कायगतासतीरूपी खांबाला बांधल्यामुळे चंचलतेचा अभाव (स्थिरता) प्राप्त होतो, म्हणून ते ओढत नाही. या सुत्तात पूर्वभाग विपश्यनाच सांगितली आहे. ၁၁. ယဝကလာပိသုတ္တဝဏ္ဏနာ ११. यवकलापिसुत्तवण्णना ၂၄၈. ဧကာဒသမေ [Pg.113] ယဝကလာပီတိ လာယိတွာ ဌပိတယဝပုဉ္ဇော. ဗျာဘင်္ဂိဟတ္ထာတိ ကာဇဟတ္ထာ. ဆဟိ ဗျာဘင်္ဂီဟိ ဟနေယျုန္တိ ဆဟိ ပုထုလကာဇဒဏ္ဍကေဟိ ပေါထေယျုံ. သတ္တမောတိ တေသု ဆသု ဇနေသု ယဝေ ပေါထေတွာ ပသိဗ္ဗကေ ပူရေတွာ အာဒါယ ဂတေသု အညော သတ္တမော အာဂစ္ဆေယျ. သုဟတတရာ အဿာတိ ယံ တတ္ထ အဝသိဋ္ဌံ အတ္ထိ ဘုသပလာပမတ္တမ္ပိ, တဿ ဂဟဏတ္ထံ သုဋ္ဌုတရံ ဟတာ. २४८. अराव्या सुत्तात, 'यवकलापी' म्हणजे कापून ठेवलेला यवाचा (जवाचा) ढीग. 'ब्याभङ्गीहत्था' म्हणजे हातात कावड घेतलेले लोक. 'छहि ब्याभङ्गीहि हनेय्युं' म्हणजे सहा रुंद कावडीच्या दांड्यांनी झोडपावे. 'सत्तमो' म्हणजे त्या सहा लोकांनी यव झोडपून, पोत्यात भरून आणि ते घेऊन निघून गेल्यावर दुसरा सातवा माणूस यावा. 'सुहततरा अस्स' म्हणजे तिथे जे काही थोडेफार भुसा किंवा फोलपट उरले असेल, ते मिळवण्यासाठी अधिक चांगल्या प्रकारे झोडपलेले. ဧဝမေဝ ခေါတိ ဧတ္ထ စတုမဟာပထော ဝိယ ဆ အာယတနာနိ ဒဋ္ဌဗ္ဗာနိ, စတုမဟာပထေ နိက္ခိတ္တယဝကလာပီ ဝိယ သတ္တော, ဆ ဗျာဘင်္ဂိယော ဝိယ ဣဋ္ဌာနိဋ္ဌမဇ္ဈတ္တဝသေန အဋ္ဌာရသ အာရမ္မဏာနိ, သတ္တမာ ဗျာဘင်္ဂီ ဝိယ ဘဝပတ္ထနာ ကိလေသာ. ယထာ စတုမဟာပထေ ဌပိတာ ယဝကလာပီ ဆဟိ ဗျာဘင်္ဂီဟိ ဟညတိ, ဧဝမိမေ သတ္တာ အဋ္ဌာရသဟိ အာရမ္မဏဒဏ္ဍကေဟိ ဆသု အာယတနေသု ဟညန္တိ. ယထာ သတ္တမေန သုဟတတရာ ဟောန္တိ, ဧဝံ သတ္တာ ဘဝပတ္ထနကိလေသေဟိ သုဟတတရာ ဟောန္တိ ဘဝေမူလကံ ဒုက္ခံ အနုဘဝမာနာ. त्याचप्रमाणे येथे, चार महामार्गांच्या छेदाप्रमाणे (चौकाप्रमाणे) सहा आयतने समजावीत. चार महामार्गांच्या छेदावर ठेवलेल्या यवाच्या ढिगाप्रमाणे प्राणी (सत्त्व) समजावा. सहा कावडीच्या दांड्यांप्रमाणे इष्ट, अनिष्ट आणि तटस्थ अशा अठरा प्रकारचे आलंबन (विषय) समजावे. सातव्या कावडीच्या दांडीप्रमाणे भव-प्रार्थना (भवाची तृष्णा) करणारे क्लेश समजावे. ज्याप्रमाणे चार महामार्गांच्या छेदावर ठेवलेला यवागी ढीग सहा कावडीच्या दांड्यांनी झोडपला जातो, त्याचप्रमाणे हे प्राणी अठरा आलंबनरूपी दांड्यांनी सहा आयतनांमध्ये झोडपले (पीडित केले) जातात. ज्याप्रमाणे सातव्या दांडीने तो ढीग अत्यंत चांगल्या प्रकारे झोडपला जातो, त्याचप्रमाणे प्राणी भव-प्रार्थनेच्या (भवातृष्णेच्या) क्लेशांमुळे भवावर आधारित दुःखाचा अनुभव घेत अत्यंत तीव्रतेने झोडपले (पीडित केले) जातात. ဣဒါနိ နေသံ တံ ဘဝပတ္ထနကိလေသံ ဒဿေတုံ ဘူတပုဗ္ဗံ, ဘိက္ခဝေတိအာဒိမာဟ. တတြာတိ သုဓမ္မာယံ ဘုမ္မံ, သုဓမ္မာယ ဒေဝသဘာယ ဒွါရေတိ အတ္ထော. ဓမ္မိကာ ခေါ ဒေဝါတိ ဓမ္မိကာ ဧတေ ဒေဝါ နာမ, ယေဟိ မာဒိသံ အသုရာဓိပတိံ ဂဟေတွာ မယှံ ဘေဒနမတ္တမ္ပိ န ကတန္တိ သန္ဓာယ ဝဒတိ. အဓမ္မိကာ ဒေဝါတိ အဓမ္မိကာ ဧတေ ဒေဝါ နာမ, ယေ မာဒိသံ အသုရာဓိပတိံ နဝဂူထသူကရံ ဝိယ ကဏ္ဌပဉ္စမေဟိ ဗန္ဓနေဟိ ဗန္ဓိတွာ နိသီဒါပေန္တိ. ဧဝံ သုခုမံ ခေါ, ဘိက္ခဝေ, ဝေပစိတ္တိဗန္ဓနန္တိ တံ ကိရ ပဒုမနာဠသုတ္တံ ဝိယ မက္ကဋဇာလသုတ္တံ ဝိယ စ သုခုမံ ဟောတိ, ဆေတ္တုံ ပန နေဝ ဝါသိယာ န ဖရသုနာ သက္ကာ. ယသ္မာ ပန စိတ္တေနေဝ ဗဇ္ဈတိ, စိတ္တေန မုစ္စတိ, တသ္မာ ‘‘ဝေပစိတ္တိဗန္ဓန’’န္တိ ဝုတ္တံ. आता त्यांचा तो भव-प्रार्थनेचा क्लेश दाखवण्यासाठी भगवंतांनी 'भूतपुब्बं, भिक्खवे' (पूर्वी घडलेली गोष्ट, भिक्खूहो) इत्यादी म्हटले आहे. 'तत्र' म्हणजे सुधम्मा देवसभेच्या दारापाशी, हा सप्तमी विभक्तीचा अर्थ आहे. 'धम्मिका खो देवा' म्हणजे हे देव खरोखरच न्यायी आहेत, ज्यांनी माझ्यासारख्या असुरपतीला पकडून माझे थोडेही नुकसान केले नाही, या उद्देशाने तो बोलतो. 'अधम्मिका देवा' म्हणजे हे देव अन्यायी आहेत, जे माझ्यासारख्या असुरपतीला विष्ठेतील डुकराप्रमाणे गळ्याभोवती पाच बंधनांनी बांधून बसवून ठेवतात. 'एवं सुखुमं खो, भिक्खवे, वेपचित्तिबन्धनं' म्हणजे ते बंधन कमळाच्या देठातील धाग्याप्रमाणे किंवा कोळ्याच्या जाळ्याच्या धाग्याप्रमाणे अत्यंत सूक्ष्म असते, परंतु ते वाशीने किंवा कुऱ्हाडीने तोडणे शक्य नसते. कारण ते केवळ चित्तानेच बांधले जाते आणि चित्तानेच मुक्त होते, म्हणून त्याला 'वेपचित्ती-बंधन' असे म्हटले आहे. တတော သုခုမတရံ မာရဗန္ဓနန္တိ ကိလေသဗန္ဓနံ ပနေသံ တတောပိ သုခုမတရံ, နေဝ စက္ခုဿ အာပါထံ ဂစ္ဆတိ, န ဣရိယာပထံ နိဝါရေတိ. တေန ဟိ ဗဒ္ဓါ သတ္တာ ပထဝိတလေပိ အာကာသေပိ ယောဇနသတမ္ပိ ယောဇနသဟဿမ္ပိ [Pg.114] ဂစ္ဆန္တိပိ အာဂစ္ဆန္တိပိ. ဆိဇ္ဇမာနံ ပနေတံ ဉာဏေနေဝ ဆိဇ္ဇတိ, န အညေနာတိ ‘‘ဉာဏမောက္ခံ ဗန္ဓန’’န္တိပိ ဝုစ္စတိ. 'ततो सुखुमतं मारबन्धनं' म्हणजे क्लेशांचे हे मार-बंधन तर त्या वेपचित्तीच्या बंधनापेक्षाही अधिक सूक्ष्म असते; ते डोळ्यांना दिसत नाही आणि शारीरिक हालचालींना (इरियापथाला) अडथळाही आणत नाही. कारण या बंधनाने बांधलेले प्राणी पृथ्वीवर किंवा आकाशात शंभर योजने किंवा हजार योजने दूर जाऊ शकतात आणि येऊ शकतात. परंतु हे मार-बंधन तुटताना केवळ ज्ञानानेच (मार्गज्ञानानेच) तुटते, इतर कशानेही नाही; म्हणून याला 'ज्ञानमोक्ष बंधन' (ज्ञानाने मुक्त होणारे बंधन) असेही म्हटले जाते. မညမာနောတိ တဏှာဒိဋ္ဌိမာနာနံ ဝသေန ခန္ဓေ မညန္တော. ဗဒ္ဓေါ မာရဿာတိ မာရဗန္ဓနေန ဗဒ္ဓေါ. ကရဏတ္ထေ ဝါ ဧတံ သာမိဝစနံ, ကိလေသမာရေန ဗဒ္ဓေါတိ အတ္ထော. မုတ္တော ပါပိမတောတိ မာရဿ ဗန္ဓနေန မုတ္တော. ကရဏတ္ထေယေဝ ဝါ ဣဒံ သာမိဝစနံ, ပါပိမတာ ကိလေသဗန္ဓနေန မုတ္တောတိ အတ္ထော. 'मञ्ञमानो' म्हणजे तृष्णा, दृष्टी आणि मान यांच्या प्रभावाने स्कंधांना 'माझे' किंवा 'मी' असे मानणारा. 'बद्धो मारस्स' म्हणजे माराच्या बंधनाने बांधलेला. किंवा येथे षष्ठी विभक्ती तृतीया विभक्तीच्या (करण अर्थाने) अर्थात वापरली आहे, म्हणजेच 'क्लेशरूपी माराने बांधलेला' असा अर्थ आहे. 'मुत्तो पापिमतो' म्हणजे माराच्या बंधनातून मुक्त झालेला. किंवा येथेही षष्ठी विभक्ती तृतीया विभक्तीच्या (करण अर्थाने) अर्थातच समजावी, म्हणजेच 'पापी क्लेशबंधनातून मुक्त झालेला' असा अर्थ आहे. အသ္မီတိ ပဒေန တဏှာမညိတံ ဝုတ္တံ. အယမဟသ္မီတိ ဒိဋ္ဌိမညိတံ. ဘဝိဿန္တိ သဿတဝသေန ဒိဋ္ဌိမညိတမေဝ. န ဘဝိဿန္တိ ဥစ္ဆေဒဝသေန. ရူပီတိအာဒီနိ သဿတဿေဝ ပဘေဒဒီပနာနိ. တသ္မာတိ ယသ္မာ မညိတံ အာဗာဓံ အန္တောဒေါသနိကန္တနဝသေန ရောဂေါ စေဝ ဂဏ္ဍော စ သလ္လဉ္စ, တသ္မာ. ဣဉ္ဇိတန္တိအာဒီနိ ယသ္မာ ဣမေဟိ ကိလေသေဟိ သတ္တာ ဣဉ္ဇန္တိ စေဝ ဖန္ဒန္တိ စ ပပဉ္စိတာ စ ဟောန္တိ ပမတ္တာကာရပတ္တာ, တသ္မာ တေသံ အာကာရဒဿနတ္ထံ ဝုတ္တာနိ. 'अस्मि' (मी आहे) या पदाने तृष्णेचे मानणे (तृष्णा-मञ्ञित) सांगितले आहे. 'अयमहमस्मि' (हा मी आहे) या पदाने दृष्टीचे मानणे (दृष्टि-मञ्ञित) सांगितले आहे. 'भविस्सं' (मी भविष्यात असेन) हे शाश्वतवादाच्या दृष्टीने दृष्टीचे मानणेच आहे. 'न भविस्सं' (मी भविष्यात नसणार) हे उच्छेदवादाच्या दृष्टीने आहे. 'रूपी' इत्यादी पदे शाश्वतवादाचेच विविध प्रकार स्पष्ट करतात. 'तस्मा' म्हणजे ज्या कारणाने हे मानणे (मञ्ञित) पीडा देणारे, अंतर्गत दोषांमुळे कापून काढणारे असल्यामुळे रोग, गंड (गळू) आणि शल्य (बाण) आहे, म्हणून. 'इञ्जितं' इत्यादी पदे, ज्या कारणाने या क्लेशांमुळे प्राणी कंपित होतात, तडफडतात, प्रपंचयुक्त (विलंबित) होतात आणि प्रमादावस्थेला प्राप्त होतात, म्हणून त्यांच्या अवस्थांचे दर्शन घडवण्यासाठी ही पदे सांगितली आहेत. မာနဂတဝါရေ ပန မာနဿ ဂတံ မာနဂတံ, မာနပဝတ္တီတိ အတ္ထော. မာနောယေဝ မာနဂတံ ဂူထဂတံ မုတ္တဂတံ ဝိယ. တတ္ထ အသ္မီတိ ဣဒံ တဏှာယ သမ္ပယုတ္တမာနဝသေန ဝုတ္တံ. အယမဟမသ္မီတိ ဒိဋ္ဌိဝသေန. နနု စ ဒိဋ္ဌိသမ္ပယုတ္တော နာမ မာနော နတ္ထီတိ? အာမ နတ္ထိ, မာနဿ ပန အပ္ပဟီနတ္တာ ဒိဋ္ဌိ နာမ ဟောတိ. မာနမူလကံ ဒိဋ္ဌိံ သန္ဓာယေတံ ဝုတ္တံ. သေသံ သဗ္ဗတ္ထ ဥတ္တာနမေဝါတိ. मानगत-वारामध्ये (मानाविषयीच्या भागात), मानाची प्रवृत्ती म्हणजे 'मानगत', असा अर्थ आहे. मान हाच 'मानगत' आहे, जसे 'गूथगत' (विष्ठा) किंवा 'मुत्तगत' (मूत्र) या शब्दांमध्ये होते. तिथे 'अस्मि' हे तृष्णेने युक्त असलेल्या मानाच्या प्रभावाने म्हटले आहे. 'अयमहमस्मि' हे दृष्टीच्या प्रभावाने म्हटले आहे. शंका: दृष्टीने युक्त असा मान नसतो ना? उत्तर: होय, नसतो. परंतु मानाचा प्रहाण न झाल्यामुळे दृष्टी निर्माण होते. मान-मूलक दृष्टीला उद्देशून हे म्हटले आहे. उर्वरित सर्व भाग सर्वत्र स्पष्टच आहे. အာသီဝိသဝဂ္ဂေါ. आसीविसवग्गो (आशीविषवर्ग समाप्त). စတုတ္ထော ပဏ္ဏာသကော. चतुत्थ पण्णासक (चौथा पन्नास सुत्तांचा समूह समाप्त). သဠာယတနသံယုတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. सळायतनसंयुत्तवण्णना समाप्त झाली. ၂. ဝေဒနာသံယုတ္တံ २. वेदनासंयुत्त ၁. သဂါထာဝဂ္ဂေါ १. सगाथावग्गो ၁. သမာဓိသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. समाधिसुत्तवण्णना ၂၄၉. ဝေဒနာသံယုတ္တေ [Pg.115] သဂါထာဝဂ္ဂဿ ပဌမေ သမာဟိတောတိ ဥပစာရေန ဝါ အပ္ပနာယ ဝါ သမာဟိတော. ဝေဒနာ စ ပဇာနာတီတိ ဝေဒနာ ဒုက္ခသစ္စဝသေန ပဇာနာတိ. ဝေဒနာနဉ္စ သမ္ဘဝန္တိ တာသံယေဝ သမ္ဘဝံ သမုဒယသစ္စဝသေန ပဇာနာတိ. ယတ္ထ စေတာတိ ယတ္ထေတာ ဝေဒနာ နိရုဇ္ဈန္တိ, တံ နိဗ္ဗာနံ နိရောဓသစ္စဝသေန ပဇာနာတိ. ခယဂါမိနန္တိ တာသံယေဝ ဝေဒနာနံ ခယဂါမိနံ မဂ္ဂံ မဂ္ဂသစ္စဝသေန ပဇာနာတိ. နိစ္ဆာတော ပရိနိဗ္ဗုတောတိ နိတ္တဏှော ဟုတွာ ကိလေသပရိနိဗ္ဗာနေန ပရိနိဗ္ဗုတော. ဧဝမေတ္ထ သုတ္တေ သမ္မသနစာရဝေဒနာ ကထိတာ. ဂါထာသု ဒွီဟိ ပဒေဟိ သမထဝိပဿနာ ကထိတာ, သေသေဟိ စတုသစ္စံ ကထိတံ. ဧဝမေတ္ထ သဗ္ဗသင်္ဂါဟိကော စတုဘူမကဓမ္မပရိစ္ဆေဒေါ ဝုတ္တော. २४९. वेदनासंयुत्तातील सगाथावर्गाच्या पहिल्या सुत्तात, 'समाहितो' म्हणजे उपचार समाधीने किंवा अप्पणा (अर्पणा) समाधीने समाहित झालेला. 'वेदना च पजानाति' म्हणजे वेदनांना दुःखसत्याच्या रूपाने जाणतो. 'वेदनानञ्च सम्भवं' म्हणजे त्या वेदनांच्या उत्पत्तीला (समुदयाला) समुदयसत्याच्या रूपाने जाणतो. 'यत्थच्चेता' म्हणजे ज्या ठिकाणी या वेदना निरुद्ध होतात, त्या निर्वाणाला निरोधसत्याच्या रूपाने जाणतो. 'खयगामिनं' म्हणजे त्या वेदनांच्या क्षयाकडे नेणाऱ्या मार्गाला मार्गसत्याच्या रूपाने जाणतो. 'निच्छातो परिनिब्बुतो' म्हणजे तृष्णारहित होऊन क्लेशांच्या परिनिर्वाणाने परिनिर्वृत झालेला. अशा प्रकारे या सुत्तात विदर्शनेच्या (विपस्सना) गोचर असलेल्या वेदना सांगितल्या आहेत. गाथांमध्ये दोन पदांनी समथ आणि विपस्सना सांगितली आहे, आणि उर्वरित पदांनी चार आर्यसत्ये सांगितली आहेत. अशा प्रकारे येथे सर्वसमावेशक अशा चार भूमींमधील धर्मांचा परिच्छेद (विभागणी) सांगितला आहे. ၂. သုခသုတ္တဝဏ္ဏနာ २. सुखसुत्तवण्णना ၂၅၀. ဒုတိယေ အဒုက္ခမသုခံ သဟာတိ အဒုက္ခမသုခဉ္စ သုခဒုက္ခေဟိ သဟ. အဇ္ဈတ္တဉ္စ ဗဟိဒ္ဓါ စာတိ အတ္တနော စ ပရဿ စ. မောသဓမ္မန္တိ နဿနသဘာဝံ. ပလောကိနန္တိ ပလုဇ္ဇနကံ ဘိဇ္ဇနသဘာဝံ. ဖုဿ ဖုဿ ဝယံ ပဿန္တိ ဉာဏေန ဖုသိတွာ ဖုသိတွာ ဝယံ ပဿန္တော. ဧဝံ တတ္ထ ဝိရဇ္ဇတီတိ ဧဝံ တာသု ဝေဒနာသု ဝိရဇ္ဇတိ. ဣဓာပိ သုတ္တေ သမ္မသနစာရဝေဒနာ ကထိတာ, ဂါထာသု ဉာဏဖုသနံ. २५०. दुसऱ्या सुत्तात, 'अदुक्खमसुखं सहा' म्हणजे अदुःख-असुख वेदना सुख आणि दुःख वेदनांच्या सोबत. 'अज्झत्तञ्च बहिद्धा च' म्हणजे स्वतःच्या आणि इतरांच्या. 'मोसधम्मं' म्हणजे नष्ट होण्याच्या स्वभावाचे. 'पलोकिनं' म्हणजे नाश पावणारे, भंग पावण्याच्या स्वभावाचे. 'फुस्स फुस्स वयं पस्सति' म्हणजे ज्ञानाने वारंवार स्पर्श करून (अनुभवून) व्यय (नाश) पाहणारा. 'एवं तत्थ विरज्जति' म्हणजे अशा प्रकारे त्या वेदनांविषयी विरक्त होतो. या सुत्तातही विदर्शनेच्या गोचर असलेल्या वेदना सांगितल्या आहेत, आणि गाथांमध्ये ज्ञानाचा स्पर्श (अनुभव) सांगितला आहे. ၃. ပဟာနသုတ္တဝဏ္ဏနာ ३. पहानसुत्तवण्णना ၂၅၁. တတိယေ အစ္ဆေစ္ဆိ တဏှန္တိ သဗ္ဗမ္ပိ တဏှံ ဆိန္ဒိ သမုစ္ဆိန္ဒိ. ဝိဝတ္တယိ သံယောဇနန္တိ ဒသဝိဓမ္ပိ သံယောဇနံ ပရိဝတ္တယိ နိမ္မူလကမကာသိ. သမ္မာတိ ဟေတုနာ ကာရဏေန. မာနာဘိသမယာတိ မာနဿ ဒဿနာဘိသမယာ, ပဟာနာဘိသမယာ စ. အရဟတ္တမဂ္ဂေါ ဟိ ကိစ္စဝသေန မာနံ သမ္ပဿတိ, အယမဿ [Pg.116] ဒဿနာဘိသမယော. တေန ဒိဋ္ဌော ပန သော တာဝဒေဝ ပဟီယတိ, ဒိဋ္ဌဝိသေန ဒိဋ္ဌသတ္တာနံ ဇီဝိတံ ဝိယ. အယမဿ ပဟာနာဘိသမယော. २५१. तिसऱ्या सुत्तात, 'अच्छेच्छि तण्हं' म्हणजे सर्व प्रकारच्या तृष्णेला छेदून टाकले, समूळ नष्ट केले. 'विवत्तयि संयोजनं' म्हणजे दहा प्रकारच्या संयोजनांना उलटवून टाकले, समूळ नष्ट केले. 'सम्मा' म्हणजे योग्य कारणाने. 'मानाभिसमया' म्हणजे मानाचा दर्शन-अभिसमय आणि प्रहाण-अभिसमय. कारण अर्हत्-मार्ग आपल्या कार्याच्या प्रभावाने मानाला पाहतो (जाणतो), हा त्याचा दर्शन-अभिसमय आहे. आणि त्या अर्हत्-मार्गाने पाहिलेला तो मान त्याच क्षणी नष्ट होतो, जसे दृष्टी प्राप्त झालेल्या (सोतापन्न) व्यक्तींचे जीवन असते. हा त्याचा प्रहाण-अभिसमय आहे. အန္တမကာသိ ဒုက္ခဿာတိ ဧဝံ အရဟတ္တမဂ္ဂေန မာနဿ ဒိဋ္ဌတ္တာ စ ပဟီနတ္တာ စ ယေ ဣမေ ‘‘ကာယဗန္ဓနဿ အန္တော ဇီရတိ (စူဠဝ. ၂၇၈) ဟရိတန္တံ ဝါ’’တိ (မ. နိ. ၁.၃၀၄) ဧဝံ ဝုတ္တအန္တိမမရိယာဒန္တော စ, ‘‘အန္တမိဒံ, ဘိက္ခဝေ, ဇီဝိကာန’’န္တိ (ဣတိဝု. ၉၁; သံ. နိ. ၃.၈၀) ဧဝံ ဝုတ္တလာမကန္တော စ, ‘‘သက္ကာယော ဧကော အန္တော’’တိ (အ. နိ. ၆.၆၁; စူဠနိ. တိဿမေတ္တေယျမာဏဝပုစ္ဆာနိဒ္ဒေသ ၁၁) ဧဝံ ဝုတ္တကောဋ္ဌာသန္တော စ, ‘‘ဧသေဝန္တော ဒုက္ခဿ သဗ္ဗပစ္စယသင်္ခယာ’’တိ (သံ နိ. ၂.၅၁; ၂.၄.၇၁; ဥဒါ. ၇၁) ဧဝံ ဝုတ္တကောဋန္တော စာတိ စတ္တာရော အန္တာ, တေသု သဗ္ဗဿေဝ ဝဋ္ဋဒုက္ခဿ အဒုံ စတုတ္ထကောဋိသင်္ခါတံ အန္တမကာသိ, ပရိစ္ဆေဒံ ပရိဝဋုမံ အကာသိ, အန္တိမသမုဿယမတ္တာဝသေသံ ဒုက္ခမကာသီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ‘अन्तमकासि दुक्खस्स’ (दुःखाचा अंत केला) म्हणजे अशा प्रकारे अरहत्तमार्गाने मानाचे (अहंकाराचे) दर्शन झाल्यामुळे आणि त्याचा प्रहाण (त्याग) केल्यामुळे, 'कमरपट्ट्याचा (कायबंधनाचा) शेवट जीर्ण होतो किंवा हिरवे गवत...' अशा प्रकारे सांगितलेला अंतिम मर्यादारूप अंत; 'भिक्खूहो, हे उपजीविकांमध्ये अत्यंत हीन आहे' अशा प्रकारे सांगितलेला हीनरूप अंत; 'सत्काय हा एक अंत आहे' अशा प्रकारे सांगितलेला कोठ्ठास (विभाग) रूप अंत; आणि 'सर्व प्रत्ययांच्या क्षयामुळे हाच दुःखाचा अंत आहे' अशा प्रकारे सांगितलेला कोटी (अंतिम सीमा) रूप अंत—हे चार अंत आहेत. त्यांपैकी, संपूर्ण संसारदुःखाचा (वट्टदुःखाचा) या चौथ्या कोटी नावाच्या अंताने अंत केला, त्याची मर्यादा निश्चित केली, म्हणजेच केवळ अंतिम शरीरापुरतेच उरलेले दुःख केले, असे म्हटले आहे. သမ္ပဇညံ န ရိဉ္စတီတိ သမ္ပဇညံ န ဇဟတိ. သင်္ချံ နောပေတီတိ ရတ္တော ဒုဋ္ဌော မူဠှောတိ ပညတ္တိံ န ဥပေတိ, တံ ပညတ္တိံ ပဟာယ ခီဏာသဝေါ နာမ ဟောတီတိ အတ္ထော. ဣမသ္မိံ သုတ္တေ အာရမ္မဏာနုသယော ကထိတော. ‘सम्पजञ्ञं न रिञ्चति’ म्हणजे संपजन्य (जागृतता) सोडत नाही. ‘सङ्ख्यं नोपेति’ म्हणजे रागी, द्वेषी किंवा मोही अशा संज्ञेला (ओळखीला) प्राप्त होत नाही; त्या संज्ञेचा त्याग करून तो ‘क्षीणासव’ (अर्हत) होतो, असा अर्थ आहे. या सूत्तात आलंबनानुशय (आळंबन-अनुशय) सांगितला आहे. ၄. ပါတာလသုတ္တဝဏ္ဏနာ ४. पातालसुत्तवर्णना (पाताल सूत्ताची व्याख्या) ၂၅၂. စတုတ္ထေ ပါတာလောတိ ပါတဿ အလံ ပရိယတ္တော, နတ္ထိ ဧတ္ထ ပတိဋ္ဌာတိ ပါတာလော. အသန္တံ အဝိဇ္ဇမာနန္တိ အသမ္ဘူတတ္တံ အပညာယမာနတ္တံ. ဧဝံ ဝါစံ ဘာသတီတိ အတ္ထိ မဟာသမုဒ္ဒေ ပါတာလောတိ ဧဝံ ဝါစံ. သော ဟိ ယံ တံ ဗလဝါမုခံ မဟာသမုဒ္ဒဿ ဥဒကံ ဝေဂေန ပက္ခန္ဒိတွာ စက္ကဝါဠံ ဝါ သိနေရုံ ဝါ အာဟစ္စ ယောဇနဒွိယောဇနဒသယောဇနပ္ပမာဏမ္ပိ ဥဂ္ဂန္တွာ ပုန မဟာသမုဒ္ဒေ ပတတိ, ယဿ ပတိတဋ္ဌာနေ မဟာနရကပပါတော ဝိယ ဟောတိ, ယံ လောကေ ဗလဝါမုခန္တိ ဝုစ္စတိ. တံ သန္ဓာယ ဧဝံ ဝဒတိ. २५२. चौथ्या सूत्तात, ‘पातालो’ म्हणजे पडण्यास (पाताय) समर्थ असणे; येथे कोणताही आधार (प्रतिष्ठा) नाही, म्हणून तो ‘पाताल’ होय. ‘असन्तं अविज्जमानं’ म्हणजे असत्य (अभूत) आणि अप्रकट (अविद्यमान). ‘अशी वाणी बोलतो’ म्हणजे 'महासागरात पाताल आहे' अशी वाणी बोलतो. कारण तो (अश्रुतवान पृथग्जन) महासागराचे जे ते प्रचंड पाण्याचे आवर्त (बलवामुख) आहे, जे वेगाने उसळून चक्रवाळ पर्वताला किंवा सुमेरू पर्वताला धडकून, एक योजन, दोन योजने किंवा दहा योजने इतक्या उंचीवर जाऊन पुन्हा महासागरात पडते, आणि ज्याच्या पडण्याच्या ठिकाणी एखाद्या महा नरकाच्या कड्यासारखी भीषण दरी निर्माण होते, ज्याला जगात ‘बलवामुख’ (प्रचंड भोवरा) म्हटले जाते, त्याला उद्देशून तो असे म्हणतो. ယသ္မာ ပန တတ္ထ တထာရူပါနံ မစ္ဆကစ္ဆပဒေဝဒါနဝါနံ ပတိဋ္ဌာပိ ဟောတိ သုခနိဝါသောပိ, တသ္မာ အသန္တံ အသံဝိဇ္ဇမာနံ တံ တံ ဝါစံ ဘာသတိ နာမ. ယသ္မာ ပန သဗ္ဗပုထုဇ္ဇနာ သာရီရိကာယ ဒုက္ခဝေဒနာယ ပတိဋ္ဌာတုံ န သက္ကောန္တိ, တသ္မာ ပါတဿ အလန္တိ အတ္ထေန အယမေဝ ပါတာလောတိ ဒဿေန္တော သာရီရိကာနံ ခေါ ဧတံ ဘိက္ခဝေတိအာဒိမာဟ. परंतु ज्या अर्थी तेथे (त्या तथाकथित पातालात) तशा प्रकारच्या मासे, कासव, देव आणि दानव यांना आधारही मिळतो आणि सुखाचा निवासही असतो, म्हणून ती असत्य आणि अविद्यमान अशी वाणी बोलणेच होय. परंतु ज्या अर्थी सर्व पृथग्जन शारीरिक दुःखद वेदनेमध्ये स्थिर राहू शकत नाहीत, म्हणून 'पडण्यास (पतन होण्यास) कारणीभूत ठरते' या अर्थाने ही शारीरिक दुःखद वेदनाच खरोखर ‘पाताल’ आहे, हे दर्शवताना भगवंतांनी 'भिक्खूहो, शारीरिक (दुःखद वेदनांचे हेच नाव आहे...)' इत्यादी म्हटले आहे. ပါတာလေ [Pg.117] န ပစ္စုဋ္ဌာသီတိ ပါတာလသ္မိံ န ပတိဋ္ဌာသိ. ဂါဓန္တိ ပတိဋ္ဌံ. အက္ကန္ဒတီတိ အနိဗဒ္ဓံ ဝိပ္ပလာပံ ဝိလပန္တော ကန္ဒတိ. ဒုဗ္ဗလောတိ ဒုဗ္ဗလဉာဏော. အပ္ပထာမကောတိ ဉာဏထာမဿ ပရိတ္တတာယ ပရိတ္တထာမကော. ဣမသ္မိံ သုတ္တေ အရိယသာဝကောတိ သောတာပန္နော. သောတာပန္နော ဟိ ဧတ္ထ ဓုရံ, ဗလဝဝိပဿကော န တိက္ခဗုဒ္ဓိ ဥပ္ပန္နံ ဝေဒနံ အနနုဝတ္တိတွာ ပတိဋ္ဌာတုံ သမတ္ထော ယောဂါဝစရောပိ ဝဋ္ဋတိ. ‘पाताले न पच्चुट्ठासि’ म्हणजे पातालात (शारीरिक दुःखद वेदनेमध्ये) स्थिर राहू शकत नाही. ‘गाधं’ म्हणजे आधार. ‘अक्कन्दति’ म्हणजे असंबद्ध प्रलाप करत क्रोश करतो. ‘दुब्बलो’ म्हणजे दुर्बळ ज्ञानी. ‘अप्पथामको’ म्हणजे ज्ञानशक्ती कमी असल्यामुळे अल्प सामर्थ्य असलेला. या सूत्तात ‘आर्यश्रावक’ म्हणजे सोतापन्न (स्रोतापन्न); कारण येथे सोतापन्न हाच मुख्य आहे. किंवा उत्पन्न झालेल्या वेदनेच्या आहारी न जाता स्थिर राहण्यास समर्थ असलेला, तीव्र प्रज्ञा असलेला बलवान विपश्यक योगावचर देखील येथे अभिप्रेत धरण्यास योग्य आहे. ၅. ဒဋ္ဌဗ္ဗသုတ္တဝဏ္ဏနာ ५. दट्ठब्बसुत्तवर्णना (दट्ठब्ब सूत्ताची व्याख्या) ၂၅၃. ပဉ္စမေ ဒုက္ခတော ဒဋ္ဌဗ္ဗာတိ ဝိပရိဏာမနဝသေန ဒုက္ခတော ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. သလ္လတောတိ ဒုက္ခာပနဝိနိဝိဇ္ဈနဋ္ဌေန သလ္လာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. အနိစ္စတောတိ အဒုက္ခမသုခါ ဟုတွာ အဘာဝါကာရေန အနိစ္စတော ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. အဒ္ဒါတိ အဒ္ဒသ. သန္တန္တိ သန္တသဘာဝံ. २५३. पाचव्या सूत्तात, ‘दुक्खतो दट्ठब्बा’ म्हणजे विपरिणाम स्वभावामुळे (बदलून नष्ट होण्याच्या स्वभावामुळे) दुःख म्हणून पाहिले पाहिजे. ‘सल्लतो’ म्हणजे पीडा देण्याच्या आणि शरीराला टोचण्याच्या स्वभावामुळे शल्य (बाण) म्हणून पाहिले पाहिजे. ‘अनिच्चतो’ म्हणजे अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होऊन नष्ट होण्याच्या स्वभावामुळे अनित्य म्हणून पाहिली पाहिजे. ‘अद्दा’ म्हणजे पाहिले. ‘सन्तं’ म्हणजे शांत स्वभावाचे. ၆. သလ္လသုတ္တဝဏ္ဏနာ ६. सल्लसुत्तवर्णना (शल्य सूत्ताची व्याख्या) ၂၅၄. ဆဋ္ဌေ တတြာတိ တေသု ဒွီသု ဇနေသု. အနုဝေဓံ ဝိဇ္ဈေယျာတိ တဿေဝ ဝဏမုခဿ အင်္ဂုလန္တရေ ဝါ ဒွင်္ဂုလန္တရေ ဝါ အာသန္နပဒေသေ အနုဂတဝေဓံ. ဧဝံ ဝိဒ္ဓဿ ဟိ သာ အနုဝေဓာ ဝေဒနာ ပဌမဝေဒနာယ ဗလဝတရာ ဟောတိ, ပစ္ဆာ ဥပ္ပဇ္ဇမာနာ ဒေါမနဿဝေဒနာပိ ဧဝမေဝ ပုရိမဝေဒနာယ ဗလဝတရာ ဟောတိ. ဒုက္ခာယ ဝေဒနာယ နိဿရဏန္တိ ဒုက္ခာယ ဝေဒနာယ ဟိ သမာဓိမဂ္ဂဖလာနိ နိဿရဏံ, တံ သော န ဇာနာတိ, ကာမသုခမေဝ နိဿရဏန္တိ ဇာနာတိ. တာသံ ဝေဒနာနန္တိ တာသံ သုခဒုက္ခဝေဒနာနံ. သညုတ္တော နံ ဝေဒယတီတိ ကိလေသေဟိ သမ္ပယုတ္တောဝ ဟုတွာ တံ ဝေဒနံ ဝေဒယတိ, န ဝိပ္ပယုတ္တော. သညုတ္တော ဒုက္ခသ္မာတိ ကရဏတ္ထေ နိဿက္ကံ, ဒုက္ခေန သမ္ပယုတ္တောတိ အတ္ထော. သင်္ခါတဓမ္မဿာတိ ဝိဒိတဓမ္မဿ တုလိတဓမ္မဿ. ဗဟုဿုတဿာတိ ပရိယတ္တိဗဟုဿုတဿ ပဋိဝေဓဗဟုဿုတဿ စ. သမ္မာ ပဇာနာတိ ဘဝဿ ပါရဂူတိ ဘဝဿ ပါရံ နိဗ္ဗာနံ ဂတော, တဒေဝ နိဗ္ဗာနံ သမ္မာ ပဇာနာတိ. ဣမသ္မိမ္ပိ သုတ္တေ အာရမ္မဏာနုသယောဝ ကထိတော. အရိယသာဝကေသု စ ခီဏာသဝေါ ဧတ္ထ ဓုရံ, အနာဂါမီပိ ဝဋ္ဋတီတိ ဝဒန္တိ. २५४. सहाव्या सूत्तात, ‘तत्र’ म्हणजे त्या दोन व्यक्तींमध्ये. ‘अनुवेधं विज्झेय्य’ म्हणजे त्याच जखमेच्या तोंवर एक बोट किंवा दोन बोटे अंतरावर जवळच पुन्हा टोचणे. कारण अशा प्रकारे टोचलेल्या व्यक्तीला ती पुन्हा टोचल्यामुळे होणारी वेदना पहिल्या वेदनेपेक्षा अधिक तीव्र असते; नंतर उत्पन्न होणारी दौर्मनस्य (मानसिक दुःख) वेदना देखील त्याचप्रमाणे पहिल्या वेदनेपेक्षा अधिक तीव्र असते. ‘दुःखद वेदनेतून सुटका (निस्सरण)’ म्हणजे दुःखद वेदनेतून सुटका करण्याचे साधन समाधी, मार्ग आणि फल हेच आहे; ते तो जाणत नाही आणि कामसुखालाच सुटकेचा मार्ग मानतो. ‘तासं वेदनानं’ म्हणजे त्या सुख-दुःख वेदनांचे. ‘सञ्ञुत्तो नं वेदयति’ म्हणजे क्लेशांनी युक्त होऊनच तो त्या वेदनेचा अनुभव घेतो, क्लेशमुक्त होऊन नाही. ‘सञ्ञुत्तो दुक्खस्मा’ यामध्ये तृतीया विभक्तीच्या अर्थात पंचमी विभक्ती समजावी, म्हणजेच ‘दुःखाने युक्त’ असा अर्थ आहे. ‘सङ्खातधम्मस्स’ म्हणजे धर्म जाणलेल्या आणि धर्माचे मूल्यमापन केलेल्या. ‘बहुस्सुतस्स’ म्हणजे पर्यत्ती-बहुश्रुत आणि प्रतिवेध-बहुश्रुत असलेल्याचे. ‘सम्यक जाणतो, भवाच्या पलीकडे गेलेला’ म्हणजे संसाराच्या पलीकडच्या तीरावर—निर्वाणाला गेलेला आणि त्या निर्वाणालाच सम्यक प्रकारे जाणणारा. या सूत्तात देखील आलंबनानुशयच सांगितला आहे. आणि आर्यश्रावकांमध्ये येथे क्षीणासव (अर्हत) हाच मुख्य आहे, परंतु अनागामी देखील येथे अभिप्रेत धरता येईल, असे आचार्य म्हणतात. ၇. ပဌမဂေလညသုတ္တဝဏ္ဏနာ ७. पठमगेलञ्ञसुत्तवर्णना (पहिले गेलञ्ञ सूत्ताची व्याख्या) ၂၅၅. သတ္တမေ [Pg.118] ယေန ဂိလာနသာလာ တေနုပသင်္ကမီတိ ‘‘သဒေဝကေ လောကေ အဂ္ဂပုဂ္ဂလော တထာဂတောပိ ဂိလာနုပဋ္ဌာနံ ဂစ္ဆတိ, ဥပဋ္ဌာတဗ္ဗယုတ္တကာ နာမ ဂိလာနာတိ ဘိက္ခူ သဒ္ဒဟိတွာ ဩကပ္ပေတွာ ဂိလာနေ ဥပဋ္ဌာတဗ္ဗေ မညိဿန္တီ’’တိ စ ‘‘ယေ တတ္ထ ကမ္မဋ္ဌာနသပ္ပာယာ, တေသံ ကမ္မဋ္ဌာနံ ကထေဿာမီ’’တိ စ စိန္တေတွာ ဥပသင်္ကမိ. ကာယေ ကာယာနုပဿီတိအာဒီသု ယံ ဝတ္တဗ္ဗံ, တံ ပရတော ဝက္ခာမ. အနိစ္စာနုပဿီတိ အနိစ္စတံ အနုပဿန္တော. ဝယာနုပဿီတိ ဝယံ အနုပဿန္တော. ဝိရာဂါနုပဿီတိ ဝိရာဂံ အနုပဿန္တော. နိရောဓာနုပဿီတိ နိရောဓံ အနုပဿန္တော. ပဋိနိဿဂ္ဂါနုပဿီတိ ပဋိနိဿဂ္ဂံ အနုပဿန္တော. २५५. सातव्या सूत्तात, ‘येन गेलानसाला तेनुပसङ्कमि’ म्हणजे जेथे आजारी भिक्खूंची शाळा (रुग्णालय) होती, तेथे गेले. 'देवलोकासह संपूर्ण जगातील अग्रपुद्गल असलेले तथागत देखील आजारी लोकांची सेवा करण्यासाठी जातात; आजारी लोक हे खरोखर सेवा करण्यास योग्य आहेत, असे मानून भिक्खू श्रद्धा ठेवून आणि मनात ठसवून आजारी लोकांची सेवा करणे आपले कर्तव्य मानतील' आणि 'जे तेथे कर्मस्थान (साधना) करण्यास योग्य आहेत, त्यांना मी कर्मस्थान सांगेन' असा विचार करून भगवंत तेथे गेले. ‘काये कायानुपस्सी’ इत्यादींमध्ये जे काही सांगायचे आहे, ते पुढे (सतिपट्ठान संयुत्तात) सांगू. ‘अनिच्चानुपस्सी’ म्हणजे अनित्यता वारंवार पाहणारा. ‘वयानुपस्सी’ म्हणजे व्यय (नाश) वारंवार पाहणारा. ‘विरागानुपस्सी’ म्हणजे विराग वारंवार पाहणारा. ‘निरोधानुपस्सी’ म्हणजे निरोध वारंवार पाहणारा. ‘पटिनिस्सग्गानुपस्सी’ म्हणजे प्रतिसर्ग (त्याग) वारंवार पाहणारा. ဧတ္တာဝတာ ကိံ ဒဿိတံ ဟောတိ? ဣမဿ ဘိက္ခုနော အာဂမနီယပဋိပဒါ, သတိပဋ္ဌာနာပိ ဟိ ပုဗ္ဗဘာဂါယေဝ, သမ္ပဇညေပိ အနိစ္စာနုပဿနာ ဝယာနုပဿနာ ဝိရာဂါနုပဿနာတိ စ ဣမာပိ တိဿော အနုပဿနာ ပုဗ္ဗဘာဂါယေဝ, နိရောဓာနုပဿနာပိ ပဋိနိဿဂ္ဂါနုပဿနာပိ ဣမာ ဒွေ မိဿကာ. ဧတ္တာဝတာ ဣမဿ ဘိက္ခုနော ဘာဝနာကာလော ဒဿိတောတိ. သေသံ ဝုတ္တနယမေဝ. यावरून काय दर्शवले जाते? या भिक्खूची आगमनीय प्रतिपदा (पूर्वभाग प्रतिपदा) दर्शवली आहे; कारण सतिपट्ठान देखील पूर्वभागातीलच (लोकोत्तर मार्गाच्या आधीचेच) आहेत. संपजन्यात देखील अनित्यानुपश्यना, वयानुपश्यना आणि विरागानुपश्यना या तीन अनुपश्यना देखील पूर्वभागातीलच आहेत. निरोधानुपश्यना आणि प्रतिसर्गानुपश्यना या दोन्ही मिश्र (लौकिक आणि लोकोत्तर दोन्ही) आहेत. यावरून या भिक्खूचा भावनाकाळ (साधनेचा काळ) दर्शवला आहे. उर्वरित भाग पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच समजावा. ၈-၉. ဒုတိယဂေလညသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ८-९. दुतियगेलञ्ञसुत्तादिवर्णना (दुसरे गेलञ्ञ सूत्त इत्यादींची व्याख्या) ၂၅၆-၂၅၇. အဋ္ဌမေ ဣမမေဝ ဖဿံ ပဋိစ္စာတိ ဝုတ္တေ ဗုဇ္ဈနကာနံ အဇ္ဈာသယေန ဝုတ္တံ, အတ္ထတော ပနေတံ နိန္နာနာကရဏံ. ကာယောဝ ဟိ ဧတ္ထ ဖဿောတိ ဝုတ္တော. နဝမံ ဥတ္တာနမေဝ. २५६-२५७. आठव्या सूत्तात, ‘स्पर्शावर अवलंबून’ असे म्हटले असता, हे सत्य जाणू इच्छिणाऱ्यांच्या आशयानुसार सांगितले आहे; परंतु अर्थाच्या दृष्टीने यात कोणताही फरक नाही. कारण येथे कायेलाच (शरीरालाच) ‘स्पर्श’ असे म्हटले आहे. नववे सूत्त अगदी स्पष्टच आहे. ၁၀. ဖဿမူလကသုတ္တဝဏ္ဏနာ १०. फस्समूलकसुत्तवर्णना (फस्समूलक सूत्ताची व्याख्या) ၂၅၈. ဒသမေ သုခဝေဒနိယန္တိ သုခဝေဒနာယ ပစ္စယဘူတံ. သေသေသုပိ ဧသေဝ နယော. အနုပဒဝဏ္ဏနာ ပနေတ္ထ ဟေဋ္ဌာ ဝိတ္ထာရိတာဝ. ဣမသ္မိံ သုတ္တဒွယေ သမ္မသနစာရဝေဒနာ ကထိတာ. २५८. दहाव्या सुत्तात, 'सुखवेदनीयं' म्हणजे सुखवेदनेला कारणीभूत असणारे (प्रत्ययभूत). उर्वरित पदांमध्येही हाच नियम समजावा. येथील अनुपदवर्णना (शब्दानुशब्दाचे स्पष्टीकरण) खाली (पूर्वीच्या सुत्तांमध्ये) सविस्तरपणे सांगितले आहे. या दोन्ही सुत्तांमध्ये विपश्यना ज्ञानाच्या गोचर असणाऱ्या वेदनेचे (संमसनचार वेदना) वर्णन केले आहे. သဂါထာဝဂ္ဂေါ ပဌမော. पहिला सगाथावग्ग समाप्त झाला. ၂. ရဟောဂတဝဂ္ဂေါ २. रहोगत वर्ग ၁. ရဟောဂတသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. रहोगतसुत्तवर्णना ၂၅၉. ရဟောဂတဝဂ္ဂဿ [Pg.119] ပဌမေ ယံ ကိဉ္စိ ဝေဒယိတံ, တံ ဒုက္ခသ္မိန္တိ ယံ ကိဉ္စိ ဝေဒယိတံ, တံ သဗ္ဗံ ဒုက္ခန္တိ အတ္ထော. သင်္ခါရာနံယေဝ အနိစ္စတန္တိအာဒီသု ယာ ဧသာ သင်္ခါရာနံ အနိစ္စတာ ခယဓမ္မတာ ဝယဓမ္မတာ ဝိပရိဏာမဓမ္မတာ, ဧတံ သန္ဓာယ ယံ ကိဉ္စိ ဝေဒယိတံ, တံ ဒုက္ခန္တိ မယာ ဘာသိတန္တိ ဒီပေတိ. ယာ ဟိ သင်္ခါရာနံ အနိစ္စတာ, ဝေဒနာနမ္ပိ သာ အနိစ္စတာ ဧဝ. အနိစ္စတာ စ နာမေသာ မရဏံ, မရဏတော ဥတ္တရိ ဒုက္ခံ နာမ နတ္ထီတိ ဣမိနာ အဓိပ္ပာယေန သဗ္ဗာ ဝေဒနာ ဒုက္ခာတိ ဝုတ္တာ. အထ ခေါ ပန ဘိက္ခု မယာတိ ဣဒံ န ကေဝလံ အဟံ ဝေဒနာနံယေဝ နိရောဓံ ပညာပေမိ, ဣမေသမ္ပိ ဓမ္မာနံ နိရောဓံ ပညာပေမီတိ ဒဿနတ္ထံ အာရဒ္ဓံ. ဝူပသမော စ ပဿဒ္ဓိယော စ ဧဝရူပါယ ဒေသနာယ ဗုဇ္ဈနကာနံ အဇ္ဈာသယေန ဝုတ္တာ. သညာဝေဒယိတနိရောဓဂ္ဂဟဏေန စေတ္ထ စတ္တာရော အာရုပ္ပာ ဂဟိတာဝ ဟောန္တီတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. २५९. रहोगतवग्गच्या पहिल्या सुत्तात, 'जे काही अनुभवले जाते, ते सर्व दुःखात समाविष्ट आहे' याचा अर्थ 'जे काही अनुभवले जाते, ते सर्व दुःख आहे' असा आहे. 'संस्कारांची अनित्यता...' इत्यादी वाक्यांमध्ये, संस्कारांची जी अनित्यता, क्षयधर्मिता, व्ययधर्मिता आणि विपरिणामधर्मिता आहे, तिला उद्देशून 'जे काही अनुभवले जाते, ते दुःख आहे' असे मी म्हटले आहे, हे स्पष्ट केले आहे. कारण संस्कारांची जी अनित्यता आहे, तीच वेदनांचीही अनित्यता आहे. आणि अनित्यता म्हणजेच मरण होय, मरणापेक्षा मोठे कोणतेही दुःख नाही, या अभिप्रायाने सर्व वेदना 'दुःख' आहेत असे म्हटले आहे. 'परंतु, भिक्खूहो, माझ्याद्वारे...' हे केवळ 'मी फक्त वेदनांचाच निरोध प्रज्ञापित करतो' असे नसून, 'या (इतर) धर्मांचाही निरोध प्रज्ञापित करतो' हे दर्शवण्यासाठी सुरू केले आहे. उपशम आणि प्रश्रब्धता हे अशा प्रकारच्या देशनेने समजून घेणाऱ्यांच्या आशयानुसार सांगितले आहेत. आणि येथे 'संज्ञावेदयितनिरोध' या ग्रहणाने चार अरूप समापत्ती देखील ग्रहण केल्या आहेत, असे समजावे. ၂-၃. ပဌမအာကာသသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ २-३. प्रथम आकाससुत्तवर्णना ၂၆၀-၂၆၁. ဒုတိယေ ပုထူ ဝါယန္တိ မာလုတာတိ ဗဟူ ဝါတာ ဝါယန္တိ. သေသံ ဥတ္တာနတ္ထမေဝါတိ. တတိယံ ဝိနာ ဂါထာဟိ ဗုဇ္ဈန္တာနံ အဇ္ဈာသယေန ဝုတ္တံ. २६०-२६१. दुसऱ्या सुत्तात, 'पुथू वायन्ति मालुता' म्हणजे अनेक वारे वाहतात. उर्वरित भाग स्पष्ट अर्थाचाच आहे. तिसरे सुत्त गाथांशिवाय समजून घेणाऱ्यांच्या आशयानुसार सांगितले आहे. ၄. အဂါရသုတ္တဝဏ္ဏနာ ४. अगारसुत्तवर्णना ၂၆၂. စတုတ္ထေ ပုရတ္ထိမာတိ ပုရတ္ထိမာယ. ဧဝံ သဗ္ဗတ္ထ. သာမိသာပိ သုခါ ဝေဒနာတိအာဒီသု သာမိသာ သုခါ နာမ ကာမာမိသပဋိသံယုတ္တာ ဝေဒနာ. နိရာမိသာ သုခါ နာမ ပဌမဇ္ဈာနာဒိဝသေန ဝိပဿနာဝသေန အနုဿတိဝသေန စ ဥပ္ပန္နာ ဝေဒနာ. သာမိသာ ဒုက္ခာ နာမ ကာမာမိသေနေဝ သာမိသာ ဝေဒနာ, နိရာမိသာ ဒုက္ခာ နာမ အနုတ္တရေသု ဝိမောက္ခေသု ပိဟံ ဥပဋ္ဌာပယတော ပိဟပစ္စယာ ဥပ္ပန္နဒေါမနဿဝေဒနာ. သာမိသာ အဒုက္ခမသုခါ နာမ ကာမာမိသေနေဝ သာမိသာ ဝေဒနာ. နိရာမိသာ အဒုက္ခမသုခါ နာမ စတုတ္ထဇ္ဈာနဝသေန ဥပ္ပန္နာ အဒုက္ခမသုခါ ဝေဒနာ. २६२. चौथ्या सुत्तात, 'पुरत्थिमा' म्हणजे पूर्व दिशेकडून. सर्व ठिकाणी याचप्रमाणे समजावे. 'सामिसा सुखा वेदना' इत्यादींमध्ये, 'सामिष सुख' (सामिसा सुखा) म्हणजे काम-आमिषाशी संबंधित असलेली वेदना. 'निरामिष सुख' (निरामिसा सुखा) म्हणजे प्रथम ध्यान इत्यादींच्या प्रभावाने, विपश्यनेच्या प्रभावाने आणि अनुस्मृतीच्या प्रभावाने उत्पन्न झालेली वेदना. 'सामिष दुःख' (सामिसा दुक्खा) म्हणजे काम-आमिषामुळेच उत्पन्न झालेली सामिष वेदना. 'निरामिष दुःख' (निरामिसा दुक्खा) म्हणजे अनुत्तर विमोक्षांची (मुक्तीची) आकांक्षा धरणाऱ्या व्यक्तीमध्ये आकांक्षेमुळे उत्पन्न झालेली दौर्मनस्य वेदना. 'सामिष अदुःख-असुख' (सामिसा अदुक्खमसुखा) म्हणजे काम-आमिषामुळेच उत्पन्न झालेली सामिष वेदना. 'निरामिष अदुःख-असुख' (निरामिसा अदुक्खमसुखा) म्हणजे चतुर्थ ध्यानाच्या प्रभावाने उत्पन्न झालेली अदुःख-असुख वेदना. ၅-၈. ပဌမအာနန္ဒသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ५-८. प्रथम आनंदसुत्तवर्णना ၂၆၃-၂၆၆. ပဉ္စမာဒီနိ [Pg.120] စတ္တာရိ ဟေဋ္ဌာ ကထိတနယာနေဝ. ပုရိမာနိ ပနေတ္ထ ဒွေ ပရိပုဏ္ဏပဿဒ္ဓိကာနိ, ပစ္ဆိမာနိ ဥပဍ္ဎပဿဒ္ဓိကာနိ. ဒေသနာယ ဗုဇ္ဈနကာနံ အဇ္ဈာသယေန ဝုတ္တာနိ. २६३-२६६. पाचवे इत्यादी चार सुत्ते खाली सांगितलेल्या पद्धतीनेच आहेत. परंतु, यातील पहिली दोन सुत्ते परिपूर्ण प्रश्रब्धतेची आहेत, नंतरची दोन सुत्ते अर्ध-प्रश्रब्धतेची आहेत. ती देशनेद्वारे समजून घेणाऱ्यांच्या आशयानुसार सांगितली आहेत. ၉-၁၀. ပဉ္စကင်္ဂသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ९-१०. पंचकंगसुत्तवर्णना ၂၆၇-၂၆၈. နဝမေ ပဉ္စကင်္ဂေါ ထပတီတိ ပဉ္စကင်္ဂေါတိ တဿ နာမံ, ဝါသိဖရသုနိခါဒနဒဏ္ဍမုဂ္ဂရကာဠသုတ္တနာဠိသင်္ခါတေဟိ ဝါ ပဉ္စဟိ အင်္ဂေဟိ သမန္နာဂတတ္တာ သော ပဉ္စကင်္ဂေါတိ ပညာတော. ထပတီတိ ဝဍ္ဎကီဇေဋ္ဌကော. ဥဒါယီတိ ပဏ္ဍိတဥဒါယိတ္ထေရော. ပရိယာယန္တိ ကာရဏံ. ဒွေပါနန္ဒာတိ ဒွေပိ, အာနန္ဒ, ပရိယာယေနာတိ ကာရဏေန. ဧတ္ထ စ ကာယိကစေတသိကဝသေန ဒွေ ဝေဒိတဗ္ဗာ, သုခါဒိဝသေန တိဿောပိ, ဣန္ဒြိယဝသေန သုခိန္ဒြိယာဒိကာ ပဉ္စ, ဒွါရဝသေန စက္ခုသမ္ဖဿဇာဒိကာ ဆ, ဥပဝိစာရဝသေန ‘‘စက္ခုနာ ရူပံ ဒိသွာ သောမနဿဌာနိယံ ရူပံ ဥပဝိစရတီ’’တိအာဒိကာ အဋ္ဌာရသ, ဆ ဂေဟသိတာနိ သောမနဿာနိ, ဆ နေက္ခမ္မသိတာနိ, ဆ ဂေဟသိတာနိ ဒေါမနဿာနိ, ဆ နေက္ခမ္မသိတာနိ, ဆ ဂေဟသိတာ ဥပေက္ခာ, ဆ နေက္ခမ္မသိတာတိ ဧဝံ ဆတ္တိံသ. တာ အတီတေ ဆတ္တိံသ, အနာဂတေ ဆတ္တိံသ, ပစ္စုပ္ပန္နေ ဆတ္တိံသာတိ ဧဝံ အဋ္ဌသတံ ဝေဒနာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. २६७-२६८. नवव्या सुत्तात, 'पंचकंग थपती' मधील 'पंचकंग' हे त्याचे नाव आहे. किंवा वाशी (तससणी), परशू (कुऱ्हाड), निखादन (छिन्नी), दंडमुग्गर (हातोडा) आणि काळसुत्त (ओळंबा/काळा दोरा) या पाच सुतारकामाच्या साधनांनी (अंगांनी) युक्त असल्यामुळे तो 'पंचकंग' या नावाने प्रसिद्ध होता. 'थपती' म्हणजे सुतारांचा प्रमुख. 'उदायी' म्हणजे पंडित उदायी थेर. 'परियाय' म्हणजे कारण. 'द्वेपि आनन्द' म्हणजे 'हे आनंदा, कारणाने दोन देखील'. आणि येथे कायिक व चैतसिक रूपाने दोन वेदना समजाव्यात. सुख इत्यादी रूपाने तीन देखील. इंद्रियांच्या रूपाने सुखिंद्रिय इत्यादी पाच. द्वारांच्या रूपाने चक्षु-संस्पर्शजन्य इत्यादी सहा. उपविचाराच्या रूपाने 'डोळ्याने रूप पाहून सौमनस्य निर्माण करणाऱ्या रूपाचा उपविचार करतो' इत्यादी अठरा. सहा गृहश्रित सौमनस्य, सहा नैष्क्रम्यश्रित सौमनस्य, सहा गृहश्रित दौर्मनस्य, सहा नैष्क्रम्यश्रित दौर्मनस्य, सहा गृहश्रित उपेक्षा आणि सहा नैष्क्रम्यश्रित उपेक्षा, अशा प्रकारे छत्तीस. त्या भूतकाळातील छत्तीस, भविष्यकाळातील छत्तीस आणि वर्तमानकाळातील छत्तीस, अशा प्रकारे एकूण एकशे आठ (१०८) वेदना समजाव्यात. ပဉ္စိမေ အာနန္ဒ ကာမဂုဏာတိ အယံ ပါဋိယေက္ကော အနုသန္ဓိ. န ကေဝလဉှိ ဒွေ အာဒိံ ကတွာ ဝေဒနာ ဘဂဝတာ ပညတ္တာ, ပရိယာယေန ဧကာပိ ဝေဒနာ ကထိတာ, တံ ဒဿေန္တော ပဉ္စကင်္ဂဿ ထပတိနော ဝါဒံ ဥပတ္ထမ္ဘေတုံ ဣမံ ဒေသနံ အာရဘိ. အဘိက္ကန္တတရန္တိ သုန္ဒရတရံ. ပဏီတတရန္တိ အတပ္ပကတရံ. ဧတ္ထ စ စတုတ္ထဇ္ဈာနတော ပဋ္ဌာယ အဒုက္ခမသုခါ ဝေဒနာ, သာပိ သန္တဋ္ဌေန ပဏီတဋ္ဌေန စ သုခန္တိ ဝုတ္တာ. နိရောဓော အဝေဒယိတသုခဝသေန သုခံ နာမ ဇာတော. ပဉ္စကာမဂုဏဝသေန ဟိ အဋ္ဌသမာပတ္တိဝသေန စ ဥပ္ပန္နံ ဝေဒယိတံ သုခံ နာမ, နိရောဓော အဝေဒယိတသုခံ နာမ. ဣတိ ဝေဒယိတသုခံ ဝါ ဟောတု အဝေဒယိတသုခံ ဝါ, နိဒ္ဒုက္ခဘာဝသင်္ခါတေန သုခဋ္ဌေန ဧကန္တသုခမေဝ ဇာတံ. 'हे आनंदा, हे पाच कामगुण आहेत' हा एक स्वतंत्र संदर्भ (अनुसंधी) आहे. कारण भगवंतांनी केवळ दोन इत्यादींपासून सुरू करून वेदना प्रज्ञापित केल्या नाहीत, तर एका विशिष्ट कारणाने (पर्यायाने) एकच वेदना देखील सांगितले आहे. हे दर्शवण्यासाठी आणि पंचकंग थपतीच्या मताचे समर्थन करण्यासाठी त्यांनी ही देशना सुरू केली. 'अभिक्कंततरं' म्हणजे अधिक सुंदर (अतिशय श्रेष्ठ). 'पणीततरं' म्हणजे अधिक प्रणीत (अतृप्ती न देणारे, अत्यंत उत्तम). आणि येथे चतुर्थ ध्यानापासून सुरू होणारी जी अदुःख-असुख वेदना आहे, ती देखील तिच्या शांत स्वरूपामुळे आणि प्रणीत स्वरूपामुळे 'सुख' अशी म्हटली गेली आहे. निरोध (संज्ञावेदयितनिरोध) हा अनुभवास न येणाऱ्या सुखाच्या (अवेदयित सुख) रूपाने 'सुख' ठरतो. कारण पाच कामगुणांच्या प्रभावाने आणि आठ समापत्तींच्या प्रभावाने उत्पन्न झालेले सुख हे 'वेदयित सुख' (अनुभवाचे सुख) आहे, तर निरोध हा 'अवेदयित सुख' (अनुभवाशिवायचे सुख) आहे. अशा प्रकारे, ते वेदयित सुख असो वा अवेदयित सुख असो, दुःखाचा अभाव असल्यामुळे सुखाच्या अर्थाने ते केवळ एकांत सुखच (पूर्ण सुखच) ठरते. ယတ္ထ ယတ္ထာတိ ယသ္မိံ ယသ္မိံ ဌာနေ. သုခံ ဥပလဗ္ဘတီတိ ဝေဒယိတံ သုခံ ဝါ အဝေဒယိတံ သုခံ ဝါ ဥပလဗ္ဘတိ. တံ တံ တထာဂတော သုခသ္မိံ ပညပေတိ, တံ သဗ္ဗံ တထာဂတော နိဒ္ဒုက္ခဘာဝံ သုခသ္မိံယေဝ ပညပေတီတိ ဣဓ [Pg.121] ဘဂဝါ နိရောဓသမာပတ္တိံ သီသံ ကတွာ နေယျပုဂ္ဂလဿ ဝသေန အရဟတ္တနိကူဋေနေဝ ဒေသနံ နိဋ္ဌာပေသိ. ဒသမံ ဥတ္တာနတ္ထမေဝါတိ. 'यत्थ यत्थ' म्हणजे ज्या ज्या ठिकाणी. 'सुखं उपलब्भति' म्हणजे वेदयित सुख किंवा अवेदयित सुख प्राप्त होते. 'तथागत त्या त्या गोष्टीला सुखात प्रज्ञापित करतात', म्हणजे तथागत त्या सर्व गोष्टींना दुःखाचा अभाव असल्यामुळे सुखातच प्रज्ञापित करतात. येथे भगवंतांनी निरोधसमापत्तीला मुख्य करून, नेय्य पुद्गलाच्या (मार्गदर्शनास योग्य व्यक्तीच्या) आवश्यकतेनुसार अर्हत्त्वाच्या शिखरावर नेऊन देशना समाप्त केली. दहावे सुत्त स्पष्ट अर्थाचेच आहे. ရဟောဂတဝဂ္ဂေါ ဒုတိယော. रहोगत वर्ग दुसरा समाप्त झाला. ၃. အဋ္ဌသတပရိယာယဝဂ္ဂေါ ३. अट्ठसतपरियाय वर्ग ၁. သီဝကသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. सीवकसुत्तवर्णना ၂၆၉. တတိယဝဂ္ဂဿ ပဌမေ မောဠိယသီဝကောတိ သီဝကောတိ တဿ နာမံ. စူဠာ ပနဿ အတ္ထိ, တသ္မာ မောဠိယသီဝကောတိ ဝုစ္စတိ. ပရိဗ္ဗာဇကောတိ ဆန္နပရိဗ္ဗာဇကော. ပိတ္တသမုဋ္ဌာနာနီတိ ပိတ္တပစ္စယာနိ. ဝေဒယိတာနီတိ ဝေဒနာ. တတ္ထ ပိတ္တပစ္စယာ တိဿော ဝေဒနာ ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ. ကထံ? ဧကစ္စော ဟိ ‘‘ပိတ္တံ မေ ကုပိတံ ဒုဇ္ဇာနံ ခေါ ပန ဇီဝိတ’’န္တိ ဒါနံ ဒေတိ, သီလံ သမာဒိယတိ ဥပေါသထကမ္မံ ကရောတိ, ဧဝမဿ ကုသလဝေဒနာ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. ဧကစ္စော ‘‘ပိတ္တဘေသဇ္ဇံ ကရိဿာမီ’’တိ ပါဏံ ဟနတိ, အဒိန္နံ အာဒိယတိ, မုသာ ဘဏတိ, ဒသ ဒုဿီလျကမ္မာနိ ကရောတိ, ဧဝမဿ အကုသလဝေဒနာ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. ဧကစ္စော ‘‘ဧတ္တကေနပိ မေ ဘေသဇ္ဇကရဏေန ပိတ္တံ န ဝူပသမ္မတိ, အလံ ယံ ဟောတိ. တံ ဟောတူ’’တိ မဇ္ဈတ္တော ကာယိကဝေဒနံ အဓိဝါသေန္တော နိပဇ္ဇတိ, ဧဝံ အဿ အဗျာကတဝေဒနာ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. २६९. तिसऱ्या वर्गाच्या पहिल्या सुत्तात, 'मोळियसीवक' मधील 'सीवक' हे त्याचे नाव आहे. परंतु त्याला एक मोठी शेंडी (चूडा) होती, म्हणून त्याला 'मोळियसीवक' (शेंडीवाला सीवक) म्हटले जाते. 'परिव्राजक' म्हणजे वस्त्र परिधान करणारा परिव्राजक (छन्नपरिव्राजक). 'पित्तसमुत्थानानि' म्हणजे पित्ताच्या कारणाने होणारे. 'वेदयितानि' म्हणजे वेदना. त्यामध्ये पित्ताच्या कारणाने तीन प्रकारच्या वेदना उत्पन्न होतात. कशा प्रकारे? एखादी व्यक्ती 'माझे पित्त बिघडले आहे, माझे जीवन अनिश्चित आहे' असा विचार करून दान देते, शील ग्रहण करते, उपोसथ कर्म करते; अशा प्रकारे तिला कुशल वेदना उत्पन्न होते. दुसरी एखादी व्यक्ती 'मी पित्तावर औषधोपचार करीन' असे म्हणून प्राण्याची हत्या करते, चोरी करते, असत्य बोलते, दहा प्रकारची दुःशील कर्मे करते; अशा प्रकारे तिला अकुशल वेदना उत्पन्न होते. तिसरी एखादी व्यक्ती 'एवढ्या औषधोपचारानेही माझे पित्त शांत होत नाही, आता जे व्हायचे ते होऊ दे' असा विचार करून तटस्थ राहते आणि शारीरिक वेदना सहन करत पडून राहते; अशा प्रकारे तिला अव्याकृत वेदना उत्पन्न होते. သာမမ္ပိ ခေါ ဧတန္တိ တံ တံ ပိတ္တဝိကာရံ ဒိသွာ အတ္တနာပိ ဧတံ ဝေဒိတဗ္ဗံ. သစ္စသမ္မတန္တိ ဘူတသမ္မတံ. လောကောပိ ဟိဿ သရီရေ သဗလဝဏ္ဏတာဒိပိတ္တဝိကာရံ ဒိသွာ ‘‘ပိတ္တမဿ ကုပိတ’’န္တိ ဇာနာတိ. တသ္မာတိ ယသ္မာ သာမဉ္စ ဝိဒိတံ လောကဿ စ သစ္စသမ္မတံ အတိဓာဝန္တိ, တသ္မာ. သေမှသမုဋ္ဌာနာဒီသုပိ ဧသေဝ နယော. ဧတ္ထ ပန သန္နိပါတိကာနီတိ တိဏ္ဏမ္ပိ ပိတ္တာဒီနံ ကောပေန သမုဋ္ဌိတာနိ. ဥတုပရိဏာမဇာနီတိ ဝိသဘာဂဥတုတော ဇာတာနိ. ဇင်္ဂလဒေသဝါသီနဉှိ အနုပဒေသေ ဝသန္တာနံ ဝိသဘာဂေါ ဥတု ဥပ္ပဇ္ဇတိ, အနုပဒေသဝါသီနဉ္စ ဇင်္ဂလဒေသေတိ ဧဝံ မလယသမုဒ္ဒတီရာဒိဝသေနာပိ ဥတုဝိသဘာဂတာ ဥပ္ပဇ္ဇတိယေဝ. တတော ဇာတာတိ ဥတုပရိဏာမဇာတာနိ နာမ. ‘सामम्पि खो एतं’ म्हणजे तो तो पित्तविकार पाहून स्वतःलाही हे समजून घ्यावे. ‘सच्चसम्मतं’ म्हणजे सत्य मानलेले (भूतसम्मत). कारण लोकही त्याच्या शरीरावर डाग, रंग इत्यादी पित्तविकार पाहून ‘याचे पित्त बिघडले आहे’ असे जाणतात. ‘तस्मा’ म्हणजे ज्याअर्थी स्वतःलाही समजलेले आणि जगालाही सत्य मानलेले याच्या पलीकडे जातात, म्हणून. कफसमुत्थान (कफामुळे उत्पन्न होणारे विकार) इत्यादींमध्येही हाच नियम आहे. येथे ‘सन्निपातिकानि’ म्हणजे पित्त इत्यादी तिन्हींच्या प्रकोपाने उत्पन्न झालेले. ‘उतुपरिणामजानि’ म्हणजे विषम ऋतूमुळे (हवामानातील बदलामुळे) उत्पन्न झालेले. कारण जंगल प्रदेशात राहणाऱ्यांना अनूप प्रदेशात (पाणथळ जागी) राहताना विषम ऋतू प्राप्त होतो, आणि अनूप प्रदेशात राहणाऱ्यांना जंगल प्रदेशात; अशा प्रकारे पर्वत, समुद्रकिनारा इत्यादींच्या प्रभावाने ऋतूची विषमता उत्पन्न होतेच. त्यापासून उत्पन्न झालेल्यांना ‘ऋतुपरिणामज’ (उतुपरिणामजात) असे म्हणतात। ဝိသမပရိဟာရဇာနီတိ [Pg.122] မဟာဘာရဝဟနသုဓာကောဋ္ဋနာဒိတော ဝါ အဝေလာယ စရန္တဿ သပ္ပဍံသကူပပါတာဒိတော ဝါ ဝိသမပရိဟာရတော ဇာတာနိ. ဩပက္ကမိကာနီတိ ‘‘အယံ စောရော ဝါ ပါရဒါရိကော ဝါ’’တိ ဂဟေတွာ ဇဏ္ဏုကကပ္ပရမုဂ္ဂရာဒီဟိ နိပ္ပောထနဥပက္ကမံ ပစ္စယံ ကတွာ ဥပ္ပန္နာနိ. ဧတံ ဗဟိ ဥပက္ကမံ လဘိတွာ ကောစိ ဝုတ္တနယေနေဝ ကုသလံ ကရောတိ, ကောစိ အကုသလံ, ကောစိ အဓိဝါသေန္တော နိပဇ္ဇတိ. ကမ္မဝိပါကဇာနီတိ ကေဝလံ ကမ္မဝိပါကတော, ဇာတာနိ. တေသုပိ ဟိ ဥပ္ပန္နေသု ဝုတ္တနယေနေဝ ကောစိ ကုသလံ ကရောတိ, ကောစိ အကုသလံ, ကောစိ အဓိဝါသေန္တော နိပဇ္ဇတိ. ဧဝံ သဗ္ဗဝါရေသု တိဝိဓာဝ ဝေဒနာ ဟောန္တိ. ‘विसमपरिहारजानि’ म्हणजे अतिशय जड ओझे वाहणे, चुना कुटणे इत्यादींमुळे किंवा अवेळी फिरणाऱ्याला सर्पदंश होणे, विहिरीत पडणे इत्यादी विषम शारीरिक हालचालींमुळे (अपथ्यामुळे) उत्पन्न झालेले. ‘ओपक्कमिकानि’ म्हणजे ‘हा चोर आहे किंवा परस्त्रीगामी आहे’ असे पकडून गुडघे, कोपर, सोटे इत्यादींनी मारहाण करण्याच्या उपक्रमाला (प्रयोगाला) कारणीभूत करून उत्पन्न झालेले. हा बाह्य हल्ला (उपक्रम) प्राप्त झाल्यावर, कोणी पूर्वोक्त पद्धतीनेच कुशल कर्म करतो, कोणी अकुशल कर्म करतो, तर कोणी सहन करत पडून राहतो. ‘कम्मविपाकजानि’ म्हणजे केवळ कर्मविपाकामुळे (कर्माच्या फळामुळे) उत्पन्न झालेले. ते उत्पन्न झाले असताही पूर्वोक्त पद्धतीनेच कोणी कुशल कर्म करतो, कोणी अकुशल कर्म करतो, तर कोणी सहन करत पडून राहतो. अशा प्रकारे सर्व प्रसंगांमध्ये तीन प्रकारच्याच वेदना होतात। တတ္ထ ပုရိမေဟိ သတ္တဟိ ကာရဏေဟိ ဥပ္ပန္နာ သာရီရိကာ ဝေဒနာ သက္ကာ ပဋိဗာဟိတုံ, ကမ္မဝိပါကဇာနံ ပန သဗ္ဗဘေသဇ္ဇာနိပိ သဗ္ဗပရိတ္တာနိပိ နာလံ ပဋိဃာတာယ. ဣမသ္မိံ သုတ္တေ လောကဝေါဟာရော နာမ ကထိတောတိ. त्यात पहिल्या सात कारणांमुळे उत्पन्न झालेल्या शारीरिक वेदना दूर करणे शक्य आहे; परंतु कर्मविपाकामुळे उत्पन्न झालेल्या वेदनांचे निवारण करण्यासाठी सर्व औषधे किंवा सर्व सुरक्षा-मंत्र (परित्त) देखील समर्थ ठरत नाहीत. या सुत्तात लोकव्यवहार (लोकवोहारी भाषा) सांगितला आहे। ၂-၁၀. အဋ္ဌသတသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ २-१०. अट्ठसतसुत्त इत्यादींचे वर्णन। ၂၇၀-၂၇၈. ဒုတိယေ အဋ္ဌသတပရိယာယန္တိ အဋ္ဌသတဿ ကာရဏဘူတံ. ဓမ္မပရိယာယန္တိ ဓမ္မကာရဏံ. ကာယိကာ စ စေတသိကာ စာတိ ဧတ္ထ ကာယိကာ ကာမာဝစရေယေဝ လဗ္ဘန္တိ, စေတသိကာ စတုဘူမိကာပိ. သုခါတိအာဒီသု သုခါ ဝေဒနာ အရူပါဝစရေ နတ္ထိ, သေသာသု တီသု ဘူမီသု လဗ္ဘန္တိ, ဒုက္ခာ ကာမာဝစရာဝ, ဣတရာ စတုဘူမိကာ. ပဉ္စကေ သုခိန္ဒြိယဒုက္ခိန္ဒြိယဒေါမနဿိန္ဒြိယာနိ ကာမာဝစရာနေဝ, သောမနဿိန္ဒြိယံ တေဘူမကံ, ဥပေက္ခိန္ဒြိယံ စတုဘူမကံ. ဆက္ကေ ပဉ္စသု ဒွါရေသု ဝေဒနာ ကာမာဝစရာဝ, မနောဒွါရေ စတုဘူမိကာ, အဋ္ဌာရသကေ ဆသု ဣဋ္ဌာရမ္မဏေသု သောမနဿေန သဟ ဥပဝိစရန္တီတိ သောမနဿူပဝိစာရာ. သေသဒွယေပိ ဧသေဝ နယော. ဣတိ အယံ ဒေသနာ ဝိစာရဝသေန အာဂတာ, တံသမ္ပယုတ္တာနံ ပန သောမနဿာဒီနံ ဝသေန ဣဓ အဋ္ဌာရသ ဝေဒနာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. २७०-२७८. दुसऱ्या सुत्तात ‘अट्ठसतपरियायं’ म्हणजे एकशे आठ (वेदनांच्या) ज्ञानाचे कारण असणारे. ‘धम्मपरियायं’ म्हणजे धर्माचे कारण (प्रवचन). ‘कायिका च चेतसिका च’ यामध्ये कायिक (शारीरिक) वेदना केवळ कामावचरातच मिळतात, तर चैतसिक (मानसिक) वेदना चारही भूमींमध्ये असतात. ‘सुखा’ इत्यादींमध्ये सुखद वेदना अरूपावचरात नसते, उर्वरित तीन भूमींमध्ये ती आढळते; दुःखद वेदना केवळ कामावचरातच असते; आणि इतर (उपेक्षा वेदना) चारही भूमींमध्ये असते. पाचच्या गटात (पञ्चके) सुखिंद्रिय, दुःखांद्रिय आणि दोमनस्सिंद्रिय हे केवळ कामावचरातीलच आहेत; सोमनस्सिंद्रिय तीन भूमींमधील (तेभूमिक) आहे आणि उपेक्खिंद्रिय चारही भूमींमधील (चतुर्भूमिक) आहे. सहाच्या गटात (छक्के) पाच द्वारांवरील वेदना केवळ कामावचरातीलच असतात, मनोद्वारावर चारही भूमींमधील असतात. अठराच्या गटात (अट्ठासके) सहा इष्ट (प्रिय) आलंबनांवर सोमनस्सासह (आनंदासह) विचार करतात, म्हणून त्यांना ‘सोमनस्सूपविचार’ (सौमनस्य-उपविचार) म्हणतात. उर्वरित दोन्हीमध्येही (दोमनस्सूपविचार आणि उपेक्खूपविचार) हाच नियम आहे. अशा प्रकारे हा उपदेश विचाराच्या (वितर्क-विचाराच्या) प्रभावाने आला आहे, परंतु त्याच्याशी संप्रयुक्त असलेल्या सोमनस्स इत्यादींच्या प्रभावाने येथे अठरा वेदना समजाव्यात। ဆ ဂေဟသိတာနိ သောမနဿာနီတိအာဒီသု ‘‘စက္ခုဝိညေယျာနံ ရူပါနံ ဣဋ္ဌာနံ ကန္တာနံ မနာပါနံ မနောရမာနံ လောကာမိသပဋိသံယုတ္တာနံ ပဋိလာဘံ ဝါ ပဋိလာဘတော သမနုပဿတော ပုဗ္ဗေ ဝါ ပဋိလဒ္ဓပုဗ္ဗံ အတီတံ နိရုဒ္ဓံ ဝိပရိဏတံ သမနုဿရတော ဥပ္ပဇ္ဇတိ သောမနဿံ. ယံ ဧဝရူပံ သောမနဿံ, ဣဒံ [Pg.123] ဝုစ္စတိ ဂေဟသိတံ သောမနဿ’’န္တိ (မ. နိ. ၃.၃၀၆). ဧဝံ ဆသု ဒွါရေသု ဝုတ္တကာမဂုဏနိဿိတာနိ သောမနဿာနိ ဆ ဂေဟသိတသောမနဿာနိ နာမ. ‘छ गेहसितानि सोमनस्सानी’ इत्यादींमध्ये—‘डोळ्यांनी जाणता येणाऱ्या, इष्ट, कांत (प्रिय), मनाजोगत्या, मनमोहक आणि लौकिक आमिषाशी संबंधित अशा रूपांचा लाभ झाल्यावर किंवा लाभ झाला आहे असे पाहणाऱ्याला, अथवा पूर्वी लाभलेल्या, भूतकाळातील, निरुद्ध झालेल्या व विपरिणाम पावलेल्या (बदललेल्या) रूपांचे स्मरण करणाऱ्याला जे सोमनस्य (आनंद) उत्पन्न होते; अशा प्रकारच्या सोमनस्याला ‘गेहसित सोमनस्य’ (गृहस्थ-आश्रित किंवा कामोपभोग-आश्रित सोमनस्य) असे म्हणतात.’ अशा प्रकारे सहा द्वारांवर सांगितलेल्या कामगुणांवर आश्रित असलेल्या सोमनस्यांना ‘सहा गेहसित सोमनस्य’ असे म्हणतात। ‘‘ရူပါနံ တွေဝ အနိစ္စတံ ဝိဒိတွာ ဝိပရိဏာမဝိရာဂနိရောဓံ ‘ပုဗ္ဗေ စေဝ ရူပါ ဧတရဟိ စ, သဗ္ဗေ တေ ရူပါ အနိစ္စာ ဒုက္ခာ ဝိပရိဏာမဓမ္မာ’တိ ဧဝမေတံ ယထာဘူတံ သမ္မပ္ပညာယ ပဿတော ဥပ္ပဇ္ဇတိ သောမနဿံ. ယံ ဧဝရူပံ သောမနဿံ, ဣဒံ ဝုစ္စတိ နေက္ခမ္မသိတံ သောမနဿ’’န္တိ (မ. နိ. ၃.၃၀၆) ဧဝံ ဆသု ဒွါရေသု ဣဋ္ဌာရမ္မဏေ အာပါထဂတေ အနိစ္စတာဒိဝသေန ဝိပဿနံ ပဋ္ဌပေတွာ ဥဿုက္ကာပေတုံ သက္ကောန္တဿ ‘‘ဥဿုက္ကိတာ မေ ဝိပဿနာ’’တိ သောမနဿဇာတဿ ဥပ္ပန္နသောမနဿာနိ ဆ နေက္ခမ္မသိတသောမနဿာနိ နာမ. ‘परंतु रूपांची अनित्यता जाणून, त्यांचा विपरिणाम, विराग आणि निरोध जाणून—‘‘पूर्वीही रूपे होती आणि आताही आहेत, ती सर्व रूपे अनित्य, दुःखद आणि विपरिणामधर्मी आहेत’’—असे याला यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहणाऱ्याला जे सोमनस्य उत्पन्न होते; अशा प्रकारच्या सोमनस्याला ‘नेक्खम्मसित सोमनस्य’ (नैष्क्रम्य-आश्रित किंवा संन्यास-आश्रित सोमनस्य) असे म्हणतात.’ अशा प्रकारे सहा द्वारांवर इष्ट आलंबन समोर आले असता, अनित्यता इत्यादींच्या रूपाने विपश्यना प्रस्थापित करून ती वाढवण्यास समर्थ असलेल्या व्यक्तीला ‘माझी विपश्यना प्रबळ झाली आहे’ अशा आनंदित अवस्थेत जे सोमनस्य उत्पन्न होते, त्या सोमनस्यांना ‘सहा नेक्खम्मसित सोमनस्य’ असे म्हणतात। ‘‘စက္ခုဝိညေယျာနံ ရူပါနံ ဣဋ္ဌာနံ ကန္တာနံ မနာပါနံ မနောရမာနံ လောကာမိသပဋိသံယုတ္တာနံ အပ္ပဋိလာဘံ ဝါ အပ္ပဋိလာဘတော သမနုပဿတော ပုဗ္ဗေ ဝါ ပဋိလဒ္ဓပုဗ္ဗံ အတီတံ နိရုဒ္ဓံ ဝိပရိဏတံ သမနုဿရတော ဥပ္ပဇ္ဇတိ ဒေါမနဿံ. ယံ ဧဝရူပံ ဒေါမနဿံ, ဣဒံ ဝုစ္စတိ ဂေဟသိတံ ဒေါမနဿ’’န္တိ. ဧဝံ ဆသု ဒွါရေသု ‘‘ဣဋ္ဌာရမ္မဏံ နာနုဘဝိဿာမိ နာနုဘဝါမီ’’တိ ဝိတက္ကယတော ဥပ္ပန္နာနိ ကာမဂုဏနိဿိတဒေါမနဿာနိ ဆ ဂေဟသိတဒေါမနဿာနိ နာမ. ‘डोळ्यांनी जाणता येणाऱ्या, इष्ट, कांत, मनाजोगत्या, मनमोहक आणि लौकिक आमिषाशी संबंधित अशा रूपांचा लाभ न झाल्यावर किंवा लाभ झालेला नाही असे पाहणाऱ्याला, अथवा पूर्वी लाभलेल्या, भूतकाळातील, निरुद्ध झालेल्या व विपरिणाम पावलेल्या रूपांचे स्मरण करणाऱ्याला जे दोमनस्य (दुःख/खिन्नता) उत्पन्न होते; अशा प्रकारच्या दोमनस्याला ‘गेहसित दोमनस्य’ असे म्हणतात.’ अशा प्रकारे सहा द्वारांवर ‘मला इष्ट आलंबनाचा अनुभव मिळणार नाही, मी तो अनुभवत नाही’ असा विचार करणाऱ्याला उत्पन्न होणाऱ्या, कामगुणांवर आश्रित असलेल्या दोमनस्यांना ‘सहा गेहसित दोमनस्य’ असे म्हणतात। ‘‘ရူပါနံ တွေဝ အနိစ္စတံ ဝိဒိတွာ ဝိပရိဏာမဝိရာဂနိရောဓံ ‘ပုဗ္ဗေ စေဝ ရူပါ ဧတရဟိ စ, သဗ္ဗေ တေ ရူပါ အနိစ္စာ ဒုက္ခာ ဝိပရိဏာမဓမ္မာ’တိ ဧဝမေတံ ယထာဘူတံ သမ္မပ္ပညာယ ဒိသွာ အနုတ္တရေသု ဝိမောက္ခေသု ပိဟံ ဥပဋ္ဌာပေတိ ‘ကုဒါဿု နာမာဟံ တဒါယတနံ ဥပသမ္ပဇ္ဇ ဝိဟရိဿာမိ, ယဒရိယာ ဧတရဟိ အာယတနံ ဥပသမ္ပဇ္ဇ ဝိဟရန္တီ’’တိ. ဣတိ အနုတ္တရေသု ဝိမောက္ခေသု ပိဟံ ဥပဋ္ဌာပယတော ဥပ္ပဇ္ဇတိ ပိဟပစ္စယာ ဒေါမနဿံ. ယံ ဧဝရူပံ ဒေါမနဿံ, ဣဒံ ဝုစ္စတိ နေက္ခမ္မသိတံ ဒေါမနဿန္တိ; ဧဝံ ဆသု ဒွါရေသု ဣဋ္ဌာရမ္မဏေ အာပါထဂတေ အနုတ္တရဝိမောက္ခသင်္ခါတအရိယဖလဓမ္မေသု ပိဟံ ဥပဋ္ဌာပေတွာ တဒဓိဂမာယ အနိစ္စတာဒိဝသေန ဝိပဿနံ ပဋ္ဌပေတွာ ဥဿုက္ကာပေတုံ အသက္ကောန္တဿ ‘‘ဣမမ္ပိ ပက္ခံ ဣမမ္ပိ မာသံ ဣမမ္ပိ သံဝစ္ဆရံ ဝိပဿနံ ဥဿုက္ကာပေတွာ အရိယဘူမိံ ပါပုဏိတုံ နာသက္ခိ’’န္တိ အနုသောစတော ဥပ္ပန္နာနိ ဒေါမနဿာနိ ဆ နေက္ခမ္မသိတဒေါမနဿာနိ နာမ. ‘परंतु रूपांची अनित्यता जाणून, त्यांचा विपरिणाम, विराग आणि निरोध जाणून—‘‘पूर्वीही रूपे होती आणि आताही आहेत, ती सर्व रूपे अनित्य, दुःखद आणि विपरिणामधर्मी आहेत’’—असे याला यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहून, अनुत्तर विमोक्षांविषयी (सर्वोच्च मुक्तीविषयी) अशी आकांक्षा धरतो की—‘‘मी कधी बरं त्या आयतनाला (अवस्थेला) प्राप्त करून विहरेन, ज्या आयतनात आता आर्य लोक प्राप्त होऊन विहरत आहेत?’’ अशा प्रकारे अनुत्तर विमोक्षांविषयी आकांक्षा धरणाऱ्याला आकांक्षेमुळे जे दोमनस्य उत्पन्न होते; अशा प्रकारच्या दोमनस्याला ‘नेक्खम्मसित दोमनस्य’ असे म्हणतात.’ अशा प्रकारे सहा द्वारांवर इष्ट आलंबन समोर आले असता, अनुत्तर विमोक्ष नावाच्या आर्य फलधर्मांविषयी आकांक्षा निर्माण करून, त्याच्या प्राप्तीसाठी अनित्यता इत्यादींच्या रूपाने विपश्यना प्रस्थापित करूनही ती वाढवण्यास असमर्थ ठरलेल्या आणि ‘या पंधरवड्यातही, या महिन्यातही, या वर्षातही मी विपश्यना वाढवून आर्यभूमीला प्राप्त करू शकलो नाही’ असा पश्चात्ताप करणाऱ्याला उत्पन्न होणारी दोमनस्ये म्हणजे ‘सहा नेक्खम्मसित दोमनस्य’ होत। ‘‘စက္ခုနာ ရူပံ ဒိသွာ ဥပ္ပဇ္ဇတိ ဥပေက္ခာ ဗာလဿ မူဠှဿ ပုထုဇ္ဇနဿ အနောဓိဇိနဿ အဝိပါကဇိနဿ အနာဒီနဝဒဿာဝိနော အဿုတဝတော ပုထုဇ္ဇနဿ[Pg.124]. ယာ ဧဝရူပါ ဥပေက္ခာ, ရူပံ သာ နာတိဝတ္တတိ, တသ္မာ သာ ဥပေက္ခာ ဂေဟသိတာတိ ဝုစ္စတီ’’တိ; ဧဝံ ဆသု ဒွါရေသု ဣဋ္ဌာရမ္မဏေ အာပါထဂတေ ဂုဠပိဏ္ဍကေ နိလီနမက္ခိကာ ဝိယ ရူပါဒီနိ အနတိဝတ္တမာနာ တတ္ထေဝ လဂ္ဂါ လဂ္ဂိတာ ဟုတွာ ဥပ္ပန္နကာမဂုဏနိဿိတာ ဥပေက္ခာ ဆ ဂေဟသိတဥပေက္ခာ နာမ. डोळ्याने रूप पाहून, अज्ञानी, मोहित झालेल्या, क्लेशांच्या मर्यादांवर विजय न मिळवलेल्या, विपाकावर विजय न मिळवलेल्या, दोषांना न पाहणाऱ्या आणि अश्रुतवान पृथग्जनाला जी उपेक्षा उत्पन्न होते; अशी जी उपेक्षा आहे, ती रूपाचे उल्लंघन करत नाही, म्हणून त्या उपेक्षेला 'गेहसित उपेक्षा' (गृह-आश्रित उपेक्षा) असे म्हटले जाते. याप्रमाणे, सहा द्वारांमध्ये इष्ट आलंबन (प्रिय विषय) समोर आल्यावर, गुळाच्या ढेपेवर बसलेल्या माशीप्रमाणे रूप इत्यादींचे उल्लंघन न करता तिथेच आसक्त (चिकटून) राहून उत्पन्न होणारी कामगुणाश्रित उपेक्षा ही 'सहा गेहसित उपेक्षा' म्हणून ओळखली जाते. ‘‘ရူပါနံ တွေဝ အနိစ္စတံ ဝိဒိတွာ ဝိပရိဏာမဝိရာဂနိရောဓံ ပုဗ္ဗေ စေဝ ရူပါ ဧတရဟိ စ, ‘သဗ္ဗေ တေ ရူပါ အနိစ္စာ ဒုက္ခာ ဝိပရိဏာမဓမ္မာ’တိ ဧဝမေတံ ယထာဘူတံ သမ္မပ္ပညာယ ပဿတော ဥပ္ပဇ္ဇတိ ဥပေက္ခာ. ယာ ဧဝရူပါ ဥပေက္ခာ, ရူပံ သာ အတိဝတ္တတိ, တသ္မာ သာ ဥပေက္ခာ နေက္ခမ္မသိတာတိ ဝုစ္စတီ’’တိ; ဧဝံ ဆသု ဒွါရေသု ဣဋ္ဌာဒိအာရမ္မဏေ အာပါထဂတေ ဣဋ္ဌေ အရဇ္ဇန္တဿ အနိဋ္ဌေ အဒုဿန္တဿ အသမပေက္ခနေ အမုယှန္တဿ ဥပ္ပန္နာ ဝိပဿနာဉာဏသမ္ပယုတ္တာ ဥပေက္ခာ နေက္ခမ္မသိတဥပေက္ခာ နာမ. ဣမသ္မိံ သုတ္တေ သဗ္ဗသင်္ဂါဟကော စတုဘူမကဓမ္မပရိစ္ဆေဒေါ ကထိတော. တတိယာဒီနိ ဥတ္တာနတ္ထာနေဝ. रूपांची अनित्यता जाणून, त्यांचा विपरिणाम (बदल), विराग आणि निरोध जाणून, 'भूतकाळात आणि वर्तमानकाळातही असणारी ती सर्व रूपे अनित्य, दुःख आणि विपरिणामधर्मी आहेत' असे हे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहणाऱ्याला जी उपेक्षा उत्पन्न होते; अशी जी उपेक्षा आहे, ती रूपाचे उल्लंघन करते, म्हणून त्या उपेक्षेला 'नेक्खम्मसित उपेक्षा' (नैष्क्रम्याश्रित उपेक्षा) असे म्हटले जाते. याप्रमाणे, सहा द्वारांमध्ये इष्ट इत्यादी आलंबन समोर आल्यावर, इष्ट विषयावर आसक्त न होणाऱ्या, अनिष्ट विषयावर द्वेष न करणाऱ्या, अयोग्य विचार न करणाऱ्या आणि मोहित न होणाऱ्या व्यक्तीला उत्पन्न झालेली विपश्यना-ज्ञान-युक्त उपेक्षा ही 'नेक्खम्मसित उपेक्षा' म्हणून ओळखली जाते. या सूत्तात सर्वसंग्राहक अशा चार भूमींच्या धर्मांचा विभाग सांगितला आहे. तिसऱ्या सूत्तापासूनचे पुढील सूत्त स्पष्ट अर्थाचेच आहेत. ၁၁. နိရာမိသသုတ္တဝဏ္ဏနာ ११. निरामिष सुत्ताचे स्पष्टीकरण ၂၇၉. ဧကာဒသမေ သာမိသာတိ ကိလေသာမိသေန သာမိသာ. နိရာမိသတရာတိ နိရာမိသာယပိ ဈာနပီတိယာ နိရာမိသတရာဝ. နနု စ ဒွီသု ဈာနေသု ပီတိ မဟဂ္ဂတာပိ ဟောတိ လောကုတ္တရာပိ, ပစ္စဝေက္ခဏပီတိ လောကိယာဝ, သာ ကသ္မာ နိရာမိသတရာ ဇာတာတိ? သန္တပဏီတဓမ္မပစ္စဝေက္ခဏဝသေန ဥပ္ပန္နတ္တာ. ယထာ ဟိ ရာဇဝလ္လဘော စူဠုပဋ္ဌာကော အပ္ပဋိဟာရိကံ ယထာသုခံ ရာဇကုလံ ပဝိသန္တော သေဋ္ဌိသေနာပတိအာဒယော ပါဒေန ပဟရန္တောပိ န ဂဏေတိ. ကသ္မာ? ရညော အာသန္နပရိစာရကတ္တာ. ဣတိ သော တေဟိ ဥတ္တရိတရော ဟောတိ, ဧဝမယမ္ပိ သန္တပဏီတဓမ္မပစ္စဝေက္ခဏဝသေန ဥပ္ပန္နတ္တာ လောကုတ္တရပီတိတောပိ ဥတ္တရိတရာတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. သေသဝါရေသုပိ ဧသေဝ နယော. २७९. अकराव्या सूत्तात, 'सामिष' म्हणजे क्लेशरूपी आमिषाने युक्त. 'निरामिषतर' म्हणजे निरामिष अशा ध्यान-प्रीतीपेक्षाही अधिक निरामिष असणारी प्रीती. पहिल्या दोन ध्यानांमधील प्रीती ही महग्गत (महान) आणि लोकोत्तरही असते, तर प्रत्यावेक्षण प्रीती ही केवळ लौकिकच असते; मग ती अधिक निरामिष कशी झाली? शांत आणि प्रणीत (उत्कृष्ट) अशा अर्हत्त्वफलाच्या धर्माच्या प्रत्यावेक्षणामुळे (चिंतनामुळे) उत्पन्न झाल्यामुळे ती अधिक निरामिष झाली आहे. ज्याप्रमाणे राजाचा प्रिय असलेला लहान सेवक कोणत्याही अडथळ्याशिवाय आपल्या इच्छेनुसार राजवाड्यात प्रवेश करताना, श्रेष्ठी (श्रीमंत व्यापारी), सेनापती इत्यादींना पायाने स्पर्श झाला तरी त्यांची पर्वा करत नाही. का? कारण तो राजाचा अत्यंत जवळचा सेवक असतो म्हणून. अशा प्रकारे तो त्यांच्यापेक्षा श्रेष्ठ ठरतो; त्याचप्रमाणे ही प्रत्यावेक्षण प्रीती सुद्धा शांत आणि प्रणीत धर्माच्या प्रत्यावेक्षणामुळे उत्पन्न झाल्यामुळे, लोकोत्तर प्रीतीपेक्षाही श्रेष्ठ आहे असे जाणावे. उर्वरित भागांमध्येही (सुख आणि उपेक्षा वारांमध्ये) हाच नियम जाणावा. ဝိမောက္ခဝါရေ ပန ရူပပဋိသံယုတ္တော ဝိမောက္ခော အတ္တနော အာရမ္မဏဘူတေန ရူပါမိသဝသေနေဝ သာမိသော နာမ, အရူပပဋိသံယုတ္တော ရူပါမိသာဘာဝေန နိရာမိသော နာမာတိ. विमोक्ष भागात (विमोक्ष वारात) रूपाशी संबंधित असलेला विमोक्ष हा स्वतःचे आलंबन असलेल्या रूपरूपी आमिषामुळेच 'सामिष' म्हणून ओळखला जातो, आणि अरूपाशी संबंधित असलेला विमोक्ष हा रूपरूपी आमिषाचा अभाव असल्यामुळे 'निरामिष' म्हणून ओळखला जातो. ဝေဒနာသံယုတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. वेदना संयुत्ताचे स्पष्टीकरण समाप्त झाले. ၃. မာတုဂါမသံယုတ္တံ ३. मातुगाम संयुत्त ၁. ပဌမပေယျာလဝဂ္ဂေါ १. प्रथम पेयाळ वर्ग ၁-၂. မာတုဂါမသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ १-२. मातुगाम सूत्त इत्यादींचे स्पष्टीकरण ၂၈၀-၂၈၁. မာတုဂါမသံယုတ္တဿ [Pg.125] ပဌမေ အင်္ဂေဟီတိ အဂုဏင်္ဂေဟိ. န စ ရူပဝါတိ န ရူပသမ္ပန္နော ဝိရူပေါ ဒုဒ္ဒသိကော. န စ ဘောဂဝါတိ န ဘောဂသမ္ပန္နော နိဒ္ဓနော. န စ သီလဝါတိ န သီလသမ္ပန္နော ဒုဿီလော. အလသော စာတိ ကန္တနပစနာဒီနိ ကမ္မာနိ ကာတုံ န သက္ကောတိ, ကုသီတော အာလသိယော နိသိန္နဋ္ဌာနေ နိသိန္နောဝ, ဌိတဌာနေ ဌိတောဝ နိဒ္ဒါယတိ ဧဝ. ပဇဉ္စဿ န လဘတီတိ အဿ ပုရိသဿ ကုလဝံသပတိဋ္ဌာပကံ ပုတ္တံ န လဘတိ, ဝဉ္ဈိတ္ထီ နာမ ဟောတိ. သုက္ကပက္ခော ဝုတ္တဝိပရိယာယေန ဝေဒိတဗ္ဗော. ဒုတိယံ ပဌမေ ဝုတ္တနယေနေဝ ပရိဝတ္တေတဗ္ဗံ. २८०-२८१. मातुगाम संयुत्ताच्या पहिल्या सूत्तात, 'अंगेहि' म्हणजे अवगुणांनी. 'न च रूपवा' म्हणजे रूपसंपन्न नसलेली, कुरूप, दिसायला वाईट. 'न च भोगवा' म्हणजे धनसंपन्न नसलेली, निर्धन. 'न च शीलवा' म्हणजे शीलसंपन्न नसलेली, दुःशील. 'अलसो च' म्हणजे सूत कातणे, स्वयंपाक करणे इत्यादी कामे करण्यास असमर्थ असणारी, आळशी, सुस्त, जी बसलेल्या जागी बसूनच आणि उभे राहिलेल्या जागी उभे राहूनच झोपते. 'पजं चस्स न लभति' म्हणजे त्या पुरुषाच्या (पतीच्या) कुलवंशाची स्थापना करणारा पुत्र न मिळणे, ती वंध्या (वांझ) स्त्री असते. शुक्लपक्ष (चांगल्या गुणांचा पक्ष) हा वर सांगितलेल्याच्या उलट अर्थाने जाणावा. दुसरे सूत्त पहिल्या सूत्तात सांगितलेल्या पद्धतीनेच (पुरुषाच्या संदर्भात) बदलून घ्यावे. ၃. အာဝေဏိကဒုက္ခသုတ္တဝဏ္ဏနာ ३. आवेणिक दुःख सूत्ताचे स्पष्टीकरण ၂၈၂. တတိယေ အာဝေဏိကာနီတိ ပါဋိပုဂ္ဂလိကာနိ ပုရိသေဟိ အသာဓာရဏာနိ. ပါရိစရိယန္တိ ပရိစာရိကဘာဝံ. २८२. तिसऱ्या सूत्तात, 'आवेणिकानि' म्हणजे वैयक्तिक, जे पुरुषांशी असाधारण (असामायिक) आहेत. 'पारिचरियं' म्हणजे परिचारिका भाव (सेवाभाव) ၄. တီဟိဓမ္မေဟိသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ४. तीहिधम्मेहि सूत्त इत्यादींचे स्पष्टीकरण ၂၈၃-၃၀၃. စတုတ္ထေ မစ္ဆေရမလပရိယုဋ္ဌိတေနာတိ ပုဗ္ဗဏှသမယသ္မိဉှိ မာတုဂါမော ခီရဒဓိသင်္ဂေါပနရန္ဓနပစနာဒီနိ ကာတုံ အာရဒ္ဓေါ, ပုတ္တကေဟိပိ ယာစိယမာနော ကိဉ္စိ ဒါတုံ န ဣစ္ဆတိ. တေနေတံ ဝုတ္တံ ‘‘ပုဗ္ဗဏှသမယံ မစ္ဆေရမလပရိယုဋ္ဌိတေန စေတသာ’’တိ. မဇ္ဈနှိကသမယေ ပန မာတုဂါမော ကောဓာဘိဘူတောဝ ဟောတိ, အန္တောဃရေ ကလဟံ အလဘန္တော ပဋိဝိဿကဃရမ္ပိ ဂန္တွာ ကလဟံ ကရောတိ, သာမိကဿ စ ဌိတနိသိန္နဋ္ဌာနာနိ ဝိလောကေန္တော ဝိစရတိ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘မဇ္ဈနှိကသမယံ ဣဿာပရိယုဋ္ဌိတေန စေတသာ’’တိ. သာယနှေ ပနဿာ အသဒ္ဓမ္မပဋိသေဝနာယ စိတ္တံ နမတိ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘သာယနှသမယံ ကာမရာဂပရိယုဋ္ဌိတေန စေတသာ’’တိ. ပဉ္စမာဒီနိ ဥတ္တာနတ္ထာနေဝ. २८३-३०३. चौथ्या सूत्तात, 'मच्छेरमलपरियुट्ठिتهन' म्हणजे सकाळच्या वेळी जेव्हा स्त्री दूध-दही साठवणे, स्वयंपाक करणे इत्यादी कामे करण्यास सुरुवात करते, तेव्हा मुलांनी मागितले तरी तिला काहीही देण्याची इच्छा नसते. म्हणून असे म्हटले आहे - 'सकाळच्या वेळी मत्सराच्या (कंजूषपणाच्या) मलाने वेढलेल्या चित्ताने'. दुपारी मात्र स्त्री क्रोधाने ग्रासलेलीच असते; घरात भांडण करायला मिळाले नाही तर ती शेजाऱ्यांच्या घरी जाऊन भांडण करते आणि पतीच्या उठण्या-बसण्याच्या जागांवर संशयाने नजर ठेवून फिरते. म्हणून म्हटले आहे - 'दुपारच्या वेळी ईर्षेने वेढलेल्या चित्ताने'. संध्याकाळी मात्र तिचे चित्त असद्धर्माचे (मैथुनधर्माचे) सेवन करण्याकडे वळते. म्हणून म्हटले आहे - 'संध्याकाळच्या वेळी कामरागाने वेढलेल्या चित्ताने'. पाचव्या सूत्तापासूनचे पुढील सूत्त स्पष्ट अर्थाचेच आहेत. ၃. ဗလဝဂ္ဂေါ ३. बल वर्ग ၁. ဝိသာရဒသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. विसारद सूत्ताचे स्पष्टीकरण ၃၀၄. ဒသမေ [Pg.126] ရူပဗလန္တိအာဒီသု ရူပသမ္ပတ္တိ ရူပဗလံ, ဘောဂသမ္ပတ္တိ ဘောဂဗလံ, ဉာတိသမ္ပတ္တိ ဉာတိဗလံ, ပုတ္တသမ္ပတ္တိ ပုတ္တဗလံ, သီလသမ္ပတ္တိ သီလဗလံ. ပဉ္စသီလဒသသီလာနိ အခဏ္ဍာနိ ကတွာ ရက္ခန္တဿ ဟိ သီလသမ္ပတ္တိယေဝ သီလဗလံ နာမ ဟောတိ. ဣမာနိ ခေါ ဘိက္ခဝေ ပဉ္စ ဗလာနီတိ ဣမာနိ ပဉ္စ ဥပတ္ထမ္ဘနဋ္ဌေန ဗလာနိ နာမ ဝုစ္စန္တိ. ३०४. दहाव्या सूत्तात, 'रूपबलं' इत्यादींमध्ये रूपसंपत्ती म्हणजे रूपबल, भोगसंपत्ती (धनसंपत्ती) म्हणजे भोगबल, ज्ञातीसंपत्ती (नातेवाईक) म्हणजे ज्ञातीबल, पुत्रसंपत्ती म्हणजे पुत्रबल आणि शीलसंपत्ती म्हणजे शीलबल होय. पंचशील आणि दशशील अखंड ठेवून त्यांचे रक्षण करणाऱ्याची शीलसंपत्तीच 'शीलबल' म्हणून ओळखली जाते. 'भिक्खूहो, ही पाच बले आहेत' म्हणजे ही पाच आधार देण्याच्या अर्थाने 'बले' म्हटली जातात. ၂-၁၀. ပသယှသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ २-१०. पसय्ह सूत्त इत्यादींचे स्पष्टीकरण ၃၀၅-၃၁၃. ပသယှာတိ အဘိဘဝိတွာ. အဘိဘုယျ ဝတ္တတီတိ အဘိဘဝတိ အဇ္ဈောတ္ထရတိ. နေဝ ရူပဗလံ တာယတီတိ နေဝ ရူပဗလံ တာယိတုံ ရက္ခိတုံ သက္ကောတိ. နာသေန္တေဝ နံ, ကုလေ န ဝါသေန္တီတိ ‘‘ဒုဿီလာ သံဘိန္နာစာရာ အတိက္ကန္တမရိယာဒါ’’တိ ဂီဝါယံ ဂဟေတွာ နီဟရန္တိ, န တသ္မိံ ကုလေ ဝါသေန္တိ. ဝါသေန္တေဝ နံ ကုလေ, န နာသေန္တီတိ ‘‘ကိံ ရူပေန ဘောဂါဒီဟိ ဝါ, ပရိသုဒ္ဓသီလာ ဧသာ အာစာရသမ္ပန္နာ’’တိ ဉတွာ ဉာတကာ တသ္မိံ ကုလေ ဝါသေန္တိယေဝ, န နာသေန္တိ. သေသံ သဗ္ဗတ္ထ ဥတ္တာနတ္ထမေဝါတိ. ३०५-३१३. 'पसय्ह' म्हणजे पराभूत करून (दडपून). 'अभिभुय्य वत्तति' म्हणजे पराभूत करते, दडपून टाकते. 'नेव रूपबलं तायति' म्हणजे रूपबल तिचे रक्षण करण्यास समर्थ ठरत नाही. 'नासेन्तेव नं, कुले न वासेन्ति' म्हणजे 'ही दुःशील, आचारभ्रष्ट आणि मर्यादा ओलांडणारी आहे' असे म्हणून तिला गचांडी धरून बाहेर काढतात आणि त्या कुळात राहू देत नाहीत. 'वासेन्तेव नं कुले, न नासेन्ति' म्हणजे 'रूपाचे किंवा भोगाचे काय करायचे? ही अत्यंत शीलवान आणि सदाचारी आहे' असे जाणून नातेवाईक तिला त्या कुळात राहूच देतात, बाहेर काढत नाहीत. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. မာတုဂါမသံယုတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. मातुगाम संयुत्ताचे स्पष्टीकरण समाप्त झाले. ၄. ဇမ္ဗုခါဒကသံယုတ္တံ ४. जम्बुखादक संयुत्त ၁. နိဗ္ဗာနပဉှာသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. निब्बानपञ्ह सूत्ताचे स्पष्टीकरण ၃၁၄. ဇမ္ဗုခါဒကသံယုတ္တေ [Pg.127] ဇမ္ဗုခါဒကော ပရိဗ္ဗာဇကောတိ ဧဝံနာမော ထေရဿ ဘာဂိနေယျော ဆန္နပရိဗ္ဗာဇကော. ယော ခေါ အာဝုသော ရာဂက္ခယောတိ နိဗ္ဗာနံ အာဂမ္မ ရာဂေါ ခီယတိ, တသ္မာ နိဗ္ဗာနံ ရာဂက္ခယောတိ ဝုစ္စတိ. ဒေါသမောဟက္ခယေသုပိ ဧသေဝ နယော. ३१४. जम्बुखादक संयुत्तात, 'जम्बुखादक परिव्राजक' म्हणजे या नावाचा थेरांचा (स्थविरांचा) भाचा, जो वस्त्र परिधान करणारा परिव्राजक होता. 'आवुस, जो रागाचा क्षय आहे' म्हणजे निर्वाणाचा आश्रय घेतल्याने (निर्वाण प्राप्त केल्याने) रागाचा क्षय होतो, म्हणून निर्वाणाला 'रागक्षय' असे म्हटले जाते. द्वेषक्षय आणि मोहक्षय यांच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. ယော ပန ဣမိနာဝ သုတ္တေန ကိလေသက္ခယမတ္တံ နိဗ္ဗာနန္တိ ဝဒေယျ, သော ဝတ္တဗ္ဗော ‘‘ကဿ ကိလေသာနံ ခယော, ကိံ အတ္တနော, ဥဒါဟု ပရေသ’’န္တိ? အဒ္ဓါ ‘‘အတ္တနော’’တိ ဝက္ခတိ. တတော ပုစ္ဆိတဗ္ဗော ‘‘ဂေါတြဘုဉာဏဿ ကိံ အာရမ္မဏ’’န္တိ? ဇာနမာနော ‘‘နိဗ္ဗာန’’န္တိ ဝက္ခတိ. ကိံ ပန ဂေါတြဘုဉာဏက္ခဏေ ကိလေသာ ခီဏာ ခီယန္တိ ခီယိဿန္တီတိ? ‘‘ခီဏာ’’တိ ဝါ ‘‘ခီယန္တီ’’တိ ဝါ န ဝတ္တဗ္ဗာ, ‘‘ခီယိဿန္တီ’’တိ ပန ဝတ္တဗ္ဗာတိ. ကိံ ပန တေသု အခီဏေသုယေဝ ကိလေသေသု ဂေါတြဘုဉာဏံ ကိလေသက္ခယံ အာရမ္မဏံ ကရောတီတိ? အဒ္ဓါ ဧဝံ ဝုတ္တေ နိရုတ္တရော ဘဝိဿတိ. पण जो कोणी याच सुत्ताच्या आधारे केवळ क्लेशांचा क्षय म्हणजेच निर्वाण असे म्हणेल, त्याला विचारले पाहिजे की, 'हा क्लेशांचा क्षय कोणाचा आहे? स्वतःचा की इतरांचा?' तो नक्कीच 'स्वतःचा' असे उत्तर देईल. त्यानंतर त्याला विचारले पाहिजे की, 'गोत्रभूज्ञानाचे आलंबन काय आहे?' जर तो जाणत असेल, तर तो 'निर्वाण' असे उत्तर देईल. पण गोत्रभूज्ञानाच्या क्षणी क्लेश नष्ट झाले आहेत, नष्ट होत आहेत की नष्ट होणार आहेत? 'नष्ट झाले आहेत' किंवा 'नष्ट होत आहेत' असे म्हणता येणार नाही, तर 'नष्ट होणार आहेत' असेच म्हटले पाहिजे. मग काय, ते क्लेश नष्ट न होताच गोत्रभूज्ञान क्लेशांच्या क्षयाला आपले आलंबन बनवते का? असे विचारल्यावर तो नक्कीच निरुत्तर होईल. မဂ္ဂဉာဏေနာပိ စေတံ ယောဇေတဗ္ဗံ. မဂ္ဂက္ခဏေပိ ဟိ ကိလေသာ ‘‘ခီဏာ’’တိ ဝါ ‘‘ခီယိဿန္တီ’’တိ ဝါ န ဝတ္တဗ္ဗာ, ‘‘ခီယန္တီ’’တိ ပန ဝတ္တဗ္ဗာ, န စ အခီဏေသုယေဝ ကိလေသေသု ကိလေသက္ခယော အာရမ္မဏံ ဟောတိ, တသ္မာ သမ္ပဋိစ္ဆိတဗ္ဗမေတံ. ယံ အာဂမ္မ ရာဂါဒယော ခီယန္တိ, တံ နိဗ္ဗာနံ. တံ ပနေတံ ‘‘ရူပိနော ဓမ္မာ အရူပိနော ဓမ္မာ’’တိအာဒီသု (ဓ. သ. ဒုကမာတိကာ ၁၁) ဒုကေသု အရူပိနော ဓမ္မာတိ သင်္ဂဟိတတ္တာ န ကိလေသက္ခယမတ္တမေဝါတိ. हे मार्गज्ञानाशी देखील जोडले पाहिजे. कारण मार्गक्षणी देखील क्लेश 'नष्ट झाले आहेत' किंवा 'नष्ट होणार आहेत' असे म्हणता येत नाही, तर 'नष्ट होत आहेत' असे म्हटले पाहिजे. आणि क्लेश नष्ट न होताच क्लेशांचा क्षय हे आलंबन होऊ शकत नाही, म्हणून हे स्वीकारले पाहिजे. ज्याचा आश्रय घेऊन (ज्याला प्राप्त करून) राग इत्यादी क्लेश नष्ट होतात, ते निर्वाण होय. आणि ते निर्वाण 'रुपिणो धम्मा अरुपिणो धम्मा' इत्यादी दुकांमध्ये (द्विकांमध्ये) 'अरुपिणो धम्मा' (अरूप धर्म) या पदात समाविष्ट असल्यामुळे केवळ क्लेशांचा क्षय म्हणजेच निर्वाण नव्हे. ၂. အရဟတ္တပဉှာသုတ္တဝဏ္ဏနာ २. अरहत्तपञ्हा सुत्त वर्णन ၃၁၅. အရဟတ္တပဉှဗျာကရဏေ ယသ္မာ အရဟတ္တံ ရာဂဒေါသမောဟာနံ ခီဏန္တေ ဥပ္ပဇ္ဇတိ, တသ္မာ ‘‘ရာဂက္ခယော ဒေါသက္ခယော မောဟက္ခယော’’တိ ဝုတ္တံ. ३१५. अरहत्तत्वाच्या प्रश्नाचे उत्तर देताना, ज्याअर्थी अरहत्तत्व हे राग, द्वेष आणि मोहाच्या क्षयाच्या शेवटी उत्पन्न होते, म्हणून 'रागक्षय, द्वेषक्षय, मोहक्षय' असे म्हटले आहे. ၃-၁၅. ဓမ္မဝါဒီပဉှာသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ३-१५. धम्मवादीपञ्हा सुत्त इत्यादींचे वर्णन ၃၁၆-၃၂၈. တေ [Pg.128] လောကေ သုဂတာတိ တေ ရာဂါဒယော ပဟာယ ဂတတ္တာ သုဋ္ဌု ဂတာတိ သုဂတာ. ဒုက္ခဿ ခေါ အာဝုသော ပရိညတ္ထန္တိ ဝဋ္ဋဒုက္ခဿ ပရိဇာနနတ္ထံ. ဒုက္ခတာတိ ဒုက္ခသဘာဝေါ. ဒုက္ခဒုက္ခတာတိအာဒီသု ဒုက္ခသင်္ခါတော ဒုက္ခသဘာဝေါ ဒုက္ခဒုက္ခတာ. သေသပဒဒွယေပိ ဧသေဝ နယော. ३१६-३२८. 'ते लोके सुगता' म्हणजे त्यांनी राग इत्यादींचा त्याग करून (ज्ञानाने) गमन केल्यामुळे ते चांगल्या प्रकारे गेले आहेत म्हणून 'सुगत' होत. 'दुक्खस्स खो आवुसो परिञ्ञत्थं' म्हणजे संसार-दुःखाचे पूर्ण आकलन (परिज्ञा) करण्यासाठी. 'दुक्खता' म्हणजे दुःखाचा स्वभाव. 'दुक्खदुक्खता' इत्यादींमध्ये दुःखात्मक मानलेला दुःखस्वभाव म्हणजे 'दुःखदुःखता' होय. उर्वरित दोन पदांमध्येही हाच नियम समजून घ्यावा. ၁၆. ဒုက္ကရပဉှာသုတ္တဝဏ္ဏနာ १६. दुक्करपञ्हा सुत्त वर्णन ၃၂၉. အဘိရတီတိ ပဗ္ဗဇ္ဇာယ အနုက္ကဏ္ဌနတာ. နစိရံ အာဝုသောတိ အာဝုသော ဓမ္မာနုဓမ္မပ္ပဋိပန္နော ဘိက္ခု ‘‘ပါတော အနုသိဋ္ဌော သာယံ ဝိသေသမဓိဂမိဿတိ, သာယံ အနုသိဋ္ဌော ပါတော ဝိသေသမဓိဂမိဿတီ’’တိ (မ. နိ. ၂.၃၄၅) ဝုတ္တတ္တာ ဃဋေန္တော ဝါယမန္တော နစိရဿံ လဟုယေဝ အရဟံ အဿ, အရဟတ္တေ ပတိဋ္ဌဟေယျာတိ ဒဿေတိ. သေသံ သဗ္ဗတ္ထ ဥတ္တာနတ္ထမေဝါတိ. ३२९. 'अभिरती' म्हणजे प्रव्रज्येमध्ये (भिक्खू होण्यात) रममाण असणे (कंटाळा न येणे). 'नचिरं आवुसो' म्हणजे 'हे आवुसो! धम्मानुधम्मप्रतिपन्न (लोकोत्तर धम्माला अनुरूप आचरण करणारा) भिक्खू सकाळी उपदेश मिळाल्यास संध्याकाळी विशेष गुणाची (मार्ग-फलाची) प्राप्ती करेल, आणि संध्याकाळी उपदेश मिळाल्यास सकाळी विशेष गुणाची प्राप्ती करेल' असे म्हटल्यामुळे, प्रयत्न आणि परिश्रम केल्यास तो लवकरच, अगदी थोड्याच वेळात अरहंत होईल, अरहंत पदावर प्रतिष्ठित होईल, हा अर्थ दर्शवतो. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. ဇမ္ဗုခါဒကသံယုတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. जम्बुखादक संयुत्त वर्णन समाप्त झाले. ၅. သာမဏ္ဍကသံယုတ္တဝဏ္ဏနာ ५. सामण्डक संयुत्त वर्णन ၃၃၀-၃၃၁. သာမဏ္ဍကသံယုတ္တေပိ ဣမိနာဝ နယေန အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. ३३०-३३१. सामण्डक संयुत्तात देखील याच पद्धतीने अर्थ समजून घ्यावा. သာမဏ္ဍကသံယုတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. सामण्डक संयुत्त वर्णन समाप्त झाले. ၆. မောဂ္ဂလ္လာနသံယုတ္တံ ६. मोग्गल्लान संयुत्त ၁-၈. ပဌမဈာနပဉှာသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ १-८. पठमझानपञ्हा सुत्त इत्यादींचे वर्णन ၃၃၂-၃၃၉. မောဂ္ဂလ္လာနသံယုတ္တေ [Pg.129] ကာမသဟဂတာတိ ပဉ္စနီဝရဏသဟဂတာ. တဿ ဟိ ပဌမဇ္ဈာနဝုဋ္ဌိတဿ ပဉ္စ နီဝရဏာနိ သန္တတော ဥပဋ္ဌဟိံသု. တေနဿ တံ ပဌမဇ္ဈာနံ ဟာနဘာဂိယံ နာမ အဟောသိ. တံ ပမာဒံ ဉတွာ သတ္ထာ ‘‘မာ ပမာဒေါ’’တိ ဩဝါဒံ အဒါသိ. ဒုတိယဇ္ဈာနာဒီသုပိ ဣမိနာဝ နယေန အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. အာရမ္မဏသဟဂတမေဝ ဟေတ္ထ ‘‘သဟဂတ’’န္တိ ဝုတ္တံ. ३३२-३३९. मोग्गल्लान संयुत्तात 'कामसहगता' म्हणजे पाच नीवरणांसह असलेले. कारण प्रथम ध्यानातून उठलेल्या त्या (मोग्गल्लान) थेरांच्या समोर पाच नीवरणे शांतपणे प्रकट झाली. त्यामुळे त्यांचे ते प्रथम ध्यान 'हानभागिय' (ऱ्हास पावणारे) झाले. तो प्रमाद (मळभ) जाणून शास्त्यांनी (बुद्धांनी) 'प्रमाद करू नकोस' असा उपदेश दिला. द्वितीय ध्यान इत्यादींमध्येही याच पद्धतीने अर्थ समजून घ्यावा. येथे 'सहगत' म्हणजे केवळ आलंबनासह असणे असे म्हटले आहे. ၉. အနိမိတ္တပဉှာသုတ္တဝဏ္ဏနာ ९. अनिमित्तपञ्हा सुत्त वर्णन ၃၄၀. အနိမိတ္တံ စေတောသမာဓိန္တိ နိစ္စနိမိတ္တာဒီနိ ပဟာယ ပဝတ္တံ ဝိပဿနာသမာဓိံယေဝ သန္ဓာယေတံ ဝုတ္တန္တိ. နိမိတ္တာနုသာရိ ဝိညာဏံ ဟောတီတိ ဧဝံ ဣမိနာ ဝိပဿနာသမာဓိဝိဟာရေန ဝိဟရတော ဝိပဿနာဉာဏေ တိက္ခေ သူရေ ဝဟမာနေ. ယထာ နာမ ပုရိသဿ တိခိဏေန ဖရသုနာ ရုက္ခံ ဆိန္ဒန္တဿ ‘‘သုဋ္ဌု ဝတ မေ ဖရသု ဝဟတီ’’တိ ခဏေ ခဏေ ဖရသုဓာရံ ဩလောကေန္တဿ ဆေဇ္ဇကိစ္စံ န နိပ္ဖဇ္ဇတိ, ဧဝံ ထေရဿာပိ ‘‘သူရံ ဝတ မေ ဟုတွာ ဉာဏံ ဝဟတီ’’တိ ဝိပဿနံ အာရဗ္ဘ နိကန္တိ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. အထ ဝိပဿနာကိစ္စံ သာဓေတုံ နာသက္ခိ. တံ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ ‘‘နိမိတ္တာနုသာရိ ဝိညာဏံ ဟောတီ’’တိ. သဗ္ဗနိမိတ္တာနံ အမနသိကာရာ အနိမိတ္တံ စေတောသမာဓိံ ဥပသမ္ပဇ္ဇ ဝိဟာသိန္တိ သဗ္ဗေသံ နိစ္စသုခအတ္တနိမိတ္တာနံ အမနသိကာရေန အနိမိတ္တံ ဝုဋ္ဌာနဂါမိနိဝိပဿနာသမ္ပယုတ္တံ စေတောသမာဓိံ နိဗ္ဗာနာရမ္မဏံ ဥပရိမဂ္ဂဖလသမာဓိံ ဥပသမ္ပဇ္ဇ ဝိဟာသိံ. ३४०. 'अनिमित्तं चेतोसमाधिं' हे नित्यनिमित्त इत्यादींचा त्याग करून प्रवृत्त झालेल्या विपश्यना समाधीलाच उद्देशून म्हटले आहे. 'निमित्तानुसारी विञ्ञाणं होति' म्हणजे अशा प्रकारे या विपश्यना समाधी विहारात विहार करणाऱ्याच्या विपश्यना ज्ञानात तीक्ष्ण व शूर प्रवृत्ती वाहत असताना. जसे एखाद्या माणसाने तीक्ष्ण कुऱ्हाडीने झाड कापताना 'माझी कुऱ्हाड खरोखरच खूप चांगली चालत आहे' असे म्हणून वारंवार कुऱ्हाडीच्या धारेकडे पाहत राहिल्यास कापण्याचे काम पूर्ण होत नाही, त्याचप्रमाणे थेरांच्या बाबतीतही 'माझे ज्ञान खरोखरच शूर होऊन चालत आहे' असे विपश्यनेला उद्देशून आसक्ती (निकान्ती) उत्पन्न झाली. त्यामुळे ते विपश्यनेचे कार्य पूर्ण करू शकले नाहीत. त्यालाच उद्देशून 'निमित्तानुसारी विञ्ञाणं होति' असे म्हटले आहे. 'सब्बनिमित्तानं अमनसिकारा अनिमित्तं चेतोसमाधिं उपसम्पज्ज विहासिं' म्हणजे सर्व नित्य, सुख व आत्मनिमित्तांच्या अमनसिकारामुळे (मनात न आणल्यामुळे) अनिमित्त, वुट्ठानगामिनी विपश्यनेशी युक्त अशा चेतोसमाधीला आणि निर्वाण आलंबन असलेल्या वरील मार्ग-फल समाधीला प्राप्त करून मी विहार केला. ၁၀-၁၁. သက္ကသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ १०-११. सक्क सुत्त इत्यादींचे वर्णन ၃၄၁-၃၄၂. အဝေစ္စပ္ပသာဒေနာတိ အစလပ္ပသာဒေန. ဒသဟိ ဌာနေဟီတိ ဒသဟိ ကာရဏေဟိ. အဓိဂဏှန္တီတိ အဘိဘဝန္တိ, အတိက္ကမိတွာ တိဋ္ဌန္တိ. သေသံ သဗ္ဗတ္ထ ဥတ္တာနတ္ထမေဝါတိ. ३४१-३४२. 'अवेच्चप्पसादेन' म्हणजे अचल श्रद्धेने (अचल प्रसादाने). 'दसहि ठानेहि' म्हणजे दहा कारणांनी. 'अधिगण्हन्ति' म्हणजे पराभूत करतात, ओलांडून उभे राहतात. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. မောဂ္ဂလ္လာနသံယုတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. मोग्गल्लान संयुत्त वर्णन समाप्त झाले. ၇. စိတ္တသံယုတ္တံ ७. चित्त संयुत्त ၁. သံယောဇနသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. संयोजन सुत्त वर्णन ၃၄၃. စိတ္တသံယုတ္တဿ [Pg.130] ပဌမေ မစ္ဆိကာသဏ္ဍေတိ ဧဝံနာမကေ ဝနသဏ္ဍေ. အယမန္တရာကထာ ဥဒပါဒီတိ ပေါရာဏကတ္ထေရာ အတိရစ္ဆာနကထာ ဟောန္တိ, နိသိန္နနိသိန္နဋ္ဌာနေ ပဉှံ သမုဋ္ဌာပေတွာ အဇာနန္တာ ပုစ္ဆန္တိ, ဇာနန္တာ ဝိဿဇ္ဇေန္တိ, တေန နေသံ အယံ ကထာ ဥဒပါဒိ. မိဂပထကန္တိ ဧဝံနာမကံ အတ္တနော ဘောဂဂါမံ. သော ကိရ အမ္ဗာဋကာရာမဿ ပိဋ္ဌိဘာဂေ ဟောတိ. တေနုပသင်္ကမီတိ ‘‘ထေရာနံ ပဉှံ ဝိဿဇ္ဇေတွာ ဖာသုဝိဟာရံ ကတွာ ဒဿာမီ’’တိ စိန္တေတွာ ဥပသင်္ကမိ. ဂမ္ဘီရေ ဗုဒ္ဓဝစနေတိ အတ္ထဂမ္ဘီရေ စေဝ ဓမ္မဂမ္ဘီရေ စ ဗုဒ္ဓဝစနေ. ပညာစက္ခု ကမတီတိ ဉာဏစက္ခု ဝဟတိ ပဝတ္တတိ. ३४३. चित्त संयुत्ताच्या पहिल्या सुत्तात 'मच्छिकाषण्ड' म्हणजे या नावाच्या वनखंडात (जंगलात). 'अयमन्तराकथा उदपादि' म्हणजे प्राचीन थेर हे तिरश्चानकथा (निरर्थक गप्पा) करणारे नव्हते. ते जिथे जिथे बसत, तिथे तिथे प्रश्न उपस्थित करून, न जाणणारे विचारत आणि जाणणारे त्याचे उत्तर देत, त्यामुळे त्यांच्यात हा संवाद सुरू झाला. 'मिगपथक' म्हणजे या नावाचे त्यांचे स्वतःचे भोगग्राम (उत्पन्नाचे गाव). ते अम्बाटक आरामाच्या मागच्या बाजूला होते असे म्हणतात. 'तेनुपसङ्कमि' म्हणजे 'थेरांच्या प्रश्नाचे उत्तर देऊन त्यांना सुखावह विहार प्राप्त करून देईन' असा विचार करून ते तिथे गेले. 'गम्भीरे बुद्धवचने' म्हणजे अर्थाने गंभीर आणि धम्माने गंभीर अशा बुद्धवचनात. 'पञ्ञाचक्खु कमति' म्हणजे ज्ञानचक्षू कार्य करतो, प्रवृत्त होतो. ၂. ပဌမဣသိဒတ္တသုတ္တဝဏ္ဏနာ २. पठम इसिदत्त सुत्त वर्णन ၃၄၄. ဒုတိယေ အာယသ္မန္တံ ထေရန္တိ တေသု ထေရေသု ဇေဋ္ဌကံ မဟာထေရံ. တုဏှီ အဟောသီတိ ဇာနန္တောပိ အဝိသာရဒတ္တာ န ကိဉ္စိ ဗျာဟရိ. ဗျာကရောမဟံ ဘန္တေတိ ‘‘အယံ ထေရော နေဝ အတ္တနာ ဗျာကရောတိ, န အညေ အဇ္ဈေသတိ, ဥပါသကောပိ ဘိက္ခုသံဃံ ဝိဟေသေတိ, အဟမေတံ ဗျာကရိတွာ ဖာသုဝိဟာရံ ကတွာ ဒဿာမီ’’တိ စိန္တေတွာ အာသနတော ဝုဋ္ဌာယ ထေရဿ သန္တိကံ ဂန္တွာ ဧဝံ ဩကာသမကာသိ, ကတာဝကာသော ပန အတ္တနော အာသနေ နိသီဒိတွာ ဗျာကာသိ. ३४४. दुसऱ्या सुत्तात 'आयुष्मंत थेर' म्हणजे त्या थेरांमध्ये जे सर्वात ज्येष्ठ महाथेर होते त्यांना. 'तुण्ही अहोसि' म्हणजे जाणत असूनही आत्मविश्वासाच्या अभावामुळे ते काहीच बोलले नाहीत. 'ब्याकरोमं भन्ते' म्हणजे 'हे महाथेर स्वतःही उत्तर देत नाहीत आणि इतरांनाही विचारत नाहीत, आणि उपासक देखील भिक्खू संघाला वारंवार प्रश्न विचारून त्रास देत आहे, म्हणून मी या प्रश्नाचे उत्तर देऊन त्यांना सुखावह विहार प्राप्त करून देईन' असा विचार करून, ते आपल्या आसनावरून उठले आणि थेरांच्या जवळ जाऊन त्यांनी परवानगी मागितली. परवानगी मिळाल्यावर त्यांनी आपल्या आसनावर बसून उत्तर दिले. သဟတ္ထာတိ သဟတ္ထေန. သန္တပ္ပေသီတိ ယာဝဒိစ္ဆကံ ဒေန္တော သုဋ္ဌု တပ္ပေသိ. သမ္ပဝါရေသီတိ ‘‘အလံ အလ’’န္တိ ဟတ္ထသညာယ စေဝ ဝါစာယ စ ပဋိက္ခိပါပေသိ. ဩနီတပတ္တပါဏိနောတိ ပါဏိတော အပနီတပတ္တာ ဓောဝိတွာ ထဝိကာယ ဩသာပေတွာ အံသေ လဂ္ဂိတပတ္တာတိ အတ္ထော. 'सहत्था' म्हणजे स्वतःच्या हाताने. 'संतप्पेसि' म्हणजे इच्छेनुसार दान देऊन चांगल्या प्रकारे तृप्त केले. 'सम्पवारेसि' म्हणजे 'पुरे, पुरे' असे हाताच्या इशाऱ्याने आणि शब्दांनी नकार दिला. 'ओनीतपत्तपाणिणो' म्हणजे हातातील पात्र बाजूला ठेवून, ते धुऊन, पिशवीत ठेवून खांद्यावर अडकवलेले पात्र असणारे, असा अर्थ आहे. ၃. ဒုတိယဣသိဒတ္တသုတ္တဝဏ္ဏနာ ३. द्वितीय इसिदत्तसुत्तवण्णना ၃၄၅. တတိယေ အဝန္တိယာတိ ဒက္ခိဏာပထေ အဝန္တိရဋ္ဌေ. ကလျာဏံ ဝုစ္စတီတိ ‘‘စတူဟိ ပစ္စယေဟိ ပဋိဇဂ္ဂိဿာမီ’’တိ ဝစနံ နိဒ္ဒေါသံ အနဝဇ္ဇံ ဝုစ္စတိ တယာ ဥပါသကာတိ အဓိပ္ပာယေန ဝဒတိ. ३४५. तिसऱ्या सुत्तात, 'अवन्तिया' म्हणजे दक्षिणपथातील अवंती राष्ट्रामध्ये. 'कल्याणं वुच्चति' (कल्याण म्हटले जाते) म्हणजे 'मी चार पच्चयांनी (प्रत्ययांनी/गरजांनी) सेवा करीन' हे तुझे निर्दोष व दोषरहित वचन, हे उपासका, तुझ्याद्वारे म्हटले गेले आहे, या अभिप्रायाने चित्त गृहपती बोलतात. ၄. မဟကပါဋိဟာရိယသုတ္တဝဏ္ဏနာ ४. महाकपाटिहारियसुत्तवण्णना ၃၄၆. စတုတ္ထေ [Pg.131] သေသကံ ဝိဿဇ္ဇေထာတိ တဿ ကိရ ထေရေဟိ သဒ္ဓိံယေဝ ကံသထာလံ ပမဇ္ဇိတွာ ပါယာသံ ဝဍ္ဎေတွာ အဒံသု. သော ဘုတ္တပါယာသော ထေရေဟိယေဝ သဒ္ဓိံ ဂန္တုကာမော စိန္တေသိ ‘‘ဃရေ တာဝ ဥပါသိကာ သေသကံ ဝိစာရေတိ, ဣဓ ပနိမေ ဒါသကမ္မကာရာ မယာ အဝုတ္တာ န ဝိစာရေဿန္တိ, ဧဝါယံ ပဏီတပါယာသော နဿိဿတီ’’တိ တေသံ အနုဇာနန္တော ဧဝမာဟ. ကုထိတန္တိ ကုဓိတံ, ဟေဋ္ဌာ သန္တတ္တာယ ဝါလိကာယ ဥပရိ အာတပေန စ အတိတိခိဏန္တိ အတ္ထော. ဣဒံ ပန တေပိဋကေ ဗုဒ္ဓဝစနေ အသမ္ဘိန္နပဒံ. ပဝေလိယမာနေနာတိ ပဋိလိယမာနေန သာဓု ခွဿ ဘန္တေတိ ‘‘ဖာသုဝိဟာရံ ကရိဿာမိ နေသ’’န္တိ စိန္တေတွာ ဧဝမာဟ. ३४६. चौथ्या सुत्तात, 'सेसकं विस्सज्जेथ' (उरलेले वाटून टाका) याविषयी: असे सांगितले जाते की, दासांनी व कामगारांनी कांस्यपात्र स्वच्छ करून, त्यात पायस (खीर) वाढून स्थविरांसह त्या चित्त गृहपतीला दिले. तो पायस ग्रहण केल्यानंतर, स्थविरांसोबतच जाण्याची इच्छा असलेल्या त्या गृहपतीने विचार केला, 'घरी तर उपासिका उरलेल्या अन्नाची व्यवस्था करेल, परंतु येथे हे दास व कामगार माझ्या सांगण्याशिवाय त्याची व्यवस्था करणार नाहीत. अशा प्रकारे हा उत्तम पायस वाया जाईल.' म्हणून त्यांना परवानगी देत त्यांनी असे म्हटले. 'कुथितं' म्हणजे तापलेले; खाली अत्यंत तापलेल्या वाळूने आणि वरून उन्हाच्या तापाने अत्यंत कडक झालेले, असा अर्थ आहे. हे पद तिपिटकातील बुद्धवचनात असंभिन्न (अमिश्रित/विशिष्ट) पद आहे. 'पवेलियमानेन' म्हणजे वितळणाऱ्या मेणाप्रमाणे मऊ होऊन नष्ट होण्यासारखे. 'साधु ख्वस्स भन्ते' याविषयी: 'मी त्यांच्या सुखावह विहाराची व्यवस्था करीन' असा विचार करून आयुष्मान महाक यांनी असे म्हटले. ဣဒ္ဓါဘိသင်္ခါရံ အဘိသင်္ခရီတိ အဓိဋ္ဌာနိဒ္ဓိံ အကာသိ. ဧတ္ထ စ ‘‘မန္ဒမန္ဒော သီတကဝါတော ဝါယတု, အဗ္ဘမဏ္ဍပံ ကတွာ ဒေဝေါ ဧကမေကံ ဖုသာယတူ’’တိ ဧဝံ နာနာပရိကမ္မံ – ‘‘သဝါတော ဒေဝေါ ဝဿတူ’’တိ ဧဝံ အဓိဋ္ဌာနံ ဧကတောပိ ဟောတိ. ‘‘သဝါတော ဒေဝေါ ဝဿတူတိ ဧကတောပရိကမ္မံ, မန္ဒမန္ဒော သီတကဝါတော ဝါယတု, အဗ္ဘမဏ္ဍပံ ကတွာ ဒေဝေါ ဧကမေကံ ဖုသာယတူ’’တိ ဧဝံ နာနာအဓိဋ္ဌာနံ ဟောတိ. ဝုတ္တနယေနေဝ နာနာပရိကမ္မံ နာနာဓိဋ္ဌာနံ, ဧကတော ပရိကမ္မံ ဧကတော အဓိဋ္ဌာနမ္ပိ ဟောတိယေဝ. ယထာ တထာ ကရောန္တဿ ပန ပါဒကဇ္ဈာနတော ဝုဋ္ဌာယ ကတပရိကမ္မဿ ပရိကမ္မာနန္တရေန မဟဂ္ဂတအဓိဋ္ဌာနစိတ္တေနေဝ တံ ဣဇ္ဈတိ. ဩကာသေသီတိ ဝိပ္ပကိရိ. 'इद्धाभिसङ्खारं अभिसङ्खरि' म्हणजे अधिष्ठान ऋद्धी प्रकट केली. आणि येथे, 'मंद-मंद शीतल वारा वाहो, ढगांचा मंडप तयार करून देव (पर्जन्य) एकेक थेंब पाडो' अशा प्रकारे विविध परिकर्म (पूर्वसिद्धता) करून, 'वाऱ्यासह पाऊस पडो' असे अधिष्ठान एकाच वेळी देखील होते. 'वाऱ्यासह पाऊस पडो' हे एकच परिकर्म करून, 'मंद-मंद शीतल वारा वाहो, ढगांचा मंडप तयार करून देव एकेक थेंब पाडो' असे विविध अधिष्ठान देखील होते. सांगितलेल्या पद्धतीनेच विविध परिकर्म व विविध अधिष्ठान, तसेच एकच परिकर्म व एकच अधिष्ठान देखील होतेच. परंतु, जो कोणी हे करतो, त्याने पादक ध्यानातून उठून परिकर्म केल्यानंतर, परिकर्माच्या लगेचच नंतर महग्गत अधिष्ठान-चित्तानेच ती ऋद्धी सिद्ध होते. 'ओकासेसी' म्हणजे विखुरले (पसरवले). ၅. ပဌမကာမဘူသုတ္တဝဏ္ဏနာ ५. प्रथमकामभूसुत्तवण्णना ၃၄၇. ပဉ္စမေ နေလင်္ဂေါတိ နိဒ္ဒေါသော. သေတပစ္ဆာဒေါတိ သေတပဋိစ္ဆာဒနော. အနီဃန္တိ နိဒ္ဒုက္ခံ. မုဟုတ္တံ တုဏှီ ဟုတွာတိ တဿ အတ္ထပေက္ခနတ္ထံ တီဏိ ပိဋကာနိ ကဏ္ဏေ ကုဏ္ဍလံ ဝိယ သဉ္စာလေန္တော ‘‘အယံ ဣမဿ အတ္ထော, အယံ ဣမဿ အတ္ထော’’တိ ဥပပရိက္ခဏတ္ထံ မုဟုတ္တံ တုဏှီ ဟုတွာ. ဝိမုတ္တိယာတိ အရဟတ္တဖလဝိမုတ္တိယာ. ဣမံ ပန ပဉှံ ကထေန္တော ဥပါသကော ဒုက္ကရံ အကာသိ. သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ ဟိ ‘‘ပဿထ နော တုမှေ, ဘိက္ခဝေ, ဧတံ ဘိက္ခုံ [Pg.132] အာဂစ္ဆန္တံ ဩဒါတကံ တနုကံ တုင်္ဂနာသိက’’န္တိ (သံ. နိ. ၂.၂၄၅) အတ္တနော ဒိဋ္ဌေန ကထေသိ. အယံ ပန နယဂ္ဂါဟေန ‘‘အရဟတော ဧတံ အဓိဝစန’’န္တိ အာဟ. ३४७. पाचव्या सुत्तात, 'नेलङ्गो' म्हणजे निर्दोष. 'सेतपच्छादो' म्हणजे पांढरे (स्वच्छ) आच्छादन असलेला (अर्हत्त्वफलरूपी छप्पर असलेला). 'अनीघं' म्हणजे दुःखविरहित. 'मुहुत्तं तुण्ही हुत्वा' (क्षणभर शांत राहून) म्हणजे त्या गाथेचा अर्थ शोधण्यासाठी, कानात कुंडल हलवावे त्याप्रमाणे तिन्ही पिटके मनात फिरवत, 'याचा हा अर्थ आहे, याचा हा अर्थ आहे' अशी परीक्षा करण्यासाठी क्षणभर शांत राहून. 'विमुत्तिया' म्हणजे अर्हत्त्वफल विमुक्तीने. या प्रश्नाचे उत्तर देताना त्या उपासकाने अत्यंत कठीण कार्य केले. कारण सम्यक्संबुद्धांनी तर, 'हे भिक्खूंनो, तुम्ही या येणाऱ्या गोऱ्या, सडपातळ आणि उंच नाक असलेल्या भिक्खूला पाहता का?' असे स्वतःच्या ज्ञानाने म्हटले होते. परंतु या गृहपतीने नय-ग्रहणाने (तर्काने) 'हे अर्हताचेच अधि वचन (समानार्थी नाव) आहे' असे म्हटले. ၆. ဒုတိယကာမဘူသုတ္တဝဏ္ဏနာ ६. द्वितीयकामभूसुत्तवण्णना ၃၄၈. ဆဋ္ဌေ ကတိ နု ခေါ ဘန္တေ သင်္ခါရာတိ အယံ ကိရ, ဂဟပတိ, နိရောဓံ ဝလဉ္ဇေတိ, တသ္မာ ‘‘နိရောဓပါဒကေ သင်္ခါရေ ပုစ္ဆိဿာမီ’’တိ စိန္တေတွာ ဧဝမာဟ. ထေရောပိဿ အဓိပ္ပာယံ ဉတွာ ပုညာဘိသင်္ခါရာဒီသု အနေကေသု သင်္ခါရေသု ဝိဇ္ဇမာနေသုပိ ကာယသင်္ခါရာဒယောဝ အာစိက္ခန္တော တယော ခေါ ဂဟပတီတိအာဒိမာဟ. တတ္ထ ကာယပ္ပဋိဗဒ္ဓတ္တာ ကာယေန သင်္ခရီယတိ နိဗ္ဗတ္တီယတီတိ ကာယသင်္ခါရော. ဝါစာယ သင်္ခရောတိ နိဗ္ဗတ္တေတီတိ ဝစီသင်္ခါရော. စိတ္တပ္ပဋိဗဒ္ဓတ္တာ စိတ္တေန သင်္ခရီယတိ နိဗ္ဗတ္တီယတီတိ စိတ္တသင်္ခါရော. ३४८. सहाव्या सुत्तात, 'कति नु खो भन्ते सङ्खारा' (भन्ते, संस्कार किती आहेत?) याविषयी: हा चित्त गृहपती निरोध-समापत्तीचा अनुभव घेणारा होता, म्हणून 'निरोध-समापत्तीचे आधार असलेल्या संस्कारांविषयी विचारतो' असा विचार करून त्याने असे विचारले. स्थविरांनी देखील त्याचा अभिप्राय जाणून, पुंण्याभिसंस्कार इत्यादी अनेक संस्कार अस्तित्वात असतानाही, केवळ काय-संस्कार इत्यादींचेच स्पष्टीकरण देत 'तयो खो गहपति' (गृहपती, तीन संस्कार आहेत) इत्यादी म्हटले. त्यात, कायाशी (शरीराशी) बद्ध असल्यामुळे कायेद्वारे जे संस्कारित व उत्पन्न केले जाते, तो 'काय-संस्कार' होय. वाचेने जे संस्कारित व उत्पन्न केले जाते, तो 'वची-संस्कार' होय. चित्ताशी बद्ध असल्यामुळे चित्ताद्वारे जे संस्कारित व उत्पन्न केले जाते, तो 'चित्त-संस्कार' होय. ကတမော ပန ဘန္တေတိ ဣဓ ကိံ ပုစ္ဆတိ? ‘‘ဣမေ သင်္ခါရာ အညမညံ မိဿာ အာလုဠိတာ အဝိဘူတာ ဒုဒ္ဒီပနာ. တထာ ဟိ ကာယဒွါရေ အာဒါနဂ္ဂဟဏမုဉ္စနစောပနာနိ ပါပေတွာ ဥပ္ပန္နာ အဋ္ဌ ကာမာဝစရကုသလစေတနာ ဒွါဒသ အကုသလစေတနာတိ ဧဝံ ကုသလာကုသလာ ဝီသတိ စေတနာပိ, အဿာသပဿာသာပိ ကာယသင်္ခါရောတွေဝ ဝုစ္စန္တိ. ဝစီဒွါရေ ဟနုသဉ္စောပနံ ဝစီဘေဒံ ပါပေတွာ ဥပ္ပန္နာ ဝုတ္တပ္ပကာရာဝ ဝီသတိ စေတနာပိ ဝိတက္ကဝိစာရာပိ ဝစီသင်္ခါရောတွေဝ ဝုစ္စန္တိ. ကာယဝစီဒွါရေသု စောပနံ အပတွာ ရဟော နိသိန္နဿ စိန္တယတော ဥပ္ပန္နာ ကုသလာကုသလာ ဧကူနတိံသစေတနာပိ, သညာ စ ဝေဒနာ စာတိ ဣမေ ဒွေ ဓမ္မာပိ စိတ္တသင်္ခါရောတွေဝ ဝုစ္စန္တိ. ဧဝံ ဣမေ သင်္ခါရာ အညမညံ မိဿာ အာလုဠိတာ အဝိဘူတာ ဒုဒ္ဒီပနာ, တေ ပါကဋေ ဝိဘူတေ ကတွာ ကထာပေဿာမီ’’တိ ပုစ္ဆိ. 'कतमो पन भन्ते' (भन्ते, ते कोणते आहेत?) येथे काय विचारले आहे? 'हे संस्कार परस्परांमध्ये मिश्रित, गोंधळलेले, अस्पष्ट आणि समजण्यास कठीण आहेत. कारण, काय-द्वारावर (शारीरिक हालचालींवर) ग्रहण करणे, सोडणे व हालचाल करणे याद्वारे उत्पन्न झालेल्या आठ कामावचर कुशल चेतना आणि बारा अकुशल चेतना, अशा प्रकारे वीस कुशल-अकुशल चेतना आणि श्वासोच्छ्वास (अस्सास-पस्सास) यांना देखील 'काय-संस्कार'च म्हटले जाते. वची-द्वारावर (वाणीच्या द्वारावर) जबड्याची हालचाल करून वाणी प्रकट करण्याद्वारे उत्पन्न झालेल्या पूर्वोक्त वीस चेतना आणि वितर्क-विचार यांना देखील 'वची-संस्कार'च म्हटले जाते. काय व वची द्वारांवर हालचाल न होता, एकांतात बसून विचार करणाऱ्या व्यक्तीमध्ये उत्पन्न झालेल्या एकोणतीस कुशल-अकुशल चेतना, तसेच संज्ञा व वेदना या दोन्ही धर्मांना देखील 'चित्त-संस्कार'च म्हटले जाते. अशा प्रकारे हे संस्कार परस्परांमध्ये मिश्रित, गोंधळलेले, अस्पष्ट आणि समजण्यास कठीण आहेत; त्यांना स्पष्ट व प्रकट करून सांगण्यासाठी' त्याने विचारले. ကသ္မာ ပန ဘန္တေတိ ဣဓ ကာယသင်္ခါရာဒိနာမဿ ပဒတ္ထံ ပုစ္ဆတိ. တဿ ဝိဿဇ္ဇနေ ကာယပ္ပဋိဗဒ္ဓါတိ ကာယနိဿိတာ. ကာယေ သတိ ဟောန္တိ, အသတိ န ဟောန္တိ. စိတ္တပ္ပဋိဗဒ္ဓါတိ စိတ္တနိဿိတာ. စိတ္တေ သတိ ဟောန္တိ, အသတိ န ဟောန္တိ. 'कस्मा पन भन्ते' (भन्ते, असे का?) येथे काय-संस्कार इत्यादी नावांच्या पदांचा अर्थ विचारला आहे. त्याच्या उत्तरात, 'कायप्पटिबद्ध' म्हणजे कायेवर (शरीरावर) आश्रित असणारे. काया (शरीर) असताना ते असतात, काया नसताना ते नसतात. 'चित्तप्पटिबद्ध' म्हणजे चित्तावर आश्रित असणारे. चित्त असताना ते असतात, चित्त नसताना ते नसतात. ဣဒါနိ [Pg.133] ‘‘ကိံ နု ခေါ ဧသ သညာဝေဒယိတနိရောဓံ ဝလဉ္ဇေတိ, နော ဝလဉ္ဇေတိ, စိဏ္ဏဝသီ ဝါ တတ္ထ နော စိဏ္ဏဝသီ’’တိ ဇာနနတ္ထံ ပုစ္ဆန္တော ကထံ ပန ဘန္တေ သညာဝေဒယိတနိရောဓသမာပတ္တိ ဟောတီတိ အာဟ. တဿ ဝိဿဇ္ဇနေ သမာပဇ္ဇိဿန္တိ ဝါ သမာပဇ္ဇာမီတိ ဝါ ပဒဒွယေန နေဝသညာနာသညာယတနသမာပတ္တိကာလော ကထိတော. သမာပန္နောတိ ပဒေန အန္တောနိရောဓော. တထာ ပုရိမေဟိ ဒွီဟိ ပဒေဟိ သစိတ္တကကာလော ကထိတော, ပစ္ဆိမေန အစိတ္တကကာလော. आता, 'हे स्थवीर संज्ञा-वेदयित-निरोध (निरोध-समापत्ती) चा अनुभव घेतात की नाही? आणि त्यात त्यांचे वशित्व (कौशल्य) आहे की नाही?' हे जाणून घेण्यासाठी विचारताना, 'कथं पन भन्ते सञ्ञावेदयितनिरोधसमापत्ति होती' (भन्ते, संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्ती कशी होते?) असे विचारले. त्याच्या उत्तरात, 'समापज्जिस्सन्ति' किंवा 'समापज्जामि' या दोन पदांद्वारे 'नेवसञ्ञानासञ्ञायतन' समापत्तीचा काळ सांगितला आहे. 'समापन्नो' या पदाने निरोधाच्या आतील अवस्था (अन्तो-निरोध) दर्शवली आहे. तसेच, पहिल्या दोन पदांद्वारे सचित्तक काळ (चित्त असलेला काळ) सांगितला आहे, आणि शेवटच्या पदाने अचित्तक काळ (चित्त नसलेला काळ) सांगितला आहे. ပုဗ္ဗေဝ တထာ စိတ္တံ ဘာဝိတံ ဟောတီတိ နိရောဓသမာပတ္တိတော ပုဗ္ဗေ အဒ္ဓါနပရိစ္ဆေဒကာလေယေဝ ‘‘ဧတ္တကံ ကာလံ အစိတ္တကော ဘဝိဿာမီ’’တိ အဒ္ဓါနပရိစ္ဆေဒံ စိတ္တံ ဘာဝိတံ ဟောတိ. ယံ တံ တထတ္တာယ ဥပနေတီတိ ယံ ပန ဧဝံ ဘာဝိတံ စိတ္တံ, တံ ပုဂ္ဂလံ တထတ္တာယ အစိတ္တကဘာဝါယ ဥပနေတိ. ဝစီသင်္ခါရော ပဌမံ နိရုဇ္ဈတီတိ သေသသင်္ခါရေဟိ ပဌမံ ဒုတိယဇ္ဈာနေယေဝ နိရုဇ္ဈတိ. တတော ကာယသင်္ခါရောတိ တတော ပရံ ကာယသင်္ခါရော စတုတ္ထဇ္ဈာနေ နိရုဇ္ဈတိ. တတော စိတ္တသင်္ခါရောတိ တတော ပရံ စိတ္တသင်္ခါရော အန္တောနိရောဓေ နိရုဇ္ဈတိ. အာယူတိ ရူပဇီဝိတိန္ဒြိယံ. ဝိပရိဘိန္နာနီတိ ဥပဟတာနိ ဝိနဋ္ဌာနိ. 'पुब्बेव तथा चित्तं भावितं होति' म्हणजे निरोध-समापत्तीच्या आधी, कालावधी निश्चित करण्याच्या वेळीच, 'मी इतका वेळ अचित्तक (चित्तविरहित) राहीन' अशा प्रकारे कालावधी निश्चित करणारे चित्त भावित (विकसित) केलेले असते. 'यं तं तथत्ताय उपनेति' म्हणजे जे अशा प्रकारे भावित केलेले चित्त असते, ते त्या व्यक्तीला 'तथत्ता' म्हणजे अचित्तक अवस्थेकडे घेऊन जाते. 'वचीसङ्खारो पठमं निरुज्झति' म्हणजे इतर संस्कारांच्या आधी, पहिल्यांदा द्वितीय ध्यानातच वची-संस्कार निरुद्ध होतो. 'ततो कायसङ्खारो' म्हणजे त्यानंतर चतुर्थ ध्यानात काय-संस्कार निरुद्ध होतो. 'ततो चित्तसङ्खारो' म्हणजे त्यानंतर निरोध-समापत्तीच्या आत चित्त-संस्कार निरुद्ध होतो. 'आयु' म्हणजे रूप-जीवितेंद्रिय. 'विपरिभिन्नानि' म्हणजे उपहत (नष्ट/क्षीण) झालेले. တတ္ထ ကေစိ ‘‘နိရောဓသမာပန္နဿ ‘စိတ္တသင်္ခါရော စ နိရုဒ္ဓေါ’တိ ဝစနတော စိတ္တံ အနိရုဒ္ဓံ ဟောတိ, တသ္မာ သစိတ္တကာပိ အယံ သမာပတ္တီ’’တိ ဝဒန္တိ. တေ ဝတ္တဗ္ဗာ – ‘‘ဝစီသင်္ခါရောပိဿ နိရုဒ္ဓေါ’’တိ ဝစနတော ဝါစာ အနိရုဒ္ဓါ ဟောတိ, တသ္မာ နိရောဓသမာပန္နေန ဓမ္မမ္ပိ ကထေန္တေန သဇ္ဈာယမ္ပိ ကရောန္တေန နိသီဒိတဗ္ဗံ သိယာ. ယော စာယံ မတော ကာလင်္ကတော, တဿာပိ စိတ္တသင်္ခါရော နိရုဒ္ဓေါတိ ဝစနတော စိတ္တံ အနိရုဒ္ဓံ ဘဝေယျ, တသ္မာ ကာလင်္ကတေ မာတာပိတရော ဝါ အရဟန္တေ ဝါ ဈာပေန္တေန အာနန္တရိယကမ္မံ ကတံ ဘဝေယျ. ဣတိ ဗျဉ္ဇနေ အဘိနိဝေသံ အကတွာ အာစရိယာနံ နယေ ဌတွာ အတ္ထော ဥပပရိက္ခိတဗ္ဗော. အတ္ထော ဟိ ပဋိသရဏံ, န ဗျဉ္ဇနံ. त्यात काही आचार्य म्हणतात की, निरोधसमापत्तीत प्रविष्ट झालेल्या व्यक्तीचा 'चित्तसंस्कार निरुद्ध होतो' या वचनावरून चित्त निरुद्ध होत नाही, म्हणून ही समापत्ती चित्तसहित (सचित्तक) असते. त्यांना असे सांगितले पाहिजे की, 'त्याचा वचीसंस्कार (वाणीचा संस्कार) देखील निरुद्ध होतो' या वचनावरून वाणी निरुद्ध होत नाही, म्हणून निरोधसमापत्तीत प्रविष्ट झालेल्या व्यक्तीने धर्मोपदेश करत किंवा सज्झाय (सज्जाय) करत बसले पाहिजे. तसेच, जो मृत (कालवश) झाला आहे, त्याचाही चित्तसंस्कार निरुद्ध होतो या वचनावरून त्याचे चित्त निरुद्ध नसावे, म्हणून मृत झालेल्या मातापित्यांचे किंवा अरहंतांचे दहन करणाऱ्या व्यक्तीने आनंतर्यकर्म केले असे होईल. म्हणून केवळ शब्दांवर (व्यंजनावर) अभिनिवेश (आग्रह) न धरता, आचार्यांच्या पद्धतीवर (नयावर) अधिष्ठित राहून अर्थाची परीक्षा केली पाहिजे. कारण अर्थ हाच आधार (प्रतिशरण) आहे, शब्द (व्यंजन) नव्हे. ဣန္ဒြိယာနိ ဝိပ္ပသန္နာနီတိ ကိရိယမယပဝတ္တသ္မိဉှိ ဝတ္တမာနေ ဗဟိဒ္ဓါရမ္မဏေသု ပသာဒေ ဃဋ္ဋေန္တေသု ဣန္ဒြိယာနိ ကိလမန္တိ, ဥပဟတာနိ မက္ခိတ္တာနိ ဝိယ ဟောန္တိ ဝါတာဒီဟိ ဥဋ္ဌိတရဇေန စတုမဟာပထေ ဌပိတအာဒါသော ဝိယ. ယထာ ပန ထဝိကာယ ပက္ခိပိတွာ မဉ္ဇူသာဒီသု ဌပိတော အာဒါသော အန္တောယေဝ [Pg.134] ဝိရောစတိ, ဧဝံ နိရောဓသမာပန္နဿ ဘိက္ခုနော အန္တောနိရောဓေ ပဉ္စ ပသာဒါ အတိဝိယ ဝိရောစန္တိ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘ဣန္ဒြိယာနိ ဝိပ္ပသန္နာနီ’’တိ. 'इंद्रिये अत्यंत प्रसन्न (तेजस्वी) असतात' याचे कारण असे की, कायिक व वाचिक क्रिया चालू असताना, बाह्य आलंबनांनी इंद्रियप्रसादांना स्पर्श केला असता इंद्रिये थकतात आणि जणू काही ती मलीन व बाधित होतात; जसे वाऱ्यामुळे उडणाऱ्या धुळीने चव्हाट्यावर ठेवलेला आरसा मलीन होतो. परंतु, जसा पिशवीत घालून पेटी इत्यादींमध्ये ठेवलेला आरसा आतल्या आतच चमकतो, त्याचप्रमाणे निरोधसमापत्तीत प्रविष्ट झालेल्या भिक्खूचे पाचही इंद्रियप्रसाद निरोधाच्या अवस्थेत अत्यंत तेजस्वी होतात. म्हणूनच 'इंद्रिये अत्यंत प्रसन्न असतात' असे म्हटले आहे. ဝုဋ္ဌဟိဿန္တိ ဝါ ဝုဋ္ဌဟာမီတိ ဝါ ပဒဒွယေန အန္တောနိရောဓကာလော ကထိတော, ဝုဋ္ဌိတောတိ ပဒေန ဖလသမာပတ္တိကာလော. တထာ ပုရိမေဟိ ဒွီဟိ ပဒေဟိ အစိတ္တကကာလော ကထိတော, ပစ္ဆိမေန သစိတ္တကကာလော. ပုဗ္ဗေဝ တထာ စိတ္တံ ဘာဝိတံ ဟောတီတိ နိရောဓသမာပတ္တိတော ပုဗ္ဗေ အဒ္ဓါနပရိစ္ဆေဒကာလေယေဝ ‘‘ဧတ္တကံ ကာလံ အစိတ္တကော ဟုတွာ တတော ပရံ သစိတ္တကော ဘဝိဿာမီ’’တိ အဒ္ဓါနပရိစ္ဆေဒံ စိတ္တံ ဘာဝိတံ ဟောတိ. ယံ တံ တထတ္တာယ ဥပနေတီတိ ယံ ဧဝံ ဘာဝိတံ စိတ္တံ, တံ ပုဂ္ဂလံ တထတ္တာယ သစိတ္တကဘာဝါယ ဥပနေတိ. ဣတိ ဟေဋ္ဌာ နိရောဓသမာပဇ္ဇန္နကာလော ဂဟိတော, ဣဓ နိရောဓတော ဝုဋ္ဌာနကာလော. 'मी उठेन' किंवा 'मी उठतो' या दोन पदांनी निरोधाच्या आतील काळ सांगितला आहे, आणि 'उठला' (वुट्ठितो) या पदाने फलसमापत्तीचा काळ सांगितला आहे. तसेच, पहिल्या दोन पदांनी चित्तरहित (अचित्तक) काळ सांगितला आहे आणि शेवटच्या पदाने चित्तसहित (सचित्तक) काळ सांगितला आहे. 'पूर्वीच तसे चित्त भावित केलेले असते' म्हणजे निरोधसमापत्तीच्या पूर्वीच काळाची मर्यादा ठरवताना 'इतका वेळ चित्तरहित राहून त्यानंतर मी चित्तसहित होईन' अशा प्रकारे काळाची मर्यादा निश्चित करणारे चित्त भावित (उत्पन्न) केलेले असते. 'जे त्याला तशा अवस्थेला नेते' म्हणजे जे असे भावित केलेले चित्त आहे, ते त्या पुद्गलाला (व्यक्तीला) तशा अवस्थेला म्हणजेच सचित्तक भावाला नेते. अशा प्रकारे, पूर्वी निरोधसमापत्तीत प्रविष्ट होण्याचा काळ घेतला आहे, आणि येथे निरोधातून उठण्याचा काळ घेतला आहे. ဣဒါနိ နိရောဓကထံ ကထေတုံ ကာလောတိ နိရောဓကထာ ကထေတဗ္ဗာ သိယာ. သာ ပနေသာ ‘‘ဒွီဟိ ဗလေဟိ သမန္နာဂတတ္တာ တယော စ သင်္ခါရာနံ ပဋိပဿဒ္ဓိယာ သောဠသဟိ ဉာဏစရိယာဟိ နဝဟိ သမာဓိစရိယာဟိ ဝသီဘာဝတာပညာ နိရောဓသမာပတ္တိယံ ဉာဏ’’န္တိ မာတိကံ ဌပေတွာ သဗ္ဗာကာရေန ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂေ ကထိတာ, တသ္မာ တတ္ထ ကထိတနယေနေဝ ဂဟေတဗ္ဗာ. ကော ပနာယံ နိရောဓော နာမ? စတုန္နံ ခန္ဓာနံ ပဋိသင်္ခါ အပ္ပဝတ္တိ. အထ ကိမတ္ထမေတံ သမာပဇ္ဇန္တီတိ? သင်္ခါရာနံ ပဝတ္တေ ဥက္ကဏ္ဌိတာ သတ္တာဟံ အစိတ္တကာ ဟုတွာ သုခံ ဝိဟရိဿာမ, ဒိဋ္ဌဓမ္မနိဗ္ဗာနံ နာမေတံ ယဒိဒံ နိရောဓောတိ ဧတဒတ္ထံ သမာပဇ္ဇန္တိ. आता निरोधकथा सांगण्याची वेळ आली आहे, म्हणून निरोधकथा सांगितली पाहिजे. ती ही निरोधकथा 'दोन बलांनी युक्त असल्यामुळे, तीन संस्कारांच्या शांततेमुळे, सोळा ज्ञानचर्यांनी, नऊ समाधिचर्यांनी वशीभाव प्राप्त झालेली प्रज्ञा म्हणजे निरोधसमापत्तीचे ज्ञान होय' अशी मातृका मांडून सर्व प्रकारे विसुद्धिमग्गात सांगितली आहे, म्हणून तेथे सांगितलेल्या पद्धतीनेच ती ग्रहण करावी. पण हा निरोध म्हणजे नक्की काय? चार स्कंधांची (नामस्कंधांची) प्रतिसंख्या-अप्रवृत्ती (पुन्हा उत्पन्न न होणे) म्हणजेच निरोध होय. तर मग यात कशासाठी प्रविष्ट होतात? संस्कारांच्या प्रवृत्तीने (सततच्या उत्पत्तीने) कंटाळलेले लोक 'सात दिवस चित्तरहित होऊन आम्ही सुखाने विहार करू, हा जो निरोध आहे तो या जन्मातील निर्वाण (दृष्टधर्मनिर्वाण) आहे' या विचाराने, या सुखासाठी यात प्रविष्ट होतात. စိတ္တသင်္ခါရော ပဌမံ ဥပ္ပဇ္ဇတီတိ နိရောဓာ ဝုဋ္ဌဟန္တဿ ဟိ ဖလသမာပတ္တိစိတ္တံ ပဌမံ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. တံသမ္ပယုတ္တံ သညဉ္စ ဝေဒနဉ္စ သန္ဓာယ ‘‘စိတ္တသင်္ခါရော ပဌမံ ဥပ္ပဇ္ဇတီ’’တိ အာဟ. တတော ကာယသင်္ခါရောတိ တတော ပရံ ဘဝင်္ဂသမယေ ကာယသင်္ခါရော ဥပ္ပဇ္ဇတိ. 'चित्तसंस्कार आधी उत्पन्न होतो' कारण निरोधातून उठणाऱ्या व्यक्तीचे फलसमापत्तीचे चित्त आधी उत्पन्न होते. त्या चित्ताशी संप्रयुक्त असलेल्या संज्ञेला आणि वेदनेला उद्देशून 'चित्तसंस्कार आधी उत्पन्न होतो' असे म्हटले आहे. 'त्यानंतर कायसंस्कार' म्हणजे त्यानंतर भवांगाच्या वेळी कायसंस्कार (श्वासोच्छ्वास) उत्पन्न होतो. ကိံ ပန ဖလသမာပတ္တိ အဿာသပဿာသေ န သမုဋ္ဌာပေတီတိ? သမုဋ္ဌာပေတိ. ဣမဿ ပန စတုတ္ထဇ္ဈာနိကာ ဖလသမာပတ္တိ, သာ န သမုဋ္ဌာပေတိ. ကိံ ဝါ ဧတေန? ဖလသမာပတ္တိ ပဌမဇ္ဈာနိကာ ဝါ ဟောတု ဒုတိယတတိယစတုတ္ထဇ္ဈာနိကာ ဝါ, သန္တသမာပတ္တိတော ဝုဋ္ဌိတဿ ဘိက္ခုနော အဿာသပဿာသာ [Pg.135] အဗ္ဗောဟာရိကာ ဟောန္တိ, တေသံ အဗ္ဗောဟာရိကဘာဝေါ သဉ္ဇီဝတ္ထေရဝတ္ထုနာ ဝေဒိတဗ္ဗော. သဉ္ဇီဝတ္ထေရဿ ဟိ သမာပတ္တိတော ဝုဋ္ဌာယ ကိံသုကပုပ္ဖသဒိသေ ဝီတစ္စိတင်္ဂါရေ မဒ္ဒမာနဿ ဂစ္ဆတော စီဝရေ အံသုမတ္တမ္ပိ န ဈာယိ, ဥသ္မာကာရမတ္တမ္ပိ နာဟောသိ. သမာပတ္တိဗလံ နာမေတန္တိ ဝဒန္တိ. ဧဝမေဝ သန္တာယ ဖလသမာပတ္တိယာ ဝုဋ္ဌိတဿ ဘိက္ခုနော အဿာသပဿာသာ အဗ္ဗောဟာရိကာ ဟောန္တီတိ ဘဝင်္ဂသမယေနေဝေတံ ကထိတန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. पण फलसमापत्ती श्वासोच्छ्वासाला उत्पन्न करत नाही का? ती उत्पन्न करते. परंतु या भिक्खूची फलसमापत्ती चतुर्थ ध्यानाची असते, ती श्वासोच्छ्वास उत्पन्न करत नाही. किंवा याने काय फरक पडतो? फलसमापत्ती प्रथम ध्यानाची असो किंवा द्वितीय, तृतीय अथवा चतुर्थ ध्यानाची असो, शांत समापत्तीतून उठलेल्या भिक्खूचे श्वासोच्छ्वास हे अव्यवहार्य (अतिसूक्ष्म, न जाणवणारे) असतात. त्यांचा हा अव्यवहार्य भाव संजीवक थेरांच्या कथेवरून समजून घ्यावा. कारण समापत्तीतून उठून पळसाच्या फुलांसारख्या धगधगत्या कोळशांवरून चालत जाणाऱ्या संजीवक थेरांच्या चीवराचा एक धागाही जळाला नाही आणि त्यांना उष्णतेचा लवलेशही जाणवला नाही. याला 'समापत्तीचे बल' असे म्हणतात, असे आचार्य सांगतात. त्याचप्रमाणे, शांत फलसमापत्तीतून उठलेल्या भिक्खूचे श्वासोच्छ्वास अव्यवहार्य असतात, हे भवांगाच्या काळाला उद्देशूनच सांगितले आहे असे समजावे. တတော ဝစီသင်္ခါရောတိ တတော ပရံ ကိရိယမယပဝတ္တဝလဉ္ဇနကာလေ ဝစီသင်္ခါရော ဥပ္ပဇ္ဇတိ. ကိံ ဘဝင်္ဂံ ဝိတက္ကဝိစာရေ န သမုဋ္ဌာပေတီတိ? သမုဋ္ဌာပေတိ. တံသမုဋ္ဌာနာ ပန ဝိတက္ကဝိစာရာ ဝါစံ အဘိသင်္ခါတုံ န သက္ကောန္တီတိ ကိရိယမယပဝတ္တဝလဉ္ဇနကာလေနေဝေတံ ကထိတံ. 'त्यानंतर वचीसंस्कार' म्हणजे त्यानंतर कायिक-वाचिक क्रियांच्या प्रवृत्तीच्या वेळी वचीसंस्कार उत्पन्न होतो. भवांग वितर्क आणि विचारांना उत्पन्न करत नाही का? ते उत्पन्न करते. परंतु त्या भवांगापासून उत्पन्न झालेले वितर्क आणि विचार वाणीला प्रवृत्त (संस्कारित) करू शकत नाहीत, म्हणून हे कायिक-वाचिक क्रियांच्या प्रवृत्तीच्या काळाला उद्देशूनच सांगितले आहे. သုညတော ဖဿောတိအာဒယော သဂုဏေနာပိ အာရမ္မဏေနာပိ ကထေတဗ္ဗာ. သဂုဏေန တာဝ သုညတာ နာမ ဖလသမာပတ္တိ, တာယ သဟဇာတဖဿံ သန္ဓာယ ‘‘သုညတော ဖဿော’’တိ ဝုတ္တံ. အနိမိတ္တပ္ပဏိဟိတေသုပိ ဧသေဝ နယော. အာရမ္မဏေန ပန နိဗ္ဗာနံ ရာဂါဒီဟိ သုညတ္တာ သုညတာ နာမ, ရာဂနိမိတ္တာဒီနံ အဘာဝါ အနိမိတ္တံ, ရာဂဒေါသမောဟပ္ပဏိဓီနံ အဘာဝါ အပ္ပဏိဟိတံ, သုညတံ နိဗ္ဗာနံ အာရမ္မဏံ ကတွာ ဥပ္ပန္နဖလသမာပတ္တိသမ္ဖဿော သုညတော နာမ. အနိမိတ္တပ္ပဏိဟိတေသုပိ ဧသေဝ နယော. 'शून्यत स्पर्श' इत्यादी देशना स्वगुणाने आणि आलंबनाने देखील सांगितल्या पाहिजेत. प्रथम स्वगुणाने - फलसमापत्ती ही राग-द्वेष इत्यादींपासून शून्य असल्यामुळे 'शून्यता' नावाचा गुण असलेली आहे, तिच्याशी सहजात (एकत्र उत्पन्न झालेल्या) स्पर्शाला उद्देशून 'शून्यत स्पर्श' असे म्हटले आहे. अनिमित्त आणि अप्रणिहित स्पर्शांच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. आलंबनाच्या दृष्टीने - निर्वाण हे राग इत्यादींपासून शून्य असल्यामुळे 'शून्य' आहे; रागनिमित्त इत्यादींचा अभाव असल्यामुळे 'अनिमित्त' आहे; राग, द्वेष व मोह यांच्या प्रणिधीचा (इच्छेचा) अभाव असल्यामुळे 'अप्रणिहित' आहे. अशा शून्य असलेल्या निर्वाणाला आलंबन करून उत्पन्न झालेल्या फलसमापत्तीच्या स्पर्शाला 'शून्यत' असे म्हणतात. अनिमित्त आणि अप्रणिहित यांच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. အပရာ အာဂမနိယကထာ နာမ ဟောတိ. သုညတအနိမိတ္တအပ္ပဏိဟိတာတိ ဟိ ဝိပဿနာပိ ဝုစ္စတိ. တတ္ထ ယော ဘိက္ခု သင်္ခါရေ အနိစ္စတော ပရိဂ္ဂဟေတွာ အနိစ္စတော ဒိသွာ အနိစ္စတော ဝုဋ္ဌာတိ, တဿ ဝုဋ္ဌာနဂါမိနိဝိပဿနာ အနိမိတ္တာ နာမ ဟောတိ. ယော ဒုက္ခတော ပရိဂ္ဂဟေတွာ ဒုက္ခတော ဒိသွာ ဒုက္ခတော ဝုဋ္ဌာတိ, တဿ အပ္ပဏိဟိတာ နာမ. ယော အနတ္တတော ပရိဂ္ဂဟေတွာ အနတ္တတော ဒိသွာ အနတ္တတော ဝုဋ္ဌာတိ, တဿ သုညတာ နာမ. တတ္ထ အနိမိတ္တဝိပဿနာယ မဂ္ဂေါ အနိမိတ္တော နာမ, အနိမိတ္တမဂ္ဂဿ ဖလံ အနိမိတ္တံ နာမ, အနိမိတ္တဖလသမာပတ္တိသဟဇာတေ ဖဿေ ဖုသန္တေ ‘‘အနိမိတ္တော ဖဿော ဖုသတီ’’တိ ဝုစ္စတိ. အပ္ပဏိဟိတသုညတေသုပိ ဧသေဝ နယော. အာဂမနိယေန ကထိတေ ပန သုညတော ဝါ ဖဿော အနိမိတ္တော ဝါ ဖဿော အပ္ပဏိဟိတော ဝါ ဖဿောတိ ဝိကပ္ပော အာပဇ္ဇေယျ, တသ္မာ သဂုဏေန [Pg.136] စေဝ အာရမ္မဏေန စ ကထေတဗ္ဗံ. ဧဝဉှိ တယော ဖဿာ ဖုသန္တီတိ သမေတိ. दुसरी 'आगमनीय कथा' नावाची चर्चा आहे. कारण 'शून्यत', 'अनिमित्त' आणि 'अप्रणिहित' या शब्दांनी विपश्यनेलाही (विपस्सना) म्हटले जाते. त्यामध्ये, जो भिक्खू संस्कारांना अनित्य रूपाने ग्रहण करून, अनित्य रूपाने पाहून, अनित्य रूपाने (संस्कारांच्या निमित्तातून) वर उठतो (मुक्त होतो), त्याच्या त्या वुट्ठानगामिनी विपश्यनेला 'अनिमित्त' असे म्हणतात. जो (संस्कारांना) दुःख रूपाने ग्रहण करून, दुःख रूपाने पाहून, दुःख रूपाने वर उठतो, त्याच्या त्या विपश्यनेला 'अप्रणिहित' (अप्पणिहित) असे म्हणतात. जो (संस्कारांना) अनात्म रूपाने ग्रहण करून, अनात्म रूपाने पाहून, अनात्म रूपाने वर उठतो, त्याच्या त्या विपश्यनेला 'शून्यता' (सुञ्ञता) असे म्हणतात. त्यामध्ये, अनिमित्त विपश्यनेचा मार्ग 'अनिमित्त' नावाचा असतो, अनिमित्त मार्गाचे फल 'अनिमित्त' नावाचे असते, आणि अनिमित्त फल-समापत्तीच्या सोबत उत्पन्न झालेल्या स्पर्शाचा (फस्साचा) स्पर्श होत असताना, 'अनिमित्त स्पर्श स्पर्श करतो' असे म्हटले जाते. अप्रणिहित आणि शून्यता यांच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. परंतु, आगमनीय कथेनुसार सांगायचे झाल्यास, 'शून्यत स्पर्श', 'अनिमित्त स्पर्श' किंवा 'अप्रणिहित स्पर्श' असा विकल्प (संभ्रम) निर्माण होऊ शकतो, म्हणून स्वतःच्या गुणाने आणि आलंबनाने त्याचे वर्णन केले पाहिजे. अशा प्रकारे 'तीन स्पर्श स्पर्श करतात' हे वचन सुसंगत ठरते. ဝိဝေကနိန္နန္တိအာဒီသု နိဗ္ဗာနံ ဝိဝေကော နာမ. တသ္မိံ ဝိဝေကေ နိန္နံ ဩနတန္တိ ဝိဝေကနိန္နံ. ဝိဝေကပေါဏန္တိ အညတော အဂန္တွာ ယေန ဝိဝေကော, တေန ဝင်္ကံ ဝိယ ဟုတွာ ဌိတန္တိ ဝိဝေကပေါဏံ. ယေန ဝိဝေကော, တေန ပတမာနံ ဝိယ ဌိတန္တိ ဝိဝေကပဗ္ဘာရံ. 'विवेकनिन्नं' इत्यादी शब्दांमध्ये, निर्वाणाला 'विवेक' असे म्हणतात. त्या विवेकाकडे (निर्वाणाकडे) झुकलेले, नमलेले असणे म्हणजे 'विवेकनिन्न' होय. 'विवेकपोणं' म्हणजे इतर आलंबनांपासून दूर येऊन ज्या बाजूला विवेक (निर्वाण) आहे, त्या बाजूला वाकल्यासारखे होऊन राहणे म्हणजे 'विवेकपोण' होय. ज्या बाजूला विवेक आहे, त्या बाजूला झुकल्यासारखे (पडल्यासारखे) होऊन राहणे म्हणजे 'विवेकपब्भार' होय. ၇. ဂေါဒတ္တသုတ္တဝဏ္ဏနာ ७. गोदत्तसुत्तवण्णना (गोदत्त सूत्राचे स्पष्टीकरण) ၃၄၉. သတ္တမေ နာနတ္ထာ စေဝ နာနာဗျဉ္ဇနာ စာတိ ဗျဉ္ဇနမ္ပိ နေသံ နာနံ, အတ္ထောပိ. တတ္ထ ဗျဉ္ဇနဿ နာနတာ ပါကဋာ. အတ္ထော ပန အပ္ပမာဏာ စေတောဝိမုတ္တိ ဘူမန္တရတော မဟဂ္ဂတာ ဟောတိ ရူပါဝစရာ, အာရမ္မဏတော သတ္တပဏ္ဏတ္တိအာရမ္မဏာ. အာကိဉ္စညာ ဘူမန္တရတော မဟဂ္ဂတာ အရူပါဝစရာ, အာရမ္မဏတော နဝတ္တဗ္ဗာရမ္မဏာ. သုညတာ ဘူမန္တရတော ကာမာဝစရာ, အာရမ္မဏတော သင်္ခါရာရမ္မဏာ. ဝိပဿနာ ဟိ ဧတ္ထ သုညတာတိ အဓိပ္ပေတာ. အနိမိတ္တာ ဘူမန္တရတော လောကုတ္တရာ, အာရမ္မဏတော နိဗ္ဗာနာရမ္မဏာ. ३४९. सातव्या सूत्रात, 'नाना अर्थ आणि नाना व्यंजन' (विविध अर्थ आणि विविध शब्द) म्हणजे त्यांचे व्यंजन (शब्द) देखील भिन्न आहे आणि अर्थ देखील भिन्न आहे. त्यामध्ये, व्यंजनांची (शब्दांची) भिन्नता स्पष्टच आहे. परंतु अर्थाच्या बाबतीत: 'अप्रमाण चेतोविमुक्ती' (अप्पमाणा चेतोविमुत्ती) ही भूमीच्या भेदाने महग्गत (महद्गत) आणि रूपावचर असते, आणि आलंबनाच्या दृष्टीने ती 'सत्त्व-प्रज्ञप्ति' (सत्तपण्णत्ति) आलंबन असणारी असते. 'आकिंचन्य चेतोविमुक्ती' (आकिञ्चञ्ञा) ही भूमीच्या भेदाने महग्गत आणि अरूपावचर असते, आणि आलंबनाच्या दृष्टीने ती 'न-वक्तव्य' (वर्णन न करता येणारे) आलंबन असणारी असते. 'शून्यता चेतोविमुक्ती' (सुञ्ञता) ही भूमीच्या भेदाने कामावचर असते, आणि आलंबनाच्या दृष्टीने ती 'संस्कार' आलंबन असणारी असते. कारण येथे विपश्यनेलाच 'शून्यता' म्हणून अभिप्रेत धरले आहे. 'अनिमित्त चेतोविमुक्ती' (अनिमित्ता) ही भूमीच्या भेदाने लोकोत्तर असते, आणि आलंबनाच्या दृष्टीने ती 'निर्वाण' आलंबन असणारी असते. ရာဂေါ ခေါ ဘန္တေ ပမာဏကရဏောတိအာဒီသု ယထာ ပဗ္ဗတပါဒေ ပူတိပဏ္ဏကသဋဥဒကံ နာမ ဟောတိ ကာဠဝဏ္ဏံ, ဩလောကေန္တာနံ ဗျာမသတဂမ္ဘီရံ ဝိယ ခါယတိ, ယဋ္ဌိံ ဝါ ရဇ္ဇုံ ဝါ ဂဟေတွာ မိနန္တဿ ပိဋ္ဌိပါဒေါတ္ထရဏမတ္တမ္ပိ န ဟောတိ; ဧဝမေဝ ယာဝ ရာဂါဒယော နုပ္ပဇ္ဇန္တိ, တာဝ ပုဂ္ဂလံ သဉ္ဇာနိတုံ န သက္ကာ ဟောတိ, သောတာပန္နော ဝိယ သကဒါဂါမီ ဝိယ အနာဂါမီ ဝိယ စ ခါယတိ. ယဒါ ပနဿ ရာဂါဒယော ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ, တဒါ ရတ္တော ဒုဋ္ဌော မူဠှောတိ ပညာယတိ. ဣတိ တေ ‘‘ဧတ္တကော အယ’’န္တိ ပုဂ္ဂလဿ ပမာဏံ ဒဿေန္တာဝ ဥပ္ပဇ္ဇန္တီတိ ပမာဏကရဏာ နာမ ဝုတ္တာ. “भंते, राग हा प्रमाण करणारा (मर्यादा ठरवणारा) आहे” इत्यादी वचनांमध्ये, ज्याप्रमाणे पर्वताच्या पायथ्याशी कुजलेल्या पानांनी आणि कचऱ्याने युक्त असे काळ्या रंगाचे पाणी असते, ते पाहणाऱ्यांना शंभर व्याम (हात) खोल असल्यासारखे वाटते, परंतु काठी किंवा दोरी घेऊन मोजणाऱ्या माणसाला ते पायाची पावले बुडण्याइतकेही खोल आढळत नाही; त्याचप्रमाणे, जोपर्यंत राग इत्यादी क्लेश उत्पन्न होत नाहीत, तोपर्यंत त्या व्यक्तीला (खऱ्या अर्थाने) ओळखणे शक्य नसते, ती व्यक्ती सोतापन्न (श्रोतापन्न), सकदागामी किंवा अनागामी असल्यासारखी भासते. परंतु जेव्हा तिच्यामध्ये राग इत्यादी क्लेश उत्पन्न होतात, तेव्हा ती रागीट (आसक्त), द्वेषी किंवा मूढ असल्याचे स्पष्ट दिसून येते. अशा प्रकारे, ते क्लेश “हा मनुष्य एवढाच (अशा योग्यतेचाच) आहे” असे त्या व्यक्तीचे प्रमाण (मर्यादा) दर्शवतच उत्पन्न होतात, म्हणून त्यांना 'प्रमाणकरण' (मर्यादा ठरवणारे) असे म्हटले आहे. ယာဝတာ ခေါ ဘန္တေ အပ္ပမာဏာ စေတောဝိမုတ္တိယောတိ ယတ္တကာ အပ္ပမာဏာ စေတောဝိမုတ္တိယော. ကိတ္တကာ ပန တာ? စတ္တာရော ဗြဟ္မဝိဟာရာ, စတ္တာရော မဂ္ဂါ, စတ္တာရိ ဖလာနီတိ ဒွါဒသ. တတြ ဗြဟ္မဝိဟာရာ ဖရဏအပ္ပမာဏတာယ အပ္ပမာဏာ, သေသာ ပမာဏကာရကာနံ ကိလေသာနံ အဘာဝေန နိဗ္ဗာနမ္ပိ အပ္ပမာဏမေဝ, စေတောဝိမုတ္တိ ပန န ဟောတိ, တသ္မာ န ဂဟိတံ. အကုပ္ပာတိ အရဟတ္တဖလစေတောဝိမုတ္တိ. သာ ဟိ တာသံ သဗ္ဗဇေဋ္ဌိကာ, တသ္မာ [Pg.137] ‘‘အဂ္ဂမက္ခာယတီ’’တိ ဝုတ္တာ. ရာဂေါ ခေါ ဘန္တေ ကိဉ္စနန္တိ ရာဂေါ ဥပ္ပဇ္ဇိတွာ ပုဂ္ဂလံ ကိဉ္စတိ မဒ္ဒတိ ပလိဗုန္ဓတိ, တသ္မာ ကိဉ္စနန္တိ ဝုတ္တော. မနုဿာ ကိရ ဂေါဏေဟိ ခလံ မဒ္ဒါပေန္တာ ‘‘ကိဉ္စေဟိ ကပိလ ကိဉ္စေဟိ ကာဠကာ’’တိ ဝဒန္တိ. ဧဝံ မဒ္ဒနဋ္ဌော ကိဉ္စနဋ္ဌောတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. ဒေါသမောဟေသုပိဧသေဝ နယော. “भंते, ज्या काही अप्रमाण चेतोविमुक्ती आहेत” म्हणजे जितक्या काही अप्रमाण चेतोविमुक्ती आहेत. त्या किती आहेत? चार ब्रह्मविहार, चार मार्ग आणि चार फल मिळून बारा (१२) आहेत. त्यामध्ये, ब्रह्मविहार हे (मैत्री इत्यादी भावनांच्या) पसरण्याच्या अमर्याद स्वरूपामुळे 'अप्रमाण' आहेत, उर्वरित (मार्ग आणि फल) हे मर्यादा निर्माण करणाऱ्या क्लेशांच्या अभावामुळे 'अप्रमाण' आहेत. निर्वाण देखील अप्रमाणच आहे, परंतु ते 'चेतोविमुक्ती' नसल्यामुळे येथे घेतलेले नाही. 'अकुप्पा' (अकोप्या) म्हणजे अर्हत्त्वफल चेतोविमुक्ती होय. कारण ती त्या सर्वांमध्ये सर्वश्रेष्ठ (सर्वात मोठी) आहे, म्हणून तिला “अग्र (सर्वश्रेष्ठ) म्हटले जाते” असे सांगितले आहे. “भंते, राग हा किंचन (बाधा/मळ) आहे” कारण राग उत्पन्न होऊन व्यक्तीला चिरडतो, पीडित करतो आणि बांधून ठेवतो, म्हणून त्याला 'किंचन' म्हटले आहे. लोक म्हणे बैलांकडून खळे तुडवून घेताना “तुडव कपिला, तुडव काळू!” असे म्हणतात. अशा प्रकारे चिरडणे किंवा तुडवणे या अर्थाने 'किंचन' हा अर्थ समजला पाहिजे. द्वेष आणि मोहाच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. အာကိဉ္စညာ စေတောဝိမုတ္တိယော နာမ နဝ ဓမ္မာ အာကိဉ္စညာယတနံ မဂ္ဂဖလာနိ စ. တတ္ထ အာကိဉ္စညာယတနံ ကိဉ္စနံ အာရမ္မဏံ အဿ နတ္ထီတိ အာကိဉ္စညံ. မဂ္ဂဖလာနိ ကိဉ္စနာနံ မဒ္ဒနပလိဗုန္ဓနကိလေသာနံ နတ္ထိတာယ အာကိဉ္စညာနိ, နိဗ္ဗာနမ္ပိ အာကိဉ္စညံ, စေတောဝိမုတ္တိ ပန န ဟောတိ, တသ္မာ န ဂဟိတံ. 'आकिंचन्य चेतोविमुक्ती' नावाचे नऊ धर्म आहेत - आकिंचन्यायतन (आकिञ्चञ्ञायतन) आणि (चार) मार्ग व (चार) फल. त्यामध्ये, आकिंचन्यायतनाला कोणतेही 'किंचन' (अल्प किंवा काहीही) आलंबन नसते, म्हणून त्याला 'आकिंचन्य' म्हणतात. मार्ग आणि फल हे चिरडणाऱ्या व बांधून ठेवणाऱ्या 'किंचन' क्लेशांच्या अभावामुळे 'आकिंचन्य' आहेत. निर्वाण देखील आकिंचन्यच आहे, परंतु ते 'चेतोविमुक्ती' नसल्यामुळे येथे घेतलेले नाही. ရာဂေါ ခေါ ဘန္တေ နိမိတ္တကရဏောတိအာဒီသု ယထာ နာမ ဒွိန္နံ ကုလာနံ သဒိသာ ဒွေ ဝစ္ဆကာ ဟောန္တိ. ယာဝ တေသံ လက္ခဏံ န ကတံ ဟောတိ, တာဝ ‘‘အယံ အသုကကုလဿ ဝစ္ဆကော, အယံ အသုကကုလဿာ’’တိ န သက္ကာ ဟောတိ ဇာနိတုံ. ယဒါ ပန တေသံ တိသူလာဒီသု အညတရံ လက္ခဏံ ကတံ ဟောတိ, တဒါ သက္ကာ ဟောတိ ဇာနိတုံ. ဧဝမေဝ ယာဝ ပုဂ္ဂလဿ ရာဂေါ နုပ္ပဇ္ဇတိ, တာဝ န သက္ကာ ဟောတိ ဇာနိတုံ ‘‘အရိယော ဝါ ပုထုဇ္ဇနော ဝါ’’တိ. ရာဂေါ ပနဿ ဥပ္ပဇ္ဇမာနောဝ ‘‘သရာဂေါ နာမ အယံ ပုဂ္ဂလော’’တိ သဉ္ဇာနနနိမိတ္တံ ကရောန္တော ဝိယ ဥပ္ပဇ္ဇတိ, တသ္မာ နိမိတ္တကရဏောတိ ဝုတ္တော. ဒေါသမောဟေသုပိ ဧသေဝ နယော. “भंते, राग हा निमित्त करणारा (चिन्ह निर्माण करणारा) आहे” इत्यादी वचनांमध्ये, ज्याप्रमाणे दोन वेगवेगळ्या कुटुंबांचे (मालकांचे) एकसारखे दिसणारे दोन वासरू असतात, जोपर्यंत त्यांच्यावर कोणतेही चिन्ह (लक्षण) अंकित केले जात नाही, तोपर्यंत “हे अमुक कुटुंबाचे वासरू आहे, हे तमुक कुटुंबाचे वासरू आहे” हे ओळखणे शक्य नसते. परंतु जेव्हा त्यांच्यावर त्रिशूळ इत्यादींपैकी एखादे चिन्ह अंकित केले जाते, तेव्हा ते ओळखणे शक्य होते. त्याचप्रमाणे, जोपर्यंत व्यक्तीमध्ये राग उत्पन्न होत नाही, तोपर्यंत “हा आर्य आहे की पृथग्जन (सामान्य माणूस) आहे” हे ओळखणे शक्य नसते. परंतु राग उत्पन्न होताच “हा मनुष्य रागीट (आसक्त) आहे” अशी ओळख पटवणारे चिन्ह निर्माण केल्यासारखा तो उत्पन्न होतो, म्हणून त्याला 'निमित्तकरण' (चिन्ह निर्माण करणारा) म्हटले आहे. द्वेष आणि मोहाच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. အနိမိတ္တာ စေတောဝိမုတ္တိယော နာမ တေရသ ဓမ္မာ ဝိပဿနာ, စတ္တာရော အာရုပ္ပာ, စတ္တာရော မဂ္ဂါ, စတ္တာရိ ဖလာနိ. တတ္ထ ဝိပဿနာ နိစ္စနိမိတ္တံ သုခနိမိတ္တံ အတ္တနိမိတ္တံ ဥဂ္ဃာဋေတီတိ အနိမိတ္တာ နာမ. စတ္တာရော အာရုပ္ပာ ရူပနိမိတ္တဿ အဘာဝါ အနိမိတ္တာ နာမ. မဂ္ဂဖလာနိ နိမိတ္တကရာနံ ကိလေသာနံ အဘာဝေန အနိမိတ္တာနိ, နိဗ္ဗာနမ္ပိ အနိမိတ္တမေဝ, တံ ပန စေတောဝိမုတ္တိ န ဟောတိ, တသ္မာ န ဂဟိတံ. အထ ကသ္မာ သုညတာ စေတောဝိမုတ္တိ န ဂဟိတာတိ? သာ ‘‘သုညာ ရာဂေနာ’’တိအာဒိဝစနတော သဗ္ဗတ္ထ အနုပဝိဋ္ဌာဝ, တသ္မာ ဝိသုံ န ဂဟိတာတိ. 'अनिमित्त चेतोविमुक्ती' नावाचे तेरा (१३) धर्म आहेत - विपश्यना, चार अरूप ध्यान, चार मार्ग आणि चार फल. त्यामध्ये, विपश्यना ही नित्य-निमित्त, सुख-निमित्त आणि आत्म-निमित्त यांचे उच्चाटन (नाश) करते, म्हणून तिला 'अनिमित्त' म्हणतात. चार अरूप ध्यान हे रूप-निमित्ताच्या अभावामुळे 'अनिमित्त' नावाचे आहेत. मार्ग आणि फल हे निमित्त निर्माण करणाऱ्या क्लेशांच्या अभावामुळे 'अनिमित्त' आहेत. निर्वाण देखील अनिमित्तच आहे, परंतु ते 'चेतोविमुक्ती' नसल्यामुळे येथे घेतलेले नाही. मग 'शून्यता चेतोविमुक्ती' येथे स्वतंत्रपणे का घेतली नाही? कारण ती “रागापासून शून्य” इत्यादी वचनांनुसार सर्व ठिकाणी समाविष्टच आहे, म्हणून तिला स्वतंत्रपणे घेतलेले नाही. ဧကတ္ထာတိ [Pg.138] အာရမ္မဏဝသေန ဧကတ္ထာ ‘‘အပ္ပမာဏံ အာကိဉ္စညံ သုညတံ အနိမိတ္တ’’န္တိ ဟိ သဗ္ဗာနေတာနိ နိဗ္ဗာနဿေဝ နာမာနိ. ဣတိ ဣမိနာ ပရိယာယေန ဧကတ္ထာ. အညသ္မိံ ပန ဌာနေ အပ္ပမာဏာပိ ဟောတိ, အညသ္မိံ အာကိဉ္စညာ, အညသ္မိံ သုညတာ, အညသ္မိံ အနိမိတ္တာတိ ဣမိနာ ပရိယာယေန နာနာဗျဉ္ဇနာတိ. 'एकार्थ' म्हणजे आलंबनाच्या (आरामणाच्या) दृष्टीने एकच अर्थ असणारे. कारण “अप्रमाण, आकिंचन्य, शून्यता आणि अनिमित्त” ही सर्व निर्वाणाचीच नावे आहेत. अशा प्रकारे या पर्यायाने ते 'एकार्थ' (एकच अर्थ असणारे) आहेत. परंतु दुसऱ्या ठिकाणी ते 'अप्रमाण' देखील असते, दुसऱ्या ठिकाणी 'आकिंचन्य', दुसऱ्या ठिकाणी 'शून्यता' आणि दुसऱ्या ठिकाणी 'अनिमित्त' असते; अशा प्रकारे या पर्यायाने ते 'नाना व्यंजन' (विविध शब्द असणारे) आहेत. ၈. နိဂဏ္ဌနာဋပုတ္တသုတ္တဝဏ္ဏနာ ८. निगण्ठनातपुत्तसुत्तवण्णना (निगंठ नातपुत्त सूत्राचे स्पष्टीकरण) ၃၅၀. အဋ္ဌမေ တေနုပသင်္ကမီတိ သယံ အာဂတာဂမော ဝိညာတသာသနော အနာဂါမီ အရိယသာဝကော သမာနော ကသ္မာ နဂ္ဂဘောဂ္ဂံ နိဿိရိကံ နိဂဏ္ဌံ ဥပသင်္ကမီတိ? ဥပဝါဒမောစနတ္ထဉ္စေဝ ဝါဒါရောပနတ္ထဉ္စ. နိဂဏ္ဌာ ကိရ ‘‘သမဏဿ ဂေါတမဿ သာဝကာ ထဒ္ဓခဒိရခါဏုကသဒိသာ, ကေနစိ သဒ္ဓိံ ပဋိသန္ထာရမ္ပိ န ကရောန္တီ’’တိ ဥပဝဒန္တိ, တဿ ဥပဝါဒဿ မောစနတ္ထဉ္စ, ‘‘ဝါဒဉ္စဿ အာရောပေဿာမီ’’တိ ဥပသင်္ကမိ. န ခွာဟံ ဧတ္ထ ဘန္တေ ဘဂဝတော သဒ္ဓါယ ဂစ္ဆာမီတိ ယဿ ဉာဏေန အသစ္ဆိကတံ ဟောတိ. သော ‘‘ဧဝံ ကိရေတ’’န္တိ အညဿ သဒ္ဓါယ ဂစ္ဆေယျ, မယာ ပန ဉာဏေနေတံ သစ္ဆိကတံ, တသ္မာ နာဟံ ဧတ္ထ ဘဂဝတော သဒ္ဓါယ ဂစ္ဆာမီတိ ဒီပေန္တော ဧဝမာဟ. ३५०. आठव्या सुत्तात 'तेनुपसङ्कमि' (त्याने जवळ जाऊन गाठले) म्हणजे स्वतः आगम (परियत्ती) जाणणारा, बुद्धांचे शासन (पटीवेध शासन) समजून घेतलेला आणि अनागामी आर्यश्रावक असूनही तो वस्त्रहीन (नग्न), निस्तेज अशा निगंठाकडे (निर्ग्रंथाकडे) कशासाठी गेला? असा आक्षेप घेतला जाऊ शकतो. स्वतःवरील निंदा दूर करण्यासाठी आणि आपला सिद्धांत प्रस्थापित करण्यासाठी तो गेला. निगंठ असे निंदा करत असत की, 'श्रमण गोतमांचे श्रावक हे कठीण खैराच्या खुंटासारखे आहेत, ते कोणाशीही साधा कुशलप्रश्न (संवाद) देखील करत नाहीत.' त्या निंदेचे निवारण करण्यासाठी आणि 'त्याच्यावर आपला सिद्धांत प्रस्थापित करीन' या हेतूने तो जवळ गेला. 'भन्ते, मी येथे भगवंतांच्या श्रद्धेने जात नाही' याचा अर्थ असा की, ज्याने स्वतःच्या ज्ञानाने हे प्रत्यक्ष अनुभवले (साक्षात्कृत केले) नाही, तो 'असे म्हणतात' या न्यायाने दुसऱ्याच्या श्रद्धेने जाईल. परंतु मी स्वतःच्या ज्ञानाने हे साक्षात्कृत केले आहे, म्हणून 'मी येथे भगवंतांच्या श्रद्धेने जात नाही' असे स्पष्ट करत त्याने असे म्हटले. ဥလ္လောကေတွာတိ ကာယံ ဥန္နာမေတွာ ကုစ္ဆိံ နီဟရိတွာ ဂီဝံ ပဂ္ဂယှ သဗ္ဗံ ဒိသံ ပေက္ခမာနော ဥလ္လောကေတွာ. ဗာဓေတဗ္ဗံ မညေယျာတိ ယထာ ဝိနိဝိဇ္ဈိတွာ န နိက္ခမတိ, ဧဝံ ပဋိဗာဟိတဗ္ဗံ မညေယျ ဗန္ဓိတဗ္ဗံ ဝါ. သဟဓမ္မိကာတိ သကာရဏာ. အထ မံ ပဋိဟရေယျာသိ သဒ္ဓိံ နိဂဏ္ဌပရိသာယာတိ ဧတေသံ အတ္ထေ ဉာတေ အထ မေ နိဂဏ္ဌပရိသာယ သဒ္ဓိံ အဘိဂစ္ဆေယျာသိ, ပတီဟာရဿ မေ သန္တိကံ အာဂန္တွာ အတ္တနော အာဂတဘာဝံ ဇာနာပေယျာသီတိ အတ္ထော. ဧကော ပဉှောတိ ဧကော ပဉှမဂ္ဂေါ, ဧကံ ပဉှဂဝေသနန္တိ အတ္ထော. ဧကော ဥဒ္ဒေသောတိ ဧကံ နာမ ကိန္တိ? အယံ ဧကော ဥဒ္ဒေသော. ဧကံ ဝေယျာကရဏန္တိ ‘‘သဗ္ဗေ သတ္တာ အာဟာရဋ္ဌိတိကာ’’တိ (ခု. ပါ. ၄.၁; အ. နိ. ၁၀.၂၇) ဣဒံ ဧကံ ဝေယျာကရဏံ. ဧဝံ သဗ္ဗတ္ထ အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. 'उल्लोकेत्वा' म्हणजे शरीर ताठ करून, पोट पुढे काढून, मान वर करून, सर्व दिशांना पाहत वर पाहणे. 'बाधेतब्बं मञ्ञेय्य' म्हणजे ज्याप्रमाणे तो भेदून बाहेर पडू शकणार नाही, त्याप्रमाणे त्याला रोखता येईल किंवा बांधता येईल असे मानणे. 'सहधम्मिका' म्हणजे कारणासहित (सकारण). 'अथ मं पटिहरेय्यासि सद्धिं निगण्ठपरिसाय' याचा अर्थ असा की, या प्रश्नांचे अर्थ समजल्यावर, तू निगंठ परिषदेसह माझ्याकडे यावे. माझ्याकडे येऊन स्वतः आल्याची माहिती द्यावी. 'एकं पञ्हो' म्हणजे एकच प्रश्नमार्ग, किंवा एका प्रश्नाचा शोध घेणे असा अर्थ आहे. 'एकं उद्देसो' म्हणजे 'एक म्हणजे काय?' हा एक उद्देश (संक्षिप्त विधान) आहे. 'एकं वेय्याकरणं' म्हणजे 'सर्व प्राणी आहारावर टिकून राहतात' हे एक व्याकरण (स्पष्टीकरण/उत्तर) आहे. याप्रमाणे सर्व ठिकाणी अर्थ समजून घ्यावा. ၉. အစေလကဿပသုတ္တဝဏ္ဏနာ ९. अचेलकस्सपसुत्तवण्णना (अचेलक कस्सप सुत्ताची वर्णना). ၃၅၁. နဝမေ [Pg.139] ကီဝစိရံ ပဗ္ဗဇိတဿာတိ ကီဝစိရော ကာလော ပဗ္ဗဇိတဿာတိ အတ္ထော. ဥတ္တရိ မနုဿဓမ္မာတိ မနုဿဓမ္မော နာမ ဒသကုသလကမ္မပထာ, တတော မနုဿဓမ္မတော ဥတ္တရိ. အလမရိယဉာဏဒဿနဝိသေသောတိ အရိယဘာဝံ ကာတုံ သမတ္ထတာယ အလမရိယောတိ သင်္ခါတော ဉာဏဒဿနဝိသေသော. နဂ္ဂေယျာတိ နဂ္ဂဘာဝတော. မုဏ္ဍေယျာတိ မုဏ္ဍဘာဝတော. ပဝါဠနိပ္ဖောဋနာယာတိ ပါဝဠနိပ္ဖောဋနတော, ဘူမိယံ နိသီဒန္တဿ အာနိသဒဋ္ဌာနေ လဂ္ဂါနံ ပံသုရဇဝါလိကာနံ ဖောဋနတ္ထံ ဂဟိတမောရပိဉ္ဆမတ္တတောတိ အတ္ထော. ३५१. नवव्या सुत्तात 'कीवचिरं पब्बजितस्स' म्हणजे प्रव्रजित होऊन किती काळ झाला, असा अर्थ आहे. 'उत्तरी मनुस्सधम्मा' म्हणजे मनुष्यांचे धर्म म्हणजे दहा कुशल कर्मपथ, त्या मनुष्यधर्मापेक्षा अधिक (श्रेष्ठ). 'अलमरियञाणदस्सनविसेसो' म्हणजे आर्यभाव प्राप्त करून देण्यास समर्थ असल्यामुळे 'अलमर्य' (आर्यत्वासाठी पुरेसे) असे म्हटलेले विशेष ज्ञानदर्शन. 'नग्गेय्या' म्हणजे नग्नतेमुळे. 'मुण्डेय्या' म्हणजे मुंडण करण्यामुळे. 'पवाळनिप्फोटनाय' म्हणजे जमिनीवर बसणाऱ्या अचलकाच्या नितंबाच्या भागाला लागलेली धूळ, माती व वाळू झटकण्यासाठी घेतलेल्या मोराच्या पिसांच्या झाडूने झटकणे, असा अर्थ आहे. ၁၀. ဂိလာနဒဿနသုတ္တဝဏ္ဏနာ १०. गिलानदस्सनसुत्तवण्णना (ग्लानदर्शन सुत्ताची वर्णना). ၃၅၂. ဒသမေ အာရာမဒေဝတာတိ ပုပ္ဖာရာမဖလာရာမေသု အဓိဝတ္ထာ ဒေဝတာ. ဝနဒေဝတာတိ ဝနသဏ္ဍေသု အဓိဝတ္ထာ ဒေဝတာ. ရုက္ခဒေဝတာတိ မတ္တရာဇကာလေ ဝေဿဝဏော စ ဒေဝတာတိ ဧဝံ တေသု တေသု ရုက္ခေသု အဓိဝတ္ထာ ဒေဝတာ. ဩသဓိတိဏဝနပ္ပတီသူတိ ဟရီတကာမလကီအာဒီသု မုဉ္ဇပဗ္ဗဇာဒီသု ဝနဇေဋ္ဌရုက္ခေသု စ အဓိဝတ္ထာ ဒေဝတာ. သံဂမ္မာတိ သန္နိပတိတွာ. သမာဂမ္မာတိ တတော တတော သမာဂန္တွာ. ပဏိဓေဟီတိ ပတ္ထနာဝသေန ဌပေဟိ. ဣဇ္ဈိဿတိ သီလဝတော စေတောပဏိဓီတိ သမိဇ္ဈိဿတိ သီလဝန္တဿ စိတ္တပတ္ထနာ. ဓမ္မိကောတိ ဒသကုသလဓမ္မသမန္နာဂတော အဂတိဂမနရဟိတော. ဓမ္မရာဇာတိ တဿေဝ ဝေဝစနံ, ဓမ္မေန ဝါ လဒ္ဓရဇ္ဇတ္တာ ဓမ္မရာဇာ. တသ္မာတိ ‘‘ယသ္မာ တေန ဟိ, အယျပုတ္တ, အမှေပိ ဩဝဒါဟီ’’တိ ဝဒထ, တသ္မာ. အပ္ပဋိဝိဘတ္တန္တိ ‘‘ဣဒံ ဘိက္ခူနံ ဒဿာမ, ဣဒံ အတ္တနာ ဘုဉ္ဇိဿာမာ’’တိ ဧဝံ အဝိဘတ္တံ ဘိက္ခူဟိ သဒ္ဓိံ သာဓာရဏမေဝ ဘဝိဿတီတိ. ३५२. दहाव्या सुत्तात 'आरामदेवता' म्हणजे पुष्पवाटिका आणि फळवाटिकांमध्ये राहणाऱ्या देवता. 'वनदेवता' म्हणजे वनखंडांमध्ये राहणाऱ्या देवता. 'रुक्खदेवता' म्हणजे मत्तराज काळातील वैश्रवण आणि इतर देवता, अशा त्या त्या वृक्षांवर अधिष्ठित असणाऱ्या देवता. 'ओसधितिणवनप्पतीसू' म्हणजे हिरडा, आवळा इत्यादी औषधी वनस्पतींमध्ये, मुंज व पब्बज इत्यादी गवतवर्गात आणि वनातील मुख्य वृक्षांवर अधिष्ठित असणाऱ्या देवता. 'संगम्मा' म्हणजे एकत्रित होऊन. 'समागम्मा' म्हणजे वेगवेगळ्या ठिकाणांहून एकत्र येऊन. 'पणिधेहि' म्हणजे आकांक्षेने (इच्छेने) चित्त एकाग्र कर (चित्त ठेव). 'इज्झिस्सति सीलवतो चेतोपणिधी' म्हणजे शीलवानाची मानसिक आकांक्षा पूर्ण होईल. 'धम्मिको' म्हणजे दहा कुशल धर्मांनी युक्त असलेला आणि चार अगततींपासून मुक्त असलेला. 'धम्मराजा' हा त्याचाच समानार्थी शब्द आहे, याशिवाय धर्माने राज्य प्राप्त केल्यामुळे त्याला 'धम्मराजा' म्हटले जाते. 'तस्मा' म्हणजे 'ज्याअर्थी तुम्ही म्हणता की, हे आर्यपुत्र, आम्हालाही उपदेश करा, म्हणून.' 'अप्पटिविभत्तं' म्हणजे 'हे आम्ही भिक्खूंना देऊ, हे आम्ही स्वतः उपभोगू' असे न वाटता, भिक्खूंसोबत सामायिक (साधारण) असणे, असा अर्थ आहे. စိတ္တသံယုတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. चित्तसंयुत्तवण्णना समाप्त झाली. ၈. ဂါမဏိသံယုတ္တံ ८. गामणिसंयुत्त ၁. စဏ္ဍသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. चण्डसुत्तवण्णना ၃၅၃. ဂါမဏိသံယုတ္တဿ [Pg.140] ပဌမေ စဏ္ဍော ဂါမဏီတိ ဓမ္မသင်္ဂါဟကတ္ထေရေဟိ စဏ္ဍောတိ ဂဟိတနာမော ဧကော ဂါမဏိ. ပါတုကရောတီတိ ဘဏ္ဍန္တံ ပဋိဘဏ္ဍန္တော အက္ကောသန္တံ ပစ္စက္ကောသန္တော ပဟရန္တံ ပဋိပဟရန္တော ပါကဋံ ကရောတီတိ ဒဿေတိ. န ပါတုကရောတီတိ အက္ကုဋ္ဌောပိ ပဟဋောပိ ကိဉ္စိ ပစ္စနီကံ အကရောန္တောတိ ဒဿေတိ. ३५३. गामणिसंयुत्ताच्या पहिल्या सुत्तात 'चण्डो गामणी' म्हणजे धम्मसंगीतकार थेरांनी 'चंड' असे नाव दिलेला एक गामणी (गावचा प्रमुख). 'पातुकरोति' (प्रकट करतो) म्हणजे भांडणाऱ्याशी भांडणारा, शिवीगाळ करणाऱ्याला उलट शिवीगाळ करणारा, मारणाऱ्याला उलट मारणारा, हे उघड करतो असे दर्शवतो. 'न पातुकरोति' (प्रकट करत नाही) म्हणजे शिवीगाळ केली असता किंवा मारहाण केली असताही कोणताही विरोध न करता शांत राहणारा, हे दर्शवतो. ၂. တာလပုဋသုတ္တဝဏ္ဏနာ २. तालपुटसुत्तवण्णना ၃၅၄. ဒုတိယေ တာလပုဋောတိ ဧဝံနာမကော. တဿ ကိရ ဗန္ဓနာ ပမုတ္တတာလပက္ကဝဏ္ဏော ဝိယ မုခဝဏ္ဏော ဝိပ္ပသန္နော အဟောသိ, တေနဿ တာလပုဋောတိ နာမံ အကံသု. သွာယံ အဘိနီဟာရသမ္ပန္နော ပစ္ဆိမဘဝိကပုဂ္ဂလော. ယသ္မာ ပန ပဋိသန္ဓိ နာမ အနိယတာ အာကာသေ ခိတ္တဒဏ္ဍသဒိသာ, တသ္မာ ဧသ နဋကုလေ နိဗ္ဗတ္တိ. ဝုဍ္ဎိပ္ပတ္တော ပန နဋသိပ္ပေ အဂ္ဂေါ ဟုတွာ သကလဇမ္ဗုဒီပေ ပါကဋော ဇာတော. တဿ ပဉ္စ သကဋသတာနိ ပဉ္စ မာတုဂါမသတာနိ ပရိဝါရော, ဘရိယာယပိဿ တာဝတကာဝါတိ မာတုဂါမသဟဿေန စေဝ သကဋသဟဿေန စ သဒ္ဓိံ ယံ ယံ နဂရံ ဝါ နိဂမံ ဝါ ပဝိသတိ, တတ္ထဿ ပုရေတရမေဝ သတသဟဿံ ဒေန္တိ. သမဇ္ဇဝေသံ ဂဏှိတွာ ပန မာတုဂါမသဟဿေန သဒ္ဓိံ ကီဠံ ကရောန္တဿ ယံ ဟတ္ထူပဂပါဒူပဂါဒိအာဘရဏဇာတံ ခိပန္တိ, တဿ ပရိယန္တော နတ္ထိ. သော တံဒိဝသံ မာတုဂါမသဟဿပရိဝါရိတော ရာဇဂဟေ ကီဠံ ကတွာ ပရိပက္ကဉာဏတ္တာ သပရိဝါရောဝ ယေန ဘဂဝါ တေနုပသင်္ကမိ. ३५४. दुसऱ्या सुत्तात 'तालपुटो' हे या नावाचे पात्र आहे. असे म्हणतात की, त्याच्या चेहऱ्याचा वर्ण देठापासून गळून पडलेल्या पिकलेल्या ताडफळाच्या रंगासारखा अत्यंत प्रसन्न (तेजस्वी) होता, म्हणून त्याचे नाव 'तालपुट' असे ठेवले गेले. तो स्वतः महान संकल्प (अभिनिहार) पूर्ण केलेला अंतिम जन्मातील (पश्चिमभविक) पुद्गल होता. परंतु प्रतिसंधी (पुनर्जन्म) हा अनिश्चित असतो, जसे आकाशात फेकलेली काठी, म्हणून त्याचा जन्म नटकुलात झाला. मोठे झाल्यावर तो नटकलेत सर्वश्रेष्ठ बनून संपूर्ण जंबुद्विपात प्रसिद्ध झाला. त्याच्याकडे पाचशे गाड्या आणि पाचशे स्त्रियांचा परिवार होता, आणि त्याच्या पत्नीकडेही तेवढाच परिवार होता. अशा प्रकारे एक हजार स्त्रिया आणि एक हजार गाड्यांसह तो ज्या ज्या नगरात किंवा निगमात प्रवेश करत असे, तिथे त्याला आधीच एक लाख (मुद्रा) दिले जात असत. नटाचा वेष धारण करून एक हजार स्त्रियांसह क्रीडा करत असताना, लोक त्याच्यावर जे हातातील, पायातील इत्यादी दागिने फेकत असत, त्याला काही सीमा नसे. त्याने त्या दिवशी एक हजार स्त्रियांच्या परिवारासह राजगृहात क्रीडा केली आणि त्याचे ज्ञान परिपक्व झाल्यामुळे तो आपल्या परिवारासह जेथे भगवंत होते तेथे गेला. သစ္စာလိကေနာတိ သစ္စေန စ အလိကေန စ. တိဋ္ဌတေတန္တိ တိဋ္ဌတု ဧတံ. ရဇနီယာတိ ရာဂပ္ပစ္စယာ မုခတော ပဉ္စဝဏ္ဏသုတ္တနီဟရဏဝါတဝုဋ္ဌိဒဿနာဒယော အညေ စ ကာမဿာဒသံယုတ္တာကာရဒဿနကာ အဘိနယာ. ဘိယျောသောမတ္တာယာတိ အဓိကပ္ပမာဏတ္တာယ. ဒေါသနီယာတိ ဒေါသပ္ပစ္စယာ ဟတ္ထပါဒစ္ဆေဒါဒိဒဿနာကာရာ. မောဟနီယာတိ မောဟပ္ပစ္စယာ ဥဒကံ ဂဟေတွာ တေလကရဏံ, တေလံ ဂဟေတွာ ဥဒကကရဏန္တိ ဧဝမာဒယော မာယာပဘေဒါ. 'सच्चालिकेन' म्हणजे सत्याने आणि असत्याने. 'तिट्ठतेतं' म्हणजे हे राहू द्या. 'रजनीया' म्हणजे रागाच्या प्रभावामुळे मुखातून पाच रंगांचे दोरे काढणे, वादळ-वारा निर्माण करून दाखवणे इत्यादी आणि कामभोगाच्या आस्वादाशी संबंधित इतर अभिनय दाखवणे. 'भिय्योसोमत्ताय' म्हणजे अधिक प्रमाणात. 'दोसणीया' म्हणजे द्वेषाच्या प्रभावामुळे हात-पाय कापून दाखवणे इत्यादी दृश्ये. 'मोहनीया' म्हणजे मोहाच्या प्रभावामुळे पाणी घेऊन तेल बनवणे, तेल घेऊन पाणी बनवणे इत्यादी विविध प्रकारच्या जादूच्या कला. ပဟာသော [Pg.141] နာမ နိရယောတိ ဝိသုံ ပဟာသနာမကော နိရယော နာမ နတ္ထိ, အဝီစိဿေဝ ပန ဧကသ္မိံ ကောဋ္ဌာသေ နစ္စန္တာ ဝိယ ဂါယန္တာ ဝိယ စ နဋဝေသံ ဂဟေတွာဝ ပစ္စန္တိ, တံ သန္ဓာယေတံ ဝုတ္တံ. နာဟံ, ဘန္တေ, ဧတံ ရောဒါမီတိ အဟံ, ဘန္တေ, ဧတံ ဘဂဝတော ဗျာကရဏံ န ရောဒါမီတိ ဧဝံ သကမ္မကဝသေနေတ္ထ အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော, န အဿုဝိမောစနမတ္တေန. ‘‘မတံ ဝါ အမ္မရောဒန္တီ’’တိအာဒယော စေတ္ထ အညေပိ ဝေါဟာရာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. "पहास नावाचा नरक" म्हणजे पहास नावाचा कोणताही वेगळा नरक अस्तित्वात नाही, तर अवीची नरकाच्याच एका भागात (नरकवासी जीव) जणू काही नाचत असल्यासारखे आणि गात असल्यासारखे नटाचे सोंग घेऊनच (आपल्या कर्माच्या विपाकानुसार) यातना भोगतात (शिजतात). त्याला अनुसरून हे म्हटले आहे. "भन्ते, मी यावर रडत नाही" याचा अर्थ "भन्ते, मी भगवंतांच्या या उत्तरावर (व्याकरणावर) रडत नाही (म्हणजे विरोध करत नाही)" असा सकर्मक अर्थाने येथे अर्थ समजून घ्यावा, केवळ अश्रू ढाळण्याच्या (अकर्मक) अर्थाने नाही. येथे "मृतासाठी आई रडते" इत्यादी इतरही व्यावहारिक प्रयोग समजून घ्यावेत. ၃-၅. ယောဓာဇီဝသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ३-५. योधजीव सुत्त इत्यादींचे वर्णन ၃၅၅-၃၅၇. တတိယေ ယောဓာဇီဝေါတိ ယုဒ္ဓေန ဇီဝိကံ ကပ္ပနကော ဓမ္မသင်္ဂါဟကတ္ထေရေဟိ ဧဝံ ဂဟိတနာမော. ဥဿဟတိ ဝါယမတီတိ ဥဿာဟံ ဝါယာမံ ကရောတိ. ပရိယာပါဒေန္တီတိ မရဏံ ပဋိပဇ္ဇာပေန္တိ. ဒုက္ကဋန္တိ ဒုဋ္ဌု ကတံ. ဒုပ္ပဏိဟိတန္တိ ဒုဋ္ဌု ဌပိတံ. ပရဇိတော နာမ နိရယောတိ အယမ္ပိ န ဝိသုံ ဧကော နိရယော, အဝီစိဿေဝ ပန ဧကသ္မိံ ကောဋ္ဌာသေ ပဉ္စာဝုဓသန္နဒ္ဓါ ဖလကဟတ္ထာ ဟတ္ထိအဿရထေ အာရုယှ သင်္ဂါမေ ယုဇ္ဈန္တာ ဝိယ ပစ္စန္တိ, တံ သန္ဓာယေတံ ဝုတ္တံ. စတုတ္ထပဉ္စမေသုပိ ဧသေဝ နယော. ३५५-३५७. तिसऱ्या सुत्तात, "योधजीव" म्हणजे युद्धाद्वारे आपली उपजीविका करणारा; धर्मसंग्राहक महास्थविरांनी त्याला असे नाव दिले आहे. "उत्साह दाखवतो, प्रयत्न करतो" म्हणजे उत्साह आणि प्रयत्न करतो. "परियापादेन्ति (यातना देतात/मारतात)" म्हणजे मरणाप्रत पोहोचवतात. "दुष्कृत" म्हणजे वाईट रीतीने केलेले. "दुष्प्रणिहित" म्हणजे वाईट रीतीने ठेवलेले (नियोजित केलेले). "परजित नावाचा नरक" म्हणजे हा देखील कोणताही वेगळा नरक नाही, तर अवीची नरकाच्याच एका भागात पाच प्रकारच्या शस्त्रांनी सज्ज होऊन, हातात ढाल घेऊन, हत्ती, घोडे व रथांवर आरूढ होऊन रणभूमीत युद्ध करत असल्यासारखे (आपल्या कर्माच्या विपाकानुसार) यातना भोगतात. त्याला अनुसरून हे म्हटले आहे. चौथ्या आणि पाचव्या सुत्तातही हाच नियम समजून घ्यावा. ၆. အသိဗန္ဓကပုတ္တသုတ္တဝဏ္ဏနာ ६. असिबंधकपुत्त सुत्ताचे वर्णन ၃၅၈. ဆဋ္ဌေ ပစ္ဆာဘူမကာတိ ပစ္ဆာဘူမိဝါသိနော. ကာမဏ္ဍလုကာတိ သကမဏ္ဍလုနော. သေဝါလမာလိကာတိ ပါတောဝ ဥဒကတော သေဝါလဉ္စေဝ ဥပ္ပလာဒီနိ စ ဂဟေတွာ ဥဒကသုဒ္ဓိကဘာဝဇာနနတ္ထာယ မာလံ ကတွာ ပိဠန္ဓနကာ. ဥဒကောရောဟကာတိ သာယံပါတံ ဥဒကံ ဩရောဟနကာ. ဥယျာပေန္တီတိ ဥပရိ ယာပေန္တိ. သညာပေန္တီတိ သမ္မာ ဉာပေန္တိ. သဂ္ဂံ နာမ ဩက္ကာမေန္တီတိ ပရိဝါရေတွာ ဌိတာ ‘‘ဂစ္ဆ, ဘော, ဗြဟ္မလောကံ, ဂစ္ဆ, ဘော, ဗြဟ္မလောက’’န္တိ ဝဒန္တာ သဂ္ဂံ ပဝေသေန္တိ. အနုပရိသက္ကေယျာတိ အနုပရိဂစ္ဆေယျ. ဥမ္မုဇ္ဇာတိ ဥမ္မုဇ္ဇ ဥဋ္ဌဟ. ထလမုပ္လဝါတိ ထလမဘိရုဟ. တတြ ယာဿာတိ တတြ ယာ ဘဝေယျ. သက္ခရာ ဝါ ကဌလာ ဝါတိ သက္ခရာ စ ကဌလာ စ. သာ အဓောဂါမီ အဿာတိ သာ အဓော ဂစ္ဆေယျ, ဟေဋ္ဌာဂါမီ ဘဝေယျ. အဓောဂစ္ဆာတိ ဟေဋ္ဌာ ဂစ္ဆ. ३५८. सहाव्या सुत्तात, "पच्छाभूमका" म्हणजे पश्चिम देशात राहणारे. "कामंडलुका" म्हणजे कमंडलू धारण करणारे. "सेवालमालिका" म्हणजे सकाळी लवकर पाण्यातून शेवाळ आणि कमळाची फुले इत्यादी काढून, आपल्या जलशुद्धीचे (पापमुक्तीचे) लक्षण दाखवण्यासाठी त्यांची माळ करून परिधान करणारे. "उदकोरोहका" म्हणजे सकाळ-संध्याकाळ पाण्यात उतरून स्नान करणारे. "उय्यापेन्ति" म्हणजे वरच्या लोकांत (ब्रह्मलोकात) पोहोचवणारे. "सञ्ञापेन्ति" म्हणजे योग्य प्रकारे समजावून सांगणारे. "स्वर्गात प्रवेश करवतात" म्हणजे भोवती उभे राहून "हे महाशया, ब्रह्मलोकात जा, ब्रह्मलोकात जा" असे म्हणत स्वर्गात (ब्रह्मलोकात) प्रवेश करवतात. "अनुपरिसक्केय्य" म्हणजे भोवती वारंवार फिरावे. "उम्मुज्ज" म्हणजे पाण्यावर वर ये (वर उठ). "थलमुप्लवा" म्हणजे जमिनीवर (किनाऱ्यावर) चढ. "तत्र यास्सा" म्हणजे तेथे जी (विशेषता) असावी. "सक्खरा वा कठला वा" म्हणजे खडे आणि खापर (मातीची भांडी). "ती अधोगामी असावी" म्हणजे ती खाली जावी, खाली जाणारी असावी. "अधोगच्छ" म्हणजे खाली जा. ၇. ခေတ္တူပမသုတ္တဝဏ္ဏနာ ७. खेत्तूपम सुत्ताचे वर्णन ၃၅၉. သတ္တမေ [Pg.142] ဇင်္ဂလန္တိ ထဒ္ဓံ န မုဒု. ဦသရန္တိ သဉ္ဇာတလောဏံ. ပါပဘူမီတိ လာမကဘူမိဘာဂံ. မံဒီပါတိအာဒီသု အဟံ ဒီပေါ ပတိဋ္ဌာ ဧတေသန္တိ မံဒီပါ. အဟံ လေဏော အလ္လီယနဋ္ဌာနံ ဧတေသန္တိ မံလေဏာ. အဟံ တာဏံ ရက္ခာ ဧတေသန္တိ မံတာဏာ. အဟံ သရဏံ ဘယနာသနံ ဧတေသန္တိ မံသရဏာ. ဝိဟရန္တီတိ မံ ဧဝံ ကတွာ ဝိဟရန္တိ. ३५९. सातव्या सुत्तात, "जंगल" म्हणजे कठीण, मऊ नसलेली जमीन. "ऊसर" म्हणजे खारट झालेली जमीन. "पापभूमी" म्हणजे निकृष्ट दर्जाची जमीन. "मंदीपा" इत्यादी शब्दांमध्ये—"मी ज्यांचा द्वीप (आश्रय) आणि प्रतिष्ठा आहे, ते 'मंदीप' (माझा आश्रय घेणारे) होत." "मी ज्यांचे लेण (सुरक्षित स्थान/गुहा) आहे, ते 'मंलेण' होत." "मी ज्यांचे ताण (रक्षण/त्राता) आहे, ते 'मंताण' होत." "मी ज्यांचे शरण (भय नष्ट करणारे) आहे, ते 'मंशरण' होत." "विहरतात" म्हणजे मला अशा प्रकारे द्वीप, लेण इत्यादी मानून जीवन जगतात. ဂေါဘတ္တမ္ပီတိ ဓညဖလဿ အဘာဝေန လာယိတွာ ကလာပကလာပံ ဗန္ဓိတွာ ဌပိတံ ဂိမှကာလေ ဂုန္နမ္ပိ ခါဒနံ ဘဝိဿတီတိ အတ္ထော. ဥဒကမဏိကောတိ ကုစ္ဆိယံ မဏိကမေခလာယ ဧဝံ လဒ္ဓနာမော ဘာဇနဝိသေသော. အဟာရီ အပရိဟာရီတိ ဥဒကံ န ဟရတိ န ပရိဟရတိ, န ပရိယာဒိယတီတိ အတ္ထော. ဣတိ ဣမသ္မိံ သုတ္တေ သက္ကစ္စဓမ္မဒေသနာဝ ကထိတာ. ဗုဒ္ဓါနဉှိ အသက္ကစ္စဓမ္မဒေသနာ နာမ နတ္ထိ. သီဟသမာနဝုတ္တိနော ဟိ ဗုဒ္ဓါ, ယထာ သီဟော ပဘိန္နဝရဝါရဏဿပိ သသဗိဠာရာဒီနမ္ပိ ဂဟဏတ္ထာယ ဧကသဒိသမေဝ ဝေဂံ ကရောတိ, ဧဝံ ဗုဒ္ဓါပိ ဧကဿ ဒေသေန္တာပိ ဒွိန္နံ ဗဟူနံ ဘိက္ခုပရိသာယ ဘိက္ခုနိဥပါသကဥပါသိကာပရိသာယပိ တိတ္ထိယာနမ္ပိ ဒေသေန္တာ သက္ကစ္စမေဝ ဒေသေန္တိ. စတဿော ပန ပရိသာ သဒ္ဒဟိတွာ ဩကပ္ပေတွာ သုဏန္တီတိ တာသံ ဒေသနာ သက္ကစ္စဒေသနာ နာမ ဇာတာ. "गोभत्तं पि (गाईंचे अन्न देखील)" म्हणजे धान्य नसल्यामुळे (गवत) कापून, त्याच्या पेंढ्या बांधून ठेवल्या असता, उन्हाळ्यात गाईंसाठी देखील ते खाण्याचे अन्न होईल, असा अर्थ आहे. "उदकमणिक" म्हणजे पोटावर मण्यांच्या मेखलेसारखा आकार असल्यामुळे असे नाव मिळालेले पाण्याचे एक विशिष्ट भांडे (माठ). "अहारी अपरिहारी" म्हणजे पाणी गळत नाही किंवा पाझरत नाही, म्हणजेच पाणी वाया जात नाही, असा अर्थ आहे. अशा प्रकारे या सुत्तात आदरपूर्वक धर्मदेशनाच सांगितली आहे. कारण बुद्धांची अनादराने केलेली धर्मदेशना कधीही नसते. बुद्ध हे सिंहासारखे आचरण करणारे असतात; ज्याप्रमाणे सिंह एखाद्या मदोन्मत्त श्रेष्ठ हत्तीला पकडण्यासाठी असो वा ससा, मांजर इत्यादी लहान प्राण्यांना पकडण्यासाठी असो, एकसारखाच पराक्रम (वेग) करतो, त्याचप्रमाणे बुद्ध देखील एका व्यक्तीला उपदेश करत असताना, दोघांना, अनेकांना, भिक्खू संघाला, भिक्खुणी-उपासक-उपासिकांच्या परिषदेला किंवा अन्य पंथीयांना (तीर्थिकांना) उपदेश करत असताना अत्यंत आदरानेच देशना देतात. परंतु चारही परिषदा श्रद्धेने आणि अंतःकरणापासून ऐकतात, म्हणून त्यांच्यासाठी ही देशना 'सक्कच्चदेसना' (आदरपूर्वक केलेली देशना) ठरते. ၈. သင်္ခဓမသုတ္တဝဏ္ဏနာ ८. संखधम सुत्ताचे वर्णन ၃၆၀. အဋ္ဌမေ ယံဗဟုလံ ယံဗဟုလန္တိ ဣမိနာ နိဂဏ္ဌော အတ္တနာဝ အတ္တနော ဝါဒံ ဘိန္ဒတိ. တသ္မာ ဘဂဝါ ဧဝံ သန္တေ န ကောစိ အာပါယိကောတိအာဒိမာဟ. ပုရိမာနိ ပန စတ္တာရိ ပဒါနိ ဒိဋ္ဌိယာ ပစ္စယာ ဟောန္တိ. တသ္မာ တေသုပိ အာဒီနဝံ ဒဿေန္တော ဣဓ, ဂါမဏိ, ဧကစ္စော သတ္ထာ ဧဝံဝါဒီ ဟောတီတိအာဒိမာဟ. တတ္ထ အဟမ္ပမှီတိ အဟမ္ပိ အမှိ. ३६०. आठव्या सुत्तात, "जे बहुतांश आहे, जे बहुतांश आहे" या वचनाने निगंठ स्वतःच स्वतःच्या मताचे खंडन करतो. म्हणून भगवंतांनी "असे असताना कोणीही अपायिक (नरकगामी) होणार नाही" इत्यादी म्हटले आहे. परंतु पूर्वीची चार पडे मिथ्या दृष्टीचे कारण बनतात. म्हणून त्यांच्यातील दोष दाखवण्यासाठी भगवंतांनी "येथे, गामणी, एखादा शास्ता असा वाद मांडणारा असतो" इत्यादी म्हटले आहे. तेथे "अहम्पम्हि" चा संधिच्छेद "अहं पि अम्हि" (मी सुद्धा आहे) असा करावा. မေတ္တာသဟဂတေနာတိအာဒီသု ယံ ဝတ္တဗ္ဗံ, တံ သဗ္ဗံ သဒ္ဓိံ ဘာဝနာနယေန ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂေ ဝုတ္တမေဝ. သေယျထာပိ, ဂါမဏိ, ဗလဝါ သင်္ခဓမောတိအာဒိ ပန ဣဓ အပုဗ္ဗံ. တတ္ထ ဗလဝါတိ ဗလသမ္ပန္နော. သင်္ခဓမောတိ သင်္ခဓမကော. အပ္ပကသိရေနာတိ အကိစ္ဆေန အဒုက္ခေန. ဒုဗ္ဗလော ဟိ သင်္ခဓမော သင်္ခံ ဓမန္တောပိ [Pg.143] န သက္ကောတိ စတဿော ဒိသာ သရေန ဝိညာပေတုံ, နာဿ သင်္ခသဒ္ဒေါ သဗ္ဗတော ဖရတိ, ဗလဝတော ပန ဝိပ္ဖာရိကော ဟောတိ, တသ္မာ ‘‘ဗလဝါ’’တိ အာဟ. "मैत्तासहगतेन (मैत्रीपूर्ण चित्ताने)" इत्यादी वाक्यांमध्ये जे काही सांगायचे आहे, ते सर्व भावनेच्या पद्धतीसह 'विशुद्धिमार्ग' ग्रंथात सांगितलेच आहे. परंतु "ज्याप्रमाणे, गामणी, एखादा बलवान शंख वाजवणारा..." इत्यादी वाक्य येथे नवीन आहे. तेथे "बलवान" म्हणजे शक्तीने संपन्न असलेला. "शंखधम" म्हणजे शंख वाजवणारा. "अप्पकसिरेन" म्हणजे विनासायास, सहजपणे (त्रासाशिवाय). कारण दुर्बल शंख वाजवणारा शंख वाजवत असला तरी आपल्या आवाजाने चारही दिशांना ऐकवू शकत नाही आणि त्याचा शंखाचा आवाज सर्वत्र पसरत नाही; परंतु बलवानाचा आवाज सर्वत्र पसरणारा असतो, म्हणून "बलवान" असे म्हटले आहे. မေတ္တာယ စေတောဝိမုတ္တိယာတိ ဧတ္ထ ‘‘မေတ္တာ’’တိ ဝုတ္တေ ဥပစာရောပိ အပ္ပနာပိ ဝဋ္ဋတိ, ‘‘စေတောဝိမုတ္တီ’’တိ ဝုတ္တေ ပန အပ္ပနာဝ ဝဋ္ဋတိ. ယံ ပမာဏကတံ ကမ္မန္တိ ပမာဏကတံ ကမ္မံ နာမ ကာမာဝစရံ ဝုစ္စတိ, အပ္ပမာဏကတံ ကမ္မံ နာမ ရူပါဝစရံ. တဉှိ ပမာဏံ အတိက္ကမိတွာ ဩဓိသကအနောဓိသကဒိသာဖရဏဝသေန ဝဍ္ဎေတွာ ကတတ္တာ အပ္ပမာဏကတန္တိ ဝုစ္စတိ. "मैत्रीयुक्त चेतोविमुक्तीने" येथे "मैत्री" असे म्हटले असता उपचार समाधी आणि अर्पणा समाधी दोन्ही योग्य ठरतात, परंतु "चेतोविमुक्ती" असे म्हटले असता केवळ अर्पणा समाधीच योग्य ठरते. "जे प्रमाणकृत कर्म आहे" यात 'प्रमाणकृत कर्म' म्हणजे कामावचर कर्म म्हटले जाते, आणि 'अप्रमाणकृत कर्म' म्हणजे रूपावचर कर्म (व अरूपावचर कर्म) म्हटले जाते. कारण ते मर्यादेचे उल्लंघन करून, विशिष्ट आणि अविशिष्ट दिशांमध्ये पसरवण्याच्या भावनेने वाढवून केले जात असल्यामुळे त्याला 'अप्रमाणकृत' असे म्हटले जाते. န တံ တတြာဝသိဿတိ, န တံ တတြာဝတိဋ္ဌတီတိ တံ ကာမာဝစရကမ္မံ တသ္မိံ ရူပါရူပါဝစရကမ္မေ န ဩဟီယတိ န တိဋ္ဌတိ. ကိံ ဝုတ္တံ ဟောတိ? တံ ကာမာဝစရကမ္မံ တဿ ရူပါရူပါဝစရကမ္မဿ အန္တရာ လဂ္ဂိတုံ ဝါ ဌာတုံ ဝါ ရူပါရူပါဝစရကမ္မံ ဖရိတွာ ပရိယာဒိယိတွာ အတ္တနော ဩကာသံ ဂဟေတွာ ပတိဋ္ဌာတုံ ဝါ န သက္ကောတိ. အထ ခေါ ရူပါရူပါဝစရကမ္မမေဝ ကာမာဝစရံ မဟောဃော ဝိယ ပရိတ္တံ ဥဒကံ ဖရိတွာ ပရိယာဒိယိတွာ အတ္တနော ဩကာသံ ကတွာ တိဋ္ဌတိ, တဿ ဝိပါကံ ပဋိဗာဟိတွာ သယမေဝ ဗြဟ္မသဟဗျတံ ဥပနေတီတိ. ဣတိ ဣဒံ သုတ္တံ အာဒိမှိ ကိလေသဝသေန ဝုဋ္ဌာယ အဝသာနေ ဗြဟ္မဝိဟာရဝသေန ဂဟိတတ္တာ ယထာနုသန္ဓိနာဝ ဂတံ. "ते तेथे उरणार नाही, ते तेथे टिकणार नाही" याचा अर्थ असा की, ते कामावचर कर्म त्या रूपावचर व अरूपावचर कर्मामध्ये मागे उरत नाही किंवा टिकत नाही. याचा काय अर्थ होतो? ते कामावचर कर्म त्या रूपावचर व अरूपावचर कर्माच्या मध्ये अडकण्यास किंवा राहण्यास, अथवा रूपावचर व अरूपावचर कर्माला व्यापून व नष्ट करून स्वतःची जागा मिळवून प्रस्थापित होण्यास समर्थ नसते. उलटपक्षी, रूपावचर व अरूपावचर कर्मच कामावचर कर्माला—ज्याप्रमाणे पाण्याचा मोठा पूर थोड्या पाण्याला व्यापून व नष्ट करून स्वतःची जागा करून घेतो, त्याप्रमाणे—व्यापून व नष्ट करून स्वतःची जागा करून घेते; आणि त्याच्या विपाकाला रोखून स्वतःच ब्रह्मलोकातील सहवासाप्रत (ब्रह्मसहव्यता) घेऊन जाते. अशा प्रकारे हे सुत्त सुरुवातीला क्लेशांच्या प्रभावाने सुरू होऊन शेवटी ब्रह्मविहाराच्या प्रभावाने ग्रहण केले गेल्यामुळे योग्य अनुसंधानानेच समाप्तीस पोहोचले आहे. ၉. ကုလသုတ္တဝဏ္ဏနာ ९. कुल सुत्ताचे वर्णन ၃၆၁. နဝမေ ဒုဗ္ဘိက္ခာတိ ဒုလ္လဘဘိက္ခာ. ဒွီဟိတိကာတိ ‘‘ဇီဝိဿာမ နု ခေါ န နု ခေါ’’တိ ဧဝံ ပဝတ္တဤဟိတိကာ. ‘‘ဒုဟိတိကာ’’တိပိ ပါဌော. အယမေဝ အတ္ထော. ဒုက္ခာ ဤဟိတိ ဧတ္ထ န သက္ကာ ကောစိ ပယောဂေါ သုခေန ကာတုန္တိ ဒုဟိတိကာ. တတ္ထ တတ္ထ မတမနုဿာနံ ဝိပ္ပကိဏ္ဏာနိ သေတာနိ အဋ္ဌိကာနိ ဧတ္ထာတိ သေတဋ္ဌိကာ. သလာကာဝုတ္တာတိ သလာကမတ္တဝုတ္တာ, ယံ တတ္ထ ဝုတ္တံ ဝါပိတံ, တံ သလာကမတ္တမေဝ အဟောသိ, ဖလေ န ဇနယတီတိ အတ္ထော. ३६१. नवव्या सुत्तात, 'दुब्भिक्खा' (दुर्भिक्ष) म्हणजे जेथे भिक्षा मिळणे कठीण आहे. 'द्वीहितिका' म्हणजे 'आपण जगू की नाही जगू?' अशा प्रकारे निर्माण झालेली द्विधा मनःस्थिती. 'दुहितिका' असाही पाठ आहे. याचाही हाच अर्थ आहे. जेथे दुःखद प्रयत्न करावे लागतात, कोणताही प्रयत्न सुखाने करणे शक्य नसते, म्हणून 'दुहितिका' म्हटले आहे. त्या त्या ठिकाणी मृत माणसांची विखुरलेली पांढरी हाडे असतात, म्हणून 'सेतट्ठिका' (पांढरी हाडे असलेली) म्हटले आहे. 'सलाकावृत्ता' म्हणजे केवळ काड्यांसारखे (दाणे नसलेले) कंस उरलेले धान्य; जे काही तिथे पेरले किंवा लावले गेले होते, ते केवळ काड्यांसारखेच झाले, त्याला फळ (दाणे) आले नाही, असा अर्थ आहे. ဥဂ္ဂိလိတုန္တိ [Pg.144] ဒွေ အန္တေ မောစေတွာ ကထေတုံ အသက္ကောန္တော ဥဂ္ဂိလိတုံ ဗဟိ နီဟရိတုံ န သက္ခီတိ. ဩဂိလိတုန္တိ ပုစ္ဆာယ ဒေါသံ ဒိသွာ ဟာရေတုံ အသက္ကောန္တော ဩဂိလိတုံ အန္တော ပဝေသေတုံ န သက္ခီတိ. 'उग्गिलितुं' (बाहेर काढणे/ओकणे) म्हणजे दोन्ही बाजू सोडवून बोलण्यास असमर्थ असल्याने, बाहेर काढण्यास किंवा ओकण्यास असमर्थ असणे. 'ओगिलितुं' (गिळणे) म्हणजे प्रश्नातील दोष पाहून तो दूर करण्यास असमर्थ असल्याने, तो गिळण्यास किंवा आत घेण्यास असमर्थ असणे. ဣတော သော ဂါမဏိ ဧကနဝုတိကပ္ပေတိ ဘဂဝါ ကထယမာနောဝ ယာဝ နိက္ခန္တော နာသိကဝါတော န ပုန ပဝိသတိ, တာဝတကေန ကာလေန ဧကနဝုတိကပ္ပေ အနုဿရိ ‘‘အတ္ထိ နု ခေါ ကိဉ္စိ ကုလေ ပက္ကဘိက္ခာဒါနေန ဥပဟတပုဗ္ဗ’’န္တိ ပရိဇာနနတ္ထံ. အထေကမ္ပိ အပဿန္တော ‘‘ဣတော သော, ဂါမဏီ’’တိအာဒိမာဟ. ဣဒါနိ ဒါနာဒီနံ အာနိသံသံ ကထေန္တော အထ ခေါ ယာနိ တာနိ ကုလာနိ အဍ္ဎာနီတိ ဓမ္မဒေသနံ အာရဘိ. တတ္ထ ဒါနသမ္ဘူတာနီတိ ဒါနေန သမ္ဘူတာနိ နိဗ္ဗတ္တာနိ. သေသပဒဒွယေပိ ဧသေဝ နယော. ဧတ္ထ ပန သစ္စံ နာမ သစ္စဝါဒိတာ. သာမညံ နာမ သေသသီလံ. ဝိကိရတီတိ အယောဂေန ဝဠဉ္ဇေန္တော ဝိပ္ပကိရတိ. ဝိဓမတီတိ ဓမေန္တော ဝိယ နာသေတိ. ဝိဒ္ဓံသေတီတိ နာသေတိ. အနိစ္စတာတိ ဟုတွာ အဘာဝေါ ဗဟုနာပိ ကာလေန သင်္ဂတာနံ ခဏေနေဝ အန္တရဓာနံ. 'हे गामणी, येथून एक्याण्णव कल्प मागे...' भगवान बोलत असतानाच, नाकातून बाहेर पडलेला श्वास जोपर्यंत पुन्हा आत जात नाही, तितक्या अल्प काळात त्यांनी एक्याण्णव कल्पांचे स्मरण केले की, 'शिजवलेल्या अन्नाची भिक्षा दिल्यामुळे कोणतेही कुल कधी नष्ट झाले आहे का?' हे जाणून घेण्यासाठी. जेव्हा त्यांना असे एकही कुल आढळले नाही, तेव्हा त्यांनी 'हे गामणी, येथून...' इत्यादी म्हटले. आता दान इत्यादींचे महत्त्व सांगताना त्यांनी 'अथ खो यानि तानि कुलानि अढानि' (जी कुले समृद्ध आहेत) या धर्मदेशनेला सुरुवात केली. त्यामध्ये 'दानसंभूतानि' म्हणजे दानामुळे समृद्ध झालेली, उत्पन्न झालेली. उर्वरित दोन पदांमध्येही हाच नियम लागू होतो. येथे 'सच्च' (सत्य) म्हणजे सत्य बोलणे. 'सामञ्ञ' (श्रमणत्व) म्हणजे उर्वरित शील. 'विकिरति' म्हणजे अयोग्य पद्धतीने खर्च करून उधळपट्टी करणे. 'विधमति' म्हणजे वाऱ्याने उडवून लावल्याप्रमाणे नष्ट करणे. 'विद्धंसेति' म्हणजे नष्ट करणे. 'अनित्यता' म्हणजे निर्माण होऊन नष्ट होणे, किंवा दीर्घकाळ साठवलेली संपत्ती एका क्षणात नाहीशी होणे. ၁၀. မဏိစူဠကသုတ္တဝဏ္ဏနာ १०. मणिचूळक सुत्ताचे स्पष्टीकरण ၃၆၂. ဒသမေ တံ ပရိသံ ဧတဒဝေါစာတိ တဿ ကိရ ဧဝံ အဟောသိ ‘‘ကုလပုတ္တာ ပဗ္ဗဇန္တာ ပုတ္တဒါရဉ္စေဝ ဇာတရူပရဇတဉ္စ ပဟာယေဝ ပဗ္ဗဇန္တိ, န စ သက္ကာ ယံ ပဟာယ ပဗ္ဗဇိတာ, တံ တေဟိ ဂဟေတု’’န္တိ နယဂ္ဂါဟေ ဌတွာ ‘‘မာ အယျော’’တိအာဒိဝစနံ အဝေါစ. ဧကံသေနေတန္တိ ဧတံ ပဉ္စကာမဂုဏကပ္ပနံ အဿမဏဓမ္မော အသကျပုတ္တိယဓမ္မောတိ ဧကံသေန ဓာရေယျာသိ. ३६२. दहाव्या सुत्तात, 'त्या परिषदेला असे म्हणाले' म्हणजे त्या गामणीच्या मनात असा विचार आला की, 'जेव्हा कुलपुत्र प्रव्रज्या घेतात, तेव्हा ते आपले मुले-बाळ आणि सोने-चांदी सोडूनच प्रव्रजित होतात. आणि त्यांनी जे सोडून दिले आहे, ते त्यांनी पुन्हा स्वीकारणे शक्य नाही.' या योग्य विचारावर ठाम राहून त्यांनी 'असे करू नका, भंते' इत्यादी शब्द म्हटले. 'एकमंसेनेतं' म्हणजे हे पाच कामगुणांचे सेवन करणे हा श्रमणधर्म नाही, हा शाक्यपुत्रीय भिक्खूंचा धर्म नाही, हे निश्चितपणे (एकमताने) लक्षात ठेवावे. တိဏန္တိ သေနာသနစ္ဆဒနတိဏံ. ပရိယေသိတဗ္ဗန္တိ တိဏစ္ဆဒနေ ဝါ ဣဋ္ဌကစ္ဆဒနေ ဝါ ဂေဟေ ပလုဇ္ဇန္တေ ယေဟိ တံ ကာရိတံ, တေသံ သန္တိကံ ဂန္တွာ ‘‘တုမှေဟိ ကာရိတသေနာသနံ ဩဝဿတိ, န သက္ကာ တတ္ထ ဝသိတု’’န္တိ အာစိက္ခိတဗ္ဗံ. မနုဿာ သက္ကောန္တာ ကရိဿန္တိ, အသက္ကောန္တာ ‘‘တုမှေ ဝဍ္ဎကိံ ဂဟေတွာ ကာရာပေထ, မယံ တေ သညာပေဿာမာ’’တိ ဝက္ခန္တိ. ဧဝံ ဝုတ္တေ ကာရေတွာ တေသံ အာစိက္ခိတဗ္ဗံ. မနုဿာ ဝဍ္ဎကီနံ ဒါတဗ္ဗံ ဒဿန္တိ. သစေ အာဝါသသာမိကာ နတ္ထိ, အညေသမ္ပိ ဘိက္ခာစာရဝတ္တေန အာရောစေတွာ ကာရေတုံ ဝဋ္ဋတိ. ဣဒံ သန္ဓာယ ‘‘ပရိယေသိတဗ္ဗ’’န္တိ ဝုတ္တံ. 'तिणं' (गवत) म्हणजे शयनासनावर (विहारावर) छप्पर घालण्याचे गवत. 'परियेसितब्बं' (शोधले पाहिजे/मागितले पाहिजे) म्हणजे गवत किंवा विटांचे छप्पर असलेला विहार जेव्हा जीर्ण होतो, तेव्हा ज्यांनी तो बांधला आहे त्यांच्याकडे जाऊन सांगावे की, 'तुम्ही बांधलेल्या विहारातून पाणी गळत आहे, तिथे राहणे शक्य नाही.' जर ते लोक समर्थ असतील तर ते दुरुस्त करतील. जर असमर्थ असतील तर ते म्हणतील, 'तुम्ही सुताराला बोलावून काम करून घ्या, आम्ही त्यांना मजुरी देऊ.' असे म्हटल्यावर काम करून घेऊन त्यांना कळवावे. ते लोक सुतारांना द्यायची मजुरी देतील. जर विहाराचे मालक नसतील, तर इतरांनाही भिक्षाटनाच्या वेळी सांगून काम करून घेणे योग्य आहे. हा संदर्भ लक्षात घेऊन 'शोधले पाहिजे/मागितले पाहिजे' असे म्हटले आहे. ဒါရုန္တိ [Pg.145] သေနာသနေ ဂေါပါနသိအာဒီသု ပလုဇ္ဇမာနေသု တဒတ္ထာယ ဒါရုံ. သကဋန္တိ ဂိဟိဝိကတံ ကတွာ တာဝကာလိကသကဋံ. န ကေဝလဉ္စ သကဋမေဝ, အညမ္ပိ ဝါသိဖရသုကုဒ္ဒါလာဒိဥပကရဏံ ဧဝံ ပရိယေသိတုံ ဝဋ္ဋတိ. ပုရိသောတိ ဟတ္ထကမ္မဝသေန ပုရိသော ပရိယေသိတဗ္ဗော. ယံကိဉ္စိ ဟိ ပုရိသံ ‘‘ဟတ္ထကမ္မံ, အာဝုသော, ကတွာ ဒဿသီ’’တိ ဝတွာ ‘‘ဒဿာမိ, ဘန္တေ,’’တိ ဝုတ္တေ ‘‘ဣဒဉ္စိဒဉ္စ ကရောဟီ’’တိ ယံ ဣစ္ဆတိ, တံ ကာရေတုံ ဝဋ္ဋတိ. န တွေဝါဟံ, ဂါမဏိ, ကေနစိ ပရိယာယေနာတိ ဇာတရူပရဇတံ ပနာဟံ ကေနစိပိ ကာရဏေန ပရိယေသိတဗ္ဗန္တိ န ဝဒါမိ. 'दारुं' (लाकूड) म्हणजे शयनासनाचे वासे इत्यादी जीर्ण झाल्यावर त्यासाठी लागणारे लाकूड. 'सकटं' (गाडी) म्हणजे गृहस्थांकडून तात्पुरती मागून घेतलेली गाडी. केवळ गाडीच नाही, तर इतरही साधने जसे की तासणी, कुऱ्हाड, कुदळ इत्यादी गोष्टी अशा प्रकारे मागणे योग्य आहे. 'पुरिसो' (माणूस) म्हणजे शारीरिक श्रमासाठी माणूस शोधला पाहिजे. कोणत्याही माणसाला 'मित्रा, तू श्रमदान करशील का?' असे विचारल्यावर त्याने 'होय भंते, करेन' असे म्हटल्यास, 'हे आणि हे काम कर' असे सांगून जे काम करून घ्यायचे आहे ते करून घेणे योग्य आहे. 'परंतु हे गामणी, मी कोणत्याही प्रकारे...' म्हणजे मी कोणत्याही कारणास्तव सोने-चांदी मिळवण्याचा प्रयत्न करावा, असे सांगत नाही. ၁၁. ဘဒြကသုတ္တဝဏ္ဏနာ ११. भद्रक सुत्ताचे स्पष्टीकरण ၃၆၃. ဧကာဒသမေ မလ္လေသူတိ ဧဝံနာမကေ ဇနပဒေ. ဝဓေနာတိ မာရဏေန. ဇာနိယာတိ ဓနဇာနိယာ. အကာလိကေန ပတ္တေနာတိ န ကာလန္တရေန ပတ္တေန, ကာလံ အနတိက္ကမိတွာဝ ပတ္တေနာတိ အတ္ထော. စိရဝါသီ နာမ ကုမာရောတိ ဧဝံနာမကော တဿ ပုတ္တော. ဗဟိ အာဝသထေ ပဋိဝသတီတိ ဗဟိနဂရေ ကိဉ္စိဒေဝ သိပ္ပံ ဥဂ္ဂဏှန္တော ဝသတိ. ဣမသ္မိံ သုတ္တေ ဝဋ္ဋဒုက္ခံ ကထိတံ. ३६३. अकराव्या सुत्तात, 'मल्लेसु' म्हणजे मल्ल नावाच्या जनपदात. 'वधेन' म्हणजे मारण्याने (हत्येने). 'जानिया' म्हणजे धनाच्या हानीने (नुकसानीने). 'अकालिकेन पत्तेन' म्हणजे विनाविलंब प्राप्त झालेल्या, किंवा काळाचे उल्लंघन न करता त्वरित प्राप्त झालेल्या, असा अर्थ आहे. 'चिरवासी' नावाचा कुमार म्हणजे त्या गामणीचा या नावाचा मुलगा. 'बहि आवसथे पटिवसति' म्हणजे नगराबाहेर एखादी कला शिकण्यासाठी राहत होता. या सुत्तात संसारदुःखाचे (वट्टदुःख) वर्णन केले आहे. ၁၂. ရာသိယသုတ္တဝဏ္ဏနာ १२. रासिय सुत्ताचे स्पष्टीकरण ၃၆၄. ဒွါဒသမေ ရာသိယောတိ ရာသိံ ကတွာ ပဉှဿ ပုစ္ဆိတတ္တာ ရာသိယောတိ ဧဝံ ဓမ္မသင်္ဂါဟကတ္ထေရေဟိ ဂဟိတနာမော. တပဿိန္တိ တပနိဿိတကံ. လူခဇီဝိန္တိ လူခဇီဝိကံ. အန္တာတိ ကောဋ္ဌာသာ. ဂါမောတိ ဂါမ္မော. ဂမ္မောတိပိ ပါဌော, ဂါမဝါသီနံ ဓမ္မောတိ အတ္ထော. အတ္တကိလမထာနုယောဂေါတိ အတ္တနော ကိလမထာနုယောဂေါ, သရီရဒုက္ခကရဏန္တိ အတ္ထော. ३६४. बाराव्या सुत्तात, 'रासियो' म्हणजे प्रश्नांचा समूह करून विचारल्यामुळे, धर्मसंग्राहक महास्थविरांनी दिलेले हे नाव आहे. 'तपस्सिं' म्हणजे शरीराला क्लेश देणाऱ्या तपाचा आश्रय घेणारा. 'लूखजीविं' म्हणजे अत्यंत खडतर किंवा रूक्ष जीवन जगणारा. 'अंता' म्हणजे भाग. 'गामो' म्हणजे ग्राम्य (हलक्या दर्जाचा). 'गम्मो' असाही पाठ आहे, ज्याचा अर्थ ग्रामस्थांचा (सामान्य लोकांचा) आचार असा आहे. 'अत्तकिलमथानुयोगो' म्हणजे स्वतःला क्लेश देण्याचा अभ्यास, म्हणजेच शरीराला दुःख देणे असा अर्थ आहे. ကသ္မာ ပနေတ္ထ ကာမသုခလ္လိကာနုယောဂေါ ဂဟိတော, ကသ္မာ အတ္တကိလမထာနုယောဂေါ, ကသ္မာ မဇ္ဈိမာ ပဋိပဒါတိ? ကာမသုခလ္လိကာနုယောဂေါ တာဝ ကာမဘောဂီနံ ဒဿနတ္ထံ ဂဟိတော, အတ္တကိလမထာနုယောဂေါ တပနိဿိတကာနံ, မဇ္ဈိမာ ပဋိပဒါ တိဏ္ဏံ နိဇ္ဇရဝတ္ထူနံ ဒဿနတ္ထံ ဂဟိတာ. ကိံ ဧတေသံ ဒဿနေ ပယောဇနန္တိ? ဣမေ ဒွေ အန္တေ ပဟာယ တထာဂတော မဇ္ဈိမာယ ပဋိပဒါယ သမ္မာသမ္ဗောဓိံ ပတ္တော. သော ကာမဘောဂိနောပိ န သဗ္ဗေ ဂရဟတိ န ပသံသတိ, တပနိဿိတကေပိ န သဗ္ဗေ ဂရဟတိ န [Pg.146] ပသံသတိ, ဂရဟိတဗ္ဗယုတ္တကေယေဝ ဂရဟတိ, ပသံသိတဗ္ဗယုတ္တကေ ပသံသတီတိ ဣမဿတ္ထဿ ပကာသနံ ဧတေသံ ဒဿနေ ပယောဇနန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. येथे कामसुखल्लिकानुयोग, अत्तकिलमथानुयोग आणि मध्यम प्रतिपदा का घेतली आहे? कामसुखल्लिकानुयोग हा कामभोगात मग्न असलेल्या लोकांना दाखवण्यासाठी घेतला आहे; अत्तकिलमथानुयोग हा शरीराला क्लेश देणाऱ्या तपस्वी लोकांना दाखवण्यासाठी घेतला आहे; आणि मध्यम प्रतिपदा ही तीन प्रकारच्या निर्जरा-वस्तू (क्लेश क्षय करण्याचे मार्ग) दाखवण्यासाठी घेतली आहे. हे दाखवण्याचा काय हेतू आहे? या दोन्ही टोकांना सोडून तथागतांनी मध्यम प्रतिपदेद्वारे सम्यक्संबोधित्व प्राप्त केले आहे. ते सर्वच कामभोगी लोकांची निंदा करत नाहीत आणि सर्वांचीच प्रशंसाही करत नाहीत; तसेच सर्वच तपस्वी लोकांची निंदा करत नाहीत आणि सर्वांचीच प्रशंसाही करत नाहीत. जे निंदेला पात्र आहेत त्यांचीच ते निंदा करतात आणि जे प्रशंसेला पात्र आहेत त्यांचीच ते प्रशंसा करतात, हा अर्थ स्पष्ट करणे हाच हे दाखवण्याचा हेतू आहे, असे समजावे. ဣဒါနိ တမတ္ထံ ပကာသေန္တော တယော ခေါမေ, ဂါမဏိ, ကာမဘောဂိနောတိအာဒိမာဟ. တတ္ထ သာဟသေနာတိ သာဟသိကကမ္မေန. န သံဝိဘဇတီတိ မိတ္တသဟာယသန္ဒိဋ္ဌသမ္ဘတ္တာနံ သံဝိဘာဂံ န ကရောတိ. န ပုညာနိ ကရောတီတိ အနာဂတဘဝဿ ပစ္စယဘူတာနိ ပုညာနိ န ကရောတိ. ဓမ္မာဓမ္မေနာတိ ဓမ္မေန စ အဓမ္မေန စ. ဌာနေဟီတိ ကာရဏေဟိ. သစ္ဆိကရောတီတိ ကထံ အတ္တာနံ အာတာပေန္တော ပရိတာပေန္တော သစ္ဆိကရောတိ? စတုရင်္ဂဝီရိယဝသေန စ ဓုတင်္ဂဝသေန စ. တိဿော သန္ဒိဋ္ဌိကာ နိဇ္ဇရာတိ ဧတ္ထ ဧကောပိ မဂ္ဂေါ တိဏ္ဏံ ကိလေသာနံ နိဇ္ဇရဏတာယ တိဿော နိဇ္ဇရာတိ ဝုတ္တောတိ. आता हाच अर्थ स्पष्ट करताना त्यांनी 'तयो खोमे, गामणि, कामभोगिनो' (हे गामणी, हे तीन कामभोगी आहेत) इत्यादी म्हटले. त्यामध्ये 'साहसेन' म्हणजे बळजबरीने किंवा हिंसक कृत्याने. 'न संविभजति' म्हणजे मित्र, सोबती आणि परिचितांना वाटा देत नाही. 'न पुञ्ञानि करोति' म्हणजे भावी जन्मासाठी साहाय्यक ठरणारी पुण्यकर्मे करत नाही. 'धम्माधम्मेन' म्हणजे न्यायाने आणि अन्यायाने. 'ठानेहि' म्हणजे कारणांनी. 'सच्छिकरोति' (साक्षात्कार करतो) - स्वतःला क्लेश आणि ताप देऊन एखादा कसा काय साक्षात्कार करू शकतो? असा प्रश्न उपस्थित होऊ शकतो. तर, चतुरंग वीर्याच्या बळावर आणि धुतंगाच्या बळावर तो साक्षात्कार करतो. 'तिस्सो संदिट्ठिका निज्जरा' यामध्ये, एकच मार्ग तीन क्लेशांच्या (राग, द्वेष, मोह) क्षयासाठी कारणीभूत असल्याने त्याला 'तीन निर्जरा' असे म्हटले आहे. ၁၃. ပါဋလိယသုတ္တဝဏ္ဏနာ १३. पाटलीय सुत्ताचे स्पष्टीकरण ၃၆၅. တေရသမေ ဒူတေယျာနီတိ ဒူတကမ္မာနိ ပဏ္ဏာနိ စေဝ မုခသာသနာနိ စ. ပါဏာတိပါတဉ္စာဟန္တိ ဣဒံ ကသ္မာ အာရဒ္ဓံ? န ကေဝလံ အဟံ မာယံ ဇာနာမိ, အညမ္ပိ ဣဒဉ္စိဒဉ္စ ဇာနာမီတိ သဗ္ဗညုဘာဝဒဿနတ္ထံ အာရဒ္ဓံ. သန္တိ ဟိ, ဂါမဏိ, ဧကေ သမဏဗြာဟ္မဏာတိ ဣဒံ သေသသမဏဗြာဟ္မဏာနံ လဒ္ဓိံ ဒဿေတွာ တဿာ ပဇဟာပနတ္ထံ အာရဒ္ဓံ. ३६५. तेराव्या सूत्तात: 'दुतेय्यानि' म्हणजे दूतकर्म, ज्यामध्ये लेखी संदेश (पत्रे) आणि तोंडी संदेश वाहून नेणे समाविष्ट आहे. 'मी प्राणातिपात सुद्धा जाणतो...' हे विधान कशासाठी सुरू केले आहे? 'मी केवळ माया (कपट) जाणतो असे नाही, तर याशिवाय इतरही हे आणि हे (विविध धर्म) जाणतो' असे स्वतःचे सर्वज्ञत्व दाखवण्यासाठी हे सुरू केले आहे. 'हे गामणी, काही श्रमण-ब्राह्मण आहेत...' हे विधान इतर श्रमण-ब्राह्मणांचे मत (दृष्टी) दर्शवून, त्याचा त्याग करण्यासाठी सुरू केले आहे. မာလီ ကုဏ္ဍလီတိ မာလာယ မာလီ, ကုဏ္ဍလေဟိ ကုဏ္ဍလီ. ဣတ္ထိကာမေဟီတိ ဣတ္ထီဟိ သဒ္ဓိံ ကာမာ ဣတ္ထိကာမာ, တေဟိ ဣတ္ထိကာမေဟိ. အာဝသထာဂါရန္တိ ကုလဃရဿ ဧကသ္မိံ ဌာနေ ဧကေကဿေဝ သုခနိဝါသတ္ထာယ ကတံ ဝါသာဂါရံ. တေနာဟံ ယထာသတ္တိ ယထာဗလံ သံဝိဘဇာမီတိ တဿာဟံ အတ္တနော သတ္တိအနုရူပေန စေဝ ဗလာနုရူပေန စ သံဝိဘာဂံ ကရောမိ. အလန္တိ ယုတ္တံ. ကင်္ခနိယေ ဌာနေတိ ကင်္ခိတဗ္ဗေ ကာရဏေ. စိတ္တသမာဓိန္တိ တသ္မိံ ဓမ္မသမာဓိသ္မိံ ဌိတော တွံ သဟ ဝိပဿနာယ စတုန္နံ မဂ္ဂါနံ ဝသေန စိတ္တသမာဓိံ သစေ ပဋိလဘေယျာသီတိ ဒဿေတိ. အပဏ္ဏကတာယ မယှန္တိ အယံ ပဋိပဒါ မယှံ အပဏ္ဏကတာယ အနပရာဓကတာယ ဧဝ သံဝတ္တတီတိ အတ္ထော. ကဋဂ္ဂါဟောတိ ဇယဂ္ဂါဟော. 'माली कुंडली' म्हणजे माळा धारण केल्याने 'माली' आणि कुंडले धारण केल्याने 'कुंडली'. 'इत्थीकामेहि' म्हणजे स्त्रियांसोबतचे कामभोग, त्या कामभोगांसह. 'आवासथागारं' म्हणजे कुलीन घराच्या एका भागात प्रत्येक अतिथीच्या सुखकारक निवासासाठी बनवलेले निवासगृह. 'म्हणून मी माझ्या शक्तीनुसार व बलानुसार दान करतो' असे जे म्हटले आहे, त्याचा अर्थ असा की, मी माझ्या श्रद्धेच्या शक्तीनुसार आणि क्षमतेनुसार दान करतो. 'अलम्' म्हणजे योग्य. 'कंखनिये ठाने' म्हणजे शंका घेण्याजोग्या कारणात. 'चित्तसमाधिं' म्हणजे त्या धर्मसमाधीमध्ये स्थित असलेला तू, विपाशनेसह चार मार्गांच्या प्रभावाने जर चित्तसमाधी प्राप्त करशील, हे दर्शवते. 'माझ्या अपण्णकतेसाठी' याचा अर्थ असा की, ही प्रतिपदा माझ्यासाठी निर्दोषतेसाठी (अपराधरहिततेसाठी) कारणीभूत ठरते. 'कटग्गाहो' म्हणजे विजय मिळवणे. အယံ ခေါ, ဂါမဏိ, ဓမ္မသမာဓိ, တတြ စေ တွံ စိတ္တသမာဓိံ ပဋိလဘေယျာသီတိ ဧတ္ထ ဓမ္မသမာဓီတိ ဒသကုသလကမ္မပထဓမ္မာ, စိတ္တသမာဓီတိ သဟ ဝိပဿနာယ [Pg.147] စတ္တာရော မဂ္ဂါ. အထ ဝါ ‘‘ပါမောဇ္ဇံ ဇာယတိ, ပမုဒိတဿ ပီတိ ဇာယတီ’’တိ (အ. နိ. ၅.၂၆) ဧဝံ ဝုတ္တာ ပါမောဇ္ဇပီတိပဿဒ္ဓိသုခသမာဓိသင်္ခါတာ ပဉ္စ ဓမ္မာ ဓမ္မသမာဓိ နာမ, စိတ္တသမာဓိ ပန သဟ ဝိပဿနာယ စတ္တာရော မဂ္ဂါဝ. အထ ဝါ ဒသကုသလကမ္မပထာ စတ္တာရော ဗြဟ္မဝိဟာရာ စာတိ အယံ ဓမ္မသမာဓိ နာမ, တံ ဓမ္မသမာဓိံ ပူရေန္တဿ ဥပ္ပန္နာ စိတ္တေကဂ္ဂတာ စိတ္တသမာဓိ နာမ. ဧဝံ တွံ ဣမံ ကင်္ခါဓမ္မံ ပဇဟေယျာသီတိ ဧဝံ တွံ ဣမသ္မိံ ဝုတ္တပ္ပဘေဒေ ဓမ္မသမာဓိသ္မိံ ဌိတော သစေ ဧဝံ စိတ္တသမာဓိံ ပဋိလဘေယျာသိ, ဧကံသေနေတံ ကင်္ခံ ပဇဟေယျာသီတိ အတ္ထော. သေသံ သဗ္ဗတ္ထ ဝုတ္တနယမေဝါတိ. 'हा खरोखर, गामणी, धर्मसमाधी आहे, आणि तेथे जर तू चित्तसमाधी प्राप्त करशील...' यामध्ये 'धर्मसमाधी' म्हणजे दहा कुशल कर्मपथ धर्म, आणि 'चित्तसमाधी' म्हणजे विपाशनेसह चार मार्ग. किंवा 'प्रमोद उत्पन्न होतो, प्रमुदिताला प्रीती उत्पन्न होते' या सूत्रात सांगितलेले प्रमोद, प्रीती, प्रस्सद्धी (प्रशांतता), सुख आणि समाधी हे पाच धर्म म्हणजे 'धर्मसमाधी' होय; आणि 'चित्तसमाधी' म्हणजे विपाशनेसह चार मार्गच होत. किंवा दहा कुशल कर्मपथ आणि चार ब्रह्मविहार म्हणजे 'धर्मसमाधी' होय, आणि त्या धर्मसमाधीची पूर्तता करणाऱ्याला उत्पन्न होणारी चित्ताची एकाग्रता म्हणजे 'चित्तसमाधी' होय. 'अशा प्रकारे तू या शंकारूप धर्माचा त्याग करशील' याचा अर्थ असा की, अशा प्रकारे तू या सांगितलेल्या प्रकारच्या धर्मसमाधीमध्ये स्थित राहून जर चित्तसमाधी प्राप्त करशील, तर निश्चितपणे त्या शंकेचा त्याग करशील. उर्वरित भाग सर्वत्र पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच समजावा. ဂါမဏိသံယုတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. गामणी संयुक्ताची अट्ठकथा (वर्णना) समाप्त झाली. ၉. အသင်္ခတသံယုတ္တံ ९. असंखत संयुक्त ၁. ပဌမဝဂ္ဂေါ १. प्रथम वर्ग ၁-၁၁. ကာယဂတာသတိသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ १-११. कायगतासती सुत्त इत्यादींची अट्ठकथा (वर्णना) ၃၆၆-၃၇၆. အသင်္ခတသံယုတ္တေ [Pg.148] အသင်္ခတန္တိ အကတံ. ဟိတေသိနာတိ ဟိတံ ဧသန္တေန. အနုကမ္ပကေနာတိ အနုကမ္ပမာနေန. အနုကမ္ပံ ဥပါဒါယာတိ အနုကမ္ပံ စိတ္တေန ပရိဂ္ဂဟေတွာ, ပဋိစ္စာတိပိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ကတံ ဝေါ တံ မယာတိ တံ မယာ ဣမံ အသင်္ခတဉ္စ အသင်္ခတမဂ္ဂဉ္စ ဒေသေန္တေန တုမှာကံ ကတံ. ဧတ္တကမေဝ ဟိ အနုကမ္ပကဿ သတ္ထု ကိစ္စံ, ယဒိဒံ အဝိပရီတဓမ္မဒေသနာ. ဣတော ပရံ ပန ပဋိပတ္တိ နာမ သာဝကာနံ ကိစ္စံ. တေနာဟ ဧတာနိ, ဘိက္ခဝေ, ရုက္ခမူလာနိ…ပေ… အမှာကံ အနုသာသနီတိ ဣမိနာ ရုက္ခမူလသေနာသနံ ဒဿေတိ. သုညာဂါရာနီတိ ဣမိနာ ဇနဝိဝိတ္တံ ဌာနံ. ဥဘယေန စ ယောဂါနုရူပံ သေနာသနံ အာစိက္ခတိ, ဒါယဇ္ဇံ နိယျာတေတိ. ३६६-३७६. असंखत संयुक्तात: 'असंखत' म्हणजे जे बनवले गेले नाही (अकृत/निर्वाण). 'हितेसिना' म्हणजे हिताचा शोध घेणाऱ्याने. 'अनुकंपकेन' म्हणजे अनुकंपा (दया) करणाऱ्याने. 'अनुकंपा उपादाय' म्हणजे अनुकंपायुक्त चित्ताने ग्रहण करून, किंवा अनुकंपेचा आश्रय घेऊन. 'ते मी तुमच्यासाठी केले आहे' याचा अर्थ असा की, हे असंखत आणि असंखताचा मार्ग उपदेशिणाऱ्या माझ्याद्वारे तुमच्यासाठी जे करायचे होते (शास्त्याचे कर्तव्य) ते केले गेले आहे. कारण अनुकंपा करणाऱ्या शास्त्याचे कर्तव्य एवढेच असते, जे म्हणजे यथार्थ (अविपरीत) धर्मोपदेश करणे. यानंतर मात्र साधना (प्रतिपत्ती) करणे हे श्रावकांचे कर्तव्य आहे. म्हणूनच भगवान म्हणाले, 'हे भिक्खूहो, ही वृक्षमूले आहेत... ही आमची अनुशासणी आहे.' याद्वारे वृक्षमूल सेनासन दर्शवले आहे. 'शून्यागारे' याद्वारे लोकवस्तीपासून दूर असलेले निर्जन स्थान दर्शवले आहे. या दोन्ही शब्दांद्वारे योगाभ्यासासाठी योग्य असे सेनासन सांगितले आहे आणि आपला वारसा सुपूर्द केला आहे. ဈာယထာတိ အာရမ္မဏူပနိဇ္ဈာနေန အဋ္ဌတိံသာရမ္မဏာနိ, လက္ခဏူပနိဇ္ဈာနေန စ အနိစ္စာဒိတော ခန္ဓာယတနာဒီနိ ဥပနိဇ္ဈာယထ, သမထဉ္စ ဝိပဿနဉ္စ ဝဍ္ဎေထာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. မာ ပမာဒတ္ထာတိ မာ ပမဇ္ဇိတ္ထ. မာ ပစ္ဆာ ဝိပ္ပဋိသာရိနော အဟုဝတ္ထာတိ ယေ ဟိ ပုဗ္ဗေ ဒဟရကာလေ အရောဂကာလေ သတ္တသပ္ပာယာဒိသမ္ပတ္တိကာလေ သတ္ထု သမ္မုခီဘာဝကာလေ စ ယောနိသောမနသိကာရရဟိတာ ရတ္တိန္ဒိဝံ မင်္ကုလဘတ္တံ ဟုတွာ သေယျသုခံ မိဒ္ဓသုခံ အနုဘောန္တာ ပမဇ္ဇန္တိ, တေ ပစ္ဆာ ဇရာကာလေ ရောဂကာလေ မရဏကာလေ ဝိပတ္တိကာလေ သတ္ထု ပရိနိဗ္ဗုတကာလေ စ တံ ပုဗ္ဗေ ပမာဒဝိဟာရံ အနုဿရန္တာ သပ္ပဋိသန္ဓိကာလကိရိယဉ္စ ဘာရိယံ သမ္ပဿမာနာ ဝိပ္ပဋိသာရိနော ဟောန္တိ. တုမှေ ပန တာဒိသာ မာ အဟုဝတ္ထာတိ ဒဿေန္တော အာဟ ‘‘မာ ပစ္ဆာ ဝိပ္ပဋိသာရိနော အဟုဝတ္ထာ’’တိ. 'झायथ' (ध्यान करा) म्हणजे आलंबन-उपनिव्यानाने ३८ आलंबनांचे ध्यान करा, आणि लक्षण-उपनिव्यानाने अनित्यता इत्यादी रूपाने स्कंध, आयतन इत्यादींचे ध्यान करा; तसेच समथ आणि विपाशना वाढवा, असे म्हटले आहे. 'मा पमादत्थ' म्हणजे प्रमाद करू नका. 'नंतर पश्चात्ताप करणारे होऊ नका' याचा अर्थ असा की, जे भिक्खू पूर्वी तरुणपणी, निरोगी असताना, सात प्रकारच्या अनुकूलतेच्या (सप्पाय) समृद्धीच्या काळात आणि शास्त्यांच्या प्रत्यक्ष उपस्थितीच्या काळात योनिशो मनसिकाराने रहित राहून, रात्रंदिवस ढेकणांचे अन्न बनून, केवळ झोपेचे आणि आळसाचे सुख अनुभवत प्रमाद करतात; ते नंतर वृद्धपकाळी, आजारपणात, मृत्यूसमयी, विपत्तीच्या काळात आणि शास्त्यांच्या परिनिर्वाणानंतर, पूर्वीच्या त्या प्रमादयुक्त विहाराचे स्मरण करून आणि भविष्यातील पुनर्जन्माची कठीण परिस्थिती पाहून पश्चात्तापग्रस्त होतात. 'परंतु तुम्ही तसे होऊ नका' हे दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी म्हटले आहे: 'नंतर पश्चात्ताप करणारे होऊ नका.' အယံ ဝေါ အမှာကံ အနုသာသနီတိ အယံ အမှာကံ သန္တိကာ ‘‘ဈာယထ မာ ပမာဒတ္ထာ’’တိ တုမှာကံ အနုသာသနီ, ဩဝါဒေါတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. 'ही आमची तुम्हाला अनुशासणी आहे' म्हणजे आमच्याकडून 'ध्यान करा, प्रमाद करू नका' अशी तुम्हाला दिलेली ही अनुशासणी (उपदेश) आहे, असे म्हटले आहे. ၂. ဒုတိယဝဂ္ဂေါ २. द्वितीय वर्ग ၁-၃၃. အသင်္ခတသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ १-३३. असंखत सुत्त इत्यादींची अट्ठकथा (वर्णना) ၃၇၇-၄၀၉. ကာယေ [Pg.149] ကာယာနုပဿီတိအာဒီသု ယံ ဝတ္တဗ္ဗံ, တံ ပရတော ဝက္ခာမ. ३७७-४०९. 'कायात कायानुपस्सी (शरीरात शरीराचे अनुपश्यन करणारा)' इत्यादी वाक्यांमध्ये जे काही सांगायचे आहे, ते आम्ही पुढे सांगू. အနတန္တိအာဒီသု တဏှာနတိယာ အဘာဝေန အနတံ. စတုန္နံ အာသဝါနံ အဘာဝေန အနာသဝံ. ပရမတ္ထသစ္စတာယ သစ္စံ. ဝဋ္ဋဿ ပရဘာဂဋ္ဌေန ပါရံ. သဏှဋ္ဌေန နိပုဏံ. သုဋ္ဌု ဒုဒ္ဒသတာယ သုဒုဒ္ဒသံ. ဇရာယ အဇရိတတ္တာ အဇဇ္ဇရံ. ထိရဋ္ဌေန ဓုဝံ. အပလုဇ္ဇနတာယ အပလောကိတံ. စက္ခုဝိညာဏေန အပဿိတဗ္ဗတ္တာ အနိဒဿနံ. တဏှာမာနဒိဋ္ဌိပပဉ္စာနံ အဘာဝေန နိပ္ပပဉ္စံ. 'अनत' इत्यादी शब्दांमध्ये: तृष्णारूपी झुकाव (नती) नसल्यामुळे 'अनत' (न वाकणारे). चार आसवांचा अभाव असल्यामुळे 'अनास्रव'. परमार्थ सत्य असल्यामुळे 'सत्य'. संसारचक्राच्या पलीकडचा भाग असल्यामुळे 'पार'. सूक्ष्म स्वभावामुळे 'निपुण'. अत्यंत कठीणतेने दिसणारे असल्यामुळे 'सुदुर्दर्श'. जरेने (वृद्धत्वामुळे) जीर्ण होत नसल्यामुळे 'अजज्जर'. स्थिर स्वभावामुळे 'ध्रुव'. नाश पावणारे नसल्यामुळे 'अपलोकित'. चक्षुविज्ञानाने न पाहता यावे असे असल्यामुळे 'अनिदर्शन'. तृष्णा, मान आणि दृष्टी या प्रपंचांचा अभाव असल्यामुळे 'निष्प्रपंच' म्हटले जाते. သန္တဘာဝဋ္ဌေန သန္တံ. မရဏာဘာဝေန အမတံ. ဥတ္တမဋ္ဌေန ပဏီတံ. သဿိရိကဋ္ဌေန သိဝံ. နိရုပဒ္ဒဝတာယ ခေမံ. တဏှာက္ခယဿ ပစ္စယတ္တာ တဏှက္ခယံ. शांत स्वभावामुळे 'शांत'. मृत्यूचा अभाव असल्यामुळे 'अमृत'. उत्तम स्वभावामुळे 'प्रणीत' (श्रेष्ठ). कल्याणकारी स्वभावामुळे 'शिव'. उपद्रवरहित असल्यामुळे 'क्षेम'. तृष्णाक्षयाचे कारण असल्यामुळे 'तृष्णाक्षय' म्हटले जाते. ဝိမှာပနီယဋ္ဌေန အစ္ဆရံ ပဟရိတဗ္ဗယုတ္တကန္တိ အစ္ဆရိယံ. အဘူတမေဝ ဘူတံ အဇာတံ ဟုတွာ အတ္ထီတိ ဝါ အဗ္ဘုတံ. နိဒ္ဒုက္ခတ္တာ အနီတိကံ. နိဒ္ဒုက္ခသဘာဝတ္တာ အနီတိကဓမ္မံ. ဝါနာဘာဝေန နိဗ္ဗာနံ. ဗျာဗဇ္ဈာဘာဝေနေဝ အဗျာဗဇ္ဈံ. ဝိရာဂါဓိဂမဿ ပစ္စယတော ဝိရာဂံ. ပရမတ္ထသုဒ္ဓိတာယ သုဒ္ဓိ. တီဟိ ဘဝေဟိ မုတ္တတာယ မုတ္တိ. ကာမာလယာနံ အဘာဝေန အနာလယံ. ပတိဋ္ဌဋ္ဌေန ဒီပံ. အလ္လီယိတဗ္ဗယုတ္တဋ္ဌေန လေဏံ. တာယနဋ္ဌေန တာဏံ. ဘယသရဏဋ္ဌေန သရဏံ, ဘယနာသနန္တိ အတ္ထော. ပရံ အယနံ ဂတိ ပတိဋ္ဌာတိ ပရာယဏံ. သေသမေတ္ထ ဝုတ္တနယမေဝါတိ. आश्चर्यचकित करणाऱ्या स्वभावामुळे चिमूट वाजवण्यासारखे (टाळी वाजवण्यासारखे) असल्यामुळे 'आश्चर्य'. जे पूर्वी कधी घडले नाही ते घडल्यामुळे किंवा जे न जन्मलेले असूनही अस्तित्वात आहे म्हणून 'अद्भुत'. दुःख नसल्यामुळे 'अनीतिक' (उपद्रवरहित). दुःखविरहित स्वभावामुळे 'अनीतिकधर्म'. 'वान' नावाच्या तृष्णेचा अभाव असल्यामुळे 'निर्वाण'. व्यापादाचा (पीडेचा) अभाव असल्यामुळे 'अव्यापज्ज' (पीडारहित). विराग प्राप्त करण्याचे कारण असल्यामुळे 'विराग'. परमार्थतः शुद्ध असल्यामुळे 'शुद्धी'. तिन्ही भवांपासून मुक्त असल्यामुळे 'मुक्ती'. कामभोगांच्या आसक्तीचा (आलयाचा) अभाव असल्यामुळे 'अनालय'. आधार असल्यामुळे 'द्वीप'. आश्रय घेण्यास योग्य असल्यामुळे 'लेण' (आश्रयस्थान). रक्षण करणाऱ्या स्वभावामुळे 'त्राण'. भयापासून शरण देणारे असल्यामुळे 'शरण', म्हणजे भयाचा नाश करणारे असा अर्थ आहे. परम अयन (मार्ग), गती आणि प्रतिष्ठा असल्यामुळे 'परायण'. उर्वरित भाग येथे पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच समजावा. အသင်္ခတသံယုတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. असंखत संयुक्ताची अट्ठकथा (वर्णना) समाप्त झाली. ၁၀. အဗျာကတသံယုတ္တံ १०. अव्याकत संयुक्त ၁. ခေမာသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. खेमा सुत्ताची अट्ठकथा (वर्णना) ၄၁၀. အဗျာကတသံယုတ္တဿ [Pg.150] ပဌမေ ခေမာတိ ဂိဟိကာလေ ဗိမ္ဗိသာရဿ ဥပါသိကာ သဒ္ဓါပဗ္ဗဇိတာ မဟာထေရီ ‘‘ဧတဒဂ္ဂံ, ဘိက္ခဝေ, မမ သာဝိကာနံ ဘိက္ခုနီနံ မဟာပညာနံ ယဒိဒံ ခေမာ’’တိ ဧဝံ ဘဂဝတာ မဟာပညတာယ ဧတဒဂ္ဂေ ဌပိတာ. ပဏ္ဍိတာတိ ပဏ္ဍိစ္စေန သမန္နာဂတာ. ဝိယတ္တာတိ ဝေယျတ္တိယေန သမန္နာဂတာ. မေဓာဝိနီတိ မေဓာယ ပညာယ သမန္နာဂတာ. ဗဟုဿုတာတိ ပရိယတ္တိဗာဟုသစ္စေနပိ ပဋိဝေဓဗာဟုသစ္စေနပိ သမန္နာဂတာ. ४१०. अव्याकतसंयुत्ताच्या पहिल्या सुत्तात, ‘खेमा’ म्हणजे गृहस्थावस्थेत असताना बिंबिसार राजाची अंतःपूरिका (राणी) आणि उपासिका असलेली, जिने श्रद्धेने प्रव्रज्या घेतली होती अशी महाथेरी. “भिक्खूंनो, माझ्या महाप्रज्ञावान भिक्खुणी श्राविकांमध्ये ही जी खेमा आहे, ती अग्र आहे,” अशा प्रकारे भगवंतांनी तिच्या महाप्रज्ञेमुळे तिला एतदग्ग (सर्वोच्च स्थान) पदावर प्रस्थापित केले होते. ‘पंडिता’ म्हणजे पांडित्याने (विद्वत्तेने) युक्त असलेली. ‘वियत्ता’ म्हणजे व्याक्तत्वाने (कुशलतेने) युक्त असलेली. ‘मेधाविनी’ म्हणजे मेधा (धारणशक्ती) आणि प्रज्ञेने युक्त असलेली. ‘बहुस्सुता’ म्हणजे परियत्ति-बहुश्रुतता आणि पटिवेध-बहुश्रुतता या दोन्हीने युक्त असलेली. ဂဏကောတိ အစ္ဆိဒ္ဒကဂဏနာယ ကုသလော. မုဒ္ဒိကောတိ အင်္ဂုလိမုဒ္ဒါယ ဂဏနာယ ကုသလော. သင်္ခါယကောတိ ပိဏ္ဍဂဏနာယ ကုသလော. ဂမ္ဘီရောတိ စတုရာသီတိယောဇနသဟဿဂမ္ဘီရော. အပ္ပမေယျောတိ အာဠှကဂဏနာယ အပ္ပမေယျော. ဒုပ္ပရိယောဂါဟောတိ အာဠှကဂဏနာယ ပမာဏဂဟဏတ္ထံ ဒုရောဂါဟော. ယေန ရူပေန တထာဂတန္တိ ယေန ရူပေန ဒီဃော ရဿော သာမော ဩဒါတောတိ သတ္တသင်္ခါတံ တထာဂတံ ပညပေယျ. တံ ရူပံ တထာဂတဿ ပဟီနန္တိ တံ ဝုတ္တပ္ပကာရရူပံ သမုဒယပ္ပဟာနေန သဗ္ဗညုတထာဂတဿ ပဟီနံ. ရူပသင်္ခါယ ဝိမုတ္တောတိ အာယတိံ ရူပဿ အနုပ္ပတ္တိယာ ရူပါရူပကောဋ္ဌာသေနပိ ဧဝရူပေါ နာမ ဘဝိဿတီတိ ဝေါဟာရဿပိ ပဋိပဿဒ္ဓတ္တာ ရူပပဏ္ဏတ္တိယာပိ ဝိမုတ္တော. ဂမ္ဘီရောတိ အဇ္ဈာသယ ဂမ္ဘီရတာယ စ ဂုဏဂမ္ဘီရတာယ စ ဂမ္ဘီရော. တဿ ဧဝံ ဂုဏဂမ္ဘီရဿ သတော သဗ္ဗညုတထာဂတဿ ယံ ဥပါဒါယ သတ္တသင်္ခါတော တထာဂတောတိ ပညတ္တိ ဟောတိ, တဒဘာဝေန တဿာ ပညတ္တိယာ အဘာဝံ ပဿန္တဿ အယံ သတ္တသင်္ခါတော ဟောတိ တထာဂတော ပရံ မရဏာတိ ဣဒံ ဝစနံ န ဥပေတိ န ယုဇ္ဇတိ, န ဟောတိ တထာဂတော ပရံ မရဏာတိအာဒိဝစနမ္ပိ န ဥပေတိ န ယုဇ္ဇတီတိ အတ္ထော. ‘गणको’ म्हणजे न थांबता (अखंड) गणना करण्यात कुशल असलेला. ‘मुद्दिको’ म्हणजे बोटांच्या साहाय्याने (मुद्रा-गणनेने) मोजण्यात कुशल असलेला. ‘संखायको’ म्हणजे एकूण बेरजेची (समूहाची) गणना करण्यात कुशल असलेला. ‘गंभीरो’ म्हणजे चौऱ्याऐंशी हजार योजने खोल असलेला. ‘अप्पमेय्यो’ म्हणजे आढक (मापण्याच्या पात्राने) मोजता न येणारा (अथांग). ‘दुप्पवियोगाहो’ म्हणजे आढक मापाने मोजून त्याचे प्रमाण ठरवण्यासाठी प्रवेश करण्यास कठीण असलेला. ‘येन रूपेन तथागतं’ म्हणजे ज्या रूपाने ‘दीर्घ, ऱ्हस्व, श्याम, अवदात (पांढरा)’ अशा प्रकारे ‘सत्त्व’ संज्ञक तथागताची प्रज्ञप्ती (ओळख) केली जाऊ शकते. ‘तं रूपं तथागतस्स पहीनं’ म्हणजे त्या पूर्वोक्त रूपाचा समुदय नष्ट झाल्यामुळे सर्वज्ञ तथागतांनी त्याचा त्याग केला आहे. ‘रूपसंखाय विमुत्तो’ म्हणजे भविष्यात रूपाची उत्पत्ती न होणार असल्यामुळे आणि रूप-अरूप भागांच्या दृष्टीने ‘अशा रूपाचा असेल’ या व्यवहाराचाही उपशम झाल्यामुळे, रूपाच्या प्रज्ञप्तीपासून मुक्त झालेला. ‘गंभीरो’ म्हणजे आशयाच्या गंभीरतेमुळे आणि गुणांच्या गंभीरतेमुळे गंभीर असलेला. अशा प्रकारे गुणांनी गंभीर असलेल्या त्या सर्वज्ञ तथागतांच्या ज्या (पंचस्कंधांना) ग्रहण करून ‘सत्त्व’ संज्ञक ‘तथागत’ अशी प्रज्ञप्ती होते, त्या पंचस्कंधांच्या अभावामुळे त्या प्रज्ञप्तीचा अभाव पाहणाऱ्या व्यक्तीसाठी “हा सत्त्वसंज्ञक तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतो” हे विधान लागू पडत नाही, योग्य ठरत नाही; तसेच “तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतो” इत्यादी विधानेही लागू पडत नाहीत, योग्य ठरत नाहीत, असा अर्थ समजावा. သံသန္ဒိဿတီတိ ဧကံ ဘဝိဿတိ. သမေဿတီတိ နိရန္တရံ ဘဝိဿတိ. န ဝိရောဓယိဿတီတိ န ဝိရုဒ္ဓံ ပဒံ ဘဝိဿတိ. အဂ္ဂပဒသ္မိန္တိ ဒေသနာယ. ဒေသနာ ဟိ ဣဓ အဂ္ဂပဒန္တိ အဓိပ္ပေတာ. ‘संसन्दिस्सति’ म्हणजे एकरूप होईल. ‘समेस्सति’ म्हणजे निरंतर (भेद नसलेले) होईल. ‘न विरोघयिस्सति’ म्हणजे परस्पर विरोधी एकही पद असणार नाही. ‘अग्गपदस्मिं’ म्हणजे देशनेमध्ये. कारण येथे देशनेलाच ‘अग्गपद’ (सर्वोच्च पद) म्हणून अभिप्रेत धरले आहे. ၂. အနုရာဓသုတ္တဝဏ္ဏနာ २. अनुराधसुत्तवण्णना (अनुराध सुत्ताचे स्पष्टीकरण). ၄၁၁. ဒုတိယံ [Pg.151] ခန္ဓိယဝဂ္ဂေ ဝိတ္ထာရိတမေဝ, အဗျာကတာဓိကာရတော ပန ဣဓ ဝုတ္တံ. ४११. दुसरे (सुत्त) खंधियवग्गात सविस्तर स्पष्ट केलेच आहे, परंतु अव्याकत (अव्याकृत) विषयाच्या अधिकाराने (संबंधाने) येथे सांगितले आहे. ၃-၈. ပဌမသာရိပုတ္တကောဋ္ဌိကသုတ္တာဒိဝဏ္ဏနာ ३-८. प्रथम सारिपुत्त-कोट्ठिक सुत्त इत्यादींचे स्पष्टीकरण (वण्णना). ၄၁၂-၄၁၇. တတိယေ ရူပဂတမေတန္တိ ရူပမတ္တမေတံ. ဧတ္ထ ရူပတော အညော ကောစိ သတ္တော နာမ န ဥပလဗ္ဘတိ, ရူပေ ပန သတိ နာမမတ္တံ ဧတံ ဟောတီတိ ဒဿေတိ. ဝေဒနာဂတမေတန္တိအာဒီသုပိ ဧသေဝ နယော. အယံ ခေါ အာဝုသော ဟေတူတိ အယံ ရူပါဒီနိ မုဉ္စိတွာ အနုပလဗ္ဘိယသဘာဝေါ ဟေတု, ယေနေတံ အဗျာကတံ ဘဂဝတာတိ. စတုတ္ထာဒီနိ ဥတ္တာနတ္ထာနေဝ. ४१२-४१७. तिसऱ्या सुत्तात, ‘रूपगतमेतं’ म्हणजे हे केवळ रूपच आहे. येथे रूपाव्यतिरिक्त दुसरा कोणताही ‘सत्त्व’ (प्राणी) आढळत नाही; परंतु रूप असताना हे केवळ नाममात्र (नाव) ठरते, असा अर्थ दर्शवला आहे. ‘वेदनागतमेतं’ इत्यादींमध्येही हाच नियम लागू होतो. ‘अयं खो आवुसो हेतू’ म्हणजे रूप इत्यादींना वगळून हा जो अनुपलब्धता स्वभाव (न आढळण्याचा स्वभाव) आहे, हेच कारण आहे ज्यामुळे भगवंतांनी याचे उत्तर दिले नाही (अव्याकृत ठेवले). चौथे इत्यादी सुत्ते स्पष्ट अर्थाचीच आहेत. ၉. ကုတူဟလသာလာသုတ္တဝဏ္ဏနာ ९. कुतूहलसालासुत्तवण्णना (कुतूहलशाला सुत्ताचे स्पष्टीकरण). ၄၁၈. နဝမေ ကုတူဟလသာလာယန္တိ ကုတူဟလသာလာ နာမ ပစ္စေကသာလာ နတ္ထိ, ယတ္ထ ပန နာနာတိတ္ထိယာ သမဏဗြာဟ္မဏာ နာနာဝိဓံ ကထံ ပဝတ္တေန္တိ, သာ ဗဟူနံ ‘‘အယံ ကိံ ဝဒတိ, အယံ ကိံ ဝဒတီ’’တိ ကုတူဟလုပ္ပဝတ္တိဋ္ဌာနတော ကုတူဟလသာလာတိ ဝုစ္စတိ. ဒူရမ္ပိ ဂစ္ဆတီတိ ယာဝ အာဘဿရဗြဟ္မလောကာ ဂစ္ဆတိ. ဣမဉ္စ ကာယံ နိက္ခိပတီတိ စုတိစိတ္တေန နိက္ခိပတိ. အနုပပန္နော ဟောတီတိ စုတိက္ခဏေယေဝ ပဋိသန္ဓိစိတ္တဿ အနုပ္ပန္နတ္တာ အနုပပန္နော ဟောတိ. ४१८. नवव्या सुत्तात, ‘कुतूहलसालायं’ या पाठात ‘कुतूहलशाला’ नावाची कोणतीही स्वतंत्र शाळा (धर्मशाळा/सभागृह) नाही; परंतु जेथे विविध पंथांचे श्रमण आणि ब्राह्मण नाना प्रकारच्या चर्चा (तिरिच्छानकथा) करत असत, ती जागा अनेक लोकांमध्ये “हा काय बोलतोय, तो काय बोलतोय?” असे कुतूहल निर्माण होण्याचे ठिकाण असल्यामुळे तिला ‘कुतूहलशाला’ असे म्हटले जाते. ‘दूरम्पि गच्छति’ म्हणजे आभास्सर ब्रह्मलोकापर्यंत जाते. ‘इमञ्च कायं निक्खिपति’ म्हणजे च्युति-चित्ताने (मृत्यूसमयीच्या चित्ताने) या शरीराचा त्याग करतो. ‘अनुपपन्नो होति’ म्हणजे च्युती क्षणीच (मृत्यूच्या क्षणीच) प्रतिसंधी-चित्त उत्पन्न न झाल्यामुळे तो अनुपपन्न (पुनर्जन्म न घेतलेला) असतो. ၁၀. အာနန္ဒသုတ္တဝဏ္ဏနာ १०. आनंदसुत्तवण्णना (आनंद सुत्ताचे स्पष्टीकरण). ၄၁၉. ဒသမေ တေသမေတံ သဒ္ဓိံ အဘဝိဿာတိ တေသံ လဒ္ဓိယာ သဒ္ဓိံ ဧတံ အဘဝိဿ. အနုလောမံ အဘဝိဿ ဉာဏဿ ဥပ္ပာဒါယ သဗ္ဗေ ဓမ္မာ အနတ္တာတိ ယံ ဧတံ ‘‘သဗ္ဗေ ဓမ္မာ အနတ္တာ’’တိ ဝိပဿနာဉာဏံ ဥပ္ပဇ္ဇတိ, အပိ နု မေ တဿ အနုလောမံ အဘဝိဿာတိ အတ္ထော. ४१९. दहाव्या सुत्तात, ‘तेसमेतं सद्धिं अभविस्स’ म्हणजे त्यांच्या (शाश्वतवादी लोकांच्या) मताशी हे (आत्मवादाचे वचन) सहमत झाले असते. ‘अनुलोमं अभविस्स जाणस्स उप्पादाय सब्बे धम्मा अनत्ता’ म्हणजे “सर्व धर्म अनत्त (अनात्म) आहेत” हे जे विपश्यना ज्ञान उत्पन्न होते, “काय ते माझ्या त्या ज्ञानाच्या उत्पत्तीसाठी अनुकूल झाले असते का?” असा अर्थ समजावा. ၁၁. သဘိယကစ္စာနသုတ္တဝဏ္ဏနာ ११. सभियकच्चानसुत्तवण्णना (सभियकच्चान सुत्ताचे स्पष्टीकरण). ၄၂၀. ဧကာဒသမေ [Pg.152] ဧတမေတ္တကေန ဧတ္တကမေဝါတိ အာဝုသော ယဿာပိ ဧတံ ဧတ္တကေန ကာလေန ‘‘ဟေတုမှိ သတိ ရူပီတိအာဒိ ပညာပနာ ဟောတိ, အသတိ န ဟောတီ’’တိ ဗျာကရဏံ ဘဝေယျ, တဿ ဧတ္တကမေဝ ဗဟု. ကော ပန ဝါဒေါ အတိက္ကန္တေတိ အတိက္ကန္တေ ပန အတိမနာပေ ဓမ္မဒေသနာနယေ ဝါဒေါယေဝ ကော, နတ္ထိ ဝါဒေါ, ဆိန္နာ ကထာတိ. ४२०. अकराव्या सुत्तात, ‘एतमेत्तकेन एत्तकमेव’ या पाठाचा संक्षिप्त अर्थ असा आहे: “हे आवुसो (मित्रांनो)! ज्या व्यक्तीला एवढ्या कमी वेळात ‘कारण असताना रूपी इत्यादी प्रज्ञप्ती होते, आणि कारण नसताना होत नाही’ असे विश्लेषण करता येते, त्याच्यासाठी एवढेच खूप मोठे (कल्याणकारी) आहे. ‘को पन वादो अतिक्कन्ते’ म्हणजे यापेक्षा अधिक श्रेष्ठ आणि अत्यंत मनोहारी अशा धम्मदेशना पद्धतीविषयी काय बोलावे? बोलण्यासारखे काही उरलेच नाही, चर्चा संपली आहे.” အဗျာကတသံယုတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. अव्याकतसंयुत्तवण्णना समाप्त झाली. ဣတိ သာရတ္ထပ္ပကာသိနိယာ သံယုတ္တနိကာယ-အဋ္ဌကထာယ अशा प्रकारे सारत्थप्पकासिनी नामक संयुत्तनिकाय-अट्ठकथेतील... သဠာယတနဝဂ္ဂဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. सळायतनवग्गवण्णना समाप्त झाली. | |||
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |