| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धाला माझा नमस्कार असो. สํยุตฺตนิกาโย संयुत्तनिकाय สฬายตนวคฺโค सळायतनवग्ग ๑. สฬายตนสํยุตฺตํ १. सळायतनसंयुत्त ๑. อนิจฺจวคฺโค १. अनिच्चवग्ग ๑. อชฺฌตฺตานิจฺจสุตฺตํ १. अज्झत्तानिच्चसुत्त ๑. เอวํ [Pg.236] เม สุตํ. เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ภิกฺขโว’’ติ. ‘‘ภทนฺเต’’ติ เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – १. असे मी ऐकले आहे. एका समयी भगवान श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेथे भगवानांनी भिक्खूंना संबोधित केले – “भिक्खूहो!” ते भिक्खू भगवानांना प्रत्युत्तर देत म्हणाले, “भदंत!” भगवानांनी हे सांगितले – ‘‘จกฺขุํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ. ยทนิจฺจํ ตํ ทุกฺขํ; ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. โสตํ อนิจฺจํ. ยทนิจฺจํ…เป… ฆานํ อนิจฺจํ. ยทนิจฺจํ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา. ยทนิจฺจํ ตํ ทุกฺขํ; ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. กาโย อนิจฺโจ. ยทนิจฺจํ…เป… มโน อนิจฺโจ. ยทนิจฺจํ ตํ ทุกฺขํ; ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, โสตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ฆานสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ชิวฺหายปิ นิพฺพินฺทติ, กายสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ[Pg.237], มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. ปฐมํ. “भिक्खूहो, चक्षू (डोळा) अनिच्च (अनित्य) आहे. जे अनिच्च आहे, ते दुःख आहे; जे दुःख आहे, ते अनत्ता (अनात्मा) आहे. जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. श्रोत (कान) अनिच्च आहे. जे अनिच्च आहे...पे... घ्राण (नाक) अनिच्च आहे. जे अनिच्च आहे...पे... जिव्हा (जीभ) अनिच्च आहे. जे अनिच्च आहे, ते दुःख आहे; जे दुःख आहे, ते अनत्ता आहे. जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. काय (शरीर) अनिच्च आहे. जे अनिच्च आहे...पे... मन अनिच्च आहे. जे अनिच्च आहे, ते दुःख आहे; जे दुःख आहे, ते अनत्ता आहे. जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षूविषयीही निर्वेद (उदासीनता) पावतो, श्रोताविषयीही निर्वेद पावतो, घ्राणाविषयीही निर्वेद पावतो, जिव्हेविषयीही निर्वेद पावतो, कायेविषयीही निर्वेद पावतो, मनाविषयीही निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्यामुळे तो विरक्त होतो; विरागामुळे तो विमुक्त होतो. विमुक्त झाल्यावर ‘(मी) विमुक्त झालो आहे’ असे ज्ञान होते. ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे कर्तव्य होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही शेष राहिलेले नाही’ असे तो जाणतो.” पहिले. ๒. อชฺฌตฺตทุกฺขสุตฺตํ २. अज्झत्तदुक्खसुत्त ๒. ‘‘จกฺขุํ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา; ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. โสตํ ทุกฺขํ…เป… ฆานํ ทุกฺขํ… ชิวฺหา ทุกฺขา… กาโย ทุกฺโข… มโน ทุกฺโข. ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา; ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. ทุติยํ. २. “भिक्खूहो, चक्षू दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनत्ता आहे; जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. श्रोत दुःख आहे...पे... घ्राण दुःख आहे... जिव्हा दुःख आहे... काय दुःख आहे... मन दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनत्ता आहे; जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा...पे... ‘आता या अस्तित्वासाठी काहीही शेष राहिलेले नाही’ असे तो जाणतो.” दुसरे. ๓. อชฺฌตฺตานตฺตสุตฺตํ ३. अज्झत्तानत्तसुत्त ๓. ‘‘จกฺขุํ, ภิกฺขเว, อนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. โสตํ อนตฺตา…เป… ฆานํ อนตฺตา… ชิวฺหา อนตฺตา… กาโย อนตฺตา… มโน อนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. ตติยํ. ३. “भिक्खूहो, चक्षू अनत्ता आहे. जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. श्रोत अनत्ता आहे...पे... घ्राण अनत्ता आहे... जिव्हा अनत्ता आहे... काय अनत्ता आहे... मन अनत्ता आहे. जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा...पे... ‘आता या अस्तित्वासाठी काहीही शेष राहिलेले नाही’ असे तो जाणतो.” तिसरे. ๔. พาหิรานิจฺจสุตฺตํ ४. बाहिरानिच्चसुत्त ๔. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนิจฺจา. ยทนิจฺจํ ตํ ทุกฺขํ; ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนิจฺจา. ยทนิจฺจํ ตํ ทุกฺขํ; ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, สทฺเทสุปิ นิพฺพินฺทติ, คนฺเธสุปิ นิพฺพินฺทติ, รเสสุปิ นิพฺพินฺทติ, โผฏฺฐพฺเพสุปิ นิพฺพินฺทติ, ธมฺเมสุปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. จตุตฺถํ. ४. “भिक्खूहो, रूप अनिच्च आहेत. जे अनिच्च आहे, ते दुःख आहे; जे दुःख आहे, ते अनत्ता आहे. जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धम्म अनिच्च आहेत. जे अनिच्च आहे, ते दुःख आहे; जे दुःख आहे, ते अनत्ता आहे. जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक रूपांविषयीही निर्वेद पावतो, शब्दांविषयीही निर्वेद पावतो, गंधांविषयीही निर्वेद पावतो, रसांविषयीही निर्वेद पावतो, स्पर्शांविषयीही निर्वेद पावतो, धम्मांविषयीही निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्यामुळे तो विरक्त होतो; विरागामुळे तो विमुक्त होतो. विमुक्त झाल्यावर ‘(मी) विमुक्त झालो आहे’ असे ज्ञान होते. ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे कर्तव्य होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही शेष राहिलेले नाही’ असे तो जाणतो.” चौथे. ๕. พาหิรทุกฺขสุตฺตํ ५. बाहिरदुक्खसुत्त ๕. ‘‘รูปา[Pg.238], ภิกฺขเว, ทุกฺขา. ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา; ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา ทุกฺขา. ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. ปญฺจมํ. ५. “भिक्खूहो, रूप दुःख आहेत. जे दुःख आहे, ते अनत्ता आहे; जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धम्म दुःख आहेत. जे दुःख आहे, ते अनत्ता आहे. जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा...पे... ‘आता या अस्तित्वासाठी काहीही शेष राहिलेले नाही’ असे तो जाणतो.” पाचवे. ๖. พาหิรานตฺตสุตฺตํ ६. बाहिरानत्तसुत्त ๖. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. ฉฏฺฐํ. ६. “भिक्खूहो, रूप अनत्ता आहेत. जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धम्म अनत्ता आहेत. जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा...पे... ‘आता या अस्तित्वासाठी काहीही शेष राहिलेले नाही’ असे तो जाणतो.” सहावे. ๗. อชฺฌตฺตานิจฺจาตีตานาคตสุตฺตํ ७. अज्झत्तानिच्चातीतानागतसुत्त ๗. ‘‘จกฺขุํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ อตีตานาคตํ; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนสฺส! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีตสฺมึ จกฺขุสฺมึ อนเปกฺโข โหติ; อนาคตํ จกฺขุํ นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนสฺส จกฺขุสฺส นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหติ. โสตํ อนิจฺจํ… ฆานํ อนิจฺจํ… ชิวฺหา อนิจฺจา อตีตานาคตา; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนาย! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีตาย ชิวฺหาย อนเปกฺโข โหติ; อนาคตํ ชิวฺหํ นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนาย ชิวฺหาย นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหติ. กาโย อนิจฺโจ…เป… มโน อนิจฺโจ อตีตานาคโต; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนสฺส! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีตสฺมึ มนสฺมึ อนเปกฺโข โหติ; อนาคตํ มนํ นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนสฺส มนสฺส นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหตี’’ติ. สตฺตมํ. ७. “भिक्खूहो, भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील चक्षू अनिच्च आहे; मग वर्तमानकाळातील चक्षूविषयी काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील चक्षूविषयी आसक्तीरहित असतो; भविष्यकाळातील चक्षूचे अभिनंदन करत नाही (त्याची आकांक्षा धरत नाही); आणि वर्तमानकाळातील चक्षूच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी प्रतिपन्न (मार्गस्थ) होतो. श्रोत अनिच्च आहे... घ्राण अनिच्च आहे... भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील जिव्हा अनिच्च आहे; मग वर्तमानकाळातील जिव्हेविषयी काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील जिव्हेविषयी आसक्तीरहित असतो; भविष्यकाळातील जिव्हेचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील जिव्हेच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी प्रतिपन्न होतो. काय अनिच्च आहे...पे... भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील मन अनिच्च आहे; मग वर्तमानकाळातील मनाविषयी काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील मनाविषयी आसक्तीरहित असतो; भविष्यकाळातील मनाचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील मनाच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी प्रतिपन्न होतो.” सातवे. ๘. อชฺฌตฺตทุกฺขาตีตานาคตสุตฺตํ ८. अज्झत्तदुक्खातीतानागतसुत्त ๘. ‘‘จกฺขุํ[Pg.239], ภิกฺขเว, ทุกฺขํ อตีตานาคตํ; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนสฺส! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีตสฺมึ จกฺขุสฺมึ อนเปกฺโข โหติ; อนาคตํ จกฺขุํ นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนสฺส จกฺขุสฺส นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหติ. โสตํ ทุกฺขํ…เป… ฆานํ ทุกฺขํ…เป… ชิวฺหา ทุกฺขา อตีตานาคตา; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนาย! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีตาย ชิวฺหาย อนเปกฺโข โหติ; อนาคตํ ชิวฺหํ นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนาย ชิวฺหาย นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหติ. กาโย ทุกฺโข…เป… มโน ทุกฺโข อตีตานาคโต; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนสฺส! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีตสฺมึ มนสฺมึ อนเปกฺโข โหติ; อนาคตํ มนํ นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนสฺส มนสฺส นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหตี’’ติ. อฏฺฐมํ. ८. “भिक्खूहो, भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील चक्षू (डोळा) दुःखकारक आहे; मग वर्तमानकाळातील चक्षूबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील चक्षूविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील चक्षूचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील चक्षूच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो. कान दुःखकारक आहे... नाक दुःखकारक आहे... भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील जिव्हा दुःखकारक आहे; मग वर्तमानकाळातील जिव्हेबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील जिव्हेविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील जिव्हेचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील जिव्हेच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो. काया दुःखकारक आहे... भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील मन दुःखकारक आहे; मग वर्तमानकाळातील मनाबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील मनाविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील मनाचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील मनाच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो.” आठवे. ๙. อชฺฌตฺตานตฺตาตีตานาคตสุตฺตํ ९. अध्यात्म-अनत्ता-अतीत-अनागत सुत्त ๙. ‘‘จกฺขุํ, ภิกฺขเว, อนตฺตา อตีตานาคตํ; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนสฺส! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีตสฺมึ จกฺขุสฺมึ อนเปกฺโข โหติ; อนาคตํ จกฺขุํ นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนสฺส จกฺขุสฺส นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหติ. โสตํ อนตฺตา…เป… ฆานํ อนตฺตา…เป… ชิวฺหา อนตฺตา อตีตานาคตา; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนาย! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีตาย ชิวฺหาย อนเปกฺโข โหติ; อนาคตํ ชิวฺหํ นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนาย ชิวฺหาย นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหติ. กาโย อนตฺตา…เป… มโน อนตฺตา อตีตานาคโต; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนสฺส! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีตสฺมึ มนสฺมึ อนเปกฺโข โหติ; อนาคตํ มนํ นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนสฺส มนสฺส นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหตี’’ติ. นวมํ. ९. “भिक्खूहो, भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील चक्षू अनात्म आहे; मग वर्तमानकाळातील चक्षूबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील चक्षूविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील चक्षूचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील चक्षूच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो. कान अनात्म आहे... नाक अनात्म आहे... भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील जिव्हा अनात्म आहे; मग वर्तमानकाळातील जिव्हेबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील जिव्हेविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील जिव्हेचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील जिव्हेच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो. काया अनात्म आहे... भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील मन अनात्म आहे; मग वर्तमानकाळातील मनाबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील मनाविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील मनाचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील मनाच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो.” नववे. ๑๐. พาหิรานิจฺจาตีตานาคตสุตฺตํ १०. बाह्य-अनिच्च-अतीत-अनागत सुत्त ๑๐. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนิจฺจา อตีตานาคตา; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนานํ! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีเตสุ รูเปสุ [Pg.240] อนเปกฺโข โหติ; อนาคเต รูเป นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนานํ รูปานํ นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหติ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนิจฺจา อตีตานาคตา; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนานํ! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีเตสุ ธมฺเมสุ อนเปกฺโข โหติ; อนาคเต ธมฺเม นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนานํ ธมฺมานํ นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหตี’’ติ. ทสมํ. १०. “भिक्खूहो, भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील रूपे अनित्य आहेत; मग वर्तमानकाळातील रूपांबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील रूपांविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील रूपांचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील रूपांच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील धम्म अनित्य आहेत; मग वर्तमानकाळातील धम्मांबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील धम्मांविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील धम्मांचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील धम्मांच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो.” दहावे. ๑๑. พาหิรทุกฺขาตีตานาคตสุตฺตํ ११. बाह्य-दुःख-अतीत-अनागत सुत्त ๑๑. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, ทุกฺขา อตีตานาคตา; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนานํ! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีเตสุ รูเปสุ อนเปกฺโข โหติ; อนาคเต รูเป นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนานํ รูปานํ นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหตี’’ติ…เป. …. เอกาทสมํ. ११. “भिक्खूहो, भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील रूपे दुःखकारक आहेत; मग वर्तमानकाळातील रूपांबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील रूपांविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील रूपांचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील रूपांच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो.” ...इत्यादी... अकरावे. ๑๒. พาหิรานตฺตาตีตานาคตสุตฺตํ १२. बाह्य-अनत्ता-अतीत-अनागत सुत्त ๑๒. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนตฺตา อตีตานาคตา; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนานํ! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีเตสุ รูเปสุ อนเปกฺโข โหติ; อนาคเต รูเป นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนานํ รูปานํ นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหติ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนตฺตา อตีตานาคตา; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนานํ! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีเตสุ ธมฺเมสุ อนเปกฺโข โหติ; อนาคเต ธมฺเม นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนานํ ธมฺมานํ นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหตี’’ติ. ทฺวาทสมํ. १२. “भिक्खूहो, भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील रूपे अनात्म आहेत; मग वर्तमानकाळातील रूपांबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील रूपांविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील रूपांचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील रूपांच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील धम्म अनात्म आहेत; मग वर्तमानकाळातील धम्मांबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील धम्मांविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील धम्मांचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील धम्मांच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो.” बारावे. อนิจฺจวคฺโค ปฐโม. पहिला अनित्य वर्ग समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) खालीलप्रमाणे आहे – อนิจฺจํ ทุกฺขํ อนตฺตา จ, ตโย อชฺฌตฺตพาหิรา; ยทนิจฺเจน ตโย วุตฺตา, เต เต อชฺฌตฺตพาหิราติ. अनित्य, दुःख आणि अनात्म; हे तीन अध्यात्मिक (अंतर्गत) आणि बाह्य आयतनांविषयी आहेत. 'यदनित्य' (जे अनित्य आहे) या सूत्राने तीन सुत्ते सांगितली आहेत, ती अध्यात्मिक आणि बाह्य आयतनांविषयी आहेत. ๒. ยมกวคฺโค २. यमक वर्ग ๑. ปฐมปุพฺเพสมฺโพธสุตฺตํ १. प्रथम पुब्बेसंबोध सुत्त ๑๓. สาวตฺถินิทานํ[Pg.241]. ‘‘ปุพฺเพว เม, ภิกฺขเว, สมฺโพธา อนภิสมฺพุทฺธสฺส โพธิสตฺตสฺเสว สโต เอตทโหสิ – ‘โก นุ โข จกฺขุสฺส อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณํ? โก โสตสฺส…เป… โก ฆานสฺส… โก ชิวฺหาย… โก กายสฺส… โก มนสฺส อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณ’นฺติ? ตสฺส มยฺหํ, ภิกฺขเว, เอตทโหสิ – ‘ยํ โข จกฺขุํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อยํ จกฺขุสฺส อสฺสาโท. ยํ จกฺขุํ อนิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, อยํ จกฺขุสฺส อาทีนโว. โย จกฺขุสฺมึ ฉนฺทราควินโย ฉนฺทราคปฺปหานํ, อิทํ จกฺขุสฺส นิสฺสรณํ. ยํ โสตํ…เป… ยํ ฆานํ…เป… ยํ ชิวฺหํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อยํ ชิวฺหาย อสฺสาโท. ยํ ชิวฺหา อนิจฺจา ทุกฺขา วิปริณามธมฺมา, อยํ ชิวฺหาย อาทีนโว. โย ชิวฺหาย ฉนฺทราควินโย ฉนฺทราคปฺปหานํ, อิทํ ชิวฺหาย นิสฺสรณํ. ยํ กายํ…เป… ยํ มนํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อยํ มนสฺส อสฺสาโท. ยํ มโน อนิจฺโจ ทุกฺโข วิปริณามธมฺโม, อยํ มนสฺส อาทีนโว. โย มนสฺมึ ฉนฺทราควินโย ฉนฺทราคปฺปหานํ, อิทํ มนสฺส นิสฺสรณ’’’นฺติ. १३. श्रावस्ती येथील निदान. “भिक्खूहो, संबोधी प्राप्त होण्यापूर्वी, मी जेव्हा केवळ एक अबोध बोधिसत्व होतो, तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला – ‘चक्षूचा आस्वाद काय आहे? त्याचा आदीनव काय आहे? आणि त्याचे निस्सरण काय आहे? श्रोताचा... घ्राणाचा... जिव्हेचा... कायेचा... मनाचा आस्वाद काय आहे, आदीनव काय आहे आणि निस्सरण काय आहे?’ भिक्खूहो, तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला – ‘चक्षूवर अवलंबून जे सुख आणि सौमनस्य उत्पन्न होते, हा चक्षूचा आस्वाद आहे. चक्षू जो अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचा आहे, हा चक्षूचा आदीनव आहे. चक्षूविषयीच्या छंदरागाचा जो विनय आणि प्रहाण आहे, हे चक्षूचे निस्सरण आहे. श्रोतावर अवलंबून... घ्राणावर अवलंबून... जिव्हेवर अवलंबून जे सुख आणि सौमनस्य उत्पन्न होते, हा जिव्हेचा आस्वाद आहे. जिव्हा जी अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाची आहे, हा जिव्हेचा आदीनव आहे. जिव्हेविषयीच्या छंदरागाचा जो विनय आणि प्रहाण आहे, हे जिव्हेचे निस्सरण आहे. कायेवर अवलंबून... मनावर अवलंबून जे सुख आणि सौमनस्य उत्पन्न होते, हा मनाचा आस्वाद आहे. मन जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, हा मनाचा आदीनव आहे. मनाविषयीच्या छंदरागाचा जो विनय आणि प्रहाण आहे, हे मनाचे निस्सरण आहे.’” ‘‘ยาวกีวญฺจาหํ, ภิกฺขเว, อิเมสํ ฉนฺนํ อชฺฌตฺติกานํ อายตนานํ เอวํ อสฺสาทญฺจ อสฺสาทโต, อาทีนวญฺจ อาทีนวโต, นิสฺสรณญฺจ นิสฺสรณโต ยถาภูตํ นาพฺภญฺญาสึ, เนว ตาวาหํ, ภิกฺขเว, สเทวเก โลเก สมารเก สพฺรหฺมเก สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย ‘อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุทฺโธ’ติ ปจฺจญฺญาสึ. ยโต จ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อิเมสํ ฉนฺนํ อชฺฌตฺติกานํ อายตนานํ เอวํ อสฺสาทญฺจ อสฺสาทโต, อาทีนวญฺจ อาทีนวโต, นิสฺสรณญฺจ นิสฺสรณโต ยถาภูตํ อพฺภญฺญาสึ, อถาหํ, ภิกฺขเว, สเทวเก โลเก สมารเก สพฺรหฺมเก สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย ‘อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุทฺโธ’ติ ปจฺจญฺญาสึ. ญาณญฺจ ปน เม ทสฺสนํ อุทปาทิ – ‘อกุปฺปา เม วิมุตฺติ, อยมนฺติมา ชาติ, นตฺถิ ทานิ ปุนพฺภโว’’’ติ. ปฐมํ. “भिक्खूहो, जोपर्यंत मी या सहा आध्यात्मिक (अंतर्गत) आयतनांचे अशा प्रकारे आस्वाद आस्वादाच्या रूपाने, आदीनव आदीनवाच्या रूपाने आणि निस्सरण निस्सरणाच्या रूपाने यथार्थपणे जाणले नव्हते, तोपर्यंत, भिक्खूहो, मी देव, मार आणि ब्रह्मासह असणाऱ्या या लोकात, श्रमण-ब्राह्मण, देव आणि मनुष्यांसह असणाऱ्या या प्रजेमध्ये ‘अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त केली आहे’ असे घोषित केले नाही. परंतु, भिक्खूहो, जेव्हा मी या सहा आध्यात्मिक आयतनांचे अशा प्रकारे आस्वाद आस्वादाच्या रूपाने, आदीनव आदीनवाच्या रूपाने आणि निस्सरण निस्सरणाच्या रूपाने यथार्थपणे जाणले, तेव्हाच, भिक्खूहो, मी देव, मार आणि ब्रह्मासह असणाऱ्या या लोकात, श्रमण-ब्राह्मण, देव आणि मनुष्यांसह असणाऱ्या या प्रजेमध्ये ‘अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त केली आहे’ असे घोषित केले. माझ्यामध्ये हे ज्ञान आणि दर्शन उत्पन्न झाले – ‘माझी विमुक्ती अढळ आहे, हा माझा अंतिम जन्म आहे, आता पुनर्भव नाही.’” पहिले. ๒. ทุติยปุพฺเพสมฺโพธสุตฺตํ २. दुसरे पुब्बेसंबोध सुत्त ๑๔. ‘‘ปุพฺเพว [Pg.242] เม, ภิกฺขเว, สมฺโพธา อนภิสมฺพุทฺธสฺส โพธิสตฺตสฺเสว สโต เอตทโหสิ – ‘โก นุ โข รูปานํ อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณํ? โก สทฺทานํ…เป… โก คนฺธานํ… โก รสานํ… โก โผฏฺฐพฺพานํ… โก ธมฺมานํ อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณ’นฺติ? ตสฺส มยฺหํ, ภิกฺขเว, เอตทโหสิ – ‘ยํ โข รูเป ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อยํ รูปานํ อสฺสาโท. ยํ รูปา อนิจฺจา ทุกฺขา วิปริณามธมฺมา, อยํ รูปานํ อาทีนโว. โย รูเปสุ ฉนฺทราควินโย ฉนฺทราคปฺปหานํ, อิทํ รูปานํ นิสฺสรณํ. ยํ สทฺเท… คนฺเธ… รเส… โผฏฺฐพฺเพ… ยํ ธมฺเม ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อยํ ธมฺมานํ อสฺสาโท. ยํ ธมฺมา อนิจฺจา ทุกฺขา วิปริณามธมฺมา, อยํ ธมฺมานํ อาทีนโว. โย ธมฺเมสุ ฉนฺทราควินโย ฉนฺทราคปฺปหานํ, อิทํ ธมฺมานํ นิสฺสรณ’’’นฺติ. १४. “भिक्खूहो, संबोधी प्राप्त होण्यापूर्वी, मी अनुत्तर बुद्ध नसताना, केवळ बोधिसत्त्व असताना माझ्या मनात असा विचार आला – ‘रूपांचा आस्वाद काय आहे? आदीनव (दोष) काय आहे? निस्सरण (मुक्ती) काय आहे? शब्दांचा... पे... गंधांचा... रसांचा... स्पर्शांचा... धर्मांचा आस्वाद काय आहे? आदीनव काय आहे? निस्सरण काय आहे?’ भिक्खूहो, तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला – ‘रूपांवर अवलंबून जे सुख आणि सोमनस्य (आनंद) उत्पन्न होते, हा रूपांचा आस्वाद आहे. रूपे जी अनित्य, दुःखद आणि परिवर्तनशील स्वभावाची आहेत, हा रूपांचा आदीनव आहे. रूपांविषयीच्या छंदरागाचा (इच्छा आणि आसक्तीचा) जो विनय (संयम) आणि प्रहाण (त्याग) आहे, हे रूपांचे निस्सरण आहे. शब्दांवर... गंधांवर... रसांवर... स्पर्शांवर... धर्मांवर अवलंबून जे सुख आणि सोमनस्य उत्पन्न होते, हा धर्मांचा आस्वाद आहे. धर्म जे अनित्य, दुःखद आणि परिवर्तनशील स्वभावाची आहेत, हा धर्मांचा आदीनव आहे. धर्मांविषयीच्या छंदरागाचा जो विनय आणि प्रहाण आहे, हे धर्मांचे निस्सरण आहे.’” ‘‘ยาวกีวญฺจาหํ, ภิกฺขเว, อิเมสํ ฉนฺนํ พาหิรานํ อายตนานํ เอวํ อสฺสาทญฺจ อสฺสาทโต, อาทีนวญฺจ อาทีนวโต, นิสฺสรณญฺจ นิสฺสรณโต ยถาภูตํ นาพฺภญฺญาสึ, เนว ตาวาหํ, ภิกฺขเว, สเทวเก โลเก สมารเก สพฺรหฺมเก สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย ‘อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุทฺโธ’ติ ปจฺจญฺญาสึ. ยโต จ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อิเมสํ ฉนฺนํ พาหิรานํ อายตนานํ เอวํ อสฺสาทญฺจ อสฺสาทโต, อาทีนวญฺจ อาทีนวโต, นิสฺสรณญฺจ นิสฺสรณโต ยถาภูตํ อพฺภญฺญาสึ, อถาหํ, ภิกฺขเว, สเทวเก โลเก สมารเก สพฺรหฺมเก สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย ‘อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุทฺโธ’ติ ปจฺจญฺญาสึ. ญาณญฺจ ปน เม ทสฺสนํ อุทปาทิ – ‘อกุปฺปา เม วิมุตฺติ, อยมนฺติมา ชาติ, นตฺถิ ทานิ ปุนพฺภโว’’’ติ. ทุติยํ. “भिक्खूहो, जोपर्यंत मी या सहा बाह्य आयतनांचे अशा प्रकारे आस्वाद आस्वादाच्या रूपाने, आदीनव आदीनवाच्या रूपाने आणि निस्सरण निस्सरणाच्या रूपाने यथार्थपणे जाणले नव्हते, तोपर्यंत, भिक्खूहो, मी देव, मार आणि ब्रह्मासह असणाऱ्या या लोकात, श्रमण-ब्राह्मण, देव आणि मनुष्यांसह असणाऱ्या या प्रजेमध्ये ‘अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त केली आहे’ असे घोषित केले नाही. परंतु, भिक्खूहो, जेव्हा मी या सहा बाह्य आयतनांचे अशा प्रकारे आस्वाद आस्वादाच्या रूपाने, आदीनव आदीनवाच्या रूपाने आणि निस्सरण निस्सरणाच्या रूपाने यथार्थपणे जाणले, तेव्हाच, भिक्खूहो, मी देव, मार आणि ब्रह्मासह असणाऱ्या या लोकात, श्रमण-ब्राह्मण, देव आणि मनुष्यांसह असणाऱ्या या प्रजेमध्ये ‘अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त केली आहे’ असे घोषित केले. माझ्यामध्ये हे ज्ञान आणि दर्शन उत्पन्न झाले – ‘माझी विमुक्ती अढळ आहे, हा माझा अंतिम जन्म आहे, आता पुनर्भव नाही.’” दुसरे. ๓. ปฐมอสฺสาทปริเยสนสุตฺตํ ३. पहिले आस्वादपरियेसन सुत्त ๑๕. ‘‘จกฺขุสฺสาหํ, ภิกฺขเว, อสฺสาทปริเยสนํ อจรึ. โย จกฺขุสฺส อสฺสาโท ตทชฺฌคมํ. ยาวตา จกฺขุสฺส อสฺสาโท ปญฺญาย เม โส สุทิฏฺโฐ. จกฺขุสฺสาหํ, ภิกฺขเว, อาทีนวปริเยสนํ อจรึ. โย จกฺขุสฺส อาทีนโว ตทชฺฌคมํ. ยาวตา จกฺขุสฺส อาทีนโว ปญฺญาย เม โส สุทิฏฺโฐ. จกฺขุสฺสาหํ, ภิกฺขเว, นิสฺสรณปริเยสนํ อจรึ. ยํ จกฺขุสฺส นิสฺสรณํ ตทชฺฌคมํ. ยาวตา จกฺขุสฺส นิสฺสรณํ, ปญฺญาย เม ตํ สุทิฏฺฐํ. โสตสฺสาหํ[Pg.243], ภิกฺขเว… ฆานสฺสาหํ, ภิกฺขเว… ชิวฺหายาหํ ภิกฺขเว, อสฺสาทปริเยสนํ อจรึ. โย ชิวฺหาย อสฺสาโท ตทชฺฌคมํ. ยาวตา ชิวฺหาย อสฺสาโท ปญฺญาย เม โส สุทิฏฺโฐ. ชิวฺหายาหํ, ภิกฺขเว, อาทีนวปริเยสนํ อจรึ. โย ชิวฺหาย อาทีนโว ตทชฺฌคมํ. ยาวตา ชิวฺหาย อาทีนโว ปญฺญาย เม โส สุทิฏฺโฐ. ชิวฺหายาหํ, ภิกฺขเว, นิสฺสรณปริเยสนํ อจรึ. ยํ ชิวฺหาย นิสฺสรณํ ตทชฺฌคมํ. ยาวตา ชิวฺหาย นิสฺสรณํ, ปญฺญาย เม ตํ สุทิฏฺฐํ. มนสฺสาหํ, ภิกฺขเว, อสฺสาทปริเยสนํ อจรึ. โย มนสฺส อสฺสาโท ตทชฺฌคมํ. ยาวตา มนสฺส อสฺสาโท ปญฺญาย เม โส สุทิฏฺโฐ. มนสฺสาหํ, ภิกฺขเว, อาทีนวปริเยสนํ อจรึ. โย มนสฺส อาทีนโว ตทชฺฌคมํ. ยาวตา มนสฺส อาทีนโว ปญฺญาย เม โส สุทิฏฺโฐ. มนสฺสาหํ, ภิกฺขเว, นิสฺสรณปริเยสนํ อจรึ. ยํ มนสฺส นิสฺสรณํ ตทชฺฌคมํ. ยาวตา มนสฺส นิสฺสรณํ, ปญฺญาย เม ตํ สุทิฏฺฐํ. १५. “भिक्खूहो, मी डोळ्याच्या (चक्षूच्या) आस्वादाचा शोध घेतला. डोळ्याचा जो आस्वाद आहे, तो मी प्राप्त केला. डोळ्याचा जितका आस्वाद आहे, तो मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिला. भिक्खूहो, मी डोळ्याच्या आदीनवाचा (दोषाचा) शोध घेतला. डोळ्याचा जो आदीनव आहे, तो मी प्राप्त केला. डोळ्याचा जितका आदीनव आहे, तो मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिला. भिक्खूहो, मी डोळ्याच्या निस्सरणाचा (मुक्तीचा) शोध घेतला. डोळ्याचे जे निस्सरण आहे, ते मी प्राप्त केले. डोळ्याचे जितके निस्सरण आहे, ते मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिले. भिक्खूहो, कानाच्या... नाकाच्या... जिभेच्या आस्वादाचा मी शोध घेतला. जिभेचा जो आस्वाद आहे, तो मी प्राप्त केला. जिभेचा जितका आस्वाद आहे, तो मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिला. भिक्खूहो, मी जिभेच्या आदीनवाचा शोध घेतला. जिभेचा जो आदीनव आहे, तो मी प्राप्त केला. जिभेचा जितका आदीनव आहे, तो मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिला. भिक्खूहो, मी जिभेच्या निस्सरणाचा शोध घेतला. जिभेचे जे निस्सरण आहे, ते मी प्राप्त केले. जिभेचे जितके निस्सरण आहे, ते मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिले. भिक्खूहो, मी मनाच्या आस्वादाचा शोध घेतला. मनाचा जो आस्वाद आहे, तो मी प्राप्त केला. मनाचा जितका आस्वाद आहे, तो मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिला. भिक्खूहो, मी मनाच्या आदीनवाचा शोध घेतला. मनाचा जो आदीनव आहे, तो मी प्राप्त केला. मनाचा जितका आदीनव आहे, तो मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिला. भिक्खूहो, मी मनाच्या निस्सरणाचा शोध घेतला. मनाचे जे निस्सरण आहे, ते मी प्राप्त केले. मनाचे जितके निस्सरण आहे, ते मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिले.” ‘‘ยาวกีวญฺจาหํ, ภิกฺขเว, อิเมสํ ฉนฺนํ อชฺฌตฺติกานํ อายตนานํ อสฺสาทญฺจ อสฺสาทโต, อาทีนวญฺจ อาทีนวโต, นิสฺสรณญฺจ นิสฺสรณโต ยถาภูตํ นาพฺภญฺญาสึ…เป… ปจฺจญฺญาสึ. ญาณญฺจ ปน เม ทสฺสนํ อุทปาทิ – ‘อกุปฺปา เม วิมุตฺติ, อยมนฺติมา ชาติ, นตฺถิ ทานิ ปุนพฺภโว’’’ติ. ตติยํ. “भिक्खूहो, जोपर्यंत मी या सहा आध्यात्मिक आयतनांचे आस्वाद आस्वादाच्या रूपाने, आदीनव आदीनवाच्या रूपाने आणि निस्सरण निस्सरणाच्या रूपाने यथार्थपणे जाणले नव्हते... पे... घोषित केले. माझ्यामध्ये हे ज्ञान आणि दर्शन उत्पन्न झाले – ‘माझी विमुक्ती अढळ आहे, हा माझा अंतिम जन्म आहे, आता पुनर्भव नाही.’” तिसरे. ๔. ทุติยอสฺสาทปริเยสนสุตฺตํ ४. दुसरे आस्वादपरियेसन सुत्त ๑๖. ‘‘รูปานาหํ, ภิกฺขเว, อสฺสาทปริเยสนํ อจรึ. โย รูปานํ อสฺสาโท ตทชฺฌคมํ. ยาวตา รูปานํ อสฺสาโท ปญฺญาย เม โส สุทิฏฺโฐ. รูปานาหํ, ภิกฺขเว, อาทีนวปริเยสนํ อจรึ. โย รูปานํ อาทีนโว ตทชฺฌคมํ. ยาวตา รูปานํ อาทีนโว ปญฺญาย เม โส สุทิฏฺโฐ. รูปานาหํ, ภิกฺขเว, นิสฺสรณปริเยสนํ อจรึ. ยํ รูปานํ นิสฺสรณํ ตทชฺฌคมํ. ยาวตา รูปานํ นิสฺสรณํ, ปญฺญาย เม ตํ สุทิฏฺฐํ. สทฺทานาหํ, ภิกฺขเว… คนฺธานาหํ, ภิกฺขเว… รสานาหํ, ภิกฺขเว… โผฏฺฐพฺพานาหํ, ภิกฺขเว… ธมฺมานาหํ, ภิกฺขเว, อสฺสาทปริเยสนํ อจรึ. โย ธมฺมานํ อสฺสาโท ตทชฺฌคมํ. ยาวตา ธมฺมานํ อสฺสาโท ปญฺญาย เม โส สุทิฏฺโฐ. ธมฺมานาหํ, ภิกฺขเว, อาทีนวปริเยสนํ อจรึ. โย ธมฺมานํ อาทีนโว ตทชฺฌคมํ. ยาวตา ธมฺมานํ อาทีนโว ปญฺญาย เม โส สุทิฏฺโฐ. ธมฺมานาหํ, ภิกฺขเว, นิสฺสรณปริเยสนํ อจรึ. ยํ ธมฺมานํ นิสฺสรณํ ตทชฺฌคมํ. ยาวตา ธมฺมานํ นิสฺสรณํ, ปญฺญาย [Pg.244] เม ตํ สุทิฏฺฐํ. १६. “भिक्षूंनो, मी रूपांच्या आस्वादाचा (सुखाचा) शोध घेत विहार केला. रूपांमध्ये जो काही आस्वाद आहे, तो मी प्राप्त केला. रूपांमध्ये जितका काही आस्वाद आहे, तो मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिला आहे. भिक्षूंनो, मी रूपांमधील दोषांचा (धोक्याचा) शोध घेत विहार केला. रूपांमध्ये जो काही दोष आहे, तो मी प्राप्त केला. रूपांमध्ये जितका काही दोष आहे, तो मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिला आहे. भिक्षूंनो, मी रूपांमधून सुटकेचा (मुक्तीचा) शोध घेत विहार केला. रूपांमधून जी काही सुटका आहे, ती मी प्राप्त केली. रूपांमधून जितकी काही सुटका आहे, ती मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिली आहे. शब्दांच्या... गंधांच्या... रसांच्या... स्पर्शांच्या... भिक्षूंनो, मी धर्मांच्या (मानसिक विषयांच्या) आस्वादाचा शोध घेत विहार केला. धर्मांमध्ये जो काही आस्वाद आहे, तो मी प्राप्त केला. धर्मांमध्ये जितका काही आस्वाद आहे, तो मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिला आहे. भिक्षूंनो, मी धर्मांमधील दोषांचा शोध घेत विहार केला. धर्मांमध्ये जो काही दोष आहे, तो मी प्राप्त केला. धर्मांमध्ये जितका काही दोष आहे, तो मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिला आहे. भिक्षूंनो, मी धर्मांमधून सुटकेचा शोध घेत विहार केला. धर्मांमधून जी काही सुटका आहे, ती मी प्राप्त केली. धर्मांमधून जितकी काही सुटका आहे, ती मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिली आहे.” ‘‘ยาวกีวญฺจาหํ, ภิกฺขเว, อิเมสํ ฉนฺนํ พาหิรานํ อายตนานํ อสฺสาทญฺจ อสฺสาทโต, อาทีนวญฺจ อาทีนวโต, นิสฺสรณญฺจ นิสฺสรณโต ยถาภูตํ นาพฺภญฺญาสึ…เป… ปจฺจญฺญาสึ. ญาณญฺจ ปน เม ทสฺสนํ อุทปาทิ – ‘อกุปฺปา เม วิมุตฺติ, อยมนฺติมา ชาติ, นตฺถิ ทานิ ปุนพฺภโว’’’ติ. จตุตฺถํ. “भिक्षूंनो, जोपर्यंत मी या सहा बाह्य आयतनांचा आस्वाद आस्वादाच्या रूपाने, दोष दोषाच्या रूपाने आणि सुटका सुटकेच्या रूपाने यथार्थपणे जाणली नव्हती... तोपर्यंत... पण जेव्हा मी ती यथार्थपणे जाणली, तेव्हा मी (संबोधी प्राप्त केल्याचे) घोषित केले. माझ्यामध्ये ज्ञान आणि दर्शन उत्पन्न झाले – ‘माझी विमुक्ती अढळ आहे, हा अंतिम जन्म आहे, आता पुनर्जन्म नाही.’” चौथे. ๕. ปฐมโนเจอสฺสาทสุตฺตํ ५. प्रथम नोचेअस्साद सुत्त ๑๗. ‘‘โน เจทํ, ภิกฺขเว, จกฺขุสฺส อสฺสาโท อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา จกฺขุสฺมึ สารชฺเชยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ จกฺขุสฺส อสฺสาโท ตสฺมา สตฺตา จกฺขุสฺมึ สารชฺชนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, จกฺขุสฺส อาทีนโว อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา จกฺขุสฺมึ นิพฺพินฺเทยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ จกฺขุสฺส อาทีนโว ตสฺมา สตฺตา จกฺขุสฺมึ นิพฺพินฺทนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, จกฺขุสฺส นิสฺสรณํ อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา จกฺขุสฺมา นิสฺสเรยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ จกฺขุสฺส นิสฺสรณํ ตสฺมา สตฺตา จกฺขุสฺมา นิสฺสรนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, โสตสฺส อสฺสาโท อภวิสฺส… โน เจทํ, ภิกฺขเว, ฆานสฺส อสฺสาโท อภวิสฺส… โน เจทํ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาย อสฺสาโท อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา ชิวฺหาย สารชฺเชยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ ชิวฺหาย อสฺสาโท, ตสฺมา สตฺตา ชิวฺหาย สารชฺชนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาย อาทีนโว อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา ชิวฺหาย นิพฺพินฺเทยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ ชิวฺหาย อาทีนโว, ตสฺมา สตฺตา ชิวฺหาย นิพฺพินฺทนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาย นิสฺสรณํ อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา ชิวฺหาย นิสฺสเรยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ ชิวฺหาย นิสฺสรณํ, ตสฺมา สตฺตา ชิวฺหาย นิสฺสรนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, กายสฺส อสฺสาโท อภวิสฺส… โน เจทํ, ภิกฺขเว, มนสฺส อสฺสาโท อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา มนสฺมึ สารชฺเชยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ มนสฺส อสฺสาโท, ตสฺมา สตฺตา มนสฺมึ สารชฺชนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, มนสฺส อาทีนโว อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา มนสฺมึ นิพฺพินฺเทยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ มนสฺส อาทีนโว, ตสฺมา สตฺตา มนสฺมึ นิพฺพินฺทนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, มนสฺส นิสฺสรณํ อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา มนสฺมา นิสฺสเรยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ มนสฺส นิสฺสรณํ, ตสฺมา สตฺตา มนสฺมา นิสฺสรนฺติ. १७. “भिक्षूंनो, जर डोळ्यांमध्ये आस्वाद नसता, तर प्राणी डोळ्यांवर आसक्त झाले नसते. परंतु, भिक्षूंनो, डोळ्यांमध्ये आस्वाद आहे, म्हणूनच प्राणी डोळ्यांवर आसक्त होतात. जर डोळ्यांमध्ये दोष नसता, तर प्राणी डोळ्यांविषयी विरक्त झाले नसते. परंतु, भिक्षूंनो, डोळ्यांमध्ये दोष आहे, म्हणूनच प्राणी डोळ्यांविषयी विरक्त होतात. जर डोळ्यांमधून सुटका नसती, तर प्राणी डोळ्यांमधून मुक्त झाले नसते. परंतु, भिक्षूंनो, डोळ्यांमधून सुटका आहे, म्हणूनच प्राणी डोळ्यांमधून मुक्त होतात. भिक्षूंनो, जर कानांमध्ये आस्वाद नसता... जर नाकामध्ये आस्वाद नसता... जर जिभेमध्ये आस्वाद नसता, तर प्राणी जिभेवर आसक्त झाले नसते. परंतु, भिक्षूंनो, जिभेमध्ये आस्वाद आहे, म्हणूनच प्राणी जिभेवर आसक्त होतात. जर जिभेमध्ये दोष नसता, तर प्राणी जिभेविषयी विरक्त झाले नसते. परंतु, भिक्षूंनो, जिभेमध्ये दोष आहे, म्हणूनच प्राणी जिभेविषयी विरक्त होतात. जर जिभेतून सुटका नसती, तर प्राणी जिभेतून मुक्त झाले नसते. परंतु, भिक्षूंनो, जिभेतून सुटका आहे, म्हणूनच प्राणी जिभेतून मुक्त होतात. भिक्षूंनो, जर शरीरामध्ये आस्वाद नसता... जर मनामध्ये आस्वाद नसता, तर प्राणी मनावर आसक्त झाले नसते. परंतु, भिक्षूंनो, मनामध्ये आस्वाद आहे, म्हणूनच प्राणी मनावर आसक्त होतात. जर मनामध्ये दोष नसता, तर प्राणी मनाविषयी विरक्त झाले नसते. परंतु, भिक्षूंनो, मनामध्ये दोष आहे, म्हणूनच प्राणी मनाविषयी विरक्त होतात. जर मनामधून सुटका नसती, तर प्राणी मनामधून मुक्त झाले नसते. परंतु, भिक्षूंनो, मनामधून सुटका आहे, म्हणूनच प्राणी मनामधून मुक्त होतात.” ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, สตฺตา อิเมสํ ฉนฺนํ อชฺฌตฺติกานํ อายตนานํ [Pg.245] อสฺสาทญฺจ อสฺสาทโต, อาทีนวญฺจ อาทีนวโต, นิสฺสรณญฺจ นิสฺสรณโต ยถาภูตํ นาพฺภญฺญํสุ, เนว ตาว, ภิกฺขเว, สตฺตา สเทวกา โลกา สมารกา สพฺรหฺมกา สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย นิสฺสฏา วิสญฺญุตฺตา วิปฺปมุตฺตา วิมริยาทีกเตน เจตสา วิหรึสุ. ยโต จ โข, ภิกฺขเว, สตฺตา อิเมสํ ฉนฺนํ อชฺฌตฺติกานํ อายตนานํ อสฺสาทญฺจ อสฺสาทโต, อาทีนวญฺจ อาทีนวโต, นิสฺสรณญฺจ นิสฺสรณโต ยถาภูตํ อพฺภญฺญํสุ, อถ, ภิกฺขเว, สตฺตา สเทวกา โลกา สมารกา สพฺรหฺมกา สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย นิสฺสฏา วิสญฺญุตฺตา วิปฺปมุตฺตา วิมริยาทีกเตน เจตสา วิหรนฺตี’’ติ. ปญฺจมํ. “भिक्षूंनो, जोपर्यंत प्राण्यांनी या सहा आध्यात्मिक आयतनांचा आस्वाद आस्वादाच्या रूपाने, दोष दोषाच्या रूपाने आणि सुटका सुटकेच्या रूपाने यथार्थपणे जाणली नव्हती, तोपर्यंत भिक्षूंनो, देव, मार आणि ब्रह्मासहित या जगातून, तसेच श्रमण-ब्राह्मण, देव आणि मनुष्यांसह या प्रजेमधून प्राणी बाहेर पडले नव्हते, अलिप्त झाले नव्हते, मुक्त झाले नव्हते आणि मर्यादामुक्त चित्ताने विहार करत नव्हते. परंतु भिक्षूंनो, जेव्हा प्राण्यांनी या सहा आध्यात्मिक आयतनांचा आस्वाद आस्वादाच्या रूपाने, दोष दोषाच्या रूपाने आणि सुटका सुटकेच्या रूपाने यथार्थपणे जाणली, तेव्हा भिक्षूंनो, देव, मार आणि ब्रह्मासहित या जगातून, तसेच श्रमण-ब्राह्मण, देव आणि मनुष्यांसह या प्रजेमधून प्राणी बाहेर पडले आहेत, अलिप्त झाले आहेत, मुक्त झाले आहेत आणि मर्यादामुक्त चित्ताने विहार करतात.” पाचवे. ๖. ทุติยโนเจอสฺสาทสุตฺตํ ६. द्वितीय नोचेअस्साद सुत्त ๑๘. ‘‘โน เจทํ, ภิกฺขเว, รูปานํ อสฺสาโท อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา รูเปสุ สารชฺเชยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ รูปานํ อสฺสาโท, ตสฺมา สตฺตา รูเปสุ สารชฺชนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, รูปานํ อาทีนโว อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา รูเปสุ นิพฺพินฺเทยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ รูปานํ อาทีนโว, ตสฺมา สตฺตา รูเปสุ นิพฺพินฺทนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, รูปานํ นิสฺสรณํ อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา รูเปหิ นิสฺสเรยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ รูปานํ นิสฺสรณํ, ตสฺมา สตฺตา รูเปหิ นิสฺสรนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, สทฺทานํ… คนฺธานํ… รสานํ… โผฏฺฐพฺพานํ… ธมฺมานํ อสฺสาโท อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา ธมฺเมสุ สารชฺเชยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ ธมฺมานํ อสฺสาโท, ตสฺมา สตฺตา ธมฺเมสุ สารชฺชนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, ธมฺมานํ อาทีนโว อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา ธมฺเมสุ นิพฺพินฺเทยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ ธมฺมานํ อาทีนโว, ตสฺมา สตฺตา ธมฺเมสุ นิพฺพินฺทนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, ธมฺมานํ นิสฺสรณํ อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา ธมฺเมหิ นิสฺสเรยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ ธมฺมานํ นิสฺสรณํ, ตสฺมา สตฺตา ธมฺเมหิ นิสฺสรนฺติ. १८. “भिक्खूंनो, जर रूपांचा आस्वाद नसता, तर प्राणी रूपांमध्ये आसक्त झाले नसते. परंतु, भिक्खूंनो, रूपांचा आस्वाद आहे, म्हणूनच प्राणी रूपांमध्ये आसक्त होतात. भिक्खूंनो, जर रूपांचा आदीनव नसता, तर प्राणी रूपांविषयी निर्वेद पावले नसते. परंतु, भिक्खूंनो, रूपांचा आदीनव आहे, म्हणूनच प्राणी रूपांविषयी निर्वेद पावतात. भिक्खूंनो, जर रूपांचे निस्सरण नसती, तर प्राणी रूपांमधून मुक्त झाले नसते. परंतु, भिक्खूंनो, रूपांचे निस्सरण आहे, म्हणूनच प्राणी रूपांमधून मुक्त होतात. भिक्खूंनो, जर शब्दांचा... गंधांचा... रसांचा... स्पर्शांचा... धम्मांचा आस्वाद नसता, तर प्राणी धम्मांमध्ये आसक्त झाले नसते. परंतु, भिक्खूंनो, धम्मांचा आस्वाद आहे, म्हणूनच प्राणी धम्मांमध्ये आसक्त होतात. भिक्खूंनो, जर धम्मांचा आदीनव नसता, तर प्राणी धम्मांविषयी निर्वेद पावले नसते. परंतु, भिक्खूंनो, धम्मांचा आदीनव आहे, म्हणूनच प्राणी धम्मांविषयी निर्वेद पावतात. भिक्खूंनो, जर धम्मांचे निस्सरण नसती, तर प्राणी धम्मांमधून मुक्त झाले नसते. परंतु, भिक्खूंनो, धम्मांचे निस्सरण आहे, म्हणूनच प्राणी धम्मांमधून मुक्त होतात.” ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, สตฺตา อิเมสํ ฉนฺนํ พาหิรานํ อายตนานํ อสฺสาทญฺจ อสฺสาทโต, อาทีนวญฺจ อาทีนวโต, นิสฺสรณญฺจ นิสฺสรณโต ยถาภูตํ นาพฺภญฺญํสุ, เนว ตาว, ภิกฺขเว, สตฺตา สเทวกา โลกา สมารกา สพฺรหฺมกา สสฺสมณพฺราหฺมณิยา [Pg.246] ปชาย สเทวมนุสฺสาย นิสฺสฏา วิสญฺญุตฺตา วิปฺปมุตฺตา วิมริยาทีกเตน เจตสา วิหรึสุ. ยโต จ โข, ภิกฺขเว, สตฺตา อิเมสํ ฉนฺนํ พาหิรานํ อายตนานํ อสฺสาทญฺจ อสฺสาทโต, อาทีนวญฺจ อาทีนวโต, นิสฺสรณญฺจ นิสฺสรณโต ยถาภูตํ อพฺภญฺญํสุ, อถ, ภิกฺขเว, สตฺตา สเทวกา โลกา สมารกา สพฺรหฺมกา สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย นิสฺสฏา วิสญฺญุตฺตา วิปฺปมุตฺตา วิมริยาทีกเตน เจตสา วิหรนฺตี’’ติ. ฉฏฺฐํ. “भिक्खूंनो, जोपर्यंत प्राण्यांनी या सहा बाह्य आयतनांचा आस्वाद आस्वादाच्या रूपाने, आदीनव आदीनवाच्या रूपाने आणि निस्सरण निस्सरणाच्या रूपाने यथाभूत (आहे तसे) जाणले नव्हते, तोपर्यंत, भिक्खूंनो, देव, मार आणि ब्रह्मासह या लोकात, श्रमण-ब्राह्मण, देव आणि मनुष्यांसह या प्रजेमध्ये प्राणी मुक्त, विसंयुक्त, विप्रमुक्त आणि अमर्याद चित्ताने विहरत नव्हते. परंतु, भिक्खूंनो, जेव्हा प्राण्यांनी या सहा बाह्य आयतनांचा आस्वाद आस्वादाच्या रूपाने, आदीनव आदीनवाच्या रूपाने आणि निस्सरण निस्सरणाच्या रूपाने यथाभूत जाणले, तेव्हा, भिक्खूंनो, देव, मार आणि ब्रह्मासह या लोकात, श्रमण-ब्राह्मण, देव आणि मनुष्यांसह या प्रजेमध्ये प्राणी मुक्त, विसंयुक्त, विप्रमुक्त आणि अमर्याद चित्ताने विहरतात.” सहावे. ๗. ปฐมาภินนฺทสุตฺตํ ७. पठम अभिनंद सुत्त ๑๙. ‘‘โย, ภิกฺขเว, จกฺขุํ อภินนฺทติ, ทุกฺขํ โส อภินนฺทติ. โย ทุกฺขํ อภินนฺทติ, อปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมาติ วทามิ. โย โสตํ…เป… โย ฆานํ…เป… โย ชิวฺหํ อภินนฺทติ, ทุกฺขํ โส อภินนฺทติ. โย ทุกฺขํ อภินนฺทติ, อปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมาติ วทามิ. โย กายํ…เป… โย มนํ อภินนฺทติ, ทุกฺขํ โส อภินนฺทติ. โย ทุกฺขํ อภินนฺทติ, อปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมา’’ติ วทามิ. १९. “भिक्खूंनो, जो डोळ्याचे अभिनंदन करतो, तो दुःखाचे अभिनंदन करतो. जो दुःखाचे अभिनंदन करतो, तो दुःखातून मुक्त झालेला नाही, असे मी म्हणतो. जो कानाचे... जो नाकाचे... जो जिभेचे अभिनंदन करतो, तो दुःखाचे अभिनंदन करतो. जो दुःखाचे अभिनंदन करतो, तो दुःखातून मुक्त झालेला नाही, असे मी म्हणतो. जो शरीराचे... जो मनाचे अभिनंदन करतो, तो दुःखाचे अभिनंदन करतो. जो दुःखाचे अभिनंदन करतो, तो दुःखातून मुक्त झालेला नाही, असे मी म्हणतो.” ‘‘โย จ โข, ภิกฺขเว, จกฺขุํ นาภินนฺทติ, ทุกฺขํ โส นาภินนฺทติ. โย ทุกฺขํ นาภินนฺทติ, ปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมาติ วทามิ. โย โสตํ…เป… โย ฆานํ…เป… โย ชิวฺหํ นาภินนฺทติ, ทุกฺขํ โส นาภินนฺทติ. โย ทุกฺขํ นาภินนฺทติ, ปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมาติ วทามิ. โย กายํ…เป… โย มนํ นาภินนฺทติ, ทุกฺขํ โส นาภินนฺทติ. โย ทุกฺขํ นาภินนฺทติ, ปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมา’’ติ วทามิ. สตฺตมํ. “परंतु भिक्खूंनो, जो डोळ्याचे अभिनंदन करत नाही, तो दुःखाचे अभिनंदन करत नाही. जो दुःखाचे अभिनंदन करत नाही, तो दुःखातून मुक्त झाला आहे, असे मी म्हणतो. जो कानाचे... जो नाकाचे... जो जिभेचे अभिनंदन करत नाही, तो दुःखाचे अभिनंदन करत नाही. जो दुःखाचे अभिनंदन करत नाही, तो दुःखातून मुक्त झाला आहे, असे मी म्हणतो. जो शरीराचे... जो मनाचे अभिनंदन करत नाही, तो दुःखाचे अभिनंदन करत नाही. जो दुःखाचे अभिनंदन करत नाही, तो दुःखातून मुक्त झाला आहे, असे मी म्हणतो.” सातवे. ๘. ทุติยาภินนฺทสุตฺตํ ८. दुतिय अभिनंद सुत्त ๒๐. ‘‘โย, ภิกฺขเว, รูเป อภินนฺทติ, ทุกฺขํ โส อภินนฺทติ. โย ทุกฺขํ อภินนฺทติ, อปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมาติ วทามิ. โย สทฺเท…เป… คนฺเธ… รเส… โผฏฺฐพฺเพ… ธมฺเม อภินนฺทติ, ทุกฺขํ โส อภินนฺทติ. โย ทุกฺขํ อภินนฺทติ, อปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมา’’ติ วทามิ. २०. “भिक्खूंनो, जो रूपांचे अभिनंदन करतो, तो दुःखाचे अभिनंदन करतो. जो दुःखाचे अभिनंदन करतो, तो दुःखातून मुक्त झालेला नाही, असे मी म्हणतो. जो शब्दांचे... गंधांचे... रसांचे... स्पर्शांचे... धम्मांचे अभिनंदन करतो, तो दुःखाचे अभिनंदन करतो. जो दुःखाचे अभिनंदन करतो, तो दुःखातून मुक्त झालेला नाही, असे मी म्हणतो.” ‘‘โย จ โข, ภิกฺขเว, รูเป นาภินนฺทติ, ทุกฺขํ โส นาภินนฺทติ. โย ทุกฺขํ นาภินนฺทติ, ปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมาติ วทามิ. โย สทฺเท…เป… คนฺเธ… รเส… โผฏฺฐพฺเพ… ธมฺเม นาภินนฺทติ, ทุกฺขํ โส นาภินนฺทติ. โย ทุกฺขํ นาภินนฺทติ, ปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมา’’ติ วทามิ. อฏฺฐมํ. “परंतु भिक्खूंनो, जो रूपांचे अभिनंदन करत नाही, तो दुःखाचे अभिनंदन करत नाही. जो दुःखाचे अभिनंदन करत नाही, तो दुःखातून मुक्त झाला आहे, असे मी म्हणतो. जो शब्दांचे... गंधांचे... रसांचे... स्पर्शांचे... धम्मांचे अभिनंदन करत नाही, तो दुःखाचे अभिनंदन करत नाही. जो दुःखाचे अभिनंदन करत नाही, तो दुःखातून मुक्त झाला आहे, असे मी म्हणतो.” आठवे. ๙. ปฐมทุกฺขุปฺปาทสุตฺตํ ९. पठम दुक्खुप्पाद सुत्त ๒๑. ‘‘โย[Pg.247], ภิกฺขเว, จกฺขุสฺส อุปฺปาโท ฐิติ อภินิพฺพตฺติ ปาตุภาโว, ทุกฺขสฺเสโส อุปฺปาโท, โรคานํ ฐิติ, ชรามรณสฺส ปาตุภาโว. โย โสตสฺส…เป… โย ฆานสฺส… โย ชิวฺหาย… โย กายสฺส… โย มนสฺส อุปฺปาโท ฐิติ อภินิพฺพตฺติ ปาตุภาโว, ทุกฺขสฺเสโส อุปฺปาโท, โรคานํ ฐิติ, ชรามรณสฺส ปาตุภาโว. २१. “भिक्खूंनो, डोळ्याचा जो उत्पाद, स्थिती, अभिनिर्वृत्ती आणि प्रादुर्भाव आहे, तो दुःखाचा उत्पाद आहे, रोगांची स्थिती आहे आणि जरामरणाचा प्रादुर्भाव आहे. कानाचा... नाकाचा... जिभेचा... शरीराचा... मनाचा जो उत्पाद, स्थिती, अभिनिर्वृत्ती आणि प्रादुर्भाव आहे, तो दुःखाचा उत्पाद आहे, रोगांची स्थिती आहे आणि जरामरणाचा प्रादुर्भाव आहे.” ‘‘โย จ โข, ภิกฺขเว, จกฺขุสฺส นิโรโธ วูปสโม อตฺถงฺคโม, ทุกฺขสฺเสโส นิโรโธ, โรคานํ วูปสโม, ชรามรณสฺส อตฺถงฺคโม. โย โสตสฺส… โย ฆานสฺส… โย ชิวฺหาย… โย กายสฺส… โย มนสฺส นิโรโธ วูปสโม อตฺถงฺคโม, ทุกฺขสฺเสโส นิโรโธ, โรคานํ วูปสโม, ชรามรณสฺส อตฺถงฺคโม’’ติ. นวมํ. “परंतु भिक्खूंनो, डोळ्याचा जो निरोध, उपशम आणि अस्त आहे, तो दुःखाचा निरोध आहे, रोगांचा उपशम आहे आणि जरामरणाचा अस्त आहे. कानाचा... नाकाचा... जिभेचा... शरीराचा... मनाचा जो निरोध, उपशम आणि अस्त आहे, तो दुःखाचा निरोध आहे, रोगांचा उपशम आहे आणि जरामरणाचा अस्त आहे.” नववे. ๑๐. ทุติยทุกฺขุปฺปาทสุตฺตํ १०. दुतिय दुक्खुप्पाद सुत्त ๒๒. ‘‘โย, ภิกฺขเว, รูปานํ อุปฺปาโท ฐิติ อภินิพฺพตฺติ ปาตุภาโว, ทุกฺขสฺเสโส อุปฺปาโท, โรคานํ ฐิติ, ชรามรณสฺส ปาตุภาโว. โย สทฺทานํ…เป… โย คนฺธานํ… โย รสานํ… โย โผฏฺฐพฺพานํ… โย ธมฺมานํ อุปฺปาโท ฐิติ อภินิพฺพตฺติ ปาตุภาโว, ทุกฺขสฺเสโส อุปฺปาโท, โรคานํ ฐิติ, ชรามรณสฺส ปาตุภาโว. २२. “भिक्खूंनो, रूपांचा जो उत्पाद, स्थिती, अभिनिर्वृत्ती आणि प्रादुर्भाव आहे, तो दुःखाचा उत्पाद आहे, रोगांची स्थिती आहे आणि जरामरणाचा प्रादुर्भाव आहे. शब्दांचा... गंधांचा... रसांचा... स्पर्शांचा... धम्मांचा जो उत्पाद, स्थिती, अभिनिर्वृत्ती आणि प्रादुर्भाव आहे, तो दुःखाचा उत्पाद आहे, रोगांची स्थिती आहे आणि जरामरणाचा प्रादुर्भाव आहे.” ‘‘โย จ โข, ภิกฺขเว, รูปานํ นิโรโธ วูปสโม อตฺถงฺคโม, ทุกฺขสฺเสโส นิโรโธ, โรคานํ วูปสโม, ชรามรณสฺส อตฺถงฺคโม. โย สทฺทานํ…เป… โย คนฺธานํ… โย รสานํ… โย โผฏฺฐพฺพานํ… โย ธมฺมานํ นิโรโธ วูปสโม อตฺถงฺคโม, ทุกฺขสฺเสโส นิโรโธ, โรคานํ วูปสโม, ชรามรณสฺส อตฺถงฺคโม’’ติ. ทสมํ. “परंतु भिक्खूंनो, रूपांचा जो निरोध, उपशम आणि अस्त आहे, तो दुःखाचा निरोध आहे, रोगांचा उपशम आहे आणि जरामरणाचा अस्त आहे. शब्दांचा... गंधांचा... रसांचा... स्पर्शांचा... धम्मांचा जो निरोध, उपशम आणि अस्त आहे, तो दुःखाचा निरोध आहे, रोगांचा उपशम आहे आणि जरामरणाचा अस्त आहे.” दहावे. ยมกวคฺโค ทุติโย. दुसरा यमकवग्ग समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याची उद्दान (अनुक्रमणिका) - สมฺโพเธน ทุเว วุตฺตา, อสฺสาเทน อปเร ทุเว; โน เจเตน ทุเว วุตฺตา, อภินนฺเทน อปเร ทุเว; อุปฺปาเทน ทุเว วุตฺตา, วคฺโค เตน ปวุจฺจตีติ. संबोधीविषयी दोन सुत्ते सांगितले आहेत, आस्वादाविषयी इतर दोन; 'नो चेत' (जर नसता) याविषयी दोन सांगितले आहेत, अभिनंदनाविषयी इतर दोन; उत्पादाविषयी दोन सांगितले आहेत, म्हणूनच याला वग्ग (वर्ग) म्हटले जाते. ๓. สพฺพวคฺโค ३. सब्बवग्ग ๑. สพฺพสุตฺตํ १. सब्बसुत्त ๒๓. สาวตฺถินิทานํ[Pg.248]. ‘‘สพฺพํ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, สพฺพํ? จกฺขุญฺเจว รูปา จ, โสตญฺจ สทฺทา จ, ฆานญฺจ คนฺธา จ, ชิวฺหา จ รสา จ, กาโย จ โผฏฺฐพฺพา จ, มโน จ ธมฺมา จ – อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, สพฺพํ. โย, ภิกฺขเว, เอวํ วเทยฺย – ‘อหเมตํ สพฺพํ ปจฺจกฺขาย อญฺญํ สพฺพํ ปญฺญาเปสฺสามี’ติ, ตสฺส วาจาวตฺถุกเมวสฺส ; ปุฏฺโฐ จ น สมฺปาเยยฺย, อุตฺตริญฺจ วิฆาตํ อาปชฺเชยฺย. ตํ กิสฺส เหตุ? ยถา ตํ, ภิกฺขเว, อวิสยสฺมิ’’นฺติ. ปฐมํ. २३. श्रावस्ती येथील प्रसंग. “भिक्खून्नों, मी तुम्हांला 'सर्व' उपदेशीन. ते लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खून्नों, 'सर्व' म्हणजे काय? डोळा आणि रूपे, कान आणि शब्द, नाक आणि गंध, जीभ आणि रस, शरीर आणि स्पर्श, मन आणि धम्म (मानसिक विषय) – भिक्खून्नों, यालाच 'सर्व' असे म्हटले जाते. भिक्खून्नों, जर कोणी असे म्हणेल की—'मी या सर्वाचा त्याग करून दुसऱ्या एखाद्या 'सर्वा'ची प्रज्ञापना (घोषणा) करीन', तर त्याचे ते बोलणे केवळ पोकळ बडबड ठरेल; आणि विचारले असता तो त्याचे स्पष्टीकरण देऊ शकणार नाही, उलट अधिकच संभ्रमात पडेल. असे का? कारण, भिक्खून्नों, ते त्याच्या कक्षेबाहेरचे आहे.” पहिले सुत्त. ๒. ปหานสุตฺตํ २. प्रहाण सुत्त ๒๔. ‘‘สพฺพปฺปหานาย โว, ภิกฺขเว, ธมฺมํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, สพฺพปฺปหานาย ธมฺโม? จกฺขุํ, ภิกฺขเว, ปหาตพฺพํ, รูปา ปหาตพฺพา, จกฺขุวิญฺญาณํ ปหาตพฺพํ, จกฺขุสมฺผสฺโส ปหาตพฺโพ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ปหาตพฺพํ…เป… ยมฺปิทํ โสตสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ปหาตพฺพํ… ยมฺปิทํ ฆานสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ปหาตพฺพํ. ชิวฺหา ปหาตพฺพา, รสา ปหาตพฺพา, ชิวฺหาวิญฺญาณํ ปหาตพฺพํ, ชิวฺหาสมฺผสฺโส ปหาตพฺโพ, ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ปหาตพฺพํ. กาโย ปหาตพฺโพ… มโน ปหาตพฺโพ, ธมฺมา ปหาตพฺพา, มโนวิญฺญาณํ ปหาตพฺพํ, มโนสมฺผสฺโส ปหาตพฺโพ, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ปหาตพฺพํ. อยํ โข, ภิกฺขเว, สพฺพปฺปหานาย ธมฺโม’’ติ. ทุติยํ. २४. “भिक्खून्नों, सर्वाच्या प्रहाणासाठी (त्यागासाठी) मी तुम्हांला धम्माचा उपदेश करीन. तो ऐका. आणि भिक्खून्नों, सर्वाच्या प्रहाणासाठी असलेला धम्म कोणता? भिक्खून्नों, डोळ्याचा त्याग केला पाहिजे, रूपांचा त्याग केला पाहिजे, चक्षु-विज्ञानाचा त्याग केला पाहिजे, चक्षु-स्पर्शाचा त्याग केला पाहिजे; आणि चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिचाही त्याग केला पाहिजे...पे... श्रोत-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिचाही त्याग केला पाहिजे... घ्राण-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिचाही त्याग केला पाहिजे. जिभेचा त्याग केला पाहिजे, रसांचा त्याग केला पाहिजे, जिव्हा-विज्ञानाचा त्याग केला पाहिजे, जिव्हा-स्पर्शाचा त्याग केला पाहिजे; आणि जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिचाही त्याग केला पाहिजे. शरीराचा त्याग केला पाहिजे... मनाचा त्याग केला पाहिजे, धम्मांचा त्याग केला पाहिजे, मनो-विज्ञानाचा त्याग केला पाहिजे, मनो-स्पर्शाचा त्याग केला पाहिजे; आणि मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिचाही त्याग केला पाहिजे. भिक्खून्नों, हाच सर्वाच्या प्रहाणासाठी असलेला धम्म आहे.” दुसरे सुत्त. ๓. อภิญฺญาปริญฺญาปหานสุตฺตํ ३. अभिज्ञा-परिज्ञा-प्रहाण सुत्त ๒๕. ‘‘สพฺพํ อภิญฺญา ปริญฺญา ปหานาย โว, ภิกฺขเว, ธมฺมํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, สพฺพํ อภิญฺญา ปริญฺญา ปหานาย ธมฺโม? จกฺขุํ, ภิกฺขเว, อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพํ, รูปา อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพา[Pg.249], จกฺขุวิญฺญาณํ อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพํ, จกฺขุสมฺผสฺโส อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺโพ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพํ…เป… ชิวฺหา อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพา, รสา อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพา, ชิวฺหาวิญฺญาณํ อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพํ, ชิวฺหาสมฺผสฺโส อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺโพ, ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพํ. กาโย อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺโพ… มโน อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺโพ, ธมฺมา อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพา, มโนวิญฺญาณํ อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพํ, มโนสมฺผสฺโส อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺโพ, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพํ. อยํ โข, ภิกฺขเว, สพฺพํ อภิญฺญา ปริญฺญา ปหานาย ธมฺโม’’ติ. ตติยํ. २५. “भिक्खून्नों, सर्वांना विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून आणि त्यांचा त्याग करण्यासाठी मी तुम्हांला धम्माचा उपदेश करीन. तो ऐका. आणि भिक्खून्नों, सर्वांना विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून आणि त्यांचा त्याग करण्यासाठी असलेला धम्म कोणता? भिक्खून्नों, डोळा विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागला पाहिजे; रूपे विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागली पाहिजेत; चक्षु-विज्ञान विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागले पाहिजे; चक्षु-स्पर्श विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागला पाहिजे; आणि चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तीही विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागली पाहिजे...पे... जिभेचा विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्याग केला पाहिजे; रसांचा विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्याग केला पाहिजे; जिव्हा-विज्ञान विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागले पाहिजे; जिव्हा-स्पर्श विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागला पाहिजे; आणि जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तीही विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागली पाहिजे. शरीराचा विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्याग केला पाहिजे... मन विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागले पाहिजे; धम्म विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागले पाहिजेत; मनो-विज्ञान विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागले पाहिजे; मनो-स्पर्श विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागला पाहिजे; आणि मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तीही विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागली पाहिजे. भिक्खून्नों, हाच सर्वांना विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून आणि त्यांचा त्याग करण्यासाठी असलेला धम्म आहे.” तिसरे सुत्त. ๔. ปฐมอปริชานนสุตฺตํ ४. प्रथम अपरिज्ञान सुत्त ๒๖. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. กิญฺจ, ภิกฺขเว, อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย? จกฺขุํ, ภิกฺขเว, อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. รูเป อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. จกฺขุวิญฺญาณํ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. จกฺขุสมฺผสฺสํ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย…เป… ชิวฺหํ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. รเส…เป… ชิวฺหาวิญฺญาณํ…เป… ชิวฺหาสมฺผสฺสํ…เป… ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. กายํ…เป… มนํ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. ธมฺเม…เป… มโนวิญฺญาณํ…เป… มโนสมฺผสฺสํ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ [Pg.250] อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. อิทํ โข, ภิกฺขเว, สพฺพํ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. २६. “भिक्खून्नों, सर्वांना विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, त्यांच्याविषयी वैराग्य न बाळगता आणि त्यांचा त्याग न करता, मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो. आणि भिक्खून्नों, असे कोणते 'सर्व' आहे, ज्याला विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि त्याचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो? भिक्खून्नों, डोळ्याला विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि त्याचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो. रूपांना विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि त्यांचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो. चक्षु-विज्ञानाला विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि त्याचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो. चक्षु-स्पर्शाला विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि त्याचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो. आणि चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिलाही विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि तिचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो...पे... जिभेला विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि तिचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो. रसांना...पे... जिव्हा-विज्ञानाला... जिव्हा-स्पर्शाला... आणि जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिलाही विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि तिचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो. शरीराला... मनाला विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि त्याचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो. धम्मांना... मनो-विज्ञानाला... मनो-स्पर्शाला... आणि मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिलाही विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि तिचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो. भिक्खून्नों, हेच ते 'सर्व' आहे, ज्याला विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि त्याचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो.” ‘‘สพฺพญฺจ โข, ภิกฺขเว, อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. กิญฺจ, ภิกฺขเว, สพฺพํ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย? จกฺขุํ, ภิกฺขเว, อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. รูเป อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. จกฺขุวิญฺญาณํ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. จกฺขุสมฺผสฺสํ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย…เป… ชิวฺหํ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. รเส…เป… ชิวฺหาวิญฺญาณํ…เป… ชิวฺหาสมฺผสฺสํ…เป… ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. กายํ…เป… มนํ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. ธมฺเม…เป… มโนวิญฺญาณํ…เป… มโนสมฺผสฺสํ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. อิทํ โข, ภิกฺขเว, สพฺพํ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยายา’’ติ. จตุตฺถํ. "भिक्खूहो, सर्व गोष्टींना विशेष ज्ञानाने जाणून (अभिज्ञान), पूर्णपणे समजून (परिज्ञान), त्यावरील आसक्ती दूर करून (विराग) आणि त्यांचा त्याग करूनच मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो. आणि भिक्खूहो, ते सर्व काय आहे, ज्याला विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि त्याचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो? भिक्खूहो, डोळ्याला विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि त्याचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो. रूपांना... चक्खू-विज्ञानाला... चक्खू-संस्पर्शाला... आणि चक्खू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्यालाही विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि त्याचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो...पे... जिभेला विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि तिचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो. रसांना... जिव्हा-विज्ञानाला... जिव्हा-संस्पर्शाला... आणि जिव्हा-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्यालाही विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि त्याचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो. शरीराला (कायेला)... मनाला विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि त्याचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो. धर्मांना (मानसिक विषयांना)... मनो-विज्ञानाला... मनो-संस्पर्शाला... आणि मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्यालाही विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि त्याचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो. भिक्खूहो, हेच ते सर्व आहे ज्याला विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि त्याचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो." चौथे. ๕. ทุติยอปริชานนสุตฺตํ ५. "दुसरे अपरिज्ञान सुत्त" ๒๗. ‘‘สพฺพํ[Pg.251], ภิกฺขเว, อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. กิญฺจ, ภิกฺขเว, สพฺพํ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย? ยญฺจ, ภิกฺขเว, จกฺขุ, เย จ รูปา, ยญฺจ จกฺขุวิญฺญาณํ, เย จ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา…เป… ยา จ ชิวฺหา, เย จ รสา, ยญฺจ ชิวฺหาวิญฺญาณํ, เย จ ชิวฺหาวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา; โย จ กาโย, เย จ โผฏฺฐพฺพา, ยญฺจ กายวิญฺญาณํ, เย จ กายวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา; โย จ มโน, เย จ ธมฺมา, ยญฺจ มโนวิญฺญาณํ, เย จ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา – อิทํ โข, ภิกฺขเว, สพฺพํ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. २७. "भिक्खूहो, सर्व गोष्टींना विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, त्यावरील आसक्ती दूर न करता आणि त्यांचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास अपात्र ठरतो. आणि भिक्खूहो, ते सर्व काय आहे, ज्याला विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, त्यावरील आसक्ती दूर न करता आणि त्याचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास अपात्र ठरतो? भिक्खूहो, जो डोळा, जे रूप, जे चक्खू-विज्ञान आणि चक्खू-विज्ञानाने जाणले जाणारे जे धर्म आहेत...पे... जी जीभ, जे रस, जे जिव्हा-विज्ञान आणि जिव्हा-विज्ञानाने जाणले जाणारे जे धर्म आहेत; जे शरीर, जे स्पर्श, जे काय-विज्ञान आणि काय-विज्ञानाने जाणले जाणारे जे धर्म आहेत; जे मन, जे धर्म, जे मनो-विज्ञान आणि मनो-विज्ञानाने जाणले जाणारे जे धर्म आहेत – भिक्खूहो, हेच ते सर्व आहे ज्याला विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, त्यावरील आसक्ती दूर न करता आणि त्याचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास अपात्र ठरतो." ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. กิญฺจ, ภิกฺขเว, สพฺพํ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย? ยญฺจ, ภิกฺขเว, จกฺขุ, เย จ รูปา, ยญฺจ จกฺขุวิญฺญาณํ, เย จ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา…เป… ยา จ ชิวฺหา, เย จ รสา, ยญฺจ ชิวฺหาวิญฺญาณํ, เย จ ชิวฺหาวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา; โย จ กาโย, เย จ โผฏฺฐพฺพา, ยญฺจ กายวิญฺญาณํ, เย จ กายวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา; โย จ มโน, เย จ ธมฺมา, ยญฺจ มโนวิญฺญาณํ, เย จ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา – อิทํ โข, ภิกฺขเว, สพฺพํ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยายา’’ติ. ปญฺจมํ. "भिक्खूहो, सर्व गोष्टींना विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि त्यांचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो. आणि भिक्खूहो, ते सर्व काय आहे, ज्याला विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि त्याचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो? भिक्खूहो, जो डोळा, जे रूप, जे चक्खू-विज्ञान आणि चक्खू-विज्ञानाने जाणले जाणारे जे धर्म आहेत...पे... जी जीभ, जे रस, जे जिव्हा-विज्ञान आणि जिव्हा-विज्ञानाने जाणले जाणारे जे धर्म आहेत; जे शरीर, जे स्पर्श, जे काय-विज्ञान आणि काय-विज्ञानाने जाणले जाणारे जे धर्म आहेत; जे मन, जे धर्म, जे मनो-विज्ञान आणि मनो-विज्ञानाने जाणले जाणारे जे धर्म आहेत – भिक्खूहो, हेच ते सर्व आहे ज्याला विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि त्याचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो." पाचवे. ๖. อาทิตฺตสุตฺตํ ६. "आदित्तसुत्त" ๒๘. เอกํ สมยํ ภควา คยายํ วิหรติ คยาสีเส สทฺธึ ภิกฺขุสหสฺเสน. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อาทิตฺตํ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, สพฺพํ อาทิตฺตํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, อาทิตฺตํ, รูปา อาทิตฺตา, จกฺขุวิญฺญาณํ อาทิตฺตํ, จกฺขุสมฺผสฺโส อาทิตฺโต. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อาทิตฺตํ. เกน อาทิตฺตํ? ‘ราคคฺคินา, โทสคฺคินา, โมหคฺคินา อาทิตฺตํ, ชาติยา ชราย มรเณน โสเกหิ ปริเทเวหิ ทุกฺเขหิ โทมนสฺเสหิ อุปายาเสหิ อาทิตฺต’นฺติ วทามิ…เป… ชิวฺหา อาทิตฺตา, รสา อาทิตฺตา, ชิวฺหาวิญฺญาณํ อาทิตฺตํ, ชิวฺหาสมฺผสฺโส อาทิตฺโต. ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อาทิตฺตํ. เกน อาทิตฺตํ? ‘ราคคฺคินา, โทสคฺคินา, โมหคฺคินา อาทิตฺตํ, ชาติยา ชราย มรเณน โสเกหิ ปริเทเวหิ ทุกฺเขหิ โทมนสฺเสหิ อุปายาเสหิ อาทิตฺต’นฺติ วทามิ…เป… มโน อาทิตฺโต, ธมฺมา อาทิตฺตา, มโนวิญฺญาณํ อาทิตฺตํ, มโนสมฺผสฺโส อาทิตฺโต. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อาทิตฺตํ. เกน อาทิตฺตํ? ‘ราคคฺคินา, โทสคฺคินา, โมหคฺคินา อาทิตฺตํ, ชาติยา ชราย มรเณน โสเกหิ ปริเทเวหิ ทุกฺเขหิ โทมนสฺเสหิ อุปายาเสหิ อาทิตฺต’นฺติ วทามิ. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ [Pg.252] เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ …เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. อิทมโวจ ภควา. อตฺตมนา เต ภิกฺขู ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทุํ. อิมสฺมิญฺจ ปน เวยฺยากรณสฺมึ ภญฺญมาเน ตสฺส ภิกฺขุสหสฺสสฺส อนุปาทาย อาสเวหิ จิตฺตานิ วิมุจฺจึสูติ. ฉฏฺฐํ. २८. "एकदा भगवान गया येथे गयासीस डोंगरावर एक हजार भिक्खूंच्या संघासह विहार करत होते. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – “भिक्खूहो, सर्व काही जळत आहे. आणि भिक्खूहो, ते सर्व काय आहे जे जळत आहे? भिक्खूहो, डोळा जळत आहे, रूपे जळत आहेत, चक्खू-विज्ञान जळत आहे, चक्खू-संस्पर्श जळत आहे. आणि चक्खू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, तेही जळत आहे. ते कशाने जळत आहे? मी सांगतो की, ते ‘राग-अग्नीने, द्वेष-अग्नीने, मोह-अग्नीने जळत आहे; जन्म, जरा, मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्स आणि उपायासाने जळत आहे’...पे... जीभ जळत आहे, रस जळत आहेत, जिव्हा-विज्ञान जळत आहे, जिव्हा-संस्पर्श जळत आहे. आणि जिव्हा-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, तेही जळत आहे. ते कशाने जळत आहे? मी सांगतो की, ते ‘राग-अग्नीने, द्वेष-अग्नीने, मोह-अग्नीने जळत आहे; जन्म, जरा, मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्स आणि उपायासाने जळत आहे’...पे... मन जळत आहे, धर्म जळत आहेत, मनो-विज्ञान जळत आहे, मनो-संस्पर्श जळत आहे. आणि मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, तेही जळत आहे. ते कशाने जळत आहे? मी सांगतो की, ते ‘राग-अग्नीने, द्वेष-अग्नीने, मोह-अग्नीने जळत आहे; जन्म, जरा, मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्स आणि उपायासाने जळत आहे’. भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक डोळ्याविषयीही निर्वेद पावतो, रूपांविषयीही निर्वेद पावतो, चक्खू-विज्ञानाविषयीही निर्वेद पावतो, चक्खू-संस्पर्शाविषयीही निर्वेद पावतो, आणि चक्खू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही निर्वेद पावतो...पे... आणि मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्याने तो विरक्त होतो; विरक्त झाल्याने तो मुक्त होतो. मुक्त झाल्यावर ‘मी मुक्त झालो आहे’ असे ज्ञान त्याला होते. ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे कर्तव्य होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही’ असे तो जाणतो.” भगवंत असे म्हणाले. संतुष्ट होऊन त्या भिक्खूंनी भगवंतांच्या भाषणाचे मनापासून अभिनंदन केले. आणि हे प्रवचन दिले जात असतानाच, त्या एक हजार भिक्खूंची चित्ते उपादानरहित होऊन आसवांपासून मुक्त झाली." सहावे. ๗. อทฺธภูตสุตฺตํ ७. "अद्धभूतसुत्त" ๒๙. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อทฺธภูตํ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, สพฺพํ อทฺธภูตํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, อทฺธภูตํ, รูปา อทฺธภูตา, จกฺขุวิญฺญาณํ อทฺธภูตํ, จกฺขุสมฺผสฺโส อทฺธภูโต, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อทฺธภูตํ. เกน อทฺธภูตํ? ‘ชาติยา ชราย มรเณน โสเกหิ ปริเทเวหิ ทุกฺเขหิ โทมนสฺเสหิ อุปายาเสหิ อทฺธภูต’นฺติ วทามิ…เป… ชิวฺหา อทฺธภูตา, รสา อทฺธภูตา, ชิวฺหาวิญฺญาณํ อทฺธภูตํ, ชิวฺหาสมฺผสฺโส อทฺธภูโต, ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อทฺธภูตํ. เกน อทฺธภูตํ? ‘ชาติยา ชราย มรเณน โสเกหิ ปริเทเวหิ ทุกฺเขหิ โทมนสฺเสหิ อุปายาเสหิ อทฺธภูต’นฺติ วทามิ. กาโย อทฺธภูโต…เป… มโน อทฺธภูโต, ธมฺมา อทฺธภูตา, มโนวิญฺญาณํ อทฺธภูตํ, มโนสมฺผสฺโส อทฺธภูโต, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อทฺธภูตํ. เกน อทฺธภูตํ? ‘ชาติยา ชราย มรเณน โสเกหิ ปริเทเวหิ ทุกฺเขหิ โทมนสฺเสหิ อุปายาเสหิ อทฺธภูต’นฺติ วทามิ. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ[Pg.253], วิราคา วิมุจฺจติ, วิมุตฺตสฺมึ ‘วิมุตฺต’มิติ ญาณํ โหติ, ‘ขีณา ชาติ วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. สตฺตมํ. २९. असे मी ऐकले आहे - एका वेळी भगवान राजगृहात वेळुवनातील कलंदकनिवाप येथे विहार करत होते. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले - "भिक्खूंनो, सर्व काही आक्रांत आहे. आणि भिक्खूंनो, सर्व काही कशाने आक्रांत आहे? भिक्खूंनो, चक्षु आक्रांत आहे, रूप आक्रांत आहेत, चक्षु-विज्ञाण आक्रांत आहे, चक्षु-संस्पर्श आक्रांत आहे, आणि चक्षु-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, ती देखील आक्रांत आहे. ती कशाने आक्रांत आहे? 'ती जन्म, जरा, मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास यांनी आक्रांत आहे,' असे मी म्हणतो... पे... जिव्हा आक्रांत आहे, रस आक्रांत आहेत, जिव्हा-विज्ञाण आक्रांत आहे, जिव्हा-संस्पर्श आक्रांत आहे, आणि जिव्हा-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, ती देखील आक्रांत आहे. ती कशाने आक्रांत आहे? 'ती जन्म, जरा, मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायासाने आक्रांत आहे,' असे मी म्हणतो. काय आक्रांत आहे... पे... मन आक्रांत आहे, धम्म आक्रांत आहेत, मनो-विज्ञाण आक्रांत आहे, मनो-संस्पर्श आक्रांत आहे, आणि मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, ती देखील आक्रांत आहे. ती कशाने आक्रांत आहे? 'ती जन्म, जरा, मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायासाने आक्रांत आहे,' असे मी म्हणतो. भिक्खूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षुविषयी निर्वेद पावतो, रूपांविषयी निर्वेद पावतो, चक्षु-विज्ञाणाविषयी निर्वेद पावतो, चक्षु-संस्पर्शाविषयी निर्वेद पावतो... पे... मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिच्याविषयीही निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्याने तो विरक्त होतो; विरक्त झाल्यामुळे तो विमुक्त होतो. विमुक्त झाल्यावर 'मी मुक्त झालो आहे' असे ज्ञान होते. 'जन्म क्षीण झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे कर्तव्य होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही,' असे तो जाणतो." सातवे सूत्र. ๘. สมุคฺฆาตสารุปฺปสุตฺตํ ८. समुग्घातसारुप्प सुत्त ๓๐. ‘‘สพฺพมญฺญิตสมุคฺฆาตสารุปฺปํ โว, ภิกฺขเว, ปฏิปทํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ, สาธุกํ มนสิ กโรถ; ภาสิสฺสามีติ. กตมา จ สา, ภิกฺขเว, สพฺพมญฺญิตสมุคฺฆาตสารุปฺปา ปฏิปทา? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุํ น มญฺญติ, จกฺขุสฺมึ น มญฺญติ, จกฺขุโต น มญฺญติ, จกฺขุํ เมติ น มญฺญติ. รูเป น มญฺญติ, รูเปสุ น มญฺญติ, รูปโต น มญฺญติ, รูปา เมติ น มญฺญติ. จกฺขุวิญฺญาณํ น มญฺญติ, จกฺขุวิญฺญาณสฺมึ น มญฺญติ, จกฺขุวิญฺญาณโต น มญฺญติ, จกฺขุวิญฺญาณํ เมติ น มญฺญติ. จกฺขุสมฺผสฺสํ น มญฺญติ, จกฺขุสมฺผสฺสสฺมึ น มญฺญติ, จกฺขุสมฺผสฺสโต น มญฺญติ, จกฺขุสมฺผสฺโส เมติ น มญฺญติ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺญติ, ตสฺมิมฺปิ น มญฺญติ, ตโตปิ น มญฺญติ, ตํ เมติ น มญฺญติ…เป… ชิวฺหํ น มญฺญติ, ชิวฺหาย น มญฺญติ, ชิวฺหาโต น มญฺญติ, ชิวฺหา เมติ น มญฺญติ. รเส น มญฺญติ, รเสสุ น มญฺญติ, รสโต น มญฺญติ, รสา เมติ น มญฺญติ. ชิวฺหาวิญฺญาณํ น มญฺญติ, ชิวฺหาวิญฺญาณสฺมึ น มญฺญติ, ชิวฺหาวิญฺญาณโต น มญฺญติ, ชิวฺหาวิญฺญาณํ เมติ น มญฺญติ. ชิวฺหาสมฺผสฺสํ น มญฺญติ, ชิวฺหาสมฺผสฺสสฺมึ น มญฺญติ, ชิวฺหาสมฺผสฺสโต น มญฺญติ, ชิวฺหาสมฺผสฺโส เมติ น มญฺญติ. ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺญติ, ตสฺมิมฺปิ น มญฺญติ, ตโตปิ น มญฺญติ, ตํ เมติ น มญฺญติ…เป… มนํ น มญฺญติ, มนสฺมึ น มญฺญติ, มนโต น มญฺญติ, มโน เมติ น มญฺญติ. ธมฺเม น มญฺญติ, ธมฺเมสุ น มญฺญติ, ธมฺมโต น มญฺญติ, ธมฺมา เมติ น มญฺญติ. มโนวิญฺญาณํ น มญฺญติ, มโนวิญฺญาณสฺมึ น มญฺญติ, มโนวิญฺญาณโต น มญฺญติ, มโนวิญฺญาณํ เมติ น มญฺญติ. มโนสมฺผสฺสํ น มญฺญติ, มโนสมฺผสฺสสฺมึ น มญฺญติ, มโนสมฺผสฺสโต น มญฺญติ, มโนสมฺผสฺโส เมติ น มญฺญติ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺญติ, ตสฺมิมฺปิ น มญฺญติ, ตโตปิ น มญฺญติ, ตํ เมติ น มญฺญติ. สพฺพํ น มญฺญติ, สพฺพสฺมึ น มญฺญติ, สพฺพโต น มญฺญติ, สพฺพํ เมติ น มญฺญติ. โส เอวํ อมญฺญมาโน [Pg.254] น จ กิญฺจิ โลเก อุปาทิยติ. อนุปาทิยํ น ปริตสฺสติ. อปริตสฺสํ ปจฺจตฺตญฺเญว ปรินิพฺพายติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาติ. อยํ โข สา, ภิกฺขเว, สพฺพมญฺญิตสมุคฺฆาตสารุปฺปา ปฏิปทา’’ติ. อฏฺฐมํ. ३०. "भिक्खूंनो, मी तुम्हाला सर्व कल्पनांचे समूळ उच्चाटन करण्यास अनुकूल असणारी प्रतिपदा सांगेन. ती लक्षपूर्वक ऐका, नीट मनात ठेवा; मी बोलेन." "आणि भिक्खूंनो, सर्व कल्पनांचे समूळ उच्चाटन करण्यास अनुकूल असणारी ती प्रतिपदा कोणती? भिक्खूंनो, या शासनात भिक्खू चक्षूला कल्पित नाही, चक्षूमध्ये कल्पना करत नाही, चक्षूपासून कल्पना करत नाही, 'चक्षू माझा आहे' अशी कल्पना करत नाही. रूपांना कल्पित नाही, रूपांमध्ये कल्पना करत नाही, रूपांपासून कल्पना करत नाही, 'रूपे माझी आहेत' अशी कल्पना करत नाही. चक्षु-विज्ञाणाला कल्पित नाही, चक्षु-विज्ञाणामध्ये कल्पना करत नाही, चक्षु-विज्ञाणापासून कल्पना करत नाही, 'चक्षु-विज्ञाण माझे आहे' अशी कल्पना करत नाही. चक्षु-संस्पर्शाला कल्पित नाही, चक्षु-संस्पर्शामध्ये कल्पना करत नाही, चक्षु-संस्पर्शापासून कल्पना करत नाही, 'चक्षु-संस्पर्श माझा आहे' अशी कल्पना करत नाही. आणि चक्षु-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिलाही तो कल्पित नाही, तिच्यामध्ये कल्पना करत नाही, तिच्यापासून कल्पना करत नाही, 'ती माझी आहे' अशी कल्पना करत नाही... पे... जिव्हेला कल्पित नाही, जिव्हेमध्ये कल्पना करत नाही, जिव्हेपासून कल्पना करत नाही, 'जिव्हा माझी आहे' अशी कल्पना करत नाही. रसांना कल्पित नाही, रसांमध्ये कल्पना करत नाही, रसांपासून कल्पना करत नाही, 'रस माझे आहेत' अशी कल्पना करत नाही. जिव्हा-विज्ञाणाला कल्पित नाही, जिव्हा-विज्ञाणामध्ये कल्पना करत नाही, जिव्हा-विज्ञाणापासून कल्पना करत नाही, 'जिव्हा-विज्ञाण माझे आहे' अशी कल्पना करत नाही. जिव्हा-संस्पर्शाला कल्पित नाही, जिव्हा-संस्पर्शामध्ये कल्पना करत नाही, जिव्हा-संस्पर्शापासून कल्पना करत नाही, 'जिव्हा-संस्पर्श माझा आहे' अशी कल्पना करत नाही. आणि जिव्हा-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिलाही तो कल्पित नाही, तिच्यामध्ये कल्पना करत नाही, तिच्यापासून कल्पना करत नाही, 'ती माझी आहे' अशी कल्पना करत नाही... पे... मनाला कल्पित नाही, मनामध्ये कल्पना करत नाही, मनापासून कल्पना करत नाही, 'मन माझे आहे' अशी कल्पना करत नाही. धम्मांना कल्पित नाही, धम्मांमध्ये कल्पना करत नाही, धम्मांपासून कल्पना करत नाही, 'धम्म माझे आहेत' अशी कल्पना करत नाही. मनो-विज्ञाणाला कल्पित नाही, मनो-विज्ञाणामध्ये कल्पना करत नाही, मनो-विज्ञाणापासून कल्पना करत नाही, 'मनो-विज्ञाण माझे आहे' अशी कल्पना करत नाही. मनो-संस्पर्शाला कल्पित नाही, मनो-संस्पर्शामध्ये कल्पना करत नाही, मनो-संस्पर्शापासून कल्पना करत नाही, 'मनो-संस्पर्श माझा आहे' अशी कल्पना करत नाही. आणि मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिलाही तो कल्पित नाही, तिच्यामध्ये कल्पना करत नाही, तिच्यापासून कल्पना करत नाही, 'ती माझी आहे' अशी कल्पना करत नाही. सर्वाला कल्पित नाही, सर्वामध्ये कल्पना करत नाही, सर्वापासून कल्पना करत नाही, 'सर्व माझे आहे' अशी कल्पना करत नाही. तो अशा प्रकारे कल्पना न करणारा या लोकात कशाचेही उपादान करत नाही. उपादान न केल्यामुळे तो व्याकुळ होत नाही. व्याकुळ न झाल्यामुळे तो स्वतःच परिनिर्वाण प्राप्त करतो. 'जन्म क्षीण झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे कर्तव्य होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही,' असे तो जाणतो. भिक्खूंनो, हीच ती सर्व कल्पनांचे समूळ उच्चाटन करण्यास अनुकूल असणारी प्रतिपदा होय." आठवे सूत्र. ๙. ปฐมสมุคฺฆาตสปฺปายสุตฺตํ ९. पठमसमुग्घातसप्पाय सुत्त ๓๑. ‘‘สพฺพมญฺญิตสมุคฺฆาตสปฺปายํ โว, ภิกฺขเว, ปฏิปทํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตมา จ สา, ภิกฺขเว, สพฺพมญฺญิตสมุคฺฆาตสปฺปายา ปฏิปทา? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุํ น มญฺญติ, จกฺขุสฺมึ น มญฺญติ, จกฺขุโต น มญฺญติ, จกฺขุํ เมติ น มญฺญติ. รูเป น มญฺญติ…เป… จกฺขุวิญฺญาณํ น มญฺญติ, จกฺขุสมฺผสฺสํ น มญฺญติ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺญติ, ตสฺมิมฺปิ น มญฺญติ, ตโตปิ น มญฺญติ, ตํ เมติ น มญฺญติ. ยญฺหิ, ภิกฺขเว, มญฺญติ, ยสฺมึ มญฺญติ, ยโต มญฺญติ, ยํ เมติ มญฺญติ, ตโต ตํ โหติ อญฺญถา. อญฺญถาภาวี ภวสตฺโต โลโก ภวเมวาภินนฺทติ…เป… ชิวฺหํ น มญฺญติ, ชิวฺหาย น มญฺญติ, ชิวฺหาโต น มญฺญติ, ชิวฺหา เมติ น มญฺญติ. รเส น มญฺญติ…เป… ชิวฺหาวิญฺญาณํ น มญฺญติ, ชิวฺหาสมฺผสฺสํ น มญฺญติ. ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺญติ, ตสฺมิมฺปิ น มญฺญติ, ตโตปิ น มญฺญติ, ตํ เมติ น มญฺญติ. ยญฺหิ, ภิกฺขเว, มญฺญติ, ยสฺมึ มญฺญติ, ยโต มญฺญติ, ยํ เมติ มญฺญติ, ตโต ตํ โหติ อญฺญถา. อญฺญถาภาวี ภวสตฺโต โลโก ภวเมวาภินนฺทติ…เป… มนํ น มญฺญติ, มนสฺมึ น มญฺญติ, มนโต น มญฺญติ, มโน เมติ น มญฺญติ. ธมฺเม น มญฺญติ…เป… มโนวิญฺญาณํ น มญฺญติ, มโนสมฺผสฺสํ น มญฺญติ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺญติ, ตสฺมิมฺปิ น มญฺญติ, ตโตปิ น มญฺญติ, ตํ เมติ น มญฺญติ. ยญฺหิ, ภิกฺขเว, มญฺญติ, ยสฺมึ มญฺญติ, ยโต มญฺญติ, ยํ เมติ มญฺญติ, ตโต ตํ โหติ อญฺญถา. อญฺญถาภาวี ภวสตฺโต โลโก ภวเมวาภินนฺทติ. ยาวตา, ภิกฺขเว, ขนฺธธาตุอายตนํ ตมฺปิ น มญฺญติ, ตสฺมิมฺปิ น มญฺญติ, ตโตปิ น มญฺญติ, ตํ เมติ น มญฺญติ. โส เอวํ อมญฺญมาโน น จ กิญฺจิ โลเก อุปาทิยติ. อนุปาทิยํ น ปริตสฺสติ. อปริตสฺสํ ปจฺจตฺตญฺเญว ปรินิพฺพายติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาติ[Pg.255]. อยํ โข สา, ภิกฺขเว, สพฺพมญฺญิตสมุคฺฆาตสปฺปายา ปฏิปทา’’ติ. นวมํ. ३१. भिक्षूंनो, सर्व कल्पनाविलासांचे (अहंकार-ममकाराचे) उच्चाटन करण्यासाठी अनुकूल असलेला मार्ग मी तुम्हांला उपदेशेन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्षूंनो, सर्व कल्पनाविलासांचे उच्चाटन करण्यासाठी अनुकूल असलेला तो मार्ग कोणता आहे? इथे, भिक्षूंनो, भिक्षू डोळ्याविषयी कल्पनाविलास करत नाही, डोळ्यामध्ये कल्पनाविलास करत नाही, डोळ्यापासून कल्पनाविलास करत नाही, 'डोळा माझा आहे' असा कल्पनाविलास करत नाही. रूपांविषयी कल्पनाविलास करत नाही... पे... चक्षु-विज्ञानाविषयी कल्पनाविलास करत नाही, चक्षु-स्पर्शाविषयी कल्पनाविलास करत नाही. चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही तो कल्पनाविलास करत नाही, त्यामध्ये कल्पनाविलास करत नाही, त्यापासून कल्पनाविलास करत नाही, 'ते माझे आहे' असा कल्पनाविलास करत नाही. कारण, भिक्षूंनो, मनुष्य ज्या गोष्टीविषयी कल्पनाविलास करतो, ज्यामध्ये कल्पनाविलास करतो, ज्यापासून कल्पनाविलास करतो, किंवा 'हे माझे आहे' असा कल्पनाविलास करतो, ती गोष्ट त्या कल्पनेपेक्षा वेगळीच होते. हा संसार बदलणारा असूनही, अस्तित्वाशी आसक्त असलेला हा लोक भवामध्येच (पुनर्जन्मातच) आनंद मानतो... पे... जिभेविषयी कल्पनाविलास करत नाही, जिभेमध्ये कल्पनाविलास करत नाही, जिभेपासून कल्पनाविलास करत नाही, 'जीभ माझी आहे' असा कल्पनाविलास करत नाही. रसांविषयी कल्पनाविलास करत नाही... पे... जिव्हा-विज्ञानाविषयी कल्पनाविलास करत नाही, जिव्हा-स्पर्शाविषयी कल्पनाविलास करत नाही. जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही तो कल्पनाविलास करत नाही, त्यामध्ये कल्पनाविलास करत नाही, त्यापासून कल्पनाविलास करत नाही, 'ते माझे आहे' असा कल्पनाविलास करत नाही. कारण, भिक्षूंनो, मनुष्य ज्या गोष्टीविषयी कल्पनाविलास करतो, ज्यामध्ये कल्पनाविलास करतो, ज्यापासून कल्पनाविलास करतो, किंवा 'हे माझे आहे' असा कल्पनाविलास करतो, ती गोष्ट त्या कल्पनेपेक्षा वेगळीच होते. हा संसार बदलणारा असूनही, अस्तित्वाशी आसक्त असलेला हा लोक भवामध्येच आनंद मानतो... पे... मनाविषयी कल्पनाविलास करत नाही, मनामध्ये कल्पनाविलास करत नाही, मनापासून कल्पनाविलास करत नाही, 'मन माझे आहे' असा कल्पनाविलास करत नाही. धर्मांविषयी कल्पनाविलास करत नाही... पे... मनो-विज्ञानाविषयी कल्पनाविलास करत नाही, मनो-स्पर्शाविषयी कल्पनाविलास करत नाही. मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही तो कल्पनाविलास करत नाही, त्यामध्ये कल्पनाविलास करत नाही, त्यापासून कल्पनाविलास करत नाही, 'ते माझे आहे' असा कल्पनाविलास करत नाही. कारण, भिक्षूंनो, मनुष्य ज्या गोष्टीविषयी कल्पनाविलास करतो, ज्यामध्ये कल्पनाविलास करतो, ज्यापासून कल्पनाविलास करतो, किंवा 'हे माझे आहे' असा कल्पनाविलास करतो, ती गोष्ट त्या कल्पनेपेक्षा वेगळीच होते. हा संसार बदलणारा असूनही, अस्तित्वाशी आसक्त असलेला हा लोक भवामध्येच आनंद मानतो. भिक्षूंनो, जितके काही स्कंध, धातू आणि आयतने आहेत, त्या सर्वांविषयी तो कल्पनाविलास करत नाही, त्यांमध्ये कल्पनाविलास करत नाही, त्यांपासून कल्पनाविलास करत नाही, 'ते माझे आहे' असा कल्पनाविलास करत नाही. अशा प्रकारे कल्पनाविलास न करणारा तो भिक्षू या जगात कशाचेही उपादान (आसक्तीने ग्रहण) करत नाही. उपादान न केल्यामुळे तो उद्विग्न होत नाही. उद्विग्न न झाल्यामुळे तो स्वतःच परिनिर्वाण प्राप्त करतो. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही,' असे तो स्पष्टपणे जाणतो. भिक्षूंनो, सर्व कल्पनाविलासांचे उच्चाटन करण्यासाठी अनुकूल असलेला हाच तो मार्ग होय. नववे सूक्त समाप्त. ๑๐. ทุติยสมุคฺฆาตสปฺปายสุตฺตํ १०. द्वितीय समुग्घातसप्पाय सुत्त (दुसरे समूळ उच्चाटन अनुकूल सूक्त) ๓๒. ‘‘สพฺพมญฺญิตสมุคฺฆาตสปฺปายํ โว, ภิกฺขเว, ปฏิปทํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตมา จ สา, ภิกฺขเว, สพฺพมญฺญิตสมุคฺฆาตสปฺปายา ปฏิปทา? ३२. भिक्षूंनो, सर्व कल्पनाविलासांचे उच्चाटन करण्यासाठी अनुकूल असलेला मार्ग मी तुम्हांला उपदेशेन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्षूंनो, सर्व कल्पनाविलासांचे उच्चाटन करण्यासाठी अनुकूल असलेला तो मार्ग कोणता आहे? ‘‘ตํ กึ มญฺญถ, ภิกฺขเว, จกฺขุํ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? भिक्षूंनो, तुम्हांला काय वाटते, डोळा नित्य आहे की अनित्य? ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. अनित्य आहे, भंते. ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक? ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. दुःखकारक आहे, भंते. ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? तर मग जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याविषयी 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे मानणे योग्य आहे का? ‘‘โน เหตํ ภนฺเต’’. नक्कीच नाही, भंते. ‘‘รูปา…เป… จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺโส นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? रूपे... पे... चक्षु-विज्ञान... चक्षु-स्पर्श नित्य आहे की अनित्य? ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’…เป…. अनित्य आहे, भंते... पे... ‘‘ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते नित्य आहे की अनित्य? ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. अनित्य आहे, भंते. ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक? ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. दुःखकारक आहे, भंते. ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? तर मग जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याविषयी 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे मानणे योग्य आहे का? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’…เป…. नक्कीच नाही, भंते... पे... ‘‘ชิวฺหา นิจฺจา วา อนิจฺจา วา’’ติ? जीभ नित्य आहे की अनित्य? ‘‘อนิจฺจา ภนฺเต’’…เป…. अनित्य आहे, भंते... पे... ‘‘รสา… ชิวฺหาวิญฺญาณํ… ชิวฺหาสมฺผสฺโส…เป… ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? रस... जिव्हा-विज्ञान... जिव्हा-स्पर्श... पे... जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते नित्य आहे की अनित्य? ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’…เป… ธมฺมา… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺโส นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วาติ? अनित्य आहे, भंते... पे... धर्म... मनो-विज्ञान... मनो-स्पर्श नित्य आहे की अनित्य? ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’. अनित्य आहे, भंते. ‘‘ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते नित्य आहे की अनित्य? ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. अनित्य आहे, भंते. ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक? ‘‘ทุกฺขํ ภนฺเต’’. दुःखकारक आहे, भंते. ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? तर मग जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याविषयी 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे मानणे योग्य आहे का? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. नक्कीच नाही, भंते. ‘‘เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… ชิวฺหายปิ นิพฺพินฺทติ, รเสสุปิ…เป… ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ธมฺเมสุปิ นิพฺพินฺทติ, มโนวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, มโนสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาติ[Pg.256]. อยํ โข สา, ภิกฺขเว, สพฺพมญฺญิตสมุคฺฆาตสปฺปายา ปฏิปทา’’ติ. ทสมํ. भिक्षूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक डोळ्याविषयी विरक्त होतो, रूपांविषयी विरक्त होतो, चक्षु-विज्ञानाविषयी विरक्त होतो, चक्षु-स्पर्शाविषयी विरक्त होतो. चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही तो विरक्त होतो... पे... जिभेविषयी विरक्त होतो, रसांविषयी... पे... जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही तो विरक्त होतो. मनाविषयी विरक्त होतो, धर्मांविषयी विरक्त होतो, मनो-विज्ञानाविषयी विरक्त होतो, मनो-स्पर्शाविषयी विरक्त होतो. मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही तो विरक्त होतो. विरक्त झाल्यामुळे तो रागरहित होतो; वैराग्यामुळे तो मुक्त होतो; मुक्त झाल्यावर 'मी मुक्त झालो आहे' असे ज्ञान त्याला होते. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही,' असे तो स्पष्टपणे जाणतो. भिक्षूंनो, सर्व कल्पनाविलासांचे उच्चाटन करण्यासाठी अनुकूल असलेला हाच तो मार्ग होय. दहावे सूक्त समाप्त. สพฺพวคฺโค ตติโย. तिसरा सर्व-वर्ग समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याची अनुक्रमणिका (उदान) - สพฺพญฺจ ทฺเวปิ ปหานา, ปริชานาปเร ทุเว; อาทิตฺตํ อทฺธภูตญฺจ, สารุปฺปา ทฺเว จ สปฺปายา; วคฺโค เตน ปวุจฺจตีติ. सब्ब (सर्व) सुत्त, दोन पहाण (प्रहाण) सुत्ते, इतर दोन परिजानन (परिज्ञान) सुत्ते, आदिच्च (आदीप्त) सुत्त, अद्धभूत (अध्वभूत) सुत्त, सारुप्प सुत्त आणि दोन सप्पाय (सप्राय) सुत्ते; यामुळे याला वग्ग (वर्ग) म्हटले जाते. हा (या वग्गाचा) संग्रह (उदान) आहे. ๔. ชาติธมฺมวคฺโค ४. जातिधम्म वग्ग ๑-๑๐. ชาติธมฺมาทิสุตฺตทสกํ १-१०. जातिधम्म आदि दहा सुत्ते ๓๓. สาวตฺถินิทานํ. ตตฺร โข…เป… ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, ชาติธมฺมํ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, สพฺพํ ชาติธมฺมํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, ชาติธมฺมํ. รูปา… จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺโส ชาติธมฺโม. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ชาติธมฺมํ…เป… ชิวฺหา… รสา… ชิวฺหาวิญฺญาณํ… ชิวฺหาสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ชาติธมฺมํ. กาโย…เป... มโน ชาติธมฺโม, ธมฺมา ชาติธมฺมา, มโนวิญฺญาณํ ชาติธมฺมํ, มโนสมฺผสฺโส ชาติธมฺโม. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ชาติธมฺมํ. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ… จกฺขุวิญฺญาเณปิ… จกฺขุสมฺผสฺเสปิ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. ปฐมํ. ३३. श्रावस्ती येथील निदान. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – 'भिक्खूहो, सर्व काही जन्म-स्वभावाचे (उत्पत्ति-धर्मी) आहे. आणि भिक्खूहो, जन्म-स्वभावाचे सर्व काही कोणते आहे? भिक्खूहो, चक्षु (डोळा) जन्म-स्वभावाचा आहे. रूप... चक्षु-विज्ञाण... चक्षु-सम्फस्स (चक्षु-स्पर्श) जन्म-स्वभावाचा आहे. चक्षु-सम्फस्साच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील जन्म-स्वभावाचे आहे...पे... जिव्हा... रस... जिव्हा-विज्ञाण... जिव्हा-सम्फस्स... जिव्हा-सम्फस्साच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील जन्म-स्वभावाचे आहे. काय...पे... मन जन्म-स्वभावाचे आहे, धम्म जन्म-स्वभावाचे आहेत, मनो-विज्ञाण जन्म-स्वभावाचे आहे, मनो-सम्फस्स जन्म-स्वभावाचा आहे. मनो-सम्फस्साच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील जन्म-स्वभावाचे आहे. भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षुविषयी देखील कंटाळतो, रूपांविषयी देखील... चक्षु-विज्ञाणाविषयी देखील... चक्षु-सम्फस्साविषयी देखील...पे... या अस्तित्वासाठी आता काहीही उरलेले नाही, असे तो जाणतो.' पहिले. ๓๔. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, ชราธมฺมํ…เป… สํขิตฺตํ. ทุติยํ. ३४. 'भिक्खूहो, सर्व काही जरा-स्वभावाचे (वृद्धत्व-धर्मी) आहे...' (संक्षिप्त). दुसरे. ๓๕. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, พฺยาธิธมฺมํ…เป…. ตติยํ. ३५. 'भिक्खूहो, सर्व काही व्याधी-स्वभावाचे (रोग-धर्मी) आहे...' (संक्षिप्त). तिसरे. ๓๖. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, มรณธมฺมํ…เป…. จตุตฺถํ. ३६. 'भिक्खूहो, सर्व काही मरण-स्वभावाचे (मृत्यू-धर्मी) आहे...' (संक्षिप्त). चौथे. ๓๗. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, โสกธมฺมํ…เป…. ปญฺจมํ. ३७. 'भिक्खूहो, सर्व काही शोक-स्वभावाचे आहे...' (संक्षिप्त). पाचवे. ๓๘. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, สํกิเลสิกธมฺมํ…เป…. ฉฏฺฐํ. ३८. 'भिक्खूहो, सर्व काही संक्लेशिक-स्वभावाचे (मलीन होणाऱ्या स्वभावाचे) आहे...' (संक्षिप्त). सहावे. ๓๙. ‘‘สพฺพํ[Pg.257], ภิกฺขเว, ขยธมฺมํ…เป…. สตฺตมํ. ३९. 'भिक्खूहो, सर्व काही क्षय-स्वभावाचे (नष्ट होणाऱ्या स्वभावाचे) आहे...' (संक्षिप्त). सातवे. ๔๐. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, วยธมฺมํ…เป…. อฏฺฐมํ. ४०. 'भिक्खूहो, सर्व काही व्यय-स्वभावाचे (ऱ्हास पावणाऱ्या स्वभावाचे) आहे...' (संक्षिप्त). आठवे. ๔๑. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, สมุทยธมฺมํ…เป…. นวมํ. ४१. 'भिक्खूहो, सर्व काही उदय-स्वभावाचे (उत्पत्ती-धर्मी) आहे...' (संक्षिप्त). नववे. ๔๒. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, นิโรธธมฺมํ…เป…. ทสมํ. ४२. 'भिक्खूहो, सर्व काही निरोध-स्वभावाचे (लय-धर्मी) आहे...' (संक्षिप्त). दहावे. ชาติธมฺมวคฺโค จตุตฺโถ. चौथा जातिधम्म वग्ग समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याचा संग्रह (उदान) - ชาติชราพฺยาธิมรณํ, โสโก จ สํกิเลสิกํ; ขยวยสมุทยํ, นิโรธธมฺเมน เต ทสาติ. जाति, जरा, व्याधी, मरण, शोक, संक्लेशिक, क्षय, व्यय, उदय आणि निरोधधम्म - ही दहा सुत्ते आहेत. ๕. สพฺพอนิจฺจวคฺโค ५. सब्बअनिच्च वग्ग (सर्व-अनित्य वर्ग) ๑-๙. อนิจฺจาทิสุตฺตนวกํ १-९. अनित्य आदि नऊ सुत्ते ๔๓. สาวตฺถินิทานํ. ตตฺร โข…เป… ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, สพฺพํ อนิจฺจํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ, รูปา อนิจฺจา, จกฺขุวิญฺญาณํ อนิจฺจํ, จกฺขุสมฺผสฺโส อนิจฺโจ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา, รสา อนิจฺจา, ชิวฺหาวิญฺญาณํ อนิจฺจํ, ชิวฺหาสมฺผสฺโส อนิจฺโจ. ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ. กาโย อนิจฺโจ…เป… มโน อนิจฺโจ, ธมฺมา อนิจฺจา, มโนวิญฺญาณํ อนิจฺจํ, มโนสมฺผสฺโส อนิจฺโจ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ธมฺเมสุปิ นิพฺพินฺทติ, มโนวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, มโนสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ [Pg.258] ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. ปฐมํ. ४३. श्रावस्ती येथील निदान. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – 'भिक्खूहो, सर्व काही अनित्य आहे. आणि भिक्खूहो, अनित्य असणारे सर्व काही कोणते आहे? भिक्खूहो, चक्षु अनित्य आहे, रूप अनित्य आहेत, चक्षु-विज्ञाण अनित्य आहे, चक्षु-सम्फस्स अनित्य आहे. चक्षु-सम्फस्साच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे...पे... जिव्हा अनित्य आहे, रस अनित्य आहेत, जिव्हा-विज्ञाण अनित्य आहे, जिव्हा-सम्फस्स अनित्य आहे. जिव्हा-सम्फस्साच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे. काय अनित्य आहे...पे... मन अनित्य आहे, धम्म अनित्य आहेत, मनो-विज्ञाण अनित्य आहे, मनो-सम्फस्स अनित्य आहे. मनो-सम्फस्साच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे. भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षुविषयी देखील कंटाळतो, रूपांविषयी देखील कंटाळतो, चक्षु-विज्ञाणाविषयी देखील कंटाळतो, चक्षु-सम्फस्साविषयी देखील कंटाळतो. चक्षु-सम्फस्साच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयी देखील कंटाळतो...पे... मनाविषयी देखील कंटाळतो, धम्मांविषयी देखील कंटाळतो, मनो-विज्ञाणाविषयी देखील कंटाळतो, मनो-सम्फस्साविषयी देखील कंटाळतो. मनो-सम्फस्साच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयी देखील कंटाळतो. कंटाळल्यामुळे तो विरक्त होतो; विरक्तीमुळे तो विमुक्त होतो; विमुक्त झाल्यावर 'मी विमुक्त झालो आहे' असे ज्ञान त्याला होते. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही,' असे तो जाणतो.' पहिले. ๔๔. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ…เป…. ทุติยํ. ४४. 'भिक्खूहो, सर्व काही दुःख आहे...' (संक्षिप्त). दुसरे. ๔๕. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อนตฺตา…เป…. ตติยํ. ४५. 'भिक्खूहो, सर्व काही अनात्मा (अनत्ता) आहे...' (संक्षिप्त). तिसरे. ๔๖. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อภิญฺเญยฺยํ…เป…. จตุตฺถํ. ४६. 'भिक्खूहो, सर्व काही अभिज्ञेय (विशेष ज्ञानाने जाणण्याजोगे) आहे...' (संक्षिप्त). चौथे. ๔๗. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, ปริญฺเญยฺยํ…เป…. ปญฺจมํ. ४७. 'भिक्खूहो, सर्व काही परिज्ञेय (पूर्णपणे समजून घेण्याजोगे) आहे...' (संक्षिप्त). पाचवे. ๔๘. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, ปหาตพฺพํ…เป…. ฉฏฺฐํ. ४८. 'भिक्खूहो, सर्व काही प्रहातव्य (त्याग करण्याजोगे) आहे...' (संक्षिप्त). सहावे. ๔๙. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, สจฺฉิกาตพฺพํ…เป…. สตฺตมํ. ४९. 'भिक्खूहो, सर्व काही साक्षात्करणीय (प्रत्यक्ष अनुभवण्याजोगे) आहे...' (संक्षिप्त). सातवे. ๕๐. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อภิญฺญาปริญฺเญยฺยํ…เป…. อฏฺฐมํ. ५०. 'भिक्खूहो, सर्व काही विशेष ज्ञानाने पूर्णपणे समजून घेण्याजोगे आहे...' (संक्षिप्त). आठवे. ๕๑. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อุปทฺทุตํ…เป…. นวมํ. ५१. 'भिक्खूहो, सर्व काही उपद्रुत (पीडित) आहे...' (संक्षिप्त). नववे. ๑๐. อุปสฺสฏฺฐสุตฺตํ १०. उपस्सट्ठ सुत्त ๕๒. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อุปสฺสฏฺฐํ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, สพฺพํ อุปสฺสฏฺฐํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, อุปสฺสฏฺฐํ, รูปา อุปสฺสฏฺฐา, จกฺขุวิญฺญาณํ อุปสฺสฏฺฐํ, จกฺขุสมฺผสฺโส อุปสฺสฏฺโฐ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อุปสฺสฏฺฐํ…เป… ชิวฺหา อุปสฺสฏฺฐา, รสา อุปสฺสฏฺฐา, ชิวฺหาวิญฺญาณํ อุปสฺสฏฺฐํ, ชิวฺหาสมฺผสฺโส อุปสฺสฏฺโฐ. ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อุปสฺสฏฺฐํ. กาโย อุปสฺสฏฺโฐ… มโน อุปสฺสฏฺโฐ, ธมฺมา อุปสฺสฏฺฐา, มโนวิญฺญาณํ อุปสฺสฏฺฐํ, มโนสมฺผสฺโส อุปสฺสฏฺโฐ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อุปสฺสฏฺฐํ. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ธมฺเมสุปิ นิพฺพินฺทติ, มโนวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, มโนสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ[Pg.259]. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. ทสมํ. ५२. “भिक्षूंनो, सर्व काही पीडित (ग्रस्त) आहे. आणि भिक्षूंनो, सर्व काही काय पीडित आहे? भिक्षूंनो, चक्षू पीडित आहे, रूप पीडित आहेत, चक्षू-विज्ञान पीडित आहे, चक्षू-संस्पर्श पीडित आहे. चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील पीडित आहे... पे... जिव्हा पीडित आहे, रस पीडित आहेत, जिव्हा-विज्ञान पीडित आहे, जिव्हा-संस्पर्श पीडित आहे. जिव्हा-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील पीडित आहे. काय (शरीर) पीडित आहे... मन पीडित आहे, धम्म पीडित आहेत, मनो-विज्ञान पीडित आहे, मनो-संस्पर्श पीडित आहे. मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील पीडित आहे. भिक्षूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षूविषयी देखील निर्वेद पावतो, रूपांविषयी देखील निर्वेद पावतो, चक्षू-विज्ञानाविषयी देखील निर्वेद पावतो, चक्षू-संस्पर्शाविषयी देखील निर्वेद पावतो. चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयी देखील तो निर्वेद पावतो... पे... मनाविषयी देखील निर्वेद पावतो, धम्मांविषयी देखील निर्वेद पावतो, मनो-विज्ञानाविषयी देखील निर्वेद पावतो, मनो-संस्पर्शाविषयी देखील निर्वेद पावतो. मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयी देखील तो निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्याने तो विरक्त होतो; विरागामुळे तो विमुक्त होतो; विमुक्त झाल्यावर 'मी विमुक्त झालो आहे' असे ज्ञान होते. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे कर्तव्य होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही' असे तो जाणतो.” दहावे सूत्र. สพฺพอนิจฺจวคฺโค ปญฺจโม. पाचवा सर्व-अनित्य वर्ग समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याचा संग्रह (उद्दान) - อนิจฺจํ ทุกฺขํ อนตฺตา, อภิญฺเญยฺยํ ปริญฺเญยฺยํ; ปหาตพฺพํ สจฺฉิกาตพฺพํ, อภิญฺเญยฺยปริญฺเญยฺยํ ; อุปทฺทุตํ อุปสฺสฏฺฐํ, วคฺโค เตน ปวุจฺจตีติ. अनित्य, दुःख, अनात्मा, अभिज्ञेय, परिज्ञेय, प्रहातव्य, साक्षात्करणीय, अभिज्ञेय-परिज्ञेय, उपद्रुत आणि उपसृष्ट (पीडित) - या सूत्रांमुळे हा वर्ग म्हटला जातो. สฬายตนวคฺเค ปฐมปณฺณาสโก สมตฺโต. सळायतन वर्गातील पहिला पन्नास सूत्रांचा समूह (प्रथम पण्णासक) समाप्त झाला. ตสฺส วคฺคุทฺทานํ – त्या वर्गांचा संग्रह (उद्दान) - อนิจฺจวคฺคํ ยมกํ, สพฺพํ วคฺคํ ชาติธมฺมํ; อนิจฺจวคฺเคน ปญฺญาสํ, ปญฺจโม เตน ปวุจฺจตีติ. अनित्यवर्ग, यमकवर्ग, सर्ववर्ग, जातिधम्मवर्ग आणि अनित्यवर्गासह पन्नास सूत्रांचा समूह होतो, म्हणून याला पाचवा (पण्णासक) म्हटले जाते. ๖. อวิชฺชาวคฺโค ६. अविद्या वर्ग ๑. อวิชฺชาปหานสุตฺตํ १. अविद्या प्रहाण सूत्र ๕๓. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กถํ นุ โข, ภนฺเต, ชานโต กถํ ปสฺสโต อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ? ५३. श्रावस्ती येथील प्रसंग. तेव्हा एक भिक्षू जेथे भगवान होते तेथे गेला; जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला तो भिक्षू भगवंतांना म्हणाला – “भंते, कशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि कशा प्रकारे पाहणाऱ्या व्यक्तीची अविद्या नष्ट होते आणि विद्या उत्पन्न होते?” ‘‘จกฺขุํ โข, ภิกฺขุ, อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชติ. รูเป อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชติ. จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชติ. โสตํ… ฆานํ… ชิวฺหํ… กายํ… มนํ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชติ. ธมฺเม [Pg.260]… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชติ. เอวํ โข, ภิกฺขุ, ชานโต เอวํ ปสฺสโต อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ. ปฐมํ. “भिक्षू, चक्षूला अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अविद्या नष्ट होते आणि विद्या उत्पन्न होते. रूपांना अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अविद्या नष्ट होते आणि विद्या उत्पन्न होते. चक्षू-विज्ञान... चक्षू-संस्पर्श... चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अविद्या नष्ट होते आणि विद्या उत्पन्न होते. श्रोत्र (कान)... घ्राण (नाक)... जिव्हा... काय (शरीर)... मनाला अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अविद्या नष्ट होते आणि विद्या उत्पन्न होते. धम्मांना... मनो-विज्ञानाला... मनो-संस्पर्शाला... मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अविद्या नष्ट होते आणि विद्या उत्पन्न होते. भिक्षू, अशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि अशा प्रकारे पाहणाऱ्याची अविद्या नष्ट होते आणि विद्या उत्पन्न होते.” पहिले सूत्र. ๒. สํโยชนปหานสุตฺตํ २. संयोजन प्रहाण सूत्र ๕๔. ‘‘กถํ นุ โข, ภนฺเต, ชานโต, กถํ ปสฺสโต, สํโยชนา ปหียนฺตี’’ติ? ‘‘จกฺขุํ โข, ภิกฺขุ, อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต สํโยชนา ปหียนฺติ. รูเป… จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต สํโยชนา ปหียนฺติ. โสตํ… ฆานํ… ชิวฺหํ… กายํ… มนํ… ธมฺเม… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต สํโยชนา ปหียนฺติ. เอวํ โข, ภิกฺขุ, ชานโต เอวํ ปสฺสโต สํโยชนา ปหียนฺตี’’ติ. ทุติยํ. ५४. “भंते, कशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि कशा प्रकारे पाहणाऱ्याची संयोजने (बंधने) नष्ट होतात?” “भिक्षू, चक्षूला अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची संयोजने नष्ट होतात. रूपांना... चक्षू-विज्ञानाला... चक्षू-संस्पर्शाला... चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची संयोजने नष्ट होतात. श्रोत्र... घ्राण... जिव्हा... काय... मनाला... धम्मांना... मनो-विज्ञानाला... मनो-संस्पर्शाला... मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची संयोजने नष्ट होतात. भिक्षू, अशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि अशा प्रकारे पाहणाऱ्याची संयोजने नष्ट होतात.” दुसरे सूत्र. ๓. สํโยชนสมุคฺฆาตสุตฺตํ ३. संयोजन समुद्घात सूत्र ๕๕. ‘‘กถํ นุ โข, ภนฺเต, ชานโต, กถํ ปสฺสโต สํโยชนา สมุคฺฆาตํ คจฺฉนฺตี’’ติ? ‘‘จกฺขุํ โข, ภิกฺขุ, อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต สํโยชนา สมุคฺฆาตํ คจฺฉนฺติ. รูเป อนตฺตโต… จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต สํโยชนา สมุคฺฆาตํ คจฺฉนฺติ. โสตํ… ฆานํ… ชิวฺหํ… กายํ… มนํ… ธมฺเม… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต สํโยชนา สมุคฺฆาตํ คจฺฉนฺติ. เอวํ โข, ภิกฺขุ, ชานโต เอวํ ปสฺสโต สํโยชนา สมุคฺฆาตํ คจฺฉนฺตี’’ติ. ตติยํ. ५५. “भंते, कशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि कशा प्रकारे पाहणाऱ्याची संयोजने समूळ नष्ट (समुद्घात) होतात?” “भिक्षू, चक्षूला अनात्मा (अनत्त) म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची संयोजने समूळ नष्ट होतात. रूपांना अनात्मा म्हणून... चक्षू-विज्ञानाला... चक्षू-संस्पर्शाला... चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील अनात्मा म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची संयोजने समूळ नष्ट होतात. श्रोत्र... घ्राण... जिव्हा... काय... मनाला... धम्मांना... मनो-विज्ञानाला... मनो-संस्पर्शाला... मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील अनात्मा म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची संयोजने समूळ नष्ट होतात. भिक्षू, अशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि अशा प्रकारे पाहणाऱ्याची संयोजने समूळ नष्ट होतात.” तिसरे सूत्र. ๔. อาสวปหานสุตฺตํ ४. आसव प्रहाण सूत्र ๕๖. ‘‘กถํ นุ โข, ภนฺเต, ชานโต, กถํ ปสฺสโต อาสวา ปหียนฺตี’’ติ…เป…. จตุตฺถํ. ५६. “भंते, कशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि कशा प्रकारे पाहणाऱ्याचे आसव नष्ट होतात?”... पे... चौथे सूत्र. ๕. อาสวสมุคฺฆาตสุตฺตํ ५. आसव समुद्घात सूत्र ๕๗. ‘‘กถํ [Pg.261] นุ โข, ภนฺเต, ชานโต, กถํ ปสฺสโต อาสวา สมุคฺฆาตํ คจฺฉนฺตี’’ติ…เป…. ปญฺจมํ. ५७. “भंते, कशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि कशा प्रकारे पाहणाऱ्याचे आसव समूळ नष्ट होतात?”... पे... पाचवे सूत्र. ๖. อนุสยปหานสุตฺตํ ६. अनुशय प्रहाण सूत्र ๕๘. ‘‘กถํ นุ โข…เป… อนุสยา ปหียนฺตี’’ติ…เป…. ฉฏฺฐํ. ५८. “भंते, कशा प्रकारे... पे... अनुशय नष्ट होतात?”... पे... सहावे सूत्र. ๗. อนุสยสมุคฺฆาตสุตฺตํ ७. अनुशय समुद्घात सूत्र ๕๙. ‘‘กถํ นุ โข…เป… อนุสยา สมุคฺฆาตํ คจฺฉนฺตี’’ติ? ‘‘จกฺขุํ โข, ภิกฺขุ, อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต อนุสยา สมุคฺฆาตํ คจฺฉนฺติ…เป… โสตํ… ฆานํ… ชิวฺหํ… กายํ… มนํ… ธมฺเม… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต อนุสยา สมุคฺฆาตํ คจฺฉนฺติ. เอวํ โข, ภิกฺขุ, ชานโต เอวํ ปสฺสโต อนุสยา สมุคฺฆาตํ คจฺฉนฺตี’’ติ. สตฺตมํ. ५९. “कशा प्रकारे... (पे)... अनुसय समूळ नष्ट होतात?” “भिक्खू, डोळ्याला अनात्म रूपाने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याचे अनुसय समूळ नष्ट होतात... कान... नाक... जीभ... शरीर... मन... धम्म... मनोविज्ञाण... मनोसंफस्स... आणि मनोसंफस्साच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होणारी जी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना आहे, तिलाही अनात्म रूपाने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याचे अनुसय समूळ नष्ट होतात. भिक्खू, अशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि अशा प्रकारे पाहणाऱ्याचे अनुसय समूळ नष्ट होतात.” सातवे. ๘. สพฺพุปาทานปริญฺญาสุตฺตํ ८. सब्बुपादानपरिञ्ञासुत्त ๖๐. ‘‘สพฺพุปาทานปริญฺญาย โว, ภิกฺขเว, ธมฺมํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, สพฺพุปาทานปริญฺญาย ธมฺโม? จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ, เวทนายปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิโมกฺขา ‘ปริญฺญาตํ เม อุปาทาน’นฺติ ปชานาติ. โสตญฺจ ปฏิจฺจ สทฺเท จ อุปฺปชฺชติ… ฆานญฺจ ปฏิจฺจ คนฺเธ จ… ชิวฺหญฺจ ปฏิจฺจ รเส จ… กายญฺจ ปฏิจฺจ โผฏฺฐพฺเพ จ… มนญฺจ ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ธมฺเมสุปิ นิพฺพินฺทติ, มโนวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, มโนสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ, เวทนายปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิโมกฺขา ‘ปริญฺญาตํ เม อุปาทาน’นฺติ [Pg.262] ปชานาติ. อยํ โข, ภิกฺขเว, สพฺพุปาทานปริญฺญาย ธมฺโม’’ติ. อฏฺฐมํ. ६०. “भिक्खूंनो, सर्व उपादानांच्या परिज्ञेसाठी (परिपूर्ण ज्ञानासाठी) मी तुम्हांला धम्म उपदेशीन. तो ऐका. आणि भिक्खूंनो, सर्व उपादानांच्या परिज्ञेसाठी असलेला धम्म कोणता? डोळा आणि रूपे यांच्यावर अवलंबून चक्खुविज्ञाण उत्पन्न होते. या तिन्हींचा संयोग म्हणजे संफस्स होय. संफस्साच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते. भिक्खूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक डोळ्याविषयीही निर्वेद पावतो, रूपांविषयीही निर्वेद पावतो, चक्खुविज्ञाणाविषयीही निर्वेद पावतो, चक्खुसंफस्साविषयीही निर्वेद पावतो, वेदनेविषयीही निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्याने तो विरक्त होतो; विरक्तीमुळे तो विमुक्त होतो; विमुक्त झाल्यावर ‘माझे उपादान परिपूर्ण जाणले गेले आहे’ असे तो प्रजाणतो. कान आणि शब्द यांच्यावर अवलंबून... नाक आणि गंध यांच्यावर अवलंबून... जीभ आणि रस यांच्यावर अवलंबून... शरीर आणि फोट्ठब्ब (स्पर्शविषय) यांच्यावर अवलंबून... मन आणि धम्म यांच्यावर अवलंबून मनोविज्ञाण उत्पन्न होते. या तिन्हींचा संयोग म्हणजे संफस्स होय. संफस्साच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते. भिक्खूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक मनाविषयीही निर्वेद पावतो, धम्मांविषयीही निर्वेद पावतो, मनोविज्ञाणाविषयीही निर्वेद पावतो, मनोसंफस्साविषयीही निर्वेद पावतो, वेदनेविषयीही निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्याने तो विरक्त होतो; विरक्तीमुळे तो विमुक्त होतो; विमुक्त झाल्यावर ‘माझे उपादान परिपूर्ण जाणले गेले आहे’ असे तो प्रजाणतो. भिक्खूंनो, हाच सर्व उपादानांच्या परिज्ञेसाठी असलेला धम्म होय.” आठवे. ๙. ปฐมสพฺพุปาทานปริยาทานสุตฺตํ ९. पठमसब्बुपादानपरियादानसुत्त ๖๑. ‘‘สพฺพุปาทานปริยาทานาย โว, ภิกฺขเว, ธมฺมํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, สพฺพุปาทานปริยาทานาย ธมฺโม? จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ, เวทนายปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิโมกฺขา ‘ปริยาทินฺนํ เม อุปาทาน’นฺติ ปชานาติ…เป… ชิวฺหญฺจ ปฏิจฺจ รเส จ อุปฺปชฺชติ ชิวฺหาวิญฺญาณํ…เป… มนญฺจ ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ธมฺเมสุปิ นิพฺพินฺทติ, มโนวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ มโนสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ, เวทนายปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิโมกฺขา ‘ปริยาทินฺนํ เม อุปาทาน’นฺติ ปชานาติ. อยํ โข, ภิกฺขเว, สพฺพุปาทานปริยาทานาย ธมฺโม’’ติ. นวมํ. ६१. “भिक्खूंनो, सर्व उपादानांच्या क्षयासाठी (परियादानासाठी) मी तुम्हांला धम्म उपदेशीन. तो ऐका. आणि भिक्खूंनो, सर्व उपादानांच्या क्षयासाठी असलेला धम्म कोणता? डोळा आणि रूपे यांच्यावर अवलंबून चक्खुविज्ञाण उत्पन्न होते. या तिन्हींचा संयोग म्हणजे संफस्स होय. संफस्साच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते. भिक्खूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक डोळ्याविषयीही निर्वेद पावतो, रूपांविषयीही निर्वेद पावतो, चक्खुविज्ञाणाविषयीही निर्वेद पावतो, चक्खुसंफस्साविषयीही निर्वेद पावतो, वेदनेविषयीही निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्याने तो विरक्त होतो; विरक्तीमुळे तो विमुक्त होतो; विमुक्त झाल्यावर ‘माझे उपादान क्षीण झाले आहे’ असे तो प्रजाणतो... (पे)... जीभ आणि रस यांच्यावर अवलंबून जिव्हाविज्ञाण उत्पन्न होते... (पे)... मन आणि धम्म यांच्यावर अवलंबून मनोविज्ञाण उत्पन्न होते. या तिन्हींचा संयोग म्हणजे संफस्स होय. संफस्साच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते. भिक्खूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक मनाविषयीही निर्वेद पावतो, धम्मांविषयीही निर्वेद पावतो, मनोविज्ञाणाविषयीही निर्वेद पावतो, मनोसंफस्साविषयीही निर्वेद पावतो, वेदनेविषयीही निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्याने तो विरक्त होतो; विरक्तीमुळे तो विमुक्त होतो; विमुक्त झाल्यावर ‘माझे उपादान क्षीण झाले आहे’ असे तो प्रजाणतो. भिक्खूंनो, हाच सर्व उपादानांच्या क्षयासाठी असलेला धम्म होय.” नववे. ๑๐. ทุติยสพฺพุปาทานปริยาทานสุตฺตํ १०. दुतियसब्बुपादानपरियादानसुत्त ๖๒. ‘‘สพฺพุปาทานปริยาทานาย โว, ภิกฺขเว, ธมฺมํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, สพฺพุปาทานปริยาทานาย ธมฺโม’’? ६२. “भिक्खूंनो, सर्व उपादानांच्या क्षयासाठी मी तुम्हांला धम्म उपदेशीन. तो ऐका. आणि भिक्खूंनो, सर्व उपादानांच्या क्षयासाठी असलेला धम्म कोणता?” ‘‘ตํ กึ มญฺญถ, ภิกฺขเว, จกฺขุ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “भिक्खूंनो, तुम्हांला काय वाटते, डोळा नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य आहे, भंते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःखकारक आहे, भंते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याविषयी ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नक्कीच नाही, भंते.” ‘‘รูปา…เป… จกฺขุวิญฺญาณํ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “रूपे... (पे)... चक्खुविज्ञाण नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’…เป…. “अनित्य आहे, भंते.”... (पे)... ‘‘จกฺขุสมฺผสฺโส นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? “चक्खुसंफस्स नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’…เป…. “अनित्य आहे, भंते.”... (पे)... ‘‘ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “आणि चक्खुसंफस्साच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होणारी जी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना आहे, ती नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’…เป…. “अनित्य आहे, भंते.”... (पे)... ‘‘โสตํ… ฆานํ… ชิวฺหา… กาโย… มโน… ธมฺมา… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา, ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “कान... नाक... जीभ... शरीर... मन... धम्म... मनोविज्ञाण... मनोसंफस्स... आणि मनोसंफस्साच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होणारी जी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना आहे, ती नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ[Pg.263], ภนฺเต’’. “अनित्य आहे, भंते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःखकारक आहे, भंते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याविषयी ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नक्कीच नाही, भंते.” ‘‘เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… ชิวฺหายปิ นิพฺพินฺทติ, รเสสุปิ นิพฺพินฺทติ, ชิวฺหาวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, ชิวฺหาสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ, ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ…เป… มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ธมฺเมสุปิ นิพฺพินฺทติ, มโนวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, มโนสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาติ. อยํ โข, ภิกฺขเว, สพฺพุปาทานปริยาทานาย ธมฺโม’’ติ. ทสมํ. “भिक्खूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक डोळ्याविषयीही निर्वेद पावतो, रूपांविषयीही निर्वेद पावतो, चक्खुविज्ञाणाविषयीही निर्वेद पावतो, चक्खुसंफस्साविषयीही निर्वेद पावतो. आणि चक्खुसंफस्साच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होणारी जी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना आहे, तिच्याविषयीही निर्वेद पावतो... (पे)... जिभेविषयीही निर्वेद पावतो, रसांविषयीही निर्वेद पावतो, जिव्हाविज्ञाणाविषयीही निर्वेद पावतो, जिव्हासंफस्साविषयीही निर्वेद पावतो, जिव्हासंफस्साच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होणाऱ्या... (पे)... मनाविषयीही निर्वेद पावतो, धम्मांविषयीही निर्वेद पावतो, मनोविज्ञाणाविषयीही निर्वेद पावतो, मनोसंफस्साविषयीही निर्वेद पावतो. आणि मनोसंफस्साच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होणारी जी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना आहे, तिच्याविषयीही निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्याने तो विरक्त होतो; विरक्तीमुळे तो विमुक्त होतो; विमुक्त झाल्यावर ‘मी विमुक्त झालो आहे’ असे ज्ञान त्याला होते. ‘जन्म संपुष्टात आला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर काहीही कर्तव्य उरलेले नाही’ असे तो प्रजाणतो. भिक्खूंनो, हाच सर्व उपादानांच्या क्षयासाठी असलेला धम्म होय.” दहावे. อวิชฺชาวคฺโค ฉฏฺโฐ. सहावा अविद्या वर्ग समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याची उद्दाने - อวิชฺชา สํโยชนา ทฺเว, อาสเวน ทุเว วุตฺตา; อนุสยา อปเร ทฺเว, ปริญฺญา ทฺเว ปริยาทินฺนํ; วคฺโค เตน ปวุจฺจตีติ. अविद्या (संयोजन) दोन, आसवासह दोन सांगितले आहेत; इतर दोन अनुसय, दोन परिञ्ञा आणि परियादिन्न सांगितले आहे; म्हणून याला वग्ग (वर्ग) म्हटले जाते. ๗. มิคชาลวคฺโค ७. मिगजाल वग्ग ๑. ปฐมมิคชาลสุตฺตํ १. प्रथम मिगजाल सुत्त ๖๓. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข อายสฺมา มิคชาโล เยน ภควา…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา มิคชาโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘‘เอกวิหารี, เอกวิหารี’ติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, เอกวิหารี โหติ, กิตฺตาวตา จ ปน สทุติยวิหารี โหตี’’ติ? ६३. श्रावस्ती येथील निदान (प्रसंग). तेव्हा आयुष्यमान मिगजाल जेथे भगवान होते तेथे गेला... आणि एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान मिगजालने भगवंतांना असे म्हटले – 'भन्ते, ‘एकविहारी, एकविहारी’ असे म्हटले जाते. भन्ते, किती प्रमाणात मनुष्य एकविहारी होतो आणि किती प्रमाणात तो सदुतीयविहारी होतो?' ‘‘สนฺติ โข, มิคชาล, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย [Pg.264] ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต อุปฺปชฺชติ นนฺที. นนฺทิยา สติ สาราโค โหติ; สาราเค สติ สํโยโค โหติ. นนฺทิสํโยชนสํยุตฺโต โข, มิคชาล, ภิกฺขุ สทุติยวิหารีติ วุจฺจติ. สนฺติ…เป… สนฺติ โข, มิคชาล, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต อุปฺปชฺชติ นนฺที. นนฺทิยา สติ สาราโค โหติ; สาราเค สติ สํโยโค โหติ. นนฺทิสํโยชนสํยุตฺโต โข, มิคชาล, ภิกฺขุ สทุติยวิหารีติ วุจฺจติ. เอวํวิหารี จ, มิคชาล, ภิกฺขุ กิญฺจาปิ อรญฺญวนปตฺถานิ ปนฺตานิ เสนาสนานิ ปฏิเสวติ อปฺปสทฺทานิ อปฺปนิคฺโฆสานิ วิชนวาตานิ มนุสฺสราหสฺเสยฺยกานิ ปฏิสลฺลานสารุปฺปานิ; อถ โข สทุติยวิหารีติ วุจฺจติ. ตํ กิสฺส เหตุ? ตณฺหา หิสฺส ทุติยา, สาสฺส อปฺปหีนา. ตสฺมา สทุติยวิหารี’’ติ วุจฺจติ. “मिगजाल, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे रूप आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यात गुंतून राहतो, तर त्याच्यामध्ये नंदी (तृष्णा) उत्पन्न होते. नंदी असल्यावर तीव्र राग उत्पन्न होतो; तीव्र राग असल्यावर संयोग निर्माण होतो. मिगजाल, अशा नंदी-संयोजनाने बद्ध असलेल्या भिक्खूला ‘सदुतीयविहारी’ असे म्हटले जाते. ... मिगजाल, जिभेने जाणता येण्याजोगे असे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे रस आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यात गुंतून राहतो, तर त्याच्यामध्ये नंदी उत्पन्न होते. नंदी असल्यावर तीव्र राग उत्पन्न होतो; तीव्र राग असल्यावर संयोग निर्माण होतो. मिगजाल, अशा नंदी-संयोजनाने बद्ध असलेल्या भिक्खूला ‘सदुतीयविहारी’ असे म्हटले जाते. मिगजाल, असा राहणारा भिक्खू जरी अरण्य, वनप्रस्थ यांसारख्या निर्जन, शांत, मानवी कोलाहलापासून दूर, एकांतात ध्यान करण्यास योग्य अशा दूरवरच्या सेनासनांचा (निवासस्थानांचा) आश्रय घेत असला, तरीही त्याला ‘सदुतीयविहारी’ असेच म्हटले जाते. त्याचे कारण काय? कारण तृष्णा हीच त्याची सोबती आहे आणि ती त्याने नष्ट केलेली नाही. म्हणूनच त्याला ‘सदुतीयविहारी’ असे म्हटले जाते।” ‘‘สนฺติ จ โข, มิคชาล, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต นนฺที นิรุชฺฌติ. นนฺทิยา อสติ สาราโค น โหติ; สาราเค อสติ สํโยโค น โหติ. นนฺทิสํโยชนวิสํยุตฺโต โข, มิคชาล, ภิกฺขุ เอกวิหารีติ วุจฺจติ…เป… สนฺติ จ โข, มิคชาล, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ จ โข, มิคชาล, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต นนฺที นิรุชฺฌติ. นนฺทิยา อสติ สาราโค น โหติ; สาราเค อสติ สํโยโค น โหติ. นนฺทิสํโยชนวิปฺปยุตฺโต โข, มิคชาล, ภิกฺขุ เอกวิหารีติ วุจฺจติ. เอวํวิหารี จ, มิคชาล, ภิกฺขุ กิญฺจาปิ คามนฺเต วิหรติ อากิณฺโณ ภิกฺขูหิ ภิกฺขุนีหิ อุปาสเกหิ อุปาสิกาหิ ราชูหิ ราชมหามตฺเตหิ ติตฺถิเยหิ ติตฺถิยสาวเกหิ. อถ โข เอกวิหารีติ วุจฺจติ. ตํ กิสฺส เหตุ? ตณฺหา หิสฺส ทุติยา, สาสฺส ปหีนา. ตสฺมา เอกวิหารีติ วุจฺจตี’’ติ. ปฐมํ. “परंतु मिगजाल, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे रूप आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात गुंतून राहत नाही, तर त्याच्यामध्ये नंदी निरुद्ध होते. नंदी नसल्यावर तीव्र राग उत्पन्न होत नाही; तीव्र राग नसल्यावर संयोग निर्माण होत नाही. मिगजाल, अशा नंदी-संयोजनापासून मुक्त असलेल्या भिक्खूला ‘एकविहारी’ असे म्हटले जाते. ... मिगजाल, जिभेने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... मिगजाल, मनाने जाणता येण्याजोगे असे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे धम्म आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात गुंतून राहत नाही, तर त्याच्यामध्ये नंदी निरुद्ध होते. नंदी नसल्यावर तीव्र राग उत्पन्न होत नाही; तीव्र राग नसल्यावर संयोग निर्माण होत नाही. मिगजाल, अशा नंदी-संयोजनापासून मुक्त असलेल्या भिक्खूला ‘एकविहारी’ असे म्हटले जाते. मिगजाल, असा राहणारा भिक्खू जरी गावाच्या सीमेवर राहत असला आणि भिक्खू, भिक्खुणी, उपासक, उपासिका, राजे, राजमहामात्र, इतर पंथांचे आचार्य आणि त्यांचे शिष्य यांच्या गर्दीत राहत असला, तरीही त्याला ‘एकविहारी’ असेच म्हटले जाते. त्याचे कारण काय? कारण तृष्णा हीच त्याची सोबती होती आणि ती त्याने नष्ट केली आहे. म्हणूनच त्याला ‘एकविहारी’ असे म्हटले जाते.” प्रथम सुत्त समाप्त. ๒. ทุติยมิคชาลสุตฺตํ २. द्वितीय मिगजाल सुत्त ๖๔. อถ [Pg.265] โข อายสฺมา มิคชาโล เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา มิคชาโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน ธมฺมํ เทเสตุ, ยมหํ ภควโต ธมฺมํ สุตฺวา เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหเรยฺย’’นฺติ. ६४. तेव्हा आयुष्यमान मिगजाल जेथे भगवान होते तेथे गेला... आणि एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान मिगजालने भगवंतांना असे म्हटले – 'भन्ते, हे चांगले होईल जर भगवंतांनी मला संक्षेपात धम्म उपदेश करावा, जेणेकरून भगवंतांकडून धम्म ऐकून मी एकटा, एकांतात, अप्रमत्त, आतापी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करू शकेन.' ‘‘สนฺติ โข, มิคชาล, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต อุปฺปชฺชติ นนฺที. นนฺทิสมุทยา ทุกฺขสมุทโย, มิคชาลาติ วทามิ…เป… สนฺติ จ โข, มิคชาล, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ จ โข, มิคชาล, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต อุปฺปชฺชติ นนฺที. นนฺทิสมุทยา ทุกฺขสมุทโย, มิคชาลาติ วทามิ. “मिगजाल, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे रूप आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यात गुंतून राहतो, तर त्याच्यामध्ये नंदी (तृष्णा) उत्पन्न होते. मिगजाल, मी असे सांगतो की, नंदीच्या उदयामुळे दुःखाचा उदय होतो. ... मिगजाल, जिभेने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... मिगजाल, मनाने जाणता येण्याजोगे असे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे धम्म आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यात गुंतून राहतो, तर त्याच्यामध्ये नंदी उत्पन्न होते. मिगजाल, मी असे सांगतो की, नंदीच्या उदयामुळे दुःखाचा उदय होतो.” ‘‘สนฺติ จ โข, มิคชาล, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต นนฺที นิรุชฺฌติ. นนฺทินิโรธา ทุกฺขนิโรโธ, มิคชาลาติ วทามิ…เป… สนฺติ จ โข, มิคชาล, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา อิฏฺฐา กนฺตา…เป… สนฺติ จ โข, มิคชาล, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต นนฺที นิรุชฺฌติ. นนฺทินิโรธา ทุกฺขนิโรโธ, มิคชาลาติ วทามี’’ติ. “परंतु मिगजाल, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे रूप आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात गुंतून राहत नाही, तर त्याच्यामध्ये नंदी निरुद्ध होते. मिगजाल, मी असे सांगतो की, नंदीच्या निरोधाने दुःखाचा निरोध होतो. ... मिगजाल, जिभेने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... मिगजाल, मनाने जाणता येण्याजोगे असे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे धम्म आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात गुंतून राहत नाही, तर त्याच्यामध्ये नंदी निरुद्ध होते. मिगजाल, मी असे सांगतो की, नंदीच्या निरोधाने दुःखाचा निरोध होतो.” อถ โข อายสฺมา มิคชาโล ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. อถ โข อายสฺมา มิคชาโล เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรโต นจิรสฺเสว – ยสฺสตฺถาย กุลปุตฺตา สมฺมเทว อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชนฺติ ตทนุตฺตรํ – พฺรหฺมจริยปริโยสานํ ทิฏฺเฐว [Pg.266] ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหาสิ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ อพฺภญฺญาสิ. อญฺญตโร จ ปนายสฺมา มิคชาโล อรหตํ อโหสีติ. ทุติยํ. तेव्हा आयुष्यमान मिगजाल भगवंतांच्या भाषणाचे अभिनंदन करून व त्याचा मनापासून स्वीकार करून आसनावरून उठला, भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि निघून गेला. त्यानंतर आयुष्यमान मिगजाल एकटा, एकांतात, अप्रमत्त, आतापी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करत असताना, फार काळ न जाता – ज्या ध्येयासाठी कुलपुत्र योग्य प्रकारे घराचा त्याग करून अनगारिक (गृहहीन) प्रव्रज्या घेतात, ते अनुत्तर ब्रह्मचर्याचे अंतिम ध्येय (अर्हतपद) याच जन्मात स्वतः उच्च ज्ञानाने जाणून, साक्षात करून आणि त्यात प्रतिष्ठित होऊन विहार करू लागला. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर काहीही उरलेले नाही,' असे त्याने प्रत्यक्ष जाणले. आणि आयुष्यमान मिगजाल अर्हतांपैकी एक झाला. द्वितीय सुत्त समाप्त. ๓. ปฐมสมิทฺธิมารปญฺหาสุตฺตํ ३. प्रथम समिद्धि मारपञ्ह सुत्त ๖๕. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. อถ โข อายสฺมา สมิทฺธิ เยน ภควา…เป… ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘‘มาโร, มาโร’ติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, มาโร วา อสฺส มารปญฺญตฺติ วา’’ติ? ६५. एकदा भगवान राजगृहात वेळुवनातील कलंदकनिवाप येथे विहार करत होते. तेव्हा आयुष्यमान समिद्धी जेथे भगवान होते तेथे गेले... आणि भगवंतांना असे म्हणाले – “भन्ते, ‘मार, मार’ असे म्हटले जाते. भन्ते, किती प्रमाणात मार किंवा माराची प्रज्ञप्ती (संकल्पना) असू शकते?” ‘‘ยตฺถ โข, สมิทฺธิ, อตฺถิ จกฺขุ, อตฺถิ รูปา, อตฺถิ จกฺขุวิญฺญาณํ, อตฺถิ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, อตฺถิ ตตฺถ มาโร วา มารปญฺญตฺติ วา. อตฺถิ โสตํ, อตฺถิ สทฺทา, อตฺถิ โสตวิญฺญาณํ, อตฺถิ โสตวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, อตฺถิ ตตฺถ มาโร วา มารปญฺญตฺติ วา. อตฺถิ ฆานํ, อตฺถิ คนฺธา, อตฺถิ ฆานวิญฺญาณํ, อตฺถิ ฆานวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, อตฺถิ ตตฺถ มาโร วา มารปญฺญตฺติ วา. อตฺถิ ชิวฺหา, อตฺถิ รสา, อตฺถิ ชิวฺหาวิญฺญาณํ, อตฺถิ ชิวฺหาวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, อตฺถิ ตตฺถ มาโร วา มารปญฺญตฺติ วา. อตฺถิ กาโย, อตฺถิ โผฏฺฐพฺพา, อตฺถิ กายวิญฺญาณํ, อตฺถิ กายวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, อตฺถิ ตตฺถ มาโร วา มารปญฺญตฺติ วา. อตฺถิ มโน, อตฺถิ ธมฺมา, อตฺถิ มโนวิญฺญาณํ, อตฺถิ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, อตฺถิ ตตฺถ มาโร วา มารปญฺญตฺติ วา. “समिद्धी, जेथे डोळा आहे, रूपे आहेत, चक्षु-विज्ञान आहे, चक्षु-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म आहेत, तेथे मार किंवा माराची प्रज्ञप्ती असते. जेथे कान आहे, शब्द आहेत, श्रोत-विज्ञान आहे, श्रोत-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म आहेत, तेथे मार किंवा माराची प्रज्ञप्ती असते. जेथे नाक आहे, गंध आहेत, घ्राण-विज्ञान आहे, घ्राण-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म आहेत, तेथे मार किंवा माराची प्रज्ञप्ती असते. जेथे जीभ आहे, रस आहेत, जिव्हा-विज्ञान आहे, जिव्हा-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म आहेत, तेथे मार किंवा माराची प्रज्ञप्ती असते. जेथे शरीर आहे, स्पर्श आहेत, काय-विज्ञान आहे, काय-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म आहेत, तेथे मार किंवा माराची प्रज्ञप्ती असते. जेथे मन आहे, धर्म आहेत, मनो-विज्ञान आहे, मनो-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म आहेत, तेथे मार किंवा माराची प्रज्ञप्ती असते.” ‘‘ยตฺถ จ โข, สมิทฺธิ, นตฺถิ จกฺขุ, นตฺถิ รูปา, นตฺถิ จกฺขุวิญฺญาณํ, นตฺถิ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, นตฺถิ ตตฺถ มาโร วา มารปญฺญตฺติ วา. นตฺถิ โสตํ…เป… นตฺถิ ฆานํ…เป… นตฺถิ ชิวฺหา, นตฺถิ รสา, นตฺถิ ชิวฺหาวิญฺญาณํ, นตฺถิ ชิวฺหาวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, นตฺถิ ตตฺถ มาโร วา มารปญฺญตฺติ วา. นตฺถิ กาโย…เป…. นตฺถิ มโน, นตฺถิ ธมฺมา, นตฺถิ มโนวิญฺญาณํ, นตฺถิ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, นตฺถิ ตตฺถ มาโร วา มารปญฺญตฺติ วา’’ติ. ตติยํ. “परंतु समिद्धी, जेथे डोळा नाही, रूपे नाहीत, चक्षु-विज्ञान नाही, चक्षु-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म नाहीत, तेथे मार किंवा माराची प्रज्ञप्ती नसते. जेथे कान नाही... नाक नाही... जीभ नाही, रस नाहीत, जिव्हा-विज्ञान नाही, जिव्हा-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म नाहीत, तेथे मार किंवा माराची प्रज्ञप्ती नसते. जेथे शरीर नाही... जेथे मन नाही, धर्म नाहीत, मनो-विज्ञान नाही, मनो-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म नाहीत, तेथे मार किंवा माराची प्रज्ञप्ती नसते.” (तिसरे सूत्र समाप्त) ๔. สมิทฺธิสตฺตปญฺหาสุตฺตํ ४. समिद्धिसत्तपञ्हसुत्त (समिद्धी प्राणी-प्रश्न सूत्र) ๖๖. ‘‘‘สตฺโต, สตฺโต’ติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, สตฺโต วา อสฺส สตฺตปญฺญตฺติ วา’’ติ…เป…. จตุตฺถํ. ६६. “भन्ते, ‘सत्त (प्राणी), सत्त’ असे म्हटले जाते. भन्ते, किती प्रमाणात सत्त किंवा सत्ताची प्रज्ञप्ती असू शकते?”... (चौथे सूत्र समाप्त) ๕. สมิทฺธิทุกฺขปญฺหาสุตฺตํ ५. समिद्धिदुक्खपञ्हसुत्त (समिद्धी दुःख-प्रश्न सूत्र) ๖๗. ‘‘‘ทุกฺขํ[Pg.267], ทุกฺข’นฺติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, ทุกฺขํ วา อสฺส ทุกฺขปญฺญตฺติ วา’’ติ…เป…. ปญฺจมํ. ६७. “भन्ते, ‘दुःख, दुःख’ असे म्हटले जाते. भन्ते, किती प्रमाणात दुःख किंवा दुःखाची प्रज्ञप्ती असू शकते?”... (पाचवे सूत्र समाप्त) ๖. สมิทฺธิโลกปญฺหาสุตฺตํ ६. समिद्धिलोकपञ्हसुत्त (समिद्धी लोक-प्रश्न सूत्र) ๖๘. ‘‘‘โลโก, โลโก’ติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, โลโก วา อสฺส โลกปญฺญตฺติ วา’’ติ? ยตฺถ โข, สมิทฺธิ, อตฺถิ จกฺขุ, อตฺถิ รูปา, อตฺถิ จกฺขุวิญฺญาณํ, อตฺถิ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, อตฺถิ ตตฺถ โลโก วา โลกปญฺญตฺติ วาติ…เป… อตฺถิ ชิวฺหา…เป… อตฺถิ มโน, อตฺถิ ธมฺมา, อตฺถิ มโนวิญฺญาณํ, อตฺถิ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, อตฺถิ ตตฺถ โลโก วา โลกปญฺญตฺติ วา. ६८. “भन्ते, ‘लोक, लोक’ असे म्हटले जाते. भन्ते, किती प्रमाणात लोक किंवा लोकाची प्रज्ञप्ती असू शकते?” “समिद्धी, जेथे डोळा आहे, रूपे आहेत, चक्षु-विज्ञान आहे, चक्षु-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म आहेत, तेथे लोक किंवा लोकाची प्रज्ञप्ती असते... जेथे जीभ आहे... जेथे मन आहे, धर्म आहेत, मनो-विज्ञान आहे, मनो-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म आहेत, तेथे लोक किंवा लोकाची प्रज्ञप्ती असते.” ‘‘ยตฺถ จ โข, สมิทฺธิ, นตฺถิ จกฺขุ, นตฺถิ รูปา, นตฺถิ จกฺขุวิญฺญาณํ, นตฺถิ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, นตฺถิ ตตฺถ โลโก วา โลกปญฺญตฺติ วา…เป… นตฺถิ ชิวฺหา…เป… นตฺถิ มโน, นตฺถิ ธมฺมา, นตฺถิ มโนวิญฺญาณํ, นตฺถิ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, นตฺถิ ตตฺถ โลโก วา โลกปญฺญตฺติ วา’’ติ. ฉฏฺฐํ. “परंतु समिद्धी, जेथे डोळा नाही, रूपे नाहीत, चक्षु-विज्ञान नाही, चक्षु-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म नाहीत, तेथे लोक किंवा लोकाची प्रज्ञप्ती नसते... जेथे जीभ नाही... जेथे मन नाही, धर्म नाहीत, मनो-विज्ञान नाही, मनो-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म नाहीत, तेथे लोक किंवा लोकाची प्रज्ञप्ती नसते.” (सहावे सूत्र समाप्त) ๗. อุปเสนอาสีวิสสุตฺตํ ७. उपसेनआसीविससुत्त (उपसेन आणि विषारी साप सूत्र) ๖๙. เอกํ สมยํ อายสฺมา จ สาริปุตฺโต อายสฺมา จ อุปเสโน ราชคเห วิหรนฺติ สีตวเน สปฺปโสณฺฑิกปพฺภาเร. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมโต อุปเสนสฺส กาเย อาสีวิโส ปติโต โหติ. อถ โข อายสฺมา อุปเสโน ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘เอถ เม, อาวุโส, อิมํ กายํ มญฺจกํ อาโรเปตฺวา พหิทฺธา นีหรถ. ปุรายํ กาโย อิเธว วิกิรติ; เสยฺยถาปิ ภุสมุฏฺฐี’’ติ. ६९. एकदा आयुष्यमान सारिपुत्त आणि आयुष्यमान उपसेन राजगृहातील शीतवनात सप्पसोंडिक कपारीत विहार करत होते. त्या वेळी आयुष्यमान उपसेन यांच्या शरीरावर एक विषारी साप पडला. तेव्हा आयुष्यमान उपसेन यांनी भिक्खूंना बोलावले – “या, आवुसो, माझ्या या शरीराला खाटेवर ठेवून बाहेर घेऊन जा. हे शरीर येथेच कोंड्याच्या मुठीसारखे विखुरण्यापूर्वी याला बाहेर काढा.” เอวํ วุตฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต อายสฺมนฺตํ อุปเสนํ เอตทโวจ – ‘‘น โข ปน มยํ ปสฺสาม อายสฺมโต อุปเสนสฺส กายสฺส วา อญฺญถตฺตํ อินฺทฺริยานํ วา วิปริณามํ. อถ จ ปนายสฺมา อุปเสโน เอวมาห – ‘เอถ เม, อาวุโส, อิมํ กายํ มญฺจกํ อาโรเปตฺวา พหิทฺธา นีหรถ. ปุรายํ กาโย อิเธว วิกิรติ; เสยฺยถาปิ ภุสมุฏฺฐี’’’ติ. ‘‘ยสฺส นูน, อาวุโส สาริปุตฺต, เอวมสฺส – ‘อหํ จกฺขูติ วา มม จกฺขูติ วา…เป… อหํ ชิวฺหาติ วา มม [Pg.268] ชิวฺหาติ วา… อหํ มโนติ วา มม มโนติ วา’. ตสฺส, อาวุโส สาริปุตฺต, สิยา กายสฺส วา อญฺญถตฺตํ อินฺทฺริยานํ วา วิปริณาโม. มยฺหญฺจ โข, อาวุโส สาริปุตฺต, น เอวํ โหติ – ‘อหํ จกฺขูติ วา มม จกฺขูติ วา…เป… อหํ ชิวฺหาติ วา มม ชิวฺหาติ วา…เป… อหํ มโนติ วา มม มโนติ วา’. ตสฺส มยฺหญฺจ โข, อาวุโส สาริปุตฺต, กึ กายสฺส วา อญฺญถตฺตํ ภวิสฺสติ, อินฺทฺริยานํ วา วิปริณาโม’’ติ! असे म्हटले असता, आयुष्यमान सारिपुत्त आयुष्यमान उपसेन यांना म्हणाले – “आम्हाला तर आयुष्यमान उपसेन यांच्या शरीरात कोणताही बदल किंवा त्यांच्या इंद्रियांमध्ये कोणतीही विकृती दिसत नाही. तरीही आयुष्यमान उपसेन असे म्हणत आहेत – ‘या, आवुसो, माझ्या या शरीराला खाटेवर ठेवून बाहेर घेऊन जा. हे शरीर येथेच कोंड्याच्या मुठीसारखे विखुरण्यापूर्वी याला बाहेर काढा.’” “आवुसो सारिपुत्त, ज्याच्या मनात खरोखर असा विचार असेल – ‘मी डोळा आहे’ किंवा ‘डोळा माझा आहे’... ‘मी जीभ आहे’ किंवा ‘जीभ माझी आहे’... ‘मी मन आहे’ किंवा ‘मन माझे आहे’, आवुसो सारिपुत्त, त्याच्या शरीरात बदल किंवा इंद्रियांमध्ये विकृती घडून येईल. परंतु, आवुसो सारिपुत्त, माझ्या मनात असा विचार येत नाही – ‘मी डोळा आहे’ किंवा ‘डोळा माझा आहे’... ‘मी जीभ आहे’ किंवा ‘जीभ माझी आहे’... ‘मी मन आहे’ किंवा ‘मन माझे आहे’. मग, आवुसो सारिपुत्त, माझ्या शरीरात बदल किंवा इंद्रियांमध्ये विकृती कशी काय घडून येईल?” ‘‘ตถา หิ ปนายสฺมโต อุปเสนสฺส ทีฆรตฺตํ อหงฺการมมงฺการมานานุสโย สุสมูหโต. ตสฺมา อายสฺมโต อุปเสนสฺส น เอวํ โหติ – ‘อหํ จกฺขูติ วา มม จกฺขูติ วา…เป… อหํ ชิวฺหาติ วา มม ชิวฺหาติ วา…เป… อหํ มโนติ วา มม มโนติ วา’’’ติ. อถ โข เต ภิกฺขู อายสฺมโต อุปเสนสฺส กายํ มญฺจกํ อาโรเปตฺวา พหิทฺธา นีหรึสุ. อถ โข อายสฺมโต อุปเสนสฺส กาโย ตตฺเถว วิกิริ; เสยฺยถาปิ ภุสมุฏฺฐีติ. สตฺตมํ. “हे अगदी योग्य आहे, कारण आयुष्यमान उपसेन यांनी दीर्घकाळापासून अहंकार (मी-पणा), ममाकार (माझे-पणा) आणि मानानुशय (अभिमानाची सुप्त प्रवृत्ती) पूर्णपणे मुळासकट नष्ट केली आहे. म्हणूनच आयुष्यमान उपसेन यांच्या मनात असा विचार येत नाही – ‘मी डोळा आहे’ किंवा ‘डोळा माझा आहे’... ‘मी जीभ आहे’ किंवा ‘जीभ माझी आहे’... ‘मी मन आहे’ किंवा ‘मन माझे आहे’.” त्यानंतर त्या भिक्खूंनी आयुष्यमान उपसेन यांचे शरीर खाटेवर ठेवून बाहेर काढले. तेव्हा आयुष्यमान उपसेन यांचे शरीर तेथेच कोंड्याच्या मुठीसारखे विखुरले. (सातवे सूत्र समाप्त) ๘. อุปวาณสนฺทิฏฺฐิกสุตฺตํ ८. उपवाणसन्दिट्ठिकसुत्त (उपवाण आणि प्रत्यक्ष दिसणारा धर्म सूत्र) ๗๐. อถ โข อายสฺมา อุปวาโณ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อุปวาโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘‘สนฺทิฏฺฐิโก ธมฺโม, สนฺทิฏฺฐิโก ธมฺโม’ติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, สนฺทิฏฺฐิโก ธมฺโม โหติ, อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’’ติ? ७०. तेव्हा आयुष्यमान उपवाण जेथे भगवान होते तेथे गेले... एका बाजूला बसल्यावर आयुष्यमान उपवाण भगवंतांना असे म्हणाले – “भन्ते, ‘सन्दिट्ठिक धम्म (प्रत्यक्ष अनुभवता येणारा धर्म), सन्दिट्ठिक धम्म’ असे म्हटले जाते. भन्ते, धर्म कोणत्या मर्यादेपर्यंत सन्दिट्ठिक (प्रत्यक्ष अनुभवता येणारा), अकालिक (तात्काळ फळ देणारा), एहिपस्सिक (या आणि पहा असे म्हणण्यास योग्य), ओपनेय्यिक (हृदयात धारण करण्यास योग्य) आणि विद्वानांनी स्वतःच्या अंतःकरणात अनुभवण्यास योग्य असा होतो?” ‘‘อิธ ปน, อุปวาณ, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา รูปปฺปฏิสํเวที จ โหติ รูปราคปฺปฏิสํเวที จ. สนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ รูเปสุ ราคํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ รูเปสุ ราโค’ติ ปชานาติ. ยํ ตํ, อุปวาณ, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา รูปปฺปฏิสํเวที จ โหติ รูปราคปฺปฏิสํเวที จ. สนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ รูเปสุ ราคํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ รูเปสุ ราโค’ติ ปชานาติ. เอวมฺปิ โข, อุปวาณ, สนฺทิฏฺฐิโก ธมฺโม โหติ อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’’ติ…เป…. “हे उपवाण, या शासनात (धम्मात) भिक्खू डोळ्याने रूप पाहून रूपाचा अनुभव घेतो आणि रूपावरील रागाचा (आसक्तीचा) देखील अनुभव घेतो. आपल्यामध्ये रूपाविषयी राग विद्यमान असताना, ‘माझ्यामध्ये रूपाविषयी राग आहे’ असे तो स्पष्टपणे जाणतो. हे उपवाण, भिक्खू डोळ्याने रूप पाहून रूपाचा अनुभव घेतो आणि रूपावरील रागाचा अनुभव घेतो; आणि आपल्यामध्ये रूपाविषयी राग विद्यमान असताना, ‘माझ्यामध्ये रूपाविषयी राग आहे’ असे स्पष्टपणे जाणतो. हे उपवाण, अशा प्रकारे धम्म हा संदिट्ठिको (प्रत्यक्ष पाहण्याजोगा), अकालिको (तात्काळ फळ देणारा), एहिपस्सिको (या आणि पहा असे म्हणण्यास योग्य), ओपनेय्यिको (स्वतःमध्ये धारण करण्यास योग्य) आणि विद्वानांनी आपापल्या ठिकाणी स्वतःच अनुभवण्याजोगा असतो.” ...पे... ‘‘ปุน จปรํ, อุปวาณ, ภิกฺขุ ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา รสปฺปฏิสํเวที จ โหติ รสราคปฺปฏิสํเวที จ. สนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ รเสสุ ราคํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ รเสสุ ราโค’ติ ปชานาติ. ยํ ตํ, อุปวาณ, ภิกฺขุ ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา รสปฺปฏิสํเวที จ โหติ รสราคปฺปฏิสํเวที จ. สนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ รเสสุ [Pg.269] ราคํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ รเสสุ ราโค’ติ ปชานาติ. เอวมฺปิ โข, อุปวาณ, สนฺทิฏฺฐิโก ธมฺโม โหติ อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’’ติ…เป…. “पुन्हा दुसरे असे की, हे उपवाण, भिक्खू जिभेने रसाची चव घेऊन रसाचा अनुभव घेतो आणि रसावरील रागाचा (आसक्तीचा) देखील अनुभव घेतो. आपल्यामध्ये रसांविषयी राग विद्यमान असताना, ‘माझ्यामध्ये रसांविषयी राग आहे’ असे तो स्पष्टपणे जाणतो. हे उपवाण, भिक्खू जिभेने रसाची चव घेऊन रसाचा अनुभव घेतो आणि रसावरील रागाचा अनुभव घेतो; आणि आपल्यामध्ये रसांविषयी राग विद्यमान असताना, ‘माझ्यामध्ये रसांविषयी राग आहे’ असे स्पष्टपणे जाणतो. हे उपवाण, अशा प्रकारे धम्म हा संदिट्ठिको, अकालिको, एहिपस्सिको, ओपनेय्यिको आणि विद्वानांनी आपापल्या ठिकाणी स्वतःच अनुभवण्याजोगा असतो.” ...पे... ‘‘ปุน จปรํ, อุปวาณ, ภิกฺขุ มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ธมฺมปฺปฏิสํเวที จ โหติ ธมฺมราคปฺปฏิสํเวที จ. สนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ ธมฺเมสุ ราคํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ธมฺเมสุ ราโค’ติ ปชานาติ. ยํ ตํ, อุปวาณ, ภิกฺขุ มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ธมฺมปฺปฏิสํเวที จ โหติ ธมฺมราคปฺปฏิสํเวที จ. สนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ ธมฺเมสุ ราคํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ธมฺเมสุ ราโค’ติ ปชานาติ. เอวมฺปิ โข, อุปวาณ, สนฺทิฏฺฐิโก ธมฺโม โหติ…เป… ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’’ติ…เป…. “पुन्हा दुसरे असे की, हे उपवाण, भिक्खू मनाने धर्माला (मानसिक विषयाला) जाणून धर्माचा अनुभव घेतो आणि धर्मावरील रागाचा (आसक्तीचा) देखील अनुभव घेतो. आपल्यामध्ये धर्मांविषयी राग विद्यमान असताना, ‘माझ्यामध्ये धर्मांविषयी राग आहे’ असे तो स्पष्टपणे जाणतो. हे उपवाण, भिक्खू मनाने धर्माला जाणून धर्माचा अनुभव घेतो आणि धर्मावरील रागाचा अनुभव घेतो; आणि आपल्यामध्ये धर्मांविषयी राग विद्यमान असताना, ‘माझ्यामध्ये धर्मांविषयी राग आहे’ असे स्पष्टपणे जाणतो. हे उपवाण, अशा प्रकारे धम्म हा संदिट्ठिको असतो... ...विद्वानांनी आपापल्या ठिकाणी स्वतःच अनुभवण्याजोगा असतो.” ...पे... ‘‘อิธ ปน, อุปวาณ, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา รูปปฺปฏิสํเวที จ โหติ, โน จ รูปราคปฺปฏิสํเวที. อสนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ รูเปสุ ราคํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ รูเปสุ ราโค’ติ ปชานาติ. ยํ ตํ, อุปวาณ, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา รูปปฺปฏิสํเวทีหิ โข โหติ, โน จ รูปราคปฺปฏิสํเวที. อสนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ รูเปสุ ราคํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ รูเปสุ ราโค’ติ ปชานาติ. เอวมฺปิ โข, อุปวาณ, สนฺทิฏฺฐิโก ธมฺโม โหติ, อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’’ติ…เป…. “परंतु हे उपवाण, या शासनात भिक्खू डोळ्याने रूप पाहून रूपाचा अनुभव तर घेतो, पण रूपावरील रागाचा (आसक्तीचा) अनुभव घेत नाही. आपल्यामध्ये रूपाविषयी राग विद्यमान नसताना, ‘माझ्यामध्ये रूपाविषयी राग नाही’ असे तो स्पष्टपणे जाणतो. हे उपवाण, भिक्खू डोळ्याने रूप पाहून केवळ रूपाचाच अनुभव घेतो, रूपावरील रागाचा अनुभव घेत नाही; आणि आपल्यामध्ये रूपाविषयी राग विद्यमान नसताना, ‘माझ्यामध्ये रूपाविषयी राग नाही’ असे स्पष्टपणे जाणतो. हे उपवाण, अशा प्रकारे धम्म हा संदिट्ठिको, अकालिको, एहिपस्सिको, ओपनेय्यिको आणि विद्वानांनी आपापल्या ठिकाणी स्वतःच अनुभवण्याजोगा असतो.” ...पे... ‘‘ปุน จปรํ, อุปวาณ, ภิกฺขุ ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา รสปฺปฏิสํเวทีหิ โข โหติ, โน จ รสราคปฺปฏิสํเวที. อสนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ รเสสุ ราคํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ รเสสุ ราโค’ติ ปชานาติ…เป…. “पुन्हा दुसरे असे की, हे उपवाण, भिक्खू जिभेने रसाची चव घेऊन केवळ रसाचाच अनुभव घेतो, रसावरील रागाचा अनुभव घेत नाही. आपल्यामध्ये रसांविषयी राग विद्यमान नसताना, ‘माझ्यामध्ये रसांविषयी राग नाही’ असे तो स्पष्टपणे जाणतो...” ...पे... ‘‘ปุน จปรํ, อุปวาณ, ภิกฺขุ มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ธมฺมปฺปฏิสํเวทีหิ โข โหติ, โน จ ธมฺมราคปฺปฏิสํเวที. อสนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ ธมฺเมสุ ราคํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ธมฺเมสุ ราโค’ติ ปชานาติ. ยํ ตํ, อุปวาณ, ภิกฺขุ มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ธมฺมปฺปฏิสํเวทีหิ โข โหติ, โน จ ธมฺมราคปฺปฏิสํเวที. อสนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ ธมฺเมสุ ราคํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ธมฺเมสุ ราโค’ติ ปชานาติ. เอวมฺปิ โข, อุปวาณ, สนฺทิฏฺฐิโก ธมฺโม โหติ, อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’’ติ. อฏฺฐมํ. “पुन्हा दुसरे असे की, हे उपवाण, भिक्खू मनाने धर्माला जाणून केवळ धर्माचाच अनुभव घेतो, धर्मावरील रागाचा अनुभव घेत नाही. आपल्यामध्ये धर्मांविषयी राग विद्यमान नसताना, ‘माझ्यामध्ये धर्मांविषयी राग नाही’ असे तो स्पष्टपणे जाणतो. हे उपवाण, भिक्खू मनाने धर्माला जाणून केवळ धर्माचाच अनुभव घेतो, धर्मावरील रागाचा अनुभव घेत नाही; आणि आपल्यामध्ये धर्मांविषयी राग विद्यमान नसताना, ‘माझ्यामध्ये धर्मांविषयी राग नाही’ असे स्पष्टपणे जाणतो. हे उपवाण, अशा प्रकारे धम्म हा संदिट्ठिको, अकालिको, एहिपस्सिको, ओपनेय्यिको आणि विद्वानांनी आपापल्या ठिकाणी स्वतःच अनुभवण्याजोगा असतो.” आठवे. ๙. ปฐมฉผสฺสายตนสุตฺตํ ९. प्रथम छफस्सायतन सुत्त ๗๑. ‘‘โย หิ โกจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ. อวุสิตํ [Pg.270] เตน พฺรหฺมจริยํ, อารกา โส อิมสฺมา ธมฺมวินยา’’ติ. ७१. “भिक्खूंनो, जो कोणी भिक्खू सहा स्पर्शायतनांचा (स्पर्शाच्या सहा आधारांचा) उदय (उत्पत्ती), अस्त (लय), आस्वाद (सुखद अनुभव), आदीनव (दोष/धोका) आणि निस्सरण (मुक्ती/सुटका) हे जसे आहे तसे (यथाभूत) जाणत नाही; त्याने ब्रह्मचर्य पूर्ण केलेले नाही, तो या धम्म-विनयापासून खूप दूर आहे.” เอวํ วุตฺเต, อญฺญตโร ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘เอตฺถาหํ, ภนฺเต, อนสฺสสํ. อหญฺหิ, ภนฺเต, ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ นปฺปชานามี’’ติ. असे म्हटले असता, एका भिक्खूने भगवंतांना असे म्हटले— “भंते, या बाबतीत मी नष्ट झालो आहे (माझे नुकसान झाले आहे). कारण भंते, मी सहा स्पर्शायतनांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण हे जसे आहे तसे जाणत नाही.” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, ภิกฺขุ, จกฺขุํ ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสี’’ติ? “भिक्खू, तुला काय वाटते? तू डोळ्याकडे ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ अशा दृष्टीने पाहतोस का?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नाही, भंते.” ‘‘สาธุ, ภิกฺขุ, เอตฺถ จ เต, ภิกฺขุ, จกฺขุ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย สุทิฏฺฐํ ภวิสฺสติ. เอเสวนฺโต ทุกฺขสฺส…เป… ชิวฺหํ ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสี’’ติ? “उत्तम, भिक्खू! आणि या बाबतीत, भिक्खू, तू डोळ्याकडे ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे योग्य प्रज्ञेने जसे आहे तसे (यथाभूत) चांगल्या प्रकारे पाहिले पाहिजेस. हाच दुःखाचा अंत आहे. ...पे... तू जिभेकडे ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ अशा दृष्टीने पाहतोस का?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नाही, भंते.” ‘‘สาธุ, ภิกฺขุ, เอตฺถ จ เต, ภิกฺขุ, ชิวฺหา ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย สุทิฏฺฐํ ภวิสฺสติ. เอเสวนฺโต ทุกฺขสฺส…เป… มนํ ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสี’’ติ? “उत्तम, भिक्खू! आणि या बाबतीत, भिक्खू, तू जिभेकडे ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे योग्य प्रज्ञेने जसे आहे तसे चांगल्या प्रकारे पाहिले पाहिजेस. हाच दुःखाचा अंत आहे. ...पे... तू मनाकडे ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ अशा दृष्टीने पाहतोस का?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नाही, भंते.” ‘‘สาธุ, ภิกฺขุ, เอตฺถ จ เต, ภิกฺขุ, มโน ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย สุทิฏฺฐํ ภวิสฺสติ. เอเสวนฺโต ทุกฺขสฺสา’’ติ. นวมํ. “उत्तम, भिक्खू! आणि या बाबतीत, भिक्खू, तू मनाकडे ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे योग्य प्रज्ञेने जसे आहे तसे चांगल्या प्रकारे पाहिले पाहिजेस. हाच दुःखाचा अंत आहे.” नववे. ๑๐. ทุติยฉผสฺสายตนสุตฺตํ १०. द्वितीय छफस्सायतन सुत्त ๗๒. ‘‘โย หิ โกจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ. อวุสิตํ เตน พฺรหฺมจริยํ, อารกา โส อิมสฺมา ธมฺมวินยา’’ติ. ७२. “भिक्खूंनो, जो कोणी भिक्खू सहा स्पर्शायतनांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण हे जसे आहे तसे जाणत नाही; त्याने ब्रह्मचर्य पूर्ण केलेले नाही, तो या धम्म-विनयापासून खूप दूर आहे.” เอวํ วุตฺเต, อญฺญตโร ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘เอตฺถาหํ, ภนฺเต, อนสฺสสํ ปนสฺสสํ. อหญฺหิ, ภนฺเต, ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ นปฺปชานามี’’ติ. असे म्हटले असता, एका भिक्खूने भगवंतांना असे म्हटले— “भंते, या बाबतीत मी पूर्णपणे नष्ट झालो आहे (माझे मोठे नुकसान झाले आहे). कारण भंते, मी सहा स्पर्शायतनांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण हे जसे आहे तसे जाणत नाही.” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, ภิกฺขุ, จกฺขุํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสี’’ติ? “भिक्खू, तुला काय वाटते? तू डोळ्याकडे ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा दृष्टीने पाहतोस का?” ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. “होय, भंते.” ‘‘สาธุ, ภิกฺขุ, เอตฺถ จ เต, ภิกฺขุ, จกฺขุ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย สุทิฏฺฐํ ภวิสฺสติ. เอวํ เต เอตํ ปฐมํ ผสฺสายตนํ ปหีนํ ภวิสฺสติ [Pg.271] อายตึ อปุนพฺภวาย…เป…. “साधू, भिक्खू! आणि येथे, भिक्खू, तू चक्षूकडे (डोळ्याकडे) ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. अशा प्रकारे, भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होण्यासाठी तुझ्याकडून हे पहिले स्पर्शायतन प्रहीन (नष्ट) केले जाईल...” ‘‘ชิวฺหํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสี’’ติ? “तू जिव्हेकडे (जिभेकडे) ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे पाहतोस का?” ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. “होय, भन्ते.” ‘‘สาธุ, ภิกฺขุ, เอตฺถ จ เต, ภิกฺขุ, ชิวฺหา ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย สุทิฏฺฐํ ภวิสฺสติ. เอวํ เต เอตํ จตุตฺถํ ผสฺสายตนํ ปหีนํ ภวิสฺสติ อายตึ อปุนพฺภวาย…เป…. “साधू, भिक्खू! आणि येथे, भिक्खू, तू जिव्हेकडे ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. अशा प्रकारे, भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होण्यासाठी तुझ्याकडून हे चौथे स्पर्शायतन प्रहीन (नष्ट) केले जाईल...” ‘‘มนํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสี’’ติ? “तू मनाकडे ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे पाहतोस का?” ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. “होय, भन्ते.” ‘‘สาธุ, ภิกฺขุ, เอตฺถ จ เต, ภิกฺขุ, มโน ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย สุทิฏฺฐํ ภวิสฺสติ. เอวํ เต เอตํ ฉฏฺฐํ ผสฺสายตนํ ปหีนํ ภวิสฺสติ อายตึ อปุนพฺภวายา’’ติ. ทสมํ. “साधू, भिक्खू! आणि येथे, भिक्खू, तू मनाकडे ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. अशा प्रकारे, भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होण्यासाठी तुझ्याकडून हे सहावे स्पर्शायतन प्रहीन (नष्ट) केले जाईल.” (दहावे सूत्र समाप्त.) ๑๑. ตติยฉผสฺสายตนสุตฺตํ ११. तिसरे छफस्सायतन सूत्र ๗๓. ‘‘โย หิ โกจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ. อวุสิตํ เตน พฺรหฺมจริยํ, อารกา โส อิมสฺมา ธมฺมวินยา’’ติ. ७३. “भिक्खूंनो, जो कोणी भिक्खू या सहा स्पर्शायतनांचा उदय (उत्पत्ती), अस्त (लय), आस्वाद (सुखद अनुभव), आदीनव (दोष) आणि निस्सरण (मुक्ती) यथार्थपणे जाणत नाही; त्याने ब्रह्मचर्य पूर्ण केलेले नाही, तो या धम्म-विनयापासून दूर आहे.” เอวํ วุตฺเต, อญฺญตโร ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘เอตฺถาหํ, ภนฺเต, อนสฺสสํ ปนสฺสสํ. อหญฺหิ, ภนฺเต, ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ นปฺปชานามี’’ติ. असे म्हटले असता, एक भिक्खू भगवंतांना म्हणाला, “भन्ते, येथे मी पूर्णपणे नष्ट झालो आहे, अत्यंत नष्ट झालो आहे. कारण, भन्ते, मी या सहा स्पर्शायतनांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण यथार्थपणे जाणत नाही.” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, ภิกฺขุ, จกฺขุ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “भिक्खू, तुला काय वाटते, चक्षू (डोळा) नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःखकारक, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील (विपरिणामधर्मी) आहे, त्याकडे ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ अशा प्रकारे पाहणे योग्य आहे का?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘โสตํ… ฆานํ… ชิวฺหา… กาโย… มโน นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? “श्रोत (कान)... घ्राण (नाक)... जिव्हा (जीभ)... काय (शरीर)... मन नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’. “अनित्य, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःखकारक, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील आहे, त्याकडे ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ अशा प्रकारे पाहणे योग्य आहे का?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขุ, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, โสตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ฆานสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ชิวฺหายปิ นิพฺพินฺทติ, กายสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. เอกาทสมํ. “असे पाहणारा, भिक्खू, श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षूविषयीही निर्वेद (उदासीनता) पावतो, श्रोताविषयीही निर्वेद पावतो, घ्राणाविषयीही निर्वेद पावतो, जिव्हेविषयीही निर्वेद पावतो, कायेविषयीही निर्वेद पावतो, मनाविषयीही निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्यामुळे तो विरक्त होतो; विरागामुळे तो मुक्त होतो. मुक्त झाल्यावर ‘मी मुक्त झालो आहे’ असे ज्ञान होते. ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही’ हे तो जाणतो.” (अकरावे सूत्र समाप्त.) มิคชาลวคฺโค สตฺตโม. मिगजाल वर्ग सातवा समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याचे उद्दान (अनुक्रमणिका) – มิคชาเลน [Pg.272] ทฺเว วุตฺตา, จตฺตาโร จ สมิทฺธินา; อุปเสโน อุปวาโณ, ฉผสฺสายตนิกา ตโยติ. मिगजालाने दोन (सूत्रे) सांगितली, आणि समिद्धीने चार; उपसेन, उपवाण आणि तीन छफस्सायतनिक सूत्रे आहेत. ๘. คิลานวคฺโค ८. गिलाण वर्ग ๑. ปฐมคิลานสุตฺตํ १. पहिले गिलाण सूत्र ๗๔. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อมุกสฺมึ, ภนฺเต, วิหาเร อญฺญตโร ภิกฺขุ นโว อปฺปญฺญาโต อาพาธิโก ทุกฺขิโต พาฬฺหคิลาโน. สาธุ, ภนฺเต, ภควา เยน โส ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมตุ อนุกมฺปํ อุปาทายา’’ติ. ७४. श्रावस्ती येथील घटना. तेव्हा एक भिक्खू भगवंतांकडे गेला... (इत्यादी)... एका बाजूला बसल्यावर तो भिक्खू भगवंतांना म्हणाला, “भन्ते, अमुक एका विहारात एक नवदीक्षित, अपरिचित भिक्खू आजारी, पीडित आणि गंभीरपणे आजारी (गिलाण) आहे. भन्ते, भगवंतांनी अनुकंपा करून त्या भिक्खूकडे जावे, ही विनंती.” อถ โข ภควา นววาทญฺจ สุตฺวา คิลานวาทญฺจ, ‘‘อปฺปญฺญาโต ภิกฺขู’’ติ อิติ วิทิตฺวา เยน โส ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ. อทฺทสา โข โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ ทูรโตว อาคจฺฉนฺตํ. ทิสฺวาน มญฺจเก สมโธสิ. อถ โข ภควา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘อลํ, ภิกฺขุ, มา ตฺวํ มญฺจเก สมโธสิ. สนฺติมานิ อาสนานิ ปญฺญตฺตานิ, ตตฺถาหํ นิสีทิสฺสามี’’ติ. นิสีทิ ภควา ปญฺญตฺเต อาสเน. นิสชฺช โข ภควา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘กจฺจิ เต, ภิกฺขุ, ขมนียํ, กจฺจิ ยาปนียํ, กจฺจิ ทุกฺขา เวทนา ปฏิกฺกมนฺติ โน อภิกฺกมนฺติ, ปฏิกฺกโมสานํ ปญฺญายติ โน อภิกฺกโม’’ติ? तेव्हा भगवंतांनी तो ‘नवदीक्षित’ आणि ‘आजारी’ असल्याचे ऐकून, आणि तो एक अपरिचित भिक्खू आहे हे जाणून, ते त्या भिक्खूकडे गेले. त्या भिक्खूने भगवंतांना दुरूनच येत असताना पाहिले. त्यांना पाहून तो आपल्या खाटेवरून उठण्याचा प्रयत्न करू लागला. तेव्हा भगवंत त्याला म्हणाले, “नको, भिक्खू, तू खाटेवरून उठू नकोस. ही आसने तयार आहेत, मी तिथेच बसेन.” भगवंत तयार केलेल्या आसनावर बसले. बसल्यावर भगवंत त्या भिक्खूला म्हणाले, “भिक्खू, तुझी प्रकृती ठीक आहे ना? तुला सहन होत आहे ना? तुझ्या वेदना कमी होत आहेत ना, की वाढत आहेत? वेदना कमी होत असल्याचे जाणवते आहे ना, की वाढत असल्याचे?” ‘‘น เม, ภนฺเต, ขมนียํ, น ยาปนียํ, พาฬฺหา เม ทุกฺขา เวทนา อภิกฺกมนฺติ โน ปฏิกฺกมนฺติ, อภิกฺกโมสานํ ปญฺญายติ โน ปฏิกฺกโม’’ติ. “भन्ते, माझी प्रकृती ठीक नाही, मला सहन होत नाही. माझ्या तीव्र वेदना वाढतच आहेत, कमी होत नाहीत; वेदना वाढत असल्याचेच जाणवते आहे, कमी होत असल्याचे नाही.” ‘‘กจฺจิ เต, ภิกฺขุ, น กิญฺจิ กุกฺกุจฺจํ, น โกจิ วิปฺปฏิสาโร’’ติ? “भिक्खू, तुला काही पश्चात्ताप (कुकुच्च) किंवा मनस्ताप (विप्पटिसार) तर होत नाही ना?” ‘‘ตคฺฆ เม, ภนฺเต, อนปฺปกํ กุกฺกุจฺจํ, อนปฺปโก วิปฺปฏิสาโร’’ติ. “नक्कीच, भन्ते, मला खूप पश्चात्ताप आणि मोठा मनस्ताप होत आहे.” ‘‘กจฺจิ ปน ตํ, ภิกฺขุ, อตฺตา สีลโต อุปวทตี’’ติ? “भिक्खू, तुझा आत्मा (मन) तुला शीलाच्या बाबतीत दोष देतो का?” ‘‘น โข มํ, ภนฺเต, อตฺตา สีลโต อุปวทตี’’ติ. “नाही, भन्ते, माझे मन मला शीलाच्या बाबतीत दोष देत नाही.” ‘‘โน เจ กิร เต, ภิกฺขุ, อตฺตา สีลโต อุปวทติ, อถ กิญฺจ เต กุกฺกุจฺจํ โก จ วิปฺปฏิสาโร’’ติ? “भिक्खू, जर तुझे मन तुला शीलाच्या बाबतीत दोष देत नाही, तर मग तुला कसला पश्चात्ताप आणि कसला मनस्ताप होत आहे?” ‘‘น ขฺวาหํ, ภนฺเต, สีลวิสุทฺธตฺถํ ภควตา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานามี’’ติ[Pg.273]. “भन्ते, भगवंतांनी केवळ शील-विशुद्धीसाठीच धम्म देशना दिली आहे, असे मी मानत नाही.” ‘‘โน เจ กิร ตฺวํ, ภิกฺขุ, สีลวิสุทฺธตฺถํ มยา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานาสิ, อถ กิมตฺถํ จรหิ ตฺวํ, ภิกฺขุ, มยา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานาสี’’ติ? “भिक्खू, जर मी केवळ शील-विशुद्धीसाठीच धम्म देशना दिली आहे असे तू मानत नाहीस, तर मग मी कोणत्या हेतूने धम्म देशना दिली आहे असे तू मानतोस?” ‘‘ราควิราคตฺถํ ขฺวาหํ, ภนฺเต, ภควตา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานามี’’ติ. “भन्ते, भगवंतांनी राग-विरागासाठी (आसक्ती नष्ट करण्यासाठी) धम्म देशना दिली आहे, असे मी मानतो.” ‘‘สาธุ สาธุ, ภิกฺขุ! สาธุ โข ตฺวํ, ภิกฺขุ, ราควิราคตฺถํ มยา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานาสิ. ราควิราคตฺโถ หิ, ภิกฺขุ, มยา ธมฺโม เทสิโต. ตํ กึ มญฺญสิ ภิกฺขุ, จกฺขุ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “साधू, साधू, भिक्खू! भिक्खू, तू खूप चांगल्या प्रकारे जाणतोस की मी राग-विरागासाठी धम्म देशना दिली आहे. कारण, भिक्खू, राग-विरागासाठीच माझ्याकडून धम्म देशना दिली गेली आहे. भिक्खू, तुला काय वाटते, चक्षू (डोळा) नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ…เป… โสตํ… ฆานํ… ชิวฺหา… กาโย… มโน นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? “... कान... नाक... जीभ... शरीर... मन नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याविषयी ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขุ, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, โสตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. “हे भिक्षू, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक डोळ्यांविषयीही विरक्त होतो, कानांविषयीही विरक्त होतो... मनाविषयीही विरक्त होतो. विरक्त झाल्यामुळे तो रागरहित होतो; वैराग्यामुळे तो मुक्त होतो; मुक्त झाल्यावर ‘मी मुक्त झालो आहे’ असे ज्ञान त्याला होते. ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर दुसरे काहीही करायचे उरलेले नाही’ असे तो जाणतो.” อิทมโวจ ภควา. อตฺตมโน โส ภิกฺขุ ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิ. อิมสฺมิญฺจ ปน เวยฺยากรณสฺมึ ภญฺญมาเน ตสฺส ภิกฺขุโน วิรชํ วีตมลํ ธมฺมจกฺขุํ อุทปาทิ – ‘‘ยํ กิญฺจิ สมุทยธมฺมํ, สพฺพํ ตํ นิโรธธมฺม’’นฺติ. ปฐมํ. भगवान असे म्हणाले. तो भिक्षू आनंदी झाला आणि त्याने भगवंतांच्या भाषणाची मनापासून प्रशंसा केली. आणि हे प्रवचन दिले जात असताना, त्या भिक्षूच्या मनात निर्मळ, निष्कलंक धम्मचक्षू उत्पन्न झाले: “जे काही उत्पन्न होण्याच्या स्वभावाचे आहे, ते सर्व नष्ट होण्याच्या स्वभावाचे आहे.” पहिले. ๒. ทุติยคิลานสุตฺตํ २. दुसरे गिळाणसुत्त ๗๕. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ…เป… ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อมุกสฺมึ, ภนฺเต, วิหาเร อญฺญตโร ภิกฺขุ นโว อปฺปญฺญาโต อาพาธิโก ทุกฺขิโต พาฬฺหคิลาโน. สาธุ, ภนฺเต, ภควา เยน โส ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมตุ อนุกมฺปํ อุปาทายา’’ติ. ७५. तेव्हा एक भिक्षू... भगवंतांना असे म्हणाला – “भन्ते, अमुक एका विहारात एक नवीन, अपरिचित भिक्षू आजारी, दुःखी आणि अत्यंत गंभीरपणे आजारी आहे. भन्ते, जर भगवंतांनी अनुकंपा करून त्या भिक्षूपाशी जावे, तर फार चांगले होईल.” อถ โข ภควา นววาทญฺจ สุตฺวา คิลานวาทญฺจ, ‘‘อปฺปญฺญาโต ภิกฺขู’’ติ อิติ วิทิตฺวา เยน โส ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ. อทฺทสา โข โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ ทูรโตว อาคจฺฉนฺตํ. ทิสฺวาน มญฺจเก สมโธสิ. อถ โข ภควา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘อลํ, ภิกฺขุ, มา ตฺวํ มญฺจเก สมโธสิ. สนฺติมานิ อาสนานิ ปญฺญตฺตานิ, ตตฺถาหํ นิสีทิสฺสามี’’ติ. นิสีทิ ภควา ปญฺญตฺเต อาสเน. นิสชฺช โข ภควา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘กจฺจิ เต, ภิกฺขุ, ขมนียํ, กจฺจิ ยาปนียํ, กจฺจิ ทุกฺขา เวทนา ปฏิกฺกมนฺติ โน อภิกฺกมนฺติ, ปฏิกฺกโมสานํ [Pg.274] ปญฺญายติ โน อภิกฺกโม’’ติ? तेव्हा भगवंतांनी तो नवीन भिक्षू आहे आणि आजारी आहे असे ऐकून, आणि तो अपरिचित भिक्षू आहे हे जाणून, ते त्या भिक्षूपाशी गेले. त्या भिक्षूने भगवंतांना दुरूनच येत असताना पाहिले. पाहून तो आपल्या खाटेवरून उठण्याचा प्रयत्न करू लागला. तेव्हा भगवान त्या भिक्षूला म्हणाले – “असू दे, भिक्षू, तू खाटेवरून उठू नकोस. ही आसने मांडलेली आहेत, तिथे मी बसेन.” भगवान मांडलेल्या आसनावर बसले. बसल्यावर भगवान त्या भिक्षूला म्हणाले – “भिक्षू, तुला सहन होत आहे ना? तुझा जीव थारावर आहे ना? तुझ्या वेदना कमी होत आहेत ना, वाढत तर नाहीत ना? वेदना कमी होत असल्याचे जाणवत आहे ना, वाढताना तर दिसत नाहीत ना?” ‘‘น เม, ภนฺเต, ขมนียํ, น ยาปนียํ…เป… น โข มํ, ภนฺเต, อตฺตา สีลโต อุปวทตี’’ติ. “भन्ते, मला सहन होत नाहीये, माझा जीव थारावर नाहीये... पण भन्ते, माझे मन मला शील पालनाच्या बाबतीत दोष देत नाही.” ‘‘โน เจ กิร เต, ภิกฺขุ, อตฺตา สีลโต อุปวทติ, อถ กิญฺจ เต กุกฺกุจฺจํ โก จ วิปฺปฏิสาโร’’ติ? “भिक्षू, जर तुझे मन तुला शील पालनाच्या बाबतीत दोष देत नाही, तर मग तुला कसली चिंता आणि कसला पश्चात्ताप होत आहे?” ‘‘น ขฺวาหํ, ภนฺเต, สีลวิสุทฺธตฺถํ ภควตา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานามี’’ติ. “भन्ते, भगवंतांनी केवळ शीलाच्या शुद्धतेसाठीच धम्माचा उपदेश केला आहे, असे मी समजत नाही.” ‘‘โน เจ กิร ตฺวํ, ภิกฺขุ, สีลวิสุทฺธตฺถํ มยา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานาสิ, อถ กิมตฺถํ จรหิ ตฺวํ, ภิกฺขุ, มยา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานาสี’’ติ? “भिक्षू, जर मी केवळ शीलाच्या शुद्धतेसाठी धम्माचा उपदेश केला आहे असे तू समजत नाहीस, तर मग मी कोणत्या हेतूने धम्माचा उपदेश केला आहे असे तू समजतोस?” ‘‘อนุปาทาปรินิพฺพานตฺถํ ขฺวาหํ, ภนฺเต, ภควตา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานามี’’ติ. “भन्ते, भगवंतांनी आसक्तीशिवाय परिनिर्वाण प्राप्त करण्यासाठी धम्माचा उपदेश केला आहे, असे मी समजतो.” ‘‘สาธุ สาธุ, ภิกฺขุ! สาธุ โข ตฺวํ, ภิกฺขุ, อนุปาทาปรินิพฺพานตฺถํ มยา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานาสิ. อนุปาทาปรินิพฺพานตฺโถ หิ, ภิกฺขุ, มยา ธมฺโม เทสิโต. “साधू, साधू, भिक्षू! भिक्षू, मी आसक्तीशिवाय परिनिर्वाण प्राप्त करण्यासाठी धम्माचा उपदेश केला आहे, हे तू अगदी योग्य समजलास. कारण भिक्षू, माझ्याकडून धम्माचा उपदेश आसक्तीशिवाय परिनिर्वाण प्राप्त करण्यासाठीच केला गेला आहे.” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, ภิกฺขุ, จกฺขุ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “तुला काय वाटते, भिक्षू, डोळा नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ…เป… โสตํ… ฆานํ… ชิวฺหา… กาโย… มโน… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “... कान... नाक... जीभ... शरीर... मन... मनोविज्ञान... मन-स्पर्श... आणि मन-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होणारी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद अशी जी काही वेदना आहे, ती नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याविषयी ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขุ, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… มนสฺมิมฺปิ… มโนวิญฺญาเณปิ… มโนสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. “हे भिक्षू, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक डोळ्यांविषयीही विरक्त होतो... मनाविषयीही... मनोविज्ञानाविषयीही... मन-स्पर्शाविषयीही विरक्त होतो. आणि मन-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होणारी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद अशी जी काही वेदना आहे, तिच्याविषयीही विरक्त होतो. विरक्त झाल्यामुळे तो रागरहित होतो; वैराग्यामुळे तो मुक्त होतो; मुक्त झाल्यावर ‘मी मुक्त झालो आहे’ असे ज्ञान त्याला होते. ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर दुसरे काहीही करायचे उरलेले नाही’ असे तो जाणतो.” อิทมโวจ ภควา. อตฺตมโน โส ภิกฺขุ ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิ. อิมสฺมิญฺจ ปน เวยฺยากรณสฺมึ ภญฺญมาเน ตสฺส ภิกฺขุสฺส อนุปาทาย อาสเวหิ จิตฺตํ วิมุจฺจีติ. ทุติยํ. भगवान असे म्हणाले. तो भिक्षू आनंदी झाला आणि त्याने भगवंतांच्या भाषणाची मनापासून प्रशंसा केली. आणि हे प्रवचन दिले जात असताना, त्या भिक्षूचे चित्त आसक्तीशिवाय आसवांपासून मुक्त झाले. दुसरे. ๓. ราธอนิจฺจสุตฺตํ ३. राध अनित्य सुत्त ๗๖. อถ โข อายสฺมา ราโธ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา ราโธ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน ธมฺมํ เทเสตุ[Pg.275], ยมหํ ภควโต ธมฺมํ สุตฺวา เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหเรยฺย’’นฺติ. ‘‘ยํ โข, ราธ, อนิจฺจํ ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. กิญฺจ, ราธ, อนิจฺจํ ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ? จกฺขุ อนิจฺจํ, รูปา อนิจฺจา, จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ. ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ…เป… ชิวฺหา… กาโย… มโน อนิจฺโจ. ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ธมฺมา… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ. ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยํ โข, ราธ, อนิจฺจํ ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ’’ติ. ตติยํ. ७६. तेव्हा आयुष्यमान राध... एका बाजूला बसले आणि आयुष्यमान राध भगवंतांना असे म्हणाले – “भन्ते, जर भगवंतांनी मला संक्षेपात धम्माचा उपदेश केला, तर फार चांगले होईल, जेणेकरून मी भगवंतांकडून धम्म ऐकून एकटा, एकांतात, अप्रमत्त, प्रयत्नशील आणि दृढनिश्चयी होऊन विहरेन.” “राध, जे अनित्य आहे, त्याविषयीची तुझी इच्छा तू सोडून दिली पाहिजेस. आणि राध, काय अनित्य आहे, ज्याविषयीची इच्छा तू सोडून दिली पाहिजेस? डोळा अनित्य आहे, रूपे अनित्य आहेत, चक्षुविज्ञान... चक्षुस्पर्श... आणि चक्षुस्पर्शाच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होणारी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद अशी जी काही वेदना आहे, तीही अनित्य आहे. त्याविषयीची तुझी इच्छा तू सोडून दिली पाहिजेस... जीभ... शरीर... मन अनित्य आहे. त्याविषयीची तुझी इच्छा तू सोडून दिली पाहिजेस. धम्म... मनोविज्ञान... मन-स्पर्श... आणि मन-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होणारी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद अशी जी काही वेदना आहे, तीही अनित्य आहे. त्याविषयीची तुझी इच्छा तू सोडून दिली पाहिजेस. राध, जे काही अनित्य आहे, त्याविषयीची तुझी इच्छा तू सोडून दिली पाहिजेस.” तिसरे. ๔. ราธทุกฺขสุตฺตํ ४. राध दुःख सुत्त ๗๗. ‘‘ยํ โข, ราธ, ทุกฺขํ ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. กิญฺจ, ราธ, ทุกฺขํ? จกฺขุ โข, ราธ, ทุกฺขํ. ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. รูปา… จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺส…เป… อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ทุกฺขํ. ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ…เป… มโน ทุกฺโข… ธมฺมา… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ทุกฺขํ. ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยํ โข, ราธ, ทุกฺขํ ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ’’ติ. จตุตฺถํ. ७७. “हे राधा, जे दुःख आहे, त्यावरील तुझी इच्छा (छंद) तू त्यागली पाहिजे. आणि राधा, दुःख काय आहे? राधा, चक्षू (डोळा) हे दुःख आहे. त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजे. रूपे... चक्षू-विज्ञान... चक्षू-स्पर्श... चक्षू-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने... जे काही अदुःख-असुख (उदासीन) वेदन उत्पन्न होते, ते देखील दुःखच आहे. त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजे... मन हे दुःख आहे... धम्म (मानसिक विषय)... मनो-विज्ञान... मनो-स्पर्श... मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुख वेदन उत्पन्न होते, ते देखील दुःखच आहे. त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजे. हे राधा, जे दुःख आहे, त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजे.” चौथे. ๕. ราธอนตฺตสุตฺตํ ५. राधा अनत्त सुत्त ๗๘. ‘‘โย โข, ราธ, อนตฺตา ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. โก จ, ราธ, อนตฺตา? จกฺขุ โข, ราธ, อนตฺตา. ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. รูปา… จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา…เป… มโน อนตฺตา… ธมฺมา… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนตฺตา. ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. โย โข, ราธ, อนตฺตา ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ’’ติ. ปญฺจมํ. ७८. “हे राधा, जे अनत्त (अनात्म) आहे, त्यावरील तुझी इच्छा (छंद) तू त्यागली पाहिजे. आणि राधा, अनत्त काय आहे? राधा, चक्षू हे अनत्त आहे. त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजे. रूपे... चक्षू-विज्ञान... चक्षू-स्पर्श... चक्षू-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने... मन हे अनत्त आहे... धम्म... मनो-विज्ञान... मनो-स्पर्श... मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुख वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनत्त आहे. त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजे. हे राधा, जे अनत्त आहे, त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजे.” पाचवे. ๖. ปฐมอวิชฺชาปหานสุตฺตํ ६. प्रथम अविज्जापहाण सुत्त ๗๙. อถ [Pg.276] โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อตฺถิ นุ โข, ภนฺเต, เอโก ธมฺโม ยสฺส ปหานา ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ? ७९. तेव्हा एक भिक्खू जेथे भगवान होते तेथे गेला... आणि एका बाजूला बसून तो भिक्खू भगवंतांना म्हणाला, “भन्ते, असा एखादा धम्म आहे का, ज्याच्या प्रहाणाने (त्यागाने) भिक्खूची अविज्जा (अविद्या) नष्ट होते आणि विज्जा (विद्या) उत्पन्न होते?” ‘‘อตฺถิ โข, ภิกฺขุ, เอโก ธมฺโม ยสฺส ปหานา ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ. “भिक्खू, असा एक धम्म आहे, ज्याच्या प्रहाणाने भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते.” ‘‘กตโม ปน, ภนฺเต, เอโก ธมฺโม ยสฺส ปหานา ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ? “पण भन्ते, तो एक धम्म कोणता आहे, ज्याच्या प्रहाणाने भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते?” ‘‘อวิชฺชา โข, ภิกฺขุ, เอโก ธมฺโม ยสฺส ปหานา ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ. “भिक्खू, अविज्जा हाच तो एक धम्म आहे, ज्याच्या प्रहाणाने भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते.” ‘‘กถํ ปน, ภนฺเต, ชานโต, กถํ ปสฺสโต ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ? “पण भन्ते, कशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि कशा प्रकारे पाहणाऱ्या भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते?” ‘‘จกฺขุํ โข, ภิกฺขุ, อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชติ. รูเป… จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ, จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชติ…เป… มนํ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชติ. ธมฺเม… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชติ. เอวํ โข, ภิกฺขุ, ชานโต เอวํ ปสฺสโต ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ. ฉฏฺฐํ. “भिक्खू, चक्षूला अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्या भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते. रूपांना... चक्षू-विज्ञानाला... चक्षू-स्पर्शाला... चक्षू-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुख वेदन उत्पन्न होते, त्यालाही अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्या भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते... मनाला अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्या भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते. धम्मांना... मनो-विज्ञानाला... मनो-स्पर्शाला... मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुख वेदन उत्पन्न होते, त्यालाही अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्या भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते. भिक्खू, अशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि अशा प्रकारे पाहणाऱ्या भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते.” सहावे. ๗. ทุติยอวิชฺชาปหานสุตฺตํ ७. द्वितीय अविज्जापहाण सुत्त ๘๐. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ…เป… เอตทโวจ – ‘‘อตฺถิ นุ โข, ภนฺเต, เอโก ธมฺโม ยสฺส ปหานา ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ? ८०. तेव्हा एक भिक्खू... भगवंतांना म्हणाला, “भन्ते, असा एखादा धम्म आहे का, ज्याच्या प्रहाणाने भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते?” ‘‘อตฺถิ โข, ภิกฺขุ, เอโก ธมฺโม ยสฺส ปหานา ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ. “भिक्खू, असा एक धम्म आहे, ज्याच्या प्रहाणाने भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते.” ‘‘กตโม ปน, ภนฺเต, เอโก ธมฺโม ยสฺส ปหานา ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ? “पण भन्ते, तो एक धम्म कोणता आहे, ज्याच्या प्रहाणाने भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते?” ‘‘อวิชฺชา โข, ภิกฺขุ, เอโก ธมฺโม ยสฺส ปหานา ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ. “भिक्खू, अविज्जा हाच तो एक धम्म आहे, ज्याच्या प्रहाणाने भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते.” ‘‘กถํ ปน, ภนฺเต, ชานโต, กถํ ปสฺสโต อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ? “पण भन्ते, कशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि कशा प्रकारे पाहणाऱ्या भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते?” ‘‘อิธ, ภิกฺขุ, ภิกฺขุโน สุตํ โหติ – ‘สพฺเพ ธมฺมา นาลํ อภินิเวสายา’ติ. เอวญฺเจตํ, ภิกฺขุ, ภิกฺขุโน สุตํ โหติ – ‘สพฺเพ ธมฺมา [Pg.277] นาลํ อภินิเวสายา’ติ. โส สพฺพํ ธมฺมํ อภิชานาติ, สพฺพํ ธมฺมํ อภิญฺญาย สพฺพํ ธมฺมํ ปริชานาติ, สพฺพํ ธมฺมํ ปริญฺญาย สพฺพนิมิตฺตานิ อญฺญโต ปสฺสติ, จกฺขุํ อญฺญโต ปสฺสติ, รูเป… จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อญฺญโต ปสฺสติ…เป… มนํ อญฺญโต ปสฺสติ, ธมฺเม… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อญฺญโต ปสฺสติ. เอวํ โข, ภิกฺขุ, ชานโต เอวํ ปสฺสโต ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ. สตฺตมํ. “भिक्खू, या शासनात भिक्खूने असे ऐकलेले असते की, 'सर्व धम्म अभिनिवेश (आसक्तीने धरून ठेवण्यास) योग्य नाहीत.' आणि भिक्खू, जेव्हा भिक्खूने असे ऐकलेले असते की, 'सर्व धम्म अभिनिवेश ठेवण्यास योग्य नाहीत,' तेव्हा तो सर्व धम्मांना विशिष्ट ज्ञानाने (अभिज्ञाने) जाणतो. सर्व धम्मांना विशिष्ट ज्ञानाने जाणून तो सर्व धम्मांना पूर्णपणे (परिज्ञाने) जाणतो. सर्व धम्मांना पूर्णपणे जाणून तो सर्व निमित्तांना अन्य रूपाने (अनात्म रूपाने) पाहतो. तो चक्षूला अन्य रूपाने पाहतो, रूपांना... चक्षू-विज्ञानाला... चक्षू-स्पर्शाला... चक्षू-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुख वेदन उत्पन्न होते, त्यालाही अन्य रूपाने पाहतो... मनाला अन्य रूपाने पाहतो, धम्मांना... मनो-विज्ञानाला... मनो-स्पर्शाला... मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुख वेदन उत्पन्न होते, त्यालाही अन्य रूपाने पाहतो. भिक्खू, अशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि अशा प्रकारे पाहणाऱ्या भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते.” सातवे. ๘. สมฺพหุลภิกฺขุสุตฺตํ ८. संबहुलभिक्खू सुत्त ๘๑. อถ โข สมฺพหุลา ภิกฺขู เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘อิธ โน, ภนฺเต, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา อมฺเห เอวํ ปุจฺฉนฺติ – ‘กิมตฺถิยํ, อาวุโส, สมเณ โคตเม พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’ติ? เอวํ ปุฏฺฐา มยํ, ภนฺเต, เตสํ อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ พฺยากโรม – ‘ทุกฺขสฺส โข, อาวุโส, ปริญฺญตฺถํ ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’ติ. กจฺจิ มยํ, ภนฺเต, เอวํ ปุฏฺฐา เอวํ พฺยากรมานา วุตฺตวาทิโน เจว ภควโต โหม, น จ ภควนฺตํ อภูเตน อพฺภาจิกฺขาม, ธมฺมสฺส จานุธมฺมํ พฺยากโรม, น จ โกจิ สหธมฺมิโก วาทานุวาโท คารยฺหํ ฐานํ อาคจฺฉตี’’ติ? ८१. तेव्हा अनेक भिक्खू जेथे भगवान होते तेथे गेले... आणि एका बाजूला बसून ते भिक्खू भगवंतांना म्हणाले, “भन्ते, येथे अन्यतीर्थीय (इतर पंथांचे) परिव्राजक आम्हाला असे विचारतात, 'मित्रांनो, श्रमण गोतमांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य कशासाठी पाळले जाते?' भन्ते, असे विचारले असता आम्ही त्या अन्यतीर्थीय परिव्राजकांना असे उत्तर देतो, 'मित्रांनो, दुःखाच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी (पूर्ण आकलनासाठी) भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते.' भन्ते, असे विचारले असता असे उत्तर देणारे आम्ही भगवंतांच्या वचनांचेच प्रतिपादन करतो ना? आम्ही भगवंतांवर असत्य आरोप तर करत नाही ना? आम्ही धम्माला अनुसरूनच उत्तर देतो ना? आणि आमच्या या विधानाचा कोणताही तर्कसंगत निष्कर्ष निंदेला पात्र ठरणार नाही ना?” ‘‘ตคฺฆ ตุมฺเห, ภิกฺขเว, เอวํ ปุฏฺฐา เอวํ พฺยากรมานา วุตฺตวาทิโน เจว เม โหถ, น จ มํ อภูเตน อพฺภาจิกฺขถ, ธมฺมสฺส จานุธมฺมํ พฺยากโรถ, น จ โกจิ สหธมฺมิโก วาทานุวาโท คารยฺหํ ฐานํ อาคจฺฉติ. ทุกฺขสฺส หิ, ภิกฺขเว, ปริญฺญตฺถํ มยิ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ. สเจ ปน โว, ภิกฺขเว, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ ปุจฺเฉยฺยุํ – ‘กตมํ ปน ตํ, อาวุโส, ทุกฺขํ, ยสฺส ปริญฺญาย สมเณ โคตเม พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’ติ? เอวํ ปุฏฺฐา ตุมฺเห, ภิกฺขเว, เตสํ อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ พฺยากเรยฺยาถ – ‘จกฺขุ โข, อาวุโส, ทุกฺขํ, ตสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ. รูปา…เป… ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ทุกฺขํ. ตสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ…เป… มโน ทุกฺโข…เป… ยมฺปิทํ [Pg.278] มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ทุกฺขํ. ตสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ. อิทํ โข ตํ, อาวุโส, ทุกฺขํ, ตสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’ติ. เอวํ ปุฏฺฐา ตุมฺเห, ภิกฺขเว, เตสํ อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ พฺยากเรยฺยาถา’’ติ. อฏฺฐมํ. “भिक्खूंनो, खरोखरच अशा प्रकारे विचारले असता आणि असे उत्तर दिले असता, तुम्ही माझ्याच वचनांचे पुनरुच्चार करता, माझ्यावर असत्य आरोप करत नाही, धर्माला अनुसरूनच उत्तर देता आणि तुमच्या या विधानावरून कोणताही तर्कसंगत आक्षेप घेण्यास वाव राहत नाही. कारण, भिक्खूंनो, दुःखाच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी (पूर्ण आकलनासाठी) माझ्या हाताखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते. पण जर, भिक्खूंनो, इतर पंथांचे परिव्राजक तुम्हाला असे विचारतील की—'मित्रांनो, ते दुःख कोणते आहे, ज्याच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी श्रमण गोतमांच्या हाताखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते?' तर असे विचारले असता, भिक्खूंनो, तुम्ही त्या इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे उत्तर दिले पाहिजे—'मित्रांनो, चक्षु (डोळा) हे दुःख आहे; त्याच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी भगवंतांच्या हाताखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते. रूप... पे... चक्षु-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद (उदासीन) वेदन उत्पन्न होते, ते देखील दुःखच आहे. त्याच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी भगवंतांच्या हाताखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते... पे... मन हे दुःख आहे... पे... मन-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील दुःखच आहे. त्याच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी भगवंतांच्या हाताखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते. मित्रांनो, हेच ते दुःख आहे, ज्याच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी भगवंतांच्या हाताखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते.' भिक्खूंनो, असे विचारले असता तुम्ही त्या इतर पंथांच्या परिव्राजकांना अशा प्रकारे उत्तर दिले पाहिजे.” आठवे. ๙. โลกปญฺหาสุตฺตํ ९. लोकपञ्हा सुत्त (लोकप्रश्न सुत्त) ๘๒. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยน ภควา…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ८२. तेव्हा एक भिक्खू जेथे भगवंत होते... पे... एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या त्या भिक्खूने भगवंतांना असे म्हटले— ‘‘‘โลโก, โลโก’ติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, โลโกติ วุจฺจตี’’ติ? ‘‘‘ลุชฺชตี’ติ โข, ภิกฺขุ, ตสฺมา โลโกติ วุจฺจติ. กิญฺจ ลุชฺชติ? จกฺขุ โข, ภิกฺขุ, ลุชฺชติ. รูปา ลุชฺชนฺติ, จกฺขุวิญฺญาณํ ลุชฺชติ, จกฺขุสมฺผสฺโส ลุชฺชติ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ลุชฺชติ…เป… ชิวฺหา ลุชฺชติ…เป… มโน ลุชฺชติ, ธมฺมา ลุชฺชนฺติ, มโนวิญฺญาณํ ลุชฺชติ, มโนสมฺผสฺโส ลุชฺชติ, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ลุชฺชติ. ลุชฺชตีติ โข, ภิกฺขุ, ตสฺมา โลโกติ วุจฺจตี’’ติ. นวมํ. “‘भन्ते, लोक, लोक’ असे म्हटले जाते. भन्ते, कोणत्या कारणाने याला ‘लोक’ म्हटले जाते?” “‘नाश पावतो’ (लुज्जति) म्हणून, भिक्खू, याला ‘लोक’ म्हटले जाते. आणि काय नाश पावते? भिक्खू, चक्षु नाश पावतो, रूपे नाश पावतात, चक्षु-विज्ञान नाश पावते, चक्षु-संस्पर्श नाश पावतो, आणि चक्षु-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील नाश पावते... पे... जिव्हा नाश पावते... पे... मन नाश पावते, धम्म (मानसिक विषय) नाश पावतात, मनो-विज्ञान नाश पावते, मन-संस्पर्श नाश पावतो, आणि मन-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील नाश पावते. भिक्खू, नाश पावतो म्हणून याला ‘लोक’ म्हटले जाते.” नववे. ๑๐. ผคฺคุนปญฺหาสุตฺตํ १०. फग्गुनपञ्हा सुत्त (फग्गुनप्रश्न सुत्त) ๘๓. อถ โข อายสฺมา ผคฺคุโน…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา ผคฺคุโน ภควนฺตํ เอตทโวจ – ८३. तेव्हा आयुष्यमान फग्गुन... पे... एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान फग्गुन यांनी भगवंतांना असे म्हटले— ‘‘อตฺถิ นุ โข, ภนฺเต, ตํ จกฺขุ, เยน จกฺขุนา อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวฏฺเฏ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย…เป… อตฺถิ นุ โข, ภนฺเต, สา ชิวฺหา, ยาย ชิวฺหาย อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวฏฺเฏ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย…เป… อตฺถิ นุ โข โส, ภนฺเต, มโน, เยน มเนน อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวฏฺเฏ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺยา’’ติ? “भन्ते, असा काही चक्षु आहे का, ज्या चक्षुद्वारे भूतकाळातील, परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा (तण्हा, मान, दिट्ठीचा) छेद केलेल्या, संसाराचा मार्ग खंडित केलेल्या, जन्म-मरणाचे चक्र संपुष्टात आणलेल्या आणि सर्व दुःखांच्या पलीकडे गेलेल्या बुद्धांचे वर्णन करू इच्छिणारा त्यांचे वर्णन करू शकेल? ...पे... भन्ते, अशी काही जिव्हा आहे का, ज्या जिव्हेद्वारे भूतकाळातील, परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा छेद केलेल्या, संसाराचा मार्ग खंडित केलेल्या, जन्म-मरणाचे चक्र संपुष्टात आणलेल्या आणि सर्व दुःखांच्या पलीकडे गेलेल्या बुद्धांचे वर्णन करू इच्छिणारा त्यांचे वर्णन करू शकेल? ...पे... भन्ते, असे काही मन आहे का, ज्या मनाद्वारे भूतकाळातील, परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा छेद केलेल्या, संसाराचा मार्ग खंडित केलेल्या, जन्म-मरणाचे चक्र संपुष्टात आणलेल्या आणि सर्व दुःखांच्या पलीकडे गेलेल्या बुद्धांचे वर्णन करू इच्छिणारा त्यांचे वर्णन करू शकेल?” ‘‘นตฺถิ โข ตํ, ผคฺคุน, จกฺขุ, เยน จกฺขุนา อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวฏฺเฏ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย [Pg.279] …เป… นตฺถิ โข สา, ผคฺคุน, ชิวฺหา, ยาย ชิวฺหาย อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวฏฺเฏ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย…เป… นตฺถิ โข โส, ผคฺคุน, มโน, เยน มเนน อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวฏฺเฏ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺยา’’ติ. ทสมํ. “फग्गुन, असा कोणताही चक्षु नाही, ज्या चक्षुद्वारे भूतकाळातील, परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा छेद केलेल्या, संसाराचा मार्ग खंडित केलेल्या, जन्म-मरणाचे चक्र संपुष्टात आणलेल्या आणि सर्व दुःखांच्या पलीकडे गेलेल्या बुद्धांचे वर्णन करू इच्छिणारा त्यांचे वर्णन करू शकेल. ...पे... फग्गुन, अशी कोणतीही जिव्हा नाही, ज्या जिव्हेद्वारे भूतकाळातील, परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा छेद केलेल्या, संसाराचा मार्ग खंडित केलेल्या, जन्म-मरणाचे चक्र संपुष्टात आणलेल्या आणि सर्व दुःखांच्या पलीकडे गेलेल्या बुद्धांचे वर्णन करू इच्छिणारा त्यांचे वर्णन करू शकेल. ...पे... फग्गुन, असे कोणतेही मन नाही, ज्या मनाद्वारे भूतकाळातील, परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा छेद केलेल्या, संसाराचा मार्ग खंडित केलेल्या, जन्म-मरणाचे चक्र संपुष्टात आणलेल्या आणि सर्व दुःखांच्या पलीकडे गेलेल्या बुद्धांचे वर्णन करू इच्छिणारा त्यांचे वर्णन करू शकेल.” दहावे. คิลานวคฺโค อฏฺฐโม. आठवा गिलाणवर्ग समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याचा संग्रह (उद्दान) पुढीलप्रमाणे आहे— คิลาเนน ทุเว วุตฺตา, ราเธน อปเร ตโย; อวิชฺชาย จ ทฺเว วุตฺตา, ภิกฺขุ โลโก จ ผคฺคุโนติ. गिलाण सूत्रात दोन सांगितले आहेत, राध सूत्रात इतर तीन; अविज्जा सूत्रात दोन सांगितले आहेत, भिक्खू, लोक आणि फग्गुन सूत्र. ๙. ฉนฺนวคฺโค ९. छन्नवर्ग ๑. ปโลกธมฺมสุตฺตํ १. पलोकधम्म सुत्त (नाशवंत स्वभाव सुत्त) ๘๔. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ८४. श्रावस्ती येथील प्रसंग. तेव्हा आयुष्यमान आनंद जेथे भगवंत होते तेथे गेले... पे... एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान आनंदांनी भगवंतांना असे म्हटले— ‘‘‘โลโก, โลโก’ติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, โลโกติ วุจฺจตี’’ติ? ‘‘ยํ โข, อานนฺท, ปโลกธมฺมํ, อยํ วุจฺจติ อริยสฺส วินเย โลโก. กิญฺจ, อานนฺท, ปโลกธมฺมํ? จกฺขุ โข, อานนฺท, ปโลกธมฺมํ, รูปา ปโลกธมฺมา, จกฺขุวิญฺญาณํ ปโลกธมฺมํ, จกฺขุสมฺผสฺโส ปโลกธมฺโม, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา…เป… ตมฺปิ ปโลกธมฺมํ…เป… ชิวฺหา ปโลกธมฺมา, รสา ปโลกธมฺมา, ชิวฺหาวิญฺญาณํ ปโลกธมฺมํ, ชิวฺหาสมฺผสฺโส ปโลกธมฺโม, ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา…เป… ตมฺปิ ปโลกธมฺมํ…เป… มโน ปโลกธมฺโม, ธมฺมา ปโลกธมฺมา, มโนวิญฺญาณํ ปโลกธมฺมํ, มโนสมฺผสฺโส ปโลกธมฺโม, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ปโลกธมฺมํ. ยํ โข, อานนฺท, ปโลกธมฺมํ, อยํ วุจฺจติ อริยสฺส วินเย โลโก’’ติ. ปฐมํ. “‘भन्ते, लोक, लोक’ असे म्हटले जाते. भन्ते, कोणत्या कारणाने याला ‘लोक’ म्हटले जाते?” “आनंदा, जे काही नाशवंत स्वभावाचे (पलोकधम्म) आहे, त्याला आर्यांच्या विनयात ‘लोक’ म्हटले जाते. आणि आनंदा, नाशवंत स्वभावाचे काय आहे? आनंदा, चक्षु नाशवंत स्वभावाचा आहे, रूपे नाशवंत स्वभावाची आहेत, चक्षु-विज्ञान नाशवंत स्वभावाचे आहे, चक्षु-संस्पर्श नाशवंत स्वभावाचा आहे, आणि चक्षु-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने... पे... जे काही वेदन उत्पन्न होते, ते देखील नाशवंत स्वभावाचे आहे... पे... जिव्हा नाशवंत स्वभावाची आहे, रस नाशवंत स्वभावाचे आहेत, जिव्हा-विज्ञान नाशवंत स्वभावाचे आहे, जिव्हा-संस्पर्श नाशवंत स्वभावाचा आहे, आणि जिव्हा-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने... पे... जे काही वेदन उत्पन्न होते, ते देखील नाशवंत स्वभावाचे आहे... पे... मन नाशवंत स्वभावाचे आहे, धम्म नाशवंत स्वभावाचे आहेत, मनो-विज्ञान नाशवंत स्वभावाचे आहे, मन-संस्पर्श नाशवंत स्वभावाचा आहे, आणि मन-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील नाशवंत स्वभावाचे आहे. आनंदा, जे काही नाशवंत स्वभावाचे आहे, त्याला आर्यांच्या विनयात ‘लोक’ म्हटले जाते.” पहिले. ๒. สุญฺญตโลกสุตฺตํ २. सुञ्ञतलोक सुत्त (शून्यलोक सुत्त) ๘๕. อถ [Pg.280] โข อายสฺมา อานนฺโท…เป… ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘‘สุญฺโญ โลโก, สุญฺโญ โลโก’ติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, สุญฺโญ โลโกติ วุจฺจตี’’ติ? ‘‘ยสฺมา จ โข, อานนฺท, สุญฺญํ อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา ตสฺมา สุญฺโญ โลโกติ วุจฺจติ. กิญฺจ, อานนฺท, สุญฺญํ อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา? จกฺขุ โข, อานนฺท, สุญฺญํ อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา. รูปา สุญฺญา อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา, จกฺขุวิญฺญาณํ สุญฺญํ อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา, จกฺขุสมฺผสฺโส สุญฺโญ อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ สุญฺญํ อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา. ยสฺมา จ โข, อานนฺท, สุญฺญํ อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา, ตสฺมา สุญฺโญ โลโกติ วุจฺจตี’’ติ. ทุติยํ. ८५. तेव्हा आयुष्यमान आनंद... भगवंतांना असे म्हणाले— 'भन्ते, “शून्य लोक, शून्य लोक” असे म्हटले जाते. भन्ते, कोणत्या कारणाने “शून्य लोक” असे म्हटले जाते?' 'आनंदा, ज्याअर्थी (हा लोक) आत्म्यापासून किंवा आत्म्याच्या मालकीच्या गोष्टींपासून शून्य आहे, म्हणूनच याला “शून्य लोक” असे म्हटले जाते. आणि आनंदा, काय आहे जे आत्म्यापासून किंवा आत्म्याच्या मालकीच्या गोष्टींपासून शून्य आहे? आनंदा, चक्षु (डोळा) आत्म्यापासून किंवा आत्म्याच्या मालकीच्या गोष्टींपासून शून्य आहे. रूपे आत्म्यापासून किंवा आत्म्याच्या मालकीच्या गोष्टींपासून शून्य आहेत. चक्षु-विज्ञान आत्म्यापासून किंवा आत्म्याच्या मालकीच्या गोष्टींपासून शून्य आहे. चक्षु-स्पर्श आत्म्यापासून किंवा आत्म्याच्या मालकीच्या गोष्टींपासून शून्य आहे... तसेच मन-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अ-दुःख-म-सुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील आत्म्यापासून किंवा आत्म्याच्या मालकीच्या गोष्टींपासून शून्य आहे. आनंदा, ज्याअर्थी हे आत्म्यापासून किंवा आत्म्याच्या मालकीच्या गोष्टींपासून शून्य आहे, म्हणूनच याला “शून्य लोक” असे म्हटले जाते.' ๓. สํขิตฺตธมฺมสุตฺตํ ३. संखित्तधम्मसुत्त (संक्षिप्त धम्म सुत्त) ๘๖. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน ธมฺมํ เทเสตุ, ยมหํ ภควโต ธมฺมํ สุตฺวา เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหเรยฺย’’นฺติ. ८६. एका बाजूला बसलेले आयुष्यमान आनंद भगवंतांना असे म्हणाले— 'भन्ते, बरे होईल जर भगवंत मला संक्षेपाने धम्म उपदेश करतील, जेणेकरून भगवंतांकडून धम्म ऐकून मी एकटा, एकांतात, अप्रमत्त (जागरूक), उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहरेन.' ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, อานนฺท, จกฺขุ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? 'आनंदा, तुला काय वाटते, चक्षु नित्य आहे की अनित्य?' ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. 'अनित्य आहे, भन्ते.' ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? 'आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?' ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. 'दुःखकारक आहे, भन्ते.' ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? 'आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील आहे, त्याविषयी “हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे” असे मानणे योग्य आहे का?' ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. 'नक्कीच नाही, भन्ते.' ‘‘รูปา นิจฺจา วา อนิจฺจา วา’’ติ? 'रूपे नित्य आहेत की अनित्य?' ‘‘อนิจฺจา, ภนฺเต’’…เป…. 'अनित्य आहेत, भन्ते.'... ‘‘จกฺขุวิญฺญาณํ…เป… ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? 'चक्षु-विज्ञान... चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अ-दुःख-म-सुखद वेदन उत्पन्न होते, ते नित्य आहे की अनित्य?' ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. 'अनित्य आहे, भन्ते.' ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? 'आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?' ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. 'दुःखकारक आहे, भन्ते.' ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส [Pg.281] เม อตฺตา’’’ติ? 'आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील आहे, त्याविषयी “हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे” असे मानणे योग्य आहे का?' ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’…เป…. 'नक्कीच नाही, भन्ते.'... ‘‘ชิวฺหา นิจฺจา วา อนิจฺจา วา’’ติ? 'जिव्हा नित्य आहे की अनित्य?' ‘‘อนิจฺจา, ภนฺเต’’…เป…. 'अनित्य आहे, भन्ते.'... ‘‘ชิวฺหาวิญฺญาณํ… ชิวฺหาสมฺผสฺโส…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? 'जिव्हा-विज्ञान... जिव्हा-स्पर्श... मन-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अ-दुःख-म-सुखद वेदन उत्पन्न होते, ते नित्य आहे की अनित्य?' ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. 'अनित्य आहे, भन्ते.' ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? 'आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?' ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. 'दुःखकारक आहे, भन्ते.' ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? 'आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील आहे, त्याविषयी “हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे” असे मानणे योग्य आहे का?' ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’…เป…. 'नक्कीच नाही, भन्ते.'... ‘‘เอวํ ปสฺสํ, อานนฺท, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. ตติยํ. 'आनंदा, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षुविषयी देखील निर्वेद पावतो... चक्षु-स्पर्शाविषयी देखील निर्वेद पावतो... मन-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अ-दुःख-म-सुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयी देखील निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्याने तो विरक्त होतो; विरक्तीमुळे तो मुक्त होतो. मुक्त झाल्यावर “मी मुक्त झालो आहे” असे ज्ञान होते. “जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर काहीही कर्तव्य उरलेले नाही” असे तो जाणतो.' ๔. ฉนฺนสุตฺตํ ४. छन्नसुत्त ๘๗. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา จ สาริปุตฺโต อายสฺมา จ มหาจุนฺโท อายสฺมา จ ฉนฺโน คิชฺฌกูเฏ ปพฺพเต วิหรนฺติ. เตน โข ปน สมเยน เยน อายสฺมา ฉนฺโน อาพาธิโก โหติ ทุกฺขิโต พาฬฺหคิลาโน. อถ โข อายสฺมา สาริปุตฺโต สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต เยนายสฺมา มหาจุนฺโท เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหาจุนฺทํ เอตทโวจ – ‘‘อายามาวุโส จุนฺท, เยนายสฺมา ฉนฺโน เตนุปสงฺกมิสฺสาม คิลานปุจฺฉกา’’ติ. ‘‘เอวมาวุโส’’ติ โข อายสฺมา มหาจุนฺโท อายสฺมโต สาริปุตฺตสฺส ปจฺจสฺโสสิ. ८७. एका वेळी भगवान बुद्ध राजगृह येथील वेळुवनातील कलंदकनिवाप येथे विहरत होते. त्या वेळी आयुष्यमान सारिपुत्त, आयुष्यमान महाचुन्द आणि आयुष्यमान छन्न हे गिद्धकूट पर्वतावर विहरत होते. त्या वेळी आयुष्यमान छन्न हे आजारी, अत्यंत कष्टी आणि गंभीरपणे आजारी होते. तेव्हा आयुष्यमान सारिपुत्त संध्याकाळच्या वेळी ध्यानातून उठून जेथे आयुष्यमान महाचुन्द होते तेथे गेले; आणि आयुष्यमान महाचुन्दांना असे म्हणाले— 'चला, आवुसो चुन्द, आपण आयुष्यमान छन्नांच्या प्रकृतीची विचारपूस करण्यासाठी त्यांच्याकडे जाऊ या.' आयुष्यमान महाचुन्दांनी आयुष्यमान सारिपुत्तांना संमती दिली— 'होय, आवुसो.' อถ โข อายสฺมา จ สาริปุตฺโต อายสฺมา จ มหาจุนฺโท เยนายสฺมา ฉนฺโน เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทึสุ. นิสชฺช โข อายสฺมา สาริปุตฺโต อายสฺมนฺตํ ฉนฺนํ เอตทโวจ – ‘‘กจฺจิ เต, อาวุโส ฉนฺน, ขมนียํ, กจฺจิ ยาปนียํ, กจฺจิ ทุกฺขา เวทนา ปฏิกฺกมนฺติ โน อภิกฺกมนฺติ, ปฏิกฺกโมสานํ ปญฺญายติ โน อภิกฺกโม’’ติ? त्यानंतर आयुष्यमान सारिपुत्त आणि आयुष्यमान महाचुन्द जेथे आयुष्यमान छन्न होते तेथे गेले; आणि तेथे मांडलेल्या आसनांवर बसले. बसल्यावर आयुष्यमान सारिपुत्त आयुष्यमान छन्नांना म्हणाले— 'आवुसो छन्न, तुमची प्रकृती ठीक आहे ना? तुम्हाला सहन होत आहे ना? तुमच्या वेदना कमी होत आहेत की वाढत आहेत? वेदना कमी होत असल्याचे जाणवत आहे की वाढत असल्याचे?' ‘‘น เม, อาวุโส สาริปุตฺต, ขมนียํ น ยาปนียํ, พาฬฺหา เม ทุกฺขา เวทนา อภิกฺกมนฺติ โน ปฏิกฺกมนฺติ, อภิกฺกโมสานํ ปญฺญายติ โน ปฏิกฺกโม. เสยฺยถาปิ, อาวุโส, พลวา ปุริโส ติณฺเหน สิขเรน มุทฺธนิ อภิมตฺเถยฺย ; เอวเมว โข, อาวุโส, อธิมตฺตา วาตา มุทฺธนิ อูหนนฺติ. น เม, อาวุโส, ขมนียํ, น ยาปนียํ…เป… โน ปฏิกฺกโม. เสยฺยถาปิ[Pg.282], อาวุโส, พลวา ปุริโส ทฬฺเหน วรตฺตกฺขณฺเฑน สีเส สีสเวฐํ ทเทยฺย; เอวเมว โข, อาวุโส, อธิมตฺตา สีเส สีสเวทนา. น เม, อาวุโส, ขมนียํ, น ยาปนียํ…เป… โน ปฏิกฺกโม. เสยฺยถาปิ, อาวุโส, ทกฺโข โคฆาตโก วา โคฆาตกนฺเตวาสี วา ติณฺเหน โควิกนฺตเนน กุจฺฉึ ปริกนฺเตยฺย; เอวเมว โข อธิมตฺตา วาตา กุจฺฉึ ปริกนฺตนฺติ. น เม, อาวุโส, ขมนียํ, น ยาปนียํ…เป… โน ปฏิกฺกโม. เสยฺยถาปิ, อาวุโส, ทฺเว พลวนฺโต ปุริสา ทุพฺพลตรํ ปุริสํ นานาพาหาสุ คเหตฺวา องฺคารกาสุยา สนฺตาเปยฺยุํ สมฺปริตาเปยฺยุํ; เอวเมว โข, อาวุโส, อธิมตฺโต กายสฺมึ ฑาโห. น เม, อาวุโส, ขมนียํ, น ยาปนียํ, พาฬฺหา เม ทุกฺขา เวทนา อภิกฺกมนฺติ โน ปฏิกฺกมนฺติ, อภิกฺกโมสานํ ปญฺญายติ โน ปฏิกฺกโม. สตฺถํ, อาวุโส สาริปุตฺต, อาหริสฺสามิ, นาวกงฺขามิ ชีวิต’’นฺติ. 'आवुसो सारिपुत्त, मला सहन होत नाहीये, माझी प्रकृती ठीक नाहीये. माझ्या तीव्र वेदना वाढतच आहेत, कमी होत नाहीयेत; त्या वाढत असल्याचेच जाणवत आहे, कमी होत असल्याचे नाही. आवुसो, ज्याप्रमाणे एखादा बलवान माणूस तीक्ष्ण तलवारीने डोक्यावर प्रहार करतो, त्याचप्रमाणे माझ्या डोक्यात तीव्र वायूचे झटके डोक्याला भेदत आहेत. आवुसो, मला सहन होत नाहीये, माझी प्रकृती ठीक नाहीये... वेदना कमी होत नाहीयेत. आवुसो, ज्याप्रमाणे एखादा बलवान माणूस मजबूत चामड्याच्या पट्ट्याने डोक्याला घट्ट आवळून टाकेल, त्याचप्रमाणे माझ्या डोक्यात तीव्र वेदना होत आहेत. आवुसो, मला सहन होत नाहीये, माझी प्रकृती ठीक नाहीये... वेदना कमी होत नाहीयेत. आवुसो, ज्याप्रमाणे एखादा कुशल कसाई किंवा त्याचा शिकाऊ साहाय्यक तीक्ष्ण सुरीने बैलाचे पोट कापून काढेल, त्याचप्रमाणे माझ्या पोटात तीव्र वायूचे झटके पोट कापून काढत आहेत. आवुसो, मला सहन होत नाहीये, माझी प्रकृती ठीक नाहीये... वेदना कमी होत नाहीयेत. आवुसो, ज्याप्रमाणे दोन बलवान माणसे एखाद्या दुर्बल माणसाला दोन्ही हातांनी पकडून धगधगत्या कोळशाच्या कुंडात भाजून काढतील, त्याचप्रमाणे माझ्या शरीरात तीव्र जळजळ होत आहे. आवुसो, मला सहन होत नाहीये, माझी प्रकृती ठीक नाहीये. माझ्या तीव्र वेदना वाढतच आहेत, कमी होत नाहीयेत; त्या वाढत असल्याचेच जाणवत आहे, कमी होत असल्याचे नाही. आवुसो सारिपुत्त, मी शस्त्राचा वापर करीन, मला आता जगण्याची इच्छा नाही.' ‘‘มา อายสฺมา ฉนฺโน สตฺถํ อาหเรสิ. ยาเปตายสฺมา ฉนฺโน, ยาเปนฺตํ มยํ อายสฺมนฺตํ ฉนฺนํ อิจฺฉาม. สเจ อายสฺมโต ฉนฺนสฺส นตฺถิ สปฺปายานิ โภชนานิ, อหํ อายสฺมโต ฉนฺนสฺส สปฺปายานิ โภชนานิ ปริเยสิสฺสามิ. สเจ อายสฺมโต ฉนฺนสฺส นตฺถิ สปฺปายานิ เภสชฺชานิ, อหํ อายสฺมโต ฉนฺนสฺส สปฺปายานิ เภสชฺชานิ ปริเยสิสฺสามิ. สเจ อายสฺมโต ฉนฺนสฺส นตฺถิ ปติรูปา อุปฏฺฐากา, อหํ อายสฺมนฺตํ ฉนฺนํ อุปฏฺฐหิสฺสามิ. มา อายสฺมา ฉนฺโน สตฺถํ อาหเรสิ. ยาเปตายสฺมา ฉนฺโน, ยาเปนฺตํ มยํ อายสฺมนฺตํ ฉนฺนํ อิจฺฉามา’’ติ. "आयुष्यमान छन्नांनी शस्त्राचा वापर करू नये. आयुष्यमान छन्नांनी जीवन कंठावे; आयुष्यमान छन्नांनी जिवंत राहावे अशी आमची इच्छा आहे. जर आयुष्यमान छन्नांकडे अनुकूल भोजन नसेल, तर मी आयुष्यमान छन्नांसाठी अनुकूल भोजन शोधून आणीन. जर आयुष्यमान छन्नांकडे अनुकूल औषध नसेल, तर मी आयुष्यमान छन्नांसाठी अनुकूल औषध शोधून आणीन. जर आयुष्यमान छन्नांकडे योग्य परिचारक नसतील, तर मी आयुष्यमान छन्नांची सेवा-शुश्रूषा करीन. आयुष्यमान छन्नांनी शस्त्राचा वापर करू नये. आयुष्यमान छन्नांनी जगावे; आयुष्यमान छन्नांनी जिवंत राहावे अशी आमची इच्छा आहे." ‘‘น เม, อาวุโส สาริปุตฺต, นตฺถิ สปฺปายานิ โภชนานิ; อตฺถิ เม สปฺปายานิ โภชนานิ. นปิ เม นตฺถิ สปฺปายานิ เภสชฺชานิ; อตฺถิ เม สปฺปายานิ เภสชฺชานิ. นปิ เม นตฺถิ ปติรูปา อุปฏฺฐากา; อตฺถิ เม ปติรูปา อุปฏฺฐากา. อปิ จ เม, อาวุโส, สตฺถา ปริจิณฺโณ ทีฆรตฺตํ มนาเปเนว, โน อมนาเปน. เอตญฺหิ, อาวุโส, สาวกสฺส ปติรูปํ ยํ สตฺถารํ ปริจเรยฺย มนาเปเนว, โน อมนาเปน. ‘อนุปวชฺชํ ฉนฺโน ภิกฺขุ สตฺถํ อาหริสฺสตี’ติ – เอวเมตํ, อาวุโส สาริปุตฺต, ธาเรหี’’ติ. "आवुसो सारिपुत्त, माझ्याकडे अनुकूल भोजन नाही असे नाही; माझ्याकडे अनुकूल भोजन आहे. माझ्याकडे अनुकूल औषध नाही असेही नाही; माझ्याकडे अनुकूल औषध आहे. माझ्याकडे योग्य परिचारक नाहीत असेही नाही; माझ्याकडे योग्य परिचारक आहेत. शिवाय, आवुसो, मी दीर्घकाळापासून शास्त्यांची (बुद्धांची) अनुकूल पद्धतीनेच सेवा केली आहे, प्रतिकूल पद्धतीने नाही. कारण शिष्यासाठी हेच योग्य आहे की त्याने शास्त्यांची अनुकूल पद्धतीनेच सेवा करावी, प्रतिकूल पद्धतीने नाही. 'भिक्खू छन्न हे दोषरहितपणे शस्त्राचा वापर करतील' – आवुसो सारिपुत्त, हे तुम्ही असेच लक्षात ठेवावे." ‘‘ปุจฺเฉยฺยาม [Pg.283] มยํ อายสฺมนฺตํ ฉนฺนํ กญฺจิเทว เทสํ, สเจ อายสฺมา ฉนฺโน โอกาสํ กโรติ ปญฺหสฺส เวยฺยากรณายา’’ติ. ‘‘ปุจฺฉาวุโส สาริปุตฺต, สุตฺวา เวทิสฺสามา’’ติ. "जर आयुष्यमान छन्न प्रश्नाचे उत्तर देण्यासाठी सवड देणार असतील, तर आम्ही आयुष्यमान छन्नांना एखाद्या विषयाबद्दल काही विचारू इच्छितो." "विचारा, आवुसो सारिपुत्त! ऐकल्यानंतर मला समजेल." ‘‘จกฺขุํ, อาวุโส ฉนฺน, จกฺขุวิญฺญาณํ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสิ…เป… ชิวฺหํ, อาวุโส ฉนฺน, ชิวฺหาวิญฺญาณํ ชิวฺหาวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสิ…เป… มนํ, อาวุโส ฉนฺน, มโนวิญฺญาณํ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสี’’ติ? "आवुसो छन्न, तुम्ही डोळा, चक्षू-विज्ञान आणि चक्षू-विज्ञानाने जाणता येणारे धर्म यांकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' अशा प्रकारे पाहता का? ...पे... आवुसो छन्न, तुम्ही जीभ, जिव्हा-विज्ञान आणि जिव्हा-विज्ञानाने जाणता येणारे धर्म यांकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' अशा प्रकारे पाहता का? ...पे... आवुसो छन्न, तुम्ही मन, मनो-विज्ञान आणि मनो-विज्ञानाने जाणता येणारे धर्म यांकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' अशा प्रकारे पाहता का?" ‘‘จกฺขุํ, อาวุโส สาริปุตฺต, จกฺขุวิญฺญาณํ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสามิ…เป… ชิวฺหํ, อาวุโส สาริปุตฺต, ชิวฺหาวิญฺญาณํ ชิวฺหาวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสามิ…เป… มนํ, อาวุโส สาริปุตฺต, มโนวิญฺญาณํ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสามี’’ติ. "आवुसो सारिपुत्त, मी डोळा, चक्षू-विज्ञान आणि चक्षू-विज्ञानाने जाणता येणारे धर्म यांकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' अशा प्रकारे पाहतो. ...पे... आवुसो सारिपुत्त, मी जीभ, जिव्हा-विज्ञान आणि जिव्हा-विज्ञानाने जाणता येणारे धर्म यांकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' अशा प्रकारे पाहतो. ...पे... आवुसो सारिपुत्त, मी मन, मनो-विज्ञान आणि मनो-विज्ञानाने जाणता येणारे धर्म यांकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' अशा प्रकारे पाहतो." ‘‘จกฺขุสฺมึ, อาวุโส ฉนฺน, จกฺขุวิญฺญาเณ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพสุ ธมฺเมสุ กึ ทิสฺวา กึ อภิญฺญาย จกฺขุํ จกฺขุวิญฺญาณํ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสิ… ชิวฺหาย, อาวุโส ฉนฺน, ชิวฺหาวิญฺญาเณ ชิวฺหาวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพสุ ธมฺเมสุ กึ ทิสฺวา กึ อภิญฺญาย ชิวฺหํ ชิวฺหาวิญฺญาณํ ชิวฺหาวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสิ… มนสฺมึ, อาวุโส ฉนฺน, มโนวิญฺญาเณ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพสุ ธมฺเมสุ กึ ทิสฺวา กึ อภิญฺญาย มนํ มโนวิญฺญาณํ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสี’’ติ? "आवुसो छन्न, डोळ्यामध्ये, चक्षू-विज्ञानामध्ये आणि चक्षू-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांमध्ये काय पाहून आणि काय विशेष रूपाने जाणून तुम्ही डोळा, चक्षू-विज्ञान आणि चक्षू-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' अशा प्रकारे पाहता? आवुसो छन्न, जिभेमध्ये, जिव्हा-विज्ञानामध्ये आणि जिव्हा-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांमध्ये काय पाहून आणि काय विशेष रूपाने जाणून तुम्ही जीभ, जिव्हा-विज्ञान आणि जिव्हा-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' अशा प्रकारे पाहता? आवुसो छन्न, मनामध्ये, मनो-विज्ञानामध्ये आणि मनो-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांमध्ये काय पाहून आणि काय विशेष रूपाने जाणून तुम्ही मन, मनो-विज्ञान आणि मनो-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' अशा प्रकारे पाहता?" ‘‘จกฺขุสฺมึ, อาวุโส สาริปุตฺต, จกฺขุวิญฺญาเณ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพสุ ธมฺเมสุ นิโรธํ ทิสฺวา นิโรธํ อภิญฺญาย จกฺขุํ จกฺขุวิญฺญาณํ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ [Pg.284] สมนุปสฺสามิ…เป… ชิวฺหาย, อาวุโส สาริปุตฺต, ชิวฺหาวิญฺญาเณ ชิวฺหาวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพสุ ธมฺเมสุ นิโรธํ ทิสฺวา นิโรธํ อภิญฺญาย ชิวฺหํ ชิวฺหาวิญฺญาณํ ชิวฺหาวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสามิ…เป… มนสฺมึ, อาวุโส สาริปุตฺต, มโนวิญฺญาเณ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพสุ ธมฺเมสุ นิโรธํ ทิสฺวา นิโรธํ อภิญฺญาย มนํ มโนวิญฺญาณํ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสามี’’ติ. "आवुसो सारिपुत्त, डोळ्यामध्ये, चक्षू-विज्ञानामध्ये आणि चक्षू-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांमध्ये निरोध पाहून आणि निरोध विशेष रूपाने जाणून मी डोळा, चक्षू-विज्ञान आणि चक्षू-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' अशा प्रकारे पाहतो. ...पे... आवुसो सारिपुत्त, जिभेमध्ये, जिव्हा-विज्ञानामध्ये आणि जिव्हा-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांमध्ये निरोध पाहून आणि निरोध विशेष रूपाने जाणून मी जीभ, जिव्हा-विज्ञान आणि जिव्हा-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' अशा प्रकारे पाहतो. ...पे... आवुसो सारिपुत्त, मनामध्ये, मनो-विज्ञानामध्ये आणि मनो-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांमध्ये निरोध पाहून आणि निरोध विशेष रूपाने जाणून मी मन, मनो-विज्ञान आणि मनो-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' अशा प्रकारे पाहतो." เอวํ วุตฺเต, อายสฺมา มหาจุนฺโท อายสฺมนฺตํ ฉนฺนํ เอตทโวจ – ‘‘ตสฺมาติห, อาวุโส ฉนฺน, อิทมฺปิ ตสฺส ภควโต สาสนํ นิจฺจกปฺปํ สาธุกํ มนสิ กาตพฺพํ – ‘นิสฺสิตสฺส จลิตํ, อนิสฺสิตสฺส จลิตํ นตฺถิ. จลิเต อสติ ปสฺสทฺธิ โหติ. ปสฺสทฺธิยา สติ นติ น โหติ. นติยา อสติ อาคติคติ น โหติ. อาคติคติยา อสติ จุตูปปาโต น โหติ. จุตูปปาเต อสติ เนวิธ น หุรํ น อุภยมนฺตเรน. เอเสวนฺโต ทุกฺขสฺสา’’’ติ. असे म्हटले असता, आयुष्यमान महाचुंदांनी आयुष्यमान छन्नांना असे म्हटले – "म्हणूनच, आवुसो छन्न, भगवंतांच्या याही उपदेशाचे नेहमी चांगल्या प्रकारे मनन केले पाहिजे – 'जो आश्रित आहे, त्याचे मन विचलित होते; जो अनाश्रित आहे, त्याचे मन विचलित होत नाही. विचलन नसताना शांतता लाभते. शांतता असताना कल नसतो. कल नसताना येणे-जाणे नसते. येणे-जाणे नसताना च्युती आणि उत्पत्ती नसते. च्युती आणि उत्पत्ती नसताना, ना या लोकात, ना परलोकात, ना या दोन्हीच्या मध्ये काही उरते. हाच दुःखाचा अंत आहे.'" อถ โข อายสฺมา จ สาริปุตฺโต อายสฺมา จ มหาจุนฺโท อายสฺมนฺตํ ฉนฺนํ อิมินา โอวาเทน โอวทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกมึสุ. อถ โข อายสฺมา ฉนฺโน อจิรปกฺกนฺเตสุ เตสุ อายสฺมนฺเตสุ สตฺถํ อาหเรสิ. त्यानंतर, आयुष्यमान सारिपुत्त आणि आयुष्यमान महाचुंद आयुष्यमान छन्नांना हा उपदेश देऊन आपापल्या आसनांवरून उठले आणि निघून गेले. त्यानंतर, ते आयुष्यमान निघून गेल्यानंतर लवकरच आयुष्यमान छन्नांनी शस्त्राचा वापर केला. อถ โข อายสฺมา สาริปุตฺโต เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา สาริปุตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อายสฺมตา, ภนฺเต, ฉนฺเนน สตฺถํ อาหริตํ. ตสฺส กา คติ โก อภิสมฺปราโย’’ติ? ‘‘นนุ เต, สาริปุตฺต, ฉนฺเนน ภิกฺขุนา สมฺมุขาเยว อนุปวชฺชตา พฺยากตา’’ติ? ‘‘อตฺถิ, ภนฺเต, ปุพฺพวิชฺชนํ นาม วชฺชิคาโม. ตตฺถายสฺมโต ฉนฺนสฺส มิตฺตกุลานิ สุหชฺชกุลานิ อุปวชฺชกุลานี’’ติ. ‘‘โหนฺติ เหเต, สาริปุตฺต, ฉนฺนสฺส ภิกฺขุโน มิตฺตกุลานิ สุหชฺชกุลานิ อุปวชฺชกุลานิ. น โข ปนาหํ, สาริปุตฺต, เอตฺตาวตา สอุปวชฺโชติ วทามิ. โย โข, สาริปุตฺต, ตญฺจ กายํ นิกฺขิปติ, อญฺญญฺจ กายํ อุปาทิยติ, ตมหํ สอุปวชฺโชติ วทามิ. ตํ ฉนฺนสฺส ภิกฺขุโน นตฺถิ. ‘อนุปวชฺชํ ฉนฺเนน ภิกฺขุนา สตฺถํ อาหริต’นฺติ – เอวเมตํ, สาริปุตฺต, ธาเรหี’’ติ. จตุตฺถํ. तेव्हा आयुष्यमान सारिपुत्त जेथे भगवान होते तेथे गेले; जवळ जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेले आयुष्यमान सारिपुत्त भगवंतांना असे म्हणाले – “भन्ते, आयुष्यमान छन्नाने शस्त्राचा वापर केला आहे (स्वतःचा जीव घेतला आहे). त्याची गती काय आहे, त्याचा परलोक काय आहे?” “सारिपुत्त, भिक्खू छन्नाने तुझ्यासमोरच स्वतःच्या निर्दोषतेची (पुनर्जन्म न घेण्याची) घोषणा केली नव्हती का?” “भन्ते, पुब्बविज्जन नावाचे एक वज्जींचे गाव आहे. तिथे आयुष्यमान छन्नाचे मित्रकुळ, सुहृदकुळ आणि आदरातिथ्य करणारे कुळ आहेत.” “सारिपुत्त, भिक्खू छन्नाचे मित्रकुळ, सुहृदकुळ आणि आदरातिथ्य करणारे कुळ आहेत हे खरे आहे. परंतु, सारिपुत्त, केवळ एवढ्यावरूनच मी कोणाला 'दोषयुक्त' म्हणत नाही. सारिपुत्त, जो कोणी या शरीराचा त्याग करतो आणि दुसऱ्या शरीराचा स्वीकार करतो, त्याला मी 'दोषयुक्त' म्हणतो. भिक्खू छन्नाच्या बाबतीत असे घडलेले नाही. भिक्खू छन्नाने दोषरहितपणे शस्त्राचा वापर केला आहे – सारिपुत्त, तू हे असेच लक्षात ठेव.” चौथे. ๕. ปุณฺณสุตฺตํ ५. पुण्ण सुत्त ๘๘. อถ [Pg.285] โข อายสฺมา ปุณฺโณ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา ปุณฺโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน ธมฺมํ เทเสตุ, ยมหํ ภควโต ธมฺมํ สุตฺวา เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหเรยฺย’’นฺติ. ८८. तेव्हा आयुष्यमान पुण्ण जेथे भगवान होते तेथे गेले; जवळ जाऊन...पे... एका बाजूला बसलेले आयुष्यमान पुण्ण भगवंतांना असे म्हणाले – “भन्ते, हे चांगले होईल जर भगवंतांनी मला संक्षेपात धम्माचा उपदेश केला, जेणेकरून भगवंतांकडून धम्म ऐकून मी एकटा, एकांतात, अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहरेन.” ‘‘สนฺติ โข, ปุณฺณ, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต อุปฺปชฺชติ นนฺที. ‘นนฺทิสมุทยา ทุกฺขสมุทโย, ปุณฺณา’ติ วทามิ…เป… สนฺติ โข, ปุณฺณ, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ โข, ปุณฺณ, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต อุปฺปชฺชติ นนฺที. ‘นนฺทิสมุทยา ทุกฺขสมุทโย, ปุณฺณา’ติ วทามิ. “पुण्ण, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत जे इष्ट, कांत (प्रिय), मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यात आनंद घेतो, त्याचे स्वागत करतो आणि त्यात गुंतून राहतो, तर त्यात आनंद घेणाऱ्या, स्वागत करणाऱ्या आणि गुंतून राहणाऱ्या त्या भिक्खूमध्ये नंदी (तृष्णा) उत्पन्न होते. ‘नंदीच्या उत्पत्तीमुळे दुःखाची उत्पत्ती होते, पुण्ण,’ असे मी म्हणतो...पे... पुण्ण, जिभेने जाणता येण्याजोगे असे रस आहेत...पे... पुण्ण, मनाने जाणता येण्याजोगे असे धम्म (विषय) आहेत जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यात आनंद घेतो, त्याचे स्वागत करतो आणि त्यात गुंतून राहतो, तर त्यात आनंद घेणाऱ्या, स्वागत करणाऱ्या आणि गुंतून राहणाऱ्या त्या भिक्खूमध्ये नंदी उत्पन्न होते. ‘नंदीच्या उत्पत्तीमुळे दुःखाची उत्पत्ती होते, पुण्ण,’ असे मी म्हणतो.” ‘‘สนฺติ โข, ปุณฺณ, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ, ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต นิรุชฺฌติ นนฺที. ‘นนฺทินิโรธา ทุกฺขนิโรโธ, ปุณฺณา’ติ วทามิ…เป… สนฺติ โข, ปุณฺณ, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ, ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต นิรุชฺฌติ นนฺที. ‘นนฺทินิโรธา ทุกฺขนิโรโธ, ปุณฺณา’ติ วทามิ. “पुण्ण, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यात आनंद घेत नाही, त्याचे स्वागत करत नाही आणि त्यात गुंतून राहत नाही, तर त्यात आनंद न घेणाऱ्या, स्वागत न करणाऱ्या आणि गुंतून न राहणाऱ्या त्या भिक्खूमध्ये नंदी निरुद्ध होते (नष्ट होते). ‘नंदीच्या निरोधाने दुःखाचा निरोध होतो, पुण्ण,’ असे मी म्हणतो...पे... पुण्ण, मनाने जाणता येण्याजोगे असे धम्म आहेत जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यात आनंद घेत नाही, त्याचे स्वागत करत नाही आणि त्यात गुंतून राहत नाही, तर त्यात आनंद न घेणाऱ्या, स्वागत न करणाऱ्या आणि गुंतून न राहणाऱ्या त्या भिक्खूमध्ये नंदी निरुद्ध होते. ‘नंदीच्या निरोधाने दुःखाचा निरोध होतो, पुण्ण,’ असे मी म्हणतो.” ‘‘อิมินา ตฺวํ, ปุณฺณ, มยา สํขิตฺเตน โอวาเทน โอวทิโต กตมสฺมึ ชนปเท วิหริสฺสสี’’ติ? ‘‘อตฺถิ, ภนฺเต, สุนาปรนฺโต นาม ชนปโท, ตตฺถาหํ วิหริสฺสามี’’ติ. “पुण्ण, माझ्याकडून या संक्षिप्त उपदेशाने उपदेशित झाल्यावर तू कोणत्या जनपदात विहरशील?” “भन्ते, सुनापरंत नावाचा एक जनपद आहे, तिथे मी विहरेन.” ‘‘จณฺฑา โข, ปุณฺณ, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา; ผรุสา โข, ปุณฺณ, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา. สเจ ตํ, ปุณฺณ, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา อกฺโกสิสฺสนฺติ ปริภาสิสฺสนฺติ, ตตฺร เต, ปุณฺณ, กินฺติ ภวิสฺสตี’’ติ? “पुण्ण, सुनापरंतचे लोक क्रूर आहेत; पुण्ण, सुनापरंतचे लोक कठोर आहेत. पुण्ण, जर सुनापरंतच्या लोकांनी तुला शिवीगाळ केली, तुझा अपमान केला, तर पुण्ण, तिथे तुला काय वाटेल?” ‘‘สเจ มํ, ภนฺเต, สุนาปรนฺตกา [Pg.286] มนุสฺสา อกฺโกสิสฺสนฺติ ปริภาสิสฺสนฺติ, ตตฺร เม เอวํ ภวิสฺสติ – ‘ภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, สุภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, ยํ เม นยิเม ปาณินา ปหารํ เทนฺตี’ติ. เอวเมตฺถ, ภควา, ภวิสฺสติ; เอวเมตฺถ, สุคต, ภวิสฺสตี’’ติ. “भन्ते, जर सुनापरंतच्या लोकांनी मला शिवीगाळ केली, माझा अपमान केला, तर तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल – ‘हे सुनापरंतचे लोक खरोखरच चांगले आहेत, हे सुनापरंतचे लोक खरोखरच खूप चांगले आहेत, कारण ते मला हाताने मारत नाहीत.’ हे भगवंता, तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल; हे सुगता, तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल.” ‘‘สเจ ปน เต, ปุณฺณ, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา ปาณินา ปหารํ ทสฺสนฺติ, ตตฺร ปน เต, ปุณฺณ, กินฺติ ภวิสฺสตี’’ติ? “पण पुण्ण, जर सुनापरंतच्या लोकांनी तुला हाताने मारले, तर तिथे तुला काय वाटेल?” ‘‘สเจ เม, ภนฺเต, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา ปาณินา ปหารํ ทสฺสนฺติ, ตตฺร เม เอวํ ภวิสฺสติ – ‘ภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, สุภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, ยํ เม นยิเม เลฑฺฑุนา ปหารํ เทนฺตี’ติ. เอวเมตฺถ, ภควา, ภวิสฺสติ; เอวเมตฺถ, สุคต, ภวิสฺสตี’’ติ. “भन्ते, जर सुनापरंतच्या लोकांनी मला हाताने मारले, तर तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल – ‘हे सुनापरंतचे लोक खरोखरच चांगले आहेत, हे सुनापरंतचे लोक खरोखरच खूप चांगले आहेत, कारण ते मला दगडाने मारत नाहीत.’ हे भगवंता, तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल; हे सुगता, तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल.” ‘‘สเจ ปน เต, ปุณฺณ, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา เลฑฺฑุนา ปหารํ ทสฺสนฺติ, ตตฺร ปน เต, ปุณฺณ, กินฺติ ภวิสฺสตี’’ติ? “पण पुण्ण, जर सुनापरंतच्या लोकांनी तुला दगडाने मारले, तर तिथे तुला काय वाटेल?” ‘‘สเจ เม, ภนฺเต, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา เลฑฺฑุนา ปหารํ ทสฺสนฺติ, ตตฺร เม เอวํ ภวิสฺสติ – ‘ภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, สุภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, ยํ เม นยิเม ทณฺเฑน ปหารํ เทนฺตี’ติ. เอวเมตฺถ, ภควา, ภวิสฺสติ; เอวเมตฺถ, สุคต, ภวิสฺสตี’’ติ. “भन्ते, जर सुनापरंतच्या लोकांनी मला दगडाने मारले, तर तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल – ‘हे सुनापरंतचे लोक खरोखरच चांगले आहेत, हे सुनापरंतचे लोक खरोखरच खूप चांगले आहेत, कारण ते मला लाठीने मारत नाहीत.’ हे भगवंता, तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल; हे सुगता, तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल.” ‘‘สเจ ปน ปุณฺณ, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา ทณฺเฑน ปหารํ ทสฺสนฺติ, ตตฺร ปน เต, ปุณฺณ, กินฺติ ภวิสฺสตี’’ติ? “पण पुण्ण, जर सुनापरंतच्या लोकांनी तुला लाठीने मारले, तर तिथे तुला काय वाटेल?” ‘‘สเจ เม, ภนฺเต, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา ทณฺเฑน ปหารํ ทสฺสนฺติ, ตตฺร เม เอวํ ภวิสฺสติ – ‘ภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, สุภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, ยํ เม นยิเม สตฺเถน ปหารํ เทนฺตี’ติ. เอวเมตฺถ, ภควา, ภวิสฺสติ; เอวเมตฺถ, สุคต, ภวิสฺสตี’’ติ. “भन्ते, जर सुनापरंतच्या लोकांनी मला लाठीने मारले, तर तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल – ‘हे सुनापरंतचे लोक खरोखरच चांगले आहेत, हे सुनापरंतचे लोक खरोखरच खूप चांगले आहेत, कारण ते मला शस्त्राने मारत नाहीत.’ हे भगवंता, तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल; हे सुगता, तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल.” ‘‘สเจ ปน เต, ปุณฺณ, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา สตฺเถน ปหารํ ทสฺสนฺติ, ตตฺร ปน เต, ปุณฺณ, กินฺติ ภวิสฺสตี’’ติ? “पण पुण्ण, जर सुनापरंतच्या लोकांनी तुला शस्त्राने मारले, तर तिथे तुला काय वाटेल?” ‘‘สเจ เม, ภนฺเต, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา สตฺเถน ปหารํ ทสฺสนฺติ, ตตฺร เม เอวํ ภวิสฺสติ – ‘ภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, สุภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, ยํ มํ นยิเม ติณฺเหน สตฺเถน ชีวิตา โวโรเปนฺตี’ติ. เอวเมตฺถ, ภควา, ภวิสฺสติ; เอวเมตฺถ, สุคต, ภวิสฺสตี’’ติ. “भन्ते, जर सुनापरंतच्या लोकांनी मला शस्त्राने मारले, तर तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल – ‘हे सुनापरंतचे लोक खरोखरच चांगले आहेत, हे सुनापरंतचे लोक खरोखरच खूप चांगले आहेत, कारण ते धारदार शस्त्राने माझा जीव घेत नाहीत.’ हे भगवंता, तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल; हे सुगता, तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल.” ‘‘สเจ [Pg.287] ปน ตํ, ปุณฺณ, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา ติณฺเหน สตฺเถน ชีวิตา โวโรเปสฺสนฺติ, ตตฺร ปน เต, ปุณฺณ, กินฺติ ภวิสฺสตี’’ติ? "पण पुण्णा, जर सुनापरान्त देशातील लोकांनी धारदार शस्त्राने तुझा प्राण घेतला, तर त्या प्रसंगी तुला काय वाटेल?" ‘‘สเจ มํ, ภนฺเต, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา ติณฺเหน สตฺเถน ชีวิตา โวโรเปสฺสนฺติ, ตตฺร เม เอวํ ภวิสฺสติ – ‘สนฺติ โข ตสฺส ภควโต สาวกา กาเยน จ ชีวิเตน จ อฏฺฏียมานา หรายมานา ชิคุจฺฉมานา สตฺถหารกํ ปริเยสนฺติ, ตํ เม อิทํ อปริยิฏฺฐญฺเญว สตฺถหารกํ ลทฺธ’นฺติ. เอวเมตฺถ, ภควา, ภวิสฺสติ; เอวเมตฺถ, สุคต, ภวิสฺสตี’’ติ. "भन्ते, जर सुनापरान्त देशातील लोकांनी धारदार शस्त्राने माझा प्राण घेतला, तर माझ्या मनात असा विचार येईल— 'भगवंतांचे असेही श्रावक आहेत जे शरीराचा आणि जीवाचा कंटाळा आल्यामुळे, लज्जित झाल्यामुळे आणि वीट आल्यामुळे स्वतःचा प्राण घेण्यासाठी शस्त्र शोधत फिरतात; परंतु मला तर न शोधताच हे प्राण घेणारे शस्त्र मिळाले आहे.' हे भगवंता, त्या प्रसंगी माझ्या मनात असा विचार येईल; हे सुगता, त्या प्रसंगी माझ्या मनात असा विचार येईल." ‘‘สาธุ สาธุ, ปุณฺณ! สกฺขิสฺสสิ โข ตฺวํ, ปุณฺณ, อิมินา ทมูปสเมน สมนฺนาคโต สุนาปรนฺตสฺมึ ชนปเท วตฺถุํ. ยสฺส ทานิ ตฺวํ, ปุณฺณ, กาลํ มญฺญสี’’ติ. "साधू, साधू पुण्णा! अशा संयम आणि शांततेने युक्त असलेला तू सुनापरान्त जनपदात राहण्यास समर्थ होशील. पुण्णा, आता तुला जी योग्य वेळ वाटेल, ती तू ठरव." อถ โข อายสฺมา ปุณฺโณ ภควโต วจนํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา เสนาสนํ สํสาเมตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย เยน สุนาปรนฺโต ชนปโท เตน จาริกํ ปกฺกามิ. อนุปุพฺเพน จาริกํ จรมาโน เยน สุนาปรนฺโต ชนปโท ตทวสริ. ตตฺร สุทํ อายสฺมา ปุณฺโณ สุนาปรนฺตสฺมึ ชนปเท วิหรติ. อถ โข อายสฺมา ปุณฺโณ เตเนวนฺตรวสฺเสน ปญฺจมตฺตานิ อุปาสกสตานิ ปฏิเวเทสิ. เตเนวนฺตรวสฺเสน ปญฺจมตฺตานิ อุปาสิกาสตานิ ปฏิเวเทสิ. เตเนวนฺตรวสฺเสน ติสฺโส วิชฺชา สจฺฉากาสิ. เตเนวนฺตรวสฺเสน ปรินิพฺพายิ. "त्यानंतर आयुष्मान पुण्ण भगवंतांच्या वचनाचे अभिनंदन व कौतुक करून, आसनावरून उठले, भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि आपले बिछाने व निवासस्थान आवरून, पात्र व चीवर घेऊन सुनापरान्त जनपदाच्या देशाने चारिकेसाठी निघाले. क्रमशः चारिका करत ते सुनापरान्त जनपदात पोहोचले. तिथे आयुष्मान पुण्ण सुनापरान्त जनपदात राहू लागले. त्यानंतर आयुष्मान पुण्ण यांनी त्याच वर्षावासात सुमारे पाचशे उपासकांना धर्मात प्रस्थापित केले, त्याच वर्षावासात सुमारे पाचशे उपासिकांना धर्मात प्रस्थापित केले, त्याच वर्षावासात तीन विद्या साक्षात केल्या आणि त्याच वर्षावासात ते परिनिर्वाण पावले." อถ โข สมฺพหุลา ภิกฺขู เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘โย โส, ภนฺเต, ปุณฺโณ นาม กุลปุตฺโต ภควตา สํขิตฺเตน โอวาเทน โอวทิโต, โส กาลงฺกโต. ตสฺส กา คติ โก อภิสมฺปราโย’’ติ? "त्यानंतर अनेक भिक्खू भगवंतांकडे आले... आणि एका बाजूला बसून त्या भिक्खूंनी भगवंतांना विचारले— 'भन्ते, पुण्ण नावाचे जे कुलपुत्र होते, ज्यांना भगवंतांनी संक्षिप्त उपदेश केला होता, त्यांचे निधन झाले आहे. त्यांची गती काय आहे आणि परलोकातील पुनर्जन्म कोणता आहे?'" ‘‘ปณฺฑิโต, ภิกฺขเว, ปุณฺโณ กุลปุตฺโต, ปจฺจปาทิ ธมฺมสฺสานุธมฺมํ, น จ มํ ธมฺมาธิกรณํ วิเหเสสิ. ปรินิพฺพุโต, ภิกฺขเว, ปุณฺโณ กุลปุตฺโต’’ติ. ปญฺจมํ. "भिक्खूंनो, पुण्ण कुलपुत्र हा बुद्धिमान होता. त्याने धर्माला अनुसरून आचरण केले आणि धर्माच्या बाबतीत मला कधीही त्रास दिला नाही. भिक्खूंनो, पुण्ण कुलपुत्र परिनिर्वाण पावला आहे." ๖. พาหิยสุตฺตํ ६. "बाहिय सुत्त" ๘๙. อถ [Pg.288] โข อายสฺมา พาหิโย เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา พาหิโย ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน ธมฺมํ เทเสตุ, ยมหํ ภควโต ธมฺมํ สุตฺวา เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหเรยฺย’’นฺติ. ८९. "त्यानंतर आयुष्मान बाहिय भगवंतांकडे आले... आणि एका बाजूला बसून आयुष्मान बाहिय भगवंतांना म्हणाले— 'भन्ते, बरे होईल जर भगवंत मला संक्षेपात धम्म उपदेश करतील, जेणेकरून भगवंतांकडून धम्म ऐकून मी एकटा, एकांतात, अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करू शकेन.'" ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, พาหิย, จกฺขุ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? "बाहिय, तुला काय वाटते, चक्षु नित्य आहे की अनित्य?" ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. "अनित्य, भन्ते." ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? "आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?" ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. "दुःखकारक, भन्ते." ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? "आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील आहे, त्याकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' अशा प्रकारे पाहणे योग्य आहे का?" ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "नक्कीच नाही, भन्ते." ‘‘รูปา นิจฺจา วา อนิจฺจา วา’’ติ? "रूपे नित्य आहेत की अनित्य?" ‘‘อนิจฺจา, ภนฺเต’’…เป… จกฺขุวิญฺญาณํ…เป… จกฺขุสมฺผสฺโส…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? "अनित्य, भन्ते... चक्षु-विज्ञाण... चक्षु-सम्फस्स... मनो-सम्फस्सच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते नित्य आहे की अनित्य?" ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. "अनित्य, भन्ते." ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? "आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?" ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. "दुःखकारक, भन्ते." ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? "आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील आहे, त्याकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' अशा प्रकारे पाहणे योग्य आहे का?" ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "नक्कीच नाही, भन्ते." ‘‘เอวํ ปสฺสํ, พาหิย, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. "असे पाहणारा, बाहिय, श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षुविषयी विरक्त होतो, रूपांविषयी विरक्त होतो, चक्षु-विज्ञाणाविषयी विरक्त होतो, चक्षु-सम्फस्साविषयी विरक्त होतो... आणि मनो-सम्फस्सच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही विरक्त होतो. विरक्त झाल्याने तो रागरहित होतो; रागरहित झाल्याने तो विमुक्त होतो. विमुक्त झाल्यावर 'मी विमुक्त झालो आहे' असे ज्ञान होते. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मासाठी काहीही उरलेले नाही' हे तो जाणतो." อถ โข อายสฺมา พาหิโย ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. อถ โข อายสฺมา พาหิโย เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรนฺโต นจิรสฺเสว – ยสฺสตฺถาย กุลปุตฺตา สมฺมเทว อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชนฺติ ตทนุตฺตรํ – พฺรหฺมจริยปริโยสานํ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหาสิ. ‘‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’’ติ อพฺภญฺญาสิ. อญฺญตโร จ ปนายสฺมา พาหิโย อรหตํ อโหสีติ. ฉฏฺฐํ. "त्यानंतर आयुष्मान बाहिय भगवंतांच्या भाषणाचे अभिनंदन व कौतुक करून, आसनावरून उठले, भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि निघून गेले. त्यानंतर आयुष्मान बाहिय एकटे, एकांतात, अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करत असताना, फार काळ न लागताच— ज्या ध्येयासाठी कुलपुत्र योग्य प्रकारे घराबाहेर पडून अनगारिक प्रव्रज्या ग्रहण करतात, ते सर्वोत्तम ब्रह्मचर्याचे अंतिम ध्येय याच जन्मात स्वतः उच्च ज्ञानाने साक्षात करून, प्राप्त करून विहरू लागले. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मासाठी काहीही उरलेले नाही' हे त्यांनी जाणले. आणि आयुष्मान बाहिय अर्हतांपैकी एक झाले." ๗. ปฐมเอชาสุตฺตํ ७. "प्रथम एजा सुत्त" ๙๐. ‘‘เอชา[Pg.289], ภิกฺขเว, โรโค, เอชา คณฺโฑ, เอชา สลฺลํ. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ตถาคโต อเนโช วิหรติ วีตสลฺโล. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เจปิ อากงฺเขยฺย ‘อเนโช วิหเรยฺยํ วีตสลฺโล’ติ, จกฺขุํ น มญฺเญยฺย, จกฺขุสฺมึ น มญฺเญยฺย, จกฺขุโต น มญฺเญยฺย, จกฺขุ เมติ น มญฺเญยฺย; รูเป น มญฺเญยฺย, รูเปสุ น มญฺเญยฺย, รูปโต น มญฺเญยฺย, รูปา เมติ น มญฺเญยฺย; จกฺขุวิญฺญาณํ น มญฺเญยฺย, จกฺขุวิญฺญาณสฺมึ น มญฺเญยฺย, จกฺขุวิญฺญาณโต น มญฺเญยฺย, จกฺขุวิญฺญาณํ เมติ น มญฺเญยฺย; จกฺขุสมฺผสฺสํ น มญฺเญยฺย, จกฺขุสมฺผสฺสสฺมึ น มญฺเญยฺย, จกฺขุสมฺผสฺสโต น มญฺเญยฺย, จกฺขุสมฺผสฺโส เมติ น มญฺเญยฺย. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตสฺมิมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตโตปิ น มญฺเญยฺย, ตํ เมติ น มญฺเญยฺย. ९०. "भिक्खूंनो, एजा (तृष्णा) हा रोग आहे, एजा हा गंड (गळू) आहे, एजा हा शल्य (काटा) आहे. म्हणून, भिक्खूंनो, तथागत एजा-रहित आणि शल्य-रहित होऊन विहार करतात. म्हणून, भिक्खूंनो, जर भिक्खूची अशी इच्छा असेल की 'मी एजा-रहित आणि शल्य-रहित होऊन विहार करावा', तर त्याने चक्षूला 'मी' मानू नये, चक्षूमध्ये 'मी' मानू नये, चक्षूपासून 'मी' मानू नये, 'चक्षू माझा आहे' असे मानू नये; रूपांना 'मी' मानू नये, रूपांमध्ये 'मी' मानू नये, रूपांपासून 'मी' मानू नये, 'रूपे माझी आहेत' असे मानू नये; चक्षु-विज्ञाणाला 'मी' मानू नये, चक्षु-विज्ञाणामध्ये 'मी' मानू नये, चक्षु-विज्ञाणापासून 'मी' मानू नये, 'चक्षु-विज्ञाण माझे आहे' असे मानू नये; चक्षु-सम्फस्साला 'मी' मानू नये, चक्षु-सम्फस्सामध्ये 'मी' मानू नये, चक्षु-सम्फस्सापासून 'मी' मानू नये, 'चक्षु-सम्फस्स माझा आहे' असे मानू नये. चक्षु-सम्फस्साच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्यालाही 'मी' मानू नये, त्यामध्ये 'मी' मानू नये, त्यापासून 'मी' मानू नये, 'ते माझे आहे' असे मानू नये." ‘‘โสตํ น มญฺเญยฺย…เป… ฆานํ น มญฺเญยฺย…เป… ชิวฺหํ น มญฺเญยฺย, ชิวฺหาย น มญฺเญยฺย, ชิวฺหาโต น มญฺเญยฺย, ชิวฺหา เมติ น มญฺเญยฺย; รเส น มญฺเญยฺย…เป… ชิวฺหาวิญฺญาณํ น มญฺเญยฺย…เป… ชิวฺหาสมฺผสฺสํ น มญฺเญยฺย…เป… ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตสฺมิมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตโตปิ น มญฺเญยฺย, ตํ เมติ น มญฺเญยฺย. “कानाविषयी कल्पना करू नये... तसेच... नाकाविषयी कल्पना करू नये... तसेच... जिभेविषयी कल्पना करू नये, जिभेच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, जिभेपासून कल्पना करू नये, 'जीभ माझी आहे' अशी कल्पना करू नये; रसांविषयी कल्पना करू नये... तसेच... जिव्हा-विज्ञानाविषयी कल्पना करू नये... तसेच... जिव्हा-स्पर्शाविषयी कल्पना करू नये... तसेच... जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही कल्पना करू नये, त्याच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, त्यापासून कल्पना करू नये, 'ते माझे आहे' अशी कल्पना करू नये.” ‘‘กายํ น มญฺเญยฺย…เป… มนํ น มญฺเญยฺย, มนสฺมึ น มญฺเญยฺย, มนโต น มญฺเญยฺย, มโน เมติ น มญฺเญยฺย; ธมฺเม น มญฺเญยฺย…เป… มโน วิญฺญาณํ…เป… มโนสมฺผสฺสํ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตสฺมิมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตโตปิ น มญฺเญยฺย, ตํ เมติ น มญฺเญยฺย; สพฺพํ น มญฺเญยฺย, สพฺพสฺมึ น มญฺเญยฺย, สพฺพโต น มญฺเญยฺย, สพฺพํ เมติ น มญฺเญยฺย. “शरिराविषयी कल्पना करू नये... तसेच... मनाविषयी कल्पना करू नये, मनाच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, मनापासून कल्पना करू नये, 'मन माझे आहे' अशी कल्पना करू नये; धम्मांविषयी कल्पना करू नये... तसेच... मनो-विज्ञानाविषयी... तसेच... मनो-स्पर्शाविषयी... तसेच... मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही कल्पना करू नये, त्याच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, त्यापासून कल्पना करू नये, 'ते माझे आहे' अशी कल्पना करू नये; सर्व गोष्टींविषयी कल्पना करू नये, सर्वांच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, सर्वांपासून कल्पना करू नये, 'सर्व माझे आहे' अशी कल्पना करू नये.” ‘‘โส เอวํ อมญฺญมาโน น กิญฺจิปิ โลเก อุปาทิยติ. อนุปาทิยํ น ปริตสฺสติ. อปริตสฺสํ ปจฺจตฺตญฺเญว ปรินิพฺพายติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. สตฺตมํ. “अशा प्रकारे कल्पना न करणारा तो (भिक्खू) लोकात कशाचेही उपादान करत नाही. उपादान न केल्यामुळे तो उद्विग्न होत नाही. उद्विग्न न झाल्यामुळे तो स्वतःच परिनिर्वाण प्राप्त करतो. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे कर्तव्य होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही शेष राहिलेले नाही,' असे तो जाणतो.” सातवे. ๘. ทุติยเอชาสุตฺตํ ८. दुसरे एजा सुत्त ๙๑. ‘‘เอชา[Pg.290], ภิกฺขเว, โรโค, เอชา คณฺโฑ, เอชา สลฺลํ. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ตถาคโต อเนโช วิหรติ วีตสลฺโล. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เจปิ อากงฺเขยฺย ‘อเนโช วิหเรยฺยํ วีตสลฺโล’ติ, จกฺขุํ น มญฺเญยฺย, จกฺขุสฺมึ น มญฺเญยฺย, จกฺขุโต น มญฺเญยฺย, จกฺขุ เมติ น มญฺเญยฺย; รูเป น มญฺเญยฺย… จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตสฺมิมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตโตปิ น มญฺเญยฺย, ตํ เมติ น มญฺเญยฺย. ยญฺหิ, ภิกฺขเว, มญฺญติ, ยสฺมึ มญฺญติ, ยโต มญฺญติ, ยํ เมติ มญฺญติ, ตโต ตํ โหติ อญฺญถา. อญฺญถาภาวี ภวสตฺโต โลโก ภวเมว อภินนฺทติ…เป…. ९१. “भिक्खूंनो, एजा (तृष्णा) हा रोग आहे, एजा हा गंड (गळू) आहे, एजा हा शल्य (काटा) आहे. म्हणूनच, भिक्खूंनो, तथागत एजा-रहित आणि शल्य-रहित होऊन विहरतात. म्हणूनच, भिक्खूंनो, जर एखाद्या भिक्खूला 'मी एजा-रहित आणि शल्य-रहित होऊन विहरावे' अशी इच्छा असेल, तर त्याने डोळ्याविषयी कल्पना करू नये, डोळ्याच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, डोळ्यापासून कल्पना करू नये, 'डोळा माझा आहे' अशी कल्पना करू नये; रूपांविषयी कल्पना करू नये... चक्षु-विज्ञानाविषयी... चक्षु-स्पर्शाविषयी... चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही कल्पना करू नये, त्याच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, त्यापासून कल्पना करू नये, 'ते माझे आहे' अशी कल्पना करू नये. कारण, भिक्खूंनो, मनुष्य ज्या कशाची कल्पना करतो, ज्याच्या ठिकाणी कल्पना करतो, ज्याच्यापासून कल्पना करतो, ज्याला 'माझे' म्हणून कल्पितो, ते त्या कल्पनेपेक्षा वेगळे (अन्यथा) होते. अन्यथा होणारा आणि अस्तित्वाला चिकटलेला हा लोक अस्तित्वाचाच आनंद घेतो... तसेच...” ‘‘ชิวฺหํ น มญฺเญยฺย, ชิวฺหาย น มญฺเญยฺย, ชิวฺหาโต น มญฺเญยฺย, ชิวฺหา เมติ น มญฺเญยฺย; รเส น มญฺเญยฺย… ชิวฺหาวิญฺญาณํ… ชิวฺหาสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตสฺมิมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตโตปิ น มญฺเญยฺย, ตํ เมติ น มญฺเญยฺย. ยญฺหิ, ภิกฺขเว, มญฺญติ, ยสฺมึ มญฺญติ, ยโต มญฺญติ, ยํ เมติ มญฺญติ, ตโต ตํ โหติ อญฺญถา. อญฺญถาภาวี ภวสตฺโต โลโก ภวเมว อภินนฺทติ…เป…. “जिभेविषयी कल्पना करू नये, जिभेच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, जिभेपासून कल्पना करू नये, 'जीभ माझी आहे' अशी कल्पना करू नये; रसांविषयी कल्पना करू नये... जिव्हा-विज्ञानाविषयी... जिव्हा-स्पर्शाविषयी... जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही कल्पना करू नये, त्याच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, त्यापासून कल्पना करू नये, 'ते माझे आहे' अशी कल्पना करू नये. कारण, भिक्खूंनो, मनुष्य ज्या कशाची कल्पना करतो, ज्याच्या ठिकाणी कल्पना करतो, ज्याच्यापासून कल्पना करतो, ज्याला 'माझे' म्हणून कल्पितो, ते त्या कल्पनेपेक्षा वेगळे (अन्यथा) होते. अन्यथा होणारा आणि अस्तित्वाला चिकटलेला हा लोक अस्तित्वाचाच आनंद घेतो... तसेच...” ‘‘มนํ น มญฺเญยฺย, มนสฺมึ น มญฺเญยฺย, มนโต น มญฺเญยฺย, มโน เมติ น มญฺเญยฺย… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตสฺมิมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตโตปิ น มญฺเญยฺย, ตํ เมติ น มญฺเญยฺย. ยญฺหิ, ภิกฺขเว, มญฺญติ, ยสฺมึ มญฺญติ, ยโต มญฺญติ, ยํ เมติ มญฺญติ, ตโต ตํ โหติ อญฺญถา. อญฺญถาภาวี ภวสตฺโต โลโก ภวเมว อภินนฺทติ. “मनाविषयी कल्पना करू नये, मनाच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, मनापासून कल्पना करू नये, 'मन माझे आहे' अशी कल्पना करू नये... मनो-विज्ञानाविषयी... मनो-स्पर्शाविषयी... मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही कल्पना करू नये, त्याच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, त्यापासून कल्पना करू नये, 'ते माझे आहे' अशी कल्पना करू नये. कारण, भिक्खूंनो, मनुष्य ज्या कशाची कल्पना करतो, ज्याच्या ठिकाणी कल्पना करतो, ज्याच्यापासून कल्पना करतो, ज्याला 'माझे' म्हणून कल्पितो, ते त्या कल्पनेपेक्षा वेगळे (अन्यथा) होते. अन्यथा होणारा आणि अस्तित्वाला चिकटलेला हा लोक अस्तित्वाचाच आनंद घेतो.” ‘‘ยาวตา, ภิกฺขเว, ขนฺธธาตุอายตนา ตมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตสฺมิมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตโตปิ น มญฺเญยฺย, ตํ เมติ น มญฺเญยฺย. โส เอวํ อมญฺญมาโน น กิญฺจิ โลเก อุปาทิยติ. อนุปาทิยํ น ปริตสฺสติ. อปริตสฺสํ ปจฺจตฺตญฺเญว ปรินิพฺพายติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. อฏฺฐมํ. “भिक्खूंनो, जितके काही स्कंध, धातू आणि आयतने आहेत, त्यांविषयीही कल्पना करू नये, त्यांच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, त्यांच्यापासून कल्पना करू नये, 'ते माझे आहे' अशी कल्पना करू नये. अशा प्रकारे कल्पना न करणारा तो (भिक्खू) लोकात कशाचेही उपादान करत नाही. उपादान न केल्यामुळे तो उद्विग्न होत नाही. उद्विग्न न झाल्यामुळे तो स्वतःच परिनिर्वाण प्राप्त करतो. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे कर्तव्य होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही शेष राहिलेले नाही,' असे तो जाणतो.” आठवे. ๙. ปฐมทฺวยสุตฺตํ ९. पहिले द्वय सुत्त ๙๒. ‘‘ทฺวยํ [Pg.291] โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, ทฺวยํ? จกฺขุญฺเจว รูปา จ, โสตญฺเจว สทฺทา จ, ฆานญฺเจว คนฺธา จ, ชิวฺหา เจว รสา จ, กาโย เจว โผฏฺฐพฺพา จ, มโน เจว ธมฺมา จ – อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ทฺวยํ. ९२. “भिक्खूंनो, मी तुम्हाला द्वय (दोन गोष्टींचा समूह) उपदेशीन. ते लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूंनो, द्वय म्हणजे काय? डोळा आणि रूपे, कान आणि शब्द, नाक आणि गंध, जीभ आणि रस, शरीर आणि स्पर्श, मन आणि धम्म (मानसिक विषय) – भिक्खूंनो, याला द्वय असे म्हणतात.” ‘‘โย, ภิกฺขเว, เอวํ วเทยฺย – ‘อหเมตํ ทฺวยํ ปจฺจกฺขาย อญฺญํ ทฺวยํ ปญฺญเปสฺสามี’ติ, ตสฺส วาจาวตฺถุกเมวสฺส. ปุฏฺโฐ จ น สมฺปาเยยฺย. อุตฺตริญฺจ วิฆาตํ อาปชฺเชยฺย. ตํ กิสฺส เหตุ? ยถา ตํ, ภิกฺขเว, อวิสยสฺมิ’’นฺติ. นวมํ. “भिक्खूंनो, जर कोणी असे म्हणाला की – 'मी या द्वयाचा त्याग करून दुसऱ्या एखाद्या द्वयाची प्रज्ञापना (स्थापना) करीन,' तर त्याचे बोलणे केवळ पोकळ शब्दच ठरेल. विचारले असता तो उत्तर देऊ शकणार नाही आणि उलटपक्षी तो त्रासाला (व्याकुळतेला) प्राप्त होईल. त्याचे कारण काय? कारण, भिक्खूंनो, ते त्याच्या विषयात (कक्षेत) नाही.” नववे. ๑๐. ทุติยทฺวยสุตฺตํ १०. दुसरे द्वय सुत्त ๙๓. ‘‘ทฺวยํ, ภิกฺขเว, ปฏิจฺจ วิญฺญาณํ สมฺโภติ. กถญฺจ, ภิกฺขเว, ทฺวยํ ปฏิจฺจ วิญฺญาณํ สมฺโภติ? จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณํ. จกฺขุ อนิจฺจํ วิปริณามิ อญฺญถาภาวิ. รูปา อนิจฺจา วิปริณามิโน อญฺญถาภาวิโน. อิตฺเถตํ ทฺวยํ จลญฺเจว พฺยถญฺจ อนิจฺจํ วิปริณามิ อญฺญถาภาวิ. จกฺขุวิญฺญาณํ อนิจฺจํ วิปริณามิ อญฺญถาภาวิ. โยปิ เหตุ โยปิ ปจฺจโย จกฺขุวิญฺญาณสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ เหตุ โสปิ ปจฺจโย อนิจฺโจ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. อนิจฺจํ โข ปน, ภิกฺขเว, ปจฺจยํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนํ จกฺขุวิญฺญาณํ กุโต นิจฺจํ ภวิสฺสติ! ยา โข, ภิกฺขเว, อิเมสํ ติณฺณํ ธมฺมานํ สงฺคติ สนฺนิปาโต สมวาโย, อยํ วุจฺจติ จกฺขุสมฺผสฺโส. จกฺขุสมฺผสฺโสปิ อนิจฺโจ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. โยปิ เหตุ โยปิ ปจฺจโย จกฺขุสมฺผสฺสสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ เหตุ โสปิ ปจฺจโย อนิจฺโจ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. อนิจฺจํ โข ปน, ภิกฺขเว, ปจฺจยํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺโน จกฺขุสมฺผสฺโส กุโต นิจฺโจ ภวิสฺสติ! ผุฏฺโฐ, ภิกฺขเว, เวเทติ, ผุฏฺโฐ เจเตติ, ผุฏฺโฐ สญฺชานาติ. อิตฺเถเตปิ ธมฺมา จลา เจว พฺยถา จ อนิจฺจา วิปริณามิโน อญฺญถาภาวิโน. โสตํ…เป…. ९३. “भिक्खूंनो, द्वयावर अवलंबून विज्ञान उत्पन्न होते. आणि भिक्खूंनो, द्वयावर अवलंबून विज्ञान कसे उत्पन्न होते? डोळा आणि रूपांवर अवलंबून चक्षु-विज्ञान उत्पन्न होते. डोळा अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथा होणारा (बदलणारा) आहे. रूपे अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथा होणारी आहेत. अशा प्रकारे हे द्वय चंचल, अस्थिर, अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथा होणारे आहे. चक्षु-विज्ञान अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथा होणारे आहे. चक्षु-विज्ञानाच्या उत्पत्तीसाठी जो काही हेतू आणि जो काही प्रत्यय (कारण) आहे, तो हेतू आणि तो प्रत्यय देखील अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथा होणारा आहे. भिक्खूंनो, अनित्य प्रत्ययावर अवलंबून उत्पन्न झालेले चक्षु-विज्ञान नित्य कसे असू शकेल! भिक्खूंनो, या तीन गोष्टींचा जो संयोग, संनिपात (एकत्र येणे) आणि समवाय आहे, त्याला चक्षु-स्पर्श असे म्हणतात. चक्षु-स्पर्श देखील अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथा होणारा आहे. चक्षु-स्पर्शाच्या उत्पत्तीसाठी जो काही हेतू आणि जो काही प्रत्यय आहे, तो हेतू आणि तो प्रत्यय देखील अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथा होणारा आहे. भिक्खूंनो, अनित्य प्रत्ययावर अवलंबून उत्पन्न झालेला चक्षु-स्पर्श नित्य कसा असू शकेल! भिक्खूंनो, स्पर्शाने युक्त झालेला मनुष्य वेदन करतो (अनुभवतो), स्पर्शाने युक्त झालेला चेतना करतो, स्पर्शाने युक्त झालेला संज्ञा करतो (जाणतो). अशा प्रकारे हे धम्म देखील चंचल, अस्थिर, अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथा होणारे आहेत. कान... तसेच...” ‘‘ชิวฺหญฺจ ปฏิจฺจ รเส จ อุปฺปชฺชติ ชิวฺหาวิญฺญาณํ. ชิวฺหา อนิจฺจา วิปริณามี อญฺญถาภาวี. รสา อนิจฺจา วิปริณามิโน อญฺญถาภาวิโน. อิตฺเถตํ ทฺวยํ จลญฺเจว พฺยถญฺจ อนิจฺจํ วิปริณามิ อญฺญถาภาวิ. ชิวฺหาวิญฺญาณํ อนิจฺจํ วิปริณามิ อญฺญถาภาวิ. โยปิ เหตุ โยปิ ปจฺจโย ชิวฺหาวิญฺญาณสฺส อุปฺปาทาย[Pg.292], โสปิ เหตุ โสปิ ปจฺจโย อนิจฺโจ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. อนิจฺจํ โข ปน, ภิกฺขเว, ปจฺจยํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนํ ชิวฺหาวิญฺญาณํ, กุโต นิจฺจํ ภวิสฺสติ! ยา โข, ภิกฺขเว, อิเมสํ ติณฺณํ ธมฺมานํ สงฺคติ สนฺนิปาโต สมวาโย, อยํ วุจฺจติ ชิวฺหาสมฺผสฺโส. ชิวฺหาสมฺผสฺโสปิ อนิจฺโจ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. โยปิ เหตุ โยปิ ปจฺจโย ชิวฺหาสมฺผสฺสสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ เหตุ โสปิ ปจฺจโย อนิจฺโจ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. อนิจฺจํ โข ปน, ภิกฺขเว, ปจฺจยํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺโน ชิวฺหาสมฺผสฺโส, กุโต นิจฺโจ ภวิสฺสติ! ผุฏฺโฐ, ภิกฺขเว, เวเทติ, ผุฏฺโฐ เจเตติ, ผุฏฺโฐ สญฺชานาติ. อิตฺเถเตปิ ธมฺมา จลา เจว พฺยถา จ อนิจฺจา วิปริณามิโน อญฺญถาภาวิโน. กายํ…เป…. “जिभ आणि रसांवर (चवींवर) अवलंबून जिव्हा-विज्ञान उत्पन्न होते. जीभ अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी (बदलणाऱ्या स्वभावाची) आहे. रस अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहेत. अशा प्रकारे हे द्वय चंचल, अस्थिर, अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. जिव्हा-विज्ञान अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. जिव्हा-विज्ञानाच्या उत्पत्तीसाठी जो काही हेतू आणि जो काही प्रत्यय (कारण) आहे, तो हेतू आणि तो प्रत्यय देखील अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. हे भिक्खूहो, अनित्य प्रत्ययावर अवलंबून उत्पन्न झालेले जिव्हा-विज्ञान नित्य कसे बरे असेल! हे भिक्खूहो, या तीन धर्मांचा जो संयोग, संनिपात आणि समवाय आहे, त्याला 'जिव्हा-सम्फस्स' (जिभेचा स्पर्श) असे म्हणतात. जिव्हा-सम्फस्स देखील अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. जिव्हा-सम्फस्साच्या उत्पत्तीसाठी जो काही हेतू आणि जो काही प्रत्यय आहे, तो हेतू आणि तो प्रत्यय देखील अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. हे भिक्खूहो, अनित्य प्रत्ययावर अवलंबून उत्पन्न झालेला जिव्हा-सम्फस्स नित्य कसा बरे असेल! हे भिक्खूहो, स्पर्शाने युक्त होऊन मनुष्य वेदन करतो, स्पर्शाने युक्त होऊन चेतना करतो, स्पर्शाने युक्त होऊन संज्ञा करतो. अशा प्रकारे हे धर्म देखील चंचल, अस्थिर, अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहेत. काया (शरीर)... आणि तद्वतच...” ‘‘มนญฺจ ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณํ. มโน อนิจฺโจ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. ธมฺมา อนิจฺจา วิปริณามิโน อญฺญถาภาวิโน. อิตฺเถตํ ทฺวยํ จลญฺเจว พฺยถญฺจ อนิจฺจํ วิปริณามิ อญฺญถาภาวิ. มโนวิญฺญาณํ อนิจฺจํ วิปริณามิ อญฺญถาภาวิ. โยปิ เหตุ โยปิ ปจฺจโย มโนวิญฺญาณสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ เหตุ โสปิ ปจฺจโย อนิจฺโจ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. อนิจฺจํ โข ปน, ภิกฺขเว, ปจฺจยํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนํ มโนวิญฺญาณํ, กุโต นิจฺจํ ภวิสฺสติ! ยา โข, ภิกฺขเว, อิเมสํ ติณฺณํ ธมฺมานํ สงฺคติ สนฺนิปาโต สมวาโย, อยํ วุจฺจติ มโนสมฺผสฺโส. มโนสมฺผสฺโสปิ อนิจฺโจ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. โยปิ เหตุ โยปิ ปจฺจโย มโนสมฺผสฺสสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ เหตุ โสปิ ปจฺจโย อนิจฺโจ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. อนิจฺจํ โข ปน, ภิกฺขเว, ปจฺจยํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺโน มโนสมฺผสฺโส, กุโต นิจฺโจ ภวิสฺสติ! ผุฏฺโฐ, ภิกฺขเว, เวเทติ, ผุฏฺโฐ เจเตติ, ผุฏฺโฐ สญฺชานาติ. อิตฺเถเตปิ ธมฺมา จลา เจว พฺยถา จ อนิจฺจา วิปริณามิโน อญฺญถาภาวิโน. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ทฺวยํ ปฏิจฺจ วิญฺญาณํ สมฺโภตี’’ติ. ทสมํ. “मन आणि धम्मांवर (मानसिक विषयांवर) अवलंबून मनो-विज्ञान उत्पन्न होते. मन अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. धम्म अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहेत. अशा प्रकारे हे द्वय चंचल, अस्थिर, अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. मनो-विज्ञान अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. मनो-विज्ञानाच्या उत्पत्तीसाठी जो काही हेतू आणि जो काही प्रत्यय आहे, तो हेतू आणि तो प्रत्यय देखील अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. हे भिक्खूहो, अनित्य प्रत्ययावर अवलंबून उत्पन्न झालेले मनो-विज्ञान नित्य कसे बरे असेल! हे भिक्खूहो, या तीन धर्मांचा जो संयोग, संनिपात आणि समवाय आहे, त्याला 'मनो-सम्फस्स' (मनाचा स्पर्श) असे म्हणतात. मनो-सम्फस्स देखील अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. मनो-सम्फस्साच्या उत्पत्तीसाठी जो काही हेतू आणि जो काही प्रत्यय आहे, तो हेतू आणि तो प्रत्यय देखील अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. हे भिक्खूहो, अनित्य प्रत्ययावर अवलंबून उत्पन्न झालेला मनो-सम्फस्स नित्य कसा बरे असेल! हे भिक्खूहो, स्पर्शाने युक्त होऊन मनुष्य वेदन करतो, स्पर्शाने युक्त होऊन चेतना करतो, स्पर्शाने युक्त होऊन संज्ञा करतो. अशा प्रकारे हे धर्म देखील चंचल, अस्थिर, अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहेत. हे भिक्खूहो, अशा प्रकारे द्वयावर अवलंबून विज्ञान उत्पन्न होते.” दहावे (सुत्त समाप्त). ฉนฺนวคฺโค นวโม. नववा छन्नवग्ग समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याची उद्दान (अनुक्रमणिका) - ปโลกสุญฺญา สํขิตฺตํ, ฉนฺโน ปุณฺโณ จ พาหิโย; เอเชน จ ทุเว วุตฺตา, ทฺวเยหิ อปเร ทุเวติ. पलोक (पलोकसुत्त), सुञ्ञ (सुञ्ञलोकतथा सुत्त), संखित्त (संखित्तसुत्त), छन्न (छन्नसुत्त), पुण्ण (पुण्णसुत्त) आणि बाहिय (बाहियसुत्त); एजेन (तृष्णेसंबंधी) दोन सुत्ते आणि द्वयावर (दोन गोष्टींवर) आधारित इतर दोन सुत्ते सांगितली आहेत. ๑๐. สฬวคฺโค १०. सळवग्ग ๑. อทนฺตอคุตฺตสุตฺตํ १. अदन्त-अगुत्त सुत्त ๙๔. สาวตฺถินิทานํ[Pg.293]. ‘‘ฉยิเม, ภิกฺขเว, ผสฺสายตนา อทนฺตา อคุตฺตา อรกฺขิตา อสํวุตา ทุกฺขาธิวาหา โหนฺติ. กตเม ฉ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, ผสฺสายตนํ อทนฺตํ อคุตฺตํ อรกฺขิตํ อสํวุตํ ทุกฺขาธิวาหํ โหติ…เป… ชิวฺหา, ภิกฺขเว, ผสฺสายตนํ อทนฺตํ อคุตฺตํ อรกฺขิตํ อสํวุตํ ทุกฺขาธิวาหํ โหติ…เป… มโน, ภิกฺขเว, ผสฺสายตนํ อทนฺตํ อคุตฺตํ อรกฺขิตํ อสํวุตํ ทุกฺขาธิวาหํ โหติ. อิเม โข, ภิกฺขเว, ฉ ผสฺสายตนา อทนฺตา อคุตฺตา อรกฺขิตา อสํวุตา ทุกฺขาธิวาหา โหนฺติ’’. ९४. श्रावस्ती येथील निदान. 'हे भिक्खूहो, ही सहा स्पर्शायतने जर अदमित, अरक्षित, असुरक्षित आणि असंवृत राहिली, तर ती तीव्र दुःख वाहून आणणारी ठरतात. कोणती सहा? हे भिक्खूहो, चक्षु (डोळा) हे स्पर्शायतन जर अदमित, अरक्षित, असुरक्षित आणि असंवृत राहिले, तर ते तीव्र दुःख वाहून आणणारे ठरते... पे... जीभ हे स्पर्शायतन जर अदमित, अरक्षित, असुरक्षित आणि असंवृत राहिले, तर ते तीव्र दुःख वाहून आणणारे ठरते... पे... मन हे स्पर्शायतन जर अदमित, अरक्षित, असुरक्षित आणि असंवृत राहिले, तर ते तीव्र दुःख वाहून आणणारे ठरते. हे भिक्खूहो, ही सहा स्पर्शायतने जर अदमित, अरक्षित, असुरक्षित आणि असंवृत राहिली, तर ती तीव्र दुःख वाहून आणणारी ठरतात.' ‘‘ฉยิเม, ภิกฺขเว, ผสฺสายตนา สุทนฺตา สุคุตฺตา สุรกฺขิตา สุสํวุตา สุขาธิวาหา โหนฺติ. กตเม ฉ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, ผสฺสายตนํ สุทนฺตํ สุคุตฺตํ สุรกฺขิตํ สุสํวุตํ สุขาธิวาหํ โหติ…เป… ชิวฺหา, ภิกฺขเว, ผสฺสายตนํ สุทนฺตํ สุคุตฺตํ สุรกฺขิตํ สุสํวุตํ สุขาธิวาหํ โหติ…เป… มโน, ภิกฺขเว, ผสฺสายตนํ สุทนฺตํ สุคุตฺตํ สุรกฺขิตํ สุสํวุตํ สุขาธิวาหํ โหติ. อิเม โข, ภิกฺขเว, ฉ ผสฺสายตนา สุทนฺตา สุคุตฺตา สุรกฺขิตา สุสํวุตา สุขาธิวาหา โหนฺตี’’ติ. อิทมโวจ ภควา…เป… เอตทโวจ สตฺถา – 'हे भिक्खूहो, ही सहा स्पर्शायतने जर सुदमित, सुरक्षित, सुसंरक्षित आणि सुसंवृत राहिली, तर ती सुख वाहून आणणारी ठरतात. कोणती सहा? हे भिक्खूहो, चक्षु हे स्पर्शायतन जर सुदमित, सुरक्षित, सुसंरक्षित आणि सुसंवृत राहिले, तर ते सुख वाहून आणणारे ठरते... पे... जीभ हे स्पर्शायतन जर सुदमित, सुरक्षित, सुसंरक्षित आणि सुसंवृत राहिले, तर ते सुख वाहून आणणारे ठरते... पे... मन हे स्पर्शायतन जर सुदमित, सुरक्षित, सुसंरक्षित आणि सुसंवृत राहिले, तर ते सुख वाहून आणणारे ठरते. हे भिक्खूहो, ही सहा स्पर्शायतने जर सुदमित, सुरक्षित, सुसंरक्षित आणि सुसंवृत राहिली, तर ती सुख वाहून आणणारी ठरतात.' भगवान असे म्हणाले... पे... शास्त्यांनी पुढे असे म्हटले - ‘‘สเฬว ผสฺสายตนานิ ภิกฺขโว,อสํวุโต ยตฺถ ทุกฺขํ นิคจฺฉติ; เตสญฺจ เย สํวรณํ อเวทิสุํ,สทฺธาทุติยา วิหรนฺตานวสฺสุตา. हे भिक्खूहो, स्पर्शायतने केवळ सहाच आहेत, जिथे असंवृत मनुष्य दुःखाला प्राप्त होतो; परंतु ज्यांनी त्यांच्या संवराचा मार्ग जाणला आहे, ते श्रद्धेला सोबती बनवून, अनासक्त होऊन विहरतात. ‘‘ทิสฺวาน รูปานิ มโนรมานิ,อโถปิ ทิสฺวาน อมโนรมานิ; มโนรเม ราคปถํ วิโนทเย,น จาปฺปิยํ เมติ มนํ ปโทสเย. मनोरम रूपे पाहून, तसेच अमनोरम रूपे पाहूनही; मनोरम रूपांविषयीचा रागाचा मार्ग दूर करावा, आणि 'हे मला अप्रिय आहे' असे म्हणून मनाला दूषित करू नये. ‘‘สทฺทญฺจ สุตฺวา ทุภยํ ปิยาปฺปิยํ,ปิยมฺหิ สทฺเท น สมุจฺฉิโต สิยา; อโถปฺปิเย โทสคตํ วิโนทเย,น จาปฺปิยํ เมติ มนํ ปโทสเย. प्रिय आणि अप्रिय असे दोन्ही प्रकारचे शब्द ऐकून, प्रिय शब्दांमध्ये अति-आसक्त होऊ नये; तसेच अप्रिय शब्दांविषयीचा द्वेष दूर करावा, आणि 'हे मला अप्रिय आहे' असे म्हणून मनाला दूषित करू नये. ‘‘คนฺธญฺจ [Pg.294] ฆตฺวา สุรภึ มโนรมํ,อโถปิ ฆตฺวา อสุจึ อกนฺติยํ; อกนฺติยสฺมึ ปฏิฆํ วิโนทเย,ฉนฺทานุนีโต น จ กนฺติเย สิยา. सुगंधी व मनोरम गंध घेऊन, तसेच अशुद्ध व अप्रिय गंध घेऊनही; अप्रिय गंधाविषयीचा प्रतिघ दूर करावा, आणि प्रिय गंधाच्या इच्छेच्या आहारी जाऊ नये. ‘‘รสญฺจ โภตฺวาน อสาทิตญฺจ สาทุํ,อโถปิ โภตฺวาน อสาทุเมกทา; สาทุํ รสํ นาชฺโฌสาย ภุญฺเช,วิโรธมาสาทุสุ โนปทํสเย. स्वादिष्ट व मधुर रसाचे सेवन करून, तसेच कधीतरी अस्वादिष्ट रसाचे सेवन करूनही; मधुर रसाचा अति-आसक्तीने उपभोग घेऊ नये, आणि अस्वादिष्ट रसाविषयी विरोध दर्शवू नये. ‘‘ผสฺเสน ผุฏฺโฐ น สุเขน มชฺเช,ทุกฺเขน ผุฏฺโฐปิ น สมฺปเวเธ; ผสฺสทฺวยํ สุขทุกฺเข อุเปกฺเข,อนานุรุทฺโธ อวิรุทฺธ เกนจิ. सुखद स्पर्शाने स्पर्शित झाल्यावर उन्मत्त होऊ नये, आणि दुःखद स्पर्शाने स्पर्शित झाल्यावर कंपायमान होऊ नये; सुख आणि दुःख या दोन्ही स्पर्शांकडे उपेक्षेने पाहावे, कोणाशीही अनुनय किंवा विरोध न बाळगता. ‘‘ปปญฺจสญฺญา อิตรีตรา นรา,ปปญฺจยนฺตา อุปยนฺติ สญฺญิโน; มโนมยํ เคหสิตญฺจ สพฺพํ,ปนุชฺช เนกฺขมฺมสิตํ อิรียติ. प्रपंच-संज्ञेने युक्त असलेले सामान्य लोक, प्रपंच करत आसक्त होतात; परंतु गृहजीवनाशी संबंधित सर्व मनोमय विचारांचा त्याग करून, मनुष्य नैष्क्रम्यावर आधारित आचरण करतो. ‘‘เอวํ มโน ฉสฺสุ ยทา สุภาวิโต,ผุฏฺฐสฺส จิตฺตํ น วิกมฺปเต กฺวจิ; เต ราคโทเส อภิภุยฺย ภิกฺขโว,ภวตฺถ ชาติมรณสฺส ปารคา’’ติ. ปฐมํ; अशा प्रकारे जेव्हा मन या सहा आयतनांमध्ये चांगल्या प्रकारे भावित होते, तेव्हा कोणत्याही स्पर्शाने त्याचे चित्त कधीही विचलित होत नाही; हे भिक्खूहो, राग आणि द्वेषावर विजय मिळवून, तुम्ही जन्म-मरणाच्या पलीकडच्या तीरावर पोहोचणारे व्हा! पहिले (सुत्त समाप्त). ๒. มาลุกฺยปุตฺตสุตฺตํ २. मालुक्यपुत्त सुत्त ๙๕. อถ โข อายสฺมา มาลุกฺยปุตฺโต เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา มาลุกฺยปุตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน ธมฺมํ เทเสตุ, ยมหํ ภควโต ธมฺมํ สุตฺวา เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหเรยฺย’’นฺติ. ९५. त्यानंतर आयुष्यमान मालुक्यपुत्त जेथे भगवान होते तेथे गेले... पे... एका बाजूला बसल्यावर आयुष्यमान मालुक्यपुत्तांनी भगवंतांना असे म्हटले – 'भंते! जर भगवंतांनी मला संक्षेपात धम्म उपदेश केला तर बरे होईल, जेणेकरून भगवंतांकडून धम्म ऐकून मी एकांतात, अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहरू शकेन.' ‘‘เอตฺถ [Pg.295] ทานิ, มาลุกฺยปุตฺต, กึ ทหเร ภิกฺขู วกฺขาม! ยตฺร หิ นาม ตฺวํ, ภิกฺขุ, ชิณฺโณ วุทฺโธ มหลฺลโก อทฺธคโต วโยอนุปฺปตฺโต สํขิตฺเตน โอวาทํ ยาจสี’’ติ. "हे मालुक्यपुत्त, आता अशा वेळी मी तरुण भिक्खूंना काय सांगावे? जेव्हा तुझ्यासारखा वृद्ध, वयोवृद्ध, म्हातारा, आयुष्याचा मोठा टप्पा पार केलेला आणि अंतिम वयात पोहोचलेला भिक्खू मला संक्षेपात उपदेश मागत आहे!" ‘‘กิญฺจาปาหํ, ภนฺเต, ชิณฺโณ วุทฺโธ มหลฺลโก อทฺธคโต วโยอนุปฺปตฺโต. เทเสตุ เม, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน ธมฺมํ, เทเสตุ สุคโต สํขิตฺเตน ธมฺมํ, อปฺเปว นามาหํ ภควโต ภาสิตสฺส อตฺถํ อาชาเนยฺยํ. อปฺเปว นามาหํ ภควโต ภาสิตสฺส ทายาโท อสฺส’’นฺติ. "भन्ते, जरी मी वृद्ध, वयोवृद्ध, म्हातारा, आयुष्याचा मोठा टप्पा पार केलेला आणि अंतिम वयात पोहोचलेला असलो, तरीही भन्ते, भगवंतांनी मला संक्षेपात धम्म उपदेश करावा, सुगतांनी मला संक्षेपात धम्म उपदेश करावा. कदाचित मी भगवंतांच्या वचनाचा अर्थ समजून घेईन, कदाचित मी भगवंतांच्या वचनाचा वारसदार बनेन." ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, มาลุกฺยปุตฺต, เย เต จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อทิฏฺฐา อทิฏฺฐปุพฺพา, น จ ปสฺสสิ, น จ เต โหติ ปสฺเสยฺยนฺติ? อตฺถิ เต ตตฺถ ฉนฺโท วา ราโค วา เปมํ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "मालुक्यपुत्त, तुला काय वाटते? डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे जे रूप तू पाहिलेले नाहीस, पूर्वी कधीही पाहिलेले नाहीस, जे तू आता पाहत नाहीस आणि 'ते पाहावे' अशी इच्छाही तुला होत नाही; अशा रूपांविषयी तुझ्या मनात काही इच्छा (छंद), राग (आसक्ती) किंवा प्रेम (जिव्हाळा) उत्पन्न होतो का?" "नाही, भन्ते." ‘‘เย เต โสตวิญฺเญยฺยา สทฺทา อสฺสุตา อสฺสุตปุพฺพา, น จ สุณาสิ, น จ เต โหติ สุเณยฺยนฺติ? อตฺถิ เต ตตฺถ ฉนฺโท วา ราโค วา เปมํ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "कानांनी जाणता येण्याजोगे जे शब्द तू ऐकलेले नाहीत, पूर्वी कधीही ऐकलेले नाहीत, जे तू आता ऐकत नाहीस आणि 'ते ऐकावे' अशी इच्छाही तुला होत नाही; अशा शब्दांविषयी तुझ्या मनात काही इच्छा, राग किंवा प्रेम उत्पन्न होते का?" "नाही, भन्ते." ‘‘เย เต ฆานวิญฺเญยฺยา คนฺธา อฆายิตา อฆายิตปุพฺพา, น จ ฆายสิ, น จ เต โหติ ฆาเยยฺยนฺติ? อตฺถิ เต ตตฺถ ฉนฺโท วา ราโค วา เปมํ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "नाकाने जाणता येण्याजोगे जे गंध तू घेतलेले नाहीत, पूर्वी कधीही घेतलेले नाहीत, जे तू आता घेत नाहीस आणि 'ते घ्यावेत' अशी इच्छाही तुला होत नाही; अशा गंधांविषयी तुझ्या मनात काही इच्छा, राग किंवा प्रेम उत्पन्न होते का?" "नाही, भन्ते." ‘‘เย เต ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา อสายิตา อสายิตปุพฺพา, น จ สายสิ, น จ เต โหติ สาเยยฺยนฺติ? อตฺถิ เต ตตฺถ ฉนฺโท วา ราโค วา เปมํ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "जिभेने जाणता येण्याजोगे जे रस तू चाखलेले नाहीत, पूर्वी कधीही चाखलेले नाहीत, जे तू आता चाखत नाहीस आणि 'ते चाखावेत' अशी इच्छाही तुला होत नाही; अशा रसांविषयी तुझ्या मनात काही इच्छा, राग किंवा प्रेम उत्पन्न होते का?" "नाही, भन्ते." ‘‘เย เต กายวิญฺเญยฺยา โผฏฺฐพฺพา อสมฺผุฏฺฐา อสมฺผุฏฺฐปุพฺพา, น จ ผุสสิ, น จ เต โหติ ผุเสยฺยนฺติ? อตฺถิ เต ตตฺถ ฉนฺโท วา ราโค วา เปมํ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "शरीराने जाणता येण्याजोगे जे स्पर्श तू अनुभवलेले नाहीत, पूर्वी कधीही अनुभवलेले नाहीत, जे तू आता अनुभवत नाहीस आणि 'ते अनुभवावेत' अशी इच्छाही तुला होत नाही; अशा स्पर्शांविषयी तुझ्या मनात काही इच्छा, राग किंवा प्रेम उत्पन्न होते का?" "नाही, भन्ते." ‘‘เย เต มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อวิญฺญาตา อวิญฺญาตปุพฺพา, น จ วิชานาสิ, น จ เต โหติ วิชาเนยฺยนฺติ? อตฺถิ เต ตตฺถ ฉนฺโท วา ราโค วา เปมํ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "मनाने जाणता येण्याजोगे जे धम्म तू जाणलेले नाहीत, पूर्वी कधीही जाणलेले नाहीत, जे तू आता जाणत नाहीस आणि 'ते जाणावेत' अशी इच्छाही तुला होत नाही; अशा धम्मांविषयी तुझ्या मनात काही इच्छा, राग किंवा प्रेम उत्पन्न होते का?" "नाही, भन्ते." ‘‘เอตฺถ จ เต, มาลุกฺยปุตฺต, ทิฏฺฐสุตมุตวิญฺญาตพฺเพสุ ธมฺเมสุ ทิฏฺเฐ ทิฏฺฐมตฺตํ ภวิสฺสติ, สุเต สุตมตฺตํ ภวิสฺสติ, มุเต มุตมตฺตํ ภวิสฺสติ, วิญฺญาเต วิญฺญาตมตฺตํ ภวิสฺสติ. ยโต โข เต, มาลุกฺยปุตฺต, ทิฏฺฐสุตมุตวิญฺญาตพฺเพสุ ธมฺเมสุ ทิฏฺเฐ ทิฏฺฐมตฺตํ ภวิสฺสติ, สุเต สุตมตฺตํ ภวิสฺสติ[Pg.296], มุเต มุตมตฺตํ ภวิสฺสติ, วิญฺญาเต วิญฺญาตมตฺตํ ภวิสฺสติ; ตโต ตฺวํ, มาลุกฺยปุตฺต, น เตน. ยโต ตฺวํ, มาลุกฺยปุตฺต, น เตน; ตโต ตฺวํ, มาลุกฺยปุตฺต, น ตตฺถ. ยโต ตฺวํ, มาลุกฺยปุตฺต, น ตตฺถ; ตโต ตฺวํ, มาลุกฺยปุตฺต, เนวิธ, น หุรํ, น อุภยมนฺตเรน. เอเสวนฺโต ทุกฺขสฺสา’’ติ. "मालुक्यपुत्त, अशा प्रकारे पाहिलेल्या, ऐकलेल्या, स्पर्श केलेल्या आणि जाणलेल्या धम्मांच्या बाबतीत: जे पाहिले आहे त्यात केवळ पाहणेच असेल; जे ऐकले आहे त्यात केवळ ऐकणेच असेल; जे स्पर्श केले आहे त्यात केवळ स्पर्श करणेच असेल; जे जाणले आहे त्यात केवळ जाणणेच असेल. मालुक्यपुत्त, जेव्हा तुझ्यासाठी पाहिलेल्या, ऐकलेल्या, स्पर्श केलेल्या आणि जाणलेल्या धम्मांच्या बाबतीत: पाहिलेल्यात केवळ पाहणेच असेल, ऐकलेल्यात केवळ ऐकणेच असेल, स्पर्श केलेल्यात केवळ स्पर्श करणेच असेल, जाणलेल्यात केवळ जाणणेच असेल; तेव्हा, मालुक्यपुत्त, तू 'त्याद्वारे' प्रभावित होणार नाहीस. मालुक्यपुत्त, जेव्हा तू 'त्याद्वारे' प्रभावित होणार नाहीस, तेव्हा तू 'त्यात' अडकणार नाहीस. मालुक्यपुत्त, जेव्हा तू 'त्यात' अडकणार नाहीस, तेव्हा तू न इथे असशील, न तिथे असशील, न दोन्हीच्या मध्ये असशील. हाच दुःखाचा अंत आहे." ‘‘อิมสฺส ขฺวาหํ, ภนฺเต, ภควตา สํขิตฺเตน ภาสิตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานามิ – "भन्ते, भगवंतांनी संक्षेपात सांगितलेल्या या धम्मवचनाचा सविस्तर अर्थ मी अशा प्रकारे समजतो –" ‘‘รูปํ ทิสฺวา สติ มุฏฺฐา, ปิยํ นิมิตฺตํ มนสิ กโรโต; สารตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ อชฺโฌส ติฏฺฐติ. "एखादे रूप पाहून, स्मृती नष्ट झाल्यामुळे, जो केवळ प्रिय लक्षणावरच मन केंद्रित करतो; तो आसक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यातच अडकून राहतो." ‘‘ตสฺส วฑฺฒนฺติ เวทนา, อเนกา รูปสมฺภวา; อภิชฺฌา จ วิเหสา จ, จิตฺตมสฺสูปหญฺญติ; เอวํ อาจินโต ทุกฺขํ, อารา นิพฺพานมุจฺจติ. "त्या रूपापासून उत्पन्न होणाऱ्या अनेक प्रकारच्या वेदना त्याच्यामध्ये वाढत जातात; अभिज्झा आणि विहेसा यामुळे त्याचे चित्त व्याकुळ होते. अशा प्रकारे दुःखाचा संचय करणाऱ्या व्यक्तीपासून निर्वाण दूर आहे, असे म्हटले जाते." ‘‘สทฺทํ สุตฺวา สติ มุฏฺฐา, ปิยํ นิมิตฺตํ มนสิ กโรโต; สารตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ อชฺโฌส ติฏฺฐติ. "एखादा शब्द ऐकून, स्मृती नष्ट झाल्यामुळे, जो केवळ प्रिय लक्षणावरच मन केंद्रित करतो; तो आसक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यातच अडकून राहतो." ‘‘ตสฺส วฑฺฒนฺติ เวทนา, อเนกา สทฺทสมฺภวา; อภิชฺฌา จ วิเหสา จ, จิตฺตมสฺสูปหญฺญติ; เอวํ อาจินโต ทุกฺขํ, อารา นิพฺพานมุจฺจติ. "त्या शब्दापासून उत्पन्न होणाऱ्या अनेक प्रकारच्या वेदना त्याच्यामध्ये वाढत जातात; अभिज्झा आणि विहेसा यामुळे त्याचे चित्त व्याकुळ होते. अशा प्रकारे दुःखाचा संचय करणाऱ्या व्यक्तीपासून निर्वाण दूर आहे, असे म्हटले जाते." ‘‘คนฺธํ ฆตฺวา สติ มุฏฺฐา, ปิยํ นิมิตฺตํ มนสิ กโรโต; สารตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ อชฺโฌส ติฏฺฐติ. "एखादा गंध घेऊन, स्मृती नष्ट झाल्यामुळे, जो केवळ प्रिय लक्षणावरच मन केंद्रित करतो; तो आसक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यातच अडकून राहतो." ‘‘ตสฺส วฑฺฒนฺติ เวทนา, อเนกา คนฺธสมฺภวา; อภิชฺฌา จ วิเหสา จ, จิตฺตมสฺสูปหญฺญติ; เอวํ อาจินโต ทุกฺขํ, อารา นิพฺพานมุจฺจติ. "त्या गंधापासून उत्पन्न होणाऱ्या अनेक प्रकारच्या वेदना त्याच्यामध्ये वाढत जातात; अभिज्झा आणि विहेसा यामुळे त्याचे चित्त व्याकुळ होते. अशा प्रकारे दुःखाचा संचय करणाऱ्या व्यक्तीपासून निर्वाण दूर आहे, असे म्हटले जाते." ‘‘รสํ โภตฺวา สติ มุฏฺฐา, ปิยํ นิมิตฺตํ มนสิ กโรโต; สารตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ อชฺโฌส ติฏฺฐติ. "एखादा रस चाखून, स्मृती नष्ट झाल्यामुळे, जो केवळ प्रिय लक्षणावरच मन केंद्रित करतो; तो आसक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यातच अडकून राहतो." ‘‘ตสฺส วฑฺฒนฺติ เวทนา, อเนกา รสสมฺภวา; อภิชฺฌา จ วิเหสา จ, จิตฺตมสฺสูปหญฺญติ; เอวํ อาจินโต ทุกฺขํ, อารา นิพฺพานมุจฺจติ. "त्या रसापासून उत्पन्न होणाऱ्या अनेक प्रकारच्या वेदना त्याच्यामध्ये वाढत जातात; अभिज्झा आणि विहेसा यामुळे त्याचे चित्त व्याकुळ होते. अशा प्रकारे दुःखाचा संचय करणाऱ्या व्यक्तीपासून निर्वाण दूर आहे, असे म्हटले जाते." ‘‘ผสฺสํ [Pg.297] ผุสฺส สติ มุฏฺฐา, ปิยํ นิมิตฺตํ มนสิ กโรโต; สารตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ อชฺโฌส ติฏฺฐติ. "एखादा स्पर्श अनुभवून, स्मृती नष्ट झाल्यामुळे, जो केवळ प्रिय लक्षणावरच मन केंद्रित करतो; तो आसक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यातच अडकून राहतो." ‘‘ตสฺส วฑฺฒนฺติ เวทนา, อเนกา ผสฺสสมฺภวา; อภิชฺฌา จ วิเหสา จ, จิตฺตมสฺสูปหญฺญติ; เอวํ อาจินโต ทุกฺขํ, อารา นิพฺพานมุจฺจติ. "त्या स्पर्शापासून उत्पन्न होणाऱ्या अनेक प्रकारच्या वेदना त्याच्यामध्ये वाढत जातात; अभिज्झा आणि विहेसा यामुळे त्याचे चित्त व्याकुळ होते. अशा प्रकारे दुःखाचा संचय करणाऱ्या व्यक्तीपासून निर्वाण दूर आहे, असे म्हटले जाते." ‘‘ธมฺมํ ญตฺวา สติ มุฏฺฐา, ปิยํ นิมิตฺตํ มนสิ กโรโต; สารตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ อชฺโฌส ติฏฺฐติ. "एखादा धम्म जाणून, स्मृती नष्ट झाल्यामुळे, जो केवळ प्रिय लक्षणावरच मन केंद्रित करतो; तो आसक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यातच अडकून राहतो." ‘‘ตสฺส วฑฺฒนฺติ เวทนา, อเนกา ธมฺมสมฺภวา; อภิชฺฌา จ วิเหสา จ, จิตฺตมสฺสูปหญฺญติ; เอวํ อาจินโต ทุกฺขํ, อารา นิพฺพานมุจฺจติ. "त्या धम्मापासून उत्पन्न होणाऱ्या अनेक प्रकारच्या वेदना त्याच्यामध्ये वाढत जातात; अभिज्झा आणि विहेसा यामुळे त्याचे चित्त व्याकुळ होते. अशा प्रकारे दुःखाचा संचय करणाऱ्या व्यक्तीपासून निर्वाण दूर आहे, असे म्हटले जाते." ‘‘น โส รชฺชติ รูเปสุ, รูปํ ทิสฺวา ปฏิสฺสโต; วิรตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ นาชฺโฌส ติฏฺฐติ. "तो रूपांमध्ये आसक्त होत नाही. रूप पाहून जो जागरूक राहतो, तो विरक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यात अडकून राहत नाही." ‘‘ยถาสฺส ปสฺสโต รูปํ, เสวโต จาปิ เวทนํ; ขียติ โนปจียติ, เอวํ โส จรตี สโต; เอวํ อปจินโต ทุกฺขํ, สนฺติเก นิพฺพานมุจฺจติ. "ज्या प्रकारे रूप पाहताना आणि वेदनेचा अनुभव घेताना त्याचे दुःख क्षीण होते, वाढत नाही; अशा प्रकारे तो जागरूक राहून आचरण करतो. अशा प्रकारे दुःखाचा क्षय करणाऱ्या व्यक्तीच्या जवळ निर्वाण आहे, असे म्हटले जाते." ‘‘น โส รชฺชติ สทฺเทสุ, สทฺทํ สุตฺวา ปฏิสฺสโต; วิรตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ นาชฺโฌส ติฏฺฐติ. "तो शब्दांमध्ये आसक्त होत नाही. शब्द ऐकून जो जागरूक राहतो, तो विरक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यात अडकून राहत नाही." ‘‘ยถาสฺส สุณโต สทฺทํ, เสวโต จาปิ เวทนํ; ขียติ โนปจียติ, เอวํ โส จรตี สโต; เอวํ อปจินโต ทุกฺขํ, สนฺติเก นิพฺพานมุจฺจติ. "ज्या प्रकारे शब्द ऐकताना आणि वेदनेचा अनुभव घेताना त्याचे दुःख क्षीण होते, वाढत नाही; अशा प्रकारे तो जागरूक राहून आचरण करतो. अशा प्रकारे दुःखाचा क्षय करणाऱ्या व्यक्तीच्या जवळ निर्वाण आहे, असे म्हटले जाते." ‘‘น โส รชฺชติ คนฺเธสุ, คนฺธํ ฆตฺวา ปฏิสฺสโต; วิรตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ นาชฺโฌส ติฏฺฐติ. "तो गंधांमध्ये आसक्त होत नाही. गंध घेऊन जो जागरूक राहतो, तो विरक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यात अडकून राहत नाही." ‘‘ยถาสฺส ฆายโต คนฺธํ, เสวโต จาปิ เวทนํ; ขียติ โนปจียติ, เอวํ โส จรตี สโต; เอวํ อปจินโต ทุกฺขํ, สนฺติเก นิพฺพานมุจฺจติ. "ज्या प्रकारे गंध घेताना आणि वेदनेचा अनुभव घेताना त्याचे दुःख क्षीण होते, वाढत नाही; अशा प्रकारे तो जागरूक राहून आचरण करतो. अशा प्रकारे दुःखाचा क्षय करणाऱ्या व्यक्तीच्या जवळ निर्वाण आहे, असे म्हटले जाते." ‘‘น โส รชฺชติ รเสสุ, รสํ โภตฺวา ปฏิสฺสโต; วิรตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ นาชฺโฌส ติฏฺฐติ. "तो रसांमध्ये आसक्त होत नाही. रस चाखून जो जागरूक राहतो, तो विरक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यात अडकून राहत नाही." ‘‘ยถาสฺส [Pg.298] สายโต รสํ, เสวโต จาปิ เวทนํ; ขียติ โนปจียติ, เอวํ โส จรตี สโต; เอวํ อปจินโต ทุกฺขํ, สนฺติเก นิพฺพานมุจฺจติ. "ज्या प्रकारे रस चाखताना आणि वेदनेचा अनुभव घेताना त्याचे दुःख क्षीण होते, वाढत नाही; अशा प्रकारे तो जागरूक राहून आचरण करतो. अशा प्रकारे दुःखाचा क्षय करणाऱ्या व्यक्तीच्या जवळ निर्वाण आहे, असे म्हटले जाते." ‘‘น โส รชฺชติ ผสฺเสสุ, ผสฺสํ ผุสฺส ปฏิสฺสโต; วิรตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ นาชฺโฌส ติฏฺฐติ. "तो स्पर्शांमध्ये आसक्त होत नाही. स्पर्श अनुभवून जो जागरूक राहतो, तो विरक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यात अडकून राहत नाही." ‘‘ยถาสฺส ผุสโต ผสฺสํ, เสวโต จาปิ เวทนํ; ขียติ โนปจียติ, เอวํ โส จรตี สโต; เอวํ อปจินโต ทุกฺขํ, สนฺติเก นิพฺพานมุจฺจติ. “ज्या प्रकारे स्पर्शाचा अनुभव घेताना आणि वेदनेचे सेवन करताना त्या व्यक्तीचे दुःख क्षीण होते, वाढत नाही; अशा प्रकारे तो स्मृतिमान होऊन जगतो. अशा प्रकारे दुःखाचा क्षय करणाऱ्या व्यक्तीसाठी निर्वाण जवळच आहे असे म्हटले जाते.” ‘‘น โส รชฺชติ ธมฺเมสุ, ธมฺมํ ญตฺวา ปฏิสฺสโต; วิรตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ นาชฺโฌส ติฏฺฐติ. “तो धम्मांना जाणून स्मृतिमान राहतो आणि धम्मांमध्ये आसक्त होत नाही. विरक्त चित्ताने तो वेदना अनुभवतो आणि त्यात गुंतून राहत नाही.” ‘‘ยถาสฺส ชานโต ธมฺมํ, เสวโต จาปิ เวทนํ; ขียติ โนปจียติ, เอวํ โส จรตี สโต; เอวํ อปจินโต ทุกฺขํ, สนฺติเก นิพฺพานมุจฺจตี’’ติ. “ज्या प्रकारे धम्माला जाणताना आणि वेदनेचे सेवन करताना त्या व्यक्तीचे दुःख क्षीण होते, वाढत नाही; अशा प्रकारे तो स्मृतिमान होऊन जगतो. अशा प्रकारे दुःखाचा क्षय करणाऱ्या व्यक्तीसाठी निर्वाण जवळच आहे असे म्हटले जाते.” ‘‘อิมสฺส ขฺวาหํ, ภนฺเต, ภควตา สํขิตฺเตน ภาสิตสฺส เอวํ วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานามี’’ติ. ‘‘สาธุ สาธุ, มาลุกฺยปุตฺต! สาธุ โข ตฺวํ, มาลุกฺยปุตฺต, มยา สํขิตฺเตน ภาสิตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานาสิ – “भंते, भगवंतांनी संक्षेपात सांगितलेल्या या उपदेशाचा अर्थ मी अशा प्रकारे सविस्तरपणे समजतो.” “साधू, साधू, मालुक्यपुत्त! मालुक्यपुत्त, मी संक्षेपात सांगितलेल्या उपदेशाचा अर्थ तू सविस्तरपणे चांगल्या प्रकारे समजलास –” ‘‘รูปํ ทิสฺวา สติ มุฏฺฐา, ปิยํ นิมิตฺตํ มนสิ กโรโต; สารตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ อชฺโฌส ติฏฺฐติ. “रूप पाहून, प्रिय निमित्ताचे मनन करणाऱ्या व्यक्तीची स्मृती नष्ट होते; तो अत्यंत आसक्त चित्ताने वेदना अनुभवतो आणि त्यातच गुंतून राहतो.” ‘‘ตสฺส วฑฺฒนฺติ เวทนา, อเนกา รูปสมฺภวา; อภิชฺฌา จ วิเหสา จ, จิตฺตมสฺสูปหญฺญติ; เอวํ อาจินโต ทุกฺขํ, อารา นิพฺพานมุจฺจติ.…เป…. “त्याच्या ठिकाणी रूपापासून उत्पन्न होणाऱ्या अनेक वेदना वाढतात; अभिज्झा (लोभ) आणि विहेसा (हिंसा/पीडा) यामुळे त्याचे चित्त दूषित होते. अशा प्रकारे दुःखाचा संचय करणाऱ्या व्यक्तीसाठी निर्वाण दूर आहे असे म्हटले जाते... इ.” ‘‘น โส รชฺชติ ธมฺเมสุ, ธมฺมํ ญตฺวา ปฏิสฺสโต; วิรตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ นาชฺโฌส ติฏฺฐติ. “तो धम्मांना जाणून स्मृतिमान राहतो आणि धम्मांमध्ये आसक्त होत नाही. विरक्त चित्ताने तो वेदना अनुभवतो आणि त्यात गुंतून राहत नाही.” ‘‘ยถาสฺส วิชานโต ธมฺมํ, เสวโต จาปิ เวทนํ; ขียติ โนปจียติ, เอวํ โส จรตี สโต; เอวํ อปจินโต ทุกฺขํ, สนฺติเก นิพฺพานมุจฺจตี’’ติ. “ज्या प्रकारे धम्माला विशेष रूपाने जाणताना आणि वेदनेचे सेवन करताना त्या व्यक्तीचे दुःख क्षीण होते, वाढत नाही; अशा प्रकारे तो स्मृतिमान होऊन जगतो. अशा प्रकारे दुःखाचा क्षय करणाऱ्या व्यक्तीसाठी निर्वाण जवळच आहे असे म्हटले जाते.” ‘‘อิมสฺส โข, มาลุกฺยปุตฺต, มยา สํขิตฺเตน ภาสิตสฺส เอวํ วิตฺถาเรน อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ’’ติ. “मालुक्यपुत्त, माझ्याद्वारे संक्षेपात सांगितलेल्या या उपदेशाचा अर्थ अशा प्रकारे सविस्तरपणे समजून घेतला पाहिजे.” อถ [Pg.299] โข อายสฺมา มาลุกฺยปุตฺโต ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. อถ โข อายสฺมา มาลุกฺยปุตฺโต เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรนฺโต นจิรสฺเสว – ยสฺสตฺถาย กุลปุตฺตา สมฺมเทว อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชนฺติ ตทนุตฺตรํ พฺรหฺมจริยปริโยสานํ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหาสิ. ‘‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’’ติ อพฺภญฺญาสิ. อญฺญตโร จ ปนายสฺมา มาลุกฺยปุตฺโต อรหตํ อโหสีติ. ทุติยํ. त्यानंतर आयुष्यमान मालुक्यपुत्त भगवंतांच्या भाषणाचे अभिनंदन करून व आनंद व्यक्त करून आसनावरून उठले, भगवंतांना अभिवादन केले आणि प्रदक्षिणा घालून निघून गेले. त्यानंतर आयुष्यमान मालुक्यपुत्त एकांतात, विलग राहून, अप्रमादी, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करू लागले. ज्या ध्येयासाठी कुलपुत्र योग्य प्रकारे घराचा त्याग करून अनगारिक प्रव्रज्या ग्रहण करतात, ते ब्रह्मचर्याचे सर्वश्रेष्ठ अंतिम ध्येय त्यांनी लवकरच याच जन्मात स्वतःच्या अभिज्ञाने साक्षात करून प्राप्त केले. “जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर पुन्हा जन्म नाही,” असे त्यांनी प्रत्यक्ष जाणले. आणि आयुष्यमान मालुक्यपुत्त अर्हतांपैकी एक झाले. दुसरे (सुत्त समाप्त). ๓. ปริหานธมฺมสุตฺตํ ३. परिहानधम्मसुत्त ๙๖. ‘‘ปริหานธมฺมญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อปริหานธมฺมญฺจ ฉ จ อภิภายตนานิ. ตํ สุณาถ. กถญฺจ, ภิกฺขเว, ปริหานธมฺโม โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อธิวาเสติ นปฺปชหติ น วิโนเทติ น พฺยนฺตีกโรติ น อนภาวํ คเมติ, เวทิตพฺพเมตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนา – ‘ปริหายามิ กุสเลหิ ธมฺเมหิ’. ปริหานญฺเหตํ วุตฺตํ ภควตาติ…เป…. ९६. “भिक्खूहो, मी तुम्हांला ऱ्हास होण्याचा स्वभाव असलेला धम्म (परिहानधम्म), ऱ्हास न होण्याचा स्वभाव असलेला धम्म (अपरिहानधम्म) आणि सहा अभिभायतने उपदेशीन. ते लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, ऱ्हास होण्याचा स्वभाव कसा असतो? भिक्खूहो, या शासनात जेव्हा एखादा भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहतो, तेव्हा त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल, आसक्ती निर्माण करणारे आणि संयोजनांना कारणीभूत ठरणारे विचार उत्पन्न होतात. जर तो भिक्खू त्यांचा स्वीकार करतो, त्यांचा त्याग करत नाही, त्यांचे निवारण करत नाही, त्यांचा अंत करत नाही आणि त्यांना पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्थितीला पोहोचवत नाही, तर भिक्खूहो, त्या भिक्खूने हे समजून घेतले पाहिजे की—‘मी कुशल धम्मांपासून घसरत आहे.’ कारण भगवंतांनी यालाच ‘ऱ्हास’ म्हटले आहे... इ.” ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา อุปฺปชฺชนฺติ…เป… ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อธิวาเสติ นปฺปชหติ น วิโนเทติ น พฺยนฺตีกโรติ น อนภาวํ คเมติ, เวทิตพฺพเมตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนา – ‘ปริหายามิ กุสเลหิ ธมฺเมหิ’. ปริหานญฺเหตํ วุตฺตํ ภควตาติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ปริหานธมฺโม โหติ. “पुन्हा दुसरे असे की, भिक्खूहो, जेव्हा भिक्खू जिभेने रसाची चव घेतो, तेव्हा... इ... पुन्हा दुसरे असे की, भिक्खूहो, जेव्हा भिक्खू मनाने धम्माला जाणून घेतो, तेव्हा त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल, आसक्ती निर्माण करणारे आणि संयोजनांना कारणीभूत ठरणारे विचार उत्पन्न होतात. जर तो भिक्खू त्यांचा स्वीकार करतो, त्यांचा त्याग करत नाही, त्यांचे निवारण करत नाही, त्यांचा अंत करत नाही आणि त्यांना पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्थितीला पोहोचवत नाही, तर भिक्खूहो, त्या भिक्खूने हे समजून घेतले पाहिजे की—‘मी कुशल धम्मांपासून घसरत आहे.’ कारण भगवंतांनी यालाच ‘ऱ्हास’ म्हटले आहे. भिक्खूहो, अशा प्रकारे ऱ्हास होण्याचा स्वभाव असतो.” ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, อปริหานธมฺโม โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาธิวาเสติ ปชหติ วิโนเทติ พฺยนฺตีกโรติ อนภาวํ คเมติ, เวทิตพฺพเมตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนา – ‘น ปริหายามิ กุสเลหิ ธมฺเมหิ’. อปริหานญฺเหตํ วุตฺตํ ภควตาติ…เป…. “आणि भिक्खूहो, ऱ्हास न होण्याचा स्वभाव कसा असतो? भिक्खूहो, या शासनात जेव्हा एखादा भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहतो, तेव्हा त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल, आसक्ती निर्माण करणारे आणि संयोजनांना कारणीभूत ठरणारे विचार उत्पन्न होतात. जर तो भिक्खू त्यांचा स्वीकार करत नाही, त्यांचा त्याग करतो, त्यांचे निवारण करतो, त्यांचा अंत करतो आणि त्यांना पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्थितीला पोहोचवतो, तर भिक्खूहो, त्या भिक्खूने हे समजून घेतले पाहिजे की—‘मी कुशल धम्मांपासून घसरत नाही.’ कारण भगवंतांनी यालाच ‘ऱ्हास न होणे’ म्हटले आहे... इ.” ‘‘ปุน [Pg.300] จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา อุปฺปชฺชนฺติ…เป… ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาธิวาเสติ ปชหติ วิโนเทติ พฺยนฺตีกโรติ อนภาวํ คเมติ, เวทิตพฺพเมตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนา – ‘น ปริหายามิ กุสเลหิ ธมฺเมหิ’. อปริหานญฺเหตํ วุตฺตํ ภควตาติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, อปริหานธมฺโม โหติ. “पुन्हा दुसरे असे की, भिक्खूहो, जेव्हा भिक्खू जिभेने रसाची चव घेतो, तेव्हा... इ... पुन्हा दुसरे असे की, भिक्खूहो, जेव्हा भिक्खू मनाने धम्माला जाणून घेतो, तेव्हा त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल, आसक्ती निर्माण करणारे आणि संयोजनांना कारणीभूत ठरणारे विचार उत्पन्न होतात. जर तो भिक्खू त्यांचा स्वीकार करत नाही, त्यांचा त्याग करतो, त्यांचे निवारण करतो, त्यांचा अंत करतो आणि त्यांना पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्थितीला पोहोचवतो, तर भिक्खूहो, त्या भिक्खूने हे समजून घेतले पाहिजे की—‘मी कुशल धम्मांपासून घसरत नाही.’ कारण भगवंतांनी यालाच ‘ऱ्हास न होणे’ म्हटले आहे. भिक्खूहो, अशा प्रकारे ऱ्हास न होण्याचा स्वभाव असतो.” ‘‘กตมานิ จ, ภิกฺขเว, ฉ อภิภายตนานิ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา นุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. เวทิตพฺพเมตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนา – ‘อภิภูตเมตํ อายตนํ’. อภิภายตนญฺเหตํ วุตฺตํ ภควตาติ…เป… ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย นุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. เวทิตพฺพเมตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนา – ‘อภิภูตเมตํ อายตนํ’. อภิภายตนญฺเหตํ วุตฺตํ ภควตาติ. อิมานิ วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, ฉ อภิภายตนานี’’ติ. ตติยํ. “आणि भिक्खूहो, ती सहा अभिभायतने कोणती आहेत? भिक्खूहो, या शासनात जेव्हा एखादा भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहतो, तेव्हा त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल, आसक्ती निर्माण करणारे आणि संयोजनांना कारणीभूत ठरणारे विचार उत्पन्न होत नाहीत. भिक्खूहो, त्या भिक्खूने हे समजून घेतले पाहिजे की—‘हे आयतन माझ्याद्वारे जिंकले गेले आहे.’ कारण भगवंतांनी यालाच ‘अभिभायतन’ म्हटले आहे... इ... पुन्हा दुसरे असे की, भिक्खूहो, जेव्हा भिक्खू मनाने धम्माला जाणून घेतो, तेव्हा त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल, आसक्ती निर्माण करणारे आणि संयोजनांना कारणीभूत ठरणारे विचार उत्पन्न होत नाहीत. भिक्खूहो, त्या भिक्खूने हे समजून घेतले पाहिजे की—‘हे आयतन माझ्याद्वारे जिंकले गेले आहे.’ कारण भगवंतांनी यालाच ‘अभिभायतन’ म्हटले आहे. भिक्खूहो, यांनाच ‘सहा अभिभायतने’ असे म्हटले जाते. तिसरे (सुत्त समाप्त).” ๔. ปมาทวิหารีสุตฺตํ ४. पमादविहारीसुत्त ๙๗. ‘‘ปมาทวิหาริญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อปฺปมาทวิหาริญฺจ. ตํ สุณาถ. กถญฺจ, ภิกฺขเว, ปมาทวิหารี โหติ? จกฺขุนฺทฺริยํ อสํวุตสฺส, ภิกฺขเว, วิหรโต จิตฺตํ พฺยาสิญฺจติ. จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ ตสฺส พฺยาสิตฺตจิตฺตสฺส ปาโมชฺชํ น โหติ. ปาโมชฺเช อสติ ปีติ น โหติ. ปีติยา อสติ ปสฺสทฺธิ น โหติ. ปสฺสทฺธิยา อสติ ทุกฺขํ โหติ. ทุกฺขิโน จิตฺตํ น สมาธิยติ. อสมาหิเต จิตฺเต ธมฺมา น ปาตุภวนฺติ. ธมฺมานํ อปาตุภาวา ปมาทวิหารี ตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ…เป… ชิวฺหินฺทฺริยํ อสํวุตสฺส, ภิกฺขเว, วิหรโต จิตฺตํ พฺยาสิญฺจติ ชิวฺหาวิญฺเญยฺเยสุ รเสสุ, ตสฺส พฺยาสิตฺตจิตฺตสฺส…เป… ปมาทวิหารี ตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ…เป… มนินฺทฺริยํ อสํวุตสฺส, ภิกฺขเว, วิหรโต จิตฺตํ พฺยาสิญฺจติ มโนวิญฺเญยฺเยสุ ธมฺเมสุ, ตสฺส พฺยาสิตฺตจิตฺตสฺส ปาโมชฺชํ น โหติ. ปาโมชฺเช อสติ ปีติ น โหติ. ปีติยา อสติ ปสฺสทฺธิ น โหติ. ปสฺสทฺธิยา อสติ ทุกฺขํ โหติ. ทุกฺขิโน จิตฺตํ น สมาธิยติ. อสมาหิเต จิตฺเต ธมฺมา น ปาตุภวนฺติ[Pg.301]. ธมฺมานํ อปาตุภาวา ปมาทวิหารี ตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ปมาทวิหารี โหติ. ९७. भिक्षूंनो, मी तुम्हांला प्रमादविहारी (मळमळीतपणे किंवा मूर्च्छितपणे जगणारा) आणि अप्रमादविहारी (जागरूकपणे जगणारा) यांविषयी उपदेश करीन. ते लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्षूंनो, मनुष्य प्रमादविहारी कसा होतो? भिक्षूंनो, चक्षुरिंद्रियावर संयम न ठेवता विहरणाऱ्याचे चित्त चक्षूने जाणता येणाऱ्या रूपांमध्ये क्लेशांनी माखते. त्याचे चित्त क्लेशांनी माखल्यामुळे त्याला प्रमोद (आनंद) लाभत नाही. प्रमोद नसताना प्रीती लाभत नाही. प्रीती नसताना प्रस्सद्धी (शांतता) लाभत नाही. प्रस्सद्धी नसताना दुःख होते. दुःखी माणसाचे चित्त समाहित (एकाग्र) होत नाही. चित्त समाहित नसताना धर्म प्रकट होत नाहीत. धर्म प्रकट न झाल्यामुळे त्याला 'प्रमादविहारी' असेच म्हटले जाते. ...पे... भिक्षूंनो, जिव्हेरेंद्रियावर संयम न ठेवता विहरणाऱ्याचे चित्त जिव्हेने जाणता येणाऱ्या रसांमध्ये क्लेशांनी माखते...पे... त्याला 'प्रमादविहारी' असेच म्हटले जाते. ...पे... भिक्षूंनो, मनेंद्रियावर संयम न ठेवता विहरणाऱ्याचे चित्त मनाने जाणता येणाऱ्या धर्मांमध्ये क्लेशांनी माखते. त्याचे चित्त क्लेशांनी माखल्यामुळे त्याला प्रमोद लाभत नाही. प्रमोद नसताना प्रीती लाभत नाही. प्रीती नसताना प्रस्सद्धी लाभत नाही. प्रस्सद्धी नसताना दुःख होते. दुःखी माणसाचे चित्त समाहित होत नाही. चित्त समाहित नसताना धर्म प्रकट होत नाहीत. धर्म प्रकट न झाल्यामुळे त्याला 'प्रमादविहारी' असेच म्हटले जाते. भिक्षूंनो, अशा प्रकारे मनुष्य प्रमादविहारी होतो. ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, อปฺปมาทวิหารี โหติ? จกฺขุนฺทฺริยํ สํวุตสฺส, ภิกฺขเว, วิหรโต จิตฺตํ น พฺยาสิญฺจติ จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ, ตสฺส อพฺยาสิตฺตจิตฺตสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ. ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ. ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. ปสฺสทฺธกาโย สุขํ วิหรติ. สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. สมาหิเต จิตฺเต ธมฺมา ปาตุภวนฺติ. ธมฺมานํ ปาตุภาวา อปฺปมาทวิหารี ตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ…เป… ชิวฺหินฺทฺริยํ สํวุตสฺส, ภิกฺขเว, วิหรโต จิตฺตํ น พฺยาสิญฺจติ…เป… อปฺปมาทวิหารี ตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ. มนินฺทฺริยํ สํวุตสฺส, ภิกฺขเว, วิหรโต จิตฺตํ น พฺยาสิญฺจติ, มโนวิญฺเญยฺเยสุ ธมฺเมสุ, ตสฺส อพฺยาสิตฺตจิตฺตสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ. ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ. ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. ปสฺสทฺธกาโย สุขํ วิหรติ. สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. สมาหิเต จิตฺเต ธมฺมา ปาตุภวนฺติ. ธมฺมานํ ปาตุภาวา อปฺปมาทวิหารี ตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, อปฺปมาทวิหารี โหตี’’ติ. จตุตฺถํ. आणि भिक्षूंनो, मनुष्य अप्रमादविहारी कसा होतो? भिक्षूंनो, चक्षुरिंद्रियावर संयम ठेवून विहरणाऱ्याचे चित्त चक्षूने जाणता येणाऱ्या रूपांमध्ये क्लेशांनी माखत नाही. ज्याचे चित्त क्लेशांनी माखलेले नसते, त्याला प्रमोद उत्पन्न होतो. प्रमोद लाभलेल्याला प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मनाच्या माणसाची काया शांत होते. शांत काया असलेला मनुष्य सुखाने विहरतो. सुखी माणसाचे चित्त समाहित होते. चित्त समाहित असताना धर्म प्रकट होतात. धर्म प्रकट झाल्यामुळे त्याला 'अप्रमादविहारी' असेच म्हटले जाते. ...पे... भिक्षूंनो, जिव्हेरेंद्रियावर संयम ठेवून विहरणाऱ्याचे चित्त क्लेशांनी माखत नाही...पे... त्याला 'अप्रमादविहारी' असेच म्हटले जाते. भिक्षूंनो, मनेंद्रियावर संयम ठेवून विहरणाऱ्याचे चित्त मनाने जाणता येणाऱ्या धर्मांमध्ये क्लेशांनी माखत नाही. ज्याचे चित्त क्लेशांनी माखलेले नसते, त्याला प्रमोद उत्पन्न होतो. प्रमोद लाभलेल्याला प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मनाच्या माणसाची काया शांत होते. शांत काया असलेला मनुष्य सुखाने विहरतो. सुखी माणसाचे चित्त समाहित होते. चित्त समाहित असताना धर्म प्रकट होतात. धर्म प्रकट झाल्यामुळे त्याला 'अप्रमादविहारी' असेच म्हटले जाते. भिक्षूंनो, अशा प्रकारे मनुष्य अप्रमादविहारी होतो. चौथे. ๕. สํวรสุตฺตํ ५. संवरसुत्त (संयम सुत्त) ๙๘. ‘‘สํวรญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ, อสํวรญฺจ. ตํ สุณาถ. กถญฺจ, ภิกฺขเว, อสํวโร โหติ? สนฺติ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ, เวทิตพฺพเมตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนา – ‘ปริหายามิ กุสเลหิ ธมฺเมหิ’. ปริหานญฺเหตํ วุตฺตํ ภควตาติ…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ, เวทิตพฺพเมตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนา – ‘ปริหายามิ กุสเลหิ ธมฺเมหิ’. ปริหานญฺเหตํ วุตฺตํ ภควตาติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, อสํวโร โหติ. ९८. भिक्षूंनो, मी तुम्हांला संवर (संयम) आणि असंवर (असंयम) यांविषयी उपदेश करीन. ते लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्षूंनो, असंवर कसा होतो? भिक्षूंनो, चक्षूने जाणता येणारी अशी रूपे आहेत जी इष्ट (इच्छित), कांत (मनोहर), मनाप (मनोरम), प्रियरूप (प्रिय वाटणारी), कामोपसंहित (कामोत्तेजक) आणि रजनीय (राग उत्पन्न करणारी) असतात. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यात आसक्त होऊन राहतो, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूने हे जाणावे की—'मी कुशल धर्मांपासून घसरत आहे.' कारण भगवंतांनी यालाच 'ऱ्हास' असे म्हटले आहे. ...पे... भिक्षूंनो, जिव्हेने जाणता येणारे असे रस आहेत...पे... भिक्षूंनो, मनाने जाणता येणारे असे धर्म आहेत जे इष्ट, कांत, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित आणि रजनीय असतात. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यात आसक्त होऊन राहतो, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूने हे जाणावे की—'मी कुशल धर्मांपासून घसरत आहे.' कारण भगवंतांनी यालाच 'ऱ्हास' असे म्हटले आहे. भिक्षूंनो, अशा प्रकारे असंवर होतो. ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, สํวโร โหติ? สนฺติ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ, เวทิตพฺพเมตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนา – ‘น ปริหายามิ กุสเลหิ ธมฺเมหิ’. อปริหานญฺเหตํ วุตฺตํ ภควตาติ [Pg.302] …เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ, เวทิตพฺพเมตํ ภิกฺขุนา – ‘น ปริหายามิ กุสเลหิ ธมฺเมหิ’. อปริหานญฺเหตํ วุตฺตํ ภควตาติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, สํวโร โหตี’’ติ. ปญฺจมํ. आणि भिक्षूंनो, संवर कसा होतो? भिक्षूंनो, चक्षूने जाणता येणारी अशी रूपे आहेत जी इष्ट, कांत, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित आणि रजनीय असतात. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूने हे जाणावे की—'मी कुशल धर्मांपासून घसरत नाही.' कारण भगवंतांनी यालाच 'अ-ऱ्हास' (ऱ्हास न होणे) असे म्हटले आहे. ...पे... भिक्षूंनो, जिव्हेने जाणता येणारे असे रस आहेत...पे... भिक्षूंनो, मनाने जाणता येणारे असे धर्म आहेत जे इष्ट, कांत, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित आणि रजनीय असतात. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूने हे जाणावे की—'मी कुशल धर्मांपासून घसरत नाही.' कारण भगवंतांनी यालाच 'अ-ऱ्हास' असे म्हटले आहे. भिक्षूंनो, अशा प्रकारे संवर होतो. पाचवे. ๖. สมาธิสุตฺตํ ६. समाधिसुत्त (समाधी सुत्त) ๙๙. ‘‘สมาธึ, ภิกฺขเว, ภาเวถ. สมาหิโต, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ยถาภูตํ ปชานาติ. กิญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ? ‘จกฺขุ อนิจฺจ’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ; ‘รูปา อนิจฺจา’ติ ยถาภูตํ ปชานาติ; ‘จกฺขุวิญฺญาณํ อนิจฺจ’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ; ‘จกฺขุสมฺผสฺโส อนิจฺโจ’ติ ยถาภูตํ ปชานาติ. ‘ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจ’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ…เป… ‘มโน อนิจฺจ’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ. ธมฺมา… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺโส… ‘ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจ’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ. สมาธึ, ภิกฺขเว, ภาเวถ. สมาหิโต, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ยถาภูตํ ปชานาตี’’ติ. ฉฏฺฐํ. ९९. भिक्षूंनो, समाधीची भावना करा. भिक्षूंनो, समाहित झालेला भिक्षू यथाभूत जाणतो. आणि तो यथाभूत काय जाणतो? 'चक्षू अनित्य आहे' असे तो यथाभूत जाणतो; 'रूपे अनित्य आहेत' असे तो यथाभूत जाणतो; 'चक्षूविज्ञान अनित्य आहे' असे तो यथाभूत जाणतो; 'चक्षूस्पर्श अनित्य आहे' असे तो यथाभूत जाणतो. 'चक्षूस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, तेही अनित्य आहे' असे तो यथाभूत जाणतो. ...पे... 'मन अनित्य आहे' असे तो यथाभूत जाणतो. 'धर्म... मनोविज्ञान... मनःस्पर्श... मनःस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, तेही अनित्य आहे' असे तो यथाभूत जाणतो. भिक्षूंनो, समाधीची भावना करा. भिक्षूंनो, समाहित झालेला भिक्षू यथाभूत जाणतो. सहावे. ๗. ปฏิสลฺลานสุตฺตํ ७. पटिसल्लानसुत्त (एकांतवास सुत्त) ๑๐๐. ‘‘ปฏิสลฺลาเน, ภิกฺขเว, โยคมาปชฺชถ. ปฏิสลฺลีโน, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ยถาภูตํ ปชานาติ. กิญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ? ‘จกฺขุ อนิจฺจ’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ; ‘รูปา อนิจฺจา’ติ ยถาภูตํ ปชานาติ; ‘จกฺขุวิญฺญาณํ อนิจฺจ’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ; ‘จกฺขุสมฺผสฺโส อนิจฺโจ’ติ ยถาภูตํ ปชานาติ. ‘ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจ’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ…เป… ‘ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจ’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ. ปฏิสลฺลาเน, ภิกฺขเว, โยคมาปชฺชถ. ปฏิสลฺลีโน, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ยถาภูตํ ปชานาตี’’ติ. สตฺตมํ. १००. "भिक्षूंनो, एकांतवासात (प्रतिसल्लाणात) उद्योग करा. भिक्षूंनो, एकांतवासात असलेला भिक्षू जसे आहे तसे (यथाभूत) जाणतो. आणि तो जसे आहे तसे काय जाणतो? 'चक्षू (डोळा) अनित्य आहे' असे तो यथाभूत जाणतो; 'रूपे अनित्य आहेत' असे तो यथाभूत जाणतो; 'चक्षू-विज्ञान अनित्य आहे' असे तो यथाभूत जाणतो; 'चक्षू-संस्पर्श अनित्य आहे' असे तो यथाभूत जाणतो. चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने (कारणाने) जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे, असे तो यथाभूत जाणतो... पे... मन-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे, असे तो यथाभूत जाणतो. भिक्षूंनो, एकांतवासात (प्रतिसल्लाणात) उद्योग करा. भिक्षूंनो, एकांतवासात असलेला भिक्षू जसे आहे तसे (यथाभूत) जाणतो." सातवे. ๘. ปฐมนตุมฺหากํสุตฺตํ ८. पहिले न-तुम्हाकं सुत्त ๑๐๑. ‘‘ยํ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ, ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ[Pg.303]. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. รูปา น ตุมฺหากํ. เต ปชหถ. เต โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสนฺติ. จกฺขุวิญฺญาณํ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. จกฺขุสมฺผสฺโส น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. โส โว ปหีโน หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. โสตํ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. สทฺทา น ตุมฺหากํ. เต ปชหถ. เต โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสนฺติ. โสตวิญฺญาณํ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. โสตสมฺผสฺโส น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. โส โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. ยมฺปิทํ โสตสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. ฆานํ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. คนฺธา น ตุมฺหากํ. เต ปชหถ. เต โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสนฺติ. ฆานวิญฺญาณํ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. ฆานสมฺผสฺโส น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. โส โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. ยมฺปิทํ ฆานสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. १०१. "भिक्षूंनो, जे तुमचे नाही, त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. आणि भिक्षूंनो, तुमचे काय नाही? भिक्षूंनो, चक्षू (डोळा) तुमचा नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. रूपे तुमची नाहीत. त्यांचा त्याग करा. त्यांचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. चक्षू-विज्ञान तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. चक्षू-संस्पर्श तुमचा नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. कान (श्रोत) तुमचा नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. शब्द तुमचे नाहीत. त्यांचा त्याग करा. त्यांचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. श्रोत-विज्ञान तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. श्रोत-संस्पर्श तुमचा नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. श्रोत-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. नाक (घ्राण) तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. गंध तुमचे नाहीत. त्यांचा त्याग करा. त्यांचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. घ्राण-विज्ञान तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. घ्राण-संस्पर्श तुमचा नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. घ्राण-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल." ชิวฺหา น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. สา โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. รสา น ตุมฺหากํ. เต ปชหถ. เต โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสนฺติ. ชิวฺหาวิญฺญาณํ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. ชิวฺหาสมฺผสฺโส น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. โส โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ …เป…. "जीभ (जिव्हा) तुमची नाही. तिचा त्याग करा. तिचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. रस (चव) तुमचे नाहीत. त्यांचा त्याग करा. त्यांचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. जिव्हा-विज्ञान तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. जिव्हा-संस्पर्श तुमचा नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. जिव्हा-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल... पे..." มโน น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. โส โว ปหีโน หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. ธมฺมา น ตุมฺหากํ. เต ปชหถ. เต โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสนฺติ. มโนวิญฺญาณํ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. มโนสมฺผสฺโส น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. โส โว ปหีโน หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. "मन तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. धम्म (मानसिक विषय) तुमचे नाहीत. त्यांचा त्याग करा. त्यांचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. मनो-विज्ञान तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. मनो-संस्पर्श तुमचा नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल." ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ยํ อิมสฺมึ เชตวเน ติณกฏฺฐสาขาปลาสํ ตํ ชโน หเรยฺย วา ฑเหยฺย วา ยถาปจฺจยํ วา กเรยฺย, อปิ นุ ตุมฺหากํ เอวมสฺส – ‘อมฺเห ชโน หรติ วา ฑหติ วา ยถาปจฺจยํ วา กโรตี’’’ติ? "भिक्षूंनो, जसे या जेतवनातील जे काही गवत, लाकूड, फांद्या आणि पाने आहेत, ते जर लोकांनी नेले, किंवा जाळले, किंवा त्यांच्या इच्छेनुसार (प्रत्ययानुसार) काहीही केले, तर तुम्हाला असे वाटेल का की—'लोक आम्हाला घेऊन जात आहेत, किंवा जाळत आहेत, किंवा त्यांच्या इच्छेनुसार आमच्याशी वागत आहेत'?" ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "नाही, भंते!" ‘‘ตํ กิสฺส เหตุ’’? "ते कोणत्या कारणाने?" ‘‘น หิ โน เอตํ, ภนฺเต, อตฺตา วา อตฺตนิยํ วา’’ติ. "कारण, भंते, ते आमचा आत्मा (स्व) नाही आणि आमच्या आत्म्याचे (स्वतःचे) काही नाही." ‘‘เอวเมว โข, ภิกฺขเว, จกฺขุ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. รูปา น ตุมฺหากํ… จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺโส…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสตี’’ติ. อฏฺฐมํ. "तसेच, भिक्षूंनो, चक्षू तुमचा नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. रूपे तुमची नाहीत... चक्षू-विज्ञान... चक्षू-संस्पर्श... पे... मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल." आठवे. ๙. ทุติยนตุมฺหากํสุตฺตํ ९. दुसरे न-तुम्हाकं सुत्त ๑๐๒. ‘‘ยํ[Pg.304], ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. รูปา น ตุมฺหากํ. เต ปชหถ. เต โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสนฺติ. จกฺขุวิญฺญาณํ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. จกฺขุสมฺผสฺโส น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. โส โว ปหีโน หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. ยมฺปิ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ, ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสตี’’ติ. นวมํ. १०२. "भिक्षूंनो, जे तुमचे नाही, त्याचा तुम्ही त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी व सुखासाठी होईल. आणि भिक्षूंनो, तुमचे काय नाही? भिक्षूंनो, चक्षु (डोळा) तुमचा नाही. त्याचा तुम्ही त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी व सुखासाठी होईल. रूपे तुमची नाहीत. त्यांचा तुम्ही त्याग करा. त्यांचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी व सुखासाठी होईल. चक्षु-विज्ञान तुमचे नाही. त्याचा तुम्ही त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी व सुखासाठी होईल. चक्षु-संस्पर्श तुमचा नाही. त्याचा तुम्ही त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी व सुखासाठी होईल... तसेच... मन-संस्पर्शामुळे उत्पन्न होणारी जी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना आहे, तीही तुमची नाही. तिचा तुम्ही त्याग करा. तिचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी व सुखासाठी होईल. भिक्षूंनो, जे तुमचे नाही, त्याचा तुम्ही त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी व सुखासाठी होईल." नववे सूत्र। ๑๐. อุทกสุตฺตํ १०. उदक सूत्र ๑๐๓. ‘‘อุทโก สุทํ, ภิกฺขเว, รามปุตฺโต เอวํ วาจํ ภาสติ – ‘อิทํ ชาตุ เวทคู, อิทํ ชาตุ สพฺพชี, อิทํ ชาตุ อปลิขตํ คณฺฑมูลํ ปลิขณิ’นฺติ. ตํ โข ปเนตํ, ภิกฺขเว, อุทโก รามปุตฺโต อเวทคูเยว สมาโน ‘เวทคูสฺมี’ติ ภาสติ, อสพฺพชีเยว สมาโน ‘สพฺพชีสฺมี’ติ ภาสติ, อปลิขตํเยว คณฺฑมูลํ ปลิขตํ เม ‘คณฺฑมูล’นฺติ ภาสติ. อิธ โข ตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘อิทํ ชาตุ เวทคู, อิทํ ชาตุ สพฺพชี, อิทํ ชาตุ อปลิขตํ คณฺฑมูลํ ปลิขณิ’’’นฺติ. १०३. "भिक्षूंनो, रामपुत्र उदक खरोखर असे बोलत असे – 'मी निश्चितच वेदगू (ज्ञान-पारंगत) आहे, मी निश्चितच सर्वजयी आहे, मी निश्चितच न उपटलेले गंडमूळ (गळवाचे मूळ) उपटून टाकले आहे.' परंतु, भिक्षूंनो, रामपुत्र उदक स्वतः वेदगू नसतानाही 'मी वेदगू आहे' असे म्हणत असे; स्वतः सर्वजयी नसतानाही 'मी सर्वजयी आहे' असे म्हणत असे; आणि गंडमूळ उपटलेले नसतानाही 'मी गंडमूळ उपटून टाकले आहे' असे म्हणत असे. भिक्षूंनो, या शासनात एखादा भिक्षूच योग्य प्रकारे बोलताना असे म्हणू शकतो – 'मी निश्चितच वेदगू आहे, मी निश्चितच सर्वजयी आहे, मी निश्चितच न उपटलेले गंडमूळ उपटून टाकले आहे.'" ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, เวทคู โหติ? ยโต โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ; เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เวทคู โหติ. "आणि भिक्षूंनो, भिक्षू कसा वेदगू होतो? जेव्हा भिक्षूंनो, भिक्षू सहा स्पर्शायतनांचा (स्पर्शाच्या आयतनांचा) उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव (दोष) आणि निस्सरण (मुक्ती) यथाभूत (आहे तसे) जाणतो; अशा प्रकारे, भिक्षूंनो, भिक्षू वेदगू होतो." ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สพฺพชี โหติ? ยโต โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ วิทิตฺวา อนุปาทาวิมุตฺโต โหติ; เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สพฺพชี โหติ. "आणि भिक्षूंनो, भिक्षू कसा सर्वजयी होतो? जेव्हा भिक्षूंनो, भिक्षू सहा स्पर्शायतनांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण यथाभूत जाणून, उपादानरहित होऊन विमुक्त होतो; अशा प्रकारे, भिक्षूंनो, भिक्षू सर्वजयी होतो." ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน อปลิขตํ คณฺฑมูลํ ปลิขตํ โหติ? คณฺโฑติ โข, ภิกฺขเว, อิมสฺเสตํ จาตุมหาภูติกสฺส กายสฺส อธิวจนํ [Pg.305] มาตาเปตฺติกสมฺภวสฺส โอทนกุมฺมาสูปจยสฺส อนิจฺจุจฺฉาทนปริมทฺทนเภทนวิทฺธํสนธมฺมสฺส. คณฺฑมูลนฺติ โข, ภิกฺขเว, ตณฺหาเยตํ อธิวจนํ. ยโต โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ตณฺหา ปหีนา โหติ อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา; เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน อปลิขตํ คณฺฑมูลํ ปลิขตํ โหติ. "आणि भिक्षूंनो, भिक्षूने न उपटलेले गंडमूळ कसे उपटून टाकलेले असते? भिक्षूंनो, 'गंड' (गळू) हे चार महाभूतांनी बनलेल्या, माता-पित्यांच्या संयोगातून उत्पन्न झालेल्या, भात आणि लापशी यावर पोसलेल्या, अनित्य, उटणे लावणे, मर्दन करणे, भेद पावणे आणि नष्ट होणे हा स्वभाव असलेल्या या शरीराचे नाव आहे. भिक्षूंनो, 'गंडमूळ' हे तृष्णेचे नाव आहे. जेव्हा भिक्षूंनो, भिक्षूची तृष्णा नष्ट झालेली असते, मुळासकट उपटून टाकलेली असते, ताडाच्या बुंध्यासारखी केलेली असते, समूळ नष्ट केलेली असते आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाची झालेली असते; अशा प्रकारे, भिक्षूंनो, भिक्षूने न उपटलेले गंडमूळ उपटून टाकलेले असते." ‘‘อุทโก สุทํ, ภิกฺขเว, รามปุตฺโต เอวํ วาจํ ภาสติ – ‘อิทํ ชาตุ เวทคู, อิทํ ชาตุ สพฺพชี, อิทํ ชาตุ อปลิขตํ คณฺฑมูลํ ปลิขณิ’นฺติ. ตํ โข ปเนตํ, ภิกฺขเว, อุทโก รามปุตฺโต อเวทคูเยว สมาโน ‘เวทคูสฺมี’ติ ภาสติ, อสพฺพชีเยว สมาโน ‘สพฺพชีสฺมี’ติ ภาสติ; อปลิขตํเยว คณฺฑมูลํ ‘ปลิขตํ เม คณฺฑมูล’นฺติ ภาสติ. อิธ โข ตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘อิทํ ชาตุ เวทคู, อิทํ ชาตุ สพฺพชี, อิทํ ชาตุ อปลิขตํ คณฺฑมูลํ ปลิขณิ’’’นฺติ. ทสมํ. "भिक्षूंनो, रामपुत्र उदक खरोखर असे बोलत असे – 'मी निश्चितच वेदगू आहे, मी निश्चितच सर्वजयी आहे, मी निश्चितच न उपटलेले गंडमूळ उपटून टाकले आहे.' परंतु, भिक्षूंनो, रामपुत्र उदक स्वतः वेदगू नसतानाही 'मी वेदगू आहे' असे म्हणत असे; स्वतः सर्वजयी नसतानाही 'मी सर्वजयी आहे' असे म्हणत असे; आणि गंडमूळ उपटलेले नसतानाही 'मी गंडमूळ उपटून टाकले आहे' असे म्हणत असे. भिक्षूंनो, या शासनात एखादा भिक्षूच योग्य प्रकारे बोलताना असे म्हणू शकतो – 'मी निश्चितच वेदगू आहे, मी निश्चितच सर्वजयी आहे, मी निश्चितच न उपटलेले गंडमूळ उपटून टाकले आहे.'" दहावे सूत्र। สฬวคฺโค ทสโม. दहावा सळ-वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – त्याची अनुक्रमणिका – ทฺเว สํคยฺหา ปริหานํ, ปมาทวิหารี จ สํวโร; สมาธิ ปฏิสลฺลานํ, ทฺเว นตุมฺหาเกน อุทฺทโกติ. दोन संगय्ह सूत्रे, परिहान सूत्र, प्रमादविहारी सूत्र, संवर सूत्र, समाधी सूत्र, पटिसल्लान सूत्र, दोन 'न तुम्हाकं' सूत्रे आणि उदक सूत्र; ही या वर्गाची अनुक्रमणिका आहे। สฬายตนวคฺเค ทุติยปณฺณาสโก สมตฺโต. सळायतन-वर्गातील दुसरा पण्णासक समाप्त झाला। ตสฺส วคฺคุทฺทานํ – त्याची वर्ग-अनुक्रमणिका अशी – อวิชฺชา มิคชาลญฺจ, คิลานํ ฉนฺนํ จตุตฺถกํ; สฬวคฺเคน ปญฺญาสํ, ทุติโย ปณฺณาสโก อยนฺติ. अविद्या वर्ग, मिगजाल वर्ग, ग्लान वर्ग, चौथा छन्न वर्ग आणि सळ-वर्गासह पन्नास सूत्रांचा हा दुसरा पण्णासक आहे। ปฐมสตกํ. पहिले शतक (समाप्त)। ๑๑. โยคกฺเขมิวคฺโค ११. (११) योगक्खेमी वर्ग ๑. โยคกฺเขมิสุตฺตํ १. योगक्खेमी सूत्र ๑๐๔. สาวตฺถินิทานํ. ‘‘โยคกฺเขมิปริยายํ โว, ภิกฺขเว, ธมฺมปริยายํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, โยคกฺเขมิปริยาโย ธมฺมปริยาโย? สนฺติ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา [Pg.306] ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. เต ตถาคตสฺส ปหีนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. เตสญฺจ ปหานาย อกฺขาสิ โยคํ, ตสฺมา ตถาคโต ‘โยคกฺเขมี’ติ วุจฺจติ…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. เต ตถาคตสฺส ปหีนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. เตสญฺจ ปหานาย อกฺขาสิ โยคํ, ตสฺมา ตถาคโต ‘โยคกฺเขมี’ติ วุจฺจติ. อยํ โข, ภิกฺขเว, โยคกฺเขมิปริยาโย ธมฺมปริยาโย’’ติ. ปฐมํ. १०४. श्रावस्ती येथील निदान. "भिक्षूंनो, मी तुम्हाला योगक्षेम-पर्याय (योगबंधनांपासून मुक्तीचा मार्ग) सांगणारी धम्मदेशना देईन. ती लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्षूंनो, योगक्षेम-पर्याय सांगणारी धम्मदेशना कोणती आहे? भिक्षूंनो, चक्षु-विज्ञेय अशी रूपे आहेत, जी इष्ट, कांत, मनाजोगती, प्रिय वाटणारी, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारी आहेत. तथागतांनी त्यांचा त्याग केला आहे, ती मुळासकट उपटून टाकली आहेत, ताडाच्या बुंध्यासारखी केली आहेत, समूळ नष्ट केली आहेत आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाची केली आहेत. आणि त्यांच्या त्यागासाठी त्यांनी प्रयत्नाचा उपदेश केला आहे, म्हणूनच तथागतांना 'योगक्षेमी' म्हटले जाते... तसेच... भिक्षूंनो, मन-विज्ञेय असे धम्म आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगते, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. तथागतांनी त्यांचा त्याग केला आहे, ती मुळासकट उपटून टाकली आहेत, ताडाच्या बुंध्यासारखी केली आहेत, समूळ नष्ट केली आहेत आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाची केली आहेत. आणि त्यांच्या त्यागासाठी त्यांनी प्रयत्नाचा उपदेश केला आहे, म्हणूनच तथागतांना 'योगक्षेमी' म्हटले जाते. भिक्षूंनो, हाच तो योगक्षेम-पर्याय सांगणारी धम्मदेशना आहे." पहिले सूत्र। ๒. อุปาทายสุตฺตํ २. उपादाय सूत्र ๑๐๕. ‘‘กิสฺมึ นุ โข, ภิกฺขเว, สติ กึ อุปาทาย อุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺข’’นฺติ? १०५. "भिक्षूंनो, काय अस्तित्वात असताना, कशाचे उपादान करून अंतर्गत सुख आणि दुःख उत्पन्न होते?" ‘‘ภควํมูลกา โน, ภนฺเต, ธมฺมา…เป…. "भंते, आमचे धम्म भगवंतांच्या मुळाशी आहेत..." ‘‘จกฺขุสฺมึ โข, ภิกฺขเว, สติ จกฺขุํ อุปาทาย อุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺขํ…เป… มนสฺมึ สติ มนํ อุปาทาย อุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺขํ. ตํ กึ มญฺญถ, ภิกฺขเว, จกฺขุ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? "भिक्षूंनो, चक्षु अस्तित्वात असताना, चक्षूचे उपादान करून अंतर्गत सुख आणि दुःख उत्पन्न होते... तसेच... मन अस्तित्वात असताना, मनाचे उपादान करून अंतर्गत सुख आणि दुःख उत्पन्न होते. भिक्षूंनो, तुम्हाला काय वाटते? चक्षु नित्य आहे की अनित्य?" ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. "अनित्य आहे, भंते." ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? "आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?" ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. "दुःखकारक आहे, भंते." ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, อปิ นุ ตํ อนุปาทาย อุปฺปชฺเชยฺย อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺข’’นฺติ? "आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याचे उपादान न करता काय अंतर्गत सुख आणि दुःख उत्पन्न होऊ शकते का?" ‘‘โน เหตํ ภนฺเต’’…เป…. "नाही, भंते." ... ‘‘ชิวฺหา นิจฺจา วา อนิจฺจา วา’’ติ? "जिव्हा नित्य आहे की अनित्य?" ‘‘อนิจฺจา, ภนฺเต’’. "अनित्य आहे, भंते." ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? "आणि जी अनित्य आहे, ती दुःखकारक आहे की सुखकारक?" ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. "दुःखकारक आहे, भंते." ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, อปิ นุ ตํ อนุปาทาย อุปฺปชฺเชยฺย อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺข’’นฺติ? "आणि जी अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाची आहे, तिचे उपादान न करता काय अंतर्गत सुख आणि दुःख उत्पन्न होऊ शकते का?" ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’…เป…. "नाही, भंते." ... ‘‘มโน นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? "मन नित्य आहे की अनित्य?" ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, อปิ นุ ตํ อนุปาทาย อุปฺปชฺเชยฺย อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺข’’นฺติ? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याला न धरून ठेवता (त्याच्याविषयी आसक्ती न बाळगता), अंतर्मनात सुख किंवा दुःख उत्पन्न होऊ शकते का?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. ทุติยํ. “भिक्षूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान (ज्ञानी) आर्यश्रावक चक्षूविषयीही (डोळ्यांविषयीही) कंटाळा (निर्वेद) अनुभवतो... पे... मनाविषयीही कंटाळा अनुभवतो. कंटाळा आल्यावर तो विरक्त होतो; विरक्तीमुळे तो मुक्त होतो. मुक्त झाल्यावर 'मुक्त झाले' असे ज्ञान होते. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही' हे तो जाणतो.” दुसरे. ๓. ทุกฺขสมุทยสุตฺตํ ३. दुःखसमुदय सुत्त ๑๐๖. ‘‘ทุกฺขสฺส, ภิกฺขเว, สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, ทุกฺขสฺส สมุทโย? จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณํ[Pg.307]. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา. อยํ ทุกฺขสฺส สมุทโย…เป… ชิวฺหญฺจ ปฏิจฺจ รเส จ อุปฺปชฺชติ ชิวฺหาวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา. อยํ ทุกฺขสฺส สมุทโย…เป… มนญฺจ ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา. อยํ โข, ภิกฺขเว, ทุกฺขสฺส สมุทโย. १०६. “भिक्षूंनो, मी तुम्हाला दुःखाचा उदय (उत्पत्ती) आणि अस्त (निरोध) शिकवणार आहे. ते लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्षूंनो, दुःखाचा उदय कोणता आहे? चक्षू (डोळा) आणि रूप यांच्यावर अवलंबून चक्षू-विज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या एकत्र येण्याला स्पर्श (फस्स) म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने (कारणाने) वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा उत्पन्न होते. हा दुःखाचा उदय आहे... पे... जिव्हा (जीभ) आणि रस यांच्यावर अवलंबून जिव्हा-विज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या एकत्र येण्याला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा उत्पन्न होते. हा दुःखाचा उदय आहे... पे... मन आणि धम्म (मानसिक विषय) यांच्यावर अवलंबून मनो-विज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या एकत्र येण्याला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा उत्पन्न होते. भिक्षूंनो, हाच दुःखाचा उदय आहे.” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, ทุกฺขสฺส อตฺถงฺคโม? จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา. ตสฺสาเยว ตณฺหาย อเสสวิราคนิโรธา อุปาทานนิโรโธ; อุปาทานนิโรธา ภวนิโรโธ; ภวนิโรธา ชาตินิโรโธ; ชาตินิโรธา ชรามรณํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา นิรุชฺฌนฺติ. เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส นิโรโธ โหติ. อยํ ทุกฺขสฺส อตฺถงฺคโม…เป… ชิวฺหญฺจ ปฏิจฺจ รเส จ อุปฺปชฺชติ ชิวฺหาวิญฺญาณํ…เป… มนญฺจ ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา. ตสฺสาเยว ตณฺหาย อเสสวิราคนิโรธา อุปาทานนิโรโธ; อุปาทานนิโรธา ภวนิโรโธ; ภวนิโรธา ชาตินิโรโธ; ชาตินิโรธา ชรามรณํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา นิรุชฺฌนฺติ. เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส นิโรโธ โหติ. อยํ โข, ภิกฺขเว, ทุกฺขสฺส อตฺถงฺคโม’’ติ. ตติยํ. “आणि भिक्षूंनो, दुःखाचा अस्त (निरोध) कोणता आहे? चक्षू आणि रूप यांच्यावर अवलंबून चक्षू-विज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या एकत्र येण्याला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा उत्पन्न होते. त्याच तृष्णेच्या संपूर्ण विरागाने आणि निरोधाने उपादान (आसक्ती) निरोध होतो; उपादान निरोधाने भव निरोध होतो; भव निरोधाने जाती (जन्म) निरोध होतो; जाती निरोधाने जरा-मरण, शोक, परिदेव (आक्रोश), दुःख, डोमनस्य (मानसिक दुःख) आणि उपायास (हताशपणा) नष्ट होतात. अशा प्रकारे या संपूर्ण दुःखसमूहाचा निरोध होतो. हा दुःखाचा अस्त आहे... पे... जिव्हा आणि रस यांच्यावर अवलंबून जिव्हा-विज्ञान उत्पन्न होते... पे... मन आणि धम्म यांच्यावर अवलंबून मनो-विज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या एकत्र येण्याला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा उत्पन्न होते. त्याच तृष्णेच्या संपूर्ण विरागाने आणि निरोधाने उपादान निरोध होतो; उपादान निरोधाने भव निरोध होतो; भव निरोधाने जाती निरोध होतो; जाती निरोधाने जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास नष्ट होतात. अशा प्रकारे या संपूर्ण दुःखसमूहाचा निरोध होतो. भिक्षूंनो, हाच दुःखाचा अस्त आहे.” तिसरे. ๔. โลกสมุทยสุตฺตํ ४. लोकसमुदय सुत्त ๑๐๗. ‘‘โลกสฺส, ภิกฺขเว, สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, โลกสฺส สมุทโย? จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา; ตณฺหาปจฺจยา อุปาทานํ; อุปาทานปจฺจยา ภโว; ภวปจฺจยา ชาติ; ชาติปจฺจยา ชรามรณํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา สมฺภวนฺติ. อยํ โข, ภิกฺขเว, โลกสฺส สมุทโย …เป… ชิวฺหญฺจ ปฏิจฺจ รเส จ อุปฺปชฺชติ ชิวฺหาวิญฺญาณํ…เป… มนญฺจ ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา; ตณฺหาปจฺจยา อุปาทานํ; อุปาทานปจฺจยา ภโว[Pg.308]; ภวปจฺจยา ชาติ; ชาติปจฺจยา ชรามรณํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา สมฺภวนฺติ. อยํ โข, ภิกฺขเว, โลกสฺส สมุทโย. १०७. “भिक्षूंनो, मी तुम्हाला लोकाचा उदय (उत्पत्ती) आणि अस्त (निरोध) शिकवणार आहे. ते लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्षूंनो, लोकाचा उदय कोणता आहे? चक्षू आणि रूप यांच्यावर अवलंबून चक्षू-विज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या एकत्र येण्याला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा; तृष्णेच्या प्रत्ययाने उपादान; उपादानाच्या प्रत्ययाने भव; भवाच्या प्रत्ययाने जाती; जातीच्या प्रत्ययाने जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास संभवतात (उत्पन्न होतात). भिक्षूंनो, हाच लोकाचा उदय आहे... पे... जिव्हा आणि रस यांच्यावर अवलंबून जिव्हा-विज्ञान उत्पन्न होते... पे... मन आणि धम्म यांच्यावर अवलंबून मनो-विज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या एकत्र येण्याला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा; तृष्णेच्या प्रत्ययाने उपादान; उपादानाच्या प्रत्ययाने भव; भवाच्या प्रत्ययाने जाती; जातीच्या प्रत्ययाने जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास संभवतात. भिक्षूंनो, हाच लोकाचा उदय आहे.” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, โลกสฺส อตฺถงฺคโม? จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา. ตสฺสาเยว ตณฺหาย อเสสวิราคนิโรธา อุปาทานนิโรโธ; อุปาทานนิโรธา ภวนิโรโธ; ภวนิโรธา ชาตินิโรโธ; ชาตินิโรธา ชรามรณํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา นิรุชฺฌนฺติ. เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส นิโรโธ โหติ. อยํ โข, ภิกฺขเว, โลกสฺส อตฺถงฺคโม…เป… ชิวฺหญฺจ ปฏิจฺจ รเส จ อุปฺปชฺชติ…เป… มนญฺจ ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา. ตสฺสาเยว ตณฺหาย อเสสวิราคนิโรธา อุปาทานนิโรโธ; อุปาทานนิโรธา…เป… เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส นิโรโธ โหติ. อยํ โข, ภิกฺขเว, โลกสฺส อตฺถงฺคโม’’ติ. จตุตฺถํ. “आणि भिक्षूंनो, लोकाचा अस्त (निरोध) कोणता आहे? चक्षू आणि रूप यांच्यावर अवलंबून चक्षू-विज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या एकत्र येण्याला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा उत्पन्न होते. त्याच तृष्णेच्या संपूर्ण विरागाने आणि निरोधाने उपादान निरोध होतो; उपादान निरोधाने भव निरोध होतो; भव निरोधाने जाती निरोध होतो; जाती निरोधाने जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास नष्ट होतात. अशा प्रकारे या संपूर्ण दुःखसमूहाचा निरोध होतो. भिक्षूंनो, हाच लोकाचा अस्त आहे... पे... जिव्हा आणि रस यांच्यावर अवलंबून उत्पन्न होते... पे... मन आणि धम्म यांच्यावर अवलंबून मनो-विज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या एकत्र येण्याला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा उत्पन्न होते. त्याच तृष्णेच्या संपूर्ण विरागाने आणि निरोधाने उपादान निरोध होतो; उपादान निरोधाने... पे... अशा प्रकारे या संपूर्ण दुःखसमूहाचा निरोध होतो. भिक्षूंनो, हाच लोकाचा अस्त आहे.” चौथे. ๕. เสยฺโยหมสฺมิสุตฺตํ ५. सेय्योहमस्मि सुत्त ๑๐๘. ‘‘กิสฺมึ นุ โข, ภิกฺขเว, สติ กึ อุปาทาย กึ อภินิวิสฺส เสยฺโยหมสฺมีติ วา โหติ, สทิโสหมสฺมีติ วา โหติ, หีโนหมสฺมีติ วา โหตี’’ติ? १०८. “भिक्षूंनो, काय अस्तित्वात असताना, कशाला धरून ठेवल्याने (कशाचे उपादान केल्याने), कशाचा अभिनिवेश (आग्रह) धरल्याने ‘मी श्रेष्ठ आहे’ किंवा ‘मी समान आहे’ किंवा ‘मी कनिष्ठ आहे’ असा विचार मनात येतो?” ‘‘ภควํมูลกา โน, ภนฺเต, ธมฺมา. “भन्ते, आमचे धम्म (शिकवणी) भगवंतांवरच आधारित (मूळ असलेले) आहेत.” ‘‘จกฺขุสฺมึ โข, ภิกฺขเว, สติ จกฺขุํ อุปาทาย จกฺขุํ อภินิวิสฺส เสยฺโยหมสฺมีติ วา โหติ, สทิโสหมสฺมีติ วา โหติ, หีโนหมสฺมีติ วา โหติ…เป… ชิวฺหาย สติ…เป… มนสฺมึ สติ มนํ อุปาทาย มนํ อภินิวิสฺส เสยฺโยหมสฺมีติ วา โหติ, สทิโสหมสฺมีติ วา โหติ, หีโนหมสฺมีติ วา โหติ. ตํ กึ มญฺญถ, ภิกฺขเว, จกฺขุ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “भिक्षूंनो, चक्षू (डोळा) अस्तित्वात असताना, चक्षूला धरून ठेवल्याने, चक्षूचा अभिनिवेश धरल्याने ‘मी श्रेष्ठ आहे’ किंवा ‘मी समान आहे’ किंवा ‘मी कनिष्ठ आहे’ असा विचार मनात येतो... पे... जिव्हा अस्तित्वात असताना... पे... मन अस्तित्वात असताना, मनाला धरून ठेवल्याने, मनाचा अभिनिवेश धरल्याने ‘मी श्रेष्ठ आहे’ किंवा ‘मी समान आहे’ किंवा ‘मी कनिष्ठ आहे’ असा विचार मनात येतो. भिक्षूंनो, तुम्हाला काय वाटते, चक्षू नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, อปิ นุ ตํ อนุปาทาย เสยฺโยหมสฺมีติ วา อสฺส, สทิโสหมสฺมีติ วา อสฺส, หีโนหมสฺมีติ วา อสฺสา’’ติ? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याला न धरून ठेवता (त्याच्याविषयी आसक्ती न बाळगता) ‘मी श्रेष्ठ आहे’ किंवा ‘मी समान आहे’ किंवा ‘मी कनिष्ठ आहे’ असा विचार मनात येऊ शकतो का?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’…เป… ชิวฺหา… กาโย นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? “नक्कीच नाही, भन्ते.”... पे... “जिव्हा... काय (शरीर) नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’…เป…. “अनित्य आहे, भन्ते.”... पे... ‘‘มโน นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? “मन नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา [Pg.309] ตํ สุขํ วา’’ติ? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, อปิ นุ ตํ อนุปาทาย เสยฺโยหมสฺมีติ วา อสฺส, สทิโสหมสฺมีติ วา อสฺส, หีโนหมสฺมีติ วา อสฺสา’’ติ? पण जे अनित्य, दुःखमय आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याला न चिकटता (त्याचे उपादान न करता) 'मी श्रेष्ठ आहे' किंवा 'मी समान आहे' किंवा 'मी कनिष्ठ आहे' असा विचार (अभिमान) निर्माण होऊ शकतो का? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. असे नाही, भन्ते! ‘‘เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. ปญฺจมํ. भिक्षूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षूविषयी निर्वेद पावतो (कंटाळतो)...पे०... मनाविषयी निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्यामुळे तो विरक्त होतो; विरक्तीमुळे तो विमुक्त होतो. विमुक्त झाल्यावर 'मी विमुक्त झालो आहे' असे ज्ञान त्याला होते. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही' असे तो जाणतो. पाचवे. ๖. สํโยชนิยสุตฺตํ ६. संयोजनीय सुत्त ๑๐๙. ‘‘สํโยชนิเย จ, ภิกฺขเว, ธมฺเม เทเสสฺสามิ สํโยชนญฺจ. ตํ สุณาถ. กตเม จ, ภิกฺขเว, สํโยชนิยา ธมฺมา, กตมญฺจ สํโยชนํ? จกฺขุํ, ภิกฺขเว, สํโยชนิโย ธมฺโม. โย ตตฺถ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ…เป… ชิวฺหา สํโยชนิโย ธมฺโม…เป… มโน สํโยชนิโย ธมฺโม. โย ตตฺถ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. อิเม วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, สํโยชนิยา ธมฺมา, อิทํ สํโยชน’’นฺติ. ฉฏฺฐํ. १०९. भिक्षूंनो, मी तुम्हाला संयोजनीय (बंधनात टाकणारे) धर्म आणि संयोजन (बंधन) शिकवीन. ते लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्षूंनो, संयोजनीय धर्म कोणते आहेत आणि संयोजन कोणते आहे? भिक्षूंनो, चक्षू हा संयोजनीय धर्म आहे. तेथे जो छंदराग (इच्छा आणि आसक्ती) आहे, ते तेथील संयोजन आहे...पे०... जिव्हा हा संयोजनीय धर्म आहे...पे०... मन हा संयोजनीय धर्म आहे. तेथे जो छंदराग आहे, ते तेथील संयोजन आहे. भिक्षूंनो, यांना संयोजनीय धर्म म्हटले जाते आणि याला संयोजन म्हटले जाते. सहावे. ๗. อุปาทานิยสุตฺตํ ७. उपादानीय सुत्त ๑๑๐. ‘‘อุปาทานิเย จ, ภิกฺขเว, ธมฺเม เทเสสฺสามิ อุปาทานญฺจ. ตํ สุณาถ. กตเม จ, ภิกฺขเว, อุปาทานิยา ธมฺมา, กตมญฺจ อุปาทานํ? จกฺขุํ, ภิกฺขเว, อุปาทานิโย ธมฺโม. โย ตตฺถ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ อุปาทานํ…เป… ชิวฺหา อุปาทานิโย ธมฺโม…เป… มโน อุปาทานิโย ธมฺโม. โย ตตฺถ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ อุปาทานํ. อิเม วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, อุปาทานิยา ธมฺมา, อิทํ อุปาทาน’’นฺติ. สตฺตมํ. ११०. भिक्षूंनो, मी तुम्हाला उपादानीय (आसक्ती निर्माण करणारे) धर्म आणि उपादान (आसक्ती) शिकवीन. ते लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्षूंनो, उपादानीय धर्म कोणते आहेत आणि उपादान कोणते आहे? भिक्षूंनो, चक्षू हा उपादानीय धर्म आहे. तेथे जो छंदराग आहे, ते तेथील उपादान आहे...पे०... जिव्हा हा उपादानीय धर्म आहे...पे०... मन हा उपादानीय धर्म आहे. तेथे जो छंदराग आहे, ते तेथील उपादान आहे. भिक्षूंनो, यांना उपादानीय धर्म म्हटले जाते आणि याला उपादान म्हटले जाते. सातवे. ๘. อชฺฌตฺติกายตนปริชานนสุตฺตํ ८. अज्झत्तिकायतनपरिज्ञान सुत्त ๑๑๑. ‘‘จกฺขุํ, ภิกฺขเว, อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. โสตํ… ฆานํ… ชิวฺหํ… กายํ… มนํ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. จกฺขุญฺจ โข, ภิกฺขเว, อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย…เป… ชิวฺหํ… กายํ… มนํ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยายา’’ติ. อฏฺฐมํ. १११. भिक्षूंनो, चक्षूला विशेष रूपाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, त्याविषयी विरक्त न होता आणि त्याचा त्याग न करता, मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ ठरतो. श्रोत्र... घ्राण... जिव्हा... काया... मन विशेष रूपाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, त्याविषयी विरक्त न होता आणि त्याचा त्याग न करता, मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ ठरतो. परंतु, भिक्षूंनो, चक्षूला विशेष रूपाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्याविषयी विरक्त होऊन आणि त्याचा त्याग करून, मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास समर्थ ठरतो...पे०... जिव्हा... काया... मन विशेष रूपाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्याविषयी विरक्त होऊन आणि त्याचा त्याग करून, मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास समर्थ ठरतो. आठवे. ๙. พาหิรายตนปริชานนสุตฺตํ ९. बाहिरायतनपरिज्ञान सुत्त ๑๑๒. ‘‘รูเป[Pg.310], ภิกฺขเว, อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. สทฺเท… คนฺเธ… รเส… โผฏฺฐพฺเพ… ธมฺเม อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. รูเป จ โข, ภิกฺขเว, อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. สทฺเท… คนฺเธ… รเส… โผฏฺฐพฺเพ… ธมฺเม อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยายา’’ติ. นวมํ. ११२. भिक्षूंनो, रूपांना विशेष रूपाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, त्यांविषयी विरक्त न होता आणि त्यांचा त्याग न करता, मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ ठरतो. शब्दांना... गंधांना... रसांना... स्पर्शांना... धर्मांना विशेष रूपाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, त्यांविषयी विरक्त न होता आणि त्यांचा त्याग न करता, मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ ठरतो. परंतु, भिक्षूंनो, रूपांना विशेष रूपाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यांविषयी विरक्त होऊन आणि त्यांचा त्याग करून, मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास समर्थ ठरतो. शब्दांना... गंधांना... रसांना... स्पर्शांना... धर्मांना विशेष रूपाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यांविषयी विरक्त होऊन आणि त्यांचा त्याग करून, मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास समर्थ ठरतो. नववे. ๑๐. อุปสฺสุติสุตฺตํ १०. उपस्सुति सुत्त ๑๑๓. เอกํ สมยํ ภควา นาติเก วิหรติ คิญฺชกาวสเถ. อถ โข ภควา รโหคโต ปฏิสลฺลีโน อิมํ ธมฺมปริยายํ อภาสิ – ‘‘จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา; ตณฺหาปจฺจยา อุปาทานํ; อุปาทานปจฺจยา ภโว; ภวปจฺจยา ชาติ; ชาติปจฺจยา ชรามรณํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา สมฺภวนฺติ. เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส สมุทโย โหติ. ชิวฺหญฺจ ปฏิจฺจ รเส จ อุปฺปชฺชติ…เป… มนญฺจ ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา; ตณฺหาปจฺจยา อุปาทานํ; อุปาทานปจฺจยา ภโว; ภวปจฺจยา ชาติ; ชาติปจฺจยา ชรามรณํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา สมฺภวนฺติ. เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส สมุทโย โหติ’’. ११३. एकदा भगवान नातिक येथे विटांच्या घरात (गिंजकावसथ येथे) विहार करत होते. तेव्हा भगवान एकांतात ध्यानस्थ बसले असताना त्यांनी या धर्मपर्यायाचे प्रवचन केले – 'चक्षू आणि रूपांवर अवलंबून चक्षूविज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या संयोगाला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने (कारणाने) वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा; तृष्णेच्या प्रत्ययाने उपादान; उपादानाच्या प्रत्ययाने भव; भवाच्या प्रत्ययाने जाती (जन्म); जातीच्या प्रत्ययाने जरा-मरण, शोक, परिदेव (क्रंदन), दुःख, डोमनस्य (मानसिक दुःख) आणि उपायास (निराशा) संभवतात. अशा प्रकारे या संपूर्ण दुःखसमूहाचा उदय होतो. जिव्हा आणि रसांवर अवलंबून...पे०... मन आणि धर्मांवर अवलंबून मनोविज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या संयोगाला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा; तृष्णेच्या प्रत्ययाने उपादान; उपादानाच्या प्रत्ययाने भव; भवाच्या प्रत्ययाने जाती; जातीच्या प्रत्ययाने जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास संभवतात. अशा प्रकारे या संपूर्ण दुःखसमूहाचा उदय होतो.' ‘‘จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา. ตสฺสาเยว ตณฺหาย อเสสวิราคนิโรธา อุปาทานนิโรโธ; อุปาทานนิโรธา ภวนิโรโธ; ภวนิโรธา ชาตินิโรโธ; ชาตินิโรธา ชรามรณํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา นิรุชฺฌนฺติ. เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส นิโรโธ โหติ…เป… ชิวฺหญฺจ ปฏิจฺจ รเส จ อุปฺปชฺชติ…เป… มนญฺจ ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา. ตสฺสาเยว ตณฺหาย อเสสวิราคนิโรธา อุปาทานนิโรโธ[Pg.311]; อุปาทานนิโรธา…เป… เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส นิโรโธ โหตี’’ติ. 'चक्षू आणि रूपांवर अवलंबून चक्षूविज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या संयोगाला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा उत्पन्न होते. त्याच तृष्णेच्या संपूर्ण विरागामुळे आणि निरोधामुळे उपादानाचा निरोध होतो; उपादाननिरोधामुळे भवानिरोध होतो; भवानिरोधामुळे जातीनिरोध होतो; जातीनिरोधामुळे जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास निरुद्ध होतात. अशा प्रकारे या संपूर्ण दुःखसमूहाचा निरोध होतो...पे०... जिव्हा आणि रसांवर अवलंबून...पे०... मन आणि धर्मांवर अवलंबून मनोविज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या संयोगाला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा उत्पन्न होते. त्याच तृष्णेच्या संपूर्ण विरागामुळे आणि निरोधामुळे उपादानाचा निरोध होतो; उपादाननिरोधामुळे...पे०... अशा प्रकारे या संपूर्ण दुःखसमूहाचा निरोध होतो.' เตน โข ปน สมเยน อญฺญตโร ภิกฺขุ ภควโต อุปสฺสุติ ฐิโต โหติ. อทฺทสา โข ภควา ตํ ภิกฺขุํ อุปสฺสุติ ฐิตํ. ทิสฺวาน ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘อสฺโสสิ โน ตฺวํ, ภิกฺขุ, อิมํ ธมฺมปริยาย’’นฺติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. ‘‘อุคฺคณฺหาหิ ตฺวํ, ภิกฺขุ, อิมํ ธมฺมปริยายํ. ปริยาปุณาหิ ตฺวํ, ภิกฺขุ, อิมํ ธมฺมปริยายํ. ธาเรหิ ตฺวํ, ภิกฺขุ, อิมํ ธมฺมปริยายํ. อตฺถสํหิโตยํ, ภิกฺขุ, ธมฺมปริยาโย อาทิพฺรหฺมจริยโก’’ติ. ทสมํ. त्या वेळी एक भिक्षू भगवंतांच्या जवळच (त्यांचे बोलणे ऐकण्याच्या अंतरावर) उभा होता. भगवंतांनी त्या भिक्षूला जवळ उभे असलेले पाहिले. त्याला पाहून भगवान त्याला म्हणाले – 'भिक्षू, तू हा धर्मपर्याय ऐकलास का?' 'होय, भन्ते!' 'भिक्षू, तू हा धर्मपर्याय ग्रहण कर. भिक्षू, तू हा धर्मपर्याय चांगल्या प्रकारे शिकून घे. भिक्षू, तू हा धर्मपर्याय मनात धारण कर. भिक्षू, हा धर्मपर्याय कल्याणकारी आहे आणि श्रेष्ठ आचरणाचा (ब्रह्मचर्याचा) प्रारंभ आहे.' दहावे. โยคกฺเขมิวคฺโค เอกาทสโม. अकरावा योगक्खेमी वर्ग समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याची अनुक्रमणिका (उदान) – โยคกฺเขมิ อุปาทาย, ทุกฺขํ โลโก จ เสยฺโย จ; สํโยชนํ อุปาทานํ, ทฺเว ปริชานํ อุปสฺสุตีติ. योगक्खेमी, उपादाय, दुःख, लोक, आणि सेय्यो; संयोजन, उपादान, दोन परिज्ञान आणि उपस्सुति. ๑๒. โลกกามคุณวคฺโค १२. लोककामगुण वर्ग ๑. ปฐมมารปาสสุตฺตํ १. प्रथम मारपास सुत्त ๑๑๔. ‘‘สนฺติ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ, ภิกฺขุ, อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อาวาสคโต มารสฺส, มารสฺส วสํ คโต, ปฏิมุกฺกสฺส มารปาโส. พทฺโธ โส มารพนฺธเนน ยถากามกรณีโย ปาปิมโต…เป…. ११४. भिक्षूंनो, चक्षूने जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत, जे इष्ट, कांत (प्रिय), मनाला आनंद देणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो (त्यात आनंद मानतो), त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यांना घट्ट धरून राहतो – तर भिक्षूंनो, अशा भिक्षूला 'माराच्या निवासस्थानात गेलेला', 'माराच्या वशमध्ये गेलेला' आणि 'ज्याच्या गळ्यात माराचा फास अडकला आहे' असे म्हटले जाते. तो माराच्या बंधनाने बांधला गेला आहे आणि त्या पापी माराच्या इच्छेनुसार वागण्यास भाग पडला आहे...पे०... ‘‘สนฺติ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อาวาสคโต มารสฺส, มารสฺส วสํ คโต, ปฏิมุกฺกสฺส มารปาโส. พทฺโธ โส มารพนฺธเนน…เป…. “भिक्षूंनो, जिभेने जाणता येण्याजोगे (जिव्हाविज्ञेय) असे रस आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रियस्वरूप, कामोपसंहित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहतो, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूला 'माराच्या निवासस्थानी गेलेला', 'माराच्या अधीन झालेला' आणि 'ज्याच्यावर माराचा पाश पडला आहे' असे म्हटले जाते. तो माराच्या बंधनाने बांधला गेला आहे... (पे)...” ‘‘สนฺติ[Pg.312], ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อาวาสคโต มารสฺส, มารสฺส วสํ คโต, ปฏิมุกฺกสฺส มารปาโส. พทฺโธ โส มารพนฺธเนน ยถากามกรณีโย ปาปิมโต. “भिक्षूंनो, मनाने जाणता येण्याजोगे (मनोविज्ञेय) असे धर्म आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रियस्वरूप, कामोपसंहित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहतो, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूला 'माराच्या निवासस्थानी गेलेला', 'माराच्या अधीन झालेला' आणि 'ज्याच्यावर माराचा पाश पडला आहे' असे म्हटले जाते. तो माराच्या बंधनाने बांधला गेला असून पापी मार त्याच्याशी आपल्या इच्छेनुसार वर्तन करू शकतो.” ‘‘สนฺติ จ โข, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ นาวาสคโต มารสฺส, น มารสฺส วสํ คโต, อุมฺมุกฺกสฺส มารปาโส. มุตฺโต โส มารพนฺธเนน น ยถากามกรณีโย ปาปิมโต…เป…. “भिक्षूंनो, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे (चक्षुविज्ञेय) असे रूप आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रियस्वरूप, कामोपसंहित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूला 'माराच्या निवासस्थानी न गेलेला', 'माराच्या अधीन न झालेला' आणि 'ज्याच्या गळ्यातील माराचा पाश सुटला आहे' असे म्हटले जाते. तो माराच्या बंधनातून मुक्त झाला असून पापी मार त्याच्याशी आपल्या इच्छेनुसार वर्तन करू शकत नाही... (पे)...” ‘‘สนฺติ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ นาวาสคโต มารสฺส, น มารสฺส วสํ คโต, อุมฺมุกฺกสฺส มารปาโส. มุตฺโต โส มารพนฺธเนน น ยถากามกรณีโย ปาปิมโต…เป…. “भिक्षूंनो, जिभेने जाणता येण्याजोगे (जिव्हाविज्ञेय) असे रस आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रियस्वरूप, कामोपसंहित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूला 'माराच्या निवासस्थानी न गेलेला', 'माराच्या अधीन न झालेला' आणि 'ज्याच्या गळ्यातील माराचा पाश सुटला आहे' असे म्हटले जाते. तो माराच्या बंधनातून मुक्त झाला असून पापी मार त्याच्याशी आपल्या इच्छेनुसार वर्तन करू शकत नाही... (पे)...” ‘‘สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ นาวาสคโต มารสฺส, น มารสฺส วสํ คโต, อุมฺมุกฺกสฺส มารปาโส. มุตฺโต โส มารพนฺธเนน น ยถากามกรณีโย ปาปิมโต’’ติ. ปฐมํ. “भिक्षूंनो, मनाने जाणता येण्याजोगे (मनोविज्ञेय) असे धर्म आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रियस्वरूप, कामोपसंहित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूला 'माराच्या निवासस्थानी न गेलेला', 'माराच्या अधीन न झालेला' आणि 'ज्याच्या गळ्यातील माराचा पाश सुटला आहे' असे म्हटले जाते. तो माराच्या बंधनातून मुक्त झाला असून पापी मार त्याच्याशी आपल्या इच्छेनुसार वर्तन करू शकत नाही.” पहिले (सुत्त समाप्त). ๒. ทุติยมารปาสสุตฺตํ २. दुसरे मारपाश सुत्त ๑๑๕. ‘‘สนฺติ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ พทฺโธ จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ, อาวาสคโต มารสฺส, มารสฺส วสํ คโต, ปฏิมุกฺกสฺส มารปาโส. พทฺโธ โส มารพนฺธเนน ยถากามกรณีโย ปาปิมโต…เป…. ११५. “भिक्षूंनो, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे (चक्षुविज्ञेय) असे रूप आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रियस्वरूप, कामोपसंहित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहतो, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूला 'चक्षुविज्ञेय रूपांमध्ये बांधला गेलेला', 'माराच्या निवासस्थानी गेलेला', 'माराच्या अधीन झालेला' आणि 'ज्याच्यावर माराचा पाश पडला आहे' असे म्हटले जाते. तो माराच्या बंधनाने बांधला गेला असून पापी मार त्याच्याशी आपल्या इच्छेनुसार वर्तन करू शकतो... (पे)...” ‘‘สนฺติ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ [Pg.313] อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ พทฺโธ มโนวิญฺเญยฺเยสุ ธมฺเมสุ, อาวาสคโต มารสฺส, มารสฺส วสํ คโต, ปฏิมุกฺกสฺส มารปาโส. พทฺโธ โส มารพนฺธเนน ยถากามกรณีโย ปาปิมโต…เป…. “भिक्षूंनो, जिभेने जाणता येण्याजोगे (जिव्हाविज्ञेय) असे रस आहेत... (पे)... भिक्षूंनो, मनाने जाणता येण्याजोगे (मनोविज्ञेय) असे धर्म आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रियस्वरूप, कामोपसंहित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहतो, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूला 'मनोविज्ञेय धर्मांमध्ये बांधला गेलेला', 'माराच्या निवासस्थानी गेलेला', 'माराच्या अधीन झालेला' आणि 'ज्याच्यावर माराचा पाश पडला आहे' असे म्हटले जाते. तो माराच्या बंधनाने बांधला गेला असून पापी मार त्याच्याशी आपल्या इच्छेनुसार वर्तन करू शकतो... (पे)...” ‘‘สนฺติ จ โข, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ มุตฺโต จกฺขุวิญฺเญยฺเยหิ รูเปหิ, นาวาสคโต มารสฺส, น มารสฺส วสํ คโต, อุมฺมุกฺกสฺส มารปาโส. มุตฺโต โส มารพนฺธเนน น ยถากามกรณีโย ปาปิมโต…เป…. “भिक्षूंनो, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे (चक्षुविज्ञेय) असे रूप आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रियस्वरूप, कामोपसंहित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूला 'चक्षुविज्ञेय रूपांमधून मुक्त झालेला', 'माराच्या निवासस्थानी न गेलेला', 'माराच्या अधीन न झालेला' आणि 'ज्याच्या गळ्यातील माराचा पाश सुटला आहे' असे म्हटले जाते. तो माराच्या बंधनातून मुक्त झाला असून पापी मार त्याच्याशी आपल्या इच्छेनुसार वर्तन करू शकत नाही... (पे)...” ‘‘สนฺติ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ มุตฺโต มโนวิญฺเญยฺเยหิ ธมฺเมหิ, นาวาสคโต มารสฺส, น มารสฺส วสํ คโต, อุมฺมุกฺกสฺส มารปาโส. มุตฺโต โส มารพนฺธเนน น ยถากามกรณีโย ปาปิมโต’’ติ. ทุติยํ. “भिक्षूंनो, जिभेने जाणता येण्याजोगे (जिव्हाविज्ञेय) असे रस आहेत... (पे)... भिक्षूंनो, मनाने जाणता येण्याजोगे (मनोविज्ञेय) असे धर्म आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रियस्वरूप, कामोपसंहित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूला 'मनोविज्ञेय धर्मांमधून मुक्त झालेला', 'माराच्या निवासस्थानी न गेलेला', 'माराच्या अधीन न झालेला' आणि 'ज्याच्या गळ्यातील माराचा पाश सुटला आहे' असे म्हटले जाते. तो माराच्या बंधनातून मुक्त झाला असून पापी मार त्याच्याशी आपल्या इच्छेनुसार वर्तन करू शकत नाही.” दुसरे (सुत्त समाप्त). ๓. โลกนฺตคมนสุตฺตํ ३. लोकंतगमन सुत्त ๑๑๖. ‘‘นาหํ, ภิกฺขเว, คมเนน โลกสฺส อนฺตํ ญาเตยฺยํ, ทฏฺเฐยฺยํ, ปตฺเตยฺยนฺติ วทามิ. น จ ปนาหํ, ภิกฺขเว, อปฺปตฺวา โลกสฺส อนฺตํ ทุกฺขสฺส อนฺตกิริยํ วทามี’’ติ. อิทํ วตฺวา ภควา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปาวิสิ. อถ โข เตสํ ภิกฺขูนํ อจิรปกฺกนฺตสฺส ภควโต เอตทโหสิ – ‘‘อิทํ โข โน, อาวุโส, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ‘นาหํ, ภิกฺขเว, คมเนน โลกสฺส อนฺตํ ญาเตยฺยํ, ทฏฺเฐยฺยํ, ปตฺเตยฺยนฺติ วทามิ. น จ ปนาหํ, ภิกฺขเว, อปฺปตฺวา โลกสฺส อนฺตํ ทุกฺขสฺส อนฺตกิริยํ วทามี’ติ. โก นุ โข อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภเชยฺยา’’ติ? ११६. “भिक्षूंनो, केवळ चालत जाऊन (प्रवास करून) लोकाचा (विश्वाचा) अंत जाणता येतो, पाहता येतो किंवा तिथे पोहोचता येते, असे मी म्हणत नाही. परंतु, भिक्षूंनो, लोकाच्या अंतापर्यंत न पोहोचता दुःखाचा अंत (दुःखमुक्ती) करता येतो, असेही मी म्हणत नाही.” असे बोलून भगवान आसनावरून उठले आणि विहारात गेले. भगवान निघून गेल्यावर काही वेळातच त्या भिक्षूंच्या मनात असा विचार आला— “आयुष्यमानहो, भगवान आपल्याला संक्षेपात हा उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करताच आसनावरून उठून विहारात गेले आहेत— ‘भिक्षूंनो, केवळ चालत जाऊन लोकाचा अंत जाणता येतो, पाहता येतो किंवा तिथे पोहोचता येते, असे मी म्हणत नाही. परंतु, भिक्षूंनो, लोकाच्या अंतापर्यंत न पोहोचता दुःखाचा अंत करता येतो, असेही मी म्हणत नाही.’ आता भगवंतांनी संक्षेपात सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ कोण स्पष्ट करू शकेल?” อถ [Pg.314] โข เตสํ ภิกฺขูนํ เอตทโหสิ – ‘‘อยํ โข อายสฺมา อานนฺโท สตฺถุ เจว สํวณฺณิโต, สมฺภาวิโต จ วิญฺญูนํ สพฺรหฺมจารีนํ. ปโหติ จายสฺมา อานนฺโท อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภชิตุํ. ยํนูน มยํ เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกเมยฺยาม; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยามา’’ติ. नंतर त्या भिक्षूंच्या मनात असा विचार आला— “हे आयुष्यमान आनंद तर शास्त्यांद्वारे (बुद्धांद्वारे) प्रशंसित आहेत आणि सुज्ञ सब्रह्मचाऱ्यांद्वारे (सहकाऱ्यांद्वारे) सन्मानित आहेत. आयुष्यमान आनंद भगवंतांनी संक्षेपात सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट करण्यास समर्थ आहेत. तर मग आपण आयुष्यमान आनंदांकडे जावे आणि त्यांच्याकडे जाऊन त्यांना या विषयाचा अर्थ विचारावा.” อถ โข เต ภิกฺขู เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา อานนฺเทน สทฺธึ สมฺโมทึสุ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตทโวจุํ – नंतर ते भिक्षू आयुष्यमान आनंदांकडे गेले. तिथे जाऊन त्यांनी आयुष्यमान आनंदांसोबत कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसल्यावर त्या भिक्षूंनी आयुष्यमान आनंदांना असे म्हटले— ‘‘อิทํ โข โน, อาวุโส อานนฺท, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ‘นาหํ, ภิกฺขเว, คมเนน โลกสฺส อนฺตํ ญาเตยฺยํ, ทฏฺเฐยฺยํ, ปตฺเตยฺยนฺติ วทามิ. น จ ปนาหํ, ภิกฺขเว, อปฺปตฺวา โลกสฺส อนฺตํ ทุกฺขสฺส อนฺตกิริยํ วทามี’ติ. เตสํ โน, อาวุโส, อมฺหากํ อจิรปกฺกนฺตสฺส ภควโต เอตทโหสิ – ‘อิทํ โข โน, อาวุโส, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – นาหํ, ภิกฺขเว, คมเนน โลกสฺส อนฺตํ ญาเตยฺยํ, ทฏฺเฐยฺยํ, ปตฺเตยฺยนฺติ วทามิ. น จ ปนาหํ, ภิกฺขเว, อปฺปตฺวา โลกสฺส อนฺตํ ทุกฺขสฺส อนฺตกิริยํ วทามีติ. โก นุ โข อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภเชยฺยา’ติ? เตสํ โน, อาวุโส, อมฺหากํ เอตทโหสิ – ‘อยํ โข, อาวุโส, อายสฺมา อานนฺโท สตฺถุ เจว สํวณฺณิโต, สมฺภาวิโต จ วิญฺญูนํ สพฺรหฺมจารีนํ. ปโหติ จายสฺมา อานนฺโท อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภชิตุํ. ยํนูน มยํ เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกเมยฺยาม; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยามา’ติ. วิภชตายสฺมา อานนฺโท’’ติ. "आवुसो आनंदा, भगवंतांनी आम्हाला संक्षेपाने हा उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला आहे – 'भिक्खूंनो, मी असे म्हणत नाही की प्रवासाने जगाचा अंत जाणता येतो, पाहता येतो किंवा तिथे पोहोचता येते. परंतु, भिक्खूंनो, जगाच्या अंतापर्यंत न पोहोचता दुःखाचा अंत करता येतो, असेही मी म्हणत नाही.' आवुसो, भगवंत निघून गेल्यावर काही वेळातच आमच्या मनात असा विचार आला – 'भगवंतांनी संक्षेपाने हा उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला आहे... तर मग भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ कोण स्पष्ट करू शकेल?' आवुसो, मग आमच्या मनात असा विचार आला – 'हे आयुष्यमान आनंद तर शास्त्यांद्वारे प्रशंसित आहेत आणि सुज्ञ सब्रह्मचाऱ्यांद्वारे सन्मानित आहेत. आयुष्यमान आनंद भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट करण्यास समर्थ आहेत. तर मग आपण आयुष्यमान आनंदांकडे जावे आणि त्यांना याविषयी विचारावे.' आयुष्यमान आनंदांनी याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट करावा." ‘‘เสยฺยถาปิ, อาวุโส, ปุริโส สารตฺถิโก สารคเวสี สารปริเยสนํ จรมาโน มหโต รุกฺขสฺส ติฏฺฐโต สารวโต อติกฺกมฺเมว, มูลํ อติกฺกมฺเมว, ขนฺธํ สาขาปลาเส สารํ ปริเยสิตพฺพํ มญฺเญยฺย; เอวํ สมฺปทมิทํ อายสฺมนฺตานํ สตฺถริ สมฺมุขีภูเต ตํ ภควนฺตํ อติสิตฺวา [Pg.315] อมฺเห เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺฉิตพฺพํ มญฺญถ. โส หาวุโส, ภควา ชานํ ชานาติ, ปสฺสํ ปสฺสติ – จกฺขุภูโต, ญาณภูโต, ธมฺมภูโต, พฺรหฺมภูโต, วตฺตา, ปวตฺตา, อตฺถสฺส นินฺเนตา, อมตสฺส ทาตา, ธมฺมสฺสามี, ตถาคโต. โส เจว ปเนตสฺส กาโล อโหสิ ยํ ภควนฺตํเยว เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยาถ. ยถา โว ภควา พฺยากเรยฺย ตถา โว ธาเรยฺยาถา’’ติ. "आवुसो, ज्याप्रमाणे एखादा मनुष्य वृक्षाचा गाभा (सार) शोधणारा, गाभ्याच्या शोधात फिरणारा, गाभ्याची इच्छा करणारा असेल, आणि तो एका मोठ्या, भक्कम, गाभा असलेल्या वृक्षाचे मूळ आणि खोड सोडून देऊन, त्याच्या फांद्या आणि पानांमध्ये गाभा शोधण्याचा विचार करेल; त्याचप्रमाणे आयुष्यमानांचे हे वागणे आहे की, शास्ते प्रत्यक्ष समोर असताना, त्या भगवंतांना सोडून तुम्ही आम्हाला या अर्थाविषयी विचारणे योग्य समजत आहात. आवुसो, ते भगवंत जाणण्याजोगे जाणतात, पाहण्याजोगे पाहतात – ते चक्षुभूत, ज्ञानभूत, धम्मभूत, ब्रह्मभूत आहेत; ते वक्ता, प्रवक्ता, अर्थाचे प्रकटीकरण करणारे, अमृताचे दाते, धम्मस्वामी आणि तथागत आहेत. भगवंतांनाच या अर्थाविषयी विचारण्याची तीच योग्य वेळ होती. भगवंत तुम्हाला जसे स्पष्ट करून सांगतील, तसेच तुम्ही ते लक्षात ठेवायला हवे होते." ‘‘อทฺธาวุโส อานนฺท, ภควา ชานํ ชานาติ, ปสฺสํ ปสฺสติ – จกฺขุภูโต, ญาณภูโต, ธมฺมภูโต, พฺรหฺมภูโต, วตฺตา, ปวตฺตา, อตฺถสฺส นินฺเนตา, อมตสฺส ทาตา, ธมฺมสฺสามี, ตถาคโต. โส เจว ปเนตสฺส กาโล อโหสิ ยํ ภควนฺตํเยว เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยาม. ยถา โน ภควา พฺยากเรยฺย ตถา นํ ธาเรยฺยาม. อปิ จายสฺมา อานนฺโท สตฺถุ เจว สํวณฺณิโต, สมฺภาวิโต จ วิญฺญูนํ สพฺรหฺมจารีนํ. ปโหติ จายสฺมา อานนฺโท อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภชิตุํ. วิภชตายสฺมา อานนฺโท อครุํ กริตฺวา’’ติ. "नक्कीच, आवुसो आनंदा, भगवंत जाणण्याजोगे जाणतात, पाहण्याजोगे पाहतात – ते चक्षुभूत, ज्ञानभूत, धम्मभूत, ब्रह्मभूत आहेत; ते वक्ता, प्रवक्ता, अर्थाचे प्रकटीकरण करणारे, अमृताचे दाते, धम्मस्वामी आणि तथागत आहेत. भगवंतांनाच या अर्थाविषयी विचारण्याची तीच योग्य वेळ होती आणि भगवंत आम्हाला जसे स्पष्ट करून सांगतील, तसेच आम्ही ते लक्षात ठेवले असते. तरीही, आयुष्यमान आनंद हे शास्त्यांद्वारे प्रशंसित आहेत आणि सुज्ञ सब्रह्मचाऱ्यांद्वारे सन्मानित आहेत. आयुष्यमान आनंद भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट करण्यास समर्थ आहेत. म्हणून आयुष्यमान आनंदांनी कोणताही संकोच न बाळगता याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट करावा." ‘‘เตนหาวุโส, สุณาถ, สาธุกํ มนสิ กโรถ; ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวมาวุโส’’ติ โข เต ภิกฺขู อายสฺมโต อานนฺทสฺส ปจฺจสฺโสสุํ. อายสฺมา อานนฺโท เอตทโวจ – "तर मग आवुसो, ऐका, चांगल्या प्रकारे मनात धारण करा; मी सांगेन." "होय, आवुसो," असे म्हणून त्या भिक्खूंनी आयुष्यमान आनंदांना प्रतिसाद दिला. आयुष्यमान आनंद म्हणाले – ‘‘ยํ โข โว, อาวุโส, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ‘นาหํ, ภิกฺขเว, คมเนน โลกสฺส อนฺตํ ญาเตยฺยํ, ทฏฺเฐยฺยํ, ปตฺเตยฺยนฺติ วทามิ. น จ ปนาหํ, ภิกฺขเว, อปฺปตฺวา โลกสฺส อนฺตํ ทุกฺขสฺส อนฺตกิริยํ วทามี’ติ, อิมสฺส ขฺวาหํ, อาวุโส, ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานามิ. เยน โข, อาวุโส, โลกสฺมึ โลกสญฺญี โหติ โลกมานี – อยํ วุจฺจติ อริยสฺส วินเย โลโก. เกน จาวุโส, โลกสฺมึ โลกสญฺญี โหติ โลกมานี? จกฺขุนา โข, อาวุโส, โลกสฺมึ โลกสญฺญี โหติ โลกมานี. โสเตน โข, อาวุโส… ฆาเนน โข, อาวุโส… ชิวฺหาย โข, อาวุโส, โลกสฺมึ โลกสญฺญี โหติ โลกมานี[Pg.316]. กาเยน โข, อาวุโส… มเนน โข, อาวุโส, โลกสฺมึ โลกสญฺญี โหติ โลกมานี. เยน โข, อาวุโส, โลกสฺมึ โลกสญฺญี โหติ โลกมานี – อยํ วุจฺจติ อริยสฺส วินเย โลโก. ยํ โข โว, อาวุโส, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ‘นาหํ, ภิกฺขเว, คมเนน โลกสฺส อนฺตํ ญาเตยฺยํ, ทฏฺเฐยฺยํ, ปตฺเตยฺยนฺติ วทามิ. น จ ปนาหํ, ภิกฺขเว, อปฺปตฺวา โลกสฺส อนฺตํ ทุกฺขสฺส อนฺตกิริยํ วทามี’ติ, อิมสฺส ขฺวาหํ, อาวุโส, ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส เอวํ วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานามิ. อากงฺขมานา จ ปน ตุมฺเห อายสฺมนฺโต ภควนฺตํเยว อุปสงฺกมิตฺวา เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยาถ. ยถา โว ภควา พฺยากโรติ ตถา นํ ธาเรยฺยาถา’’ติ. "आवुसो, भगवंतांनी तुम्हाला संक्षेपाने जो उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला आहे – 'भिक्खूंनो, मी असे म्हणत नाही की प्रवासाने जगाचा अंत जाणता येतो, पाहता येतो किंवा तिथे पोहोचता येते. परंतु, भिक्खूंनो, जगाच्या अंतापर्यंत न पोहोचता दुःखाचा अंत करता येतो, असेही मी म्हणत नाही.' आवुसो, भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ मी या प्रकारे जाणतो: आवुसो, ज्याच्याद्वारे या जगात 'जगाची संज्ञा' (लोकसंज्ञा) होते आणि 'जगाची धारणा' (लोकमानी) होते – त्यालाच आर्यांच्या विनयात 'जग' (लोक) म्हटले जाते. आणि आवुसो, कशामुळे या जगात 'जगाची संज्ञा' होते आणि 'जगाची धारणा' होते? आवुसो, डोळ्यामुळे या जगात 'जगाची संज्ञा' होते आणि 'जगाची धारणा' होते. कानामुळे... नाकामुळे... जिभेमुळे या जगात 'जगाची संज्ञा' होते आणि 'जगाची धारणा' होते. शरीरामुळे... मनामुळे या जगात 'जगाची संज्ञा' होते आणि 'जगाची धारणा' होते. आवुसो, ज्याच्याद्वारे या जगात 'जगाची संज्ञा' होते आणि 'जगाची धारणा' होते – त्यालाच आर्यांच्या विनयात 'जग' म्हटले जाते. आवुसो, भगवंतांनी तुम्हाला संक्षेपाने जो उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला आहे – 'भिक्खूंनो, मी असे म्हणत नाही की प्रवासाने जगाचा अंत जाणता येतो, पाहता येतो किंवा तिथे पोहोचता येते. परंतु, भिक्खूंनो, जगाच्या अंतापर्यंत न पोहोचता दुःखाचा अंत करता येतो, असेही मी म्हणत नाही.' या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ मी अशा प्रकारे जाणतो. आता, आयुष्यमानांनो, जर तुमची इच्छा असेल, तर तुम्ही स्वतः भगवंतांकडे जावे आणि त्यांना या अर्थाविषयी विचारावे. भगवंत तुम्हाला जसे स्पष्ट करून सांगतील, तसेच तुम्ही ते लक्षात ठेवावे." ‘‘เอวมาวุโส’’ติ โข เต ภิกฺขู อายสฺมโต อานนฺทสฺส ปฏิสฺสุตฺวา อุฏฺฐายาสนา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – "होय, आवुसो," असे म्हणून त्या भिक्खूंनी आयुष्यमान आनंदांचे म्हणणे मान्य केले आणि आसनावरून उठून जेथे भगवंत होते तेथे ते गेले. तेथे पोहोचून त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या त्या भिक्खूंनी भगवंतांना असे म्हटले – ‘‘ยํ โข โน, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ‘นาหํ, ภิกฺขเว, คมเนน โลกสฺส อนฺตํ ญาเตยฺยํ, ทฏฺเฐยฺยํ, ปตฺเตยฺยนฺติ วทามิ. น จ ปนาหํ, ภิกฺขเว, อปฺปตฺวา โลกสฺส อนฺตํ ทุกฺขสฺส อนฺตกิริยํ วทามี’ติ. เตสํ โน, ภนฺเต, อมฺหากํ อจิรปกฺกนฺตสฺส ภควโต เอตทโหสิ – ‘อิทํ โข โน, อาวุโส, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – นาหํ, ภิกฺขเว, คมเนน โลกสฺส อนฺตํ ญาเตยฺยํ, ทฏฺเฐยฺยํ, ปตฺเตยฺยนฺติ วทามิ. น จ ปนาหํ, ภิกฺขเว, อปฺปตฺวา โลกสฺส อนฺตํ ทุกฺขสฺส อนฺตกิริยํ วทามี’ติ. โก นุ โข อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภเชยฺยาติ? เตสํ โน, ภนฺเต, อมฺหากํ เอตทโหสิ – ‘อยํ โข อายสฺมา อานนฺโท สตฺถุ เจว สํวณฺณิโต, สมฺภาวิโต จ วิญฺญูนํ สพฺรหฺมจารีนํ. ปโหติ จายสฺมา อานนฺโท อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภชิตุํ. ยํนูน มยํ เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกเมยฺยาม; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยามา’ติ. อถ โข มยํ[Pg.317], ภนฺเต, เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกมิมฺห; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺฉิมฺห. เตสํ โน, ภนฺเต, อายสฺมตา อานนฺเทน อิเมหิ อากาเรหิ อิเมหิ ปเทหิ อิเมหิ พฺยญฺชเนหิ อตฺโถ วิภตฺโต’’ติ. “भन्ते, भगवंतांनी आम्हाला संक्षेपाने उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला - ‘भिक्खूहो, मी असे म्हणत नाही की (शारीरिक) गमनाने (चालून) लोकाच्या (विश्वाच्या) अंताला जाणता येते, पाहता येते किंवा पोहोचता येते. परंतु, भिक्खूहो, लोकाच्या अंताला न पोहोचता दुःखाचा अंत (दुःखमुक्ती) करता येतो, असेही मी म्हणत नाही.’ भगवंतांच्या निघून गेल्यानंतर लवकरच आमच्या मनात असा विचार आला - ‘आयुष्यांनो, भगवंतांनी आम्हाला संक्षेपाने उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला - ... आता भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ कोण स्पष्ट करू शकेल?’ भन्ते, तेव्हा आमच्या मनात असा विचार आला - ‘हे आयुष्यमान आनंद शास्त्यांद्वारे (बुद्धांद्वारे) प्रशंसित आहेत आणि सुज्ञ सब्रह्मचाऱ्यांद्वारे सन्मानित आहेत. आयुष्यमान आनंद भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट करण्यास समर्थ आहेत. तर मग आपण आयुष्यमान आनंदांकडे जावे आणि त्यांना या उपदेशाचा अर्थ विचारावा.’ भन्ते, त्यानंतर आम्ही आयुष्यमान आनंदांकडे गेलो आणि त्यांना या उपदेशाचा अर्थ विचारला. भन्ते, आयुष्यमान आनंदांनी या कारणांनी, या पदांनी आणि या व्यंजनांनी (शब्दांनी) आम्हाला याचा अर्थ सविस्तर स्पष्ट करून सांगितला आहे.” ‘‘ปณฺฑิโต, ภิกฺขเว, อานนฺโท; มหาปญฺโญ, ภิกฺขเว, อานนฺโท! มํ เจปิ ตุมฺเห, ภิกฺขเว, เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยาถ, อหมฺปิ ตํ เอวเมวํ พฺยากเรยฺยํ ยถา ตํ อานนฺเทน พฺยากตํ. เอโส เจเวตสฺส อตฺโถ, เอวญฺจ นํ ธาเรยฺยาถา’’ติ. ตติยํ. “भिक्खूहो, आनंद पंडित आहे; भिक्खूहो, आनंद महाप्रज्ञ आहे! भिक्खूहो, जर तुम्ही मलाही हाच अर्थ विचारला असता, तर मीसुद्धा त्याचे तसेच स्पष्टीकरण दिले असते जसे आनंदाने दिले आहे. हाच याचा खरा अर्थ आहे आणि तुम्ही तो असाच लक्षात ठेवावा.” (तिसरे सूत्र समाप्त.) ๔. กามคุณสุตฺตํ ४. कामगुणसुत्त ๑๑๗. ‘‘ปุพฺเพว เม, ภิกฺขเว, สมฺโพธา อนภิสมฺพุทฺธสฺส โพธิสตฺตสฺเสว สโต เอตทโหสิ – ‘เยเม ปญฺจ กามคุณา เจตโส สมฺผุฏฺฐปุพฺพา อตีตา นิรุทฺธา วิปริณตา, ตตฺร เม จิตฺตํ พหุลํ คจฺฉมานํ คจฺเฉยฺย ปจฺจุปฺปนฺเนสุ วา อปฺปํ วา อนาคเตสุ’. ตสฺส มยฺหํ, ภิกฺขเว, เอตทโหสิ – ‘เยเม ปญฺจ กามคุณา เจตโส สมฺผุฏฺฐปุพฺพา อตีตา นิรุทฺธา วิปริณตา, ตตฺร เม อตฺตรูเปน อปฺปมาโท สติ เจตโส อารกฺโข กรณีโย’. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ตุมฺหากมฺปิ เย เต ปญฺจ กามคุณา เจตโส สมฺผุฏฺฐปุพฺพา อตีตา นิรุทฺธา วิปริณตา, ตตฺร โว จิตฺตํ พหุลํ คจฺฉมานํ คจฺเฉยฺย ปจฺจุปฺปนฺเนสุ วา อปฺปํ วา อนาคเตสุ. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ตุมฺหากมฺปิ เย เต ปญฺจ กามคุณา เจตโส สมฺผุฏฺฐปุพฺพา อตีตา นิรุทฺธา วิปริณตา, ตตฺร โว อตฺตรูเปหิ อปฺปมาโท สติ เจตโส อารกฺโข กรณีโย. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, เส อายตเน เวทิตพฺเพ ยตฺถ จกฺขุ จ นิรุชฺฌติ, รูปสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ ชิวฺหา จ นิรุชฺฌติ, รสสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ มโน จ นิรุชฺฌติ, ธมฺมสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ’’ติ. อิทํ วตฺวา ภควา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปาวิสิ. ११७. “भिक्खूहो, संबोधी प्राप्त होण्यापूर्वी, मी जेव्हा अनुत्पन्नज्ञान बोधिसत्वच होतो, तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला - ‘माझ्या चित्ताने पूर्वी अनुभवलेले, जे आता भूतकाळात जमा झाले आहेत, निरुद्ध झाले आहेत आणि बदलून गेले आहेत, अशा पाच कामगुणांकडे माझे चित्त वारंवार धाव घेईल, किंवा वर्तमानकाळातील कामगुणांकडे धाव घेईल, अथवा भविष्यकाळातील कामगुणांकडे थोडेफार धाव घेईल.’ भिक्खूहो, तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला - ‘माझ्या चित्ताने पूर्वी अनुभवलेले, जे आता भूतकाळात जमा झाले आहेत, निरुद्ध झाले आहेत आणि बदलून गेले आहेत, अशा पाच कामगुणांच्या बाबतीत मी स्वतःच्या कल्याणासाठी अप्रमाद (जागरूकता), स्मृती (सती) ठेवून चित्ताचे रक्षण केले पाहिजे.’ म्हणून, भिक्खूहो, तुमच्या बाबतीतही, तुमच्या चित्ताने पूर्वी अनुभवलेले, जे आता भूतकाळात जमा झाले आहेत, निरुद्ध झाले आहेत आणि बदलून गेले आहेत, अशा पाच कामगुणांकडे तुमचे चित्त वारंवार धाव घेईल, किंवा वर्तमानकाळातील कामगुणांकडे धाव घेईल, अथवा भविष्यकाळातील कामगुणांकडे थोडेफार धाव घेईल. म्हणून, भिक्खूहो, तुमच्या चित्ताने पूर्वी अनुभवलेले, जे आता भूतकाळात जमा झाले आहेत, निरुद्ध झाले आहेत आणि बदलून गेले आहेत, अशा पाच कामगुणांच्या बाबतीत तुम्ही स्वतःच्या कल्याणासाठी अप्रमाद (जागरूकता), स्मृती (सती) ठेवून चित्ताचे रक्षण केले पाहिजे. म्हणून, भिक्खूहो, ते आयतन (स्थान) जाणले पाहिजे, जिथे चक्षू (डोळा) निरुद्ध होतो आणि रूपसंज्ञा निरुद्ध होते; ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जिथे जिव्हा (जीभ) निरुद्ध होते आणि रससंज्ञा निरुद्ध होते; ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जिथे मन निरुद्ध होते आणि धम्मसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे.” असे बोलून भगवंत आसनावरून उठले आणि विहारात गेले. อถ โข เตสํ ภิกฺขูนํ อจิรปกฺกนฺตสฺส ภควโต เอตทโหสิ – ‘‘อิทํ โข โน, อาวุโส, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ‘ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, เส อายตเน เวทิตพฺเพ ยตฺถ จกฺขุ จ นิรุชฺฌติ, รูปสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ ชิวฺหา จ นิรุชฺฌติ, รสสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส [Pg.318] อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ มโน จ นิรุชฺฌติ, ธมฺมสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ’ติ. โก นุ โข อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภเชยฺยา’’ติ? त्यानंतर, भगवंतांच्या निघून गेल्यानंतर लवकरच त्या भिक्खूंच्या मनात असा विचार आला - “आयुष्यांनो, भगवंतांनी आम्हाला संक्षेपाने उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला - ‘म्हणून, भिक्खूहो, ते आयतन जाणले पाहिजे, जिथे चक्षू निरुद्ध होतो आणि रूपसंज्ञा निरुद्ध होते; ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जिथे जिव्हा निरुद्ध होते आणि रससंज्ञा निरुद्ध होते; ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जिथे मन निरुद्ध होते आणि धम्मसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे.’ आता भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ कोण स्पष्ट करू शकेल?” อถ โข เตสํ ภิกฺขูนํ เอตทโหสิ – ‘‘อยํ โข อายสฺมา อานนฺโท สตฺถุ เจว สํวณฺณิโต, สมฺภาวิโต จ วิญฺญูนํ สพฺรหฺมจารีนํ. ปโหติ จายสฺมา อานนฺโท อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภชิตุํ. ยํนูน มยํ เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกเมยฺยาม; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยามา’’ติ. त्यानंतर त्या भिक्खूंच्या मनात असा विचार आला - “हे आयुष्यमान आनंद शास्त्यांद्वारे प्रशंसित आहेत आणि सुज्ञ सब्रह्मचाऱ्यांद्वारे सन्मानित आहेत. आयुष्यमान आनंद भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट करण्यास समर्थ आहेत. तर मग आपण आयुष्यमान आनंदांकडे जावे आणि त्यांना या उपदेशाचा अर्थ विचारावा.” อถ โข เต ภิกฺขู เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา อานนฺเทน สทฺธึ สมฺโมทึสุ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตทโวจุํ – त्यानंतर ते भिक्खू आयुष्यमान आनंदांकडे गेले. तिथे पोहोचून त्यांनी आयुष्यमान आनंदांशी कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण आटोपून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसल्यानंतर त्या भिक्खूंनी आयुष्यमान आनंदांना असे म्हटले - ‘‘อิทํ โข โน, อาวุโส อานนฺท, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ‘ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, เส อายตเน เวทิตพฺเพ ยตฺถ จกฺขุ จ นิรุชฺฌติ, รูปสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ ชิวฺหา จ นิรุชฺฌติ, รสสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ มโน จ นิรุชฺฌติ, ธมฺมสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ’ติ. เตสํ โน, อาวุโส, อมฺหากํ อจิรปกฺกนฺตสฺส ภควโต เอตทโหสิ – ‘อิทํ โข โน, อาวุโส, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, เส อายตเน เวทิตพฺเพ ยตฺถ จกฺขุ จ นิรุชฺฌติ, รูปสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ ชิวฺหา จ นิรุชฺฌติ, รสสญฺญา จ นิรุชฺฌติ เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ มโน จ นิรุชฺฌติ, ธมฺมสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ’ติ. โก นุ โข อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภเชยฺยาติ? เตสํ โน, อาวุโส, อมฺหากํ เอตทโหสิ – ‘อยํ โข อายสฺมา อานนฺโท สตฺถุ เจว สํวณฺณิโต, สมฺภาวิโต จ วิญฺญูนํ สพฺรหฺมจารีนํ. ปโหติ จายสฺมา อานนฺโท อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน [Pg.319] อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภชิตุํ. ยํนูน มยํ เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกเมยฺยาม; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยามา’ติ. วิภชตายสฺมา อานนฺโท’’ติ. “हे आवुसो आनंद, भगवंतांनी आम्हाला संक्षेपाने हा उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला आहे – ‘म्हणूनच, भिक्खूंनो, ते आयतन जाणले पाहिजे, जेथे चक्षू निरुद्ध होतो आणि रूपसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जेथे जिव्हा निरुद्ध होते आणि रससंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जेथे मन निरुद्ध होते आणि धम्मसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे.’ आवुसो, भगवंतांच्या निघून गेल्यानंतर लवकरच आमच्या मनात असा विचार आला – ‘भगवंतांनी आम्हाला संक्षेपाने हा उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला आहे – म्हणूनच, भिक्खूंनो, ते आयतन जाणले पाहिजे, जेथे चक्षू निरुद्ध होतो आणि रूपसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जेथे जिव्हा निरुद्ध होते आणि रससंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जेथे मन निरुद्ध होते आणि धम्मसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे.’ भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ कोण बरे स्पष्ट करू शकेल? मग आवुसो, आमच्या मनात असा विचार आला – ‘हे आयुष्यमान आनंद शास्त्यांद्वारे प्रशंसित आहेत आणि सुज्ञ सब्रह्मचाऱ्यांद्वारे सन्मानित आहेत. आयुष्यमान आनंद भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट करण्यास समर्थ आहेत. तर मग आपण आयुष्यमान आनंदांकडे जावे आणि त्यांना याविषयी विचारावे.’ आयुष्यमान आनंदांनी याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट करावा.” ‘‘เสยฺยถาปิ, อาวุโส, ปุริโส สารตฺถิโก สารคเวสี สารปริเยสนํ จรมาโน มหโต รุกฺขสฺส…เป… วิภชตายสฺมา อานนฺโท อครุํ กริตฺวาติ. “ज्याप्रमाणे, आवुसो, एखादा साराची इच्छा करणारा, साराचा शोध घेणारा आणि साराच्या शोधात फिरणारा मनुष्य एखाद्या मोठ्या वृक्षाच्या... पे... आयुष्यमान आनंदांनी संकोच न बाळगता याचा अर्थ स्पष्ट करावा.” ‘‘เตนหาวุโส, สุณาถ, สาธุกํ มนสิ กโรถ; ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวมาวุโส’’ติ โข เต ภิกฺขู อายสฺมโต อานนฺทสฺส ปจฺจสฺโสสุํ. อายสฺมา อานนฺโท เอตทโวจ – “तर मग आवुसो, ऐका, नीट मनन करा; मी सांगेन.” “तसेच आवुसो,” असे म्हणून त्या भिक्खूंनी आयुष्यमान आनंदांना प्रतिसाद दिला. आयुष्यमान आनंद म्हणाले – ‘‘ยํ โข โว, อาวุโส, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ‘ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, เส อายตเน เวทิตพฺเพ ยตฺถ จกฺขุ จ นิรุชฺฌติ, รูปสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ มโน จ นิรุชฺฌติ, ธมฺมสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ’ติ. อิมสฺส ขฺวาหํ, อาวุโส, ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานามิ. สฬายตนนิโรธํ โน เอตํ, อาวุโส, ภควตา สนฺธาย ภาสิตํ – ‘ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, เส อายตเน เวทิตพฺเพ, ยตฺถ จกฺขุ จ นิรุชฺฌติ, รูปสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ มโน จ นิรุชฺฌติ, ธมฺมสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ’ติ. อยํ โข, อาวุโส, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ‘ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, เส อายตเน เวทิตพฺเพ ยตฺถ จกฺขุ จ นิรุชฺฌติ, รูปสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ มโน จ นิรุชฺฌติ, ธมฺมสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ’ติ. อิมสฺส ขฺวาหํ, อาวุโส, ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส เอวํ วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานามิ. อากงฺขมานา จ ปน ตุมฺเห อายสฺมนฺโต ภควนฺตํเยว อุปสงฺกมถ; อุปสงฺกมิตฺวา เอตมตฺถํ ปุจฺเฉยฺยาถ. ยถา โว ภควา พฺยากโรติ ตถา นํ ธาเรยฺยาถา’’ติ. “आवुसो, भगवंतांनी तुम्हाला संक्षेपाने जो उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला आहे – ‘म्हणूनच, भिक्खूंनो, ते आयतन जाणले पाहिजे, जेथे चक्षू निरुद्ध होतो आणि रूपसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जेथे मन निरुद्ध होते आणि धम्मसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे.’ आवुसो, भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ मी या प्रकारे समजतो. आवुसो, भगवंतांनी हे षडायतन-निरोधाला उद्देशून म्हटले आहे – ‘म्हणूनच, भिक्खूंनो, ते आयतन जाणले पाहिजे, जेथे चक्षू निरुद्ध होतो आणि रूपसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जेथे मन निरुद्ध होते आणि धम्मसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे.’ आवुसो, भगवंतांनी संक्षेपाने हा उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला आहे – ‘म्हणूनच, भिक्खूंनो, ते आयतन जाणले पाहिजे, जेथे चक्षू निरुद्ध होतो आणि रूपसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जेथे मन निरुद्ध होते आणि धम्मसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे.’ भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ मी अशा प्रकारे समजतो. परंतु, आयुष्यमान हो, जर तुमची इच्छा असेल, तर तुम्ही भगवंतांकडेच जावे आणि त्यांना याविषयी विचारावे. भगवंत तुम्हाला जसे स्पष्ट करून सांगतील, तसेच तुम्ही ते लक्षात ठेवावे.” ‘‘เอวมาวุโส’’ติ [Pg.320] โข เต ภิกฺขู อายสฺมโต อานนฺทสฺส ปฏิสฺสุตฺวา อุฏฺฐายาสนา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – “तसेच आवुसो,” असे म्हणून त्या भिक्खूंनी आयुष्यमान आनंदांचे म्हणणे मान्य केले आणि आसनावरून उठून जेथे भगवंत होते तेथे गेले. तेथे जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या त्या भिक्खूंनी भगवंतांना असे म्हटले – ‘‘ยํ โข โน, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ‘ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, เส อายตเน เวทิตพฺเพ ยตฺถ จกฺขุ จ นิรุชฺฌติ, รูปสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ ชิวฺหา จ นิรุชฺฌติ, รสสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ มโน จ นิรุชฺฌติ, ธมฺมสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ’ติ, เตสํ โน, ภนฺเต, อมฺหากํ อจิรปกฺกนฺตสฺส ภควโต เอตทโหสิ – ‘อิทํ โข โน, อาวุโส, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, เส อายตเน เวทิตพฺเพ ยตฺถ จกฺขุ จ นิรุชฺฌติ, รูปสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ มโน จ นิรุชฺฌติ, ธมฺมสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ’ติ. ‘โก นุ โข อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภเชยฺยา’ติ? เตสํ โน, ภนฺเต, อมฺหากํ เอตทโหสิ – ‘อยํ โข อายสฺมา อานนฺโท สตฺถุ เจว สํวณฺณิโต, สมฺภาวิโต จ วิญฺญูนํ สพฺรหฺมจารีนํ. ปโหติ จายสฺมา อานนฺโท อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภชิตุํ. ยํนูน มยํ เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกเมยฺยาม; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยามา’ติ. อถ โข มยํ, ภนฺเต, เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกมิมฺห; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺฉิมฺห. เตสํ โน, ภนฺเต, อายสฺมตา อานนฺเทน อิเมหิ อากาเรหิ, อิเมหิ ปเทหิ, อิเมหิ พฺยญฺชเนหิ อตฺโถ วิภตฺโต’’ติ. “भन्ते! भगवंतांनी आम्हाला संक्षेपाने जो उपदेश केला आणि त्याचा सविस्तर अर्थ न सांगता आपल्या आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला – ‘म्हणूनच, भिक्खून्नों, ते आयतन जाणले पाहिजे, जेथे चक्षूचा निरोध होतो आणि रूपसंज्ञेचा निरोध होतो; ते आयतन जाणले पाहिजे...पे... जेथे जिव्हेचा निरोध होतो आणि रससंज्ञेचा निरोध होतो; ते आयतन जाणले पाहिजे...पे... जेथे मनाचा निरोध होतो आणि धम्मसंज्ञेचा निरोध होतो, ते आयतन जाणले पाहिजे’ – भन्ते, भगवंतांच्या निघून गेल्यानंतर लगेचच आमच्या मनात असा विचार आला – ‘आयुष्यमानांनो! भगवंतांनी संक्षेपाने उपदेश केला आणि त्याचा सविस्तर अर्थ न सांगता आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला – म्हणूनच, भिक्खून्नों, ते आयतन जाणले पाहिजे जेथे चक्षूचा निरोध होतो आणि रूपसंज्ञेचा निरोध होतो...पे... जेथे मनाचा निरोध होतो आणि धम्मसंज्ञेचा निरोध होतो, ते आयतन जाणले पाहिजे.’ ‘भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ कोण बरे स्पष्ट करू शकेल?’ भन्ते, तेव्हा आमच्या मनात असा विचार आला – ‘हे आयुष्यमान आनंद शास्त्यांद्वारे प्रशंसित आहेत आणि सुज्ञ सब्रह्मचाऱ्यांद्वारे सन्मानित आहेत. आयुष्यमान आनंद भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट करण्यास समर्थ आहेत. तर मग आपण आयुष्यमान आनंदांकडे जावे आणि त्यांना याविषयी विचारावे.’ त्यानंतर, भन्ते, आम्ही आयुष्यमान आनंदांकडे गेलो आणि त्यांना या अर्थाविषयी विचारले. भन्ते, आयुष्यमान आनंदांनी या प्रकारांनी, या पदांनी आणि या व्यंजनांनी आम्हाला हा अर्थ सविस्तर स्पष्ट करून सांगितला.” ‘‘ปณฺฑิโต, ภิกฺขเว, อานนฺโท; มหาปญฺโญ, ภิกฺขเว, อานนฺโท! มํ เจปิ ตุมฺเห, ภิกฺขเว, เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยาถ, อหมฺปิ ตํ เอวเมวํ พฺยากเรยฺยํ ยถา ตํ อานนฺเทน พฺยากตํ. เอโส เจเวตสฺส อตฺโถ. เอวญฺจ นํ ธาเรยฺยาถา’’ติ. จตุตฺถํ. “भिक्खून्नों, आनंद पंडित आहे; भिक्खून्नों, आनंद महाप्रज्ञ आहे! जर तुम्ही मलाही या अर्थाविषयी विचारले असते, तर मीसुद्धा त्याचे तसेच स्पष्टीकरण दिले असते जसे आनंदाने दिले आहे. हाच याचा खरा अर्थ आहे. आणि तुम्ही तो असाच लक्षात ठेवावा.” चौथे. ๕. สกฺกปญฺหสุตฺตํ ५. सक्कपञ्हसुत्त ๑๑๘. เอกํ [Pg.321] สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ คิชฺฌกูเฏ ปพฺพเต. อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข สกฺโก เทวานมินฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘โก นุ โข, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ? โก ปน, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ? ११८. एकदा भगवान राजगृह येथे गिज्झकूट पर्वतावर विहार करत होते. तेव्हा देवांचा राजा सक्क जेथे भगवान होते तेथे आला; आल्यानंतर भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेला देवांचा राजा सक्क भगवंतांना म्हणाला – “भन्ते! असे कोणते कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करू शकत नाहीत? आणि भन्ते, असे कोणते कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात?” ‘‘สนฺติ โข, เทวานมินฺท, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ ตทุปาทานํ. สอุปาทาโน, เทวานมินฺท, ภิกฺขุ โน ปรินิพฺพายติ…เป…. “देवेन्द्रा! चक्षूने जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यात आसक्त होऊन राहतो, तर त्या आनंद मानणाऱ्या, स्वागत करणाऱ्या आणि आसक्त होऊन राहणाऱ्या भिक्खूचे विज्ञान त्यावर आश्रित होते आणि त्याचे उपादान बनते. देवेन्द्रा! उपादानयुक्त भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करू शकत नाही...पे... ‘‘สนฺติ โข, เทวานมินฺท, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ โข, เทวานมินฺท, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ ตทุปาทานํ. สอุปาทาโน, เทวานมินฺท, ภิกฺขุ โน ปรินิพฺพายติ. อยํ โข, เทวานมินฺท, เหตุ, อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ. “देवेन्द्रा! जिव्हेने जाणता येण्याजोगे रस आहेत...पे... देवेन्द्रा! मनाने जाणता येण्याजोगे धम्म आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यात आसक्त होऊन राहतो, तर त्या आनंद मानणाऱ्या, स्वागत करणाऱ्या आणि आसक्त होऊन राहणाऱ्या भिक्खूचे विज्ञान त्यावर आश्रित होते आणि त्याचे उपादान बनते. देवेन्द्रा! उपादानयुक्त भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करू शकत नाही. देवेन्द्रा! हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करू शकत नाहीत. ‘‘สนฺติ จ โข, เทวานมินฺท, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต น ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ, น ตทุปาทานํ. อนุปาทาโน, เทวานมินฺท, ภิกฺขุ ปรินิพฺพายติ…เป…. “परंतु देवेन्द्रा! चक्षूने जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर त्या आनंद न मानणाऱ्या, स्वागत न करणाऱ्या आणि आसक्त न राहणाऱ्या भिक्खूचे विज्ञान त्यावर आश्रित होत नाही आणि त्याचे उपादानही होत नाही. देवेन्द्रा! उपादानरहित भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करतो...पे... ‘‘สนฺติ โข, เทวานมินฺท, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ โข, เทวานมินฺท, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต น ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ น ตทุปาทานํ. อนุปาทาโน, เทวานมินฺท, ภิกฺขุ [Pg.322] ปรินิพฺพายติ. อยํ โข, เทวานมินฺท, เหตุ, อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ. ปญฺจมํ. “देवेन्द्रा! जिव्हेने जाणता येण्याजोगे रस आहेत...पे... देवेन्द्रा! मनाने जाणता येण्याजोगे धम्म आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर त्या आनंद न मानणाऱ्या, स्वागत न करणाऱ्या आणि आसक्त न राहणाऱ्या भिक्खूचे विज्ञान त्यावर आश्रित होत नाही आणि त्याचे उपादानही होत नाही. देवेन्द्रा! उपादानरहित भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करतो. देवेन्द्रा! हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात.” पाचवे. ๖. ปญฺจสิขสุตฺตํ ६. पञ्चसिखसुत्त ๑๑๙. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ คิชฺฌกูเฏ ปพฺพเต. อถ โข ปญฺจสิโข คนฺธพฺพเทวปุตฺโต เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข ปญฺจสิโข คนฺธพฺพเทวปุตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘โก นุ โข, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ? โก ปน, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ? ‘‘สนฺติ โข, ปญฺจสิข, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา…เป… สนฺติ โข, ปญฺจสิข, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ ตทุปาทานํ. สอุปาทาโน, ปญฺจสิข, ภิกฺขุ โน ปรินิพฺพายติ. อยํ โข, ปญฺจสิข, เหตุ, อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ’’. ११९. एकदा भगवान राजगृह येथे गृध्रकूट पर्वतावर विहार करत होते. तेव्हा पंचशिख नावाचा गंधर्वदेवपुत्र जेथे भगवान होते तेथे आला; जवळ येऊन भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेला पंचशिख गंधर्वदेवपुत्र भगवंतांना म्हणाला – "भन्ते, काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करत नाहीत? आणि भन्ते, काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात?" "पंचशिख, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत... तसेच पंचशिख, मनाने जाणता येण्याजोगे असे धर्म आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यातच आसक्त होऊन राहतो, तर त्या अभिनंदन करणाऱ्या, स्वागत करणाऱ्या आणि आसक्त होऊन राहणाऱ्या भिक्खूचे विज्ञान त्यावरच आश्रित होते आणि त्याचे उपादान बनते. पंचशिख, उपादानयुक्त असलेला भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करत नाही. पंचशिख, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करत नाहीत." ‘‘สนฺติ จ โข, ปญฺจสิข, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา…เป… สนฺติ โข, ปญฺจสิข, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ, ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต น ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ, น ตทุปาทานํ. อนุปาทาโน, ปญฺจสิข, ภิกฺขุ ปรินิพฺพายติ. อยํ โข, ปญฺจสิข, เหตุ, อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ. ฉฏฺฐํ. "परंतु पंचशिख, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत जे इष्ट, कांत, मनाजोगे आहेत... तसेच पंचशिख, मनाने जाणता येण्याजोगे असे धर्म आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर त्या अभिनंदन न करणाऱ्या, स्वागत न करणाऱ्या आणि आसक्त न होऊन राहणाऱ्या भिक्खूचे विज्ञान त्यावर आश्रित होत नाही आणि त्याचे उपादानही होत नाही. पंचशिख, उपादानरहित भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करतो. पंचशिख, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात." (सहावे सुत्त समाप्त.) ๗. สาริปุตฺตสทฺธิวิหาริกสุตฺตํ ७. सारिपुत्तसद्धिविहारिक सुत्त ๑๒๐. เอกํ สมยํ อายสฺมา สาริปุตฺโต สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยนายสฺมา สาริปุตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา สาริปุตฺเตน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โส ภิกฺขุ อายสฺมนฺตํ สาริปุตฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สทฺธิวิหาริโก[Pg.323], อาวุโส สาริปุตฺต, ภิกฺขุ สิกฺขํ ปจฺจกฺขาย หีนายาวตฺโต’’ติ. १२०. एकदा आयुष्यमान सारिपुत्त सावत्थी येथे अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेव्हा एक भिक्खू जेथे आयुष्यमान सारिपुत्त होते तेथे आला; जवळ येऊन त्याने आयुष्यमान सारिपुत्तांशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला तो भिक्खू आयुष्यमान सारिपुत्तांना म्हणाला – "आवुसो सारिपुत्त, तुमचा सद्धिविहारिक भिक्खू शिक्षेचा (शील-नियमांचा) त्याग करून हीन गृहस्थाश्रमात परतला आहे." ‘‘เอวเมตํ, อาวุโส, โหติ อินฺทฺริเยสุ อคุตฺตทฺวารสฺส, โภชเน อมตฺตญฺญุโน, ชาคริยํ อนนุยุตฺตสฺส. ‘โส วตาวุโส, ภิกฺขุ อินฺทฺริเยสุ อคุตฺตทฺวาโร โภชเน อมตฺตญฺญู ชาคริยํ อนนุยุตฺโต ยาวชีวํ ปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ สนฺตาเนสฺสตี’ติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. ‘โส วตาวุโส, ภิกฺขุ อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวาโร, โภชเน มตฺตญฺญู, ชาคริยํ อนุยุตฺโต ยาวชีวํ ปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ สนฺตาเนสฺสตี’ติ ฐานเมตํ วิชฺชติ. "आवुसो, ज्याचे इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित नाही, जो भोजनात मात्रा (प्रमाण) जाणत नाही आणि जो जागृत राहण्यात तत्पर नाही, त्याच्या बाबतीत असेच घडते. 'आवुसो, जो भिक्खू इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित न ठेवणारा, भोजनात प्रमाण न जाणणारा आणि जागृत राहण्यात तत्पर नसलेला आहे, तो आयुष्यभर परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध ब्रह्मचर्याचे पालन करू शकेल' – हे शक्य नाही. परंतु, 'आवुसो, जो भिक्खू इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवणारा, भोजनात प्रमाण जाणणारा आणि जागृत राहण्यात तत्पर असलेला आहे, तो आयुष्यभर परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध ब्रह्मचर्याचे पालन करू शकेल' – हे शक्य आहे." ‘‘กถญฺจาวุโส, อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวาโร โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา น นิมิตฺตคฺคาหี โหติ นานุพฺยญฺชนคฺคาหี. ยตฺวาธิกรณเมนํ จกฺขุนฺทฺริยํ อสํวุตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อนฺวาสฺสเวยฺยุํ ตสฺส สํวราย ปฏิปชฺชติ, รกฺขติ จกฺขุนฺทฺริยํ, จกฺขุนฺทฺริเย สํวรํ อาปชฺชติ. โสเตน สทฺทํ สุตฺวา… ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตฺวา… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา… กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสิตฺวา… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย น นิมิตฺตคฺคาหี โหติ นานุพฺยญฺชนคฺคาหี. ยตฺวาธิกรณเมนํ มนินฺทฺริยํ อสํวุตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อนฺวาสฺสเวยฺยุํ, ตสฺส สํวราย ปฏิปชฺชติ, รกฺขติ มนินฺทฺริยํ, มนินฺทฺริเย สํวรํ อาปชฺชติ. เอวํ โข, อาวุโส, อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวาโร โหติ. "आणि आवुसो, भिक्खू इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवणारा कसा होतो? आवुसो, या शासनात भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहून त्याच्या बाह्य लक्षणांचे ग्रहण करत नाही आणि त्याच्या उप-लक्षणांचेही ग्रहण करत नाही. कारण जर त्याने चक्षुरिंद्रिय असंयत (असुरक्षित) ठेवून विहार केला, तर अभिज्झा (लोभ) आणि दोमनस्स (दौर्मनस्य/दुःख) हे पापी अकुशल धर्म त्याच्यावर प्रभाव पाडू शकतील; म्हणून तो त्याच्या संवरासाठी प्रयत्न करतो, चक्षुरिंद्रियाचे रक्षण करतो आणि चक्षुरिंद्रियाचा संवर प्राप्त करतो. कानाने शब्द ऐकून... नाकाने गंध घेऊन... जिभेने रस चाखून... शरीराने स्पर्श अनुभवून... मनाने धर्म (विचार) जाणून तो बाह्य लक्षणांचे ग्रहण करत नाही आणि उप-लक्षणांचेही ग्रहण करत नाही. कारण जर त्याने मनेंद्रिय असंयत ठेवून विहार केला, तर अभिज्झा आणि दोमनस्स हे पापी अकुशल धर्म त्याच्यावर प्रभाव पाडू शकतील; म्हणून तो त्याच्या संवरासाठी प्रयत्न करतो, मनेंद्रियाचे रक्षण करतो आणि मनेंद्रियाचा संवर प्राप्त करतो. आवुसो, अशा प्रकारे भिक्खू इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवणारा होतो." ‘‘กถญฺจาวุโส, โภชเน มตฺตญฺญู โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ ปฏิสงฺขา โยนิโส อาหารํ อาหาเรติ – ‘เนว ทวาย, น มทาย, น มณฺฑนาย, น วิภูสนาย, ยาวเทว อิมสฺส กายสฺส ฐิติยา ยาปนาย, วิหึสูปรติยา, พฺรหฺมจริยานุคฺคหาย. อิติ ปุราณญฺจ เวทนํ ปฏิหงฺขามิ, นวญฺจ เวทนํ น อุปฺปาเทสฺสามิ, ยาตฺรา จ เม ภวิสฺสติ, อนวชฺชตา จ ผาสุวิหาโร จา’ติ. เอวํ โข, อาวุโส, โภชเน มตฺตญฺญู โหติ. "आणि आवुसो, भिक्खू भोजनात प्रमाण जाणणारा कसा होतो? आवुसो, या शासनात भिक्खू विचारपूर्वक आणि योग्य प्रकारे विचार करून भोजन ग्रहण करतो – 'खेळ-मजेसाठी नाही, मदासाठी नाही, शरीराच्या सुशोभीकरणासाठी नाही, केवळ या शरीराच्या स्थितीसाठी, त्याच्या रक्षणासाठी, भुकेची पीडा शांत करण्यासाठी आणि ब्रह्मचर्याला साहाय्य करण्यासाठी. अशा प्रकारे मी जुन्या वेदनेचा (भुकेचा) नाश करीन आणि नवीन वेदना (अतिभोजनाची पीडा) उत्पन्न होऊ देणार नाही; माझी जीवनयात्रा सुरळीत चालेल, मी निर्दोष राहीन आणि सुखाने विहार करीन.' आवुसो, अशा प्रकारे भिक्खू भोजनात प्रमाण जाणणारा होतो." ‘‘กถญฺจาวุโส, ชาคริยํ อนุยุตฺโต โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ ทิวสํ จงฺกเมน นิสชฺชาย อาวรณีเยหิ ธมฺเมหิ จิตฺตํ ปริโสเธติ. รตฺติยา ปฐมํ ยามํ จงฺกเมน นิสชฺชาย อาวรณีเยหิ ธมฺเมหิ จิตฺตํ ปริโสเธติ. รตฺติยา มชฺฌิมํ ยามํ ทกฺขิเณน ปสฺเสน สีหเสยฺยํ กปฺเปติ ปาเท ปาทํ อจฺจาธาย สโต สมฺปชาโน, อุฏฺฐานสญฺญํ มนสิ กริตฺวา. รตฺติยา ปจฺฉิมํ ยามํ ปจฺจุฏฺฐาย จงฺกเมน นิสชฺชาย อาวรณีเยหิ ธมฺเมหิ จิตฺตํ ปริโสเธติ. เอวํ โข, อาวุโส, ชาคริยํ [Pg.324] อนุยุตฺโต โหติ. ตสฺมาติหาวุโส, เอวํ สิกฺขิตพฺพํ – ‘อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวารา ภวิสฺสาม, โภชเน มตฺตญฺญุโน, ชาคริยํ อนุยุตฺตา’ติ. เอวญฺหิ โว, อาวุโส, สิกฺขิตพฺพ’’นฺติ. สตฺตมํ. "आणि आवुसो, भिक्खू जागृत राहण्यात तत्पर कसा होतो? आवुसो, या शासनात भिक्खू दिवसा चंक्रमण (चालणे) आणि बसून राहण्याद्वारे मनाला अडथळा आणणाऱ्या (आवरणीय) धर्मांपासून शुद्ध करतो. रात्रीच्या पहिल्या प्रहरात चंक्रमण आणि बसून राहण्याद्वारे मनाला अडथळा आणणाऱ्या धर्मांपासून शुद्ध करतो. रात्रीच्या मध्यम प्रहरात उजव्या कुशीवर, एका पायावर दुसरा पाय ठेवून, स्मृती आणि संप्रजन्य (जागरूकता) ठेवून, उठण्याची संज्ञा मनात ठेवून सिंहशय्या धारण करतो. रात्रीच्या अंतिम प्रहरात लवकर उठून चंक्रमण आणि बसून राहण्याद्वारे मनाला अडथळा आणणाऱ्या धर्मांपासून शुद्ध करतो. आवुसो, अशा प्रकारे भिक्खू जागृत राहण्यात तत्पर होतो. म्हणूनच आवुसो, तुम्ही असेच शिकले पाहिजे – 'आम्ही इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवणारे बनू, भोजनात प्रमाण जाणणारे बनू आणि जागृत राहण्यात तत्पर बनू.' आवुसो, तुम्ही असेच शिकले पाहिजे." (सातवे सुत्त समाप्त.) ๘. ราหุโลวาทสุตฺตํ ८. राहुलोवाद सुत्त ๑๒๑. เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. อถ โข ภควโต รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘‘ปริปกฺกา โข ราหุลสฺส วิมุตฺติปริปาจนิยา ธมฺมา; ยํนูนาหํ ราหุลํ อุตฺตรึ อาสวานํ ขเย วิเนยฺย’’นฺติ. อถ โข ภควา ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สาวตฺถิยํ ปิณฺฑาย จริตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺโต อายสฺมนฺตํ ราหุลํ อามนฺเตสิ – ‘‘คณฺหาหิ, ราหุล, นิสีทนํ. เยน อนฺธวนํ เตนุปสงฺกมิสฺสาม ทิวาวิหารายา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา ราหุโล ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา นิสีทนํ อาทาย ภควนฺตํ ปิฏฺฐิโต ปิฏฺฐิโต อนุพนฺธิ. १२१. एकदा भगवान श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेव्हा एकांतात ध्यानस्थ बसलेल्या भगवंतांच्या मनात असा विचार आला – “राहुलचे विमुक्ती परिपक्व करणारे (विमुत्तिपारिपचनिया) धर्म आता परिपक्व झाले आहेत. मी राहुलला आसवांच्या क्षयासाठी (आसवांचा नाश करण्यासाठी) आणखी पुढे मार्गदर्शन केले तर किती बरे होईल!” त्यानंतर भगवान सकाळच्या वेळी चिवर परिधान करून, पात्र व चिवर घेऊन श्रावस्तीमध्ये भिक्षेसाठी गेले. भिक्षाटनाहून परत आल्यावर, भोजनोत्तर त्यांनी आयुष्यमान राहुलला बोलावले आणि म्हणाले – “राहुल, आसन (निसीदन) घे. आपण दिवसाच्या विश्रांतीसाठी अंधवनाकडे जाऊया.” आयुष्यमान राहुलने “तसेच असो, भन्ते!” असे म्हणून भगवंतांच्या शब्दाचा स्वीकार केला आणि आसन घेऊन ते भगवंतांच्या मागेमागे चालू लागले. เตน โข ปน สมเยน อเนกานิ เทวตาสหสฺสานิ ภควนฺตํ อนุพนฺธานิ โหนฺติ – ‘‘อชฺช ภควา อายสฺมนฺตํ ราหุลํ อุตฺตรึ อาสวานํ ขเย วิเนสฺสตี’’ติ. อถ โข ภควา อนฺธวนํ อชฺโฌคาเหตฺวา อญฺญตรสฺมึ รุกฺขมูเล ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. อายสฺมาปิ โข ราหุโล ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข อายสฺมนฺตํ ราหุลํ ภควา เอตทโวจ – त्या वेळी हजारो देवपुत्र (देवता) भगवंतांच्या मागेमागे जात होते. ते विचार करत होते – “आज भगवान आयुष्यमान राहुलला आसवांच्या क्षयासाठी आणखी पुढे उपदेश करतील.” त्यानंतर भगवान अंधवनात प्रवेश करून एका वृक्षाच्या खाली तयार केलेल्या आसनावर बसले. आयुष्यमान राहुलनेही भगवंतांना अभिवादन केले आणि ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान राहुलला भगवान असे म्हणाले – ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, ราหุล, จกฺขุ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “राहुल, तुला काय वाटते? चक्षू (डोळा) नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील (विपरिणामधम्म) आहे, त्याविषयी ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा (अत्ता) आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ( ) “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘รูปา นิจฺจา วา อนิจฺจา วา’’ติ? “रूपे नित्य आहेत की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจา, ภนฺเต’’…เป…. “अनित्य आहेत, भन्ते.”... (तसेच पुढे)... ‘‘จกฺขุวิญฺญาณํ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “चक्षु-विज्ञान नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’…เป…. “अनित्य आहे, भन्ते.”... (तसेच पुढे)... ‘‘จกฺขุสมฺผสฺโส นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? “चक्षु-संस्पर्श नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’…เป…. “अनित्य आहे, भन्ते.”... (तसेच पुढे)... ‘‘ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทนาคตํ, สญฺญาคตํ, สงฺขารคตํ, วิญฺญาณคตํ, ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “चक्षु-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी वेदना, संज्ञा, संस्कार आणि विज्ञान उत्पन्न होते, ते नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ[Pg.325], เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील आहे, त्याविषयी ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’…เป…. “नक्कीच नाही, भन्ते.”... (तसेच पुढे)... ‘‘ชิวฺหา นิจฺจา วา อนิจฺจา วา’’ติ? “जिव्हा (जीभ) नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจา, ภนฺเต’’…เป…. “अनित्य आहे, भन्ते.”... (तसेच पुढे)... ‘‘ชิวฺหาวิญฺญาณํ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “जिव्हा-विज्ञान नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’…เป…. “अनित्य आहे, भन्ते.”... (तसेच पुढे)... ‘‘ชิวฺหาสมฺผสฺโส นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? “जिव्हा-संस्पर्श नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’…เป…. “अनित्य आहे, भन्ते.”... (तसेच पुढे)... ‘‘ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทนาคตํ, สญฺญาคตํ, สงฺขารคตํ, วิญฺญาณคตํ, ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “जिव्हा-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी वेदना, संज्ञा, संस्कार आणि विज्ञान उत्पन्न होते, ते नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील आहे, त्याविषयी ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’…เป…. “नक्कीच नाही, भन्ते.”... (तसेच पुढे)... ‘‘มโน นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? “मन नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วาติ? “जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील आहे, त्याविषयी ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘ธมฺมา นิจฺจา วา อนิจฺจา วา’’ติ? “धम्म (मानसिक विषय) नित्य आहेत की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจา, ภนฺเต’’…เป…. “अनित्य आहेत, भन्ते.”... (तसेच पुढे)... ‘‘มโนวิญฺญาณํ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “मनोविज्ञान नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’…เป…. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘มโนสมฺผสฺโส นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? “मनोसंस्पर्श नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’…เป…. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทนาคตํ, สญฺญาคตํ, สงฺขารคตํ, วิญฺญาณคตํ, ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “आणि मनोसंस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही वेदनारूप, संज्ञारूप, संस्काररूप किंवा विज्ञानरूप उत्पन्न होते, ते नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याला ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “असे नाही, भन्ते.” ‘‘เอวํ ปสฺสํ, ราหุล, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทนาคตํ สญฺญาคตํ สงฺขารคตํ วิญฺญาณคตํ ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… ชิวฺหายปิ นิพฺพินฺทติ, รเสสุปิ นิพฺพินฺทติ, ชิวฺหาวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, ชิวฺหาสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ, ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทนาคตํ สญฺญาคตํ สงฺขารคตํ วิญฺญาณคตํ ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป…. “हे राहुल, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षूविषयी विरक्त होतो, रूपांविषयी विरक्त होतो, चक्षुविज्ञानाविषयी विरक्त होतो, चक्षुसंस्पर्शाविषयी विरक्त होतो; आणि चक्षुसंस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही वेदनारूप, संज्ञारूप, संस्काररूप किंवा विज्ञानरूप उत्पन्न होते, त्याविषयीही तो विरक्त होतो... जिभेविषयी विरक्त होतो, रसांविषयी विरक्त होतो, जिव्हाविज्ञानाविषयी विरक्त होतो, जिव्हासंस्पर्शाविषयी विरक्त होतो; आणि जिव्हासंस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही वेदनारूप, संज्ञारूप, संस्काररूप किंवा विज्ञानरूप उत्पन्न होते, त्याविषयीही तो विरक्त होतो...” ‘‘มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ธมฺเมสุปิ นิพฺพินฺทติ, มโนวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, มโนสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทนาคตํ สญฺญาคตํ สงฺขารคตํ วิญฺญาณคตํ ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. “मनाविषयी विरक्त होतो, धम्मांविषयी विरक्त होतो, मनोविज्ञानाविषयी विरक्त होतो, मनोसंस्पर्शाविषयी विरक्त होतो; आणि मनोसंस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही वेदनारूप, संज्ञारूप, संस्काररूप किंवा विज्ञानरूप उत्पन्न होते, त्याविषयीही तो विरक्त होतो. विरक्त झाल्याने तो वैराग्य प्राप्त करतो; वैराग्यामुळे तो विमुक्त होतो. विमुक्त झाल्यावर ‘मी विमुक्त झालो आहे’ असे ज्ञान होते. ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही’ हे तो जाणतो.” อิทมโวจ ภควา. อตฺตมโน อายสฺมา ราหุโล ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิ. อิมสฺมิญฺจ ปน เวยฺยากรณสฺมึ ภญฺญมาเน อายสฺมโต ราหุลสฺส อนุปาทาย อาสเวหิ จิตฺตํ วิมุจฺจิ. อเนกานญฺจ [Pg.326] เทวตาสหสฺสานํ วิรชํ วีตมลํ ธมฺมจกฺขุํ อุทปาทิ – ‘‘ยํ กิญฺจิ สมุทยธมฺมํ, สพฺพํ ตํ นิโรธธมฺม’’นฺติ. อฏฺฐมํ. भगवान असे म्हणाले. आयुष्यमान राहुल यांनी भगवंतांच्या भाषणाचे आनंदाने स्वागत केले आणि त्याचे अभिनंदन केले. हे प्रवचन दिले जात असताना, आयुष्यमान राहुल यांचे चित्त उपादानरहित होऊन आसवांपासून विमुक्त झाले. तसेच, अनेक हजारो देवतांमध्ये विरज, विमल धम्मचक्षू उत्पन्न झाला की, ‘जे काही उत्पन्न होण्याच्या स्वभावाचे आहे, ते सर्व नष्ट होण्याच्या स्वभावाचे आहे.’ आठवे सुत्त समाप्त. ๙. สํโยชนิยธมฺมสุตฺตํ ९. संयोजनीयधम्मसुत्त ๑๒๒. ‘‘สํโยชนิเย จ, ภิกฺขเว, ธมฺเม เทเสสฺสามิ สํโยชนญฺจ. ตํ สุณาถ. กตเม จ, ภิกฺขเว, สํโยชนิยา ธมฺมา, กตมญฺจ สํโยชนํ? สนฺติ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. อิเม วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, สํโยชนิยา ธมฺมา. โย ตตฺถ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. อิเม วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, สํโยชนิยา ธมฺมา. โย ตตฺถ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ สํโยชน’’นฺติ. นวมํ. १२२. “भगवंतांनी सांगितले, ‘भिक्षूंनो, मी तुम्हाला संयोजनीय धम्म आणि संयोजन शिकवणार आहे. ते लक्षपूर्वक ऐका. भिक्षूंनो, संयोजनीय धम्म कोणते आहेत आणि संयोजन कोणते आहे? भिक्षूंनो, चक्षुविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आनंद देणारे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. भिक्षूंनो, यांना संयोजनीय धम्म म्हणतात. तेथे जो छंदराग आहे, तेच तेथील संयोजन आहे... भिक्षूंनो, जिव्हाविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... भिक्षूंनो, मनोविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे धम्म आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आनंद देणारे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. भिक्षूंनो, यांना संयोजनीय धम्म म्हणतात. तेथे जो छंदराग आहे, तेच तेथील संयोजन आहे.’ नववे सुत्त समाप्त.” ๑๐. อุปาทานิยธมฺมสุตฺตํ १०. उपादानीयधम्मसुत्त ๑๒๓. ‘‘อุปาทานิเย จ, ภิกฺขเว, ธมฺเม เทเสสฺสามิ อุปาทานญฺจ. ตํ สุณาถ. กตเม จ, ภิกฺขเว, อุปาทานิยา ธมฺมา, กตมญฺจ อุปาทานํ? สนฺติ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. อิเม วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, อุปาทานิยา ธมฺมา. โย ตตฺถ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ อุปาทานํ…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. อิเม วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, อุปาทานิยา ธมฺมา. โย ตตฺถ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ อุปาทาน’’นฺติ. ทสมํ. १२३. “भगवंतांनी सांगितले, ‘भिक्षूंनो, मी तुम्हाला उपादानीय धम्म आणि उपादान शिकवणार आहे. ते लक्षपूर्वक ऐका. भिक्षूंनो, उपादानीय धम्म कोणते आहेत आणि उपादान कोणते आहे? भिक्षूंनो, चक्षुविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आनंद देणारे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. भिक्षूंनो, यांना उपादानीय धम्म म्हणतात. तेथे जो छंदराग आहे, तेच तेथील उपादान आहे... भिक्षूंनो, जिव्हाविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... भिक्षूंनो, मनोविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे धम्म आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आनंद देणारे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. भिक्षूंनो, यांना उपादानीय धम्म म्हणतात. तेथे जो छंदराग आहे, तेच तेथील उपादान आहे.’ दहावे सुत्त समाप्त.” โลกกามคุณวคฺโค ทฺวาทสโม. लोककामगुणवर्ग (बारावा वर्ग) समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) खालीलप्रमाणे आहे – มารปาเสน ทฺเว วุตฺตา, โลกกามคุเณน จ; สกฺโก ปญฺจสิโข เจว, สาริปุตฺโต จ ราหุโล; สํโยชนํ อุปาทานํ, วคฺโค เตน ปวุจฺจตีติ. मारपास सुत्तासह दोन सुत्ते आणि लोककामगुण सुत्तासह दोन सुत्ते सांगितली आहेत; तसेच सक्क सुत्त, पंचसिख सुत्त, सारिपुत्त सुत्त, राहुल सुत्त, संयोजन सुत्त आणि उपादान सुत्त; यांमुळे याला वर्ग म्हटले जाते. ๑๓. คหปติวคฺโค १३. गृहपती वर्ग ๑. เวสาลีสุตฺตํ १. वैशाली सुत्त ๑๒๔. เอกํ [Pg.327] สมยํ ภควา เวสาลิยํ วิหรติ มหาวเน กูฏาคารสาลายํ. อถ โข อุคฺโค คหปติ เวสาลิโก เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อุคฺโค คหปติ เวสาลิโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘โก นุ โข, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ? โก ปน, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ? १२४. एकदा भगवान वैशाली येथील महावनातील कुटागारशाळेत विहार करत होते. तेव्हा वैशालीचा उग्ग गृहपती भगवंतांकडे गेला; जवळ जाऊन त्याने भगवंतांना वंदन केले आणि तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या उग्ग गृहपतीने भगवंतांना विचारले – ‘भन्ते, असे कोणते कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करू शकत नाहीत? आणि भन्ते, असे कोणते कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करू शकतात?’ ‘‘สนฺติ โข, คหปติ, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ ตทุปาทานํ. สอุปาทาโน, คหปติ, ภิกฺขุ โน ปรินิพฺพายติ…เป… สนฺติ โข, คหปติ, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ โข, คหปติ, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ ตทุปาทานํ. สอุปาทาโน, คหปติ, ภิกฺขุ โน ปรินิพฺพายติ. อยํ โข, คหปติ, เหตุ, อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ. “भगवंतांनी उत्तर दिले, ‘गृहपती, चक्षुविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आनंद देणारे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यांच्यात गुंतून राहतो, तर अशा प्रकारे आनंद घेणाऱ्या, स्वागत करणाऱ्या आणि गुंतून राहणाऱ्या भिक्षूचे विज्ञान त्यावर आधारित होते आणि ते त्याचे उपादान बनते. गृहपती, उपादानयुक्त भिक्षू परिनिर्वाण प्राप्त करू शकत नाही... गृहपती, जिव्हाविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... गृहपती, मनोविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे असे धम्म आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आनंद देणारे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यांच्यात गुंतून राहतो, तर अशा प्रकारे आनंद घेणाऱ्या, स्वागत करणाऱ्या आणि गुंतून राहणाऱ्या भिक्षूचे विज्ञान त्यावर आधारित होते आणि ते त्याचे उपादान बनते. गृहपती, उपादानयुक्त भिक्षू परिनिर्वाण प्राप्त करू शकत नाही. गृहपती, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करू शकत नाहीत.’” ‘‘สนฺติ จ โข, คหปติ, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต น ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ, น ตทุปาทานํ. อนุปาทาโน, คหปติ, ภิกฺขุ ปรินิพฺพายติ…เป… สนฺติ โข, คหปติ, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ โข, คหปติ, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ, ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต. น ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ, น ตทุปาทานํ. อนุปาทาโน[Pg.328], คหปติ, ภิกฺขุ ปรินิพฺพายติ. อยํ โข, คหปติ, เหตุ อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ. ปฐมํ. गृहपती, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत, जे इष्ट, कांत (मनोहर), मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही (त्यात आनंद मानत नाही), त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर त्या भिक्खूचे, जो अभिनंदन करत नाही, स्वागत करत नाही आणि आसक्त होऊन राहत नाही, विज्ञान त्यावर आश्रित राहत नाही आणि त्याचे उपादान होत नाही. हे गृहपती, उपादानरहित झालेला भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करतो... (तसेच) गृहपती, जिभेने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... (तसेच) गृहपती, मनाने जाणता येण्याजोगे धर्म आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर त्या भिक्खूचे, जो अभिनंदन करत नाही, स्वागत करत नाही आणि आसक्त होऊन राहत नाही, विज्ञान त्यावर आश्रित राहत नाही आणि त्याचे उपादान होत नाही. हे गृहपती, उपादानरहित झालेला भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करतो. हे गृहपती, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात (दृष्टधर्मात) परिनिर्वाण प्राप्त करतात. पहिले. ๒. วชฺชีสุตฺตํ २. वज्जी सुत्त ๑๒๕. เอกํ สมยํ ภควา วชฺชีสุ วิหรติ หตฺถิคาเม. อถ โข อุคฺโค คหปติ หตฺถิคามโก เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อุคฺโค คหปติ หตฺถิคามโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘โก นุ โข, ภนฺเต, เหตุ โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ? โก ปน, ภนฺเต เหตุ โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ? (ยถา ปุริมสุตฺตนฺตํ, เอวํ วิตฺถาเรตพฺพํ). อยํ โข, คหปติ, เหตุ อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตีติ. ทุติยํ. १२५. एकदा भगवान वज्जी देशातील हत्थिगाम येथे विहार करत होते. तेव्हा हत्थिगामचा रहिवासी उग्ग गृहपती जेथे भगवान होते तेथे गेला; आणि भगवंतांजवळ जाऊन एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला उग्ग गृहपती भगवंतांना म्हणाला – 'भंते, असे कोणते कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात (दृष्टधर्मात) परिनिर्वाण प्राप्त करत नाहीत? आणि भंते, असे कोणते कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात?' (मागील सुत्ताप्रमाणेच सविस्तर वर्णन करावे). 'गृहपती, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात.' दुसरे. ๓. นาฬนฺทสุตฺตํ ३. नाळंदा सुत्त ๑๒๖. เอกํ สมยํ ภควา นาฬนฺทายํ วิหรติ ปาวาริกมฺพวเน. อถ โข, อุปาลิ คหปติ, เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข, อุปาลิ คหปติ, ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘โก นุ โข, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ? โก ปน, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ? (ยถา ปุริมสุตฺตนฺตํ, เอวํ วิตฺถาเรตพฺพํ). อยํ โข, คหปติ, เหตุ อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตีติ. ตติยํ. १२६. एकदा भगवान नाळंदा येथील पावारिकाच्या आंबराईत (पावारिकम्बवनात) विहार करत होते. तेव्हा उपाली गृहपती जेथे भगवान होते तेथे गेला... आणि भगवंतांजवळ जाऊन एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला उपाली गृहपती भगवंतांना म्हणाला – 'भंते, असे कोणते कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात (दृष्टधर्मात) परिनिर्वाण प्राप्त करत नाहीत? आणि भंते, असे कोणते कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात?' (मागील सुत्ताप्रमाणेच सविस्तर वर्णन करावे). 'गृहपती, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात.' तिसरे. ๔. ภารทฺวาชสุตฺตํ ४. भारद्वाज सुत्त ๑๒๗. เอกํ สมยํ อายสฺมา ปิณฺโฑลภารทฺวาโช โกสมฺพิยํ วิหรติ โฆสิตาราเม. อถ โข ราชา อุเทโน เยนายสฺมา ปิณฺโฑลภารทฺวาโช เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา ปิณฺโฑลภารทฺวาเชน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราชา อุเทโน อายสฺมนฺตํ ปิณฺโฑลภารทฺวาชํ เอตทโวจ – ‘‘โก นุ โข, โภ ภารทฺวาช, เหตุ [Pg.329] โก ปจฺจโย เยนิเม ทหรา ภิกฺขู สุสู กาฬเกสา ภทฺเรน โยพฺพเนน สมนฺนาคตา ปฐเมน วยสา อนิกีฬิตาวิโน กาเมสุ ยาวชีวํ ปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ จรนฺติ, อทฺธานญฺจ อาปาเทนฺตี’’ติ? ‘‘วุตฺตํ โข เอตํ, มหาราช, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน – ‘เอถ ตุมฺเห, ภิกฺขเว, มาตุมตฺตีสุ มาตุจิตฺตํ อุปฏฺฐเปถ, ภคินิมตฺตีสุ ภคินิจิตฺตํ อุปฏฺฐเปถ, ธีตุมตฺตีสุ ธีตุจิตฺตํ อุปฏฺฐเปถา’ติ. อยํ โข, มหาราช, เหตุ, อยํ ปจฺจโย เยนิเม ทหรา ภิกฺขู สุสู กาฬเกสา ภทฺเรน โยพฺพเนน สมนฺนาคตา ปฐเมน วยสา อนิกีฬิตาวิโน กาเมสุ ยาวชีวํ ปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ จรนฺติ, อทฺธานญฺจ อาปาเทนฺตี’’ติ. १२७. एकदा आयुष्यमान पिंडोल भारद्वाज कौशाम्बी येथील घोषितारामात विहार करत होते. तेव्हा राजा उदेन जेथे आयुष्यमान पिंडोल भारद्वाज होते तेथे गेला; आणि त्यांच्याजवळ जाऊन त्याने आयुष्यमान पिंडोल भारद्वाज यांच्याशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी व संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला राजा उदेन आयुष्यमान पिंडोल भारद्वाज यांना म्हणाला – 'हे भारद्वाज, असे कोणते कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे हे तरुण, कोवळे, काळे केस असलेले, सुंदर तारुण्याने युक्त, प्रथम वयातील भिक्खू, ज्यांनी कामभोगांचा कधी उपभोग घेतलेला नाही, ते आयुष्यभर परिपूर्ण व अत्यंत शुद्ध ब्रह्मचर्याचे पालन करतात आणि ते दीर्घकाळ टिकवून ठेवतात?' 'महाराज, जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी असे म्हटले आहे – 'या, भिक्खूंनो! तुम्ही आपल्या आईच्या वयाच्या स्त्रियांच्या ठिकाणी मातृभाव (आईची भावना) ठेवा, बहिणीच्या वयाच्या स्त्रियांच्या ठिकाणी भगिनीभाव (बहिणीची भावना) ठेवा आणि मुलीच्या वयाच्या स्त्रियांच्या ठिकाणी पुत्रीभाव (मुलीची भावना) ठेवा.' महाराज, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे हे तरुण, कोवळे, काळे केस असलेले, सुंदर तारुण्याने युक्त, प्रथम वयातील भिक्खू, ज्यांनी कामभोगांचा कधी उपभोग घेतलेला नाही, ते आयुष्यभर परिपूर्ण व अत्यंत शुद्ध ब्रह्मचर्याचे पालन करतात आणि ते दीर्घकाळ टिकवून ठेवतात.' ‘‘โลลํ โข, โภ ภารทฺวาช, จิตฺตํ. อปฺเปกทา มาตุมตฺตีสุปิ โลภธมฺมา อุปฺปชฺชนฺติ, ภคินิมตฺตีสุปิ โลภธมฺมา อุปฺปชฺชนฺติ, ธีตุมตฺตีสุปิ โลภธมฺมา อุปฺปชฺชนฺติ. อตฺถิ นุ โข, โภ ภารทฺวาช, อญฺโญ จ เหตุ, อญฺโญ จ ปจฺจโย เยนิเม ทหรา ภิกฺขู สุสู กาฬเกสา…เป… อทฺธานญฺจ อาปาเทนฺตี’’ติ? 'हे भारद्वाज, चित्त (मन) अत्यंत चंचल असते. कधीकधी आईच्या वयाच्या स्त्रियांच्या बाबतीतही लोभ उत्पन्न होतो, बहिणीच्या वयाच्या स्त्रियांच्या बाबतीतही लोभ उत्पन्न होतो आणि मुलीच्या वयाच्या स्त्रियांच्या बाबतीतही लोभ उत्पन्न होतो. हे भारद्वाज, असे दुसरे काही कारण किंवा दुसरा काही प्रत्यय आहे का, ज्यामुळे हे तरुण, कोवळे, काळे केस असलेले भिक्खू... ब्रह्मचर्य दीर्घकाळ टिकवून ठेवतात?' ‘‘วุตฺตํ โข เอตํ, มหาราช, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน – ‘เอถ ตุมฺเห, ภิกฺขเว, อิมเมว กายํ อุทฺธํ ปาทตลา อโธ เกสมตฺถกา ตจปริยนฺตํ ปูรํ นานปฺปการสฺส อสุจิโน ปจฺจเวกฺขถ – อตฺถิ อิมสฺมึ กาเย เกสา โลมา นขา ทนฺตา ตโจ มํสํ นฺหารุ อฏฺฐิ อฏฺฐิมิญฺชํ วกฺกํ หทยํ ยกนํ กิโลมกํ ปิหกํ ปปฺผาสํ อนฺตํ อนฺตคุณํ อุทริยํ กรีสํ ปิตฺตํ เสมฺหํ ปุพฺโพ โลหิตํ เสโท เมโท อสฺสุ วสา เขโฬ สิงฺฆาณิกา ลสิกา มุตฺต’นฺติ. อยมฺปิ โข, มหาราช, เหตุ, อยํ ปจฺจโย เยนิเม ทหรา ภิกฺขู สุสู กาฬเกสา…เป… อทฺธานญฺจ อาปาเทนฺตี’’ติ. ‘‘เย เต, โภ ภารทฺวาช, ภิกฺขู ภาวิตกายา ภาวิตสีลา ภาวิตจิตฺตา ภาวิตปญฺญา, เตสํ ตํ สุกรํ โหติ. เย จ โข เต, โภ ภารทฺวาช, ภิกฺขู อภาวิตกายา อภาวิตสีลา อภาวิตจิตฺตา อภาวิตปญฺญา, เตสํ ตํ ทุกฺกรํ โหติ. อปฺเปกทา, โภ ภารทฺวาช, อสุภโต มนสิ [Pg.330] กริสฺสามีติ สุภโตว อาคจฺฉติ. อตฺถิ นุ โข, โภ ภารทฺวาช, อญฺโญ จ โข เหตุ อญฺโญ จ ปจฺจโย เยนิเม ทหรา ภิกฺขู สุสู กาฬเกสา…เป… อทฺธานญฺจ อาปาเทนฺตี’’ติ? 'महाराज, जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी असे म्हटले आहे – 'या, भिक्खूंनो! तुम्ही पायाच्या तळव्यापासून वर आणि केसांच्या टोकापासून खाली, त्वचेने वेढलेल्या आणि विविध प्रकारच्या अशुद्धीने भरलेल्या या शरीराचेच असे निरीक्षण करा – या शरीरात केस (डोक्यावरील), रोम (अंगावरील केस), नखे, दात, त्वचा, मांस, शिरा, हाडे, अस्थिमज्जा, वृक्क, हृदय, यकृत, क्लोमक, प्लीहा, फुफ्फुस, मोठे आतडे, लहान आतडे, जठरातील अन्न, विष्ठा, पित्त, कफ, पू, रक्त, घाम, मेद, अश्रू, वसा, लाळ, शेंबूड, सांध्यांमधील वंगण आणि मूत्र आहे.' महाराज, हेसुद्धा ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे हे तरुण, कोवळे, काळे केस असलेले भिक्खू... ब्रह्मचर्य दीर्घकाळ टिकवून ठेवतात.' 'हे भारद्वाज, जे भिक्खू भावितकाय (शरीरावर नियंत्रण मिळवलेले), भावितशील (शील विकसित केलेले), भावितचित्त (चित्त विकसित केलेले) आणि भावितप्रज्ञ (प्रज्ञा विकसित केलेले) आहेत, त्यांच्यासाठी हे करणे सोपे असते. परंतु, हे भारद्वाज, जे भिक्खू अभावितकाय, अभावितशील, अभावितचित्त आणि अभावितप्रज्ञ आहेत, त्यांच्यासाठी हे करणे कठीण असते. कधीकधी, हे भारद्वाज, 'मी शरीराचा अशुद्ध (अशुभ) म्हणून विचार करेन' असे मनात आणले तरी ते शुभ (सुंदर) म्हणूनच समोर येते. हे भारद्वाज, असे दुसरे काही कारण किंवा दुसरा काही प्रत्यय आहे का, ज्यामुळे हे तरुण, कोवळे, काळे केस असलेले भिक्खू... ब्रह्मचर्य दीर्घकाळ टिकवून ठेवतात?' ‘‘วุตฺตํ โข เอตํ, มหาราช, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน – ‘เอถ ตุมฺเห, ภิกฺขเว, อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวารา วิหรถ. จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา มา นิมิตฺตคฺคาหิโน อหุวตฺถ, มานุพฺยญฺชนคฺคาหิโน. ยตฺวาธิกรณเมนํ จกฺขุนฺทฺริยํ อสํวุตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อนฺวาสฺสเวยฺยุํ, ตสฺส สํวราย ปฏิปชฺชถ. รกฺขถ จกฺขุนฺทฺริยํ; จกฺขุนฺทฺริเย สํวรํ อาปชฺชถ. โสเตน สทฺทํ สุตฺวา…เป… ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตฺวา… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา… กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสิตฺวา… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย มา นิมิตฺตคฺคาหิโน อหุวตฺถ, มานุพฺยญฺชนคฺคาหิโน. ยตฺวาธิกรณเมนํ มนินฺทฺริยํ อสํวุตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อนฺวาสฺสเวยฺยุํ, ตสฺส สํวราย ปฏิปชฺชถ. รกฺขถ มนินฺทฺริยํ; มนินฺทฺริเย สํวรํ อาปชฺชถา’ติ. อยมฺปิ โข, มหาราช, เหตุ อยํ ปจฺจโย เยนิเม ทหรา ภิกฺขู สุสู กาฬเกสา ภทฺเรน โยพฺพเนน สมนฺนาคตา ปฐเมน วยสา อนิกีฬิตาวิโน กาเมสุ ยาวชีวํ ปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ จรนฺติ, อทฺธานญฺจ อาปาเทนฺตี’’ติ. “महाराज, जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी हेच सांगितले आहे – ‘या, भिक्खूंनो, तुम्ही इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवून (संयम राखून) विहार करा. डोळ्यांनी रूप पाहून (स्त्री-पुरुष इत्यादींचे) बाह्य रूप (निमित्त) ग्रहण करू नका, तसेच त्यांचे अवयव किंवा हावभाव (अनुव्यंजन) ग्रहण करू नका. कारण, जर चक्षुरिंद्रिय असंयत ठेवून विहार केला, तर अभिज्झा (लोभ) आणि दोमनस्स (खिन्नता/द्वेष) हे पापी अकुशल धर्म तुमच्यावर स्वार होतील. म्हणून त्याच्या संवरासाठी (संयमासाठी) प्रयत्न करा. चक्षुरिंद्रियाचे रक्षण करा, चक्षुरिंद्रियाचा संवर प्राप्त करा. कानांनी शब्द ऐकून... नाकाने गंध घेऊन... जिभेने रस चाखून... शरीराने स्पर्श अनुभवून... मनाने धर्माचे (विचारांचे) ज्ञान करून घेऊन बाह्य रूप (निमित्त) ग्रहण करू नका, तसेच त्यांचे अवयव किंवा हावभाव (अनुव्यंजन) ग्रहण करू नका. कारण, जर मनेंद्रिय असंयत ठेवून विहार केला, तर अभिज्झा आणि दोमनस्स हे पापी अकुशल धर्म तुमच्यावर स्वार होतील. म्हणून त्याच्या संवरासाठी प्रयत्न करा. मनेंद्रियाचे रक्षण करा, मनेंद्रियाचा संवर प्राप्त करा.’ महाराज, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे हे तरुण, नवोदित, काळेभोर केस असलेले, सुंदर तारुण्याने युक्त, प्रथम वयातील आणि कामभोगांमध्ये कधीही न रमलेले भिक्खू आयुष्यभर परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध ब्रह्मचर्याचे आचरण करतात आणि दीर्घकाळपर्यंत ते टिकवून ठेवतात.” ‘‘อจฺฉริยํ, โภ ภารทฺวาช; อพฺภุตํ, โภ ภารทฺวาช! ยาว สุภาสิตํ จิทํ, โภ ภารทฺวาช, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน. เอโสว โข, โภ ภารทฺวาช, เหตุ, เอส ปจฺจโย เยนิเม ทหรา ภิกฺขู สุสู กาฬเกสา ภทฺเรน โยพฺพเนน สมนฺนาคตา ปฐเมน วยสา อนิกีฬิตาวิโน กาเมสุ ยาวชีวํ ปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ จรนฺติ, อทฺธานญฺจ อาปาเทนฺตีติ. อหมฺปิ โข, โภ ภารทฺวาช, ยสฺมึ สมเย อรกฺขิเตเนว กาเยน, อรกฺขิตาย วาจาย, อรกฺขิเตน จิตฺเตน, อนุปฏฺฐิตาย สติยา, อสํวุเตหิ อินฺทฺริเยหิ อนฺเตปุรํ ปวิสามิ, อติวิย มํ ตสฺมึ สมเย โลภธมฺมา ปริสหนฺติ. ยสฺมิญฺจ ขฺวาหํ, โภ ภารทฺวาช, สมเย รกฺขิเตเนว กาเยน, รกฺขิตาย วาจาย, รกฺขิเตน จิตฺเตน, อุปฏฺฐิตาย สติยา, สํวุเตหิ อินฺทฺริเยหิ อนฺเตปุรํ ปวิสามิ, น มํ ตถา [Pg.331] ตสฺมึ สมเย โลภธมฺมา ปริสหนฺติ. อภิกฺกนฺตํ, โภ ภารทฺวาช; อภิกฺกนฺตํ, โภ ภารทฺวาช! เสยฺยถาปิ, โภ ภารทฺวาช, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย, ปฏิจฺฉนฺนํ วา วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย, จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตีติ; เอวเมวํ โภตา ภารทฺวาเชน อเนกปริยาเยน ธมฺโม ปกาสิโต. เอสาหํ, โภ ภารทฺวาช, ตํ ภควนฺตํ สรณํ คจฺฉามิ, ธมฺมญฺจ, ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. อุปาสกํ มํ ภวํ ภารทฺวาโช ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. จตุตฺถํ. “आश्चर्यकारक आहे, हे भारद्वाज! अद्भुत आहे, हे भारद्वाज! हे भारद्वाज, जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी हे वचन किती सुभाषित (उत्कृष्टपणे) सांगितले आहे! हे भारद्वाज, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे हे तरुण, नवोदित, काळेभोर केस असलेले, सुंदर तारुण्याने युक्त, प्रथम वयातील आणि कामभोगांमध्ये कधीही न रमलेले भिक्खू आयुष्यभर परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध ब्रह्मचर्याचे आचरण करतात आणि दीर्घकाळपर्यंत ते टिकवून ठेवतात. हे भारद्वाज, मी स्वतः सुद्धा जेव्हा अरक्षित शरीराने, अरक्षित वाणीने, अरक्षित चित्ताने, स्मृती जागृत न ठेवता, असंयत इंद्रियांनी अंतःपुरात (राजवाड्यात) प्रवेश करतो, तेव्हा मला त्या वेळी लोभ उत्पन्न करणारे विचार (लोभधर्म) अत्यंत पीडित करतात. परंतु हे भारद्वाज, जेव्हा मी रक्षित शरीराने, रक्षित वाणीने, रक्षित चित्ताने, स्मृती जागृत ठेवून, संयत इंद्रियांनी अंतःपुरात प्रवेश करतो, तेव्हा मला त्या वेळी लोभ उत्पन्न करणारे विचार तशा प्रकारे पीडित करत नाहीत. अतिशय सुंदर, हे भारद्वाज! अतिशय सुंदर, हे भारद्वाज! जसे, हे भारद्वाज, कोणी पालथे घातलेले उताणे करावे, झाकलेले उघडे करावे, वाट चुकलेल्याला वाट दाखवावी किंवा अंधारात तेलाचा दिवा लावावा जेणेकरून डोळे असणाऱ्यांना रूपे दिसावीत; त्याचप्रमाणे आदरणीय भारद्वाजांनी अनेक प्रकारे धम्म प्रकाशित केला आहे. मी, हे भारद्वाज, त्या भगवंतांना शरण जातो, धम्माला शरण जातो आणि भिक्खू संघाला शरण जातो. आदरणीय भारद्वाजांनी मला आजपासून जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे.” (चौथे सूत्र समाप्त.) ๕. โสณสุตฺตํ ५. सोण सुत्त ๑๒๘. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. อถ โข โสโณ คหปติปุตฺโต เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โสโณ คหปติปุตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘โก นุ โข, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ? โก ปน, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ? (ยถา ปุริมสุตฺตนฺตํ, เอวํ วิตฺถาเรตพฺพํ). อยํ โข, โสณ, เหตุ, อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตีติ. ปญฺจมํ. १२८. एका वेळी भगवान राजगृह येथे वेळुवनातील कलंदकनिवाप (खारुतांना अन्न देण्याची जागा) येथे विहार करत होते. तेव्हा सोण गृहपतीपुत्र जेथे भगवान होते तेथे गेला. तेथे जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला सोण गृहपतीपुत्र भगवंतांना म्हणाला – “भंते, काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात (दृष्टधर्मात) परिनिर्वाण प्राप्त करत नाहीत? आणि भंते, काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात?” (मागील सूत्राप्रमाणेच याचा विस्तार करावा.) “सोण, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात.” (पाचवे सूत्र समाप्त.) ๖. โฆสิตสุตฺตํ ६. घोषित सुत्त ๑๒๙. เอกํ สมยํ อายสฺมา อานนฺโท โกสมฺพิยํ วิหรติ โฆสิตาราเม. อถ โข โฆสิโต คหปติ เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โฆสิโต คหปติ อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตทโวจ – ‘‘‘ธาตุนานตฺตํ, ธาตุนานตฺต’นฺติ, ภนฺเต อานนฺท, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, ธาตุนานตฺตํ วุตฺตํ ภควตา’’ติ? ‘‘สํวิชฺชติ โข, คหปติ, จกฺขุธาตุ, รูปา จ มนาปา, จกฺขุวิญฺญาณญฺจ สุขเวทนิยํ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขา เวทนา. สํวิชฺชติ โข, คหปติ, จกฺขุธาตุ, รูปา จ อมนาปา, จกฺขุวิญฺญาณญฺจ ทุกฺขเวทนิยํ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ทุกฺขา เวทนา. สํวิชฺชติ โข, คหปติ, จกฺขุธาตุ, รูปา จ มนาปา อุเปกฺขาเวทนิยา, จกฺขุวิญฺญาณญฺจ อทุกฺขมสุขเวทนิยํ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ อทุกฺขมสุขา [Pg.332] เวทนา…เป… สํวิชฺชติ โข, คหปติ, ชิวฺหาธาตุ, รสา จ มนาปา, ชิวฺหาวิญฺญาณญฺจ สุขเวทนิยํ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขา เวทนา. สํวิชฺชติ โข, คหปติ, ชิวฺหาธาตุ, รสา จ อมนาปา, ชิวฺหาวิญฺญาณญฺจ ทุกฺขเวทนิยํ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ทุกฺขา เวทนา. สํวิชฺชติ โข, คหปติ, ชิวฺหาธาตุ, รสา จ อุเปกฺขาเวทนิยา, ชิวฺหาวิญฺญาณญฺจ อทุกฺขมสุขเวทนิยํ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ อทุกฺขมสุขา เวทนา…เป… สํวิชฺชติ โข, คหปติ, มโนธาตุ, ธมฺมา จ มนาปา, มโนวิญฺญาณญฺจ สุขเวทนิยํ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขา เวทนา. สํวิชฺชติ โข, คหปติ, มโนธาตุ, ธมฺมา จ อมนาปา, มโนวิญฺญาณญฺจ ทุกฺขเวทนิยํ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ทุกฺขา เวทนา. สํวิชฺชติ โข, คหปติ, มโนธาตุ, ธมฺมา จ อุเปกฺขาเวทนิยา, มโนวิญฺญาณญฺจ อทุกฺขมสุขเวทนิยํ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ อทุกฺขมสุขา เวทนา. เอตฺตาวตา โข, คหปติ, ธาตุนานตฺตํ วุตฺตํ ภควตา’’ติ. ฉฏฺฐํ. १२९. एकदा आयुष्यमान आनंद कोसंबी येथे घोसितारामात विहार करत होते. तेव्हा घोसित गृहपती जेथे आयुष्यमान आनंद होते तेथे गेला... आणि एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या घोसित गृहपतीने आयुष्यमान आनंदांना असे म्हटले – 'भन्ते आनंद, 'धातूंची विविधता, धातूंची विविधता' असे म्हटले जाते. भन्ते, भगवंतांनी कोणत्या मर्यादेपर्यंत धातूंची विविधता सांगितली आहे?' 'गृहपती, चक्षु-धातू अस्तित्वात आहे, मनपसंत रूपे अस्तित्वात आहेत आणि चक्षु-विज्ञान अस्तित्वात आहे. सुखकारक स्पर्शावर अवलंबून सुखद वेदना उत्पन्न होते. गृहपती, चक्षु-धातू अस्तित्वात आहे, नापसंत रूपे अस्तित्वात आहेत आणि चक्षु-विज्ञान अस्तित्वात आहे. दुःखकारक स्पर्शावर अवलंबून दुःखद वेदना उत्पन्न होते. गृहपती, चक्षु-धातू अस्तित्वात आहे, उपेक्षा-वेदनेस कारणीभूत असणारी रूपे अस्तित्वात आहेत आणि चक्षु-विज्ञान अस्तित्वात आहे. अदुःख-असुखकारक स्पर्शावर अवलंबून अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होते. ...तसेच गृहपती, जिव्हा-धातू अस्तित्वात आहे, मनपसंत रस अस्तित्वात आहेत आणि जिव्हा-विज्ञान अस्तित्वात आहे. सुखकारक स्पर्शावर अवलंबून सुखद वेदना उत्पन्न होते. गृहपती, जिव्हा-धातू अस्तित्वात आहे, नापसंत रस अस्तित्वात आहेत आणि जिव्हा-विज्ञान अस्तित्वात आहे. दुःखकारक स्पर्शावर अवलंबून दुःखद वेदना उत्पन्न होते. गृहपती, जिव्हा-धातू अस्तित्वात आहे, उपेक्षा-वेदनेस कारणीभूत असणारे रस अस्तित्वात आहेत आणि जिव्हा-विज्ञान अस्तित्वात आहे. अदुःख-असुखकारक स्पर्शावर अवलंबून अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होते. ...तसेच गृहपती, मनो-धातू अस्तित्वात आहे, मनपसंत धम्म अस्तित्वात आहेत आणि मनो-विज्ञान अस्तित्वात आहे. सुखकारक स्पर्शावर अवलंबून सुखद वेदना उत्पन्न होते. गृहपती, मनो-धातू अस्तित्वात आहे, नापसंत धम्म अस्तित्वात आहेत आणि मनो-विज्ञान अस्तित्वात आहे. दुःखकारक स्पर्शावर अवलंबून दुःखद वेदना उत्पन्न होते. गृहपती, मनो-धातू अस्तित्वात आहे, उपेक्षा-वेदनेस कारणीभूत असणारे धम्म अस्तित्वात आहेत आणि मनो-विज्ञान अस्तित्वात आहे. अदुःख-असुखकारक स्पर्शावर अवलंबून अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होते. गृहपती, एवढ्या मर्यादेपर्यंत भगवंतांनी धातूंची विविधता सांगितली आहे.' सहावे सूत्र. ๗. หาลิทฺทิกานิสุตฺตํ ७. हालिद्दिकानि सुत्त ๑๓๐. เอกํ สมยํ อายสฺมา มหากจฺจาโน อวนฺตีสุ วิหรติ กุรรฆเร ปปาเต ปพฺพเต. อถ โข หาลิทฺทิกานิ คหปติ เยนายสฺมา มหากจฺจาโน เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข หาลิทฺทิกานิ คหปติ อายสฺมนฺตํ มหากจฺจานํ เอตทโวจ – ‘‘วุตฺตมิทํ, ภนฺเต, ภควตา – ‘ธาตุนานตฺตํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ผสฺสนานตฺตํ; ผสฺสนานตฺตํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ เวทนานานตฺต’นฺติ. กถํ นุ โข, ภนฺเต, ธาตุนานตฺตํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ผสฺสนานตฺตํ; ผสฺสนานตฺตํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ เวทนานานตฺต’’นฺติ? ‘‘อิธ, คหปติ, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา ‘มนาปํ อิตฺเถต’นฺติ ปชานาติ จกฺขุวิญฺญาณํ สุขเวทนิยญฺจ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขา เวทนา. จกฺขุนา โข ปเนว รูปํ ทิสฺวา ‘อมนาปํ อิตฺเถต’นฺติ ปชานาติ จกฺขุวิญฺญาณํ ทุกฺขเวทนิยญฺจ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ทุกฺขา เวทนา. จกฺขุนา โข ปเนว รูปํ ทิสฺวา ‘อุเปกฺขาฏฺฐานิยํ [Pg.333] อิตฺเถต’นฺติ ปชานาติ จกฺขุวิญฺญาณํ อทุกฺขมสุขเวทนิยญฺจ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ อทุกฺขมสุขา เวทนา. १३०. एकदा आयुष्यमान महाकच्चान अवंती देशात कुररघर येथील पपात पर्वतावर विहार करत होते. तेव्हा हालिद्दिकानि गृहपती जेथे आयुष्यमान महाकच्चान होते तेथे गेला... आणि एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या हालिद्दिकानि गृहपतीने आयुष्यमान महाकच्चानांना असे म्हटले – 'भन्ते, भगवंतांनी असे म्हटले आहे – धातूंच्या विविधतेवर अवलंबून स्पर्शाची विविधता उत्पन्न होते; स्पर्शाच्या विविधतेवर अवलंबून वेदनेची विविधता उत्पन्न होते. भन्ते, धातूंच्या विविधतेवर अवलंबून स्पर्शाची विविधता कशी उत्पन्न होते आणि स्पर्शाच्या विविधतेवर अवलंबून वेदनेची विविधता कशी उत्पन्न होते?' 'गृहपती, येथे भिक्खू डोळ्याने रूप पाहून, 'हे मनपसंत आहे' असे जाणतो. चक्षु-विज्ञान आणि सुखकारक स्पर्शावर अवलंबून सुखद वेदना उत्पन्न होते. डोळ्याने रूप पाहून, 'हे नापसंत आहे' असे जाणतो. चक्षु-विज्ञान आणि दुःखकारक स्पर्शावर अवलंबून दुःखद वेदना उत्पन्न होते. डोळ्याने रूप पाहून, 'हे उपेक्षेचे स्थान आहे' असे जाणतो. चक्षु-विज्ञान आणि अदुःख-असुखकारक स्पर्शावर अवलंबून अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होते. ‘‘ปุน จปรํ, คหปติ, ภิกฺขุ โสเตน สทฺทํ สุตฺวา…เป… ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตฺวา…เป… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา…เป… กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสิตฺวา…เป… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ‘มนาปํ อิตฺเถต’นฺติ ปชานาติ มโนวิญฺญาณํ สุขเวทนิยญฺจ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขา เวทนา. มนสา โข ปเนว ธมฺมํ วิญฺญาย ‘อมนาปํ อิตฺเถต’นฺติ ปชานาติ มโนวิญฺญาณํ ทุกฺขเวทนิยญฺจ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ทุกฺขา เวทนา. มนสา โข ปเนว ธมฺมํ วิญฺญาย ‘อุเปกฺขาฏฺฐานิยํ อิตฺเถต’นฺติ ปชานาติ มโนวิญฺญาณํ อทุกฺขมสุขเวทนิยญฺจ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ อทุกฺขมสุขา เวทนา. เอวํ โข, คหปติ, ธาตุนานตฺตํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ผสฺสนานตฺตํ; ผสฺสนานตฺตํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ เวทนานานตฺต’’นฺติ. สตฺตมํ. 'पुन्हा, गृहपती, भिक्खू कानाने शब्द ऐकून... नाकाने गंध घेऊन... जिभेने रस चाखून... शरीराने स्पर्श स्पर्शून... मनाने धम्म जाणून, 'हे मनपसंत आहे' असे जाणतो. मनो-विज्ञान आणि सुखकारक स्पर्शावर अवलंबून सुखद वेदना उत्पन्न होते. मनाने धम्म जाणून, 'हे नापसंत आहे' असे जाणतो. मनो-विज्ञान आणि दुःखकारक स्पर्शावर अवलंबून दुःखद वेदना उत्पन्न होते. मनाने धम्म जाणून, 'हे उपेक्षेचे स्थान आहे' असे जाणतो. मनो-विज्ञान आणि अदुःख-असुखकारक स्पर्शावर अवलंबून अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होते. अशा प्रकारे, गृहपती, धातूंच्या विविधतेवर अवलंबून स्पर्शाची विविधता उत्पन्न होते; आणि स्पर्शाच्या विविधतेवर अवलंबून वेदनेची विविधता उत्पन्न होते.' सातवे सूत्र. ๘. นกุลปิตุสุตฺตํ ८. नकुलपितु सुत्त ๑๓๑. เอกํ สมยํ ภควา ภคฺเคสุ วิหรติ สุสุมารคิเร เภสกฬาวเน มิคทาเย. อถ โข นกุลปิตา คหปติ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข นกุลปิตา คหปติ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘โก นุ โข, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ? โก ปน, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ? ‘‘สนฺติ โข, คหปติ, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ ตทุปาทานํ. สอุปาทาโน, คหปติ, ภิกฺขุ โน ปรินิพฺพายติ…เป… สนฺติ โข, คหปติ, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ โข, คหปติ, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ ตทุปาทานํ. สอุปาทาโน, คหปติ, ภิกฺขุ โน ปรินิพฺพายติ[Pg.334]. อยํ โข, คหปติ, เหตุ อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ’’. १३१. एकदा भगवान भग्ग देशात सुसुमारगिरि येथील भेसकळावनातील मृगदायात विहार करत होते. तेव्हा नकुलपिता गृहपती जेथे भगवान होते तेथे गेला... आणि एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या नकुलपिता गृहपतीने भगवंतांना असे म्हटले – 'भन्ते, काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करत नाहीत? आणि भन्ते, काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात?' 'गृहपती, चक्षु-विज्ञानाने जाणता येण्याजोगी अशी रूपे आहेत जी इष्ट, कांत, मनपसंत, प्रिय वाटणारी, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारी आहेत. जर भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे कौतुक करतो आणि त्यात गुंतून राहतो, तर त्यांचे अभिनंदन करणाऱ्या, कौतुक करणाऱ्या आणि त्यात गुंतून राहणाऱ्या भिक्खूचे विज्ञान त्यावर आश्रित होते आणि त्याचे उपादान बनते. उपादानयुक्त भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करत नाही. ...तसेच गृहपती, जिव्हा-विज्ञानाने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... ...तसेच गृहपती, मनो-विज्ञानाने जाणता येण्याजोगे धम्म आहेत जे इष्ट, कांत, मनपसंत, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे कौतुक करतो आणि त्यात गुंतून राहतो, तर त्यांचे अभिनंदन करणाऱ्या, कौतुक करणाऱ्या आणि त्यात गुंतून राहणाऱ्या भिक्खूचे विज्ञान त्यावर आश्रित होते आणि त्याचे उपादान बनते. उपादानयुक्त भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करत नाही. गृहपती, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करत नाहीत.' ‘‘สนฺติ จ โข, คหปติ, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุนาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต น ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ, น ตทุปาทานํ. อนุปาทาโน, คหปติ, ภิกฺขุ ปรินิพฺพายติ…เป… สนฺติ โข, คหปติ, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ โข, คหปติ, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ นาภินนฺทโต นาภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต น ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ น ตทุปาทานํ. อนุปาทาโน, คหปติ, ภิกฺขุ ปรินิพฺพายติ. อยํ โข, คหปติ, เหตุ, อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ. อฏฺฐมํ. “गृहपती, चक्षुविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत जे इष्ट, कांत (प्रिय), मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यांच्यात गुंतून राहत नाही, तर त्या रूपांचे अभिनंदन न करणाऱ्या, स्वागत न करणाऱ्या आणि त्यात न गुंतणाऱ्या भिक्खूचे त्या रूपांवर आश्रित असणारे विज्ञान निर्माण होत नाही आणि उपादानही (आसक्ती) होत नाही. हे गृहपती, उपादानरहित (आसक्तीरहित) भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करतो... तसेच... गृहपती, जिव्हाविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... तसेच... गृहपती, मनोविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे असे धम्म (विचार/विषय) आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यांच्यात गुंतून राहत नाही, तर त्या धम्मांचे अभिनंदन न करणाऱ्या, स्वागत न करणाऱ्या आणि त्यात न गुंतणाऱ्या भिक्खूचे त्या धम्मांवर आश्रित असणारे विज्ञान निर्माण होत नाही आणि उपादानही होत नाही. हे गृहपती, उपादानरहित भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करतो. हे गृहपती, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय (हेतू) आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात (दृष्टधर्मात) परिनिर्वाण प्राप्त करतात.” आठवे सूत्र. ๙. โลหิจฺจสุตฺตํ ९. लोहिच्च सुत्त ๑๓๒. เอกํ สมยํ อายสฺมา มหากจฺจาโน อวนฺตีสุ วิหรติ มกฺกรกเต อรญฺญกุฏิกายํ. อถ โข โลหิจฺจสฺส พฺราหฺมณสฺส สมฺพหุลา อนฺเตวาสิกา กฏฺฐหารกา มาณวกา เยนายสฺมโต มหากจฺจานสฺส อรญฺญกุฏิกา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ปริโต ปริโต กุฏิกาย อนุจงฺกมนฺติ อนุวิจรนฺติ อุจฺจาสทฺทา มหาสทฺทา กานิจิ กานิจิ เสเลยฺยกานิ กโรนฺติ – ‘‘อิเม ปน มุณฺฑกา สมณกา อิพฺภา กณฺหา พนฺธุปาทาปจฺจา, อิเมสํ ภรตกานํ สกฺกตา ครุกตา มานิตา ปูชิตา อปจิตา’’ติ. อถ โข อายสฺมา มหากจฺจาโน วิหารา นิกฺขมิตฺวา เต มาณวเก เอตทโวจ – ‘‘มา มาณวกา สทฺทมกตฺถ; ธมฺมํ โว ภาสิสฺสามี’’ติ. เอวํ วุตฺเต, เต มาณวกา ตุณฺหี อเหสุํ. อถ โข อายสฺมา มหากจฺจาโน เต มาณวเก คาถาหิ อชฺฌภาสิ – १३२. एकदा आयुष्यमान महाकच्चान अवंती देशातील मक्करकट येथील एका अरण्यकुटीत (वनातील कुटीत) विहार करत होते. तेव्हा लोहिच्च ब्राह्मणाचे अनेक लाकडे गोळा करणारे तरुण शिष्य (माणवक) आयुष्यमान महाकच्चान यांच्या अरण्यकुटीजवळ आले. तिथे आल्यावर ते कुटीच्या सभोवताली ये-जा करू लागले, फिरू लागले आणि मोठ्या आवाजात गोंगाट करत एकमेकांच्या पाठीवर उड्या मारण्याचे खेळ खेळू लागले. ते म्हणाले, “हे मुंडक (बोडके), हीन श्रमण, शूद्र, काळे आणि ब्रह्मदेवाच्या पायापासून उत्पन्न झालेले आहेत. या हीन श्रमणांचा (लोकांकडून) सत्कार, आदर, सन्मान, पूजा आणि गौरव केला जातो.” तेव्हा आयुष्यमान महाकच्चान कुटीतून बाहेर आले आणि त्या तरुणांना म्हणाले, “तरुणांनो, गोंगाट करू नका; मी तुम्हाला धम्म शिकवतो.” असे म्हटल्यावर ते तरुण शांत झाले. त्यानंतर आयुष्यमान महाकच्चान यांनी त्या तरुणांना गाथांद्वारे संबोधित केले— ‘‘สีลุตฺตมา ปุพฺพตรา อเหสุํ,เต พฺราหฺมณา เย ปุราณํ สรนฺติ; คุตฺตานิ ทฺวารานิ สุรกฺขิตานิ,อเหสุํ เตสํ อภิภุยฺย โกธํ. “जे प्राचीन ब्राह्मणांच्या आचरणाचे स्मरण करतात, ते प्राचीन काळातील ब्राह्मण शीलालाच सर्वश्रेष्ठ मानत असत. त्यांनी आपल्या क्रोधावर विजय मिळवून आपल्या इंद्रिय-द्वारांचे उत्तम प्रकारे रक्षण केले होते. ‘‘ธมฺเม [Pg.335] จ ฌาเน จ รตา อเหสุํ,เต พฺราหฺมณา เย ปุราณํ สรนฺติ; อิเม จ โวกฺกมฺม ชปามเสติ,โคตฺเตน มตฺตา วิสมํ จรนฺติ. ते प्राचीन ब्राह्मणांच्या आचरणाचे स्मरण करणारे ब्राह्मण धम्मामध्ये आणि ध्यानामध्ये रममाण असत. परंतु आजचे हे तरुण मात्र त्या गुणांपासून दूर जाऊन, ‘आम्ही वेदांचे पठण करतो’ असे म्हणत आपल्या गोत्राच्या (कुळाच्या) अभिमानाने उन्मत्त होऊन अधर्माने वागतात. ‘‘โกธาภิภูตา ปุถุอตฺตทณฺฑา,วิรชฺชมานา สตณฺหาตณฺเหสุ; อคุตฺตทฺวารสฺส ภวนฺติ โมฆา,สุปิเนว ลทฺธํ ปุริสสฺส วิตฺตํ. क्रोधाने ग्रासलेले, हातात विविध प्रकारचे दंड (काठ्या) घेतलेले, आणि तृष्णा असलेल्या व नसलेल्या लोकांवर अन्याय करणारे हे noble लोक आहेत. ज्याची इंद्रिय-द्वारे सुरक्षित नाहीत, त्याचे सर्व व्रत-नियम तसेच व्यर्थ ठरतात, जसे एखाद्या माणसाला स्वप्नात मिळालेले धन जागे झाल्यावर व्यर्थ ठरते. ‘‘อนาสกา ถณฺฑิลสายิกา จ; ปาโต สินานญฺจ ตโย จ เวทา. उपवास करणे, उघड्या जमिनीवर झोपणे, पहाटेच स्नान करणे आणि तीन वेदांचे अध्ययन करणे; ‘‘ขราชินํ ชฏาปงฺโก, มนฺตา สีลพฺพตํ ตโป; กุหนา วงฺกทณฺฑา จ, อุทกาจมนานิ จ. खरखरीत काळवीटाचे चामडे पांघरणे, जटा वाढवणे, शरीरावर मळ साचू देणे, मंत्रपठण करणे, व्रत-नियम व तप आचरणे, ढोंगीपणा करणे, वाकडी काठी बाळगणे आणि पाण्याने आचमन करणे (तोंड धुणे); ‘‘วณฺณา เอเต พฺราหฺมณานํ, กตา กิญฺจิกฺขภาวนา; จิตฺตญฺจ สุสมาหิตํ, วิปฺปสนฺนมนาวิลํ; อขิลํ สพฺพภูเตสุ, โส มคฺโค พฺรหฺมปตฺติยา’’ติ. ब्राह्मणांची ही बाह्य लक्षणे केवळ ऐहिक लाभ मिळवण्यासाठीच केली जातात. परंतु (प्राचीन ब्राह्मणांचे) चित्त सुसमाहित (एकाग्र), अत्यंत प्रसन्न आणि निर्मळ होते. सर्व प्राणिमात्रांबद्दल त्यांच्या मनात कोणताही द्वेष (कठोरता) नव्हता; हाच ब्रह्मलोकाची प्राप्ती करण्याचा खरा मार्ग आहे.” อถ โข เต มาณวกา กุปิตา อนตฺตมนา เยน โลหิจฺโจ พฺราหฺมโณ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา โลหิจฺจํ พฺราหฺมณํ เอตทโวจุํ – ‘‘ยคฺเฆ! ภวํ ชาเนยฺย, สมโณ มหากจฺจาโน พฺราหฺมณานํ มนฺเต เอกํเสน อปวทติ, ปฏิกฺโกสตี’’ติ? เอวํ วุตฺเต, โลหิจฺโจ พฺราหฺมโณ กุปิโต อโหสิ อนตฺตมโน. อถ โข โลหิจฺจสฺส พฺราหฺมณสฺส เอตทโหสิ – ‘‘น โข ปน เมตํ ปติรูปํ โยหํ อญฺญทตฺถุ มาณวกานํเยว สุตฺวา สมณํ มหากจฺจานํ อกฺโกเสยฺยํ ปริภาเสยฺยํ. ยํนูนาหํ อุปสงฺกมิตฺวา ปุจฺเฉยฺย’’นฺติ. तेव्हा ते तरुण क्रोधीत व अप्रसन्न होऊन लोहिच्च ब्राह्मणाकडे गेले. तिथे जाऊन त्यांनी लोहिच्च ब्राह्मणाला म्हटले, “महाराज, आपल्याला माहीत असावे की, श्रमण महाकच्चान ब्राह्मणांच्या मंत्रांची (वेदांची) पूर्णपणे निंदा करतात आणि त्यांचा निषेध करतात.” असे म्हटल्यावर लोहिच्च ब्राह्मण क्रोधीत व अप्रसन्न झाला. परंतु लोहिच्च ब्राह्मणाच्या मनात असा विचार आला, “केवळ या तरुणांचे ऐकून मी श्रमण महाकच्चान यांना शिवीगाळ करणे किंवा त्यांच्याशी विरोध करणे मला योग्य वाटत नाही. मी स्वतः त्यांच्याकडे जाऊन विचारले तर बरे होईल.” อถ โข โลหิจฺโจ พฺราหฺมโณ เตหิ มาณวเกหิ สทฺธึ เยนายสฺมา มหากจฺจาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา มหากจฺจาเนน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โลหิจฺโจ พฺราหฺมโณ [Pg.336] อายสฺมนฺตํ มหากจฺจานํ เอตทโวจ – ‘‘อาคมํสุ นุ ขฺวิธ, โภ กจฺจาน, อมฺหากํ สมฺพหุลา อนฺเตวาสิกา กฏฺฐหารกา มาณวกา’’ติ? ‘‘อาคมํสุ ขฺวิธ เต, พฺราหฺมณ, สมฺพหุลา อนฺเตวาสิกา กฏฺฐหารกา มาณวกา’’ติ. ‘‘อหุ ปน โภโต กจฺจานสฺส เตหิ มาณวเกหิ สทฺธึ โกจิเทว กถาสลฺลาโป’’ติ? ‘‘อหุ โข เม, พฺราหฺมณ, เตหิ มาณวเกหิ สทฺธึ โกจิเทว กถาสลฺลาโป’’ติ. ‘‘ยถา กถํ ปน โภโต กจฺจานสฺส เตหิ มาณวเกหิ สทฺธึ อโหสิ กถาสลฺลาโป’’ติ? ‘‘เอวํ โข เม, พฺราหฺมณ, เตหิ มาณวเกหิ สทฺธึ อโหสิ กถาสลฺลาโป – त्यानंतर लोहिच्च ब्राह्मण त्या तरुणांसह आयुष्यमान महाकच्चान यांच्याकडे गेला. तिथे गेल्यावर त्याने आयुष्यमान महाकच्चान यांच्याशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी व संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या लोहिच्च ब्राह्मणाने आयुष्यमान महाकच्चान यांना विचारले, “हे कच्चान, आमचे अनेक लाकडे गोळा करणारे तरुण शिष्य इथे आले होते का?” “होय ब्राह्मणा, तुझे अनेक लाकडे गोळा करणारे तरुण शिष्य इथे आले होते.” “पूजनीय कच्चान यांचे त्या तरुणांशी काही संभाषण झाले का?” “होय ब्राह्मणा, माझे त्या तरुणांशी काही संभाषण झाले.” “पूजनीय कच्चान यांचे त्या तरुणांशी कशा प्रकारचे संभाषण झाले?” “हे ब्राह्मणा, माझे त्या तरुणांशी अशा प्रकारचे संभाषण झाले— ‘‘สีลุตฺตมา ปุพฺพตรา อเหสุํ,เต พฺราหฺมณา เย ปุราณํ สรนฺติ; …เป…; อขิลํ สพฺพภูเตสุ,โส มคฺโค พฺรหฺมปตฺติยา’’ติ. “‘जे प्राचीन ब्राह्मणांच्या आचरणाचे स्मरण करतात, ते प्राचीन काळातील ब्राह्मण शीलालाच सर्वश्रेष्ठ मानत असत... (तसेच)... सर्व प्राणिमात्रांबद्दल त्यांच्या मनात कोणताही द्वेष नव्हता; हाच ब्रह्मलोकाची प्राप्ती करण्याचा खरा मार्ग आहे.’ ‘‘เอวํ โข เม, พฺราหฺมณ, เตหิ มาณวเกหิ สทฺธึ อโหสิ กถาสลฺลาโป’’ติ. “हे ब्राह्मणा, माझे त्या तरुणांशी अशा प्रकारचे संभाषण झाले.” ‘‘‘อคุตฺตทฺวาโร’ติ ภวํ กจฺจาโน อาห. กิตฺตาวตา นุ โข, โภ กจฺจาน, อคุตฺตทฺวาโร โหตี’’ติ? ‘‘อิธ, พฺราหฺมณ, เอกจฺโจ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา ปิยรูเป รูเป อธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป รูเป พฺยาปชฺชติ, อนุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ, ปริตฺตเจตโส ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. โสเตน สทฺทํ สุตฺวา… ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตฺวา… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา… กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสิตฺวา… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ปิยรูเป ธมฺเม อธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป จ ธมฺเม พฺยาปชฺชติ, อนุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ, ปริตฺตเจตโส ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. เอวํ โข, พฺราหฺมณ, อคุตฺตทฺวาโร โหตี’’ติ. ‘‘อจฺฉริยํ, โภ กจฺจาน; อพฺภุตํ, โภ กจฺจาน! ยาวญฺจิทํ โภตา กจฺจาเนน อคุตฺตทฺวาโรว สมาโน อคุตฺตทฺวาโรติ อกฺขาโต. “पूजनीय कच्चान यांनी ‘इंद्रिय-द्वारे सुरक्षित नसलेला’ (अगुप्तद्वार) असे म्हटले. हे कच्चान, कोणत्या अर्थाने माणूस ‘इंद्रिय-द्वारे सुरक्षित नसलेला’ होतो?” “हे ब्राह्मणा, या जगात एखादा मनुष्य डोळ्यांनी रूप पाहून प्रिय वाटणाऱ्या रूपावर आसक्त होतो आणि अप्रिय वाटणाऱ्या रूपाचा द्वेष करतो. तो शरीराची स्मृती (कायानुस्मृती) न ठेवता, संकुचित चित्ताने जगतो. ज्या विमुक्तीमध्ये (चित्तविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्ती) त्याचे उत्पन्न झालेले पापी, अकुशल धम्म पूर्णपणे नष्ट होतात, त्या चित्तविमुक्तीला आणि प्रज्ञाविमुक्तीला तो यथार्थपणे जाणत नाही. कानाने शब्द ऐकून... नाकाने गंध घेऊन... जिभेने रस चाखून... शरीराने स्पर्श अनुभवून... मनाने धम्म (विचार) जाणून प्रिय वाटणाऱ्या धम्मावर आसक्त होतो आणि अप्रिय वाटणाऱ्या धम्माचा द्वेष करतो. तो शरीराची स्मृती न ठेवता, संकुचित चित्ताने जगतो. ज्या विमुक्तीमध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी, अकुशल धम्म पूर्णपणे नष्ट होतात, त्या चित्तविमुक्तीला आणि प्रज्ञाविमुक्तीला तो यथार्थपणे जाणत नाही. हे ब्राह्मणा, अशा प्रकारे माणूस ‘इंद्रिय-द्वारे सुरक्षित नसलेला’ होतो.” “आश्चर्यकारक आहे, हे कच्चान! अद्भुत आहे, हे कच्चान! पूजनीय कच्चान यांनी खरोखरच ज्याची इंद्रिय-द्वारे सुरक्षित नाहीत, त्यालाच ‘इंद्रिय-द्वारे सुरक्षित नसलेला’ असे योग्य प्रकारे सांगितले आहे.” ‘‘‘คุตฺตทฺวาโร’ติ [Pg.337] ภวํ กจฺจาโน อาห. กิตฺตาวตา นุ โข, โภ กจฺจาน, คุตฺตทฺวาโร โหตี’’ติ? ‘‘อิธ, พฺราหฺมณ, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา ปิยรูเป รูเป นาธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป รูเป น พฺยาปชฺชติ, อุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ, อปฺปมาณเจตโส ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ ปชานาติ ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. โสเตน สทฺทํ สุตฺวา… ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตฺวา… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา… กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสิตฺวา… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ปิยรูเป ธมฺเม นาธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป ธมฺเม น พฺยาปชฺชติ, อุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ, อปฺปมาณเจตโส ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ ปชานาติ, ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. เอวํ โข, พฺราหฺมณ, คุตฺตทฺวาโร โหตี’’ติ. “‘इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित असलेला’ असे आदरणीय कच्चायन म्हणतात. हे आदरणीय कच्चायन, मनुष्य कोणत्या प्रकारे इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित असलेला होतो?” “ब्राह्मणा, येथे भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहून प्रिय वाटणाऱ्या रूपावर आसक्त होत नाही आणि अप्रिय वाटणाऱ्या रूपावर द्वेष करत नाही. तो शरीराविषयीची स्मृती प्रस्थापित करून, अमर्याद चित्ताने विहार करतो. ज्यामध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी, अकुशल धर्म पूर्णपणे निरुद्ध होतात, त्या चेतोविमुक्तीला आणि प्रज्ञाविमुक्तीला तो यथार्थपणे जाणतो. कानाने शब्द ऐकून... नाकाने गंध घेऊन... जिभेने रस चाखून... शरीराने स्पर्श अनुभवून... मनाने धर्म जाणून प्रिय वाटणाऱ्या धर्मावर आसक्त होत नाही आणि अप्रिय वाटणाऱ्या धर्मावर द्वेष करत नाही. तो शरीराविषयीची स्मृती प्रस्थापित करून, अमर्याद चित्ताने विहार करतो. ज्यामध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी, अकुशल धर्म पूर्णपणे निरुद्ध होतात, त्या चेतोविमुक्तीला आणि प्रज्ञाविमुक्तीला तो यथार्थपणे जाणतो. ब्राह्मणा, अशा प्रकारे मनुष्य इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित असलेला होतो.” ‘‘อจฺฉริยํ, โภ กจฺจาน; อพฺภุตํ, โภ กจฺจาน! ยาวญฺจิทํ โภตา กจฺจาเนน คุตฺตทฺวาโรว สมาโน คุตฺตทฺวาโรติ อกฺขาโต. อภิกฺกนฺตํ, โภ กจฺจาน; อภิกฺกนฺตํ, โภ กจฺจาน! เสยฺยถาปิ, โภ กจฺจาน, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย, ปฏิจฺฉนฺนํ วา วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย, จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตีติ; เอวเมวํ โภตา กจฺจาเนน อเนกปริยาเยน ธมฺโม ปกาสิโต. เอสาหํ, โภ กจฺจาน, ตํ ภควนฺตํ สรณํ คจฺฉามิ, ธมฺมญฺจ, ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. อุปาสกํ มํ ภวํ กจฺจาโน ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คตํ. ยถา จ ภวํ กจฺจาโน มกฺกรกเต อุปาสกกุลานิ อุปสงฺกมติ; เอวเมว โลหิจฺจกุลํ อุปสงฺกมตุ. ตตฺถ เย มาณวกา วา มาณวิกา วา ภวนฺตํ กจฺจานํ อภิวาเทสฺสนฺติ ปจฺจุฏฺฐิสฺสนฺติ อาสนํ วา อุทกํ วา ทสฺสนฺติ, เตสํ ตํ ภวิสฺสติ ทีฆรตฺตํ หิตาย สุขายา’’ติ. นวมํ. “आश्चर्यकारक आहे, हे आदरणीय कच्चायन! अद्भुत आहे, हे आदरणीय कच्चायन! आदरणीय कच्चायन यांनी खरोखरच इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित असलेल्यालाच ‘इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित असलेला’ असे म्हटले आहे. अतिशय सुंदर, हे आदरणीय कच्चायन! अतिशय सुंदर, हे आदरणीय कच्चायन! ज्याप्रमाणे, हे आदरणीय कच्चायन, कोणी पालथे घातलेले भांडे उताणे करावे, झाकलेले उघडे करावे, वाट चुकलेल्याला वाट दाखवावी किंवा अंधारात तेलाचा दिवा धरावा जेणेकरून डोळे असणाऱ्यांना रूपे दिसू शकतील; त्याचप्रमाणे आदरणीय कच्चायन यांनी अनेक मार्गांनी धर्म प्रकाशित केला आहे. हे आदरणीय कच्चायन, मी त्या भगवंतांना, धर्माला आणि भिक्खू संघाला शरण जातो. आदरणीय कच्चायन यांनी मला आजपासून जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे. ज्याप्रमाणे आदरणीय कच्चायन मक्करकट येथील उपासकांच्या कुळांमध्ये जातात, त्याचप्रमाणे त्यांनी लोहिच्च कुळातही जावे. तेथे जे तरुण किंवा तरुणी आदरणीय कच्चायन यांना अभिवादन करतील, त्यांच्या स्वागतासाठी उठून उभे राहतील, त्यांना आसन किंवा पाणी देतील, ते त्यांच्या दीर्घकालीन हितासाठी आणि सुखासाठी ठरेल.” नववे सुत्त समाप्त. ๑๐. เวรหจฺจานิสุตฺตํ १०. वेराहच्चानि सुत्त ๑๓๓. เอกํ สมยํ อายสฺมา อุทายี กามณฺฑายํ วิหรติ โตเทยฺยสฺส พฺราหฺมณสฺส อมฺพวเน. อถ โข เวรหจฺจานิโคตฺตาย พฺราหฺมณิยา อนฺเตวาสี มาณวโก เยนายสฺมา อุทายี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา อุทายินา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข ตํ มาณวกํ [Pg.338] อายสฺมา อุทายี ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสสิ สมาทเปสิ สมุตฺเตเชสิ สมฺปหํเสสิ. อถ โข โส มาณวโก อายสฺมตา อุทายินา ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺสิโต สมาทปิโต สมุตฺเตชิโต สมฺปหํสิโต อุฏฺฐายาสนา เยน เวรหจฺจานิโคตฺตา พฺราหฺมณี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เวรหจฺจานิโคตฺตํ พฺราหฺมณึ เอตทโวจ – ‘‘ยคฺเฆ, โภติ, ชาเนยฺยาสิ ! สมโณ อุทายี ธมฺมํ เทเสติ อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ, สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสตี’’ติ. १३३. एका वेळी आदरणीय उदायी कामंडा येथे तोदेय्य ब्राह्मणाच्या आम्रवनात विहार करत होते. तेव्हा वेराहच्चानि गोत्राच्या ब्राह्मणीचा एक तरुण शिष्य जेथे आदरणीय उदायी होते तेथे गेला. तेथे जाऊन त्याने आदरणीय उदायी यांच्याशी कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या त्या तरुणाला आदरणीय उदायी यांनी धम्मचर्चेने उपदेश केला, प्रोत्साहित केले, उत्साहित केले आणि आनंदित केले. तेव्हा तो तरुण आदरणीय उदायी यांच्या धम्मचर्चेने उपदेशित, प्रोत्साहित, उत्साहित आणि आनंदित होऊन आपल्या आसनावरून उठला आणि जेथे वेराहच्चानि गोत्राची ब्राह्मणी होती तेथे गेला. तेथे जाऊन तो वेराहच्चानि गोत्राच्या ब्राह्मणीला म्हणाला— “बाईसाहेब, आपल्याला माहीत असावे! श्रमण उदायी असा धर्म उपदेशितात जो सुरुवातीला कल्याणकारी, मध्ये कल्याणकारी आणि शेवटी कल्याणकारी आहे; जो अर्थपूर्ण आणि सुस्पष्ट शब्दांनी युक्त आहे; ते पूर्णपणे परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचा प्रकाश पसरवितात.” ‘‘เตน หิ ตฺวํ, มาณวก, มม วจเนน สมณํ อุทายึ นิมนฺเตหิ สฺวาตนาย ภตฺเตนา’’ติ. ‘‘เอวํ โภตี’’ติ โข โส มาณวโก เวรหจฺจานิโคตฺตาย พฺราหฺมณิยา ปฏิสฺสุตฺวา เยนายสฺมา อุทายี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อุทายึ เอตทโวจ – ‘‘อธิวาเสตุ กิร, ภวํ, อุทายิ, อมฺหากํ อาจริยภริยาย เวรหจฺจานิโคตฺตาย พฺราหฺมณิยา สฺวาตนาย ภตฺต’’นฺติ. อธิวาเสสิ โข อายสฺมา อุทายี ตุณฺหีภาเวน. อถ โข อายสฺมา อุทายี ตสฺสา รตฺติยา อจฺจเยน ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย เยน เวรหจฺจานิโคตฺตาย พฺราหฺมณิยา นิเวสนํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. อถ โข เวรหจฺจานิโคตฺตา พฺราหฺมณี อายสฺมนฺตํ อุทายึ ปณีเตน ขาทนีเยน โภชนีเยน สหตฺถา สนฺตปฺเปสิ สมฺปวาเรสิ. อถ โข เวรหจฺจานิโคตฺตา พฺราหฺมณี อายสฺมนฺตํ อุทายึ ภุตฺตาวึ โอนีตปตฺตปาณึ ปาทุกา อาโรหิตฺวา อุจฺเจ อาสเน นิสีทิตฺวา สีสํ โอคุณฺฐิตฺวา อายสฺมนฺตํ อุทายึ เอตทโวจ – ‘‘ภณ, สมณ, ธมฺม’’นฺติ. ‘‘ภวิสฺสติ, ภคินิ, สมโย’’ติ วตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกมิ. “‘तर मग, तरुणा, माझ्या सांगण्यावरून श्रमण उदायी यांना उद्याच्या भोजनासाठी आमंत्रित कर.’ ‘तसेच असो, बाईसाहेब,’ असे म्हणून तो तरुण वेराहच्चानि गोत्राच्या ब्राह्मणीच्या आज्ञेचे पालन करून जेथे आदरणीय उदायी होते तेथे गेला. तेथे जाऊन तो आदरणीय उदायी यांना म्हणाला— ‘आदरणीय उदायी यांनी आमच्या आचार्यांच्या पत्नी वेराहच्चानि गोत्राच्या ब्राह्मणीचे उद्याच्या भोजनाचे आमंत्रण स्वीकारावे.’ आदरणीय उदायी यांनी मौन बाळगून ते स्वीकारले. त्यानंतर ती रात्र संपल्यावर, सकाळी आदरणीय उदायी यांनी वस्त्रे परिधान केली आणि पात्र व चीवर घेऊन जेथे वेराहच्चानि गोत्राच्या ब्राह्मणीचे घर होते तेथे गेले. तेथे जाऊन ते तयार केलेल्या आसनावर बसले. तेव्हा वेराहच्चानि गोत्राच्या ब्राह्मणीने आदरणीय उदायी यांना उत्तम अन्न व खाद्यपदार्थांनी स्वतःच्या हाताने तृप्त केले आणि आग्रहपूर्वक वाढले. जेव्हा आदरणीय उदायी यांचे भोजन झाले आणि त्यांनी पात्रातून हात काढून घेतला, तेव्हा वेराहच्चानि गोत्राची ब्राह्मणी पादत्राणे घालून, एका उंच आसनावर बसली आणि आपले डोके झाकून आदरणीय उदायी यांना म्हणाली— ‘श्रमणा, धर्माचा उपदेश करा.’ ‘भगिनी, त्यासाठी योग्य वेळ येईल,’ असे सांगून ते आसनावरून उठले आणि निघून गेले.” ทุติยมฺปิ โข โส มาณวโก เยนายสฺมา อุทายี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา อุทายินา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข ตํ มาณวกํ อายสฺมา อุทายี ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสสิ สมาทเปสิ สมุตฺเตเชสิ สมฺปหํเสสิ. ทุติยมฺปิ โข โส มาณวโก อายสฺมตา อุทายินา ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺสิโต สมาทปิโต สมุตฺเตชิโต สมฺปหํสิโต อุฏฺฐายาสนา เยน เวรหจฺจานิโคตฺตา พฺราหฺมณี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา [Pg.339] เวรหจฺจานิโคตฺตํ พฺราหฺมณึ เอตทโวจ – ‘‘ยคฺเฆ, โภติ, ชาเนยฺยาสิ! สมโณ อุทายี ธมฺมํ เทเสติ อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ, สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสตี’’ติ. “दुसऱ्यांदाही तो तरुण जेथे आदरणीय उदायी होते तेथे गेला. तेथे जाऊन त्याने आदरणीय उदायी यांच्याशी कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या त्या तरुणाला आदरणीय उदायी यांनी धम्मचर्चेने उपदेश केला, प्रोत्साहित केले, उत्साहित केले आणि आनंदित केले. दुसऱ्यांदाही तो तरुण आदरणीय उदायी यांच्या धम्मचर्चेने उपदेशित, प्रोत्साहित, उत्साहित आणि आनंदित होऊन आपल्या आसनावरून उठला आणि जेथे वेराहच्चानि गोत्राची ब्राह्मणी होती तेथे गेला. तेथे जाऊन तो वेराहच्चानि गोत्राच्या ब्राह्मणीला म्हणाला— ‘बाईसाहेब, आपल्याला माहीत असावे! श्रमण उदायी असा धर्म उपदेशितात जो सुरुवातीला कल्याणकारी, मध्ये कल्याणकारी आणि शेवटी कल्याणकारी आहे; जो अर्थपूर्ण आणि सुस्पष्ट शब्दांनी युक्त आहे; ते पूर्णपणे परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचा प्रकाश पसरवितात.’” ‘‘เอวเมวํ ปน ตฺวํ, มาณวก, สมณสฺส อุทายิสฺส วณฺณํ ภาสสิ. สมโณ ปนุทายี ‘ภณ, สมณ, ธมฺม’นฺติ วุตฺโต สมาโน ‘ภวิสฺสติ, ภคินิ, สมโย’ติ วตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกนฺโต’’ติ. ‘‘ตถา หิ ปน ตฺวํ, โภติ, ปาทุกา อาโรหิตฺวา อุจฺเจ อาสเน นิสีทิตฺวา สีสํ โอคุณฺฐิตฺวา เอตทโวจ – ‘ภณ, สมณ, ธมฺม’นฺติ. ธมฺมครุโน หิ เต ภวนฺโต ธมฺมคารวา’’ติ. ‘‘เตน หิ ตฺวํ, มาณวก, มม วจเนน สมณํ อุทายึ นิมนฺเตหิ สฺวาตนาย ภตฺเตนา’’ติ. ‘‘เอวํ, โภตี’’ติ โข โส มาณวโก เวรหจฺจานิโคตฺตาย พฺราหฺมณิยา ปฏิสฺสุตฺวา เยนายสฺมา อุทายี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อุทายึ เอตทโวจ – ‘‘อธิวาเสตุ กิร ภวํ อุทายี อมฺหากํ อาจริยภริยาย เวรหจฺจานิโคตฺตาย พฺราหฺมณิยา สฺวาตนาย ภตฺต’’นฺติ. อธิวาเสสิ โข อายสฺมา อุทายี ตุณฺหีภาเวน. “हे तरुण माणसा (माणवका), तू तर श्रमण उदायींची अशीच प्रशंसा करतोस. परंतु जेव्हा मी त्यांना म्हणाले, ‘श्रमणा, धम्म उपदेश करा,’ तेव्हा ते ‘भगिनी, यासाठी योग्य वेळ येईल’ असे सांगून आसनावरून उठून निघून गेले.” “आदरणीय बाई, ते यासाठी की आपण पादत्राणे घालून, उच्च आसनावर बसून आणि आपले डोके झाकून त्यांना म्हणालात—‘श्रमणा, धम्म उपदेश करा.’ कारण ते पूजनीय लोक धम्माचा आदर करतात आणि धम्माविषयी गौरव बाळगतात.” “तसे असेल तर, हे तरुण माणसा, माझ्या वतीने श्रमण उदायींना उद्याच्या भोजनासाठी आमंत्रित कर.” “होय, आदरणीय बाई,” असे म्हणून तो तरुण वेराहच्चानी गोत्राच्या ब्राह्मण स्त्रीला वचन देऊन जिथे आयुष्यमान उदायी होते तिथे गेला. तिथे जाऊन त्याने आयुष्यमान उदायींना असे म्हटले—“पूजनीय उदायींनी आमच्या आचार्यांच्या पत्नी वेराहच्चानी गोत्राच्या ब्राह्मण स्त्रीचे उद्याच्या भोजनाचे आमंत्रण स्वीकारावे.” आयुष्यमान उदायींनी मौन बाळगून ते आमंत्रण स्वीकारले. อถ โข อายสฺมา อุทายี ตสฺสา รตฺติยา อจฺจเยน ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย เยน เวรหจฺจานิโคตฺตาย พฺราหฺมณิยา นิเวสนํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. อถ โข เวรหจฺจานิโคตฺตา พฺราหฺมณี อายสฺมนฺตํ อุทายึ ปณีเตน ขาทนีเยน โภชนีเยน สหตฺถา สนฺตปฺเปสิ สมฺปวาเรสิ. อถ โข เวรหจฺจานิโคตฺตา พฺราหฺมณี อายสฺมนฺตํ อุทายึ ภุตฺตาวึ โอนีตปตฺตปาณึ ปาทุกา โอโรหิตฺวา นีเจ อาสเน นิสีทิตฺวา สีสํ วิวริตฺวา อายสฺมนฺตํ อุทายึ เอตทโวจ – ‘‘กิสฺมึ นุ โข, ภนฺเต, สติ อรหนฺโต สุขทุกฺขํ ปญฺญเปนฺติ, กิสฺมึ อสติ อรหนฺโต สุขทุกฺขํ น ปญฺญเปนฺตี’’ติ? त्यानंतर ती रात्र संपल्यावर, आयुष्यमान उदायींनी सकाळी चीवर परिधान केले आणि पात्र व चीवर घेऊन जिथे वेराहच्चानी गोत्राच्या ब्राह्मण स्त्रीचे घर होते तिथे गेले. तिथे जाऊन ते मांडलेल्या आसनावर बसले. त्यानंतर वेराहच्चानी गोत्राच्या ब्राह्मण स्त्रीने आयुष्यमान उदायींना उत्तम खाद्यान्न आणि भोजनाने स्वतःच्या हाताने तृप्त केले व आग्रहपूर्वक वाढले. त्यानंतर, आयुष्यमान उदायींनी भोजन आटोपून पात्रातून हात काढून घेतल्यावर, वेराहच्चानी गोत्राच्या ब्राह्मण स्त्रीने आपली पादत्राणे काढून, एका सखल आसनावर बसून, आपले डोके उघडे करून आयुष्यमान उदायींना असे विचारले—“भंते, काय अस्तित्वात असताना अराहंत सुख-दुःखाची प्रज्ञप्ती करतात, आणि काय अस्तित्वात नसताना अराहंत सुख-दुःखाची प्रज्ञप्ती करत नाहीत?” ‘‘จกฺขุสฺมึ โข, ภคินิ, สติ อรหนฺโต สุขทุกฺขํ ปญฺญเปนฺติ, จกฺขุสฺมึ อสติ อรหนฺโต สุขทุกฺขํ น ปญฺญเปนฺติ…เป… ชิวฺหาย สติ อรหนฺโต สุขทุกฺขํ ปญฺญเปนฺติ, ชิวฺหาย อสติ อรหนฺโต สุขทุกฺขํ น ปญฺญเปนฺติ…เป…. มนสฺมึ สติ อรหนฺโต สุขทุกฺขํ ปญฺญเปนฺติ, มนสฺมึ อสติ อรหนฺโต สุขทุกฺขํ น ปญฺญเปนฺตี’’ติ. “भगिनी, डोळे (चक्षू) अस्तित्वात असताना अराहंत सुख-दुःखाची प्रज्ञप्ती करतात, डोळे अस्तित्वात नसताना अराहंत सुख-दुःखाची प्रज्ञप्ती करत नाहीत...पे... जीभ (जिव्हा) अस्तित्वात असताना अराहंत सुख-दुःखाची प्रज्ञप्ती करतात, जीभ अस्तित्वात नसताना अराहंत सुख-दुःखाची प्रज्ञप्ती करत नाहीत...पे... मन अस्तित्वात असताना अराहंत सुख-दुःखाची प्रज्ञप्ती करतात, मन अस्तित्वात नसताना अराहंत सुख-दुःखाची प्रज्ञप्ती करत नाहीत.” เอวํ วุตฺเต, เวรหจฺจานิโคตฺตา พฺราหฺมณี อายสฺมนฺตํ อุทายึ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต; อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต! เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย[Pg.340], ปฏิจฺฉนฺนํ วา วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย, จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตีติ; เอวเมวํ อยฺเยน อุทายินา อเนกปริยาเยน ธมฺโม ปกาสิโต. เอสาหํ, อยฺย อุทายิ, ตํ ภควนฺตํ สรณํ คจฺฉามิ, ธมฺมญฺจ, ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. อุปาสิกํ มํ อยฺโย อุทายี ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ทสมํ. असे म्हटल्यावर, वेराहच्चानी गोत्राच्या ब्राह्मण स्त्रीने आयुष्यमान उदायींना असे म्हटले—“अतिशय सुंदर, भंते! अतिशय सुंदर, भंते! जसे काही, भंते, उपडे ठेवलेले उताणे करावे, झाकलेले उघडे करावे, वाट चुकलेल्याला वाट दाखवावी, किंवा अंधारात तेलाचा दिवा धरावा जेणेकरून डोळस व्यक्तींना रूपे दिसू शकतील; त्याचप्रमाणे आदरणीय उदायींनी अनेक पर्यायांनी धम्म प्रकाशित केला आहे. मी, आदरणीय उदायी, त्या भगवंतांना शरण जाते, धम्माला शरण जाते आणि भिक्खू संघाला शरण जाते. आदरणीय उदायींनी मला आजपासून जन्मभर शरण गेलेली उपासिका म्हणून स्वीकारावे.” दहावे (सुत्त समाप्त). คหปติวคฺโค เตรสโม. गृहपती वर्ग तेरावा (समाप्त). ตสฺสุทฺทานํ – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) — เวสาลี วชฺชิ นาฬนฺทา, ภารทฺวาช โสโณ จ โฆสิโต; หาลิทฺทิโก นกุลปิตา, โลหิจฺโจ เวรหจฺจานีติ. वेसाली, वज्जी, नाळंदा, भारद्वाज, सोण, घोसित, हालिद्दिक, नकुलपिता, लोहिच्च आणि वेराहच्चानी. ๑๔. เทวทหวคฺโค १४. देवदह वर्ग ๑. เทวทหสุตฺตํ १. देवदह सुत्त ๑๓๔. เอกํ สมยํ ภควา สกฺเกสุ วิหรติ เทวทหํ นาม สกฺยานํ นิคโม. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘นาหํ, ภิกฺขเว, สพฺเพสํเยว ภิกฺขูนํ ฉสุ ผสฺสายตเนสุ อปฺปมาเทน กรณียนฺติ วทามิ, น จ ปนาหํ, ภิกฺขเว, สพฺเพสํเยว ภิกฺขูนํ ฉสุ ผสฺสายตเนสุ นาปฺปมาเทน กรณียนฺติ วทามิ. เย เต, ภิกฺขเว, ภิกฺขู อรหนฺโต ขีณาสวา วุสิตวนฺโต กตกรณียา โอหิตภารา อนุปฺปตฺตสทตฺถา ปริกฺขีณภวสํโยชนา สมฺมทญฺญา วิมุตฺตา, เตสาหํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ฉสุ ผสฺสายตเนสุ นาปฺปมาเทน กรณียนฺติ วทามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? กตํ เตสํ อปฺปมาเทน, อภพฺพา เต ปมชฺชิตุํ. เย จ โข เต, ภิกฺขเว, ภิกฺขู เสกฺขา อปฺปตฺตมานสา อนุตฺตรํ โยคกฺเขมํ ปตฺถยมานา วิหรนฺติ, เตสาหํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ฉสุ ผสฺสายตเนสุ อปฺปมาเทน กรณียนฺติ วทามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? สนฺติ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา มโนรมาปิ, อมโนรมาปิ. ตฺยาสฺส ผุสฺส ผุสฺส จิตฺตํ น ปริยาทาย ติฏฺฐนฺติ. เจตโส อปริยาทานา อารทฺธํ โหติ วีริยํ อสลฺลีนํ, อุปฏฺฐิตา สติ อสมฺมุฏฺฐา, ปสฺสทฺโธ กาโย อสารทฺโธ, สมาหิตํ จิตฺตํ เอกคฺคํ. อิมํ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อปฺปมาทผลํ [Pg.341] สมฺปสฺสมาโน เตสํ ภิกฺขูนํ ฉสุ ผสฺสายตเนสุ อปฺปมาเทน กรณียนฺติ วทามิ…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา มโนรมาปิ อมโนรมาปิ. ตฺยาสฺส ผุสฺส ผุสฺส จิตฺตํ น ปริยาทาย ติฏฺฐนฺติ. เจตโส อปริยาทานา อารทฺธํ โหติ วีริยํ อสลฺลีนํ, อุปฏฺฐิตา สติ อสมฺมุฏฺฐา, ปสฺสทฺโธ กาโย อสารทฺโธ, สมาหิตํ จิตฺตํ เอกคฺคํ. อิมํ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อปฺปมาทผลํ สมฺปสฺสมาโน เตสํ ภิกฺขูนํ ฉสุ ผสฺสายตเนสุ อปฺปมาเทน กรณียนฺติ วทามี’’ติ. ปฐมํ. १३४. एकदा भगवान शाक्यांच्या देशात ‘देवदह’ नावाच्या शाक्यांच्या नगरात विहार करत होते. तिथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले—“भिक्खूंनो, मी सर्वच भिक्खूंना सहा स्पर्श-आयतनांच्या बाबतीत अप्रमादाने (जागरूकतेने) साधना केली पाहिजे असे म्हणत नाही; आणि भिक्खूंनो, मी सर्वच भिक्खूंना सहा स्पर्श-आयतनांच्या बाबतीत अप्रमादाने साधना करण्याची गरज नाही असेही म्हणत नाही. भिक्खूंनो, जे भिक्खू अराहंत आहेत, ज्यांचे आसव नष्ट झाले आहेत, ज्यांनी ब्रह्मचर्य पूर्ण केले आहे, ज्यांचे कर्तव्य पूर्ण झाले आहे, ज्यांनी ओझे उतरवून ठेवले आहे, ज्यांनी आपले ध्येय गाठले आहे, ज्यांचे भव-संयोजन पूर्णपणे नष्ट झाले आहे आणि जे सम्यक ज्ञानाने विमुक्त झाले आहेत, अशा भिक्खूंना मी सहा स्पर्श-आयतनांच्या बाबतीत अप्रमादाने साधना करण्याची गरज आहे असे म्हणत नाही. त्याचे कारण काय? त्यांनी अप्रमादाने आपले कार्य पूर्ण केले आहे, ते आता प्रमाद करण्यास असमर्थ आहेत. परंतु भिक्खूंनो, जे भिक्खू शैक्ष आहेत, ज्यांनी अद्याप अंतिम ध्येय प्राप्त केलेले नाही, आणि जे अनुत्तर योगक्षेम प्राप्त करण्याची आकांक्षा बाळगून विहार करत आहेत, अशा भिक्खूंना मी सहा स्पर्श-आयतनांच्या बाबतीत अप्रमादाने साधना केली पाहिजे असे सांगतो. त्याचे कारण काय? भिक्खूंनो, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगी अशी रूपे असतात जी मनोरम असतात आणि काही अमनोरम असतात. ती रूपे वारंवार स्पर्श करूनही त्या भिक्खूच्या चित्तावर ताबा मिळवून राहू शकत नाहीत. चित्तावर ताबा न मिळाल्यामुळे, त्याचे वीर्य दृढ आणि न खचणारे असते, त्याची स्मृती जागृत आणि संभ्रमरहित असते, शरीर शांत आणि व्याकुळतारहित असते, आणि चित्त एकाग्र व समाहित असते. भिक्खूंनो, अप्रमादाचे हे फळ पाहूनच मी त्या भिक्खूंना सहा स्पर्श-आयतनांच्या बाबतीत अप्रमादाने साधना केली पाहिजे असे सांगतो...पे... भिक्खूंनो, मनाने जाणता येण्याजोगे असे धम्म असतात जे मनोरम असतात आणि काही अमनोरम असतात. ते वारंवार स्पर्श करूनही त्या भिक्खूच्या चित्तावर ताबा मिळवून राहू शकत नाहीत. चित्तावर ताबा न मिळाल्यामुळे, त्याचे वीर्य दृढ आणि न खचणारे असते, त्याची स्मृती जागृत आणि संभ्रमरहित असते, शरीर शांत आणि व्याकुळतारहित असते, आणि चित्त एकाग्र व समाहित असते. भिक्खूंनो, अप्रमादाचे हे फळ पाहूनच मी त्या भिक्खूंना सहा स्पर्श-आयतनांच्या बाबतीत अप्रमादाने साधना केली पाहिजे असे सांगतो.” पहिले (सुत्त समाप्त). ๒. ขณสุตฺตํ २. क्षण सुत्त ๑๓๕. ‘‘ลาภา โว, ภิกฺขเว, สุลทฺธํ โว, ภิกฺขเว, ขโณ โว ปฏิลทฺโธ พฺรหฺมจริยวาสาย. ทิฏฺฐา มยา, ภิกฺขเว, ฉผสฺสายตนิกา นาม นิรยา. ตตฺถ ยํ กิญฺจิ จกฺขุนา รูปํ ปสฺสติ อนิฏฺฐรูปํเยว ปสฺสติ, โน อิฏฺฐรูปํ; อกนฺตรูปํเยว ปสฺสติ, โน กนฺตรูปํ; อมนาปรูปํเยว ปสฺสติ, โน มนาปรูปํ. ยํ กิญฺจิ โสเตน สทฺทํ สุณาติ…เป… ยํ กิญฺจิ ฆาเนน คนฺธํ ฆายติ…เป… ยํ กิญฺจิ ชิวฺหาย รสํ สายติ…เป… ยํ กิญฺจิ กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสติ…เป… ยํ กิญฺจิ มนสา ธมฺมํ วิชานาติ อนิฏฺฐรูปํเยว วิชานาติ, โน อิฏฺฐรูปํ; อกนฺตรูปํเยว วิชานาติ, โน กนฺตรูปํ; อมนาปรูปํเยว วิชานาติ, โน มนาปรูปํ. ลาภา โว, ภิกฺขเว, สุลทฺธํ โว, ภิกฺขเว, ขโณ โว ปฏิลทฺโธ พฺรหฺมจริยวาสาย. ทิฏฺฐา มยา, ภิกฺขเว, ฉผสฺสายตนิกา นาม สคฺคา. ตตฺถ ยํ กิญฺจิ จกฺขุนา รูปํ ปสฺสติ อิฏฺฐรูปํเยว ปสฺสติ, โน อนิฏฺฐรูปํ; กนฺตรูปํเยว ปสฺสติ, โน อกนฺตรูปํ; มนาปรูปํเยว ปสฺสติ, โน อมนาปรูปํ…เป… ยํ กิญฺจิ ชิวฺหาย รสํ สายติ…เป… ยํ กิญฺจิ มนสา ธมฺมํ วิชานาติ อิฏฺฐรูปํเยว วิชานาติ, โน อนิฏฺฐรูปํ; กนฺตรูปํเยว วิชานาติ, โน อกนฺตรูปํ; มนาปรูปํเยว วิชานาติ, โน อมนาปรูปํ. ลาภา โว, ภิกฺขเว, สุลทฺธํ โว, ภิกฺขเว, ขโณ โว ปฏิลทฺโธ พฺรหฺมจริยวาสายา’’ติ. ทุติยํ. १३५. “भिक्खूहो, हा तुमचा लाभ आहे, भिक्खूहो, हे तुम्हाला सुदैवाने लाभले आहे, की तुम्हाला ब्रह्मचर्यवासासाठी सुवर्णसंधी प्राप्त झाली आहे. भिक्खूहो, मी 'सहा स्पर्शायतने' नावाचे नरक पाहिले आहेत. तिथे डोळ्यांनी जे काही रूप पाहिले जाते, ते केवळ अनिष्टच असते, इष्ट नाही; केवळ अकांतच असते, कांत नाही; केवळ अमनापच असते, मनाप नाही. कानाने जो काही शब्द ऐकला जातो... नाकाने जो काही गंध घेतला जातो... जिभेने जो काही रस चाखला जातो... शरीराने ज्या काही स्पर्शाचा अनुभव घेतला जातो... मनाने ज्या काही धर्माचे (मनोविषयाचे) ज्ञान होते, ते केवळ अनिष्टच असते, इष्ट नाही; केवळ अकांतच असते, कांत नाही; केवळ अमनापच असते, मनाप नाही. भिक्खूहो, हा तुमचा लाभ आहे, भिक्खूहो, हे तुम्हाला सुदैवाने लाभले आहे, की तुम्हाला ब्रह्मचर्यवासासाठी सुवर्णसंधी प्राप्त झाली आहे. भिक्खूहो, मी 'सहा स्पर्शायतने' नावाचे स्वर्ग पाहिले आहेत. तिथे डोळ्यांनी जे काही रूप पाहिले जाते, ते केवळ इष्टच असते, अनिष्ट नाही; केवळ कांतच असते, अकांत नाही; केवळ मनापच असते, अमनाप नाही... जिभेने जो काही रस चाखला जातो... मनाने ज्या काही धर्माचे ज्ञान होते, ते केवळ इष्टच असते, अनिष्ट नाही; केवळ कांतच असते, अकांत नाही; केवळ मनापच असते, अमनाप नाही. भिक्खूहो, हा तुमचा लाभ आहे, भिक्खूहो, हे तुम्हाला सुदैवाने लाभले आहे, की तुम्हाला ब्रह्मचर्यवासासाठी सुवर्णसंधी प्राप्त झाली आहे।” (दुसरे सूत्र समाप्त.) ๓. ปฐมรูปารามสุตฺตํ ३. प्रथम रूपाराम सूत्र ๑๓๖. ‘‘รูปารามา, ภิกฺขเว, เทวมนุสฺสา รูปรตา รูปสมฺมุทิตา. รูปวิปริณามวิราคนิโรธา ทุกฺขา, ภิกฺขเว, เทวมนุสฺสา วิหรนฺติ. สทฺทารามา, ภิกฺขเว[Pg.342], เทวมนุสฺสา สทฺทรตา สทฺทสมฺมุทิตา. สทฺทวิปริณามวิราคนิโรธา ทุกฺขา, ภิกฺขเว, เทวมนุสฺสา วิหรนฺติ. คนฺธารามา… รสารามา… โผฏฺฐพฺพารามา… ธมฺมารามา, ภิกฺขเว, เทวมนุสฺสา ธมฺมรตา ธมฺมสมฺมุทิตา. ธมฺมวิปริณามวิราคนิโรธา ทุกฺขา, ภิกฺขเว, เทวมนุสฺสา วิหรนฺติ. ตถาคโต จ โข, ภิกฺขเว, อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ รูปานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวํ จ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ วิทิตฺวา น รูปาราโม น รูปรโต น รูปสมฺมุทิโต. รูปวิปริณามวิราคนิโรธา สุโข, ภิกฺขเว, ตถาคโต วิหรติ. สทฺทานํ… คนฺธานํ… รสานํ… โผฏฺฐพฺพานํ… ธมฺมานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ วิทิตฺวา น ธมฺมาราโม, น ธมฺมรโต, น ธมฺมสมฺมุทิโต. ธมฺมวิปริณามวิราคนิโรธา สุโข, ภิกฺขเว, ตถาคโต วิหรติ’’. อิทมโวจ ภควา. อิทํ วตฺวาน สุคโต อถาปรํ เอตทโวจ สตฺถา – १३६. “भिक्खूहो, देव आणि मनुष्य रूपांमध्ये रमणारे, रूपांमध्ये आसक्त असणारे आणि रूपांमध्येच आनंद मानणारे आहेत. रूपांच्या विपरिणामामुळे (बदलामुळे), विरागामुळे (नाशाने) आणि निरोधाने (अंताने) देव आणि मनुष्य दुःखात जगतात. भिक्खूहो, देव आणि मनुष्य शब्दांमध्ये रमणारे, शब्दांमध्ये आसक्त असणारे आणि शब्दांमध्येच आनंद मानणारे आहेत. शब्दांच्या विपरिणामामुळे, विरागामुळे आणि निरोधाने देव आणि मनुष्य दुःखात जगतात. गंधांमध्ये रमणारे... रसांमध्ये रमणारे... स्पर्शांमध्ये रमणारे... भिक्खूहो, देव आणि मनुष्य धर्मांमध्ये (मनोविषयांमध्ये) रमणारे, धर्मांमध्ये आसक्त असणारे आणि धर्मांमध्येच आनंद मानणारे आहेत. धर्मांच्या विपरिणामामुळे, विरागामुळे आणि निरोधाने देव आणि मनुष्य दुःखात जगतात. परंतु भिक्खूहो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध तथागतांनी रूपांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव (दोष) आणि निस्सरण (मुक्ती) हे जसे आहे तसे (यथाभूत) जाणून घेतल्यामुळे, ते रूपांमध्ये रमत नाहीत, रूपांमध्ये आसक्त होत नाहीत आणि रूपांमध्ये आनंद मानत नाहीत. रूपांच्या विपरिणामामुळे, विरागामुळे आणि निरोधाने तथागत सुखाने विहरतात. शब्दांचा... गंधांचा... रसांचा... स्पर्शांचा... धर्मांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण हे जसे आहे तसे जाणून घेतल्यामुळे, ते धर्मांमध्ये रमत नाहीत, धर्मांमध्ये आसक्त होत नाहीत आणि धर्मांमध्ये आनंद मानत नाहीत. धर्मांच्या विपरिणामामुळे, विरागामुळे आणि निरोधाने तथागत सुखाने विहरतात.” भगवान असे म्हणाले. हे बोलून सुगतांनी, शास्त्यांनी पुढे हे म्हटले – ‘‘รูปา สทฺทา รสา คนฺธา, ผสฺสา ธมฺมา จ เกวลา; อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา จ, ยาวตตฺถีติ วุจฺจติ. “रूप, शब्द, रस, गंध, स्पर्श आणि सर्व धर्म (मनोविषय), जे काही इष्ट, कांत (प्रिय) आणि मनाप (मनोरम) आहेत असे म्हटले जाते; ‘‘สเทวกสฺส โลกสฺส, เอเต โว สุขสมฺมตา; ยตฺถ เจเต นิรุชฺฌนฺติ, ตํ เตสํ ทุกฺขสมฺมตํ. “देवांसह संपूर्ण जगासाठी हेच सुखाचे साधन मानले गेले आहे. परंतु जिथे यांचा निरोध (नाश) होतो, त्याला ते दुःख मानतात. ‘‘สุขํ ทิฏฺฐมริเยภิ, สกฺกายสฺส นิโรธนํ; ปจฺจนีกมิทํ โหติ, สพฺพโลเกน ปสฺสตํ. “आर्यांनी (सत्पुरुषांनी) सक्काय-निरोध (अस्तित्वाच्या मोहाचा निरोध) हेच सुख म्हणून पाहिले आहे. हे स्पष्ट पाहणाऱ्यांचे दर्शन संपूर्ण जगाच्या अगदी विरुद्ध आहे. ‘‘ยํ ปเร สุขโต อาหุ, ตทริยา อาหุ ทุกฺขโต; ยํ ปเร ทุกฺขโต อาหุ, ตทริยา สุขโต วิทู. “ज्याला इतर लोक सुख म्हणतात, त्याला आर्य दुःख म्हणतात; ज्याला इतर लोक दुःख म्हणतात, त्याला आर्य सुख म्हणून जाणतात. ‘‘ปสฺส ธมฺมํ ทุราชานํ, สมฺมูฬฺเหตฺถ อวิทฺทสุ; นิวุตานํ ตโม โหติ, อนฺธกาโร อปสฺสตํ. “हा समजण्यास कठीण असलेला धर्म पहा, जिथे अज्ञानी लोक मोहित होतात. ज्यांचे मन झाकलेले आहे त्यांच्यासाठी हा अंधकार आहे, आणि जे पाहत नाहीत त्यांच्यासाठी हा काळोख आहे. ‘‘สตญฺจ วิวฏํ โหติ, อาโลโก ปสฺสตามิ; สนฺติเก น วิชานนฺติ, มคฺคา ธมฺมสฺส อโกวิทา. “परंतु सत्पुरुषांसाठी हा उघडलेला आहे, पाहणाऱ्यांसाठी हा प्रकाशासारखा आहे. जे मूर्ख धर्मात अकुशल आहेत, ते जवळ असूनही याला जाणत नाहीत. ‘‘ภวราคปเรเตภิ, ภวราคานุสารีภิ ; มารเธยฺยานุปนฺเนหิ, นายํ ธมฺโม สุสมฺพุโธ. “जे भवरागाने (अस्तित्वाच्या तृष्णेने) ग्रस्त आहेत, जे भवरागाचे अनुकरण करतात, जे मारच्या साम्राज्यात अडकलेले आहेत, त्यांच्यासाठी हा धर्म सहज समजण्याजोगा नाही. ‘‘โก [Pg.343] นุ อญฺญตฺร มริเยภิ, ปทํ สมฺพุทฺธุมรหติ; ยํ ปทํ สมฺมทญฺญาย, ปรินิพฺพนฺติ อนาสวา’’ติ. ตติยํ; “आर्यांशिवाय दुसरा कोण या पदाला (निर्वाणाला) पूर्णपणे जाणण्यास पात्र आहे? ज्या पदाला योग्य प्रकारे जाणून, आस्रव-रहित (अनास्रव) होऊन ते परिनिर्वाण प्राप्त करतात.” (तिसरे सूत्र समाप्त.) ๔. ทุติยรูปารามสุตฺตํ ४. द्वितीय रूपाराम सूत्र ๑๓๗. ‘‘รูปารามา, ภิกฺขเว, เทวมนุสฺสา รูปรตา รูปสมฺมุทิตา. รูปวิปริณามวิราคนิโรธา ทุกฺขา, ภิกฺขเว, เทวมนุสฺสา วิหรนฺติ. สทฺทารามา… คนฺธารามา… รสารามา … โผฏฺฐพฺพารามา… ธมฺมารามา, ภิกฺขเว, เทวมนุสฺสา ธมฺมรตา ธมฺมสมฺมุทิตา. ธมฺมวิปริณามวิราคนิโรธา ทุกฺขา, ภิกฺขเว, เทวมนุสฺสา วิหรนฺติ. ตถาคโต จ, ภิกฺขเว, อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ รูปานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ วิทิตฺวา น รูปาราโม น รูปรโต น รูปสมฺมุทิโต. รูปวิปริณามวิราคนิโรธา สุโข, ภิกฺขเว, ตถาคโต วิหรติ. สทฺทานํ… คนฺธานํ… รสานํ… โผฏฺฐพฺพานํ… ธมฺมานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ วิทิตฺวา น ธมฺมาราโม น ธมฺมรโต น ธมฺมสมฺมุทิโต. ธมฺมวิปริณามวิราคนิโรธา สุโข, ภิกฺขเว, ตถาคโต วิหรตี’’ติ. จตุตฺถํ. १३७. “भिक्खूहो, देव आणि मनुष्य रूपांमध्ये रमणारे, रूपांमध्ये आसक्त असणारे आणि रूपांमध्येच आनंद मानणारे आहेत. रूपांच्या विपरिणामामुळे, विरागामुळे आणि निरोधाने देव आणि मनुष्य दुःखात जगतात. शब्दांमध्ये रमणारे... गंधांमध्ये रमणारे... रसांमध्ये रमणारे... स्पर्शांमध्ये रमणारे... भिक्खूहो, देव आणि मनुष्य धर्मांमध्ये रमणारे, धर्मांमध्ये आसक्त असणारे आणि धर्मांमध्येच आनंद मानणारे आहेत. धर्मांच्या विपरिणामामुळे, विरागामुळे आणि निरोधाने देव आणि मनुष्य दुःखात जगतात. भिक्खूहो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध तथागतांनी रूपांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण हे जसे आहे तसे जाणून घेतल्यामुळे, ते रूपांमध्ये रमत नाहीत, रूपांमध्ये आसक्त होत नाहीत आणि रूपांमध्ये आनंद मानत नाहीत. रूपांच्या विपरिणामामुळे, विरागामुळे आणि निरोधाने तथागत सुखाने विहरतात. शब्दांचा... गंधांचा... रसांचा... स्पर्शांचा... धर्मांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण हे जसे आहे तसे जाणून घेतल्यामुळे, ते धर्मांमध्ये रमत नाहीत, धर्मांमध्ये आसक्त होत नाहीत आणि धर्मांमध्ये आनंद मानत नाहीत. धर्मांच्या विपरिणामामुळे, विरागामुळे आणि निरोधाने तथागत सुखाने विहरतात.” (चौथे सूत्र समाप्त.) ๕. ปฐมนตุมฺหากํสุตฺตํ ५. प्रथम न तुम्हाक सूत्र ๑๓๘. ‘‘ยํ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ; ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ…เป… ชิวฺหา น ตุมฺหากํ; ตํ ปชหถ. สา โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ…เป… มโน น ตุมฺหากํ; ตํ ปชหถ. โส โว ปหีโน หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ยํ อิมสฺมึ เชตวเน ติณกฏฺฐสาขาปลาสํ ตํ ชโน หเรยฺย วา ฑเหยฺย วา ยถาปจฺจยํ วา กเรยฺย, อปิ นุ ตุมฺหากํ เอวมสฺส – ‘อมฺเห ชโน หรติ วา ฑหติ วา ยถาปจฺจยํ วา กโรตี’’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตํ กิสฺส เหตุ’’? ‘‘น หิ โน เอตํ, ภนฺเต, อตฺตา วา อตฺตนิยํ วา’’ติ. ‘‘เอวเมว โข, ภิกฺขเว, จกฺขุ น ตุมฺหากํ; ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ…เป… ชิวฺหา น ตุมฺหากํ; ตํ ปชหถ. สา โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ…เป… มโน น ตุมฺหากํ[Pg.344]; ตํ ปชหถ. โส โว ปหีโน หิตาย สุขาย ภวิสฺสตี’’ติ. ปญฺจมํ. १३८. “भिक्षूंनो, जे तुमचे नाही, त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. आणि भिक्षूंनो, तुमचे काय नाही? भिक्षूंनो, डोळा (चक्षू) तुमचा नाही; त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल... तसेच... जीभ (जिव्हा) तुमची नाही; तिचा त्याग करा. तिचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल... तसेच... मन तुमचे नाही; त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. भिक्षूंनो, समजा या जेतवनात जे काही गवत, लाकूड, फांद्या आणि पाने आहेत, ती लोकांनी नेली किंवा जाळली किंवा त्यांच्या इच्छेनुसार त्यांची विल्हेवाट लावली, तर तुम्हाला असे वाटेल का की—‘लोक आपल्याला घेऊन जात आहेत, किंवा जाळत आहेत, किंवा आपल्या इच्छेनुसार आपली विल्हेवाट लावत आहेत’?” “नाही, भन्ते.” “ते कशामुळे?” “कारण, भन्ते, हे आमचा आत्मा (स्व) नाही आणि आमच्या आत्म्याचे (स्वतःचे) काही नाही.” “तसेच, भिक्षूंनो, डोळा तुमचा नाही; त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल... तसेच... जीभ तुमची नाही; तिचा त्याग करा. तिचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल... तसेच... मन तुमचे नाही; त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल.” पाचवे. ๖. ทุติยนตุมฺหากํสุตฺตํ ६. दुसरे न-तुम्हाकं सुत्त (तुमचे नसलेले सुत्त) ๑๓๙. ‘‘ยํ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ, ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ? รูปา, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ; เต ปชหถ. เต โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสนฺติ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา น ตุมฺหากํ; เต ปชหถ. เต โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสนฺติ. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ยํ อิมสฺมึ เชตวเน…เป… เอวเมว โข, ภิกฺขเว, รูปา น ตุมฺหากํ; เต ปชหถ. เต โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสนฺตี’’ติ. ฉฏฺฐํ. १३९. “भिक्षूंनो, जे तुमचे नाही, त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. आणि भिक्षूंनो, तुमचे काय नाही? भिक्षूंनो, रूपे (दृश्य वस्तू) तुमची नाहीत; त्यांचा त्याग करा. त्यांचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. शब्द... गंध... रस... स्पर्श (फोठ्ठब्ब)... विचार/धम्म तुमचे नाहीत; त्यांचा त्याग करा. त्यांचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. भिक्षूंनो, समजा या जेतवनात... तसेच... तसेच, भिक्षूंनो, रूपे तुमची नाहीत; त्यांचा त्याग करा. त्यांचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल.” सहावे. ๗. อชฺฌตฺตานิจฺจเหตุสุตฺตํ ७. अज्झत्त-अनिच्च-हेतू सुत्त (अंतर्गत अनित्यतेचे कारण सुत्त) ๑๔๐. ‘‘จกฺขุํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ. โยปิ เหตุ, โยปิ ปจฺจโย จกฺขุสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ อนิจฺโจ. อนิจฺจสมฺภูตํ, ภิกฺขเว, จกฺขุ กุโต นิจฺจํ ภวิสฺสติ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา. โยปิ เหตุ, โยปิ ปจฺจโย ชิวฺหาย อุปฺปาทาย โสปิ อนิจฺโจ. อนิจฺจสมฺภูตา, ภิกฺขเว, ชิวฺหา กุโต นิจฺจา ภวิสฺสติ…เป… มโน อนิจฺโจ. โยปิ, ภิกฺขเว, เหตุ โยปิ ปจฺจโย มนสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ อนิจฺโจ. อนิจฺจสมฺภูโต, ภิกฺขเว, มโน กุโต นิจฺโจ ภวิสฺสติ! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… ชิวฺหายปิ นิพฺพินฺทติ…เป… นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. สตฺตมํ. १४०. “भिक्षूंनो, डोळा (चक्षू) अनित्य आहे. डोळ्याच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय (अनुकूल परिस्थिती) आहे, ते देखील अनित्य आहे. भिक्षूंनो, अनित्यापासून उत्पन्न झालेला डोळा नित्य कसा असू शकेल?... तसेच... जीभ अनित्य आहे. जिभेच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील अनित्य आहे. भिक्षूंनो, अनित्यापासून उत्पन्न झालेली जीभ नित्य कशी असू शकेल?... तसेच... मन अनित्य आहे. भिक्षूंनो, मनाच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील अनित्य आहे. भिक्षूंनो, अनित्यापासून उत्पन्न झालेले मन नित्य कसे असू शकेल! असे पाहणारा, भिक्षूंनो, सुतवान (श्रुतवान) आर्यश्रावक डोळ्याविषयी देखील विरक्त होतो... तसेच... जिभेविषयी देखील विरक्त होतो... तसेच... मनाविषयी देखील विरक्त होतो. विरक्त होऊन तो रागरहित होतो; वैराग्यामुळे तो मुक्त होतो; मुक्त झाल्यावर ‘मुक्त झाले’ असे ज्ञान होते. ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही,’ असे तो जाणतो.” सातवे. ๘. อชฺฌตฺตทุกฺขเหตุสุตฺตํ ८. अज्झत्त-दुक्ख-हेतू सुत्त (अंतर्गत दुःखाचे कारण सुत्त) ๑๔๑. ‘‘จกฺขุํ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ. โยปิ เหตุ โยปิ ปจฺจโย จกฺขุสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ ทุกฺโข. ทุกฺขสมฺภูตํ, ภิกฺขเว, จกฺขุ กุโต สุขํ ภวิสฺสติ…เป… ชิวฺหา ทุกฺขา. โยปิ เหตุ, โยปิ ปจฺจโย ชิวฺหาย อุปฺปาทาย, โสปิ ทุกฺโข. ทุกฺขสมฺภูตา, ภิกฺขเว, ชิวฺหา กุโต สุขา ภวิสฺสติ…เป… มโน ทุกฺโข. โยปิ เหตุ โยปิ ปจฺจโย มนสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ ทุกฺโข. ทุกฺขสมฺภูโต, ภิกฺขเว, มโน กุโต สุโข ภวิสฺสติ! เอวํ ปสฺสํ…เป… ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. อฏฺฐมํ. १४१. “भिक्षूंनो, डोळा दुःख आहे. डोळ्याच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील दुःखकारक आहे. भिक्षूंनो, दुःखापासून उत्पन्न झालेला डोळा सुखकारक कसा असू शकेल?... तसेच... जीभ दुःख आहे. जिभेच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील दुःखकारक आहे. भिक्षूंनो, दुःखापासून उत्पन्न झालेली जीभ सुखकारक कशी असू शकेल?... तसेच... मन दुःख आहे. मनाच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील दुःखकारक आहे. भिक्षूंनो, दुःखापासून उत्पन्न झालेले मन सुखकारक कसे असू शकेल! असे पाहणारा... तसेच... ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही,’ असे तो जाणतो.” आठवे. ๙. อชฺฌตฺตานตฺตเหตุสุตฺตํ ९. अज्झत्त-अनत्ता-हेतू सुत्त (अंतर्गत अनात्मतेचे कारण सुत्त) ๑๔๒. ‘‘จกฺขุํ[Pg.345], ภิกฺขเว, อนตฺตา. โยปิ เหตุ, โยปิ ปจฺจโย จกฺขุสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ อนตฺตา. อนตฺตสมฺภูตํ, ภิกฺขเว, จกฺขุ กุโต อตฺตา ภวิสฺสติ…เป… ชิวฺหา อนตฺตา. โยปิ เหตุ โยปิ ปจฺจโย ชิวฺหาย อุปฺปาทาย, โสปิ อนตฺตา. อนตฺตสมฺภูตา, ภิกฺขเว, ชิวฺหา กุโต อตฺตา ภวิสฺสติ…เป… มโน อนตฺตา. โยปิ เหตุ โยปิ ปจฺจโย มนสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ อนตฺตา. อนตฺตสมฺภูโต, ภิกฺขเว, มโน กุโต อตฺตา ภวิสฺสติ! เอวํ ปสฺสํ…เป… ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. นวมํ. १४२. “भिक्षूंनो, डोळा अनात्मा (अनात्ता) आहे. डोळ्याच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील अनात्मा आहे. भिक्षूंनो, अनात्म्यापासून उत्पन्न झालेला डोळा आत्मा कसा असू शकेल?... तसेच... जीभ अनात्मा आहे. जिभेच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील अनात्मा आहे. भिक्षूंनो, अनात्म्यापासून उत्पन्न झालेली जीभ आत्मा कशी असू शकेल?... तसेच... मन अनात्मा आहे. मनाच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील अनात्मा आहे. भिक्षूंनो, अनात्म्यापासून उत्पन्न झालेले मन आत्मा कसे असू शकेल! असे पाहणारा... तसेच... ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही,’ असे तो जाणतो.” नववे. ๑๐. พาหิรานิจฺจเหตุสุตฺตํ १०. बाहिर-अनिच्च-हेतू सुत्त (बाह्य अनित्यतेचे कारण सुत्त) ๑๔๓. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนิจฺจา. โยปิ เหตุ, โยปิ ปจฺจโย รูปานํ อุปฺปาทาย, โสปิ อนิจฺโจ. อนิจฺจสมฺภูตา, ภิกฺขเว, รูปา กุโต นิจฺจา ภวิสฺสนฺติ! สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนิจฺจา. โยปิ เหตุ, โยปิ ปจฺจโย ธมฺมานํ อุปฺปาทาย, โสปิ อนิจฺโจ. อนิจฺจสมฺภูตา, ภิกฺขเว, ธมฺมา กุโต นิจฺจา ภวิสฺสนฺติ! เอวํ ปสฺสํ…เป… ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. ทสมํ. १४३. “भिक्षूंनो, रूपे अनित्य आहेत. रूपांच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील अनित्य आहे. भिक्षूंनो, अनित्यापासून उत्पन्न झालेली रूपे नित्य कशी असू शकतील! शब्द... गंध... रस... स्पर्श... विचार/धम्म अनित्य आहेत. धम्मांच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील अनित्य आहे. भिक्षूंनो, अनित्यापासून उत्पन्न झालेले धम्म नित्य कसे असू शकतील! असे पाहणारा... तसेच... ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही,’ असे तो जाणतो.” दहावे. ๑๑. พาหิรทุกฺขเหตุสุตฺตํ ११. बाहिर-दुक्ख-हेतू सुत्त (बाह्य दुःखाचे कारण सुत्त) ๑๔๔. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, ทุกฺขา. โยปิ เหตุ, โยปิ ปจฺจโย รูปานํ อุปฺปาทาย, โสปิ ทุกฺโข. ทุกฺขสมฺภูตา, ภิกฺขเว, รูปา กุโต สุขา ภวิสฺสนฺติ! สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา ทุกฺขา. โยปิ เหตุ, โยปิ ปจฺจโย ธมฺมานํ อุปฺปาทาย, โสปิ ทุกฺโข. ทุกฺขสมฺภูตา, ภิกฺขเว, ธมฺมา กุโต สุขา ภวิสฺสนฺติ! เอวํ ปสฺสํ…เป… ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. เอกาทสมํ. १४४. “भिक्षूंनो, रूपे दुःख आहेत. रूपांच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील दुःखकारक आहे. भिक्षूंनो, दुःखापासून उत्पन्न झालेली रूपे सुखकारक कशी असू शकतील! शब्द... गंध... रस... स्पर्श... विचार/धम्म दुःख आहेत. धम्मांच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील दुःखकारक आहे. भिक्षूंनो, दुःखापासून उत्पन्न झालेले धम्म सुखकारक कसे असू शकतील! असे पाहणारा... तसेच... ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही,’ असे तो जाणतो.” अकरावे. ๑๒. พาหิรานตฺตเหตุสุตฺตํ १२. बाहिर-अनत्ता-हेतू सुत्त (बाह्य अनात्मतेचे कारण सुत्त) ๑๔๕. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนตฺตา. โยปิ เหตุ, โยปิ ปจฺจโย รูปานํ อุปฺปาทาย, โสปิ อนตฺตา. อนตฺตสมฺภูตา, ภิกฺขเว, รูปา กุโต อตฺตา ภวิสฺสนฺติ! สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนตฺตา. โยปิ เหตุ, โยปิ ปจฺจโย ธมฺมานํ อุปฺปาทาย, โสปิ อนตฺตา. อนตฺตสมฺภูตา, ภิกฺขเว, ธมฺมา [Pg.346] กุโต อตฺตา ภวิสฺสนฺติ! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, สทฺเทสุปิ… คนฺเธสุปิ… รเสสุปิ… โผฏฺฐพฺเพสุปิ… ธมฺเมสุปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. ทฺวาทสมํ. १४५. भिक्खूहो, रूप अनात्म आहेत. रूपांच्या उत्पत्तीसाठी जो काही हेतू आणि जो काही प्रत्यय आहे, तो देखील अनात्मच आहे. भिक्खूहो, अनात्मापासून उत्पन्न झालेले रूप कसे बरे आत्म असू शकतील? शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धम्म अनात्म आहेत. धम्मांच्या उत्पत्तीसाठी जो काही हेतू आणि जो काही प्रत्यय आहे, तो देखील अनात्मच आहे. भिक्खूहो, अनात्मापासून उत्पन्न झालेले धम्म कसे बरे आत्म असू शकतील? भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक रूपांविषयी देखील निर्वेद पावतो, शब्दांविषयी देखील... गंधांविषयी... रसांविषयी... स्पर्शांविषयी... धम्मांविषयी देखील निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्याने तो विरक्त होतो; विरक्तीमुळे तो मुक्त होतो. मुक्त झाल्यावर 'मी मुक्त झालो आहे' असे ज्ञान होते. 'जन्म क्षीण झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे कर्तव्य होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर दुसरे काही करायचे उरले नाही' असे तो जाणतो. बारावे. เทวทหวคฺโค จุทฺทสโม. देवदहवग्गो चौदावा समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याचा संग्रह (उद्दान) पुढीलप्रमाणे – เทวทโห ขโณ รูปา, ทฺเว นตุมฺหากเมว จ; เหตุนาปิ ตโย วุตฺตา, ทุเว อชฺฌตฺตพาหิราติ. देवदह, खण, रूप, दोन 'न तुम्हाकं' (तुमचे नाही), हेतूने देखील तीन सांगितले आहेत, आणि दोन 'अध्यात्म-बाह्य' सांगितले आहेत. ๑๕. นวปุราณวคฺโค १५. नवपुराणवग्गो ๑. กมฺมนิโรธสุตฺตํ १. कम्मनिरोधसुत्त ๑๔๖. ‘‘นวปุราณานิ, ภิกฺขเว, กมฺมานิ เทเสสฺสามิ กมฺมนิโรธํ กมฺมนิโรธคามินิญฺจ ปฏิปทํ. ตํ สุณาถ, สาธุกํ มนสิ กโรถ; ภาสิสฺสามีติ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ปุราณกมฺมํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, ปุราณกมฺมํ อภิสงฺขตํ อภิสญฺเจตยิตํ เวทนิยํ ทฏฺฐพฺพํ…เป… ชิวฺหา ปุราณกมฺมา อภิสงฺขตา อภิสญฺเจตยิตา เวทนิยา ทฏฺฐพฺพา…เป… มโน ปุราณกมฺโม อภิสงฺขโต อภิสญฺเจตยิโต เวทนิโย ทฏฺฐพฺโพ. อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ปุราณกมฺมํ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, นวกมฺมํ? ยํ โข, ภิกฺขเว, เอตรหิ กมฺมํ กโรติ กาเยน วาจาย มนสา, อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, นวกมฺมํ. กตโม จ, ภิกฺขเว, กมฺมนิโรโธ? โย โข, ภิกฺขเว, กายกมฺมวจีกมฺมมโนกมฺมสฺส นิโรธา วิมุตฺตึ ผุสติ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, กมฺมนิโรโธ. กตมา จ, ภิกฺขเว, กมฺมนิโรธคามินี ปฏิปทา? อยเมว อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ, สมฺมาสงฺกปฺโป, สมฺมาวาจา, สมฺมากมฺมนฺโต, สมฺมาอาชีโว, สมฺมาวายาโม, สมฺมาสติ, สมฺมาสมาธิ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, กมฺมนิโรธคามินี ปฏิปทา. อิติ โข, ภิกฺขเว, เทสิตํ มยา ปุราณกมฺมํ, เทสิตํ [Pg.347] นวกมฺมํ, เทสิโต กมฺมนิโรโธ, เทสิตา กมฺมนิโรธคามินี ปฏิปทา. ยํ โข, ภิกฺขเว, สตฺถารา กรณียํ สาวกานํ หิเตสินา อนุกมฺปเกน อนุกมฺปํ อุปาทาย, กตํ โว ตํ มยา. เอตานิ, ภิกฺขเว, รุกฺขมูลานิ, เอตานิ สุญฺญาคารานิ. ฌายถ, ภิกฺขเว, มา ปมาทตฺถ; มา ปจฺฉาวิปฺปฏิสาริโน อหุวตฺถ. อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนี’’ติ. ปฐมํ. १४६. भिक्खूहो, मी तुम्हाला नवीन आणि जुने कर्म, कर्मनिरोध आणि कर्मनिरोधाकडे नेणारी प्रतिपदा शिकवीन. ते ऐका, नीट मनन करा; मी सांगेन. भिक्खूहो, जुने कर्म कोणते? भिक्खूहो, चक्षु हे जुने कर्म आहे, जे संस्कारित, चेतनेने निर्माण केलेले आणि वेदनिय (अनुभव घेण्यास योग्य) म्हणून पाहिले पाहिजे... पे... जिव्हा हे जुने कर्म आहे, जे संस्कारित, चेतनेने निर्माण केलेले आणि वेदनिय म्हणून पाहिले पाहिजे... पे... मन हे जुने कर्म आहे, जे संस्कारित, चेतनेने निर्माण केलेले आणि वेदनिय म्हणून पाहिले पाहिजे. भिक्खूहो, याला जुने कर्म असे म्हणतात. आणि भिक्खूहो, नवीन कर्म कोणते? भिक्खूहो, सध्याच्या काळात मनुष्य काया, वाचा किंवा मनाने जे काही कर्म करतो, भिक्खूहो, याला नवीन कर्म असे म्हणतात. आणि भिक्खूहो, कर्मनिरोध म्हणजे काय? भिक्खूहो, कायकर्म, वचीकर्म आणि मनोकर्म यांच्या निरोधाने जो विमुक्ती प्राप्त करतो, भिक्खूहो, याला कर्मनिरोध असे म्हणतात. आणि भिक्खूहो, कर्मनिरोधाकडे नेणारी प्रतिपदा कोणती? हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग होय, जसे की – सम्यक दृष्टी, सम्यक संकल्प, सम्यक वाचा, सम्यक कर्मांत, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृती, सम्यक समाधी. भिक्खूहो, याला कर्मनिरोधाकडे नेणारी प्रतिपदा असे म्हणतात. अशा प्रकारे, भिक्खूहो, मी तुम्हाला जुने कर्म शिकवले आहे, नवीन कर्म शिकवले आहे, कर्मनिरोध शिकवला आहे आणि कर्मनिरोधाकडे नेणारी प्रतिपदा शिकवली आहे. भिक्खूहो, शिष्यांचे कल्याण इच्छिणाऱ्या, त्यांच्याबद्दल अनुकंपा बाळगणाऱ्या कारुणिक शास्त्याने अनुकंपेपोटी जे काही करायला हवे, ते मी तुमच्यासाठी केले आहे. भिक्खूहो, ही वृक्षमूळे आहेत, ही शून्यगृहे आहेत. भिक्खूहो, ध्यान करा, प्रमाद करू नका; नंतर पश्चात्ताप करणारे होऊ नका. हाच आमचा तुम्हाला उपदेश आहे. पहिले. ๒. อนิจฺจนิพฺพานสปฺปายสุตฺตํ २. अनिच्चनिब्बानसप्पायसुत्त ๑๔๗. ‘‘นิพฺพานสปฺปายํ โว, ภิกฺขเว, ปฏิปทํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ…เป… กตมา จ สา, ภิกฺขเว, นิพฺพานสปฺปายา ปฏิปทา? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุํ อนิจฺจนฺติ ปสฺสติ, รูปา อนิจฺจาติ ปสฺสติ, จกฺขุวิญฺญาณํ อนิจฺจนฺติ ปสฺสติ, จกฺขุสมฺผสฺโส อนิจฺโจติ ปสฺสติ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจนฺติ ปสฺสติ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจาติ ปสฺสติ, รสา อนิจฺจาติ ปสฺสติ, ชิวฺหาวิญฺญาณํ อนิจฺจนฺติ ปสฺสติ, ชิวฺหาสมฺผสฺโส อนิจฺโจติ ปสฺสติ, ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจนฺติ ปสฺสติ…เป… มโน อนิจฺโจติ ปสฺสติ, ธมฺมา อนิจฺจาติ ปสฺสติ, มโนวิญฺญาณํ อนิจฺจนฺติ ปสฺสติ, มโนสมฺผสฺโส อนิจฺโจติ ปสฺสติ, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจนฺติ ปสฺสติ. อยํ โข สา, ภิกฺขเว, นิพฺพานสปฺปายา ปฏิปทา’’ติ. ทุติยํ. १४७. भिक्खूहो, मी तुम्हाला निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली प्रतिपदा शिकवीन. ती ऐका... पे... आणि भिक्खूहो, निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली ती प्रतिपदा कोणती? भिक्खूहो, या शासनात भिक्खू चक्षूला अनित्य म्हणून पाहतो, रूपांना अनित्य म्हणून पाहतो, चक्षु-विज्ञानाला अनित्य म्हणून पाहतो, चक्षु-स्पर्शाला अनित्य म्हणून पाहतो. चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील तो अनित्य म्हणून पाहतो... पे... जिव्हेला अनित्य म्हणून पाहतो, रसांना अनित्य म्हणून पाहतो, जिव्हा-विज्ञानाला अनित्य म्हणून पाहतो, जिव्हा-स्पर्शाला अनित्य म्हणून पाहतो, जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील तो अनित्य म्हणून पाहतो... पे... मनाला अनित्य म्हणून पाहतो, धम्मांना अनित्य म्हणून पाहतो, मनो-विज्ञानाला अनित्य म्हणून पाहतो, मनो-स्पर्शाला अनित्य म्हणून पाहतो, मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील तो अनित्य म्हणून पाहतो. भिक्खूहो, हीच ती निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली प्रतिपदा होय. दुसरे. ๓. ทุกฺขนิพฺพานสปฺปายสุตฺตํ ३. दुक्खनिब्बानसप्पायसुत्त ๑๔๘. ‘‘นิพฺพานสปฺปายํ โว, ภิกฺขเว, ปฏิปทํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ…เป… กตมา จ สา, ภิกฺขเว, นิพฺพานสปฺปายา ปฏิปทา? อิธ, ภิกฺขเว, จกฺขุํ ทุกฺขนฺติ ปสฺสติ, รูปา ทุกฺขาติ ปสฺสติ, จกฺขุวิญฺญาณํ ทุกฺขนฺติ ปสฺสติ, จกฺขุสมฺผสฺโส ทุกฺโขติ ปสฺสติ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ทุกฺขนฺติ ปสฺสติ…เป… ชิวฺหา ทุกฺขาติ ปสฺสติ…เป… มโน ทุกฺโขติ ปสฺสติ, ธมฺมา ทุกฺขาติ ปสฺสติ, มโนวิญฺญาณํ ทุกฺขนฺติ ปสฺสติ, มโนสมฺผสฺโส ทุกฺโขติ ปสฺสติ, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ [Pg.348] ทุกฺขนฺติ ปสฺสติ. อยํ โข สา, ภิกฺขเว, นิพฺพานสปฺปายา ปฏิปทา’’ติ. ตติยํ. १४८. भिक्खूहो, मी तुम्हाला निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली प्रतिपदा शिकवीन. ती ऐका... पे... आणि भिक्खूहो, निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली ती प्रतिपदा कोणती? भिक्खूहो, या शासनात भिक्खू चक्षूला दुःख म्हणून पाहतो, रूपांना दुःख म्हणून पाहतो, चक्षु-विज्ञानाला दुःख म्हणून पाहतो, चक्षु-स्पर्शाला दुःख म्हणून पाहतो. चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील तो दुःख म्हणून पाहतो... पे... जिव्हेला दुःख म्हणून पाहतो... पे... मनाला दुःख म्हणून पाहतो, धम्मांना दुःख म्हणून पाहतो, मनो-विज्ञानाला दुःख म्हणून पाहतो, मनो-स्पर्शाला दुःख म्हणून पाहतो, मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील तो दुःख म्हणून पाहतो. भिक्खूहो, हीच ती निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली प्रतिपदा होय. तिसरे. ๔. อนตฺตนิพฺพานสปฺปายสุตฺตํ ४. अनत्तनिब्बानसप्पायसुत्त ๑๔๙. ‘‘นิพฺพานสปฺปายํ โว, ภิกฺขเว, ปฏิปทํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ…เป… กตมา จ สา, ภิกฺขเว, นิพฺพานสปฺปายา ปฏิปทา? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุํ อนตฺตาติ ปสฺสติ, รูปา อนตฺตาติ ปสฺสติ, จกฺขุวิญฺญาณํ อนตฺตาติ ปสฺสติ, จกฺขุสมฺผสฺโส อนตฺตาติ ปสฺสติ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนตฺตาติ ปสฺสติ…เป… มโน อนตฺตาติ ปสฺสติ, ธมฺมา อนตฺตาติ ปสฺสติ, มโนวิญฺญาณํ อนตฺตาติ ปสฺสติ, มโนสมฺผสฺโส อนตฺตาติ ปสฺสติ, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนตฺตาติ ปสฺสติ. อยํ โข สา, ภิกฺขเว, นิพฺพานสปฺปายา ปฏิปทา’’ติ. จตุตฺถํ. १४९. भिक्खूहो, मी तुम्हाला निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली प्रतिपदा शिकवीन. ती ऐका... पे... आणि भिक्खूहो, निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली ती प्रतिपदा कोणती? भिक्खूहो, या शासनात भिक्खू चक्षूला अनात्म म्हणून पाहतो, रूपांना अनात्म म्हणून पाहतो, चक्षु-विज्ञानाला अनात्म म्हणून पाहतो, चक्षु-स्पर्शाला अनात्म म्हणून पाहतो. चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील तो अनात्म म्हणून पाहतो... पे... मनाला अनात्म म्हणून पाहतो, धम्मांना अनात्म म्हणून पाहतो, मनो-विज्ञानाला अनात्म म्हणून पाहतो, मनो-स्पर्शाला अनात्म म्हणून पाहतो, मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील तो अनात्म म्हणून पाहतो. भिक्खूहो, हीच ती निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली प्रतिपदा होय. चौथे. ๕. นิพฺพานสปฺปายปฏิปทาสุตฺตํ ५. निर्वाणसप्पायपटिपदा सुत्त ๑๕๐. ‘‘นิพฺพานสปฺปายํ โว, ภิกฺขเว, ปฏิปทํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ…เป… กตมา จ สา, ภิกฺขเว, นิพฺพานสปฺปายา ปฏิปทา? ตํ กึ มญฺญถ, ภิกฺขเว, จกฺขุ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? १५०. “भिक्षूंनो, मी तुम्हांला निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली प्रतिपदा (मार्ग) देशना करीन. ती ऐका... आणि भिक्षूंनो, निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली ती प्रतिपदा कोणती? भिक्षूंनो, तुम्हांला काय वाटते, चक्षु (डोळा) नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील (विपरिणामधम्म) आहे, त्याविषयी 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘รูปา นิจฺจา วา อนิจฺจา วา’’ติ? “रूपे नित्य आहेत की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจา, ภนฺเต’’…เป…. “अनित्य आहेत, भन्ते.” ...पे... ‘‘จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺโส…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “चक्षुविज्ञान... चक्षुसंस्पर्श... पे... मनःसंस्पर्शामुळे उत्पन्न होणारी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद (उदासीन) अशी जी काही वेदना आहे, ती नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील आहे, त्याविषयी 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ …เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาติ. อยํ โข สา, ภิกฺขเว, นิพฺพานสปฺปายา ปฏิปทา’’ติ. ปญฺจมํ. “भिक्षूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षुविषयीही विरक्त होतो, रूपांविषयीही विरक्त होतो, चक्षुविज्ञानाविषयीही विरक्त होतो, चक्षुसंस्पर्शाविषयीही विरक्त होतो... पे... मनःसंस्पर्शामुळे उत्पन्न होणारी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद अशी जी काही वेदना आहे, तिच्याविषयीही विरक्त होतो. विरक्त झाल्यामुळे तो रागरहित होतो; विरागामुळे तो विमुक्त होतो... पे... 'आता या जन्मानंतर काही कर्तव्य उरले नाही' हे तो जाणतो. भिक्षूंनो, हीच ती निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली प्रतिपदा होय.” पाचवे. ๖. อนฺเตวาสิกสุตฺตํ ६. अंतेवासिक सुत्त ๑๕๑. ‘‘อนนฺเตวาสิกมิทํ[Pg.349], ภิกฺขเว, พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ อนาจริยกํ. สนฺเตวาสิโก, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สาจริยโก ทุกฺขํ น ผาสุ วิหรติ. อนนฺเตวาสิโก, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อนาจริยโก สุขํ ผาสุ วิหรติ. กถญฺจ, ภิกฺขุ, สนฺเตวาสิโก สาจริยโก ทุกฺขํ น ผาสุ วิหรติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. ตฺยาสฺส อนฺโต วสนฺติ, อนฺตสฺส วสนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา สนฺเตวาสิโกติ วุจฺจติ. เต นํ สมุทาจรนฺติ, สมุทาจรนฺติ นํ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา สาจริยโกติ วุจฺจติ…เป…. १५१. “भिक्षूंनो, हे ब्रह्मचर्य अंतेवासिकाशिवाय (शिष्याशिवाय) आणि आचार्याशिवाय (गुरूशिवाय) जगले जाते. भिक्षूंनो, जो भिक्षू अंतेवासिकासह आणि आचार्यासह राहतो, तो दुःखात राहतो, सुखाने राहत नाही. भिक्षूंनो, जो भिक्षू अंतेवासिकाशिवाय आणि आचार्याशिवाय राहतो, तो सुखाने आणि आरामात राहतो. आणि भिक्षूंनो, अंतेवासिकासह आणि आचार्यासह राहणारा भिक्षू दुःखात आणि असुखात कसा राहतो? भिक्षूंनो, येथे जेव्हा भिक्षू डोळ्याने रूप पाहतो, तेव्हा त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल धर्म, आसक्तीयुक्त विचार आणि संयोजनाला (बंधनाला) कारणीभूत असणारे विचार उत्पन्न होतात. ते त्याच्या आत राहतात; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्या आत राहत असल्यामुळे त्याला 'अंतेवासिक असलेला' (शिष्य असलेला) असे म्हणतात. ते त्याच्यावर ताबा मिळवतात; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्यावर ताबा मिळवत असल्यामुळे त्याला 'साचारिक' (आचार्य असलेला) असे म्हणतात... पे... ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. ตฺยาสฺส อนฺโต วสนฺติ, อนฺตสฺส วสนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา สนฺเตวาสิโกติ วุจฺจติ. เต นํ สมุทาจรนฺติ, สมุทาจรนฺติ นํ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา สาจริยโกติ วุจฺจติ…เป…. “पुन्हा दुसरे असे की, भिक्षूंनो, भिक्षूने जिभेने रसाची चव घेतली असता, त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल धर्म, आसक्तीयुक्त विचार आणि संयोजनाला कारणीभूत असणारे विचार उत्पन्न होतात. ते त्याच्या आत राहतात; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्या आत राहत असल्यामुळे त्याला 'अंतेवासिक असलेला' असे म्हणतात. ते त्याच्यावर ताबा मिळवतात; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्यावर ताबा मिळवत असल्यामुळे त्याला 'साचारिक' असे म्हणतात... पे... ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. ตฺยาสฺส อนฺโต วสนฺติ, อนฺตสฺส วสนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา สนฺเตวาสิโกติ วุจฺจติ. เต นํ สมุทาจรนฺติ, สมุทาจรนฺติ นํ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา สาจริยโกติ วุจฺจติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สนฺเตวาสิโก สาจริยโก ทุกฺขํ, น ผาสุ วิหรติ. “पुन्हा दुसरे असे की, भिक्षूंनो, भिक्षूने मनाने धर्माला (विचाराला) जाणले असता, त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल धर्म, आसक्तीयुक्त विचार आणि संयोजनाला कारणीभूत असणारे विचार उत्पन्न होतात. ते त्याच्या आत राहतात; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्या आत राहत असल्यामुळे त्याला 'अंतेवासिक असलेला' असे म्हणतात. ते त्याच्यावर ताबा मिळवतात; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्यावर ताबा मिळवत असल्यामुळे त्याला 'साचारिक' असे म्हणतात. भिक्षूंनो, अशा प्रकारे अंतेवासिकासह आणि आचार्यासह राहणारा भिक्षू दुःखात राहतो, सुखाने राहत नाही.” ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อนนฺเตวาสิโก อนาจริยโก สุขํ ผาสุ วิหรติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา น อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. ตฺยาสฺส น อนฺโต วสนฺติ, นาสฺส อนฺโต วสนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา อนนฺเตวาสิโกติ วุจฺจติ. เต นํ น สมุทาจรนฺติ, น สมุทาจรนฺติ นํ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา อนาจริยโกติ วุจฺจติ…เป…. “आणि भिक्षूंनो, अंतेवासिकाशिवाय आणि आचार्याशिवाय राहणारा भिक्षू सुखाने आणि आरामात कसा राहतो? भिक्षूंनो, येथे जेव्हा भिक्षू डोळ्याने रूप पाहतो, तेव्हा त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल धर्म, आसक्तीयुक्त विचार आणि संयोजनाला कारणीभूत असणारे विचार उत्पन्न होत नाहीत. ते त्याच्या आत राहत नाहीत; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्या आत राहत नसल्यामुळे त्याला 'अंतेवासिकाशिवाय असलेला' (शिष्याशिवाय असलेला) असे म्हणतात. ते त्याच्यावर ताबा मिळवत नाहीत; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्यावर ताबा मिळवत नसल्यामुळे त्याला 'आचार्याशिवाय असलेला' (गुरूशिवाय असलेला) असे म्हणतात... पे...” ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา น อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. ตฺยาสฺส น อนฺโต วสนฺติ, นาสฺส [Pg.350] อนฺโต วสนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา อนนฺเตวาสิโกติ วุจฺจติ. เต นํ น สมุทาจรนฺติ, น สมุทาจรนฺติ นํ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา อนาจริยโกติ วุจฺจติ…เป…. “पुन्हा दुसरे असे की, भिक्षूंनो, भिक्षूने जिभेने रसाची चव घेतली असता, त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल धर्म, आसक्तीयुक्त विचार आणि संयोजनाला कारणीभूत असणारे विचार उत्पन्न होत नाहीत. ते त्याच्या आत राहत नाहीत; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्या आत राहत नसल्यामुळे त्याला 'अंतेवासिकाशिवाय असलेला' असे म्हणतात. ते त्याच्यावर ताबा मिळवत नाहीत; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्यावर ताबा मिळवत नसल्यामुळे त्याला 'आचार्याशिवाय असलेला' असे म्हणतात... पे...” ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย น อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. ตฺยาสฺส น อนฺโต วสนฺติ, นาสฺส อนฺโต วสนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา อนนฺเตวาสิโกติ วุจฺจติ. เต นํ น สมุทาจรนฺติ, น สมุทาจรนฺติ นํ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา อนาจริยโกติ วุจฺจติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อนนฺเตวาสิโก อนาจริยโก สุขํ ผาสุ วิหรติ. อนนฺเตวาสิกมิทํ, ภิกฺขเว, พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ. อนาจริยกํ สนฺเตวาสิโก, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สาจริยโก ทุกฺขํ, น ผาสุ วิหรติ. อนนฺเตวาสิโก, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อนาจริยโก สุขํ ผาสุ วิหรตี’’ติ. ฉฏฺฐํ. “पुन्हा दुसरे असे की, भिक्षूंनो, भिक्षूने मनाने धर्माला जाणले असता, त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल धर्म, आसक्तीयुक्त विचार आणि संयोजनाला कारणीभूत असणारे विचार उत्पन्न होत नाहीत. ते त्याच्या आत राहत नाहीत; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्या आत राहत नसल्यामुळे त्याला 'अंतेवासिकाशिवाय असलेला' असे म्हणतात. ते त्याच्यावर ताबा मिळवत नाहीत; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्यावर ताबा मिळवत नसल्यामुळे त्याला 'आचार्याशिवाय असलेला' असे म्हणतात. भिक्षूंनो, अशा प्रकारे अंतेवासिकाशिवाय आणि आचार्याशिवाय राहणारा भिक्षू सुखाने आणि आरामात राहतो. भिक्षूंनो, हे ब्रह्मचर्य अंतेवासिकाशिवाय आणि आचार्याशिवाय जगले जाते. भिक्षूंनो, जो भिक्षू अंतेवासिकासह आणि आचार्यासह राहतो, तो दुःखात राहतो, सुखाने राहत नाही. जो भिक्षू अंतेवासिकाशिवाय आणि आचार्याशिवाय राहतो, तो सुखाने आणि आरामात राहतो.” सहावे. ๗. กิมตฺถิยพฺรหฺมจริยสุตฺตํ ७. किमत्थियब्रह्मचर्य सुत्त ๑๕๒. ‘‘สเจ โว, ภิกฺขเว, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ ปุจฺเฉยฺยุํ – ‘กิมตฺถิยํ, อาวุโส, สมเณ โคตเม พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’ติ? เอวํ ปุฏฺฐา ตุมฺเห, ภิกฺขเว, เตสํ อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ พฺยากเรยฺยาถ – ‘ทุกฺขสฺส โข, อาวุโส, ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’ติ. สเจ ปน โว, ภิกฺขเว, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ ปุจฺเฉยฺยุํ – ‘กตมํ ปนาวุโส, ทุกฺขํ, ยสฺส ปริญฺญาย สมเณ โคตเม พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’ติ? เอวํ ปุฏฺฐา ตุมฺเห, ภิกฺขเว, เตสํ อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ พฺยากเรยฺยาถ – १५२. “भिक्षूंनो, जर इतर पंथांचे (अन्यतीर्थीय) परिव्राजक तुम्हांला असे विचारतील की—'मित्रांनो, श्रमण गोतमांच्या सान्निध्यात ब्रह्मचर्य कशासाठी जगले जाते?'—तर भिक्षूंनो, असे विचारले असता तुम्ही त्या अन्यतीर्थीय परिव्राजकांना असे उत्तर द्यावे—'मित्रांनो, दुःखाच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी (पूर्ण आकलनासाठी) भगवंतांच्या सान्निध्यात ब्रह्मचर्य जगले जाते.' पण भिक्षूंनो, जर ते अन्यतीर्थीय परिव्राजक तुम्हांला असे विचारतील की—'पण मित्रांनो, ते दुःख कोणते, ज्याच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी श्रमण गोतमांच्या सान्निध्यात ब्रह्मचर्य जगले जाते?'—तर भिक्षूंनो, असे विचारले असता तुम्ही त्या अन्यतीर्थीय परिव्राजकांना असे उत्तर द्यावे—” ‘‘จกฺขุ โข, อาวุโส, ทุกฺขํ; ตสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ. รูปา ทุกฺขา; เตสํ ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ. จกฺขุวิญฺญาณํ ทุกฺขํ; ตสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ. จกฺขุสมฺผสฺโส ทุกฺโข; ตสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ทุกฺขํ; ตสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ…เป… ชิวฺหา ทุกฺขา… มโน ทุกฺโข; ตสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ทุกฺขํ; ตสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ. อิทํ โข, อาวุโส[Pg.351], ทุกฺขํ; ยสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’ติ. เอวํ ปุฏฺฐา ตุมฺเห, ภิกฺขเว, เตสํ อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ พฺยากเรยฺยาถา’’ติ. สตฺตมํ. “मित्रांनो, डोळा दुःखकारक आहे; त्याच्या परिपूर्ण ज्ञानासाठी भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते. रूपे दुःखकारक आहेत; त्यांच्या परिपूर्ण ज्ञानासाठी भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते. चक्षू-विज्ञान दुःखकारक आहे; त्याच्या परिपूर्ण ज्ञानासाठी भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते. चक्षू-संस्पर्श दुःखकारक आहे; त्याच्या परिपूर्ण ज्ञानासाठी भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते. चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अ-दुःखद-अ-सुखद वेदना उत्पन्न होते, ती देखील दुःखकारक आहे; तिच्या परिपूर्ण ज्ञानासाठी भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते...पे०... जीभ दुःखकारक आहे... मन दुःखकारक आहे; त्याच्या परिपूर्ण ज्ञानासाठी भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते...पे०... मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अ-दुःखद-अ-सुखद वेदना उत्पन्न होते, ती देखील दुःखकारक आहे; तिच्या परिपूर्ण ज्ञानासाठी भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते. मित्रांनो, हेच ते दुःख आहे, ज्याच्या परिपूर्ण ज्ञानासाठी भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते. भिक्षूंनो, असे विचारले असता, तुम्ही त्या इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे उत्तर दिले पाहिजे.” सातवे सुत्त। ๘. อตฺถินุโขปริยายสุตฺตํ ८. अत्थिनुखोपरियायसुत्त ๑๕๓. ‘‘อตฺถิ นุ โข, ภิกฺขเว, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม ภิกฺขุ อญฺญตฺเรว สทฺธาย, อญฺญตฺร รุจิยา, อญฺญตฺร อนุสฺสวา, อญฺญตฺร อาการปริวิตกฺกา, อญฺญตฺร ทิฏฺฐินิชฺฌานกฺขนฺติยา อญฺญํ พฺยากเรยฺย – ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานามี’’ติ ? ‘‘ภควํมูลกา โน, ภนฺเต, ธมฺมา, ภควํเนตฺติกา ภควํปฏิสรณา. สาธุ วต, ภนฺเต, ภควนฺตํเยว ปฏิภาตุ เอตสฺส ภาสิตสฺส อตฺโถ. ภควโต สุตฺวา ภิกฺขู ธาเรสฺสนฺตี’’ติ. ‘‘เตน หิ, ภิกฺขเว, สุณาถ, สาธุกํ มนสิ กโรถ; ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – ‘‘อตฺถิ, ภิกฺขเว, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม ภิกฺขุ อญฺญตฺเรว สทฺธาย, อญฺญตฺร รุจิยา, อญฺญตฺร อนุสฺสวา, อญฺญตฺร อาการปริวิตกฺกา, อญฺญตฺร ทิฏฺฐินิชฺฌานกฺขนฺติยา อญฺญํ พฺยากเรยฺย – ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานามี’’ติ. १५३. “भिक्षूंनो, अशी एखादी पद्धत आहे का, जिचा अवलंब करून एखादा भिक्षू—श्रद्धेशिवाय, वैयक्तिक आवडीशिवाय, परंपरेने ऐकलेल्या गोष्टीशिवाय, तार्किक विचाराशिवाय, आणि एखाद्या मताचा विचार करून स्वीकार करण्याशिवाय—अंतिम ज्ञान घोषित करू शकेल की: ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही’ असे मी जाणतो?” “भन्ते, आमची शिकवण भगवंतांवर आधारित आहे, भगवंतच आमचे मार्गदर्शक आहेत आणि भगवंतच आमचे आश्रयस्थान आहेत. भन्ते, हे फार चांगले होईल जर भगवंतांनीच या विधानाचा अर्थ स्पष्ट केला. भगवंतांकडून ऐकून भिक्षू ते लक्षात ठेवतील.” “तसे असेल तर, भिक्षूंनो, लक्षपूर्वक ऐका आणि नीट मनन करा; मी सांगेन.” “होय, भन्ते,” असे म्हणून त्या भिक्षूंनी भगवंतांना प्रतिसाद दिला. भगवंत म्हणाले: “भिक्षूंनो, अशी एक पद्धत आहे, जिचा अवलंब करून एखादा भिक्षू—श्रद्धेशिवाय, वैयक्तिक आवडीशिवाय, परंपरेने ऐकलेल्या गोष्टीशिवाय, तार्किक विचाराशिवाय, आणि एखाद्या मताचा विचार करून स्वीकार करण्याशिवाय—अंतिम ज्ञान घोषित करू शकतो की: ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही’ असे मी जाणतो.” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, ปริยาโย, ยํ ปริยายํ อาคมฺม ภิกฺขุ อญฺญตฺเรว สทฺธาย…เป… อญฺญตฺร ทิฏฺฐินิชฺฌานกฺขนฺติยา อญฺญํ พฺยากโรติ – ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานามี’ติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ; อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ. ยํ ตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ; อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ. อปิ นุเม, ภิกฺขเว, ธมฺมา สทฺธาย วา เวทิตพฺพา, รุจิยา วา เวทิตพฺพา, อนุสฺสเวน วา เวทิตพฺพา, อาการปริวิตกฺเกน วา เวทิตพฺพา, ทิฏฺฐินิชฺฌานกฺขนฺติยา วา เวทิตพฺพา’’ติ? ‘‘โน เหตํ[Pg.352], ภนฺเต’’. ‘‘นนุเม, ภิกฺขเว, ธมฺมา ปญฺญาย ทิสฺวา เวทิตพฺพา’’ติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. ‘‘อยํ โข, ภิกฺขเว, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม ภิกฺขุ อญฺญตฺเรว สทฺธาย, อญฺญตฺร รุจิยา, อญฺญตฺร อนุสฺสวา, อญฺญตฺร อาการปริวิตกฺกา, อญฺญตฺร ทิฏฺฐินิชฺฌานกฺขนฺติยา อญฺญํ พฺยากโรติ – ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานามี’’ติ…เป…. “आणि भिक्षूंनो, ती कोणती पद्धत आहे, जिचा अवलंब करून भिक्षू श्रद्धेशिवाय...पे०... मताचा विचार करून स्वीकार करण्याशिवाय अंतिम ज्ञान घोषित करतो की—‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही’ असे मी जाणतो? इथे, भिक्षूंनो, एखादा भिक्षू डोळ्याने रूप पाहून, जर त्याच्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह असेल, तर तो जाणतो: ‘माझ्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह आहे’; किंवा जर त्याच्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह नसेल, तर तो जाणतो: ‘माझ्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह नाही’. भिक्षूंनो, जेव्हा एखादा भिक्षू डोळ्याने रूप पाहून, जर त्याच्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह असेल, तर तो जाणतो: ‘माझ्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह आहे’; किंवा जर त्याच्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह नसेल, तर तो जाणतो: ‘माझ्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह नाही’. भिक्षूंनो, या गोष्टी काय केवळ श्रद्धेने जाणायच्या आहेत, किंवा आवडीने, किंवा परंपरेने ऐकलेल्या गोष्टीने, किंवा तार्किक विचाराने, किंवा एखाद्या मताचा विचार करून स्वीकार करण्याने जाणायच्या आहेत का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” “भिक्षूंनो, या गोष्टी प्रज्ञेने पाहून जाणायच्या नाहीत का?” “होय, भन्ते.” “भिक्षूंनो, हीच ती पद्धत आहे, जिचा अवलंब करून भिक्षू केवळ श्रद्धेशिवाय, वैयक्तिक आवडीशिवाय, परंपरेने ऐकलेल्या गोष्टीशिवाय, तार्किक विचाराशिवाय, आणि एखाद्या मताचा विचार करून स्वीकार करण्याशिवाय अंतिम ज्ञान घोषित करतो की: ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही’ असे मी जाणतो.”...पे०... ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ…เป… ราคโทสโมโหติ ปชานาติ; อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ. ยํ ตํ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ; อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ; อปิ นุเม, ภิกฺขเว, ธมฺมา สทฺธาย วา เวทิตพฺพา, รุจิยา วา เวทิตพฺพา, อนุสฺสเวน วา เวทิตพฺพา, อาการปริวิตกฺเกน วา เวทิตพฺพา, ทิฏฺฐินิชฺฌานกฺขนฺติยา วา เวทิตพฺพา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘นนุเม, ภิกฺขเว, ธมฺมา ปญฺญาย ทิสฺวา เวทิตพฺพา’’ติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. ‘‘อยมฺปิ โข, ภิกฺขเว, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม ภิกฺขุ อญฺญตฺเรว สทฺธาย, อญฺญตฺร รุจิยา, อญฺญตฺร อนุสฺสวา, อญฺญตฺร อาการปริวิตกฺกา, อญฺญตฺร ทิฏฺฐินิชฺฌานกฺขนฺติยา อญฺญํ พฺยากโรติ – ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานามี’’ติ …เป…. “पुन्हा पुढे, भिक्षूंनो, एखादा भिक्षू जिभेने चव घेऊन, जर त्याच्यामध्ये अंतर्गत...पे०... राग, द्वेष किंवा मोह असेल, तर तो जाणतो: ‘माझ्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह आहे’; किंवा जर त्याच्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह नसेल, तर तो जाणतो: ‘माझ्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह नाही’. भिक्षूंनो, जेव्हा एखादा भिक्षू जिभेने चव घेऊन, जर त्याच्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह असेल, तर तो जाणतो: ‘माझ्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह आहे’; किंवा जर त्याच्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह नसेल, तर तो जाणतो: ‘माझ्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह नाही’. भिक्षूंनो, या गोष्टी काय केवळ श्रद्धेने जाणायच्या आहेत, किंवा आवडीने, किंवा परंपरेने ऐकलेल्या गोष्टीने, किंवा तार्किक विचाराने, किंवा एखाद्या मताचा विचार करून स्वीकार करण्याने जाणायच्या आहेत का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” “भिक्षूंनो, या गोष्टी प्रज्ञेने पाहून जाणायच्या नाहीत का?” “होय, भन्ते.” “भिक्षूंनो, ही देखील ती पद्धत आहे, जिचा अवलंब करून भिक्षू केवळ श्रद्धेशिवाय, वैयक्तिक आवडीशिवाय, परंपरेने ऐकलेल्या गोष्टीशिवाय, तार्किक विचाराशिवाय, आणि एखाद्या मताचा विचार करून स्वीकार करण्याशिवाय अंतिम ज्ञान घोषित करतो की: ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही’ असे मी जाणतो.”...पे०... ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ; อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ. ยํ ตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ; อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ; อปิ นุเม, ภิกฺขเว, ธมฺมา สทฺธาย วา เวทิตพฺพา, รุจิยา วา เวทิตพฺพา, อนุสฺสเวน วา เวทิตพฺพา, อาการปริวิตกฺเกน วา เวทิตพฺพา, ทิฏฺฐินิชฺฌานกฺขนฺติยา วา เวทิตพฺพา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘นนุเม, ภิกฺขเว, ธมฺมา ปญฺญาย ทิสฺวา เวทิตพฺพา’’ติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. ‘‘อยมฺปิ โข, ภิกฺขเว, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม ภิกฺขุ [Pg.353] อญฺญตฺเรว สทฺธาย, อญฺญตฺร รุจิยา, อญฺญตฺร อนุสฺสวา, อญฺญตฺร อาการปริวิตกฺกา, อญฺญตฺร ทิฏฺฐินิชฺฌานกฺขนฺติยา อญฺญํ พฺยากโรติ – ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานามี’’ติ. อฏฺฐมํ. "पुन्हा आणखी, भिक्षूंनो, जेव्हा एखादा भिक्षू मनाने धम्माला (मानसिक विषयाला) जाणून, जर त्याच्यामध्ये आंतरिक राग, द्वेष किंवा मोह असेल, तर तो जाणतो: 'माझ्यामध्ये आंतरिक राग, द्वेष किंवा मोह आहे'; किंवा जर त्याच्यामध्ये आंतरिक राग, द्वेष किंवा मोह नसेल, तर तो जाणतो: 'माझ्यामध्ये आंतरिक राग, द्वेष किंवा मोह नाही.' भिक्षूंनो, जो भिक्षू मनाने धम्माला जाणून, जर त्याच्यामध्ये आंतरिक राग, द्वेष किंवा मोह असेल, तर तो जाणतो: 'माझ्यामध्ये आंतरिक राग, द्वेष किंवा मोह आहे'; किंवा जर त्याच्यामध्ये आंतरिक राग, द्वेष किंवा मोह नसेल, तर तो जाणतो: 'माझ्यामध्ये आंतरिक राग, द्वेष किंवा मोह नाही'; तर मग, भिक्षूंनो, हे धम्म केवळ श्रद्धेने जाणले पाहिजेत का, किंवा आवडीने (रुचीने) जाणले पाहिजेत का, किंवा परंपरेने (ऐकीव माहितीने) जाणले पाहिजेत का, किंवा तार्किक विचाराने (आकारपरिवितर्काने) जाणले पाहिजेत का, किंवा एखाद्या मताचा विचार करून स्वीकार करण्याने (दृष्टिनिझानखंतीने) जाणले पाहिजेत का?" "नाही, भन्ते." "भिक्षूंनो, हे धम्म प्रज्ञेने पाहून जाणले पाहिजेत की नाही?" "होय, भन्ते." "भिक्षूंनो, हीच ती पद्धत (पर्याय) आहे, ज्याचा आश्रय घेऊन भिक्षू—श्रद्धेशिवाय, आवडीशिवाय, परंपरेशिवाय, तार्किक विचाराशिवाय, एखाद्या मताचा विचार करून स्वीकार करण्याशिवाय—अंतिम ज्ञान (अर्हत्त्व) घोषित करतो की: 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही' असे मी जाणतो." आठवे. ๙. อินฺทฺริยสมฺปนฺนสุตฺตํ ९. इंद्रियसंपन्न सुत्त ๑๕๔. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘‘อินฺทฺริยสมฺปนฺโน, อินฺทฺริยสมฺปนฺโน’ติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, อินฺทฺริยสมฺปนฺโน โหตี’’ติ? १५४. तेव्हा एक भिक्षू जेथे भगवान होते तेथे गेला... आणि एका बाजूला बसून तो भिक्षू भगवंतांना म्हणाला— "भन्ते, 'इंद्रियसंपन्न, इंद्रियसंपन्न' असे म्हटले जाते. भन्ते, किती प्रमाणात मनुष्य इंद्रियसंपन्न होतो?" ‘‘จกฺขุนฺทฺริเย เจ, ภิกฺขุ, อุทยพฺพยานุปสฺสี วิหรนฺโต จกฺขุนฺทฺริเย นิพฺพินฺทติ…เป… ชิวฺหินฺทฺริเย เจ, ภิกฺขุ, อุทยพฺพยานุปสฺสี วิหรนฺโต ชิวฺหินฺทฺริเย นิพฺพินฺทติ…เป… มนินฺทฺริเย เจ, ภิกฺขุ, อุทยพฺพยานุปสฺสี วิหรนฺโต มนินฺทฺริเย นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ…เป… วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาติ. เอตฺตาวตา โข, ภิกฺขุ, อินฺทฺริยสมฺปนฺโน โหตี’’ติ. นวมํ. "भिक्षू, जर एखादा भिक्षू चक्षुरिंद्रियाच्या (डोळ्याच्या इंद्रियाच्या) उत्पत्ती आणि विनाशाचे वारंवार अनुदर्शन करत विहरतो, तेव्हा तो चक्षुरिंद्रियाविषयी विरक्त (निर्विण्ण) होतो... जिव्हा-इंद्रियाच्या (जिभेच्या इंद्रियाच्या) उत्पत्ती आणि विनाशाचे वारंवार अनुदर्शन करत विहरतो, तेव्हा तो जिव्हा-इंद्रियाविषयी विरक्त होतो... मन-इंद्रियाच्या उत्पत्ती आणि विनाशाचे वारंवार अनुदर्शन करत विहरतो, तेव्हा तो मन-इंद्रियाविषयी विरक्त होतो. विरक्त होऊन तो रागरहित होतो... चित्त विमुक्त झाल्यावर 'ते विमुक्त झाले आहे' असे ज्ञान होते. तो जाणतो: 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही.' भिक्षू, एवढ्या प्रमाणात मनुष्य इंद्रियसंपन्न होतो." नववे. ๑๐. ธมฺมกถิกปุจฺฉสุตฺตํ १०. धम्मकथिकपुच्छा सुत्त ๑๕๕. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘‘ธมฺมกถิโก, ธมฺมกถิโก’ติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, ธมฺมกถิโก โหตี’’ติ? १५५. तेव्हा एक भिक्षू जेथे भगवान होते तेथे गेला... आणि एका बाजूला बसून तो भिक्षू भगवंतांना म्हणाला— "भन्ते, 'धम्मकथिक (धम्म प्रवचनकार), धम्मकथिक' असे म्हटले जाते. भन्ते, किती प्रमाणात मनुष्य धम्मकथिक होतो?" ‘‘จกฺขุสฺส เจ, ภิกฺขุ นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ธมฺมํ เทเสติ, ‘ธมฺมกถิโก ภิกฺขู’ติ อลํวจนาย. จกฺขุสฺส เจ, ภิกฺขุ, นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหติ, ‘ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺโน ภิกฺขู’ติ อลํวจนาย. จกฺขุสฺส เจ, ภิกฺขุ, นิพฺพิทา วิราคา นิโรธา อนุปาทาวิมุตฺโต โหติ, ‘ทิฏฺฐธมฺมนิพฺพานปฺปตฺโต ภิกฺขู’ติ อลํวจนาย…เป… ชิวฺหาย เจ, ภิกฺขุ, นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ธมฺมํ เทเสติ, ‘ธมฺมกถิโก ภิกฺขู’ติ อลํวจนาย…เป… มนสฺส เจ, ภิกฺขุ, นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ธมฺมํ เทเสติ, ‘ธมฺมกถิโก ภิกฺขู’ติ อลํวจนาย. มนสฺส เจ, ภิกฺขุ, นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหติ, ‘ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺโน ภิกฺขู’ติ อลํวจนาย. มนสฺส [Pg.354] เจ, ภิกฺขุ, นิพฺพิทา วิราคา นิโรธา อนุปาทาวิมุตฺโต โหติ, ‘ทิฏฺฐธมฺมนิพฺพานปฺปตฺโต ภิกฺขู’ติ อลํวจนายา’’ติ. ทสมํ. "भिक्षू, जर एखादा भिक्षू चक्षूच्या (डोळ्याच्या) विरक्तीसाठी (निर्वेदासाठी), विरागासाठी आणि निरोधासाठी धम्माचा उपदेश करतो, तर त्याला 'धम्मकथिक भिक्षू' म्हणणे योग्य आहे. जर एखादा भिक्षू चक्षूच्या विरक्तीसाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी प्रतिपन्न (साधना करत) असतो, तर त्याला 'धम्मानुधम्मप्रतिपन्न भिक्षू' म्हणणे योग्य आहे. जर एखादा भिक्षू चक्षूच्या विरक्तीमुळे, विरागामुळे आणि निरोधामुळे उपादानरहित होऊन विमुक्त होतो, तर त्याला 'दृष्टधम्मनिर्वाणप्राप्त भिक्षू' (याच जन्मात निर्वाण प्राप्त केलेला भिक्षू) म्हणणे योग्य आहे... जिभेच्या विरक्तीसाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी धम्माचा उपदेश करतो, तर त्याला 'धम्मकथिक भिक्षू' म्हणणे योग्य आहे... मनाच्या विरक्तीसाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी धम्माचा उपदेश करतो, तर त्याला 'धम्मकथिक भिक्षू' म्हणणे योग्य आहे. जर एखादा भिक्षू मनाच्या विरक्तीसाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी प्रतिपन्न असतो, तर त्याला 'धम्मानुधम्मप्रतिपन्न भिक्षू' म्हणणे योग्य आहे. जर एखादा भिक्षू मनाच्या विरक्तीमुळे, विरागामुळे आणि निरोधामुळे उपादानरहित होऊन विमुक्त होतो, तर त्याला 'दृष्टधम्मनिर्वाणप्राप्त भिक्षू' म्हणणे योग्य आहे." दहावे. นวปุราณวคฺโค ปญฺจทสโม. नवपुराणवर्ग पंधरावा समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याचे उद्दान (विषयसूची) – กมฺมํ จตฺตาริ สปฺปายา, อนนฺเตวาสิ กิมตฺถิยา; อตฺถิ นุ โข ปริยาโย, อินฺทฺริยกถิเกน จาติ. कम्म सुत्त, चार सप्पाय सुत्ते, अनन्तेवासी सुत्त, किमत्थिय सुत्त, अत्थि नु खो परियाय सुत्त, इंद्रिय सुत्त आणि धम्मकथिक सुत्त; हे दहा सुत्ते आहेत. สฬายตนวคฺเค ตติยปณฺณาสโก สมตฺโต. सळायतनवर्गातील तिसरा पन्नासक (पन्नास सुत्तांचा समूह) समाप्त झाला. ตสฺส วคฺคุทฺทานํ – त्याचे वर्ग-उद्दान – โยคกฺเขมิ จ โลโก จ, คหปติ เทวทเหน จ; นวปุราเณน ปณฺณาโส, ตติโย เตน วุจฺจตีติ. योगक्खेमी वर्ग, लोक वर्ग, गृहपती वर्ग, देवदह वर्ग आणि नवपुराण वर्ग; यामुळे याला तिसरा पन्नासक म्हटले जाते. ๑๖. นนฺทิกฺขยวคฺโค १६. नंदिक्षय वर्ग ๑. อชฺฌตฺตนนฺทิกฺขยสุตฺตํ १. अज्झत्त नन्दिक्खय सुत्त (आध्यात्मिक नंदिक्षय सुत्त) ๑๕๖. ‘‘อนิจฺจํเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุํ อนิจฺจนฺติ ปสฺสติ, สาสฺส โหติ สมฺมาทิฏฺฐิ. สมฺมา ปสฺสํ นิพฺพินฺทติ. นนฺทิกฺขยา ราคกฺขโย; ราคกฺขยา นนฺทิกฺขโย. นนฺทิราคกฺขยา จิตฺตํ สุวิมุตฺตนฺติ วุจฺจติ…เป… อนิจฺจํเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ชิวฺหํ อนิจฺจนฺติ ปสฺสติ, สาสฺส โหติ สมฺมาทิฏฺฐิ. สมฺมา ปสฺสํ นิพฺพินฺทติ. นนฺทิกฺขยา ราคกฺขโย; ราคกฺขยา…เป… จิตฺตํ สุวิมุตฺตนฺติ วุจฺจติ…เป… อนิจฺจํเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ มนํ อนิจฺจนฺติ ปสฺสติ, สาสฺส โหติ สมฺมาทิฏฺฐิ. สมฺมา ปสฺสํ นิพฺพินฺทติ. นนฺทิกฺขยา ราคกฺขโย; ราคกฺขยา นนฺทิกฺขโย. นนฺทิราคกฺขยา จิตฺตํ สุวิมุตฺตนฺติ วุจฺจตี’’ติ. ปฐมํ. १५६. "भिक्षूंनो, जो खरोखर अनित्य असलेल्या चक्षूला (डोळ्याला) 'अनित्य' म्हणून पाहतो, ती त्याची सम्यक् दृष्टी असते. सम्यक् प्रकारे पाहणारा विरक्त होतो. नंदीच्या (आनंदाच्या/आसक्तीच्या) क्षयामुळे रागाचा क्षय होतो; रागाच्या क्षयामुळे नंदीचा क्षय होतो. नंदी आणि रागाच्या क्षयामुळे चित्त 'सुविमुक्त' (उत्तम प्रकारे विमुक्त) झाले आहे असे म्हटले जाते... भिक्षूंनो, जो खरोखर अनित्य असलेल्या जिभेला 'अनित्य' म्हणून पाहतो, ती त्याची सम्यक् दृष्टी असते. सम्यक् प्रकारे पाहणारा विरक्त होतो. नंदीच्या क्षयामुळे रागाचा क्षय होतो; रागाच्या क्षयामुळे... चित्त सुविमुक्त झाले आहे असे म्हटले जाते... भिक्षूंनो, जो खरोखर अनित्य असलेल्या मनाला 'अनित्य' म्हणून पाहतो, ती त्याची सम्यक् दृष्टी असते. सम्यक् प्रकारे पाहणारा विरक्त होतो. नंदीच्या क्षयामुळे रागाचा क्षय होतो; रागाच्या क्षयामुळे नंदीचा क्षय होतो. नंदी आणि रागाच्या क्षयामुळे चित्त सुविमुक्त झाले आहे असे म्हटले जाते." पहिले. ๒. พาหิรนนฺทิกฺขยสุตฺตํ २. बाहिर नन्दिक्खय सुत्त (बाह्य नंदिक्षय सुत्त) ๑๕๗. ‘‘อนิจฺเจเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ รูเป อนิจฺจาติ ปสฺสติ, สาสฺส โหติ สมฺมาทิฏฺฐิ. สมฺมา ปสฺสํ นิพฺพินฺทติ. นนฺทิกฺขยา ราคกฺขโย; ราคกฺขยา นนฺทิกฺขโย[Pg.355]. นนฺทิราคกฺขยา จิตฺตํ สุวิมุตฺตนฺติ วุจฺจติ. อนิจฺเจเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สทฺเท… คนฺเธ… รเส… โผฏฺฐพฺเพ… ธมฺเม อนิจฺจาติ ปสฺสติ, สาสฺส โหติ สมฺมาทิฏฺฐิ. สมฺมา ปสฺสํ นิพฺพินฺทติ. นนฺทิกฺขยา ราคกฺขโย; ราคกฺขยา นนฺทิกฺขโย. นนฺทิราคกฺขยา จิตฺตํ สุวิมุตฺตนฺติ วุจฺจตี’’ติ. ทุติยํ. १५७. "भिक्षूंनो, जो खरोखर अनित्य असलेल्या रूपांना 'अनित्य' म्हणून पाहतो, ती त्याची सम्यक् दृष्टी असते. सम्यक् प्रकारे पाहणारा विरक्त होतो. नंदीच्या क्षयामुळे रागाचा क्षय होतो; रागाच्या क्षयामुळे नंदीचा क्षय होतो. नंदी आणि रागाच्या क्षयामुळे चित्त सुविमुक्त झाले आहे असे म्हटले जाते. भिक्षूंनो, जो खरोखर अनित्य असलेल्या शब्दांना... गंधांना... रसांना... स्पर्शांना... धम्मांना (मानसिक विषयांना) 'अनित्य' म्हणून पाहतो, ती त्याची सम्यक् दृष्टी असते. सम्यक् प्रकारे पाहणारा विरक्त होतो. नंदीच्या क्षयामुळे रागाचा क्षय होतो; रागाच्या क्षयामुळे नंदीचा क्षय होतो. नंदी आणि रागाच्या क्षयामुळे चित्त सुविमुक्त झाले आहे असे म्हटले जाते." दुसरे. ๓. อชฺฌตฺตอนิจฺจนนฺทิกฺขยสุตฺตํ ३. अज्झत्त अनित्य नन्दिक्खय सुत्त (आध्यात्मिक अनित्य नंदिक्षय सुत्त) ๑๕๘. ‘‘จกฺขุํ, ภิกฺขเว, โยนิโส มนสิ กโรถ; จกฺขานิจฺจตญฺจ ยถาภูตํ สมนุปสฺสถ. จกฺขุํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ โยนิโส มนสิกโรนฺโต, จกฺขานิจฺจตญฺจ ยถาภูตํ สมนุปสฺสนฺโต จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นนฺทิกฺขยา ราคกฺขโย; ราคกฺขยา นนฺทิกฺขโย. นนฺทิราคกฺขยา จิตฺตํ สุวิมุตฺตนฺติ วุจฺจติ. โสตํ, ภิกฺขเว, โยนิโส มนสิ กโรถ… ฆานํ… ชิวฺหํ, ภิกฺขเว, โยนิโส มนสิ กโรถ; ชิวฺหานิจฺจตญฺจ ยถาภูตํ สมนุปสฺสถ. ชิวฺหํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ โยนิโส มนสิกโรนฺโต, ชิวฺหานิจฺจตญฺจ ยถาภูตํ สมนุปสฺสนฺโต ชิวฺหายปิ นิพฺพินฺทติ. นนฺทิกฺขยา ราคกฺขโย; ราคกฺขยา นนฺทิกฺขโย. นนฺทิราคกฺขยา จิตฺตํ สุวิมุตฺตนฺติ วุจฺจติ. กายํ… มนํ, ภิกฺขเว, โยนิโส มนสิ กโรถ; มนานิจฺจตญฺจ ยถาภูตํ สมนุปสฺสถ. มนํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ โยนิโส มนสิกโรนฺโต, มนานิจฺจตญฺจ ยถาภูตํ สมนุปสฺสนฺโต มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นนฺทิกฺขยา ราคกฺขโย; ราคกฺขยา นนฺทิกฺขโย. นนฺทิราคกฺขยา จิตฺตํ สุวิมุตฺตนฺติ วุจฺจตี’’ติ. ตติยํ. १५८. “भिक्खूंनो, चक्षूवर योनिशो मनसिकार करा; आणि चक्षूच्या अनित्यतेचे यथाभूत दर्शन घ्या. भिक्खूंनो, जेव्हा भिक्खू चक्षूवर योनिशो मनसिकार करतो आणि चक्षूच्या अनित्यतेचे यथाभूत दर्शन घेतो, तेव्हा तो चक्षूविषयी निर्वेद प्राप्त करतो. नंदीच्या क्षयामुळे रागाचा क्षय होतो; रागाच्या क्षयामुळे नंदीचा क्षय होतो. नंदी आणि रागाच्या क्षयामुळे चित्त सुविमुक्त झाले आहे असे म्हटले जाते. भिक्खूंनो, श्रोत्रावर योनिशो मनसिकार करा... घाणावर... भिक्खूंनो, जिव्हेवर योनिशो मनसिकार करा; आणि जिव्हेच्या अनित्यतेचे यथाभूत दर्शन घ्या. भिक्खूंनो, जेव्हा भिक्खू जिव्हेवर योनिशो मनसिकार करतो आणि जिव्हेच्या अनित्यतेचे यथाभूत दर्शन घेतो, तेव्हा तो जिव्हेविषयी निर्वेद प्राप्त करतो. नंदीच्या क्षयामुळे रागाचा क्षय होतो; रागाच्या क्षयामुळे नंदीचा क्षय होतो. नंदी आणि रागाच्या क्षयामुळे चित्त सुविमुक्त झाले आहे असे म्हटले जाते. काया... भिक्खूंनो, मनावर योनिशो मनसिकार करा; आणि मनाच्या अनित्यतेचे यथाभूत दर्शन घ्या. भिक्खूंनो, जेव्हा भिक्खू मनावर योनिशो मनसिकार करतो आणि मनाच्या अनित्यतेचे यथाभूत दर्शन घेतो, तेव्हा तो मनाविषयी निर्वेद प्राप्त करतो. नंदीच्या क्षयामुळे रागाचा क्षय होतो; रागाच्या क्षयामुळे नंदीचा क्षय होतो. नंदी आणि रागाच्या क्षयामुळे चित्त सुविमुक्त झाले आहे असे म्हटले जाते.” हे तिसरे. ๔. พาหิรอนิจฺจนนฺทิกฺขยสุตฺตํ ४. बाहिर-अनित्य-नंदी-क्षय सुत्त ๑๕๙. ‘‘รูเป, ภิกฺขเว, โยนิโส มนสิ กโรถ; รูปานิจฺจตญฺจ ยถาภูตํ สมนุปสฺสถ. รูเป, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ โยนิโส มนสิกโรนฺโต, รูปานิจฺจตญฺจ ยถาภูตํ สมนุปสฺสนฺโต รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ. นนฺทิกฺขยา ราคกฺขโย; ราคกฺขยา นนฺทิกฺขโย. นนฺทิราคกฺขยา จิตฺตํ สุวิมุตฺตนฺติ วุจฺจติ. สทฺเท… คนฺเธ… รเส… โผฏฺฐพฺเพ… ธมฺเม, ภิกฺขเว, โยนิโส มนสิ กโรถ; ธมฺมานิจฺจตญฺจ ยถาภูตํ สมนุปสฺสถ. ธมฺเม, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ โยนิโส มนสิกโรนฺโต, ธมฺมานิจฺจตญฺจ ยถาภูตํ สมนุปสฺสนฺโต ธมฺเมสุปิ นิพฺพินฺทติ. นนฺทิกฺขยา ราคกฺขโย; ราคกฺขยา นนฺทิกฺขโย. นนฺทิราคกฺขยา จิตฺตํ สุวิมุตฺตนฺติ วุจฺจตี’’ติ. จตุตฺถํ. १५९. “भिक्खूंनो, रूपांवर योनिशो मनसिकार करा; आणि रूपांच्या अनित्यतेचे यथाभूत दर्शन घ्या. भिक्खूंनो, जेव्हा भिक्खू रूपांवर योनिशो मनसिकार करतो आणि रूपांच्या अनित्यतेचे यथाभूत दर्शन घेतो, तेव्हा तो रूपांविषयी निर्वेद प्राप्त करतो. नंदीच्या क्षयामुळे रागाचा क्षय होतो; रागाच्या क्षयामुळे नंदीचा क्षय होतो. नंदी आणि रागाच्या क्षयामुळे चित्त सुविमुक्त झाले आहे असे म्हटले जाते. शब्दांवर... गंधांवर... रसांवर... स्पर्शांवर... भिक्खूंनो, धम्मांवर योनिशो मनसिकार करा; आणि धम्मांच्या अनित्यतेचे यथाभूत दर्शन घ्या. भिक्खूंनो, जेव्हा भिक्खू धम्मांवर योनिशो मनसिकार करतो आणि धम्मांच्या अनित्यतेचे यथाभूत दर्शन घेतो, तेव्हा तो धम्मांविषयी निर्वेद प्राप्त करतो. नंदीच्या क्षयामुळे रागाचा क्षय होतो; रागाच्या क्षयामुळे नंदीचा क्षय होतो. नंदी आणि रागाच्या क्षयामुळे चित्त सुविमुक्त झाले आहे असे म्हटले जाते.” हे चौथे. ๕. ชีวกมฺพวนสมาธิสุตฺตํ ५. जीवक-अम्बवन-समाधी सुत्त ๑๖๐. เอกํ [Pg.356] สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ ชีวกมฺพวเน. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ภิกฺขโว’’ติ…เป… ‘‘สมาธึ, ภิกฺขเว, ภาเวถ. สมาหิตสฺส, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ยถาภูตํ โอกฺขายติ. กิญฺจ ยถาภูตํ โอกฺขายติ? จกฺขุํ อนิจฺจนฺติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ, รูปา อนิจฺจาติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ, จกฺขุวิญฺญาณํ อนิจฺจนฺติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ, จกฺขุสมฺผสฺโส อนิจฺโจติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจนฺติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจาติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ…เป… มโน อนิจฺโจติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ, ธมฺมา อนิจฺจาติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจนฺติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ. สมาธึ, ภิกฺขเว, ภาเวถ. สมาหิตสฺส, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ยถาภูตํ โอกฺขายตี’’ติ. ปญฺจมํ. १६०. एकदा भगवान राजगृह येथे जीवकाच्या आंबराईत विहार करत होते. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – “भिक्खूंनो!” ...पे... “भिक्खूंनो, समाधीची भावना करा. भिक्खूंनो, समाहित झालेल्या भिक्खूला गोष्टी जशा आहेत तशा (यथाभूत) स्पष्ट दिसतात. आणि काय यथाभूत स्पष्ट दिसते? ‘चक्षू अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते; ‘रूपे अनित्य आहेत’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते; ‘चक्षू-विज्ञान अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते; ‘चक्षू-संस्पर्श अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते; आणि चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील ‘अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते...पे... ‘जिव्हा अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते...पे... ‘मन अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते; ‘धम्म अनित्य आहेत’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते...पे... आणि मन-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील ‘अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते. भिक्खूंनो, समाधीची भावना करा. समाहित झालेल्या भिक्खूला गोष्टी यथाभूत स्पष्ट दिसतात.” हे पाचवे. ๖. ชีวกมฺพวนปฏิสลฺลานสุตฺตํ ६. जीवक-अम्बवन-प्रतिसल्लान सुत्त ๑๖๑. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ ชีวกมฺพวเน. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ…เป… ‘‘ปฏิสลฺลาเน, ภิกฺขเว, โยคมาปชฺชถ. ปฏิสลฺลีนสฺส, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ยถาภูตํ โอกฺขายติ. กิญฺจ ยถาภูตํ โอกฺขายติ? จกฺขุํ อนิจฺจนฺติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ, รูปา อนิจฺจาติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ, จกฺขุวิญฺญาณํ อนิจฺจนฺติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ, จกฺขุสมฺผสฺโส อนิจฺโจติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจนฺติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ…เป… มโน อนิจฺโจติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ, ธมฺมา… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจนฺติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ. ปฏิสลฺลาเน ภิกฺขเว, โยคมาปชฺชถ. ปฏิสลฺลีนสฺส, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ยถาภูตํ โอกฺขายตี’’ติ. ฉฏฺฐํ. १६१. एकदा भगवान राजगृह येथे जीवकाच्या आंबराईत विहार करत होते. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले...पे... “भिक्खूंनो, प्रतिसल्लानात (एकांतवासात) उद्योग करा. भिक्खूंनो, प्रतिसल्लीन झालेल्या भिक्खूला गोष्टी जशा आहेत तशा (यथाभूत) स्पष्ट दिसतात. आणि काय यथाभूत स्पष्ट दिसते? ‘चक्षू अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते; ‘रूपे अनित्य आहेत’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते; ‘चक्षू-विज्ञान अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते; ‘चक्षू-संस्पर्श अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते; आणि चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील ‘अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते...पे... ‘मन अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते; ‘धम्म... मन-विज्ञान... मन-संस्पर्श... आणि मन-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील ‘अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते. भिक्खूंनो, प्रतिसल्लानात उद्योग करा. प्रतिसल्लीन झालेल्या भिक्खूला गोष्टी यथाभूत स्पष्ट दिसतात.” हे सहावे. ๗. โกฏฺฐิกอนิจฺจสุตฺตํ ७. कोठ्ठिक-अनित्य सुत्त ๑๖๒. อถ โข อายสฺมา มหาโกฏฺฐิโก เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา โกฏฺฐิโก ภควนฺตํ เอตทโวจ [Pg.357] – ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน ธมฺมํ เทเสตุ, ยมหํ ภควโต ธมฺมํ สุตฺวา เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหเรยฺย’’นฺติ. १६२. तेव्हा आयुष्यमान महाकोठ्ठिक जेथे भगवान होते तेथे गेले...पे... एका बाजूला बसल्यावर आयुष्यमान कोठ्ठिक भगवंतांना म्हणाले – “भन्ते! मला भगवंतांनी संक्षेपात धम्म उपदेश करावा, जेणेकरून भगवंतांकडून धम्म ऐकून मी एकांतात, जनसमुदायापासून दूर, अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करू शकेन.” ‘‘ยํ โข, โกฏฺฐิก, อนิจฺจํ ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. กิญฺจ, โกฏฺฐิก, อนิจฺจํ? จกฺขุ โข, โกฏฺฐิก, อนิจฺจํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. รูปา อนิจฺจา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. จกฺขุวิญฺญาณํ อนิจฺจํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. จกฺขุสมฺผสฺโส อนิจฺโจ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. รสา อนิจฺจา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ชิวฺหาวิญฺญาณํ อนิจฺจํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ชิวฺหาสมฺผสฺโส อนิจฺโจ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ…เป… มโน อนิจฺโจ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ธมฺมา อนิจฺจา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. มโนวิญฺญาณํ อนิจฺจํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. มโนสมฺผสฺโส อนิจฺโจ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยํ โข, โกฏฺฐิก, อนิจฺจํ ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ’’ติ. สตฺตมํ. “हे कोट्ठिक, जे अनित्य आहे, त्यावरील तुझी इच्छा (छंद) तू त्यागली पाहिजेस. आणि कोट्ठिक, अनित्य काय आहे? कोट्ठिक, चक्षू (डोळा) अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. रूपे अनित्य आहेत; त्यांवरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. चक्षू-विज्ञान अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. चक्षू-संस्पर्श अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने (कारणाने) जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस... पे... जिव्हा (जीभ) अनित्य आहे; तिच्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. रस अनित्य आहेत; त्यांवरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. जिव्हा-विज्ञान अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. जिव्हा-संस्पर्श अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. जिव्हा-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस... पे... मन अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. धम्म अनित्य आहेत; त्यांवरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. मनो-विज्ञान अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. मनो-संस्पर्श अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. हे कोट्ठिक, जे अनित्य आहे, त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस.” सातवे. ๘. โกฏฺฐิกทุกฺขสุตฺตํ ८. कोट्ठिक दुःख सुत्त ๑๖๓. อถ โข อายสฺมา มหาโกฏฺฐิโก…เป… ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต…เป… วิหเรยฺย’’นฺติ. ‘‘ยํ โข, โกฏฺฐิก, ทุกฺขํ ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. กิญฺจ, โกฏฺฐิก, ทุกฺขํ? จกฺขุ โข, โกฏฺฐิก, ทุกฺขํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. รูปา ทุกฺขา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. จกฺขุวิญฺญาณํ ทุกฺขํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. จกฺขุสมฺผสฺโส ทุกฺโข; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ทุกฺขํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ…เป… ชิวฺหา ทุกฺขา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ…เป… มโน ทุกฺโข; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ธมฺมา ทุกฺขา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. มโนวิญฺญาณํ ทุกฺขํ[Pg.358]; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. มโนสมฺผสฺโส ทุกฺโข; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ทุกฺขํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยํ โข, โกฏฺฐิก, ทุกฺขํ ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ’’ติ. อฏฺฐมํ. १६३. तेव्हा आयुष्यमान महाकोट्ठिक... पे... भगवंतांना असे म्हणाले – “भंते, मला असे (थोडक्यात धम्म शिकवा)... पे... जेणेकरून मी विहरत राहीन.” “हे कोट्ठिक, जे दुःख आहे, त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. आणि कोट्ठिक, दुःख काय आहे? कोट्ठिक, चक्षू दुःख आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. रूपे दुःख आहेत; त्यांवरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. चक्षू-विज्ञान दुःख आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. चक्षू-संस्पर्श दुःख आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील दुःख आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस... पे... जिव्हा दुःख आहे; तिच्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस... पे... मन दुःख आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. धम्म दुःख आहेत; त्यांवरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. मनो-विज्ञान दुःख आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. मनो-संस्पर्श दुःख आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील दुःख आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. हे कोट्ठिक, जे दुःख आहे, त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस.” आठवे. ๙. โกฏฺฐิกอนตฺตสุตฺตํ ९. कोट्ठिक अनत्त सुत्त ๑๖๔. เอกมนฺตํ…เป… วิหเรยฺยนฺติ. ‘‘โย โข, โกฏฺฐิก, อนตฺตา ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. โก จ, โกฏฺฐิก, อนตฺตา? จกฺขุ โข, โกฏฺฐิก, อนตฺตา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. รูปา อนตฺตา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. จกฺขุวิญฺญาณํ อนตฺตา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. จกฺขุสมฺผสฺโส อนตฺตา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนตฺตา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ …เป… ชิวฺหา อนตฺตา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ…เป… มโน อนตฺตา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ธมฺมา อนตฺตา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนตฺตา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. โย โข, โกฏฺฐิก, อนตฺตา, ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ’’ติ. นวมํ. १६४. एका बाजूला... पे... विहरत राहीन. “हे कोट्ठिक, जे अनात्म आहे, त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. आणि कोट्ठिक, अनात्म काय आहे? कोट्ठिक, चक्षू अनात्म आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. रूपे अनात्म आहेत; त्यांवरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. चक्षू-विज्ञान अनात्म आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. चक्षू-संस्पर्श अनात्म आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनात्म आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस... पे... जिव्हा अनात्म आहे; तिच्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस... पे... मन अनात्म आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. धम्म अनात्म आहेत; त्यांवरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. मनो-विज्ञान... मनो-संस्पर्श... मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनात्म आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. हे कोट्ठिक, जे अनात्म आहे, त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस.” नववे. ๑๐. มิจฺฉาทิฏฺฐิปหานสุตฺตํ १०. मिच्छादिट्ठि पहाण सुत्त ๑๖๕. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กถํ นุ โข, ภนฺเต, ชานโต กถํ ปสฺสโต มิจฺฉาทิฏฺฐิ ปหียตี’’ติ? १६५. तेव्हा एक भिक्खू जेथे भगवंत होते तेथे आला... पे... एका बाजूला बसून त्या भिक्खूने भगवंतांना असे विचारले – “भंते, कशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि कशा प्रकारे पाहणाऱ्या व्यक्तीची मिथ्यादृष्टी (मिच्छादिट्ठि) नष्ट होते?” ‘‘จกฺขุํ โข, ภิกฺขุ, อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต มิจฺฉาทิฏฺฐิ ปหียติ. รูเป อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต มิจฺฉาทิฏฺฐิ ปหียติ. จกฺขุวิญฺญาณํ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต มิจฺฉาทิฏฺฐิ ปหียติ. จกฺขุสมฺผสฺสํ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต มิจฺฉาทิฏฺฐิ ปหียติ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต มิจฺฉาทิฏฺฐิ ปหียติ. เอวํ โข, ภิกฺขุ, ชานโต เอวํ ปสฺสโต มิจฺฉาทิฏฺฐิ ปหียตี’’ติ. ทสมํ. “भिक्खू, चक्षूला अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची मिथ्यादृष्टी नष्ट होते. रूपांना अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची मिथ्यादृष्टी नष्ट होते. चक्षू-विज्ञानाला अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची मिथ्यादृष्टी नष्ट होते. चक्षू-संस्पर्शाला अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची मिथ्यादृष्टी नष्ट होते... पे... मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची मिथ्यादृष्टी नष्ट होते. भिक्खू, अशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि अशा प्रकारे पाहणाऱ्याची मिथ्यादृष्टी नष्ट होते.” दहावे. ๑๑. สกฺกายทิฏฺฐิปหานสุตฺตํ ११. सक्कायदिट्ठि पहाण सुत्त ๑๖๖. อถ [Pg.359] โข อญฺญตโร ภิกฺขุ…เป… เอตทโวจ – ‘‘กถํ นุ โข, ภนฺเต, ชานโต กถํ ปสฺสโต สกฺกายทิฏฺฐิ ปหียตี’’ติ? ‘‘จกฺขุํ โข, ภิกฺขุ, ทุกฺขโต ชานโต ปสฺสโต สกฺกายทิฏฺฐิ ปหียติ. รูเป ทุกฺขโต ชานโต ปสฺสโต สกฺกายทิฏฺฐิ ปหียติ. จกฺขุวิญฺญาณํ ทุกฺขโต ชานโต ปสฺสโต สกฺกายทิฏฺฐิ ปหียติ. จกฺขุสมฺผสฺสํ ทุกฺขโต ชานโต ปสฺสโต สกฺกายทิฏฺฐิ ปหียติ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ทุกฺขโต ชานโต ปสฺสโต สกฺกายทิฏฺฐิ ปหียติ. เอวํ โข, ภิกฺขุ, ชานโต เอวํ ปสฺสโต สกฺกายทิฏฺฐิ ปหียตี’’ติ. เอกาทสมํ. १६६. तेव्हा एक भिक्खू... पे... असे म्हणाला – “भंते, कशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि कशा प्रकारे पाहणाऱ्या व्यक्तीची सत्कायदृष्टी (सक्कायदिट्ठि) नष्ट होते?” “भिक्खू, चक्षूला दुःख म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची सत्कायदृष्टी नष्ट होते. रूपांना दुःख म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची सत्कायदृष्टी नष्ट होते. चक्षू-विज्ञानाला दुःख म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची सत्कायदृष्टी नष्ट होते. चक्षू-संस्पर्शाला दुःख म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची सत्कायदृष्टी नष्ट होते... पे... मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील दुःख म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची सत्कायदृष्टी नष्ट होते. भिक्खू, अशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि अशा प्रकारे पाहणाऱ्याची सत्कायदृष्टी नष्ट होते.” अकरावे. ๑๒. อตฺตานุทิฏฺฐิปหานสุตฺตํ १२. अत्तानुदिट्ठि पहाण सुत्त ๑๖๗. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ…เป… เอตทโวจ – ‘‘กถํ นุ โข, ภนฺเต, ชานโต กถํ ปสฺสโต อตฺตานุทิฏฺฐิ ปหียตี’’ติ? ‘‘จกฺขุํ โข, ภิกฺขุ, อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต อตฺตานุทิฏฺฐิ ปหียติ. รูเป อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต อตฺตานุทิฏฺฐิ ปหียติ. จกฺขุวิญฺญาณํ อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต อตฺตานุทิฏฺฐิ ปหียติ. จกฺขุสมฺผสฺสํ อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต อตฺตานุทิฏฺฐิ ปหียติ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต อตฺตานุทิฏฺฐิ ปหียติ…เป… ชิวฺหํ อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต อตฺตานุทิฏฺฐิ ปหียติ…เป… มนํ อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต อตฺตานุทิฏฺฐิ ปหียติ. ธมฺเม… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต อตฺตานุทิฏฺฐิ ปหียตี’’ติ. ทฺวาทสมํ. १६७. तेव्हा एक भिक्खू... पे... भगवंतांना असे म्हणाला – “भन्ते, कशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि कशा प्रकारे पाहणाऱ्याची 'अत्तानुदिट्ठी' (आत्म-दृष्टी) नष्ट होते?” “भिक्खू, चक्षूला (डोळ्याला) अनात्म रूपाने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अत्तानुदिट्ठी नष्ट होते. रूपांना अनात्म रूपाने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अत्तानुदिट्ठी नष्ट होते. चक्षु-विज्ञानाला अनात्म रूपाने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अत्तानुदिट्ठी नष्ट होते. चक्षु-संस्पर्शाला अनात्म रूपाने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अत्तानुदिट्ठी नष्ट होते. चक्षु-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने (कारणाने) जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन (अनुभूती) उत्पन्न होते, त्यालाही अनात्म रूपाने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अत्तानुदिट्ठी नष्ट होते... पे... जिव्हेला (जिभेला) अनात्म रूपाने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अत्तानुदिट्ठी नष्ट होते... पे... मनाला अनात्म रूपाने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अत्तानुदिट्ठी नष्ट होते. धम्मांना... मनो-विज्ञानाला... मनो-संस्पर्शाला... मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्यालाही अनात्म रूपाने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अत्तानुदिट्ठी नष्ट होते.” बारावे सूत्र. นนฺทิกฺขยวคฺโค โสฬสโม. सोळावा नन्दिक्खय वर्ग समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याची उद्दान (अनुक्रमणिका) – นนฺทิกฺขเยน จตฺตาโร, ชีวกมฺพวเน ทุเว; โกฏฺฐิเกน ตโย วุตฺตา, มิจฺฉา สกฺกาย อตฺตโนติ. नन्दिक्खय सूत्रांचे चार, जीवक-अंबवनातील दोन, कोट्ठिक सूत्रांचे तीन, आणि मिच्छा, सक्काय व अत्तानुदिट्ठी अशी (सूत्रे) सांगितली आहेत. ๑๗. สฏฺฐิเปยฺยาลวคฺโค १७. सट्ठिपेय्याल वर्ग ๑. อชฺฌตฺตอนิจฺจฉนฺทสุตฺตํ १. अज्झत्त-अनिच्च-छन्द सूत्र ๑๖๘. ‘‘ยํ[Pg.360], ภิกฺขเว, อนิจฺจํ, ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ…เป… มโน อนิจฺโจ; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ, ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ’’ติ. १६८. “भिक्खूंनो, जे अनित्य आहे, त्यावरील तुमची इच्छा (छंद) तुम्ही सोडून दिली पाहिजे. आणि भिक्खूंनो, अनित्य काय आहे? भिक्खूंनो, चक्षू (डोळा) अनित्य आहे; त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे... पे... जिव्हा (जीभ) अनित्य आहे; त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे... पे... मन अनित्य आहे; त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे. भिक्खूंनो, जे अनित्य आहे, त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे.” ๒. อชฺฌตฺตอนิจฺจราคสุตฺตํ २. अज्झत्त-अनिच्च-राग सूत्र ๑๖๙. ‘‘ยํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ, ตตฺร โว ราโค ปหาตพฺโพ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ; ตตฺร โว ราโค ปหาตพฺโพ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา; ตตฺร โว ราโค ปหาตพฺโพ…เป… มโน อนิจฺโจ; ตตฺร โว ราโค ปหาตพฺโพ. ยํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ, ตตฺร โว ราโค ปหาตพฺโพ’’ติ. १६९. “भिक्खूंनो, जे अनित्य आहे, त्यावरील तुमची आसक्ती (राग) तुम्ही सोडून दिली पाहिजे. आणि भिक्खूंनो, अनित्य काय आहे? भिक्खूंनो, चक्षू अनित्य आहे; त्यावरील तुमची आसक्ती तुम्ही सोडून दिली पाहिजे... पे... जिव्हा अनित्य आहे; त्यावरील तुमची आसक्ती तुम्ही सोडून दिली पाहिजे... पे... मन अनित्य आहे; त्यावरील तुमची आसक्ती तुम्ही सोडून दिली पाहिजे. भिक्खूंनो, जे अनित्य आहे, त्यावरील तुमची आसक्ती तुम्ही सोडून दिली पाहिजे.” ๓. อชฺฌตฺตอนิจฺจฉนฺทราคสุตฺตํ ३. अज्झत्त-अनिच्च-छन्दराग सूत्र ๑๗๐. ‘‘ยํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ, ตตฺร โว ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ; ตตฺร โว ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา; ตตฺร โว ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ…เป… มโน อนิจฺโจ; ตตฺร โว ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. ยํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ, ตตฺร โว ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ’’ติ. १७०. “भिक्खूंनो, जे अनित्य आहे, त्यावरील तुमची इच्छा आणि आसक्ती (छंदराग) तुम्ही सोडून दिली पाहिजे. आणि भिक्खूंनो, अनित्य काय आहे? भिक्खूंनो, चक्षू अनित्य आहे; त्यावरील तुमची इच्छा आणि आसक्ती तुम्ही सोडून दिली पाहिजे... पे... जिव्हा अनित्य आहे; त्यावरील तुमची इच्छा आणि आसक्ती तुम्ही सोडून दिली पाहिजे... पे... मन अनित्य आहे; त्यावरील तुमची इच्छा आणि आसक्ती तुम्ही सोडून दिली पाहिजे. भिक्खूंनो, जे अनित्य आहे, त्यावरील तुमची इच्छा आणि आसक्ती तुम्ही सोडून दिली पाहिजे.” ๔-๖. ทุกฺขฉนฺทาทิสุตฺตํ ४-६. दुक्ख-छन्दादि सूत्र ๑๗๑-๑๗๓. ‘‘ยํ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ, ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ…เป… ชิวฺหา ทุกฺขา…เป… มโน ทุกฺโข; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. ยํ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ’’ติ. १७१-१७३. “भिक्खूंनो, जे दुःख आहे, त्यावरील तुमची इच्छा (छंद) तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती (राग) सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती (छंदराग) सोडून दिली पाहिजे. आणि भिक्खूंनो, दुःख काय आहे? भिक्खूंनो, चक्षू दुःख आहे; त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे... पे... जिव्हा दुःख आहे... पे... मन दुःख आहे; त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. भिक्खूंनो, जे दुःख आहे, त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे.” ๗-๙. อนตฺตฉนฺทาทิสุตฺตํ ७-९. अनात्त-छन्दादि सूत्र ๑๗๔-๑๗๖. ‘‘โย[Pg.361], ภิกฺขเว, อนตฺตา, ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. โก จ, ภิกฺขเว, อนตฺตา? จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนตฺตา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ…เป… ชิวฺหา อนตฺตา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ…เป… มโน อนตฺตา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. โย, ภิกฺขเว, อนตฺตา ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ’’ติ. १७४-१७६. “भिक्खूंनो, जे अनात्म (अनात्ता) आहे, त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. आणि भिक्खूंनो, अनात्म काय आहे? भिक्खूंनो, चक्षू अनात्म आहे; त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे... पे... जिव्हा अनात्म आहे; त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे... पे... मन अनात्म आहे; त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. भिक्खूंनो, जे अनात्म आहे, त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे.” ๑๐-๑๒. พาหิรานิจฺจฉนฺทาทิสุตฺตํ १०-१२. बाहिर-अनिच्च-छन्दादि सूत्र ๑๗๗-๑๗๙. ‘‘ยํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ, ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ? รูปา, ภิกฺขเว, อนิจฺจา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. สทฺทา อนิจฺจา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. คนฺธา อนิจฺจา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. รสา อนิจฺจา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. โผฏฺฐพฺพา อนิจฺจา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. ธมฺมา อนิจฺจา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. ยํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ’’ติ. १७७-१७९. “भिक्खूंनो, जे अनित्य आहे, त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. आणि भिक्खूंनो, अनित्य काय आहे? भिक्खूंनो, रूप अनित्य आहेत; त्यांवरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. शब्द अनित्य आहेत; त्यांवरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. गंध अनित्य आहेत; त्यांवरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. रस अनित्य आहेत; त्यांवरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. स्पर्श (फोट्ठब्ब) अनित्य आहेत; त्यांवरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. धम्म अनित्य आहेत; त्यांवरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. भिक्खूंनो, जे अनित्य आहे, त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे.” ๑๓-๑๕. พาหิรทุกฺขฉนฺทาทิสุตฺตํ १३-१५. बाहिर-दुक्ख-छन्दादि सूत्र ๑๘๐-๑๘๒. ‘‘ยํ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ, ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ? รูปา, ภิกฺขเว, ทุกฺขา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา ทุกฺขา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. ยํ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ, ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ’’ติ. १८०-१८२. “भिक्खूंनो, जे दुःख आहे, त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. आणि भिक्खूंनो, दुःख काय आहे? भिक्खूंनो, रूप दुःख आहेत; त्यांवरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धम्म दुःख आहेत; त्यांवरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. भिक्खूंनो, जे दुःख आहे, त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे.” ๑๖-๑๘. พาหิรานตฺตฉนฺทาทิสุตฺตํ १६-१८. बाहिर-अनात्त-छन्दादि सूत्र ๑๘๓-๑๘๕. ‘‘โย[Pg.362], ภิกฺขเว, อนตฺตา, ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. โก จ, ภิกฺขเว, อนตฺตา? รูปา, ภิกฺขเว, อนตฺตา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนตฺตา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. โย, ภิกฺขเว, อนตฺตา ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ’’ติ. १८३-१८५. “भिक्खूंनो, जे अनात्म आहे, त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. आणि भिक्खूंनो, अनात्म काय आहे? भिक्खूंनो, रूप अनात्म आहेत; त्यांवरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धम्म अनात्म आहेत; त्यांवरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. भिक्खूंनो, जे अनात्म आहे, त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे.” ๑๙. อชฺฌตฺตาตีตานิจฺจสุตฺตํ १९. अज्झत्त-अतीत-अनिच्च सूत्र ๑๘๖. ‘‘จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ อตีตํ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา อตีตา…เป… มโน อนิจฺโจ อตีโต. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… ชิวฺหายปิ นิพฺพินฺทติ…เป… มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. १८६. “भिक्खूंनो, भूतकाळातील चक्षु अनित्य आहे... जिव्हा अनित्य आहे... मन अनित्य आहे. भिक्खूंनो, असे पाहणारा, श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षुविषयी निर्वेद पावतो... जिव्हेविषयी निर्वेद पावतो... मनाविषयी निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्यामुळे तो विरक्त होतो; विरागामुळे विमुक्त होतो. विमुक्त झाल्यावर 'विमुक्त झाले' असे ज्ञान होते. 'जन्म क्षीण झाला, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले, जे करायचे होते ते केले गेले, आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे तो जाणतो.” ๒๐. อชฺฌตฺตานาคตานิจฺจสุตฺตํ २०. अध्यात्म-अनागत-अनित्य सुत्त ๑๘๗. ‘‘จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ อนาคตํ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา อนาคตา…เป… มโน อนิจฺโจ อนาคโต. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. १८७. “भिक्खूंनो, भविष्यकाळातील चक्षु अनित्य आहे... जिव्हा अनित्य आहे... मन अनित्य आहे. असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” ๒๑. อชฺฌตฺตปจฺจุปฺปนฺนานิจฺจสุตฺตํ २१. अध्यात्म-पच्चुप्पन्न-अनित्य सुत्त ๑๘๘. ‘‘จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ ปจฺจุปฺปนฺนํ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา ปจฺจุปฺปนฺนา…เป… มโน อนิจฺโจ ปจฺจุปฺปนฺโน. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. १८८. “भिक्खूंनो, वर्तमानकाळातील चक्षु अनित्य आहे... जिव्हा अनित्य आहे... मन अनित्य आहे. असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” ๒๒-๒๔. อชฺฌตฺตาตีตาทิทุกฺขสุตฺตํ २२-२४. अध्यात्म-अतीतादि-दुःख सुत्त ๑๘๙-๑๙๑. ‘‘จกฺขุ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ อตีตํ อนาคตํ ปจฺจุปฺปนฺนํ…เป… ชิวฺหา ทุกฺขา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา…เป… มโน ทุกฺโข อตีโต อนาคโต ปจฺจุปฺปนฺโน. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. १८९-१९१. “भिक्खूंनो, भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील चक्षु दुःखकारक आहे... जिव्हा दुःखकारक आहे... मन दुःखकारक आहे. भिक्खूंनो, असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” ๒๕-๒๗. อชฺฌตฺตาตีตาทิอนตฺตสุตฺตํ २५-२७. अध्यात्म-अतीतादि-अनत्त सुत्त ๑๙๒-๑๙๔. ‘‘จกฺขุ[Pg.363], ภิกฺขเว, อนตฺตา อตีตํ อนาคตํ ปจฺจุปฺปนฺนํ…เป… ชิวฺหา อนตฺตา…เป… มโน อนตฺตา อตีโต อนาคโต ปจฺจุปฺปนฺโน. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. १९२-१९४. “भिक्खूंनो, भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील चक्षु अनात्म आहे... जिव्हा अनात्म आहे... मन अनात्म आहे. असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” ๒๘-๓๐. พาหิราตีตาทิอนิจฺจสุตฺตํ २८-३०. बाहिर-अतीतादि-अनित्य सुत्त ๑๙๕-๑๙๗. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนิจฺจา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนิจฺจา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. १९५-१९७. “भिक्खूंनो, भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील रूपे अनित्य आहेत. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील धम्म अनित्य आहेत. असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” ๓๑-๓๓. พาหิราตีตาทิทุกฺขสุตฺตํ ३१-३३. बाहिर-अतीतादि-दुःख सुत्त ๑๙๘-๒๐๐. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, ทุกฺขา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา ทุกฺขา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. १९८-२००. “भिक्खूंनो, भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील रूपे दुःखकारक आहेत. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील धम्म दुःखकारक आहेत. असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” ๓๔-๓๖. พาหิราตีตาทิอนตฺตสุตฺตํ ३४-३६. बाहिर-अतीतादि-अनत्त सुत्त ๒๐๑-๒๐๓. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนตฺตา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนตฺตา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २०१-२०३. “भिक्खूंनो, भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील रूपे अनात्म आहेत. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील धम्म अनात्म आहेत. असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” ๓๗. อชฺฌตฺตาตีตยทนิจฺจสุตฺตํ ३७. अध्यात्म-अतीत-यदनिच्च सुत्त ๒๐๔. ‘‘จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ อตีตํ. ยทนิจฺจํ, ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา อตีตา. ยทนิจฺจํ, ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ…เป… มโน อนิจฺโจ อตีโต. ยทนิจฺจํ, ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २०४. “भिक्खूंनो, भूतकाळातील चक्षु अनित्य आहे. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे... भूतकाळातील जिव्हा अनित्य आहे. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे... भूतकाळातील मन अनित्य आहे. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” ๓๘. อชฺฌตฺตานาคตยทนิจฺจสุตฺตํ ३८. अध्यात्म-अनागत-यदनिच्च सुत्त ๒๐๕. ‘‘จกฺขุ[Pg.364], ภิกฺขเว, อนิจฺจํ อนาคตํ. ยทนิจฺจํ, ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา อนาคตา. ยทนิจฺจํ, ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ…เป… มโน อนิจฺโจ อนาคโต. ยทนิจฺจํ, ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २०५. “भिक्खूंनो, भविष्यकाळातील चक्षु अनित्य आहे. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे... भविष्यकाळातील जिव्हा अनित्य आहे. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे... भविष्यकाळातील मन अनित्य आहे. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. भिक्खूंनो, असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” ๓๙. อชฺฌตฺตปจฺจุปฺปนฺนยทนิจฺจสุตฺตํ ३९. अध्यात्म-पच्चुप्पन्न-यदनिच्च सुत्त ๒๐๖. ‘‘จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ ปจฺจุปฺปนฺนํ. ยทนิจฺจํ, ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา ปจฺจุปฺปนฺนา. ยทนิจฺจํ, ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ…เป… มโน อนิจฺโจ ปจฺจุปฺปนฺโน. ยทนิจฺจํ ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २०६. “भिक्खूंनो, वर्तमानकाळातील चक्षु अनित्य आहे. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे... वर्तमानकाळातील जिव्हा अनित्य आहे. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे... वर्तमानकाळातील मन अनित्य आहे. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” ๔๐-๔๒. อชฺฌตฺตาตีตาทิยํทุกฺขสุตฺตํ ४०-४२. अध्यात्म-अतीतादि-यं दुःख सुत्त ๒๐๗-๒๐๙. ‘‘จกฺขุ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ อตีตํ อนาคตํ ปจฺจุปฺปนฺนํ. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ…เป… ชิวฺหา ทุกฺขา…เป… มโน ทุกฺโข อตีโต อนาคโต ปจฺจุปฺปนฺโน. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २०७-२०९. “भिक्खूंनो, भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील चक्षु दुःखकारक आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे... जिव्हा दुःखकारक आहे... भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील मन दुःखकारक आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” ๔๓-๔๕. อชฺฌตฺตาตีตาทิยทนตฺตสุตฺตํ ४३-४५. अध्यात्म-अतीतादि-यदनत्त सुत्त ๒๑๐-๒๑๒. ‘‘จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนตฺตา อตีตํ อนาคตํ ปจฺจุปฺปนฺนํ. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ [Pg.365] ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ…เป… ชิวฺหา อนตฺตา…เป… มโน อนตฺตา อตีโต อนาคโต ปจฺจุปฺปนฺโน. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २१०-२१२. “भिक्खूंनो, भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील चक्षु अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे... जिव्हा अनात्म आहे... भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील मन अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” ๔๖-๔๘. พาหิราตีตาทิยทนิจฺจสุตฺตํ ४६-४८. बाहिर-अतीतादि-यदनिच्च सुत्त ๒๑๓-๒๑๕. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนิจฺจา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. ยทนิจฺจํ, ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนิจฺจา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. ยทนิจฺจํ ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २१३-२१५. “भिक्खूहो, भूतकाळ, भविष्यकाळ आणि वर्तमानकाळातील रूपे अनित्य आहेत. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... भूतकाळ, भविष्यकाळ आणि वर्तमानकाळातील धम्म (मानसिक विषय) अनित्य आहेत. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा...पे... या अस्तित्वासाठी आता काहीही कर्तव्य उरलेले नाही, असे तो जाणतो.” ๔๙-๕๑. พาหิราตีตาทิยํทุกฺขสุตฺตํ ४९-५१. बाह्य अतीत आदि दुःख सुत्त ๒๑๖-๒๑๘. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, ทุกฺขา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา ทุกฺขา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २१६-२१८. “भिक्खूहो, भूतकाळ, भविष्यकाळ आणि वर्तमानकाळातील रूपे दुःखकारक आहेत. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... भूतकाळ, भविष्यकाळ आणि वर्तमानकाळातील धम्म दुःखकारक आहेत. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा...पे... या अस्तित्वासाठी आता काहीही कर्तव्य उरलेले नाही, असे तो जाणतो.” ๕๒-๕๔. พาหิราตีตาทิยทนตฺตสุตฺตํ ५२-५४. बाह्य अतीत आदि अनात्म सुत्त ๒๑๙-๒๒๑. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนตฺตา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนตฺตา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २१९-२२१. “भिक्खूहो, भूतकाळ, भविष्यकाळ आणि वर्तमानकाळातील रूपे अनात्म आहेत. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... भूतकाळ, भविष्यकाळ आणि वर्तमानकाळातील धम्म अनात्म आहेत. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा...पे... या अस्तित्वासाठी आता काहीही कर्तव्य उरलेले नाही, असे तो जाणतो.” ๕๕. อชฺฌตฺตายตนอนิจฺจสุตฺตํ ५५. आध्यात्मिक आयतन अनित्य सुत्त ๒๒๒. ‘‘จกฺขุ[Pg.366], ภิกฺขเว, อนิจฺจํ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา…เป… มโน อนิจฺโจ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २२२. “भिक्खूहो, चक्षु (डोळे) अनित्य आहेत...पे... जिव्हा (जीभ) अनित्य आहे...पे... मन अनित्य आहे. असे पाहणारा...पे... या अस्तित्वासाठी आता काहीही कर्तव्य उरलेले नाही, असे तो जाणतो.” ๕๖. อชฺฌตฺตายตนทุกฺขสุตฺตํ ५६. आध्यात्मिक आयतन दुःख सुत्त ๒๒๓. ‘‘จกฺขุ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ…เป… ชิวฺหา ทุกฺขา…เป… มโน ทุกฺโข. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २२३. “भिक्खूहो, चक्षु दुःखकारक आहेत...पे... जिव्हा दुःखकारक आहे...पे... मन दुःखकारक आहे. असे पाहणारा...पे... या अस्तित्वासाठी आता काहीही कर्तव्य उरलेले नाही, असे तो जाणतो.” ๕๗. อชฺฌตฺตายตนอนตฺตสุตฺตํ ५७. आध्यात्मिक आयतन अनात्म सुत्त ๒๒๔. ‘‘จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนตฺตา…เป… ชิวฺหา อนตฺตา…เป… มโน อนตฺตา. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २२४. “भिक्खूहो, चक्षु अनात्म आहेत...पे... जिव्हा अनात्म आहे...पे... मन अनात्म आहे. असे पाहणारा...पे... या अस्तित्वासाठी आता काहीही कर्तव्य उरलेले नाही, असे तो जाणतो.” ๕๘. พาหิรายตนอนิจฺจสุตฺตํ ५८. बाह्य आयतन अनित्य सुत्त ๒๒๕. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนิจฺจา. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนิจฺจา. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २२५. “भिक्खूहो, रूपे अनित्य आहेत. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धम्म अनित्य आहेत. असे पाहणारा...पे... या अस्तित्वासाठी आता काहीही कर्तव्य उरलेले नाही, असे तो जाणतो.” ๕๙. พาหิรายตนทุกฺขสุตฺตํ ५९. बाह्य आयतन दुःख सुत्त ๒๒๖. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, ทุกฺขา. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา ทุกฺขา. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २२६. “भिक्खूहो, रूपे दुःखकारक आहेत. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धम्म दुःखकारक आहेत. असे पाहणारा...पे... या अस्तित्वासाठी आता काहीही कर्तव्य उरलेले नाही, असे तो जाणतो.” ๖๐. พาหิรายตนอนตฺตสุตฺตํ ६०. बाह्य आयतन अनात्म सुत्त ๒๒๗. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนตฺตา. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนตฺตา. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २२७. “भिक्खूहो, रूपे अनात्म आहेत. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धम्म अनात्म आहेत. असे पाहणारा...पे... या अस्तित्वासाठी आता काहीही कर्तव्य उरलेले नाही, असे तो जाणतो.” สฏฺฐิเปยฺยาลวคฺโค สตฺตรสโม. सट्ठिपेय्यालवग्गो (साठ सुत्तांचा संक्षेप वर्ग) समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याचे उद्दान (अनुक्रमणिका) – ฉนฺเทนฏฺฐารส โหนฺติ, อตีเตน จ ทฺเว นว; ยทนิจฺจาฏฺฐารส วุตฺตา, ตโย อชฺฌตฺตพาหิรา; เปยฺยาโล สฏฺฐิโก วุตฺโต, พุทฺเธนาทิจฺจพนฺธุนาติ. “छंद (इच्छा) सुत्तांचे अठरा आहेत, अतीत सुत्तांचे दोन नऊ (अठरा) आहेत; यदनिच्च सुत्तांचे अठरा सांगितले आहेत, आणि आध्यात्मिक व बाह्य मिळून तीन आहेत; अशा प्रकारे आदित्यबंधू (सूर्याचे वंशज) असलेल्या बुद्धांनी साठ सुत्तांचा हा पेय्याल (संक्षेप) सांगितला आहे.” สุตฺตนฺตานิ สฏฺฐิ. एकूण साठ सुत्ते आहेत. ๑๘. สมุทฺทวคฺโค १८. समुद्रवग्गो (समुद्र वर्ग) ๑. ปฐมสมุทฺทสุตฺตํ १. प्रथम समुद्र सुत्त ๒๒๘. ‘‘‘สมุทฺโท[Pg.367], สมุทฺโท’ติ, ภิกฺขเว, อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน ภาสติ. เนโส, ภิกฺขเว, อริยสฺส วินเย สมุทฺโท. มหา เอโส, ภิกฺขเว, อุทกราสิ มหาอุทกณฺณโว. จกฺขุ, ภิกฺขเว, ปุริสสฺส สมุทฺโท; ตสฺส รูปมโย เวโค. โย ตํ รูปมยํ เวคํ สหติ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อตริ จกฺขุสมุทฺทํ สอูมึ สาวฏฺฏํ สคาหํ สรกฺขสํ; ติณฺโณ ปารงฺคโต ถเล ติฏฺฐติ พฺราหฺมโณ…เป… ชิวฺหา, ภิกฺขเว, ปุริสสฺส สมุทฺโท; ตสฺส รสมโย เวโค. โย ตํ รสมยํ เวคํ สหติ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อตริ ชิวฺหาสมุทฺทํ สอูมึ สาวฏฺฏํ สคาหํ สรกฺขสํ; ติณฺโณ ปารงฺคโต ถเล ติฏฺฐติ พฺราหฺมโณ…เป… มโน, ภิกฺขเว, ปุริสสฺส สมุทฺโท; ตสฺส ธมฺมมโย เวโค. โย ตํ ธมฺมมยํ เวคํ สหติ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อตริ มโนสมุทฺทํ สอูมึ สาวฏฺฏํ สคาหํ สรกฺขสํ; ติณฺโณ ปารงฺคโต ถเล ติฏฺฐติ พฺราหฺมโณ’’ติ. อิทมโวจ…เป… สตฺถา – २२८. “‘समुद्र, समुद्र’ असे, भिक्खूहो, अश्रुतवान (अज्ञानी) पृथग्जन म्हणतो. परंतु, भिक्खूहो, आर्यांच्या विनयामध्ये (शासनात) हा समुद्र नाही. हा तर केवळ पाण्याचा मोठा साठा, पाण्याचा विशाल विस्तार आहे. भिक्खूहो, मनुष्यासाठी चक्षु (डोळा) हाच समुद्र आहे; त्याचा वेग रूपमय (रूपांनी बनलेला) असतो. जो मनुष्य त्या रूपमय वेगाला सहन करतो (त्यावर नियंत्रण ठेवतो), त्याला, भिक्खूहो, असे म्हटले जाते की त्याने लाटा, भोवरे, सुसरी (जलचर प्राणी) आणि राक्षसांनी युक्त अशा चक्षु-समुद्राला पार केले आहे; तो पार गेलेला, पलीकडच्या तीरावर पोहोचलेला आणि कोरड्या जमिनीवर उभा असलेला ब्राह्मण (अर्हत) आहे...पे... भिक्खूहो, मनुष्यासाठी जिव्हा (जीभ) हा समुद्र आहे; तिचा वेग रसमय असतो. जो मनुष्य त्या रसमय वेगाला सहन करतो, त्याला, भिक्खूहो, असे म्हटले जाते की त्याने लाटा, भोवरे, सुसरी आणि राक्षसांनी युक्त अशा जिव्हा-समुद्राला पार केले आहे; तो पार गेलेला, पलीकडच्या तीरावर पोहोचलेला आणि कोरड्या जमिनीवर उभा असलेला ब्राह्मण आहे...पे... भिक्खूहो, मनुष्यासाठी मन हा समुद्र आहे; त्याचा वेग धम्ममय (विचारांनी बनलेला) असतो. जो मनुष्य त्या धम्ममय वेगाला सहन करतो, त्याला, भिक्खूहो, असे म्हटले जाते की त्याने लाटा, भोवरे, सुसरी आणि राक्षसांनी युक्त अशा मन-समुद्राला पार केले आहे; तो पार गेलेला, पलीकडच्या तीरावर पोहोचलेला आणि कोरड्या जमिनीवर उभा असलेला ब्राह्मण आहे.” भगवान असे म्हणाले...पे... शास्त्यांनी (बुद्धांनी) पुढे असे म्हटले – ‘‘โย อิมํ สมุทฺทํ สคาหํ สรกฺขสํ,สอูมึ สาวฏฺฏํ สภยํ ทุตฺตรํ อจฺจตริ; ส เวทคู วุสิตพฺรหฺมจริโย,โลกนฺตคู ปารคโตติ วุจฺจตี’’ติ. ปฐมํ; “ज्याने सुसरी, राक्षस, लाटा, भोवरे आणि भयाने युक्त असलेल्या, पार करण्यास अत्यंत कठीण अशा या समुद्राला पार केले आहे; तो वेदगू (ज्ञानी), ब्रह्मचर्य पूर्ण केलेला, लोकाचा अंत गाठलेला आणि पलीकडच्या तीरावर पोहोचलेला भिक्खू (अर्हत) म्हटला जातो.” पहिले सुत्त समाप्त. ๒. ทุติยสมุทฺทสุตฺตํ २. द्वितीय समुद्र सुत्त ๒๒๙. ‘‘สมุทฺโท, สมุทฺโท’ติ, ภิกฺขเว, อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน ภาสติ. เนโส, ภิกฺขเว, อริยสฺส วินเย สมุทฺโท. มหา เอโส, ภิกฺขเว, อุทกราสิ มหาอุทกณฺณโว. สนฺติ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อริยสฺส วินเย สมุทฺโท. เอตฺถายํ สเทวโก โลโก สมารโก สพฺรหฺมโก สสฺสมณพฺราหฺมณี ปชา สเทวมนุสฺสา เยภุยฺเยน สมุนฺนา ตนฺตากุลกชาตา กุลคณฺฐิกชาตา มุญฺชปพฺพชภูตา, อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ สํสารํ นาติวตฺตติ…เป…. २२९. “‘समुद्र, समुद्र’ असे, भिक्खूहो, अश्रुतवान पृथग्जन म्हणतो. परंतु, भिक्खूहो, आर्यांच्या विनयामध्ये हा समुद्र नाही. हा तर केवळ पाण्याचा मोठा साठा, पाण्याचा विशाल विस्तार आहे. भिक्खूहो, चक्षु-विज्ञानाने जाणता येण्याजोगी अशी रूपे आहेत, जी इष्ट, कांत (प्रिय), मनाला आनंद देणारी, प्रिय वाटणारी, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारी आहेत. भिक्खूहो, आर्यांच्या विनयामध्ये यालाच ‘समुद्र’ म्हटले जाते. या रूपमय समुद्रात देव, मार आणि ब्रह्मासह हा देवलोक, तसेच श्रमण, ब्राह्मण, राजे आणि मनुष्यांसह ही प्रजा बहुतांश करून बुडून गेली आहे; ती गुंफलेल्या सुताच्या गोळ्यासारखी, गाठी पडलेल्या सुतासारखी, मुंज आणि बब्बज गवतासारखी गुंतागुंतीची झाली आहे. ती अपाय (दुर्गती), विनाश आणि संसाराला पार करू शकत नाही...पे...” ‘‘สนฺติ[Pg.368], ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อริยสฺส วินเย สมุทฺโท. เอตฺถายํ สเทวโก โลโก สมารโก สพฺรหฺมโก สสฺสมณพฺราหฺมณี ปชา สเทวมนุสฺสา เยภุยฺเยน สมุนฺนา ตนฺตากุลกชาตา กุลคณฺฐิกชาตา มุญฺชปพฺพชภูตา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ สํสารํ นาติวตฺตตี’’ติ. “भिक्खूहो, जिव्हा-विज्ञानाने जाणता येण्याजोगे रस आहेत...पे... भिक्खूहो, मनो-विज्ञानाने जाणता येण्याजोगे धम्म (मानसिक विषय) आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाला आनंद देणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. भिक्खूहो, आर्यांच्या विनयामध्ये यालाच ‘समुद्र’ म्हटले जाते. या धम्ममय समुद्रात देव, मार आणि ब्रह्मासह हा देवलोक, तसेच श्रमण, ब्राह्मण, राजे आणि मनुष्यांसह ही प्रजा बहुतांश करून बुडून गेली आहे; ती गुंफलेल्या सुताच्या गोळ्यासारखी, गाठी पडलेल्या सुतासारखी, मुंज आणि बब्बज गवतासारखी गुंतागुंतीची झाली आहे. ती अपाय, दुर्गती, विनाश आणि संसाराला पार करू शकत नाही.” ‘‘ยสฺส ราโค จ โทโส จ, อวิชฺชา จ วิราชิตา; โส อิมํ สมุทฺทํ สคาหํ สรกฺขสํ, สอูมิภยํ ทุตฺตรํ อจฺจตริ. “ज्याची आसक्ती (राग), द्वेष आणि अविद्या नष्ट झाली आहे; त्याने सुसरी, राक्षस, लाटांच्या भयाने युक्त असलेल्या, पार करण्यास अत्यंत कठीण अशा या समुद्राला पार केले आहे.” ‘‘สงฺคาติโค มจฺจุชโห นิรุปธิ, ปหาสิ ทุกฺขํ อปุนพฺภวาย; อตฺถงฺคโต โส น ปุเนติ, อโมหยี, มจฺจุราชนฺติ พฺรูมี’’ติ. ทุติยํ; जो आसक्तीच्या पलीकडे गेला आहे, ज्याने मृत्यूचा त्याग केला आहे, जो उपाधिरहित आहे, ज्याने पुनर्जन्म न होण्यासाठी दुःखाचा त्याग केला आहे; तो अस्तंगत झाला आहे, तो पुन्हा परत येत नाही, त्याने मृत्यूच्या राजाला (मारराजाला) भ्रमित केले आहे, असे मी म्हणतो. दुसरे. ๓. พาฬิสิโกปมสุตฺตํ ३. बाळिसिकोपम सुत्त ๒๓๐. ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, พาฬิสิโก อามิสคตพฬิสํ คมฺภีเร อุทกรหเท ปกฺขิเปยฺย. ตเมนํ อญฺญตโร อามิสจกฺขุ มจฺโฉ คิเลยฺย. เอวญฺหิ โส, ภิกฺขเว, มจฺโฉ คิลิตพฬิโส พาฬิสิกสฺส อนยํ อาปนฺโน พฺยสนํ อาปนฺโน ยถากามกรณีโย พาฬิสิกสฺส. २३०. भिक्षूहो, ज्याप्रमाणे एखादा कोळी आमिष (चारा) लावलेला गळ एका खोल जलाशयात टाकेल आणि आमिषावर डोळा असलेला एखादा मासा तो गळ गिळेल. भिक्षूहो, अशा प्रकारे तो गळ गिळलेला मासा कोळ्याच्या तावडीत सापडून अनर्थाला प्राप्त होतो, विनाशाला प्राप्त होतो आणि कोळ्याच्या इच्छेनुसार वागविण्यास पात्र ठरतो. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ฉยิเม พฬิสา โลกสฺมึ อนยาย สตฺตานํ วธาย ปาณินํ. กตเม ฉ? สนฺติ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ, ภิกฺขุ, อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ คิลิตพฬิโส, มารสฺส อนยํ อาปนฺโน พฺยสนํ อาปนฺโน ยถากามกรณีโย ปาปิมโต…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป…. तसेच, भिक्षूहो, या जगात प्राण्यांच्या अनर्थासाठी आणि जीवांच्या विनाशासाठी हे सहा गळ आहेत. कोणते सहा? भिक्षूहो, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेने युक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यात आसक्त होऊन राहतो, तर भिक्षूहो, त्या भिक्षूला 'माराचा गळ गिळलेला भिक्षू' असे म्हटले जाते. तो अनर्थाला प्राप्त झाला आहे, विनाशाला प्राप्त झाला आहे आणि पापी माराच्या इच्छेनुसार वागविण्यास पात्र ठरला आहे... तसेच, भिक्षूहो, जिभेने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ, ภิกฺขุ, อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ คิลิตพฬิโส มารสฺส อนยํ อาปนฺโน พฺยสนํ อาปนฺโน ยถากามกรณีโย ปาปิมโต. भिक्षूहो, मनाने जाणता येण्याजोगे असे धम्म आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेने युक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यात आसक्त होऊन राहतो, तर भिक्षूहो, त्या भिक्षूला 'माराचा गळ गिळलेला भिक्षू' असे म्हटले जाते. तो अनर्थाला प्राप्त झाला आहे, विनाशाला प्राप्त झाला आहे आणि पापी माराच्या इच्छेनुसार वागविण्यास पात्र ठरला आहे. ‘‘สนฺติ [Pg.369] จ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ น คิลิตพฬิโส มารสฺส อเภทิ พฬิสํ ปริเภทิ พฬิสํ น อนยํ อาปนฺโน น พฺยสนํ อาปนฺโน น ยถากามกรณีโย ปาปิมโต…เป…. भिक्षूहो, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेने युक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर भिक्षूहो, त्या भिक्षूला 'माराचा गळ न गिळलेला भिक्षू' असे म्हटले जाते. त्याने तो गळ तोडला आहे, तो गळ नष्ट केला आहे. तो अनर्थाला प्राप्त झालेला नाही, विनाशाला प्राप्त झालेला नाही आणि पापी मार त्याच्याशी आपल्या इच्छेनुसार वागू शकत नाही... तसेच... ‘‘สนฺติ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป…. สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ น คิลิตพฬิโส มารสฺส อเภทิ พฬิสํ ปริเภทิ พฬิสํ น อนยํ อาปนฺโน น พฺยสนํ อาปนฺโน น ยถากามกรณีโย ปาปิมโต’’ติ. ตติยํ. भिक्षूहो, जिभेने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... तसेच, भिक्षूहो, मनाने जाणता येण्याजोगे असे धम्म आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेने युक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर भिक्षूहो, त्या भिक्षूला 'माराचा गळ न गिळलेला भिक्षू' असे म्हटले जाते. त्याने तो गळ तोडला आहे, तो गळ नष्ट केला आहे. तो अनर्थाला प्राप्त झालेला नाही, विनाशाला प्राप्त झालेला नाही आणि पापी मार त्याच्याशी आपल्या इच्छेनुसार वागू शकत नाही. तिसरे. ๔. ขีรรุกฺโขปมสุตฺตํ ४. खीररुक्खोपम सुत्त ๒๓๑. ‘‘ยสฺส กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ โย ราโค โส อตฺถิ, โย โทโส โส อตฺถิ, โย โมโห โส อตฺถิ, โย ราโค โส อปฺปหีโน, โย โทโส โส อปฺปหีโน, โย โมโห โส อปฺปหีโน ตสฺส ปริตฺตา เจปิ จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา จกฺขุสฺส อาปาถํ อาคจฺฉนฺติ ปริยาทิยนฺเตวสฺส จิตฺตํ; โก ปน วาโท อธิมตฺตานํ! ตํ กิสฺส เหตุ? โย, ภิกฺขเว, ราโค, โส อตฺถิ, โย โทโส โส อตฺถิ, โย โมโห โส อตฺถิ, โย ราโค โส อปฺปหีโน, โย โทโส โส อปฺปหีโน, โย โมโห โส อปฺปหีโน…เป…. २३१. भिक्षूहो, ज्या कोणा भिक्षूमध्ये किंवा भिक्षुणीमध्ये डोळ्यांनी जाणता येण्याजोग्या रूपांविषयी जो राग आहे तो तसाच असेल, जो द्वेष आहे तो तसाच असेल, जो मोह आहे तो तसाच असेल; आणि तो राग नष्ट केलेला नसेल, तो द्वेष नष्ट केलेला नसेल, तो मोह नष्ट केलेला नसेल; तर डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे अगदी थोडे रूप जरी त्यांच्या डोळ्यांसमोर आले, तरी ते त्यांच्या चित्ताला व्यापून टाकतात; मग मोठ्या रूपांविषयी तर काय सांगावे! त्याचे कारण काय? भिक्षूहो, कारण जो राग आहे तो तसाच आहे, जो द्वेष आहे तो तसाच आहे, जो मोह आहे तो तसाच आहे; आणि तो राग नष्ट केलेला नाही, तो द्वेष नष्ट केलेला नाही, तो मोह नष्ट केलेला नाही... तसेच... ‘‘ยสฺส กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา ชิวฺหาวิญฺเญยฺเยสุ รเสสุ โย ราโค โส อตฺถิ…เป…. भिक्षूहो, ज्या कोणा भिक्षूमध्ये किंवा भिक्षुणीमध्ये जिभेने जाणता येण्याजोग्या रसांविषयी जो राग आहे तो तसाच असेल... तसेच... ‘‘ยสฺส กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา มโนวิญฺเญยฺเยสุ ธมฺเมสุ โย ราโค โส อตฺถิ, โย โทโส โส อตฺถิ, โย โมโห โส อตฺถิ, โย ราโค โส อปฺปหีโน, โย โทโส โส อปฺปหีโน, โย โมโห โส อปฺปหีโน, ตสฺส ปริตฺตา เจปิ มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา มนสฺส อาปาถํ อาคจฺฉนฺติ ปริยาทิยนฺเตวสฺส จิตฺตํ; โก ปน วาโท อธิมตฺตานํ! ตํ กิสฺส เหตุ? โย, ภิกฺขเว, ราโค, โส อตฺถิ, โย โทโส โส อตฺถิ, โย โมโห โส [Pg.370] อตฺถิ, โย ราโค โส อปฺปหีโน, โย โทโส โส อปฺปหีโน, โย โมโห โส อปฺปหีโน. भिक्षूहो, ज्या कोणा भिक्षूमध्ये किंवा भिक्षुणीमध्ये मनाने जाणता येण्याजोग्या धम्मांविषयी जो राग आहे तो तसाच असेल, जो द्वेष आहे तो तसाच असेल, जो मोह आहे तो तसाच असेल; आणि तो राग नष्ट केलेला नसेल, तो द्वेष नष्ट केलेला नसेल, तो मोह नष्ट केलेला नसेल; तर मनाने जाणता येण्याजोगे अगदी थोडे जरी धम्म त्यांच्या मनासमोर आले, तरी ते त्यांच्या चित्ताला व्यापून टाकतात; मग मोठ्या धम्मांविषयी तर काय सांगावे! त्याचे कारण काय? भिक्षूहो, कारण जो राग आहे तो तसाच आहे, जो द्वेष आहे तो तसाच आहे, जो मोह आहे तो तसाच आहे; आणि तो राग नष्ट केलेला नाही, तो द्वेष नष्ट केलेला नाही, तो मोह नष्ट केलेला नाही. ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ขีรรุกฺโข อสฺสตฺโถ วา นิคฺโรโธ วา ปิลกฺโข วา อุทุมฺพโร วา ทหโร ตรุโณ โกมารโก. ตเมนํ ปุริโส ติณฺหาย กุฐาริยา ยโต ยโต อาภินฺเทยฺย อาคจฺเฉยฺย ขีร’’นฺติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตํ กิสฺส เหตุ’’? ‘‘ยญฺหิ, ภนฺเต, ขีรํ ตํ อตฺถี’’ติ. भिक्षूहो, ज्याप्रमाणे समजा एखादे दूध किंवा चीक असणारे झाड असेल—पिंपळ, वटवृक्ष, पिळ्ळख किंवा उदुंबर—जे लहान, कोवळे आणि तरुण आहे. जर एखाद्या माणसाने त्यावर तीक्ष्ण कुऱ्हाडीने जिथे जिथे घाव घातला, तिथे तिथे चीक बाहेर येईल का? 'होय, भंते.' 'त्याचे कारण काय?' 'कारण, भंते, त्या झाडामध्ये चीक आहे.' ‘‘เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ยสฺส กสฺสจิ ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ โย ราโค โส อตฺถิ, โย โทโส โส อตฺถิ, โย โมโห โส อตฺถิ, โย ราโค โส อปฺปหีโน, โย โทโส โส อปฺปหีโน, โย โมโห โส อปฺปหีโน, ตสฺส ปริตฺตา เจปิ จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา จกฺขุสฺส อาปาถํ อาคจฺฉนฺติ ปริยาทิยนฺเตวสฺส จิตฺตํ; โก ปน วาโท อธิมตฺตานํ! ตํ กิสฺส เหตุ? โย, ภิกฺขเว, ราโค โส อตฺถิ, โย โทโส โส อตฺถิ, โย โมโห โส อตฺถิ, โย ราโค โส อปฺปหีโน, โย โทโส โส อปฺปหีโน, โย โมโห โส อปฺปหีโน…เป…. तशाच प्रकारे, भिक्षूहो, ज्या कोणा भिक्षूमध्ये किंवा भिक्षुणीमध्ये डोळ्यांनी जाणता येण्याजोग्या रूपांविषयी जो राग आहे तो तसाच असेल, जो द्वेष आहे तो तसाच असेल, जो मोह आहे तो तसाच असेल; आणि तो राग नष्ट केलेला नसेल, तो द्वेष नष्ट केलेला नसेल, तो मोह नष्ट केलेला नसेल; तर डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे अगदी थोडे रूप जरी त्यांच्या डोळ्यांसमोर आले, तरी ते त्यांच्या चित्ताला व्यापून टाकतात; मग मोठ्या रूपांविषयी तर काय सांगावे! त्याचे कारण काय? भिक्षूहो, कारण जो राग आहे तो तसाच आहे, जो द्वेष आहे तो तसाच आहे, जो मोह आहे तो तसाच आहे; आणि तो राग नष्ट केलेला नाही, तो द्वेष नष्ट केलेला नाही, तो मोह नष्ट केलेला नाही... तसेच... ‘‘ยสฺส กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา ชิวฺหาวิญฺเญยฺเยสุ รเสสุ โย ราโค โส อตฺถิ…เป…. भिक्षूहो, ज्या कोणा भिक्षूमध्ये किंवा भिक्षुणीमध्ये जिभेने जाणता येण्याजोग्या रसांविषयी जो राग आहे तो तसाच असेल... तसेच... ‘‘ยสฺส กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา มโนวิญฺเญยฺเยสุ ธมฺเมสุ โย ราโค โส อตฺถิ, โย โทโส โส อตฺถิ, โย โมโห โส อตฺถิ, โย ราโค โส อปฺปหีโน, โย โทโส โส อปฺปหีโน, โย โมโห โส อปฺปหีโน, ตสฺส ปริตฺตา เจปิ มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา มนสฺส อาปาถํ อาคจฺฉนฺติ ปริยาทิยนฺเตวสฺส จิตฺตํ; โก ปน วาโท อธิมตฺตานํ! ตํ กิสฺส เหตุ? โย, ภิกฺขเว, ราโค โส อตฺถิ, โย โทโส โส อตฺถิ, โย โมโห โส อตฺถิ, โย ราโค โส อปฺปหีโน, โย โทโส โส อปฺปหีโน, โย โมโห โส อปฺปหีโน. भिक्षूहो, ज्या कोणा भिक्षूमध्ये किंवा भिक्षुणीमध्ये मनाने जाणता येण्याजोग्या धम्मांविषयी जो राग आहे तो तसाच असेल, जो द्वेष आहे तो तसाच असेल, जो मोह आहे तो तसाच असेल; आणि तो राग नष्ट केलेला नसेल, तो द्वेष नष्ट केलेला नसेल, तो मोह नष्ट केलेला नसेल; तर मनाने जाणता येण्याजोगे अगदी थोडे जरी धम्म त्यांच्या मनासमोर आले, तरी ते त्यांच्या चित्ताला व्यापून टाकतात; मग मोठ्या धम्मांविषयी तर काय सांगावे! त्याचे कारण काय? भिक्षूहो, कारण जो राग आहे तो तसाच आहे, जो द्वेष आहे तो तसाच आहे, जो मोह आहे तो तसाच आहे; आणि तो राग नष्ट केलेला नाही, तो द्वेष नष्ट केलेला नाही, तो मोह नष्ट केलेला नाही. ‘‘ยสฺส กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ โย ราโค โส นตฺถิ, โย โทโส โส นตฺถิ, โย โมโห โส นตฺถิ, โย ราโค โส ปหีโน, โย โทโส โส ปหีโน, โย โมโห โส [Pg.371] ปหีโน, ตสฺส อธิมตฺตา เจปิ จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา จกฺขุสฺส อาปาถํ อาคจฺฉนฺติ เนวสฺส จิตฺตํ ปริยาทิยนฺติ; โก ปน วาโท ปริตฺตานํ! ตํ กิสฺส เหตุ? โย, ภิกฺขเว, ราโค โส นตฺถิ, โย โทโส โส นตฺถิ, โย โมโห โส นตฺถิ, โย ราโค โส ปหีโน, โย โทโส โส ปหีโน, โย โมโห โส ปหีโน…เป…. “भिक्षूंनो, ज्या कोणा भिक्षूच्या किंवा भिक्षुणीच्या बाबतीत, डोळ्याने जाणता येणाऱ्या रूपांविषयी जो राग असतो तो नसतो, जो द्वेष असतो तो नसतो, जो मोह असतो तो नसतो; जो राग असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो द्वेष असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो मोह असतो तो नष्ट केलेला असतो; तर डोळ्याने जाणता येणारी अत्यंत प्रबळ रूपे जरी त्याच्या डोळ्यांच्या टप्प्यात आली, तरी ती त्याच्या चित्ताला वश करू शकत नाहीत; मग क्षुल्लक रूपांबद्दल तर काय सांगावे! त्याचे कारण काय? भिक्षूंनो, जो राग असतो तो नसतो, जो द्वेष असतो तो नसतो, जो मोह असतो तो नसतो; जो राग असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो द्वेष असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो मोह असतो तो नष्ट केलेला असतो... पे...” ‘‘ยสฺส กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา ชิวฺหาวิญฺเญยฺเยสุ รเสสุ…เป… มโนวิญฺเญยฺเยสุ ธมฺเมสุ โย ราโค โส นตฺถิ, โย โทโส โส นตฺถิ, โย โมโห โส นตฺถิ, โย ราโค โส ปหีโน, โย โทโส โส ปหีโน, โย โมโห โส ปหีโน, ตสฺส อธิมตฺตา เจปิ มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา มนสฺส อาปาถํ อาคจฺฉนฺติ เนวสฺส จิตฺตํ ปริยาทิยนฺติ; โก ปน วาโท ปริตฺตานํ! ตํ กิสฺส เหตุ? โย, ภิกฺขเว, ราโค โส นตฺถิ, โย โทโส โส นตฺถิ, โย โมโห โส นตฺถิ, โย ราโค โส ปหีโน, โย โทโส โส ปหีโน, โย โมโห โส ปหีโน. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ขีรรุกฺโข อสฺสตฺโถ วา นิคฺโรโธ วา ปิลกฺโข วา อุทุมฺพโร วา สุกฺโข โกลาโป เตโรวสฺสิโก. ตเมนํ ปุริโส ติณฺหาย กุฐาริยา ยโต ยโต อาภินฺเทยฺย อาคจฺเฉยฺย ขีร’’นฺติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตํ กิสฺส เหตุ’’? ‘‘ยญฺหิ, ภนฺเต, ขีรํ ตํ นตฺถี’’ติ. “भिक्षूंनो, ज्या कोणा भिक्षूच्या किंवा भिक्षुणीच्या बाबतीत, जिभेने जाणता येणाऱ्या रसांविषयी... पे... मनाद्वारे जाणता येणाऱ्या मनोविषयांबद्दल जो राग असतो तो नसतो, जो द्वेष असतो तो नसतो, जो मोह असतो तो नसतो; जो राग असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो द्वेष असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो मोह असतो तो नष्ट केलेला असतो; तर मनाद्वारे जाणता येणारे अत्यंत प्रबळ मनोविषय जरी त्याच्या मनाच्या टप्प्यात आले, तरी ती त्याच्या चित्ताला वश करू शकत नाहीत; मग क्षुल्लक मनोविषयांबद्दल तर काय सांगावे! त्याचे कारण काय? भिक्षूंनो, जो राग असतो तो नसतो, जो द्वेष असतो तो नसतो, जो मोह असतो तो नसतो; जो राग असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो द्वेष असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो मोह असतो तो नष्ट केलेला असतो. भिक्षूंनो, समजा एखादा चिकाचा वृक्ष असेल—पिंपळ, वटवृक्ष, पिंपरी किंवा उंबर—जो वाळलेला, कुजलेला आणि जुना झालेला आहे. जर एखाद्या माणसाने धारदार कुऱ्हाडीने त्याला ठिकठिकाणी तोडले, तर त्यातून चीक बाहेर पडेल का?” “नाही, भन्ते.” “त्याचे कारण काय?” “कारण, भन्ते, त्यात जो चीक असायला हवा होता, तो आता नाहीच.” ‘‘เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ยสฺส กสฺสจิ ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ โย ราโค โส นตฺถิ, โย โทโส โส นตฺถิ, โย โมโห โส นตฺถิ, โย ราโค โส ปหีโน, โย โทโส โส ปหีโน, โย โมโห โส ปหีโน, ตสฺส อธิมตฺตา เจปิ จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา จกฺขุสฺส อาปาถํ อาคจฺฉนฺติ เนวสฺส จิตฺตํ ปริยาทิยนฺติ; โก ปน วาโท ปริตฺตานํ! ตํ กิสฺส เหตุ? โย, ภิกฺขเว, ราโค โส นตฺถิ, โย โทโส โส นตฺถิ, โย โมโห โส นตฺถิ, โย ราโค โส ปหีโน, โย โทโส โส ปหีโน, โย โมโห โส ปหีโน…เป…. “त्याचप्रमाणे, भिक्षूंनो, ज्या कोणा भिक्षूच्या किंवा भिक्षुणीच्या बाबतीत, डोळ्याने जाणता येणाऱ्या रूपांविषयी जो राग असतो तो नसतो, जो द्वेष असतो तो नसतो, जो मोह असतो तो नसतो; जो राग असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो द्वेष असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो मोह असतो तो नष्ट केलेला असतो; तर डोळ्याने जाणता येणारी अत्यंत प्रबळ रूपे जरी त्याच्या डोळ्यांच्या टप्प्यात आली, तरी ती त्याच्या चित्ताला वश करू शकत नाहीत; मग क्षुल्लक रूपांबद्दल तर काय सांगावे! त्याचे कारण काय? भिक्षूंनो, जो राग असतो तो नसतो, जो द्वेष असतो तो नसतो, जो मोह असतो तो नसतो; जो राग असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो द्वेष असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो मोह असतो तो नष्ट केलेला असतो... पे...” ‘‘ยสฺส กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา ชิวฺหาวิญฺเญยฺเยสุ รเสสุ…เป…. “भिक्षूंनो, ज्या कोणा भिक्षूच्या किंवा भिक्षुणीच्या बाबतीत, जिभेने जाणता येणाऱ्या रसांविषयी... पे...” ‘‘ยสฺส [Pg.372] กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา มโนวิญฺเญยฺเยสุ ธมฺเมสุ โย ราโค โส นตฺถิ, โย โทโส โส นตฺถิ, โย โมโห โส นตฺถิ, โย ราโค โส ปหีโน, โย โทโส โส ปหีโน, โย โมโห โส ปหีโน, ตสฺส อธิมตฺตา เจปิ มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา มนสฺส อาปาถํ อาคจฺฉนฺติ, เนวสฺส จิตฺตํ ปริยาทิยนฺติ; โก ปน วาโท ปริตฺตานํ! ตํ กิสฺส เหตุ? โย, ภิกฺขเว, ราโค โส นตฺถิ, โย โทโส โส นตฺถิ, โย โมโห โส นตฺถิ, โย ราโค โส ปหีโน, โย โทโส โส ปหีโน, โย โมโห โส ปหีโน’’ติ. จตุตฺถํ. “भिक्षूंनो, ज्या कोणा भिक्षूच्या किंवा भिक्षुणीच्या बाबतीत, मनाद्वारे जाणता येणाऱ्या मनोविषयांबद्दल जो राग असतो तो नसतो, जो द्वेष असतो तो नसतो, जो मोह असतो तो नसतो; जो राग असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो द्वेष असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो मोह असतो तो नष्ट केलेला असतो; तर मनाद्वारे जाणता येणारे अत्यंत प्रबळ मनोविषय जरी त्याच्या मनाच्या टप्प्यात आले, तरी ती त्याच्या चित्ताला वश करू शकत नाहीत; मग क्षुल्लक मनोविषयांबद्दल तर काय सांगावे! त्याचे कारण काय? भिक्षूंनो, जो राग असतो तो नसतो, जो द्वेष असतो तो नसतो, जो मोह असतो तो नसतो; जो राग असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो द्वेष असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो मोह असतो तो नष्ट केलेला असतो.” चौथे सुत्त. ๕. โกฏฺฐิกสุตฺตํ ५. कोट्ठिक सुत्त ๒๓๒. เอกํ สมยํ อายสฺมา จ สาริปุตฺโต อายสฺมา จ มหาโกฏฺฐิโก พาราณสิยํ วิหรนฺติ อิสิปตเน มิคทาเย. อถ โข อายสฺมา มหาโกฏฺฐิโก สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต เยนายสฺมา สาริปุตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา สาริปุตฺเตน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา มหาโกฏฺฐิโก อายสฺมนฺตํ สาริปุตฺตํ เอตทโวจ – २३२. एकदा आयुष्यमान सारिपुत्त आणि आयुष्यमान महाकोट्ठिक वाराणसी येथील इसिपतन येथील मृगदावात विहार करत होते. तेव्हा आयुष्यमान महाकोट्ठिक संध्याकाळच्या वेळी एकांतातून उठून जेथे आयुष्यमान सारिपुत्त होते तेथे गेले; तेथे जाऊन त्यांनी आयुष्यमान सारिपुत्त यांच्याशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण आटोपून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसल्यावर आयुष्यमान महाकोट्ठिक आयुष्यमान सारिपुत्त यांना असे म्हणाले – ‘‘กึ นุ โข, อาวุโส สาริปุตฺต, จกฺขุ รูปานํ สํโยชนํ, รูปา จกฺขุสฺส สํโยชนํ…เป… ชิวฺหา รสานํ สํโยชนํ, รสา ชิวฺหาย สํโยชนํ …เป… มโน ธมฺมานํ สํโยชนํ, ธมฺมา มนสฺส สํโยชน’’นฺติ? “मित्र सारिपुत्त, डोळा हा रूपांचे बंधन आहे की रूपे ही डोळ्याचे बंधन आहेत? ...पे... जीभ ही रसांचे बंधन आहे की रस हे जिभेचे बंधन आहेत? ...पे... मन हे मनोविषयांचे बंधन आहे की मनोविषय हे मनाचे बंधन आहेत?” ‘‘น โข, อาวุโส โกฏฺฐิก, จกฺขุ รูปานํ สํโยชนํ, น รูปา จกฺขุสฺส สํโยชนํ. ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ สํโยชนํ…เป… น ชิวฺหา รสานํ สํโยชนํ, น รสา ชิวฺหาย สํโยชนํ. ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ สํโยชนํ…เป… น มโน ธมฺมานํ สํโยชนํ, น ธมฺมา มนสฺส สํโยชนํ. ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. “मित्र कोट्ठिक, डोळा हा रूपांचे बंधन नाही आणि रूपेही डोळ्याचे बंधन नाहीत. परंतु त्या दोन्हीवर अवलंबून जो इच्छा-राग उत्पन्न होतो, तेच तेथे बंधन आहे. ...पे... जीभ ही रसांचे बंधन नाही आणि रसही जिभेचे बंधन नाहीत. परंतु त्या दोन्हीवर अवलंबून जो इच्छा-राग उत्पन्न होतो, तेच तेथे बंधन आहे. ...पे... मन हे मनोविषयांचे बंधन नाही आणि मनोविषयही मनाचे बंधन नाहीत. परंतु त्या दोन्हीवर अवलंबून जो इच्छा-राग उत्पन्न होतो, तेच तेथे बंधन आहे.” ‘‘เสยฺยถาปิ, อาวุโส, กาโฬ จ พลีพทฺโท โอทาโต จ พลีพทฺโท เอเกน ทาเมน วา โยตฺเตน วา สํยุตฺตา อสฺสุ. โย นุ โข เอวํ [Pg.373] วเทยฺย – ‘กาโฬ พลีพทฺโท โอทาตสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชนํ, โอทาโต พลีพทฺโท กาฬสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชน’นฺติ, สมฺมา นุ โข โส วทมาโน วเทยฺยา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, อาวุโส’’. ‘‘น โข, อาวุโส, กาโฬ พลีพทฺโท โอทาตสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชนํ, น โอทาโต พลีพทฺโท กาฬสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชนํ. เยน จ โข เต เอเกน ทาเมน วา โยตฺเตน วา สํยุตฺตา ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. “मित्रा, समजा एक काळा बैल आणि एक पांढरा बैल एकाच दोरीने किंवा जोताने एकत्र बांधलेले असतील. जर कोणी असे म्हणाला की—‘काळा बैल हा पांढऱ्या बैलाचे बंधन आहे, आणि पांढरा बैल हा काळ्या बैलाचे बंधन आहे’, तर त्याचे असे बोलणे योग्य ठरेल का?’ ‘नाही, मित्रा.’ ‘मित्रा, काळा बैल हा पांढऱ्या बैलाचे बंधन नाही आणि पांढरा बैल हा काळ्या बैलाचे बंधन नाही. परंतु ज्या एका दोरीने किंवा जोताने ते एकत्र बांधलेले आहेत, तेच तेथे बंधन आहे.’” ‘‘เอวเมว โข, อาวุโส, น จกฺขุ รูปานํ สํโยชนํ, น รูปา จกฺขุสฺส สํโยชนํ. ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ สํโยชนํ…เป… น ชิวฺหา รสานํ สํโยชนํ…เป… น มโน ธมฺมานํ สํโยชนํ, น ธมฺมา มนสฺส สํโยชนํ. ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. “त्याचप्रमाणे, मित्रा, डोळा हा रूपांचे बंधन नाही आणि रूपेही डोळ्याचे बंधन नाहीत. परंतु त्या दोन्हीवर अवलंबून जो इच्छा-राग उत्पन्न होतो, तेच तेथे बंधन आहे. ...पे... जीभ ही रसांचे बंधन नाही... पे... मन हे मनोविषयांचे बंधन नाही आणि मनोविषयही मनाचे बंधन नाहीत. परंतु त्या दोन्हीवर अवलंबून जो इच्छा-राग उत्पन्न होतो, तेच तेथे बंधन आहे.” ‘‘จกฺขุ วา, อาวุโส, รูปานํ สํโยชนํ อภวิสฺส, รูปา วา จกฺขุสฺส สํโยชนํ, นยิทํ พฺรหฺมจริยวาโส ปญฺญาเยถ สมฺมา ทุกฺขกฺขยาย. ยสฺมา จ โข, อาวุโส, น จกฺขุ รูปานํ สํโยชนํ, น รูปา จกฺขุสฺส สํโยชนํ; ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ, ตสฺมา พฺรหฺมจริยวาโส ปญฺญายติ สมฺมา ทุกฺขกฺขยาย…เป…. “मित्रा, जर डोळा हा रूपांचे बंधन असता किंवा रूपे ही डोळ्याचे बंधन असती, तर दुःखाच्या पूर्ण नाशासाठी या ब्रह्मचर्यवासाचे प्रयोजन दिसले नसते. परंतु मित्रा, डोळा हा रूपांचे बंधन नाही आणि रूपेही डोळ्याचे बंधन नाहीत; तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो इच्छा-राग उत्पन्न होतो, तेच तेथे बंधन आहे, म्हणूनच दुःखाच्या पूर्ण नाशासाठी ब्रह्मचर्यवासाचे प्रयोजन दिसून येते... पे...” ‘‘ชิวฺหา, อาวุโส, รสานํ สํโยชนํ อภวิสฺส, รสา วา ชิวฺหาย สํโยชนํ, นยิทํ พฺรหฺมจริยวาโส ปญฺญาเยถ สมฺมา ทุกฺขกฺขยาย. ยสฺมา จ โข, อาวุโส, น ชิวฺหา รสานํ สํโยชนํ, น รสา ชิวฺหาย สํโยชนํ; ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ, ตสฺมา พฺรหฺมจริยวาโส ปญฺญายติ สมฺมา ทุกฺขกฺขยาย…เป…. “हे आवुसो, जर जीभ ही रसांचे संयोजन (बंधन) असती किंवा रस हे जिभेचे संयोजन असते, तर दुःखाच्या पूर्ण नाशासाठी हे ब्रह्मचर्यवास योग्य प्रकारे दिसून आले नसते. परंतु, हे आवुसो, जीभ ही रसांचे संयोजन नाही आणि रस हे जिभेचे संयोजन नाही; तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो छंदराग उत्पन्न होतो, तेच तेथे संयोजन आहे. म्हणूनच, दुःखाच्या पूर्ण नाशासाठी हे ब्रह्मचर्यवास योग्य प्रकारे दिसून येते... (पे)...” ‘‘มโน วา, อาวุโส, ธมฺมานํ สํโยชนํ อภวิสฺส, ธมฺมา วา มนสฺส สํโยชนํ, นยิทํ พฺรหฺมจริยวาโส ปญฺญาเยถ สมฺมา ทุกฺขกฺขยาย. ยสฺมา จ โข, อาวุโส, น มโน ธมฺมานํ สํโยชนํ, น ธมฺมา มนสฺส สํโยชนํ; ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ, ตสฺมา พฺรหฺมจริยวาโส ปญฺญายติ สมฺมา ทุกฺขกฺขยาย. “हे आवुसो, जर मन हे धम्मांचे (मानसिक विषयांचे) संयोजन असते किंवा धम्म हे मनाचे संयोजन असते, तर दुःखाच्या पूर्ण नाशासाठी हे ब्रह्मचर्यवास योग्य प्रकारे दिसून आले नसते. परंतु, हे आवुसो, मन हे धम्मांचे संयोजन नाही आणि धम्म हे मनाचे संयोजन नाही; तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो छंदराग उत्पन्न होतो, तेच तेथे संयोजन आहे. म्हणूनच, दुःखाच्या पूर्ण नाशासाठी हे ब्रह्मचर्यवास योग्य प्रकारे दिसून येते.” ‘‘อิมินาเปตํ[Pg.374], อาวุโส, ปริยาเยน เวทิตพฺพํ ยถา น จกฺขุ รูปานํ สํโยชนํ, น รูปา จกฺขุสฺส สํโยชนํ. ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ…เป… น ชิวฺหา รสานํ สํโยชนํ…เป… น มโน ธมฺมานํ สํโยชนํ, น ธมฺมา มนสฺส สํโยชนํ. ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. “हे आवुसो, या पर्यायाने देखील हे समजून घेतले पाहिजे की, डोळे हे रूपांचे संयोजन नाही आणि रूपे हे डोळ्यांचे संयोजन नाही; तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो छंदराग उत्पन्न होतो, तेच तेथे संयोजन आहे... (पे)... जीभ ही रसांचे संयोजन नाही... (पे)... मन हे धम्मांचे संयोजन नाही आणि धम्म हे मनाचे संयोजन नाही; तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो छंदराग उत्पन्न होतो, तेच तेथे संयोजन आहे.” ‘‘สํวิชฺชติ โข, อาวุโส, ภควโต จกฺขุ. ปสฺสติ ภควา จกฺขุนา รูปํ. ฉนฺทราโค ภควโต นตฺถิ. สุวิมุตฺตจิตฺโต ภควา. สํวิชฺชติ โข, อาวุโส, ภควโต โสตํ. สุณาติ ภควา โสเตน สทฺทํ. ฉนฺทราโค ภควโต นตฺถิ. สุวิมุตฺตจิตฺโต ภควา. สํวิชฺชติ โข, อาวุโส, ภควโต ฆานํ. ฆายติ ภควา ฆาเนน คนฺธํ. ฉนฺทราโค ภควโต นตฺถิ. สุวิมุตฺตจิตฺโต ภควา. สํวิชฺชติ โข, อาวุโส, ภควโต ชิวฺหา. สายติ ภควา ชิวฺหาย รสํ. ฉนฺทราโค ภควโต นตฺถิ. สุวิมุตฺตจิตฺโต ภควา. สํวิชฺชติ โข, อาวุโส, ภควโต กาโย. ผุสติ ภควา กาเยน โผฏฺฐพฺพํ. ฉนฺทราโค ภควโต นตฺถิ. สุวิมุตฺตจิตฺโต ภควา. สํวิชฺชติ โข, อาวุโส, ภควโต มโน. วิชานาติ ภควา มนสา ธมฺมํ. ฉนฺทราโค ภควโต นตฺถิ. สุวิมุตฺตจิตฺโต ภควา. “हे आवुसो, भगवंतांकडे डोळे आहेत. भगवंत डोळ्यांनी रूप पाहतात, परंतु भगवंतांमध्ये छंदराग नाही; भगवंत सुविमुक्तचित्त (पूर्णपणे मुक्त चित्त असलेले) आहेत. हे आवुसो, भगवंतांकडे कान आहेत. भगवंत कानांनी शब्द ऐकतात, परंतु भगवंतांमध्ये छंदराग नाही; भगवंत सुविमुक्तचित्त आहेत. हे आवुसो, भगवंतांकडे नाक आहे. भगवंत नाकाने गंध घेतात, परंतु भगवंतांमध्ये छंदराग नाही; भगवंत सुविमुक्तचित्त आहेत. हे आवुसो, भगवंतांकडे जीभ आहे. भगवंत जिभेने रसाची चव घेतात, परंतु भगवंतांमध्ये छंदराग नाही; भगवंत सुविमुक्तचित्त आहेत. हे आवुसो, भगवंतांकडे शरीर आहे. भगवंत शरीराने स्पर्शाचा अनुभव घेतात, परंतु भगवंतांमध्ये छंदराग नाही; भगवंत सुविमुक्तचित्त आहेत. हे आवुसो, भगवंतांकडे मन आहे. भगवंत मनाने धम्म जाणतात, परंतु भगवंतांमध्ये छंदराग नाही; भगवंत सुविमुक्तचित्त आहेत.” ‘‘อิมินา โข เอตํ, อาวุโส, ปริยาเยน เวทิตพฺพํ ยถา น จกฺขุ รูปานํ สํโยชนํ, น รูปา จกฺขุสฺส สํโยชนํ; ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. น โสตํ… น ฆานํ… น ชิวฺหา รสานํ สํโยชนํ, น รสา ชิวฺหาย สํโยชนํ; ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. น กาโย… น มโน ธมฺมานํ สํโยชนํ, น ธมฺมา มนสฺส สํโยชนํ; ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชน’’นฺติ. ปญฺจมํ. “हे आवुसो, या पर्यायाने हे समजून घेतले पाहिजे की, डोळे हे रूपांचे संयोजन नाही आणि रूपे हे डोळ्यांचे संयोजन नाही; तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो छंदराग उत्पन्न होतो, तेच तेथे संयोजन आहे. कान नाही... नाक नाही... जीभ ही रसांचे संयोजन नाही आणि रस हे जिभेचे संयोजन नाही; तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो छंदराग उत्पन्न होतो, तेच तेथे संयोजन आहे. शरीर नाही... मन हे धम्मांचे संयोजन नाही आणि धम्म हे मनाचे संयोजन नाही; तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो छंदराग उत्पन्न होतो, तेच तेथे संयोजन आहे.” पाचवे. ๖. กามภูสุตฺตํ ६. कामभू सुत्त ๒๓๓. เอกํ สมยํ อายสฺมา จ อานนฺโท อายสฺมา จ กามภู โกสมฺพิยํ วิหรนฺติ โฆสิตาราเม. อถ โข อายสฺมา กามภู สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา อานนฺเทน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ [Pg.375] กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา กามภู อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตทโวจ – २३३. एकदा आयुष्यमान आनंद आणि आयुष्यमान कामभू कोसंबी येथील घोषिताराम विहारामध्ये विहार करत होते. तेव्हा आयुष्यमान कामभू संध्याकाळच्या वेळी ध्यानातून उठून जेथे आयुष्यमान आनंद होते तेथे गेले; तेथे जाऊन त्यांनी आयुष्यमान आनंदांशी कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसल्यावर आयुष्यमान कामभू आयुष्यमान आनंदांना असे म्हणाले – ‘‘กึ นุ โข, อาวุโส อานนฺท, จกฺขุ รูปานํ สํโยชนํ, รูปา จกฺขุสฺส สํโยชนํ…เป… ชิวฺหา รสานํ สํโยชนํ, รสา ชิวฺหาย สํโยชนํ…เป… มโน ธมฺมานํ สํโยชนํ, ธมฺมา มนสฺส สํโยชน’’นฺติ? “हे आवुसो आनंद, डोळे हे रूपांचे संयोजन आहे की रूपे हे डोळ्यांचे संयोजन आहे? ... जीभ ही रसांचे संयोजन आहे की रस हे जिभेचे संयोजन आहे? ... मन हे धम्मांचे संयोजन आहे की धम्म हे मनाचे संयोजन आहे?” ‘‘น โข, อาวุโส กามภู, จกฺขุ รูปานํ สํโยชนํ, น รูปา จกฺขุสฺส สํโยชนํ. ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ…เป… น ชิวฺหา รสานํ สํโยชนํ, น รสา ชิวฺหาย สํโยชนํ…เป… น มโน ธมฺมานํ สํโยชนํ, น ธมฺมา มนสฺส สํโยชนํ. ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. “हे आवुसो कामभू, डोळे हे रूपांचे संयोजन नाही आणि रूपे हे डोळ्यांचे संयोजन नाही. तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो छंदराग उत्पन्न होतो, तेच तेथे संयोजन आहे... (पे)... जीभ ही रसांचे संयोजन नाही आणि रस हे जिभेचे संयोजन नाही... (पे)... मन हे धम्मांचे संयोजन नाही आणि धम्म हे मनाचे संयोजन नाही. तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो छंदराग उत्पन्न होतो, तेच तेथे संयोजन आहे.” ‘‘เสยฺยถาปิ, อาวุโส, กาโฬ จ พลีพทฺโท โอทาโต จ พลีพทฺโท เอเกน ทาเมน วา โยตฺเตน วา สํยุตฺตา อสฺสุ. โย นุ โข เอวํ วเทยฺย – ‘กาโฬ พลีพทฺโท โอทาตสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชนํ, โอทาโต พลีพทฺโท กาฬสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชน’นฺติ, สมฺมา นุ โข โส วทมาโน วเทยฺยา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, อาวุโส’’. ‘‘น โข, อาวุโส, กาโฬ พลีพทฺโท โอทาตสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชนํ, นปิ โอทาโต พลีพทฺโท กาฬสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชนํ. เยน จ โข เต เอเกน ทาเมน วา โยตฺเตน วา สํยุตฺตา, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. เอวเมว โข, อาวุโส, น จกฺขุ รูปานํ สํโยชนํ, น รูปา จกฺขุสฺส สํโยชนํ…เป… น ชิวฺหา…เป… น มโน…เป… ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชน’’นฺติ. ฉฏฺฐํ. “हे आवुसो, समजा एक काळा बैल आणि एक पांढरा बैल एकाच दोरीने किंवा जोताने एकत्र बांधलेले असतील. जर कोणी असे म्हणाला की, ‘काळा बैल हा पांढऱ्या बैलाचे संयोजन आहे, आणि पांढरा बैल हा काळ्या बैलाचे संयोजन आहे,’ तर त्याचे हे बोलणे योग्य ठरेल का?” “नाही, आवुसो.” “हे आवुसो, काळा बैल हा पांढऱ्या बैलाचे संयोजन नाही आणि पांढरा बैल हा काळ्या बैलाचे संयोजन नाही. तर ज्या एका दोरीने किंवा जोताने ते दोन्ही बांधलेले आहेत, तेच तेथे संयोजन आहे. तसेच, हे आवुसो, डोळे हे रूपांचे संयोजन नाही आणि रूपे हे डोळ्यांचे संयोजन नाही... (पे)... जीभ नाही... (पे)... मन नाही... (पे)... तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो छंदराग उत्पन्न होतो, तेच तेथे संयोजन आहे.” सहावे. ๗. อุทายีสุตฺตํ ७. उदायी सुत्त ๒๓๔. เอกํ สมยํ อายสฺมา จ อานนฺโท อายสฺมา จ อุทายี โกสมฺพิยํ วิหรนฺติ โฆสิตาราเม. อถ โข อายสฺมา อุทายี สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา อานนฺเทน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อุทายี อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตทโวจ – २३४. एकदा आयुष्यमान आनंद आणि आयुष्यमान उदायी कोसंबी येथील घोषिताराम विहारामध्ये विहार करत होते. तेव्हा आयुष्यमान उदायी संध्याकाळच्या वेळी ध्यानातून उठून जेथे आयुष्यमान आनंद होते तेथे गेले; तेथे जाऊन त्यांनी आयुष्यमान आनंदांशी कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसल्यावर आयुष्यमान उदायी आयुष्यमान आनंदांना असे म्हणाले – ‘‘ยเถว [Pg.376] นุ โข, อาวุโส อานนฺท, อยํ กาโย ภควตา อเนกปริยาเยน อกฺขาโต วิวโฏ ปกาสิโต – ‘อิติปายํ กาโย อนตฺตา’ติ, สกฺกา เอวเมว วิญฺญาณํ ปิทํ อาจิกฺขิตุํ เทเสตุํ ปญฺญเปตุํ ปฏฺฐเปตุํ วิวริตุํ วิภชิตุํ อุตฺตานีกาตุํ – ‘อิติปิทํ วิญฺญาณํ อนตฺตา’’’ติ? “हे आवुसो आनंद, ज्याप्रमाणे भगवंतांनी या शरीराचे अनेक पर्यायांनी वर्णन केले आहे, ते उघड केले आहे आणि प्रकाशित केले आहे की—‘या कारणाने हे शरीर अनात्मा आहे,’ त्याचप्रमाणे या विज्ञानाचे देखील स्पष्टीकरण देणे, उपदेश करणे, प्रज्ञापित करणे, प्रस्थापित करणे, उघड करणे, विश्लेषण करणे आणि स्पष्ट करणे शक्य आहे का की—‘या कारणाने हे विज्ञान अनात्मा आहे’?” ‘‘ยเถว โข, อาวุโส อุทายี, อยํ กาโย ภควตา อเนกปริยาเยน อกฺขาโต วิวโฏ ปกาสิโต – ‘อิติปายํ กาโย อนตฺตา’ติ, สกฺกา เอวเมว วิญฺญาณํ ปิทํ อาจิกฺขิตุํ เทเสตุํ ปญฺญเปตุํ ปฏฺฐเปตุํ วิวริตุํ วิภชิตุํ อุตฺตานีกาตุํ – ‘อิติปิทํ วิญฺญาณํ อนตฺตา’’’ติ. "हे आवुसो उदायी, ज्याप्रमाणे भगवंतांनी या शरीराला अनेक पर्यायांनी स्पष्ट केले आहे, उघड केले आहे आणि प्रकाशित केले आहे की—'या कारणाने हे शरीर अनात्मा आहे', त्याचप्रमाणे या विज्ञानालाही सांगणे, उपदेशिणे, प्रज्ञापित करणे, प्रस्थापित करणे, उघड करणे, विभाजित करणे आणि स्पष्ट करणे शक्य आहे की—'या कारणाने हे विज्ञान अनात्मा आहे'." ‘‘จกฺขุญฺจ, อาวุโส, ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณ’’นฺติ? ‘‘เอวมาวุโส’’ติ. ‘‘โย จาวุโส, เหตุ, โย จ ปจฺจโย จกฺขุวิญฺญาณสฺส อุปฺปาทาย, โส จ เหตุ, โส จ ปจฺจโย สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ อปริเสสํ นิรุชฺเฌยฺย. อปิ นุ โข จกฺขุวิญฺญาณํ ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, อาวุโส’’. ‘‘อิมินาปิ โข เอตํ, อาวุโส, ปริยาเยน ภควตา อกฺขาตํ วิวฏํ ปกาสิตํ – ‘อิติปิทํ วิญฺญาณํ อนตฺตา’’’ติ…เป…. "हे आवुसो, डोळा आणि रूपांवर अवलंबून चक्षु-विज्ञान उत्पन्न होते का?" "होय, आवुसो." "हे आवुसो, चक्षु-विज्ञानाच्या उत्पत्तीसाठी जो हेतू आणि जो प्रत्यय आहे, तो हेतू आणि तो प्रत्यय जर पूर्णपणे, सर्व प्रकारे, निरवशेषपणे निरुद्ध झाला, तर चक्षु-विज्ञान जाणवले जाईल का?" "नाही, आवुसो." "हे आवुसो, याही पर्यायाने भगवंतांनी हे स्पष्ट केले आहे, उघड केले आहे आणि प्रकाशित केले आहे की—'या कारणाने हे विज्ञान अनात्मा आहे'..." ‘‘ชิวฺหญฺจาวุโส, ปฏิจฺจ รเส จ อุปฺปชฺชติ ชิวฺหาวิญฺญาณ’’นฺติ? ‘‘เอวมาวุโส’’ติ. ‘‘โย จาวุโส, เหตุ โย จ ปจฺจโย ชิวฺหาวิญฺญาณสฺส อุปฺปาทาย, โส จ เหตุ, โส จ ปจฺจโย สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ อปริเสสํ นิรุชฺเฌยฺย, อปิ นุ โข ชิวฺหาวิญฺญาณํ ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, อาวุโส’’. ‘‘อิมินาปิ โข เอตํ, อาวุโส, ปริยาเยน ภควตา อกฺขาตํ วิวฏํ ปกาสิตํ – ‘อิติปิทํ วิญฺญาณํ อนตฺตา’’’ติ…เป…. "हे आवुसो, जीभ आणि रसांवर अवलंबून जिव्हा-विज्ञान उत्पन्न होते का?" "होय, आवुसो." "हे आवुसो, जिव्हा-विज्ञानाच्या उत्पत्तीसाठी जो हेतू आणि जो प्रत्यय आहे, तो हेतू आणि तो प्रत्यय जर पूर्णपणे, सर्व प्रकारे, निरवशेषपणे निरुद्ध झाला, तर जिव्हा-विज्ञान जाणवले जाईल का?" "नाही, आवुसो." "हे आवुसो, याही पर्यायाने भगवंतांनी हे स्पष्ट केले आहे, उघड केले आहे आणि प्रकाशित केले आहे की—'या कारणाने हे विज्ञान अनात्मा आहे'..." ‘‘มนญฺจาวุโส, ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณ’’นฺติ? ‘‘เอวมาวุโส’’ติ. ‘‘โย จาวุโส, เหตุ, โย จ ปจฺจโย มโนวิญฺญาณสฺส อุปฺปาทาย, โส จ เหตุ, โส จ ปจฺจโย สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ อปริเสสํ นิรุชฺเฌยฺย, อปิ นุ โข มโนวิญฺญาณํ ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, อาวุโส’’. ‘‘อิมินาปิ โข เอตํ, อาวุโส, ปริยาเยน ภควตา อกฺขาตํ วิวฏํ ปกาสิตํ – ‘อิติปิทํ วิญฺญาณํ อนตฺตา’’’ติ. "हे आवुसो, मन आणि धम्मांवर अवलंबून मनो-विज्ञान उत्पन्न होते का?" "होय, आवुसो." "हे आवुसो, मनो-विज्ञानाच्या उत्पत्तीसाठी जो हेतू आणि जो प्रत्यय आहे, तो हेतू आणि तो प्रत्यय जर पूर्णपणे, सर्व प्रकारे, निरवशेषपणे निरुद्ध झाला, तर मनो-विज्ञान जाणवले जाईल का?" "नाही, आवुसो." "हे आवुसो, याही पर्यायाने भगवंतांनी हे स्पष्ट केले आहे, उघड केले आहे आणि प्रकाशित केले आहे की—'या कारणाने हे विज्ञान अनात्मा आहे'." ‘‘เสยฺยถาปิ, อาวุโส, ปุริโส สารตฺถิโก สารคเวสี สารปริเยสนํ จรมาโน ติณฺหํ กุฐารึ อาทาย วนํ ปวิเสยฺย. โส ตตฺถ [Pg.377] ปสฺเสยฺย มหนฺตํ กทลิกฺขนฺธํ อุชุํ นวํ อกุกฺกุกชาตํ. ตเมนํ มูเล ฉินฺเทยฺย; มูเล เฉตฺวา อคฺเค ฉินฺเทยฺย; อคฺเค เฉตฺวา ปตฺตวฏฺฏึ วินิพฺภุเชยฺย. โส ตตฺถ เผคฺคุมฺปิ นาธิคจฺเฉยฺย, กุโต สารํ! เอวเมว โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ฉสุ ผสฺสายตเนสุ เนวตฺตานํ น อตฺตนิยํ สมนุปสฺสติ. โส เอวํ อสมนุปสฺสนฺโต น กิญฺจิ โลเก อุปาทิยติ. อนุปาทิยํ น ปริตสฺสติ. อปริตสฺสํ ปจฺจตฺตญฺเญว ปรินิพฺพายติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. สตฺตมํ. "हे आवुसो, समजा एखादा माणूस ज्याला गाभ्याची गरज आहे, जो गाभ्याच्या शोधात आहे, गाभा शोधत फिरत असताना, एक धारदार कुऱ्हाड घेऊन जंगलात प्रवेश करतो. तिथे त्याला केळीचे एक मोठे, सरळ, नवीन आणि न कुजलेले खोड दिसते. तो ते मुळापासून कापतो; मुळापासून कापून त्याचे शेंडे कापतो; शेंडे कापून पानांचे वेढे सोलून काढतो. त्याला तिथे भुसा देखील सापडणार नाही, मग गाभा कुठून मिळणार! तसेच, हे आवुसो, भिक्खू सहा स्पर्शायतनांमध्ये स्वतःला पाहत नाही आणि स्वतःचे असे काही पाहत नाही. तो असे न पाहिल्यामुळे जगात कशाचेही उपादान करत नाही. उपादान न केल्यामुळे तो उद्विग्न होत नाही. उद्विग्न न झाल्यामुळे तो स्वतःच परिनिर्वाण प्राप्त करतो. तो जाणतो: 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही'." हे सातवे (सुत्त) आहे. ๘. อาทิตฺตปริยายสุตฺตํ ८. "आदित्यपर्यायसुत्त" ๒๓๕. ‘‘อาทิตฺตปริยายํ โว, ภิกฺขเว, ธมฺมปริยายํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, อาทิตฺตปริยาโย, ธมฺมปริยาโย? วรํ, ภิกฺขเว, ตตฺตาย อโยสลากาย อาทิตฺตาย สมฺปชฺชลิตาย สโชติภูตาย จกฺขุนฺทฺริยํ สมฺปลิมฏฺฐํ, น ตฺเวว จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ อนุพฺยญฺชนโส นิมิตฺตคฺคาโห. นิมิตฺตสฺสาทคถิตํ วา, ภิกฺขเว, วิญฺญาณํ ติฏฺฐมานํ ติฏฺเฐยฺย, อนุพฺยญฺชนสฺสาทคถิตํ วา ตสฺมิญฺเจ สมเย กาลํ กเรยฺย, ฐานเมตํ วิชฺชติ, ยํ ทฺวินฺนํ คตีนํ อญฺญตรํ คตึ คจฺเฉยฺย – นิรยํ วา, ติรจฺฉานโยนึ วา. อิมํ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อาทีนวํ ทิสฺวา เอวํ วทามิ. २३५. "भिक्खूंनो, मी तुम्हांला 'आदित्यपर्याय' नावाचा धम्मपर्याय उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूंनो, आदित्यपर्याय धम्मपर्याय कोणता आहे? भिक्खूंनो, लालभडक, पेटलेल्या, धगधगत्या आणि ज्वाळांनी युक्त अशा लोखंडी सळईने चक्षुरिंद्रिय फोडून टाकणे अधिक श्रेयस्कर आहे, परंतु चक्षु-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या रूपांच्या लक्षणांचे व अवयवांचे ग्रहण करणे श्रेयस्कर नाही. भिक्खूंनो, जर विज्ञान त्या लक्षणांच्या आस्वादात किंवा अवयवांच्या आस्वादात अडकून राहिले आणि त्या स्थितीत जर एखाद्याचा मृत्यू झाला, तर अशी शक्यता आहे की तो दोन गतींपैकी एका गतीला प्राप्त होईल—नरकात किंवा प्राण्यांच्या योनीत. भिक्खूंनो, हा दोष पाहूनच मी असे सांगतो." ‘‘วรํ, ภิกฺขเว, ติณฺเหน อโยสงฺกุนา อาทิตฺเตน สมฺปชฺชลิเตน สโชติภูเตน โสตินฺทฺริยํ สมฺปลิมฏฺฐํ, น ตฺเวว โสตวิญฺเญยฺเยสุ สทฺเทสุ อนุพฺยญฺชนโส นิมิตฺตคฺคาโห. นิมิตฺตสฺสาทคถิตํ วา, ภิกฺขเว, วิญฺญาณํ ติฏฺฐมานํ ติฏฺเฐยฺย, อนุพฺยญฺชนสฺสาทคถิตํ วา ตสฺมิญฺเจ สมเย กาลงฺกเรยฺย, ฐานเมตํ วิชฺชติ, ยํ ทฺวินฺนํ คตีนํ อญฺญตรํ คตึ คจฺเฉยฺย – นิรยํ วา ติรจฺฉานโยนึ วา. อิมํ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อาทีนวํ ทิสฺวา เอวํ วทามิ. "भिक्खूंनो, धारदार, लालभडक, पेटलेल्या आणि धगधगत्या लोखंडी सुळक्याने श्रोत्रेंद्रिय विद्ध करणे अधिक श्रेयस्कर आहे, परंतु श्रोत्र-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या शब्दांच्या लक्षणांचे व अवयवांचे ग्रहण करणे श्रेयस्कर नाही. भिक्खूंनो, जर विज्ञान त्या लक्षणांच्या आस्वादात किंवा अवयवांच्या आस्वादात अडकून राहिले आणि त्या स्थितीत जर एखाद्याचा मृत्यू झाला, तर अशी शक्यता आहे की तो दोन गतींपैकी एका गतीला प्राप्त होईल—नरकात किंवा प्राण्यांच्या योनीत. भिक्खूंनो, हा दोष पाहूनच मी असे सांगतो." ‘‘วรํ[Pg.378], ภิกฺขเว, ติณฺเหน นขจฺเฉทเนน อาทิตฺเตน สมฺปชฺชลิเตน สโชติภูเตน ฆานินฺทฺริยํ สมฺปลิมฏฺฐํ, น ตฺเวว ฆานวิญฺเญยฺเยสุ คนฺเธสุ อนุพฺยญฺชนโส นิมิตฺตคฺคาโห. นิมิตฺตสฺสาทคถิตํ วา, ภิกฺขเว, วิญฺญาณํ ติฏฺฐมานํ ติฏฺเฐยฺย, อนุพฺยญฺชนสฺสาทคถิตํ วา ตสฺมิญฺเจ สมเย กาลํ กเรยฺย. ฐานเมตํ วิชฺชติ, ยํ ทฺวินฺนํ คตีนํ อญฺญตรํ คตึ คจฺเฉยฺย – นิรยํ วา ติรจฺฉานโยนึ วา. อิมํ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อาทีนวํ ทิสฺวา เอวํ วทามิ. "भिक्खूंनो, धारदार, लालभडक, पेटलेल्या आणि धगधगत्या नख-कातरणीने घ्राणेंद्रिय विद्ध करणे अधिक श्रेयस्कर आहे, परंतु घ्राण-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या गंधांच्या लक्षणांचे व अवयवांचे ग्रहण करणे श्रेयस्कर नाही. भिक्खूंनो, जर विज्ञान त्या लक्षणांच्या आस्वादात किंवा अवयवांच्या आस्वादात अडकून राहिले आणि त्या स्थितीत जर एखाद्याचा मृत्यू झाला, तर अशी शक्यता आहे की तो दोन गतींपैकी एका गतीला प्राप्त होईल—नरकात किंवा प्राण्यांच्या योनीत. भिक्खूंनो, हा दोष पाहूनच मी असे सांगतो." ‘‘วรํ, ภิกฺขเว, ติณฺเหน ขุเรน อาทิตฺเตน สมฺปชฺชลิเตน สโชติภูเตน ชิวฺหินฺทฺริยํ สมฺปลิมฏฺฐํ, น ตฺเวว ชิวฺหาวิญฺเญยฺเยสุ รเสสุ อนุพฺยญฺชนโส นิมิตฺตคฺคาโห. นิมิตฺตสฺสาทคถิตํ วา, ภิกฺขเว, วิญฺญาณํ ติฏฺฐมานํ ติฏฺเฐยฺย, อนุพฺยญฺชนสฺสาทคถิตํ วา ตสฺมิญฺเจ สมเย กาลํ กเรยฺย. ฐานเมตํ วิชฺชติ, ยํ ทฺวินฺนํ คตีนํ อญฺญตรํ คตึ คจฺเฉยฺย – นิรยํ วา ติรจฺฉานโยนึ วา. อิมํ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อาทีนวํ ทิสฺวา เอวํ วทามิ. "भिक्खूंनो, धारदार, लालभडक, पेटलेल्या आणि धगधगत्या वस्तऱ्याने जिव्हेंद्रिय कापून टाकणे अधिक श्रेयस्कर आहे, परंतु जिव्हा-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या रसांच्या लक्षणांचे व अवयवांचे ग्रहण करणे श्रेयस्कर नाही. भिक्खूंनो, जर विज्ञान त्या लक्षणांच्या आस्वादात किंवा अवयवांच्या आस्वादात अडकून राहिले आणि त्या स्थितीत जर एखाद्याचा मृत्यू झाला, तर अशी शक्यता आहे की तो दोन गतींपैकी एका गतीला प्राप्त होईल—नरकात किंवा प्राण्यांच्या योनीत. भिक्खूंनो, हा दोष पाहूनच मी असे सांगतो." ‘‘วรํ, ภิกฺขเว, ติณฺหาย สตฺติยา อาทิตฺตาย สมฺปชฺชลิตาย สโชติภูตาย กายินฺทฺริยํ สมฺปลิมฏฺฐํ, น ตฺเวว กายวิญฺเญยฺเยสุ โผฏฺฐพฺเพสุ อนุพฺยญฺชนโส นิมิตฺตคฺคาโห. นิมิตฺตสฺสาทคถิตํ วา, ภิกฺขเว, วิญฺญาณํ ติฏฺฐมานํ ติฏฺเฐยฺย, อนุพฺยญฺชนสฺสาทคถิตํ วา ตสฺมิญฺเจ สมเย กาลํ กเรยฺย. ฐานเมตํ วิชฺชติ, ยํ ทฺวินฺนํ คตีนํ อญฺญตรํ คตึ คจฺเฉยฺย – นิรยํ วา ติรจฺฉานโยนึ วา. อิมํ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อาทีนวํ ทิสฺวา เอวํ วทามิ. "भिक्खूंनो, धारदार, लालभडक, पेटलेल्या आणि धगधगत्या भाल्याने कायेंद्रिय विद्ध करणे अधिक श्रेयस्कर आहे, परंतु काय-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या स्पर्शांच्या लक्षणांचे व अवयवांचे ग्रहण करणे श्रेयस्कर नाही. भिक्खूंनो, जर विज्ञान त्या लक्षणांच्या आस्वादात किंवा अवयवांच्या आस्वादात अडकून राहिले आणि त्या स्थितीत जर एखाद्याचा मृत्यू झाला, तर अशी शक्यता आहे की तो दोन गतींपैकी एका गतीला प्राप्त होईल—नरकात किंवा प्राण्यांच्या योनीत. भिक्खूंनो, हा दोष पाहूनच मी असे सांगतो." ‘‘วรํ, ภิกฺขเว, โสตฺตํ. โสตฺตํ โข ปนาหํ, ภิกฺขเว, วญฺฌํ ชีวิตานํ วทามิ, อผลํ ชีวิตานํ วทามิ, โมมูหํ ชีวิตานํ วทามิ, น ตฺเวว ตถารูเป วิตกฺเก วิตกฺเกยฺย ยถารูปานํ วิตกฺกานํ วสํ คโต สงฺฆํ ภินฺเทยฺย. อิมํ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, วญฺฌํ ชีวิตานํ อาทีนวํ ทิสฺวา เอวํ วทามิ. भिक्खूहो, झोपणे अधिक चांगले आहे. परंतु भिक्खूहो, मी जिवंत लोकांसाठी झोपण्याला व्यर्थ (वांझ), निष्फळ आणि अत्यंत अज्ञानाचे (मोहग्रस्त) मानतो. परंतु माणसाने अशा विचारांचा विचार करू नये, ज्यांच्या आहारी जाऊन तो संघात फूट पाडेल. भिक्खूहो, जिवंत लोकांसाठी हा दोष पाहूनच मी असे म्हणतो। ‘‘ตตฺถ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘ติฏฺฐตุ ตาว ตตฺตาย อโยสลากาย อาทิตฺตาย สมฺปชฺชลิตาย สโชติภูตาย จกฺขุนฺทฺริยํ สมฺปลิมฏฺฐํ. หนฺทาหํ อิทเมว มนสิ กโรมิ – อิติ จกฺขุ อนิจฺจํ, รูปา อนิจฺจา, จกฺขุวิญฺญาณํ อนิจฺจํ, จกฺขุสมฺผสฺโส อนิจฺโจ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ’’’. तेथे, भिक्खूहो, श्रुतवान आर्यश्रावक असा विचार करतो – 'तप्त, प्रज्वलित, धगधगत्या आणि लालभडक लोखंडी सळईने चक्षुरिंद्रियाला (डोळ्याला) छिन्नभिन्न करणे बाजूलाच राहो. चला, मी याच गोष्टीचे मनन करतो – डोळा अनित्य आहे, रूपे अनित्य आहेत, चक्षु-विज्ञान अनित्य आहे, चक्षु-स्पर्श अनित्य आहे, आणि चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अ-दुःख-अ-सुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे।' ‘‘ติฏฺฐตุ [Pg.379] ตาว ติณฺเหน อโยสงฺกุนา อาทิตฺเตน สมฺปชฺชลิเตน สโชติภูเตน โสตินฺทฺริยํ สมฺปลิมฏฺฐํ. หนฺทาหํ อิทเมว มนสิ กโรมิ – อิติ โสตํ อนิจฺจํ, สทฺทา อนิจฺจา, โสตวิญฺญาณํ อนิจฺจํ, โสตสมฺผสฺโส อนิจฺโจ, ยมฺปิทํ โสตสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ. 'तीक्ष्ण, तप्त, प्रज्वलित, धगधगत्या आणि लालभडक लोखंडी सुळाने श्रोत्रेंद्रियाला (कानाला) छिन्नभिन्न करणे बाजूलाच राहो. चला, मी याच गोष्टीचे मनन करतो – कान अनित्य आहे, शब्द अनित्य आहेत, श्रोत्र-विज्ञान अनित्य आहे, श्रोत्र-स्पर्श अनित्य आहे, आणि श्रोत्र-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अ-दुःख-अ-सुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे।' ‘‘ติฏฺฐตุ ตาว ติณฺเหน นขจฺเฉทเนน อาทิตฺเตน สมฺปชฺชลิเตน สโชติภูเตน ฆานินฺทฺริยํ สมฺปลิมฏฺฐํ. หนฺทาหํ อิทเมว มนสิ กโรมิ – อิติ ฆานํ อนิจฺจํ, คนฺธา อนิจฺจา, ฆานวิญฺญาณํ อนิจฺจํ, ฆานสมฺผสฺโส อนิจฺโจ, ยมฺปิทํ ฆานสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ…เป… ตมฺปิ อนิจฺจํ. 'तीक्ष्ण, तप्त, प्रज्वलित, धगधगत्या आणि लालभडक नख कापण्याच्या हत्याराने घ्राणेंद्रियाला (नाकाला) छिन्नभिन्न करणे बाजूलाच राहो. चला, मी याच गोष्टीचे मनन करतो – नाक अनित्य आहे, गंध अनित्य आहेत, घ्राण-विज्ञान अनित्य आहे, घ्राण-स्पर्श अनित्य आहे, आणि घ्राण-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही वेदन उत्पन्न होते... ते देखील अनित्य आहे।' ‘‘ติฏฺฐตุ ตาว ติณฺเหน ขุเรน อาทิตฺเตน สมฺปชฺชลิเตน สโชติภูเตน ชิวฺหินฺทฺริยํ สมฺปลิมฏฺฐํ. หนฺทาหํ อิทเมว มนสิ กโรมิ – อิติ ชิวฺหา อนิจฺจา, รสา อนิจฺจา, ชิวฺหาวิญฺญาณํ อนิจฺจํ, ชิวฺหาสมฺผสฺโส อนิจฺโจ, ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ…เป… ตมฺปิ อนิจฺจํ. 'तीक्ष्ण, तप्त, प्रज्वलित, धगधगत्या आणि लालभडक वस्तऱ्याने जिव्हाइंद्रियाला (जिभेला) छिन्नभिन्न करणे बाजूलाच राहो. चला, मी याच गोष्टीचे मनन करतो – जीभ अनित्य आहे, रस अनित्य आहेत, जिव्हा-विज्ञान अनित्य आहे, जिव्हा-स्पर्श अनित्य आहे, आणि जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही उत्पन्न होते... ते देखील अनित्य आहे।' ‘‘ติฏฺฐตุ ตาว ติณฺหาย สตฺติยา อาทิตฺตาย สมฺปชฺชลิตาย สโชติภูตาย กายินฺทฺริยํ สมฺปลิมฏฺฐํ. หนฺทาหํ อิทเมว มนสิ กโรมิ – อิติ กาโย อนิจฺโจ, โผฏฺฐพฺพา อนิจฺจา, กายวิญฺญาณํ อนิจฺจํ, กายสมฺผสฺโส อนิจฺโจ, ยมฺปิทํ กายสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ…เป… ตมฺปิ อนิจฺจํ. 'तीक्ष्ण, तप्त, प्रज्वलित, धगधगत्या आणि लालभडक भाल्याने कायेंद्रियाला (शरीराला) छिन्नभिन्न करणे बाजूलाच राहो. चला, मी याच गोष्टीचे मनन करतो – शरीर अनित्य आहे, स्पर्श अनित्य आहेत, काय-विज्ञान अनित्य आहे, काय-स्पर्श अनित्य आहे, आणि काय-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही वेदन उत्पन्न होते... ते देखील अनित्य आहे।' ‘‘ติฏฺฐตุ ตาว โสตฺตํ. หนฺทาหํ อิทเมว มนสิ กโรมิ – อิติ มโน อนิจฺโจ, ธมฺมา อนิจฺจา, มโนวิญฺญาณํ อนิจฺจํ, มโนสมฺผสฺโส อนิจฺโจ, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ’’. 'झोपणे बाजूलाच राहो. चला, मी याच गोष्टीचे मनन करतो – मन अनित्य आहे, धम्म अनित्य आहेत, मनो-विज्ञान अनित्य आहे, मनो-स्पर्श अनित्य आहे, आणि मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अ-दुःख-अ-सुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे।' ‘‘เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาติ. อยํ โข, ภิกฺขเว, อาทิตฺตปริยาโย, ธมฺมปริยาโย’’ติ. อฏฺฐมํ. भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक डोळ्याविषयी विरक्त होतो, रूपांविषयी विरक्त होतो, चक्षु-विज्ञानाविषयी विरक्त होतो, चक्षु-स्पर्शाविषयी विरक्त होतो... आणि मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अ-दुःख-अ-सुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयी देखील विरक्त होतो. विरक्त झाल्याने तो रागरहित होतो; रागरहित झाल्याने तो विमुक्त होतो. विमुक्त झाल्यावर 'मी विमुक्त झालो आहे' असे ज्ञान होते. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर दुसरे काही करायचे उरलेले नाही,' असे तो जाणतो. भिक्खूहो, हाच 'आदित्तपर्याय' (प्रज्वलित उपदेश) नावाचा धम्मपर्याय आहे. आठवे सूत्र समाप्त. ๙. ปฐมหตฺถปาโทปมสุตฺตํ ९. प्रथम हस्तपाद उपमा सूत्र ๒๓๖. ‘‘หตฺเถสุ[Pg.380], ภิกฺขเว, สติ อาทานนิกฺเขปนํ ปญฺญายติ; ปาเทสุ สติ อภิกฺกมปฏิกฺกโม ปญฺญายติ; ปพฺเพสุ สติ สมิญฺชนปสารณํ ปญฺญายติ; กุจฺฉิสฺมึ สติ ชิฆจฺฉา ปิปาสา ปญฺญายติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, จกฺขุสฺมึ สติ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺขํ…เป… ชิวฺหาย สติ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺขํ…เป… มนสฺมึ สติ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺขํ…เป…. २३६. भिक्खूहो, हात असताना वस्तू घेणे व ठेवणे दिसून येते; पाय असताना पुढे जाणे व मागे येणे दिसून येते; सांधे असताना आकुंचन व प्रसरण दिसून येते; पोट असताना भूक व तहान दिसून येते. त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, डोळा असताना चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने अध्यात्मिक सुख आणि दुःख उत्पन्न होते... जीभ असताना जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने अध्यात्मिक सुख आणि दुःख उत्पन्न होते... मन असताना मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने अध्यात्मिक सुख आणि दुःख उत्पन्न होते... ‘‘หตฺเถสุ, ภิกฺขเว, อสติ อาทานนิกฺเขปนํ น ปญฺญายติ; ปาเทสุ อสติ อภิกฺกมปฏิกฺกโม น ปญฺญายติ; ปพฺเพสุ อสติ สมิญฺชนปสารณํ น ปญฺญายติ; กุจฺฉิสฺมึ อสติ ชิฆจฺฉา ปิปาสา น ปญฺญายติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, จกฺขุสฺมึ อสติ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา นุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺขํ…เป… ชิวฺหาย อสติ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา นุปฺปชฺชติ…เป… มนสฺมึ อสติ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา นุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺข’’นฺติ. นวมํ. भिक्खूहो, हात नसताना वस्तू घेणे व ठेवणे दिसून येत नाही; पाय नसताना पुढे जाणे व मागे येणे दिसून येत नाही; सांधे नसताना आकुंचन व प्रसरण दिसून येत नाही; पोट नसताना भूक व तहान दिसून येत नाही. त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, डोळा नसताना चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने अध्यात्मिक सुख आणि दुःख उत्पन्न होत नाही... जीभ नसताना जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होत नाही... मन नसताना मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने अध्यात्मिक सुख आणि दुःख उत्पन्न होत नाही. नववे सूत्र समाप्त. ๑๐. ทุติยหตฺถปาโทปมสุตฺตํ १०. द्वितीय हस्तपाद उपमा सूत्र ๒๓๗. ‘‘หตฺเถสุ, ภิกฺขเว, สติ อาทานนิกฺเขปนํ โหติ; ปาเทสุ สติ อภิกฺกมปฏิกฺกโม โหติ; ปพฺเพสุ สติ สมิญฺชนปสารณํ โหติ; กุจฺฉิสฺมึ สติ ชิฆจฺฉา ปิปาสา โหติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, จกฺขุสฺมึ สติ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺขํ…เป… ชิวฺหาย สติ…เป… มนสฺมึ สติ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺขํ…เป…. २३७. भिक्खूहो, हात असताना वस्तू घेणे व ठेवणे होते; पाय असताना पुढे जाणे व मागे येणे होते; सांधे असताना आकुंचन व प्रसरण होते; पोट असताना भूक व तहान होते. त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, डोळा असताना चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने अध्यात्मिक सुख आणि दुःख उत्पन्न होते... जीभ असताना... मन असताना मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने अध्यात्मिक सुख आणि दुःख उत्पन्न होते... ‘‘หตฺเถสุ, ภิกฺขเว, อสติ อาทานนิกฺเขปนํ น โหติ; ปาเทสุ อสติ อภิกฺกมปฏิกฺกโม น โหติ; ปพฺเพสุ อสติ สมิญฺชนปสารณํ น โหติ; กุจฺฉิสฺมึ อสติ ชิฆจฺฉา ปิปาสา น โหติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, จกฺขุสฺมึ อสติ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา นุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺขํ…เป… ชิวฺหาย อสติ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา นุปฺปชฺชติ…เป… มนสฺมึ อสติ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา นุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺข’’นฺติ. ทสมํ. भिक्खूहो, हात नसताना वस्तू घेणे व ठेवणे होत नाही; पाय नसताना पुढे जाणे व मागे येणे होत नाही; सांधे नसताना आकुंचन व प्रसरण होत नाही; पोट नसताना भूक व तहान होत नाही. त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, डोळा नसताना चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने अध्यात्मिक सुख आणि दुःख उत्पन्न होत नाही... जीभ नसताना जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होत नाही... मन नसताना मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने अध्यात्मिक सुख आणि दुःख उत्पन्न होत नाही. दहावे सूत्र समाप्त. สมุทฺทวคฺโค อฏฺฐรสโม. समुद्रवर्ग अठरावा समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याची अनुक्रमणिका (उदान) – ทฺเว [Pg.381] สมุทฺทา พาฬิสิโก, ขีรรุกฺเขน โกฏฺฐิโก; กามภู อุทายี เจว, อาทิตฺเตน จ อฏฺฐมํ; หตฺถปาทูปมา ทฺเวติ, วคฺโค เตน ปวุจฺจตีติ. दोन समुद्र सूत्रे, बाळिसिक सूत्र, खीररुक्ख सूत्र, कोठ्ठिक सूत्र, कामभू सूत्र, उदायी सूत्र, आठवे आदित्त सूत्र आणि दोन हस्तपाद उपमा सूत्रे; या सूत्रांमुळे याला वर्ग म्हटले जाते. ๑๙. อาสีวิสวคฺโค १९. आसीविसवर्ग (सर्पवर्ग) ๑. อาสีวิโสปมสุตฺตํ १. आसीविसोपमसूत्र (सर्प उपमा सूत्र) ๒๓๘. ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, จตฺตาโร อาสีวิสา อุคฺคเตชา โฆรวิสา. อถ ปุริโส อาคจฺเฉยฺย ชีวิตุกาโม อมริตุกาโม สุขกาโม ทุกฺขปฺปฏิกูโล. ตเมนํ เอวํ วเทยฺยุํ – ‘อิเม เต, อมฺโภ ปุริส, จตฺตาโร อาสีวิสา อุคฺคเตชา โฆรวิสา กาเลน กาลํ วุฏฺฐาเปตพฺพา, กาเลน กาลํ นฺหาเปตพฺพา, กาเลน กาลํ โภเชตพฺพา, กาเลน กาลํ สํเวเสตพฺพา. ยทา จ โข เต, อมฺโภ ปุริส, อิเมสํ จตุนฺนํ อาสีวิสานํ อุคฺคเตชานํ โฆรวิสานํ อญฺญตโร วา อญฺญตโร วา กุปฺปิสฺสติ, ตโต ตฺวํ, อมฺโภ ปุริส, มรณํ วา นิคจฺฉสิ, มรณมตฺตํ วา ทุกฺขํ. ยํ เต, อมฺโภ ปุริส, กรณียํ ตํ กโรหี’’’ติ. २३८. भिक्षूंनो, समजा अत्यंत जहाल आणि भयंकर विषारी असे चार सर्प आहेत. तेव्हा एखादा माणूस, ज्याला जगण्याची इच्छा आहे, मरण्याची इच्छा नाही, जो सुखाचा आकांक्षी आहे आणि दुःखाचा तिरस्कार करतो, तिथे येईल. लोक त्याला असे म्हणतील— 'हे माणसा, हे अत्यंत जहाल आणि भयंकर विषारी असे चार सर्प आहेत. तुला वेळोवेळी त्यांना उठवावे लागेल, वेळोवेळी त्यांना आंघोळ घालावी लागेल, वेळोवेळी त्यांना खायला द्यावे लागेल आणि वेळोवेळी त्यांना झोपवावे लागेल. आणि हे माणसा, जेव्हा या अत्यंत जहाल आणि भयंकर विषारी चार सर्पांपैकी कोणताही एक सर्प तुझ्यावर क्रुद्ध होईल, तेव्हा हे माणसा, तू मृत्यूला प्राप्त होशील किंवा मृत्यूतुल्य दुःखाला प्राप्त होशील. म्हणून हे माणसा, तुला जे काही करायचे आहे, ते तू कर!' ‘‘อถ โข โส, ภิกฺขเว, ปุริโส ภีโต จตุนฺนํ อาสีวิสานํ อุคฺคเตชานํ โฆรวิสานํ เยน วา เตน วา ปลาเยถ. ตเมนํ เอวํ วเทยฺยุํ – ‘อิเม โข, อมฺโภ ปุริส, ปญฺจ วธกา ปจฺจตฺถิกา ปิฏฺฐิโต ปิฏฺฐิโต อนุพนฺธา, ยตฺเถว นํ ปสฺสิสฺสาม ตตฺเถว ชีวิตา โวโรเปสฺสามาติ. ยํ เต, อมฺโภ ปุริส, กรณียํ ตํ กโรหี’’’ติ. भिक्षूंनो, त्यानंतर तो माणूस त्या अत्यंत जहाल आणि भयंकर विषारी चार सर्पांच्या भयाने सैरावैरा पळू लागेल. लोक त्याला असे म्हणतील— 'हे माणसा, हे पाच मारेकरी शत्रू तुझ्या पाठीवर लागलेले आहेत, जे असा विचार करत आहेत की, "आम्ही याला जिथे कुठे पाहू, तिथेच याचा जीव घेऊ." हे माणसा, तुला जे काही करायचे आहे, ते तू कर!' ‘‘อถ โข โส, ภิกฺขเว, ปุริโส ภีโต จตุนฺนํ อาสีวิสานํ อุคฺคเตชานํ โฆรวิสานํ, ภีโต ปญฺจนฺนํ วธกานํ ปจฺจตฺถิกานํ เยน วา เตน วา ปลาเยถ. ตเมนํ เอวํ วเทยฺยุํ – ‘อยํ เต, อมฺโภ ปุริส, ฉฏฺโฐ อนฺตรจโร วธโก อุกฺขิตฺตาสิโก ปิฏฺฐิโต ปิฏฺฐิโต อนุพนฺโธ ยตฺเถว นํ ปสฺสิสฺสามิ ตตฺเถว สิโร ปาเตสฺสามีติ. ยํ เต, อมฺโภ ปุริส, กรณียํ ตํ กโรหี’’’ติ. भिक्षूंनो, त्यानंतर तो माणूस त्या अत्यंत जहाल आणि भयंकर विषारी चार सर्पांच्या भयाने आणि त्या पाच मारेकरी शत्रूंच्या भयाने सैरावैरा पळू लागेल. लोक त्याला असे म्हणतील— 'हे माणसा, हा तुझा सहावा मारेकरी, जो तुझा अंतर्गत गुप्तचर आहे, उपसलेली तलवार घेऊन तुझ्या पाठीवर लागला आहे, आणि विचार करत आहे की, "मी याला जिथे कुठे पाहीन, तिथेच याचे डोके उडवीन." हे माणसा, तुला जे काही करायचे आहे, ते तू कर!' ‘‘อถ [Pg.382] โข โส, ภิกฺขเว, ปุริโส ภีโต จตุนฺนํ อาสีวิสานํ อุคฺคเตชานํ โฆรวิสานํ, ภีโต ปญฺจนฺนํ วธกานํ ปจฺจตฺถิกานํ, ภีโต ฉฏฺฐสฺส อนฺตรจรสฺส วธกสฺส อุกฺขิตฺตาสิกสฺส เยน วา เตน วา ปลาเยถ. โส ปสฺเสยฺย สุญฺญํ คามํ. ยญฺญเทว ฆรํ ปวิเสยฺย ริตฺตกญฺเญว ปวิเสยฺย ตุจฺฉกญฺเญว ปวิเสยฺย สุญฺญกญฺเญว ปวิเสยฺย. ยญฺญเทว ภาชนํ ปริมเสยฺย ริตฺตกญฺเญว ปริมเสยฺย ตุจฺฉกญฺเญว ปริมเสยฺย สุญฺญกญฺเญว ปริมเสยฺย. ตเมนํ เอวํ วเทยฺยุํ – ‘อิทานิ, อมฺโภ ปุริส, อิมํ สุญฺญํ คามํ โจรา คามฆาตกา ปวิสนฺติ. ยํ เต, อมฺโภ ปุริส, กรณียํ ตํ กโรหี’’’ติ. भिक्षूंनो, त्यानंतर तो माणूस त्या अत्यंत जहाल आणि भयंकर विषारी चार सर्पांच्या भयाने, त्या पाच मारेकरी शत्रूंच्या भयाने आणि उपसलेली तलवार घेतलेल्या त्या सहाव्या अंतर्गत मारेकऱ्याच्या भयाने सैरावैरा पळू लागेल. त्याला एक ओसाड गाव दिसेल. तो ज्या ज्या घरात प्रवेश करेल, ते घर त्याला रिकामेच, तुच्छ आणि ओसाडच आढळेल. तो ज्या ज्या पात्राला स्पर्श करेल, ते पात्र त्याला रिकामेच, पोकळ आणि ओसाडच आढळेल. लोक त्याला असे म्हणतील— 'हे माणसा, आता या ओसाड गावात गावे लुटणारे दरोडेखोर प्रवेश करत आहेत. हे माणसा, तुला जे काही करायचे आहे, ते तू कर!' ‘‘อถ โข โส, ภิกฺขเว, ปุริโส ภีโต จตุนฺนํ อาสีวิสานํ อุคฺคเตชานํ โฆรวิสานํ, ภีโต ปญฺจนฺนํ วธกานํ ปจฺจตฺถิกานํ, ภีโต ฉฏฺฐสฺส อนฺตรจรสฺส วธกสฺส อุกฺขิตฺตาสิกสฺส, ภีโต โจรานํ คามฆาตกานํ เยน วา เตน วา ปลาเยถ. โส ปสฺเสยฺย มหนฺตํ อุทกณฺณวํ โอริมํ ตีรํ สาสงฺกํ สปฺปฏิภยํ, ปาริมํ ตีรํ เขมํ อปฺปฏิภยํ. น จสฺส นาวา สนฺตารณี อุตฺตรเสตุ วา อปารา ปารํ คมนาย. อถ โข, ภิกฺขเว, ตสฺส ปุริสสฺส เอวมสฺส – ‘อยํ โข มหาอุทกณฺณโว โอริมํ ตีรํ สาสงฺกํ สปฺปฏิภยํ, ปาริมํ ตีรํ เขมํ อปฺปฏิภยํ, นตฺถิ จ นาวา สนฺตารณี อุตฺตรเสตุ วา อปารา ปารํ คมนาย. ยํนูนาหํ ติณกฏฺฐสาขาปลาสํ สํกฑฺฒิตฺวา กุลฺลํ พนฺธิตฺวา ตํ กุลฺลํ นิสฺสาย หตฺเถหิ จ ปาเทหิ จ วายมมาโน โสตฺถินา ปารํ คจฺเฉยฺย’’’นฺติ. भिक्षूंनो, त्यानंतर तो माणूस त्या अत्यंत जहाल आणि भयंकर विषारी चार सर्पांच्या भयाने, त्या पाच मारेकरी शत्रूंच्या भयाने, उपसलेली तलवार घेतलेल्या त्या सहाव्या अंतर्गत मारेकऱ्याच्या भयाने आणि गावे लुटणाऱ्या दरोडेखोरांच्या भयाने सैरावैरा पळू लागेल. त्याला पाण्याचा एक विशाल जलाशय दिसेल, ज्याचा अलीकडचा काठ अत्यंत शंकास्पद आणि भययुक्त असेल, तर पलीकडचा काठ सुरक्षित आणि भयरहित असेल. परंतु पलीकडच्या काठावर जाण्यासाठी कोणतीही बोट किंवा पूल नसेल. भिक्षूंनो, तेव्हा त्या माणसाच्या मनात असा विचार येईल— 'हा पाण्याचा विशाल जलाशय आहे, ज्याचा अलीकडचा काठ भययुक्त व शंकास्पद आहे आणि पलीकडचा काठ सुरक्षित व भयरहित आहे; परंतु पलीकडे जाण्यासाठी कोणतीही बोट किंवा पूल नाही. मग मी गवत, लाकडे, फांद्या आणि पाने गोळा करून एक तराफा का बांधू नये? आणि त्या तराफ्याचा आश्रय घेऊन, आपल्या हातापायांनी प्रयत्न करत सुरक्षितपणे पलीकडच्या काठावर का जाऊ नये?' ‘‘อถ โข โส, ภิกฺขเว, ปุริโส ติณกฏฺฐสาขาปลาสํ สํกฑฺฒิตฺวา กุลฺลํ พนฺธิตฺวา ตํ กุลฺลํ นิสฺสาย หตฺเถหิ จ ปาเทหิ จ วายมมาโน โสตฺถินา ปารํ คจฺเฉยฺย, ติณฺโณ ปารงฺคโต ถเล ติฏฺฐติ พฺราหฺมโณ. भिक्षूंनो, त्यानंतर तो माणूस गवत, लाकडे, फांद्या आणि पाने गोळा करून, एक तराफा बांधून आणि त्या तराफ्याचा आश्रय घेऊन, आपल्या हातापायांनी प्रयत्न करत सुरक्षितपणे पलीकडच्या काठावर जाईल. तो पार गेलेला, पलीकडच्या तीरावर पोहोचलेला तो ब्राह्मण कोरड्या जमिनीवर उभा राहील. ‘‘อุปมา โข มฺยายํ, ภิกฺขเว, กตา อตฺถสฺส วิญฺญาปนาย. อยญฺเจตฺถ อตฺโถ – จตฺตาโร อาสีวิสา อุคฺคเตชา โฆรวิสาติ โข, ภิกฺขเว, จตุนฺเนตํ มหาภูตานํ อธิวจนํ – ปถวีธาตุยา, อาโปธาตุยา, เตโชธาตุยา, วาโยธาตุยา. भिक्षूंनो, अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी मी ही उपमा दिली आहे. आणि याचा अर्थ असा आहे— 'अत्यंत जहाल आणि भयंकर विषारी चार सर्प' हे, भिक्षूंनो, चार महाभूतांचे नाव आहे— पृथ्वीधातू, आपधातू, तेजोधातू आणि वायोधातू. ‘‘ปญฺจ [Pg.383] วธกา ปจฺจตฺถิกาติ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจนฺเนตํ อุปาทานกฺขนฺธานํ อธิวจนํ, เสยฺยถิทํ – รูปุปาทานกฺขนฺธสฺส, เวทนุปาทานกฺขนฺธสฺส, สญฺญุปาทานกฺขนฺธสฺส, สงฺขารุปาทานกฺขนฺธสฺส, วิญฺญาณุปาทานกฺขนฺธสฺส. भिक्षूंनो, 'पाच मारेकरी शत्रू' हे पाच उपादानस्कंधांचे नाव आहे, ते म्हणजे— रूप-उपादानस्कंध, वेदना-उपादानस्कंध, संज्ञा-उपादानस्कंध, संस्कार-उपादानस्कंध आणि विज्ञान-उपादानस्कंध. ‘‘ฉฏฺโฐ อนฺตรจโร วธโก อุกฺขิตฺตาสิโกติ โข, ภิกฺขเว, นนฺทีราคสฺเสตํ อธิวจนํ. भिक्षूंनो, 'उपसलेली तलवार घेतलेला सहावा अंतर्गत मारेकरी' हे नंदीराग (आसक्ती आणि तृष्णा) याचे नाव आहे. ‘‘สุญฺโญ คาโมติ โข, ภิกฺขเว, ฉนฺเนตํ อชฺฌตฺติกานํ อายตนานํ อธิวจนํ. จกฺขุโต เจปิ นํ, ภิกฺขเว, ปณฺฑิโต พฺยตฺโต เมธาวี อุปปริกฺขติ ริตฺตกญฺเญว ขายติ, ตุจฺฉกญฺเญว ขายติ, สุญฺญกญฺเญว ขายติ…เป… ชิวฺหาโต เจปิ นํ, ภิกฺขเว…เป… มนโต เจปิ นํ, ภิกฺขเว, ปณฺฑิโต พฺยตฺโต เมธาวี อุปปริกฺขติ ริตฺตกญฺเญว ขายติ, ตุจฺฉกญฺเญว ขายติ, สุญฺญกญฺเญว ขายติ. भिक्षूंनो, 'ओसाड गाव' हे सहा अंतर्गत आयतनांचे नाव आहे. भिक्षूंनो, जर एखादा बुद्धिमान, चतुर आणि प्रज्ञावान भिक्षू डोळ्याच्या दृष्टीने त्याचे परीक्षण करेल, तर ते त्याला रिकामेच वाटेल, तुच्छच वाटेल, ओसाडच वाटेल... तसेच जिभेच्या दृष्टीने... भिक्षूंनो, जर एखादा बुद्धिमान, चतुर आणि प्रज्ञावान भिक्षू मनाच्या दृष्टीने त्याचे परीक्षण करेल, तर ते त्याला रिकामेच वाटेल, तुच्छच वाटेल, ओसाडच वाटेल. ‘‘โจรา คามฆาตกาติ โข, ภิกฺขเว, ฉนฺเนตํ พาหิรานํ อายตนานํ อธิวจนํ. จกฺขุ, ภิกฺขเว, หญฺญติ มนาปามนาเปสุ รูเปสุ; โสตํ, ภิกฺขเว…เป… ฆานํ, ภิกฺขเว…เป… ชิวฺหา, ภิกฺขเว, หญฺญติ มนาปามนาเปสุ รเสสุ; กาโย, ภิกฺขเว…เป… มโน, ภิกฺขเว, หญฺญติ มนาปามนาเปสุ ธมฺเมสุ. भिक्षूंनो, 'गावे लुटणारे दरोडेखोर' हे सहा बाह्य आयतनांचे नाव आहे. भिक्षूंनो, डोळा हा प्रिय आणि अप्रिय रूपांमुळे आहत होतो; कान... नाक... भिक्षूंनो, जीभ ही प्रिय आणि अप्रिय रसांमुळे आहत होते; शरीर... भिक्षूंनो, मन हे प्रिय आणि अप्रिय धर्मांमुळे आहत होते. ‘‘มหา อุทกณฺณโวติ โข, ภิกฺขเว, จตุนฺเนตํ โอฆานํ อธิวจนํ – กาโมฆสฺส, ภโวฆสฺส, ทิฏฺโฐฆสฺส, อวิชฺโชฆสฺส. भिक्षूंनो, 'पाण्याचा विशाल जलाशय' हे चार ओघांचे नाव आहे— कामौघ, भवौघ, दिठ्ठौघ आणि अविज्जौघ. ‘‘โอริมํ ตีรํ สาสงฺกํ สปฺปฏิภยนฺติ โข, ภิกฺขเว, สกฺกายสฺเสตํ อธิวจนํ. भिक्षूंनो, 'भययुक्त आणि शंकास्पद अलीकडचा काठ' हे सक्काय याचे नाव आहे. ‘‘ปาริมํ ตีรํ เขมํ อปฺปฏิภยนฺติ โข, ภิกฺขเว, นิพฺพานสฺเสตํ อธิวจนํ. भिक्षूंनो, 'सुरक्षित आणि भयरहित पलीकडचा काठ' हे निब्बान याचे नाव आहे. ‘‘กุลฺลนฺติ โข, ภิกฺขเว, อริยสฺเสตํ อฏฺฐงฺคิกสฺส มคฺคสฺส อธิวจนํ, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ…เป… สมฺมาสมาธิ. भिक्षूंनो, 'तराफा' हे आर्य अष्टांगिक मार्गाचे नाव आहे, जसे की— सम्यक दृष्टी... सम्यक समाधी. ‘‘ตสฺส หตฺเถหิ จ ปาเทหิ จ วายาโมติ โข, ภิกฺขเว, วีริยารมฺภสฺเสตํ อธิวจนํ. भिक्षूंनो, 'त्या तराफ्यासाठी हातापायांनी केलेला प्रयत्न' हे वीर्यारंभ याचे नाव आहे. ‘‘ติณฺโณ ปารงฺคโต ถเล ติฏฺฐติ พฺราหฺมโณติ โข, ภิกฺขเว, อรหโต เอตํ อธิวจน’’นฺติ. ปฐมํ. "हे भिक्खूंनो, 'जो पार झाला आहे, पलीकडच्या तीरावर पोहोचला आहे आणि कोरड्या जमिनीवर उभा आहे असा ब्राह्मण' हे अर्हताचेच एक नाव आहे." पहिले. ๒. รโถปมสุตฺตํ २. रथोपम सुत्त ๒๓๙. ‘‘ตีหิ[Pg.384], ภิกฺขเว, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต ภิกฺขุ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สุขโสมนสฺสพหุโล วิหรติ, โยนิ จสฺส อารทฺธา โหติ อาสวานํ ขยาย. กตเมหิ ตีหิ? อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวาโร โหติ, โภชเน มตฺตญฺญู, ชาคริยํ อนุยุตฺโต. २३९. "हे भिक्खूंनो, तीन धम्मांनी युक्त असलेला भिक्खू याच जन्मात अत्यंत सुख आणि सोमनस्याने विहरतो आणि आसवांच्या क्षयासाठी त्याचा योग्य प्रयत्न आरंभलेला असतो. कोणत्या तीन धम्मांनी? इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवणारा असतो, भोजनात प्रमाण जाणणारा असतो आणि जागृततेत तत्पर असतो. ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวาโร โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา น นิมิตฺตคฺคาหี โหติ, นานุพฺยญฺชนคฺคาหี; ยตฺวาธิกรณเมนํ จกฺขุนฺทฺริยํ อสํวุตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อนฺวาสฺสเวยฺยุํ. ตสฺส สํวราย ปฏิปชฺชติ; รกฺขติ จกฺขุนฺทฺริยํ; จกฺขุนฺทฺริเย สํวรํ อาปชฺชติ. โสเตน สทฺทํ สุตฺวา… ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตฺวา… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา… กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสิตฺวา… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย น นิมิตฺตคฺคาหี โหติ นานุพฺยญฺชนคฺคาหี; ยตฺวาธิกรณเมนํ มนินฺทฺริยํ อสํวุตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อนฺวาสฺสเวยฺยุํ, ตสฺส สํวราย ปฏิปชฺชติ; รกฺขติ มนินฺทฺริยํ; มนินฺทฺริเย สํวรํ อาปชฺชติ. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, สุภูมิยํ จาตุมหาปเถ อาชญฺญรโถ ยุตฺโต อสฺส ฐิโต โอธสฺตปโตโท. ตเมนํ ทกฺโข โยคฺคาจริโย อสฺสทมฺมสารถิ อภิรุหิตฺวา วาเมน หตฺเถน รสฺมิโย คเหตฺวา, ทกฺขิเณน หตฺเถน ปโตทํ คเหตฺวา, เยนิจฺฉกํ ยทิจฺฉกํ สาเรยฺยปิ ปจฺจาสาเรยฺยปิ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อิเมสํ ฉนฺนํ อินฺทฺริยานํ อารกฺขาย สิกฺขติ, สํยมาย สิกฺขติ, ทมาย สิกฺขติ, อุปสมาย สิกฺขติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวาโร โหติ. "आणि हे भिक्खूंनो, भिक्खू इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवणारा कसा होतो? येथे, हे भिक्खूंनो, भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहून त्याच्या बाह्य रूपाचे ग्रहण करत नाही, किंवा त्याच्या तपशीलांचे ग्रहण करत नाही. कारण, जर त्याने चक्षुरिंद्रिय असंयत ठेवले, तर अभिज्झा आणि दोमनस्स हे पापी अकुशल धम्म त्याच्यावर आक्रमण करतील. म्हणून तो त्याच्या संवरासाठी प्रयत्न करतो; चक्षुरिंद्रियाचे रक्षण करतो; चक्षुरिंद्रियाचा संवर करतो. कानाने शब्द ऐकून... नाकाने गंध घेऊन... जिभेने रस चाखून... शरीराने स्पर्श अनुभवून... मनाने धम्म जाणून तो त्याच्या बाह्य रूपाचे ग्रहण करत नाही, किंवा त्याच्या तपशीलांचे ग्रहण करत नाही. कारण, जर त्याने मनेंद्रिय असंयत ठेवले, तर अभिज्झा आणि दोमनस्स हे पापी अकुशल धम्म त्याच्यावर आक्रमण करतील. म्हणून तो त्याच्या संवरासाठी प्रयत्न करतो; मनेंद्रियाचे रक्षण करतो; मनेंद्रियाचा संवर करतो. जसे की, हे भिक्खूंनो, एखाद्या सपाट जमिनीवर, चौकात, उत्तम जातीच्या घोड्यांचा रथ जोडलेला उभा असेल आणि चाबूक तयार असेल. मग एखादा कुशल सारथी, घोड्यांना वश करणारा प्रशिक्षक, त्यावर आरूढ होऊन डाव्या हाताने लगाम पकडेल आणि उजव्या हाताने चाबूक धरून, त्याला पाहिजे तिथे, पाहिजे त्या मार्गाने तो रथ पुढे नेईल किंवा मागे आणेल. त्याचप्रमाणे, हे भिक्खूंनो, भिक्खू या सहा इंद्रियांच्या रक्षणासाठी शिकतो, संयमासाठी शिकतो, दमनासाठी शिकतो, उपशमासाठी शिकतो. अशा प्रकारे, हे भिक्खूंनो, भिक्खू इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवणारा होतो." ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ โภชเน มตฺตญฺญู โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ปฏิสงฺขา โยนิโส อาหารํ อาหาเรติ – ‘เนว ทวาย, น มทาย, น มณฺฑนาย, น วิภูสนาย, ยาวเทว อิมสฺส กายสฺส ฐิติยา, ยาปนาย, วิหึสูปรติยา, พฺรหฺมจริยานุคฺคหาย, อิติ ปุราณญฺจ เวทนํ ปฏิหงฺขามิ, นวญฺจ เวทนํ น อุปฺปาเทสฺสามิ, ยาตฺรา จ เม ภวิสฺสติ, อนวชฺชตา จ ผาสุวิหาโร จา’ติ. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ปุริโส วณํ อาลิมฺเปยฺย [Pg.385] ยาวเทว โรหนตฺถาย, เสยฺยถา วา ปน อกฺขํ อพฺภญฺเชยฺย ยาวเทว ภารสฺส นิตฺถรณตฺถาย; เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ปฏิสงฺขา โยนิโส อาหารํ อาหาเรติ – ‘เนว ทวาย, น มทาย, น มณฺฑนาย, น วิภูสนาย, ยาวเทว อิมสฺส กายสฺส ฐิติยา, ยาปนาย, วิหึสูปรติยา, พฺรหฺมจริยานุคฺคหาย, อิติ ปุราณญฺจ เวทนํ ปฏิหงฺขามิ, นวญฺจ เวทนํ น อุปฺปาเทสฺสามิ, ยาตฺรา จ เม ภวิสฺสติ, อนวชฺชตา จ ผาสุวิหาโร จา’ติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ โภชเน มตฺตญฺญู โหติ. "आणि हे भिक्खूंनो, भिक्खू भोजनात प्रमाण जाणणारा कसा होतो? येथे, हे भिक्खूंनो, भिक्खू शहाणपणाने विचार करून भोजन ग्रहण करतो – 'मजेसाठी नाही, मदासाठी नाही, शरीराच्या सुशोभीकरणासाठी नाही, सौंदर्यासाठी नाही; तर केवळ या शरीराच्या स्थितीसाठी, त्याच्या रक्षणासाठी, भुकेची पीडा शांत करण्यासाठी आणि ब्रह्मचर्याला साहाय्य करण्यासाठी. अशा प्रकारे मी जुन्या वेदनेचा नाश करीन आणि नवीन वेदना उत्पन्न होऊ देणार नाही. माझी जीवनयात्रा सुरळीत चालेल, मी निर्दोष राहीन आणि सुखाने विहरेन.' जसे की, हे भिक्खूंनो, एखादा माणूस जखमेवर केवळ ती बरी व्हावी म्हणून मलम लावतो, किंवा जसे गाडीच्या कण्याला केवळ भार वाहून नेण्यासाठी तेल लावतो; त्याचप्रमाणे, हे भिक्खूंनो, भिक्खू शहाणपणाने विचार करून भोजन ग्रहण करतो – 'मजेसाठी नाही, मदासाठी नाही, शरीराच्या सुशोभीकरणासाठी नाही, सौंदर्यासाठी नाही; तर केवळ या शरीराच्या स्थितीसाठी, त्याच्या रक्षणासाठी, भुकेची पीडा शांत करण्यासाठी आणि ब्रह्मचर्याला साहाय्य करण्यासाठी. अशा प्रकारे मी जुन्या वेदनेचा नाश करीन आणि नवीन वेदना उत्पन्न होऊ देणार नाही. माझी जीवनयात्रा सुरळीत चालेल, मी निर्दोष राहीन आणि सुखाने विहरेन.' अशा प्रकारे, हे भिक्खूंनो, भिक्खू भोजनात प्रमाण जाणणारा होतो." ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ชาคริยํ อนุยุตฺโต โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ทิวสํ จงฺกเมน นิสชฺชาย อาวรณีเยหิ ธมฺเมหิ จิตฺตํ ปริโสเธติ. รตฺติยา ปฐมํ ยามํ จงฺกเมน นิสชฺชาย อาวรณีเยหิ ธมฺเมหิ จิตฺตํ ปริโสเธติ. รตฺติยา มชฺฌิมํ ยามํ ทกฺขิเณน ปสฺเสน สีหเสยฺยํ กปฺเปติ ปาเท ปาทํ อจฺจาธาย สโต สมฺปชาโน อุฏฺฐานสญฺญํ มนสิ กริตฺวา. รตฺติยา ปจฺฉิมํ ยามํ ปจฺจุฏฺฐาย จงฺกเมน นิสชฺชาย อาวรณีเยหิ ธมฺเมหิ จิตฺตํ ปริโสเธติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ชาคริยํ อนุยุตฺโต โหติ. อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ตีหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต ภิกฺขุ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สุขโสมนสฺสพหุโล วิหรติ, โยนิ จสฺส อารทฺธา โหติ อาสวานํ ขยายา’’ติ. ทุติยํ. "आणि हे भिक्खूंनो, भिक्खू जागृततेत तत्पर कसा होतो? येथे, हे भिक्खूंनो, भिक्खू दिवसा चंक्रमणाने आणि बसण्याने मनाला अडथळा आणणाऱ्या धम्मांपासून शुद्ध करतो. रात्रीच्या पहिल्या प्रहरात चंक्रमणाने आणि बसण्याने मनाला अडथळा आणणाऱ्या धम्मांपासून शुद्ध करतो. रात्रीच्या मध्यम प्रहरात उजव्या कुशीवर, एका पायावर दुसरा पाय ठेवून, स्मृती आणि संप्रजन्य ठेवून, उठण्याची संज्ञा मनात ठेवून सिंहशयन करतो. रात्रीच्या अंतिम प्रहरात लवकर उठून चंक्रमणाने आणि बसण्याने मनाला अडथळा आणणाऱ्या धम्मांपासून शुद्ध करतो. अशा प्रकारे, हे भिक्खूंनो, भिक्खू जागृततेत तत्पर होतो. हे भिक्खूंनो, या तीन धम्मांनी युक्त असलेला भिक्खू याच जन्मात अत्यंत सुख आणि सोमनस्याने विहरतो आणि आसवांच्या क्षयासाठी त्याचा योग्य प्रयत्न आरंभलेला असतो." दुसरे. ๓. กุมฺโมปมสุตฺตํ ३. कुम्मोपम सुत्त ๒๔๐. ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, กุมฺโม กจฺฉโป สายนฺหสมยํ อนุนทีตีเร โคจรปสุโต อโหสิ. สิงฺคาโลปิ โข, ภิกฺขเว, สายนฺหสมยํ อนุนทีตีเร โคจรปสุโต อโหสิ. อทฺทสา โข, ภิกฺขเว, กุมฺโม กจฺฉโป สิงฺคาลํ ทูรโตว โคจรปสุตํ. ทิสฺวาน โสณฺฑิปญฺจมานิ องฺคานิ สเก กปาเล สโมทหิตฺวา อปฺโปสฺสุกฺโก ตุณฺหีภูโต สงฺกสายติ. สิงฺคาโลปิ โข, ภิกฺขเว, อทฺทส กุมฺมํ กจฺฉปํ ทูรโตว โคจรปสุตํ. ทิสฺวาน เยน กุมฺโม กจฺฉโป เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา กุมฺมํ กจฺฉปํ ปจฺจุปฏฺฐิโต อโหสิ – ‘ยทายํ กุมฺโม กจฺฉโป โสณฺฑิปญฺจมานํ องฺคานํ อญฺญตรํ วา อญฺญตรํ วา องฺคํ อภินินฺนาเมสฺสติ, ตตฺเถว นํ คเหตฺวา อุทฺทาลิตฺวา ขาทิสฺสามี’ติ. ยทา โข, ภิกฺขเว, กุมฺโม กจฺฉโป [Pg.386] โสณฺฑิปญฺจมานํ องฺคานํ อญฺญตรํ วา อญฺญตรํ วา องฺคํ น อภินินฺนามิ, อถ สิงฺคาโล กุมฺมมฺหา นิพฺพิชฺช ปกฺกามิ, โอตารํ อลภมาโน. २४०. "पूर्वीची गोष्ट आहे, हे भिक्खूंनो, एक कासव संध्याकाळच्या वेळी नदीकाठी चारा शोधण्यात मग्न होते. हे भिक्खूंनो, एक कोल्हा देखील संध्याकाळच्या वेळी त्याच नदीकाठी भक्ष्य शोधण्यात मग्न होता. त्या कासवाने भक्ष्य शोधणाऱ्या कोल्ह्याला दुरूनच पाहिले. त्याला पाहून त्याने आपली चार पावले आणि पाचवे डोके आपल्या पाठीच्या कवचात ओढून घेतले आणि तो निश्चिंत व शांत होऊन बसून राहिला. हे भिक्खूंनो, कोल्ह्यानेही त्या कासवाला दुरूनच पाहिले होते. त्याला पाहून तो कासवाजवळ आला आणि तिथेच दबा धरून बसला – 'जेव्हा हे कासव आपल्या पाच अवयवांपैकी एखादा अवयव बाहेर काढेल, तेव्हा मी त्याला तिथेच पकडून, त्याचे कवच सोलून खाऊन टाकीन.' पण हे भिक्खूंनो, जेव्हा त्या कासवाने आपल्या पाच अवयवांपैकी कोणताही अवयव बाहेर काढला नाही, तेव्हा तो कोल्हा कासवाकडून कोणतीही संधी न मिळाल्यामुळे निराश होऊन निघून गेला." ‘‘เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ตุมฺเหปิ มาโร ปาปิมา สตตํ สมิตํ ปจฺจุปฏฺฐิโต – ‘อปฺเปว นามาหํ อิเมสํ จกฺขุโต วา โอตารํ ลเภยฺยํ…เป… ชิวฺหาโต วา โอตารํ ลเภยฺยํ…เป… มนโต วา โอตารํ ลเภยฺย’นฺติ. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวารา วิหรถ. จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา มา นิมิตฺตคฺคาหิโน อหุวตฺถ, มา อนุพฺยญฺชนคฺคาหิโน. ยตฺวาธิกรณเมนํ จกฺขุนฺทฺริยํ อสํวุตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อนฺวาสฺสเวยฺยุํ, ตสฺส สํวราย ปฏิปชฺชถ, รกฺขถ จกฺขุนฺทฺริยํ, จกฺขุนฺทฺริเย สํวรํ อาปชฺชถ. โสเตน สทฺทํ สุตฺวา… ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตฺวา… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา… กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสิตฺวา… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย มา นิมิตฺตคฺคาหิโน อหุวตฺถ, มา อนุพฺยญฺชนคฺคาหิโน. ยตฺวาธิกรณเมนํ มนินฺทฺริยํ อสํวุตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อนฺวาสฺสเวยฺยุํ, ตสฺส สํวราย ปฏิปชฺชถ, รกฺขถ มนินฺทฺริยํ, มนินฺทฺริเย สํวรํ อาปชฺชถ. ยโต ตุมฺเห, ภิกฺขเว, อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวารา วิหริสฺสถ, อถ ตุมฺเหหิปิ มาโร ปาปิมา นิพฺพิชฺช ปกฺกมิสฺสติ, โอตารํ อลภมาโน – กุมฺมมฺหาว สิงฺคาโล’’ติ. “त्याचप्रमाणे, भिक्षूंनो! पापी मार तुमच्यावर सतत आणि निरंतर पाळत ठेवून असतो की, ‘कदाचित मला यांच्या डोळ्यांद्वारे संधी मिळेल... किंवा जिभेद्वारे संधी मिळेल... किंवा मनाद्वारे संधी मिळेल.’ म्हणून, भिक्षूंनो! तुम्ही आपल्या इंद्रियांचे दरवाजे सुरक्षित ठेवून (इंद्रिय संवर करून) विहार करा. डोळ्यांनी रूप पाहून त्याच्या बाह्य लक्षणांचे (निमित्त) ग्रहण करू नका, त्याच्या उप-लक्षणांचे (अनुव्यंजन) ग्रहण करू नका. कारण, जर तुम्ही चक्षुरिंद्रिय असंयत ठेवून विहार केला, तर अभिज्झा (लोभ) आणि दोमनस्स (खिन्नता) हे पापी अकुशल धर्म तुमच्यावर आक्रमण करतील. म्हणून, त्याच्या संवरासाठी (संयमासाठी) प्रतिपन्न व्हा (प्रयत्न करा), चक्षुरिंद्रियाचे रक्षण करा, चक्षुरिंद्रियाचा संवर प्राप्त करा. कानाने शब्द ऐकून... नाकाने गंध घेऊन... जिभेने रस चाखून... कायेने स्पर्श अनुभवून... मनाने धर्माचे (विचारांचे) ज्ञान करून घेऊन बाह्य लक्षणांचे ग्रहण करू नका, उप-लक्षणांचे ग्रहण करू नका. कारण, जर तुम्ही मनेंद्रिय असंयत ठेवून विहार केला, तर अभिज्झा आणि दोमनस्स हे पापी अकुशल धर्म तुमच्यावर आक्रमण करतील. म्हणून, त्याच्या संवरासाठी प्रतिपन्न व्हा, मनेंद्रियाचे रक्षण करा, मनेंद्रियाचा संवर प्राप्त करा. भिक्षूंनो! जेव्हा तुम्ही इंद्रियांचे दरवाजे सुरक्षित ठेवून विहार कराल, तेव्हा पापी मार तुमच्यामध्ये संधी मिळवण्यास असमर्थ ठरून, निराश होऊन निघून जाईल; ज्याप्रमाणे कोल्हा कासवापासून दूर निघून गेला होता.” ‘‘กุมฺโม องฺคานิ สเก กปาเล,สโมทหํ ภิกฺขุ มโนวิตกฺเก; อนิสฺสิโต อญฺญมเหฐยาโน,ปรินิพฺพุโต นูปวเทยฺย กญฺจี’’ติ. ตติยํ; “ज्याप्रमाणे कासव आपले अवयव स्वतःच्या पाठीच्या कवचात सामावून घेते, त्याचप्रमाणे भिक्षूने आपल्या मनातील विचारांना (मनोवितर्क) आवरून धरावे. कशावरही आश्रित न राहता (तृष्णा व दृष्टीपासून अलिप्त राहून), इतरांना त्रास न देता, पूर्णपणे शांत (परिनिर्वृत) होऊन त्याने कोणाचीही निंदा करू नये.” (तिसरे) ๔. ปฐมทารุกฺขนฺโธปมสุตฺตํ ४. प्रथम दारुक्खन्धोपम सुत्त (मोठ्या लाकडाच्या ओंडक्याच्या उपमेचे पहिले सुत्त) ๒๔๑. เอกํ สมยํ ภควา โกสมฺพิยํ วิหรติ คงฺคาย นทิยา ตีเร. อทฺทสา โข ภควา มหนฺตํ ทารุกฺขนฺธํ คงฺคาย นทิยา โสเตน วุยฺหมานํ. ทิสฺวาน ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ปสฺสถ โน ตุมฺเห, ภิกฺขเว, อมุํ มหนฺตํ ทารุกฺขนฺธํ คงฺคาย นทิยา โสเตน วุยฺหมาน’’นฺติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. ‘‘สเจ โส, ภิกฺขเว, ทารุกฺขนฺโธ น โอริมํ ตีรํ อุปคจฺฉติ, น ปาริมํ ตีรํ อุปคจฺฉติ, น มชฺเฌ สํสีทิสฺสติ, น ถเล อุสฺสีทิสฺสติ, น มนุสฺสคฺคาโห คเหสฺสติ, น [Pg.387] อมนุสฺสคฺคาโห คเหสฺสติ, น อาวฏฺฏคฺคาโห คเหสฺสติ, น อนฺโตปูติ ภวิสฺสติ; เอวญฺหิ โส, ภิกฺขเว, ทารุกฺขนฺโธ สมุทฺทนินฺโน ภวิสฺสติ สมุทฺทโปโณ สมุทฺทปพฺภาโร. ตํ กิสฺส เหตุ? สมุทฺทนินฺโน, ภิกฺขเว, คงฺคาย นทิยา โสโต สมุทฺทโปโณ สมุทฺทปพฺภาโร. २४१. एकदा भगवान कोसंबी येथे गंगा नदीच्या तीरावर विहार करत होते. भगवंतांनी गंगेच्या प्रवाहाबरोबर वाहून जाणारा एक मोठा लाकडाचा ओंडका पाहिला. तो पाहून त्यांनी भिक्षूंना संबोधित केले— “भिक्षूंनो! गंगेच्या प्रवाहाबरोबर वाहून जाणारा तो मोठा लाकडाचा ओंडका तुम्हाला दिसतो आहे का?” “होय, भंते!” “भिक्षूंनो! जर तो लाकडाचा ओंडका या काठाला (अलीकडच्या तीराला) लागला नाही, पलीकडच्या तीराला लागला नाही, मध्यप्रवाहात बुडाला नाही, कोरड्या जमिनीवर अडकला नाही, माणसांनी पकडला नाही, अमानुषांनी (देव-यक्षांनी) पकडला नाही, पाण्याच्या भोवऱ्यात अडकला नाही आणि आतून सडला नाही; तर भिक्षूंनो, तो लाकडाचा ओंडका समुद्राकडेच झुकेल, समुद्राकडेच वळेल आणि समुद्राकडेच प्रवाही होईल. याचे कारण काय? भिक्षूंनो, कारण गंगा नदीचा प्रवाह समुद्राकडेच झुकणारा, समुद्राकडेच वळणारा आणि समुद्राकडेच प्रवाही असणारा आहे.” ‘‘เอวเมว โข, ภิกฺขเว, สเจ ตุมฺเหปิ น โอริมํ ตีรํ อุปคจฺฉถ, น ปาริมํ ตีรํ อุปคจฺฉถ; น มชฺเฌ สํสีทิสฺสถ, น ถเล อุสฺสีทิสฺสถ, น มนุสฺสคฺคาโห คเหสฺสติ, น อมนุสฺสคฺคาโห คเหสฺสติ, น อาวฏฺฏคฺคาโห คเหสฺสติ, น อนฺโตปูตี ภวิสฺสถ; เอวํ ตุมฺเห, ภิกฺขเว, นิพฺพานนินฺนา ภวิสฺสถ นิพฺพานโปณา นิพฺพานปพฺภารา. ตํ กิสฺส เหตุ? นิพฺพานนินฺนา, ภิกฺขเว, สมฺมาทิฏฺฐิ นิพฺพานโปณา นิพฺพานปพฺภารา’’ติ. เอวํ วุตฺเต, อญฺญตโร ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข, ภนฺเต, โอริมํ ตีรํ, กึ ปาริมํ ตีรํ, โก มชฺเฌ สํสาโท, โก ถเล อุสฺสาโท, โก มนุสฺสคฺคาโห, โก อมนุสฺสคฺคาโห, โก อาวฏฺฏคฺคาโห, โก อนฺโตปูติภาโว’’ติ? “त्याचप्रमाणे, भिक्षूंनो! जर तुम्हीही अलीकडच्या तीराला लागला नाहीत, पलीकडच्या तीराला लागला नाहीत; मध्यप्रवाहात बुडाला नाहीत, कोरड्या जमिनीवर अडकला नाहीत, माणसांनी पकडले नाही, अमानुषांनी पकडले नाही, पाण्याच्या भोवऱ्यात अडकला नाहीत आणि आतून सडला नाहीत; तर भिक्षूंनो, तुम्ही निर्वाणाकडेच झुकाल, निर्वाणाकडेच वळाल आणि निर्वाणाकडेच प्रवाही व्हाल. याचे कारण काय? भिक्षूंनो, कारण सम्यक् दृष्टी ही निर्वाणाकडेच झुकणारी, निर्वाणाकडेच वळणारी आणि निर्वाणाकडेच प्रवाही असणारी आहे.” असे विचारले असता, एका भिक्षूने भगवंतांना विचारले— “भंते! अलीकडचे तीर म्हणजे काय? पलीकडचे तीर म्हणजे काय? मध्यप्रवाहात बुडणे म्हणजे काय? कोरड्या जमिनीवर अडकणे म्हणजे काय? माणसांनी पकडणे म्हणजे काय? अमानुषांनी पकडणे म्हणजे काय? पाण्याच्या भोवऱ्यात अडकणे म्हणजे काय? आणि आतून सडणे म्हणजे काय?” ‘‘‘โอริมํ ตีร’นฺติ โข, ภิกฺขุ, ฉนฺเนตํ อชฺฌตฺติกานํ อายตนานํ อธิวจนํ. ‘ปาริมํ ตีร’นฺติ โข, ภิกฺขุ, ฉนฺเนตํ พาหิรานํ อายตนานํ อธิวจนํ. ‘มชฺเฌ สํสาโท’ติ โข, ภิกฺขุ, นนฺทีราคสฺเสตํ อธิวจนํ. ‘ถเล อุสฺสาโท’ติ โข, ภิกฺขุ, อสฺมิมานสฺเสตํ อธิวจนํ. “भिक्षू! ‘अलीकडचे तीर’ हे सहा आध्यात्मिक (अंतर्गत) आयतनांचे (अज्झत्तिक आयतन) नाव आहे. ‘पलीकडचे तीर’ हे सहा बाह्य आयतनांचे (बाहिर आयतन) नाव आहे. ‘मध्यप्रवाहात बुडणे’ हे नंदीराग (आसक्ती आणि अभिलाषा) याचे नाव आहे. ‘कोरड्या जमिनीवर अडकणे’ हे अस्मिमान (अहंकार/‘मी आहे’ हा भाव) याचे नाव आहे.” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขุ, มนุสฺสคฺคาโห? อิธ, ภิกฺขุ, คิหีหิ สํสฏฺโฐ วิหรติ, สหนนฺที สหโสกี, สุขิเตสุ สุขิโต, ทุกฺขิเตสุ ทุกฺขิโต, อุปฺปนฺเนสุ กิจฺจกรณีเยสุ อตฺตนา เตสุ โยคํ อาปชฺชติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขุ, มนุสฺสคฺคาโห. “आणि भिक्षू! ‘माणसांनी पकडणे’ म्हणजे काय? येथे एखादा भिक्षू गृहस्थांच्या (लोकांच्या) संसर्गात राहतो; त्यांच्यासोबतच आनंदित होतो आणि त्यांच्यासोबतच दुःखी होतो, ते सुखी असताना सुखी होतो आणि ते दुःखी असताना दुःखी होतो, आणि त्यांची कामे किंवा कर्तव्ये उद्भवली असता स्वतः त्यात गुंतवून घेतो. भिक्षू! याला ‘माणसांनी पकडणे’ असे म्हणतात.” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขุ, อมนุสฺสคฺคาโห? อิธ, ภิกฺขุ, เอกจฺโจ อญฺญตรํ เทวนิกายํ ปณิธาย พฺรหฺมจริยํ จรติ – ‘อิมินาหํ สีเลน วา วเตน วา ตเปน วา พฺรหฺมจริเยน วา เทโว วา ภวิสฺสามิ เทวญฺญตโร วา’ติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขุ, อมนุสฺสคฺคาโห. ‘อาวฏฺฏคฺคาโห’ติ โข, ภิกฺขุ, ปญฺจนฺเนตํ กามคุณานํ อธิวจนํ. “आणि भिक्षू! ‘अमानुषांनी पकडणे’ म्हणजे काय? येथे एखादा भिक्षू एखाद्या देवलोकात जन्म घेण्याच्या आकांक्षेने ब्रह्मचर्य पाळतो— ‘मी या शीलाने, व्रताने, तपाने किंवा ब्रह्मचर्याने देव किंवा देवांपैकी एक होईन.’ भिक्षू! याला ‘अमानुषांनी पकडणे’ असे म्हणतात. ‘पाण्याच्या भोवऱ्यात अडकणे’ हे पाच कामगुणांचे नाव आहे.” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขุ, อนฺโตปูติภาโว? อิธ, ภิกฺขุ, เอกจฺโจ ทุสฺสีโล โหติ ปาปธมฺโม อสุจิสงฺกสฺสรสมาจาโร ปฏิจฺฉนฺนกมฺมนฺโต อสฺสมโณ [Pg.388] สมณปฏิญฺโญ อพฺรหฺมจารี พฺรหฺมจาริปฏิญฺโญ อนฺโตปูติ อวสฺสุโต กสมฺพุชาโต. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขุ, ‘อนฺโตปูติภาโว’’’ติ. “आणि भिक्षू! ‘आतून सडणे’ म्हणजे काय? येथे एखादा भिक्षू दुःशील असतो, पापधर्मी असतो, अपवित्र व संशयास्पद आचरण करणारा असतो, आपली दुष्कृत्ये लपवणारा असतो, श्रमण नसतानाही स्वतःला श्रमण म्हणवून घेणारा असतो, ब्रह्मचारी नसतानाही स्वतःला ब्रह्मचारी म्हणवून घेणारा असतो, आतून सडलेला, वासनांनी ओला झालेला (क्लेशयुक्त) आणि कचऱ्यासारखा झालेला असतो. भिक्षू! याला ‘आतून सडणे’ असे म्हणतात.” เตน โข ปน สมเยน นนฺโท โคปาลโก ภควโต อวิทูเร ฐิโต โหติ. อถ โข นนฺโท โคปาลโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อหํ โข, ภนฺเต, น โอริมํ ตีรํ อุปคจฺฉามิ, น ปาริมํ ตีรํ อุปคจฺฉามิ, น มชฺเฌ สํสีทิสฺสามิ, น ถเล อุสฺสีทิสฺสามิ, น มํ มนุสฺสคฺคาโห คเหสฺสติ, น อมนุสฺสคฺคาโห คเหสฺสติ, น อาวฏฺฏคฺคาโห คเหสฺสติ, น อนฺโตปูติ ภวิสฺสามิ. ลเภยฺยาหํ, ภนฺเต, ภควโต สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, ลเภยฺยํ อุปสมฺปท’’นฺติ. ‘‘เตน หิ ตฺวํ, นนฺท, สามิกานํ คาโว นิยฺยาเตหี’’ติ. ‘‘คมิสฺสนฺติ, ภนฺเต, คาโว วจฺฉคิทฺธินิโย’’ติ. ‘‘นิยฺยาเตเหว ตฺวํ, นนฺท, สามิกานํ คาโว’’ติ. อถ โข นนฺโท โคปาลโก สามิกานํ คาโว นิยฺยาเตตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘นิยฺยาติตา, ภนฺเต, สามิกานํ คาโว. ลเภยฺยาหํ, ภนฺเต, ภควโต สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, ลเภยฺยํ อุปสมฺปท’’นฺติ. อลตฺถ โข นนฺโท โคปาลโก ภควโต สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, อลตฺถ อุปสมฺปทํ. อจิรูปสมฺปนฺโน จ ปนายสฺมา นนฺโท เอโก วูปกฏฺโฐ…เป… อญฺญตโร จ ปนายสฺมา นนฺโท อรหตํ อโหสีติ. จตุตฺถํ. त्या वेळी नन्द नावाचा गोपाळ भगवंतांच्या जवळच उभा होता. तेव्हा नन्द गोपाळ भगवंतांना म्हणाला – "भंते, मी अलीकडच्या तीरावर जाणार नाही, पलीकडच्या तीरावर जाणार नाही, मध्येच बुडणार नाही, कोरड्या जमिनीवर अडकणार नाही, मला मनुष्य पकडणार नाही, अमानुष पकडणार नाही, पाण्याचा भोवरा पकडणार नाही आणि मी आतून सडणार नाही. भंते, मला भगवंतांच्या सन्निध प्रवज्जा (दीक्षा) मिळावी, उपसंपदा मिळावी." "नन्द, असे असेल तर तू गाई त्यांच्या मालकांना परत कर." "भंते, गाई आपल्या वासरांच्या ओढीने स्वतःच परत जातील." "नन्द, तू गाई त्यांच्या मालकांना परतच कर." त्यानंतर नन्द गोपाळाने गाई त्यांच्या मालकांना परत केल्या आणि तो भगवंतांकडे आला. आल्यानंतर तो भगवंतांना म्हणाला – "भंते, गाई त्यांच्या मालकांना परत केल्या आहेत. भंते, मला भगवंतांच्या सन्निध प्रवज्जा मिळावी, उपसंपदा मिळावी." नन्द गोपाळाला भगवंतांच्या सन्निध प्रवज्जा मिळाली, उपसंपदा मिळाली. उपसंपदा मिळाल्यानंतर लवकरच आयुष्यमान नन्द एकटे, एकांतात राहून... (पे)... आयुष्यमान नन्द अर्हंतांपैकी एक झाले. चौथे (सुत्त). ๕. ทุติยทารุกฺขนฺโธปมสุตฺตํ ५. दुसरे दारुक्खन्धोपम सुत्त. ๒๔๒. เอกํ สมยํ ภควา กิมิลายํ วิหรติ คงฺคาย นทิยา ตีเร. อทฺทสา โข ภควา มหนฺตํ ทารุกฺขนฺธํ คงฺคาย นทิยา โสเตน วุยฺหมานํ. ทิสฺวาน ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ปสฺสถ โน ตุมฺเห, ภิกฺขเว, อมุํ มหนฺตํ ทารุกฺขนฺธํ คงฺคาย นทิยา โสเตน วุยฺหมาน’’นฺติ? ‘‘เอวํ ภนฺเต’’…เป… เอวํ วุตฺเต, อายสฺมา กิมิโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – กึ นุ โข, ภนฺเต, โอริมํ ตีรํ…เป… กตโม จ, กิมิล, อนฺโตปูติภาโว. อิธ, กิมิล, ภิกฺขุ อญฺญตรํ สํกิลิฏฺฐํ อาปตฺตึ อาปนฺโน โหติ ยถารูปาย อาปตฺติยา น วุฏฺฐานํ ปญฺญายติ. อยํ วุจฺจติ, กิมิล, อนฺโตปูติภาโวติ. ปญฺจมํ. २४२. एकदा भगवान किमिला येथे गंगा नदीच्या तीरावर विहार करत होते. भगवंतांनी गंगेच्या प्रवाहात वाहून जाणारा एक मोठा लाकडाचा ओंडका पाहिला. तो पाहून त्यांनी भिक्खूंना संबोधित केले – "भिक्खूंनो, गंगेच्या प्रवाहात वाहून जाणारा तो मोठा लाकडाचा ओंडका तुम्हाला दिसतोय का?" "होय, भंते!" ... (पे) ... असे म्हटल्यावर आयुष्यमान किमिल भगवंतांना म्हणाले – "भंते, अलीकडचे तीर म्हणजे काय? ... (पे) ... आणि किमिल, 'आतून सडणे' म्हणजे काय?" "किमिल, येथे एखादा भिक्खू अशा प्रकारच्या मलीन आपत्तीला (नियमाच्या उल्लंघनाला) प्राप्त होतो, ज्या आपत्तीतून बाहेर पडण्याचा मार्ग दिसत नाही. किमिल, यालाच 'आतून सडणे' असे म्हणतात." पाचवे (सुत्त). ๖. อวสฺสุตปริยายสุตฺตํ ६. अवस्सुतपरियाय सुत्त. ๒๔๓. เอกํ [Pg.389] สมยํ ภควา สกฺเกสุ วิหรติ กปิลวตฺถุสฺมึ นิคฺโรธาราเม. เตน โข ปน สมเยน กาปิลวตฺถวานํ สกฺยานํ นวํ สนฺถาคารํ อจิรการิตํ โหติ อนชฺฌาวุฏฺฐํ สมเณน วา พฺราหฺมเณน วา เกนจิ วา มนุสฺสภูเตน. อถ โข กาปิลวตฺถวา สกฺยา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข กาปิลวตฺถวา สกฺยา ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘อิธ, ภนฺเต, กาปิลวตฺถวานํ สกฺยานํ นวํ สนฺถาคารํ อจิรการิตํ อนชฺฌาวุฏฺฐํ สมเณน วา พฺราหฺมเณน วา เกนจิ วา มนุสฺสภูเตน. ตํ, ภนฺเต, ภควา ปฐมํ ปริภุญฺชตุ. ภควตา ปฐมํ ปริภุตฺตํ ปจฺฉา กาปิลวตฺถวา สกฺยา ปริภุญฺชิสฺสนฺติ. ตทสฺส กาปิลวตฺถวานํ สกฺยานํ ทีฆรตฺตํ หิตาย สุขายา’’ติ. อธิวาเสสิ ภควา ตุณฺหีภาเวน. २४३. एकदा भगवान शाक्य देशात कपिलवस्तू येथील निग्रोधाराम विहारामध्ये राहत होते. त्या वेळी कपिलवस्तूच्या शाक्यांचे एक नवीन संथागार (सभागृह) नुकतेच बांधून पूर्ण झाले होते, ज्यामध्ये अद्याप कोणताही श्रमण, ब्राह्मण किंवा कोणताही मनुष्य राहिला नव्हता. तेव्हा कपिलवस्तूचे शाक्य भगवंतांकडे आले. आल्यानंतर त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेले कपिलवस्तूचे शाक्य भगवंतांना म्हणाले – "भंते, येथे कपिलवस्तूच्या शाक्यांचे एक नवीन संथागार नुकतेच बांधून पूर्ण झाले आहे, ज्यामध्ये अद्याप कोणताही श्रमण, ब्राह्मण किंवा कोणताही मनुष्य राहिला नाही. भंते, भगवंतांनी सर्वप्रथम त्याचा वापर करावा. भगवंतांनी सर्वप्रथम वापर केल्यानंतर, कपिलवस्तूचे शाक्य त्याचा वापर करतील. ते कपिलवस्तूच्या शाक्यांच्या दीर्घकालीन हितासाठी आणि सुखासाठी होईल." भगवंतांनी मौन बाळगून संमती दिली. อถ โข กาปิลวตฺถวา สกฺยา ภควโต อธิวาสนํ วิทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา เยน นวํ สนฺถาคารํ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา สพฺพสนฺถรึ สนฺถาคารํ สนฺถริตฺวา อาสนานิ ปญฺญาเปตฺวา อุทกมณิกํ ปติฏฺฐาเปตฺวา เตลปฺปทีปํ อาโรเปตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘สพฺพสนฺถริสนฺถตํ, ภนฺเต, สนฺถาคารํ, อาสนานิ ปญฺญตฺตานิ, อุทกมณิโก ปติฏฺฐาปิโต, เตลปฺปทีโป อาโรปิโต. ยสฺส ทานิ, ภนฺเต, ภควา กาลํ มญฺญตี’’ติ. อถ โข ภควา นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สทฺธึ ภิกฺขุสงฺเฆน เยน นวํ สนฺถาคารํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปาเท ปกฺขาเลตฺวา สนฺถาคารํ ปวิสิตฺวา มชฺฌิมํ ถมฺภํ นิสฺสาย ปุรตฺถาภิมุโข นิสีทิ. ภิกฺขุสงฺโฆปิ โข ปาเท ปกฺขาเลตฺวา สนฺถาคารํ ปวิสิตฺวา ปจฺฉิมํ ภิตฺตึ นิสฺสาย ปุรตฺถาภิมุโข นิสีทิ ภควนฺตํเยว ปุรกฺขตฺวา. กาปิลวตฺถวา สกฺยา ปาเท ปกฺขาเลตฺวา สนฺถาคารํ ปวิสิตฺวา ปุรตฺถิมํ ภิตฺตึ นิสฺสาย ปจฺฉิมาภิมุขา นิสีทึสุ ภควนฺตํเยว ปุรกฺขตฺวา. อถ โข ภควา กาปิลวตฺถเว สกฺเย พหุเทว รตฺตึ ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสตฺวา สมาทเปตฺวา สมุตฺเตเชตฺวา สมฺปหํเสตฺวา อุยฺโยเชสิ – ‘‘อภิกฺกนฺตา โข, โคตมา, รตฺติ. ยสฺส ทานิ กาลํ มญฺญถา’’ติ[Pg.390]. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข กาปิลวตฺถวา สกฺยา ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกมึสุ. तेव्हा कपिलवस्तूच्या शाक्यांनी भगवंतांची संमती जाणून घेतली आणि ते आपापल्या आसनांवरून उठले. त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि ते नवीन संथागाराकडे गेले. तेथे जाऊन त्यांनी संथागारात सर्व बाजूंनी आसने पसरवली, आसने मांडली, पाण्याचा मोठा घडा ठेवला आणि तेलाचा दिवा लावला. त्यानंतर ते पुन्हा भगवंतांकडे आले. आल्यानंतर त्यांनी भगवंतांना म्हटले – "भंते, संथागारात सर्व बाजूंनी आसने पसरवली आहेत, आसने मांडली आहेत, पाण्याचा घडा ठेवला आहे आणि तेलाचा दिवा लावला आहे. आता भगवंतांना जशी वेळ योग्य वाटेल तसे करावे." त्यानंतर भगवंतांनी वस्त्रे परिधान केली, पात्र आणि चीवर घेऊन ते भिक्खू संघासह नवीन संथागाराकडे गेले. तेथे पोहोचून त्यांनी आपले पाय धुतले, संथागारात प्रवेश केला आणि मधल्या खांबाला टेकून पूर्वेकडे तोंड करून ते बसले. भिक्खू संघानेही आपले पाय धुतले, संथागारात प्रवेश केला आणि पश्चिमेकडील भिंतीला टेकून, भगवंतांना समोर ठेवून पूर्वेकडे तोंड करून ते बसले. कपिलवस्तूचे शाक्यही आपले पाय धुवून संथागारात आले आणि पूर्वेकडील भिंतीला टेकून, भगवंतांना समोर ठेवून पश्चिमेकडे तोंड करून बसले. त्यानंतर भगवंतांनी कपिलवस्तूच्या शाक्यांना रात्रीच्या बऱ्याच वेळेपर्यंत धम्म उपदेशाने (धम्मकथेने) संबोधिले, प्रेरित केले, उत्साहित केले आणि आनंदित केले. त्यानंतर त्यांनी त्यांना निरोप दिला – "हे गोतमांनो, रात्र बरीच उलटून गेली आहे. आता तुम्हाला जशी वेळ योग्य वाटेल तसे करावे." "तसेच असो, भंते!" असे म्हणून कपिलवस्तूच्या शाक्यांनी भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार केला, ते आसनावरून उठले, त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि ते निघून गेले. อถ โข ภควา อจิรปกฺกนฺเตสุ กาปิลวตฺถเวสุ สกฺเยสุ อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ อามนฺเตสิ – ‘‘วิคตถินมิทฺโธ โข, โมคฺคลฺลาน, ภิกฺขุสงฺโฆ. ปฏิภาตุ ตํ, โมคฺคลฺลาน, ภิกฺขูนํ ธมฺมี กถา. ปิฏฺฐิ เม อาคิลายติ; ตมหํ อายมิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. อถ โข ภควา จตุคฺคุณํ สงฺฆาฏึ ปญฺญเปตฺวา ทกฺขิเณน ปสฺเสน สีหเสยฺยํ กปฺเปสิ, ปาเท ปาทํ อจฺจาธาย, สโต สมฺปชาโน อุฏฺฐานสญฺญํ มนสิ กริตฺวา. ตตฺร โข อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘อาวุโส ภิกฺขเว’’ติ. ‘‘อาวุโส’’ติ โข เต ภิกฺขู อายสฺมโต มหาโมคฺคลฺลานสฺส ปจฺจสฺโสสุํ. อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – ‘‘อวสฺสุตปริยายญฺจ โว, อาวุโส, เทเสสฺสามิ, อนวสฺสุตปริยายญฺจ. ตํ สุณาถ, สาธุกํ มนสิ กโรถ; ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวมาวุโส’’ติ โข เต ภิกฺขู อายสฺมโต มหาโมคฺคลฺลานสฺส ปจฺจสฺโสสุํ. อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – त्यानंतर, कपिलवस्तूचे शाक्य निघून गेल्यानंतर फार वेळ झाला नव्हता, तेव्हा भगवंतांनी आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना संबोधित केले – “मोग्गल्लाना, भिक्खू संघ आळस आणि सुस्ती (थिन-मिद्ध) पासून मुक्त झाला आहे. मोग्गल्लाना, तू भिक्खूंना धम्म उपदेश कर. माझी पाठ दुखत आहे, म्हणून मी ती सरळ करतो (विश्रांती घेतो).” “तसेच असो, भन्ते,” असे आयुष्यमान महामोग्गल्लानांनी भगवंतांना उत्तर दिले. त्यानंतर भगवंतांनी आपली दुप्पट केलेली संघाटी चार पदरी करून अंथरली आणि उजव्या कुशीवर, एका पायावर दुसरा पाय ठेवून, स्मृती व संप्रजन्य राखून, उठण्याची संज्ञा मनात ठेवून सिंहशय्या ग्रहण केली. तेव्हा आयुष्यमान महामोग्गल्लानांनी भिक्खूंना संबोधित केले – “आवुसो भिक्खू!” “आवुसो,” असे त्या भिक्खूंनी आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना उत्तर दिले. आयुष्यमान महामोग्गल्लानांनी हे सांगितले – “आवुसो, मी तुम्हाला क्लेशांच्या पावसाने ओले होणे (अवस्सुत पर्याय) आणि क्लेशांच्या पावसाने ओले न होणे (अनवस्सुत पर्याय) याविषयी धम्म उपदेश करीन. तो नीट ऐका, मनावर नीट बिंबवा; मी बोलतो.” “तसेच असो, आवुसो,” असे त्या भिक्खूंनी आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना उत्तर दिले. आयुष्यमान महामोग्गल्लानांनी हे सांगितले – ‘‘กถํ, อาวุโส, อวสฺสุโต โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา ปิยรูเป รูเป อธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป รูเป พฺยาปชฺชติ, อนุปฏฺฐิตกายสฺสติ วิหรติ ปริตฺตเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ …เป… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา…เป… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ปิยรูเป ธมฺเม อธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป ธมฺเม พฺยาปชฺชติ, อนุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ ปริตฺตเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. อยํ วุจฺจติ, อาวุโส, ภิกฺขุ อวสฺสุโต จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ…เป… อวสฺสุโต ชิวฺหาวิญฺเญยฺเยสุ รเสสุ…เป… อวสฺสุโต มโนวิญฺเญยฺเยสุ ธมฺเมสุ. เอวํวิหาริญฺจาวุโส, ภิกฺขุํ จกฺขุโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ ลภเตว มาโร โอตารํ, ลภติ มาโร อารมฺมณํ…เป… ชิวฺหาโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ, ลภเตว มาโร โอตารํ[Pg.391], ลภติ มาโร อารมฺมณํ…เป… มนโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ, ลภเตว มาโร โอตารํ, ลภติ มาโร อารมฺมณํ. “आवुसो, मनुष्य क्लेशांच्या पावसाने ओला कसा होतो? आवुसो, येथे एखादा भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहून प्रिय वाटणाऱ्या रूपावर आसक्त होतो आणि अप्रिय वाटणाऱ्या रूपाचा द्वेष करतो. तो शरीराविषयीची स्मृती (कायानुस्मृती) प्रस्थापित न करता, संकुचित मनाने राहतो. आणि ज्या चित्तविमुक्ती व प्रज्ञाविमुक्तीमध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी अकुशल धर्म पूर्णपणे नष्ट होतात, ती चित्तविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्ती तो यथार्थपणे जाणत नाही... तसेच... जिभेने रसाची चव घेऊन... मनाद्वारे धम्माला (विचाराला) जाणून प्रिय वाटणाऱ्या धम्मावर आसक्त होतो आणि अप्रिय वाटणाऱ्या धम्माचा द्वेष करतो. तो शरीराविषयीची स्मृती प्रस्थापित न करता, संकुचित मनाने राहतो. आणि ज्या चित्तविमुक्ती व प्रज्ञाविमुक्तीमध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी अकुशल धर्म पूर्णपणे नष्ट होतात, ती चित्तविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्ती तो यथार्थपणे जाणत नाही. आवुसो, अशा भिक्खूला डोळ्यांनी जाणता येणाऱ्या रूपांमध्ये क्लेशांच्या पावसाने ओला झालेला... जिभेने जाणता येणाऱ्या रसांमध्ये क्लेशांच्या पावसाने ओला झालेला... मनाद्वारे जाणता येणाऱ्या धम्मांमध्ये क्लेशांच्या पावसाने ओला झालेला भिक्खू असे म्हणतात. आवुसो, अशा प्रकारे राहणाऱ्या भिक्खूजवळ जर मार डोळ्यांच्या मार्गाने आला, तर माराला त्याच्यात प्रवेश करण्याची संधी मिळते, माराला आधार मिळतो... जर मार जिभेच्या मार्गाने आला, तर माराला प्रवेश करण्याची संधी मिळते, माराला आधार मिळतो... जर मार मनाच्या मार्गाने आला, तर माराला प्रवेश करण्याची संधी मिळते, माराला आधार मिळतो. ‘‘เสยฺยถาปิ, อาวุโส, นฬาคารํ วา ติณาคารํ วา สุกฺขํ โกลาปํ เตโรวสฺสิกํ. ปุรตฺถิมาย เจปิ นํ ทิสาย ปุริโส อาทิตฺตาย ติณุกฺกาย อุปสงฺกเมยฺย, ลเภเถว อคฺคิ โอตารํ, ลเภถ อคฺคิ อารมฺมณํ; ปจฺฉิมาย เจปิ นํ ทิสาย ปุริโส อาทิตฺตาย ติณุกฺกาย อุปสงฺกเมยฺย…เป… อุตฺตราย เจปิ นํ ทิสาย…เป… ทกฺขิณาย เจปิ นํ ทิสาย…เป… เหฏฺฐิมโต เจปิ นํ…เป… อุปริมโต เจปิ นํ… ยโต กุโตจิ เจปิ นํ ปุริโส อาทิตฺตาย ติณุกฺกาย อุปสงฺกเมยฺย, ลเภเถว อคฺคิ โอตารํ ลเภถ อคฺคิ อารมฺมณํ. เอวเมว โข, อาวุโส, เอวํวิหารึ ภิกฺขุํ จกฺขุโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ, ลภเตว มาโร โอตารํ, ลภติ มาโร อารมฺมณํ…เป… ชิวฺหาโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ…เป… มนโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ, ลภเตว มาโร โอตารํ, ลภติ มาโร อารมฺมณํ. เอวํวิหาริญฺจาวุโส, ภิกฺขุํ รูปา อธิภํสุ, น ภิกฺขุ รูเป อธิโภสิ; สทฺทา ภิกฺขุํ อธิภํสุ, น ภิกฺขุ สทฺเท อธิโภสิ; คนฺธา ภิกฺขุํ อธิภํสุ, น ภิกฺขุ คนฺเธ อธิโภสิ; รสา ภิกฺขุํ อธิภํสุ, น ภิกฺขุ รเส อธิโภสิ; โผฏฺฐพฺพา ภิกฺขุํ อธิภํสุ, น ภิกฺขุ โผฏฺฐพฺเพ อธิโภสิ; ธมฺมา ภิกฺขุํ อธิภํสุ, น ภิกฺขุ ธมฺเม อธิโภสิ. อยํ วุจฺจตาวุโส, ภิกฺขุ รูปาธิภูโต, สทฺทาธิภูโต, คนฺธาธิภูโต, รสาธิภูโต, โผฏฺฐพฺพาธิภูโต, ธมฺมาธิภูโต, อธิภูโต, อนธิภู, อธิภํสุ นํ ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สํกิเลสิกา โปโนพฺภวิกา สทรา ทุกฺขวิปากา อายตึ ชาติชรามรณิยา. เอวํ โข, อาวุโส, อวสฺสุโต โหติ. “आवुसो, समजा एखादे लव्हाळ्यांचे किंवा गवताचे घर असेल, जे सुकलेले, कुजलेले आणि अनेक पावसाळे जुने असेल. जर एखाद्या माणसाने पेटती गवताची मशाल घेऊन पूर्व दिशेकडून त्या घराकडे प्रवेश केला, तर अग्नीला त्यात प्रवेश करण्याची संधी मिळते, अग्नीला आधार मिळतो. जर पश्चिमेकडून... उत्तरेकडून... दक्षिणेकडून... खालून... वरून... किंवा कोणत्याही बाजूने एखाद्या माणसाने पेटती गवताची मशाल घेऊन त्या घराकडे प्रवेश केला, तर अग्नीला त्यात प्रवेश करण्याची संधी मिळते, अग्नीला आधार मिळतो. तसेच, आवुसो, अशा प्रकारे राहणाऱ्या भिक्खूजवळ जर मार डोळ्यांच्या मार्गाने आला, तर माराला प्रवेश करण्याची संधी मिळते, माराला आधार मिळतो... जिभेच्या मार्गाने... मनाच्या मार्गाने आला, तर माराला प्रवेश करण्याची संधी मिळते, माराला आधार मिळतो. आवुसो, अशा प्रकारे राहणाऱ्या भिक्खूला रूपे पराभूत करतात, भिक्खू रूपांवर विजय मिळवू शकत नाही; शब्द भिक्खूला पराभूत करतात, भिक्खू शब्दांवर विजय मिळवू शकत नाही; गंध भिक्खूला पराभूत करतात, भिक्खू गंधांवर विजय मिळवू शकत नाही; रस भिक्खूला पराभूत करतात, भिक्खू रसांवर विजय मिळवू शकत नाही; स्पर्श भिक्खूला पराभूत करतात, भिक्खू स्पर्शांवर विजय मिळवू शकत नाही; धम्म (विचार) भिक्खूला पराभूत करतात, भिक्खू धम्मांवर विजय मिळवू शकत नाही. आवुसो, अशा भिक्खूला रूपांनी पराभूत केलेला, शब्दांनी पराभूत केलेला, गंधांनी पराभूत केलेला, रसांनी पराभूत केलेला, स्पर्शांनी पराभूत केलेला, धम्मांनी पराभूत केलेला – पराभूत झालेला आणि स्वतः विजय न मिळवू शकणारा असे म्हणतात. त्याला क्लेशकारक, पुनर्जन्म देणारे, त्रासदायक, दुःखद परिणाम देणारे आणि भविष्यात जन्म, जरा व मृत्यूकडे नेणारे पापी अकुशल धर्म पराभूत करतात. आवुसो, अशा प्रकारे मनुष्य क्लेशांच्या पावसाने ओला होतो. ‘‘กถญฺจาวุโส, อนวสฺสุโต โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา ปิยรูเป รูเป นาธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป รูเป น พฺยาปชฺชติ, อุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ อปฺปมาณเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ ปชานาติ ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ…เป… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา…เป… มนสา [Pg.392] ธมฺมํ วิญฺญาย ปิยรูเป ธมฺเม นาธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป ธมฺเม น พฺยาปชฺชติ, อุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ อปฺปมาณเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ ปชานาติ ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. อยํ วุจฺจตาวุโส, ภิกฺขุ อนวสฺสุโต จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ…เป… อนวสฺสุโต มโนวิญฺเญยฺเยสุ ธมฺเมสุ. เอวํวิหาริญฺจาวุโส, ภิกฺขุํ จกฺขุโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ, เนว ลภติ มาโร โอตารํ, น ลภติ มาโร อารมฺมณํ…เป… ชิวฺหาโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ…เป… มนโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ, เนว ลภติ มาโร โอตารํ, น ลภติ มาโร อารมฺมณํ. “आणि आवुसो, मनुष्य क्लेशांच्या पावसाने ओला न झालेला कसा होतो? आवुसो, येथे एखादा भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहून प्रिय वाटणाऱ्या रूपावर आसक्त होत नाही आणि अप्रिय वाटणाऱ्या रूपाचा द्वेष करत नाही. तो शरीराविषयीची स्मृती (कायानुस्मृती) प्रस्थापित करून, अमर्याद मनाने राहतो. आणि ज्या चित्तविमुक्ती व प्रज्ञाविमुक्तीमध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी अकुशल धर्म पूर्णपणे नष्ट होतात, ती चित्तविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्ती तो यथार्थपणे जाणतो... तसेच... जिभेने रसाची चव घेऊन... मनाद्वारे धम्माला (विचाराला) जाणून प्रिय वाटणाऱ्या धम्मावर आसक्त होत नाही आणि अप्रिय वाटणाऱ्या धम्माचा द्वेष करत नाही. तो शरीराविषयीची स्मृती प्रस्थापित करून, अमर्याद मनाने राहतो. आणि ज्या चित्तविमुक्ती व प्रज्ञाविमुक्तीमध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी अकुशल धर्म पूर्णपणे नष्ट होतात, ती चित्तविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्ती तो यथार्थपणे जाणतो. आवुसो, अशा भिक्खूला डोळ्यांनी जाणता येणाऱ्या रूपांमध्ये क्लेशांच्या पावसाने ओला न झालेला... मनाद्वारे जाणता येणाऱ्या धम्मांमध्ये क्लेशांच्या पावसाने ओला न झालेला भिक्खू असे म्हणतात. आवुसो, अशा प्रकारे राहणाऱ्या भिक्खूजवळ जर मार डोळ्यांच्या मार्गाने आला, तर माराला प्रवेश करण्याची कोणतीही संधी मिळत नाही, माराला आधार मिळत नाही... जिभेच्या मार्गाने... मनाच्या मार्गाने आला, तर माराला प्रवेश करण्याची कोणतीही संधी मिळत नाही, माराला आधार मिळत नाही.” ‘‘เสยฺยถาปิ, อาวุโส, กูฏาคารํ วา สาลา วา พหลมตฺติกา อทฺทาวเลปนา. ปุรตฺถิมาย เจปิ นํ ทิสาย ปุริโส อาทิตฺตาย ติณุกฺกาย อุปสงฺกเมยฺย, เนว ลเภถ อคฺคิ โอตารํ, น ลเภถ อคฺคิ อารมฺมณํ…เป… ปจฺฉิมาย เจปิ นํ… อุตฺตราย เจปิ นํ… ทกฺขิณาย เจปิ นํ… เหฏฺฐิมโต เจปิ นํ… อุปริมโต เจปิ นํ… ยโต กุโตจิ เจปิ นํ ปุริโส อาทิตฺตาย ติณุกฺกาย อุปสงฺกเมยฺย, เนว ลเภถ อคฺคิ โอตารํ, น ลเภถ อคฺคิ อารมฺมณํ. เอวเมว โข, อาวุโส, เอวํวิหารึ ภิกฺขุํ จกฺขุโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ, เนว ลภติ มาโร โอตารํ, น ลภติ มาโร อารมฺมณํ…เป… มนโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ, เนว ลภติ มาโร โอตารํ, น ลภติ มาโร อารมฺมณํ. เอวํวิหารี จาวุโส, ภิกฺขุ รูเป อธิโภสิ, น รูปา ภิกฺขุํ อธิภํสุ; สทฺเท ภิกฺขุ อธิโภสิ, น สทฺทา ภิกฺขุํ อธิภํสุ; คนฺเธ ภิกฺขุ อธิโภสิ, น คนฺธา ภิกฺขุํ อธิภํสุ; รเส ภิกฺขุ อธิโภสิ, น รสา ภิกฺขุํ อธิภํสุ; โผฏฺฐพฺเพ ภิกฺขุ อธิโภสิ, น โผฏฺฐพฺพา ภิกฺขุํ อธิภํสุ; ธมฺเม ภิกฺขุ อธิโภสิ, น ธมฺมา ภิกฺขุํ อธิภํสุ. อยํ วุจฺจตาวุโส, ภิกฺขุ รูปาธิภู, สทฺทาธิภู, คนฺธาธิภู, รสาธิภู, โผฏฺฐพฺพาธิภู, ธมฺมาธิภู, อธิภู, อนธิภูโต, อธิโภสิ เต ปาปเก อกุสเล ธมฺเม สํกิเลสิเก โปโนพฺภวิเก สทเร ทุกฺขวิปาเก อายตึ ชาติชรามรณิเย. เอวํ โข, อาวุโส, อนวสฺสุโต โหตี’’ติ. “मित्रांनो, समजा एखादे शिखरयुक्त घर किंवा सभागृह असेल, जे जाड मातीने बनवलेले आणि ओल्या गाराने लिंपलेले असेल. जर एखादा माणूस पेटती गवताची मशाल घेऊन पूर्व दिशेकडून त्याजवळ आला, तर अग्नीला त्यात प्रवेश करण्याची संधी मिळणार नाही, अग्नीला त्यात आधार मिळणार नाही... तसेच पश्चिम दिशेकडून... उत्तर दिशेकडून... दक्षिण दिशेकडून... खालून... वरून... किंवा कोणत्याही बाजूने जर एखादा माणूस पेटती गवताची मशाल घेऊन त्याजवळ आला, तर अग्नीला त्यात प्रवेश करण्याची संधी मिळणार नाही, अग्नीला त्यात आधार मिळणार नाही. त्याचप्रमाणे, मित्रांनो, अशा प्रकारे विहार करणाऱ्या भिक्खूजवळ जर मार डोळ्याच्या माध्यमातून आला, तर माराला प्रवेश करण्याची संधी मिळणार नाही, माराला आधार मिळणार नाही... तसेच मनाच्या माध्यमातून जर मार आला, तर माराला प्रवेश करण्याची संधी मिळणार नाही, माराला आधार मिळणार नाही. मित्रांनो, अशा प्रकारे विहार करणारा भिक्खू रूपांवर विजय मिळवतो, रूपे भिक्खूला पराभूत करत नाहीत; तो शब्दांवर विजय मिळवतो, शब्द भिक्खूला पराभूत करत नाहीत; तो गंधांवर विजय मिळवतो, गंध भिक्खूला पराभूत करत नाहीत; तो रसांवर विजय मिळवतो, रस भिक्खूला पराभूत करत नाहीत; तो स्पर्शांवर विजय मिळवतो, स्पर्श भिक्खूला पराभूत करत नाहीत; तो धम्मांवर विजय मिळवतो, धम्म भिक्खूला पराभूत करत नाहीत. मित्रांनो, अशा भिक्खूला 'रूपांवर विजय मिळवणारा', 'शब्दांवर विजय मिळवणारा', 'गंधांवर विजय मिळवणारा', 'रसांवर विजय मिळवणारा', 'स्पर्शांवर विजय मिळवणारा', 'धम्मांवर विजय मिळवणारा' असे म्हटले जाते; तो सर्वांवर विजय मिळवणारा आहे, कोणाकडूनही पराभूत न होणारा आहे. त्याने त्या क्लेशकारक, पुनर्जन्म देणाऱ्या, संतापजनक, दुःखद विपाक देणाऱ्या आणि भविष्यात जन्म, जरा व मरणाकडे नेणाऱ्या पापी अकुशल धम्मांवर विजय मिळवला आहे. मित्रांनो, अशा प्रकारे भिक्खू हा अनास्रव (क्लेशांनी ओला न होणारा) होतो.” อถ [Pg.393] โข ภควา วุฏฺฐหิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ อามนฺเตสิ – ‘‘สาธุ สาธุ, โมคฺคลฺลาน! สาธุ โข ตฺวํ, โมคฺคลฺลาน, ภิกฺขูนํ อวสฺสุตปริยายญฺจ อนวสฺสุตปริยายญฺจ อภาสี’’ติ. त्यानंतर भगवान (आपल्या आसनावरून) उठले आणि त्यांनी आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना संबोधित केले— “साधू, साधू, मोग्गल्लान! मोग्गल्लान, तू भिक्खूंना आस्रवयुक्त स्थिती आणि अनास्रव स्थिती खूप चांगल्या प्रकारे सांगितलीस.” อิทมโวจ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน. สมนุญฺโญ สตฺถา อโหสิ. อตฺตมนา เต ภิกฺขู อายสฺมโต มหาโมคฺคลฺลานสฺส ภาสิตํ อภินนฺทุนฺติ. ฉฏฺฐํ. आयुष्यमान महामोग्गल्लान असे म्हणाले. शास्त्यांनी (बुद्धांनी) याला संमती दिली. ते भिक्खू आनंदी झाले आणि त्यांनी आयुष्यमान महामोग्गल्लानांच्या भाषणाचे मनापासून स्वागत केले. सहावे सूत्र समाप्त. ๗. ทุกฺขธมฺมสุตฺตํ ७. दुक्खधम्म सुत्त (दुःखकारक धम्मांचे सूत्र) ๒๔๔. ยโต โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สพฺเพสํเยว ทุกฺขธมฺมานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ. ตถา โข ปนสฺส กามา ทิฏฺฐา โหนฺติ, ยถาสฺส กาเม ปสฺสโต, โย กาเมสุ กามจฺฉนฺโท กามสฺเนโห กามมุจฺฉา กามปริฬาโห, โส นานุเสติ. ตถา โข ปนสฺส จาโร จ วิหาโร จ อนุพุทฺโธ โหติ, ยถา จรนฺตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา นานุเสนฺติ. २४४. “भिक्खूंनो, जेव्हा भिक्खू सर्व दुःखकारक धम्मांचा उदय आणि अस्त यथार्थपणे जाणतो, तेव्हा त्याने कामभोगांना अशा प्रकारे पाहिलेले असते की, कामभोगांकडे पाहताना त्याच्यामध्ये कामभोगांविषयी जो कामच्छंद, कामस्नेह, काममुच्छा आणि कामपरिळाह असतो, तो सुप्त राहत नाही. तसेच, त्याचे आचरण आणि विहार अशा प्रकारे योग्य रीतीने समजलेले असते की, तसे आचरण व विहार करणाऱ्या भिक्खूमध्ये अभिज्झा आणि दोमनस्स हे पापी अकुशल धम्म सुप्त राहत नाहीत.” ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สพฺเพสํเยว ทุกฺขธมฺมานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ? ‘อิติ รูปํ, อิติ รูปสฺส สมุทโย, อิติ รูปสฺส อตฺถงฺคโม; อิติ เวทนา… อิติ สญฺญา… อิติ สงฺขารา… อิติ วิญฺญาณํ, อิติ วิญฺญาณสฺส สมุทโย, อิติ วิญฺญาณสฺส อตฺถงฺคโม’ติ – เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สพฺเพสํเยว ทุกฺขธมฺมานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ. “आणि भिक्खूंनो, भिक्खू सर्व दुःखकारक धम्मांचा उदय आणि अस्त यथार्थपणे कसा जाणतो? 'असे रूप आहे, असा रूपाचा उदय आहे, असा रूपाचा अस्त आहे; अशी वेदना आहे... अशी संज्ञा आहे... असे संस्कार आहेत... असे विज्ञान आहे, असा विज्ञानाचा उदय आहे, असा विज्ञानाचा अस्त आहे'— अशा प्रकारे, भिक्खूंनो, भिक्खू सर्व दुःखकारक धम्मांचा उदय आणि अस्त यथार्थपणे जाणतो.” ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน กามา ทิฏฺฐา โหนฺติ? ยถาสฺส กาเม ปสฺสโต, โย กาเมสุ กามจฺฉนฺโท กามสฺเนโห กามมุจฺฉา กามปริฬาโห, โส นานุเสติ. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, องฺคารกาสุ สาธิกโปริสา ปุณฺณา องฺคารานํ วีตจฺจิกานํ วีตธูมานํ. อถ ปุริโส อาคจฺเฉยฺย ชีวิตุกาโม อมริตุกาโม สุขกาโม ทุกฺขปฏิกูโล. ตเมนํ ทฺเว พลวนฺโต ปุริสา นานาพาหาสุ คเหตฺวา, ตํ องฺคารกาสุํ อุปกฑฺเฒยฺยุํ. โส อิติจีติเจว กายํ สนฺนาเมยฺย. ตํ กิสฺส เหตุ? ญาต ญฺหิ, ภิกฺขเว, ตสฺส ปุริสสฺส อิมํ จาหํ องฺคารกาสุํ ปปติสฺสามิ, ตโตนิทานํ มรณํ วา นิคจฺฉิสฺสามิ มรณมตฺตํ วา ทุกฺขนฺติ. เอวเมว โข[Pg.394], ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน องฺคารกาสูปมา กามา ทิฏฺฐา โหนฺติ, ยถาสฺส กาเม ปสฺสโต, โย กาเมสุ กามจฺฉนฺโท กามสฺเนโห กามมุจฺฉา กามปริฬาโห, โส นานุเสติ. “आणि भिक्खूंनो, भिक्खूने कामभोगांना कशा प्रकारे पाहिलेले असते? जेणेकरून कामभोगांकडे पाहताना त्याच्यामध्ये कामभोगांविषयी जो कामच्छंद, कामस्नेह, काममुच्छा आणि कामपरिळाह असतो, तो सुप्त राहत नाही. भिक्खूंनो, समजा माणसाच्या उंचीपेक्षा खोल अशी कोळशांची खाण असेल, जी ज्वाला नसलेल्या आणि धूर नसलेल्या धगधगत्या कोळशांनी पूर्ण भरलेली असेल. तेव्हा एखादा माणूस तिथे येईल, ज्याला जगण्याची इच्छा आहे, मरण्याची इच्छा नाही, जो सुखाची आकांक्षा बाळगतो आणि दुःखाचा तिरस्कार करतो. मग दोन बलवान पुरुष त्याला दोन्ही हातांना धरून त्या कोळशाच्या खाणीकडे ओढू लागतील. तो माणूस इकडे-तिकडे आपले शरीर मागे खेचण्याचा प्रयत्न करेल. त्याचे कारण काय? भिक्खूंनो, कारण त्या माणसाला ठाऊक असते की, 'जर मी या कोळशाच्या खाणीत पडलो, तर त्यामुळे माझा मृत्यू होईल किंवा मृत्यूतुल्य तीव्र दुःख मला सहन करावे लागेल.' त्याचप्रमाणे, भिक्खूंनो, जेव्हा भिक्खूने कामभोगांना कोळशाच्या खाणीसारखे पाहिलेले असते, तेव्हा कामभोगांकडे पाहताना त्याच्यामध्ये कामभोगांविषयी जो कामच्छंद, कामस्नेह, काममुच्छा आणि कामपरिळाह असतो, तो सुप्त राहत नाही.” ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน จาโร จ วิหาโร จ อนุพุทฺโธ โหติ, ยถา จรนฺตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา นานุสฺสวนฺติ ? เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ปุริโส พหุกณฺฏกํ ทายํ ปวิเสยฺย. ตสฺส ปุรโตปิ กณฺฏโก, ปจฺฉโตปิ กณฺฏโก, อุตฺตรโตปิ กณฺฏโก, ทกฺขิณโตปิ กณฺฏโก, เหฏฺฐโตปิ กณฺฏโก, อุปริโตปิ กณฺฏโก. โส สโตว อภิกฺกเมยฺย, สโตว ปฏิกฺกเมยฺย – ‘มา มํ กณฺฏโก’ติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ยํ โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, อยํ วุจฺจติ อริยสฺส วินเย กณฺฏโก’’ติ. อิติ วิทิตฺวา สํวโร จ อสํวโร จ เวทิตพฺโพ. “आणि भिक्खूंनो, भिक्खूचे आचरण आणि विहार कशा प्रकारे योग्य रीतीने समजलेले असते, जेणेकरून तसे आचरण व विहार करणाऱ्या भिक्खूमध्ये अभिज्झा आणि दोमनस्स हे पापी अकुशल धम्म पाझरत नाहीत? भिक्खूंनो, समजा एखादा माणूस अनेक काटे असलेल्या जंगलात प्रवेश करेल. त्याच्या समोरही काटा असेल, मागेही काटा असेल, डावीकडेही काटा असेल, उजवीकडेही काटा असेल, खालीही काटा असेल आणि वरही काटा असेल. तो अत्यंत सजग राहूनच पुढे पाऊल टाकेल आणि सजग राहूनच मागे पाऊल घेईल— 'मला काटा टोचू नये' या विचाराने. त्याचप्रमाणे, भिक्खूंनो, या जगात जे काही प्रिय वाटणारे आणि सुखद वाटणारे आहे, त्याला अरियांच्या विनयामध्ये 'काटा' म्हटले जाते. हे अशा प्रकारे जाणून संवर आणि असंवर समजून घेतले पाहिजे.” ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, อสํวโร โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา ปิยรูเป รูเป อธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป รูเป พฺยาปชฺชติ, อนุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ ปริตฺตเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ, ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ…เป… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา…เป… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ปิยรูเป ธมฺเม อธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป ธมฺเม พฺยาปชฺชติ, อนุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ ปริตฺตเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, อสํวโร โหติ. “आणि भिक्खूंनो, असंवर कसा होतो? भिक्खूंनो, या शासनात एखादा भिक्खू डोळ्याने रूप पाहून प्रिय वाटणाऱ्या रूपावर आसक्त होतो आणि अप्रिय वाटणाऱ्या रूपावर द्वेष करतो. तो शरीराविषयीची स्मृती प्रस्थापित न करता, संकुचित चित्ताने विहार करतो. आणि ज्यामध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी अकुशल धम्म पूर्णपणे नष्ट होतात, ती चेतोविमुत्ती आणि प्रज्ञाविमुत्ती तो यथार्थपणे जाणत नाही... जिभेने रसाची चव घेऊन... मनाद्वारे धम्म जाणून प्रिय वाटणाऱ्या धम्मावर आसक्त होतो आणि अप्रिय वाटणाऱ्या धम्मावर द्वेष करतो. तो शरीराविषयीची स्मृती प्रस्थापित न करता, संकुचित चित्ताने विहार करतो. आणि ज्यामध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी अकुशल धम्म पूर्णपणे नष्ट होतात, ती चेतोविमुत्ती आणि प्रज्ञाविमुत्ती तो यथार्थपणे जाणत नाही. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे असंवर होतो.” ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, สํวโร โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา ปิยรูเป รูเป นาธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป รูเป น พฺยาปชฺชติ, อุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ อปฺปมาณเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ ปชานาติ, ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ…เป… ชิวฺหา รสํ สายิตฺวา…เป… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ปิยรูเป ธมฺเม นาธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป ธมฺเม น พฺยาปชฺชติ, อุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ อปฺปมาณเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ ปชานาติ, ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา [Pg.395] อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, สํวโร โหติ. भिक्खूहो, संवर (इंद्रिय-संयम) कसा होतो? येथे, भिक्खूहो, भिक्खू डोळ्याने रूप पाहून प्रिय वाटणाऱ्या रूपावर आसक्त होत नाही आणि अप्रिय वाटणाऱ्या रूपावर द्वेष करत नाही. तो शरीराविषयी जागृत राहून (कायगतासती प्रस्थापित करून) आणि अमर्याद चित्ताने विहार करतो. ज्यामध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी, अकुशल धर्म पूर्णपणे निरुद्ध होतात, ती चेतोविमुत्ती आणि पञ्ञाविमुत्ती तो यथार्थपणे जाणतो... तसेच... जिभेने रसाची चव घेऊन... तसेच... मनाने धम्माला (विचाराला) जाणून प्रिय वाटणाऱ्या धम्मावर आसक्त होत नाही आणि अप्रिय वाटणाऱ्या धम्मावर द्वेष करत नाही. तो शरीराविषयी जागृत राहून आणि अमर्याद चित्ताने विहार करतो. ज्यामध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी, अकुशल धर्म पूर्णपणे निरुद्ध होतात, ती चेतोविमुत्ती आणि पञ्ञाविमुत्ती तो यथार्थपणे जाणतो. भिक्खूहो, अशा प्रकारे संवर होतो. ‘‘ตสฺส เจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน เอวํ จรโต เอวํ วิหรโต กทาจิ กรหจิ สติสมฺโมสา อุปฺปชฺชนฺติ, ปาปกา อกุสลา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา, ทนฺโธ, ภิกฺขเว, สตุปฺปาโท. อถ โข นํ ขิปฺปเมว ปชหติ วิโนเทติ พฺยนฺตีกโรติ อนภาวํ คเมติ. भिक्खूहो, अशा प्रकारे आचरण करणाऱ्या आणि अशा प्रकारे विहार करणाऱ्या त्या भिक्खूच्या मनात कधीतरी स्मृतीच्या विस्मरणामुळे जर संयोजनाला (बंधनाला) कारणीभूत असणारे पापी, अकुशल विचार आणि संकल्प उत्पन्न झाले, तर भिक्खूहो, स्मृतीचा उदय जरी मंद असला, तरी तो त्यांना त्वरित सोडून देतो, दूर करतो, नष्ट करतो आणि पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्थितीला पोहोचवतो. ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ปุริโส ทิวสํสนฺตตฺเต อโยกฏาเห ทฺเว วา ตีณิ วา อุทกผุสิตานิ นิปาเตยฺย. ทนฺโธ, ภิกฺขเว, อุทกผุสิตานํ นิปาโต, อถ โข นํ ขิปฺปเมว ปริกฺขยํ ปริยาทานํ คจฺเฉยฺย. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ตสฺส เจ ภิกฺขุโน เอวํ จรโต, เอวํ วิหรโต กทาจิ กรหจิ สติสมฺโมสา อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา, ทนฺโธ, ภิกฺขเว, สตุปฺปาโท. อถ โข นํ ขิปฺปเมว ปชหติ วิโนเทติ พฺยนฺตีกโรติ อนภาวํ คเมติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน จาโร จ วิหาโร จ อนุพุทฺโธ โหติ; ยถา จรนฺตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา นานุสฺสวนฺติ. ตญฺเจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุํ เอวํ จรนฺตํ เอวํ วิหรนฺตํ ราชาโน วา ราชมหามตฺตา วา มิตฺตา วา อมจฺจา วา ญาตี วา สาโลหิตา วา, โภเคหิ อภิหฏฺฐุํ ปวาเรยฺยุํ – ‘เอหิ, โภ ปุริส, กึ เต อิเม กาสาวา อนุทหนฺติ, กึ มุณฺโฑ กปาลมนุจรสิ, เอหิ หีนายาวตฺติตฺวา โภเค จ ภุญฺชสฺสุ, ปุญฺญานิ จ กโรหี’ติ. โส วต, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เอวํ จรนฺโต เอวํ วิหรนฺโต สิกฺขํ ปจฺจกฺขาย หีนายาวตฺติสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. भिक्खूहो, जसे एखाद्या माणसाने दिवसभर तापलेल्या लोखंडाच्या कढईवर पाण्याचे दोन किंवा तीन थेंब टाकले, तर भिक्खूहो, पाण्याचे थेंब पडणे जरी मंद असले, तरी ते त्वरित नष्ट आणि लुप्त होऊन जातील. त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, अशा प्रकारे आचरण करणाऱ्या आणि अशा प्रकारे विहार करणाऱ्या त्या भिक्खूच्या मनात कधीतरी स्मृतीच्या विस्मरणामुळे जर संयोजनाला कारणीभूत असणारे पापी, अकुशल विचार आणि संकल्प उत्पन्न झाले, तर भिक्खूहो, स्मृतीचा उदय जरी मंद असला, तरी तो त्यांना त्वरित सोडून देतो, दूर करतो, नष्ट करतो आणि पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्थितीला पोहोचवतो. भिक्खूहो, अशा प्रकारे भिक्खूचे आचरण आणि विहार सुविदित (अनुकूल) असतो; अशा प्रकारे आचरण आणि विहार करणाऱ्या भिक्खूच्या मागे अभिज्झा (लोभ) आणि दोमनस्स (दौर्मनस्य/खिन्नता) हे पापी, अकुशल धर्म लागत नाहीत. भिक्खूहो, अशा प्रकारे आचरण आणि विहार करणाऱ्या त्या भिक्खूला जर राजे, राजमहामात्र (राजमंत्री), मित्र, अमात्य, नातेवाईक किंवा सगेसोयरे यांनी संपत्तीचे प्रलोभन दाखवून आमंत्रित केले की—'या, गृहस्थ! ही काषाय वस्त्रे तुम्हाला का त्रास देत आहेत? डोके मुंडवून हातात भिक्षापात्र घेऊन का फिरत आहात? या, गृहस्थधर्मात (हीन जीवनात) परत या, संपत्तीचा उपभोग घ्या आणि पुण्यकर्मे करा.' तर भिक्खूहो, तो भिक्खू अशा प्रकारे आचरण आणि विहार करत असताना, शिक्षेचा (शील-नियमांचा) त्याग करून गृहस्थधर्मात परत जाईल, हे अशक्य आहे (अशी कोणतीही शक्यता नाही). ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, คงฺคา นที ปาจีนนินฺนา ปาจีนโปณา ปาจีนปพฺภารา. อถ มหาชนกาโย อาคจฺเฉยฺย กุทฺทาล-ปิฏกํ อาทาย – ‘มยํ อิมํ คงฺคํ นทึ ปจฺฉานินฺนํ กริสฺสาม ปจฺฉาโปณํ ปจฺฉาปพฺภาร’นฺติ. ตํ กึ มญฺญถ, ภิกฺขเว, อปิ นุ โข โส มหาชนกาโย คงฺคํ นทึ ปจฺฉานินฺนํ กเรยฺย ปจฺฉาโปณํ ปจฺฉาปพฺภาร’’นฺติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตํ กิสฺส เหตุ’’? ‘‘คงฺคา, ภนฺเต, นที ปาจีนนินฺนา ปาจีนโปณา ปาจีนปพฺภารา; สา น สุกรา ปจฺฉานินฺนา กาตุํ ปจฺฉาโปณา ปจฺฉาปพฺภารา. ยาวเทว จ ปน โส มหาชนกาโย กิลมถสฺส วิฆาตสฺส ภาคี อสฺสา’’ติ. ‘‘เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ตญฺเจ ภิกฺขุํ เอวํ จรนฺตํ เอวํ วิหรนฺตํ ราชาโน วา ราชมหามตฺตา [Pg.396] วา มิตฺตา วา อมจฺจา วา ญาตี วา สาโลหิตา วา โภเคหิ อภิหฏฺฐุํ ปวาเรยฺยุํ – ‘เอหิ, โภ ปุริส, กึ เต อิเม กาสาวา อนุทหนฺติ, กึ มุณฺโฑ กปาลมนุจรสิ, เอหิ หีนายาวตฺติตฺวา โภเค จ ภุญฺชสฺสุ, ปุญฺญานิ จ กโรหี’ติ. โส วต, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เอวํ จรนฺโต เอวํ วิหรนฺโต สิกฺขํ ปจฺจกฺขาย หีนายาวตฺติสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. ตํ กิสฺส เหตุ? ยญฺหิ ตํ, ภิกฺขเว, จิตฺตํ ทีฆรตฺตํ วิเวกนินฺนํ วิเวกโปณํ วิเวกปพฺภารํ, ตถา หีนายาวตฺติสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชตี’’ติ. สตฺตมํ. भिक्खूहो, जसे गंगा नदी पूर्वेकडे वाहणारी, पूर्वेकडे झुकलेली आणि पूर्वेकडे उतार असणारी आहे. तेव्हा जर लोकांचा मोठा समूह कुदळ आणि टोपली घेऊन आला आणि म्हणाला—'आम्ही या गंगा नदीला पश्चिमेकडे वाहणारी, पश्चिमेकडे झुकलेली आणि पश्चिमेकडे उतार असणारी करू.' भिक्खूहो, तुम्हाला काय वाटते? तो लोकांचा मोठा समूह गंगा नदीला पश्चिमेकडे वाहणारी, पश्चिमेकडे झुकलेली आणि पश्चिमेकडे उतार असणारी करू शकेल का? 'नाही, भन्ते.' 'ते कशामुळे?' 'भन्ते, गंगा नदी पूर्वेकडे वाहणारी, पूर्वेकडे झुकलेली आणि पूर्वेकडे उतार असणारी आहे; तिला पश्चिमेकडे वाहणारी, पश्चिमेकडे झुकलेली आणि पश्चिमेकडे उतार असणारी करणे सोपे नाही. तो लोकांचा समूह केवळ थकवा आणि त्रासाचाच धनी होईल.' तसेच, भिक्खूहो, अशा प्रकारे आचरण आणि विहार करणाऱ्या त्या भिक्खूला जर राजे, राजमहामात्र, मित्र, अमात्य, नातेवाईक किंवा सगेसोयरे यांनी संपत्तीचे प्रलोभन दाखवून आमंत्रित केले की—'या, गृहस्थ! ही काषाय वस्त्रे तुम्हाला का त्रास देत आहेत? डोके मुंडवून हातात भिक्षापात्र घेऊन का फिरत आहात? या, गृहस्थधर्मात परत या, संपत्तीचा उपभोग घ्या आणि पुण्यकर्मे करा.' तर भिक्खूहो, तो भिक्खू अशा प्रकारे आचरण आणि विहार करत असताना, शिक्षेचा त्याग करून गृहस्थधर्मात परत जाईल, हे अशक्य आहे. ते कशामुळे? कारण, भिक्खूहो, ज्याचे चित्त दीर्घकाळापासून विवेकाकडे (एकांतात/प्रविवेक) झुकलेले, विवेकाकडे वळलेले आणि विवेकाकडे उतार असणारे झाले आहे, ते पुन्हा गृहस्थधर्मात परत जाईल, हे अशक्य आहे. ๘. กึสุโกปมสุตฺตํ ८. किंसुकोपम सुत्त ๒๔๕. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยนญฺญตโร ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘กิตฺตาวตา นุ โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’’ติ? ‘‘ยโต โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ, เอตฺตาวตา โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’’ติ. २४५. त्यानंतर एक भिक्खू दुसऱ्या एका भिक्खूपाशी गेला; आणि जवळ जाऊन त्या भिक्खूला म्हणाला—'आवुसो, किती मर्यादेपर्यंत भिक्खूचे दर्शन (ज्ञानदृष्टी) सुविशुद्ध होते?' 'आवुसो, जेव्हा भिक्खू सहा स्पर्शायतनांचा (इंद्रिय-संस्पर्शाच्या स्थानांचा) उदय आणि अस्त यथार्थपणे जाणतो, आवुसो, एवढ्या मर्यादेने भिक्खूचे दर्शन सुविशुद्ध होते.' อถ โข โส ภิกฺขุ อสนฺตุฏฺโฐ ตสฺส ภิกฺขุสฺส ปญฺหเวยฺยากรเณน, เยนญฺญตโร ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘กิตฺตาวตา นุ โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’’ติ? ‘‘ยโต โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ปญฺจนฺนํ อุปาทานกฺขนฺธานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ, เอตฺตาวตา โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’’ติ. त्यानंतर तो भिक्खू त्या भिक्खूच्या प्रश्नाच्या उत्तराने असंतुष्ट राहून, दुसऱ्या एका भिक्खूपाशी गेला; आणि जवळ जाऊन त्या भिक्खूला म्हणाला—'आवुसो, किती मर्यादेपर्यंत भिक्खूचे दर्शन सुविशुद्ध होते?' 'आवुसो, जेव्हा भिक्खू पाच उपादानस्कंधांचा उदय आणि अस्त यथार्थपणे जाणतो, आवुसो, एवढ्या मर्यादेने भिक्खूचे दर्शन सुविशुद्ध होते.' อถ โข โส ภิกฺขุ อสนฺตุฏฺโฐ ตสฺส ภิกฺขุสฺส ปญฺหเวยฺยากรเณน, เยนญฺญตโร ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘กิตฺตาวตา นุ โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’’ติ? ‘‘ยโต โข, อาวุโส, ภิกฺขุ จตุนฺนํ มหาภูตานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ, เอตฺตาวตา โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’’ติ. त्यानंतर तो भिक्खू त्या भिक्खूच्या प्रश्नाच्या उत्तराने असंतुष्ट राहून, दुसऱ्या एका भिक्खूपाशी गेला; आणि जवळ जाऊन त्या भिक्खूला म्हणाला—'आवुसो, किती मर्यादेपर्यंत भिक्खूचे दर्शन सुविशुद्ध होते?' 'आवुसो, जेव्हा भिक्खू चार महाभूतांचा उदय आणि अस्त यथार्थपणे जाणतो, आवुसो, एवढ्या मर्यादेने भिक्खूचे दर्शन सुविशुद्ध होते.' อถ โข โส ภิกฺขุ อสนฺตุฏฺโฐ ตสฺส ภิกฺขุสฺส ปญฺหเวยฺยากรเณน, เยนญฺญตโร ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘กิตฺตาวตา [Pg.397] นุ โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’’ติ? ‘‘ยโต โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ยํ กิญฺจิ สมุทยธมฺมํ, สพฺพํ ตํ นิโรธธมฺมนฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ, เอตฺตาวตา, โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’’ติ. त्यानंतर तो भिक्खू त्या भिक्खूच्या प्रश्नाच्या उत्तराने असंतुष्ट राहून, दुसऱ्या एका भिक्खूपाशी गेला; आणि जवळ जाऊन त्या भिक्खूला म्हणाला—'आवुसो, किती मर्यादेपर्यंत भिक्खूचे दर्शन सुविशुद्ध होते?' 'आवुसो, जेव्हा भिक्खू हे यथार्थपणे जाणतो की—जे काही उदय पावणारे (उत्पत्तीचे स्वभाव असणारे) आहे, ते सर्व निरोध पावणारे (नष्ट होण्याच्या स्वभावाचे) आहे, आवुसो, एवढ्या मर्यादेने भिक्खूचे दर्शन सुविशुद्ध होते.' อถ โข โส ภิกฺขุ อสนฺตุฏฺโฐ ตสฺส ภิกฺขุสฺส ปญฺหเวยฺยากรเณน, เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธาหํ, ภนฺเต, เยนญฺญตโร ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมึ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจํ – กิตฺตาวตา นุ โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’ติ? เอวํ วุตฺเต, ภนฺเต, โส ภิกฺขุ มํ เอตทโวจ – ‘ยโต โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ, เอตฺตาวตา โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’ติ. อถ ขฺวาหํ, ภนฺเต, อสนฺตุฏฺโฐ ตสฺส ภิกฺขุสฺส ปญฺหเวยฺยากรเณน, เยนญฺญตโร ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมึ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจํ – ‘กิตฺตาวตา นุ โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’ติ? เอวํ วุตฺเต, ภนฺเต, โส ภิกฺขุ มํ เอตทโวจ – ‘ยโต โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ปญฺจนฺนํ อุปาทานกฺขนฺธานํ…เป… จตุนฺนํ มหาภูตานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ…เป… ยํ กิญฺจิ สมุทยธมฺมํ, สพฺพํ ตํ นิโรธธมฺมนฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ, เอตฺตาวตา โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’ติ. อถ ขฺวาหํ, ภนฺเต, อสนฺตุฏฺโฐ ตสฺส ภิกฺขุสฺส ปญฺหเวยฺยากรเณน เยน ภควา เตนุปสงฺกมึ ( ). กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’’ติ? तेव्हा तो भिक्खू त्या भिक्खूच्या प्रश्नाच्या उत्तराने असंतुष्ट होऊन जेथे भगवान होते तेथे गेला; आणि भगवंतांजवळ जाऊन भगवंतांना असे म्हणाला – “भंते, मी येथे एका दुसऱ्या भिक्खूपाशी गेलो; आणि त्या भिक्खूपाशी जाऊन त्याला असे विचारले – ‘आवुसो, भिक्खूचे दर्शन किती प्रमाणात सुविशुद्ध होते?’ असे विचारल्यावर, भंते, तो भिक्खू मला म्हणाला – ‘आवुसो, जेव्हा भिक्खू सहा स्पर्शायतनांचा उदय आणि अस्त यथाभूत जाणतो, तेव्हा, आवुसो, भिक्खूचे दर्शन सुविशुद्ध होते.’ त्यावर, भंते, मी त्या भिक्खूच्या प्रश्नाच्या उत्तराने असंतुष्ट होऊन दुसऱ्या एका भिक्खूपाशी गेलो; आणि त्या भिक्खूपाशी जाऊन त्याला असे विचारले – ‘आवुसो, भिक्खूचे दर्शन किती प्रमाणात सुविशुद्ध होते?’ असे विचारल्यावर, भंते, तो भिक्खू मला म्हणाला – ‘आवुसो, जेव्हा भिक्खू पाच उपादानस्कंधांचा...पे... चार महाभूतांचा उदय आणि अस्त यथाभूत जाणतो...पे... जे काही उदय पावणारे आहे, ते सर्व निरोध पावणारे आहे, असे यथाभूत जाणतो, तेव्हा, आवुसो, भिक्खूचे दर्शन सुविशुद्ध होते.’ त्यावर, भंते, मी त्या भिक्खूच्या प्रश्नाच्या उत्तराने असंतुष्ट होऊन जेथे भगवान होते तेथे आलो. भंते, भिक्खूचे दर्शन किती प्रमाणात सुविशुद्ध होते?” ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขุ, ปุริสสฺส กึสุโก อทิฏฺฐปุพฺโพ อสฺส. โส เยนญฺญตโร ปุริโส กึสุกสฺส ทสฺสาวี เตนุปสงฺกเมยฺย. อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ปุริสํ เอวํ วเทยฺย – ‘กีทิโส, โภ ปุริส, กึสุโก’ติ? โส เอวํ วเทยฺย – ‘กาฬโก โข, อมฺโภ ปุริส, กึสุโก – เสยฺยถาปิ ฌามขาณู’ติ. เตน โข ปน, ภิกฺขุ, สมเยน ตาทิโสวสฺส กึสุโก ยถาปิ ตสฺส ปุริสสฺส ทสฺสนํ. อถ โข, โส ภิกฺขุ, ปุริโส อสนฺตุฏฺโฐ ตสฺส ปุริสสฺส ปญฺหเวยฺยากรเณน, เยนญฺญตโร ปุริโส กึสุกสฺส ทสฺสาวี เตนุปสงฺกเมยฺย; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ปุริสํ เอวํ วเทยฺย – ‘กีทิโส[Pg.398], โภ ปุริส, กึสุโก’ติ? โส เอวํ วเทยฺย – ‘โลหิตโก โข, อมฺโภ ปุริส, กึสุโก – เสยฺยถาปิ มํสเปสี’ติ. เตน โข ปน, ภิกฺขุ, สมเยน ตาทิโสวสฺส กึสุโก ยถาปิ ตสฺส ปุริสสฺส ทสฺสนํ. อถ โข โส ภิกฺขุ ปุริโส อสนฺตุฏฺโฐ ตสฺส ปุริสสฺส ปญฺหเวยฺยากรเณน, เยนญฺญตโร ปุริโส กึสุกสฺส ทสฺสาวี เตนุปสงฺกเมยฺย; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ปุริสํ เอวํ วเทยฺย – ‘กีทิโส, โภ ปุริส, กึสุโก’ติ? โส เอวํ วเทยฺย – ‘โอจีรกชาโต โข, อมฺโภ ปุริส, กึสุโก อาทินฺนสิปาฏิโก – เสยฺยถาปิ สิรีโส’ติ. เตน โข ปน, ภิกฺขุ, สมเยน ตาทิโสวสฺส กึสุโก, ยถาปิ ตสฺส ปุริสสฺส ทสฺสนํ. อถ โข โส ภิกฺขุ ปุริโส อสนฺตุฏฺโฐ ตสฺส ปุริสสฺส ปญฺหเวยฺยากรเณน, เยนญฺญตโร ปุริโส กึสุกสฺส ทสฺสาวี เตนุปสงฺกเมยฺย; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ปุริสํ เอวํ วเทยฺย – ‘กีทิโส, โภ ปุริส, กึสุโก’ติ? โส เอวํ วเทยฺย – ‘พหลปตฺตปลาโส สนฺทจฺฉาโย โข, อมฺโภ ปุริส, กึสุโก – เสยฺยถาปิ นิคฺโรโธ’ติ. เตน โข ปน, ภิกฺขุ, สมเยน ตาทิโสวสฺส กึสุโก, ยถาปิ ตสฺส ปุริสสฺส ทสฺสนํ. เอวเมว โข, ภิกฺขุ, ยถา ยถา อธิมุตฺตานํ เตสํ สปฺปุริสานํ ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหติ, ตถา ตถา โข เตหิ สปฺปุริเสหิ พฺยากตํ. “हे भिक्खू, समजा एखाद्या माणसाने पूर्वी कधीही किंशुक (पळसाचे) झाड पाहिलेले नसेल. तो अशा एका माणसाकडे गेला ज्याने किंशुक झाड पाहिले आहे. त्याच्याकडे जाऊन तो त्याला असे विचारेल – ‘हे गृहस्था, किंशुक झाड कसे असते?’ तो त्याला असे उत्तर देईल – ‘हे गृहस्था, किंशुक झाड जळलेल्या खुंटासारखे काळेकुट्ट असते.’ हे भिक्खू, त्या वेळी त्या माणसाच्या दृष्टीने किंशुक झाड अगदी तसेच असेल जसे त्याने पाहिले होते. त्यानंतर, हे भिक्खू, तो माणूस त्या माणसाच्या उत्तराने असंतुष्ट होऊन, किंशुक झाड पाहिलेल्या दुसऱ्या एका माणसाकडे गेला. त्याच्याकडे जाऊन तो त्याला असे विचारेल – ‘हे गृहस्था, किंशुक झाड कसे असते?’ तो त्याला असे उत्तर देईल – ‘हे गृहस्था, किंशुक झाड मांसाच्या तुकड्यासारखे लालभडक असते.’ हे भिक्खू, त्या वेळी त्या माणसाच्या दृष्टीने किंशुक झाड अगदी तसेच असेल जसे त्याने पाहिले होते. त्यानंतर, हे भिक्खू, तो माणूस त्या माणसाच्या उत्तराने असंतुष्ट होऊन, किंशुक झाड पाहिलेल्या आणखी एका माणसाकडे गेला. त्याच्याकडे जाऊन तो त्याला असे विचारेल – ‘हे गृहस्था, किंशुक झाड कसे असते?’ तो त्याला असे उत्तर देईल – ‘हे गृहस्था, किंशुक झाड शिरीषाच्या झाडासारखे लोंबकळणाऱ्या सालीचे आणि लटकणाऱ्या शेंगांचे असते.’ हे भिक्खू, त्या वेळी त्या माणसाच्या दृष्टीने किंशुक झाड अगदी तसेच असेल जसे त्याने पाहिले होते. त्यानंतर, हे भिक्खू, तो माणूस त्या माणसाच्या उत्तराने असंतुष्ट होऊन, किंशुक झाड पाहिलेल्या आणखी एका माणसाकडे गेला. त्याच्याकडे जाऊन तो त्याला असे विचारेल – ‘हे गृहस्था, किंशुक झाड कसे असते?’ तो त्याला असे उत्तर देईल – ‘हे गृहस्था, किंशुक झाड वडाच्या झाडासारखे दाट पानांनी आणि फांद्यांनी युक्त असून थंडगार सावली देणारे असते.’ हे भिक्खू, त्या वेळी त्या माणसाच्या दृष्टीने किंशुक झाड अगदी तसेच असेल जसे त्याने पाहिले होते. त्याचप्रमाणे, हे भिक्खू, ज्या ज्या प्रकारे त्या सत्पुरुषांचे दर्शन सुविशुद्ध झाले होते, त्या त्या प्रकारेच त्यांनी उत्तर दिले.” ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขุ, รญฺโญ ปจฺจนฺติมํ นครํ ทฬฺหุทฺธาปํ ทฬฺหปาการโตรณํ ฉทฺวารํ. ตตฺรสฺส โทวาริโก ปณฺฑิโต พฺยตฺโต เมธาวี, อญฺญาตานํ นิวาเรตา, ญาตานํ ปเวเสตา. ปุรตฺถิมาย ทิสาย อาคนฺตฺวา สีฆํ ทูตยุคํ ตํ โทวาริกํ เอวํ วเทยฺย – ‘กหํ, โภ ปุริส, อิมสฺส นครสฺส นครสฺสามี’ติ? โส เอวํ วเทยฺย – ‘เอโส, ภนฺเต, มชฺเฌ สิงฺฆาฏเก นิสินฺโน’ติ. อถ โข ตํ สีฆํ ทูตยุคํ นครสฺสามิกสฺส ยถาภูตํ วจนํ นิยฺยาเตตฺวา ยถาคตมคฺคํ ปฏิปชฺเชยฺย. ปจฺฉิมาย ทิสาย อาคนฺตฺวา สีฆํ ทูตยุคํ…เป… อุตฺตราย ทิสาย… ทกฺขิณาย ทิสาย อาคนฺตฺวา สีฆํ ทูตยุคํ ตํ โทวาริกํ เอวํ วเทยฺย – ‘กหํ, โภ ปุริส, อิมสฺส นครสฺสามี’ติ? โส เอวํ วเทยฺย – ‘เอโส, ภนฺเต, มชฺเฌ สิงฺฆาฏเก นิสินฺโน’ติ. อถ โข ตํ สีฆํ ทูตยุคํ นครสฺสามิกสฺส ยถาภูตํ วจนํ นิยฺยาเตตฺวา ยถาคตมคฺคํ ปฏิปชฺเชยฺย. “हे भिक्खू, समजा एखाद्या राजाचे मजबूत पाया असलेले, मजबूत तटबंदी व वेशी असलेले आणि सहा वेशी (द्वारे) असलेले एखादे सीमावर्ती नगर आहे. तेथे एक चतुर, कुशल आणि बुद्धिमान द्वारपाल आहे, जो अनोळखी लोकांना आत येण्यापासून रोखतो आणि ओळखीच्या लोकांनाच आत प्रवेश देतो. पूर्व दिशेकडून वेगाने येणारे दोन दूत त्या द्वारपालाल असे विचारतील – ‘हे गृहस्था, या नगराचा स्वामी कुठे आहे?’ तो द्वारपाल असे उत्तर देईल – ‘भंते, ते मध्यभागी असलेल्या चौकात बसले आहेत.’ त्यानंतर ते वेगवान दूत नगराच्या स्वामीला जसा आहे तसा संदेश देऊन ज्या मार्गाने आले होते त्याच मार्गाने परत जातील. पश्चिम दिशेकडून वेगाने येणारे दोन दूत...पे... उत्तर दिशेकडून... दक्षिण दिशेकडून वेगाने येणारे दोन दूत त्या द्वारपालाल असे विचारतील – ‘हे गृहस्था, या नगराचा स्वामी कुठे आहे?’ तो द्वारपाल असे उत्तर देईल – ‘भंते, ते मध्यभागी असलेल्या चौकात बसले आहेत.’ त्यानंतर ते वेगवान दूत नगराच्या स्वामीला जसा आहे तसा संदेश देऊन ज्या मार्गाने आले होते त्याच मार्गाने परत जातील।” ‘‘อุปมา [Pg.399] โข มฺยายํ, ภิกฺขุ, กตา อตฺถสฺส วิญฺญาปนาย. อยญฺเจตฺถ อตฺโถ – ‘นคร’นฺติ โข, ภิกฺขุ, อิมสฺเสตํ จาตุมหาภูติกสฺส กายสฺส อธิวจนํ มาตาเปตฺติกสมฺภวสฺส โอทนกุมฺมาสูปจยสฺส อนิจฺจุจฺฉาทนปริมทฺทนเภทนวิทฺธํสนธมฺมสฺส. ‘ฉ ทฺวารา’ติ โข, ภิกฺขุ, ฉนฺเนตํ อชฺฌตฺติกานํ อายตนานํ อธิวจนํ. ‘โทวาริโก’ติ โข, ภิกฺขุ, สติยา เอตํ อธิวจนํ. ‘สีฆํ ทูตยุค’นฺติ โข, ภิกฺขุ, สมถวิปสฺสนาเนตํ อธิวจนํ. ‘นครสฺสามี’ติ โข, ภิกฺขุ, วิญฺญาณสฺเสตํ อธิวจนํ. ‘มชฺเฌ สิงฺฆาฏโก’ติ โข, ภิกฺขุ, จตุนฺเนตํ มหาภูตานํ อธิวจนํ – ปถวีธาตุยา, อาโปธาตุยา, เตโชธาตุยา, วาโยธาตุยา. ‘ยถาภูตํ วจน’นฺติ โข, ภิกฺขุ, นิพฺพานสฺเสตํ อธิวจนํ. ‘ยถาคตมคฺโค’ติ โข, ภิกฺขุ, อริยสฺเสตํ อฏฺฐงฺคิกสฺส มคฺคสฺส อธิวจนํ, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิยา…เป… สมฺมาสมาธิสฺสา’’ติ. อฏฺฐมํ. “हे भिक्खू, अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी मी ही उपमा दिली आहे. आणि याचा अर्थ असा आहे – ‘नगर’ हे भिक्खू, चार महाभूतांनी बनलेल्या, माता-पित्यांपासून उत्पन्न झालेल्या, भात आणि पेज याने पुष्ट झालेल्या, अनित्य असणाऱ्या, उटणे लावणे, चोळणे, विखुरणे आणि नष्ट होणे हा स्वभाव असणाऱ्या या शरीराचे नाव आहे. ‘सहा द्वारे’ हे भिक्खू, सहा आध्यात्मिक आयतनांचे नाव आहे. ‘द्वारपाल’ हे भिक्खू, सतीचे (स्मृतीचे) नाव आहे. ‘वेगवान दूतांची जोडी’ हे भिक्खू, समथ आणि विपस्सनेचे नाव आहे. ‘नगराचा स्वामी’ हे भिक्खू, विज्ञानाचे नाव आहे. ‘मध्यभागी असलेला चौक’ हे भिक्खू, चार महाभूतांचे नाव आहे – पृथ्वीधातू, आपधातू, तेजोधातू आणि वायोधातू. ‘यथाभूत वचन’ हे भिक्खू, निर्वाणाचे नाव आहे. ‘ज्या मार्गाने ते आले तो मार्ग’ हे भिक्खू, आर्य अष्टांगिक मार्गाचे नाव आहे, म्हणजेच – सम्यक दृष्टी... पे... सम्यक समाधी.” आठवे. ๙. วีโณปมสุตฺตํ ९. वीणोपम सुत्त ๒๔๖. ‘‘ยสฺส กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ อุปฺปชฺเชยฺย ฉนฺโท วา ราโค วา โทโส วา โมโห วา ปฏิฆํ วาปิ เจตโส, ตโต จิตฺตํ นิวาเรยฺย. สภโย เจโส มคฺโค สปฺปฏิภโย จ สกณฺฏโก จ สคหโน จ อุมฺมคฺโค จ กุมฺมคฺโค จ ทุหิติโก จ. อสปฺปุริสเสวิโต เจโส มคฺโค, น เจโส มคฺโค สปฺปุริเสหิ เสวิโต. น ตฺวํ เอตํ อรหสีติ. ตโต จิตฺตํ นิวารเย จกฺขุวิญฺเญยฺเยหิ รูเปหิ…เป… ยสฺส กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา ชิวฺหาวิญฺเญยฺเยสุ รเสสุ…เป… มโนวิญฺเญยฺเยสุ ธมฺเมสุ อุปฺปชฺเชยฺย ฉนฺโท วา ราโค วา โทโส วา โมโห วา ปฏิฆํ วาปิ เจตโส ตโต จิตฺตํ นิวาเรยฺย. สภโย เจโส มคฺโค สปฺปฏิภโย จ สกณฺฏโก จ สคหโน จ อุมฺมคฺโค จ กุมฺมคฺโค จ ทุหิติโก จ. อสปฺปุริสเสวิโต เจโส มคฺโค, น เจโส มคฺโค สปฺปุริเสหิ เสวิโต. น ตฺวํ เอตํ อรหสีติ. ตโต จิตฺตํ นิวารเย มโนวิญฺเญยฺเยหิ ธมฺเมหิ. २४६. “भिक्खूंनो, जर कोणत्याही भिक्खू किंवा भिक्खुणीच्या मनात डोळ्यांनी जाणता येणाऱ्या रूपांविषयी छंद (इच्छा), राग (आसक्ती), द्वेष, मोह किंवा मनाचा प्रतिघात उत्पन्न झाला, तर त्याने त्यापासून आपले चित्त परावृत्त करावे. ‘हा मार्ग भययुक्त आहे, संकटमय आहे, काट्यांनी भरलेला आहे, झाडी-झुडपांनी वेढलेला आहे, चुकीचा मार्ग आहे, कुमार्ग आहे आणि अत्यंत कष्टदायक आहे. हा असत्पुरुषांनी आचरलेला मार्ग आहे, सत्पुरुषांनी आचरलेला मार्ग नाही. तू या मार्गावर चालण्यास योग्य नाहीस.’ अशा प्रकारे, डोळ्यांनी जाणता येणाऱ्या रूपांपासून चित्त परावृत्त करावे... पे... भिक्खूंनो, जर कोणत्याही भिक्खू किंवा भिक्खुणीच्या मनात जिभेने जाणता येणाऱ्या रसांविषयी... पे... मनाने जाणता येणाऱ्या धर्मांविषयी छंद, राग, द्वेष, मोह किंवा मनाचा प्रतिघात उत्पन्न झाला, तर त्याने त्यापासून आपले चित्त परावृत्त करावे. ‘हा मार्ग भययुक्त आहे, संकटमय आहे, काट्यांनी भरलेला आहे, झाडी-झुडपांनी वेढलेला आहे, चुकीचा मार्ग आहे, कुमार्ग आहे आणि अत्यंत कष्टदायक आहे. हा असत्पुरुषांनी आचरलेला मार्ग आहे, सत्पुरुषांनी आचरलेला मार्ग नाही. तू या मार्गावर चालण्यास योग्य नाहीस.’ अशा प्रकारे, मनाने जाणता येणाऱ्या धर्मांपासून चित्त परावृत्त करावे.” ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, กิฏฺฐํ สมฺปนฺนํ. กิฏฺฐารกฺโข จ ปมตฺโต, โคโณ จ กิฏฺฐาโท อทุํ กิฏฺฐํ โอตริตฺวา ยาวทตฺถํ มทํ อาปชฺเชยฺย ปมาทํ อาปชฺเชยฺย[Pg.400]; เอวเมว โข, ภิกฺขเว, อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน ฉสุ ผสฺสายตเนสุ อสํวุตการี ปญฺจสุ กามคุเณสุ ยาวทตฺถํ มทํ อาปชฺชติ ปมาทํ อาปชฺชติ. “भिक्खूंनो, समजा जसे एखादे पीक पिकून तयार झाले आहे आणि पिकाचा राखणदार गाफील आहे. पीक खाणारा एखादा बैल त्या पिकात शिरून आपल्या इच्छेनुसार तृप्त होईपर्यंत खाऊन उन्मत्त होईल आणि गाफील होईल; त्याचप्रमाणे, भिक्खूंनो, अश्रुतवान पृथग्जन सहा स्पर्शायतनांवर संयम न ठेवता, पाच कामगुणांमध्ये आपल्या इच्छेनुसार आकंठ बुडून उन्मत्त होतो आणि गाफील होतो.” ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, กิฏฺฐํ สมฺปนฺนํ กิฏฺฐารกฺโข จ อปฺปมตฺโต โคโณ จ กิฏฺฐาโท อทุํ กิฏฺฐํ โอตเรยฺย. ตเมนํ กิฏฺฐารกฺโข นาสายํ สุคฺคหิตํ คณฺเหยฺย. นาสายํ สุคฺคหิตํ คเหตฺวา อุปริฆฏายํ สุนิคฺคหิตํ นิคฺคณฺเหยฺย. อุปริฆฏายํ สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา ทณฺเฑน สุตาฬิตํ ตาเฬยฺย. ทณฺเฑน สุตาฬิตํ ตาเฬตฺวา โอสชฺเชยฺย. ทุติยมฺปิ โข, ภิกฺขเว …เป… ตติยมฺปิ โข, ภิกฺขเว, โคโณ กิฏฺฐาโท อทุํ กิฏฺฐํ โอตเรยฺย. ตเมนํ กิฏฺฐารกฺโข นาสายํ สุคฺคหิตํ คณฺเหยฺย. นาสายํ สุคฺคหิตํ คเหตฺวา อุปริฆฏายํ สุนิคฺคหิตํ นิคฺคณฺเหยฺย. อุปริฆฏายํ สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา ทณฺเฑน สุตาฬิตํ ตาเฬยฺย. ทณฺเฑน สุตาฬิตํ ตาเฬตฺวา โอสชฺเชยฺย. เอวญฺหิ โส, ภิกฺขเว, โคโณ กิฏฺฐาโท คามคโต วา อรญฺญคโต วา, ฐานพหุโล วา อสฺส นิสชฺชพหุโล วา น ตํ กิฏฺฐํ ปุน โอตเรยฺย – ตเมว ปุริมํ ทณฺฑสมฺผสฺสํ สมนุสฺสรนฺโต. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ยโต โข ภิกฺขุโน ฉสุ ผสฺสายตเนสุ จิตฺตํ อุทุชิตํ โหติ สุทุชิตํ, อชฺฌตฺตเมว สนฺติฏฺฐติ, สนฺนิสีทติ, เอโกทิ โหติ, สมาธิยติ. “भिक्खूंनो, समजा जसे एखादे पीक पिकून तयार झाले आहे आणि पिकाचा राखणदार जागरूक आहे. पीक खाणारा तो बैल त्या पिकात शिरला, तर पिकाचा राखणदार त्याला नाकातून घट्ट पकडेल. नाकातून घट्ट पकडल्यानंतर, त्याच्या शिंगांच्या मधल्या भागावर घट्ट दाबून त्याला नियंत्रणात आणेल. शिंगांच्या मधल्या भागावर घट्ट दाबून नियंत्रणात आणल्यानंतर, तो त्याला काठीने चांगला चोप देईल. काठीने चांगला चोप दिल्यानंतर तो त्याला सोडून देईल. दुसऱ्यांदाही, भिक्खूंनो... पे... तिसऱ्यांदाही, भिक्खूंनो, पीक खाणारा तो बैल त्या पिकात शिरला, तर पिकाचा राखणदार त्याला नाकातून घट्ट पकडेल. नाकातून घट्ट पकडल्यानंतर, त्याच्या शिंगांच्या मधल्या भागावर घट्ट दाबून त्याला नियंत्रणात आणेल. शिंगांच्या मधल्या भागावर घट्ट दाबून नियंत्रणात आणल्यानंतर, तो त्याला काठीने चांगला चोप देईल. काठीने चांगला चोप दिल्यानंतर तो त्याला सोडून देईल. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे तो पीक खाणारा बैल गावात गेला असो वा जंगलात गेला असो, उभा असो वा बसलेला असो, पूर्वी मिळालेल्या काठीच्या प्रहाराचे स्मरण करून तो पुन्हा त्या पिकात शिरणार नाही. त्याचप्रमाणे, भिक्खूंनो, जेव्हा भिक्खूचे चित्त सहा स्पर्शायतनांच्या बाबतीत दमन केले जाते, चांगल्या प्रकारे दमन केले जाते, तेव्हा ते केवळ अंतरातच स्थिर होते, शांत होते, एकाग्र होते आणि समाधीत लीन होते.” ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, รญฺโญ วา ราชมหามตฺตสฺส วา วีณาย สทฺโท อสฺสุตปุพฺโพ อสฺส. โส วีณาสทฺทํ สุเณยฺย. โส เอวํ วเทยฺย – ‘อมฺโภ, กสฺส นุ โข เอโส สทฺโท เอวํรชนีโย เอวํกมนีโย เอวํมทนีโย เอวํมุจฺฉนีโย เอวํพนฺธนีโย’ติ? ตเมนํ เอวํ วเทยฺยุํ – ‘เอสา, โข, ภนฺเต, วีณา นาม, ยสฺสา เอโส สทฺโท เอวํรชนีโย เอวํกมนีโย เอวํมทนีโย เอวํมุจฺฉนีโย เอวํพนฺธนีโย’ติ. โส เอวํ วเทยฺย – ‘คจฺฉถ เม, โภ, ตํ วีณํ อาหรถา’ติ. ตสฺส ตํ วีณํ อาหเรยฺยุํ. ตเมนํ เอวํ วเทยฺยุํ – ‘อยํ โข สา, ภนฺเต, วีณา ยสฺสา เอโส สทฺโท เอวํรชนีโย เอวํกมนีโย เอวํมทนีโย เอวํมุจฺฉนีโย เอวํพนฺธนีโย’ติ. โส เอวํ วเทยฺย – ‘อลํ เม, โภ, ตาย วีณาย, ตเมว เม สทฺทํ อาหรถา’ติ. ตเมนํ เอวํ วเทยฺยุํ – ‘อยํ โข, ภนฺเต, วีณา นาม อเนกสมฺภารา มหาสมฺภารา. อเนเกหิ สมฺภาเรหิ สมารทฺธา วทติ[Pg.401], เสยฺยถิทํ – โทณิญฺจ ปฏิจฺจ จมฺมญฺจ ปฏิจฺจ ทณฺฑญฺจ ปฏิจฺจ อุปธารเณ จ ปฏิจฺจ ตนฺติโย จ ปฏิจฺจ โกณญฺจ ปฏิจฺจ ปุริสสฺส จ ตชฺชํ วายามํ ปฏิจฺจ เอวายํ, ภนฺเต, วีณา นาม อเนกสมฺภารา มหาสมฺภารา. อเนเกหิ สมฺภาเรหิ สมารทฺธา วทตี’ติ. โส ตํ วีณํ ทสธา วา สตธา วา ผาเลยฺย, ทสธา วา สตธา วา ตํ ผาเลตฺวา สกลิกํ สกลิกํ กเรยฺย. สกลิกํ สกลิกํ กริตฺวา อคฺคินา ฑเหยฺย, อคฺคินา ฑหิตฺวา มสึ กเรยฺย. มสึ กริตฺวา มหาวาเต วา โอผุเนยฺย, นทิยา วา สีฆโสตาย ปวาเหยฺย. โส เอวํ วเทยฺย – ‘อสตี กิรายํ, โภ, วีณา นาม, ยเถวํ ยํ กิญฺจิ วีณา นาม เอตฺถ จ ปนายํ ชโน อติเวลํ ปมตฺโต ปลฬิโต’ติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ รูปํ สมนฺเวสติ ยาวตา รูปสฺส คติ, เวทนํ สมนฺเวสติ ยาวตา เวทนาย คติ, สญฺญํ สมนฺเวสติ ยาวตา สญฺญาย คติ, สงฺขาเร สมนฺเวสติ ยาวตา สงฺขารานํ คติ, วิญฺญาณํ สมนฺเวสติ ยาวตา วิญฺญาณสฺส คติ. ตสฺส รูปํ สมนฺเวสโต ยาวตา รูปสฺส คติ, เวทนํ สมนฺเวสโต…เป… สญฺญํ… สงฺขาเร… วิญฺญาณํ สมนฺเวสโต ยาวตา วิญฺญาณสฺส คติ. ยมฺปิสฺส ตํ โหติ อหนฺติ วา มมนฺติ วา อสฺมีติ วา ตมฺปิ ตสฺส น โหตี’’ติ. นวมํ. “भिक्खूंनो, समजा एखाद्या राजाने किंवा राजअमात्याने पूर्वी कधीही विणेचा आवाज ऐकला नसेल. त्याने विणेचा आवाज ऐकला आणि तो म्हणाला, 'अहो माणसा, हा कोणाचा आवाज आहे जो इतका मोहक, इतका सुंदर, इतका मादक, इतका भुरळ पाडणारा आणि इतका बांधून ठेवणारा आहे?' त्यावर लोक त्याला म्हणतील, 'महाराज, ही विणा नावाची वस्तू आहे, जिचा हा आवाज इतका मोहक, इतका सुंदर, इतका मादक, इतका भुरळ पाडणारा आणि इतका बांधून ठेवणारा आहे.' तो राजा म्हणेल, 'जा, माझ्यासाठी ती विणा घेऊन या.' मग ते लोक त्याच्यासाठी ती विणा घेऊन येतील. ते त्याला म्हणतील, 'महाराज, हीच ती विणा आहे, जिचा हा आवाज इतका मोहक, सुंदर, मादक, भुरळ पाडणारा आणि बांधून ठेवणारा आहे.' तो राजा म्हणेल, 'अहो, मला या विणेचे काही काम नाही, मला फक्त तो आवाजच आणून द्या.' त्यावर ते लोक त्याला म्हणतील, 'महाराज, विणा ही अनेक घटकांनी, अनेक भागांनी मिळून बनलेली असते. अनेक घटकांच्या एकत्र येण्याने ती वाजते; जसे की— विणेचे भांडे (खोलगट भाग), चामडे, दांडी, आधार देणारे भाग, तारा, कोन (वाजवण्याची काठी) आणि माणसाचे योग्य प्रयत्न यावर अवलंबून ती वाजते. महाराज, अशा प्रकारे ही विणा अनेक घटकांनी बनलेली असून, अनेक भागांच्या साहाय्याने वाजते.' मग तो राजा त्या विणेचे दहा किंवा शंभर तुकडे करेल. तिचे दहा किंवा शंभर तुकडे करून तिचे बारीक बारीक कपचे करेल. बारीक तुकडे करून तो ते आगीत जाळून टाकेल, आगीत जाळून त्याची राख करेल. राख करून तो ती मोठ्या वाऱ्यात उडवून देईल किंवा वेगवान प्रवाहाच्या नदीत वाहून देईल. मग तो राजा असे म्हणेल, 'अहो, ही विणा नावाची वस्तू खरोखरच निरर्थक आहे, आणि विणा नावाची कोणतीही वस्तू अशीच निरर्थक असते. परंतु, सामान्य लोक मात्र तिच्यामध्ये अत्यंत बेसावध आणि आसक्त होतात.' भिक्खूंनो, याचप्रमाणे भिक्खू रूपाचा शोध घेतो, जिथपर्यंत रूपाची गती आहे; वेदनेचा शोध घेतो, जिथपर्यंत वेदनेची गती आहे; संज्ञेचा शोध घेतो, जिथपर्यंत संज्ञेची गती आहे; संस्कारांचा शोध घेतो, जिथपर्यंत संस्कारांची गती आहे; विज्ञानाचा शोध घेतो, जिथपर्यंत विज्ञानाची गती आहे. जेव्हा तो रूपाचा शोध घेतो जिथपर्यंत रूपाची गती आहे, वेदनेचा शोध घेतो... संज्ञेचा... संस्कारांचा... विज्ञानाचा शोध घेतो जिथपर्यंत विज्ञानाची गती आहे, तेव्हा त्याच्या मनात पूर्वी निर्माण होणारे 'मी', 'माझे' किंवा 'मी आहे' असे जे काही अहंकारयुक्त विचार होते, ते नष्ट होतात.” नववे सूत्र समाप्त. ๑๐. ฉปฺปาณโกปมสุตฺตํ १०. छप्पाणकोपम सुत्त (सहा प्राण्यांच्या उपमेचे सूत्र) ๒๔๗. ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ปุริโส อรุคตฺโต ปกฺกคตฺโต สรวนํ ปวิเสยฺย. ตสฺส กุสกณฺฏกา เจว ปาเท วิชฺเฌยฺยุํ, สรปตฺตานิ จ คตฺตานิ วิเลเขยฺยุํ. เอวญฺหิ โส, ภิกฺขเว, ปุริโส ภิยฺโยโสมตฺตาย ตโตนิทานํ ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวทิเยถ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, อิเธกจฺโจ ภิกฺขุ คามคโต วา อรญฺญคโต วา ลภติ วตฺตารํ – ‘อยญฺจ โส อายสฺมา เอวํการี เอวํสมาจาโร อสุจิคามกณฺฏโก’ติ. ตํ กณฺฏโกติ อิติ วิทิตฺวา สํวโร จ อสํวโร จ เวทิตพฺโพ. २४७. “भिक्खूंनो, समजा एखादा माणूस ज्याच्या अंगावर जखमा झाल्या आहेत आणि त्या पिकल्या आहेत, तो काट्यांच्या जंगलात शिरला. तिथे कुसळांचे काटे त्याच्या पायात रुतले आणि गवताची पाती त्याच्या जखम झालेल्या अंगाला ओरखडू लागली. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे तो माणूस त्या काट्यांमुळे अत्यंत तीव्र दुःख आणि मनस्ताप सहन करेल. भिक्खूंनो, याचप्रमाणे या धम्मात एखादा भिक्खू गावात किंवा जंगलात गेला असता, त्याला असे बोलणारे लोक भेटतात की, 'हा आयुष्यमान अशा प्रकारची कृत्ये करणारा, असे आचरण करणारा, अपवित्र आणि गावाचा काटा आहे.' त्याला 'काटा' असे जाणून, संयम (संवर) आणि असंयम (असंवर) काय आहे हे समजून घेतले पाहिजे.” ‘‘กถญฺจ[Pg.402], ภิกฺขเว, อสํวโร โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา ปิยรูเป รูเป อธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป รูเป พฺยาปชฺชติ, อนุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ ปริตฺตเจตโส. ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ, ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. โสเตน สทฺทํ สุตฺวา… ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตฺวา… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา… กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสิตฺวา… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ปิยรูเป ธมฺเม อธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป ธมฺเม พฺยาปชฺชติ, อนุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ ปริตฺตเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ, ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. “आणि भिक्खूंनो, असंयम (असंवर) कसा असतो? येथे एखादा भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहून प्रिय वाटणाऱ्या रूपाकडे आकर्षित होतो आणि अप्रिय वाटणाऱ्या रूपाबद्दल द्वेष करतो. तो शरीराविषयीची स्मृती (कायगतासती) प्रस्थापित न करता, संकुचित चित्ताने राहतो. ज्यामध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी, अकुशल विचार पूर्णपणे नष्ट होतात, ती चेतोविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्ती तो जशी आहे तशी (यथाभूत) जाणत नाही. कानाने आवाज ऐकून... नाकाने गंध घेऊन... जिभेने रस चाखून... शरीराने स्पर्श अनुभवून... मनाने विचार जाणून तो प्रिय वाटणाऱ्या विचारांकडे आकर्षित होतो आणि अप्रिय वाटणाऱ्या विचारांबद्दल द्वेष करतो. तो शरीराविषयीची स्मृती प्रस्थापित न करता, संकुचित चित्ताने राहतो. ज्यामध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी, अकुशल विचार पूर्णपणे नष्ट होतात, ती चेतोविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्ती तो जशी आहे तशी जाणत नाही.” ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ปุริโส ฉปฺปาณเก คเหตฺวา นานาวิสเย นานาโคจเร ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. อหึ คเหตฺวา ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. สุสุมารํ คเหตฺวา ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. ปกฺขึ คเหตฺวา ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. กุกฺกุรํ คเหตฺวา ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. สิงฺคาลํ คเหตฺวา ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. มกฺกฏํ คเหตฺวา ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺธิตฺวา มชฺเฌ คณฺฐึ กริตฺวา โอสฺสชฺเชยฺย. อถ โข, เต, ภิกฺขเว, ฉปฺปาณกา นานาวิสยา นานาโคจรา สกํ สกํ โคจรวิสยํ อาวิญฺเฉยฺยุํ – อหิ อาวิญฺเฉยฺย ‘วมฺมิกํ ปเวกฺขามี’ติ, สุสุมาโร อาวิญฺเฉยฺย ‘อุทกํ ปเวกฺขามี’ติ, ปกฺขี อาวิญฺเฉยฺย ‘อากาสํ เฑสฺสามี’ติ, กุกฺกุโร อาวิญฺเฉยฺย ‘คามํ ปเวกฺขามี’ติ, สิงฺคาโล อาวิญฺเฉยฺย ‘สีวถิกํ ปเวกฺขามี’ติ, มกฺกโฏ อาวิญฺเฉยฺย ‘วนํ ปเวกฺขามี’ติ. ยทา โข เต, ภิกฺขเว, ฉปฺปาณกา ฌตฺตา อสฺสุ กิลนฺตา, อถ โข โย เนสํ ปาณกานํ พลวตโร อสฺส ตสฺส เต อนุวตฺเตยฺยุํ, อนุวิธาเยยฺยุํ วสํ คจฺเฉยฺยุํ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ยสฺส กสฺสจิ ภิกฺขุโน กายคตาสติ อภาวิตา อพหุลีกตา, ตํ จกฺขุ อาวิญฺฉติ มนาปิเยสุ รูเปสุ, อมนาปิยา รูปา ปฏิกูลา โหนฺติ…เป… มโน อาวิญฺฉติ มนาปิเยสุ ธมฺเมสุ, อมนาปิยา ธมฺมา ปฏิกูลา โหนฺติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, อสํวโร โหติ. “भिक्खूंनो, समजा एखाद्या माणसाने वेगवेगळ्या अधिवासातील आणि वेगवेगळ्या खाद्याच्या शोधात असणाऱ्या सहा प्राण्यांना पकडले आणि त्यांना मजबूत दोरीने बांधले. त्याने साप पकडून मजबूत दोरीने बांधला, मगर पकडून मजबूत दोरीने बांधली, पक्षी पकडून मजबूत दोरीने बांधला, कुत्रा पकडून मजबूत दोरीने बांधला, कोल्हा पकडून मजबूत दोरीने बांधला आणि माकड पकडून मजबूत दोरीने बांधले. त्यांना मजबूत दोरीने बांधून, मध्यभागी एक गाठ मारून सोडून दिले. भिक्खूंनो, त्यानंतर ते वेगवेगळ्या अधिवासातील आणि वेगवेगळ्या खाद्याच्या शोधात असणारे सहा प्राणी आपापल्या क्षेत्राकडे खेचू लागतील— साप 'मी वारुळात शिरेन' म्हणून खेचेल, मगर 'मी पाण्यात शिरेन' म्हणून खेचेल, पक्षी 'मी आकाशात उडेन' म्हणून खेचेल, कुत्रा 'मी गावात शिरेन' म्हणून खेचेल, कोल्हा 'मी स्मशानात शिरेन' म्हणून खेचेल आणि माकड 'मी जंगलात शिरेन' म्हणून खेचेल. भिक्खूंनो, जेव्हा ते सहाही प्राणी भुकेले आणि थकलेले असतील, तेव्हा त्यांच्यापैकी जो प्राणी सर्वात बलवान असेल, इतर सर्व प्राणी त्याच्या मागे जातील, त्याचे अनुकरण करतील आणि त्याच्या नियंत्रणाखाली येतील. भिक्खूंनो, याचप्रमाणे ज्या कोणत्याही भिक्खूने शरीराविषयीची स्मृती (कायगतासती) विकसित केलेली नसते आणि तिचा वारंवार सराव केलेला नसतो, त्याला डोळे प्रिय वाटणाऱ्या रूपांकडे खेचतात आणि अप्रिय रूपे त्याला प्रतिकूल वाटतात... तसेच कान, नाक, जीभ, त्वचा आणि मन त्याला प्रिय वाटणाऱ्या विचारांकडे खेचते आणि अप्रिय विचार त्याला प्रतिकूल वाटतात. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे असंयम (असंवर) होतो.” ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, สํวโร โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา ปิยรูเป รูเป นาธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป รูเป น พฺยาปชฺชติ, อุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ [Pg.403] วิหรติ อปฺปมาณเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ ปชานาติ, ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ…เป… ชิวฺหา รสํ สายิตฺวา…เป… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ปิยรูเป ธมฺเม นาธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป ธมฺเม น พฺยาปชฺชติ, อุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ อปฺปมาณเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ ปชานาติ ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. भिक्खूंनो, संवर (संयम) कसा होतो? येथे, भिक्खूंनो, भिक्खू डोळ्याने रूप पाहून प्रिय वाटणाऱ्या रूपावर आसक्त होत नाही आणि अप्रिय वाटणाऱ्या रूपावर द्वेष करत नाही. तो शरीराविषयीची स्मृती (कायागतासती) प्रस्थापित करून, अमर्याद चित्ताने विहार करतो. आणि ज्यामध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले ते पापी अकुशल धर्म पूर्णपणे निरुद्ध होतात, ती चेतोविमुत्ती आणि प्रज्ञाविमुत्ती तो यथाभूत (जशी आहे तशी) जाणतो... पे... जिभेने रसाची चव घेऊन... पे... मनाने धर्माला (विचाराला) जाणून प्रिय वाटणाऱ्या धर्मावर आसक्त होत नाही आणि अप्रिय वाटणाऱ्या धर्मावर द्वेष करत नाही. तो शरीराविषयीची स्मृती प्रस्थापित करून, अमर्याद चित्ताने विहार करतो. आणि ज्यामध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले ते पापी अकुशल धर्म पूर्णपणे निरुद्ध होतात, ती चेतोविमुत्ती आणि प्रज्ञाविमुत्ती तो यथाभूत जाणतो. ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ปุริโส ฉปฺปาณเก คเหตฺวา นานาวิสเย นานาโคจเร ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. อหึ คเหตฺวา ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. สุสุมารํ คเหตฺวา ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. ปกฺขึ คเหตฺวา…เป… กุกฺกุรํ คเหตฺวา… สิงฺคาลํ คเหตฺวา… มกฺกฏํ คเหตฺวา ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺธิตฺวา ทฬฺเห ขีเล วา ถมฺเภ วา อุปนิพนฺเธยฺย. อถ โข เต, ภิกฺขเว, ฉปฺปาณกา นานาวิสยา นานาโคจรา สกํ สกํ โคจรวิสยํ อาวิญฺเฉยฺยุํ – อหิ อาวิญฺเฉยฺย ‘วมฺมิกํ ปเวกฺขามี’ติ, สุสุมาโร อาวิญฺเฉยฺย ‘อุทกํ ปเวกฺขามี’ติ, ปกฺขี อาวิญฺเฉยฺย ‘อากาสํ เฑสฺสามี’ติ, กุกฺกุโร อาวิญฺเฉยฺย ‘คามํ ปเวกฺขามี’ติ, สิงฺคาโล อาวิญฺเฉยฺย ‘สีวถิกํ ปเวกฺขามี’ติ, มกฺกโฏ อาวิญฺเฉยฺย ‘วนํ ปเวกฺขามี’ติ. ยทา โข เต, ภิกฺขเว, ฉปฺปาณกา ฌตฺตา อสฺสุ กิลนฺตา, อถ ตเมว ขีลํ วา ถมฺภํ วา อุปติฏฺเฐยฺยุํ, อุปนิสีเทยฺยุํ, อุปนิปชฺเชยฺยุํ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ยสฺส กสฺสจิ ภิกฺขุโน กายคตาสติ ภาวิตา พหุลีกตา, ตํ จกฺขุ นาวิญฺฉติ มนาปิเยสุ รูเปสุ, อมนาปิยา รูปา นปฺปฏิกูลา โหนฺติ…เป… ชิวฺหา นาวิญฺฉติ มนาปิเยสุ รเสสุ…เป… มโน นาวิญฺฉติ มนาปิเยสุ ธมฺเมสุ, อมนาปิยา ธมฺมา นปฺปฏิกูลา โหนฺติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, สํวโร โหติ. भिक्खूंनो, जसे एखाद्या माणसाने वेगवेगळ्या क्षेत्रांतील आणि वेगवेगळ्या विहारक्षेत्रांतील सहा प्राण्यांना पकडून मजबूत दोरीने बांधावे. त्याने साप पकडून मजबूत दोरीने बांधावा, मगर पकडून मजबूत दोरीने बांधावी, पक्षी पकडून... पे... कुत्रा पकडून... कोल्हा पकडून... माकड पकडून मजबूत दोरीने बांधावे. मजबूत दोरीने बांधून त्यांना एका मजबूत खुंट्याला किंवा खांबाला बांधावे. मग, भिक्खूंनो, ते वेगवेगळ्या क्षेत्रांतील व वेगवेगळ्या विहारक्षेत्रांतील सहा प्राणी आपापल्या विहारक्षेत्राकडे खेचू लागतील – साप 'मी वारुळात शिरेन' असे म्हणून खेचेल, मगर 'मी पाण्यात शिरेन' असे म्हणून खेचेल, पक्षी 'मी आकाशात उडेन' असे म्हणून खेचेल, कुत्रा 'मी गावात शिरेन' असे म्हणून खेचेल, कोल्हा 'मी स्मशानात शिरेन' असे म्हणून खेचेल, माकड 'मी जंगलात शिरेन' असे म्हणून खेचेल. भिक्खूंनो, जेव्हा ते सहा प्राणी भुकेले, तान्हेले आणि थकलेले होतील, तेव्हा ते त्याच खुंट्यापाशी किंवा खांबापाशी उभे राहतील, तिथेच बसतील, तिथेच झोपतील. याचप्रमाणे, भिक्खूंनो, ज्या कोणत्याही भिक्खूने कायागतासती (शरीराविषयीची स्मृती) विकसित केली आहे, बहुलीकृत (वारंवार सराव) केली आहे, त्याला डोळा प्रिय रूपांकडे खेचत नाही आणि अप्रिय रूपे प्रतिकूल वाटत नाहीत... पे... जीभ प्रिय रसांकडे खेचत नाही... पे... मन प्रिय धर्मांकडे खेचत नाही आणि अप्रिय धर्म प्रतिकूल वाटत नाहीत. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे संवर होतो. ‘‘‘ทฬฺเห ขีเล วา ถมฺเภ วา’ติ โข, ภิกฺขเว, กายคตาย สติยา เอตํ อธิวจนํ. ตสฺมาติห โว, ภิกฺขเว, เอวํ สิกฺขิตพฺพํ – ‘กายคตา โน สติ ภาวิตา ภวิสฺสติ พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา’ติ. เอวญฺหิ โข, ภิกฺขเว, สิกฺขิตพฺพ’’นฺติ. ทสมํ. भिक्खूंनो, 'मजबूत खुंटा किंवा खांब' हे शरीराविषयीच्या स्मृतीचे (कायागतासतीचे) नाव (अधिवचन) आहे. म्हणून, भिक्खूंनो, तुम्ही स्वतःला असे प्रशिक्षित केले पाहिजे – 'आमची कायागतासती विकसित केली जाईल, बहुलीकृत केली जाईल, वाहनासारखी केली जाईल, आधारासारखी केली जाईल, प्रस्थापित केली जाईल, तिचा सराव केला जाईल आणि ती चांगल्या प्रकारे आरंभिली जाईल.' भिक्खूंनो, तुम्ही स्वतःला असेच प्रशिक्षित केले पाहिजे. दहावे (सुत्त समाप्त). ๑๑. ยวกลาปิสุตฺตํ ११. यवकलापि सुत्त (सातूच्या पेंढीचे सुत्त) ๒๔๘. ‘‘เสยฺยถาปิ[Pg.404], ภิกฺขเว, ยวกลาปี จาตุมหาปเถ นิกฺขิตฺตา อสฺส. อถ ฉ ปุริสา อาคจฺเฉยฺยุํ พฺยาภงฺคิหตฺถา. เต ยวกลาปึ ฉหิ พฺยาภงฺคีหิ หเนยฺยุํ. เอวญฺหิ สา, ภิกฺขเว, ยวกลาปี สุหตา อสฺส ฉหิ พฺยาภงฺคีหิ หญฺญมานา. อถ สตฺตโม ปุริโส อาคจฺเฉยฺย พฺยาภงฺคิหตฺโถ. โส ตํ ยวกลาปึ สตฺตมาย พฺยาภงฺคิยา หเนยฺย. เอวญฺหิ สา ภิกฺขเว, ยวกลาปี สุหตตรา อสฺส, สตฺตมาย พฺยาภงฺคิยา หญฺญมานา. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน จกฺขุสฺมึ หญฺญติ มนาปามนาเปหิ รูเปหิ…เป… ชิวฺหาย หญฺญติ มนาปามนาเปหิ รเสหิ…เป… มนสฺมึ หญฺญติ มนาปามนาเปหิ ธมฺเมหิ. สเจ โส, ภิกฺขเว, อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน อายตึ ปุนพฺภวาย เจเตติ, เอวญฺหิ โส, ภิกฺขเว, โมฆปุริโส สุหตตโร โหติ, เสยฺยถาปิ สา ยวกลาปี สตฺตมาย พฺยาภงฺคิยา หญฺญมานา. २४८. भिक्खूंनो, जसे चौकामध्ये (चार रस्त्यांच्या संगमावर) सातूची (जवाची) एक पेंढी ठेवली असावी. नंतर हातात बडविण्याचे दांडे (सोटे) घेतलेले सहा पुरुष तिथे यावेत. त्यांनी त्या सातूच्या पेंढीला त्या सहा सोट्यांनी बडवावे. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे ती सातूची पेंढी सहा सोट्यांनी बडवली गेल्यामुळे चांगलीच बडवली जाईल. नंतर हातात सोटा घेतलेला सातवा पुरुष तिथे यावा. त्याने त्या सातूच्या पेंढीला सातव्या सोट्याने बडवावे. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे ती सातूची पेंढी सातव्या सोट्याने बडवली गेल्यामुळे आणखीनच जास्त बडवली जाईल. याचप्रमाणे, भिक्खूंनो, अश्रुतवान पृथग्जन डोळ्यामध्ये अनुकूल आणि प्रतिकूल रूपांद्वारे बडवला जातो... पे... जिभेमध्ये अनुकूल आणि प्रतिकूल रसांद्वारे बडवला जातो... पे... मनामध्ये अनुकूल आणि प्रतिकूल धर्मांद्वारे बडवला जातो. भिक्खूंनो, जर तो अश्रुतवान पृथग्जन भविष्यात पुन्हा जन्म घेण्यासाठी (पुनर्जन्मासाठी) संकल्प करतो, तर तो मोघपुरुष सातव्या सोट्याने बडवल्या गेलेल्या सातूच्या पेंढीप्रमाणे आणखीनच जास्त बडवला जातो. ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, เทวาสุรสงฺคาโม สมุปพฺยูฬฺโห อโหสิ. อถ โข, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติ อสุรินฺโท อสุเร อามนฺเตสิ – ‘สเจ, มาริสา, เทวาสุรสงฺคาเม สมุปพฺยูฬฺเห อสุรา ชิเนยฺยุํ เทวา ปราชิเนยฺยุํ, เยน นํ สกฺกํ เทวานมินฺทํ กณฺฐปญฺจเมหิ พนฺธเนหิ พนฺธิตฺวา มม สนฺติเก อาเนยฺยาถ อสุรปุร’นฺติ. สกฺโกปิ โข, ภิกฺขเว, เทวานมินฺโท เทเว ตาวตึเส อามนฺเตสิ – ‘สเจ, มาริสา, เทวาสุรสงฺคาเม สมุปพฺยูฬฺเห เทวา ชิเนยฺยุํ อสุรา ปราชิเนยฺยุํ, เยน นํ เวปจิตฺตึ อสุรินฺทํ กณฺฐปญฺจเมหิ พนฺธเนหิ พนฺธิตฺวา มม สนฺติเก อาเนยฺยาถ สุธมฺมํ เทวสภ’นฺติ. ตสฺมึ โข ปน, ภิกฺขเว, สงฺคาเม เทวา ชินึสุ, อสุรา ปราชินึสุ. อถ โข, ภิกฺขเว, เทวา ตาวตึสา เวปจิตฺตึ อสุรินฺทํ กณฺฐปญฺจเมหิ พนฺธเนหิ พนฺธิตฺวา สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส สนฺติเก อาเนสุํ สุธมฺมํ เทวสภํ. ตตฺร สุทํ, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติ อสุรินฺโท กณฺฐปญฺจเมหิ พนฺธเนหิ พทฺโธ โหติ. ยทา โข, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติสฺส อสุรินฺทสฺส เอวํ โหติ – ‘ธมฺมิกา โข เทวา, อธมฺมิกา อสุรา[Pg.405], อิเธว ทานาหํ เทวปุรํ คจฺฉามี’ติ. อถ กณฺฐปญฺจเมหิ พนฺธเนหิ มุตฺตํ อตฺตานํ สมนุปสฺสติ, ทิพฺเพหิ จ ปญฺจหิ กามคุเณหิ สมปฺปิโต สมงฺคีภูโต ปริจาเรติ. ยทา จ โข, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติสฺส อสุรินฺทสฺส เอวํ โหติ – ‘ธมฺมิกา โข อสุรา, อธมฺมิกา เทวา, ตตฺเถว ทานาหํ อสุรปุรํ คมิสฺสามี’ติ, อถ กณฺฐปญฺจเมหิ พนฺธเนหิ พทฺธํ อตฺตานํ สมนุปสฺสติ. ทิพฺเพหิ จ ปญฺจหิ กามคุเณหิ ปริหายติ. เอวํ สุขุมํ โข, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติพนฺธนํ. ตโต สุขุมตรํ มารพนฺธนํ. มญฺญมาโน โข, ภิกฺขเว, พทฺโธ มารสฺส, อมญฺญมาโน มุตฺโต ปาปิมโต. भिक्खूंनो, पूर्वी देव आणि असूर यांच्यात मोठे युद्ध पेटले होते. तेव्हा, भिक्खूंनो, असुरांचा राजा वेपचित्ती असुरांना म्हणाला – 'मित्रांनो, जर या युद्धात असूर जिंकले आणि देवांचा पराभव झाला, तर देवांचा राजा सक्क (शक्र) याला चार हातपाय आणि मान अशा पाच ठिकाणी बांधून माझ्याकडे असुरपुरात घेऊन या.' भिक्खूंनो, देवांचा राजा सक्क यानेही तावतिंस देवांना सांगितले – 'मित्रांनो, जर या युद्धात देव जिंकले आणि असूर पराभूत झाले, तर असुरांचा राजा वेपचित्ती याला चार हातपाय आणि मान अशा पाच ठिकाणी बांधून माझ्याकडे सुधम्मा देवसभेत घेऊन या.' भिक्खूंनो, त्या युद्धात देव जिंकले आणि असूर पराभूत झाले. तेव्हा, भिक्खूंनो, तावतिंस देवांनी असुरांचा राजा वेपचित्ती याला पाच ठिकाणी बांधून देवांचा राजा सक्क याच्याकडे सुधम्मा देवसभेत आणले. तिथे, भिक्खूंनो, असुरांचा राजा वेपचित्ती पाच ठिकाणी बांधलेला होता. भिक्खूंनो, जेव्हा वेपचित्ती असुराच्या मनात असा विचार आला – 'देवच धार्मिक (न्यायी) आहेत, असूर अधार्मिक आहेत; आता मी याच देवपुरात राहीन,' तेव्हा तो स्वतःला त्या पाच बंधनांतून मुक्त झालेला पाहत असे आणि पाच दिव्य कामगुणांनी युक्त होऊन आनंद उपभोगत असे. पण भिक्खूंनो, जेव्हा वेपचित्ती असुराच्या मनात असा विचार आला – 'असूरच धार्मिक आहेत, देव अधार्मिक आहेत; आता मी माझ्या असुरपुरातच जाईन,' तेव्हा तो स्वतःला त्या पाच बंधनांनी बांधलेला पाहत असे आणि दिव्य पाच कामगुणांपासून वंचित होत असे. भिक्खूंनो, वेपचित्तीचे बंधन इतके सूक्ष्म होते. परंतु, त्याहूनही अधिक सूक्ष्म माराचे बंधन आहे. भिक्खूंनो, जो कल्पना करतो (अहंकार करतो), तो माराच्या बंधनात पडतो; जो कल्पना करत नाही, तो त्या पापी मारापासून मुक्त होतो. ‘‘‘อสฺมี’ติ, ภิกฺขเว, มญฺญิตเมตํ, ‘อยมหมสฺมี’ติ มญฺญิตเมตํ, ‘ภวิสฺส’นฺติ มญฺญิตเมตํ, ‘น ภวิสฺส’นฺติ มญฺญิตเมตํ, ‘รูปี ภวิสฺส’นฺติ มญฺญิตเมตํ, ‘อรูปี ภวิสฺส’นฺติ มญฺญิตเมตํ, ‘สญฺญี ภวิสฺส’นฺติ มญฺญิตเมตํ, ‘อสญฺญี ภวิสฺส’นฺติ มญฺญิตเมตํ, ‘เนวสญฺญีนาสญฺญี ภวิสฺส’นฺติ มญฺญิตเมตํ. มญฺญิตํ, ภิกฺขเว, โรโค, มญฺญิตํ คณฺโฑ, มญฺญิตํ สลฺลํ. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ‘อมญฺญมาเนน เจตสา วิหริสฺสามา’ติ – เอวญฺหิ โว, ภิกฺขเว, สิกฺขิตพฺพํ. “भिक्खूहो, 'मी आहे' ही एक कल्पना (अहंकारयुक्त विचार) आहे; 'मी असा आहे' ही एक कल्पना आहे; 'मी होईन' ही एक कल्पना आहे; 'मी होणार नाही' ही एक कल्पना आहे; 'मी रूपवान (भौतिक रूप असलेला) होईन' ही एक कल्पना आहे; 'मी अरूप (अमूर्त) होईन' ही एक कल्पना आहे; 'मी संज्ञायुक्त (सचेतन) होईन' ही एक कल्पना आहे; 'मी असंज्ञायुक्त (अचेतन) होईन' ही एक कल्पना आहे; 'मी नैवसंज्ञानासंज्ञायुक्त (संज्ञायुक्तही नाही आणि असंज्ञायुक्तही नाही असा) होईन' ही एक कल्पना आहे. भिक्खूहो, कल्पना हा एक रोग आहे, कल्पना हा एक गंड (गळू) आहे, कल्पना हा एक शल्य (बाण) आहे. म्हणून, भिक्खूहो, तुम्ही स्वतःला असे प्रशिक्षित केले पाहिजे: 'आम्ही कल्पनाविरहित चित्ताने विहार करू.' भिक्खूहो, तुम्ही असेच स्वतःला प्रशिक्षित केले पाहिजे.” ‘‘‘อสฺมี’ติ, ภิกฺขเว, อิญฺชิตเมตํ, ‘อยมหมสฺมี’ติ อิญฺชิตเมตํ, ‘ภวิสฺส’นฺติ อิญฺชิตเมตํ, ‘น ภวิสฺส’นฺติ อิญฺชิตเมตํ, ‘รูปี ภวิสฺส’นฺติ อิญฺชิตเมตํ, ‘อรูปี ภวิสฺส’นฺติ อิญฺชิตเมตํ, ‘สญฺญี ภวิสฺส’นฺติ อิญฺชิตเมตํ, ‘อสญฺญี ภวิสฺส’นฺติ อิญฺชิตเมตํ, ‘เนวสญฺญีนาสญฺญี ภวิสฺส’นฺติ อิญฺชิตเมตํ. อิญฺชิตํ, ภิกฺขเว, โรโค, อิญฺชิตํ คณฺโฑ, อิญฺชิตํ สลฺลํ. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ‘อนิญฺชมาเนน เจตสา วิหริสฺสามา’ติ – เอวญฺหิ โว, ภิกฺขเว, สิกฺขิตพฺพํ. “भिक्खूहो, 'मी आहे' हे एक विचलन (कंपन) आहे; 'मी असा आहे' हे एक विचलन आहे; 'मी होईन' हे एक विचलन आहे; 'मी होणार नाही' हे एक विचलन आहे; 'मी रूपवान होईन' हे एक विचलन आहे; 'मी अरूप होईन' हे एक विचलन आहे; 'मी संज्ञायुक्त होईन' हे एक विचलन आहे; 'मी असंज्ञायुक्त होईन' हे एक विचलन आहे; 'मी नैवसंज्ञानासंज्ञायुक्त होईन' हे एक विचलन आहे. भिक्खूहो, विचलन हा एक रोग आहे, विचलन हा एक गंड आहे, विचलन हा एक शल्य आहे. म्हणून, भिक्खूहो, तुम्ही स्वतःला असे प्रशिक्षित केले पाहिजे: 'आम्ही अविचलित चित्ताने विहार करू.' भिक्खूहो, तुम्ही असेच स्वतःला प्रशिक्षित केले पाहिजे.” ‘‘‘อสฺมี’ติ, ภิกฺขเว, ผนฺทิตเมตํ, ‘อยมหมสฺมี’ติ ผนฺทิตเมตํ, ‘ภวิสฺส’นฺติ…เป… ‘น ภวิสฺส’นฺติ… ‘รูปี ภวิสฺส’นฺติ… ‘อรูปี ภวิสฺส’นฺติ… ‘สญฺญี ภวิสฺส’นฺติ… ‘อสญฺญี ภวิสฺส’นฺติ… ‘เนวสญฺญีนาสญฺญี ภวิสฺส’นฺติ ผนฺทิตเมตํ. ผนฺทิตํ, ภิกฺขเว, โรโค, ผนฺทิตํ คณฺโฑ, ผนฺทิตํ สลฺลํ. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ‘อผนฺทมาเนน เจตสา วิหริสฺสามา’ติ – เอวญฺหิ โว, ภิกฺขเว, สิกฺขิตพฺพํ. “भिक्खूहो, 'मी आहे' हे एक स्पंदन (थरथराट) आहे; 'मी असा आहे' हे एक स्पंदन आहे; 'मी होईन'... 'मी होणार नाही'... 'मी रूपवान होईन'... 'मी अरूप होईन'... 'मी संज्ञायुक्त होईन'... 'मी असंज्ञायुक्त होईन'... 'मी नैवसंज्ञानासंज्ञायुक्त होईन' हे एक स्पंदन आहे. भिक्खूहो, स्पंदन हा एक रोग आहे, स्पंदन हा एक गंड आहे, स्पंदन हा एक शल्य आहे. म्हणून, भिक्खूहो, तुम्ही स्वतःला असे प्रशिक्षित केले पाहिजे: 'आम्ही स्पंदनरहित चित्ताने विहार करू.' भिक्खूहो, तुम्ही असेच स्वतःला प्रशिक्षित केले पाहिजे.” ‘‘‘อสฺมี’ติ, ภิกฺขเว, ปปญฺจิตเมตํ, ‘อยมหมสฺมี’ติ ปปญฺจิตเมตํ, ‘ภวิสฺส’นฺติ…เป… ‘น ภวิสฺส’นฺติ… ‘รูปี ภวิสฺส’นฺติ… ‘อรูปี ภวิสฺส’นฺติ… ‘สญฺญี ภวิสฺส’นฺติ… ‘อสญฺญี ภวิสฺส’นฺติ… ‘เนวสญฺญีนาสญฺญี ภวิสฺส’นฺติ ปปญฺจิตเมตํ[Pg.406]. ปปญฺจิตํ, ภิกฺขเว, โรโค, ปปญฺจิตํ คณฺโฑ, ปปญฺจิตํ สลฺลํ. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ‘นิปฺปปญฺเจน เจตสา วิหริสฺสามา’ติ – เอวญฺหิ โว, ภิกฺขเว, สิกฺขิตพฺพํ. “भिक्खूहो, 'मी आहे' हा एक प्रपंच (मानसिक विस्तार) आहे; 'मी असा आहे' हा एक प्रपंच आहे; 'मी होईन'... 'मी होणार नाही'... 'मी रूपवान होईन'... 'मी अरूप होईन'... 'मी संज्ञायुक्त होईन'... 'मी असंज्ञायुक्त होईन'... 'मी नैवसंज्ञानासंज्ञायुक्त होईन' हा एक प्रपंच आहे. भिक्खूहो, प्रपंच हा एक रोग आहे, प्रपंच हा एक गंड आहे, प्रपंच हा एक शल्य आहे. म्हणून, भिक्खूहो, तुम्ही स्वतःला असे प्रशिक्षित केले पाहिजे: 'आम्ही प्रपंचरहित चित्ताने विहार करू.' भिक्खूहो, तुम्ही असेच स्वतःला प्रशिक्षित केले पाहिजे.” ‘‘‘อสฺมี’ติ, ภิกฺขเว, มานคตเมตํ, ‘อยมหมสฺมี’ติ มานคตเมตํ, ‘ภวิสฺส’นฺติ มานคตเมตํ, ‘น ภวิสฺส’นฺติ มานคตเมตํ, ‘รูปี ภวิสฺส’นฺติ มานคตเมตํ, ‘อรูปี ภวิสฺส’นฺติ มานคตเมตํ, ‘สญฺญี ภวิสฺส’นฺติ มานคตเมตํ, ‘อสญฺญี ภวิสฺส’นฺติ มานคตเมตํ, ‘เนวสญฺญีนาสญฺญี ภวิสฺส’นฺติ มานคตเมตํ. มานคตํ, ภิกฺขเว, โรโค, มานคตํ คณฺโฑ, มานคตํ สลฺลํ. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ‘นิหตมาเนน เจตสา วิหริสฺสามา’ติ – เอวญฺหิ โว, ภิกฺขเว, สิกฺขิตพฺพ’’นฺติ. เอกาทสมํ. “भिक्खूहो, 'मी आहे' हा एक मान (अहंकार) आहे; 'मी असा आहे' हा एक मान आहे; 'मी होईन' हा एक मान आहे; 'मी होणार नाही' हा एक मान आहे; 'मी रूपवान होईन' हा एक मान आहे; 'मी अरूप होईन' हा एक मान आहे; 'मी संज्ञायुक्त होईन' हा एक मान आहे; 'मी असंज्ञायुक्त होईन' हा एक मान आहे; 'मी नैवसंज्ञानासंज्ञायुक्त होईन' हा एक मान आहे. भिक्खूहो, मान हा एक रोग आहे, मान हा एक गंड आहे, मान हा एक शल्य आहे. म्हणून, भिक्खूहो, तुम्ही स्वतःला असे प्रशिक्षित केले पाहिजे: 'आम्ही मान नष्ट केलेल्या चित्ताने विहार करू.' भिक्खूहो, तुम्ही असेच स्वतःला प्रशिक्षित केले पाहिजे.” हे अकरावे (सुत्त) समाप्त. อาสีวิสวคฺโค เอกูนวีสติโม. आसीविसवर्ग एकोणिसावा समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याचा सारांश (उद्दान) पुढीलप्रमाणे – อาสีวิโส รโถ กุมฺโม, ทฺเว ทารุกฺขนฺธา อวสฺสุโต; ทุกฺขธมฺมา กึสุกา วีณา, ฉปฺปาณา ยวกลาปีติ. आसीविस, रथ, कुम्म (कासव), दोन दारुक्खन्ध (लाकडाचे ओंडके), अवस्सुत, दुक्खधम्म, किंसुक, वीणा, छप्पाण आणि यवकलापी. สฬายตนวคฺเค จตุตฺถปณฺณาสโก สมตฺโต. सळायतनवर्गातील चौथा पण्णासक समाप्त झाला. ตสฺส วคฺคุทฺทานํ – त्याचा वर्ग-सारांश (वग्गुद्दान) पुढीलप्रमाणे – นนฺทิกฺขโย สฏฺฐินโย, สมุทฺโท อุรเคน จ; จตุปณฺณาสกา เอเต, นิปาเตสุ ปกาสิตาติ. नन्दिक्खय, सट्ठिनय, समुद्र आणि उरग (आसीविस); हे चार पण्णासक निपातांमध्ये चांगल्या प्रकारे प्रकाशित केले आहेत. สฬายตนสํยุตฺตํ สมตฺตํ. सळायतनसंयुत्त समाप्त झाले. ๒. เวทนาสํยุตฺตํ २. वेदनासंयुत्त ๑. สคาถาวคฺโค १. सगाथावर्ग ๑. สมาธิสุตฺตํ १. समाधिसुत्त ๒๔๙. ‘‘ติสฺโส [Pg.407] อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา. กตมา ติสฺโส? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา โข, ภิกฺขเว, ติสฺโส เวทนาติ. २४९. “भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत. कोणत्या तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुखद वेदना. भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत.” ‘‘สมาหิโต สมฺปชาโน, สโต พุทฺธสฺส สาวโก; เวทนา จ ปชานาติ, เวทนานญฺจ สมฺภวํ. “समाहित (एकाग्रचित्त), संप्रजन्ययुक्त (जागरूक) आणि सजग असलेला बुद्धांचा श्रावक वेदनांना जाणतो आणि वेदनांच्या उत्पत्तीलाही जाणतो.” ‘‘ยตฺถ เจตา นิรุชฺฌนฺติ, มคฺคญฺจ ขยคามินํ; เวทนานํ ขยา ภิกฺขุ, นิจฺฉาโต ปรินิพฺพุโต’’ติ. ปฐมํ; “ज्या ठिकाणी या वेदना निरुद्ध होतात (नष्ट होतात) ते स्थान आणि त्यांच्या क्षयाकडे नेणारा मार्गही तो जाणतो. वेदनांच्या क्षयामुळे तो भिक्खू तृष्णारहित होऊन पूर्णपणे परिनिर्वाण प्राप्त करतो.” पहिले (सुत्त) समाप्त. ๒. สุขสุตฺตํ २. सुखसुत्त ๒๕๐. ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา. กตมา ติสฺโส? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา โข, ภิกฺขเว, ติสฺโส เวทนาติ. २५०. “भिक्खूहो, या three वेदना आहेत. कोणत्या तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुखद वेदना. भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत.” ‘‘สุขํ วา ยทิ วา ทุกฺขํ, อทุกฺขมสุขํ สห; อชฺฌตฺตญฺจ พหิทฺธา จ, ยํ กิญฺจิ อตฺถิ เวทิตํ. “सुखद असो वा दुःखद असो, किंवा अदुःख-असुखद असो; अध्यात्मिक (अंतर्गत) असो वा बाह्य असो, जे काही अनुभवले जाते,” ‘‘เอตํ ทุกฺขนฺติ ญตฺวาน, โมสธมฺมํ ปโลกินํ; ผุสฺส ผุสฺส วยํ ปสฺสํ, เอวํ ตตฺถ วิรชฺชตี’’ติ. ทุติยํ; “ते सर्व विनाशी आणि नाशवंत असून 'हे दुःख आहे' असे जाणून, वारंवार स्पर्श करून (अनुभवून) त्यांचा व्यय (नाश) पाहणारा भिक्खू अशा प्रकारे त्या वेदनांविषयी विरक्त होतो.” दुसरे (सुत्त) समाप्त. ๓. ปหานสุตฺตํ ३. पहाणसुत्त ๒๕๑. ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา. กตมา ติสฺโส? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา. สุขาย, ภิกฺขเว, เวทนาย ราคานุสโย ปหาตพฺโพ, ทุกฺขาย เวทนาย ปฏิฆานุสโย ปหาตพฺโพ, อทุกฺขมสุขาย เวทนาย อวิชฺชานุสโย ปหาตพฺโพ. ยโต โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน สุขาย เวทนาย ราคานุสโย ปหีโน โหติ, ทุกฺขาย เวทนาย ปฏิฆานุสโย ปหีโน โหติ, อทุกฺขมสุขาย [Pg.408] เวทนาย อวิชฺชานุสโย ปหีโน โหติ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ‘ภิกฺขุ นิรนุสโย สมฺมทฺทโส อจฺเฉจฺฉิ ตณฺหํ, วิวตฺตยิ สํโยชนํ, สมฺมา มานาภิสมยา อนฺตมกาสิ ทุกฺขสฺสา’’’ติ. २५१. “भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत. कोणत्या तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुखद वेदना. भिक्खूहो, सुखद वेदनेतील रागानुशय (आसक्तीची सुप्त प्रवृत्ती) नष्ट केला पाहिजे, दुःखद वेदनेतील प्रतिघानुशय (द्वेषाची सुप्त प्रवृत्ती) नष्ट केला पाहिजे, आणि अदुःख-असुखद वेदनेतील अविद्यानुशय (अज्ञानाची सुप्त प्रवृत्ती) नष्ट केला पाहिजे. भिक्खूहो, जेव्हा भिक्खूचा सुखद वेदनेतील रागानुशय नष्ट होतो, दुःखद वेदनेतील प्रतिघानुशय नष्ट होतो, आणि अदुःख-असुखद वेदनेतील अविद्यानुशय नष्ट होतो, तेव्हा, भिक्खूहो, त्या भिक्खूला 'अनुशयरहित, सम्यक दृष्टी असलेला, तृष्णा तोडलेला, संयोजने (बंधने) नष्ट केलेला आणि मानाचा सम्यक प्रकारे नाश करून दुःखाचा अंत केलेला भिक्खू' असे म्हटले जाते.” ‘‘สุขํ เวทยมานสฺส, เวทนํ อปฺปชานโต; โส ราคานุสโย โหติ, อนิสฺสรณทสฺสิโน. “सुखाचा अनुभव घेताना, जो वेदनेला यथार्थपणे जाणत नाही आणि तिच्यातून मुक्त होण्याचा मार्ग पाहत नाही, त्याच्यामध्ये रागानुशय निर्माण होतो.” ‘‘ทุกฺขํ เวทยมานสฺส, เวทนํ อปฺปชานโต; ปฏิฆานุสโย โหติ, อนิสฺสรณทสฺสิโน. “दुःखाचा अनुभव घेताना, जो वेदनेला यथार्थपणे जाणत नाही आणि तिच्यातून मुक्त होण्याचा मार्ग पाहत नाही, त्याच्यामध्ये प्रतिघानुशय निर्माण होतो.” ‘‘อทุกฺขมสุขํ สนฺตํ, ภูริปญฺเญน เทสิตํ; ตญฺจาปิ อภินนฺทติ, เนว ทุกฺขา ปมุจฺจติ. “विशाल प्रज्ञा असलेल्या बुद्धांनी ज्या अदुःख-असुखद वेदनेला शांत म्हटले आहे, जर कोणी तिचाही आनंद घेत राहिला, तर तो दुःखातून मुक्त होऊ शकत नाही.” ‘‘ยโต จ ภิกฺขุ อาตาปี, สมฺปชญฺญํ น ริญฺจติ; ตโต โส เวทนา สพฺพา, ปริชานาติ ปณฺฑิโต. “परंतु जेव्हा उद्योगी (प्रयत्नशील) भिक्खू संप्रजन्य (जागरूकता) सोडत नाही, तेव्हा तो प्रज्ञावान भिक्खू सर्व वेदनांना पूर्णपणे जाणतो.” ‘‘โส เวทนา ปริญฺญาย, ทิฏฺเฐ ธมฺเม อนาสโว; กายสฺส เภทา ธมฺมฏฺโฐ, สงฺขฺยํ โนเปติ เวทคู’’ติ. ตติยํ; “तो वेदनांना पूर्णपणे जाणून याच जन्मात अनास्रव (आसवरहित) होतो. धर्मात स्थित असलेला तो वेदज्ञ (ज्ञानी) शरीराच्या भेदानंतर (मृत्य्यूनंतर) कोणत्याही संज्ञेला (पुनर्जन्माला) प्राप्त होत नाही.” तिसरे (सुत्त) समाप्त. ๔. ปาตาลสุตฺตํ ४. पातालसुत्त ๒๕๒. ‘‘อสฺสุตวา, ภิกฺขเว, ปุถุชฺชโน ยํ วาจํ ภาสติ – ‘อตฺถิ มหาสมุทฺเท ปาตาโล’ติ. ตํ โข ปเนตํ, ภิกฺขเว, อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน อสนฺตํ อวิชฺชมานํ เอวํ วาจํ ภาสติ – ‘อตฺถิ มหาสมุทฺเท ปาตาโล’ติ. สารีริกานํ โข เอตํ, ภิกฺขเว, ทุกฺขานํ เวทนานํ อธิวจนํ ยทิทํ ‘ปาตาโล’ติ. อสฺสุตวา, ภิกฺขเว, ปุถุชฺชโน สารีริกาย ทุกฺขาย เวทนาย ผุฏฺโฐ สมาโน โสจติ กิลมติ ปริเทวติ อุรตฺตาฬึ กนฺทติ สมฺโมหํ อาปชฺชติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ‘อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน ปาตาเล น ปจฺจุฏฺฐาสิ, คาธญฺจ นาชฺฌคา’. สุตวา จ โข, ภิกฺขเว, อริยสาวโก สารีริกาย ทุกฺขาย เวทนาย ผุฏฺโฐ สมาโน เนว โสจติ, น กิลมติ, น ปริเทวติ, น อุรตฺตาฬึ กนฺทติ, น สมฺโมหํ อาปชฺชติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ‘สุตวา อริยสาวโก ปาตาเล ปจฺจุฏฺฐาสิ, คาธญฺจ อชฺฌคา’’’ติ. २५२. भिक्खूहो, अश्रुतवान पृथग्जन असे म्हणतो की, 'महासागरात एक अथांग पाताळ आहे.' परंतु, भिक्खूहो, तो अश्रुतवान पृथग्जन जे अस्तित्वात नाही, जे विद्यमान नाही, अशा गोष्टीबद्दल असे म्हणतो की, 'महासागरात अथांग पाताळ आहे.' भिक्खूहो, हे 'पाताळ' शरीरात उत्पन्न होणाऱ्या दुःखद वेदनांचेच नाव आहे. भिक्खूहो, जेव्हा अश्रुतवान पृथग्जन शारीरिक दुःखद वेदनेने पीडित होतो, तेव्हा तो शोक करतो, कष्टी होतो, रडतो, छाती बडवून घेतो आणि संभ्रमात पडतो. भिक्खूहो, यालाच 'अश्रुतवान पृथग्जन जो अथांग पाताळात उभा राहू शकला नाही आणि ज्याला कोणताही आधार सापडला नाही' असे म्हणतात. परंतु, भिक्खूहो, जेव्हा श्रुतवान आर्यश्रावक शारीरिक दुःखद वेदनेने पीडित होतो, तेव्हा तो शोक करत नाही, कष्टी होत नाही, रडत नाही, छाती बडवून घेत नाही आणि संभ्रमात पडत नाही. भिक्खूहो, यालाच 'श्रुतवान आर्यश्रावक जो अथांग पाताळात उभा राहू शकला आणि ज्याला आधार सापडला' असे म्हणतात. ‘‘โย [Pg.409] เอตา นาธิวาเสติ, อุปฺปนฺนา เวทนา ทุขา; สารีริกา ปาณหรา, ยาหิ ผุฏฺโฐ ปเวธติ. जो मनुष्य शरीरात उत्पन्न झालेल्या, प्राणांतिक असणाऱ्या या दुःखद वेदना सहन करू शकत नाही आणि ज्यांच्यामुळे पीडित होऊन तो थरथर कापतो, ‘‘อกฺกนฺทติ ปโรทติ, ทุพฺพโล อปฺปถามโก; น โส ปาตาเล ปจฺจุฏฺฐาสิ, อโถ คาธมฺปิ นาชฺฌคา. तो दुर्बल आणि अल्प सामर्थ्य असलेला मनुष्य आक्रोश करतो, रडतो; तो त्या अथांग पाताळात उभा राहू शकत नाही आणि त्याला कोणताही आधारही मिळत नाही. ‘‘โย เจตา อธิวาเสติ, อุปฺปนฺนา เวทนา ทุขา; สารีริกา ปาณหรา, ยาหิ ผุฏฺโฐ น เวธติ; ส เว ปาตาเล ปจฺจุฏฺฐาสิ, อโถ คาธมฺปิ อชฺฌคา’’ติ. จตุตฺถํ; परंतु जो मनुष्य शरीरात उत्पन्न झालेल्या, प्राणांतिक असणाऱ्या या दुःखद वेदना सहन करतो आणि ज्यांच्यामुळे पीडित होऊनही तो थरथर कापत नाही; तो खरोखरच त्या अथांग पाताळात उभा राहू शकतो आणि त्याला आधारही मिळतो. (चौथे सूत्र समाप्त) ๕. ทฏฺฐพฺพสุตฺตํ ५. दट्ठब्ब सुत्त (पाहण्यायोग्य सुत्त) ๒๕๓. ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา. กตมา ติสฺโส? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา. สุขา, ภิกฺขเว, เวทนา ทุกฺขโต ทฏฺฐพฺพา, ทุกฺขา เวทนา สลฺลโต ทฏฺฐพฺพา, อทุกฺขมสุขา เวทนา อนิจฺจโต ทฏฺฐพฺพา. ยโต โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน สุขา เวทนา ทุกฺขโต ทิฏฺฐา โหติ, ทุกฺขา เวทนา สลฺลโต ทิฏฺฐา โหติ, อทุกฺขมสุขา เวทนา อนิจฺจโต ทิฏฺฐา โหติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ‘ภิกฺขุ สมฺมทฺทโส อจฺเฉจฺฉิ ตณฺหํ, วิวตฺตยิ สํโยชนํ, สมฺมา มานาภิสมยา อนฺตมกาสิ ทุกฺขสฺสา’’’ติ. २५३. भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत. कोणत्या three? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना. भिक्खूहो, सुखद वेदनेकडे दुःख म्हणून पाहिले पाहिजे, दुःखद वेदनेकडे शल्यासारखे (बाणासारखे) पाहिले पाहिजे आणि अदुःख-असुख वेदनेकडे अनित्य म्हणून पाहिले पाहिजे. भिक्खूहो, जेव्हा भिक्खू सुखद वेदनेला दुःख म्हणून पाहतो, दुःखद वेदनेला शल्यासारखे पाहतो आणि अदुःख-असुख वेदनेला अनित्य म्हणून पाहतो – तेव्हा, भिक्खूहो, त्या भिक्खूला 'सम्यक दृष्टी असलेला, ज्याने तृष्णा नष्ट केली आहे, संयोजनांना (बंधनांना) तोडले आहे आणि मानाचे (अहंकाराचे) सम्यक आकलन करून दुःखाचा अंत केला आहे' असे म्हटले जाते. ‘‘โย สุขํ ทุกฺขโต อทฺท, ทุกฺขมทฺทกฺขิ สลฺลโต; อทุกฺขมสุขํ สนฺตํ, อทฺทกฺขิ นํ อนิจฺจโต. ज्याने सुखाला दुःख म्हणून पाहिले, दुःखाला शल्यासारखे (बाणासारखे) पाहिले आणि शांत असलेल्या अदुःख-असुख वेदनेला अनित्य म्हणून पाहिले, ‘‘ส เว สมฺมทฺทโส ภิกฺขุ, ปริชานาติ เวทนา; โส เวทนา ปริญฺญาย, ทิฏฺเฐ ธมฺเม อนาสโว; กายสฺส เภทา ธมฺมฏฺโฐ, สงฺขฺยํ โนเปติ เวทคู’’ติ. ปญฺจมํ; तो सम्यक दृष्टी असलेला भिक्खू खरोखरच वेदनांना पूर्णपणे जाणतो. वेदनांचे पूर्ण ज्ञान प्राप्त करून तो याच जन्मात आसवमुक्त (अनास्रव) होतो. धर्मात प्रतिष्ठित असलेला आणि वेदपारंगत (परम ज्ञानी) असलेला तो भिक्खू, शरीराच्या विघटनानंतर कोणत्याही संज्ञेला (पुनर्जन्माला) प्राप्त होत नाही. (पाचवे सूत्र समाप्त) ๖. สลฺลสุตฺตํ ६. सल्ल सुत्त (शल्य सुत्त) ๒๕๔. ‘‘อสฺสุตวา, ภิกฺขเว, ปุถุชฺชโน สุขมฺปิ เวทนํ เวทยติ, ทุกฺขมฺปิ เวทนํ เวทยติ, อทุกฺขมสุขมฺปิ เวทนํ เวทยติ. สุตวา, ภิกฺขเว, อริยสาวโก สุขมฺปิ เวทนํ เวทยติ, ทุกฺขมฺปิ เวทนํ เวทยติ, อทุกฺขมสุขมฺปิ [Pg.410] เวทนํ เวทยติ. ตตฺร, ภิกฺขเว, โก วิเสโส โก อธิปฺปยาโส กึ นานากรณํ สุตวโต อริยสาวกสฺส อสฺสุตวตา ปุถุชฺชเนนา’’ติ? ภควํมูลกา โน, ภนฺเต, ธมฺมา…เป… อสฺสุตวา. ภิกฺขเว, ปุถุชฺชโน ทุกฺขาย เวทนาย ผุฏฺโฐ สมาโน โสจติ กิลมติ ปริเทวติ อุรตฺตาฬึ กนฺทติ สมฺโมหํ อาปชฺชติ. โส ทฺเว เวทนา เวทยติ – กายิกญฺจ, เจตสิกญฺจ. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ปุริสํ สลฺเลน วิชฺเฌยฺย. ตเมนํ ทุติเยน สลฺเลน อนุเวธํ วิชฺเฌยฺย. เอวญฺหิ โส, ภิกฺขเว, ปุริโส ทฺวิสลฺเลน เวทนํ เวทยติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน ทุกฺขาย เวทนาย ผุฏฺโฐ สมาโน โสจติ กิลมติ ปริเทวติ อุรตฺตาฬึ กนฺทติ สมฺโมหํ อาปชฺชติ. โส ทฺเว เวทนา เวทยติ – กายิกญฺจ, เจตสิกญฺจ. ตสฺสาเยว โข ปน ทุกฺขาย เวทนาย ผุฏฺโฐ สมาโน ปฏิฆวา โหติ. ตเมนํ ทุกฺขาย เวทนาย ปฏิฆวนฺตํ, โย ทุกฺขาย เวทนาย ปฏิฆานุสโย, โส อนุเสติ. โส ทุกฺขาย เวทนาย ผุฏฺโฐ สมาโน กามสุขํ อภินนฺทติ. ตํ กิสฺส เหตุ? น หิ โส, ภิกฺขเว, ปชานาติ อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน อญฺญตฺร กามสุขา ทุกฺขาย เวทนาย นิสฺสรณํ, ตสฺส กามสุขญฺจ อภินนฺทโต, โย สุขาย เวทนาย ราคานุสโย, โส อนุเสติ. โส ตาสํ เวทนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ. ตสฺส ตาสํ เวทนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ อปฺปชานโต, โย อทุกฺขมสุขาย เวทนาย อวิชฺชานุสโย, โส อนุเสติ. โส สุขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, สญฺญุตฺโต นํ เวทยติ. ทุกฺขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, สญฺญุตฺโต นํ เวทยติ. อทุกฺขมสุขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, สญฺญุตฺโต นํ เวทยติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ‘อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน สญฺญุตฺโต ชาติยา ชราย มรเณน โสเกหิ ปริเทเวหิ ทุกฺเขหิ โทมนสฺเสหิ อุปายาเสหิ, สญฺญุตฺโต ทุกฺขสฺมา’ติ วทามิ. २५४. भिक्खूहो, अश्रुतवान पृथग्जन सुखद वेदनाही अनुभवतो, दुःखद वेदनाही अनुभवतो आणि अदुःख-असुख वेदनाही अनुभवतो. भिक्खूहो, श्रुतवान आर्यश्रावकही सुखद वेदना अनुभवतो, दुःखद वेदना अनुभवतो आणि अदुःख-असुख वेदना अनुभवतो. मग, भिक्खूहो, श्रुतवान आर्यश्रावक आणि अश्रुतवान पृथग्जन यांच्यात काय फरक आहे, काय वैशिष्ट्य आहे, काय भिन्नता आहे? भंते, आमचे धर्म भगवंतांवरच आधारित आहेत... (इत्यादी)... भिक्खूहो, जेव्हा अश्रुतवान पृथग्जन दुःखद वेदनेने पीडित होतो, तेव्हा तो शोक करतो, कष्टी होतो, रडतो, छाती बडवून घेतो आणि संभ्रमात पडतो. तो दोन प्रकारच्या वेदना अनुभवतो – शारीरिक आणि मानसिक. भिक्खूहो, हे अगदी तसेच आहे, जसे एखाद्या माणसाला एका बाणाने (शल्याने) विंधावे आणि त्यानंतर लगेचच त्याला दुसऱ्या बाणाने विंधावे; अशा प्रकारे तो माणूस दोन बाणांच्या वेदना अनुभवतो. त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, अश्रुतवान पृथग्जन जेव्हा दुःखद वेदनेने पीडित होतो... तो दोन प्रकारच्या वेदना अनुभवतो – शारीरिक आणि मानसिक. त्याच दुःखद वेदनेने पीडित झाल्यावर तो तिच्याबद्दल द्वेष (प्रतिघ) बाळगतो. दुःखद वेदनेबद्दल द्वेष बाळगणाऱ्या त्या पृथग्जनाच्या मनात दुःखद वेदनेविषयीचा द्वेषाचा सुप्त कल (प्रतिघानुशय) जागृत राहतो. दुःखद वेदनेने पीडित झाल्यावर तो कामसुखाची इच्छा करतो. असे का? कारण, भिक्खूहो, त्या अश्रुतवान पृथग्जनाला कामसुखाशिवाय दुःखद वेदनेतून मुक्त होण्याचा दुसरा कोणताही मार्ग माहीत नसतो. जेव्हा तो कामसुखाची इच्छा करतो, तेव्हा सुखद वेदनेविषयीचा त्याचा रागाचा सुप्त कल (रागानुशय) जागृत राहतो. तो या वेदनांची उत्पत्ती, त्यांचा अस्त, त्यांचे आस्वादन, त्यांचे दुष्परिणाम आणि त्यांच्यापासून मिळणारी मुक्ती हे जसे आहे तसे (यथाभूत) जाणत नाही. या वेदनांची उत्पत्ती, अस्त, आस्वादन, दुष्परिणाम आणि मुक्ती यथाभूत न जाणणाऱ्या त्या पृथग्जनाच्या मनात अदुःख-असुख वेदनेविषयीचा अज्ञानाचा सुप्त कल (अविद्यानुशय) जागृत राहतो. तो जर सुखद वेदना अनुभवतो, तर ती आसक्तीने (क्लेशांनी युक्त होऊन) अनुभवतो. जर दुःखद वेदना अनुभवतो, तर ती आसक्तीने अनुभवतो. जर अदुःख-असुख वेदना अनुभवतो, तर ती आसक्तीने अनुभवतो. भिक्खूहो, यालाच 'अश्रुतवान पृथग्जन जो जन्म, जरा, मरण, शोक, आक्रोश, दुःख, दौर्मनस्य आणि नैराश्याशी बांधलेला आहे, तो दुःखाशीच बांधलेला आहे' असे मी म्हणतो. ‘‘สุตวา จ โข, ภิกฺขเว, อริยสาวโก ทุกฺขาย เวทนาย ผุฏฺโฐ สมาโน น โสจติ, น กิลมติ, น ปริเทวติ, น อุรตฺตาฬึ กนฺทติ, น [Pg.411] สมฺโมหํ อาปชฺชติ. โส เอกํ เวทนํ เวทยติ – กายิกํ, น เจตสิกํ. परंतु, भिक्खूहो, जेव्हा श्रुतवान आर्यश्रावक दुःखद वेदनेने पीडित होतो, तेव्हा तो शोक करत नाही, कष्टी होत नाही, रडत नाही, छाती बडवून घेत नाही आणि संभ्रमात पडत नाही. तो केवळ एकच वेदना अनुभवतो – शारीरिक, मानसिक नाही. ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ปุริสํ สลฺเลน วิชฺเฌยฺย. ตเมนํ ทุติเยน สลฺเลน อนุเวธํ น วิชฺเฌยฺย. เอวญฺหิ โส, ภิกฺขเว, ปุริโส เอกสลฺเลน เวทนํ เวทยติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก ทุกฺขาย เวทนาย ผุฏฺโฐ สมาโน น โสจติ, น กิลมติ, น ปริเทวติ, น อุรตฺตาฬึ กนฺทติ, น สมฺโมหํ อาปชฺชติ. โส เอกํ เวทนํ เวทยติ – กายิกํ, น เจตสิกํ. ตสฺสาเยว โข ปน ทุกฺขาย เวทนาย ผุฏฺโฐ สมาโน ปฏิฆวา น โหติ. ตเมนํ ทุกฺขาย เวทนาย อปฺปฏิฆวนฺตํ, โย ทุกฺขาย เวทนาย ปฏิฆานุสโย, โส นานุเสติ. โส ทุกฺขาย เวทนาย ผุฏฺโฐ สมาโน กามสุขํ นาภินนฺทติ. ตํ กิสฺส เหตุ? ปชานาติ หิ โส, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อญฺญตฺร กามสุขา ทุกฺขาย เวทนาย นิสฺสรณํ. ตสฺส กามสุขํ นาภินนฺทโต โย สุขาย เวทนาย ราคานุสโย, โส นานุเสติ. โส ตาสํ เวทนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวํ จ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ. ตสฺส ตาสํ เวทนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ ปชานโต, โย อทุกฺขมสุขาย เวทนาย อวิชฺชานุสโย, โส นานุเสติ. โส สุขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, วิสญฺญุตฺโต นํ เวทยติ. ทุกฺขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, วิสญฺญุตฺโต นํ เวทยติ. อทุกฺขมสุขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, วิสญฺญุตฺโต นํ เวทยติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ‘สุตวา อริยสาวโก วิสญฺญุตฺโต ชาติยา ชราย มรเณน โสเกหิ ปริเทเวหิ ทุกฺเขหิ โทมนสฺเสหิ อุปายาเสหิ, วิสญฺญุตฺโต ทุกฺขสฺมา’ติ วทามิ. อยํ โข, ภิกฺขเว, วิเสโส, อยํ อธิปฺปยาโส, อิทํ นานากรณํ สุตวโต อริยสาวกสฺส อสฺสุตวตา ปุถุชฺชเนนา’’ติ. भिक्षूंनो, समजा एखाद्या माणसाला बाणाने विंधले गेले. परंतु त्याला लगेचच दुसऱ्या बाणाने विंधले गेले नाही, तर तो माणूस केवळ एकाच बाणामुळे होणारी वेदना अनुभवतो. त्याचप्रमाणे, भिक्षूंनो, जेव्हा सुतवान (श्रुतवान) आर्यश्रावक दुःखद वेदनेने स्पर्शित होतो, तेव्हा तो शोक करत नाही, खिन्न होत नाही, रडत-कढत नाही, छाती बडवून घेत आक्रोश करत नाही आणि संमोहित होत नाही. तो केवळ एकाच प्रकारची वेदना अनुभवतो – जी शारीरिक असते, मानसिक नव्हे. त्या दुःखद वेदनेने स्पर्शित झाल्यावरही तो तिच्याबद्दल द्वेष (प्रतिघ) बाळगत नाही. दुःखद वेदनेबद्दल द्वेष न बाळगणाऱ्या त्या सुतवान आर्यश्रावकामध्ये दुःखद वेदनेशी संबंधित असलेला प्रतिघानुशय (द्वेषाची सुप्त प्रवृत्ती) सुप्त राहत नाही. दुःखद वेदनेने स्पर्शित झाल्यावर तो कामसुखाची अभिलाषा धरत नाही. त्याचे कारण काय? कारण, भिक्षूंनो, तो सुतवान आर्यश्रावक कामसुखाव्यतिरिक्त दुःखद वेदनेतून मुक्त होण्याचा मार्ग (निस्सरण) जाणतो. कामसुखाची अभिलाषा न धरणाऱ्या त्या श्रावकामध्ये सुखद वेदनेशी संबंधित असलेला रागानुशय (आसक्तीची सुप्त प्रवृत्ती) सुप्त राहत नाही. तो त्या वेदनांचा उदय (उत्पत्ती), अस्त (लय), आस्वाद (गोडी), आदीनव (दोष) आणि निस्सरण (मुक्ती) यथाभूत (आहे तसे) जाणतो. त्या वेदनांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण यथाभूत जाणणाऱ्या त्या श्रावकामध्ये अदुःख-असुख (उपेक्षा) वेदनेशी संबंधित असलेला अविद्यानुशय (अज्ञानाची सुप्त प्रवृत्ती) सुप्त राहत नाही. जर तो सुखद वेदना अनुभवतो, तर ती आसक्तीरहित (विसंयुक्त) होऊन अनुभवतो. जर तो दुःखद वेदना अनुभवतो, तर ती आसक्तीरहित होऊन अनुभवतो. जर तो अदुःख-असुख वेदना अनुभवतो, तर ती आसक्तीरहित होऊन अनुभवतो. भिक्षूंनो, अशा सुतवान आर्यश्रावकाला 'जन्म, जरा, मरण, शोक, रडणे-कढणे, दुःख, दौर्मनस्य आणि उपायास यांपासून विसंयुक्त (मुक्त) झालेला' असे म्हटले जाते; तो दुःखापासून विसंयुक्त झाला आहे, असे मी सांगतो. भिक्षूंनो, सुतवान आर्यश्रावक आणि अश्रुतवान पृथग्जनामधील हाच तो विशेष, हाच अभिप्राय आणि हाच भेद आहे. ‘‘น เวทนํ เวทยติ สปญฺโญ,สุขมฺปิ ทุกฺขมฺปิ พหุสฺสุโตปิ; อยญฺจ ธีรสฺส ปุถุชฺชเนน,มหา วิเสโส กุสลสฺส โหติ. प्रज्ञावान आणि बहुश्रुत पुरुष सुख किंवा दुःख या वेदनांनी (आसक्त होऊन) प्रभावित होत नाही. प्रज्ञावान, कुशल अशा धीर पुरुषाचा आणि सामान्य पृथग्जनाचा हाच मोठा विशेष (फरक) आहे. ‘‘สงฺขาตธมฺมสฺส [Pg.412] พหุสฺสุตสฺส,วิปสฺสโต โลกมิมํ ปรญฺจ; อิฏฺฐสฺส ธมฺมา น มเถนฺติ จิตฺตํ,อนิฏฺฐโต โน ปฏิฆาตเมติ. ज्याने धर्माचे आकलन केले आहे, जो बहुश्रुत आहे आणि जो या लोकाला व परलोकाला विपश्यनेने (यथार्थतेने) पाहतो, अशा आर्यश्रावकाचे चित्त इष्ट (अनुकूल) गोष्टींनी विचलित होत नाही आणि अनिष्ट (प्रतिकूल) गोष्टींमुळे तो प्रतिघाला (द्वेषाला) प्राप्त होत नाही. ‘‘ตสฺสานุโรธา อถวา วิโรธา,วิธูปิตา อตฺถคตา น สนฺติ; ปทญฺจ ญตฺวา วิรชํ อโสกํ,สมฺมา ปชานาติ ภวสฺส ปารคู’’ติ. ฉฏฺฐํ; त्याच्यामधील अनुनय (आसक्ती) आणि विरोध (द्वेष) पूर्णपणे नष्ट झाले आहेत, अस्त पावले आहेत, आता ते अस्तित्वात नाहीत. तो विरज (मळरहित) आणि अशोक (शोकरहित) अशा पदाला (निर्वाणाला) जाणून, भवसागराच्या पलीकडे गेलेला असून, सम्यक प्रकारे प्रज्ञावान बनतो. ๗. ปฐมเคลญฺญสุตฺตํ ७. प्रथम गेलञ्ञ सुत्त (पहिले आजारपण विषयक सूत्र) ๒๕๕. เอกํ สมยํ ภควา เวสาลิยํ วิหรติ มหาวเน กูฏาคารสาลายํ. อถ โข ภควา สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต เยน คิลานสาลา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. นิสชฺช โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – २५५. एकदा भगवान वैशाली येथील महावनातील कूटागारशाळेत विहार करत होते. तेव्हा भगवान संध्याकाळच्या वेळी ध्यानातून उठून जेथे रुग्णालय (गिलाणशाळा) होते, तेथे गेले. तेथे गेल्यावर ते तयार केलेल्या आसनावर बसले. बसल्यावर भगवंतांनी भिक्षूंना संबोधित केले – ‘‘สโต, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺปชาโน กาลํ อาคเมยฺย. อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนี. भिक्षूंनो, भिक्षूने स्मृतीवान आणि संप्रजन्यवान राहून काळाची वाट पाहावी. हाच आमचा तुम्हासाठी उपदेश आहे. ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สโต โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา, วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ; เวทนาสุ เวทนานุปสฺสี วิหรติ…เป… จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสี วิหรติ…เป… ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา, วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สโต โหติ. आणि भिक्षूंनो, भिक्षू स्मृतीवान कसा होतो? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू शरीरामध्ये शरीराचे सतत अवलोकन करत (कायानुपस्सी), उद्योगी (आतापी), संप्रजन्यवान आणि स्मृतीवान होऊन, लोकांमधील अभिज्झा (लोभ) आणि दौर्मनस्य (खिन्नता) दूर करून विहार करतो. वेदनांमध्ये वेदनांचे सतत अवलोकन करत (वेदनानुपस्सी) विहार करतो... चित्तामध्ये चित्ताचे सतत अवलोकन करत (चित्तानुपस्सी) विहार करतो... धर्मांमध्ये धर्मांचे सतत अवलोकन करत (धम्मानुपस्सी), उद्योगी, संप्रजन्यवान आणि स्मृतीवान होऊन, लोकांमधील अभिज्झा आणि दौर्मनस्य दूर करून विहार करतो. भिक्षूंनो, अशा प्रकारे भिक्षू स्मृतीवान होतो. ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺปชาโน โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อภิกฺกนฺเต ปฏิกฺกนฺเต สมฺปชานการี โหติ, อาโลกิเต วิโลกิเต สมฺปชานการี โหติ, สมิญฺชิเต ปสาริเต สมฺปชานการี โหติ, สงฺฆาฏิปตฺตจีวรธารเณ สมฺปชานการี โหติ, อสิเต ปีเต ขายิเต สายิเต สมฺปชานการี โหติ, อุจฺจารปสฺสาวกมฺเม สมฺปชานการี โหติ, คเต ฐิเต นิสินฺเน สุตฺเต ชาคริเต ภาสิเต ตุณฺหีภาเว [Pg.413] สมฺปชานการี โหติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺปชานการี โหติ. สโต, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺปชาโน กาลํ อาคเมยฺย. อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนี. आणि भिक्षूंनो, भिक्षू संप्रजन्यवान कसा होतो? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू पुढे जाताना आणि मागे वळताना सजगतेने कृती करतो; समोर पाहताना आणि आजूबाजूला पाहताना सजगतेने कृती करतो; हात-पाय आखडताना आणि पसरताना सजगतेने कृती करतो; संघात, पात्र आणि चीवर धारण करताना सजगतेने कृती करतो; खाताना, पिताना, चावताना आणि चव घेताना सजगतेने कृती करतो; मलमूत्र विसर्जन करताना सजगतेने कृती करतो; चालताना, उभे राहताना, बसताना, झोपताना, जागत असताना, बोलताना आणि मौन बाळगताना सजगतेने कृती करतो. भिक्षूंनो, अशा प्रकारे भिक्षू संप्रजन्यवान होतो. भिक्षूंनो, भिक्षूने स्मृतीवान आणि संप्रजन्यवान राहून काळाची वाट पाहावी. हाच आमचा तुम्हासाठी उपदेश आहे. ‘‘ตสฺส เจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน เอวํ สตสฺส สมฺปชานสฺส อปฺปมตฺตสฺส อาตาปิโน ปหิตตฺตสฺส วิหรโต อุปฺปชฺชติ สุขา เวทนา, โส เอวํ ปชานาติ – ‘อุปฺปนฺนา โข มฺยายํ สุขา เวทนา. สา จ โข ปฏิจฺจ, โน อปฺปฏิจฺจ. กึ ปฏิจฺจ? อิมเมว กายํ ปฏิจฺจ. อยํ โข ปน กาโย อนิจฺโจ สงฺขโต ปฏิจฺจสมุปฺปนฺโน. อนิจฺจํ โข ปน สงฺขตํ ปฏิจฺจสมุปฺปนฺนํ กายํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนา สุขา เวทนา กุโต นิจฺจา ภวิสฺสตี’ติ! โส กาเย จ สุขาย จ เวทนาย อนิจฺจานุปสฺสี วิหรติ, วยานุปสฺสี วิหรติ, วิราคานุปสฺสี วิหรติ, นิโรธานุปสฺสี วิหรติ, ปฏินิสฺสคฺคานุปสฺสี วิหรติ. ตสฺส กาเย จ สุขาย จ เวทนาย อนิจฺจานุปสฺสิโน วิหรโต, วยานุปสฺสิโน วิหรโต, วิราคานุปสฺสิโน วิหรโต, นิโรธานุปสฺสิโน วิหรโต, ปฏินิสฺสคฺคานุปสฺสิโน วิหรโต, โย กาเย จ สุขาย จ เวทนาย ราคานุสโย, โส ปหียติ. भिक्षूंनो, अशा प्रकारे स्मृतीवान, संप्रजन्यवान, अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करणाऱ्या भिक्षूमध्ये जर सुखद वेदना उत्पन्न झाली, तर तो हे चांगल्या प्रकारे जाणतो – 'माझ्यामध्ये ही सुखद वेदना उत्पन्न झाली आहे. ती कारणावर अवलंबून उत्पन्न झाली आहे, कारणाशिवाय नाही. कशावर अवलंबून? याच शरीरावर अवलंबून. परंतु हे शरीर अनित्य, संस्कृत आणि प्रतीत्यसमुत्पन्न आहे. मग अनित्य, संस्कृत आणि प्रतीत्यसमुत्पन्न शरीरावर अवलंबून उत्पन्न झालेली सुखद वेदना नित्य कशी असू शकेल!' तो शरीरात आणि सुखद वेदनेत अनित्याचे सतत अवलोकन करत विहार करतो, व्ययाचे (नाशाचे) सतत अवलोकन करत विहार करतो, विरागाचे (आसक्तीमुक्तीचे) सतत अवलोकन करत विहार करतो, निरोधाचे (लय पावणारे) सतत अवलोकन करत विहार करतो, प्रतिनिसर्गाचे (त्यागाचे) सतत अवलोकन करत विहार करतो. शरीरात आणि सुखद वेदनेत अनित्याचे, व्ययाचे, विरागाचे, निरोधाचे आणि प्रतिनिसर्गाचे सतत अवलोकन करत विहार करणाऱ्या त्या भिक्षूचा, शरीराशी आणि सुखद वेदनेशी संबंधित असलेला जो रागानुशय आहे, तो नष्ट होतो. ‘‘ตสฺส เจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน เอวํ สตสฺส สมฺปชานสฺส อปฺปมตฺตสฺส อาตาปิโน ปหิตตฺตสฺส วิหรโต อุปฺปชฺชติ ทุกฺขา เวทนา. โส เอวํ ปชานาติ – ‘อุปฺปนฺนา โข มฺยายํ ทุกฺขา เวทนา. สา จ โข ปฏิจฺจ, โน อปฺปฏิจฺจ. กึ ปฏิจฺจ? อิมเมว กายํ ปฏิจฺจ. อยํ โข ปน กาโย อนิจฺโจ สงฺขโต ปฏิจฺจสมุปฺปนฺโน. อนิจฺจํ โข ปน สงฺขตํ ปฏิจฺจสมุปฺปนฺนํ กายํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนา ทุกฺขา เวทนา กุโต นิจฺจา ภวิสฺสตี’ติ! โส กาเย จ ทุกฺขาย เวทนาย อนิจฺจานุปสฺสี วิหรติ, วยานุปสฺสี วิหรติ, วิราคานุปสฺสี วิหรติ, นิโรธานุปสฺสี วิหรติ, ปฏินิสฺสคฺคานุปสฺสี วิหรติ. ตสฺส กาเย จ ทุกฺขาย จ เวทนาย อนิจฺจานุปสฺสิโน วิหรโต…เป… ปฏินิสฺสคฺคานุปสฺสิโน วิหรโต, โย กาเย จ ทุกฺขาย จ เวทนาย ปฏิฆานุสโย, โส ปหียติ. भिक्षूंनो, जर अशा प्रकारे स्मृतिमान, संप्रजन्ययुक्त, अप्रमादी, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहरणाऱ्या भिक्षूला दुःखद वेदना उत्पन्न झाली, तर तो हे अशा प्रकारे जाणतो – 'मला ही दुःखद वेदना उत्पन्न झाली आहे. ती अवलंबून उत्पन्न झाली आहे, कारणाशिवाय नाही. कशावर अवलंबून? याच शरीरावर अवलंबून. पण हे शरीर तर अनित्य, संस्कृत आणि प्रतीत्यसमुत्पन्न आहे. मग अनित्य, संस्कृत आणि प्रतीत्यसमुत्पन्न शरीरावर अवलंबून उत्पन्न झालेली दुःखद वेदना नित्य कशी असू शकेल?' तो शरीरामध्ये आणि दुःखद वेदनेमध्ये अनित्यानुपश्यी होऊन विहरतो, वयानुपश्यी होऊन विहरतो, विरागानुपश्यी होऊन विहरतो, निरोधानुपश्यी होऊन विहरतो, प्रतिनिसर्गानुपश्यी होऊन विहरतो. शरीरामध्ये आणि दुःखद वेदनेमध्ये अनित्यानुपश्यी होऊन विहरणाऱ्या... पे... प्रतिनिसर्गानुपश्यी होऊन विहरणाऱ्या त्या भिक्षूचा शरीराविषयी आणि दुःखद वेदनेविषयी जो प्रतिघानुशय असतो, तो नष्ट होतो. ‘‘ตสฺส เจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน เอวํ สตสฺส สมฺปชานสฺส อปฺปมตฺตสฺส อาตาปิโน ปหิตตฺตสฺส วิหรโต อุปฺปชฺชติ อทุกฺขมสุขา เวทนา, โส เอวํ ปชานาติ – ‘อุปฺปนฺนา โข มฺยายํ อทุกฺขมสุขา เวทนา. สา จ โข ปฏิจฺจ, โน อปฺปฏิจฺจ. กึ ปฏิจฺจ? อิมเมว กายํ ปฏิจฺจ. อยํ โข ปน กาโย อนิจฺโจ สงฺขโต ปฏิจฺจสมุปฺปนฺโน. อนิจฺจํ โข ปน สงฺขตํ ปฏิจฺจสมุปฺปนฺนํ กายํ [Pg.414] ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนา อทุกฺขมสุขา เวทนา กุโต นิจฺจา ภวิสฺสตี’ติ! โส กาเย จ อทุกฺขมสุขาย จ เวทนาย อนิจฺจานุปสฺสี วิหรติ, วยานุปสฺสี วิหรติ, วิราคานุปสฺสี วิหรติ, นิโรธานุปสฺสี วิหรติ, ปฏินิสฺสคฺคานุปสฺสี วิหรติ. ตสฺส กาเย จ อทุกฺขมสุขาย จ เวทนาย อนิจฺจานุปสฺสิโน วิหรโต…เป… ปฏินิสฺสคฺคานุปสฺสิโน วิหรโต, โย กาเย จ อทุกฺขมสุขาย จ เวทนาย อวิชฺชานุสโย, โส ปหียติ. भिक्षूंनो, जर अशा प्रकारे स्मृतिमान, संप्रजन्ययुक्त, अप्रमादी, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहरणाऱ्या भिक्षूला अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न झाली, तर तो हे अशा प्रकारे जाणतो – 'मला ही अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न झाली आहे. ती अवलंबून उत्पन्न झाली आहे, कारणाशिवाय नाही. कशावर अवलंबून? याच शरीरावर अवलंबून. पण हे शरीर तर अनित्य, संस्कृत आणि प्रतीत्यसमुत्पन्न आहे. मग अनित्य, संस्कृत आणि प्रतीत्यसमुत्पन्न शरीरावर अवलंबून उत्पन्न झालेली अदुःख-असुख वेदना नित्य कशी असू शकेल?' तो शरीरामध्ये आणि अदुःख-असुख वेदनेमध्ये अनित्यानुपश्यी होऊन विहरतो, वयानुपश्यी होऊन विहरतो, विरागानुपश्यी होऊन विहरतो, निरोधानुपश्यी होऊन विहरतो, प्रतिनिसर्गानुपश्यी होऊन विहरतो. शरीरामध्ये आणि अदुःख-असुख वेदनेमध्ये अनित्यानुपश्यी होऊन विहरणाऱ्या... पे... प्रतिनिसर्गानुपश्यी होऊन विहरणाऱ्या त्या भिक्षूचा शरीराविषयी आणि अदुःख-असुख वेदनेविषयी जो अविद्यानुशय असतो, तो नष्ट होतो. ‘‘โส สุขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, สา อนิจฺจาติ ปชานาติ, อนชฺโฌสิตาติ ปชานาติ, อนภินนฺทิตาติ ปชานาติ; ทุกฺขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, สา อนิจฺจาติ ปชานาติ, อนชฺโฌสิตาติ ปชานาติ, อนภินนฺทิตาติ ปชานาติ; อทุกฺขมสุขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, สา อนิจฺจาติ ปชานาติ, อนชฺโฌสิตาติ ปชานาติ, อนภินนฺทิตาติ ปชานาติ. โส สุขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, วิสญฺญุตฺโต นํ เวทยติ; ทุกฺขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, วิสญฺญุตฺโต นํ เวทยติ; อทุกฺขมสุขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, วิสญฺญุตฺโต นํ เวทยติ. โส กายปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยมาโน ‘กายปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ, ชีวิตปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยมาโน ‘ชีวิตปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ. ‘กายสฺส เภทา อุทฺธํ ชีวิตปริยาทานา อิเธว สพฺพเวทยิตานิ อนภินนฺทิตานิ สีตีภวิสฺสนฺตี’ติ ปชานาติ. तो जर सुखद वेदना अनुभवतो, तेव्हा 'ती अनित्य आहे' असे जाणतो, 'ती आसक्ती निर्माण करणारी नाही' असे जाणतो, 'ती अभिनंदनीय नाही' असे जाणतो. जर तो दुःखद वेदना अनुभवतो, तेव्हा 'ती अनित्य आहे' असे जाणतो, 'ती आसक्ती निर्माण करणारी नाही' असे जाणतो, 'ती अभिनंदनीय नाही' असे जाणतो. जर तो अदुःख-असुख वेदना अनुभवतो, तेव्हा 'ती अनित्य आहे' असे जाणतो, 'ती आसक्ती निर्माण करणारी नाही' असे जाणतो, 'ती अभिनंदनीय नाही' असे जाणतो. जर तो सुखद वेदना अनुभवतो, तर ती आसक्तीरहित होऊन अनुभवतो. जर तो दुःखद वेदना अनुभवतो, तर ती आसक्तीरहित होऊन अनुभवतो. जर तो अदुःख-असुख वेदना अनुभवतो, तर ती आसक्तीरहित होऊन अनुभवतो. शरीराच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवताना तो 'मी शरीराच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवत आहे' असे जाणतो. जीवनाच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवताना तो 'मी जीवनाच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवत आहे' असे जाणतो. 'शरीर नष्ट झाल्यानंतर आणि जीवन संपल्यानंतर, याच जन्मात सर्व अनुभवलेल्या वेदना अभिनंदित न होता शांत होतील' असे तो जाणतो. ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, เตลญฺจ ปฏิจฺจ วฏฺฏิญฺจ ปฏิจฺจ เตลปฺปทีโป ฌาเยยฺย, ตสฺเสว เตลสฺส จ วฏฺฏิยา จ ปริยาทานา อนาหาโร นิพฺพาเยยฺย; เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กายปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยมาโน ‘กายปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ. ชีวิตปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยมาโน ‘ชีวิตปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ. ‘กายสฺส เภทา อุทฺธํ ชีวิตปริยาทานา อิเธว สพฺพเวทยิตานิ อนภินนฺทิตานิ สีตีภวิสฺสนฺตี’ติ ปชานาตี’’ติ. สตฺตมํ. भिक्षूंनो, ज्याप्रमाणे तेल आणि वात यांवर अवलंबून तेलाचा दिवा जळतो, आणि तेल व वात संपल्यामुळे इंधन न मिळाल्याने तो विझून जातो; त्याचप्रमाणे, भिक्षूंनो, भिक्षू शरीराच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवताना 'मी शरीराच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवत आहे' असे जाणतो. जीवनाच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवताना 'मी जीवनाच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवत आहे' असे जाणतो. 'शरीर नष्ट झाल्यानंतर आणि जीवन संपल्यानंतर, याच जन्मात सर्व अनुभवलेल्या वेदना अभिनंदित न होता शांत होतील' असे तो जाणतो. ๘. ทุติยเคลญฺญสุตฺตํ ८. दुसरे गेलञ्ञ सुत्त ๒๕๖. เอกํ สมยํ ภควา เวสาลิยํ วิหรติ มหาวเน กูฏาคารสาลายํ. อถ โข ภควา สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต เยน คิลานสาลา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. นิสชฺช โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – २५६. एकदा भगवान वैशाली येथील महावनात कूटागारशाळेत विहरत होते. तेव्हा भगवान संध्याकाळच्या वेळी ध्यानातून उठून जेथे रुग्णालय होते, तेथे गेले. तेथे जाऊन ते मांडलेल्या आसनावर बसले. बसल्यानंतर भगवंतांनी भिक्षूंना संबोधित केले – ‘‘สโต[Pg.415], ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺปชาโน กาลํ อาคเมยฺย. อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนี. भिक्षूंनो, भिक्षूने स्मृतिमान आणि संप्रजन्ययुक्त होऊन काळाची वाट पाहावी. हाच आमचा तुम्हासाठी उपदेश आहे. ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สโต โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา, วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ; เวทนาสุ เวทนานุปสฺสี วิหรติ… จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสี วิหรติ… ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา, วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สโต โหติ. आणि भिक्षूंनो, भिक्षू स्मृतिमान कसा होतो? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू शरीरात शरीराचे सतत दर्शन घेत (कायानुपश्यी होऊन), उद्योगी, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान होऊन विहरतो, आणि जगातील अभिज्झा व डोमनस्स दूर करतो. वेदनांमध्ये वेदनेचे सतत दर्शन घेत विहरतो... चित्तात चित्ताचे सतत दर्शन घेत विहरतो... धर्मांमध्ये धर्माचे सतत दर्शन घेत (धर्मानुपश्यी होऊन), उद्योगी, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान होऊन विहरतो, आणि जगातील अभिज्झा व डोमनस्स दूर करतो. अशा प्रकारे, भिक्षूंनो, भिक्षू स्मृतिमान होतो. ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺปชาโน โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อภิกฺกนฺเต ปฏิกฺกนฺเต สมฺปชานการี โหติ…เป… ภาสิเต ตุณฺหีภาเว สมฺปชานการี โหติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺปชาโน โหติ. สโต, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺปชาโน กาลํ อาคเมยฺย. อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนี. आणि भिक्षूंनो, भिक्षू संप्रजन्ययुक्त कसा होतो? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू पुढे जाताना आणि मागे वळताना सजगतेने कृती करतो... पे... बोलताना आणि मौन बाळगताना सजगतेने कृती करतो. अशा प्रकारे, भिक्षूंनो, भिक्षू संप्रजन्ययुक्त होतो. भिक्षूंनो, भिक्षूने स्मृतिमान आणि संप्रजन्ययुक्त होऊन काळाची वाट पाहावी. हाच आमचा तुम्हासाठी उपदेश आहे. ‘‘ตสฺส เจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน เอวํ สตสฺส สมฺปชานสฺส อปฺปมตฺตสฺส อาตาปิโน ปหิตตฺตสฺส วิหรโต อุปฺปชฺชติ สุขา เวทนา. โส เอวํ ปชานาติ – ‘อุปฺปนฺนา โข มฺยายํ สุขา เวทนา; สา จ โข ปฏิจฺจ, โน อปฺปฏิจฺจ. กึ ปฏิจฺจ? อิมเมว ผสฺสํ ปฏิจฺจ. อยํ โข ปน ผสฺโส อนิจฺโจ สงฺขโต ปฏิจฺจสมุปฺปนฺโน. อนิจฺจํ โข ปน สงฺขตํ ปฏิจฺจสมุปฺปนฺนํ ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนา สุขา เวทนา กุโต นิจฺจา ภวิสฺสตี’ติ! โส ผสฺเส จ สุขาย จ เวทนาย อนิจฺจานุปสฺสี วิหรติ, วยานุปสฺสี วิหรติ, วิราคานุปสฺสี วิหรติ, นิโรธานุปสฺสี วิหรติ, ปฏินิสฺสคฺคานุปสฺสี วิหรติ. ตสฺส ผสฺเส จ สุขาย จ เวทนาย อนิจฺจานุปสฺสิโน วิหรโต, วยานุปสฺสิโน วิหรโต, วิราคานุปสฺสิโน วิหรโต, นิโรธานุปสฺสิโน วิหรโต, ปฏินิสฺสคฺคานุปสฺสิโน วิหรโต โย ผสฺเส จ สุขาย จ เวทนาย ราคานุสโย, โส ปหียติ. भिक्षूंनो, जर अशा प्रकारे स्मृतिमान, संप्रजन्ययुक्त, अप्रमादी, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहरणाऱ्या भिक्षूला सुखद वेदना उत्पन्न झाली, तर तो हे अशा प्रकारे जाणतो – 'मला ही सुखद वेदना उत्पन्न झाली आहे. ती अवलंबून उत्पन्न झाली आहे, कारणाशिवाय नाही. कशावर अवलंबून? याच स्पर्शावर अवलंबून. पण हा स्पर्श तर अनित्य, संस्कृत आणि प्रतीत्यसमुत्पन्न आहे. मग अनित्य, संस्कृत आणि प्रतीत्यसमुत्पन्न स्पर्शावर अवलंबून उत्पन्न झालेली सुखद वेदना नित्य कशी असू शकेल?' तो स्पर्शात आणि सुखद वेदनेत अनित्यानुपश्यी होऊन विहरतो, वयानुपश्यी होऊन विहरतो, विरागानुपश्यी होऊन विहरतो, निरोधानुपश्यी होऊन विहरतो, प्रतिनिसर्गानुपश्यी होऊन विहरतो. स्पर्शात आणि सुखद वेदनेत अनित्यानुपश्यी होऊन विहरणाऱ्या, वयानुपश्यी होऊन विहरणाऱ्या, विरागानुपश्यी होऊन विहरणाऱ्या, nirodhānupassino (निरोधानुपश्यी होऊन विहरणाऱ्या), प्रतिनिसर्गानुपश्यी होऊन विहरणाऱ्या त्या भिक्षूचा स्पर्शाविषयी आणि सुखद वेदनेविषयी जो रागानुशय असतो, तो नष्ट होतो. ‘‘ตสฺส เจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน เอวํ สตสฺส…เป… วิหรโต อุปฺปชฺชติ ทุกฺขา เวทนา…เป… อุปฺปชฺชติ อทุกฺขมสุขา เวทนา. โส เอวํ ปชานาติ – ‘อุปฺปนฺนา โข มฺยายํ อทุกฺขมสุขา เวทนา; สา จ โข ปฏิจฺจ, โน อปฺปฏิจฺจ. กึ ปฏิจฺจ? อิมเมว ผสฺสํ ปฏิจฺจ…เป… กายสฺส [Pg.416] เภทา อุทฺธํ ชีวิตปริยาทานา อิเธว สพฺพเวทยิตานิ อนภินนฺทิตานิ สีตีภวิสฺสนฺตี’ติ ปชานาติ’’. “भिक्खूहो, अशा प्रकारे स्मृतिमान (सतीमान) आणि संप्रजन्ययुक्त होऊन... विहार करणाऱ्या त्या भिक्खूला जर दुःखद वेदना उत्पन्न झाली... किंवा अदुःख-असुख (उपेक्षा) वेदना उत्पन्न झाली, तर तो असे जाणतो – ‘मला ही अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न झाली आहे; आणि ती प्रत्यय (कारण) अवलंबून उत्पन्न झाली आहे, कारणाशिवाय नाही. कशावर अवलंबून? याच स्पर्शावर अवलंबून... शरीराच्या भेदानंतर (मृत्यूनंतर), आयुष्याच्या समाप्तीनंतर, याच जन्मात सर्व वेदना, ज्यांचे अभिनंदन केले गेले नाही (ज्यांच्याविषयी आसक्ती नाही), त्या शांत (शीतळ) होतील,’ असे तो जाणतो.” ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, เตลญฺจ ปฏิจฺจ วฏฺฏิญฺจ ปฏิจฺจ เตลปฺปทีโป ฌาเยยฺย, ตสฺเสว เตลสฺส จ วฏฺฏิยา จ ปริยาทานา อนาหาโร นิพฺพาเยยฺย; เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กายปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยมาโน ‘กายปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ. ชีวิตปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยมาโน ‘ชีวิตปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ. ‘กายสฺส เภทา อุทฺธํ ชีวิตปริยาทานา อิเธว สพฺพเวทยิตานิ อนภินนฺทิตานิ สีตีภวิสฺสนฺตี’ติ ปชานาตี’’ติ. อฏฺฐมํ. “भिक्खूहो, ज्याप्रमाणे तेल आणि वात यांच्यावर अवलंबून तेलाचा दिवा जळतो, आणि त्या तेलाच्या व वातीच्या संपण्याने, इंधन न मिळाल्यामुळे तो विझून जातो; त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, भिक्खू शरीराच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवत असताना ‘मी शरीराच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवत आहे’ असे जाणतो. आयुष्याच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवत असताना ‘मी आयुष्याच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवत आहे’ असे जाणतो. ‘शरीराच्या भेदानंतर, आयुष्याच्या समाप्तीनंतर, याच जन्मात सर्व वेदना, ज्यांचे अभिनंदन केले गेले नाही, त्या शांत होतील,’ असे तो जाणतो.” हे आठवे. ๙. อนิจฺจสุตฺตํ ९. अनिच्चसुत्त (अनित्य सूत्र) ๒๕๗. ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา อนิจฺจา สงฺขตา ปฏิจฺจสมุปฺปนฺนา ขยธมฺมา วยธมฺมา วิราคธมฺมา นิโรธธมฺมา. กตมา ติสฺโส? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา โข, ภิกฺขเว, ติสฺโส เวทนา อนิจฺจา สงฺขตา ปฏิจฺจสมุปฺปนฺนา ขยธมฺมา วยธมฺมา วิราคธมฺมา นิโรธธมฺมา’’ติ. นวมํ. २५७. “भिक्खूहो, या तीन वेदना अनित्य आहेत, संस्कृत (संस्कारित) आहेत, प्रतीत्यसमुत्पन्न आहेत, क्षयधर्म (नष्ट होण्याचा स्वभाव असणाऱ्या) आहेत, वयधर्म (ऱ्हास पावणारा स्वभाव असणाऱ्या) आहेत, विरागधर्म (आसक्ती नष्ट होण्याचा स्वभाव असणाऱ्या) आहेत, निरोधधर्म (लय पावणारा स्वभाव असणाऱ्या) आहेत. कोणत्या तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना. भिक्खूहो, या तीन वेदना अनित्य, संस्कृत, प्रतीत्यसमुत्पन्न, क्षयधर्म, वयधर्म, विरागधर्म आणि निरोधधर्म आहेत.” हे नववे. ๑๐. ผสฺสมูลกสุตฺตํ १०. फस्समूलकसुत्त (स्पर्शमूलक सूत्र) ๒๕๘. ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา ผสฺสชา ผสฺสมูลกา ผสฺสนิทานา ผสฺสปจฺจยา. กตมา ติสฺโส? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา. สุขเวทนิยํ, ภิกฺขเว, ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขา เวทนา. ตสฺเสว สุขเวทนิยสฺส ผสฺสสฺส นิโรธา, ยํ ตชฺชํ เวทยิตํ สุขเวทนิยํ ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนา สุขา เวทนา, สา นิรุชฺฌติ, สา วูปสมฺมติ. ทุกฺขเวทนิยํ, ภิกฺขเว, ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ทุกฺขา เวทนา. ตสฺเสว ทุกฺขเวทนิยสฺส ผสฺสสฺส นิโรธา, ยํ ตชฺชํ เวทยิตํ ทุกฺขเวทนิยํ ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนา ทุกฺขา เวทนา, สา นิรุชฺฌติ, สา วูปสมฺมติ. อทุกฺขมสุขเวทนิยํ, ภิกฺขเว, ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ อทุกฺขมสุขา เวทนา. ตสฺเสว อทุกฺขมสุขเวทนิยสฺส ผสฺสสฺส นิโรธา, ยํ ตชฺชํ เวทยิตํ อทุกฺขมสุขเวทนิยํ ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนา อทุกฺขมสุขา เวทนา, สา นิรุชฺฌติ, สา วูปสมฺมติ. เสยฺยถาปิ[Pg.417], ภิกฺขเว, ทฺวินฺนํ กฏฺฐานํ สงฺฆฏฺฏนสโมธานา อุสฺมา ชายติ, เตโช อภินิพฺพตฺตติ. เตสํเยว กฏฺฐานํ นานาภาวา วินิกฺเขปา, ยา ตชฺชา อุสฺมา, สา นิรุชฺฌติ, สา วูปสมฺมติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, อิมา ติสฺโส เวทนา ผสฺสชา ผสฺสมูลกา ผสฺสนิทานา ผสฺสปจฺจยา. ตชฺชํ ผสฺสํ ปฏิจฺจ ตชฺชา เวทนา อุปฺปชฺชนฺติ. ตชฺชสฺส ผสฺสสฺส นิโรธา ตชฺชา เวทนา นิรุชฺฌนฺตี’’ติ. ทสมํ. २५८. “भिक्खूहो, या तीन वेदना स्पर्शापासून उत्पन्न होणाऱ्या (स्पर्शज), स्पर्शमूलक, स्पर्श हेच ज्यांचे निदान (कारण) आहे अशा आणि स्पर्शप्रत्ययी (स्पर्शावर अवलंबून असणाऱ्या) आहेत. कोणत्या तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना. भिक्खूहो, सुखद वेदनेला कारणीभूत असणाऱ्या स्पर्शावर अवलंबून सुखद वेदना उत्पन्न होते. त्या सुखद वेदनेला कारणीभूत असणाऱ्या स्पर्शाच्या निरोधाने (नष्ट होण्याने), त्या स्पर्शावर अवलंबून उत्पन्न झालेली जी सुखद वेदना आहे, ती निरुद्ध होते, ती शांत होते. भिक्खूहो, दुःखद वेदनेला कारणीभूत असणाऱ्या स्पर्शावर अवलंबून दुःखद वेदना उत्पन्न होते. त्या दुःखद वेदनेला कारणीभूत असणाऱ्या स्पर्शाच्या निरोधाने, त्या स्पर्शावर अवलंबून उत्पन्न झालेली जी दुःखद वेदना आहे, ती निरुद्ध होते, ती शांत होते. भिक्खूहो, अदुःख-असुख वेदनेला कारणीभूत असणाऱ्या स्पर्शावर अवलंबून अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होते. त्या अदुःख-असुख वेदनेला कारणीभूत असणाऱ्या स्पर्शाच्या निरोधाने, त्या स्पर्शावर अवलंबून उत्पन्न झालेली जी अदुःख-असुख वेदना आहे, ती निरुद्ध होते, ती शांत होते. भिक्खूहो, ज्याप्रमाणे दोन लाकडांच्या घर्षणामुळे व एकत्र येण्यामुळे उष्णता निर्माण होते, अग्नी प्रज्वलित होतो; परंतु तीच लाकडे वेगळी केल्याने व दूर ठेवल्याने त्यापासून निर्माण झालेली उष्णता निरुद्ध होते, शांत होते. त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, या तीन वेदना स्पर्शज, स्पर्शमूलक, स्पर्श हेच ज्यांचे निदान आहे अशा आणि स्पर्शप्रत्ययी आहेत. योग्य स्पर्शावर अवलंबून तशाच वेदना उत्पन्न होतात आणि त्या योग्य स्पर्शाच्या निरोधाने तशा वेदना निरुद्ध होतात.” हे दहावे. สคาถาวคฺโค ปฐโม. सगाथावग्गो पठमो (गाथांसह असलेला पहिला वर्ग समाप्त). ตสฺสุทฺทานํ – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – สมาธิ สุขํ ปหาเนน, ปาตาลํ ทฏฺฐพฺเพน จ; สลฺเลน เจว เคลญฺญา, อนิจฺจ ผสฺสมูลกาติ. समाधी, सुख, प्रहाण, पाताल, द्रष्टव्य, शल्य, गेलञ्ञ (आजारपण), अनित्य आणि फस्समूलक (स्पर्शमूलक). ๒. รโหคตวคฺโค २. रहोगतवग्गो (एकांतात जाण्याचा वर्ग) ๑. รโหคตสุตฺตํ १. रहोगतसुत्त (एकांत सूत्र) ๒๕๙. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธ มยฺหํ, ภนฺเต, รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘ติสฺโส เวทนา วุตฺตา ภควตา. สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา ติสฺโส เวทนา วุตฺตา ภควตา. วุตฺตํ โข ปเนตํ ภควตา – ‘ยํ กิญฺจิ เวทยิตํ ตํ ทุกฺขสฺมิ’นฺติ. กึ นุ โข เอตํ ภควตา สนฺธาย ภาสิตํ – ‘ยํ กิญฺจิ เวทยิตํ ตํ ทุกฺขสฺมิ’’’นฺติ? २५९. तेव्हा एक भिक्खू भगवंतांकडे गेला; जवळ जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या त्या भिक्खूने भगवंतांना असे विचारले – “भंते, येथे मी एकांतात ध्यानस्थ बसलो असताना माझ्या मनात असा विचार आला – ‘भगवंतांनी तीन वेदना सांगितल्या आहेत: सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना. भगवंतांनी या तीन वेदना सांगितल्या आहेत. परंतु भगवंतांनी असेही म्हटले आहे – “जे काही अनुभवले जाते, ते सर्व दुःखात समाविष्ट आहे.” भगवंतांनी नेमके काय लक्षात घेऊन (कशाचा संदर्भ देऊन) असे म्हटले आहे की, “जे काही अनुभवले जाते, ते सर्व दुःखात समाविष्ट आहे”?’” ‘‘สาธุ สาธุ, ภิกฺขุ! ติสฺโส อิมา, ภิกฺขุ, เวทนา วุตฺตา มยา. สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา ติสฺโส เวทนา วุตฺตา มยา. วุตฺตํ โข ปเนตํ, ภิกฺขุ, มยา – ‘ยํ กิญฺจิ เวทยิตํ, ตํ ทุกฺขสฺมิ’นฺติ. ตํ โข ปเนตํ, ภิกฺขุ, มยา สงฺขารานํเยว อนิจฺจตํ สนฺธาย ภาสิตํ – ‘ยํ กิญฺจิ เวทยิตํ ตํ ทุกฺขสฺมิ’นฺติ[Pg.418]. ตํ โข ปเนตํ, ภิกฺขุ, มยา สงฺขารานํเยว ขยธมฺมตํ…เป… วยธมฺมตํ…เป… วิราคธมฺมตํ …เป… นิโรธธมฺมตํ…เป… วิปริณามธมฺมตํ สนฺธาย ภาสิตํ – ‘ยํ กิญฺจิ เวทยิตํ ตํ ทุกฺขสฺมิ’นฺติ. อถ โข ปน, ภิกฺขุ, มยา อนุปุพฺพสงฺขารานํ นิโรโธ อกฺขาโต. ปฐมํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วาจา นิรุทฺธา โหติ. ทุติยํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วิตกฺกวิจารา นิรุทฺธา โหนฺติ. ตติยํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส ปีติ นิรุทฺธา โหติ. จตุตฺถํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส อสฺสาสปสฺสาสา นิรุทฺธา โหนฺติ. อากาสานญฺจายตนํ สมาปนฺนสฺส รูปสญฺญา นิรุทฺธา โหติ. วิญฺญาณญฺจายตนํ สมาปนฺนสฺส อากาสานญฺจายตนสญฺญา นิรุทฺธา โหติ. อากิญฺจญฺญายตนํ สมาปนฺนสฺส วิญฺญาณญฺจายตนสญฺญา นิรุทฺธา โหติ. เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ สมาปนฺนสฺส อากิญฺจญฺญายตนสญฺญา นิรุทฺธา โหติ. สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺนสฺส สญฺญา จ เวทนา จ นิรุทฺธา โหนฺติ. ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราโค นิรุทฺโธ โหติ, โทโส นิรุทฺโธ โหติ, โมโห นิรุทฺโธ โหติ. อถ โข, ภิกฺขุ, มยา อนุปุพฺพสงฺขารานํ วูปสโม อกฺขาโต. ปฐมํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วาจา วูปสนฺตา โหติ. ทุติยํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วิตกฺกวิจารา วูปสนฺตา โหนฺติ…เป… สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺนสฺส สญฺญา จ เวทนา จ วูปสนฺตา โหนฺติ. ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราโค วูปสนฺโต โหติ, โทโส วูปสนฺโต โหติ, โมโห วูปสนฺโต โหติ. ฉยิมา, ภิกฺขุ, ปสฺสทฺธิโย. ปฐมํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วาจา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหติ. ทุติยํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วิตกฺกวิจารา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหนฺติ. ตติยํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส ปีติ ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหติ. จตุตฺถํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส อสฺสาสปสฺสาสา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหนฺติ. สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺนสฺส สญฺญา จ เวทนา จ ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหนฺติ. ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราโค ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหติ, โทโส ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหติ, โมโห ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหตี’’ติ. ปฐมํ. “साधू, साधू, भिक्खू! हे भिक्खू, मी तीन प्रकारच्या वेदना सांगितल्या आहेत. सुखद वेदना (सुखा वेदना), दुःखद वेदना (दुक्खा वेदना) आणि अदुःख-असुख वेदना (अदुक्खमसुखा वेदना) - या तीन वेदना मी सांगितल्या आहेत. परंतु, हे भिक्खू, मी असेही म्हटले आहे की—'जे काही अनुभवले जाते, ते सर्व दुःखात समाविष्ट आहे.' हे मी संस्कारांच्या (संखारांच्या) अनित्यतेचा (अणिच्चता) विचार करूनच म्हटले आहे की—'जे काही अनुभवले जाते, ते दुःखात समाविष्ट आहे.' हे मी संस्कारांच्या क्षयधर्मतेचा (खयधम्मता)... पे... व्ययधर्मतेचा (वयधम्मता)... पे... विरागधर्मतेचा (विरागधम्मता)... पे... निरोधधर्मतेचा (निरोधधम्मता)... पे... विपरिणामधर्मतेचा (विपरिणामधम्मता) विचार करूनच म्हटले आहे की—'जे काही अनुभवले जाते, ते दुःखात समाविष्ट आहे.' शिवाय, हे भिक्खू, मी संस्कारांचा अनुक्रमिक निरोध (अनुपुब्बसंखारानं निरोधो) सांगितला आहे. प्रथम ध्यान प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची वाणी निरुद्ध होते. द्वितीय ध्यान प्राप्त झालेल्या व्यक्तीचे वितर्क आणि विचार निरुद्ध होतात. तृतीय ध्यान प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची प्रीती निरुद्ध होते. चतुर्थ ध्यान प्राप्त झालेल्या व्यक्तीचे श्वासोच्छ्वास (अस्सास-पस्सासा) निरुद्ध होतात. आकासानञ्चायतन प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची रूपसंज्ञा निरुद्ध होते. विञ्ञाणञ्चायतन प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची आकासानञ्चायतनसंज्ञा निरुद्ध होते. आकिञ्चञ्ञायतन प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची विञ्ञाणञ्चायतनसंज्ञा निरुद्ध होते. नेवसंञ्ञानासंञ्ञायतन प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची आकिञ्चञ्ञायतनसंज्ञा निरुद्ध होते. संज्ञा-वेदयित-निरोध (संञ्ञावेदयितनिरोध) प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची संज्ञा आणि वेदना दोन्ही निरुद्ध होतात. क्षीणास्रव (खीणासव) भिक्खूचा राग निरुद्ध होतो, द्वेष (दोसो) निरुद्ध होतो, मोह निरुद्ध होतो. तसेच, हे भिक्खू, मी संस्कारांचे अनुक्रमिक शांत होणे (अनुपुब्बसंखारानं वूपसमो) सांगितले आहे. प्रथम ध्यान प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची वाणी शांत होते. द्वितीय ध्यान प्राप्त झालेल्या व्यक्तीचे वितर्क आणि विचार शांत होतात... पे... संज्ञा-वेदयित-निरोध प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची संज्ञा आणि वेदना शांत होतात. क्षीणास्रव भिक्खूचा राग शांत होतो, द्वेष शांत होतो, मोह शांत होतो. हे भिक्खू, या सहा प्रकारच्या शांतता (पस्सद्धियो) आहेत. प्रथम ध्यान प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची वाणी शांत (प्रश्रब्ध) होते. द्वितीय ध्यान प्राप्त झालेल्या व्यक्तीचे वितर्क आणि विचार शांत होतात. तृतीय ध्यान प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची प्रीती शांत होते. चतुर्थ ध्यान प्राप्त झालेल्या व्यक्तीचे श्वासोच्छ्वास शांत होतात. संज्ञा-वेदयित-निरोध प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची संज्ञा आणि वेदना शांत होतात. क्षीणास्रव भिक्खूचा राग शांत होतो, द्वेष शांत होतो, मोह शांत होतो.” पहिले. ๒. ปฐมอากาสสุตฺตํ २. प्रथम आकास सुत्त ๒๖๐. ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, อากาเส วิวิธา วาตา วายนฺติ. ปุรตฺถิมาปิ วาตา วายนฺติ, ปจฺฉิมาปิ วาตา วายนฺติ, อุตฺตราปิ วาตา วายนฺติ, ทกฺขิณาปิ วาตา วายนฺติ, สรชาปิ วาตา วายนฺติ, อรชาปิ วาตา วายนฺติ, สีตาปิ วาตา วายนฺติ, อุณฺหาปิ วาตา วายนฺติ, ปริตฺตาปิ วาตา วายนฺติ, อธิมตฺตาปิ วาตา [Pg.419] วายนฺติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, อิมสฺมึ กายสฺมึ วิวิธา เวทนา อุปฺปชฺชนฺติ, สุขาปิ เวทนา อุปฺปชฺชติ, ทุกฺขาปิ เวทนา อุปฺปชฺชติ, อทุกฺขมสุขาปิ เวทนา อุปฺปชฺชตี’’ติ. २६०. “भिक्खूंनो, ज्याप्रमाणे आकाशात विविध वारे वाहतात: पूर्वेकडचे वारे वाहतात, पश्चिमेकडचे वारे वाहतात, उत्तरेकडचे वारे वाहतात, दक्षिणेकडचे वारे वाहतात; धुळीने भरलेले वारे वाहतात, धुळीशिवायचे वारे वाहतात; थंड वारे वाहतात, उष्ण वारे वाहतात; मंद वारे वाहतात आणि अतिशय वेगवान वारे वाहतात. त्याचप्रमाणे, भिक्खूंनो, या शरीरात विविध वेदना उत्पन्न होतात: सुखद वेदनाही उत्पन्न होते, दुःखद वेदनाही उत्पन्न होते आणि अदुःख-असुख वेदनाही उत्पन्न होते.” ‘‘ยถาปิ วาตา อากาเส, วายนฺติ วิวิธา ปุถู; ปุรตฺถิมา ปจฺฉิมา จาปิ, อุตฺตรา อถ ทกฺขิณา. “ज्याप्रमाणे आकाशात अनेक प्रकारचे विविध वारे वाहतात; पूर्वेकडचे आणि पश्चिमेकडचे, तसेच उत्तरेकडचे आणि दक्षिणेकडचे वारे, ‘‘สรชา อรชา จปิ, สีตา อุณฺหา จ เอกทา; อธิมตฺตา ปริตฺตา จ, ปุถู วายนฺติ มาลุตา. धुळीने भरलेले आणि धुळीशिवायचे, कधी थंड तर कधी उष्ण, अतिशय वेगवान आणि मंद—असे अनेक प्रकारचे वारे वाहतात; ‘‘ตเถวิมสฺมึ กายสฺมึ, สมุปฺปชฺชนฺติ เวทนา; สุขทุกฺขสมุปฺปตฺติ, อทุกฺขมสุขา จ ยา. त्याचप्रमाणे या शरीरातही विविध वेदना उत्पन्न होतात; सुख आणि दुःखाची उत्पत्ती होते, तसेच जी अदुःख-असुख वेदना आहे तीही उत्पन्न होते. ‘‘ยโต จ ภิกฺขุ อาตาปี, สมฺปชญฺญํ น ริญฺจติ ; ตโต โส เวทนา สพฺพา, ปริชานาติ ปณฺฑิโต. परंतु जेव्हा भिक्खू उद्योगी (आतापी) असतो आणि संप्रजन्य (स्पष्ट आकलन) सोडत नाही, तेव्हा तो ज्ञानी भिक्खू सर्व वेदना पूर्णपणे जाणतो. ‘‘โส เวทนา ปริญฺญาย, ทิฏฺเฐ ธมฺเม อนาสโว; กายสฺส เภทา ธมฺมฏฺโฐ, สงฺขฺยํ โนเปติ เวทคู’’ติ. ทุติยํ; तो वेदनांना पूर्णपणे जाणून घेऊन, याच जन्मात (दिट्ठे धम्मे) आस्रवरहित (अनास्रव) होतो. धर्मात स्थित असलेला तो वेदपारंगत (वेदगू) भिक्खू, शरीराच्या भेदानंतर (मृत्यूनंतर) कोणत्याही संज्ञेला (पुनर्जन्माच्या गणनेला) प्राप्त होत नाही.” दुसरे. ๓. ทุติยอากาสสุตฺตํ ३. दुसरे आकास सुत्त ๒๖๑. ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, อากาเส วิวิธา วาตา วายนฺติ. ปุรตฺถิมาปิ วาตา วายนฺติ…เป… อธิมตฺตาปิ วาตา วายนฺติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, อิมสฺมึ กายสฺมึ วิวิธา เวทนา อุปฺปชฺชนฺติ, สุขาปิ เวทนา อุปฺปชฺชติ, ทุกฺขาปิ เวทนา อุปฺปชฺชติ, อทุกฺขมสุขาปิ เวทนา อุปฺปชฺชตี’’ติ. ตติยํ. २६१. “भिक्खूंनो, ज्याप्रमाणे आकाशात विविध वारे वाहतात: पूर्वेकडचे वारे वाहतात... पे... अतिशय वेगवान वारे वाहतात. त्याचप्रमाणे, भिक्खूंनो, या शरीरात विविध वेदना उत्पन्न होतात: सुखद वेदनाही उत्पन्न होते, दुःखद वेदनाही उत्पन्न होते आणि अदुःख-असुख वेदनाही उत्पन्न होते.” तिसरे. ๔. อคารสุตฺตํ ४. अगार सुत्त ๒๖๒. ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, อาคนฺตุกาคารํ. ตตฺถ ปุรตฺถิมายปิ ทิสาย อาคนฺตฺวา วาสํ กปฺเปนฺติ, ปจฺฉิมายปิ ทิสาย อาคนฺตฺวา วาสํ กปฺเปนฺติ, อุตฺตรายปิ ทิสาย อาคนฺตฺวา วาสํ กปฺเปนฺติ, ทกฺขิณายปิ ทิสาย อาคนฺตฺวา วาสํ กปฺเปนฺติ. ขตฺติยาปิ อาคนฺตฺวา วาสํ กปฺเปนฺติ, พฺราหฺมณาปิ อาคนฺตฺวา วาสํ กปฺเปนฺติ, เวสฺสาปิ อาคนฺตฺวา วาสํ กปฺเปนฺติ, สุทฺทาปิ อาคนฺตฺวา วาสํ กปฺเปนฺติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, อิมสฺมึ กายสฺมึ วิวิธา เวทนา [Pg.420] อุปฺปชฺชนฺติ. สุขาปิ เวทนา อุปฺปชฺชติ, ทุกฺขาปิ เวทนา อุปฺปชฺชติ, อทุกฺขมสุขาปิ เวทนา อุปฺปชฺชติ. สามิสาปิ สุขา เวทนา อุปฺปชฺชติ, สามิสาปิ ทุกฺขา เวทนา อุปฺปชฺชติ, สามิสาปิ อทุกฺขมสุขา เวทนา อุปฺปชฺชติ. นิรามิสาปิ สุขา เวทนา อุปฺปชฺชติ, นิรามิสาปิ ทุกฺขา เวทนา อุปฺปชฺชติ, นิรามิสาปิ อทุกฺขมสุขา เวทนา อุปฺปชฺชตี’’ติ. จตุตฺถํ. २६२. “भिक्खूंनो, समजा एखादी धर्मशाळा (आगंतुकागार - पाहुण्यांचे विश्रामगृह) आहे. तिथे पूर्वेकडून येऊन लोक मुक्काम करतात, पश्चिमेकडून येऊन मुक्काम करतात, उत्तरेकडून येऊन मुक्काम करतात, दक्षिणेकडून येऊन मुक्काम करतात. क्षत्रियही येऊन मुक्काम करतात, ब्राह्मणही येऊन मुक्काम करतात, वैश्यही येऊन मुक्काम करतात आणि शूद्रही येऊन मुक्काम करतात. त्याचप्रमाणे, भिक्खूंनो, या शरीरात विविध वेदना उत्पन्न होतात: सुखद वेदनाही उत्पन्न होते, दुःखद वेदनाही उत्पन्न होते आणि अदुःख-असुख वेदनाही उत्पन्न होते. सामिष (भौतिक सुखांशी संबंधित) सुखद वेदनाही उत्पन्न होते, सामिष दुःखद वेदनाही उत्पन्न होते, सामिष अदुःख-असुख वेदनाही उत्पन्न होते. निरामिक्ष (भौतिक सुखांशी संबंधित नसलेली) सुखद वेदनाही उत्पन्न होते, निरामिक्ष दुःखद वेदनाही उत्पन्न होते, निरामिक्ष अदुःख-असुख वेदनाही उत्पन्न होते.” चौथे. ๕. ปฐมอานนฺทสุตฺตํ ५. प्रथम आनंद सुत्त ๒๖๓. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ, เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กตมา นุ โข, ภนฺเต, เวทนา, กตโม เวทนาสมุทโย, กตโม เวทนานิโรโธ, กตมา เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา? โก เวทนาย อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณนฺติ? ติสฺโส อิมา, อานนฺท, เวทนา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา วุจฺจนฺติ, อานนฺท, เวทนา. ผสฺสสมุทยา เวทนาสมุทโย; ผสฺสนิโรธา เวทนานิโรโธ. อยเมว อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ…เป… สมฺมาสมาธิ. ยํ เวทนํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อยํ เวทนาย อสฺสาโท. ยา เวทนา อนิจฺจา ทุกฺขา วิปริณามธมฺมา, อยํ เวทนาย อาทีนโว. โย เวทนาย ฉนฺทราควินโย ฉนฺทราคปฺปหานํ, อิทํ เวทนาย นิสฺสรณํ. อถ โข ปนานนฺท, มยา อนุปุพฺพสงฺขารานํ นิโรโธ อกฺขาโต. ปฐมํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วาจา นิรุทฺธา โหติ…เป… สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺนสฺส สญฺญา จ เวทนา จ นิรุทฺธา โหนฺติ. ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราโค นิรุทฺโธ โหติ, โทโส นิรุทฺโธ โหติ, โมโห นิรุทฺโธ โหติ. อถ โข ปนานนฺท, มยา อนุปุพฺพสงฺขารานํ วูปสโม อกฺขาโต. ปฐมํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วาจา วูปสนฺตา โหติ…เป… สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺนสฺส สญฺญา จ เวทนา จ วูปสนฺตา โหนฺติ. ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราโค วูปสนฺโต โหติ, โทโส วูปสนฺโต โหติ, โมโห วูปสนฺโต โหติ. อถ โข ปนานนฺท, มยา อนุปุพฺพสงฺขารานํ ปฏิปฺปสฺสทฺธิ อกฺขาตา. ปฐมํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วาจา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหติ…เป… อากาสานญฺจายตนํ สมาปนฺนสฺส รูปสญฺญา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหติ. วิญฺญาณญฺจายตนํ สมาปนฺนสฺส อากาสานญฺจายตนสญฺญา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหติ. อากิญฺจญฺญายตนํ สมาปนฺนสฺส [Pg.421] วิญฺญาณญฺจายตนสญฺญา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหติ. เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ สมาปนฺนสฺส อากิญฺจญฺญายตนสญฺญา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหติ. สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺนสฺส สญฺญา จ เวทนา จ ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหนฺติ. ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราโค ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหติ, โทโส ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหติ, โมโห ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหตี’’ติ. ปญฺจมํ. २६३. त्यानंतर आयुष्यमान आनंद जेथे भगवान होते तेथे गेले; आणि पोहोचल्यावर एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेले आयुष्यमान आनंद भगवानांना म्हणाले – “भन्ते, वेदना म्हणजे काय? वेदनेचा उगम (समुदय) काय? वेदनेचा निरोध काय? आणि वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग (प्रतिपदा) कोणता? वेदनेचा आस्वाद (आनंद) काय? तिचा दोष (आदीनव) काय? आणि तिच्यातून सुटका (निस्सरण) काय?” “आनंदा, या तीन वेदना आहेत – सुखद वेदना (सुखा वेदना), दुःखद वेदना (दुःखा वेदना) आणि अदुःख-असुख वेदना (उदासीन वेदना). आनंदा, यांनाच वेदना असे म्हणतात. स्पर्शाच्या (फस्स) उगमामुळे वेदनेचा उगम होतो; स्पर्शाच्या निरोधामुळे वेदनेचा निरोध होतो. हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे जो वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग आहे, जसे की – सम्यक दृष्टी...पे... सम्यक समाधी. वेदनेवर अवलंबून जे सुख आणि सौमनस्य (आनंद) उत्पन्न होते, हा वेदनेचा आस्वाद आहे. जी वेदना अनित्य, दुःखद आणि परिवर्तनशील स्वभावाची (विपरिणामधम्मा) आहे, हा वेदनेचा दोष आहे. वेदनेविषयीच्या इच्छा-रागाचा (छंदराग) जो विनय (दूर करणे) आणि प्रहाण (त्याग) आहे, हे वेदनेतून सुटका (निस्सरण) आहे. परंतु आनंदा, मी संस्कारांच्या क्रमिक निरोधाविषयी (अनुपूर्व-संस्कार-निरोध) सांगितले आहे. प्रथम ध्यानात (झान) समापन्न झालेल्या व्यक्तीची वाणी निरुद्ध होते...पे... संज्ञा-वेदयित-निरोधात (निरोध समापत्ती) समापन्न झालेल्या व्यक्तीची संज्ञा आणि वेदना दोन्ही निरुद्ध होतात. आसवांचा क्षय झालेल्या (क्षीणासव) भिक्खूचा राग निरुद्ध होतो, द्वेष निरुद्ध होतो, मोह निरुद्ध होतो. परंतु आनंदा, मी संस्कारांच्या क्रमिक उपशमाविषयी (शांतीविषयी) सांगितले आहे. प्रथम ध्यानात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची वाणी उपशमित (शांत) होते...पे... संज्ञा-वेदयित-निरोधात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची संज्ञा आणि वेदना दोन्ही उपशमित होतात. आसवांचा क्षय झालेल्या भिक्खूचा राग उपशमित होतो, द्वेष उपशमित होतो, मोह उपशमित होतो. परंतु आनंदा, मी संस्कारांच्या क्रमिक प्रतिप्रश्रब्धीविषयी (पूर्ण शांततेविषयी) सांगितले आहे. प्रथम ध्यानात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची वाणी प्रतिप्रश्रब्ध (शांत) होते...पे... आकाशांनंत्यायतन ध्यानात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची रूपसंज्ञा प्रतिप्रश्रब्ध होते. विज्ञाणांनंत्यायतन ध्यानात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची आकाशांनंत्यायतनसंज्ञा प्रतिप्रश्रब्ध होते. आकिंचन्यायतन ध्यानात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची विज्ञाणांनंत्यायतनसंज्ञा प्रतिप्रश्रब्ध होते. नैवसंज्ञानासंज्ञायतन ध्यानात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची आकिंचन्यायतनसंज्ञा प्रतिप्रश्रब्ध होते. संज्ञा-वेदयित-निरोधात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची संज्ञा आणि वेदना दोन्ही प्रतिप्रश्रब्ध होतात. आसवांचा क्षय झालेल्या भिक्खूचा राग प्रतिप्रश्रब्ध होतो, द्वेष प्रतिप्रश्रब्ध होतो, मोह प्रतिप्रश्रब्ध होतो.” पाचवे. ๖. ทุติยอานนฺทสุตฺตํ ६. दुसरे आनंद सुत्त ๒๖๔. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ ภควา เอตทโวจ – ‘‘กตมา นุ โข, อานนฺท, เวทนา, กตโม เวทนาสมุทโย, กตโม เวทนานิโรโธ, กตมา เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา? โก เวทนาย อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณ’’นฺติ? ‘‘ภควํมูลกา โน, ภนฺเต, ธมฺมา ภควนฺเนตฺติกา ภควมฺปฏิสรณา. สาธุ, ภนฺเต, ภควนฺตญฺเญว ปฏิภาตุ เอตสฺส ภาสิตสฺส อตฺโถ. ภควโต สุตฺวา ภิกฺขู ธาเรสฺสนฺตี’’ติ. ‘‘เตน หิ, อานนฺท, สุโณหิ, สาธุกํ มนสิ กโรหิ; ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. ภควา เอตทโวจ – ‘‘ติสฺโส อิมา, อานนฺท, เวทนา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา วุจฺจนฺติ, อานนฺท, เวทนา…เป… ผสฺสสมุทยา…เป… ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราโค ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหติ, โทโส ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหติ, โมโห ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหตี’’ติ. ฉฏฺฐํ. २६४. त्यानंतर आयुष्यमान आनंद जेथे भगवान होते तेथे गेले; आणि पोहोचल्यावर भगवानांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान आनंदांना भगवान म्हणाले – “आनंदा, वेदना म्हणजे काय? वेदनेचा उगम काय? वेदनेचा निरोध काय? आणि वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग कोणता? वेदनेचा आस्वाद काय? तिचा दोष काय? आणि तिच्यातून सुटका काय?” “भन्ते, आमचे धर्म (शिकवण) भगवन्-मूलक (भगवानांवर आधारित) आहेत, भगवन्-नेत्रिक (भगवानांच्या मार्गदर्शनाखाली) आहेत आणि भगवन्-प्रतिशरण (भगवानांचा आश्रय घेणारे) आहेत. भन्ते, हे उत्तम होईल जर भगवानांनीच या भाषणाचा अर्थ स्पष्ट करावा. भगवानांकडून ऐकून भिक्खू त्याचे स्मरण ठेवतील.” “तसे असेल तर आनंदा, ऐक, नीट मनन कर; मी सांगेन.” “होय, भन्ते,” असे म्हणून आयुष्यमान आनंदांनी भगवानांना प्रतिसाद दिला. भगवान म्हणाले – “आनंदा, या तीन वेदना आहेत – सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना. आनंदा, यांनाच वेदना असे म्हणतात...पे... स्पर्शाच्या उगमामुळे...पे... आसवांचा क्षय झालेल्या भिक्खूचा राग प्रतिप्रश्रब्ध होतो, द्वेष प्रतिप्रश्रब्ध होतो, मोह प्रतिप्रश्रब्ध होतो.” सहावे. ๗. ปฐมสมฺพหุลสุตฺตํ ७. पहिले संबहुल सुत्त ๒๖๕. อถ โข สมฺพหุลา ภิกฺขู เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘กตมา นุ โข, ภนฺเต, เวทนา, กตโม เวทนาสมุทโย, กตโม เวทนานิโรโธ, กตมา เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา? โก เวทนาย อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณ’’นฺติ? ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, เวทนา. ผสฺสสมุทยา [Pg.422] เวทนาสมุทโย; ผสฺสนิโรธา เวทนานิโรโธ. อยเมว อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ…เป… สมฺมาสมาธิ. ยํ เวทนํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อยํ เวทนาย อสฺสาโท. ยา เวทนา อนิจฺจา ทุกฺขา วิปริณามธมฺมา, อยํ เวทนาย อาทีนโว. โย เวทนาย ฉนฺทราควินโย ฉนฺทราคปฺปหานํ, อิทํ เวทนาย นิสฺสรณํ. २६५. त्यानंतर अनेक भिक्खू जेथे भगवान होते तेथे गेले; आणि पोहोचल्यावर भगवानांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेले ते भिक्खू भगवानांना म्हणाले – “भन्ते, वेदना म्हणजे काय? वेदनेचा उगम काय? वेदनेचा निरोध काय? आणि वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग कोणता? वेदनेचा आस्वाद काय? तिचा दोष काय? आणि तिच्यातून सुटका काय?” “भिक्खूंनो, या तीन वेदना आहेत – सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना. भिक्खूंनो, यांनाच वेदना असे म्हणतात. स्पर्शाच्या उगमामुळे वेदनेचा उगम होतो; स्पर्शाच्या निरोधामुळे वेदनेचा निरोध होतो. हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे जो वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग आहे, जसे की – सम्यक दृष्टी...पे... सम्यक समाधी. वेदनेवर अवलंबून जे सुख आणि सौमनस्य उत्पन्न होते, हा वेदनेचा आस्वाद आहे. जी वेदना अनित्य, दुःखद आणि परिवर्तनशील स्वभावाची आहे, हा वेदनेचा दोष आहे. वेदनेविषयीच्या इच्छा-रागाचा जो विनय आणि प्रहाण आहे, हे वेदनेतून सुटका आहे.” ‘‘อถ โข ปน, ภิกฺขเว, มยา อนุปุพฺพสงฺขารานํ นิโรโธ อกฺขาโต. ปฐมํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วาจา นิรุทฺธา โหติ…เป… ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราโค นิรุทฺโธ โหติ, โทโส นิรุทฺโธ โหติ, โมโห นิรุทฺโธ โหติ. อถ โข ปน, ภิกฺขเว, มยา อนุปุพฺพสงฺขารานํ วูปสโม อกฺขาโต. ปฐมํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วาจา วูปสนฺตา โหติ…เป… ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราโค วูปสนฺโต โหติ, โทโส วูปสนฺโต โหติ, โมโห วูปสนฺโต โหติ. ฉยิมา, ภิกฺขเว, ปสฺสทฺธิโย. ปฐมํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วาจา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหติ. ทุติยํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วิตกฺกวิจารา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหนฺติ. ตติยํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส ปีติ ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหติ. จตุตฺถํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส อสฺสาสปสฺสาสา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหนฺติ. สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺนสฺส สญฺญา จ เวทนา จ ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหนฺติ. ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราโค ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหติ, โทโส ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหติ, โมโห ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหตี’’ติ. สตฺตมํ. “भिक्खूहो, मी अनुक्रमे संस्कारांचा निरोध सांगितला आहे. प्रथम ध्यानात समापन्न झालेल्याची वाणी निरुद्ध होते...पे... क्षीणास्रव भिक्खूचा राग निरुद्ध होतो, द्वेष निरुद्ध होतो, मोह निरुद्ध होतो. भिक्खूहो, मी अनुक्रमे संस्कारांचे उपशमन सांगितले आहे. प्रथम ध्यानात समापन्न झालेल्याची वाणी उपशमित होते...पे... क्षीणास्रव भिक्खूचा राग उपशमित होतो, द्वेष उपशमित होतो, मोह उपशमित होतो. भिक्खूहो, या सहा प्रस्रब्धी आहेत. प्रथम ध्यानात समापन्न झालेल्याची वाणी प्रस्रब्ध होते. द्वितीय ध्यानात समापन्न झालेल्याचे वितर्क आणि विचार प्रस्रब्ध होतात. तृतीय ध्यानात समापन्न झालेल्याची प्रीती प्रस्रब्ध होते. चतुर्थ ध्यानात समापन्न झालेल्याचे श्वासोच्छ्वास प्रस्रब्ध होतात. संज्ञा-वेदना-निरोध समापन्न झालेल्याची संज्ञा आणि वेदना प्रस्रब्ध होतात. क्षीणास्रव भिक्खूचा राग प्रस्रब्ध होतो, द्वेष प्रस्रब्ध होतो, मोह प्रस्रब्ध होतो.” सातवे (सुत्त). ๘. ทุติยสมฺพหุลสุตฺตํ ८. दुसरे संबहुल सुत्त ๒๖๖. อถ โข สมฺพหุลา ภิกฺขู เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู ภควา เอตทโวจ – ‘‘กตมา นุ โข, ภิกฺขเว, เวทนา, กตโม เวทนาสมุทโย, กตโม เวทนานิโรโธ, กตมา เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา? โก เวทนาย อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณ’’นฺติ? ‘‘ภควํมูลกา โน, ภนฺเต, ธมฺมา…เป…’’ ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, เวทนา…เป… ผสฺสสมุทยา…เป…. (ยถา ปุริมสุตฺตนฺเต, ตถา วิตฺถาเรตพฺโพ.) อฏฺฐมํ. २६६. त्यानंतर अनेक भिक्खू जेथे भगवान होते तेथे गेले...पे... एका बाजूला बसलेल्या त्या भिक्खूंना भगवान म्हणाले – “भिक्खूहो, वेदना कोणती आहे? वेदनेचा उगम (समुदय) कोणता? वेदनेचा निरोध कोणता? वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारी प्रतिपदा (मार्ग) कोणती? वेदनेचा आस्वाद कोणता? तिचा दोष (आदीनव) कोणता? आणि तिचे निःसरण कोणते?” “भंते, आमचे धर्म भगवन्-मूलक आहेत...पे...” “भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत – सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना. भिक्खूहो, यांना वेदना म्हटले जाते...पे... स्पर्शाच्या उगमामुळे (समुदयामुळे)...पे... (जसे मागील सुत्तात आहे, तसेच सविस्तर सांगावे.)” आठवे (सुत्त). ๙. ปญฺจกงฺคสุตฺตํ ९. पंचकंग सुत्त ๒๖๗. อถ [Pg.423] โข ปญฺจกงฺโค ถปติ เยนายสฺมา อุทายี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อุทายึ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ปญฺจกงฺโค ถปติ อายสฺมนฺตํ อุทายึ เอตทโวจ – ‘‘กติ นุ โข, ภนฺเต อุทายิ, เวทนา วุตฺตา ภควตา’’ติ? ‘‘ติสฺโส โข, ถปติ, เวทนา วุตฺตา ภควตา. สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา โข, ถปติ, ติสฺโส เวทนา วุตฺตา ภควตา’’ติ. เอวํ วุตฺเต, ปญฺจกงฺโค ถปติ อายสฺมนฺตํ อุทายึ เอตทโวจ – ‘‘น โข, ภนฺเต อุทายิ, ติสฺโส เวทนา วุตฺตา ภควตา. ทฺเว เวทนา วุตฺตา ภควตา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา. ยายํ, ภนฺเต, อทุกฺขมสุขา เวทนา, สนฺตสฺมึ เอสา ปณีเต สุเข วุตฺตา ภควตา’’ติ. ทุติยมฺปิ โข อายสฺมา อุทายี ปญฺจกงฺคํ ถปตึ เอตทโวจ – ‘‘น โข, ถปติ, ทฺเว เวทนา วุตฺตา ภควตา. ติสฺโส เวทนา วุตฺตา ภควตา. สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา ติสฺโส เวทนา วุตฺตา ภควตา’’ติ. ทุติยมฺปิ โข ปญฺจกงฺโค ถปติ อายสฺมนฺตํ อุทายึ เอตทโวจ – ‘‘น โข, ภนฺเต อุทายิ, ติสฺโส เวทนา วุตฺตา ภควตา. ทฺเว เวทนา วุตฺตา ภควตา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา. ยายํ, ภนฺเต, อทุกฺขมสุขา เวทนา, สนฺตสฺมึ เอสา ปณีเต สุเข วุตฺตา ภควตา’’ติ. ตติยมฺปิ โข อายสฺมา อุทายี ปญฺจกงฺคํ ถปตึ เอตทโวจ – ‘‘น โข, ถปติ, ทฺเว เวทนา วุตฺตา ภควตา. ติสฺโส เวทนา วุตฺตา ภควตา. สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา ติสฺโส เวทนา วุตฺตา ภควตา’’ติ. ตติยมฺปิ โข ปญฺจกงฺโค ถปติ อายสฺมนฺตํ อุทายึ เอตทโวจ – ‘‘น โข, ภนฺเต อุทายิ, ติสฺโส เวทนา วุตฺตา ภควตา. ทฺเว เวทนา วุตฺตา ภควตา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา. ยายํ, ภนฺเต, อทุกฺขมสุขา เวทนา, สนฺตสฺมึ เอสา ปณีเต สุเข วุตฺตา ภควตา’’ติ. เนว สกฺขิ อายสฺมา อุทายี ปญฺจกงฺคํ ถปตึ สญฺญาเปตุํ, น ปนาสกฺขิ ปญฺจกงฺโค ถปติ อายสฺมนฺตํ อุทายึ สญฺญาเปตุํ. อสฺโสสิ โข อายสฺมา อานนฺโท อายสฺมโต อุทายิสฺส ปญฺจกงฺเคน ถปตินา สทฺธึ อิมํ กถาสลฺลาปํ. २६७. त्यानंतर पंचकंग थपती जेथे आयुष्यमान उदायी होते तेथे गेला; जाऊन आयुष्यमान उदायींना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला पंचकंग थपती आयुष्यमान उदायींना म्हणाला – “भंते उदायी, भगवंतांनी किती प्रकारच्या वेदना सांगितल्या आहेत?” “थपती, भगवंतांनी तीन प्रकारच्या वेदना सांगितल्या आहेत. सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना – थपती, भगवंतांनी या तीन वेदना सांगितल्या आहेत.” असे म्हटले असता, पंचकंग थपती आयुष्यमान उदायींना म्हणाला – “भंते उदायी, भगवंतांनी तीन वेदना सांगितलेल्या नाहीत. भगवंतांनी दोनच वेदना सांगितल्या आहेत – सुखद वेदना आणि दुःखद वेदना. भंते, जी ही अदुःख-असुख वेदना आहे, ती भगवंतांनी शांत आणि प्रणीत सुखात सांगितली आहे.” दुसऱ्यांदाही आयुष्यमान उदायी पंचकंग थपतीला म्हणाले – “थपती, भगवंतांनी दोन वेदना सांगितलेल्या नाहीत. भगवंतांनी तीन वेदना सांगितल्या आहेत. सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना – या तीन वेदना भगवंतांनी सांगितल्या आहेत.” दुसऱ्यांदाही पंचकंग थपती आयुष्यमान उदायींना म्हणाला – “भंते उदायी, भगवंतांनी तीन वेदना सांगितलेल्या नाहीत. भगवंतांनी दोनच वेदना सांगितल्या आहेत – सुखद वेदना आणि दुःखद वेदना. भंते, जी ही अदुःख-असुख वेदना आहे, ती भगवंतांनी शांत आणि प्रणीत सुखात सांगितली आहे.” तिसऱ्यांदाही आयुष्यमान उदायी पंचकंग थपतीला म्हणाले – “थपती, भगवंतांनी दोन वेदना सांगितलेल्या नाहीत. भगवंतांनी तीन वेदना सांगितल्या आहेत. सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना – या तीन वेदना भगवंतांनी सांगितल्या आहेत.” तिसऱ्यांदाही पंचकंग थपती आयुष्यमान उदायींना म्हणाला – “भंते उदायी, भगवंतांनी तीन वेदना सांगितलेल्या नाहीत. भगवंतांनी दोनच वेदना सांगितल्या आहेत – सुखद वेदना आणि दुःखद वेदना. भंते, जी ही अदुःख-असुख वेदना आहे, ती भगवंतांनी शांत आणि प्रणीत सुखात सांगितली आहे.” आयुष्यमान उदायी पंचकंग थपतीला पटवून देऊ शकले नाहीत, आणि पंचकंग थपतीही आयुष्यमान उदायींना पटवून देऊ शकला नाही. आयुष्यमान आनंदांनी आयुष्यमान उदायींचा पंचकंग थपतीसोबतचा हा संवाद ऐकला. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อานนฺโท ยาวตโก [Pg.424] อายสฺมโต อุทายิสฺส ปญฺจกงฺเคน ถปตินา สทฺธึ อโหสิ กถาสลฺลาโป ตํ สพฺพํ ภควโต อาโรเจสิ. त्यानंतर आयुष्यमान आनंद जेथे भगवान होते तेथे गेले; जाऊन एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान आनंदांनी आयुष्यमान उदायींचा पंचकंग थपतीसोबत जेवढा काही संवाद झाला होता, तो सर्व भगवंतांना सांगितला. ‘‘สนฺตเมว, อานนฺท, ปริยายํ ปญฺจกงฺโค ถปติ อุทายิสฺส ภิกฺขุโน นาพฺภนุโมทิ; สนฺตญฺจ ปนานนฺท, ปริยายํ อุทายี ภิกฺขุ ปญฺจกงฺคสฺส ถปติโน นาพฺภนุโมทิ. ทฺเวปิ มยา, อานนฺท, เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน. ติสฺโสปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน. ปญฺจปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน. ฉปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน. อฏฺฐารสาปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน. ฉตฺตึสาปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน. อฏฺฐสตมฺปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน. เอวํ ปริยายเทสิโต โข, อานนฺท, มยา ธมฺโม. เอวํ ปริยายเทสิเต โข, อานนฺท, มยา ธมฺเม เย อญฺญมญฺญสฺส สุภาสิตํ สุลปิตํ, น สมนุมญฺญิสฺสนฺติ, น สมนุชานิสฺสนฺติ, น สมนุโมทิสฺสนฺติ, เตสํ เอตํ ปาฏิกงฺขํ – ภณฺฑนชาตา กลหชาตา วิวาทาปนฺนา อญฺญมญฺญํ มุขสตฺตีหิ วิตุทนฺตา วิหริสฺสนฺตีติ. เอวํ ปริยายเทสิโต โข, อานนฺท, มยา ธมฺโม. เอวํ ปริยายเทสิเต โข, อานนฺท, มยา ธมฺเม เย อญฺญมญฺญสฺส สุภาสิตํ สุลปิตํ สมนุมญฺญิสฺสนฺติ สมนุชานิสฺสนฺติ สมนุโมทิสฺสนฺติ, เตสํ เอตํ ปาฏิกงฺขํ – สมคฺคา สมฺโมทมานา อวิวทมานา ขีโรทกีภูตา อญฺญมญฺญํ ปิยจกฺขูหิ สมฺปสฺสนฺตา วิหริสฺสนฺตี’’ติ. “आनंदा, सुतार पंचकंगने भिक्खू उदायीच्या अगदी योग्य अशा स्पष्टीकरणाचा स्वीकार केला नाही; आणि आनंदा, भिक्खू उदायीनेही सुतार पंचकंगच्या अगदी योग्य अशा स्पष्टीकरणाचा स्वीकार केला नाही. आनंदा, माझ्याद्वारे एका पद्धतीने दोन प्रकारच्या वेदनाही सांगितल्या गेल्या आहेत. माझ्याद्वारे दुसऱ्या पद्धतीने तीन प्रकारच्या वेदनाही सांगितल्या गेल्या आहेत. माझ्याद्वारे पाच प्रकारच्या वेदनाही सांगितल्या गेल्या आहेत. माझ्याद्वारे सहा प्रकारच्या वेदनाही सांगितल्या गेल्या आहेत. माझ्याद्वारे अठरा प्रकारच्या वेदनाही सांगितल्या गेल्या आहेत. माझ्याद्वारे छत्तीस प्रकारच्या वेदनाही सांगितल्या गेल्या आहेत. माझ्याद्वारे एकशे आठ प्रकारच्या वेदनाही सांगितल्या गेल्या आहेत. आनंदा, अशा प्रकारे माझ्याद्वारे वेगवेगळ्या पद्धतींनी धम्माचा उपदेश केला गेला आहे. आनंदा, जेव्हा माझ्याद्वारे अशा प्रकारे वेगवेगळ्या पद्धतींनी धम्माचा उपदेश केला गेला आहे, तेव्हा जे लोक एकमेकांनी चांगल्या प्रकारे मांडलेल्या आणि चांगल्या प्रकारे बोललेल्या गोष्टी मान्य करणार नाहीत, संमती देणार नाहीत आणि त्यांचा स्वीकार करणार नाहीत, त्यांच्याकडून अशीच अपेक्षा केली जाऊ शकते की—ते भांडणखोर, कलहप्रिय आणि वादात पडणारे बनून एकमेकांवर शब्दांचे भाले फेकत जगतील. परंतु आनंदा, जेव्हा माझ्याद्वारे अशा प्रकारे वेगवेगळ्या पद्धतींनी धम्माचा उपदेश केला गेला आहे, तेव्हा जे लोक एकमेकांनी चांगल्या प्रकारे मांडलेल्या आणि चांगल्या प्रकारे बोललेल्या गोष्टी मान्य करतील, संमती देतील आणि त्यांचा स्वीकार करतील, त्यांच्याकडून अशी अपेक्षा केली जाऊ शकते की—ते ऐक्याने, आनंदाने, वाद न घालता, दुधात पाणी मिळावे तसे एकरूप होऊन, एकमेकांकडे प्रेमाच्या नजरेने पाहत राहतील.” ‘‘ปญฺจิเม, อานนฺท, กามคุณา. กตเม ปญฺจ? จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา…เป… กายวิญฺเญยฺยา โผฏฺฐพฺพา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. อิเม โข, อานนฺท, ปญฺจ กามคุณา. ยํ โข, อานนฺท, อิเม ปญฺจ กามคุเณ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ – อิทํ วุจฺจติ กามสุขํ. เย โข, อานนฺท, เอวํ วเทยฺยุํ – ‘เอตํปรมํ สนฺตํ สุขํ โสมนสฺสํ ปฏิสํเวเทนฺตี’ติ – อิทํ เนสาหํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อตฺถานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. “आनंदा, हे पाच कामगुण आहेत. कोणते पाच? डोळ्यांनी जाणता येणारे रूप, जे इष्ट, प्रिय, मनाला आवडणारे, प्रिय रूप असणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत... तसेच शरीराने जाणता येणारे स्पर्श, जे इष्ट, प्रिय, मनाला आवडणारे, प्रिय रूप असणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. आनंदा, हेच ते पाच कामगुण आहेत. आनंदा, या पाच कामगुणांवर अवलंबून जे सुख आणि सौमनस्य उत्पन्न होते, त्याला 'कामसुख' असे म्हणतात. आनंदा, जे लोक असे म्हणतील की—'प्राणी ज्याचा अनुभव घेतात ते हेच परम शांत सुख आणि सौमनस्य आहे'—त्यांचे हे म्हणणे मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? आनंदा, कारण या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख अस्तित्वात आहे.” ‘‘กตมญฺจานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ? อิธานนฺท, ภิกฺขุ วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ โข, อานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. เย โข, อานนฺท, เอวํ [Pg.425] วเทยฺยุํ – ‘เอตํปรมํ สนฺตํ สุขํ โสมนสฺสํ ปฏิสํเวเทนฺตี’ติ – อิทํ เนสาหํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อตฺถานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. “आणि आनंदा, या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख कोणते आहे? आनंदा, येथे भिक्खू कामभोगांपासून अलिप्त राहून, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त राहून, वितर्क आणि विचारांसह असणाऱ्या, अलिप्ततेपासून उत्पन्न झालेल्या प्रीती आणि सुखाने युक्त अशा पहिल्या ध्यानाचा लाभ घेऊन विहरतो. आनंदा, हेच ते या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख आहे. आनंदा, जे लोक असे म्हणतील की—'प्राणी ज्याचा अनुभव घेतात ते हेच परम शांत सुख आणि सौमनस्य आहे'—त्यांचे हे म्हणणे मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? आनंदा, कारण या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख अस्तित्वात आहे.” ‘‘กตมญฺจานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ? อิธานนฺท, ภิกฺขุ, วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา อชฺฌตฺตํ สมฺปสาทนํ เจตโส เอโกทิภาวํ อวิตกฺกํ อวิจารํ สมาธิชํ ปีติสุขํ ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ โข, อานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. เย โข, อานนฺท, เอวํ วเทยฺยุํ – ‘เอตํปรมํ สนฺตํ สุขํ โสมนสฺสํ ปฏิสํเวเทนฺตี’ติ – อิทํ เนสาหํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อตฺถานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. “आणि आनंदा, या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख कोणते आहे? आनंदा, येथे भिक्खू वितर्क आणि विचारांच्या शांत होण्यामुळे, चित्ताच्या अंतर्गत प्रसन्नतेने आणि एकाग्रतेने युक्त असणाऱ्या, वितर्करहित, विचाररहित, समाधीपासून उत्पन्न झालेल्या प्रीती आणि सुखाने युक्त अशा दुसऱ्या ध्यानाचा लाभ घेऊन विहरतो. आनंदा, हेच ते या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख आहे. आनंदा, जे लोक असे म्हणतील की—'प्राणी ज्याचा अनुभव घेतात ते हेच परम शांत सुख आणि सौमनस्य आहे'—त्यांचे हे म्हणणे मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? आनंदा, कारण या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख अस्तित्वात आहे.” ‘‘กตมญฺจานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ? อิธานนฺท, ภิกฺขุ ปีติยา จ วิราคา อุเปกฺขโก จ วิหรติ สโต จ สมฺปชาโน, สุขญฺจ กาเยน ปฏิสํเวเทติ, ยํ ตํ อริยา อาจิกฺขนฺติ – ‘อุเปกฺขโก สติมา สุขวิหารี’ติ ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ โข, อานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. เย โข, อานนฺท, เอวํ วเทยฺยุํ – ‘เอตํปรมํ สนฺตํ สุขํ โสมนสฺสํ ปฏิสํเวเทนฺตี’ติ – อิทํ เนสาหํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อตฺถานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. “आणि आनंदा, या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख कोणते आहे? आनंदा, येथे भिक्खू प्रीतीचाही विराग झाल्यामुळे उपेक्षक राहून विहरतो, तसेच तो स्मृतिमान आणि प्रज्ञावान असतो, आणि शरीराने सुखाचा अनुभव घेतो; ज्याच्याविषयी आर्य लोक असे म्हणतात की—'तो उपेक्षक, स्मृतिमान आणि सुखविहारी आहे'—अशा तिसऱ्या ध्यानाचा लाभ घेऊन विहरतो. आनंदा, हेच ते या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख आहे. आनंदा, जे लोक असे म्हणतील की—'प्राणी ज्याचा अनुभव घेतात ते हेच परम शांत सुख आणि सौमनस्य आहे'—त्यांचे हे म्हणणे मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? आनंदा, कारण या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख अस्तित्वात आहे.” ‘‘กตมญฺจานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ? อิธานนฺท, ภิกฺขุ สุขสฺส จ ปหานา ทุกฺขสฺส จ ปหานา ปุพฺเพว โสมนสฺสโทมนสฺสานํ อตฺถงฺคมา อทุกฺขมสุขํ อุเปกฺขาสติปาริสุทฺธึ จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ โข, อานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. เย โข, อานนฺท, เอวํ วเทยฺยุํ – ‘เอตํปรมํ สนฺตํ สุขํ โสมนสฺสํ ปฏิสํเวเทนฺตี’ติ – อิทํ เนสาหํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อตฺถานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. “आणि आनंदा, या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख कोणते आहे? आनंदा, येथे भिक्खू सुखाचा त्याग केल्यामुळे आणि दुःखाचा त्याग केल्यामुळे, तसेच आधीच सौमनस्य आणि दौर्मनस्य नष्ट झाल्यामुळे, जे दुःखही नाही आणि सुखही नाही अशा उपेक्षेमुळे स्मृतीच्या शुद्धतेने युक्त असणाऱ्या चौथ्या ध्यानाचा लाभ घेऊन विहरतो. आनंदा, हेच ते या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख आहे. आनंदा, जे लोक असे म्हणतील की—'प्राणी ज्याचा अनुभव घेतात ते हेच परम शांत सुख आणि सौमनस्य आहे'—त्यांचे हे म्हणणे मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? आनंदा, कारण या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख अस्तित्वात आहे.” ‘‘กตมญฺจานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ? อิธานนฺท, ภิกฺขุ สพฺพโส รูปสญฺญานํ สมติกฺกมา, ปฏิฆสญฺญานํ อตฺถงฺคมา, นานตฺตสญฺญานํ อมนสิการา, ‘อนนฺโต อากาโส’ติ อากาสานญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ โข, อานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. เย โข, อานนฺท, เอวํ วเทยฺยุํ – ‘เอตํปรมํ สนฺตํ [Pg.426] สุขํ โสมนสฺสํ ปฏิสํเวเทนฺตี’ติ – อิทํ เนสาหํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อตฺถานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. “आणि आनंदा, या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख कोणते आहे? आनंदा, येथे भिक्खू सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांचे पूर्णपणे उल्लंघन करून, प्रतिघसंज्ञांच्या अस्त होण्यामुळे, नानात्वसंज्ञांकडे मन न दिल्यामुळे, 'आकाश अनंत आहे' अशा भावनेने आकाशानंत्यायतनाचा लाभ घेऊन विहरतो. आनंदा, हेच ते या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख आहे. आनंदा, जे लोक असे म्हणतील की—'प्राणी ज्याचा अनुभव घेतात ते हेच परम शांत सुख आणि सौमनस्य आहे'—त्यांचे हे म्हणणे मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? आनंदा, कारण या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख अस्तित्वात आहे.” ‘‘กตมญฺจานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ? อิธานนฺท, ภิกฺขุ สพฺพโส อากาสานญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม, ‘อนนฺตํ วิญฺญาณ’นฺติ วิญฺญาณญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ โข, อานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. เย โข, อานนฺท, เอวํ วเทยฺยุํ – ‘เอตํปรมํ สนฺตํ สุขํ โสมนสฺสํ ปฏิสํเวเทนฺตี’ติ – อิทํ เนสาหํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อตฺถานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. “आणि आनंदा, या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख कोणते? आनंदा, येथे भिक्खू सर्व प्रकारे आकासानञ्चायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून, 'विज्ञान अनंत आहे' असे जाणत विञ्ञाणञ्चायतनात प्रवेश करून विहरतो. आनंदा, हेच त्या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख आहे. आनंदा, जे कोणी असे म्हणतील की—'हेच परम शांत सुख आणि सौमनस्य आहे ज्याचा ते अनुभव घेतात'—तर त्यांचे हे म्हणणे मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? आनंदा, कारण या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख अस्तित्वात आहे।” ‘‘กตมญฺจานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ? อิธานนฺท, ภิกฺขุ สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม, ‘นตฺถิ กิญฺจี’ติ อากิญฺจญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ โข, อานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. เย โข, อานนฺท, เอวํ วเทยฺยุํ – ‘เอตํปรมํ สนฺตํ สุขํ โสมนสฺสํ ปฏิสํเวเทนฺตี’ติ – อิทํ เนสาหํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อตฺถานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. “आणि आनंदा, या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख कोणते? आनंदा, येथे भिक्खू सर्व प्रकारे विञ्ञाणञ्चायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून, 'काहीही नाही' असे जाणत आकिञ्चञ्ञायतनात प्रवेश करून विहरतो. आनंदा, हेच त्या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख आहे. आनंदा, जे कोणी असे म्हणतील की—'हेच परम शांत सुख आणि सौमनस्य आहे ज्याचा ते अनुभव घेतात'—तर त्यांचे हे म्हणणे मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? आनंदा, कारण या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख अस्तित्वात आहे।” ‘‘กตมญฺจานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ? อิธานนฺท, ภิกฺขุ สพฺพโส อากิญฺจญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ โข, อานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. เย โข, อานนฺท, เอวํ วเทยฺยุํ – ‘เอตํปรมํ สนฺตํ สุขํ โสมนสฺสํ ปฏิสํเวเทนฺตี’ติ – อิทํ เนสาหํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อตฺถานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. “आणि आनंदा, या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख कोणते? आनंदा, येथे भिक्खू सर्व प्रकारे आकिञ्चञ्ञायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून नेवसञ्ञानासञ्ञायतनात प्रवेश करून विहरतो. आनंदा, हेच त्या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख आहे. आनंदा, जे कोणी असे म्हणतील की—'हेच परम शांत सुख आणि सौमनस्य आहे ज्याचा ते अनुभव घेतात'—तर त्यांचे हे म्हणणे मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? आनंदा, कारण या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख अस्तित्वात आहे।” ‘‘กตมญฺจานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ? อิธานนฺท, ภิกฺขุ สพฺพโส เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม สญฺญาเวทยิตนิโรธํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ โข, อานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. “आणि आनंदा, या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख कोणते? आनंदा, येथे भिक्खू सर्व प्रकारे नेवसञ्ञानासञ्ञायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून सञ्ञावेदयितनिरोधात प्रवेश करून विहरतो. आनंदा, हेच त्या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख आहे।” ‘‘ฐานํ โข ปเนตํ, อานนฺท, วิชฺชติ ยํ อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ วเทยฺยุํ – ‘สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมโณ โคตโม อาห, ตญฺจ สุขสฺมึ [Pg.427] ปญฺญเปติ. ตยิทํ กึสุ, ตยิทํ กถํสู’ติ? เอวํวาทิโน, อานนฺท, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวมสฺสุ วจนียา – ‘น โข, อาวุโส, ภควา สุขญฺเญว เวทนํ สนฺธาย สุขสฺมึ ปญฺญเปติ. ยตฺถ ยตฺถ, อาวุโส, สุขํ อุปลพฺภติ, ยหึ ยหึ, ตํ ตํ ตถาคโต สุขสฺมึ ปญฺญเปตี’’’ติ. นวมํ. “आनंदा, अशी शक्यता आहे की इतर पंथांचे परिव्राजक असे म्हणतील—'श्रमण गौतम संज्ञा आणि वेदनांच्या निरोधाविषयी बोलतात आणि त्याला सुखात समाविष्ट करतात. हे काय आहे? हे कसे काय?' आनंदा, असे बोलणाऱ्या इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे उत्तर दिले पाहिजे—'मित्रांनो, भगवान केवळ सुखद वेदनेचा संदर्भ देऊनच त्याला सुखात समाविष्ट करत नाहीत. तर मित्रांनो, जिथे जिथे आणि ज्या ज्या प्रकारे सुख प्राप्त होते, तथागत त्याला सुखात समाविष्ट करतात (सुख म्हणून घोषित करतात).'” नववे. ๑๐. ภิกฺขุสุตฺตํ १०. भिक्खू सुत्त ๒๖๘. ‘‘ทฺเวปิ มยา, ภิกฺขเว, เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน, ติสฺโสปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน, ปญฺจปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน, ฉปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน, อฏฺฐารสาปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน, ฉตฺตึสาปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน, อฏฺฐสตมฺปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน. เอวํ ปริยายเทสิโต, ภิกฺขเว, มยา ธมฺโม. เอวํ ปริยายเทสิเต โข, ภิกฺขเว, มยา ธมฺเม เย อญฺญมญฺญสฺส สุภาสิตํ สุลปิตํ น สมนุมญฺญิสฺสนฺติ, น สมนุชานิสฺสนฺติ, น สมนุโมทิสฺสนฺติ, เตสํ เอตํ ปาฏิกงฺขํ – ภณฺฑนชาตา กลหชาตา วิวาทาปนฺนา อญฺญมญฺญํ มุขสตฺตีหิ วิตุทนฺตา วิหริสฺสนฺตีติ. เอวํ ปริยายเทสิโต, ภิกฺขเว, มยา ธมฺโม. เอวํ ปริยายเทสิเต โข, ภิกฺขเว, มยา ธมฺเม เย อญฺญมญฺญสฺส สุภาสิตํ สุลปิตํ สมนุมญฺญิสฺสนฺติ สมนุชานิสฺสนฺติ สมนุโมทิสฺสนฺติ, เตสํ เอตํ ปาฏิกงฺขํ – สมคฺคา สมฺโมทมานา อวิวทมานา ขีโรทกีภูตา อญฺญมญฺญํ ปิยจกฺขูหิ สมฺปสฺสนฺตา วิหริสฺสนฺตีติ. २६८. “भिक्खूंनो, मी वेगवेगळ्या पद्धतीने (पर्यायाने) दोन वेदना सांगितल्या आहेत, तीन वेदना सांगितल्या आहेत, पाच वेदना सांगितल्या आहेत, सहा वेदना सांगितल्या आहेत, अठरा वेदना सांगितल्या आहेत, छत्तीस वेदना सांगितल्या आहेत आणि एकशे आठ वेदना देखील वेगवेगळ्या पद्धतीने सांगितल्या आहेत. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे मी वेगवेगळ्या पद्धतीने धम्माचा उपदेश केला आहे. भिक्खूंनो, माझ्याद्वारे अशा प्रकारे वेगवेगळ्या पद्धतीने धम्माचा उपदेश केला गेला असताना, जे एकमेकांच्या सुभाषित आणि सुभाषित वचनांना संमती देणार नाहीत, मान्यता देणार नाहीत आणि आनंद व्यक्त करणार नाहीत, त्यांच्याकडून अशीच अपेक्षा केली जाऊ शकते की—ते भांडण, कलह आणि वादात पडून एकमेकांवर शब्दांचे भाले (मुखरूपी शस्त्रे) चालवत राहतील. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे मी वेगवेगळ्या पद्धतीने धम्माचा उपदेश केला आहे. भिक्खूंनो, माझ्याद्वारे अशा प्रकारे वेगवेगळ्या पद्धतीने धम्माचा उपदेश केला गेला असताना, जे एकमेकांच्या सुभाषित आणि सुभाषित वचनांना संमती देतील, मान्यता देतील आणि आनंद व्यक्त करतील, त्यांच्याकडून अशी अपेक्षा केली जाऊ शकते की—ते ऐक्याने, आनंदाने, वाद न घालता, दुधात पाणी मिळावे तसे एकरूप होऊन, एकमेकांकडे प्रेमळ नजरेने पाहत विहरतील।” ‘‘ปญฺจิเม, ภิกฺขเว, กามคุณา…เป… ฐานํ โข ปเนตํ, ภิกฺขเว, วิชฺชติ ยํ อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ วเทยฺยุํ – ‘สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมโณ โคตโม อาห, ตญฺจ สุขสฺมึ ปญฺญเปติ. ตยิทํ กึสุ, ตยิทํ กถํสู’ติ? เอวํวาทิโน, ภิกฺขเว, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวมสฺสุ วจนียา – ‘น โข, อาวุโส, ภควา สุขญฺเญว เวทนํ สนฺธาย สุขสฺมึ ปญฺญเปติ. ยตฺถ ยตฺถ, อาวุโส, สุขํ อุปลพฺภติ ยหึ ยหึ, ตํ ตํ ตถาคโต สุขสฺมึ ปญฺญเปตี’’ติ. ทสมํ. “भिक्खूंनो, हे पाच कामगुण आहेत... (पेय्याल)... भिक्खूंनो, अशी शक्यता आहे की इतर पंथांचे परिव्राजक असे म्हणतील—'श्रमण गौतम संज्ञा आणि वेदनांच्या निरोधाविषयी बोलतात आणि त्याला सुखात समाविष्ट करतात. हे काय आहे? हे कसे काय?' भिक्खूंनो, असे बोलणाऱ्या इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे उत्तर दिले पाहिजे—'मित्रांनो, भगवान केवळ सुखद वेदनेचा संदर्भ देऊनच त्याला सुखात समाविष्ट करत नाहीत. तर मित्रांनो, जिथे जिथे आणि ज्या ज्या प्रकारे सुख प्राप्त होते, तथागत त्याला सुखात समाविष्ट करतात (सुख म्हणून घोषित करतात).'” दहावे. รโหคตวคฺโค ทุติโย. दुसरा रहुगतवर्ग समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याचा संग्रह (उद्दान) — รโหคตํ [Pg.428] ทฺเว อากาสํ, อคารํ ทฺเว จ อานนฺทา; สมฺพหุลา ทุเว วุตฺตา, ปญฺจกงฺโค จ ภิกฺขุนาติ. रहुगत, दोन आकास, अगार, दोन आनंद, दोन संबहुला, पञ्चकङ्ग आणि भिक्खू. ๓. อฏฺฐสตปริยายวคฺโค ३. अट्ठसतपरियायवर्ग (एकशे आठ प्रकारांचा वर्ग) ๑. สีวกสุตฺตํ १. सीवक सुत्त ๒๖๙. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. อถ โข โมฬิยสีวโก ปริพฺพาชโก เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โมฬิยสีวโก ปริพฺพาชโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สนฺติ, โภ โคตม, เอเก สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘ยํ กิญฺจายํ ปุริสปุคฺคโล ปฏิสํเวเทติ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา สพฺพํ ตํ ปุพฺเพกตเหตู’ติ. อิธ ภวํ โคตโม กิมาหา’’ติ? २६९. एकदा भगवान राजगृहातील वेळुवनात कलन्दकनिवाप येथे विहरत होते. तेव्हा मोळियसीवक परिव्राजक भगवंतांकडे आला; जवळ येऊन त्याने भगवंतांसोबत कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या मोळियसीवक परिव्राजकाने भगवंतांना असे म्हटले—'हे गौतम, काही श्रमण आणि ब्राह्मण असे मानणारे व अशी दृष्टी असणारे आहेत की—हा मनुष्य जे काही सुख, दुःख किंवा अदुःख-असुख (उदासीन) वेदना अनुभवतो, ते सर्व त्याच्या पूर्वकर्माच्या प्रभावामुळे (पूर्वकृत हेतूने) होते. यावर आदरणीय गौतम काय म्हणतात?' ‘‘ปิตฺตสมุฏฺฐานานิปิ โข, สีวก, อิเธกจฺจานิ เวทยิตานิ อุปฺปชฺชนฺติ. สามมฺปิ โข เอตํ, สีวก, เวทิตพฺพํ ยถา ปิตฺตสมุฏฺฐานานิปิ อิเธกจฺจานิ เวทยิตานิ อุปฺปชฺชนฺติ; โลกสฺสปิ โข เอตํ, สีวก, สจฺจสมฺมตํ ยถา ปิตฺตสมุฏฺฐานานิปิ อิเธกจฺจานิ เวทยิตานิ อุปฺปชฺชนฺติ. ตตฺร, สีวก, เย เต สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘ยํ กิญฺจายํ ปุริสปุคฺคโล ปฏิสํเวเทติ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา สพฺพํ ตํ ปุพฺเพกตเหตู’ติ. ยญฺจ สามํ ญาตํ ตญฺจ อติธาวนฺติ, ยญฺจ โลเก สจฺจสมฺมตํ ตญฺจ อติธาวนฺติ. ตสฺมา เตสํ สมณพฺราหฺมณานํ มิจฺฉาติ วทามิ. हे सीवक, या जगात पित्तप्रकोपामुळे उत्पन्न होणाऱ्या काही वेदना खरोखरच उत्पन्न होतात. हे सीवक, पित्तप्रकोपामुळे या जगात काही वेदना उत्पन्न होतात, हे स्वतःच्या अनुभवाने देखील जाणता येते; आणि हे सीवक, पित्तप्रकोपामुळे या जगात काही वेदना उत्पन्न होतात, हे जगामध्ये देखील सत्य मानले जाते. तेथे, हे सीवक, जे श्रमण आणि ब्राह्मण असे प्रतिपादन करणारे व अशी दृष्टी बाळगणारे आहेत की—'हा पुरुष-पुद्गल जे काही सुख, दुःख किंवा अदुःख-असुख वेदना अनुभवतो, ते सर्व पूर्वकर्माच्या हेतूमुळेच होते.' ते स्वतःच्या अनुभवाने जाणलेल्या गोष्टीचेही उल्लंघन करतात आणि जगात जे सत्य मानले गेले आहे त्याचेही उल्लंघन करतात. म्हणूनच, त्या श्रमण-ब्राह्मणांचे हे मत चुकीचे आहे, असे मी म्हणतो. ‘‘เสมฺหสมุฏฺฐานานิปิ โข, สีวก…เป… วาตสมุฏฺฐานานิปิ โข, สีวก…เป… สนฺนิปาติกานิปิ โข, สีวก…เป… อุตุปริณามชานิปิ โข, สีวก…เป… วิสมปริหารชานิปิ โข, สีวก…เป… โอปกฺกมิกานิปิ โข, สีวก…เป… กมฺมวิปากชานิปิ โข, สีวก, อิเธกจฺจานิ เวทยิตานิ อุปฺปชฺชนฺติ. สามมฺปิ โข เอตํ, สีวก, เวทิตพฺพํ. ยถา กมฺมวิปากชานิปิ อิเธกจฺจานิ [Pg.429] เวทยิตานิ อุปฺปชฺชนฺติ; โลกสฺสปิ โข เอตํ, สีวก, สจฺจสมฺมตํ. ยถา กมฺมวิปากชานิปิ อิเธกจฺจานิ เวทยิตานิ อุปฺปชฺชนฺติ; ตตฺร, สีวก, เย เต สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘ยํ กิญฺจายํ ปุริสปุคฺคโล ปฏิสํเวเทติ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา สพฺพํ ตํ ปุพฺเพกตเหตู’ติ. ยญฺจ สามํ ญาตํ ตญฺจ อติธาวนฺติ ยญฺจ โลเก สจฺจสมฺมตํ ตญฺจ อติธาวนฺติ. ตสฺมา เตสํ สมณพฺราหฺมณานํ มิจฺฉาติ วทามีติ. เอวํ วุตฺเต, โมฬิยสีวโก ปริพฺพาชโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม, อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม …เป… อุปาสกํ มํ ภวํ โคตโม ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’’นฺติ. हे सीवक, कफप्रकोपामुळे उत्पन्न होणाऱ्या... हे सीवक, वातप्रकोपामुळे उत्पन्न होणाऱ्या... हे सीवक, तिन्ही दोषांच्या एकत्र येण्यामुळे (सन्निपात) उत्पन्न होणाऱ्या... हे सीवक, ऋतूंच्या परिवर्तनामुळे उत्पन्न होणाऱ्या... हे सीवक, अयोग्य वागणुकीमुळे उत्पन्न होणाऱ्या... हे सीवक, बाह्य उपक्रमांमुळे उत्पन्न होणाऱ्या... हे सीवक, कर्मविपाकामुळे उत्पन्न होणाऱ्या काही वेदना या जगात खरोखरच उत्पन्न होतात. हे सीवक, कर्मविपाकामुळे काही वेदना उत्पन्न होतात, हे स्वतःच्या अनुभवाने देखील जाणता येते; आणि हे सीवक, कर्मविपाकामुळे काही वेदना उत्पन्न होतात, हे जगामध्ये देखील सत्य मानले जाते. तेथे, हे सीवक, जे श्रमण आणि ब्राह्मण असे प्रतिपादन करणारे व अशी दृष्टी बाळगणारे आहेत की—'हा पुरुष-पुद्गल जे काही सुख, दुःख किंवा अदुःख-असुख वेदना अनुभवतो, ते सर्व पूर्वकर्माच्या हेतूमुळेच होते.' ते स्वतःच्या अनुभवाने जाणलेल्या गोष्टीचेही उल्लंघन करतात आणि जगात जे सत्य मानले गेले आहे त्याचेही उल्लंघन करतात. म्हणूनच, त्या श्रमण-ब्राह्मणांचे हे मत चुकीचे आहे, असे मी म्हणतो. असे म्हटले असता, मोळियसीवक परिव्राजक भगवंतांना म्हणाला—'अतिशय सुंदर, हे गौतम! अतिशय सुंदर, हे गौतम! ... आजपासून मला भगवंत गौतमांनी जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे.' ‘‘ปิตฺตํ เสมฺหญฺจ วาโต จ, สนฺนิปาตา อุตูนิ จ; วิสมํ โอปกฺกมิกํ, กมฺมวิปาเกน อฏฺฐมี’’ติ. ปฐมํ; पित्त, कफ आणि वात, तिन्ही दोषांचे एकत्र येणे (सन्निपात), ऋतूंचे परिवर्तन, अयोग्य वागणूक, बाह्य उपक्रम आणि आठवे कारण म्हणजे कर्मविपाक. (पहिले सुत्त समाप्त) ๒. อฏฺฐสตสุตฺตํ २. अट्ठसत सुत्त (एकशे आठ प्रकारच्या वेदनांचे सुत्त) ๒๗๐. ‘‘อฏฺฐสตปริยายํ โว, ภิกฺขเว, ธมฺมปริยายํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, อฏฺฐสตปริยาโย, ธมฺมปริยาโย? ทฺเวปิ มยา, ภิกฺขเว, เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน; ติสฺโสปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน; ปญฺจปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน; ฉปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน; อฏฺฐารสาปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน; ฉตฺตึสาปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน; อฏฺฐสตมฺปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน. ‘‘กตมา จ, ภิกฺขเว, ทฺเว เวทนา? กายิกา จ เจตสิกา จ – อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, ทฺเว เวทนา. กตมา จ, ภิกฺขเว, ติสฺโส เวทนา? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, ติสฺโส เวทนา. กตมา จ, ภิกฺขเว, ปญฺจ เวทนา? สุขินฺทฺริยํ, ทุกฺขินฺทฺริยํ, โสมนสฺสินฺทฺริยํ, โทมนสฺสินฺทฺริยํ, อุเปกฺขินฺทฺริยํ – อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, ปญฺจ เวทนา. กตมา จ, ภิกฺขเว, ฉ เวทนา? จกฺขุสมฺผสฺสชา เวทนา…เป… มโนสมฺผสฺสชา เวทนา – อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, ฉ เวทนา. กตมา จ, ภิกฺขเว, อฏฺฐารส เวทนา? ฉ โสมนสฺสูปวิจารา, ฉ โทมนสฺสูปวิจารา, ฉ อุเปกฺขูปวิจารา – อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, อฏฺฐารส เวทนา. กตมา จ, ภิกฺขเว, ฉตฺตึส เวทนา? ฉ เคหสิตานิ โสมนสฺสานิ, ฉ เนกฺขมฺมสิตานิ โสมนสฺสานิ, ฉ เคหสิตานิ โทมนสฺสานิ, ฉ เนกฺขมฺมสิตานิ [Pg.430] โทมนสฺสานิ, ฉ เคหสิตา อุเปกฺขา, ฉ เนกฺขมฺมสิตา อุเปกฺขา – อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, ฉตฺตึส เวทนา. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อฏฺฐสตํ เวทนา? อตีตา ฉตฺตึส เวทนา, อนาคตา ฉตฺตึส เวทนา, ปจฺจุปฺปนฺนา ฉตฺตึส เวทนา – อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, อฏฺฐสตํ เวทนา. อยํ, ภิกฺขเว, อฏฺฐสตปริยาโย ธมฺมปริยาโย’’ติ. ทุติยํ. २७०. भिक्खूूंनो, मी तुम्हांला एकशे आठ प्रकारच्या वेदनांच्या विश्लेषणाची धम्मदेशना देईन. ती लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूूंनो, एकशे आठ प्रकारच्या वेदनांचे विश्लेषण करणारी धम्मदेशना कोणती आहे? भिक्खूूंनो, मी एका पद्धतीने दोन प्रकारच्या वेदना सांगितल्या आहेत; दुसऱ्या पद्धतीने तीन प्रकारच्या वेदना सांगितल्या आहेत; पाच प्रकारच्या वेदना सांगितल्या आहेत; सहा प्रकारच्या वेदना सांगितल्या आहेत; अठरा प्रकारच्या वेदना सांगितल्या आहेत; छत्तीस प्रकारच्या वेदना सांगितल्या आहेत; आणि एका पद्धतीने एकशे आठ प्रकारच्या वेदना सांगितल्या आहेत. आणि भिक्खूूंनो, दोन प्रकारच्या वेदना कोणत्या आहेत? शारीरिक आणि मानसिक—भिक्खूूंनो, यांना दोन प्रकारच्या वेदना म्हणतात. आणि भिक्खूूंनो, तीन प्रकारच्या वेदना कोणत्या आहेत? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख (उदासीन) वेदना—भिक्खूूंनो, यांना तीन प्रकारच्या वेदना म्हणतात. आणि भिक्खूूंनो, पाच प्रकारच्या वेदना कोणत्या आहेत? सुखेंद्रिय, दुःखेंद्रिय, सौमनस्येंद्रिय, दौर्मनस्येंद्रिय आणि उपेक्षेंद्रिय—भिक्खूूंनो, यांना पाच प्रकारच्या वेदना म्हणतात. आणि भिक्खूूंनो, सहा प्रकारच्या वेदना कोणत्या आहेत? चक्षु-संस्पर्शजन्य वेदना... आणि मन-संस्पर्शजन्य वेदना—भिक्खूूंनो, यांना सहा प्रकारच्या वेदना म्हणतात. आणि भिक्खूूंनो, अठरा प्रकारच्या वेदना कोणत्या आहेत? सहा सौमनस्य-उपविचार, सहा दौर्मनस्य-उपविचार आणि सहा उपेक्षा-उपविचार—भिक्खूूंनो, यांना अठरा प्रकारच्या वेदना म्हणतात. आणि भिक्खूूंनो, छत्तीस प्रकारच्या वेदना कोणत्या आहेत? गृहस्थजीवनावर आधारित सहा सौमनस्य वेदना, नैष्क्रम्यावर आधारित सहा सौमनस्य वेदना; गृहस्थजीवनावर आधारित सहा दौर्मनस्य वेदना, नैष्क्रम्यावर आधारित सहा दौर्मनस्य वेदना; गृहस्थजीवनावर आधारित सहा उपेक्षा वेदना, नैष्क्रम्यावर आधारित सहा उपेक्षा वेदना—भिक्खूूंनो, यांना छत्तीस प्रकारच्या वेदना म्हणतात. आणि भिक्खूूंनो, एकशे आठ प्रकारच्या वेदना कोणत्या आहेत? भूतकाळातील छत्तीस वेदना, भविष्यकाळातील छत्तीस वेदना आणि वर्तमानकाळातील छत्तीस वेदना—भिक्खूूंनो, यांना एकशे आठ प्रकारच्या वेदना म्हणतात. भिक्खूूंनो, हाच एकशे आठ प्रकारच्या वेदनांच्या विश्लेषणाचा धम्मपर्याय आहे. (दुसरे सुत्त समाप्त) ๓. อญฺญตรภิกฺขุสุตฺตํ ३. अञ्ञतरभिक्खू सुत्त (एका भिक्खूचे सुत्त) ๒๗๑. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กตมา นุ โข, ภนฺเต, เวทนา, กตโม เวทนาสมุทโย, กตมา เวทนาสมุทยคามินี ปฏิปทา? กตโม เวทนานิโรโธ, กตมา เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา? โก เวทนาย อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณ’’นฺติ? २७१. त्यानंतर एक भिक्खू भगवंतांकडे गेला; तिथे जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला तो भिक्खू भगवंतांना म्हणाला—'भंते, वेदना म्हणजे काय? वेदनेचा उगम (समुदय) कसा होतो? वेदनेच्या उगमाकडे नेणारा मार्ग कोणता? वेदनेचा निरोध कसा होतो? वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग कोणता? वेदनेचा आस्वाद (आकर्षण) काय आहे? तिचा दोष (आदीनव) काय आहे? आणि तिच्यातून सुटका (निःसरण) कशी होते?' ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขุ, เวทนา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา. อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขุ, เวทนา. ผสฺสสมุทยา เวทนาสมุทโย. ตณฺหา เวทนาสมุทยคามินี ปฏิปทา. ผสฺสนิโรธา เวทนานิโรโธ. อยเมว อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ…เป… สมฺมาสมาธิ. ยํ เวทนํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อยํ เวทนาย อสฺสาโท; ยา เวทนา อนิจฺจา ทุกฺขา วิปริณามธมฺมา, อยํ เวทนาย อาทีนโว; โย เวทนาย ฉนฺทราควินโย ฉนฺทราคปฺปหานํ, อิทํ เวทนาย นิสฺสรณ’’นฺติ. ตติยํ. भिक्खू, या तीन वेदना आहेत—सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख (उदासीन) वेदना. भिक्खू, यांनाच वेदना म्हणतात. स्पर्शाच्या उगमामुळे वेदनेचा उगम होतो. तृष्णा हा वेदनेच्या उगमाकडे नेणारा मार्ग आहे. स्पर्शाच्या निरोधामुळे वेदनेचा निरोध होतो. हाच आर्य अष्टांगिक मार्ग वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग आहे, म्हणजेच—सम्यक दृष्टी... सम्यक समाधी. वेदनेवर अवलंबून जे सुख आणि सौमनस्य (आनंद) उत्पन्न होते, तो वेदनेचा आस्वाद आहे; जी वेदना अनित्य, दुःखद आणि परिवर्तनशील स्वभावाची आहे, तो वेदनेचा दोष आहे; वेदनेविषयीच्या इच्छा-रागाचे (छंदराग) नियंत्रण करणे आणि इच्छा-रागाचा त्याग करणे, हे वेदनेतून सुटका (निःसरण) मिळवणे आहे. (तिसरे सुत्त समाप्त) ๔. ปุพฺพสุตฺตํ ४. पुब्ब सुत्त (पूर्वीचे सुत्त) ๒๗๒. ‘‘ปุพฺเพว เม, ภิกฺขเว, สมฺโพธา อนภิสมฺพุทฺธสฺส โพธิสตฺตสฺเสว สโต เอตทโหสิ – ‘กตมา นุ โข เวทนา, กตโม เวทนาสมุทโย, กตมา เวทนาสมุทยคามินี ปฏิปทา, กตโม เวทนานิโรโธ, กตมา เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา? โก เวทนาย อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณ’นฺติ? ตสฺส มยฺหํ, ภิกฺขเว, เอตทโหสิ – ‘ติสฺโส อิมา เวทนา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา. อิมา วุจฺจนฺติ เวทนา. ผสฺสสมุทยา เวทนาสมุทโย. ตณฺหา เวทนาสมุทยคามินี ปฏิปทา…เป… โย เวทนาย ฉนฺทราควินโย ฉนฺทราคปฺปหานํ. อิทํ เวทนาย นิสฺสรณ’’’นฺติ. จตุตฺถํ. २७२. “भिक्खूहो, संबोधीच्या (पूर्ण ज्ञानाच्या) पूर्वी, मी अजून पूर्णपणे संबुद्ध नसताना, केवळ एक बोधिसत्व असताना माझ्या मनात असा विचार आला – ‘वेदना म्हणजे काय? वेदनेचा उगम (समुदय) काय? वेदनेच्या उगमाकडे नेणारा मार्ग कोणता? वेदनेचा निरोध काय? वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग कोणता? वेदनेतील आस्वाद (सुखदता) काय? तिचा दोष (आदीनव) काय? आणि तिच्यातून सुटका (निस्सरण) काय?’ भिक्खूहो, तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला – ‘या तीन वेदना आहेत – सुखद वेदना (सुखा वेदना), दुःखद वेदना (दुःखा वेदना) आणि सुखदही नसलेली व दुःखदही नसलेली वेदना (अदुक्खमसुखा वेदना). यांना वेदना असे म्हणतात. स्पर्शाच्या उगमामुळे (फस्ससमुदया) वेदनेचा उगम होतो. तृष्णा (तण्हा) हा वेदनेच्या उगमाकडे नेणारा मार्ग आहे... पे... वेदनेतील जो इच्छा-राग दूर करणे (छंदरागविनय) व इच्छा-रागाचा त्याग करणे (छंदरागप्पहान) आहे, हेच वेदनेतून सुटका (निस्सरण) आहे.’” चौथे. ๕. ญาณสุตฺตํ ५. ज्ञानसुत्त ๒๗๓. ‘‘‘อิมา [Pg.431] เวทนา’ติ เม, ภิกฺขเว, ปุพฺเพ อนนุสฺสุเตสุ ธมฺเมสุ จกฺขุํ อุทปาทิ, ญาณํ อุทปาทิ, ปญฺญา อุทปาทิ, วิชฺชา อุทปาทิ, อาโลโก อุทปาทิ. ‘อยํ เวทนาสมุทโย’ติ เม, ภิกฺขเว, ปุพฺเพ อนนุสฺสุเตสุ ธมฺเมสุ จกฺขุํ อุทปาทิ…เป… อาโลโก อุทปาทิ. ‘อยํ เวทนาสมุทยคามินี ปฏิปทา’ติ เม, ภิกฺขเว, ปุพฺเพ อนนุสฺสุเตสุ ธมฺเมสุ จกฺขุํ อุทปาทิ…เป… ‘อยํ เวทนานิโรโธ’ติ เม, ภิกฺขเว, ปุพฺเพ อนนุสฺสุเตสุ ธมฺเมสุ จกฺขุํ อุทปาทิ …เป… ‘อยํ เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา’ติ เม, ภิกฺขเว, ปุพฺเพ อนนุสฺสุเตสุ ธมฺเมสุ จกฺขุํ อุทปาทิ…เป… ‘อยํ เวทนาย อสฺสาโท’ติ เม, ภิกฺขเว, ปุพฺเพ อนนุสฺสุเตสุ ธมฺเมสุ…เป… ‘อยํ เวทนาย อาทีนโว’ติ เม, ภิกฺขเว, ปุพฺเพ อนนุสฺสุเตสุ ธมฺเมสุ…เป… ‘อิทํ โข นิสฺสรณ’นฺติ เม, ภิกฺขเว, ปุพฺเพ อนนุสฺสุเตสุ ธมฺเมสุ จกฺขุํ อุทปาทิ, ญาณํ อุทปาทิ, ปญฺญา อุทปาทิ, วิชฺชา อุทปาทิ, อาโลโก อุทปาที’’ติ. ปญฺจมํ. २७३. “‘ह्या वेदना आहेत’ – भिक्खूहो, पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या धर्मांमध्ये माझ्यामध्ये चक्षू (दृष्टी) उत्पन्न झाला, ज्ञान उत्पन्न झाले, प्रज्ञा उत्पन्न झाली, विद्या उत्पन्न झाली, प्रकाश उत्पन्न झाला. ‘हा वेदनेचा उगम आहे’ – भिक्खूहो, पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या धर्मांमध्ये माझ्यामध्ये चक्षू उत्पन्न झाला... पे... प्रकाश उत्पन्न झाला. ‘हा वेदनेच्या उगमाकडे नेणारा मार्ग आहे’ – भिक्खूहो, पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या धर्मांमध्ये माझ्यामध्ये चक्षू उत्पन्न झाला... पे... ‘हा वेदनेचा निरोध आहे’ – भिक्खूहो, पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या धर्मांमध्ये माझ्यामध्ये चक्षू उत्पन्न झाला... पे... ‘हा वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग आहे’ – भिक्खूहो, पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या धर्मांमध्ये माझ्यामध्ये चक्षू उत्पन्न झाला... पे... ‘हा वेदनेतील आस्वाद आहे’ – भिक्खूहो, पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या धर्मांमध्ये... पे... ‘हा वेदनेतील दोष आहे’ – भिक्खूहो, पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या धर्मांमध्ये... पे... ‘हीच वेदनेतून सुटका आहे’ – भिक्खूहो, पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या धर्मांमध्ये माझ्यामध्ये चक्षू उत्पन्न झाला, ज्ञान उत्पन्न झाले, प्रज्ञा उत्पन्न झाली, विद्या उत्पन्न झाली, प्रकाश उत्पन्न झाला.” पाचवे. ๖. สมฺพหุลภิกฺขุสุตฺตํ ६. संबहुलभिक्खुसुत्त ๒๗๔. อถ โข สมฺพหุลา ภิกฺขู เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘กตมา นุ โข, ภนฺเต, เวทนา, กตโม เวทนาสมุทโย, กตมา เวทนาสมุทยคามินี ปฏิปทา? กตโม เวทนานิโรโธ, กตมา เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา? โก เวทนาย อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณ’’นฺติ? ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา. อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, เวทนา. ผสฺสสมุทยา เวทนาสมุทโย. ตณฺหา เวทนาสมุทยคามินี ปฏิปทา. ผสฺสนิโรธา…เป… โย เวทนาย ฉนฺทราควินโย ฉนฺทราคปฺปหานํ. อิทํ เวทนาย นิสฺสรณ’’นฺติ. ฉฏฺฐํ. २७४. तेव्हा अनेक भिक्खू जेथे भगवान होते तेथे आले; आल्यानंतर... पे... एका बाजूला बसून त्या भिक्खूंनी भगवंतांना विचारले – “भंते, वेदना म्हणजे काय? वेदनेचा उगम काय? वेदनेच्या उगमाकडे नेणारा मार्ग कोणता? वेदनेचा निरोध काय? वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग कोणता? वेदनेतील आस्वाद काय? तिचा दोष काय? आणि तिच्यातून सुटका काय?” “भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत – सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि सुखदही नसलेली व दुःखदही नसलेली वेदना. भिक्खूहो, यांना वेदना असे म्हणतात. स्पर्शाच्या उगमामुळे वेदनेचा उगम होतो. तृष्णा हा वेदनेच्या उगमाकडे नेणारा मार्ग आहे. स्पर्शाच्या निरोधामुळे... पे... वेदनेतील जो इच्छा-राग दूर करणे व इच्छा-रागाचा त्याग करणे आहे, हेच वेदनेतून सुटका आहे.” सहावे. ๗. ปฐมสมณพฺราหฺมณสุตฺตํ ७. पठमसमणब्राह्मणसुत्त ๒๗๕. ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา. กตมา ติสฺโส? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา. เย หิ เกจิ, ภิกฺขเว, สมณา [Pg.432] วา พฺราหฺมณา วา อิมาสํ ติสฺสนฺนํ เวทนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ นปฺปชานนฺติ. น เม เต, ภิกฺขเว, สมณา วา พฺราหฺมณา วา สมเณสุ วา สมณสมฺมตา พฺราหฺมเณสุ วา พฺราหฺมณสมฺมตา, น จ ปน เต อายสฺมนฺโต สามญฺญตฺถํ วา พฺรหฺมญฺญตฺถํ วา ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหรนฺติ. เย จ โข เกจิ, ภิกฺขเว, สมณา วา พฺราหฺมณา วา อิมาสํ ติสฺสนฺนํ เวทนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวํ จ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ ปชานนฺติ. เต โข เม, ภิกฺขเว, สมณา วา พฺราหฺมณา วา สมเณสุ เจว สมณสมฺมตา พฺราหฺมเณสุ จ พฺราหฺมณสมฺมตา. เต จ ปนายสฺมนฺโต สามญฺญตฺถญฺจ พฺรหฺมญฺญตฺถญฺจ, ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหรนฺตี’’ติ. สตฺตมํ. २७५. “भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत. कोणत्या तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि सुखदही नसलेली व दुःखदही नसलेली वेदना. भिक्खूहो, जे कोणी श्रमण किंवा ब्राह्मण या तीन वेदनांचा उगम, त्यांचा अस्त (निरोध), त्यांचा आस्वाद, त्यांचा दोष आणि त्यांच्यातून सुटका यथाभूत (आहे तशी) जाणत नाहीत; भिक्खूहो, ते श्रमण किंवा ब्राह्मण माझ्या मते श्रमणांमध्ये श्रमण म्हणून मानले जात नाहीत किंवा ब्राह्मणांमध्ये ब्राह्मण म्हणून मानले जात नाहीत. तसेच ते आयुष्यमान याच जन्मात (दृष्टधर्मात) स्वतः उच्च ज्ञानाने (अभिज्ञा) साक्षात करून, प्राप्त करून आणि त्यात प्रतिष्ठित होऊन विहरत नाहीत. परंतु, भिक्खूहो, जे कोणी श्रमण किंवा ब्राह्मण या तीन वेदनांचा उगम, त्यांचा अस्त, त्यांचा आस्वाद, त्यांचा दोष आणि त्यांच्यातून सुटका यथाभूत जाणतात; भिक्खूहो, ते श्रमण किंवा ब्राह्मण माझ्या मते श्रमणांमध्ये श्रमण म्हणून मानले जातात आणि ब्राह्मणांमध्ये ब्राह्मण म्हणून मानले जातात. तसेच ते आयुष्यमान याच जन्मात स्वतः उच्च ज्ञानाने साक्षात करून, प्राप्त करून आणि त्यात प्रतिष्ठित होऊन विहरतात.” सातवे. ๘. ทุติยสมณพฺราหฺมณสุตฺตํ ८. दुतियसमणब्राह्मणसुत्त ๒๗๖. ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา. กตมา ติสฺโส? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา. เย หิ เกจิ, ภิกฺขเว, สมณา วา พฺราหฺมณา วา อิมาสํ ติสฺสนฺนํ เวทนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ นปฺปชานนฺติ…เป… ปชานนฺติ…เป… สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหรนฺตี’’ติ. อฏฺฐมํ. २७६. “भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत. कोणत्या तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि सुखदही नसलेली व दुःखदही नसलेली वेदना. भिक्खूहो, जे कोणी श्रमण किंवा ब्राह्मण या तीन वेदनांचा उगम, त्यांचा अस्त, त्यांचा आस्वाद, त्यांचा दोष आणि त्यांच्यातून सुटका यथाभूत जाणत नाहीत... पे... जाणतात... पे... स्वतः उच्च ज्ञानाने साक्षात करून, प्राप्त करून आणि त्यात प्रतिष्ठित होऊन विहरतात.” आठवे. ๙. ตติยสมณพฺราหฺมณสุตฺตํ ९. ततियसमणब्राह्मणसुत्त ๒๗๗. ‘‘เย หิ เกจิ, ภิกฺขเว, สมณา วา พฺราหฺมณา วา เวทนํ นปฺปชานนฺติ, เวทนาสมุทยํ นปฺปชานนฺติ, เวทนานิโรธํ นปฺปชานนฺติ, เวทนานิโรธคามินึ ปฏิปทํ นปฺปชานนฺติ…เป… ปชานนฺติ…เป… สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหรนฺตี’’ติ. นวมํ. २७७. “भिक्खूहो, जे कोणी श्रमण किंवा ब्राह्मण वेदना जाणत नाहीत, वेदनेचा उगम जाणत नाहीत, वेदनेचा निरोध जाणत नाहीत, वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग जाणत नाहीत... पे... जाणतात... पे... स्वतः उच्च ज्ञानाने साक्षात करून, प्राप्त करून आणि त्यात प्रतिष्ठित होऊन विहरतात.” नववे. ๑๐. สุทฺธิกสุตฺตํ १०. सुद्धिकसुत्त ๒๗๘. ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา. กตมา ติสฺโส? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา โข, ภิกฺขเว, ติสฺโส เวทนา’’ติ. ทสมํ. २७८. “भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत. कोणत्या तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि सुखदही नसलेली व दुःखदही नसलेली वेदना – भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत.” दहावे. ๑๑. นิรามิสสุตฺตํ ११. निरामीससुत्त ๒๗๙. ‘‘อตฺถิ[Pg.433], ภิกฺขเว, สามิสา ปีติ, อตฺถิ นิรามิสา ปีติ, อตฺถิ นิรามิสา นิรามิสตรา ปีติ; อตฺถิ สามิสํ สุขํ, อตฺถิ นิรามิสํ สุขํ, อตฺถิ นิรามิสา นิรามิสตรํ สุขํ; อตฺถิ สามิสา อุเปกฺขา, อตฺถิ นิรามิสา อุเปกฺขา, อตฺถิ นิรามิสา นิรามิสตรา อุเปกฺขา; อตฺถิ สามิโส วิโมกฺโข, อตฺถิ นิรามิโส วิโมกฺโข, อตฺถิ นิรามิสา นิรามิสตโร วิโมกฺโข. กตมา จ, ภิกฺขเว, สามิสา ปีติ? ปญฺจิเม, ภิกฺขเว, กามคุณา. กตเม ปญฺจ? จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา…เป… กายวิญฺเญยฺยา โผฏฺฐพฺพา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. อิเม โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ กามคุณา. ยา โข, ภิกฺขเว, อิเม ปญฺจ กามคุเณ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ปีติ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, สามิสา ปีติ. २७९. “भिक्खूहो, सामीस (भौतिक/आमिषयुक्त) प्रीती आहे, निरामीस (आमिषरहित/आध्यात्मिक) प्रीती आहे आणि निरामीसपेक्षाही अधिक निरामीस प्रीती आहे; सामीस सुख आहे, निरामीस सुख आहे आणि निरामीसपेक्षाही अधिक निरामीस सुख आहे; सामीस उपेक्षा आहे, निरामीस उपेक्षा आहे आणि निरामीसपेक्षाही अधिक निरामीस उपेक्षा आहे; सामीस विमोक्ष (मुक्ती) आहे, निरामीस विमोक्ष आहे आणि निरामीसपेक्षाही अधिक निरामीस विमोक्ष आहे. आणि भिक्खूहो, सामीस प्रीती कोणती? भिक्खूहो, हे पाच कामगुण आहेत. कोणते पाच? चक्षूने जाणता येणारे (चक्खुविञ्ञेय्य) रूप – जे इष्ट, कांत (प्रिय), मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे असतात... पे... कायेने (स्पर्शाने) जाणता येणारे (कायविञ्ञेय्य) स्प्रष्टव्य (फोट्ठब्ब) – जे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे असतात. भिक्खूहो, हे पाच कामगुण आहेत. भिक्खूहो, या पाच कामगुणांवर अवलंबून जी प्रीती उत्पन्न होते, तिला ‘सामीस प्रीती’ असे म्हणतात.” ‘‘กตมา จ, ภิกฺขเว, นิรามิสา ปีติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา อชฺฌตฺตํ สมฺปสาทนํ เจตโส เอโกทิภาวํ อวิตกฺกํ อวิจารํ สมาธิชํ ปีติสุขํ ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, นิรามิสา ปีติ. भिक्षूंनो, निरामिश प्रीती कोणती? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू कामभोगांपासून अलिप्त होऊन, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, वितर्क व विचारांसह असलेल्या, विवेकजन्य प्रीती व सुखाने युक्त अशा पहिल्या ध्यानाचे संपादन करून विहरतो. वितर्क व विचारांच्या शांत होण्यामुळे, चित्ताच्या अंतर्गत प्रसन्नतेने युक्त, चित्ताची एकाग्रता साधणाऱ्या, वितर्कविरहित, विचारविरहित, समाधीजन्य प्रीती व सुखाने युक्त अशा दुसऱ्या ध्यानाचे संपादन करून विहरतो. भिक्षूंनो, याला निरामिश प्रीती असे म्हणतात. ‘‘กตมา จ, ภิกฺขเว, นิรามิสา นิรามิสตรา ปีติ? ยา โข, ภิกฺขเว, ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราคา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต, โทสา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต, โมหา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต อุปฺปชฺชติ ปีติ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, นิรามิสา นิรามิสตรา ปีติ. भिक्षूंनो, निरामिशाहूनही अधिक निरामिश प्रीती कोणती? भिक्षूंनो, जेव्हा आसवमुक्त भिक्षू आपले चित्त रागापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, चित्त द्वेषापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, चित्त मोहापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, तेव्हा जी प्रीती उत्पन्न होते; भिक्षूंनो, याला निरामिशाहूनही अधिक निरामिश प्रीती असे म्हणतात. ‘‘กตมญฺจ, ภิกฺขเว, สามิสํ สุขํ? ปญฺจิเม, ภิกฺขเว, กามคุณา. กตเม ปญฺจ? จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา…เป… กายวิญฺเญยฺยา โผฏฺฐพฺพา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. อิเม โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ กามคุณา. ยํ โข, ภิกฺขเว, อิเม ปญฺจ กามคุเณ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, สามิสํ สุขํ. भिक्षूंनो, सामिष सुख कोणते? भिक्षूंनो, हे पाच कामगुण आहेत. कोणते पाच? डोळ्यांनी जाणता येणारे, इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय रूप असलेले, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे रूप... तसेच... शरीराने जाणता येणारे, इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय रूप असलेले, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे स्पर्श. भिक्षूंनो, हे पाच कामगुण आहेत. भिक्षूंनो, या पाच कामगुणांवर अवलंबून जे सुख आणि सौमनस्य उत्पन्न होते, भिक्षूंनो, याला सामिष सुख असे म्हणतात. ‘‘กตมญฺจ[Pg.434], ภิกฺขเว, นิรามิสํ สุขํ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา อชฺฌตฺตํ สมฺปสาทนํ เจตโส เอโกทิภาวํ อวิตกฺกํ อวิจารํ สมาธิชํ ปีติสุขํ ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. ปีติยา จ วิราคา อุเปกฺขโก จ วิหรติ สโต จ สมฺปชาโน สุขญฺจ กาเยน ปฏิสํเวเทติ, ยํ ตํ อริยา อาจิกฺขนฺติ – ‘อุเปกฺขโก สติมา สุขวิหารี’ติ ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, นิรามิสํ สุขํ. भिक्षूंनो, निरामिश सुख कोणते? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू कामभोगांपासून अलिप्त होऊन, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, वितर्क व विचारांसह असलेल्या, विवेकजन्य प्रीती व सुखाने युक्त अशा पहिल्या ध्यानाचे संपादन करून विहरतो. वितर्क व विचारांच्या शांत होण्यामुळे, चित्ताच्या अंतर्गत प्रसन्नतेने युक्त, चित्ताची एकाग्रता साधणाऱ्या, वितर्कविरहित, विचारविरहित, समाधीजन्य प्रीती व सुखाने युक्त अशा दुसऱ्या ध्यानाचे संपादन करून विहरतो. प्रीतीचाही विराग झाल्यामुळे तो उपेक्षक होऊन विहरतो, स्मृतीवान आणि प्रज्ञावान राहतो आणि शरीराने सुखाचा अनुभव घेतो, ज्याविषयी आर्य म्हणतात की—'तो उपेक्षक, स्मृतीवान आणि सुखविहारी आहे'—अशा तिसऱ्या ध्यानाचे संपादन करून विहरतो. भिक्षूंनो, याला निरामिश सुख असे म्हणतात. ‘‘กตมญฺจ, ภิกฺขเว, นิรามิสา นิรามิสตรํ สุขํ? ยํ โข, ภิกฺขเว, ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราคา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต, โทสา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต, โมหา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, นิรามิสา นิรามิสตรํ สุขํ. भिक्षूंनो, निरामिशाहूनही अधिक निरामिश सुख कोणते? भिक्षूंनो, जेव्हा आसवमुक्त भिक्षू आपले चित्त रागापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, चित्त द्वेषापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, चित्त मोहापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, तेव्हा जे सुख आणि सौमनस्य उत्पन्न होते; भिक्षूंनो, याला निरामिशाहूनही अधिक निरामिश सुख असे म्हणतात. ‘‘กตมา จ, ภิกฺขเว, สามิสา อุเปกฺขา? ปญฺจิเม, ภิกฺขเว, กามคุณา. กตเม ปญฺจ? จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา…เป… กายวิญฺเญยฺยา โผฏฺฐพฺพา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. อิเม โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ กามคุณา. ยา โข, ภิกฺขเว, อิเม ปญฺจ กามคุเณ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ อุเปกฺขา, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, สามิสา อุเปกฺขา. भिक्षूंनो, सामिष उपेक्षा कोणती? भिक्षूंनो, हे पाच कामगुण आहेत. कोणते पाच? डोळ्यांनी जाणता येणारे, इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय रूप असलेले, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे रूप... तसेच... शरीराने जाणता येणारे, इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय रूप असलेले, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे स्पर्श. भिक्षूंनो, हे पाच कामगुण आहेत. भिक्षूंनो, या पाच कामगुणांवर अवलंबून जी उपेक्षा उत्पन्न होते, भिक्षूंनो, याला सामिष उपेक्षा असे म्हणतात. ‘‘กตมา จ, ภิกฺขเว, นิรามิสา อุเปกฺขา? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สุขสฺส จ ปหานา, ทุกฺขสฺส จ ปหานา, ปุพฺเพว โสมนสฺสโทมนสฺสานํ อตฺถงฺคมา, อทุกฺขมสุขํ อุเปกฺขาสติปาริสุทฺธึ จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, นิรามิสา อุเปกฺขา. भिक्षूंनो, निरामिश उपेक्षा कोणती? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू सुखाचा त्याग केल्यामुळे आणि दुःखाचा त्याग केल्यामुळे, तसेच पूर्वीच सौमनस्य आणि दोमनस्य नष्ट झाल्यामुळे, दुःखही नाही आणि सुखही नाही अशा, उपेक्षेमुळे स्मृतीच्या शुद्धतेने युक्त अशा चौथ्या ध्यानाचे संपादन करून विहरतो. भिक्षूंनो, याला निरामिश उपेक्षा असे म्हणतात. ‘‘กตมา จ, ภิกฺขเว, นิรามิสา นิรามิสตรา อุเปกฺขา? ยา โข, ภิกฺขเว, ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราคา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต, โทสา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต, โมหา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต อุปฺปชฺชติ อุเปกฺขา, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, นิรามิสา นิรามิสตรา อุเปกฺขา. भिक्षूंनो, निरामिशाहूनही अधिक निरामिश उपेक्षा कोणती? भिक्षूंनो, जेव्हा आसवमुक्त भिक्षू आपले चित्त रागापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, चित्त द्वेषापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, चित्त मोहापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, तेव्हा जी उपेक्षा उत्पन्न होते; भिक्षूंनो, याला निरामिशाहूनही अधिक निरामिश उपेक्षा असे म्हणतात. ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, สามิโส วิโมกฺโข? รูปปฺปฏิสํยุตฺโต วิโมกฺโข สามิโส วิโมกฺโข. भिक्षूंनो, सामिष विमोक्ष कोणता? रूपाशी संबंधित असलेला विमोक्ष हा सामिष विमोक्ष होय. ‘‘กตโม [Pg.435] จ, ภิกฺขเว, นิรามิโส วิโมกฺโข? อรูปปฺปฏิสํยุตฺโต วิโมกฺโข นิรามิโส วิโมกฺโข. भिक्षूंनो, निरामिश विमोक्ष कोणता? अरूपाशी संबंधित असलेला विमोक्ष हा निरामिश विमोक्ष होय. ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, นิรามิสา นิรามิสตโร วิโมกฺโข? โย โข, ภิกฺขเว, ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราคา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต, โทสา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต, โมหา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต อุปฺปชฺชติ วิโมกฺโข, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, นิรามิสา นิรามิสตโร วิโมกฺโข’’ติ. เอกาทสมํ. भिक्षूंनो, निरामिशाहूनही अधिक निरामिश विमोक्ष कोणता? भिक्षूंनो, जेव्हा आसवमुक्त भिक्षू आपले चित्त रागापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, चित्त द्वेषापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, चित्त मोहापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, तेव्हा जो विमोक्ष उत्पन्न होतो; भिक्षूंनो, याला निरामिशाहूनही अधिक निरामिश विमोक्ष असे म्हणतात. อฏฺฐสตปริยายวคฺโค ตติโย. अठ्ठसतपरियाय वर्ग तिसरा समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याची अनुक्रमणिका — สีวกอฏฺฐสตํ ภิกฺขุ, ปุพฺเพ ญาณญฺจ ภิกฺขุนา; สมณพฺราหฺมณา ตีณิ, สุทฺธิกญฺจ นิรามิสนฺติ. सीवक, अठ्ठसत, भिक्खू, पुब्बे ज्ञान आणि भिक्खुना; तीन समणब्राह्मण, सुद्धिक आणि निरामिस. เวทนาสํยุตฺตํ สมตฺตํ. वेदनासंयुक्त समाप्त. ๓. มาตุคามสํยุตฺตํ ३. मातुगामसंयुक्त ๑. ปฐมเปยฺยาลวคฺโค १. प्रथम पेय्याल वर्ग ๑. มาตุคามสุตฺตํ १. मातुगाम सुत्त ๒๘๐. ‘‘ปญฺจหิ[Pg.436], ภิกฺขเว, องฺเคหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม เอกนฺตอมนาโป โหติ ปุริสสฺส. กตเมหิ ปญฺจหิ? น จ รูปวา โหติ, น จ โภควา โหติ, น จ สีลวา โหติ, อลโส จ โหติ, ปชญฺจสฺส น ลภติ – อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจหิ องฺเคหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม เอกนฺตอมนาโป โหติ ปุริสสฺส. ปญฺจหิ, ภิกฺขเว, องฺเคหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม เอกนฺตมนาโป โหติ ปุริสสฺส. กตเมหิ ปญฺจหิ? รูปวา จ โหติ, โภควา จ โหติ, สีลวา จ โหติ, ทกฺโข จ โหติ อนลโส, ปชญฺจสฺส ลภติ – อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจหิ องฺเคหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม เอกนฺตมนาโป โหติ ปุริสสฺสา’’ติ. ปฐมํ. २८०. भिक्षूंनो, पाच अंगांनी युक्त असलेली स्त्री पुरुषाला अत्यंत नावडती असते. कोणत्या पाच अंगांनी? ती रूपवान नसते, ती धनवान नसते, ती शीलवान नसते, ती आळशी असते आणि तिला संतती प्राप्त होत नाही — भिक्षूंनो, या पाच अंगांनी युक्त असलेली स्त्री पुरुषाला अत्यंत नावडती असते. भिक्षूंनो, पाच अंगांनी युक्त असलेली स्त्री पुरुषाला अत्यंत आवडती असते. कोणत्या पाच अंगांनी? ती रूपवान असते, ती धनवान नसते, ती शीलवान नसते, ती चतुर व अनळशी असते आणि तिला संतती प्राप्त होते — भिक्षूंनो, या पाच अंगांनी युक्त असलेली स्त्री पुरुषाला अत्यंत आवडती असते. ๒. ปุริสสุตฺตํ २. पुरिस सुत्त ๒๘๑. ‘‘ปญฺจหิ, ภิกฺขเว, องฺเคหิ สมนฺนาคโต ปุริโส เอกนฺตอมนาโป โหติ มาตุคามสฺส. กตเมหิ ปญฺจหิ? น จ รูปวา โหติ, น จ โภควา โหติ, น จ สีลวา โหติ, อลโส จ โหติ, ปชญฺจสฺส น ลภติ – อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจหิ องฺเคหิ สมนฺนาคโต ปุริโส เอกนฺตอมนาโป โหติ มาตุคามสฺส. ปญฺจหิ, ภิกฺขเว, องฺเคหิ สมนฺนาคโต ปุริโส เอกนฺตมนาโป โหติ มาตุคามสฺส. กตเมหิ ปญฺจหิ? รูปวา จ โหติ, โภควา จ โหติ, สีลวา จ โหติ, ทกฺโข จ โหติ อนลโส, ปชญฺจสฺส ลภติ – อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจหิ องฺเคหิ สมนฺนาคโต ปุริโส เอกนฺตมนาโป โหติ มาตุคามสฺสา’’ติ. ทุติยํ. २८१. “भिक्षूंनो, पाच अंगांनी युक्त असलेला पुरुष स्त्रीला अत्यंत नापसंत असतो. कोणत्या पाच? तो रूपवान नसतो, धनवान नसतो, शीलवान नसतो, आळशी असतो आणि त्याला संतती प्राप्त होत नाही – भिक्षूंनो, या पाच अंगांनी युक्त असलेला पुरुष स्त्रीला अत्यंत नापसंत असतो. भिक्षूंनो, पाच अंगांनी युक्त असलेला पुरुष स्त्रीला अत्यंत प्रिय असतो. कोणत्या पाच? तो रूपवान असतो, धनवान असतो, शीलवान असतो, चतुर व उद्योगी असतो आणि त्याला संतती प्राप्त होते – भिक्षूंनो, या पाच अंगांनी युक्त असलेला पुरुष स्त्रीला अत्यंत प्रिय असतो.” हे दुसरे. ๓. อาเวณิกทุกฺขสุตฺตํ ३. आवेणिकदुक्खसुत्तं ๒๘๒. ‘‘ปญฺจิมานิ, ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส อาเวณิกานิ ทุกฺขานิ, ยานิ มาตุคาโม ปจฺจนุโภติ, อญฺญตฺเรว ปุริเสหิ. กตมานิ ปญฺจ? อิธ, ภิกฺขเว[Pg.437], มาตุคาโม ทหโรว สมาโน ปติกุลํ คจฺฉติ, ญาตเกหิ วินา โหติ. อิทํ, ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส ปฐมํ อาเวณิกํ ทุกฺขํ, ยํ มาตุคาโม ปจฺจนุโภติ, อญฺญตฺเรว ปุริเสหิ. ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม อุตุนี โหติ. อิทํ, ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส ทุติยํ อาเวณิกํ ทุกฺขํ, ยํ มาตุคาโม ปจฺจนุโภติ, อญฺญตฺเรว ปุริเสหิ. ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม คพฺภินี โหติ. อิทํ, ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส ตติยํ อาเวณิกํ ทุกฺขํ, ยํ มาตุคาโม ปจฺจนุโภติ, อญฺญตฺเรว ปุริเสหิ. ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม วิชายติ. อิทํ, ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส จตุตฺถํ อาเวณิกํ ทุกฺขํ, ยํ มาตุคาโม ปจฺจนุโภติ, อญฺญตฺเรว ปุริเสหิ. ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม ปุริสสฺส ปาริจริยํ อุเปติ. อิทํ โข, ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส ปญฺจมํ อาเวณิกํ ทุกฺขํ, ยํ มาตุคาโม ปจฺจนุโภติ, อญฺญตฺเรว ปุริเสหิ. อิมานิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ มาตุคามสฺส อาเวณิกานิ ทุกฺขานิ, ยานิ มาตุคาโม ปจฺจนุโภติ, อญฺญตฺเรว ปุริเสหี’’ติ. ตติยํ. २८२. “भिक्षूंनो, स्त्रीची पाच अशी विशिष्ट दुःखे आहेत, जी केवळ स्त्रीच भोगते, पुरुष नाही. कोणती पाच? इथे, भिक्षूंनो, स्त्री अगदी तरुण वयातच पतीच्या घरी जाते आणि आपल्या नातेवाईकांपासून विभक्त होते. भिक्षूंनो, हे स्त्रीचे पहिले विशिष्ट दुःख आहे, जे ती पुरुषांशिवाय स्वतःच भोगते. पुन्हा दुसरे म्हणजे, भिक्षूंनो, स्त्री ऋतुमती होते. भिक्षूंनो, हे स्त्रीचे दुसरे विशिष्ट दुःख आहे, जे ती पुरुषांशिवाय स्वतःच भोगते. पुन्हा तिसरे म्हणजे, भिक्षूंनो, स्त्री गर्भवती होते. भिक्षूंनो, हे स्त्रीचे तिसरे विशिष्ट दुःख आहे, जे ती पुरुषांशिवाय स्वतःच भोगते. पुन्हा चौथे म्हणजे, भिक्षूंनो, स्त्री प्रसूती होते. भिक्षूंनो, हे स्त्रीचे चौथे विशिष्ट दुःख आहे, जे ती पुरुषांशिवाय स्वतःच भोगते. पुन्हा पाचवे म्हणजे, भिक्षूंनो, स्त्रीला पुरुषाची सेवा करावी लागते. भिक्षूंनो, हे स्त्रीचे पाचवे विशिष्ट दुःख आहे, जे ती पुरुषांशिवाय स्वतःच भोगते. भिक्षूंनो, ही स्त्रीची पाच विशिष्ट दुःखे आहेत, जी स्त्री पुरुषांशिवाय स्वतःच भोगते.” हे तिसरे. ๔. ตีหิธมฺเมหิสุตฺตํ ४. तीहिधम्मेहिसुत्तं ๒๘๓. ‘‘ตีหิ, ภิกฺขเว, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม เยภุยฺเยน กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ตีหิ? อิธ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม ปุพฺพณฺหสมยํ มจฺเฉรมลปริยุฏฺฐิเตน เจตสา อคารํ อชฺฌาวสติ. มชฺฌนฺหิกสมยํ อิสฺสาปริยุฏฺฐิเตน เจตสา อคารํ อชฺฌาวสติ. สายนฺหสมยํ กามราคปริยุฏฺฐิเตน เจตสา อคารํ อชฺฌาวสติ. อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ตีหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม เยภุยฺเยน กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ. จตุตฺถํ. २८३. “भिक्षूंनो, तीन धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री बहुधा शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या तीन? इथे, भिक्षूंनो, स्त्री सकाळच्या वेळी कृपणतेच्या मळाने ग्रासलेल्या चित्ताने घरात राहते. दुपारच्या वेळी ईर्षेने ग्रासलेल्या चित्ताने घरात राहते. संध्याकाळच्या वेळी कामरागाने ग्रासलेल्या चित्ताने घरात राहते. भिक्षूंनो, या तीन धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री बहुधा शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते.” हे चौथे. ๕. โกธนสุตฺตํ ५. कोधनसुत्तं ๒๘๔. อถ โข อายสฺมา อนุรุทฺโธ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อนุรุทฺโธ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธาหํ, ภนฺเต, มาตุคามํ ปสฺสามิ ทิพฺเพน จกฺขุนา วิสุทฺเธน อติกฺกนฺตมานุสเกน กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชนฺตํ. กตีหิ นุ โข, ภนฺเต, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม [Pg.438] กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ? २८४. तेव्हा आयुष्यमान अनुरुद्ध जेथे भगवान होते तेथे गेले. जाऊन एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान अनुरुद्धांनी भगवंतांना असे म्हटले – “भंते, मी मानवी दृष्टीच्या पलीकडच्या, अत्यंत शुद्ध अशा दिव्य चक्षूंनी स्त्रियांना शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होताना पाहतो. भंते, किती धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते?” ‘‘ปญฺจหิ โข, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? อสฺสทฺโธ จ โหติ, อหิริโก จ โหติ, อโนตฺตปฺปี จ โหติ, โกธโน จ โหติ, ทุปฺปญฺโญ จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ. ปญฺจมํ. “अनुरुद्धा, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती अश्रद्ध असते, निर्लज्ज असते, पापभीरू नसलेली असते, क्रोधी असते आणि प्रज्ञाहीन असते – अनुरुद्धा, या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते.” हे पाचवे. ๖. อุปนาหีสุตฺตํ ६. उपनाहीसुत्तं ๒๘๕. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? อสฺสทฺโธ จ โหติ, อหิริโก จ โหติ, อโนตฺตปฺปี จ โหติ, อุปนาหี จ โหติ, ทุปฺปญฺโญ จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ. ฉฏฺฐํ. २८५. “अनुरुद्धा, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती अश्रद्ध असते, निर्लज्ज असते, पापभीरू नसलेली असते, वैर बाळगणारी असते आणि प्रज्ञाहीन असते – अनुरुद्धा, या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते.” हे सहावे. ๗. อิสฺสุกีสุตฺตํ ७. इस्सुकीसुत्तं ๒๘๖. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? อสฺสทฺโธ จ โหติ, อหิริโก จ โหติ, อโนตฺตปฺปี จ โหติ, อิสฺสุกี จ โหติ, ทุปฺปญฺโญ จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ. สตฺตมํ. २८६. “अनुरुद्धा, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती अश्रद्ध असते, निर्लज्ज असते, पापभीरू नसलेली असते, ईर्ष्याळू असते आणि प्रज्ञाहीन असते – अनुरुद्धा, या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते.” हे सातवे. ๘. มจฺฉรีสุตฺตํ ८. मच्छरीसुत्तं ๒๘๗. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? อสฺสทฺโธ จ โหติ, อหิริโก จ โหติ, อโนตฺตปฺปี จ โหติ, มจฺฉรี จ โหติ, ทุปฺปญฺโญ จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ [Pg.439] ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ. อฏฺฐมํ. २८७. “अनुरुद्धा, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती अश्रद्ध असते, निर्लज्ज असते, पापभीरू नसलेली असते, कंजूष असते आणि प्रज्ञाहीन असते – अनुरुद्धा, या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री... पे... अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते.” हे आठवे. ๙. อติจารีสุตฺตํ ९. अतिचारीसुत्तं ๒๘๘. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? อสฺสทฺโธ จ โหติ, อหิริโก จ โหติ, อโนตฺตปฺปี จ โหติ, อติจารี จ โหติ, ทุปฺปญฺโญ จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… อุปปชฺชตี’’ติ. นวมํ. २८८. “अनुरुद्धा, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री... पे... अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती अश्रद्ध असते, निर्लज्ज असते, पापभीरू नसलेली असते, व्यभिचारी असते आणि प्रज्ञाहीन असते – अनुरुद्धा, या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री... पे... उत्पन्न होते.” हे नववे. ๑๐. ทุสฺสีลสุตฺตํ १०. दुस्सीलासुत्तं ๒๘๙. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? อสฺสทฺโธ จ โหติ, อหิริโก จ โหติ, อโนตฺตปฺปี จ โหติ, ทุสฺสีโล จ โหติ, ทุปฺปญฺโญ จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ. ทสมํ. २८९. “हे अनुरुद्ध, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री...पे... नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती अश्रद्ध असते, निर्लज्ज असते, भीतीरहित असते, दुःशील असते आणि दुर्बुद्धी असते. हे अनुरुद्ध, खरोखर या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री...पे... नरकात उत्पन्न होते.” दहावे. ๑๑. อปฺปสฺสุตสุตฺตํ ११. अप्पस्सुत सुत्त ๒๙๐. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? อสฺสทฺโธ จ โหติ, อหิริโก จ โหติ, อโนตฺตปฺปี จ โหติ, อปฺปสฺสุโต จ โหติ, ทุปฺปญฺโญ จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ. เอกาทสมํ. २९०. “हे अनुरुद्ध, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री...पे... नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती अश्रद्ध असते, निर्लज्ज असते, भीतीरहित असते, अल्पश्रुत असते आणि दुर्बुद्धी असते. हे अनुरुद्ध, खरोखर या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री...पे... नरकात उत्पन्न होते.” अकरावे. ๑๒. กุสีตสุตฺตํ १२. कुसीत सुत्त ๒๙๑. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? อสฺสทฺโธ จ โหติ, อหิริโก จ โหติ, อโนตฺตปฺปี จ โหติ, กุสีโต จ โหติ, ทุปฺปญฺโญ จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ. ทฺวาทสมํ. २९१. “हे अनुरुद्ध, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री...पे... नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती अश्रद्ध असते, निर्लज्ज असते, भीतीरहित असते, आळशी असते आणि दुर्बुद्धी असते. हे अनुरुद्ध, खरोखर या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री...पे... अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि नरकात उत्पन्न होते.” बारावे. ๑๓. มุฏฺฐสฺสติสุตฺตํ १३. मुट्ठस्सति सुत्त ๒๙๒. ‘‘ปญฺจหิ[Pg.440], อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? อสฺสทฺโธ จ โหติ, อหิริโก จ โหติ, อโนตฺตปฺปี จ โหติ, มุฏฺฐสฺสติ จ โหติ, ทุปฺปญฺโญ จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ. เตรสมํ. २९२. “हे अनुरुद्ध, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री...पे... नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती अश्रद्ध असते, निर्लज्ज असते, भीतीरहित असते, स्मृतिभ्रष्ट असते आणि दुर्बुद्धी असते. हे अनुरुद्ध, खरोखर या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री...पे... नरकात उत्पन्न होते.” तेरावे. ๑๔. ปญฺจเวรสุตฺตํ १४. पंचवेर सुत्त ๒๙๓. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? ปาณาติปาตี จ โหติ, อทินฺนาทายี จ โหติ, กาเมสุมิจฺฉาจารี จ โหติ, มุสาวาที จ โหติ, สุราเมรยมชฺชปฺปมาทฏฺฐายี จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ. จุทฺทสมํ. २९३. “हे अनुरुद्ध, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री...पे... नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती प्राणातिपाती (जीवहत्या करणारी) असते, अदिन्नादायी (चोरी करणारी) असते, कामेसू मिच्छाचारी (व्यभिचारी) असते, मुसावादी (असत्य बोलणारी) असते आणि सुरा-मेरय-मज्ज-पमादठायी (मद्य व मादक द्रव्यांचे सेवन करून प्रमाद करणारी) असते. हे अनुरुद्ध, खरोखर या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि नरकात उत्पन्न होते.” चौदावे. ปฐมเปยฺยาลวคฺโค. पहिला पेयाळ वर्ग समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याचा संग्रह (उद्दान) - มาตุคาโม ปุริโส จ, อาเวณิกา ติธมฺโม จ ; โกธโน อุปนาหี จ, อิสฺสุกี มจฺฉเรน จ; อติจารี จ ทุสฺสีโล, อปฺปสฺสุโต จ กุสีโต; มุฏฺฐสฺสติ ปญฺจเวรํ, กณฺหปกฺเข ปกาสิโต. स्त्री आणि पुरुष, आवेणिक (असाधारण दुःख), तीन धर्म; क्रोधी, उपनाही (वैर धरणारी), ईर्ष्याळू आणि मत्सर करणारी; अतिचारी (व्यभिचारी), दुःशील, अल्पश्रुत आणि आळशी; स्मृतिभ्रष्ट आणि पाच वैर - हे कृष्णपक्षात (अंधकारमय बाजूत) प्रकाशित केले आहेत. ๒. ทุติยเปยฺยาลวคฺโค २. दुसरा पेयाळ वर्ग ๑. อกฺโกธนสุตฺตํ १. अक्कोधन सुत्त ๒๙๔. อถ โข อายสฺมา อนุรุทฺโธ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อนุรุทฺโธ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธาหํ, ภนฺเต, มาตุคามํ ปสฺสามิ ทิพฺเพน จกฺขุนา วิสุทฺเธน อติกฺกนฺตมานุสเกน [Pg.441] กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺตํ. กตีหิ นุ โข, ภนฺเต, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชตี’’ติ? २९४. तेव्हा आयुष्यमान अनुरुद्ध जेथे भगवान होते तेथे गेले. जाऊन... एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान अनुरुद्धांनी भगवंतांना असे म्हटले – “भंते, मी येथे मानवी दृष्टीपलीकडच्या, विशुद्ध अशा दिव्य चक्षूंनी स्त्रियांना कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होताना पाहत आहे. भंते, किती धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होते?” ‘‘ปญฺจหิ โข, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? สทฺโธ จ โหติ, หิริมา จ โหติ, โอตฺตปฺปี จ โหติ, อกฺโกธโน จ โหติ, ปญฺญวา จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชตี’’ติ. ปฐมํ. “हे अनुरुद्ध, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती श्रद्धावान असते, लज्जावान असते, भय बाळगणारी असते, अक्रोधी असते आणि प्रज्ञावान असते. हे अनुरुद्ध, खरोखर या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होते.” पहिले. ๒. อนุปนาหีสุตฺตํ २. अनुपनाही सुत्त ๒๙๕. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? สทฺโธ จ โหติ, หิริมา จ โหติ, โอตฺตปฺปี จ โหติ, อนุปนาหี จ โหติ, ปญฺญวา จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชตี’’ติ. ทุติยํ. २९५. “हे अनुरुद्ध, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती श्रद्धावान असते, लज्जावान असते, भय बाळगणारी असते, वैर न धरणारी असते आणि प्रज्ञावान असते. हे अनुरुद्ध, खरोखर या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होते.” दुसरे. ๓. อนิสฺสุกีสุตฺตํ ३. अनिस्सुकी सुत्त ๒๙๖. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? สทฺโธ จ โหติ, หิริมา จ โหติ, โอตฺตปฺปี จ โหติ, อนิสฺสุกี จ โหติ, ปญฺญวา จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชตี’’ติ. ตติยํ. २९६. “हे अनुरुद्ध, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती श्रद्धावान असते, लज्जावान असते, भय बाळगणारी असते, ईर्ष्या न करणारी असते आणि प्रज्ञावान असते...पे...।” तिसरे. ๔. อมจฺฉรีสุตฺตํ ४. अमच्छरी सुत्त ๒๙๗. อมจฺฉรี จ โหติ, ปญฺญวา จ โหติ…เป…. จตุตฺถํ. २९७. ती कंजूषपणा नसलेली असते आणि प्रज्ञावान असते...पे...। चौथे. ๕. อนติจารีสุตฺตํ ५. अनतिचारी सुत्त ๒๙๘. อนติจารี จ โหติ, ปญฺญวา จ โหติ…เป…. ปญฺจมํ. २९८. ती व्यभिचार न करणारी असते आणि प्रज्ञावान असते...पे...। पाचवे. ๖. สุสีลสุตฺตํ ६. सुशील सुत्त ๒๙๙. สีลวา จ โหติ, ปญฺญวา จ โหติ…เป…. ฉฏฺฐํ. २९९. ती शीलवान असते आणि प्रज्ञावान असते...पे...। सहावे. ๗. พหุสฺสุตสุตฺตํ ७. बहुस्सुत सुत्त ๓๐๐. พหุสฺสุโต [Pg.442] จ โหติ, ปญฺญวา จ โหติ…เป…. สตฺตมํ. ३००. ती बहुश्रुत असते आणि प्रज्ञावान असते...पे...। सातवे. ๘. อารทฺธวีริยสุตฺตํ ८. आरद्धवीरिय सुत्त ๓๐๑. อารทฺธวีริโย จ โหติ, ปญฺญวา จ โหติ…เป…. อฏฺฐมํ. ३०१. ती प्रयत्नशील असते आणि प्रज्ञावान असते...पे...। आठवे. ๙. อุปฏฺฐิตสฺสติสุตฺตํ ९. उपट्ठितस्सति सुत्त ๓๐๒. ‘‘อุปฏฺฐิตสฺสติ จ โหติ, ปญฺญวา จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชตี’’ติ. นวมํ. ३०२. “ती जागरूक स्मृती असलेली असते आणि प्रज्ञावान असते. हे अनुरुद्ध, खरोखर या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होते.” नववे. อิเม อฏฺฐ สุตฺตนฺตสงฺเขปา. हे आठ संक्षिप्त सुत्त आहेत. ๑๐. ปญฺจสีลสุตฺตํ १०. पंचशील सुत्त ๓๐๓. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? ปาณาติปาตา ปฏิวิรโต จ โหติ, อทินฺนาทานา ปฏิวิรโต จ โหติ, กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรโต จ โหติ, มุสาวาทา ปฏิวิรโต จ โหติ, สุราเมรยมชฺชปฺปมาทฏฺฐานา ปฏิวิรโต จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชตี’’ติ. ทสมํ. ३०३. “हे अनुरुद्ध, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती प्राणातिपातापासून विरत असते, अदिन्नादानापासून विरत असते, कामेसू मिच्छाचारापासून विरत असते, मुसावादापासून विरत असते आणि सुरा-मेरय-मज्ज-पमादठ्ठानापासून विरत असते. हे अनुरुद्ध, खरोखर या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होते.” दहावे. ทุติยเปยฺยาลวคฺโค. दुसरा पेयाळ वर्ग समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याचा संग्रह (उद्दान) - ทุติเย จ อกฺโกธโน, อนุปนาหี อนิสฺสุกี; อมจฺฉรี อนติจารี, สีลวา จ พหุสฺสุโต; วีริยํ สติ สีลญฺจ, สุกฺกปกฺเข ปกาสิโต. दुसऱ्या वर्गात अक्रोधी, वैर न धरणारी, ईर्ष्या न करणारी; कंजूषपणा नसलेली, व्यभिचार न करणारी, शीलवान आणि बहुश्रुत; वीर्य (प्रयत्नशीलता), स्मृती आणि शील - हे शुक्लपक्षात (उज्ज्वल बाजूत) प्रकाशित केले आहेत. ๓. พลวคฺโค ३. बल वर्ग ๑. วิสารทสุตฺตํ १. विसारद सुत्त ๓๐๔. ‘‘ปญฺจิมานิ[Pg.443], ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส พลานิ. กตมานิ ปญฺจ? รูปพลํ, โภคพลํ, ญาติพลํ, ปุตฺตพลํ, สีลพลํ – อิมานิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ มาตุคามสฺส พลานิ. อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจหิ พเลหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม วิสารโท อคารํ อชฺฌาวสตี’’ติ. ปฐมํ. ३०४. “भिक्खूहो, स्त्रीची ही पाच बले आहेत. कोणती पाच? रूपबल (सौंदर्याचे बल), भोगबल (संपत्तीचे बल), ज्ञातिबल (नातेवाइकांचे बल), पुत्रबल (पुत्रांचे बल) आणि शीलबल (शीलाचे बल) – भिक्खूहो, हीच स्त्रीची पाच बले आहेत. भिक्खूहो, या पाच बलांनी युक्त असलेली स्त्री आत्मविश्वासाने घरात राहते.” पहिले. ๒. ปสยฺหสุตฺตํ २. पसय्ह सुत्त ๓๐๕. ‘‘ปญฺจิมานิ, ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส พลานิ. กตมานิ ปญฺจ? รูปพลํ, โภคพลํ, ญาติพลํ, ปุตฺตพลํ, สีลพลํ – อิมานิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ มาตุคามสฺส พลานิ. อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจหิ พเลหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม สามิกํ ปสยฺห อคารํ อชฺฌาวสตี’’ติ. ทุติยํ. ३०५. “भिक्खूहो, स्त्रीची ही पाच बले आहेत. कोणती पाच? रूपबल, भोगबल, ज्ञातिबल, पुत्रबल आणि शीलबल – भिक्खूहो, हीच स्त्रीची पाच बले आहेत. भिक्खूहो, या पाच बलांनी युक्त असलेली स्त्री पतीवर वर्चस्व गाजवून घरात राहते.” दुसरे. ๓. อภิภุยฺยสุตฺตํ ३. अभिभूय सुत्त ๓๐๖. ‘‘ปญฺจิมานิ, ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส พลานิ. กตมานิ ปญฺจ? รูปพลํ, โภคพลํ, ญาติพลํ, ปุตฺตพลํ, สีลพลํ – อิมานิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ มาตุคามสฺส พลานิ. อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจหิ พเลหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม สามิกํ อภิภุยฺย วตฺตตี’’ติ. ตติยํ. ३०६. “भिक्खूहो, स्त्रीची ही पाच बले आहेत. कोणती पाच? रूपबल, भोगबल, ज्ञातिबल, पुत्रबल आणि शीलबल – भिक्खूहो, हीच स्त्रीची पाच बले आहेत. भिक्खूहो, या पाच बलांनी युक्त असलेली स्त्री पतीवर नियंत्रण ठेवून वावरते.” तिसरे. ๔. เอกสุตฺตํ ४. एक सुत्त ๓๐๗. ‘‘เอเกน จ โข, ภิกฺขเว, พเลน สมนฺนาคโต ปุริโส มาตุคามํ อภิภุยฺย วตฺตติ. กตเมน เอเกน พเลน? อิสฺสริยพเลน อภิภูตํ มาตุคามํ เนว รูปพลํ ตายติ, น โภคพลํ ตายติ, น ญาติพลํ ตายติ, น ปุตฺตพลํ ตายติ, น สีลพลํ ตายตี’’ติ. จตุตฺถํ. ३०७. “भिक्खूहो, एकाच बलाने युक्त असलेला पुरुष स्त्रीवर वर्चस्व गाजवून वावरतो. कोणत्या एका बलाने? अधिकारबलाने (प्रभुत्वबलाने). अधिकारबलाने पराभूत झालेल्या स्त्रीचे ना रूपबल रक्षण करू शकते, ना भोगबल रक्षण करू शकते, ना ज्ञातिबल रक्षण करू शकते, ना पुत्रबल रक्षण करू शकते, ना शीलबल रक्षण करू शकते.” चौथे. ๕. องฺคสุตฺตํ ५. अंग सुत्त ๓๐๘. ‘‘ปญฺจิมานิ, ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส พลานิ. กตมานิ ปญฺจ? รูปพลํ, โภคพลํ, ญาติพลํ, ปุตฺตพลํ, สีลพลํ. รูปพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, น จ โภคพเลน – เอวํ โส เตนงฺเคน อปริปูโร โหติ. ยโต จ โข, ภิกฺขเว, มาตุคาโม รูปพเลน จ สมนฺนาคโต โหติ, โภคพเลน จ – เอวํ โส เตนงฺเคน ปริปูโร โหติ. รูปพเลน [Pg.444] จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, โภคพเลน จ, น จ ญาติพเลน – เอวํ โส เตนงฺเคน อปริปูโร โหติ. ยโต จ โข, ภิกฺขเว, มาตุคาโม รูปพเลน จ สมนฺนาคโต โหติ, โภคพเลน จ, ญาติพเลน จ – เอวํ โส เตนงฺเคน ปริปูโร โหติ. รูปพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, โภคพเลน จ, ญาติพเลน จ, น จ ปุตฺตพเลน – เอวํ โส เตนงฺเคน อปริปูโร โหติ. ยโต จ โข, ภิกฺขเว, มาตุคาโม รูปพเลน จ สมนฺนาคโต โหติ, โภคพเลน จ, ญาติพเลน จ, ปุตฺตพเลน จ – เอวํ โส เตนงฺเคน ปริปูโร โหติ. รูปพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, โภคพเลน จ, ญาติพเลน จ, ปุตฺตพเลน จ, น จ สีลพเลน – เอวํ โส เตนงฺเคน อปริปูโร โหติ. ยโต จ โข, ภิกฺขเว, มาตุคาโม รูปพเลน จ สมนฺนาคโต โหติ, โภคพเลน จ, ญาติพเลน จ, ปุตฺตพเลน จ, สีลพเลน จ – เอวํ โส เตนงฺเคน ปริปูโร โหติ. อิมานิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ มาตุคามสฺส พลานี’’ติ. ปญฺจมํ. ३०८. “भिक्खूहो, स्त्रीची ही पाच बले आहेत. कोणती पाच? रूपबल, भोगबल, ज्ञातिबल, पुत्रबल आणि शीलबल. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री रूपबलाने युक्त असेल, पण भोगबलाने युक्त नसेल, तर ती त्या अंगाने अपूर्ण असते. परंतु भिक्खूहो, जेव्हा स्त्री रूपबलाने आणि भोगबलानेही युक्त असते, तेव्हा ती त्या अंगाने पूर्ण असते. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री रूपबलाने आणि भोगबलाने युक्त असेल, पण ज्ञातिबलाने युक्त नसेल, तर ती त्या अंगाने अपूर्ण असते. परंतु भिक्खूहो, जेव्हा स्त्री रूपबलाने, भोगबलाने आणि ज्ञातिबलानेही युक्त असते, तेव्हा ती त्या अंगाने पूर्ण असते. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री रूपबलाने, भोगबलाने आणि ज्ञातिबलाने युक्त असेल, पण पुत्रबलाने युक्त नसेल, तर ती त्या अंगाने अपूर्ण असते. परंतु भिक्खूहो, जेव्हा स्त्री रूपबलाने, भोगबलाने, ज्ञातिबलाने आणि पुत्रबलानेही युक्त असते, तेव्हा ती त्या अंगाने पूर्ण असते. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री रूपबलाने, भोगबलाने, ज्ञातिबलाने आणि पुत्रबलाने युक्त असेल, पण शीलबलाने युक्त नसेल, तर ती त्या अंगाने अपूर्ण असते. परंतु भिक्खूहो, जेव्हा स्त्री रूपबलाने, भोगबलाने, ज्ञातिबलाने, पुत्रबलाने आणि शीलबलानेही युक्त असते, तेव्हा ती त्या अंगाने पूर्ण असते. भिक्खूहो, हीच स्त्रीची पाच बले आहेत.” पाचवे. ๖. นาเสนฺติสุตฺตํ ६. नासेन्ति सुत्त ๓๐๙. ‘‘ปญฺจิมานิ, ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส พลานิ. กตมานิ ปญฺจ? รูปพลํ, โภคพลํ, ญาติพลํ, ปุตฺตพลํ, สีลพลํ. รูปพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, น จ สีลพเลน, นาเสนฺเตว นํ, กุเล น วาเสนฺติ. รูปพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, โภคพเลน จ, น จ สีลพเลน, นาเสนฺเตว นํ, กุเล น วาเสนฺติ. รูปพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, โภคพเลน จ, ญาติพเลน จ, น จ สีลพเลน, นาเสนฺเตว นํ, กุเล น วาเสนฺติ. รูปพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, โภคพเลน จ, ญาติพเลน จ, ปุตฺตพเลน จ, น จ สีลพเลน, นาเสนฺเตว นํ, กุเล น วาเสนฺติ. สีลพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, น จ รูปพเลน, วาเสนฺเตว นํ, กุเล น นาเสนฺติ. สีลพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, น จ โภคพเลน, วาเสนฺเตว นํ, กุเล น นาเสนฺติ. สีลพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, น จ ญาติพเลน, วาเสนฺเตว นํ, กุเล น นาเสนฺติ. สีลพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, น จ ปุตฺตพเลน, วาเสนฺเตว นํ, กุเล น นาเสนฺติ. อิมานิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ มาตุคามสฺส พลานี’’ติ. ฉฏฺฐํ. ३०९. “भिक्खूहो, स्त्रीची ही पाच बले आहेत. कोणती पाच? रूपबल, भोगबल, ज्ञातिबल, पुत्रबल आणि शीलबल. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री रूपबलाने युक्त असेल, पण शीलबलाने युक्त नसेल, तर तिला कुटुंबातून हाकलून दिले जाते, तिला कुटुंबात राहू दिले जात नाही. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री रूपबलाने आणि भोगबलाने युक्त असेल, पण शीलबलाने युक्त नसेल, तर तिला कुटुंबातून हाकलून दिले जाते, तिला कुटुंबात राहू दिले जात नाही. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री रूपबलाने, भोगबलाने आणि ज्ञातिबलाने युक्त असेल, पण शीलबलाने युक्त नसेल, तर तिला कुटुंबातून हाकलून दिले जाते, तिला कुटुंबात राहू दिले जात नाही. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री रूपबलाने, भोगबलाने, ज्ञातिबलाने आणि पुत्रबलाने युक्त असेल, पण शीलबलाने युक्त नसेल, तर तिला कुटुंबातून हाकलून दिले जाते, तिला कुटुंबात राहू दिले जात नाही. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री शीलबलाने युक्त असेल, पण रूपबलाने युक्त नसेल, तर तिला कुटुंबात राहू दिले जाते, तिला कुटुंबातून हाकलून दिले जात नाही. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री शीलबलाने युक्त असेल, पण भोगबलाने युक्त नसेल, तर तिला कुटुंबात राहू दिले जाते, तिला कुटुंबातून हाकलून दिले जात नाही. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री शीलबलाने युक्त असेल, पण ज्ञातिबलाने युक्त नसेल, तर तिला कुटुंबात राहू दिले जाते, तिला कुटुंबातून हाकलून दिले जात नाही. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री शीलबलाने युक्त असेल, पण पुत्रबलाने युक्त नसेल, तर तिला कुटुंबात राहू दिले जाते, तिला कुटुंबातून हाकलून दिले जात नाही. भिक्खूहो, हीच स्त्रीची पाच बले आहेत.” सहावे. ๗. เหตุสุตฺตํ ७. हेतु सुत्त ๓๑๐. ‘‘ปญฺจิมานิ[Pg.445], ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส พลานิ. กตมานิ ปญฺจ? รูปพลํ, โภคพลํ, ญาติพลํ, ปุตฺตพลํ, สีลพลํ. น, ภิกฺขเว, มาตุคาโม รูปพลเหตุ วา โภคพลเหตุ วา ญาติพลเหตุ วา ปุตฺตพลเหตุ วา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. สีลพลเหตุ โข, ภิกฺขเว, มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. อิมานิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ มาตุคามสฺส พลานี’’ติ. สตฺตมํ. ३१०. “भिक्खूहो, स्त्रीची ही पाच बले आहेत. कोणती पाच? रूपबल, भोगबल, ज्ञातिबल, पुत्रबल आणि शीलबल. भिक्खूहो, रूपबलामुळे, भोगबलामुळे, ज्ञातिबलामुळे किंवा पुत्रबलामुळे स्त्री शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होत नाही. परंतु भिक्खूहो, शीलबलामुळेच स्त्री शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होते. भिक्खूहो, हीच स्त्रीची पाच बले आहेत.” सातवे. ๘. ฐานสุตฺตํ ८. ठाण सुत्त ๓๑๑. ‘‘ปญฺจิมานิ, ภิกฺขเว, ฐานานิ ทุลฺลภานิ อกตปุญฺเญน มาตุคาเมน. กตมานิ ปญฺจ? ปติรูเป กุเล ชาเยยฺยนฺติ – อิทํ, ภิกฺขเว, ปฐมํ ฐานํ ทุลฺลภํ อกตปุญฺเญน มาตุคาเมน. ปติรูเป กุเล ชายิตฺวา ปติรูปํ กุลํ คจฺเฉยฺยนฺติ – อิทํ, ภิกฺขเว, ทุติยํ ฐานํ ทุลฺลภํ อกตปุญฺเญน มาตุคาเมน. ปติรูเป กุเล ชายิตฺวา, ปติรูปํ กุลํ คนฺตฺวา, อสปตฺติ อคารํ อชฺฌาวเสยฺยนฺติ – อิทํ, ภิกฺขเว, ตติยํ ฐานํ ทุลฺลภํ อกตปุญฺเญน มาตุคาเมน. ปติรูเป กุเล ชายิตฺวา, ปติรูปํ กุลํ คนฺตฺวา, อสปตฺติ อคารํ อชฺฌาวสนฺตี ปุตฺตวตี อสฺสนฺติ – อิทํ, ภิกฺขเว, จตุตฺถํ ฐานํ ทุลฺลภํ อกตปุญฺเญน มาตุคาเมน. ปติรูเป กุเล ชายิตฺวา, ปติรูปํ กุลํ คนฺตฺวา, อสปตฺติ อคารํ อชฺฌาวสนฺตี ปุตฺตวตี สมานา สามิกํ อภิภุยฺย วตฺเตยฺยนฺติ – อิทํ, ภิกฺขเว, ปญฺจมํ ฐานํ ทุลฺลภํ อกตปุญฺเญน มาตุคาเมน. อิมานิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ ฐานานิ ทุลฺลภานิ อกตปุญฺเญน มาตุคาเมนาติ. ३११. “भिक्खूहो, पुण्य न केलेल्या स्त्रीसाठी ही पाच स्थाने (गोष्टी) मिळणे कठीण असते. कोणती पाच? 'माझा जन्म योग्य कुळात व्हावा' – भिक्खूहो, पुण्य न केलेल्या स्त्रीसाठी हे पहिले स्थान मिळणे कठीण असते. 'योग्य कुळात जन्म घेऊन मी योग्य कुळात जावे (विवाह करावा)' – भिक्खूहो, पुण्य न केलेल्या स्त्रीसाठी हे दुसरे स्थान मिळणे कठीण असते. 'योग्य कुळात जन्म घेऊन आणि योग्य कुळात जाऊन मी सवतीशिवाय (शत्रूशिवाय) घरात राहावे' – भिक्खूहो, पुण्य न केलेल्या स्त्रीसाठी हे तिसरे स्थान मिळणे कठीण असते. 'योग्य कुळात जन्म घेऊन, योग्य कुळात जाऊन आणि सवतीशिवाय घरात राहून मी पुत्रवती (संतती असणारी) व्हावे' – भिक्खूहो, पुण्य न केलेल्या स्त्रीसाठी हे चौथे स्थान मिळणे कठीण असते. 'योग्य कुळात जन्म घेऊन, योग्य कुळात जाऊन, सवतीशिवाय घरात राहून आणि पुत्रवती होऊन मी पतीवर नियंत्रण ठेवून (पतीला वश करून) राहावे' – भिक्खूहो, पुण्य न केलेल्या स्त्रीसाठी हे पाचवे स्थान मिळणे कठीण असते. भिक्खूहो, पुण्य न केलेल्या स्त्रीसाठी ही पाच स्थाने मिळणे कठीण असते.” ‘‘ปญฺจิมานิ, ภิกฺขเว, ฐานานิ สุลภานิ กตปุญฺเญน มาตุคาเมน. กตมานิ ปญฺจ? ปติรูเป กุเล ชาเยยฺยนฺติ – อิทํ, ภิกฺขเว, ปฐมํ ฐานํ สุลภํ กตปุญฺเญน มาตุคาเมน. ปติรูเป กุเล ชายิตฺวา ปติรูปํ กุลํ คจฺเฉยฺยนฺติ – อิทํ, ภิกฺขเว, ทุติยํ ฐานํ สุลภํ กตปุญฺเญน มาตุคาเมน. ปติรูเป กุเล ชายิตฺวา ปติรูปํ กุลํ คนฺตฺวา อสปตฺติ อคารํ อชฺฌาวเสยฺยนฺติ – อิทํ, ภิกฺขเว, ตติยํ ฐานํ สุลภํ กตปุญฺเญน มาตุคาเมน. ปติรูเป กุเล ชายิตฺวา ปติรูปํ กุลํ คนฺตฺวา อสปตฺติ อคารํ อชฺฌาวสนฺตี ปุตฺตวตี อสฺสนฺติ – อิทํ, ภิกฺขเว, จตุตฺถํ ฐานํ สุลภํ กตปุญฺเญน มาตุคาเมน. ปติรูเป กุเล ชายิตฺวา ปติรูปํ กุลํ คนฺตฺวา อสปตฺติ อคารํ อชฺฌาวสนฺตี [Pg.446] ปุตฺตวตี สมานา สามิกํ อภิภุยฺย วตฺเตยฺยนฺติ – อิทํ, ภิกฺขเว, ปญฺจมํ ฐานํ สุลภํ กตปุญฺเญน มาตุคาเมน. อิมานิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ ฐานานิ สุลภานิ กตปุญฺเญน มาตุคาเมนา’’ติ. อฏฺฐมํ. “भिक्खूहो, पुण्य केलेल्या स्त्रीसाठी ही पाच स्थाने मिळणे सुलभ (सहज) असते. कोणती पाच? 'माझा जन्म योग्य कुळात व्हावा' – भिक्खूहो, पुण्य केलेल्या स्त्रीसाठी हे पहिले स्थान मिळणे सुलभ असते. 'योग्य कुळात जन्म घेऊन मी योग्य कुळात जावे' – भिक्खूहो, पुण्य केलेल्या स्त्रीसाठी हे दुसरे स्थान मिळणे सुलभ असते. 'योग्य कुळात जन्म घेऊन आणि योग्य कुळात जाऊन मी सवतीशिवाय घरात राहावे' – भिक्खूहो, पुण्य केलेल्या स्त्रीसाठी हे तिसरे स्थान मिळणे सुलभ असते. 'योग्य कुळात जन्म घेऊन, योग्य कुळात जाऊन आणि सवतीशिवाय घरात राहून मी पुत्रवती व्हावे' – भिक्खूहो, पुण्य केलेल्या स्त्रीसाठी हे चौथे स्थान मिळणे सुलभ असते. 'योग्य कुळात जन्म घेऊन, योग्य कुळात जाऊन, सवतीशिवाय घरात राहून आणि पुत्रवती होऊन मी पतीवर नियंत्रण ठेवून राहावे' – भिक्खूहो, पुण्य केलेल्या स्त्रीसाठी हे पाचवे स्थान मिळणे सुलभ असते. भिक्खूहो, पुण्य केलेल्या स्त्रीसाठी ही पाच स्थाने मिळणे सुलभ असते.” आठवे. ๙. ปญฺจสีลวิสารทสุตฺตํ ९. पंचशीलविशारद सुत्त ๓๑๒. ‘‘ปญฺจหิ, ภิกฺขเว, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม วิสารโท อคารํ อชฺฌาวสติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? ปาณาติปาตา ปฏิวิรโต จ โหติ, อทินฺนาทานา ปฏิวิรโต จ โหติ, กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรโต จ โหติ, มุสาวาทา ปฏิวิรโต จ โหติ, สุราเมรยมชฺชปฺปมาทฏฺฐานา ปฏิวิรโต จ โหติ – อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม วิสารโท อคารํ อชฺฌาวสตี’’ติ. นวมํ. ३१२. “भिक्खूहो, पाच गुणांनी युक्त असलेली स्त्री आत्मविश्वासाने (निर्भयपणे) घरात राहते. कोणत्या पाच गुणांनी? ती प्राणातिपातापासून (जीवहिंसेपासून) अलिप्त असते, अदत्तादानापासून (चोरी करण्यापासून) अलिप्त असते, कामेसू मिच्छाचारापासून (व्यभिचारापासून) अलिप्त असते, मुसावादापासून (असत्य बोलण्यापासून) अलिप्त असते आणि सुरा-मेरय-मज्ज-पमादठ्ठानापासून (मद्य व मादक पदार्थांच्या सेवनापासून) अलिप्त असते. भिक्खूहो, या पाच गुणांनी युक्त असलेली स्त्री आत्मविश्वासाने घरात राहते.” नववे. ๑๐. วฑฺฒีสุตฺตํ १०. वड्ढी सुत्त (वृद्धी सुत्त) ๓๑๓. ‘‘ปญฺจหิ, ภิกฺขเว, วฑฺฒีหิ วฑฺฒมานา อริยสาวิกา อริยาย วฑฺฒิยา วฑฺฒติ สาราทายินี จ โหติ วราทายินี จ กายสฺส. กตเมหิ ปญฺจหิ? สทฺธาย วฑฺฒติ, สีเลน วฑฺฒติ, สุเตน วฑฺฒติ, จาเคน วฑฺฒติ, ปญฺญาย วฑฺฒติ – อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจหิ วฑฺฒีหิ วฑฺฒมานา อริยสาวิกา อริยาย วฑฺฒิยา วฑฺฒติ, สาราทายินี จ โหติ, วราทายินี จ กายสฺสา’’ติ. ३१३. “भिक्खूहो, पाच प्रकारच्या वृद्धीने (प्रगतीने) प्रगती करणारी आर्य श्राविका ही आर्यांच्या वृद्धीने वृद्धिंगत होते आणि ती या शरीराचे (जीवनाचे) सार ग्रहण करणारी व श्रेष्ठ गोष्टी प्राप्त करणारी ठरते. कोणत्या पाच प्रकारच्या? ती श्रद्धेने वृद्धिंगत होते, शीलाने वृद्धिंगत होते, सुताने (ज्ञानाने/श्रवणाने) वृद्धिंगत होते, त्यागाने (दानाने) वृद्धिंगत होते आणि प्रज्ञेने वृद्धिंगत होते. भिक्खूहो, या पाच प्रकारच्या वृद्धीने प्रगती करणारी आर्य श्राविका ही आर्यांच्या वृद्धीने वृद्धिंगत होते आणि ती या शरीराचे सार ग्रहण करणारी व श्रेष्ठ गोष्टी प्राप्त करणारी ठरते.” ‘‘สทฺธาย สีเลน จ ยาธ วฑฺฒติ,ปญฺญาย จาเคน สุเตน จูภยํ; สา ตาทิสี สีลวตี อุปาสิกา,อาทียติ สารมิเธว อตฺตโน’’ติ. ทสมํ; “जी स्त्री येथे श्रद्धा आणि शीलाने, तसेच प्रज्ञा, त्याग आणि सुताने (श्रुताने) वृद्धिंगत होते; अशी ती शीलवान उपासिका या लोकातच स्वतःसाठी जीवनाचे खरे सार प्राप्त करून घेते.” दहावे. พลวคฺโค ตติโย. तिसरा बलवर्ग समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) - วิสารทา ปสยฺห อภิภุยฺย, เอกํ องฺเคน ปญฺจมํ; นาเสนฺติ เหตุ ฐานญฺจ, วิสารโท วฑฺฒินา ทสาติ. विशारदा, पसय्ह (बळजबरीने), अभिभुय्य (पतीवर नियंत्रण), एक अंग (पाचवे अंग), नासेंति (नाश करणे), हेतू, ठाण (स्थान), विशारद आणि वड्ढी (वृद्धी) – अशी ही दहा सुत्ते आहेत. มาตุคามสํยุตฺตํ สมตฺตํ. मातुगाम संयुत्त समाप्त. ๔. ชมฺพุขาทกสํยุตฺตํ ४. जम्बुखादक संयुत्त ๑. นิพฺพานปญฺหาสุตฺตํ १. निब्बानपञ्ह सुत्त (निर्वाणप्रश्न सुत्त) ๓๑๔. เอกํ [Pg.447] สมยํ อายสฺมา สาริปุตฺโต มคเธสุ วิหรติ นาลกคามเก. อถ โข ชมฺพุขาทโก ปริพฺพาชโก เยนายสฺมา สาริปุตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา สาริปุตฺเตน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ชมฺพุขาทโก ปริพฺพาชโก อายสฺมนฺตํ สาริปุตฺตํ เอตทโวจ – ३१४. एकदा आयुष्यमान सारिपुत्त मगध देशातील नालक गावात राहत होते. तेव्हा जम्बुखादक नावाचा परिव्राजक जेथे आयुष्यमान सारिपुत्त होते तेथे आला. आल्यानंतर त्याने आयुष्यमान सारिपुत्तांशी कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या जम्बुखादक परिव्राजकाने आयुष्यमान सारिपुत्तांना असे म्हटले - ‘‘‘นิพฺพานํ, นิพฺพาน’นฺติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตมํ นุ โข, อาวุโส, นิพฺพาน’’นฺติ? ‘‘โย โข, อาวุโส, ราคกฺขโย โทสกฺขโย โมหกฺขโย – อิทํ วุจฺจติ นิพฺพาน’’นฺติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. ปฐมํ. “'मित्र सारिपुत्त, 'निब्बान, निब्बान' (निर्वाण, निर्वाण) असे म्हटले जाते. हे निब्बान म्हणजे नेमके काय?' 'मित्रा, रागाचा (आसक्तीचा) क्षय, द्वेषाचा क्षय आणि मोहाचा क्षय – यालाच निब्बान असे म्हणतात.' 'पण मित्रा, या निब्बानाचा साक्षात्कार करण्यासाठी काही मार्ग किंवा काही प्रतिपदा (साधना) आहे का?' 'होय मित्रा, या निब्बानाचा साक्षात्कार करण्यासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे.' 'पण मित्रा, या निब्बानाच्या साक्षात्कारासाठी कोणता मार्ग आणि कोणती प्रतिपदा आहे?' 'मित्रा, या निब्बानाच्या साक्षात्कारासाठी हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे; जसे की – सम्यक दृष्टी, सम्यक संकल्प, सम्यक वाचा, सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक सती (स्मृती) आणि सम्यक समाधी. मित्रा, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे जी निब्बानाच्या साक्षात्कारासाठी आहे.' 'मित्रा सारिपुत्त, या निब्बानाच्या साक्षात्कारासाठी हा मार्ग उत्तम आहे, ही प्रतिपदा उत्तम आहे. आणि मित्रा सारिपुत्त, अप्रमादासाठी (जागरूक राहण्यासाठी) हे पुरेसे व योग्यच आहे.'” पहिले. ๒. อรหตฺตปญฺหาสุตฺตํ २. अरहत्तपञ्ह सुत्त (अर्हत्वप्रश्न सुत्त) ๓๑๕. ‘‘‘อรหตฺตํ, อรหตฺต’นฺติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตมํ นุ โข, อาวุโส, อรหตฺต’’นฺติ? ‘‘โย โข, อาวุโส, ราคกฺขโย โทสกฺขโย โมหกฺขโย – อิทํ วุจฺจติ อรหตฺต’’นฺติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา เอตสฺส อรหตฺตสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา เอตสฺส อรหตฺตสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. ‘‘กตโม [Pg.448] ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา เอตสฺส อรหตฺตสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เอตสฺส อรหตฺตสฺส สจฺฉิกิริยาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข อาวุโส, มคฺโค, อยํ ปฏิปทา เอตสฺส อรหตฺตสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา เอตสฺส อรหตฺตสฺส สจฺฉิกิริยาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. ทุติยํ. ३१५. “आवुसो सारिपुत्त, ‘अरहंतपद, अरहंतपद’ असे म्हटले जाते. आवुसो, अरहंतपद म्हणजे नेमके काय?” “आवुसो, रागाचा क्षय, द्वेषाचा क्षय आणि मोहाचा क्षय; यालाच ‘अरहंतपद’ असे म्हटले जाते.” “पण आवुसो, या अरहंतपदाच्या साक्षात्कारासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा (साधना) आहे का?” “आवुसो, या अरहंतपदाच्या साक्षात्कारासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे.” “पण आवुसो, या अरहंतपदाच्या साक्षात्कारासाठी कोणता मार्ग आहे, कोणती प्रतिपदा आहे?” “आवुसो, या अरहंतपदाच्या साक्षात्कारासाठी हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे; जसे की— सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती आणि सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, जी या अरहंतपदाच्या साक्षात्कारासाठी आहे.” “आवुसो, या अरहंतपदाच्या साक्षात्कारासाठी असलेला मार्ग कल्याणकारी आहे, प्रतिपदा कल्याणकारी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्त, अप्रमादासाठी (जागरूकतेसाठी) हे पुरेसे व योग्यच आहे.” दुसरे. ๓. ธมฺมวาทีปญฺหาสุตฺตํ ३. धम्मवादीपञ्हा सुत्त ๓๑๖. ‘‘เก นุ โข, อาวุโส สาริปุตฺต, โลเก ธมฺมวาทิโน, เก โลเก สุปฺปฏิปนฺนา, เก โลเก สุคตา’’ติ? ‘‘เย โข, อาวุโส, ราคปฺปหานาย ธมฺมํ เทเสนฺติ, โทสปฺปหานาย ธมฺมํ เทเสนฺติ, โมหปฺปหานาย ธมฺมํ เทเสนฺติ, เต โลเก ธมฺมวาทิโน. เย โข, อาวุโส, ราคสฺส ปหานาย ปฏิปนฺนา, โทสสฺส ปหานาย ปฏิปนฺนา, โมหสฺส ปหานาย ปฏิปนฺนา, เต โลเก สุปฺปฏิปนฺนา. เยสํ โข, อาวุโส, ราโค ปหีโน อุจฺฉินฺนมูโล ตาลาวตฺถุกโต อนภาวงฺกโต อายตึ อนุปฺปาทธมฺโม, โทโส ปหีโน อุจฺฉินฺนมูโล ตาลาวตฺถุกโต อนภาวงฺกโต อายตึ อนุปฺปาทธมฺโม, โมโห ปหีโน อุจฺฉินฺนมูโล ตาลาวตฺถุกโต อนภาวงฺกโต อายตึ อนุปฺปาทธมฺโม, เต โลเก สุคตา’’ติ. ३१६. “आवुसो सारिपुत्त, या जगात धम्मवादी (धर्माचे प्रवक्ते) कोण आहेत? जगात सुप्रतिपन्न (योग्य प्रकारे आचरण करणारे) कोण आहेत? आणि जगात सुगत (कल्याणप्रत पोहोचलेले) कोण आहेत?” “आवुसो, जे रागाच्या प्रहाणासाठी धम्म उपदेशितात, द्वेषाच्या प्रहाणासाठी धम्म उपदेशितात, मोहाच्या प्रहाणासाठी धम्म उपदेशितात; ते जगात ‘धम्मवादी’ आहेत. आवुसो, जे रागाच्या प्रहाणासाठी आचरण करतात, द्वेषाच्या प्रहाणासाठी आचरण करतात, मोहाच्या प्रहाणासाठी आचरण करतात; ते जगात ‘सुप्रतिपन्न’ आहेत. आवुसो, ज्यांचा राग नष्ट झाला आहे, मुळासकट उपटून टाकला गेला आहे, ताडाच्या झाडासारखा समूळ नष्ट केला गेला आहे, अस्तित्वातून नाहीसा केला गेला आहे आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाचा झाला आहे; ज्यांचा द्वेष नष्ट झाला आहे, मुळासकट उपटून टाकला गेला आहे, ताडाच्या झाडासारखा समूळ नष्ट केला गेला आहे, अस्तित्वातून नाहीसा केला गेला आहे आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाचा झाला आहे; ज्यांचा मोह नष्ट झाला आहे, मुळासकट उपटून टाकला गेला आहे, ताडाच्या झाडासारखा समूळ नष्ट केला गेला आहे, अस्तित्वातून नाहीसा केला गेला आहे आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाचा झाला आहे; ते जगात ‘सुगत’ आहेत.” ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา เอตสฺส ราคสฺส โทสสฺส โมหสฺส ปหานายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา เอตสฺส ราคสฺส โทสสฺส โมหสฺส ปหานายา’’ติ. ‘‘กตโม, ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา เอตสฺส ราคสฺส โทสสฺส โมหสฺส ปหานายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เอตสฺส ราคสฺส โทสสฺส โมหสฺส ปหานาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา เอตสฺส ราคสฺส โทสสฺส โมหสฺส ปหานายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอตสฺส ราคสฺส โทสสฺส โมหสฺส ปหานาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. ตติยํ. “पण आवुसो, या रागाच्या, द्वेषाच्या आणि मोहाच्या प्रहाणासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?” “आवुसो, या रागाच्या, द्वेषाच्या आणि मोहाच्या प्रहाणासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे.” “पण आवुसो, या रागाच्या, द्वेषाच्या आणि मोहाच्या प्रहाणासाठी कोणता मार्ग आहे, कोणती प्रतिपदा आहे?” “आवुसो, या रागाच्या, द्वेषाच्या आणि मोहाच्या प्रहाणासाठी हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे; जसे की— सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती आणि सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, जी या रागाच्या, द्वेषाच्या आणि मोहाच्या प्रहाणासाठी आहे.” “आवुसो, या रागाच्या, द्वेषाच्या आणि मोहाच्या प्रहाणासाठी असलेला मार्ग कल्याणकारी आहे, प्रतिपदा कल्याणकारी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्त, अप्रमादासाठी हे पुरेसे व योग्यच आहे.” तिसरे. ๔. กิมตฺถิยสุตฺตํ ४. किमत्थिय सुत्त ๓๑๗. ‘‘กิมตฺถิยํ[Pg.449], อาวุโส สาริปุตฺต, สมเณ โคตเม พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’’ติ? ‘‘ทุกฺขสฺส โข, อาวุโส, ปริญฺญตฺถํ ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา เอตสฺส ทุกฺขสฺส ปริญฺญายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตสฺส ทุกฺขสฺส ปริญฺญายา’’ติ? ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอตสฺส ทุกฺขสฺส ปริญฺญายา’’ติ? ३१७. “आवुसो सारिपुत्त, श्रमण गोतमांच्या मार्गदर्शनाखाली कोणत्या उद्देशाने ब्रह्मचर्य पाळले जाते?” “आवुसो, दुःखाच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी (पूर्ण आकलनासाठी) भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते.” “पण आवुसो, या दुःखाच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?” “आवुसो, या दुःखाच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे.” “पण आवुसो, या दुःखाच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी कोणता मार्ग आहे, कोणती प्रतिपदा आहे?” ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอตสฺส ทุกฺขสฺส ปริญฺญาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา เอตสฺส ทุกฺขสฺส ปริญฺญายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอตสฺส ทุกฺขสฺส ปริญฺญาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. จตุตฺถํ. “आवुसो, या दुःखाच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे; जसे की— सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती आणि सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, जी या दुःखाच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी आहे.” “आवुसो, या दुःखाच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी असलेला मार्ग कल्याणकारी आहे, प्रतिपदा कल्याणकारी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्त, अप्रमादासाठी हे पुरेसे व योग्यच आहे.” चौथे. ๕. อสฺสาสปฺปตฺตสุตฺตํ ५. अस्सासपत्त सुत्त ๓๑๘. ‘‘‘อสฺสาสปฺปตฺโต, อสฺสาสปฺปตฺโต’ติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, อาวุโส, อสฺสาสปฺปตฺโต โหตี’’ติ? ‘‘ยโต โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ, เอตฺตาวตา โข, อาวุโส, อสฺสาสปฺปตฺโต โหตี’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตสฺส อสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตสฺส อสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอตสฺส อสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เอตสฺส อสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอตสฺส อสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอตสฺส อสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. ปญฺจมํ. ३१८. “आवुसो सारिपुत्त, ‘आश्वासनास प्राप्त झालेला, आश्वासनास प्राप्त झालेला’ असे म्हटले जाते. आवुसो, किती प्रमाणात मनुष्य आश्वासनास प्राप्त झालेला होतो?” “आवुसो, जेव्हा एखादा भिक्षू सहा स्पर्शायतनांचा उदय, अस्त, आस्वाद, दोष आणि त्यातून सुटका (निःसरण) यथाभूत (जसे आहे तसे) जाणतो; आवुसो, एवढ्या प्रमाणात तो आश्वासनास प्राप्त झालेला होतो.” “पण आवुसो, या आश्वासनाच्या साक्षात्कारासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?” “आवुसो, या आश्वासनाच्या साक्षात्कारासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे.” “पण आवुसो, या आश्वासनाच्या साक्षात्कारासाठी कोणता मार्ग आहे, कोणती प्रतिपदा आहे?” “आवुसो, या आश्वासनाच्या साक्षात्कारासाठी हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे; जसे की— सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती आणि सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, जी या आश्वासनाच्या साक्षात्कारासाठी आहे.” “आवुसो, या आश्वासनाच्या साक्षात्कारासाठी असलेला मार्ग कल्याणकारी आहे, प्रतिपदा कल्याणकारी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्त, अप्रमादासाठी हे पुरेसे व योग्यच आहे.” पाचवे. ๖. ปรมสฺสาสปฺปตฺตสุตฺตํ ६. परमस्सासपत्त सुत्त ๓๑๙. ‘‘‘ปรมสฺสาสปฺปตฺโต, ปรมสฺสาสปฺปตฺโต’ติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, อาวุโส, ปรมสฺสาสปฺปตฺโต โหตี’’ติ? ‘‘ยโต [Pg.450] โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ วิทิตฺวา อนุปาทาวิมุตฺโต โหติ, เอตฺตาวตา โข, อาวุโส, ปรมสฺสาสปฺปตฺโต โหตี’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตสฺส ปรมสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตสฺส ปรมสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. ‘‘กตโม ปน, อาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอตสฺส ปรมสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เอตสฺส ปรมสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอตสฺส ปรมสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอตสฺส ปรมสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. ฉฏฺฐํ. ३१९. “‘परम आश्वासप्राप्त, परम आश्वासप्राप्त’ असे, आवुसो सारिपुत्त, म्हटले जाते. आवुसो, कोणत्या मर्यादेपर्यंत मनुष्य परम आश्वासप्राप्त होतो?” “आवुसो, जेव्हा एखादा भिक्खू सहा स्पर्शायतनांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण हे यथाभूत जाणून, अनासक्त होऊन विमुक्त होतो; आवुसो, एवढ्यानेच तो परम आश्वासप्राप्त होतो.” “पण आवुसो, या परम आश्वासाच्या साक्षात्कारासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?” “आवुसो, या परम आश्वासाच्या साक्षात्कारासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे.” “पण आवुसो, तो मार्ग कोणता आणि ती प्रतिपदा कोणती, जी या परम आश्वासाच्या साक्षात्कारासाठी आहे?” “आवुसो, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे जो या परम आश्वासाच्या साक्षात्कारासाठी आहे; जसे की – सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, जी या परम आश्वासाच्या साक्षात्कारासाठी आहे.” “आवुसो, हा मार्ग कल्याणकारी आहे, ही प्रतिपदा कल्याणकारी आहे, जी या परम आश्वासाच्या साक्षात्कारासाठी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्त, अप्रमादासाठी हे पुरेसे व योग्यच आहे.” सहावे. ๗. เวทนาปญฺหาสุตฺตํ ७. वेदनापञ्हा सुत्त ๓๒๐. ‘‘‘เวทนา, เวทนา’ติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตมา นุ โข, อาวุโส, เวทนา’’ติ? ‘‘ติสฺโส อิมาวุโส, เวทนา. กตมา ติสฺโส? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา โข, อาวุโส, ติสฺโส เวทนา’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตาสํ ติสฺสนฺนํ เวทนานํ ปริญฺญายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตาสํ ติสฺสนฺนํ เวทนานํ ปริญฺญายา’’ติ. ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอตาสํ ติสฺสนฺนํ เวทนานํ ปริญฺญายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอตาสํ ติสฺสนฺนํ เวทนานํ ปริญฺญาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอตาสํ ติสฺสนฺนํ เวทนานํ ปริญฺญายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอตาสํ ติสฺสนฺนํ เวทนานํ ปริญฺญาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. สตฺตมํ. ३२०. “‘वेदना, वेदना’ असे, आवुसो सारिपुत्त, म्हटले जाते. आवुसो, वेदना म्हणजे काय?” “आवुसो, या तीन वेदना आहेत. कोणत्या तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना – आवुसो, या तीन वेदना आहेत.” “पण आवुसो, या तिन्ही वेदनांच्या परिज्ञानासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?” “आवुसो, या तिन्ही वेदनांच्या परिज्ञानासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे.” “पण आवुसो, तो मार्ग कोणता आणि ती प्रतिपदा कोणती, जी या तिन्ही वेदनांच्या परिज्ञानासाठी आहे?” “आवुसो, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे जो या तिन्ही वेदनांच्या परिज्ञानासाठी आहे; जसे की – सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, जी या तिन्ही वेदनांच्या परिज्ञानासाठी आहे.” “आवुसो, हा मार्ग कल्याणकारी आहे, ही प्रतिपदा कल्याणकारी आहे, जी या तिन्ही वेदनांच्या परिज्ञानासाठी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्त, अप्रमादासाठी हे पुरेसे व योग्यच आहे.” सातवे. ๘. อาสวปญฺหาสุตฺตํ ८. आसवपञ्हा सुत्त ๓๒๑. ‘‘‘อาสโว, อาสโว’ติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตโม นุ โข, อาวุโส, อาสโว’’ติ? ‘‘ตโย เม, อาวุโส, อาสวา[Pg.451]. กามาสโว, ภวาสโว, อวิชฺชาสโว – อิเม โข, อาวุโส, ตโย อาสวา’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา เอเตสํ อาสวานํ ปหานายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา เอเตสํ อาสวานํ ปหานายา’’ติ. ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา เอเตสํ อาสวานํ ปหานายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เอเตสํ อาสวานํ ปหานาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอเตสํ อาสวานํ ปหานายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอเตสํ อาสวานํ ปหานาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. อฏฺฐมํ. ३२१. “‘आसव, आसव’ असे, आवुसो सारिपुत्त, म्हटले जाते. आवुसो, आसव म्हणजे काय?” “आवुसो, हे तीन आसव आहेत. कामासव, भवासव आणि अविद्यासव – आवुसो, हे तीन आसव आहेत.” “पण आवुसो, या आसवांच्या प्रहाणासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?” “आवुसो, या आसवांच्या प्रहाणासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे.” “पण आवुसो, तो मार्ग कोणता आणि ती प्रतिपदा कोणती, जी या आसवांच्या प्रहाणासाठी आहे?” “आवुसो, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे जो या आसवांच्या प्रहाणासाठी आहे; जसे की – सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, जी या आसवांच्या प्रहाणासाठी आहे.” “आवुसो, हा मार्ग कल्याणकारी आहे, ही प्रतिपदा कल्याणकारी आहे, जी या आसवांच्या प्रहाणासाठी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्त, अप्रमादासाठी हे पुरेसे व योग्यच आहे.” आठवे. ๙. อวิชฺชาปญฺหาสุตฺตํ ९. अविद्यापञ्हा सुत्त ๓๒๒. ‘‘‘อวิชฺชา, อวิชฺชา’ติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตมา นุ โข, อาวุโส, อวิชฺชา’’ติ? ‘‘ยํ โข, อาวุโส, ทุกฺเข อญฺญาณํ, ทุกฺขสมุทเย อญฺญาณํ, ทุกฺขนิโรเธ อญฺญาณํ, ทุกฺขนิโรธคามินิยา ปฏิปทาย อญฺญาณํ – อยํ วุจฺจตาวุโส, อวิชฺชา’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอติสฺสา อวิชฺชาย ปหานายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอติสฺสา อวิชฺชาย ปหานายา’’ติ. ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอติสฺสา อวิชฺชาย ปหานายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอติสฺสา อวิชฺชาย ปหานาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอติสฺสา อวิชฺชาย ปหานายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอติสฺสา อวิชฺชาย ปหานาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. นวมํ. ३२२. “‘अविद्या, अविद्या’ असे, आवुसो सारिपुत्त, म्हटले जाते. आवुसो, अविद्या म्हणजे काय?” “आवुसो, दुःखाविषयीचे अज्ञान, दुःखसमुदयाविषयीचे अज्ञान, दुःखनिरोधाविषयीचे अज्ञान आणि दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदेविषयीचे अज्ञान – आवुसो, याला अविद्या म्हटले जाते.” “पण आवुसो, या अविद्येच्या प्रहाणासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?” “आवुसो, या अविद्येच्या प्रहाणासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे.” “पण आवुसो, तो मार्ग कोणता आणि ती प्रतिपदा कोणती, जी या अविद्येच्या प्रहाणासाठी आहे?” “आवुसो, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे जो या अविद्येच्या प्रहाणासाठी आहे; जसे की – सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, जी या अविद्येच्या प्रहाणासाठी आहे.” “आवुसो, हा मार्ग कल्याणकारी आहे, ही प्रतिपदा कल्याणकारी आहे, जी या अविद्येच्या प्रहाणासाठी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्त, अप्रमादासाठी हे पुरेसे व योग्यच आहे.” नववे. ๑๐. ตณฺหาปญฺหาสุตฺตํ १०. तण्हापञ्हा सुत्त ๓๒๓. ‘‘‘ตณฺหา, ตณฺหา’ติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตมา นุ โข, อาวุโส, ตณฺหา’’ติ? ‘‘ติสฺโส อิมา, อาวุโส, ตณฺหา. กามตณฺหา, ภวตณฺหา, วิภวตณฺหา – อิมา โข, อาวุโส, ติสฺโส ตณฺหา’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตาสํ ตณฺหานํ ปหานายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตาสํ ตณฺหานํ ปหานายา’’ติ. ‘‘กตโม [Pg.452] ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอตาสํ ตณฺหานํ ปหานายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอตาสํ ตณฺหานํ ปหานาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอตาสํ ตณฺหานํ ปหานายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอตาสํ ตณฺหานํ ปหานาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. ทสมํ. ३२३. “‘तण्हा, tण्हा’ असे, आवुसो सारिपुत्त, म्हटले जाते. आवुसो, तण्हा म्हणजे काय?” “आवुसो, या तीन प्रकारच्या तण्हा आहेत. कामतण्हा, भवतण्हा आणि विभवतण्हा – आवुसो, या तीन प्रकारच्या तण्हा आहेत.” “पण आवुसो, या तण्हांच्या प्रहाणासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?” “आवुसो, या तण्हांच्या प्रहाणासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे.” “पण आवुसो, तो मार्ग कोणता आणि ती प्रतिपदा कोणती, जी या तण्हांच्या प्रहाणासाठी आहे?” “आवुसो, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे जो या तण्हांच्या प्रहाणासाठी आहे; जसे की – सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, जी या तण्हांच्या प्रहाणासाठी आहे.” “आवुसो, हा मार्ग कल्याणकारी आहे, ही प्रतिपदा कल्याणकारी आहे, जी या तण्हांच्या प्रहाणासाठी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्त, अप्रमादासाठी हे पुरेसे व योग्यच आहे.” दहावे. ๑๑. โอฆปญฺหาสุตฺตํ ११. ओघपञ्हा सुत्त ๓๒๔. ‘‘‘โอโฆ, โอโฆ’ติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตโม นุ โข, อาวุโส, โอโฆ’’ติ? ‘‘จตฺตาโรเม, อาวุโส, โอฆา. กาโมโฆ, ภโวโฆ, ทิฏฺโฐโฆ, อวิชฺโชโฆ – อิเม โข, อาวุโส, จตฺตาโร โอฆา’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอเตสํ โอฆานํ ปหานายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอเตสํ โอฆานํ ปหานายา’’ติ. ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอเตสํ โอฆานํ ปหานายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอเตสํ โอฆานํ ปหานาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอเตสํ โอฆานํ ปหานายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอเตสํ โอฆานํ ปหานาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. เอกาทสมํ. ३२४. "आवुसो सारिपुत्ता, 'ओघ, ओघ' (पूर) असे म्हटले जाते. आवुसो, ओघ म्हणजे काय?" "आवुसो, हे चार ओघ आहेत: कामोघ, भवोघ, दिट्ठोघ आणि अविज्जोघ. आवुसो, हेच चार ओघ आहेत." "पण आवुसो, या ओघांच्या प्रहाणासाठी (त्याग करण्यासाठी) काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा (आचरण) आहे का?" "आहे आवुसो, या ओघांच्या प्रहाणासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे." "पण आवुसो, या ओघांच्या प्रहाणासाठी कोणता मार्ग आहे, कोणती प्रतिपदा आहे?" "आवुसो, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे, जो या ओघांच्या प्रहाणासाठी आहे; जसे की - सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, या ओघांच्या प्रहाणासाठी." "आवुसो, या ओघांच्या प्रहाणासाठी हा मार्ग कल्याणकारी आहे, ही प्रतिपदा कल्याणकारी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्ता, अप्रमादासाठी (जागरूक राहण्यासाठी) हे योग्यच आहे." अकरावे. ๑๒. อุปาทานปญฺหาสุตฺตํ १२. उपादानप्रश्नसुत्त ๓๒๕. ‘‘‘อุปาทานํ, อุปาทาน’นฺติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตมํ นุ โข, อาวุโส, อุปาทาน’’นฺติ? ‘‘จตฺตาริมานิ, อาวุโส, อุปาทานานิ. กามุปาทานํ, ทิฏฺฐุปาทานํ สีลพฺพตุปาทานํ, อตฺตวาทุปาทานํ – อิมานิ โข, อาวุโส, จตฺตาริ อุปาทานานี’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอเตสํ อุปาทานานํ ปหานายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอเตสํ อุปาทานานํ ปหานายา’’ติ. ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอเตสํ อุปาทานานํ ปหานายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอเตสํ อุปาทานานํ ปหานาย, เสยฺยถิทํ [Pg.453] – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอเตสํ อุปาทานานํ ปหานายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอเตสํ อุปาทานานํ ปหานาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. ทฺวาทสมํ. ३२५. "आवुसो सारिपुत्ता, 'उपादान, उपादान' असे म्हटले जाते. आवुसो, उपादान म्हणजे काय?" "आवुसो, ही चार उपादाने आहेत: कामुपादान, दिट्ठुपादान, सीलब्बतुपादान आणि अत्तवादुपादान. आवुसो, हीच चार उपादाने आहेत." "पण आवुसो, या उपादानांच्या प्रहाणासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?" "आहे आवुसो, या उपादानांच्या प्रहाणासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे." "पण आवुसो, या उपादानांच्या प्रहाणासाठी कोणता मार्ग आहे, कोणती प्रतिपदा आहे?" "आवुसो, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे, जो या उपादानांच्या प्रहाणासाठी आहे; जसे की - सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, या उपादानांच्या प्रहाणासाठी." "आवुसो, या उपादानांच्या प्रहाणासाठी हा मार्ग कल्याणकारी आहे, ही प्रतिपदा कल्याणकारी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्ता, अप्रमादासाठी हे योग्यच आहे." बारावे. ๑๓. ภวปญฺหาสุตฺตํ १३. भवप्रश्नसुत्त ๓๒๖. ‘‘‘ภโว, ภโว’ติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตโม นุ โข, อาวุโส, ภโว’’ติ? ‘‘ตโย เม, อาวุโส, ภวา. กามภโว, รูปภโว, อรูปภโว – อิเม โข, อาวุโส, ตโย ภวา’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอเตสํ ภวานํ ปริญฺญายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอเตสํ ภวานํ ปริญฺญายา’’ติ. ‘‘กตโม, ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอเตสํ ภวานํ ปริญฺญายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอเตสํ ภวานํ ปริญฺญาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอเตสํ ภวานํ ปริญฺญายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอเตสํ ภวานํ ปริญฺญาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. เตรสมํ. ३२६. "आवुसो सारिपुत्ता, 'भव, भव' असे म्हटले जाते. आवुसो, भव म्हणजे काय?" "आवुसो, हे तीन भव आहेत: कामभव, रूपभव आणि अरूपभव. आवुसो, हेच तीन भव आहेत." "पण आवुसो, या भवांच्या परिज्ञानासाठी (पूर्ण आकलनासाठी) काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?" "आहे आवुसो, या भवांच्या परिज्ञानासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे." "पण आवुसो, या भवांच्या परिज्ञानासाठी कोणता मार्ग आहे, कोणती प्रतिपदा आहे?" "आवुसो, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे, जो या भवांच्या परिज्ञानासाठी आहे; जसे की - सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, या भवांच्या परिज्ञानासाठी." "आवुसो, या भवांच्या परिज्ञानासाठी हा मार्ग कल्याणकारी आहे, ही प्रतिपदा कल्याणकारी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्ता, अप्रमादासाठी हे योग्यच आहे." तेरावे. ๑๔. ทุกฺขปญฺหาสุตฺตํ १४. दुःखप्रश्नसुत्त ๓๒๗. ‘‘‘ทุกฺขํ, ทุกฺข’นฺติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตมํ นุ โข, อาวุโส, ทุกฺข’’นฺติ? ‘‘ติสฺโส อิมา, อาวุโส, ทุกฺขตา. ทุกฺขทุกฺขตา, สงฺขารทุกฺขตา, วิปริณามทุกฺขตา – อิมา โข, อาวุโส, ติสฺโส ทุกฺขตา’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตาสํ ทุกฺขตานํ ปริญฺญายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตาสํ ทุกฺขตานํ ปริญฺญายา’’ติ. ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอตาสํ ทุกฺขตานํ ปริญฺญายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอตาสํ ทุกฺขตานํ ปริญฺญาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอตาสํ ทุกฺขตานํ ปริญฺญายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอตาสํ ทุกฺขตานํ ปริญฺญาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. จุทฺทสมํ. ३२७. "आवुसो सारिपुत्ता, 'दुःख, दुःख' असे म्हटले जाते. आवुसो, दुःख म्हणजे काय?" "आवुसो, या तीन दुःखता (दुःखाचे प्रकार) आहेत: दुःख-दुःखता, संस्कार-दुःखता आणि विपरिणाम-दुःखता. आवुसो, या तीन दुःखता आहेत." "पण आवुसो, या दुःखतांच्या परिज्ञानासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?" "आहे आवुसो, या दुःखतांच्या परिज्ञानासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे." "पण आवुसो, या दुःखतांच्या परिज्ञानासाठी कोणता मार्ग आहे, कोणती प्रतिपदा आहे?" "आवुसो, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे, जो या दुःखतांच्या परिज्ञानासाठी आहे; जसे की - सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, या दुःखतांच्या परिज्ञानासाठी." "आवुसो, या दुःखतांच्या परिज्ञानासाठी हा मार्ग कल्याणकारी आहे, ही प्रतिपदा कल्याणकारी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्ता, अप्रमादासाठी हे योग्यच आहे." चौदावे. ๑๕. สกฺกายปญฺหาสุตฺตํ १५. सक्कायप्रश्नसुत्त ๓๒๘. ‘‘‘สกฺกาโย[Pg.454], สกฺกาโย’ติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตโม นุ โข, อาวุโส, สกฺกาโย’’ติ? ‘‘ปญฺจิเม, อาวุโส, อุปาทานกฺขนฺธา สกฺกาโย วุตฺโต ภควตา, เสยฺยถิทํ – รูปุปาทานกฺขนฺโธ, เวทนุปาทานกฺขนฺโธ, สญฺญุปาทานกฺขนฺโธ, สงฺขารุปาทานกฺขนฺโธ, วิญฺญาณุปาทานกฺขนฺโธ. อิเม โข, อาวุโส, ปญฺจุปาทานกฺขนฺธา สกฺกาโย วุตฺโต ภควตา’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตสฺส สกฺกายสฺส ปริญฺญายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตสฺส สกฺกายสฺส ปริญฺญายา’’ติ. ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอตสฺส สกฺกายสฺส ปริญฺญายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอตสฺส สกฺกายสฺส ปริญฺญาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอตสฺส สกฺกายสฺส ปริญฺญายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอตสฺส สกฺกายสฺส ปริญฺญาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. ปนฺนรสมํ. ३२८. "आवुसो सारिपुत्ता, 'सक्काय, सक्काय' असे म्हटले जाते. आवुसो, सक्काय म्हणजे काय?" "आवुसो, भगवंतांनी या पाच उपादानस्कंधांना 'सक्काय' म्हटले आहे; जसे की - रूपोपादानस्कंध, वेदनोपादानस्कंध, संज्ञोपादानस्कंध, संस्कारोपादानस्कंध आणि विज्ञानोपादानस्कंध. आवुसो, भगवंतांनी या पाच उपादानस्कंधांना 'सक्काय' म्हटले आहे." "पण आवुसो, या सक्कायाच्या परिज्ञानासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?" "आहे आवुसो, या सक्कायाच्या परिज्ञानासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे." "पण आवुसो, या सक्कायाच्या परिज्ञानासाठी कोणता मार्ग आहे, कोणती प्रतिपदा आहे?" "आवुसो, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे, जो या सक्कायाच्या परिज्ञानासाठी आहे; जसे की - सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, या सक्कायाच्या परिज्ञानासाठी." "आवुसो, या सक्कायाच्या परिज्ञानासाठी हा मार्ग कल्याणकारी आहे, ही प्रतिपदा कल्याणकारी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्ता, अप्रमादासाठी हे योग्यच आहे." पंधरावे. ๑๖. ทุกฺกรปญฺหาสุตฺตํ १६. दुक्करप्रश्नसुत्त ๓๒๙. ‘‘กึ นุ โข, อาวุโส สาริปุตฺต, อิมสฺมึ ธมฺมวินเย ทุกฺกร’’นฺติ? ‘‘ปพฺพชฺชา โข, อาวุโส, อิมสฺมึ ธมฺมวินเย ทุกฺกรา’’ติ. ‘‘ปพฺพชิเตน ปนาวุโส, กึ ทุกฺกร’’นฺติ? ‘‘ปพฺพชิเตน โข, อาวุโส, อภิรติ ทุกฺกรา’’ติ. ‘‘อภิรเตน ปนาวุโส, กึ ทุกฺกร’’นฺติ? ‘‘อภิรเตน โข, อาวุโส, ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปตฺติ ทุกฺกรา’’ติ. ‘‘กีวจิรํ ปนาวุโส, ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺโน ภิกฺขุ อรหํ อสฺสา’’ติ? ‘‘นจิรํ, อาวุโส’’ติ. โสฬสมํ. ३२९. "आदरणीय सारिपुत्त, या धम्म-विनयात काय करणे कठीण आहे?" "मित्रा, या धम्म-विनयात प्रव्रज्या (दीक्षा) घेणे कठीण आहे." "पण मित्रा, प्रव्रजित झालेल्या व्यक्तीला काय करणे कठीण आहे?" "मित्रा, प्रव्रजित झालेल्या व्यक्तीला (प्रव्रज्येत) रममाण होणे कठीण आहे." "पण मित्रा, रममाण झालेल्या व्यक्तीला काय करणे कठीण आहे?" "मित्रा, रममाण झालेल्या व्यक्तीला धम्मानुकूल आचरण (धम्मानुधम्मपटिपत्ती) करणे कठीण आहे." "पण मित्रा, धम्मानुकूल आचरण करणाऱ्या भिक्खूला अर्हत होण्यासाठी किती वेळ लागतो?" "मित्रा, फार काळ लागत नाही (लवकरच तो अर्हत होतो)." सोळावे (सुत्त)." ชมฺพุขาทกสํยุตฺตํ สมตฺตํ. जम्बुखादक संयुत्त समाप्त झाले. ตสฺสุทฺทานํ – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – นิพฺพานํ อรหตฺตญฺจ, ธมฺมวาที กิมตฺถิยํ; อสฺสาโส ปรมสฺสาโส, เวทนา อาสวาวิชฺชา; ตณฺหา โอฆา อุปาทานํ, ภโว ทุกฺขญฺจ สกฺกาโย.อิมสฺมึ ธมฺมวินเย ทุกฺกรนฺติ. निब्बान आणि अरहत्तत्व, धम्मवादी, किमत्थिय (काय उद्देशाने); अस्सास (आश्वास), परमस्सास, वेदना, आसव, अविज्जा; तण्हा (तृष्णा), ओघ, उपादान, भव, दुक्ख आणि सक्काय; आणि या धम्म-विनयात कठीण काय आहे, हे या उद्दानातील विषय आहेत. ๕. สามณฺฑกสํยุตฺตํ ५. सामण्डक संयुत्त ๑. สามณฺฑกสุตฺตํ १. सामण्डक सुत्त ๓๓๐. เอกํ [Pg.455] สมยํ อายสฺมา สาริปุตฺโต วชฺชีสุ วิหรติ อุกฺกเจลายํ คงฺคาย นทิยา ตีเร. อถ โข สามณฺฑโก ปริพฺพาชโก เยนายสฺมา สาริปุตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา สาริปุตฺเตน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข สามณฺฑโก ปริพฺพาชโก อายสฺมนฺตํ สาริปุตฺตํ เอตทโวจ – ३३०. एका वेळी आयुष्यमान सारिपुत्त वज्जी देशात, गंगा नदीच्या तीरावर असलेल्या उक्कचेला येथे विहार करत होते. तेव्हा सामण्डक नावाचा परिव्राजक जेथे आयुष्यमान सारिपुत्त होते तेथे आला; आल्यानंतर त्याने आयुष्यमान सारिपुत्तांशी कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी व संस्मरणीय संभाषण आटोपून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या सामण्डक परिव्राजकाने आयुष्यमान सारिपुत्तांना असे म्हटले – ‘‘‘นิพฺพานํ, นิพฺพาน’นฺติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตมํ นุ โข, อาวุโส, นิพฺพาน’’นฺติ? ‘‘โย โข, อาวุโส, ราคกฺขโย โทสกฺขโย โมหกฺขโย – อิทํ วุจฺจติ นิพฺพาน’’นฺติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. "‘निब्बान, निब्बान’ असे म्हटले जाते, आदरणीय सारिपुत्त. मित्रा, निब्बान म्हणजे नेमके काय?" "मित्रा, जो राग-क्षय (लोभाचा नाश), दोस-क्षय (द्वेषाचा नाश) आणि मोह-क्षय (मोहाचा नाश) आहे – यालाच निब्बान असे म्हणतात." "पण मित्रा, या निब्बानाचा साक्षात्कार करण्यासाठी काही मार्ग किंवा काही प्रतिपदा (आचरण) आहे का?" "मित्रा, या निब्बानाचा साक्षात्कार करण्यासाठी मार्ग आहे आणि प्रतिपदा देखील आहे." ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. ปฐมํ. "पण मित्रा, या निब्बानाचा साक्षात्कार करण्यासाठी तो मार्ग कोणता आणि ती प्रतिपदा कोणती?" "मित्रा, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे, जो या निब्बानाचा साक्षात्कार करण्यासाठी आहे; जसे की – सम्यक दृष्टी, सम्यक संकल्प, सम्यक वाचा, सम्यक कर्मांत, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृती आणि सम्यक समाधी. मित्रा, हाच तो मार्ग आहे आणि हीच ती प्रतिपदा आहे, जी या निब्बानाचा साक्षात्कार करण्यासाठी आहे." "मित्रा सारिपुत्त, या निब्बानाचा साक्षात्कार करण्यासाठी हा मार्ग कल्याणकारी आहे आणि ही प्रतिपदा देखील कल्याणकारी आहे. आणि मित्रा, अप्रमादाने (जागरूकतेने) प्रयत्न करण्यासाठी हे पुरेसे व योग्यच आहे." पहिले (सुत्त). (ยถา ชมฺพุขาทกสํยุตฺตํ, ตถา วิตฺถาเรตพฺพํ). (ज्याप्रमाणे जम्बुखादक संयुत्त आहे, त्याचप्रमाणे याचा विस्तार करावा). ๒. ทุกฺกรสุตฺตํ २. दुक्कर सुत्त ๓๓๑. ‘‘กึ [Pg.456] นุ โข, อาวุโส สาริปุตฺต, อิมสฺมึ ธมฺมวินเย ทุกฺกร’’นฺติ? ‘‘ปพฺพชฺชา โข, อาวุโส, อิมสฺมึ ธมฺมวินเย ทุกฺกรา’’ติ. ‘‘ปพฺพชิเตน ปนาวุโส, กึ ทุกฺกร’’นฺติ? ‘‘ปพฺพชิเตน โข, อาวุโส, อภิรติ ทุกฺกรา’’ติ. ‘‘อภิรเตน ปนาวุโส, กึ ทุกฺกร’’นฺติ? ‘‘อภิรเตน โข, อาวุโส, ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปตฺติ ทุกฺกรา’’ติ. ‘‘กีวจิรํ ปนาวุโส, ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺโน ภิกฺขุ อรหํ อสฺสา’’ติ? ‘‘นจิรํ, อาวุโส’’ติ. โสฬสมํ. ३३१. "आदरणीय सारिपुत्त, या धम्म-विनयात काय करणे कठीण आहे?" "मित्रा, या धम्म-विनयात प्रव्रज्या घेणे कठीण आहे." "पण मित्रा, प्रव्रजित झालेल्या व्यक्तीला काय करणे कठीण आहे?" "मित्रा, प्रव्रजित झालेल्या व्यक्तीला (प्रव्रज्येत) रममाण होणे कठीण आहे." "पण मित्रा, रममाण झालेल्या व्यक्तीला काय करणे कठीण आहे?" "मित्रा, रममाण झालेल्या व्यक्तीला धम्मानुकूल आचरण करणे कठीण आहे." "पण मित्रा, धम्मानुकूल आचरण करणाऱ्या भिक्खूला अर्हत होण्यासाठी किती वेळ लागतो?" "मित्रा, फार काळ लागत नाही." सोळावे (सुत्त). (ปุริมกสทิสํ อุทฺทานํ.) (पूर्वीप्रमाणेच उद्दान समजावे.) สามณฺฑกสํยุตฺตํ สมตฺตํ. सामण्डक संयुत्त समाप्त झाले. ๖. โมคฺคลฺลานสํยุตฺตํ ६. मोग्गल्लान संयुत्त ๑. ปฐมฌานปญฺหาสุตฺตํ १. पठमझानपञ्हा सुत्त ๓๓๒. เอกํ [Pg.457] สมยํ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. ตตฺร โข อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘อาวุโส, ภิกฺขเว’’ติ. ‘‘อาวุโส’’ติ โข เต ภิกฺขู อายสฺมโต มหาโมคฺคลฺลานสฺส ปจฺจสฺโสสุํ. อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – ३३२. एका वेळी आयुष्यमान महामोग्गल्लान सावत्थी येथे अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लानांनी भिक्खूंना संबोधित केले – "मित्रांनो, भिक्खूंनो!" "मित्रा!" असे म्हणून त्या भिक्खूंनी आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना प्रतिसाद दिला. आयुष्यमान महामोग्गल्लान यांनी पुढीलप्रमाणे म्हटले – ‘‘อิธ มยฺหํ, อาวุโส, รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘ปฐมํ ฌานํ, ปฐมํ ฌาน’นฺติ วุจฺจติ. กตมํ นุ โข ปฐมํ ฌานนฺติ? ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, เอตทโหสิ – ‘อิธ ภิกฺขุ วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ วุจฺจติ ปฐมํ ฌาน’นฺติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, อิมินา วิหาเรน วิหรโต กามสหคตา สญฺญามนสิการา สมุทาจรนฺติ. "मित्रांनो, येथे एकांतात ध्यानस्थ बसलो असताना माझ्या मनात असा विचार आला – 'प्रथम ध्यान, प्रथम ध्यान' असे म्हटले जाते. पण प्रथम ध्यान म्हणजे नेमके काय? मित्रांनो, तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला – 'येथे भिक्खू कामभोगांपासून अलिप्त होऊन, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, वितर्क आणि विचारांसह, विवेकापासून (अलिप्ततेपासून) उत्पन्न झालेले प्रीती व सुख असणारे प्रथम ध्यान प्राप्त करून विहार करतो. याला प्रथम ध्यान असे म्हणतात.' मित्रांनो, मी देखील कामभोगांपासून अलिप्त होऊन, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, वितर्क आणि विचारांसह, विवेकापासून उत्पन्न झालेले प्रीती व सुख असणारे प्रथम ध्यान प्राप्त करून विहार करत होतो. मित्रांनो, या विहारात विहार करत असताना, माझ्या मनात कामभोगांशी संबंधित संज्ञा आणि मनसिकार (विचार) उत्पन्न होऊ लागले." ‘‘อถ โข มํ, อาวุโส, ภควา อิทฺธิยา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ – ‘โมคฺคลฺลาน, โมคฺคลฺลาน! มา, พฺราหฺมณ, ปฐมํ ฌานํ ปมาโท, ปฐเม ฌาเน จิตฺตํ สณฺฐเปหิ, ปฐเม ฌาเน จิตฺตํ เอโกทึ กโรหิ, ปฐเม ฌาเน จิตฺตํ สมาทหา’ติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, อปเรน สมเยน วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหาสึ. ยญฺหิ ตํ, อาวุโส, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘สตฺถารานุคฺคหิโต สาวโก มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’ติ, มมํ ตํ สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘สตฺถารานุคฺคหิโต สาวโก มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’’’ติ. ปฐมํ. "तेव्हा मित्रांनो, भगवंतांनी आपल्या ऋद्धीबलाने माझ्याजवळ येऊन मला असे म्हटले – 'मोग्गल्लान, moggallāna! हे ब्राह्मणा, प्रथम ध्यानाबाबत गाफील (प्रमादी) राहू नकोस. प्रथम ध्यानात चित्त स्थिर कर, प्रथम ध्यानात चित्त एकाग्र कर, प्रथम ध्यानात चित्त समाहित कर.' त्यानंतर मित्रांनो, मी कामभोगांपासून अलिप्त होऊन, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, वितर्क आणि विचारांसह, विवेकापासून उत्पन्न झालेले प्रीती व सुख असणारे प्रथम ध्यान प्राप्त करून विहार केला. मित्रांनो, ज्याच्याविषयी योग्य प्रकारे बोलताना असे म्हटले जाऊ शकते की – 'हा शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) अनुग्रहाने महा-अभिज्ञा प्राप्त झालेला श्रावक आहे', माझ्याविषयीच योग्य प्रकारे बोलताना असे म्हटले जाऊ शकते की – 'हा शास्त्यांच्या अनुग्रहाने महा-अभिज्ञा प्राप्त झालेला श्रावक आहे'." पहिले (सुत्त). ๒. ทุติยฌานปญฺหาสุตฺตํ २. दुतियझानपञ्हा सुत्त ๓๓๓. ‘‘‘ทุติยํ [Pg.458] ฌานํ, ทุติยํ ฌาน’นฺติ วุจฺจติ. กตมํ นุ โข ทุติยํ ฌานนฺติ? ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, เอตทโหสิ – ‘อิธ ภิกฺขุ วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา อชฺฌตฺตํ สมฺปสาทนํ เจตโส เอโกทิภาวํ อวิตกฺกํ อวิจารํ สมาธิชํ ปีติสุขํ ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ วุจฺจติ ทุติยํ ฌาน’นฺติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา อชฺฌตฺตํ สมฺปสาทนํ เจตโส เอโกทิภาวํ อวิตกฺกํ อวิจารํ สมาธิชํ ปีติสุขํ ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, อิมินา วิหาเรน วิหรโต วิตกฺกสหคตา สญฺญามนสิการา สมุทาจรนฺติ. ३३३. "‘द्वितीय ध्यान, द्वितीय ध्यान’ असे म्हटले जाते. पण द्वितीय ध्यान म्हणजे नेमके काय? मित्रांनो, तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला – ‘येथे भिक्खू वितर्क आणि विचारांच्या शांत होण्यामुळे, अध्यात्मिक प्रसन्नता आणि चित्ताची एकाग्रता असणारे, वितर्करहित, विचाररहित, समाधीपासून उत्पन्न झालेले प्रीती व सुख असणारे द्वितीय ध्यान प्राप्त करून विहार करतो. याला द्वितीय ध्यान असे म्हणतात.’ मित्रांनो, मी देखील वितर्क आणि विचारांच्या शांत होण्यामुळे, अध्यात्मिक प्रसन्नता आणि चित्ताची एकाग्रता असणारे, वितर्करहित, विचाररहित, समाधीपासून उत्पन्न झालेले प्रीती व सुख असणारे द्वितीय ध्यान प्राप्त करून विहार करत होतो. मित्रांनो, या विहारात विहार करत असताना, माझ्या मनात वितर्कांशी संबंधित संज्ञा आणि मनसिकार उत्पन्न होऊ लागले." ‘‘อถ โข มํ, อาวุโส, ภควา อิทฺธิยา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ – ‘โมคฺคลฺลาน, โมคฺคลฺลาน! มา, พฺราหฺมณ, ทุติยํ ฌานํ ปมาโท, ทุติเย ฌาเน จิตฺตํ สณฺฐเปหิ, ทุติเย ฌาเน จิตฺตํ เอโกทึ กโรหิ, ทุติเย ฌาเน จิตฺตํ สมาทหา’ติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, อปเรน สมเยน วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา อชฺฌตฺตํ สมฺปสาทนํ เจตโส เอโกทิภาวํ อวิตกฺกํ อวิจารํ สมาธิชํ ปีติสุขํ ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหาสึ. ยญฺหิ ตํ, อาวุโส, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘สตฺถารานุคฺคหิโต สาวโก มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’ติ, มมํ ตํ สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘สตฺถารานุคฺคหิโต สาวโก มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’’’ติ. ทุติยํ. “तेव्हा, मित्रांनो, भगवान आपल्या ऋद्धीने माझ्याकडे आले आणि मला म्हणाले— ‘मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मणा, दुसऱ्या ध्यानाबाबत प्रमाद करू नकोस. दुसऱ्या ध्यानात चित्त स्थिर कर, दुसऱ्या ध्यानात चित्त एकाग्र कर, दुसऱ्या ध्यानात चित्त समाहित कर.’ त्यानंतर, मित्रांनो, काही काळानंतर वितर्क आणि विचारांच्या शांत होण्याने, आंतरिक प्रसन्नता आणि चित्ताची एकाग्रता असलेल्या, वितर्करहित, विचाररहित, समाधीतून उत्पन्न झालेल्या प्रीती आणि सुखाने युक्त अशा दुसऱ्या ध्यानात प्रवेश करून मी विहरलो. मित्रांनो, जर कोणी योग्य रीतीने बोलताना असे म्हणू शकेल की— ‘शास्त्यांच्या अनुग्रहाने शिष्याने महान अभिज्ञा प्राप्त केली आहे,’ तर माझ्याविषयीच योग्य रीतीने बोलताना असे म्हटले जाऊ शकते की— ‘शास्त्यांच्या अनुग्रहाने शिष्याने महान अभिज्ञा प्राप्त केली आहे.’” (दुसरे) ๓. ตติยฌานปญฺหาสุตฺตํ ३. तृतीयझानपञ्हसुत्त (तिसऱ्या ध्यानाविषयीच्या प्रश्नाचे सूत्र) ๓๓๔. ‘‘‘ตติยํ ฌานํ, ตติยํ ฌาน’นฺติ วุจฺจติ. กตมํ นุ โข ตติยํ ฌานนฺติ? ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, เอตทโหสิ – อิธ ภิกฺขุ ปีติยา จ วิราคา อุเปกฺขโก จ วิหรติ สโต จ สมฺปชาโน สุขญฺจ กาเยน ปฏิสํเวเทติ, ยํ ตํ อริยา อาจิกฺขนฺติ – ‘อุเปกฺขโก สติมา สุขวิหารี’ติ ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ วุจฺจติ ตติยํ ฌานนฺติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, ปีติยา จ วิราคา อุเปกฺขโก จ วิหรามิ สโต จ สมฺปชาโน สุขญฺจ กาเยน ปฏิสํเวเทมิ. ยํ ตํ อริยา อาจิกฺขนฺติ – ‘อุเปกฺขโก สติมา สุขวิหารี’ติ ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, อิมินา วิหาเรน วิหรโต ปีติสหคตา สญฺญามนสิการา สมุทาจรนฺติ. ३३४. “‘तिसरे ध्यान, तिसरे ध्यान’ असे म्हटले जाते. तिसरे ध्यान म्हणजे काय? मित्रांनो, माझ्या मनात असा विचार आला— ‘येथे भिक्खू प्रीतीचाही विराग झाल्यामुळे उपेक्षक राहून विहरतो, आणि स्मृतीवान व प्रज्ञावान होऊन शरीराने सुखाचा अनुभव घेतो, ज्याविषयी आर्य पुरुष सांगतात की— “तो उपेक्षक, स्मृतीवान आणि सुखविहारी आहे”, अशा तिसऱ्या ध्यानात प्रवेश करून तो विहरतो. याला तिसरे ध्यान असे म्हणतात.’ मित्रांनो, मी प्रीतीचा विराग झाल्यामुळे उपेक्षक राहून विहरलो, आणि स्मृतीवान व प्रज्ञावान होऊन शरीराने सुखाचा अनुभव घेतला. ज्याविषयी आर्य पुरुष सांगतात की— ‘तो उपेक्षक, स्मृतीवान आणि सुखविहारी आहे’, अशा तिसऱ्या ध्यानात प्रवेश करून मी विहरलो. मित्रांनो, या विहारात विहरत असताना माझ्या मनात प्रीतीशी संबंधित संज्ञा आणि मनसिकार वारंवार उद्भवू लागले.” ‘‘อถ [Pg.459] โข มํ, อาวุโส, ภควา อิทฺธิยา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ – ‘โมคฺคลฺลาน, โมคฺคลฺลาน! มา, พฺราหฺมณ, ตติยํ ฌานํ ปมาโท, ตติเย ฌาเน จิตฺตํ สณฺฐเปหิ, ตติเย ฌาเน จิตฺตํ เอโกทึ กโรหิ, ตติเย ฌาเน จิตฺตํ สมาทหา’ติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, อปเรน สมเยน ปีติยา จ วิราคา อุเปกฺขโก จ วิหรามิ สโต จ สมฺปชาโน สุขญฺจ กาเยน ปฏิสํเวเทมิ, ยํ ตํ อริยา อาจิกฺขนฺติ – ‘อุเปกฺขโก สติมา สุขวิหารี’ติ ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหาสึ. ยญฺหิ ตํ อาวุโส สมฺมา วทมาโน วเทยฺย…เป… มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’’ติ. ตติยํ. “तेव्हा, मित्रांनो, भगवान आपल्या ऋद्धीने माझ्याकडे आले आणि मला म्हणाले— ‘मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मणा, तिसऱ्या ध्यानाबाबत प्रमाद करू नकोस. तिसऱ्या ध्यानात चित्त स्थिर कर, तिसऱ्या ध्यानात चित्त एकाग्र कर, तिसऱ्या ध्यानात चित्त समाहित कर.’ त्यानंतर, मित्रांनो, काही काळानंतर प्रीतीचा विराग झाल्यामुळे मी उपेक्षक राहून विहरलो, आणि स्मृतीवान व प्रज्ञावान होऊन शरीराने सुखाचा अनुभव घेतला. ज्याविषयी आर्य पुरुष सांगतात की— ‘तो उपेक्षक, स्मृतीवान आणि सुखविहारी आहे’, अशा तिसऱ्या ध्यानात प्रवेश करून मी विहरलो. मित्रांनो, जर कोणी योग्य रीतीने बोलताना असे म्हणू शकेल की... (पे)... ‘शास्त्यांच्या अनुग्रहाने शिष्याने महान अभिज्ञा प्राप्त केली आहे,’ तर माझ्याविषयीच योग्य रीतीने बोलताना असे म्हटले जाऊ शकते.” (तिसरे) ๔. จตุตฺถฌานปญฺหาสุตฺตํ ४. चतुत्थझानपञ्हसुत्त (चौथ्या ध्यानाविषयीच्या प्रश्नाचे सूत्र) ๓๓๕. ‘‘‘จตุตฺถํ ฌานํ, จตุตฺถํ ฌาน’นฺติ วุจฺจติ. กตมํ นุ โข จตุตฺถํ ฌานนฺติ? ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, เอตทโหสิ – ‘อิธ ภิกฺขุ สุขสฺส จ ปหานา ทุกฺขสฺส จ ปหานา ปุพฺเพว โสมนสฺสโทมนสฺสานํ อตฺถงฺคมา อทุกฺขมสุขํ อุเปกฺขาสติปาริสุทฺธึ จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ วุจฺจติ จตุตฺถํ ฌาน’นฺติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, สุขสฺส จ ปหานา ทุกฺขสฺส จ ปหานา ปุพฺเพว โสมนสฺสโทมนสฺสานํ อตฺถงฺคมา อทุกฺขมสุขํ อุเปกฺขาสติปาริสุทฺธึ จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, อิมินา วิหาเรน วิหรโต สุขสหคตา สญฺญามนสิการา สมุทาจรนฺติ. ३३५. “‘चौथे ध्यान, चौथे ध्यान’ असे म्हटले जाते. चौथे ध्यान म्हणजे काय? मित्रांनो, माझ्या मनात असा विचार आला— ‘येथे भिक्खू सुखाचा त्याग केल्यामुळे आणि दुःखाचा त्याग केल्यामुळे, तसेच पूर्वीच सोमनस्य आणि डोमनस्य नष्ट झाल्यामुळे, जे दुःखही नाही आणि सुखही नाही, आणि जे उपेक्षेमुळे स्मृतीच्या शुद्धतेने युक्त आहे, अशा चौथ्या ध्यानात प्रवेश करून विहरतो. याला चौथे ध्यान असे म्हणतात.’ मित्रांनो, मी सुखाचा त्याग केल्यामुळे आणि दुःखाचा त्याग केल्यामुळे, तसेच पूर्वीच सोमनस्य आणि डोमनस्य नष्ट झाल्यामुळे, जे दुःखही नाही आणि सुखही नाही, आणि जे उपेक्षेमुळे स्मृतीच्या शुद्धतेने युक्त आहे, अशा चौथ्या ध्यानात प्रवेश करून विहरलो. मित्रांनो, या विहारात विहरत असताना माझ्या मनात सुखाशी संबंधित संज्ञा आणि मनसिकार वारंवार उद्भवू लागले.” ‘‘อถ โข มํ, อาวุโส, ภควา อิทฺธิยา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ – ‘โมคฺคลฺลาน, โมคฺคลฺลาน! มา, พฺราหฺมณ, จตุตฺถํ ฌานํ ปมาโท, จตุตฺเถ ฌาเน จิตฺตํ สณฺฐเปหิ, จตุตฺเถ ฌาเน จิตฺตํ เอโกทึ กโรหิ, จตุตฺเถ ฌาเน จิตฺตํ สมาทหา’ติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, อปเรน สมเยน สุขสฺส จ ปหานา ทุกฺขสฺส จ ปหานา ปุพฺเพว โสมนสฺสโทมนสฺสานํ อตฺถงฺคมา อทุกฺขมสุขํ อุเปกฺขาสติปาริสุทฺธึ จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหาสึ. ยญฺหิ ตํ, อาวุโส, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย…เป… มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’’ติ. จตุตฺถํ. “तेव्हा, मित्रांनो, भगवान आपल्या ऋद्धीने माझ्याकडे आले आणि मला म्हणाले— ‘मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मणा, चौथ्या ध्यानाबाबत प्रमाद करू नकोस. चौथ्या ध्यानात चित्त स्थिर कर, चौथ्या ध्यानात चित्त एकाग्र कर, चौथ्या ध्यानात चित्त समाहित कर.’ त्यानंतर, मित्रांनो, काही काळानंतर सुखाचा त्याग केल्यामुळे आणि दुःखाचा त्याग केल्यामुळे, तसेच पूर्वीच सोमनस्य आणि डोमनस्य नष्ट झाल्यामुळे, जे दुःखही नाही आणि सुखही नाही, आणि जे उपेक्षेमुळे स्मृतीच्या शुद्धतेने युक्त आहे, अशा चौथ्या ध्यानात प्रवेश करून मी विहरलो. मित्रांनो, जर कोणी योग्य रीतीने बोलताना असे म्हणू शकेल की... (पे)... ‘शास्त्यांच्या अनुग्रहाने शिष्याने महान अभिज्ञा प्राप्त केली आहे,’ तर माझ्याविषयीच योग्य रीतीने बोलताना असे म्हटले जाऊ शकते.” (चौथे) ๕. อากาสานญฺจายตนปญฺหาสุตฺตํ ५. आकासानञ्चायतनपञ्हसुत्त (आकासानंचायतनाविषयीच्या प्रश्नाचे सूत्र) ๓๓๖. ‘‘‘อากาสานญฺจายตนํ, อากาสานญฺจายตน’นฺติ วุจฺจติ. กตมํ นุ โข อากาสานญฺจายตนนฺติ? ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, เอตทโหสิ – ‘อิธ [Pg.460] ภิกฺขุ สพฺพโส รูปสญฺญานํ สมติกฺกมา ปฏิฆสญฺญานํ อตฺถงฺคมา นานตฺตสญฺญานํ อมนสิการา อนนฺโต อากาโสติ อากาสานญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ วุจฺจติ อากาสานญฺจายตน’นฺติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, สพฺพโส รูปสญฺญานํ สมติกฺกมา ปฏิฆสญฺญานํ อตฺถงฺคมา นานตฺตสญฺญานํ อมนสิการา อนนฺโต อากาโสติ อากาสานญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, อิมินา วิหาเรน วิหรโต รูปสหคตา สญฺญามนสิการา สมุทาจรนฺติ. ३३६. “‘आकासानंचायतन, आकासानंचायतन’ असे म्हटले जाते. आकासानंचायतन म्हणजे काय? मित्रांनो, माझ्या मनात असा विचार आला— ‘येथे भिक्खू सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांच्या पलीकडे गेल्यामुळे, प्रतिघसंज्ञांच्या अस्त होण्यामुळे, आणि नानात्वसंज्ञांकडे मनसिकार न केल्यामुळे, “आकाश अनंत आहे” असे जाणत आकासानंचायतनात प्रवेश करून विहरतो. याला आकासानंचायतन असे म्हणतात.’ मित्रांनो, मी सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांच्या पलीकडे गेल्यामुळे, प्रतिघसंज्ञांच्या अस्त होण्यामुळे, आणि नानात्वसंज्ञांकडे मनसिकार न केल्यामुळे, ‘आकाश अनंत आहे’ असे जाणत आकासानंचायतनात प्रवेश करून विहरलो. मित्रांनो, या विहारात विहरत असताना माझ्या मनात रूपाशी संबंधित संज्ञा आणि मनसिकार वारंवार उद्भवू लागले.” ‘‘อถ โข มํ, อาวุโส, ภควา อิทฺธิยา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ – ‘โมคฺคลฺลาน, โมคฺคลฺลาน! มา, พฺราหฺมณ, อากาสานญฺจายตนํ ปมาโท, อากาสานญฺจายตเน จิตฺตํ สณฺฐเปหิ, อากาสานญฺจายตเน จิตฺตํ เอโกทึ กโรหิ, อากาสานญฺจายตเน จิตฺตํ สมาทหา’ติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, อปเรน สมเยน สพฺพโส รูปสญฺญานํ สมติกฺกมา ปฏิฆสญฺญานํ อตฺถงฺคมา นานตฺตสญฺญานํ อมนสิการา อนนฺโต อากาโสติ อากาสานญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหาสึ. ยญฺหิ ตํ, อาวุโส, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย…เป… มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’’ติ. ปญฺจมํ. “तेव्हा, मित्रांनो, भगवान आपल्या ऋद्धीने माझ्याकडे आले आणि मला म्हणाले— ‘मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मणा, आकासानंचायतनाबाबत प्रमाद करू नकोस. आकासानंचायतनात चित्त स्थिर कर, आकासानंचायतनात चित्त एकाग्र कर, आकासानंचायतनात चित्त समाहित कर.’ त्यानंतर, मित्रांनो, काही काळानंतर मी सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांच्या पलीकडे गेल्यामुळे, प्रतिघसंज्ञांच्या अस्त होण्यामुळे, आणि नानात्वसंज्ञांकडे मनसिकार न केल्यामुळे, ‘आकाश अनंत आहे’ असे जाणत आकासानंचायतनात प्रवेश करून विहरलो. मित्रांनो, जर कोणी योग्य रीतीने बोलताना असे म्हणू शकेल की... (पे)... ‘शास्त्यांच्या अनुग्रहाने शिष्याने महान अभिज्ञा प्राप्त केली आहे,’ तर माझ्याविषयीच योग्य रीतीने बोलताना असे म्हटले जाऊ शकते.” (पाचवे) ๖. วิญฺญาณญฺจายตนปญฺหาสุตฺตํ ६. विञ्ञाणञ्चायतनपञ्हसुत्त (विज्ञाणंचायतनाविषयीच्या प्रश्नाचे सूत्र) ๓๓๗. ‘‘‘วิญฺญาณญฺจายตนํ, วิญฺญาณญฺจายตน’นฺติ วุจฺจติ. กตมํ นุ โข วิญฺญาณญฺจายตนนฺติ? ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, เอตทโหสิ – ‘อิธ ภิกฺขุ สพฺพโส อากาสานญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม อนนฺตํ วิญฺญาณนฺติ วิญฺญาณญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ วุจฺจติ วิญฺญาณญฺจายตน’นฺติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, สพฺพโส อากาสานญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม อนนฺตํ วิญฺญาณนฺติ วิญฺญาณญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, อิมินา วิหาเรน วิหรโต อากาสานญฺจายตนสหคตา สญฺญามนสิการา สมุทาจรนฺติ. ३३७. “‘विज्ञाणंचायतन, विज्ञाणंचायतन’ असे म्हटले जाते. विज्ञाणंचायतन म्हणजे काय? मित्रांनो, माझ्या मनात असा विचार आला— ‘येथे भिक्खू सर्व प्रकारे आकासानंचायतनाच्या पलीकडे जाऊन, “विज्ञान अनंत आहे” असे जाणत विज्ञाणंचायतनात प्रवेश करून विहरतो. याला विज्ञाणंचायतन असे म्हणतात.’ मित्रांनो, मी सर्व प्रकारे आकासानंचायतनाच्या पलीकडे जाऊन, ‘विज्ञान अनंत आहे’ असे जाणत विज्ञाणंचायतनात प्रवेश करून विहरलो. मित्रांनो, या विहारात विहरत असताना माझ्या मनात आकासानंचायतनाशी संबंधित संज्ञा आणि मनसिकार वारंवार उद्भवू लागले.” ‘‘อถ โข มํ, อาวุโส, ภควา อิทฺธิยา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ – ‘โมคฺคลฺลาน, โมคฺคลฺลาน! มา, พฺราหฺมณ, วิญฺญาณญฺจายตนํ ปมาโท, วิญฺญาณญฺจายตเน จิตฺตํ สณฺฐเปหิ, วิญฺญาณญฺจายตเน จิตฺตํ เอโกทึ กโรหิ, วิญฺญาณญฺจายตเน จิตฺตํ สมาทหา’ติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, อปเรน สมเยน สพฺพโส อากาสานญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม อนนฺตํ วิญฺญาณนฺติ [Pg.461] วิญฺญาณญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหาสึ. ยญฺหิ ตํ, อาวุโส, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย…เป… มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’’ติ. ฉฏฺฐํ. तेव्हा, आवुसो, भगवान आपल्या ऋद्धीने माझ्याकडे आले आणि मला म्हणाले – 'मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मणा, विज्ञाणंचायतनाबाबत प्रमाद करू नकोस. विज्ञाणंचायतनात चित्त स्थिर कर, विज्ञाणंचायतनात चित्त एकाग्र कर, विज्ञाणंचायतनात चित्त समाहित कर.' त्यानंतर, आवुसो, काही काळानंतर मी सर्व प्रकारे आकासानंचायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून, 'विज्ञान अनंत आहे' असे जाणत विज्ञाणंचायतनात प्रवेश करून विहरलो. आवुसो, ज्याच्याबद्दल योग्य प्रकारे बोलताना असे म्हटले जाऊ शकते की... पे... 'तो महान अभिज्ञेला प्राप्त झालेला श्रावक आहे', ते माझ्याच बाबतीत योग्य प्रकारे म्हटले जाऊ शकते." सहावे. ๗. อากิญฺจญฺญายตนปญฺหาสุตฺตํ ७. आकिंचञ्ञायतनपञ्हसुत्त ๓๓๘. ‘‘‘อากิญฺจญฺญายตนํ, อากิญฺจญฺญายตน’นฺติ วุจฺจติ. กตมํ นุ โข อากิญฺจญฺญายตนนฺติ? ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, เอตทโหสิ – ‘อิธ ภิกฺขุ สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม นตฺถิ กิญฺจีติ อากิญฺจญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ วุจฺจติ อากิญฺจญฺญายตน’นฺติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม นตฺถิ กิญฺจีติ อากิญฺจญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, อิมินา วิหาเรน วิหรโต วิญฺญาณญฺจายตนสหคตา สญฺญามนสิการา สมุทาจรนฺติ. ३३८. "'आकिंचञ्ञायतन, आकिंचञ्ञायतन' असे म्हटले जाते. हे आकिंचञ्ञायतन म्हणजे काय? आवुसो, एकांतात असताना माझ्या मनात असा विचार आला – 'येथे भिक्खू सर्व प्रकारे विज्ञाणंचायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून, 'काहीही नाही' असे जाणत आकिंचञ्ञायतनात प्रवेश करून विहरतो. याला आकिंचञ्ञायतन असे म्हणतात.' तेव्हा, आवुसो, मी सर्व प्रकारे विज्ञाणंचायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून, 'काहीही नाही' असे जाणत आकिंचञ्ञायतनात प्रवेश करून विहरत होतो. आवुसो, या विहारात विहरत असताना, मला विज्ञाणंचायतनाशी संबंधित संज्ञा आणि मनसिकार सतावत होते." ‘‘อถ โข มํ, อาวุโส, ภควา อิทฺธิยา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ – ‘โมคฺคลฺลาน, โมคฺคลฺลาน! มา, พฺราหฺมณ, อากิญฺจญฺญายตนํ ปมาโท, อากิญฺจญฺญายตเน จิตฺตํ สณฺฐเปหิ, อากิญฺจญฺญายตเน จิตฺตํ เอโกทึ กโรหิ, อากิญฺจญฺญายตเน จิตฺตํ สมาทหา’ติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, อปเรน สมเยน สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม นตฺถิ กิญฺจีติ อากิญฺจญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหาสึ. ยญฺหิ ตํ, อาวุโส, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย…เป… มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’’ติ. สตฺตมํ. तेव्हा, आवुसो, भगवान आपल्या ऋद्धीने माझ्याकडे आले आणि मला म्हणाले – 'मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मणा, आकिंचञ्ञायतनाबाबत प्रमाद करू नकोस. आकिंचञ्ञायतनात चित्त स्थिर कर, आकिंचञ्ञायतनात चित्त एकाग्र कर, आकिंचञ्ञायतनात चित्त समाहित कर.' त्यानंतर, आवुसो, काही काळानंतर मी सर्व प्रकारे विज्ञाणंचायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून, 'काहीही नाही' असे जाणत आकिंचञ्ञायतनात प्रवेश करून विहरलो. आवुसो, ज्याच्याबद्दल योग्य प्रकारे बोलताना असे म्हटले जाऊ शकते की... पे... 'तो महान अभिज्ञेला प्राप्त झालेला श्रावक आहे', ते माझ्याच बाबतीत योग्य प्रकारे म्हटले जाऊ शकते." सातवे. ๘. เนวสญฺญานาสญฺญายตนปญฺหาสุตฺตํ ८. नेवसञ्ञानासञ्ञायतनपञ्हsuत्त ๓๓๙. ‘‘‘เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ, เนวสญฺญานาสญฺญายตน’นฺติ วุจฺจติ. กตมํ นุ โข เนวสญฺญานาสญฺญายตนนฺติ? ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, เอตทโหสิ – ‘อิธ ภิกฺขุ สพฺพโส อากิญฺจญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ วุจฺจติ เนวสญฺญานาสญฺญายตน’นฺติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, สพฺพโส อากิญฺจญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, อิมินา วิหาเรน วิหรโต อากิญฺจญฺญายตนสหคตา สญฺญามนสิการา สมุทาจรนฺติ. ३३९. "'नेवसञ्ञानासञ्ञायतन, नेवसञ्ञानासञ्ञायतन' असे म्हटले जाते. हे नेवसञ्ञानासञ्ञायतन म्हणजे काय? आवुसो, एकांतात असताना माझ्या मनात असा विचार आला – 'येथे भिक्खू सर्व प्रकारे आकिंचञ्ञायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून नेवसञ्ञानासञ्ञायतनात प्रवेश करून विहरतो. याला नेवसञ्ञानासञ्ञायतन असे म्हणतात.' तेव्हा, आवुसो, मी सर्व प्रकारे आकिंचञ्ञायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून नेवसञ्ञानासञ्ञायतनात प्रवेश करून विहरत होतो. आवुसो, या विहारात विहरत असताना, मला आकिंचञ्ञायतनाशी संबंधित संज्ञा आणि मनसिकार सतावत होते." ‘‘อถ [Pg.462] โข มํ, อาวุโส, ภควา อิทฺธิยา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ – ‘โมคฺคลฺลาน, โมคฺคลฺลาน! มา, พฺราหฺมณ, เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ ปมาโท, เนวสญฺญานาสญฺญายตเน จิตฺตํ สณฺฐเปหิ, เนวสญฺญานาสญฺญายตเน จิตฺตํ เอโกทึ กโรหิ, เนวสญฺญานาสญฺญายตเน จิตฺตํ สมาทหา’ติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, อปเรน สมเยน สพฺพโส อากิญฺจญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหาสึ. ยญฺหิ ตํ, อาวุโส, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย…เป… มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’’ติ. อฏฺฐมํ. तेव्हा, आवुसो, भगवान आपल्या ऋद्धीने माझ्याकडे आले आणि मला म्हणाले – 'मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मणा, नेवसञ्ञानासञ्ञायतनाबाबत प्रमाद करू नकोस. नेवसञ्ञानासञ्ञायतनात चित्त स्थिर कर, नेवसञ्ञानासञ्ञायतनात चित्त एकाग्र कर, नेवसञ्ञानासञ्ञायतनात चित्त समाहित कर.' त्यानंतर, आवुसो, काही काळानंतर मी सर्व प्रकारे आकिंचञ्ञायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून नेवसञ्ञानासञ्ञायतनात प्रवेश करून विहरलो. आवुसो, ज्याच्याबद्दल योग्य प्रकारे बोलताना असे म्हटले जाऊ शकते की... पे... 'तो महान अभिज्ञेला प्राप्त झालेला श्रावक आहे', ते माझ्याच बाबतीत योग्य प्रकारे म्हटले जाऊ शकते." आठवे. ๙. อนิมิตฺตปญฺหาสุตฺตํ ९. अनिमित्तपञ्हसुत्त ๓๔๐. ‘‘‘อนิมิตฺโต เจโตสมาธิ, อนิมิตฺโต เจโตสมาธี’ติ วุจฺจติ. กตโม นุ โข อนิมิตฺโต เจโตสมาธีติ? ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, เอตทโหสิ – ‘อิธ ภิกฺขุ สพฺพนิมิตฺตานํ อมนสิการา อนิมิตฺตํ เจโตสมาธึ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ วุจฺจติ อนิมิตฺโต เจโตสมาธี’ติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, สพฺพนิมิตฺตานํ อมนสิการา อนิมิตฺตํ เจโตสมาธึ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, อิมินา วิหาเรน วิหรโต นิมิตฺตานุสาริ วิญฺญาณํ โหติ. ३४०. "'अनिमित्त चेतोसमाधी, अनिमित्त चेतोसमाधी' असे म्हटले जाते. ही अनिमित्त चेतोसमाधी म्हणजे काय? आवुसो, एकांतात असताना माझ्या मनात असा विचार आला – 'येथे भिक्खू सर्व निमित्तांना मनात न आणल्यामुळे अनिमित्त चेतोसमाधीत प्रवेश करून विहरतो. याला अनिमित्त चेतोसमाधी असे म्हणतात.' तेव्हा, आवुसो, मी सर्व निमित्तांना मनात न आणल्यामुळे अनिमित्त चेतोसमाधीत प्रवेश करून विहरत होतो. आवुसो, या विहारात विहरत असताना, माझे विज्ञान निमित्तांचे अनुसरण करणारे होत होते." ‘‘อถ โข มํ, อาวุโส, ภควา อิทฺธิยา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ – ‘โมคฺคลฺลาน, โมคฺคลฺลาน! มา, พฺราหฺมณ, อนิมิตฺตํ เจโตสมาธึ ปมาโท, อนิมิตฺเต เจโตสมาธิสฺมึ จิตฺตํ สณฺฐเปหิ, อนิมิตฺเต เจโตสมาธิสฺมึ จิตฺตํ เอโกทึ กโรหิ, อนิมิตฺเต เจโตสมาธิสฺมึ จิตฺตํ สมาทหา’ติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, อปเรน สมเยน สพฺพนิมิตฺตานํ อมนสิการา อนิมิตฺตํ เจโตสมาธึ อุปสมฺปชฺช วิหาสึ. ยญฺหิ ตํ, อาวุโส, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘สตฺถารานุคฺคหิโต สาวโก มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’ติ, มมํ ตํ สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘สตฺถารานุคฺคหิโต สาวโก มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’’’ติ. นวมํ. तेव्हा, आवुसो, भगवान आपल्या ऋद्धीने माझ्याकडे आले आणि मला म्हणाले – 'मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मणा, अनिमित्त चेतोसमाधीबाबत प्रमाद करू नकोस. अनिमित्त चेतोसमाधीत चित्त स्थिर कर, अनिमित्त चेतोसमाधीत चित्त एकाग्र कर, अनिमित्त चेतोसमाधीत चित्त समाहित कर.' त्यानंतर, आवुसो, काही काळानंतर मी सर्व निमित्तांना मनात न आणल्यामुळे अनिमित्त चेतोसमाधीत प्रवेश करून विहरलो. आवुसो, ज्याच्याबद्दल योग्य प्रकारे बोलताना असे म्हटले जाऊ शकते की – 'तो शास्त्यांच्या अनुग्रहाने महान अभिज्ञेला प्राप्त झालेला श्रावक आहे', ते माझ्याच बाबतीत योग्य प्रकारे बोलताना म्हटले जाईल की – 'तो शास्त्यांच्या अनुग्रहाने महान अभिज्ञेला प्राप्त झालेला श्रावक आहे'." नववे. ๑๐. สกฺกสุตฺตํ १०. सक्कसुत्त ๓๔๑. อถ โข อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน – เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย, ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย; เอวเมว – เชตวเน อนฺตรหิโต เทเวสุ ตาวตึเสสุ ปาตุรโหสิ[Pg.463]. อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท ปญฺจหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตํ โข สกฺกํ เทวานมินฺทํ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – ३४१. तेव्हा आयुष्यमान महामोग्गल्लान – जसे एखाद्या बलवान माणसाने आपला दुमडलेला हात पसरावा किंवा पसरलेला हात दुमडावा; त्याचप्रमाणे – जेतवनातून अंतर्धान पावून तावतिंस देवलोकात प्रकट झाले. तेव्हा देवांचा राजा सक्क पाचशे देवतांसह जेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान होते तेथे आला; जवळ येऊन त्याने आयुष्यमान महामोग्गल्लान यांना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभे राहिलेल्या देवांचा राजा सक्क याला आयुष्यमान महामोग्गल्लान म्हणाले – ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, พุทฺธสรณคมนํ โหติ. พุทฺธสรณคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. สาธุ โข, เทวานมินฺท, ธมฺมสรณคมนํ โหติ. ธมฺมสรณคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. สาธุ โข, เทวานมินฺท, สงฺฆสรณคมนํ โหติ. สงฺฆสรณคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺตี’’ติ. "हे देवांच्या राजा सक्क, बुद्ध सरण जाणे हे कल्याणकारीच आहे. हे देवांच्या राजा सक्क, बुद्ध सरण गेल्याच्या कारणामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. हे देवांच्या राजा सक्क, धम्म सरण जाणे हे कल्याणकारीच आहे. हे देवांच्या राजा सक्क, धम्म सरण गेल्याच्या कारणामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. हे देवांच्या राजा सक्क, संघ सरण जाणे हे कल्याणकारीच आहे. हे देवांच्या राजा सक्क, संघ सरण गेल्याच्या कारणामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात." ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, พุทฺธสรณคมนํ โหติ. พุทฺธสรณคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, ธมฺมสรณคมนํ โหติ. ธมฺมสรณคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, สงฺฆ…เป… สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺตี’’ติ. “हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, बुद्धाला शरण जाणे हे खरोखरच उत्तम आहे. बुद्धाला शरण गेल्याच्या कारणानेच, हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, धम्माला शरण जाणे हे खरोखरच उत्तम आहे. धम्माला शरण गेल्याच्या कारणानेच, हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, संघाला... पे... सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท ฉหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป… อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท สตฺตหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป… อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท อฏฺฐหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป… อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท อสีติยา เทวตาสหสฺเสหิ สทฺธึ เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตํ โข สกฺกํ เทวานมินฺทํ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – त्यानंतर देवांचा राजा शक्र सहाशे देवतांसह... पे... त्यानंतर देवांचा राजा शक्र सातशे देवतांसह... पे... त्यानंतर देवांचा राजा शक्र आठशे देवतांसह... पे... त्यानंतर देवांचा राजा शक्र ऐंशी हजार देवतांसह जेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान होते, तेथे गेला; तिथे जाऊन आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना अभिवादन करून एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभे राहिलेल्या देवांच्या राजा शक्राला आयुष्यमान महामोग्गल्लान असे म्हणाले – ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, พุทฺธสรณคมนํ โหติ. พุทฺธสรณคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. สาธุ โข, เทวานมินฺท, ธมฺมสรณคมนํ โหติ. ธมฺมสรณคมนเหตุ [Pg.464] โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. สาธุ โข, เทวานมินฺท, สงฺฆสรณคมนํ โหติ. สงฺฆสรณคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺตี’’ติ. “हे देवांच्या राजा शक्रा, बुद्धाला शरण जाणे हे खरोखरच उत्तम आहे. बुद्धाला शरण गेल्याच्या कारणानेच, हे देवांच्या राजा शक्रा, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. हे देवांच्या राजा शक्रा, धम्माला शरण जाणे हे खरोखरच उत्तम आहे. धम्माला शरण गेल्याच्या कारणानेच, हे देवांच्या राजा शक्रा, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. हे देवांच्या राजा शक्रा, संघाला शरण जाणे हे खरोखरच उत्तम आहे. संघाला शरण गेल्याच्या कारणानेच, हे देवांच्या राजा शक्रा, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, พุทฺธสรณคมนํ โหติ. พุทฺธสรณคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, ธมฺมสรณคมนํ โหติ…เป… สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, สงฺฆสรณคมนํ โหติ. สงฺฆสรณคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺตี’’ติ. “हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, बुद्धाला शरण जाणे हे खरोखरच उत्तम आहे. बुद्धाला शरण गेल्याच्या कारणानेच, हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, धम्माला शरण जाणे हे खरोखरच उत्तम आहे... पे... हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, संघाला शरण जाणे हे खरोखरच उत्तम आहे. संघाला शरण गेल्याच्या कारणानेच, हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท ปญฺจหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตํ โข สกฺกํ เทวานมินฺทํ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – त्यानंतर देवांचा राजा शक्र पाचशे देवतांसह जेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान होते, तेथे गेला; तिथे जाऊन आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना अभिवादन करून एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभे राहिलेल्या देवांच्या राजा शक्राला आयुष्यमान महामोग्गल्लान असे म्हणाले – ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘อิติปิ โส ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน สุคโต โลกวิทู อนุตฺตโร ปุริสทมฺมสารถิ สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. “हे देवांच्या राजा शक्रा, बुद्धावर अचल श्रद्धा असणे हे खरोखरच उत्तम आहे – ‘ते भगवान खरोखरच अर्हत, सम्यक्संबुद्ध, विद्याचरणसंपन्न, सुगत, लोकविदू, अनुत्तर पुरुषदम्यसारथी, देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध आणि भगवान आहेत.’ बुद्धावर अचल श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, हे देवांच्या राजा शक्रा, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม สนฺทิฏฺฐิโก อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. “हे देवांच्या राजा शक्रा, धम्मावर अचल श्रद्धा असणे हे खरोखरच उत्तम आहे – ‘धम्म भगवंतांद्वारे सुविख्यात आहे, तो प्रत्यक्ष पाहण्याजोगा, तात्काळ फळ देणारा, ‘ये आणि पाहा’ असे म्हणण्यास योग्य, स्वतःच्या अंतकरणात धारण करण्यास योग्य आणि सुज्ञांनी आपापल्या परीने अनुभवण्याजोगा आहे.’ धम्मावर अचल श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, हे देवांच्या राजा शक्रा, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, อุชุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ[Pg.465], ญายปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, สามีจิปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, ยทิทํ จตฺตาริ ปุริสยุคานิ อฏฺฐ ปุริสปุคฺคลา เอส ภควโต สาวกสงฺโฆ อาหุเนยฺโย ปาหุเนยฺโย ทกฺขิเณยฺโย อญฺชลิกรณีโย อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสา’ติ. สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. “हे देवांच्या राजा शक्रा, संघावर अचल श्रद्धा असणे हे खरोखरच उत्तम आहे – ‘भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ ऋजुप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ न्यायप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ सामीचीप्रतिपन्न आहे; म्हणजेच पुरुषांच्या चार जोड्या आणि आठ पुरुष-पुद्गल, हा भगवंतांचा श्रावकसंघ आहुनेय, पाहुनेय, दक्खिणेय, अंजलिकरणीय आणि जगाचे अनुत्तर पुण्यक्षेत्र आहे.’ संघावर अचल श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, हे देवांच्या राजा शक्रा, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนํ โหติ อขณฺเฑหิ อจฺฉิทฺเทหิ อสพเลหิ อกมฺมาเสหิ ภุชิสฺเสหิ วิญฺญุปฺปสตฺเถหิ อปรามฏฺเฐหิ สมาธิสํวตฺตนิเกหิ. อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺตี’’ติ. “हे देवांच्या राजा शक्रा, आर्यांना प्रिय असलेल्या शीलांनी संपन्न असणे हे खरोखरच उत्तम आहे, जे अखंड, अछिद्र, डाग नसलेले, मळरहित, स्वतंत्र, विद्वानांनी प्रशंसिलेले, चुकीच्या दृष्टीने न स्पर्श केलेले आणि समाधीला पोषक असणारे आहेत. आर्यांना प्रिय असलेल्या शीलांनी संपन्न असण्याच्या कारणानेच, हे देवांच्या राजा शक्रा, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘อิติปิ โส…เป… สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. “हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, बुद्धावर अचल श्रद्धा असणे हे खरोखरच उत्तम आहे – ‘ते भगवान खरोखरच... पे... देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध आणि भगवान आहेत.’ बुद्धावर अचल श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม…เป… ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. “हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, धम्मावर अचल श्रद्धा असणे हे खरोखरच उत्तम आहे – ‘धम्म भगवंतांद्वारे सुविख्यात आहे... पे... सुज्ञांनी आपापल्या परीने अनुभवण्याजोगा आहे.’ धम्मावर अचल श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ…เป… อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสา’ติ. สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. “हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, संघावर अचल श्रद्धा असणे हे खरोखरच उत्तम आहे – ‘भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे... पे... जगाचे अनुत्तर पुण्यक्षेत्र आहे.’ संघावर अचल श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนํ โหติ อขณฺเฑหิ…เป… สมาธิสํวตฺตนิเกหิ. อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺตี’’ติ. “हे मित्र मोग्गल्लान, अखंडित... समाधीला पोषक असणाऱ्या, आर्यांना प्रिय असणाऱ्या शीलांनी संपन्न असणे खरोखरच उत्तम आहे. हे मित्र मोग्गल्लान, आर्यांना प्रिय असणाऱ्या शीलांनी संपन्न असण्याच्या कारणामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” อถ [Pg.466] โข สกฺโก เทวานมินฺโท ฉหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป…. อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท สตฺตหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป…. อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท อฏฺฐหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป…. อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท อสีติยา เทวตาสหสฺเสหิ สทฺธึ เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตํ โข สกฺกํ เทวานมินฺทํ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – त्यानंतर देवांचा राजा शक्र सहाशे देवतांसह... सातशे देवतांसह... आठशे देवतांसह... ऐंशी हजार देवतांसह जेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान होते तेथे आला. तेथे येऊन त्याने आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभे राहिलेल्या देवांचा राजा शक्र याला आयुष्यमान महामोग्गल्लान असे म्हणाले – ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘อิติปิ โส ภควา…เป… สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. “हे देवाधिपती शक्र, बुद्धांवर अचल श्रद्धा असणे खरोखरच उत्तम आहे – 'ते भगवान असे आहेत... देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध, भगवान.' हे देवाधिपती शक्र, बुद्धांवरील अचल श्रद्धेमुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม…เป… ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. “हे देवाधिपती शक्र, धम्मावर अचल श्रद्धा असणे खरोखरच उत्तम आहे – 'भगवंतांनी धम्माचे सुंदर प्रकारे आख्यान केले आहे... विद्वानांनी आपापल्या ठिकाणी तो स्वतः जाणून घेण्याजोगा आहे.' हे देवाधिपती शक्र, धम्मावरील अचल श्रद्धेमुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ…เป… อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสา’ติ. สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. “हे देवाधिपती शक्र, संघावर अचल श्रद्धा असणे खरोखरच उत्तम आहे – 'भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे... जगासाठी सर्वश्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र आहे.' हे देवाधिपती शक्र, संघावरील अचल श्रद्धेमुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนํ โหติ อขณฺเฑหิ…เป… สมาธิสํวตฺตนิเกหิ. อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺตี’’ติ. “हे देवाधिपती शक्र, अखंडित... समाधीला पोषक असणाऱ्या, आर्यांना प्रिय असणाऱ्या शीलांनी संपन्न असणे खरोखरच उत्तम आहे. हे देवाधिपती शक्र, आर्यांना प्रिय असणाऱ्या शीलांनी संपन्न असण्याच्या कारणामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘อิติปิ โส ภควา…เป… สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. “हे मित्र मोग्गल्लान, बुद्धांवर अचल श्रद्धा असणे खरोखरच उत्तम आहे – 'ते भगवान असे आहेत... देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध, भगवान.' हे मित्र मोग्गल्लान, बुद्धांवरील अचल श्रद्धेमुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘สาธุ [Pg.467] โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม…เป… ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. “हे मित्र मोग्गल्लान, धम्मावर अचल श्रद्धा असणे खरोखरच उत्तम आहे – 'भगवंतांनी धम्माचे सुंदर प्रकारे आख्यान केले आहे... विद्वानांनी आपापल्या ठिकाणी तो स्वतः जाणून घेण्याजोगा आहे.' हे मित्र मोग्गल्लान, धम्मावरील अचल श्रद्धेमुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ…เป… อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสา’ติ. สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. “हे मित्र मोग्गल्लान, संघावर अचल श्रद्धा असणे खरोखरच उत्तम आहे – 'भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे... जगासाठी सर्वश्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र आहे.' हे मित्र मोग्गल्लान, संघावरील अचल श्रद्धेमुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนํ โหติ อขณฺเฑหิ…เป… สมาธิสํวตฺตนิเกหิ. อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺตี’’ติ. “हे मित्र मोग्गल्लान, अखंडित... समाधीला पोषक असणाऱ्या, आर्यांना प्रिय असणाऱ्या शीलांनी संपन्न असणे खरोखरच उत्तम आहे. हे मित्र मोग्गल्लान, आर्यांना प्रिय असणाऱ्या शीलांनी संपन्न असण्याच्या कारणामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท ปญฺจหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ …เป… เอกมนฺตํ ฐิตํ โข สกฺกํ เทวานมินฺทํ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – त्यानंतर देवांचा राजा शक्र पाचशे देवतांसह जेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान होते तेथे आला... एका बाजूला उभे राहिलेल्या देवांचा राजा शक्र याला आयुष्यमान महामोग्गल्लान असे म्हणाले – ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, พุทฺธสรณคมนํ โหติ. พุทฺธสรณคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา, ทิพฺเพน วณฺเณน, ทิพฺเพน สุเขน, ทิพฺเพน ยเสน, ทิพฺเพน อาธิปเตยฺเยน, ทิพฺเพหิ รูเปหิ, ทิพฺเพหิ สทฺเทหิ, ทิพฺเพหิ คนฺเธหิ, ทิพฺเพหิ รเสหิ, ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. “हे देवाधिपती शक्र, बुद्धांना शरण जाणे खरोखरच उत्तम आहे. बुद्धांना शरण जाण्याच्या कारणामुळेच, हे देवाधिपती शक्र, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य, दिव्य वर्ण, दिव्य सुख, दिव्य यश, दिव्य अधिपत्य, दिव्य रूप, दिव्य शब्द, दिव्य गंध, दिव्य रस आणि दिव्य स्पर्श.” ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, ธมฺมสรณคมนํ โหติ. ธมฺมสรณคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา, ทิพฺเพน วณฺเณน, ทิพฺเพน สุเขน, ทิพฺเพน ยเสน, ทิพฺเพน อาธิปเตยฺเยน, ทิพฺเพหิ รูเปหิ, ทิพฺเพหิ สทฺเทหิ, ทิพฺเพหิ คนฺเธหิ, ทิพฺเพหิ รเสหิ, ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. “हे देवाधिपती शक्र, धम्माला शरण जाणे खरोखरच उत्तम आहे. धम्माला शरण जाण्याच्या कारणामुळेच, हे देवाधिपती शक्र, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य, दिव्य वर्ण, दिव्य सुख, दिव्य यश, दिव्य अधिपत्य, दिव्य रूप, दिव्य शब्द, दिव्य गंध, दिव्य रस आणि दिव्य स्पर्श.” ‘‘สาธุ [Pg.468] โข, เทวานมินฺท, สงฺฆสรณคมนํ โหติ. สงฺฆสรณคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา, ทิพฺเพน วณฺเณน, ทิพฺเพน สุเขน, ทิพฺเพน ยเสน, ทิพฺเพน อาธิปเตยฺเยน, ทิพฺเพหิ รูเปหิ, ทิพฺเพหิ สทฺเทหิ, ทิพฺเพหิ คนฺเธหิ, ทิพฺเพหิ รเสหิ, ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหี’’ติ. “हे देवाधिपती शक्र, संघाला शरण जाणे खरोखरच उत्तम आहे. संघाला शरण जाण्याच्या कारणामुळेच, हे देवाधिपती शक्र, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य, दिव्य वर्ण, दिव्य सुख, दिव्य यश, दिव्य अधिपत्य, दिव्य रूप, दिव्य शब्द, दिव्य गंध, दिव्य रस आणि दिव्य स्पर्श.” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, พุทฺธสรณคมนํ โหติ. พุทฺธสรณคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. “हे मित्र मोग्गल्लान, बुद्धांना शरण जाणे खरोखरच उत्तम आहे. बुद्धांना शरण जाण्याच्या कारणामुळेच, हे मित्र मोग्गल्लान, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य... दिव्य स्पर्श.” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, ธมฺมสรณคมนํ โหติ…เป…. “हे मित्र मोग्गल्लान, धम्माला शरण जाणे खरोखरच चांगले आहे... पे...” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, สงฺฆสรณคมนํ โหติ. สงฺฆสรณคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา, ทิพฺเพน วณฺเณน, ทิพฺเพน สุเขน, ทิพฺเพน ยเสน, ทิพฺเพน อาธิปเตยฺเยน, ทิพฺเพหิ รูเปหิ, ทิพฺเพหิ สทฺเทหิ, ทิพฺเพหิ คนฺเธหิ, ทิพฺเพหิ รเสหิ, ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหี’’ติ. “हे मित्र मोग्गल्लान, संघाला शरण जाणे खरोखरच चांगले आहे. हे मित्र मोग्गल्लान, संघाला शरण गेल्याच्या कारणानेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला म्हणजेच स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा बाबींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य, दिव्य वर्ण, दिव्य सुख, दिव्य यश, दिव्य अधिपत्य, दिव्य रूप, दिव्य शब्द, दिव्य गंध, दिव्य रस आणि दिव्य स्पर्श.” อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท ฉหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป… อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท สตฺตหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป… อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท อฏฺฐหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป… อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท อสีติยา เทวตาสหสฺเสหิ สทฺธึ เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตํ โข สกฺกํ เทวานมินฺทํ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – त्यानंतर देवांचा राजा शक्र सहाशे देवतांसह... पे... सातशे देवतांसह... पे... आठशे देवतांसह... पे... ऐंशी हजार देवतांसह जेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान होते तेथे आला; आल्यानंतर आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना अभिवादन करून एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभ्या असलेल्या देवांचा राजा शक्राला आयुष्यमान महामोग्गल्लान म्हणाले – ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, พุทฺธสรณคมนํ โหติ. พุทฺธสรณคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. “देवाधिपती शक्रा, बुद्धाला शरण जाणे खरोखरच चांगले आहे. देवाधिपती शक्रा, बुद्धाला शरण गेल्याच्या कारणानेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला म्हणजेच स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा बाबींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य... पे... दिव्य स्पर्शाने.” ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, ธมฺมสรณคมนํ โหติ…เป…. “देवाधिपती शक्रा, धम्माला शरण जाणे खरोखरच चांगले आहे... पे...” ‘‘สาธุ [Pg.469] โข, เทวานมินฺท, สงฺฆสรณคมนํ โหติ. สงฺฆสรณคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา, ทิพฺเพน วณฺเณน, ทิพฺเพน สุเขน, ทิพฺเพน ยเสน, ทิพฺเพน อาธิปเตยฺเยน, ทิพฺเพหิ รูเปหิ, ทิพฺเพหิ สทฺเทหิ, ทิพฺเพหิ คนฺเธหิ, ทิพฺเพหิ รเสหิ, ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหี’’ติ. “देवाधिपती शक्रा, संघाला शरण जाणे खरोखरच चांगले आहे. देवाधिपती शक्रा, संघाला शरण गेल्याच्या कारणानेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला म्हणजेच स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा बाबींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य, दिव्य वर्ण, दिव्य सुख, दिव्य यश, दिव्य अधिपत्य, दिव्य रूप, दिव्य शब्द, दिव्य गंध, दिव्य रस आणि दिव्य स्पर्श.” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, พุทฺธสรณคมนํ โหติ…เป… สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, ธมฺมสรณคมนํ โหติ…เป… สาธุ โข มาริส โมคฺคลฺลาน, สงฺฆสรณคมนํ โหติ. สงฺฆสรณคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา, ทิพฺเพน วณฺเณน, ทิพฺเพน สุเขน, ทิพฺเพน ยเสน, ทิพฺเพน อาธิปเตยฺเยน, ทิพฺเพหิ รูเปหิ, ทิพฺเพหิ สทฺเทหิ, ทิพฺเพหิ คนฺเธหิ, ทิพฺเพหิ รเสหิ, ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหี’’ติ. “हे मित्र मोग्गल्लान, बुद्धाला शरण जाणे खरोखरच चांगले आहे... पे... हे मित्र मोग्गल्लान, धम्माला शरण जाणे खरोखरच चांगले आहे... पे... हे मित्र मोग्गल्लान, संघाला शरण जाणे खरोखरच चांगले आहे. हे मित्र मोग्गल्लान, संघाला शरण गेल्याच्या कारणानेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला म्हणजेच स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा बाबींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य, दिव्य वर्ण, दिव्य सुख, दिव्य यश, दिव्य अधिपत्य, दिव्य रूप, दिव्य शब्द, दिव्य गंध, दिव्य रस आणि दिव्य स्पर्श.” อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท ปญฺจหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตํ โข สกฺกํ เทวานมินฺทํ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – त्यानंतर देवांचा राजा शक्र पाचशे देवतांसह जेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान होते तेथे आला; आल्यानंतर आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना अभिवादन करून एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभ्या असलेल्या देवांचा राजा शक्राला आयुष्यमान महामोग्गल्लान म्हणाले – ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘อิติปิ โส ภควา…เป… สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. “देवाधिपती शक्रा, बुद्धावर अढळ श्रद्धा असणे खरोखरच चांगले आहे – ‘ते भगवान असे आहेत... पे... देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध, भगवान आहेत.’ देवाधिपती शक्रा, बुद्धावर अढळ श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला म्हणजेच स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा बाबींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य... पे... दिव्य स्पर्शाने.” ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม…เป… ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ…เป…. “देवाधिपती शक्रा, धम्मावर अढळ श्रद्धा असणे खरोखरच चांगले आहे – ‘भगवंतांनी धम्माचे सुंदर प्रकारे आख्यान केले आहे... पे... विद्वानांनी तो आपापल्या ठिकाणी अनुभवण्याजोगा आहे.’ देवाधिपती शक्रा, धम्मावर अढळ श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला म्हणजेच स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात... पे...” ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ…เป… โลกสฺสา’ติ. สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน [Pg.470] สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ…เป…. “देवाधिपती शक्रा, संघावर अढळ श्रद्धा असणे खरोखरच चांगले आहे – ‘भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे... पे... जगाचे अनुत्तर पुण्यक्षेत्र आहे.’ देवाधिपती शक्रा, संघावर अढळ श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला म्हणजेच स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात... पे...” ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนํ โหติ อขณฺเฑหิ…เป… สมาธิสํวตฺตนิเกหิ. อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหี’’ติ. “देवाधिपती शक्रा, अखंडित... पे... समाधीला पोषक असणाऱ्या, आर्यजनांना प्रिय असलेल्या शीलांनी संपन्न असणे खरोखरच चांगले आहे. देवाधिपती शक्रा, आर्यजनांना प्रिय असलेल्या शीलांनी संपन्न असण्याच्या कारणानेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला म्हणजेच स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा बाबींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य... पे... दिव्य स्पर्शाने.” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘อิติปิ โส ภควา…เป… สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. “हे मित्र मोग्गल्लान, बुद्धावर अढळ श्रद्धा असणे खरोखरच चांगले आहे – ‘ते भगवान असे आहेत... पे... देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध, भगवान आहेत.’ हे मित्र मोग्गल्लान, बुद्धावर अढळ श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला म्हणजेच स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा बाबींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य... पे... दिव्य स्पर्शाने.” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม…เป… ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. “हे मित्र मोग्गल्लान, धम्मावर अढळ श्रद्धा असणे खरोखरच चांगले आहे – ‘भगवंतांनी धम्माचे सुंदर प्रकारे आख्यान केले आहे... पे... विद्वानांनी तो आपापल्या ठिकाणी अनुभवण्याजोगा आहे.’ हे मित्र मोग्गल्लान, धम्मावर अढळ श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला म्हणजेच स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा बाबींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य... पे... दिव्य स्पर्शाने.” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ…เป… โลกสฺสา’ติ. สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ…เป…. “हे प्रिय मोग्गल्लान, संघामध्ये अढळ श्रद्धेने युक्त असणे हे खरोखर कल्याणकारी आहे – ‘भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे... जगासाठी सर्वश्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र आहे.’ हे प्रिय मोग्गल्लान, संघामध्ये अशा अढळ श्रद्धेने युक्त असल्यामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात...” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนํ โหติ อขณฺเฑหิ…เป… สมาธิสํวตฺตนิเกหิ. อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหี’’ติ. “हे प्रिय मोग्गल्लान, आर्यांना प्रिय असलेल्या, अखंडित... समाधीला पोषक असणाऱ्या शीलांनी युक्त असणे हे खरोखर कल्याणकारी आहे. हे प्रिय मोग्गल्लान, आर्यांना प्रिय असलेल्या शीलांनी युक्त असल्यामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींनी वरचढ ठरतात – दिव्य आयुष्याने... दिव्य स्पर्शांनी.” อถ [Pg.471] โข สกฺโก เทวานมินฺโท ฉหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป… อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท สตฺตหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป… อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท อฏฺฐหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป… อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท อสีติยา เทวตาสหสฺเสหิ สทฺธึ เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตํ โข สกฺกํ เทวานมินฺทํ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – त्यानंतर देवांचा राजा शक्र सहाशे देवतांसह... त्यानंतर देवांचा राजा शक्र सातशे देवतांसह... त्यानंतर देवांचा राजा शक्र आठशे देवतांसह... त्यानंतर देवांचा राजा शक्र ऐंशी हजार देवतांसह जेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान होते, तेथे आला. जवळ येऊन त्याने आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभे राहिलेल्या देवांचा राजा शक्र याला आयुष्यमान महामोग्गल्लान यांनी असे म्हटले – ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘อิติปิ โส ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน สุคโต โลกวิทู อนุตฺตโร ปุริสทมฺมสารถิ สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา, ทิพฺเพน วณฺเณน, ทิพฺเพน สุเขน, ทิพฺเพน ยเสน, ทิพฺเพน อาธิปเตยฺเยน, ทิพฺเพหิ รูเปหิ, ทิพฺเพหิ สทฺเทหิ, ทิพฺเพหิ คนฺเธหิ, ทิพฺเพหิ รเสหิ, ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. “देवांचा राजा शक्र, बुद्धामध्ये अढळ श्रद्धेने युक्त असणे हे खरोखर कल्याणकारी आहे – ‘ते भगवंत अर्हत, सम्यक्संबुद्ध, विद्याचरणसंपन्न, सुगत, लोकविदू, अनुत्तर पुरुषदम्यसारथी, देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध आणि भगवंत आहेत.’ देवांचा राजा शक्र, बुद्धामध्ये अशा अढळ श्रद्धेने युक्त असल्यामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींनी वरचढ ठरतात – दिव्य आयुष्याने, दिव्य वर्णाने, दिव्य सुखाने, दिव्य यशाने, दिव्य आधिपत्याने, दिव्य रूपांनी, दिव्य शब्दांनी, दिव्य गंधांनी, दिव्य रसांनी आणि दिव्य स्पर्शांनी.” ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม สนฺทิฏฺฐิโก อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. “देवांचा राजा शक्र, धम्मामध्ये अढळ श्रद्धेने युक्त असणे हे खरोखर कल्याणकारी आहे – ‘भगवंतांनी धम्माचे सुस्पष्ट व्याख्यान केले आहे, तो संदृष्टिक, अकालिक, एहिपस्सिक, ओपनेय्यिक आणि विद्वानांनी आपापल्या परीने स्वतः अनुभवण्याजोगा आहे.’ देवांचा राजा शक्र, धम्मामध्ये अशा अढळ श्रद्धेने युक्त असल्यामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींनी वरचढ ठरतात – दिव्य आयुष्याने... दिव्य स्पर्शांनी.” ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, อุชุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, ญายปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, สามีจิปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, ยทิทํ จตฺตาริ ปุริสยุคานิ อฏฺฐ ปุริสปุคฺคลา เอส ภควโต สาวกสงฺโฆ อาหุเนยฺโย ปาหุเนยฺโย ทกฺขิเณยฺโย อญฺชลิกรณีโย อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสา’ติ. สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต [Pg.472] อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. “देवांचा राजा शक्र, संघामध्ये अढळ श्रद्धेने युक्त असणे हे खरोखर कल्याणकारी आहे – ‘भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ ऋजुप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ न्यायप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ सामीचीप्रतिपन्न आहे. म्हणजेच, पुरुषांच्या चार जोड्या आणि आठ पुरुष-पुद्गल, हाच भगवंतांचा श्रावकसंघ आहुनेय्य, पाहुनेय्य, दक्खिणेय्य, अंजलिकरणीय आणि जगासाठी सर्वश्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र आहे.’ देवांचा राजा शक्र, संघामध्ये अशा अढळ श्रद्धेने युक्त असल्यामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींनी वरचढ ठरतात – दिव्य आयुष्याने... दिव्य स्पर्शांनी.” ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนํ โหติ อขณฺเฑหิ อจฺฉิทฺเทหิ อสพเลหิ อกมฺมาเสหิ ภุชิสฺเสหิ วิญฺญุปฺปสตฺเถหิ อปรามฏฺเฐหิ สมาธิสํวตฺตนิเกหิ. อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา, ทิพฺเพน วณฺเณน, ทิพฺเพน สุเขน, ทิพฺเพน ยเสน, ทิพฺเพน อาธิปเตยฺเยน, ทิพฺเพหิ รูเปหิ, ทิพฺเพหิ สทฺเทหิ, ทิพฺเพหิ คนฺเธหิ, ทิพฺเพหิ รเสหิ, ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหี’’ติ. “देवांचा राजा शक्र, आर्यांना प्रिय असलेल्या, अखंडित, अछिद्र, कलंक नसलेल्या, डाग नसलेल्या, बंधनांतून मुक्त करणाऱ्या, विद्वानांनी प्रशंसिलेल्या, चुकीच्या दृष्टीने न स्पर्श केलेल्या आणि समाधीला पोषक असणाऱ्या शीलांनी युक्त असणे हे खरोखर कल्याणकारी आहे. देवांचा राजा शक्र, आर्यांना प्रिय असलेल्या शीलांनी युक्त असल्यामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींनी वरचढ ठरतात – दिव्य आयुष्याने, दिव्य वर्णाने, दिव्य सुखाने, दिव्य यशाने, दिव्य आधिपत्याने, दिव्य रूपांनी, दिव्य शब्दांनी, दिव्य गंधांनी, दिव्य रसांनी आणि दिव्य स्पर्शांनी.” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘อิติปิ โส ภควา…เป… สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. “हे प्रिय मोग्गल्लान, बुद्धामध्ये अढळ श्रद्धेने युक्त असणे हे खरोखर कल्याणकारी आहे – ‘ते भगवंत... देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध आणि भगवंत आहेत.’ हे प्रिय मोग्गल्लान, बुद्धामध्ये अशा अढळ श्रद्धेने युक्त असल्यामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींनी वरचढ ठरतात – दिव्य आयुष्याने... दिव्य स्पर्शांनी.” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม…เป… ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. “हे प्रिय मोग्गल्लान, धम्मामध्ये अढळ श्रद्धेने युक्त असणे हे खरोखर कल्याणकारी आहे – ‘भगवंतांनी धम्माचे सुस्पष्ट व्याख्यान केले आहे... आणि विद्वानांनी आपापल्या परीने स्वतः अनुभवण्याजोगा आहे.’ हे प्रिय मोग्गल्लान, धम्मामध्ये अशा अढळ श्रद्धेने युक्त असल्यामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींनी वरचढ ठरतात – दिव्य आयुष्याने... दिव्य स्पर्शांनी.” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ…เป… อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสา’ติ. สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. “हे प्रिय मोग्गल्लान, संघामध्ये अढळ श्रद्धेने युक्त असणे हे खरोखर कल्याणकारी आहे – ‘भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे... जगासाठी सर्वश्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र आहे.’ हे प्रिय मोग्गल्लान, संघामध्ये अशा अढळ श्रद्धेने युक्त असल्यामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींनी वरचढ ठरतात – दिव्य आयुष्याने... दिव्य स्पर्शांनी.” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนํ โหติ อขณฺเฑหิ…เป… สมาธิสํวตฺตนิเกหิ. อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนเหตุ [Pg.473] โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา, ทิพฺเพน วณฺเณน, ทิพฺเพน สุเขน, ทิพฺเพน ยเสน, ทิพฺเพน อาธิปเตยฺเยน, ทิพฺเพหิ รูเปหิ, ทิพฺเพหิ สทฺเทหิ, ทิพฺเพหิ คนฺเธหิ, ทิพฺเพหิ รเสหิ, ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหี’’ติ. ทสมํ. “हे प्रिय मोग्गल्लान, अखंडित... आणि समाधीला पूरक असणाऱ्या, आर्यांना प्रिय असणाऱ्या शीलांनी संपन्न असणे खरोखरच उत्तम आहे. हे प्रिय मोग्गल्लान, आर्यांना प्रिय असणाऱ्या शीलांनी संपन्न असण्याच्या कारणामुळेच, या जगात काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा बाबींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात - दिव्य आयुष्य, दिव्य वर्ण, दिव्य सुख, दिव्य यश, दिव्य आधिपत्य, दिव्य रूप, दिव्य शब्द, दिव्य गंध, दिव्य रस आणि दिव्य स्पर्श.” दहावे. ๑๑. จนฺทนสุตฺตํ ११. चंदनसुत्त ๓๔๒. อถ โข จนฺทโน เทวปุตฺโต…เป…. ३४२. त्यानंतर चंदन देवपुत्र... (पेय्याल)... อถ โข สุยาโม เทวปุตฺโต…เป…. त्यानंतर सुयाम देवपुत्र... (पेय्याल)... อถ โข สนฺตุสิโต เทวปุตฺโต…เป…. त्यानंतर संतुसित देवपुत्र... (पेय्याल)... อถ โข สุนิมฺมิโต เทวปุตฺโต…เป…. त्यानंतर सुनिम्मित देवपुत्र... (पेय्याल)... อถ โข วสวตฺติ เทวปุตฺโต…เป…. त्यानंतर वसवत्ती देवपुत्र... (पेय्याल)... (ยถา สกฺกสุตฺตํ ตถา อิเม ปญฺจ เปยฺยาลา วิตฺถาเรตพฺพา). เอกาทสมํ. (ज्याप्रमाणे सक्कसुत्त सविस्तर सांगितले आहे, त्याचप्रमाणे हे पाच पेय्याल सविस्तर जाणावेत). अकरावे. โมคฺคลฺลานสํยุตฺตํ สมตฺตํ. मोग्गल्लानसंयुत्त समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – สวิตกฺกาวิตกฺกญฺจ, สุเขน จ อุเปกฺขโก; อากาสญฺเจว วิญฺญาณํ, อากิญฺจํ เนวสญฺญินา; อนิมิตฺโต จ สกฺโก จ, จนฺทเนกาทเสน จาติ. सवितक्क-अवितक्क, सुख, उपेक्षक, आकास, विञ्ञाण, आकिञ्चञ्ञ, नेवसञ्ञीनासञ्ञी, अनिमित्त, सक्क आणि अकरावे चंदन. ๗. จิตฺตสํยุตฺตํ ७. चित्तसंयुत्त ๑. สํโยชนสุตฺตํ १. संयोजनसुत्त ๓๔๓. เอกํ [Pg.474] สมยํ สมฺพหุลา เถรา ภิกฺขู มจฺฉิกาสณฺเฑ วิหรนฺติ อมฺพาฏกวเน. เตน โข ปน สมเยน สมฺพหุลานํ เถรานํ ภิกฺขูนํ ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺตานํ มณฺฑลมาเฬ สนฺนิสินฺนานํ สนฺนิปติตานํ อยมนฺตรากถา อุทปาทิ – ‘‘‘สํโยชน’นฺติ วา, อาวุโส, ‘สํโยชนิยา ธมฺมา’ติ วา อิเม ธมฺมา นานตฺถา นานาพฺยญฺชนา อุทาหุ เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นาน’’นฺติ? ตตฺเรกจฺเจหิ เถเรหิ ภิกฺขูหิ เอวํ พฺยากตํ โหติ – ‘‘‘สํโยชน’นฺติ วา, อาวุโส, ‘สํโยชนิยา ธมฺมา’ติ วา อิเม ธมฺมา นานตฺถา เจว นานาพฺยญฺชนา จา’’ติ. เอกจฺเจหิ เถเรหิ ภิกฺขูหิ เอวํ พฺยากตํ โหติ – ‘‘‘สํโยชน’นฺติ วา, อาวุโส, ‘สํโยชนิยา ธมฺมา’ติ วา อิเม ธมฺมา เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นาน’’นฺติ. ३४३. एकदा अनेक थेर भिक्खू मच्छिकाखंड येथील आंबाटकवनात विहार करत होते. त्या वेळी, भोजनानंतर भिक्षाटनाहून परतलेले अनेक थेर भिक्खू मंडपशाळेत एकत्र बसले असताना त्यांच्यात असा संवाद सुरू झाला – “मित्रांनो, ‘संयोजन’ आणि ‘संयोजनीय धर्म’ हे अर्थानेही भिन्न आणि शब्दानेही भिन्न आहेत, की ते अर्थाने एकच असून केवळ शब्दाने भिन्न आहेत?” तेव्हा काही थेर भिक्खूंनी असे उत्तर दिले – “मित्रांनो, ‘संयोजन’ आणि ‘संयोजनीय धर्म’ हे अर्थानेही भिन्न आहेत आणि शब्दानेही भिन्न आहेत.” तर काही थेर भिक्खूंनी असे उत्तर दिले – “मित्रांनो, ‘संयोजन’ आणि ‘संयोजनीय धर्म’ हे अर्थाने एकच आहेत, केवळ शब्दाने भिन्न आहेत.” เตน โข ปน สมเยน จิตฺโต คหปติ มิคปถกํ อนุปฺปตฺโต โหติ เกนจิเทว กรณีเยน. อสฺโสสิ โข จิตฺโต คหปติ สมฺพหุลานํ กิร เถรานํ ภิกฺขูนํ ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺตานํ มณฺฑลมาเฬ สนฺนิสินฺนานํ สนฺนิปติตานํ อยมนฺตรากถา อุทปาทิ – ‘‘‘สํโยชน’นฺติ วา, อาวุโส, ‘สํโยชนิยา ธมฺมา’ติ วา อิเม ธมฺมา นานตฺถา นานาพฺยญฺชนา อุทาหุ เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นาน’’นฺติ? ตตฺเรกจฺเจหิ เถเรหิ ภิกฺขูหิ เอวํ พฺยากตํ – ‘‘‘สํโยชน’นฺติ วา, อาวุโส, ‘สํโยชนิยา ธมฺมา’ติ วา อิเม ธมฺมา นานตฺถา เจว นานาพฺยญฺชนา จา’’ติ. เอกจฺเจหิ เถเรหิ ภิกฺขูหิ เอวํ พฺยากตํ ‘สํโยชน’นฺติ วา, อาวุโส ‘สํโยชนิยา ธมฺมา’ติ วา อิเม ธมฺมา เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นานนฺติ. อถ โข จิตฺโต คหปติ เยน เถรา ภิกฺขู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เถเร ภิกฺขู อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จิตฺโต คหปติ เถเร ภิกฺขู เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต, สมฺพหุลานํ กิร เถรานํ ภิกฺขูนํ ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺตานํ มณฺฑลมาเฬ สนฺนิสินฺนานํ สนฺนิปติตานํ อยมนฺตรากถา อุทปาทิ – ‘สํโยชน’นฺติ วา, อาวุโส, ‘สํโยชนิยา ธมฺมา’ติ วา อิเม ธมฺมา นานตฺถา นานาพฺยญฺชนา อุทาหุ เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นาน’’นฺติ? เอกจฺเจหิ เถเรหิ ภิกฺขูหิ [Pg.475] เอวํ พฺยากตํ – ‘‘‘สํโยชน’นฺติ วา, อาวุโส, ‘สํโยชนิยา ธมฺมา’ติ วา อิเม ธมฺมา นานตฺถา เจว นานาพฺยญฺชนา จา’’ติ. เอกจฺเจหิ เถเรหิ ภิกฺขูหิ เอวํ พฺยากตํ ‘‘‘สํโยชน’นฺติ วา, อาวุโส, ‘สํโยชนิยา ธมฺมา’ติ วา อิเม ธมฺมา เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นาน’’นฺติ. ‘‘เอวํ, คหปตี’’ติ. त्या वेळी चित्त गृहपती काही कामासाठी मिगपथक येथे आले होते. चित्त गृहपतींनी ऐकले की, भोजनानंतर भिक्षाटनाहून परतलेले अनेक थेर भिक्खू मंडपशाळेत एकत्र बसले असताना त्यांच्यात असा संवाद सुरू झाला आहे – “मित्रांनो, ‘संयोजन’ आणि ‘संयोजनीय धर्म’ हे अर्थानेही भिन्न आणि शब्दानेही भिन्न आहेत, की ते अर्थाने एकच असून केवळ शब्दाने भिन्न आहेत?” आणि काही थेर भिक्खूंनी उत्तर दिले आहे – “मित्रांनो, ‘संयोजन’ आणि ‘संयोजनीय धर्म’ हे अर्थानेही भिन्न आहेत आणि शब्दानेही भिन्न आहेत.” तर काही थेर भिक्खूंनी उत्तर दिले आहे – “मित्रांनो, ‘संयोजन’ आणि ‘संयोजनीय धर्म’ हे अर्थाने एकच आहेत, केवळ शब्दाने भिन्न आहेत.” त्यानंतर चित्त गृहपती जेथे थेर भिक्खू होते तेथे गेले. तेथे जाऊन त्यांनी थेर भिक्खूंना अभिवादन केले आणि एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतींनी थेर भिक्खूंना विचारले – “भंते, मी असे ऐकले आहे की, भोजनानंतर भिक्षाटनाहून परतलेले अनेक थेर भिक्खू मंडपशाळेत एकत्र बसले असताना त्यांच्यात असा संवाद सुरू झाला – ‘मित्रांनो, संयोजन आणि संयोजनीय धर्म हे अर्थानेही भिन्न आणि शब्दानेही भिन्न आहेत, की ते अर्थाने एकच असून केवळ शब्दाने भिन्न आहेत?’ त्यावर काही थेर भिक्खूंनी उत्तर दिले – ‘मित्रांनो, संयोजन आणि संयोजनीय धर्म हे अर्थानेही भिन्न आहेत आणि शब्दानेही भिन्न आहेत.’ तर काही थेर भिक्खूंनी उत्तर दिले – ‘मित्रांनो, संयोजन आणि संयोजनीय धर्म हे अर्थाने एकच आहेत, केवळ शब्दाने भिन्न आहेत.’ हे खरे आहे का?” “होय, गृहपती, हे खरे आहे.” ‘‘‘สํโยชน’นฺติ วา, ภนฺเต, ‘สํโยชนิยา ธมฺมา’ติ วา อิเม ธมฺมา นานตฺถา เจว นานาพฺยญฺชนา จ. เตน หิ, ภนฺเต, อุปมํ โว กริสฺสามิ. อุปมายปิเธกจฺเจ วิญฺญู ปุริสา ภาสิตสฺส อตฺถํ อาชานนฺติ. เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, กาโฬ จ พลีพทฺโท โอทาโต จ พลีพทฺโท เอเกน ทาเมน วา โยตฺเตน วา สํยุตฺตา อสฺสุ. โย นุ โข เอวํ วเทยฺย – ‘กาโฬ พลีพทฺโท โอทาตสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชนํ, โอทาโต พลีพทฺโท กาฬสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชน’นฺติ, สมฺมา นุ โข โส วทมาโน วเทยฺยา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, คหปติ! น โข, คหปติ, กาโฬ พลีพทฺโท โอทาตสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชนํ, นปิ โอทาโต พลีพทฺโท กาฬสฺส พฬีพทฺทสฺส สํโยชนํ; เยน โข เต เอเกน ทาเมน วา โยตฺเตน วา สํยุตฺตา ตํ ตตฺถ สํโยชน’’นฺติ. ‘‘เอวเมว โข, ภนฺเต, น จกฺขุ รูปานํ สํโยชนํ, น รูปา จกฺขุสฺส สํโยชนํ; ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. น โสตํ สทฺทานํ… น ฆานํ คนฺธานํ… น ชิวฺหา รสานํ… น กาโย โผฏฺฐพฺพานํ สํโยชนํ, น โผฏฺฐพฺพา กายสฺส สํโยชนํ; ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. น มโน ธมฺมานํ สํโยชนํ, น ธมฺมา มนสฺส สํโยชนํ; ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ สํโยชน’’นฺติ. ‘‘ลาภา เต, คหปติ, สุลทฺธํ เต, คหปติ, ยสฺส เต คมฺภีเร พุทฺธวจเน ปญฺญาจกฺขุ กมตี’’ติ. ปฐมํ. “भंते, ‘संयोजन’ आणि ‘संयोजनीय धर्म’ हे अर्थानेही भिन्न आहेत आणि शब्दानेही भिन्न आहेत. म्हणूनच, भंते, मी आपल्याला एक उपमा देतो. कारण या जगात काही बुद्धिमान लोक उपमेच्या द्वारेही बोलण्याचा अर्थ समजून घेतात. भंते, समजा एक काळा बैल आणि एक पांढरा बैल एकाच दोरीने किंवा जोताने एकत्र बांधलेले आहेत. जर कोणी असे म्हटले की – ‘काळा बैल हा पांढऱ्या बैलाचे बंधन आहे, आणि पांढरा बैल हा काळ्या बैलाचे बंधन आहे’, तर त्याचे हे बोलणे योग्य ठरेल का?” “नाही, गृहपती! गृहपती, काळा बैल हा पांढऱ्या बैलाचे बंधन नाही, आणि पांढरा बैलही काळ्या बैलाचे बंधन नाही; तर ज्या एका दोरीने किंवा जोताने ते दोघे एकत्र बांधलेले आहेत, तेच तेथील बंधन (संयोजन) आहे.” “तसेच, भंते, डोळे हे रूपांचे बंधन नाही आणि रूपे ही डोळ्यांचे बंधन नाही; तर त्या दोन्हीच्या आधारे जो इच्छा-राग (छंदराग) उत्पन्न होतो, तेच तेथील बंधन आहे. कान हे शब्दांचे बंधन नाही... नाक हे गंधाचे बंधन नाही... जीभ ही रसांचे बंधन नाही... शरीर हे स्पर्शांचे बंधन नाही आणि स्पर्श हे शरीराचे बंधन नाही; तर त्या दोन्हीच्या आधारे जो इच्छा-राग उत्पन्न होतो, तेच तेथील बंधन आहे. मन हे धर्मांचे बंधन नाही आणि धर्म हे मनाचे बंधन नाही; तर त्या दोन्हीच्या आधारे जो इच्छा-राग उत्पन्न होतो, तेच तेथील बंधन आहे.” “गृहपती, हा तुझा लाभ आहे! गृहपती, तुला हे उत्तम लाभले आहे, की तुझी प्रज्ञाचक्षू बुद्धांच्या या गंभीर वचनात प्रवेश करते!” पहिले. ๒. ปฐมอิสิทตฺตสุตฺตํ २. प्रथम इसिदत्तसुत्त ๓๔๔. เอกํ สมยํ สมฺพหุลา เถรา ภิกฺขู มจฺฉิกาสณฺเฑ วิหรนฺติ อมฺพาฏกวเน. อถ โข จิตฺโต คหปติ เยน เถรา ภิกฺขู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เถเร ภิกฺขู อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จิตฺโต คหปติ เถเร ภิกฺขู เอตทโวจ – ‘‘อธิวาเสนฺตุ เม, ภนฺเต, เถรา สฺวาตนาย ภตฺต’’นฺติ. อธิวาเสสุํ โข เถรา ภิกฺขู ตุณฺหีภาเวน[Pg.476]. อถ โข จิตฺโต คหปติ เถรานํ ภิกฺขูนํ อธิวาสนํ วิทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา เถเร ภิกฺขู อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. อถ โข เถรา ภิกฺขู ตสฺสา รตฺติยา อจฺจเยน ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย เยน จิตฺตสฺส คหปติสฺส นิเวสนํ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทึสุ. ३४४. एकदा अनेक ज्येष्ठ थेर भिक्खू मच्छिकाषंड येथील आंबाटक वनात विहार करत होते. तेव्हा चित्त गृहपती जेथे थेर भिक्खू होते तेथे गेला; तिथे जाऊन त्याने थेर भिक्खूंना अभिवादन केले आणि एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीने थेर भिक्खूंना असे म्हटले— 'भन्ते, थेर भिक्खूंनी उद्यासाठी माझे भोजन स्वीकारावे.' थेर भिक्खूंनी मौन राहून ते स्वीकारले. त्यानंतर चित्त गृहपतीने थेर भिक्खूंची संमती जाणून घेऊन, आपल्या आसनावरून उठून, थेर भिक्खूंना अभिवादन केले आणि प्रदक्षिणा करून तो निघून गेला. त्यानंतर ती रात्र संपल्यावर, सकाळी थेर भिक्खूंनी चिवर परिधान करून, पात्र व चिवर घेऊन जेथे चित्त गृहपतीचे घर होते तेथे गेले; तिथे जाऊन ते मांडलेल्या आसनांवर बसले. อถ โข จิตฺโต คหปติ เยน เถรา ภิกฺขู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เถเร ภิกฺขู อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมนฺตํ เถรํ เอตทโวจ – ‘‘‘ธาตุนานตฺตํ, ธาตุนานตฺต’นฺติ, ภนฺเต เถร, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, ธาตุนานตฺตํ วุตฺตํ ภควตา’’ติ? เอวํ วุตฺเต อายสฺมา เถโร ตุณฺหี อโหสิ. ทุติยมฺปิ โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมนฺตํ เถรํ เอตทโวจ – ‘‘‘ธาตุนานตฺตํ, ธาตุนานตฺต’นฺติ, ภนฺเต เถร, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, ธาตุนานตฺตํ วุตฺตํ ภควตา’’ติ? ทุติยมฺปิ โข อายสฺมา เถโร ตุณฺหี อโหสิ. ตติยมฺปิ โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมนฺตํ เถรํ เอตทโวจ – ‘‘‘ธาตุนานตฺตํ, ธาตุนานตฺต’นฺติ, ภนฺเต เถร, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, ธาตุนานตฺตํ วุตฺตํ ภควตา’’ติ? ตติยมฺปิ โข อายสฺมา เถโร ตุณฺหี อโหสิ. तेव्हा चित्त गृहपती जेथे थेर भिक्खू होते तेथे गेला; तिथे जाऊन त्याने थेर भिक्खूंना अभिवादन केले आणि एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीने आयुष्यमान थेरांना असे म्हटले— 'भन्ते थेर, धातूंची विविधता, धातूंची विविधता असे म्हटले जाते. भन्ते, भगवंतांनी किती प्रकारे धातूंची विविधता सांगितली आहे?' असे विचारले असता आयुष्यमान थेर मौन राहिले. दुसऱ्यांदाही चित्त गृहपतीने आयुष्यमान थेरांना असे म्हटले— 'भन्ते थेर, धातूंची विविधता, धातूंची विविधता असे म्हटले जाते. भन्ते, भगवंतांनी किती प्रकारे धातूंची विविधता सांगितली आहे?' दुसऱ्यांदाही आयुष्यमान थेर मौन राहिले. तिसऱ्यांदाही चित्त गृहपतीने आयुष्यमान थेरांना असे म्हटले— 'भन्ते थेर, धातूंची विविधता, धातूंची विविधता असे म्हटले जाते. भन्ते, भगवंतांनी किती प्रकारे धातूंची विविधता सांगितली आहे?' तिसऱ्यांदाही आयुष्यमान थेर मौन राहिले. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา อิสิทตฺโต ตสฺมึ ภิกฺขุสงฺเฆ สพฺพนวโก โหติ. อถ โข อายสฺมา อิสิทตฺโต อายสฺมนฺตํ เถรํ เอตทโวจ – ‘‘พฺยากโรมหํ, ภนฺเต เถร, จิตฺตสฺส คหปติโน เอตํ ปญฺห’’นฺติ? ‘‘พฺยากโรหิ ตฺวํ, อาวุโส อิสิทตฺต, จิตฺตสฺส คหปติโน เอตํ ปญฺห’’นฺติ. ‘‘เอวญฺหิ ตฺวํ, คหปติ, ปุจฺฉสิ – ‘ธาตุนานตฺตํ, ธาตุนานตฺตนฺติ, ภนฺเต เถร, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, ธาตุนานตฺตํ, วุตฺตํ ภควตา’’’ติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. ‘‘อิทํ โข, คหปติ, ธาตุนานตฺตํ วุตฺตํ ภควตา – จกฺขุธาตุ, รูปธาตุ, จกฺขุวิญฺญาณธาตุ…เป… มโนธาตุ, ธมฺมธาตุ, มโนวิญฺญาณธาตุ. เอตฺตาวตา โข, คหปติ, ธาตุนานตฺตํ วุตฺตํ ภควตา’’ติ. त्या वेळी आयुष्यमान इसिदत्त त्या भिक्खू संघात सर्वात कनिष्ठ होते. तेव्हा आयुष्यमान इसिदत्तांनी आयुष्यमान थेरांना असे म्हटले— 'भन्ते थेर, मी चित्त गृहपतीच्या या प्रश्नाचे उत्तर देऊ का?' 'आवुसो इसिदत्त, तूच चित्त गृहपतीच्या या प्रश्नाचे उत्तर दे.' 'गृहपती, तू असाच प्रश्न विचारत आहेस ना— भन्ते थेर, धातूंची विविधता, धातूंची विविधता असे म्हटले जाते. भन्ते, भगवंतांनी किती प्रकारे धातूंची विविधता सांगितली आहे?' 'होय, भन्ते.' 'गृहपती, भगवंतांनी ही धातूंची विविधता अशी सांगितली आहे— चक्षु-धातू, रूप-धातू, चक्षु-विज्ञान-धातू...पे... मनो-धातू, धम्म-धातू, मनो-विज्ञान-धातू. गृहपती, एवढ्याच प्रकारे भगवंतांनी धातूंची विविधता सांगितली आहे.' อถ โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมโต อิสิทตฺตสฺส ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา เถเร ภิกฺขู ปณีเตน ขาทนีเยน โภชนีเยน สหตฺถา สนฺตปฺเปสิ สมฺปวาเรสิ. อถ โข เถรา ภิกฺขู ภุตฺตาวิโน โอนีตปตฺตปาณิโน อุฏฺฐายาสนา ปกฺกมึสุ. อถ โข อายสฺมา เถโร อายสฺมนฺตํ อิสิทตฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ โข ตํ, อาวุโส อิสิทตฺต[Pg.477], เอโส ปญฺโห ปฏิภาสิ, เนโส ปญฺโห มํ ปฏิภาสิ. เตนหาวุโส อิสิทตฺต, ยทา อญฺญถาปิ เอวรูโป ปญฺโห อาคจฺเฉยฺย, ตญฺเญเวตฺถ ปฏิภาเสยฺยา’’ติ. ทุติยํ. तेव्हा चित्त गृहपतीने आयुष्यमान इसिदत्तांच्या भाषणाचे अभिनंदन व अनुमोदन करून, थेर भिक्खूंना उत्तम प्रकारच्या खाद्य व भोज्य पदार्थांनी स्वतःच्या हाताने तृप्त केले व संतुष्ट केले. त्यानंतर थेर भिक्खूंनी भोजन आटोपल्यावर आणि पात्रातून हात काढून घेतल्यावर, आसनावरून उठून ते निघून गेले. तेव्हा आयुष्यमान थेरांनी आयुष्यमान इसिदत्तांना असे म्हटले— 'साधू! आवुसो इसिदत्त, तुला या प्रश्नाचे उत्तर उत्तम प्रकारे सुचले. मला या प्रश्नाचे उत्तर सुचले नव्हते. म्हणूनच, आवुसो इसिदत्त, जेव्हा कधी भविष्यात असा प्रश्न येईल, तेव्हा तूच त्याचे उत्तर द्यावेस.' दुसरे. ๓. ทุติยอิสิทตฺตสุตฺตํ ३. दुसरे इसिदत्त सुत्त ๓๔๕. เอกํ สมยํ สมฺพหุลา เถรา ภิกฺขู มจฺฉิกาสณฺเฑ วิหรนฺติ อมฺพาฏกวเน. อถ โข จิตฺโต คหปติ เยน เถรา ภิกฺขู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เถเร ภิกฺขู อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จิตฺโต คหปติ เถเร ภิกฺขู เอตทโวจ – ‘‘อธิวาเสนฺตุ เม, ภนฺเต เถรา, สฺวาตนาย ภตฺต’’นฺติ. อธิวาเสสุํ โข เถรา ภิกฺขู ตุณฺหีภาเวน. อถ โข จิตฺโต คหปติ เถรานํ ภิกฺขูนํ อธิวาสนํ วิทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา เถเร ภิกฺขู อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. อถ โข เถรา ภิกฺขู ตสฺสา รตฺติยา อจฺจเยน ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย เยน จิตฺตสฺส คหปติสฺส นิเวสนํ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทึสุ. ३४५. एकदा अनेक ज्येष्ठ थेर भिक्खू मच्छिकाषंड येथील आंबाटक वनात विहार करत होते. तेव्हा चित्त गृहपती जेथे थेर भिक्खू होते तेथे गेला; तिथे जाऊन त्याने थेर भिक्खूंना अभिवादन केले आणि एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीने थेर भिक्खूंना असे म्हटले— 'भन्ते थेर, उद्यासाठी माझे भोजन स्वीकारावे.' थेर भिक्खूंनी मौन राहून ते स्वीकारले. त्यानंतर चित्त गृहपतीने थेर भिक्खूंची संमती जाणून घेऊन, आपल्या आसनावरून उठून, थेर भिक्खूंना अभिवादन केले आणि प्रदक्षिणा करून तो निघून गेला. त्यानंतर ती रात्र संपल्यावर, सकाळी थेर भिक्खूंनी चिवर परिधान करून, पात्र व चिवर घेऊन जेथे चित्त गृहपतीचे घर होते तेथे गेले; तिथे जाऊन ते मांडलेल्या आसनांवर बसले. อถ โข จิตฺโต คหปติ เยน เถรา ภิกฺขู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เถเร ภิกฺขู อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมนฺตํ เถรํ เอตทโวจ – ‘‘ยา อิมา, ภนฺเต เถร, อเนกวิหิตา ทิฏฺฐิโย โลเก อุปฺปชฺชนฺติ – ‘สสฺสโต โลโกติ วา, อสสฺสโต โลโกติ วา, อนฺตวา โลโกติ วา, อนนฺตวา โลโกติ วา, ตํ ชีวํ ตํ สรีรนฺติ วา, อญฺญํ ชีวํ อญฺญํ สรีรนฺติ วา, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา. ยานิ จิมานิ ทฺวาสฏฺฐิ ทิฏฺฐิคตานิ พฺรหฺมชาเล ภณิตานิ; อิมา นุ โข, ภนฺเต, ทิฏฺฐิโย กิสฺมึ สติ โหนฺติ, กิสฺมึ อสติ น โหนฺตี’’ติ? तेव्हा चित्त गृहपती जेथे थेर भिक्खू होते तेथे गेला; तिथे जाऊन त्याने थेर भिक्खूंना अभिवादन केले आणि एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीने आयुष्यमान थेरांना असे म्हटले— 'भन्ते थेर, जगात ज्या या अनेक प्रकारच्या दृष्टी निर्माण होतात— लोक शाश्वत आहे किंवा लोक अशाश्वत आहे; लोक सान्त आहे किंवा लोक अनन्त आहे; जो जीव आहे तेच शरीर आहे किंवा जीव वेगळा आणि शरीर वेगळे आहे; तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात किंवा तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात किंवा तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही किंवा तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही; आणि ब्रह्मजाल सुत्तात ज्या बासष्ट दृष्टी सांगितल्या आहेत; भन्ते, या सर्व दृष्टी कशाच्या अस्तित्वामुळे निर्माण होतात आणि कशाच्या अभावामुळे निर्माण होत नाहीत?' เอวํ วุตฺเต, อายสฺมา เถโร ตุณฺหี อโหสิ. ทุติยมฺปิ โข จิตฺโต คหปติ…เป… ตติยมฺปิ โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมนฺตํ เถรํ เอตทโวจ – ‘‘ยา อิมา, ภนฺเต เถร, อเนกวิหิตา ทิฏฺฐิโย โลเก [Pg.478] อุปฺปชฺชนฺติ – สสฺสโต โลโกติ วา, อสสฺสโต โลโกติ วา, อนฺตวา โลโกติ วา, อนนฺตวา โลโกติ วา, ตํ ชีวํ ตํ สรีรนฺติ วา, อญฺญํ ชีวํ อญฺญํ สรีรนฺติ วา, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา. ยานิ จิมานิ ทฺวาสฏฺฐิ ทิฏฺฐิคตานิ พฺรหฺมชาเล ภณิตานิ; อิมา นุ โข, ภนฺเต, ทิฏฺฐิโย กิสฺมึ สติ โหนฺติ, กิสฺมึ อสติ น โหนฺตี’’ติ? ตติยมฺปิ โข อายสฺมา เถโร ตุณฺหี อโหสิ. असे विचारले असता, आयुष्यमान स्थवीर शांत राहिले. दुसऱ्यांदाही चित्त गृहपतीने... आणि तिसऱ्यांदाही चित्त गृहपतीने आयुष्यमान स्थविरांना असे म्हटले – “भन्ते स्थवीर, जगात ज्या या अनेक प्रकारच्या दृष्टी उत्पन्न होतात – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा 'लोक अशाश्वत आहे', 'लोक सान्त आहे' किंवा 'लोक अनंंत आहे', 'जो जीव आहे तेच शरीर आहे' किंवा 'जीव वेगळा आहे आणि शरीर वेगळे आहे', 'तथागत मृत्यूनंतर असतात' किंवा 'तथागत मृत्यूनंतर नसतात', 'तथागत मृत्यूनंतर असतात आणि नसतातही' किंवा 'तथागत मृत्यूनंतर असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही'. तसेच ब्रह्मजाल सुत्तात ज्या बासष्ट दृष्टी सांगितल्या आहेत; भन्ते, या दृष्टी कशाच्या अस्तित्वामुळे निर्माण होतात आणि कशाच्या अभावामुळे निर्माण होत नाहीत?” तिसऱ्यांदाही आयुष्यमान स्थवीर शांतच राहिले. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา อิสิทตฺโต ตสฺมึ ภิกฺขุสงฺเฆ สพฺพนวโก โหติ. อถ โข อายสฺมา อิสิทตฺโต อายสฺมนฺตํ เถรํ เอตทโวจ – ‘‘พฺยากโรมหํ, ภนฺเต เถร, จิตฺตสฺส คหปติโน เอตํ ปญฺห’’นฺติ? ‘‘พฺยากโรหิ ตฺวํ, อาวุโส อิสิทตฺต, จิตฺตสฺส คหปติโน เอตํ ปญฺห’’นฺติ. ‘‘เอวญฺหิ ตฺวํ, คหปติ, ปุจฺฉสิ – ‘ยา อิมา, ภนฺเต เถร, อเนกวิหิตา ทิฏฺฐิโย โลเก อุปฺปชฺชนฺติ – สสฺสโต โลโกติ วา…เป…; อิมา นุ โข, ภนฺเต, ทิฏฺฐิโย กิสฺมึ สติ โหนฺติ, กิสฺมึ อสติ น โหนฺตี’’’ติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. ‘‘ยา อิมา, คหปติ, อเนกวิหิตา ทิฏฺฐิโย โลเก อุปฺปชฺชนฺติ – ‘สสฺสโต โลโกติ วา, อสสฺสโต โลโกติ วา, อนฺตวา โลโกติ วา อนนฺตวา โลโกติ วา, ตํ ชีวํ ตํ สรีรนฺติ วา, อญฺญํ ชีวํ อญฺญํ สรีรนฺติ วา, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา. ยานิ จิมานิ ทฺวาสฏฺฐิ ทิฏฺฐิคตานิ พฺรหฺมชาเล ภณิตานิ; อิมา โข, คหปติ, ทิฏฺฐิโย สกฺกายทิฏฺฐิยา สติ โหนฺติ, สกฺกายทิฏฺฐิยา อสติ น โหนฺตี’’’ติ. त्या वेळी आयुष्यमान इसिदत्त त्या भिक्खू संघात सर्वात कनिष्ठ होते. तेव्हा आयुष्यमान इसिदत्तांनी आयुष्यमान स्थविरांना असे म्हटले – “भन्ते स्थवीर, मी चित्त गृहपतीच्या या प्रश्नाचे उत्तर देऊ का?” “मित्रा इसिदत्ता, तू चित्त गृहपतीच्या या प्रश्नाचे उत्तर दे.” (मग इसिदत्तांनी विचारले) “गृहपती, तू असाच प्रश्न विचारत आहेस का – 'भन्ते स्थवीर, जगात ज्या या अनेक प्रकारच्या दृष्टी उत्पन्न होतात – लोक शाश्वत आहे... इत्यादी... भन्ते, या दृष्टी कशाच्या अस्तित्वामुळे निर्माण होतात आणि कशाच्या अभावामुळे निर्माण होत नाहीत?'” “होय, भन्ते.” “गृहपती, जगात ज्या या अनेक प्रकारच्या दृष्टी उत्पन्न होतात – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा 'लोक अशाश्वत आहे', 'लोक सान्त आहे' किंवा 'लोक अनंंत आहे', 'जो जीव आहे तेच शरीर आहे' किंवा 'जीव वेगळा आहे आणि शरीर वेगळे आहे', 'तथागत मृत्यूनंतर असतात' किंवा 'तथागत मृत्यूनंतर नसतात', 'तथागत मृत्यूनंतर असतात आणि नसतातही' किंवा 'तथागत मृत्यूनंतर असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही'. तसेच ब्रह्मजाल सुत्तात ज्या बासष्ट दृष्टी सांगितल्या आहेत; गृहपती, या दृष्टी सत्कायदृष्टी अस्तित्वात असताना निर्माण होतात आणि सत्कायदृष्टी अस्तित्वात नसताना निर्माण होत नाहीत.” ‘‘กถํ ปน, ภนฺเต, สกฺกายทิฏฺฐิ โหตี’’ติ? ‘‘อิธ, คหปติ, อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน อริยานํ อทสฺสาวี อริยธมฺมสฺส อโกวิโท อริยธมฺเม อวินีโต, สปฺปุริสานํ อทสฺสาวี สปฺปุริสธมฺมสฺส อโกวิโท สปฺปุริสธมฺเม อวินีโต รูปํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, รูปวนฺตํ วา อตฺตานํ, อตฺตนิ วา รูปํ, รูปสฺมึ วา อตฺตานํ; เวทนํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ…เป… สญฺญํ… สงฺขาเร… วิญฺญาณํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, วิญฺญาณวนฺตํ วา อตฺตานํ, อตฺตนิ [Pg.479] วา วิญฺญาณํ, วิญฺญาณสฺมึ วา อตฺตานํ. เอวํ โข, คหปติ, สกฺกายทิฏฺฐิ โหตี’’ติ. “पण भन्ते, सत्कायदृष्टी कशी निर्माण होते?” “गृहपती, या जगात अश्रुतवान पृथग्जन, जो आर्यांचे दर्शन न घेतलेला, आर्यधम्मात अकुशल आणि आर्यधम्मात अविनीत आहे; सत्पुरुषांचे दर्शन न घेतलेला, सत्पुरुषधम्मात अकुशल आणि सत्पुरुषधम्मात अविनीत आहे; तो रूपाला आत्मा म्हणून पाहतो, किंवा आत्म्याला रूपवान पाहतो, किंवा आत्म्यामध्ये रूप पाहतो, किंवा रूपामध्ये आत्मा पाहतो. तो वेदनेला आत्मा म्हणून पाहतो... संज्ञेला... संस्कारांना... विज्ञानाला आत्मा म्हणून पाहतो, किंवा आत्म्याला विज्ञानवान पाहतो, किंवा आत्म्यामध्ये विज्ञान पाहतो, किंवा विज्ञानामध्ये आत्मा पाहतो. गृहपती, अशा प्रकारे सत्कायदृष्टी निर्माण होते.” ‘‘กถํ ปน, ภนฺเต, สกฺกายทิฏฺฐิ น โหตี’’ติ? ‘‘อิธ, คหปติ, สุตวา อริยสาวโก อริยานํ ทสฺสาวี อริยธมฺมสฺส โกวิโท อริยธมฺเม สุวินีโต สปฺปุริสานํ ทสฺสาวี สปฺปุริสธมฺมสฺส โกวิโท สปฺปุริสธมฺเม สุวินีโต น รูปํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, น รูปวนฺตํ วา อตฺตานํ, น อตฺตนิ วา รูปํ, น รูปสฺมึ วา อตฺตานํ; น เวทนํ… น สญฺญํ… น สงฺขาเร… น วิญฺญาณํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, น วิญฺญาณวนฺตํ วา อตฺตานํ, น อตฺตนิ วา วิญฺญาณํ, น วิญฺญาณสฺมึ วา อตฺตานํ. เอวํ โข, คหปติ, สกฺกายทิฏฺฐิ น โหตี’’ติ. “पण भन्ते, सत्कायदृष्टी कशी निर्माण होत नाही?” “गृहपती, या जगात श्रुतवान आर्यश्रावक, जो आर्यांचे दर्शन घेणारा, आर्यधम्मात कुशल आणि आर्यधम्मात सुविनीत आहे; सत्पुरुषांचे दर्शन घेणारा, सत्पुरुषधम्मात कुशल आणि सत्पुरुषधम्मात सुविनीत आहे; तो रूपाला आत्मा म्हणून पाहत नाही, किंवा आत्म्याला रूपवान पाहत नाही, किंवा आत्म्यामध्ये रूप पाहत नाही, किंवा रूपामध्ये आत्मा पाहत नाही. तो वेदनेला... संज्ञेला... संस्कारांना... विज्ञानाला आत्मा म्हणून पाहत नाही, किंवा आत्म्याला विज्ञानवान पाहत नाही, किंवा आत्म्यामध्ये विज्ञान पाहत नाही, किंवा विज्ञानामध्ये आत्मा पाहत नाही. गृहपती, अशा प्रकारे सत्कायदृष्टी निर्माण होत नाही.” ‘‘กุโต, ภนฺเต, อยฺโย อิสิทตฺโต อาคจฺฉตี’’ติ? ‘‘อวนฺติยา โข, คหปติ, อาคจฺฉามี’’ติ. ‘‘อตฺถิ, ภนฺเต, อวนฺติยา อิสิทตฺโต นาม กุลปุตฺโต อมฺหากํ อทิฏฺฐสหาโย ปพฺพชิโต? ทิฏฺโฐ โส อายสฺมตา’’ติ? ‘‘เอวํ, คหปตี’’ติ. ‘‘กหํ นุ โข โส, ภนฺเต, อายสฺมา เอตรหิ วิหรตี’’ติ? เอวํ วุตฺเต, อายสฺมา อิสิทตฺโต ตุณฺหี อโหสิ. ‘‘อยฺโย โน, ภนฺเต, อิสิทตฺโต’’ติ? ‘‘เอวํ, คหปตี’’ติ. ‘‘อภิรมตุ, ภนฺเต, อยฺโย อิสิทตฺโต มจฺฉิกาสณฺเฑ. รมณียํ อมฺพาฏกวนํ. อหํ อยฺยสฺส อิสิทตฺตสฺส อุสฺสุกฺกํ กริสฺสามิ จีวรปิณฺฑปาตเสนาสนคิลานปฺปจฺจยเภสชฺชปริกฺขาราน’’นฺติ. ‘‘กลฺยาณํ วุจฺจติ, คหปตี’’ติ. “भन्ते, आर्य इसिदत्त कोठून आले आहेत?” “गृहपती, मी अवंती देशातून आलो आहे.” “भन्ते, अवंतीमध्ये इसिदत्त नावाचा एक कुलपुत्र आहे, जो आमचा न पाहिलेला मित्र आहे आणि त्याने प्रव्रज्या घेतली आहे. आयुष्यमानांनी त्याला पाहिले आहे का?” “होय, गृहपती.” “भन्ते, ते आयुष्यमान सध्या कोठे विहार करत आहेत?” असे विचारले असता, आयुष्यमान इसिदत्त शांत राहिले. “भन्ते, आपणच तर ते आर्य इसिदत्त नाही ना?” “होय, गृहपती, (मीच तो).” “भन्ते, आर्य इसिदत्तांनी मच्छिकाषंड येथेच आनंदाने राहावे. हे आंबाटकवन अत्यंत रमणीय आहे. मी आर्य इसिदत्तांसाठी चीवर, पिंडपात, शयनासन आणि आजारपणातील औषधोपचारांची व्यवस्था करण्यासाठी तत्पर राहीन.” “गृहपती, तू खूप चांगले बोललास.” อถ โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมโต อิสิทตฺตสฺส ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา เถเร ภิกฺขู ปณีเตน ขาทนีเยน โภชนีเยน สหตฺถา สนฺตปฺเปสิ สมฺปวาเรสิ. อถ โข เถรา ภิกฺขู ภุตฺตาวิโน โอนีตปตฺตปาณิโน อุฏฺฐายาสนา ปกฺกมึสุ. อถ โข อายสฺมา เถโร อายสฺมนฺตํ อิสิทตฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ โข ตํ, อาวุโส อิสิทตฺต, เอโส ปญฺโห ปฏิภาสิ. เนโส ปญฺโห มํ ปฏิภาสิ. เตนหาวุโส อิสิทตฺต, ยทา อญฺญถาปิ เอวรูโป ปญฺโห อาคจฺเฉยฺย, ตญฺเญเวตฺถ ปฏิภาเสยฺยา’’ติ. อถ โข อายสฺมา อิสิทตฺโต เสนาสนํ สํสาเมตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย มจฺฉิกาสณฺฑมฺหา ปกฺกามิ. ยํ มจฺฉิกาสณฺฑมฺหา ปกฺกามิ, ตถา ปกฺกนฺโตว อโหสิ, น ปุน ปจฺจาคจฺฉีติ. ตติยํ. त्यानंतर चित्त गृहपतीने आयुष्यमान इसिदत्तांच्या भाषणाचे अभिनंदन करून व त्याचे कौतुक करून, ज्येष्ठ भिक्खूंना स्वतःच्या हाताने उत्तम खाद्य आणि भोज्य पदार्थांनी तृप्त केले व संतुष्ट केले. भोजन संपवून आणि पात्रातून हात काढून घेतल्यावर, ते ज्येष्ठ भिक्खू आपापल्या आसनांवरून उठून निघून गेले. त्यानंतर आयुष्यमान स्थविरांनी आयुष्यमान इसिदत्तांना असे म्हटले – “मित्रा इसिदत्ता, खूप छान! तुला या प्रश्नाचे उत्तर सुचले. मला या प्रश्नाचे उत्तर सुचले नव्हते. म्हणूनच, मित्रा इसिदत्ता, जेव्हा कधी भविष्यात असा प्रश्न येईल, तेव्हा तूच त्याचे उत्तर दे.” त्यानंतर आयुष्यमान इसिदत्तांनी आपले शयनासन आवरले, पात्र व चीवर घेतले आणि ते मच्छिकाषंड येथून निघून गेले. ते मच्छिकाषंड येथून जे गेले, ते कायमचेच गेले, पुन्हा कधीही परत आले नाहीत. (हे तिसरे सुत्त समाप्त.) ๔. มหกปาฏิหาริยสุตฺตํ ४. महकपाटिहारिय सुत्त ๓๔๖. เอกํ [Pg.480] สมยํ สมฺพหุลา เถรา ภิกฺขู มจฺฉิกาสณฺเฑ วิหรนฺติ อมฺพาฏกวเน. อถ โข จิตฺโต คหปติ เยน เถรา ภิกฺขู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เถเร ภิกฺขู อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จิตฺโต คหปติ เถเร ภิกฺขู เอตทโวจ – ‘‘อธิวาเสนฺตุ เม, ภนฺเต เถรา, สฺวาตนาย โคกุเล ภตฺต’’นฺติ. อธิวาเสสุํ โข เถรา ภิกฺขู ตุณฺหีภาเวน. อถ โข จิตฺโต คหปติ เถรานํ ภิกฺขูนํ อธิวาสนํ วิทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา เถเร ภิกฺขู อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. อถ โข เถรา ภิกฺขู ตสฺสา รตฺติยา อจฺจเยน ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย เยน จิตฺตสฺส คหปติโน โคกุลํ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทึสุ. ३४६. एका वेळी अनेक थेर भिक्खू मच्छिकाषण्ड येथील अंबाटकवनात विहार करत होते. तेव्हा चित्त गृहपती जेथे थेर भिक्खू होते तेथे गेला; तिथे जाऊन त्याने थेर भिक्खूंना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीने थेर भिक्खूंना असे म्हटले – “भन्ते थेर, उद्या माझ्या गोठ्यात भोजनाचा स्वीकार करावा.” थेर भिक्खूंनी मौन बाळगून संमती दिली. त्यानंतर चित्त गृहपतीने थेर भिक्खूंची संमती जाणून घेऊन, आपल्या आसनावरून उठून, थेर भिक्खूंना अभिवादन केले आणि प्रदक्षिणा घालून तो निघून गेला. त्यानंतर ती रात्र उलटल्यावर, सकाळी थेर भिक्खूंनी चीवर परिधान केले आणि पात्र-चीवर घेऊन ते चित्त गृहपतीच्या गोठ्याकडे गेले; तिथे पोहोचून ते मांडलेल्या आसनांवर बसले. อถ โข จิตฺโต คหปติ เถเร ภิกฺขู ปณีเตน สปฺปิปายาเสน สหตฺถา สนฺตปฺเปสิ สมฺปวาเรสิ. อถ โข เถรา ภิกฺขู ภุตฺตาวิโน โอนีตปตฺตปาณิโน อุฏฺฐายาสนา ปกฺกมึสุ. จิตฺโตปิ โข คหปติ ‘เสสกํ วิสฺสชฺเชถา’ติ วตฺวา เถเร ภิกฺขู ปิฏฺฐิโต ปิฏฺฐิโต อนุพนฺธิ. เตน โข ปน สมเยน อุณฺหํ โหติ กุถิตํ ; เต จ เถรา ภิกฺขู ปเวลิยมาเนน มญฺเญ กาเยน คจฺฉนฺติ, ยถา ตํ โภชนํ ภุตฺตาวิโน. त्यानंतर चित्त गृहपतीने थेर भिक्खूंना उत्तम तूपयुक्त खिरीने (पायसाने) स्वतःच्या हाताने वाढून तृप्त केले व संतुष्ट केले. भोजन आटोपल्यावर आणि पात्रातून हात काढून घेतल्यावर थेर भिक्खू आसनावरून उठून निघून गेले. चित्त गृहपतीनेही 'उरलेले अन्न वाटून द्या' असे सांगून थेर भिक्खूंच्या मागून पाठलाग केला (त्यांच्या मागे मागे गेला). त्या वेळी अतिशय कडक ऊन पडले होते आणि ते थेर भिक्खू जणू काही भोजन केल्यामुळे गलितगात्र झालेल्या शरीराने चालत होते. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา มหโก ตสฺมึ ภิกฺขุสงฺเฆ สพฺพนวโก โหติ. อถ โข อายสฺมา มหโก อายสฺมนฺตํ เถรํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ ขฺวสฺส, ภนฺเต เถร, สีตโก จ วาโต วาเยยฺย, อพฺภสมฺปิลาโป จ อสฺส, เทโว จ เอกเมกํ ผุสาเยยฺยา’’ติ. त्या वेळी आयुष्यमान महक त्या भिक्खू संघात सर्वात कनिष्ठ होते. तेव्हा आयुष्यमान महक यांनी आयुष्यमान थेरांना असे म्हटले – “भन्ते थेर, किती बरे झाले असते जर थंड वारा सुटला असता, ढग दाटून आले असते आणि पावसाचे थेंब पडले असते!” ‘‘สาธุ ขฺวสฺส, อาวุโส มหก, ยํ สีตโก จ วาโต วาเยยฺย, อพฺภสมฺปิลาโป จ อสฺส, เทโว จ เอกเมกํ ผุสาเยยฺยา’’ติ. อถ โข อายสฺมา มหโก ตถารูปํ อิทฺธาภิสงฺขารํ อภิสงฺขริ ยถา สีตโก จ วาโต วายิ, อพฺภสมฺปิลาโป จ อสฺส, เทโว จ เอกเมกํ ผุสิ. อถ โข จิตฺตสฺส คหปติโน เอตทโหสิ – ‘‘โย โข อิมสฺมึ ภิกฺขุสงฺเฆ สพฺพนวโก ภิกฺขุ ตสฺสายํ เอวรูโป อิทฺธานุภาโว’’ติ[Pg.481]. อถ โข อายสฺมา มหโก อารามํ สมฺปาปุณิตฺวา อายสฺมนฺตํ เถรํ เอตทโวจ – ‘‘อลเมตฺตาวตา, ภนฺเต เถรา’’ติ? ‘‘อลเมตฺตาวตา, อาวุโส มหก! กตเมตฺตาวตา, อาวุโส มหก! ปูชิตเมตฺตาวตา, อาวุโส มหกา’’ติ. อถ โข เถรา ภิกฺขู ยถาวิหารํ อคมํสุ. อายสฺมาปิ มหโก สกํ วิหารํ อคมาสิ. “हे आवुसो महक, किती बरे झाले असते जर थंड वारा सुटला असता, ढग दाटून आले असते आणि पावसाचे थेंब पडले असते!” तेव्हा आयुष्यमान महक यांनी तशा प्रकारचा ऋद्धी-चमत्कार केला, ज्यामुळे थंड वारा सुटू लागला, ढग दाटून आले आणि पावसाचे थेंब पडू लागले. तेव्हा चित्त गृहपतीच्या मनात असा विचार आला – “या भिक्खू संघात जो सर्वात कनिष्ठ भिक्खू आहे, त्याचाच हा असा ऋद्धी-प्रभाव आहे!” त्यानंतर आयुष्यमान महक आरामात पोहोचल्यावर आयुष्यमान थेरांना म्हणाले – “भन्ते थेर, एवढे पुरेसे आहे का?” “आवुसो महक, एवढे पुरेसे आहे! आवुसो महक, एवढे केले ते पुरेसे आहे! आवुसो महक, एवढी पूजा पुरेसी आहे!” त्यानंतर थेर भिक्खू आपापल्या विहाराकडे गेले. आयुष्यमान महक देखील आपल्या स्वतःच्या विहाराकडे गेले. อถ โข จิตฺโต คหปติ เยนายสฺมา มหโก เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหกํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมนฺตํ มหกํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต, อยฺโย มหโก อุตฺตริมนุสฺสธมฺมํ อิทฺธิปาฏิหาริยํ ทสฺเสตู’’ติ. ‘‘เตน หิ ตฺวํ, คหปติ, อาลินฺเท อุตฺตราสงฺคํ ปญฺญเปตฺวา ติณกลาปํ โอกาเสหี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมโต มหกสฺส ปฏิสฺสุตฺวา อาลินฺเท อุตฺตราสงฺคํ ปญฺญเปตฺวา ติณกลาปํ โอกาเสสิ. อถ โข อายสฺมา มหโก วิหารํ ปวิสิตฺวา สูจิฆฏิกํ ทตฺวา ตถารูปํ อิทฺธาภิสงฺขารํ อภิสงฺขริ ยถา ตาลจฺฉิคฺคเฬน จ อคฺคฬนฺตริกาย จ อจฺจิ นิกฺขมิตฺวา ติณานิ ฌาเปสิ, อุตฺตราสงฺคํ น ฌาเปสิ. อถ โข จิตฺโต คหปติ อุตฺตราสงฺคํ ปปฺโผเฏตฺวา สํวิคฺโค โลมหฏฺฐชาโต เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. อถ โข อายสฺมา มหโก วิหารา นิกฺขมิตฺวา จิตฺตํ คหปตึ เอตทโวจ – ‘‘อลเมตฺตาวตา, คหปตี’’ติ? त्यानंतर चित्त गृहपती जेथे आयुष्यमान महक होते तेथे गेला; तिथे जाऊन त्याने आयुष्यमान महक यांना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीने आयुष्यमान महक यांना असे म्हटले – “भन्ते, पूजनीय महक यांनी मला मानसोत्तर धर्माचा (उत्तरीमनुस्सधम्म) ऋद्धी-चमत्कार दाखवावा, ही विनंती.” “तर मग गृहपती, तू ओसरीवर आपले उपरणे (उत्तरासंग) पसरवून त्यावर गवताची पेंढी पसरव.” “होय, भन्ते,” असे म्हणून चित्त गृहपतीने आयुष्यमान महक यांच्या सांगण्यावरून ओसरीवर आपले उपरणे पसरवले आणि त्यावर गवताची पेंढी पसरवली. त्यानंतर आयुष्यमान महक यांनी विहारात प्रवेश करून दार लावून घेतले आणि असा ऋद्धी-चमत्कार केला की, कुलुपाच्या छिद्रातून आणि दाराच्या फटीतून आगीची ज्वाला बाहेर पडली आणि तिने गवत जाळले, पण उपरण्याला काहीही इजा झाली नाही. तेव्हा चित्त गृहपतीने आपले उपरणे झटकले आणि तो भयभीत व रोमांचित होऊन एका बाजूला उभा राहिला. त्यानंतर आयुष्यमान महक विहारातून बाहेर आले आणि चित्त गृहपतीला म्हणाले – “गृहपती, एवढे पुरेसे आहे का?” ‘‘อลเมตฺตาวตา, ภนฺเต มหก! กตเมตฺตาวตา, ภนฺเต, มหก! ปูชิตเมตฺตาวตา, ภนฺเต มหก! อภิรมตุ, ภนฺเต, อยฺโย มหโก มจฺฉิกาสณฺเฑ. รมณียํ อมฺพาฏกวนํ. อหํ อยฺยสฺส มหกสฺส อุสฺสุกฺกํ กริสฺสามิ จีวรปิณฺฑปาตเสนาสนคิลานปฺปจฺจยเภสชฺชปริกฺขาราน’’นฺติ. ‘‘กลฺยาณํ วุจฺจติ, คหปตี’’ติ. อถ โข อายสฺมา มหโก เสนาสนํ สํสาเมตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย มจฺฉิกาสณฺฑมฺหา ปกฺกามิ. ยํ มจฺฉิกาสณฺฑมฺหา ปกฺกามิ, ตถา ปกฺกนฺโตว อโหสิ; น ปุน ปจฺจาคจฺฉีติ. จตุตฺถํ. “भन्ते महक, एवढे पुरेसे आहे! भन्ते महक, एवढे केले ते पुरेसे आहे! भन्ते महक, एवढी पूजा पुरेसी आहे! भन्ते, पूजनीय महक यांनी मच्छिकाषण्ड येथील रमणीय अंबाटकवनात आनंदाने राहावे. मी पूजनीय महक यांच्यासाठी चीवर, पिंडपात, शयनासन आणि आजारपणातील औषधोपचार या गरजा पुरवण्यास तत्पर राहीन.” “गृहपती, तू खूप चांगले बोललास,” असे ते म्हणाले. त्यानंतर आयुष्यमान महक यांनी आपले बिछाने आवरले आणि पात्र-चीवर घेऊन ते मच्छिकाषण्ड येथून निघून गेले. ते मच्छिकाषण्ड येथून जे निघून गेले, ते कायमचेच निघून गेले; ते पुन्हा कधीही परत आले नाहीत. चौथे सूत्र समाप्त. ๕. ปฐมกามภูสุตฺตํ ५. प्रथम कामभू सूत्र ๓๔๗. เอกํ สมยํ อายสฺมา กามภู มจฺฉิกาสณฺเฑ วิหรติ อมฺพาฏกวเน. อถ โข จิตฺโต คหปติ เยนายสฺมา กามภู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ กามภุํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ[Pg.482]. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข จิตฺตํ คหปตึ อายสฺมา กามภู เอตทโวจ – ३४७. एका वेळी आयुष्यमान कामभू मच्छिकाषण्ड येथील अंबाटकवनात विहार करत होते. तेव्हा चित्त गृहपती जेथे आयुष्यमान कामभू होते तेथे गेला; तिथे जाऊन त्याने आयुष्यमान कामभू यांना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीला आयुष्यमान कामभू यांनी असे म्हटले – ‘‘วุตฺตมิทํ, คหปติ – “गृहपती, हे असे म्हटले गेले आहे – ‘‘เนลงฺโค เสตปจฺฉาโท, เอกาโร วตฺตตี รโถ; อนีฆํ ปสฺส อายนฺตํ, ฉินฺนโสตํ อพนฺธน’’นฺติ. “दोषरहित चाके असलेला, पांढरे छत असलेला, एक कणा असलेला रथ चालत आहे; त्या दुःखमुक्त, तृष्णेचा प्रवाह तोडलेल्या आणि बंधनांमधून मुक्त झालेल्या येणाऱ्या (अर्हताला) पाहा.” ‘‘อิมสฺส นุ โข, คหปติ, สํขิตฺเตน ภาสิตสฺส กถํ วิตฺถาเรน อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ’’ติ? ‘‘กึ นุ โข เอตํ, ภนฺเต, ภควตา ภาสิต’’นฺติ? ‘‘เอวํ, คหปตี’’ติ. ‘‘เตน หิ, ภนฺเต, มุหุตฺตํ อาคเมหิ ยาวสฺส อตฺถํ เปกฺขามี’’ติ. อถ โข จิตฺโต คหปติ มุหุตฺตํ ตุณฺหี หุตฺวา อายสฺมนฺตํ กามภุํ เอตทโวจ – “गृहपती, संक्षेपाने सांगितलेल्या या वचनाचा सविस्तर अर्थ कसा समजून घ्यावा?” “भन्ते, हे भगवान बुद्धांनी सांगितले आहे का?” “होय, गृहपती.” “तर मग भन्ते, क्षणभर थांबा, जोपर्यंत मी याच्या अर्थावर विचार करतो.” त्यानंतर चित्त गृहपती क्षणभर शांत राहिला आणि आयुष्यमान कामभू यांना म्हणाला – ‘‘‘เนลงฺค’นฺติ โข, ภนฺเต, สีลานเมตํ อธิวจนํ. ‘เสตปจฺฉาโท’ติ โข, ภนฺเต, วิมุตฺติยา เอตํ อธิวจนํ. ‘เอกาโร’ติ โข, ภนฺเต, สติยา เอตํ อธิวจนํ. ‘วตฺตตี’ติ โข, ภนฺเต, อภิกฺกมปฏิกฺกมสฺเสตํ อธิวจนํ. ‘รโถ’ติ โข, ภนฺเต, อิมสฺเสตํ จาตุมหาภูติกสฺส กายสฺส อธิวจนํ มาตาเปตฺติกสมฺภวสฺส โอทนกุมฺมาสูปจยสฺส อนิจฺจุจฺฉาทนปริมทฺทนเภทนวิทฺธํสนธมฺมสฺส. ราโค โข, ภนฺเต, นีโฆ, โทโส นีโฆ, โมโห นีโฆ. เต ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ปหีนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. ตสฺมา ขีณาสโว ภิกฺขุ ‘อนีโฆ’ติ วุจฺจติ. ‘อายนฺต’นฺติ โข, ภนฺเต, อรหโต เอตํ อธิวจนํ. ‘โสโต’ติ โข, ภนฺเต, ตณฺหาเยตํ อธิวจนํ. สา ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ปหีนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. ตสฺมา ขีณาสโว ภิกฺขุ ‘ฉินฺนโสโต’ติ วุจฺจติ. ราโค โข, ภนฺเต, พนฺธนํ, โทโส พนฺธนํ, โมโห พนฺธนํ. เต ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ปหีนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. ตสฺมา ขีณาสโว ภิกฺขุ ‘อพนฺธโน’ติ วุจฺจติ. อิติ โข, ภนฺเต, ยํ ตํ ภควตา วุตฺตํ – “भन्ते, 'नेळंग' (दोषरहित) हे शीलांचे नाव आहे. भन्ते, 'श्वेतछत्र' (पांढरे छप्पर) हे विमुक्तीचे नाव आहे. भन्ते, 'एकच कणा' (एक आरी) हे सतीचे (स्मृतीचे) नाव आहे. भन्ते, 'चालतो' हे पुढे जाणे आणि मागे फिरणे याचे नाव आहे. भन्ते, 'रथ' हे चार महाभूतांनी बनलेल्या, माता-पित्यांपासून उत्पन्न झालेल्या, भात आणि कण्याने पुष्ट झालेल्या, अनित्य, उटणे लावणे, चोळणे, नष्ट होणे आणि विखुरणे हा स्वभाव असलेल्या या शरीराचे नाव आहे. भन्ते, राग हा उपद्रव आहे, द्वेष हा उपद्रव आहे, मोह हा उपद्रव आहे. क्षीणासव भिक्खूने हे नष्ट केले आहेत, मुळासकट उपटून टाकले आहेत, ताळाच्या बुंध्यासारखे केले आहेत, नामशेष केले आहेत आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाचे केले आहेत. म्हणून क्षीणासव भिक्खूला 'उपद्रवरहित' (अनीघ) म्हटले जाते. भन्ते, 'येणारा' हे अरहंताचे नाव आहे. भन्ते, 'प्रवाह' हे तण्हाचे (तृष्णेचे) नाव आहे. क्षीणासव भिक्खूने ती नष्ट केली आहे, मुळासकट उपटून टाकली आहे, ताळाच्या बुंध्यासारखी केली आहे, नामशेष केली आहे आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाची केली आहे. म्हणून क्षीणासव भिक्खूला 'छिन्नस्रोत' (प्रवाह तोडलेला) म्हटले जाते. भन्ते, राग हे बंधन आहे, द्वेष हे बंधन आहे, मोह हे बंधन आहे. क्षीणासव भिक्खूने हे नष्ट केले आहेत, मुळासकट उपटून टाकले आहेत, ताळाच्या बुंध्यासारखे केले आहेत, नामशेष केले आहेत आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाचे केले आहेत. म्हणून क्षीणासव भिक्खूला 'बंधनमुक्त' (अबंधन) म्हटले जाते. भन्ते, या प्रकारे भगवंतांनी जे म्हटले होते –” ‘‘เนลงฺโค เสตปจฺฉาโท, เอกาโร วตฺตตี รโถ; อนีฆํ ปสฺส อายนฺตํ, ฉินฺนโสตํ อพนฺธน’’นฺติ. “दोषरहित, श्वेतछत्र असलेला, एक कणा असलेला रथ चालत आहे. उपद्रवरहित, प्रवाह तोडलेल्या, बंधनमुक्त अशा येणाऱ्याला पहा.” ‘‘อิมสฺส [Pg.483] โข, ภนฺเต, ภควตา สํขิตฺเตน ภาสิตสฺส เอวํ วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานามี’’ติ. ‘‘ลาภา เต, คหปติ, สุลทฺธํ เต, คหปติ! ยสฺส เต คมฺภีเร พุทฺธวจเน ปญฺญาจกฺขุ กมตี’’ติ. ปญฺจมํ. “भन्ते, भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या या वचनाचा अर्थ मी अशा प्रकारे सविस्तरपणे समजतो.” “हा तुझा लाभ आहे, गृहपती! हे तुला सुलाभ झाले आहे, गृहपती! ज्या तुझी प्रज्ञाचक्षू भगवंतांच्या गंभीर वचनात प्रवेश करते.” पाचवे समाप्त. ๖. ทุติยกามภูสุตฺตํ ६. दुसरे कामभू सुत्त ๓๔๘. เอกํ สมยํ อายสฺมา กามภู มจฺฉิกาสณฺเฑ วิหรติ อมฺพาฏกวเน. อถ โข จิตฺโต คหปติ เยนายสฺมา กามภู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมนฺตํ กามภุํ เอตทโวจ – ‘‘กติ นุ โข, ภนฺเต, สงฺขารา’’ติ? ‘‘ตโย โข, คหปติ, สงฺขารา – กายสงฺขาโร, วจีสงฺขาโร, จิตฺตสงฺขาโร’’ติ. ‘‘สาธุ, ภนฺเต’’ติ โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมโต กามภุสฺส ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา อายสฺมนฺตํ กามภุํ อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ‘‘กตโม ปน, ภนฺเต, กายสงฺขาโร, กตโม วจีสงฺขาโร, กตโม จิตฺตสงฺขาโร’’ติ? ‘‘อสฺสาสปสฺสาสา โข, คหปติ, กายสงฺขาโร, วิตกฺกวิจารา วจีสงฺขาโร, สญฺญา จ เวทนา จ จิตฺตสงฺขาโร’’ติ. ३४८. एका वेळी आयुष्यमान कामभू मच्छिकाषंड येथील आंबाटक वनात विहार करत होते. तेव्हा चित्त गृहपती जेथे आयुष्यमान कामभू होते तेथे गेले; जाऊन एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीने आयुष्यमान कामभू यांना असे म्हटले – “भन्ते, संस्कार किती आहेत?” “गृहपती, तीन संस्कार आहेत – कायसंस्कार, वचीसंस्कार आणि चित्तसंस्कार.” “खूप छान, भन्ते!” असे म्हणून चित्त गृहपतीने आयुष्यमान कामभू यांच्या भाषणाचे अभिनंदन करून, अनुमोदन करून आयुष्यमान कामभू यांना पुढील प्रश्न विचारला – “पण भन्ते, कायसंस्कार कोणता, वचीसंस्कार कोणता आणि चित्तसंस्कार कोणता?” “गृहपती, श्वासोच्छ्वास हा कायसंस्कार आहे, वितर्क आणि विचार हा वचीसंस्कार आहे, संज्ञा आणि वेदना हा चित्तसंस्कार आहे.” ‘‘สาธุ, ภนฺเต’’ติ โข จิตฺโต คหปติ…เป… อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ‘‘กสฺมา ปน, ภนฺเต, อสฺสาสปสฺสาสา กายสงฺขาโร, กสฺมา วิตกฺกวิจารา วจีสงฺขาโร, กสฺมา สญฺญา จ เวทนา จ จิตฺตสงฺขาโร’’ติ? ‘‘อสฺสาสปสฺสาสา โข, คหปติ, กายิกา. เอเต ธมฺมา กายปฺปฏิพทฺธา, ตสฺมา อสฺสาสปสฺสาสา กายสงฺขาโร. ปุพฺเพ โข, คหปติ, วิตกฺเกตฺวา วิจาเรตฺวา ปจฺฉา วาจํ ภินฺทติ, ตสฺมา วิตกฺกวิจารา วจีสงฺขาโร. สญฺญา จ เวทนา จ เจตสิกา. เอเต ธมฺมา จิตฺตปฺปฏิพทฺธา, ตสฺมา สญฺญา จ เวทนา จ จิตฺตสงฺขาโร’’ติ. “खूप छान, भन्ते!” असे म्हणून चित्त गृहपतीने...पे... पुढील प्रश्न विचारला – “पण भन्ते, श्वासोच्छ्वास हा कायसंस्कार का आहे, वितर्क आणि विचार हा वचीसंस्कार का आहे, आणि संज्ञा व वेदना हा चित्तसंस्कार का आहे?” “गृहपती, श्वासोच्छ्वास हे कायिक (शारीरिक) आहेत. हे धर्म शरीराशी संबंधित आहेत, म्हणून श्वासोच्छ्वास हा कायसंस्कार आहे. गृहपती, मनुष्य आधी वितर्क आणि विचार करतो, आणि नंतर वाणी उच्चारतो, म्हणून वितर्क आणि विचार हा वचीसंस्कार आहे. संज्ञा आणि वेदना हे चैतसिक आहेत. हे धर्म चित्ताशी संबंधित आहेत, म्हणून संज्ञा आणि वेदना हा चित्तसंस्कार आहे.” สาธุ…เป… อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ‘‘กถํ ปน, ภนฺเต, สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติ โหตี’’ติ? ‘‘น โข, คหปติ, สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปชฺชนฺตสฺส ภิกฺขุโน เอวํ โหติ – ‘อหํ สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปชฺชิสฺส’นฺติ วา ‘อหํ สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปชฺชามี’ติ วา ‘อหํ สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺโน’ติ วา. อถ ขฺวสฺส ปุพฺเพว ตถา จิตฺตํ ภาวิตํ โหติ ยํ ตํ ตถตฺตาย อุปเนตี’’ติ. “खूप छान...” पे... पुढील प्रश्न विचारला – “पण भन्ते, संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्ती कशी प्राप्त होते?” “गृहपती, संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्ती प्राप्त करणाऱ्या भिक्खूच्या मनात असा विचार येत नाही – 'मी संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्ती प्राप्त करीन' किंवा 'मी संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्ती प्राप्त करत आहे' किंवा 'मी संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्ती प्राप्त केली आहे.' तर त्याचे चित्त आधीच अशा प्रकारे भावित (विकसित) झालेले असते, जे त्याला त्या अवस्थेकडे घेऊन जाते.” สาธุ [Pg.484] …เป… อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ‘‘สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปชฺชนฺตสฺส ปน, ภนฺเต, ภิกฺขุโน กตเม ธมฺมา ปฐมํ นิรุชฺฌนฺติ, ยทิ วา กายสงฺขาโร, ยทิ วา วจีสงฺขาโร, ยทิ วา จิตฺตสงฺขาโร’’ติ? ‘‘สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปชฺชนฺตสฺส โข, คหปติ, ภิกฺขุโน วจีสงฺขาโร ปฐมํ นิรุชฺฌติ, ตโต กายสงฺขาโร, ตโต จิตฺตสงฺขาโร’’ติ. “खूप छान...” पे... पुढील प्रश्न विचारला – “पण भन्ते, संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्ती प्राप्त करणाऱ्या भिक्खूचे कोणते धर्म आधी निरुद्ध होतात – कायसंस्कार, वचीसंस्कार की चित्तसंस्कार?” “गृहपती, संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्ती प्राप्त करणाऱ्या भिक्खूचा वचीसंस्कार आधी निरुद्ध होतो, त्यानंतर कायसंस्कार आणि त्यानंतर चित्तसंस्कार निरुद्ध होतो.” สาธุ…เป… อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ‘‘ยฺวายํ, ภนฺเต, มโต กาลงฺกโต, โย จายํ ภิกฺขุ สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺโน, อิเมสํ กึ นานากรณ’’นฺติ? ‘‘ยฺวายํ คหปติ, มโต กาลงฺกโต ตสฺส กายสงฺขาโร นิรุทฺโธ ปฏิปฺปสฺสทฺโธ, วจีสงฺขาโร นิรุทฺโธ ปฏิปฺปสฺสทฺโธ, จิตฺตสงฺขาโร นิรุทฺโธ ปฏิปฺปสฺสทฺโธ, อายุ ปริกฺขีโณ, อุสฺมา วูปสนฺตา, อินฺทฺริยานิ วิปริภินฺนานิ. โย จ ขฺวายํ, คหปติ, ภิกฺขุ สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺโน, ตสฺสปิ กายสงฺขาโร นิรุทฺโธ ปฏิปฺปสฺสทฺโธ, วจีสงฺขาโร นิรุทฺโธ ปฏิปฺปสฺสทฺโธ, จิตฺตสงฺขาโร นิรุทฺโธ ปฏิปฺปสฺสทฺโธ, อายุ อปริกฺขีโณ, อุสฺมา อวูปสนฺตา, อินฺทฺริยานิ วิปฺปสนฺนานิ. ยฺวายํ, คหปติ, มโต กาลงฺกโต, โย จายํ ภิกฺขุ สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺโน, อิทํ เนสํ นานากรณ’’นฺติ. “खूप छान...” पे... पुढील प्रश्न विचारला – “भन्ते, जो मृत झाला आहे, कालवश झाला आहे, आणि जो भिक्खू संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्ती प्राप्त झाला आहे, या दोघांमध्ये काय फरक आहे?” “गृहपती, जो मृत झाला आहे, कालवश झाला आहे, त्याचा कायसंस्कार निरुद्ध आणि शांत झाला आहे, वचीसंस्कार निरुद्ध आणि शांत झाला आहे, चित्तसंस्कार निरुद्ध आणि शांत झाला आहे, आयुष्य संपले आहे, उष्मा (शारीरिक उष्णता) शांत झाली आहे आणि इंद्रिये नष्ट झाली आहेत. पण गृहपती, जो भिक्खू संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्ती प्राप्त झाला आहे, त्याचाही कायसंस्कार निरुद्ध आणि शांत झाला आहे, वचीसंस्कार निरुद्ध आणि शांत झाला आहे, चित्तसंस्कार निरुद्ध आणि शांत झाला आहे, परंतु त्याचे आयुष्य संपलेले नाही, उष्मा शांत झालेली नाही आणि इंद्रिये अत्यंत प्रसन्न (तेजस्वी) आहेत. गृहपती, जो मृत झाला आहे, कालवश झाला आहे, आणि जो भिक्खू संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्ती प्राप्त झाला आहे, हा त्यांच्यातील फरक आहे.” สาธุ…เป… อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ‘‘กถํ ปน, ภนฺเต, สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐานํ โหตี’’ติ? ‘‘น โข, คหปติ, สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐหนฺตสฺส ภิกฺขุโน เอวํ โหติ – ‘อหํ สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐหิสฺส’นฺติ วา ‘อหํ สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐหามี’ติ วา ‘อหํ สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐิโต’ติ วา. อถ ขฺวสฺส ปุพฺเพว ตถา จิตฺตํ ภาวิตํ โหติ, ยํ ตํ ตถตฺตาย อุปเนตี’’ติ. “खूप छान...” पे... पुढील प्रश्न विचारला – “पण भन्ते, संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्तीमधून व्युत्थान (बाहेर पडणे) कसे होते?” “गृहपती, संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्तीमधून बाहेर पडणाऱ्या भिक्खूच्या मनात असा विचार येत नाही – 'मी संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्तीमधून बाहेर पडेन' किंवा 'मी संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्तीमधून बाहेर पडत आहे' किंवा 'मी संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्तीमधून बाहेर पडलो आहे.' तर त्याचे चित्त आधीच अशा प्रकारे भावित (विकसित) झालेले असते, जे त्याला त्या अवस्थेकडे घेऊन जाते.” สาธุ, ภนฺเต…เป… อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ‘‘สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐหนฺตสฺส ปน, ภนฺเต, ภิกฺขุโน กตเม ธมฺมา ปฐมํ อุปฺปชฺชนฺติ, ยทิ วา กายสงฺขาโร, ยทิ วา วจีสงฺขาโร, ยทิ วา จิตฺตสงฺขาโร’’ติ? ‘‘สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐหนฺตสฺส, คหปติ, ภิกฺขุโน จิตฺตสงฺขาโร ปฐมํ อุปฺปชฺชติ, ตโต กายสงฺขาโร, ตโต วจีสงฺขาโร’’ติ. "साधू, भन्ते!" ... (असे म्हणून) त्यांनी पुढे आणखी प्रश्न विचारला— "भन्ते, संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्तीमधून (संज्ञा आणि वेदना यांच्या निरोधाच्या अवस्थेतून) बाहेर पडणाऱ्या भिक्खूमध्ये कोणते धर्म सर्वात आधी उत्पन्न होतात— कायसंखार (शारीरिक संस्कार), वचीसंखार (वाचिक संस्कार) की चित्तसंखार (मानसिक संस्कार)?" "गृहपती, संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्तीमधून बाहेर पडणाऱ्या भिक्खूमध्ये सर्वात आधी चित्तसंखार उत्पन्न होतो, त्यानंतर कायसंखार आणि त्यानंतर वचीसंखार उत्पन्न होतो." สาธุ…เป… อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ‘‘สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐิตํ ปน, ภนฺเต, ภิกฺขุํ กติ ผสฺสา ผุสนฺติ’’? ‘‘สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐิตํ [Pg.485] โข, คหปติ, ภิกฺขุํ ตโย ผสฺสา ผุสนฺติ – สุญฺญโต ผสฺโส, อนิมิตฺโต ผสฺโส, อปฺปณิหิโต ผสฺโส’’ติ. "साधू, भन्ते!" ... त्यांनी पुढे आणखी प्रश्न विचारला— "भन्ते, संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्तीमधून बाहेर पडलेल्या भिक्खूला किती प्रकारचे फस्स (स्पर्श) स्पर्श करतात?" "गृहपती, संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्तीमधून बाहेर पडलेल्या भिक्खूला तीन प्रकारचे फस्स स्पर्श करतात— सुञ्ञत फस्स (शून्यता-स्पर्श), अनिमित्त फस्स (निमित्तहीन-स्पर्श) आणि अप्पणिहित फस्स (प्रणिधीरहित-स्पर्श)." สาธุ…เป… อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ‘‘สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐิตสฺส ปน, ภนฺเต, ภิกฺขุโน กึนินฺนํ จิตฺตํ โหติ, กึโปณํ, กึปพฺภาร’’นฺติ? ‘‘สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐิตสฺส โข, คหปติ, ภิกฺขุโน วิเวกนินฺนํ จิตฺตํ โหติ วิเวกโปณํ วิเวกปพฺภาร’’นฺติ. "साधू, भन्ते!" ... त्यांनी पुढे आणखी प्रश्न विचारला— "भन्ते, संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्तीमधून बाहेर पडलेल्या भिक्खूचे चित्त कशाकडे झुकलेले, कशाकडे प्रवृत्त आणि कशाकडे प्रवण (कललेले) असते?" "गृहपती, संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्तीमधून बाहेर पडलेल्या भिक्खूचे चित्त विवेकाकडे (एकांत/विवेक/निर्वाणाकडे) झुकलेले, विवेकाकडे प्रवृत्त आणि विवेकाकडे प्रवण असते." ‘‘สาธุ, ภนฺเต’’ติ โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมโต กามภุสฺส ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา อายสฺมนฺตํ กามภุํ อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ‘‘สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา ปน, ภนฺเต, กติ ธมฺมา พหูปการา’’ติ? ‘‘อทฺธา โข ตฺวํ, คหปติ, ยํ ปฐมํ ปุจฺฉิตพฺพํ ตํ ปุจฺฉสิ. อปิ จ ตฺยาหํ พฺยากริสฺสามิ. สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา โข, คหปติ, ทฺเว ธมฺมา พหูปการา – สมโถ จ วิปสฺสนา จา’’ติ. ฉฏฺฐํ. "साधू, भन्ते!" असे म्हणून चित्त गृहपतीने आयुष्यमान कामभू यांच्या भाषणाचे अभिनंदन करून, त्याचे कौतुक करून आयुष्यमान कामभू यांना पुढे आणखी प्रश्न विचारला— "भन्ते, संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्तीच्या प्राप्तीसाठी किती धर्म बहुउपकारक (अतिशय साहाय्यक) आहेत?" "गृहपती, खरोखर तू जो प्रश्न सर्वात आधी विचारायला हवा होतास, तो शेवटी विचारत आहेस; तरीही मी तुला याचे उत्तर देईन. गृहपती, संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्तीसाठी दोन धर्म बहुउपकारक आहेत— समथ आणि विपस्सना." सहावे (सुत्त समाप्त). ๗. โคทตฺตสุตฺตํ ७. गोदत्तसुत्त ๓๔๙. เอกํ สมยํ อายสฺมา โคทตฺโต มจฺฉิกาสณฺเฑ วิหรติ อมฺพาฏกวเน. อถ โข จิตฺโต คหปติ เยนายสฺมา โคทตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ โคทตฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข จิตฺตํ คหปตึ อายสฺมา โคทตฺโต เอตทโวจ – ‘‘ยา จายํ, คหปติ, อปฺปมาณา เจโตวิมุตฺติ, ยา จ อากิญฺจญฺญา เจโตวิมุตฺติ, ยา จ สุญฺญตา เจโตวิมุตฺติ, ยา จ อนิมิตฺตา เจโตวิมุตฺติ, อิเม ธมฺมา นานตฺถา นานาพฺยญฺชนา อุทาหุ เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นาน’’นฺติ? ‘‘อตฺถิ, ภนฺเต, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม อิเม ธมฺมา นานตฺถา เจว นานาพฺยญฺชนา จ. อตฺถิ ปน, ภนฺเต, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม อิเม ธมฺมา เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นาน’’นฺติ. ३४९. एका वेळी आयुष्यमान गोदत्त मच्छिकाषण्ड येथील अम्बाटक वनात विहार करत होते. तेव्हा चित्त गृहपती जेथे आयुष्यमान गोदत्त होते तेथे गेले; आणि आयुष्यमान गोदत्त यांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीला आयुष्यमान गोदत्त म्हणाले— "गृहपती, ही जी अप्पमाण चेतोविमुत्ती (अप्रमाण चेतोविमुक्ती), आकिञ्चञ्ञ चेतोविमुत्ती (अकिंचन्य चेतोविमुक्ती), सुञ्ञता चेतोविमुत्ती (शून्यता चेतोविमुक्ती) आणि अनिमित्त चेतोविमुत्ती (निमित्तहीन चेतोविमुक्ती) आहे; हे धर्म अर्थानेही भिन्न आणि शब्दानेही भिन्न आहेत, की अर्थाने एकच असून केवळ शब्दानेच भिन्न आहेत?" "भन्ते, असा एक पर्याय (दृष्टिकोन) आहे, ज्या आधारे हे धर्म अर्थानेही भिन्न आहेत आणि शब्दानेही भिन्न आहेत. आणि भन्ते, असाही एक पर्याय आहे, ज्या आधारे हे धर्म अर्थाने एकच आहेत आणि केवळ शब्दानेच भिन्न आहेत." ‘‘กตโม จ, ภนฺเต, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม อิเม ธมฺมา นานตฺถา เจว นานาพฺยญฺชนา จ? อิธ, ภนฺเต, ภิกฺขุ เมตฺตาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ. อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ [Pg.486] เมตฺตาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. กรุณาสหคเตน เจตสา…เป… มุทิตาสหคเตน เจตสา…เป… อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ. อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. อยํ วุจฺจติ, ภนฺเต, อปฺปมาณา เจโตวิมุตฺติ. "आणि भन्ते, तो कोणता पर्याय आहे, ज्या आधारे हे धर्म अर्थानेही भिन्न आहेत आणि शब्दानेही भिन्न आहेत? येथे, भन्ते, भिक्खू मैत्रीयुक्त चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहार करतो, तसेच दुसऱ्या दिशेला, तिसऱ्या दिशेला आणि चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरपे, सर्वत्र, स्वतःप्रमाणेच सर्वांना, तो या संपूर्ण जगाला विस्तीर्ण, महान, अप्रमाण (असीम), वैररहित आणि व्यापादरहित (द्वेषरहित) अशा मैत्रीयुक्त चित्ताने व्यापून विहार करतो. करुणेने युक्त चित्ताने... मुदितेने युक्त चित्ताने... उपेक्षेने युक्त चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहार करतो, तसेच दुसऱ्या दिशेला, तिसऱ्या दिशेला आणि चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरपे, सर्वत्र, स्वतःप्रमाणेच सर्वांना, तो या संपूर्ण जगाला विस्तीर्ण, महान, अप्रमाण, वैररहित आणि व्यापादरहित अशा उपेक्षायुक्त चित्ताने व्यापून विहार करतो. भन्ते, याला 'अप्पमाण चेतोविमुत्ती' (अप्रमाण चेतोविमुक्ती) असे म्हणतात." ‘‘กตมา จ, ภนฺเต, อากิญฺจญฺญา เจโตวิมุตฺติ? อิธ, ภนฺเต, ภิกฺขุ สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม, ‘นตฺถิ กิญฺจี’ติ อากิญฺจญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ วุจฺจติ, ภนฺเต, อากิญฺจญฺญา เจโตวิมุตฺติ. "आणि भन्ते, 'आकिञ्चञ्ञ चेतोविमुत्ती' (अकिंचन्य चेतोविमुक्ती) कोणती आहे? येथे, भन्ते, भिक्खू सर्व प्रकारे विञ्ञाणञ्चायतनाचा (विज्ञानानंत्यायतन) अतिक्रम करून, 'काहीही नाही' (नत्थि किञ्चि) अशा भावनेने आकिञ्चञ्ञायतन (अकिंचन्यायतन) समापत्ती प्राप्त करून विहार करतो. भन्ते, याला 'आकिञ्चञ्ञ चेतोविमुत्ती' असे म्हणतात." ‘‘กตมา จ, ภนฺเต, สุญฺญตา เจโตวิมุตฺติ? อิธ, ภนฺเต, ภิกฺขุ อรญฺญคโต วา รุกฺขมูลคโต วา สุญฺญาคารคโต วา อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘สุญฺญมิทํ อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา’ติ. อยํ วุจฺจติ, ภนฺเต, สุญฺญตา เจโตวิมุตฺติ. "आणि भन्ते, 'सुञ्ञता चेतोविमुत्ती' (शून्यता चेतोविमुक्ती) कोणती आहे? येथे, भन्ते, भिक्खू अरण्यात जाऊन, किंवा वृक्षाच्या मुळाशी जाऊन, किंवा शून्य घरात (एकांतात) जाऊन असा विचार करतो— 'हे आत्म्यापासून किंवा आत्म्याच्या मालकीच्या गोष्टींपासून शून्य आहे.' भन्ते, याला 'सुञ्ञता चेतोविमुत्ती' असे म्हणतात." ‘‘กตมา จ, ภนฺเต, อนิมิตฺตา เจโตวิมุตฺติ? อิธ, ภนฺเต, ภิกฺขุ สพฺพนิมิตฺตานํ อมนสิการา อนิมิตฺตํ เจโตสมาธึ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ วุจฺจติ, ภนฺเต, อนิมิตฺตา เจโตวิมุตฺติ. อยํ โข, ภนฺเต, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม อิเม ธมฺมา นานตฺถา เจว นานาพฺยญฺชนา จ. "आणि भन्ते, 'अनिमित्त चेतोविमुत्ती' (निमित्तहीन चेतोविमुक्ती) कोणती आहे? येथे, भन्ते, भिक्खू सर्व प्रकारच्या निमित्तांकडे (चिन्हांकडे) दुर्लक्ष करून (मनात न आणता), अनिमित्त चेतोसमाधी प्राप्त करून विहार करतो. भन्ते, याला 'अनिमित्त चेतोविमुत्ती' असे म्हणतात. भन्ते, हाच तो पर्याय आहे, ज्या आधारे हे धर्म अर्थानेही भिन्न आहेत आणि शब्दानेही भिन्न आहेत." ‘‘กตโม จ, ภนฺเต, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม อิเม ธมฺมา เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นานํ? ราโค, ภนฺเต, ปมาณกรโณ, โทโส ปมาณกรโณ, โมโห ปมาณกรโณ. เต ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ปหีนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. ยาวตา โข, ภนฺเต, อปฺปมาณา เจโตวิมุตฺติโย, อกุปฺปา ตาสํ เจโตวิมุตฺติ อคฺคมกฺขายติ. สา โข ปน อกุปฺปา เจโตวิมุตฺติ สุญฺญา ราเคน, สุญฺญา โทเสน, สุญฺญา โมเหน. ราโค โข, ภนฺเต, กิญฺจนํ, โทโส กิญฺจนํ, โมโห กิญฺจนํ. เต ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ปหีนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. ยาวตา โข, ภนฺเต, อากิญฺจญฺญา เจโตวิมุตฺติโย, อกุปฺปา ตาสํ เจโตวิมุตฺติ อคฺคมกฺขายติ. สา โข [Pg.487] ปน อกุปฺปา เจโตวิมุตฺติ สุญฺญา ราเคน, สุญฺญา โทเสน, สุญฺญา โมเหน. ราโค โข, ภนฺเต, นิมิตฺตกรโณ, โทโส นิมิตฺตกรโณ, โมโห นิมิตฺตกรโณ. เต ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ปหีนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. ยาวตา โข, ภนฺเต, อนิมิตฺตา เจโตวิมุตฺติโย, อกุปฺปา ตาสํ เจโตวิมุตฺติ อคฺคมกฺขายติ. สา โข ปน อกุปฺปา เจโตวิมุตฺติ สุญฺญา ราเคน, สุญฺญา โทเสน, สุญฺญา โมเหน. อยํ โข, ภนฺเต, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม อิเม ธมฺมา เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นาน’’นฺติ. ‘‘ลาภา เต, คหปติ, สุลทฺธํ เต, คหปติ! ยสฺส เต คมฺภีเร พุทฺธวจเน ปญฺญาจกฺขุ กมตี’’ติ. สตฺตมํ. “भन्ते, ती कोणती पद्धत (पर्याय) आहे, ज्या आधारे हे धर्म अर्थाने एकच आहेत आणि केवळ त्यांच्या व्यंजनांमध्ये (शब्दांमध्ये) भिन्नता आहे? भन्ते, राग (आसक्ती) हा मर्यादा निर्माण करणारा आहे, द्वेष हा मर्यादा निर्माण करणारा आहे, आणि मोह हा मर्यादा निर्माण करणारा आहे. ज्या भिक्खूचे आसव नष्ट झाले आहेत (क्षीणासव), त्याने हे नष्ट केले आहेत, मुळापासून उपटून टाकले आहेत, ताडाच्या बुंध्यासारखे केले आहेत, नामशेष केले आहेत, जेणेकरून भविष्यात ते पुन्हा उत्पन्न होणार नाहीत. भन्ते, जितक्या काही अमर्याद चित्तविमुक्ती (अप्पमाणा चेतोविमुत्ती) आहेत, त्या सर्वांमध्ये अकुप्पा (अकंप्य) चित्तविमुक्ती ही सर्वश्रेष्ठ मानली जाते. ती अकुप्पा चित्तविमुक्ती रागापासून शून्य आहे, द्वेषापासून शून्य आहे, मोहापासून शून्य आहे. भन्ते, राग हा अडथळा (किंचन) आहे, द्वेष हा अडथळा आहे, मोह हा अडथळा आहे. ज्या भिक्खूचे आसव नष्ट झाले आहेत, त्याने हे नष्ट केले आहेत, मुळापासून उपटून टाकले आहेत, ताडाच्या बुंध्यासारखे केले आहेत, नामशेष केले आहेत, जेणेकरून भविष्यात ते पुन्हा उत्पन्न होणार नाहीत. भन्ते, जितक्या काही आकिंचन्या (अकिंचनत्व) चित्तविमुक्ती आहेत, त्या सर्वांमध्ये अकुप्पा चित्तविमुक्ती ही सर्वश्रेष्ठ मानली जाते. ती अकुप्पा चित्तविमुक्ती रागापासून शून्य आहे, द्वेषापासून शून्य आहे, मोहापासून शून्य आहे. भन्ते, राग हा निमित्त (चिन्ह) निर्माण करणारा आहे, द्वेष हा निमित्त निर्माण करणारा आहे, मोह हा निमित्त निर्माण करणारा आहे. ज्या भिक्खूचे आसव नष्ट झाले आहेत, त्याने हे नष्ट केले आहेत, मुळापासून उपटून टाकले आहेत, ताडाच्या बुंध्यासारखे केले आहेत, नामशेष केले आहेत, जेणेकरून भविष्यात ते पुन्हा उत्पन्न होणार नाहीत. भन्ते, जितक्या काही अनिमित्त चित्तविमुक्ती आहेत, त्या सर्वांमध्ये अकुप्पा चित्तविमुक्ती ही सर्वश्रेष्ठ मानली जाते. ती अकुप्पा चित्तविमुक्ती रागापासून शून्य आहे, द्वेषापासून शून्य आहे, मोहापासून शून्य आहे. भन्ते, हीच ती पद्धत आहे, ज्या आधारे हे धर्म अर्थाने एकच आहेत आणि केवळ त्यांच्या व्यंजनांमध्ये (शब्दांमध्ये) भिन्नता आहे.” “हे गृहपती, हा तुझा लाभ आहे! हे गृहपती, तुला हे उत्तम प्रकारे प्राप्त झाले आहे! कारण तुझी प्रज्ञाचक्षू भगवंतांच्या या गंभीर वचनांमध्ये प्रवेश करते.” सातवे (सुत्त समाप्त). ๘. นิคณฺฐนาฏปุตฺตสุตฺตํ ८. निगण्ठ नाटपुत्त सुत्त ๓๕๐. เตน โข ปน สมเยน นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต มจฺฉิกาสณฺฑํ อนุปฺปตฺโต โหติ มหติยา นิคณฺฐปริสาย สทฺธึ. อสฺโสสิ โข จิตฺโต คหปติ – ‘‘นิคณฺโฐ กิร นาฏปุตฺโต มจฺฉิกาสณฺฑํ อนุปฺปตฺโต มหติยา นิคณฺฐปริสาย สทฺธิ’’นฺติ. อถ โข จิตฺโต คหปติ สมฺพหุเลหิ อุปาสเกหิ สทฺธึ เยน นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา นิคณฺเฐน นาฏปุตฺเตน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข จิตฺตํ คหปตึ นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต เอตทโวจ – ‘‘สทฺทหสิ ตฺวํ, คหปติ, สมณสฺส โคตมสฺส – อตฺถิ อวิตกฺโก อวิจาโร สมาธิ, อตฺถิ วิตกฺกวิจารานํ นิโรโธ’’ติ? ३५०. त्या वेळी निगण्ठ नाटपुत्त आपल्या मोठ्या निगण्ठ अनुयायांच्या समूहासह मच्छिकाषण्ड येथे आलेला होता. चित्त गृहपतीने ऐकले की, “निगण्ठ नाटपुत्त आपल्या मोठ्या निगण्ठ अनुयायांच्या समूहासह मच्छिकाषण्ड येथे आलेला आहे.” तेव्हा चित्त गृहपती अनेक उपासकांसह जेथे निगण्ठ नाटपुत्त होता तेथे गेला. तेथे जाऊन त्याने निगण्ठ नाटपुत्त याच्याशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीला निगण्ठ नाटपुत्त म्हणाला, “गृहपती, श्रमण गोतमांच्या या गोष्टीवर तुझा विश्वास आहे का की, ‘वितर्क आणि विचार नसलेली समाधी (अवितक्क अविचार समाधी) असते, आणि वितर्क व विचारांचा निरोध (लय) होतो’?” ‘‘น ขฺวาหํ เอตฺถ, ภนฺเต, ภควโต สทฺธาย คจฺฉามิ. อตฺถิ อวิตกฺโก อวิจาโร สมาธิ, อตฺถิ วิตกฺกวิจารานํ นิโรโธ’’ติ. เอวํ วุตฺเต, นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต อุลฺโลเกตฺวา เอตทโวจ – ‘‘อิทํ ภวนฺโต ปสฺสนฺตุ, ยาว อุชุโก จายํ จิตฺโต คหปติ, ยาว อสโฐ จายํ จิตฺโต คหปติ, ยาว อมายาวี จายํ จิตฺโต คหปติ, วาตํ วา โส ชาเลน พาเธตพฺพํ มญฺเญยฺย, โย วิตกฺกวิจาเร นิโรเธตพฺพํ มญฺเญยฺย[Pg.488], สกมุฏฺฐินา วา โส คงฺคาย โสตํ อาวาเรตพฺพํ มญฺเญยฺย, โย วิตกฺกวิจาเร นิโรเธตพฺพํ มญฺเญยฺยา’’ติ. “भन्ते, या बाबतीत मी केवळ भगवंतांवर श्रद्धा ठेवून चालत नाही की, ‘वितर्क आणि विचार नसलेली समाधी असते, आणि वितर्क व विचारांचा निरोध होतो’.” असे म्हटल्यावर, निगण्ठ नाटपुत्ताने आपल्या अनुयायांकडे अभिमानाने पाहत म्हटले, “महाशयांनो, हे पहा! हा चित्त गृहपती किती सरळ आहे! हा चित्त गृहपती किती निष्कपट आहे! हा चित्त गृहपती किती माया नसलेला (प्रामाणिक) आहे! जो कोणी असे मानतो की वितर्क आणि विचारांचा निरोध केला जाऊ शकतो, तो जाळ्याने वारा पकडता येईल असे मानण्यासारखे आहे, किंवा आपल्या मुठीने गंगा नदीचा प्रवाह रोखता येईल असे मानण्यासारखे आहे.” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, ภนฺเต, กตมํ นุ โข ปณีตตรํ – ญาณํ วา สทฺธา วา’’ติ? ‘‘สทฺธาย โข, คหปติ, ญาณํเยว ปณีตตร’’นฺติ. ‘‘อหํ โข, ภนฺเต, ยาวเทว อากงฺขามิ, วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. อหํ โข, ภนฺเต, ยาวเทว อากงฺขามิ, วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา…เป… ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. อหํ โข, ภนฺเต, ยาวเทว อากงฺขามิ, ปีติยา จ วิราคา…เป… ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. อหํ โข, ภนฺเต, ยาวเทว อากงฺขามิ, สุขสฺส จ ปหานา…เป… จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. น โส ขฺวาหํ, ภนฺเต, เอวํ ชานนฺโต เอวํ ปสฺสนฺโต กสฺส อญฺญสฺส สมณสฺส วา พฺราหฺมณสฺส วา สทฺธาย คมิสฺสามิ? อตฺถิ อวิตกฺโก อวิจาโร สมาธิ, อตฺถิ วิตกฺกวิจารานํ นิโรโธ’’ติ. “भन्ते, तुम्हाला काय वाटते, ज्ञान आणि श्रद्धा या दोन्हीपैकी काय अधिक श्रेष्ठ आहे?” “गृहपती, श्रद्धेपेक्षा ज्ञानच अधिक श्रेष्ठ आहे.” “भन्ते, मला जेव्हा जेव्हा इच्छा होते, तेव्हा मी कामभोगांपासून अलिप्त होऊन, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, वितर्क आणि विचारांसह असलेल्या, विवेकापासून उत्पन्न झालेल्या प्रीती आणि सुखाने युक्त अशा पहिल्या ध्यानात (प्रथम ध्यान) प्रवेश करून विहरतो. भन्ते, मला जेव्हा जेव्हा इच्छा होते, तेव्हा वितर्क आणि विचारांच्या शांत होण्याने... (पूर्ववत)... दुसऱ्या ध्यानात प्रवेश करून विहरतो. भन्ते, मला जेव्हा जेव्हा इच्छा होते, तेव्हा प्रीतीचाही विराग झाल्यामुळे... (पूर्ववत)... तिसऱ्या ध्यानात प्रवेश करून विहरतो. भन्ते, मला जेव्हा जेव्हा इच्छा होते, तेव्हा सुखाचाही त्याग केल्यामुळे... (पूर्ववत)... चौथ्या ध्यानात प्रवेश करून विहरतो. भन्ते, अशा प्रकारे जाणणारा आणि पाहणारा मी, ‘वितर्क आणि विचार नसलेली समाधी असते, आणि वितर्क व विचारांचा निरोध होतो’ या गोष्टीसाठी इतर कोणत्या श्रमणावर किंवा ब्राह्मणावर श्रद्धा ठेवून का जाईन?” เอวํ วุตฺเต, นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต สกํ ปริสํ อปโลเกตฺวา เอตทโวจ – ‘‘อิทํ ภวนฺโต ปสฺสนฺตุ, ยาว อนุชุโก จายํ จิตฺโต คหปติ, ยาว สโฐ จายํ จิตฺโต คหปติ, ยาว มายาวี จายํ จิตฺโต คหปตี’’ติ. असे म्हटल्यावर, निगण्ठ नाटपुत्ताने आपल्या अनुयायांकडे तिरकस नजरेने पाहत म्हटले, “महाशयांनो, हे पहा! हा चित्त गृहपती किती कुटिल (असरळ) आहे! हा चित्त गृहपती किती धूर्त (सठ) आहे! हा चित्त गृहपती किती कपटी (मायी) आहे!” ‘‘อิทาเนว โข เต มยํ, ภนฺเต, ภาสิตํ – ‘เอวํ อาชานาม อิทํ ภวนฺโต ปสฺสนฺตุ, ยาว อุชุโก จายํ จิตฺโต คหปติ, ยาว อสโฐ จายํ จิตฺโต คหปติ, ยาว อมายาวี จายํ จิตฺโต คหปตี’ติ. อิทาเนว จ ปน มยํ, ภนฺเต, ภาสิตํ – ‘เอวํ อาชานาม อิทํ ภวนฺโต ปสฺสนฺตุ, ยาว อนุชุโก จายํ จิตฺโต คหปติ, ยาว สโฐ จายํ จิตฺโต คหปติ, ยาว มายาวี จายํ จิตฺโต คหปตี’ติ. สเจ เต, ภนฺเต, ปุริมํ สจฺจํ, ปจฺฉิมํ เต มิจฺฉา. สเจ ปน เต, ภนฺเต, ปุริมํ มิจฺฉา, ปจฺฉิมํ เต สจฺจํ. อิเม โข ปน, ภนฺเต, ทส สหธมฺมิกา ปญฺหา อาคจฺฉนฺติ. ยทา เนสํ อตฺถํ อาชาเนยฺยาสิ, อถ มํ ปฏิหเรยฺยาสิ สทฺธึ นิคณฺฐปริสาย. เอโก ปญฺโห, เอโก อุทฺเทโส, เอกํ เวยฺยากรณํ. ทฺเว ปญฺหา, ทฺเว อุทฺเทสา, ทฺเว เวยฺยากรณานิ. ตโย ปญฺหา, ตโย อุทฺเทสา, ตีณิ เวยฺยากรณานิ. จตฺตาโร ปญฺหา, จตฺตาโร อุทฺเทสา, จตฺตาริ [Pg.489] เวยฺยากรณานิ. ปญฺจ ปญฺหา, ปญฺจ อุทฺเทสา, ปญฺจ เวยฺยากรณานิ. ฉ ปญฺหา, ฉ อุทฺเทสา, ฉ เวยฺยากรณานิ. สตฺต ปญฺหา, สตฺต อุทฺเทสา, สตฺต เวยฺยากรณานิ. อฏฺฐ ปญฺหา, อฏฺฐ อุทฺเทสา, อฏฺฐ เวยฺยากรณานิ. นว ปญฺหา, นว อุทฺเทสา, นว เวยฺยากรณานิ. ทส ปญฺหา, ทส อุทฺเทสา, ทส เวยฺยากรณานี’’ติ. อถ โข จิตฺโต คหปติ นิคณฺฐํ นาฏปุตฺตํ อิเม ทส สหธมฺมิเก ปญฺเห อาปุจฺฉิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกามีติ. อฏฺฐมํ. "भन्ते, नुकतेच आम्ही आपले हे बोलणे ऐकले - 'अहो सज्जनो, हे पहा! हा चित्त गृहपती किती सरळ आहे, हा चित्त गृहपती किती निष्कपट आहे, हा चित्त गृहपती किती मायारहित आहे!' आणि आता लगेचच आम्ही आपले हे बोलणे ऐकतो - 'अहो सज्जनो, हे पहा! हा चित्त गृहपती किती कुटिल आहे, हा चित्त गृहपती किती कपटी आहे, हा चित्त गृहपती किती मायावी आहे!' भन्ते, जर तुमचे पहिले विधान सत्य असेल, तर तुमचे नंतरचे विधान असत्य आहे. आणि जर तुमचे पहिले विधान असत्य असेल, तर तुमचे नंतरचे विधान सत्य आहे. भन्ते, हे दहा सकारण प्रश्न उपस्थित होतात. जेव्हा तुम्हाला त्यांचा अर्थ समजेल, तेव्हा तुम्ही तुमच्या निगंठ परिषदेसह मला उत्तर द्यावे. एक प्रश्न, एक उद्देश, एक व्याकरण. दोन प्रश्न, दोन उद्देश, दोन व्याकरणे. तीन प्रश्न, तीन उद्देश, तीन व्याकरणे. चार प्रश्न, चार उद्देश, चार व्याकरणे. पाच प्रश्न, पाच उद्देश, पाच व्याकरणे. सहा प्रश्न, सहा उद्देश, सहा व्याकरणे. सात प्रश्न, सात उद्देश, सात व्याकरणे. आठ प्रश्न, आठ उद्देश, आठ व्याकरणे. नऊ प्रश्न, नऊ उद्देश, नऊ व्याकरणे. दहा प्रश्न, दहा उद्देश, दहा व्याकरणे." त्यानंतर चित्त गृहपतीने निगंठ नातपुत्ताला हे दहा सकारण प्रश्न विचारून आपल्या आसनावरून उठून तेथून प्रस्थान केले. आठवे सूत्र समाप्त. ๙. อเจลกสฺสปสุตฺตํ ९. अचेलकस्सपसुत्त ๓๕๑. เตน โข ปน สมเยน อเจโล กสฺสโป มจฺฉิกาสณฺฑํ อนุปฺปตฺโต โหติ จิตฺตสฺส คหปติโน ปุราณคิหิสหาโย. อสฺโสสิ โข จิตฺโต คหปติ – ‘‘อเจโล กิร กสฺสโป มจฺฉิกาสณฺฑํ อนุปฺปตฺโต อมฺหากํ ปุราณคิหิสหาโย’’ติ. อถ โข จิตฺโต คหปติ เยน อเจโล กสฺสโป เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อเจเลน กสฺสเปน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จิตฺโต คหปติ อเจลํ กสฺสปํ เอตทโวจ – ‘‘กีวจิรํ ปพฺพชิตสฺส, ภนฺเต, กสฺสปา’’ติ? ‘‘ตึสมตฺตานิ โข เม, คหปติ, วสฺสานิ ปพฺพชิตสฺสา’’ติ. ‘‘อิเมหิ ปน เต, ภนฺเต, ตึสมตฺเตหิ วสฺเสหิ อตฺถิ โกจิ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสโส อธิคโต ผาสุวิหาโร’’ติ? ‘‘อิเมหิ โข เม, คหปติ, ตึสมตฺเตหิ วสฺเสหิ ปพฺพชิตสฺส นตฺถิ โกจิ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสโส อธิคโต ผาสุวิหาโร, อญฺญตฺร นคฺเคยฺยา จ มุณฺเฑยฺยา จ ปาวฬนิปฺโผฏนาย จา’’ติ. เอวํ วุตฺเต, จิตฺโต คหปติ อเจลํ กสฺสปํ เอตทโวจ – ‘‘อจฺฉริยํ วต, โภ, อพฺภุตํ วต, โภ! ธมฺมสฺส สฺวากฺขาตตา ยตฺร หิ นาม ตึสมตฺเตหิ วสฺเสหิ น โกจิ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสโส อธิคโต อภวิสฺส ผาสุวิหาโร, อญฺญตฺร นคฺเคยฺยา จ มุณฺเฑยฺยา จ ปาวฬนิปฺโผฏนาย จา’’ติ! ३५१. त्या वेळी चित्त गृहपतीचा गृहस्थजीवनातील जुना मित्र असलेला अचेल कस्सप मच्छिकाखंड येथे आला होता. चित्त गृहपतीने ऐकले की, 'आमचा गृहस्थजीवनातील जुना मित्र अचेल कस्सप मच्छिकाखंड येथे आला आहे.' तेव्हा चित्त गृहपती जेथे अचेल कस्सप होता तेथे गेला; आणि तेथे पोहोचून त्याने अचेल कस्सपशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी व संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीने अचेल कस्सपला विचारले, 'भन्ते कस्सप, तुम्हाला प्रव्रजित होऊन किती काळ झाला आहे?' 'गृहपती, मला प्रव्रजित होऊन सुमारे तीस वर्षे झाली आहेत.' 'पण भन्ते, या तीस वर्षांत तुम्हाला मानवी धर्मापलीकडचे, आर्यांना योग्य असे कोणतेही विशेष ज्ञान-दर्शन किंवा सुखाचा विहार प्राप्त झाला आहे का?' 'गृहपती, प्रव्रजित झाल्यापासून या तीस वर्षांत मला नग्न राहणे, मुंडण करणे आणि आसन स्वच्छ करण्यासाठी मोरपिसांचा झाडू वापरणे याशिवाय मानवी धर्मापलीकडचे, आर्यांना योग्य असे कोणतेही विशेष ज्ञान-दर्शन किंवा सुखाचा विहार प्राप्त झालेला नाही.' असे म्हटल्यावर चित्त गृहपती अचेल कस्सपला म्हणाला, 'आश्चर्य आहे, हे महाशय! अद्भुत आहे, हे महाशय! धम्माचे सुविख्यातत्व पहा, की तीस वर्षांनंतरही नग्न राहणे, मुंडण करणे आणि आसन स्वच्छ करण्यासाठी मोरपिसांचा झाडू वापरणे याशिवाय मानवी धर्मापलीकडचे, आर्यांना योग्य असे कोणतेही विशेष ज्ञान-दर्शन किंवा सुखाचा विहार प्राप्त होऊ शकला नाही!' ‘‘ตุยฺหํ ปน, คหปติ, กีวจิรํ อุปาสกตฺตํ อุปคตสฺสา’’ติ? ‘‘มยฺหมฺปิ โข ปน, ภนฺเต, ตึสมตฺตานิ วสฺสานิ อุปาสกตฺตํ อุปคตสฺสา’’ติ. ‘‘อิเมหิ ปน เต, คหปติ, ตึสมตฺเตหิ วสฺเสหิ อตฺถิ โกจิ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสโส [Pg.490] อธิคโต ผาสุวิหาโร’’ติ? ‘‘คิหิโนปิ สิยา, ภนฺเต. อหญฺหิ, ภนฺเต, ยาวเทว อากงฺขามิ, วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. อหญฺหิ, ภนฺเต, ยาวเทว อากงฺขามิ, วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา …เป… ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. อหญฺหิ, ภนฺเต, ยาวเทว อากงฺขามิ, ปีติยา จ วิราคา…เป… ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. อหญฺหิ, ภนฺเต, ยาวเทว อากงฺขามิ, สุขสฺส จ ปหานา…เป… จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. สเจ โข ปนาหํ, ภนฺเต, ภควโต ปฐมตรํ กาลํ กเรยฺยํ, อนจฺฉริยํ โข ปเนตํ ยํ มํ ภควา เอวํ พฺยากเรยฺย – ‘นตฺถิ ตํ สํโยชนํ เยน สํโยชเนน สํยุตฺโต จิตฺโต คหปติ ปุน อิมํ โลกํ อาคจฺเฉยฺยา’’’ติ. เอวํ วุตฺเต, อเจโล กสฺสโป จิตฺตํ คหปตึ เอตทโวจ – ‘‘อจฺฉริยํ วต โภ, อพฺภุตํ วต โภ! ธมฺมสฺส สฺวากฺขาตตา, ยตฺร หิ นาม คิหี โอทาตวสโน เอวรูปํ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ อธิคมิสฺสติ ผาสุวิหารํ. ลเภยฺยาหํ, คหปติ, อิมสฺมึ ธมฺมวินเย ปพฺพชฺชํ, ลเภยฺยํ อุปสมฺปท’’นฺติ. 'पण गृहपती, तुला उपासकत्व पत्करून किती काळ झाला आहे?' 'भन्ते, मलाही उपासकत्व पत्करून सुमारे तीस वर्षे झाली आहेत.' 'पण गृहपती, या तीस वर्षांत तुला मानवी धर्मापलीकडचे, आर्यांना योग्य असे कोणतेही विशेष ज्ञान-दर्शन किंवा सुखाचा विहार प्राप्त झाला आहे का?' 'भन्ते, गृहस्थालाही ते प्राप्त होऊ शकते. मी, भन्ते, जेव्हा जेव्हा इच्छितो, तेव्हा कामभोगांपासून अलिप्त होऊन, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, वितर्क आणि विचारांसह, विवेकापासून उत्पन्न झालेले प्रीती व सुख असणारे पहिले ध्यान प्राप्त करून विहार करतो. मी, भन्ते, जेव्हा जेव्हा इच्छितो, तेव्हा वितर्क आणि विचारांच्या शांत होण्याने... दुसरे ध्यान प्राप्त करून विहार करतो. मी, भन्ते, जेव्हा जेव्हा इच्छितो, प्रीतीच्या विरागाने... तिसरे ध्यान प्राप्त करून विहार करतो. मी, भन्ते, जेव्हा जेव्हा इच्छितो, सुखाचा त्याग केल्याने... चौथे ध्यान प्राप्त करून विहार करतो. भन्ते, जर मी भगवंतांच्या आधी मृत्यू पावलो, तर भगवंतांनी माझ्याविषयी असे घोषित करणे यात काही आश्चर्य नाही की - 'असे कोणतेही बंधन शिल्लक नाही, ज्या बंधनाने बांधला जाऊन चित्त गृहपती पुन्हा या जगात येईल.' असे म्हटल्यावर अचेल कस्सप चित्त गृहपतीला म्हणाला, 'आश्चर्य आहे, हे महाशय! अद्भुत आहे, हे महाशय! धम्माचे सुविख्यातत्व पहा, की पांढरे वस्त्र परिधान करणारा गृहस्थसुद्धा अशा प्रकारचा मानवी धर्मापलीकडचा, आर्यांना योग्य असा विशेष ज्ञान-दर्शन रूप सुखाचा विहार प्राप्त करू शकतो! गृहपती, मला या धम्म आणि विनयामध्ये प्रव्रज्या मिळावी, मला उपसंपदा मिळावी.' อถ โข จิตฺโต คหปติ อเจลํ กสฺสปํ อาทาย เยน เถรา ภิกฺขู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เถเร ภิกฺขู เอตทโวจ – ‘‘อยํ, ภนฺเต, อเจโล กสฺสโป อมฺหากํ ปุราณคิหิสหาโย. อิมํ เถรา ปพฺพาเชนฺตุ อุปสมฺปาเทนฺตุ. อหมสฺส อุสฺสุกฺกํ กริสฺสามิ จีวรปิณฺฑปาตเสนาสนคิลานปฺปจฺจยเภสชฺชปริกฺขาราน’’นฺติ. อลตฺถ โข อเจโล กสฺสโป อิมสฺมึ ธมฺมวินเย ปพฺพชฺชํ, อลตฺถ อุปสมฺปทํ. อจิรูปสมฺปนฺโน จ ปนายสฺมา กสฺสโป เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรนฺโต นจิรสฺเสว – ยสฺสตฺถาย กุลปุตฺตา สมฺมเทว อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชนฺติ, ตทนุตฺตรํ พฺรหฺมจริยปริโยสานํ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหาสิ. ‘‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’’ติ อพฺภญฺญาสิ. อญฺญตโร จ ปนายสฺมา กสฺสโป อรหตํ อโหสีติ. นวมํ. त्यानंतर चित्त गृहपतीने अचेल कस्सपला सोबत घेतले आणि जेथे थेर भिक्खू होते तेथे तो गेला; तेथे जाऊन तो थेर भिक्खूंना म्हणाला, 'भन्ते, हा अचेल कस्सप आमचा गृहस्थजीवनातील जुना मित्र आहे. थेर भिक्खूंनी याला प्रव्रज्या द्यावी आणि उपसंपदा द्यावी. मी याच्यासाठी चीवर, पिंडपात, शयनासन आणि आजारपणातील औषधोपचार या सर्व गरजा पुरवण्याची जबाबदारी घेतो.' अशा प्रकारे अचेल कस्सपला या धम्म आणि विनयामध्ये प्रव्रज्या मिळाली आणि उपसंपदा मिळाली. उपसंपदा मिळाल्यानंतर लवकरच आयुष्यमान कस्सप एकटे, जनसमुदायापासून दूर, अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करू लागले. ज्या ध्येयासाठी कुलपुत्र योग्य रीतीने घरादाराचा त्याग करून अनगारिक अवस्थेत प्रव्रजित होतात, ते ब्रह्मचर्याचे सर्वश्रेष्ठ अंतिम ध्येय त्यांनी याच जन्मात स्वतः अभिज्ञाद्वारे साक्षात करून प्राप्त केले. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर दुसरा कोणताही जन्म नाही,' हे त्यांनी प्रत्यक्ष जाणले. आणि आयुष्यमान कस्सप अर्हतांपैकी एक झाले. नववे सूत्र समाप्त. ๑๐. คิลานทสฺสนสุตฺตํ १०. गिलाणदस्सनसुत्त ๓๕๒. เตน [Pg.491] โข ปน สมเยน จิตฺโต คหปติ อาพาธิโก โหติ ทุกฺขิโต พาฬฺหคิลาโน. อถ โข สมฺพหุลา อารามเทวตา วนเทวตา รุกฺขเทวตา โอสธิติณวนปฺปตีสุ อธิวตฺถา เทวตา สงฺคมฺม สมาคมฺม จิตฺตํ คหปตึ เอตทโวจุํ – ‘‘ปณิเธหิ, คหปติ, อนาคตมทฺธานํ ราชา อสฺสํ จกฺกวตฺตี’’ติ. ३५२. त्या वेळी चित्त गृहपती आजारी, दुःखी आणि अत्यंत आजारी होते. तेव्हा अनेक आरामदेवता, वनदेवता, वृक्षदेवता आणि औषधी वनस्पती, गवत व वनवृक्षांवर अधिवास करणाऱ्या देवता एकत्र येऊन, एकत्र जमून चित्त गृहपतीला असे म्हणाल्या – "गृहपती, भविष्यात मी चक्रवर्ती राजा व्हावे, अशी आकांक्षा कर." เอวํ วุตฺเต, จิตฺโต คหปติ ตา อารามเทวตา วนเทวตา รุกฺขเทวตา โอสธิติณวนปฺปตีสุ อธิวตฺถา เทวตา เอตทโวจ – ‘‘ตมฺปิ อนิจฺจํ, ตมฺปิ อทฺธุวํ, ตมฺปิ ปหาย คมนีย’’นฺติ. เอวํ วุตฺเต, จิตฺตสฺส คหปติโน มิตฺตามจฺจา ญาติสาโลหิตา จิตฺตํ คหปตึ เอตทโวจุํ – ‘‘สตึ, อยฺยปุตฺต, อุปฏฺฐเปหิ, มา วิปฺปลปี’’ติ. ‘‘กึ ตาหํ วทามิ ยํ มํ ตุมฺเห เอวํ วเทถ – ‘สตึ, อยฺยปุตฺต, อุปฏฺฐเปหิ, มา วิปฺปลปี’’’ติ? ‘‘เอวํ โข ตฺวํ, อยฺยปุตฺต, วเทสิ – ‘ตมฺปิ อนิจฺจํ, ตมฺปิ อทฺธุวํ, ตมฺปิ ปหาย คมนีย’’’นฺติ. ‘‘ตถา หิ ปน มํ อารามเทวตา วนเทวตา รุกฺขเทวตา โอสธิติณวนปฺปตีสุ อธิวตฺถา เทวตา เอวมาหํสุ – ‘ปณิเธหิ, คหปติ, อนาคตมทฺธานํ ราชา อสฺสํ จกฺกวตฺตี’ติ. ตาหํ เอวํ วทามิ – ‘ตมฺปิ อนิจฺจํ…เป… ตมฺปิ ปหาย คมนีย’’’นฺติ. ‘‘กึ ปน ตา, อยฺยปุตฺต, อารามเทวตา วนเทวตา รุกฺขเทวตา โอสธิติณวนปฺปตีสุ อธิวตฺถา เทวตา อตฺถวสํ สมฺปสฺสมานา เอวมาหํสุ – ‘ปณิเธหิ, คหปติ, อนาคตมทฺธานํ ราชา อสฺสํ จกฺกวตฺตี’’’ติ? ‘‘ตาสํ โข อารามเทวตานํ วนเทวตานํ รุกฺขเทวตานํ โอสธิติณวนปฺปตีสุ อธิวตฺถานํ เทวตานํ เอวํ โหติ – ‘อยํ โข จิตฺโต คหปติ, สีลวา กลฺยาณธมฺโม. สเจ ปณิทหิสฺสติ – อนาคตมทฺธานํ ราชา อสฺสํ จกฺกวตฺตี’ติ, ‘ตสฺส โข อยํ อิชฺฌิสฺสติ, สีลวโต เจโตปณิธิ วิสุทฺธตฺตา ธมฺมิโก ธมฺมิกํ ผลํ อนุปสฺสตี’ติ. อิมํ โข ตา อารามเทวตา วนเทวตา รุกฺขเทวตา โอสธิติณวนปฺปตีสุ อธิวตฺถา เทวตา อตฺถวสํ สมฺปสฺสมานา เอวมาหํสุ – ‘ปณิเธหิ, คหปติ, อนาคตมทฺธานํ ราชา อสฺสํ จกฺกวตฺตี’ติ. ตาหํ เอวํ วทามิ – ‘ตมฺปิ อนิจฺจํ, ตมฺปิ อทฺธุวํ, ตมฺปิ ปหาย คมนีย’’’นฺติ. असे म्हटले असता, चित्त गृहपती त्या आरामदेवता, वनदेवता, वृक्षदेवता आणि औषधी वनस्पती, गवत व वनवृक्षांवर अधिवास करणाऱ्या देवतांना म्हणाले – "ते देखील अनित्य आहे, ते देखील अध्रुव आहे, ते देखील सोडून जावे लागणारे आहे." असे म्हटले असता, चित्त गृहपतीचे मित्र, अमात्य, नातेवाईक आणि सगेसोयरे चित्त गृहपतीला म्हणाले – "आर्यपुत्र, स्मृती जागृत ठेवा, बडबडू नका." "मी असे काय बोलत आहे की तुम्ही मला असे म्हणत आहात – 'आर्यपुत्र, स्मृती जागृत ठेवा, बडबडू नका'?" "आर्यपुत्र, आपण असे म्हणालात – 'ते देखील अनित्य आहे, ते देखील अध्रुव आहे, ते देखील सोडून जावे लागणारे आहे.'" "कारण आरामदेवता, वनदेवता, वृक्षदेवता आणि औषधी वनस्पती, गवत व वनवृक्षांवर अधिवास करणाऱ्या देवता मला असे म्हणाल्या होत्या – 'गृहपती, भविष्यात मी चक्रवर्ती राजा व्हावे, अशी आकांक्षा कर.' म्हणून मी त्यांना असे म्हणालो – 'ते देखील अनित्य आहे... पे... ते देखील सोडून जावे लागणारे आहे.'" "पण आर्यपुत्र, त्या आरामदेवता, वनदेवता, वृक्षदेवता आणि औषधी वनस्पती, गवत व वनवृक्षांवर अधिवास करणाऱ्या देवता कोणता विशेष लाभ पाहून असे म्हणाल्या – 'गृहपती, भविष्यात मी चक्रवर्ती राजा व्हावे, अशी आकांक्षा कर'?" "त्या आरामदेवता, वनदेवता, वृक्षदेवता आणि औषधी वनस्पती, गवत व वनवृक्षांवर अधिवास करणाऱ्या देवतांच्या मनात असा विचार आला – 'हा चित्त गृहपती शीलवान व कल्याणधर्मी आहे. जर त्याने भविष्यात मी चक्रवर्ती राजा व्हावे अशी आकांक्षा केली, तर त्याच्या शीलाच्या शुद्धतेमुळे त्याची ही मनोआकांक्षा पूर्ण होईल. धार्मिक व्यक्तीला धार्मिक फळच मिळते.' हा विशेष लाभ पाहून त्या आरामदेवता, वनदेवता, वृक्षदेवता आणि औषधी वनस्पती, गवत व वनवृक्षांवर अधिवास करणाऱ्या देवतांनी मला असे म्हटले – 'गृहपती, भविष्यात मी चक्रवर्ती राजा व्हावे, अशी आकांक्षा कर.' म्हणून मी त्यांना असे म्हणालो – 'ते देखील अनित्य आहे, ते देखील अध्रुव आहे, ते देखील सोडून जावे लागणारे आहे.'" ‘‘เตน [Pg.492] หิ, อยฺยปุตฺต, อมฺเหปิ โอวทาหี’’ติ. ‘‘ตสฺมา หิ โว เอวํ สิกฺขิตพฺพํ – พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคตา ภวิสฺสาม – ‘อิติปิ โส ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน สุคโต โลกวิทู อนุตฺตโร ปุริสทมฺมสารถิ สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคตา ภวิสฺสาม – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม สนฺทิฏฺฐิโก อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคตา ภวิสฺสาม – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, อุชุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, ญายปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, สามีจิปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, ยทิทํ จตฺตาริ ปุริสยุคานิ อฏฺฐ ปุริสปุคฺคลา เอส ภควโต สาวกสงฺโฆ อาหุเนยฺโย ปาหุเนยฺโย ทกฺขิเณยฺโย อญฺชลิกรณีโย อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสา’ติ. ยํ โข ปน กิญฺจิ กุเล เทยฺยธมฺมํ สพฺพํ ตํ อปฺปฏิวิภตฺตํ ภวิสฺสติ สีลวนฺเตหิ กลฺยาณธมฺเมหีติ เอวญฺหิ โว สิกฺขิตพฺพ’’นฺติ. อถ โข จิตฺโต คหปติ มิตฺตามจฺเจ ญาติสาโลหิเต พุทฺเธ จ ธมฺเม จ สงฺเฆ จ จาเค จ สมาทเปตฺวา กาลมกาสีติ. ทสมํ. "तसे असेल तर, आर्यपुत्र, आम्हालाही उपदेश करा." "म्हणून तुम्ही असे शिकले पाहिजे – 'आम्ही बुद्धांवर अचल श्रद्धेने युक्त होऊ – ते भगवान अर्हत, सम्यक्संबुद्ध, विद्याचरणसंपन्न, सुगत, लोकविदू, अनुत्तर पुरुषदम्यसारथी, देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध आणि भगवान आहेत.' 'आम्ही धम्मावर अचल श्रद्धेने युक्त होऊ – भगवंतांनी धम्माचे सुंदर रीतीने आख्यान केले आहे, तो प्रत्यक्ष पाहण्याजोगा, तात्काळ फळ देणारा, ये आणि पाहा असे म्हणण्यास योग्य, स्वतःच्या अंतकरणात धारण करण्यास योग्य आणि सुज्ञांनी आपापल्या परीने अनुभवण्याजोगा आहे.' 'आम्ही संघावर अचल श्रद्धेने युक्त होऊ – भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ ऋजुप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ न्यायप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ सामीचीप्रतिपन्न आहे; म्हणजेच ही चार पुरुषयुगे आणि आठ पुरुषपुद्गल आहेत, हा भगवंतांचा श्रावकसंघ आहुनेय, पाहुनेय, दक्खिणेय, अंजलिकरणीय आणि जगाचे अनुत्तर पुण्यक्षेत्र आहे.' 'तसेच, आमच्या कुळात जे काही देयधर्म असेल, ते सर्व आम्ही शीलवान व कल्याणधर्मी लोकांमध्ये सामायिकपणे वाटून देऊ.' अशा प्रकारे तुम्ही स्वतःला प्रशिक्षित केले पाहिजे." त्यानंतर चित्त गृहपतीने आपले मित्र, अमात्य, नातेवाईक आणि सगेसोयरे यांना बुद्ध, धम्म, संघ आणि त्याग यांमध्ये प्रस्थापित करून देहत्याग केला. दहावे सूत्र समाप्त. จิตฺตสํยุตฺตํ สมตฺตํ. चित्तसंयुत्त समाप्त झाले. ตสฺสุทฺทานํ – त्याचे उद्दान – สํโยชนํ ทฺเว อิสิทตฺตา, มหโก กามภูปิ จ; โคทตฺโต จ นิคณฺโฐ จ, อเจเลน คิลานทสฺสนนฺติ. संयोजन, दोन इसिदत्त सूत्रे, महक आणि कामभू सूत्र; गोदत्त आणि निगण्ठ सूत्र, अचेल आणि ग्लानदर्शन सूत्र. ๘. คามณิสํยุตฺตํ ८. गामणिसंयुत्त ๑. จณฺฑสุตฺตํ १. चण्डसूत्र ๓๕๓. สาวตฺถินิทานํ[Pg.493]. อถ โข จณฺโฑ คามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จณฺโฑ คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘โก นุ โข, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺโจ จณฺโฑ จณฺโฑตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ. โก ปน, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺโจ โสรโต โสรโตตฺเวว สงฺขํ คจฺฉตี’’ติ? ‘‘อิธ, คามณิ, เอกจฺจสฺส ราโค อปฺปหีโน โหติ. ราคสฺส อปฺปหีนตฺตา ปเร โกเปนฺติ, ปเรหิ โกปิยมาโน โกปํ ปาตุกโรติ. โส จณฺโฑตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ. โทโส อปฺปหีโน โหติ. โทสสฺส อปฺปหีนตฺตา ปเร โกเปนฺติ, ปเรหิ โกปิยมาโน โกปํ ปาตุกโรติ. โส จณฺโฑตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ. โมโห อปฺปหีโน โหติ. โมหสฺส อปฺปหีนตฺตา ปเร โกเปนฺติ, ปเรหิ โกปิยมาโน โกปํ ปาตุกโรติ. โส จณฺโฑตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ. อยํ โข, คามณิ, เหตุ, อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺโจ จณฺโฑ จณฺโฑตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ’’. ३५३. श्रावस्ती येथील निदान. तेव्हा चण्ड नावाचा ग्रामणी जेथे भगवान होते तेथे गेला; तिथे जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चण्ड ग्रामणीने भगवंतांना असे विचारले – "भंते, काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही व्यक्तींना चण्ड, चण्ड असेच म्हटले जाते? आणि भंते, काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही व्यक्तींना सोरत, सोरत असेच म्हटले जाते?" "ग्रामणी, या जगात काही व्यक्तींचा राग नष्ट झालेला नसतो. राग नष्ट न झाल्यामुळे इतर लोक त्यांना संतप्त करतात, आणि इतरांनी संतप्त केले असता ते आपला क्रोध प्रकट करतात. त्यामुळे त्यांना चण्ड असेच म्हटले जाते. त्यांचा द्वेष नष्ट झालेला नसतो. द्वेष नष्ट न झाल्यामुळे इतर लोक त्यांना संतप्त करतात, आणि इतरांनी संतप्त केले असता ते आपला क्रोध प्रकट करतात. त्यामुळे त्यांना चण्ड असेच म्हटले जाते. त्यांचा मोह नष्ट झालेला नसतो. मोह नष्ट न झाल्यामुळे इतर लोक त्यांना संतप्त करतात, आणि इतरांनी संतप्त केले असता ते आपला क्रोध प्रकट करतात. त्यामुळे त्यांना चण्ड असेच म्हटले जाते. ग्रामणी, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही व्यक्तींना चण्ड, चण्ड असेच म्हटले जाते." ‘‘อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺจสฺส ราโค ปหีโน โหติ. ราคสฺส ปหีนตฺตา ปเร น โกเปนฺติ, ปเรหิ โกปิยมาโน โกปํ น ปาตุกโรติ. โส โสรโตตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ. โทโส ปหีโน โหติ. โทสสฺส ปหีนตฺตา ปเร น โกเปนฺติ, ปเรหิ โกปิยมาโน โกปํ น ปาตุกโรติ. โส โสรโตตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ. โมโห ปหีโน โหติ. โมหสฺส ปหีนตฺตา ปเร น โกเปนฺติ, ปเรหิ โกปิยมาโน โกปํ น ปาตุกโรติ. โส โสรโตตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ. อยํ โข, คามณิ, เหตุ อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺโจ โสรโต โสรโตตฺเวว สงฺขํ คจฺฉตี’’ติ. "परंतु ग्रामणी, या जगात काही व्यक्तींचा राग नष्ट झालेला असतो. राग नष्ट झाल्यामुळे इतर लोक त्यांना संतप्त करत नाहीत, आणि इतरांनी संतप्त केले तरी ते आपला क्रोध प्रकट करत नाहीत. त्यामुळे त्यांना सोरत असेच म्हटले जाते. त्यांचा द्वेष नष्ट झालेला असतो. द्वेष नष्ट झाल्यामुळे इतर लोक त्यांना संतप्त करत नाहीत, आणि इतरांनी संतप्त केले तरी ते आपला क्रोध प्रकट करत नाहीत. त्यामुळे त्यांना सोरत असेच म्हटले जाते. त्यांचा मोह नष्ट झालेला असतो. मोह नष्ट झाल्यामुळे इतर लोक त्यांना संतप्त करत नाहीत, आणि इतरांनी संतप्त केले तरी ते आपला क्रोध प्रकट करत नाहीत. त्यामुळे त्यांना सोरत असेच म्हटले जाते. ग्रामणी, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही व्यक्तींना सोरत, सोरत असेच म्हटले जाते." เอวํ วุตฺเต, จณฺโฑ คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต, อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต! เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย, ปฏิจฺฉนฺนํ วา [Pg.494] วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย – จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตีติ; เอวเมวํ ภควตา อเนกปริยาเยน ธมฺโม ปกาสิโต. เอสาหํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ สรณํ คจฺฉามิ ธมฺมญฺจ ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. อุปาสกํ มํ ภควา ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ปฐมํ. असे म्हटले असता, चंड ग्रामणी भगवंतांना म्हणाला – “अतिशय सुंदर, भन्ते! अतिशय सुंदर, भन्ते! ज्याप्रमाणे, भन्ते, पालथा घातलेला घडा उताणा करावा, झाकलेली वस्तू उघडी करावी, वाट चुकलेल्याला मार्ग दाखवावा, किंवा डोळे असणाऱ्यांना रूपे दिसावीत म्हणून अंधारात तेलाचा दिवा धरावा; त्याचप्रमाणे भगवंतांनी अनेक मार्गांनी धम्म प्रकाशित केला आहे. भन्ते, मी भगवंतांना, धम्माला आणि भिक्खू संघाला शरण जातो. भगवंतांनी मला आजपासून जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून मानावे.” पहिले. ๒. ตาลปุฏสุตฺตํ २. तालपुट सुत्त ๓๕๔. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. อถ โข ตาลปุโฏ นฏคามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ตาลปุโฏ นฏคามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต, ปุพฺพกานํ อาจริยปาจริยานํ นฏานํ ภาสมานานํ – ‘โย โส นโฏ รงฺคมชฺเฌ สมชฺชมชฺเฌ สจฺจาลิเกน ชนํ หาเสติ รเมติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปหาสานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’ติ. อิธ ภควา กิมาหา’’ติ? ‘‘อลํ, คามณิ, ติฏฺฐเตตํ. มา มํ เอตํ ปุจฺฉี’’ติ. ทุติยมฺปิ โข ตาลปุโฏ นฏคามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต, ปุพฺพกานํ อาจริยปาจริยานํ นฏานํ ภาสมานานํ – ‘โย โส นโฏ รงฺคมชฺเฌ สมชฺชมชฺเฌ สจฺจาลิเกน ชนํ หาเสติ รเมติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปหาสานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’ติ. อิธ ภควา กิมาหา’’ติ? ‘‘อลํ, คามณิ, ติฏฺฐเตตํ. มา มํ เอตํ ปุจฺฉี’’ติ. ตติยมฺปิ โข ตาลปุโฏ นฏคามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต, ปุพฺพกานํ อาจริยปาจริยานํ นฏานํ ภาสมานานํ – ‘โย โส นโฏ รงฺคมชฺเฌ สมชฺชมชฺเฌ สจฺจาลิเกน ชนํ หาเสติ รเมติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปหาสานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’ติ. อิธ ภควา กิมาหา’’ติ? ३५४. एकदा भगवान राजगृहातील वेळुवनात कलंदकनिवाप येथे विहार करत होते. तेव्हा तालपुट नावाचा नटग्रामणी जेथे भगवान होते तेथे आला. आल्यानंतर भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला तालपुट नटग्रामणी भगवंतांना म्हणाला – “भन्ते, मी पूर्वीच्या आचार्यांच्या आणि त्यांच्याही आचार्यांच्या परंपरेतील नटांकडून असे ऐकले आहे की – ‘जो नट रंगमंचावर किंवा जनसमुदायामध्ये सत्य आणि असत्याच्या साहाय्याने लोकांचे मनोरंजन करतो, त्यांना हसवतो व आनंदित करतो, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर ‘पहास’ नावाच्या देवांच्या संगतीत जन्माला येतो.’ यावर भगवान काय म्हणतात?” “पुरे, ग्रामणी! हे राहू दे. मला हा प्रश्न विचारू नकोस.” दुसऱ्यांदाही तालपुट नटग्रामणी भगवंतांना म्हणाला – “भन्ते, मी पूर्वीच्या आचार्यांच्या आणि त्यांच्याही आचार्यांच्या परंपरेतील नटांकडून असे ऐकले आहे की – ‘जो नट रंगमंचावर किंवा जनसमुदायामध्ये सत्य आणि असत्याच्या साहाय्याने लोकांचे मनोरंजन करतो, त्यांना हसवतो व आनंदित करतो, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर ‘पहास’ नावाच्या देवांच्या संगतीत जन्माला येतो.’ यावर भगवान काय म्हणतात?” “पुरे, ग्रामणी! हे राहू दे. मला हा प्रश्न विचारू नकोस.” तिसऱ्यांदाही तालपुट नटग्रामणी भगवंतांना म्हणाला – “भन्ते, मी पूर्वीच्या आचार्यांच्या आणि त्यांच्याही आचार्यांच्या परंपरेतील नटांकडून असे ऐकले आहे की – ‘जो नट रंगमंचावर किंवा जनसमुदायामध्ये सत्य आणि असत्याच्या साहाय्याने लोकांचे मनोरंजन करतो, त्यांना हसवतो व आनंदित करतो, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर ‘पहास’ नावाच्या देवांच्या संगतीत जन्माला येतो.’ यावर भगवान काय म्हणतात?” ‘‘อทฺธา โข ตฺยาหํ, คามณิ, น ลภามิ – ‘อลํ, คามณิ, ติฏฺฐเตตํ, มา มํ เอตํ ปุจฺฉี’ติ. อปิ จ ตฺยาหํ พฺยากริสฺสามิ. ปุพฺเพ โข, คามณิ, สตฺตา อวีตราคา ราคพนฺธนพทฺธา. เตสํ นโฏ รงฺคมชฺเฌ สมชฺชมชฺเฌ เย ธมฺมา รชนียา เต อุปสํหรติ ภิยฺโยโสมตฺตาย. ปุพฺเพ โข, คามณิ, สตฺตา อวีตโทสา โทสพนฺธนพทฺธา. เตสํ นโฏ รงฺคมชฺเฌ สมชฺชมชฺเฌ เย ธมฺมา [Pg.495] โทสนียา เต อุปสํหรติ ภิยฺโยโสมตฺตาย. ปุพฺเพ โข, คามณิ, สตฺตา อวีตโมหา โมหพนฺธนพทฺธา. เตสํ นโฏ รงฺคมชฺเฌ สมชฺชมชฺเฌ เย ธมฺมา โมหนียา เต อุปสํหรติ ภิยฺโยโสมตฺตาย. โส อตฺตนา มตฺโต ปมตฺโต ปเร มเทตฺวา ปมาเทตฺวา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปหาโส นาม นิรโย ตตฺถ อุปปชฺชติ. สเจ โข ปนสฺส เอวํทิฏฺฐิ โหติ – ‘โย โส นโฏ รงฺคมชฺเฌ สมชฺชมชฺเฌ สจฺจาลิเกน ชนํ หาเสติ รเมติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปหาสานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’ติ, สาสฺส โหติ มิจฺฉาทิฏฺฐิ. มิจฺฉาทิฏฺฐิกสฺส โข ปนาหํ, คามณิ, ปุริสปุคฺคลสฺส ทฺวินฺนํ คตีนํ อญฺญตรํ คตึ วทามิ – นิรยํ วา ติรจฺฉานโยนึ วา’’ติ. “नक्कीच, ग्रामणी, मी तुला ‘पुरे, ग्रामणी! हे राहू दे, मला हा प्रश्न विचारू नकोस’ असे म्हणून थांबवू शकलो नाही. तरीही, मी तुला याचे उत्तर देईन. ग्रामणी, पूर्वीपासूनच प्राणी हे रागापासून मुक्त नसतात, ते रागाच्या बंधनात बांधलेले असतात. अशा लोकांसमोर नट रंगमंचावर किंवा जनसमुदायामध्ये जे राग उत्पन्न करणारे विषय आहेत, ते अधिक प्रमाणात सादर करतो. ग्रामणी, पूर्वीपासूनच प्राणी हे द्वेषापासून मुक्त नसतात, ते द्वेषाच्या बंधनात बांधलेले असतात. अशा लोकांसमोर नट रंगमंचावर किंवा जनसमुदायामध्ये जे द्वेष उत्पन्न करणारे विषय आहेत, ते अधिक प्रमाणात सादर करतो. ग्रामणी, पूर्वीपासूनच प्राणी हे मोहापासून मुक्त नसतात, ते मोहाच्या बंधनात बांधलेले असतात. अशा लोकांसमोर नट रंगमंचावर किंवा जनसमुदायामध्ये जे मोह उत्पन्न करणारे विषय आहेत, ते अधिक प्रमाणात सादर करतो. तो स्वतः मत्त आणि प्रमत्त होऊन, इतरांनाही मत्त व प्रमत्त करतो; त्यामुळे शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर तो ‘पहास’ नावाच्या नरकात जन्माला येतो. परंतु, जर त्याची अशी दृष्टी असेल की – ‘जो नट रंगमंचावर किंवा जनसमुदायामध्ये सत्य आणि असत्याच्या साहाय्याने लोकांचे मनोरंजन करतो, त्यांना हसवतो व आनंदित करतो, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर ‘पहास’ नावाच्या देवांच्या संगतीत जन्माला येतो’, तर ही त्याची मिथ्यादृष्टी आहे. ग्रामणी, मिथ्यादृष्टी असलेल्या व्यक्तीसाठी मी दोन गतींपैकी एक गती सांगतो – एक तर नरक किंवा तिर्यक योनी.” เอวํ วุตฺเต, ตาลปุโฏ นฏคามณิ, ปโรทิ, อสฺสูนิ ปวตฺเตสิ. ‘‘เอตํ โข ตฺยาหํ, คามณิ, นาลตฺถํ – ‘อลํ, คามณิ, ติฏฺฐเตตํ; มา มํ เอตํ ปุจฺฉี’’’ติ. ‘‘นาหํ, ภนฺเต, เอตํ โรทามิ ยํ มํ ภควา เอวมาห; อปิ จาหํ, ภนฺเต, ปุพฺพเกหิ อาจริยปาจริเยหิ นเฏหิ ทีฆรตฺตํ นิกโต วญฺจิโต ปลุทฺโธ – ‘โย โส นโฏ รงฺคมชฺเฌ สมชฺชมชฺเฌ สจฺจาลิเกน ชนํ หาเสติ รเมติ โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปหาสานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’’’ติ. ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต, อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต! เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย, ปฏิจฺฉนฺนํ วา วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย – จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตีติ; เอวเมวํ ภควตา อเนกปริยาเยน ธมฺโม ปกาสิโต. เอสาหํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ สรณํ คจฺฉามิ ธมฺมญฺจ ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. ลเภยฺยาหํ, ภนฺเต, ภควโต สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, ลเภยฺยํ อุปสมฺปท’’นฺติ. อลตฺถ โข ตาลปุโฏ นฏคามณิ ภควโต สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, อลตฺถ อุปสมฺปทํ. อจิรูปสมฺปนฺโน จ ปนายสฺมา ตาลปุโฏ…เป… อรหตํ อโหสีติ. ทุติยํ. असे म्हटले असता, तालपुट नटग्रामणी रडू लागला, त्याच्या डोळ्यांतून अश्रू वाहू लागले. “ग्रामणी, म्हणूनच मी तुला थांबवत होतो की – ‘पुरे, ग्रामणी! हे राहू दे, मला हा प्रश्न विचारू नकोस.’” “भन्ते, भगवान मला असे म्हणाले म्हणून मी रडत नाही; तर भन्ते, पूर्वीच्या आचार्यांनी आणि त्यांच्याही आचार्यांनी, त्या नटांनी मला दीर्घकाळ फसवले, ठकवले आणि प्रलोभित केले की – ‘जो नट रंगमंचावर किंवा जनसमुदायामध्ये सत्य आणि असत्याच्या साहाय्याने लोकांचे मनोरंजन करतो, त्यांना हसवतो व आनंदित करतो, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर ‘पहास’ नावाच्या देवांच्या संगतीत जन्माला येतो.’ अतिशय सुंदर, भन्ते! अतिशय सुंदर, भन्ते! ज्याप्रमाणे, भन्ते, पालथा घातलेला घडा उताणा करावा, झाकलेली वस्तू उघडी करावी, वाट चुकलेल्याला मार्ग दाखवावा, किंवा डोळे असणाऱ्यांना रूपे दिसावीत म्हणून अंधारात तेलाचा दिवा धरावा; त्याचप्रमाणे भगवंतांनी अनेक मार्गांनी धम्म प्रकाशित केला आहे. भन्ते, मी भगवंतांना, धम्माला आणि भिक्खू संघाला शरण जातो. भन्ते, मला भगवंतांच्या सन्निध प्रवज्जा मिळावी, उपसंपदा मिळावी.” त्यानंतर तालपुट नटग्रामणीला भगवंतांच्या सन्निध प्रवज्जा मिळाली, उपसंपदा मिळाली. उपसंपदा मिळाल्यानंतर लवकरच आयुष्यमान तालपुट... पे... अर्हतांपैकी एक झाले. दुसरे. ๓. โยธาชีวสุตฺตํ ३. योधाजीव सुत्त ๓๕๕. อถ โข โยธาชีโว คามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โยธาชีโว คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต, ปุพฺพกานํ อาจริยปาจริยานํ โยธาชีวานํ ภาสมานานํ – ‘โย โส โยธาชีโว สงฺคาเม อุสฺสหติ วายมติ, ตเมนํ [Pg.496] อุสฺสหนฺตํ วายมนฺตํ ปเร หนนฺติ ปริยาปาเทนฺติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรชิตานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’ติ. อิธ ภควา กิมาหา’’ติ? ‘‘อลํ, คามณิ, ติฏฺฐเตตํ; มา มํ เอตํ ปุจฺฉี’’ติ. ทุติยมฺปิ โข…เป… ตติยมฺปิ โข โยธาชีโว คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต, ปุพฺพกานํ อาจริยปาจริยานํ โยธาชีวานํ ภาสมานานํ – ‘โย โส โยธาชีโว สงฺคาเม อุสฺสหติ วายมติ, ตเมนํ อุสฺสหนฺตํ วายมนฺตํ ปเร หนนฺติ ปริยาปาเทนฺติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรชิตานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’ติ. อิธ ภควา กิมาหา’’ติ? ३५५. तेव्हा योध्दाजीवक (योद्धा) ग्रामणी जेथे भगवान होते तेथे गेला; गेल्यावर... एका बाजूला बसलेल्या योध्दाजीवक ग्रामणीने भगवंतांना असे म्हटले – "भन्ते, मी पूर्वीच्या आचार्यांच्या आणि त्यांच्याही आचार्यांच्या परंपरेतील योद्ध्यांकडून असे ऐकले आहे की – 'जो योद्धा युद्धात प्रयत्न करतो, परिश्रम करतो, आणि त्याला तसा प्रयत्न व परिश्रम करत असताना शत्रू मारतात, ठार करतात, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर 'परजित' नावाच्या देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतो.' यावर भगवान काय म्हणतात?" "पुरे, ग्रामणी! हे राहू दे. मला हे विचारू नकोस." दुसऱ्यांदाही... तिसऱ्यांदाही योध्दाजीवक ग्रामणीने भगवंतांना असे म्हटले – "भन्ते, मी पूर्वीच्या आचार्यांच्या आणि त्यांच्याही आचार्यांच्या परंपरेतील योद्ध्यांकडून असे ऐकले आहे की – 'जो योद्धा युद्धात प्रयत्न करतो, परिश्रम करतो, आणि त्याला तसा प्रयत्न व परिश्रम करत असताना शत्रू मारतात, ठार करतात, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर 'परजित' नावाच्या देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतो.' यावर भगवान काय म्हणतात?" ‘‘อทฺธา โข ตฺยาหํ, คามณิ, น ลภามิ – ‘อลํ, คามณิ, ติฏฺฐเตตํ; มา มํ เอตํ ปุจฺฉี’ติ. อปิ จ ตฺยาหํ พฺยากริสฺสามิ. โย โส, คามณิ, โยธาชีโว สงฺคาเม อุสฺสหติ วายมติ, ตสฺส ตํ จิตฺตํ ปุพฺเพ คหิตํ ทุกฺกฏํ ทุปฺปณิหิตํ – ‘อิเม สตฺตา หญฺญนฺตุ วา พชฺฌนฺตุ วา อุจฺฉิชฺชนฺตุ วา วินสฺสนฺตุ วา มา วา อเหสุํ อิติ วา’ติ. ตเมนํ อุสฺสหนฺตํ วายมนฺตํ ปเร หนนฺติ ปริยาปาเทนฺติ; โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรชิโต นาม นิรโย ตตฺถ อุปปชฺชตีติ. สเจ โข ปนสฺส เอวํ ทิฏฺฐิ โหติ – ‘โย โส โยธาชีโว สงฺคาเม อุสฺสหติ วายมติ ตเมนํ อุสฺสหนฺตํ วายมนฺตํ ปเร หนนฺติ ปริยาปาเทนฺติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรชิตานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’ติ, สาสฺส โหติ มิจฺฉาทิฏฺฐิ. มิจฺฉาทิฏฺฐิกสฺส โข ปนาหํ, คามณิ, ปุริสปุคฺคลสฺส ทฺวินฺนํ คตีนํ อญฺญตรํ คตึ วทามิ – นิรยํ วา ติรจฺฉานโยนึ วา’’ติ. "नक्कीच, ग्रामणी, मी तुला 'पुरे, ग्रामणी! हे राहू दे. मला हे विचारू नकोस' असे म्हणून थांबवू शकलो नाही. तरीही मी तुला याचे उत्तर देईन. ग्रामणी, जो योद्धा युद्धात प्रयत्न करतो, परिश्रम करतो, त्याचे चित्त आधीच दूषित, चुकीच्या मार्गाने प्रवृत्त आणि अयोग्य रीतीने स्थापित झालेले असते की – 'हे प्राणी मारले जावोत, बांधले जावोत, नष्ट होवोत, विनाश पावोत किंवा त्यांचे अस्तित्वच संपून जावो.' अशा प्रकारे प्रयत्न व परिश्रम करत असताना शत्रू त्याला मारतात, ठार करतात; तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर 'परजित' नावाच्या नरकात उत्पन्न होतो. परंतु, जर त्याची अशी दृष्टी (समजूत) असेल की – 'जो योद्धा युद्धात प्रयत्न करतो, परिश्रम करतो, आणि त्याला तसा प्रयत्न व परिश्रम करत असताना शत्रू मारतात, ठार करतात, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर 'परजित' नावाच्या देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतो', तर ही त्याची मिथ्यादृष्टी (चुकीची समजूत) आहे. ग्रामणी, मिथ्यादृष्टी असलेल्या व्यक्तीसाठी मी दोन गतींपैकी एक गती सांगतो – एक तर नरक किंवा तिर्यक योनी (पशू योनी)." เอวํ วุตฺเต, โยธาชีโว คามณิ ปโรทิ, อสฺสูนิ ปวตฺเตสิ. ‘‘เอตํ โข ตฺยาหํ, คามณิ, นาลตฺถํ – ‘อลํ, คามณิ, ติฏฺฐเตตํ; มา มํ เอตํ ปุจฺฉี’’’ติ. ‘‘นาหํ, ภนฺเต, เอตํ โรทามิ ยํ มํ ภควา เอวมาห; อปิจาหํ, ภนฺเต, ปุพฺพเกหิ อาจริยปาจริเยหิ โยธาชีเวหิ ทีฆรตฺตํ นิกโต วญฺจิโต ปลุทฺโธ – ‘โย โส โยธาชีโว สงฺคาเม อุสฺสหติ วายมติ, ตเมนํ อุสฺสหนฺตํ วายมนฺตํ ปเร หนนฺติ ปริยาปาเทนฺติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรชิตานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’’’ติ. ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต…เป… อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ตติยํ. असे म्हटले असता, योध्दाजीवक ग्रामणी रडू लागला, त्याच्या डोळ्यांतून अश्रू वाहू लागले. (भगवान म्हणाले –) "ग्रामणी, म्हणूनच मी तुला आधीच थांबवत होतो की – 'पुरे, ग्रामणी! हे राहू दे. मला हे विचारू नकोस.'" "भन्ते, भगवान मला असे म्हणाले म्हणून मी रडत नाही; तर भन्ते, मला पूर्वीच्या आचार्यांनी आणि त्यांच्याही आचार्यांच्या परंपरेतील योद्ध्यांनी दीर्घकाळापासून फसवले आहे, ठकवले आहे आणि प्रलोभित केले आहे की – 'जो योद्धा युद्धात प्रयत्न करतो, परिश्रम करतो, आणि त्याला तसा प्रयत्न व परिश्रम करत असताना शत्रू मारतात, ठार करतात, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर 'परजित' नावाच्या देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतो.' अतिशय सुंदर, भन्ते! ... आजपासून मला प्राणांतिक शरण गेलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे." तिसरे (सूत्र समाप्त). ๔. หตฺถาโรหสุตฺตํ ४. हत्थारोह सुत्त (हत्तीस्वार सुत्त) ๓๕๖. อถ [Pg.497] โข หตฺถาโรโห คามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา…เป… อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คตนฺติ. จตุตฺถํ. ३५६. तेव्हा हत्थारोह (हत्तीस्वार) ग्रामणी जेथे भगवान होते तेथे गेला; गेल्यावर... आजपासून मला प्राणांतिक शरण गेलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे. चौथे (सूत्र समाप्त). ๕. อสฺสาโรหสุตฺตํ ५. अस्सारोह सुत्त (घोडस्वार सुत्त) ๓๕๗. อถ โข อสฺสาโรโห คามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อสฺสาโรโห คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต, ปุพฺพกานํ อาจริยปาจริยานํ อสฺสาโรหานํ ภาสมานานํ – ‘โย โส อสฺสาโรโห สงฺคาเม อุสฺสหติ วายมติ, ตเมนํ อุสฺสหนฺตํ วายมนฺตํ ปเร หนนฺติ ปริยาปาเทนฺติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรชิตานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’ติ. อิธ ภควา กิมาหา’’ติ? ‘‘อลํ, คามณิ, ติฏฺฐเตตํ; มา มํ เอตํ ปุจฺฉี’’ติ. ทุติยมฺปิ โข…เป… ตติยมฺปิ โข อสฺสาโรโห คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต, ปุพฺพกานํ อาจริยปาจริยานํ อสฺสาโรหานํ ภาสมานานํ – ‘โย โส อสฺสาโรโห สงฺคาเม อุสฺสหติ วายมติ, ตเมนํ อุสฺสหนฺตํ วายมนฺตํ ปเร หนนฺติ ปริยาปาเทนฺติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรชิตานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’ติ. อิธ ภควา กิมาหา’’ติ? ३५७. तेव्हा अस्सारोह (घोडस्वार) ग्रामणी जेथे भगवान होते तेथे गेला; गेल्यावर एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या अस्सारोह ग्रामणीने भगवंतांना असे म्हटले – "भन्ते, मी पूर्वीच्या आचार्यांच्या आणि त्यांच्याही आचार्यांच्या परंपरेतील घोडस्वारांकडून असे ऐकले आहे की – 'जो घोडस्वार युद्धात प्रयत्न करतो, परिश्रम करतो, आणि त्याला तसा प्रयत्न व परिश्रम करत असताना शत्रू मारतात, ठार करतात, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर 'परजित' नावाच्या देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतो.' यावर भगवान काय म्हणतात?" "पुरे, ग्रामणी! हे राहू दे. मला हे विचारू नकोस." दुसऱ्यांदाही... तिसऱ्यांदाही अस्सारोह ग्रामणीने भगवंतांना असे म्हटले – "भन्ते, मी पूर्वीच्या आचार्यांच्या आणि त्यांच्याही आचार्यांच्या परंपरेतील घोडस्वारांकडून असे ऐकले आहे की – 'जो घोडस्वार युद्धात प्रयत्न करतो, परिश्रम करतो, आणि त्याला तसा प्रयत्न व परिश्रम करत असताना शत्रू मारतात, ठार करतात, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर 'परजित' नावाच्या देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतो.' यावर भगवान काय म्हणतात?" ‘‘อทฺธา โข ตฺยาหํ, คามณิ, น ลภามิ – ‘อลํ, คามณิ, ติฏฺฐเตตํ; มา มํ เอตํ ปุจฺฉี’ติ. อปิ จ โข ตฺยาหํ พฺยากริสฺสามิ. โย โส, คามณิ, อสฺสาโรโห สงฺคาเม อุสฺสหติ วายมติ ตสฺส ตํ จิตฺตํ ปุพฺเพ คหิตํ ทุกฺกฏํ ทุปฺปณิหิตํ – ‘อิเม สตฺตา หญฺญนฺตุ วา พชฺฌนฺตุ วา อุจฺฉิชฺชนฺตุ วา วินสฺสนฺตุ วา มา อเหสุํ อิติ วา’ติ. ตเมนํ อุสฺสหนฺตํ วายมนฺตํ ปเร หนนฺติ ปริยาปาเทนฺติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรชิโต นาม นิรโย ตตฺถ อุปปชฺชติ. สเจ โข ปนสฺส เอวํ ทิฏฺฐิ โหติ – ‘โย โส อสฺสาโรโห สงฺคาเม อุสฺสหติ วายมติ, ตเมนํ อุสฺสหนฺตํ วายมนฺตํ ปเร หนนฺติ ปริยาปาเทนฺติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรชิตานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’ติ, สาสฺส โหติ มิจฺฉาทิฏฺฐิ. มิจฺฉาทิฏฺฐิกสฺส โข ปนาหํ คามณิ, ปุริสปุคฺคลสฺส ทฺวินฺนํ คตีนํ อญฺญตรํ คตึ วทามิ – นิรยํ วา ติรจฺฉานโยนึ วา’’ติ. "नक्कीच, ग्रामणी, मी तुला 'पुरे, ग्रामणी! हे राहू दे. मला हे विचारू नकोस' असे म्हणून थांबवू शकलो नाही. तरीही मी तुला याचे उत्तर देईन. ग्रामणी, जो घोडस्वार युद्धात प्रयत्न करतो, परिश्रम करतो, त्याचे चित्त आधीच दूषित, चुकीच्या मार्गाने प्रवृत्त आणि अयोग्य रीतीने स्थापित झालेले असते की – 'हे प्राणी मारले जावोत, बांधले जावोत, नष्ट होवोत, विनाश पावोत किंवा त्यांचे अस्तित्वच संपून जावो.' अशा प्रकारे प्रयत्न व परिश्रम करत असताना शत्रू त्याला मारतात, ठार करतात; तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर 'परजित' नावाच्या नरकात उत्पन्न होतो. परंतु, जर त्याची अशी दृष्टी (समजूत) असेल की – 'जो घोडस्वार युद्धात प्रयत्न करतो, परिश्रम करतो, आणि त्याला तसा प्रयत्न व परिश्रम करत असताना शत्रू मारतात, ठार करतात, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर 'परजित' नावाच्या देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतो', तर ही त्याची मिथ्यादृष्टी (चुकीची समजूत) आहे. ग्रामणी, मिथ्यादृष्टी असलेल्या व्यक्तीसाठी मी दोन गतींपैकी एक गती सांगतो – एक तर नरक किंवा तिर्यक योनी (पशू योनी)." เอวํ [Pg.498] วุตฺเต, อสฺสาโรโห คามณิ ปโรทิ, อสฺสูนิ ปวตฺเตสิ. ‘‘เอตํ โข ตฺยาหํ, คามณิ, นาลตฺถํ – ‘อลํ, คามณิ, ติฏฺฐเตตํ; มา มํ เอตํ ปุจฺฉี’’’ติ. ‘‘นาหํ, ภนฺเต, เอตํ โรทามิ ยํ มํ ภควา เอวมาห. อปิจาหํ, ภนฺเต, ปุพฺพเกหิ อาจริยปาจริเยหิ อสฺสาโรเหหิ ทีฆรตฺตํ นิกโต วญฺจิโต ปลุทฺโธ – ‘โย โส อสฺสาโรโห สงฺคาเม อุสฺสหติ วายมติ, ตเมนํ อุสฺสหนฺตํ วายมนฺตํ ปเร หนนฺติ ปริยาปาเทนฺติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรชิตานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’’’ติ. ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต…เป… อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ปญฺจมํ. असे म्हटले असता, अश्वारोही गामणि रडू लागला आणि त्याने अश्रू ढाळले. 'गामणी, म्हणूनच मी तुला आधीच म्हणालो होतो— "असो गामणी, हे राहू दे; मला हा प्रश्न विचारू नकोस."' 'भंते, भगवान मला जे म्हणाले, त्याबद्दल मी रडत नाही. तर भंते, पूर्वीच्या आचार्यांनी आणि पूर्वाचार्यांनी, अश्वारोही शिक्षकांनी मला दीर्घकाळ फसवले, ठकवले आणि प्रलोभन दिले की— "जो अश्वारोही युद्धात पराक्रम करतो, प्रयत्न करतो, आणि त्या पराक्रम व प्रयत्न करणाऱ्याला शत्रू मारतात, ठार करतात; तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर 'परजित' नावाच्या देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतो."' 'अतिशय सुंदर, भंते! ... आजपासून मला जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे.' पाचवे. ๖. อสิพนฺธกปุตฺตสุตฺตํ ६. असिबंधकपुत्त सुत्त ๓๕๘. เอกํ สมยํ ภควา นาฬนฺทายํ วิหรติ ปาวาริกมฺพวเน. อถ โข อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘พฺราหฺมณา, ภนฺเต, ปจฺฉา ภูมกา กามณฺฑลุกา เสวาลมาลิกา อุทโกโรหกา อคฺคิปริจารกา. เต มตํ กาลงฺกตํ อุยฺยาเปนฺติ นาม สญฺญาเปนฺติ นาม สคฺคํ นาม โอกฺกาเมนฺติ. ภควา ปน, ภนฺเต, อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ปโหติ ตถา กาตุํ ยถา สพฺโพ โลโก กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺเชยฺยา’’ติ? ‘‘เตน หิ, คามณิ, ตญฺเญเวตฺถ ปฏิปุจฺฉิสฺสามิ. ยถา เต ขเมยฺย ตถา นํ พฺยากเรยฺยาสี’’ติ. ३५८. एकदा भगवान नालंदामध्ये पावारिकाच्या आम्रवनात विहार करत होते. तेव्हा असिबंधकाचा पुत्र गामणि जेथे भगवान होते तेथे आला; आल्यानंतर भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला असिबंधकाचा पुत्र गामणि भगवंतांना म्हणाला— 'भंते, पश्चिमेकडील प्रदेशातील ब्राह्मण—जे कमंडलू धारण करतात, शेवाळाच्या माळा घालतात, पाण्यात उतरतात आणि अग्नीची पूजा करतात. ते मृत झालेल्या, कालवश झालेल्या व्यक्तीला वर नेतात, त्याला मार्ग दाखवतात आणि स्वर्गात प्रवेश करवून देतात. परंतु भंते, भगवान जे अर्हत, सम्यक्संबुद्ध आहेत, ते असे करण्यास समर्थ आहेत का, जेणेकरून सर्व लोक शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतील?' 'गामणी, तर मग मी तुलाच याविषयी उलट विचारतो. तुला जसे योग्य वाटेल तसे तू त्याचे उत्तर दे.' ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อิธสฺส ปุริโส ปาณาติปาตี อทินฺนาทายี กาเมสุมิจฺฉาจารี มุสาวาที ปิสุณวาโจ ผรุสวาโจ สมฺผปฺปลาปี อภิชฺฌาลุ พฺยาปนฺนจิตฺโต มิจฺฉาทิฏฺฐิโก. ตเมนํ มหา ชนกาโย สงฺคมฺม สมาคมฺม อายาเจยฺย โถเมยฺย ปญฺชลิโก อนุปริสกฺเกยฺย – ‘อยํ ปุริโส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชตู’ติ. ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อปิ นุ โส ปุริโส มหโต ชนกายสฺส อายาจนเหตุ วา โถมนเหตุ วา ปญฺชลิกา อนุปริสกฺกนเหตุ วา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺเชยฺยา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. 'गामणी, तुला काय वाटते? समजा, एखादा माणूस प्राणातिपाती (जीवहिंसा करणारा), अदिन्नादायी (चोरी करणारा), कामेसू मिच्छाचारी (कामोपभोगात गैरवर्तन करणारा), मुसावादी (असत्य बोलणारा), पिसुणवाचो (चहाडखोर), फरुसवाचो (कठोर बोलणारा), संफप्पलापी (व्यर्थ बडबड करणारा), अभिज्झालू (लोभी), व्यापात्रचित्त (द्वेषी) आणि मिच्छादिट्ठिको (मिथ्या दृष्टी असलेला) असेल. आणि लोकांचा मोठा समुदाय एकत्र येऊन, त्याच्याभोवती जमून, हात जोडून प्रार्थना करेल, त्याची स्तुती करेल आणि प्रदक्षिणा घालत म्हणेल— "हा माणूस शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होवो." गामणी, तुला काय वाटते? त्या मोठ्या लोकसमुदायाच्या प्रार्थनेमुळे, स्तुतीमुळे किंवा हात जोडून प्रदक्षिणा घालण्याच्या प्रार्थनेमुळे, तो माणूस शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होईल का?' 'नाही, भंते.' ‘‘เสยฺยถาปิ, คามณิ, ปุริโส มหตึ ปุถุสิลํ คมฺภีเร อุทกรหเท ปกฺขิเปยฺย. ตเมนํ มหา ชนกาโย สงฺคมฺม สมาคมฺม อายาเจยฺย โถเมยฺย [Pg.499] ปญฺชลิโก อนุปริสกฺเกยฺย – ‘อุมฺมุชฺช, โภ ปุถุสิเล, อุปฺลว, โภ ปุถุสิเล, ถลมุปฺลว, โภ ปุถุสิเล’ติ. ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อปิ นุ สา ปุถุสิลา มหโต ชนกายสฺส อายาจนเหตุ วา โถมนเหตุ วา ปญฺชลิกา อนุปริสกฺกนเหตุ วา อุมฺมุชฺเชยฺย วา อุปฺลเวยฺย วา ถลํ วา อุปฺลเวยฺยา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘เอวเมว โข, คามณิ, โย โส ปุริโส ปาณาติปาตี อทินฺนาทายี กาเมสุมิจฺฉาจารี มุสาวาที ปิสุณวาโจ ผรุสวาโจ สมฺผปฺปลาปี อภิชฺฌาลุ พฺยาปนฺนจิตฺโต มิจฺฉาทิฏฺฐิโก. กิญฺจาปิ ตํ มหา ชนกาโย สงฺคมฺม สมาคมฺม อายาเจยฺย โถเมยฺย ปญฺชลิโก อนุปริสกฺเกยฺย – ‘อยํ ปุริโส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชตู’’’ติ, อถ โข โส ปุริโส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺเชยฺย. 'गामणी, जसे की एखाद्या माणसाने एका खोल पाण्याच्या तळ्यात मोठी शिळा फेकली. आणि लोकांचा मोठा समुदाय एकत्र येऊन, त्याच्याभोवती जमून, हात जोडून प्रार्थना करेल, त्याची स्तुती करेल आणि प्रदक्षिणा घालत म्हणेल— "हे शिळे, वर ये! हे शिळे, तरंग! हे शिळे, कोरड्या जमिनीवर ये!" गामणी, तुला काय वाटते? त्या मोठ्या लोकसमुदायाच्या प्रार्थनेमुळे, स्तुतीमुळे किंवा हात जोडून प्रदक्षिणा घालण्याच्या प्रार्थनेमुळे, ती शिळा वर येईल का, तरंगेल का किंवा कोरड्या जमिनीवर येईल का?' 'नाही, भंते.' 'तसेच, गामणी, जो माणूस प्राणातिपाती, अदिन्नादायी, कामेसू मिच्छाचारी, मुसावादी, पिसुणवाचो, फरुसवाचो, संफप्पलापी, अभिज्झालू, व्यापात्रचित्त आणि मिच्छादिट्ठिको आहे; जरी लोकांचा मोठा समुदाय एकत्र येऊन, त्याच्याभोवती जमून, हात जोडून प्रार्थना करेल, त्याची स्तुती करेल आणि प्रदक्षिणा घालत म्हणेल— "हा माणूस शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होवो," तरीही तो माणूस शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि नरकातच उत्पन्न होईल.' ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อิธสฺส ปุริโส ปาณาติปาตา ปฏิวิรโต อทินฺนาทานา ปฏิวิรโต กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรโต มุสาวาทา ปฏิวิรโต ปิสุณาย วาจาย ปฏิวิรโต ผรุสาย วาจาย ปฏิวิรโต สมฺผปฺปลาปา ปฏิวิรโต อนภิชฺฌาลุ อพฺยาปนฺนจิตฺโต สมฺมาทิฏฺฐิโก. ตเมนํ มหา ชนกาโย สงฺคมฺม สมาคมฺม อายาเจยฺย โถเมยฺย ปญฺชลิโก อนุปริสกฺเกยฺย – ‘อยํ ปุริโส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตู’ติ. ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อปิ นุ โส ปุริโส มหโต ชนกายสฺส อายาจนเหตุ วา โถมนเหตุ วา ปญฺชลิกา อนุปริสกฺกนเหตุ วา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺเชยฺยา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. 'गामणी, तुला काय वाटते? समजा, एखादा माणूस प्राणातिपातापासून (जीवहिंसेपासून) विरत असेल, अदिन्नादानापासून (चोरीपासून) विरत असेल, कामेसू मिच्छाचारापासून (कामोपभोगातील गैरवर्तनापासून) विरत असेल, मुसावादापासून (असत्य बोलण्यापासून) विरत असेल, पिसुणा वाचापासून (चहाडी करण्यापासून) विरत असेल, फरुसा वाचापासून (कठोर बोलण्यापासून) विरत असेल, संफप्पलापापासून (व्यर्थ बडबड करण्यापासून) विरत असेल, अनभिज्झालू (लोभ नसलेला), अव्यापात्रचित्त (द्वेष नसलेला) आणि सम्मादिट्ठिको (सम्यक दृष्टी असलेला) असेल. आणि लोकांचा मोठा समुदाय एकत्र येऊन, त्याच्याभोवती जमून, हात जोडून प्रार्थना करेल, त्याची स्तुती करेल आणि प्रदक्षिणा घालत म्हणेल— "हा माणूस शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि नरकात उत्पन्न होवो." गामणी, तुला काय वाटते? त्या मोठ्या लोकसमुदायाच्या प्रार्थनेमुळे, स्तुतीमुळे किंवा हात जोडून प्रदक्षिणा घालण्याच्या प्रार्थनेमुळे, तो माणूस शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि नरकात उत्पन्न होईल का?' 'नाही, भंते.' ‘‘เสยฺยถาปิ, คามณิ, ปุริโส สปฺปิกุมฺภํ วา เตลกุมฺภํ วา คมฺภีเร อุทกรหเท โอคาเหตฺวา ภินฺเทยฺย. ตตฺร ยาสฺส สกฺขรา วา กฐลา วา สา อโธคามี อสฺส; ยญฺจ ขฺวสฺส ตตฺร สปฺปิ วา เตลํ วา ตํ อุทฺธํ คามิ อสฺส. ตเมนํ มหา ชนกาโย สงฺคมฺม สมาคมฺม อายาเจยฺย โถเมยฺย ปญฺชลิโก อนุปริสกฺเกยฺย – ‘โอสีท, โภ สปฺปิเตล, สํสีท, โภ สปฺปิเตล, อโธ คจฺฉ, โภ สปฺปิเตลา’ติ. ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อปิ [Pg.500] นุ ตํ สปฺปิเตลํ มหโต ชนกายสฺส อายาจนเหตุ วา โถมนเหตุ วา ปญฺชลิกา อนุปริสกฺกนเหตุ วา โอสีเทยฺย วา สํสีเทยฺย วา อโธ วา คจฺเฉยฺยา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘เอวเมว โข, คามณิ, โย โส ปุริโส ปาณาติปาตา ปฏิวิรโต, อทินฺนาทานา ปฏิวิรโต, กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรโต, มุสาวาทา ปฏิวิรโต, ปิสุณาย วาจาย ปฏิวิรโต, ผรุสาย วาจาย ปฏิวิรโต, สมฺผปฺปลาปา ปฏิวิรโต, อนภิชฺฌาลุ, อพฺยาปนฺนจิตฺโต, สมฺมาทิฏฺฐิโก, กิญฺจาปิ ตํ มหา ชนกาโย สงฺคมฺม สมาคมฺม อายาเจยฺย โถเมยฺย ปญฺชลิโก อนุปริสกฺเกยฺย – ‘อยํ ปุริโส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตู’ติ, อถ โข โส ปุริโส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺเชยฺยา’’ติ. เอวํ วุตฺเต, อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต…เป… อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ฉฏฺฐํ. 'गामणी, जसे की एखाद्या माणसाने तुपाचा किंवा तेलाचा घडा खोल पाण्याच्या तळ्यात बुडवून फोडला. तेथे जे काही खडे किंवा खापर असतील ते खाली जातील; आणि जे काही तूप किंवा तेल असेल ते वर येईल. आणि लोकांचा मोठा समुदाय एकत्र येऊन, त्याच्याभोवती जमून, हात जोडून प्रार्थना करेल, त्याची स्तुती करेल आणि प्रदक्षिणा घालत म्हणेल— "हे तूप-तेला, खाली बुड! हे तूप-तेला, खाली जा! हे तूप-तेला, खाली बस!" गामणी, तुला काय वाटते? त्या मोठ्या लोकसमुदायाच्या प्रार्थनेमुळे, स्तुतीमुळे किंवा हात जोडून प्रदक्षिणा घालण्याच्या प्रार्थनेमुळे, ते तूप-तेल खाली बुडेल का, खाली जाईल का किंवा खाली बसेल का?' 'नाही, भंते.' 'तसेच, गामणी, जो माणूस प्राणातिपातापासून विरत आहे, अदिन्नादानापासून विरत आहे, कामेसू मिच्छाचारापासून विरत आहे, मुसावादापासून विरत आहे, पिसुणा वाचापासून विरत आहे, फरुसा वाचापासून विरत आहे, संफप्पलापापासून विरत आहे, अनभिज्झालू, अव्यापात्रचित्त आणि सम्मादिट्ठिको आहे; जरी लोकांचा मोठा समुदाय एकत्र येऊन, त्याच्याभोवती जमून, हात जोडून प्रार्थना करेल, त्याची स्तुती करेल आणि प्रदक्षिणा घालत म्हणेल— "हा माणूस शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि नरकात उत्पन्न होवो," तरीही तो माणूस शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकातच उत्पन्न होईल.' असे म्हटले असता, असिबंधकाचा पुत्र गामणि भगवंतांना म्हणाला— 'अतिशय सुंदर, भंते! ... आजपासून मला जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे.' सहावे. ๗. เขตฺตูปมสุตฺตํ ७. खेत्तूपम सुत्त (शेताच्या उपमेचे सुत्त) ๓๕๙. เอกํ สมยํ ภควา นาฬนฺทายํ วิหรติ ปาวาริกมฺพวเน. อถ โข อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘นนุ, ภนฺเต, ภควา สพฺพปาณภูตหิตานุกมฺปี วิหรตี’’ติ? ‘‘เอวํ, คามณิ, ตถาคโต สพฺพปาณภูตหิตานุกมฺปี วิหรตี’’ติ. ‘‘อถ กิญฺจรหิ, ภนฺเต, ภควา เอกจฺจานํ สกฺกจฺจํ ธมฺมํ เทเสติ, เอกจฺจานํ โน ตถา สกฺกจฺจํ ธมฺมํ เทเสตี’’ติ? ‘‘เตน หิ, คามณิ, ตญฺเญเวตฺถ ปฏิปุจฺฉิสฺสามิ. ยถา เต ขเมยฺย ตถา นํ พฺยากเรยฺยาสิ. ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อิธสฺสุ กสฺสกสฺส คหปติโน ตีณิ เขตฺตานิ – เอกํ เขตฺตํ อคฺคํ, เอกํ เขตฺตํ มชฺฌิมํ, เอกํ เขตฺตํ หีนํ ชงฺคลํ อูสรํ ปาปภูมิ. ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อสุ กสฺสโก คหปติ พีชานิ ปติฏฺฐาเปตุกาโม กตฺถ ปฐมํ ปติฏฺฐาเปยฺย, ยํ วา อทุํ เขตฺตํ อคฺคํ, ยํ วา อทุํ เขตฺตํ มชฺฌิมํ, ยํ วา อทุํ เขตฺตํ หีนํ ชงฺคลํ อูสรํ ปาปภูมี’’ติ? ‘‘อสุ, ภนฺเต, กสฺสโก คหปติ พีชานิ ปติฏฺฐาเปตุกาโม ยํ อทุํ เขตฺตํ อคฺคํ ตตฺถ ปติฏฺฐาเปยฺย[Pg.501]. ตตฺถ ปติฏฺฐาเปตฺวา ยํ อทุํ เขตฺตํ มชฺฌิมํ ตตฺถ ปติฏฺฐาเปยฺย. ตตฺถ ปติฏฺฐาเปตฺวา ยํ อทุํ เขตฺตํ หีนํ ชงฺคลํ อูสรํ ปาปภูมิ ตตฺถ ปติฏฺฐาเปยฺยปิ, โนปิ ปติฏฺฐาเปยฺย. ตํ กิสฺส เหตุ? อนฺตมโส โคภตฺตมฺปิ ภวิสฺสตี’’ติ. ३५९. एकदा भगवान नालंदा येथे पावारिकाच्या आंबवनात विहार करत होते. तेव्हा असिबंधकपुत्र गामणी भगवंतांकडे आला; जवळ येऊन भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला असिबंधकपुत्र गामणी भगवंतांना म्हणाला – "भंते, भगवान सर्व प्राणिमात्रांवर अनुकंपा करणारे आणि त्यांचे हित करणारे आहेत ना?" "होय गामणी, तथागत सर्व प्राणिमात्रांवर अनुकंपा करणारे आणि त्यांचे हित करणारे आहेत." "तर मग भंते, भगवान काही लोकांना आदरपूर्वक धम्म शिकवतात, तर काहींना तशा प्रकारे आदरपूर्वक धम्म का शिकवत नाहीत?" "तर मग गामणी, मी तुलाच याविषयी उलट प्रश्न विचारतो. तुला जसे योग्य वाटेल तसे तू उत्तर दे. गामणी, तुला काय वाटते? समजा, एखाद्या शेतकरी गृहपतीकडे तीन शेते आहेत – एक सर्वोत्तम शेत, एक मध्यम शेत आणि एक निकृष्ट, खडकाळ, खारट व वाईट जमीन असलेले शेत. गामणी, तुला काय वाटते? तो शेतकरी गृहपती जेव्हा बियाणे पेरू इच्छितो, तेव्हा तो सर्वात आधी कुठे पेरेल? सर्वोत्तम शेतात, मध्यम शेतात, की निकृष्ट, खडकाळ, खारट व वाईट जमीन असलेल्या शेतात?" "भंते, तो शेतकरी गृहपती बियाणे पेरू इच्छित असताना, सर्वात आधी जे सर्वोत्तम शेत आहे तिथे पेरेल. तिथे पेरणी केल्यानंतर, जे मध्यम शेत आहे तिथे पेरेल. तिथे पेरणी केल्यानंतर, जे निकृष्ट, खडकाळ, खारट व वाईट जमीन असलेले शेत आहे, तिथे तो पेरेलही किंवा कदाचित पेरणारही नाही. त्याचे कारण काय? कारण कमीत कमी गुरांसाठी चारा तरी होईल." ‘‘เสยฺยถาปิ, คามณิ, ยํ อทุํ เขตฺตํ อคฺคํ; เอวเมว มยฺหํ ภิกฺขุภิกฺขุนิโย. เตสาหํ ธมฺมํ เทเสมิ – อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ, สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสมิ. ตํ กิสฺส เหตุ? เอเต หิ, คามณิ, มํทีปา มํเลณา มํตาณา มํสรณา วิหรนฺติ. เสยฺยถาปิ, คามณิ, ยํ อทุํ เขตฺตํ มชฺฌิมํ; เอวเมว มยฺหํ อุปาสกอุปาสิกาโย. เตสํ ปาหํ ธมฺมํ เทเสมิ – อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ, สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสมิ. ตํ กิสฺส เหตุ? เอเต หิ, คามณิ, มํทีปา มํเลณา มํตาณา มํสรณา วิหรนฺติ. เสยฺยถาปิ, คามณิ, ยํ อทุํ เขตฺตํ หีนํ ชงฺคลํ อูสรํ ปาปภูมิ; เอวเมว มยฺหํ อญฺญติตฺถิยา สมณพฺราหฺมณปริพฺพาชกา. เตสํ ปาหํ ธมฺมํ เทเสมิ – อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ, เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสมิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อปฺเปว นาม เอกํ ปทมฺปิ อาชาเนยฺยุํ ตํ เนสํ อสฺส ทีฆรตฺตํ หิตาย สุขายา’’ติ. "गामणी, ज्याप्रमाणे ते सर्वोत्तम शेत आहे, त्याचप्रमाणे माझे भिक्खू आणि भिक्खुनी आहेत. मी त्यांना धम्म उपदेश करतो – जो आदी-कल्याण (सुरुवातीला कल्याणकारी), मध्य-कल्याण (मध्ये कल्याणकारी) आणि परियोसान-कल्याण (शेवटी कल्याणकारी) आहे; अर्थासहित आणि व्यंजनासहित परिपूर्ण व अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचे मी प्रकाशन करतो. त्याचे कारण काय? कारण गामणी, हे भिक्खू आणि भिक्खुनी मलाच आपला द्वीप (आश्रय), मलाच आपले लेण (आडोसा), मलाच आपले त्राण (रक्षक) आणि मलाच आपले शरण मानून राहतात. गामणी, ज्याप्रमाणे ते मध्यम शेत आहे, त्याचप्रमाणे माझे उपासक आणि उपासिका आहेत. मी त्यांनाही धम्म उपदेश करतो – जो आदी-कल्याण, मध्य-कल्याण आणि परियोसान-कल्याण आहे; अर्थासहित आणि व्यंजनासहित परिपूर्ण व अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचे मी प्रकाशन करतो. त्याचे कारण काय? कारण गामणी, हे उपासक आणि उपासिका मलाच आपला द्वीप, मलाच आपले लेण, मलाच आपले त्राण आणि मलाच आपले शरण मानून राहतात. गामणी, ज्याप्रमाणे ते निकृष्ट, खडकाळ, खारट व वाईट जमीन असलेले शेत आहे, त्याचप्रमाणे माझे अन्य पंथांचे श्रमण, ब्राह्मण आणि परिव्राजक आहेत. मी त्यांनाही धम्म उपदेश करतो – जो आदी-कल्याण, मध्य-कल्याण आणि परियोसान-कल्याण आहे; अर्थासहित आणि व्यंजनासहित परिपूर्ण व अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचे मी प्रकाशन करतो. त्याचे कारण काय? कारण जर त्यांनी एक जरी पद (वाक्य) जाणले, तरी ते त्यांच्या दीर्घकालीन हितासाठी आणि सुखासाठी होईल." ‘‘เสยฺยถาปิ, คามณิ, ปุริสสฺส ตโย อุทกมณิกา – เอโก อุทกมณิโก อจฺฉิทฺโท อหารี อปริหารี, เอโก อุทกมณิโก อจฺฉิทฺโท หารี ปริหารี, เอโก อุทกมณิโก ฉิทฺโท หารี ปริหารี. ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อสุ ปุริโส อุทกํ นิกฺขิปิตุกาโม กตฺถ ปฐมํ นิกฺขิเปยฺย, โย วา โส อุทกมณิโก อจฺฉิทฺโท อหารี อปริหารี, โย วา โส อุทกมณิโก อจฺฉิทฺโท หารี ปริหารี, โย วา โส อุทกมณิโก ฉิทฺโท หารี ปริหารี’’ติ? ‘‘อสุ, ภนฺเต, ปุริโส อุทกํ นิกฺขิปิตุกาโม, โย โส อุทกมณิโก อจฺฉิทฺโท อหารี อปริหารี ตตฺถ นิกฺขิเปยฺย, ตตฺถ นิกฺขิปิตฺวา, โย โส อุทกมณิโก อจฺฉิทฺโท หารี ปริหารี ตตฺถ นิกฺขิเปยฺย, ตตฺถ นิกฺขิปิตฺวา, โย โส อุทกมณิโก ฉิทฺโท หารี ปริหารี ตตฺถ นิกฺขิเปยฺยปิ, โนปิ นิกฺขิเปยฺย. ตํ กิสฺส เหตุ? อนฺตมโส ภณฺฑโธวนมฺปิ ภวิสฺสตี’’ติ. "गामणी, ज्याप्रमाणे एखाद्या माणसाकडे पाण्याचे तीन रांजण असावेत – एक रांजण छिद्र नसलेला, पाणी न गळणारा आणि न पाझरणारा; एक रांजण छिद्र नसलेला पण पाणी गळणारा आणि पाझरणारा; आणि एक रांजण छिद्र असलेला, पाणी गळणारा आणि पाझरणारा. गामणी, तुला काय वाटते? तो माणूस जेव्हा पाणी साठवू इच्छितो, तेव्हा तो सर्वात आधी कोणत्या रांजणात पाणी साठवेल? जो छिद्र नसलेला, पाणी न गळणारा आणि न पाझरणारा आहे त्यात; की जो छिद्र नसलेला पण पाणी गळणारा आणि पाझरणारा आहे त्यात; की जो छिद्र असलेला, पाणी गळणारा आणि पाझरणारा आहे त्यात?" "भंते, तो माणूस पाणी साठवू इच्छित असताना, सर्वात आधी जो छिद्र नसलेला, पाणी न गळणारा आणि न पाझरणारा रांजण आहे त्यात पाणी साठवेल. त्यात साठवल्यानंतर, जो छिद्र नसलेला पण पाणी गळणारा आणि पाझरणारा रांजण आहे त्यात साठवेल. त्यात साठवल्यानंतर, जो छिद्र असलेला, पाणी गळणारा आणि पाझरणारा रांजण आहे, त्यात तो पाणी साठवेलही किंवा कदाचित साठवणारही नाही. त्याचे कारण काय? कारण कमीत कमी भांडी किंवा कपडे धुण्यासाठी तरी ते पाणी उपयोगी पडेल." ‘‘เสยฺยถาปิ, คามณิ, โย โส อุทกมณิโก อจฺฉิทฺโท อหารี อปริหารี; เอวเมว มยฺหํ ภิกฺขุภิกฺขุนิโย. เตสาหํ ธมฺมํ เทเสมิ – อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ [Pg.502] สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ, เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสมิ. ตํ กิสฺส เหตุ? เอเต หิ, คามณิ, มํทีปา มํเลณา มํตาณา มํสรณา วิหรนฺติ. เสยฺยถาปิ, คามณิ, โย โส อุทกมณิโก อจฺฉิทฺโท หารี ปริหารี; เอวเมว มยฺหํ อุปาสกอุปาสิกาโย. เตสาหํ ธมฺมํ เทเสมิ – อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ, เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสมิ. ตํ กิสฺส เหตุ? เอเต หิ, คามณิ, มํทีปา มํเลณา มํตาณา มํสรณา วิหรนฺติ. เสยฺยถาปิ, คามณิ, โย โส อุทกมณิโก ฉิทฺโท หารี ปริหารี; เอวเมว มยฺหํ อญฺญติตฺถิยา สมณพฺราหฺมณปริพฺพาชกา. เตสาหํ ธมฺมํ เทเสมิ – อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสมิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อปฺเปว นาม เอกํ ปทมฺปิ อาชาเนยฺยุํ, ตํ เนสํ อสฺส ทีฆรตฺตํ หิตาย สุขายา’’ติ. เอวํ วุตฺเต, อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต…เป… อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. สตฺตมํ. "गामणी, ज्याप्रमाणे तो छिद्र नसलेला, पाणी न गळणारा आणि न पाझरणारा रांजण आहे, त्याचप्रमाणे माझे भिक्खू आणि भिक्खुनी आहेत. मी त्यांना धम्म उपदेश करतो – जो आदी-कल्याण, मध्य-कल्याण आणि परियोसान-कल्याण आहे; अर्थासहित आणि व्यंजनासहित परिपूर्ण व अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचे मी प्रकाशन करतो. त्याचे कारण काय? कारण गामणी, हे भिक्खू आणि भिक्खुनी मलाच आपला द्वीप, मलाच आपले लेण, मलाच आपले त्राण आणि मलाच आपले शरण मानून राहतात. गामणी, ज्याप्रमाणे तो छिद्र नसलेला पण पाणी गळणारा आणि पाझरणारा रांजण आहे, त्याचप्रमाणे माझे उपासक आणि उपासिका आहेत. मी त्यांना धम्म उपदेश करतो – जो आदी-कल्याण, मध्य-कल्याण आणि परियोसान-कल्याण आहे; अर्थासहित आणि व्यंजनासहित परिपूर्ण व अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचे मी प्रकाशन करतो. त्याचे कारण काय? कारण गामणी, हे उपासक आणि उपासिका मलाच आपला द्वीप, मलाच आपले लेण, मलाच आपले त्राण आणि मलाच आपले शरण मानून राहतात. गामणी, ज्याप्रमाणे तो छिद्र असलेला, पाणी गळणारा आणि पाझरणारा रांजण आहे, त्याचप्रमाणे माझे अन्य पंथांचे श्रमण, ब्राह्मण आणि परिव्राजक आहेत. मी त्यांना धम्म उपदेश करतो – जो आदी-कल्याण, मध्य-कल्याण आणि परियोसान-कल्याण आहे; अर्थासहित आणि व्यंजनासहित परिपूर्ण व अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचे मी प्रकाशन करतो. त्याचे कारण काय? कारण जर त्यांनी एक जरी पद (वाक्य) जाणले, तरी ते त्यांच्या दीर्घकालीन हितासाठी आणि सुखासाठी होईल." असे म्हटले असता, असिबंधकपुत्र गामणी भगवंतांना म्हणाला – "अतिशय सुंदर, भंते! अतिशय सुंदर, भंते! ... आजपासून मला भगवंतांनी जोपर्यंत जिवंत आहे तोपर्यंत शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे." सातवे सुत्त समाप्त. ๘. สงฺขธมสุตฺตํ ८. संखधम सुत्त (शंख वाजवणाऱ्याचे सुत्त) ๓๖๐. เอกํ สมยํ ภควา นาฬนฺทายํ วิหรติ ปาวาริกมฺพวเน. อถ โข อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ นิคณฺฐสาวโก เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข อสิพนฺธกปุตฺตํ คามณึ ภควา เอตทโวจ – ‘‘กถํ นุ โข, คามณิ, นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต สาวกานํ ธมฺมํ เทเสตี’’ติ? ‘‘เอวํ โข, ภนฺเต, นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต สาวกานํ ธมฺมํ เทเสติ – ‘โย โกจิ ปาณํ อติปาเตติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโก, โย โกจิ อทินฺนํ อาทิยติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโก, โย โกจิ กาเมสุ มิจฺฉา จรติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโก, โย โกจิ มุสา ภณติ สพฺโพ, โส อาปายิโก เนรยิโก. ยํพหุลํ ยํพหุลํ วิหรติ, เตน เตน นียตี’ติ. เอวํ โข, ภนฺเต, นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต สาวกานํ ธมฺมํ เทเสตี’’ติ. ‘‘‘ยํพหุลํ ยํพหุลญฺจ, คามณิ, วิหรติ, เตน เตน นียติ’, เอวํ สนฺเต น โกจิ อาปายิโก เนรยิโก ภวิสฺสติ, ยถา นิคณฺฐสฺส นาฏปุตฺตสฺส วจนํ’’. ३६०. एकदा भगवान नाळंदा येथे पावारिकच्या आम्रवनात विहार करत होते. तेव्हा निगंठ श्रावक असलेला असिबंधकपुत्र गामणी जेथे भगवान होते तेथे आला; आणि जवळ येऊन एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या असिबंधकपुत्र गामणीला भगवान म्हणाले – “गामणी, निगंठ नाटपुत्त आपल्या श्रावकांना कशा प्रकारे धम्माचा उपदेश करतात?” “भंते, निगंठ नाटपुत्त आपल्या श्रावकांना असा धम्माचा उपदेश करतात – ‘जो कोणी प्राणाची हिंसा करतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो; जो कोणी न दिलेले घेतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो; जो कोणी कामभोगांमध्ये व्यभिचार करतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो; जो कोणी असत्य बोलतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो. मनुष्य ज्या कर्मात बहुतांश काळ घालवतो, त्यानुसारच तो नेला जातो.’ भंते, अशा प्रकारे निगंठ नाटपुत्त आपल्या श्रावकांना धम्माचा उपदेश करतात.” “गामणी, जर ‘मनुष्य ज्या कर्मात बहुतांश काळ घालवतो, त्यानुसारच तो नेला जातो’ असे असेल, तर निगंठ नाटपुत्तांच्या वचनानुसार कोणीही अपाय किंवा नरकात जाणार नाही.” ‘‘ตํ [Pg.503] กึ มญฺญสิ, คามณิ, โย โส ปุริโส ปาณาติปาตี รตฺติยา วา ทิวสสฺส วา สมยาสมยํ อุปาทาย, กตโม พหุตโร สมโย, ยํ วา โส ปาณมติปาเตติ, ยํ วา โส ปาณํ นาติปาเตตี’’ติ? ‘‘โย โส, ภนฺเต, ปุริโส ปาณาติปาตี รตฺติยา วา ทิวสสฺส วา สมยาสมยํ อุปาทาย, อปฺปตโร โส สมโย ยํ โส ปาณมติปาเตติ, อถ โข สฺเวว พหุตโร สมโย ยํ โส ปาณํ นาติปาเตตี’’ติ. ‘‘‘ยํพหุลํ ยํพหุลญฺจ, คามณิ, วิหรติ เตน เตน นียตี’ติ, เอวํ สนฺเต น โกจิ อาปายิโก เนรยิโก ภวิสฺสติ, ยถา นิคณฺฐสฺส นาฏปุตฺตสฺส วจนํ’’. “गामणी, तुला काय वाटते? जो मनुष्य प्राणाची हिंसा करणारा आहे, त्याच्या रात्रीच्या किंवा दिवसाच्या वेळेचा विचार करता, कोणता काळ अधिक असतो – ज्या काळात तो प्राणाची हिंसा करतो की ज्या काळात तो प्राणाची हिंसा करत नाही?” “भंते, जो मनुष्य प्राणाची हिंसा करणारा आहे, त्याच्या रात्रीच्या किंवा दिवसाच्या वेळेचा विचार करता, ज्या काळात तो प्राणाची हिंसा करतो तो काळ अत्यंत अल्प असतो; उलटपक्षी, ज्या काळात तो प्राणाची हिंसा करत नाही तोच काळ अधिक असतो.” “गामणी, जर ‘मनुष्य ज्या कर्मात बहुतांश काळ घालवतो, त्यानुसारच तो नेला जातो’ असे असेल, तर निगंठ नाटपुत्तांच्या वचनानुसार कोणीही अपाय किंवा नरकात जाणार नाही.” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, โย โส ปุริโส อทินฺนาทายี รตฺติยา วา ทิวสสฺส วา สมยาสมยํ อุปาทาย, กตโม พหุตโร สมโย, ยํ วา โส อทินฺนํ อาทิยติ, ยํ วา โส อทินฺนํ นาทิยตี’’ติ. ‘‘โย โส, ภนฺเต, ปุริโส อทินฺนาทายี รตฺติยา วา ทิวสสฺส วา สมยาสมยํ อุปาทาย อปฺปตโร โส สมโย, ยํ โส อทินฺนํ อาทิยติ, อถ โข สฺเวว พหุตโร สมโย, ยํ โส อทินฺนํ นาทิยตี’’ติ. ‘‘‘ยํพหุลํ ยํพหุลญฺจ, คามณิ, วิหรติ เตน เตน นียตี’ติ, เอวํ สนฺเต น โกจิ อาปายิโก เนรยิโก ภวิสฺสติ, ยถา นิคณฺฐสฺส นาฏปุตฺตสฺส วจนํ’’. “गामणी, तुला काय वाटते? जो मनुष्य न दिलेले घेणारा आहे, त्याच्या रात्रीच्या किंवा दिवसाच्या वेळेचा विचार करता, कोणता काळ अधिक असतो – ज्या काळात तो न दिलेले घेतो की ज्या काळात तो न दिलेले घेत नाही?” “भंते, जो मनुष्य न दिलेले घेणारा आहे, त्याच्या रात्रीच्या किंवा दिवसाच्या वेळेचा विचार करता, ज्या काळात तो न दिलेले घेतो तो काळ अत्यंत अल्प असतो; उलटपक्षी, ज्या काळात तो न दिलेले घेत नाही तोच काळ अधिक असतो.” “गामणी, जर ‘मनुष्य ज्या कर्मात बहुतांश काळ घालवतो, त्यानुसारच तो नेला जातो’ असे असेल, तर निगंठ नाटपुत्तांच्या वचनानुसार कोणीही अपाय किंवा नरकात जाणार नाही.” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, โย โส ปุริโส กาเมสุมิจฺฉาจารี รตฺติยา วา ทิวสสฺส วา สมยาสมยํ อุปาทาย, กตโม พหุตโร สมโย, ยํ วา โส กาเมสุ มิจฺฉา จรติ, ยํ วา โส กาเมสุ มิจฺฉา น จรตี’’ติ? ‘‘โย โส, ภนฺเต, ปุริโส กาเมสุมิจฺฉาจารี รตฺติยา วา ทิวสสฺส วา สมยาสมยํ อุปาทาย, อปฺปตโร โส สมโย ยํ โส กาเมสุ มิจฺฉา จรติ, อถ โข สฺเวว พหุตโร สมโย, ยํ โส กาเมสุ มิจฺฉา น จรตี’’ติ. ‘‘‘ยํพหุลํ ยํพหุลญฺจ, คามณิ, วิหรติ เตน เตน นียตี’ติ, เอวํ สนฺเต น โกจิ อาปายิโก เนรยิโก ภวิสฺสติ, ยถา นิคณฺฐสฺส นาฏปุตฺตสฺส วจนํ’’. “गामणी, तुला काय वाटते? जो मनुष्य कामभोगांमध्ये व्यभिचार करणारा आहे, त्याच्या रात्रीच्या किंवा दिवसाच्या वेळेचा विचार करता, कोणता काळ अधिक असतो – ज्या काळात तो कामभोगांमध्ये व्यभिचार करतो की ज्या काळात तो कामभोगांमध्ये व्यभिचार करत नाही?” “भंते, जो मनुष्य कामभोगांमध्ये व्यभिचार करणारा आहे, त्याच्या रात्रीच्या किंवा दिवसाच्या वेळेचा विचार करता, ज्या काळात तो कामभोगांमध्ये व्यभिचार करतो तो काळ अत्यंत अल्प असतो; उलटपक्षी, ज्या काळात तो कामभोगांमध्ये व्यभिचार करत नाही तोच काळ अधिक असतो.” “गामणी, जर ‘मनुष्य ज्या कर्मात बहुतांश काळ घालवतो, त्यानुसारच तो नेला जातो’ असे असेल, तर निगंठ नाटपुत्तांच्या वचनानुसार कोणीही अपाय किंवा नरकात जाणार नाही.” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, โย โส ปุริโส มุสาวาที รตฺติยา วา ทิวสสฺส วา สมยาสมยํ อุปาทาย, กตโม พหุตโร สมโย, ยํ วา โส มุสา ภณติ, ยํ วา โส มุสา น ภณตี’’ติ? ‘‘โย โส, ภนฺเต, ปุริโส มุสาวาที รตฺติยา วา ทิวสสฺส วา สมยาสมยํ อุปาทาย[Pg.504], อปฺปตโร โส สมโย, ยํ โส มุสา ภณติ, อถ โข สฺเวว พหุตโร สมโย, ยํ โส มุสา น ภณตี’’ติ. ‘‘‘ยํพหุลํ ยํพหุลญฺจ, คามณิ, วิหรติ เตน เตน นียตี’ติ, เอวํ สนฺเต น โกจิ อาปายิโก เนรยิโก ภวิสฺสติ, ยถา นิคณฺฐสฺส นาฏปุตฺตสฺส วจนํ’’. “गामणी, तुला काय वाटते? जो मनुष्य असत्य बोलणारा आहे, त्याच्या रात्रीच्या किंवा दिवसाच्या वेळेचा विचार करता, कोणता काळ अधिक असतो – ज्या काळात तो असत्य बोलतो की ज्या काळात तो असत्य बोलत नाही?” “भंते, जो मनुष्य असत्य बोलणारा आहे, त्याच्या रात्रीच्या किंवा दिवसाच्या वेळेचा विचार करता, ज्या काळात तो असत्य बोलतो तो काळ अत्यंत अल्प असतो; उलटपक्षी, ज्या काळात तो असत्य बोलत नाही तोच काळ अधिक असतो.” “गामणी, जर ‘मनुष्य ज्या कर्मात बहुतांश काळ घालवतो, त्यानुसारच तो नेला जातो’ असे असेल, तर निगंठ नाटपुत्तांच्या वचनानुसार कोणीही अपाय किंवा नरकात जाणार नाही.” ‘‘อิธ, คามณิ, เอกจฺโจ สตฺถา เอวํวาที โหติ เอวํทิฏฺฐิ – ‘โย โกจิ ปาณมติปาเตติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโก, โย โกจิ อทินฺนํ อาทิยติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโก, โย โกจิ กาเมสุ มิจฺฉา จรติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโก, โย โกจิ มุสา ภณติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโก’ติ. ตสฺมึ โข ปน, คามณิ, สตฺถริ สาวโก อภิปฺปสนฺโน โหติ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘มยฺหํ โข สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – โย โกจิ ปาณมติปาเตติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโกติ. อตฺถิ โข ปน มยา ปาโณ อติปาติโต, อหมฺปมฺหิ อาปายิโก เนรยิโกติ ทิฏฺฐึ ปฏิลภติ. ตํ, คามณิ, วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา ยถาภตํ นิกฺขิตฺโต เอวํ นิรเย. มยฺหํ โข สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – โย โกจิ อทินฺนํ อาทิยติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโกติ. อตฺถิ โข ปน มยา อทินฺนํ อาทินฺนํ อหมฺปมฺหิ อาปายิโก เนรยิโกติ ทิฏฺฐึ ปฏิลภติ. ตํ, คามณิ, วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา ยถาภตํ นิกฺขิตฺโต เอวํ นิรเย. มยฺหํ โข สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – โย โกจิ กาเมสุ มิจฺฉา จรติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโก’ติ. อตฺถิ โข ปน มยา กาเมสุ มิจฺฉา จิณฺณํ. ‘อหมฺปมฺหิ อาปายิโก เนรยิโก’ติ ทิฏฺฐึ ปฏิลภติ. ตํ, คามณิ, วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา ยถาภตํ นิกฺขิตฺโต เอวํ นิรเย. มยฺหํ โข สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – โย โกจิ มุสา ภณติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโกติ. อตฺถิ โข ปน มยา มุสา ภณิตํ. ‘อหมฺปมฺหิ อาปายิโก เนรยิโก’ติ ทิฏฺฐึ ปฏิลภติ. ตํ, คามณิ, วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา ยถาภตํ นิกฺขิตฺโต เอวํ นิรเย. “गामणी, या जगात एखादा शास्ता असा वाद मांडणारा आणि अशी दृष्टी बाळगणारा असतो – ‘जो कोणी प्राणाची हिंसा करतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो; जो कोणी न दिलेले घेतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो; जो कोणी कामभोगांमध्ये व्यभिचार करतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो; जो कोणी असत्य बोलतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो.’ गामणी, त्या शास्त्यावर त्याचा एखादा श्रावक अत्यंत श्रद्धा ठेवतो. त्याच्या मनात असा विचार येतो – ‘माझे शास्ते असा वाद मांडणारे आणि अशी दृष्टी बाळगणारे आहेत की – जो कोणी प्राणाची हिंसा करतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो. माझ्याकडूनही प्राणाची हिंसा झाली आहे, त्यामुळे मीसुद्धा अपाय आणि नरकास पात्र आहे.’ अशा प्रकारे तो ही दृष्टी दृढ करतो. गामणी, त्या वचनाचा त्याग न करता, त्या चित्ताचा त्याग न करता आणि त्या दृष्टीचा त्याग न करता, जणू काही उचलून आणून ठेवल्याप्रमाणे तो नरकात टाकला जातो. त्याच्या मनात असा विचार येतो – ‘माझे शास्ते असा वाद मांडणारे आणि अशी दृष्टी बाळगणारे आहेत की – जो कोणी न दिलेले घेतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो. माझ्याकडूनही न दिलेले घेतले गेले आहे, त्यामुळे मीसुद्धा अपाय आणि नरकास पात्र आहे.’ अशा प्रकारे तो ही दृष्टी दृढ करतो. गामणी, त्या वचनाचा त्याग न करता, त्या चित्ताचा त्याग न करता आणि त्या दृष्टीचा त्याग न करता, जणू काही उचलून आणून ठेवल्याप्रमाणे तो नरकात टाकला जातो. त्याच्या मनात असा विचार येतो – ‘माझे शास्ते असा वाद मांडणारे आणि अशी दृष्टी बाळगणारे आहेत की – जो कोणी कामभोगांमध्ये व्यभिचार करतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो. माझ्याकडूनही कामभोगांमध्ये व्यभिचार घडला आहे, त्यामुळे मीसुद्धा अपाय आणि नरकास पात्र आहे.’ अशा प्रकारे तो ही दृष्टी दृढ करतो. गामणी, त्या वचनाचा त्याग न करता, त्या चित्ताचा त्याग न करता आणि त्या दृष्टीचा त्याग न करता, जणू काही उचलून आणून ठेवल्याप्रमाणे तो नरकात टाकला जातो. त्याच्या मनात असा विचार येतो – ‘माझे शास्ते असा वाद मांडणारे आणि अशी दृष्टी बाळगणारे आहेत की – जो कोणी असत्य बोलतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो. माझ्याकडूनही असत्य बोलले गेले आहे, त्यामुळे मीसुद्धा अपाय आणि नरकास पात्र आहे.’ अशा प्रकारे तो ही दृष्टी दृढ करतो. गामणी, त्या वचनाचा त्याग न करता, त्या चित्ताचा त्याग न करता आणि त्या दृष्टीचा त्याग न करता, जणू काही उचलून आणून ठेवल्याप्रमाणे तो नरकात टाकला जातो.” ‘‘อิธ [Pg.505] ปน, คามณิ, ตถาคโต โลเก อุปฺปชฺชติ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน สุคโต โลกวิทู อนุตฺตโร ปุริสทมฺมสารถิ สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา. โส อเนกปริยาเยน ปาณาติปาตํ ครหติ วิครหติ, ‘ปาณาติปาตา วิรมถา’ติ จาห. อทินฺนาทานํ ครหติ วิครหติ, ‘อทินฺนาทานา วิรมถา’ติ จาห. กาเมสุมิจฺฉาจารํ ครหติ, วิครหติ ‘กาเมสุมิจฺฉาจารา วิรมถา’ติ จาห. มุสาวาทํ ครหติ วิครหติ ‘มุสาวาทา วิรมถา’ติ จาห. ตสฺมึ โข ปน, คามณิ, สตฺถริ สาวโก อภิปฺปสนฺโน โหติ. โส อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘ภควา โข อเนกปริยาเยน ปาณาติปาตํ ครหติ วิครหติ, ปาณาติปาตา วิรมถาติ จาห. อตฺถิ โข ปน มยา ปาโณ อติปาติโต ยาวตโก วา ตาวตโก วา. โย โข ปน มยา ปาโณ อติปาติโต ยาวตโก วา ตาวตโก วา, ตํ น สุฏฺฐุ, ตํ น สาธุ. อหญฺเจว โข ปน ตปฺปจฺจยา วิปฺปฏิสารี อสฺสํ. น เมตํ ปาปํ กมฺมํ อกตํ ภวิสฺสตี’ติ. โส อิติ ปฏิสงฺขาย ตญฺเจว ปาณาติปาตํ ปชหติ. อายติญฺจ ปาณาติปาตา ปฏิวิรโต โหติ. เอวเมตสฺส ปาปสฺส กมฺมสฺส ปหานํ โหติ. เอวเมตสฺส ปาปสฺส กมฺมสฺส สมติกฺกโม โหติ. हे ग्रामणी, या जगात तथागत उत्पन्न होतात, जे अर्हत, सम्यक्संबुद्ध, विद्याचरणसंपन्न, सुगत, लोकविदू, अनुत्तर पुरुषदम्यसारथी, देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध आणि भगवान आहेत. ते अनेक पर्यायांनी प्राणातिपाताची (जीवहिंसेची) निंदा करतात, निर्भत्सना करतात आणि म्हणतात: 'प्राणातिपातापासून अलिप्त राहा.' ते अदित्नादानाची (चोरीची) निंदा करतात, निर्भत्सना करतात आणि म्हणतात: 'अदित्नादानापासून अलिप्त राहा.' ते कामेसू मिच्छाचाराची (व्यभिचाराची) निंदा करतात, निर्भत्सना करतात आणि म्हणतात: 'कामेसू मिच्छाचारापासून अलिप्त राहा.' ते मृषावादाची (असत्य बोलण्याची) निंदा करतात, निर्भत्सना करतात आणि म्हणतात: 'मृषावादापासून अलिप्त राहा.' हे ग्रामणी, त्या शास्त्यांवर एखादा श्रावक अत्यंत प्रसन्न होतो. तो असा विचार करतो – 'भगवान अनेक पर्यायांनी प्राणातिपाताची निंदा करतात, निर्भत्सना करतात आणि म्हणतात: "प्राणातिपातापासून अलिप्त राहा." माझ्याकडून कमी-अधिक प्रमाणात प्राणांची हिंसा झाली आहे. माझ्याकडून जी काही कमी-अधिक प्रमाणात जीवहिंसा झाली आहे, ते योग्य नव्हते, ते चांगले नव्हते. जरी मी याबद्दल पश्चात्ताप केला, तरी माझे ते पापकर्म न केल्यासारखे होणार नाही.' तो असा विचार करून त्या प्राणातिपाताचा त्याग करतो आणि भविष्यात प्राणातिपातापासून अलिप्त राहतो. अशा प्रकारे त्याच्या त्या पापकर्माचा त्याग होतो; अशा प्रकारे तो त्या पापकर्माचे अतिक्रमण करतो. ‘‘‘ภควา โข อเนกปริยาเยน อทินฺนาทานํ ครหติ วิครหติ, อทินฺนาทานา วิรมถาติ จาห. อตฺถิ โข ปน มยา อทินฺนํ อาทินฺนํ ยาวตกํ วา ตาวตกํ วา. ยํ โข ปน มยา อทินฺนํ อาทินฺนํ ยาวตกํ วา ตาวตกํ วา ตํ น สุฏฺฐุ, ตํ น สาธุ. อหญฺเจว โข ปน ตปฺปจฺจยา วิปฺปฏิสารี อสฺสํ, น เมตํ ปาปํ กมฺมํ อกตํ ภวิสฺสตี’ติ. โส อิติ ปฏิสงฺขาย ตญฺเจว อทินฺนาทานํ ปชหติ. อายติญฺจ อทินฺนาทานา ปฏิวิรโต โหติ. เอวเมตสฺส ปาปสฺส กมฺมสฺส ปหานํ โหติ. เอวเมตสฺส ปาปสฺส กมฺมสฺส สมติกฺกโม โหติ. तो असा विचार करतो – 'भगवान अनेक पर्यायांनी अदित्नादानाची निंदा करतात, निर्भत्सना करतात आणि म्हणतात: "अदित्नादानापासून अलिप्त राहा." माझ्याकडून कमी-अधिक प्रमाणात न दिलेले घेतले गेले आहे. माझ्याकडून जे काही कमी-अधिक प्रमाणात न दिलेले घेतले गेले आहे, ते योग्य नव्हते, ते चांगले नव्हते. जरी मी याबद्दल पश्चात्ताप केला, तरी माझे ते पापकर्म न केल्यासारखे होणार नाही.' तो असा विचार करून त्या अदित्नादानाचा त्याग करतो आणि भविष्यात अदित्नादानापासून अलिप्त राहतो. अशा प्रकारे त्याच्या त्या पापकर्माचा त्याग होतो; अशा प्रकारे तो त्या पापकर्माचे अतिक्रमण करतो. ‘‘‘ภควา โข ปน อเนกปริยาเยน กาเมสุมิจฺฉาจารํ ครหติ วิครหติ, กาเมสุมิจฺฉาจารา วิรมถาติ จาห. อตฺถิ โข ปน มยา กาเมสุ มิจฺฉา จิณฺณํ ยาวตกํ วา ตาวตกํ วา. ยํ โข ปน มยา กาเมสุ มิจฺฉา จิณฺณํ ยาวตกํ วา ตาวตกํ วา ตํ น สุฏฺฐุ, ตํ น สาธุ. อหญฺเจว โข ปน ตปฺปจฺจยา วิปฺปฏิสารี อสฺสํ, น [Pg.506] เมตํ ปาปํ กมฺมํ อกตํ ภวิสฺสตี’ติ. โส อิติ ปฏิสงฺขาย ตญฺเจว กาเมสุมิจฺฉาจารํ ปชหติ, อายติญฺจ กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรโต โหติ. เอวเมตสฺส ปาปสฺส กมฺมสฺส ปหานํ โหติ. เอวเมตสฺส ปาปสฺส กมฺมสฺส สมติกฺกโม โหติ. तो असा विचार करतो – 'भगवान अनेक पर्यायांनी कामेसू मिच्छाचाराची निंदा करतात, निर्भत्सना करतात आणि म्हणतात: "कामेसू मिच्छाचारापासून अलिप्त राहा." माझ्याकडून कमी-अधिक प्रमाणात कामभोगांमध्ये चुकीचे वर्तन घडले आहे. माझ्याकडून जे काही कमी-अधिक प्रमाणात कामभोगांमध्ये चुकीचे वर्तन घडले आहे, ते योग्य नव्हते, ते चांगले नव्हते. जरी मी याबद्दल पश्चात्ताप केला, तरी माझे ते पापकर्म न केल्यासारखे होणार नाही.' तो असा विचार करून त्या कामेसू मिच्छाचाराचा त्याग करतो आणि भविष्यात कामेसू मिच्छाचारापासून अलिप्त राहतो. अशा प्रकारे त्याच्या त्या पापकर्माचा त्याग होतो; अशा प्रकारे तो त्या पापकर्माचे अतिक्रमण करतो. ‘‘‘ภควา โข ปน อเนกปริยาเยน มุสาวาทํ ครหติ วิครหติ, มุสาวาทา วิรมถาติ จาห. อตฺถิ โข ปน มยา มุสา ภณิตํ ยาวตกํ วา ตาวตกํ วา. ยํ โข ปน มยา มุสา ภณิตํ ยาวตกํ วา ตาวตกํ วา ตํ น สุฏฺฐุ, ตํ น สาธุ. อหญฺเจว โข ปน ตปฺปจฺจยา วิปฺปฏิสารี อสฺสํ, น เมตํ ปาปํ กมฺมํ อกตํ ภวิสฺสตี’ติ. โส อิติ ปฏิสงฺขาย ตญฺเจว มุสาวาทํ ปชหติ, อายติญฺจ มุสาวาทา ปฏิวิรโต โหติ. เอวเมตสฺส ปาปสฺส กมฺมสฺส ปหานํ โหติ. เอวเมตสฺส ปาปสฺส กมฺมสฺส สมติกฺกโม โหติ. तो असा विचार करतो – 'भगवान अनेक पर्यायांनी मृषावादाची निंदा करतात, निर्भत्सना करतात आणि म्हणतात: "मृषावादापासून अलिप्त राहा." माझ्याकडून कमी-अधिक प्रमाणात असत्य बोलले गेले आहे. माझ्याकडून जे काही कमी-अधिक प्रमाणात असत्य बोलले गेले आहे, ते योग्य नव्हते, ते चांगले नव्हते. जरी मी याबद्दल पश्चात्ताप केला, तरी माझे ते पापकर्म न केल्यासारखे होणार नाही.' तो असा विचार करून त्या मृषावादाचा त्याग करतो आणि भविष्यात मृषावादापासून अलिप्त राहतो. अशा प्रकारे त्याच्या त्या पापकर्माचा त्याग होतो; अशा प्रकारे तो त्या पापकर्माचे अतिक्रमण करतो. ‘‘โส ปาณาติปาตํ ปหาย ปาณาติปาตา ปฏิวิรโต โหติ. อทินฺนาทานํ ปหาย อทินฺนาทานา ปฏิวิรโต โหติ. กาเมสุมิจฺฉาจารํ ปหาย กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรโต โหติ. มุสาวาทํ ปหาย มุสาวาทา ปฏิวิรโต โหติ. ปิสุณํ วาจํ ปหาย ปิสุณาย วาจาย ปฏิวิรโต โหติ. ผรุสํ วาจํ ปหาย ผรุสาย วาจาย ปฏิวิรโต โหติ. สมฺผปฺปลาปํ ปหาย สมฺผปฺปลาปา ปฏิวิรโต โหติ. อภิชฺฌํ ปหาย อนภิชฺฌาลุ โหติ. พฺยาปาทปฺปโทสํ ปหาย อพฺยาปนฺนจิตฺโต โหติ. มิจฺฉาทิฏฺฐึ ปหาย สมฺมาทิฏฺฐิโก โหติ. तो प्राणातिपाताचा त्याग करून प्राणातिपातापासून अलिप्त राहतो. अदित्नादानाचा त्याग करून अदित्नादानापासून अलिप्त राहतो. कामेसू मिच्छाचाराचा त्याग करून कामेसू मिच्छाचारापासून अलिप्त राहतो. मृषावादाचा त्याग करून मृषावादापासून अलिप्त राहतो. पिशुन वाचेचा (चुगलीचा) त्याग करून पिशुन वाचेपासून अलिप्त राहतो. परुष वाचेचा (कठोर बोलण्याचा) त्याग करून परुष वाचेपासून अलिप्त राहतो. संफप्पलापाचा (व्यर्थ बडबडीचा) त्याग करून संफप्पलापापासून अलिप्त राहतो. अभिध्येचा (लोभाचा) त्याग करून अनभिध्यालू (लोभरहित) होतो. व्यापाद-प्रदोषाचा (द्वेषाचा) त्याग करून अव्यापन्नचित्त (द्वेषरहित चित्त असलेला) होतो. मिथ्यादृष्टीचा त्याग करून सम्यग्दृष्टी होतो. ‘‘ส โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต เมตฺตาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ. อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ เมตฺตาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. เสยฺยถาปิ, คามณิ, พลวา สงฺขธโม อปฺปกสิเรเนว จตุทฺทิสา วิญฺญาเปยฺย; เอวเมว โข, คามณิ, เอวํ ภาวิตาย เมตฺตาย เจโตวิมุตฺติยา เอวํ พหุลีกตาย ยํ ปมาณกตํ กมฺมํ, น ตํ ตตฺราวสิสฺสติ, น ตํ ตตฺราวติฏฺฐติ. हे ग्रामणी, तो याप्रमाणे लोभरहित, द्वेषरहित, संमोहरहित, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान होऊन मैत्रीपूर्ण चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो; तसेच दुसऱ्या दिशेला, तसेच तिसऱ्या दिशेला, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरपे, सर्वत्र, स्वतःप्रमाणेच सर्वांना मानून, संपूर्ण जगाला विस्तीर्ण, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित अशा मैत्रीपूर्ण चित्ताने व्यापून विहरतो. हे ग्रामणी, ज्याप्रमाणे एखादा बलवान शंख वाजवणारा अगदी सहजपणे चारही दिशांना आपला आवाज पोहोचवू शकतो; त्याचप्रमाणे, हे ग्रामणी, अशा प्रकारे मैत्रीच्या चेतोविमुक्तीची भावना केली असता, तिचा वारंवार सराव केला असता, जे काही मर्यादित कर्म असते, ते तेथे शिल्लक राहत नाही, ते तेथे टिकून राहत नाही. ‘‘ส [Pg.507] โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต กรุณาสหคเตน เจตสา…เป… มุทิตาสหคเตน เจตสา…เป…. อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ. อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. เสยฺยถาปิ, คามณิ, พลวา สงฺขธโม อปฺปกสิเรเนว จตุทฺทิสา วิญฺญาเปยฺย; เอวเมว โข, คามณิ, เอวํ ภาวิตาย อุเปกฺขาย เจโตวิมุตฺติยา เอวํ พหุลีกตาย ยํ ปมาณกตํ กมฺมํ น ตํ ตตฺราวสิสฺสติ, น ตํ ตตฺราวติฏฺฐตี’’ติ. เอวํ วุตฺเต, อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต, อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต…เป… อุปาสกํ มํ ภควา ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. อฏฺฐมํ. हे ग्रामणी, तो याप्रमाणे लोभरहित, द्वेषरहित, संमोहरहित, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान होऊन करुणापूर्ण चित्ताने... पे... मुदितापूर्ण चित्ताने... पे... उपेक्षापूर्ण चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो; तसेच दुसऱ्या दिशेला, तसेच तिसऱ्या दिशेला, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरपे, सर्वत्र, स्वतःप्रमाणेच सर्वांना मानून, संपूर्ण जगाला विस्तीर्ण, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित अशा उपेक्षापूर्ण चित्ताने व्यापून विहरतो. हे ग्रामणी, ज्याप्रमाणे एखादा बलवान शंख वाजवणारा अगदी सहजपणे चारही दिशांना आपला आवाज पोहोचवू शकतो; त्याचप्रमाणे, हे ग्रामणी, अशा प्रकारे उपेक्षेच्या चेतोविमुक्तीची भावना केली असता, तिचा वारंवार सराव केला असता, जे काही मर्यादित कर्म असते, ते तेथे शिल्लक राहत नाही, ते तेथे टिकून राहत नाही. असे म्हटले असता, असिबंधकपुत्र ग्रामणी भगवंतांना म्हणाला – "अतिशय सुंदर, भन्ते! अतिशय सुंदर, भन्ते! ... भगवंतांनी मला आजपासून जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे." आठवे सूत्र समाप्त. ๙. กุลสุตฺตํ ९. कुलसुत्त ๓๖๑. เอกํ สมยํ ภควา โกสเลสุ จาริกํ จรมาโน มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ เยน นาฬนฺทา ตทวสริ. ตตฺร สุทํ ภควา นาฬนฺทายํ วิหรติ ปาวาริกมฺพวเน. ३६१. एकदा भगवान कोसल देशात मोठ्या भिक्खू संघासोबत चारिका (धम्मयात्रा) करत असताना जेथे नाळंदा होते, तेथे पोहोचले. तेथे भगवान नाळंदा येथील पावारिकाच्या आंबराईत (पावारिकम्बवनात) विहार करत होते. เตน โข ปน สมเยน นาฬนฺทา ทุพฺภิกฺขา โหติ ทฺวีหิติกา เสตฏฺฐิกา สลากาวุตฺตา. เตน โข ปน สมเยน นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต นาฬนฺทายํ ปฏิวสติ มหติยา นิคณฺฐปริสาย สทฺธึ. อถ โข อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ นิคณฺฐสาวโก เยน นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา นิคณฺฐํ นาฏปุตฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข อสิพนฺธกปุตฺตํ คามณึ นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต เอตทโวจ – ‘‘เอหิ ตฺวํ, คามณิ, สมณสฺส โคตมสฺส วาทํ อาโรเปหิ. เอวํ เต กลฺยาโณ กิตฺติสทฺโท อพฺภุคฺคจฺฉิสฺสติ – ‘อสิพนฺธกปุตฺเตน คามณินา สมณสฺส โคตมสฺส เอวํมหิทฺธิกสฺส เอวํมหานุภาวสฺส วาโท อาโรปิโต’’’ติ. त्या वेळी नाळंदामध्ये मोठा दुष्काळ पडला होता, अन्न मिळणे कठीण झाले होते, (मृत लोकांची) हाडे पांढरी पडली होती आणि शलाकेद्वारे (रेशनच्या चिठ्ठ्यांद्वारे) उपजीविका करावी लागत होती. त्या वेळी निगण्ठ नाटपुत्त मोठ्या निगण्ठ परिषदेसह (अनुयायांसह) नाळंदामध्ये राहत होते. तेव्हा निगण्ठांचा श्रावक (शिष्य) असलेला असिबंधकपुत्र ग्रामणी (गावचा प्रमुख) जेथे निगण्ठ नाटपुत्त होते, तेथे गेला; आणि निगण्ठ नाटपुत्तांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या असिबंधकपुत्र ग्रामणीला निगण्ठ नाटपुत्त म्हणाले— 'ये ग्रामणी, तू श्रमण गोतमाच्या सिद्धांताचे खंडन कर (त्यांच्यावर वाद लाद). यामुळे तुझी अशी उत्तम कीर्ती सर्वत्र पसरून जाईल की— असिबंधकपुत्र ग्रामणीने एवढ्या महा-ऋद्धीवान आणि महा-प्रतापी श्रमण गोतमाच्या सिद्धांताचे खंडन केले आहे.' ‘‘กถํ ปนาหํ, ภนฺเต, สมณสฺส โคตมสฺส เอวํมหิทฺธิกสฺส เอวํมหานุภาวสฺส วาทํ อาโรเปสฺสามี’’ติ? ‘‘เอหิ ตฺวํ, คามณิ, เยน สมโณ โคตโม เตนุปสงฺกม; อุปสงฺกมิตฺวา สมณํ โคตมํ เอวํ [Pg.508] วเทหิ – ‘นนุ, ภนฺเต, ภควา อเนกปริยาเยน กุลานํ อนุทฺทยํ วณฺเณติ, อนุรกฺขํ วณฺเณติ, อนุกมฺปํ วณฺเณตี’ติ? สเจ โข, คามณิ, สมโณ โคตโม เอวํ ปุฏฺโฐ เอวํ พฺยากโรติ – ‘เอวํ, คามณิ, ตถาคโต อเนกปริยาเยน กุลานํ อนุทฺทยํ วณฺเณติ, อนุรกฺขํ วณฺเณติ, อนุกมฺปํ วณฺเณตี’ติ, ตเมนํ ตฺวํ เอวํ วเทยฺยาสิ – ‘อถ กิญฺจรหิ, ภนฺเต, ภควา ทุพฺภิกฺเข ทฺวีหิติเก เสตฏฺฐิเก สลากาวุตฺเต มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ จาริกํ จรติ? อุจฺเฉทาย ภควา กุลานํ ปฏิปนฺโน, อนยาย ภควา กุลานํ ปฏิปนฺโน, อุปฆาตาย ภควา กุลานํ ปฏิปนฺโน’ติ! อิมํ โข เต, คามณิ, สมโณ โคตโม อุภโตโกฏิกํ ปญฺหํ ปุฏฺโฐ เนว สกฺขติ อุคฺคิลิตุํ, เนว สกฺขติ โอคิลิตุ’’นฺติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ นิคณฺฐสฺส นาฏปุตฺตสฺส ปฏิสฺสุตฺวา อุฏฺฐายาสนา นิคณฺฐํ นาฏปุตฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – 'पण भंते, मी एवढ्या महा-ऋद्धीवान आणि महा-प्रतापी श्रमण गोतमाच्या सिद्धांताचे खंडन कसे करू शकेन?' 'ये ग्रामणी, तू जेथे श्रमण गोतम आहेत तेथे जा; आणि श्रमण गोतमांना असे विचार— भंते, भगवान अनेक प्रकारे कुळांवर (कुटुंबांवर) दया करण्याची, त्यांचे रक्षण करण्याची आणि त्यांच्याबद्दल अनुकंपा बाळगण्याची प्रशंसा करत नाहीत का? ग्रामणी, जर असे विचारल्यावर श्रमण गोतम असे उत्तर देतील की— होय ग्रामणी, तथागत अनेक प्रकारे कुळांवर दया करण्याची, त्यांचे रक्षण करण्याची आणि त्यांच्याबद्दल अनुकंपा बाळगण्याची प्रशंसा करतात, तर तू त्यांना असे म्हणावेस— तर मग भंते, भगवान या दुष्काळाच्या, अन्न मिळणे कठीण झालेल्या, हाडे पांढरी पडलेल्या आणि शलाकेद्वारे उपजीविका करावी लागणाऱ्या कठीण काळात मोठ्या भिक्खू संघासोबत चारिका का करत आहेत? भगवान कुळांच्या विनाशासाठी प्रवृत्त झाले आहेत का, भगवान कुळांच्या अहितासाठी प्रवृत्त झाले आहेत का, भगवान कुळांच्या नाशासाठी प्रवृत्त झाले आहेत का? ग्रामणी, हा दोन्ही बाजूंनी कोंडीत पकडणारा प्रश्न विचारल्यावर श्रमण गोतमांना तो ना गिळता येईल, ना ओकता येईल.' 'तसेच असो, भंते,' असे म्हणून असिबंधकपुत्र ग्रामणीने निगण्ठ नाटपुत्तांचे म्हणणे मान्य केले. तो आपल्या आसनावरून उठला, निगण्ठ नाटपुत्तांना अभिवादन करून व प्रदक्षिणा घालून जेथे भगवान होते तेथे गेला; आणि भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या असिबंधकपुत्र ग्रामणीने भगवंतांना असे विचारले— ‘‘นนุ, ภนฺเต, ภควา อเนกปริยาเยน กุลานํ อนุทฺทยํ วณฺเณติ, อนุรกฺขํ วณฺเณติ, อนุกมฺปํ วณฺเณตี’’ติ? ‘‘เอวํ, คามณิ, ตถาคโต อเนกปริยาเยน กุลานํ อนุทฺทยํ วณฺเณติ, อนุรกฺขํ วณฺเณติ, อนุกมฺปํ วณฺเณตี’’ติ. ‘‘อถ กิญฺจรหิ, ภนฺเต, ภควา ทุพฺภิกฺเข ทฺวีหิติเก เสตฏฺฐิเก สลากาวุตฺเต มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ จาริกํ จรติ? อุจฺเฉทาย ภควา กุลานํ ปฏิปนฺโน, อนยาย ภควา กุลานํ ปฏิปนฺโน, อุปฆาตาย ภควา กุลานํ ปฏิปนฺโน’’ติ. ‘‘อิโต โส, คามณิ, เอกนวุติกปฺเป ยมหํ อนุสฺสรามิ, นาภิชานามิ กิญฺจิ กุลํ ปกฺกภิกฺขานุปฺปทานมตฺเตน อุปหตปุพฺพํ. อถ โข ยานิ ตานิ กุลานิ อฑฺฒานิ มหทฺธนานิ มหาโภคานิ ปหูตชาตรูปรชตานิ ปหูตวิตฺตูปกรณานิ ปหูตธนธญฺญานิ, สพฺพานิ ตานิ ทานสมฺภูตานิ เจว สจฺจสมฺภูตานิ จ สามญฺญสมฺภูตานิ จ. อฏฺฐ โข, คามณิ, เหตู, อฏฺฐ ปจฺจยา กุลานํ อุปฆาตาย. ราชโต วา กุลานิ อุปฆาตํ คจฺฉนฺติ, โจรโต วา กุลานิ อุปฆาตํ คจฺฉนฺติ, อคฺคิโต วา กุลานิ อุปฆาตํ คจฺฉนฺติ[Pg.509], อุทกโต วา กุลานิ อุปฆาตํ คจฺฉนฺติ, นิหิตํ วา ฐานา วิคจฺฉติ, ทุปฺปยุตฺตา วา กมฺมนฺตา วิปชฺชนฺติ, กุเล วา กุลงฺคาโรติ อุปฺปชฺชติ, โย เต โภเค วิกิรติ วิธมติ วิทฺธํเสติ, อนิจฺจตาเย อฏฺฐมีติ. อิเม โข, คามณิ, อฏฺฐ เหตู, อฏฺฐ ปจฺจยา กุลานํ อุปฆาตาย. อิเมสุ โข, คามณิ, อฏฺฐสุ เหตูสุ, อฏฺฐสุ ปจฺจเยสุ สํวิชฺชมาเนสุ โย มํ เอวํ วเทยฺย – ‘อุจฺเฉทาย ภควา กุลานํ ปฏิปนฺโน, อนยาย ภควา กุลานํ ปฏิปนฺโน, อุปฆาตาย ภควา กุลานํ ปฏิปนฺโน’ติ, ตํ, คามณิ, วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา ยถาภตํ นิกฺขิตฺโต เอวํ นิรเย’’ติ. เอวํ วุตฺเต, อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต, อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต…เป… อุปาสกํ มํ ภควา ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. นวมํ. 'भंते, भगवान अनेक प्रकारे कुळांवर दया करण्याची, त्यांचे रक्षण करण्याची आणि त्यांच्याबद्दल अनुकंपा बाळगण्याची प्रशंसा करत नाहीत का?' 'होय ग्रामणी, तथागत अनेक प्रकारे कुळांवर दया करण्याची, त्यांचे रक्षण करण्याची आणि त्यांच्याबद्दल अनुकंपा बाळगण्याची प्रशंसा करतात.' 'तर मग भंते, भगवान या दुष्काळाच्या, अन्न मिळणे कठीण झालेल्या, हाडे पांढरी पडलेल्या आणि शलाकेद्वारे उपजीविका करावी लागणाऱ्या कठीण काळात मोठ्या भिक्खू संघासोबत चारिका का करत आहेत? भगवान कुळांच्या विनाशासाठी प्रवृत्त झाले आहेत का, भगवान कुळांच्या अहितासाठी प्रवृत्त झाले आहेत का, भगवान कुळांच्या नाशासाठी प्रवृत्त झाले आहेत का?' 'ग्रामणी, मला इथून मागे एक्याण्णव कल्प आठवतात, पण शिजवलेले अन्न दान केल्यामुळे कोणतेही कुळ नष्ट झाले आहे, असे मला आठवत नाही. उलट, जी कुळे समृद्ध, महाधनी, महाभोगी, विपुल सुवर्ण व चांदी असलेली, विपुल साधनसामग्री असलेली आणि विपुल धनधान्य असलेली आहेत, ती सर्व दानामुळे, सत्यपालनामुळे आणि संयमामुळे (श्रामण्यधर्मामुळे) तशी झाली आहेत. ग्रामणी, कुळांच्या नाशाची आठ कारणे आणि आठ प्रत्यय (परिस्थिती) आहेत. कुळे राजाकडून नष्ट होतात, चोरांकडून नष्ट होतात, अग्नीमुळे नष्ट होतात, पाण्यामुळे (पुरामुळे) नष्ट होतात; किंवा पुरून ठेवलेले धन जागेवरून नाहीसे होते; किंवा चुकीच्या पद्धतीने केलेले उद्योग अयशस्वी होतात; किंवा कुळात एखादा कुलंगार (उधळ्या) जन्माला येतो, जो त्या संपत्तीची उधळपट्टी करतो, ती नष्ट करतो; आणि अनित्यता (नाशवंतता) हे आठवे कारण आहे. ग्रामणी, कुळांच्या नाशाची ही आठ कारणे आणि आठ प्रत्यय आहेत. ग्रामणी, ही आठ कारणे आणि आठ प्रत्यय अस्तित्वात असताना, जो कोणी माझ्याविषयी असे म्हणेल की— भगवान कुळांच्या विनाशासाठी प्रवृत्त झाले आहेत, भगवान कुळांच्या अहितासाठी प्रवृत्त झाले आहेत, भगवान कुळांच्या नाशासाठी प्रवृत्त झाले आहेत, तर ग्रामणी, जोपर्यंत तो आपले ते बोलणे सोडत नाही, ते मन बदलत नाही आणि ती दृष्टी (मत) सोडत नाही, तोपर्यंत तो जणू काही उचलून नरकात टाकल्यासारखा होईल.' असे म्हटल्यावर, असिबंधकपुत्र ग्रामणी भगवंतांना म्हणाला— 'अतिशय सुंदर, भंते! अतिशय सुंदर, भंते! ... आजपासून भगवंतांनी मला आजीवन शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे.' नववे सूत्र समाप्त. ๑๐. มณิจูฬกสุตฺตํ १०. मणिचूळक सुत्त ๓๖๒. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. เตน โข ปน สมเยน ราชนฺเตปุเร ราชปริสาย สนฺนิสินฺนานํ สนฺนิปติตานํ อยมนฺตรากถา อุทปาทิ – ‘‘กปฺปติ สมณานํ สกฺยปุตฺติยานํ ชาตรูปรชตํ, สาทิยนฺติ สมณา สกฺยปุตฺติยา ชาตรูปรชตํ, ปฏิคฺคณฺหนฺติ สมณา สกฺยปุตฺติยา ชาตรูปรชต’’นฺติ! ३६२. एकदा भगवान राजगृह येथे वेळुवनातील कलंदकनिवापात विहार करत होते. त्या वेळी राजवाड्यात एकत्र जमलेल्या आणि बसलेल्या राजपरिषदेमध्ये अशी चर्चा सुरू झाली— 'शाक्यपुत्रीय श्रमणांना सुवर्ण आणि चांदी (पैसा-अडका) कल्पते (योग्य आहे), शाक्यपुत्रीय श्रमण सुवर्ण आणि चांदीचा स्वीकार करतात, शाक्यपुत्रीय श्रमण सुवर्ण आणि चांदी ग्रहण करतात!' เตน โข ปน สมเยน มณิจูฬโก คามณิ ตสฺสํ ปริสายํ นิสินฺโน โหติ. อถ โข มณิจูฬโก คามณิ ตํ ปริสํ เอตทโวจ – ‘‘มา อยฺโย เอวํ อวจุตฺถ. น กปฺปติ สมณานํ สกฺยปุตฺติยานํ ชาตรูปรชตํ, น สาทิยนฺติ สมณา สกฺยปุตฺติยา ชาตรูปรชตํ, นปฺปฏิคฺคณฺหนฺติ สมณา สกฺยปุตฺติยา ชาตรูปรชตํ, นิกฺขิตฺตมณิสุวณฺณา สมณา สกฺยปุตฺติยา อเปตชาตรูปรชตา’’ติ. อสกฺขิ โข มณิจูฬโก คามณิ ตํ ปริสํ สญฺญาเปตุํ. อถ โข มณิจูฬโก คามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข มณิจูฬโก คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธ, ภนฺเต, ราชนฺเตปุเร ราชปริสาย สนฺนิสินฺนานํ สนฺนิปติตานํ อยมนฺตรากถา อุทปาทิ – ‘กปฺปติ สมณานํ สกฺยปุตฺติยานํ ชาตรูปรชตํ, สาทิยนฺติ สมณา สกฺยปุตฺติยา ชาตรูปรชตํ, ปฏิคฺคณฺหนฺติ สมณา สกฺยปุตฺติยา ชาตรูปรชต’นฺติ. เอวํ วุตฺเต, อหํ, ภนฺเต, ตํ ปริสํ เอตทโวจํ – ‘มา อยฺโย เอวํ อวจุตฺถ. น กปฺปติ สมณานํ สกฺยปุตฺติยานํ ชาตรูปรชตํ, น สาทิยนฺติ สมณา สกฺยปุตฺติยา ชาตรูปรชตํ, นปฺปฏิคฺคณฺหนฺติ สมณา สกฺยปุตฺติยา [Pg.510] ชาตรูปรชตํ, นิกฺขิตฺตมณิสุวณฺณา สมณา สกฺยปุตฺติยา อเปตชาตรูปรชตา’ติ. อสกฺขึ ขฺวาหํ, ภนฺเต, ตํ ปริสํ สญฺญาเปตุํ. กจฺจาหํ, ภนฺเต, เอวํ พฺยากรมาโน วุตฺตวาที เจว ภควโต โหมิ, น จ ภควนฺตํ อภูเตน อพฺภาจิกฺขามิ, ธมฺมสฺส จานุธมฺมํ พฺยากโรมิ, น จ โกจิ สหธมฺมิโก วาทานุวาโท คารยฺหํ ฐานํ อาคจฺฉตี’’ติ? त्या वेळी मणिचूळक नावाचा ग्रामणी (गावप्रमुख) त्या सभेत बसलेला होता. तेव्हा मणिचूळक ग्रामणीने त्या सभेला असे म्हटले— "आर्यहो, असे बोलू नका. शाक्यपुत्रीय श्रमणांना सोने-चांदी कल्पत (योग्य) नाही. शाक्यपुत्रीय श्रमण सोने-चांदीचा स्वीकार करत नाहीत, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोने-चांदी ग्रहण करत नाहीत. शाक्यपुत्रीय श्रमणांनी मणी व सुवर्णाचा त्याग केला आहे, ते सोने-चांदीपासून अलिप्त आहेत." मणिचूळक ग्रामणी त्या सभेला हे पटवून देण्यास समर्थ ठरला. त्यानंतर मणिचूळक ग्रामणी जेथे भगवान होते, तेथे गेला; भगवंतांजवळ जाऊन आणि त्यांना अभिवादन करून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या मणिचूळक ग्रामणीने भगवंतांना असे म्हटले— "भन्ते, येथे राजवाड्यात राजसभेमध्ये एकत्र जमलेल्या आणि बसलेल्या लोकांमध्ये असा संवाद सुरू झाला होता— 'शाक्यपुत्रीय श्रमणांना सोने-चांदी कल्पते, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोने-चांदीचा स्वीकार करतात, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोने-चांदी ग्रहण करतात.' असे म्हटले असता, भन्ते, मी त्या सभेला असे म्हणालो— 'आर्यहो, असे बोलू नका. शाक्यपुत्रीय श्रमणांना सोने-चांदी कल्पत नाही, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोने-चांदीचा स्वीकार करत नाहीत, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोने-चांदी ग्रहण करत नाहीत. शाक्यपुत्रीय श्रमणांनी मणी व सुवर्णाचा त्याग केला आहे, ते सोने-चांदीपासून अलिप्त आहेत.' भन्ते, मी त्या सभेला हे पटवून देण्यास समर्थ ठरलो. भन्ते, असे उत्तर देऊन मी भगवंतांच्या शिकवणीनुसारच बोललो ना? मी भगवंतांवर असत्य आरोप तर केला नाही ना? मी धर्माला अनुसरूनच उत्तर दिले ना? आणि माझ्या या विधानाचा कोणताही तर्कसंगत निष्कर्ष आक्षेपार्ह ठरणार नाही ना?" ‘‘ตคฺฆ ตฺวํ, คามณิ, เอวํ พฺยากรมาโน วุตฺตวาที เจว เม โหสิ, น จ มํ อภูเตน อพฺภาจิกฺขสิ, ธมฺมสฺส จานุธมฺมํ พฺยากโรสิ, น จ โกจิ สหธมฺมิโก วาทานุวาโท คารยฺหํ ฐานํ อาคจฺฉติ. น หิ, คามณิ, กปฺปติ สมณานํ สกฺยปุตฺติยานํ ชาตรูปรชตํ, น สาทิยนฺติ สมณา สกฺยปุตฺติยา ชาตรูปรชตํ, นปฺปฏิคฺคณฺหนฺติ สมณา สกฺยปุตฺติยา ชาตรูปรชตํ, นิกฺขิตฺตมณิสุวณฺณา สมณา สกฺยปุตฺติยา อเปตชาตรูปรชตา. ยสฺส โข, คามณิ, ชาตรูปรชตํ กปฺปติ, ปญฺจปิ ตสฺส กามคุณา กปฺปนฺติ. ยสฺส ปญฺจ กามคุณา กปฺปนฺติ ( ), เอกํเสเนตํ, คามณิ, ธาเรยฺยาสิ อสฺสมณธมฺโม อสกฺยปุตฺติยธมฺโมติ. อปิ จาหํ, คามณิ, เอวํ วทามิ – ติณํ ติณตฺถิเกน ปริเยสิตพฺพํ, ทารุ ทารุตฺถิเกน ปริเยสิตพฺพํ, สกฏํ สกฏตฺถิเกน ปริเยสิตพฺพํ, ปุริโส ปุริสตฺถิเกน ปริเยสิตพฺโพ. นตฺเววาหํ, คามณิ, เกนจิ ปริยาเยน ‘ชาตรูปรชตํ สาทิตพฺพํ ปริเยสิตพฺพ’นฺติ วทามี’’ติ. ทสมํ. "नक्कीच, ग्रामणी! असे उत्तर देऊन तू माझ्या शिकवणीनुसारच बोलला आहेस, तू माझ्यावर असत्य आरोप केला नाहीस, तू धर्माला अनुसरूनच उत्तर दिले आहेस आणि तुझ्या या विधानाचा कोणताही तर्कसंगत निष्कर्ष आक्षेपार्ह ठरत नाही. कारण, ग्रामणी, शाक्यपुत्रीय श्रमणांना सोने-चांदी कल्पत नाही, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोने-चांदीचा स्वीकार करत नाहीत, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोने-चांदी ग्रहण करत नाहीत. शाक्यपुत्रीय श्रमणांनी मणी व सुवर्णाचा त्याग केला आहे, ते सोने-चांदीपासून अलिप्त आहेत. ग्रामणी, ज्याला सोने-चांदी कल्पते, त्याला पाचही कामगुण (इंद्रियसुखाचे पाच प्रकार) कल्पतात. ज्याला पाच कामगुण कल्पतात, त्याला तू निश्चितपणे असा समजावा की तो श्रमणधर्माचे पालन करणारा नाही आणि शाक्यपुत्रीय धर्माचे पालन करणारा नाही. शिवाय, ग्रामणी, मी असे सांगतो— 'ज्याला गवताची गरज आहे त्याने गवत शोधावे; ज्याला लाकडाची गरज आहे त्याने लाकूड शोधावे; ज्याला गाडीची गरज आहे त्याने गाडी शोधावी; ज्याला कामगाराची गरज आहे त्याने कामगार शोधावा.' परंतु, ग्रामणी, मी कोणत्याही प्रकारे असे म्हणत नाही की सोने-चांदीचा स्वीकार करावा किंवा त्याचा शोध घ्यावा." दहावे (सुत्त समाप्त). ๑๑. ภทฺรกสุตฺตํ ११. भद्रक सुत्त ๓๖๓. เอกํ สมยํ ภควา มลฺเลสุ วิหรติ อุรุเวลกปฺปํ นาม มลฺลานํ นิคโม. อถ โข ภทฺรโก คามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ภทฺรโก คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา ทุกฺขสฺส สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ เทเสตู’’ติ. ‘‘อหญฺเจ เต, คามณิ, อตีตมทฺธานํ อารพฺภ [Pg.511] ทุกฺขสฺส สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ เทเสยฺยํ – ‘เอวํ อโหสิ อตีตมทฺธาน’นฺติ, ตตฺร เต สิยา กงฺขา, สิยา วิมติ. อหํ เจ เต, คามณิ, อนาคตมทฺธานํ อารพฺภ ทุกฺขสฺส สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ เทเสยฺยํ – ‘เอวํ ภวิสฺสติ อนาคตมทฺธาน’นฺติ, ตตฺราปิ เต สิยา กงฺขา, สิยา วิมติ. อปิ จาหํ, คามณิ, อิเธว นิสินฺโน เอตฺเถว เต นิสินฺนสฺส ทุกฺขสฺส สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาหิ, สาธุกํ มนสิ กโรหิ; ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข ภทฺรโก คามณิ ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. ภควา เอตทโวจ – ३६३. एकदा भगवान मल्ल देशात 'उरुवेलकप्प' नावाच्या मल्लांच्या नगरात विहार करत होते. तेव्हा भद्रक नावाचा ग्रामणी जेथे भगवान होते, तेथे गेला; भगवंतांजवळ जाऊन आणि त्यांना अभिवादन करून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या भद्रक ग्रामणीने भगवंतांना असे म्हटले— "भन्ते, किती बरे होईल जर भगवंतांनी मला दुःखाचा उदय (उत्पत्ती) आणि त्याचा अस्त (निरोध) याविषयी उपदेश केला तर!" "ग्रामणी, जर मी तुला भूतकाळाचा संदर्भ देऊन दुःखाचा उदय आणि अस्त याविषयी उपदेश केला की, 'भूतकाळात असे घडले होते,' तर त्याविषयी तुझ्या मनात शंका आणि संभ्रम निर्माण होऊ शकतो. आणि जर मी तुला भविष्यकाळाचा संदर्भ देऊन दुःखाचा उदय आणि अस्त याविषयी उपदेश केला की, 'भविष्यकाळात असे घडेल,' तर तिथेही तुझ्या मनात शंका आणि संभ्रम निर्माण होऊ शकतो. त्याऐवजी, ग्रामणी, मी येथेच बसलेला असताना आणि तूही येथेच बसलेला असताना, मी तुला दुःखाचा उदय आणि अस्त याविषयी उपदेश करतो. ते लक्षपूर्वक ऐक आणि नीट मनात धर; मी सांगतो." "होय, भन्ते," असे म्हणून भद्रक ग्रामणीने भगवंतांच्या बोलण्याला संमती दिली. भगवान म्हणाले— ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อตฺถิ เต อุรุเวลกปฺเป มนุสฺสา เยสํ เต วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา อุปฺปชฺเชยฺยุํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา’’ติ? ‘‘อตฺถิ เม, ภนฺเต, อุรุเวลกปฺเป มนุสฺสา เยสํ เม วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา อุปฺปชฺเชยฺยุํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปน เต, คามณิ, อุรุเวลกปฺเป มนุสฺสา เยสํ เต วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา นุปฺปชฺเชยฺยุํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา’’ติ? ‘‘อตฺถิ เม, ภนฺเต, อุรุเวลกปฺเป มนุสฺสา เยสํ เม วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา นุปฺปชฺเชยฺยุํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา’’ติ. ‘‘โก นุ โข, คามณิ, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน เต เอกจฺจานํ อุรุเวลกปฺปิยานํ มนุสฺสานํ วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา อุปฺปชฺเชยฺยุํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา’’ติ? ‘‘เยสํ เม, ภนฺเต, อุรุเวลกปฺปิยานํ มนุสฺสานํ วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา อุปฺปชฺเชยฺยุํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา, อตฺถิ เม เตสุ ฉนฺทราโค. เยสํ ปน, ภนฺเต, อุรุเวลกปฺปิยานํ มนุสฺสานํ วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา นุปฺปชฺเชยฺยุํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา, นตฺถิ เม เตสุ ฉนฺทราโค’’ติ. ‘‘อิมินา ตฺวํ, คามณิ, ธมฺเมน ทิฏฺเฐน วิทิเตน อกาลิเกน ปตฺเตน ปริโยคาฬฺเหน อตีตานาคเต นยํ เนหิ – ‘ยํ โข กิญฺจิ อตีตมทฺธานํ ทุกฺขํ อุปฺปชฺชมานํ อุปฺปชฺชิ สพฺพํ ตํ ฉนฺทมูลกํ ฉนฺทนิทานํ. ฉนฺโท หิ มูลํ ทุกฺขสฺส. ยมฺปิ หิ กิญฺจิ อนาคตมทฺธานํ ทุกฺขํ อุปฺปชฺชมานํ อุปฺปชฺชิสฺสติ, สพฺพํ ตํ ฉนฺทมูลกํ ฉนฺทนิทานํ. ฉนฺโท หิ มูลํ ทุกฺขสฺสา’’’ติ[Pg.512]. ‘‘อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต! ยาว สุภาสิตํ จิทํ, ภนฺเต, ภควตา – ‘ยํ กิญฺจิ ทุกฺขํ อุปฺปชฺชมานํ อุปฺปชฺชติ, สพฺพํ ตํ ฉนฺทมูลกํ ฉนฺทนิทานํ. ฉนฺโท หิ มูลํ ทุกฺขสฺสา’ติ. อตฺถิ เม, ภนฺเต, จิรวาสี นาม กุมาโร พหิ อาวสเถ ปฏิวสติ. โส ขฺวาหํ, ภนฺเต, กาลสฺเสว วุฏฺฐาย ปุริสํ อุยฺโยเชมิ – ‘คจฺฉ, ภเณ, จิรวาสึ กุมารํ ชานาหี’ติ. ยาวกีวญฺจ, ภนฺเต, โส ปุริโส นาคจฺฉติ, ตสฺส เม โหเตว อญฺญถตฺตํ – ‘มา เหว จิรวาสิสฺส กุมารสฺส กิญฺจิ อาพาธยิตฺถา’’’ติ. “तुला काय वाटते, गामणी? उरुवेलाकप्पमध्ये असे काही लोक आहेत का, ज्यांच्या हत्येमुळे, बंधनामुळे, हानीमुळे किंवा निंदेमुळे तुला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास उत्पन्न होतील?” “आहेत, भन्ते! उरुवेलाकप्पमध्ये असे लोक आहेत, ज्यांच्या हत्येमुळे, बंधनामुळे, हानीमुळे किंवा निंदेमुळे मला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास उत्पन्न होतील.” “पण गामणी, उरुवेलाकप्पमध्ये असेही काही लोक आहेत का, ज्यांच्या हत्येमुळे, बंधनामुळे, हानीमुळे किंवा निंदेमुळे तुला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास उत्पन्न होणार नाहीत?” “आहेत, भन्ते! उरुवेलाकप्पमध्ये असेही लोक आहेत, ज्यांच्या हत्येमुळे, बंधनामुळे, हानीमुळे किंवा निंदेमुळे मला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास उत्पन्न होणार नाहीत.” “गामणी, याचे काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय (हेतू) आहे, ज्यामुळे उरुवेलाकप्पमधील काही लोकांच्या हत्येमुळे, बंधनामुळे, हानीमुळे किंवा निंदेमुळे तुला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास उत्पन्न होतील?” “भन्ते, उरुवेलाकप्पमधील ज्या लोकांच्या हत्येमुळे, बंधनामुळे, हानीमुळे किंवा निंदेमुळे मला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास उत्पन्न होतील, त्यांच्याविषयी माझ्या मनात 'छंदराग' (इच्छा आणि आसक्ती) आहे. परंतु, भन्ते, ज्या लोकांच्या बाबतीत मला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास उत्पन्न होणार नाहीत, त्यांच्याविषयी माझ्या मनात छंदराग नाही.” “गामणी, या प्रत्यक्ष पाहिलेल्या, जाणलेल्या, अकालिक (तात्काळ फळ देणाऱ्या), प्राप्त केलेल्या आणि पूर्णपणे अवगत केलेल्या धर्माच्या आधारे तू भूतकाळ आणि भविष्यकाळाबाबत हाच नियम लागू कर: 'भूतकाळात जे काही दुःख उत्पन्न झाले, ते सर्व छंदमूलक (इच्छेवर आधारित) आणि छंदनिदान (इच्छेमुळे उद्भवलेले) होते; कारण छंद (इच्छा/आसक्ती) हेच दुःखाचे मूळ आहे. भविष्यकाळातही जे काही दुःख उत्पन्न होईल, ते सर्व छंदमूलक आणि छंदनिदानच असेल; कारण छंद हेच दुःखाचे मूळ आहे.'” “आश्चर्यकारक आहे, भन्ते! अद्भुत आहे, भन्ते! भगवंतांनी हे किती सुंदर सांगितले आहे की—'जे काही दुःख उत्पन्न होते, ते सर्व छंदमूलक आणि छंदनिदान असते; कारण छंद हेच दुःखाचे मूळ आहे.' भन्ते, माझा 'चिरवासी' नावाचा एक मुलगा आहे, जो नगराबाहेर एका वस्तीत राहतो. भन्ते, मी पहाटेच उठून एका माणसाला पाठवतो आणि सांगतो—'अरे जा, चिरवासी कसा आहे ते पाहून ये.' भन्ते, जोपर्यंत तो माणूस परत येत नाही, तोपर्यंत माझे मन अस्वस्थ असते की—'माझ्या चिरवासी मुलाला काही त्रास तर झाला नसेल ना!'” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, จิรวาสิสฺส กุมารสฺส วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา อุปฺปชฺเชยฺยุํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา’’ติ? ‘‘จิรวาสิสฺส เม, ภนฺเต, กุมารสฺส วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา ชีวิตสฺสปิ สิยา อญฺญถตฺตํ, กึ ปน เม นุปฺปชฺชิสฺสนฺติ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา’’ติ. ‘‘อิมินาปิ โข เอตํ, คามณิ, ปริยาเยน เวทิตพฺพํ – ‘ยํ กิญฺจิ ทุกฺขํ อุปฺปชฺชมานํ อุปฺปชฺชติ, สพฺพํ ตํ ฉนฺทมูลกํ ฉนฺทนิทานํ. ฉนฺโท หิ มูลํ ทุกฺขสฺสา’’’ติ. “तुला काय वाटते, गामणी? जर चिरवासी मुलाची हत्या झाली, त्याला बंधन झाले, त्याची हानी झाली किंवा त्याची निंदा झाली, तर तुला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास उत्पन्न होतील का?” “भन्ते, जर माझ्या चिरवासी मुलाची हत्या झाली, त्याला बंधन झाले, त्याची हानी झाली किंवा त्याची निंदा झाली, तर माझ्या प्राणावरच बेतेल, मग मला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास का बरे उत्पन्न होणार नाहीत?” “गामणी, यावरूनही हे समजून घेतले पाहिजे की—'जे काही दुःख उत्पन्न होते, ते सर्व छंदमूलक आणि छंदनिदान असते; कारण छंद हेच दुःखाचे मूळ आहे.'” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, ยทา เต จิรวาสิมาตา อทิฏฺฐา อโหสิ, อสฺสุตา อโหสิ, เต จิรวาสิมาตุยา ฉนฺโท วา ราโค วา เปมํ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ทสฺสนํ วา เต, คามณิ, อาคมฺม สวนํ วา เอวํ เต อโหสิ – ‘จิรวาสิมาตุยา ฉนฺโท วา ราโค วา เปมํ วา’’’ติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. “तुला काय वाटते, गामणी? जेव्हा तू चिरवासीच्या आईला पाहिले नव्हते किंवा तिच्याबद्दल ऐकलेही नव्हते, तेव्हा तिच्याविषयी तुझ्या मनात छंद (इच्छा), राग (आसक्ती) किंवा प्रेम होते का?” “नाही, भन्ते.” “गामणी, मग तिला पाहिल्यामुळे किंवा तिच्याबद्दल ऐकल्यामुळेच तुझ्या मनात चिरवासीच्या आईबद्दल छंद, राग किंवा प्रेम उत्पन्न झाले का?” “होय, भन्ते.” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, จิรวาสิมาตุยา เต วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา อุปฺปชฺเชยฺยุํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา’’ติ? ‘‘จิรวาสิมาตุยา เม, ภนฺเต, วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา ชีวิตสฺสปิ สิยา อญฺญถตฺตํ, กึ ปน เม นุปฺปชฺชิสฺสนฺติ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา’’ติ! ‘‘อิมินาปิ โข เอตํ, คามณิ, ปริยาเยน เวทิตพฺพํ – ‘ยํ กิญฺจิ ทุกฺขํ อุปฺปชฺชมานํ อุปฺปชฺชติ, สพฺพํ ตํ ฉนฺทมูลกํ ฉนฺทนิทานํ. ฉนฺโท หิ มูลํ ทุกฺขสฺสา’’’ติ. เอกาทสมํ. “तुला काय वाटते, गामणी? जर चिरवासीच्या आईची हत्या झाली, तिला बंधन झाले, तिची हानी झाली किंवा तिची निंदा झाली, तर तुला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास उत्पन्न होतील का?” “भन्ते, जर चिरवासीच्या आईची हत्या झाली, तिला बंधन झाले, तिची हानी झाली किंवा तिची निंदा झाली, तर माझ्या प्राणावरच बेतेल, मग मला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास का बरे उत्पन्न होणार नाहीत!” “गामणी, यावरूनही हे समजून घेतले पाहिजे की—'जे काही दुःख उत्पन्न होते, ते सर्व छंदमूलक आणि छंदनिदान असते; कारण छंद हेच दुःखाचे मूळ आहे.'” ๑๒. ราสิยสุตฺตํ १२. रासिय सुत्त ๓๖๔. อถ [Pg.513] โข ราสิโย คามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราสิโย คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต, ‘สมโณ โคตโม สพฺพํ ตปํ ครหติ, สพฺพํ ตปสฺสึ ลูขชีวึ เอกํเสน อุปวทติ อุปกฺโกสตี’ติ. เย เต, ภนฺเต, เอวมาหํสุ – ‘สมโณ โคตโม สพฺพํ ตปํ ครหติ, สพฺพํ ตปสฺสึ ลูขชีวึ เอกํเสน อุปวทติ อุปกฺโกสตี’ติ, กจฺจิ เต, ภนฺเต, ภควโต วุตฺตวาทิโน, น จ ภควนฺตํ อภูเตน อพฺภาจิกฺขนฺติ, ธมฺมสฺส จานุธมฺมํ พฺยากโรนฺติ, น จ โกจิ สหธมฺมิโก วาทานุวาโท คารยฺหํ ฐานํ อาคจฺฉตี’’ติ? ‘‘เย เต, คามณิ, เอวมาหํสุ – ‘สมโณ โคตโม สพฺพํ ตปํ ครหติ, สพฺพํ ตปสฺสึ ลูขชีวึ เอกํเสน อุปวทติ อุปกฺโกสตี’ติ, น เม เต วุตฺตวาทิโน, อพฺภาจิกฺขนฺติ จ ปน มํ เต อสตา ตุจฺฉา อภูเตน’’. ३६४. त्यानंतर रासिय गामणी जेथे भगवंत होते तेथे गेला. जवळ जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या रासिय गामणीने भगवंतांना असे म्हटले— “भन्ते, मी असे ऐकले आहे की—‘श्रमण गौतम सर्व तपाची (तपश्चर्येची) निंदा करतात आणि खडतर जीवन जगणाऱ्या सर्व तपस्वी लोकांवर पूर्णपणे आक्षेप घेतात व त्यांची निर्भत्सना करतात.’ भन्ते, जे लोक असे म्हणतात की—‘श्रमण गौतम सर्व तपाची निंदा करतात आणि खडतर जीवन जगणाऱ्या सर्व तपस्वी लोकांवर पूर्णपणे आक्षेप घेतात व त्यांची निर्भत्सना करतात’, ते भगवंतांच्या वचनांचे योग्य प्रकारे कथन करत आहेत का? ते भगवंतांवर खोटा आरोप तर करत नाहीत ना? ते धर्माला अनुसरूनच स्पष्टीकरण देत आहेत का? आणि त्यांच्या या विधानामुळे कोणताही सहधर्मीय वादविवाद निंदनीय ठरत नाही ना?” “गामणी, जे लोक असे म्हणतात की—‘श्रमण गौतम सर्व तपाची निंदा करतात आणि खडतर जीवन जगणाऱ्या सर्व तपस्वी लोकांवर पूर्णपणे आक्षेप घेतात व त्यांची निर्भत्सना करतात’, ते माझ्या वचनांचे योग्य प्रकारे कथन करत नाहीत. उलट, ते माझ्यावर असत्य, निरर्थक आणि खोटा आरोप करत आहेत.” ‘‘ทฺเวเม, คามณิ, อนฺตา ปพฺพชิเตน น เสวิตพฺพา – โย จายํ กาเมสุ กามสุขลฺลิกานุโยโค หีโน คมฺโม โปถุชฺชนิโก อนริโย อนตฺถสํหิโต, โย จายํ อตฺตกิลมถานุโยโค ทุกฺโข อนริโย อนตฺถสํหิโต. เอเต เต, คามณิ, อุโภ อนฺเต อนุปคมฺม มชฺฌิมา ปฏิปทา ตถาคเตน อภิสมฺพุทฺธา – จกฺขุกรณี ญาณกรณี อุปสมาย อภิญฺญาย สมฺโพธาย นิพฺพานาย สํวตฺตติ. กตมา จ สา, คามณิ, มชฺฌิมา ปฏิปทา ตถาคเตน อภิสมฺพุทฺธา – จกฺขุกรณี ญาณกรณี อุปสมาย อภิญฺญาย สมฺโพธาย นิพฺพานาย สํวตฺตติ? อยเมว อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ…เป… สมฺมาสมาธิ. อยํ โข สา, คามณิ, มชฺฌิมา ปฏิปทา ตถาคเตน อภิสมฺพุทฺธา – จกฺขุกรณี ญาณกรณี อุปสมาย อภิญฺญาย สมฺโพธาย นิพฺพานาย สํวตฺตติ. “हे गामणी, प्रव्रजिताने (गृहत्याग केलेल्याने) या दोन टोकांचे सेवन करू नये. कोणते दोन? एक म्हणजे कामवासनांमध्ये कामसुखल्लिकानुयोग (इंद्रियसुखांचा उपभोग घेणे), जो हीन, ग्राम्य (सामान्य लोकांचा), पृथग्जनांचा, अनार्य आणि अनर्थकारक आहे; आणि दुसरा म्हणजे आत्मक्लमथानुयोग (स्वतःला क्लेश देणे), जो दुःखकारक, अनार्य आणि अनर्थकारक आहे. हे गामणी, या दोन्ही टोकांना न जाता तथागतांनी मध्यम मार्गाचा (मज्झिमा पटिपदा) साक्षात्कार केला आहे, जो ज्ञानचक्षू प्रदान करणारा, ज्ञान देणारा असून उपशमासाठी (शांतीसाठी), अभिज्ञेसाठी (विशिष्ट ज्ञानासाठी), संबोधीसाठी आणि निर्वाणासाठी कारणीभूत ठरतो. आणि हे गामणी, तथागतांनी साक्षात्कार केलेला तो मध्यम मार्ग कोणता आहे, जो ज्ञानचक्षू प्रदान करणारा, ज्ञान देणारा असून उपशमासाठी, अभिज्ञेसाठी, संबोधीसाठी आणि निर्वाणासाठी कारणीभूत ठरतो? तो हाच आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे, जसे की – सम्यक् दृष्टी... सम्यक् समाधी. हे गामणी, हाच तो मध्यम मार्ग आहे ज्याचा तथागतांनी साक्षात्कार केला आहे, जो ज्ञानचक्षू प्रदान करणारा, ज्ञान देणारा असून उपशमासाठी, अभिज्ञेसाठी, संबोधीसाठी आणि निर्वाणासाठी कारणीभूत ठरतो.” ‘‘ตโย โข เม, คามณิ, กามโภคิโน สนฺโต สํวิชฺชมานา โลกสฺมึ. กตเม ตโย? อิธ, คามณิ, เอกจฺโจ กามโภคี อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ, สาหเสน อธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสน น อตฺตานํ สุเขติ น ปีเณติ น สํวิภชติ น ปุญฺญานิ กโรติ. อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺโจ กามโภคี อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสน. อธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสน อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ, น สํวิภชติ น ปุญฺญานิ กโรติ. อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺโจ กามโภคี อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ [Pg.514] สาหเสน. อธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสน อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรติ. “हे गामणी, जगात तीन प्रकारचे कामभोगी (इंद्रियसुखांचा उपभोग घेणारे) लोक अस्तित्वात आहेत. कोणते तीन? हे गामणी, येथे एखादा कामभोगी अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवतो. अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवून तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करत नाही, ती इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मेही करत नाही. हे गामणी, येथे दुसरा एखादा कामभोगी अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवतो. अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवून तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो, पण ती इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही. हे गामणी, येथे तिसरा एखादा कामभोगी अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवतो. अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवून तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो, ती इतरांना वाटतो आणि पुण्यकर्मेही करतो.” ‘‘อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺโจ กามโภคี ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนปิ อสาหเสนปิ. ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสนปิ อสาหเสนปิ น อตฺตานํ สุเขติ, น ปีเณติ, น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรติ. อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺโจ กามโภคี ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนปิ อสาหเสนปิ. ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสนปิ อสาหเสนปิ อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ, น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรติ. อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺโจ กามโภคี ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสติ, สาหเสนปิ อสาหเสนปิ. ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสนปิ อสาหเสนปิ อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรติ. “हे गामणी, येथे एखादा कामभोगी धर्माने व अधर्माने, बळजबरीने व बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवतो. धर्माने व अधर्माने, बळजबरीने व बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवून तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करत नाही, ती इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मेही करत नाही. हे गामणी, येथे दुसरा एखादा कामभोगी धर्माने व अधर्माने, बळजबरीने व बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवतो. धर्माने व अधर्माने, बळजबरीने व बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवून तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो, पण ती इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही. हे गामणी, येथे तिसरा एखादा कामभोगी धर्माने व अधर्माने, बळजबरीने व बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवतो. धर्माने व अधर्माने, बळजबरीने व बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवून तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो, ती इतरांना वाटतो आणि पुण्यकर्मेही करतो.” ‘‘อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺโจ กามโภคี ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสน. ธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา อสาหเสน น อตฺตานํ สุเขติ, น ปีเณติ, น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรติ. อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺโจ กามโภคี ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสน. ธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา อสาหเสน อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ, น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรติ. อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺโจ กามโภคี ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสน. ธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา อสาหเสน อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรติ. เต จ โภเค คธิโต มุจฺฉิโต อชฺโฌปนฺโน อนาทีนวทสฺสาวี อนิสฺสรณปญฺโญ ปริภุญฺชติ. อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺโจ กามโภคี ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสน. ธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา อสาหเสน อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรติ. เต จ โภเค อคธิโต อมุจฺฉิโต อนชฺโฌปนฺโน อาทีนวทสฺสาวี นิสฺสรณปญฺโญ ปริภุญฺชติ. “हे गामणी, येथे एखादा कामभोगी धर्माने आणि बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवतो. धर्माने आणि बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवून तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करत नाही, ती इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मेही करत नाही. हे गामणी, येथे दुसरा एखादा कामभोगी धर्माने आणि बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवतो. धर्माने आणि बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवून तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो, पण ती इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही. हे गामणी, येथे तिसरा एखादा कामभोगी धर्माने आणि बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवतो. धर्माने आणि बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवून तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो, ती इतरांना वाटतो आणि पुण्यकर्मेही करतो; परंतु तो त्या संपत्तीचा उपभोग घेताना त्यात आसक्त, मोहित आणि आकंठ बुडलेला असतो, त्यातील दोष पाहत नाही आणि त्यातून मुक्त होण्याचे ज्ञान त्याला नसते. हे गामणी, येथे आणखी एखादा कामभोगी धर्माने आणि बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवतो. धर्माने आणि बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवून तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो, ती इतरांना वाटतो आणि पुण्यकर्मेही करतो; आणि तो त्या संपत्तीचा उपभोग घेताना त्यात आसक्त न होता, मोहित न होता, आकंठ न बुडता, त्यातील दोष पाहून आणि त्यातून मुक्त होण्याचे ज्ञान ठेवून उपभोग घेतो.” ‘‘ตตฺร[Pg.515], คามณิ, ยฺวายํ กามโภคี อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสน, อธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสน น อตฺตานํ สุเขติ, น ปีเณติ, น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรติ. อยํ, คามณิ, กามโภคี ตีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห. กตเมหิ ตีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห? อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนาติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน คารยฺโห. น อตฺตานํ สุเขติ น ปีเณตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน คารยฺโห. น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรตีติ, อิมินา ตติเยน ฐาเนน คารยฺโห. อยํ, คามณิ, กามโภคี อิเมหิ ตีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห. “त्यांच्यामध्ये, हे गामणी, जो कामभोगी अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवतो, आणि अधर्माने व बळजबरीने संपत्ती मिळवून स्वतःला सुखी व संतुष्ट करत नाही, ती इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मेही करत नाही; तो कामभोगी, हे गामणी, तीन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो. कोणत्या तीन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो? ‘तो अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवतो’ – या पहिल्या कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. ‘तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करत नाही’ – या दुसऱ्या कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. ‘तो ती संपत्ती इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही’ – या तिसऱ्या कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. हे गामणी, हा कामभोगी या तीन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो.” ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ กามโภคี อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสน, อธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสน อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ, น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรติ. อยํ, คามณิ, กามโภคี ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห, เอเกน ฐาเนน ปาสํโส. กตเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห? อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนาติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน คารยฺโห. น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน คารยฺโห. กตเมน เอเกน ฐาเนน ปาสํโส? อตฺตานํ สุเขติ ปีเณตีติ, อิมินา เอเกน ฐาเนน ปาสํโส. อยํ, คามณิ, กามโภคี อิเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห, อิมินา เอเกน ฐาเนน ปาสํโส. “त्यांच्यामध्ये, हे गामणी, जो कामभोगी अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवतो, आणि अधर्माने व बळजबरीने संपत्ती मिळवून स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो, पण ती इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही; तो कामभोगी, हे गामणी, दोन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो आणि एका कारणामुळे प्रशंसनीय ठरतो. कोणत्या दोन कारणांमुळे तो निंदनीय ठरतो? ‘तो अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवतो’ – या पहिल्या कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. ‘तो ती संपत्ती इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही’ – या दुसऱ्या कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. आणि कोणत्या एका कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो? ‘तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो’ – या एका कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो. हे गामणी, हा कामभोगी या दोन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो आणि या एका कारणामुळे प्रशंसनीय ठरतो.” ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ กามโภคี อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสน, อธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสน อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรติ. อยํ, คามณิ, กามโภคี เอเกน ฐาเนน คารยฺโห, ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส. กตเมน เอเกน ฐาเนน คารยฺโห? อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนาติ, อิมินา เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. กตเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส? อตฺตานํ สุเขติ ปีเณตีติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน ปาสํโส. สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน ปาสํโส. อยํ, คามณิ, กามโภคี, อิมินา เอเกน ฐาเนน คารยฺโห, อิเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส. “त्यांच्यामध्ये, हे गामणी, जो कामभोगी अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवतो, आणि अधर्माने व बळजबरीने संपत्ती मिळवून स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो, ती इतरांना वाटतो आणि पुण्यकर्मेही करतो; तो कामभोगी, हे गामणी, एका कारणामुळे निंदनीय ठरतो आणि दोन कारणांमुळे प्रशंसनीय ठरतो. कोणत्या एका कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो? ‘तो अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवतो’ – या एका कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. आणि कोणत्या दोन कारणांमुळे तो प्रशंसनीय ठरतो? ‘तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो’ – या पहिल्या कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो. ‘तो ती संपत्ती इतरांना वाटतो आणि पुण्यकर्मे करतो’ – या दुसऱ्या कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो. हे गामणी, हा कामभोगी या एका कारणामुळे निंदनीय ठरतो आणि या दोन कारणांमुळे प्रशंसनीय ठरतो.” ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ กามโภคี ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนปิ อสาหเสนปิ, ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสนปิ อสาหเสนปิ น อตฺตานํ สุเขติ, น ปีเณติ, น สํวิภชติ, น [Pg.516] ปุญฺญานิ กโรติ. อยํ, คามณิ, กามโภคี เอเกน ฐาเนน ปาสํโส, ตีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห. กตเมน เอเกน ฐาเนน ปาสํโส? ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสนาติ, อิมินา เอเกน ฐาเนน ปาสํโส. กตเมหิ ตีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห? อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนาติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน คารยฺโห. น อตฺตานํ สุเขติ, น ปีเณตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน คารยฺโห. น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรตีติ, อิมินา ตติเยน ฐาเนน คารยฺโห. อยํ, คามณิ, กามโภคี อิมินา เอเกน ฐาเนน ปาสํโส, อิเมหิ ตีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห. हे ग्रामणी, त्या लोकांमध्ये जो हा कामभोगी न्यायाने व अन्यायाने, बळजबरीने व विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो, आणि न्यायाने व अन्यायाने, बळजबरीने व विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवून स्वतःला सुखी करत नाही, तृप्त करत नाही, इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही. हे ग्रामणी, हा कामभोगी एका कारणाने प्रशंसनीय आहे आणि तीन कारणांनी निंदनीय आहे. कोणत्या एका कारणाने प्रशंसनीय आहे? 'तो न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो' - या एका कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. कोणत्या तीन कारणांनी निंदनीय आहे? 'तो अन्यायाने, बळजबरीने संपत्ती मिळवतो' - या पहिल्या कारणाने तो निंदनीय आहे. 'तो स्वतःला सुखी करत नाही, तृप्त करत नाही' - या दुसऱ्या कारणाने तो निंदनीय आहे. 'तो इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही' - या तिसऱ्या कारणाने तो निंदनीय आहे. हे ग्रामणी, हा कामभोगी या एका कारणाने प्रशंसनीय आहे आणि या तीन कारणांनी निंदनीय आहे. ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ กามโภคี ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนปิ อสาหเสนปิ, ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสนปิ อสาหเสนปิ อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ, น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรติ. อยํ, คามณิ, กามโภคี ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส, ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห. กตเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส? ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสนาติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน ปาสํโส. อตฺตานํ สุเขติ ปีเณตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน ปาสํโส. กตเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห? อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนาติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน คารยฺโห. น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน คารยฺโห. อยํ, คามณิ, กามโภคี อิเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส, อิเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห. हे ग्रामणी, त्या लोकांमध्ये जो हा कामभोगी न्यायाने व अन्यायाने, बळजबरीने व विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो, आणि न्यायाने व अन्यायाने, बळजबरीने व विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवून स्वतःला सुखी करतो, तृप्त करतो, पण इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही. हे ग्रामणी, हा कामभोगी दोन कारणांनी प्रशंसनीय आहे आणि दोन कारणांनी निंदनीय आहे. कोणत्या दोन कारणांनी प्रशंसनीय आहे? 'तो न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो' - या पहिल्या कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. 'तो स्वतःला सुखी करतो, तृप्त करतो' - या दुसऱ्या कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. कोणत्या दोन कारणांनी निंदनीय आहे? 'तो अन्यायाने, बळजबरीने संपत्ती मिळवतो' - या पहिल्या कारणाने तो निंदनीय आहे. 'तो इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही' - या दुसऱ्या कारणाने तो निंदनीय आहे. हे ग्रामणी, हा कामभोगी या दोन कारणांनी प्रशंसनीय आहे आणि या दोन कारणांनी निंदनीय आहे. ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ กามโภคี ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนปิ อสาหเสนปิ, ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสนปิ อสาหเสนปิ อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรติ. อยํ, คามณิ, กามโภคี ตีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส, เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. กตเมหิ ตีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส? ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสนาติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน ปาสํโส. อตฺตานํ สุเขติ ปีเณตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน ปาสํโส. สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรตีติ, อิมินา ตติเยน ฐาเนน ปาสํโส. กตเมน เอเกน ฐาเนน คารยฺโห? อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนาติ[Pg.517], อิมินา เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. อยํ, คามณิ, กามโภคี อิเมหิ ตีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส, อิมินา เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. हे ग्रामणी, त्या लोकांमध्ये जो हा कामभोगी न्यायाने व अन्यायाने, बळजबरीने व विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो, आणि न्यायाने व अन्यायाने, बळजबरीने व विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवून स्वतःला सुखी करतो, तृप्त करतो, इतरांना वाटतो आणि पुण्यकर्मे करतो. हे ग्रामणी, हा कामभोगी तीन कारणांनी प्रशंसनीय आहे आणि एका कारणाने निंदनीय आहे. कोणत्या तीन कारणांनी प्रशंसनीय आहे? 'तो न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो' - या पहिल्या कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. 'तो स्वतःला सुखी करतो, तृप्त करतो' - या दुसऱ्या कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. 'तो इतरांना वाटतो आणि पुण्यकर्मे करतो' - या तिसऱ्या कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. कोणत्या एका कारणाने निंदनीय आहे? 'तो अन्यायाने, बळजबरीने संपत्ती मिळवतो' - या एका कारणाने तो निंदनीय आहे. हे ग्रामणी, हा कामभोगी या तीन कारणांनी प्रशंसनीय आहे आणि या एका कारणाने निंदनीय आहे. ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ กามโภคี ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสน, ธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา อสาหเสน, น อตฺตานํ สุเขติ, น ปีเณติ, น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรติ. อยํ, คามณิ, กามโภคี เอเกน ฐาเนน ปาสํโส, ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห. กตเมน เอเกน ฐาเนน ปาสํโส? ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสนาติ, อิมินา เอเกน ฐาเนน ปาสํโส. กตเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห? น อตฺตานํ สุเขติ, น ปีเณตีติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน คารยฺโห. น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน คารยฺโห. อยํ, คามณิ, กามโภคี อิมินา เอเกน ฐาเนน ปาสํโส, อิเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห. हे ग्रामणी, त्या लोकांमध्ये जो हा कामभोगी न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो, आणि न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवून स्वतःला सुखी करत नाही, तृप्त करत नाही, इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही. हे ग्रामणी, हा कामभोगी एका कारणाने प्रशंसनीय आहे आणि दोन कारणांनी निंदनीय आहे. कोणत्या एका कारणाने प्रशंसनीय आहे? 'तो न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो' - या एका कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. कोणत्या दोन कारणांनी निंदनीय आहे? 'तो स्वतःला सुखी करत नाही, तृप्त करत नाही' - या पहिल्या कारणाने तो निंदनीय आहे. 'तो इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही' - या दुसऱ्या कारणाने तो निंदनीय आहे. हे ग्रामणी, हा कामभोगी या एका कारणाने प्रशंसनीय आहे आणि या दोन कारणांनी निंदनीय आहे. ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ กามโภคี ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสน, ธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา อสาหเสน อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ, น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรติ. อยํ, คามณิ, กามโภคี ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส, เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. กตเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส? ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสนาติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน ปาสํโส. อตฺตานํ สุเขติ ปีเณตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน ปาสํโส. กตเมน เอเกน ฐาเนน คารยฺโห? น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรตีติ, อิมินา เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. อยํ, คามณิ, กามโภคี อิเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส, อิมินา เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. हे ग्रामणी, त्या लोकांमध्ये जो हा कामभोगी न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो, आणि न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवून स्वतःला सुखी करतो, तृप्त करतो, पण इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही. हे ग्रामणी, हा कामभोगी दोन कारणांनी प्रशंसनीय आहे आणि एका कारणाने निंदनीय आहे. कोणत्या दोन कारणांनी प्रशंसनीय आहे? 'तो न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो' - या पहिल्या कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. 'तो स्वतःला सुखी करतो, तृप्त करतो' - या दुसऱ्या कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. कोणत्या एका कारणाने निंदनीय आहे? 'तो इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही' - या एका कारणाने तो निंदनीय आहे. हे ग्रामणी, हा कामभोगी या दोन कारणांनी प्रशंसनीय आहे आणि या एका कारणाने निंदनीय आहे. ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ กามโภคี ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสน, ธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา อสาหเสน อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรติ, เต จ โภเค คธิโต มุจฺฉิโต อชฺโฌปนฺโน อนาทีนวทสฺสาวี อนิสฺสรณปญฺโญ ปริภุญฺชติ. อยํ, คามณิ, กามโภคี ตีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส, เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. กตเมหิ ตีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส? ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสนาติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน ปาสํโส. อตฺตานํ สุเขติ ปีเณตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน ปาสํโส. สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรตีติ, อิมินา ตติเยน ฐาเนน ปาสํโส[Pg.518]. กตเมน เอเกน ฐาเนน คารยฺโห? เต จ โภเค คธิโต มุจฺฉิโต อชฺโฌปนฺโน อนาทีนวทสฺสาวี อนิสฺสรณปญฺโญ ปริภุญฺชตีติ, อิมินา เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. อยํ, คามณิ, กามโภคี อิเมหิ ตีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส, อิมินา เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. हे ग्रामणी, त्या लोकांमध्ये जो हा कामभोगी न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो, आणि न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवून स्वतःला सुखी करतो, तृप्त करतो, इतरांना वाटतो आणि पुण्यकर्मे करतो, परंतु त्या संपत्तीचा उपभोग घेताना तो त्यात आसक्त, मोहित, आकंठ बुडालेला, त्यातील दोष न पाहणारा आणि त्यातून मुक्त होण्याचे ज्ञान नसलेला होऊन तिचा उपभोग घेतो. हे ग्रामणी, हा कामभोगी तीन कारणांनी प्रशंसनीय आहे आणि एका कारणाने निंदनीय आहे. कोणत्या तीन कारणांनी प्रशंसनीय आहे? 'तो न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो' - या पहिल्या कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. 'तो स्वतःला सुखी करतो, तृप्त करतो' - या दुसऱ्या कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. 'तो इतरांना वाटतो आणि पुण्यकर्मे करतो' - या तिसऱ्या कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. कोणत्या एका कारणाने निंदनीय आहे? 'तो त्या संपत्तीचा उपभोग घेताना त्यात आसक्त, मोहित, आकंठ बुडालेला, त्यातील दोष न पाहणारा आणि त्यातून मुक्त होण्याचे ज्ञान नसलेला होऊन तिचा उपभोग घेतो' - या एका कारणाने तो निंदनीय आहे. हे ग्रामणी, हा कामभोगी या तीन कारणांनी प्रशंसनीय आहे आणि या एका कारणाने निंदनीय आहे. ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ กามโภคี ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสน, ธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา อสาหเสน อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรติ. เต จ โภเค อคธิโต อมุจฺฉิโต อนชฺโฌปนฺโน อาทีนวทสฺสาวี นิสฺสรณปญฺโญ ปริภุญฺชติ. อยํ, คามณิ, กามโภคี จตูหิ ฐาเนหิ ปาสํโส. กตเมหิ จตูหิ ฐาเนหิ ปาสํโส? ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสนาติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน ปาสํโส. อตฺตานํ สุเขติ ปีเณตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน ปาสํโส. สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรตีติ, อิมินา ตติเยน ฐาเนน ปาสํโส. เต จ โภเค อคธิโต อมุจฺฉิโต อนชฺโฌปนฺโน อาทีนวทสฺสาวี นิสฺสรณปญฺโญ ปริภุญฺชตีติ, อิมินา จตุตฺเถน ฐาเนน ปาสํโส. อยํ, คามณิ, กามโภคี อิเมหิ จตูหิ ฐาเนหิ ปาสํโส. हे ग्रामणी! त्या (कामभोगी लोकांमध्ये) जो कामभोगी न्याय्य मार्गाने (धर्माने), बळजबरी न करता संपत्ती मिळवतो; न्याय्य मार्गाने आणि बळजबरी न करता संपत्ती मिळवून स्वतःला सुखी व तृप्त करतो; ती संपत्ती इतरांमध्ये वाटतो आणि पुण्यकर्मे करतो; आणि त्या संपत्तीचा उपभोग घेताना त्यात आसक्त न होता, मोहित न होता, गुंतून न पडता, त्यातील दोष पाहणारा आणि मुक्तीची प्रज्ञा असणारा होऊन उपभोग घेतो. हे ग्रामणी! हा कामभोगी चार कारणांमुळे प्रशंसनीय ठरतो. कोणत्या चार कारणांमुळे प्रशंसनीय ठरतो? 'तो न्याय्य मार्गाने, बळजबरी न करता संपत्ती मिळवतो' - या पहिल्या कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो. 'तो स्वतःला सुखी व तृप्त करतो' - या दुसऱ्या कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो. 'तो संपत्ती वाटतो आणि पुण्यकर्मे करतो' - या तिसऱ्या कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो. 'तो त्या संपत्तीचा उपभोग घेताना त्यात आसक्त न होता, मोहित न होता, गुंतून न पडता, त्यातील दोष पाहणारा आणि मुक्तीची प्रज्ञा असणारा होऊन उपभोग घेतो' - या चौथ्या कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो. हे ग्रामणी! हा कामभोगी या चार कारणांमुळे प्रशंसनीय ठरतो. ‘‘ตโยเม, คามณิ, ตปสฺสิโน ลูขชีวิโน สนฺโต สํวิชฺชมานา โลกสฺมึ. กตเม ตโย? อิธ, คามณิ, เอกจฺโจ ตปสฺสี ลูขชีวี สทฺธา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิโต โหติ – ‘อปฺเปว นาม กุสลํ ธมฺมํ อธิคจฺเฉยฺยํ, อปฺเปว นาม อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ สจฺฉิกเรยฺย’นฺติ. โส อตฺตานํ อาตาเปติ ปริตาเปติ, กุสลญฺจ ธมฺมํ นาธิคจฺฉติ, อุตฺตริ จ มนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ น สจฺฉิกโรติ. हे ग्रामणी! जगात हे तीन प्रकारचे तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारे लोक अस्तित्वात आहेत. कोणते तीन? हे ग्रामणी! येथे एखादा तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा मनुष्य श्रद्धेने घरातून बेघर होऊन प्रव्रजित होतो—'कदाचित मला कुशल धर्म प्राप्त होईल, कदाचित मला मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेष प्रत्यक्ष अनुभवता येईल' या विचाराने. तो स्वतःला क्लेश देतो, अत्यंत पीडित करतो; परंतु तो कुशल धर्म प्राप्त करत नाही आणि मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेषही प्रत्यक्ष अनुभवत नाही. ‘‘อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺโจ ตปสฺสี ลูขชีวี สทฺธา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิโต โหติ – ‘อปฺเปว นาม กุสลํ ธมฺมํ อธิคจฺเฉยฺยํ, อปฺเปว นาม อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ สจฺฉิกเรยฺย’นฺติ. โส อตฺตานํ อาตาเปติ ปริตาเปติ, กุสลญฺหิ โข ธมฺมํ อธิคจฺฉติ, อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ น สจฺฉิกโรติ. हे ग्रामणी! पुन्हा येथे एखादा तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा मनुष्य श्रद्धेने घरातून बेघर होऊन प्रव्रजित होतो—'कदाचित मला कुशल धर्म प्राप्त होईल, कदाचित मला मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेष प्रत्यक्ष अनुभवता येईल' या विचाराने. तो स्वतःला क्लेश देतो, अत्यंत पीडित करतो; तो कुशल धर्म तर प्राप्त करतो, परंतु मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेष प्रत्यक्ष अनुभवत नाही. ‘‘อิธ [Pg.519] ปน, คามณิ, เอกจฺโจ ตปสฺสี ลูขชีวี สทฺธา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิโต โหติ – ‘อปฺเปว นาม กุสลํ ธมฺมํ อธิคจฺเฉยฺยํ, อปฺเปว นาม อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ สจฺฉิกเรยฺย’นฺติ. โส อตฺตานํ อาตาเปติ ปริตาเปติ, กุสลญฺจ ธมฺมํ อธิคจฺฉติ, อุตฺตริ จ มนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ สจฺฉิกโรติ. हे ग्रामणी! पुन्हा येथे एखादा तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा मनुष्य श्रद्धेने घरातून बेघर होऊन प्रव्रजित होतो—'कदाचित मला कुशल धर्म प्राप्त होईल, कदाचित मला मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेष प्रत्यक्ष अनुभवता येईल' या विचाराने. तो स्वतःला क्लेश देतो, अत्यंत पीडित करतो; तो कुशल धर्मही प्राप्त करतो आणि मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेषही प्रत्यक्ष अनुभवतो. ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ ตปสฺสี ลูขชีวี อตฺตานํ อาตาเปติ ปริตาเปติ, กุสลญฺจ ธมฺมํ นาธิคจฺฉติ, อุตฺตริ จ มนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ น สจฺฉิกโรติ. อยํ, คามณิ, ตปสฺสี ลูขชีวี ตีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห. กตเมหิ ตีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห? อตฺตานํ อาตาเปติ ปริตาเปตีติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน คารยฺโห. กุสลญฺจ ธมฺมํ นาธิคจฺฉตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน คารยฺโห. อุตฺตริ จ มนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ น สจฺฉิกโรตีติ, อิมินา ตติเยน ฐาเนน คารยฺโห. อยํ, คามณิ, ตปสฺสี ลูขชีวี, อิเมหิ ตีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห. हे ग्रामणी! त्या (तपस्वी लोकांमध्ये) जो तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा स्वतःला क्लेश देतो, अत्यंत पीडित करतो; परंतु कुशल धर्म प्राप्त करत नाही आणि मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेषही प्रत्यक्ष अनुभवत नाही. हे ग्रामणी! हा तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा मनुष्य तीन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो. कोणत्या तीन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो? 'तो स्वतःला क्लेश देतो, अत्यंत पीडित करतो' - या पहिल्या कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. 'तो कुशल धर्म प्राप्त करत नाही' - या दुसऱ्या कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. 'तो मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेष प्रत्यक्ष अनुभवत नाही' - या तिसऱ्या कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. हे ग्रामणी! हा तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा मनुष्य या तीन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो. ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ ตปสฺสี ลูขชีวี อตฺตานํ อาตาเปติ ปริตาเปติ, กุสลญฺหิ โข ธมฺมํ อธิคจฺฉติ, อุตฺตริ จ มนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ น สจฺฉิกโรติ. อยํ, คามณิ, ตปสฺสี ลูขชีวี ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห, เอเกน ฐาเนน ปาสํโส. กตเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห? อตฺตานํ อาตาเปติ ปริตาเปตีติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน คารยฺโห. อุตฺตริ จ มนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ น สจฺฉิกโรตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน คารยฺโห. กตเมน เอเกน ฐาเนน ปาสํโส? กุสลญฺหิ โข ธมฺมํ อธิคจฺฉตีติ, อิมินา เอเกน ฐาเนน ปาสํโส. อยํ, คามณิ, ตปสฺสี ลูขชีวี อิเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห, อิมินา เอเกน ฐาเนน ปาสํโส. हे ग्रामणी! त्या (तपस्वी लोकांमध्ये) जो तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा स्वतःला क्लेश देतो, अत्यंत पीडित करतो; तो कुशल धर्म तर प्राप्त करतो, परंतु मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेष प्रत्यक्ष अनुभवत नाही. हे ग्रामणी! हा तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा मनुष्य दोन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो आणि एका कारणामुळे प्रशंसनीय ठरतो. कोणत्या दोन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो? 'तो स्वतःला क्लेश देतो, अत्यंत पीडित करतो' - या पहिल्या कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. 'तो मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेष प्रत्यक्ष अनुभवत नाही' - या दुसऱ्या कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. कोणत्या एका कारणामुळे प्रशंसनीय ठरतो? 'तो कुशल धर्म प्राप्त करतो' - या एका कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो. हे ग्रामणी! हा तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा मनुष्य या दोन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो आणि या एका कारणामुळे प्रशंसनीय ठरतो. ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ ตปสฺสี ลูขชีวี อตฺตานํ อาตาเปติ ปริตาเปติ, กุสลญฺจ ธมฺมํ อธิคจฺฉติ, อุตฺตริ จ มนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ สจฺฉิกโรติ. อยํ, คามณิ, ตปสฺสี ลูขชีวี เอเกน ฐาเนน คารยฺโห, ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส. กตเมน เอเกน ฐาเนน คารยฺโห? อตฺตานํ อาตาเปติ ปริตาเปตีติ, อิมินา เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. กตเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส? กุสลญฺจ ธมฺมํ อธิคจฺฉตีติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน ปาสํโส. อุตฺตริ จ มนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ สจฺฉิกโรตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน ปาสํโส[Pg.520]. อยํ, คามณิ, ตปสฺสี ลูขชีวี อิมินา เอเกน ฐาเนน คารยฺโห, อิเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส. हे ग्रामणी! त्या (तपस्वी लोकांमध्ये) जो तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा स्वतःला क्लेश देतो, अत्यंत पीडित करतो; तो कुशल धर्मही प्राप्त करतो आणि मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेषही प्रत्यक्ष अनुभवतो. हे ग्रामणी! हा तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा मनुष्य एका कारणामुळे निंदनीय ठरतो आणि दोन कारणांमुळे प्रशंसनीय ठरतो. कोणत्या एका कारणामुळे निंदनीय ठरतो? 'तो स्वतःला क्लेश देतो, अत्यंत पीडित करतो' - या एका कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. कोणत्या दोन कारणांमुळे प्रशंसनीय ठरतो? 'तो कुशल धर्म प्राप्त करतो' - या पहिल्या कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो. 'तो मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेष प्रत्यक्ष अनुभवतो' - या दुसऱ्या कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो. हे ग्रामणी! हा तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा मनुष्य या एका कारणामुळे निंदनीय ठरतो आणि या दोन कारणांमुळे प्रशंसनीय ठरतो. ‘‘ติสฺโส อิมา, คามณิ, สนฺทิฏฺฐิกา นิชฺชรา อกาลิกา เอหิปสฺสิกา โอปเนยฺยิกา ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺพา วิญฺญูหิ. กตมา ติสฺโส? ยํ รตฺโต ราคาธิกรณํ อตฺตพฺยาพาธายปิ เจเตติ, ปรพฺยาพาธายปิ เจเตติ, อุภยพฺยาพาธายปิ เจเตติ. ราเค ปหีเน เนวตฺตพฺยาพาธาย เจเตติ, น ปรพฺยาพาธาย เจเตติ, น อุภยพฺยาพาธาย เจเตติ. สนฺทิฏฺฐิกา นิชฺชรา อกาลิกา เอหิปสฺสิกา โอปเนยฺยิกา ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺพา วิญฺญูหิ. ยํ ทุฏฺโฐ โทสาธิกรณํ อตฺตพฺยาพาธายปิ เจเตติ, ปรพฺยาพาธายปิ เจเตติ, อุภยพฺยาพาธายปิ เจเตติ. โทเส ปหีเน เนวตฺตพฺยาพาธาย เจเตติ, น ปรพฺยาพาธาย เจเตติ, น อุภยพฺยาพาธาย เจเตติ. สนฺทิฏฺฐิกา นิชฺชรา อกาลิกา เอหิปสฺสิกา โอปเนยฺยิกา ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺพา วิญฺญูหิ. ยํ มูฬฺโห โมหาธิกรณํ อตฺตพฺยาพาธายปิ เจเตติ, ปรพฺยาพาธายปิ เจเตติ, อุภยพฺยาพาธายปิ เจเตติ. โมเห ปหีเน เนวตฺตพฺยาพาธาย เจเตติ, น ปรพฺยาพาธาย เจเตติ, น อุภยพฺยาพาธาย เจเตติ. สนฺทิฏฺฐิกา นิชฺชรา อกาลิกา เอหิปสฺสิกา โอปเนยฺยิกา ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺพา วิญฺญูหิ. อิมา โข, คามณิ, ติสฺโส สนฺทิฏฺฐิกา นิชฺชรา อกาลิกา เอหิปสฺสิกา โอปเนยฺยิกา ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺพา วิญฺญูหี’’ติ. “हे ग्रामणी, या तीन प्रत्यक्ष दिसणाऱ्या (संदीट्ठिक), तात्काळ फळ देणाऱ्या (अकालिक), ‘या आणि पहा’ असे सांगण्यास योग्य (एहिपस्सिक), स्वतःमध्ये धारण करण्यास योग्य (ओपनेय्यिक) आणि सुज्ञांनी स्वतःच्या अंतःकरणात अनुभवण्याजोग्या (पच्चत्तं वेदितब्बा विञ्ञूहि) क्लेश-क्षयाच्या (निर्जरा) गोष्टी आहेत. कोणत्या तीन? (१) जो मनुष्य रागाने (आसक्तीने) ग्रासलेला असतो, तो रागाच्या प्रभावामुळे स्वतःच्या विनाशाचा विचार करतो, इतरांच्या विनाशाचा विचार करतो आणि दोघांच्याही विनाशाचा विचार करतो. राग नष्ट झाल्यावर, तो स्वतःच्या विनाशाचा विचार करत नाही, इतरांच्या विनाशाचा विचार करत नाही आणि दोघांच्याही विनाशाचा विचार करत नाही. हा प्रत्यक्ष दिसणारा, तात्काळ फळ देणारा, ‘या आणि पहा’ असे सांगण्यास योग्य, स्वतःमध्ये धारण करण्यास योग्य आणि सुज्ञांनी स्वतःच्या अंतःकरणात अनुभवण्याजोगा क्लेश-क्षय आहे. (२) जो मनुष्य द्वेषाने ग्रासलेला असतो, तो द्वेषाच्या प्रभावामुळे स्वतःच्या विनाशाचा विचार करतो, इतरांच्या विनाशाचा विचार करतो आणि दोघांच्याही विनाशाचा विचार करतो. द्वेष नष्ट झाल्यावर, तो स्वतःच्या विनाशाचा विचार करत नाही, इतरांच्या विनाशाचा विचार करत नाही आणि दोघांच्याही विनाशाचा विचार करत नाही. हा प्रत्यक्ष दिसणारा, तात्काळ फळ देणारा, ‘या आणि पहा’ असे सांगण्यास योग्य, स्वतःमध्ये धारण करण्यास योग्य आणि सुज्ञांनी स्वतःच्या अंतःकरणात अनुभवण्याजोगा क्लेश-क्षय आहे. (३) जो मनुष्य मोहाने ग्रासलेला असतो, तो मोहाच्या प्रभावामुळे स्वतःच्या विनाशाचा विचार करतो, इतरांच्या विनाशाचा विचार करतो आणि दोघांच्याही विनाशाचा विचार करतो. मोह नष्ट झाल्यावर, तो स्वतःच्या विनाशाचा विचार करत नाही, इतरांच्या विनाशाचा विचार करत नाही आणि दोघांच्याही विनाशाचा विचार करत नाही. हा प्रत्यक्ष दिसणारा, तात्काळ फळ देणारा, ‘या आणि पहा’ असे सांगण्यास योग्य, स्वतःमध्ये धारण करण्यास योग्य आणि सुज्ञांनी स्वतःच्या अंतःकरणात अनुभवण्याजोगा क्लेश-क्षय आहे. हे ग्रामणी, या तीन प्रत्यक्ष दिसणाऱ्या, तात्काळ फळ देणाऱ्या, ‘या आणि पहा’ असे सांगण्यास योग्य, स्वतःमध्ये धारण करण्यास योग्य आणि सुज्ञांनी स्वतःच्या अंतःकरणात अनुभवण्याजोग्या क्लेश-क्षयाच्या गोष्टी आहेत.” เอวํ วุตฺเต, ราสิโย คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต…เป… อุปาสกํ มํ ภควา ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ทฺวาทสมํ. असे म्हटले असता, रासिय ग्रामणी भगवंतांना म्हणाला – “अतिशय सुंदर, भन्ते! ... भगवंतांनी मला आजपासून जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे.” बारावे सुत्त समाप्त. ๑๓. ปาฏลิยสุตฺตํ १३. पाटलीय सुत्त ๓๖๕. เอกํ สมยํ ภควา โกลิเยสุ วิหรติ อุตฺตรํ นาม โกลิยานํ นิคโม. อถ โข ปาฏลิโย คามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ปาฏลิโย คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต – ‘สมโณ โคตโม มายํ ชานาตี’ติ. เย เต, ภนฺเต, เอวมาหํสุ – ‘สมโณ โคตโม มายํ ชานาตี’ติ, กจฺจิ เต, ภนฺเต, ภควโต [Pg.521] วุตฺตวาทิโน, น จ ภควนฺตํ อภูเตน อพฺภาจิกฺขนฺติ, ธมฺมสฺส จานุธมฺมํ พฺยากโรนฺติ, น จ โกจิ สหธมฺมิโก วาทานุวาโท คารยฺหํ ฐานํ อาคจฺฉติ? อนพฺภาจิกฺขิตุกามา หิ มยํ, ภนฺเต, ภควนฺต’’นฺติ. ‘‘เย เต, คามณิ, เอวมาหํสุ – ‘สมโณ โคตโม มายํ ชานาตี’ติ, วุตฺตวาทิโน เจว เม, เต น จ มํ อภูเตน อพฺภาจิกฺขนฺติ, ธมฺมสฺส จานุธมฺมํ พฺยากโรนฺติ, น จ โกจิ สหธมฺมิโก วาทานุวาโท คารยฺหํ ฐานํ อาคจฺฉตีติ, สจฺจํเยว กิร, โภ, มยํ เตสํ สมณพฺราหฺมณานํ น สทฺทหาม – ‘สมโณ โคตโม มายํ ชานาตีติ, สมโณ ขลุ โภ โคตโม มายาวี’ติ. โย นุ โข, คามณิ, เอวํ วเทติ – ‘อหํ มายํ ชานามี’ติ, โส เอวํ วเทติ – ‘อหํ มายาวี’ติ. ตเถว ตํ ภควา โหติ, ตเถว ตํ สุคต โหตี’’ติ. เตน หิ, คามณิ, ตญฺเญเวตฺถ ปฏิปุจฺฉิสฺสามิ; ยถา เต ขเมยฺย, ตถา ตํ พฺยากเรยฺยาสิ – ३६५. एकदा भगवान कोलिय देशात ‘उत्तर’ नावाच्या कोलियांच्या नगरात विहार करत होते. तेव्हा पाटलीय ग्रामणी भगवंतांकडे गेला; जवळ जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला पाटलीय ग्रामणी भगवंतांना म्हणाला – “भन्ते, मी असे ऐकले आहे की – ‘श्रमण गौतम माया (जादू) जाणतात.’ भन्ते, जे असे म्हणतात की ‘श्रमण गौतम माया जाणतात’, ते भगवंतांच्या वचनानुसारच बोलत आहेत ना? ते भगवंतांवर खोटा आळ तर आणत नाहीत ना? ते धर्माला अनुसरूनच स्पष्टीकरण देत आहेत ना? आणि त्यांच्या विधानावरून कोणताही कायदेशीर आक्षेप किंवा निंदा करण्याची जागा निर्माण होत नाही ना? कारण भन्ते, आम्हाला भगवंतांवर खोटा आळ आणण्याची इच्छा नाही.” “हे ग्रामणी, जे असे म्हणतात की ‘श्रमण गौतम माया जाणतात’, ते मेरे वचनानुसारच बोलत आहेत आणि माझ्यावर खोटा आळ आणत नाहीत. ते धर्माला अनुसरूनच स्पष्टीकरण देत आहेत आणि त्यांच्या विधानावरून निंदा करण्याची कोणतीही जागा निर्माण होत नाही.” “भन्ते, मग तर आम्ही त्या श्रमण-ब्राह्मणांच्या विधानावर विश्वास ठेवला नव्हता जे म्हणत होते की ‘श्रमण गौतम माया जाणतात.’ खरोखरच, भन्ते, श्रमण गौतम तर मायावी (जादूगार) आहेत!” “हे ग्रामणी, जो असे म्हणतो की ‘मी माया जाणतो’, तो असेही म्हणतो का की ‘मी मायावी आहे’?” “तसेच आहे, भगवन्! तसेच आहे, सुगत!” “तर मग, हे ग्रामणी, मी तुला याच विषयावर काही प्रश्न विचारतो. तुला जसे योग्य वाटेल तसे उत्तर दे –” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, ชานาสิ ตฺวํ โกลิยานํ ลมฺพจูฬเก ภเฏ’’ติ? ‘‘ชานามหํ, ภนฺเต, โกลิยานํ ลมฺพจูฬเก ภเฏ’’ติ. ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, กิมตฺถิยา โกลิยานํ ลมฺพจูฬกา ภฏา’’ติ? ‘‘เย จ, ภนฺเต, โกลิยานํ โจรา เต จ ปฏิเสเธตุํ, ยานิ จ โกลิยานํ ทูเตยฺยานิ ตานิ จ วหาตุํ, เอตทตฺถิยา, ภนฺเต, โกลิยานํ ลมฺพจูฬกา ภฏา’’ติ. ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, ชานาสิ ตฺวํ โกลิยานํ ลมฺพจูฬเก ภเฏ สีลวนฺเต วา เต ทุสฺสีเล วา’’ติ? ‘‘ชานามหํ, ภนฺเต, โกลิยานํ ลมฺพจูฬเก ภเฏ ทุสฺสีเล ปาปธมฺเม; เย จ โลเก ทุสฺสีลา ปาปธมฺมา โกลิยานํ ลมฺพจูฬกา ภฏา เตสํ อญฺญตรา’’ติ. ‘‘โย นุ โข, คามณิ, เอวํ วเทยฺย – ‘ปาฏลิโย คามณิ ชานาติ โกลิยานํ ลมฺพจูฬเก ภเฏ ทุสฺสีเล ปาปธมฺเม, ปาฏลิโยปิ คามณิ ทุสฺสีโล ปาปธมฺโม’ติ, สมฺมา นุ โข โส วทมาโน วเทยฺยา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต! อญฺเญ, ภนฺเต, โกลิยานํ ลมฺพจูฬกา ภฏา, อญฺโญหมสฺมิ. อญฺญถาธมฺมา โกลิยานํ ลมฺพจูฬกา ภฏา, อญฺญถาธมฺโมหมสฺมี’’ติ. ‘‘ตฺวญฺหิ นาม, คามณิ, ลจฺฉสิ – ‘ปาฏลิโย คามณิ ชานาติ โกลิยานํ ลมฺพจูฬเก ภเฏ ทุสฺสีเล ปาปธมฺเม, น จ ปาฏลิโย คามณิ ทุสฺสีโล ปาปธมฺโม’ติ, กสฺมา ตถาคโต น ลจฺฉติ – ‘ตถาคโต มายํ ชานาติ, น จ ตถาคโต มายาวี’ติ? มายํ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, มายาย [Pg.522] จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ มายาวี กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ’’. “तुला काय वाटते, ग्रामणी? तू कोलियांच्या लम्बचूळक (लोबत्या तुऱ्याचे फेटे घालणाऱ्या) सेवकांना ओळखतोस का?” “होय, भन्ते! मी कोलियांच्या लम्बचूळक सेवकांना ओळखतो.” “तुला काय वाटते, ग्रामणी? कोलियांच्या लम्बचूळक सेवकांचे काय काम असते?” “भन्ते, कोलियांच्या वतीने चोरांना पकडणे आणि कोलियांचे निरोप (संदेश) पोहोचवणे, हेच कोलियांच्या लम्बचूळक सेवकांचे काम असते.” “तुला काय वाटते, ग्रामणी? तू कोलियांच्या लम्बचूळक सेवकांना शीलवान समजतोस की दुःशील (शीलहीन)?” “भन्ते, मी कोलियांच्या लम्बचूळक सेवकांना दुःशील आणि पापी स्वभावाचे म्हणून ओळखतो. जगात जे कोणी दुःशील आणि पापी स्वभावाचे लोक आहेत, त्यांपैकीच ते काही आहेत.” “हे ग्रामणी, जर कोणी असे म्हटले की – ‘पाटलीय ग्रामणी कोलियांच्या दुःशील व पापी लम्बचूळक सेवकांना ओळखतो, म्हणून पाटलीय ग्रामणी सुद्धा दुःशील आणि पापी आहे,’ तर त्याचे असे बोलणे योग्य ठरेल का?” “अजिबात नाही, भन्ते! कोलियांचे लम्बचूळक सेवक वेगळे आहेत आणि मी वेगळा आहे. कोलियांच्या लम्बचूळक सेवकांचा स्वभाव वेगळा आहे आणि माझा स्वभाव वेगळा आहे.” “हे ग्रामणी, जर तुझ्या बाबतीत असे म्हटले जाऊ शकते की – ‘पाटलीय ग्रामणी कोलियांच्या दुःशील व पापी लम्बचूळक सेवकांना ओळखतो, पण पाटलीय ग्रामणी स्वतः दुःशील आणि पापी नाही,’ तर तथागतांच्या बाबतीत असे का म्हटले जाऊ शकत नाही की – ‘तथागत माया (जादू) जाणतात, पण तथागत स्वतः मायावी (जादूगार) नाहीत’? हे ग्रामणी, मी मायाही जाणतो आणि मायेचे फळही जाणतो; तसेच मायेचा प्रयोग करणारा मनुष्य शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर कशा प्रकारे दुर्गतीला, अपायाला, विनिपाताला आणि नरकाला प्राप्त होतो, हेही मी चांगल्या प्रकारे जाणतो.” ‘‘ปาณาติปาตํ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, ปาณาติปาตสฺส จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ ปาณาติปาตี กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ. อทินฺนาทานํ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, อทินฺนาทานสฺส จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ อทินฺนาทายี กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ. กาเมสุมิจฺฉาจารํ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, กาเมสุมิจฺฉาจารสฺส จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ กาเมสุมิจฺฉาจารี กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ. มุสาวาทํ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, มุสาวาทสฺส จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ มุสาวาที กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ. ปิสุณวาจํ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, ปิสุณวาจาย จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ ปิสุณวาโจ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ. ผรุสวาจํ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, ผรุสวาจาย จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ ผรุสวาโจ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ. สมฺผปฺปลาปํ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, สมฺผปฺปลาปสฺส จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ สมฺผปฺปลาปี กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ. อภิชฺฌํ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, อภิชฺฌาย จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ อภิชฺฌาลุ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ. พฺยาปาทปโทสํ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, พฺยาปาทปโทสสฺส จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ พฺยาปนฺนจิตฺโต กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ. มิจฺฉาทิฏฺฐึ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, มิจฺฉาทิฏฺฐิยา จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ มิจฺฉาทิฏฺฐิโก กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ. हे ग्रामणी, मी प्राणातिपात (प्राणहत्या) जाणतो आणि प्राणातिपाताचा विपाक (परिणाम) देखील जाणतो. तसेच, प्राणातिपात करणारा मनुष्य कशा प्रकारे आचरण करून, काया भेदून मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात (नरकात) उत्पन्न होतो, हे देखील मी जाणतो. हे ग्रामणी, मी अदिन्नादान (चोरी) जाणतो आणि अदिन्नादानाचा विपाक देखील जाणतो. तसेच, अदिन्नादान करणारा मनुष्य कशा प्रकारे आचरण करून, काया भेदून मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात उत्पन्न होतो, हे देखील मी जाणतो. हे ग्रामणी, मी कामेसुमिच्छाचार (कामोपभोगातील व्यभिचार) जाणतो आणि कामेसुमिच्छाचाराचा विपाक देखील जाणतो. तसेच, कामेसुमिच्छाचार करणारा मनुष्य कशा प्रकारे आचरण करून, काया भेदून मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात उत्पन्न होतो, हे देखील मी जाणतो. हे ग्रामणी, मी मुसावाद (असत्य बोलणे) जाणतो आणि मुसावादाचा विपाक देखील जाणतो. तसेच, मुसावाद बोलणारा मनुष्य कशा प्रकारे आचरण करून, काया भेदून मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात उत्पन्न होतो, हे देखील मी जाणतो. हे ग्रामणी, मी पिसुणवाचा (चहाडी) जाणतो आणि पिसुणवाचेचा विपाक देखील जाणतो. तसेच, पिसुणवाचा बोलणारा मनुष्य कशा प्रकारे आचरण करून, काया भेदून मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात उत्पन्न होतो, हे देखील मी जाणतो. हे ग्रामणी, मी फरुसवाचा (कठोर बोलणे) जाणतो आणि फरुसवाचेचा विपाक देखील जाणतो. तसेच, फरुसवाचा बोलणारा मनुष्य कशा प्रकारे आचरण करून, काया भेदून मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात उत्पन्न होतो, हे देखील मी जाणतो. हे ग्रामणी, मी सम्फप्पलाप (व्यर्थ बडबड) जाणतो आणि सम्फप्पलापाचा विपाक देखील जाणतो. तसेच, सम्फप्पलाप करणारा मनुष्य कशा प्रकारे आचरण करून, काया भेदून मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात उत्पन्न होतो, हे देखील मी जाणतो. हे ग्रामणी, मी अभिध्या (लोभ) जाणतो आणि अभिध्येचा विपाक देखील जाणतो. तसेच, अभिध्या बाळगणारा मनुष्य कशा प्रकारे आचरण करून, काया भेदून मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात उत्पन्न होतो, हे देखील मी जाणतो. हे ग्रामणी, मी व्यापाद-प्रदोष (द्वेषयुक्त विचार) जाणतो आणि व्यापाद-प्रदोषाचा विपाक देखील जाणतो. तसेच, व्यापादयुक्त चित्त असलेला मनुष्य कशा प्रकारे आचरण करून, काया भेदून मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात उत्पन्न होतो, हे देखील मी जाणतो. हे ग्रामणी, मी मिच्छादिट्ठी (मिथ्या दृष्टी) जाणतो आणि मिच्छादिट्ठीचा विपाक देखील जाणतो. तसेच, मिच्छादिट्ठी बाळगणारा मनुष्य कशा प्रकारे आचरण करून, काया भेदून मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात उत्पन्न होतो, हे देखील मी जाणतो. ‘‘สนฺติ หิ, คามณิ, เอเก สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘โย โกจิ ปาณมติปาเตติ, สพฺโพ โส ทิฏฺเฐว ธมฺเม ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวทยติ. โย โกจิ อทินฺนํ อาทิยติ, สพฺโพ โส ทิฏฺเฐว ธมฺเม [Pg.523] ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวทยติ. โย โกจิ กาเมสุ มิจฺฉา จรติ, สพฺโพ โส ทิฏฺเฐว ธมฺเม ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวทยติ. โย โกจิ มุสา ภณติ, สพฺโพ โส ทิฏฺเฐว ธมฺเม ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวทยตี’’’ติ. हे ग्रामणी, काही श्रमण व ब्राह्मण असे प्रतिपादन करणारे आणि अशा मताचे आहेत की—'जो कोणी प्राणातिपात (प्राणहत्या) करतो, तो सर्व या प्रत्यक्ष जन्मातच (दृष्टधर्मातच) दुःख आणि दौर्मनस्य (मानसिक क्लेश) भोगतो. जो कोणी अदिन्नादान (चोरी) करतो, तो सर्व या प्रत्यक्ष जन्मातच दुःख आणि दौर्मनस्य भोगतो. जो कोणी कामोपभोगात व्यभिचार करतो, तो सर्व या प्रत्यक्ष जन्मातच दुःख आणि दौर्मनस्य भोगतो. जो कोणी असत्य बोलतो, तो सर्व या प्रत्यक्ष जन्मातच दुःख आणि दौर्मनस्य भोगतो.' ‘‘ทิสฺสติ โข ปน, คามณิ, อิเธกจฺโจ มาลี กุณฺฑลี สุนฺหาโต สุวิลิตฺโต กปฺปิตเกสมสฺสุ อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรนฺโต. ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส กึ อกาสิ มาลี กุณฺฑลี สุนฺหาโต สุวิลิตฺโต กปฺปิตเกสมสฺสุ อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรตี’ติ? ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส รญฺโญ ปจฺจตฺถิกํ ปสยฺห ชีวิตา โวโรเปสิ. ตสฺส ราชา อตฺตมโน อภิหารมทาสิ. เตนายํ ปุริโส มาลี กุณฺฑลี สุนฺหาโต สุวิลิตฺโต กปฺปิตเกสมสฺสุ, อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรตี’’’ติ. परंतु, हे ग्रामणी, या जगात एखादा मनुष्य फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला, उत्तम स्नान केलेला, सुगंधी उटणे लावलेला, केशरचना व दाढी व्यवस्थित केलेली आणि स्त्रियांसोबत कामोपभोगात जणू राजासारखा रममाण होताना दिसतो. लोक त्याच्याबद्दल असे विचारतात—'अहो! या माणसाने असे काय केले आहे, ज्यामुळे तो फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला, उत्तम स्नान केलेला, सुगंधी उटणे लावलेला, केशरचना व दाढी व्यवस्थित केलेली आणि स्त्रियांसोबत कामोपभोगात जणू राजासारखा रममाण होत आहे?' त्यावर लोक असे उत्तर देतात—'अहो! या माणसाने राजाच्या शत्रूवर हल्ला करून त्याला जिवंत मारले (त्याचे प्राण घेतले). राजाने प्रसन्न होऊन त्याला मोठा पुरस्कार दिला. म्हणूनच हा मनुष्य फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला, उत्तम स्नान केलेला, सुगंधी उटणे लावलेला, केशरचना व दाढी व्यवस्थित केलेली आणि स्त्रियांसोबत कामोपभोगात जणू राजासारखा रममाण होत आहे.' ‘‘ทิสฺสติ โข, คามณิ, อิเธกจฺโจ ทฬฺหาย รชฺชุยา ปจฺฉาพาหํ คาฬฺหพนฺธนํ พนฺธิตฺวา ขุรมุณฺฑํ กริตฺวา ขรสฺสเรน ปณเวน รถิยาย รถิยํ สิงฺฆาฏเกน สิงฺฆาฏกํ ปริเนตฺวา, ทกฺขิเณน ทฺวาเรน นิกฺขาเมตฺวา, ทกฺขิณโต นครสฺส สีสํ ฉิชฺชมาโน. ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส กึ อกาสิ, ทฬฺหาย รชฺชุยา ปจฺฉาพาหํ คาฬฺหพนฺธนํ พนฺธิตฺวา ขุรมุณฺฑํ กริตฺวา ขรสฺสเรน ปณเวน รถิยาย รถิยํ สิงฺฆาฏเกน สิงฺฆาฏกํ ปริเนตฺวา ทกฺขิเณน ทฺวาเรน นิกฺขาเมตฺวา ทกฺขิณโต นครสฺส สีสํ ฉินฺทตี’ติ ? ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส ราชเวรี อิตฺถึ วา ปุริสํ วา ชีวิตา โวโรเปสิ, เตน นํ ราชาโน คเหตฺวา เอวรูปํ กมฺมการณํ กาเรนฺตี’’’ติ. तसेच, हे ग्रामणी, या जगात एखादा मनुष्य मजबूत दोरीने पाठीमागे हात घट्ट बांधलेला, डोके पूर्णपणे मुंडण केलेला, कर्कश आवाजाच्या ढोलाच्या तालावर गल्लीगल्लीतून आणि चौकाचौकातून फिरवला जाणारा, आणि नंतर दक्षिण दरवाजातून बाहेर नेऊन शहराच्या दक्षिणेला त्याचे शीर कापले जात असताना दिसतो. लोक त्याच्याबद्दल असे विचारतात—'अहो! या माणसाने असे काय केले आहे, ज्यामुळे मजबूत दोरीने पाठीमागे हात घट्ट बांधून, डोके मुंडण करून, कर्कश आवाजाच्या ढोलाच्या तालावर गल्लीगल्लीतून आणि चौकाचौकातून फिरवून, दक्षिण दरवाजातून बाहेर नेऊन शहराच्या दक्षिणेला त्याचे शीर कापले जात आहे?' त्यावर लोक असे उत्तर देतात—'अहो! हा मनुष्य राजाचा शत्रू होता, त्याने एखाद्या स्त्रीचे किंवा पुरुषाचे प्राण घेतले होते. म्हणूनच राजांनी त्याला पकडून अशी कठोर शिक्षा दिली आहे.' ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อปิ นุ เต เอวรูปํ ทิฏฺฐํ วา สุตํ วา’’ติ? ‘‘ทิฏฺฐญฺจ โน, ภนฺเต, สุตญฺจ สุยฺยิสฺสติ จา’’ติ. ‘‘ตตฺร, คามณิ, เย เต สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘โย โกจิ ปาณมติปาเตติ, สพฺโพ โส ทิฏฺเฐว ธมฺเม ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวทยตี’ติ, สจฺจํ วา เต อาหํสุ มุสา วา’’ติ? ‘‘มุสา, ภนฺเต’’. ‘‘เย ปน เต ตุจฺฉํ มุสา วิลปนฺติ, สีลวนฺโต วา เต ทุสฺสีลา วา’’ติ? ‘‘ทุสฺสีลา, ภนฺเต’’. ‘‘เย ปน เต ทุสฺสีลา [Pg.524] ปาปธมฺมา มิจฺฉาปฏิปนฺนา วา เต สมฺมาปฏิปนฺนา วา’’ติ? ‘‘มิจฺฉาปฏิปนฺนา, ภนฺเต’’. ‘‘เย ปน เต มิจฺฉาปฏิปนฺนา มิจฺฉาทิฏฺฐิกา วา เต สมฺมาทิฏฺฐิกา วา’’ติ? ‘‘มิจฺฉาทิฏฺฐิกา, ภนฺเต’’. ‘‘เย ปน เต มิจฺฉาทิฏฺฐิกา กลฺลํ นุ เตสุ ปสีทิตุ’’นฺติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. यावर तुला काय वाटते, हे ग्रामणी? तू असे कधी पाहिले किंवा ऐकले आहे का?'' ''भन्ते, आम्ही हे पाहिले देखील आहे आणि ऐकले देखील आहे, आणि पुढेही ऐकू येईल.'' ''अशा वेळी, हे ग्रामणी, जे श्रमण व ब्राह्मण असे प्रतिपादन करणारे आणि अशा मताचे आहेत की—'जो कोणी प्राणातिपात करतो, तो सर्व या प्रत्यक्ष जन्मातच दुःख आणि दौर्मनस्य भोगतो,' ते खरे बोलतात की खोटे?'' ''खोटे बोलतात, भन्ते.'' ''आणि जे असे व्यर्थ असत्य बोलतात, ते शीलवान आहेत की दुःशील (शीलहीन)?'' ''दुःशील आहेत, भन्ते.'' ''आणि जे दुःशील, पापी प्रवृत्तीचे आहेत, ते चुकीच्या मार्गाने चालणारे (मिथ्याप्रतिपन्न) आहेत की योग्य मार्गाने चालणारे (सम्यक्प्रतिपन्न)?'' ''चुकीच्या मार्गाने चालणारे आहेत, भन्ते.'' ''आणि जे चुकीच्या मार्गाने चालणारे आहेत, ते मिथ्यादृष्टी (चुकीची दृष्टी असणारे) आहेत की सम्यग्दृष्टी (योग्य दृष्टी असणारे)?'' ''मिथ्यादृष्टी आहेत, भन्ते.'' ''आणि जे मिथ्यादृष्टी आहेत, त्यांच्यावर श्रद्धा ठेवणे किंवा त्यांच्याविषयी आदर बाळगणे योग्य आहे का?'' ''नाही, भन्ते, हे मुळीच योग्य नाही. ‘‘ทิสฺสติ โข ปน, คามณิ, อิเธกจฺโจ มาลี กุณฺฑลี…เป… อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรนฺโต. ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส กึ อกาสิ มาลี กุณฺฑลี…เป… อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรตี’ติ? ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส รญฺโญ ปจฺจตฺถิกสฺส ปสยฺห รตนํ อหาสิ. ตสฺส ราชา อตฺตมโน อภิหารมทาสิ. เตนายํ ปุริโส มาลี กุณฺฑลี…เป… อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรตี’’’ติ. तसेच, हे ग्रामणी, या जगात एखादा मनुष्य फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला...पे... आणि स्त्रियांसोबत कामोपभोगात जणू राजासारखा रममाण होताना दिसतो. लोक त्याच्याबद्दल असे विचारतात—'अहो! या माणसाने असे काय केले आहे, ज्यामुळे तो फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला...पे... आणि स्त्रियांसोबत कामोपभोगात जणू राजासारखा रममाण होत आहे?' त्यावर लोक असे उत्तर देतात—'अहो! या माणसाने राजाच्या शत्रूवर हल्ला करून त्याचे रत्न (मौल्यवान संपत्ती) चोरले. राजाने प्रसन्न होऊन त्याला मोठा पुरस्कार दिला. म्हणूनच हा मनुष्य फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला...पे... आणि स्त्रियांसोबत कामोपभोगात जणू राजासारखा रममाण होत आहे.' ‘‘ทิสฺสติ โข, คามณิ, อิเธกจฺโจ ทฬฺหาย รชฺชุยา…เป… ทกฺขิณโต นครสฺส สีสํ ฉิชฺชมาโน ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส กึ อกาสิ ทฬฺหาย รชฺชุยา…เป… ทกฺขิณโต นครสฺส สีสํ ฉินฺทตี’ติ? ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส คามา วา อรญฺญา วา อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยิ. เตน นํ ราชาโน คเหตฺวา เอวรูปํ กมฺมการณํ กาเรนฺตี’ติ. ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อปิ นุ เต เอวรูปํ ทิฏฺฐํ วา สุตํ วา’’ติ? ‘‘ทิฏฺฐญฺจ โน, ภนฺเต, สุตญฺจ สุยฺยิสฺสติ จา’’ติ. ‘‘ตตฺร, คามณิ, เย เต สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘โย โกจิ อทินฺนํ อาทิยติ, สพฺโพ โส ทิฏฺเฐว ธมฺเม ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวทยตี’ติ, สจฺจํ วา เต อาหํสุ มุสา วาติ…เป… กลฺลํ นุ เตสุ ปสีทิตุ’’นฺติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “हे ग्रामणी, येथे एखादा मनुष्य मजबूत दोरीने [हात मागे बांधून]...पे... शहराच्या दक्षिण दिशेला त्याचे डोके कापले जात असताना दिसतो. लोक त्याला पाहून असे म्हणतात—'अरे! या माणसाने काय केले आहे, ज्यामुळे मजबूत दोरीने...पे... शहराच्या दक्षिण दिशेला त्याचे डोके कापले जात आहे?' त्यावर लोक असे म्हणतात—'अरे! या माणसाने गावातील किंवा अरण्यातील न दिलेली वस्तू चोरीच्या उद्देशाने घेतली (चोरली). म्हणूनच राजांनी त्याला पकडून अशी शिक्षा दिली आहे.' यावर तुला काय वाटते, ग्रामणी? तू असे कधी पाहिले किंवा ऐकले आहेस का?” “भन्ते, आम्ही हे पाहिले आहे, ऐकले आहे आणि पुढेही ऐकू.” “तिथे, ग्रामणी, जे श्रमण-ब्राह्मण अशा सिद्धांताचे व दृष्टीचे आहेत की—'जो कोणी न दिलेली वस्तू घेतो, तो सर्व याच जन्मात (दृष्टधर्मात) दुःख आणि दौर्मनस्य भोगतो,' त्यांनी खरे सांगितले की खोटे?...पे... अशा लोकांवर श्रद्धा ठेवणे योग्य आहे का?” “नाही, भन्ते.” ‘‘ทิสฺสติ โข ปน, คามณิ, อิเธกจฺโจ มาลี กุณฺฑลี…เป… อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรนฺโต. ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส กึ อกาสิ มาลี กุณฺฑลี…เป… อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรตี’ติ? ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส รญฺโญ ปจฺจตฺถิกสฺส ทาเรสุ จาริตฺตํ อาปชฺชิ. ตสฺส ราชา อตฺตมโน อภิหารมทาสิ. เตนายํ ปุริโส มาลี กุณฺฑลี…เป… อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรตี’’’ติ. “परंतु, हे ग्रामणी, येथे एखादा मनुष्य फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला...पे... स्त्रियांसोबत कामभोगांचा उपभोग घेत एखाद्या राजासारखा विहार करताना दिसतो. लोक त्याला पाहून असे म्हणतात—'अरे! या माणसाने काय केले आहे, ज्यामुळे फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला...पे... स्त्रियांसोबत कामभोगांचा उपभोग घेत एखाद्या राजासारखा विहार करत आहे?' त्यावर लोक असे म्हणतात—'अरे! या माणसाने राजाच्या शत्रूच्या पत्नीशी संबंध ठेवले. राजा त्याच्यावर प्रसन्न झाला आणि त्याने त्याला बक्षीस दिले. म्हणूनच हा मनुष्य फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला...पे... स्त्रियांसोबत कामभोगांचा उपभोग घेत एखाद्या राजासारखा विहार करत आहे.'” ‘‘ทิสฺสติ [Pg.525] โข, คามณิ, อิเธกจฺโจ ทฬฺหาย รชฺชุยา…เป… ทกฺขิณโต นครสฺส สีสํ ฉิชฺชมาโน. ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส กึ อกาสิ ทฬฺหาย รชฺชุยา…เป… ทกฺขิณโต นครสฺส สีสํ ฉินฺทตี’ติ? ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส กุลิตฺถีสุ กุลกุมารีสุ จาริตฺตํ อาปชฺชิ, เตน นํ ราชาโน คเหตฺวา เอวรูปํ กมฺมการณํ กาเรนฺตี’ติ. ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อปิ นุ เต เอวรูปํ ทิฏฺฐํ วา สุตํ วา’’ติ? ‘‘ทิฏฺฐญฺจ โน, ภนฺเต, สุตญฺจ สุยฺยิสฺสติ จา’’ติ. ‘‘ตตฺร, คามณิ, เย เต สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘โย โกจิ กาเมสุ มิจฺฉา จรติ, สพฺโพ โส ทิฏฺเฐว ธมฺเม ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวทยตี’ติ, สจฺจํ วา เต อาหํสุ มุสา วาติ…เป… กลฺลํ นุ เตสุ ปสีทิตุ’’นฺติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “हे ग्रामणी, येथे एखादा मनुष्य मजबूत दोरीने...पे... शहराच्या दक्षिण दिशेला त्याचे डोके कापले जात असताना दिसतो. लोक त्याला पाहून असे म्हणतात—'अरे! या माणसाने काय केले आहे, ज्यामुळे मजबूत दोरीने...पे... शहराच्या दक्षिण दिशेला त्याचे डोके कापले जात आहे?' त्यावर लोक असे म्हणतात—'अरे! या माणसाने कुलीन स्त्रियांशी किंवा कुलीन कुमारिकांशी व्यभिचार केला, म्हणूनच राजांनी त्याला पकडून अशी शिक्षा दिली आहे.' यावर तुला काय वाटते, ग्रामणी? तू असे कधी पाहिले किंवा ऐकले आहेस का?” “भन्ते, आम्ही हे पाहिले आहे, ऐकले आहे आणि पुढेही ऐकू.” “तिथे, ग्रामणी, जे श्रमण-ब्राह्मण अशा सिद्धांताचे व दृष्टीचे आहेत की—'जो कोणी कामभोगांमध्ये मिथ्याचार करतो, तो सर्व याच जन्मात (दृष्टधर्मात) दुःख आणि दौर्मनस्य भोगतो,' त्यांनी खरे सांगितले की खोटे?...पे... अशा लोकांवर श्रद्धा ठेवणे योग्य आहे का?” “नाही, भन्ते.” ‘‘ทิสฺสติ โข ปน, คามณิ, อิเธกจฺโจ มาลี กุณฺฑลี สุนฺหาโต สุวิลิตฺโต กปฺปิตเกสมสฺสุ อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรนฺโต. ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส กึ อกาสิ มาลี กุณฺฑลี สุนฺหาโต สุวิลิตฺโต กปฺปิตเกสมสฺสุ อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรตี’ติ? ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส ราชานํ มุสาวาเทน หาเสสิ. ตสฺส ราชา อตฺตมโน อภิหารมทาสิ. เตนายํ ปุริโส มาลี กุณฺฑลี สุนฺหาโต สุวิลิตฺโต กปฺปิตเกสมสฺสุ อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรตี’’’ติ. “परंतु, हे ग्रामणी, येथे एखादा मनुष्य फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला, उत्तम प्रकारे स्नान केलेला, सुगंधी उटणे लावलेला, केस व दाढी व्यवस्थित कापलेला, स्त्रियांसोबत कामभोगांचा उपभोग घेत एखाद्या राजासारखा विहार करताना दिसतो. लोक त्याला पाहून असे म्हणतात—'अरे! या माणसाने काय केले आहे, ज्यामुळे फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला, उत्तम प्रकारे स्नान केलेला, सुगंधी उटणे लावलेला, केस व दाढी व्यवस्थित कापलेला, स्त्रियांसोबत कामभोगांचा उपभोग घेत एखाद्या राजासारखा विहार करत आहे?' त्यावर लोक असे म्हणतात—'अरे! या माणसाने राजाला असत्य बोलून हसविले. राजा त्याच्यावर प्रसन्न झाला आणि त्याने त्याला बक्षीस दिले. म्हणूनच हा मनुष्य फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला, उत्तम प्रकारे स्नान केलेला, सुगंधी उटणे लावलेला, केस व दाढी व्यवस्थित कापलेला, स्त्रियांसोबत कामभोगांचा उपभोग घेत एखाद्या राजासारखा विहार करत आहे.'” ‘‘ทิสฺสติ โข, คามณิ, อิเธกจฺโจ ทฬฺหาย รชฺชุยา ปจฺฉาพาหํ คาฬฺหพนฺธนํ พนฺธิตฺวา ขุรมุณฺฑํ กริตฺวา ขรสฺสเรน ปณเวน รถิยาย รถิยํ สิงฺฆาฏเกน สิงฺฆาฏกํ ปริเนตฺวา ทกฺขิเณน ทฺวาเรน นิกฺขาเมตฺวา ทกฺขิณโต นครสฺส สีสํ ฉิชฺชมาโน. ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส กึ อกาสิ ทฬฺหาย รชฺชุยา ปจฺฉาพาหํ คาฬฺหพนฺธนํ พนฺธิตฺวา ขุรมุณฺฑํ กริตฺวา ขรสฺสเรน ปณเวน รถิยาย รถิยํ สิงฺฆาฏเกน สิงฺฆาฏกํ ปริเนตฺวา, ทกฺขิเณน ทฺวาเรน นิกฺขาเมตฺวา, ทกฺขิณโต นครสฺส สีสํ ฉินฺทตี’ติ? ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส คหปติสฺส วา คหปติปุตฺตสฺส วา มุสาวาเทน อตฺถํ ภญฺชิ, เตน นํ ราชาโน คเหตฺวา เอวรูปํ กมฺมการณํ กาเรนฺตี’ติ. ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อปิ นุ เต เอวรูปํ ทิฏฺฐํ วา สุตํ วา’’ติ? ‘‘ทิฏฺฐญฺจ โน[Pg.526], ภนฺเต, สุตญฺจ สุยฺยิสฺสติ จา’’ติ. ‘‘ตตฺร, คามณิ, เย เต สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘โย โกจิ มุสา ภณติ, สพฺโพ โส ทิฏฺเฐว ธมฺเม ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวทยตี’ติ, สจฺจํ วา เต อาหํสุ มุสา วา’’ติ? ‘‘มุสา, ภนฺเต’’. ‘‘เย ปน เต ตุจฺฉํ มุสา วิลปนฺติ สีลวนฺโต วา เต ทุสฺสีลา วา’’ติ? ‘‘ทุสฺสีลา, ภนฺเต’’. ‘‘เย ปน เต ทุสฺสีลา ปาปธมฺมา มิจฺฉาปฏิปนฺนา วา เต สมฺมาปฏิปนฺนา วา’’ติ? ‘‘มิจฺฉาปฏิปนฺนา, ภนฺเต’’. ‘‘เย ปน เต มิจฺฉาปฏิปนฺนา มิจฺฉาทิฏฺฐิกา วา เต สมฺมาทิฏฺฐิกา วา’’ติ? ‘‘มิจฺฉาทิฏฺฐิกา, ภนฺเต’’. ‘‘เย ปน เต มิจฺฉาทิฏฺฐิกา กลฺลํ นุ เตสุ ปสีทิตุ’’นฺติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “हे ग्रामणी, येथे एखादा मनुष्य मजबूत दोरीने हात मागे घट्ट बांधलेला, डोके पूर्णपणे मुंडण केलेला, कर्कश आवाजाच्या ढोलाच्या तालावर गल्लीगल्लीतून आणि चौकाचौकातून फिरवला जाऊन, दक्षिण दरवाजातून बाहेर काढून, शहराच्या दक्षिण दिशेला त्याचे डोके कापले जात असताना दिसतो. लोक त्याला पाहून असे म्हणतात—'अरे! या माणसाने काय केले आहे, ज्यामुळे मजबूत दोरीने हात मागे घट्ट बांधून, डोके पूर्णपणे मुंडण करून, कर्कश आवाजाच्या ढोलाच्या तालावर गल्लीगल्लीतून आणि चौकाचौकातून फिरवून, दक्षिण दरवाजातून बाहेर काढून, शहराच्या दक्षिण दिशेला त्याचे डोके कापले जात आहे?' त्यावर लोक असे म्हणतात—'अरे! या माणसाने एखाद्या गृहपतीचे किंवा गृहपतीच्या पुत्राचे असत्य बोलून नुकसान केले. म्हणूनच राजांनी त्याला पकडून अशी शिक्षा दिली आहे.' यावर तुला काय वाटते, ग्रामणी? तू असे कधी पाहिले किंवा ऐकले आहेस का?” “भन्ते, आम्ही हे पाहिले आहे, ऐकले आहे आणि पुढेही ऐकू.” “तिथे, ग्रामणी, जे श्रमण-ब्राह्मण अशा सिद्धांताचे व दृष्टीचे आहेत की—'जो कोणी असत्य बोलतो, तो सर्व याच जन्मात (दृष्टधर्मात) दुःख आणि दौर्मनस्य भोगतो,' त्यांनी खरे सांगितले की खोटे?” “खोटे, भन्ते.” “परंतु जे निरर्थक असत्य बडबडतात, ते शीलवान आहेत की दुःशील?” “दुःशील, भन्ते.” “परंतु जे दुःशील व पापी स्वभावाचे आहेत, ते मिथ्याप्रतिपन्न (चुकीच्या मार्गाने चालणारे) आहेत की सम्यक्प्रतिपन्न (योग्य मार्गाने चालणारे)?” “मिथ्याप्रतिपन्न, भन्ते.” “परंतु जे मिथ्याप्रतिपन्न आहेत, ते मिथ्यादृष्टीचे आहेत की सम्यग्दृष्टीचे?” “मिथ्यादृष्टीचे, भन्ते.” “परंतु जे मिथ्यादृष्टीचे आहेत, त्यांच्यावर श्रद्धा ठेवणे योग्य आहे का?” “नाही, भन्ते.” ‘‘อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต! อตฺถิ เม, ภนฺเต, อาวสถาคารํ. ตตฺถ อตฺถิ มญฺจกานิ, อตฺถิ อาสนานิ, อตฺถิ อุทกมณิโก, อตฺถิ เตลปฺปทีโป. ตตฺถ โย สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา วาสํ อุเปติ, เตนาหํ ยถาสตฺติ ยถาพลํ สํวิภชามิ. ภูตปุพฺพํ, ภนฺเต, จตฺตาโร สตฺถาโร นานาทิฏฺฐิกา นานาขนฺติกา นานารุจิกา, ตสฺมึ อาวสถาคาเร วาสํ อุปคจฺฉุํ’’. “आश्चर्य आहे, भन्ते! अद्भुत आहे, भन्ते! भन्ते, माझी एक धर्मशाळा आहे. तिथे खाटा आहेत, आसने आहेत, पाण्याचा माठ आहे आणि तेलाचा दिवा आहे. तिथे जो कोणी श्रमण किंवा ब्राह्मण वास्तव्यासाठी येतो, त्याला मी माझ्या शक्तीनुसार व क्षमतेनुसार दान देतो. भन्ते, पूर्वीची गोष्ट आहे, वेगवेगळ्या दृष्टीचे, वेगवेगळ्या आवडीचे आणि वेगवेगळ्या पसंतीचे चार शास्ते त्या धर्मशाळेत वास्तव्यासाठी आले होते.” ‘‘เอโก สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – ‘นตฺถิ ทินฺนํ, นตฺถิ ยิฏฺฐํ, นตฺถิ หุตํ, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก. นตฺถิ อยํ โลโก, นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ มาตา, นตฺถิ ปิตา, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ โลเก สมณพฺราหฺมณา สมฺมคฺคตา สมฺมาปฏิปนฺนา เย อิมญฺจ โลกํ ปรญฺจ โลกํ สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา ปเวเทนฺตี’’’ติ. “त्यातील एक शास्ता अशा सिद्धांताचा व दृष्टीचा होता—'दिलेल्या दानाला काही अर्थ नाही, यज्ञाला काही अर्थ नाही, हवनाला काही अर्थ नाही; चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक नसतो; हा लोक नाही, परलोक नाही; माता नाही, पिता नाही; औपपातिक (स्वयंभू उत्पन्न होणारे) प्राणी नाहीत; जगात असे कोणतेही योग्य मार्गाने चालणारे, सम्यक्प्रतिपन्न श्रमण-ब्राह्मण नाहीत, ज्यांनी स्वतःच्या अभिज्ञेने हा लोक आणि परलोक प्रत्यक्ष जाणून घेऊन तो प्रकट केला आहे.'” ‘‘เอโก สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – ‘อตฺถิ ทินฺนํ, อตฺถิ ยิฏฺฐํ, อตฺถิ หุตํ, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก, อตฺถิ อยํ โลโก, อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ มาตา, อตฺถิ ปิตา, อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ โลเก สมณพฺราหฺมณา สมฺมคฺคตา สมฺมาปฏิปนฺนา, เย อิมญฺจ โลกํ ปรญฺจ โลกํ สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา ปเวเทนฺตี’’’ติ. “एक शास्ता असा वाद मांडणारा व अशी दृष्टी असणारा आहे – 'दान दिल्यास त्याचे फळ असते, यज्ञ-पूजेचे फळ असते, हवनाचे फळ असते, चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ आणि विपाक असतो, हा लोक आहे, परलोक आहे, माता आहे, पिता आहे, औपपातिक प्राणी आहेत; जगात असे सम्यक मार्गावर चालणारे, सम्यक प्रतिपन्न श्रमण व ब्राह्मण आहेत, जे स्वतःच्या उच्च ज्ञानाने या लोकाचा आणि परलोकाचा साक्षात्कार करून तो प्रकट करतात.'” ‘‘เอโก สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – ‘กโรโต การยโต, ฉินฺทโต เฉทาปยโต, ปจโต ปาจาปยโต, โสจยโต โสจาปยโต, กิลมโต กิลมาปยโต, ผนฺทโต ผนฺทาปยโต, ปาณมติปาตยโต, อทินฺนํ อาทิยโต, สนฺธึ ฉินฺทโต, นิลฺโลปํ หรโต, เอกาคาริกํ [Pg.527] กโรโต, ปริปนฺเถ ติฏฺฐโต, ปรทารํ คจฺฉโต, มุสา ภณโต, กโรโต น กรียติ ปาปํ. ขุรปริยนฺเตน เจปิ จกฺเกน โย อิมิสฺสา ปถวิยา ปาเณ เอกํ มํสขลํ เอกํ มํสปุญฺชํ กเรยฺย, นตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, นตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. ทกฺขิณํ เจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย หนนฺโต ฆาเตนฺโต ฉินฺทนฺโต เฉทาเปนฺโต ปจนฺโต ปาจาเปนฺโต, นตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, นตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. อุตฺตรํ เจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย ททนฺโต ทาเปนฺโต ยชนฺโต ยชาเปนฺโต, นตฺถิ ตโตนิทานํ ปุญฺญํ, นตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม. ทาเนน ทเมน สํยเมน สจฺจวชฺเชน นตฺถิ ปุญฺญํ, นตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม’’’ติ. “एक शास्ता असा वाद मांडणारा व अशी दृष्टी असणारा आहे – 'करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, अंगच्छेद करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, छळ करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, शोक करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, त्रास देणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, भयभीत करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, प्राणांचा घात करणाऱ्याला, चोरी करणाऱ्याला, घरफोडी करणाऱ्याला, दरोडा घालणाऱ्याला, एकाकी घरावर हल्ला करणाऱ्याला, वाटेत अडवून लुटणाऱ्याला, परस्त्रीगमन करणाऱ्याला, असत्य बोलणाऱ्याला – हे सर्व करणाऱ्याला कोणतेही पाप लागत नाही. जर कोणी वस्तऱ्यासारख्या तीक्ष्ण धारेच्या चक्राने या पृथ्वीवरील सर्व प्राण्यांचे तुकडे करून त्यांचा एकच मांसाचा गोळा किंवा मांसाचा ढीग केला, तरीही त्या कारणाने कोणतेही पाप घडत नाही, किंवा पापाचा विपाक मिळत नाही. जर कोणी गंगेच्या दक्षिण किनाऱ्याने प्राण्यांची हत्या करत, करवून घेत, अंगच्छेद करत, करवून घेत, छळ करत, करवून घेत गेला, तरीही त्या कारणाने कोणतेही पाप घडत नाही, किंवा पापाचा विपाक मिळत नाही. जर कोणी गंगेच्या उत्तर किनाऱ्याने दान देत, देववत, यज्ञ करत, करवून घेत गेला, तरीही त्या कारणाने कोणतेही पुण्य घडत नाही, किंवा पुण्याचा विपाक मिळत नाही. दान, इंद्रियसंयम, शील आणि सत्यवचन यांमुळे कोणतेही पुण्य लाभत नाही, किंवा पुण्याचा विपाक मिळत नाही.'” ‘‘เอโก สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – ‘กโรโต การยโต, ฉินฺทโต เฉทาปยโต, ปจโต ปาจาปยโต, โสจยโต โสจาปยโต, กิลมโต กิลมาปยโต, ผนฺทโต ผนฺทาปยโต, ปาณมติปาตยโต, อทินฺนํ อาทิยโต, สนฺธึ ฉินฺทโต, นิลฺโลปํ หรโต, เอกาคาริกํ กโรโต, ปริปนฺเถ ติฏฺฐโต, ปรทารํ คจฺฉโต, มุสา ภณโต, กโรโต กรียติ ปาปํ. ขุรปริยนฺเตน เจปิ จกฺเกน โย อิมิสฺสา ปถวิยา ปาเณ เอกํ มํสขลํ เอกํ มํสปุญฺชํ กเรยฺย, อตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, อตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. ทกฺขิณํ เจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย หนนฺโต ฆาเตนฺโต ฉินฺทนฺโต เฉทาเปนฺโต ปจนฺโต ปาจาเปนฺโต, อตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, อตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. อุตฺตรํ เจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย ททนฺโต ทาเปนฺโต, ยชนฺโต ยชาเปนฺโต, อตฺถิ ตโตนิทานํ ปุญฺญํ, อตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม. ทาเนน ทเมน สํยเมน สจฺจวชฺเชน อตฺถิ ปุญฺญํ, อตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม’’’ติ. “एक शास्ता असा वाद मांडणारा व अशी दृष्टी असणारा आहे – 'करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, अंगच्छेद करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, छळ करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, शोक करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, त्रास देणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, भयभीत करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, प्राणांचा घात करणाऱ्याला, चोरी करणाऱ्याला, घरफोडी करणाऱ्याला, दरोडा घालणाऱ्याला, एकाकी घरावर हल्ला करणाऱ्याला, वाटेत अडवून लुटणाऱ्याला, परस्त्रीगमन करणाऱ्याला, असत्य बोलणाऱ्याला – हे सर्व करणाऱ्याला पाप लागते. जर कोणी वस्तऱ्यासारख्या तीक्ष्ण धारेच्या चक्राने या पृथ्वीवरील सर्व प्राण्यांचे तुकडे करून त्यांचा एकच मांसाचा गोळा किंवा मांसाचा ढीग केला, तर त्या कारणाने पाप घडते आणि पापाचा विपाक मिळतो. जर कोणी गंगेच्या दक्षिण किनाऱ्याने प्राण्यांची हत्या करत, करवून घेत, अंगच्छेद करत, करवून घेत, छळ करत, करवून घेत गेला, तर त्या कारणाने पाप घडते आणि पापाचा विपाक मिळतो. जर कोणी गंगेच्या उत्तर किनाऱ्याने दान देत, देववत, यज्ञ करत, करवून घेत गेला, तर त्या कारणाने पुण्य घडते आणि पुण्याचा विपाक मिळतो. दान, इंद्रियसंयम, शील आणि सत्यवचन यांमुळे पुण्य लाभते आणि पुण्याचा विपाक मिळतो.'” ‘‘ตสฺส มยฺหํ, ภนฺเต, อหุเทว กงฺขา, อหุ วิจิกิจฺฉา – ‘โกสุ นาม อิเมสํ ภวตํ สมณพฺราหฺมณานํ สจฺจํ อาห, โก มุสา’’’ติ? “त्यामुळे, भंते, माझ्या मनात शंका आणि संशय निर्माण झाला की – 'या आदरणीय श्रमण आणि ब्राह्मणांपैकी कोण बरे सत्य बोलत आहे आणि कोण असत्य?'” ‘‘อลญฺหิ เต, คามณิ, กงฺขิตุํ, อลํ วิจิกิจฺฉิตุํ. กงฺขนีเย จ ปน เต ฐาเน วิจิกิจฺฉา อุปฺปนฺนา’’ติ. ‘‘เอวํ ปสนฺโนหํ, ภนฺเต, ภควติ. ปโหติ เม ภควา ตถา ธมฺมํ เทเสตุํ ยถาหํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺย’’นฺติ. “हे ग्रामणी, तुला शंका वाटणे योग्यच आहे, संशय येणे योग्यच आहे. संशयास्पद बाबीमध्येच तुला संशय निर्माण झाला आहे.” “भंते, मी भगवंतांवर असा प्रसन्न आहे. भगवंत मला अशा प्रकारे धम्माचा उपदेश करण्यास समर्थ आहेत, जेणेकरून मी या संशयाचा त्याग करू शकेन.” ‘‘อตฺถิ, คามณิ, ธมฺมสมาธิ. ตตฺร เจ ตฺวํ จิตฺตสมาธึ ปฏิลเภยฺยาสิ. เอวํ ตฺวํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺยาสิ. กตโม จ, คามณิ, ธมฺมสมาธิ? อิธ, คามณิ, อริยสาวโก ปาณาติปาตํ ปหาย ปาณาติปาตา ปฏิวิรโต [Pg.528] โหติ, อทินฺนาทานํ ปหาย อทินฺนาทานา ปฏิวิรโต โหติ, กาเมสุมิจฺฉาจารํ ปหาย กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรโต โหติ, มุสาวาทํ ปหาย มุสาวาทา ปฏิวิรโต โหติ, ปิสุณํ วาจํ ปหาย ปิสุณาย วาจาย ปฏิวิรโต โหติ, ผรุสํ วาจํ ปหาย ผรุสาย วาจาย ปฏิวิรโต โหติ, สมฺผปฺปลาปํ ปหาย สมฺผปฺปลาปา ปฏิวิรโต โหติ, อภิชฺฌํ ปหาย อนภิชฺฌาลุ โหติ, พฺยาปาทปโทสํ ปหาย อพฺยาปนฺนจิตฺโต โหติ, มิจฺฉาทิฏฺฐึ ปหาย สมฺมาทิฏฺฐิโก โหติ. “हे ग्रामणी, धम्मसमाधी अस्तित्वात आहे. जर तू त्यामध्ये चित्तसमाधी प्राप्त केलीस, तर तू या संशयाचा त्याग करू शकशील. आणि हे ग्रामणी, धम्मसमाधी कोणती आहे? येथे, हे ग्रामणी, आर्यश्रावक प्राणातिपाताचा त्याग करून प्राणातिपातापासून अलिप्त राहतो; अदित्नादानाचा त्याग करून चोरीपासून अलिप्त राहतो; कामेसू मिच्छाचाराचा त्याग करून व्यभिचारापासून अलिप्त राहतो; मुसावादाचा त्याग करून असत्य बोलण्यापासून अलिप्त राहतो; पिसुणा वाचा त्यागून चहाडी करण्यापासून अलिप्त राहतो; फरुसा वाचा त्यागून कठोर बोलण्यापासून अलिप्त राहतो; सम्फप्पलापाचा त्याग करून व्यर्थ बडबडीपासून अलिप्त राहतो; अभिध्येचा त्याग करून लोभरहित होतो; व्यापाद-द्वेषाचा त्याग करून द्वेषरहित चित्ताचा होतो; आणि मिच्छादिट्ठीचा त्याग करून सम्यक दृष्टीचा होतो.” ‘‘ส โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต เมตฺตาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ, อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ เมตฺตาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. โส อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘ยฺวายํ สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – นตฺถิ ทินฺนํ, นตฺถิ ยิฏฺฐํ, นตฺถิ หุตํ, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก, นตฺถิ อยํ โลโก, นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ มาตา, นตฺถิ ปิตา, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ โลเก สมณพฺราหฺมณา, สมฺมคฺคตา สมฺมาปฏิปนฺนา เย อิมญฺจ โลกํ ปรญฺจ โลกํ สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา ปเวเทนฺตี’ติ. ‘สเจ ตสฺส โภโต สตฺถุโน สจฺจํ วจนํ, อปณฺณกตาย มยฺหํ, ยฺวาหํ น กิญฺจิ พฺยาพาเธมิ ตสํ วา ถาวรํ วา? อุภยเมตฺถ กฏคฺคาโห, ยํ จมฺหิ กาเยน สํวุโต วาจาย สํวุโต มนสา สํวุโต, ยญฺจ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิสฺสามี’ติ. ตสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ. ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ. ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวทยติ. สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อยํ โข, คามณิ, ธมฺมสมาธิ. ตตฺร เจ ตฺวํ จิตฺตสมาธึ ปฏิลเภยฺยาสิ, เอวํ ตฺวํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺยาสิ. “हे ग्रामणी, तो आर्यश्रावक अशा प्रकारे लोभरहित, द्वेषरहित, संमोहरहित, जागरूक आणि स्मृतिमान होऊन मैत्रीपूर्ण चित्ताने एका देशात व्यापून राहतो; तसेच दुसऱ्या दिशेला, तिसऱ्या दिशेला आणि चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, आडवे, सर्वत्र, सर्वांना स्वतःसमान मानून, संपूर्ण जगाला विशाल, महान, अमर्याद, वैररहित आणि द्वेषरहित अशा मैत्रीपूर्ण चित्ताने व्यापून राहतो. तो असा विचार करतो – 'जो शास्ता असा वाद मांडणारा व अशी दृष्टी असणारा आहे की – "दान दिल्यास त्याचे फळ नसते, यज्ञ-पूजेचे फळ नसते, हवनाचे फळ नसते, चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ आणि विपाक असतो, हा लोक नाही, परलोक नाही, माता नाही, पिता नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत; जगात असे सम्यक मार्गावर चालणारे, सम्यक प्रतिपन्न श्रमण व ब्राह्मण नाहीत, जे स्वतःच्या उच्च ज्ञानाने या लोकाचा आणि परलोकाचा साक्षात्कार करून तो प्रकट करतात." जर त्या आदरणीय शास्त्याचे वचन सत्य असेल, तरीही माझ्यासाठी हे निर्दोष आहे की मी कोणत्याही भयभीत होणाऱ्या किंवा स्थिर प्राण्याला पीडा देत नाही. दोन्ही प्रकारे माझाच विजय आहे; कारण मी कायेने संयमित आहे, वाचेने संयमित आहे, मनाने संयमित आहे, आणि कायेच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर मी सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होईन.' असा विचार केल्याने त्याच्यामध्ये प्रमोद उत्पन्न होतो. प्रमुदित झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मनाच्या व्यक्तीची काया शांत होते. शांत काया असणारा सुखाचा अनुभव घेतो. सुखी व्यक्तीचे चित्त समाधीस्थ होते. हे ग्रामणी, हीच धम्मसमाधी आहे. जर तू त्यामध्ये चित्तसमाधी प्राप्त केलीस, तर तू या संशयाचा त्याग करू शकशील.” ‘‘ส โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต เมตฺตาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา [Pg.529] จตุตฺถํ, อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ เมตฺตาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. โส อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘ยฺวายํ สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – อตฺถิ ทินฺนํ, อตฺถิ ยิฏฺฐํ, อตฺถิ หุตํ, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก, อตฺถิ อยํ โลโก, อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ มาตา, อตฺถิ ปิตา, อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ โลเก สมณพฺราหฺมณา, สมฺมคฺคตา สมฺมาปฏิปนฺนา เย อิมญฺจ โลกํ ปรญฺจ โลกํ สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา ปเวเทนฺตี’ติ. ‘สเจ ตสฺส โภโต สตฺถุโน สจฺจํ วจนํ, อปณฺณกตาย มยฺหํ, ยฺวาหํ น กิญฺจิ พฺยาพาเธมิ ตสํ วา ถาวรํ วา? อุภยเมตฺถ กฏคฺคาโห, ยํ จมฺหิ กาเยน สํวุโต วาจาย สํวุโต มนสา สํวุโต, ยญฺจ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิสฺสามี’ติ. ตสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ. ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ. ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวทยติ. สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อยํ โข, คามณิ, ธมฺมสมาธิ. ตตฺร เจ ตฺวํ จิตฺตสมาธึ ปฏิลเภยฺยาสิ, เอวํ ตฺวํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺยาสิ. “हे ग्रामणी, तो आर्यश्रावक अशा प्रकारे लोभ विरहित, द्वेष विरहित, संमोह विरहित, संप्रजन्ययुक्त (सजग) आणि स्मृतिमान होऊन एका दिशेला मैत्रीपूर्ण चित्ताने व्यापून विहरतो; तसेच दुसऱ्या दिशेला, तसेच तिसऱ्या दिशेला, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरके, सर्वत्र, सर्वांच्या ठिकाणी स्वतःप्रमाणेच, संपूर्ण जगाला विस्तीर्ण, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित अशा मैत्रीपूर्ण चित्ताने व्यापून विहरतो. तो असा विचार करतो – ‘जो हा शास्ता असा वाद मांडणारा आणि अशी दृष्टी बाळगणारा आहे की – दान देण्याचे फळ आहे, यज्ञाचे फळ आहे, आहुतीचे फळ आहे; चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ आणि विपाक आहे; हा लोक आहे, परलोक आहे; माता आहे, पिता आहे; औपपातिक (स्वयं उत्पन्न होणारे) प्राणी आहेत; जगात असे सम्यक मार्गावर चालणारे, सम्यक प्रतिपन्न श्रमण-ब्राह्मण आहेत, ज्यांनी या लोकाला आणि परलोकाला स्वतः अभिज्ञेने साक्षात करून प्रगट केले आहे.’ ‘जर त्या आदरणीय शास्त्यांचे वचन सत्य असेल, तर माझ्यासाठी हे निर्विवाद आहे की मी कोणत्याही त्रस किंवा स्थावर प्राण्याला पीडा देत नाही. दोन्ही प्रकारे मी विजयी डाव खेळला आहे: कारण मी कायेने संयमित आहे, वाचेने संयमित आहे, मनाने संयमित आहे; आणि शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर मी सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होईन.’ त्याच्यामध्ये प्रमोद उत्पन्न होतो. प्रमोद झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मनाच्या माणसाची काया शांत होते. शांत काया असलेला सुखाचा अनुभव घेतो. सुखी माणसाचे चित्त समाहित होते. हेच, हे ग्रामणी, धर्मसमाधी होय. जर तू त्यात चित्तसमाधी प्राप्त केलीस, तर तू या संशयाचा त्याग करू शकशील.” ‘‘ส โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต เมตฺตาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ, อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ เมตฺตาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. โส อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘ยฺวายํ สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – กโรโต การยโต, ฉินฺทโต เฉทาปยโต, ปจโต ปาจาปยโต, โสจยโต โสจาปยโต, กิลมโต กิลมาปยโต, ผนฺทโต ผนฺทาปยโต, ปาณมติปาตยโต, อทินฺนํ อาทิยโต, สนฺธึ ฉินฺทโต, นิลฺโลปํ หรโต, เอกาคาริกํ กโรโต, ปริปนฺเถ ติฏฺฐโต, ปรทารํ คจฺฉโต, มุสา ภณโต, กโรโต น กรียติ ปาปํ. ขุรปริยนฺเตน เจปิ จกฺเกน โย อิมิสฺสา ปถวิยา ปาเณ เอกํ มํสขลํ เอกํ มํสปุญฺชํ กเรยฺย, นตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, นตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. ทกฺขิณญฺเจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย หนนฺโต ฆาเตนฺโต ฉินฺทนฺโต เฉทาเปนฺโต ปจนฺโต ปาจาเปนฺโต, นตฺถิ ตโตนิทานํ [Pg.530] ปาปํ, นตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. อุตฺตรญฺเจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย ททนฺโต ทาเปนฺโต, ยชนฺโต ยชาเปนฺโต, นตฺถิ ตโตนิทานํ ปุญฺญํ, นตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม. ทาเนน ทเมน สํยเมน สจฺจวชฺเชน นตฺถิ ปุญฺญํ, นตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม’ติ. ‘สเจ ตสฺส โภโต สตฺถุโน สจฺจํ วจนํ, อปณฺณกตาย มยฺหํ, ยฺวาหํ น กิญฺจิ พฺยาพาเธมิ ตสํ วา ถาวรํ วา? อุภยเมตฺถ กฏคฺคาโห, ยํ จมฺหิ กาเยน สํวุโต วาจาย สํวุโต มนสา สํวุโต, ยญฺจ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิสฺสามี’ติ. ตสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ. ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ. ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวทยติ. สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อยํ โข, คามณิ, ธมฺมสมาธิ ตตฺร เจ ตฺวํ จิตฺตสมาธึ ปฏิลเภยฺยาสิ, เอวํ ตฺวํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺยาสิ. “हे ग्रामणी, तो आर्यश्रावक अशा प्रकारे लोभ विरहित, द्वेष विरहित, संमोह विरहित, संप्रजन्ययुक्त (सजग) आणि स्मृतिमान होऊन एका दिशेला मैत्रीपूर्ण चित्ताने व्यापून विहरतो; तसेच दुसऱ्या दिशेला, तसेच तिसऱ्या दिशेला, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरके, सर्वत्र, सर्वांच्या ठिकाणी स्वतःप्रमाणेच, संपूर्ण जगाला विस्तीर्ण, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित अशा मैत्रीपूर्ण चित्ताने व्यापून विहरतो. तो असा विचार करतो – ‘जो हा शास्ता असा वाद मांडणारा आणि अशी दृष्टी बाळगणारा आहे की – करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, कापणाऱ्याला किंवा कापवून घेणाऱ्याला, छळणाऱ्याला किंवा छळवून घेणाऱ्याला, शोक करणाऱ्याला किंवा शोक करवून घेणाऱ्याला, थकवणाऱ्याला किंवा थकवून घेणाऱ्याला, थरथर कापणाऱ्याला किंवा थरथर कापवून घेणाऱ्याला, प्राणाचा घात करणाऱ्याला, चोरी करणाऱ्याला, घर फोडणाऱ्याला, दरोडा घालणाऱ्याला, एकाच घरावर हल्ला करणाऱ्याला, वाटेत दबा धरून बसणाऱ्याला, परस्त्रीगमन करणाऱ्याला, असत्य बोलणाऱ्याला – असे करणाऱ्याकडून कोणतेही पाप घडत नाही. जरी एखाद्याने वस्तऱ्यासारख्या तीक्ष्ण धारेच्या चक्राने या पृथ्वीवरील प्राण्यांचे एकाच मांसाच्या गोळ्यात किंवा मांसाच्या ढिगाऱ्यात रूपांतर केले, तरी त्या कारणाने कोणतेही पाप घडत नाही, किंवा पापाचा आगम (प्राप्ती) होत नाही. जरी कोणी गंगेच्या दक्षिण तीरावर प्राण्यांना मारत, मारवून घेत, कापत, कापवून घेत, छळत, छळवून घेत गेला, तरी त्या कारणाने कोणतेही पाप घडत नाही, किंवा पापाचा आगम होत नाही. जरी कोणी गंगेच्या उत्तर तीरावर दान देत, देववून घेत, यज्ञ करत, करवून घेत गेला, तरी त्या कारणाने कोणतेही पुण्य लाभत नाही, किंवा पुण्याचा आगम होत नाही. दानाने, दमाने, संयमाने आणि सत्य बोलण्याने कोणतेही पुण्य लाभत नाही, किंवा पुण्याचा आगम होत नाही.’ ‘जर त्या आदरणीय शास्त्यांचे वचन सत्य असेल, तर माझ्यासाठी हे निर्विवाद आहे की मी कोणत्याही त्रस किंवा स्थावर प्राण्याला पीडा देत नाही. दोन्ही प्रकारे मी विजयी डाव खेळला आहे: कारण मी कायेने संयमित आहे, वाचेने संयमित आहे, मनाने संयमित आहे; आणि शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर मी सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होईन.’ त्याच्यामध्ये प्रमोद उत्पन्न होतो. प्रमोद झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मनाच्या माणसाची काया शांत होते. शांत काया असलेला सुखाचा अनुभव घेतो. सुखी माणसाचे चित्त समाहित होते. हेच, हे ग्रामणी, धर्मसमाधी होय. जर तू त्यात चित्तसमाधी प्राप्त केलीस, तर तू या संशयाचा त्याग करू शकशील.” ‘‘ส โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต เมตฺตาสหคเต เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ, อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ เมตฺตาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. โส อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘ยฺวายํ สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – กโรโต การยโต, ฉินฺทโต เฉทาปยโต, ปจโต ปาจาปยโต, โสจยโต โสจาปยโต, กิลมโต กิลมาปยโต, ผนฺทโต ผนฺทาปยโต, ปาณมติปาตยโต, อทินฺนํ อาทิยโต, สนฺธึ ฉินฺทโต, นิลฺโลปํ หรโต, เอกาคาริกํ กโรโต, ปริปนฺเถ ติฏฺฐโต, ปรทารํ คจฺฉโต, มุสา ภณโต, กโรโต กรียติ ปาปํ. ขุรปริยนฺเตน เจปิ จกฺเกน โย อิมิสฺสา ปถวิยา ปาเณ เอกํ มํสขลํ เอกํ มํสปุญฺชํ กเรยฺย, อตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, อตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. ทกฺขิณญฺเจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย หนนฺโต ฆาเตนฺโต ฉินฺทนฺโต เฉทาเปนฺโต ปจนฺโต ปาจาเปนฺโต, อตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, อตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. อุตฺตรญฺเจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย ททนฺโต ทาเปนฺโต, ยชนฺโต ยชาเปนฺโต, อตฺถิ ตโตนิทานํ [Pg.531] ปุญฺญํ, อตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม. ทาเนน ทเมน สํยเมน สจฺจวชฺเชน อตฺถิ ปุญฺญํ อตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโมติ. สเจ ตสฺส โภโต สตฺถุโน สจฺจํ วจนํ, อปณฺณกตาย มยฺหํ, ยฺวาหํ น กิญฺจิ พฺยาพาเธมิ ตสํ วา ถาวรํ วา? อุภยเมตฺถ กฏคฺคาโห, ยํ จมฺหิ กาเยน สํวุโต วาจาย สํวุโต มนสา สํวุโต, ยญฺจ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิสฺสามี’ติ. ตสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ. ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ. ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวทยติ. สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อยํ โข, คามณิ, ธมฺมสมาธิ. ตตฺร เจ ตฺวํ จิตฺตสมาธึ ปฏิลเภยฺยาสิ, เอวํ ตฺวํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺยาสิ. “हे ग्रामणी, तो आर्यश्रावक अशा प्रकारे लोभ विरहित, द्वेष विरहित, संमोहरहित, प्रज्ञायुक्त आणि स्मृतिमान होऊन मैत्रीपूर्ण चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो, तसेच दुसऱ्या, तसेच तिसऱ्या, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरपे, सर्वत्र, सर्वांना स्वतःसमान मानून, संपूर्ण जगाला मैत्रीपूर्ण चित्ताने, जे विशाल, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित आहे, व्यापून विहरतो. तो असा विचार करतो – ‘हा जो शास्ता असा वाद आणि अशी दृष्टी बाळगतो की: करणाऱ्याने, करवून घेणाऱ्याने, कापणाऱ्याने, कापवून घेणाऱ्याने, छळ करणाऱ्याने, छळ करवून घेणाऱ्याने, शोक करणाऱ्याने, शोक करवून घेणाऱ्याने, त्रास देणाऱ्याने, त्रास करवून घेणाऱ्याने, थरथर कापणाऱ्याने, थरथर कापवून घेणाऱ्याने, प्राणाचा घात करणाऱ्याने, चोरी करणाऱ्याने, घर फोडणाऱ्याने, दरोडा घालणाऱ्याने, वाटेत लुटणाऱ्याने, परस्त्रीगमन करणाऱ्याने, असत्य बोलणाऱ्याने - कर्म केल्यास पाप घडते. जरी कोणी वस्तऱ्यासारख्या तीक्ष्ण धारेच्या चक्राने या पृथ्वीवरील प्राण्यांचे एकाच मांसाच्या गोळ्यात किंवा मांसाच्या ढिगाऱ्यात रूपांतर केले, तरी त्या कारणाने पाप घडते, पापाचा संचय होतो. जरी कोणी गंगा नदीच्या दक्षिण तीरावर प्राण्यांचा घात करत, घात करवून घेत, कापून, कापवून घेत, छळ करत, छळ करवून घेत गेला, तरी त्या कारणाने पाप घडते, पापाचा संचय होतो. जरी कोणी गंगा नदीच्या उत्तर तीरावर दान देत, देववत, यज्ञ करत, करवून घेत गेला, तरी त्या कारणाने पुण्य घडते, पुण्याचा संचय होतो. दानाने, दमाने, संयमाने आणि सत्य बोलण्याने पुण्य घडते, पुण्याचा संचय होतो.’ जर त्या आदरणीय शास्त्यांचे वचन सत्य असेल, तर माझ्यासाठी हे निर्दोष आहे, कारण मी कोणत्याही त्रस किंवा स्थावर प्राण्याला पीडा देत नाही. येथे दोन्ही प्रकारे माझाच विजय आहे: एक तर मी कायेने संयमित आहे, वाचेने संयमित आहे, मनाने संयमित आहे; आणि शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर मी सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होईन. त्याच्यामध्ये प्रमोद उत्पन्न होतो. प्रमुदित झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मनाच्या व्यक्तीची काया शांत होते. शांत काया असलेला सुख अनुभवतो. सुखी व्यक्तीचे चित्त समाधीस्थ होते. हे ग्रामणी, हाच ‘धम्मसमाधी’ आहे. जर तू यामध्ये चित्तसमाधी प्राप्त केलीस, तर तू या संशयरूपी धम्माचा त्याग करू शकशील.” ‘‘ส โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต กรุณาสหคเต เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ…เป… มุทิตาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ…เป…. “हे ग्रामणी, तो आर्यश्रावक अशा प्रकारे लोभ विरहित, द्वेष विरहित, संमोहरहित, प्रज्ञायुक्त आणि स्मृतिमान होऊन करुणापूर्ण चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो... (तसेच सर्व दिशांना व्यापून विहरतो)... मुदितापूर्ण चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो...” ‘‘ส โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต อุเปกฺขาสหคเต เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ, อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. โส อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘ยฺวายํ สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – นตฺถิ ทินฺนํ, นตฺถิ ยิฏฺฐํ, นตฺถิ หุตํ นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก, นตฺถิ อยํ โลโก นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ มาตา นตฺถิ ปิตา นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ โลเก สมณพฺราหฺมณา สมฺมคฺคตา สมฺมาปฏิปนฺนา เย อิมญฺจ โลกํ ปรญฺจ โลกํ สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา ปเวเทนฺตีติ. สเจ ตสฺส โภโต สตฺถุโน สจฺจํ วจนํ, อปณฺณกตาย มยฺหํ, ยฺวาหํ น กิญฺจิ พฺยาพาเธมิ ตสํ วา ถาวรํ วา? อุภยเมตฺถ กฏคฺคาโห, ยํ จมฺหิ กาเยน สํวุโต วาจาย สํวุโต มนสา สํวุโต, ยญฺจ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิสฺสามี’ติ. ตสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ. ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ. ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวทยติ. สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อยํ [Pg.532] โข, คามณิ, ธมฺมสมาธิ. ตตฺร เจ ตฺวํ จิตฺตสมาธึ ปฏิลเภยฺยาสิ, เอวํ ตฺวํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺยาสิ. “हे ग्रामणी, तो आर्यश्रावक अशा प्रकारे लोभ विरहित, द्वेष विरहित, संमोहरहित, प्रज्ञायुक्त आणि स्मृतिमान होऊन उपेक्षापूर्ण चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो, तसेच दुसऱ्या, तसेच तिसऱ्या, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरपे, सर्वत्र, सर्वांना स्वतःसमान मानून, संपूर्ण जगाला उपेक्षापूर्ण चित्ताने, जे विशाल, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित आहे, व्यापून विहरतो. तो असा विचार करतो – ‘हा जो शास्ता असा वाद आणि अशी दृष्टी बाळगतो की: दान देण्याला काही अर्थ नाही, यज्ञाला काही अर्थ नाही, हवनाला काही अर्थ नाही, चांगल्या-वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक मिळत नाही, हा लोक नाही, परलोक नाही, माता नाही, पिता नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत; जगात असे कोणी सम्यक मार्गावर चालणारे, सम्यक प्रतिपन्न श्रमण किंवा ब्राह्मण नाहीत, ज्यांनी हा लोक आणि परलोक स्वतःच्या उच्च ज्ञानाने प्रत्यक्ष जाणून घोषित केला आहे.’ जर त्या आदरणीय शास्त्यांचे वचन सत्य असेल, तर माझ्यासाठी हे निर्दोष आहे, कारण मी कोणत्याही त्रस किंवा स्थावर प्राण्याला पीडा देत नाही. येथे दोन्ही प्रकारे माझाच विजय आहे: एक तर मी कायेने संयमित आहे, वाचेने संयमित आहे, मनाने संयमित आहे; आणि शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर मी सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होईन. त्याच्यामध्ये प्रमोद उत्पन्न होतो. प्रमुदित झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मनाच्या व्यक्तीची काया शांत होते. शांत काया असलेला सुख अनुभवतो. सुखी व्यक्तीचे चित्त समाधीस्थ होते. हे ग्रामणी, हाच ‘धम्मसमाधी’ आहे. जर तू यामध्ये चित्तसमाधी प्राप्त केलीस, तर तू या संशयरूपी धम्माचा त्याग करू शकशील.” ‘‘ส โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต อุเปกฺขาสหคเต เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ, อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. โส อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘ยฺวายํ สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – อตฺถิ ทินฺนํ, อตฺถิ ยิฏฺฐํ, อตฺถิ หุตํ, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก, อตฺถิ อยํ โลโก อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ มาตา อตฺถิ ปิตา อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ โลเก สมณพฺราหฺมณา สมฺมคฺคตา สมฺมาปฏิปนฺนา เย อิมญฺจ โลกํ ปรญฺจ โลกํ สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา ปเวเทนฺตีติ. สเจ ตสฺส โภโต สตฺถุโน สจฺจํ วจนํ, อปณฺณกตาย มยฺหํ, ยฺวาหํ น กิญฺจิ พฺยาพาเธมิ ตสํ วา ถาวรํ วา? อุภยเมตฺถ กฏคฺคาโห, ยํ จมฺหิ กาเยน สํวุโต วาจาย สํวุโต มนสา สํวุโต, ยญฺจ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิสฺสามี’ติ. ตสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ. ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ. ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวทยติ. สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อยํ โข, คามณิ, ธมฺมสมาธิ. ตตฺร เจ ตฺวํ จิตฺตสมาธึ ปฏิลเภยฺยาสิ, เอวํ ตฺวํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺยาสิ. “हे ग्रामणी, तो आर्यश्रावक अशा प्रकारे लोभ विरहित, द्वेष विरहित, संमोहरहित, प्रज्ञायुक्त आणि स्मृतिमान होऊन उपेक्षापूर्ण चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो, तसेच दुसऱ्या, तसेच तिसऱ्या, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरपे, सर्वत्र, सर्वांना स्वतःसमान मानून, संपूर्ण जगाला उपेक्षापूर्ण चित्ताने, जे विशाल, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित आहे, व्यापून विहरतो. तो असा विचार करतो – ‘हा जो शास्ता असा वाद आणि अशी दृष्टी बाळगतो की: दान देण्याला अर्थ आहे, यज्ञाला अर्थ आहे, हवनाला अर्थ आहे, चांगल्या-वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक मिळतो, हा लोक आहे, परलोक आहे, माता आहे, पिता आहे, औपपातिक प्राणी आहेत; जगात असे सम्यक मार्गावर चालणारे, सम्यक प्रतिपन्न श्रमण किंवा ब्राह्मण आहेत, ज्यांनी हा लोक आणि परलोक स्वतःच्या उच्च ज्ञानाने प्रत्यक्ष जाणून घोषित केला आहे.’ जर त्या आदरणीय शास्त्यांचे वचन सत्य असेल, तर माझ्यासाठी हे निर्दोष आहे, कारण मी कोणत्याही त्रस किंवा स्थावर प्राण्याला पीडा देत नाही. येथे दोन्ही प्रकारे माझाच विजय आहे: एक तर मी कायेने संयमित आहे, वाचेने संयमित आहे, मनाने संयमित आहे; आणि शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर मी सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होईन. त्याच्यामध्ये प्रमोद उत्पन्न होतो. प्रमुदित झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मनाच्या व्यक्तीची काया शांत होते. शांत काया असलेला सुख अनुभवतो. सुखी व्यक्तीचे चित्त समाधीस्थ होते. हे ग्रामणी, हाच ‘धम्मसमाधी’ आहे. जर तू यामध्ये चित्तसमाधी प्राप्त केलीस, तर तू या संशयरूपी धम्माचा त्याग करू शकशील.” ‘‘ส โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต อุเปกฺขาสหคเต เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ, อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. โส อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘ยฺวายํ สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – กโรโต การยโต, เฉทโต เฉทาปยโต, ปจโต ปาจาปยโต, โสจยโต โสจาปยโต, กิลมโต กิลมาปยโต, ผนฺทโต ผนฺทาปยโต, ปาณมติปาตยโต, อทินฺนํ อาทิยโต, สนฺธึ ฉินฺทโต, นิลฺโลปํ หรโต, เอกาคาริกํ [Pg.533] กโรโต, ปริปนฺเถ ติฏฺฐโต, ปรทารํ คจฺฉโต, มุสา ภณโต, กโรโต น กรียติ ปาปํ. ขุรปริยนฺเตน เจปิ จกฺเกน โย อิมิสฺสา ปถวิยา ปาเณ เอกํ มํสขลํ เอกํ มํสปุญฺชํ กเรยฺย, นตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, นตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. ทกฺขิณญฺเจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย หนนฺโต ฆาเตนฺโต ฉินฺทนฺโต เฉทาเปนฺโต ปจนฺโต ปาจาเปนฺโต, นตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, นตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. อุตฺตรญฺเจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย ททนฺโต ทาเปนฺโต, ยชนฺโต ยชาเปนฺโต, นตฺถิ ตโตนิทานํ ปุญฺญํ, นตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม. ทาเนน ทเมน สํยเมน สจฺจวชฺเชน นตฺถิ ปุญฺญํ, นตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม’ติ. ‘สเจ ตสฺส โภโต สตฺถุโน สจฺจํ วจนํ, อปณฺณกตาย มยฺหํ, ยฺวาหํ น กิญฺจิ พฺยาพาเธมิ ตสํ วา ถาวรํ วา? อุภยเมตฺถ กฏคฺคาโห, ยํ จมฺหิ กาเยน สํวุโต วาจาย สํวุโต มนสา สํวุโต, ยญฺจ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิสฺสามี’ติ. ตสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ. ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ. ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวทยติ. สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อยํ โข, คามณิ, ธมฺมสมาธิ. ตตฺร เจ ตฺวํ จิตฺตสมาธึ ปฏิลเภยฺยาสิ, เอวํ ตฺวํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺยาสิ. हे ग्रामणी, तो आर्यश्रावक अशा प्रकारे अभिज्झा (लोभ) विरहित, व्यापाद (द्वेष) विरहित, संभ्रमरहित, संप्रज्ञानयुक्त (जागरूक) आणि स्मृतिमान होऊन, उपेक्षेने युक्त असलेल्या चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो; तसेच दुसऱ्या दिशेला, तसेच तिसऱ्या दिशेला, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, आडवे (तिरके), सर्वत्र, स्वतःप्रमाणेच सर्वांना मानून, संपूर्ण जगाला उपेक्षेने युक्त, विस्तीर्ण, महद्गत (महान), अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित (पीडारहित) चित्ताने व्यापून विहरतो. तो असा विचार करतो – 'जे कोणी असे शास्ता (गुरू) आहेत जे अशा वादाचे व अशा दृष्टीचे आहेत की – "करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, अंगच्छेद करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, छळ करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, शोक करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, त्रास देणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, कंपित करणाऱ्याला किंवा कंपित करवून घेणाऱ्याला, प्राणातिपात करणाऱ्याला, चोरी करणाऱ्याला, घरफोडी करणाऱ्याला, दरोडा घालणाऱ्याला, एकाच घरावर दरोडा घालणाऱ्याला, वाटेत अडवून लुटणाऱ्याला, परस्त्रीगमन करणाऱ्याला, असत्य बोलणाऱ्याला – हे सर्व करणाऱ्याला कोणतेही पाप लागत नाही. जर एखाद्याने वस्तऱ्यासारख्या तीक्ष्ण धारेच्या चक्राने या पृथ्वीवरील प्राण्यांचा एकाच मांसाचा गोळा किंवा मांसाचा ढीग केला, तरीही त्या कारणाने कोणतेही पाप लागत नाही, पापाचा संचय होत नाही. जर कोणी गंगा नदीच्या दक्षिण तीरावर जाऊन हत्या करत, करवून घेत, अंगच्छेद करत, करवून घेत, छळ करत, करवून घेत गेला, तरीही त्या कारणाने कोणतेही पाप लागत नाही, पापाचा संचय होत नाही. जर कोणी गंगा नदीच्या उत्तर तीरावर जाऊन दान देत, देववत, यज्ञ करत, करवून घेत गेला, तरीही त्या कारणाने कोणतेही पुण्य लाभत नाही, पुण्याचा संचय होत नाही. दानाने, दमनाने, संयमाने आणि सत्य बोलण्याने कोणतेही पुण्य लाभत नाही, पुण्याचा संचय होत नाही." जर त्या आदरणीय शास्त्यांचे वचन सत्य असेल, तर माझ्यासाठी हे निर्दोष (अपण्णक) आहे की मी कोणत्याही त्रस (चंचल) किंवा स्थावर (स्थिर) प्राण्याला पीडा देत नाही. दोन्ही प्रकारे माझाच विजय (कटग्गाहो) आहे: कारण मी कायेने संयमित आहे, वाचेने संयमित आहे, मनाने संयमित आहे; आणि कायेच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर मी सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होईन.' त्याच्यामध्ये प्रमोद उत्पन्न होतो. प्रमुदित झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मनाच्या माणसाची काया शांत होते. शांत काया असलेला सुखाचा अनुभव घेतो. सुखी माणसाचे चित्त समाहित होते. हे ग्रामणी, हाच 'धम्मसमाधी' आहे. जर तू या धम्मसमाधीमध्ये चित्तसमाधी प्राप्त केलीस, तर तू या शंकेच्या (कांखाधम्माचा) त्याग करू शकशील. ‘‘ส โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต อุเปกฺขาสหคเต เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ, อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. โส อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘ยฺวายํ สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – กโรโต การยโต, ฉินฺทโต เฉทาปยโต, ปจโต ปาจาปยโต, โสจยโต โสจาปยโต, กิลมโต กิลมาปยโต, ผนฺทโต ผนฺทาปยโต, ปาณมติปาตยโต, อทินฺนํ อาทิยโต, สนฺธึ ฉินฺทโต, นิลฺโลปํ หรโต, เอกาคาริกํ กโรโต, ปริปนฺเถ ติฏฺฐโต, ปรทารํ คจฺฉโต, มุสา ภณโต, กโรโต กรียติ ปาปํ. ขุรปริยนฺเตน เจปิ จกฺเกน โย อิมิสฺสา ปถวิยา ปาเณ เอกํ มํสขลํ เอกํ มํสปุญฺชํ กเรยฺย, อตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, อตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. ทกฺขิณญฺเจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย หนนฺโต [Pg.534] ฆาเตนฺโต ฉินฺทนฺโต เฉทาเปนฺโต ปจนฺโต ปาจาเปนฺโต, อตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, อตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. อุตฺตรญฺเจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย ททนฺโต ทาเปนฺโต, ยชนฺโต ยชาเปนฺโต, อตฺถิ ตโตนิทานํ ปุญฺญํ, อตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม. ทาเนน ทเมน สํยเมน สจฺจวชฺเชน อตฺถิ ปุญฺญํ, อตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม’ติ. ‘สเจ ตสฺส โภโต สตฺถุโน สจฺจํ วจนํ, อปณฺณกตาย มยฺหํ, ยฺวาหํ น กิญฺจิ พฺยาพาเธมิ ตสํ วา ถาวรํ วา? อุภยเมตฺถ กฏคฺคาโห, ยํ จมฺหิ กาเยน สํวุโต วาจาย สํวุโต มนสา สํวุโต, ยญฺจ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิสฺสามี’ติ. ตสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ. ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ. ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวทยติ. สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อยํ โข, คามณิ, ธมฺมสมาธิ. ตตฺร เจ ตฺวํ จิตฺตสมาธึ ปฏิลเภยฺยาสิ, เอวํ ตฺวํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺยาสี’’ติ. हे ग्रामणी, तो आर्यश्रावक अशा प्रकारे अभिज्झा (लोभ) विरहित, व्यापाद (द्वेष) विरहित, संभ्रमरहित, संप्रज्ञानयुक्त (जागरूक) आणि स्मृतिमान होऊन, उपेक्षेने युक्त असलेल्या चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो; तसेच दुसऱ्या दिशेला, तसेच तिसऱ्या दिशेला, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, आडवे (तिरके), सर्वत्र, स्वतःप्रमाणेच सर्वांना मानून, संपूर्ण जगाला उपेक्षेने युक्त, विस्तीर्ण, महद्गत (महान), अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित (पीडारहित) चित्ताने व्यापून विहरतो. तो असा विचार करतो – 'जे कोणी असे शास्ता (गुरू) आहेत जे अशा वादाचे व अशा दृष्टीचे आहेत की – "करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, अंगच्छेद करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, छळ करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, शोक करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, त्रास देणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, कंपित करणाऱ्याला किंवा कंपित करवून घेणाऱ्याला, प्राणातिपात करणाऱ्याला, चोरी करणाऱ्याला, घरफोडी करणाऱ्याला, दरोडा घालणाऱ्याला, एकाच घरावर दरोडा घालणाऱ्याला, वाटेत अडवून लुटणाऱ्याला, परस्त्रीगमन करणाऱ्याला, असत्य बोलणाऱ्याला – हे सर्व करणाऱ्याला पाप लागते. जर एखाद्याने वस्तऱ्यासारख्या तीक्ष्ण धारेच्या चक्राने या पृथ्वीवरील प्राण्यांचा एकाच मांसाचा गोळा किंवा मांसाचा ढीग केला, तर त्या कारणाने पाप लागते, पापाचा संचय होतो. जर कोणी गंगा नदीच्या दक्षिण तीरावर जाऊन हत्या करत, करवून घेत, अंगच्छेद करत, करवून घेत, छळ करत, करवून घेत गेला, तर त्या कारणाने पाप लागते, पापाचा संचय होतो. जर कोणी गंगा नदीच्या उत्तर तीरावर जाऊन दान देत, देववत, यज्ञ करत, करवून घेत गेला, तर त्या कारणाने पुण्य लाभते, पुण्याचा संचय होतो. दानाने, दमनाने, संयमाने आणि सत्य बोलण्याने पुण्य लाभते, पुण्याचा संचय होतो." जर त्या आदरणीय शास्त्यांचे वचन सत्य असेल, तर माझ्यासाठी हे निर्दोष (अपण्णक) आहे की मी कोणत्याही त्रस (चंचल) किंवा स्थावर (स्थिर) प्राण्याला पीडा देत नाही. दोन्ही प्रकारे माझाच विजय (कटग्गाहो) आहे: कारण मी कायेने संयमित आहे, वाचेने संयमित आहे, मनाने संयमित आहे; आणि कायेच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर मी सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होईन.' त्याच्यामध्ये प्रमोद उत्पन्न होतो. प्रमुदित झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मनाच्या माणसाची काया शांत होते. शांत काया असलेला सुखाचा अनुभव घेतो. सुखी माणसाचे चित्त समाहित होते. हे ग्रामणी, हाच 'धम्मसमाधी' आहे. जर तू या धम्मसमाधीमध्ये चित्तसमाधी प्राप्त केलीस, तर तू या शंकेच्या (कांखाधम्माचा) त्याग करू शकशील. เอวํ วุตฺเต, ปาฏลิโย คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต, อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต…เป… อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. เตรสมํ. असे म्हटले असता, पाटलीय ग्रामणी भगवंतांना म्हणाले – “अतिशय सुंदर, भंते! अतिशय सुंदर, भंते! ... आजपासून मला भगवंतांनी जन्मभर शरण गेलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे.” तेरावे (सुत्त समाप्त). คามณิสํยุตฺตํ สมตฺตํ. ग्रामणी संयुत्त समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – จณฺโฑ ปุโฏ โยธาชีโว, หตฺถสฺโส อสิพนฺธโก; เทสนา สงฺขกุลํ มณิจูฬํ, ภทฺรราสิยปาฏลีติ. चंड, पुट, योधाजीव, हत्थस्स (हत्ती व घोडा), असिबंधक, देसना, संखकुल, मणीचूळ, भद्र, रासिय आणि पाटली. ๙. อสงฺขตสํยุตฺตํ ९. असंखत संयुत्त ๑. ปฐมวคฺโค १. प्रथम वर्ग ๑. กายคตาสติสุตฺตํ १. कायगतासती सुत्त ๓๖๖. สาวตฺถินิทานํ[Pg.535]. ‘‘อสงฺขตญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อสงฺขตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อสงฺขตํ? โย, ภิกฺขเว, ราคกฺขโย โทสกฺขโย โมหกฺขโย – อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตํ. กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? กายคตาสติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค’’. ३६६. श्रावस्ती येथील निदान. "भिक्षूंनो, मी तुम्हांला असंखत (असंस्कृत/निर्वाण) आणि असंखताकडे नेणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. भिक्षूंनो, असंखत कोणते? भिक्षूंनो, जो रागक्षय (लोभाचा नाश), द्वेषक्षय (द्वेषाचा नाश) आणि मोहक्षय (मोहाचा नाश) आहे – यालाच, भिक्षूंनो, असंखत असे म्हणतात. आणि भिक्षूंनो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? कायगतासती (शरीराविषयीची जागरूकता). भिक्षूंनो, यालाच असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात." ‘‘อิติ โข, ภิกฺขเว, เทสิตํ โว มยา อสงฺขตํ, เทสิโต อสงฺขตคามิมคฺโค. ยํ, ภิกฺขเว, สตฺถารา กรณียํ สาวกานํ หิเตสินา อนุกมฺปเกน อนุกมฺปํ อุปาทาย, กตํ โว ตํ มยา. เอตานิ, ภิกฺขเว, รุกฺขมูลานิ, เอตานิ สุญฺญาคารานิ. ฌายถ, ภิกฺขเว, มา ปมาทตฺถ; มา ปจฺฉา วิปฺปฏิสาริโน อหุวตฺถ. อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนี’’ติ. ปฐมํ. "अशा प्रकारे, भिक्षूंनो, मी तुम्हांला असंखताचा उपदेश केला आहे आणि असंखताकडे नेणाऱ्या मार्गाचाही उपदेश केला आहे. भिक्षूंनो, आपल्या श्रावकांचे हित इच्छिणाऱ्या, त्यांच्यावर अनुकंपा करणाऱ्या शास्त्याने अनुकंपेपोटी जे काही करणे आवश्यक आहे, ते मी तुमच्यासाठी केले आहे. भिक्षूंनो, ही वृक्षमूले आहेत, ही शून्यगृहे (शांत/एकांत जागा) आहेत. भिक्षूंनो, ध्यान करा, आळस (प्रमाद) करू नका; नंतर पश्चात्ताप करण्याची वेळ येऊ देऊ नका. हीच आमची तुम्हांला शिकवण (अनुशासणी) आहे." पहिले (सुत्त समाप्त). ๒. สมถวิปสฺสนาสุตฺตํ २. समथविपस्सना सुत्त ๓๖๗. ‘‘อสงฺขตญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อสงฺขตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อสงฺขตํ? โย, ภิกฺขเว, ราคกฺขโย โทสกฺขโย โมหกฺขโย – อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตํ. กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? สมโถ จ วิปสฺสนา จ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. ทุติยํ. ३६७. “भिक्षूंनो, मी तुम्हांला असंस्कृत (असंखत) आणि असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग उपदेशीन. तो ऐका. आणि भिक्षूंनो, असंस्कृत कोणते? भिक्षूंनो, जो रागाचा क्षय, द्वेषाचा क्षय आणि मोहाचा क्षय आहे – यालाच, भिक्षूंनो, असंस्कृत म्हटले जाते. आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? समथ आणि विपश्यना. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... (दुसरे सूत्र).” ๓. สวิตกฺกสวิจารสุตฺตํ ३. सवितक्क-सविचार सुत्त ๓๖๘. ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? สวิตกฺกสวิจาโร สมาธิ, อวิตกฺกวิจารมตฺโต สมาธิ, อวิตกฺกอวิจาโร สมาธิ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. ตติยํ. ३६८. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? सवितक्क-सविचार समाधी, अवितक्क-विचारमात्र समाधी, अवितक्क-अविचार समाधी – भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... (तिसरे सूत्र).” ๔. สุญฺญตสมาธิสุตฺตํ ४. सुञ्ञत-समाधी सुत्त ๓๖๙. ‘‘กตโม [Pg.536] จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? สุญฺญโต สมาธิ, อนิมิตฺโต สมาธิ, อปฺปณิหิโต สมาธิ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. จตุตฺถํ. ३६९. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? सुञ्ञत समाधी, अनिमित्त समाधी, अप्पणिहित समाधी – भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... (चौथे सूत्र).” ๕. สติปฏฺฐานสุตฺตํ ५. सतिपट्ठान सुत्त ๓๗๐. ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? จตฺตาโร สติปฏฺฐานา. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. ปญฺจมํ. ३७०. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? चार सतिपट्ठान (स्मृतिप्रस्थान). भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... (पाचवे सूत्र).” ๖. สมฺมปฺปธานสุตฺตํ ६. सम्मदपधान सुत्त ๓๗๑. ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? จตฺตาโร สมฺมปฺปธานา. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. ฉฏฺฐํ. ३७१. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? चार सम्मप्पधान (सम्यक्प्रधान). भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... (सहावे सूत्र).” ๗. อิทฺธิปาทสุตฺตํ ७. इद्धिपाद सुत्त ๓๗๒. ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? จตฺตาโร อิทฺธิปาทา. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. สตฺตมํ. ३७२. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? चार इद्धिपाद (ऋद्धिपाद). भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... (सातवे सूत्र).” ๘. อินฺทฺริยสุตฺตํ ८. इंद्रिय सुत्त ๓๗๓. ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? ปญฺจินฺทฺริยานิ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. อฏฺฐมํ. ३७३. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? पाच इंद्रिये. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... (आठवे सूत्र).” ๙. พลสุตฺตํ ९. बल सुत्त ๓๗๔. ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? ปญฺจ พลานิ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. นวมํ. ३७४. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? पाच बले. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... (नवे सूत्र).” ๑๐. โพชฺฌงฺคสุตฺตํ १०. बोज्झंग सुत्त ๓๗๕. ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? สตฺต โพชฺฌงฺคา. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. ทสมํ. ३७५. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? सात बोज्झंग (बोध्यंग). भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... (दहावे सूत्र).” ๑๑. มคฺคงฺคสุตฺตํ ११. मग्गंग सुत्त ๓๗๖. ‘‘กตโม [Pg.537] จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค. อิติ โข, ภิกฺขเว, เทสิตํ โว มยา อสงฺขตํ, เทสิโต อสงฺขตคามิมคฺโค. ยํ, ภิกฺขเว, สตฺถารา กรณียํ สาวกานํ หิเตสินา อนุกมฺปเกน อนุกมฺปํ อุปาทาย กตํ โว ตํ มยา. เอตานิ, ภิกฺขเว, รุกฺขมูลานิ, เอตานิ สุญฺญาคารานิ. ฌายถ, ภิกฺขเว, มา ปมาทตฺถ; มา ปจฺฉา วิปฺปฏิสาริโน อหุวตฺถ. อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนี’’ติ. เอกาทสมํ. ३७६. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? आर्य अष्टांगिक मार्ग. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते. अशा प्रकारे, भिक्षूंनो, मी तुम्हांला असंस्कृत उपदेशिले आहे आणि असंस्कृताकडे नेणारा मार्गही उपदेशिला आहे. भिक्षूंनो, शिष्यांचे कल्याण इच्छिणाऱ्या, त्यांच्यावर अनुकंपा करणाऱ्या शास्त्याने अनुकंपेपोटी जे काही करायला हवे, ते मी तुमच्यासाठी केले आहे. भिक्षूंनो, ही वृक्षमूले आहेत, ही शून्य घरे आहेत. भिक्षूंनो, ध्यान करा, प्रमाद करू नका; नंतर पश्चात्ताप करण्याची वेळ येऊ देऊ नका. हीच आमची तुम्हांला अनुशासणी आहे.” (अकरावे सूत्र). ปฐโม วคฺโค. पहिला वर्ग (वग्ग). ตสฺสุทฺทานํ – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – กาโย สมโถ สวิตกฺโก, สุญฺญโต สติปฏฺฐานา; สมฺมปฺปธานา อิทฺธิปาทา, อินฺทฺริยพลโพชฺฌงฺคา; มคฺเคน เอกาทสมํ, ตสฺสุทฺทานํ ปวุจฺจติ. काया, समथ, सवितक्क, सुञ्ञत, सतिपट्ठान, सम्मप्पधान, इद्धिपाद, इंद्रिय, बल, बोज्झंग आणि अकरावा मार्ग; अशी ही अनुक्रमणिका सांगितली जाते. ๒. ทุติยวคฺโค २. दुसरा वर्ग (वग्ग) ๑. อสงฺขตสุตฺตํ १. असंखत सुत्त ๓๗๗. ‘‘อสงฺขตญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อสงฺขตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อสงฺขตํ? โย, ภิกฺขเว, ราคกฺขโย โทสกฺขโย โมหกฺขโย – อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตํ. กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? สมโถ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค. อิติ โข, ภิกฺขเว, เทสิตํ โว มยา อสงฺขตํ, เทสิโต อสงฺขตคามิมคฺโค. ยํ, ภิกฺขเว, สตฺถารา กรณียํ สาวกานํ หิเตสินา อนุกมฺปเกน อนุกมฺปํ อุปาทาย, กตํ โว ตํ มยา. เอตานิ, ภิกฺขเว, รุกฺขมูลานิ, เอตานิ สุญฺญาคารานิ. ฌายถ, ภิกฺขเว, มา ปมาทตฺถ; มา ปจฺฉา วิปฺปฏิสาริโน อหุวตฺถ. อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนีติ. ३७७. “भिक्षूंनो, मी तुम्हांला असंस्कृत आणि असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग उपदेशीन. तो ऐका. आणि भिक्षूंनो, असंस्कृत कोणते? भिक्षूंनो, जो रागाचा क्षय, द्वेषाचा क्षय आणि मोहाचा क्षय आहे – यालाच, भिक्षूंनो, असंस्कृत म्हटले जाते. आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? समथ. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते. अशा प्रकारे, भिक्षूंनो, मी तुम्हांला असंस्कृत उपदेशिले आहे आणि असंस्कृताकडे नेणारा मार्गही उपदेशिला आहे. भिक्षूंनो, शिष्यांचे कल्याण इच्छिणाऱ्या, त्यांच्यावर अनुकंपा करणाऱ्या शास्त्याने अनुकंपेपोटी जे काही करायला हवे, ते मी तुमच्यासाठी केले आहे. भिक्षूंनो, ही वृक्षमूले आहेत, ही शून्य घरे आहेत. भिक्षूंनो, ध्यान करा, प्रमाद करू नका; नंतर पश्चात्ताप करण्याची वेळ येऊ देऊ नका. हीच आमची तुम्हांला अनुशासणी आहे.” ‘‘อสงฺขตญฺจ [Pg.538] โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อสงฺขตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อสงฺขตํ? โย, ภิกฺขเว, ราคกฺขโย โทสกฺขโย โมหกฺขโย – อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตํ. กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? วิปสฺสนา. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค. อิติ โข, ภิกฺขเว, เทสิตํ โว มยา อสงฺขตํ…เป… อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนีติ. “भिक्षूंनो, मी तुम्हांला असंस्कृत आणि असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग उपदेशीन. तो ऐका. आणि भिक्षूंनो, असंस्कृत कोणते? भिक्षूंनो, जो रागाचा क्षय, द्वेषाचा क्षय आणि मोहाचा क्षय आहे – यालाच, भिक्षूंनो, असंस्कृत म्हटले जाते. आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? विपश्यना. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते. अशा प्रकारे, भिक्षूंनो, मी तुम्हांला असंस्कृत उपदेशिले आहे... हीच आमची तुम्हांला अनुशासणी आहे.” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? สวิตกฺโก สวิจาโร สมาธิ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อวิตกฺโก วิจารมตฺโต สมาธิ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อวิตกฺโก อวิจาโร สมาธิ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? सवितक्क-सविचार समाधी. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? अवितक्क-विचारमात्र समाधी. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? अवितक्क-अविचार समाधी. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते...” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? สุญฺญโต สมาธิ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อนิมิตฺโต สมาธิ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อปฺปณิหิโต สมาธิ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? सुञ्ञत समाधी. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? अनिमित्त समाधी. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? अप्पणिहित समाधी. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते...” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เวทนาสุ เวทนานุปสฺสี วิหรติ…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสี…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू कायेमध्ये कायेचे सतत दर्शन घेत (कायानुपश्यी होऊन), उद्योगी, सजग आणि स्मृतिमान होऊन, लोकांमधील अभिज्झा आणि डोमनस्स दूर करून विहरतो. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू वेदनांमध्ये वेदनांचे सतत दर्शन घेत (वेदनानुपश्यी होऊन) विहरतो... भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू चित्तामध्ये चित्ताचे सतत दर्शन घेत (चित्तानुपश्यी होऊन) विहरतो... भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू धम्मांमध्ये धम्मांचे सतत दर्शन घेत (धम्मानुपश्यी होऊन) विहरतो... भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते...” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อนุปฺปนฺนานํ ปาปกานํ อกุสลานํ ธมฺมานํ อนุปฺปาทา ฉนฺทํ ชเนติ วายมติ วีริยํ อารภติ จิตฺตํ ปคฺคณฺหาติ ปทหติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อุปฺปนฺนานํ [Pg.539] ปาปกานํ อกุสลานํ ธมฺมานํ ปหานา ฉนฺทํ ชเนติ วายมติ วีริยํ อารภติ จิตฺตํ ปคฺคณฺหาติ ปทหติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อนุปฺปนฺนานํ กุสลานํ ธมฺมานํ อุปฺปาทา ฉนฺทํ ชเนติ วายมติ วีริยํ อารภติ จิตฺตํ ปคฺคณฺหาติ ปทหติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อุปฺปนฺนานํ กุสลานํ ธมฺมานํ ฐิติยา อสมฺโมสาย ภิยฺโยภาวาย เวปุลฺลาย ภาวนาย ปาริปูริยา ฉนฺทํ ชเนติ วายมติ วีริยํ อารภติ จิตฺตํ ปคฺคณฺหาติ ปทหติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. “भिक्खूहो, असंखताकडे (असंस्कृताकडे/निर्वाणाकडे) नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे (या धम्मात) भिक्खू न उत्पन्न झालेल्या पापकारक अकुशल धर्मांचा उत्पाद न होण्यासाठी छंद (इच्छा) उत्पन्न करतो, प्रयत्न करतो, वीर्य आरंभितो, चित्त प्रग्रहित करतो आणि दृढ प्रयत्न करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू उत्पन्न झालेल्या पापकारक अकुशल धर्मांच्या प्रहाणासाठी (त्यागासाठी) छंद उत्पन्न करतो, प्रयत्न करतो, वीर्य आरंभितो, चित्त प्रग्रहित करतो आणि दृढ प्रयत्न करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू न उत्पन्न झालेल्या कुशल धर्मांच्या उत्पत्तीसाठी छंद उत्पन्न करतो, प्रयत्न करतो, वीर्य आरंभितो, चित्त प्रग्रहित करतो आणि दृढ प्रयत्न करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू उत्पन्न झालेल्या कुशल धर्मांच्या स्थितीसाठी, त्यांच्या विनाशाच्या अभावासाठी (असंमोहासाठी), वृद्धीसाठी, विपुलतेसाठी, भावनेसाठी आणि परिपूर्तीसाठी छंद उत्पन्न करतो, प्रयत्न करतो, वीर्य आरंभितो, चित्त प्रग्रहित करतो आणि दृढ प्रयत्न करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे...” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ฉนฺทสมาธิปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค …เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ วีริยสมาธิปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จิตฺตสมาธิปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ วีมํสสมาธิปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. “भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू छंद-समाधी आणि प्रधान-संस्कारांनी युक्त अशा इद्धिपादाची (ऋद्धिपादाची) भावना करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू वीर्य-समाधी आणि प्रधान-संस्कारांनी युक्त अशा इद्धिपादाची भावना करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू चित्त-समाधी आणि प्रधान-संस्कारांनी युक्त अशा इद्धिपादाची भावना करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू विमंसा-समाधी (मीमांसा-समाधी) आणि प्रधान-संस्कारांनी युक्त अशा इद्धिपादाची भावना करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे...” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สทฺธินฺทฺริยํ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิตํ วิราคนิสฺสิตํ นิโรธนิสฺสิตํ โวสฺสคฺคปริณามึ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ วีริยินฺทฺริยํ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิตํ…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สตินฺทฺริยํ ภาเวติ…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมาธินฺทฺริยํ ภาเวติ…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ปญฺญินฺทฺริยํ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิตํ วิราคนิสฺสิตํ [Pg.540] นิโรธนิสฺสิตํ โวสฺสคฺคปริณามึ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. “भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू विवेक-आश्रित, विराग-आश्रित, निरोध-आश्रित आणि त्याग-परिणामी अशा सद्धिंद्रियाची (श्रद्धेंद्रियाची) भावना करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू विवेक-आश्रित... पे... वीरियिंद्रियाची (वीर्येन्द्रियाची) भावना करतो... भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू... पे... सतिंद्रियाची (स्मृतीन्द्रियाची) भावना करतो... भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू... पे... समाधिंद्रियाची (समाधीन्द्रियाची) भावना करतो... भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू विवेक-आश्रित, विराग-आश्रित, निरोध-आश्रित आणि त्याग-परिणामी अशा पञ्ञिंद्रियाची (प्रज्ञेन्द्रियाची) भावना करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे...” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สทฺธาพลํ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิตํ…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ วีริยพลํ ภาเวติ…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สติพลํ ภาเวติ…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมาธิพลํ ภาเวติ…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ปญฺญาพลํ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิตํ วิราคนิสฺสิตํ นิโรธนิสฺสิตํ โวสฺสคฺคปริณามึ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. “भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू विवेक-आश्रित... पे... श्रद्धाबलाची भावना करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू... पे... वीर्यबलाची भावना करतो... भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू... पे... सतिबलाची (स्मृतीबलाची) भावना करतो... भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू... पे... समाधिबलाची भावना करतो... भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू विवेक-आश्रित, विराग-आश्रित, निरोध-आश्रित आणि त्याग-परिणामी अशा पञ्ञाबलाची (प्रज्ञाबलाची) भावना करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे...” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สติสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ธมฺมวิจยสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ…เป… วีริยสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ…เป… ปีติสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ…เป… ปสฺสทฺธิสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ…เป… สมาธิสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ…เป… อุเปกฺขาสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิตํ วิราคนิสฺสิตํ นิโรธนิสฺสิตํ โวสฺสคฺคปริณามึ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. “भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू... पे... सति-संबोज्झंगाची (स्मृती-संबोध्यंगाची) भावना करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू... पे... धम्मविचय-संबोज्झंगाची (धर्मविचय-संबोध्यंगाची) भावना करतो... वीर्य-संबोज्झंगाची भावना करतो... पे... पीति-संबोज्झंगाची भावना करतो... पे... पस्सद्धि-संबोज्झंगाची भावना करतो... पे... समाधी-संबोज्झंगाची भावना करतो... पे... विवेक-आश्रित, विराग-आश्रित, निरोध-आश्रित आणि त्याग-परिणामी अशा उपेक्खा-संबोज्झंगाची (उपेक्षा-संबोध्यंगाची) भावना करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे...” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺมาทิฏฺฐึ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิตํ วิราคนิสฺสิตํ นิโรธนิสฺสิตํ โวสฺสคฺคปริณามึ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺมาสงฺกปฺปํ ภาเวติ …เป… สมฺมาวาจํ ภาเวติ…เป… สมฺมากมฺมนฺตํ ภาเวติ…เป… สมฺมาอาชีวํ ภาเวติ…เป… สมฺมาวายามํ ภาเวติ…เป… สมฺมาสตึ ภาเวติ…เป… อสงฺขตญฺจ โว ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อสงฺขตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อสงฺขตํ…เป…? กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺมาสมาธึ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิตํ วิราคนิสฺสิตํ นิโรธนิสฺสิตํ โวสฺสคฺคปริณามึ[Pg.541]. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค. อิติ โข, ภิกฺขเว, เทสิตํ โว มยา อสงฺขตํ, เทสิโต อสงฺขตคามิมคฺโค. ยํ, ภิกฺขเว, สตฺถารา กรณียํ สาวกานํ หิเตสินา อนุกมฺปเกน อนุกมฺปํ อุปาทาย, กตํ โว ตํ มยา. เอตานิ, ภิกฺขเว, รุกฺขมูลานิ, เอตานิ สุญฺญาคารานิ. ฌายถ, ภิกฺขเว, มา ปมาทตฺถ; มา ปจฺฉา วิปฺปฏิสาริโน อหุวตฺถ. อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนี’’ติ. ปฐมํ. “भिक्खूहो, असंखताकडे (असंस्कृत/निर्वाणाकडे) घेऊन जाणारा मार्ग कोणता आहे? इथे, भिक्खूहो, भिक्खू विवेकनिश्रित, विरागनिश्रित, निरोधनिश्रित आणि वोस्सग्गपरिणामी (त्यागामध्ये परिणत होणाऱ्या) सम्यक दृष्टीची भावना करतो. भिक्खूहो, यालाच असंखताकडे घेऊन जाणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... आणि भिक्खूहो, असंखताकडे घेऊन जाणारा मार्ग कोणता आहे? इथे, भिक्खूहो, भिक्खू सम्यक संकल्पाची भावना करतो... पे... सम्यक वाचेची भावना करतो... पे... सम्यक कर्मांताची भावना करतो... पे... सम्यक आजीविकेची भावना करतो... पे... सम्यक व्यायामाची भावना करतो... पे... सम्यक स्मृतीची भावना करतो... पे... भिक्खूहो, मी तुम्हांला असंखत आणि असंखताकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, असंखत कोणते आहे? ... पे ... आणि भिक्खूहो, असंखताकडे घेऊन जाणारा मार्ग कोणता आहे? इथे, भिक्खूहो, भिक्खू विवेकनिश्रित, विरागनिश्रित, निरोधनिश्रित आणि वोस्सग्गपरिणामी अशा सम्यक समाधीची भावना करतो. भिक्खूहो, यालाच असंखताकडे घेऊन जाणारा मार्ग असे म्हणतात. अशा प्रकारे, भिक्खूहो, मी तुम्हांला असंखताचा उपदेश केला आहे आणि असंखताकडे घेऊन जाणाऱ्या मार्गाचाही उपदेश केला आहे. भिक्खूहो, आपल्या श्रावकांचे कल्याण इच्छिणाऱ्या आणि त्यांच्याबद्दल अनुकंपा बाळगणाऱ्या शास्त्याने अनुकंपेपोटी जे काही करायला हवे, ते सर्व मी तुमच्यासाठी केले आहे. भिक्खूहो, ही वृक्षमूळे आहेत, ही शून्यागारे आहेत. भिक्खूहो, ध्यान करा, प्रमाद करू नका; नंतर पश्चात्ताप करण्याची वेळ येऊ देऊ नका. हाच आमचा तुम्हांला उपदेश आहे.” पहिले सुत्तं. ๒. อนตสุตฺตํ २. अनत सुत्त ๓๗๘. ‘‘อนตญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ, อนตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อนตํ…เป…’’. (ยถา อสงฺขตํ ตถา วิตฺถาเรตพฺพํ). ทุติยํ. ३७८. “भिक्खूहो, मी तुम्हांला अनत (तृष्णारहित निर्वाण) आणि अनताकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अनत कोणते आहे? ... पे ...” (जसे असंखत सुत्तामध्ये सविस्तर सांगितले आहे, तसेच येथेही सविस्तर जाणावे). दुसरे सुत्तं. ๓-๓๒. อนาสวาทิสุตฺตํ ३-३२. अनासव सुत्त ๓๗๙-๔๐๘. ‘‘อนาสวญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อนาสวคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อนาสวํ…เป… สจฺจญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ สจฺจคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, สจฺจํ…เป… ปารญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ ปารคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ปารํ…เป… นิปุณญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ นิปุณคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, นิปุณํ…เป… สุทุทฺทสญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ สุทุทฺทสคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, สุทุทฺทสํ…เป… อชชฺชรญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อชชฺชรคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อชชฺชรํ…เป… ธุวญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ ธุวคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ธุวํ…เป… อปโลกิตญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อปโลกิตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อปโลกิตํ…เป… อนิทสฺสนญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อนิทสฺสนคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อนิทสฺสนํ…เป… นิปฺปปญฺจญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ นิปฺปปญฺจคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, นิปฺปปญฺจํ…เป…? ३७९-४०८. “भिक्खूहो, मी तुम्हांला अनासव (आसवरहित निर्वाण) आणि अनासवाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अनासव कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला सत्य आणि सत्याकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, सत्य कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला पार (पलीकडचा तीर) आणि पाराकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, पार कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला निपुण (सूक्ष्म) आणि निपुणाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, निपुण कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला सुदुद्दरस (अतिशय कठीण दिसणारे) आणि सुदुद्दरसाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, सुदुद्दरस कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला अजज्जर (जरा-रहित/वृद्धत्व नसलेले) आणि अजज्जराकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अजज्जर कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला ध्रुव (स्थिर/नित्य) आणि ध्रुवाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, ध्रुव कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला अपलोकित (नाश न पावणारे) आणि अपलोकिताकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अपलोकित कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला अनिदर्शन (अदृश्य/न दिसणारे) आणि अनिदर्शनाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अनिदर्शन कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला निष्प्रपंच (प्रपंचापलीकडील) आणि निष्प्रपंचाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, निष्प्रपंच कोणते आहे? ... पे ...” ‘‘สนฺตญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ สนฺตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, สนฺตํ…เป… อมตญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อมตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อมตํ…เป… ปณีตญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ ปณีตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ปณีตํ…เป… สิวญฺจ โว, ภิกฺขเว[Pg.542], เทเสสฺสามิ สิวคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, สิวํ…เป… เขมญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ เขมคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, เขมํ…เป… ตณฺหากฺขยญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ ตณฺหากฺขยคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ตณฺหากฺขยํ…เป…? “भिक्खूहो, मी तुम्हांला शांत आणि शांताकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, शांत कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला अमृत (मरणरहित) आणि अमृताकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अमृत कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्आनंला प्रणीत (श्रेष्ठ) आणि प्रणीताकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, प्रणीत कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला शिव (कल्याणकारी/शीतल) आणि शिवाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, शिव कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला क्षेम (सुरक्षित) आणि क्षेमाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, क्षेम कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला तृष्णाक्षय (तण्हाक्खय) आणि तृष्णाक्षयाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, तृष्णाक्षय कोणते आहे? ... पे ...” ‘‘อจฺฉริยญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อจฺฉริยคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อจฺฉริยํ…เป… อพฺภุตญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อพฺภุตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อพฺภุตํ…เป… อนีติกญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อนีติกคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อนีติกํ…เป… อนีติกธมฺมญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อนีติกธมฺมคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อนีติกธมฺมํ…เป… นิพฺพานญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ นิพฺพานคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, นิพฺพานํ…เป… อพฺยาปชฺฌญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อพฺยาปชฺฌคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อพฺยาปชฺฌํ…เป… วิราคญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ วิราคคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, วิราโค…เป…? “भिक्खूहो, मी तुम्हांला आश्चर्यकारक आणि आश्चर्यकारकाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, आश्चर्यकारक कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला अद्भुत आणि अद्भुताकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अद्भुत कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला अनीतिक (उपद्रवरहित) आणि अनीतिककडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अनीतिक कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला अनीतिकधम्म (निरुपद्रवी स्वभाव असणारे) आणि अनीतिकधम्माकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अनीतिकधम्म कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला निर्वाण (निब्बान) आणि निर्वाणाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, निर्वाण कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला अव्यापज्झ (पीडारहित) आणि अव्यापज्झाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अव्यापज्झ कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला विराग (रागविरहित) आणि विरागाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, विराग कोणता आहे? ... पे ...” ‘‘สุทฺธิญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ สุทฺธิคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมา จ, ภิกฺขเว, สุทฺธิ…เป… มุตฺติญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ มุตฺติคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมา จ, ภิกฺขเว, มุตฺติ…เป… อนาลยญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อนาลยคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, อนาลโย…เป… ทีปญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ ทีปคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ทีปํ…เป… เลณญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ เลณคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, เลณํ…เป… ตาณญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ ตาณคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ตาณํ…เป… สรณญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ สรณคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, สรณํ…เป…อนุสาสนี’’ติ? พาตฺตึสติมํ. “भिक्खूहो, मी तुम्हांला शुद्धी आणि शुद्धीकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, शुद्धी कोणती आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला मुक्ती आणि मुक्तीकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, मुक्ती कोणती आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला अनालय (आसक्ती नसलेले) आणि अनालयाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अनालय कोणता आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला द्वीप (आश्रयस्थान) आणि द्वीपाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, द्वीप कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला लेण (गुहा/लपण्याची जागा) आणि लेणाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, leṇaṃ (लेण) कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला ताण (संरक्षण) आणि ताणाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, ताण कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला शरण आणि शरणाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, शरण कोणते आहे? ... पे ... हाच आमचा तुम्हांला उपदेश आहे.” बत्तिसावे सुत्तं. ๓๓. ปรายนสุตฺตํ ३३. परायन सुत्त ๔๐๙. ‘‘ปรายนญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ ปรายนคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ปรายนํ? โย, ภิกฺขเว, ราคกฺขโย โทสกฺขโย [Pg.543] โมหกฺขโย – อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ปรายนํ. กตโม จ, ภิกฺขเว, ปรายนคามี มคฺโค? กายคตาสติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ปรายนคามิมคฺโค. อิติ โข, ภิกฺขเว, เทสิตํ โว มยา ปรายนํ, เทสิโต ปรายนคามิมคฺโค. ยํ, ภิกฺขเว, สตฺถารา กรณียํ สาวกานํ หิเตสินา อนุกมฺปเกน อนุกมฺปํ อุปาทาย, กตํ โว ตํ มยา. เอตานิ, ภิกฺขเว, รุกฺขมูลานิ, เอตานิ สุญฺญาคารานิ. ฌายถ, ภิกฺขเว, มา ปมาทตฺถ; มา ปจฺฉา วิปฺปฏิสาริโน อหุวตฺถ. อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนี’’ติ. (ยถา อสงฺขตํ ตถา วิตฺถาเรตพฺพํ). เตตฺตึสติมํ. ४०९. "भिक्खूहो, मी तुम्हांला अंतिम ध्येय (परायण) आणि अंतिम ध्येयाकडे नेणारा मार्ग उपदेशेन. तो ऐका. आणि भिक्खूहो, अंतिम ध्येय कोणते? भिक्खूहो, रागाचा क्षय, द्वेषाचा क्षय आणि मोहाचा क्षय – भिक्खूहो, यालाच अंतिम ध्येय असे म्हणतात. आणि भिक्खूहो, अंतिम ध्येयाकडे नेणारा मार्ग कोणता? कायगतासती (शरीराविषयीची स्मृती). भिक्खूहो, यालाच अंतिम ध्येयाकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात. अशा प्रकारे, भिक्खूहो, मी तुम्हांला अंतिम ध्येय उपदेशिले आहे आणि अंतिम ध्येयाकडे नेणारा मार्ग उपदेशिला आहे. भिक्खूहो, आपल्या शिष्यांचे हित इच्छिणाऱ्या आणि त्यांच्यावर अनुकंपा करणाऱ्या अनुकंपक शास्त्याने अनुकंपेपोटी जे काही करायला हवे, ते मी तुमच्यासाठी केले आहे. भिक्खूहो, ही वृक्षमूले आहेत, ही शून्यगृहे (निर्जन स्थाने) आहेत. ध्यान करा, भिक्खूहो, प्रमाद (आळस) करू नका; नंतर पश्चात्ताप करणारे होऊ नका. हेच आमचे तुम्हांला अनुशासन आहे." (असंखत सुत्ताप्रमाणे सविस्तर स्पष्ट करावे). तेहतिसावे सुत्त. ทุติโย วคฺโค. दुसरा वग्ग समाप्त. ตสฺสุทฺทานํ – त्याची उद्दान-गाथा – อสงฺขตํ อนตํ อนาสวํ, สจฺจญฺจ ปารํ นิปุณํ สุทุทฺทสํ; อชชฺชรํ ธุวํ อปโลกิตํ, อนิทสฺสนํ นิปฺปปญฺจ สนฺตํ. असंखत (असंस्कृत), अनत (तृष्णारहित), अनासव (आसवरहित), सत्य, पार (पलीकडचा तीर), निपुण (सूक्ष्म), सुदुद्दस (अतिशय कठीणतेने दिसणारे), अजज्जर (जरा-रहित), ध्रुव (स्थिर), अपलोकित (नाशरहित), अनिदर्शन (अदृश्य), निष्प्रपंच (प्रपंचातीत) आणि शांत. อมตํ ปณีตญฺจ สิวญฺจ เขมํ, ตณฺหากฺขโย อจฺฉริยญฺจ อพฺภุตํ; อนีติกํ อนีติกธมฺมํ, นิพฺพานเมตํ สุคเตน เทสิตํ. अमृत (मरणरहित), प्रणीत (उत्कृष्ट), शिव (कल्याणकारी), क्षेम (सुरक्षित), तृष्णाक्षय, आश्चर्यकारक, अद्भुत, अनितीक (उपद्रवरहित), अनितीकधम्म (उपद्रवरहित स्वभाव असलेले) – हेच ते सुगतांनी उपदेशिलेले निर्वाण होय. อพฺยาปชฺโฌ วิราโค จ, สุทฺธิ มุตฺติ อนาลโย; ทีโป เลณญฺจ ตาณญฺจ, สรณญฺจ ปรายนนฺติ. अव्यापज्झ (व्याधी/पीडारहित), विराग, शुद्धी, मुक्ती, अनालय (आसक्तीरहित), द्वीप (आश्रयस्थान), लेण (गुहा/लपण्याची जागा), ताण (रक्षण), शरण आणि परायण (अंतिम ध्येय). อสงฺขตสํยุตฺตํ สมตฺตํ. असंखतसंयुत्त समाप्त. ๑๐. อพฺยากตสํยุตฺตํ १०. अव्याकतसंयुत्त ๑. เขมาสุตฺตํ १. खेमा सुत्त ๔๑๐. เอกํ [Pg.544] สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. เตน โข ปน สมเยน เขมา ภิกฺขุนี โกสเลสุ จาริกํ จรมานา อนฺตรา จ สาวตฺถึ อนฺตรา จ สาเกตํ โตรณวตฺถุสฺมึ วาสํ อุปคตา โหติ. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล สาเกตา สาวตฺถึ คจฺฉนฺโต, อนฺตรา จ สาเกตํ อนฺตรา จ สาวตฺถึ โตรณวตฺถุสฺมึ เอกรตฺติวาสํ อุปคจฺฉิ. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล อญฺญตรํ ปุริสํ อามนฺเตสิ – ‘‘เอหิ ตฺวํ, อมฺโภ ปุริส, โตรณวตฺถุสฺมึ ตถารูปํ สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา ชาน ยมหํ อชฺช ปยิรุปาเสยฺย’’นฺติ. ४१०. एकदा भगवान श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. त्या वेळी खेमा नावाची भिक्खुणी कोसल देशात चारिका (भ्रमण) करत असताना, श्रावस्ती आणि साकेत यांच्या दरम्यान असलेल्या तोरणवत्थू येथे मुक्कामास राहिली होती. तेव्हा कोसलचा राजा प्रसेनजित साकेतहून श्रावस्तीला जात असताना, साकेत आणि श्रावस्ती यांच्या दरम्यान असलेल्या तोरणवत्थू येथे एका रात्रीच्या मुक्कामासाठी थांबला. मग कोसलचा राजा प्रसेनजित एका माणसाला म्हणाला – 'हे माणसा, ये, तोरणवत्थूमध्ये असा एखादा श्रमण किंवा ब्राह्मण आहे का, ज्याची मी आज भेट घेऊ शकेन (सेवा करू शकेन), याचा शोध घे.' ‘‘เอวํ, เทวา’’ติ โข โส ปุริโส รญฺโญ ปเสนทิสฺส โกสลสฺส ปฏิสฺสุตฺวา เกวลกปฺปํ โตรณวตฺถุํ อาหิณฺฑนฺโต นาทฺทส ตถารูปํ สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา ยํ ราชา ปเสนทิ โกสโล ปยิรุปาเสยฺย. อทฺทสา โข โส ปุริโส เขมํ ภิกฺขุนึ โตรณวตฺถุสฺมึ วาสํ อุปคตํ. ทิสฺวาน เยน ราชา ปเสนทิ โกสโล เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ราชานํ ปเสนทึ โกสลํ เอตทโวจ – 'तसेच होईल, महाराज,' असे म्हणून त्या माणसाने कोसलचा राजा प्रसेनजित याच्या आज्ञेचे पालन केले आणि संपूर्ण तोरणवत्थूमध्ये फिरूनही त्याला असा कोणताही श्रमण किंवा ब्राह्मण आढळला नाही, ज्याची राजा प्रसेनजित भेट घेऊ शकेल. परंतु, त्या माणसाने खेमा भिक्खुणीला तोरणवत्थू येथे मुक्कामास राहिलेले पाहिले. त्यांना पाहून तो कोसलचा राजा प्रसेनजित याच्याकडे गेला; आणि जवळ जाऊन राजा प्रसेनजितला म्हणाला – ‘‘นตฺถิ โข, เทว, โตรณวตฺถุสฺมึ ตถารูโป สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา ยํ เทโว ปยิรุปาเสยฺย. อตฺถิ จ โข, เทว, เขมา นาม ภิกฺขุนี, ตสฺส ภควโต สาวิกา อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส. ตสฺสา โข ปน อยฺยาย เอวํ กลฺยาโณ กิตฺติสทฺโท อพฺภุคฺคโต – ‘ปณฺฑิตา, วิยตฺตา เมธาวินี พหุสฺสุตา จิตฺตกถา กลฺยาณปฏิภานา’ติ. ตํ เทโว ปยิรุปาสตู’’ติ. 'महाराज, तोरणवत्थूमध्ये असा कोणताही श्रमण किंवा ब्राह्मण नाही, ज्याची महाराज भेट घेऊ शकतील. परंतु, महाराज, त्या अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवंतांची शिष्या असलेली खेमा नावाची भिक्खुणी येथे आहे. त्या आदरणीय आर्यांविषयी अशी उत्तम कीर्ती पसरली आहे की – 'त्या पंडिता (विदुषी), चतुर, बुद्धीमान, बहुश्रुत, वक्तृत्वसंपन्न आणि प्रतिभावान आहेत.' महाराजांनी त्यांची भेट घ्यावी.' อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล เยน เขมา ภิกฺขุนี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เขมํ ภิกฺขุนึ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ [Pg.545] นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราชา ปเสนทิ โกสโล เขมํ ภิกฺขุนึ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข, อยฺเย, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, มหาราช, ภควตา – ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ ปนยฺเย, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, มหาราช, อพฺยากตํ ภควตา – ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ นุ โข, อยฺเย, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, มหาราช, ภควตา – ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ ปนยฺเย, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ. ‘‘เอตมฺปิ โข, มหาราช, อพฺยากตํ ภควตา – ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. त्यानंतर कोसलचा राजा प्रसेनजित जेथे खेमा भिक्खुणी होती तेथे गेला; जवळ जाऊन त्याने खेमा भिक्खुणीला अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या कोसलच्या राजा प्रसेनजितने खेमा भिक्खुणीला विचारले – 'आदरणीय आर्ये, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात का?' 'महाराज, भगवंतांनी हे अव्याकृत (अस्पष्ट/घोषित न केलेले) ठेवले आहे की – 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात.'' 'तर मग, आर्ये, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात का?' 'महाराज, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात.'' 'तर मग, आर्ये, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही का?' 'महाराज, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की – 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही.'' 'तर मग, आर्ये, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही का?' 'महाराज, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.' ‘‘‘กึ นุ โข, อยฺเย, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ, อิติ ปุฏฺฐา สมานา – ‘อพฺยากตํ โข เอตํ, มหาราช, ภควตา – โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ. ‘กึ ปนยฺเย, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ อิติ ปุฏฺฐา สมานา – ‘เอตมฺปิ โข, มหาราช, อพฺยากตํ ภควตา – น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ. ‘กึ นุ โข, อยฺเย, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ อิติ ปุฏฺฐา สมานา – ‘อพฺยากตํ โข เอตํ, มหาราช, ภควตา – โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ. ‘กึ ปนยฺเย, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ อิติ ปุฏฺฐา สมานา – ‘เอตมฺปิ โข, มหาราช, อพฺยากตํ ภควตา – เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ. ‘โก นุ โข, อยฺเย, เหตุ, โก ปจฺจโย เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’’ติ? 'आदरणीय आर्ये, 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात का?' असे विचारले असता, आपण म्हणता – 'महाराज, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात.' 'तर मग, आर्ये, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात का?' असे विचारले असता, आपण म्हणता – 'महाराज, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात.' 'तर मग, आर्ये, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही का?' असे विचारले असता, आपण म्हणता – 'महाराज, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही.' 'तर मग, आर्ये, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही का?' असे विचारले असता, आपण म्हणता – 'महाराज, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.' तर मग, आर्ये, याचे काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय (हेतू) आहे, ज्यामुळे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे?' ‘‘เตน หิ, มหาราช, ตญฺเญเวตฺถ ปฏิปุจฺฉิสฺสามิ. ยถา เต ขเมยฺย ตถา นํ พฺยากเรยฺยาสิ. ตํ กึ มญฺญสิ, มหาราช, อตฺถิ เต โกจิ คณโก วา มุทฺทิโก วา สงฺขายโก วา โย ปโหติ คงฺคาย วาลุกํ คเณตุํ – เอตฺตกา วาลุกา อิติ วา, เอตฺตกานิ วาลุกสตานิ อิติ วา, เอตฺตกานิ วาลุกสหสฺสานิ อิติ วา, เอตฺตกานิ วาลุกสตสหสฺสานิ อิติ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, อยฺเย’’. ‘‘อตฺถิ ปน เต โกจิ คณโก วา มุทฺทิโก วา สงฺขายโก วา โย ปโหติ มหาสมุทฺเท [Pg.546] อุทกํ คเณตุํ – เอตฺตกานิ อุทกาฬฺหกานิ อิติ วา, เอตฺตกานิ อุทกาฬฺหกสตานิ อิติ วา, เอตฺตกานิ อุทกาฬฺหกสหสฺสานิ อิติ วา, เอตฺตกานิ อุทกาฬฺหกสตสหสฺสานิ อิติ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, อยฺเย’’. ‘‘ตํ กิสฺส เหตุ’’? ‘‘มหายฺเย, สมุทฺโท คมฺภีโร อปฺปเมยฺโย ทุปฺปริโยคาโห’’ติ. ‘‘เอวเมว โข, มหาราช, เยน รูเป ตถาคตํ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย ตํ รูปํ ตถาคตสฺส ปหีนํ อุจฺฉินฺนมูลํ ตาลาวตฺถุกตํ อนภาวงฺกตํ อายตึ อนุปฺปาทธมฺมํ. รูปสงฺขายวิมุตฺโต โข, มหาราช, ตถาคโต คมฺภีโร อปฺปเมยฺโย ทุปฺปริโยคาโห – เสยฺยถาปิ มหาสมุทฺโท. ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ. “तर मग, महाराज, मी आपल्यालाच याविषयी पुन्हा विचारते. जसे आपल्याला योग्य वाटेल, तसे आपण त्याचे उत्तर द्यावे. महाराज, आपल्याला काय वाटते? आपल्याकडे असा कोणी गणक (हिशेबनीस), मुद्दिक (बोटांवर मोजणारा) किंवा संख्यायक (गणितज्ञ) आहे का, जो गंगेतील वाळूचे कण मोजण्यास समर्थ असेल—की 'इतके वाळूचे कण आहेत' किंवा 'इतके शेकडो वाळूचे कण आहेत' किंवा 'इतके हजारो वाळूचे कण आहेत' किंवा 'इतके लाखो वाळूचे कण आहेत'?” “नाही, आर्ये.” “तर मग, महाराज, आपल्याकडे असा कोणी गणक, मुद्दिक किंवा संख्यायक आहे का, जो महासागरातील पाण्याचे मोजमाप करण्यास समर्थ असेल—की 'इतके आढक पाणी आहे' किंवा 'इतके शेकडो आढक पाणी आहे' किंवा 'इतके हजारो आढक पाणी आहे' किंवा 'इतके लाखो आढक पाणी आहे'?” “नाही, आर्ये.” “ते कोणत्या कारणाने?” “आर्ये, महासागर हा खोल, अमेय (अथांग) आणि थांग लागण्यास कठीण आहे.” “त्याचप्रमाणे, महाराज, ज्या रूपाच्या आधारे तथागतांचे वर्णन केले जाऊ शकले असते, ते रूप तथागतांनी नष्ट केले आहे, मुळासकट उपटून टाकले आहे, ताडाच्या खुंटासारखे केले आहे, नामशेष केले आहे आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्वभावाचे केले आहे. महाराज, रूपाच्या संज्ञेपासून मुक्त झालेले तथागत हे महासागरासारखेच खोल, अमेय आणि थांग लागण्यास कठीण आहेत. 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही' हेही लागू होत नाही.” ‘‘ยาย เวทนาย ตถาคตํ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย, สา เวทนา ตถาคตสฺส ปหีนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. เวทนาสงฺขายวิมุตฺโต, มหาราช, ตถาคโต คมฺภีโร อปฺปเมยฺโย ทุปฺปริโยคาโห – เสยฺยถาปิ มหาสมุทฺโท. ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ. “ज्या वेदनेच्या आधारे तथागतांचे वर्णन केले जाऊ शकले असते, ती वेदना तथागतांनी नष्ट केली आहे, मुळासकट उपटून टाकली आहे, ताडाच्या खुंटासारखी केली आहे, नामशेष केली आहे आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्वभावाची केली आहे. महाराज, वेदनेच्या संज्ञेपासून मुक्त झालेले तथागत हे महासागरासारखेच खोल, अमेय आणि थांग लागण्यास कठीण आहेत. 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही' हेही लागू होत नाही.” ‘‘ยาย สญฺญา ตถาคตํ…เป… เยหิ สงฺขาเรหิ ตถาคตํ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย, เต สงฺขารา ตถาคตสฺส ปหีนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. สงฺขารสงฺขายวิมุตฺโต โข, มหาราช, ตถาคโต คมฺภีโร อปฺปเมยฺโย ทุปฺปริโยคาโห – เสยฺยถาปิ มหาสมุทฺโท. ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ. “ज्या संज्ञेच्या आधारे तथागतांचे... (पेय्याल)... ज्या संस्कारांच्या आधारे तथागतांचे वर्णन केले जाऊ शकले असते, ते संस्कार तथागतांनी नष्ट केले आहेत, मुळासकट उपटून टाकले आहेत, ताडाच्या खुंटासारखे केले आहेत, नामशेष केले आहेत आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्वभावाचे केले आहेत. महाराज, संस्कारांच्या संज्ञेपासून मुक्त झालेले तथागत हे महासागरासारखेच खोल, अमेय आणि थांग लागण्यास कठीण आहेत. 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही' हेही लागू होत नाही.” ‘‘เยน วิญฺญาเณ ตถาคตํ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย ตํ วิญฺญาณํ ตถาคตสฺส ปหีนํ อุจฺฉินฺนมูลํ ตาลาวตฺถุกตํ อนภาวงฺกตํ อายตึ [Pg.547] อนุปฺปาทธมฺมํ. วิญฺญาณสงฺขายวิมุตฺโต โข, มหาราช, ตถาคโต คมฺภีโร อปฺปเมยฺโย ทุปฺปริโยคาโห – เสยฺยถาปิ มหาสมุทฺโท. ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปตี’’ติ. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล เขมาย ภิกฺขุนิยา ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา เขมํ ภิกฺขุนึ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. “ज्या विज्ञानाच्या आधारे तथागतांचे वर्णन केले जाऊ शकले असते, ते विज्ञान तथागतांनी नष्ट केले आहे, मुळासकट उपटून टाकले आहे, ताडाच्या खुंटासारखे केले आहे, नामशेष केले आहे आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्वभावाचे केले आहे. महाराज, विज्ञानाच्या संज्ञेपासून मुक्त झालेले तथागत हे महासागरासारखेच खोल, अमेय आणि थांग लागण्यास कठीण आहेत. 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही' हेही लागू होत नाही.” तेव्हा कोसलचा राजा प्रसेनजित याने खेमा भिक्षुणीच्या भाषणाचे अभिनंदन केले, त्याचे कौतुक केले आणि आसनावरून उठून खेमा भिक्षुणीला अभिवादन करून, प्रदक्षिणा घालून तो निघून गेला. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล อปเรน สมเยน เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข, ภนฺเต, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, มหาราช, มยา – ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ ปน, ภนฺเต, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, มหาราช, อพฺยากตํ มยา – ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ นุ โข, ภนฺเต, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, มหาราช, มยา – ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ ปน, ภนฺเต, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, มหาราช, อพฺยากตํ มยา – ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ นุ โข, ภนฺเต, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ อิติ ปุฏฺโฐ สมาโน – ‘อพฺยากตํ โข เอตํ, มหาราช, มยา – โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ…เป…. ‘‘‘กึ ปน, ภนฺเต, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ อิติ ปุฏฺโฐ สมาโน – ‘‘‘เอตมฺปิ โข, มหาราช, อพฺยากตํ มยา – เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ. โก นุ โข, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ? त्यानंतर दुसऱ्या एका प्रसंगी कोसलचा राजा प्रसेनजित जेथे भगवान होते तेथे गेला. तेथे पोहोचल्यावर भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या कोसलच्या राजा प्रसेनजिताने भगवंतांना विचारले—'भंते, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात का?' 'महाराज, मी हे घोषित केलेले नाही (अव्याकृत ठेवले आहे) की—तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात.' 'तर मग, भंते, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात का?' 'महाराज, मी हेही घोषित केलेले नाही की—तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात.' 'तर मग, भंते, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही का?' 'महाराज, मी हेही घोषित केलेले नाही की—तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही.' 'तर मग, भंते, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही का?' 'महाराज, मी हेही घोषित केलेले नाही की—तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही.' 'भंते, जेव्हा विचारले जाते की—तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात का? तेव्हा आपण म्हणता—महाराज, मी हे घोषित केलेले नाही की तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात... (पेय्याल)... आणि जेव्हा विचारले जाते की—तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही का? तेव्हा आपण म्हणता—महाराज, मी हेही घोषित केलेले नाही की तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही. भंते, याचे काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय (हेतू) आहे, ज्यामुळे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे?' ‘‘เตน หิ, มหาราช, ตญฺเญเวตฺถ ปฏิปุจฺฉิสฺสามิ. ยถา เต ขเมยฺย ตถา นํ พฺยากเรยฺยาสิ. ตํ กึ มญฺญสิ, มหาราช, อตฺถิ เต โกจิ คณโก วา มุทฺทิโก วา สงฺขายโก วา โย ปโหติ คงฺคาย วาลุกํ คเณตุํ [Pg.548] – เอตฺตกา วาลุกา อิติ วา…เป… เอตฺตกานิ วาลุกสตสหสฺสานิ อิติ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘อตฺถิ ปน เต โกจิ คณโก วา มุทฺทิโก วา สงฺขายโก วา โย ปโหติ มหาสมุทฺเท อุทกํ คเณตุํ – เอตฺตกานิ อุทกาฬฺหกานิ อิติ วา…เป… เอตฺตกานิ อุทกาฬฺหกสตสหสฺสานิ อิติ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตํ กิสฺส เหตุ’’? ‘‘มหา, ภนฺเต, สมุทฺโท คมฺภีโร อปฺปเมยฺโย ทุปฺปริโยคาโห. เอวเมว โข, มหาราช, เยน รูเปน ตถาคตํ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย, ตํ รูปํ ตถาคตสฺส ปหีนํ อุจฺฉินฺนมูลํ ตาลาวตฺถุกตํ อนภาวงฺกตํ อายตึ อนุปฺปาทธมฺมํ. รูปสงฺขายวิมุตฺโต โข, มหาราช, ตถาคโต คมฺภีโร อปฺปเมยฺโย ทุปฺปริโยคาโห – เสยฺยถาปิ มหาสมุทฺโท. ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ. ยาย เวทนาย…เป… ยาย สญฺญาย…เป… เยหิ สงฺขาเรหิ…เป…’’. “तसे असेल तर, महाराज, मी तुम्हालाच याविषयी पुन्हा विचारतो. जसे तुम्हाला योग्य वाटेल तसे तुम्ही त्याचे उत्तर द्या. महाराज, तुम्हाला काय वाटते? गंगेतील वाळू मोजण्यास समर्थ असा एखादा गणक (हिशोबनीस), मुद्रिक (बोटांवर मोजणारा) किंवा संख्यायक (संख्या मोजणारा) तुमच्याकडे आहे का, जो मोजू शकेल की—'इतके वाळूचे कण आहेत' किंवा... 'इतके लाख वाळूचे कण आहेत'?” “नाही, भंते.” “पण महाराज, महासागरातील पाणी मोजण्यास समर्थ असा एखादा गणक, मुद्रिक किंवा संख्यायक तुमच्याकडे आहे का, जो मोजू शकेल की—'पाण्याचे इतके आळ्हक (माप) आहेत' किंवा... 'पाण्याचे इतके लाख आळ्हक आहेत'?” “नाही, भंते.” “ते कशामुळे?” “भंते, महासागर हा विशाल, खोल, अमेय (मोजता न येणारा) आणि दुस्तर (प्रवेश करण्यास कठीण) आहे.” “तशाच प्रकारे, महाराज, ज्या रूपाने तथागतांना प्रज्ञप्त (वर्णन) केले जाऊ शकते, ते रूप तथागतांनी प्रहीन (नष्ट) केले आहे, मुळासकट उपटून टाकले आहे, ताडाच्या खुंटासारखे केले आहे, नामशेष केले आहे आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाचे केले आहे. महाराज, रूपाच्या संज्ञेपासून मुक्त झालेले तथागत महासागराप्रमाणेच खोल, अमेय आणि दुस्तर आहेत. 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात' हेही लागू होत नाही... 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात आणि नसतात असेही नाही' हेही लागू होत नाही. ज्या वेदनेने... ज्या संज्ञेने... ज्या संस्कारांनी...” ‘‘เยน วิญฺญาเณน ตถาคตํ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย, ตํ วิญฺญาณํ ตถาคตสฺส ปหีนํ อุจฺฉินฺนมูลํ ตาลาวตฺถุกตํ อนภาวงฺกตํ อายตึ อนุปฺปาทธมฺมํ. วิญฺญาณสงฺขายวิมุตฺโต โข, มหาราช, ตถาคโต คมฺภีโร อปฺปเมยฺโย ทุปฺปริโยคาโห – เสยฺยถาปิ มหาสมุทฺโท. ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปตี’’ติ. “ज्या विज्ञानाने तथागतांना प्रज्ञप्त केले जाऊ शकते, ते विज्ञान तथागतांनी प्रहीन केले आहे, मुळासकट उपटून टाकले आहे, ताडाच्या खुंटासारखे केले आहे, नामशेष केले आहे आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाचे केले आहे. महाराज, विज्ञानाच्या संज्ञेपासून मुक्त झालेले तथागत महासागराप्रमाणेच खोल, अमेय आणि दुस्तर आहेत. 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात' हेही लागू होत नाही, 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात' हेही लागू होत नाही, 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही' हेही लागू होत नाही, 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात आणि नसतात असेही नाही' हेही लागू होत नाही.” ‘‘อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต! ยตฺร หิ นาม สตฺถุ เจว สาวิกาย จ อตฺเถน อตฺโถ พฺยญฺชเนน พฺยญฺชนํ สํสนฺทิสฺสติ, สเมสฺสติ, น วิโรธยิสฺสติ ยทิทํ อคฺคปทสฺมึ. เอกมิทาหํ, ภนฺเต, สมยํ เขมํ ภิกฺขุนึ อุปสงฺกมิตฺวา เอตมตฺถํ อปุจฺฉึ. สาปิ เม อยฺยา เอเตหิ ปเทหิ เอเตหิ พฺยญฺชเนหิ เอตมตฺถํ พฺยากาสิ, เสยฺยถาปิ ภควา. อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต! ยตฺร หิ นาม สตฺถุ เจว สาวิกาย จ อตฺเถน อตฺโถ พฺยญฺชเนน พฺยญฺชนํ สํสนฺทิสฺสติ, สเมสฺสติ, น วิโรธยิสฺสติ ยทิทํ อคฺคปทสฺมึ. หนฺท ทานิ มยํ, ภนฺเต, คจฺฉาม. พหุกิจฺจา มยํ พหุกรณียา’’ติ. ‘‘ยสฺส ทานิ ตฺวํ, มหาราช, กาลํ มญฺญสี’’ติ. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ภควโต [Pg.549] ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามีติ. ปฐมํ. “आश्चर्यकारक आहे, भंते! अद्भुत आहे, भंते! कारण या श्रेष्ठ पदाच्या (परम सत्याच्या) बाबतीत शास्त्यांचे (बुद्धांचे) आणि त्यांच्या श्राविकेचे अर्थाशी अर्थ आणि व्यंजनाशी (शब्दांशी) व्यंजन तंतोतंत जुळते आहे, सुसंगत आहे आणि त्यात कोणताही विरोध नाही. भंते, एका वेळी मी खेमा भिक्खुणींकडे जाऊन त्यांना याविषयी विचारले होते. त्या आदरणीय आर्यांनीही मला याच पदांनी आणि याच व्यंजनांनी या विषयाचे स्पष्टीकरण दिले होते, जसे की भगवंतांनी दिले आहे. आश्चर्यकारक आहे, भंते! अद्भुत आहे, भंते! कारण या श्रेष्ठ पदाच्या बाबतीत शास्त्यांचे आणि त्यांच्या श्राविकेचे अर्थाशी अर्थ आणि व्यंजनाशी व्यंजन तंतोतंत जुळते आहे, सुसंगत आहे आणि त्यात कोणताही विरोध नाही. भंते, आता आम्ही निघतो. आम्हाला बरीच कामे आणि कर्तव्ये आहेत.” “महाराज, आता तुम्हाला जी योग्य वेळ वाटेल ती (तुम्ही करू शकता).” त्यानंतर कोसलचा राजा प्रसेनजित भगवंतांच्या भाषणाचे अभिनंदन व अनुमोदन करून, आसनावरून उठून, भगवंतांना अभिवादन व प्रदक्षिणा करून निघून गेला. पहिले (सुत्त समाप्त). ๒. อนุราธสุตฺตํ २. अनुराध सुत्त ๔๑๑. เอกํ สมยํ ภควา เวสาลิยํ วิหรติ มหาวเน กูฏาคารสาลายํ. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา อนุราโธ ภควโต อวิทูเร อรญฺญกุฏิกายํ วิหรติ. อถ โข สมฺพหุลา อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เยนายสฺมา อนุราโธ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา อนุราเธน สทฺธึ สมฺโมทึสุ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา อายสฺมนฺตํ อนุราธํ เอตทโวจุํ – ‘‘โย โส, อาวุโส อนุราธ, ตถาคโต อุตฺตมปุริโส ปรมปุริโส ปรมปตฺติปตฺโต, ตํ ตถาคโต อิเมสุ จตูสุ ฐาเนสุ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปติ – ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา, ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา, ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา, ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา’’ติ? ‘‘โย โส, อาวุโส, ตถาคโต อุตฺตมปุริโส ปรมปุริโส ปรมปตฺติปตฺโต, ตํ ตถาคโต อญฺญตฺร อิเมหิ จตูหิ ฐาเนหิ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปติ – ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา, ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา’’ติ. เอวํ วุตฺเต, เต อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา อายสฺมนฺตํ อนุราธํ เอตทโวจุํ – ‘‘โส จายํ ภิกฺขุ นโว ภวิสฺสติ อจิรปพฺพชิโต, เถโร วา ปน พาโล อพฺยตฺโต’’ติ. อถ โข เต อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา อายสฺมนฺตํ อนุราธํ นววาเทน จ พาลวาเทน จ อปสาเทตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกมึสุ. ४११. एकदा भगवान वैशाली येथील महावनातील कूटागारशाळेत विहार करत होते. त्या वेळी आयुष्यमान अनुराध भगवंतांपासून काही अंतरावर एका अरण्यकुटीत विहार करत होते. तेव्हा अनेक अन्यधर्मीय परिव्राजक आयुष्यमान अनुराधांकडे आले. आल्यानंतर त्यांनी आयुष्यमान अनुराधांशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण आटोपून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेले ते अन्यधर्मीय परिव्राजक आयुष्यमान अनुराधांना म्हणाले—'मित्र अनुराध, जे तथागत उत्तम पुरुष, परम पुरुष आणि परम प्राप्तीला पोहोचलेले आहेत, ते तथागत या चार पर्यायांपैकी कोणत्या पर्यायाने प्रज्ञप्त (वर्णन) करतात—"तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात", "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात", "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही", किंवा "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात आणि नसतात असेही नाही"?' 'मित्रांनो, जे तथागत उत्तम पुरुष, परम पुरुष आणि परम प्राप्तीला पोहोचलेले आहेत, ते तथागत या चार पर्यायांव्यतिरिक्त इतर प्रकारे प्रज्ञप्त करतात की—"तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात", "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात", "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही", किंवा "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात आणि नसतात असेही नाही".' असे म्हटल्यावर, ते अन्यधर्मीय परिव्राजक आयुष्यमान अनुराधांना म्हणाले—'हा भिक्खू नवीन असावा, ज्याने नुकतीच प्रव्रज्या घेतली आहे; किंवा जर तो थेर (ज्येष्ठ) असेल, तर तो मूर्ख आणि अज्ञानी असावा.' त्यानंतर ते अन्यधर्मीय परिव्राजक आयुष्यमान अनुराधांना 'नवशिका' आणि 'मूर्ख' असे म्हणून त्यांचा उपहास करून आसनावरून उठून निघून गेले. อถ โข อายสฺมโต อนุราธสฺส อจิรปกฺกนฺเตสุ อญฺญติตฺถิเยสุ ปริพฺพาชเกสุ เอตทโหสิ – ‘‘สเจ โข มํ เต อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา อุตฺตรึ ปุจฺเฉยฺยุํ, กถํ พฺยากรมาโน นุ ขฺวาหํ เตสํ อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ วุตฺตวาที เจว ภควโต อสฺสํ, น [Pg.550] จ ภควนฺตํ อภูเตน อพฺภาจิกฺเขยฺยํ, ธมฺมสฺส จานุธมฺมํ พฺยากเรยฺยํ, น จ โกจิ สหธมฺมิโก วาทานุวาโท คารยฺหํ ฐานํ อาคจฺเฉยฺยา’’ติ? อถ โข อายสฺมา อนุราโธ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อนุราโธ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธาหํ, ภนฺเต, ภควโต อวิทูเร อรญฺญกุฏิกายํ วิหรามิ. อถ โข, ภนฺเต, สมฺพหุลา อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เยนาหํ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา มยา สทฺธึ สมฺโมทึสุ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข, ภนฺเต, เต อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา มํ เอตทโวจุํ – ‘‘โย โส, อาวุโส อนุราธ, ตถาคโต อุตฺตมปุริโส ปรมปุริโส ปรมปตฺติปตฺโต, ตํ ตถาคโต อิเมสุ จตูสุ ฐาเนสุ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปติ – ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา’’ติ? เอวํ วุตฺตาหํ, ภนฺเต, เต อญฺญติตฺถิเย ปริพฺพาชเก เอตทโวจํ – ‘‘โย โส, อาวุโส, ตถาคโต อุตฺตมปุริโส ปรมปุริโส ปรมปตฺติปตฺโต, ตํ ตถาคโต อญฺญตฺร อิเมหิ จตูหิ ฐาเนหิ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปติ – ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา’’ติ. เอวํ วุตฺเต, ภนฺเต, เต อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา มํ เอตทโวจุํ – ‘‘โส จายํ ภิกฺขุ นโว ภวิสฺสติ อจิรปพฺพชิโต เถโร วา ปน พาโล อพฺยตฺโต’’ติ. อถ โข มํ, ภนฺเต, เต อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา นววาเทน จ พาลวาเทน จ อปสาเทตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกมึสุ. ตสฺส มยฺหํ, ภนฺเต, อจิรปกฺกนฺเตสุ เตสุ อญฺญติตฺถิเยสุ ปริพฺพาชเกสุ เอตทโหสิ – ‘‘สเจ โข มํ เต อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา อุตฺตรึ ปุจฺเฉยฺยุํ, กถํ พฺยากรมาโน นุ ขฺวาหํ เตสํ อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ วุตฺตวาที เจว ภควโต อสฺสํ, น จ ภควนฺตํ อภูเตน อพฺภาจิกฺเขยฺยํ, ธมฺมสฺส จานุธมฺมํ พฺยากเรยฺยํ, น จ โกจิ สหธมฺมิโก วาทานุวาโท คารยฺหํ ฐานํ อาคจฺเฉยฺยา’’ติ? त्यानंतर, ते अन्यधर्मीय परिव्राजक निघून गेल्यावर काही वेळातच आयुष्यमान अनुराधांच्या मनात असा विचार आला – “जर ते अन्यधर्मीय परिव्राजक मला यापुढे विचारतील, तर मी त्या अन्यधर्मीय परिव्राजकांना कशा प्रकारे उत्तर दिले पाहिजे जेणेकरून मी भगवंतांच्या वचनांनुसार बोलणारा ठरेन, भगवंतांवर असत्य आरोप करणार नाही, धर्माला अनुसरूनच उत्तर देईन आणि कोणताही सहधर्मीय वादविवाद किंवा आक्षेप निंदनीय ठरणार नाही?” त्यानंतर आयुष्यमान अनुराध जेथे भगवंत होते तेथे गेले; आणि भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान अनुराधांनी भगवंतांना असे म्हटले – “भन्ते, मी येथे भगवंतांच्या जवळच एका अरण्यकुटीत राहत आहे. त्यानंतर, भन्ते, अनेक अन्यधर्मीय परिव्राजक मी जेथे होतो तेथे आले; आणि त्यांनी माझ्याशी कुशल-मंगल विचारपूस केली. आनंददायी व संस्मरणीय संभाषण संपवून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसल्यावर, भन्ते, ते अन्यधर्मीय परिव्राजक मला म्हणाले – ‘आवुसो अनुराध, जो तो तथागत उत्तम पुरुष, परम पुरुष, परम प्राप्तीला पोहोचलेला आहे, त्या तथागतांना या चार गोष्टींमध्ये प्रज्ञापित करताना तथागत कसे प्रज्ञापित करतात – तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात, किंवा... तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात, किंवा... तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही, किंवा... तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही?’ असे विचारल्यावर, भन्ते, मी त्या अन्यधर्मीय परिव्राजकांना असे म्हटले – ‘आवुसो, जो तो तथागत उत्तम पुरुष, परम पुरुष, परम प्राप्तीला पोहोचलेला आहे, त्या तथागतांना या चार गोष्टींशिवाय प्रज्ञापित करताना तथागत कसे प्रज्ञापित करतात – तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात, किंवा... तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात, किंवा... तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही, किंवा... तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही?’ असे म्हटल्यावर, भन्ते, ते अन्यधर्मीय परिव्राजक मला म्हणाले – ‘हा भिक्खू नक्कीच नवीन असेल, ज्याने नुकतीच प्रव्रज्या घेतली आहे, किंवा जर तो थेर असेल, तर तो मूर्ख आणि अज्ञानी असेल.’ त्यानंतर, भन्ते, ते अन्यधर्मीय परिव्राजक मला ‘नवशिका’ आणि ‘मूर्ख’ असे म्हणून, माझा अनादर करून आसनावरून उठून निघून गेले. भन्ते, ते अन्यधर्मीय परिव्राजक निघून गेल्यावर काही वेळातच माझ्या मनात असा विचार आला – ‘जर ते अन्यधर्मीय परिव्राजक मला यापुढे विचारतील, तर मी त्या अन्यधर्मीय परिव्राजकांना कशा प्रकारे उत्तर दिले पाहिजे जेणेकरून मी भगवंतांच्या वचनांनुसार बोलणारा ठरेन, भगवंतांवर असत्य आरोप करणार नाही, धर्माला अनुसरूनच उत्तर देईन आणि कोणताही सहधर्मीय वादविवाद किंवा आक्षेप निंदनीय ठरणार नाही?’” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, อนุราธ, รูปํ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “अनुराध, तुला काय वाटते, रूप नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याविषयी ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘เวทนา นิจฺจา วา อนิจฺจา วา’’ติ?…เป… สญฺญา [Pg.551] …เป… สงฺขารา…เป… ‘‘วิญฺญาณํ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “वेदना नित्य आहे की अनित्य?”... “संज्ञा...”... “संस्कार...”... “विज्ञान नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याविषयी ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘ตสฺมาติห, อนุราธ, ยํ กิญฺจิ รูปํ อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺนํ อชฺฌตฺตํ วา พหิทฺธา วา โอฬาริกํ วา สุขุมํ วา หีนํ วา ปณีตํ วา ยํ ทูเร สนฺติเก วา, สพฺพํ รูปํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. ยา กาจิ เวทนา อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺนา…เป… ยา กาจิ สญฺญา…เป… เย เกจิ สงฺขารา…เป… ยํ กิญฺจิ วิญฺญาณํ อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺนํ อชฺฌตฺตํ วา พหิทฺธา วา โอฬาริกํ วา สุขุมํ วา หีนํ วา ปณีตํ วา ยํ ทูเร สนฺติเก วา, สพฺพํ วิญฺญาณํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ, อนุราธ, สุตวา อริยสาวโก รูปสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, เวทนายปิ นิพฺพินฺทติ, สญฺญายปิ นิพฺพินฺทติ, สงฺขาเรสุปิ นิพฺพินฺทติ, วิญฺญาณสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาติ. “म्हणूनच, अनुराध, भूत, भविष्य किंवा वर्तमान काळातील, अंतर्गत किंवा बाह्य, स्थूल किंवा सूक्ष्म, हीन किंवा प्रणीत, दूर किंवा जवळ असलेले कोणतेही रूप असो; त्या सर्व रूपांविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. कोणतीही वेदना असो... कोणतीही संज्ञा असो... कोणतेही संस्कार असोत... भूत, भविष्य किंवा वर्तमान काळातील, अंतर्गत किंवा बाह्य, स्थूल किंवा सूक्ष्म, हीन किंवा प्रणीत, दूर किंवा जवळ असलेले कोणतेही विज्ञान असो; त्या सर्व विज्ञानांविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा, अनुराध, श्रुतवान आर्यश्रावक रूपाविषयीही विरक्त होतो, वेदनेविषयीही विरक्त होतो, संज्ञेविषयीही विरक्त होतो, संस्कारांविषयीही विरक्त होतो आणि विज्ञानाविषयीही विरक्त होतो. विरक्त झाल्यामुळे तो आसक्तीरहित होतो; आसक्तीरहित झाल्यामुळे तो मुक्त होतो. मुक्त झाल्यावर ‘मी मुक्त झालो आहे’ असे ज्ञान त्याला होते. ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर पुन्हा काहीही करायचे उरलेले नाही’ हे तो जाणतो.” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, อนุราธ, รูปํ ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘เวทนํ ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘สญฺญํ ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘สงฺขาเร ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘วิญฺญาณํ ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, อนุราธ, รูปสฺมึ ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘อญฺญตฺร รูปา ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘เวทนาย…เป… อญฺญตฺร เวทนาย…เป… สญฺญาย…เป… อญฺญตฺร สญฺญาย…เป… สงฺขาเรสุ…เป… อญฺญตฺร สงฺขาเรหิ…เป… วิญฺญาณสฺมึ ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘อญฺญตฺร วิญฺญาณา ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “अनुराध, तुला काय वाटते, तू रूपाला तथागत मानतोस का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” “तू वेदनेला तथागत मानतोस का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” “तू संज्ञेला तथागत मानतोस का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” “तू संस्कारांना तथागत मानतोस का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” “तू विज्ञानाला तथागत मानतोस का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” “अनुराध, तुला काय वाटते, तू तथागतांना रूपात पाहतोस का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” “तू तथागतांना रूपाव्यतिरिक्त पाहतोस का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” “तू तथागतांना वेदनेत... वेदनेव्यतिरिक्त... संज्ञेत... संज्ञेव्यतिरिक्त... संस्कारांत... संस्कारांव्यतिरिक्त... विज्ञानात पाहतोस का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” “तू तथागतांना विज्ञानाव्यतिरिक्त पाहतोस का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, อนุราธ, รูปํ, เวทนํ, สญฺญํ, สงฺขาเร, วิญฺญาณํ ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, อนุราธ, อยํ โส อรูปี อเวทโน อสญฺญี อสงฺขาโร อวิญฺญาโณ ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘เอตฺถ จ เต, อนุราธ, ทิฏฺเฐว [Pg.552] ธมฺเม สจฺจโต เถตโต ตถาคเต อนุปลพฺภิยมาเน กลฺลํ นุ เต ตํ เวยฺยากรณํ – โย โส, อาวุโส, ตถาคโต อุตฺตมปุริโส ปรมปุริโส ปรมปตฺติปตฺโต, ตํ ตถาคโต อญฺญตฺร อิเมหิ จตูหิ ฐาเนหิ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปติ – ‘‘‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘สาธุ สาธุ, อนุราธ! ปุพฺเพ จาหํ, อนุราธ, เอตรหิ จ ทุกฺขญฺเจว ปญฺญาเปมิ ทุกฺขสฺส จ นิโรธ’’นฺติ. ทุติยํ. “अनुराधा, तुला काय वाटते? तू रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार आणि विज्ञानाला ‘तथागत’ म्हणून पाहतोस का?” “नाही, भन्ते.” “अनुराधा, तुला काय वाटते? हा जो रूपरहित, वेदनारहित, संज्ञारहित, संस्काररहित आणि विज्ञानरहित आहे, त्याला तू ‘तथागत’ म्हणून पाहतोस का?” “नाही, भन्ते.” “अनुराधा, जेव्हा याच जन्मात (दृष्टधर्मात) तथागत सत्यतः आणि निश्चितपणे उपलब्ध होत नाहीत, तर मग तुझे हे स्पष्टीकरण योग्य ठरेल का की—‘मित्रांनो, जो तो तथागत उत्तम पुरुष, परम पुरुष, परम प्राप्तीला प्राप्त झालेला आहे, त्याला या चार पर्यायांच्या व्यतिरिक्त इतर प्रकारे प्रज्ञापित (वर्णन) केले जाऊ शकते की—"तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात" किंवा... पे... "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही"?’” “नाही, भन्ते.” “साधू, साधू, अनुराधा! पूर्वीही आणि आताही, मी केवळ दुःख आणि दुःखाचा निरोधच प्रज्ञापित करतो.” दुसरे. ๓. ปฐมสาริปุตฺตโกฏฺฐิกสุตฺตํ ३. प्रथम सारिपुत्त-कोट्ठिक सुत्त ๔๑๒. เอกํ สมยํ อายสฺมา จ สาริปุตฺโต, อายสฺมา จ มหาโกฏฺฐิโก พาราณสิยํ วิหรนฺติ อิสิปตเน มิคทาเย. อถ โข อายสฺมา มหาโกฏฺฐิโก สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต เยนายสฺมา สาริปุตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา สาริปุตฺเตน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา มหาโกฏฺฐิโก อายสฺมนฺตํ สาริปุตฺตํ เอตทโวจ – ४१२. एका वेळी आयुष्यमान सारिपुत्त आणि आयुष्यमान महाकोट्ठिक वाराणसी येथे इसिपतन येथील मृगदावात विहार करत होते. तेव्हा आयुष्यमान महाकोट्ठिक संध्याकाळच्या वेळी ध्यानातून (एकांतातून) उठून जेथे आयुष्यमान सारिपुत्त होते तेथे गेले; तेथे जाऊन त्यांनी आयुष्यमान सारिपुत्त यांच्याशी कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण संपवून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसल्यावर आयुष्यमान महाकोट्ठिक आयुष्यमान सारिपुत्त यांना असे म्हणाले— ‘‘กึ นุ โข, อาวุโส สาริปุตฺต, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, อาวุโส, ภควตา – ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ ปนาวุโส, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, อาวุโส, อพฺยากตํ ภควตา – ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ นุ โข, อาวุโส, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, อาวุโส, ภควตา – ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ ปนาวุโส, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, อาวุโส, อพฺยากตํ ภควตา – ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. “मित्र सारिपुत्त, काय तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात?” “मित्रा, भगवंतांनी हे अव्याकृत (अस्पष्ट/अनुत्तरित) ठेवले आहे की—‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात.’” “पण मित्रा, काय तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात?” “मित्रा, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की—‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात.’” “पण मित्रा, काय तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही?” “मित्रा, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की—‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही.’” “पण मित्रा, काय तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही?” “मित्रा, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की—‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’” ‘‘‘กึ นุ โข, อาวุโส, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ อิติ ปุฏฺโฐ สมาโน, ‘อพฺยากตํ โข เอตํ, อาวุโส, ภควตา – โหติ ตถาคโต [Pg.553] ปรํ มรณา’ติ วเทสิ…เป… ‘กึ ปนาวุโส, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ อิติ ปุฏฺโฐ สมาโน – ‘เอตมฺปิ โข, อาวุโส, อพฺยากตํ ภควตา – เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ. โก นุ โข, อาวุโส, เหตุ, โก ปจฺจโย เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ? “‘मित्रा, काय तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात?’ असे विचारले असता, तू म्हणालास, ‘मित्रा, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की—तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’... पे... ‘पण मित्रा, काय तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही?’ असे विचारले असता, तू म्हणालास, ‘मित्रा, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की—तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’ मित्रा, याचे काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय (हेतू) आहे, ज्यामुळे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे?” ‘‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ โข, อาวุโส, รูปคตเมตํ. น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, รูปคตเมตํ. โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, รูปคตเมตํ. เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, รูปคตเมตํ. โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ โข, อาวุโส, เวทนาคตเมตํ. น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, เวทนาคตเมตํ. โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, เวทนาคตเมตํ. เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, เวทนาคตเมตํ. โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ โข, อาวุโส, สญฺญาคตเมตํ. น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, สญฺญาคตเมตํ. โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, สญฺญาคตเมตํ. เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, สญฺญาคตเมตํ. โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ โข, อาวุโส, สงฺขารคตเมตํ. น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, สงฺขารคตเมตํ. โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, สงฺขารคตเมตํ. เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, สงฺขารคตเมตํ. โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ โข, อาวุโส, วิญฺญาณคตเมตํ. น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, วิญฺญาณคตเมตํ. โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, วิญฺญาณคตเมตํ. เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, วิญฺญาณคตเมตํ. อยํ โข, อาวุโส, เหตุ อยํ ปจฺจโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ. ตติยํ. “मित्रा, ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ हा विचार रूपाशी संबंधित (रूपगत) आहे. ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात’ हा विचार रूपाशी संबंधित आहे. ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही’ हा विचार रूपाशी संबंधित आहे. ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ हा विचार रूपाशी संबंधित आहे. मित्रा, ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ हा विचार वेदनेशी संबंधित (वेदनागत) आहे... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ हा विचार वेदनेशी संबंधित आहे. मित्रा, ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ हा विचार संज्ञेशी संबंधित (संज्ञागत) आहे... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ हा विचार संज्ञेशी संबंधित आहे. मित्रा, ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ हा विचार संस्कारांशी संबंधित (संस्कारगत) आहे... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ हा विचार संस्कारांशी संबंधित आहे. मित्रा, ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ हा विचार विज्ञानाशी संबंधित (विज्ञानगत) आहे. ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात’ हा विचार विज्ञानाशी संबंधित आहे. ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही’ हा विचार विज्ञानाशी संबंधित आहे. ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ हा विचार विज्ञानाशी संबंधित आहे. मित्रा, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे.” तिसरे. ๔. ทุติยสาริปุตฺตโกฏฺฐิกสุตฺตํ ४. द्वितीय सारिपुत्त-कोट्ठिक सुत्त ๔๑๓. เอกํ สมยํ อายสฺมา จ สาริปุตฺโต, อายสฺมา จ มหาโกฏฺฐิโก พาราณสิยํ วิหรนฺติ อิสิปตเน มิคทาเย…เป… (สาเยว [Pg.554] ปุจฺฉา) ‘‘โก นุ โข, อาวุโส, เหตุ, โก ปจฺจโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ? ‘‘รูปํ โข, อาวุโส, อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, รูปสมุทยํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, รูปนิโรธํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, รูปนิโรธคามินึ ปฏิปทํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ; ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ; ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ; ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ. เวทนํ…เป… สญฺญํ…เป… สงฺขาเร…เป… วิญฺญาณํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, วิญฺญาณสมุทยํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, วิญฺญาณนิโรธํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, วิญฺญาณนิโรธคามินึ ปฏิปทํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ; ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ; ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ; ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติปิสฺส โหติ. ४१३. एका वेळी आयुष्यमान सारिपुत्त आणि आयुष्यमान महाकोट्ठिक वाराणसी येथे इसिपतन येथील मृगदावात विहार करत होते... पे... (तीच विचारणा) “मित्रा, याचे काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे?” “मित्रा, रूपाला यथार्थपणे (यथाभूत) न जाणणाऱ्या आणि न पाहणाऱ्याला, रूपाच्या उत्पत्तीला (समुदयाला) यथार्थपणे न जाणणाऱ्या आणि न पाहणाऱ्याला, रूपाच्या निरोधाला यथार्थपणे न जाणणाऱ्या आणि न पाहणाऱ्याला, रूपाच्या निरोधाकडे नेणाऱ्या मार्गाला (प्रतिपदेला) यथार्थपणे न जाणणाऱ्या आणि न पाहणाऱ्याला असे वाटते की—‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’; किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात’; किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही’; किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’ वेदनेला... पे... संज्ञेला... पे... संस्कारांना... पे... विज्ञानाला यथार्थपणे न जाणणाऱ्या आणि न पाहणाऱ्याला, विज्ञानाच्या उत्पत्तीला यथार्थपणे न जाणणाऱ्या आणि न पाहणाऱ्याला, विज्ञानाच्या निरोधाला यथार्थपणे न जाणणाऱ्या आणि न पाहणाऱ्याला, विज्ञानाच्या निरोधाकडे नेणाऱ्या मार्गाला यथार्थपणे न जाणणाऱ्या आणि न पाहणाऱ्याला असे वाटते की—‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’; किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात’; किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही’; किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’” ‘‘รูปญฺจ โข, อาวุโส, ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, รูปสมุทยํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, รูปนิโรธํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, รูปนิโรธคามินึ ปฏิปทํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ. เวทนํ…เป… สญฺญํ…เป… สงฺขาเร…เป… วิญฺญาณํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, วิญฺญาณสมุทยํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, วิญฺญาณนิโรธํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, วิญฺญาณนิโรธคามินึ ปฏิปทํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ; ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ; ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ; ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ. อยํ โข, อาวุโส, เหตุ อยํ ปจฺจโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ. จตุตฺถํ. “परंतु, आवुसो, जो रूपाला यथार्थपणे जाणतो आणि पाहतो, रूपाच्या उत्पत्तीला यथार्थपणे जाणतो आणि पाहतो, रूपाच्या निरोधाला यथार्थपणे जाणतो आणि पाहतो, रूपाच्या निरोधाकडे नेणाऱ्या मार्गाला यथार्थपणे जाणतो आणि पाहतो, त्याच्या मनात ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ असा विचार येत नाही... पे... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ असाही विचार येत नाही. वेदनेला... पे... संज्ञेला... पे... संस्कारांना... पे... विज्ञानाला यथार्थपणे जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्या, विज्ञानाच्या उत्पत्तीला यथार्थपणे जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्या, विज्ञानाच्या निरोधाला यथार्थपणे जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्या, विज्ञानाच्या निरोधाकडे नेणाऱ्या मार्गाला यथार्थपणे जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्या व्यक्तीच्या मनात ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ असा विचार येत नाही; ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात’ असा विचार येत नाही; ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही’ असा विचार येत नाही; ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ असा विचार येत नाही. आवुसो, हेच ते कारण आहे, हाच तो हेतू आहे, ज्यामुळे भगवंतांनी हे अव्याकृत (अनुत्तरित) ठेवले आहे.” चौथे. ๕. ตติยสาริปุตฺตโกฏฺฐิกสุตฺตํ ५. तृतीय सारिपुत्त-कोट्ठिक सुत्त ๔๑๔. เอกํ [Pg.555] สมยํ อายสฺมา จ สาริปุตฺโต, อายสฺมา จ มหาโกฏฺฐิโก พาราณสิยํ วิหรนฺติ อิสิปตเน มิคทาเย…เป… (สาเยว ปุจฺฉา) ‘‘โก นุ โข, อาวุโส, เหตุ โก ปจฺจโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ? ‘‘รูเป โข, อาวุโส, อวิคตราคสฺส อวิคตจฺฉนฺทสฺส อวิคตเปมสฺส อวิคตปิปาสสฺส อวิคตปริฬาหสฺส อวิคตตณฺหสฺส ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ. เวทนาย…เป… สญฺญาย…เป… สงฺขาเรสุ…เป… วิญฺญาเณ อวิคตราคสฺส อวิคตจฺฉนฺทสฺส อวิคตเปมสฺส อวิคตปิปาสสฺส อวิคตปริฬาหสฺส อวิคตตณฺหสฺส ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ. รูเป จ โข, อาวุโส, วิคตราคสฺส…เป… เวทนาย…เป… สญฺญาย…เป… สงฺขาเรสุ…เป… วิญฺญาเณ วิคตราคสฺส วิคตจฺฉนฺทสฺส วิคตเปมสฺส วิคตปิปาสสฺส วิคตปริฬาหสฺส วิคตตณฺหสฺส ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ. อยํ โข, อาวุโส, เหตุ, อยํ ปจฺจโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ. ปญฺจมํ. ४१४. एकदा आयुष्यमान सारिपुत्त आणि आयुष्यमान महाकोट्ठिक वाराणसी येथे इसिपतन येथील मृगदावात विहार करत होते... पे... (तीच विचारणा) “आवुसो, भगवंतांनी हे अव्याकृत का ठेवले आहे, याचे कारण काय आणि हेतू काय?” “आवुसो, ज्याचा रूपावरील राग दूर झालेला नाही, ज्याची इच्छा दूर झालेली नाही, ज्याचे प्रेम दूर झालेले नाही, ज्याची तृष्णा दूर झालेली नाही, ज्याचा परिदाह दूर झालेला नाही, ज्याची तण्हा (तृष्णा) दूर झालेली नाही, त्याच्या मनात ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ असा विचार येतो... पे... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ असा विचार येतो. वेदनेवर... पे... संज्ञेवर... पे... संस्कारांवर... पे... विज्ञानावर ज्याचा राग दूर झालेला नाही, ज्याची इच्छा दूर झालेली नाही, ज्याचे प्रेम दूर झालेले नाही, ज्याची तृष्णा दूर झालेली नाही, ज्याचा परिदाह दूर झालेला नाही, ज्याची तण्हा दूर झालेली नाही, त्याच्या मनात ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ असा विचार येतो... पे... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ असा विचार येतो. परंतु आवुसो, ज्याचा रूपावरील राग दूर झाला आहे... पे... वेदनेवरील... पे... संज्ञेवरील... पे... संस्कारांवरील... पे... विज्ञानावरील राग दूर झाला आहे, इच्छा दूर झाली आहे, प्रेम दूर झाले आहे, तृष्णा दूर झाली आहे, परिदाह दूर झाला आहे, तण्हा दूर झाली आहे, त्याच्या मनात ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ असा विचार येत नाही... पे... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ असा विचार येत नाही. आवुसो, हेच ते कारण आहे, हाच तो हेतू आहे, ज्यामुळे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे.” पाचवे. ๖. จตุตฺถสาริปุตฺตโกฏฺฐิกสุตฺตํ ६. चतुर्थ सारिपुत्त-कोट्ठिक सुत्त ๔๑๕. เอกํ สมยํ อายสฺมา จ สาริปุตฺโต, อายสฺมา จ มหาโกฏฺฐิโก พาราณสิยํ วิหรนฺติ อิสิปตเน มิคทาเย. อถ โข อายสฺมา สาริปุตฺโต สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต เยนายสฺมา มหาโกฏฺฐิโก เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา มหาโกฏฺฐิเกน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา สาริปุตฺโต อายสฺมนฺตํ มหาโกฏฺฐิกํ เอตทโวจ – ‘‘‘กึ นุ โข, อาวุโส โกฏฺฐิก, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ…เป… ‘กึ ปนาวุโส, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ อิติ ปุฏฺโฐ สมาโน – ‘เอตมฺปิ โข, อาวุโส, อพฺยากตํ ภควตา – เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต [Pg.556] ปรํ มรณา’ติ วเทสิ’’. ‘‘โก นุ โข, อาวุโส, เหตุ, โก ปจฺจโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ? ४१५. एकदा आयुष्यमान सारिपुत्त आणि आयुष्यमान महाकोट्ठिक वाराणसी येथे इसिपतन येथील मृगदावात विहार करत होते. तेव्हा आयुष्यमान सारिपुत्त संध्याकाळच्या वेळी ध्यानातून उठून जेथे आयुष्यमान महाकोट्ठिक होते तेथे गेले. तेथे जाऊन त्यांनी आयुष्यमान महाकोट्ठिक यांच्याशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेले आयुष्यमान सारिपुत्त आयुष्यमान महाकोट्ठिक यांना म्हणाले— “आवुसो कोट्ठिक, ‘काय तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात?’... पे... ‘आवुसो, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही का?’ असा प्रश्न विचारला असता, तुम्ही म्हणालात की, ‘आवुसो, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’ आवुसो, भगवंतांनी हे अव्याकृत का ठेवले आहे, याचे कारण काय आणि हेतू काय?” ‘‘รูปารามสฺส โข, อาวุโส, รูปรตสฺส รูปสมฺมุทิตสฺส รูปนิโรธํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ; ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ; ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ; ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ. เวทนารามสฺส โข, อาวุโส, เวทนารตสฺส เวทนาสมฺมุทิตสฺส, เวทนานิโรธํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ…เป… สญฺญารามสฺส โข, อาวุโส…เป… สงฺขารารามสฺส โข อาวุโส…เป… วิญฺญาณารามสฺส โข, อาวุโส, วิญฺญาณรตสฺส วิญฺญาณสมฺมุทิตสฺส วิญฺญาณนิโรธํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ’’. “आवुसो, जो रूपात रममाण होतो, रूपात आनंद घेतो, रूपात हर्षित होतो आणि रूपाच्या निरोधाला यथार्थपणे जाणत नाही व पाहत नाही, त्याच्या मनात ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ असा विचार येतो; ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात’ असा विचार येतो; ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही’ असा विचार येतो; ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ असा विचार येतो. आवुसो, जो वेदनेत रममाण होतो, वेदनेत आनंद घेतो, वेदनेत हर्षित होतो आणि वेदनेच्या निरोधाला यथार्थपणे जाणत नाही व पाहत नाही, त्याच्या मनात ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ असा विचार येतो... पे... संज्ञेत रममाण होणाऱ्या... पे... संस्कारांत रममाण होणाऱ्या... पे... आवुसो, जो विज्ञानात रममाण होतो, विज्ञानात आनंद घेतो, विज्ञानात हर्षित होतो आणि विज्ञानाच्या निरोधाला यथार्थपणे जाणत नाही व पाहत नाही, त्याच्या मनात ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ असा विचार येतो... पे... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ असा विचार येतो.” ‘‘น รูปารามสฺส โข, อาวุโส, น รูปรตสฺส น รูปสมฺมุทิตสฺส, รูปนิโรธํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ. น เวทนารามสฺส โข, อาวุโส…เป… น สญฺญารามสฺส โข, อาวุโส…เป… น สงฺขารารามสฺส โข, อาวุโส…เป… น วิญฺญาณารามสฺส โข, อาวุโส, น วิญฺญาณรตสฺส น วิญฺญาณสมฺมุทิตสฺส, วิญฺญาณนิโรธํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ. อยํ โข, อาวุโส, เหตุ, อยํ ปจฺจโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ. “परंतु आवुसो, जो रूपात रममाण होत नाही, रूपात आनंद घेत नाही, रूपात हर्षित होत नाही आणि रूपाच्या निरोधाला यथार्थपणे जाणतो व पाहतो, त्याच्या मनात ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ असा विचार येत नाही... पे... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ असा विचार येत नाही. जो वेदनेत रममाण होत नाही... पे... संज्ञेत रममाण होत नाही... पे... संस्कारांत रममाण होत नाही... पे... आवुसो, जो विज्ञानात रममाण होत नाही, विज्ञानात आनंद घेत नाही, विज्ञानात हर्षित होत नाही आणि विज्ञानाच्या निरोधाला यथार्थपणे जाणतो व पाहतो, त्याच्या मनात ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ असा विचार येत नाही... पे... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ असा विचार येत नाही. आवुसो, हेच ते कारण आहे, हाच तो हेतू आहे, ज्यामुळे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे.” ‘‘สิยา ปนาวุโส, อญฺโญปิ ปริยาโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ? ‘‘สิยา, อาวุโส. ภวารามสฺส โข, อาวุโส, ภวรตสฺส ภวสมฺมุทิตสฺส, ภวนิโรธํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ. น [Pg.557] ภวารามสฺส โข, อาวุโส, น ภวรตสฺส น ภวสมฺมุทิตสฺส, ภวนิโรธํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ. อยมฺปิ โข, อาวุโส, ปริยาโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ. “पण आवुसो, अशी दुसरी एखादी पद्धत (पर्याय) असू शकते का, ज्याद्वारे भगवंतांनी हे अव्याकृत (घोषित न केलेले) ठेवले आहे?” “असू शकते, आवुसो. जो भवामध्ये (अस्तित्वात) रमणारा, भवामध्ये आनंद घेणारा, भवामध्ये हर्ष मानणारा आहे आणि ज्याला भवाचा निरोध यथाभूत (जसा आहे तसा) माहीत नाही व दिसत नाही, त्याच्या मनात असे विचार येतात की: ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’... किंवा... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’ परंतु, आवुसो, जो भवामध्ये रमणारा नाही, भवामध्ये आनंद घेणारा नाही, भवामध्ये हर्ष मानणारा नाही आणि ज्याला भवाचा निरोध यथाभूत माहीत आहे व दिसतो, त्याच्या मनात असे विचार येत नाहीत की: ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’... किंवा... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’ आवुसो, हासुद्धा तो पर्याय आहे, ज्याद्वारे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे.” ‘‘สิยา ปนาวุโส, อญฺโญปิ ปริยาโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ? ‘‘สิยา, อาวุโส. อุปาทานารามสฺส โข, อาวุโส, อุปาทานรตสฺส อุปาทานสมฺมุทิตสฺส, อุปาทานนิโรธํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ. น อุปาทานารามสฺส โข, อาวุโส, น อุปาทานรตสฺส น อุปาทานสมฺมุทิตสฺส, อุปาทานนิโรธํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ…เป… ‘เนว, โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ. อยมฺปิ โข อาวุโส, ปริยาโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ. “पण आवुसो, अशी दुसरी एखादी पद्धत (पर्याय) असू शकते का, ज्याद्वारे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे?” “असू शकते, आवुसो. जो उपादानामध्ये (आसक्तीत) रमणारा, उपादानामध्ये आनंद घेणारा, उपादानामध्ये हर्ष मानणारा आहे आणि ज्याला उपादानाचा निरोध यथाभूत माहीत नाही व दिसत नाही, त्याच्या मनात असे विचार येतात की: ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’... किंवा... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’ परंतु, आवुसो, जो उपादानामध्ये रमणारा नाही, उपादानामध्ये आनंद घेणारा नाही, उपादानामध्ये हर्ष मानणारा नाही आणि ज्याला उपादानाचा निरोध यथाभूत माहीत आहे व दिसतो, त्याच्या मनात असे विचार येत नाहीत की: ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’... किंवा... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’ आवुसो, हासुद्धा तो पर्याय आहे, ज्याद्वारे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे.” ‘‘สิยา ปนาวุโส, อญฺโญปิ ปริยาโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ? ‘‘สิยา, อาวุโส. ตณฺหารามสฺส โข, อาวุโส, ตณฺหารตสฺส ตณฺหาสมฺมุทิตสฺส, ตณฺหานิโรธํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ. น ตณฺหารามสฺส โข, อาวุโส, น ตณฺหารตสฺส น ตณฺหาสมฺมุทิตสฺส, ตณฺหานิโรธํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ…เป. … ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ. อยมฺปิ โข, อาวุโส, ปริยาโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ. “पण आवुसो, अशी दुसरी एखादी पद्धत (पर्याय) असू शकते का, ज्याद्वारे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे?” “असू शकते, आवुसो. जो तण्हामध्ये (तृष्णेत) रमणारा, तण्हामध्ये आनंद घेणारा, तण्हामध्ये हर्ष मानणारा आहे आणि ज्याला तण्हा-निरोध (तृष्णेचा निरोध) यथाभूत माहीत नाही व दिसत नाही, त्याच्या मनात असे विचार येतात की: ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’... किंवा... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’ परंतु, आवुसो, जो तण्हामध्ये रमणारा नाही, तण्हामध्ये आनंद घेणारा नाही, तण्हामध्ये हर्ष मानणारा नाही आणि ज्याला तण्हा-निरोध यथाभूत माहीत आहे व दिसतो, त्याच्या मनात असे विचार येत नाहीत की: ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’... किंवा... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’ आवुसो, हासुद्धा तो पर्याय आहे, ज्याद्वारे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे.” ‘‘สิยา ปนาวุโส, อญฺโญปิ ปริยาโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ? ‘‘เอตฺถ ทานิ, อาวุโส สาริปุตฺต, อิโต อุตฺตริ กึ อิจฺฉสิ? ตณฺหาสงฺขยวิมุตฺตสฺส, อาวุโส สาริปุตฺต, ภิกฺขุโน วฏฺฏํ นตฺถิ ปญฺญาปนายา’’ติ. ฉฏฺฐํ. “पण आवुसो, अशी दुसरी एखादी पद्धत (पर्याय) असू शकते का, ज्याद्वारे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे?” “आता, आवुसो सारिपुत्त, यापेक्षा अधिक तुला काय हवे आहे? आवुसो सारिपुत्त, जो भिक्खू तृष्णेच्या क्षयामुळे विमुक्त झाला आहे, त्याच्या वर्णनासाठी (प्रज्ञप्तीसाठी) कोणतेही संसारचक्र शिल्लक राहत नाही.” (सहावे सूत्र समाप्त) ๗. โมคฺคลฺลานสุตฺตํ ७. मोग्गल्लान सुत्त ๔๑๖. อถ [Pg.558] โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา มหาโมคฺคลฺลาเนน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ เอตทโวจ – ४१६. तेव्हा वच्छगोत्त परिव्राजक जेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान होते तेथे गेला. तेथे पोहोचल्यावर त्याने आयुष्यमान महामोग्गल्लानांसोबत कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या वच्छगोत्त परिव्राजकाने आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना असे म्हटले – ‘‘กึ นุ โข, โภ โมคฺคลฺลาน, สสฺสโต โลโก’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – ‘สสฺสโต โลโก’’’ติ. ‘‘กึ ปน, โภ โมคฺคลฺลาน, อสสฺสโต โลโก’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ ภควตา – ‘อสสฺสโต โลโก’’’ติ. ‘‘กึ นุ โข, โภ โมคฺคลฺลาน, อนฺตวา โลโก’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – ‘อนฺตวา โลโก’’’ติ. ‘‘กึ ปน, โภ โมคฺคลฺลาน, อนนฺตวา โลโก’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ ภควตา – ‘อนนฺตวา โลโก’’’ติ. ‘‘กึ นุ โข, โภ โมคฺคลฺลาน, ตํ ชีวํ ตํ สรีร’’นฺติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – ‘ตํ ชีวํ ตํ สรีร’’’นฺติ. ‘‘กึ ปน, โภ โมคฺคลฺลาน, อญฺญํ ชีวํ อญฺญํ สรีร’’นฺติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ ภควตา – ‘อญฺญํ ชีวํ อญฺญํ สรีร’’’นฺติ. ‘‘กึ นุ โข, โภ โมคฺคลฺลาน, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ ปน, โภ โมคฺคลฺลาน, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ ภควตา – ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ นุ โข, โภ โมคฺคลฺลาน, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ ปน, โภ โมคฺคลฺลาน, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ ภควตา – ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. “हे मोग्गल्लान, काय लोक (विश्व) शाश्वत आहे?” “वच्छ, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की – ‘लोक शाश्वत आहे’.” “तर मग, हे मोग्गल्लान, लोक अशाश्वत आहे का?” “वच्छ, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – ‘लोक अशाश्वत आहे’.” “तर मग, हे मोग्गल्लान, लोक सान्त (मर्यादित) आहे का?” “वच्छ, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की – ‘लोक सान्त आहे’.” “तर मग, हे मोग्गल्लान, लोक अनन्त (अमर्यादित) आहे का?” “वच्छ, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – ‘लोक अनन्त आहे’.” “तर मग, हे मोग्गल्लान, जो जीव आहे तेच शरीर आहे का?” “वच्छ, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की – ‘जो जीव आहे तेच शरीर आहे’.” “तर मग, हे मोग्गल्लान, जीव वेगळा आणि शरीर वेगळे आहे का?” “वच्छ, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – ‘जीव वेगळा आणि शरीर वेगळे आहे’.” “तर मग, हे मोग्गल्लान, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात का?” “वच्छ, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की – ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’.” “तर मग, हे मोग्गल्लान, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात का?” “वच्छ, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात’.” “तर मग, हे मोग्गल्लान, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही का?” “वच्छ, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही’.” “तर मग, हे मोग्गल्लान, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही का?” “वच्छ, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’.” ‘‘โก นุ โข, โภ โมคฺคลฺลาน, เหตุ โก ปจฺจโย, เยน อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ ปุฏฺฐานํ เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – สสฺสโต โลโกติ วา, อสสฺสโต โลโกติ วา, อนฺตวา โลโกติ วา, อนนฺตวา โลโกติ วา, ตํ ชีวํ ตํ สรีรนฺติ วา, อญฺญํ ชีวํ อญฺญํ สรีรนฺติ วา, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, น โหติ ตถาคโต ปรํ [Pg.559] มรณาติ วา, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา? โก ปน, โภ โมคฺคลฺลาน, เหตุ โก ปจฺจโย, เยน สมณสฺส โคตมสฺส เอวํ ปุฏฺฐสฺส น เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – สสฺสโต โลโกติปิ, อสสฺสโต โลโกติปิ, อนฺตวา โลโกติปิ, อนนฺตวา โลโกติปิ, ตํ ชีวํ ตํ สรีรนฺติปิ, อญฺญํ ชีวํ อญฺญํ สรีรนฺติปิ, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติปิ, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติปิ, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติปิ, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติปี’’ติ? “हे मोग्गल्लान, याचे काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय (हेतू) आहे, ज्यामुळे इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे प्रश्न विचारले असता ते अशी उत्तरे देतात की – ‘लोक शाश्वत आहे’ किंवा ‘लोक अशाश्वत आहे’; ‘लोक सान्त आहे’ किंवा ‘लोक अनन्त आहे’; ‘जो जीव आहे तेच शरीर आहे’ किंवा ‘जीव वेगळा आणि शरीर वेगळे आहे’; ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात’ किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही’ किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’? परंतु, हे मोग्गल्लान, याचे काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे श्रमण गोतमांना असे प्रश्न विचारले असता ते अशी उत्तरे देत नाहीत की – ‘लोक शाश्वत आहे’ किंवा ‘लोक अशाश्वत आहे’; ‘लोक सान्त आहे’ किंवा ‘लोक अनन्त आहे’; ‘जो जीव आहे तेच शरीर आहे’ किंवा ‘जीव वेगळा आणि शरीर वेगळे आहे’; ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात’ किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही’ किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’?” ‘‘อญฺญติตฺถิยา โข, วจฺฉ, ปริพฺพาชกา จกฺขุํ ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสนฺติ…เป… ชิวฺหํ ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสนฺติ…เป… มนํ ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสนฺติ. ตสฺมา อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ ปุฏฺฐานํ เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – สสฺสโต โลโกติ วา…เป… เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา. ตถาคโต จ โข, วจฺฉ, อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ จกฺขุํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสติ…เป… ชิวฺหํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสติ…เป… มนํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสติ. ตสฺมา ตถาคตสฺส เอวํ ปุฏฺฐสฺส น เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – สสฺสโต โลโกติปิ…เป… เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติปี’’ติ. हे वच्छ, इतर पंथांचे परिव्राजक डोळ्याकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे पाहतात...पे... जिभेकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे पाहतात...पे... मनाकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे पाहतात. म्हणूनच, जेव्हा इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे प्रश्न विचारले जातात, तेव्हा त्यांचे उत्तर असे असते – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा ...पे... 'तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात'. परंतु, हे वच्छ, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध तथागत डोळ्याकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' असे पाहतात...पे... जिभेकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' असे पाहतात...पे... मनाकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' असे पाहतात. म्हणूनच, जेव्हा तथागतांना असे प्रश्न विचारले जातात, तेव्हा त्यांचे उत्तर असे होत नाही – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा ...पे... 'तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात' असे. อถ โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก อุฏฺฐายาสนา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข, โภ โคตม, สสฺสโต โลโก’’ติ? อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, มยา – ‘สสฺสโต โลโก’ติ…เป…. ‘‘กึ ปน, โภ โคตม, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ มยา – ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. तेव्हा वच्छगोत्त परिव्राजक आपल्या आसनावरून उठला आणि जेथे भगवान होते तेथे गेला; तिथे जाऊन त्याने भगवानांसोबत कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या वच्छगोत्त परिव्राजकाने भगवानांना असे विचारले – 'हे गौतम, काय लोक शाश्वत आहे?' 'हे वच्छ, मी हे घोषित केलेले नाही की – लोक शाश्वत आहे ...पे...।' 'पण, हे गौतम, तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात काय?' 'हे वच्छ, मी हे देखील घोषित केलेले नाही की – तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात'. ‘‘โก [Pg.560] นุ โข, โภ โคตม, เหตุ โก ปจฺจโย, เยน อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ ปุฏฺฐานํ เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติ วา…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา? โก ปน, โภ โคตม, เหตุ โก ปจฺจโย, เยน โภโต โคตมสฺส เอวํ ปุฏฺฐสฺส น เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติปิ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปี’’ติ? हे गौतम, कोणते कारण आणि कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे प्रश्न विचारले असता, ते असे उत्तर देतात – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा ...पे... 'तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात'? आणि हे गौतम, कोणते कारण आणि कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे आपणा गौतमांना असे प्रश्न विचारले असता, आपण असे उत्तर देत नाही – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा ...पे... 'तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात'? ‘‘อญฺญติตฺถิยา โข, วจฺฉ, ปริพฺพาชกา จกฺขุํ ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสนฺติ…เป… ชิวฺหํ ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสนฺติ…เป… มนํ ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสนฺติ. ตสฺมา อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ ปุฏฺฐานํ เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติ วา…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา. ตถาคโต จ โข, วจฺฉ, อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ จกฺขุํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสติ…เป… ชิวฺหํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสติ…เป… มนํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสติ. ตสฺมา ตถาคตสฺส เอวํ ปุฏฺฐสฺส น เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติปิ, ‘อสสฺสโต โลโก’ติปิ, ‘อนฺตวา โลโก’ติปิ, ‘อนนฺตวา โลโก’ติปิ, ‘ตํ ชีวํ ตํ สรีร’นฺติปิ, ‘อญฺญํ ชีวํ อญฺญํ สรีร’นฺติปิ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ, ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ, ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ, ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปี’’ติ. हे वच्छ, इतर पंथांचे परिव्राजक डोळ्याकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे पाहतात...पे... जिभेकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे पाहतात...पे... मनाकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे पाहतात. म्हणूनच, जेव्हा इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे प्रश्न विचारले जातात, तेव्हा त्यांचे उत्तर असे असते – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा ...पे... 'तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात'. परंतु, हे वच्छ, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध तथागत डोळ्याकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' असे पाहतात...पे... जिभेकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' असे पाहतात...पे... मनाकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' असे पाहतात. म्हणूनच, जेव्हा तथागतांना असे प्रश्न विचारले जातात, तेव्हा त्यांचे उत्तर असे होत नाही – 'लोक शाश्वत आहे', 'लोक अशाश्वत आहे', 'लोक सान्त आहे', 'लोक अनन्त आहे', 'तोच जीव आणि तेच शरीर आहे', 'जीव वेगळा आणि शरीर वेगळे आहे', 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात', 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात', 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही', 'तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात' असे. ‘‘อจฺฉริยํ, โภ โคตม, อพฺภุตํ, โภ โคตม! ยตฺร หิ นาม สตฺถุ จ สาวกสฺส จ อตฺเถน อตฺโถ พฺยญฺชเนน พฺยญฺชนํ สํสนฺทิสฺสติ สเมสฺสติ น วิโรธยิสฺสติ, ยทิทํ อคฺคปทสฺมึ. อิทานาหํ, โภ โคตม, สมณํ มหาโมคฺคลฺลานํ อุปสงฺกมิตฺวา เอตมตฺถํ อปุจฺฉึ. สมโณปิ เม โมคฺคลฺลาโน เอเตหิ ปเทหิ เอเตหิ พฺยญฺชเนหิ ตมตฺถํ พฺยากาสิ, เสยฺยถาปิ ภวํ โคตโม. อจฺฉริยํ, โภ โคตม, อพฺภุตํ, โภ โคตม[Pg.561]! ยตฺร หิ นาม สตฺถุ จ สาวกสฺส จ อตฺเถน อตฺโถ พฺยญฺชเนน พฺยญฺชนํ สํสนฺทิสฺสติ สเมสฺสติ น วิโรธยิสฺสติ, ยทิทํ อคฺคปทสฺมิ’’นฺติ. สตฺตมํ. आश्चर्यकारक आहे, हे गौतम! अद्भुत आहे, हे गौतम! कारण की, या परम पदाच्या बाबतीत शास्त्याचे आणि श्रावकाचे अर्थाशी अर्थ आणि व्यंजनाशी व्यंजन तंतोतंत जुळते, सुसंगत होते आणि विसंगत ठरत नाही. आत्ताच, हे गौतम, मी श्रमण महामोग्गल्लानांकडे जाऊन हाच विषय विचारला होता. श्रमण मोग्गल्लानांनी देखील याच पदांनी आणि याच व्यंजनांनी मला हाच अर्थ स्पष्ट केला, जसा आपण गौतम यांनी केला. आश्चर्यकारक आहे, हे गौतम! अद्भुत आहे, हे गौतम! कारण की, या परम पदाच्या बाबतीत शास्त्याचे आणि श्रावकाचे अर्थाशी अर्थ आणि व्यंजनाशी व्यंजन तंतोतंत जुळते, सुसंगत होते आणि विसंगत ठरत नाही. ๘. วจฺฉโคตฺตสุตฺตํ ८. वच्छगोत्तसुत्त ๔๑๗. อถ โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข, โภ โคตม, สสฺสโต โลโก’’ติ? อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, มยา – ‘สสฺสโต โลโก’ติ…เป…. ‘‘กึ ปน, โภ โคตม, ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ มยา – ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ४१७. तेव्हा वच्छगोत्त परिव्राजक जेथे भगवान होते तेथे गेला; तिथे जाऊन त्याने भगवानांसोबत कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या वच्छगोत्त परिव्राजकाने भगवानांना असे विचारले – 'हे गौतम, काय लोक शाश्वत आहे?' 'हे वच्छ, मी हे घोषित केलेले नाही की – लोक शाश्वत आहे ...पे...।' 'पण, हे गौतम, तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात काय?' 'हे वच्छ, मी हे देखील घोषित केलेले नाही की – तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात'. ‘‘โก นุ โข, โภ โคตม, เหตุ, โก ปจฺจโย, เยน อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ ปุฏฺฐานํ เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติ วา…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา? โก ปน, โภ โคตม, เหตุ, โก ปจฺจโย, เยน โภโต โคตมสฺส เอวํ ปุฏฺฐสฺส น เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติปิ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปี’’ติ? हे गौतम, कोणते कारण आणि कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे प्रश्न विचारले असता, ते असे उत्तर देतात – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा ...पे... 'तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात'? आणि हे गौतम, कोणते कारण आणि कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे आपणा गौतमांना असे प्रश्न विचारले असता, आपण असे उत्तर देत नाही – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा ...पे... 'तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात'? ‘‘อญฺญติตฺถิยา โข, วจฺฉ, ปริพฺพาชกา รูปํ อตฺตโต สมนุปสฺสนฺติ, รูปวนฺตํ วา อตฺตานํ, อตฺตนิ วา รูปํ, รูปสฺมึ วา อตฺตานํ. เวทนํ อตฺตโต สมนุปสฺสนฺติ…เป… สญฺญํ…เป… สงฺขาเร…เป… วิญฺญาณํ อตฺตโต สมนุปสฺสนฺติ, วิญฺญาณวนฺตํ วา อตฺตานํ, อตฺตนิ วา วิญฺญาณํ, วิญฺญาณสฺมึ วา อตฺตานํ. ตสฺมา อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ ปุฏฺฐานํ เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติ วา…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา. ตถาคโต จ โข, วจฺฉ, อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ น รูปํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, น รูปวนฺตํ วา อตฺตานํ, น อตฺตนิ วา รูปํ, น รูปสฺมึ วา อตฺตานํ. น เวทนํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ…เป… น สญฺญํ…เป… น สงฺขาเร…เป… น วิญฺญาณํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, น [Pg.562] วิญฺญาณวนฺตํ วา อตฺตานํ, น อตฺตนิ วา วิญฺญาณํ, น วิญฺญาณสฺมึ วา อตฺตานํ. ตสฺมา ตถาคตสฺส เอวํ ปุฏฺฐสฺส น เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติปิ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปี’’ติ. “हे वच्छ, इतर पंथांचे परिव्राजक रूपाला आत्मा म्हणून पाहतात, किंवा आत्म्याला रूपवान मानतात, किंवा आत्म्यामध्ये रूप पाहतात, किंवा रूपामध्ये आत्मा पाहतात. ते वेदनेला आत्मा म्हणून पाहतात... संज्ञेला... संस्कारांना... विज्ञानाला आत्मा म्हणून पाहतात, किंवा आत्म्याला विज्ञानवान मानतात, किंवा आत्म्यामध्ये विज्ञान पाहतात, किंवा विज्ञानामध्ये आत्मा पाहतात. म्हणूनच, इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे विचारले असता त्यांचे असे उत्तर असते – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा... 'तथागत मृत्यूनंतर न असतात, न नसतात' असे. परंतु, हे वच्छ, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध तथागत रूपाला आत्मा म्हणून पाहत नाहीत, किंवा आत्म्याला रूपवान मानत नाहीत, किंवा आत्म्यामध्ये रूप पाहत नाहीत, किंवा रूपामध्ये आत्मा पाहत नाहीत. ते वेदनेला आत्मा म्हणून पाहत नाहीत... संज्ञेला... संस्कारांना... विज्ञानाला आत्मा म्हणून पाहत नाहीत, किंवा आत्म्याला विज्ञानवान मानत नाहीत, किंवा आत्म्यामध्ये विज्ञान पाहत नाहीत, किंवा विज्ञानामध्ये आत्मा पाहत नाहीत. म्हणूनच, तथागतांना असे विचारले असता त्यांचे असे उत्तर नसते – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा... 'तथागत मृत्यूनंतर न असतात, न नसतात' असे.” อถ โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก อุฏฺฐายาสนา เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา มหาโมคฺคลฺลาเนน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข, โภ โมคฺคลฺลาน, สสฺสโต โลโก’’ติ? อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – ‘สสฺสโต โลโก’ติ…เป…. ‘‘กึ ปน, โภ โมคฺคลฺลาน, ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ ภควตา – ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. त्यानंतर वच्छगोत्त परिव्राजक आपल्या आसनावरून उठला आणि जेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान होते तेथे गेला. तेथे जाऊन त्याने आयुष्यमान महामोग्गल्लानांशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी व संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या वच्छगोत्त परिव्राजकाने आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना असे विचारले – “हे मोग्गल्लान, काय लोक शाश्वत आहे?” “वच्छ, भगवंतांनी हे अव्याकृत (अनुत्तरित) ठेवले आहे की – 'लोक शाश्वत आहे'... “पण, हे मोग्गल्लान, 'तथागत मृत्यूनंतर न असतात, न नसतात' काय?” “वच्छ, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – 'तथागत मृत्यूनंतर न असतात, न नसतात'.” ‘‘โก นุ โข, โภ โมคฺคลฺลาน, เหตุ, โก ปจฺจโย, เยน อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ ปุฏฺฐานํ เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติ วา…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา? โก ปน, โภ โมคฺคลฺลาน, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน สมณสฺส โคตมสฺส เอวํ ปุฏฺฐสฺส น เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติปิ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปี’’ติ? “हे मोग्गल्लान, याचे काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे विचारले असता त्यांचे असे उत्तर असते – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा... 'तथागत मृत्यूनंतर न असतात, न नसतात' असे? आणि हे मोग्गल्लान, याचे काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे श्रमण गोतमांना असे विचारले असता त्यांचे असे उत्तर नसते – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा... 'तथागत मृत्यूनंतर न असतात, न नसतात' असे?” ‘‘อญฺญติตฺถิยา โข, วจฺฉ, ปริพฺพาชกา รูปํ อตฺตโต สมนุปสฺสนฺติ, รูปวนฺตํ วา อตฺตานํ, อตฺตนิ วา รูปํ, รูปสฺมึ วา อตฺตานํ. เวทนํ อตฺตโต สมนุปสฺสนฺติ…เป… สญฺญํ…เป… สงฺขาเร…เป… วิญฺญาณํ อตฺตโต สมนุปสฺสนฺติ, วิญฺญาณวนฺตํ วา อตฺตานํ, อตฺตนิ วา วิญฺญาณํ, วิญฺญาณสฺมึ วา อตฺตานํ. ตสฺมา อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ ปุฏฺฐานํ เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติ วา…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา. ตถาคโต จ โข, วจฺฉ, อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ น รูปํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, น รูปวนฺตํ วา อตฺตานํ, น อตฺตนิ วา รูปํ, น รูปสฺมึ วา อตฺตานํ. น เวทนํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ…เป… น [Pg.563] สญฺญํ…เป… น สงฺขาเร…เป… น วิญฺญาณํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, น วิญฺญาณวนฺตํ วา อตฺตานํ, น อตฺตนิ วา วิญฺญาณํ, น วิญฺญาณสฺมึ วา อตฺตานํ. ตสฺมา ตถาคตสฺส เอวํ ปุฏฺฐสฺส น เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติปิ, ‘อสสฺสโต โลโก’ติปิ, ‘อนฺตวา โลโก’ติปิ, ‘อนนฺตวา โลโก’ติปิ, ‘ตํ ชีวํ ตํ สรีร’นฺติปิ, ‘อญฺญํ ชีวํ อญฺญํ สรีร’นฺติปิ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ, ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ, ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ, ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปี’’ติ. “वच्छ, इतर पंथांचे परिव्राजक रूपाला आत्मा म्हणून पाहतात, किंवा आत्म्याला रूपवान मानतात, किंवा आत्म्यामध्ये रूप पाहतात, किंवा रूपामध्ये आत्मा पाहतात. ते वेदनेला आत्मा म्हणून पाहतात... संज्ञेला... संस्कारांना... विज्ञानाला आत्मा म्हणून पाहतात, किंवा आत्म्याला विज्ञानवान मानतात, किंवा आत्म्यामध्ये विज्ञान पाहतात, किंवा विज्ञानामध्ये आत्मा पाहतात. म्हणूनच, इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे विचारले असता त्यांचे असे उत्तर असते – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा... 'तथागत मृत्यूनंतर न असतात, न नसतात' असे. परंतु, वच्छ, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध तथागत रूपाला आत्मा म्हणून पाहत नाहीत, किंवा आत्म्याला रूपवान मानत नाहीत, किंवा आत्म्यामध्ये रूप पाहत नाहीत, किंवा रूपामध्ये आत्मा पाहत नाहीत. ते वेदनेला आत्मा म्हणून पाहत नाहीत... संज्ञेला... संस्कारांना... विज्ञानाला आत्मा म्हणून पाहत नाहीत, किंवा आत्म्याला विज्ञानवान मानत नाहीत, किंवा आत्म्यामध्ये विज्ञान पाहत नाहीत, किंवा विज्ञानामध्ये आत्मा पाहत नाहीत. म्हणूनच, तथागतांना असे विचारले असता त्यांचे असे उत्तर नसते – 'लोक शाश्वत आहे' असेही नाही, 'लोक अशाश्वत आहे' असेही नाही, 'लोक सान्त आहे' असेही नाही, 'लोक अनन्त आहे' असेही नाही, 'तोच जीव आणि तेच शरीर आहे' असेही नाही, 'जीव वेगळा आणि शरीर वेगळे आहे' असेही नाही, 'तथागत मृत्यूनंतर असतात' असेही नाही, 'तथागत मृत्यूनंतर नसतात' असेही नाही, 'तथागत मृत्यूनंतर असतात आणि नसतातही' असेही नाही, 'तथागत मृत्यूनंतर न असतात, न नसतात' असेही नाही.” ‘‘อจฺฉริยํ, โภ โมคฺคลฺลาน, อพฺภุตํ, โภ โมคฺคลฺลาน! ยตฺร หิ นาม สตฺถุ จ สาวกสฺส จ อตฺเถน อตฺโถ พฺยญฺชเนน พฺยญฺชนํ สํสนฺทิสฺสติ, สเมสฺสติ, น วิโรธยิสฺสติ, ยทิทํ อคฺคปทสฺมึ. อิทานาหํ, โภ โมคฺคลฺลาน, สมณํ โคตมํ อุปสงฺกมิตฺวา เอตมตฺถํ อปุจฺฉึ. สมโณปิ เม โคตโม เอเตหิ ปเทหิ เอเตหิ พฺยญฺชเนหิ เอตมตฺถํ พฺยากาสิ, เสยฺยถาปิ ภวํ โมคฺคลฺลาโน. อจฺฉริยํ, โภ โมคฺคลฺลาน, อพฺภุตํ, โภ โมคฺคลฺลาน! ยตฺร หิ นาม สตฺถุ จ สาวกสฺส จ อตฺเถน อตฺโถ พฺยญฺชเนน พฺยญฺชนํ สํสนฺทิสฺสติ สเมสฺสติ น วิโรธยิสฺสติ, ยทิทํ อคฺคปทสฺมิ’’นฺติ. อฏฺฐมํ. “आश्चर्यकारक आहे, हे मोग्गल्लान! अद्भुत आहे, हे मोग्गल्लान! कारण की, या परम पदाच्या बाबतीत शास्त्यांचे आणि श्रावकाचे अर्थाशी अर्थ आणि व्यंजनाशी व्यंजन तंतोतंत जुळते, समान होते आणि विसंगत ठरत नाही. हे मोग्गल्लान, नुकतेच मी श्रमण गोतमांकडे जाऊन त्यांना याविषयी विचारले होते. श्रमण गोतमांनीही मला याच पदांनी आणि याच व्यंजनांनी हाच अर्थ स्पष्ट केला, जसा आपण, पूज्य मोग्गल्लानांनी केला. आश्चर्यकारक आहे, हे मोग्गल्लान! अद्भुत आहे, हे मोग्गल्लान! कारण की, या परम पदाच्या बाबतीत शास्त्यांचे आणि श्रावकाचे अर्थाशी अर्थ आणि व्यंजनाशी व्यंजन तंतोतंत जुळते, समान होते आणि विसंगत ठरत नाही.” आठवे सूत्र समाप्त. ๙. กุตูหลสาลาสุตฺตํ ९. कुतूहलशाला सूत्र ๔๑๘. อถ โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ४१८. त्यानंतर वच्छगोत्त परिव्राजक जेथे भगवंत होते तेथे गेला. तेथे जाऊन त्याने भगवंतांशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी व संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या वच्छगोत्त परिव्राजकाने भगवंतांना असे विचारले – ‘‘ปุริมานิ, โภ โคตม, ทิวสานิ ปุริมตรานิ สมฺพหุลานํ นานาติตฺถิยานํ สมณพฺราหฺมณานํ ปริพฺพาชกานํ กุตูหลสาลายํ สนฺนิสินฺนานํ สนฺนิปติตานํ อยมนฺตรากถา อุทปาทิ – ‘อยํ โข ปูรโณ กสฺสโป สงฺฆี เจว คณี จ คณาจริโย จ ญาโต ยสสฺสี ติตฺถกโร สาธุสมฺมโต พหุชนสฺส. โสปิ สาวกํ อพฺภตีตํ กาลงฺกตํ อุปปตฺตีสุ พฺยากโรติ – ‘อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน, อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน’ติ. โยปิสฺส [Pg.564] สาวโก อุตฺตมปุริโส ปรมปุริโส ปรมปตฺติปตฺโต ตมฺปิ สาวกํ อพฺภตีตํ กาลงฺกตํ อุปปตฺตีสุ พฺยากโรติ – ‘อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน, อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน’’’ติ. “हे गोतम, काही दिवसांपूर्वी, विविध पंथांचे अनेक श्रमण, ब्राह्मण आणि परिव्राजक कुतूहलशाळेत एकत्र जमले असताना त्यांच्यात असा संवाद सुरू झाला – 'हा पूरण कस्सप संघाचा नायक, गणाचा नायक, गणाचार्य, प्रसिद्ध, यशस्वी, पंथसंस्थापक आणि बहुसंख्य लोकांद्वारे साधू मानला गेलेला आहे. तो आपल्या मृत झालेल्या शिष्यांच्या पुनर्जन्माविषयी भाकीत करतो की – 'अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे, अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे.' त्याचा जो शिष्य उत्तम पुरुष, परम पुरुष, परम प्राप्तीला पोहोचलेला असतो, त्या मृत शिष्याविषयीही तो भाकीत करतो की – 'अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे, अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे.'” ‘‘อยมฺปิ โข มกฺขลิ โคสาโล…เป… อยมฺปิ โข นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต…เป… อยมฺปิ โข สญฺจโย เพลฏฺฐปุตฺโต…เป… อยมฺปิ โข ปกุโธ กจฺจาโน…เป… อยมฺปิ โข อชิโต เกสกมฺพโล สงฺฆี เจว คณี จ คณาจริโย จ ญาโต ยสสฺสี ติตฺถกโร สาธุสมฺมโต พหุชนสฺส. โสปิ สาวกํ อพฺภตีตํ กาลงฺกตํ อุปปตฺตีสุ พฺยากโรติ – ‘อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน, อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน’ติ. โยปิสฺส สาวโก อุตฺตมปุริโส ปรมปุริโส ปรมปตฺติปตฺโต ตมฺปิ สาวกํ อพฺภตีตํ กาลงฺกตํ อุปปตฺตีสุ พฺยากโรติ – ‘อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน, อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน’’’ติ. हा मक्खलि गोसाल देखील... हा निगण्ठ नाटपुत्त देखील... हा संजय बेलट्ठिपुत्त देखील... हा पकुध कच्चायन देखील... हा अजित केसकम्बल देखील संघनायक, गणप्रमुख, गणाचार्य, प्रसिद्ध, कीर्तिमान, पंथसंस्थापक आणि बहुसंख्य लोकांद्वारे सत्पुरुष मानला गेलेला आहे. तो देखील आपल्या मृत व दिवंगत झालेल्या शिष्यांच्या पुनर्जन्माविषयी घोषित करतो की – 'अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे, अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे.' त्याचा जो शिष्य उत्तम पुरुष, परम पुरुष, परम प्राप्तीला पोहोचलेला असतो, त्या मृत व दिवंगत शिष्याविषयी देखील तो पुनर्जन्माबाबत घोषित करतो की – 'अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे, अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे.' ‘‘อยมฺปิ โข สมโณ โคตโม สงฺฆี เจว คณี จ คณาจริโย จ ญาโต ยสสฺสี ติตฺถกโร สาธุสมฺมโต พหุชนสฺส. โสปิ สาวกํ อพฺภตีตํ กาลงฺกตํ อุปปตฺตีสุ พฺยากโรติ – ‘อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน, อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน’ติ. โยปิสฺส สาวโก อุตฺตมปุริโส ปรมปุริโส ปรมปตฺติปตฺโต ตญฺจ สาวกํ อพฺภตีตํ กาลงฺกตํ อุปปตฺตีสุ น พฺยากโรติ – ‘อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน, อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน’ติ. อปิ จ โข นํ เอวํ พฺยากโรติ – ‘อจฺเฉจฺฉิ ตณฺหํ, วิวตฺตยิ สํโยชนํ, สมฺมา มานาภิสมยา อนฺตมกาสิ ทุกฺขสฺสา’ติ. ตสฺส มยฺหํ, โภ โคตม, อหุ เทว กงฺขา, อหุ วิจิกิจฺฉา – ‘กถํ นาม สมณสฺส โคตมสฺส ธมฺโม อภิญฺเญยฺโย’’’ติ ? हे श्रमण गौतम देखील संघनायक, गणप्रमुख, गणाचार्य, प्रसिद्ध, कीर्तिमान, पंथसंस्थापक आणि बहुसंख्य लोकांद्वारे सत्पुरुष मानले गेलेले आहेत. ते देखील आपल्या मृत व दिवंगत झालेल्या शिष्यांच्या पुनर्जन्माविषयी घोषित करतात की – 'अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे, अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे.' परंतु, त्यांचा जो शिष्य उत्तम पुरुष, परम पुरुष, परम प्राप्तीला पोहोचलेला असतो, त्या मृत व दिवंगत शिष्याविषयी मात्र ते पुनर्जन्माबाबत घोषित करत नाहीत की – 'अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे, अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे.' उलट, ते त्याच्याविषयी असे घोषित करतात की – 'त्याने तृष्णा नष्ट केली आहे, संयोजनांना (बंधनांना) तोडले आहे आणि मानाचे (अहंकाराचे) सम्यक् आकलन करून दुःखाचा अंत केला आहे.' हे गौतम, यामुळे माझ्या मनात शंका आणि संभ्रम निर्माण झाला की – 'श्रमण गौतमांचा धर्म नेमका कसा समजून घ्यावा?' ‘‘อลญฺหิ เต, วจฺฉ, กงฺขิตุํ, อลํ วิจิกิจฺฉิตุํ. กงฺขนีเย จ ปน เต ฐาเน วิจิกิจฺฉา อุปฺปนฺนา. สอุปาทานสฺส ขฺวาหํ, วจฺฉ, อุปปตฺตึ ปญฺญาเปมิ โน อนุปาทานสฺส. เสยฺยถาปิ, วจฺฉ, อคฺคิ สอุปาทาโน ชลติ, โน อนุปาทาโน; เอวเมว ขฺวาหํ, วจฺฉ, สอุปาทานสฺส อุปปตฺตึ ปญฺญาเปมิ, โน อนุปาทานสฺสา’’ติ. हे वच्छ, तुझ्या मनात शंका निर्माण होणे स्वाभाविक आहे, संभ्रम निर्माण होणे योग्यच आहे. शंका घेण्यासारख्याच बाबतीत तुला संभ्रम निर्माण झाला आहे. वच्छ, मी उपादान (आसक्ती) असलेल्याचाच पुनर्जन्म प्रज्ञापित करतो, उपादान नसलेल्याचा नाही. वच्छ, ज्याप्रमाणे इंधन (उपादान) असेपर्यंतच अग्नी जळतो, इंधनाशिवाय नाही; त्याचप्रमाणे, वच्छ, मी उपादान असलेल्याचाच पुनर्जन्म प्रज्ञापित करतो, उपादान नसलेल्याचा नाही. ‘‘ยสฺมึ[Pg.565], โภ โคตม, สมเย อจฺจิ วาเตน ขิตฺตา ทูรมฺปิ คจฺฉติ, อิมสฺส ปน ภวํ โคตโม กึ อุปาทานสฺมึ ปญฺญาเปตี’’ติ? ‘‘ยสฺมึ โข, วจฺฉ, สมเย อจฺจิ วาเตน ขิตฺตา ทูรมฺปิ คจฺฉติ, ตมหํ วาตูปาทานํ ปญฺญาเปมิ. วาโต หิสฺส, วจฺฉ, ตสฺมึ สมเย อุปาทานํ โหตี’’ติ. ‘‘ยสฺมิญฺจ ปน, โภ โคตม, สมเย อิมญฺจ กายํ นิกฺขิปติ, สตฺโต จ อญฺญตรํ กายํ อนุปปนฺโน โหติ, อิมสฺส ปน ภวํ โคตโม กึ อุปาทานสฺมึ ปญฺญาเปตี’’ติ? ‘‘ยสฺมึ โข, วจฺฉ, สมเย อิมญฺจ กายํ นิกฺขิปติ, สตฺโต จ อญฺญตรํ กายํ อนุปปนฺโน โหติ, ตมหํ ตณฺหูปาทานํ วทามิ. ตณฺหา หิสฺส, วจฺฉ, ตสฺมึ สมเย อุปาทานํ โหตี’’ติ. นวมํ. हे गौतम, ज्या वेळी वाऱ्याने उडालेली अग्नीची ज्वाला दूरवर जाते, त्या वेळी आपण त्या ज्वालेचे उपादान (इंधन) काय असल्याचे प्रज्ञापित करता? वच्छ, ज्या वेळी वाऱ्याने उडालेली अग्नीची ज्वाला दूरवर जाते, त्या वेळी मी 'वारा' हेच तिचे उपादान असल्याचे प्रज्ञापित करतो. कारण वच्छ, त्या वेळी वाराच तिचे उपादान असते. आणि हे गौतम, ज्या वेळी प्राणी या शरीराचा त्याग करतो आणि अद्याप दुसऱ्या शरीरात उत्पन्न झालेला नसतो, त्या वेळी आपण त्याचे उपादान काय असल्याचे प्रज्ञापित करता? वच्छ, ज्या वेळी प्राणी या शरीराचा त्याग करतो आणि अद्याप दुसऱ्या शरीरात उत्पन्न झालेला नसतो, त्या वेळी मी 'तृष्णा' हेच त्याचे उपादान असल्याचे सांगतो. कारण वच्छ, त्या वेळी तृष्णाच त्याचे उपादान असते. (नववे सूत्र समाप्त) ๑๐. อานนฺทสุตฺตํ १०. आनंदसुत्त ๔๑๙. อถ โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข, โภ โคตม, อตฺถตฺตา’’ติ? เอวํ วุตฺเต, ภควา ตุณฺหี อโหสิ. ‘‘กึ ปน, โภ โคตม, นตฺถตฺตา’’ติ? ทุติยมฺปิ โข ภควา ตุณฺหี อโหสิ. อถ โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก อุฏฺฐายาสนา ปกฺกามิ. ४१९. त्यानंतर वच्छगोत्त परिव्राजक जेथे भगवान होते तेथे गेला. तिथे पोहोचून त्याने भगवंतांसोबत कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या वच्छगोत्त परिव्राजकाने भगवंतांना विचारले – 'हे गौतम, आत्मा अस्तित्वात आहे का?' असे विचारले असता, भगवान मौन राहिले. 'तर मग हे गौतम, आत्मा अस्तित्वात नाही का?' दुसऱ्यांदा विचारले असता देखील भगवान मौनच राहिले. त्यानंतर वच्छगोत्त परिव्राजक आपल्या आसनावरून उठून निघून गेला. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท อจิรปกฺกนฺเต วจฺฉโคตฺเต ปริพฺพาชเก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข, ภนฺเต, ภควา วจฺฉโคตฺตสฺส ปริพฺพาชกสฺส ปญฺหํ ปุฏฺโฐ น พฺยากาสี’’ติ? ‘‘อหญฺจานนฺท, วจฺฉโคตฺตสฺส ปริพฺพาชกสฺส ‘อตฺถตฺตา’ติ ปุฏฺโฐ สมาโน ‘อตฺถตฺตา’ติ พฺยากเรยฺยํ, เย เต, อานนฺท, สมณพฺราหฺมณา สสฺสตวาทา เตสเมตํ สทฺธึ อภวิสฺส. อหญฺจานนฺท, วจฺฉโคตฺตสฺส ปริพฺพาชกสฺส ‘นตฺถตฺตา’ติ ปุฏฺโฐ สมาโน ‘นตฺถตฺตา’ติ พฺยากเรยฺยํ, เย เต, อานนฺท, สมณพฺราหฺมณา อุจฺเฉทวาทา เตสเมตํ สทฺธึ อภวิสฺส. อหญฺจานนฺท, วจฺฉโคตฺตสฺส ปริพฺพาชกสฺส ‘อตฺถตฺตา’ติ ปุฏฺโฐ สมาโน ‘อตฺถตฺตา’ติ พฺยากเรยฺยํ, อปิ นุ เม ตํ, อานนฺท, อนุโลมํ อภวิสฺส ญาณสฺส อุปฺปาทาย – ‘สพฺเพ ธมฺมา อนตฺตา’’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘อหญฺจานนฺท, วจฺฉโคตฺตสฺส ปริพฺพาชกสฺส [Pg.566] ‘นตฺถตฺตา’ติ ปุฏฺโฐ สมาโน ‘นตฺถตฺตา’ติ พฺยากเรยฺยํ, สมฺมูฬฺหสฺส, อานนฺท, วจฺฉโคตฺตสฺส ปริพฺพาชกสฺส ภิยฺโย สมฺโมหาย อภวิสฺส – ‘อหุวา เม นูน ปุพฺเพ อตฺตา, โส เอตรหิ นตฺถี’’’ติ. ทสมํ. त्यानंतर, वच्छगोत्त परिव्राजक निघून गेल्यावर काही वेळातच आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांना विचारले – 'भन्ते, भगवंतांनी वच्छगोत्त परिव्राजकाच्या प्रश्नाचे उत्तर का दिले नाही?' 'आनंदा, जर मी वच्छगोत्त परिव्राजकाच्या "आत्मा अस्तित्वात आहे का?" या प्रश्नाला "आत्मा अस्तित्वात आहे" असे उत्तर दिले असते, तर आनंदा, ते शाश्वतवादी श्रमण-ब्राह्मणांच्या मताशी सुसंगत ठरले असते. आणि आनंदा, जर मी वच्छगोत्त परिव्राजकाच्या "आत्मा अस्तित्वात नाही का?" या प्रश्नाला "आत्मा अस्तित्वात नाही" असे उत्तर दिले असते, तर आनंदा, ते उच्छेदवादी श्रमण-ब्राह्मणांच्या मताशी सुसंगत ठरले असते. आनंदा, जर मी वच्छगोत्त परिव्राजकाच्या "आत्मा अस्तित्वात आहे का?" या प्रश्नाला "आत्मा अस्तित्वात आहे" असे उत्तर दिले असते, तर आनंदा, "सर्व धर्म अनात्म आहेत" हे ज्ञान उत्पन्न होण्यास ते सुसंगत ठरले असते का?' 'नाही, भन्ते.' 'आणि आनंदा, जर मी वच्छगोत्त परिव्राजकाच्या "आत्मा अस्तित्वात नाही का?" या प्रश्नाला "आत्मा अस्तित्वात नाही" असे उत्तर दिले असते, तर आधीच संभ्रमात असलेला वच्छगोत्त परिव्राजक अधिकच संभ्रमात पडला असता की – "माझा आत्मा पूर्वी नक्कीच अस्तित्वात होता, तो आता नाहीसा झाला आहे."' (दहावे सूत्र समाप्त) ๑๑. สภิยกจฺจานสุตฺตํ ११. सभियकच्चानसुत्त ๔๒๐. เอกํ สมยํ อายสฺมา สภิโย กจฺจาโน ญาติเก วิหรติ คิญฺชกาวสเถ. อถ โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก เยนายสฺมา สภิโย กจฺจาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา สภิเยน กจฺจาเนน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก อายสฺมนฺตํ สภิยํ กจฺจานํ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข โภ, กจฺจาน, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ ปน, โภ กจฺจาน, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ ภควตา – ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ४२०. एकदा आयुष्यमान सभिय कच्चान ज्ञातीक येथील विटांच्या विहारात (गिंजकावसथ) विहार करत होते. त्या वेळी वच्छगोत्त परिव्राजक जेथे आयुष्यमान सभिय कच्चान होते तेथे गेला. तिथे पोहोचून त्याने आयुष्यमान सभिय कच्चान यांच्याशी कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या वच्छगोत्त परिव्राजकाने आयुष्यमान सभिय कच्चान यांना विचारले – 'हे कच्चान, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहतात का?' 'वच्छ, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की – "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहतात."' 'तर मग हे कच्चान, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहत नाहीत का?' 'वच्छ, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहत नाहीत."' ‘‘กึ นุ โข, โภ กจฺจาน, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ ปน, โภ กจฺจาน, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ ภควตา – ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. 'हे कच्चान, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहतात आणि राहतही नाहीत का?' 'वच्छ, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की – "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहतात आणि राहतही नाहीत."' 'तर मग हे कच्चान, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहतही नाहीत आणि असेही नाही की ते राहत नाहीत का?' 'वच्छ, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहतही नाहीत आणि असेही नाही की ते राहत नाहीत."' ‘‘‘กึ นุ โข, โภ กจฺจาน, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ, อิติ ปุฏฺโฐ สมาโน – ‘อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ. ‘กึ ปน, โภ กจฺจาน, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ, อิติ ปุฏฺโฐ สมาโน – ‘อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ. ‘กึ นุ โข, โภ กจฺจาน, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ, อิติ ปุฏฺโฐ สมาโน – ‘อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ. ‘กึ ปน, โภ กจฺจาน, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ, อิติ ปุฏฺโฐ สมาโน – ‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ ภควตา – เนว โหติ น [Pg.567] น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ. โก นุ โข, โภ กจฺจาน, เหตุ, โก ปจฺจโย, เยเนตํ อพฺยากตํ สมเณน โคตเมนา’’ติ? ‘‘โย จ, วจฺฉ, เหตุ, โย จ ปจฺจโย ปญฺญาปนาย รูปีติ วา อรูปีติ วา สญฺญีติ วา อสญฺญีติ วา เนวสญฺญีนาสญฺญีติ วา, โส จ เหตุ, โส จ ปจฺจโย สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ อปริเสสํ นิรุชฺเฌยฺย. เกน นํ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย รูปีติ วา อรูปีติ วา สญฺญีติ วา อสญฺญีติ วา เนวสญฺญีนาสญฺญีติ วา’’ติ. ‘‘กีวจิรํ ปพฺพชิโตสิ, โภ กจฺจานา’’ติ? ‘‘นจิรํ, อาวุโส, ตีณิ วสฺสานี’’ติ. ‘‘ยสฺสป’สฺส, อาวุโส, เอตเมตฺตเกน เอตฺตกเมว ตํป’สฺส พหุ, โก ปน วาโท เอวํ อภิกฺกนฺเต’’ติ! เอกาทสมํ. “‘हे कच्चान, मृत्यूनंतर तथागत अस्तित्वात असतात का?’ असा प्रश्न विचारला असता, तुम्ही म्हणालात की, ‘वच्छा, भगवंतांनी हे अव्याकृत (अनुत्तरित) ठेवले आहे की मृत्यूनंतर तथागत अस्तित्वात असतात.’ ‘पण हे कच्चान, मृत्यूनंतर तथागत अस्तित्वात नसतात का?’ असा प्रश्न विचारला असता, तुम्ही म्हणालात की, ‘वच्छा, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की मृत्यूनंतर तथागत अस्तित्वात नसतात.’ ‘हे कच्चान, मृत्यूनंतर तथागत अस्तित्वात असतात आणि नसतातही का?’ असा प्रश्न विचारला असता, तुम्ही म्हणालात की, ‘वच्छा, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की मृत्यूनंतर तथागत अस्तित्वात असतात आणि नसतातही.’ ‘पण हे कच्चान, मृत्यूनंतर तथागत अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही का?’ असा प्रश्न विचारला असता, तुम्ही म्हणालात की, ‘वच्छा, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की मृत्यूनंतर तथागत अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही.’ हे कच्चान, श्रमण गोतमांनी हे अव्याकृत ठेवण्याचे कारण काय, प्रत्यय काय?” “वच्छा, ‘रूपी’ (रूपवान) किंवा ‘अरूपी’ (रूपरहित) किंवा ‘संज्ञी’ (संज्ञा असलेला) किंवा ‘असंज्ञी’ (संज्ञारहित) किंवा ‘नैवसंज्ञी-नासंज्ञी’ (संज्ञा असलेलाही नाही आणि नसलेलाही नाही) असे प्रज्ञप्त (वर्णन) करण्याचे जे कारण आणि जो प्रत्यय आहे, तो कारण आणि तो प्रत्यय जर सर्व प्रकारे, संपूर्णपणे, निरवशेषपणे निरुद्ध झाला, तर कोणत्या आधारावर त्याचे वर्णन ‘रूपी’ किंवा ‘अरूपी’ किंवा ‘संज्ञी’ किंवा ‘असंज्ञी’ किंवा ‘नैवसंज्ञी-नासंज्ञी’ असे केले जाऊ शकेल?” “हे कच्चान, तुम्हाला प्रव्रजित होऊन किती काळ झाला आहे?” “फार काळ झालेला नाही, आवुसो, तीन वर्षे झाली आहेत.” “आवुसो, ज्याने एवढ्या काळात एवढे प्राप्त केले आहे, त्याने खरोखरच खूप काही प्राप्त केले आहे, मग ज्याने याहून अधिक प्रगती केली आहे त्याच्याबद्दल काय सांगावे!” अकरावे सुत्त समाप्त। อพฺยากตสํยุตฺตํ สมตฺตํ. अव्याकृतसंयुत्त समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – त्याची उद्दान (अनुक्रमणिका) – เขมาเถรี อนุราโธ, สาริปุตฺโตติ โกฏฺฐิโก; โมคฺคลฺลาโน จ วจฺโฉ จ, กุตูหลสาลานนฺโท; สภิโย เอกาทสมนฺติ; खेमाथेरी, अनुराध, सारिपुत्त, कोट्ठिक, मोग्गल्लान, वच्छ, कुतूहलसाला, आनंद आणि सभिय; ही अकरा सुत्ते आहेत। สฬายตนวคฺโค จตุตฺโถ. चौथा सळायतनवग्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – त्याची उद्दान (अनुक्रमणिका) – สฬายตนเวทนา, มาตุคาโม ชมฺพุขาทโก; สามณฺฑโก โมคฺคลฺลาโน, จิตฺโต คามณิ สงฺขตํ; อพฺยากตนฺติ ทสธาติ. सळायतन, वेदना, मातुगाम, जम्बुखादक, सामण्डक, मोग्गल्लान, चित्त, गामणि, संखत आणि अव्याकृत; हे दहा प्रकार आहेत। สฬายตนวคฺคสํยุตฺตปาฬิ นิฏฺฐิตา. सळायतनवग्गसंयुत्तपाळि समाप्त। | |||
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |