| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| Français | |||
| Canon Pali | Commentaires | Sous-commentaires | Autres |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| Deutsch | |||
| Pali-Kanon | Kommentare | Subkommentare | Sonstige |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส उन भगवान, अर्हत्, सम्यक सम्बुद्ध को नमस्कार। สํยุตฺตนิกาโย संयुत्त निकाय สฬายตนวคฺโค सळायतन वग्ग ๑. สฬายตนสํยุตฺตํ १. सळायतन संयुत्त ๑. อนิจฺจวคฺโค १. अनिच्च वग्ग ๑. อชฺฌตฺตานิจฺจสุตฺตํ १. अज्झत्तानिच्च सुत्त ๑. เอวํ [Pg.236] เม สุตํ. เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ภิกฺขโว’’ติ. ‘‘ภทนฺเต’’ติ เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – १. ऐसा मैंने सुना है। एक समय भगवान सावत्थी में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— 'भिक्षुओं!' 'भदन्त!' उन भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने यह कहा— ‘‘จกฺขุํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ. ยทนิจฺจํ ตํ ทุกฺขํ; ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. โสตํ อนิจฺจํ. ยทนิจฺจํ…เป… ฆานํ อนิจฺจํ. ยทนิจฺจํ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา. ยทนิจฺจํ ตํ ทุกฺขํ; ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. กาโย อนิจฺโจ. ยทนิจฺจํ…เป… มโน อนิจฺโจ. ยทนิจฺจํ ตํ ทุกฺขํ; ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, โสตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ฆานสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ชิวฺหายปิ นิพฺพินฺทติ, กายสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ[Pg.237], มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. ปฐมํ. “भिक्षुओं! चक्षु अनित्य है। जो अनित्य है, वह दुःख है; जो दुःख है, वह अनात्मा है। जो अनात्मा है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार इसे यथाभूत सम्यक् प्रज्ञा से देखना चाहिए। श्रोत्र अनित्य है। जो अनित्य है...पे... घ्राण अनित्य है। जो अनित्य है...पे... जिह्वा अनित्य है। जो अनित्य है, वह दुःख है; जो दुःख है, वह अनात्मा है। जो अनात्मा है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार इसे यथाभूत सम्यक् प्रज्ञा से देखना चाहिए। काय अनित्य है। जो अनित्य है...पे... मन अनित्य है। जो अनित्य है, वह दुःख है; जो दुःख है, वह अनात्मा है। जो अनात्मा है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार इसे यथाभूत सम्यक् प्रज्ञा से देखना चाहिए। भिक्षुओं! इस प्रकार देखते हुए श्रुतवान् आर्य श्रावक चक्षु से भी निर्वेद प्राप्त करता है, श्रोत्र से भी निर्वेद प्राप्त करता है, घ्राण से भी निर्वेद प्राप्त करता है, जिह्वा से भी निर्वेद प्राप्त करता है, काय से भी निर्वेद प्राप्त करता है, मन से भी निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद प्राप्त कर वह विरक्त होता है; वैराग्य से विमुक्त होता है; विमुक्त होने पर 'विमुक्त हूँ' ऐसा ज्ञान होता है। 'जाति क्षीण हो गई, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया, जो करना था वह कर लिया गया, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है'—ऐसा वह जान लेता है।” प्रथम (सुत्त)। ๒. อชฺฌตฺตทุกฺขสุตฺตํ २. अज्झत्तदुक्ख सुत्त ๒. ‘‘จกฺขุํ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา; ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. โสตํ ทุกฺขํ…เป… ฆานํ ทุกฺขํ… ชิวฺหา ทุกฺขา… กาโย ทุกฺโข… มโน ทุกฺโข. ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา; ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. ทุติยํ. २. “भिक्षुओं! चक्षु दुःख है। जो दुःख है, वह अनात्मा है; जो अनात्मा है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार इसे यथाभूत सम्यक् प्रज्ञा से देखना चाहिए। श्रोत्र दुःख है...पे... घ्राण दुःख है... जिह्वा दुःख है... काय दुःख है... मन दुःख है। जो दुःख है, वह अनात्मा है; जो अनात्मा है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार इसे यथाभूत सम्यक् प्रज्ञा से देखना चाहिए। इस प्रकार देखते हुए...पे... अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है—ऐसा वह जान लेता है।” द्वितीय (सुत्त)। ๓. อชฺฌตฺตานตฺตสุตฺตํ ३. अज्झत्तानत्त सुत्त ๓. ‘‘จกฺขุํ, ภิกฺขเว, อนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. โสตํ อนตฺตา…เป… ฆานํ อนตฺตา… ชิวฺหา อนตฺตา… กาโย อนตฺตา… มโน อนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. ตติยํ. ३. “भिक्षुओं! चक्षु अनात्मा है। जो अनात्मा है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार इसे यथाभूत सम्यक् प्रज्ञा से देखना चाहिए। श्रोत्र अनात्मा है...पे... घ्राण अनात्मा है... जिह्वा अनात्मा है... काय अनात्मा है... मन अनात्मा है। जो अनात्मा है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार इसे यथाभूत सम्यक् प्रज्ञा से देखना चाहिए। इस प्रकार देखते हुए...पे... अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है—ऐसा वह जान लेता है।” तृतीय (सुत्त)। ๔. พาหิรานิจฺจสุตฺตํ ४. बाहिरानिच्च सुत्त ๔. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนิจฺจา. ยทนิจฺจํ ตํ ทุกฺขํ; ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนิจฺจา. ยทนิจฺจํ ตํ ทุกฺขํ; ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, สทฺเทสุปิ นิพฺพินฺทติ, คนฺเธสุปิ นิพฺพินฺทติ, รเสสุปิ นิพฺพินฺทติ, โผฏฺฐพฺเพสุปิ นิพฺพินฺทติ, ธมฺเมสุปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. จตุตฺถํ. ४. “भिक्षुओं! रूप अनित्य हैं। जो अनित्य है, वह दुःख है; जो दुःख है, वह अनात्मा है। जो अनात्मा है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार इसे यथाभूत सम्यक् प्रज्ञा से देखना चाहिए। शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धर्म अनित्य हैं। जो अनित्य है, वह दुःख है; जो दुःख है, वह अनात्मा है। जो अनात्मा है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार इसे यथाभूत सम्यक् प्रज्ञा से देखना चाहिए। भिक्षुओं! इस प्रकार देखते हुए श्रुतवान् आर्य श्रावक रूपों से भी निर्वेद प्राप्त करता है, शब्दों से भी निर्वेद प्राप्त करता है, गंधों से भी निर्वेद प्राप्त करता है, रसों से भी निर्वेद प्राप्त करता है, स्पर्शों से भी निर्वेद प्राप्त करता है, धर्मों से भी निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद प्राप्त कर वह विरक्त होता है; वैराग्य से विमुक्त होता है; विमुक्त होने पर 'विमुक्त हूँ' ऐसा ज्ञान होता है। 'जाति क्षीण हो गई, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया, जो करना था वह कर लिया गया, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है'—ऐसा वह जान लेता है।” चतुर्थ (सुत्त)। ๕. พาหิรทุกฺขสุตฺตํ ५. बाहिरदुक्ख सुत्त ๕. ‘‘รูปา[Pg.238], ภิกฺขเว, ทุกฺขา. ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา; ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา ทุกฺขา. ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. ปญฺจมํ. ५. “भिक्षुओं! रूप दुःख हैं। जो दुःख है, वह अनात्मा है; जो अनात्मा है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार इसे यथाभूत सम्यक् प्रज्ञा से देखना चाहिए। शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धर्म दुःख हैं। जो दुःख है, वह अनात्मा है। जो अनात्मा है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार इसे यथाभूत सम्यक् प्रज्ञा से देखना चाहिए। इस प्रकार देखते हुए...पे... अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है—ऐसा वह जान लेता है।” पंचम (सुत्त)। ๖. พาหิรานตฺตสุตฺตํ ६. बाहिरानत्त सुत्त ๖. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. ฉฏฺฐํ. ६. “भिक्षुओं! रूप अनात्मा हैं। जो अनात्मा है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार इसे यथाभूत सम्यक् प्रज्ञा से देखना चाहिए। शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धर्म अनात्मा हैं। जो अनात्मा है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार इसे यथाभूत सम्यक् प्रज्ञा से देखना चाहिए। इस प्रकार देखते हुए...पे... अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है—ऐसा वह जान लेता है।” षष्ठ (सुत्त)। ๗. อชฺฌตฺตานิจฺจาตีตานาคตสุตฺตํ ७. अज्झत्तानिच्चातीतानागत सुत्त ๗. ‘‘จกฺขุํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ อตีตานาคตํ; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนสฺส! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีตสฺมึ จกฺขุสฺมึ อนเปกฺโข โหติ; อนาคตํ จกฺขุํ นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนสฺส จกฺขุสฺส นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหติ. โสตํ อนิจฺจํ… ฆานํ อนิจฺจํ… ชิวฺหา อนิจฺจา อตีตานาคตา; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนาย! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีตาย ชิวฺหาย อนเปกฺโข โหติ; อนาคตํ ชิวฺหํ นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนาย ชิวฺหาย นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหติ. กาโย อนิจฺโจ…เป… มโน อนิจฺโจ อตีตานาคโต; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนสฺส! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีตสฺมึ มนสฺมึ อนเปกฺโข โหติ; อนาคตํ มนํ นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนสฺส มนสฺส นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหตี’’ติ. สตฺตมํ. ७. “भिक्षुओं! अतीत और अनागत का चक्षु अनित्य है; फिर वर्तमान के विषय में तो कहना ही क्या! भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक अतीत के चक्षु के प्रति निरपेक्ष होता है; अनागत चक्षु का अभिनन्दन नहीं करता; और वर्तमान चक्षु के निर्वेद, विराग और निरोध के लिए प्रतिपन्न होता है। श्रोत्र अनित्य है... घ्राण अनित्य है... अतीत और अनागत की जिह्वा अनित्य है; फिर वर्तमान के विषय में तो कहना ही क्या! भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक अतीत की जिह्वा के प्रति निरपेक्ष होता है; अनागत जिह्वा का अभिनन्दन नहीं करता; और वर्तमान जिह्वा के निर्वेद, विराग और निरोध के लिए प्रतिपन्न होता है। काय अनित्य है...पे... अतीत और अनागत का मन अनित्य है; फिर वर्तमान के विषय में तो कहना ही क्या! भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक अतीत के मन के प्रति निरपेक्ष होता है; अनागत मन का अभिनन्दन नहीं करता; और वर्तमान मन के निर्वेद, विराग और निरोध के लिए प्रतिपन्न होता है।” सातवाँ सुत्त। ๘. อชฺฌตฺตทุกฺขาตีตานาคตสุตฺตํ ८. अध्यात्म-दुःख-अतीत-अनागत सुत्त ๘. ‘‘จกฺขุํ[Pg.239], ภิกฺขเว, ทุกฺขํ อตีตานาคตํ; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนสฺส! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีตสฺมึ จกฺขุสฺมึ อนเปกฺโข โหติ; อนาคตํ จกฺขุํ นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนสฺส จกฺขุสฺส นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหติ. โสตํ ทุกฺขํ…เป… ฆานํ ทุกฺขํ…เป… ชิวฺหา ทุกฺขา อตีตานาคตา; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนาย! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีตาย ชิวฺหาย อนเปกฺโข โหติ; อนาคตํ ชิวฺหํ นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนาย ชิวฺหาย นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหติ. กาโย ทุกฺโข…เป… มโน ทุกฺโข อตีตานาคโต; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนสฺส! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีตสฺมึ มนสฺมึ อนเปกฺโข โหติ; อนาคตํ มนํ นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนสฺส มนสฺส นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหตี’’ติ. อฏฺฐมํ. ८. “भिक्षुओं! अतीत और अनागत का चक्षु दुःख है; फिर वर्तमान के विषय में तो कहना ही क्या! भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक अतीत के चक्षु के प्रति निरपेक्ष होता है; अनागत चक्षु का अभिनन्दन नहीं करता; और वर्तमान चक्षु के निर्वेद, विराग और निरोध के लिए प्रतिपन्न होता है। श्रोत्र दुःख है...पे... घ्राण दुःख है...पे... अतीत और अनागत की जिह्वा दुःख है; फिर वर्तमान के विषय में तो कहना ही क्या! भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक अतीत की जिह्वा के प्रति निरपेक्ष होता है; अनागत जिह्वा का अभिनन्दन नहीं करता; और वर्तमान जिह्वा के निर्वेद, विराग और निरोध के लिए प्रतिपन्न होता है। काय दुःख है...पे... अतीत और अनागत का मन दुःख है; फिर वर्तमान के विषय में तो कहना ही क्या! भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक अतीत के मन के प्रति निरपेक्ष होता है; अनागत मन का अभिनन्दन नहीं करता; और वर्तमान मन के निर्वेद, विराग और निरोध के लिए प्रतिपन्न होता है।” आठवाँ सुत्त। ๙. อชฺฌตฺตานตฺตาตีตานาคตสุตฺตํ ९. अध्यात्म-अनात्म-अतीत-अनागत सुत्त ๙. ‘‘จกฺขุํ, ภิกฺขเว, อนตฺตา อตีตานาคตํ; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนสฺส! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีตสฺมึ จกฺขุสฺมึ อนเปกฺโข โหติ; อนาคตํ จกฺขุํ นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนสฺส จกฺขุสฺส นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหติ. โสตํ อนตฺตา…เป… ฆานํ อนตฺตา…เป… ชิวฺหา อนตฺตา อตีตานาคตา; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนาย! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีตาย ชิวฺหาย อนเปกฺโข โหติ; อนาคตํ ชิวฺหํ นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนาย ชิวฺหาย นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหติ. กาโย อนตฺตา…เป… มโน อนตฺตา อตีตานาคโต; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนสฺส! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีตสฺมึ มนสฺมึ อนเปกฺโข โหติ; อนาคตํ มนํ นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนสฺส มนสฺส นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหตี’’ติ. นวมํ. ९. “भिक्षुओं! अतीत और अनागत का चक्षु अनात्म है; फिर वर्तमान के विषय में तो कहना ही क्या! भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक अतीत के चक्षु के प्रति निरपेक्ष होता है; अनागत चक्षु का अभिनन्दन नहीं करता; और वर्तमान चक्षु के निर्वेद, विराग और निरोध के लिए प्रतिपन्न होता है। श्रोत्र अनात्म है...पे... घ्राण अनात्म है...पे... अतीत और अनागत की जिह्वा अनात्म है; फिर वर्तमान के विषय में तो कहना ही क्या! भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक अतीत की जिह्वा के प्रति निरपेक्ष होता है; अनागत जिह्वा का अभिनन्दन नहीं करता; और वर्तमान जिह्वा के निर्वेद, विराग और निरोध के लिए प्रतिपन्न होता है। काय अनात्म है...पे... अतीत और अनागत का मन अनात्म है; फिर वर्तमान के विषय में तो कहना ही क्या! भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक अतीत के मन के प्रति निरपेक्ष होता है; अनागत मन का अभिनन्दन नहीं करता; और वर्तमान मन के निर्वेद, विराग और निरोध के लिए प्रतिपन्न होता है।” नौवाँ सुत्त। ๑๐. พาหิรานิจฺจาตีตานาคตสุตฺตํ १०. बाह्य-अनित्य-अतीत-अनागत सुत्त ๑๐. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนิจฺจา อตีตานาคตา; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนานํ! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีเตสุ รูเปสุ [Pg.240] อนเปกฺโข โหติ; อนาคเต รูเป นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนานํ รูปานํ นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหติ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนิจฺจา อตีตานาคตา; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนานํ! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีเตสุ ธมฺเมสุ อนเปกฺโข โหติ; อนาคเต ธมฺเม นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนานํ ธมฺมานํ นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหตี’’ติ. ทสมํ. १०. “भिक्षुओं! अतीत और अनागत के रूप अनित्य हैं; फिर वर्तमान के विषय में तो कहना ही क्या! भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक अतीत के रूपों के प्रति निरपेक्ष होता है; अनागत रूपों का अभिनन्दन नहीं करता; और वर्तमान रूपों के निर्वेद, विराग और निरोध के लिए प्रतिपन्न होता है। शब्द... गंध... रस... स्प्रष्टव्य... अतीत और अनागत के धर्म अनित्य हैं; फिर वर्तमान के विषय में तो कहना ही क्या! भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक अतीत के धर्मों के प्रति निरपेक्ष होता है; अनागत धर्मों का अभिनन्दन नहीं करता; और वर्तमान धर्मों के निर्वेद, विराग और निरोध के लिए प्रतिपन्न होता है।” दसवाँ सुत्त। ๑๑. พาหิรทุกฺขาตีตานาคตสุตฺตํ ११. बाह्य-दुःख-अतीत-अनागत सुत्त ๑๑. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, ทุกฺขา อตีตานาคตา; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนานํ! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีเตสุ รูเปสุ อนเปกฺโข โหติ; อนาคเต รูเป นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนานํ รูปานํ นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหตี’’ติ…เป. …. เอกาทสมํ. ११. “भिक्षुओं! अतीत और अनागत के रूप दुःख हैं; फिर वर्तमान के विषय में तो कहना ही क्या! भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक अतीत के रूपों के प्रति निरपेक्ष होता है; अनागत रूपों का अभिनन्दन नहीं करता; और वर्तमान रूपों के निर्वेद, विराग और निरोध के लिए प्रतिपन्न होता है।”...पे... ग्यारहवाँ सुत्त। ๑๒. พาหิรานตฺตาตีตานาคตสุตฺตํ १२. बाह्य-अनात्म-अतीत-अनागत सुत्त ๑๒. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนตฺตา อตีตานาคตา; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนานํ! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีเตสุ รูเปสุ อนเปกฺโข โหติ; อนาคเต รูเป นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนานํ รูปานํ นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหติ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนตฺตา อตีตานาคตา; โก ปน วาโท ปจฺจุปฺปนฺนานํ! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อตีเตสุ ธมฺเมสุ อนเปกฺโข โหติ; อนาคเต ธมฺเม นาภินนฺทติ; ปจฺจุปฺปนฺนานํ ธมฺมานํ นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหตี’’ติ. ทฺวาทสมํ. १२. “भिक्षुओं! अतीत और अनागत के रूप अनात्म हैं; फिर वर्तमान के विषय में तो कहना ही क्या! भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक अतीत के रूपों के प्रति निरपेक्ष होता है; अनागत रूपों का अभिनन्दन नहीं करता; और वर्तमान रूपों के निर्वेद, विराग और निरोध के लिए प्रतिपन्न होता है। शब्द... गंध... रस... स्प्रष्टव्य... अतीत और अनागत के धर्म अनात्म हैं; फिर वर्तमान के विषय में तो कहना ही क्या! भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक अतीत के धर्मों के प्रति निरपेक्ष होता है; अनागत धर्मों का अभिनन्दन नहीं करता; और वर्तमान धर्मों के निर्वेद, विराग और निरोध के लिए प्रतिपन्न होता है।” बारहवाँ सुत्त। อนิจฺจวคฺโค ปฐโม. प्रथम अनित्य वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका उदान (संग्रह श्लोक) इस प्रकार है — อนิจฺจํ ทุกฺขํ อนตฺตา จ, ตโย อชฺฌตฺตพาหิรา; ยทนิจฺเจน ตโย วุตฺตา, เต เต อชฺฌตฺตพาหิราติ. अनित्य, दुःख और अनात्म — ये तीन अध्यात्म और बाह्य (सुत्त) हैं; 'यदनिच्च' के साथ तीन (सुत्त) कहे गए हैं, वे ही अध्यात्म और बाह्य (सुत्त) कहे गए हैं। ๒. ยมกวคฺโค २. यमक वर्ग ๑. ปฐมปุพฺเพสมฺโพธสุตฺตํ १. प्रथम पुब्बेसम्बोध सुत्त ๑๓. สาวตฺถินิทานํ[Pg.241]. ‘‘ปุพฺเพว เม, ภิกฺขเว, สมฺโพธา อนภิสมฺพุทฺธสฺส โพธิสตฺตสฺเสว สโต เอตทโหสิ – ‘โก นุ โข จกฺขุสฺส อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณํ? โก โสตสฺส…เป… โก ฆานสฺส… โก ชิวฺหาย… โก กายสฺส… โก มนสฺส อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณ’นฺติ? ตสฺส มยฺหํ, ภิกฺขเว, เอตทโหสิ – ‘ยํ โข จกฺขุํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อยํ จกฺขุสฺส อสฺสาโท. ยํ จกฺขุํ อนิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, อยํ จกฺขุสฺส อาทีนโว. โย จกฺขุสฺมึ ฉนฺทราควินโย ฉนฺทราคปฺปหานํ, อิทํ จกฺขุสฺส นิสฺสรณํ. ยํ โสตํ…เป… ยํ ฆานํ…เป… ยํ ชิวฺหํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อยํ ชิวฺหาย อสฺสาโท. ยํ ชิวฺหา อนิจฺจา ทุกฺขา วิปริณามธมฺมา, อยํ ชิวฺหาย อาทีนโว. โย ชิวฺหาย ฉนฺทราควินโย ฉนฺทราคปฺปหานํ, อิทํ ชิวฺหาย นิสฺสรณํ. ยํ กายํ…เป… ยํ มนํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อยํ มนสฺส อสฺสาโท. ยํ มโน อนิจฺโจ ทุกฺโข วิปริณามธมฺโม, อยํ มนสฺส อาทีนโว. โย มนสฺมึ ฉนฺทราควินโย ฉนฺทราคปฺปหานํ, อิทํ มนสฺส นิสฺสรณ’’’นฺติ. १३. श्रावस्ती। "भिक्षुओं! बोधि प्राप्त करने से पहले, जब मैं बुद्ध नहीं हुआ था और केवल बोधिसत्व ही था, तब मेरे मन में यह विचार आया— 'चक्षु का आस्वाद क्या है, आदिनव क्या है, निस्सरण क्या है? श्रोत्र का... घ्राण का... जिह्वा का... काय का... मन का आस्वाद क्या है, आदिनव क्या है, निस्सरण क्या है?' भिक्षुओं! तब मुझे यह विचार हुआ— 'चक्षु के कारण जो सुख और सौमनस्य उत्पन्न होता है, वह चक्षु का आस्वाद है। चक्षु जो अनित्य, दुःख और विपरिणामधर्मा है, वह चक्षु का आदिनव है। चक्षु में जो छंद-राग का विनय और प्रहाण है, वह चक्षु का निस्सरण है। श्रोत्र... घ्राण... जिह्वा के कारण जो सुख और सौमनस्य उत्पन्न होता है, वह जिह्वा का आस्वाद है। जिह्वा जो अनित्य, दुःख और विपरिणामधर्मा है, वह जिह्वा का आदिनव है। जिह्वा में जो छंद-राग का विनय और प्रहाण है, वह जिह्वा का निस्सरण है। काय... मन के कारण जो सुख और सौमनस्य उत्पन्न होता है, वह मन का आस्वाद है। मन जो अनित्य, दुःख और विपरिणामधर्मा है, वह मन का आदिनव है। मन में जो छंद-राग का विनय और प्रहाण है, वह मन का निस्सरण है'।" ‘‘ยาวกีวญฺจาหํ, ภิกฺขเว, อิเมสํ ฉนฺนํ อชฺฌตฺติกานํ อายตนานํ เอวํ อสฺสาทญฺจ อสฺสาทโต, อาทีนวญฺจ อาทีนวโต, นิสฺสรณญฺจ นิสฺสรณโต ยถาภูตํ นาพฺภญฺญาสึ, เนว ตาวาหํ, ภิกฺขเว, สเทวเก โลเก สมารเก สพฺรหฺมเก สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย ‘อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุทฺโธ’ติ ปจฺจญฺญาสึ. ยโต จ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อิเมสํ ฉนฺนํ อชฺฌตฺติกานํ อายตนานํ เอวํ อสฺสาทญฺจ อสฺสาทโต, อาทีนวญฺจ อาทีนวโต, นิสฺสรณญฺจ นิสฺสรณโต ยถาภูตํ อพฺภญฺญาสึ, อถาหํ, ภิกฺขเว, สเทวเก โลเก สมารเก สพฺรหฺมเก สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย ‘อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุทฺโธ’ติ ปจฺจญฺญาสึ. ญาณญฺจ ปน เม ทสฺสนํ อุทปาทิ – ‘อกุปฺปา เม วิมุตฺติ, อยมนฺติมา ชาติ, นตฺถิ ทานิ ปุนพฺภโว’’’ติ. ปฐมํ. "भिक्षुओं! जब तक मैंने इन छह आध्यात्मिक आयतनों के आस्वाद को आस्वाद के रूप में, आदिनव को आदिनव के रूप में और निस्सरण को निस्सरण के रूप में यथार्थतः नहीं जान लिया, तब तक भिक्षुओं, मैंने देवों, मारों और ब्रह्माओं सहित इस लोक में, श्रमणों और ब्राह्मणों सहित इस प्रजा में, देवों और मनुष्यों के बीच 'अनुत्तर सम्यक-संबोधि' प्राप्त कर ली है, ऐसा स्वीकार नहीं किया। भिक्षुओं! जब मैंने इन छह आध्यात्मिक आयतनों के आस्वाद को आस्वाद के रूप में, आदिनव को आदिनव के रूप में और निस्सरण को निस्सरण के रूप में यथार्थतः जान लिया, तब भिक्षुओं, मैंने देवों, मारों और ब्रह्माओं सहित इस लोक में, श्रमणों और ब्राह्मणों सहित इस प्रजा में, देवों और मनुष्यों के बीच 'अनुत्तर सम्यक-संबोधि' प्राप्त कर ली है, ऐसा स्वीकार किया। और मुझे यह ज्ञान-दर्शन उत्पन्न हुआ— 'मेरी विमुक्ति अडिग है, यह अंतिम जन्म है, अब पुनर्जन्म नहीं होगा'। प्रथम सुत्त।" ๒. ทุติยปุพฺเพสมฺโพธสุตฺตํ २. द्वितीय पुब्बेसम्बोध सुत्त ๑๔. ‘‘ปุพฺเพว [Pg.242] เม, ภิกฺขเว, สมฺโพธา อนภิสมฺพุทฺธสฺส โพธิสตฺตสฺเสว สโต เอตทโหสิ – ‘โก นุ โข รูปานํ อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณํ? โก สทฺทานํ…เป… โก คนฺธานํ… โก รสานํ… โก โผฏฺฐพฺพานํ… โก ธมฺมานํ อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณ’นฺติ? ตสฺส มยฺหํ, ภิกฺขเว, เอตทโหสิ – ‘ยํ โข รูเป ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อยํ รูปานํ อสฺสาโท. ยํ รูปา อนิจฺจา ทุกฺขา วิปริณามธมฺมา, อยํ รูปานํ อาทีนโว. โย รูเปสุ ฉนฺทราควินโย ฉนฺทราคปฺปหานํ, อิทํ รูปานํ นิสฺสรณํ. ยํ สทฺเท… คนฺเธ… รเส… โผฏฺฐพฺเพ… ยํ ธมฺเม ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อยํ ธมฺมานํ อสฺสาโท. ยํ ธมฺมา อนิจฺจา ทุกฺขา วิปริณามธมฺมา, อยํ ธมฺมานํ อาทีนโว. โย ธมฺเมสุ ฉนฺทราควินโย ฉนฺทราคปฺปหานํ, อิทํ ธมฺมานํ นิสฺสรณ’’’นฺติ. १४. "भिक्षुओं! बोधि प्राप्त करने से पहले, जब मैं बुद्ध नहीं हुआ था और केवल बोधिसत्व ही था, तब मेरे मन में यह विचार आया— 'रूपों का आस्वाद क्या है, आदिनव क्या है, निस्सरण क्या है? शब्दों का... गंधों का... रसों का... स्पर्शों का... धर्मों का आस्वाद क्या है, आदिनव क्या है, निस्सरण क्या है?' भिक्षुओं! तब मुझे यह विचार हुआ— 'रूपों के कारण जो सुख और सौमनस्य उत्पन्न होता है, वह रूपों का आस्वाद है। रूप जो अनित्य, दुःख और विपरिणामधर्मा हैं, वह रूपों का आदिनव है। रूपों में जो छंद-राग का विनय और प्रहाण है, वह रूपों का निस्सरण है। शब्दों... गंधों... रसों... स्पर्शों... धर्मों के कारण जो सुख और सौमनस्य उत्पन्न होता है, वह धर्मों का आस्वाद है। धर्म जो अनित्य, दुःख और विपरिणामधर्मा हैं, वह धर्मों का आदिनव है। धर्मों में जो छंद-राग का विनय और प्रहाण है, वह धर्मों का निस्सरण है'।" ‘‘ยาวกีวญฺจาหํ, ภิกฺขเว, อิเมสํ ฉนฺนํ พาหิรานํ อายตนานํ เอวํ อสฺสาทญฺจ อสฺสาทโต, อาทีนวญฺจ อาทีนวโต, นิสฺสรณญฺจ นิสฺสรณโต ยถาภูตํ นาพฺภญฺญาสึ, เนว ตาวาหํ, ภิกฺขเว, สเทวเก โลเก สมารเก สพฺรหฺมเก สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย ‘อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุทฺโธ’ติ ปจฺจญฺญาสึ. ยโต จ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อิเมสํ ฉนฺนํ พาหิรานํ อายตนานํ เอวํ อสฺสาทญฺจ อสฺสาทโต, อาทีนวญฺจ อาทีนวโต, นิสฺสรณญฺจ นิสฺสรณโต ยถาภูตํ อพฺภญฺญาสึ, อถาหํ, ภิกฺขเว, สเทวเก โลเก สมารเก สพฺรหฺมเก สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย ‘อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุทฺโธ’ติ ปจฺจญฺญาสึ. ญาณญฺจ ปน เม ทสฺสนํ อุทปาทิ – ‘อกุปฺปา เม วิมุตฺติ, อยมนฺติมา ชาติ, นตฺถิ ทานิ ปุนพฺภโว’’’ติ. ทุติยํ. "भिक्षुओं! जब तक मैंने इन छह बाह्य आयतनों के आस्वाद को आस्वाद के रूप में, आदिनव को आदिनव के रूप में और निस्सरण को निस्सरण के रूप में यथार्थतः नहीं जान लिया, तब तक भिक्षुओं, मैंने देवों, मारों और ब्रह्माओं सहित इस लोक में, श्रमणों और ब्राह्मणों सहित इस प्रजा में, देवों और मनुष्यों के बीच 'अनुत्तर सम्यक-संबोधि' प्राप्त कर ली है, ऐसा स्वीकार नहीं किया। भिक्षुओं! जब मैंने इन छह बाह्य आयतनों के आस्वाद को आस्वाद के रूप में, आदिनव को आदिनव के रूप में और निस्सरण को निस्सरण के रूप में यथार्थतः जान लिया, तब भिक्षुओं, मैंने देवों, मारों और ब्रह्माओं सहित इस लोक में, श्रमणों और ब्राह्मणों सहित इस प्रजा में, देवों और मनुष्यों के बीच 'अनुत्तर सम्यक-संबोधि' प्राप्त कर ली है, ऐसा स्वीकार किया। और मुझे यह ज्ञान-दर्शन उत्पन्न हुआ— 'मेरी विमुक्ति अडिग है, यह अंतिम जन्म है, अब पुनर्जन्म नहीं होगा'। द्वितीय सुत्त।" ๓. ปฐมอสฺสาทปริเยสนสุตฺตํ ३. प्रथम आस्वादपरियेसन सुत्त ๑๕. ‘‘จกฺขุสฺสาหํ, ภิกฺขเว, อสฺสาทปริเยสนํ อจรึ. โย จกฺขุสฺส อสฺสาโท ตทชฺฌคมํ. ยาวตา จกฺขุสฺส อสฺสาโท ปญฺญาย เม โส สุทิฏฺโฐ. จกฺขุสฺสาหํ, ภิกฺขเว, อาทีนวปริเยสนํ อจรึ. โย จกฺขุสฺส อาทีนโว ตทชฺฌคมํ. ยาวตา จกฺขุสฺส อาทีนโว ปญฺญาย เม โส สุทิฏฺโฐ. จกฺขุสฺสาหํ, ภิกฺขเว, นิสฺสรณปริเยสนํ อจรึ. ยํ จกฺขุสฺส นิสฺสรณํ ตทชฺฌคมํ. ยาวตา จกฺขุสฺส นิสฺสรณํ, ปญฺญาย เม ตํ สุทิฏฺฐํ. โสตสฺสาหํ[Pg.243], ภิกฺขเว… ฆานสฺสาหํ, ภิกฺขเว… ชิวฺหายาหํ ภิกฺขเว, อสฺสาทปริเยสนํ อจรึ. โย ชิวฺหาย อสฺสาโท ตทชฺฌคมํ. ยาวตา ชิวฺหาย อสฺสาโท ปญฺญาย เม โส สุทิฏฺโฐ. ชิวฺหายาหํ, ภิกฺขเว, อาทีนวปริเยสนํ อจรึ. โย ชิวฺหาย อาทีนโว ตทชฺฌคมํ. ยาวตา ชิวฺหาย อาทีนโว ปญฺญาย เม โส สุทิฏฺโฐ. ชิวฺหายาหํ, ภิกฺขเว, นิสฺสรณปริเยสนํ อจรึ. ยํ ชิวฺหาย นิสฺสรณํ ตทชฺฌคมํ. ยาวตา ชิวฺหาย นิสฺสรณํ, ปญฺญาย เม ตํ สุทิฏฺฐํ. มนสฺสาหํ, ภิกฺขเว, อสฺสาทปริเยสนํ อจรึ. โย มนสฺส อสฺสาโท ตทชฺฌคมํ. ยาวตา มนสฺส อสฺสาโท ปญฺญาย เม โส สุทิฏฺโฐ. มนสฺสาหํ, ภิกฺขเว, อาทีนวปริเยสนํ อจรึ. โย มนสฺส อาทีนโว ตทชฺฌคมํ. ยาวตา มนสฺส อาทีนโว ปญฺญาย เม โส สุทิฏฺโฐ. มนสฺสาหํ, ภิกฺขเว, นิสฺสรณปริเยสนํ อจรึ. ยํ มนสฺส นิสฺสรณํ ตทชฺฌคมํ. ยาวตา มนสฺส นิสฺสรณํ, ปญฺญาย เม ตํ สุทิฏฺฐํ. १५. “भिक्षुओं, मैंने चक्षु के आस्वाद की खोज की। चक्षु का जो आस्वाद है, उसे मैंने प्राप्त किया। चक्षु का जितना आस्वाद है, उसे मैंने प्रज्ञा से भली-भाँति देख लिया है। भिक्षुओं, मैंने चक्षु के आदिनव की खोज की। चक्षु का जो आदिनव है, उसे मैंने प्राप्त किया। चक्षु का जितना आदिनव है, उसे मैंने प्रज्ञा से भली-भाँति देख लिया है। भिक्षुओं, मैंने चक्षु के निस्सरण की खोज की। चक्षु का जो निस्सरण है, उसे मैंने प्राप्त किया। चक्षु का जितना निस्सरण है, उसे मैंने प्रज्ञा से भली-भाँति देख लिया है। भिक्षुओं, मैंने श्रोत्र के... घ्राण के... जिह्वा के आस्वाद की खोज की। जिह्वा का जो आस्वाद है, उसे मैंने प्राप्त किया। जिह्वा का जितना आस्वाद है, उसे मैंने प्रज्ञा से भली-भाँति देख लिया है। भिक्षुओं, मैंने जिह्वा के आदिनव की खोज की। जिह्वा का जो आदिनव है, उसे मैंने प्राप्त किया। जिह्वा का जितना आदिनव है, उसे मैंने प्रज्ञा से भली-भाँति देख लिया है। भिक्षुओं, मैंने जिह्वा के निस्सरण की खोज की। जिह्वा का जो निस्सरण है, उसे मैंने प्राप्त किया। जिह्वा का जितना निस्सरण है, उसे मैंने प्रज्ञा से भली-भाँति देख लिया है। भिक्षुओं, मैंने मन के आस्वाद की खोज की। मन का जो आस्वाद है, उसे मैंने प्राप्त किया। मन का जितना आस्वाद है, उसे मैंने प्रज्ञा से भली-भाँति देख लिया है। भिक्षुओं, मैंने मन के आदिनव की खोज की। मन का जो आदिनव है, उसे मैंने प्राप्त किया। मन का जितना आदिनव है, उसे मैंने प्रज्ञा से भली-भाँति देख लिया है। भिक्षुओं, मैंने मन के निस्सरण की खोज की। मन का जो निस्सरण है, उसे मैंने प्राप्त किया। मन का जितना निस्सरण है, उसे मैंने प्रज्ञा से भली-भाँति देख लिया है।” ‘‘ยาวกีวญฺจาหํ, ภิกฺขเว, อิเมสํ ฉนฺนํ อชฺฌตฺติกานํ อายตนานํ อสฺสาทญฺจ อสฺสาทโต, อาทีนวญฺจ อาทีนวโต, นิสฺสรณญฺจ นิสฺสรณโต ยถาภูตํ นาพฺภญฺญาสึ…เป… ปจฺจญฺญาสึ. ญาณญฺจ ปน เม ทสฺสนํ อุทปาทิ – ‘อกุปฺปา เม วิมุตฺติ, อยมนฺติมา ชาติ, นตฺถิ ทานิ ปุนพฺภโว’’’ติ. ตติยํ. “भिक्षुओं, जब तक मैंने इन छह आन्तरिक आयतनों के आस्वाद को आस्वाद के रूप में, आदिनव को आदिनव के रूप में, और निस्सरण को निस्सरण के रूप में यथाभूत नहीं जाना था... तब तक मैंने (अनुत्तर सम्यक सम्बोधि का) दावा नहीं किया। परन्तु जब मैंने जान लिया... तब मुझमें यह ज्ञान और दर्शन उत्पन्न हुआ— ‘मेरी विमुक्ति अडिग है, यह अन्तिम जन्म है, अब पुनर्जन्म नहीं है’। तृतीय।” ๔. ทุติยอสฺสาทปริเยสนสุตฺตํ ४. द्वितीय आस्वाद-परियेसन सुत्त ๑๖. ‘‘รูปานาหํ, ภิกฺขเว, อสฺสาทปริเยสนํ อจรึ. โย รูปานํ อสฺสาโท ตทชฺฌคมํ. ยาวตา รูปานํ อสฺสาโท ปญฺญาย เม โส สุทิฏฺโฐ. รูปานาหํ, ภิกฺขเว, อาทีนวปริเยสนํ อจรึ. โย รูปานํ อาทีนโว ตทชฺฌคมํ. ยาวตา รูปานํ อาทีนโว ปญฺญาย เม โส สุทิฏฺโฐ. รูปานาหํ, ภิกฺขเว, นิสฺสรณปริเยสนํ อจรึ. ยํ รูปานํ นิสฺสรณํ ตทชฺฌคมํ. ยาวตา รูปานํ นิสฺสรณํ, ปญฺญาย เม ตํ สุทิฏฺฐํ. สทฺทานาหํ, ภิกฺขเว… คนฺธานาหํ, ภิกฺขเว… รสานาหํ, ภิกฺขเว… โผฏฺฐพฺพานาหํ, ภิกฺขเว… ธมฺมานาหํ, ภิกฺขเว, อสฺสาทปริเยสนํ อจรึ. โย ธมฺมานํ อสฺสาโท ตทชฺฌคมํ. ยาวตา ธมฺมานํ อสฺสาโท ปญฺญาย เม โส สุทิฏฺโฐ. ธมฺมานาหํ, ภิกฺขเว, อาทีนวปริเยสนํ อจรึ. โย ธมฺมานํ อาทีนโว ตทชฺฌคมํ. ยาวตา ธมฺมานํ อาทีนโว ปญฺญาย เม โส สุทิฏฺโฐ. ธมฺมานาหํ, ภิกฺขเว, นิสฺสรณปริเยสนํ อจรึ. ยํ ธมฺมานํ นิสฺสรณํ ตทชฺฌคมํ. ยาวตา ธมฺมานํ นิสฺสรณํ, ปญฺญาย [Pg.244] เม ตํ สุทิฏฺฐํ. १६. “भिक्षुओं, मैंने रूपों के आस्वाद की खोज की। रूपों का जो आस्वाद है, उसे मैंने प्राप्त किया। रूपों का जितना आस्वाद है, उसे मैंने प्रज्ञा से भली-भाँति देख लिया है। भिक्षुओं, मैंने रूपों के आदिनव की खोज की। रूपों का जो आदिनव है, उसे मैंने प्राप्त किया। रूपों का जितना आदिनव है, उसे मैंने प्रज्ञा से भली-भाँति देख लिया है। भिक्षुओं, मैंने रूपों के निस्सरण की खोज की। रूपों का जो निस्सरण है, उसे मैंने प्राप्त किया। रूपों का जितना निस्सरण है, उसे मैंने प्रज्ञा से भली-भाँति देख लिया है। भिक्षुओं, मैंने शब्दों के... गंधों के... रसों के... स्पर्शों के... धर्मों के आस्वाद की खोज की। धर्मों का जो आस्वाद है, उसे मैंने प्राप्त किया। धर्मों का जितना आस्वाद है, उसे मैंने प्रज्ञा से भली-भाँति देख लिया है। भिक्षुओं, मैंने धर्मों के आदिनव की खोज की। धर्मों का जो आदिनव है, उसे मैंने प्राप्त किया। धर्मों का जितना आदिनव है, उसे मैंने प्रज्ञा से भली-भाँति देख लिया है। भिक्षुओं, मैंने धर्मों के निस्सरण की खोज की। धर्मों का जो निस्सरण है, उसे मैंने प्राप्त किया। धर्मों का जितना निस्सरण है, उसे मैंने प्रज्ञा से भली-भाँति देख लिया है।” ‘‘ยาวกีวญฺจาหํ, ภิกฺขเว, อิเมสํ ฉนฺนํ พาหิรานํ อายตนานํ อสฺสาทญฺจ อสฺสาทโต, อาทีนวญฺจ อาทีนวโต, นิสฺสรณญฺจ นิสฺสรณโต ยถาภูตํ นาพฺภญฺญาสึ…เป… ปจฺจญฺญาสึ. ญาณญฺจ ปน เม ทสฺสนํ อุทปาทิ – ‘อกุปฺปา เม วิมุตฺติ, อยมนฺติมา ชาติ, นตฺถิ ทานิ ปุนพฺภโว’’’ติ. จตุตฺถํ. “भिक्षुओं, जब तक मैंने इन छह बाह्य आयतनों के आस्वाद को आस्वाद के रूप में, आदिनव को आदिनव के रूप में, और निस्सरण को निस्सरण के रूप में यथाभूत नहीं जाना था... तब तक मैंने (अनुत्तर सम्यक सम्बोधि का) दावा नहीं किया। परन्तु जब मैंने जान लिया... तब मुझमें यह ज्ञान और दर्शन उत्पन्न हुआ— ‘मेरी विमुक्ति अडिग है, यह अन्तिम जन्म है, अब पुनर्जन्म नहीं है’। चतुर्थ।” ๕. ปฐมโนเจอสฺสาทสุตฺตํ ५. प्रथम नो-चे-आस्वाद सुत्त ๑๗. ‘‘โน เจทํ, ภิกฺขเว, จกฺขุสฺส อสฺสาโท อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา จกฺขุสฺมึ สารชฺเชยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ จกฺขุสฺส อสฺสาโท ตสฺมา สตฺตา จกฺขุสฺมึ สารชฺชนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, จกฺขุสฺส อาทีนโว อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา จกฺขุสฺมึ นิพฺพินฺเทยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ จกฺขุสฺส อาทีนโว ตสฺมา สตฺตา จกฺขุสฺมึ นิพฺพินฺทนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, จกฺขุสฺส นิสฺสรณํ อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา จกฺขุสฺมา นิสฺสเรยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ จกฺขุสฺส นิสฺสรณํ ตสฺมา สตฺตา จกฺขุสฺมา นิสฺสรนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, โสตสฺส อสฺสาโท อภวิสฺส… โน เจทํ, ภิกฺขเว, ฆานสฺส อสฺสาโท อภวิสฺส… โน เจทํ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาย อสฺสาโท อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา ชิวฺหาย สารชฺเชยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ ชิวฺหาย อสฺสาโท, ตสฺมา สตฺตา ชิวฺหาย สารชฺชนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาย อาทีนโว อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา ชิวฺหาย นิพฺพินฺเทยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ ชิวฺหาย อาทีนโว, ตสฺมา สตฺตา ชิวฺหาย นิพฺพินฺทนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาย นิสฺสรณํ อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา ชิวฺหาย นิสฺสเรยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ ชิวฺหาย นิสฺสรณํ, ตสฺมา สตฺตา ชิวฺหาย นิสฺสรนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, กายสฺส อสฺสาโท อภวิสฺส… โน เจทํ, ภิกฺขเว, มนสฺส อสฺสาโท อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา มนสฺมึ สารชฺเชยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ มนสฺส อสฺสาโท, ตสฺมา สตฺตา มนสฺมึ สารชฺชนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, มนสฺส อาทีนโว อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา มนสฺมึ นิพฺพินฺเทยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ มนสฺส อาทีนโว, ตสฺมา สตฺตา มนสฺมึ นิพฺพินฺทนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, มนสฺส นิสฺสรณํ อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา มนสฺมา นิสฺสเรยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ มนสฺส นิสฺสรณํ, ตสฺมา สตฺตา มนสฺมา นิสฺสรนฺติ. १७. भिक्षुओं! यदि चक्षु (आँख) का यह आस्वाद न होता, तो प्राणी चक्षु में आसक्त न होते। चूँकि भिक्षुओं, चक्षु का आस्वाद है, इसलिए प्राणी चक्षु में आसक्त होते हैं। यदि चक्षु का यह आदिनव (दोष) न होता, तो प्राणी चक्षु से विरक्त न होते। चूँकि भिक्षुओं, चक्षु का आदिनव है, इसलिए प्राणी चक्षु से विरक्त होते हैं। यदि चक्षु का यह निस्सरण (मुक्ति) न होता, तो प्राणी चक्षु से मुक्त न होते। चूँकि भिक्षुओं, चक्षु का निस्सरण है, इसलिए प्राणी चक्षु से मुक्त होते हैं। भिक्षुओं! यदि श्रोत्र (कान) का आस्वाद न होता... यदि घ्राण (नाक) का आस्वाद न होता... यदि जिह्वा (जीभ) का आस्वाद न होता, तो प्राणी जिह्वा में आसक्त न होते। चूँकि भिक्षुओं, जिह्वा का आस्वाद है, इसलिए प्राणी जिह्वा में आसक्त होते हैं। यदि जिह्वा का आदिनव न होता, तो प्राणी जिह्वा से विरक्त न होते। चूँकि भिक्षुओं, जिह्वा का आदिनव है, इसलिए प्राणी जिह्वा से विरक्त होते हैं। यदि जिह्वा का निस्सरण न होता, तो प्राणी जिह्वा से मुक्त न होते। चूँकि भिक्षुओं, जिह्वा का निस्सरण है, इसलिए प्राणी जिह्वा से मुक्त होते हैं। भिक्षुओं! यदि काया (शरीर) का आस्वाद न होता... यदि मन का आस्वाद न होता, तो प्राणी मन में आसक्त न होते। चूँकि भिक्षुओं, मन का आस्वाद है, इसलिए प्राणी मन में आसक्त होते हैं। यदि मन का आदिनव न होता, तो प्राणी मन से विरक्त न होते। चूँकि भिक्षुओं, मन का आदिनव है, इसलिए प्राणी मन से विरक्त होते हैं। यदि मन का निस्सरण न होता, तो प्राणी मन से मुक्त न होते। चूँकि भिक्षुओं, मन का निस्सरण है, इसलिए प्राणी मन से मुक्त होते हैं। ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, สตฺตา อิเมสํ ฉนฺนํ อชฺฌตฺติกานํ อายตนานํ [Pg.245] อสฺสาทญฺจ อสฺสาทโต, อาทีนวญฺจ อาทีนวโต, นิสฺสรณญฺจ นิสฺสรณโต ยถาภูตํ นาพฺภญฺญํสุ, เนว ตาว, ภิกฺขเว, สตฺตา สเทวกา โลกา สมารกา สพฺรหฺมกา สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย นิสฺสฏา วิสญฺญุตฺตา วิปฺปมุตฺตา วิมริยาทีกเตน เจตสา วิหรึสุ. ยโต จ โข, ภิกฺขเว, สตฺตา อิเมสํ ฉนฺนํ อชฺฌตฺติกานํ อายตนานํ อสฺสาทญฺจ อสฺสาทโต, อาทีนวญฺจ อาทีนวโต, นิสฺสรณญฺจ นิสฺสรณโต ยถาภูตํ อพฺภญฺญํสุ, อถ, ภิกฺขเว, สตฺตา สเทวกา โลกา สมารกา สพฺรหฺมกา สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย นิสฺสฏา วิสญฺญุตฺตา วิปฺปมุตฺตา วิมริยาทีกเตน เจตสา วิหรนฺตี’’ติ. ปญฺจมํ. भिक्षुओं! जब तक प्राणियों ने इन छह आध्यात्मिक आयतनों के आस्वाद को आस्वाद के रूप में, आदिनव को आदिनव के रूप में और निस्सरण को निस्सरण के रूप में यथार्थतः नहीं जाना था, तब तक भिक्षुओं, वे प्राणी देवों, मारों और ब्रह्माओं सहित इस लोक में, श्रमणों और ब्राह्मणों सहित इस प्रजा में, तथा देवों और मनुष्यों के बीच से न तो निःसृत हुए थे, न विसंयुक्त हुए थे, न विमुक्त हुए थे और न ही वे मर्यादा-रहित चित्त से विहार करते थे। भिक्षुओं! जब प्राणियों ने इन छह आध्यात्मिक आयतनों के आस्वाद, आदिनव और निस्सरण को यथार्थतः जान लिया, तब भिक्षुओं, वे प्राणी देवों, मारों और ब्रह्माओं सहित इस लोक से, श्रमणों और ब्राह्मणों सहित इस प्रजा से, तथा देवों और मनुष्यों के बीच से निःसृत हो गए, विसंयुक्त हो गए, विमुक्त हो गए और मर्यादा-रहित चित्त से विहार करने लगे। पाँचवाँ (सुत्त)। ๖. ทุติยโนเจอสฺสาทสุตฺตํ ६. द्वितीय नो चे अस्साद सुत्त ๑๘. ‘‘โน เจทํ, ภิกฺขเว, รูปานํ อสฺสาโท อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา รูเปสุ สารชฺเชยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ รูปานํ อสฺสาโท, ตสฺมา สตฺตา รูเปสุ สารชฺชนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, รูปานํ อาทีนโว อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา รูเปสุ นิพฺพินฺเทยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ รูปานํ อาทีนโว, ตสฺมา สตฺตา รูเปสุ นิพฺพินฺทนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, รูปานํ นิสฺสรณํ อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา รูเปหิ นิสฺสเรยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ รูปานํ นิสฺสรณํ, ตสฺมา สตฺตา รูเปหิ นิสฺสรนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, สทฺทานํ… คนฺธานํ… รสานํ… โผฏฺฐพฺพานํ… ธมฺมานํ อสฺสาโท อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา ธมฺเมสุ สารชฺเชยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ ธมฺมานํ อสฺสาโท, ตสฺมา สตฺตา ธมฺเมสุ สารชฺชนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, ธมฺมานํ อาทีนโว อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา ธมฺเมสุ นิพฺพินฺเทยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ ธมฺมานํ อาทีนโว, ตสฺมา สตฺตา ธมฺเมสุ นิพฺพินฺทนฺติ. โน เจทํ, ภิกฺขเว, ธมฺมานํ นิสฺสรณํ อภวิสฺส, นยิทํ สตฺตา ธมฺเมหิ นิสฺสเรยฺยุํ. ยสฺมา จ โข, ภิกฺขเว, อตฺถิ ธมฺมานํ นิสฺสรณํ, ตสฺมา สตฺตา ธมฺเมหิ นิสฺสรนฺติ. १८. भिक्षुओं! यदि रूपों का यह आस्वाद न होता, तो प्राणी रूपों में आसक्त न होते। चूँकि भिक्षुओं, रूपों का आस्वाद है, इसलिए प्राणी रूपों में आसक्त होते हैं। यदि रूपों का यह आदिनव न होता, तो प्राणी रूपों से विरक्त न होते। चूँकि भिक्षुओं, रूपों का आदिनव है, इसलिए प्राणी रूपों से विरक्त होते हैं। यदि रूपों का यह निस्सरण न होता, तो प्राणी रूपों से मुक्त न होते। चूँकि भिक्षुओं, रूपों का निस्सरण है, इसलिए प्राणी रूपों से मुक्त होते हैं। भिक्षुओं! यदि शब्दों... गंधों... रसों... स्पर्शों... धर्मों (मानसिक विषयों) का आस्वाद न होता, तो प्राणी धर्मों में आसक्त न होते। चूँकि भिक्षुओं, धर्मों का आस्वाद है, इसलिए प्राणी धर्मों में आसक्त होते हैं। यदि धर्मों का आदिनव न होता, तो प्राणी धर्मों से विरक्त न होते। चूँकि भिक्षुओं, धर्मों का आदिनव है, इसलिए प्राणी धर्मों से विरक्त होते हैं। यदि धर्मों का निस्सरण न होता, तो प्राणी धर्मों से मुक्त न होते। चूँकि भिक्षुओं, धर्मों का निस्सरण है, इसलिए प्राणी धर्मों से मुक्त होते हैं। ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, สตฺตา อิเมสํ ฉนฺนํ พาหิรานํ อายตนานํ อสฺสาทญฺจ อสฺสาทโต, อาทีนวญฺจ อาทีนวโต, นิสฺสรณญฺจ นิสฺสรณโต ยถาภูตํ นาพฺภญฺญํสุ, เนว ตาว, ภิกฺขเว, สตฺตา สเทวกา โลกา สมารกา สพฺรหฺมกา สสฺสมณพฺราหฺมณิยา [Pg.246] ปชาย สเทวมนุสฺสาย นิสฺสฏา วิสญฺญุตฺตา วิปฺปมุตฺตา วิมริยาทีกเตน เจตสา วิหรึสุ. ยโต จ โข, ภิกฺขเว, สตฺตา อิเมสํ ฉนฺนํ พาหิรานํ อายตนานํ อสฺสาทญฺจ อสฺสาทโต, อาทีนวญฺจ อาทีนวโต, นิสฺสรณญฺจ นิสฺสรณโต ยถาภูตํ อพฺภญฺญํสุ, อถ, ภิกฺขเว, สตฺตา สเทวกา โลกา สมารกา สพฺรหฺมกา สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย นิสฺสฏา วิสญฺญุตฺตา วิปฺปมุตฺตา วิมริยาทีกเตน เจตสา วิหรนฺตี’’ติ. ฉฏฺฐํ. हे भिक्षुओं! जब तक प्राणियों ने इन छह बाह्य आयतनों के आस्वाद को आस्वाद के रूप में, उनके दोष को दोष के रूप में और उनके निस्सरण (मुक्ति) को निस्सरण के रूप में यथाभूत (जैसा है वैसा) नहीं जाना, तब तक, हे भिक्षुओं! वे प्राणी देवों, मारों और ब्रह्माओं सहित इस लोक में, श्रमणों और ब्राह्मणों सहित इस प्रजा में, तथा देवों और मनुष्यों सहित इस संसार से न तो निस्सृत (बाहर निकले) हुए, न विसंयुक्त हुए, न विप्रमुक्त हुए और न ही मर्यादा-रहित (क्लेश-मुक्त) चित्त के साथ विहार करते थे। हे भिक्षुओं! जब प्राणियों ने इन छह बाह्य आयतनों के आस्वाद को आस्वाद के रूप में, उनके दोष को दोष के रूप में और उनके निस्सरण को निस्सरण के रूप में यथाभूत जान लिया, तब, हे भिक्षुओं! वे प्राणी देवों, मारों और ब्रह्माओं सहित इस लोक में, श्रमणों और ब्राह्मणों सहित इस प्रजा में, तथा देवों और मनुष्यों सहित इस संसार से निस्सृत, विसंयुक्त और विप्रमुक्त होकर मर्यादा-रहित चित्त के साथ विहार करते हैं। ๗. ปฐมาภินนฺทสุตฺตํ ७. प्रथम अभिनन्द सुत्त। ๑๙. ‘‘โย, ภิกฺขเว, จกฺขุํ อภินนฺทติ, ทุกฺขํ โส อภินนฺทติ. โย ทุกฺขํ อภินนฺทติ, อปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมาติ วทามิ. โย โสตํ…เป… โย ฆานํ…เป… โย ชิวฺหํ อภินนฺทติ, ทุกฺขํ โส อภินนฺทติ. โย ทุกฺขํ อภินนฺทติ, อปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมาติ วทามิ. โย กายํ…เป… โย มนํ อภินนฺทติ, ทุกฺขํ โส อภินนฺทติ. โย ทุกฺขํ อภินนฺทติ, อปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมา’’ติ วทามิ. १९. हे भिक्षुओं! जो चक्षु (आँख) का अभिनन्दन (आनन्द) करता है, वह दुःख का अभिनन्दन करता है। जो दुःख का अभिनन्दन करता है, मैं कहता हूँ कि वह दुःख से मुक्त नहीं है। जो श्रोत्र (कान) का... जो घ्राण (नाक) का... जो जिह्वा (जीभ) का अभिनन्दन करता है, वह दुःख का अभिनन्दन करता है। जो दुःख का अभिनन्दन करता है, मैं कहता हूँ कि वह दुःख से मुक्त नहीं है। जो काय (शरीर) का... जो मन का अभिनन्दन करता है, वह दुःख का अभिनन्दन करता है। जो दुःख का अभिनन्दन करता है, मैं कहता हूँ कि वह दुःख से मुक्त नहीं है। ‘‘โย จ โข, ภิกฺขเว, จกฺขุํ นาภินนฺทติ, ทุกฺขํ โส นาภินนฺทติ. โย ทุกฺขํ นาภินนฺทติ, ปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมาติ วทามิ. โย โสตํ…เป… โย ฆานํ…เป… โย ชิวฺหํ นาภินนฺทติ, ทุกฺขํ โส นาภินนฺทติ. โย ทุกฺขํ นาภินนฺทติ, ปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมาติ วทามิ. โย กายํ…เป… โย มนํ นาภินนฺทติ, ทุกฺขํ โส นาภินนฺทติ. โย ทุกฺขํ นาภินนฺทติ, ปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมา’’ติ วทามิ. สตฺตมํ. हे भिक्षुओं! जो चक्षु का अभिनन्दन नहीं करता, वह दुःख का अभिनन्दन नहीं करता। जो दुःख का अभिनन्दन नहीं करता, मैं कहता हूँ कि वह दुःख से मुक्त है। जो श्रोत्र का... जो घ्राण का... जो जिह्वा का अभिनन्दन नहीं करता, वह दुःख का अभिनन्दन नहीं करता। जो दुःख का अभिनन्दन नहीं करता, मैं कहता हूँ कि वह दुःख से मुक्त है। जो काय का... जो मन का अभिनन्दन नहीं करता, वह दुःख का अभिनन्दन नहीं करता। जो दुःख का अभिनन्दन नहीं करता, मैं कहता हूँ कि वह दुःख से मुक्त है। ๘. ทุติยาภินนฺทสุตฺตํ ८. द्वितीय अभिनन्द सुत्त। ๒๐. ‘‘โย, ภิกฺขเว, รูเป อภินนฺทติ, ทุกฺขํ โส อภินนฺทติ. โย ทุกฺขํ อภินนฺทติ, อปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมาติ วทามิ. โย สทฺเท…เป… คนฺเธ… รเส… โผฏฺฐพฺเพ… ธมฺเม อภินนฺทติ, ทุกฺขํ โส อภินนฺทติ. โย ทุกฺขํ อภินนฺทติ, อปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมา’’ติ วทามิ. २०. हे भिक्षुओं! जो रूपों का अभिनन्दन करता है, वह दुःख का अभिनन्दन करता है। जो दुःख का अभिनन्दन करता है, मैं कहता हूँ कि वह दुःख से मुक्त नहीं है। जो शब्दों का... गंधों का... रसों का... स्पर्शों का... धर्मों (मानसिक विषयों) का अभिनन्दन करता है, वह दुःख का अभिनन्दन करता है। जो दुःख का अभिनन्दन करता है, मैं कहता हूँ कि वह दुःख से मुक्त नहीं है। ‘‘โย จ โข, ภิกฺขเว, รูเป นาภินนฺทติ, ทุกฺขํ โส นาภินนฺทติ. โย ทุกฺขํ นาภินนฺทติ, ปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมาติ วทามิ. โย สทฺเท…เป… คนฺเธ… รเส… โผฏฺฐพฺเพ… ธมฺเม นาภินนฺทติ, ทุกฺขํ โส นาภินนฺทติ. โย ทุกฺขํ นาภินนฺทติ, ปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมา’’ติ วทามิ. อฏฺฐมํ. हे भिक्षुओं! जो रूपों का अभिनन्दन नहीं करता, वह दुःख का अभिनन्दन नहीं करता। जो दुःख का अभिनन्दन नहीं करता, मैं कहता हूँ कि वह दुःख से मुक्त है। जो शब्दों का... गंधों का... रसों का... स्पर्शों का... धर्मों का अभिनन्दन नहीं करता, वह दुःख का अभिनन्दन नहीं करता। जो दुःख का अभिनन्दन नहीं करता, मैं कहता हूँ कि वह दुःख से मुक्त है। ๙. ปฐมทุกฺขุปฺปาทสุตฺตํ ९. प्रथम दुःख-उत्पाद सुत्त। ๒๑. ‘‘โย[Pg.247], ภิกฺขเว, จกฺขุสฺส อุปฺปาโท ฐิติ อภินิพฺพตฺติ ปาตุภาโว, ทุกฺขสฺเสโส อุปฺปาโท, โรคานํ ฐิติ, ชรามรณสฺส ปาตุภาโว. โย โสตสฺส…เป… โย ฆานสฺส… โย ชิวฺหาย… โย กายสฺส… โย มนสฺส อุปฺปาโท ฐิติ อภินิพฺพตฺติ ปาตุภาโว, ทุกฺขสฺเสโส อุปฺปาโท, โรคานํ ฐิติ, ชรามรณสฺส ปาตุภาโว. २१. हे भिक्षुओं! चक्षु का जो उत्पाद (उत्पत्ति), स्थिति (बने रहना), अभिनिर्वृत्ति (पुनर्जन्म) और प्रादुर्भाव (प्रकट होना) है, वह दुःख का उत्पाद है, रोगों की स्थिति है और जरा-मरण का प्रादुर्भाव है। श्रोत्र का... घ्राण का... जिह्वा का... काय का... मन का जो उत्पाद, स्थिति, अभिनिर्वृत्ति और प्रादुर्भाव है, वह दुःख का उत्पाद है, रोगों की स्थिति है और जरा-मरण का प्रादुर्भाव है। ‘‘โย จ โข, ภิกฺขเว, จกฺขุสฺส นิโรโธ วูปสโม อตฺถงฺคโม, ทุกฺขสฺเสโส นิโรโธ, โรคานํ วูปสโม, ชรามรณสฺส อตฺถงฺคโม. โย โสตสฺส… โย ฆานสฺส… โย ชิวฺหาย… โย กายสฺส… โย มนสฺส นิโรโธ วูปสโม อตฺถงฺคโม, ทุกฺขสฺเสโส นิโรโธ, โรคานํ วูปสโม, ชรามรณสฺส อตฺถงฺคโม’’ติ. นวมํ. हे भिक्षुओं! चक्षु का जो निरोध (समाप्ति), व्युपशम (शान्त होना) और अस्तंगम (मिट जाना) है, वह दुःख का निरोध है, रोगों का व्युपशम है और जरा-मरण का अस्तंगम है। श्रोत्र का... घ्राण का... जिह्वा का... काय का... मन का जो निरोध, व्युपशम और अस्तंगम है, वह दुःख का निरोध है, रोगों का व्युपशम है और जरा-मरण का अस्तंगम है। ๑๐. ทุติยทุกฺขุปฺปาทสุตฺตํ १०. द्वितीय दुःख-उत्पाद सुत्त। ๒๒. ‘‘โย, ภิกฺขเว, รูปานํ อุปฺปาโท ฐิติ อภินิพฺพตฺติ ปาตุภาโว, ทุกฺขสฺเสโส อุปฺปาโท, โรคานํ ฐิติ, ชรามรณสฺส ปาตุภาโว. โย สทฺทานํ…เป… โย คนฺธานํ… โย รสานํ… โย โผฏฺฐพฺพานํ… โย ธมฺมานํ อุปฺปาโท ฐิติ อภินิพฺพตฺติ ปาตุภาโว, ทุกฺขสฺเสโส อุปฺปาโท, โรคานํ ฐิติ, ชรามรณสฺส ปาตุภาโว. २२. हे भिक्षुओं! रूपों का जो उत्पाद, स्थिति, अभिनिर्वृत्ति और प्रादुर्भाव है, वह दुःख का उत्पाद है, रोगों की स्थिति है और जरा-मरण का प्रादुर्भाव है। शब्दों का... गंधों का... रसों का... स्पर्शों का... धर्मों का जो उत्पाद, स्थिति, अभिनिर्वृत्ति और प्रादुर्भाव है, वह दुःख का उत्पाद है, रोगों की स्थिति है और जरा-मरण का प्रादुर्भाव है। ‘‘โย จ โข, ภิกฺขเว, รูปานํ นิโรโธ วูปสโม อตฺถงฺคโม, ทุกฺขสฺเสโส นิโรโธ, โรคานํ วูปสโม, ชรามรณสฺส อตฺถงฺคโม. โย สทฺทานํ…เป… โย คนฺธานํ… โย รสานํ… โย โผฏฺฐพฺพานํ… โย ธมฺมานํ นิโรโธ วูปสโม อตฺถงฺคโม, ทุกฺขสฺเสโส นิโรโธ, โรคานํ วูปสโม, ชรามรณสฺส อตฺถงฺคโม’’ติ. ทสมํ. हे भिक्षुओं! रूपों का जो निरोध, व्युपशम और अस्तंगम है, वह दुःख का निरोध है, रोगों का व्युपशम है और जरा-मरण का अस्तंगम है। शब्दों का... गंधों का... रसों का... स्पर्शों का... धर्मों का जो निरोध, व्युपशम और अस्तंगम है, वह दुःख का निरोध है, रोगों का व्युपशम है और जरा-मरण का अस्तंगम है। ยมกวคฺโค ทุติโย. द्वितीय यमक वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका उद्दान (विषय-सूची) – สมฺโพเธน ทุเว วุตฺตา, อสฺสาเทน อปเร ทุเว; โน เจเตน ทุเว วุตฺตา, อภินนฺเทน อปเร ทุเว; อุปฺปาเทน ทุเว วุตฺตา, วคฺโค เตน ปวุจฺจตีติ. सम्बोध (ज्ञान) के विषय में दो सुत्त कहे गए हैं, आस्वाद के विषय में अन्य दो; 'नो चे' (यदि नहीं) के विषय में दो कहे गए हैं, अभिनन्दन के विषय में अन्य दो; उत्पाद के विषय में दो सुत्त कहे गए हैं, इसलिए इसे 'वर्ग' कहा जाता है। ๓. สพฺพวคฺโค ३. सर्व वर्ग। ๑. สพฺพสุตฺตํ १. सर्व सुत्त। ๒๓. สาวตฺถินิทานํ[Pg.248]. ‘‘สพฺพํ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, สพฺพํ? จกฺขุญฺเจว รูปา จ, โสตญฺจ สทฺทา จ, ฆานญฺจ คนฺธา จ, ชิวฺหา จ รสา จ, กาโย จ โผฏฺฐพฺพา จ, มโน จ ธมฺมา จ – อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, สพฺพํ. โย, ภิกฺขเว, เอวํ วเทยฺย – ‘อหเมตํ สพฺพํ ปจฺจกฺขาย อญฺญํ สพฺพํ ปญฺญาเปสฺสามี’ติ, ตสฺส วาจาวตฺถุกเมวสฺส ; ปุฏฺโฐ จ น สมฺปาเยยฺย, อุตฺตริญฺจ วิฆาตํ อาปชฺเชยฺย. ตํ กิสฺส เหตุ? ยถา ตํ, ภิกฺขเว, อวิสยสฺมิ’’นฺติ. ปฐมํ. २३. श्रावस्ती निदान। 'हे भिक्षुओं! मैं तुम्हें 'सब' (सर्व) का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। हे भिक्षुओं! 'सब' क्या है? चक्षु और रूप, श्रोत्र और शब्द, घ्राण और गंध, जिह्वा और रस, काय और स्पर्श, मन और धर्म—हे भिक्षुओं! इसे ही 'सब' कहा जाता है। हे भिक्षुओं! यदि कोई ऐसा कहे—'मैं इस सब को त्याग कर किसी दूसरे 'सब' की प्रज्ञप्ति (स्थापना) करूँगा', तो उसकी वह बात केवल वाणी तक ही सीमित रहेगी; पूछने पर वह उत्तर नहीं दे पाएगा और इसके अतिरिक्त वह कष्ट (व्याकुलता) को प्राप्त होगा। ऐसा क्यों? हे भिक्षुओं! क्योंकि वह उसके विषय (सामर्थ्य) से बाहर है।' ๒. ปหานสุตฺตํ २. प्रहाण सुत्त। ๒๔. ‘‘สพฺพปฺปหานาย โว, ภิกฺขเว, ธมฺมํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, สพฺพปฺปหานาย ธมฺโม? จกฺขุํ, ภิกฺขเว, ปหาตพฺพํ, รูปา ปหาตพฺพา, จกฺขุวิญฺญาณํ ปหาตพฺพํ, จกฺขุสมฺผสฺโส ปหาตพฺโพ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ปหาตพฺพํ…เป… ยมฺปิทํ โสตสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ปหาตพฺพํ… ยมฺปิทํ ฆานสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ปหาตพฺพํ. ชิวฺหา ปหาตพฺพา, รสา ปหาตพฺพา, ชิวฺหาวิญฺญาณํ ปหาตพฺพํ, ชิวฺหาสมฺผสฺโส ปหาตพฺโพ, ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ปหาตพฺพํ. กาโย ปหาตพฺโพ… มโน ปหาตพฺโพ, ธมฺมา ปหาตพฺพา, มโนวิญฺญาณํ ปหาตพฺพํ, มโนสมฺผสฺโส ปหาตพฺโพ, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ปหาตพฺพํ. อยํ โข, ภิกฺขเว, สพฺพปฺปหานาย ธมฺโม’’ติ. ทุติยํ. २४. “भिक्षुओं! मैं तुम्हें सब (आयतन) के परित्याग के लिए धर्म का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। और भिक्षुओं! सब के परित्याग के लिए वह धर्म कौन सा है? भिक्षुओं! चक्षु (आँख) का परित्याग करना चाहिए, रूपों का परित्याग करना चाहिए, चक्षु-विज्ञान का परित्याग करना चाहिए, चक्षु-स्पर्श का परित्याग करना चाहिए; और चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय (कारण) से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसका भी परित्याग करना चाहिए... (पे)... श्रोत्र-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसका भी परित्याग करना चाहिए... घ्राण-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसका भी परित्याग करना चाहिए। जिह्वा (जीभ) का परित्याग करना चाहिए, रसों का परित्याग करना चाहिए, जिह्वा-विज्ञान का परित्याग करना चाहिए, जिह्वा-स्पर्श का परित्याग करना चाहिए; और जिह्वा-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसका भी परित्याग करना चाहिए। काय (शरीर) का परित्याग करना चाहिए... मन का परित्याग करना चाहिए, धर्मों (मानसिक विषयों) का परित्याग करना चाहिए, मनो-विज्ञान का परित्याग करना चाहिए, मनो-स्पर्श का परित्याग करना चाहिए; और मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसका भी परित्याग करना चाहिए। भिक्षुओं! यही सब के परित्याग के लिए धर्म है।” द्वितीय। ๓. อภิญฺญาปริญฺญาปหานสุตฺตํ ३. अभिज्ञा-परिज्ञा-प्रहाण सुत्त ๒๕. ‘‘สพฺพํ อภิญฺญา ปริญฺญา ปหานาย โว, ภิกฺขเว, ธมฺมํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, สพฺพํ อภิญฺญา ปริญฺญา ปหานาย ธมฺโม? จกฺขุํ, ภิกฺขเว, อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพํ, รูปา อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพา[Pg.249], จกฺขุวิญฺญาณํ อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพํ, จกฺขุสมฺผสฺโส อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺโพ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพํ…เป… ชิวฺหา อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพา, รสา อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพา, ชิวฺหาวิญฺญาณํ อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพํ, ชิวฺหาสมฺผสฺโส อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺโพ, ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพํ. กาโย อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺโพ… มโน อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺโพ, ธมฺมา อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพา, มโนวิญฺญาณํ อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพํ, มโนสมฺผสฺโส อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺโพ, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อภิญฺญา ปริญฺญา ปหาตพฺพํ. อยํ โข, ภิกฺขเว, สพฺพํ อภิญฺญา ปริญฺญา ปหานาย ธมฺโม’’ติ. ตติยํ. २५. “भिक्षुओं! मैं तुम्हें सब (आयतन) को विशेष ज्ञान (अभिज्ञा) से जानकर, पूर्णतः जानकर (परिज्ञा) और परित्याग करने के लिए धर्म का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। और भिक्षुओं! सब को विशेष ज्ञान से जानकर, पूर्णतः जानकर और परित्याग करने के लिए वह धर्म कौन सा है? भिक्षुओं! चक्षु को विशेष ज्ञान से जानकर और पूर्णतः जानकर उसका परित्याग करना चाहिए, रूपों को विशेष ज्ञान से जानकर और पूर्णतः जानकर उनका परित्याग करना चाहिए, चक्षु-विज्ञान को विशेष ज्ञान से जानकर और पूर्णतः जानकर उसका परित्याग करना चाहिए, चक्षु-स्पर्श को विशेष ज्ञान से जानकर और पूर्णतः जानकर उसका परित्याग करना चाहिए; और चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे भी विशेष ज्ञान से जानकर और पूर्णतः जानकर उसका परित्याग करना चाहिए... (पे)... जिह्वा को विशेष ज्ञान से जानकर और पूर्णतः जानकर उसका परित्याग करना चाहिए, रसों को विशेष ज्ञान से जानकर और पूर्णतः जानकर उनका परित्याग करना चाहिए, जिह्वा-विज्ञान को विशेष ज्ञान से जानकर और पूर्णतः जानकर उसका परित्याग करना चाहिए, जिह्वा-स्पर्श को विशेष ज्ञान से जानकर और पूर्णतः जानकर उसका परित्याग करना चाहिए; और जिह्वा-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे भी विशेष ज्ञान से जानकर और पूर्णतः जानकर उसका परित्याग करना चाहिए। काय को विशेष ज्ञान से जानकर और पूर्णतः जानकर उसका परित्याग करना चाहिए... मन को विशेष ज्ञान से जानकर और पूर्णतः जानकर उसका परित्याग करना चाहिए, धर्मों को विशेष ज्ञान से जानकर और पूर्णतः जानकर उनका परित्याग करना चाहिए, मनो-विज्ञान को विशेष ज्ञान से जानकर और पूर्णतः जानकर उसका परित्याग करना चाहिए, मनो-स्पर्श को विशेष ज्ञान से जानकर और पूर्णतः जानकर उसका परित्याग करना चाहिए; और मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे भी विशेष ज्ञान से जानकर और पूर्णतः जानकर उसका परित्याग करना चाहिए। भिक्षुओं! यही सब को विशेष ज्ञान से जानकर, पूर्णतः जानकर और परित्याग करने के लिए धर्म है।” तृतीय। ๔. ปฐมอปริชานนสุตฺตํ ४. प्रथम अपरिज्ञान सुत्त ๒๖. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. กิญฺจ, ภิกฺขเว, อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย? จกฺขุํ, ภิกฺขเว, อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. รูเป อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. จกฺขุวิญฺญาณํ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. จกฺขุสมฺผสฺสํ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย…เป… ชิวฺหํ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. รเส…เป… ชิวฺหาวิญฺญาณํ…เป… ชิวฺหาสมฺผสฺสํ…เป… ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. กายํ…เป… มนํ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. ธมฺเม…เป… มโนวิญฺญาณํ…เป… มโนสมฺผสฺสํ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ [Pg.250] อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. อิทํ โข, ภิกฺขเว, สพฺพํ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. २६. “भिक्षुओं! सब (आयतन) को विशेष ज्ञान से न जानते हुए, पूर्णतः न जानते हुए, विरक्त न करते हुए और परित्याग न करते हुए, कोई दुखों के क्षय (निर्वाण) के लिए समर्थ नहीं होता। और भिक्षुओं! वह क्या है जिसे विशेष ज्ञान से न जानते हुए, पूर्णतः न जानते हुए, विरक्त न करते हुए और परित्याग न करते हुए दुखों के क्षय के लिए समर्थ नहीं होता? भिक्षुओं! चक्षु को विशेष ज्ञान से न जानते हुए, पूर्णतः न जानते हुए, विरक्त न करते हुए और परित्याग न करते हुए दुखों के क्षय के लिए समर्थ नहीं होता। रूपों को विशेष ज्ञान से न जानते हुए, पूर्णतः न जानते हुए, विरक्त न करते हुए और परित्याग न करते हुए दुखों के क्षय के लिए समर्थ नहीं होता। चक्षु-विज्ञान को विशेष ज्ञान से न जानते हुए, पूर्णतः न जानते हुए, विरक्त न करते हुए और परित्याग न करते हुए दुखों के क्षय के लिए समर्थ नहीं होता। चक्षु-स्पर्श को विशेष ज्ञान से न जानते हुए, पूर्णतः न जानते हुए, विरक्त न करते हुए और परित्याग न करते हुए दुखों के क्षय के लिए समर्थ नहीं होता। और चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे विशेष ज्ञान से न जानते हुए, पूर्णतः न जानते हुए, विरक्त न करते हुए और परित्याग न करते हुए दुखों के क्षय के लिए समर्थ नहीं होता... (पे)... जिह्वा को विशेष ज्ञान से न जानते हुए, पूर्णतः न जानते हुए, विरक्त न करते हुए और परित्याग न करते हुए दुखों के क्षय के लिए समर्थ नहीं होता। रसों को... जिह्वा-विज्ञान को... जिह्वा-स्पर्श को... और जिह्वा-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे विशेष ज्ञान से न जानते हुए, पूर्णतः न जानते हुए, विरक्त न करते हुए और परित्याग न करते हुए दुखों के क्षय के लिए समर्थ नहीं होता। काय को... मन को विशेष ज्ञान से न जानते हुए, पूर्णतः न जानते हुए, विरक्त न करते हुए और परित्याग न करते हुए दुखों के क्षय के लिए समर्थ नहीं होता। धर्मों को... मनो-विज्ञान को... मनो-स्पर्श को... और मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे विशेष ज्ञान से न जानते हुए, पूर्णतः न जानते हुए, विरक्त न करते हुए और परित्याग न करते हुए दुखों के क्षय के लिए समर्थ नहीं होता। भिक्षुओं! यही वह सब है जिसे विशेष ज्ञान से न जानते हुए, पूर्णतः न जानते हुए, विरक्त न करते हुए और परित्याग न करते हुए दुखों के क्षय के लिए समर्थ नहीं होता।” ‘‘สพฺพญฺจ โข, ภิกฺขเว, อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. กิญฺจ, ภิกฺขเว, สพฺพํ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย? จกฺขุํ, ภิกฺขเว, อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. รูเป อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. จกฺขุวิญฺญาณํ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. จกฺขุสมฺผสฺสํ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย…เป… ชิวฺหํ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. รเส…เป… ชิวฺหาวิญฺญาณํ…เป… ชิวฺหาสมฺผสฺสํ…เป… ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. กายํ…เป… มนํ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. ธมฺเม…เป… มโนวิญฺญาณํ…เป… มโนสมฺผสฺสํ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. อิทํ โข, ภิกฺขเว, สพฺพํ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยายา’’ติ. จตุตฺถํ. "भिक्षुओं! वास्तव में, सब कुछ को विशेष ज्ञान (अभिज्ञा) से जानकर, पूर्णतः समझकर (परिज्ञा), विरक्त होकर और त्यागकर ही कोई दुखों के क्षय के योग्य होता है। और भिक्षुओं, वह सब क्या है जिसे विशेष ज्ञान से जानकर, पूर्णतः समझकर, विरक्त होकर और त्यागकर कोई दुखों के क्षय के योग्य होता है? भिक्षुओं! चक्षु (आँख) को विशेष ज्ञान से जानकर, पूर्णतः समझकर, विरक्त होकर और त्यागकर कोई दुखों के क्षय के योग्य होता है। रूपों को विशेष ज्ञान से जानकर, पूर्णतः समझकर, विरक्त होकर और त्यागकर कोई दुखों के क्षय के योग्य होता है। चक्षु-विज्ञान को... चक्षु-संपर्श को... चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से उत्पन्न होने वाली सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना को भी विशेष ज्ञान से जानकर, पूर्णतः समझकर, विरक्त होकर और त्यागकर कोई दुखों के क्षय के योग्य होता है। ...पे... जिह्वा (जीभ) को विशेष ज्ञान से जानकर, पूर्णतः समझकर, विरक्त होकर और त्यागकर कोई दुखों के क्षय के योग्य होता है। रसों को... जिह्वा-विज्ञान को... जिह्वा-संपर्श को... जिह्वा-संपर्श के प्रत्यय से उत्पन्न होने वाली सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना को भी विशेष ज्ञान से जानकर, पूर्णतः समझकर, विरक्त होकर और त्यागकर कोई दुखों के क्षय के योग्य होता है। काय (शरीर) को... मन को विशेष ज्ञान से जानकर, पूर्णतः समझकर, विरक्त होकर और त्यागकर कोई दुखों के क्षय के योग्य होता है। धर्मों (मानसिक विषयों) को... मनो-विज्ञान को... मनो-संपर्श को... मनो-संपर्श के प्रत्यय से उत्पन्न होने वाली सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना को भी विशेष ज्ञान से जानकर, पूर्णतः समझकर, विरक्त होकर और त्यागकर कोई दुखों के क्षय के योग्य होता है। भिक्षुओं! वास्तव में, इस सब कुछ को विशेष ज्ञान से जानकर, पूर्णतः समझकर, विरक्त होकर और त्यागकर ही कोई दुखों के क्षय के योग्य होता है।" चौथा सुत्त। ๕. ทุติยอปริชานนสุตฺตํ ५. द्वितीय अपरिजानन सुत्त ๒๗. ‘‘สพฺพํ[Pg.251], ภิกฺขเว, อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. กิญฺจ, ภิกฺขเว, สพฺพํ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย? ยญฺจ, ภิกฺขเว, จกฺขุ, เย จ รูปา, ยญฺจ จกฺขุวิญฺญาณํ, เย จ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา…เป… ยา จ ชิวฺหา, เย จ รสา, ยญฺจ ชิวฺหาวิญฺญาณํ, เย จ ชิวฺหาวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา; โย จ กาโย, เย จ โผฏฺฐพฺพา, ยญฺจ กายวิญฺญาณํ, เย จ กายวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา; โย จ มโน, เย จ ธมฺมา, ยญฺจ มโนวิญฺญาณํ, เย จ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา – อิทํ โข, ภิกฺขเว, สพฺพํ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. २७. "भिक्षुओं! सब कुछ को विशेष ज्ञान से न जानकर, पूर्णतः न समझकर, विरक्त न होकर और न त्यागकर कोई दुखों के क्षय के अयोग्य होता है। और भिक्षुओं, वह सब क्या है जिसे विशेष ज्ञान से न जानकर, पूर्णतः न समझकर, विरक्त न होकर और न त्यागकर कोई दुखों के क्षय के अयोग्य होता है? भिक्षुओं! जो चक्षु है, जो रूप हैं, जो चक्षु-विज्ञान है, और जो चक्षु-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्म हैं... जो जिह्वा है, जो रस हैं, जो जिह्वा-विज्ञान है, और जो जिह्वा-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्म हैं; जो काय है, जो स्पर्श (फोठब्ब) हैं, जो काय-विज्ञान है, और जो काय-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्म हैं; जो मन है, जो धर्म हैं, जो मनो-विज्ञान है, और जो मनो-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्म हैं—भिक्षुओं! वास्तव में, इस सब कुछ को विशेष ज्ञान से न जानकर, पूर्णतः न समझकर, विरक्त न होकर और न त्यागकर कोई दुखों के क्षय के अयोग्य होता है।" ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. กิญฺจ, ภิกฺขเว, สพฺพํ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย? ยญฺจ, ภิกฺขเว, จกฺขุ, เย จ รูปา, ยญฺจ จกฺขุวิญฺญาณํ, เย จ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา…เป… ยา จ ชิวฺหา, เย จ รสา, ยญฺจ ชิวฺหาวิญฺญาณํ, เย จ ชิวฺหาวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา; โย จ กาโย, เย จ โผฏฺฐพฺพา, ยญฺจ กายวิญฺญาณํ, เย จ กายวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา; โย จ มโน, เย จ ธมฺมา, ยญฺจ มโนวิญฺญาณํ, เย จ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา – อิทํ โข, ภิกฺขเว, สพฺพํ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยายา’’ติ. ปญฺจมํ. "भिक्षुओं! सब कुछ को विशेष ज्ञान से जानकर, पूर्णतः समझकर, विरक्त होकर और त्यागकर कोई दुखों के क्षय के योग्य होता है। और भिक्षुओं, वह सब क्या है जिसे विशेष ज्ञान से जानकर, पूर्णतः समझकर, विरक्त होकर और त्यागकर कोई दुखों के क्षय के योग्य होता है? भिक्षुओं! जो चक्षु है, जो रूप हैं, जो चक्षु-विज्ञान है, और जो चक्षु-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्म हैं... जो जिह्वा है, जो रस हैं, जो जिह्वा-विज्ञान है, और जो जिह्वा-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्म हैं; जो काय है, जो स्पर्श हैं, जो काय-विज्ञान है, और जो काय-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्म हैं; जो मन है, जो धर्म हैं, जो मनो-विज्ञान है, और जो मनो-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्म हैं—भिक्षुओं! वास्तव में, इस सब कुछ को विशेष ज्ञान से जानकर, पूर्णतः समझकर, विरक्त होकर और त्यागकर ही कोई दुखों के क्षय के योग्य होता है।" पाँचवाँ सुत्त। ๖. อาทิตฺตสุตฺตํ ६. आदित्त सुत्त ๒๘. เอกํ สมยํ ภควา คยายํ วิหรติ คยาสีเส สทฺธึ ภิกฺขุสหสฺเสน. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อาทิตฺตํ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, สพฺพํ อาทิตฺตํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, อาทิตฺตํ, รูปา อาทิตฺตา, จกฺขุวิญฺญาณํ อาทิตฺตํ, จกฺขุสมฺผสฺโส อาทิตฺโต. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อาทิตฺตํ. เกน อาทิตฺตํ? ‘ราคคฺคินา, โทสคฺคินา, โมหคฺคินา อาทิตฺตํ, ชาติยา ชราย มรเณน โสเกหิ ปริเทเวหิ ทุกฺเขหิ โทมนสฺเสหิ อุปายาเสหิ อาทิตฺต’นฺติ วทามิ…เป… ชิวฺหา อาทิตฺตา, รสา อาทิตฺตา, ชิวฺหาวิญฺญาณํ อาทิตฺตํ, ชิวฺหาสมฺผสฺโส อาทิตฺโต. ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อาทิตฺตํ. เกน อาทิตฺตํ? ‘ราคคฺคินา, โทสคฺคินา, โมหคฺคินา อาทิตฺตํ, ชาติยา ชราย มรเณน โสเกหิ ปริเทเวหิ ทุกฺเขหิ โทมนสฺเสหิ อุปายาเสหิ อาทิตฺต’นฺติ วทามิ…เป… มโน อาทิตฺโต, ธมฺมา อาทิตฺตา, มโนวิญฺญาณํ อาทิตฺตํ, มโนสมฺผสฺโส อาทิตฺโต. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อาทิตฺตํ. เกน อาทิตฺตํ? ‘ราคคฺคินา, โทสคฺคินา, โมหคฺคินา อาทิตฺตํ, ชาติยา ชราย มรเณน โสเกหิ ปริเทเวหิ ทุกฺเขหิ โทมนสฺเสหิ อุปายาเสหิ อาทิตฺต’นฺติ วทามิ. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ [Pg.252] เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ …เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. อิทมโวจ ภควา. อตฺตมนา เต ภิกฺขู ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทุํ. อิมสฺมิญฺจ ปน เวยฺยากรณสฺมึ ภญฺญมาเน ตสฺส ภิกฺขุสหสฺสสฺส อนุปาทาย อาสเวหิ จิตฺตานิ วิมุจฺจึสูติ. ฉฏฺฐํ. २८. एक समय भगवान गया में गयासीस पर एक हजार भिक्षुओं के साथ विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— "हे भिक्षुओं! सब कुछ प्रदीप्त (जल रहा) है। और भिक्षुओं, वह सब क्या है जो प्रदीप्त है? भिक्षुओं! चक्षु (आँख) प्रदीप्त है, रूप प्रदीप्त हैं, चक्षु-विज्ञान प्रदीप्त है, चक्षु-संपर्श प्रदीप्त है। चक्षु-संपर्श के प्रत्यय (कारण) से जो सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी प्रदीप्त है। वह किससे प्रदीप्त है? मैं कहता हूँ कि वह राग की अग्नि से, द्वेष की अग्नि से, और मोह की अग्नि से प्रदीप्त है; वह जन्म, जरा, मरण, शोक, परिदेव (रोना-पीटना), दुःख, दौर्मनस्य (मानसिक कष्ट) और उपायास (हताशा) से प्रदीप्त है... (पे)... जिह्वा प्रदीप्त है, रस प्रदीप्त हैं, जिह्वा-विज्ञान प्रदीप्त है, जिह्वा-संपर्श प्रदीप्त है। जिह्वा-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी प्रदीप्त है। वह किससे प्रदीप्त है? मैं कहता हूँ कि वह राग की अग्नि से, द्वेष की अग्नि से, और मोह की अग्नि से प्रदीप्त है; वह जन्म, जरा, मरण, शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास से प्रदीप्त है... (पे)... मन प्रदीप्त है, धम्म (विचार) प्रदीप्त हैं, मनो-विज्ञान प्रदीप्त है, मनो-संपर्श प्रदीप्त है। मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी प्रदीप्त है। वह किससे प्रदीप्त है? मैं कहता हूँ कि वह राग की अग्नि से, द्वेष की अग्नि से, और मोह की अग्नि से प्रदीप्त है; वह जन्म, जरा, मरण, शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास से प्रदीप्त है। हे भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक चक्षु से निर्वेद (वैराग्य) प्राप्त करता है, रूपों से निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-विज्ञान से निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-संपर्श से निर्वेद प्राप्त करता है; चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उससे भी निर्वेद प्राप्त करता है... (पे)... मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उससे भी निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद से वह विरक्त होता है; विराग से वह मुक्त होता है; मुक्त होने पर 'मैं मुक्त हूँ' ऐसा ज्ञान होता है। वह जान लेता है— 'जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है'।" भगवान ने यह कहा। उन भिक्षुओं ने प्रसन्न होकर भगवान के प्रवचन का अभिनंदन किया। और जब यह उपदेश दिया जा रहा था, तब उन एक हजार भिक्षुओं के चित्त बिना किसी उपादान (आसक्ति) के आस्रवों से मुक्त हो गए। छठा सुत्त। ๗. อทฺธภูตสุตฺตํ ७. अद्धभूत सुत्त ๒๙. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อทฺธภูตํ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, สพฺพํ อทฺธภูตํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, อทฺธภูตํ, รูปา อทฺธภูตา, จกฺขุวิญฺญาณํ อทฺธภูตํ, จกฺขุสมฺผสฺโส อทฺธภูโต, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อทฺธภูตํ. เกน อทฺธภูตํ? ‘ชาติยา ชราย มรเณน โสเกหิ ปริเทเวหิ ทุกฺเขหิ โทมนสฺเสหิ อุปายาเสหิ อทฺธภูต’นฺติ วทามิ…เป… ชิวฺหา อทฺธภูตา, รสา อทฺธภูตา, ชิวฺหาวิญฺญาณํ อทฺธภูตํ, ชิวฺหาสมฺผสฺโส อทฺธภูโต, ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อทฺธภูตํ. เกน อทฺธภูตํ? ‘ชาติยา ชราย มรเณน โสเกหิ ปริเทเวหิ ทุกฺเขหิ โทมนสฺเสหิ อุปายาเสหิ อทฺธภูต’นฺติ วทามิ. กาโย อทฺธภูโต…เป… มโน อทฺธภูโต, ธมฺมา อทฺธภูตา, มโนวิญฺญาณํ อทฺธภูตํ, มโนสมฺผสฺโส อทฺธภูโต, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อทฺธภูตํ. เกน อทฺธภูตํ? ‘ชาติยา ชราย มรเณน โสเกหิ ปริเทเวหิ ทุกฺเขหิ โทมนสฺเสหิ อุปายาเสหิ อทฺธภูต’นฺติ วทามิ. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ[Pg.253], วิราคา วิมุจฺจติ, วิมุตฺตสฺมึ ‘วิมุตฺต’มิติ ญาณํ โหติ, ‘ขีณา ชาติ วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. สตฺตมํ. २९. ऐसा मैंने सुना— एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दकनिवाप में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— "हे भिक्षुओं! सब कुछ अभिभूत (उत्पीड़ित) है। और भिक्षुओं, वह सब क्या है जो अभिभूत है? भिक्षुओं! चक्षु अभिभूत है, रूप अभिभूत हैं, चक्षु-विज्ञान अभिभूत है, चक्षु-संपर्श अभिभूत है; चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी अभिभूत है। वह किससे अभिभूत है? मैं कहता हूँ कि वह जन्म, जरा, मरण, शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास से अभिभूत है... (पे)... जिह्वा अभिभूत है, रस अभिभूत हैं, जिह्वा-विज्ञान अभिभूत है, जिह्वा-संपर्श अभिभूत है; जिह्वा-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी अभिभूत है। वह किससे अभिभूत है? मैं कहता हूँ कि वह जन्म, जरा, मरण, शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास से अभिभूत है। काय (शरीर) अभिभूत है... (पे)... मन अभिभूत है, धम्म अभिभूत हैं, मनो-विज्ञान अभिभूत है, मनो-संपर्श अभिभूत है; मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी अभिभूत है। वह किससे अभिभूत है? मैं कहता हूँ कि वह जन्म, जरा, मरण, शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास से अभिभूत है। हे भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक चक्षु से निर्वेद प्राप्त करता है, रूपों से निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-विज्ञान से निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-संपर्श से निर्वेद प्राप्त करता है... (पे)... मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उससे भी निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद से वह विरक्त होता है, विराग से वह मुक्त होता है, मुक्त होने पर 'मैं मुक्त हूँ' ऐसा ज्ञान होता है— 'जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है'।" सातवाँ सुत्त। ๘. สมุคฺฆาตสารุปฺปสุตฺตํ ८. समुग्घातसारुप्प सुत्त ๓๐. ‘‘สพฺพมญฺญิตสมุคฺฆาตสารุปฺปํ โว, ภิกฺขเว, ปฏิปทํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ, สาธุกํ มนสิ กโรถ; ภาสิสฺสามีติ. กตมา จ สา, ภิกฺขเว, สพฺพมญฺญิตสมุคฺฆาตสารุปฺปา ปฏิปทา? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุํ น มญฺญติ, จกฺขุสฺมึ น มญฺญติ, จกฺขุโต น มญฺญติ, จกฺขุํ เมติ น มญฺญติ. รูเป น มญฺญติ, รูเปสุ น มญฺญติ, รูปโต น มญฺญติ, รูปา เมติ น มญฺญติ. จกฺขุวิญฺญาณํ น มญฺญติ, จกฺขุวิญฺญาณสฺมึ น มญฺญติ, จกฺขุวิญฺญาณโต น มญฺญติ, จกฺขุวิญฺญาณํ เมติ น มญฺญติ. จกฺขุสมฺผสฺสํ น มญฺญติ, จกฺขุสมฺผสฺสสฺมึ น มญฺญติ, จกฺขุสมฺผสฺสโต น มญฺญติ, จกฺขุสมฺผสฺโส เมติ น มญฺญติ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺญติ, ตสฺมิมฺปิ น มญฺญติ, ตโตปิ น มญฺญติ, ตํ เมติ น มญฺญติ…เป… ชิวฺหํ น มญฺญติ, ชิวฺหาย น มญฺญติ, ชิวฺหาโต น มญฺญติ, ชิวฺหา เมติ น มญฺญติ. รเส น มญฺญติ, รเสสุ น มญฺญติ, รสโต น มญฺญติ, รสา เมติ น มญฺญติ. ชิวฺหาวิญฺญาณํ น มญฺญติ, ชิวฺหาวิญฺญาณสฺมึ น มญฺญติ, ชิวฺหาวิญฺญาณโต น มญฺญติ, ชิวฺหาวิญฺญาณํ เมติ น มญฺญติ. ชิวฺหาสมฺผสฺสํ น มญฺญติ, ชิวฺหาสมฺผสฺสสฺมึ น มญฺญติ, ชิวฺหาสมฺผสฺสโต น มญฺญติ, ชิวฺหาสมฺผสฺโส เมติ น มญฺญติ. ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺญติ, ตสฺมิมฺปิ น มญฺญติ, ตโตปิ น มญฺญติ, ตํ เมติ น มญฺญติ…เป… มนํ น มญฺญติ, มนสฺมึ น มญฺญติ, มนโต น มญฺญติ, มโน เมติ น มญฺญติ. ธมฺเม น มญฺญติ, ธมฺเมสุ น มญฺญติ, ธมฺมโต น มญฺญติ, ธมฺมา เมติ น มญฺญติ. มโนวิญฺญาณํ น มญฺญติ, มโนวิญฺญาณสฺมึ น มญฺญติ, มโนวิญฺญาณโต น มญฺญติ, มโนวิญฺญาณํ เมติ น มญฺญติ. มโนสมฺผสฺสํ น มญฺญติ, มโนสมฺผสฺสสฺมึ น มญฺญติ, มโนสมฺผสฺสโต น มญฺญติ, มโนสมฺผสฺโส เมติ น มญฺญติ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺญติ, ตสฺมิมฺปิ น มญฺญติ, ตโตปิ น มญฺญติ, ตํ เมติ น มญฺญติ. สพฺพํ น มญฺญติ, สพฺพสฺมึ น มญฺญติ, สพฺพโต น มญฺญติ, สพฺพํ เมติ น มญฺญติ. โส เอวํ อมญฺญมาโน [Pg.254] น จ กิญฺจิ โลเก อุปาทิยติ. อนุปาทิยํ น ปริตสฺสติ. อปริตสฺสํ ปจฺจตฺตญฺเญว ปรินิพฺพายติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาติ. อยํ โข สา, ภิกฺขเว, สพฺพมญฺญิตสมุคฺฆาตสารุปฺปา ปฏิปทา’’ติ. อฏฺฐมํ. ३०. “भिक्षुओं, मैं तुम्हें सभी कल्पनाओं (अभिमानों) के उन्मूलन के लिए उपयुक्त प्रतिपदा (मार्ग) का उपदेश दूँगा। उसे सुनो, अच्छी तरह मन में धारण करो; मैं कहूँगा। और भिक्षुओं, सभी कल्पनाओं के उन्मूलन के लिए उपयुक्त वह प्रतिपदा क्या है? भिक्षुओं, यहाँ भिक्षु चक्षु (आँख) की कल्पना नहीं करता, चक्षु में कल्पना नहीं करता, चक्षु से कल्पना नहीं करता, 'चक्षु मेरा है' ऐसी कल्पना नहीं करता। वह रूपों की कल्पना नहीं करता, रूपों में कल्पना नहीं करता, रूपों से कल्पना नहीं करता, 'रूप मेरे हैं' ऐसी कल्पना नहीं करता। वह चक्षु-विज्ञान की कल्पना नहीं करता, चक्षु-विज्ञान में कल्पना नहीं करता, चक्षु-विज्ञान से कल्पना नहीं करता, 'चक्षु-विज्ञान मेरा है' ऐसी कल्पना नहीं करता। वह चक्षु-संपर्श की कल्पना नहीं करता, चक्षु-संपर्श में कल्पना नहीं करता, चक्षु-संपर्श से कल्पना नहीं करता, 'चक्षु-संपर्श मेरा है' ऐसी कल्पना नहीं करता। चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदन (अनुभव) उत्पन्न होता है, वह उसकी भी कल्पना नहीं करता, उसमें कल्पना नहीं करता, उससे कल्पना नहीं करता, 'वह मेरा है' ऐसी कल्पना नहीं करता... विस्तार... वह जिह्वा (जीभ) की कल्पना नहीं करता, जिह्वा में कल्पना नहीं करता, जिह्वा से कल्पना नहीं करता, 'जिह्वा मेरी है' ऐसी कल्पना नहीं करता। वह रसों की कल्पना नहीं करता, रसों में कल्पना नहीं करता, रसों से कल्पना नहीं करता, 'रस मेरे हैं' ऐसी कल्पना नहीं करता। वह जिह्वा-विज्ञान की कल्पना नहीं करता, जिह्वा-विज्ञान में कल्पना नहीं करता, जिह्वा-विज्ञान से कल्पना नहीं करता, 'जिह्वा-विज्ञान मेरा है' ऐसी कल्पना नहीं करता। वह जिह्वा-संपर्श की कल्पना नहीं करता, जिह्वा-संपर्श में कल्पना नहीं करता, जिह्वा-संपर्श से कल्पना नहीं करता, 'जिह्वा-संपर्श मेरा है' ऐसी कल्पना नहीं करता। जिह्वा-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदन उत्पन्न होता है, वह उसकी भी कल्पना नहीं करता, उसमें कल्पना नहीं करता, उससे कल्पना नहीं करता, 'वह मेरा है' ऐसी कल्पना नहीं करता... विस्तार... वह मन की कल्पना नहीं करता, मन में कल्पना नहीं करता, मन से कल्पना नहीं करता, 'मन मेरा है' ऐसी कल्पना नहीं करता। वह धर्मों (मानसिक विषयों) की कल्पना नहीं करता, धर्मों में कल्पना नहीं करता, धर्मों से कल्पना नहीं करता, 'धर्म मेरे हैं' ऐसी कल्पना नहीं करता। वह मनो-विज्ञान की कल्पना नहीं करता, मनो-विज्ञान में कल्पना नहीं करता, मनो-विज्ञान से कल्पना नहीं करता, 'मनो-विज्ञान मेरा है' ऐसी कल्पना नहीं करता। वह मनो-संपर्श की कल्पना नहीं करता, मनो-संपर्श में कल्पना नहीं करता, मनो-संपर्श से कल्पना नहीं करता, 'मनो-संपर्श मेरा है' ऐसी कल्पना नहीं करता। मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदन उत्पन्न होता है, वह उसकी भी कल्पना नहीं करता, उसमें कल्पना नहीं करता, उससे कल्पना नहीं करता, 'वह मेरा है' ऐसी कल्पना नहीं करता। वह सब (सकल आयतनों) की कल्पना नहीं करता, सब में कल्पना नहीं करता, सब से कल्पना नहीं करता, 'सब मेरा है' ऐसी कल्पना नहीं करता। इस प्रकार कल्पना न करता हुआ वह लोक में किसी भी वस्तु को ग्रहण (उपादान) नहीं करता। उपादान न करते हुए वह उद्विग्न नहीं होता। उद्विग्न न होते हुए वह स्वयं ही परिनिर्वाण प्राप्त कर लेता है। वह जान लेता है— 'जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस स्थिति के लिए और कुछ शेष नहीं है'। भिक्षुओं, यही वह सभी कल्पनाओं के उन्मूलन के लिए उपयुक्त प्रतिपदा है।” ๙. ปฐมสมุคฺฆาตสปฺปายสุตฺตํ ९. प्रथम समुग्घात-सप्पाय सुत्त ๓๑. ‘‘สพฺพมญฺญิตสมุคฺฆาตสปฺปายํ โว, ภิกฺขเว, ปฏิปทํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตมา จ สา, ภิกฺขเว, สพฺพมญฺญิตสมุคฺฆาตสปฺปายา ปฏิปทา? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุํ น มญฺญติ, จกฺขุสฺมึ น มญฺญติ, จกฺขุโต น มญฺญติ, จกฺขุํ เมติ น มญฺญติ. รูเป น มญฺญติ…เป… จกฺขุวิญฺญาณํ น มญฺญติ, จกฺขุสมฺผสฺสํ น มญฺญติ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺญติ, ตสฺมิมฺปิ น มญฺญติ, ตโตปิ น มญฺญติ, ตํ เมติ น มญฺญติ. ยญฺหิ, ภิกฺขเว, มญฺญติ, ยสฺมึ มญฺญติ, ยโต มญฺญติ, ยํ เมติ มญฺญติ, ตโต ตํ โหติ อญฺญถา. อญฺญถาภาวี ภวสตฺโต โลโก ภวเมวาภินนฺทติ…เป… ชิวฺหํ น มญฺญติ, ชิวฺหาย น มญฺญติ, ชิวฺหาโต น มญฺญติ, ชิวฺหา เมติ น มญฺญติ. รเส น มญฺญติ…เป… ชิวฺหาวิญฺญาณํ น มญฺญติ, ชิวฺหาสมฺผสฺสํ น มญฺญติ. ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺญติ, ตสฺมิมฺปิ น มญฺญติ, ตโตปิ น มญฺญติ, ตํ เมติ น มญฺญติ. ยญฺหิ, ภิกฺขเว, มญฺญติ, ยสฺมึ มญฺญติ, ยโต มญฺญติ, ยํ เมติ มญฺญติ, ตโต ตํ โหติ อญฺญถา. อญฺญถาภาวี ภวสตฺโต โลโก ภวเมวาภินนฺทติ…เป… มนํ น มญฺญติ, มนสฺมึ น มญฺญติ, มนโต น มญฺญติ, มโน เมติ น มญฺญติ. ธมฺเม น มญฺญติ…เป… มโนวิญฺญาณํ น มญฺญติ, มโนสมฺผสฺสํ น มญฺญติ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺญติ, ตสฺมิมฺปิ น มญฺญติ, ตโตปิ น มญฺญติ, ตํ เมติ น มญฺญติ. ยญฺหิ, ภิกฺขเว, มญฺญติ, ยสฺมึ มญฺญติ, ยโต มญฺญติ, ยํ เมติ มญฺญติ, ตโต ตํ โหติ อญฺญถา. อญฺญถาภาวี ภวสตฺโต โลโก ภวเมวาภินนฺทติ. ยาวตา, ภิกฺขเว, ขนฺธธาตุอายตนํ ตมฺปิ น มญฺญติ, ตสฺมิมฺปิ น มญฺญติ, ตโตปิ น มญฺญติ, ตํ เมติ น มญฺญติ. โส เอวํ อมญฺญมาโน น จ กิญฺจิ โลเก อุปาทิยติ. อนุปาทิยํ น ปริตสฺสติ. อปริตสฺสํ ปจฺจตฺตญฺเญว ปรินิพฺพายติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาติ[Pg.255]. อยํ โข สา, ภิกฺขเว, สพฺพมญฺญิตสมุคฺฆาตสปฺปายา ปฏิปทา’’ติ. นวมํ. ३१. “भिक्षुओं, मैं तुम्हें सभी कल्पनाओं (अभिमान/अहंकार) के उन्मूलन के लिए उपयुक्त प्रतिपदा (मार्ग) का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। और भिक्षुओं, वह सभी कल्पनाओं के उन्मूलन के लिए उपयुक्त प्रतिपदा क्या है? यहाँ, भिक्षुओं, भिक्षु चक्षु की कल्पना नहीं करता, चक्षु में कल्पना नहीं करता, चक्षु से कल्पना नहीं करता, 'चक्षु मेरा है' ऐसी कल्पना नहीं करता। वह रूपों की कल्पना नहीं करता... चक्षु-विज्ञान की कल्पना नहीं करता, चक्षु-संपर्श की कल्पना नहीं करता, और चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसकी भी कल्पना नहीं करता, उसमें कल्पना नहीं करता, उससे कल्पना नहीं करता, 'वह मेरा है' ऐसी कल्पना नहीं करता। क्योंकि भिक्षुओं, जिसकी वह कल्पना करता है, जिसमें वह कल्पना करता है, जिससे वह कल्पना करता है, जिसे वह 'मेरा' मानकर कल्पना करता है, वह उससे अन्यथा (भिन्न) हो जाता है। अन्यथा होने वाला यह संसार भव में आसक्त होकर भव का ही अभिनन्दन करता है... (इसी प्रकार जिह्वा और मन के लिए)... भिक्षुओं, जहाँ तक स्कन्ध, धातु और आयतन हैं, उनकी भी वह कल्पना नहीं करता, उनमें कल्पना नहीं करता, उनसे कल्पना नहीं करता, 'वे मेरे हैं' ऐसी कल्पना नहीं करता। इस प्रकार कल्पना न करता हुआ वह लोक में किसी भी चीज़ को ग्रहण (उपादान) नहीं करता। ग्रहण न करता हुआ वह उद्विग्न नहीं होता। उद्विग्न न होता हुआ वह स्वयं ही परिनिर्वाण को प्राप्त होता है। वह जान लेता है— 'जाति क्षीण हो गई, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया, जो करना था वह कर लिया गया, अब इस स्थिति के लिए कुछ और शेष नहीं है।' भिक्षुओं, यही वह सभी कल्पनाओं के उन्मूलन के लिए उपयुक्त प्रतिपदा है।” नौवाँ सुत्त। ๑๐. ทุติยสมุคฺฆาตสปฺปายสุตฺตํ १०. द्वितीय समुग्घातसप्पाय सुत्त ๓๒. ‘‘สพฺพมญฺญิตสมุคฺฆาตสปฺปายํ โว, ภิกฺขเว, ปฏิปทํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตมา จ สา, ภิกฺขเว, สพฺพมญฺญิตสมุคฺฆาตสปฺปายา ปฏิปทา? ३२. “भिक्षुओं, मैं तुम्हें सभी कल्पनाओं के उन्मूलन के लिए उपयुक्त प्रतिपदा का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। और भिक्षुओं, वह सभी कल्पनाओं के उन्मूलन के लिए उपयुक्त प्रतिपदा क्या है?” ‘‘ตํ กึ มญฺญถ, ภิกฺขเว, จกฺขุํ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “भिक्षुओं, तुम क्या मानते हो? चक्षु नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “भदन्त, अनित्य है।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “भदन्त, दुःख है।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “जो अनित्य, दुःख और विपरिणामधर्मा (परिवर्तनशील) है, क्या उसे ऐसा देखना उचित है— ‘यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है’?” ‘‘โน เหตํ ภนฺเต’’. “नहीं, भदन्त।” ‘‘รูปา…เป… จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺโส นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? “रूप... चक्षु-विज्ञान... चक्षु-संपर्श नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’…เป…. “भदन्त, अनित्य है...।” ‘‘ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “भदन्त, अनित्य है।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “भदन्त, दुःख है।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “जो अनित्य, दुःख और विपरिणामधर्मा है, क्या उसे ऐसा देखना उचित है— ‘यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है’?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’…เป…. “नहीं, भदन्त...।” ‘‘ชิวฺหา นิจฺจา วา อนิจฺจา วา’’ติ? “जिह्वा नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจา ภนฺเต’’…เป…. “भदन्त, अनित्य है...।” ‘‘รสา… ชิวฺหาวิญฺญาณํ… ชิวฺหาสมฺผสฺโส…เป… ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “रस... जिह्वा-विज्ञान... जिह्वा-संपर्श... और जिह्वा-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’…เป… ธมฺมา… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺโส นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วาติ? “भदन्त, अनित्य है... धर्म... मनो-विज्ञान... मन-संपर्श नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’. “भदन्त, अनित्य है।” ‘‘ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “मन-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “भदन्त, अनित्य है।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?” ‘‘ทุกฺขํ ภนฺเต’’. “भदन्त, दुःख है।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “जो अनित्य, दुःख और विपरिणामधर्मा है, क्या उसे ऐसा देखना उचित है— ‘यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है’?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नहीं, भदन्त।” ‘‘เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… ชิวฺหายปิ นิพฺพินฺทติ, รเสสุปิ…เป… ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ธมฺเมสุปิ นิพฺพินฺทติ, มโนวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, มโนสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาติ[Pg.256]. อยํ โข สา, ภิกฺขเว, สพฺพมญฺญิตสมุคฺฆาตสปฺปายา ปฏิปทา’’ติ. ทสมํ. “हे भिक्षुओं! इस प्रकार देखते हुए श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षु से भी निर्वेद प्राप्त करता है, रूपों से भी निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-विज्ञान से भी निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-स्पर्श से भी निर्वेद प्राप्त करता है। चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उससे भी वह निर्वेद प्राप्त करता है... (पे)... जिह्वा से भी निर्वेद प्राप्त करता है, रसों से भी... (पे)... जिह्वा-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उससे भी वह निर्वेद प्राप्त करता है। मन से भी निर्वेद प्राप्त करता है, धर्मों (विषयों) से भी निर्वेद प्राप्त करता है, मनो-विज्ञान से भी निर्वेद प्राप्त करता है, मनो-स्पर्श से भी निर्वेद प्राप्त करता है। मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उससे भी वह निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद से वह विरक्त होता है; विराग से विमुक्त होता है; विमुक्त होने पर 'मैं विमुक्त हूँ' ऐसा ज्ञान होता है। 'जन्म क्षीण हो गया, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया, जो करना था वह कर लिया गया, अब इस अस्तित्व के लिए कुछ और शेष नहीं है'—ऐसा वह जान लेता है। हे भिक्षुओं! यही वह प्रतिपदा (मार्ग) है जो समस्त कल्पनाओं (अभिमानों) के उन्मूलन के लिए उपयुक्त है।” दसवाँ सुत्त। สพฺพวคฺโค ตติโย. तृतीय 'सब्ब' वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका उद्दान (विषय-सूची) – สพฺพญฺจ ทฺเวปิ ปหานา, ปริชานาปเร ทุเว; อาทิตฺตํ อทฺธภูตญฺจ, สารุปฺปา ทฺเว จ สปฺปายา; วคฺโค เตน ปวุจฺจตีติ. सब्ब सुत्त, दो पहान सुत्त, अन्य दो परिजान सुत्त, आदित्त, अद्धभूत, सारुप्प और दो सप्पाय सुत्त; इसी कारण यह वर्ग (सब्बवग्ग) कहा जाता है। ๔. ชาติธมฺมวคฺโค ४. ४. जातिधम्म वर्ग ๑-๑๐. ชาติธมฺมาทิสุตฺตทสกํ १-१०. जातिधम्म आदि दस सुत्त ๓๓. สาวตฺถินิทานํ. ตตฺร โข…เป… ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, ชาติธมฺมํ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, สพฺพํ ชาติธมฺมํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, ชาติธมฺมํ. รูปา… จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺโส ชาติธมฺโม. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ชาติธมฺมํ…เป… ชิวฺหา… รสา… ชิวฺหาวิญฺญาณํ… ชิวฺหาสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ชาติธมฺมํ. กาโย…เป... มโน ชาติธมฺโม, ธมฺมา ชาติธมฺมา, มโนวิญฺญาณํ ชาติธมฺมํ, มโนสมฺผสฺโส ชาติธมฺโม. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ชาติธมฺมํ. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ… จกฺขุวิญฺญาเณปิ… จกฺขุสมฺผสฺเสปิ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. ปฐมํ. ३३. श्रावस्ती निदान। वहाँ (भगवान ने कहा)— “हे भिक्षुओं! सब कुछ जन्म लेने के स्वभाव वाला (जातिधम्म) है। और हे भिक्षुओं! वह सब क्या है जो जन्म लेने के स्वभाव वाला है? चक्षु जन्म लेने के स्वभाव वाला है, रूप... चक्षु-विज्ञान... चक्षु-स्पर्श जन्म लेने के स्वभाव वाला है। चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी जन्म लेने के स्वभाव वाली है... (पे)... जिह्वा... रस... जिह्वा-विज्ञान... जिह्वा-स्पर्श... जिह्वा-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी जन्म लेने के स्वभाव वाली है। काय... (पे)... मन जन्म लेने के स्वभाव वाला है, धर्म जन्म लेने के स्वभाव वाले हैं, मनो-विज्ञान जन्म लेने के स्वभाव वाला है, मनो-स्पर्श जन्म लेने के स्वभाव वाला है। मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी जन्म लेने के स्वभाव वाली है। हे भिक्षुओं! इस प्रकार देखते हुए श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षु से भी निर्वेद प्राप्त करता है, रूपों से भी... चक्षु-विज्ञान से भी... चक्षु-स्पर्श से भी... (पे)... अब इस अस्तित्व के लिए कुछ और शेष नहीं है—ऐसा वह जान लेता है।” प्रथम सुत्त। ๓๔. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, ชราธมฺมํ…เป… สํขิตฺตํ. ทุติยํ. ३४. “हे भिक्षुओं! सब कुछ जरा (वृद्धावस्था) के स्वभाव वाला है... (संक्षिप्त)।” द्वितीय सुत्त। ๓๕. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, พฺยาธิธมฺมํ…เป…. ตติยํ. ३५. “हे भिक्षुओं! सब कुछ व्याधि (रोग) के स्वभाव वाला है...।” तृतीय सुत्त। ๓๖. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, มรณธมฺมํ…เป…. จตุตฺถํ. ३६. “हे भिक्षुओं! सब कुछ मरण (मृत्यु) के स्वभाव वाला है...।” चतुर्थ सुत्त। ๓๗. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, โสกธมฺมํ…เป…. ปญฺจมํ. ३७. “हे भिक्षुओं! सब कुछ शोक के स्वभाव वाला है...।” पंचम सुत्त। ๓๘. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, สํกิเลสิกธมฺมํ…เป…. ฉฏฺฐํ. ३८. “हे भिक्षुओं! सब कुछ संक्लेश (मलिनता) के स्वभाव वाला है...।” छठा सुत्त। ๓๙. ‘‘สพฺพํ[Pg.257], ภิกฺขเว, ขยธมฺมํ…เป…. สตฺตมํ. ३९. “हे भिक्षुओं! सब कुछ क्षय (नष्ट होने) के स्वभाव वाला है...।” सातवाँ सुत्त। ๔๐. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, วยธมฺมํ…เป…. อฏฺฐมํ. ४०. “हे भिक्षुओं! सब कुछ व्यय (विनाश) के स्वभाव वाला है...।” आठवाँ सुत्त। ๔๑. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, สมุทยธมฺมํ…เป…. นวมํ. ४१. “हे भिक्षुओं! सब कुछ समुदय (उत्पन्न होने) के स्वभाव वाला है...।” नौवाँ सुत्त। ๔๒. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, นิโรธธมฺมํ…เป…. ทสมํ. ४२. “हे भिक्षुओं! सब कुछ निरोध (समाप्त होने) के स्वभाव वाला है...।” दसवाँ सुत्त। ชาติธมฺมวคฺโค จตุตฺโถ. चतुर्थ जातिधम्म वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका उद्दान – ชาติชราพฺยาธิมรณํ, โสโก จ สํกิเลสิกํ; ขยวยสมุทยํ, นิโรธธมฺเมน เต ทสาติ. जाति, जरा, व्याधि, मरण, शोक, संक्लेशिक, क्षय, व्यय, समुदय और निरोधधम्म—ये दस (सुत्त) हैं। ๕. สพฺพอนิจฺจวคฺโค ५. ५. सब्ब अनित्य वर्ग ๑-๙. อนิจฺจาทิสุตฺตนวกํ १-९. अनित्य आदि नौ सुत्त ๔๓. สาวตฺถินิทานํ. ตตฺร โข…เป… ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, สพฺพํ อนิจฺจํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ, รูปา อนิจฺจา, จกฺขุวิญฺญาณํ อนิจฺจํ, จกฺขุสมฺผสฺโส อนิจฺโจ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา, รสา อนิจฺจา, ชิวฺหาวิญฺญาณํ อนิจฺจํ, ชิวฺหาสมฺผสฺโส อนิจฺโจ. ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ. กาโย อนิจฺโจ…เป… มโน อนิจฺโจ, ธมฺมา อนิจฺจา, มโนวิญฺญาณํ อนิจฺจํ, มโนสมฺผสฺโส อนิจฺโจ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ธมฺเมสุปิ นิพฺพินฺทติ, มโนวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, มโนสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ [Pg.258] ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. ปฐมํ. ४३. श्रावस्ती निदान। वहाँ (भगवान ने कहा)— “हे भिक्षुओं! सब कुछ अनित्य है। और हे भिक्षुओं! वह सब क्या है जो अनित्य है? चक्षु अनित्य है, रूप अनित्य हैं, चक्षु-विज्ञान अनित्य है, चक्षु-स्पर्श अनित्य है। चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी अनित्य है... (पे)... जिह्वा अनित्य है, रस अनित्य हैं, जिह्वा-विज्ञान अनित्य है, जिह्वा-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी अनित्य है। काय अनित्य है... (पे)... मन अनित्य है, धर्म अनित्य हैं, मनो-विज्ञान अनित्य है, मनो-स्पर्श अनित्य है। मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी अनित्य है। हे भिक्षुओं! इस प्रकार देखते हुए श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षु से भी निर्वेद प्राप्त करता है, रूपों से भी निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-विज्ञान से भी निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-स्पर्श से भी निर्वेद प्राप्त करता है। चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उससे भी वह निर्वेद प्राप्त करता है... (पे)... मन से भी निर्वेद प्राप्त करता है, धर्मों से भी निर्वेद प्राप्त करता है, मनो-विज्ञान से भी निर्वेद प्राप्त करता है, मनो-स्पर्श से भी निर्वेद प्राप्त करता है, मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उससे भी वह निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद से वह विरक्त होता है; विराग से विमुक्त होता है; विमुक्त होने पर 'मैं विमुक्त हूँ' ऐसा ज्ञान होता है। 'जन्म क्षीण हो गया, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया, जो करना था वह कर लिया गया, अब इस अस्तित्व के लिए कुछ और शेष नहीं है'—ऐसा वह जान लेता है।” प्रथम सुत्त। ๔๔. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ…เป…. ทุติยํ. ४४. “हे भिक्षुओं! सब कुछ दुःख है...।” द्वितीय सुत्त। ๔๕. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อนตฺตา…เป…. ตติยํ. ४५. “हे भिक्षुओं! सब कुछ अनात्मा है...।” तृतीय सुत्त। ๔๖. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อภิญฺเญยฺยํ…เป…. จตุตฺถํ. ४६. “हे भिक्षुओं! सब कुछ अभिज्ञेय (विशेष ज्ञान से जानने योग्य) है...।” चतुर्थ सुत्त। ๔๗. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, ปริญฺเญยฺยํ…เป…. ปญฺจมํ. ४७. “हे भिक्षुओं! सब कुछ परिज्ञेय (पूर्णतः जानने योग्य) है...।” पंचम सुत्त। ๔๘. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, ปหาตพฺพํ…เป…. ฉฏฺฐํ. ४८. भिक्षुओं! सब कुछ त्यागने योग्य है... (इत्यादि)। छठा (सूत्र)। ๔๙. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, สจฺฉิกาตพฺพํ…เป…. สตฺตมํ. ४९. भिक्षुओं! सब कुछ साक्षात् करने योग्य है... (इत्यादि)। सातवाँ (सूत्र)। ๕๐. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อภิญฺญาปริญฺเญยฺยํ…เป…. อฏฺฐมํ. ५०. भिक्षुओं! सब कुछ अभिज्ञा (विशिष्ट ज्ञान) द्वारा परिज्ञात करने योग्य है... (इत्यादि)। आठवाँ (सूत्र)। ๕๑. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อุปทฺทุตํ…เป…. นวมํ. ५१. भिक्षुओं! सब कुछ उपद्रुत (उत्पीड़ित) है... (इत्यादि)। नौवाँ (सूत्र)। ๑๐. อุปสฺสฏฺฐสุตฺตํ १०. उपसृष्ट सुत्त ๕๒. ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อุปสฺสฏฺฐํ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, สพฺพํ อุปสฺสฏฺฐํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, อุปสฺสฏฺฐํ, รูปา อุปสฺสฏฺฐา, จกฺขุวิญฺญาณํ อุปสฺสฏฺฐํ, จกฺขุสมฺผสฺโส อุปสฺสฏฺโฐ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อุปสฺสฏฺฐํ…เป… ชิวฺหา อุปสฺสฏฺฐา, รสา อุปสฺสฏฺฐา, ชิวฺหาวิญฺญาณํ อุปสฺสฏฺฐํ, ชิวฺหาสมฺผสฺโส อุปสฺสฏฺโฐ. ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อุปสฺสฏฺฐํ. กาโย อุปสฺสฏฺโฐ… มโน อุปสฺสฏฺโฐ, ธมฺมา อุปสฺสฏฺฐา, มโนวิญฺญาณํ อุปสฺสฏฺฐํ, มโนสมฺผสฺโส อุปสฺสฏฺโฐ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อุปสฺสฏฺฐํ. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ธมฺเมสุปิ นิพฺพินฺทติ, มโนวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, มโนสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ[Pg.259]. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. ทสมํ. ५२. भिक्षुओं! सब कुछ उपसृष्ट (अभिभूत) है। और भिक्षुओं! वह सब क्या है जो उपसृष्ट है? भिक्षुओं! चक्षु उपसृष्ट है, रूप उपसृष्ट हैं, चक्षु-विज्ञान उपसृष्ट है, चक्षु-संपर्श उपसृष्ट है। चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी उपसृष्ट है... (इत्यादि)... जिह्वा उपसृष्ट है, रस उपसृष्ट हैं, जिह्वा-विज्ञान उपसृष्ट है, जिह्वा-संपर्श उपसृष्ट है। जिह्वा-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी उपसृष्ट है। काय उपसृष्ट है... मन उपसृष्ट है, धम्म उपसृष्ट हैं, मनो-विज्ञान उपसृष्ट है, मनो-संपर्श उपसृष्ट है। मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी उपसृष्ट है। भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक चक्षु से भी निर्वेद प्राप्त करता है, रूपों से भी निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-विज्ञान से भी निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-संपर्श से भी निर्वेद प्राप्त करता है। चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, उससे भी निर्वेद प्राप्त करता है... (इत्यादि)... मन से भी निर्वेद प्राप्त करता है, धम्मों से भी निर्वेद प्राप्त करता है, मनो-विज्ञान से भी निर्वेद प्राप्त करता है, मनो-संपर्श से भी निर्वेद प्राप्त करता है। मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, उससे भी निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद होने पर वह विरक्त होता है; वैराग्य से वह विमुक्त होता है; विमुक्त होने पर 'विमुक्त हूँ' ऐसा ज्ञान होता है। वह जान लेता है— 'जन्म क्षीण हो गया, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया, जो करना था वह कर लिया गया, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है।' दसवाँ (सूत्र)। สพฺพอนิจฺจวคฺโค ปญฺจโม. पाँचवाँ सब्ब-अनिच्च वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश — อนิจฺจํ ทุกฺขํ อนตฺตา, อภิญฺเญยฺยํ ปริญฺเญยฺยํ; ปหาตพฺพํ สจฺฉิกาตพฺพํ, อภิญฺเญยฺยปริญฺเญยฺยํ ; อุปทฺทุตํ อุปสฺสฏฺฐํ, วคฺโค เตน ปวุจฺจตีติ. अनिच्च, दुक्ख, अनत्ता, अभिज्ञेय, परिज्ञेय; पहातब्ब, सच्छिकातब्ब, अभिज्ञेय-परिज्ञेय; उपद्रुत और उपसृष्ट—इनके कारण यह वर्ग कहा जाता है। สฬายตนวคฺเค ปฐมปณฺณาสโก สมตฺโต. सळायतन-वग्ग का प्रथम पन्नासक समाप्त हुआ। ตสฺส วคฺคุทฺทานํ – उसका वर्ग-सारांश — อนิจฺจวคฺคํ ยมกํ, สพฺพํ วคฺคํ ชาติธมฺมํ; อนิจฺจวคฺเคน ปญฺญาสํ, ปญฺจโม เตน ปวุจฺจตีติ. अनिच्च वर्ग, यमक, सब्ब वर्ग, जातिधम्म; अनिच्च वर्ग के साथ पचास (सूत्र) होते हैं, इसलिए इसे पाँचवाँ कहा जाता है। ๖. อวิชฺชาวคฺโค ६. अविद्या वर्ग ๑. อวิชฺชาปหานสุตฺตํ १. अविद्या-प्रहाण सुत्त ๕๓. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กถํ นุ โข, ภนฺเต, ชานโต กถํ ปสฺสโต อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ? ५३. श्रावस्ती निदान। तब एक भिक्षु जहाँ भगवान् थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए उस भिक्षु ने भगवान् से यह कहा— 'भन्ते! कैसे जानने वाले और कैसे देखने वाले की अविद्या नष्ट होती है और विद्या उत्पन्न होती है?' ‘‘จกฺขุํ โข, ภิกฺขุ, อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชติ. รูเป อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชติ. จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชติ. โสตํ… ฆานํ… ชิวฺหํ… กายํ… มนํ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชติ. ธมฺเม [Pg.260]… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชติ. เอวํ โข, ภิกฺขุ, ชานโต เอวํ ปสฺสโต อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ. ปฐมํ. भिक्षु! चक्षु को ही अनित्य रूप में जानने और देखने वाले की अविद्या नष्ट होती है और विद्या उत्पन्न होती है। रूपों को अनित्य रूप में जानने और देखने वाले की अविद्या नष्ट होती है और विद्या उत्पन्न होती है। चक्षु-विज्ञान... चक्षु-संपर्श... चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे अनित्य रूप में जानने और देखने वाले की अविद्या नष्ट होती है और विद्या उत्पन्न होती है। श्रोत्र... घ्राण... जिह्वा... काय... मन को अनित्य रूप में जानने और देखने वाले की अविद्या नष्ट होती है और विद्या उत्पन्न होती है। धम्मों... मनो-विज्ञान... मनो-संपर्श... मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे अनित्य रूप में जानने और देखने वाले की अविद्या नष्ट होती है और विद्या उत्पन्न होती है। भिक्षु! इस प्रकार जानने और इस प्रकार देखने वाले की अविद्या नष्ट होती है और विद्या उत्पन्न होती है। पहला (सूत्र)। ๒. สํโยชนปหานสุตฺตํ २. संयोजन-प्रहाण सुत्त ๕๔. ‘‘กถํ นุ โข, ภนฺเต, ชานโต, กถํ ปสฺสโต, สํโยชนา ปหียนฺตี’’ติ? ‘‘จกฺขุํ โข, ภิกฺขุ, อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต สํโยชนา ปหียนฺติ. รูเป… จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต สํโยชนา ปหียนฺติ. โสตํ… ฆานํ… ชิวฺหํ… กายํ… มนํ… ธมฺเม… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต สํโยชนา ปหียนฺติ. เอวํ โข, ภิกฺขุ, ชานโต เอวํ ปสฺสโต สํโยชนา ปหียนฺตี’’ติ. ทุติยํ. ५४. 'भन्ते! कैसे जानने वाले और कैसे देखने वाले के संयोजन नष्ट होते हैं?' 'भिक्षु! चक्षु को ही अनित्य रूप में जानने और देखने वाले के संयोजन नष्ट होते हैं। रूपों... चक्षु-विज्ञान... चक्षु-संपर्श... चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे अनित्य रूप में जानने और देखने वाले के संयोजन नष्ट होते हैं। श्रोत्र... घ्राण... जिह्वा... काय... मन... धम्मों... मनो-विज्ञान... मनो-संपर्श... मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे अनित्य रूप में जानने और देखने वाले के संयोजन नष्ट होते हैं। भिक्षु! इस प्रकार जानने और इस प्रकार देखने वाले के संयोजन नष्ट होते हैं।' दूसरा (सूत्र)। ๓. สํโยชนสมุคฺฆาตสุตฺตํ ३. संयोजन-समुद्घात सुत्त ๕๕. ‘‘กถํ นุ โข, ภนฺเต, ชานโต, กถํ ปสฺสโต สํโยชนา สมุคฺฆาตํ คจฺฉนฺตี’’ติ? ‘‘จกฺขุํ โข, ภิกฺขุ, อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต สํโยชนา สมุคฺฆาตํ คจฺฉนฺติ. รูเป อนตฺตโต… จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต สํโยชนา สมุคฺฆาตํ คจฺฉนฺติ. โสตํ… ฆานํ… ชิวฺหํ… กายํ… มนํ… ธมฺเม… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต สํโยชนา สมุคฺฆาตํ คจฺฉนฺติ. เอวํ โข, ภิกฺขุ, ชานโต เอวํ ปสฺสโต สํโยชนา สมุคฺฆาตํ คจฺฉนฺตี’’ติ. ตติยํ. ५५. “भन्ते! किस प्रकार जानने वाले और किस प्रकार देखने वाले के संयोजन (बंधन) समूल नष्ट हो जाते हैं?” “भिक्षु! चक्षु को अनात्म (अत्ता नहीं) के रूप में जानने और देखने वाले के संयोजन समूल नष्ट हो जाते हैं। रूपों को अनात्म के रूप में... चक्षु-विज्ञान को... चक्षु-संपर्श को... चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे भी अनात्म के रूप में जानने और देखने वाले के संयोजन समूल नष्ट हो जाते हैं। श्रोत्र... घ्राण... जिह्वा... काय... मन... धर्मों... मनो-विज्ञान... मनो-संपर्श... मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे भी अनात्म के रूप में जानने और देखने वाले के संयोजन समूल नष्ट हो जाते हैं। भिक्षु! इस प्रकार जानने और इस प्रकार देखने वाले के संयोजन समूल नष्ट हो जाते हैं।” तीसरा (सूत्त)। ๔. อาสวปหานสุตฺตํ ४. आसव-प्रहाण सूत्त ๕๖. ‘‘กถํ นุ โข, ภนฺเต, ชานโต, กถํ ปสฺสโต อาสวา ปหียนฺตี’’ติ…เป…. จตุตฺถํ. ५६. “भन्ते! किस प्रकार जानने वाले और किस प्रकार देखने वाले के आस्रव क्षीण हो जाते हैं?” ...पे... चौथा (सूत्त)। ๕. อาสวสมุคฺฆาตสุตฺตํ ५. आस्रव-समुद्घात सूत्त ๕๗. ‘‘กถํ [Pg.261] นุ โข, ภนฺเต, ชานโต, กถํ ปสฺสโต อาสวา สมุคฺฆาตํ คจฺฉนฺตี’’ติ…เป…. ปญฺจมํ. ५७. “भन्ते! किस प्रकार जानने वाले और किस प्रकार देखने वाले के आस्रव समूल नष्ट हो जाते हैं?” ...पे... पाँचवाँ (सूत्त)। ๖. อนุสยปหานสุตฺตํ ६. अनुशय-प्रहाण सूत्त ๕๘. ‘‘กถํ นุ โข…เป… อนุสยา ปหียนฺตี’’ติ…เป…. ฉฏฺฐํ. ५८. “भन्ते! किस प्रकार...पे... अनुशय क्षीण हो जाते हैं?” ...पे... छठा (सूत्त)। ๗. อนุสยสมุคฺฆาตสุตฺตํ ७. अनुशय-समुद्घात सूत्त ๕๙. ‘‘กถํ นุ โข…เป… อนุสยา สมุคฺฆาตํ คจฺฉนฺตี’’ติ? ‘‘จกฺขุํ โข, ภิกฺขุ, อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต อนุสยา สมุคฺฆาตํ คจฺฉนฺติ…เป… โสตํ… ฆานํ… ชิวฺหํ… กายํ… มนํ… ธมฺเม… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต อนุสยา สมุคฺฆาตํ คจฺฉนฺติ. เอวํ โข, ภิกฺขุ, ชานโต เอวํ ปสฺสโต อนุสยา สมุคฺฆาตํ คจฺฉนฺตี’’ติ. สตฺตมํ. ५९. “भन्ते! किस प्रकार...पे... अनुशय समूल नष्ट हो जाते हैं?” “भिक्षु! चक्षु को अनात्म के रूप में जानने और देखने वाले के अनुशय समूल नष्ट हो जाते हैं...पे... श्रोत्र... घ्राण... जिह्वा... काय... मन... धर्मों... मनो-विज्ञान... मनो-संपर्श... मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे भी अनात्म के रूप में जानने और देखने वाले के अनुशय समूल नष्ट हो जाते हैं। भिक्षु! इस प्रकार जानने और इस प्रकार देखने वाले के अनुशय समूल नष्ट हो जाते हैं।” सातवाँ (सूत्त)। ๘. สพฺพุปาทานปริญฺญาสุตฺตํ ८. सर्व-उपादान-परिज्ञा सूत्त ๖๐. ‘‘สพฺพุปาทานปริญฺญาย โว, ภิกฺขเว, ธมฺมํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, สพฺพุปาทานปริญฺญาย ธมฺโม? จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ, เวทนายปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิโมกฺขา ‘ปริญฺญาตํ เม อุปาทาน’นฺติ ปชานาติ. โสตญฺจ ปฏิจฺจ สทฺเท จ อุปฺปชฺชติ… ฆานญฺจ ปฏิจฺจ คนฺเธ จ… ชิวฺหญฺจ ปฏิจฺจ รเส จ… กายญฺจ ปฏิจฺจ โผฏฺฐพฺเพ จ… มนญฺจ ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ธมฺเมสุปิ นิพฺพินฺทติ, มโนวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, มโนสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ, เวทนายปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิโมกฺขา ‘ปริญฺญาตํ เม อุปาทาน’นฺติ [Pg.262] ปชานาติ. อยํ โข, ภิกฺขเว, สพฺพุปาทานปริญฺญาย ธมฺโม’’ติ. อฏฺฐมํ. ६०. “भिक्षुओं! मैं तुम्हें समस्त उपादानों की परिज्ञा (पूर्ण ज्ञान) के लिए धर्म का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! समस्त उपादानों की परिज्ञा के लिए वह धर्म क्या है? चक्षु और रूपों के प्रतीत्य (कारण) से चक्षु-विज्ञान उत्पन्न होता है। तीनों का मिलन स्पर्श है। स्पर्श के प्रत्यय से वेदना होती है। भिक्षुओं! इस प्रकार देखते हुए श्रुतवान आर्य-श्रावक चक्षु से निर्वेद (वैराग्य) प्राप्त करता है, रूपों से निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-विज्ञान से निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-संपर्श से निर्वेद प्राप्त करता है, वेदना से निर्वेद प्राप्त करता है। निर्विण्ण होने पर वह विरक्त हो जाता है; विराग से वह मुक्त हो जाता है; विमुक्त होने पर वह जान लेता है—'मैंने उपादान को पूर्णतः जान लिया है'। श्रोत्र और शब्दों के प्रतीत्य से... घ्राण और गंधों के प्रतीत्य से... जिह्वा और रसों के प्रतीत्य से... काय और स्पर्शों के प्रतीत्य से... मन और धर्मों के प्रतीत्य से मनो-विज्ञान उत्पन्न होता है। तीनों का मिलन स्पर्श है। स्पर्श के प्रत्यय से वेदना होती है। भिक्षुओं! इस प्रकार देखते हुए श्रुतवान आर्य-श्रावक मन से निर्वेद प्राप्त करता है, धर्मों से निर्वेद प्राप्त करता है, मनो-विज्ञान से निर्वेद प्राप्त करता है, मनो-संपर्श से निर्वेद प्राप्त करता है, वेदना से निर्वेद प्राप्त करता है। निर्विण्ण होने पर वह विरक्त हो जाता है; विराग से वह मुक्त हो जाता है; विमुक्त होने पर वह जान लेता है—'मैंने उपादान को पूर्णतः जान लिया है'। भिक्षुओं! यही समस्त उपादानों की परिज्ञा के लिए धर्म है। आठवाँ (सूत्त)। ๙. ปฐมสพฺพุปาทานปริยาทานสุตฺตํ ९. प्रथम सर्व-उपादान-पर्यादान सूत्त ๖๑. ‘‘สพฺพุปาทานปริยาทานาย โว, ภิกฺขเว, ธมฺมํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, สพฺพุปาทานปริยาทานาย ธมฺโม? จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ, เวทนายปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิโมกฺขา ‘ปริยาทินฺนํ เม อุปาทาน’นฺติ ปชานาติ…เป… ชิวฺหญฺจ ปฏิจฺจ รเส จ อุปฺปชฺชติ ชิวฺหาวิญฺญาณํ…เป… มนญฺจ ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ธมฺเมสุปิ นิพฺพินฺทติ, มโนวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ มโนสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ, เวทนายปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิโมกฺขา ‘ปริยาทินฺนํ เม อุปาทาน’นฺติ ปชานาติ. อยํ โข, ภิกฺขเว, สพฺพุปาทานปริยาทานาย ธมฺโม’’ติ. นวมํ. ६१. “भिक्षुओं! मैं तुम्हें समस्त उपादानों के क्षय (पर्यादान) के लिए धर्म का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! समस्त उपादानों के क्षय के लिए वह धर्म क्या है? चक्षु और रूपों के प्रतीत्य से चक्षु-विज्ञान उत्पन्न होता है। तीनों का मिलन स्पर्श है। स्पर्श के प्रत्यय से वेदना होती है। भिक्षुओं! इस प्रकार देखते हुए श्रुतवान आर्य-श्रावक चक्षु से निर्वेद प्राप्त करता है, रूपों से निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-विज्ञान से निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-संपर्श से निर्वेद प्राप्त करता है, वेदना से निर्वेद प्राप्त करता है। निर्विण्ण होने पर वह विरक्त हो जाता है; विराग से वह मुक्त हो जाता है; विमुक्त होने पर वह जान लेता है—'मैंने उपादान को क्षीण कर दिया है'। ...पे... जिह्वा और रसों के प्रतीत्य से जिह्वा-विज्ञान उत्पन्न होता है...पे... मन और धर्मों के प्रतीत्य से मनो-विज्ञान उत्पन्न होता है। तीनों का मिलन स्पर्श है। स्पर्श के प्रत्यय से वेदना होती है। भिक्षुओं! इस प्रकार देखते हुए श्रुतवान आर्य-श्रावक मन से निर्वेद प्राप्त करता है, धर्मों से निर्वेद प्राप्त करता है, मनो-विज्ञान से निर्वेद प्राप्त करता है, मनो-संपर्श से निर्वेद प्राप्त करता है, वेदना से निर्वेद प्राप्त करता है। निर्विण्ण होने पर वह विरक्त हो जाता है; विराग से वह मुक्त हो जाता है; विमुक्त होने पर वह जान लेता है—'मैंने उपादान को क्षीण कर दिया है'। भिक्षुओं! यही समस्त उपादानों के क्षय के लिए धर्म है। नवाँ (सूत्त)। ๑๐. ทุติยสพฺพุปาทานปริยาทานสุตฺตํ १०. द्वितीय सर्व-उपादान-पर्यादान सूत्त ๖๒. ‘‘สพฺพุปาทานปริยาทานาย โว, ภิกฺขเว, ธมฺมํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, สพฺพุปาทานปริยาทานาย ธมฺโม’’? ६२. “भिक्षुओं! मैं तुम्हें समस्त उपादानों के क्षय के लिए धर्म का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! समस्त उपादानों के क्षय के लिए वह धर्म क्या है?” ‘‘ตํ กึ มญฺญถ, ภิกฺขเว, จกฺขุ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “भिक्षुओं! तुम क्या सोचते हो, चक्षु नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य है, भन्ते!” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःख है, भन्ते!” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “जो अनित्य, दुःखद और विपरिणामधर्मी है, क्या उसे ऐसा देखना उचित है—'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है'?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नहीं, भन्ते!” ‘‘รูปา…เป… จกฺขุวิญฺญาณํ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “रूप...पे... चक्षु-विज्ञान नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’…เป…. “अनित्य है, भन्ते! ...पे...।”}]``` ‘‘จกฺขุสมฺผสฺโส นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? क्या चक्षु-संपर्श नित्य है या अनित्य? ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’…เป…. भन्ते! अनित्य है। ... (पे) ... ‘‘ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? चक्षु-संपर्श के प्रत्यय (कारण) से जो सुखद, दुखद या अदुख-असुख (उपेक्षा) वेदना उत्पन्न होती है, क्या वह भी नित्य है या अनित्य? ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’…เป…. भन्ते! अनित्य है। ... (पे) ... ‘‘โสตํ… ฆานํ… ชิวฺหา… กาโย… มโน… ธมฺมา… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา, ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? श्रोत्र... घ्राण... जिह्वा... काय... मन... धर्म... मनो-विज्ञान... मनो-संपर्श... मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या अदुख-असुख वेदना उत्पन्न होती है, क्या वह भी नित्य है या अनित्य? ‘‘อนิจฺจํ[Pg.263], ภนฺเต’’. भन्ते! अनित्य है। ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? जो अनित्य है, क्या वह दुख है या सुख? ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. भन्ते! वह दुख है। ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? जो अनित्य, दुख और विपरिणाम-धर्मी (परिवर्तनशील) है, क्या उसे ऐसा देखना उचित है— 'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है'? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. भन्ते! ऐसा नहीं है। ‘‘เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… ชิวฺหายปิ นิพฺพินฺทติ, รเสสุปิ นิพฺพินฺทติ, ชิวฺหาวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, ชิวฺหาสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ, ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ…เป… มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ธมฺเมสุปิ นิพฺพินฺทติ, มโนวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, มโนสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาติ. อยํ โข, ภิกฺขเว, สพฺพุปาทานปริยาทานาย ธมฺโม’’ติ. ทสมํ. भिक्षुओं! इस प्रकार देखते हुए श्रुतवान आर्य-श्रावक चक्षु में भी निर्वेद (वैराग्य) प्राप्त करता है, रूपों में भी निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-विज्ञान में भी निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-संपर्श में भी निर्वेद प्राप्त करता है। चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या अदुख-असुख वेदना उत्पन्न होती है, उसमें भी वह निर्वेद प्राप्त करता है... (पे) ... जिह्वा में भी निर्वेद प्राप्त करता है, रसों में भी निर्वेद प्राप्त करता है, जिह्वा-विज्ञान में भी निर्वेद प्राप्त करता है, जिह्वा-संपर्श में भी निर्वेद प्राप्त करता है, जिह्वा-संपर्श के प्रत्यय से जो उत्पन्न होती है... (पे) ... मन में भी निर्वेद प्राप्त करता है, धर्मों में भी निर्वेद प्राप्त करता है, मनो-विज्ञान में भी निर्वेद प्राप्त करता है, मनो-संपर्श में भी निर्वेद प्राप्त करता है। मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या अदुख-असुख वेदना उत्पन्न होती है, उसमें भी वह निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद प्राप्त करने पर वह विरक्त हो जाता है; वैराग्य से वह विमुक्त हो जाता है; विमुक्त होने पर 'मैं विमुक्त हूँ' ऐसा ज्ञान होता है। वह जान लेता है— 'जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है।' भिक्षुओं! यह सभी उपादानों के पूर्ण क्षय के लिए धर्म है। दसवां (सूत्र)। อวิชฺชาวคฺโค ฉฏฺโฐ. छठा अविद्या-वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उदान) — อวิชฺชา สํโยชนา ทฺเว, อาสเวน ทุเว วุตฺตา; อนุสยา อปเร ทฺเว, ปริญฺญา ทฺเว ปริยาทินฺนํ; วคฺโค เตน ปวุจฺจตีติ. दो अविद्या, दो संयोजन, दो आस्रव के साथ कहे गए; अन्य दो अनुशय, दो परिज्ञा और एक परियादिन्न; इसी कारण इसे वर्ग कहा जाता है। ๗. มิคชาลวคฺโค ७. मिगजाल-वर्ग ๑. ปฐมมิคชาลสุตฺตํ १. प्रथम मिगजाल सूत्र ๖๓. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข อายสฺมา มิคชาโล เยน ภควา…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา มิคชาโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘‘เอกวิหารี, เอกวิหารี’ติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, เอกวิหารี โหติ, กิตฺตาวตา จ ปน สทุติยวิหารี โหตี’’ติ? ६३. श्रावस्ती निदान। तब आयुष्मान मिगजाल जहाँ भगवान थे... (पे) ... एक ओर बैठे हुए आयुष्मान मिगजाल ने भगवान से यह कहा— 'भन्ते! एकविहारी, एकविहारी ऐसा कहा जाता है। भन्ते! किस सीमा तक कोई एकविहारी होता है, और किस सीमा तक कोई सद्वितीय-विहारी (साथी के साथ रहने वाला) होता है?' ‘‘สนฺติ โข, มิคชาล, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย [Pg.264] ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต อุปฺปชฺชติ นนฺที. นนฺทิยา สติ สาราโค โหติ; สาราเค สติ สํโยโค โหติ. นนฺทิสํโยชนสํยุตฺโต โข, มิคชาล, ภิกฺขุ สทุติยวิหารีติ วุจฺจติ. สนฺติ…เป… สนฺติ โข, มิคชาล, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต อุปฺปชฺชติ นนฺที. นนฺทิยา สติ สาราโค โหติ; สาราเค สติ สํโยโค โหติ. นนฺทิสํโยชนสํยุตฺโต โข, มิคชาล, ภิกฺขุ สทุติยวิหารีติ วุจฺจติ. เอวํวิหารี จ, มิคชาล, ภิกฺขุ กิญฺจาปิ อรญฺญวนปตฺถานิ ปนฺตานิ เสนาสนานิ ปฏิเสวติ อปฺปสทฺทานิ อปฺปนิคฺโฆสานิ วิชนวาตานิ มนุสฺสราหสฺเสยฺยกานิ ปฏิสลฺลานสารุปฺปานิ; อถ โข สทุติยวิหารีติ วุจฺจติ. ตํ กิสฺส เหตุ? ตณฺหา หิสฺส ทุติยา, สาสฺส อปฺปหีนา. ตสฺมา สทุติยวิหารี’’ติ วุจฺจติ. मिगजाल! चक्षु-विज्ञेय ऐसे रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय (लुभावने) हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है, तो उन रूपों का अभिनन्दन करने वाले, स्वागत करने वाले और उनमें आसक्त होकर स्थित रहने वाले उस भिक्षु में नन्दि (तृष्णा) उत्पन्न होती है। नन्दि होने पर साराग (तीव्र राग) होता है; साराग होने पर संयोग (बंधन) होता है। मिगजाल! नन्दि-संयोजन से युक्त भिक्षु को 'सद्वितीय-विहारी' कहा जाता है। ... (पे) ... मिगजाल! जिह्वा-विज्ञेय ऐसे रस हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है, तो उस भिक्षु में नन्दि उत्पन्न होती है। नन्दि होने पर साराग होता है; साराग होने पर संयोग होता है। मिगजाल! नन्दि-संयोजन से युक्त भिक्षु को 'सद्वितीय-विहारी' कहा जाता है। मिगजाल! ऐसा विहार करने वाला भिक्षु चाहे अरण्य के निर्जन वन-प्रान्तों में, दूरस्थ शयनासनों में रहता हो, जहाँ अल्प शब्द हो, अल्प शोर हो, जो जन-संपर्क से रहित हो, मनुष्यों के एकांत कार्यों के योग्य हो और प्रतिसंलयन (ध्यान) के अनुकूल हो; फिर भी उसे 'सद्वितीय-विहारी' ही कहा जाता है। ऐसा क्यों? क्योंकि तृष्णा ही उसकी दूसरी (साथी) है, और उसने उसे त्यागा नहीं है। इसलिए उसे 'सद्वितीय-विहारी' कहा जाता है। ‘‘สนฺติ จ โข, มิคชาล, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต นนฺที นิรุชฺฌติ. นนฺทิยา อสติ สาราโค น โหติ; สาราเค อสติ สํโยโค น โหติ. นนฺทิสํโยชนวิสํยุตฺโต โข, มิคชาล, ภิกฺขุ เอกวิหารีติ วุจฺจติ…เป… สนฺติ จ โข, มิคชาล, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ จ โข, มิคชาล, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต นนฺที นิรุชฺฌติ. นนฺทิยา อสติ สาราโค น โหติ; สาราเค อสติ สํโยโค น โหติ. นนฺทิสํโยชนวิปฺปยุตฺโต โข, มิคชาล, ภิกฺขุ เอกวิหารีติ วุจฺจติ. เอวํวิหารี จ, มิคชาล, ภิกฺขุ กิญฺจาปิ คามนฺเต วิหรติ อากิณฺโณ ภิกฺขูหิ ภิกฺขุนีหิ อุปาสเกหิ อุปาสิกาหิ ราชูหิ ราชมหามตฺเตหิ ติตฺถิเยหิ ติตฺถิยสาวเกหิ. อถ โข เอกวิหารีติ วุจฺจติ. ตํ กิสฺส เหตุ? ตณฺหา หิสฺส ทุติยา, สาสฺส ปหีนา. ตสฺมา เอกวิหารีติ วุจฺจตี’’ติ. ปฐมํ. मिगजाल! चक्षु-विज्ञेय ऐसे रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता, उनका स्वागत नहीं करता और उनमें आसक्त होकर स्थित नहीं रहता, तो उन रूपों का अभिनन्दन न करने वाले, स्वागत न करने वाले और उनमें आसक्त न रहने वाले उस भिक्षु की नन्दि निरुद्ध हो जाती है। नन्दि न होने पर साराग नहीं होता; साराग न होने पर संयोग नहीं होता। मिगजाल! नन्दि-संयोजन से विमुक्त भिक्षु को 'एकविहारी' कहा जाता है। ... (पे) ... मिगजाल! जिह्वा-विज्ञेय रस हैं... (पे) ... मिगजाल! मनो-विज्ञेय ऐसे धर्म हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता, उनका स्वागत नहीं करता और उनमें आसक्त होकर स्थित नहीं रहता, तो उस भिक्षु की नन्दि निरुद्ध हो जाती है। नन्दि न होने पर साराग नहीं होता; साराग न होने पर संयोग नहीं होता। मिगजाल! नन्दि-संयोजन से विमुक्त भिक्षु को 'एकविहारी' कहा जाता है। मिगजाल! ऐसा विहार करने वाला भिक्षु चाहे गाँव के पास विहार करता हो, भिक्षुओं, भिक्षुणियों, उपासकों, उपासिकाओं, राजाओं, राज-महामात्रों, तीर्थिकों और तीर्थिक-श्रावकों से घिरा हुआ हो; फिर भी उसे 'एकविहारी' ही कहा जाता है। ऐसा क्यों? क्योंकि तृष्णा ही उसकी दूसरी थी, और उसने उसे त्याग दिया है। इसलिए उसे 'एकविहारी' कहा जाता है। प्रथम (सूत्र)। ๒. ทุติยมิคชาลสุตฺตํ २. द्वितीय मिगजाल सूत्र ๖๔. อถ [Pg.265] โข อายสฺมา มิคชาโล เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา มิคชาโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน ธมฺมํ เทเสตุ, ยมหํ ภควโต ธมฺมํ สุตฺวา เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหเรยฺย’’นฺติ. ६४. तब आयुष्मान् मिगजाल जहाँ भगवान् थे वहाँ पहुँचे... एक ओर बैठे हुए आयुष्मान् मिगजाल ने भगवान् से यह कहा— "भन्ते! अच्छा हो यदि भगवान् मुझे संक्षेप में धर्म का उपदेश दें, जिसे सुनकर मैं अकेला, एकांतवासी, अप्रमादी, उद्योगी और दृढ़संकल्प होकर विहार कर सकूँ।" ‘‘สนฺติ โข, มิคชาล, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต อุปฺปชฺชติ นนฺที. นนฺทิสมุทยา ทุกฺขสมุทโย, มิคชาลาติ วทามิ…เป… สนฺติ จ โข, มิคชาล, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ จ โข, มิคชาล, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต อุปฺปชฺชติ นนฺที. นนฺทิสมุทยา ทุกฺขสมุทโย, มิคชาลาติ วทามิ. "मिगजाल! चक्षु-विज्ञेय (आँखों से जानने योग्य) ऐसे रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रजनीय (राग उत्पन्न करने वाले) हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है, तो उस अभिनन्दन करने वाले, स्वागत करने वाले और आसक्त होकर स्थित रहने वाले भिक्षु में नन्दि (तृष्णा) उत्पन्न होती है। मिगजाल! मैं कहता हूँ कि नन्दि के उदय से दुःख का उदय होता है... मिगजाल! जिह्वा-विज्ञेय रस हैं... मिगजाल! मन-विज्ञेय धर्म (विषय) हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है, तो उस अभिनन्दन करने वाले, स्वागत करने वाले और आसक्त होकर स्थित रहने वाले भिक्षु में नन्दि उत्पन्न होती है। मिगजाल! मैं कहता हूँ कि नन्दि के उदय से दुःख का उदय होता है।" ‘‘สนฺติ จ โข, มิคชาล, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต นนฺที นิรุชฺฌติ. นนฺทินิโรธา ทุกฺขนิโรโธ, มิคชาลาติ วทามิ…เป… สนฺติ จ โข, มิคชาล, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา อิฏฺฐา กนฺตา…เป… สนฺติ จ โข, มิคชาล, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต นนฺที นิรุชฺฌติ. นนฺทินิโรธา ทุกฺขนิโรโธ, มิคชาลาติ วทามี’’ติ. "मिगजाल! चक्षु-विज्ञेय ऐसे रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता, उनका स्वागत नहीं करता और उनमें आसक्त होकर स्थित नहीं रहता, तो उस अभिनन्दन न करने वाले, स्वागत न करने वाले और आसक्त होकर स्थित न रहने वाले भिक्षु में नन्दि निरुद्ध हो जाती है। मिगजाल! मैं कहता हूँ कि नन्दि के निरोध से दुःख का निरोध होता है... मिगजाल! जिह्वा-विज्ञेय इष्ट, कान्त रस हैं... मिगजाल! मन-विज्ञेय धर्म हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता, उनका स्वागत नहीं करता और उनमें आसक्त होकर स्थित नहीं रहता, तो उस अभिनन्दन न करने वाले, स्वागत न करने वाले और आसक्त होकर स्थित न रहने वाले भिक्षु में नन्दि निरुद्ध हो जाती है। मिगजाल! मैं कहता हूँ कि नन्दि के निरोध से दुःख का निरोध होता है।" อถ โข อายสฺมา มิคชาโล ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. อถ โข อายสฺมา มิคชาโล เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรโต นจิรสฺเสว – ยสฺสตฺถาย กุลปุตฺตา สมฺมเทว อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชนฺติ ตทนุตฺตรํ – พฺรหฺมจริยปริโยสานํ ทิฏฺเฐว [Pg.266] ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหาสิ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ อพฺภญฺญาสิ. อญฺญตโร จ ปนายสฺมา มิคชาโล อรหตํ อโหสีติ. ทุติยํ. तब आयुष्मान् मिगजाल भगवान् के भाषण का अभिनन्दन और अनुमोदन कर, आसन से उठकर, भगवान् को अभिवादन कर और प्रदक्षिणा कर चले गए। तब आयुष्मान् मिगजाल अकेले, एकांतवासी, अप्रमादी, उद्योगी और दृढ़संकल्प होकर विहार करते हुए शीघ्र ही—जिसके लिए कुलपुत्र सम्यक् रूप से घर से बेघर होकर प्रव्रजित होते हैं, उस अनुत्तर—ब्रह्मचर्य की पूर्णता को इसी जन्म में स्वयं विशेष ज्ञान से जानकर, साक्षात्कार कर और प्राप्त कर विहार करने लगे। उन्होंने जान लिया— "जाति क्षीण हो गई, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया, जो करना था वह कर लिया गया, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है।" और आयुष्मान् मिगजाल अर्हतों में से एक हुए। (द्वितीय सुत्त) ๓. ปฐมสมิทฺธิมารปญฺหาสุตฺตํ ३. प्रथम समिद्धि मार-प्रश्न सुत्त ๖๕. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. อถ โข อายสฺมา สมิทฺธิ เยน ภควา…เป… ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘‘มาโร, มาโร’ติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, มาโร วา อสฺส มารปญฺญตฺติ วา’’ติ? ६५. एक समय भगवान् राजगृह के वेणुवन कलन्दक-निवाप में विहार कर रहे थे। तब आयुष्मान् समिद्धि जहाँ भगवान् थे वहाँ पहुँचे... भगवान् से यह कहा— "भन्ते! 'मार, मार' ऐसा कहा जाता है। भन्ते! किस सीमा तक मार होता है या मार की प्रज्ञप्ति (संज्ञा) होती है?" ‘‘ยตฺถ โข, สมิทฺธิ, อตฺถิ จกฺขุ, อตฺถิ รูปา, อตฺถิ จกฺขุวิญฺญาณํ, อตฺถิ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, อตฺถิ ตตฺถ มาโร วา มารปญฺญตฺติ วา. อตฺถิ โสตํ, อตฺถิ สทฺทา, อตฺถิ โสตวิญฺญาณํ, อตฺถิ โสตวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, อตฺถิ ตตฺถ มาโร วา มารปญฺญตฺติ วา. อตฺถิ ฆานํ, อตฺถิ คนฺธา, อตฺถิ ฆานวิญฺญาณํ, อตฺถิ ฆานวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, อตฺถิ ตตฺถ มาโร วา มารปญฺญตฺติ วา. อตฺถิ ชิวฺหา, อตฺถิ รสา, อตฺถิ ชิวฺหาวิญฺญาณํ, อตฺถิ ชิวฺหาวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, อตฺถิ ตตฺถ มาโร วา มารปญฺญตฺติ วา. อตฺถิ กาโย, อตฺถิ โผฏฺฐพฺพา, อตฺถิ กายวิญฺญาณํ, อตฺถิ กายวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, อตฺถิ ตตฺถ มาโร วา มารปญฺญตฺติ วา. อตฺถิ มโน, อตฺถิ ธมฺมา, อตฺถิ มโนวิญฺญาณํ, อตฺถิ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, อตฺถิ ตตฺถ มาโร วา มารปญฺญตฺติ วา. "समिद्धि! जहाँ चक्षु है, रूप हैं, चक्षु-विज्ञान है, चक्षु-विज्ञान द्वारा विज्ञेय धर्म हैं, वहाँ मार है या मार की प्रज्ञप्ति है। जहाँ श्रोत्र है, शब्द हैं, श्रोत्र-विज्ञान है, श्रोत्र-विज्ञान द्वारा विज्ञेय धर्म हैं, वहाँ मार है या मार की प्रज्ञप्ति है। जहाँ घ्राण है, गंध हैं, घ्राण-विज्ञान है, घ्राण-विज्ञान द्वारा विज्ञेय धर्म हैं, वहाँ मार है या मार की प्रज्ञप्ति है। जहाँ जिह्वा है, रस हैं, जिह्वा-विज्ञान है, जिह्वा-विज्ञान द्वारा विज्ञेय धर्म हैं, वहाँ मार है या मार की प्रज्ञप्ति है। जहाँ काय है, स्प्रष्टव्य हैं, काय-विज्ञान है, काय-विज्ञान द्वारा विज्ञेय धर्म हैं, वहाँ मार है या मार की प्रज्ञप्ति है। जहाँ मन है, धर्म हैं, मनो-विज्ञान है, मनो-विज्ञान द्वारा विज्ञेय धर्म हैं, वहाँ मार है या मार की प्रज्ञप्ति है।" ‘‘ยตฺถ จ โข, สมิทฺธิ, นตฺถิ จกฺขุ, นตฺถิ รูปา, นตฺถิ จกฺขุวิญฺญาณํ, นตฺถิ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, นตฺถิ ตตฺถ มาโร วา มารปญฺญตฺติ วา. นตฺถิ โสตํ…เป… นตฺถิ ฆานํ…เป… นตฺถิ ชิวฺหา, นตฺถิ รสา, นตฺถิ ชิวฺหาวิญฺญาณํ, นตฺถิ ชิวฺหาวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, นตฺถิ ตตฺถ มาโร วา มารปญฺญตฺติ วา. นตฺถิ กาโย…เป…. นตฺถิ มโน, นตฺถิ ธมฺมา, นตฺถิ มโนวิญฺญาณํ, นตฺถิ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, นตฺถิ ตตฺถ มาโร วา มารปญฺญตฺติ วา’’ติ. ตติยํ. "समिद्धि! जहाँ चक्षु नहीं है, रूप नहीं हैं, चक्षु-विज्ञान नहीं है, चक्षु-विज्ञान द्वारा विज्ञेय धर्म नहीं हैं, वहाँ न मार है और न मार की प्रज्ञप्ति है। जहाँ श्रोत्र नहीं है... जहाँ घ्राण नहीं है... जहाँ जिह्वा नहीं है, रस नहीं हैं, जिह्वा-विज्ञान नहीं है, जिह्वा-विज्ञान द्वारा विज्ञेय धर्म नहीं हैं, वहाँ न मार है और न मार की प्रज्ञप्ति है। जहाँ काय नहीं है... जहाँ मन नहीं है, धर्म नहीं हैं, मनो-विज्ञान नहीं है, मनो-विज्ञान द्वारा विज्ञेय धर्म नहीं हैं, वहाँ न मार है और न मार की प्रज्ञप्ति है।" (तृतीय सुत्त) ๔. สมิทฺธิสตฺตปญฺหาสุตฺตํ ४. समिद्धि सत्त्व-प्रश्न सुत्त ๖๖. ‘‘‘สตฺโต, สตฺโต’ติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, สตฺโต วา อสฺส สตฺตปญฺญตฺติ วา’’ติ…เป…. จตุตฺถํ. ६६. "भन्ते! 'सत्त्व, सत्त्व' ऐसा कहा जाता है। भन्ते! किस सीमा तक सत्त्व होता है या सत्त्व की प्रज्ञप्ति होती है?"... (चतुर्थ सुत्त) ๕. สมิทฺธิทุกฺขปญฺหาสุตฺตํ ५. समिद्धि दुःख-प्रश्न सुत्त ๖๗. ‘‘‘ทุกฺขํ[Pg.267], ทุกฺข’นฺติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, ทุกฺขํ วา อสฺส ทุกฺขปญฺญตฺติ วา’’ติ…เป…. ปญฺจมํ. ६७. "भन्ते! 'दुःख, दुःख' ऐसा कहा जाता है। भन्ते! किस सीमा तक दुःख होता है या दुःख की प्रज्ञप्ति होती है?"... (पंचम सुत्त) ๖. สมิทฺธิโลกปญฺหาสุตฺตํ ६. समिद्धि लोक-प्रश्न सुत्त ๖๘. ‘‘‘โลโก, โลโก’ติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, โลโก วา อสฺส โลกปญฺญตฺติ วา’’ติ? ยตฺถ โข, สมิทฺธิ, อตฺถิ จกฺขุ, อตฺถิ รูปา, อตฺถิ จกฺขุวิญฺญาณํ, อตฺถิ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, อตฺถิ ตตฺถ โลโก วา โลกปญฺญตฺติ วาติ…เป… อตฺถิ ชิวฺหา…เป… อตฺถิ มโน, อตฺถิ ธมฺมา, อตฺถิ มโนวิญฺญาณํ, อตฺถิ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, อตฺถิ ตตฺถ โลโก วา โลกปญฺญตฺติ วา. ६८. "भन्ते! 'लोक, लोक' ऐसा कहा जाता है। भन्ते! किस सीमा तक लोक होता है या लोक की प्रज्ञप्ति (संज्ञा) होती है?" "समिद्धि! जहाँ चक्षु है, रूप हैं, चक्षु-विज्ञान है, चक्षु-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्म हैं, वहाँ लोक है या लोक की प्रज्ञप्ति है... (पे)... जहाँ जिह्वा है... (पे)... जहाँ मन है, धर्म हैं, मनो-विज्ञान है, मनो-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्म हैं, वहाँ लोक है या लोक की प्रज्ञप्ति है।" ‘‘ยตฺถ จ โข, สมิทฺธิ, นตฺถิ จกฺขุ, นตฺถิ รูปา, นตฺถิ จกฺขุวิญฺญาณํ, นตฺถิ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, นตฺถิ ตตฺถ โลโก วา โลกปญฺญตฺติ วา…เป… นตฺถิ ชิวฺหา…เป… นตฺถิ มโน, นตฺถิ ธมฺมา, นตฺถิ มโนวิญฺญาณํ, นตฺถิ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺพา ธมฺมา, นตฺถิ ตตฺถ โลโก วา โลกปญฺญตฺติ วา’’ติ. ฉฏฺฐํ. "और जहाँ, समिद्धि! चक्षु नहीं है, रूप नहीं हैं, चक्षु-विज्ञान नहीं है, चक्षु-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्म नहीं हैं, वहाँ न लोक है और न लोक की प्रज्ञप्ति है... (पे)... जहाँ जिह्वा नहीं है... (पे)... जहाँ मन नहीं है, धर्म नहीं हैं, मनो-विज्ञान नहीं है, मनो-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्म नहीं हैं, वहाँ न लोक है और न लोक की प्रज्ञप्ति है।" छठा। ๗. อุปเสนอาสีวิสสุตฺตํ ७. उपसेन आसीविस सुत्त ๖๙. เอกํ สมยํ อายสฺมา จ สาริปุตฺโต อายสฺมา จ อุปเสโน ราชคเห วิหรนฺติ สีตวเน สปฺปโสณฺฑิกปพฺภาเร. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมโต อุปเสนสฺส กาเย อาสีวิโส ปติโต โหติ. อถ โข อายสฺมา อุปเสโน ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘เอถ เม, อาวุโส, อิมํ กายํ มญฺจกํ อาโรเปตฺวา พหิทฺธา นีหรถ. ปุรายํ กาโย อิเธว วิกิรติ; เสยฺยถาปิ ภุสมุฏฺฐี’’ติ. ६९. एक समय आयुष्मान सारिपुत्र और आयुष्मान उपसेन राजगृह के शीतवन में सप्पसोण्डिक पर्वत-प्राग्भार में विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान उपसेन के शरीर पर एक विषैला सर्प गिर पड़ा। तब आयुष्मान उपसेन ने भिक्षुओं को संबोधित किया— "आओ आयुष्मानों! मेरे इस शरीर को मंचक (चारपाई) पर चढ़ाकर बाहर निकाल दो। इससे पहले कि यह शरीर यहीं भूसे की मुट्ठी की तरह बिखर जाए।" เอวํ วุตฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต อายสฺมนฺตํ อุปเสนํ เอตทโวจ – ‘‘น โข ปน มยํ ปสฺสาม อายสฺมโต อุปเสนสฺส กายสฺส วา อญฺญถตฺตํ อินฺทฺริยานํ วา วิปริณามํ. อถ จ ปนายสฺมา อุปเสโน เอวมาห – ‘เอถ เม, อาวุโส, อิมํ กายํ มญฺจกํ อาโรเปตฺวา พหิทฺธา นีหรถ. ปุรายํ กาโย อิเธว วิกิรติ; เสยฺยถาปิ ภุสมุฏฺฐี’’’ติ. ‘‘ยสฺส นูน, อาวุโส สาริปุตฺต, เอวมสฺส – ‘อหํ จกฺขูติ วา มม จกฺขูติ วา…เป… อหํ ชิวฺหาติ วา มม [Pg.268] ชิวฺหาติ วา… อหํ มโนติ วา มม มโนติ วา’. ตสฺส, อาวุโส สาริปุตฺต, สิยา กายสฺส วา อญฺญถตฺตํ อินฺทฺริยานํ วา วิปริณาโม. มยฺหญฺจ โข, อาวุโส สาริปุตฺต, น เอวํ โหติ – ‘อหํ จกฺขูติ วา มม จกฺขูติ วา…เป… อหํ ชิวฺหาติ วา มม ชิวฺหาติ วา…เป… อหํ มโนติ วา มม มโนติ วา’. ตสฺส มยฺหญฺจ โข, อาวุโส สาริปุตฺต, กึ กายสฺส วา อญฺญถตฺตํ ภวิสฺสติ, อินฺทฺริยานํ วา วิปริณาโม’’ติ! ऐसा कहने पर, आयुष्मान सारिपुत्र ने आयुष्मान उपसेन से यह कहा— "हम आयुष्मान उपसेन के शरीर में कोई विकार (अन्यथाभाव) या इन्द्रियों में कोई परिवर्तन नहीं देख रहे हैं। फिर भी आयुष्मान उपसेन ऐसा कह रहे हैं— 'आओ आयुष्मानों! मेरे इस शरीर को मंचक पर चढ़ाकर बाहर निकाल दो। इससे पहले कि यह शरीर यहीं भूसे की मुट्ठी की तरह बिखर जाए'।" "आयुष्मान सारिपुत्र! जिसके मन में ऐसा हो— 'मैं चक्षु हूँ' या 'चक्षु मेरा है'... (पे)... 'मैं जिह्वा हूँ' या 'जिह्वा मेरी है'... 'मैं मन हूँ' या 'मन मेरा है', आयुष्मान सारिपुत्र! उसके शरीर में विकार या इन्द्रियों में परिवर्तन हो सकता है। किन्तु आयुष्मान सारिपुत्र! मेरे मन में ऐसा नहीं होता— 'मैं चक्षु हूँ' या 'चक्षु मेरा है'... (पे)... 'मैं जिह्वा हूँ' या 'जिह्वा मेरी है'... (पे)... 'मैं मन हूँ' या 'मन मेरा है'। आयुष्मान सारिपुत्र! मुझ जैसे व्यक्ति के शरीर में विकार या इन्द्रियों में परिवर्तन कैसे होगा?" ‘‘ตถา หิ ปนายสฺมโต อุปเสนสฺส ทีฆรตฺตํ อหงฺการมมงฺการมานานุสโย สุสมูหโต. ตสฺมา อายสฺมโต อุปเสนสฺส น เอวํ โหติ – ‘อหํ จกฺขูติ วา มม จกฺขูติ วา…เป… อหํ ชิวฺหาติ วา มม ชิวฺหาติ วา…เป… อหํ มโนติ วา มม มโนติ วา’’’ติ. อถ โข เต ภิกฺขู อายสฺมโต อุปเสนสฺส กายํ มญฺจกํ อาโรเปตฺวา พหิทฺธา นีหรึสุ. อถ โข อายสฺมโต อุปเสนสฺส กาโย ตตฺเถว วิกิริ; เสยฺยถาปิ ภุสมุฏฺฐีติ. สตฺตมํ. "यह सत्य है, क्योंकि आयुष्मान उपसेन ने दीर्घकाल से अहंकार, ममकार और मान-अनुशय को समूल नष्ट कर दिया है। इसीलिए आयुष्मान उपसेन के मन में ऐसा नहीं होता— 'मैं चक्षु हूँ' या 'चक्षु मेरा है'... (पे)... 'मैं जिह्वा हूँ' या 'जिह्वा मेरी है'... (पे)... 'मैं मन हूँ' या 'मन मेरा है'।" तब उन भिक्षुओं ने आयुष्मान उपसेन के शरीर को मंचक पर चढ़ाकर बाहर निकाला। तब आयुष्मान उपसेन का शरीर वहीं भूसे की मुट्ठी की तरह बिखर गया। सातवाँ। ๘. อุปวาณสนฺทิฏฺฐิกสุตฺตํ ८. उपवाण संदिट्ठिक सुत्त ๗๐. อถ โข อายสฺมา อุปวาโณ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อุปวาโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘‘สนฺทิฏฺฐิโก ธมฺโม, สนฺทิฏฺฐิโก ธมฺโม’ติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, สนฺทิฏฺฐิโก ธมฺโม โหติ, อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’’ติ? ७०. तब आयुष्मान उपवाण जहाँ भगवान् थे, वहाँ पहुँचे... (पे)... एक ओर बैठे हुए आयुष्मान उपवाण ने भगवान् से यह कहा— "भन्ते! 'सन्दिट्ठिक धर्म, सन्दिट्ठिक धर्म' ऐसा कहा जाता है। भन्ते! किस सीमा तक धर्म सन्दिट्ठिक, अकालिक, एहिपस्सिक, ओपनेय्यिक और विज्ञ पुरुषों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य होता है?" ‘‘อิธ ปน, อุปวาณ, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา รูปปฺปฏิสํเวที จ โหติ รูปราคปฺปฏิสํเวที จ. สนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ รูเปสุ ราคํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ รูเปสุ ราโค’ติ ปชานาติ. ยํ ตํ, อุปวาณ, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา รูปปฺปฏิสํเวที จ โหติ รูปราคปฺปฏิสํเวที จ. สนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ รูเปสุ ราคํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ รูเปสุ ราโค’ติ ปชานาติ. เอวมฺปิ โข, อุปวาณ, สนฺทิฏฺฐิโก ธมฺโม โหติ อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’’ติ…เป…. "उपवाण! यहाँ भिक्षु चक्षु से रूप को देखकर रूप का अनुभव करने वाला और रूप-राग का अनुभव करने वाला होता है। वह अपने भीतर विद्यमान रूपों के प्रति राग को 'मेरे भीतर रूपों के प्रति राग है'—ऐसा भली-भाँति जानता है। उपवाण! चूँकि भिक्षु चक्षु से रूप को देखकर रूप का अनुभव करने वाला और रूप-राग का अनुभव करने वाला होता है, और अपने भीतर विद्यमान रूपों के प्रति राग को 'मेरे भीतर रूपों के प्रति राग है'—ऐसा जानता है, उपवाण! इस प्रकार धर्म सन्दिट्ठिक, अकालिक, एहिपस्सिक, ओपनेय्यिक और विज्ञ पुरुषों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य होता है... (पे)...।" ‘‘ปุน จปรํ, อุปวาณ, ภิกฺขุ ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา รสปฺปฏิสํเวที จ โหติ รสราคปฺปฏิสํเวที จ. สนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ รเสสุ ราคํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ รเสสุ ราโค’ติ ปชานาติ. ยํ ตํ, อุปวาณ, ภิกฺขุ ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา รสปฺปฏิสํเวที จ โหติ รสราคปฺปฏิสํเวที จ. สนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ รเสสุ [Pg.269] ราคํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ รเสสุ ราโค’ติ ปชานาติ. เอวมฺปิ โข, อุปวาณ, สนฺทิฏฺฐิโก ธมฺโม โหติ อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’’ติ…เป…. "फिर, उपवाण! भिक्षु जिह्वा से रस का आस्वादन कर रस का अनुभव करने वाला और रस-राग का अनुभव करने वाला होता है। वह अपने भीतर विद्यमान रसों के प्रति राग को 'मेरे भीतर रसों के प्रति राग है'—ऐसा जानता है। उपवाण! चूँकि भिक्षु जिह्वा से रस का आस्वादन कर रस का अनुभव करने वाला और रस-राग का अनुभव करने वाला होता है, और अपने भीतर विद्यमान रसों के प्रति राग को 'मेरे भीतर रसों के प्रति राग है'—ऐसा जानता है, उपवाण! इस प्रकार भी धर्म सन्दिट्ठिक, अकालिक, एहिपस्सिक, ओपनेय्यिक और विज्ञ पुरुषों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य होता है... (पे)...।" ‘‘ปุน จปรํ, อุปวาณ, ภิกฺขุ มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ธมฺมปฺปฏิสํเวที จ โหติ ธมฺมราคปฺปฏิสํเวที จ. สนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ ธมฺเมสุ ราคํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ธมฺเมสุ ราโค’ติ ปชานาติ. ยํ ตํ, อุปวาณ, ภิกฺขุ มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ธมฺมปฺปฏิสํเวที จ โหติ ธมฺมราคปฺปฏิสํเวที จ. สนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ ธมฺเมสุ ราคํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ธมฺเมสุ ราโค’ติ ปชานาติ. เอวมฺปิ โข, อุปวาณ, สนฺทิฏฺฐิโก ธมฺโม โหติ…เป… ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’’ติ…เป…. "फिर, उपवाण! भिक्षु मन से धर्म को जानकर धर्म का अनुभव करने वाला और धर्म-राग का अनुभव करने वाला होता है। वह अपने भीतर विद्यमान धर्मों के प्रति राग को 'मेरे भीतर धर्मों के प्रति राग है'—ऐसा जानता है। उपवाण! चूँकि भिक्षु मन से धर्म को जानकर धर्म का अनुभव करने वाला और धर्म-राग का अनुभव करने वाला होता है, और अपने भीतर विद्यमान धर्मों के प्रति राग को 'मेरे भीतर धर्मों के प्रति राग है'—ऐसा जानता है, उपवाण! इस प्रकार भी धर्म सन्दिट्ठिक... (पे)... विज्ञ पुरुषों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य होता है... (पे)...।" ‘‘อิธ ปน, อุปวาณ, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา รูปปฺปฏิสํเวที จ โหติ, โน จ รูปราคปฺปฏิสํเวที. อสนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ รูเปสุ ราคํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ รูเปสุ ราโค’ติ ปชานาติ. ยํ ตํ, อุปวาณ, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา รูปปฺปฏิสํเวทีหิ โข โหติ, โน จ รูปราคปฺปฏิสํเวที. อสนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ รูเปสุ ราคํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ รูเปสุ ราโค’ติ ปชานาติ. เอวมฺปิ โข, อุปวาณ, สนฺทิฏฺฐิโก ธมฺโม โหติ, อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’’ติ…เป…. “हे उपवाण! यहाँ भिक्षु आँख से रूप को देखकर रूप का अनुभव तो करता है, किन्तु रूप के प्रति राग (आसक्ति) का अनुभव नहीं करता। वह अपने भीतर रूपों के प्रति राग के अभाव को इस प्रकार जानता है—'मेरे भीतर रूपों के प्रति राग नहीं है।' हे उपवाण! जिस रूप को भिक्षु आँख से देखकर रूप का अनुभव तो करता है, किन्तु रूप के प्रति राग का अनुभव नहीं करता, वह अपने भीतर रूपों के प्रति राग के अभाव को इस प्रकार जानता है—'मेरे भीतर रूपों के प्रति राग नहीं है।' हे उपवाण! इस प्रकार भी धर्म सांदृष्टिक (स्वयं प्रत्यक्ष करने योग्य), अकालिक, एहिपस्सिक (आओ और देखो कहने योग्य), औपनेयिक (अपने भीतर ले जाने योग्य) और विद्वानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य होता है।”...पे...। ‘‘ปุน จปรํ, อุปวาณ, ภิกฺขุ ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา รสปฺปฏิสํเวทีหิ โข โหติ, โน จ รสราคปฺปฏิสํเวที. อสนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ รเสสุ ราคํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ รเสสุ ราโค’ติ ปชานาติ…เป…. “पुनः, हे उपवाण! भिक्षु जीभ से रस का आस्वादन कर रस का अनुभव तो करता है, किन्तु रस के प्रति राग का अनुभव नहीं करता। वह अपने भीतर रसों के प्रति राग के अभाव को इस प्रकार जानता है—'मेरे भीतर रसों के प्रति राग नहीं है'...पे...। ‘‘ปุน จปรํ, อุปวาณ, ภิกฺขุ มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ธมฺมปฺปฏิสํเวทีหิ โข โหติ, โน จ ธมฺมราคปฺปฏิสํเวที. อสนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ ธมฺเมสุ ราคํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ธมฺเมสุ ราโค’ติ ปชานาติ. ยํ ตํ, อุปวาณ, ภิกฺขุ มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ธมฺมปฺปฏิสํเวทีหิ โข โหติ, โน จ ธมฺมราคปฺปฏิสํเวที. อสนฺตญฺจ อชฺฌตฺตํ ธมฺเมสุ ราคํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ธมฺเมสุ ราโค’ติ ปชานาติ. เอวมฺปิ โข, อุปวาณ, สนฺทิฏฺฐิโก ธมฺโม โหติ, อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’’ติ. อฏฺฐมํ. “पुनः, हे उपवाण! भिक्षु मन से धर्म (मानसिक विषयों) को जानकर धर्म का अनुभव तो करता है, किन्तु धर्म के प्रति राग का अनुभव नहीं करता। वह अपने भीतर धर्मों के प्रति राग के अभाव को इस प्रकार जानता है—'मेरे भीतर धर्मों के प्रति राग नहीं है।' हे उपवाण! जिस धर्म को भिक्षु मन से जानकर धर्म का अनुभव तो करता है, किन्तु धर्म के प्रति राग का अनुभव नहीं करता, वह अपने भीतर धर्मों के प्रति राग के अभाव को इस प्रकार जानता है—'मेरे भीतर धर्मों के प्रति राग नहीं है।' हे उपवाण! इस प्रकार भी धर्म सांदृष्टिक, अकालिक, एहिपस्सिक, औपनेयिक और विद्वानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य होता है।” आठवाँ सूत्र। ๙. ปฐมฉผสฺสายตนสุตฺตํ ९. ९. प्रथम षड-स्पर्शायतन सूत्र ๗๑. ‘‘โย หิ โกจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ. อวุสิตํ [Pg.270] เตน พฺรหฺมจริยํ, อารกา โส อิมสฺมา ธมฺมวินยา’’ติ. ७१. “भिक्षुओं! जो कोई भी भिक्षु छह स्पर्शायतनों की उत्पत्ति, विनाश, स्वाद (आस्वाद), दोष और निस्सरण (मुक्ति) को यथार्थ रूप में नहीं जानता, उसने ब्रह्मचर्य का पालन नहीं किया है; वह इस धर्म-विनय से दूर है।” เอวํ วุตฺเต, อญฺญตโร ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘เอตฺถาหํ, ภนฺเต, อนสฺสสํ. อหญฺหิ, ภนฺเต, ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ นปฺปชานามี’’ติ. ऐसा कहे जाने पर, एक भिक्षु ने भगवान से यह कहा—“भन्ते! यहाँ मैं नष्ट हो गया हूँ। क्योंकि भन्ते! मैं छह स्पर्शायतनों की उत्पत्ति, विनाश, स्वाद, दोष और निस्सरण को यथार्थ रूप में नहीं जानता हूँ।” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, ภิกฺขุ, จกฺขุํ ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสี’’ติ? “भिक्षु! तुम क्या सोचते हो? क्या तुम आँख को 'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है'—इस प्रकार देखते हो?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नहीं, भन्ते!” ‘‘สาธุ, ภิกฺขุ, เอตฺถ จ เต, ภิกฺขุ, จกฺขุ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย สุทิฏฺฐํ ภวิสฺสติ. เอเสวนฺโต ทุกฺขสฺส…เป… ชิวฺหํ ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสี’’ติ? “साधु भिक्षु! यहाँ तुम्हारे द्वारा आँख को 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार यथार्थ रूप में सम्यक प्रज्ञा से भली-भाँति देखा जाना चाहिए। यही दुःख का अंत है...पे... क्या तुम जीभ को 'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है'—इस प्रकार देखते हो?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नहीं, भन्ते!” ‘‘สาธุ, ภิกฺขุ, เอตฺถ จ เต, ภิกฺขุ, ชิวฺหา ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย สุทิฏฺฐํ ภวิสฺสติ. เอเสวนฺโต ทุกฺขสฺส…เป… มนํ ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสี’’ติ? “साधु भिक्षु! यहाँ तुम्हारे द्वारा जीभ को 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार यथार्थ रूप में सम्यक प्रज्ञा से भली-भाँति देखा जाना चाहिए। यही दुःख का अंत है...पे... क्या तुम मन को 'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है'—इस प्रकार देखते हो?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नहीं, भन्ते!” ‘‘สาธุ, ภิกฺขุ, เอตฺถ จ เต, ภิกฺขุ, มโน ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย สุทิฏฺฐํ ภวิสฺสติ. เอเสวนฺโต ทุกฺขสฺสา’’ติ. นวมํ. “साधु भिक्षु! यहाँ तुम्हारे द्वारा मन को 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार यथार्थ रूप में सम्यक प्रज्ञा से भली-भाँति देखा जाना चाहिए। यही दुःख का अंत है।” नौवाँ सूत्र। ๑๐. ทุติยฉผสฺสายตนสุตฺตํ १०. १०. द्वितीय षड-स्पर्शायतन सूत्र ๗๒. ‘‘โย หิ โกจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ. อวุสิตํ เตน พฺรหฺมจริยํ, อารกา โส อิมสฺมา ธมฺมวินยา’’ติ. ७२. “भिक्षुओं! जो कोई भी भिक्षु छह स्पर्शायतनों की उत्पत्ति, विनाश, स्वाद, दोष और निस्सरण को यथार्थ रूप में नहीं जानता, उसने ब्रह्मचर्य का पालन नहीं किया है; वह इस धर्म-विनय से दूर है।” เอวํ วุตฺเต, อญฺญตโร ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘เอตฺถาหํ, ภนฺเต, อนสฺสสํ ปนสฺสสํ. อหญฺหิ, ภนฺเต, ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ นปฺปชานามี’’ติ. ऐसा कहे जाने पर, एक भिक्षु ने भगवान से यह कहा—“भन्ते! यहाँ मैं नष्ट हो गया हूँ, पूरी तरह नष्ट हो गया हूँ। क्योंकि भन्ते! मैं छह स्पर्शायतनों की उत्पत्ति, विनाश, स्वाद, दोष और निस्सरण को यथार्थ रूप में नहीं जानता हूँ।” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, ภิกฺขุ, จกฺขุํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสี’’ติ? “भिक्षु! तुम क्या सोचते हो? क्या तुम आँख को 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार देखते हो?” ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. “हाँ, भन्ते!” ‘‘สาธุ, ภิกฺขุ, เอตฺถ จ เต, ภิกฺขุ, จกฺขุ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย สุทิฏฺฐํ ภวิสฺสติ. เอวํ เต เอตํ ปฐมํ ผสฺสายตนํ ปหีนํ ภวิสฺสติ [Pg.271] อายตึ อปุนพฺภวาย…เป…. “साधु भिक्षु! यहाँ तुम्हारे द्वारा आँख को 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार यथार्थ रूप में सम्यक प्रज्ञा से भली-भाँति देखा जाना चाहिए। इस प्रकार तुम्हारे लिए यह प्रथम स्पर्शायतन भविष्य में पुनर्जन्म न होने के लिए प्रहीण (नष्ट) हो जाएगा...पे...। ‘‘ชิวฺหํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสี’’ติ? “क्या तुम जीभ को 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार देखते हो?” ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. “हाँ, भन्ते!” ‘‘สาธุ, ภิกฺขุ, เอตฺถ จ เต, ภิกฺขุ, ชิวฺหา ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย สุทิฏฺฐํ ภวิสฺสติ. เอวํ เต เอตํ จตุตฺถํ ผสฺสายตนํ ปหีนํ ภวิสฺสติ อายตึ อปุนพฺภวาย…เป…. “साधु भिक्षु! यहाँ तुम्हारे द्वारा जीभ को 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार यथार्थ रूप में सम्यक प्रज्ञा से भली-भाँति देखा जाना चाहिए। इस प्रकार तुम्हारे लिए यह चौथा स्पर्शायतन भविष्य में पुनर्जन्म न होने के लिए प्रहीण हो जाएगा...पे...। ‘‘มนํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสี’’ติ? “क्या तुम मन को 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार देखते हो?” ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. “हाँ, भन्ते!” ‘‘สาธุ, ภิกฺขุ, เอตฺถ จ เต, ภิกฺขุ, มโน ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย สุทิฏฺฐํ ภวิสฺสติ. เอวํ เต เอตํ ฉฏฺฐํ ผสฺสายตนํ ปหีนํ ภวิสฺสติ อายตึ อปุนพฺภวายา’’ติ. ทสมํ. “साधु भिक्षु! यहाँ तुम्हारे द्वारा मन को 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार यथार्थ रूप में सम्यक प्रज्ञा से भली-भाँति देखा जाना चाहिए। इस प्रकार तुम्हारे लिए यह छठा स्पर्शायतन भविष्य में पुनर्जन्म न होने के लिए प्रहीण हो जाएगा।” दसवाँ सूत्र। ๑๑. ตติยฉผสฺสายตนสุตฺตํ ११. ११. तृतीय षड-स्पर्शायतन सूत्र ๗๓. ‘‘โย หิ โกจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ. อวุสิตํ เตน พฺรหฺมจริยํ, อารกา โส อิมสฺมา ธมฺมวินยา’’ติ. ७३. "भिक्षुओं, जो कोई भी भिक्षु छह स्पर्श-आयतन के उदय (उत्पत्ति), अस्त (विनाश), आस्वाद (तृप्ति), आदिनाव (दोष) और निस्सरण (मुक्ति) को यथार्थ रूप में नहीं जानता, उसने ब्रह्मचर्य का पालन नहीं किया है; वह इस धर्म-विनय से दूर है।" เอวํ วุตฺเต, อญฺญตโร ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘เอตฺถาหํ, ภนฺเต, อนสฺสสํ ปนสฺสสํ. อหญฺหิ, ภนฺเต, ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ นปฺปชานามี’’ติ. ऐसा कहे जाने पर, एक भिक्षु ने भगवान से यह कहा— "भन्ते, यहाँ मैं नष्ट हो गया हूँ, पूरी तरह नष्ट हो गया हूँ। क्योंकि भन्ते, मैं छह स्पर्श-आयतन के उदय, अस्त, आस्वाद, आदिनाव और निस्सरण को यथार्थ रूप में नहीं जानता हूँ।" ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, ภิกฺขุ, จกฺขุ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? "भिक्षु, तुम क्या मानते हो? चक्षु (आँख) नित्य है या अनित्य?" ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. "अनित्य है, भन्ते।" ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? "जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?" ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. "दुःख है, भन्ते।" ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? "जो अनित्य, दुःख और विपरिणामधर्मी (बदलने वाला) है, क्या उसे ऐसा देखना उचित है— 'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है'?" ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "नहीं, भन्ते।" ‘‘โสตํ… ฆานํ… ชิวฺหา… กาโย… มโน นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? "श्रोत्र (कान)... घ्राण (नाक)... जिह्वा (जीभ)... काय (शरीर)... मन नित्य है या अनित्य?" ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’. "अनित्य है, भन्ते।" ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? "जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?" ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. "दुःख है, भन्ते।" ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? "जो अनित्य, दुःख और विपरिणामधर्मी है, क्या उसे ऐसा देखना उचित है— 'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है'?" ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "नहीं, भन्ते।" ‘‘เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขุ, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, โสตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ฆานสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ชิวฺหายปิ นิพฺพินฺทติ, กายสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. เอกาทสมํ. "भिक्षु, इस प्रकार देखते हुए श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षु से भी निर्वेद (वैराग्य) प्राप्त करता है, श्रोत्र से भी निर्वेद प्राप्त करता है, घ्राण से भी निर्वेद प्राप्त करता है, जिह्वा से भी निर्वेद प्राप्त करता है, काय से भी निर्वेद प्राप्त करता है, मन से भी निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद होने पर वह विरक्त होता है; विरक्ति से वह मुक्त होता है; मुक्त होने पर 'मैं मुक्त हूँ' ऐसा ज्ञान होता है। वह जान लेता है— 'जाति (पुनर्जन्म) क्षीण हो गई है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस स्थिति के लिए कुछ और शेष नहीं है'।" ग्यारहवाँ (सुत्त)। มิคชาลวคฺโค สตฺตโม. सातवाँ मिगजाल वग्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका उद्दान (सारांश)— มิคชาเลน [Pg.272] ทฺเว วุตฺตา, จตฺตาโร จ สมิทฺธินา; อุปเสโน อุปวาโณ, ฉผสฺสายตนิกา ตโยติ. मिगजाल (सुत्त) दो कहे गए, चार समिद्धि (सुत्त) कहे गए; उपसेन, उपवाण और तीन छह-स्पर्श-आयतनिक (सुत्त) हैं। ๘. คิลานวคฺโค ८. गिलाण वग्ग ๑. ปฐมคิลานสุตฺตํ १. प्रथम गिलाण सुत्त ๗๔. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อมุกสฺมึ, ภนฺเต, วิหาเร อญฺญตโร ภิกฺขุ นโว อปฺปญฺญาโต อาพาธิโก ทุกฺขิโต พาฬฺหคิลาโน. สาธุ, ภนฺเต, ภควา เยน โส ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมตุ อนุกมฺปํ อุปาทายา’’ติ. ७४. श्रावस्ती निदान। तब एक भिक्षु जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचा... एक ओर बैठकर उस भिक्षु ने भगवान से यह कहा— "भन्ते, अमुक विहार में एक नया, अपरिचित भिक्षु बीमार है, दुखी है और गंभीर रूप से अस्वस्थ है। अच्छा होगा भन्ते, यदि भगवान अनुकम्पा करके उस भिक्षु के पास चलें।" อถ โข ภควา นววาทญฺจ สุตฺวา คิลานวาทญฺจ, ‘‘อปฺปญฺญาโต ภิกฺขู’’ติ อิติ วิทิตฺวา เยน โส ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ. อทฺทสา โข โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ ทูรโตว อาคจฺฉนฺตํ. ทิสฺวาน มญฺจเก สมโธสิ. อถ โข ภควา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘อลํ, ภิกฺขุ, มา ตฺวํ มญฺจเก สมโธสิ. สนฺติมานิ อาสนานิ ปญฺญตฺตานิ, ตตฺถาหํ นิสีทิสฺสามี’’ติ. นิสีทิ ภควา ปญฺญตฺเต อาสเน. นิสชฺช โข ภควา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘กจฺจิ เต, ภิกฺขุ, ขมนียํ, กจฺจิ ยาปนียํ, กจฺจิ ทุกฺขา เวทนา ปฏิกฺกมนฺติ โน อภิกฺกมนฺติ, ปฏิกฺกโมสานํ ปญฺญายติ โน อภิกฺกโม’’ติ? तब भगवान ने 'नया' और 'बीमार' शब्द सुनकर, और यह जानकर कि वह 'अपरिचित भिक्षु' है, जहाँ वह भिक्षु था वहाँ गए। उस भिक्षु ने भगवान को दूर से ही आते देखा। देखकर वह अपनी खाट (मंचक) पर हिलने-डुलने लगा। तब भगवान ने उस भिक्षु से कहा— "बस भिक्षु, तुम खाट पर मत हिलो। यहाँ बिछे हुए आसन हैं, मैं वहीं बैठूँगा।" भगवान बिछे हुए आसन पर बैठ गए। बैठकर भगवान ने उस भिक्षु से कहा— "भिक्षु, क्या तुम्हारी स्थिति सहनीय है? क्या तुम निर्वाह कर पा रहे हो? क्या दुःखद वेदनाएँ घट रही हैं और बढ़ नहीं रही हैं? क्या उनका घटना स्पष्ट है और बढ़ना नहीं?" ‘‘น เม, ภนฺเต, ขมนียํ, น ยาปนียํ, พาฬฺหา เม ทุกฺขา เวทนา อภิกฺกมนฺติ โน ปฏิกฺกมนฺติ, อภิกฺกโมสานํ ปญฺญายติ โน ปฏิกฺกโม’’ติ. "भन्ते, मेरी स्थिति सहनीय नहीं है, निर्वाह करना कठिन है। मेरी तीव्र दुःखद वेदनाएँ बढ़ रही हैं, घट नहीं रही हैं; उनका बढ़ना स्पष्ट है, घटना नहीं।" ‘‘กจฺจิ เต, ภิกฺขุ, น กิญฺจิ กุกฺกุจฺจํ, น โกจิ วิปฺปฏิสาโร’’ติ? "भिक्षु, क्या तुम्हें कोई कौकृत्य (पछतावा) या विप्रतिसार (ग्लानि) तो नहीं है?" ‘‘ตคฺฆ เม, ภนฺเต, อนปฺปกํ กุกฺกุจฺจํ, อนปฺปโก วิปฺปฏิสาโร’’ติ. "भन्ते, वास्तव में मुझे बहुत पछतावा और बहुत ग्लानि है।" ‘‘กจฺจิ ปน ตํ, ภิกฺขุ, อตฺตา สีลโต อุปวทตี’’ติ? "भिक्षु, क्या तुम्हारा अपना मन तुम्हें शील की दृष्टि से दोष देता है?" ‘‘น โข มํ, ภนฺเต, อตฺตา สีลโต อุปวทตี’’ติ. "नहीं भन्ते, मेरा मन मुझे शील की दृष्टि से दोष नहीं देता।" ‘‘โน เจ กิร เต, ภิกฺขุ, อตฺตา สีลโต อุปวทติ, อถ กิญฺจ เต กุกฺกุจฺจํ โก จ วิปฺปฏิสาโร’’ติ? "भिक्षु, यदि तुम्हारा मन तुम्हें शील की दृष्टि से दोष नहीं देता, तो फिर तुम्हें किस बात का पछतावा और ग्लानि है?" ‘‘น ขฺวาหํ, ภนฺเต, สีลวิสุทฺธตฺถํ ภควตา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานามี’’ติ[Pg.273]. "भन्ते, मैं यह नहीं समझता कि भगवान ने शील की शुद्धि के लिए धर्म का उपदेश दिया है।" ‘‘โน เจ กิร ตฺวํ, ภิกฺขุ, สีลวิสุทฺธตฺถํ มยา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานาสิ, อถ กิมตฺถํ จรหิ ตฺวํ, ภิกฺขุ, มยา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานาสี’’ติ? "भिक्षु, यदि तुम यह नहीं समझते कि मैंने शील की शुद्धि के लिए धर्म का उपदेश दिया है, तो फिर तुम क्या समझते हो कि मैंने किस उद्देश्य के लिए धर्म का उपदेश दिया है?" ‘‘ราควิราคตฺถํ ขฺวาหํ, ภนฺเต, ภควตา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานามี’’ติ. “भन्ते! मैं भगवान द्वारा उपदेशित धर्म को राग के विराग (त्याग) के लिए समझता हूँ।” ‘‘สาธุ สาธุ, ภิกฺขุ! สาธุ โข ตฺวํ, ภิกฺขุ, ราควิราคตฺถํ มยา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานาสิ. ราควิราคตฺโถ หิ, ภิกฺขุ, มยา ธมฺโม เทสิโต. ตํ กึ มญฺญสิ ภิกฺขุ, จกฺขุ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “साधु, साधु भिक्षु! साधु भिक्षु, तुम मेरे द्वारा उपदेशित धर्म को राग के विराग के लिए अच्छी तरह समझते हो। भिक्षु, वास्तव में मेरे द्वारा उपदेशित धर्म राग के विराग के लिए ही है। भिक्षु, तुम क्या सोचते हो? क्या चक्षु (आँख) नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य है, भन्ते।” ‘‘ยํ…เป… โสตํ… ฆานํ… ชิวฺหา… กาโย… มโน นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? “...श्रोत्र... घ्राण... जिह्वा... काय... मन नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’. “अनित्य है, भन्ते।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःख है, भन्ते।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “जो अनित्य, दुःख और परिवर्तनशील स्वभाव वाला है, क्या उसे ऐसा देखना उचित है— ‘यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है’?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नहीं, भन्ते।” ‘‘เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขุ, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, โสตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. “भिक्षु, ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक चक्षु से भी निर्वेद (वैराग्य) प्राप्त करता है, श्रोत्र से भी निर्वेद प्राप्त करता है... मन से भी निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद से वह विरक्त होता है; विरक्ति से वह मुक्त होता है; मुक्त होने पर ‘मैं मुक्त हूँ’ ऐसा ज्ञान होता है। वह जान लेता है— ‘जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस स्थिति के लिए कुछ शेष नहीं है’।” อิทมโวจ ภควา. อตฺตมโน โส ภิกฺขุ ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิ. อิมสฺมิญฺจ ปน เวยฺยากรณสฺมึ ภญฺญมาเน ตสฺส ภิกฺขุโน วิรชํ วีตมลํ ธมฺมจกฺขุํ อุทปาทิ – ‘‘ยํ กิญฺจิ สมุทยธมฺมํ, สพฺพํ ตํ นิโรธธมฺม’’นฺติ. ปฐมํ. भगवान ने यह कहा। वह भिक्षु भगवान के प्रवचन से प्रसन्न हुआ और उसने उसका अभिनन्दन किया। जब यह व्याख्या कही जा रही थी, तब उस भिक्षु को विरज, निर्मल धर्म-चक्षु उत्पन्न हुआ— “जो कुछ भी उदय होने वाला स्वभाव है, वह सब निरोध होने वाला स्वभाव है।” प्रथम (सुत्त)। ๒. ทุติยคิลานสุตฺตํ २. द्वितीय गिलान सुत्त ๗๕. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ…เป… ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อมุกสฺมึ, ภนฺเต, วิหาเร อญฺญตโร ภิกฺขุ นโว อปฺปญฺญาโต อาพาธิโก ทุกฺขิโต พาฬฺหคิลาโน. สาธุ, ภนฺเต, ภควา เยน โส ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมตุ อนุกมฺปํ อุปาทายา’’ติ. ७५. तब एक भिक्षु... ने भगवान से यह कहा— “भन्ते, अमुक विहार में एक नया, अज्ञात भिक्षु बीमार है, दुखी है और गंभीर रूप से अस्वस्थ है। भन्ते, अच्छा होगा यदि भगवान अनुकम्पा करके उस भिक्षु के पास चलें।” อถ โข ภควา นววาทญฺจ สุตฺวา คิลานวาทญฺจ, ‘‘อปฺปญฺญาโต ภิกฺขู’’ติ อิติ วิทิตฺวา เยน โส ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ. อทฺทสา โข โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ ทูรโตว อาคจฺฉนฺตํ. ทิสฺวาน มญฺจเก สมโธสิ. อถ โข ภควา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘อลํ, ภิกฺขุ, มา ตฺวํ มญฺจเก สมโธสิ. สนฺติมานิ อาสนานิ ปญฺญตฺตานิ, ตตฺถาหํ นิสีทิสฺสามี’’ติ. นิสีทิ ภควา ปญฺญตฺเต อาสเน. นิสชฺช โข ภควา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘กจฺจิ เต, ภิกฺขุ, ขมนียํ, กจฺจิ ยาปนียํ, กจฺจิ ทุกฺขา เวทนา ปฏิกฺกมนฺติ โน อภิกฺกมนฺติ, ปฏิกฺกโมสานํ [Pg.274] ปญฺญายติ โน อภิกฺกโม’’ติ? तब भगवान ने ‘नया’ और ‘बीमार’ होने की बात सुनकर और यह जानकर कि वह ‘अज्ञात भिक्षु’ है, जहाँ वह भिक्षु था वहाँ गए। उस भिक्षु ने भगवान को दूर से ही आते देखा। देखकर वह अपनी खाट पर हिलने-डुलने लगा। तब भगवान ने उस भिक्षु से यह कहा— “बस भिक्षु, तुम खाट पर मत हिलो। यहाँ बिछे हुए आसन हैं, मैं वहीं बैठूँगा।” भगवान बिछे हुए आसन पर बैठ गए। बैठकर भगवान ने उस भिक्षु से यह कहा— “भिक्षु, क्या तुम्हारी स्थिति सहनीय है? क्या तुम निर्वाह कर पा रहे हो? क्या दुःखद वेदनाएँ घट रही हैं और बढ़ नहीं रही हैं? क्या उनका घटना दिखाई दे रहा है और बढ़ना नहीं?” ‘‘น เม, ภนฺเต, ขมนียํ, น ยาปนียํ…เป… น โข มํ, ภนฺเต, อตฺตา สีลโต อุปวทตี’’ติ. “भन्ते, मेरी स्थिति सहनीय नहीं है, निर्वाह योग्य नहीं है... भन्ते, मेरा आत्मा (स्वयं) मुझे शील की दृष्टि से दोष नहीं देता है।” ‘‘โน เจ กิร เต, ภิกฺขุ, อตฺตา สีลโต อุปวทติ, อถ กิญฺจ เต กุกฺกุจฺจํ โก จ วิปฺปฏิสาโร’’ติ? “भिक्षु, यदि तुम्हारा आत्मा तुम्हें शील की दृष्टि से दोष नहीं देता है, तो फिर तुम्हें किस बात की चिंता और पश्चाताप है?” ‘‘น ขฺวาหํ, ภนฺเต, สีลวิสุทฺธตฺถํ ภควตา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานามี’’ติ. “भन्ते, मैं भगवान द्वारा उपदेशित धर्म को शील-विशुद्धि के लिए नहीं समझता हूँ।” ‘‘โน เจ กิร ตฺวํ, ภิกฺขุ, สีลวิสุทฺธตฺถํ มยา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานาสิ, อถ กิมตฺถํ จรหิ ตฺวํ, ภิกฺขุ, มยา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานาสี’’ติ? “भिक्षु, यदि तुम मेरे द्वारा उपदेशित धर्म को शील-विशुद्धि के लिए नहीं समझते हो, तो फिर तुम मेरे द्वारा उपदेशित धर्म को किस उद्देश्य के लिए समझते हो?” ‘‘อนุปาทาปรินิพฺพานตฺถํ ขฺวาหํ, ภนฺเต, ภควตา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานามี’’ติ. “भन्ते, मैं भगवान द्वारा उपदेशित धर्म को बिना किसी उपादान (आसक्ति) के परिनिर्वाण प्राप्त करने के लिए समझता हूँ।” ‘‘สาธุ สาธุ, ภิกฺขุ! สาธุ โข ตฺวํ, ภิกฺขุ, อนุปาทาปรินิพฺพานตฺถํ มยา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานาสิ. อนุปาทาปรินิพฺพานตฺโถ หิ, ภิกฺขุ, มยา ธมฺโม เทสิโต. “साधु, साधु भिक्षु! साधु भिक्षु, तुम मेरे द्वारा उपदेशित धर्म को बिना उपादान के परिनिर्वाण के लिए अच्छी तरह समझते हो। भिक्षु, वास्तव में मेरे द्वारा उपदेशित धर्म बिना उपादान के परिनिर्वाण के लिए ही है।” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, ภิกฺขุ, จกฺขุ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “भिक्षु, तुम क्या सोचते हो? क्या चक्षु नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य है, भन्ते।” ‘‘ยํ…เป… โสตํ… ฆานํ… ชิวฺหา… กาโย… มโน… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “...श्रोत्र... घ्राण... जिह्वा... काय... मन... मनो-विज्ञान... मनो-स्पर्श... और मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, क्या वह नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य है, भन्ते।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःख है, भन्ते।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “जो अनित्य, दुःख और परिवर्तनशील स्वभाव वाला है, क्या उसे ऐसा देखना उचित है— ‘यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है’?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नहीं, भन्ते।” ‘‘เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขุ, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… มนสฺมิมฺปิ… มโนวิญฺญาเณปิ… มโนสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. “भिक्षु, ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक चक्षु से भी निर्वेद प्राप्त करता है... मन से भी... मनो-विज्ञान से भी... मनो-स्पर्श से भी निर्वेद प्राप्त करता है। मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, उससे भी वह निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद से वह विरक्त होता है; विरक्ति से वह मुक्त होता है; मुक्त होने पर ‘मैं मुक्त हूँ’ ऐसा ज्ञान होता है। वह जान लेता है— ‘जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस स्थिति के लिए कुछ शेष नहीं है’।” อิทมโวจ ภควา. อตฺตมโน โส ภิกฺขุ ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิ. อิมสฺมิญฺจ ปน เวยฺยากรณสฺมึ ภญฺญมาเน ตสฺส ภิกฺขุสฺส อนุปาทาย อาสเวหิ จิตฺตํ วิมุจฺจีติ. ทุติยํ. भगवान ने यह कहा। वह भिक्षु भगवान के प्रवचन से प्रसन्न हुआ और उसने उसका अभिनन्दन किया। जब यह व्याख्या कही जा रही थी, तब उस भिक्षु का चित्त बिना किसी उपादान के आस्रवों से मुक्त हो गया। द्वितीय (सुत्त)।” ๓. ราธอนิจฺจสุตฺตํ ३. राधा अनित्य सूत्र ๗๖. อถ โข อายสฺมา ราโธ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา ราโธ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน ธมฺมํ เทเสตุ[Pg.275], ยมหํ ภควโต ธมฺมํ สุตฺวา เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหเรยฺย’’นฺติ. ‘‘ยํ โข, ราธ, อนิจฺจํ ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. กิญฺจ, ราธ, อนิจฺจํ ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ? จกฺขุ อนิจฺจํ, รูปา อนิจฺจา, จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ. ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ…เป… ชิวฺหา… กาโย… มโน อนิจฺโจ. ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ธมฺมา… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ. ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยํ โข, ราธ, อนิจฺจํ ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ’’ติ. ตติยํ. ७६. तब आयुष्मान राधा... एक ओर बैठे हुए आयुष्मान राधा ने भगवान से यह कहा - "भन्ते! अच्छा हो यदि भगवान मुझे संक्षेप में धर्म का उपदेश दें, जिसे सुनकर मैं अकेला, एकांतवासी, अप्रमत्त, उत्साही और दृढ़संकल्प होकर विहार कर सकूँ।" "राधा! जो अनित्य है, उसके प्रति तुम्हें छंद (इच्छा) का त्याग करना चाहिए। और राधा! अनित्य क्या है? चक्षु अनित्य है, रूप अनित्य हैं, चक्षु-विज्ञान... चक्षु-संपर्श... चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी अनित्य है। उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए... जिह्वा... काय... मन अनित्य है। उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। धर्म... मनो-विज्ञान... मनो-संपर्श... मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी अनित्य है। उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। राधा! जो अनित्य है, उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए।" तीसरा। ๔. ราธทุกฺขสุตฺตํ ४. राधा दुःख सूत्र ๗๗. ‘‘ยํ โข, ราธ, ทุกฺขํ ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. กิญฺจ, ราธ, ทุกฺขํ? จกฺขุ โข, ราธ, ทุกฺขํ. ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. รูปา… จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺส…เป… อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ทุกฺขํ. ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ…เป… มโน ทุกฺโข… ธมฺมา… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ทุกฺขํ. ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยํ โข, ราธ, ทุกฺขํ ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ’’ติ. จตุตฺถํ. ७७. "राधा! जो दुःख है, उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। और राधा! दुःख क्या है? राधा! चक्षु दुःख है। उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। रूप... चक्षु-विज्ञान... चक्षु-संपर्श... चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो... न-दुखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी दुःख है। उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए... मन दुःख है... धर्म... मनो-विज्ञान... मनो-संपर्श... मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी दुःख है। उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। राधा! जो दुःख है, उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए।" चौथा। ๕. ราธอนตฺตสุตฺตํ ५. राधा अनात्म सूत्र ๗๘. ‘‘โย โข, ราธ, อนตฺตา ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. โก จ, ราธ, อนตฺตา? จกฺขุ โข, ราธ, อนตฺตา. ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. รูปา… จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา…เป… มโน อนตฺตา… ธมฺมา… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนตฺตา. ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. โย โข, ราธ, อนตฺตา ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ’’ติ. ปญฺจมํ. ७८. "राधा! जो अनात्म है, उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। और राधा! अनात्म क्या है? राधा! चक्षु अनात्म है। उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। रूप... चक्षु-विज्ञान... चक्षु-संपर्श... चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो... मन अनात्म है... धर्म... मनो-विज्ञान... मनो-संपर्श... मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी अनात्म है। उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। राधा! जो अनात्म है, उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए।" पाँचवाँ। ๖. ปฐมอวิชฺชาปหานสุตฺตํ ६. प्रथम अविद्या-प्रहाण सूत्र ๗๙. อถ [Pg.276] โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อตฺถิ นุ โข, ภนฺเต, เอโก ธมฺโม ยสฺส ปหานา ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ? ७९. तब एक भिक्षु जहाँ भगवान थे वहाँ गया... एक ओर बैठे हुए उस भिक्षु ने भगवान से यह कहा - "भन्ते! क्या कोई ऐसा एक धर्म है, जिसके त्यागने से भिक्षु की अविद्या नष्ट हो जाती है और विद्या उत्पन्न होती है?" ‘‘อตฺถิ โข, ภิกฺขุ, เอโก ธมฺโม ยสฺส ปหานา ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ. "भिक्षु! ऐसा एक धर्म है, जिसके त्यागने से भिक्षु की अविद्या नष्ट हो जाती है और विद्या उत्पन्न होती है।" ‘‘กตโม ปน, ภนฺเต, เอโก ธมฺโม ยสฺส ปหานา ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ? "भन्ते! वह एक धर्म कौन सा है, जिसके त्यागने से भिक्षु की अविद्या नष्ट हो जाती है और विद्या उत्पन्न होती है?" ‘‘อวิชฺชา โข, ภิกฺขุ, เอโก ธมฺโม ยสฺส ปหานา ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ. "भिक्षु! अविद्या ही वह एक धर्म है, जिसके त्यागने से भिक्षु की अविद्या नष्ट हो जाती है और विद्या उत्पन्न होती है।" ‘‘กถํ ปน, ภนฺเต, ชานโต, กถํ ปสฺสโต ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ? "भन्ते! भिक्षु के कैसे जानने और कैसे देखने से अविद्या नष्ट होती है और विद्या उत्पन्न होती है?" ‘‘จกฺขุํ โข, ภิกฺขุ, อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชติ. รูเป… จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ, จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชติ…เป… มนํ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชติ. ธมฺเม… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชติ. เอวํ โข, ภิกฺขุ, ชานโต เอวํ ปสฺสโต ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ. ฉฏฺฐํ. "भिक्षु! चक्षु को अनित्य के रूप में जानने और देखने वाले भिक्षु की अविद्या नष्ट होती है और विद्या उत्पन्न होती है। रूपों को... चक्षु-विज्ञान को... चक्षु-संपर्श को... चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे भी अनित्य के रूप में जानने और देखने वाले भिक्षु की अविद्या नष्ट होती है और विद्या उत्पन्न होती है... मन को अनित्य के रूप में जानने और देखने वाले भिक्षु की अविद्या नष्ट होती है और विद्या उत्पन्न होती है। धर्मों को... मनो-विज्ञान को... मनो-संपर्श को... मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे भी अनित्य के रूप में जानने और देखने वाले भिक्षु की अविद्या नष्ट होती है और विद्या उत्पन्न होती है। भिक्षु! इस प्रकार जानने और इस प्रकार देखने वाले भिक्षु की अविद्या नष्ट होती है और विद्या उत्पन्न होती है।" छठा। ๗. ทุติยอวิชฺชาปหานสุตฺตํ ७. द्वितीय अविद्या-प्रहाण सूत्र ๘๐. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ…เป… เอตทโวจ – ‘‘อตฺถิ นุ โข, ภนฺเต, เอโก ธมฺโม ยสฺส ปหานา ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ? ८०. तब एक भिक्षु ने... यह कहा - "भन्ते! क्या कोई ऐसा एक धर्म है, जिसके त्यागने से भिक्षु की अविद्या नष्ट हो जाती है और विद्या उत्पन्न होती है?" ‘‘อตฺถิ โข, ภิกฺขุ, เอโก ธมฺโม ยสฺส ปหานา ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ. "भिक्षु! ऐसा एक धर्म है, जिसके त्यागने से भिक्षु की अविद्या नष्ट हो जाती है और विद्या उत्पन्न होती है।" ‘‘กตโม ปน, ภนฺเต, เอโก ธมฺโม ยสฺส ปหานา ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ? "भन्ते! वह एक धर्म कौन सा है, जिसके त्यागने से भिक्षु की अविद्या नष्ट हो जाती है और विद्या उत्पन्न होती है?" ‘‘อวิชฺชา โข, ภิกฺขุ, เอโก ธมฺโม ยสฺส ปหานา ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ. "भिक्षु! अविद्या ही वह एक धर्म है, जिसके त्यागने से भिक्षु की अविद्या नष्ट हो जाती है और विद्या उत्पन्न होती है।" ‘‘กถํ ปน, ภนฺเต, ชานโต, กถํ ปสฺสโต อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ? "भन्ते! कैसे जानने और कैसे देखने से अविद्या नष्ट होती है और विद्या उत्पन्न होती है?" ‘‘อิธ, ภิกฺขุ, ภิกฺขุโน สุตํ โหติ – ‘สพฺเพ ธมฺมา นาลํ อภินิเวสายา’ติ. เอวญฺเจตํ, ภิกฺขุ, ภิกฺขุโน สุตํ โหติ – ‘สพฺเพ ธมฺมา [Pg.277] นาลํ อภินิเวสายา’ติ. โส สพฺพํ ธมฺมํ อภิชานาติ, สพฺพํ ธมฺมํ อภิญฺญาย สพฺพํ ธมฺมํ ปริชานาติ, สพฺพํ ธมฺมํ ปริญฺญาย สพฺพนิมิตฺตานิ อญฺญโต ปสฺสติ, จกฺขุํ อญฺญโต ปสฺสติ, รูเป… จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อญฺญโต ปสฺสติ…เป… มนํ อญฺญโต ปสฺสติ, ธมฺเม… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อญฺญโต ปสฺสติ. เอวํ โข, ภิกฺขุ, ชานโต เอวํ ปสฺสโต ภิกฺขุโน อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชตี’’ติ. สตฺตมํ. “भिक्षु, यहाँ किसी भिक्षु ने यह सुना होता है— ‘सभी धर्म (पदार्थ) अभिनिवेश (आसक्ति/दुराग्रह) के योग्य नहीं हैं।’ और भिक्षु, यदि भिक्षु ने ऐसा सुना होता है कि ‘सभी धर्म अभिनिवेश के योग्य नहीं हैं’, तो वह सभी धर्मों को विशेष ज्ञान (अभिज्ञा) से जानता है। सभी धर्मों को विशेष ज्ञान से जानकर वह सभी धर्मों का पूर्ण परिज्ञान (परिज्ञा) करता है। सभी धर्मों का पूर्ण परिज्ञान करके वह सभी निमित्तों को अन्य (अनात्म) रूप में देखता है; वह चक्षु को अन्य रूप में देखता है, रूपों को... चक्षु-विज्ञान को... चक्षु-स्पर्श को... चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे भी वह अन्य रूप में देखता है... विस्तार... वह मन को अन्य रूप में देखता है, धर्मों को... मनो-विज्ञान को... मनो-स्पर्श को... मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे भी वह अन्य रूप में देखता है। भिक्षु, इस प्रकार जानने वाले और इस प्रकार देखने वाले भिक्षु की अविद्या नष्ट हो जाती है और विद्या उत्पन्न होती है।” सातवाँ सूत्र। ๘. สมฺพหุลภิกฺขุสุตฺตํ ८. ८. सम्बहुलभिक्खु सुत्त (अनेक भिक्षु सूत्र) ๘๑. อถ โข สมฺพหุลา ภิกฺขู เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘อิธ โน, ภนฺเต, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา อมฺเห เอวํ ปุจฺฉนฺติ – ‘กิมตฺถิยํ, อาวุโส, สมเณ โคตเม พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’ติ? เอวํ ปุฏฺฐา มยํ, ภนฺเต, เตสํ อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ พฺยากโรม – ‘ทุกฺขสฺส โข, อาวุโส, ปริญฺญตฺถํ ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’ติ. กจฺจิ มยํ, ภนฺเต, เอวํ ปุฏฺฐา เอวํ พฺยากรมานา วุตฺตวาทิโน เจว ภควโต โหม, น จ ภควนฺตํ อภูเตน อพฺภาจิกฺขาม, ธมฺมสฺส จานุธมฺมํ พฺยากโรม, น จ โกจิ สหธมฺมิโก วาทานุวาโท คารยฺหํ ฐานํ อาคจฺฉตี’’ติ? ८१. ८१. तब अनेक भिक्षु जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे... एक ओर बैठकर उन भिक्षुओं ने भगवान से यह कहा— “भन्ते, यहाँ अन्य मतों के परिव्राजक हमसे इस प्रकार पूछते हैं— ‘आयुष्मन्, श्रमण गौतम के पास ब्रह्मचर्य का पालन किस प्रयोजन के लिए किया जाता है?’ भन्ते, इस प्रकार पूछे जाने पर हम उन अन्य मतों के परिव्राजकों को इस प्रकार उत्तर देते हैं— ‘आयुष्मन्, दुःख के पूर्ण परिज्ञान (परिज्ञा) के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है।’ भन्ते, इस प्रकार पूछे जाने पर और इस प्रकार उत्तर देने पर, क्या हम भगवान के वचनों को ही दोहरा रहे हैं? क्या हम भगवान पर झूठा आरोप तो नहीं लगा रहे? क्या हम धर्म के अनुकूल ही उत्तर दे रहे हैं? और क्या धर्म के अनुसार किया गया हमारा कोई वाद-प्रतिवाद निंदा के योग्य स्थान को तो प्राप्त नहीं होता?” ‘‘ตคฺฆ ตุมฺเห, ภิกฺขเว, เอวํ ปุฏฺฐา เอวํ พฺยากรมานา วุตฺตวาทิโน เจว เม โหถ, น จ มํ อภูเตน อพฺภาจิกฺขถ, ธมฺมสฺส จานุธมฺมํ พฺยากโรถ, น จ โกจิ สหธมฺมิโก วาทานุวาโท คารยฺหํ ฐานํ อาคจฺฉติ. ทุกฺขสฺส หิ, ภิกฺขเว, ปริญฺญตฺถํ มยิ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ. สเจ ปน โว, ภิกฺขเว, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ ปุจฺเฉยฺยุํ – ‘กตมํ ปน ตํ, อาวุโส, ทุกฺขํ, ยสฺส ปริญฺญาย สมเณ โคตเม พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’ติ? เอวํ ปุฏฺฐา ตุมฺเห, ภิกฺขเว, เตสํ อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ พฺยากเรยฺยาถ – ‘จกฺขุ โข, อาวุโส, ทุกฺขํ, ตสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ. รูปา…เป… ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ทุกฺขํ. ตสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ…เป… มโน ทุกฺโข…เป… ยมฺปิทํ [Pg.278] มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ทุกฺขํ. ตสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ. อิทํ โข ตํ, อาวุโส, ทุกฺขํ, ตสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’ติ. เอวํ ปุฏฺฐา ตุมฺเห, ภิกฺขเว, เตสํ อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ พฺยากเรยฺยาถา’’ติ. อฏฺฐมํ. “निश्चित ही भिक्षुओं, इस प्रकार पूछे जाने पर और इस प्रकार उत्तर देने पर तुम मेरे वचनों को ही कह रहे हो, मुझ पर झूठा आरोप नहीं लगा रहे हो, धर्म के अनुकूल ही उत्तर दे रहे हो, और धर्म के अनुसार किया गया तुम्हारा कोई वाद-प्रतिवाद निंदा के योग्य स्थान को प्राप्त नहीं होता। भिक्षुओं, वास्तव में दुःख के पूर्ण परिज्ञान के लिए ही मेरे पास ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है। भिक्षुओं, यदि अन्य मतों के परिव्राजक तुमसे इस प्रकार पूछें— ‘आयुष्मन्, वह दुःख क्या है, जिसके पूर्ण परिज्ञान के लिए श्रमण गौतम के पास ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है?’ तो भिक्षुओं, इस प्रकार पूछे जाने पर तुम उन अन्य मतों के परिव्राजकों को इस प्रकार उत्तर देना— ‘आयुष्मन्, चक्षु दुःख है, उसके पूर्ण परिज्ञान के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है। रूप... विस्तार... चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी दुःख है। उसके पूर्ण परिज्ञान के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है... विस्तार... मन दुःख है... विस्तार... मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी दुःख है। उसके पूर्ण परिज्ञान के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है। आयुष्मन्, यही वह दुःख है, जिसके पूर्ण परिज्ञान के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है।’ भिक्षुओं, इस प्रकार पूछे जाने पर तुम उन अन्य मतों के परिव्राजकों को इस प्रकार उत्तर देना।” आठवाँ सूत्र। ๙. โลกปญฺหาสุตฺตํ ९. ९. लोकपञ्हा सुत्त (लोक प्रश्न सूत्र) ๘๒. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยน ภควา…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ८२. ८२. तब एक भिक्षु जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा... एक ओर बैठकर उस भिक्षु ने भगवान से यह कहा— ‘‘‘โลโก, โลโก’ติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, โลโกติ วุจฺจตี’’ติ? ‘‘‘ลุชฺชตี’ติ โข, ภิกฺขุ, ตสฺมา โลโกติ วุจฺจติ. กิญฺจ ลุชฺชติ? จกฺขุ โข, ภิกฺขุ, ลุชฺชติ. รูปา ลุชฺชนฺติ, จกฺขุวิญฺญาณํ ลุชฺชติ, จกฺขุสมฺผสฺโส ลุชฺชติ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ลุชฺชติ…เป… ชิวฺหา ลุชฺชติ…เป… มโน ลุชฺชติ, ธมฺมา ลุชฺชนฺติ, มโนวิญฺญาณํ ลุชฺชติ, มโนสมฺผสฺโส ลุชฺชติ, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ลุชฺชติ. ลุชฺชตีติ โข, ภิกฺขุ, ตสฺมา โลโกติ วุจฺจตี’’ติ. นวมํ. “भन्ते, ‘लोक, लोक’ ऐसा कहा जाता है। भन्ते, किस कारण से ‘लोक’ कहा जाता है?” “भिक्षु, क्योंकि यह ‘लुज्जित’ (क्षय/नष्ट) होता है, इसलिए इसे ‘लोक’ कहा जाता है। क्या लुज्जित होता है? भिक्षु, चक्षु लुज्जित होता है, रूप लुज्जित होते हैं, चक्षु-विज्ञान लुज्जित होता है, चक्षु-स्पर्श लुज्जित होता है, चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी लुज्जित होती है... विस्तार... जिह्वा लुज्जित होती है... विस्तार... मन लुज्जित होता है, धर्म लुज्जित होते हैं, मनो-विज्ञान लुज्जित होता है, मनो-स्पर्श लुज्जित होता है, मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी लुज्जित होती है। भिक्षु, क्योंकि यह लुज्जित होता है, इसलिए इसे ‘लोक’ कहा जाता है।” नौवाँ सूत्र। ๑๐. ผคฺคุนปญฺหาสุตฺตํ १०. १०. फग्गुणपञ्हा सुत्त (फग्गुण प्रश्न सूत्र) ๘๓. อถ โข อายสฺมา ผคฺคุโน…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา ผคฺคุโน ภควนฺตํ เอตทโวจ – ८३. ८३. तब आयुष्मान् फग्गुण जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे... एक ओर बैठकर आयुष्मान् फग्गुण ने भगवान से यह कहा— ‘‘อตฺถิ นุ โข, ภนฺเต, ตํ จกฺขุ, เยน จกฺขุนา อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวฏฺเฏ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย…เป… อตฺถิ นุ โข, ภนฺเต, สา ชิวฺหา, ยาย ชิวฺหาย อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวฏฺเฏ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย…เป… อตฺถิ นุ โข โส, ภนฺเต, มโน, เยน มเนน อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวฏฺเฏ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺยา’’ติ? “भन्ते, क्या वह चक्षु है, जिस चक्षु के द्वारा उन अतीत के बुद्धों को प्रज्ञप्त (वर्णित) किया जा सके, जो परिनिर्वाण को प्राप्त हो चुके हैं, जिन्होंने प्रपञ्चों को काट दिया है, जिन्होंने (संसार के) मार्ग को काट दिया है, जिनका संसार-चक्र समाप्त हो गया है और जो सभी दुखों से पार हो चुके हैं? ... भन्ते, क्या वह जिह्वा है, जिस जिह्वा के द्वारा उन अतीत के बुद्धों को प्रज्ञप्त किया जा सके... विस्तार... भन्ते, क्या वह मन है, जिस मन के द्वारा उन अतीत के बुद्धों को प्रज्ञप्त किया जा सके, जो परिनिर्वाण को प्राप्त हो चुके हैं, जिन्होंने प्रपञ्चों को काट दिया है, जिन्होंने मार्ग को काट दिया है, जिनका संसार-चक्र समाप्त हो गया है और जो सभी दुखों से पार हो चुके हैं?” ‘‘นตฺถิ โข ตํ, ผคฺคุน, จกฺขุ, เยน จกฺขุนา อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวฏฺเฏ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย [Pg.279] …เป… นตฺถิ โข สา, ผคฺคุน, ชิวฺหา, ยาย ชิวฺหาย อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวฏฺเฏ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย…เป… นตฺถิ โข โส, ผคฺคุน, มโน, เยน มเนน อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวฏฺเฏ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺยา’’ติ. ทสมํ. “हे फग्गुण! वह चक्षु नहीं है, जिस चक्षु के द्वारा अतीत के, परिनिर्वाण प्राप्त, प्रपंचों को काट चुके, संसार-पथ को काट चुके, जन्म-मरण के चक्र को समाप्त कर चुके और सभी दुखों से पार पा चुके बुद्धों को प्रज्ञप्त करते हुए प्रज्ञप्त किया जा सके... हे फग्गुण! वह जिह्वा नहीं है, जिस जिह्वा के द्वारा अतीत के, परिनिर्वाण प्राप्त, प्रपंचों को काट चुके, संसार-पथ को काट चुके, जन्म-मरण के चक्र को समाप्त कर चुके और सभी दुखों से पार पा चुके बुद्धों को प्रज्ञप्त करते हुए प्रज्ञप्त किया जा सके... हे फग्गुण! वह मन नहीं है, जिस मन के द्वारा अतीत के, परिनिर्वाण प्राप्त, प्रपंचों को काट चुके, संसार-पथ को काट चुके, जन्म-मरण के चक्र को समाप्त कर चुके और सभी दुखों से पार पा चुके बुद्धों को प्रज्ञप्त करते हुए प्रज्ञप्त किया जा सके।” दसवाँ। คิลานวคฺโค อฏฺฐโม. आठवाँ गिलान-वग्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका उदान (सारांश) - คิลาเนน ทุเว วุตฺตา, ราเธน อปเร ตโย; อวิชฺชาย จ ทฺเว วุตฺตา, ภิกฺขุ โลโก จ ผคฺคุโนติ. ग्लान के नाम से दो (सूत्र) कहे गए हैं, राध के नाम से अन्य तीन; अविद्या के नाम से दो कहे गए हैं, और भिक्खु, लोक तथा फग्गुण। ๙. ฉนฺนวคฺโค ९. छन्न-वग्ग ๑. ปโลกธมฺมสุตฺตํ १. पलोकधम्म सुत्त ๘๔. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ८४. श्रावस्ती निदान। तब आयुष्मान आनन्द जहाँ भगवान् थे, वहाँ पहुँचे... एक ओर बैठे हुए आयुष्मान आनन्द ने भगवान् से यह कहा - ‘‘‘โลโก, โลโก’ติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, โลโกติ วุจฺจตี’’ติ? ‘‘ยํ โข, อานนฺท, ปโลกธมฺมํ, อยํ วุจฺจติ อริยสฺส วินเย โลโก. กิญฺจ, อานนฺท, ปโลกธมฺมํ? จกฺขุ โข, อานนฺท, ปโลกธมฺมํ, รูปา ปโลกธมฺมา, จกฺขุวิญฺญาณํ ปโลกธมฺมํ, จกฺขุสมฺผสฺโส ปโลกธมฺโม, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา…เป… ตมฺปิ ปโลกธมฺมํ…เป… ชิวฺหา ปโลกธมฺมา, รสา ปโลกธมฺมา, ชิวฺหาวิญฺญาณํ ปโลกธมฺมํ, ชิวฺหาสมฺผสฺโส ปโลกธมฺโม, ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา…เป… ตมฺปิ ปโลกธมฺมํ…เป… มโน ปโลกธมฺโม, ธมฺมา ปโลกธมฺมา, มโนวิญฺญาณํ ปโลกธมฺมํ, มโนสมฺผสฺโส ปโลกธมฺโม, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ปโลกธมฺมํ. ยํ โข, อานนฺท, ปโลกธมฺมํ, อยํ วุจฺจติ อริยสฺส วินเย โลโก’’ติ. ปฐมํ. “भन्ते! 'लोक, लोक' ऐसा कहा जाता है। भन्ते! किस सीमा तक 'लोक' कहा जाता है?” “आनन्द! जो विनाशशील स्वभाव वाला है, उसे आर्य विनय में 'लोक' कहा जाता है। आनन्द! विनाशशील स्वभाव वाला क्या है? आनन्द! चक्षु विनाशशील स्वभाव वाला है, रूप विनाशशील स्वभाव वाले हैं, चक्षु-विज्ञान विनाशशील स्वभाव वाला है, चक्षु-स्पर्श विनाशशील स्वभाव वाला है, चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय से उत्पन्न होने वाली... वह वेदना भी विनाशशील स्वभाव वाली है... जिह्वा विनाशशील स्वभाव वाली है, रस विनाशशील स्वभाव वाले हैं, जिह्वा-विज्ञान विनाशशील स्वभाव वाला है, जिह्वा-स्पर्श विनाशशील स्वभाव वाला है, जिह्वा-स्पर्श के प्रत्यय से उत्पन्न होने वाली... वह वेदना भी विनाशशील स्वभाव वाली है... मन विनाशशील स्वभाव वाला है, धर्म (विषय) विनाशशील स्वभाव वाले हैं, मन-विज्ञान विनाशशील स्वभाव वाला है, मन-स्पर्श विनाशशील स्वभाव वाला है, मन-स्पर्श के प्रत्यय से उत्पन्न होने वाली जो सुखद, दुखद या न-सुख-न-दुखद वेदना है, वह भी विनाशशील स्वभाव वाली है। आनन्द! जो विनाशशील स्वभाव वाला है, उसे आर्य विनय में 'लोक' कहा जाता है।” प्रथम। ๒. สุญฺญตโลกสุตฺตํ २. सुञ्ञतलोक सुत्त ๘๕. อถ [Pg.280] โข อายสฺมา อานนฺโท…เป… ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘‘สุญฺโญ โลโก, สุญฺโญ โลโก’ติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, สุญฺโญ โลโกติ วุจฺจตี’’ติ? ‘‘ยสฺมา จ โข, อานนฺท, สุญฺญํ อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา ตสฺมา สุญฺโญ โลโกติ วุจฺจติ. กิญฺจ, อานนฺท, สุญฺญํ อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา? จกฺขุ โข, อานนฺท, สุญฺญํ อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา. รูปา สุญฺญา อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา, จกฺขุวิญฺญาณํ สุญฺญํ อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา, จกฺขุสมฺผสฺโส สุญฺโญ อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ สุญฺญํ อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา. ยสฺมา จ โข, อานนฺท, สุญฺญํ อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา, ตสฺมา สุญฺโญ โลโกติ วุจฺจตี’’ติ. ทุติยํ. ८५. तब आयुष्मान आनन्द... भगवान् से यह कहा— “भन्ते! 'शून्य लोक, शून्य लोक' ऐसा कहा जाता है। भन्ते! किस सीमा तक 'शून्य लोक' कहा जाता है?” “आनन्द! क्योंकि यह आत्मा से अथवा आत्मीय से शून्य है, इसलिए 'शून्य लोक' कहा जाता है। आनन्द! आत्मा या आत्मीय से शून्य क्या है? आनन्द! चक्षु आत्मा या आत्मीय से शून्य है। रूप आत्मा या आत्मीय से शून्य हैं, चक्षु-विज्ञान आत्मा या आत्मीय से शून्य है, चक्षु-स्पर्श आत्मा या आत्मीय से शून्य है... मन-स्पर्श के प्रत्यय से उत्पन्न होने वाली जो सुखद, दुखद या न-सुख-न-दुखद वेदना है, वह भी आत्मा या आत्मीय से शून्य है। आनन्द! क्योंकि यह आत्मा से अथवा आत्मीय से शून्य है, इसलिए 'शून्य लोक' कहा जाता है।” द्वितीय। ๓. สํขิตฺตธมฺมสุตฺตํ ३. संखित्तधम्म सुत्त ๘๖. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน ธมฺมํ เทเสตุ, ยมหํ ภควโต ธมฺมํ สุตฺวา เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหเรยฺย’’นฺติ. ८६. एक ओर बैठे हुए आयुष्मान आनन्द ने भगवान् से यह कहा— “भन्ते! अच्छा हो यदि भगवान् मुझे संक्षेप में धर्म का उपदेश दें, जिसे सुनकर मैं अकेला, एकांत में, अप्रमत्त, उद्योगी और दृढ़निश्चयी होकर विहार करूँ।” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, อานนฺท, จกฺขุ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “आनन्द! तुम क्या सोचते हो, चक्षु नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य, भन्ते।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “जो अनित्य है, वह दुख है या सुख?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुख, भन्ते।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “जो अनित्य, दुख और विपरिणाम-धर्मी है, क्या उसे ऐसा मानना उचित है— 'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरी आत्मा है'?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नहीं, भन्ते।” ‘‘รูปา นิจฺจา วา อนิจฺจา วา’’ติ? “रूप नित्य हैं या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจา, ภนฺเต’’…เป…. “अनित्य, भन्ते...।”},{ ‘‘จกฺขุวิญฺญาณํ…เป… ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “चक्षु-विज्ञान... (पे)... चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय (कारण) से जो सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, वह नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य है, भन्ते।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःख है, भन्ते।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส [Pg.281] เม อตฺตา’’’ติ? “जो अनित्य, दुःख और विपरिणामधर्मी (परिवर्तनशील) है, क्या उसे ऐसा देखना उचित है— ‘यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है’?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’…เป…. “नहीं, भन्ते! ... (पे) ...” ‘‘ชิวฺหา นิจฺจา วา อนิจฺจา วา’’ติ? “जिह्वा नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจา, ภนฺเต’’…เป…. “अनित्य है, भन्ते! ... (पे) ...” ‘‘ชิวฺหาวิญฺญาณํ… ชิวฺหาสมฺผสฺโส…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “जिह्वा-विज्ञान... जिह्वा-स्पर्श... (पे)... मन-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, वह नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य है, भन्ते।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “जो अनित्य है, क्या वह दुःख है या सुख?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “भन्ते! वह दुःख है।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “जो अनित्य, दुःख और विपरिणामधर्मा (परिवर्तनशील) है, क्या उसे ऐसा देखना उचित है— ‘यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है’?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’…เป…. “भन्ते! ऐसा नहीं है।” ‘‘เอวํ ปสฺสํ, อานนฺท, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. ตติยํ. “आनन्द! इस प्रकार देखते हुए श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षु से भी निर्वेद (वैराग्य) प्राप्त करता है... चक्षु-संपर्श से भी निर्वेद प्राप्त करता है... मन-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदन (अनुभव) उत्पन्न होता है, उससे भी निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद से वह विरक्त होता है; विराग से विमुक्त होता है; विमुक्त होने पर ‘विमुक्त हूँ’ ऐसा ज्ञान होता है। वह जान लेता है— ‘जन्म क्षीण हो गया, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया, जो करना था वह कर लिया गया, अब इसके बाद कुछ और करना शेष नहीं है’।” ๔. ฉนฺนสุตฺตํ ४. ४. छन्न सुत्त ๘๗. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา จ สาริปุตฺโต อายสฺมา จ มหาจุนฺโท อายสฺมา จ ฉนฺโน คิชฺฌกูเฏ ปพฺพเต วิหรนฺติ. เตน โข ปน สมเยน เยน อายสฺมา ฉนฺโน อาพาธิโก โหติ ทุกฺขิโต พาฬฺหคิลาโน. อถ โข อายสฺมา สาริปุตฺโต สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต เยนายสฺมา มหาจุนฺโท เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหาจุนฺทํ เอตทโวจ – ‘‘อายามาวุโส จุนฺท, เยนายสฺมา ฉนฺโน เตนุปสงฺกมิสฺสาม คิลานปุจฺฉกา’’ติ. ‘‘เอวมาวุโส’’ติ โข อายสฺมา มหาจุนฺโท อายสฺมโต สาริปุตฺตสฺส ปจฺจสฺโสสิ. ८७. ८७. एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दक-निवाप में विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान सारिपुत्र, आयुष्मान महाचुन्द और आयुष्मान छन्न गृध्रकूट पर्वत पर विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान छन्न बीमार, दुःखी और गंभीर रूप से अस्वस्थ थे। तब आयुष्मान सारिपुत्र सायंकाल के समय ध्यान (प्रतिसंलयन) से उठकर जहाँ आयुष्मान महाचुन्द थे, वहाँ गए; जाकर आयुष्मान महाचुन्द से यह बोले— ‘आओ आयुष्मान चुन्द, जहाँ आयुष्मान छन्न हैं, वहाँ उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछने (ग्लान-पृच्छक) के लिए चलें।’ आयुष्मान महाचुन्द ने आयुष्मान सारिपुत्र को उत्तर दिया— ‘ठीक है, आयुष्मान’। อถ โข อายสฺมา จ สาริปุตฺโต อายสฺมา จ มหาจุนฺโท เยนายสฺมา ฉนฺโน เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทึสุ. นิสชฺช โข อายสฺมา สาริปุตฺโต อายสฺมนฺตํ ฉนฺนํ เอตทโวจ – ‘‘กจฺจิ เต, อาวุโส ฉนฺน, ขมนียํ, กจฺจิ ยาปนียํ, กจฺจิ ทุกฺขา เวทนา ปฏิกฺกมนฺติ โน อภิกฺกมนฺติ, ปฏิกฺกโมสานํ ปญฺญายติ โน อภิกฺกโม’’ติ? तब आयुष्मान सारिपुत्र और आयुष्मान महाचुन्द जहाँ आयुष्मान छन्न थे, वहाँ गए; जाकर बिछाए हुए आसनों पर बैठ गए। बैठकर आयुष्मान सारिपुत्र ने आयुष्मान छन्न से यह कहा— ‘आयुष्मान छन्न! क्या आप (पीड़ा) सहन कर पा रहे हैं? क्या आपका निर्वाह हो पा रहा है? क्या दुःखद वेदनाएँ घट रही हैं, बढ़ तो नहीं रहीं? क्या उनका घटना दिखाई दे रहा है, बढ़ना नहीं’? ‘‘น เม, อาวุโส สาริปุตฺต, ขมนียํ น ยาปนียํ, พาฬฺหา เม ทุกฺขา เวทนา อภิกฺกมนฺติ โน ปฏิกฺกมนฺติ, อภิกฺกโมสานํ ปญฺญายติ โน ปฏิกฺกโม. เสยฺยถาปิ, อาวุโส, พลวา ปุริโส ติณฺเหน สิขเรน มุทฺธนิ อภิมตฺเถยฺย ; เอวเมว โข, อาวุโส, อธิมตฺตา วาตา มุทฺธนิ อูหนนฺติ. น เม, อาวุโส, ขมนียํ, น ยาปนียํ…เป… โน ปฏิกฺกโม. เสยฺยถาปิ[Pg.282], อาวุโส, พลวา ปุริโส ทฬฺเหน วรตฺตกฺขณฺเฑน สีเส สีสเวฐํ ทเทยฺย; เอวเมว โข, อาวุโส, อธิมตฺตา สีเส สีสเวทนา. น เม, อาวุโส, ขมนียํ, น ยาปนียํ…เป… โน ปฏิกฺกโม. เสยฺยถาปิ, อาวุโส, ทกฺโข โคฆาตโก วา โคฆาตกนฺเตวาสี วา ติณฺเหน โควิกนฺตเนน กุจฺฉึ ปริกนฺเตยฺย; เอวเมว โข อธิมตฺตา วาตา กุจฺฉึ ปริกนฺตนฺติ. น เม, อาวุโส, ขมนียํ, น ยาปนียํ…เป… โน ปฏิกฺกโม. เสยฺยถาปิ, อาวุโส, ทฺเว พลวนฺโต ปุริสา ทุพฺพลตรํ ปุริสํ นานาพาหาสุ คเหตฺวา องฺคารกาสุยา สนฺตาเปยฺยุํ สมฺปริตาเปยฺยุํ; เอวเมว โข, อาวุโส, อธิมตฺโต กายสฺมึ ฑาโห. น เม, อาวุโส, ขมนียํ, น ยาปนียํ, พาฬฺหา เม ทุกฺขา เวทนา อภิกฺกมนฺติ โน ปฏิกฺกมนฺติ, อภิกฺกโมสานํ ปญฺญายติ โน ปฏิกฺกโม. สตฺถํ, อาวุโส สาริปุตฺต, อาหริสฺสามิ, นาวกงฺขามิ ชีวิต’’นฺติ. “आयुष्मान सारिपुत्र! मैं सहन नहीं कर पा रहा हूँ, मेरा निर्वाह नहीं हो पा रहा है। मेरी तीव्र दुःखद वेदनाएँ बढ़ रही हैं, घट नहीं रहीं; उनका बढ़ना ही दिखाई दे रहा है, घटना नहीं। आयुष्मान! जैसे कोई बलवान पुरुष तीक्ष्ण शस्त्र से सिर को मथ डाले, वैसे ही मेरे सिर में अत्यंत तीव्र वायु प्रहार कर रही है। आयुष्मान! मैं सहन नहीं कर पा रहा हूँ... घटना नहीं दिखाई दे रही। आयुष्मान! जैसे कोई बलवान पुरुष मजबूत चमड़े की रस्सी से सिर में पट्टी बाँध दे, वैसे ही मेरे सिर में अत्यंत तीव्र वेदना हो रही है। आयुष्मान! मैं सहन नहीं कर पा रहा हूँ... घटना नहीं दिखाई दे रही। आयुष्मान! जैसे कोई कुशल कसाई या कसाई का शिष्य तीक्ष्ण छुरे से पेट को चीर डाले, वैसे ही अत्यंत तीव्र वायु मेरे पेट को चीर रही है। आयुष्मान! मैं सहन नहीं कर पा रहा हूँ... घटना नहीं दिखाई दे रही। आयुष्मान! जैसे दो बलवान पुरुष एक दुर्बल पुरुष को बाहों से पकड़कर अंगारों की खाई में तपाएँ, वैसे ही मेरे शरीर में अत्यंत तीव्र जलन हो रही है। आयुष्मान! मैं सहन नहीं कर पा रहा हूँ, मेरा निर्वाह नहीं हो पा रहा है। मेरी तीव्र दुःखद वेदनाएँ बढ़ रही हैं, घट नहीं रहीं; उनका बढ़ना ही दिखाई दे रहा है, घटना नहीं। आयुष्मान सारिपुत्र! मैं शस्त्र का प्रयोग करूँगा (आत्महत्या करूँगा), मुझे जीवित रहने की इच्छा नहीं है।” ‘‘มา อายสฺมา ฉนฺโน สตฺถํ อาหเรสิ. ยาเปตายสฺมา ฉนฺโน, ยาเปนฺตํ มยํ อายสฺมนฺตํ ฉนฺนํ อิจฺฉาม. สเจ อายสฺมโต ฉนฺนสฺส นตฺถิ สปฺปายานิ โภชนานิ, อหํ อายสฺมโต ฉนฺนสฺส สปฺปายานิ โภชนานิ ปริเยสิสฺสามิ. สเจ อายสฺมโต ฉนฺนสฺส นตฺถิ สปฺปายานิ เภสชฺชานิ, อหํ อายสฺมโต ฉนฺนสฺส สปฺปายานิ เภสชฺชานิ ปริเยสิสฺสามิ. สเจ อายสฺมโต ฉนฺนสฺส นตฺถิ ปติรูปา อุปฏฺฐากา, อหํ อายสฺมนฺตํ ฉนฺนํ อุปฏฺฐหิสฺสามิ. มา อายสฺมา ฉนฺโน สตฺถํ อาหเรสิ. ยาเปตายสฺมา ฉนฺโน, ยาเปนฺตํ มยํ อายสฺมนฺตํ ฉนฺนํ อิจฺฉามา’’ติ. “आयुष्मान छन्न शस्त्र का प्रयोग न करें। आयुष्मान छन्न जीवन निर्वाह करें, हम चाहते हैं कि आयुष्मान छन्न जीवित रहें। यदि आयुष्मान छन्न के पास उचित भोजन नहीं है, तो मैं आयुष्मान छन्न के लिए उचित भोजन ढूँढूँगा। यदि आयुष्मान छन्न के पास उचित औषधियाँ नहीं हैं, तो मैं आयुष्मान छन्न के लिए उचित औषधियाँ ढूँढूँगा। यदि आयुष्मान छन्न के पास योग्य परिचारक (सेवा करने वाले) नहीं हैं, तो मैं आयुष्मान छन्न की सेवा करूँगा। आयुष्मान छन्न शस्त्र का प्रयोग न करें। आयुष्मान छन्न जीवन निर्वाह करें, हम चाहते हैं कि आयुष्मान छन्न जीवित रहें।” ‘‘น เม, อาวุโส สาริปุตฺต, นตฺถิ สปฺปายานิ โภชนานิ; อตฺถิ เม สปฺปายานิ โภชนานิ. นปิ เม นตฺถิ สปฺปายานิ เภสชฺชานิ; อตฺถิ เม สปฺปายานิ เภสชฺชานิ. นปิ เม นตฺถิ ปติรูปา อุปฏฺฐากา; อตฺถิ เม ปติรูปา อุปฏฺฐากา. อปิ จ เม, อาวุโส, สตฺถา ปริจิณฺโณ ทีฆรตฺตํ มนาเปเนว, โน อมนาเปน. เอตญฺหิ, อาวุโส, สาวกสฺส ปติรูปํ ยํ สตฺถารํ ปริจเรยฺย มนาเปเนว, โน อมนาเปน. ‘อนุปวชฺชํ ฉนฺโน ภิกฺขุ สตฺถํ อาหริสฺสตี’ติ – เอวเมตํ, อาวุโส สาริปุตฺต, ธาเรหี’’ติ. “आयुष्मान सारिपुत्र! ऐसा नहीं है कि मेरे पास उचित भोजन नहीं है; मेरे पास उचित भोजन है। ऐसा भी नहीं है कि मेरे पास उचित औषधियाँ नहीं हैं; मेरे पास उचित औषधियाँ हैं। ऐसा भी नहीं है कि मेरे पास योग्य परिचारक नहीं हैं; मेरे पास योग्य परिचारक हैं। और आयुष्मान! मैंने दीर्घकाल तक शास्ता (बुद्ध) की सेवा प्रिय भाव से की है, अप्रिय भाव से नहीं। आयुष्मान! शिष्य के लिए यही उचित है कि वह शास्ता की सेवा प्रिय भाव से करे, अप्रिय भाव से नहीं। आयुष्मान सारिपुत्र! इसे इस प्रकार याद रखें— ‘भिक्षु छन्न निर्दोष (अनुपवज्ज) होकर शस्त्र का प्रयोग करेगा’।” ‘‘ปุจฺเฉยฺยาม [Pg.283] มยํ อายสฺมนฺตํ ฉนฺนํ กญฺจิเทว เทสํ, สเจ อายสฺมา ฉนฺโน โอกาสํ กโรติ ปญฺหสฺส เวยฺยากรณายา’’ติ. ‘‘ปุจฺฉาวุโส สาริปุตฺต, สุตฺวา เวทิสฺสามา’’ติ. “यदि आयुष्मान छन्न प्रश्न का उत्तर देने का अवसर दें, तो हम आयुष्मान छन्न से कुछ पूछना चाहेंगे।” “आयुष्मान सारिपुत्र! पूछें, सुनकर हम जानेंगे।” ‘‘จกฺขุํ, อาวุโส ฉนฺน, จกฺขุวิญฺญาณํ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสิ…เป… ชิวฺหํ, อาวุโส ฉนฺน, ชิวฺหาวิญฺญาณํ ชิวฺหาวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสิ…เป… มนํ, อาวุโส ฉนฺน, มโนวิญฺญาณํ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสี’’ติ? “आयुष्मान छन्न! क्या तुम चक्षु (आँख), चक्षु-विज्ञान और चक्षु-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्मों (विषयों) को ‘यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है’—इस प्रकार देखते हो? ... आयुष्मान छन्न! क्या तुम जिह्वा (जीभ), जिह्वा-विज्ञान और जिह्वा-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्मों को ‘यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है’—इस प्रकार देखते हो? ... आयुष्मान छन्न! क्या तुम मन, मनो-विज्ञान और मनो-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्मों को ‘यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है’—इस प्रकार देखते हो?” ‘‘จกฺขุํ, อาวุโส สาริปุตฺต, จกฺขุวิญฺญาณํ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสามิ…เป… ชิวฺหํ, อาวุโส สาริปุตฺต, ชิวฺหาวิญฺญาณํ ชิวฺหาวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสามิ…เป… มนํ, อาวุโส สาริปุตฺต, มโนวิญฺญาณํ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสามี’’ติ. “आयुष्मान सारिपुत्र! मैं चक्षु, चक्षु-विज्ञान और चक्षु-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्मों को ‘यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है’—इस प्रकार देखता हूँ। ... आयुष्मान सारिपुत्र! मैं जिह्वा, जिह्वा-विज्ञान और जिह्वा-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्मों को ‘यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है’—इस प्रकार देखता हूँ। ... आयुष्मान सारिपुत्र! मैं मन, मनो-विज्ञान और मनो-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्मों को ‘यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है’—इस प्रकार देखता हूँ।” ‘‘จกฺขุสฺมึ, อาวุโส ฉนฺน, จกฺขุวิญฺญาเณ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพสุ ธมฺเมสุ กึ ทิสฺวา กึ อภิญฺญาย จกฺขุํ จกฺขุวิญฺญาณํ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสิ… ชิวฺหาย, อาวุโส ฉนฺน, ชิวฺหาวิญฺญาเณ ชิวฺหาวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพสุ ธมฺเมสุ กึ ทิสฺวา กึ อภิญฺญาย ชิวฺหํ ชิวฺหาวิญฺญาณํ ชิวฺหาวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสิ… มนสฺมึ, อาวุโส ฉนฺน, มโนวิญฺญาเณ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพสุ ธมฺเมสุ กึ ทิสฺวา กึ อภิญฺญาย มนํ มโนวิญฺญาณํ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสสี’’ติ? “आयुष्मान छन्न! चक्षु में, चक्षु-विज्ञान में और चक्षु-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्मों में क्या देखकर, क्या जानकर तुम चक्षु, चक्षु-विज्ञान और चक्षु-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्मों को ‘यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है’—इस प्रकार देखते हो? ... आयुष्मान छन्न! जिह्वा में, जिह्वा-विज्ञान में और जिह्वा-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्मों में क्या देखकर, क्या जानकर तुम जिह्वा, जिह्वा-विज्ञान और जिह्वा-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्मों को ‘यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है’—इस प्रकार देखते हो? ... आयुष्मान छन्न! मन में, मनो-विज्ञान में और मनो-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्मों में क्या देखकर, क्या जानकर तुम मन, मनो-विज्ञान और मनो-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्मों को ‘यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है’—इस प्रकार देखते हो?” ‘‘จกฺขุสฺมึ, อาวุโส สาริปุตฺต, จกฺขุวิญฺญาเณ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพสุ ธมฺเมสุ นิโรธํ ทิสฺวา นิโรธํ อภิญฺญาย จกฺขุํ จกฺขุวิญฺญาณํ จกฺขุวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ [Pg.284] สมนุปสฺสามิ…เป… ชิวฺหาย, อาวุโส สาริปุตฺต, ชิวฺหาวิญฺญาเณ ชิวฺหาวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพสุ ธมฺเมสุ นิโรธํ ทิสฺวา นิโรธํ อภิญฺญาย ชิวฺหํ ชิวฺหาวิญฺญาณํ ชิวฺหาวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสามิ…เป… มนสฺมึ, อาวุโส สาริปุตฺต, มโนวิญฺญาเณ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพสุ ธมฺเมสุ นิโรธํ ทิสฺวา นิโรธํ อภิญฺญาย มนํ มโนวิญฺญาณํ มโนวิญฺญาณวิญฺญาตพฺเพ ธมฺเม ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสามี’’ติ. “आयुष्मान सारिपुत्र! चक्षु में, चक्षु-विज्ञान में और चक्षु-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्मों में निरोध (समाप्ति) को देखकर, निरोध को जानकर मैं चक्षु, चक्षु-विज्ञान और चक्षु-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्मों को ‘यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है’—इस प्रकार देखता हूँ। ... आयुष्मान सारिपुत्र! जिह्वा में, जिह्वा-विज्ञान में और जिह्वा-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्मों में निरोध को देखकर, निरोध को जानकर मैं जिह्वा, जिह्वा-विज्ञान और जिह्वा-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्मों को ‘यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है’—इस प्रकार देखता हूँ। ... आयुष्मान सारिपुत्र! मन में, मनो-विज्ञान में और मनो-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्मों में निरोध को देखकर, निरोध को जानकर मैं मन, मनो-विज्ञान और मनो-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्मों को ‘यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है’—इस प्रकार देखता हूँ।” เอวํ วุตฺเต, อายสฺมา มหาจุนฺโท อายสฺมนฺตํ ฉนฺนํ เอตทโวจ – ‘‘ตสฺมาติห, อาวุโส ฉนฺน, อิทมฺปิ ตสฺส ภควโต สาสนํ นิจฺจกปฺปํ สาธุกํ มนสิ กาตพฺพํ – ‘นิสฺสิตสฺส จลิตํ, อนิสฺสิตสฺส จลิตํ นตฺถิ. จลิเต อสติ ปสฺสทฺธิ โหติ. ปสฺสทฺธิยา สติ นติ น โหติ. นติยา อสติ อาคติคติ น โหติ. อาคติคติยา อสติ จุตูปปาโต น โหติ. จุตูปปาเต อสติ เนวิธ น หุรํ น อุภยมนฺตเรน. เอเสวนฺโต ทุกฺขสฺสา’’’ติ. ऐसा कहे जाने पर, आयुष्मान महाचुन्द ने आयुष्मान छन्न से यह कहा— “इसलिए, आयुष्मान छन्न! भगवान के इस उपदेश को भी सदा अच्छी तरह मन में धारण करना चाहिए— ‘जो आश्रित है, उसमें चंचलता होती है; जो अनाश्रित है, उसमें चंचलता नहीं होती। चंचलता न होने पर शांति (प्रश्रब्धि) होती है। शांति होने पर (तृष्णा रूपी) झुकाव नहीं होता। झुकाव न होने पर आना-जाना (आगति-गति) नहीं होता। आना-जाना न होने पर मृत्यु और पुनर्जन्म (च्युति-उपपत्ति) नहीं होती। मृत्यु और पुनर्जन्म न होने पर न यहाँ, न वहाँ, न दोनों के बीच कुछ होता है। यही दुखों का अंत है’।” อถ โข อายสฺมา จ สาริปุตฺโต อายสฺมา จ มหาจุนฺโท อายสฺมนฺตํ ฉนฺนํ อิมินา โอวาเทน โอวทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกมึสุ. อถ โข อายสฺมา ฉนฺโน อจิรปกฺกนฺเตสุ เตสุ อายสฺมนฺเตสุ สตฺถํ อาหเรสิ. तब आयुष्मान सारिपुत्र और आयुष्मान महाचुन्द आयुष्मान छन्न को यह उपदेश देकर आसन से उठकर चले गए। उन आयुष्मन्तों के जाने के कुछ ही समय बाद, आयुष्मान छन्न ने शस्त्र का प्रयोग किया (आत्महत्या कर ली)। อถ โข อายสฺมา สาริปุตฺโต เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา สาริปุตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อายสฺมตา, ภนฺเต, ฉนฺเนน สตฺถํ อาหริตํ. ตสฺส กา คติ โก อภิสมฺปราโย’’ติ? ‘‘นนุ เต, สาริปุตฺต, ฉนฺเนน ภิกฺขุนา สมฺมุขาเยว อนุปวชฺชตา พฺยากตา’’ติ? ‘‘อตฺถิ, ภนฺเต, ปุพฺพวิชฺชนํ นาม วชฺชิคาโม. ตตฺถายสฺมโต ฉนฺนสฺส มิตฺตกุลานิ สุหชฺชกุลานิ อุปวชฺชกุลานี’’ติ. ‘‘โหนฺติ เหเต, สาริปุตฺต, ฉนฺนสฺส ภิกฺขุโน มิตฺตกุลานิ สุหชฺชกุลานิ อุปวชฺชกุลานิ. น โข ปนาหํ, สาริปุตฺต, เอตฺตาวตา สอุปวชฺโชติ วทามิ. โย โข, สาริปุตฺต, ตญฺจ กายํ นิกฺขิปติ, อญฺญญฺจ กายํ อุปาทิยติ, ตมหํ สอุปวชฺโชติ วทามิ. ตํ ฉนฺนสฺส ภิกฺขุโน นตฺถิ. ‘อนุปวชฺชํ ฉนฺเนน ภิกฺขุนา สตฺถํ อาหริต’นฺติ – เอวเมตํ, สาริปุตฺต, ธาเรหี’’ติ. จตุตฺถํ. तब आयुष्मान सारिपुत्र जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान सारिपुत्र ने भगवान से यह कहा— “भन्ते! आयुष्मान छन्न ने शस्त्र का प्रयोग किया है। उनकी गति क्या है, उनका परलोक क्या है?” “सारिपुत्र! क्या भिक्षु छन्न ने तुम्हारे सामने ही अपनी पुनर्जन्म-रहित अवस्था (अनुपवज्जता) की घोषणा नहीं की थी?” “भन्ते! पुब्बविज्जन नामक एक वज्जि ग्राम है। वहाँ आयुष्मान छन्न के मित्र-कुल, सुहृद-कुल और परिचित परिवार (उपवज्ज-कुल) हैं।” “सारिपुत्र! भिक्षु छन्न के वे मित्र-कुल, सुहृद-कुल और परिचित परिवार भले ही हों, किन्तु सारिपुत्र! मैं इतने मात्र से किसी को ‘स-उपवज्ज’ (पुनर्जन्म के बंधन युक्त) नहीं कहता। सारिपुत्र! जो इस शरीर को छोड़ता है और दूसरे शरीर को ग्रहण करता है, उसे मैं ‘स-उपवज्ज’ कहता हूँ। भिक्षु छन्न के लिए वैसा नहीं है। भिक्षु छन्न ने पुनर्जन्म-रहित होकर शस्त्र का प्रयोग किया है—सारिपुत्र! ऐसा ही तुम धारण करो।” चतुर्थ। ๕. ปุณฺณสุตฺตํ ५. ५. पुण्ण सुत्त ๘๘. อถ [Pg.285] โข อายสฺมา ปุณฺโณ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา ปุณฺโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน ธมฺมํ เทเสตุ, ยมหํ ภควโต ธมฺมํ สุตฺวา เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหเรยฺย’’นฺติ. ८८. तब आयुष्मान पुण्ण जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर... एक ओर बैठे हुए आयुष्मान पुण्ण ने भगवान से यह कहा— “भन्ते! अच्छा हो यदि भगवान मुझे संक्षेप में धर्म का उपदेश दें, जिसे सुनकर मैं अकेला, एकांतवासी, अप्रमादी, उद्योगी और दृढ़-संकल्पी होकर विहार कर सकूँ।” ‘‘สนฺติ โข, ปุณฺณ, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต อุปฺปชฺชติ นนฺที. ‘นนฺทิสมุทยา ทุกฺขสมุทโย, ปุณฺณา’ติ วทามิ…เป… สนฺติ โข, ปุณฺณ, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ โข, ปุณฺณ, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต อุปฺปชฺชติ นนฺที. ‘นนฺทิสมุทยา ทุกฺขสมุทโย, ปุณฺณา’ติ วทามิ. “पुण! चक्षु-विज्ञेय (आँखों से जानने योग्य) ऐसे रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। यदि कोई भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है, तो उसे नंदी (आसक्ति) उत्पन्न होती है। पुण! मैं कहता हूँ कि ‘नंदि के उदय से दुःख का उदय होता है’... पुण! जिह्वा-विज्ञेय रस हैं... पुण! मन-विज्ञेय ऐसे धर्म हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। यदि कोई भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है, तो उसे नंदि उत्पन्न होती है। पुण! मैं कहता हूँ कि ‘नंदि के उदय से दुःख का उदय होता है’।” ‘‘สนฺติ โข, ปุณฺณ, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ, ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต นิรุชฺฌติ นนฺที. ‘นนฺทินิโรธา ทุกฺขนิโรโธ, ปุณฺณา’ติ วทามิ…เป… สนฺติ โข, ปุณฺณ, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ, ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต นิรุชฺฌติ นนฺที. ‘นนฺทินิโรธา ทุกฺขนิโรโธ, ปุณฺณา’ติ วทามิ. “पुण! चक्षु-विज्ञेय ऐसे रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। यदि कोई भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता, उनका स्वागत नहीं करता और उनमें आसक्त होकर स्थित नहीं रहता, तो उसकी नंदि निरुद्ध हो जाती है। पुण! मैं कहता हूँ कि ‘नंदि के निरोध से दुःख का निरोध होता है’... पुण! मन-विज्ञेय ऐसे धर्म हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। यदि कोई भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता, उनका स्वागत नहीं करता और उनमें आसक्त होकर स्थित नहीं रहता, तो उसकी नंदि निरुद्ध हो जाती है। पुण! मैं कहता हूँ कि ‘नंदि के निरोध से दुःख का निरोध होता है’।” ‘‘อิมินา ตฺวํ, ปุณฺณ, มยา สํขิตฺเตน โอวาเทน โอวทิโต กตมสฺมึ ชนปเท วิหริสฺสสี’’ติ? ‘‘อตฺถิ, ภนฺเต, สุนาปรนฺโต นาม ชนปโท, ตตฺถาหํ วิหริสฺสามี’’ติ. “पुण! मेरे द्वारा इस संक्षिप्त उपदेश से उपदिष्ट होकर तुम किस जनपद में विहार करोगे?” “भन्ते! सुनापरान्त नामक एक जनपद है, मैं वहाँ विहार करूँगा।” ‘‘จณฺฑา โข, ปุณฺณ, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา; ผรุสา โข, ปุณฺณ, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา. สเจ ตํ, ปุณฺณ, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา อกฺโกสิสฺสนฺติ ปริภาสิสฺสนฺติ, ตตฺร เต, ปุณฺณ, กินฺติ ภวิสฺสตี’’ติ? “पुण! सुनापरान्त के मनुष्य चण्ड (क्रूर) हैं; पुण! सुनापरान्त के मनुष्य परुष (कठोर) हैं। पुण! यदि सुनापरान्त के मनुष्य तुम्हें गाली दें, तुम्हें अपशब्द कहें, तो वहाँ तुम्हें कैसा विचार होगा?” ‘‘สเจ มํ, ภนฺเต, สุนาปรนฺตกา [Pg.286] มนุสฺสา อกฺโกสิสฺสนฺติ ปริภาสิสฺสนฺติ, ตตฺร เม เอวํ ภวิสฺสติ – ‘ภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, สุภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, ยํ เม นยิเม ปาณินา ปหารํ เทนฺตี’ติ. เอวเมตฺถ, ภควา, ภวิสฺสติ; เอวเมตฺถ, สุคต, ภวิสฺสตี’’ติ. “भन्ते! यदि सुनापरान्त के मनुष्य मुझे गाली दें, अपशब्द कहें, तो वहाँ मुझे ऐसा विचार होगा— ‘ये सुनापरान्त के मनुष्य वास्तव में भले हैं, ये सुनापरान्त के मनुष्य बहुत भले हैं, जो ये मुझे हाथ के प्रहार नहीं मारते।’ भगवान्! वहाँ मुझे ऐसा विचार होगा; सुगत! वहाँ मुझे ऐसा विचार होगा।” ‘‘สเจ ปน เต, ปุณฺณ, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา ปาณินา ปหารํ ทสฺสนฺติ, ตตฺร ปน เต, ปุณฺณ, กินฺติ ภวิสฺสตี’’ติ? “पुण! यदि सुनापरान्त के मनुष्य तुम्हें हाथ से प्रहार करें, तो वहाँ तुम्हें कैसा विचार होगा?” ‘‘สเจ เม, ภนฺเต, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา ปาณินา ปหารํ ทสฺสนฺติ, ตตฺร เม เอวํ ภวิสฺสติ – ‘ภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, สุภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, ยํ เม นยิเม เลฑฺฑุนา ปหารํ เทนฺตี’ติ. เอวเมตฺถ, ภควา, ภวิสฺสติ; เอวเมตฺถ, สุคต, ภวิสฺสตี’’ติ. “भन्ते! यदि सुनापरान्त के मनुष्य मुझे हाथ से प्रहार करें, तो वहाँ मुझे ऐसा विचार होगा— ‘ये सुनापरान्त के मनुष्य वास्तव में भले हैं, ये सुनापरान्त के मनुष्य बहुत भले हैं, जो ये मुझे ढेले से नहीं मारते।’ भगवान्! वहाँ मुझे ऐसा विचार होगा; सुगत! वहाँ मुझे ऐसा विचार होगा।” ‘‘สเจ ปน เต, ปุณฺณ, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา เลฑฺฑุนา ปหารํ ทสฺสนฺติ, ตตฺร ปน เต, ปุณฺณ, กินฺติ ภวิสฺสตี’’ติ? “पुण! यदि सुनापरान्त के मनुष्य तुम्हें ढेले से मारें, तो वहाँ तुम्हें कैसा विचार होगा?” ‘‘สเจ เม, ภนฺเต, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา เลฑฺฑุนา ปหารํ ทสฺสนฺติ, ตตฺร เม เอวํ ภวิสฺสติ – ‘ภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, สุภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, ยํ เม นยิเม ทณฺเฑน ปหารํ เทนฺตี’ติ. เอวเมตฺถ, ภควา, ภวิสฺสติ; เอวเมตฺถ, สุคต, ภวิสฺสตี’’ติ. “भन्ते! यदि सुनापरान्त के मनुष्य मुझे ढेले से मारें, तो वहाँ मुझे ऐसा विचार होगा— ‘ये सुनापरान्त के मनुष्य वास्तव में भले हैं, ये सुनापरान्त के मनुष्य बहुत भले हैं, जो ये मुझे डंडे से नहीं मारते।’ भगवान्! वहाँ मुझे ऐसा विचार होगा; सुगत! वहाँ मुझे ऐसा विचार होगा।” ‘‘สเจ ปน ปุณฺณ, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา ทณฺเฑน ปหารํ ทสฺสนฺติ, ตตฺร ปน เต, ปุณฺณ, กินฺติ ภวิสฺสตี’’ติ? “पुण! यदि सुनापरान्त के मनुष्य तुम्हें डंडे से मारें, तो वहाँ तुम्हें कैसा विचार होगा?” ‘‘สเจ เม, ภนฺเต, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา ทณฺเฑน ปหารํ ทสฺสนฺติ, ตตฺร เม เอวํ ภวิสฺสติ – ‘ภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, สุภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, ยํ เม นยิเม สตฺเถน ปหารํ เทนฺตี’ติ. เอวเมตฺถ, ภควา, ภวิสฺสติ; เอวเมตฺถ, สุคต, ภวิสฺสตี’’ติ. “भन्ते! यदि सुनापरान्त के मनुष्य मुझे डंडे से मारें, तो वहाँ मुझे ऐसा विचार होगा— ‘ये सुनापरान्त के मनुष्य वास्तव में भले हैं, ये सुनापरान्त के मनुष्य बहुत भले हैं, जो ये मुझे शस्त्र से नहीं मारते।’ भगवान्! वहाँ मुझे ऐसा विचार होगा; सुगत! वहाँ मुझे ऐसा विचार होगा।” ‘‘สเจ ปน เต, ปุณฺณ, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา สตฺเถน ปหารํ ทสฺสนฺติ, ตตฺร ปน เต, ปุณฺณ, กินฺติ ภวิสฺสตี’’ติ? “पुण! यदि सुनापरान्त के मनुष्य तुम्हें शस्त्र से मारें, तो वहाँ तुम्हें कैसा विचार होगा?” ‘‘สเจ เม, ภนฺเต, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา สตฺเถน ปหารํ ทสฺสนฺติ, ตตฺร เม เอวํ ภวิสฺสติ – ‘ภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, สุภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, ยํ มํ นยิเม ติณฺเหน สตฺเถน ชีวิตา โวโรเปนฺตี’ติ. เอวเมตฺถ, ภควา, ภวิสฺสติ; เอวเมตฺถ, สุคต, ภวิสฺสตี’’ติ. “भन्ते! यदि सुनापरान्त के मनुष्य मुझे शस्त्र से मारें, तो वहाँ मुझे ऐसा विचार होगा— ‘ये सुनापरान्त के मनुष्य वास्तव में भले हैं, ये सुनापरान्त के मनुष्य बहुत भले हैं, जो ये मुझे तीक्ष्ण शस्त्र से प्राणों से वंचित नहीं करते।’ भगवान्! वहाँ मुझे ऐसा विचार होगा; सुगत! वहाँ मुझे ऐसा विचार होगा।” ‘‘สเจ [Pg.287] ปน ตํ, ปุณฺณ, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา ติณฺเหน สตฺเถน ชีวิตา โวโรเปสฺสนฺติ, ตตฺร ปน เต, ปุณฺณ, กินฺติ ภวิสฺสตี’’ติ? “पुण! यदि सुनापरान्त के मनुष्य तुम्हें तीक्ष्ण शस्त्र से प्राणों से वंचित कर दें, तो वहाँ तुम्हें कैसा विचार होगा?” ‘‘สเจ มํ, ภนฺเต, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา ติณฺเหน สตฺเถน ชีวิตา โวโรเปสฺสนฺติ, ตตฺร เม เอวํ ภวิสฺสติ – ‘สนฺติ โข ตสฺส ภควโต สาวกา กาเยน จ ชีวิเตน จ อฏฺฏียมานา หรายมานา ชิคุจฺฉมานา สตฺถหารกํ ปริเยสนฺติ, ตํ เม อิทํ อปริยิฏฺฐญฺเญว สตฺถหารกํ ลทฺธ’นฺติ. เอวเมตฺถ, ภควา, ภวิสฺสติ; เอวเมตฺถ, สุคต, ภวิสฺสตี’’ติ. “भन्ते! यदि सुनापरान्त के मनुष्य मुझे तीक्ष्ण शस्त्र से प्राणों से वंचित कर दें, तो वहाँ मुझे ऐसा विचार होगा— ‘उस भगवान् के ऐसे श्रावक भी हैं जो शरीर और जीवन से पीड़ित, लज्जित और घृणा करते हुए प्राण लेने वाले शस्त्र को खोजते हैं; मुझे तो वह प्राण लेने वाला शस्त्र बिना खोजे ही मिल गया।’ भगवान्! वहाँ मुझे ऐसा विचार होगा; सुगत! वहाँ मुझे ऐसा विचार होगा।” ‘‘สาธุ สาธุ, ปุณฺณ! สกฺขิสฺสสิ โข ตฺวํ, ปุณฺณ, อิมินา ทมูปสเมน สมนฺนาคโต สุนาปรนฺตสฺมึ ชนปเท วตฺถุํ. ยสฺส ทานิ ตฺวํ, ปุณฺณ, กาลํ มญฺญสี’’ติ. “साधु! साधु! पुण! तुम इस दम-उपशम (इन्द्रिय संयम और शांति) से युक्त होकर सुनापरान्त जनपद में रहने में समर्थ होगे। पुण! अब तुम जिसका समय समझो (प्रस्थान करो)।” อถ โข อายสฺมา ปุณฺโณ ภควโต วจนํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา เสนาสนํ สํสาเมตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย เยน สุนาปรนฺโต ชนปโท เตน จาริกํ ปกฺกามิ. อนุปุพฺเพน จาริกํ จรมาโน เยน สุนาปรนฺโต ชนปโท ตทวสริ. ตตฺร สุทํ อายสฺมา ปุณฺโณ สุนาปรนฺตสฺมึ ชนปเท วิหรติ. อถ โข อายสฺมา ปุณฺโณ เตเนวนฺตรวสฺเสน ปญฺจมตฺตานิ อุปาสกสตานิ ปฏิเวเทสิ. เตเนวนฺตรวสฺเสน ปญฺจมตฺตานิ อุปาสิกาสตานิ ปฏิเวเทสิ. เตเนวนฺตรวสฺเสน ติสฺโส วิชฺชา สจฺฉากาสิ. เตเนวนฺตรวสฺเสน ปรินิพฺพายิ. तब आयुष्मान पुण्ण भगवान के वचनों का अभिनन्दन और अनुमोदन कर, आसन से उठकर, भगवान को अभिवादन कर और प्रदक्षिणा कर, अपने शयनासन को व्यवस्थित कर, पात्र और चीवर लेकर जहाँ सुनापरान्त जनपद था, वहाँ चारिका के लिए निकल पड़े। क्रमशः चारिका करते हुए वे सुनापरान्त जनपद पहुँचे। वहाँ आयुष्मान पुण्ण सुनापरान्त जनपद में विहार करने लगे। तब आयुष्मान पुण्ण ने उसी वर्षावास के भीतर पाँच सौ उपासकों को सत्य का बोध कराया। उसी वर्षावास के भीतर पाँच सौ उपासिकाओं को सत्य का बोध कराया। उसी वर्षावास के भीतर तीनों विद्याओं का साक्षात्कार किया। उसी वर्षावास के भीतर वे परिनिर्वाण को प्राप्त हुए। อถ โข สมฺพหุลา ภิกฺขู เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘โย โส, ภนฺเต, ปุณฺโณ นาม กุลปุตฺโต ภควตา สํขิตฺเตน โอวาเทน โอวทิโต, โส กาลงฺกโต. ตสฺส กา คติ โก อภิสมฺปราโย’’ติ? तब बहुत से भिक्षु जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे... एक ओर बैठे हुए उन भिक्षुओं ने भगवान से यह कहा— "भन्ते! पुण्ण नाम का वह कुलपुत्र, जिसे भगवान ने संक्षिप्त उपदेश से अनुशासित किया था, वह काल कर गया है। उसकी गति क्या है, उसका परलोक क्या है?" ‘‘ปณฺฑิโต, ภิกฺขเว, ปุณฺโณ กุลปุตฺโต, ปจฺจปาทิ ธมฺมสฺสานุธมฺมํ, น จ มํ ธมฺมาธิกรณํ วิเหเสสิ. ปรินิพฺพุโต, ภิกฺขเว, ปุณฺโณ กุลปุตฺโต’’ติ. ปญฺจมํ. "भिक्षुओं! पुण्ण कुलपुत्र पण्डित था, उसने धर्म के अनुकूल धर्म का आचरण किया और धर्म के कारण मुझे कष्ट नहीं दिया। भिक्षुओं! पुण्ण कुलपुत्र परिनिर्वाण को प्राप्त हो गया है।" पाँचवाँ (सूत्र)। ๖. พาหิยสุตฺตํ ६. बाहिय सुत्त। ๘๙. อถ [Pg.288] โข อายสฺมา พาหิโย เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา พาหิโย ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน ธมฺมํ เทเสตุ, ยมหํ ภควโต ธมฺมํ สุตฺวา เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหเรยฺย’’นฺติ. ८९. तब आयुष्मान बाहिय जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे... एक ओर बैठे हुए आयुष्मान बाहिय ने भगवान से यह कहा— "भन्ते! अच्छा हो यदि भगवान मुझे संक्षेप में धर्म का उपदेश दें, जिसे सुनकर मैं अकेला, एकांत में, अप्रमत्त, उद्योगी और दृढ़निश्चयी होकर विहार कर सकूँ।" ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, พาหิย, จกฺขุ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? "बाहिय! तुम क्या मानते हो, चक्षु नित्य है या अनित्य?" ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. "भन्ते! अनित्य है।" ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? "जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?" ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. "भन्ते! दुःख है।" ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? "जो अनित्य, दुःख और परिवर्तनशील है, क्या उसे ऐसा देखना उचित है— 'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है'?" ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "भन्ते! ऐसा नहीं।" ‘‘รูปา นิจฺจา วา อนิจฺจา วา’’ติ? "रूप नित्य हैं या अनित्य?" ‘‘อนิจฺจา, ภนฺเต’’…เป… จกฺขุวิญฺญาณํ…เป… จกฺขุสมฺผสฺโส…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? "भन्ते! अनित्य हैं।" ... "चक्षु-विज्ञान... चक्षु-स्पर्श... मन-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह नित्य है या अनित्य?" ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. "भन्ते! अनित्य है।" ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? "जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?" ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. "भन्ते! दुःख है।" ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? "जो अनित्य, दुःख और परिवर्तनशील है, क्या उसे ऐसा देखना उचित है— 'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है'?" ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "भन्ते! ऐसा नहीं।" ‘‘เอวํ ปสฺสํ, พาหิย, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. "बाहिय! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक चक्षु से भी निर्वेद प्राप्त करता है, रूपों से भी निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-विज्ञान से भी निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-स्पर्श से भी निर्वेद प्राप्त करता है... मन-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, उससे भी निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद होने पर वह विरक्त होता है; विरक्ति से वह मुक्त होता है; मुक्त होने पर 'मैं मुक्त हूँ' ऐसा ज्ञान होता है। वह जान लेता है— 'जन्म क्षीण हो गया, ब्रह्मचर्य पूर्ण हुआ, जो करना था वह कर लिया गया, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है'।" อถ โข อายสฺมา พาหิโย ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. อถ โข อายสฺมา พาหิโย เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรนฺโต นจิรสฺเสว – ยสฺสตฺถาย กุลปุตฺตา สมฺมเทว อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชนฺติ ตทนุตฺตรํ – พฺรหฺมจริยปริโยสานํ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหาสิ. ‘‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’’ติ อพฺภญฺญาสิ. อญฺญตโร จ ปนายสฺมา พาหิโย อรหตํ อโหสีติ. ฉฏฺฐํ. तब आयुष्मान बाहिय भगवान के भाषण का अभिनन्दन और अनुमोदन कर, आसन से उठकर, भगवान को अभिवादन कर और प्रदक्षिणा कर चले गए। तब आयुष्मान बाहिय अकेले, एकांत में, अप्रमत्त, उद्योगी और दृढ़निश्चयी होकर विहार करते हुए शीघ्र ही—जिसके लिए कुलपुत्र सम्यक प्रकार से घर से बेघर होकर प्रव्रजित होते हैं—उस अनुत्तर ब्रह्मचर्य की पूर्णता (अर्हत्व) का इसी जन्म में स्वयं अभिज्ञा से साक्षात्कार कर, उसे प्राप्त कर विहार करने लगे। उन्होंने जान लिया— "जन्म क्षीण हो गया, ब्रह्मचर्य पूर्ण हुआ, जो करना था वह कर लिया गया, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है।" और आयुष्मान बाहिय अर्हन्तों में से एक हुए। छठा (सूत्र)। ๗. ปฐมเอชาสุตฺตํ ७. प्रथम एजा सुत्त। ๙๐. ‘‘เอชา[Pg.289], ภิกฺขเว, โรโค, เอชา คณฺโฑ, เอชา สลฺลํ. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ตถาคโต อเนโช วิหรติ วีตสลฺโล. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เจปิ อากงฺเขยฺย ‘อเนโช วิหเรยฺยํ วีตสลฺโล’ติ, จกฺขุํ น มญฺเญยฺย, จกฺขุสฺมึ น มญฺเญยฺย, จกฺขุโต น มญฺเญยฺย, จกฺขุ เมติ น มญฺเญยฺย; รูเป น มญฺเญยฺย, รูเปสุ น มญฺเญยฺย, รูปโต น มญฺเญยฺย, รูปา เมติ น มญฺเญยฺย; จกฺขุวิญฺญาณํ น มญฺเญยฺย, จกฺขุวิญฺญาณสฺมึ น มญฺเญยฺย, จกฺขุวิญฺญาณโต น มญฺเญยฺย, จกฺขุวิญฺญาณํ เมติ น มญฺเญยฺย; จกฺขุสมฺผสฺสํ น มญฺเญยฺย, จกฺขุสมฺผสฺสสฺมึ น มญฺเญยฺย, จกฺขุสมฺผสฺสโต น มญฺเญยฺย, จกฺขุสมฺผสฺโส เมติ น มญฺเญยฺย. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตสฺมิมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตโตปิ น มญฺเญยฺย, ตํ เมติ น มญฺเญยฺย. ९०. "भिक्षुओं! एजा (तृष्णा) रोग है, एजा फोड़ा है, एजा शल्य (काँटा) है। इसलिए भिक्षुओं! तथागत एजा-रहित और शल्य-रहित होकर विहार करते हैं। इसलिए भिक्षुओं! यदि भिक्षु ऐसी इच्छा करे कि 'मैं एजा-रहित और शल्य-रहित होकर विहार करूँ', तो वह चक्षु के विषय में कल्पना न करे, चक्षु में कल्पना न करे, चक्षु से कल्पना न करे, 'चक्षु मेरा है' ऐसी कल्पना न करे; रूपों के विषय में कल्पना न करे, रूपों में कल्पना न करे, रूपों से कल्पना न करे, 'रूप मेरे हैं' ऐसी कल्पना न करे; चक्षु-विज्ञान के विषय में कल्पना न करे, चक्षु-विज्ञान में कल्पना न करे, चक्षु-विज्ञान से कल्पना न करे, 'चक्षु-विज्ञान मेरा है' ऐसी कल्पना न करे; चक्षु-स्पर्श के विषय में कल्पना न करे, चक्षु-स्पर्श में कल्पना न करे, चक्षु-स्पर्श से कल्पना न करे, 'चक्षु-स्पर्श मेरा है' ऐसी कल्पना न करे। चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसकी भी कल्पना न करे, उसमें भी कल्पना न करे, उससे भी कल्पना न करे, 'वह मेरी है' ऐसी कल्पना न करे।" ‘‘โสตํ น มญฺเญยฺย…เป… ฆานํ น มญฺเญยฺย…เป… ชิวฺหํ น มญฺเญยฺย, ชิวฺหาย น มญฺเญยฺย, ชิวฺหาโต น มญฺเญยฺย, ชิวฺหา เมติ น มญฺเญยฺย; รเส น มญฺเญยฺย…เป… ชิวฺหาวิญฺญาณํ น มญฺเญยฺย…เป… ชิวฺหาสมฺผสฺสํ น มญฺเญยฺย…เป… ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตสฺมิมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตโตปิ น มญฺเญยฺย, ตํ เมติ น มญฺเญยฺย. “कान के विषय में कल्पना न करे... नाक के विषय में कल्पना न करे... जिह्वा के विषय में कल्पना न करे, जिह्वा में कल्पना न करे, जिह्वा से कल्पना न करे, 'जिह्वा मेरी है' ऐसी कल्पना न करे; रसों के विषय में कल्पना न करे... जिह्वा-विज्ञान के विषय में कल्पना न करे... जिह्वा-स्पर्श के विषय में कल्पना न करे... जिह्वा-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, उसके विषय में भी कल्पना न करे, उसमें कल्पना न करे, उससे कल्पना न करे, 'वह मेरा है' ऐसी कल्पना न करे।" ‘‘กายํ น มญฺเญยฺย…เป… มนํ น มญฺเญยฺย, มนสฺมึ น มญฺเญยฺย, มนโต น มญฺเญยฺย, มโน เมติ น มญฺเญยฺย; ธมฺเม น มญฺเญยฺย…เป… มโน วิญฺญาณํ…เป… มโนสมฺผสฺสํ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตสฺมิมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตโตปิ น มญฺเญยฺย, ตํ เมติ น มญฺเญยฺย; สพฺพํ น มญฺเญยฺย, สพฺพสฺมึ น มญฺเญยฺย, สพฺพโต น มญฺเญยฺย, สพฺพํ เมติ น มญฺเญยฺย. “काया के विषय में कल्पना न करे... मन के विषय में कल्पना न करे, मन में कल्पना न करे, मन से कल्पना न करे, 'मन मेरा है' ऐसी कल्पना न करे; धर्मों के विषय में कल्पना न करे... मनो-विज्ञान... मनो-स्पर्श... मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, उसके विषय में भी कल्पना न करे, उसमें कल्पना न करे, उससे कल्पना न करे, 'वह मेरा है' ऐसी कल्पना न करे; सब के विषय में कल्पना न करे, सब में कल्पना न करे, सब से कल्पना न करे, 'सब मेरा है' ऐसी कल्पना न करे।" ‘‘โส เอวํ อมญฺญมาโน น กิญฺจิปิ โลเก อุปาทิยติ. อนุปาทิยํ น ปริตสฺสติ. อปริตสฺสํ ปจฺจตฺตญฺเญว ปรินิพฺพายติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. สตฺตมํ. “इस प्रकार कल्पना न करता हुआ वह लोक में किसी भी वस्तु को ग्रहण नहीं करता। ग्रहण न करता हुआ वह उद्विग्न नहीं होता। उद्विग्न न होता हुआ वह स्वयं ही पूर्णतः निर्वाण प्राप्त कर लेता है। वह जान लेता है— 'जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है'।” सातवाँ सूत्र। ๘. ทุติยเอชาสุตฺตํ ८. द्वितीय एजा सूत्र ๙๑. ‘‘เอชา[Pg.290], ภิกฺขเว, โรโค, เอชา คณฺโฑ, เอชา สลฺลํ. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ตถาคโต อเนโช วิหรติ วีตสลฺโล. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เจปิ อากงฺเขยฺย ‘อเนโช วิหเรยฺยํ วีตสลฺโล’ติ, จกฺขุํ น มญฺเญยฺย, จกฺขุสฺมึ น มญฺเญยฺย, จกฺขุโต น มญฺเญยฺย, จกฺขุ เมติ น มญฺเญยฺย; รูเป น มญฺเญยฺย… จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตสฺมิมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตโตปิ น มญฺเญยฺย, ตํ เมติ น มญฺเญยฺย. ยญฺหิ, ภิกฺขเว, มญฺญติ, ยสฺมึ มญฺญติ, ยโต มญฺญติ, ยํ เมติ มญฺญติ, ตโต ตํ โหติ อญฺญถา. อญฺญถาภาวี ภวสตฺโต โลโก ภวเมว อภินนฺทติ…เป…. ९१. “भिक्षुओं! एजा (तृष्णा) रोग है, एजा फोड़ा है, एजा शल्य है। इसलिए, भिक्षुओं! तथागत तृष्णा-रहित और शल्य-रहित होकर विहार करते हैं। इसलिए, भिक्षुओं! यदि भिक्षु भी यह इच्छा करे कि 'मैं तृष्णा-रहित और शल्य-रहित होकर विहार करूँ', तो वह चक्षु के विषय में कल्पना न करे, चक्षु में कल्पना न करे, चक्षु से कल्पना न करे, 'चक्षु मेरा है' ऐसी कल्पना न करे; रूपों के विषय में कल्पना न करे... चक्षु-विज्ञान... चक्षु-स्पर्श... चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, उसके विषय में भी कल्पना न करे, उसमें कल्पना न करे, उससे कल्पना न करे, 'वह मेरा है' ऐसी कल्पना न करे। भिक्षुओं! क्योंकि वह जिसके विषय में कल्पना करता है, जिसमें कल्पना करता है, जिससे कल्पना करता है, जिसे 'मेरा' मानकर कल्पना करता है—वह उससे अन्यथा हो जाता है। अन्यथा होने वाला यह लोक, भव में आसक्त होकर भव का ही अभिनन्दन करता है...।" ‘‘ชิวฺหํ น มญฺเญยฺย, ชิวฺหาย น มญฺเญยฺย, ชิวฺหาโต น มญฺเญยฺย, ชิวฺหา เมติ น มญฺเญยฺย; รเส น มญฺเญยฺย… ชิวฺหาวิญฺญาณํ… ชิวฺหาสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตสฺมิมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตโตปิ น มญฺเญยฺย, ตํ เมติ น มญฺเญยฺย. ยญฺหิ, ภิกฺขเว, มญฺญติ, ยสฺมึ มญฺญติ, ยโต มญฺญติ, ยํ เมติ มญฺญติ, ตโต ตํ โหติ อญฺญถา. อญฺญถาภาวี ภวสตฺโต โลโก ภวเมว อภินนฺทติ…เป…. “जिह्वा के विषय में कल्पना न करे, जिह्वा में कल्पना न करे, जिह्वा से कल्पना न करे, 'जिह्वा मेरी है' ऐसी कल्पना न करे; रसों के विषय में कल्पना न करे... जिह्वा-विज्ञान... जिह्वा-स्पर्श... जिह्वा-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, उसके विषय में भी कल्पना न करे, उसमें कल्पना न करे, उससे कल्पना न करे, 'वह मेरा है' ऐसी कल्पना न करे। भिक्षुओं! क्योंकि वह जिसके विषय में कल्पना करता है, जिसमें कल्पना करता है, जिससे कल्पना करता है, जिसे 'मेरा' मानकर कल्पना करता है—वह उससे अन्यथा हो जाता है। अन्यथा होने वाला यह लोक, भव में आसक्त होकर भव का ही अभिनन्दन करता है...।" ‘‘มนํ น มญฺเญยฺย, มนสฺมึ น มญฺเญยฺย, มนโต น มญฺเญยฺย, มโน เมติ น มญฺเญยฺย… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตสฺมิมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตโตปิ น มญฺเญยฺย, ตํ เมติ น มญฺเญยฺย. ยญฺหิ, ภิกฺขเว, มญฺญติ, ยสฺมึ มญฺญติ, ยโต มญฺญติ, ยํ เมติ มญฺญติ, ตโต ตํ โหติ อญฺญถา. อญฺญถาภาวี ภวสตฺโต โลโก ภวเมว อภินนฺทติ. “मन के विषय में कल्पना न करे, मन में कल्पना न करे, मन से कल्पना न करे, 'मन मेरा है' ऐसी कल्पना न करे... मनो-विज्ञान... मनो-स्पर्श... मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, उसके विषय में भी कल्पना न करे, उसमें कल्पना न करे, उससे कल्पना न करे, 'वह मेरा है' ऐसी कल्पना न करे। भिक्षुओं! क्योंकि वह जिसके विषय में कल्पना करता है, जिसमें कल्पना करता है, जिससे कल्पना करता है, जिसे 'मेरा' मानकर कल्पना करता है—वह उससे अन्यथा हो जाता है। अन्यथा होने वाला यह लोक, भव में आसक्त होकर भव का ही अभिनन्दन करता है।" ‘‘ยาวตา, ภิกฺขเว, ขนฺธธาตุอายตนา ตมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตสฺมิมฺปิ น มญฺเญยฺย, ตโตปิ น มญฺเญยฺย, ตํ เมติ น มญฺเญยฺย. โส เอวํ อมญฺญมาโน น กิญฺจิ โลเก อุปาทิยติ. อนุปาทิยํ น ปริตสฺสติ. อปริตสฺสํ ปจฺจตฺตญฺเญว ปรินิพฺพายติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. อฏฺฐมํ. “भिक्षुओं! जितने भी स्कन्ध, धातु और आयतन हैं, उनके विषय में भी कल्पना न करे, उनमें कल्पना न करे, उनसे कल्पना न करे, 'वे मेरे हैं' ऐसी कल्पना न करे। इस प्रकार कल्पना न करता हुआ वह लोक में किसी भी वस्तु को ग्रहण नहीं करता। ग्रहण न करता हुआ वह उद्विग्न नहीं होता। उद्विग्न न होता हुआ वह स्वयं ही पूर्णतः निर्वाण प्राप्त कर लेता है। वह जान लेता है— 'जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है'।” आठवाँ सूत्र। ๙. ปฐมทฺวยสุตฺตํ ९. प्रथम द्वय सूत्र ๙๒. ‘‘ทฺวยํ [Pg.291] โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, ทฺวยํ? จกฺขุญฺเจว รูปา จ, โสตญฺเจว สทฺทา จ, ฆานญฺเจว คนฺธา จ, ชิวฺหา เจว รสา จ, กาโย เจว โผฏฺฐพฺพา จ, มโน เจว ธมฺมา จ – อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ทฺวยํ. ९२. “भिक्षुओं! मैं तुम्हें 'द्वय' (दो-दो के जोड़े) का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! द्वय क्या है? चक्षु और रूप, श्रोत्र और शब्द, घ्राण और गंध, जिह्वा और रस, काय और स्पर्श, मन और धर्म—भिक्षुओं! इसे 'द्वय' कहा जाता है।" ‘‘โย, ภิกฺขเว, เอวํ วเทยฺย – ‘อหเมตํ ทฺวยํ ปจฺจกฺขาย อญฺญํ ทฺวยํ ปญฺญเปสฺสามี’ติ, ตสฺส วาจาวตฺถุกเมวสฺส. ปุฏฺโฐ จ น สมฺปาเยยฺย. อุตฺตริญฺจ วิฆาตํ อาปชฺเชยฺย. ตํ กิสฺส เหตุ? ยถา ตํ, ภิกฺขเว, อวิสยสฺมิ’’นฺติ. นวมํ. “भिक्षुओं! यदि कोई ऐसा कहे— 'मैं इस द्वय को छोड़कर किसी अन्य द्वय की प्रज्ञप्ति करूँगा', तो उसकी वह बात केवल शब्द मात्र ही होगी। पूछने पर वह उत्तर नहीं दे पाएगा और अत्यधिक कष्ट को प्राप्त होगा। ऐसा क्यों? क्योंकि भिक्षुओं! वह उसके विषय से बाहर है।” नवाँ सूत्र। ๑๐. ทุติยทฺวยสุตฺตํ १०. द्वितीय द्वय सूत्र ๙๓. ‘‘ทฺวยํ, ภิกฺขเว, ปฏิจฺจ วิญฺญาณํ สมฺโภติ. กถญฺจ, ภิกฺขเว, ทฺวยํ ปฏิจฺจ วิญฺญาณํ สมฺโภติ? จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณํ. จกฺขุ อนิจฺจํ วิปริณามิ อญฺญถาภาวิ. รูปา อนิจฺจา วิปริณามิโน อญฺญถาภาวิโน. อิตฺเถตํ ทฺวยํ จลญฺเจว พฺยถญฺจ อนิจฺจํ วิปริณามิ อญฺญถาภาวิ. จกฺขุวิญฺญาณํ อนิจฺจํ วิปริณามิ อญฺญถาภาวิ. โยปิ เหตุ โยปิ ปจฺจโย จกฺขุวิญฺญาณสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ เหตุ โสปิ ปจฺจโย อนิจฺโจ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. อนิจฺจํ โข ปน, ภิกฺขเว, ปจฺจยํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนํ จกฺขุวิญฺญาณํ กุโต นิจฺจํ ภวิสฺสติ! ยา โข, ภิกฺขเว, อิเมสํ ติณฺณํ ธมฺมานํ สงฺคติ สนฺนิปาโต สมวาโย, อยํ วุจฺจติ จกฺขุสมฺผสฺโส. จกฺขุสมฺผสฺโสปิ อนิจฺโจ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. โยปิ เหตุ โยปิ ปจฺจโย จกฺขุสมฺผสฺสสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ เหตุ โสปิ ปจฺจโย อนิจฺโจ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. อนิจฺจํ โข ปน, ภิกฺขเว, ปจฺจยํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺโน จกฺขุสมฺผสฺโส กุโต นิจฺโจ ภวิสฺสติ! ผุฏฺโฐ, ภิกฺขเว, เวเทติ, ผุฏฺโฐ เจเตติ, ผุฏฺโฐ สญฺชานาติ. อิตฺเถเตปิ ธมฺมา จลา เจว พฺยถา จ อนิจฺจา วิปริณามิโน อญฺญถาภาวิโน. โสตํ…เป…. ९३. “भिक्षुओं, द्वय (दो बातों) के आश्रय से विज्ञान उत्पन्न होता है। और भिक्षुओं, कैसे द्वय के आश्रय से विज्ञान उत्पन्न होता है? चक्षु और रूपों के आश्रय से चक्षु-विज्ञान उत्पन्न होता है। चक्षु अनित्य है, विपरिणामी (परिवर्तनशील) है, अन्यथाभावी (अन्य प्रकार का हो जाने वाला) है। रूप अनित्य हैं, विपरिणामी हैं, अन्यथाभावी हैं। इस प्रकार यह द्वय चंचल और अस्थिर है, अनित्य है, विपरिणामी है, अन्यथाभावी है। चक्षु-विज्ञान अनित्य है, विपरिणामी है, अन्यथाभावी है। चक्षु-विज्ञान की उत्पत्ति के लिए जो भी हेतु है, जो भी प्रत्यय है, वह हेतु और वह प्रत्यय भी अनित्य, विपरिणामी और अन्यथाभावी है। भिक्षुओं, अनित्य प्रत्यय के आश्रय से उत्पन्न हुआ चक्षु-विज्ञान भला नित्य कैसे होगा! भिक्षुओं, इन तीनों धर्मों का जो संगम, सन्निपात (मिलन) और समवाय (संयोग) है, उसे चक्षु-संस्पर्श कहा जाता है। चक्षु-संस्पर्श भी अनित्य, विपरिणामी और अन्यथाभावी है। चक्षु-संस्पर्श की उत्पत्ति के लिए जो भी हेतु है, जो भी प्रत्यय है, वह हेतु और वह प्रत्यय भी अनित्य, विपरिणामी और अन्यथाभावी है। भिक्षुओं, अनित्य प्रत्यय के आश्रय से उत्पन्न हुआ चक्षु-संस्पर्श भला नित्य कैसे होगा! भिक्षुओं, संस्पर्श होने पर (मनुष्य) वेदन (अनुभव) करता है, संस्पर्श होने पर चेतना करता है, संस्पर्श होने पर संज्ञा (पहचान) करता है। इस प्रकार ये धर्म भी चंचल, अस्थिर, अनित्य, विपरिणामी और अन्यथाभावी हैं। श्रोत्र... पे...।” ‘‘ชิวฺหญฺจ ปฏิจฺจ รเส จ อุปฺปชฺชติ ชิวฺหาวิญฺญาณํ. ชิวฺหา อนิจฺจา วิปริณามี อญฺญถาภาวี. รสา อนิจฺจา วิปริณามิโน อญฺญถาภาวิโน. อิตฺเถตํ ทฺวยํ จลญฺเจว พฺยถญฺจ อนิจฺจํ วิปริณามิ อญฺญถาภาวิ. ชิวฺหาวิญฺญาณํ อนิจฺจํ วิปริณามิ อญฺญถาภาวิ. โยปิ เหตุ โยปิ ปจฺจโย ชิวฺหาวิญฺญาณสฺส อุปฺปาทาย[Pg.292], โสปิ เหตุ โสปิ ปจฺจโย อนิจฺโจ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. อนิจฺจํ โข ปน, ภิกฺขเว, ปจฺจยํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนํ ชิวฺหาวิญฺญาณํ, กุโต นิจฺจํ ภวิสฺสติ! ยา โข, ภิกฺขเว, อิเมสํ ติณฺณํ ธมฺมานํ สงฺคติ สนฺนิปาโต สมวาโย, อยํ วุจฺจติ ชิวฺหาสมฺผสฺโส. ชิวฺหาสมฺผสฺโสปิ อนิจฺโจ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. โยปิ เหตุ โยปิ ปจฺจโย ชิวฺหาสมฺผสฺสสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ เหตุ โสปิ ปจฺจโย อนิจฺโจ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. อนิจฺจํ โข ปน, ภิกฺขเว, ปจฺจยํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺโน ชิวฺหาสมฺผสฺโส, กุโต นิจฺโจ ภวิสฺสติ! ผุฏฺโฐ, ภิกฺขเว, เวเทติ, ผุฏฺโฐ เจเตติ, ผุฏฺโฐ สญฺชานาติ. อิตฺเถเตปิ ธมฺมา จลา เจว พฺยถา จ อนิจฺจา วิปริณามิโน อญฺญถาภาวิโน. กายํ…เป…. “जिह्वा और रसों के आश्रय से जिह्वा-विज्ञान उत्पन्न होता है। जिह्वा अनित्य है, विपरिणामी है, अन्यथाभावी है। रस अनित्य हैं, विपरिणामी हैं, अन्यथाभावी हैं। इस प्रकार यह द्वय चंचल और अस्थिर है, अनित्य है, विपरिणामी है, अन्यथाभावी है। जिह्वा-विज्ञान अनित्य है, विपरिणामी है, अन्यथाभावी है। जिह्वा-विज्ञान की उत्पत्ति के लिए जो भी हेतु है, जो भी प्रत्यय है, वह हेतु और वह प्रत्यय भी अनित्य, विपरिणामी और अन्यथाभावी है। भिक्षुओं, अनित्य प्रत्यय के आश्रय से उत्पन्न हुआ जिह्वा-विज्ञान भला नित्य कैसे होगा! भिक्षुओं, इन तीनों धर्मों का जो संगम, सन्निपात और समवाय है, उसे जिह्वा-संस्पर्श कहा जाता है। जिह्वा-संस्पर्श भी अनित्य, विपरिणामी और अन्यथाभावी है। जिह्वा-संस्पर्श की उत्पत्ति के लिए जो भी हेतु है, जो भी प्रत्यय है, वह हेतु और वह प्रत्यय भी अनित्य, विपरिणामी और अन्यथाभावी है। भिक्षुओं, अनित्य प्रत्यय के आश्रय से उत्पन्न हुआ जिह्वा-संस्पर्श भला नित्य कैसे होगा! भिक्षुओं, संस्पर्श होने पर वेदन करता है, संस्पर्श होने पर चेतना करता है, संस्पर्श होने पर संज्ञा करता है। इस प्रकार ये धर्म भी चंचल, अस्थिर, अनित्य, विपरिणामी और अन्यथाभावी हैं। काय... पे...।” ‘‘มนญฺจ ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณํ. มโน อนิจฺโจ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. ธมฺมา อนิจฺจา วิปริณามิโน อญฺญถาภาวิโน. อิตฺเถตํ ทฺวยํ จลญฺเจว พฺยถญฺจ อนิจฺจํ วิปริณามิ อญฺญถาภาวิ. มโนวิญฺญาณํ อนิจฺจํ วิปริณามิ อญฺญถาภาวิ. โยปิ เหตุ โยปิ ปจฺจโย มโนวิญฺญาณสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ เหตุ โสปิ ปจฺจโย อนิจฺโจ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. อนิจฺจํ โข ปน, ภิกฺขเว, ปจฺจยํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนํ มโนวิญฺญาณํ, กุโต นิจฺจํ ภวิสฺสติ! ยา โข, ภิกฺขเว, อิเมสํ ติณฺณํ ธมฺมานํ สงฺคติ สนฺนิปาโต สมวาโย, อยํ วุจฺจติ มโนสมฺผสฺโส. มโนสมฺผสฺโสปิ อนิจฺโจ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. โยปิ เหตุ โยปิ ปจฺจโย มโนสมฺผสฺสสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ เหตุ โสปิ ปจฺจโย อนิจฺโจ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. อนิจฺจํ โข ปน, ภิกฺขเว, ปจฺจยํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺโน มโนสมฺผสฺโส, กุโต นิจฺโจ ภวิสฺสติ! ผุฏฺโฐ, ภิกฺขเว, เวเทติ, ผุฏฺโฐ เจเตติ, ผุฏฺโฐ สญฺชานาติ. อิตฺเถเตปิ ธมฺมา จลา เจว พฺยถา จ อนิจฺจา วิปริณามิโน อญฺญถาภาวิโน. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ทฺวยํ ปฏิจฺจ วิญฺญาณํ สมฺโภตี’’ติ. ทสมํ. “मन और धर्मों के आश्रय से मनो-विज्ञान उत्पन्न होता है। मन अनित्य है, विपरिणामी है, अन्यथाभावी है। धर्म अनित्य हैं, विपरिणामी हैं, अन्यथाभावी हैं। इस प्रकार यह द्वय चंचल और अस्थिर है, अनित्य है, विपरिणामी है, अन्यथाभावी है। मनो-विज्ञान अनित्य है, विपरिणामी है, अन्यथाभावी है। मनो-विज्ञान की उत्पत्ति के लिए जो भी हेतु है, जो भी प्रत्यय है, वह हेतु और वह प्रत्यय भी अनित्य, विपरिणामी और अन्यथाभावी है। भिक्षुओं, अनित्य प्रत्यय के आश्रय से उत्पन्न हुआ मनो-विज्ञान भला नित्य कैसे होगा! भिक्षुओं, इन तीनों धर्मों का जो संगम, सन्निपात और समवाय है, उसे मनो-संस्पर्श कहा जाता है। मनो-संस्पर्श भी अनित्य, विपरिणामी और अन्यथाभावी है। मनो-संस्पर्श की उत्पत्ति के लिए जो भी हेतु है, जो भी प्रत्यय है, वह हेतु और वह प्रत्यय भी अनित्य, विपरिणामी और अन्यथाभावी है। भिक्षुओं, अनित्य प्रत्यय के आश्रय से उत्पन्न हुआ मनो-संस्पर्श भला नित्य कैसे होगा! भिक्षुओं, संस्पर्श होने पर वेदन करता है, संस्पर्श होने पर चेतना करता है, संस्पर्श होने पर संज्ञा करता है। इस प्रकार ये धर्म भी चंचल, अस्थिर, अनित्य, विपरिणामी और अन्यथाभावी हैं। भिक्षुओं, इस प्रकार द्वय के आश्रय से विज्ञान उत्पन्न होता है।” दसवां (सुत्त समाप्त)। ฉนฺนวคฺโค นวโม. छन्न-वग्ग नौवां। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उदान) – ปโลกสุญฺญา สํขิตฺตํ, ฉนฺโน ปุณฺโณ จ พาหิโย; เอเชน จ ทุเว วุตฺตา, ทฺวเยหิ อปเร ทุเวติ. पलोक-सुञ्ञ, संखित्त, छन्न, पुण्ण और बाहिय; एजेन (तृष्णा) पर दो कहे गए हैं, और द्वय पर अन्य दो। ๑๐. สฬวคฺโค १०. सळ-वग्ग ๑. อทนฺตอคุตฺตสุตฺตํ १. अदन्त-अगुत्त सुत्त ๙๔. สาวตฺถินิทานํ[Pg.293]. ‘‘ฉยิเม, ภิกฺขเว, ผสฺสายตนา อทนฺตา อคุตฺตา อรกฺขิตา อสํวุตา ทุกฺขาธิวาหา โหนฺติ. กตเม ฉ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, ผสฺสายตนํ อทนฺตํ อคุตฺตํ อรกฺขิตํ อสํวุตํ ทุกฺขาธิวาหํ โหติ…เป… ชิวฺหา, ภิกฺขเว, ผสฺสายตนํ อทนฺตํ อคุตฺตํ อรกฺขิตํ อสํวุตํ ทุกฺขาธิวาหํ โหติ…เป… มโน, ภิกฺขเว, ผสฺสายตนํ อทนฺตํ อคุตฺตํ อรกฺขิตํ อสํวุตํ ทุกฺขาธิวาหํ โหติ. อิเม โข, ภิกฺขเว, ฉ ผสฺสายตนา อทนฺตา อคุตฺตา อรกฺขิตา อสํวุตา ทุกฺขาธิวาหา โหนฺติ’’. ९४. श्रावस्ती-निदान। “भिक्षुओं, ये छह फस्सायतन (स्पर्श के आयतन) यदि अदन्त (अदमित), अगुत्त (असुरक्षित), अरक्खित (अरक्षित) और असंयुत (असंवरित) हों, तो वे महान दुःख को लाने वाले होते हैं। वे छह कौन से हैं? भिक्षुओं, चक्षु-फस्सायतन यदि अदन्त, अगुत्त, अरक्खित और असंयुत हो, तो वह महान दुःख को लाने वाला होता है... पे... जिह्वा-फस्सायतन यदि अदन्त, अगुत्त, अरक्खित और असंयुत हो, तो वह महान दुःख को लाने वाला होता है... पे... मन-फस्सायतन यदि अदन्त, अगुत्त, अरक्खित और असंयुत हो, तो वह महान दुःख को लाने वाला होता है। भिक्षुओं, ये छह फस्सायतन यदि अदन्त, अगुत्त, अरक्खित और असंयुत हों, तो वे महान दुःख को लाने वाले होते हैं।” ‘‘ฉยิเม, ภิกฺขเว, ผสฺสายตนา สุทนฺตา สุคุตฺตา สุรกฺขิตา สุสํวุตา สุขาธิวาหา โหนฺติ. กตเม ฉ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, ผสฺสายตนํ สุทนฺตํ สุคุตฺตํ สุรกฺขิตํ สุสํวุตํ สุขาธิวาหํ โหติ…เป… ชิวฺหา, ภิกฺขเว, ผสฺสายตนํ สุทนฺตํ สุคุตฺตํ สุรกฺขิตํ สุสํวุตํ สุขาธิวาหํ โหติ…เป… มโน, ภิกฺขเว, ผสฺสายตนํ สุทนฺตํ สุคุตฺตํ สุรกฺขิตํ สุสํวุตํ สุขาธิวาหํ โหติ. อิเม โข, ภิกฺขเว, ฉ ผสฺสายตนา สุทนฺตา สุคุตฺตา สุรกฺขิตา สุสํวุตา สุขาธิวาหา โหนฺตี’’ติ. อิทมโวจ ภควา…เป… เอตทโวจ สตฺถา – “भिक्षुओं! ये छह स्पर्श-आयतन यदि भली-भाँति दमित हों, भली-भाँति रक्षित हों, भली-भाँति सुरक्षित हों और भली-भाँति संवृत (नियंत्रित) हों, तो वे महान सुख को लाने वाले होते हैं। वे छह कौन से हैं? भिक्षुओं! चक्षु स्पर्श-आयतन यदि भली-भाँति दमित, रक्षित, सुरक्षित और संवृत हो, तो वह महान सुख को लाने वाला होता है... (पे)... जिह्वा स्पर्श-आयतन... (पे)... मन स्पर्श-आयतन यदि भली-भाँति दमित, रक्षित, सुरक्षित और संवृत हो, तो वह महान सुख को लाने वाला होता है। भिक्षुओं! ये छह स्पर्श-आयतन यदि भली-भाँति दमित, रक्षित, सुरक्षित और संवृत हों, तो वे महान सुख को लाने वाले होते हैं।” भगवान ने यह कहा... (पे)... शास्ता ने यह कहा— ‘‘สเฬว ผสฺสายตนานิ ภิกฺขโว,อสํวุโต ยตฺถ ทุกฺขํ นิคจฺฉติ; เตสญฺจ เย สํวรณํ อเวทิสุํ,สทฺธาทุติยา วิหรนฺตานวสฺสุตา. “भिक्षुओं! स्पर्श-आयतन छह ही हैं, जिनमें असंयमित होने पर मनुष्य दुःख को प्राप्त होता है। जिन्होंने इनका संवर (नियंत्रण) जान लिया है, वे श्रद्धा को साथी बनाकर, अनास्रव (चित्त-मल रहित) होकर विहार करते हैं। ‘‘ทิสฺวาน รูปานิ มโนรมานิ,อโถปิ ทิสฺวาน อมโนรมานิ; มโนรเม ราคปถํ วิโนทเย,น จาปฺปิยํ เมติ มนํ ปโทสเย. मनोरम रूपों को देखकर, और अमनोरम रूपों को भी देखकर; मनोरम में राग के मार्ग को दूर करे, और ‘यह मुझे अप्रिय है’ ऐसा सोचकर मन को दूषित न करे। ‘‘สทฺทญฺจ สุตฺวา ทุภยํ ปิยาปฺปิยํ,ปิยมฺหิ สทฺเท น สมุจฺฉิโต สิยา; อโถปฺปิเย โทสคตํ วิโนทเย,น จาปฺปิยํ เมติ มนํ ปโทสเย. प्रिय और अप्रिय दोनों प्रकार के शब्दों को सुनकर, प्रिय शब्द में आसक्त न हो; और अप्रिय में द्वेष को दूर करे, और ‘यह मुझे अप्रिय है’ ऐसा सोचकर मन को दूषित न करे। ‘‘คนฺธญฺจ [Pg.294] ฆตฺวา สุรภึ มโนรมํ,อโถปิ ฆตฺวา อสุจึ อกนฺติยํ; อกนฺติยสฺมึ ปฏิฆํ วิโนทเย,ฉนฺทานุนีโต น จ กนฺติเย สิยา. सुगंधित और मनोरम गंध को सूंघकर, और अशुचि एवं अप्रिय गंध को भी सूंघकर; अप्रिय में प्रतिघ (क्रोध) को दूर करे, और प्रिय में छंद (इच्छा) के वशीभूत न हो। ‘‘รสญฺจ โภตฺวาน อสาทิตญฺจ สาทุํ,อโถปิ โภตฺวาน อสาทุเมกทา; สาทุํ รสํ นาชฺโฌสาย ภุญฺเช,วิโรธมาสาทุสุ โนปทํสเย. स्वादिष्ट और मधुर रस का भोग करके, और कभी अस्वादिष्ट रस का भी भोग करके; स्वादिष्ट रस में आसक्त होकर न खाए, और अस्वादिष्ट में विरोध (अरुचि) न दिखाए। ‘‘ผสฺเสน ผุฏฺโฐ น สุเขน มชฺเช,ทุกฺเขน ผุฏฺโฐปิ น สมฺปเวเธ; ผสฺสทฺวยํ สุขทุกฺเข อุเปกฺเข,อนานุรุทฺโธ อวิรุทฺธ เกนจิ. सुखद स्पर्श से स्पर्शित होने पर मदोन्मत्त न हो, और दुःखद स्पर्श से स्पर्शित होने पर भी कम्पित न हो; सुख और दुःख दोनों प्रकार के स्पर्शों में उपेक्षा रखे, किसी के प्रति न अनुनय (आसक्ति) रखे और न विरोध। ‘‘ปปญฺจสญฺญา อิตรีตรา นรา,ปปญฺจยนฺตา อุปยนฺติ สญฺญิโน; มโนมยํ เคหสิตญฺจ สพฺพํ,ปนุชฺช เนกฺขมฺมสิตํ อิรียติ. प्रपंच-संज्ञा वाले साधारण मनुष्य, प्रपंच करते हुए (संसार में) फँस जाते हैं; घर (गृहस्थी) पर आश्रित सभी मनोगत संकल्पों को त्यागकर, नैष्क्रम्य (वैराग्य) पर आश्रित होकर विचरण करे। ‘‘เอวํ มโน ฉสฺสุ ยทา สุภาวิโต,ผุฏฺฐสฺส จิตฺตํ น วิกมฺปเต กฺวจิ; เต ราคโทเส อภิภุยฺย ภิกฺขโว,ภวตฺถ ชาติมรณสฺส ปารคา’’ติ. ปฐมํ; इस प्रकार जब मन इन छहों (आयतन) में भली-भाँति भावित हो जाता है, तो किसी भी स्पर्श से चित्त कभी विचलित नहीं होता। भिक्षुओं! राग और द्वेष को जीतकर, तुम जन्म और मरण के पार जाने वाले बनो।” (प्रथम सुत्त समाप्त) ๒. มาลุกฺยปุตฺตสุตฺตํ २. मालुक्यपुत्त सुत्त ๙๕. อถ โข อายสฺมา มาลุกฺยปุตฺโต เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา มาลุกฺยปุตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน ธมฺมํ เทเสตุ, ยมหํ ภควโต ธมฺมํ สุตฺวา เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหเรยฺย’’นฺติ. ९५. तब आयुष्मान मालुक्यपुत्त जहाँ भगवान थे, वहाँ गए... (पे)... एक ओर बैठे हुए आयुष्मान मालुक्यपुत्त ने भगवान से यह कहा— “भन्ते! अच्छा हो यदि भगवान मुझे संक्षेप में धर्म का उपदेश दें, जिसे सुनकर मैं अकेला, एकांतवासी, अप्रमत्त, उद्योगी और दृढ़निश्चयी होकर विहार कर सकूँ।” ‘‘เอตฺถ [Pg.295] ทานิ, มาลุกฺยปุตฺต, กึ ทหเร ภิกฺขู วกฺขาม! ยตฺร หิ นาม ตฺวํ, ภิกฺขุ, ชิณฺโณ วุทฺโธ มหลฺลโก อทฺธคโต วโยอนุปฺปตฺโต สํขิตฺเตน โอวาทํ ยาจสี’’ติ. “मालुक्यपुत्त! अब हम युवा भिक्षुओं से क्या कहें! जब तुम जैसे वृद्ध, वयोवृद्ध, बूढ़े, लंबी आयु वाले और अंतिम अवस्था को प्राप्त भिक्षु संक्षेप में उपदेश माँग रहे हो!” ‘‘กิญฺจาปาหํ, ภนฺเต, ชิณฺโณ วุทฺโธ มหลฺลโก อทฺธคโต วโยอนุปฺปตฺโต. เทเสตุ เม, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน ธมฺมํ, เทเสตุ สุคโต สํขิตฺเตน ธมฺมํ, อปฺเปว นามาหํ ภควโต ภาสิตสฺส อตฺถํ อาชาเนยฺยํ. อปฺเปว นามาหํ ภควโต ภาสิตสฺส ทายาโท อสฺส’’นฺติ. “भन्ते! यद्यपि मैं वृद्ध, वयोवृद्ध, बूढ़ा, लंबी आयु वाला और अंतिम अवस्था को प्राप्त हूँ, फिर भी भन्ते! भगवान मुझे संक्षेप में धर्म का उपदेश दें, सुगत मुझे संक्षेप में धर्म का उपदेश दें। संभव है कि मैं भगवान के कहे हुए का अर्थ समझ सकूँ, संभव है कि मैं भगवान के उपदेश का उत्तराधिकारी बन सकूँ।” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, มาลุกฺยปุตฺต, เย เต จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อทิฏฺฐา อทิฏฺฐปุพฺพา, น จ ปสฺสสิ, น จ เต โหติ ปสฺเสยฺยนฺติ? อตฺถิ เต ตตฺถ ฉนฺโท วา ราโค วา เปมํ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “मालुक्यपुत्त! तुम क्या सोचते हो? वे रूप जो चक्षु-विज्ञान द्वारा जानने योग्य हैं, जिन्हें तुमने नहीं देखा, पहले कभी नहीं देखा, जिन्हें तुम अभी नहीं देख रहे हो और न ही उन्हें देखने की इच्छा तुम्हारे मन में होती है— क्या उनमें तुम्हारा कोई छंद (इच्छा), राग या प्रेम है?” “नहीं, भन्ते।” ‘‘เย เต โสตวิญฺเญยฺยา สทฺทา อสฺสุตา อสฺสุตปุพฺพา, น จ สุณาสิ, น จ เต โหติ สุเณยฺยนฺติ? อตฺถิ เต ตตฺถ ฉนฺโท วา ราโค วา เปมํ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “वे शब्द जो श्रोत्र-विज्ञान द्वारा जानने योग्य हैं, जिन्हें तुमने नहीं सुना, पहले कभी नहीं सुना, जिन्हें तुम अभी नहीं सुन रहे हो और न ही उन्हें सुनने की इच्छा तुम्हारे मन में होती है— क्या उनमें तुम्हारा कोई छंद, राग या प्रेम है?” “नहीं, भन्ते।” ‘‘เย เต ฆานวิญฺเญยฺยา คนฺธา อฆายิตา อฆายิตปุพฺพา, น จ ฆายสิ, น จ เต โหติ ฆาเยยฺยนฺติ? อตฺถิ เต ตตฺถ ฉนฺโท วา ราโค วา เปมํ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “वे गंध जो घ्राण-विज्ञान द्वारा जानने योग्य हैं, जिन्हें तुमने नहीं सूंघा, पहले कभी नहीं सूंघा, जिन्हें तुम अभी नहीं सूंघ रहे हो और न ही उन्हें सूंघने की इच्छा तुम्हारे मन में होती है— क्या उनमें तुम्हारा कोई छंद, राग या प्रेम है?” “नहीं, भन्ते।” ‘‘เย เต ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา อสายิตา อสายิตปุพฺพา, น จ สายสิ, น จ เต โหติ สาเยยฺยนฺติ? อตฺถิ เต ตตฺถ ฉนฺโท วา ราโค วา เปมํ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “वे रस जो जिह्वा-विज्ञान द्वारा जानने योग्य हैं, जिनका तुमने आस्वादन नहीं किया, पहले कभी नहीं किया, जिनका तुम अभी आस्वादन नहीं कर रहे हो और न ही उनका आस्वादन करने की इच्छा तुम्हारे मन में होती है— क्या उनमें तुम्हारा कोई छंद, राग या प्रेम है?” “नहीं, भन्ते।” ‘‘เย เต กายวิญฺเญยฺยา โผฏฺฐพฺพา อสมฺผุฏฺฐา อสมฺผุฏฺฐปุพฺพา, น จ ผุสสิ, น จ เต โหติ ผุเสยฺยนฺติ? อตฺถิ เต ตตฺถ ฉนฺโท วา ราโค วา เปมํ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “वे स्पर्श जो काय-विज्ञान द्वारा जानने योग्य हैं, जिन्हें तुमने स्पर्श नहीं किया, पहले कभी नहीं किया, जिन्हें तुम अभी स्पर्श नहीं कर रहे हो और न ही उन्हें स्पर्श करने की इच्छा तुम्हारे मन में होती है— क्या उनमें तुम्हारा कोई छंद, राग या प्रेम है?” “नहीं, भन्ते।” ‘‘เย เต มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อวิญฺญาตา อวิญฺญาตปุพฺพา, น จ วิชานาสิ, น จ เต โหติ วิชาเนยฺยนฺติ? อตฺถิ เต ตตฺถ ฉนฺโท วา ราโค วา เปมํ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “वे धर्म (मानसिक विषय) जो मनो-विज्ञान द्वारा जानने योग्य हैं, जिन्हें तुमने नहीं जाना, पहले कभी नहीं जाना, जिन्हें तुम अभी नहीं जान रहे हो और न ही उन्हें जानने की इच्छा तुम्हारे मन में होती है— क्या उनमें तुम्हारा कोई छंद, राग या प्रेम है?” “नहीं, भन्ते।” ‘‘เอตฺถ จ เต, มาลุกฺยปุตฺต, ทิฏฺฐสุตมุตวิญฺญาตพฺเพสุ ธมฺเมสุ ทิฏฺเฐ ทิฏฺฐมตฺตํ ภวิสฺสติ, สุเต สุตมตฺตํ ภวิสฺสติ, มุเต มุตมตฺตํ ภวิสฺสติ, วิญฺญาเต วิญฺญาตมตฺตํ ภวิสฺสติ. ยโต โข เต, มาลุกฺยปุตฺต, ทิฏฺฐสุตมุตวิญฺญาตพฺเพสุ ธมฺเมสุ ทิฏฺเฐ ทิฏฺฐมตฺตํ ภวิสฺสติ, สุเต สุตมตฺตํ ภวิสฺสติ[Pg.296], มุเต มุตมตฺตํ ภวิสฺสติ, วิญฺญาเต วิญฺญาตมตฺตํ ภวิสฺสติ; ตโต ตฺวํ, มาลุกฺยปุตฺต, น เตน. ยโต ตฺวํ, มาลุกฺยปุตฺต, น เตน; ตโต ตฺวํ, มาลุกฺยปุตฺต, น ตตฺถ. ยโต ตฺวํ, มาลุกฺยปุตฺต, น ตตฺถ; ตโต ตฺวํ, มาลุกฺยปุตฺต, เนวิธ, น หุรํ, น อุภยมนฺตเรน. เอเสวนฺโต ทุกฺขสฺสา’’ติ. “हे मालुक्यपुत्र! इन देखे गए, सुने गए, अनुभव किए गए और जाने गए विषयों में, तुम्हारे लिए देखे हुए में केवल देखना मात्र होगा, सुने हुए में केवल सुनना मात्र होगा, अनुभव किए हुए में केवल अनुभव मात्र होगा, और जाने हुए में केवल जानना मात्र होगा। मालुक्यपुत्र! जब तुम्हारे लिए देखे गए, सुने गए, अनुभव किए गए और जाने गए विषयों में, देखे हुए में केवल देखना मात्र होगा, सुने हुए में केवल सुनना मात्र होगा, अनुभव किए हुए में केवल अनुभव मात्र होगा, और जाने हुए में केवल जानना मात्र होगा; तब मालुक्यपुत्र, तुम उसके द्वारा (राग, द्वेष या मोह से प्रभावित) नहीं होगे। मालुक्यपुत्र! जब तुम उसके द्वारा नहीं होगे, तब मालुक्यपुत्र, तुम उसमें (उन विषयों में) नहीं होगे। मालुक्यपुत्र! जब तुम उसमें नहीं होगे, तब मालुक्यपुत्र, तुम न यहाँ होगे, न वहाँ होगे, और न ही दोनों के बीच में होगे। यही दु:ख का अंत है।” ‘‘อิมสฺส ขฺวาหํ, ภนฺเต, ภควตา สํขิตฺเตน ภาสิตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานามิ – “भन्ते! भगवान द्वारा संक्षेप में कहे गए इस (वचन) के अर्थ को मैं विस्तार से इस प्रकार समझता हूँ —” ‘‘รูปํ ทิสฺวา สติ มุฏฺฐา, ปิยํ นิมิตฺตํ มนสิ กโรโต; สารตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ อชฺโฌส ติฏฺฐติ. रूप को देखकर, प्रिय निमित्त (सुखद लक्षण) का मनन करने वाले की स्मृति खो जाती है; वह आसक्त चित्त से अनुभव करता है और उसमें लिप्त होकर स्थित रहता है। ‘‘ตสฺส วฑฺฒนฺติ เวทนา, อเนกา รูปสมฺภวา; อภิชฺฌา จ วิเหสา จ, จิตฺตมสฺสูปหญฺญติ; เอวํ อาจินโต ทุกฺขํ, อารา นิพฺพานมุจฺจติ. उसके लिए रूप से उत्पन्न अनेक वेदनाएँ बढ़ती हैं; लोभ और विहंसा (पीड़ा) से उसका चित्त पीड़ित होता है; इस प्रकार दुःख का संचय करने वाले के लिए निर्वाण दूर कहा जाता है। ‘‘สทฺทํ สุตฺวา สติ มุฏฺฐา, ปิยํ นิมิตฺตํ มนสิ กโรโต; สารตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ อชฺโฌส ติฏฺฐติ. शब्द को सुनकर, प्रिय निमित्त का मनन करने वाले की स्मृति खो जाती है; वह आसक्त चित्त से अनुभव करता है और उसमें लिप्त होकर स्थित रहता है। ‘‘ตสฺส วฑฺฒนฺติ เวทนา, อเนกา สทฺทสมฺภวา; อภิชฺฌา จ วิเหสา จ, จิตฺตมสฺสูปหญฺญติ; เอวํ อาจินโต ทุกฺขํ, อารา นิพฺพานมุจฺจติ. उसके लिए शब्द से उत्पन्न अनेक वेदनाएँ बढ़ती हैं; लोभ और विहंसा से उसका चित्त पीड़ित होता है; इस प्रकार दुःख का संचय करने वाले के लिए निर्वाण दूर कहा जाता है। ‘‘คนฺธํ ฆตฺวา สติ มุฏฺฐา, ปิยํ นิมิตฺตํ มนสิ กโรโต; สารตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ อชฺโฌส ติฏฺฐติ. गंध को सूंघकर, प्रिय निमित्त का मनन करने वाले की स्मृति खो जाती है; वह आसक्त चित्त से अनुभव करता है और उसमें लिप्त होकर स्थित रहता है। ‘‘ตสฺส วฑฺฒนฺติ เวทนา, อเนกา คนฺธสมฺภวา; อภิชฺฌา จ วิเหสา จ, จิตฺตมสฺสูปหญฺญติ; เอวํ อาจินโต ทุกฺขํ, อารา นิพฺพานมุจฺจติ. उसके लिए गंध से उत्पन्न अनेक वेदनाएँ बढ़ती हैं; लोभ और विहंसा से उसका चित्त पीड़ित होता है; इस प्रकार दुःख का संचय करने वाले के लिए निर्वाण दूर कहा जाता है। ‘‘รสํ โภตฺวา สติ มุฏฺฐา, ปิยํ นิมิตฺตํ มนสิ กโรโต; สารตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ อชฺโฌส ติฏฺฐติ. रस का आस्वादन कर, प्रिय निमित्त का मनन करने वाले की स्मृति खो जाती है; वह आसक्त चित्त से अनुभव करता है और उसमें लिप्त होकर स्थित रहता है। ‘‘ตสฺส วฑฺฒนฺติ เวทนา, อเนกา รสสมฺภวา; อภิชฺฌา จ วิเหสา จ, จิตฺตมสฺสูปหญฺญติ; เอวํ อาจินโต ทุกฺขํ, อารา นิพฺพานมุจฺจติ. उसके लिए रस से उत्पन्न अनेक वेदनाएँ बढ़ती हैं; लोभ और विहंसा से उसका चित्त पीड़ित होता है; इस प्रकार दुःख का संचय करने वाले के लिए निर्वाण दूर कहा जाता है। ‘‘ผสฺสํ [Pg.297] ผุสฺส สติ มุฏฺฐา, ปิยํ นิมิตฺตํ มนสิ กโรโต; สารตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ อชฺโฌส ติฏฺฐติ. स्पर्श का अनुभव कर, प्रिय निमित्त का मनन करने वाले की स्मृति खो जाती है; वह आसक्त चित्त से अनुभव करता है और उसमें लिप्त होकर स्थित रहता है। ‘‘ตสฺส วฑฺฒนฺติ เวทนา, อเนกา ผสฺสสมฺภวา; อภิชฺฌา จ วิเหสา จ, จิตฺตมสฺสูปหญฺญติ; เอวํ อาจินโต ทุกฺขํ, อารา นิพฺพานมุจฺจติ. उसके लिए स्पर्श से उत्पन्न अनेक वेदनाएँ बढ़ती हैं; लोभ और विहंसा से उसका चित्त पीड़ित होता है; इस प्रकार दुःख का संचय करने वाले के लिए निर्वाण दूर कहा जाता है। ‘‘ธมฺมํ ญตฺวา สติ มุฏฺฐา, ปิยํ นิมิตฺตํ มนสิ กโรโต; สารตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ อชฺโฌส ติฏฺฐติ. धम्म (मनोविषय) को जानकर, प्रिय निमित्त का मनन करने वाले की स्मृति खो जाती है; वह आसक्त चित्त से अनुभव करता है और उसमें लिप्त होकर स्थित रहता है। ‘‘ตสฺส วฑฺฒนฺติ เวทนา, อเนกา ธมฺมสมฺภวา; อภิชฺฌา จ วิเหสา จ, จิตฺตมสฺสูปหญฺญติ; เอวํ อาจินโต ทุกฺขํ, อารา นิพฺพานมุจฺจติ. उसके लिए धम्म से उत्पन्न अनेक वेदनाएँ बढ़ती हैं; लोभ और विहंसा से उसका चित्त पीड़ित होता है; इस प्रकार दुःख का संचय करने वाले के लिए निर्वाण दूर कहा जाता है। ‘‘น โส รชฺชติ รูเปสุ, รูปํ ทิสฺวา ปฏิสฺสโต; วิรตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ นาชฺโฌส ติฏฺฐติ. वह रूपों में आसक्त नहीं होता, रूप को देखकर वह स्मृतिमान रहता है; वह विरक्त चित्त से अनुभव करता है और उसमें लिप्त होकर नहीं रहता। ‘‘ยถาสฺส ปสฺสโต รูปํ, เสวโต จาปิ เวทนํ; ขียติ โนปจียติ, เอวํ โส จรตี สโต; เอวํ อปจินโต ทุกฺขํ, สนฺติเก นิพฺพานมุจฺจติ. जिस प्रकार रूप को देखते हुए और वेदना का अनुभव करते हुए उसका दुःख क्षय होता है, संचय नहीं होता, वह उसी प्रकार स्मृतिमान होकर विचरण करता है; इस प्रकार दुःख का क्षय करने वाले के लिए निर्वाण निकट कहा जाता है। ‘‘น โส รชฺชติ สทฺเทสุ, สทฺทํ สุตฺวา ปฏิสฺสโต; วิรตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ นาชฺโฌส ติฏฺฐติ. वह शब्दों में आसक्त नहीं होता, शब्द को सुनकर वह स्मृतिमान रहता है; वह विरक्त चित्त से अनुभव करता है और उसमें लिप्त होकर नहीं रहता। ‘‘ยถาสฺส สุณโต สทฺทํ, เสวโต จาปิ เวทนํ; ขียติ โนปจียติ, เอวํ โส จรตี สโต; เอวํ อปจินโต ทุกฺขํ, สนฺติเก นิพฺพานมุจฺจติ. जिस प्रकार शब्द को सुनते हुए और वेदना का अनुभव करते हुए उसका दुःख क्षय होता है, संचय नहीं होता, वह उसी प्रकार स्मृतिमान होकर विचरण करता है; इस प्रकार दुःख का क्षय करने वाले के लिए निर्वाण निकट कहा जाता है। ‘‘น โส รชฺชติ คนฺเธสุ, คนฺธํ ฆตฺวา ปฏิสฺสโต; วิรตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ นาชฺโฌส ติฏฺฐติ. वह गंधों में आसक्त नहीं होता, गंध को सूंघकर वह स्मृतिमान रहता है; वह विरक्त चित्त से अनुभव करता है और उसमें लिप्त होकर नहीं रहता। ‘‘ยถาสฺส ฆายโต คนฺธํ, เสวโต จาปิ เวทนํ; ขียติ โนปจียติ, เอวํ โส จรตี สโต; เอวํ อปจินโต ทุกฺขํ, สนฺติเก นิพฺพานมุจฺจติ. जिस प्रकार गंध को सूंघते हुए और वेदना का अनुभव करते हुए उसका दुःख क्षय होता है, संचय नहीं होता, वह उसी प्रकार स्मृतिमान होकर विचरण करता है; इस प्रकार दुःख का क्षय करने वाले के लिए निर्वाण निकट कहा जाता है। ‘‘น โส รชฺชติ รเสสุ, รสํ โภตฺวา ปฏิสฺสโต; วิรตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ นาชฺโฌส ติฏฺฐติ. वह रसों में आसक्त नहीं होता, रस का आस्वादन कर वह स्मृतिमान रहता है; वह विरक्त चित्त से अनुभव करता है और उसमें लिप्त होकर नहीं रहता। ‘‘ยถาสฺส [Pg.298] สายโต รสํ, เสวโต จาปิ เวทนํ; ขียติ โนปจียติ, เอวํ โส จรตี สโต; เอวํ อปจินโต ทุกฺขํ, สนฺติเก นิพฺพานมุจฺจติ. जिस प्रकार रस का आस्वादन करते हुए और वेदना का अनुभव करते हुए उसका दुःख क्षय होता है, संचय नहीं होता, वह उसी प्रकार स्मृतिमान होकर विचरण करता है; इस प्रकार दुःख का क्षय करने वाले के लिए निर्वाण निकट कहा जाता है। ‘‘น โส รชฺชติ ผสฺเสสุ, ผสฺสํ ผุสฺส ปฏิสฺสโต; วิรตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ นาชฺโฌส ติฏฺฐติ. वह स्पर्शों में आसक्त नहीं होता, स्पर्श का अनुभव कर वह स्मृतिमान रहता है; वह विरक्त चित्त से अनुभव करता है और उसमें लिप्त होकर नहीं रहता। ‘‘ยถาสฺส ผุสโต ผสฺสํ, เสวโต จาปิ เวทนํ; ขียติ โนปจียติ, เอวํ โส จรตี สโต; เอวํ อปจินโต ทุกฺขํ, สนฺติเก นิพฺพานมุจฺจติ. जिस प्रकार स्पर्श का अनुभव करते हुए और वेदना का अनुभव करते हुए उसका दुःख क्षय होता है, संचय नहीं होता, वह उसी प्रकार स्मृतिमान होकर विचरण करता है; इस प्रकार दुःख का क्षय करने वाले के लिए निर्वाण निकट कहा जाता है। ‘‘น โส รชฺชติ ธมฺเมสุ, ธมฺมํ ญตฺวา ปฏิสฺสโต; วิรตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ นาชฺโฌส ติฏฺฐติ. वह धम्मों (मनोविषयों) में आसक्त नहीं होता, धम्म को जानकर वह स्मृतिमान रहता है; वह विरक्त चित्त से अनुभव करता है और उसमें लिप्त होकर नहीं रहता। ‘‘ยถาสฺส ชานโต ธมฺมํ, เสวโต จาปิ เวทนํ; ขียติ โนปจียติ, เอวํ โส จรตี สโต; เอวํ อปจินโต ทุกฺขํ, สนฺติเก นิพฺพานมุจฺจตี’’ติ. जिस प्रकार धम्म को जानते हुए और वेदना का अनुभव करते हुए उसका दुःख क्षय होता है, संचय नहीं होता, वह उसी प्रकार स्मृतिमान होकर विचरण करता है; इस प्रकार दुःख का क्षय करने वाले के लिए निर्वाण निकट कहा जाता है। ‘‘อิมสฺส ขฺวาหํ, ภนฺเต, ภควตา สํขิตฺเตน ภาสิตสฺส เอวํ วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานามี’’ติ. ‘‘สาธุ สาธุ, มาลุกฺยปุตฺต! สาธุ โข ตฺวํ, มาลุกฺยปุตฺต, มยา สํขิตฺเตน ภาสิตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานาสิ – “भन्ते! भगवान द्वारा संक्षेप में कहे गए इस उपदेश का अर्थ मैं इस प्रकार विस्तार से समझता हूँ।” “साधु, साधु मालुक्यपुत्त! मालुक्यपुत्त, यह बहुत अच्छा है कि तुम मेरे द्वारा संक्षेप में कहे गए उपदेश का अर्थ विस्तार से समझते हो—” ‘‘รูปํ ทิสฺวา สติ มุฏฺฐา, ปิยํ นิมิตฺตํ มนสิ กโรโต; สารตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ อชฺโฌส ติฏฺฐติ. रूप को देखकर, प्रिय निमित्त का मनन करने वाले की स्मृति खो जाती है; वह आसक्त चित्त से अनुभव करता है और उसमें लिप्त होकर स्थित रहता है। ‘‘ตสฺส วฑฺฒนฺติ เวทนา, อเนกา รูปสมฺภวา; อภิชฺฌา จ วิเหสา จ, จิตฺตมสฺสูปหญฺญติ; เอวํ อาจินโต ทุกฺขํ, อารา นิพฺพานมุจฺจติ.…เป…. उसके लिए रूप से उत्पन्न अनेक वेदनाएँ बढ़ती हैं; लोभ और विहंसा से उसका चित्त पीड़ित होता है; इस प्रकार दुःख का संचय करने वाले के लिए निर्वाण दूर कहा जाता है। ...पे... ‘‘น โส รชฺชติ ธมฺเมสุ, ธมฺมํ ญตฺวา ปฏิสฺสโต; วิรตฺตจิตฺโต เวเทติ, ตญฺจ นาชฺโฌส ติฏฺฐติ. वह धम्मों में आसक्त नहीं होता, धम्म को जानकर वह स्मृतिमान रहता है; वह विरक्त चित्त से अनुभव करता है और उसमें लिप्त होकर नहीं रहता। ‘‘ยถาสฺส วิชานโต ธมฺมํ, เสวโต จาปิ เวทนํ; ขียติ โนปจียติ, เอวํ โส จรตี สโต; เอวํ อปจินโต ทุกฺขํ, สนฺติเก นิพฺพานมุจฺจตี’’ติ. जिस प्रकार धम्म को जानते हुए और वेदना का अनुभव करते हुए उसका दुःख क्षय होता है, संचय नहीं होता, वह उसी प्रकार स्मृतिमान होकर विचरण करता है; इस प्रकार दुःख का क्षय करने वाले के लिए निर्वाण निकट कहा जाता है। ‘‘อิมสฺส โข, มาลุกฺยปุตฺต, มยา สํขิตฺเตน ภาสิตสฺส เอวํ วิตฺถาเรน อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ’’ติ. “मालुक्यपुत्त! मेरे द्वारा संक्षेप में कहे गए इस उपदेश का अर्थ इसी प्रकार विस्तार से समझना चाहिए।” อถ [Pg.299] โข อายสฺมา มาลุกฺยปุตฺโต ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. อถ โข อายสฺมา มาลุกฺยปุตฺโต เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรนฺโต นจิรสฺเสว – ยสฺสตฺถาย กุลปุตฺตา สมฺมเทว อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชนฺติ ตทนุตฺตรํ พฺรหฺมจริยปริโยสานํ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหาสิ. ‘‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’’ติ อพฺภญฺญาสิ. อญฺญตโร จ ปนายสฺมา มาลุกฺยปุตฺโต อรหตํ อโหสีติ. ทุติยํ. तब आयुष्मान मालुक्यपुत्त भगवान के भाषण का अभिनन्दन और अनुमोदन कर, आसन से उठकर, भगवान को अभिवादन कर और प्रदक्षिणा कर चले गए। तब आयुष्मान मालुक्यपुत्त अकेले, एकांत में, अप्रमत्त, उत्साही और दृढ़संकल्प होकर विहार करते हुए शीघ्र ही—जिसके लिए कुलपुत्र सम्यक रूप से घर से बेघर होकर प्रव्रजित होते हैं—उस अनुत्तर ब्रह्मचर्य की पूर्णता को इसी जन्म में स्वयं उच्च ज्ञान से जानकर, साक्षात्कार कर और प्राप्त कर विहार करने लगे। उन्होंने जान लिया—'जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है।' और आयुष्मान मालुक्यपुत्त अर्हतों में से एक हो गए। (दूसरा सूत्त समाप्त)। ๓. ปริหานธมฺมสุตฺตํ ३. परिहानधम्म सुत्त ๙๖. ‘‘ปริหานธมฺมญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อปริหานธมฺมญฺจ ฉ จ อภิภายตนานิ. ตํ สุณาถ. กถญฺจ, ภิกฺขเว, ปริหานธมฺโม โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อธิวาเสติ นปฺปชหติ น วิโนเทติ น พฺยนฺตีกโรติ น อนภาวํ คเมติ, เวทิตพฺพเมตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนา – ‘ปริหายามิ กุสเลหิ ธมฺเมหิ’. ปริหานญฺเหตํ วุตฺตํ ภควตาติ…เป…. ९६. "भिक्षुओं, मैं तुम्हें पतन के स्वभाव वाले धर्म (परिहानधम्म), पतन न होने के स्वभाव वाले धर्म (अपरिहानधम्म) और छह अभिभायतन (अभिभूत करने वाले आयतन) का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। और भिक्षुओं, पतन का स्वभाव वाला धर्म क्या है? भिक्षुओं, यहाँ किसी भिक्षु को आँख से रूप देखकर पापमय, अकुशल, चंचल विचार (सरसंकप्पा) और संयोजन (बंधन) उत्पन्न होते हैं। यदि भिक्षु उन्हें स्वीकार करता है, त्यागता नहीं, दूर नहीं करता, नष्ट नहीं करता, और उन्हें पुनर्जन्म तक नहीं पहुँचाता, तो भिक्षुओं, उस भिक्षु को यह जानना चाहिए—'मैं कुशल धर्मों से गिर रहा हूँ'। भगवान ने इसे ही 'परिहान' (पतन) कहा है...।" ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา อุปฺปชฺชนฺติ…เป… ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อธิวาเสติ นปฺปชหติ น วิโนเทติ น พฺยนฺตีกโรติ น อนภาวํ คเมติ, เวทิตพฺพเมตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนา – ‘ปริหายามิ กุสเลหิ ธมฺเมหิ’. ปริหานญฺเหตํ วุตฺตํ ภควตาติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ปริหานธมฺโม โหติ. "फिर भिक्षुओं, भिक्षु को जीभ से रस चखकर... फिर भिक्षुओं, भिक्षु को मन से धर्म (विचार) जानकर पापमय, अकुशल, चंचल विचार और संयोजन उत्पन्न होते हैं। यदि भिक्षु उन्हें स्वीकार करता है, त्यागता नहीं, दूर नहीं करता, नष्ट नहीं करता, और उन्हें पुनर्जन्म तक नहीं पहुँचाता, तो भिक्षुओं, उस भिक्षु को यह जानना चाहिए—'मैं कुशल धर्मों से गिर रहा हूँ'। भगवान ने इसे ही 'परिहान' कहा है। भिक्षुओं, इस प्रकार पतन का स्वभाव वाला धर्म होता है।" ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, อปริหานธมฺโม โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาธิวาเสติ ปชหติ วิโนเทติ พฺยนฺตีกโรติ อนภาวํ คเมติ, เวทิตพฺพเมตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนา – ‘น ปริหายามิ กุสเลหิ ธมฺเมหิ’. อปริหานญฺเหตํ วุตฺตํ ภควตาติ…เป…. "और भिक्षुओं, पतन न होने के स्वभाव वाला धर्म क्या है? भिक्षुओं, यहाँ किसी भिक्षु को आँख से रूप देखकर पापमय, अकुशल, चंचल विचार और संयोजन उत्पन्न होते हैं। यदि भिक्षु उन्हें स्वीकार नहीं करता, त्याग देता है, दूर कर देता है, नष्ट कर देता है, और उन्हें पुनर्जन्म तक नहीं पहुँचने देता, तो भिक्षुओं, उस भिक्षु को यह जानना चाहिए—'मैं कुशल धर्मों से नहीं गिर रहा हूँ'। भगवान ने इसे ही 'अपरिहान' (पतन न होना) कहा है...।" ‘‘ปุน [Pg.300] จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา อุปฺปชฺชนฺติ…เป… ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาธิวาเสติ ปชหติ วิโนเทติ พฺยนฺตีกโรติ อนภาวํ คเมติ, เวทิตพฺพเมตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนา – ‘น ปริหายามิ กุสเลหิ ธมฺเมหิ’. อปริหานญฺเหตํ วุตฺตํ ภควตาติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, อปริหานธมฺโม โหติ. "फिर भिक्षुओं, भिक्षु को जीभ से रस चखकर... फिर भिक्षुओं, भिक्षु को मन से धर्म जानकर पापमय, अकुशल, चंचल विचार और संयोजन उत्पन्न होते हैं। यदि भिक्षु उन्हें स्वीकार नहीं करता, त्याग देता है, दूर कर देता है, नष्ट कर देता है, और उन्हें पुनर्जन्म तक नहीं पहुँचने देता, तो भिक्षुओं, उस भिक्षु को यह जानना चाहिए—'मैं कुशल धर्मों से नहीं गिर रहा हूँ'। भगवान ने इसे ही 'अपरिहान' कहा है। भिक्षुओं, इस प्रकार पतन न होने के स्वभाव वाला धर्म होता है।" ‘‘กตมานิ จ, ภิกฺขเว, ฉ อภิภายตนานิ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา นุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. เวทิตพฺพเมตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนา – ‘อภิภูตเมตํ อายตนํ’. อภิภายตนญฺเหตํ วุตฺตํ ภควตาติ…เป… ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย นุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. เวทิตพฺพเมตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนา – ‘อภิภูตเมตํ อายตนํ’. อภิภายตนญฺเหตํ วุตฺตํ ภควตาติ. อิมานิ วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, ฉ อภิภายตนานี’’ติ. ตติยํ. "और भिक्षुओं, छह अभिभायतन कौन से हैं? भिक्षुओं, यहाँ किसी भिक्षु को आँख से रूप देखकर पापमय, अकुशल, चंचल विचार और संयोजन उत्पन्न नहीं होते। भिक्षुओं, उस भिक्षु को यह जानना चाहिए—'यह आयतन अभिभूत (वश में) कर लिया गया है'। भगवान ने इसे ही 'अभिभायतन' कहा है... फिर भिक्षुओं, भिक्षु को मन से धर्म जानकर पापमय, अकुशल धर्म, चंचल विचार और संयोजन उत्पन्न नहीं होते। भिक्षुओं, उस भिक्षु को यह जानना चाहिए—'यह आयतन अभिभूत कर लिया गया है'। भगवान ने इसे ही 'अभिभायतन' कहा है। भिक्षुओं, इन्हें ही छह अभिभायतन कहा जाता है।" (तीसरा सूत्त समाप्त)। ๔. ปมาทวิหารีสุตฺตํ ४. पमादविहारी सुत्त ๙๗. ‘‘ปมาทวิหาริญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อปฺปมาทวิหาริญฺจ. ตํ สุณาถ. กถญฺจ, ภิกฺขเว, ปมาทวิหารี โหติ? จกฺขุนฺทฺริยํ อสํวุตสฺส, ภิกฺขเว, วิหรโต จิตฺตํ พฺยาสิญฺจติ. จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ ตสฺส พฺยาสิตฺตจิตฺตสฺส ปาโมชฺชํ น โหติ. ปาโมชฺเช อสติ ปีติ น โหติ. ปีติยา อสติ ปสฺสทฺธิ น โหติ. ปสฺสทฺธิยา อสติ ทุกฺขํ โหติ. ทุกฺขิโน จิตฺตํ น สมาธิยติ. อสมาหิเต จิตฺเต ธมฺมา น ปาตุภวนฺติ. ธมฺมานํ อปาตุภาวา ปมาทวิหารี ตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ…เป… ชิวฺหินฺทฺริยํ อสํวุตสฺส, ภิกฺขเว, วิหรโต จิตฺตํ พฺยาสิญฺจติ ชิวฺหาวิญฺเญยฺเยสุ รเสสุ, ตสฺส พฺยาสิตฺตจิตฺตสฺส…เป… ปมาทวิหารี ตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ…เป… มนินฺทฺริยํ อสํวุตสฺส, ภิกฺขเว, วิหรโต จิตฺตํ พฺยาสิญฺจติ มโนวิญฺเญยฺเยสุ ธมฺเมสุ, ตสฺส พฺยาสิตฺตจิตฺตสฺส ปาโมชฺชํ น โหติ. ปาโมชฺเช อสติ ปีติ น โหติ. ปีติยา อสติ ปสฺสทฺธิ น โหติ. ปสฺสทฺธิยา อสติ ทุกฺขํ โหติ. ทุกฺขิโน จิตฺตํ น สมาธิยติ. อสมาหิเต จิตฺเต ธมฺมา น ปาตุภวนฺติ[Pg.301]. ธมฺมานํ อปาตุภาวา ปมาทวิหารี ตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ปมาทวิหารี โหติ. ९७. "भिक्षुओं, मैं तुम्हें प्रमाद में विहार करने वाले और अप्रमाद में विहार करने वाले का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। और भिक्षुओं, प्रमाद में विहार करने वाला कैसे होता है? भिक्षुओं, चक्षु-इन्द्रिय को असंयत (असुरक्षित) रखकर विहार करने वाले का चित्त चक्षु-विज्ञेय रूपों में आसक्त (सिक्त) हो जाता है। उस आसक्त चित्त वाले के लिए प्रमोद (प्रसन्नता) नहीं होता। प्रमोद न होने पर प्रीति नहीं होती। प्रीति न होने पर प्रश्रब्धि (शांति) नहीं होती। प्रश्रब्धि न होने पर दुःख होता है। दुःखी का चित्त समाहित नहीं होता। चित्त समाहित न होने पर धर्म (कुशल अवस्थाएँ) प्रकट नहीं होते। धर्मों के प्रकट न होने से वह 'प्रमादविहारी' (प्रमाद में विहार करने वाला) ही कहलाता है... भिक्षुओं, जिह्वा-इन्द्रिय को असंयत रखकर विहार करने वाले का चित्त जिह्वा-विज्ञेय रसों में आसक्त हो जाता है... वह 'प्रमादविहारी' ही कहलाता है... भिक्षुओं, मन-इन्द्रिय को असंयत रखकर विहार करने वाले का चित्त मन-विज्ञेय धर्मों में आसक्त हो जाता है। उस आसक्त चित्त वाले के लिए प्रमोद नहीं होता। प्रमोद न होने पर प्रीति नहीं होती। प्रीति न होने पर प्रश्रब्धि नहीं होती। प्रश्रब्धि न होने पर दुःख होता है। दुःखी का चित्त समाहित नहीं होता। चित्त समाहित न होने पर धर्म प्रकट नहीं होते। धर्मों के प्रकट न होने से वह 'प्रमादविहारी' ही कहलाता है। भिक्षुओं, इस प्रकार प्रमादविहारी होता है।" ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, อปฺปมาทวิหารี โหติ? จกฺขุนฺทฺริยํ สํวุตสฺส, ภิกฺขเว, วิหรโต จิตฺตํ น พฺยาสิญฺจติ จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ, ตสฺส อพฺยาสิตฺตจิตฺตสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ. ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ. ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. ปสฺสทฺธกาโย สุขํ วิหรติ. สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. สมาหิเต จิตฺเต ธมฺมา ปาตุภวนฺติ. ธมฺมานํ ปาตุภาวา อปฺปมาทวิหารี ตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ…เป… ชิวฺหินฺทฺริยํ สํวุตสฺส, ภิกฺขเว, วิหรโต จิตฺตํ น พฺยาสิญฺจติ…เป… อปฺปมาทวิหารี ตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ. มนินฺทฺริยํ สํวุตสฺส, ภิกฺขเว, วิหรโต จิตฺตํ น พฺยาสิญฺจติ, มโนวิญฺเญยฺเยสุ ธมฺเมสุ, ตสฺส อพฺยาสิตฺตจิตฺตสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ. ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ. ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. ปสฺสทฺธกาโย สุขํ วิหรติ. สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. สมาหิเต จิตฺเต ธมฺมา ปาตุภวนฺติ. ธมฺมานํ ปาตุภาวา อปฺปมาทวิหารี ตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, อปฺปมาทวิหารี โหตี’’ติ. จตุตฺถํ. “भिक्षुओं, कोई कैसे अप्रमाद-विहारी (प्रमाद रहित होकर विहार करने वाला) होता है? भिक्षुओं, चक्षु-इन्द्रिय को संयमित कर विहार करने वाले का चित्त चक्षु-विज्ञेय रूपों में आसक्त (सिक्त) नहीं होता। उस अनासक्त चित्त वाले को प्रमोद उत्पन्न होता है। प्रमुदित को प्रीति उत्पन्न होती है। प्रीति-युक्त चित्त वाले की काया शांत हो जाती है। शांत काया वाला सुखपूर्वक विहार करता है। सुखी का चित्त समाहित हो जाता है। चित्त के समाहित होने पर धर्म (बोधिपाक्षिक धर्म) प्रकट होते हैं। धर्मों के प्रकट होने के कारण ही वह 'अप्रमाद-विहारी' कहलाता है। ... (इसी प्रकार) जिह्वा-इन्द्रिय को संयमित कर विहार करने वाले का चित्त ... अप्रमाद-विहारी कहलाता है। भिक्षुओं, मन-इन्द्रिय को संयमित कर विहार करने वाले का चित्त मन-विज्ञेय धर्मों में आसक्त नहीं होता। उस अनासक्त चित्त वाले को प्रमोद उत्पन्न होता है। प्रमुदित को प्रीति उत्पन्न होती है। प्रीति-युक्त चित्त वाले की काया शांत हो जाती है। शांत काया वाला सुखपूर्वक विहार करता है। सुखी का चित्त समाहित हो जाता है। चित्त के समाहित होने पर धर्म प्रकट होते हैं। धर्मों के प्रकट होने के कारण ही वह 'अप्रमाद-विहारी' कहलाता है। भिक्षुओं, इस प्रकार कोई अप्रमाद-विहारी होता है।” चतुर्थ। ๕. สํวรสุตฺตํ ५. संवर सूत्र ๙๘. ‘‘สํวรญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ, อสํวรญฺจ. ตํ สุณาถ. กถญฺจ, ภิกฺขเว, อสํวโร โหติ? สนฺติ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ, เวทิตพฺพเมตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนา – ‘ปริหายามิ กุสเลหิ ธมฺเมหิ’. ปริหานญฺเหตํ วุตฺตํ ภควตาติ…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ, เวทิตพฺพเมตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนา – ‘ปริหายามิ กุสเลหิ ธมฺเมหิ’. ปริหานญฺเหตํ วุตฺตํ ภควตาติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, อสํวโร โหติ. ९८. “भिक्षुओं, मैं तुम्हें संवर (संयम) और असंवर (असंयम) का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, असंवर क्या है? भिक्षुओं, चक्षु-विज्ञेय ऐसे रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रंजनीय (राग उत्पन्न करने वाले) हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है, तो भिक्षु को यह समझना चाहिए— 'मैं कुशल धर्मों से परिहीण (पतित) हो रहा हूँ। भगवान ने इसे ही परिहाणि (पतन) कहा है'। ... भिक्षुओं, जिह्वा-विज्ञेय रस हैं ... भिक्षुओं, मन-विज्ञेय ऐसे धर्म हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रंजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है, तो भिक्षु को यह समझना चाहिए— 'मैं कुशल धर्मों से परिहीण हो रहा हूँ। भगवान ने इसे ही परिहाणि कहा है'। भिक्षुओं, इस प्रकार असंवर होता है।” ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, สํวโร โหติ? สนฺติ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ, เวทิตพฺพเมตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนา – ‘น ปริหายามิ กุสเลหิ ธมฺเมหิ’. อปริหานญฺเหตํ วุตฺตํ ภควตาติ [Pg.302] …เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ, เวทิตพฺพเมตํ ภิกฺขุนา – ‘น ปริหายามิ กุสเลหิ ธมฺเมหิ’. อปริหานญฺเหตํ วุตฺตํ ภควตาติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, สํวโร โหตี’’ติ. ปญฺจมํ. “भिक्षुओं, संवर क्या है? भिक्षुओं, चक्षु-विज्ञेय ऐसे रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रंजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता, उनका स्वागत नहीं करता और उनमें आसक्त होकर स्थित नहीं रहता, तो भिक्षु को यह समझना चाहिए— 'मैं कुशल धर्मों से परिहीण नहीं हो रहा हूँ। भगवान ने इसे ही अपरिहाणि (पतन न होना) कहा है'। ... भिक्षुओं, जिह्वा-विज्ञेय रस हैं ... भिक्षुओं, मन-विज्ञेय ऐसे धर्म हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रंजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता, उनका स्वागत नहीं करता और उनमें आसक्त होकर स्थित नहीं रहता, तो भिक्षु को यह समझना चाहिए— 'मैं कुशल धर्मों से परिहीण नहीं हो रहा हूँ। भगवान ने इसे ही अपरिहाणि कहा है'। भिक्षुओं, इस प्रकार संवर होता है।” पंचम। ๖. สมาธิสุตฺตํ ६. समाधि सूत्र ๙๙. ‘‘สมาธึ, ภิกฺขเว, ภาเวถ. สมาหิโต, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ยถาภูตํ ปชานาติ. กิญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ? ‘จกฺขุ อนิจฺจ’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ; ‘รูปา อนิจฺจา’ติ ยถาภูตํ ปชานาติ; ‘จกฺขุวิญฺญาณํ อนิจฺจ’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ; ‘จกฺขุสมฺผสฺโส อนิจฺโจ’ติ ยถาภูตํ ปชานาติ. ‘ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจ’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ…เป… ‘มโน อนิจฺจ’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ. ธมฺมา… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺโส… ‘ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจ’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ. สมาธึ, ภิกฺขเว, ภาเวถ. สมาหิโต, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ยถาภูตํ ปชานาตี’’ติ. ฉฏฺฐํ. ९९. “भिक्षुओं, समाधि का भाव करो (समाधि विकसित करो)। भिक्षुओं, समाहित भिक्षु यथाभूत (जैसा है वैसा) जानता है। वह यथाभूत क्या जानता है? 'चक्षु अनित्य है'—ऐसा वह यथाभूत जानता है; 'रूप अनित्य हैं'—ऐसा वह यथाभूत जानता है; 'चक्षु-विज्ञान अनित्य है'—ऐसा वह यथाभूत जानता है; 'चक्षु-स्पर्श अनित्य है'—ऐसा वह यथाभूत जानता है। चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय (कारण) से जो सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, 'वह भी अनित्य है'—ऐसा वह यथाभूत जानता है। ... 'मन अनित्य है'—ऐसा वह यथाभूत जानता है। धर्म... मन-विज्ञान... मन-स्पर्श... मन-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, 'वह भी अनित्य है'—ऐसा वह यथाभूत जानता है। भिक्षुओं, समाधि का भाव करो। भिक्षुओं, समाहित भिक्षु यथाभूत जानता है।” षष्ठ। ๗. ปฏิสลฺลานสุตฺตํ ७. प्रतिसंलयन सूत्र ๑๐๐. ‘‘ปฏิสลฺลาเน, ภิกฺขเว, โยคมาปชฺชถ. ปฏิสลฺลีโน, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ยถาภูตํ ปชานาติ. กิญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ? ‘จกฺขุ อนิจฺจ’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ; ‘รูปา อนิจฺจา’ติ ยถาภูตํ ปชานาติ; ‘จกฺขุวิญฺญาณํ อนิจฺจ’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ; ‘จกฺขุสมฺผสฺโส อนิจฺโจ’ติ ยถาภูตํ ปชานาติ. ‘ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจ’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ…เป… ‘ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจ’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ. ปฏิสลฺลาเน, ภิกฺขเว, โยคมาปชฺชถ. ปฏิสลฺลีโน, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ยถาภูตํ ปชานาตี’’ติ. สตฺตมํ. १००. “भिक्षुओं, प्रतिसंलयन (एकान्त-वास) में योग (प्रयत्न) करो। भिक्षुओं, प्रतिसंलीन (एकान्त में स्थित) भिक्षु यथाभूत जानता है। वह यथाभूत क्या जानता है? 'चक्षु अनित्य है'—ऐसा वह यथाभूत जानता है; 'रूप अनित्य हैं'—ऐसा वह यथाभूत जानता है; 'चक्षु-विज्ञान अनित्य है'—ऐसा वह यथाभूत जानता है; 'चक्षु-स्पर्श अनित्य है'—ऐसा वह यथाभूत जानता है। चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, 'वह भी अनित्य है'—ऐसा वह यथाभूत जानता है। ... मन-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, 'वह भी अनित्य है'—ऐसा वह यथाभूत जानता है। भिक्षुओं, प्रतिसंलयन में योग करो। भिक्षुओं, प्रतिसंलीन भिक्षु यथाभूत जानता है।” सप्तम। ๘. ปฐมนตุมฺหากํสุตฺตํ ८. प्रथम न-तुम्हाक सूत्र ๑๐๑. ‘‘ยํ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ, ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ[Pg.303]. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. รูปา น ตุมฺหากํ. เต ปชหถ. เต โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสนฺติ. จกฺขุวิญฺญาณํ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. จกฺขุสมฺผสฺโส น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. โส โว ปหีโน หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. โสตํ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. สทฺทา น ตุมฺหากํ. เต ปชหถ. เต โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสนฺติ. โสตวิญฺญาณํ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. โสตสมฺผสฺโส น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. โส โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. ยมฺปิทํ โสตสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. ฆานํ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. คนฺธา น ตุมฺหากํ. เต ปชหถ. เต โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสนฺติ. ฆานวิญฺญาณํ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. ฆานสมฺผสฺโส น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. โส โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. ยมฺปิทํ ฆานสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. १०१. भिक्षुओं! जो तुम्हारा नहीं है, उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। और भिक्षुओं! क्या तुम्हारा नहीं है? भिक्षुओं! चक्षु (आँख) तुम्हारी नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। रूप तुम्हारे नहीं हैं। उन्हें त्याग दो। उनका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। चक्षु-विज्ञान तुम्हारा नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। चक्षु-संपर्श तुम्हारा नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। चक्षु-संपर्श के प्रत्यय (कारण) से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी तुम्हारी नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। श्रोत्र (कान) तुम्हारा नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। शब्द तुम्हारे नहीं हैं। उन्हें त्याग दो। उनका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। श्रोत्र-विज्ञान तुम्हारा नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। श्रोत्र-संपर्श तुम्हारा नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। श्रोत्र-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी तुम्हारी नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। घ्राण (नाक) तुम्हारा नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। गंध तुम्हारे नहीं हैं। उन्हें त्याग दो। उनका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। घ्राण-विज्ञान तुम्हारा नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। घ्राण-संपर्श तुम्हारा नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। घ्राण-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी तुम्हारी नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। ชิวฺหา น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. สา โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. รสา น ตุมฺหากํ. เต ปชหถ. เต โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสนฺติ. ชิวฺหาวิญฺญาณํ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. ชิวฺหาสมฺผสฺโส น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. โส โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ …เป…. जिह्वा (जीभ) तुम्हारी नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। रस तुम्हारे नहीं हैं। उन्हें त्याग दो। उनका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। जिह्वा-विज्ञान तुम्हारा नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। जिह्वा-संपर्श तुम्हारा नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। जिह्वा-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी तुम्हारी नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा... इत्यादि...। มโน น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. โส โว ปหีโน หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. ธมฺมา น ตุมฺหากํ. เต ปชหถ. เต โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสนฺติ. มโนวิญฺญาณํ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. มโนสมฺผสฺโส น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. โส โว ปหีโน หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. मन तुम्हारा नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। धर्म (मानसिक विषय) तुम्हारे नहीं हैं। उन्हें त्याग दो। उनका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। मनो-विज्ञान तुम्हारा नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। मनो-संपर्श तुम्हारा नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी तुम्हारी नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ยํ อิมสฺมึ เชตวเน ติณกฏฺฐสาขาปลาสํ ตํ ชโน หเรยฺย วา ฑเหยฺย วา ยถาปจฺจยํ วา กเรยฺย, อปิ นุ ตุมฺหากํ เอวมสฺส – ‘อมฺเห ชโน หรติ วา ฑหติ วา ยถาปจฺจยํ วา กโรตี’’’ติ? भिक्षुओं! जैसे इस जेतवन में जो घास, लकड़ी, शाखाएँ और पत्ते हैं, उन्हें यदि कोई व्यक्ति ले जाए, जला दे या अपनी इच्छानुसार उनका उपयोग करे, तो क्या तुम्हें ऐसा विचार आएगा कि 'लोग हमें ले जा रहे हैं, हमें जला रहे हैं या अपनी इच्छानुसार हमारे साथ व्यवहार कर रहे हैं'? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. नहीं, भन्ते! ‘‘ตํ กิสฺส เหตุ’’? वह किस कारण से? ‘‘น หิ โน เอตํ, ภนฺเต, อตฺตา วา อตฺตนิยํ วา’’ติ. क्योंकि भन्ते! वह न तो हमारा 'आत्मा' है और न ही 'आत्मीय' (हमारा अपना) है। ‘‘เอวเมว โข, ภิกฺขเว, จกฺขุ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. รูปา น ตุมฺหากํ… จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺโส…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสตี’’ติ. อฏฺฐมํ. इसी प्रकार, भिक्षुओं! चक्षु तुम्हारा नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। रूप तुम्हारे नहीं हैं... चक्षु-विज्ञान... चक्षु-संपर्श... इत्यादि... मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी तुम्हारी नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। (आठवाँ सुत्त समाप्त)। ๙. ทุติยนตุมฺหากํสุตฺตํ ९. द्वितीय न-तुम्हाकं सुत्त ๑๐๒. ‘‘ยํ[Pg.304], ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. รูปา น ตุมฺหากํ. เต ปชหถ. เต โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสนฺติ. จกฺขุวิญฺญาณํ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. จกฺขุสมฺผสฺโส น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. โส โว ปหีโน หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ น ตุมฺหากํ. ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. ยมฺปิ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ, ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสตี’’ติ. นวมํ. १०२. भिक्षुओं! जो तुम्हारा नहीं है, उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। और भिक्षुओं! क्या तुम्हारा नहीं है? भिक्षुओं! चक्षु तुम्हारी नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। रूप तुम्हारे नहीं हैं। उन्हें त्याग दो। उनका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। चक्षु-विज्ञान तुम्हारा नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। चक्षु-संपर्श तुम्हारा नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा... इत्यादि... मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी तुम्हारी नहीं है। उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। भिक्षुओं! जो तुम्हारा नहीं है, उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। (नौवाँ सुत्त समाप्त)। ๑๐. อุทกสุตฺตํ १०. उदक सुत्त ๑๐๓. ‘‘อุทโก สุทํ, ภิกฺขเว, รามปุตฺโต เอวํ วาจํ ภาสติ – ‘อิทํ ชาตุ เวทคู, อิทํ ชาตุ สพฺพชี, อิทํ ชาตุ อปลิขตํ คณฺฑมูลํ ปลิขณิ’นฺติ. ตํ โข ปเนตํ, ภิกฺขเว, อุทโก รามปุตฺโต อเวทคูเยว สมาโน ‘เวทคูสฺมี’ติ ภาสติ, อสพฺพชีเยว สมาโน ‘สพฺพชีสฺมี’ติ ภาสติ, อปลิขตํเยว คณฺฑมูลํ ปลิขตํ เม ‘คณฺฑมูล’นฺติ ภาสติ. อิธ โข ตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘อิทํ ชาตุ เวทคู, อิทํ ชาตุ สพฺพชี, อิทํ ชาตุ อปลิขตํ คณฺฑมูลํ ปลิขณิ’’’นฺติ. १०३. भिक्षुओं! रामपुत्र उदक इस प्रकार की वाणी बोलता है— 'मैं निश्चित ही वेदज्ञ (ज्ञानी) हूँ, मैं निश्चित ही सर्वविजेता हूँ, मैंने निश्चित ही न खोदे गए फोड़े की जड़ (दुःख की जड़) को खोद डाला है।' भिक्षुओं! रामपुत्र उदक वेदज्ञ न होते हुए भी कहता है कि 'मैं वेदज्ञ हूँ', सर्वविजेता न होते हुए भी कहता है कि 'मैं सर्वविजेता हूँ', और फोड़े की जड़ को न खोदते हुए भी कहता है कि 'मैंने फोड़े की जड़ को खोद डाला है।' भिक्षुओं! इस शासन में यदि कोई भिक्षु सम्यक् रूप से कहना चाहे, तो वह कह सकता है— 'मैं निश्चित ही वेदज्ञ हूँ, मैं निश्चित ही सर्वविजेता हूँ, मैंने निश्चित ही न खोदे गए फोड़े की जड़ को खोद डाला है'। ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, เวทคู โหติ? ยโต โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ; เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เวทคู โหติ. भिक्षुओं! भिक्षु कैसे वेदज्ञ होता है? भिक्षुओं! जब भिक्षु छह स्पर्श-आयतन के उदय, अस्त, आस्वाद, दोष और निस्सरण (मुक्ति) को यथार्थ रूप से जान लेता है; भिक्षुओं! इस प्रकार भिक्षु वेदज्ञ होता है। ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สพฺพชี โหติ? ยโต โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ วิทิตฺวา อนุปาทาวิมุตฺโต โหติ; เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สพฺพชี โหติ. भिक्षुओं! भिक्षु कैसे सर्वविजेता होता है? भिक्षुओं! जब भिक्षु छह स्पर्श-आयतन के उदय, अस्त, आस्वाद, दोष और निस्सरण को यथार्थ रूप से जानकर अनुपादा-विमुक्त (बिना आसक्ति के मुक्त) हो जाता है; भिक्षुओं! इस प्रकार भिक्षु सर्वविजेता होता है। ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน อปลิขตํ คณฺฑมูลํ ปลิขตํ โหติ? คณฺโฑติ โข, ภิกฺขเว, อิมสฺเสตํ จาตุมหาภูติกสฺส กายสฺส อธิวจนํ [Pg.305] มาตาเปตฺติกสมฺภวสฺส โอทนกุมฺมาสูปจยสฺส อนิจฺจุจฺฉาทนปริมทฺทนเภทนวิทฺธํสนธมฺมสฺส. คณฺฑมูลนฺติ โข, ภิกฺขเว, ตณฺหาเยตํ อธิวจนํ. ยโต โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ตณฺหา ปหีนา โหติ อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา; เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน อปลิขตํ คณฺฑมูลํ ปลิขตํ โหติ. भिक्षुओं! भिक्षु के लिए न खोदे गए फोड़े की जड़ कैसे खोद दी गई होती है? भिक्षुओं! 'फोड़ा' (गण्ड) इस चार महाभूतों से बने शरीर का नाम है, जो माता-पिता से उत्पन्न है, अन्न-दलिया से पुष्ट है, और अनित्यता, उबटन, मर्दन, भेदन तथा विनाश के स्वभाव वाला है। भिक्षुओं! 'फोड़े की जड़' (गण्डमूल) तृष्णा का नाम है। भिक्षुओं! जब भिक्षु की तृष्णा प्रहीण (नष्ट) हो जाती है, जड़ से कट जाती है, कटे हुए ताड़ के वृक्ष के समान हो जाती है, अभाव को प्राप्त हो जाती है और भविष्य में पुनः उत्पन्न न होने वाले स्वभाव वाली हो जाती है; भिक्षुओं! इस प्रकार भिक्षु के लिए न खोदे गए फोड़े की जड़ खोद दी गई होती है। ‘‘อุทโก สุทํ, ภิกฺขเว, รามปุตฺโต เอวํ วาจํ ภาสติ – ‘อิทํ ชาตุ เวทคู, อิทํ ชาตุ สพฺพชี, อิทํ ชาตุ อปลิขตํ คณฺฑมูลํ ปลิขณิ’นฺติ. ตํ โข ปเนตํ, ภิกฺขเว, อุทโก รามปุตฺโต อเวทคูเยว สมาโน ‘เวทคูสฺมี’ติ ภาสติ, อสพฺพชีเยว สมาโน ‘สพฺพชีสฺมี’ติ ภาสติ; อปลิขตํเยว คณฺฑมูลํ ‘ปลิขตํ เม คณฺฑมูล’นฺติ ภาสติ. อิธ โข ตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘อิทํ ชาตุ เวทคู, อิทํ ชาตุ สพฺพชี, อิทํ ชาตุ อปลิขตํ คณฺฑมูลํ ปลิขณิ’’’นฺติ. ทสมํ. भिक्षुओं! रामपुत्र उदक इस प्रकार की वाणी बोलता है— 'मैं निश्चित ही वेदज्ञ हूँ, मैं निश्चित ही सर्वविजेता हूँ, मैंने निश्चित ही न खोदे गए फोड़े की जड़ को खोद डाला है।' भिक्षुओं! रामपुत्र उदक वेदज्ञ न होते हुए भी कहता है कि 'मैं वेदज्ञ हूँ', सर्वविजेता न होते हुए भी कहता है कि 'मैं सर्वविजेता हूँ', और फोड़े की जड़ को न खोदते हुए भी कहता है कि 'मैंने फोड़े की जड़ को खोद डाला है।' भिक्षुओं! इस शासन में यदि कोई भिक्षु सम्यक् रूप से कहना चाहे, तो वह कह सकता है— 'मैं निश्चित ही वेदज्ञ हूँ, मैं निश्चित ही सर्वविजेता हूँ, मैंने निश्चित ही न खोदे गए फोड़े की जड़ को खोद डाला है'। दसवाँ सुत्त। สฬวคฺโค ทสโม. पाँचवाँ सळ-वग्ग समाप्त हुआ। ตสฺสุทฺทานํ – उसका उद्दान (विषय-सूची) इस प्रकार है— ทฺเว สํคยฺหา ปริหานํ, ปมาทวิหารี จ สํวโร; สมาธิ ปฏิสลฺลานํ, ทฺเว นตุมฺหาเกน อุทฺทโกติ. दो संगय्ह सुत्त, परिहान, प्रमादविहारी, संवर, समाधि, प्रतिसल्लान, दो न-तुम्हाक सुत्त और उदक सुत्त। สฬายตนวคฺเค ทุติยปณฺณาสโก สมตฺโต. सळायतन-वग्ग में द्वितीय पण्णासक समाप्त हुआ। ตสฺส วคฺคุทฺทานํ – उसका वग्ग-उद्दान— อวิชฺชา มิคชาลญฺจ, คิลานํ ฉนฺนํ จตุตฺถกํ; สฬวคฺเคน ปญฺญาสํ, ทุติโย ปณฺณาสโก อยนฺติ. अविद्या, मृगजल, ग्लान, चौथा छन्न और सळ-वग्ग के साथ पचास सुत्त; यह दूसरा पण्णासक है। ปฐมสตกํ. प्रथम शतक। ๑๑. โยคกฺเขมิวคฺโค ११. (11) योगक्खेमि-वग्ग ๑. โยคกฺเขมิสุตฺตํ १. 1. योगक्खेमि सुत्त ๑๐๔. สาวตฺถินิทานํ. ‘‘โยคกฺเขมิปริยายํ โว, ภิกฺขเว, ธมฺมปริยายํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, โยคกฺเขมิปริยาโย ธมฺมปริยาโย? สนฺติ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา [Pg.306] ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. เต ตถาคตสฺส ปหีนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. เตสญฺจ ปหานาย อกฺขาสิ โยคํ, ตสฺมา ตถาคโต ‘โยคกฺเขมี’ติ วุจฺจติ…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. เต ตถาคตสฺส ปหีนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. เตสญฺจ ปหานาย อกฺขาสิ โยคํ, ตสฺมา ตถาคโต ‘โยคกฺเขมี’ติ วุจฺจติ. อยํ โข, ภิกฺขเว, โยคกฺเขมิปริยาโย ธมฺมปริยาโย’’ติ. ปฐมํ. १०४. श्रावस्ती निदान। 'भिक्षुओं! मैं तुम्हें योगक्षेम-पर्याय (योगों से सुरक्षा का मार्ग) धर्म-पर्याय का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! योगक्षेम-पर्याय धर्म-पर्याय क्या है? भिक्षुओं! चक्षु-विज्ञेय रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और राग उत्पन्न करने वाले हैं। तथागत ने उन्हें प्रहीण कर दिया है, जड़ से काट दिया है, कटे हुए ताड़ के समान कर दिया है, अभाव को प्राप्त कर दिया है और भविष्य में पुनः उत्पन्न न होने वाले स्वभाव वाला बना दिया है। और उनके प्रहाण के लिए योग (प्रयत्न) का उपदेश दिया है, इसलिए तथागत 'योगक्षेमी' कहे जाते हैं... भिक्षुओं! मन-विज्ञेय धर्म हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और राग उत्पन्न करने वाले हैं। तथागत ने उन्हें प्रहीण कर दिया है, जड़ से काट दिया है, कटे हुए ताड़ के समान कर दिया है, अभाव को प्राप्त कर दिया है और भविष्य में पुनः उत्पन्न न होने वाले स्वभाव वाला बना दिया है। और उनके प्रहाण के लिए योग का उपदेश दिया है, इसलिए तथागत 'योगक्षेमी' कहे जाते हैं। भिक्षुओं! यही योगक्षेम-पर्याय धर्म-पर्याय है'। प्रथम सुत्त। ๒. อุปาทายสุตฺตํ २. 2. उपादाय सुत्त ๑๐๕. ‘‘กิสฺมึ นุ โข, ภิกฺขเว, สติ กึ อุปาทาย อุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺข’’นฺติ? १०५. भिक्षुओं! किसके होने पर, किसे ग्रहण (उपादान) करने पर भीतर सुख-दुःख उत्पन्न होता है? ‘‘ภควํมูลกา โน, ภนฺเต, ธมฺมา…เป…. भन्ते! हमारे धर्म (शिक्षाएँ) भगवान् ही जिनके मूल हैं...। ‘‘จกฺขุสฺมึ โข, ภิกฺขเว, สติ จกฺขุํ อุปาทาย อุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺขํ…เป… มนสฺมึ สติ มนํ อุปาทาย อุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺขํ. ตํ กึ มญฺญถ, ภิกฺขเว, จกฺขุ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? भिक्षुओं! चक्षु के होने पर, चक्षु को ग्रहण करने पर भीतर सुख-दुःख उत्पन्न होता है... मन के होने पर, मन को ग्रहण करने पर भीतर सुख-दुःख उत्पन्न होता है। भिक्षुओं! तुम क्या सोचते हो, चक्षु नित्य है या अनित्य? ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. भन्ते! अनित्य है। ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख? ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. भन्ते! दुःख है। ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, อปิ นุ ตํ อนุปาทาย อุปฺปชฺเชยฺย อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺข’’นฺติ? जो अनित्य, दुःख और विपरिणाम-धर्मी है, क्या उसे ग्रहण न करने पर भीतर सुख-दुःख उत्पन्न होगा? ‘‘โน เหตํ ภนฺเต’’…เป…. भन्ते! ऐसा नहीं होगा...। ‘‘ชิวฺหา นิจฺจา วา อนิจฺจา วา’’ติ? जिह्वा नित्य है या अनित्य? ‘‘อนิจฺจา, ภนฺเต’’. भन्ते! अनित्य है। ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख? ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. भन्ते! दुःख है। ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, อปิ นุ ตํ อนุปาทาย อุปฺปชฺเชยฺย อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺข’’นฺติ? जो अनित्य, दुःख और विपरिणाम-धर्मी है, क्या उसे ग्रहण न करने पर भीतर सुख-दुःख उत्पन्न होगा? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’…เป…. भन्ते! ऐसा नहीं होगा...। ‘‘มโน นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? "क्या मन नित्य है या अनित्य?" ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’. "भन्ते! अनित्य है।" ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? "जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?" ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. "भन्ते! दुःख है।" ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, อปิ นุ ตํ อนุปาทาย อุปฺปชฺเชยฺย อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺข’’นฺติ? "जो अनित्य, दुःख और विपरिणामधर्मा (परिवर्तनशील) है, क्या उसे ग्रहण न करने पर (बिना आसक्ति के) भीतर सुख या दुःख उत्पन्न हो सकता है?" ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "भन्ते! ऐसा नहीं है।" ‘‘เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. ทุติยํ. "भिक्षुओं! इस प्रकार देखते हुए श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षु से भी निर्वेद (वैराग्य) प्राप्त करता है... (पे)... मन से भी निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद से वह विरक्त होता है; विरक्ति से वह विमुक्त होता है; विमुक्त होने पर 'मैं विमुक्त हूँ' ऐसा ज्ञान होता है। वह जान लेता है— 'जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब यहाँ के लिए कुछ और शेष नहीं है'—ऐसा वह जान लेता है। दूसरा सूत्र।" ๓. ทุกฺขสมุทยสุตฺตํ ३. दुःखसमुदय सुत्त ๑๐๖. ‘‘ทุกฺขสฺส, ภิกฺขเว, สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, ทุกฺขสฺส สมุทโย? จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณํ[Pg.307]. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา. อยํ ทุกฺขสฺส สมุทโย…เป… ชิวฺหญฺจ ปฏิจฺจ รเส จ อุปฺปชฺชติ ชิวฺหาวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา. อยํ ทุกฺขสฺส สมุทโย…เป… มนญฺจ ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา. อยํ โข, ภิกฺขเว, ทุกฺขสฺส สมุทโย. १०६. "भिक्षुओं! मैं तुम्हें दुःख के उदय (उत्पत्ति) और अस्त (निरोध) का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! दुःख का उदय क्या है? चक्षु और रूपों के प्रतीत्य (कारण) चक्षु-विज्ञान उत्पन्न होता है। इन तीनों के मिलन से स्पर्श होता है। स्पर्श के प्रत्यय (कारण) से वेदना होती है; वेदना के प्रत्यय से तृष्णा होती है। यह दुःख का उदय है... (पे)... जिह्वा और रसों के प्रतीत्य जिह्वा-विज्ञान उत्पन्न होता है। इन तीनों के मिलन से स्पर्श होता है। स्पर्श के प्रत्यय से वेदना होती है; वेदना के प्रत्यय से तृष्णा होती है। यह दुःख का उदय है... (पे)... मन और धम्मों के प्रतीत्य मनो-विज्ञान उत्पन्न होता है। इन तीनों के मिलन से स्पर्श होता है। स्पर्श के प्रत्यय से वेदना होती है; वेदना के प्रत्यय से तृष्णा होती है। भिक्षुओं! यही दुःख का उदय है।" ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, ทุกฺขสฺส อตฺถงฺคโม? จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา. ตสฺสาเยว ตณฺหาย อเสสวิราคนิโรธา อุปาทานนิโรโธ; อุปาทานนิโรธา ภวนิโรโธ; ภวนิโรธา ชาตินิโรโธ; ชาตินิโรธา ชรามรณํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา นิรุชฺฌนฺติ. เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส นิโรโธ โหติ. อยํ ทุกฺขสฺส อตฺถงฺคโม…เป… ชิวฺหญฺจ ปฏิจฺจ รเส จ อุปฺปชฺชติ ชิวฺหาวิญฺญาณํ…เป… มนญฺจ ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา. ตสฺสาเยว ตณฺหาย อเสสวิราคนิโรธา อุปาทานนิโรโธ; อุปาทานนิโรธา ภวนิโรโธ; ภวนิโรธา ชาตินิโรโธ; ชาตินิโรธา ชรามรณํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา นิรุชฺฌนฺติ. เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส นิโรโธ โหติ. อยํ โข, ภิกฺขเว, ทุกฺขสฺส อตฺถงฺคโม’’ติ. ตติยํ. "भिक्षुओं! दुःख का अस्त (निरोध) क्या है? चक्षु और रूपों के प्रतीत्य चक्षु-विज्ञान उत्पन्न होता है। इन तीनों के मिलन से स्पर्श होता है। स्पर्श के प्रत्यय से वेदना होती है; वेदना के प्रत्यय से तृष्णा होती है। उसी तृष्णा के पूर्णतः वैराग्य और निरोध से उपादान का निरोध होता है; उपादान के निरोध से भव का निरोध होता है; भव के निरोध से जाति (जन्म) का निरोध होता है; जाति के निरोध से जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास निरुद्ध हो जाते हैं। इस प्रकार इस संपूर्ण दुःख-स्कंध का निरोध होता है। यह दुःख का अस्त है... (पे)... जिह्वा और रसों के प्रतीत्य जिह्वा-विज्ञान उत्पन्न होता है... (पे)... मन और धम्मों के प्रतीत्य मनो-विज्ञान उत्पन्न होता है। इन तीनों के मिलन से स्पर्श होता है। स्पर्श के प्रत्यय से वेदना होती है; वेदना के प्रत्यय से तृष्णा होती है। उसी तृष्णा के पूर्णतः वैराग्य और निरोध से उपादान का निरोध होता है; उपादान के निरोध से भव का निरोध होता है; भव के निरोध से जाति का निरोध होता है; जाति के निरोध से जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास निरुद्ध हो जाते हैं। इस प्रकार इस संपूर्ण दुःख-स्कंध का निरोध होता है। भिक्षुओं! यही दुःख का अस्त है। तीसरा सूत्र।" ๔. โลกสมุทยสุตฺตํ ४. लोकसमुदय सुत्त ๑๐๗. ‘‘โลกสฺส, ภิกฺขเว, สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, โลกสฺส สมุทโย? จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา; ตณฺหาปจฺจยา อุปาทานํ; อุปาทานปจฺจยา ภโว; ภวปจฺจยา ชาติ; ชาติปจฺจยา ชรามรณํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา สมฺภวนฺติ. อยํ โข, ภิกฺขเว, โลกสฺส สมุทโย …เป… ชิวฺหญฺจ ปฏิจฺจ รเส จ อุปฺปชฺชติ ชิวฺหาวิญฺญาณํ…เป… มนญฺจ ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา; ตณฺหาปจฺจยา อุปาทานํ; อุปาทานปจฺจยา ภโว[Pg.308]; ภวปจฺจยา ชาติ; ชาติปจฺจยา ชรามรณํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา สมฺภวนฺติ. อยํ โข, ภิกฺขเว, โลกสฺส สมุทโย. १०७. "भिक्षुओं! मैं तुम्हें लोक के उदय और अस्त का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! लोक का उदय क्या है? चक्षु और रूपों के प्रतीत्य चक्षु-विज्ञान उत्पन्न होता है। इन तीनों के मिलन से स्पर्श होता है। स्पर्श के प्रत्यय से वेदना होती है; वेदना के प्रत्यय से तृष्णा होती है; तृष्णा के प्रत्यय से उपादान होता है; उपादान के प्रत्यय से भव होता है; भव के प्रत्यय से जाति होती है; जाति के प्रत्यय से जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास उत्पन्न होते हैं। भिक्षुओं! यही लोक का उदय है... (पे)... जिह्वा और रसों के प्रतीत्य जिह्वा-विज्ञान उत्पन्न होता है... (पे)... मन और धम्मों के प्रतीत्य मनो-विज्ञान उत्पन्न होता है। इन तीनों के मिलन से स्पर्श होता है। स्पर्श के प्रत्यय से वेदना होती है; वेदना के प्रत्यय से तृष्णा होती है; तृष्णा के प्रत्यय से उपादान होता है; उपादान के प्रत्यय से भव होता है; भव के प्रत्यय से जाति होती है; जाति के प्रत्यय से जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास उत्पन्न होते हैं। भिक्षुओं! यही लोक का उदय है।" ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, โลกสฺส อตฺถงฺคโม? จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา. ตสฺสาเยว ตณฺหาย อเสสวิราคนิโรธา อุปาทานนิโรโธ; อุปาทานนิโรธา ภวนิโรโธ; ภวนิโรธา ชาตินิโรโธ; ชาตินิโรธา ชรามรณํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา นิรุชฺฌนฺติ. เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส นิโรโธ โหติ. อยํ โข, ภิกฺขเว, โลกสฺส อตฺถงฺคโม…เป… ชิวฺหญฺจ ปฏิจฺจ รเส จ อุปฺปชฺชติ…เป… มนญฺจ ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา. ตสฺสาเยว ตณฺหาย อเสสวิราคนิโรธา อุปาทานนิโรโธ; อุปาทานนิโรธา…เป… เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส นิโรโธ โหติ. อยํ โข, ภิกฺขเว, โลกสฺส อตฺถงฺคโม’’ติ. จตุตฺถํ. "भिक्षुओं! लोक का अस्त क्या है? चक्षु और रूपों के प्रतीत्य चक्षु-विज्ञान उत्पन्न होता है। इन तीनों के मिलन से स्पर्श होता है। स्पर्श के प्रत्यय से वेदना होती है; वेदना के प्रत्यय से तृष्णा होती है। उसी तृष्णा के पूर्णतः वैराग्य और निरोध से उपादान का निरोध होता है; उपादान के निरोध से भव का निरोध होता है; भव के निरोध से जाति का निरोध होता है; जाति के निरोध से जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास निरुद्ध हो जाते हैं। इस प्रकार इस संपूर्ण दुःख-स्कंध का निरोध होता है। भिक्षुओं! यही लोक का अस्त है... (पे)... जिह्वा और रसों के प्रतीत्य (जिह्वा-विज्ञान) उत्पन्न होता है... (पे)... मन और धम्मों के प्रतीत्य मनो-विज्ञान उत्पन्न होता है। इन तीनों के मिलन से स्पर्श होता है। स्पर्श के प्रत्यय से वेदना होती है; वेदना के प्रत्यय से तृष्णा होती है। उसी तृष्णा के पूर्णतः वैराग्य और निरोध से उपादान का निरोध होता है; उपादान के निरोध से... (पे)... इस प्रकार इस संपूर्ण दुःख-स्कंध का निरोध होता है। भिक्षुओं! यही लोक का अस्त है। चौथा सूत्र।" ๕. เสยฺโยหมสฺมิสุตฺตํ ५. सेय्योहमस्मि सुत्त ๑๐๘. ‘‘กิสฺมึ นุ โข, ภิกฺขเว, สติ กึ อุปาทาย กึ อภินิวิสฺส เสยฺโยหมสฺมีติ วา โหติ, สทิโสหมสฺมีติ วา โหติ, หีโนหมสฺมีติ วา โหตี’’ติ? १०८. "भिक्षुओं! किसके होने पर, किसे ग्रहण कर, किसमें अभिनिवेश (आसक्ति) कर 'मैं श्रेष्ठ हूँ' ऐसा होता है, या 'मैं समान हूँ' ऐसा होता है, या 'मैं हीन हूँ' ऐसा होता है?" ‘‘ภควํมูลกา โน, ภนฺเต, ธมฺมา. "भन्ते! हमारे धर्म (शिक्षाएँ) भगवान्-मूलक हैं (अर्थात् भगवान् ही उनके मूल हैं)।" ‘‘จกฺขุสฺมึ โข, ภิกฺขเว, สติ จกฺขุํ อุปาทาย จกฺขุํ อภินิวิสฺส เสยฺโยหมสฺมีติ วา โหติ, สทิโสหมสฺมีติ วา โหติ, หีโนหมสฺมีติ วา โหติ…เป… ชิวฺหาย สติ…เป… มนสฺมึ สติ มนํ อุปาทาย มนํ อภินิวิสฺส เสยฺโยหมสฺมีติ วา โหติ, สทิโสหมสฺมีติ วา โหติ, หีโนหมสฺมีติ วา โหติ. ตํ กึ มญฺญถ, ภิกฺขเว, จกฺขุ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “भिक्षुओं! चक्षु (आँख) के होने पर, चक्षु को उपादान (पकड़) कर, चक्षु में अभिनिवेश (आसक्ति) कर, 'मैं श्रेष्ठ हूँ' ऐसा होता है, या 'मैं समान हूँ' ऐसा होता है, या 'मैं हीन हूँ' ऐसा होता है... [इसी प्रकार] जिह्वा के होने पर... मन के होने पर, मन को उपादान कर, मन में अभिनिवेश कर, 'मैं श्रेष्ठ हूँ' ऐसा होता है, या 'मैं समान हूँ' ऐसा होता है, या 'मैं हीन हूँ' ऐसा होता है। भिक्षुओं! तुम क्या सोचते हो, क्या चक्षु नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “भन्ते! अनित्य है।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “भन्ते! दुःख है।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, อปิ นุ ตํ อนุปาทาย เสยฺโยหมสฺมีติ วา อสฺส, สทิโสหมสฺมีติ วา อสฺส, หีโนหมสฺมีติ วา อสฺสา’’ติ? “जो अनित्य, दुःख और विपरिणामधर्मी (बदलने वाला) है, क्या उसे उपादान न करने पर (बिना पकड़े) 'मैं श्रेष्ठ हूँ' ऐसा होगा, या 'मैं समान हूँ' ऐसा होगा, या 'मैं हीन हूँ' ऐसा होगा?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’…เป… ชิวฺหา… กาโย นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? “भन्ते! ऐसा नहीं है... [इसी प्रकार] जिह्वा... क्या काया नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’…เป…. “भन्ते! अनित्य है...” ‘‘มโน นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? “क्या मन नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’. “भन्ते! अनित्य है।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา [Pg.309] ตํ สุขํ วา’’ติ? “जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “भन्ते! दुःख है।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, อปิ นุ ตํ อนุปาทาย เสยฺโยหมสฺมีติ วา อสฺส, สทิโสหมสฺมีติ วา อสฺส, หีโนหมสฺมีติ วา อสฺสา’’ติ? “जो अनित्य, दुःख और विपरिणामधर्मी है, क्या उसे उपादान न करने पर 'मैं श्रेष्ठ हूँ' ऐसा होगा, या 'मैं समान हूँ' ऐसा होगा, या 'मैं हीन हूँ' ऐसा होगा?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “भन्ते! ऐसा नहीं है।” ‘‘เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. ปญฺจมํ. “भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षु से भी निर्वेद (वैराग्य) प्राप्त करता है... मन से भी निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद होने पर विरक्त होता है; वैराग्य से विमुक्त होता है; विमुक्त होने पर 'विमुक्त हूँ' ऐसा ज्ञान होता है। वह जान लेता है— 'जन्म क्षीण हो गया, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया, जो करना था वह कर लिया गया, अब इस अस्तित्व के लिए कुछ शेष नहीं है'।” ๖. สํโยชนิยสุตฺตํ ६. ६. संयोजनीय सुत्त ๑๐๙. ‘‘สํโยชนิเย จ, ภิกฺขเว, ธมฺเม เทเสสฺสามิ สํโยชนญฺจ. ตํ สุณาถ. กตเม จ, ภิกฺขเว, สํโยชนิยา ธมฺมา, กตมญฺจ สํโยชนํ? จกฺขุํ, ภิกฺขเว, สํโยชนิโย ธมฺโม. โย ตตฺถ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ…เป… ชิวฺหา สํโยชนิโย ธมฺโม…เป… มโน สํโยชนิโย ธมฺโม. โย ตตฺถ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. อิเม วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, สํโยชนิยา ธมฺมา, อิทํ สํโยชน’’นฺติ. ฉฏฺฐํ. १०९. “भिक्षुओं! मैं तुम्हें संयोजनीय (बंधन उत्पन्न करने वाले) धर्मों और संयोजन (बंधन) का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! संयोजनीय धर्म कौन से हैं और संयोजन क्या है? भिक्षुओं! चक्षु संयोजनीय धर्म है। उसमें जो छन्द-राग (इच्छा और आसक्ति) है, वह वहाँ संयोजन है... जिह्वा संयोजनीय धर्म है... मन संयोजनीय धर्म है। उसमें जो छन्द-राग है, वह वहाँ संयोजन है। भिक्षुओं! इन्हें संयोजनीय धर्म कहा जाता है और इसे संयोजन कहा जाता है।” ๗. อุปาทานิยสุตฺตํ ७. ७. उपादानीय सुत्त ๑๑๐. ‘‘อุปาทานิเย จ, ภิกฺขเว, ธมฺเม เทเสสฺสามิ อุปาทานญฺจ. ตํ สุณาถ. กตเม จ, ภิกฺขเว, อุปาทานิยา ธมฺมา, กตมญฺจ อุปาทานํ? จกฺขุํ, ภิกฺขเว, อุปาทานิโย ธมฺโม. โย ตตฺถ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ อุปาทานํ…เป… ชิวฺหา อุปาทานิโย ธมฺโม…เป… มโน อุปาทานิโย ธมฺโม. โย ตตฺถ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ อุปาทานํ. อิเม วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, อุปาทานิยา ธมฺมา, อิทํ อุปาทาน’’นฺติ. สตฺตมํ. ११०. “भिक्षुओं! मैं तुम्हें उपादानीय (उपादान उत्पन्न करने वाले) धर्मों और उपादान का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! उपादानीय धर्म कौन से हैं और उपादान क्या है? भिक्षुओं! चक्षु उपादानीय धर्म है। उसमें जो छन्द-राग है, वह वहाँ उपादान है... जिह्वा उपादानीय धर्म है... मन उपादानीय धर्म है। उसमें जो छन्द-राग है, वह वहाँ उपादान है। भिक्षुओं! इन्हें उपादानीय धर्म कहा जाता है और इसे उपादान कहा जाता है।” ๘. อชฺฌตฺติกายตนปริชานนสุตฺตํ ८. ८. अध्यात्मिक आयतन परिज्ञान सुत्त ๑๑๑. ‘‘จกฺขุํ, ภิกฺขเว, อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. โสตํ… ฆานํ… ชิวฺหํ… กายํ… มนํ อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. จกฺขุญฺจ โข, ภิกฺขเว, อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย…เป… ชิวฺหํ… กายํ… มนํ อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยายา’’ติ. อฏฺฐมํ. १११. “भिक्षुओं! चक्षु को विशेष रूप से न जानते हुए, पूर्णतः न समझते हुए, उससे विरक्त न होते हुए और उसे न त्यागते हुए, कोई दुःख के क्षय के लिए अयोग्य है। श्रोत्र... घ्राण... जिह्वा... काया... मन को विशेष रूप से न जानते हुए, पूर्णतः न समझते हुए, उससे विरक्त न होते हुए और उसे न त्यागते हुए, कोई दुःख के क्षय के लिए अयोग्य है। भिक्षुओं! चक्षु को विशेष रूप से जानते हुए, पूर्णतः समझते हुए, उससे विरक्त होते हुए और उसे त्यागते हुए, कोई दुःख के क्षय के लिए योग्य है... जिह्वा... काया... मन को विशेष रूप से जानते हुए, पूर्णतः समझते हुए, उससे विरक्त होते हुए और उसे त्यागते हुए, कोई दुःख के क्षय के लिए योग्य है।” ๙. พาหิรายตนปริชานนสุตฺตํ ९. ९. बाह्य आयतन परिज्ञान सुत्त ๑๑๒. ‘‘รูเป[Pg.310], ภิกฺขเว, อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. สทฺเท… คนฺเธ… รเส… โผฏฺฐพฺเพ… ธมฺเม อนภิชานํ อปริชานํ อวิราชยํ อปฺปชหํ อภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. รูเป จ โข, ภิกฺขเว, อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยาย. สทฺเท… คนฺเธ… รเส… โผฏฺฐพฺเพ… ธมฺเม อภิชานํ ปริชานํ วิราชยํ ปชหํ ภพฺโพ ทุกฺขกฺขยายา’’ติ. นวมํ. ११२. “भिक्षुओं! रूपों को विशेष रूप से न जानते हुए, पूर्णतः न समझते हुए, उनसे विरक्त न होते हुए और उन्हें न त्यागते हुए, कोई दुःख के क्षय के लिए अयोग्य है। शब्दों... गंधों... रसों... स्पर्शों... धर्मों को विशेष रूप से न जानते हुए, पूर्णतः न समझते हुए, उनसे विरक्त न होते हुए और उन्हें न त्यागते हुए, कोई दुःख के क्षय के लिए अयोग्य है। भिक्षुओं! रूपों को विशेष रूप से जानते हुए, पूर्णतः समझते हुए, उनसे विरक्त होते हुए और उन्हें त्यागते हुए, कोई दुःख के क्षय के लिए योग्य है। शब्दों... गंधों... रसों... स्पर्शों... धर्मों को विशेष रूप से जानते हुए, पूर्णतः समझते हुए, उनसे विरक्त होते हुए और उन्हें त्यागते हुए, कोई दुःख के क्षय के लिए योग्य है।” ๑๐. อุปสฺสุติสุตฺตํ १०. १०. उपश्रुति सुत्त ๑๑๓. เอกํ สมยํ ภควา นาติเก วิหรติ คิญฺชกาวสเถ. อถ โข ภควา รโหคโต ปฏิสลฺลีโน อิมํ ธมฺมปริยายํ อภาสิ – ‘‘จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา; ตณฺหาปจฺจยา อุปาทานํ; อุปาทานปจฺจยา ภโว; ภวปจฺจยา ชาติ; ชาติปจฺจยา ชรามรณํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา สมฺภวนฺติ. เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส สมุทโย โหติ. ชิวฺหญฺจ ปฏิจฺจ รเส จ อุปฺปชฺชติ…เป… มนญฺจ ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา; ตณฺหาปจฺจยา อุปาทานํ; อุปาทานปจฺจยา ภโว; ภวปจฺจยา ชาติ; ชาติปจฺจยา ชรามรณํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา สมฺภวนฺติ. เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส สมุทโย โหติ’’. ११३. एक समय भगवान नातिक में ईंटों के घर (गिञ्जकावसथ) में विहार कर रहे थे। तब भगवान एकांत में ध्यानस्थ होकर इस धर्म-पर्याय को बोले— 'चक्षु और रूपों के प्रतीत्य (कारण) से चक्षु-विज्ञान उत्पन्न होता है। इन तीनों के संगम से स्पर्श होता है। स्पर्श के प्रत्यय (कारण) से वेदना होती है; वेदना के प्रत्यय से तृष्णा; तृष्णा के प्रत्यय से उपादान; उपादान के प्रत्यय से भव; भव के प्रत्यय से जाति (जन्म); जाति के प्रत्यय से जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार इस संपूर्ण दुःख-स्कंध का उदय होता है। जिह्वा और रसों के प्रतीत्य से... मन और धर्मों के प्रतीत्य से मनो-विज्ञान उत्पन्न होता है। इन तीनों के संगम से स्पर्श होता है। स्पर्श के प्रत्यय से वेदना होती है; वेदना के प्रत्यय से तृष्णा; तृष्णा के प्रत्यय से उपादान; उपादान के प्रत्यय से भव; भव के प्रत्यय से जाति; जाति के प्रत्यय से जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार इस संपूर्ण दुःख-स्कंध का उदय होता है'। ‘‘จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา. ตสฺสาเยว ตณฺหาย อเสสวิราคนิโรธา อุปาทานนิโรโธ; อุปาทานนิโรธา ภวนิโรโธ; ภวนิโรธา ชาตินิโรโธ; ชาตินิโรธา ชรามรณํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา นิรุชฺฌนฺติ. เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส นิโรโธ โหติ…เป… ชิวฺหญฺจ ปฏิจฺจ รเส จ อุปฺปชฺชติ…เป… มนญฺจ ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณํ. ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส. ผสฺสปจฺจยา เวทนา; เวทนาปจฺจยา ตณฺหา. ตสฺสาเยว ตณฺหาย อเสสวิราคนิโรธา อุปาทานนิโรโธ[Pg.311]; อุปาทานนิโรธา…เป… เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส นิโรโธ โหตี’’ติ. “चक्षु और रूपों के आश्रय से चक्षु-विज्ञान उत्पन्न होता है। इन तीनों के मिलन से स्पर्श होता है। स्पर्श के प्रत्यय से वेदना होती है; वेदना के प्रत्यय से तृष्णा होती है। उसी तृष्णा के पूर्णतः विराग और निरोध से उपादान का निरोध होता है; उपादान के निरोध से भव का निरोध होता है; भव के निरोध से जाति का निरोध होता है; जाति के निरोध से जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास निरुद्ध हो जाते हैं। इस प्रकार इस संपूर्ण दुःख-स्कंध का निरोध होता है... (इसी प्रकार) जिह्वा और रसों के आश्रय से... मन और धर्मों के आश्रय से मनो-विज्ञान उत्पन्न होता है। इन तीनों के मिलन से स्पर्श होता है। स्पर्श के प्रत्यय से वेदना होती है; वेदना के प्रत्यय से तृष्णा होती है। उसी तृष्णा के पूर्णतः विराग और निरोध से उपादान का निरोध होता है; उपादान के निरोध से... इस प्रकार इस संपूर्ण दुःख-स्कंध का निरोध होता है।” เตน โข ปน สมเยน อญฺญตโร ภิกฺขุ ภควโต อุปสฺสุติ ฐิโต โหติ. อทฺทสา โข ภควา ตํ ภิกฺขุํ อุปสฺสุติ ฐิตํ. ทิสฺวาน ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘อสฺโสสิ โน ตฺวํ, ภิกฺขุ, อิมํ ธมฺมปริยาย’’นฺติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. ‘‘อุคฺคณฺหาหิ ตฺวํ, ภิกฺขุ, อิมํ ธมฺมปริยายํ. ปริยาปุณาหิ ตฺวํ, ภิกฺขุ, อิมํ ธมฺมปริยายํ. ธาเรหิ ตฺวํ, ภิกฺขุ, อิมํ ธมฺมปริยายํ. อตฺถสํหิโตยํ, ภิกฺขุ, ธมฺมปริยาโย อาทิพฺรหฺมจริยโก’’ติ. ทสมํ. उस समय एक अन्य भिक्षु भगवान के समीप (उनकी बातें सुनने के लिए) खड़ा था। भगवान ने उस भिक्षु को समीप खड़ा देखा। देखकर उस भिक्षु से यह कहा— “भिक्षु, क्या तुमने इस धर्म-पर्याय को सुना?” “हाँ, भन्ते!” “भिक्षु, तुम इस धर्म-पर्याय को ग्रहण करो। भिक्षु, तुम इस धर्म-पर्याय को सीखो। भिक्षु, तुम इस धर्म-पर्याय को धारण करो। भिक्षु, यह धर्म-पर्याय अर्थपूर्ण है और ब्रह्मचर्य का प्रारंभ है।” दसवाँ। โยคกฺเขมิวคฺโค เอกาทสโม. योगक्षेमी-वग्ग ग्यारहवाँ। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान)— โยคกฺเขมิ อุปาทาย, ทุกฺขํ โลโก จ เสยฺโย จ; สํโยชนํ อุปาทานํ, ทฺเว ปริชานํ อุปสฺสุตีติ. योगक्षेमी, उपादाय, दुःख, लोक, सेय्यो, संयोजन, उपादान, दो परिजान और उपस्सुति। ๑๒. โลกกามคุณวคฺโค १२. लोककामगुण-वग्ग ๑. ปฐมมารปาสสุตฺตํ १. प्रथम मारपास सुत्त ๑๑๔. ‘‘สนฺติ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ, ภิกฺขุ, อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อาวาสคโต มารสฺส, มารสฺส วสํ คโต, ปฏิมุกฺกสฺส มารปาโส. พทฺโธ โส มารพนฺธเนน ยถากามกรณีโย ปาปิมโต…เป…. ११४. “भिक्षुओं, चक्षु-विज्ञान द्वारा जानने योग्य ऐसे रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रजनीय (लुभावने) हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है—तो भिक्षुओं, वह भिक्षु मार के आवास में गया हुआ, मार के वश में गया हुआ और मार के पाश (फंदे) में फँसा हुआ कहा जाता है। वह मार के बंधन से बँधा हुआ है और उस पापी (मार) की इच्छानुसार वश में है...। ‘‘สนฺติ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อาวาสคโต มารสฺส, มารสฺส วสํ คโต, ปฏิมุกฺกสฺส มารปาโส. พทฺโธ โส มารพนฺธเนน…เป…. “भिक्षुओं, जिह्वा-विज्ञान द्वारा जानने योग्य ऐसे रस हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है—तो भिक्षुओं, वह भिक्षु मार के आवास में गया हुआ, मार के वश में गया हुआ और मार के पाश में फँसा हुआ कहा जाता है। वह मार के बंधन से बँधा हुआ है...। ‘‘สนฺติ[Pg.312], ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อาวาสคโต มารสฺส, มารสฺส วสํ คโต, ปฏิมุกฺกสฺส มารปาโส. พทฺโธ โส มารพนฺธเนน ยถากามกรณีโย ปาปิมโต. “भिक्षुओं, मनो-विज्ञान द्वारा जानने योग्य ऐसे धर्म (विषय) हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है—तो भिक्षुओं, वह भिक्षु मार के आवास में गया हुआ, मार के वश में गया हुआ और मार के पाश में फँसा हुआ कहा जाता है। वह मार के बंधन से बँधा हुआ है और उस पापी की इच्छानुसार वश में है। ‘‘สนฺติ จ โข, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ นาวาสคโต มารสฺส, น มารสฺส วสํ คโต, อุมฺมุกฺกสฺส มารปาโส. มุตฺโต โส มารพนฺธเนน น ยถากามกรณีโย ปาปิมโต…เป…. “भिक्षुओं, चक्षु-विज्ञान द्वारा जानने योग्य ऐसे रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता, उनका स्वागत नहीं करता और उनमें आसक्त होकर स्थित नहीं रहता—तो भिक्षुओं, वह भिक्षु मार के आवास में नहीं गया हुआ, मार के वश में नहीं गया हुआ और मार के पाश से मुक्त कहा जाता है। वह मार के बंधन से मुक्त है और उस पापी की इच्छानुसार वश में नहीं है...। ‘‘สนฺติ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ นาวาสคโต มารสฺส, น มารสฺส วสํ คโต, อุมฺมุกฺกสฺส มารปาโส. มุตฺโต โส มารพนฺธเนน น ยถากามกรณีโย ปาปิมโต…เป…. “भिक्षुओं, जिह्वा-विज्ञान द्वारा जानने योग्य ऐसे रस हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता, उनका स्वागत नहीं करता और उनमें आसक्त होकर स्थित नहीं रहता—तो भिक्षुओं, वह भिक्षु मार के आवास में नहीं गया हुआ, मार के वश में नहीं गया हुआ और मार के पाश से मुक्त कहा जाता है। वह मार के बंधन से मुक्त है और उस पापी की इच्छानुसार वश में नहीं है...। ‘‘สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ นาวาสคโต มารสฺส, น มารสฺส วสํ คโต, อุมฺมุกฺกสฺส มารปาโส. มุตฺโต โส มารพนฺธเนน น ยถากามกรณีโย ปาปิมโต’’ติ. ปฐมํ. “भिक्षुओं, मनो-विज्ञान द्वारा जानने योग्य ऐसे धर्म हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता, उनका स्वागत नहीं करता और उनमें आसक्त होकर स्थित नहीं रहता—तो भिक्षुओं, वह भिक्षु मार के आवास में नहीं गया हुआ, मार के वश में नहीं गया हुआ और मार के पाश से मुक्त कहा जाता है। वह मार के बंधन से मुक्त है और उस पापी की इच्छानुसार वश में नहीं है।” प्रथम। ๒. ทุติยมารปาสสุตฺตํ २. द्वितीय मारपास सुत्त ๑๑๕. ‘‘สนฺติ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ พทฺโธ จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ, อาวาสคโต มารสฺส, มารสฺส วสํ คโต, ปฏิมุกฺกสฺส มารปาโส. พทฺโธ โส มารพนฺธเนน ยถากามกรณีโย ปาปิมโต…เป…. ११५. “भिक्षुओं, चक्षु-विज्ञान द्वारा जानने योग्य ऐसे रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है—तो भिक्षुओं, वह भिक्षु चक्षु-विज्ञेय रूपों में बँधा हुआ, मार के आवास में गया हुआ, मार के वश में गया हुआ और मार के पाश में फँसा हुआ कहा जाता है। वह मार के बंधन से बँधा हुआ है और उस पापी की इच्छानुसार वश में है...। ‘‘สนฺติ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ [Pg.313] อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ พทฺโธ มโนวิญฺเญยฺเยสุ ธมฺเมสุ, อาวาสคโต มารสฺส, มารสฺส วสํ คโต, ปฏิมุกฺกสฺส มารปาโส. พทฺโธ โส มารพนฺธเนน ยถากามกรณีโย ปาปิมโต…เป…. “भिक्षुओं, जिह्वा-विज्ञान द्वारा जानने योग्य ऐसे रस हैं... भिक्षुओं, मनो-विज्ञान द्वारा जानने योग्य ऐसे धर्म हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है—तो भिक्षुओं, वह भिक्षु मनो-विज्ञेय धर्मों में बँधा हुआ, मार के आवास में गया हुआ, मार के वश में गया हुआ और मार के पाश में फँसा हुआ कहा जाता है। वह मार के बंधन से बँधा हुआ है और उस पापी की इच्छानुसार वश में है...।”}]``` ‘‘สนฺติ จ โข, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ มุตฺโต จกฺขุวิญฺเญยฺเยหิ รูเปหิ, นาวาสคโต มารสฺส, น มารสฺส วสํ คโต, อุมฺมุกฺกสฺส มารปาโส. มุตฺโต โส มารพนฺธเนน น ยถากามกรณีโย ปาปิมโต…เป…. "भिक्षुओं, चक्षु-विज्ञेय (आँखों से देखे जाने वाले) ऐसे रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय (राग उत्पन्न करने वाले) हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता, उनका स्वागत नहीं करता और उनमें आसक्त होकर नहीं रहता, तो भिक्षुओं, वह भिक्षु चक्षु-विज्ञेय रूपों से मुक्त कहा जाता है; वह मार के निवास स्थान में नहीं गया है, मार के वश में नहीं पड़ा है, और मार का पाश उसके गले से उतर गया है। वह मार के बन्धन से मुक्त है और पापी मार की इच्छानुसार वश में करने योग्य नहीं है...।" ‘‘สนฺติ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ มุตฺโต มโนวิญฺเญยฺเยหิ ธมฺเมหิ, นาวาสคโต มารสฺส, น มารสฺส วสํ คโต, อุมฺมุกฺกสฺส มารปาโส. มุตฺโต โส มารพนฺธเนน น ยถากามกรณีโย ปาปิมโต’’ติ. ทุติยํ. "भिक्षुओं, जिह्वा-विज्ञेय रस हैं... भिक्षुओं, मनो-विज्ञेय धर्म (विषय) हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता, उनका स्वागत नहीं करता और उनमें आसक्त होकर नहीं रहता, तो भिक्षुओं, वह भिक्षु मनो-विज्ञेय धर्मों से मुक्त कहा जाता है; वह मार के निवास स्थान में नहीं गया है, मार के वश में नहीं पड़ा है, और मार का पाश उसके गले से उतर गया है। वह मार के बन्धन से मुक्त है और पापी मार की इच्छानुसार वश में करने योग्य नहीं है।" दूसरा सूत्र। ๓. โลกนฺตคมนสุตฺตํ ३. ३. लोकन्तगमन सुत्त ๑๑๖. ‘‘นาหํ, ภิกฺขเว, คมเนน โลกสฺส อนฺตํ ญาเตยฺยํ, ทฏฺเฐยฺยํ, ปตฺเตยฺยนฺติ วทามิ. น จ ปนาหํ, ภิกฺขเว, อปฺปตฺวา โลกสฺส อนฺตํ ทุกฺขสฺส อนฺตกิริยํ วทามี’’ติ. อิทํ วตฺวา ภควา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปาวิสิ. อถ โข เตสํ ภิกฺขูนํ อจิรปกฺกนฺตสฺส ภควโต เอตทโหสิ – ‘‘อิทํ โข โน, อาวุโส, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ‘นาหํ, ภิกฺขเว, คมเนน โลกสฺส อนฺตํ ญาเตยฺยํ, ทฏฺเฐยฺยํ, ปตฺเตยฺยนฺติ วทามิ. น จ ปนาหํ, ภิกฺขเว, อปฺปตฺวา โลกสฺส อนฺตํ ทุกฺขสฺส อนฺตกิริยํ วทามี’ติ. โก นุ โข อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภเชยฺยา’’ติ? ११६. ११६. "भिक्षुओं, मैं यह नहीं कहता कि (शारीरिक रूप से) चलकर लोक के अन्त को जाना जा सकता है, देखा जा सकता है या पहुँचा जा सकता है। और भिक्षुओं, मैं यह भी नहीं कहता कि लोक के अन्त तक पहुँचे बिना दुःख का अन्त किया जा सकता है।" यह कहकर भगवान आसन से उठकर विहार (कुटी) में प्रविष्ट हो गए। तब भगवान के जाने के कुछ ही समय बाद उन भिक्षुओं के मन में यह विचार आया— "आवुसों, भगवान हमें संक्षेप में यह उपदेश देकर कि— 'भिक्षुओं, मैं यह नहीं कहता कि चलकर लोक के अन्त को जाना, देखा या पहुँचा जा सकता है; और लोक के अन्त तक पहुँचे बिना दुःख का अन्त किया जा सकता है'— विस्तार से अर्थ की व्याख्या किए बिना ही आसन से उठकर विहार में चले गए हैं। अब भगवान द्वारा संक्षेप में कहे गए और विस्तार से न समझाए गए इस उपदेश के अर्थ की विस्तार से व्याख्या कौन कर सकता है?" อถ [Pg.314] โข เตสํ ภิกฺขูนํ เอตทโหสิ – ‘‘อยํ โข อายสฺมา อานนฺโท สตฺถุ เจว สํวณฺณิโต, สมฺภาวิโต จ วิญฺญูนํ สพฺรหฺมจารีนํ. ปโหติ จายสฺมา อานนฺโท อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภชิตุํ. ยํนูน มยํ เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกเมยฺยาม; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยามา’’ติ. तब उन भिक्षुओं के मन में यह विचार आया— "ये आयुष्मान आनन्द शास्ता (बुद्ध) द्वारा प्रशंसित हैं और बुद्धिमान सब्रह्मचारियों द्वारा सम्मानित हैं। आयुष्मान आनन्द भगवान द्वारा संक्षेप में कहे गए और विस्तार से न समझाए गए इस उपदेश के अर्थ की विस्तार से व्याख्या करने में समर्थ हैं। क्यों न हम आयुष्मान आनन्द के पास चलें और उनसे इस विषय में पूछें?" อถ โข เต ภิกฺขู เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา อานนฺเทน สทฺธึ สมฺโมทึสุ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตทโวจุํ – तब वे भिक्षु आयुष्मान आनन्द के पास गए और उनके साथ कुशल-क्षेम पूछकर प्रसन्नतापूर्वक बातचीत की। सुखद और स्मरणीय चर्चा समाप्त कर वे एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए उन भिक्षुओं ने आयुष्मान आनन्द से यह कहा— ‘‘อิทํ โข โน, อาวุโส อานนฺท, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ‘นาหํ, ภิกฺขเว, คมเนน โลกสฺส อนฺตํ ญาเตยฺยํ, ทฏฺเฐยฺยํ, ปตฺเตยฺยนฺติ วทามิ. น จ ปนาหํ, ภิกฺขเว, อปฺปตฺวา โลกสฺส อนฺตํ ทุกฺขสฺส อนฺตกิริยํ วทามี’ติ. เตสํ โน, อาวุโส, อมฺหากํ อจิรปกฺกนฺตสฺส ภควโต เอตทโหสิ – ‘อิทํ โข โน, อาวุโส, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – นาหํ, ภิกฺขเว, คมเนน โลกสฺส อนฺตํ ญาเตยฺยํ, ทฏฺเฐยฺยํ, ปตฺเตยฺยนฺติ วทามิ. น จ ปนาหํ, ภิกฺขเว, อปฺปตฺวา โลกสฺส อนฺตํ ทุกฺขสฺส อนฺตกิริยํ วทามีติ. โก นุ โข อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภเชยฺยา’ติ? เตสํ โน, อาวุโส, อมฺหากํ เอตทโหสิ – ‘อยํ โข, อาวุโส, อายสฺมา อานนฺโท สตฺถุ เจว สํวณฺณิโต, สมฺภาวิโต จ วิญฺญูนํ สพฺรหฺมจารีนํ. ปโหติ จายสฺมา อานนฺโท อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภชิตุํ. ยํนูน มยํ เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกเมยฺยาม; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยามา’ติ. วิภชตายสฺมา อานนฺโท’’ติ. "आवुस आनन्द, भगवान हमें संक्षेप में यह उपदेश देकर कि— 'भिक्षुओं, मैं यह नहीं कहता कि चलकर लोक के अन्त को जाना, देखा या पहुँचा जा सकता है; और लोक के अन्त तक पहुँचे बिना दुःख का अन्त किया जा सकता है'— विस्तार से अर्थ की व्याख्या किए बिना ही आसन से उठकर विहार में चले गए हैं। आवुस, भगवान के जाने के कुछ ही समय बाद हमारे मन में यह विचार आया— 'भगवान संक्षेप में उपदेश देकर चले गए हैं, इसकी विस्तार से व्याख्या कौन कर सकता है?' तब हमें लगा कि आयुष्मान आनन्द शास्ता द्वारा प्रशंसित और सब्रह्मचारियों द्वारा सम्मानित हैं, और वे इस उपदेश की विस्तार से व्याख्या करने में समर्थ हैं। इसलिए हम आपके पास आए हैं। आयुष्मान आनन्द, कृपया इसकी व्याख्या करें।" ‘‘เสยฺยถาปิ, อาวุโส, ปุริโส สารตฺถิโก สารคเวสี สารปริเยสนํ จรมาโน มหโต รุกฺขสฺส ติฏฺฐโต สารวโต อติกฺกมฺเมว, มูลํ อติกฺกมฺเมว, ขนฺธํ สาขาปลาเส สารํ ปริเยสิตพฺพํ มญฺเญยฺย; เอวํ สมฺปทมิทํ อายสฺมนฺตานํ สตฺถริ สมฺมุขีภูเต ตํ ภควนฺตํ อติสิตฺวา [Pg.315] อมฺเห เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺฉิตพฺพํ มญฺญถ. โส หาวุโส, ภควา ชานํ ชานาติ, ปสฺสํ ปสฺสติ – จกฺขุภูโต, ญาณภูโต, ธมฺมภูโต, พฺรหฺมภูโต, วตฺตา, ปวตฺตา, อตฺถสฺส นินฺเนตา, อมตสฺส ทาตา, ธมฺมสฺสามี, ตถาคโต. โส เจว ปเนตสฺส กาโล อโหสิ ยํ ภควนฺตํเยว เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยาถ. ยถา โว ภควา พฺยากเรยฺย ตถา โว ธาเรยฺยาถา’’ติ. "आवुसों, जैसे कोई व्यक्ति जिसे सार (मजबूत लकड़ी) की आवश्यकता हो, सार की खोज में निकला हो, वह एक विशाल, खड़े हुए सारयुक्त वृक्ष के मूल (जड़) और तने को छोड़कर शाखाओं और पत्तों में सार ढूँढने की बात सोचे; ठीक वैसा ही आप आयुष्मानों का यह व्यवहार है कि साक्षात् शास्ता (भगवान) के सम्मुख होते हुए भी, आप उन्हें छोड़कर मुझसे इसका अर्थ पूछना उचित समझते हैं। आवुस, वे भगवान जो जानने योग्य है उसे जानते हैं, जो देखने योग्य है उसे देखते हैं— वे चक्षु-स्वरूप हैं, ज्ञान-स्वरूप हैं, धर्म-स्वरूप हैं, ब्रह्म-स्वरूप हैं; वे वक्ता हैं, प्रवर्तक हैं, अर्थ के प्रकाशक हैं, अमृत (निर्वाण) के दाता हैं, धर्म के स्वामी हैं, तथागत हैं। वही समय था जब आपको भगवान से ही इसका अर्थ पूछना चाहिए था। भगवान ने आपको जैसा बताया होता, वैसा ही आपको धारण करना चाहिए था।" ‘‘อทฺธาวุโส อานนฺท, ภควา ชานํ ชานาติ, ปสฺสํ ปสฺสติ – จกฺขุภูโต, ญาณภูโต, ธมฺมภูโต, พฺรหฺมภูโต, วตฺตา, ปวตฺตา, อตฺถสฺส นินฺเนตา, อมตสฺส ทาตา, ธมฺมสฺสามี, ตถาคโต. โส เจว ปเนตสฺส กาโล อโหสิ ยํ ภควนฺตํเยว เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยาม. ยถา โน ภควา พฺยากเรยฺย ตถา นํ ธาเรยฺยาม. อปิ จายสฺมา อานนฺโท สตฺถุ เจว สํวณฺณิโต, สมฺภาวิโต จ วิญฺญูนํ สพฺรหฺมจารีนํ. ปโหติ จายสฺมา อานนฺโท อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภชิตุํ. วิภชตายสฺมา อานนฺโท อครุํ กริตฺวา’’ติ. “निश्चित ही, आयुष्मान आनंद! भगवान जानते हुए जानते हैं, देखते हुए देखते हैं—वे चक्षु-स्वरूप हैं, ज्ञान-स्वरूप हैं, धर्म-स्वरूप हैं, ब्रह्म-स्वरूप हैं; वे वक्ता हैं, प्रज्ञापक हैं, अर्थ के प्रदाता हैं, अमृत के दाता हैं, धर्म के स्वामी हैं, तथागत हैं। यही वह समय था जब हमें भगवान से ही इस अर्थ के बारे में पूछना चाहिए था। जैसा भगवान हमें उत्तर देते, वैसा ही हम उसे धारण करते। फिर भी, आयुष्मान आनंद शास्ता (बुद्ध) द्वारा प्रशंसित हैं और विज्ञ सब्रह्मचारियों द्वारा सम्मानित हैं। आयुष्मान आनंद भगवान द्वारा संक्षेप में कहे गए और विस्तार से न समझाए गए इस उपदेश का विस्तार से अर्थ समझाने में समर्थ हैं। आयुष्मान आनंद बिना किसी संकोच के इसका विस्तार से विवेचन करें।” ‘‘เตนหาวุโส, สุณาถ, สาธุกํ มนสิ กโรถ; ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวมาวุโส’’ติ โข เต ภิกฺขู อายสฺมโต อานนฺทสฺส ปจฺจสฺโสสุํ. อายสฺมา อานนฺโท เอตทโวจ – “तो आयुष्मानों, सुनो, अच्छी तरह मनन करो; मैं कहूँगा।” “ठीक है, आयुष्मान,” उन भिक्षुओं ने आयुष्मान आनंद को उत्तर दिया। आयुष्मान आनंद ने यह कहा— ‘‘ยํ โข โว, อาวุโส, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ‘นาหํ, ภิกฺขเว, คมเนน โลกสฺส อนฺตํ ญาเตยฺยํ, ทฏฺเฐยฺยํ, ปตฺเตยฺยนฺติ วทามิ. น จ ปนาหํ, ภิกฺขเว, อปฺปตฺวา โลกสฺส อนฺตํ ทุกฺขสฺส อนฺตกิริยํ วทามี’ติ, อิมสฺส ขฺวาหํ, อาวุโส, ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานามิ. เยน โข, อาวุโส, โลกสฺมึ โลกสญฺญี โหติ โลกมานี – อยํ วุจฺจติ อริยสฺส วินเย โลโก. เกน จาวุโส, โลกสฺมึ โลกสญฺญี โหติ โลกมานี? จกฺขุนา โข, อาวุโส, โลกสฺมึ โลกสญฺญี โหติ โลกมานี. โสเตน โข, อาวุโส… ฆาเนน โข, อาวุโส… ชิวฺหาย โข, อาวุโส, โลกสฺมึ โลกสญฺญี โหติ โลกมานี[Pg.316]. กาเยน โข, อาวุโส… มเนน โข, อาวุโส, โลกสฺมึ โลกสญฺญี โหติ โลกมานี. เยน โข, อาวุโส, โลกสฺมึ โลกสญฺญี โหติ โลกมานี – อยํ วุจฺจติ อริยสฺส วินเย โลโก. ยํ โข โว, อาวุโส, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ‘นาหํ, ภิกฺขเว, คมเนน โลกสฺส อนฺตํ ญาเตยฺยํ, ทฏฺเฐยฺยํ, ปตฺเตยฺยนฺติ วทามิ. น จ ปนาหํ, ภิกฺขเว, อปฺปตฺวา โลกสฺส อนฺตํ ทุกฺขสฺส อนฺตกิริยํ วทามี’ติ, อิมสฺส ขฺวาหํ, อาวุโส, ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส เอวํ วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานามิ. อากงฺขมานา จ ปน ตุมฺเห อายสฺมนฺโต ภควนฺตํเยว อุปสงฺกมิตฺวา เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยาถ. ยถา โว ภควา พฺยากโรติ ตถา นํ ธาเรยฺยาถา’’ติ. “आयुष्मानों, भगवान ने जो संक्षेप में उपदेश देकर और विस्तार से अर्थ न समझाकर आसन से उठकर विहार में प्रवेश किया—‘भिक्षुओं, मैं यह नहीं कहता कि (शारीरिक) गमन से लोक के अंत को जाना जा सकता है, देखा जा सकता है या पहुँचा जा सकता है। और भिक्षुओं, मैं यह भी नहीं कहता कि लोक के अंत तक पहुँचे बिना दुखों का अंत किया जा सकता है’—आयुष्मानों, भगवान द्वारा संक्षेप में कहे गए और विस्तार से न समझाए गए इस उपदेश का मैं इस प्रकार विस्तार से अर्थ समझता हूँ। आयुष्मानों, लोक में जिसके कारण ‘लोक’ की संज्ञा होती है, ‘लोक’ का मान (धारणा) होता है—उसे आर्यों के विनय में ‘लोक’ कहा जाता है। और आयुष्मानों, लोक में किसके कारण ‘लोक’ की संज्ञा और ‘लोक’ का मान होता है? आयुष्मानों, चक्षु के कारण लोक में ‘लोक’ की संज्ञा और ‘लोक’ का मान होता है। श्रोत्र के कारण... घ्राण के कारण... जिह्वा के कारण... काया के कारण... मन के कारण लोक में ‘लोक’ की संज्ञा और ‘लोक’ का मान होता है। आयुष्मानों, लोक में जिसके कारण ‘लोक’ की संज्ञा और ‘लोक’ का मान होता है—उसे आर्यों के विनय में ‘लोक’ कहा जाता है। आयुष्मानों, भगवान ने जो संक्षेप में उपदेश देकर और विस्तार से अर्थ न समझाकर आसन से उठकर विहार में प्रवेश किया—‘भिक्षुओं, मैं यह नहीं कहता कि गमन से लोक के अंत को जाना जा सकता है... (वही उपदेश)...’—आयुष्मानों, भगवान द्वारा संक्षेप में कहे गए और विस्तार से न समझाए गए इस उपदेश का मैं इस प्रकार विस्तार से अर्थ समझता हूँ। यदि आप आयुष्मान चाहें, तो भगवान के पास ही जाकर इस अर्थ को पूछें। जैसा भगवान आपको उत्तर दें, वैसा ही आप उसे धारण करें।” ‘‘เอวมาวุโส’’ติ โข เต ภิกฺขู อายสฺมโต อานนฺทสฺส ปฏิสฺสุตฺวา อุฏฺฐายาสนา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – “ठीक है, आयुष्मान,” उन भिक्षुओं ने आयुष्मान आनंद की बात स्वीकार की और आसन से उठकर जहाँ भगवान थे, वहाँ गए; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए उन भिक्षुओं ने भगवान से यह कहा— ‘‘ยํ โข โน, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ‘นาหํ, ภิกฺขเว, คมเนน โลกสฺส อนฺตํ ญาเตยฺยํ, ทฏฺเฐยฺยํ, ปตฺเตยฺยนฺติ วทามิ. น จ ปนาหํ, ภิกฺขเว, อปฺปตฺวา โลกสฺส อนฺตํ ทุกฺขสฺส อนฺตกิริยํ วทามี’ติ. เตสํ โน, ภนฺเต, อมฺหากํ อจิรปกฺกนฺตสฺส ภควโต เอตทโหสิ – ‘อิทํ โข โน, อาวุโส, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – นาหํ, ภิกฺขเว, คมเนน โลกสฺส อนฺตํ ญาเตยฺยํ, ทฏฺเฐยฺยํ, ปตฺเตยฺยนฺติ วทามิ. น จ ปนาหํ, ภิกฺขเว, อปฺปตฺวา โลกสฺส อนฺตํ ทุกฺขสฺส อนฺตกิริยํ วทามี’ติ. โก นุ โข อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภเชยฺยาติ? เตสํ โน, ภนฺเต, อมฺหากํ เอตทโหสิ – ‘อยํ โข อายสฺมา อานนฺโท สตฺถุ เจว สํวณฺณิโต, สมฺภาวิโต จ วิญฺญูนํ สพฺรหฺมจารีนํ. ปโหติ จายสฺมา อานนฺโท อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภชิตุํ. ยํนูน มยํ เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกเมยฺยาม; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยามา’ติ. อถ โข มยํ[Pg.317], ภนฺเต, เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกมิมฺห; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺฉิมฺห. เตสํ โน, ภนฺเต, อายสฺมตา อานนฺเทน อิเมหิ อากาเรหิ อิเมหิ ปเทหิ อิเมหิ พฺยญฺชเนหิ อตฺโถ วิภตฺโต’’ติ. “भन्ते, भगवान ने जो हमें संक्षेप में उपदेश देकर और विस्तार से अर्थ न समझाकर आसन से उठकर विहार में प्रवेश किया—‘भिक्षुओं, मैं यह नहीं कहता कि गमन से लोक के अंत को जाना जा सकता है, देखा जा सकता है या पहुँचा जा सकता है। और भिक्षुओं, मैं यह भी नहीं कहता कि लोक के अंत तक पहुँचे बिना दुखों का अंत किया जा सकता है’—भन्ते, भगवान के जाने के कुछ ही समय बाद हमें यह विचार आया—‘भगवान ने यह संक्षेप में उपदेश दिया है और विस्तार से अर्थ नहीं समझाया है... इसका विस्तार से अर्थ कौन समझा सकता है?’ भन्ते, हमें यह विचार आया—‘ये आयुष्मान आनंद शास्ता द्वारा प्रशंसित हैं और विज्ञ सब्रह्मचारियों द्वारा सम्मानित हैं। आयुष्मान आनंद भगवान द्वारा संक्षेप में कहे गए इस उपदेश का विस्तार से अर्थ समझाने में समर्थ हैं। क्यों न हम आयुष्मान आनंद के पास चलें और उनसे इस अर्थ को पूछें।’ तब भन्ते, हम आयुष्मान आनंद के पास गए और उनसे यह अर्थ पूछा। भन्ते, आयुष्मान आनंद ने इन कारणों से, इन पदों से और इन व्यंजनों (शब्दों) से हमें अर्थ विस्तार से समझाया है।” ‘‘ปณฺฑิโต, ภิกฺขเว, อานนฺโท; มหาปญฺโญ, ภิกฺขเว, อานนฺโท! มํ เจปิ ตุมฺเห, ภิกฺขเว, เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยาถ, อหมฺปิ ตํ เอวเมวํ พฺยากเรยฺยํ ยถา ตํ อานนฺเทน พฺยากตํ. เอโส เจเวตสฺส อตฺโถ, เอวญฺจ นํ ธาเรยฺยาถา’’ติ. ตติยํ. “भिक्षुओं, आनंद पंडित है; भिक्षुओं, आनंद महाप्रज्ञ है! भिक्षुओं, यदि तुम मुझसे भी इस अर्थ को पूछते, तो मैं भी वैसा ही उत्तर देता जैसा आनंद ने दिया है। यही इसका अर्थ है, और इसे इसी प्रकार धारण करो।” तृतीय सुत्त। ๔. กามคุณสุตฺตํ ४. कामगुण सुत्त ๑๑๗. ‘‘ปุพฺเพว เม, ภิกฺขเว, สมฺโพธา อนภิสมฺพุทฺธสฺส โพธิสตฺตสฺเสว สโต เอตทโหสิ – ‘เยเม ปญฺจ กามคุณา เจตโส สมฺผุฏฺฐปุพฺพา อตีตา นิรุทฺธา วิปริณตา, ตตฺร เม จิตฺตํ พหุลํ คจฺฉมานํ คจฺเฉยฺย ปจฺจุปฺปนฺเนสุ วา อปฺปํ วา อนาคเตสุ’. ตสฺส มยฺหํ, ภิกฺขเว, เอตทโหสิ – ‘เยเม ปญฺจ กามคุณา เจตโส สมฺผุฏฺฐปุพฺพา อตีตา นิรุทฺธา วิปริณตา, ตตฺร เม อตฺตรูเปน อปฺปมาโท สติ เจตโส อารกฺโข กรณีโย’. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ตุมฺหากมฺปิ เย เต ปญฺจ กามคุณา เจตโส สมฺผุฏฺฐปุพฺพา อตีตา นิรุทฺธา วิปริณตา, ตตฺร โว จิตฺตํ พหุลํ คจฺฉมานํ คจฺเฉยฺย ปจฺจุปฺปนฺเนสุ วา อปฺปํ วา อนาคเตสุ. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ตุมฺหากมฺปิ เย เต ปญฺจ กามคุณา เจตโส สมฺผุฏฺฐปุพฺพา อตีตา นิรุทฺธา วิปริณตา, ตตฺร โว อตฺตรูเปหิ อปฺปมาโท สติ เจตโส อารกฺโข กรณีโย. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, เส อายตเน เวทิตพฺเพ ยตฺถ จกฺขุ จ นิรุชฺฌติ, รูปสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ ชิวฺหา จ นิรุชฺฌติ, รสสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ มโน จ นิรุชฺฌติ, ธมฺมสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ’’ติ. อิทํ วตฺวา ภควา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปาวิสิ. ११७. "भिक्षुओं, संबोधि से पूर्व, जब मैं अभी बुद्ध नहीं हुआ था और केवल बोधिसत्व ही था, तब मेरे मन में यह विचार आया— 'ये जो पाँच काम-गुण हैं, जिनका मैंने पहले मन से अनुभव किया है, जो अतीत हो चुके हैं, निरुद्ध हो चुके हैं और बदल चुके हैं; मेरा चित्त बार-बार उन्हीं (अतीत काम-गुणों) की ओर जा सकता है, या वर्तमान की ओर, या थोड़ा भविष्य की ओर।' भिक्षुओं, तब मुझे यह विचार आया— 'ये जो पाँच काम-गुण हैं, जिनका मैंने पहले मन से अनुभव किया है, जो अतीत हो चुके हैं, निरुद्ध हो चुके हैं और बदल चुके हैं; वहाँ मुझे अपने कल्याण के लिए अप्रमाद और स्मृति के साथ चित्त की रक्षा करनी चाहिए।' इसलिए भिक्षुओं, तुम्हारे लिए भी ये जो पाँच काम-गुण हैं, जिनका तुमने पहले मन से अनुभव किया है, जो अतीत हो चुके हैं, निरुद्ध हो चुके हैं और बदल चुके हैं; तुम्हारा चित्त बार-बार उन्हीं की ओर जा सकता है, या वर्तमान की ओर, या थोड़ा भविष्य की ओर। इसलिए भिक्षुओं, तुम्हारे लिए भी ये जो पाँच काम-गुण हैं... वहाँ तुम्हें अपने कल्याण के लिए अप्रमाद और स्मृति के साथ चित्त की रक्षा करनी चाहिए। इसलिए भिक्षुओं, उस आयतन को जानना चाहिए जहाँ चक्षु निरुद्ध हो जाता है और रूप-संज्ञा निरुद्ध हो जाती है, उस आयतन को जानना चाहिए... पे... जहाँ जिह्वा निरुद्ध हो जाती है और रस-संज्ञा निरुद्ध हो जाती है, उस आयतन को जानना चाहिए... पे... जहाँ मन निरुद्ध हो जाता है और धर्म-संज्ञा निरुद्ध हो जाती है, उस आयतन को जानना चाहिए।" यह कहकर भगवान आसन से उठकर विहार में प्रविष्ट हो गए। อถ โข เตสํ ภิกฺขูนํ อจิรปกฺกนฺตสฺส ภควโต เอตทโหสิ – ‘‘อิทํ โข โน, อาวุโส, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ‘ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, เส อายตเน เวทิตพฺเพ ยตฺถ จกฺขุ จ นิรุชฺฌติ, รูปสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ ชิวฺหา จ นิรุชฺฌติ, รสสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส [Pg.318] อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ มโน จ นิรุชฺฌติ, ธมฺมสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ’ติ. โก นุ โข อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภเชยฺยา’’ติ? तब उन भिक्षुओं को, भगवान के जाने के कुछ ही समय बाद, यह विचार आया— "आयुष्मन्, भगवान हमें संक्षेप में यह उपदेश देकर और विस्तार से इसका अर्थ स्पष्ट किए बिना ही आसन से उठकर विहार में प्रविष्ट हो गए हैं— 'इसलिए भिक्षुओं, उस आयतन को जानना चाहिए जहाँ चक्षु निरुद्ध हो जाता है और रूप-संज्ञा निरुद्ध हो जाती है, उस आयतन को जानना चाहिए... पे... जहाँ जिह्वा निरुद्ध हो जाती है और रस-संज्ञा निरुद्ध हो जाती है, उस आयतन को जानना चाहिए... पे... जहाँ मन निरुद्ध हो जाता है और धर्म-संज्ञा निरुद्ध हो जाती है, उस आयतन को जानना चाहिए।' अब भगवान द्वारा संक्षेप में कहे गए और विस्तार से स्पष्ट न किए गए इस उपदेश का विस्तार से अर्थ कौन समझा सकता है?" อถ โข เตสํ ภิกฺขูนํ เอตทโหสิ – ‘‘อยํ โข อายสฺมา อานนฺโท สตฺถุ เจว สํวณฺณิโต, สมฺภาวิโต จ วิญฺญูนํ สพฺรหฺมจารีนํ. ปโหติ จายสฺมา อานนฺโท อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภชิตุํ. ยํนูน มยํ เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกเมยฺยาม; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยามา’’ติ. तब उन भिक्षुओं को यह विचार आया— "यह आयुष्मान आनंद शास्ता (बुद्ध) द्वारा प्रशंसित हैं और विज्ञ सब्रह्मचारियों द्वारा सम्मानित हैं। आयुष्मान आनंद भगवान द्वारा संक्षेप में कहे गए और विस्तार से स्पष्ट न किए गए इस उपदेश का विस्तार से अर्थ समझाने में समर्थ हैं। क्यों न हम आयुष्मान आनंद के पास चलें और उनसे इसका अर्थ पूछें।" อถ โข เต ภิกฺขู เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา อานนฺเทน สทฺธึ สมฺโมทึสุ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตทโวจุํ – तब वे भिक्षु जहाँ आयुष्मान आनंद थे, वहाँ गए। पहुँचकर उन्होंने आयुष्मान आनंद के साथ कुशल-क्षेम पूछा। आनंददायक और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वे एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए उन भिक्षुओं ने आयुष्मान आनंद से यह कहा— ‘‘อิทํ โข โน, อาวุโส อานนฺท, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ‘ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, เส อายตเน เวทิตพฺเพ ยตฺถ จกฺขุ จ นิรุชฺฌติ, รูปสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ ชิวฺหา จ นิรุชฺฌติ, รสสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ มโน จ นิรุชฺฌติ, ธมฺมสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ’ติ. เตสํ โน, อาวุโส, อมฺหากํ อจิรปกฺกนฺตสฺส ภควโต เอตทโหสิ – ‘อิทํ โข โน, อาวุโส, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, เส อายตเน เวทิตพฺเพ ยตฺถ จกฺขุ จ นิรุชฺฌติ, รูปสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ ชิวฺหา จ นิรุชฺฌติ, รสสญฺญา จ นิรุชฺฌติ เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ มโน จ นิรุชฺฌติ, ธมฺมสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ’ติ. โก นุ โข อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภเชยฺยาติ? เตสํ โน, อาวุโส, อมฺหากํ เอตทโหสิ – ‘อยํ โข อายสฺมา อานนฺโท สตฺถุ เจว สํวณฺณิโต, สมฺภาวิโต จ วิญฺญูนํ สพฺรหฺมจารีนํ. ปโหติ จายสฺมา อานนฺโท อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน [Pg.319] อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภชิตุํ. ยํนูน มยํ เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกเมยฺยาม; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยามา’ติ. วิภชตายสฺมา อานนฺโท’’ติ. "आयुष्मन् आनंद, भगवान हमें संक्षेप में यह उपदेश देकर और विस्तार से इसका अर्थ स्पष्ट किए बिना ही आसन से उठकर विहार में प्रविष्ट हो गए हैं— 'इसलिए भिक्षुओं, उस आयतन को जानना चाहिए जहाँ चक्षु निरुद्ध हो जाता है और रूप-संज्ञा निरुद्ध हो जाती है... पे... जहाँ मन निरुद्ध हो जाता है और धर्म-संज्ञा निरुद्ध हो जाती है, उस आयतन को जानना चाहिए।' आयुष्मन् आनंद, भगवान के जाने के कुछ ही समय बाद हमें यह विचार आया— 'भगवान ने संक्षेप में उपदेश दिया है... इसका विस्तार से अर्थ कौन समझा सकता है?' तब हमें यह विचार आया— 'यह आयुष्मान आनंद शास्ता द्वारा प्रशंसित हैं और विज्ञ सब्रह्मचारियों द्वारा सम्मानित हैं। आयुष्मान आनंद भगवान द्वारा संक्षेप में कहे गए और विस्तार से स्पष्ट न किए गए इस उपदेश का विस्तार से अर्थ समझाने में समर्थ हैं। क्यों न हम आयुष्मान आनंद के पास चलें और उनसे इसका अर्थ पूछें।' आयुष्मान आनंद, कृपया इसका विस्तार से अर्थ समझाएँ।" ‘‘เสยฺยถาปิ, อาวุโส, ปุริโส สารตฺถิโก สารคเวสี สารปริเยสนํ จรมาโน มหโต รุกฺขสฺส…เป… วิภชตายสฺมา อานนฺโท อครุํ กริตฺวาติ. "आयुष्मन्, जैसे कोई पुरुष सार की इच्छा रखने वाला, सार की खोज करने वाला, सार की तलाश में घूमते हुए किसी विशाल, खड़े और सारवान वृक्ष के... पे... आयुष्मान आनंद, आप बिना किसी संकोच के इसका विस्तार से अर्थ समझाएँ।" ‘‘เตนหาวุโส, สุณาถ, สาธุกํ มนสิ กโรถ; ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวมาวุโส’’ติ โข เต ภิกฺขู อายสฺมโต อานนฺทสฺส ปจฺจสฺโสสุํ. อายสฺมา อานนฺโท เอตทโวจ – "तो आयुष्मन्, सुनो और अच्छी तरह मन लगाकर समझो; मैं कहूँगा।" उन भिक्षुओं ने "जी आयुष्मन्" कहकर आयुष्मान आनंद को उत्तर दिया। आयुष्मान आनंद ने यह कहा— ‘‘ยํ โข โว, อาวุโส, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ‘ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, เส อายตเน เวทิตพฺเพ ยตฺถ จกฺขุ จ นิรุชฺฌติ, รูปสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ มโน จ นิรุชฺฌติ, ธมฺมสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ’ติ. อิมสฺส ขฺวาหํ, อาวุโส, ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานามิ. สฬายตนนิโรธํ โน เอตํ, อาวุโส, ภควตา สนฺธาย ภาสิตํ – ‘ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, เส อายตเน เวทิตพฺเพ, ยตฺถ จกฺขุ จ นิรุชฺฌติ, รูปสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ มโน จ นิรุชฺฌติ, ธมฺมสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ’ติ. อยํ โข, อาวุโส, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ‘ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, เส อายตเน เวทิตพฺเพ ยตฺถ จกฺขุ จ นิรุชฺฌติ, รูปสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ มโน จ นิรุชฺฌติ, ธมฺมสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ’ติ. อิมสฺส ขฺวาหํ, อาวุโส, ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส เอวํ วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานามิ. อากงฺขมานา จ ปน ตุมฺเห อายสฺมนฺโต ภควนฺตํเยว อุปสงฺกมถ; อุปสงฺกมิตฺวา เอตมตฺถํ ปุจฺเฉยฺยาถ. ยถา โว ภควา พฺยากโรติ ตถา นํ ธาเรยฺยาถา’’ติ. “हे आयुष्मानों! भगवान ने संक्षेप में जिस उपदेश को निर्दिष्ट कर, विस्तार से अर्थ का विभाजन किए बिना, आसन से उठकर विहार में प्रवेश किया—'इसलिए, भिक्षुओं! उस आयतन को जानना चाहिए जहाँ चक्षु निरुद्ध होता है और रूप-संज्ञा निरुद्ध होती है, उस आयतन को जानना चाहिए... जहाँ मन निरुद्ध होता है और धर्म-संज्ञा निरुद्ध होती है, उस आयतन को जानना चाहिए'—हे आयुष्मानों! भगवान द्वारा संक्षेप में निर्दिष्ट और विस्तार से अविभक्त इस उपदेश का मैं विस्तार से इस प्रकार अर्थ जानता हूँ। हे आयुष्मानों! भगवान ने यह बात छह आयतनों के निरोध (निर्वाण) के संदर्भ में कही है—'इसलिए, भिक्षुओं! उस आयतन को जानना चाहिए जहाँ चक्षु निरुद्ध होता है और रूप-संज्ञा निरुद्ध होती है... जहाँ मन निरुद्ध होता है और धर्म-संज्ञा निरुद्ध होती है, उस आयतन को जानना चाहिए'। हे आयुष्मानों! भगवान ने संक्षेप में जिस उपदेश को निर्दिष्ट कर, विस्तार से अर्थ का विभाजन किए बिना, आसन से उठकर विहार में प्रवेश किया... इस उपदेश का मैं विस्तार से इस प्रकार अर्थ जानता हूँ। यदि आप आयुष्मान चाहें, तो भगवान के ही पास जाएँ और उनसे इस अर्थ को पूछें। भगवान आपको जैसा उत्तर दें, उसे वैसा ही धारण करें।” ‘‘เอวมาวุโส’’ติ [Pg.320] โข เต ภิกฺขู อายสฺมโต อานนฺทสฺส ปฏิสฺสุตฺวา อุฏฺฐายาสนา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – “उन भिक्षुओं ने आयुष्मान आनंद को 'ठीक है आयुष्मान' कहकर उत्तर दिया और आसन से उठकर जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे। पहुँचकर भगवान का अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए उन भिक्षुओं ने भगवान से यह कहा—” ‘‘ยํ โข โน, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ‘ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, เส อายตเน เวทิตพฺเพ ยตฺถ จกฺขุ จ นิรุชฺฌติ, รูปสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ ชิวฺหา จ นิรุชฺฌติ, รสสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ มโน จ นิรุชฺฌติ, ธมฺมสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ’ติ, เตสํ โน, ภนฺเต, อมฺหากํ อจิรปกฺกนฺตสฺส ภควโต เอตทโหสิ – ‘อิทํ โข โน, อาวุโส, ภควา สํขิตฺเตน อุทฺเทสํ อุทฺทิสิตฺวา วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภชิตฺวา อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปวิฏฺโฐ – ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, เส อายตเน เวทิตพฺเพ ยตฺถ จกฺขุ จ นิรุชฺฌติ, รูปสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ…เป… ยตฺถ มโน จ นิรุชฺฌติ, ธมฺมสญฺญา จ นิรุชฺฌติ, เส อายตเน เวทิตพฺเพ’ติ. ‘โก นุ โข อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภเชยฺยา’ติ? เตสํ โน, ภนฺเต, อมฺหากํ เอตทโหสิ – ‘อยํ โข อายสฺมา อานนฺโท สตฺถุ เจว สํวณฺณิโต, สมฺภาวิโต จ วิญฺญูนํ สพฺรหฺมจารีนํ. ปโหติ จายสฺมา อานนฺโท อิมสฺส ภควตา สํขิตฺเตน อุทฺเทสสฺส อุทฺทิฏฺฐสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อวิภตฺตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภชิตุํ. ยํนูน มยํ เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกเมยฺยาม; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยามา’ติ. อถ โข มยํ, ภนฺเต, เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกมิมฺห; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺฉิมฺห. เตสํ โน, ภนฺเต, อายสฺมตา อานนฺเทน อิเมหิ อากาเรหิ, อิเมหิ ปเทหิ, อิเมหิ พฺยญฺชเนหิ อตฺโถ วิภตฺโต’’ติ. “भन्ते! भगवान ने संक्षेप में जिस उपदेश को निर्दिष्ट कर, विस्तार से अर्थ का विभाजन किए बिना, आसन से उठकर विहार में प्रवेश किया—'इसलिए, भिक्षुओं! उस आयतन को जानना चाहिए जहाँ चक्षु निरुद्ध होता है और रूप-संज्ञा निरुद्ध होती है... जहाँ जिह्वा निरुद्ध होती है और रस-संज्ञा निरुद्ध होती है... जहाँ मन निरुद्ध होता है और धर्म-संज्ञा निरुद्ध होती है, उस आयतन को जानना चाहिए'—भन्ते! भगवान के जाने के कुछ ही समय बाद हमें यह विचार आया—'भगवान ने संक्षेप में यह उपदेश दिया है... अब भगवान द्वारा संक्षेप में निर्दिष्ट और विस्तार से अविभक्त इस उपदेश का विस्तार से अर्थ कौन विभाजित करेगा?' भन्ते! तब हमें यह विचार आया—'ये आयुष्मान आनंद शास्ता (बुद्ध) द्वारा प्रशंसित हैं और बुद्धिमान सब्रह्मचारियों द्वारा सम्मानित हैं। आयुष्मान आनंद भगवान द्वारा संक्षेप में निर्दिष्ट और विस्तार से अविभक्त इस उपदेश का विस्तार से अर्थ विभाजित करने में समर्थ हैं। क्यों न हम आयुष्मान आनंद के पास जाएँ और उनसे इस अर्थ को पूछें?' तब भन्ते! हम आयुष्मान आनंद के पास गए और उनसे यह अर्थ पूछा। भन्ते! आयुष्मान आनंद ने इन आकारों, इन पदों और इन व्यंजनों (शब्दों) के माध्यम से हमें अर्थ विस्तार से समझाया।” ‘‘ปณฺฑิโต, ภิกฺขเว, อานนฺโท; มหาปญฺโญ, ภิกฺขเว, อานนฺโท! มํ เจปิ ตุมฺเห, ภิกฺขเว, เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยาถ, อหมฺปิ ตํ เอวเมวํ พฺยากเรยฺยํ ยถา ตํ อานนฺเทน พฺยากตํ. เอโส เจเวตสฺส อตฺโถ. เอวญฺจ นํ ธาเรยฺยาถา’’ติ. จตุตฺถํ. “भिक्षुओं! आनंद पंडित है; भिक्षुओं! आनंद महाप्रज्ञ है। भिक्षुओं! यदि तुम मुझसे भी इस अर्थ को पूछते, तो मैं भी उसी प्रकार उत्तर देता जैसा आनंद ने दिया है। यही इसका अर्थ है। इसे इसी प्रकार धारण करो।” (चौथा सूत्त समाप्त) ๕. สกฺกปญฺหสุตฺตํ ५. सक्कपञ्ह सुत्त (शक्र-प्रश्न सूत्र) ๑๑๘. เอกํ [Pg.321] สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ คิชฺฌกูเฏ ปพฺพเต. อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข สกฺโก เทวานมินฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘โก นุ โข, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ? โก ปน, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ? ११८. एक समय भगवान राजगृह में गृध्रकूट पर्वत पर विहार कर रहे थे। तब देवताओं के राजा शक्र (इंद्र) जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे। पहुँचकर भगवान का अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े होकर देवताओं के राजा शक्र ने भगवान से यह कहा—'भन्ते! क्या हेतु है, क्या प्रत्यय (कारण) है, जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म (दृष्ट धर्म) में परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करते? और भन्ते! क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त कर लेते हैं?' ‘‘สนฺติ โข, เทวานมินฺท, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ ตทุปาทานํ. สอุปาทาโน, เทวานมินฺท, ภิกฺขุ โน ปรินิพฺพายติ…เป…. “हे देवराज! चक्षु-विज्ञेय (आँखों से जाने जाने वाले) ऐसे रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय (लुभावने) हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है, तो उस अभिनन्दन करने वाले, स्वागत करने वाले और आसक्त होकर स्थित रहने वाले भिक्षु का विज्ञान उसी पर आश्रित हो जाता है और वही उसका उपादान (आसक्ति) बन जाता है। हे देवराज! उपादान युक्त भिक्षु परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करता है...। ‘‘สนฺติ โข, เทวานมินฺท, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ โข, เทวานมินฺท, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ ตทุปาทานํ. สอุปาทาโน, เทวานมินฺท, ภิกฺขุ โน ปรินิพฺพายติ. อยํ โข, เทวานมินฺท, เหตุ, อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ. “हे देवराज! जिह्वा-विज्ञेय रस हैं... हे देवराज! मनो-विज्ञेय धर्म (विषय) हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है, तो उस अभिनन्दन करने वाले, स्वागत करने वाले और आसक्त होकर स्थित रहने वाले भिक्षु का विज्ञान उसी पर आश्रित हो जाता है और वही उसका उपादान बन जाता है। हे देवराज! उपादान युक्त भिक्षु परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करता है। हे देवराज! यही वह हेतु है, यही वह प्रत्यय है जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म (दृष्टधर्म) में ही परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करते हैं।” ‘‘สนฺติ จ โข, เทวานมินฺท, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต น ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ, น ตทุปาทานํ. อนุปาทาโน, เทวานมินฺท, ภิกฺขุ ปรินิพฺพายติ…เป…. “हे देवराज! चक्षु-विज्ञेय ऐसे रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता है, उनका स्वागत नहीं करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित नहीं रहता है, तो उस अभिनन्दन न करने वाले, स्वागत न करने वाले और आसक्त न रहने वाले भिक्षु का विज्ञान उस पर आश्रित नहीं होता है और न ही वह उसका उपादान बनता है। हे देवराज! उपादान रहित भिक्षु परिनिर्वाण प्राप्त करता है...। ‘‘สนฺติ โข, เทวานมินฺท, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ โข, เทวานมินฺท, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต น ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ น ตทุปาทานํ. อนุปาทาโน, เทวานมินฺท, ภิกฺขุ [Pg.322] ปรินิพฺพายติ. อยํ โข, เทวานมินฺท, เหตุ, อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ. ปญฺจมํ. “हे देवराज! जिह्वा-विज्ञेय रस हैं... हे देवराज! मनो-विज्ञेय धर्म हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता है, उनका स्वागत नहीं करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित नहीं रहता है, तो उस अभिनन्दन न करने वाले, स्वागत न करने वाले और आसक्त न रहने वाले भिक्षु का विज्ञान उस पर आश्रित नहीं होता है और न ही वह उसका उपादान बनता है। हे देवराज! उपादान रहित भिक्षु परिनिर्वाण प्राप्त करता है। हे देवराज! यही वह हेतु है, यही वह प्रत्यय है जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त करते हैं।” पाँचवाँ सुत्त। ๖. ปญฺจสิขสุตฺตํ ६. ६. पञ्चसिख सुत्त ๑๑๙. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ คิชฺฌกูเฏ ปพฺพเต. อถ โข ปญฺจสิโข คนฺธพฺพเทวปุตฺโต เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข ปญฺจสิโข คนฺธพฺพเทวปุตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘โก นุ โข, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ? โก ปน, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ? ‘‘สนฺติ โข, ปญฺจสิข, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา…เป… สนฺติ โข, ปญฺจสิข, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ ตทุปาทานํ. สอุปาทาโน, ปญฺจสิข, ภิกฺขุ โน ปรินิพฺพายติ. อยํ โข, ปญฺจสิข, เหตุ, อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ’’. ११९. ११९. एक समय भगवान राजगृह में गृध्रकूट पर्वत पर विहार कर रहे थे। तब पञ्चसिख गन्धर्व देवपुत्र जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़ा हो गया। एक ओर खड़े हुए पञ्चसिख गन्धर्व देवपुत्र ने भगवान से यह कहा— “भन्ते! क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करते? और भन्ते! क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त करते हैं?” “पञ्चसिख! चक्षु-विज्ञेय रूप हैं... पञ्चसिख! मनो-विज्ञेय धर्म हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है, तो उस अभिनन्दन करने वाले, स्वागत करने वाले और आसक्त होकर स्थित रहने वाले भिक्षु का विज्ञान उसी पर आश्रित हो जाता है और वही उसका उपादान बन जाता है। पञ्चसिख! उपादान युक्त भिक्षु परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करता है। पञ्चसिख! यही वह हेतु है, यही वह प्रत्यय है जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करते हैं।” ‘‘สนฺติ จ โข, ปญฺจสิข, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา…เป… สนฺติ โข, ปญฺจสิข, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ, ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต น ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ, น ตทุปาทานํ. อนุปาทาโน, ปญฺจสิข, ภิกฺขุ ปรินิพฺพายติ. อยํ โข, ปญฺจสิข, เหตุ, อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ. ฉฏฺฐํ. “पञ्चसिख! चक्षु-विज्ञेय रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप हैं... पञ्चसिख! मनो-विज्ञेय धर्म हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता है, उनका स्वागत नहीं करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित नहीं रहता है, तो उस अभिनन्दन न करने वाले, स्वागत न करने वाले और आसक्त न रहने वाले भिक्षु का विज्ञान उस पर आश्रित नहीं होता है और न ही वह उसका उपादान बनता है। पञ्चसिख! उपादान रहित भिक्षु परिनिर्वाण प्राप्त करता है। पञ्चसिख! यही वह हेतु है, यही वह प्रत्यय है जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त करते हैं।” छठा सुत्त। ๗. สาริปุตฺตสทฺธิวิหาริกสุตฺตํ ७. ७. सारिपुत्त सद्धिविहारिक सुत्त ๑๒๐. เอกํ สมยํ อายสฺมา สาริปุตฺโต สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยนายสฺมา สาริปุตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา สาริปุตฺเตน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โส ภิกฺขุ อายสฺมนฺตํ สาริปุตฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สทฺธิวิหาริโก[Pg.323], อาวุโส สาริปุตฺต, ภิกฺขุ สิกฺขํ ปจฺจกฺขาย หีนายาวตฺโต’’ติ. १२०. १२०. एक समय आयुष्मान सारिपुत्त सावत्थी में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे। तब एक भिक्षु जहाँ आयुष्मान सारिपुत्त थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर आयुष्मान सारिपुत्त के साथ कुशल-क्षेम पूछा। सुखद और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए उस भिक्षु ने आयुष्मान सारिपुत्त से यह कहा— “आवुस सारिपुत्त! आपका सद्धिविहारिक (शिष्य) भिक्षु शिक्षा का त्याग कर हीन (गृहस्थ) जीवन में लौट गया है।” ‘‘เอวเมตํ, อาวุโส, โหติ อินฺทฺริเยสุ อคุตฺตทฺวารสฺส, โภชเน อมตฺตญฺญุโน, ชาคริยํ อนนุยุตฺตสฺส. ‘โส วตาวุโส, ภิกฺขุ อินฺทฺริเยสุ อคุตฺตทฺวาโร โภชเน อมตฺตญฺญู ชาคริยํ อนนุยุตฺโต ยาวชีวํ ปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ สนฺตาเนสฺสตี’ติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. ‘โส วตาวุโส, ภิกฺขุ อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวาโร, โภชเน มตฺตญฺญู, ชาคริยํ อนุยุตฺโต ยาวชีวํ ปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ สนฺตาเนสฺสตี’ติ ฐานเมตํ วิชฺชติ. “आवुस! जिसकी इन्द्रियों के द्वार सुरक्षित नहीं हैं, जो भोजन में मात्रा को नहीं जानता और जो जागृति (प्रमाद रहित होने) में संलग्न नहीं है, उसके साथ ऐसा ही होता है। आवुस! यह संभव नहीं है कि वह भिक्षु जिसकी इन्द्रियों के द्वार सुरक्षित नहीं हैं, जो भोजन में मात्रा को नहीं जानता और जो जागृति में संलग्न नहीं है, वह जीवन भर परिपूर्ण और परिशुद्ध ब्रह्मचर्य का पालन कर सकेगा। आवुस! यह संभव है कि वह भिक्षु जिसकी इन्द्रियों के द्वार सुरक्षित हैं, जो भोजन में मात्रा को जानता है और जो जागृति में संलग्न है, वह जीवन भर परिपूर्ण और परिशुद्ध ब्रह्मचर्य का पालन कर सकेगा।” ‘‘กถญฺจาวุโส, อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวาโร โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา น นิมิตฺตคฺคาหี โหติ นานุพฺยญฺชนคฺคาหี. ยตฺวาธิกรณเมนํ จกฺขุนฺทฺริยํ อสํวุตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อนฺวาสฺสเวยฺยุํ ตสฺส สํวราย ปฏิปชฺชติ, รกฺขติ จกฺขุนฺทฺริยํ, จกฺขุนฺทฺริเย สํวรํ อาปชฺชติ. โสเตน สทฺทํ สุตฺวา… ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตฺวา… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา… กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสิตฺวา… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย น นิมิตฺตคฺคาหี โหติ นานุพฺยญฺชนคฺคาหี. ยตฺวาธิกรณเมนํ มนินฺทฺริยํ อสํวุตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อนฺวาสฺสเวยฺยุํ, ตสฺส สํวราย ปฏิปชฺชติ, รกฺขติ มนินฺทฺริยํ, มนินฺทฺริเย สํวรํ อาปชฺชติ. เอวํ โข, อาวุโส, อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวาโร โหติ. हे आयुष्मान! इंद्रियों में सुरक्षित द्वारों वाला कैसे होता है? हे आयुष्मान! यहाँ भिक्षु आँखों से रूप को देखकर न तो उसके निमित्त (सामान्य लक्षणों) को ग्रहण करता है और न ही उसके अनुव्यंजन (विवरणों) को। जिस कारण से चक्षु-इंद्रिय को असंयत रखकर विहार करने वाले उस भिक्षु को लोभ और द्वेष जैसे पापमय अकुशल धर्म सता सकते हैं, वह उसके संयम के लिए अभ्यास करता है, चक्षु-इंद्रिय की रक्षा करता है और चक्षु-इंद्रिय में संवर (संयम) को प्राप्त होता है। कान से शब्द सुनकर... नाक से गंध सूंघकर... जीभ से रस चखकर... शरीर से स्पर्श का अनुभव करके... मन से धर्म को जानकर न तो निमित्तग्राही होता है और न ही अनुव्यंजनग्राही। जिस कारण से मन-इंद्रिय को असंयत रखकर विहार करने वाले उस भिक्षु को लोभ और द्वेष जैसे पापमय अकुशल धर्म सता सकते हैं, वह उसके संयम के लिए अभ्यास करता है, मन-इंद्रिय की रक्षा करता है और मन-इंद्रिय में संवर को प्राप्त होता है। हे आयुष्मान! इस प्रकार इंद्रियों में सुरक्षित द्वारों वाला होता है। ‘‘กถญฺจาวุโส, โภชเน มตฺตญฺญู โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ ปฏิสงฺขา โยนิโส อาหารํ อาหาเรติ – ‘เนว ทวาย, น มทาย, น มณฺฑนาย, น วิภูสนาย, ยาวเทว อิมสฺส กายสฺส ฐิติยา ยาปนาย, วิหึสูปรติยา, พฺรหฺมจริยานุคฺคหาย. อิติ ปุราณญฺจ เวทนํ ปฏิหงฺขามิ, นวญฺจ เวทนํ น อุปฺปาเทสฺสามิ, ยาตฺรา จ เม ภวิสฺสติ, อนวชฺชตา จ ผาสุวิหาโร จา’ติ. เอวํ โข, อาวุโส, โภชเน มตฺตญฺญู โหติ. हे आयुष्मान! भोजन में मात्रा को जानने वाला कैसे होता है? हे आयुष्मान! यहाँ भिक्षु विवेकपूर्वक विचार करके आहार ग्रहण करता है—'न तो मनोरंजन के लिए, न मद के लिए, न श्रृंगार के लिए, न शोभा के लिए, बल्कि केवल इस शरीर की स्थिति और निर्वाह के लिए, कष्ट की निवृत्ति के लिए और ब्रह्मचर्य की सहायता के लिए। इस प्रकार मैं पुरानी वेदना को शांत करूँगा और नई वेदना को उत्पन्न नहीं होने दूँगा, और मेरी जीवन-यात्रा सुगम होगी, मैं निर्दोष रहूँगा और सुखपूर्वक विहार करूँगा।' हे आयुष्मान! इस प्रकार भोजन में मात्रा को जानने वाला होता है। ‘‘กถญฺจาวุโส, ชาคริยํ อนุยุตฺโต โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ ทิวสํ จงฺกเมน นิสชฺชาย อาวรณีเยหิ ธมฺเมหิ จิตฺตํ ปริโสเธติ. รตฺติยา ปฐมํ ยามํ จงฺกเมน นิสชฺชาย อาวรณีเยหิ ธมฺเมหิ จิตฺตํ ปริโสเธติ. รตฺติยา มชฺฌิมํ ยามํ ทกฺขิเณน ปสฺเสน สีหเสยฺยํ กปฺเปติ ปาเท ปาทํ อจฺจาธาย สโต สมฺปชาโน, อุฏฺฐานสญฺญํ มนสิ กริตฺวา. รตฺติยา ปจฺฉิมํ ยามํ ปจฺจุฏฺฐาย จงฺกเมน นิสชฺชาย อาวรณีเยหิ ธมฺเมหิ จิตฺตํ ปริโสเธติ. เอวํ โข, อาวุโส, ชาคริยํ [Pg.324] อนุยุตฺโต โหติ. ตสฺมาติหาวุโส, เอวํ สิกฺขิตพฺพํ – ‘อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวารา ภวิสฺสาม, โภชเน มตฺตญฺญุโน, ชาคริยํ อนุยุตฺตา’ติ. เอวญฺหิ โว, อาวุโส, สิกฺขิตพฺพ’’นฺติ. สตฺตมํ. हे आयुष्मान! जागरण में लगा हुआ कैसे होता है? हे आयुष्मान! यहाँ भिक्षु दिन के समय चंक्रमण और बैठने के द्वारा चित्त को बाधक धर्मों से शुद्ध करता है। रात्रि के प्रथम प्रहर में चंक्रमण और बैठने के द्वारा चित्त को बाधक धर्मों से शुद्ध करता है। रात्रि के मध्यम प्रहर में दाहिनी करवट लेकर, एक पैर पर दूसरा पैर रखकर, स्मृतिवान और संप्रजन्य होकर, उठने के संकल्प को मन में रखकर सिंह-शय्या लगाता है। रात्रि के अंतिम प्रहर में उठकर चंक्रमण और बैठने के द्वारा चित्त को बाधक धर्मों से शुद्ध करता है। हे आयुष्मान! इस प्रकार जागरण में लगा हुआ होता है। इसलिए, हे आयुष्मान! इस प्रकार सीखना चाहिए—'हम इंद्रियों में सुरक्षित द्वारों वाले होंगे, भोजन में मात्रा को जानने वाले होंगे और जागरण में लगे हुए होंगे।' हे आयुष्मान! तुम्हें इसी प्रकार सीखना चाहिए। सातवाँ (सुत्त) समाप्त। ๘. ราหุโลวาทสุตฺตํ ८. राहुलवाद सुत्त ๑๒๑. เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. อถ โข ภควโต รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘‘ปริปกฺกา โข ราหุลสฺส วิมุตฺติปริปาจนิยา ธมฺมา; ยํนูนาหํ ราหุลํ อุตฺตรึ อาสวานํ ขเย วิเนยฺย’’นฺติ. อถ โข ภควา ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สาวตฺถิยํ ปิณฺฑาย จริตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺโต อายสฺมนฺตํ ราหุลํ อามนฺเตสิ – ‘‘คณฺหาหิ, ราหุล, นิสีทนํ. เยน อนฺธวนํ เตนุปสงฺกมิสฺสาม ทิวาวิหารายา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา ราหุโล ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา นิสีทนํ อาทาย ภควนฺตํ ปิฏฺฐิโต ปิฏฺฐิโต อนุพนฺธิ. १२१. एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन विहार में विहार कर रहे थे। तब एकांत में ध्यानमग्न भगवान के मन में ऐसा विचार उत्पन्न हुआ—'राहुल के विमुक्ति को परिपक्व करने वाले धर्म परिपक्व हो गए हैं; क्यों न मैं राहुल को आस्रवों के क्षय के लिए और अधिक प्रशिक्षित करूँ।' तब भगवान पूर्वाह्न के समय निवसन पहनकर, पात्र और चीवर लेकर श्रावस्ती में भिक्षा के लिए गए और भोजन के पश्चात भिक्षाटन से लौटकर आयुष्मान राहुल को संबोधित किया—'राहुल, निसीदन (आसन) उठा लो। हम दिन के विश्राम के लिए अंधवन चलेंगे।' 'जी भंते,' कहकर आयुष्मान राहुल ने भगवान को उत्तर दिया और निसीदन लेकर भगवान के पीछे-पीछे चल दिए। เตน โข ปน สมเยน อเนกานิ เทวตาสหสฺสานิ ภควนฺตํ อนุพนฺธานิ โหนฺติ – ‘‘อชฺช ภควา อายสฺมนฺตํ ราหุลํ อุตฺตรึ อาสวานํ ขเย วิเนสฺสตี’’ติ. อถ โข ภควา อนฺธวนํ อชฺโฌคาเหตฺวา อญฺญตรสฺมึ รุกฺขมูเล ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. อายสฺมาปิ โข ราหุโล ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข อายสฺมนฺตํ ราหุลํ ภควา เอตทโวจ – उस समय हजारों देवता भगवान के पीछे-पीछे चल रहे थे—'आज भगवान आयुष्मान राहुल को आस्रवों के क्षय के लिए और अधिक प्रशिक्षित करेंगे।' तब भगवान अंधवन में प्रवेश कर एक वृक्ष के नीचे बिछाए गए आसन पर बैठ गए। आयुष्मान राहुल ने भी भगवान को अभिवादन किया और एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान राहुल से भगवान ने यह कहा— ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, ราหุล, จกฺขุ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? राहुल, तुम क्या मानते हो, चक्षु नित्य है या अनित्य? ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. भंते, अनित्य है। ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख? ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. भंते, दुःख है। ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? जो अनित्य, दुःख और विपरिणामधर्मी है, क्या उसे ऐसा देखना उचित है—'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है'? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ( ) नहीं भंते। ‘‘รูปา นิจฺจา วา อนิจฺจา วา’’ติ? रूप नित्य हैं या अनित्य? ‘‘อนิจฺจา, ภนฺเต’’…เป…. भंते, अनित्य हैं... इत्यादि। ‘‘จกฺขุวิญฺญาณํ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? चक्षु-विज्ञान नित्य है या अनित्य? ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’…เป…. भंते, अनित्य है... इत्यादि। ‘‘จกฺขุสมฺผสฺโส นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? चक्षु-संपर्श नित्य है या अनित्य? ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’…เป…. भंते, अनित्य है... इत्यादि। ‘‘ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทนาคตํ, สญฺญาคตํ, สงฺขารคตํ, วิญฺญาณคตํ, ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो भी वेदना, संज्ञा, संस्कार या विज्ञान उत्पन्न होता है, वह भी नित्य है या अनित्य? ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. भंते, अनित्य है। ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख? ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. भंते, दुःख है। ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ[Pg.325], เอโส เม อตฺตา’’’ติ? जो अनित्य, दुःख और विपरिणामधर्मी है, क्या उसे ऐसा देखना उचित है—'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है'? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’…เป…. नहीं भंते... इत्यादि। ‘‘ชิวฺหา นิจฺจา วา อนิจฺจา วา’’ติ? जिह्वा नित्य है या अनित्य? ‘‘อนิจฺจา, ภนฺเต’’…เป…. भंते, अनित्य है... इत्यादि। ‘‘ชิวฺหาวิญฺญาณํ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? जिह्वा-विज्ञान नित्य है या अनित्य? ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’…เป…. भंते, अनित्य है... इत्यादि। ‘‘ชิวฺหาสมฺผสฺโส นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? जिह्वा-संपर्श नित्य है या अनित्य? ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’…เป…. भंते, अनित्य है... इत्यादि। ‘‘ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทนาคตํ, สญฺญาคตํ, สงฺขารคตํ, วิญฺญาณคตํ, ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “जिह्वा-स्पर्श (जीभ के स्पर्श) के प्रत्यय से जो वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान उत्पन्न होते हैं, क्या वे नित्य हैं या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य हैं, भन्ते।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःख है, भन्ते।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “जो अनित्य, दुःख और परिवर्तनशील स्वभाव वाला है, क्या उसे ऐसा देखना उचित है— ‘यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है’?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’…เป…. “नहीं, भन्ते।”...पे... ‘‘มโน นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? “मन नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’. “अनित्य है, भन्ते।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วาติ? “जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःख है, भन्ते।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “जो अनित्य, दुःख और परिवर्तनशील स्वभाव वाला मन है, क्या उसे ऐसा देखना उचित है— ‘यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है’?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नहीं, भन्ते।” ‘‘ธมฺมา นิจฺจา วา อนิจฺจา วา’’ติ? “धम्म (मानसिक विषय) नित्य हैं या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจา, ภนฺเต’’…เป…. “अनित्य हैं, भन्ते।”...पे... ‘‘มโนวิญฺญาณํ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “मनो-विज्ञान नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’…เป…. “अनित्य है, भन्ते।”...पे... ‘‘มโนสมฺผสฺโส นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วา’’ติ? “मनो-स्पर्श नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺโจ, ภนฺเต’’…เป…. “अनित्य है, भन्ते।”...पे... ‘‘ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทนาคตํ, สญฺญาคตํ, สงฺขารคตํ, วิญฺญาณคตํ, ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? “मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान उत्पन्न होते हैं, क्या वे नित्य हैं या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “अनित्य हैं, भन्ते।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. “दुःख है, भन्ते।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? “जो अनित्य, दुःख और परिवर्तनशील स्वभाव वाला है, क्या उसे ऐसा देखना उचित है— ‘यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है’?” ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “नहीं, भन्ते।” ‘‘เอวํ ปสฺสํ, ราหุล, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทนาคตํ สญฺญาคตํ สงฺขารคตํ วิญฺญาณคตํ ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… ชิวฺหายปิ นิพฺพินฺทติ, รเสสุปิ นิพฺพินฺทติ, ชิวฺหาวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, ชิวฺหาสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ, ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทนาคตํ สญฺญาคตํ สงฺขารคตํ วิญฺญาณคตํ ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป…. “हे राहुल! इस प्रकार देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक चक्षु से भी निर्वेद प्राप्त करता है, रूपों से भी निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-विज्ञान से भी निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-स्पर्श से भी निर्वेद प्राप्त करता है; और चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय से जो वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान उत्पन्न होते हैं, उनसे भी निर्वेद प्राप्त करता है... जिह्वा से भी निर्वेद प्राप्त करता है, रसों से भी निर्वेद प्राप्त करता है, जिह्वा-विज्ञान से भी निर्वेद प्राप्त करता है, जिह्वा-स्पर्श से भी निर्वेद प्राप्त करता है; और जिह्वा-स्पर्श के प्रत्यय से जो वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान उत्पन्न होते हैं, उनसे भी निर्वेद प्राप्त करता है...। ” ‘‘มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, ธมฺเมสุปิ นิพฺพินฺทติ, มโนวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, มโนสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทนาคตํ สญฺญาคตํ สงฺขารคตํ วิญฺญาณคตํ ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. “मन से भी निर्वेद प्राप्त करता है, धम्मों से भी निर्वेद प्राप्त करता है, मनो-विज्ञान से भी निर्वेद प्राप्त करता है, मनो-स्पर्श से भी निर्वेद प्राप्त करता है; और मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान उत्पन्न होते हैं, उनसे भी निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद होने पर वह विरक्त हो जाता है; विरक्त होने से वह मुक्त हो जाता है; मुक्त होने पर ‘मैं मुक्त हूँ’ ऐसा ज्ञान होता है। वह जान लेता है— ‘जन्म क्षीण हो गया, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया, जो करना था वह कर लिया गया, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है’।” อิทมโวจ ภควา. อตฺตมโน อายสฺมา ราหุโล ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิ. อิมสฺมิญฺจ ปน เวยฺยากรณสฺมึ ภญฺญมาเน อายสฺมโต ราหุลสฺส อนุปาทาย อาสเวหิ จิตฺตํ วิมุจฺจิ. อเนกานญฺจ [Pg.326] เทวตาสหสฺสานํ วิรชํ วีตมลํ ธมฺมจกฺขุํ อุทปาทิ – ‘‘ยํ กิญฺจิ สมุทยธมฺมํ, สพฺพํ ตํ นิโรธธมฺม’’นฺติ. อฏฺฐมํ. भगवान ने यह कहा। आयुष्मान राहुल भगवान के भाषण से प्रसन्न हुए और उसका अभिनन्दन किया। जब यह उपदेश दिया जा रहा था, तब आयुष्मान राहुल का चित्त उपादान-रहित होकर आस्रवों से मुक्त हो गया। और अनेक सहस्र देवताओं को विरज, निर्मल धर्म-चक्षु उत्पन्न हुआ— ‘जो कुछ भी उत्पन्न होने वाला स्वभाव वाला है, वह सब निरोध होने वाला स्वभाव वाला है’। आठवाँ सूक्त समाप्त। ๙. สํโยชนิยธมฺมสุตฺตํ ९. संयोजनीय धम्म सुत्त ๑๒๒. ‘‘สํโยชนิเย จ, ภิกฺขเว, ธมฺเม เทเสสฺสามิ สํโยชนญฺจ. ตํ สุณาถ. กตเม จ, ภิกฺขเว, สํโยชนิยา ธมฺมา, กตมญฺจ สํโยชนํ? สนฺติ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. อิเม วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, สํโยชนิยา ธมฺมา. โย ตตฺถ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. อิเม วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, สํโยชนิยา ธมฺมา. โย ตตฺถ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ สํโยชน’’นฺติ. นวมํ. १२२. “भिक्षुओं! मैं तुम्हें संयोजन उत्पन्न करने वाले धर्मों और संयोजन के बारे में उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! संयोजन उत्पन्न करने वाले धर्म कौन से हैं और संयोजन क्या है? भिक्षुओं! चक्षु-विज्ञेय रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और राग उत्पन्न करने वाले हैं। भिक्षुओं! इन्हें संयोजन उत्पन्न करने वाले धर्म कहा जाता है। उनमें जो छन्द-राग है, वही वहाँ संयोजन है... भिक्षुओं! जिह्वा-विज्ञेय रस हैं... भिक्षुओं! मनो-विज्ञेय धम्म हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और राग उत्पन्न करने वाले हैं। भिक्षुओं! इन्हें संयोजन उत्पन्न करने वाले धर्म कहा जाता है। उनमें जो छन्द-राग है, वही वहाँ संयोजन है।” नौवाँ सूक्त समाप्त। ๑๐. อุปาทานิยธมฺมสุตฺตํ १०. उपादानीय धम्म सुत्त ๑๒๓. ‘‘อุปาทานิเย จ, ภิกฺขเว, ธมฺเม เทเสสฺสามิ อุปาทานญฺจ. ตํ สุณาถ. กตเม จ, ภิกฺขเว, อุปาทานิยา ธมฺมา, กตมญฺจ อุปาทานํ? สนฺติ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. อิเม วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, อุปาทานิยา ธมฺมา. โย ตตฺถ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ อุปาทานํ…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. อิเม วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, อุปาทานิยา ธมฺมา. โย ตตฺถ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ อุปาทาน’’นฺติ. ทสมํ. १२३. “भिक्षुओं! मैं तुम्हें उपादान (आसक्ति) के योग्य धर्मों और उपादान के बारे में उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! उपादान के योग्य धर्म कौन से हैं और उपादान क्या है? भिक्षुओं! चक्षु-विज्ञेय (आँखों से जाने जाने वाले) रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय (राग उत्पन्न करने वाले) हैं। भिक्षुओं! इन्हें उपादान के योग्य धर्म कहा जाता है। वहाँ जो छन्द-राग (इच्छा और आसक्ति) है, वही वहाँ उपादान है... (इसी प्रकार) जिह्वा-विज्ञेय रस हैं... मन-विज्ञेय धर्म हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। भिक्षुओं! इन्हें उपादान के योग्य धर्म कहा जाता है। वहाँ जो छन्द-राग है, वही वहाँ उपादान है।” दसवाँ (सूत्र)। โลกกามคุณวคฺโค ทฺวาทสโม. लोककामगुण वर्ग बारहवाँ है। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान) इस प्रकार है – มารปาเสน ทฺเว วุตฺตา, โลกกามคุเณน จ; สกฺโก ปญฺจสิโข เจว, สาริปุตฺโต จ ราหุโล; สํโยชนํ อุปาทานํ, วคฺโค เตน ปวุจฺจตีติ. मारपास (सूत्र) के साथ दो कहे गए हैं, और लोककामगुण (सूत्र) के साथ दो; सक्क, पञ्चसिख, सारिपुत्त और राहुल; संयोजन और उपादान; इसी कारण इसे वर्ग कहा जाता है। ๑๓. คหปติวคฺโค १३. गृहपति वर्ग ๑. เวสาลีสุตฺตํ १. वैशाली सूत्र ๑๒๔. เอกํ [Pg.327] สมยํ ภควา เวสาลิยํ วิหรติ มหาวเน กูฏาคารสาลายํ. อถ โข อุคฺโค คหปติ เวสาลิโก เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อุคฺโค คหปติ เวสาลิโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘โก นุ โข, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ? โก ปน, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ? १२४. एक समय भगवान वैशाली के महावन में कूटागारशाला में विहार कर रहे थे। तब वैशाली का उग्ग गृहपति जहाँ भगवान थे, वहाँ गया; जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए उग्ग गृहपति ने भगवान से यह कहा — “भन्ते! वह क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म (दृष्ट धर्म) में परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करते? और भन्ते! वह क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त करते हैं?” ‘‘สนฺติ โข, คหปติ, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ ตทุปาทานํ. สอุปาทาโน, คหปติ, ภิกฺขุ โน ปรินิพฺพายติ…เป… สนฺติ โข, คหปติ, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ โข, คหปติ, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ ตทุปาทานํ. สอุปาทาโน, คหปติ, ภิกฺขุ โน ปรินิพฺพายติ. อยํ โข, คหปติ, เหตุ, อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ. “गृहपति! चक्षु-विज्ञेय रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है, तो उस अभिनन्दन करने वाले, स्वागत करने वाले और आसक्त होकर स्थित रहने वाले का विज्ञान उसी पर आश्रित होता है और वही उसका उपादान बन जाता है। गृहपति! उपादान सहित (स-उपादान) भिक्षु परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करता... (इसी प्रकार) जिह्वा-विज्ञेय रस हैं... मन-विज्ञेय धर्म हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है, तो उसका विज्ञान उसी पर आश्रित होता है और वही उसका उपादान बन जाता है। गृहपति! उपादान सहित भिक्षु परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करता। गृहपति! यही वह हेतु है, यही वह प्रत्यय है, जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करते। ‘‘สนฺติ จ โข, คหปติ, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา, อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต น ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ, น ตทุปาทานํ. อนุปาทาโน, คหปติ, ภิกฺขุ ปรินิพฺพายติ…เป… สนฺติ โข, คหปติ, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ โข, คหปติ, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ, ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต. น ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ, น ตทุปาทานํ. อนุปาทาโน[Pg.328], คหปติ, ภิกฺขุ ปรินิพฺพายติ. อยํ โข, คหปติ, เหตุ อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ. ปฐมํ. “गृहपति! चक्षु-विज्ञेय रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता, उनका स्वागत नहीं करता और उनमें आसक्त होकर स्थित नहीं रहता, तो उस अभिनन्दन न करने वाले, स्वागत न करने वाले और आसक्त होकर स्थित न रहने वाले का विज्ञान उस पर आश्रित नहीं होता और न ही वह उसका उपादान बनता है। गृहपति! उपादान रहित (अनुपादान) भिक्षु परिनिर्वाण प्राप्त करता है... (इसी प्रकार) जिह्वा-विज्ञेय रस हैं... मन-विज्ञेय धर्म हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता, उनका स्वागत नहीं करता और उनमें आसक्त होकर स्थित नहीं रहता, तो उसका विज्ञान उस पर आश्रित नहीं होता और न ही वह उसका उपादान बनता है। गृहपति! उपादान रहित भिक्षु परिनिर्वाण प्राप्त करता है। गृहपति! यही वह हेतु है, यही वह प्रत्यय है, जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त करते हैं।” प्रथम (सूत्र)। ๒. วชฺชีสุตฺตํ २. वज्जी सूत्र ๑๒๕. เอกํ สมยํ ภควา วชฺชีสุ วิหรติ หตฺถิคาเม. อถ โข อุคฺโค คหปติ หตฺถิคามโก เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อุคฺโค คหปติ หตฺถิคามโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘โก นุ โข, ภนฺเต, เหตุ โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ? โก ปน, ภนฺเต เหตุ โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ? (ยถา ปุริมสุตฺตนฺตํ, เอวํ วิตฺถาเรตพฺพํ). อยํ โข, คหปติ, เหตุ อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตีติ. ทุติยํ. १२५. एक समय भगवान वज्जी देश के हत्थिग्राम में विहार कर रहे थे। तब हत्थिग्राम का उग्ग गृहपति जहाँ भगवान थे, वहाँ गया; जाकर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए हत्थिग्राम के उग्ग गृहपति ने भगवान से यह कहा — “भन्ते! वह क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करते? और भन्ते! वह क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त करते हैं?” (पिछले सूत्र की तरह विस्तार करना चाहिए)। “गृहपति! यही वह हेतु है, यही वह प्रत्यय है, जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त करते हैं।” द्वितीय (सूत्र)। ๓. นาฬนฺทสุตฺตํ ३. नालन्दा सूत्र ๑๒๖. เอกํ สมยํ ภควา นาฬนฺทายํ วิหรติ ปาวาริกมฺพวเน. อถ โข, อุปาลิ คหปติ, เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข, อุปาลิ คหปติ, ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘โก นุ โข, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ? โก ปน, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ? (ยถา ปุริมสุตฺตนฺตํ, เอวํ วิตฺถาเรตพฺพํ). อยํ โข, คหปติ, เหตุ อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตีติ. ตติยํ. १२६. एक समय भगवान नालन्दा के पावारिक आम्रवन में विहार कर रहे थे। तब उपालि गृहपति जहाँ भगवान थे, वहाँ गया... एक ओर बैठे हुए उपालि गृहपति ने भगवान से यह कहा — “भन्ते! वह क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करते? और भन्ते! वह क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त करते हैं?” (पिछले सूत्र की तरह विस्तार करना चाहिए)। “गृहपति! यही वह हेतु है, यही वह प्रत्यय है, जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त करते हैं।” तृतीय (सूत्र)। ๔. ภารทฺวาชสุตฺตํ ४. भारद्वाज सूत्र ๑๒๗. เอกํ สมยํ อายสฺมา ปิณฺโฑลภารทฺวาโช โกสมฺพิยํ วิหรติ โฆสิตาราเม. อถ โข ราชา อุเทโน เยนายสฺมา ปิณฺโฑลภารทฺวาโช เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา ปิณฺโฑลภารทฺวาเชน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราชา อุเทโน อายสฺมนฺตํ ปิณฺโฑลภารทฺวาชํ เอตทโวจ – ‘‘โก นุ โข, โภ ภารทฺวาช, เหตุ [Pg.329] โก ปจฺจโย เยนิเม ทหรา ภิกฺขู สุสู กาฬเกสา ภทฺเรน โยพฺพเนน สมนฺนาคตา ปฐเมน วยสา อนิกีฬิตาวิโน กาเมสุ ยาวชีวํ ปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ จรนฺติ, อทฺธานญฺจ อาปาเทนฺตี’’ติ? ‘‘วุตฺตํ โข เอตํ, มหาราช, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน – ‘เอถ ตุมฺเห, ภิกฺขเว, มาตุมตฺตีสุ มาตุจิตฺตํ อุปฏฺฐเปถ, ภคินิมตฺตีสุ ภคินิจิตฺตํ อุปฏฺฐเปถ, ธีตุมตฺตีสุ ธีตุจิตฺตํ อุปฏฺฐเปถา’ติ. อยํ โข, มหาราช, เหตุ, อยํ ปจฺจโย เยนิเม ทหรา ภิกฺขู สุสู กาฬเกสา ภทฺเรน โยพฺพเนน สมนฺนาคตา ปฐเมน วยสา อนิกีฬิตาวิโน กาเมสุ ยาวชีวํ ปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ จรนฺติ, อทฺธานญฺจ อาปาเทนฺตี’’ติ. १२७. एक समय आयुष्मान पिण्डोल भारद्वाज कोसम्बी के घोषिताराम में विहार कर रहे थे। तब राजा उदेन जहाँ आयुष्मान पिण्डोल भारद्वाज थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर आयुष्मान पिण्डोल भारद्वाज के साथ कुशल-क्षेम पूछा। आनंददायक और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वे एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए राजा उदेन ने आयुष्मान पिण्डोल भारद्वाज से यह कहा— "हे भारद्वाज! क्या कारण है, क्या हेतु है कि ये युवा भिक्षु, जो अभी तरुण हैं, जिनके बाल काले हैं, जो उत्तम यौवन से युक्त हैं, अपनी प्रथम अवस्था में हैं, जिन्होंने काम-भोगों का अनुभव नहीं किया है, वे जीवन भर पूर्ण और शुद्ध ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं और उसे दीर्घकाल तक निभाते हैं?" "महाराज! उन जानने वाले, देखने वाले, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध भगवान ने यह कहा है— 'आओ भिक्षुओं! तुम माता की आयु वाली स्त्रियों में माता का भाव स्थापित करो, बहन की आयु वाली स्त्रियों में बहन का भाव स्थापित करो, और पुत्री की आयु वाली स्त्रियों में पुत्री का भाव स्थापित करो'। महाराज! यही वह कारण है, यही वह हेतु है जिससे ये युवा भिक्षु, जो अभी तरुण हैं, जिनके बाल काले हैं, जो उत्तम यौवन से युक्त हैं, अपनी प्रथम अवस्था में हैं, जिन्होंने काम-भोगों का अनुभव नहीं किया है, वे जीवन भर पूर्ण और शुद्ध ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं और उसे दीर्घकाल तक निभाते हैं।" ‘‘โลลํ โข, โภ ภารทฺวาช, จิตฺตํ. อปฺเปกทา มาตุมตฺตีสุปิ โลภธมฺมา อุปฺปชฺชนฺติ, ภคินิมตฺตีสุปิ โลภธมฺมา อุปฺปชฺชนฺติ, ธีตุมตฺตีสุปิ โลภธมฺมา อุปฺปชฺชนฺติ. อตฺถิ นุ โข, โภ ภารทฺวาช, อญฺโญ จ เหตุ, อญฺโญ จ ปจฺจโย เยนิเม ทหรา ภิกฺขู สุสู กาฬเกสา…เป… อทฺธานญฺจ อาปาเทนฺตี’’ติ? "हे भारद्वाज! चित्त चंचल होता है। कभी-कभी माता की आयु वाली स्त्रियों के प्रति भी लोभ के विचार उत्पन्न हो जाते हैं, बहन की आयु वाली स्त्रियों के प्रति भी, और पुत्री की आयु वाली स्त्रियों के प्रति भी। हे भारद्वाज! क्या कोई अन्य कारण या अन्य हेतु भी है जिससे ये युवा भिक्षु, जो अभी तरुण हैं, जिनके बाल काले हैं... (वही)... और उसे दीर्घकाल तक निभाते हैं?" ‘‘วุตฺตํ โข เอตํ, มหาราช, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน – ‘เอถ ตุมฺเห, ภิกฺขเว, อิมเมว กายํ อุทฺธํ ปาทตลา อโธ เกสมตฺถกา ตจปริยนฺตํ ปูรํ นานปฺปการสฺส อสุจิโน ปจฺจเวกฺขถ – อตฺถิ อิมสฺมึ กาเย เกสา โลมา นขา ทนฺตา ตโจ มํสํ นฺหารุ อฏฺฐิ อฏฺฐิมิญฺชํ วกฺกํ หทยํ ยกนํ กิโลมกํ ปิหกํ ปปฺผาสํ อนฺตํ อนฺตคุณํ อุทริยํ กรีสํ ปิตฺตํ เสมฺหํ ปุพฺโพ โลหิตํ เสโท เมโท อสฺสุ วสา เขโฬ สิงฺฆาณิกา ลสิกา มุตฺต’นฺติ. อยมฺปิ โข, มหาราช, เหตุ, อยํ ปจฺจโย เยนิเม ทหรา ภิกฺขู สุสู กาฬเกสา…เป… อทฺธานญฺจ อาปาเทนฺตี’’ติ. ‘‘เย เต, โภ ภารทฺวาช, ภิกฺขู ภาวิตกายา ภาวิตสีลา ภาวิตจิตฺตา ภาวิตปญฺญา, เตสํ ตํ สุกรํ โหติ. เย จ โข เต, โภ ภารทฺวาช, ภิกฺขู อภาวิตกายา อภาวิตสีลา อภาวิตจิตฺตา อภาวิตปญฺญา, เตสํ ตํ ทุกฺกรํ โหติ. อปฺเปกทา, โภ ภารทฺวาช, อสุภโต มนสิ [Pg.330] กริสฺสามีติ สุภโตว อาคจฺฉติ. อตฺถิ นุ โข, โภ ภารทฺวาช, อญฺโญ จ โข เหตุ อญฺโญ จ ปจฺจโย เยนิเม ทหรา ภิกฺขู สุสู กาฬเกสา…เป… อทฺธานญฺจ อาปาเทนฺตี’’ติ? "महाराज! उन जानने वाले, देखने वाले, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध भगवान ने यह कहा है— 'आओ भिक्षुओं! तुम इसी शरीर का, जो तलवों से ऊपर और सिर के बालों से नीचे है, जो त्वचा से घिरा हुआ है और नाना प्रकार की अशुद्धियों से भरा है, प्रत्यवेक्षण करो— इस शरीर में केश, रोम, नख, दाँत, त्वचा, मांस, स्नायु, अस्थि, अस्थि-मज्जा, वृक्क, हृदय, यकृत, क्लोमक, प्लीहा, फुफ्फुस, आँत, आँत की नली, उदरस्थ भोजन, मल, पित्त, कफ, पीप, रक्त, पसीना, वसा, आँसू, तेल, लार, नाक की गंदगी, जोड़ों का तेल और मूत्र है'। महाराज! यह भी वह कारण है, यह हेतु है जिससे ये युवा भिक्षु, जो अभी तरुण हैं, जिनके बाल काले हैं... (वही)... और उसे दीर्घकाल तक निभाते हैं।" "हे भारद्वाज! जो भिक्षु भावित-काय, भावित-शील, भावित-चित्त और भावित-प्रज्ञा वाले हैं, उनके लिए यह सरल है। किंतु जो भिक्षु अभाावित-काय, अभाावित-शील, अभाावित-चित्त और अभाावित-प्रज्ञा वाले हैं, उनके लिए यह कठिन है। हे भारद्वाज! कभी-कभी 'अशुभ' का मनन करते हुए भी 'शुभ' का ही विचार आ जाता है। हे भारद्वाज! क्या कोई अन्य कारण या हेतु भी है जिससे ये युवा भिक्षु, जो अभी तरुण हैं, जिनके बाल काले हैं... (वही)... और उसे दीर्घकाल तक निभाते हैं?" ‘‘วุตฺตํ โข เอตํ, มหาราช, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน – ‘เอถ ตุมฺเห, ภิกฺขเว, อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวารา วิหรถ. จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา มา นิมิตฺตคฺคาหิโน อหุวตฺถ, มานุพฺยญฺชนคฺคาหิโน. ยตฺวาธิกรณเมนํ จกฺขุนฺทฺริยํ อสํวุตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อนฺวาสฺสเวยฺยุํ, ตสฺส สํวราย ปฏิปชฺชถ. รกฺขถ จกฺขุนฺทฺริยํ; จกฺขุนฺทฺริเย สํวรํ อาปชฺชถ. โสเตน สทฺทํ สุตฺวา…เป… ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตฺวา… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา… กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสิตฺวา… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย มา นิมิตฺตคฺคาหิโน อหุวตฺถ, มานุพฺยญฺชนคฺคาหิโน. ยตฺวาธิกรณเมนํ มนินฺทฺริยํ อสํวุตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อนฺวาสฺสเวยฺยุํ, ตสฺส สํวราย ปฏิปชฺชถ. รกฺขถ มนินฺทฺริยํ; มนินฺทฺริเย สํวรํ อาปชฺชถา’ติ. อยมฺปิ โข, มหาราช, เหตุ อยํ ปจฺจโย เยนิเม ทหรา ภิกฺขู สุสู กาฬเกสา ภทฺเรน โยพฺพเนน สมนฺนาคตา ปฐเมน วยสา อนิกีฬิตาวิโน กาเมสุ ยาวชีวํ ปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ จรนฺติ, อทฺธานญฺจ อาปาเทนฺตี’’ติ. "महाराज! उन जानने वाले, देखने वाले, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध भगवान ने यह कहा है— 'आओ भिक्षुओं! तुम इंद्रियों के द्वारों की रक्षा करते हुए विहार करो। आँख से रूप देखकर उसके निमित्त को ग्रहण मत करो, उसके अनुव्यंजन को ग्रहण मत करो। क्योंकि जिस कारण से चक्षु-इंद्रिय को असंयत रखकर विहार करने वाले व्यक्ति को लोभ और दौर्मनस्य जैसे पापमय अकुशल धर्म घेर सकते हैं, उसके संयम के लिए अभ्यास करो। चक्षु-इंद्रिय की रक्षा करो; चक्षु-इंद्रिय में संवर प्राप्त करो। कान से शब्द सुनकर... नाक से गंध सूंघकर... जीभ से रस चखकर... शरीर से स्पर्श का अनुभव कर... मन से धर्म जानकर उसके निमित्त को ग्रहण मत करो, उसके अनुव्यंजन को ग्रहण मत करो। क्योंकि जिस कारण से मन-इंद्रिय को असंयत रखकर विहार करने वाले व्यक्ति को लोभ और दौर्मनस्य जैसे पापमय अकुशल धर्म घेर सकते हैं, उसके संयम के लिए अभ्यास करो। मन-इंद्रिय की रक्षा करो; मन-इंद्रिय में संवर प्राप्त करो'। महाराज! यह भी वह कारण है, यह हेतु है जिससे ये युवा भिक्षु, जो अभी तरुण हैं, जिनके बाल काले हैं, जो उत्तम यौवन से युक्त हैं, अपनी प्रथम अवस्था में हैं, जिन्होंने काम-भोगों का अनुभव नहीं किया है, वे जीवन भर पूर्ण और शुद्ध ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं और उसे दीर्घकाल तक निभाते हैं।" ‘‘อจฺฉริยํ, โภ ภารทฺวาช; อพฺภุตํ, โภ ภารทฺวาช! ยาว สุภาสิตํ จิทํ, โภ ภารทฺวาช, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน. เอโสว โข, โภ ภารทฺวาช, เหตุ, เอส ปจฺจโย เยนิเม ทหรา ภิกฺขู สุสู กาฬเกสา ภทฺเรน โยพฺพเนน สมนฺนาคตา ปฐเมน วยสา อนิกีฬิตาวิโน กาเมสุ ยาวชีวํ ปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ จรนฺติ, อทฺธานญฺจ อาปาเทนฺตีติ. อหมฺปิ โข, โภ ภารทฺวาช, ยสฺมึ สมเย อรกฺขิเตเนว กาเยน, อรกฺขิตาย วาจาย, อรกฺขิเตน จิตฺเตน, อนุปฏฺฐิตาย สติยา, อสํวุเตหิ อินฺทฺริเยหิ อนฺเตปุรํ ปวิสามิ, อติวิย มํ ตสฺมึ สมเย โลภธมฺมา ปริสหนฺติ. ยสฺมิญฺจ ขฺวาหํ, โภ ภารทฺวาช, สมเย รกฺขิเตเนว กาเยน, รกฺขิตาย วาจาย, รกฺขิเตน จิตฺเตน, อุปฏฺฐิตาย สติยา, สํวุเตหิ อินฺทฺริเยหิ อนฺเตปุรํ ปวิสามิ, น มํ ตถา [Pg.331] ตสฺมึ สมเย โลภธมฺมา ปริสหนฺติ. อภิกฺกนฺตํ, โภ ภารทฺวาช; อภิกฺกนฺตํ, โภ ภารทฺวาช! เสยฺยถาปิ, โภ ภารทฺวาช, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย, ปฏิจฺฉนฺนํ วา วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย, จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตีติ; เอวเมวํ โภตา ภารทฺวาเชน อเนกปริยาเยน ธมฺโม ปกาสิโต. เอสาหํ, โภ ภารทฺวาช, ตํ ภควนฺตํ สรณํ คจฺฉามิ, ธมฺมญฺจ, ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. อุปาสกํ มํ ภวํ ภารทฺวาโช ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. จตุตฺถํ. “आश्चर्य है, हे भारद्वाज! अद्भुत है, हे भारद्वाज! उन भगवान, जो जानने वाले, देखने वाले, अर्हत् और सम्यक्सम्बुद्ध हैं, उनके द्वारा यह वचन कितना सुभाषित है। हे भारद्वाज, यही वह हेतु है, यही वह प्रत्यय है, जिससे ये युवा भिक्षु, जो अभी तरुण हैं, जिनके बाल काले हैं, जो उत्तम यौवन से युक्त हैं, अपनी प्रथम अवस्था में हैं, जिन्होंने काम-भोगों का अनुभव नहीं किया है, वे जीवनभर पूर्ण और शुद्ध ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं और उसे निरंतर बनाए रखते हैं। हे भारद्वाज, मैं भी जब अरक्षित शरीर, अरक्षित वाणी, अरक्षित चित्त, अनुपस्थित स्मृति और असंयत इन्द्रियों के साथ अन्तःपुर में प्रवेश करता हूँ, तब उस समय लोभ के धर्म मुझे अत्यधिक पीड़ित करते हैं। परन्तु हे भारद्वाज, जब मैं रक्षित शरीर, रक्षित वाणी, रक्षित चित्त, उपस्थित स्मृति और संयत इन्द्रियों के साथ अन्तःपुर में प्रवेश करता हूँ, तब उस समय लोभ के धर्म मुझे उस प्रकार पीड़ित नहीं करते। अति सुंदर, हे भारद्वाज! अति सुंदर, हे भारद्वाज! जैसे कोई औंधे हुए को सीधा कर दे, या ढके हुए को खोल दे, या मार्ग भूले हुए को रास्ता दिखा दे, या अंधकार में तेल का दीपक जला दे ताकि आँख वाले रूप देख सकें; इसी प्रकार आपने अनेक प्रकार से धर्म को प्रकाशित किया है। मैं उन भगवान की शरण जाता हूँ, धर्म की और भिक्षु-संघ की शरण जाता हूँ। आप मुझे आज से जीवनभर के लिए शरणागत उपासक स्वीकार करें।” चतुर्थ सुत्त। ๕. โสณสุตฺตํ ५. सोण सुत्त ๑๒๘. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. อถ โข โสโณ คหปติปุตฺโต เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โสโณ คหปติปุตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘โก นุ โข, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ? โก ปน, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ? (ยถา ปุริมสุตฺตนฺตํ, เอวํ วิตฺถาเรตพฺพํ). อยํ โข, โสณ, เหตุ, อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตีติ. ปญฺจมํ. १२८. एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दकनिवाप में विहार कर रहे थे। तब गृहपति पुत्र सोण जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए गृहपति पुत्र सोण ने भगवान से यह कहा— “भन्ते! वह क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करते? और भन्ते! वह क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त कर लेते हैं?” (जैसे पिछले सुत्त में है, वैसे ही विस्तार करना चाहिए)। “हे सोण! यही वह हेतु है, यही वह प्रत्यय है, जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त कर लेते हैं।” पंचम सुत्त। ๖. โฆสิตสุตฺตํ ६. घोसित सुत्त ๑๒๙. เอกํ สมยํ อายสฺมา อานนฺโท โกสมฺพิยํ วิหรติ โฆสิตาราเม. อถ โข โฆสิโต คหปติ เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โฆสิโต คหปติ อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตทโวจ – ‘‘‘ธาตุนานตฺตํ, ธาตุนานตฺต’นฺติ, ภนฺเต อานนฺท, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, ธาตุนานตฺตํ วุตฺตํ ภควตา’’ติ? ‘‘สํวิชฺชติ โข, คหปติ, จกฺขุธาตุ, รูปา จ มนาปา, จกฺขุวิญฺญาณญฺจ สุขเวทนิยํ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขา เวทนา. สํวิชฺชติ โข, คหปติ, จกฺขุธาตุ, รูปา จ อมนาปา, จกฺขุวิญฺญาณญฺจ ทุกฺขเวทนิยํ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ทุกฺขา เวทนา. สํวิชฺชติ โข, คหปติ, จกฺขุธาตุ, รูปา จ มนาปา อุเปกฺขาเวทนิยา, จกฺขุวิญฺญาณญฺจ อทุกฺขมสุขเวทนิยํ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ อทุกฺขมสุขา [Pg.332] เวทนา…เป… สํวิชฺชติ โข, คหปติ, ชิวฺหาธาตุ, รสา จ มนาปา, ชิวฺหาวิญฺญาณญฺจ สุขเวทนิยํ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขา เวทนา. สํวิชฺชติ โข, คหปติ, ชิวฺหาธาตุ, รสา จ อมนาปา, ชิวฺหาวิญฺญาณญฺจ ทุกฺขเวทนิยํ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ทุกฺขา เวทนา. สํวิชฺชติ โข, คหปติ, ชิวฺหาธาตุ, รสา จ อุเปกฺขาเวทนิยา, ชิวฺหาวิญฺญาณญฺจ อทุกฺขมสุขเวทนิยํ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ อทุกฺขมสุขา เวทนา…เป… สํวิชฺชติ โข, คหปติ, มโนธาตุ, ธมฺมา จ มนาปา, มโนวิญฺญาณญฺจ สุขเวทนิยํ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขา เวทนา. สํวิชฺชติ โข, คหปติ, มโนธาตุ, ธมฺมา จ อมนาปา, มโนวิญฺญาณญฺจ ทุกฺขเวทนิยํ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ทุกฺขา เวทนา. สํวิชฺชติ โข, คหปติ, มโนธาตุ, ธมฺมา จ อุเปกฺขาเวทนิยา, มโนวิญฺญาณญฺจ อทุกฺขมสุขเวทนิยํ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ อทุกฺขมสุขา เวทนา. เอตฺตาวตา โข, คหปติ, ธาตุนานตฺตํ วุตฺตํ ภควตา’’ติ. ฉฏฺฐํ. १२९. एक समय आयुष्मान् आनन्द कौशाम्बी के घोषिताराम में विहार कर रहे थे। तब घोषित गृहपति जहाँ आयुष्मान् आनन्द थे वहाँ पहुँचा... एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए घोषित गृहपति ने आयुष्मान् आनन्द से यह कहा— “भन्ते आनन्द! ‘धातु-विविधता, धातु-विविधता’ ऐसा कहा जाता है। भन्ते! भगवान ने किस सीमा तक धातु-विविधता का वर्णन किया है?” “गृहपति! चक्षु-धातु विद्यमान है, मनभावन रूप विद्यमान हैं, और चक्षु-विज्ञान विद्यमान है। सुखद वेदना के हेतुभूत स्पर्श के कारण सुखद वेदना उत्पन्न होती है। गृहपति! चक्षु-धातु विद्यमान है, अप्रिय रूप विद्यमान हैं, और चक्षु-विज्ञान विद्यमान है। दुःखद वेदना के हेतुभूत स्पर्श के कारण दुःखद वेदना उत्पन्न होती है। गृहपति! चक्षु-धातु विद्यमान है, उपेक्षा-वेदनीय रूप विद्यमान हैं, और चक्षु-विज्ञान विद्यमान है। अदुःख-असुख वेदना के हेतुभूत स्पर्श के कारण अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होती है...। गृहपति! जिह्वा-धातु विद्यमान है, मनभावन रस विद्यमान हैं, और जिह्वा-विज्ञान विद्यमान है। सुखद वेदना के हेतुभूत स्पर्श के कारण सुखद वेदना उत्पन्न होती है। गृहपति! जिह्वा-धातु विद्यमान है, अप्रिय रस विद्यमान हैं, और जिह्वा-विज्ञान विद्यमान है। दुःखद वेदना के हेतुभूत स्पर्श के कारण दुःखद वेदना उत्पन्न होती है। गृहपति! जिह्वा-धातु विद्यमान है, उपेक्षा-वेदनीय रस विद्यमान हैं, और जिह्वा-विज्ञान विद्यमान है। अदुःख-असुख वेदना के हेतुभूत स्पर्श के कारण अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होती है...। गृहपति! मनो-धातु विद्यमान है, मनभावन धर्म विद्यमान हैं, और मनो-विज्ञान विद्यमान है। सुखद वेदना के हेतुभूत स्पर्श के कारण सुखद वेदना उत्पन्न होती है। गृहपति! मनो-धातु विद्यमान है, अप्रिय धर्म विद्यमान हैं, और मनो-विज्ञान विद्यमान है। दुःखद वेदना के हेतुभूत स्पर्श के कारण दुःखद वेदना उत्पन्न होती है। गृहपति! मनो-धातु विद्यमान है, उपेक्षा-वेदनीय धर्म विद्यमान हैं, और मनो-विज्ञान विद्यमान है। अदुःख-असुख वेदना के हेतुभूत स्पर्श के कारण अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होती है। गृहपति! इतनी सीमा तक भगवान ने धातु-विविधता का वर्णन किया है।” छठा सुत्त। ๗. หาลิทฺทิกานิสุตฺตํ ७. हालिद्दिकानि सुत्त ๑๓๐. เอกํ สมยํ อายสฺมา มหากจฺจาโน อวนฺตีสุ วิหรติ กุรรฆเร ปปาเต ปพฺพเต. อถ โข หาลิทฺทิกานิ คหปติ เยนายสฺมา มหากจฺจาโน เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข หาลิทฺทิกานิ คหปติ อายสฺมนฺตํ มหากจฺจานํ เอตทโวจ – ‘‘วุตฺตมิทํ, ภนฺเต, ภควตา – ‘ธาตุนานตฺตํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ผสฺสนานตฺตํ; ผสฺสนานตฺตํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ เวทนานานตฺต’นฺติ. กถํ นุ โข, ภนฺเต, ธาตุนานตฺตํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ผสฺสนานตฺตํ; ผสฺสนานตฺตํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ เวทนานานตฺต’’นฺติ? ‘‘อิธ, คหปติ, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา ‘มนาปํ อิตฺเถต’นฺติ ปชานาติ จกฺขุวิญฺญาณํ สุขเวทนิยญฺจ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขา เวทนา. จกฺขุนา โข ปเนว รูปํ ทิสฺวา ‘อมนาปํ อิตฺเถต’นฺติ ปชานาติ จกฺขุวิญฺญาณํ ทุกฺขเวทนิยญฺจ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ทุกฺขา เวทนา. จกฺขุนา โข ปเนว รูปํ ทิสฺวา ‘อุเปกฺขาฏฺฐานิยํ [Pg.333] อิตฺเถต’นฺติ ปชานาติ จกฺขุวิญฺญาณํ อทุกฺขมสุขเวทนิยญฺจ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ อทุกฺขมสุขา เวทนา. १३०. एक समय आयुष्मान महाकात्यायन अवन्ती देश के कुररघर में प्रपात पर्वत पर विहार कर रहे थे। तब हालिद्दिकानि गृहपति जहाँ आयुष्मान महाकात्यायन थे, वहाँ पहुँचा... एक ओर बैठकर हालिद्दिकानि गृहपति ने आयुष्मान महाकात्यायन से यह कहा - "भन्ते, भगवान ने यह कहा है - 'धातुओं की विविधता के कारण स्पर्श की विविधता उत्पन्न होती है; स्पर्श की विविधता के कारण वेदना की विविधता उत्पन्न होती है।' भन्ते, धातुओं की विविधता के कारण स्पर्श की विविधता कैसे उत्पन्न होती है और स्पर्श की विविधता के कारण वेदना की विविधता कैसे उत्पन्न होती है?" "गृहपति, यहाँ भिक्षु आँख से रूप देखकर जानता है कि 'यह मनोज्ञ है'। चक्षु-विज्ञान और सुखद स्पर्श के कारण सुखद वेदना उत्पन्न होती है। फिर, आँख से रूप देखकर जानता है कि 'यह अमनोज्ञ है'। चक्षु-विज्ञान और दुखद स्पर्श के कारण दुखद वेदना उत्पन्न होती है। फिर, आँख से रूप देखकर जानता है कि 'यह उपेक्षा का स्थान है'। चक्षु-विज्ञान और अदुक्खमसुख स्पर्श के कारण अदुक्खमसुख वेदना उत्पन्न होती है।" ‘‘ปุน จปรํ, คหปติ, ภิกฺขุ โสเตน สทฺทํ สุตฺวา…เป… ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตฺวา…เป… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา…เป… กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสิตฺวา…เป… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ‘มนาปํ อิตฺเถต’นฺติ ปชานาติ มโนวิญฺญาณํ สุขเวทนิยญฺจ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขา เวทนา. มนสา โข ปเนว ธมฺมํ วิญฺญาย ‘อมนาปํ อิตฺเถต’นฺติ ปชานาติ มโนวิญฺญาณํ ทุกฺขเวทนิยญฺจ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ทุกฺขา เวทนา. มนสา โข ปเนว ธมฺมํ วิญฺญาย ‘อุเปกฺขาฏฺฐานิยํ อิตฺเถต’นฺติ ปชานาติ มโนวิญฺญาณํ อทุกฺขมสุขเวทนิยญฺจ. ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ อทุกฺขมสุขา เวทนา. เอวํ โข, คหปติ, ธาตุนานตฺตํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ผสฺสนานตฺตํ; ผสฺสนานตฺตํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ เวทนานานตฺต’’นฺติ. สตฺตมํ. "पुनः गृहपति, भिक्षु कान से शब्द सुनकर... नाक से गंध सूंघकर... जीभ से रस चखकर... शरीर से स्पर्श छूकर... मन से धर्म जानकर जानता है कि 'यह मनोज्ञ है'। मनो-विज्ञान और सुखद स्पर्श के कारण सुखद वेदना उत्पन्न होती है। मन से धर्म जानकर जानता है कि 'यह अमनोज्ञ है'। मनो-विज्ञान और दुखद स्पर्श के कारण दुखद वेदना उत्पन्न होती है। मन से धर्म जानकर जानता है कि 'यह उपेक्षा का स्थान है'। मनो-विज्ञान और अदुक्खमसुख स्पर्श के कारण अदुक्खमसुख वेदना उत्पन्न होती है। गृहपति, इस प्रकार धातुओं की विविधता के कारण स्पर्श की विविधता उत्पन्न होती है और स्पर्श की विविधता के कारण वेदना की विविधता उत्पन्न होती है।" सातवाँ सुत्त। ๘. นกุลปิตุสุตฺตํ ८. नकुलपितु सुत्त ๑๓๑. เอกํ สมยํ ภควา ภคฺเคสุ วิหรติ สุสุมารคิเร เภสกฬาวเน มิคทาเย. อถ โข นกุลปิตา คหปติ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข นกุลปิตา คหปติ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘โก นุ โข, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ? โก ปน, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ? ‘‘สนฺติ โข, คหปติ, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ ตทุปาทานํ. สอุปาทาโน, คหปติ, ภิกฺขุ โน ปรินิพฺพายติ…เป… สนฺติ โข, คหปติ, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ โข, คหปติ, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อภินนฺทโต อภิวทโต อชฺโฌสาย ติฏฺฐโต ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ ตทุปาทานํ. สอุปาทาโน, คหปติ, ภิกฺขุ โน ปรินิพฺพายติ[Pg.334]. อยํ โข, คหปติ, เหตุ อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม โน ปรินิพฺพายนฺติ’’. १३१. एक समय भगवान भग्ग देश के सुसुमारगिरि के भेसकळावन मृगदाव में विहार कर रहे थे। तब नकुलपिता गृहपति जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा... एक ओर बैठकर नकुलपिता गृहपति ने भगवान से यह कहा - "भन्ते, वह क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करते? और भन्ते, वह क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त करते हैं?" "गृहपति, चक्षु-विज्ञेय ऐसे रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनोज्ञ, प्रिय, काम-युक्त और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है, तो उस अभिनन्दन करने वाले, स्वागत करने वाले और आसक्त होकर स्थित रहने वाले का विज्ञान उसी पर आश्रित होता है और वही उसका उपादान बन जाता है। गृहपति, उपादान सहित भिक्षु परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करता... गृहपति, जिह्वा-विज्ञेय रस हैं... गृहपति, मनो-विज्ञेय धर्म हैं जो इष्ट, कान्त, मनोज्ञ, प्रिय, काम-युक्त और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है, तो उस अभिनन्दन करने वाले, स्वागत करने वाले और आसक्त होकर स्थित रहने वाले का विज्ञान उसी पर आश्रित होता है और वही उसका उपादान बन जाता है। गृहपति, उपादान सहित भिक्षु परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करता। गृहपति, यही वह हेतु है, यही वह प्रत्यय है, जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करते।" ‘‘สนฺติ จ โข, คหปติ, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุนาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ อนภินนฺทโต อนภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต น ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ, น ตทุปาทานํ. อนุปาทาโน, คหปติ, ภิกฺขุ ปรินิพฺพายติ…เป… สนฺติ โข, คหปติ, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ โข, คหปติ, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. ตสฺส ตํ นาภินนฺทโต นาภิวทโต อนชฺโฌสาย ติฏฺฐโต น ตนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ โหติ น ตทุปาทานํ. อนุปาทาโน, คหปติ, ภิกฺขุ ปรินิพฺพายติ. อยํ โข, คหปติ, เหตุ, อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายนฺตี’’ติ. อฏฺฐมํ. "परन्तु गृहपति, चक्षु-विज्ञेय ऐसे रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनोज्ञ, प्रिय, काम-युक्त और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता, उनका स्वागत नहीं करता और उनमें आसक्त होकर स्थित नहीं रहता, तो उस अभिनन्दन न करने वाले, स्वागत न करने वाले और आसक्त न होने वाले का विज्ञान उस पर आश्रित नहीं होता और न ही वह उसका उपादान बनता है। गृहपति, उपादान रहित भिक्षु परिनिर्वाण प्राप्त करता है... गृहपति, जिह्वा-विज्ञेय रस हैं... गृहपति, मनो-विज्ञेय धर्म हैं जो इष्ट, कान्त, मनोज्ञ, प्रिय, काम-युक्त और रजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता, उनका स्वागत नहीं करता और उनमें आसक्त होकर स्थित नहीं रहता, तो उस अभिनन्दन न करने वाले, स्वागत न करने वाले और आसक्त न होने वाले का विज्ञान उस पर आश्रित नहीं होता और न ही वह उसका उपादान बनता है। गृहपति, उपादान रहित भिक्षु परिनिर्वाण प्राप्त करता है। गृहपति, यही वह हेतु है, यही वह प्रत्यय है, जिससे इस लोक में कुछ प्राणी इसी जन्म में परिनिर्वाण प्राप्त करते हैं।" आठवाँ सुत्त। ๙. โลหิจฺจสุตฺตํ ९. लोहिच्च सुत्त ๑๓๒. เอกํ สมยํ อายสฺมา มหากจฺจาโน อวนฺตีสุ วิหรติ มกฺกรกเต อรญฺญกุฏิกายํ. อถ โข โลหิจฺจสฺส พฺราหฺมณสฺส สมฺพหุลา อนฺเตวาสิกา กฏฺฐหารกา มาณวกา เยนายสฺมโต มหากจฺจานสฺส อรญฺญกุฏิกา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ปริโต ปริโต กุฏิกาย อนุจงฺกมนฺติ อนุวิจรนฺติ อุจฺจาสทฺทา มหาสทฺทา กานิจิ กานิจิ เสเลยฺยกานิ กโรนฺติ – ‘‘อิเม ปน มุณฺฑกา สมณกา อิพฺภา กณฺหา พนฺธุปาทาปจฺจา, อิเมสํ ภรตกานํ สกฺกตา ครุกตา มานิตา ปูชิตา อปจิตา’’ติ. อถ โข อายสฺมา มหากจฺจาโน วิหารา นิกฺขมิตฺวา เต มาณวเก เอตทโวจ – ‘‘มา มาณวกา สทฺทมกตฺถ; ธมฺมํ โว ภาสิสฺสามี’’ติ. เอวํ วุตฺเต, เต มาณวกา ตุณฺหี อเหสุํ. อถ โข อายสฺมา มหากจฺจาโน เต มาณวเก คาถาหิ อชฺฌภาสิ – १३२. एक समय आयुष्मान महाकात्यायन अवन्ती देश के मक्करकट नगर की एक अरण्य-कुटी (वन-कुटी) में विहार कर रहे थे। तब लोहिच्च ब्राह्मण के बहुत से अन्तेवासी (शिष्य) माणवक, जो लकड़ी बीनने वाले थे, जहाँ आयुष्मान महाकात्यायन की अरण्य-कुटी थी, वहाँ आए। आकर वे कुटी के चारों ओर बार-बार टहलने और घूमने लगे और ऊँचे स्वर में शोर मचाते हुए तरह-तरह के खेल (एक-दूसरे की पीठ पर कूदना आदि) करने लगे— "ये मुंडित सिर वाले श्रमण, नीच, काले, ब्रह्मा के चरणों से उत्पन्न हैं; इन भरतकों (गृहपतियों) का सत्कार, गौरव, मान, पूजन और सम्मान किया जाता है।" तब आयुष्मान महाकात्यायन विहार (कुटी) से बाहर निकले और उन माणवकों से यह कहा— "माणवकों! शोर मत करो; मैं तुम्हें धर्म का उपदेश दूँगा।" ऐसा कहने पर वे माणवक चुप हो गए। तब आयुष्मान महाकात्यायन ने उन माणवकों को गाथाओं में संबोधित किया— ‘‘สีลุตฺตมา ปุพฺพตรา อเหสุํ,เต พฺราหฺมณา เย ปุราณํ สรนฺติ; คุตฺตานิ ทฺวารานิ สุรกฺขิตานิ,อเหสุํ เตสํ อภิภุยฺย โกธํ. "प्राचीन काल के वे ब्राह्मण शील में उत्तम थे, जो पुराने (ब्राह्मण) धर्म का स्मरण करते थे; उनकी इन्द्रियाँ (द्वार) भली-भाँति रक्षित और सुरक्षित थीं, और वे क्रोध को जीतकर रहते थे।" ‘‘ธมฺเม [Pg.335] จ ฌาเน จ รตา อเหสุํ,เต พฺราหฺมณา เย ปุราณํ สรนฺติ; อิเม จ โวกฺกมฺม ชปามเสติ,โคตฺเตน มตฺตา วิสมํ จรนฺติ. "वे धर्म और ध्यान में रत थे, वे ब्राह्मण जो पुराने धर्म का स्मरण करते थे; किन्तु ये (आज के ब्राह्मण) उन गुणों को छोड़कर 'हम मंत्र जपते हैं' ऐसा कहते हुए, अपने गोत्र के मद में चूर होकर अधर्म का आचरण करते हैं।" ‘‘โกธาภิภูตา ปุถุอตฺตทณฺฑา,วิรชฺชมานา สตณฺหาตณฺเหสุ; อคุตฺตทฺวารสฺส ภวนฺติ โมฆา,สุปิเนว ลทฺธํ ปุริสสฺส วิตฺตํ. "क्रोध से दबे हुए, नाना प्रकार के दण्ड धारण किए हुए, वे तृष्णावान और तृष्णारहितों के प्रति द्वेष रखते हैं; जिसकी इन्द्रियाँ सुरक्षित नहीं हैं, उसके सभी व्रत-नियम वैसे ही व्यर्थ हो जाते हैं जैसे स्वप्न में प्राप्त किया हुआ धन।" ‘‘อนาสกา ถณฺฑิลสายิกา จ; ปาโต สินานญฺจ ตโย จ เวทา. "उपवास करना, नग्न भूमि पर सोना, प्रातःकाल स्नान करना और तीनों वेदों का अध्ययन करना;" ‘‘ขราชินํ ชฏาปงฺโก, มนฺตา สีลพฺพตํ ตโป; กุหนา วงฺกทณฺฑา จ, อุทกาจมนานิ จ. "खुरदरा मृगचर्म, जटाएँ, शरीर का मैल, मंत्र, शील-व्रत और तप, पाखंड, टेढ़े दण्ड और जल से आचमन करना—" ‘‘วณฺณา เอเต พฺราหฺมณานํ, กตา กิญฺจิกฺขภาวนา; จิตฺตญฺจ สุสมาหิตํ, วิปฺปสนฺนมนาวิลํ; อขิลํ สพฺพภูเตสุ, โส มคฺโค พฺรหฺมปตฺติยา’’ติ. "ब्राह्मणों के ये बाहरी रूप केवल अल्प धन की वृद्धि के लिए बनाए गए हैं; (किन्तु) जिसका चित्त भली-भाँति समाहित, प्रसन्न और निर्मल है, और जो समस्त प्राणियों के प्रति कोमल (अहिंसक) है, वही ब्रह्म-प्राप्ति का मार्ग है।" อถ โข เต มาณวกา กุปิตา อนตฺตมนา เยน โลหิจฺโจ พฺราหฺมโณ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา โลหิจฺจํ พฺราหฺมณํ เอตทโวจุํ – ‘‘ยคฺเฆ! ภวํ ชาเนยฺย, สมโณ มหากจฺจาโน พฺราหฺมณานํ มนฺเต เอกํเสน อปวทติ, ปฏิกฺโกสตี’’ติ? เอวํ วุตฺเต, โลหิจฺโจ พฺราหฺมโณ กุปิโต อโหสิ อนตฺตมโน. อถ โข โลหิจฺจสฺส พฺราหฺมณสฺส เอตทโหสิ – ‘‘น โข ปน เมตํ ปติรูปํ โยหํ อญฺญทตฺถุ มาณวกานํเยว สุตฺวา สมณํ มหากจฺจานํ อกฺโกเสยฺยํ ปริภาเสยฺยํ. ยํนูนาหํ อุปสงฺกมิตฺวา ปุจฺเฉยฺย’’นฺติ. तब वे माणवक कुपित और अप्रसन्न होकर जहाँ लोहिच्च ब्राह्मण था, वहाँ गए; जाकर उन्होंने लोहिच्च ब्राह्मण से यह कहा— "मान्यवर! आप जानें, श्रमण महाकात्यायन ब्राह्मणों के मंत्रों की स्पष्ट रूप से निंदा और विरोध करते हैं।" ऐसा कहने पर लोहिच्च ब्राह्मण कुपित और अप्रसन्न हुआ। तब लोहिच्च ब्राह्मण को यह विचार आया— "मेरे लिए यह उचित नहीं होगा कि मैं केवल माणवकों की बात सुनकर श्रमण महाकात्यायन को अपशब्द कहूँ या उनकी निंदा करूँ। क्यों न मैं स्वयं उनके पास जाकर पूछूँ?" อถ โข โลหิจฺโจ พฺราหฺมโณ เตหิ มาณวเกหิ สทฺธึ เยนายสฺมา มหากจฺจาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา มหากจฺจาเนน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โลหิจฺโจ พฺราหฺมโณ [Pg.336] อายสฺมนฺตํ มหากจฺจานํ เอตทโวจ – ‘‘อาคมํสุ นุ ขฺวิธ, โภ กจฺจาน, อมฺหากํ สมฺพหุลา อนฺเตวาสิกา กฏฺฐหารกา มาณวกา’’ติ? ‘‘อาคมํสุ ขฺวิธ เต, พฺราหฺมณ, สมฺพหุลา อนฺเตวาสิกา กฏฺฐหารกา มาณวกา’’ติ. ‘‘อหุ ปน โภโต กจฺจานสฺส เตหิ มาณวเกหิ สทฺธึ โกจิเทว กถาสลฺลาโป’’ติ? ‘‘อหุ โข เม, พฺราหฺมณ, เตหิ มาณวเกหิ สทฺธึ โกจิเทว กถาสลฺลาโป’’ติ. ‘‘ยถา กถํ ปน โภโต กจฺจานสฺส เตหิ มาณวเกหิ สทฺธึ อโหสิ กถาสลฺลาโป’’ติ? ‘‘เอวํ โข เม, พฺราหฺมณ, เตหิ มาณวเกหิ สทฺธึ อโหสิ กถาสลฺลาโป – तब लोहिच्च ब्राह्मण उन माणवकों के साथ जहाँ आयुष्मान महाकात्यायन थे, वहाँ गया; जाकर आयुष्मान महाकात्यायन के साथ कुशल-क्षेम की चर्चा की। सुखद और स्मरणीय बातें करने के बाद वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए लोहिच्च ब्राह्मण ने आयुष्मान महाकात्यायन से यह कहा— "हे कात्यायन! क्या हमारे बहुत से अन्तेवासी लकड़ी बीनने वाले माणवक यहाँ आए थे?" "हाँ ब्राह्मण! तुम्हारे बहुत से अन्तेवासी लकड़ी बीनने वाले माणवक यहाँ आए थे।" "तो क्या आप कात्यायन का उन माणवकों के साथ कोई वार्तालाप हुआ था?" "हाँ ब्राह्मण! मेरा उन माणवकों के साथ कुछ वार्तालाप हुआ था।" "आप कात्यायन का उन माणवकों के साथ किस प्रकार का वार्तालाप हुआ था?" "हे ब्राह्मण! मेरा उन माणवकों के साथ इस प्रकार का वार्तालाप हुआ था—" ‘‘สีลุตฺตมา ปุพฺพตรา อเหสุํ,เต พฺราหฺมณา เย ปุราณํ สรนฺติ; …เป…; อขิลํ สพฺพภูเตสุ,โส มคฺโค พฺรหฺมปตฺติยา’’ติ. "प्राचीन काल के वे ब्राह्मण शील में उत्तम थे, जो पुराने धर्म का स्मरण करते थे... (विस्तार)... समस्त प्राणियों के प्रति जो कोमलता है, वही ब्रह्म-प्राप्ति का मार्ग है।" ‘‘เอวํ โข เม, พฺราหฺมณ, เตหิ มาณวเกหิ สทฺธึ อโหสิ กถาสลฺลาโป’’ติ. "हे ब्राह्मण! उन माणवकों के साथ मेरा इस प्रकार का वार्तालाप हुआ था।" ‘‘‘อคุตฺตทฺวาโร’ติ ภวํ กจฺจาโน อาห. กิตฺตาวตา นุ โข, โภ กจฺจาน, อคุตฺตทฺวาโร โหตี’’ติ? ‘‘อิธ, พฺราหฺมณ, เอกจฺโจ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา ปิยรูเป รูเป อธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป รูเป พฺยาปชฺชติ, อนุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ, ปริตฺตเจตโส ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. โสเตน สทฺทํ สุตฺวา… ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตฺวา… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา… กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสิตฺวา… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ปิยรูเป ธมฺเม อธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป จ ธมฺเม พฺยาปชฺชติ, อนุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ, ปริตฺตเจตโส ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. เอวํ โข, พฺราหฺมณ, อคุตฺตทฺวาโร โหตี’’ติ. ‘‘อจฺฉริยํ, โภ กจฺจาน; อพฺภุตํ, โภ กจฺจาน! ยาวญฺจิทํ โภตา กจฺจาเนน อคุตฺตทฺวาโรว สมาโน อคุตฺตทฺวาโรติ อกฺขาโต. "'असुरक्षित इन्द्रियों वाला'—ऐसा आप कात्यायन ने कहा। हे कात्यायन! किस सीमा तक व्यक्ति असुरक्षित इन्द्रियों वाला होता है?" "यहाँ, ब्राह्मण! कोई व्यक्ति आँखों से रूप देखकर प्रिय रूप में आसक्त हो जाता है और अप्रिय रूप के प्रति द्वेष करता है; वह शरीर की स्मृति (कायगतसति) के बिना विहार करता है, उसका चित्त संकीर्ण होता है, और वह उस चेतोविमुक्ति और प्रज्ञाविमुक्ति को यथार्थ रूप में नहीं जानता जहाँ उत्पन्न हुए वे पापमय अकुशल धर्म पूर्णतः निरुद्ध हो जाते हैं। कान से शब्द सुनकर... नाक से गंध सूंघकर... जीभ से रस चखकर... शरीर से स्पर्श का अनुभव कर... मन से धर्म (विचार) को जानकर प्रिय धर्मों में आसक्त होता है और अप्रिय धर्मों के प्रति द्वेष करता है; वह शरीर की स्मृति के बिना विहार करता है, उसका चित्त संकीर्ण होता है, और वह उस चेतोविमुक्ति और प्रज्ञाविमुक्ति को यथार्थ रूप में नहीं जानता जहाँ उत्पन्न हुए वे पापमय अकुशल धर्म पूर्णतः निरुद्ध हो जाते हैं। हे ब्राह्मण! इस प्रकार व्यक्ति असुरक्षित इन्द्रियों वाला होता है।" "आश्चर्य है, हे कात्यायन! अद्भुत है, हे कात्यायन! आप कात्यायन ने असुरक्षित इन्द्रियों वाले को वास्तव में असुरक्षित इन्द्रियों वाला ही कहा है।" ‘‘‘คุตฺตทฺวาโร’ติ [Pg.337] ภวํ กจฺจาโน อาห. กิตฺตาวตา นุ โข, โภ กจฺจาน, คุตฺตทฺวาโร โหตี’’ติ? ‘‘อิธ, พฺราหฺมณ, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา ปิยรูเป รูเป นาธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป รูเป น พฺยาปชฺชติ, อุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ, อปฺปมาณเจตโส ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ ปชานาติ ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. โสเตน สทฺทํ สุตฺวา… ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตฺวา… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา… กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสิตฺวา… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ปิยรูเป ธมฺเม นาธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป ธมฺเม น พฺยาปชฺชติ, อุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ, อปฺปมาณเจตโส ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ ปชานาติ, ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. เอวํ โข, พฺราหฺมณ, คุตฺตทฺวาโร โหตี’’ติ. आदरणीय कच्चान कहते हैं— 'इन्द्रियों के द्वारों को सुरक्षित रखने वाला'। हे कच्चान! किस सीमा तक कोई व्यक्ति इन्द्रियों के द्वारों को सुरक्षित रखने वाला होता है? ब्राह्मण! यहाँ भिक्षु आँखों से रूप को देखकर प्रिय रूप में आसक्त नहीं होता, अप्रिय रूप में द्वेष नहीं करता, शरीरगत स्मृति (कायानुस्मृति) को उपस्थित रखकर विहार करता है, और असीमित चित्त वाला होकर उस चेतोविमुक्ति और प्रज्ञाविमुक्ति को यथार्थ रूप में जानता है, जहाँ उसके उत्पन्न हुए पापमय अकुशल धर्म पूर्णतः निरुद्ध हो जाते हैं। कान से शब्द सुनकर... नाक से गंध सूंघकर... जीभ से रस चखकर... शरीर से स्पर्श का अनुभव कर... मन से धर्म (विषय) को जानकर प्रिय धर्म में आसक्त नहीं होता, अप्रिय धर्म में द्वेष नहीं करता, शरीरगत स्मृति को उपस्थित रखकर विहार करता है, और असीमित चित्त वाला होकर उस चेतोविमुक्ति और प्रज्ञाविमुक्ति को यथार्थ रूप में जानता है, जहाँ उसके उत्पन्न हुए पापमय अकुशल धर्म पूर्णतः निरुद्ध हो जाते हैं। ब्राह्मण! इस प्रकार कोई इन्द्रियों के द्वारों को सुरक्षित रखने वाला होता है। ‘‘อจฺฉริยํ, โภ กจฺจาน; อพฺภุตํ, โภ กจฺจาน! ยาวญฺจิทํ โภตา กจฺจาเนน คุตฺตทฺวาโรว สมาโน คุตฺตทฺวาโรติ อกฺขาโต. อภิกฺกนฺตํ, โภ กจฺจาน; อภิกฺกนฺตํ, โภ กจฺจาน! เสยฺยถาปิ, โภ กจฺจาน, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย, ปฏิจฺฉนฺนํ วา วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย, จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตีติ; เอวเมวํ โภตา กจฺจาเนน อเนกปริยาเยน ธมฺโม ปกาสิโต. เอสาหํ, โภ กจฺจาน, ตํ ภควนฺตํ สรณํ คจฺฉามิ, ธมฺมญฺจ, ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. อุปาสกํ มํ ภวํ กจฺจาโน ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คตํ. ยถา จ ภวํ กจฺจาโน มกฺกรกเต อุปาสกกุลานิ อุปสงฺกมติ; เอวเมว โลหิจฺจกุลํ อุปสงฺกมตุ. ตตฺถ เย มาณวกา วา มาณวิกา วา ภวนฺตํ กจฺจานํ อภิวาเทสฺสนฺติ ปจฺจุฏฺฐิสฺสนฺติ อาสนํ วา อุทกํ วา ทสฺสนฺติ, เตสํ ตํ ภวิสฺสติ ทีฆรตฺตํ หิตาย สุขายา’’ติ. นวมํ. आश्चर्य है, हे कच्चान! अद्भुत है, हे कच्चान! आदरणीय कच्चान ने वास्तव में इन्द्रियों के द्वारों को सुरक्षित रखने वाले को ही 'इन्द्रियों के द्वारों को सुरक्षित रखने वाला' कहा है। बहुत सुंदर, हे कच्चान! बहुत सुंदर, हे कच्चान! जैसे कोई औंधे हुए को सीधा कर दे, ढके हुए को खोल दे, मार्ग भूले हुए को रास्ता दिखा दे, या अंधेरे में तेल का दीपक जला दे ताकि आँख वाले रूप देख सकें; वैसे ही आदरणीय कच्चान ने अनेक प्रकार से धर्म को प्रकाशित किया है। हे कच्चान! मैं उन भगवान बुद्ध की शरण में जाता हूँ, धर्म की और भिक्षु संघ की शरण में जाता हूँ। आदरणीय कच्चान मुझे आज से जीवन भर के लिए शरणागत उपासक स्वीकार करें। जैसे आदरणीय कच्चान मक्करकट में उपासक परिवारों के पास जाते हैं, वैसे ही लोहिच्च परिवार के पास भी आया करें। वहाँ जो युवक या युवतियाँ आदरणीय कच्चान का अभिवादन करेंगे, प्रत्युत्थान करेंगे, आसन या जल देंगे, वह उनके लिए दीर्घकाल तक हित और सुख के लिए होगा। नौवाँ सुत्त समाप्त। ๑๐. เวรหจฺจานิสุตฺตํ १०. वेरहच्चानि सुत्त ๑๓๓. เอกํ สมยํ อายสฺมา อุทายี กามณฺฑายํ วิหรติ โตเทยฺยสฺส พฺราหฺมณสฺส อมฺพวเน. อถ โข เวรหจฺจานิโคตฺตาย พฺราหฺมณิยา อนฺเตวาสี มาณวโก เยนายสฺมา อุทายี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา อุทายินา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข ตํ มาณวกํ [Pg.338] อายสฺมา อุทายี ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสสิ สมาทเปสิ สมุตฺเตเชสิ สมฺปหํเสสิ. อถ โข โส มาณวโก อายสฺมตา อุทายินา ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺสิโต สมาทปิโต สมุตฺเตชิโต สมฺปหํสิโต อุฏฺฐายาสนา เยน เวรหจฺจานิโคตฺตา พฺราหฺมณี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เวรหจฺจานิโคตฺตํ พฺราหฺมณึ เอตทโวจ – ‘‘ยคฺเฆ, โภติ, ชาเนยฺยาสิ ! สมโณ อุทายี ธมฺมํ เทเสติ อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ, สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสตี’’ติ. १३३. एक समय आयुष्मान उदायी कामण्डा में तोदेय्य ब्राह्मण के आम्रवन में विहार कर रहे थे। तब वेरहच्चानि गोत्र की ब्राह्मणी का शिष्य एक युवक जहाँ आयुष्मान उदायी थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर आयुष्मान उदायी के साथ कुशल-क्षेम पूछा। सुखद और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए उस युवक को आयुष्मान उदायी ने धार्मिक चर्चा से उपदेश दिया, उत्साहित किया, उत्तेजित किया और प्रसन्न किया। तब वह युवक आयुष्मान उदायी द्वारा धार्मिक चर्चा से उपदिष्ट, उत्साहित, उत्तेजित और प्रसन्न होकर अपने आसन से उठा और जहाँ वेरहच्चानि गोत्र की ब्राह्मणी थी, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर वेरहच्चानि गोत्र की ब्राह्मणी से यह कहा— 'आदरणीया! आप जानें, श्रमण उदायी ऐसे धर्म का उपदेश देते हैं जो आदि में कल्याणकारी है, मध्य में कल्याणकारी है और अंत में कल्याणकारी है; जो अर्थ सहित है, व्यंजन सहित है, और वे पूर्णतः परिपूर्ण एवं शुद्ध ब्रह्मचर्य को प्रकाशित करते हैं'। ‘‘เตน หิ ตฺวํ, มาณวก, มม วจเนน สมณํ อุทายึ นิมนฺเตหิ สฺวาตนาย ภตฺเตนา’’ติ. ‘‘เอวํ โภตี’’ติ โข โส มาณวโก เวรหจฺจานิโคตฺตาย พฺราหฺมณิยา ปฏิสฺสุตฺวา เยนายสฺมา อุทายี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อุทายึ เอตทโวจ – ‘‘อธิวาเสตุ กิร, ภวํ, อุทายิ, อมฺหากํ อาจริยภริยาย เวรหจฺจานิโคตฺตาย พฺราหฺมณิยา สฺวาตนาย ภตฺต’’นฺติ. อธิวาเสสิ โข อายสฺมา อุทายี ตุณฺหีภาเวน. อถ โข อายสฺมา อุทายี ตสฺสา รตฺติยา อจฺจเยน ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย เยน เวรหจฺจานิโคตฺตาย พฺราหฺมณิยา นิเวสนํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. อถ โข เวรหจฺจานิโคตฺตา พฺราหฺมณี อายสฺมนฺตํ อุทายึ ปณีเตน ขาทนีเยน โภชนีเยน สหตฺถา สนฺตปฺเปสิ สมฺปวาเรสิ. อถ โข เวรหจฺจานิโคตฺตา พฺราหฺมณี อายสฺมนฺตํ อุทายึ ภุตฺตาวึ โอนีตปตฺตปาณึ ปาทุกา อาโรหิตฺวา อุจฺเจ อาสเน นิสีทิตฺวา สีสํ โอคุณฺฐิตฺวา อายสฺมนฺตํ อุทายึ เอตทโวจ – ‘‘ภณ, สมณ, ธมฺม’’นฺติ. ‘‘ภวิสฺสติ, ภคินิ, สมโย’’ติ วตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกมิ. 'तो हे युवक! तुम मेरी ओर से श्रमण उदायी को कल के भोजन के लिए निमंत्रित करो।' 'ठीक है आदरणीया' कहकर उस युवक ने वेरहच्चानि गोत्र की ब्राह्मणी को उत्तर दिया और जहाँ आयुष्मान उदायी थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर आयुष्मान उदायी से यह कहा— 'आदरणीय उदायी! हमारी आचार्य-पत्नी वेरहच्चानि गोत्र की ब्राह्मणी का कल के लिए भोजन स्वीकार करें।' आयुष्मान उदायी ने मौन रहकर स्वीकार कर लिया। फिर आयुष्मान उदायी उस रात के बीतने पर, पूर्वाह्न समय में निवसन (अधोवस्त्र) पहनकर और पात्र-चीवर लेकर जहाँ वेरहच्चानि गोत्र की ब्राह्मणी का निवास था, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर बिछाए हुए आसन पर बैठ गए। तब वेरहच्चानि गोत्र की ब्राह्मणी ने आयुष्मान उदायी को उत्तम खाद्य और भोज्य पदार्थों से अपने हाथों से संतृप्त और संतुष्ट किया। जब आयुष्मान उदायी भोजन कर चुके और पात्र से हाथ हटा लिया, तब वेरहच्चानि गोत्र की ब्राह्मणी खड़ाऊँ पहनकर, ऊँचे आसन पर बैठकर और सिर ढँककर आयुष्मान उदायी से यह बोली— 'श्रमण! धर्म का उपदेश दो।' 'बहन! इसका समय (फिर कभी) होगा' कहकर वे आसन से उठे और चले गए। ทุติยมฺปิ โข โส มาณวโก เยนายสฺมา อุทายี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา อุทายินา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข ตํ มาณวกํ อายสฺมา อุทายี ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสสิ สมาทเปสิ สมุตฺเตเชสิ สมฺปหํเสสิ. ทุติยมฺปิ โข โส มาณวโก อายสฺมตา อุทายินา ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺสิโต สมาทปิโต สมุตฺเตชิโต สมฺปหํสิโต อุฏฺฐายาสนา เยน เวรหจฺจานิโคตฺตา พฺราหฺมณี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา [Pg.339] เวรหจฺจานิโคตฺตํ พฺราหฺมณึ เอตทโวจ – ‘‘ยคฺเฆ, โภติ, ชาเนยฺยาสิ! สมโณ อุทายี ธมฺมํ เทเสติ อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ, สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสตี’’ติ. दूसरी बार भी वह युवक जहाँ आयुष्मान उदायी थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर आयुष्मान उदायी के साथ कुशल-क्षेम पूछा। सुखद और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए उस युवक को आयुष्मान उदायी ने धार्मिक चर्चा से उपदेश दिया, उत्साहित किया, उत्तेजित किया और प्रसन्न किया। दूसरी बार भी आयुष्मान उदायी द्वारा धार्मिक चर्चा से उपदेशित, उत्साहित, उत्तेजित और प्रसन्न होकर वह युवक अपने आसन से उठा और जहाँ वेरहच्चानि गोत्र की ब्राह्मणी थी, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर उसने वेरहच्चानि गोत्र की ब्राह्मणी से यह कहा— "आदरणीया, आप जानें! श्रमण उदायी आदि में कल्याणकारी, मध्य में कल्याणकारी और अंत में कल्याणकारी धर्म का उपदेश देते हैं; वे अर्थ सहित, व्यंजन सहित, पूर्णतः परिपूर्ण और अत्यंत शुद्ध ब्रह्मचर्य को प्रकाशित करते हैं।" ‘‘เอวเมวํ ปน ตฺวํ, มาณวก, สมณสฺส อุทายิสฺส วณฺณํ ภาสสิ. สมโณ ปนุทายี ‘ภณ, สมณ, ธมฺม’นฺติ วุตฺโต สมาโน ‘ภวิสฺสติ, ภคินิ, สมโย’ติ วตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกนฺโต’’ติ. ‘‘ตถา หิ ปน ตฺวํ, โภติ, ปาทุกา อาโรหิตฺวา อุจฺเจ อาสเน นิสีทิตฺวา สีสํ โอคุณฺฐิตฺวา เอตทโวจ – ‘ภณ, สมณ, ธมฺม’นฺติ. ธมฺมครุโน หิ เต ภวนฺโต ธมฺมคารวา’’ติ. ‘‘เตน หิ ตฺวํ, มาณวก, มม วจเนน สมณํ อุทายึ นิมนฺเตหิ สฺวาตนาย ภตฺเตนา’’ติ. ‘‘เอวํ, โภตี’’ติ โข โส มาณวโก เวรหจฺจานิโคตฺตาย พฺราหฺมณิยา ปฏิสฺสุตฺวา เยนายสฺมา อุทายี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อุทายึ เอตทโวจ – ‘‘อธิวาเสตุ กิร ภวํ อุทายี อมฺหากํ อาจริยภริยาย เวรหจฺจานิโคตฺตาย พฺราหฺมณิยา สฺวาตนาย ภตฺต’’นฺติ. อธิวาเสสิ โข อายสฺมา อุทายี ตุณฺหีภาเวน. "युवक, तुम तो श्रमण उदायी की इस प्रकार प्रशंसा कर रहे हो। परंतु जब मैंने श्रमण उदायी से कहा— 'श्रमण, धर्म का उपदेश दें', तो उन्होंने 'बहन, समय आएगा' कहकर आसन से उठकर चले गए।" "आदरणीया, ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि आपने खड़ाऊँ पहनकर, ऊँचे आसन पर बैठकर और सिर ढँककर यह कहा था— 'श्रमण, धर्म का उपदेश दें'। वे भदंत धर्म के प्रति गौरव रखने वाले और धर्म का आदर करने वाले होते हैं।" "तो युवक, तुम मेरे कहने से श्रमण उदायी को कल के भोजन के लिए निमंत्रित करो।" "ठीक है, आदरणीया," कहकर उस युवक ने वेरहच्चानि गोत्र की ब्राह्मणी को उत्तर दिया और जहाँ आयुष्मान उदायी थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर आयुष्मान उदायी से यह कहा— "भदंत उदायी, हमारे आचार्य की पत्नी वेरहच्चानि गोत्र की ब्राह्मणी का कल के लिए भोजन स्वीकार करें।" आयुष्मान उदायी ने मौन रहकर स्वीकार कर लिया। อถ โข อายสฺมา อุทายี ตสฺสา รตฺติยา อจฺจเยน ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย เยน เวรหจฺจานิโคตฺตาย พฺราหฺมณิยา นิเวสนํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. อถ โข เวรหจฺจานิโคตฺตา พฺราหฺมณี อายสฺมนฺตํ อุทายึ ปณีเตน ขาทนีเยน โภชนีเยน สหตฺถา สนฺตปฺเปสิ สมฺปวาเรสิ. อถ โข เวรหจฺจานิโคตฺตา พฺราหฺมณี อายสฺมนฺตํ อุทายึ ภุตฺตาวึ โอนีตปตฺตปาณึ ปาทุกา โอโรหิตฺวา นีเจ อาสเน นิสีทิตฺวา สีสํ วิวริตฺวา อายสฺมนฺตํ อุทายึ เอตทโวจ – ‘‘กิสฺมึ นุ โข, ภนฺเต, สติ อรหนฺโต สุขทุกฺขํ ปญฺญเปนฺติ, กิสฺมึ อสติ อรหนฺโต สุขทุกฺขํ น ปญฺญเปนฺตี’’ติ? फिर आयुष्मान उदायी उस रात के बीतने पर पूर्वाह्न समय में निवसन पहनकर, पात्र और चीवर लेकर जहाँ वेरहच्चानि गोत्र की ब्राह्मणी का घर था, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर बिछे हुए आसन पर बैठ गए। तब वेरहच्चानि गोत्र की ब्राह्मणी ने आयुष्मान उदायी को उत्तम खाद्य और भोज्य पदार्थों से अपने हाथों से संतृप्त और संतुष्ट किया। फिर वेरहच्चानि गोत्र की ब्राह्मणी ने आयुष्मान उदायी को भोजन कर चुकने और पात्र से हाथ हटा लेने पर, खड़ाऊँ उतारकर, नीचे आसन पर बैठकर और सिर खोलकर आयुष्मान उदायी से यह कहा— "भंते, किसके होने पर अर्हंत सुख-दुःख का प्रज्ञापन करते हैं, और किसके न होने पर अर्हंत सुख-दुःख का प्रज्ञापन नहीं करते हैं?" ‘‘จกฺขุสฺมึ โข, ภคินิ, สติ อรหนฺโต สุขทุกฺขํ ปญฺญเปนฺติ, จกฺขุสฺมึ อสติ อรหนฺโต สุขทุกฺขํ น ปญฺญเปนฺติ…เป… ชิวฺหาย สติ อรหนฺโต สุขทุกฺขํ ปญฺญเปนฺติ, ชิวฺหาย อสติ อรหนฺโต สุขทุกฺขํ น ปญฺญเปนฺติ…เป…. มนสฺมึ สติ อรหนฺโต สุขทุกฺขํ ปญฺญเปนฺติ, มนสฺมึ อสติ อรหนฺโต สุขทุกฺขํ น ปญฺญเปนฺตี’’ติ. "बहन, चक्षु के होने पर अर्हंत सुख-दुःख का प्रज्ञापन करते हैं, चक्षु के न होने पर अर्हंत सुख-दुःख का प्रज्ञापन नहीं करते हैं... पे... जिह्वा के होने पर अर्हंत सुख-दुःख का प्रज्ञापन करते हैं, जिह्वा के न होने पर अर्हंत सुख-दुःख का प्रज्ञापन नहीं करते हैं... पे... मन के होने पर अर्हंत सुख-दुःख का प्रज्ञापन करते हैं, मन के न होने पर अर्हंत सुख-दुःख का प्रज्ञापन नहीं करते हैं।" เอวํ วุตฺเต, เวรหจฺจานิโคตฺตา พฺราหฺมณี อายสฺมนฺตํ อุทายึ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต; อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต! เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย[Pg.340], ปฏิจฺฉนฺนํ วา วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย, จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตีติ; เอวเมวํ อยฺเยน อุทายินา อเนกปริยาเยน ธมฺโม ปกาสิโต. เอสาหํ, อยฺย อุทายิ, ตํ ภควนฺตํ สรณํ คจฺฉามิ, ธมฺมญฺจ, ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. อุปาสิกํ มํ อยฺโย อุทายี ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ทสมํ. ऐसा कहे जाने पर, वेरहच्चानि गोत्र की ब्राह्मणी ने आयुष्मान उदायी से यह कहा— "अति सुंदर, भंते! अति सुंदर, भंते! जैसे, भंते, कोई औंधे हुए को सीधा कर दे, या ढँके हुए को खोल दे, या मार्ग भूले हुए को रास्ता दिखा दे, या अंधकार में तेल का दीपक जला दे कि आँख वाले रूप देख सकें; इसी प्रकार आयुष्मान उदायी ने अनेक पर्यायों से धर्म को प्रकाशित किया है। आयुष्मान उदायी, मैं उन भगवान की शरण जाती हूँ, धर्म की और भिक्षु संघ की भी शरण जाती हूँ। आयुष्मान उदायी मुझे आज से जीवन पर्यंत शरण में आई हुई उपासिका स्वीकार करें।" दसवाँ। คหปติวคฺโค เตรสโม. तेरहवाँ गहपति वर्ग। ตสฺสุทฺทานํ – उसका उद्दान— เวสาลี วชฺชิ นาฬนฺทา, ภารทฺวาช โสโณ จ โฆสิโต; หาลิทฺทิโก นกุลปิตา, โลหิจฺโจ เวรหจฺจานีติ. वैशाली, वज्जी, नालंदा, भारद्वाज, सोण, घोषित, हालिद्दिक, नकुलपिता, लोहिच्च और वेरहच्चानि। ๑๔. เทวทหวคฺโค १४. देवदह वर्ग ๑. เทวทหสุตฺตํ १. देवदह सुत्त ๑๓๔. เอกํ สมยํ ภควา สกฺเกสุ วิหรติ เทวทหํ นาม สกฺยานํ นิคโม. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘นาหํ, ภิกฺขเว, สพฺเพสํเยว ภิกฺขูนํ ฉสุ ผสฺสายตเนสุ อปฺปมาเทน กรณียนฺติ วทามิ, น จ ปนาหํ, ภิกฺขเว, สพฺเพสํเยว ภิกฺขูนํ ฉสุ ผสฺสายตเนสุ นาปฺปมาเทน กรณียนฺติ วทามิ. เย เต, ภิกฺขเว, ภิกฺขู อรหนฺโต ขีณาสวา วุสิตวนฺโต กตกรณียา โอหิตภารา อนุปฺปตฺตสทตฺถา ปริกฺขีณภวสํโยชนา สมฺมทญฺญา วิมุตฺตา, เตสาหํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ฉสุ ผสฺสายตเนสุ นาปฺปมาเทน กรณียนฺติ วทามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? กตํ เตสํ อปฺปมาเทน, อภพฺพา เต ปมชฺชิตุํ. เย จ โข เต, ภิกฺขเว, ภิกฺขู เสกฺขา อปฺปตฺตมานสา อนุตฺตรํ โยคกฺเขมํ ปตฺถยมานา วิหรนฺติ, เตสาหํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ฉสุ ผสฺสายตเนสุ อปฺปมาเทน กรณียนฺติ วทามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? สนฺติ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา มโนรมาปิ, อมโนรมาปิ. ตฺยาสฺส ผุสฺส ผุสฺส จิตฺตํ น ปริยาทาย ติฏฺฐนฺติ. เจตโส อปริยาทานา อารทฺธํ โหติ วีริยํ อสลฺลีนํ, อุปฏฺฐิตา สติ อสมฺมุฏฺฐา, ปสฺสทฺโธ กาโย อสารทฺโธ, สมาหิตํ จิตฺตํ เอกคฺคํ. อิมํ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อปฺปมาทผลํ [Pg.341] สมฺปสฺสมาโน เตสํ ภิกฺขูนํ ฉสุ ผสฺสายตเนสุ อปฺปมาเทน กรณียนฺติ วทามิ…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา มโนรมาปิ อมโนรมาปิ. ตฺยาสฺส ผุสฺส ผุสฺส จิตฺตํ น ปริยาทาย ติฏฺฐนฺติ. เจตโส อปริยาทานา อารทฺธํ โหติ วีริยํ อสลฺลีนํ, อุปฏฺฐิตา สติ อสมฺมุฏฺฐา, ปสฺสทฺโธ กาโย อสารทฺโธ, สมาหิตํ จิตฺตํ เอกคฺคํ. อิมํ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อปฺปมาทผลํ สมฺปสฺสมาโน เตสํ ภิกฺขูนํ ฉสุ ผสฺสายตเนสุ อปฺปมาเทน กรณียนฺติ วทามี’’ติ. ปฐมํ. १३४. एक समय भगवान शाक्यों के जनपद में देवदह नामक शाक्य निगम में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— "भिक्षुओं, मैं सभी भिक्षुओं के लिए छह स्पर्श-आयतनों में अप्रमाद के साथ कर्तव्य है, ऐसा नहीं कहता हूँ; और न ही मैं यह कहता हूँ कि सभी भिक्षुओं के लिए छह स्पर्श-आयतनों में अप्रमाद के साथ कर्तव्य नहीं है। भिक्षुओं, जो भिक्षु अर्हन्त हैं, क्षीणासव हैं, जिन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया है, जो कृत-करणीय हैं, जिन्होंने भार उतार दिया है, जिन्होंने अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया है, जिनके भव-संयोजन क्षीण हो चुके हैं, जो सम्यक् ज्ञान से विमुक्त हैं, उन भिक्षुओं के लिए मैं छह स्पर्श-आयतनों में अप्रमाद के साथ कर्तव्य है, ऐसा नहीं कहता हूँ। वह किस कारण से? उन्होंने अप्रमाद के साथ (अपना कार्य) कर लिया है, वे प्रमाद करने के अयोग्य हैं। किन्तु भिक्षुओं, जो भिक्षु शैक्ष (साधक) हैं, जिन्होंने अभी परम पद प्राप्त नहीं किया है, जो अनुत्तर योगक्षेम (निर्वाण) की आकांक्षा करते हुए विहार करते हैं, उन भिक्षुओं के लिए मैं छह स्पर्श-आयतनों में अप्रमाद के साथ कर्तव्य है, ऐसा कहता हूँ। वह किस कारण से? भिक्षुओं, चक्षु-विज्ञेय रूप होते हैं जो मनभावन भी होते हैं और मनभावन नहीं भी। वे (रूप) उस भिक्षु के चित्त को बार-बार स्पर्श करके उसे अभिभूत करके नहीं ठहरते। चित्त के अभिभूत न होने से वीर्य आरब्ध होता है, लीन नहीं होता; स्मृति उपस्थित होती है, विस्मृत नहीं होती; काय शांत होता है, उद्विग्न नहीं होता; चित्त समाहित और एकाग्र होता है। भिक्षुओं, मैं अप्रमाद के इस फल को देखते हुए उन भिक्षुओं के लिए छह स्पर्श-आयतनों में अप्रमाद के साथ कर्तव्य है, ऐसा कहता हूँ... (इसी प्रकार) भिक्षुओं, मन-विज्ञेय धर्म होते हैं जो मनभावन भी होते हैं और मनभावन नहीं भी। वे उस भिक्षु के चित्त को बार-बार स्पर्श करके उसे अभिभूत करके नहीं ठहरते। चित्त के अभिभूत न होने से वीर्य आरब्ध होता है, लीन नहीं होता; स्मृति उपस्थित होती है, विस्मृत नहीं होती; काय शांत होता है, उद्विग्न नहीं होता; चित्त समाहित और एकाग्र होता है। भिक्षुओं, मैं अप्रमाद के इस फल को देखते हुए उन भिक्षुओं के लिए छह स्पर्श-आयतनों में अप्रमाद के साथ कर्तव्य है, ऐसा कहता हूँ।" प्रथम। ๒. ขณสุตฺตํ २. क्षण सुत्त ๑๓๕. ‘‘ลาภา โว, ภิกฺขเว, สุลทฺธํ โว, ภิกฺขเว, ขโณ โว ปฏิลทฺโธ พฺรหฺมจริยวาสาย. ทิฏฺฐา มยา, ภิกฺขเว, ฉผสฺสายตนิกา นาม นิรยา. ตตฺถ ยํ กิญฺจิ จกฺขุนา รูปํ ปสฺสติ อนิฏฺฐรูปํเยว ปสฺสติ, โน อิฏฺฐรูปํ; อกนฺตรูปํเยว ปสฺสติ, โน กนฺตรูปํ; อมนาปรูปํเยว ปสฺสติ, โน มนาปรูปํ. ยํ กิญฺจิ โสเตน สทฺทํ สุณาติ…เป… ยํ กิญฺจิ ฆาเนน คนฺธํ ฆายติ…เป… ยํ กิญฺจิ ชิวฺหาย รสํ สายติ…เป… ยํ กิญฺจิ กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสติ…เป… ยํ กิญฺจิ มนสา ธมฺมํ วิชานาติ อนิฏฺฐรูปํเยว วิชานาติ, โน อิฏฺฐรูปํ; อกนฺตรูปํเยว วิชานาติ, โน กนฺตรูปํ; อมนาปรูปํเยว วิชานาติ, โน มนาปรูปํ. ลาภา โว, ภิกฺขเว, สุลทฺธํ โว, ภิกฺขเว, ขโณ โว ปฏิลทฺโธ พฺรหฺมจริยวาสาย. ทิฏฺฐา มยา, ภิกฺขเว, ฉผสฺสายตนิกา นาม สคฺคา. ตตฺถ ยํ กิญฺจิ จกฺขุนา รูปํ ปสฺสติ อิฏฺฐรูปํเยว ปสฺสติ, โน อนิฏฺฐรูปํ; กนฺตรูปํเยว ปสฺสติ, โน อกนฺตรูปํ; มนาปรูปํเยว ปสฺสติ, โน อมนาปรูปํ…เป… ยํ กิญฺจิ ชิวฺหาย รสํ สายติ…เป… ยํ กิญฺจิ มนสา ธมฺมํ วิชานาติ อิฏฺฐรูปํเยว วิชานาติ, โน อนิฏฺฐรูปํ; กนฺตรูปํเยว วิชานาติ, โน อกนฺตรูปํ; มนาปรูปํเยว วิชานาติ, โน อมนาปรูปํ. ลาภา โว, ภิกฺขเว, สุลทฺธํ โว, ภิกฺขเว, ขโณ โว ปฏิลทฺโธ พฺรหฺมจริยวาสายา’’ติ. ทุติยํ. १३५. "भिक्षुओं, यह तुम्हारे लिए लाभ है, भिक्षुओं, यह तुम्हारे लिए सुलब्ध है कि तुम्हें ब्रह्मचर्य वास के लिए क्षण (अवसर) प्राप्त हुआ है। भिक्षुओं, मैंने छह स्पर्श-आयतनों वाले 'निरय' (नरक) देखे हैं। वहाँ चक्षु से जो कुछ भी रूप देखता है, वह अनिष्ट रूप ही देखता है, इष्ट रूप नहीं; अप्रिय रूप ही देखता है, प्रिय रूप नहीं; अमनोज्ञ रूप ही देखता है, मनोज्ञ रूप नहीं। कान से जो कुछ भी शब्द सुनता है... नाक से जो कुछ भी गंध सूँघता है... जीभ से जो कुछ भी रस चखता है... शरीर से जो कुछ भी स्पर्श करता है... मन से जो कुछ भी धर्म जानता है, वह अनिष्ट ही जानता है, इष्ट नहीं; अप्रिय ही जानता है, प्रिय नहीं; अमनोज्ञ ही जानता है, मनोज्ञ नहीं। भिक्षुओं, यह तुम्हारे लिए लाभ है, भिक्षुओं, यह तुम्हारे लिए सुलब्ध है कि तुम्हें ब्रह्मचर्य वास के लिए क्षण प्राप्त हुआ है। भिक्षुओं, मैंने छह स्पर्श-आयतनों वाले 'स्वर्ग' देखे हैं। वहाँ चक्षु से जो कुछ भी रूप देखता है, वह इष्ट रूप ही देखता है, अनिष्ट नहीं; प्रिय रूप ही देखता है, अप्रिय नहीं; मनोज्ञ रूप ही देखता है, अमनोज्ञ नहीं... (इसी प्रकार) जीभ से जो कुछ भी रस चखता है... मन से जो कुछ भी धर्म जानता है, वह इष्ट ही जानता है, अनिष्ट नहीं; प्रिय ही जानता है, अप्रिय नहीं; मनोज्ञ ही जानता है, अमनोज्ञ नहीं। भिक्षुओं, यह तुम्हारे लिए लाभ है, भिक्षुओं, यह तुम्हारे लिए सुलब्ध है कि तुम्हें ब्रह्मचर्य वास के लिए क्षण प्राप्त हुआ है।" द्वितीय। ๓. ปฐมรูปารามสุตฺตํ ३. प्रथम रूपाराम सुत्त ๑๓๖. ‘‘รูปารามา, ภิกฺขเว, เทวมนุสฺสา รูปรตา รูปสมฺมุทิตา. รูปวิปริณามวิราคนิโรธา ทุกฺขา, ภิกฺขเว, เทวมนุสฺสา วิหรนฺติ. สทฺทารามา, ภิกฺขเว[Pg.342], เทวมนุสฺสา สทฺทรตา สทฺทสมฺมุทิตา. สทฺทวิปริณามวิราคนิโรธา ทุกฺขา, ภิกฺขเว, เทวมนุสฺสา วิหรนฺติ. คนฺธารามา… รสารามา… โผฏฺฐพฺพารามา… ธมฺมารามา, ภิกฺขเว, เทวมนุสฺสา ธมฺมรตา ธมฺมสมฺมุทิตา. ธมฺมวิปริณามวิราคนิโรธา ทุกฺขา, ภิกฺขเว, เทวมนุสฺสา วิหรนฺติ. ตถาคโต จ โข, ภิกฺขเว, อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ รูปานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวํ จ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ วิทิตฺวา น รูปาราโม น รูปรโต น รูปสมฺมุทิโต. รูปวิปริณามวิราคนิโรธา สุโข, ภิกฺขเว, ตถาคโต วิหรติ. สทฺทานํ… คนฺธานํ… รสานํ… โผฏฺฐพฺพานํ… ธมฺมานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ วิทิตฺวา น ธมฺมาราโม, น ธมฺมรโต, น ธมฺมสมฺมุทิโต. ธมฺมวิปริณามวิราคนิโรธา สุโข, ภิกฺขเว, ตถาคโต วิหรติ’’. อิทมโวจ ภควา. อิทํ วตฺวาน สุคโต อถาปรํ เอตทโวจ สตฺถา – १३६. "भिक्षुओं, देव और मनुष्य रूप में रमण करने वाले, रूप में रत रहने वाले और रूप में ही आनंदित होने वाले होते हैं। भिक्षुओं, रूप के विपरिणाम, विराग और निरोध से देव और मनुष्य दुःखपूर्वक विहार करते हैं। भिक्षुओं, देव और मनुष्य शब्द में रमण करने वाले, शब्द में रत रहने वाले और शब्द में ही आनंदित होने वाले होते हैं। शब्द के विपरिणाम, विराग और निरोध से देव और मनुष्य दुःखपूर्वक विहार करते हैं। गंध में... रस में... स्पर्श में... भिक्षुओं, देव और मनुष्य धर्म में रमण करने वाले, धर्म में रत रहने वाले और धर्म में ही आनंदित होने वाले होते हैं। धर्म के विपरिणाम, विराग और निरोध से देव और मनुष्य दुःखपूर्वक विहार करते हैं। किन्तु भिक्षुओं, अर्हन्त सम्यक्-सम्बुद्ध तथागत रूपों के उदय, अस्त, आस्वाद, दोष और निशरण को यथार्थ रूप से जानकर न रूप में रमण करते हैं, न रूप में रत होते हैं और न रूप में आनंदित होते हैं। भिक्षुओं, रूप के विपरिणाम, विराग और निरोध से तथागत सुखपूर्वक विहार करते हैं। शब्दों के... गंधों के... रसों के... स्पर्शों के... धर्मों के उदय, अस्त, आस्वाद, दोष और निशरण को यथार्थ रूप से जानकर वे न धर्म में रमण करते हैं, न धर्म में रत होते हैं और न धर्म में आनंदित होते हैं। धर्म के विपरिणाम, विराग और निरोध से तथागत सुखपूर्वक विहार करते हैं।" भगवान ने यह कहा। यह कहकर सुगत शास्ता ने पुनः यह कहा— ‘‘รูปา สทฺทา รสา คนฺธา, ผสฺสา ธมฺมา จ เกวลา; อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา จ, ยาวตตฺถีติ วุจฺจติ. "रूप, शब्द, रस, गंध, स्पर्श और सभी धर्म; जो इष्ट, प्रिय और मनोज्ञ कहे जाते हैं, जहाँ तक वे विद्यमान हैं।" ‘‘สเทวกสฺส โลกสฺส, เอเต โว สุขสมฺมตา; ยตฺถ เจเต นิรุชฺฌนฺติ, ตํ เตสํ ทุกฺขสมฺมตํ. "देवों सहित इस लोक के लिए ये सुख माने गए हैं; किन्तु जहाँ इनका निरोध होता है, उसे वे दुःख मानते हैं।" ‘‘สุขํ ทิฏฺฐมริเยภิ, สกฺกายสฺส นิโรธนํ; ปจฺจนีกมิทํ โหติ, สพฺพโลเกน ปสฺสตํ. आर्यों द्वारा सत्काय (अहं-भाव) के निरोध को सुख के रूप में देखा गया है; यह (दृष्टि) संपूर्ण लोक के लिए विपरीत है। ‘‘ยํ ปเร สุขโต อาหุ, ตทริยา อาหุ ทุกฺขโต; ยํ ปเร ทุกฺขโต อาหุ, ตทริยา สุขโต วิทู. जिसे दूसरे (साधारण जन) सुख कहते हैं, उसे आर्य दुःख कहते हैं; जिसे दूसरे दुःख कहते हैं, उसे आर्य सुख के रूप में जानते हैं। ‘‘ปสฺส ธมฺมํ ทุราชานํ, สมฺมูฬฺเหตฺถ อวิทฺทสุ; นิวุตานํ ตโม โหติ, อนฺธกาโร อปสฺสตํ. इस दुर्बोध धर्म (निर्वाण) को देखो, जिसमें अज्ञानी मोहित हैं; जो (क्लेशों से) ढके हुए हैं उनके लिए यह अंधकार है, और जो नहीं देखते उनके लिए यह घोर अंधेरा है। ‘‘สตญฺจ วิวฏํ โหติ, อาโลโก ปสฺสตามิ; สนฺติเก น วิชานนฺติ, มคฺคา ธมฺมสฺส อโกวิทา. सत्पुरुषों के लिए यह (निर्वाण) खुला है, देखने वालों के लिए यह प्रकाश के समान है; (किन्तु) जो मार्ग और धर्म में अकुशल हैं, वे समीप होने पर भी इसे नहीं जानते। ‘‘ภวราคปเรเตภิ, ภวราคานุสารีภิ ; มารเธยฺยานุปนฺเนหิ, นายํ ธมฺโม สุสมฺพุโธ. जो भव-राग (अस्तित्व के प्रति तृष्णा) से अभिभूत हैं, जो भव-राग का अनुसरण करने वाले हैं, और जो मार के वश में पड़े हुए हैं, उनके लिए यह धर्म सुबोध (आसानी से समझने योग्य) नहीं है। ‘‘โก [Pg.343] นุ อญฺญตฺร มริเยภิ, ปทํ สมฺพุทฺธุมรหติ; ยํ ปทํ สมฺมทญฺญาย, ปรินิพฺพนฺติ อนาสวา’’ติ. ตติยํ; आर्यों के अतिरिक्त और कौन उस पद (निर्वाण) को पूर्णतः समझने योग्य है? जिस पद को सम्यक् प्रकार से जानकर आस्रव-रहित जन परिनिर्वाण प्राप्त करते हैं। (तीसरा सूत्त) ๔. ทุติยรูปารามสุตฺตํ ४. द्वितीय रूपाराम सूत्त ๑๓๗. ‘‘รูปารามา, ภิกฺขเว, เทวมนุสฺสา รูปรตา รูปสมฺมุทิตา. รูปวิปริณามวิราคนิโรธา ทุกฺขา, ภิกฺขเว, เทวมนุสฺสา วิหรนฺติ. สทฺทารามา… คนฺธารามา… รสารามา … โผฏฺฐพฺพารามา… ธมฺมารามา, ภิกฺขเว, เทวมนุสฺสา ธมฺมรตา ธมฺมสมฺมุทิตา. ธมฺมวิปริณามวิราคนิโรธา ทุกฺขา, ภิกฺขเว, เทวมนุสฺสา วิหรนฺติ. ตถาคโต จ, ภิกฺขเว, อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ รูปานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ วิทิตฺวา น รูปาราโม น รูปรโต น รูปสมฺมุทิโต. รูปวิปริณามวิราคนิโรธา สุโข, ภิกฺขเว, ตถาคโต วิหรติ. สทฺทานํ… คนฺธานํ… รสานํ… โผฏฺฐพฺพานํ… ธมฺมานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ วิทิตฺวา น ธมฺมาราโม น ธมฺมรโต น ธมฺมสมฺมุทิโต. ธมฺมวิปริณามวิราคนิโรธา สุโข, ภิกฺขเว, ตถาคโต วิหรตี’’ติ. จตุตฺถํ. १३७. भिक्षुओं! देव और मनुष्य रूपों में रमण करने वाले, रूपों में आसक्त और रूपों में हर्षित होने वाले होते हैं। रूपों के विपरिणाम (परिवर्तन), विराग और निरोध से, भिक्षुओं, देव और मनुष्य दुःखपूर्वक विहार करते हैं। (शब्दों में... गंधों में... रसों में... स्पर्शों में...) भिक्षुओं! देव और मनुष्य धर्मों (मनोविषयों) में रमण करने वाले, धर्मों में आसक्त और धर्मों में हर्षित होने वाले होते हैं। धर्मों के विपरिणाम, विराग और निरोध से, भिक्षुओं, देव और मनुष्य दुःखपूर्वक विहार करते हैं। किन्तु भिक्षुओं! अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध तथागत रूपों की उत्पत्ति, विनाश, आस्वाद, दोष और निस्सरण (मुक्ति) को यथार्थ रूप से जानकर, न रूपों में रमण करते हैं, न रूपों में आसक्त होते हैं और न रूपों में हर्षित होते हैं। रूपों के विपरिणाम, विराग और निरोध होने पर भी, भिक्षुओं, तथागत सुखपूर्वक विहार करते हैं। (शब्दों... गंधों... रसों... स्पर्शों...) धर्मों की उत्पत्ति, विनाश, आस्वाद, दोष और निस्सरण को यथार्थ रूप से जानकर, न धर्मों में रमण करते हैं, न धर्मों में आसक्त होते हैं और न धर्मों में हर्षित होते हैं। धर्मों के विपरिणाम, विराग और निरोध होने पर भी, भिक्षुओं, तथागत सुखपूर्वक विहार करते हैं। (चौथा सूत्त) ๕. ปฐมนตุมฺหากํสุตฺตํ ५. प्रथम न-तुम्हाकं सूत्त (जो तुम्हारा नहीं है) ๑๓๘. ‘‘ยํ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ; ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ…เป… ชิวฺหา น ตุมฺหากํ; ตํ ปชหถ. สา โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ…เป… มโน น ตุมฺหากํ; ตํ ปชหถ. โส โว ปหีโน หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ยํ อิมสฺมึ เชตวเน ติณกฏฺฐสาขาปลาสํ ตํ ชโน หเรยฺย วา ฑเหยฺย วา ยถาปจฺจยํ วา กเรยฺย, อปิ นุ ตุมฺหากํ เอวมสฺส – ‘อมฺเห ชโน หรติ วา ฑหติ วา ยถาปจฺจยํ วา กโรตี’’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตํ กิสฺส เหตุ’’? ‘‘น หิ โน เอตํ, ภนฺเต, อตฺตา วา อตฺตนิยํ วา’’ติ. ‘‘เอวเมว โข, ภิกฺขเว, จกฺขุ น ตุมฺหากํ; ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ…เป… ชิวฺหา น ตุมฺหากํ; ตํ ปชหถ. สา โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ…เป… มโน น ตุมฺหากํ[Pg.344]; ตํ ปชหถ. โส โว ปหีโน หิตาย สุขาย ภวิสฺสตี’’ติ. ปญฺจมํ. १३८. भिक्षुओं! जो तुम्हारा नहीं है, उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। और भिक्षुओं, क्या तुम्हारा नहीं है? भिक्षुओं! चक्षु (आँख) तुम्हारी नहीं है; उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा... जिह्वा (जीभ) तुम्हारी नहीं है; उसे त्याग दो। वह तुम्हारे हित और सुख के लिए होगी... मन तुम्हारा नहीं है; उसे त्याग दो। वह तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। भिक्षुओं! जैसे इस जेतवन में जो घास, लकड़ी, शाखाएँ और पत्ते हैं, उन्हें यदि कोई व्यक्ति ले जाए, जला दे या अपनी इच्छानुसार कुछ भी करे, तो क्या तुम्हें ऐसा विचार होगा कि 'यह व्यक्ति हमें ले जा रहा है या हमें जला रहा है या हमारे साथ अपनी इच्छानुसार व्यवहार कर रहा है'? 'नहीं, भन्ते!' 'वह किसलिए?' 'क्योंकि भन्ते, यह न तो हमारा आत्मा है और न ही आत्मीय (हमसे संबंधित) है।' इसी प्रकार, भिक्षुओं! चक्षु तुम्हारा नहीं है; उसे त्याग दो। वह तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा... जिह्वा तुम्हारी नहीं है... मन तुम्हारा नहीं है; उसे त्याग दो। वह तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। (पाँचवाँ सूत्त) ๖. ทุติยนตุมฺหากํสุตฺตํ ६. द्वितीय न-तुम्हाकं सूत्त ๑๓๙. ‘‘ยํ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ, ตํ ปชหถ. ตํ โว ปหีนํ หิตาย สุขาย ภวิสฺสติ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ? รูปา, ภิกฺขเว, น ตุมฺหากํ; เต ปชหถ. เต โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสนฺติ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา น ตุมฺหากํ; เต ปชหถ. เต โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสนฺติ. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ยํ อิมสฺมึ เชตวเน…เป… เอวเมว โข, ภิกฺขเว, รูปา น ตุมฺหากํ; เต ปชหถ. เต โว ปหีนา หิตาย สุขาย ภวิสฺสนฺตี’’ติ. ฉฏฺฐํ. १३९. भिक्षुओं! जो तुम्हारा नहीं है, उसे त्याग दो। उसका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। और भिक्षुओं, क्या तुम्हारा नहीं है? भिक्षुओं! रूप तुम्हारे नहीं हैं; उन्हें त्याग दो। उनका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धर्म (मनोविषय) तुम्हारे नहीं हैं; उन्हें त्याग दो। उनका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। भिक्षुओं! जैसे इस जेतवन में... इसी प्रकार, भिक्षुओं! रूप तुम्हारे नहीं हैं; उन्हें त्याग दो। उनका त्याग तुम्हारे हित और सुख के लिए होगा। (छठा सूत्त) ๗. อชฺฌตฺตานิจฺจเหตุสุตฺตํ ७. अध्यात्म-अनिच्च-हेतु सूत्त (आंतरिक अनित्यता के हेतु का सूत्त) ๑๔๐. ‘‘จกฺขุํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ. โยปิ เหตุ, โยปิ ปจฺจโย จกฺขุสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ อนิจฺโจ. อนิจฺจสมฺภูตํ, ภิกฺขเว, จกฺขุ กุโต นิจฺจํ ภวิสฺสติ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา. โยปิ เหตุ, โยปิ ปจฺจโย ชิวฺหาย อุปฺปาทาย โสปิ อนิจฺโจ. อนิจฺจสมฺภูตา, ภิกฺขเว, ชิวฺหา กุโต นิจฺจา ภวิสฺสติ…เป… มโน อนิจฺโจ. โยปิ, ภิกฺขเว, เหตุ โยปิ ปจฺจโย มนสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ อนิจฺโจ. อนิจฺจสมฺภูโต, ภิกฺขเว, มโน กุโต นิจฺโจ ภวิสฺสติ! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… ชิวฺหายปิ นิพฺพินฺทติ…เป… นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. สตฺตมํ. १४०. भिक्षुओं! चक्षु अनित्य है। चक्षु की उत्पत्ति के लिए जो हेतु है, जो प्रत्यय (कारण) है, वह भी अनित्य है। भिक्षुओं! अनित्य (कारणों) से उत्पन्न चक्षु भला नित्य कैसे हो सकता है? ... जिह्वा अनित्य है। जिह्वा की उत्पत्ति के लिए जो हेतु है, जो प्रत्यय है, वह भी अनित्य है। अनित्य से उत्पन्न जिह्वा भला नित्य कैसे हो सकती है? ... मन अनित्य है। भिक्षुओं! मन की उत्पत्ति के लिए जो हेतु है, जो प्रत्यय है, वह भी अनित्य है। अनित्य से उत्पन्न मन भला नित्य कैसे हो सकता है! भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान् आर्य-श्रावक चक्षु से भी निर्वेद (विरक्त) होता है... जिह्वा से भी निर्वेद होता है... मन से भी निर्वेद होता है। निर्वेद होने पर वह विरागी होता है; विराग से वह मुक्त होता है; मुक्त होने पर 'मैं मुक्त हूँ' ऐसा ज्ञान होता है। वह जान लेता है—'जन्म क्षीण हो गया, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया, जो करना था वह कर लिया गया, अब इस अस्तित्व के लिए कुछ शेष नहीं है'। (सातवाँ सूत्त) ๘. อชฺฌตฺตทุกฺขเหตุสุตฺตํ ८. अध्यात्म-दुःख-हेतु सूत्त ๑๔๑. ‘‘จกฺขุํ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ. โยปิ เหตุ โยปิ ปจฺจโย จกฺขุสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ ทุกฺโข. ทุกฺขสมฺภูตํ, ภิกฺขเว, จกฺขุ กุโต สุขํ ภวิสฺสติ…เป… ชิวฺหา ทุกฺขา. โยปิ เหตุ, โยปิ ปจฺจโย ชิวฺหาย อุปฺปาทาย, โสปิ ทุกฺโข. ทุกฺขสมฺภูตา, ภิกฺขเว, ชิวฺหา กุโต สุขา ภวิสฺสติ…เป… มโน ทุกฺโข. โยปิ เหตุ โยปิ ปจฺจโย มนสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ ทุกฺโข. ทุกฺขสมฺภูโต, ภิกฺขเว, มโน กุโต สุโข ภวิสฺสติ! เอวํ ปสฺสํ…เป… ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. อฏฺฐมํ. १४१. “भिक्षुओं! चक्षु (आँख) दुःख है। चक्षु की उत्पत्ति के लिए जो भी हेतु और जो भी प्रत्यय है, वह भी दुःख है। भिक्षुओं! दुःख से उत्पन्न चक्षु भला सुख कैसे होगा? ...पे... जिह्वा दुःख है। जिह्वा की उत्पत्ति के लिए जो भी हेतु और जो भी प्रत्यय है, वह भी दुःख है। भिक्षुओं! दुःख से उत्पन्न जिह्वा भला सुख कैसे होगी? ...पे... मन दुःख है। मन की उत्पत्ति के लिए जो भी हेतु और जो भी प्रत्यय है, वह भी दुःख है। भिक्षुओं! दुःख से उत्पन्न मन भला सुख कैसे होगा! ऐसा देखते हुए ...पे... वह जान लेता है— ‘जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है’।” आठवाँ सूत्र। ๙. อชฺฌตฺตานตฺตเหตุสุตฺตํ ९. ९. अध्यात्म-अनात्म-हेतु सूत्र ๑๔๒. ‘‘จกฺขุํ[Pg.345], ภิกฺขเว, อนตฺตา. โยปิ เหตุ, โยปิ ปจฺจโย จกฺขุสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ อนตฺตา. อนตฺตสมฺภูตํ, ภิกฺขเว, จกฺขุ กุโต อตฺตา ภวิสฺสติ…เป… ชิวฺหา อนตฺตา. โยปิ เหตุ โยปิ ปจฺจโย ชิวฺหาย อุปฺปาทาย, โสปิ อนตฺตา. อนตฺตสมฺภูตา, ภิกฺขเว, ชิวฺหา กุโต อตฺตา ภวิสฺสติ…เป… มโน อนตฺตา. โยปิ เหตุ โยปิ ปจฺจโย มนสฺส อุปฺปาทาย, โสปิ อนตฺตา. อนตฺตสมฺภูโต, ภิกฺขเว, มโน กุโต อตฺตา ภวิสฺสติ! เอวํ ปสฺสํ…เป… ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. นวมํ. १४२. “भिक्षुओं! चक्षु अनात्मा है। चक्षु की उत्पत्ति के लिए जो भी हेतु और जो भी प्रत्यय है, वह भी अनात्मा है। भिक्षुओं! अनात्मा से उत्पन्न चक्षु भला आत्मा कैसे होगा? ...पे... जिह्वा अनात्मा है। जिह्वा की उत्पत्ति के लिए जो भी हेतु और जो भी प्रत्यय है, वह भी अनात्मा है। भिक्षुओं! अनात्मा से उत्पन्न जिह्वा भला आत्मा कैसे होगी? ...पे... मन अनात्मा है। मन की उत्पत्ति के लिए जो भी हेतु और जो भी प्रत्यय है, वह भी अनात्मा है। भिक्षुओं! अनात्मा से उत्पन्न मन भला आत्मा कैसे होगा! ऐसा देखते हुए ...पे... वह जान लेता है— ‘जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है’।” नवाँ सूत्र। ๑๐. พาหิรานิจฺจเหตุสุตฺตํ १०. १०. बाह्य-अनित्य-हेतु सूत्र ๑๔๓. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนิจฺจา. โยปิ เหตุ, โยปิ ปจฺจโย รูปานํ อุปฺปาทาย, โสปิ อนิจฺโจ. อนิจฺจสมฺภูตา, ภิกฺขเว, รูปา กุโต นิจฺจา ภวิสฺสนฺติ! สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนิจฺจา. โยปิ เหตุ, โยปิ ปจฺจโย ธมฺมานํ อุปฺปาทาย, โสปิ อนิจฺโจ. อนิจฺจสมฺภูตา, ภิกฺขเว, ธมฺมา กุโต นิจฺจา ภวิสฺสนฺติ! เอวํ ปสฺสํ…เป… ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. ทสมํ. १४३. “भिक्षुओं! रूप अनित्य हैं। रूपों की उत्पत्ति के लिए जो भी हेतु और जो भी प्रत्यय है, वह भी अनित्य है। भिक्षुओं! अनित्य से उत्पन्न रूप भला नित्य कैसे होंगे! शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धर्म (मन के विषय) अनित्य हैं। धर्मों की उत्पत्ति के लिए जो भी हेतु और जो भी प्रत्यय है, वह भी अनित्य है। भिक्षुओं! अनित्य से उत्पन्न धर्म भला नित्य कैसे होंगे! ऐसा देखते हुए ...पे... वह जान लेता है— ‘जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है’।” दसवाँ सूत्र। ๑๑. พาหิรทุกฺขเหตุสุตฺตํ ११. ११. बाह्य-दुःख-हेतु सूत्र ๑๔๔. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, ทุกฺขา. โยปิ เหตุ, โยปิ ปจฺจโย รูปานํ อุปฺปาทาย, โสปิ ทุกฺโข. ทุกฺขสมฺภูตา, ภิกฺขเว, รูปา กุโต สุขา ภวิสฺสนฺติ! สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา ทุกฺขา. โยปิ เหตุ, โยปิ ปจฺจโย ธมฺมานํ อุปฺปาทาย, โสปิ ทุกฺโข. ทุกฺขสมฺภูตา, ภิกฺขเว, ธมฺมา กุโต สุขา ภวิสฺสนฺติ! เอวํ ปสฺสํ…เป… ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. เอกาทสมํ. १४४. “भिक्षुओं! रूप दुःख हैं। रूपों की उत्पत्ति के लिए जो भी हेतु और जो भी प्रत्यय है, वह भी दुःख है। भिक्षुओं! दुःख से उत्पन्न रूप भला सुख कैसे होंगे! शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धर्म दुःख हैं। धर्मों की उत्पत्ति के लिए जो भी हेतु और जो भी प्रत्यय है, वह भी दुःख है। भिक्षुओं! दुःख से उत्पन्न धर्म भला सुख कैसे होंगे! ऐसा देखते हुए ...पे... वह जान लेता है— ‘जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है’।” ग्यारहवाँ सूत्र। ๑๒. พาหิรานตฺตเหตุสุตฺตํ १२. १२. बाह्य-अनात्म-हेतु सूत्र ๑๔๕. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนตฺตา. โยปิ เหตุ, โยปิ ปจฺจโย รูปานํ อุปฺปาทาย, โสปิ อนตฺตา. อนตฺตสมฺภูตา, ภิกฺขเว, รูปา กุโต อตฺตา ภวิสฺสนฺติ! สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนตฺตา. โยปิ เหตุ, โยปิ ปจฺจโย ธมฺมานํ อุปฺปาทาย, โสปิ อนตฺตา. อนตฺตสมฺภูตา, ภิกฺขเว, ธมฺมา [Pg.346] กุโต อตฺตา ภวิสฺสนฺติ! เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, สทฺเทสุปิ… คนฺเธสุปิ… รเสสุปิ… โผฏฺฐพฺเพสุปิ… ธมฺเมสุปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. ทฺวาทสมํ. १४५. “भिक्षुओं! रूप अनात्मा हैं। रूपों की उत्पत्ति के लिए जो भी हेतु और जो भी प्रत्यय है, वह भी अनात्मा है। भिक्षुओं! अनात्मा से उत्पन्न रूप भला आत्मा कैसे होंगे! शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धर्म अनात्मा हैं। धर्मों की उत्पत्ति के लिए जो भी हेतु और जो भी प्रत्यय है, वह भी अनात्मा है। भिक्षुओं! अनात्मा से उत्पन्न धर्म भला आत्मा कैसे होंगे! भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक रूपों से भी निर्वेद प्राप्त करता है, शब्दों से भी... गंधों से भी... रसों से भी... स्पर्शों से भी... धर्मों से भी निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद होने पर वह विरक्त हो जाता है; विरक्त होने पर वह विमुक्त हो जाता है; विमुक्त होने पर ‘मैं विमुक्त हूँ’ ऐसा ज्ञान होता है। वह जान लेता है— ‘जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है’।” बारहवाँ सूत्र। เทวทหวคฺโค จุทฺทสโม. चौदहवाँ देवदह-वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उदान) – เทวทโห ขโณ รูปา, ทฺเว นตุมฺหากเมว จ; เหตุนาปิ ตโย วุตฺตา, ทุเว อชฺฌตฺตพาหิราติ. देवदह, क्षण, रूप, दो ‘न तुम्हाकं’ (तुम्हारा नहीं), हेतु के साथ तीन कहे गए हैं, और दो अध्यात्म-बाह्य कहे गए हैं। ๑๕. นวปุราณวคฺโค १५. १५. ५. नव-पुराण वर्ग ๑. กมฺมนิโรธสุตฺตํ १. १. कर्म-निरोध सूत्र ๑๔๖. ‘‘นวปุราณานิ, ภิกฺขเว, กมฺมานิ เทเสสฺสามิ กมฺมนิโรธํ กมฺมนิโรธคามินิญฺจ ปฏิปทํ. ตํ สุณาถ, สาธุกํ มนสิ กโรถ; ภาสิสฺสามีติ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ปุราณกมฺมํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, ปุราณกมฺมํ อภิสงฺขตํ อภิสญฺเจตยิตํ เวทนิยํ ทฏฺฐพฺพํ…เป… ชิวฺหา ปุราณกมฺมา อภิสงฺขตา อภิสญฺเจตยิตา เวทนิยา ทฏฺฐพฺพา…เป… มโน ปุราณกมฺโม อภิสงฺขโต อภิสญฺเจตยิโต เวทนิโย ทฏฺฐพฺโพ. อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ปุราณกมฺมํ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, นวกมฺมํ? ยํ โข, ภิกฺขเว, เอตรหิ กมฺมํ กโรติ กาเยน วาจาย มนสา, อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, นวกมฺมํ. กตโม จ, ภิกฺขเว, กมฺมนิโรโธ? โย โข, ภิกฺขเว, กายกมฺมวจีกมฺมมโนกมฺมสฺส นิโรธา วิมุตฺตึ ผุสติ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, กมฺมนิโรโธ. กตมา จ, ภิกฺขเว, กมฺมนิโรธคามินี ปฏิปทา? อยเมว อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ, สมฺมาสงฺกปฺโป, สมฺมาวาจา, สมฺมากมฺมนฺโต, สมฺมาอาชีโว, สมฺมาวายาโม, สมฺมาสติ, สมฺมาสมาธิ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, กมฺมนิโรธคามินี ปฏิปทา. อิติ โข, ภิกฺขเว, เทสิตํ มยา ปุราณกมฺมํ, เทสิตํ [Pg.347] นวกมฺมํ, เทสิโต กมฺมนิโรโธ, เทสิตา กมฺมนิโรธคามินี ปฏิปทา. ยํ โข, ภิกฺขเว, สตฺถารา กรณียํ สาวกานํ หิเตสินา อนุกมฺปเกน อนุกมฺปํ อุปาทาย, กตํ โว ตํ มยา. เอตานิ, ภิกฺขเว, รุกฺขมูลานิ, เอตานิ สุญฺญาคารานิ. ฌายถ, ภิกฺขเว, มา ปมาทตฺถ; มา ปจฺฉาวิปฺปฏิสาริโน อหุวตฺถ. อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนี’’ติ. ปฐมํ. १४६. “भिक्षुओं, मैं तुम्हें नवीन और पुरातन कर्मों, कर्म-निरोध और कर्म-निरोध की ओर ले जाने वाले मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो, अच्छी तरह मनन करो; मैं कहूँगा। भिक्षुओं, पुरातन कर्म क्या है? भिक्षुओं, चक्षु (आँख) पुरातन कर्म है, जो संस्कारित है, चेतना द्वारा निर्मित है और वेदनीय (अनुभव करने योग्य) के रूप में देखा जाना चाहिए... जिह्वा पुरातन कर्म है, जो संस्कारित है, चेतना द्वारा निर्मित है और वेदनीय के रूप में देखी जानी चाहिए... मन पुरातन कर्म है, जो संस्कारित है, चेतना द्वारा निर्मित है और वेदनीय के रूप में देखा जाना चाहिए। भिक्षुओं, इसे पुरातन कर्म कहा जाता है। भिक्षुओं, नवीन कर्म क्या है? भिक्षुओं, वर्तमान में जो कर्म काया, वाणी या मन से किया जाता है, उसे नवीन कर्म कहा जाता है। भिक्षुओं, कर्म-निरोध क्या है? भिक्षुओं, जो काय-कर्म, वच-कर्म और मन-कर्म के निरोध से विमुक्ति (अर्हत्व फल) को प्राप्त करता है, उसे कर्म-निरोध कहा जाता है। भिक्षुओं, कर्म-निरोधगामिनी प्रतिपदा (मार्ग) क्या है? यही आर्य अष्टांगिक मार्ग है, जैसे कि - सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि - भिक्षुओं, इसे कर्म-निरोधगामिनी प्रतिपदा कहा जाता है। इस प्रकार, भिक्षुओं, मैंने पुरातन कर्म का उपदेश दिया, नवीन कर्म का उपदेश दिया, कर्म-निरोध का उपदेश दिया और कर्म-निरोधगामिनी प्रतिपदा का उपदेश दिया। भिक्षुओं, शिष्यों का हित चाहने वाले, अनुकम्पा करने वाले शास्ता द्वारा अनुकम्पा के कारण जो किया जाना चाहिए, वह मैंने तुम्हारे लिए कर दिया है। भिक्षुओं, ये वृक्षों के मूल हैं, ये शून्य आवास (एकांत स्थान) हैं। भिक्षुओं, ध्यान करो, प्रमाद मत करो; बाद में पश्चाताप मत करना। यही तुम्हारे लिए हमारा अनुशासन है।” प्रथम। ๒. อนิจฺจนิพฺพานสปฺปายสุตฺตํ २. अनित्य-निर्वाण-सप्पाय सुत्त ๑๔๗. ‘‘นิพฺพานสปฺปายํ โว, ภิกฺขเว, ปฏิปทํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ…เป… กตมา จ สา, ภิกฺขเว, นิพฺพานสปฺปายา ปฏิปทา? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุํ อนิจฺจนฺติ ปสฺสติ, รูปา อนิจฺจาติ ปสฺสติ, จกฺขุวิญฺญาณํ อนิจฺจนฺติ ปสฺสติ, จกฺขุสมฺผสฺโส อนิจฺโจติ ปสฺสติ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจนฺติ ปสฺสติ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจาติ ปสฺสติ, รสา อนิจฺจาติ ปสฺสติ, ชิวฺหาวิญฺญาณํ อนิจฺจนฺติ ปสฺสติ, ชิวฺหาสมฺผสฺโส อนิจฺโจติ ปสฺสติ, ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจนฺติ ปสฺสติ…เป… มโน อนิจฺโจติ ปสฺสติ, ธมฺมา อนิจฺจาติ ปสฺสติ, มโนวิญฺญาณํ อนิจฺจนฺติ ปสฺสติ, มโนสมฺผสฺโส อนิจฺโจติ ปสฺสติ, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจนฺติ ปสฺสติ. อยํ โข สา, ภิกฺขเว, นิพฺพานสปฺปายา ปฏิปทา’’ติ. ทุติยํ. १४७. “भिक्षुओं, मैं तुम्हें निर्वाण के अनुकूल प्रतिपदा (मार्ग) का उपदेश दूँगा। उसे सुनो... भिक्षुओं, वह निर्वाण के अनुकूल प्रतिपदा क्या है? भिक्षुओं, यहाँ भिक्षु चक्षु को अनित्य देखता है, रूपों को अनित्य देखता है, चक्षु-विज्ञान को अनित्य देखता है, चक्षु-स्पर्श को अनित्य देखता है। चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय (कारण) से जो सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे भी वह अनित्य देखता है... जिह्वा को अनित्य देखता है, रसों को अनित्य देखता है, जिह्वा-विज्ञान को अनित्य देखता है, जिह्वा-स्पर्श को अनित्य देखता है, जिह्वा-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे भी वह अनित्य देखता है... मन को अनित्य देखता है, धर्मों (मानसिक विषयों) को अनित्य देखता है, मनो-विज्ञान को अनित्य देखता है, मनो-स्पर्श को अनित्य देखता है, मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे भी वह अनित्य देखता है। भिक्षुओं, यही निर्वाण के अनुकूल प्रतिपदा है।” द्वितीय। ๓. ทุกฺขนิพฺพานสปฺปายสุตฺตํ ३. दुःख-निर्वाण-सप्पाय सुत्त ๑๔๘. ‘‘นิพฺพานสปฺปายํ โว, ภิกฺขเว, ปฏิปทํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ…เป… กตมา จ สา, ภิกฺขเว, นิพฺพานสปฺปายา ปฏิปทา? อิธ, ภิกฺขเว, จกฺขุํ ทุกฺขนฺติ ปสฺสติ, รูปา ทุกฺขาติ ปสฺสติ, จกฺขุวิญฺญาณํ ทุกฺขนฺติ ปสฺสติ, จกฺขุสมฺผสฺโส ทุกฺโขติ ปสฺสติ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ทุกฺขนฺติ ปสฺสติ…เป… ชิวฺหา ทุกฺขาติ ปสฺสติ…เป… มโน ทุกฺโขติ ปสฺสติ, ธมฺมา ทุกฺขาติ ปสฺสติ, มโนวิญฺญาณํ ทุกฺขนฺติ ปสฺสติ, มโนสมฺผสฺโส ทุกฺโขติ ปสฺสติ, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ [Pg.348] ทุกฺขนฺติ ปสฺสติ. อยํ โข สา, ภิกฺขเว, นิพฺพานสปฺปายา ปฏิปทา’’ติ. ตติยํ. १४८. “भिक्षुओं, मैं तुम्हें निर्वाण के अनुकूल प्रतिपदा का उपदेश दूँगा। उसे सुनो... भिक्षुओं, वह निर्वाण के अनुकूल प्रतिपदा क्या है? भिक्षुओं, यहाँ भिक्षु चक्षु को दुःख देखता है, रूपों को दुःख देखता है, चक्षु-विज्ञान को दुःख देखता है, चक्षु-स्पर्श को दुःख देखता है, चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे भी वह दुःख देखता है... जिह्वा को दुःख देखता है... मन को दुःख देखता है, धर्मों को दुःख देखता है, मनो-विज्ञान को दुःख देखता है, मनो-स्पर्श को दुःख देखता है, मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे भी वह दुःख देखता है। भिक्षुओं, यही निर्वाण के अनुकूल प्रतिपदा है।” तृतीय। ๔. อนตฺตนิพฺพานสปฺปายสุตฺตํ ४. अनात्म-निर्वाण-सप्पाय सुत्त ๑๔๙. ‘‘นิพฺพานสปฺปายํ โว, ภิกฺขเว, ปฏิปทํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ…เป… กตมา จ สา, ภิกฺขเว, นิพฺพานสปฺปายา ปฏิปทา? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุํ อนตฺตาติ ปสฺสติ, รูปา อนตฺตาติ ปสฺสติ, จกฺขุวิญฺญาณํ อนตฺตาติ ปสฺสติ, จกฺขุสมฺผสฺโส อนตฺตาติ ปสฺสติ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนตฺตาติ ปสฺสติ…เป… มโน อนตฺตาติ ปสฺสติ, ธมฺมา อนตฺตาติ ปสฺสติ, มโนวิญฺญาณํ อนตฺตาติ ปสฺสติ, มโนสมฺผสฺโส อนตฺตาติ ปสฺสติ, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนตฺตาติ ปสฺสติ. อยํ โข สา, ภิกฺขเว, นิพฺพานสปฺปายา ปฏิปทา’’ติ. จตุตฺถํ. १४९. “भिक्षुओं, मैं तुम्हें निर्वाण के अनुकूल प्रतिपदा का उपदेश दूँगा। उसे सुनो... भिक्षुओं, वह निर्वाण के अनुकूल प्रतिपदा क्या है? भिक्षुओं, यहाँ भिक्षु चक्षु को अनात्म देखता है, रूपों को अनात्म देखता है, चक्षु-विज्ञान को अनात्म देखता है, चक्षु-स्पर्श को अनात्म देखता है, चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे भी वह अनात्म देखता है... मन को अनात्म देखता है, धर्मों को अनात्म देखता है, मनो-विज्ञान को अनात्म देखता है, मनो-स्पर्श को अनात्म देखता है, मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-सुखद-न-दुखद वेदना उत्पन्न होती है, उसे भी वह अनात्म देखता है। भिक्षुओं, यही निर्वाण के अनुकूल प्रतिपदा है।” चतुर्थ। ๕. นิพฺพานสปฺปายปฏิปทาสุตฺตํ ५. निर्वाण-सप्पाय-प्रतिपदा सुत्त ๑๕๐. ‘‘นิพฺพานสปฺปายํ โว, ภิกฺขเว, ปฏิปทํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ…เป… กตมา จ สา, ภิกฺขเว, นิพฺพานสปฺปายา ปฏิปทา? ตํ กึ มญฺญถ, ภิกฺขเว, จกฺขุ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? १५०. “भिक्षुओं, मैं तुम्हें निर्वाण के अनुकूल प्रतिपदा का उपदेश दूँगा। उसे सुनो... भिक्षुओं, वह निर्वाण के अनुकूल प्रतिपदा क्या है? भिक्षुओं, तुम क्या सोचते हो, चक्षु नित्य है या अनित्य?” ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. “भन्ते! अनित्य है।” ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? “जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?” ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. "दुःख है, भन्ते।" ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? "जो अनित्य, दुःखद और परिवर्तनशील है, क्या उसे ऐसा मानना उचित है कि— 'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है'?" ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "नहीं, भन्ते।" ‘‘รูปา นิจฺจา วา อนิจฺจา วา’’ติ? "रूप नित्य हैं या अनित्य?" ‘‘อนิจฺจา, ภนฺเต’’…เป…. "अनित्य हैं, भन्ते। ...पे..." ‘‘จกฺขุวิญฺญาณํ… จกฺขุสมฺผสฺโส…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? "चक्षु-विज्ञान... चक्षु-स्पर्श... ...पे... और मन-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदन उत्पन्न होता है, क्या वह नित्य है या अनित्य?" ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. "अनित्य है, भन्ते।" ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? "जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?" ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. "दुःख है, भन्ते।" ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? "जो अनित्य, दुःखद और परिवर्तनशील है, क्या उसे ऐसा मानना उचित है कि— 'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है'?" ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "नहीं, भन्ते।" ‘‘เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ …เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาติ. อยํ โข สา, ภิกฺขเว, นิพฺพานสปฺปายา ปฏิปทา’’ติ. ปญฺจมํ. "भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक चक्षु से भी निर्वेद प्राप्त करता है, रूपों से भी निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-विज्ञान से भी निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-स्पर्श से भी निर्वेद प्राप्त करता है... ...पे... और मन-स्पर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदन उत्पन्न होता है, उससे भी निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद से वह विरागी होता है; वैराग्य से वह विमुक्त होता है... 'इसके बाद अब और कुछ करने को शेष नहीं है', ऐसा वह जान लेता है। भिक्षुओं! यही निर्वाण के अनुकूल प्रतिपदा है।" पाँचवाँ। ๖. อนฺเตวาสิกสุตฺตํ ६. अन्तेवासिक सुत्त ๑๕๑. ‘‘อนนฺเตวาสิกมิทํ[Pg.349], ภิกฺขเว, พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ อนาจริยกํ. สนฺเตวาสิโก, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สาจริยโก ทุกฺขํ น ผาสุ วิหรติ. อนนฺเตวาสิโก, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อนาจริยโก สุขํ ผาสุ วิหรติ. กถญฺจ, ภิกฺขุ, สนฺเตวาสิโก สาจริยโก ทุกฺขํ น ผาสุ วิหรติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. ตฺยาสฺส อนฺโต วสนฺติ, อนฺตสฺส วสนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา สนฺเตวาสิโกติ วุจฺจติ. เต นํ สมุทาจรนฺติ, สมุทาจรนฺติ นํ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา สาจริยโกติ วุจฺจติ…เป…. १५१. "भिक्षुओं! यह ब्रह्मचर्य बिना अन्तेवासी और बिना आचार्य के जिया जाता है। भिक्षुओं! जो भिक्षु अन्तेवासी और आचार्य के साथ रहता है, वह दुःखपूर्वक और कष्ट से विहार करता है। भिक्षुओं! जो भिक्षु बिना अन्तेवासी और बिना आचार्य के रहता है, वह सुखपूर्वक विहार करता है। और भिक्षुओं, कैसे एक भिक्षु अन्तेवासी और आचार्य के साथ दुःखपूर्वक विहार करता है? भिक्षुओं! यहाँ भिक्षु द्वारा चक्षु से रूप देखने पर पापमय अकुशल धर्म उत्पन्न होते हैं, जो संकल्पों के पीछे भागने वाले और संयोजन उत्पन्न करने वाले होते हैं। वे उसके भीतर वास करते हैं; क्योंकि पापमय अकुशल धर्म उसके भीतर वास करते हैं, इसलिए उसे 'अन्तेवासी वाला' कहा जाता है। वे उसे अभिभूत करते हैं; क्योंकि पापमय अकुशल धर्म उसे अभिभूत करते हैं, इसलिए उसे 'आचार्य वाला' कहा जाता है। ...पे..." ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. ตฺยาสฺส อนฺโต วสนฺติ, อนฺตสฺส วสนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา สนฺเตวาสิโกติ วุจฺจติ. เต นํ สมุทาจรนฺติ, สมุทาจรนฺติ นํ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา สาจริยโกติ วุจฺจติ…เป…. "फिर भिक्षुओं! भिक्षु द्वारा जिह्वा से रस चखने पर पापमय अकुशल धर्म उत्पन्न होते हैं, जो संकल्पों के पीछे भागने वाले और संयोजन उत्पन्न करने वाले होते हैं। वे उसके भीतर वास करते हैं; क्योंकि पापमय अकुशल धर्म उसके भीतर वास करते हैं, इसलिए उसे 'अन्तेवासी वाला' कहा जाता है। वे उसे अभिभूत करते हैं; क्योंकि पापमय अकुशल धर्म उसे अभिभूत करते हैं, इसलिए उसे 'आचार्य वाला' कहा जाता है। ...पे..." ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. ตฺยาสฺส อนฺโต วสนฺติ, อนฺตสฺส วสนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา สนฺเตวาสิโกติ วุจฺจติ. เต นํ สมุทาจรนฺติ, สมุทาจรนฺติ นํ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา สาจริยโกติ วุจฺจติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สนฺเตวาสิโก สาจริยโก ทุกฺขํ, น ผาสุ วิหรติ. "फिर भिक्षुओं! भिक्षु द्वारा मन से धर्म को जानने पर पापमय अकुशल धर्म उत्पन्न होते हैं, जो संकल्पों के पीछे भागने वाले और संयोजन उत्पन्न करने वाले होते हैं। वे उसके भीतर वास करते हैं; क्योंकि पापमय अकुशल धर्म उसके भीतर वास करते हैं, इसलिए उसे 'अन्तेवासी वाला' कहा जाता है। वे उसे अभिभूत करते हैं; क्योंकि पापमय अकुशल धर्म उसे अभिभूत करते हैं, इसलिए उसे 'आचार्य वाला' कहा जाता है। भिक्षुओं! इस प्रकार अन्तेवासी और आचार्य के साथ रहने वाला भिक्षु दुःखपूर्वक और कष्ट से विहार करता है।" ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อนนฺเตวาสิโก อนาจริยโก สุขํ ผาสุ วิหรติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา น อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. ตฺยาสฺส น อนฺโต วสนฺติ, นาสฺส อนฺโต วสนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา อนนฺเตวาสิโกติ วุจฺจติ. เต นํ น สมุทาจรนฺติ, น สมุทาจรนฺติ นํ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา อนาจริยโกติ วุจฺจติ…เป…. "और भिक्षुओं, कैसे एक भिक्षु बिना अन्तेवासी और बिना आचार्य के सुखपूर्वक विहार करता है? भिक्षुओं! यहाँ भिक्षु द्वारा चक्षु से रूप देखने पर पापमय अकुशल धर्म उत्पन्न नहीं होते, जो संकल्पों के पीछे भागने वाले और संयोजन उत्पन्न करने वाले होते हैं। वे उसके भीतर वास नहीं करते; क्योंकि पापमय अकुशल धर्म उसके भीतर वास नहीं करते, इसलिए उसे 'बिना अन्तेवासी वाला' कहा जाता है। वे उसे अभिभूत नहीं करते; क्योंकि पापमय अकुशल धर्म उसे अभिभूत नहीं करते, इसलिए उसे 'बिना आचार्य वाला' कहा जाता है। ...पे..." ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา น อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. ตฺยาสฺส น อนฺโต วสนฺติ, นาสฺส [Pg.350] อนฺโต วสนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา อนนฺเตวาสิโกติ วุจฺจติ. เต นํ น สมุทาจรนฺติ, น สมุทาจรนฺติ นํ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา อนาจริยโกติ วุจฺจติ…เป…. "फिर भिक्षुओं! भिक्षु द्वारा जिह्वा से रस चखने पर पापमय अकुशल धर्म उत्पन्न नहीं होते, जो संकल्पों के पीछे भागने वाले और संयोजन उत्पन्न करने वाले होते हैं। वे उसके भीतर वास नहीं करते; क्योंकि पापमय अकुशल धर्म उसके भीतर वास नहीं करते, इसलिए उसे 'बिना अन्तेवासी वाला' कहा जाता है। वे उसे अभिभूत नहीं करते; क्योंकि पापमय अकुशल धर्म उसे अभिभूत नहीं करते, इसलिए उसे 'बिना आचार्य वाला' कहा जाता है। ...पे..." ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย น อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา. ตฺยาสฺส น อนฺโต วสนฺติ, นาสฺส อนฺโต วสนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา อนนฺเตวาสิโกติ วุจฺจติ. เต นํ น สมุทาจรนฺติ, น สมุทาจรนฺติ นํ ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ. ตสฺมา อนาจริยโกติ วุจฺจติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อนนฺเตวาสิโก อนาจริยโก สุขํ ผาสุ วิหรติ. อนนฺเตวาสิกมิทํ, ภิกฺขเว, พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ. อนาจริยกํ สนฺเตวาสิโก, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สาจริยโก ทุกฺขํ, น ผาสุ วิหรติ. อนนฺเตวาสิโก, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อนาจริยโก สุขํ ผาสุ วิหรตี’’ติ. ฉฏฺฐํ. "फिर भिक्षुओं! भिक्षु द्वारा मन से धर्म को जानने पर पापमय अकुशल धर्म उत्पन्न नहीं होते, जो संकल्पों के पीछे भागने वाले और संयोजन उत्पन्न करने वाले होते हैं। वे उसके भीतर वास नहीं करते; क्योंकि पापमय अकुशल धर्म उसके भीतर वास नहीं करते, इसलिए उसे 'बिना अन्तेवासी वाला' कहा जाता है। वे उसे अभिभूत नहीं करते; क्योंकि पापमय अकुशल धर्म उसे अभिभूत नहीं करते, इसलिए उसे 'बिना आचार्य वाला' कहा जाता है। भिक्षुओं! इस प्रकार बिना अन्तेवासी और बिना आचार्य के रहने वाला भिक्षु सुखपूर्वक विहार करता है। भिक्षुओं! यह ब्रह्मचर्य बिना अन्तेवासी और बिना आचार्य के जिया जाता है। भिक्षुओं! जो भिक्षु अन्तेवासी और आचार्य के साथ रहता है, वह दुःखपूर्वक और कष्ट से विहार करता है। जो भिक्षु बिना अन्तेवासी और बिना आचार्य के रहता है, वह सुखपूर्वक विहार करता है।" छठा। ๗. กิมตฺถิยพฺรหฺมจริยสุตฺตํ ७. किमत्थिय ब्रह्मचर्य सुत्त ๑๕๒. ‘‘สเจ โว, ภิกฺขเว, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ ปุจฺเฉยฺยุํ – ‘กิมตฺถิยํ, อาวุโส, สมเณ โคตเม พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’ติ? เอวํ ปุฏฺฐา ตุมฺเห, ภิกฺขเว, เตสํ อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ พฺยากเรยฺยาถ – ‘ทุกฺขสฺส โข, อาวุโส, ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’ติ. สเจ ปน โว, ภิกฺขเว, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ ปุจฺเฉยฺยุํ – ‘กตมํ ปนาวุโส, ทุกฺขํ, ยสฺส ปริญฺญาย สมเณ โคตเม พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’ติ? เอวํ ปุฏฺฐา ตุมฺเห, ภิกฺขเว, เตสํ อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ พฺยากเรยฺยาถ – १५२. “भिक्षुओं, यदि अन्य मतों के परिव्राजक तुमसे इस प्रकार पूछें— ‘आयुष्मानों, श्रमण गौतम के पास ब्रह्मचर्य का पालन किस प्रयोजन के लिए किया जाता है?’ तो भिक्षुओं, इस प्रकार पूछे जाने पर तुम उन अन्य मतों के परिव्राजकों को इस प्रकार उत्तर देना— ‘आयुष्मानों, दुःख के पूर्ण परिज्ञान (परिज्ञा) के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है।’ भिक्षुओं, यदि वे अन्य मतों के परिव्राजक फिर इस प्रकार पूछें— ‘आयुष्मानों, वह दुःख कौन सा है, जिसके पूर्ण परिज्ञान के लिए श्रमण गौतम के पास ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है?’ तो भिक्षुओं, इस प्रकार पूछे जाने पर तुम उन अन्य मतों के परिव्राजकों को इस प्रकार उत्तर देना—” ‘‘จกฺขุ โข, อาวุโส, ทุกฺขํ; ตสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ. รูปา ทุกฺขา; เตสํ ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ. จกฺขุวิญฺญาณํ ทุกฺขํ; ตสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ. จกฺขุสมฺผสฺโส ทุกฺโข; ตสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ทุกฺขํ; ตสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ…เป… ชิวฺหา ทุกฺขา… มโน ทุกฺโข; ตสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ทุกฺขํ; ตสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสติ. อิทํ โข, อาวุโส[Pg.351], ทุกฺขํ; ยสฺส ปริญฺญาย ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’ติ. เอวํ ปุฏฺฐา ตุมฺเห, ภิกฺขเว, เตสํ อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ พฺยากเรยฺยาถา’’ติ. สตฺตมํ. “‘आयुष्मानों, चक्षु (आँख) दुःख है; उसके पूर्ण परिज्ञान के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है। रूप दुःख हैं; उनके पूर्ण परिज्ञान के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है। चक्षु-विज्ञान दुःख है; उसके पूर्ण परिज्ञान के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है। चक्षु-संपर्श दुःख है; उसके पूर्ण परिज्ञान के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है। चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदन (अनुभव) उत्पन्न होता है, वह भी दुःख है; उसके पूर्ण परिज्ञान के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है... (पेय्याल)... जिह्वा दुःख है... मन दुःख है; उसके पूर्ण परिज्ञान के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है... मन-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदन उत्पन्न होता है, वह भी दुःख है; उसके पूर्ण परिज्ञान के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है। आयुष्मानों, यही वह दुःख है, जिसके पूर्ण परिज्ञान के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है।’ भिक्षुओं, इस प्रकार पूछे जाने पर तुम उन अन्य मतों के परिव्राजकों को इस प्रकार उत्तर देना।” सातवाँ सुत्त। ๘. อตฺถินุโขปริยายสุตฺตํ ८. अत्थिनुखोपरियाय सुत्त ๑๕๓. ‘‘อตฺถิ นุ โข, ภิกฺขเว, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม ภิกฺขุ อญฺญตฺเรว สทฺธาย, อญฺญตฺร รุจิยา, อญฺญตฺร อนุสฺสวา, อญฺญตฺร อาการปริวิตกฺกา, อญฺญตฺร ทิฏฺฐินิชฺฌานกฺขนฺติยา อญฺญํ พฺยากเรยฺย – ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานามี’’ติ ? ‘‘ภควํมูลกา โน, ภนฺเต, ธมฺมา, ภควํเนตฺติกา ภควํปฏิสรณา. สาธุ วต, ภนฺเต, ภควนฺตํเยว ปฏิภาตุ เอตสฺส ภาสิตสฺส อตฺโถ. ภควโต สุตฺวา ภิกฺขู ธาเรสฺสนฺตี’’ติ. ‘‘เตน หิ, ภิกฺขเว, สุณาถ, สาธุกํ มนสิ กโรถ; ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – ‘‘อตฺถิ, ภิกฺขเว, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม ภิกฺขุ อญฺญตฺเรว สทฺธาย, อญฺญตฺร รุจิยา, อญฺญตฺร อนุสฺสวา, อญฺญตฺร อาการปริวิตกฺกา, อญฺญตฺร ทิฏฺฐินิชฺฌานกฺขนฺติยา อญฺญํ พฺยากเรยฺย – ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานามี’’ติ. १५३. “भिक्षुओं, क्या कोई ऐसा उपाय (पर्याय) है, जिसे अपनाकर भिक्षु श्रद्धा के बिना, रुचि के बिना, अनुश्रव (परंपरा) के बिना, आकार-परिवितर्क (तर्क-वितर्क) के बिना, और दृष्टि-निज्झान-खान्ति (विचारों के प्रति स्वीकृति) के बिना ही अपनी अर्हत्व-अवस्था की घोषणा कर सके— ‘जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है’—ऐसा मैं जानता हूँ?” “भन्ते, हमारे धर्म भगवान-मूलक हैं, भगवान-नेत्रिक (मार्गदर्शक) हैं, भगवान-प्रतिशरण (शरण) हैं। भन्ते, अच्छा होगा यदि भगवान ही इस कथन का अर्थ स्पष्ट करें। भगवान से सुनकर भिक्षु इसे धारण करेंगे।” “तो भिक्षुओं, सुनो, अच्छी तरह मनन करो; मैं कहूँगा।” “जी भन्ते,” उन भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने यह कहा— “भिक्षुओं, ऐसा उपाय है, जिसे अपनाकर भिक्षु श्रद्धा के बिना, रुचि के बिना, अनुश्रव के बिना, आकार-परिवितर्क के बिना, और दृष्टि-निज्झान-खान्ति के बिना ही अपनी अर्हत्व-अवस्था की घोषणा कर सकता है— ‘जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है’—ऐसा मैं जानता हूँ।” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, ปริยาโย, ยํ ปริยายํ อาคมฺม ภิกฺขุ อญฺญตฺเรว สทฺธาย…เป… อญฺญตฺร ทิฏฺฐินิชฺฌานกฺขนฺติยา อญฺญํ พฺยากโรติ – ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานามี’ติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ; อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ. ยํ ตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ; อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ. อปิ นุเม, ภิกฺขเว, ธมฺมา สทฺธาย วา เวทิตพฺพา, รุจิยา วา เวทิตพฺพา, อนุสฺสเวน วา เวทิตพฺพา, อาการปริวิตกฺเกน วา เวทิตพฺพา, ทิฏฺฐินิชฺฌานกฺขนฺติยา วา เวทิตพฺพา’’ติ? ‘‘โน เหตํ[Pg.352], ภนฺเต’’. ‘‘นนุเม, ภิกฺขเว, ธมฺมา ปญฺญาย ทิสฺวา เวทิตพฺพา’’ติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. ‘‘อยํ โข, ภิกฺขเว, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม ภิกฺขุ อญฺญตฺเรว สทฺธาย, อญฺญตฺร รุจิยา, อญฺญตฺร อนุสฺสวา, อญฺญตฺร อาการปริวิตกฺกา, อญฺญตฺร ทิฏฺฐินิชฺฌานกฺขนฺติยา อญฺญํ พฺยากโรติ – ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานามี’’ติ…เป…. “और भिक्षुओं, वह कौन सा उपाय है, जिसे अपनाकर भिक्षु श्रद्धा के बिना... (पेय्याल)... दृष्टि-निज्झान-खान्ति के बिना ही अपनी अर्हत्व-अवस्था की घोषणा करता है— ‘जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है’—ऐसा मैं जानता हूँ? भिक्षुओं, यहाँ भिक्षु चक्षु से रूप को देखकर, यदि भीतर राग, द्वेष या मोह विद्यमान हो, तो जानता है— ‘मेरे भीतर राग, द्वेष या मोह है’; अथवा यदि भीतर राग, द्वेष या मोह विद्यमान न हो, तो जानता है— ‘मेरे भीतर राग, द्वेष या मोह नहीं है’। भिक्षुओं, जो भिक्षु चक्षु से रूप को देखकर, भीतर विद्यमान राग, द्वेष या मोह को जानता है कि ‘मेरे भीतर राग, द्वेष या मोह है’, और अविद्यमान को जानता है कि ‘मेरे भीतर राग, द्वेष या मोह नहीं है’। तो भिक्षुओं, क्या ये धर्म श्रद्धा से जानने योग्य हैं, या रुचि से, या अनुश्रव से, या आकार-परिवितर्क से, या दृष्टि-निज्झान-खान्ति से जानने योग्य हैं?” “नहीं भन्ते।” “भिक्षुओं, क्या ये धर्म प्रज्ञा से देखकर जानने योग्य नहीं हैं?” “हाँ भन्ते।” “भिक्षुओं, यही वह उपाय है, जिसे अपनाकर भिक्षु श्रद्धा के बिना, रुचि के बिना, अनुश्रव के बिना, आकार-परिवितर्क के बिना, और दृष्टि-निज्झान-खान्ति के बिना ही अपनी अर्हत्व-अवस्था की घोषणा करता है— ‘जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है’—ऐसा मैं जानता हूँ।”}]` ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ…เป… ราคโทสโมโหติ ปชานาติ; อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ. ยํ ตํ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ; อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ; อปิ นุเม, ภิกฺขเว, ธมฺมา สทฺธาย วา เวทิตพฺพา, รุจิยา วา เวทิตพฺพา, อนุสฺสเวน วา เวทิตพฺพา, อาการปริวิตกฺเกน วา เวทิตพฺพา, ทิฏฺฐินิชฺฌานกฺขนฺติยา วา เวทิตพฺพา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘นนุเม, ภิกฺขเว, ธมฺมา ปญฺญาย ทิสฺวา เวทิตพฺพา’’ติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. ‘‘อยมฺปิ โข, ภิกฺขเว, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม ภิกฺขุ อญฺญตฺเรว สทฺธาย, อญฺญตฺร รุจิยา, อญฺญตฺร อนุสฺสวา, อญฺญตฺร อาการปริวิตกฺกา, อญฺญตฺร ทิฏฺฐินิชฺฌานกฺขนฺติยา อญฺญํ พฺยากโรติ – ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานามี’’ติ …เป…. पुनः, भिक्षुओं, एक भिक्षु जिह्वा से रस का आस्वादन कर, यदि भीतर राग, द्वेष या मोह विद्यमान हो, तो वह जानता है कि 'मेरे भीतर राग, द्वेष या मोह है'; अथवा यदि भीतर राग, द्वेष या मोह विद्यमान न हो, तो वह जानता है कि 'मेरे भीतर राग, द्वेष या मोह नहीं है'। ... भिक्षुओं, क्या इन धर्मों को श्रद्धा से, रुचि से, अनुश्रुति से, तर्क-वितर्क से, या दृष्टि-निध्यान-क्षान्ति (विचारों की स्वीकृति) से जानना चाहिए? 'नहीं, भन्ते।' भिक्षुओं, क्या इन धर्मों को प्रज्ञा से देखकर जानना चाहिए? 'हाँ, भन्ते।' भिक्षुओं, यही वह विधि है जिसके आधार पर भिक्षु श्रद्धा के बिना, रुचि के बिना, अनुश्रुति के बिना, तर्क-वितर्क के बिना, दृष्टि-निध्यान-क्षान्ति के बिना अर्हत्व की घोषणा करता है— 'जाति क्षीण हो गई है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है'। ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ; อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ. ยํ ตํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ; อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมหํ, นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ราคโทสโมโหติ ปชานาติ; อปิ นุเม, ภิกฺขเว, ธมฺมา สทฺธาย วา เวทิตพฺพา, รุจิยา วา เวทิตพฺพา, อนุสฺสเวน วา เวทิตพฺพา, อาการปริวิตกฺเกน วา เวทิตพฺพา, ทิฏฺฐินิชฺฌานกฺขนฺติยา วา เวทิตพฺพา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘นนุเม, ภิกฺขเว, ธมฺมา ปญฺญาย ทิสฺวา เวทิตพฺพา’’ติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. ‘‘อยมฺปิ โข, ภิกฺขเว, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม ภิกฺขุ [Pg.353] อญฺญตฺเรว สทฺธาย, อญฺญตฺร รุจิยา, อญฺญตฺร อนุสฺสวา, อญฺญตฺร อาการปริวิตกฺกา, อญฺญตฺร ทิฏฺฐินิชฺฌานกฺขนฺติยา อญฺญํ พฺยากโรติ – ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานามี’’ติ. อฏฺฐมํ. पुनः, भिक्षुओं, एक भिक्षु मन से धर्म (मानसिक विषयों) को जानकर, यदि भीतर राग, द्वेष या मोह विद्यमान हो, तो वह जानता है कि 'मेरे भीतर राग, द्वेष या मोह है'; अथवा यदि भीतर राग, द्वेष या मोह विद्यमान न हो, तो वह जानता है कि 'मेरे भीतर राग, द्वेष या मोह नहीं है'। ... भिक्षुओं, क्या इन धर्मों को श्रद्धा से, रुचि से, अनुश्रुति से, तर्क-वितर्क से, या दृष्टि-निध्यान-क्षान्ति से जानना चाहिए? 'नहीं, भन्ते।' भिक्षुओं, क्या इन धर्मों को प्रज्ञा से देखकर जानना चाहिए? 'हाँ, भन्ते।' भिक्षुओं, यही वह विधि है जिसके आधार पर भिक्षु श्रद्धा के बिना, रुचि के बिना, अनुश्रुति के बिना, तर्क-वितर्क के बिना, दृष्टि-निध्यान-क्षान्ति के बिना अर्हत्व की घोषणा करता है— 'जाति क्षीण हो गई है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है'। ๙. อินฺทฺริยสมฺปนฺนสุตฺตํ ९. इन्द्रियसम्पन्न सुत्त ๑๕๔. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘‘อินฺทฺริยสมฺปนฺโน, อินฺทฺริยสมฺปนฺโน’ติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, อินฺทฺริยสมฺปนฺโน โหตี’’ติ? १५४. तब एक भिक्षु जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचा... एक ओर बैठे हुए उस भिक्षु ने भगवान से यह कहा— 'भन्ते, ऐसा कहा जाता है कि 'इन्द्रियसम्पन्न, इन्द्रियसम्पन्न'। भन्ते, किस सीमा तक कोई इन्द्रियसम्पन्न होता है?' ‘‘จกฺขุนฺทฺริเย เจ, ภิกฺขุ, อุทยพฺพยานุปสฺสี วิหรนฺโต จกฺขุนฺทฺริเย นิพฺพินฺทติ…เป… ชิวฺหินฺทฺริเย เจ, ภิกฺขุ, อุทยพฺพยานุปสฺสี วิหรนฺโต ชิวฺหินฺทฺริเย นิพฺพินฺทติ…เป… มนินฺทฺริเย เจ, ภิกฺขุ, อุทยพฺพยานุปสฺสี วิหรนฺโต มนินฺทฺริเย นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ…เป… วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาติ. เอตฺตาวตา โข, ภิกฺขุ, อินฺทฺริยสมฺปนฺโน โหตี’’ติ. นวมํ. भिक्षु, यदि कोई चक्षु-इन्द्रिय में उदय और व्यय (उत्पत्ति और विनाश) का अनुपश्यी होकर विहार करता है, तो वह चक्षु-इन्द्रिय से निर्वेद (वैराग्य) प्राप्त करता है... यदि वह जिह्वा-इन्द्रिय में... यदि वह मन-इन्द्रिय में उदय और व्यय का अनुपश्यी होकर विहार करता है, तो वह मन-इन्द्रिय से निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद से वह विरक्त होता है... विमुक्त होने पर 'विमुक्त हूँ' ऐसा ज्ञान होता है। वह जानता है— 'जाति क्षीण हो गई है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है'। भिक्षु, इतनी सीमा तक कोई इन्द्रियसम्पन्न होता है। ๑๐. ธมฺมกถิกปุจฺฉสุตฺตํ १०. धम्मकथिक-पुच्छा सुत्त ๑๕๕. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘‘ธมฺมกถิโก, ธมฺมกถิโก’ติ, ภนฺเต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, ธมฺมกถิโก โหตี’’ติ? १५५. तब एक भिक्षु जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचा... एक ओर बैठे हुए उस भिक्षु ने भगवान से यह कहा— 'भन्ते, ऐसा कहा जाता है कि 'धर्मकथक, धर्मकथक'। भन्ते, किस सीमा तक कोई धर्मकथक होता है?' ‘‘จกฺขุสฺส เจ, ภิกฺขุ นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ธมฺมํ เทเสติ, ‘ธมฺมกถิโก ภิกฺขู’ติ อลํวจนาย. จกฺขุสฺส เจ, ภิกฺขุ, นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหติ, ‘ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺโน ภิกฺขู’ติ อลํวจนาย. จกฺขุสฺส เจ, ภิกฺขุ, นิพฺพิทา วิราคา นิโรธา อนุปาทาวิมุตฺโต โหติ, ‘ทิฏฺฐธมฺมนิพฺพานปฺปตฺโต ภิกฺขู’ติ อลํวจนาย…เป… ชิวฺหาย เจ, ภิกฺขุ, นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ธมฺมํ เทเสติ, ‘ธมฺมกถิโก ภิกฺขู’ติ อลํวจนาย…เป… มนสฺส เจ, ภิกฺขุ, นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ธมฺมํ เทเสติ, ‘ธมฺมกถิโก ภิกฺขู’ติ อลํวจนาย. มนสฺส เจ, ภิกฺขุ, นิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย ปฏิปนฺโน โหติ, ‘ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺโน ภิกฺขู’ติ อลํวจนาย. มนสฺส [Pg.354] เจ, ภิกฺขุ, นิพฺพิทา วิราคา นิโรธา อนุปาทาวิมุตฺโต โหติ, ‘ทิฏฺฐธมฺมนิพฺพานปฺปตฺโต ภิกฺขู’ติ อลํวจนายา’’ติ. ทสมํ. भिक्षु, यदि कोई चक्षु के निर्वेद के लिए, विराग के लिए, निरोध के लिए धर्म का उपदेश देता है, तो उसे 'धर्मकथक भिक्षु' कहना उचित है। भिक्षु, यदि कोई चक्षु के निर्वेद के लिए, विराग के लिए, निरोध के लिए प्रतिपन्न (अभ्यासरत) है, तो उसे 'धर्मानुधर्म-प्रतिपन्न भिक्षु' कहना उचित है। भिक्षु, यदि कोई चक्षु के निर्वेद, विराग और निरोध के कारण अनुपादान (बिना आसक्ति के) विमुक्त है, तो उसे 'दृष्टधर्म-निर्वाण-प्राप्त भिक्षु' कहना उचित है। ... यदि कोई जिह्वा के लिए... यदि कोई मन के निर्वेद के लिए, विराग के लिए, निरोध के लिए धर्म का उपदेश देता है, तो उसे 'धर्मकथक भिक्षु' कहना उचित है। यदि कोई मन के निर्वेद के लिए, विराग के लिए, निरोध के लिए प्रतिपन्न है, तो उसे 'धर्मानुधर्म-प्रतिपन्न भिक्षु' कहना उचित है। यदि कोई मन के निर्वेद, विराग और निरोध के कारण अनुपादान विमुक्त है, तो उसे 'दृष्टधर्म-निर्वाण-प्राप्त भिक्षु' कहना उचित है। นวปุราณวคฺโค ปญฺจทสโม. पन्द्रहवाँ नवपुराण वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान)— กมฺมํ จตฺตาริ สปฺปายา, อนนฺเตวาสิ กิมตฺถิยา; อตฺถิ นุ โข ปริยาโย, อินฺทฺริยกถิเกน จาติ. कर्म, चार सप्पाय, अनन्तेवासी, किमत्थिय, अत्थि नु खो परियाय, इन्द्रिय और कथक (धर्मकथक)। สฬายตนวคฺเค ตติยปณฺณาสโก สมตฺโต. सळायतन वर्ग में तृतीय पन्नासक समाप्त। ตสฺส วคฺคุทฺทานํ – उसका वर्ग-सारांश (वग्ग-उद्दान)— โยคกฺเขมิ จ โลโก จ, คหปติ เทวทเหน จ; นวปุราเณน ปณฺณาโส, ตติโย เตน วุจฺจตีติ. योगक्खेमी, लोक, गृहपति, देवदह और नवपुराण—इनसे तृतीय पन्नासक कहा जाता है। ๑๖. นนฺทิกฺขยวคฺโค १६. नन्दिक्खय वर्ग ๑. อชฺฌตฺตนนฺทิกฺขยสุตฺตํ १. अध्यात्म-नन्दिक्खय सुत्त ๑๕๖. ‘‘อนิจฺจํเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุํ อนิจฺจนฺติ ปสฺสติ, สาสฺส โหติ สมฺมาทิฏฺฐิ. สมฺมา ปสฺสํ นิพฺพินฺทติ. นนฺทิกฺขยา ราคกฺขโย; ราคกฺขยา นนฺทิกฺขโย. นนฺทิราคกฺขยา จิตฺตํ สุวิมุตฺตนฺติ วุจฺจติ…เป… อนิจฺจํเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ชิวฺหํ อนิจฺจนฺติ ปสฺสติ, สาสฺส โหติ สมฺมาทิฏฺฐิ. สมฺมา ปสฺสํ นิพฺพินฺทติ. นนฺทิกฺขยา ราคกฺขโย; ราคกฺขยา…เป… จิตฺตํ สุวิมุตฺตนฺติ วุจฺจติ…เป… อนิจฺจํเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ มนํ อนิจฺจนฺติ ปสฺสติ, สาสฺส โหติ สมฺมาทิฏฺฐิ. สมฺมา ปสฺสํ นิพฺพินฺทติ. นนฺทิกฺขยา ราคกฺขโย; ราคกฺขยา นนฺทิกฺขโย. นนฺทิราคกฺขยา จิตฺตํ สุวิมุตฺตนฺติ วุจฺจตี’’ติ. ปฐมํ. १५६. "भिक्षुओं, भिक्षु अनित्य ही चक्षु को 'अनित्य' के रूप में देखता है, यह उसकी सम्यक् दृष्टि होती है। सम्यक् रूप से देखते हुए वह निर्वेद प्राप्त करता है। नन्दि (आसक्ति) के क्षय से राग का क्षय होता है; राग के क्षय से नन्दि का क्षय होता है। नन्दि और राग के क्षय से चित्त 'सुविमुक्त' कहा जाता है... इसी प्रकार भिक्षु अनित्य ही जिह्वा को 'अनित्य' के रूप में देखता है... चित्त 'सुविमुक्त' कहा जाता है... भिक्षुओं, भिक्षु अनित्य ही मन को 'अनित्य' के रूप में देखता है, यह उसकी सम्यक् दृष्टि होती है। सम्यक् रूप से देखते हुए वह निर्वेद प्राप्त करता है। नन्दि के क्षय से राग का क्षय होता है; राग के क्षय से नन्दि का क्षय होता है। नन्दि और राग के क्षय से चित्त 'सुविमुक्त' कहा जाता है।" प्रथम सूत्र। ๒. พาหิรนนฺทิกฺขยสุตฺตํ २. २. बाह्य-नन्दि-क्षय सूत्र ๑๕๗. ‘‘อนิจฺเจเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ รูเป อนิจฺจาติ ปสฺสติ, สาสฺส โหติ สมฺมาทิฏฺฐิ. สมฺมา ปสฺสํ นิพฺพินฺทติ. นนฺทิกฺขยา ราคกฺขโย; ราคกฺขยา นนฺทิกฺขโย[Pg.355]. นนฺทิราคกฺขยา จิตฺตํ สุวิมุตฺตนฺติ วุจฺจติ. อนิจฺเจเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สทฺเท… คนฺเธ… รเส… โผฏฺฐพฺเพ… ธมฺเม อนิจฺจาติ ปสฺสติ, สาสฺส โหติ สมฺมาทิฏฺฐิ. สมฺมา ปสฺสํ นิพฺพินฺทติ. นนฺทิกฺขยา ราคกฺขโย; ราคกฺขยา นนฺทิกฺขโย. นนฺทิราคกฺขยา จิตฺตํ สุวิมุตฺตนฺติ วุจฺจตี’’ติ. ทุติยํ. १५७. "भिक्षुओं, भिक्षु अनित्य ही रूपों को 'अनित्य' के रूप में देखता है, यह उसकी सम्यक् दृष्टि होती है। सम्यक् रूप से देखते हुए वह निर्वेद प्राप्त करता है। नन्दि के क्षय से राग का क्षय होता है; राग के क्षय से नन्दि का क्षय होता है। नन्दि और राग के क्षय से चित्त 'सुविमुक्त' कहा जाता है। भिक्षुओं, भिक्षु अनित्य ही शब्दों... गंधों... रसों... स्पर्शों... धर्मों को 'अनित्य' के रूप में देखता है, यह उसकी सम्यक् दृष्टि होती है। सम्यक् रूप से देखते हुए वह निर्वेद प्राप्त करता है। नन्दि के क्षय से राग का क्षय होता है; राग के क्षय से नन्दि का क्षय होता है। नन्दि और राग के क्षय से चित्त 'सुविमुक्त' कहा जाता है।" द्वितीय सूत्र। ๓. อชฺฌตฺตอนิจฺจนนฺทิกฺขยสุตฺตํ ३. ३. अध्यात्म-अनित्य-नन्दि-क्षय सूत्र ๑๕๘. ‘‘จกฺขุํ, ภิกฺขเว, โยนิโส มนสิ กโรถ; จกฺขานิจฺจตญฺจ ยถาภูตํ สมนุปสฺสถ. จกฺขุํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ โยนิโส มนสิกโรนฺโต, จกฺขานิจฺจตญฺจ ยถาภูตํ สมนุปสฺสนฺโต จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นนฺทิกฺขยา ราคกฺขโย; ราคกฺขยา นนฺทิกฺขโย. นนฺทิราคกฺขยา จิตฺตํ สุวิมุตฺตนฺติ วุจฺจติ. โสตํ, ภิกฺขเว, โยนิโส มนสิ กโรถ… ฆานํ… ชิวฺหํ, ภิกฺขเว, โยนิโส มนสิ กโรถ; ชิวฺหานิจฺจตญฺจ ยถาภูตํ สมนุปสฺสถ. ชิวฺหํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ โยนิโส มนสิกโรนฺโต, ชิวฺหานิจฺจตญฺจ ยถาภูตํ สมนุปสฺสนฺโต ชิวฺหายปิ นิพฺพินฺทติ. นนฺทิกฺขยา ราคกฺขโย; ราคกฺขยา นนฺทิกฺขโย. นนฺทิราคกฺขยา จิตฺตํ สุวิมุตฺตนฺติ วุจฺจติ. กายํ… มนํ, ภิกฺขเว, โยนิโส มนสิ กโรถ; มนานิจฺจตญฺจ ยถาภูตํ สมนุปสฺสถ. มนํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ โยนิโส มนสิกโรนฺโต, มนานิจฺจตญฺจ ยถาภูตํ สมนุปสฺสนฺโต มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นนฺทิกฺขยา ราคกฺขโย; ราคกฺขยา นนฺทิกฺขโย. นนฺทิราคกฺขยา จิตฺตํ สุวิมุตฺตนฺติ วุจฺจตี’’ติ. ตติยํ. १५८. "भिक्षुओं, चक्षु को योनिशो मनसिकार करो और चक्षु की अनित्यता को यथाभूत देखो। भिक्षुओं, चक्षु को योनिशो मनसिकार करते हुए और चक्षु की अनित्यता को यथाभूत देखते हुए भिक्षु चक्षु से भी निर्वेद प्राप्त करता है। नन्दि के क्षय से राग का क्षय होता है; राग के क्षय से नन्दि का क्षय होता है। नन्दि और राग के क्षय से चित्त 'सुविमुक्त' कहा जाता है। भिक्षुओं, श्रोत्र को... घ्राण को... जिह्वा को योनिशो मनसिकार करो और जिह्वा की अनित्यता को यथाभूत देखो। भिक्षुओं, जिह्वा को योनिशो मनसिकार करते हुए और जिह्वा की अनित्यता को यथाभूत देखते हुए भिक्षु जिह्वा से भी निर्वेद प्राप्त करता है। नन्दि के क्षय से राग का क्षय होता है; राग के क्षय से नन्दि का क्षय होता है। नन्दि और राग के क्षय से चित्त 'सुविमुक्त' कहा जाता है। काय को... भिक्षुओं, मन को योनिशो मनसिकार करो और मन की अनित्यता को यथाभूत देखो। भिक्षुओं, मन को योनिशो मनसिकार करते हुए और मन की अनित्यता को यथाभूत देखते हुए भिक्षु मन से भी निर्वेद प्राप्त करता है। नन्दि के क्षय से राग का क्षय होता है; राग के क्षय से नन्दि का क्षय होता है। नन्दि और राग के क्षय से चित्त 'सुविमुक्त' कहा जाता है।" तृतीय सूत्र। ๔. พาหิรอนิจฺจนนฺทิกฺขยสุตฺตํ ४. ४. बाह्य-अनित्य-नन्दि-क्षय सूत्र ๑๕๙. ‘‘รูเป, ภิกฺขเว, โยนิโส มนสิ กโรถ; รูปานิจฺจตญฺจ ยถาภูตํ สมนุปสฺสถ. รูเป, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ โยนิโส มนสิกโรนฺโต, รูปานิจฺจตญฺจ ยถาภูตํ สมนุปสฺสนฺโต รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ. นนฺทิกฺขยา ราคกฺขโย; ราคกฺขยา นนฺทิกฺขโย. นนฺทิราคกฺขยา จิตฺตํ สุวิมุตฺตนฺติ วุจฺจติ. สทฺเท… คนฺเธ… รเส… โผฏฺฐพฺเพ… ธมฺเม, ภิกฺขเว, โยนิโส มนสิ กโรถ; ธมฺมานิจฺจตญฺจ ยถาภูตํ สมนุปสฺสถ. ธมฺเม, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ โยนิโส มนสิกโรนฺโต, ธมฺมานิจฺจตญฺจ ยถาภูตํ สมนุปสฺสนฺโต ธมฺเมสุปิ นิพฺพินฺทติ. นนฺทิกฺขยา ราคกฺขโย; ราคกฺขยา นนฺทิกฺขโย. นนฺทิราคกฺขยา จิตฺตํ สุวิมุตฺตนฺติ วุจฺจตี’’ติ. จตุตฺถํ. १५९. "भिक्षुओं, रूपों को योनिशो मनसिकार करो और रूपों की अनित्यता को यथाभूत देखो। भिक्षुओं, रूपों को योनिशो मनसिकार करते हुए और रूपों की अनित्यता को यथाभूत देखते हुए भिक्षु रूपों से भी निर्वेद प्राप्त करता है। नन्दि के क्षय से राग का क्षय होता है; राग के क्षय से नन्दि का क्षय होता है। नन्दि और राग के क्षय से चित्त 'सुविमुक्त' कहा जाता है। भिक्षुओं, शब्दों... गंधों... रसों... स्पर्शों... धर्मों को योनिशो मनसिकार करो और धर्मों की अनित्यता को यथाभूत देखो। भिक्षुओं, धर्मों को योनिशो मनसिकार करते हुए और धर्मों की अनित्यता को यथाभूत देखते हुए भिक्षु धर्मों से भी निर्वेद प्राप्त करता है। नन्दि के क्षय से राग का क्षय होता है; राग के क्षय से नन्दि का क्षय होता है। नन्दि और राग के क्षय से चित्त 'सुविमुक्त' कहा जाता है।" चतुर्थ सूत्र। ๕. ชีวกมฺพวนสมาธิสุตฺตํ ५. ५. जीवक-अम्बवन-समाधि सूत्र ๑๖๐. เอกํ [Pg.356] สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ ชีวกมฺพวเน. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ภิกฺขโว’’ติ…เป… ‘‘สมาธึ, ภิกฺขเว, ภาเวถ. สมาหิตสฺส, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ยถาภูตํ โอกฺขายติ. กิญฺจ ยถาภูตํ โอกฺขายติ? จกฺขุํ อนิจฺจนฺติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ, รูปา อนิจฺจาติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ, จกฺขุวิญฺญาณํ อนิจฺจนฺติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ, จกฺขุสมฺผสฺโส อนิจฺโจติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจนฺติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจาติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ…เป… มโน อนิจฺโจติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ, ธมฺมา อนิจฺจาติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจนฺติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ. สมาธึ, ภิกฺขเว, ภาเวถ. สมาหิตสฺส, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ยถาภูตํ โอกฺขายตี’’ติ. ปญฺจมํ. १६०. एक समय भगवान राजगृह के जीवक-अम्बवन में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— "भिक्षुओं!"... "भिक्षुओं, समाधि की भावना करो। भिक्षुओं, समाहित भिक्षु को यथाभूत स्पष्ट दिखाई देता है। और क्या यथाभूत स्पष्ट दिखाई देता है? चक्षु अनित्य है—यह यथाभूत स्पष्ट दिखाई देता है; रूप अनित्य हैं—यह यथाभूत स्पष्ट दिखाई देता है; चक्षु-विज्ञान अनित्य है—यह यथाभूत स्पष्ट दिखाई देता है; चक्षु-संपर्श अनित्य है—यह यथाभूत स्पष्ट दिखाई देता है; और चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी अनित्य है—यह यथाभूत स्पष्ट दिखाई देता है... जिह्वा अनित्य है—यह यथाभूत स्पष्ट दिखाई देता है... मन अनित्य है—यह यथाभूत स्पष्ट दिखाई देता है; धर्म अनित्य हैं—यह यथाभूत स्पष्ट दिखाई देता है... और मन-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी अनित्य है—यह यथाभूत स्पष्ट दिखाई देता है। भिक्षुओं, समाधि की भावना करो। भिक्षुओं, समाहित भिक्षु को यथाभूत स्पष्ट दिखाई देता है।" पंचम सूत्र। ๖. ชีวกมฺพวนปฏิสลฺลานสุตฺตํ ६. ६. जीवक-अम्बवन-प्रतिसंलयन सूत्र ๑๖๑. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ ชีวกมฺพวเน. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ…เป… ‘‘ปฏิสลฺลาเน, ภิกฺขเว, โยคมาปชฺชถ. ปฏิสลฺลีนสฺส, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ยถาภูตํ โอกฺขายติ. กิญฺจ ยถาภูตํ โอกฺขายติ? จกฺขุํ อนิจฺจนฺติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ, รูปา อนิจฺจาติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ, จกฺขุวิญฺญาณํ อนิจฺจนฺติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ, จกฺขุสมฺผสฺโส อนิจฺโจติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจนฺติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ…เป… มโน อนิจฺโจติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ, ธมฺมา… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจนฺติ ยถาภูตํ โอกฺขายติ. ปฏิสลฺลาเน ภิกฺขเว, โยคมาปชฺชถ. ปฏิสลฺลีนสฺส, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ยถาภูตํ โอกฺขายตี’’ติ. ฉฏฺฐํ. १६१. एक समय भगवान राजगृह में जीवक के आम्रवन में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया... "भिक्षुओं, एकांतवास में योग करो। भिक्षुओं, एकांतवासी भिक्षु को यथाभूत स्पष्ट होता है। और क्या यथाभूत स्पष्ट होता है? 'चक्षु अनित्य है' - यह यथाभूत स्पष्ट होता है, 'रूप अनित्य हैं' - यह यथाभूत स्पष्ट होता है, 'चक्षु-विज्ञान अनित्य है' - यह यथाभूत स्पष्ट होता है, 'चक्षु-संपर्श अनित्य है' - यह यथाभूत स्पष्ट होता है, और चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदन उत्पन्न होता है, वह भी 'अनित्य है' - यह यथाभूत स्पष्ट होता है... मन अनित्य है... धर्म... मनो-विज्ञान... मनो-संपर्श... मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदन उत्पन्न होता है, वह भी 'अनित्य है' - यह यथाभूत स्पष्ट होता है। भिक्षुओं, एकांतवास में योग करो। भिक्षुओं, एकांतवासी भिक्षु को यथाभूत स्पष्ट होता है।" छठा सूत्र। ๗. โกฏฺฐิกอนิจฺจสุตฺตํ ७. कोष्ठिक अनित्य सूत्र। ๑๖๒. อถ โข อายสฺมา มหาโกฏฺฐิโก เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา โกฏฺฐิโก ภควนฺตํ เอตทโวจ [Pg.357] – ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน ธมฺมํ เทเสตุ, ยมหํ ภควโต ธมฺมํ สุตฺวา เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหเรยฺย’’นฺติ. १६२. तब आयुष्मान महाकोष्ठिक जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे... एक ओर बैठे हुए आयुष्मान कोष्ठिक ने भगवान से यह कहा - "भन्ते, अच्छा हो यदि भगवान मुझे संक्षेप में धर्म का उपदेश दें, जिसे सुनकर मैं अकेला, एकांत में, अप्रमत्त, आतापी और दृढ़निश्चयी होकर विहार कर सकूँ।" ‘‘ยํ โข, โกฏฺฐิก, อนิจฺจํ ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. กิญฺจ, โกฏฺฐิก, อนิจฺจํ? จกฺขุ โข, โกฏฺฐิก, อนิจฺจํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. รูปา อนิจฺจา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. จกฺขุวิญฺญาณํ อนิจฺจํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. จกฺขุสมฺผสฺโส อนิจฺโจ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. รสา อนิจฺจา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ชิวฺหาวิญฺญาณํ อนิจฺจํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ชิวฺหาสมฺผสฺโส อนิจฺโจ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ…เป… มโน อนิจฺโจ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ธมฺมา อนิจฺจา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. มโนวิญฺญาณํ อนิจฺจํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. มโนสมฺผสฺโส อนิจฺโจ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยํ โข, โกฏฺฐิก, อนิจฺจํ ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ’’ติ. สตฺตมํ. "कोष्ठिक, जो अनित्य है, उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। और कोष्ठिक, अनित्य क्या है? कोष्ठिक, चक्षु अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। रूप अनित्य हैं; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। चक्षु-विज्ञान अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। चक्षु-संपर्श अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। और चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदन उत्पन्न होता है, वह भी अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए... जिह्वा अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। रस अनित्य हैं; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। जिह्वा-विज्ञान अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। जिह्वा-संपर्श अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। और जिह्वा-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदन उत्पन्न होता है, वह भी अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए... मन अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। धर्म अनित्य हैं; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। मनो-विज्ञान अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। मनो-संपर्श अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। और मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदन उत्पन्न होता है, वह भी अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। कोष्ठिक, जो अनित्य है, उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए।" सातवाँ सूत्र। ๘. โกฏฺฐิกทุกฺขสุตฺตํ ८. कोष्ठिक दुःख सूत्र। ๑๖๓. อถ โข อายสฺมา มหาโกฏฺฐิโก…เป… ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต…เป… วิหเรยฺย’’นฺติ. ‘‘ยํ โข, โกฏฺฐิก, ทุกฺขํ ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. กิญฺจ, โกฏฺฐิก, ทุกฺขํ? จกฺขุ โข, โกฏฺฐิก, ทุกฺขํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. รูปา ทุกฺขา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. จกฺขุวิญฺญาณํ ทุกฺขํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. จกฺขุสมฺผสฺโส ทุกฺโข; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ทุกฺขํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ…เป… ชิวฺหา ทุกฺขา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ…เป… มโน ทุกฺโข; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ธมฺมา ทุกฺขา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. มโนวิญฺญาณํ ทุกฺขํ[Pg.358]; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. มโนสมฺผสฺโส ทุกฺโข; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ทุกฺขํ; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยํ โข, โกฏฺฐิก, ทุกฺขํ ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ’’ติ. อฏฺฐมํ. १६३. तब आयुष्मान महाकोष्ठिक... भगवान से यह कहा - "भन्ते, अच्छा हो... विहार कर सकूँ।" "कोष्ठिक, जो दुःख है, उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। और कोष्ठिक, दुःख क्या है? कोष्ठिक, चक्षु दुःख है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। रूप दुःख हैं; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। चक्षु-विज्ञान दुःख है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। चक्षु-संपर्श दुःख है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। और चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदन उत्पन्न होता है, वह भी दुःख है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए... जिह्वा दुःख है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए... मन दुःख है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। धर्म दुःख हैं; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। मनो-विज्ञान दुःख है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। मनो-संपर्श दुःख है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। और मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदन उत्पन्न होता है, वह भी दुःख है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। कोष्ठिक, जो दुःख है, उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए।" आठवाँ सूत्र। ๙. โกฏฺฐิกอนตฺตสุตฺตํ ९. कोष्ठिक अनात्म सूत्र। ๑๖๔. เอกมนฺตํ…เป… วิหเรยฺยนฺติ. ‘‘โย โข, โกฏฺฐิก, อนตฺตา ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. โก จ, โกฏฺฐิก, อนตฺตา? จกฺขุ โข, โกฏฺฐิก, อนตฺตา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. รูปา อนตฺตา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. จกฺขุวิญฺญาณํ อนตฺตา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. จกฺขุสมฺผสฺโส อนตฺตา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนตฺตา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ …เป… ชิวฺหา อนตฺตา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ…เป… มโน อนตฺตา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ธมฺมา อนตฺตา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺโส… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนตฺตา; ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. โย โข, โกฏฺฐิก, อนตฺตา, ตตฺร เต ฉนฺโท ปหาตพฺโพ’’ติ. นวมํ. १६४. एक ओर... (बैठकर)... 'मैं विहार करना चाहता हूँ' ऐसा कहा। 'हे कोष्ठिक! जो अनात्म है, उसके प्रति तुम्हें छंद (इच्छा) का त्याग करना चाहिए। और हे कोष्ठिक! अनात्म क्या है? हे कोष्ठिक! चक्षु अनात्म है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। रूप अनात्म हैं; उनके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। चक्षु-विज्ञान अनात्म है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। चक्षु-संपर्श अनात्म है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदन (अनुभव) उत्पन्न होता है, वह भी अनात्म है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए... जिह्वा अनात्म है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए... मन अनात्म है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। धर्म (मानसिक विषय) अनात्म हैं; उनके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। मनो-विज्ञान... मनो-संपर्श... मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदन उत्पन्न होता है, वह भी अनात्म है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। हे कोष्ठिक! जो अनात्म है, उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए'। नौवां सुत्त। ๑๐. มิจฺฉาทิฏฺฐิปหานสุตฺตํ १०. मिथ्यादृष्टि-प्रहाण सुत्त ๑๖๕. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กถํ นุ โข, ภนฺเต, ชานโต กถํ ปสฺสโต มิจฺฉาทิฏฺฐิ ปหียตี’’ติ? १६५. तब कोई भिक्षु जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा... एक ओर बैठे हुए उस भिक्षु ने भगवान से यह कहा— 'भन्ते! कैसे जानने वाले और कैसे देखने वाले की मिथ्यादृष्टि क्षीण होती है?' ‘‘จกฺขุํ โข, ภิกฺขุ, อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต มิจฺฉาทิฏฺฐิ ปหียติ. รูเป อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต มิจฺฉาทิฏฺฐิ ปหียติ. จกฺขุวิญฺญาณํ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต มิจฺฉาทิฏฺฐิ ปหียติ. จกฺขุสมฺผสฺสํ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต มิจฺฉาทิฏฺฐิ ปหียติ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจโต ชานโต ปสฺสโต มิจฺฉาทิฏฺฐิ ปหียติ. เอวํ โข, ภิกฺขุ, ชานโต เอวํ ปสฺสโต มิจฺฉาทิฏฺฐิ ปหียตี’’ติ. ทสมํ. 'भिक्षु! चक्षु को अनित्य के रूप में जानने और देखने वाले की मिथ्यादृष्टि क्षीण होती है। रूपों को अनित्य के रूप में जानने और देखने वाले की मिथ्यादृष्टि क्षीण होती है। चक्षु-विज्ञान को अनित्य के रूप में जानने और देखने वाले की मिथ्यादृष्टि क्षीण होती है। चक्षु-संपर्श को अनित्य के रूप में जानने और देखने वाले की मिथ्यादृष्टि क्षीण होती है... मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदन उत्पन्न होता है, उसे भी अनित्य के रूप में जानने और देखने वाले की मिथ्यादृष्टि क्षीण होती है। भिक्षु! इस प्रकार जानने और इस प्रकार देखने वाले की मिथ्यादृष्टि क्षीण होती है'। दसवां सुत्त। ๑๑. สกฺกายทิฏฺฐิปหานสุตฺตํ ११. सत्कायदृष्टि-प्रहाण सुत्त ๑๖๖. อถ [Pg.359] โข อญฺญตโร ภิกฺขุ…เป… เอตทโวจ – ‘‘กถํ นุ โข, ภนฺเต, ชานโต กถํ ปสฺสโต สกฺกายทิฏฺฐิ ปหียตี’’ติ? ‘‘จกฺขุํ โข, ภิกฺขุ, ทุกฺขโต ชานโต ปสฺสโต สกฺกายทิฏฺฐิ ปหียติ. รูเป ทุกฺขโต ชานโต ปสฺสโต สกฺกายทิฏฺฐิ ปหียติ. จกฺขุวิญฺญาณํ ทุกฺขโต ชานโต ปสฺสโต สกฺกายทิฏฺฐิ ปหียติ. จกฺขุสมฺผสฺสํ ทุกฺขโต ชานโต ปสฺสโต สกฺกายทิฏฺฐิ ปหียติ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ ทุกฺขโต ชานโต ปสฺสโต สกฺกายทิฏฺฐิ ปหียติ. เอวํ โข, ภิกฺขุ, ชานโต เอวํ ปสฺสโต สกฺกายทิฏฺฐิ ปหียตี’’ติ. เอกาทสมํ. १६६. तब कोई भिक्षु... यह बोला— 'भन्ते! कैसे जानने वाले और कैसे देखने वाले की सत्कायदृष्टि क्षीण होती है?' 'भिक्षु! चक्षु को दुःख के रूप में जानने और देखने वाले की सत्कायदृष्टि क्षीण होती है। रूपों को दुःख के रूप में जानने और देखने वाले की सत्कायदृष्टि क्षीण होती है। चक्षु-विज्ञान को दुःख के रूप में जानने और देखने वाले की सत्कायदृष्टि क्षीण होती है। चक्षु-संपर्श को दुःख के रूप में जानने और देखने वाले की सत्कायदृष्टि क्षीण होती है... मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदन उत्पन्न होता है, उसे भी दुःख के रूप में जानने और देखने वाले की सत्कायदृष्टि क्षीण होती है। भिक्षु! इस प्रकार जानने और इस प्रकार देखने वाले की सत्कायदृष्टि क्षीण होती है'। ग्यारहवां सुत्त। ๑๒. อตฺตานุทิฏฺฐิปหานสุตฺตํ १२. आत्मानुदृष्टि-प्रहाण सुत्त ๑๖๗. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ…เป… เอตทโวจ – ‘‘กถํ นุ โข, ภนฺเต, ชานโต กถํ ปสฺสโต อตฺตานุทิฏฺฐิ ปหียตี’’ติ? ‘‘จกฺขุํ โข, ภิกฺขุ, อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต อตฺตานุทิฏฺฐิ ปหียติ. รูเป อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต อตฺตานุทิฏฺฐิ ปหียติ. จกฺขุวิญฺญาณํ อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต อตฺตานุทิฏฺฐิ ปหียติ. จกฺขุสมฺผสฺสํ อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต อตฺตานุทิฏฺฐิ ปหียติ. ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต อตฺตานุทิฏฺฐิ ปหียติ…เป… ชิวฺหํ อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต อตฺตานุทิฏฺฐิ ปหียติ…เป… มนํ อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต อตฺตานุทิฏฺฐิ ปหียติ. ธมฺเม… มโนวิญฺญาณํ… มโนสมฺผสฺสํ… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนตฺตโต ชานโต ปสฺสโต อตฺตานุทิฏฺฐิ ปหียตี’’ติ. ทฺวาทสมํ. १६७. तब कोई भिक्षु... यह बोला— 'भन्ते! कैसे जानने वाले और कैसे देखने वाले की आत्मानुदृष्टि क्षीण होती है?' 'भिक्षु! चक्षु को अनात्म के रूप में जानने और देखने वाले की आत्मानुदृष्टि क्षीण होती है। रूपों को अनात्म के रूप में जानने और देखने वाले की आत्मानुदृष्टि क्षीण होती है। चक्षु-विज्ञान को अनात्म के रूप में जानने और देखने वाले की आत्मानुदृष्टि क्षीण होती है। चक्षु-संपर्श को अनात्म के रूप में जानने और देखने वाले की आत्मानुदृष्टि क्षीण होती है। चक्षु-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदन उत्पन्न होता है, उसे भी अनात्म के रूप में जानने और देखने वाले की आत्मानुदृष्टि क्षीण होती है... जिह्वा को अनात्म के रूप में... मन को अनात्म के रूप में... धर्मों को... मनो-विज्ञान को... मनो-संपर्श को... मनो-संपर्श के प्रत्यय से जो सुखद, दुखद या न-दुखद-न-सुखद वेदन उत्पन्न होता है, उसे भी अनात्म के रूप में जानने और देखने वाले की आत्मानुदृष्टि क्षीण होती है'। बारहवां सुत्त। นนฺทิกฺขยวคฺโค โสฬสโม. सोलहवाँ नन्दिक्षय वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान) — นนฺทิกฺขเยน จตฺตาโร, ชีวกมฺพวเน ทุเว; โกฏฺฐิเกน ตโย วุตฺตา, มิจฺฉา สกฺกาย อตฺตโนติ. नन्दिक्षय के चार, जीवक-अम्रवन के दो; कोष्ठिक के तीन कहे गए हैं, (तथा) मिथ्या, सत्काय और आत्मा (के सुत्त)। ๑๗. สฏฺฐิเปยฺยาลวคฺโค १७. षष्टि-पेय्याल वर्ग ๑. อชฺฌตฺตอนิจฺจฉนฺทสุตฺตํ १. अध्यात्म-अनित्य-छंद सुत्त ๑๖๘. ‘‘ยํ[Pg.360], ภิกฺขเว, อนิจฺจํ, ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ…เป… มโน อนิจฺโจ; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ. ยํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ, ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ’’ติ. १६८. 'भिक्षुओं! जो अनित्य है, उसके प्रति तुम्हें छंद (इच्छा) का त्याग करना चाहिए। और भिक्षुओं! अनित्य क्या है? भिक्षुओं! चक्षु अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए... जिह्वा अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए... मन अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए। भिक्षुओं! जो अनित्य है, उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए'। ๒. อชฺฌตฺตอนิจฺจราคสุตฺตํ २. अध्यात्म-अनित्य-राग सुत्त ๑๖๙. ‘‘ยํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ, ตตฺร โว ราโค ปหาตพฺโพ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ; ตตฺร โว ราโค ปหาตพฺโพ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา; ตตฺร โว ราโค ปหาตพฺโพ…เป… มโน อนิจฺโจ; ตตฺร โว ราโค ปหาตพฺโพ. ยํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ, ตตฺร โว ราโค ปหาตพฺโพ’’ติ. १६९. 'भिक्षुओं! जो अनित्य है, उसके प्रति तुम्हें राग का त्याग करना चाहिए। और भिक्षुओं! अनित्य क्या है? भिक्षुओं! चक्षु अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें राग का त्याग करना चाहिए... जिह्वा अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें राग का त्याग करना चाहिए... मन अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें राग का त्याग करना चाहिए। भिक्षुओं! जो अनित्य है, उसके प्रति तुम्हें राग का त्याग करना चाहिए'। ๓. อชฺฌตฺตอนิจฺจฉนฺทราคสุตฺตํ ३. अध्यात्म-अनित्य-छंद-राग सुत्त ๑๗๐. ‘‘ยํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ, ตตฺร โว ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ; ตตฺร โว ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา; ตตฺร โว ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ…เป… มโน อนิจฺโจ; ตตฺร โว ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. ยํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ, ตตฺร โว ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ’’ติ. १७०. “हे भिक्षुओं! जो अनित्य है, उसके प्रति तुम्हें छंद-राग (इच्छा और आसक्ति) का त्याग करना चाहिए। और भिक्षुओं! अनित्य क्या है? भिक्षुओं! चक्षु अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें छंद-राग का त्याग करना चाहिए... जिह्वा अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें छंद-राग का त्याग करना चाहिए... मन अनित्य है; उसके प्रति तुम्हें छंद-राग का त्याग करना चाहिए। हे भिक्षुओं! जो अनित्य है, उसके प्रति तुम्हें छंद-राग का त्याग करना चाहिए।” ๔-๖. ทุกฺขฉนฺทาทิสุตฺตํ ४-६. दुःख-छंद-आदि सुत्त ๑๗๑-๑๗๓. ‘‘ยํ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ, ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ? จกฺขุ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ…เป… ชิวฺหา ทุกฺขา…เป… มโน ทุกฺโข; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. ยํ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ’’ติ. 171-173. “हे भिक्षुओं! जो दुःख है, उसके प्रति तुम्हें छंद (इच्छा) का त्याग करना चाहिए, राग (आसक्ति) का त्याग करना चाहिए, छंद-राग का त्याग करना चाहिए। और भिक्षुओं! दुःख क्या है? भिक्षुओं! चक्षु दुःख है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए, राग का त्याग करना चाहिए, छंद-राग का त्याग करना चाहिए... जिह्वा दुःख है... मन दुःख है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए, राग का त्याग करना चाहिए, छंद-राग का त्याग करना चाहिए। हे भिक्षुओं! जो दुःख है, उसके प्रति तुम्हें छंद, राग और छंद-राग का त्याग करना चाहिए।” ๗-๙. อนตฺตฉนฺทาทิสุตฺตํ ७-९. अनात्मा-छंद-आदि सुत्त ๑๗๔-๑๗๖. ‘‘โย[Pg.361], ภิกฺขเว, อนตฺตา, ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. โก จ, ภิกฺขเว, อนตฺตา? จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนตฺตา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ…เป… ชิวฺหา อนตฺตา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ…เป… มโน อนตฺตา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. โย, ภิกฺขเว, อนตฺตา ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ’’ติ. 174-176. “हे भिक्षुओं! जो अनात्मा है, उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए, राग का त्याग करना चाहिए, छंद-राग का त्याग करना चाहिए। और भिक्षुओं! अनात्मा क्या है? भिक्षुओं! चक्षु अनात्मा है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए, राग का त्याग करना चाहिए, छंद-राग का त्याग करना चाहिए... जिह्वा अनात्मा है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए, राग का त्याग करना चाहिए, छंद-राग का त्याग करना चाहिए... मन अनात्मा है; उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए, राग का त्याग करना चाहिए, छंद-राग का त्याग करना चाहिए। हे भिक्षुओं! जो अनात्मा है, उसके प्रति तुम्हें छंद, राग और छंद-राग का त्याग करना चाहिए।” ๑๐-๑๒. พาหิรานิจฺจฉนฺทาทิสุตฺตํ १०-१२. बाह्य-अनित्य-छंद-आदि सुत्त ๑๗๗-๑๗๙. ‘‘ยํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ, ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ? รูปา, ภิกฺขเว, อนิจฺจา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. สทฺทา อนิจฺจา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. คนฺธา อนิจฺจา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. รสา อนิจฺจา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. โผฏฺฐพฺพา อนิจฺจา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. ธมฺมา อนิจฺจา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. ยํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ’’ติ. 177-179. “हे भिक्षुओं! जो अनित्य है, उसके प्रति तुम्हें छंद का त्याग करना चाहिए, राग का त्याग करना चाहिए, छंद-राग का त्याग करना चाहिए। और भिक्षुओं! अनित्य क्या है? भिक्षुओं! रूप अनित्य हैं; उनके प्रति तुम्हें छंद, राग और छंद-राग का त्याग करना चाहिए। शब्द अनित्य हैं... गंध अनित्य हैं... रस अनित्य हैं... स्पर्श अनित्य हैं... धम्म अनित्य हैं; उनके प्रति तुम्हें छंद, राग और छंद-राग का त्याग करना चाहिए। हे भिक्षुओं! जो अनित्य है, उसके प्रति तुम्हें छंद, राग और छंद-राग का त्याग करना चाहिए।” ๑๓-๑๕. พาหิรทุกฺขฉนฺทาทิสุตฺตํ १३-१५. बाह्य-दुःख-छंद-आदि सुत्त ๑๘๐-๑๘๒. ‘‘ยํ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ, ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. กิญฺจ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ? รูปา, ภิกฺขเว, ทุกฺขา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา ทุกฺขา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. ยํ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ, ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ’’ติ. 180-182. “हे भिक्षुओं! जो दुःख है, उसके प्रति तुम्हें छंद, राग और छंद-राग का त्याग करना चाहिए। और भिक्षुओं! दुःख क्या है? भिक्षुओं! रूप दुःख हैं; उनके प्रति तुम्हें छंद, राग और छंद-राग का त्याग करना चाहिए। शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धम्म दुःख हैं; उनके प्रति तुम्हें छंद, राग और छंद-राग का त्याग करना चाहिए। हे भिक्षुओं! जो दुःख है, उसके प्रति तुम्हें छंद, राग और छंद-राग का त्याग करना चाहिए।” ๑๖-๑๘. พาหิรานตฺตฉนฺทาทิสุตฺตํ १६-१८. बाह्य-अनात्मा-छंद-आदि सुत्त ๑๘๓-๑๘๕. ‘‘โย[Pg.362], ภิกฺขเว, อนตฺตา, ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. โก จ, ภิกฺขเว, อนตฺตา? รูปา, ภิกฺขเว, อนตฺตา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนตฺตา; ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ. โย, ภิกฺขเว, อนตฺตา ตตฺร โว ฉนฺโท ปหาตพฺโพ, ราโค ปหาตพฺโพ, ฉนฺทราโค ปหาตพฺโพ’’ติ. 183-185. “हे भिक्षुओं! जो अनात्मा है, उसके प्रति तुम्हें छंद, राग और छंद-राग का त्याग करना चाहिए। और भिक्षुओं! अनात्मा क्या है? भिक्षुओं! रूप अनात्मा हैं; उनके प्रति तुम्हें छंद, राग और छंद-राग का त्याग करना चाहिए। शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धम्म अनात्मा हैं; उनके प्रति तुम्हें छंद, राग और छंद-राग का त्याग करना चाहिए। हे भिक्षुओं! जो अनात्मा है, उसके प्रति तुम्हें छंद, राग और छंद-राग का त्याग करना चाहिए।” ๑๙. อชฺฌตฺตาตีตานิจฺจสุตฺตํ १९. अध्यात्म-अतीत-अनित्य सुत्त ๑๘๖. ‘‘จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ อตีตํ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา อตีตา…เป… มโน อนิจฺโจ อตีโต. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ…เป… ชิวฺหายปิ นิพฺพินฺทติ…เป… มนสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. १८६. “हे भिक्षुओं! अतीत चक्षु अनित्य है... अतीत जिह्वा अनित्य है... अतीत मन अनित्य है। हे भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक चक्षु से भी निर्वेद प्राप्त करता है... जिह्वा से भी निर्वेद प्राप्त करता है... मन से भी निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद होने पर वह विरक्त होता है; विरक्त होने से वह मुक्त होता है; मुक्त होने पर 'मैं मुक्त हूँ' ऐसा ज्ञान होता है। वह जान लेता है—'जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है'।” ๒๐. อชฺฌตฺตานาคตานิจฺจสุตฺตํ २०. अध्यात्म-अनागत-अनित्य सुत्त ๑๘๗. ‘‘จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ อนาคตํ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา อนาคตา…เป… มโน อนิจฺโจ อนาคโต. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. १८७. “हे भिक्षुओं! अनागत चक्षु अनित्य है... अनागत जिह्वा अनित्य है... अनागत मन अनित्य है। ऐसा देखते हुए... वह जान लेता है—'अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है'।” ๒๑. อชฺฌตฺตปจฺจุปฺปนฺนานิจฺจสุตฺตํ २१. अध्यात्म-प्रत्युत्पन्न-अनित्य सुत्त ๑๘๘. ‘‘จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ ปจฺจุปฺปนฺนํ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา ปจฺจุปฺปนฺนา…เป… มโน อนิจฺโจ ปจฺจุปฺปนฺโน. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. १८८. “हे भिक्षुओं! प्रत्युत्पन्न चक्षु अनित्य है... प्रत्युत्पन्न जिह्वा अनित्य है... प्रत्युत्पन्न मन अनित्य है। ऐसा देखते हुए... वह जान लेता है—'अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है'।” ๒๒-๒๔. อชฺฌตฺตาตีตาทิทุกฺขสุตฺตํ २२-२४. अध्यात्म-अतीत-आदि-दुःख सुत्त ๑๘๙-๑๙๑. ‘‘จกฺขุ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ อตีตํ อนาคตํ ปจฺจุปฺปนฺนํ…เป… ชิวฺหา ทุกฺขา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา…เป… มโน ทุกฺโข อตีโต อนาคโต ปจฺจุปฺปนฺโน. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. 189-191. “हे भिक्षुओं! अतीत, अनागत और प्रत्युत्पन्न चक्षु दुःख है... अतीत, अनागत और प्रत्युत्पन्न जिह्वा दुःख है... अतीत, अनागत और प्रत्युत्पन्न मन दुःख है। ऐसा देखते हुए... वह जान लेता है—'अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है'।” ๒๕-๒๗. อชฺฌตฺตาตีตาทิอนตฺตสุตฺตํ २५-२७. अध्यात्म-अतीत-आदि-अनात्मा सुत्त ๑๙๒-๑๙๔. ‘‘จกฺขุ[Pg.363], ภิกฺขเว, อนตฺตา อตีตํ อนาคตํ ปจฺจุปฺปนฺนํ…เป… ชิวฺหา อนตฺตา…เป… มโน อนตฺตา อตีโต อนาคโต ปจฺจุปฺปนฺโน. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. 192-194. "भिक्षुओं! अतीत, अनागत और वर्तमान चक्षु अनात्म है... जिह्वा अनात्म है... अतीत, अनागत और वर्तमान मन अनात्म है। ऐसा देखते हुए... वह जान लेता है कि इस (अवस्था) के लिए अब और कुछ करना शेष नहीं है।" ๒๘-๓๐. พาหิราตีตาทิอนิจฺจสุตฺตํ २८-३०. बाह्य-अतीत-आदि-अनित्य-सूत्र ๑๙๕-๑๙๗. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนิจฺจา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนิจฺจา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. 195-197. "भिक्षुओं! अतीत, अनागत और वर्तमान रूप अनित्य हैं। शब्द... गंध... रस... स्पर्श... अतीत, अनागत और वर्तमान धर्म अनित्य हैं। ऐसा देखते हुए... वह जान लेता है कि इस (अवस्था) के लिए अब और कुछ करना शेष नहीं है।" ๓๑-๓๓. พาหิราตีตาทิทุกฺขสุตฺตํ ३१-३३. बाह्य-अतीत-आदि-दुःख-सूत्र ๑๙๘-๒๐๐. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, ทุกฺขา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา ทุกฺขา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. 198-200. "भिक्षुओं! अतीत, अनागत और वर्तमान रूप दुःख हैं। शब्द... गंध... रस... स्पर्श... अतीत, अनागत और वर्तमान धर्म दुःख हैं। ऐसा देखते हुए... वह जान लेता है कि इस (अवस्था) के लिए अब और कुछ करना शेष नहीं है।" ๓๔-๓๖. พาหิราตีตาทิอนตฺตสุตฺตํ ३४-३६. बाह्य-अतीत-आदि-अनात्म-सूत्र ๒๐๑-๒๐๓. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนตฺตา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนตฺตา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. 201-203. "भिक्षुओं! अतीत, अनागत और वर्तमान रूप अनात्म हैं। शब्द... गंध... रस... स्पर्श... अतीत, अनागत और वर्तमान धर्म अनात्म हैं। ऐसा देखते हुए... वह जान लेता है कि इस (अवस्था) के लिए अब और कुछ करना शेष नहीं है।" ๓๗. อชฺฌตฺตาตีตยทนิจฺจสุตฺตํ ३७. अध्यात्म-अतीत-यदनित्य-सूत्र ๒๐๔. ‘‘จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ อตีตํ. ยทนิจฺจํ, ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา อตีตา. ยทนิจฺจํ, ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ…เป… มโน อนิจฺโจ อตีโต. ยทนิจฺจํ, ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २०४. "भिक्षुओं! अतीत चक्षु अनित्य है। जो अनित्य है, वह दुःख है। जो दुःख है, वह अनात्म है। जो अनात्म है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार सही प्रज्ञा से यथाभूत देखना चाहिए... अतीत जिह्वा अनित्य है... अतीत मन अनित्य है। जो अनित्य है, वह दुःख है। जो दुःख है, वह अनात्म है। जो अनात्म है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार सही प्रज्ञा से यथाभूत देखना चाहिए। ऐसा देखते हुए... वह जान लेता है कि इस (अवस्था) के लिए अब और कुछ करना शेष नहीं है।" ๓๘. อชฺฌตฺตานาคตยทนิจฺจสุตฺตํ ३८. अध्यात्म-अनागत-यदनित्य-सूत्र ๒๐๕. ‘‘จกฺขุ[Pg.364], ภิกฺขเว, อนิจฺจํ อนาคตํ. ยทนิจฺจํ, ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา อนาคตา. ยทนิจฺจํ, ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ…เป… มโน อนิจฺโจ อนาคโต. ยทนิจฺจํ, ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २०५. "भिक्षुओं! अनागत चक्षु अनित्य है। जो अनित्य है, वह दुःख है। जो दुःख है, वह अनात्म है। जो अनात्म है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार सही प्रज्ञा से यथाभूत देखना चाहिए... अनागत जिह्वा अनित्य है... अनागत मन अनित्य है। जो अनित्य है, वह दुःख है। जो दुःख है, वह अनात्म है। जो अनात्म है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार सही प्रज्ञा से यथाभूत देखना चाहिए। भिक्षुओं! ऐसा देखते हुए... वह जान लेता है कि इस (अवस्था) के लिए अब और कुछ करना शेष नहीं है।" ๓๙. อชฺฌตฺตปจฺจุปฺปนฺนยทนิจฺจสุตฺตํ ३९. अध्यात्म-प्रत्युत्पन्न-यदनित्य-सूत्र ๒๐๖. ‘‘จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ ปจฺจุปฺปนฺนํ. ยทนิจฺจํ, ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา ปจฺจุปฺปนฺนา. ยทนิจฺจํ, ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ…เป… มโน อนิจฺโจ ปจฺจุปฺปนฺโน. ยทนิจฺจํ ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २०६. "भिक्षुओं! वर्तमान चक्षु अनित्य है। जो अनित्य है, वह दुःख है। जो दुःख है, वह अनात्म है। जो अनात्म है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार सही प्रज्ञा से यथाभूत देखना चाहिए... वर्तमान जिह्वा अनित्य है... वर्तमान मन अनित्य है। जो अनित्य है, वह दुःख है। जो दुःख है, वह अनात्म है। जो अनात्म है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार सही प्रज्ञा से यथाभूत देखना चाहिए। ऐसा देखते हुए... वह जान लेता है कि इस (अवस्था) के लिए अब और कुछ करना शेष नहीं है।" ๔๐-๔๒. อชฺฌตฺตาตีตาทิยํทุกฺขสุตฺตํ ४०-४२. अध्यात्म-अतीत-आदि-यद्दुःख-सूत्र ๒๐๗-๒๐๙. ‘‘จกฺขุ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ อตีตํ อนาคตํ ปจฺจุปฺปนฺนํ. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ…เป… ชิวฺหา ทุกฺขา…เป… มโน ทุกฺโข อตีโต อนาคโต ปจฺจุปฺปนฺโน. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. 207-209. "भिक्षुओं! अतीत, अनागत और वर्तमान चक्षु दुःख है। जो दुःख है, वह अनात्म है। जो अनात्म है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार सही प्रज्ञा से यथाभूत देखना चाहिए... जिह्वा दुःख है... अतीत, अनागत और वर्तमान मन दुःख है। जो दुःख है, वह अनात्म है। जो अनात्म है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार सही प्रज्ञा से यथाभूत देखना चाहिए। ऐसा देखते हुए... वह जान लेता है कि इस (अवस्था) के लिए अब और कुछ करना शेष नहीं है।" ๔๓-๔๕. อชฺฌตฺตาตีตาทิยทนตฺตสุตฺตํ ४३-४५. अध्यात्म-अतीत-आदि-यदनत्म-सूत्र ๒๑๐-๒๑๒. ‘‘จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนตฺตา อตีตํ อนาคตํ ปจฺจุปฺปนฺนํ. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ [Pg.365] ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ…เป… ชิวฺหา อนตฺตา…เป… มโน อนตฺตา อตีโต อนาคโต ปจฺจุปฺปนฺโน. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. 210-212. "भिक्षुओं! अतीत, अनागत और वर्तमान चक्षु अनात्म है। जो अनात्म है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार सही प्रज्ञा से यथाभूत देखना चाहिए... जिह्वा अनात्म है... अतीत, अनागत और वर्तमान मन अनात्म है। जो अनात्म है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार सही प्रज्ञा से यथाभूत देखना चाहिए। ऐसा देखते हुए... वह जान लेता है कि इस (अवस्था) के लिए अब और कुछ करना शेष नहीं है।" ๔๖-๔๘. พาหิราตีตาทิยทนิจฺจสุตฺตํ ४६-४८. बाह्य-अतीत-आदि-यदनित्य-सूत्र ๒๑๓-๒๑๕. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนิจฺจา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. ยทนิจฺจํ, ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนิจฺจา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. ยทนิจฺจํ ตํ ทุกฺขํ. ยํ ทุกฺขํ ตทนตฺตา. ยทนตฺตา ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. "भिक्षुओं! अतीत, अनागत और वर्तमान रूप अनित्य हैं। जो अनित्य है, वह दुःख है। जो दुःख है, वह अनात्मा है। जो अनात्मा है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार यथार्थ रूप से सम्यक प्रज्ञा द्वारा देखना चाहिए। शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धर्म अतीत, अनागत और वर्तमान में अनित्य हैं। जो अनित्य है, वह दुःख है। जो दुःख है, वह अनात्मा है। जो अनात्मा है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार यथार्थ रूप से सम्यक प्रज्ञा द्वारा देखना चाहिए। इस प्रकार देखते हुए... वह जान लेता है कि इस (अवस्था) के लिए अब और कुछ शेष नहीं है।" ๔๙-๕๑. พาหิราตีตาทิยํทุกฺขสุตฺตํ ४९-५१. बाह्य-अतीत-आदि यद-दुःख सूत्र ๒๑๖-๒๑๘. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, ทุกฺขา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา ทุกฺขา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. ยํ ทุกฺขํ, ตทนตฺตา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. "भिक्षुओं! अतीत, अनागत और वर्तमान रूप दुःख हैं। जो दुःख है, वह अनात्मा है। जो अनात्मा है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार यथार्थ रूप से सम्यक प्रज्ञा द्वारा देखना चाहिए। शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धर्म अतीत, अनागत और वर्तमान में दुःख हैं। जो दुःख है, वह अनात्मा है। जो अनात्मा है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार यथार्थ रूप से सम्यक प्रज्ञा द्वारा देखना चाहिए। इस प्रकार देखते हुए... वह जान लेता है कि इस (अवस्था) के लिए अब और कुछ शेष नहीं है।" ๕๒-๕๔. พาหิราตีตาทิยทนตฺตสุตฺตํ ५२-५४. बाह्य-अतीत-आदि यद-अनात्म सूत्र ๒๑๙-๒๒๑. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนตฺตา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนตฺตา อตีตา อนาคตา ปจฺจุปฺปนฺนา. ยทนตฺตา, ตํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. "भिक्षुओं! अतीत, अनागत और वर्तमान रूप अनात्मा हैं। जो अनात्मा है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार यथार्थ रूप से सम्यक प्रज्ञा द्वारा देखना चाहिए। शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धर्म अतीत, अनागत और वर्तमान में अनात्मा हैं। जो अनात्मा है, उसे 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है'—इस प्रकार यथार्थ रूप से सम्यक प्रज्ञा द्वारा देखना चाहिए। इस प्रकार देखते हुए... वह जान लेता है कि इस (अवस्था) के लिए अब और कुछ शेष नहीं है।" ๕๕. อชฺฌตฺตายตนอนิจฺจสุตฺตํ ५५. अध्यात्म-आयतन अनित्य सूत्र ๒๒๒. ‘‘จกฺขุ[Pg.366], ภิกฺขเว, อนิจฺจํ…เป… ชิวฺหา อนิจฺจา…เป… มโน อนิจฺโจ. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २२२. "भिक्षुओं! चक्षु अनित्य है... जिह्वा अनित्य है... मन अनित्य है। इस प्रकार देखते हुए... वह जान लेता है कि इस (अवस्था) के लिए अब और कुछ शेष नहीं है।" ๕๖. อชฺฌตฺตายตนทุกฺขสุตฺตํ ५६. अध्यात्म-आयतन दुःख सूत्र ๒๒๓. ‘‘จกฺขุ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ…เป… ชิวฺหา ทุกฺขา…เป… มโน ทุกฺโข. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २२३. "भिक्षुओं! चक्षु दुःख है... जिह्वा दुःख है... मन दुःख है। इस प्रकार देखते हुए... वह जान लेता है कि इस (अवस्था) के लिए अब और कुछ शेष नहीं है।" ๕๗. อชฺฌตฺตายตนอนตฺตสุตฺตํ ५७. अध्यात्म-आयतन अनात्म सूत्र ๒๒๔. ‘‘จกฺขุ, ภิกฺขเว, อนตฺตา…เป… ชิวฺหา อนตฺตา…เป… มโน อนตฺตา. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २२४. "भिक्षुओं! चक्षु अनात्मा है... जिह्वा अनात्मा है... मन अनात्मा है। इस प्रकार देखते हुए... वह जान लेता है कि इस (अवस्था) के लिए अब और कुछ शेष नहीं है।" ๕๘. พาหิรายตนอนิจฺจสุตฺตํ ५८. बाह्य-आयतन अनित्य सूत्र ๒๒๕. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนิจฺจา. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนิจฺจา. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २२५. "भिक्षुओं! रूप अनित्य हैं। शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धर्म अनित्य हैं। इस प्रकार देखते हुए... वह जान लेता है कि इस (अवस्था) के लिए अब और कुछ शेष नहीं है।" ๕๙. พาหิรายตนทุกฺขสุตฺตํ ५९. बाह्य-आयतन दुःख सूत्र ๒๒๖. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, ทุกฺขา. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา ทุกฺขา. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २२६. "भिक्षुओं! रूप दुःख हैं। शब्द, गंध, रस, स्पर्श और धर्म दुःख हैं। इस प्रकार देखते हुए... वह जान लेता है कि इस (अवस्था) के लिए अब और कुछ शेष नहीं है।" ๖๐. พาหิรายตนอนตฺตสุตฺตํ ६०. बाह्य-आयतन अनात्म सूत्र ๒๒๗. ‘‘รูปา, ภิกฺขเว, อนตฺตา. สทฺทา… คนฺธา… รสา… โผฏฺฐพฺพา… ธมฺมา อนตฺตา. เอวํ ปสฺสํ…เป… นาปรํ อิตฺถตฺตายาติ ปชานาตี’’ติ. २२७. "भिक्षुओं! रूप अनात्मा हैं। शब्द, गंध, रस, स्पर्श और धर्म अनात्मा हैं। इस प्रकार देखते हुए... वह जान लेता है कि इस (अवस्था) के लिए अब और कुछ शेष नहीं है।" สฏฺฐิเปยฺยาลวคฺโค สตฺตรสโม. साठ-पेय्याल वर्ग, सत्रहवाँ समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उदान) इस प्रकार है – ฉนฺเทนฏฺฐารส โหนฺติ, อตีเตน จ ทฺเว นว; ยทนิจฺจาฏฺฐารส วุตฺตา, ตโย อชฺฌตฺตพาหิรา; เปยฺยาโล สฏฺฐิโก วุตฺโต, พุทฺเธนาทิจฺจพนฺธุนาติ. "छन्द (इच्छा) के साथ अठारह सूत्र हैं, और अतीत के साथ दो बार नौ (अठारह); 'यदनिच्च' (जो अनित्य है) के अठारह कहे गए हैं, और तीन अध्यात्म-बाह्य के; इस प्रकार साठ सूत्रों का पेय्याल आदित्य-बन्धु बुद्ध द्वारा कहा गया है।" สุตฺตนฺตานิ สฏฺฐิ. साठ सूत्र। ๑๘. สมุทฺทวคฺโค १८. समुद्र वर्ग ๑. ปฐมสมุทฺทสุตฺตํ १. प्रथम समुद्र सूत्र ๒๒๘. ‘‘‘สมุทฺโท[Pg.367], สมุทฺโท’ติ, ภิกฺขเว, อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน ภาสติ. เนโส, ภิกฺขเว, อริยสฺส วินเย สมุทฺโท. มหา เอโส, ภิกฺขเว, อุทกราสิ มหาอุทกณฺณโว. จกฺขุ, ภิกฺขเว, ปุริสสฺส สมุทฺโท; ตสฺส รูปมโย เวโค. โย ตํ รูปมยํ เวคํ สหติ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อตริ จกฺขุสมุทฺทํ สอูมึ สาวฏฺฏํ สคาหํ สรกฺขสํ; ติณฺโณ ปารงฺคโต ถเล ติฏฺฐติ พฺราหฺมโณ…เป… ชิวฺหา, ภิกฺขเว, ปุริสสฺส สมุทฺโท; ตสฺส รสมโย เวโค. โย ตํ รสมยํ เวคํ สหติ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อตริ ชิวฺหาสมุทฺทํ สอูมึ สาวฏฺฏํ สคาหํ สรกฺขสํ; ติณฺโณ ปารงฺคโต ถเล ติฏฺฐติ พฺราหฺมโณ…เป… มโน, ภิกฺขเว, ปุริสสฺส สมุทฺโท; ตสฺส ธมฺมมโย เวโค. โย ตํ ธมฺมมยํ เวคํ สหติ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อตริ มโนสมุทฺทํ สอูมึ สาวฏฺฏํ สคาหํ สรกฺขสํ; ติณฺโณ ปารงฺคโต ถเล ติฏฺฐติ พฺราหฺมโณ’’ติ. อิทมโวจ…เป… สตฺถา – २२८. "भिक्षुओं! अश्रुतवान पृथग्जन 'समुद्र, समुद्र' कहता है। भिक्षुओं! आर्यों के विनय में यह समुद्र नहीं है। भिक्षुओं! यह तो केवल जल की विशाल राशि है, जल का महासागर है। भिक्षुओं! मनुष्य के लिए चक्षु ही समुद्र है; रूपों का वेग ही उसका वेग है। जो उस रूपमय वेग को सहन कर लेता है, भिक्षुओं! वह चक्षु-समुद्र को पार कर गया—तरंगों, भँवरों, मगरमच्छों और राक्षसों के साथ; वह पार पहुँच गया, स्थल पर स्थित है, वह ब्राह्मण (अर्हत) कहलाता है। ... भिक्षुओं! मनुष्य के लिए जिह्वा ही समुद्र है; रसों का वेग ही उसका वेग है। जो उस रसमय वेग को सहन कर लेता है, भिक्षुओं! वह जिह्वा-समुद्र को पार कर गया—तरंगों, भँवरों, मगरमच्छों और राक्षसों के साथ; वह पार पहुँच गया, स्थल पर स्थित है, वह ब्राह्मण कहलाता है। ... भिक्षुओं! मनुष्य के लिए मन ही समुद्र है; धर्मों का वेग ही उसका वेग है। जो उस धर्ममय वेग को सहन कर लेता है, भिक्षुओं! वह मन-समुद्र को पार कर गया—तरंगों, भँवरों, मगरमच्छों और राक्षसों के साथ; वह पार पहुँच गया, स्थल पर स्थित है, वह ब्राह्मण कहलाता है। शास्ता ने यह कहा..." ‘‘โย อิมํ สมุทฺทํ สคาหํ สรกฺขสํ,สอูมึ สาวฏฺฏํ สภยํ ทุตฺตรํ อจฺจตริ; ส เวทคู วุสิตพฺรหฺมจริโย,โลกนฺตคู ปารคโตติ วุจฺจตี’’ติ. ปฐมํ; "जिसने मगरमच्छों और राक्षसों वाले, तरंगों, भँवरों और भयों वाले इस दुस्तर समुद्र को पार कर लिया है; वह वेदज्ञ, ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला, लोक के अंत तक पहुँचा हुआ और पारगामी कहलाता है। प्रथम सूत्र।" ๒. ทุติยสมุทฺทสุตฺตํ २. द्वितीय समुद्र सूत्र ๒๒๙. ‘‘สมุทฺโท, สมุทฺโท’ติ, ภิกฺขเว, อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน ภาสติ. เนโส, ภิกฺขเว, อริยสฺส วินเย สมุทฺโท. มหา เอโส, ภิกฺขเว, อุทกราสิ มหาอุทกณฺณโว. สนฺติ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อริยสฺส วินเย สมุทฺโท. เอตฺถายํ สเทวโก โลโก สมารโก สพฺรหฺมโก สสฺสมณพฺราหฺมณี ปชา สเทวมนุสฺสา เยภุยฺเยน สมุนฺนา ตนฺตากุลกชาตา กุลคณฺฐิกชาตา มุญฺชปพฺพชภูตา, อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ สํสารํ นาติวตฺตติ…เป…. २२९. "भिक्षुओं! अश्रुतवान पृथग्जन 'समुद्र, समुद्र' कहता है। भिक्षुओं! आर्यों के विनय में यह समुद्र नहीं है। भिक्षुओं! यह तो केवल जल की विशाल राशि है, जल का महासागर है। भिक्षुओं! चक्षु-विज्ञेय ऐसे रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय, काम-युक्त और रजनीय हैं। भिक्षुओं! आर्यों के विनय में इसे ही समुद्र कहा जाता है। यहाँ यह देवों, मारों और ब्रह्मा सहित लोक, श्रमणों और ब्राह्मणों सहित प्रजा, देवों और मनुष्यों सहित, अधिकांशतः डूबी हुई है, धागों की उलझी हुई गुत्थी की तरह, पक्षियों के घोंसले की तरह, मूँज और बब्बज घास की तरह उलझी हुई है, और वह अपाय, दुर्गति, विनिपात और संसार को पार नहीं कर पाती।" ‘‘สนฺติ[Pg.368], ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อริยสฺส วินเย สมุทฺโท. เอตฺถายํ สเทวโก โลโก สมารโก สพฺรหฺมโก สสฺสมณพฺราหฺมณี ปชา สเทวมนุสฺสา เยภุยฺเยน สมุนฺนา ตนฺตากุลกชาตา กุลคณฺฐิกชาตา มุญฺชปพฺพชภูตา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ สํสารํ นาติวตฺตตี’’ติ. भिक्षुओं, जिह्वा-विज्ञान द्वारा जानने योग्य रस हैं... भिक्षुओं, मन-विज्ञान द्वारा जानने योग्य ऐसे धर्म (विषय) हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रंजनीय (लुभावने) हैं। भिक्षुओं, आर्य के विनय में इसे 'समुद्र' कहा जाता है। यहाँ यह देवों, मारों और ब्रह्माओं सहित लोक, श्रमणों, ब्राह्मणों, देवों और मनुष्यों सहित यह प्रजा अधिकांशतः (इसमें) डूबी हुई है, सूत के उलझे हुए गोले की तरह उलझी हुई है, चिड़िया के घोंसले की तरह गुंथी हुई है, मूंज और बब्बज घास की तरह (जटिल) होकर अपाय, दुर्गति, विनिपात और संसार का अतिक्रमण नहीं कर पाती है। ‘‘ยสฺส ราโค จ โทโส จ, อวิชฺชา จ วิราชิตา; โส อิมํ สมุทฺทํ สคาหํ สรกฺขสํ, สอูมิภยํ ทุตฺตรํ อจฺจตริ. जिसका राग, द्वेष और अविद्या क्षीण (विराजित) हो गई है; उसने ग्राहों (मगरमच्छों) और राक्षसों वाले, लहरों और भयों वाले, इस दुस्तर समुद्र को पार कर लिया है। ‘‘สงฺคาติโค มจฺจุชโห นิรุปธิ, ปหาสิ ทุกฺขํ อปุนพฺภวาย; อตฺถงฺคโต โส น ปุเนติ, อโมหยี, มจฺจุราชนฺติ พฺรูมี’’ติ. ทุติยํ; संग (आसक्ति) का अतिक्रमण करने वाला, मृत्यु को त्यागने वाला, उपधि-रहित, उसने पुनर्जन्म न होने के लिए दुःख को त्याग दिया है; वह अस्त (शांत) हो गया है, वह पुनः नहीं आता; मैं कहता हूँ कि उसने मृत्युराज को मोहित (चकित) कर दिया है। (द्वितीय सुत्त समाप्त) ๓. พาฬิสิโกปมสุตฺตํ ३. ३. बालिशिकोपम सुत्त ๒๓๐. ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, พาฬิสิโก อามิสคตพฬิสํ คมฺภีเร อุทกรหเท ปกฺขิเปยฺย. ตเมนํ อญฺญตโร อามิสจกฺขุ มจฺโฉ คิเลยฺย. เอวญฺหิ โส, ภิกฺขเว, มจฺโฉ คิลิตพฬิโส พาฬิสิกสฺส อนยํ อาปนฺโน พฺยสนํ อาปนฺโน ยถากามกรณีโย พาฬิสิกสฺส. २३०. भिक्षुओं, जैसे कोई मछुआरा मांस (चारे) से युक्त मछली पकड़ने का काँटा गहरे जलाशय में डाले। तब कोई चारे का लोभी मछली उसे निगल ले। भिक्षुओं, इस प्रकार वह मछली, जिसने काँटा निगल लिया है, मछुआरे के अनय (विपत्ति) और व्यसन (विनाश) को प्राप्त हो जाती है और मछुआरे की इच्छानुसार वश में हो जाती है। เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ฉยิเม พฬิสา โลกสฺมึ อนยาย สตฺตานํ วธาย ปาณินํ. กตเม ฉ? สนฺติ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ, ภิกฺขุ, อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ คิลิตพฬิโส, มารสฺส อนยํ อาปนฺโน พฺยสนํ อาปนฺโน ยถากามกรณีโย ปาปิมโต…เป… สนฺติ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป…. इसी प्रकार, भिक्षुओं, लोक में प्राणियों के अनय (अहित) और वध के लिए ये छह काँटे हैं। वे छह कौन से हैं? भिक्षुओं, चक्षु-विज्ञान द्वारा जानने योग्य ऐसे रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रंजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है, तो भिक्षुओं, वह भिक्षु 'काँटा निगला हुआ' कहा जाता है; वह मार के अनय और व्यसन को प्राप्त हो गया है और पापी मार की इच्छानुसार वश में हो गया है... (इसी प्रकार) भिक्षुओं, जिह्वा-विज्ञान द्वारा जानने योग्य रस हैं... สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ, ภิกฺขุ, อภินนฺทติ อภิวทติ อชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ คิลิตพฬิโส มารสฺส อนยํ อาปนฺโน พฺยสนํ อาปนฺโน ยถากามกรณีโย ปาปิมโต. भिक्षुओं, मन-विज्ञान द्वारा जानने योग्य ऐसे धर्म हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रंजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनका स्वागत करता है और उनमें आसक्त होकर स्थित रहता है, तो भिक्षुओं, वह भिक्षु 'काँटा निगला हुआ' कहा जाता है; वह मार के अनय और व्यसन को प्राप्त हो गया है और पापी मार की इच्छानुसार वश में हो गया है। ‘‘สนฺติ [Pg.369] จ, ภิกฺขเว, จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ น คิลิตพฬิโส มารสฺส อเภทิ พฬิสํ ปริเภทิ พฬิสํ น อนยํ อาปนฺโน น พฺยสนํ อาปนฺโน น ยถากามกรณีโย ปาปิมโต…เป…. और भिक्षुओं, चक्षु-विज्ञान द्वारा जानने योग्य ऐसे रूप हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रंजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता, उनका स्वागत नहीं करता और उनमें आसक्त होकर स्थित नहीं रहता, तो भिक्षुओं, वह भिक्षु 'काँटा न निगला हुआ' कहा जाता है; उसने मार के काँटे को तोड़ दिया है, काँटे को पूरी तरह नष्ट कर दिया है; वह अनय और व्यसन को प्राप्त नहीं हुआ है और पापी मार की इच्छानुसार वश में नहीं है... ‘‘สนฺติ, ภิกฺขเว, ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา…เป…. สนฺติ, ภิกฺขเว, มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. ตญฺเจ ภิกฺขุ นาภินนฺทติ นาภิวทติ นาชฺโฌสาย ติฏฺฐติ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ น คิลิตพฬิโส มารสฺส อเภทิ พฬิสํ ปริเภทิ พฬิสํ น อนยํ อาปนฺโน น พฺยสนํ อาปนฺโน น ยถากามกรณีโย ปาปิมโต’’ติ. ตติยํ. भिक्षुओं, जिह्वा-विज्ञान द्वारा जानने योग्य रस हैं... भिक्षुओं, मन-विज्ञान द्वारा जानने योग्य ऐसे धर्म हैं जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय रूप वाले, काम-युक्त और रंजनीय हैं। यदि भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता, उनका स्वागत नहीं करता और उनमें आसक्त होकर स्थित नहीं रहता, तो भिक्षुओं, वह भिक्षु 'काँटा न निगला हुआ' कहा जाता है; उसने मार के काँटे को तोड़ दिया है, काँटे को पूरी तरह नष्ट कर दिया है; वह अनय और व्यसन को प्राप्त नहीं हुआ है और पापी मार की इच्छानुसार वश में नहीं है। (तृतीय सुत्त समाप्त) ๔. ขีรรุกฺโขปมสุตฺตํ ४. ४. खीररुक्खोपम सुत्त ๒๓๑. ‘‘ยสฺส กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ โย ราโค โส อตฺถิ, โย โทโส โส อตฺถิ, โย โมโห โส อตฺถิ, โย ราโค โส อปฺปหีโน, โย โทโส โส อปฺปหีโน, โย โมโห โส อปฺปหีโน ตสฺส ปริตฺตา เจปิ จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา จกฺขุสฺส อาปาถํ อาคจฺฉนฺติ ปริยาทิยนฺเตวสฺส จิตฺตํ; โก ปน วาโท อธิมตฺตานํ! ตํ กิสฺส เหตุ? โย, ภิกฺขเว, ราโค, โส อตฺถิ, โย โทโส โส อตฺถิ, โย โมโห โส อตฺถิ, โย ราโค โส อปฺปหีโน, โย โทโส โส อปฺปหีโน, โย โมโห โส อปฺปหีโน…เป…. २३१. भिक्षुओं, जिस किसी भिक्षु या भिक्षुणी के चक्षु-विज्ञान द्वारा जानने योग्य रूपों में जो राग है वह विद्यमान है, जो द्वेष है वह विद्यमान है, जो मोह है वह विद्यमान है; जो राग है वह प्रहीण (नष्ट) नहीं हुआ है, जो द्वेष है वह प्रहीण नहीं हुआ है, जो मोह है वह प्रहीण नहीं हुआ है; तो यदि थोड़े से भी चक्षु-विज्ञान द्वारा जानने योग्य रूप उसकी आँखों के सामने आते हैं, तो वे उसके चित्त को पूरी तरह वश में कर लेते हैं (अभिभूत कर देते हैं); फिर बहुत अधिक (रूपों) के बारे में तो कहना ही क्या! ऐसा किस कारण से है? भिक्षुओं, क्योंकि जो राग है वह विद्यमान है, जो द्वेष है वह विद्यमान है, जो मोह है वह विद्यमान है; जो राग है वह प्रहीण नहीं हुआ है, जो द्वेष है वह प्रहीण नहीं हुआ है, जो मोह है वह प्रहीण नहीं हुआ है... ‘‘ยสฺส กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา ชิวฺหาวิญฺเญยฺเยสุ รเสสุ โย ราโค โส อตฺถิ…เป…. भिक्षुओं, जिस किसी भिक्षु या भिक्षुणी के जिह्वा-विज्ञान द्वारा जानने योग्य रसों में जो राग है वह विद्यमान है... ‘‘ยสฺส กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา มโนวิญฺเญยฺเยสุ ธมฺเมสุ โย ราโค โส อตฺถิ, โย โทโส โส อตฺถิ, โย โมโห โส อตฺถิ, โย ราโค โส อปฺปหีโน, โย โทโส โส อปฺปหีโน, โย โมโห โส อปฺปหีโน, ตสฺส ปริตฺตา เจปิ มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา มนสฺส อาปาถํ อาคจฺฉนฺติ ปริยาทิยนฺเตวสฺส จิตฺตํ; โก ปน วาโท อธิมตฺตานํ! ตํ กิสฺส เหตุ? โย, ภิกฺขเว, ราโค, โส อตฺถิ, โย โทโส โส อตฺถิ, โย โมโห โส [Pg.370] อตฺถิ, โย ราโค โส อปฺปหีโน, โย โทโส โส อปฺปหีโน, โย โมโห โส อปฺปหีโน. भिक्षुओं, जिस किसी भिक्षु या भिक्षुणी के मन-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्मों में जो राग है वह विद्यमान है, जो द्वेष है वह विद्यमान है, जो मोह है वह विद्यमान है; जो राग है वह प्रहीण नहीं हुआ है, जो द्वेष है वह प्रहीण नहीं हुआ है, जो मोह है वह प्रहीण नहीं हुआ है; तो यदि थोड़े से भी मन-विज्ञान द्वारा जानने योग्य धर्म उसके मन के सामने आते हैं, तो वे उसके चित्त को पूरी तरह वश में कर लेते हैं; फिर बहुत अधिक (धर्मों) के बारे में तो कहना ही क्या! ऐसा किस कारण से है? भिक्षुओं, क्योंकि जो राग है वह विद्यमान है, जो द्वेष है वह विद्यमान है, जो मोह है वह विद्यमान है; जो राग है वह प्रहीण नहीं हुआ है, जो द्वेष है वह प्रहीण नहीं हुआ है, जो मोह है वह प्रहीण नहीं हुआ है। ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ขีรรุกฺโข อสฺสตฺโถ วา นิคฺโรโธ วา ปิลกฺโข วา อุทุมฺพโร วา ทหโร ตรุโณ โกมารโก. ตเมนํ ปุริโส ติณฺหาย กุฐาริยา ยโต ยโต อาภินฺเทยฺย อาคจฺเฉยฺย ขีร’’นฺติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตํ กิสฺส เหตุ’’? ‘‘ยญฺหิ, ภนฺเต, ขีรํ ตํ อตฺถี’’ติ. भिक्षुओं, जैसे कोई दूध वाला वृक्ष (क्षीर-वृक्ष) हो—चाहे वह पीपल (अश्वत्थ) हो, बरगद (न्यग्रोध) हो, पिलक्ख हो या गूलर (उदुम्बर) हो—जो छोटा, नया और कोमल हो। यदि कोई मनुष्य उसे तीखी कुल्हाड़ी से जहाँ-जहाँ से काटे, क्या वहाँ-वहाँ से दूध (अर्क) निकलेगा? "हाँ, भन्ते!" "ऐसा किस कारण से है?" "भन्ते, क्योंकि उसमें दूध विद्यमान है।" ‘‘เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ยสฺส กสฺสจิ ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ โย ราโค โส อตฺถิ, โย โทโส โส อตฺถิ, โย โมโห โส อตฺถิ, โย ราโค โส อปฺปหีโน, โย โทโส โส อปฺปหีโน, โย โมโห โส อปฺปหีโน, ตสฺส ปริตฺตา เจปิ จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา จกฺขุสฺส อาปาถํ อาคจฺฉนฺติ ปริยาทิยนฺเตวสฺส จิตฺตํ; โก ปน วาโท อธิมตฺตานํ! ตํ กิสฺส เหตุ? โย, ภิกฺขเว, ราโค โส อตฺถิ, โย โทโส โส อตฺถิ, โย โมโห โส อตฺถิ, โย ราโค โส อปฺปหีโน, โย โทโส โส อปฺปหีโน, โย โมโห โส อปฺปหีโน…เป…. "भिक्षुओं! इसी प्रकार, जिस किसी भिक्षु या भिक्षुणी के लिए चक्षु-विज्ञेय रूपों में जो राग है वह विद्यमान है, जो द्वेष है वह विद्यमान है, जो मोह है वह विद्यमान है; वह राग प्रहीण (त्यागा हुआ) नहीं है, वह द्वेष प्रहीण नहीं है, वह मोह प्रहीण नहीं है; तो उसके चक्षु के समक्ष यदि थोड़े से भी चक्षु-विज्ञेय रूप आते हैं, तो वे उसके चित्त को अभिभूत कर लेते हैं; फिर बहुत अधिक (रूपों) के विषय में तो कहना ही क्या! वह किस कारण से है? भिक्षुओं! क्योंकि जो राग है वह विद्यमान है, जो द्वेष है वह विद्यमान है, जो मोह है वह विद्यमान है; वह राग प्रहीण नहीं है, वह द्वेष प्रहीण नहीं है, वह मोह प्रहीण नहीं है...।" ‘‘ยสฺส กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา ชิวฺหาวิญฺเญยฺเยสุ รเสสุ โย ราโค โส อตฺถิ…เป…. "भिक्षुओं! जिस किसी भिक्षु या भिक्षुणी के लिए जिह्वा-विज्ञेय रसों में जो राग है वह विद्यमान है...।" ‘‘ยสฺส กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา มโนวิญฺเญยฺเยสุ ธมฺเมสุ โย ราโค โส อตฺถิ, โย โทโส โส อตฺถิ, โย โมโห โส อตฺถิ, โย ราโค โส อปฺปหีโน, โย โทโส โส อปฺปหีโน, โย โมโห โส อปฺปหีโน, ตสฺส ปริตฺตา เจปิ มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา มนสฺส อาปาถํ อาคจฺฉนฺติ ปริยาทิยนฺเตวสฺส จิตฺตํ; โก ปน วาโท อธิมตฺตานํ! ตํ กิสฺส เหตุ? โย, ภิกฺขเว, ราโค โส อตฺถิ, โย โทโส โส อตฺถิ, โย โมโห โส อตฺถิ, โย ราโค โส อปฺปหีโน, โย โทโส โส อปฺปหีโน, โย โมโห โส อปฺปหีโน. "भिक्षुओं! जिस किसी भिक्षु या भिक्षुणी के लिए मनो-विज्ञेय धर्मों में जो राग है वह विद्यमान है, जो द्वेष है वह विद्यमान है, जो मोह है वह विद्यमान है; वह राग प्रहीण नहीं है, वह द्वेष प्रहीण नहीं है, वह मोह प्रहीण नहीं है; तो उसके मन के समक्ष यदि थोड़े से भी मनो-विज्ञेय धर्म आते हैं, तो वे उसके चित्त को अभिभूत कर लेते हैं; फिर बहुत अधिक (धर्मों) के विषय में तो कहना ही क्या! वह किस कारण से है? भिक्षुओं! क्योंकि जो राग है वह विद्यमान है, जो द्वेष है वह विद्यमान है, जो मोह है वह विद्यमान है; वह राग प्रहीण नहीं है, वह द्वेष प्रहीण नहीं है, वह मोह प्रहीण नहीं है।" ‘‘ยสฺส กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ โย ราโค โส นตฺถิ, โย โทโส โส นตฺถิ, โย โมโห โส นตฺถิ, โย ราโค โส ปหีโน, โย โทโส โส ปหีโน, โย โมโห โส [Pg.371] ปหีโน, ตสฺส อธิมตฺตา เจปิ จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา จกฺขุสฺส อาปาถํ อาคจฺฉนฺติ เนวสฺส จิตฺตํ ปริยาทิยนฺติ; โก ปน วาโท ปริตฺตานํ! ตํ กิสฺส เหตุ? โย, ภิกฺขเว, ราโค โส นตฺถิ, โย โทโส โส นตฺถิ, โย โมโห โส นตฺถิ, โย ราโค โส ปหีโน, โย โทโส โส ปหีโน, โย โมโห โส ปหีโน…เป…. "भिक्षुओं! जिस किसी भिक्षु या भिक्षुणी के लिए चक्षु-विज्ञेय रूपों में जो राग है वह नहीं है, जो द्वेष है वह नहीं है, जो मोह है वह नहीं है; वह राग प्रहीण है, वह द्वेष प्रहीण है, वह मोह प्रहीण है; तो उसके चक्षु के समक्ष यदि बहुत अधिक चक्षु-विज्ञेय रूप भी आते हैं, तो वे उसके चित्त को अभिभूत नहीं करते; फिर थोड़े से (रूपों) के विषय में तो कहना ही क्या! वह किस कारण से है? भिक्षुओं! क्योंकि जो राग है वह नहीं है, जो द्वेष है वह नहीं है, जो मोह है वह नहीं है; वह राग प्रहीण है, वह द्वेष प्रहीण है, वह मोह प्रहीण है...।" ‘‘ยสฺส กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา ชิวฺหาวิญฺเญยฺเยสุ รเสสุ…เป… มโนวิญฺเญยฺเยสุ ธมฺเมสุ โย ราโค โส นตฺถิ, โย โทโส โส นตฺถิ, โย โมโห โส นตฺถิ, โย ราโค โส ปหีโน, โย โทโส โส ปหีโน, โย โมโห โส ปหีโน, ตสฺส อธิมตฺตา เจปิ มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา มนสฺส อาปาถํ อาคจฺฉนฺติ เนวสฺส จิตฺตํ ปริยาทิยนฺติ; โก ปน วาโท ปริตฺตานํ! ตํ กิสฺส เหตุ? โย, ภิกฺขเว, ราโค โส นตฺถิ, โย โทโส โส นตฺถิ, โย โมโห โส นตฺถิ, โย ราโค โส ปหีโน, โย โทโส โส ปหีโน, โย โมโห โส ปหีโน. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ขีรรุกฺโข อสฺสตฺโถ วา นิคฺโรโธ วา ปิลกฺโข วา อุทุมฺพโร วา สุกฺโข โกลาโป เตโรวสฺสิโก. ตเมนํ ปุริโส ติณฺหาย กุฐาริยา ยโต ยโต อาภินฺเทยฺย อาคจฺเฉยฺย ขีร’’นฺติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตํ กิสฺส เหตุ’’? ‘‘ยญฺหิ, ภนฺเต, ขีรํ ตํ นตฺถี’’ติ. "भिक्षुओं! जिस किसी भिक्षु या भिक्षुणी के लिए जिह्वा-विज्ञेय रसों में... मनो-विज्ञेय धर्मों में जो राग है वह नहीं है, जो द्वेष है वह नहीं है, जो मोह है वह नहीं है; वह राग प्रहीण है, वह द्वेष प्रहीण है, वह मोह प्रहीण है; तो उसके मन के समक्ष यदि बहुत अधिक मनो-विज्ञेय धर्म भी आते हैं, तो वे उसके चित्त को अभिभूत नहीं करते; फिर थोड़े से (धर्मों) के विषय में तो कहना ही क्या! वह किस कारण से है? भिक्षुओं! क्योंकि जो राग है वह नहीं है, जो द्वेष है वह नहीं है, जो मोह है वह नहीं है; वह राग प्रहीण है, वह द्वेष प्रहीण है, वह मोह प्रहीण है। भिक्षुओं! जैसे कोई दूध वाला वृक्ष (क्षीर-वृक्ष) हो—चाहे वह पीपल (अश्वत्थ) हो, बरगद (न्यग्रोध) हो, पिलखन (प्लक्ष) हो या गूलर (उदुम्बर) हो—जो सूखा हुआ, सड़ा हुआ और वर्षों पुराना हो। यदि कोई पुरुष उसे तीखी कुल्हाड़ी से जहाँ-जहाँ से काटे, तो क्या उसमें से दूध (रस) निकलेगा? 'नहीं, भन्ते!' 'वह किस कारण से?' 'भन्ते! क्योंकि उसमें जो दूध (रस) होना चाहिए, वह नहीं है।'" ‘‘เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ยสฺส กสฺสจิ ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ โย ราโค โส นตฺถิ, โย โทโส โส นตฺถิ, โย โมโห โส นตฺถิ, โย ราโค โส ปหีโน, โย โทโส โส ปหีโน, โย โมโห โส ปหีโน, ตสฺส อธิมตฺตา เจปิ จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา จกฺขุสฺส อาปาถํ อาคจฺฉนฺติ เนวสฺส จิตฺตํ ปริยาทิยนฺติ; โก ปน วาโท ปริตฺตานํ! ตํ กิสฺส เหตุ? โย, ภิกฺขเว, ราโค โส นตฺถิ, โย โทโส โส นตฺถิ, โย โมโห โส นตฺถิ, โย ราโค โส ปหีโน, โย โทโส โส ปหีโน, โย โมโห โส ปหีโน…เป…. "भिक्षुओं! इसी प्रकार, जिस किसी भिक्षु या भिक्षुणी के लिए चक्षु-विज्ञेय रूपों में जो राग है वह नहीं है, जो द्वेष है वह नहीं है, जो मोह है वह नहीं है; वह राग प्रहीण है, वह द्वेष प्रहीण है, वह मोह प्रहीण है; तो उसके चक्षु के समक्ष यदि बहुत अधिक चक्षु-विज्ञेय रूप भी आते हैं, तो वे उसके चित्त को अभिभूत नहीं करते; फिर थोड़े से (रूपों) के विषय में तो कहना ही क्या! वह किस कारण से है? भिक्षुओं! क्योंकि जो राग है वह नहीं है, जो द्वेष है वह नहीं है, जो मोह है वह नहीं है; वह राग प्रहीण है, वह द्वेष प्रहीण है, वह मोह प्रहीण है...।" ‘‘ยสฺส กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา ชิวฺหาวิญฺเญยฺเยสุ รเสสุ…เป…. "भिक्षुओं! जिस किसी भिक्षु या भिक्षुणी के लिए जिह्वा-विज्ञेय रसों में...।" ‘‘ยสฺส [Pg.372] กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา มโนวิญฺเญยฺเยสุ ธมฺเมสุ โย ราโค โส นตฺถิ, โย โทโส โส นตฺถิ, โย โมโห โส นตฺถิ, โย ราโค โส ปหีโน, โย โทโส โส ปหีโน, โย โมโห โส ปหีโน, ตสฺส อธิมตฺตา เจปิ มโนวิญฺเญยฺยา ธมฺมา มนสฺส อาปาถํ อาคจฺฉนฺติ, เนวสฺส จิตฺตํ ปริยาทิยนฺติ; โก ปน วาโท ปริตฺตานํ! ตํ กิสฺส เหตุ? โย, ภิกฺขเว, ราโค โส นตฺถิ, โย โทโส โส นตฺถิ, โย โมโห โส นตฺถิ, โย ราโค โส ปหีโน, โย โทโส โส ปหีโน, โย โมโห โส ปหีโน’’ติ. จตุตฺถํ. "भिक्षुओं! जिस किसी भिक्षु या भिक्षुणी के लिए मनो-विज्ञेय धर्मों में जो राग है वह नहीं है, जो द्वेष है वह नहीं है, जो मोह है वह नहीं है; वह राग प्रहीण है, वह द्वेष प्रहीण है, वह मोह प्रहीण है; तो उसके मन के समक्ष यदि बहुत अधिक मनो-विज्ञेय धर्म भी आते हैं, तो वे उसके चित्त को अभिभूत नहीं करते; फिर थोड़े से (धर्मों) के विषय में तो कहना ही क्या! वह किस कारण से है? भिक्षुओं! क्योंकि जो राग है वह नहीं है, जो द्वेष है वह नहीं है, जो मोह है वह नहीं है; वह राग प्रहीण है, वह द्वेष प्रहीण है, वह मोह प्रहीण है।" (चौथा सुत्त समाप्त)। ๕. โกฏฺฐิกสุตฺตํ ५. कोट्टिक सुत्त ๒๓๒. เอกํ สมยํ อายสฺมา จ สาริปุตฺโต อายสฺมา จ มหาโกฏฺฐิโก พาราณสิยํ วิหรนฺติ อิสิปตเน มิคทาเย. อถ โข อายสฺมา มหาโกฏฺฐิโก สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต เยนายสฺมา สาริปุตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา สาริปุตฺเตน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา มหาโกฏฺฐิโก อายสฺมนฺตํ สาริปุตฺตํ เอตทโวจ – २३२. एक समय आयुष्मान सारिपुत्र और आयुष्मान महाकोट्टिक वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाव में विहार कर रहे थे। तब आयुष्मान महाकोट्टिक सायंकाल के समय ध्यान (प्रतिसंलयन) से उठकर जहाँ आयुष्मान सारिपुत्र थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर आयुष्मान सारिपुत्र के साथ कुशल-क्षेम पूछा। आनंददायक और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वे एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान महाकोट्टिक ने आयुष्मान सारिपुत्र से यह कहा— ‘‘กึ นุ โข, อาวุโส สาริปุตฺต, จกฺขุ รูปานํ สํโยชนํ, รูปา จกฺขุสฺส สํโยชนํ…เป… ชิวฺหา รสานํ สํโยชนํ, รสา ชิวฺหาย สํโยชนํ …เป… มโน ธมฺมานํ สํโยชนํ, ธมฺมา มนสฺส สํโยชน’’นฺติ? "“आवुस सारिपुत्र! क्या चक्षु रूपों का संयोजन (बंधन) है, या रूप चक्षु का संयोजन हैं? ... क्या जिह्वा रसों का संयोजन है, या रस जिह्वा का संयोजन हैं? ... क्या मन धर्मों का संयोजन है, या धर्म मन का संयोजन हैं?”" ‘‘น โข, อาวุโส โกฏฺฐิก, จกฺขุ รูปานํ สํโยชนํ, น รูปา จกฺขุสฺส สํโยชนํ. ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ สํโยชนํ…เป… น ชิวฺหา รสานํ สํโยชนํ, น รสา ชิวฺหาย สํโยชนํ. ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ สํโยชนํ…เป… น มโน ธมฺมานํ สํโยชนํ, น ธมฺมา มนสฺส สํโยชนํ. ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. “हे आयुष्मान कोष्ठिक! न तो चक्षु (आँख) रूपों का संयोजन (बंधन) है, और न ही रूप चक्षु का संयोजन हैं। बल्कि उन दोनों के आश्रय से जो छन्द-राग (इच्छा और आसक्ति) उत्पन्न होता है, वही वहाँ संयोजन है... पे... न जिह्वा रसों का संयोजन है, न ही रस जिह्वा का संयोजन हैं। बल्कि उन दोनों के आश्रय से जो छन्द-राग उत्पन्न होता है, वही वहाँ संयोजन है... पे... न मन धर्मों (विषयों) का संयोजन है, न ही धर्म मन का संयोजन हैं। बल्कि उन दोनों के आश्रय से जो छन्द-राग उत्पन्न होता है, वही वहाँ संयोजन है।” ‘‘เสยฺยถาปิ, อาวุโส, กาโฬ จ พลีพทฺโท โอทาโต จ พลีพทฺโท เอเกน ทาเมน วา โยตฺเตน วา สํยุตฺตา อสฺสุ. โย นุ โข เอวํ [Pg.373] วเทยฺย – ‘กาโฬ พลีพทฺโท โอทาตสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชนํ, โอทาโต พลีพทฺโท กาฬสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชน’นฺติ, สมฺมา นุ โข โส วทมาโน วเทยฺยา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, อาวุโส’’. ‘‘น โข, อาวุโส, กาโฬ พลีพทฺโท โอทาตสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชนํ, น โอทาโต พลีพทฺโท กาฬสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชนํ. เยน จ โข เต เอเกน ทาเมน วา โยตฺเตน วา สํยุตฺตา ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. “आयुष्मान! जैसे एक काला बैल और एक सफेद बैल एक ही रस्सी या जोत से बँधे हों। यदि कोई ऐसा कहे— ‘काला बैल सफेद बैल का बंधन है, सफेद बैल काले बैल का बंधन है’, तो क्या वह ठीक कहते हुए ऐसा कहेगा?” “नहीं, आयुष्मान।” “आयुष्मान! न तो काला बैल सफेद बैल का बंधन है, न ही सफेद बैल काले बैल का बंधन है। बल्कि जिस एक रस्सी या जोत से वे दोनों बँधे हैं, वही वहाँ बंधन है।” ‘‘เอวเมว โข, อาวุโส, น จกฺขุ รูปานํ สํโยชนํ, น รูปา จกฺขุสฺส สํโยชนํ. ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ สํโยชนํ…เป… น ชิวฺหา รสานํ สํโยชนํ…เป… น มโน ธมฺมานํ สํโยชนํ, น ธมฺมา มนสฺส สํโยชนํ. ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. “इसी प्रकार, आयुष्मान! न तो चक्षु रूपों का संयोजन है, न ही रूप चक्षु का संयोजन हैं। बल्कि उन दोनों के आश्रय से जो छन्द-राग उत्पन्न होता है, वही वहाँ संयोजन है... पे... न जिह्वा रसों का संयोजन है... पे... न मन धर्मों का संयोजन है, न ही धर्म मन का संयोजन हैं। बल्कि उन दोनों के आश्रय से जो छन्द-राग उत्पन्न होता है, वही वहाँ संयोजन है।” ‘‘จกฺขุ วา, อาวุโส, รูปานํ สํโยชนํ อภวิสฺส, รูปา วา จกฺขุสฺส สํโยชนํ, นยิทํ พฺรหฺมจริยวาโส ปญฺญาเยถ สมฺมา ทุกฺขกฺขยาย. ยสฺมา จ โข, อาวุโส, น จกฺขุ รูปานํ สํโยชนํ, น รูปา จกฺขุสฺส สํโยชนํ; ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ, ตสฺมา พฺรหฺมจริยวาโส ปญฺญายติ สมฺมา ทุกฺขกฺขยาย…เป…. “आयुष्मान! यदि चक्षु रूपों का संयोजन होता, या रूप चक्षु का संयोजन होते, तो दुःख के पूर्ण क्षय के लिए यह ब्रह्मचर्य-वास (पवित्र जीवन) सार्थक न होता। आयुष्मान! चूँकि न तो चक्षु रूपों का संयोजन है, न ही रूप चक्षु का संयोजन हैं; बल्कि उन दोनों के आश्रय से जो छन्द-राग उत्पन्न होता है, वही वहाँ संयोजन है, इसीलिए दुःख के पूर्ण क्षय के लिए ब्रह्मचर्य-वास सार्थक होता है... पे...।” ‘‘ชิวฺหา, อาวุโส, รสานํ สํโยชนํ อภวิสฺส, รสา วา ชิวฺหาย สํโยชนํ, นยิทํ พฺรหฺมจริยวาโส ปญฺญาเยถ สมฺมา ทุกฺขกฺขยาย. ยสฺมา จ โข, อาวุโส, น ชิวฺหา รสานํ สํโยชนํ, น รสา ชิวฺหาย สํโยชนํ; ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ, ตสฺมา พฺรหฺมจริยวาโส ปญฺญายติ สมฺมา ทุกฺขกฺขยาย…เป…. “आयुष्मान! यदि जिह्वा रसों का संयोजन होती, या रस जिह्वा का संयोजन होते, तो दुःख के पूर्ण क्षय के लिए यह ब्रह्मचर्य-वास सार्थक न होता। आयुष्मान! चूँकि न तो जिह्वा रसों का संयोजन है, न ही रस जिह्वा का संयोजन हैं; बल्कि उन दोनों के आश्रय से जो छन्द-राग उत्पन्न होता है, वही वहाँ संयोजन है, इसीलिए दुःख के पूर्ण क्षय के लिए ब्रह्मचर्य-वास सार्थक होता है... पे...।” ‘‘มโน วา, อาวุโส, ธมฺมานํ สํโยชนํ อภวิสฺส, ธมฺมา วา มนสฺส สํโยชนํ, นยิทํ พฺรหฺมจริยวาโส ปญฺญาเยถ สมฺมา ทุกฺขกฺขยาย. ยสฺมา จ โข, อาวุโส, น มโน ธมฺมานํ สํโยชนํ, น ธมฺมา มนสฺส สํโยชนํ; ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ, ตสฺมา พฺรหฺมจริยวาโส ปญฺญายติ สมฺมา ทุกฺขกฺขยาย. “आयुष्मान! यदि मन धर्मों का संयोजन होता, या धर्म मन का संयोजन होते, तो दुःख के पूर्ण क्षय के लिए यह ब्रह्मचर्य-वास सार्थक न होता। आयुष्मान! चूँकि न तो मन धर्मों का संयोजन है, न ही धर्म मन का संयोजन हैं; बल्कि उन दोनों के आश्रय से जो छन्द-राग उत्पन्न होता है, वही वहाँ संयोजन है, इसीलिए दुःख के पूर्ण क्षय के लिए ब्रह्मचर्य-वास सार्थक होता है।” ‘‘อิมินาเปตํ[Pg.374], อาวุโส, ปริยาเยน เวทิตพฺพํ ยถา น จกฺขุ รูปานํ สํโยชนํ, น รูปา จกฺขุสฺส สํโยชนํ. ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ…เป… น ชิวฺหา รสานํ สํโยชนํ…เป… น มโน ธมฺมานํ สํโยชนํ, น ธมฺมา มนสฺส สํโยชนํ. ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. “आयुष्मान! इस विधि (पर्याय) से भी यह जानना चाहिए कि कैसे न तो चक्षु रूपों का संयोजन है, न ही रूप चक्षु का संयोजन हैं। बल्कि उन दोनों के आश्रय से जो छन्द-राग उत्पन्न होता है, वही वहाँ संयोजन है... पे... न जिह्वा रसों का संयोजन है... पे... न मन धर्मों का संयोजन है, न ही धर्म मन का संयोजन हैं। बल्कि उन दोनों के आश्रय से जो छन्द-राग उत्पन्न होता है, वही वहाँ संयोजन है।” ‘‘สํวิชฺชติ โข, อาวุโส, ภควโต จกฺขุ. ปสฺสติ ภควา จกฺขุนา รูปํ. ฉนฺทราโค ภควโต นตฺถิ. สุวิมุตฺตจิตฺโต ภควา. สํวิชฺชติ โข, อาวุโส, ภควโต โสตํ. สุณาติ ภควา โสเตน สทฺทํ. ฉนฺทราโค ภควโต นตฺถิ. สุวิมุตฺตจิตฺโต ภควา. สํวิชฺชติ โข, อาวุโส, ภควโต ฆานํ. ฆายติ ภควา ฆาเนน คนฺธํ. ฉนฺทราโค ภควโต นตฺถิ. สุวิมุตฺตจิตฺโต ภควา. สํวิชฺชติ โข, อาวุโส, ภควโต ชิวฺหา. สายติ ภควา ชิวฺหาย รสํ. ฉนฺทราโค ภควโต นตฺถิ. สุวิมุตฺตจิตฺโต ภควา. สํวิชฺชติ โข, อาวุโส, ภควโต กาโย. ผุสติ ภควา กาเยน โผฏฺฐพฺพํ. ฉนฺทราโค ภควโต นตฺถิ. สุวิมุตฺตจิตฺโต ภควา. สํวิชฺชติ โข, อาวุโส, ภควโต มโน. วิชานาติ ภควา มนสา ธมฺมํ. ฉนฺทราโค ภควโต นตฺถิ. สุวิมุตฺตจิตฺโต ภควา. “आयुष्मान! भगवान के पास चक्षु विद्यमान है। भगवान चक्षु से रूप देखते हैं। (किन्तु) भगवान में छन्द-राग नहीं है। भगवान सुविमुक्त-चित्त (भली-भाँति मुक्त चित्त वाले) हैं। आयुष्मान! भगवान के पास श्रोत्र (कान) विद्यमान है। भगवान श्रोत्र से शब्द सुनते हैं। भगवान में छन्द-राग नहीं है। भगवान सुविमुक्त-चित्त हैं। आयुष्मान! भगवान के पास घ्राण (नाक) विद्यमान है। भगवान घ्राण से गंध सूँघते हैं। भगवान में छन्द-राग नहीं है। भगवान सुविमुक्त-चित्त हैं। आयुष्मान! भगवान के पास जिह्वा विद्यमान है। भगवान जिह्वा से रस का आस्वादन करते हैं। भगवान में छन्द-राग नहीं है। भगवान सुविमुक्त-चित्त हैं। आयुष्मान! भगवान के पास काय (शरीर) विद्यमान है। भगवान काय से स्पर्श का अनुभव करते हैं। भगवान में छन्द-राग नहीं है। भगवान सुविमुक्त-चित्त हैं। आयुष्मान! भगवान के पास मन विद्यमान है। भगवान मन से धर्मों (विषयों) को जानते हैं। भगवान में छन्द-राग नहीं है। भगवान सुविमुक्त-चित्त हैं।” ‘‘อิมินา โข เอตํ, อาวุโส, ปริยาเยน เวทิตพฺพํ ยถา น จกฺขุ รูปานํ สํโยชนํ, น รูปา จกฺขุสฺส สํโยชนํ; ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. น โสตํ… น ฆานํ… น ชิวฺหา รสานํ สํโยชนํ, น รสา ชิวฺหาย สํโยชนํ; ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. น กาโย… น มโน ธมฺมานํ สํโยชนํ, น ธมฺมา มนสฺส สํโยชนํ; ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชน’’นฺติ. ปญฺจมํ. “आयुष्मान! इस विधि से भी यह जानना चाहिए कि कैसे न तो चक्षु रूपों का संयोजन है, न ही रूप चक्षु का संयोजन हैं; बल्कि उन दोनों के आश्रय से जो छन्द-राग उत्पन्न होता है, वही वहाँ संयोजन है। न श्रोत्र... न घ्राण... न जिह्वा रसों का संयोजन है, न ही रस जिह्वा का संयोजन हैं; बल्कि उन दोनों के आश्रय से जो छन्द-राग उत्पन्न होता है, वही वहाँ संयोजन है। न काय... न मन धर्मों का संयोजन है, न ही धर्म मन का संयोजन हैं; बल्कि उन दोनों के आश्रय से जो छन्द-राग उत्पन्न होता है, वही वहाँ संयोजन है।” पाँचवाँ। ๖. กามภูสุตฺตํ ६. कामभू सुत्त ๒๓๓. เอกํ สมยํ อายสฺมา จ อานนฺโท อายสฺมา จ กามภู โกสมฺพิยํ วิหรนฺติ โฆสิตาราเม. อถ โข อายสฺมา กามภู สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา อานนฺเทน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ [Pg.375] กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา กามภู อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตทโวจ – २३३. एक समय आयुष्मान आनन्द और आयुष्मान कामभू कोसम्बी के घोषिताराम में विहार कर रहे थे। तब आयुष्मान कामभू सायंकाल के समय ध्यान (प्रतिसंलयन) से उठकर जहाँ आयुष्मान आनन्द थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर आयुष्मान आनन्द के साथ कुशल-क्षेम पूछा। प्रसन्नतापूर्ण और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वे एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान कामभू ने आयुष्मान आनन्द से यह कहा— ‘‘กึ นุ โข, อาวุโส อานนฺท, จกฺขุ รูปานํ สํโยชนํ, รูปา จกฺขุสฺส สํโยชนํ…เป… ชิวฺหา รสานํ สํโยชนํ, รสา ชิวฺหาย สํโยชนํ…เป… มโน ธมฺมานํ สํโยชนํ, ธมฺมา มนสฺส สํโยชน’’นฺติ? “आवुस आनन्द! क्या चक्षु (आँख) रूपों का संयोजन (बन्धन) है, या रूप चक्षु का संयोजन हैं? ... क्या जिह्वा रसों का संयोजन है, या रस जिह्वा का संयोजन हैं? ... क्या मन धर्मों (मानसिक विषयों) का संयोजन है, या धर्म मन का संयोजन हैं?” ‘‘น โข, อาวุโส กามภู, จกฺขุ รูปานํ สํโยชนํ, น รูปา จกฺขุสฺส สํโยชนํ. ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ…เป… น ชิวฺหา รสานํ สํโยชนํ, น รสา ชิวฺหาย สํโยชนํ…เป… น มโน ธมฺมานํ สํโยชนํ, น ธมฺมา มนสฺส สํโยชนํ. ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. “आवुस कामभू! न तो चक्षु रूपों का संयोजन है, और न ही रूप चक्षु का संयोजन हैं। बल्कि उन दोनों के आश्रय से जो छन्द-राग (इच्छा और आसक्ति) उत्पन्न होता है, वही वहाँ संयोजन है। ... न जिह्वा रसों का संयोजन है, न रस जिह्वा का संयोजन हैं। ... न मन धर्मों का संयोजन है, न धर्म मन का संयोजन हैं। बल्कि उन दोनों के आश्रय से जो छन्द-राग उत्पन्न होता है, वही वहाँ संयोजन है।” ‘‘เสยฺยถาปิ, อาวุโส, กาโฬ จ พลีพทฺโท โอทาโต จ พลีพทฺโท เอเกน ทาเมน วา โยตฺเตน วา สํยุตฺตา อสฺสุ. โย นุ โข เอวํ วเทยฺย – ‘กาโฬ พลีพทฺโท โอทาตสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชนํ, โอทาโต พลีพทฺโท กาฬสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชน’นฺติ, สมฺมา นุ โข โส วทมาโน วเทยฺยา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, อาวุโส’’. ‘‘น โข, อาวุโส, กาโฬ พลีพทฺโท โอทาตสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชนํ, นปิ โอทาโต พลีพทฺโท กาฬสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชนํ. เยน จ โข เต เอเกน ทาเมน วา โยตฺเตน วา สํยุตฺตา, ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. เอวเมว โข, อาวุโส, น จกฺขุ รูปานํ สํโยชนํ, น รูปา จกฺขุสฺส สํโยชนํ…เป… น ชิวฺหา…เป… น มโน…เป… ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค, ตํ ตตฺถ สํโยชน’’นฺติ. ฉฏฺฐํ. “आवुस! जैसे एक काला बैल और एक सफेद बैल एक ही रस्सी या जोत से बँधे हों। यदि कोई ऐसा कहे— ‘काला बैल सफेद बैल का बन्धन है, या सफेद बैल काले बैल का बन्धन है’, तो क्या वह ठीक कहने वाला ठीक कहेगा?” “नहीं, आवुस।” “आवुस! न तो काला बैल सफेद बैल का बन्धन है, और न ही सफेद बैल काले बैल का बन्धन है। बल्कि जिस एक रस्सी या जोत से वे बँधे हैं, वही वहाँ बन्धन है। इसी प्रकार, आवुस! न चक्षु रूपों का संयोजन है, न रूप चक्षु का संयोजन हैं... न जिह्वा... न मन... बल्कि उन दोनों के आश्रय से जो छन्द-राग उत्पन्न होता है, वही वहाँ संयोजन है।” (छठा सुत्त) ๗. อุทายีสุตฺตํ ७. उदायी सुत्त ๒๓๔. เอกํ สมยํ อายสฺมา จ อานนฺโท อายสฺมา จ อุทายี โกสมฺพิยํ วิหรนฺติ โฆสิตาราเม. อถ โข อายสฺมา อุทายี สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา อานนฺเทน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อุทายี อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตทโวจ – २३४. एक समय आयुष्मान आनन्द और आयुष्मान उदायी कोसम्बी के घोषिताराम में विहार कर रहे थे। तब आयुष्मान उदायी सायंकाल के समय ध्यान से उठकर जहाँ आयुष्मान आनन्द थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर आयुष्मान आनन्द के साथ कुशल-क्षेम पूछा। प्रसन्नतापूर्ण और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वे एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान उदायी ने आयुष्मान आनन्द से यह कहा— ‘‘ยเถว [Pg.376] นุ โข, อาวุโส อานนฺท, อยํ กาโย ภควตา อเนกปริยาเยน อกฺขาโต วิวโฏ ปกาสิโต – ‘อิติปายํ กาโย อนตฺตา’ติ, สกฺกา เอวเมว วิญฺญาณํ ปิทํ อาจิกฺขิตุํ เทเสตุํ ปญฺญเปตุํ ปฏฺฐเปตุํ วิวริตุํ วิภชิตุํ อุตฺตานีกาตุํ – ‘อิติปิทํ วิญฺญาณํ อนตฺตา’’’ติ? “आवुस आनन्द! जैसे भगवान ने इस शरीर को अनेक पर्यायों (विधियों) से कहा है, खोला है, प्रकाशित किया है कि— ‘यह शरीर अनात्मा है’, क्या उसी प्रकार इस विज्ञान (चेतना) के बारे में भी बताया जा सकता है, उपदेश दिया जा सकता है, प्रज्ञापित किया जा सकता है, स्थापित किया जा सकता है, खोला जा सकता है, विभाजित किया जा सकता है और स्पष्ट किया जा सकता है कि— ‘यह विज्ञान भी अनात्मा है’?” ‘‘ยเถว โข, อาวุโส อุทายี, อยํ กาโย ภควตา อเนกปริยาเยน อกฺขาโต วิวโฏ ปกาสิโต – ‘อิติปายํ กาโย อนตฺตา’ติ, สกฺกา เอวเมว วิญฺญาณํ ปิทํ อาจิกฺขิตุํ เทเสตุํ ปญฺญเปตุํ ปฏฺฐเปตุํ วิวริตุํ วิภชิตุํ อุตฺตานีกาตุํ – ‘อิติปิทํ วิญฺญาณํ อนตฺตา’’’ติ. “आवुस उदायी! जैसे भगवान ने इस शरीर को अनेक पर्यायों से कहा है, खोला है, प्रकाशित किया है कि— ‘यह शरीर अनात्मा है’, उसी प्रकार इस विज्ञान के बारे में भी बताया जा सकता है, उपदेश दिया जा सकता है, प्रज्ञापित किया जा सकता है, स्थापित किया जा सकता है, खोला जा सकता है, विभाजित किया जा सकता है और स्पष्ट किया जा सकता है कि— ‘यह विज्ञान भी अनात्मा है’।” ‘‘จกฺขุญฺจ, อาวุโส, ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณ’’นฺติ? ‘‘เอวมาวุโส’’ติ. ‘‘โย จาวุโส, เหตุ, โย จ ปจฺจโย จกฺขุวิญฺญาณสฺส อุปฺปาทาย, โส จ เหตุ, โส จ ปจฺจโย สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ อปริเสสํ นิรุชฺเฌยฺย. อปิ นุ โข จกฺขุวิญฺญาณํ ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, อาวุโส’’. ‘‘อิมินาปิ โข เอตํ, อาวุโส, ปริยาเยน ภควตา อกฺขาตํ วิวฏํ ปกาสิตํ – ‘อิติปิทํ วิญฺญาณํ อนตฺตา’’’ติ…เป…. “आवुस! क्या चक्षु और रूपों के आश्रय से चक्षु-विज्ञान उत्पन्न होता है?” “हाँ, आवुस!” “आवुस! चक्षु-विज्ञान की उत्पत्ति के लिए जो हेतु और जो प्रत्यय (कारण) हैं, यदि वे हेतु और प्रत्यय पूरी तरह से, सब प्रकार से, बिना किसी अवशेष के निरुद्ध (समाप्त) हो जाएँ, तो क्या चक्षु-विज्ञान प्रतीत होगा?” “नहीं, आवुस।” “आवुस! इस पर्याय से भी भगवान ने यह कहा है, खोला है, प्रकाशित किया है कि— ‘यह विज्ञान अनात्मा है’।” ... ‘‘ชิวฺหญฺจาวุโส, ปฏิจฺจ รเส จ อุปฺปชฺชติ ชิวฺหาวิญฺญาณ’’นฺติ? ‘‘เอวมาวุโส’’ติ. ‘‘โย จาวุโส, เหตุ โย จ ปจฺจโย ชิวฺหาวิญฺญาณสฺส อุปฺปาทาย, โส จ เหตุ, โส จ ปจฺจโย สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ อปริเสสํ นิรุชฺเฌยฺย, อปิ นุ โข ชิวฺหาวิญฺญาณํ ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, อาวุโส’’. ‘‘อิมินาปิ โข เอตํ, อาวุโส, ปริยาเยน ภควตา อกฺขาตํ วิวฏํ ปกาสิตํ – ‘อิติปิทํ วิญฺญาณํ อนตฺตา’’’ติ…เป…. “आवुस! क्या जिह्वा और रसों के आश्रय से जिह्वा-विज्ञान उत्पन्न होता है?” “हाँ, आवुस!” “आवुस! जिह्वा-विज्ञान की उत्पत्ति के लिए जो हेतु और जो प्रत्यय हैं, यदि वे हेतु और प्रत्यय पूरी तरह से, सब प्रकार से, बिना किसी अवशेष के निरुद्ध हो जाएँ, तो क्या जिह्वा-विज्ञान प्रतीत होगा?” “नहीं, आवुस।” “आवुस! इस पर्याय से भी भगवान ने यह कहा है, खोला है, प्रकाशित किया है कि— ‘यह विज्ञान अनात्मा है’।” ... ‘‘มนญฺจาวุโส, ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณ’’นฺติ? ‘‘เอวมาวุโส’’ติ. ‘‘โย จาวุโส, เหตุ, โย จ ปจฺจโย มโนวิญฺญาณสฺส อุปฺปาทาย, โส จ เหตุ, โส จ ปจฺจโย สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ อปริเสสํ นิรุชฺเฌยฺย, อปิ นุ โข มโนวิญฺญาณํ ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, อาวุโส’’. ‘‘อิมินาปิ โข เอตํ, อาวุโส, ปริยาเยน ภควตา อกฺขาตํ วิวฏํ ปกาสิตํ – ‘อิติปิทํ วิญฺญาณํ อนตฺตา’’’ติ. “आवुस! क्या मन और धर्मों के आश्रय से मनो-विज्ञान उत्पन्न होता है?” “हाँ, आवुस!” “आवुस! मनो-विज्ञान की उत्पत्ति के लिए जो हेतु और जो प्रत्यय हैं, यदि वे हेतु और प्रत्यय पूरी तरह से, सब प्रकार से, बिना किसी अवशेष के निरुद्ध हो जाएँ, तो क्या मनो-विज्ञान प्रतीत होगा?” “नहीं, आवुस।” “आवुस! इस पर्याय से भी भगवान ने यह कहा है, खोला है, प्रकाशित किया है कि— ‘यह विज्ञान अनात्मा है’।” ‘‘เสยฺยถาปิ, อาวุโส, ปุริโส สารตฺถิโก สารคเวสี สารปริเยสนํ จรมาโน ติณฺหํ กุฐารึ อาทาย วนํ ปวิเสยฺย. โส ตตฺถ [Pg.377] ปสฺเสยฺย มหนฺตํ กทลิกฺขนฺธํ อุชุํ นวํ อกุกฺกุกชาตํ. ตเมนํ มูเล ฉินฺเทยฺย; มูเล เฉตฺวา อคฺเค ฉินฺเทยฺย; อคฺเค เฉตฺวา ปตฺตวฏฺฏึ วินิพฺภุเชยฺย. โส ตตฺถ เผคฺคุมฺปิ นาธิคจฺเฉยฺย, กุโต สารํ! เอวเมว โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ฉสุ ผสฺสายตเนสุ เนวตฺตานํ น อตฺตนิยํ สมนุปสฺสติ. โส เอวํ อสมนุปสฺสนฺโต น กิญฺจิ โลเก อุปาทิยติ. อนุปาทิยํ น ปริตสฺสติ. อปริตสฺสํ ปจฺจตฺตญฺเญว ปรินิพฺพายติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาตี’’ติ. สตฺตมํ. "हे आवुसो! जैसे कोई पुरुष सार (मजबूत लकड़ी) की इच्छा रखने वाला, सार की खोज करने वाला, सार की तलाश में घूमते हुए एक तीखी कुल्हाड़ी लेकर वन में प्रवेश करे। वह वहाँ एक विशाल, सीधे, नए और बिना सड़न वाले केले के तने को देखे। वह उसे जड़ से काट दे; जड़ से काटकर अग्र भाग (ऊपरी हिस्सा) काट दे; अग्र भाग काटकर पत्तों की परतों को अलग करे। उसे वहाँ सार तो क्या, छाल (असार लकड़ी) भी प्राप्त नहीं होगी। हे आवुसो! इसी प्रकार भिक्षु छह स्पर्श-आयतन (इन्द्रियों) में न तो आत्मा को देखता है और न ही आत्मीय (आत्मा से संबंधित) को। वह इस प्रकार न देखते हुए लोक में किसी भी चीज़ के प्रति आसक्त नहीं होता। आसक्ति न होने पर वह व्याकुल नहीं होता। व्याकुल न होने पर वह स्वयं ही परिनिर्वाण प्राप्त कर लेता है। वह जान लेता है— 'जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है'।" सातवाँ सुत्त। ๘. อาทิตฺตปริยายสุตฺตํ ८. आदित्तपरियाय सुत्त ๒๓๕. ‘‘อาทิตฺตปริยายํ โว, ภิกฺขเว, ธมฺมปริยายํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, อาทิตฺตปริยาโย, ธมฺมปริยาโย? วรํ, ภิกฺขเว, ตตฺตาย อโยสลากาย อาทิตฺตาย สมฺปชฺชลิตาย สโชติภูตาย จกฺขุนฺทฺริยํ สมฺปลิมฏฺฐํ, น ตฺเวว จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ อนุพฺยญฺชนโส นิมิตฺตคฺคาโห. นิมิตฺตสฺสาทคถิตํ วา, ภิกฺขเว, วิญฺญาณํ ติฏฺฐมานํ ติฏฺเฐยฺย, อนุพฺยญฺชนสฺสาทคถิตํ วา ตสฺมิญฺเจ สมเย กาลํ กเรยฺย, ฐานเมตํ วิชฺชติ, ยํ ทฺวินฺนํ คตีนํ อญฺญตรํ คตึ คจฺเฉยฺย – นิรยํ วา, ติรจฺฉานโยนึ วา. อิมํ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อาทีนวํ ทิสฺวา เอวํ วทามิ. २३५. "भिक्षुओं! मैं तुम्हें 'आदित्तपरियाय' (प्रदीप्त होने का पर्याय) नामक धर्म-उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! आदित्तपरियाय धर्म-उपदेश क्या है? भिक्षुओं! तपती हुई, प्रदीप्त, प्रज्वलित और ज्योतिर्मय लोहे की शलाका से चक्षु-इन्द्रिय (आँख) को बिंधवा लेना श्रेष्ठ है, किन्तु चक्षु-विज्ञान द्वारा जानने योग्य रूपों के निमित्त (मुख्य लक्षण) और अनुव्यंजन (बारीक विवरण) को ग्रहण करना श्रेष्ठ नहीं है। भिक्षुओं! यदि निमित्त के आस्वाद में फँसा हुआ या अनुव्यंजन के आस्वाद में फँसा हुआ विज्ञान (चित्त) स्थित रहे, और उस समय यदि वह (प्राणी) काल कर जाए (मर जाए), तो यह संभव है कि वह दो गतियों में से किसी एक गति को प्राप्त हो—नरक या तिर्यक योनि (पशु योनि)। भिक्षुओं! मैं इस दोष को देखकर ही ऐसा कहता हूँ।" ‘‘วรํ, ภิกฺขเว, ติณฺเหน อโยสงฺกุนา อาทิตฺเตน สมฺปชฺชลิเตน สโชติภูเตน โสตินฺทฺริยํ สมฺปลิมฏฺฐํ, น ตฺเวว โสตวิญฺเญยฺเยสุ สทฺเทสุ อนุพฺยญฺชนโส นิมิตฺตคฺคาโห. นิมิตฺตสฺสาทคถิตํ วา, ภิกฺขเว, วิญฺญาณํ ติฏฺฐมานํ ติฏฺเฐยฺย, อนุพฺยญฺชนสฺสาทคถิตํ วา ตสฺมิญฺเจ สมเย กาลงฺกเรยฺย, ฐานเมตํ วิชฺชติ, ยํ ทฺวินฺนํ คตีนํ อญฺญตรํ คตึ คจฺเฉยฺย – นิรยํ วา ติรจฺฉานโยนึ วา. อิมํ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อาทีนวํ ทิสฺวา เอวํ วทามิ. "भिक्षुओं! तीखे, तपते हुए, प्रज्वलित और ज्योतिर्मय लोहे के शंकु (कील) से श्रोत्र-इन्द्रिय (कान) को बिंधवा लेना श्रेष्ठ है, किन्तु श्रोत्र-विज्ञान द्वारा जानने योग्य शब्दों के निमित्त और अनुव्यंजन को ग्रहण करना श्रेष्ठ नहीं है। भिक्षुओं! यदि निमित्त के आस्वाद में फँसा हुआ या अनुव्यंजन के आस्वाद में फँसा हुआ विज्ञान स्थित रहे, और उस समय यदि वह काल कर जाए, तो यह संभव है कि वह दो गतियों में से किसी एक गति को प्राप्त हो—नरक या तिर्यक योनि। भिक्षुओं! मैं इस दोष को देखकर ही ऐसा कहता हूँ।" ‘‘วรํ[Pg.378], ภิกฺขเว, ติณฺเหน นขจฺเฉทเนน อาทิตฺเตน สมฺปชฺชลิเตน สโชติภูเตน ฆานินฺทฺริยํ สมฺปลิมฏฺฐํ, น ตฺเวว ฆานวิญฺเญยฺเยสุ คนฺเธสุ อนุพฺยญฺชนโส นิมิตฺตคฺคาโห. นิมิตฺตสฺสาทคถิตํ วา, ภิกฺขเว, วิญฺญาณํ ติฏฺฐมานํ ติฏฺเฐยฺย, อนุพฺยญฺชนสฺสาทคถิตํ วา ตสฺมิญฺเจ สมเย กาลํ กเรยฺย. ฐานเมตํ วิชฺชติ, ยํ ทฺวินฺนํ คตีนํ อญฺญตรํ คตึ คจฺเฉยฺย – นิรยํ วา ติรจฺฉานโยนึ วา. อิมํ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อาทีนวํ ทิสฺวา เอวํ วทามิ. "भिक्षुओं! तीखे, तपते हुए, प्रज्वलित और ज्योतिर्मय नख-कर्तनी (नाखून काटने वाले औजार) से घ्राण-इन्द्रिय (नाक) को बिंधवा लेना श्रेष्ठ है, किन्तु घ्राण-विज्ञान द्वारा जानने योग्य गंधों के निमित्त और अनुव्यंजन को ग्रहण करना श्रेष्ठ नहीं है। भिक्षुओं! यदि निमित्त के आस्वाद में फँसा हुआ या अनुव्यंजन के आस्वाद में फँसा हुआ विज्ञान स्थित रहे, और उस समय यदि वह काल कर जाए, तो यह संभव है कि वह दो गतियों में से किसी एक गति को प्राप्त हो—नरक या तिर्यक योनि। भिक्षुओं! मैं इस दोष को देखकर ही ऐसा कहता हूँ।" ‘‘วรํ, ภิกฺขเว, ติณฺเหน ขุเรน อาทิตฺเตน สมฺปชฺชลิเตน สโชติภูเตน ชิวฺหินฺทฺริยํ สมฺปลิมฏฺฐํ, น ตฺเวว ชิวฺหาวิญฺเญยฺเยสุ รเสสุ อนุพฺยญฺชนโส นิมิตฺตคฺคาโห. นิมิตฺตสฺสาทคถิตํ วา, ภิกฺขเว, วิญฺญาณํ ติฏฺฐมานํ ติฏฺเฐยฺย, อนุพฺยญฺชนสฺสาทคถิตํ วา ตสฺมิญฺเจ สมเย กาลํ กเรยฺย. ฐานเมตํ วิชฺชติ, ยํ ทฺวินฺนํ คตีนํ อญฺญตรํ คตึ คจฺเฉยฺย – นิรยํ วา ติรจฺฉานโยนึ วา. อิมํ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อาทีนวํ ทิสฺวา เอวํ วทามิ. "भिक्षुओं! तीखे, तपते हुए, प्रज्वलित और ज्योतिर्मय उस्तरे (क्षुर) से जिह्वा-इन्द्रिय (जीभ) को कटवा लेना श्रेष्ठ है, किन्तु जिह्वा-विज्ञान द्वारा जानने योग्य रसों के निमित्त और अनुव्यंजन को ग्रहण करना श्रेष्ठ नहीं है। भिक्षुओं! यदि निमित्त के आस्वाद में फँसा हुआ या अनुव्यंजन के आस्वाद में फँसा हुआ विज्ञान स्थित रहे, और उस समय यदि वह काल कर जाए, तो यह संभव है कि वह दो गतियों में से किसी एक गति को प्राप्त हो—नरक या तिर्यक योनि। भिक्षुओं! मैं इस दोष को देखकर ही ऐसा कहता हूँ।" ‘‘วรํ, ภิกฺขเว, ติณฺหาย สตฺติยา อาทิตฺตาย สมฺปชฺชลิตาย สโชติภูตาย กายินฺทฺริยํ สมฺปลิมฏฺฐํ, น ตฺเวว กายวิญฺเญยฺเยสุ โผฏฺฐพฺเพสุ อนุพฺยญฺชนโส นิมิตฺตคฺคาโห. นิมิตฺตสฺสาทคถิตํ วา, ภิกฺขเว, วิญฺญาณํ ติฏฺฐมานํ ติฏฺเฐยฺย, อนุพฺยญฺชนสฺสาทคถิตํ วา ตสฺมิญฺเจ สมเย กาลํ กเรยฺย. ฐานเมตํ วิชฺชติ, ยํ ทฺวินฺนํ คตีนํ อญฺญตรํ คตึ คจฺเฉยฺย – นิรยํ วา ติรจฺฉานโยนึ วา. อิมํ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อาทีนวํ ทิสฺวา เอวํ วทามิ. "भिक्षुओं! तीखी, तपती हुई, प्रज्वलित और ज्योतिर्मय शक्ति (भाले) से काय-इन्द्रिय (शरीर) को बिंधवा लेना श्रेष्ठ है, किन्तु काय-विज्ञान द्वारा जानने योग्य स्पर्शों के निमित्त और अनुव्यंजन को ग्रहण करना श्रेष्ठ नहीं है। भिक्षुओं! यदि निमित्त के आस्वाद में फँसा हुआ या अनुव्यंजन के आस्वाद में फँसा हुआ विज्ञान स्थित रहे, और उस समय यदि वह काल कर जाए, तो यह संभव है कि वह दो गतियों में से किसी एक गति को प्राप्त हो—नरक या तिर्यक योनि। भिक्षुओं! मैं इस दोष को देखकर ही ऐसा कहता हूँ।" ‘‘วรํ, ภิกฺขเว, โสตฺตํ. โสตฺตํ โข ปนาหํ, ภิกฺขเว, วญฺฌํ ชีวิตานํ วทามิ, อผลํ ชีวิตานํ วทามิ, โมมูหํ ชีวิตานํ วทามิ, น ตฺเวว ตถารูเป วิตกฺเก วิตกฺเกยฺย ยถารูปานํ วิตกฺกานํ วสํ คโต สงฺฆํ ภินฺเทยฺย. อิมํ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, วญฺฌํ ชีวิตานํ อาทีนวํ ทิสฺวา เอวํ วทามิ. "भिक्षुओं! सो जाना (नींद) श्रेष्ठ है। भिक्षुओं! मैं जीवित प्राणियों के लिए नींद को बाँझ (निष्फल) कहता हूँ, नींद को फलहीन कहता हूँ, नींद को अत्यंत मोहपूर्ण कहता हूँ; किन्तु ऐसे वितर्कों (विचारों) को नहीं करना चाहिए जिनके वश में होकर कोई संघ में भेद (विभाजन) उत्पन्न कर दे। भिक्षुओं! मैं जीवित प्राणियों के लिए इस दोष को देखकर ही ऐसा कहता हूँ।" ‘‘ตตฺถ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘ติฏฺฐตุ ตาว ตตฺตาย อโยสลากาย อาทิตฺตาย สมฺปชฺชลิตาย สโชติภูตาย จกฺขุนฺทฺริยํ สมฺปลิมฏฺฐํ. หนฺทาหํ อิทเมว มนสิ กโรมิ – อิติ จกฺขุ อนิจฺจํ, รูปา อนิจฺจา, จกฺขุวิญฺญาณํ อนิจฺจํ, จกฺขุสมฺผสฺโส อนิจฺโจ, ยมฺปิทํ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ’’’. "भिक्षुओं! वहाँ श्रुतवान आर्य-श्रावक इस प्रकार विचार करता है— 'तपती हुई, प्रदीप्त, प्रज्वलित और ज्योतिर्मय लोहे की शलाका से चक्षु-इन्द्रिय का बिंधना तो दूर रहे, अब मैं इसी बात को मन में धारण करूँगा कि— चक्षु अनित्य है, रूप अनित्य हैं, चक्षु-विज्ञान अनित्य है, चक्षु-स्पर्श अनित्य है, और चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय (कारण) से जो भी सुखद, दुःखद या न-दुःखद-न-सुखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी अनित्य है'।" ‘‘ติฏฺฐตุ [Pg.379] ตาว ติณฺเหน อโยสงฺกุนา อาทิตฺเตน สมฺปชฺชลิเตน สโชติภูเตน โสตินฺทฺริยํ สมฺปลิมฏฺฐํ. หนฺทาหํ อิทเมว มนสิ กโรมิ – อิติ โสตํ อนิจฺจํ, สทฺทา อนิจฺจา, โสตวิญฺญาณํ อนิจฺจํ, โสตสมฺผสฺโส อนิจฺโจ, ยมฺปิทํ โสตสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ. "अत्यंत तीक्ष्ण, प्रज्वलित, देदीप्यमान और ज्वालाओं से युक्त लोहे की शलाका से श्रोत्रेन्द्रिय (कान) को बींध दिया जाना तो दूर रहे, अब मैं इसी बात का मनन करता हूँ—'श्रोत्र अनित्य है, शब्द अनित्य हैं, श्रोत्र-विज्ञान अनित्य है, श्रोत्र-स्पर्श अनित्य है, और श्रोत्र-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी अनित्य है'।" ‘‘ติฏฺฐตุ ตาว ติณฺเหน นขจฺเฉทเนน อาทิตฺเตน สมฺปชฺชลิเตน สโชติภูเตน ฆานินฺทฺริยํ สมฺปลิมฏฺฐํ. หนฺทาหํ อิทเมว มนสิ กโรมิ – อิติ ฆานํ อนิจฺจํ, คนฺธา อนิจฺจา, ฆานวิญฺญาณํ อนิจฺจํ, ฆานสมฺผสฺโส อนิจฺโจ, ยมฺปิทํ ฆานสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ…เป… ตมฺปิ อนิจฺจํ. "अत्यंत तीक्ष्ण, प्रज्वलित, देदीप्यमान और ज्वालाओं से युक्त नख-कर्तनी (नख काटने वाले शस्त्र) से घ्राणेन्द्रिय (नाक) को बींध दिया जाना तो दूर रहे, अब मैं इसी बात का मनन करता हूँ—'घ्राण अनित्य है, गंध अनित्य हैं, घ्राण-विज्ञान अनित्य है, घ्राण-स्पर्श अनित्य है, और घ्राण-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी वेदना उत्पन्न होती है... वह भी अनित्य है'।" ‘‘ติฏฺฐตุ ตาว ติณฺเหน ขุเรน อาทิตฺเตน สมฺปชฺชลิเตน สโชติภูเตน ชิวฺหินฺทฺริยํ สมฺปลิมฏฺฐํ. หนฺทาหํ อิทเมว มนสิ กโรมิ – อิติ ชิวฺหา อนิจฺจา, รสา อนิจฺจา, ชิวฺหาวิญฺญาณํ อนิจฺจํ, ชิวฺหาสมฺผสฺโส อนิจฺโจ, ยมฺปิทํ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ…เป… ตมฺปิ อนิจฺจํ. "अत्यंत तीक्ष्ण, प्रज्वलित, देदीप्यमान और ज्वालाओं से युक्त क्षुर (उस्तरे) से जिह्वेन्द्रिय (जीभ) को काट दिया जाना तो दूर रहे, अब मैं इसी बात का मनन करता हूँ—'जिह्वा अनित्य है, रस अनित्य हैं, जिह्वा-विज्ञान अनित्य है, जिह्वा-स्पर्श अनित्य है, और जिह्वा-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी उत्पन्न होता है... वह भी अनित्य है'।" ‘‘ติฏฺฐตุ ตาว ติณฺหาย สตฺติยา อาทิตฺตาย สมฺปชฺชลิตาย สโชติภูตาย กายินฺทฺริยํ สมฺปลิมฏฺฐํ. หนฺทาหํ อิทเมว มนสิ กโรมิ – อิติ กาโย อนิจฺโจ, โผฏฺฐพฺพา อนิจฺจา, กายวิญฺญาณํ อนิจฺจํ, กายสมฺผสฺโส อนิจฺโจ, ยมฺปิทํ กายสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ…เป… ตมฺปิ อนิจฺจํ. "अत्यंत तीक्ष्ण, प्रज्वलित, देदीप्यमान और ज्वालाओं से युक्त शक्ति (भाले) से कायेन्द्रिय (शरीर) को बींध दिया जाना तो दूर रहे, अब मैं इसी बात का मनन करता हूँ—'काय अनित्य है, स्प्रष्टव्य अनित्य हैं, काय-विज्ञान अनित्य है, काय-स्पर्श अनित्य है, और काय-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी वेदना उत्पन्न होती है... वह भी अनित्य है'।" ‘‘ติฏฺฐตุ ตาว โสตฺตํ. หนฺทาหํ อิทเมว มนสิ กโรมิ – อิติ มโน อนิจฺโจ, ธมฺมา อนิจฺจา, มโนวิญฺญาณํ อนิจฺจํ, มโนสมฺผสฺโส อนิจฺโจ, ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตมฺปิ อนิจฺจํ’’. "सोते रहना तो दूर रहे, अब मैं इसी बात का मनन करता हूँ—'मन अनित्य है, धम्म अनित्य हैं, मनो-विज्ञान अनित्य है, मनो-स्पर्श अनित्य है, और मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, वह भी अनित्य है'।" ‘‘เอวํ ปสฺสํ, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก จกฺขุสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, รูเปสุปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุวิญฺญาเณปิ นิพฺพินฺทติ, จกฺขุสมฺผสฺเสปิ นิพฺพินฺทติ…เป… ยมฺปิทํ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา ตสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาติ. อยํ โข, ภิกฺขเว, อาทิตฺตปริยาโย, ธมฺมปริยาโย’’ติ. อฏฺฐมํ. "भिक्षुओं! इस प्रकार देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक चक्षु से भी निर्वेद (वैराग्य) प्राप्त करता है, रूपों से भी निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-विज्ञान से भी निर्वेद प्राप्त करता है, चक्षु-स्पर्श से भी निर्वेद प्राप्त करता है... मनो-स्पर्श के प्रत्यय से जो भी सुखद, दुःखद या न-सुखद-न-दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, उससे भी निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद प्राप्त कर वह विरक्त होता है; विरक्त होने से वह मुक्त हो जाता है; मुक्त होने पर 'मैं मुक्त हूँ' ऐसा ज्ञान होता है। वह जान लेता है—'जन्म क्षीण हो गया, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया, जो करना था वह कर लिया गया, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है।' भिक्षुओं! यह 'आदित्त-पर्याय' नामक धर्म-पर्याय है।" आठवाँ (सूत्र)। ๙. ปฐมหตฺถปาโทปมสุตฺตํ ९. प्रथम हस्त-पादोपम सूत्र ๒๓๖. ‘‘หตฺเถสุ[Pg.380], ภิกฺขเว, สติ อาทานนิกฺเขปนํ ปญฺญายติ; ปาเทสุ สติ อภิกฺกมปฏิกฺกโม ปญฺญายติ; ปพฺเพสุ สติ สมิญฺชนปสารณํ ปญฺญายติ; กุจฺฉิสฺมึ สติ ชิฆจฺฉา ปิปาสา ปญฺญายติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, จกฺขุสฺมึ สติ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺขํ…เป… ชิวฺหาย สติ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺขํ…เป… มนสฺมึ สติ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺขํ…เป…. २३६. "भिक्षुओं! हाथों के होने पर लेना और रखना दिखाई देता है; पैरों के होने पर आगे बढ़ना और पीछे हटना दिखाई देता है; पोरों (जोड़ों) के होने पर सिकोड़ना और फैलाना दिखाई देता है; कुक्षि (पेट) के होने पर भूख और प्यास दिखाई देती है। इसी प्रकार, भिक्षुओं! चक्षु के होने पर चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय से भीतर सुख और दुःख उत्पन्न होता है... जिह्वा के होने पर जिह्वा-स्पर्श के प्रत्यय से भीतर सुख और दुःख उत्पन्न होता है... मन के होने पर मनो-स्पर्श के प्रत्यय से भीतर सुख और दुःख उत्पन्न होता है...।" ‘‘หตฺเถสุ, ภิกฺขเว, อสติ อาทานนิกฺเขปนํ น ปญฺญายติ; ปาเทสุ อสติ อภิกฺกมปฏิกฺกโม น ปญฺญายติ; ปพฺเพสุ อสติ สมิญฺชนปสารณํ น ปญฺญายติ; กุจฺฉิสฺมึ อสติ ชิฆจฺฉา ปิปาสา น ปญฺญายติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, จกฺขุสฺมึ อสติ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา นุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺขํ…เป… ชิวฺหาย อสติ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา นุปฺปชฺชติ…เป… มนสฺมึ อสติ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา นุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺข’’นฺติ. นวมํ. "भिक्षुओं! हाथों के न होने पर लेना और रखना दिखाई नहीं देता; पैरों के न होने पर आगे बढ़ना और पीछे हटना दिखाई नहीं देता; पोरों के न होने पर सिकोड़ना और फैलाना दिखाई नहीं देता; कुक्षि के न होने पर भूख और प्यास दिखाई नहीं देती। इसी प्रकार, भिक्षुओं! चक्षु के न होने पर चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय से भीतर सुख और दुःख उत्पन्न नहीं होता... जिह्वा के न होने पर जिह्वा-स्पर्श के प्रत्यय से उत्पन्न नहीं होता... मन के न होने पर मनो-स्पर्श के प्रत्यय से भीतर सुख और दुःख उत्पन्न नहीं होता।" नवाँ (सूत्र)। ๑๐. ทุติยหตฺถปาโทปมสุตฺตํ १०. द्वितीय हस्त-पादोपम सूत्र ๒๓๗. ‘‘หตฺเถสุ, ภิกฺขเว, สติ อาทานนิกฺเขปนํ โหติ; ปาเทสุ สติ อภิกฺกมปฏิกฺกโม โหติ; ปพฺเพสุ สติ สมิญฺชนปสารณํ โหติ; กุจฺฉิสฺมึ สติ ชิฆจฺฉา ปิปาสา โหติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, จกฺขุสฺมึ สติ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺขํ…เป… ชิวฺหาย สติ…เป… มนสฺมึ สติ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา อุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺขํ…เป…. २३७. "भिक्षुओं! हाथों के होने पर लेना और रखना होता है; पैरों के होने पर आगे बढ़ना और पीछे हटना होता है; पोरों के होने पर सिकोड़ना और फैलाना होता है; कुक्षि के होने पर भूख और प्यास होती है। इसी प्रकार, भिक्षुओं! चक्षु के होने पर चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय से भीतर सुख और दुःख उत्पन्न होता है... जिह्वा के होने पर... मन के होने पर मनो-स्पर्श के प्रत्यय से भीतर सुख और दुःख उत्पन्न होता है...।" ‘‘หตฺเถสุ, ภิกฺขเว, อสติ อาทานนิกฺเขปนํ น โหติ; ปาเทสุ อสติ อภิกฺกมปฏิกฺกโม น โหติ; ปพฺเพสุ อสติ สมิญฺชนปสารณํ น โหติ; กุจฺฉิสฺมึ อสติ ชิฆจฺฉา ปิปาสา น โหติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, จกฺขุสฺมึ อสติ จกฺขุสมฺผสฺสปจฺจยา นุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺขํ…เป… ชิวฺหาย อสติ ชิวฺหาสมฺผสฺสปจฺจยา นุปฺปชฺชติ…เป… มนสฺมึ อสติ มโนสมฺผสฺสปจฺจยา นุปฺปชฺชติ อชฺฌตฺตํ สุขํ ทุกฺข’’นฺติ. ทสมํ. "भिक्षुओं! हाथों के न होने पर लेना और रखना नहीं होता; पैरों के न होने पर आगे बढ़ना और पीछे हटना नहीं होता; पोरों के न होने पर सिकोड़ना और फैलाना नहीं होता; कुक्षि के न होने पर भूख और प्यास नहीं होती। इसी प्रकार, भिक्षुओं! चक्षु के न होने पर चक्षु-स्पर्श के प्रत्यय से भीतर सुख और दुःख उत्पन्न नहीं होता... जिह्वा के न होने पर जिह्वा-स्पर्श के प्रत्यय से उत्पन्न नहीं होता... मन के न होने पर मनो-स्पर्श के प्रत्यय से भीतर सुख और दुःख उत्पन्न नहीं होता।" दसवाँ (सूत्र)। สมุทฺทวคฺโค อฏฺฐรสโม. अठारहवाँ समुद्र वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान) — ทฺเว [Pg.381] สมุทฺทา พาฬิสิโก, ขีรรุกฺเขน โกฏฺฐิโก; กามภู อุทายี เจว, อาทิตฺเตน จ อฏฺฐมํ; หตฺถปาทูปมา ทฺเวติ, วคฺโค เตน ปวุจฺจตีติ. दो समुद्र (सूत्र), बालिशिक, क्षीरवृक्ष, कोष्ठिक, कामभू, उदायी और आठवाँ आदित्त (सूत्र); दो हस्त-पादोपम सूत्र—इनसे यह वर्ग कहा जाता है। ๑๙. อาสีวิสวคฺโค १९. आसीविस वर्ग ๑. อาสีวิโสปมสุตฺตํ १. आसीविसोमप सूत्र ๒๓๘. ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, จตฺตาโร อาสีวิสา อุคฺคเตชา โฆรวิสา. อถ ปุริโส อาคจฺเฉยฺย ชีวิตุกาโม อมริตุกาโม สุขกาโม ทุกฺขปฺปฏิกูโล. ตเมนํ เอวํ วเทยฺยุํ – ‘อิเม เต, อมฺโภ ปุริส, จตฺตาโร อาสีวิสา อุคฺคเตชา โฆรวิสา กาเลน กาลํ วุฏฺฐาเปตพฺพา, กาเลน กาลํ นฺหาเปตพฺพา, กาเลน กาลํ โภเชตพฺพา, กาเลน กาลํ สํเวเสตพฺพา. ยทา จ โข เต, อมฺโภ ปุริส, อิเมสํ จตุนฺนํ อาสีวิสานํ อุคฺคเตชานํ โฆรวิสานํ อญฺญตโร วา อญฺญตโร วา กุปฺปิสฺสติ, ตโต ตฺวํ, อมฺโภ ปุริส, มรณํ วา นิคจฺฉสิ, มรณมตฺตํ วา ทุกฺขํ. ยํ เต, อมฺโภ ปุริส, กรณียํ ตํ กโรหี’’’ติ. २३८. "भिक्षुओं, जैसे चार अत्यंत विषैले और भयानक विष वाले सर्प हों। तब कोई मनुष्य आए जो जीवित रहना चाहता हो, मरना न चाहता हो, सुख का इच्छुक हो और दुःख से घृणा करता हो। उससे लोग ऐसा कहें— 'हे पुरुष, ये चार अत्यंत विषैले और भयानक विष वाले सर्प हैं, जिन्हें समय-समय पर उठाना चाहिए, समय-समय पर नहलाना चाहिए, समय-समय पर खिलाना चाहिए और समय-समय पर सुलाना चाहिए। हे पुरुष, जब इन चार अत्यंत विषैले और भयानक विष वाले सर्पों में से कोई एक भी क्रोधित होगा, तब हे पुरुष, तुम मृत्यु को प्राप्त होगे या मृत्यु के समान दुःख को। हे पुरुष, जो तुम्हें करना चाहिए, वह करो'।" ‘‘อถ โข โส, ภิกฺขเว, ปุริโส ภีโต จตุนฺนํ อาสีวิสานํ อุคฺคเตชานํ โฆรวิสานํ เยน วา เตน วา ปลาเยถ. ตเมนํ เอวํ วเทยฺยุํ – ‘อิเม โข, อมฺโภ ปุริส, ปญฺจ วธกา ปจฺจตฺถิกา ปิฏฺฐิโต ปิฏฺฐิโต อนุพนฺธา, ยตฺเถว นํ ปสฺสิสฺสาม ตตฺเถว ชีวิตา โวโรเปสฺสามาติ. ยํ เต, อมฺโภ ปุริส, กรณียํ ตํ กโรหี’’’ติ. "तब, भिक्षुओं, वह पुरुष उन चार अत्यंत विषैले और भयानक विष वाले सर्पों से डरकर इधर-उधर भागने लगे। उससे लोग ऐसा कहें— 'हे पुरुष, ये पाँच हत्यारे शत्रु तुम्हारे पीछे-पीछे लगे हुए हैं, वे जहाँ भी तुम्हें देखेंगे, वहीं तुम्हारे प्राण ले लेंगे। हे पुरुष, जो तुम्हें करना चाहिए, वह करो'।" ‘‘อถ โข โส, ภิกฺขเว, ปุริโส ภีโต จตุนฺนํ อาสีวิสานํ อุคฺคเตชานํ โฆรวิสานํ, ภีโต ปญฺจนฺนํ วธกานํ ปจฺจตฺถิกานํ เยน วา เตน วา ปลาเยถ. ตเมนํ เอวํ วเทยฺยุํ – ‘อยํ เต, อมฺโภ ปุริส, ฉฏฺโฐ อนฺตรจโร วธโก อุกฺขิตฺตาสิโก ปิฏฺฐิโต ปิฏฺฐิโต อนุพนฺโธ ยตฺเถว นํ ปสฺสิสฺสามิ ตตฺเถว สิโร ปาเตสฺสามีติ. ยํ เต, อมฺโภ ปุริส, กรณียํ ตํ กโรหี’’’ติ. "तब, भिक्षुओं, वह पुरुष उन चार अत्यंत विषैले सर्पों से डरकर और उन पाँच हत्यारे शत्रुओं से डरकर इधर-उधर भागने लगे। उससे लोग ऐसा कहें— 'हे पुरुष, यह छठा भीतर रहने वाला हत्यारा हाथ में तलवार लिए तुम्हारे पीछे-पीछे लगा हुआ है, वह जहाँ भी तुम्हें देखेगा, वहीं तुम्हारा सिर काट देगा। हे पुरुष, जो तुम्हें करना चाहिए, वह करो'।" ‘‘อถ [Pg.382] โข โส, ภิกฺขเว, ปุริโส ภีโต จตุนฺนํ อาสีวิสานํ อุคฺคเตชานํ โฆรวิสานํ, ภีโต ปญฺจนฺนํ วธกานํ ปจฺจตฺถิกานํ, ภีโต ฉฏฺฐสฺส อนฺตรจรสฺส วธกสฺส อุกฺขิตฺตาสิกสฺส เยน วา เตน วา ปลาเยถ. โส ปสฺเสยฺย สุญฺญํ คามํ. ยญฺญเทว ฆรํ ปวิเสยฺย ริตฺตกญฺเญว ปวิเสยฺย ตุจฺฉกญฺเญว ปวิเสยฺย สุญฺญกญฺเญว ปวิเสยฺย. ยญฺญเทว ภาชนํ ปริมเสยฺย ริตฺตกญฺเญว ปริมเสยฺย ตุจฺฉกญฺเญว ปริมเสยฺย สุญฺญกญฺเญว ปริมเสยฺย. ตเมนํ เอวํ วเทยฺยุํ – ‘อิทานิ, อมฺโภ ปุริส, อิมํ สุญฺญํ คามํ โจรา คามฆาตกา ปวิสนฺติ. ยํ เต, อมฺโภ ปุริส, กรณียํ ตํ กโรหี’’’ติ. "तब, भिक्षुओं, वह पुरुष उन चार अत्यंत विषैले सर्पों से डरकर, उन पाँच हत्यारे शत्रुओं से डरकर और उस हाथ में तलवार लिए छठे भीतर रहने वाले हत्यारे से डरकर इधर-उधर भागने लगे। उसे एक शून्य गाँव दिखाई दे। वह जिस भी घर में प्रवेश करे, वह उसे रिक्त ही मिले, तुच्छ ही मिले, शून्य ही मिले। वह जिस भी पात्र को टटोले, वह उसे रिक्त ही मिले, तुच्छ ही मिले, शून्य ही मिले। उससे लोग ऐसा कहें— 'हे पुरुष, अब इस शून्य गाँव में गाँव को लूटने वाले डाकू प्रवेश कर रहे हैं। हे पुरुष, जो तुम्हें करना चाहिए, वह करो'।" ‘‘อถ โข โส, ภิกฺขเว, ปุริโส ภีโต จตุนฺนํ อาสีวิสานํ อุคฺคเตชานํ โฆรวิสานํ, ภีโต ปญฺจนฺนํ วธกานํ ปจฺจตฺถิกานํ, ภีโต ฉฏฺฐสฺส อนฺตรจรสฺส วธกสฺส อุกฺขิตฺตาสิกสฺส, ภีโต โจรานํ คามฆาตกานํ เยน วา เตน วา ปลาเยถ. โส ปสฺเสยฺย มหนฺตํ อุทกณฺณวํ โอริมํ ตีรํ สาสงฺกํ สปฺปฏิภยํ, ปาริมํ ตีรํ เขมํ อปฺปฏิภยํ. น จสฺส นาวา สนฺตารณี อุตฺตรเสตุ วา อปารา ปารํ คมนาย. อถ โข, ภิกฺขเว, ตสฺส ปุริสสฺส เอวมสฺส – ‘อยํ โข มหาอุทกณฺณโว โอริมํ ตีรํ สาสงฺกํ สปฺปฏิภยํ, ปาริมํ ตีรํ เขมํ อปฺปฏิภยํ, นตฺถิ จ นาวา สนฺตารณี อุตฺตรเสตุ วา อปารา ปารํ คมนาย. ยํนูนาหํ ติณกฏฺฐสาขาปลาสํ สํกฑฺฒิตฺวา กุลฺลํ พนฺธิตฺวา ตํ กุลฺลํ นิสฺสาย หตฺเถหิ จ ปาเทหิ จ วายมมาโน โสตฺถินา ปารํ คจฺเฉยฺย’’’นฺติ. "तब, भिक्षुओं, वह पुरुष उन चार अत्यंत विषैले सर्पों से डरकर, उन पाँच हत्यारे शत्रुओं से डरकर, उस छठे भीतर रहने वाले हत्यारे से डरकर और गाँव को लूटने वाले डाकुओं से डरकर इधर-उधर भागने लगे। उसे एक विशाल जलराशि दिखाई दे, जिसका निकटवर्ती तट संशयपूर्ण और भयावह हो, और पार का तट सुरक्षित और भयरहित हो। पार जाने के लिए न तो कोई नाव हो और न ही कोई पुल। तब, भिक्षुओं, उस पुरुष के मन में ऐसा विचार आए— 'यह विशाल जलराशि है, जिसका निकटवर्ती तट भयावह है और पार का तट सुरक्षित है, और पार जाने के लिए न कोई नाव है न पुल। क्यों न मैं घास, लकड़ी, शाखाओं और पत्तों को इकट्ठा कर एक बेड़ा बना लूँ और उस बेड़े के सहारे अपने हाथों और पैरों से प्रयास करते हुए कुशलतापूर्वक पार चला जाऊँ'।" ‘‘อถ โข โส, ภิกฺขเว, ปุริโส ติณกฏฺฐสาขาปลาสํ สํกฑฺฒิตฺวา กุลฺลํ พนฺธิตฺวา ตํ กุลฺลํ นิสฺสาย หตฺเถหิ จ ปาเทหิ จ วายมมาโน โสตฺถินา ปารํ คจฺเฉยฺย, ติณฺโณ ปารงฺคโต ถเล ติฏฺฐติ พฺราหฺมโณ. "तब, भिक्षुओं, वह पुरुष घास, लकड़ी, शाखाओं और पत्तों को इकट्ठा कर एक बेड़ा बना ले और उस बेड़े के सहारे अपने हाथों और पैरों से प्रयास करते हुए कुशलतापूर्वक पार चला जाए। वह पार पहुँचा हुआ, किनारे पर खड़ा हुआ 'ब्राह्मण' है।" ‘‘อุปมา โข มฺยายํ, ภิกฺขเว, กตา อตฺถสฺส วิญฺญาปนาย. อยญฺเจตฺถ อตฺโถ – จตฺตาโร อาสีวิสา อุคฺคเตชา โฆรวิสาติ โข, ภิกฺขเว, จตุนฺเนตํ มหาภูตานํ อธิวจนํ – ปถวีธาตุยา, อาโปธาตุยา, เตโชธาตุยา, วาโยธาตุยา. "भिक्षुओं, अर्थ को समझाने के लिए मैंने यह उपमा दी है। इसका अर्थ यह है— 'चार अत्यंत विषैले और भयानक विष वाले सर्प' यह चार महाभूतों का नाम है— पृथ्वी-धातु, आप-धातु, तेजो-धातु, और वायु-धातु।" ‘‘ปญฺจ [Pg.383] วธกา ปจฺจตฺถิกาติ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจนฺเนตํ อุปาทานกฺขนฺธานํ อธิวจนํ, เสยฺยถิทํ – รูปุปาทานกฺขนฺธสฺส, เวทนุปาทานกฺขนฺธสฺส, สญฺญุปาทานกฺขนฺธสฺส, สงฺขารุปาทานกฺขนฺธสฺส, วิญฺญาณุปาทานกฺขนฺธสฺส. "भिक्षुओं, 'पाँच हत्यारे शत्रु' यह पाँच उपादान-स्कंधों का नाम है, जैसे— रूप-उपादान-स्कंध, वेदना-उपादान-स्कंध, संज्ञा-उपादान-स्कंध, संस्कार-उपादान-स्कंध, और विज्ञान-उपादान-स्कंध।" ‘‘ฉฏฺโฐ อนฺตรจโร วธโก อุกฺขิตฺตาสิโกติ โข, ภิกฺขเว, นนฺทีราคสฺเสตํ อธิวจนํ. "भिक्षुओं, 'छठा भीतर रहने वाला हाथ में तलवार लिए हत्यारा' यह 'नंदीराग' का नाम है।" ‘‘สุญฺโญ คาโมติ โข, ภิกฺขเว, ฉนฺเนตํ อชฺฌตฺติกานํ อายตนานํ อธิวจนํ. จกฺขุโต เจปิ นํ, ภิกฺขเว, ปณฺฑิโต พฺยตฺโต เมธาวี อุปปริกฺขติ ริตฺตกญฺเญว ขายติ, ตุจฺฉกญฺเญว ขายติ, สุญฺญกญฺเญว ขายติ…เป… ชิวฺหาโต เจปิ นํ, ภิกฺขเว…เป… มนโต เจปิ นํ, ภิกฺขเว, ปณฺฑิโต พฺยตฺโต เมธาวี อุปปริกฺขติ ริตฺตกญฺเญว ขายติ, ตุจฺฉกญฺเญว ขายติ, สุญฺญกญฺเญว ขายติ. "भिक्षुओं, 'शून्य गाँव' यह छह आंतरिक आयतनों का नाम है। भिक्षुओं, यदि कोई विद्वान, चतुर और बुद्धिमान भिक्षु उसे आँख की दृष्टि से जाँचे, तो वह उसे रिक्त ही प्रतीत होता है, तुच्छ ही प्रतीत होता है, शून्य ही प्रतीत होता है... (पे)... जीभ की दृष्टि से... (पे)... मन की दृष्टि से भी यदि, भिक्षुओं, कोई विद्वान, चतुर और बुद्धिमान भिक्षु उसे जाँचे, तो वह उसे रिक्त ही प्रतीत होता है, तुच्छ ही प्रतीत होता है, शून्य ही प्रतीत होता है।" ‘‘โจรา คามฆาตกาติ โข, ภิกฺขเว, ฉนฺเนตํ พาหิรานํ อายตนานํ อธิวจนํ. จกฺขุ, ภิกฺขเว, หญฺญติ มนาปามนาเปสุ รูเปสุ; โสตํ, ภิกฺขเว…เป… ฆานํ, ภิกฺขเว…เป… ชิวฺหา, ภิกฺขเว, หญฺญติ มนาปามนาเปสุ รเสสุ; กาโย, ภิกฺขเว…เป… มโน, ภิกฺขเว, หญฺญติ มนาปามนาเปสุ ธมฺเมสุ. "भिक्षुओं! 'गाँव को नष्ट करने वाले लुटेरे'—यह छह बाहरी आयतनों का नाम है। भिक्षुओं! चक्षु (आँख) प्रिय और अप्रिय रूपों से आहत होता है; भिक्षुओं! श्रोत्र (कान)... घ्राण (नाक)... भिक्षुओं! जिह्वा (जीभ) प्रिय और अप्रिय रसों से आहत होती है; काया (शरीर)... भिक्षुओं! मन प्रिय और अप्रिय धर्मों से आहत होता है।" ‘‘มหา อุทกณฺณโวติ โข, ภิกฺขเว, จตุนฺเนตํ โอฆานํ อธิวจนํ – กาโมฆสฺส, ภโวฆสฺส, ทิฏฺโฐฆสฺส, อวิชฺโชฆสฺส. "भिक्षुओं! 'महा जल-सागर'—यह चार ओघों (बाढ़ों) का नाम है—काम-ओघ, भव-ओघ, दृष्टि-ओघ और अविद्या-ओघ।" ‘‘โอริมํ ตีรํ สาสงฺกํ สปฺปฏิภยนฺติ โข, ภิกฺขเว, สกฺกายสฺเสตํ อธิวจนํ. "भिक्षुओं! 'यह तट, जो शंकास्पद और भययुक्त है'—यह 'सत्काय' (पंच-उपादान-स्कंध) का नाम है।" ‘‘ปาริมํ ตีรํ เขมํ อปฺปฏิภยนฺติ โข, ภิกฺขเว, นิพฺพานสฺเสตํ อธิวจนํ. "भिक्षुओं! 'वह तट, जो सुरक्षित और भयरहित है'—यह निर्वाण का नाम है।" ‘‘กุลฺลนฺติ โข, ภิกฺขเว, อริยสฺเสตํ อฏฺฐงฺคิกสฺส มคฺคสฺส อธิวจนํ, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ…เป… สมฺมาสมาธิ. "भिक्षुओं! 'बेड़ा'—यह आर्य अष्टांगिक मार्ग का नाम है, जैसे कि—सम्यक दृष्टि... सम्यक समाधि।" ‘‘ตสฺส หตฺเถหิ จ ปาเทหิ จ วายาโมติ โข, ภิกฺขเว, วีริยารมฺภสฺเสตํ อธิวจนํ. "भिक्षुओं! 'हाथों और पैरों से किया गया उसका प्रयास'—यह वीर्य-आरंभ (पुरुषार्थ) का नाम है।" ‘‘ติณฺโณ ปารงฺคโต ถเล ติฏฺฐติ พฺราหฺมโณติ โข, ภิกฺขเว, อรหโต เอตํ อธิวจน’’นฺติ. ปฐมํ. "भिक्षुओं! 'वह ब्राह्मण जो पार कर गया है, दूसरे तट पर पहुँच गया है और स्थल पर खड़ा है'—यह अर्हत का नाम है।" (प्रथम सुत्त) ๒. รโถปมสุตฺตํ २. रथोपम सुत्त ๒๓๙. ‘‘ตีหิ[Pg.384], ภิกฺขเว, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต ภิกฺขุ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สุขโสมนสฺสพหุโล วิหรติ, โยนิ จสฺส อารทฺธา โหติ อาสวานํ ขยาย. กตเมหิ ตีหิ? อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวาโร โหติ, โภชเน มตฺตญฺญู, ชาคริยํ อนุยุตฺโต. २३९. "भिक्षुओं! तीन धर्मों से युक्त भिक्षु इसी जन्म में सुख और सौमनस्य के बाहुल्य के साथ विहार करता है, और आस्रवों के क्षय के लिए उसका प्रयत्न आरम्भ हो जाता है। वे तीन कौन से हैं? वह इंद्रियों में सुरक्षित द्वारों वाला होता है, भोजन में मात्रा जानने वाला होता है, और जागरण में लगा रहता है।" ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวาโร โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา น นิมิตฺตคฺคาหี โหติ, นานุพฺยญฺชนคฺคาหี; ยตฺวาธิกรณเมนํ จกฺขุนฺทฺริยํ อสํวุตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อนฺวาสฺสเวยฺยุํ. ตสฺส สํวราย ปฏิปชฺชติ; รกฺขติ จกฺขุนฺทฺริยํ; จกฺขุนฺทฺริเย สํวรํ อาปชฺชติ. โสเตน สทฺทํ สุตฺวา… ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตฺวา… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา… กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสิตฺวา… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย น นิมิตฺตคฺคาหี โหติ นานุพฺยญฺชนคฺคาหี; ยตฺวาธิกรณเมนํ มนินฺทฺริยํ อสํวุตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อนฺวาสฺสเวยฺยุํ, ตสฺส สํวราย ปฏิปชฺชติ; รกฺขติ มนินฺทฺริยํ; มนินฺทฺริเย สํวรํ อาปชฺชติ. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, สุภูมิยํ จาตุมหาปเถ อาชญฺญรโถ ยุตฺโต อสฺส ฐิโต โอธสฺตปโตโท. ตเมนํ ทกฺโข โยคฺคาจริโย อสฺสทมฺมสารถิ อภิรุหิตฺวา วาเมน หตฺเถน รสฺมิโย คเหตฺวา, ทกฺขิเณน หตฺเถน ปโตทํ คเหตฺวา, เยนิจฺฉกํ ยทิจฺฉกํ สาเรยฺยปิ ปจฺจาสาเรยฺยปิ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อิเมสํ ฉนฺนํ อินฺทฺริยานํ อารกฺขาย สิกฺขติ, สํยมาย สิกฺขติ, ทมาย สิกฺขติ, อุปสมาย สิกฺขติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวาโร โหติ. "और भिक्षुओं! भिक्षु इंद्रियों में सुरक्षित द्वारों वाला कैसे होता है? यहाँ, भिक्षुओं! भिक्षु आँख से रूप देखकर न तो उसके सामान्य लक्षणों को ग्रहण करता है और न ही उसके विवरणों को; क्योंकि यदि वह चक्षु-इंद्रिय को असंयत छोड़कर विहार करे, तो लोभ और दौर्मनस्य जैसे पापी अकुशल धर्म उसे घेर सकते हैं। वह उसके संयम के लिए अभ्यास करता है; चक्षु-इंद्रिय की रक्षा करता है; चक्षु-इंद्रिय में संयम प्राप्त करता है। कान से शब्द सुनकर... नाक से गंध सूंघकर... जीभ से रस चखकर... शरीर से स्पर्श का अनुभव कर... मन से धर्म जानकर न तो निमित्तग्राही होता है और न ही अनुव्यंजनग्राही; क्योंकि यदि वह मन-इंद्रिय को असंयत छोड़कर विहार करे, तो लोभ और दौर्मनस्य जैसे पापी अकुशल धर्म उसे घेर सकते हैं। वह उसके संयम के लिए अभ्यास करता है; मन-इंद्रिय की रक्षा करता है; मन-इंद्रिय में संयम प्राप्त करता है। भिक्षुओं! जैसे किसी समतल भूमि पर, चौराहे पर, एक उत्तम घोड़ों वाला रथ खड़ा हो और चाबुक तैयार हो। तब एक चतुर प्रशिक्षक, घोड़ों को वश में करने वाला सारथी, उस पर चढ़कर, बाएं हाथ से लगाम पकड़कर और दाएं हाथ से चाबुक लेकर, जहाँ चाहे और जैसे चाहे, उसे ले जा सके या वापस ला सके। इसी प्रकार, भिक्षुओं! भिक्षु इन छह इंद्रियों की रक्षा, संयम, दमन और शांति के लिए शिक्षा ग्रहण करता है। इस प्रकार, भिक्षुओं! भिक्षु इंद्रियों में सुरक्षित द्वारों वाला होता है।" ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ โภชเน มตฺตญฺญู โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ปฏิสงฺขา โยนิโส อาหารํ อาหาเรติ – ‘เนว ทวาย, น มทาย, น มณฺฑนาย, น วิภูสนาย, ยาวเทว อิมสฺส กายสฺส ฐิติยา, ยาปนาย, วิหึสูปรติยา, พฺรหฺมจริยานุคฺคหาย, อิติ ปุราณญฺจ เวทนํ ปฏิหงฺขามิ, นวญฺจ เวทนํ น อุปฺปาเทสฺสามิ, ยาตฺรา จ เม ภวิสฺสติ, อนวชฺชตา จ ผาสุวิหาโร จา’ติ. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ปุริโส วณํ อาลิมฺเปยฺย [Pg.385] ยาวเทว โรหนตฺถาย, เสยฺยถา วา ปน อกฺขํ อพฺภญฺเชยฺย ยาวเทว ภารสฺส นิตฺถรณตฺถาย; เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ปฏิสงฺขา โยนิโส อาหารํ อาหาเรติ – ‘เนว ทวาย, น มทาย, น มณฺฑนาย, น วิภูสนาย, ยาวเทว อิมสฺส กายสฺส ฐิติยา, ยาปนาย, วิหึสูปรติยา, พฺรหฺมจริยานุคฺคหาย, อิติ ปุราณญฺจ เวทนํ ปฏิหงฺขามิ, นวญฺจ เวทนํ น อุปฺปาเทสฺสามิ, ยาตฺรา จ เม ภวิสฺสติ, อนวชฺชตา จ ผาสุวิหาโร จา’ติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ โภชเน มตฺตญฺญู โหติ. "और भिक्षुओं! भिक्षु भोजन में मात्रा जानने वाला कैसे होता है? यहाँ, भिक्षुओं! भिक्षु विवेकपूर्वक विचार करके आहार ग्रहण करता है—'न तो मनोरंजन के लिए, न मद के लिए, न सजावट के लिए, न सुंदरता के लिए, बल्कि केवल इस शरीर की स्थिति और निर्वाह के लिए, कष्ट की निवृत्ति के लिए, और ब्रह्मचर्य के पालन के लिए। इस प्रकार मैं पुरानी वेदना को शांत करूँगा और नई वेदना उत्पन्न नहीं होने दूँगा, और मेरी जीवन-यात्रा निर्दोष और सुखद होगी।' भिक्षुओं! जैसे कोई पुरुष घाव पर केवल उसे भरने के लिए लेप लगाता है, या जैसे कोई बोझ ढोने के लिए धुरी में तेल लगाता है; इसी प्रकार, भिक्षुओं! भिक्षु विवेकपूर्वक विचार करके आहार ग्रहण करता है—'न तो मनोरंजन के लिए, न मद के लिए, न सजावट के लिए, न सुंदरता के लिए, बल्कि केवल इस शरीर की स्थिति, निर्वाह, कष्ट-निवारण और ब्रह्मचर्य के पालन के लिए। इस प्रकार मैं पुरानी वेदना को शांत करूँगा और नई वेदना उत्पन्न नहीं होने दूँगा, और मेरी जीवन-यात्रा निर्दोष और सुखद होगी।' इस प्रकार, भिक्षुओं! भिक्षु भोजन में मात्रा जानने वाला होता है।" ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ชาคริยํ อนุยุตฺโต โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ทิวสํ จงฺกเมน นิสชฺชาย อาวรณีเยหิ ธมฺเมหิ จิตฺตํ ปริโสเธติ. รตฺติยา ปฐมํ ยามํ จงฺกเมน นิสชฺชาย อาวรณีเยหิ ธมฺเมหิ จิตฺตํ ปริโสเธติ. รตฺติยา มชฺฌิมํ ยามํ ทกฺขิเณน ปสฺเสน สีหเสยฺยํ กปฺเปติ ปาเท ปาทํ อจฺจาธาย สโต สมฺปชาโน อุฏฺฐานสญฺญํ มนสิ กริตฺวา. รตฺติยา ปจฺฉิมํ ยามํ ปจฺจุฏฺฐาย จงฺกเมน นิสชฺชาย อาวรณีเยหิ ธมฺเมหิ จิตฺตํ ปริโสเธติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ชาคริยํ อนุยุตฺโต โหติ. อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ตีหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต ภิกฺขุ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สุขโสมนสฺสพหุโล วิหรติ, โยนิ จสฺส อารทฺธา โหติ อาสวานํ ขยายา’’ติ. ทุติยํ. "और भिक्षुओं! भिक्षु जागरण में लगा हुआ कैसे होता है? यहाँ, भिक्षुओं! भिक्षु दिन के समय चंक्रमण और बैठने के द्वारा बाधक धर्मों से अपने चित्त को शुद्ध करता है। रात्रि के प्रथम पहर में चंक्रमण और बैठने के द्वारा बाधक धर्मों से चित्त को शुद्ध करता है। रात्रि के मध्यम पहर में, वह दाहिनी करवट पर, एक पैर के ऊपर दूसरा पैर रखकर, स्मृतिवान और सचेत होकर, उठने के विचार को मन में रखकर 'सिंह-शय्या' लगाता है। रात्रि के अंतिम पहर में उठकर, चंक्रमण और बैठने के द्वारा बाधक धर्मों से चित्त को शुद्ध करता है। इस प्रकार, भिक्षुओं! भिक्षु जागरण में लगा हुआ होता है। भिक्षुओं! इन तीन धर्मों से युक्त भिक्षु इसी जन्म में सुख और सौमनस्य के बाहुल्य के साथ विहार करता है, और आस्रवों के क्षय के लिए उसका प्रयत्न आरम्भ हो जाता है।" (द्वितीय सुत्त) ๓. กุมฺโมปมสุตฺตํ ३. कुम्मोपम सुत्त ๒๔๐. ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, กุมฺโม กจฺฉโป สายนฺหสมยํ อนุนทีตีเร โคจรปสุโต อโหสิ. สิงฺคาโลปิ โข, ภิกฺขเว, สายนฺหสมยํ อนุนทีตีเร โคจรปสุโต อโหสิ. อทฺทสา โข, ภิกฺขเว, กุมฺโม กจฺฉโป สิงฺคาลํ ทูรโตว โคจรปสุตํ. ทิสฺวาน โสณฺฑิปญฺจมานิ องฺคานิ สเก กปาเล สโมทหิตฺวา อปฺโปสฺสุกฺโก ตุณฺหีภูโต สงฺกสายติ. สิงฺคาโลปิ โข, ภิกฺขเว, อทฺทส กุมฺมํ กจฺฉปํ ทูรโตว โคจรปสุตํ. ทิสฺวาน เยน กุมฺโม กจฺฉโป เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา กุมฺมํ กจฺฉปํ ปจฺจุปฏฺฐิโต อโหสิ – ‘ยทายํ กุมฺโม กจฺฉโป โสณฺฑิปญฺจมานํ องฺคานํ อญฺญตรํ วา อญฺญตรํ วา องฺคํ อภินินฺนาเมสฺสติ, ตตฺเถว นํ คเหตฺวา อุทฺทาลิตฺวา ขาทิสฺสามี’ติ. ยทา โข, ภิกฺขเว, กุมฺโม กจฺฉโป [Pg.386] โสณฺฑิปญฺจมานํ องฺคานํ อญฺญตรํ วา อญฺญตรํ วา องฺคํ น อภินินฺนามิ, อถ สิงฺคาโล กุมฺมมฺหา นิพฺพิชฺช ปกฺกามิ, โอตารํ อลภมาโน. २४०. भिक्षुओं, प्राचीन काल की बात है, एक कछुआ सायंकाल के समय नदी के किनारे आहार की खोज में लगा हुआ था। भिक्षुओं, एक सियार भी सायंकाल के समय उसी नदी के किनारे आहार की खोज में लगा हुआ था। भिक्षुओं, उस कछुए ने दूर से ही आहार खोजते हुए सियार को देख लिया। देखकर, उसने अपने पाँचों अंगों (चार पैर और मुख) को अपनी ढाल (खोल) के भीतर समेट लिया और निश्चिंत होकर चुपचाप बैठ गया। भिक्षुओं, सियार ने भी दूर से ही आहार खोजते हुए उस कछुए को देख लिया। देखकर वह उस स्थान पर पहुँचा जहाँ कछुआ था; वहाँ पहुँचकर वह कछुए के पास इस ताक में खड़ा हो गया— 'जब यह कछुआ अपने पाँचों अंगों में से किसी भी एक अंग को बाहर निकालेगा, तब मैं उसे वहीं पकड़कर, चीरकर खा जाऊँगा।' भिक्षुओं, जब उस कछुए ने अपने पाँचों अंगों में से किसी भी अंग को बाहर नहीं निकाला, तब वह सियार कोई अवसर न पाकर, निराश होकर वहाँ से चला गया। ‘‘เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ตุมฺเหปิ มาโร ปาปิมา สตตํ สมิตํ ปจฺจุปฏฺฐิโต – ‘อปฺเปว นามาหํ อิเมสํ จกฺขุโต วา โอตารํ ลเภยฺยํ…เป… ชิวฺหาโต วา โอตารํ ลเภยฺยํ…เป… มนโต วา โอตารํ ลเภยฺย’นฺติ. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวารา วิหรถ. จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา มา นิมิตฺตคฺคาหิโน อหุวตฺถ, มา อนุพฺยญฺชนคฺคาหิโน. ยตฺวาธิกรณเมนํ จกฺขุนฺทฺริยํ อสํวุตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อนฺวาสฺสเวยฺยุํ, ตสฺส สํวราย ปฏิปชฺชถ, รกฺขถ จกฺขุนฺทฺริยํ, จกฺขุนฺทฺริเย สํวรํ อาปชฺชถ. โสเตน สทฺทํ สุตฺวา… ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตฺวา… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา… กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสิตฺวา… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย มา นิมิตฺตคฺคาหิโน อหุวตฺถ, มา อนุพฺยญฺชนคฺคาหิโน. ยตฺวาธิกรณเมนํ มนินฺทฺริยํ อสํวุตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อนฺวาสฺสเวยฺยุํ, ตสฺส สํวราย ปฏิปชฺชถ, รกฺขถ มนินฺทฺริยํ, มนินฺทฺริเย สํวรํ อาปชฺชถ. ยโต ตุมฺเห, ภิกฺขเว, อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวารา วิหริสฺสถ, อถ ตุมฺเหหิปิ มาโร ปาปิมา นิพฺพิชฺช ปกฺกมิสฺสติ, โอตารํ อลภมาโน – กุมฺมมฺหาว สิงฺคาโล’’ติ. भिक्षुओं, इसी प्रकार पापी मार भी निरंतर और सदैव तुम्हारे पीछे लगा रहता है कि— 'शायद मैं इन (भिक्षुओं) के चक्षु (आँख) के माध्यम से कोई छिद्र (अवसर) पा सकूँ... या जिह्वा के माध्यम से... या मन के माध्यम से कोई अवसर पा सकूँ।' इसलिए, भिक्षुओं, तुम इंद्रियों के द्वारों को सुरक्षित रखकर विहार करो। चक्षु से रूप को देखकर उसके निमित्त (सामान्य आकृति) को ग्रहण मत करो, उसके अनुव्यंजन (विस्तृत विवरण) को ग्रहण मत करो। क्योंकि जिस कारण से चक्षु-इंद्रिय को असंयत (असुरक्षित) रखकर विहार करने वाले व्यक्ति को लोभ और शोक जैसे पापी अकुशल धर्म सता सकते हैं, उसके संयम के लिए अभ्यास करो, चक्षु-इंद्रिय की रक्षा करो, चक्षु-इंद्रिय में संवर (संयम) को प्राप्त करो। कान से शब्द सुनकर... नाक से गंध सूंघकर... जीभ से रस चखकर... शरीर से स्पर्श का अनुभव कर... मन से धम्म (विचार) को जानकर उसके निमित्त को ग्रहण मत करो, उसके अनुव्यंजन को ग्रहण मत करो। क्योंकि जिस कारण से मन-इंद्रिय को असंयत रखकर विहार करने वाले व्यक्ति को लोभ और शोक जैसे पापी अकुशल धर्म सता सकते हैं, उसके संयम के लिए अभ्यास करो, मन-इंद्रिय की रक्षा करो, मन-इंद्रिय में संवर को प्राप्त करो। भिक्षुओं, जब तुम इंद्रियों के द्वारों को सुरक्षित रखकर विहार करोगे, तब पापी मार भी तुमसे कोई अवसर न पाकर, निराश होकर वैसे ही चला जाएगा, जैसे कछुए के पास से सियार चला गया था। ‘‘กุมฺโม องฺคานิ สเก กปาเล,สโมทหํ ภิกฺขุ มโนวิตกฺเก; อนิสฺสิโต อญฺญมเหฐยาโน,ปรินิพฺพุโต นูปวเทยฺย กญฺจี’’ติ. ตติยํ; जैसे कछुआ अपने अंगों को अपनी ढाल के भीतर समेट लेता है, वैसे ही भिक्षु अपने मन के वितर्कों (विचारों) को (अपने भीतर) समेट ले; वह किसी पर आश्रित न होकर, किसी को कष्ट न पहुँचाते हुए, शांत (परिनिर्वृत) होकर किसी की निंदा न करे। ๔. ปฐมทารุกฺขนฺโธปมสุตฺตํ ४. प्रथम दारुक्खन्धोपम सुत्त (लकड़ी के लट्ठे के उपमा का पहला सूत्र) ๒๔๑. เอกํ สมยํ ภควา โกสมฺพิยํ วิหรติ คงฺคาย นทิยา ตีเร. อทฺทสา โข ภควา มหนฺตํ ทารุกฺขนฺธํ คงฺคาย นทิยา โสเตน วุยฺหมานํ. ทิสฺวาน ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ปสฺสถ โน ตุมฺเห, ภิกฺขเว, อมุํ มหนฺตํ ทารุกฺขนฺธํ คงฺคาย นทิยา โสเตน วุยฺหมาน’’นฺติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. ‘‘สเจ โส, ภิกฺขเว, ทารุกฺขนฺโธ น โอริมํ ตีรํ อุปคจฺฉติ, น ปาริมํ ตีรํ อุปคจฺฉติ, น มชฺเฌ สํสีทิสฺสติ, น ถเล อุสฺสีทิสฺสติ, น มนุสฺสคฺคาโห คเหสฺสติ, น [Pg.387] อมนุสฺสคฺคาโห คเหสฺสติ, น อาวฏฺฏคฺคาโห คเหสฺสติ, น อนฺโตปูติ ภวิสฺสติ; เอวญฺหิ โส, ภิกฺขเว, ทารุกฺขนฺโธ สมุทฺทนินฺโน ภวิสฺสติ สมุทฺทโปโณ สมุทฺทปพฺภาโร. ตํ กิสฺส เหตุ? สมุทฺทนินฺโน, ภิกฺขเว, คงฺคาย นทิยา โสโต สมุทฺทโปโณ สมุทฺทปพฺภาโร. २४१. एक समय भगवान बुद्ध कौशाम्बी में गंगा नदी के तट पर विहार कर रहे थे। भगवान ने गंगा नदी की धारा में बहते हुए एक विशाल लकड़ी के लट्ठे को देखा। देखकर उन्होंने भिक्षुओं को संबोधित किया— 'भिक्षुओं, क्या तुम गंगा नदी की धारा में बहते हुए इस विशाल लकड़ी के लट्ठे को देख रहे हो?' 'हाँ, भंते!' 'भिक्षुओं, यदि वह लकड़ी का लट्ठा न इस किनारे लगे, न उस किनारे लगे, न बीच में डूबे, न सूखी जमीन पर अटके, न उसे मनुष्य पकड़ें, न उसे अमनुष्य (यक्ष आदि) पकड़ें, न वह भँवर में फँसे और न ही वह भीतर से सड़ जाए; तो भिक्षुओं, वह लकड़ी का लट्ठा समुद्र की ओर ही जाएगा, समुद्र की ओर ही झुकेगा, समुद्र की ओर ही बढ़ेगा। ऐसा क्यों? क्योंकि भिक्षुओं, गंगा नदी की धारा समुद्र की ओर जाने वाली, समुद्र की ओर झुकने वाली और समुद्र की ओर बढ़ने वाली है। ‘‘เอวเมว โข, ภิกฺขเว, สเจ ตุมฺเหปิ น โอริมํ ตีรํ อุปคจฺฉถ, น ปาริมํ ตีรํ อุปคจฺฉถ; น มชฺเฌ สํสีทิสฺสถ, น ถเล อุสฺสีทิสฺสถ, น มนุสฺสคฺคาโห คเหสฺสติ, น อมนุสฺสคฺคาโห คเหสฺสติ, น อาวฏฺฏคฺคาโห คเหสฺสติ, น อนฺโตปูตี ภวิสฺสถ; เอวํ ตุมฺเห, ภิกฺขเว, นิพฺพานนินฺนา ภวิสฺสถ นิพฺพานโปณา นิพฺพานปพฺภารา. ตํ กิสฺส เหตุ? นิพฺพานนินฺนา, ภิกฺขเว, สมฺมาทิฏฺฐิ นิพฺพานโปณา นิพฺพานปพฺภารา’’ติ. เอวํ วุตฺเต, อญฺญตโร ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข, ภนฺเต, โอริมํ ตีรํ, กึ ปาริมํ ตีรํ, โก มชฺเฌ สํสาโท, โก ถเล อุสฺสาโท, โก มนุสฺสคฺคาโห, โก อมนุสฺสคฺคาโห, โก อาวฏฺฏคฺคาโห, โก อนฺโตปูติภาโว’’ติ? भिक्षुओं, इसी प्रकार यदि तुम भी न इस किनारे लगो, न उस किनारे लगो; न बीच में डूबो, न सूखी जमीन पर अटको; न तुम्हें मनुष्य पकड़ें, न अमनुष्य पकड़ें, न तुम भँवर में फँसो और न ही तुम भीतर से सड़ो; तो भिक्षुओं, तुम निर्वाण की ओर ही जाओगे, निर्वाण की ओर ही झुकोगे, निर्वाण की ओर ही बढ़ोगे। ऐसा क्यों? क्योंकि भिक्षुओं, सम्यक-दृष्टि निर्वाण की ओर ले जाने वाली, निर्वाण की ओर झुकाने वाली और निर्वाण की ओर बढ़ाने वाली होती है।' ऐसा कहने पर, एक भिक्षु ने भगवान से यह पूछा— 'भंते, यह 'इस तरफ का किनारा' क्या है? 'उस तरफ का किनारा' क्या है? 'बीच में डूबना' क्या है? 'सूखी जमीन पर अटकना' क्या है? 'मनुष्यों द्वारा पकड़ा जाना' क्या है? 'अमनुष्यों द्वारा पकड़ा जाना' क्या है? 'भँवर में फँसना' क्या है? और 'भीतर से सड़ जाना' क्या है?' ‘‘‘โอริมํ ตีร’นฺติ โข, ภิกฺขุ, ฉนฺเนตํ อชฺฌตฺติกานํ อายตนานํ อธิวจนํ. ‘ปาริมํ ตีร’นฺติ โข, ภิกฺขุ, ฉนฺเนตํ พาหิรานํ อายตนานํ อธิวจนํ. ‘มชฺเฌ สํสาโท’ติ โข, ภิกฺขุ, นนฺทีราคสฺเสตํ อธิวจนํ. ‘ถเล อุสฺสาโท’ติ โข, ภิกฺขุ, อสฺมิมานสฺเสตํ อธิวจนํ. भिक्षु, 'इस तरफ का किनारा' छह आध्यात्मिक (आंतरिक) आयतनों का नाम है। 'उस तरफ का किनारा' छह बाह्य आयतनों का नाम है। 'बीच में डूबना' नंदीराग (आनंद और आसक्ति) का नाम है। 'सूखी जमीन पर अटकना' अस्मि-मान (मैं हूँ, ऐसा अहंकार) का नाम है। ‘‘กตโม จ, ภิกฺขุ, มนุสฺสคฺคาโห? อิธ, ภิกฺขุ, คิหีหิ สํสฏฺโฐ วิหรติ, สหนนฺที สหโสกี, สุขิเตสุ สุขิโต, ทุกฺขิเตสุ ทุกฺขิโต, อุปฺปนฺเนสุ กิจฺจกรณีเยสุ อตฺตนา เตสุ โยคํ อาปชฺชติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขุ, มนุสฺสคฺคาโห. और भिक्षु, 'मनुष्यों द्वारा पकड़ा जाना' क्या है? यहाँ, भिक्षु गृहस्थों के साथ बहुत अधिक घुल-मिलकर रहता है, उनके साथ ही प्रसन्न होता है और उनके साथ ही दुखी होता है; उनके सुखी होने पर सुखी होता है और उनके दुखी होने पर दुखी होता है; और उनके कार्यों के उत्पन्न होने पर स्वयं उनमें लग जाता है। भिक्षु, इसे 'मनुष्यों द्वारा पकड़ा जाना' कहा जाता है। ‘‘กตโม จ, ภิกฺขุ, อมนุสฺสคฺคาโห? อิธ, ภิกฺขุ, เอกจฺโจ อญฺญตรํ เทวนิกายํ ปณิธาย พฺรหฺมจริยํ จรติ – ‘อิมินาหํ สีเลน วา วเตน วา ตเปน วา พฺรหฺมจริเยน วา เทโว วา ภวิสฺสามิ เทวญฺญตโร วา’ติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขุ, อมนุสฺสคฺคาโห. ‘อาวฏฺฏคฺคาโห’ติ โข, ภิกฺขุ, ปญฺจนฺเนตํ กามคุณานํ อธิวจนํ. और भिक्षु, 'अमानुष द्वारा पकड़ा जाना' क्या है? यहाँ, भिक्षु, कोई (भिक्षु) किसी देव-निकाय (देवलोक) की आकांक्षा करते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करता है— 'मैं इस शील से, या व्रत से, या तप से, या ब्रह्मचर्य से देव या कोई अन्य देव बनूँगा'। भिक्षु, इसे 'अमानुष द्वारा पकड़ा जाना' कहा जाता है। भिक्षु, 'भँवर द्वारा पकड़ा जाना' यह पाँच काम-गुणों का नाम है। ‘‘กตโม จ, ภิกฺขุ, อนฺโตปูติภาโว? อิธ, ภิกฺขุ, เอกจฺโจ ทุสฺสีโล โหติ ปาปธมฺโม อสุจิสงฺกสฺสรสมาจาโร ปฏิจฺฉนฺนกมฺมนฺโต อสฺสมโณ [Pg.388] สมณปฏิญฺโญ อพฺรหฺมจารี พฺรหฺมจาริปฏิญฺโญ อนฺโตปูติ อวสฺสุโต กสมฺพุชาโต. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขุ, ‘อนฺโตปูติภาโว’’’ติ. और भिक्षु, 'भीतर से सड़ा हुआ होना' क्या है? यहाँ, भिक्षु, कोई (भिक्षु) दुःशील होता है, पापधर्मी, अशुचि, संदेहास्पद आचरण वाला, अपने कर्मों को छिपाने वाला, श्रमण न होते हुए भी श्रमण होने की प्रतिज्ञा करने वाला, ब्रह्मचारी न होते हुए भी ब्रह्मचारी होने की प्रतिज्ञा करने वाला, भीतर से सड़ा हुआ, (काम-राग से) गीला और कचरे के समान होता है। भिक्षु, इसे 'भीतर से सड़ा हुआ होना' कहा जाता है। เตน โข ปน สมเยน นนฺโท โคปาลโก ภควโต อวิทูเร ฐิโต โหติ. อถ โข นนฺโท โคปาลโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อหํ โข, ภนฺเต, น โอริมํ ตีรํ อุปคจฺฉามิ, น ปาริมํ ตีรํ อุปคจฺฉามิ, น มชฺเฌ สํสีทิสฺสามิ, น ถเล อุสฺสีทิสฺสามิ, น มํ มนุสฺสคฺคาโห คเหสฺสติ, น อมนุสฺสคฺคาโห คเหสฺสติ, น อาวฏฺฏคฺคาโห คเหสฺสติ, น อนฺโตปูติ ภวิสฺสามิ. ลเภยฺยาหํ, ภนฺเต, ภควโต สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, ลเภยฺยํ อุปสมฺปท’’นฺติ. ‘‘เตน หิ ตฺวํ, นนฺท, สามิกานํ คาโว นิยฺยาเตหี’’ติ. ‘‘คมิสฺสนฺติ, ภนฺเต, คาโว วจฺฉคิทฺธินิโย’’ติ. ‘‘นิยฺยาเตเหว ตฺวํ, นนฺท, สามิกานํ คาโว’’ติ. อถ โข นนฺโท โคปาลโก สามิกานํ คาโว นิยฺยาเตตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘นิยฺยาติตา, ภนฺเต, สามิกานํ คาโว. ลเภยฺยาหํ, ภนฺเต, ภควโต สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, ลเภยฺยํ อุปสมฺปท’’นฺติ. อลตฺถ โข นนฺโท โคปาลโก ภควโต สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, อลตฺถ อุปสมฺปทํ. อจิรูปสมฺปนฺโน จ ปนายสฺมา นนฺโท เอโก วูปกฏฺโฐ…เป… อญฺญตโร จ ปนายสฺมา นนฺโท อรหตํ อโหสีติ. จตุตฺถํ. उस समय नन्द नामक ग्वाला भगवान के पास ही खड़ा था। तब नन्द ग्वाले ने भगवान से यह कहा— 'भन्ते, मैं न तो इस किनारे पर जाऊँगा, न उस किनारे पर जाऊँगा, न बीच में डूबूँगा, न स्थल पर अटकूँगा, न मुझे मनुष्य पकड़ेंगे, न अमानुष पकड़ेंगे, न भँवर पकड़ेगा और न ही मैं भीतर से सड़ा हुआ होऊँगा। भन्ते, मुझे भगवान के पास प्रव्रज्या मिले, उपसम्पदा मिले।' 'तो नन्द, तुम स्वामियों को गायें लौटा दो।' 'भन्ते, गायें अपने बछड़ों के प्रति स्नेह के कारण स्वयं चली जाएँगी।' 'नन्द, तुम स्वामियों को गायें लौटा ही दो।' तब नन्द ग्वाले ने स्वामियों को गायें लौटा दीं और जहाँ भगवान थे वहाँ आया; आकर भगवान से यह कहा— 'भन्ते, स्वामियों को गायें लौटा दी गई हैं। भन्ते, मुझे भगवान के पास प्रव्रज्या मिले, उपसम्पदा मिले।' नन्द ग्वाले को भगवान के पास प्रव्रज्या मिली, उपसम्पदा मिली। उपसम्पदा प्राप्त करने के कुछ ही समय बाद आयुष्मान नन्द अकेले, एकांत में... और आयुष्मान नन्द अर्हतों में से एक हुए। चौथा (सूत्र)। ๕. ทุติยทารุกฺขนฺโธปมสุตฺตํ ५. द्वितीय दारुक्खन्धोपम सुत्त ๒๔๒. เอกํ สมยํ ภควา กิมิลายํ วิหรติ คงฺคาย นทิยา ตีเร. อทฺทสา โข ภควา มหนฺตํ ทารุกฺขนฺธํ คงฺคาย นทิยา โสเตน วุยฺหมานํ. ทิสฺวาน ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ปสฺสถ โน ตุมฺเห, ภิกฺขเว, อมุํ มหนฺตํ ทารุกฺขนฺธํ คงฺคาย นทิยา โสเตน วุยฺหมาน’’นฺติ? ‘‘เอวํ ภนฺเต’’…เป… เอวํ วุตฺเต, อายสฺมา กิมิโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – กึ นุ โข, ภนฺเต, โอริมํ ตีรํ…เป… กตโม จ, กิมิล, อนฺโตปูติภาโว. อิธ, กิมิล, ภิกฺขุ อญฺญตรํ สํกิลิฏฺฐํ อาปตฺตึ อาปนฺโน โหติ ยถารูปาย อาปตฺติยา น วุฏฺฐานํ ปญฺญายติ. อยํ วุจฺจติ, กิมิล, อนฺโตปูติภาโวติ. ปญฺจมํ. २४२. एक समय भगवान किमिला में गंगा नदी के तट पर विहार कर रहे थे। भगवान ने गंगा नदी की धारा में बहते हुए एक बड़े लट्ठे को देखा। देखकर भिक्षुओं को संबोधित किया— 'भिक्षुओं, क्या तुम गंगा नदी की धारा में बहते हुए उस बड़े लट्ठे को देख रहे हो?' 'हाँ, भन्ते।' ... ऐसा कहने पर आयुष्मान किमिल ने भगवान से यह कहा— 'भन्ते, यह किनारा क्या है? ... और किमिल, भीतर से सड़ा हुआ होना क्या है?' 'यहाँ, किमिल, कोई भिक्षु किसी संक्लिष्ट (मलिन) आपत्ति को प्राप्त होता है, जिस आपत्ति से निकलना (शुद्धि) दिखाई नहीं देता। किमिल, इसे 'भीतर से सड़ा हुआ होना' कहा जाता है।' पाँचवाँ (सूत्र)। ๖. อวสฺสุตปริยายสุตฺตํ ६. अवस्सुतपरियाय सुत्त ๒๔๓. เอกํ [Pg.389] สมยํ ภควา สกฺเกสุ วิหรติ กปิลวตฺถุสฺมึ นิคฺโรธาราเม. เตน โข ปน สมเยน กาปิลวตฺถวานํ สกฺยานํ นวํ สนฺถาคารํ อจิรการิตํ โหติ อนชฺฌาวุฏฺฐํ สมเณน วา พฺราหฺมเณน วา เกนจิ วา มนุสฺสภูเตน. อถ โข กาปิลวตฺถวา สกฺยา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข กาปิลวตฺถวา สกฺยา ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘อิธ, ภนฺเต, กาปิลวตฺถวานํ สกฺยานํ นวํ สนฺถาคารํ อจิรการิตํ อนชฺฌาวุฏฺฐํ สมเณน วา พฺราหฺมเณน วา เกนจิ วา มนุสฺสภูเตน. ตํ, ภนฺเต, ภควา ปฐมํ ปริภุญฺชตุ. ภควตา ปฐมํ ปริภุตฺตํ ปจฺฉา กาปิลวตฺถวา สกฺยา ปริภุญฺชิสฺสนฺติ. ตทสฺส กาปิลวตฺถวานํ สกฺยานํ ทีฆรตฺตํ หิตาย สุขายา’’ติ. อธิวาเสสิ ภควา ตุณฺหีภาเวน. २४३. एक समय भगवान शाक्यों के कपिलवस्तु में निग्रोधाराम में विहार कर रहे थे। उस समय कपिलवस्तु के शाक्यों का एक नया संथागार (सभा-भवन) बनकर तैयार हुआ था, जिसमें अभी तक किसी श्रमण, ब्राह्मण या किसी भी मनुष्य ने निवास नहीं किया था। तब कपिलवस्तु के शाक्य जहाँ भगवान थे वहाँ आए; आकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए कपिलवस्तु के शाक्यों ने भगवान से यह कहा— 'भन्ते, यहाँ कपिलवस्तु के शाक्यों का एक नया संथागार बनकर तैयार हुआ है, जिसमें अभी तक किसी श्रमण, ब्राह्मण या किसी भी मनुष्य ने निवास नहीं किया है। भन्ते, भगवान पहले उसका उपयोग करें। भगवान द्वारा पहले उपयोग किए जाने पर बाद में कपिलवस्तु के शाक्य उसका उपयोग करेंगे। वह कपिलवस्तु के शाक्यों के लिए दीर्घकाल तक हित और सुख के लिए होगा।' भगवान ने मौन रहकर अपनी सहमति दी। อถ โข กาปิลวตฺถวา สกฺยา ภควโต อธิวาสนํ วิทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา เยน นวํ สนฺถาคารํ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา สพฺพสนฺถรึ สนฺถาคารํ สนฺถริตฺวา อาสนานิ ปญฺญาเปตฺวา อุทกมณิกํ ปติฏฺฐาเปตฺวา เตลปฺปทีปํ อาโรเปตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘สพฺพสนฺถริสนฺถตํ, ภนฺเต, สนฺถาคารํ, อาสนานิ ปญฺญตฺตานิ, อุทกมณิโก ปติฏฺฐาปิโต, เตลปฺปทีโป อาโรปิโต. ยสฺส ทานิ, ภนฺเต, ภควา กาลํ มญฺญตี’’ติ. อถ โข ภควา นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สทฺธึ ภิกฺขุสงฺเฆน เยน นวํ สนฺถาคารํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปาเท ปกฺขาเลตฺวา สนฺถาคารํ ปวิสิตฺวา มชฺฌิมํ ถมฺภํ นิสฺสาย ปุรตฺถาภิมุโข นิสีทิ. ภิกฺขุสงฺโฆปิ โข ปาเท ปกฺขาเลตฺวา สนฺถาคารํ ปวิสิตฺวา ปจฺฉิมํ ภิตฺตึ นิสฺสาย ปุรตฺถาภิมุโข นิสีทิ ภควนฺตํเยว ปุรกฺขตฺวา. กาปิลวตฺถวา สกฺยา ปาเท ปกฺขาเลตฺวา สนฺถาคารํ ปวิสิตฺวา ปุรตฺถิมํ ภิตฺตึ นิสฺสาย ปจฺฉิมาภิมุขา นิสีทึสุ ภควนฺตํเยว ปุรกฺขตฺวา. อถ โข ภควา กาปิลวตฺถเว สกฺเย พหุเทว รตฺตึ ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสตฺวา สมาทเปตฺวา สมุตฺเตเชตฺวา สมฺปหํเสตฺวา อุยฺโยเชสิ – ‘‘อภิกฺกนฺตา โข, โคตมา, รตฺติ. ยสฺส ทานิ กาลํ มญฺญถา’’ติ[Pg.390]. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข กาปิลวตฺถวา สกฺยา ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกมึสุ. तब कपिलवस्तु के शाक्य, भगवान की स्वीकृति जानकर, आसन से उठकर, भगवान का अभिवादन कर और प्रदक्षिणा कर जहाँ नया सभा-भवन था, वहाँ गए। वहाँ पहुँचकर पूरे सभा-भवन में बिछौने बिछाकर, आसन लगाकर, जल-पात्र स्थापित कर और तेल के दीपक जलाकर जहाँ भगवान थे, वहाँ आए। वहाँ पहुँचकर भगवान से यह बोले— "भन्ते! सभा-भवन में पूरी तरह बिछौने बिछा दिए गए हैं, आसन लगा दिए गए हैं, जल-पात्र स्थापित कर दिया गया है और तेल के दीपक जला दिए गए हैं। अब भन्ते! भगवान जैसा उचित समय समझें।" तब भगवान ने चीवर पहनकर, पात्र और चीवर लेकर भिक्षु-संघ के साथ जहाँ नया सभा-भवन था, वहाँ गए। वहाँ पहुँचकर पैर धोकर सभा-भवन में प्रवेश किया और मध्यम स्तंभ का सहारा लेकर पूर्वाभिमुख होकर बैठ गए। भिक्षु-संघ ने भी पैर धोकर सभा-भवन में प्रवेश किया और पश्चिमी दीवार का सहारा लेकर पूर्वाभिमुख होकर भगवान के सामने बैठ गए। कपिलवस्तु के शाक्य भी पैर धोकर सभा-भवन में प्रवेश कर पूर्वी दीवार का सहारा लेकर पश्चिमाभिमुख होकर भगवान के सामने बैठ गए। तब भगवान ने कपिलवस्तु के शाक्यों को बहुत रात तक धार्मिक कथा से उपदेश देकर, समाहित कर, उत्साहित कर और प्रसन्न कर उन्हें विदा किया— "हे गौतमों! रात बहुत बीत गई है। अब तुम जैसा उचित समय समझो।" "जी भन्ते!" कहकर कपिलवस्तु के शाक्यों ने भगवान की बात स्वीकार की और आसन से उठकर, भगवान का अभिवादन कर और प्रदक्षिणा कर चले गए। อถ โข ภควา อจิรปกฺกนฺเตสุ กาปิลวตฺถเวสุ สกฺเยสุ อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ อามนฺเตสิ – ‘‘วิคตถินมิทฺโธ โข, โมคฺคลฺลาน, ภิกฺขุสงฺโฆ. ปฏิภาตุ ตํ, โมคฺคลฺลาน, ภิกฺขูนํ ธมฺมี กถา. ปิฏฺฐิ เม อาคิลายติ; ตมหํ อายมิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. อถ โข ภควา จตุคฺคุณํ สงฺฆาฏึ ปญฺญเปตฺวา ทกฺขิเณน ปสฺเสน สีหเสยฺยํ กปฺเปสิ, ปาเท ปาทํ อจฺจาธาย, สโต สมฺปชาโน อุฏฺฐานสญฺญํ มนสิ กริตฺวา. ตตฺร โข อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘อาวุโส ภิกฺขเว’’ติ. ‘‘อาวุโส’’ติ โข เต ภิกฺขู อายสฺมโต มหาโมคฺคลฺลานสฺส ปจฺจสฺโสสุํ. อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – ‘‘อวสฺสุตปริยายญฺจ โว, อาวุโส, เทเสสฺสามิ, อนวสฺสุตปริยายญฺจ. ตํ สุณาถ, สาธุกํ มนสิ กโรถ; ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวมาวุโส’’ติ โข เต ภิกฺขู อายสฺมโต มหาโมคฺคลฺลานสฺส ปจฺจสฺโสสุํ. อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – तब भगवान ने कपिलवस्तु के शाक्यों के जाने के कुछ ही समय बाद आयुष्मान महामौद्गल्यायन को संबोधित किया— "मौद्गल्यायन! भिक्षु-संघ आलस्य और तन्द्रा से रहित है। मौद्गल्यायन! तुम भिक्षुओं को धार्मिक कथा सुनाओ। मेरी पीठ दुख रही है; मैं उसे सीधा करूँगा।" "जी भन्ते!" कहकर आयुष्मान महामौद्गल्यायन ने भगवान को उत्तर दिया। तब भगवान ने चार तहों वाली संघाटी बिछाकर दाहिनी करवट लेकर, एक पैर पर दूसरा पैर रखकर, स्मृतिवान और संप्रजन्य युक्त होकर, उठने की संज्ञा मन में रखकर सिंह-शय्या लगाई। वहाँ आयुष्मान महामौद्गल्यायन ने भिक्षुओं को संबोधित किया— "आयुष्मान भिक्षुओं!" "आयुष्मान!" कहकर उन भिक्षुओं ने आयुष्मान महामौद्गल्यायन को उत्तर दिया। आयुष्मान महामौद्गल्यायन ने यह कहा— "आयुष्मानों! मैं तुम्हें आस्रवयुक्त होने की विधि और आस्रव-रहित होने की विधि का उपदेश दूँगा। उसे सुनो, अच्छी तरह मन में धारण करो; मैं कहूँगा।" "जी आयुष्मान!" कहकर उन भिक्षुओं ने आयुष्मान महामौद्गल्यायन को उत्तर दिया। आयुष्मान महामौद्गल्यायन ने यह कहा— ‘‘กถํ, อาวุโส, อวสฺสุโต โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา ปิยรูเป รูเป อธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป รูเป พฺยาปชฺชติ, อนุปฏฺฐิตกายสฺสติ วิหรติ ปริตฺตเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ …เป… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา…เป… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ปิยรูเป ธมฺเม อธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป ธมฺเม พฺยาปชฺชติ, อนุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ ปริตฺตเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. อยํ วุจฺจติ, อาวุโส, ภิกฺขุ อวสฺสุโต จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ…เป… อวสฺสุโต ชิวฺหาวิญฺเญยฺเยสุ รเสสุ…เป… อวสฺสุโต มโนวิญฺเญยฺเยสุ ธมฺเมสุ. เอวํวิหาริญฺจาวุโส, ภิกฺขุํ จกฺขุโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ ลภเตว มาโร โอตารํ, ลภติ มาโร อารมฺมณํ…เป… ชิวฺหาโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ, ลภเตว มาโร โอตารํ[Pg.391], ลภติ มาโร อารมฺมณํ…เป… มนโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ, ลภเตว มาโร โอตารํ, ลภติ มาโร อารมฺมณํ. "आयुष्मानों! कैसे कोई आस्रवयुक्त होता है? यहाँ, आयुष्मानों! भिक्षु आँख से रूप देखकर प्रिय लगने वाले रूपों में आसक्त हो जाता है और अप्रिय लगने वाले रूपों से द्वेष करता है। वह शरीर की स्मृति को उपस्थित न रखते हुए क्षुद्र चित्त से विहार करता है। वह उस चेतोविमुक्ति और प्रज्ञाविमुक्ति को यथार्थ रूप में नहीं जानता, जहाँ उसके उत्पन्न हुए पापमय अकुशल धर्म पूरी तरह निरुद्ध हो जाते हैं। ... (पेय्याल) ... जीभ से रस चखकर ... मन से धर्म को जानकर प्रिय लगने वाले धर्मों में आसक्त हो जाता है और अप्रिय लगने वाले धर्मों से द्वेष करता है। वह शरीर की स्मृति को उपस्थित न रखते हुए क्षुद्र चित्त से विहार करता है। वह उस चेतोविमुक्ति और प्रज्ञाविमुक्ति को यथार्थ रूप में नहीं जानता, जहाँ उसके उत्पन्न हुए पापमय अकुशल धर्म पूरी तरह निरुद्ध हो जाते हैं। आयुष्मानों! इसे कहते हैं— चक्षु-विज्ञेय रूपों में आस्रवयुक्त भिक्षु ... जिह्वा-विज्ञेय रसों में आस्रवयुक्त ... मनो-विज्ञेय धर्मों में आस्रवयुक्त। आयुष्मानों! इस प्रकार विहार करने वाले भिक्षु के पास यदि मार आँख के माध्यम से आता है, तो मार को प्रवेश का अवसर मिल ही जाता है, मार को आलम्बन मिल जाता है। ... यदि मार जीभ के माध्यम से आता है, तो मार को प्रवेश का अवसर मिल ही जाता है, मार को आलम्बन मिल जाता है। ... यदि मार मन के माध्यम से आता है, तो मार को प्रवेश का अवसर मिल ही जाता है, मार को आलम्बन मिल जाता है।" ‘‘เสยฺยถาปิ, อาวุโส, นฬาคารํ วา ติณาคารํ วา สุกฺขํ โกลาปํ เตโรวสฺสิกํ. ปุรตฺถิมาย เจปิ นํ ทิสาย ปุริโส อาทิตฺตาย ติณุกฺกาย อุปสงฺกเมยฺย, ลเภเถว อคฺคิ โอตารํ, ลเภถ อคฺคิ อารมฺมณํ; ปจฺฉิมาย เจปิ นํ ทิสาย ปุริโส อาทิตฺตาย ติณุกฺกาย อุปสงฺกเมยฺย…เป… อุตฺตราย เจปิ นํ ทิสาย…เป… ทกฺขิณาย เจปิ นํ ทิสาย…เป… เหฏฺฐิมโต เจปิ นํ…เป… อุปริมโต เจปิ นํ… ยโต กุโตจิ เจปิ นํ ปุริโส อาทิตฺตาย ติณุกฺกาย อุปสงฺกเมยฺย, ลเภเถว อคฺคิ โอตารํ ลเภถ อคฺคิ อารมฺมณํ. เอวเมว โข, อาวุโส, เอวํวิหารึ ภิกฺขุํ จกฺขุโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ, ลภเตว มาโร โอตารํ, ลภติ มาโร อารมฺมณํ…เป… ชิวฺหาโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ…เป… มนโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ, ลภเตว มาโร โอตารํ, ลภติ มาโร อารมฺมณํ. เอวํวิหาริญฺจาวุโส, ภิกฺขุํ รูปา อธิภํสุ, น ภิกฺขุ รูเป อธิโภสิ; สทฺทา ภิกฺขุํ อธิภํสุ, น ภิกฺขุ สทฺเท อธิโภสิ; คนฺธา ภิกฺขุํ อธิภํสุ, น ภิกฺขุ คนฺเธ อธิโภสิ; รสา ภิกฺขุํ อธิภํสุ, น ภิกฺขุ รเส อธิโภสิ; โผฏฺฐพฺพา ภิกฺขุํ อธิภํสุ, น ภิกฺขุ โผฏฺฐพฺเพ อธิโภสิ; ธมฺมา ภิกฺขุํ อธิภํสุ, น ภิกฺขุ ธมฺเม อธิโภสิ. อยํ วุจฺจตาวุโส, ภิกฺขุ รูปาธิภูโต, สทฺทาธิภูโต, คนฺธาธิภูโต, รสาธิภูโต, โผฏฺฐพฺพาธิภูโต, ธมฺมาธิภูโต, อธิภูโต, อนธิภู, อธิภํสุ นํ ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สํกิเลสิกา โปโนพฺภวิกา สทรา ทุกฺขวิปากา อายตึ ชาติชรามรณิยา. เอวํ โข, อาวุโส, อวสฺสุโต โหติ. हे आयुष्मानों, जैसे कोई सरकंडों का घर या घास का घर हो, जो सूखा हो, जर्जर हो और तीन साल से अधिक पुराना हो। यदि कोई पुरुष जलती हुई घास की मशाल लेकर पूर्व दिशा से उसके पास आए, तो अग्नि को प्रवेश का अवसर मिल ही जाएगा, अग्नि को आधार मिल ही जाएगा। यदि कोई पुरुष पश्चिम दिशा से... उत्तर दिशा से... दक्षिण दिशा से... नीचे से... ऊपर से... या कहीं से भी यदि कोई पुरुष जलती हुई घास की मशाल लेकर आए, तो अग्नि को प्रवेश का अवसर मिल ही जाएगा, अग्नि को आधार मिल ही जाएगा। इसी प्रकार, हे आयुष्मानों, इस प्रकार विहार करने वाले भिक्षु के पास यदि मार चक्षु के माध्यम से आए, तो मार को प्रवेश का अवसर मिल ही जाता है, मार को आधार मिल ही जाता है... यदि मार जिह्वा के माध्यम से आए... यदि मार मन के माध्यम से आए, तो मार को प्रवेश का अवसर मिल ही जाता है, मार को आधार मिल ही जाता है। हे आयुष्मानों, ऐसे विहार करने वाले भिक्षु को रूप अभिभूत कर लेते हैं, भिक्षु रूपों को अभिभूत नहीं कर पाता; शब्द भिक्षु को अभिभूत कर लेते हैं, भिक्षु शब्दों को अभिभूत नहीं कर पाता; गंध भिक्षु को अभिभूत कर लेते हैं, भिक्षु गंधों को अभिभूत नहीं कर पाता; रस भिक्षु को अभिभूत कर लेते हैं, भिक्षु रसों को अभिभूत नहीं कर पाता; स्पर्श भिक्षु को अभिभूत कर लेते हैं, भिक्षु स्पर्शों को अभिभूत नहीं कर पाता; धर्म भिक्षु को अभिभूत कर लेते हैं, भिक्षु धर्मों को अभिभूत नहीं कर पाता। हे आयुष्मानों, ऐसा भिक्षु 'रूपों द्वारा अभिभूत', 'शब्दों द्वारा अभिभूत', 'गंधों द्वारा अभिभूत', 'रसों द्वारा अभिभूत', 'स्पर्शों द्वारा अभिभूत', 'धर्मों द्वारा अभिभूत' कहा जाता है। वह अभिभूत है, वह विजेता नहीं है; उसे वे पापमय अकुशल धर्म अभिभूत कर लेते हैं जो संक्लेशकारी हैं, पुनर्जन्म देने वाले हैं, संतापयुक्त हैं, दुःखद विपाक वाले हैं और भविष्य में जाति, जरा एवं मरण देने वाले हैं। हे आयुष्मानों, इस प्रकार वह 'आस्रव-सिक्त' होता है। ‘‘กถญฺจาวุโส, อนวสฺสุโต โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา ปิยรูเป รูเป นาธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป รูเป น พฺยาปชฺชติ, อุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ อปฺปมาณเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ ปชานาติ ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ…เป… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา…เป… มนสา [Pg.392] ธมฺมํ วิญฺญาย ปิยรูเป ธมฺเม นาธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป ธมฺเม น พฺยาปชฺชติ, อุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ อปฺปมาณเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ ปชานาติ ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. อยํ วุจฺจตาวุโส, ภิกฺขุ อนวสฺสุโต จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ…เป… อนวสฺสุโต มโนวิญฺเญยฺเยสุ ธมฺเมสุ. เอวํวิหาริญฺจาวุโส, ภิกฺขุํ จกฺขุโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ, เนว ลภติ มาโร โอตารํ, น ลภติ มาโร อารมฺมณํ…เป… ชิวฺหาโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ…เป… มนโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ, เนว ลภติ มาโร โอตารํ, น ลภติ มาโร อารมฺมณํ. हे आयुष्मानों, कोई 'आस्रव-रहित' कैसे होता है? हे आयुष्मानों, यहाँ इस शासन में भिक्षु आँखों से रूप देखकर प्रिय लगने वाले रूपों में आसक्त नहीं होता और अप्रिय लगने वाले रूपों से द्वेष नहीं करता। वह शरीर के प्रति स्मृति को उपस्थित रखकर और असीमित चित्त के साथ विहार करता है। वह उस चेतोविमुक्ति और प्रज्ञाविमुक्ति को यथार्थ रूप में जानता है, जहाँ उसके वे उत्पन्न हुए पापमय अकुशल धर्म बिना किसी अवशेष के निरुद्ध हो जाते हैं... जिह्वा से रस चखकर... मन से धर्म को जानकर प्रिय लगने वाले धर्मों में आसक्त नहीं होता और अप्रिय लगने वाले धर्मों से द्वेष नहीं करता। वह शरीर के प्रति स्मृति को उपस्थित रखकर और असीमित चित्त के साथ विहार करता है। वह उस चेतोविमुक्ति और प्रज्ञाविमुक्ति को यथार्थ रूप में जानता है, जहाँ उसके वे उत्पन्न हुए पापमय अकुशल धर्म बिना किसी अवशेष के निरुद्ध हो जाते हैं। हे आयुष्मानों, ऐसा भिक्षु चक्षु-विज्ञेय रूपों में 'आस्रव-रहित' कहा जाता है... मनो-विज्ञेय धर्मों में 'आस्रव-रहित' कहा जाता है। हे आयुष्मानों, इस प्रकार विहार करने वाले भिक्षु के पास यदि मार चक्षु के माध्यम से आए, तो मार को प्रवेश का अवसर नहीं मिलता, मार को आधार नहीं मिलता... यदि मार जिह्वा के माध्यम से आए... यदि मार मन के माध्यम से आए, तो मार को प्रवेश का अवसर नहीं मिलता, मार को आधार नहीं मिलता। ‘‘เสยฺยถาปิ, อาวุโส, กูฏาคารํ วา สาลา วา พหลมตฺติกา อทฺทาวเลปนา. ปุรตฺถิมาย เจปิ นํ ทิสาย ปุริโส อาทิตฺตาย ติณุกฺกาย อุปสงฺกเมยฺย, เนว ลเภถ อคฺคิ โอตารํ, น ลเภถ อคฺคิ อารมฺมณํ…เป… ปจฺฉิมาย เจปิ นํ… อุตฺตราย เจปิ นํ… ทกฺขิณาย เจปิ นํ… เหฏฺฐิมโต เจปิ นํ… อุปริมโต เจปิ นํ… ยโต กุโตจิ เจปิ นํ ปุริโส อาทิตฺตาย ติณุกฺกาย อุปสงฺกเมยฺย, เนว ลเภถ อคฺคิ โอตารํ, น ลเภถ อคฺคิ อารมฺมณํ. เอวเมว โข, อาวุโส, เอวํวิหารึ ภิกฺขุํ จกฺขุโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ, เนว ลภติ มาโร โอตารํ, น ลภติ มาโร อารมฺมณํ…เป… มนโต เจปิ นํ มาโร อุปสงฺกมติ, เนว ลภติ มาโร โอตารํ, น ลภติ มาโร อารมฺมณํ. เอวํวิหารี จาวุโส, ภิกฺขุ รูเป อธิโภสิ, น รูปา ภิกฺขุํ อธิภํสุ; สทฺเท ภิกฺขุ อธิโภสิ, น สทฺทา ภิกฺขุํ อธิภํสุ; คนฺเธ ภิกฺขุ อธิโภสิ, น คนฺธา ภิกฺขุํ อธิภํสุ; รเส ภิกฺขุ อธิโภสิ, น รสา ภิกฺขุํ อธิภํสุ; โผฏฺฐพฺเพ ภิกฺขุ อธิโภสิ, น โผฏฺฐพฺพา ภิกฺขุํ อธิภํสุ; ธมฺเม ภิกฺขุ อธิโภสิ, น ธมฺมา ภิกฺขุํ อธิภํสุ. อยํ วุจฺจตาวุโส, ภิกฺขุ รูปาธิภู, สทฺทาธิภู, คนฺธาธิภู, รสาธิภู, โผฏฺฐพฺพาธิภู, ธมฺมาธิภู, อธิภู, อนธิภูโต, อธิโภสิ เต ปาปเก อกุสเล ธมฺเม สํกิเลสิเก โปโนพฺภวิเก สทเร ทุกฺขวิปาเก อายตึ ชาติชรามรณิเย. เอวํ โข, อาวุโส, อนวสฺสุโต โหตี’’ติ. हे आयुष्मानों, जैसे कोई कूटागार या शाला हो, जिसमें मिट्टी का मोटा लेप लगा हो और जो अच्छी तरह प्लास्टर किया गया हो। यदि कोई पुरुष जलती हुई घास की मशाल लेकर पूर्व दिशा से उसके पास आए, तो अग्नि को प्रवेश का अवसर नहीं मिलेगा, अग्नि को आधार नहीं मिलेगा... पश्चिम दिशा से... उत्तर दिशा से... दक्षिण दिशा से... नीचे से... ऊपर से... या कहीं से भी यदि कोई पुरुष जलती हुई घास की मशाल लेकर आए, तो अग्नि को प्रवेश का अवसर नहीं मिलेगा, अग्नि को आधार नहीं मिलेगा। इसी प्रकार, हे आयुष्मानों, इस प्रकार विहार करने वाले भिक्षु के पास यदि मार चक्षु के माध्यम से आए, तो मार को प्रवेश का अवसर नहीं मिलता, मार को आधार नहीं मिलता... यदि मार मन के माध्यम से आए, तो मार को प्रवेश का अवसर नहीं मिलता, मार को आधार नहीं मिलता। हे आयुष्मानों, ऐसा विहार करने वाला भिक्षु रूपों को अभिभूत कर लेता है, रूप भिक्षु को अभिभूत नहीं कर पाते; वह शब्दों को अभिभूत कर लेता है, शब्द भिक्षु को अभिभूत नहीं कर पाते; वह गंधों को अभिभूत कर लेता है, गंध भिक्षु को अभिभूत नहीं कर पाते; वह रसों को अभिभूत कर लेता है, रस भिक्षु को अभिभूत नहीं कर पाते; वह स्पर्शों को अभिभूत कर लेता है, स्पर्श भिक्षु को अभिभूत नहीं कर पाते; वह धर्मों को अभिभूत कर लेता है, धर्म भिक्षु को अभिभूत नहीं कर पाते। हे आयुष्मानों, ऐसा भिक्षु 'रूपों को अभिभूत करने वाला', 'शब्दों को अभिभूत करने वाला', 'गंधों को अभिभूत करने वाला', 'रसों को अभिभूत करने वाला', 'स्पर्शों को अभिभूत करने वाला', 'धर्मों को अभिभूत करने वाला' कहा जाता है। वह विजेता है, वह अभिभूत नहीं है; वह उन पापमय अकुशल धर्मों को अभिभूत कर लेता है जो संक्लेशकारी हैं, पुनर्जन्म देने वाले हैं, संतापयुक्त हैं, दुःखद विपाक वाले हैं और भविष्य में जाति, जरा एवं मरण देने वाले हैं। हे आयुष्मानों, इस प्रकार वह 'आस्रव-रहित' होता है। อถ [Pg.393] โข ภควา วุฏฺฐหิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ อามนฺเตสิ – ‘‘สาธุ สาธุ, โมคฺคลฺลาน! สาธุ โข ตฺวํ, โมคฺคลฺลาน, ภิกฺขูนํ อวสฺสุตปริยายญฺจ อนวสฺสุตปริยายญฺจ อภาสี’’ติ. तब भगवान ने उठकर आयुष्मान महामोग्गलान को संबोधित किया— 'साधु! साधु! मोग्गलान। मोग्गलान, तुमने भिक्षुओं के लिए आस्रव-सिक्त होने के पर्याय और आस्रव-रहित होने के पर्याय का बहुत अच्छा वर्णन किया है'। อิทมโวจ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน. สมนุญฺโญ สตฺถา อโหสิ. อตฺตมนา เต ภิกฺขู อายสฺมโต มหาโมคฺคลฺลานสฺส ภาสิตํ อภินนฺทุนฺติ. ฉฏฺฐํ. आयुष्मान महामोग्गलान ने यह कहा। शास्ता ने इसका अनुमोदन किया। उन भिक्षुओं ने आयुष्मान महामोग्गलान के भाषण का प्रसन्न मन से अभिनंदन किया। छठा सुत्त समाप्त। ๗. ทุกฺขธมฺมสุตฺตํ ७. दुक्खधम्म सुत्त ๒๔๔. ยโต โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สพฺเพสํเยว ทุกฺขธมฺมานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ. ตถา โข ปนสฺส กามา ทิฏฺฐา โหนฺติ, ยถาสฺส กาเม ปสฺสโต, โย กาเมสุ กามจฺฉนฺโท กามสฺเนโห กามมุจฺฉา กามปริฬาโห, โส นานุเสติ. ตถา โข ปนสฺส จาโร จ วิหาโร จ อนุพุทฺโธ โหติ, ยถา จรนฺตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา นานุเสนฺติ. २४४. भिक्षुओं, जब कोई भिक्षु सभी दुःखदायी धर्मों (दुःख के कारणों) की उत्पत्ति और विनाश को यथार्थ रूप में जान लेता है, तब वह काम-भोगों को इस प्रकार देखता है कि काम-भोगों को देखते हुए उसके भीतर जो काम-छन्द (इच्छा), काम-स्नेह, काम-मूर्च्छा (मोह) और काम-परिदाह (जलन) होते हैं, वे अनुशयित (स्थिर) नहीं रहते। इसी प्रकार, उसका विचरण और विहार इस तरह भली-भाँति ज्ञात होता है कि विचरण और विहार करते समय उसमें अभिध्या (लोभ) और दौर्मनस्य (द्वेष) जैसे पापमय अकुशल धर्म अनुशयित नहीं होते। ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สพฺเพสํเยว ทุกฺขธมฺมานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ? ‘อิติ รูปํ, อิติ รูปสฺส สมุทโย, อิติ รูปสฺส อตฺถงฺคโม; อิติ เวทนา… อิติ สญฺญา… อิติ สงฺขารา… อิติ วิญฺญาณํ, อิติ วิญฺญาณสฺส สมุทโย, อิติ วิญฺญาณสฺส อตฺถงฺคโม’ติ – เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สพฺเพสํเยว ทุกฺขธมฺมานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ. और भिक्षुओं, भिक्षु किस प्रकार सभी दुःखदायी धर्मों की उत्पत्ति और विनाश को यथार्थ रूप में जानता है? 'यह रूप है, यह रूप की उत्पत्ति है, यह रूप का विनाश है; यह वेदना है... यह संज्ञा है... ये संस्कार हैं... यह विज्ञान है, यह विज्ञान की उत्पत्ति है, यह विज्ञान का विनाश है'—इस प्रकार, भिक्षुओं, भिक्षु सभी दुःखदायी धर्मों की उत्पत्ति और विनाश को यथार्थ रूप में जानता है। ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน กามา ทิฏฺฐา โหนฺติ? ยถาสฺส กาเม ปสฺสโต, โย กาเมสุ กามจฺฉนฺโท กามสฺเนโห กามมุจฺฉา กามปริฬาโห, โส นานุเสติ. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, องฺคารกาสุ สาธิกโปริสา ปุณฺณา องฺคารานํ วีตจฺจิกานํ วีตธูมานํ. อถ ปุริโส อาคจฺเฉยฺย ชีวิตุกาโม อมริตุกาโม สุขกาโม ทุกฺขปฏิกูโล. ตเมนํ ทฺเว พลวนฺโต ปุริสา นานาพาหาสุ คเหตฺวา, ตํ องฺคารกาสุํ อุปกฑฺเฒยฺยุํ. โส อิติจีติเจว กายํ สนฺนาเมยฺย. ตํ กิสฺส เหตุ? ญาต ญฺหิ, ภิกฺขเว, ตสฺส ปุริสสฺส อิมํ จาหํ องฺคารกาสุํ ปปติสฺสามิ, ตโตนิทานํ มรณํ วา นิคจฺฉิสฺสามิ มรณมตฺตํ วา ทุกฺขนฺติ. เอวเมว โข[Pg.394], ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน องฺคารกาสูปมา กามา ทิฏฺฐา โหนฺติ, ยถาสฺส กาเม ปสฺสโต, โย กาเมสุ กามจฺฉนฺโท กามสฺเนโห กามมุจฺฉา กามปริฬาโห, โส นานุเสติ. और भिक्षुओं, भिक्षु काम-भोगों को किस प्रकार देखता है? जैसे काम-भोगों को देखते हुए उसके भीतर जो काम-छन्द, काम-स्नेह, काम-मूर्च्छा और काम-परिदाह होते हैं, वे अनुशयित नहीं रहते। भिक्षुओं, जैसे एक पुरुष की ऊँचाई से भी गहरी अंगारों की खाई हो, जो बिना ज्वाला और बिना धुएँ के दहकते अंगारों से भरी हो। तब कोई पुरुष आए जो जीवित रहने का इच्छुक हो, मरना न चाहता हो, सुख का अभिलाषी हो और दुःख से घृणा करता हो। तब दो बलवान पुरुष उसे अलग-अलग भुजाओं से पकड़कर उस अंगारों की खाई की ओर खींचें। तब वह पुरुष अपने शरीर को यहाँ-वहाँ मरोड़ेगा। वह किस कारण से? भिक्षुओं, क्योंकि उस पुरुष को यह ज्ञात है कि 'यदि मैं इस अंगारों की खाई में गिरूँगा, तो उसके कारण मेरी मृत्यु हो जाएगी या मृत्यु के समान दुःख होगा'। इसी प्रकार, भिक्षुओं, भिक्षु काम-भोगों को अंगारों की खाई के समान देखता है, जिससे काम-भोगों को देखते हुए उसके भीतर काम-छन्द, काम-स्नेह, काम-मूर्च्छा और काम-परिदाह अनुशयित नहीं होते। ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน จาโร จ วิหาโร จ อนุพุทฺโธ โหติ, ยถา จรนฺตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา นานุสฺสวนฺติ ? เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ปุริโส พหุกณฺฏกํ ทายํ ปวิเสยฺย. ตสฺส ปุรโตปิ กณฺฏโก, ปจฺฉโตปิ กณฺฏโก, อุตฺตรโตปิ กณฺฏโก, ทกฺขิณโตปิ กณฺฏโก, เหฏฺฐโตปิ กณฺฏโก, อุปริโตปิ กณฺฏโก. โส สโตว อภิกฺกเมยฺย, สโตว ปฏิกฺกเมยฺย – ‘มา มํ กณฺฏโก’ติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ยํ โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, อยํ วุจฺจติ อริยสฺส วินเย กณฺฏโก’’ติ. อิติ วิทิตฺวา สํวโร จ อสํวโร จ เวทิตพฺโพ. और भिक्षुओं, भिक्षु का विचरण और विहार किस प्रकार भली-भाँति ज्ञात होता है, जिससे विचरण और विहार करते समय अभिध्या और दौर्मनस्य जैसे पापमय अकुशल धर्म पीछे नहीं लगते? भिक्षुओं, जैसे कोई पुरुष बहुत काँटों वाले वन में प्रवेश करे। उसके आगे भी काँटा हो, पीछे भी काँटा हो, उत्तर में भी काँटा हो, दक्षिण में भी काँटा हो, नीचे भी काँटा हो और ऊपर भी काँटा हो। वह सचेत होकर ही आगे बढ़े और सचेत होकर ही पीछे हटे—'कहीं मुझे काँटा न चुभ जाए'। इसी प्रकार, भिक्षुओं, लोक में जो कुछ भी प्रिय रूप और सुखद रूप है, उसे आर्यों के विनय में 'काँटा' कहा जाता है। ऐसा जानकर संवर (संयम) और असंवर (असंयम) को समझना चाहिए। ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, อสํวโร โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา ปิยรูเป รูเป อธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป รูเป พฺยาปชฺชติ, อนุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ ปริตฺตเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ, ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ…เป… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา…เป… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ปิยรูเป ธมฺเม อธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป ธมฺเม พฺยาปชฺชติ, อนุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ ปริตฺตเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, อสํวโร โหติ. और भिक्षुओं, असंवर (असंयम) कैसे होता है? यहाँ, भिक्षुओं, भिक्षु आँखों से रूप को देखकर प्रिय लगने वाले रूप में आसक्त हो जाता है और अप्रिय लगने वाले रूप से द्वेष करता है। वह शरीर के प्रति स्मृति (कायानुपश्यना) के बिना और संकुचित चित्त के साथ विहार करता है। वह उस चेतो-विमुक्ति और प्रज्ञा-विमुक्ति को यथार्थ रूप में नहीं जानता, जहाँ उसके उत्पन्न हुए वे पापमय अकुशल धर्म पूरी तरह निरुद्ध (समाप्त) हो जाते हैं। ... जिह्वा से रस चखकर... मन से धर्म (विचार) को जानकर प्रिय लगने वाले धर्म में आसक्त होता है और अप्रिय लगने वाले धर्म से द्वेष करता है। वह शरीर के प्रति स्मृति के बिना और संकुचित चित्त के साथ विहार करता है। वह उस चेतो-विमुक्ति और प्रज्ञा-विमुक्ति को यथार्थ रूप में नहीं जानता, जहाँ उसके उत्पन्न हुए वे पापमय अकुशल धर्म पूरी तरह निरुद्ध हो जाते हैं। भिक्षुओं, इस प्रकार असंवर होता है। ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, สํวโร โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา ปิยรูเป รูเป นาธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป รูเป น พฺยาปชฺชติ, อุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ อปฺปมาณเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ ปชานาติ, ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ…เป… ชิวฺหา รสํ สายิตฺวา…เป… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ปิยรูเป ธมฺเม นาธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป ธมฺเม น พฺยาปชฺชติ, อุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ อปฺปมาณเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ ปชานาติ, ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา [Pg.395] อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, สํวโร โหติ. और भिक्षुओं, संवर (संयम) कैसे होता है? यहाँ, भिक्षुओं, भिक्षु आँखों से रूप को देखकर प्रिय लगने वाले रूप में आसक्त नहीं होता और अप्रिय लगने वाले रूप से द्वेष नहीं करता। वह शरीर के प्रति उपस्थित स्मृति (कायानुपश्यना) के साथ और असीमित (विशाल) चित्त के साथ विहार करता है। वह उस चेतो-विमुक्ति और प्रज्ञा-विमुक्ति को यथार्थ रूप में जानता है, जहाँ उसके उत्पन्न हुए वे पापमय अकुशल धर्म पूरी तरह निरुद्ध हो जाते हैं। ... जिह्वा से रस चखकर... मन से धर्म को जानकर प्रिय लगने वाले धर्म में आसक्त नहीं होता और अप्रिय लगने वाले धर्म से द्वेष नहीं करता। वह शरीर के प्रति उपस्थित स्मृति के साथ और असीमित चित्त के साथ विहार करता है। वह उस चेतो-विमुक्ति और प्रज्ञा-विमुक्ति को यथार्थ रूप में जानता है, जहाँ उसके उत्पन्न हुए वे पापमय अकुशल धर्म पूरी तरह निरुद्ध हो जाते हैं। भिक्षुओं, इस प्रकार संवर होता है। ‘‘ตสฺส เจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน เอวํ จรโต เอวํ วิหรโต กทาจิ กรหจิ สติสมฺโมสา อุปฺปชฺชนฺติ, ปาปกา อกุสลา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา, ทนฺโธ, ภิกฺขเว, สตุปฺปาโท. อถ โข นํ ขิปฺปเมว ปชหติ วิโนเทติ พฺยนฺตีกโรติ อนภาวํ คเมติ. भिक्षुओं, यदि इस प्रकार विचरण और विहार करते हुए उस भिक्षु में कभी-कभार स्मृति की विस्मृति (भूल) के कारण पापमय अकुशल विचार और संयोजन (बंधन) उत्पन्न करने वाले संकल्प पैदा होते हैं, तो भिक्षुओं, स्मृति का उत्पन्न होना भले ही धीमा हो, किंतु वह उन्हें शीघ्र ही त्याग देता है, दूर कर देता है, नष्ट कर देता है और उन्हें पुन: उत्पन्न नहीं होने देता। ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ปุริโส ทิวสํสนฺตตฺเต อโยกฏาเห ทฺเว วา ตีณิ วา อุทกผุสิตานิ นิปาเตยฺย. ทนฺโธ, ภิกฺขเว, อุทกผุสิตานํ นิปาโต, อถ โข นํ ขิปฺปเมว ปริกฺขยํ ปริยาทานํ คจฺเฉยฺย. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ตสฺส เจ ภิกฺขุโน เอวํ จรโต, เอวํ วิหรโต กทาจิ กรหจิ สติสมฺโมสา อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา สรสงฺกปฺปา สํโยชนิยา, ทนฺโธ, ภิกฺขเว, สตุปฺปาโท. อถ โข นํ ขิปฺปเมว ปชหติ วิโนเทติ พฺยนฺตีกโรติ อนภาวํ คเมติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน จาโร จ วิหาโร จ อนุพุทฺโธ โหติ; ยถา จรนฺตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา นานุสฺสวนฺติ. ตญฺเจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุํ เอวํ จรนฺตํ เอวํ วิหรนฺตํ ราชาโน วา ราชมหามตฺตา วา มิตฺตา วา อมจฺจา วา ญาตี วา สาโลหิตา วา, โภเคหิ อภิหฏฺฐุํ ปวาเรยฺยุํ – ‘เอหิ, โภ ปุริส, กึ เต อิเม กาสาวา อนุทหนฺติ, กึ มุณฺโฑ กปาลมนุจรสิ, เอหิ หีนายาวตฺติตฺวา โภเค จ ภุญฺชสฺสุ, ปุญฺญานิ จ กโรหี’ติ. โส วต, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เอวํ จรนฺโต เอวํ วิหรนฺโต สิกฺขํ ปจฺจกฺขาย หีนายาวตฺติสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. “भिक्षुओं, जैसे कोई मनुष्य दिन भर तपते हुए लोहे के कड़ाह में दो या तीन पानी की बूंदें डाले। भिक्षुओं, पानी की बूंदों का गिरना तो धीमा हो सकता है, किंतु वे शीघ्र ही क्षय और विनाश (सूखने) को प्राप्त हो जाती हैं। इसी प्रकार, भिक्षुओं, यदि इस प्रकार विचरण करते हुए, इस प्रकार विहार करते हुए उस भिक्षु को कभी-कभार स्मृति के विस्मरण से पापमय अकुशल संकल्प, जो संयोजन (बंधन) के कारण हैं, उत्पन्न होते हैं, तो भिक्षुओं, स्मृति का उत्पन्न होना (भले ही) धीमा हो, किंतु वह उन्हें शीघ्र ही त्याग देता है, दूर कर देता है, नष्ट कर देता है और पुन: उत्पन्न न होने की स्थिति में पहुँचा देता है। भिक्षुओं, इस प्रकार भिक्षु का विचरण और विहार भली-भाँति ज्ञात होता है; जिस प्रकार विचरण और विहार करते हुए भिक्षु के भीतर अभिध्या (लोभ) और दौर्मनस्य (द्वेष) रूपी पापमय अकुशल धर्म नहीं टिकते। भिक्षुओं, यदि उस प्रकार विचरण करते हुए और विहार करते हुए उस भिक्षु को राजा, राज-महामात्र, मित्र, अमात्य, ज्ञाति या सगे-संबंधी भोगों (संपत्ति) का प्रलोभन देकर आमंत्रित करें—'हे पुरुष, आओ! ये काषाय वस्त्र तुम्हें क्यों जला रहे हैं? तुम मुंडित होकर भिक्षा-पात्र लिए क्यों घूम रहे हो? आओ, हीन (गृहस्थ) जीवन में लौट आओ, भोगों का उपभोग करो और पुण्य कर्म करो'—तो भिक्षुओं, वह भिक्षु जो इस प्रकार विचरण और विहार कर रहा है, शिक्षा का परित्याग कर हीन जीवन में लौट जाएगा, ऐसा संभव नहीं है।” ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, คงฺคา นที ปาจีนนินฺนา ปาจีนโปณา ปาจีนปพฺภารา. อถ มหาชนกาโย อาคจฺเฉยฺย กุทฺทาล-ปิฏกํ อาทาย – ‘มยํ อิมํ คงฺคํ นทึ ปจฺฉานินฺนํ กริสฺสาม ปจฺฉาโปณํ ปจฺฉาปพฺภาร’นฺติ. ตํ กึ มญฺญถ, ภิกฺขเว, อปิ นุ โข โส มหาชนกาโย คงฺคํ นทึ ปจฺฉานินฺนํ กเรยฺย ปจฺฉาโปณํ ปจฺฉาปพฺภาร’’นฺติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตํ กิสฺส เหตุ’’? ‘‘คงฺคา, ภนฺเต, นที ปาจีนนินฺนา ปาจีนโปณา ปาจีนปพฺภารา; สา น สุกรา ปจฺฉานินฺนา กาตุํ ปจฺฉาโปณา ปจฺฉาปพฺภารา. ยาวเทว จ ปน โส มหาชนกาโย กิลมถสฺส วิฆาตสฺส ภาคี อสฺสา’’ติ. ‘‘เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ตญฺเจ ภิกฺขุํ เอวํ จรนฺตํ เอวํ วิหรนฺตํ ราชาโน วา ราชมหามตฺตา [Pg.396] วา มิตฺตา วา อมจฺจา วา ญาตี วา สาโลหิตา วา โภเคหิ อภิหฏฺฐุํ ปวาเรยฺยุํ – ‘เอหิ, โภ ปุริส, กึ เต อิเม กาสาวา อนุทหนฺติ, กึ มุณฺโฑ กปาลมนุจรสิ, เอหิ หีนายาวตฺติตฺวา โภเค จ ภุญฺชสฺสุ, ปุญฺญานิ จ กโรหี’ติ. โส วต, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เอวํ จรนฺโต เอวํ วิหรนฺโต สิกฺขํ ปจฺจกฺขาย หีนายาวตฺติสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. ตํ กิสฺส เหตุ? ยญฺหิ ตํ, ภิกฺขเว, จิตฺตํ ทีฆรตฺตํ วิเวกนินฺนํ วิเวกโปณํ วิเวกปพฺภารํ, ตถา หีนายาวตฺติสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชตี’’ติ. สตฺตมํ. “भिक्षुओं, जैसे गंगा नदी पूर्व की ओर बहने वाली, पूर्व की ओर झुकने वाली और पूर्व की ओर ढाल वाली है। तब यदि कोई जन-समूह कुदाल और टोकरी लेकर आए और कहे—'हम इस गंगा नदी को पश्चिम की ओर बहने वाली, पश्चिम की ओर झुकने वाली और पश्चिम की ओर ढाल वाली बना देंगे।' भिक्षुओं, तुम क्या सोचते हो? क्या वह जन-समूह गंगा नदी को पश्चिम की ओर बहने वाली, पश्चिम की ओर झुकने वाली और पश्चिम की ओर ढाल वाली बना सकेगा?” “नहीं, भन्ते!” “वह किस कारण से?” “भन्ते, गंगा नदी पूर्व की ओर बहने वाली, पूर्व की ओर झुकने वाली और पूर्व की ओर ढाल वाली है; उसे पश्चिम की ओर बहने वाली, पश्चिम की ओर झुकने वाली और पश्चिम की ओर ढाल वाली बनाना सुगम नहीं है। वह जन-समूह केवल थकान और कष्ट का ही भागी होगा।” “इसी प्रकार, भिक्षुओं, यदि उस प्रकार विचरण करते हुए और विहार करते हुए उस भिक्षु को राजा, राज-महामात्र, मित्र, अमात्य, ज्ञाति या सगे-संबंधी भोगों का प्रलोभन देकर आमंत्रित करें—'हे पुरुष, आओ! ये काषाय वस्त्र तुम्हें क्यों जला रहे हैं? तुम मुंडित होकर भिक्षा-पात्र लिए क्यों घूम रहे हो? आओ, हीन जीवन में लौट आओ, भोगों का उपभोग करो और पुण्य कर्म करो'—तो भिक्षुओं, वह भिक्षु जो इस प्रकार विचरण और विहार कर रहा है, शिक्षा का परित्याग कर हीन जीवन में लौट जाएगा, ऐसा संभव नहीं है। वह किस कारण से? भिक्षुओं, क्योंकि जो चित्त दीर्घकाल से विवेक (एकांत/निर्वाण) की ओर प्रवृत्त है, विवेक की ओर झुका हुआ है, विवेक की ओर ढाल वाला है, वह हीन जीवन में लौट जाएगा, ऐसा संभव नहीं है।” सातवाँ (सूत्र)। ๘. กึสุโกปมสุตฺตํ ८. ८. किंशुक-उपमा सूत्र ๒๔๕. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยนญฺญตโร ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘กิตฺตาวตา นุ โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’’ติ? ‘‘ยโต โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ, เอตฺตาวตา โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’’ติ. २४५. २४५. तब कोई भिक्षु जहाँ एक अन्य भिक्षु था, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर उस भिक्षु से यह बोला— “आयुष्मान्, किस सीमा तक भिक्षु का दर्शन (ज्ञान) सुविशुद्ध होता है?” “आयुष्मान्, जब भिक्षु छह स्पर्श-आयतन (इंद्रिय-आयतन) के उदय और अस्त को यथार्थ रूप से जान लेता है, आयुष्मान्, इतनी सीमा तक भिक्षु का दर्शन सुविशुद्ध होता है।” อถ โข โส ภิกฺขุ อสนฺตุฏฺโฐ ตสฺส ภิกฺขุสฺส ปญฺหเวยฺยากรเณน, เยนญฺญตโร ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘กิตฺตาวตา นุ โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’’ติ? ‘‘ยโต โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ปญฺจนฺนํ อุปาทานกฺขนฺธานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ, เอตฺตาวตา โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’’ติ. तब वह भिक्षु उस भिक्षु के प्रश्न-व्याकरण (उत्तर) से संतुष्ट न होकर, जहाँ एक अन्य भिक्षु था, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर उस भिक्षु से यह बोला— “आयुष्मान्, किस सीमा तक भिक्षु का दर्शन सुविशुद्ध होता है?” “आयुष्मान्, जब भिक्षु पाँच उपादान-स्कंधों के उदय और अस्त को यथार्थ रूप से जान लेता है, आयुष्मान्, इतनी सीमा तक भिक्षु का दर्शन सुविशुद्ध होता है।” อถ โข โส ภิกฺขุ อสนฺตุฏฺโฐ ตสฺส ภิกฺขุสฺส ปญฺหเวยฺยากรเณน, เยนญฺญตโร ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘กิตฺตาวตา นุ โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’’ติ? ‘‘ยโต โข, อาวุโส, ภิกฺขุ จตุนฺนํ มหาภูตานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ, เอตฺตาวตา โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’’ติ. तब वह भिक्षु उस भिक्षु के प्रश्न-व्याकरण से संतुष्ट न होकर, जहाँ एक अन्य भिक्षु था, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर उस भिक्षु से यह बोला— “आयुष्मान्, किस सीमा तक भिक्षु का दर्शन सुविशुद्ध होता है?” “आयुष्मान्, जब भिक्षु चार महाभूतों के उदय और अस्त को यथार्थ रूप से जान लेता है, आयुष्मान्, इतनी सीमा तक भिक्षु का दर्शन सुविशुद्ध होता है।” อถ โข โส ภิกฺขุ อสนฺตุฏฺโฐ ตสฺส ภิกฺขุสฺส ปญฺหเวยฺยากรเณน, เยนญฺญตโร ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘กิตฺตาวตา [Pg.397] นุ โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’’ติ? ‘‘ยโต โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ยํ กิญฺจิ สมุทยธมฺมํ, สพฺพํ ตํ นิโรธธมฺมนฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ, เอตฺตาวตา, โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’’ติ. तब वह भिक्षु उस भिक्षु के प्रश्न-व्याकरण से संतुष्ट न होकर, जहाँ एक अन्य भिक्षु था, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर उस भिक्षु से यह बोला— “आयुष्मान्, किस सीमा तक भिक्षु का दर्शन सुविशुद्ध होता है?” “आयुष्मान्, जब भिक्षु यह यथार्थ रूप से जान लेता है कि— 'जो कुछ भी उदय-धर्मी (उत्पत्ति स्वभाव वाला) है, वह सब निरोध-धर्मी (विनाश स्वभाव वाला) है'— आयुष्मान्, इतनी सीमा तक भिक्षु का दर्शन सुविशुद्ध होता है।” อถ โข โส ภิกฺขุ อสนฺตุฏฺโฐ ตสฺส ภิกฺขุสฺส ปญฺหเวยฺยากรเณน, เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธาหํ, ภนฺเต, เยนญฺญตโร ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมึ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจํ – กิตฺตาวตา นุ โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’ติ? เอวํ วุตฺเต, ภนฺเต, โส ภิกฺขุ มํ เอตทโวจ – ‘ยโต โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ, เอตฺตาวตา โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’ติ. อถ ขฺวาหํ, ภนฺเต, อสนฺตุฏฺโฐ ตสฺส ภิกฺขุสฺส ปญฺหเวยฺยากรเณน, เยนญฺญตโร ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมึ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจํ – ‘กิตฺตาวตา นุ โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’ติ? เอวํ วุตฺเต, ภนฺเต, โส ภิกฺขุ มํ เอตทโวจ – ‘ยโต โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ปญฺจนฺนํ อุปาทานกฺขนฺธานํ…เป… จตุนฺนํ มหาภูตานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ…เป… ยํ กิญฺจิ สมุทยธมฺมํ, สพฺพํ ตํ นิโรธธมฺมนฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ, เอตฺตาวตา โข, อาวุโส, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’ติ. อถ ขฺวาหํ, ภนฺเต, อสนฺตุฏฺโฐ ตสฺส ภิกฺขุสฺส ปญฺหเวยฺยากรเณน เยน ภควา เตนุปสงฺกมึ ( ). กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, ภิกฺขุโน ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหตี’’ติ? तब वह भिक्षु उस भिक्षु के प्रश्न के उत्तर से असंतुष्ट होकर जहाँ भगवान थे वहाँ गया; पहुँचकर भगवान से यह कहा— 'भन्ते, यहाँ मैं एक अन्य भिक्षु के पास गया; जाकर उस भिक्षु से यह पूछा— "आयुष्मान, किस सीमा तक भिक्षु का दर्शन भली-भाँति शुद्ध होता है?" भन्ते, ऐसा पूछने पर उस भिक्षु ने मुझसे यह कहा— "आयुष्मान, जब भिक्षु छह स्पर्श-आयतनों के उदय और अस्त को यथार्थ रूप में जान लेता है, आयुष्मान, इतनी सीमा तक भिक्षु का दर्शन भली-भाँति शुद्ध होता है।" तब मैं, भन्ते, उस भिक्षु के उत्तर से असंतुष्ट होकर एक अन्य भिक्षु के पास गया; जाकर उस भिक्षु से यह पूछा— "आयुष्मान, किस सीमा तक भिक्षु का दर्शन भली-भाँति शुद्ध होता है?" भन्ते, ऐसा पूछने पर उस भिक्षु ने मुझसे यह कहा— "आयुष्मान, जब भिक्षु पाँच उपादान-स्कंधों के... पे... चार महाभूतों के उदय और अस्त को यथार्थ रूप में जान लेता है... पे... जो कुछ भी उदय होने वाला धर्म है, वह सब निरोध होने वाला धर्म है, ऐसा यथार्थ रूप में जान लेता है, आयुष्मान, इतनी सीमा तक भिक्षु का दर्शन भली-भाँति शुद्ध होता है।" तब मैं, भन्ते, उस भिक्षु के उत्तर से असंतुष्ट होकर जहाँ भगवान थे वहाँ आया हूँ। भन्ते, किस सीमा तक भिक्षु का दर्शन भली-भाँति शुद्ध होता है?' ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขุ, ปุริสสฺส กึสุโก อทิฏฺฐปุพฺโพ อสฺส. โส เยนญฺญตโร ปุริโส กึสุกสฺส ทสฺสาวี เตนุปสงฺกเมยฺย. อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ปุริสํ เอวํ วเทยฺย – ‘กีทิโส, โภ ปุริส, กึสุโก’ติ? โส เอวํ วเทยฺย – ‘กาฬโก โข, อมฺโภ ปุริส, กึสุโก – เสยฺยถาปิ ฌามขาณู’ติ. เตน โข ปน, ภิกฺขุ, สมเยน ตาทิโสวสฺส กึสุโก ยถาปิ ตสฺส ปุริสสฺส ทสฺสนํ. อถ โข, โส ภิกฺขุ, ปุริโส อสนฺตุฏฺโฐ ตสฺส ปุริสสฺส ปญฺหเวยฺยากรเณน, เยนญฺญตโร ปุริโส กึสุกสฺส ทสฺสาวี เตนุปสงฺกเมยฺย; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ปุริสํ เอวํ วเทยฺย – ‘กีทิโส[Pg.398], โภ ปุริส, กึสุโก’ติ? โส เอวํ วเทยฺย – ‘โลหิตโก โข, อมฺโภ ปุริส, กึสุโก – เสยฺยถาปิ มํสเปสี’ติ. เตน โข ปน, ภิกฺขุ, สมเยน ตาทิโสวสฺส กึสุโก ยถาปิ ตสฺส ปุริสสฺส ทสฺสนํ. อถ โข โส ภิกฺขุ ปุริโส อสนฺตุฏฺโฐ ตสฺส ปุริสสฺส ปญฺหเวยฺยากรเณน, เยนญฺญตโร ปุริโส กึสุกสฺส ทสฺสาวี เตนุปสงฺกเมยฺย; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ปุริสํ เอวํ วเทยฺย – ‘กีทิโส, โภ ปุริส, กึสุโก’ติ? โส เอวํ วเทยฺย – ‘โอจีรกชาโต โข, อมฺโภ ปุริส, กึสุโก อาทินฺนสิปาฏิโก – เสยฺยถาปิ สิรีโส’ติ. เตน โข ปน, ภิกฺขุ, สมเยน ตาทิโสวสฺส กึสุโก, ยถาปิ ตสฺส ปุริสสฺส ทสฺสนํ. อถ โข โส ภิกฺขุ ปุริโส อสนฺตุฏฺโฐ ตสฺส ปุริสสฺส ปญฺหเวยฺยากรเณน, เยนญฺญตโร ปุริโส กึสุกสฺส ทสฺสาวี เตนุปสงฺกเมยฺย; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ปุริสํ เอวํ วเทยฺย – ‘กีทิโส, โภ ปุริส, กึสุโก’ติ? โส เอวํ วเทยฺย – ‘พหลปตฺตปลาโส สนฺทจฺฉาโย โข, อมฺโภ ปุริส, กึสุโก – เสยฺยถาปิ นิคฺโรโธ’ติ. เตน โข ปน, ภิกฺขุ, สมเยน ตาทิโสวสฺส กึสุโก, ยถาปิ ตสฺส ปุริสสฺส ทสฺสนํ. เอวเมว โข, ภิกฺขุ, ยถา ยถา อธิมุตฺตานํ เตสํ สปฺปุริสานํ ทสฺสนํ สุวิสุทฺธํ โหติ, ตถา ตถา โข เตหิ สปฺปุริเสหิ พฺยากตํ. "जैसे कि, भिक्षु, किसी पुरुष ने पहले कभी किंशुक (पलाश) का वृक्ष न देखा हो। वह किसी ऐसे पुरुष के पास जाए जिसने किंशुक देखा हो। जाकर वह उस पुरुष से ऐसा पूछे— 'हे पुरुष, किंशुक कैसा होता है?' वह ऐसा कहे— 'हे पुरुष, किंशुक काला होता है—जैसे कि जला हुआ ठूँठ।' भिक्षु, उस समय उस पुरुष के देखने के अनुसार किंशुक वैसा ही होता है। तब वह पुरुष उस पुरुष के उत्तर से असंतुष्ट होकर किसी अन्य पुरुष के पास जाए जिसने किंशुक देखा हो; जाकर वह उस पुरुष से ऐसा पूछे— 'हे पुरुष, किंशुक कैसा होता है?' वह ऐसा कहे— 'हे पुरुष, किंशुक लाल होता है—जैसे कि मांस की पेशी।' भिक्षु, उस समय उस पुरुष के देखने के अनुसार किंशुक वैसा ही होता है। तब वह पुरुष उस पुरुष के उत्तर से असंतुष्ट होकर किसी अन्य पुरुष के पास जाए जिसने किंशुक देखा हो; जाकर वह उस पुरुष से ऐसा पूछे— 'हे पुरुष, किंशुक कैसा होता है?' वह ऐसा कहे— 'हे पुरुष, किंशुक सिरिस (शिरीष) के समान लटकती हुई फलियों वाला होता है।' भिक्षु, उस समय उस पुरुष के देखने के अनुसार किंशुक वैसा ही होता है। तब वह पुरुष उस पुरुष के उत्तर से असंतुष्ट होकर किसी अन्य पुरुष के पास जाए जिसने किंशुक देखा हो; जाकर वह उस पुरुष से ऐसा पूछे— 'हे पुरुष, किंशुक कैसा होता है?' वह ऐसा कहे— 'हे पुरुष, किंशुक बरगद के समान घने पत्तों वाला और सघन छाया वाला होता है।' भिक्षु, उस समय उस पुरुष के देखने के अनुसार किंशुक वैसा ही होता है। इसी प्रकार, भिक्षु, जैसे-जैसे उन सत्पुरुषों का दर्शन भली-भाँति शुद्ध होता है, वैसे-वैसे ही उन सत्पुरुषों द्वारा उत्तर दिया गया है।" ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขุ, รญฺโญ ปจฺจนฺติมํ นครํ ทฬฺหุทฺธาปํ ทฬฺหปาการโตรณํ ฉทฺวารํ. ตตฺรสฺส โทวาริโก ปณฺฑิโต พฺยตฺโต เมธาวี, อญฺญาตานํ นิวาเรตา, ญาตานํ ปเวเสตา. ปุรตฺถิมาย ทิสาย อาคนฺตฺวา สีฆํ ทูตยุคํ ตํ โทวาริกํ เอวํ วเทยฺย – ‘กหํ, โภ ปุริส, อิมสฺส นครสฺส นครสฺสามี’ติ? โส เอวํ วเทยฺย – ‘เอโส, ภนฺเต, มชฺเฌ สิงฺฆาฏเก นิสินฺโน’ติ. อถ โข ตํ สีฆํ ทูตยุคํ นครสฺสามิกสฺส ยถาภูตํ วจนํ นิยฺยาเตตฺวา ยถาคตมคฺคํ ปฏิปชฺเชยฺย. ปจฺฉิมาย ทิสาย อาคนฺตฺวา สีฆํ ทูตยุคํ…เป… อุตฺตราย ทิสาย… ทกฺขิณาย ทิสาย อาคนฺตฺวา สีฆํ ทูตยุคํ ตํ โทวาริกํ เอวํ วเทยฺย – ‘กหํ, โภ ปุริส, อิมสฺส นครสฺสามี’ติ? โส เอวํ วเทยฺย – ‘เอโส, ภนฺเต, มชฺเฌ สิงฺฆาฏเก นิสินฺโน’ติ. อถ โข ตํ สีฆํ ทูตยุคํ นครสฺสามิกสฺส ยถาภูตํ วจนํ นิยฺยาเตตฺวา ยถาคตมคฺคํ ปฏิปชฺเชยฺย. "जैसे कि, भिक्षु, राजा का कोई सीमावर्ती नगर हो, जिसकी नींव सुदृढ़ हो, दीवारें और द्वार-तोरण सुदृढ़ हों और जिसमें छह द्वार हों। वहाँ कोई बुद्धिमान, चतुर और मेधावी द्वारपाल हो, जो अपरिचितों को रोके और परिचितों को प्रवेश दे। पूर्व दिशा से आकर शीघ्रगामी दूतों की एक जोड़ी उस द्वारपाल से ऐसा कहे— 'हे पुरुष, इस नगर का स्वामी कहाँ है?' वह ऐसा कहे— 'आर्य, वह बीच चौराहे पर बैठा है।' तब वह शीघ्रगामी दूतों की जोड़ी नगर-स्वामी को यथार्थ संदेश पहुँचाकर जिस मार्ग से आई थी उसी मार्ग से लौट जाए। पश्चिम दिशा से... उत्तर दिशा से... दक्षिण दिशा से आकर शीघ्रगामी दूतों की एक जोड़ी उस द्वारपाल से ऐसा कहे— 'हे पुरुष, इस नगर का स्वामी कहाँ है?' वह ऐसा कहे— 'आर्य, वह बीच चौराहे पर बैठा है।़' तब वह शीघ्रगामी दूतों की जोड़ी नगर-स्वामी को यथार्थ संदेश पहुँचाकर जिस मार्ग से आई थी उसी मार्ग से लौट जाए।" ‘‘อุปมา [Pg.399] โข มฺยายํ, ภิกฺขุ, กตา อตฺถสฺส วิญฺญาปนาย. อยญฺเจตฺถ อตฺโถ – ‘นคร’นฺติ โข, ภิกฺขุ, อิมสฺเสตํ จาตุมหาภูติกสฺส กายสฺส อธิวจนํ มาตาเปตฺติกสมฺภวสฺส โอทนกุมฺมาสูปจยสฺส อนิจฺจุจฺฉาทนปริมทฺทนเภทนวิทฺธํสนธมฺมสฺส. ‘ฉ ทฺวารา’ติ โข, ภิกฺขุ, ฉนฺเนตํ อชฺฌตฺติกานํ อายตนานํ อธิวจนํ. ‘โทวาริโก’ติ โข, ภิกฺขุ, สติยา เอตํ อธิวจนํ. ‘สีฆํ ทูตยุค’นฺติ โข, ภิกฺขุ, สมถวิปสฺสนาเนตํ อธิวจนํ. ‘นครสฺสามี’ติ โข, ภิกฺขุ, วิญฺญาณสฺเสตํ อธิวจนํ. ‘มชฺเฌ สิงฺฆาฏโก’ติ โข, ภิกฺขุ, จตุนฺเนตํ มหาภูตานํ อธิวจนํ – ปถวีธาตุยา, อาโปธาตุยา, เตโชธาตุยา, วาโยธาตุยา. ‘ยถาภูตํ วจน’นฺติ โข, ภิกฺขุ, นิพฺพานสฺเสตํ อธิวจนํ. ‘ยถาคตมคฺโค’ติ โข, ภิกฺขุ, อริยสฺเสตํ อฏฺฐงฺคิกสฺส มคฺคสฺส อธิวจนํ, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิยา…เป… สมฺมาสมาธิสฺสา’’ติ. อฏฺฐมํ. "हे भिक्षु, अर्थ को समझाने के लिए मैंने यह उपमा दी है। और यहाँ इसका अर्थ यह है— 'नगर', हे भिक्षु, इस चार महाभूतों से बने शरीर का नाम है, जो माता-पिता के संयोग से उत्पन्न हुआ है, अन्न और सत्तू के संचय से बढ़ा है, और जो अनित्य, उबटन लगाने, मालिश करने, टूटने और बिखर जाने के स्वभाव वाला है। 'छह द्वार', हे भिक्षु, छह आध्यात्मिक आयतनों का नाम है। 'द्वारपाल', हे भिक्षु, स्मृति का नाम है। 'शीघ्रगामी दूतों की जोड़ी', हे भिक्षु, शमथ और विपश्यना का नाम है। 'नगर का स्वामी', हे भिक्षु, विज्ञान का नाम है। 'मध्य में चौराहा', हे भिक्षु, चार महाभूतों का नाम है— पृथ्वी धातु, आपो धातु, तेजो धातु और वायु धातु। 'यथार्थ वचन', हे भिक्षु, निर्वाण का नाम है। 'यथागत मार्ग', हे भिक्षु, आर्य अष्टांगिक मार्ग का नाम है, जैसे कि— सम्यक् दृष्टि... आदि... सम्यक् समाधि।" आठवाँ (सूत्र)। ๙. วีโณปมสุตฺตํ ९. वीणोपम सुत्त ๒๔๖. ‘‘ยสฺส กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา จกฺขุวิญฺเญยฺเยสุ รูเปสุ อุปฺปชฺเชยฺย ฉนฺโท วา ราโค วา โทโส วา โมโห วา ปฏิฆํ วาปิ เจตโส, ตโต จิตฺตํ นิวาเรยฺย. สภโย เจโส มคฺโค สปฺปฏิภโย จ สกณฺฏโก จ สคหโน จ อุมฺมคฺโค จ กุมฺมคฺโค จ ทุหิติโก จ. อสปฺปุริสเสวิโต เจโส มคฺโค, น เจโส มคฺโค สปฺปุริเสหิ เสวิโต. น ตฺวํ เอตํ อรหสีติ. ตโต จิตฺตํ นิวารเย จกฺขุวิญฺเญยฺเยหิ รูเปหิ…เป… ยสฺส กสฺสจิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา ชิวฺหาวิญฺเญยฺเยสุ รเสสุ…เป… มโนวิญฺเญยฺเยสุ ธมฺเมสุ อุปฺปชฺเชยฺย ฉนฺโท วา ราโค วา โทโส วา โมโห วา ปฏิฆํ วาปิ เจตโส ตโต จิตฺตํ นิวาเรยฺย. สภโย เจโส มคฺโค สปฺปฏิภโย จ สกณฺฏโก จ สคหโน จ อุมฺมคฺโค จ กุมฺมคฺโค จ ทุหิติโก จ. อสปฺปุริสเสวิโต เจโส มคฺโค, น เจโส มคฺโค สปฺปุริเสหิ เสวิโต. น ตฺวํ เอตํ อรหสีติ. ตโต จิตฺตํ นิวารเย มโนวิญฺเญยฺเยหิ ธมฺเมหิ. २४६. "भिक्षुओं, जिस किसी भिक्षु या भिक्षुणी के मन में चक्षु-विज्ञेय रूपों के प्रति छंद (इच्छा), राग, द्वेष, मोह या चित्त का प्रतिघात (क्रोध) उत्पन्न हो, तो उसे वहाँ से चित्त को हटा लेना चाहिए। यह मार्ग भययुक्त है, संकटपूर्ण है, काँटों से भरा है, घने जंगलों वाला है, कुमार्ग है, बुरा रास्ता है और कष्टदायक है। यह मार्ग असत्पुरुषों द्वारा सेवित है, सत्पुरुषों द्वारा सेवित नहीं है। 'तुम्हें इस मार्ग पर नहीं चलना चाहिए'—ऐसा सोचकर चक्षु-विज्ञेय रूपों से चित्त को हटा लेना चाहिए... इसी प्रकार... भिक्षुओं, जिस किसी भिक्षु या भिक्षुणी के मन में जिह्वा-विज्ञेय रसों... आदि... मन-विज्ञेय धर्मों के प्रति छंद, राग, द्वेष, मोह या चित्त का प्रतिघात उत्पन्न हो, तो उसे वहाँ से चित्त को हटा लेना चाहिए। यह मार्ग भययुक्त है, संकटपूर्ण है, काँटों से भरा है, घने जंगलों वाला है, कुमार्ग है, बुरा रास्ता है और कष्टदायक है। यह मार्ग असत्पुरुषों द्वारा सेवित है, सत्पुरुषों द्वारा सेवित नहीं है। 'तुम्हें इस मार्ग पर नहीं चलना चाहिए'—ऐसा सोचकर मन-विज्ञेय धर्मों से चित्त को हटा लेना चाहिए।" ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, กิฏฺฐํ สมฺปนฺนํ. กิฏฺฐารกฺโข จ ปมตฺโต, โคโณ จ กิฏฺฐาโท อทุํ กิฏฺฐํ โอตริตฺวา ยาวทตฺถํ มทํ อาปชฺเชยฺย ปมาทํ อาปชฺเชยฺย[Pg.400]; เอวเมว โข, ภิกฺขเว, อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน ฉสุ ผสฺสายตเนสุ อสํวุตการี ปญฺจสุ กามคุเณสุ ยาวทตฺถํ มทํ อาปชฺชติ ปมาทํ อาปชฺชติ. "भिक्षुओं, जैसे कोई लहलहाती फसल हो और फसल का रक्षक प्रमादी (असावधान) हो, और फसल खाने वाला कोई बैल उस फसल में घुसकर इच्छानुसार खाकर मदमत्त हो जाए और प्रमाद करने लगे; इसी प्रकार, भिक्षुओं, अश्रुतवान् पृथग्जन छह स्पर्श-आयतनों में असंयमित होकर पाँच काम-गुणों में इच्छानुसार मदमत्त हो जाता है और प्रमाद करने लगता है।" ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, กิฏฺฐํ สมฺปนฺนํ กิฏฺฐารกฺโข จ อปฺปมตฺโต โคโณ จ กิฏฺฐาโท อทุํ กิฏฺฐํ โอตเรยฺย. ตเมนํ กิฏฺฐารกฺโข นาสายํ สุคฺคหิตํ คณฺเหยฺย. นาสายํ สุคฺคหิตํ คเหตฺวา อุปริฆฏายํ สุนิคฺคหิตํ นิคฺคณฺเหยฺย. อุปริฆฏายํ สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา ทณฺเฑน สุตาฬิตํ ตาเฬยฺย. ทณฺเฑน สุตาฬิตํ ตาเฬตฺวา โอสชฺเชยฺย. ทุติยมฺปิ โข, ภิกฺขเว …เป… ตติยมฺปิ โข, ภิกฺขเว, โคโณ กิฏฺฐาโท อทุํ กิฏฺฐํ โอตเรยฺย. ตเมนํ กิฏฺฐารกฺโข นาสายํ สุคฺคหิตํ คณฺเหยฺย. นาสายํ สุคฺคหิตํ คเหตฺวา อุปริฆฏายํ สุนิคฺคหิตํ นิคฺคณฺเหยฺย. อุปริฆฏายํ สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา ทณฺเฑน สุตาฬิตํ ตาเฬยฺย. ทณฺเฑน สุตาฬิตํ ตาเฬตฺวา โอสชฺเชยฺย. เอวญฺหิ โส, ภิกฺขเว, โคโณ กิฏฺฐาโท คามคโต วา อรญฺญคโต วา, ฐานพหุโล วา อสฺส นิสชฺชพหุโล วา น ตํ กิฏฺฐํ ปุน โอตเรยฺย – ตเมว ปุริมํ ทณฺฑสมฺผสฺสํ สมนุสฺสรนฺโต. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ยโต โข ภิกฺขุโน ฉสุ ผสฺสายตเนสุ จิตฺตํ อุทุชิตํ โหติ สุทุชิตํ, อชฺฌตฺตเมว สนฺติฏฺฐติ, สนฺนิสีทติ, เอโกทิ โหติ, สมาธิยติ. "भिक्षुओं, जैसे कोई लहलहाती फसल हो और फसल का रक्षक अप्रमादी (सावधान) हो, और फसल खाने वाला बैल उस फसल में घुस जाए। तब वह फसल का रक्षक उसे नाक से मजबूती से पकड़ ले। नाक से मजबूती से पकड़कर उसे सींगों के बीच (मस्तक पर) अच्छी तरह दबाए। सींगों के बीच अच्छी तरह दबाकर उसे डंडे से खूब पीटे। डंडे से खूब पीटकर उसे छोड़ दे। दूसरी बार भी... तीसरी बार भी, भिक्षुओं, वह फसल खाने वाला बैल उस फसल में घुसे, और वह रक्षक उसे नाक से पकड़कर, मस्तक पर दबाकर, डंडे से खूब पीटकर छोड़ दे। भिक्षुओं, इस प्रकार वह फसल खाने वाला बैल चाहे गाँव में जाए या जंगल में, वह खड़ा ही रहेगा या बैठा ही रहेगा, पर उस फसल में फिर कभी नहीं घुसेगा—उस पहले वाले डंडे की मार को याद करते हुए। इसी प्रकार, भिक्षुओं, जब भिक्षु का चित्त छह स्पर्श-आयतनों में अच्छी तरह दमित (शिक्षित) हो जाता है, तब वह भीतर ही अच्छी तरह स्थित होता है, शांत होता है, एकाग्र होता है और समाहित हो जाता है।" ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, รญฺโญ วา ราชมหามตฺตสฺส วา วีณาย สทฺโท อสฺสุตปุพฺโพ อสฺส. โส วีณาสทฺทํ สุเณยฺย. โส เอวํ วเทยฺย – ‘อมฺโภ, กสฺส นุ โข เอโส สทฺโท เอวํรชนีโย เอวํกมนีโย เอวํมทนีโย เอวํมุจฺฉนีโย เอวํพนฺธนีโย’ติ? ตเมนํ เอวํ วเทยฺยุํ – ‘เอสา, โข, ภนฺเต, วีณา นาม, ยสฺสา เอโส สทฺโท เอวํรชนีโย เอวํกมนีโย เอวํมทนีโย เอวํมุจฺฉนีโย เอวํพนฺธนีโย’ติ. โส เอวํ วเทยฺย – ‘คจฺฉถ เม, โภ, ตํ วีณํ อาหรถา’ติ. ตสฺส ตํ วีณํ อาหเรยฺยุํ. ตเมนํ เอวํ วเทยฺยุํ – ‘อยํ โข สา, ภนฺเต, วีณา ยสฺสา เอโส สทฺโท เอวํรชนีโย เอวํกมนีโย เอวํมทนีโย เอวํมุจฺฉนีโย เอวํพนฺธนีโย’ติ. โส เอวํ วเทยฺย – ‘อลํ เม, โภ, ตาย วีณาย, ตเมว เม สทฺทํ อาหรถา’ติ. ตเมนํ เอวํ วเทยฺยุํ – ‘อยํ โข, ภนฺเต, วีณา นาม อเนกสมฺภารา มหาสมฺภารา. อเนเกหิ สมฺภาเรหิ สมารทฺธา วทติ[Pg.401], เสยฺยถิทํ – โทณิญฺจ ปฏิจฺจ จมฺมญฺจ ปฏิจฺจ ทณฺฑญฺจ ปฏิจฺจ อุปธารเณ จ ปฏิจฺจ ตนฺติโย จ ปฏิจฺจ โกณญฺจ ปฏิจฺจ ปุริสสฺส จ ตชฺชํ วายามํ ปฏิจฺจ เอวายํ, ภนฺเต, วีณา นาม อเนกสมฺภารา มหาสมฺภารา. อเนเกหิ สมฺภาเรหิ สมารทฺธา วทตี’ติ. โส ตํ วีณํ ทสธา วา สตธา วา ผาเลยฺย, ทสธา วา สตธา วา ตํ ผาเลตฺวา สกลิกํ สกลิกํ กเรยฺย. สกลิกํ สกลิกํ กริตฺวา อคฺคินา ฑเหยฺย, อคฺคินา ฑหิตฺวา มสึ กเรยฺย. มสึ กริตฺวา มหาวาเต วา โอผุเนยฺย, นทิยา วา สีฆโสตาย ปวาเหยฺย. โส เอวํ วเทยฺย – ‘อสตี กิรายํ, โภ, วีณา นาม, ยเถวํ ยํ กิญฺจิ วีณา นาม เอตฺถ จ ปนายํ ชโน อติเวลํ ปมตฺโต ปลฬิโต’ติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ รูปํ สมนฺเวสติ ยาวตา รูปสฺส คติ, เวทนํ สมนฺเวสติ ยาวตา เวทนาย คติ, สญฺญํ สมนฺเวสติ ยาวตา สญฺญาย คติ, สงฺขาเร สมนฺเวสติ ยาวตา สงฺขารานํ คติ, วิญฺญาณํ สมนฺเวสติ ยาวตา วิญฺญาณสฺส คติ. ตสฺส รูปํ สมนฺเวสโต ยาวตา รูปสฺส คติ, เวทนํ สมนฺเวสโต…เป… สญฺญํ… สงฺขาเร… วิญฺญาณํ สมนฺเวสโต ยาวตา วิญฺญาณสฺส คติ. ยมฺปิสฺส ตํ โหติ อหนฺติ วา มมนฺติ วา อสฺมีติ วา ตมฺปิ ตสฺส น โหตี’’ติ. นวมํ. “भिक्षुओं, जैसे किसी राजा या राजमहामात्र ने पहले कभी वीणा की आवाज़ न सुनी हो। वह वीणा की आवाज़ सुने। वह ऐसा कहे— ‘अरे, यह किसकी आवाज़ है जो इतनी रंजक, इतनी कमनीय, इतनी मदहोश करने वाली, इतनी मोहक और इतनी बांध लेने वाली है?’ तब उसे लोग ऐसा कहें— ‘भन्ते, यह वीणा है, जिसकी यह आवाज़ इतनी रंजक, इतनी कमनीय, इतनी मदहोश करने वाली, इतनी मोहक और इतनी बांध लेने वाली है।’ वह ऐसा कहे— ‘अरे, जाओ और मेरे लिए वह वीणा ले आओ।’ वे उसके लिए वह वीणा ले आएं। वे उसे ऐसा कहें— ‘भन्ते, यह वही वीणा है जिसकी यह आवाज़ इतनी रंजक, इतनी कमनीय, इतनी मदहोश करने वाली, इतनी मोहक और इतनी बांध लेने वाली है।’ वह ऐसा कहे— ‘अरे, मुझे इस वीणा से क्या लेना-देना, मेरे लिए तो वही आवाज़ ले आओ।’ वे उसे ऐसा कहें— ‘भन्ते, यह वीणा अनेक सामग्रियों से बनी है, महान सामग्रियों से बनी है। अनेक सामग्रियों के संयोग से यह बजती है, जैसे— द्रोणी (खोल), चमड़ा, दण्ड, खूँटियाँ, तार, कोण (बजाने का यंत्र) और पुरुष के उचित प्रयत्न के कारण; भन्ते, इस प्रकार यह वीणा अनेक सामग्रियों वाली, महान सामग्रियों वाली है। अनेक सामग्रियों के संयोग से यह बजती है।’ वह उस वीणा को दस टुकड़ों में या सौ टुकड़ों में फाड़ डाले; दस या सौ टुकड़ों में फाड़कर उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में कर दे। छोटे-छोटे टुकड़ों में करके उसे आग में जला दे, आग में जलाकर उसकी राख बना दे। राख बनाकर उसे तेज़ हवा में उड़ा दे या तेज़ धारा वाली नदी में बहा दे। वह ऐसा कहे— ‘अरे, यह वीणा तो व्यर्थ ही है, जो कुछ भी वीणा कहलाती है; और यहाँ यह लोग इसमें अत्यधिक प्रमादी और आसक्त हैं।’ इसी प्रकार, भिक्षुओं, भिक्षु रूप की खोज करता है जहाँ तक रूप की गति है, वेदना की खोज करता है जहाँ तक वेदना की गति है, संज्ञा की खोज करता है जहाँ तक संज्ञा की गति है, संस्कारों की खोज करता है जहाँ तक संस्कारों की गति है, विज्ञान की खोज करता है जहाँ तक विज्ञान की गति है। रूप की खोज करते हुए जहाँ तक रूप की गति है... वेदना की... संज्ञा की... संस्कारों की... विज्ञान की खोज करते हुए जहाँ तक विज्ञान की गति है, उसे जो ‘मैं हूँ’ या ‘मेरा है’ या ‘मैं हूँ’ (अस्मि) ऐसा जो अहंकार होता था, वह भी उसे नहीं होता।” नौवां सुत्त समाप्त। ๑๐. ฉปฺปาณโกปมสุตฺตํ १०. १०. छप्पाणकोपम सुत्त ๒๔๗. ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ปุริโส อรุคตฺโต ปกฺกคตฺโต สรวนํ ปวิเสยฺย. ตสฺส กุสกณฺฏกา เจว ปาเท วิชฺเฌยฺยุํ, สรปตฺตานิ จ คตฺตานิ วิเลเขยฺยุํ. เอวญฺหิ โส, ภิกฺขเว, ปุริโส ภิยฺโยโสมตฺตาย ตโตนิทานํ ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวทิเยถ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, อิเธกจฺโจ ภิกฺขุ คามคโต วา อรญฺญคโต วา ลภติ วตฺตารํ – ‘อยญฺจ โส อายสฺมา เอวํการี เอวํสมาจาโร อสุจิคามกณฺฏโก’ติ. ตํ กณฺฏโกติ อิติ วิทิตฺวา สํวโร จ อสํวโร จ เวทิตพฺโพ. २४७. २४७. “भिक्षुओं, जैसे कोई पुरुष जिसके शरीर पर घाव हों और वे घाव पके हुए हों, वह सरकंडों के वन (काँटों के जंगल) में प्रवेश करे। कुश के काँटे उसके पैरों में चुभें और सरकंडों के पत्ते उसके शरीर के घावों को खुरच दें। भिक्षुओं, इस प्रकार वह पुरुष उस कारण से और भी अधिक दुःख और मानसिक कष्ट का अनुभव करेगा। इसी प्रकार, भिक्षुओं, यहाँ कोई भिक्षु गाँव में गया हो या जंगल में गया हो, उसे निंदा करने वाला मिल जाता है— ‘यह आयुष्मान ऐसा करने वाला है, ऐसा आचरण करने वाला है, यह अशुद्ध है, गाँव का काँटा है।’ उसे ‘काँटा’ जानकर संयम और असंयम को समझना चाहिए। ‘‘กถญฺจ[Pg.402], ภิกฺขเว, อสํวโร โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา ปิยรูเป รูเป อธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป รูเป พฺยาปชฺชติ, อนุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ ปริตฺตเจตโส. ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ, ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. โสเตน สทฺทํ สุตฺวา… ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตฺวา… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา… กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสิตฺวา… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ปิยรูเป ธมฺเม อธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป ธมฺเม พฺยาปชฺชติ, อนุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ ปริตฺตเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ, ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. “और भिक्षुओं, असंयम कैसे होता है? यहाँ, भिक्षुओं, भिक्षु आँख से रूप देखकर प्रिय लगने वाले रूप में आसक्त हो जाता है और अप्रिय लगने वाले रूप से द्वेष करता है। वह शरीर की स्मृति (कायागतासति) को उपस्थित न रखते हुए संकुचित चित्त वाला होकर विहार करता है। वह उस चेतोविमुक्ति और प्रज्ञाविमुक्ति को यथार्थ रूप से नहीं जानता, जहाँ उसके उत्पन्न हुए वे पापमय अकुशल धर्म बिना शेष रहे निरुद्ध हो जाते हैं। कान से शब्द सुनकर... नाक से गंध सूंघकर... जीभ से रस चखकर... शरीर से स्पर्श छूकर... मन से धर्म (विचार) जानकर प्रिय लगने वाले धर्म में आसक्त हो जाता है और अप्रिय लगने वाले धर्म से द्वेष करता है। वह शरीर की स्मृति को उपस्थित न रखते हुए संकुचित चित्त वाला होकर विहार करता है। वह उस चेतोविमुक्ति और प्रज्ञाविमुक्ति को यथार्थ रूप से नहीं जानता, जहाँ उसके उत्पन्न हुए वे पापमय अकुशल धर्म बिना शेष रहे निरुद्ध हो जाते हैं। ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ปุริโส ฉปฺปาณเก คเหตฺวา นานาวิสเย นานาโคจเร ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. อหึ คเหตฺวา ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. สุสุมารํ คเหตฺวา ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. ปกฺขึ คเหตฺวา ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. กุกฺกุรํ คเหตฺวา ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. สิงฺคาลํ คเหตฺวา ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. มกฺกฏํ คเหตฺวา ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺธิตฺวา มชฺเฌ คณฺฐึ กริตฺวา โอสฺสชฺเชยฺย. อถ โข, เต, ภิกฺขเว, ฉปฺปาณกา นานาวิสยา นานาโคจรา สกํ สกํ โคจรวิสยํ อาวิญฺเฉยฺยุํ – อหิ อาวิญฺเฉยฺย ‘วมฺมิกํ ปเวกฺขามี’ติ, สุสุมาโร อาวิญฺเฉยฺย ‘อุทกํ ปเวกฺขามี’ติ, ปกฺขี อาวิญฺเฉยฺย ‘อากาสํ เฑสฺสามี’ติ, กุกฺกุโร อาวิญฺเฉยฺย ‘คามํ ปเวกฺขามี’ติ, สิงฺคาโล อาวิญฺเฉยฺย ‘สีวถิกํ ปเวกฺขามี’ติ, มกฺกโฏ อาวิญฺเฉยฺย ‘วนํ ปเวกฺขามี’ติ. ยทา โข เต, ภิกฺขเว, ฉปฺปาณกา ฌตฺตา อสฺสุ กิลนฺตา, อถ โข โย เนสํ ปาณกานํ พลวตโร อสฺส ตสฺส เต อนุวตฺเตยฺยุํ, อนุวิธาเยยฺยุํ วสํ คจฺเฉยฺยุํ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ยสฺส กสฺสจิ ภิกฺขุโน กายคตาสติ อภาวิตา อพหุลีกตา, ตํ จกฺขุ อาวิญฺฉติ มนาปิเยสุ รูเปสุ, อมนาปิยา รูปา ปฏิกูลา โหนฺติ…เป… มโน อาวิญฺฉติ มนาปิเยสุ ธมฺเมสุ, อมนาปิยา ธมฺมา ปฏิกูลา โหนฺติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, อสํวโร โหติ. भिक्षुओं, जैसे कोई पुरुष अलग-अलग निवास-स्थान और अलग-अलग विचरण-क्षेत्र वाले छह प्राणियों को पकड़कर एक मजबूत रस्सी से बाँध दे। वह एक साँप को पकड़कर मजबूत रस्सी से बाँध दे, एक मगरमच्छ को पकड़कर मजबूत रस्सी से बाँध दे, एक पक्षी को पकड़कर मजबूत रस्सी से बाँध दे, एक कुत्ते को पकड़कर मजबूत रस्सी से बाँध दे, एक सियार को पकड़कर मजबूत रस्सी से बाँध दे, और एक बंदर को पकड़कर मजबूत रस्सी से बाँध दे। उन्हें मजबूत रस्सी से बाँधकर, बीच में एक गाँठ लगाकर छोड़ दे। तब, भिक्षुओं, वे अलग-अलग निवास और विचरण-क्षेत्र वाले छह प्राणी अपने-अपने विचरण-क्षेत्र की ओर खींचेंगे—साँप यह सोचकर खींचेगा कि 'मैं बाँबी (बिल) में प्रवेश करूँगा', मगरमच्छ यह सोचकर खींचेगा कि 'मैं जल में प्रवेश करूँगा', पक्षी यह सोचकर खींचेगा कि 'मैं आकाश में उड़ूँगा', कुत्ता यह सोचकर खींचेगा कि 'मैं गाँव में प्रवेश करूँगा', सियार यह सोचकर खींचेगा कि 'मैं श्मशान में प्रवेश करूँगा', और बंदर यह सोचकर खींचेगा कि 'मैं वन में प्रवेश करूँगा'। भिक्षुओं, जब वे छह प्राणी भूखे-प्यासे और थक जाएँगे, तब उनमें से जो प्राणी सबसे अधिक बलवान होगा, वे सब उसी के पीछे चलेंगे, उसी का अनुसरण करेंगे और उसी के वश में हो जाएँगे। इसी प्रकार, भिक्षुओं, जिस किसी भिक्षु ने कायानुपश्यना (कायगतसति) का अभ्यास नहीं किया है और उसे बार-बार नहीं किया है, उसे आँख प्रिय रूपों की ओर खींचती है और अप्रिय रूप उसे प्रतिकूल लगते हैं... मन प्रिय धर्मों (विचारों) की ओर खींचता है और अप्रिय धर्म प्रतिकूल लगते हैं। भिक्षुओं, इस प्रकार असंयम (असंवर) होता है। ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, สํวโร โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา ปิยรูเป รูเป นาธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป รูเป น พฺยาปชฺชติ, อุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ [Pg.403] วิหรติ อปฺปมาณเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ ปชานาติ, ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ…เป… ชิวฺหา รสํ สายิตฺวา…เป… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย ปิยรูเป ธมฺเม นาธิมุจฺจติ, อปฺปิยรูเป ธมฺเม น พฺยาปชฺชติ, อุปฏฺฐิตกายสฺสติ จ วิหรติ อปฺปมาณเจตโส, ตญฺจ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ยถาภูตํ ปชานาติ ยตฺถสฺส เต อุปฺปนฺนา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อปริเสสา นิรุชฺฌนฺติ. और भिक्षुओं, संयम (संवर) कैसे होता है? यहाँ, भिक्षुओं, भिक्षु आँख से रूप देखकर प्रिय लगने वाले रूपों में आसक्त नहीं होता और अप्रिय लगने वाले रूपों से द्वेष नहीं करता। वह शरीर में स्थापित स्मृति (कायगतसति) के साथ और अप्रमाणित चित्त (विशाल चित्त) के साथ विहार करता है। वह उस चेतो-विमुक्ति और प्रज्ञा-विमुक्ति को यथार्थ रूप में जानता है, जहाँ उसके उत्पन्न हुए वे पापमय अकुशल धर्म बिना किसी अवशेष के निरुद्ध हो जाते हैं... (इसी प्रकार) जीभ से रस चखकर... मन से धर्म को जानकर, वह प्रिय लगने वाले धर्मों में आसक्त नहीं होता और अप्रिय लगने वाले धर्मों से द्वेष नहीं करता। वह शरीर में स्थापित स्मृति के साथ और अप्रमाणित चित्त के साथ विहार करता है। वह उस चेतो-विमुक्ति और प्रज्ञा-विमुक्ति को यथार्थ रूप में जानता है, जहाँ उसके उत्पन्न हुए वे पापमय अकुशल धर्म बिना किसी अवशेष के निरुद्ध हो जाते हैं। ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ปุริโส ฉปฺปาณเก คเหตฺวา นานาวิสเย นานาโคจเร ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. อหึ คเหตฺวา ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. สุสุมารํ คเหตฺวา ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. ปกฺขึ คเหตฺวา…เป… กุกฺกุรํ คเหตฺวา… สิงฺคาลํ คเหตฺวา… มกฺกฏํ คเหตฺวา ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺเธยฺย. ทฬฺหาย รชฺชุยา พนฺธิตฺวา ทฬฺเห ขีเล วา ถมฺเภ วา อุปนิพนฺเธยฺย. อถ โข เต, ภิกฺขเว, ฉปฺปาณกา นานาวิสยา นานาโคจรา สกํ สกํ โคจรวิสยํ อาวิญฺเฉยฺยุํ – อหิ อาวิญฺเฉยฺย ‘วมฺมิกํ ปเวกฺขามี’ติ, สุสุมาโร อาวิญฺเฉยฺย ‘อุทกํ ปเวกฺขามี’ติ, ปกฺขี อาวิญฺเฉยฺย ‘อากาสํ เฑสฺสามี’ติ, กุกฺกุโร อาวิญฺเฉยฺย ‘คามํ ปเวกฺขามี’ติ, สิงฺคาโล อาวิญฺเฉยฺย ‘สีวถิกํ ปเวกฺขามี’ติ, มกฺกโฏ อาวิญฺเฉยฺย ‘วนํ ปเวกฺขามี’ติ. ยทา โข เต, ภิกฺขเว, ฉปฺปาณกา ฌตฺตา อสฺสุ กิลนฺตา, อถ ตเมว ขีลํ วา ถมฺภํ วา อุปติฏฺเฐยฺยุํ, อุปนิสีเทยฺยุํ, อุปนิปชฺเชยฺยุํ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ยสฺส กสฺสจิ ภิกฺขุโน กายคตาสติ ภาวิตา พหุลีกตา, ตํ จกฺขุ นาวิญฺฉติ มนาปิเยสุ รูเปสุ, อมนาปิยา รูปา นปฺปฏิกูลา โหนฺติ…เป… ชิวฺหา นาวิญฺฉติ มนาปิเยสุ รเสสุ…เป… มโน นาวิญฺฉติ มนาปิเยสุ ธมฺเมสุ, อมนาปิยา ธมฺมา นปฺปฏิกูลา โหนฺติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, สํวโร โหติ. भिक्षुओं, जैसे कोई पुरुष अलग-अलग निवास और विचरण-क्षेत्र वाले छह प्राणियों को पकड़कर एक मजबूत रस्सी से बाँध दे। वह साँप को... मगरमच्छ को... पक्षी को... कुत्ते को... सियार को... बंदर को पकड़कर मजबूत रस्सी से बाँध दे। उन्हें मजबूत रस्सी से बाँधकर एक मजबूत खूँटे या खंभे से बाँध दे। तब, भिक्षुओं, वे अलग-अलग निवास और विचरण-क्षेत्र वाले छह प्राणी अपने-अपने विचरण-क्षेत्र की ओर खींचेंगे—साँप बाँबी की ओर, मगरमच्छ जल की ओर, पक्षी आकाश की ओर, कुत्ता गाँव की ओर, सियार श्मशान की ओर, और बंदर वन की ओर खींचेगा। भिक्षुओं, जब वे छह प्राणी भूखे-प्यासे और थक जाएँगे, तब वे उसी खूँटे या खंभे के पास खड़े हो जाएँगे, बैठ जाएँगे या लेट जाएँगे। इसी प्रकार, भिक्षुओं, जिस किसी भिक्षु ने कायानुपश्यना (कायगतसति) का अभ्यास और संवर्धन किया है, उसे आँख प्रिय रूपों की ओर नहीं खींचती और अप्रिय रूप उसे प्रतिकूल नहीं लगते... जीभ प्रिय रसों की ओर नहीं खींचती... मन प्रिय धर्मों की ओर नहीं खींचता और अप्रिय धर्म उसे प्रतिकूल नहीं लगते। भिक्षुओं, इस प्रकार संयम (संवर) होता है। ‘‘‘ทฬฺเห ขีเล วา ถมฺเภ วา’ติ โข, ภิกฺขเว, กายคตาย สติยา เอตํ อธิวจนํ. ตสฺมาติห โว, ภิกฺขเว, เอวํ สิกฺขิตพฺพํ – ‘กายคตา โน สติ ภาวิตา ภวิสฺสติ พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา’ติ. เอวญฺหิ โข, ภิกฺขเว, สิกฺขิตพฺพ’’นฺติ. ทสมํ. भिक्षुओं, 'मजबूत खूँटा या खंभा'—यह कायानुपश्यना (कायगतसति) का ही एक नाम है। इसलिए, भिक्षुओं, तुम्हें इस प्रकार शिक्षा लेनी चाहिए—'हमारी कायानुपश्यना विकसित होगी, बहुलीकृत (निरंतर अभ्यास) होगी, सवारी (यान) की तरह बनाई जाएगी, आधार की तरह बनाई जाएगी, प्रतिष्ठित होगी, संचित होगी और भली-भाँति आरम्भ की जाएगी।' भिक्षुओं, तुम्हें इसी प्रकार शिक्षा लेनी चाहिए। दसवाँ सुत्त समाप्त। ๑๑. ยวกลาปิสุตฺตํ ११. यवकलापि सुत्त ๒๔๘. ‘‘เสยฺยถาปิ[Pg.404], ภิกฺขเว, ยวกลาปี จาตุมหาปเถ นิกฺขิตฺตา อสฺส. อถ ฉ ปุริสา อาคจฺเฉยฺยุํ พฺยาภงฺคิหตฺถา. เต ยวกลาปึ ฉหิ พฺยาภงฺคีหิ หเนยฺยุํ. เอวญฺหิ สา, ภิกฺขเว, ยวกลาปี สุหตา อสฺส ฉหิ พฺยาภงฺคีหิ หญฺญมานา. อถ สตฺตโม ปุริโส อาคจฺเฉยฺย พฺยาภงฺคิหตฺโถ. โส ตํ ยวกลาปึ สตฺตมาย พฺยาภงฺคิยา หเนยฺย. เอวญฺหิ สา ภิกฺขเว, ยวกลาปี สุหตตรา อสฺส, สตฺตมาย พฺยาภงฺคิยา หญฺญมานา. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน จกฺขุสฺมึ หญฺญติ มนาปามนาเปหิ รูเปหิ…เป… ชิวฺหาย หญฺญติ มนาปามนาเปหิ รเสหิ…เป… มนสฺมึ หญฺญติ มนาปามนาเปหิ ธมฺเมหิ. สเจ โส, ภิกฺขเว, อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน อายตึ ปุนพฺภวาย เจเตติ, เอวญฺหิ โส, ภิกฺขเว, โมฆปุริโส สุหตตโร โหติ, เสยฺยถาปิ สา ยวกลาปี สตฺตมาย พฺยาภงฺคิยา หญฺญมานา. २४८. भिक्षुओं, जैसे जौ का एक गट्ठर किसी चौराहे पर रखा हो। तब छह पुरुष अपने हाथों में लाठियाँ (पीटने के औजार) लेकर आएँ। वे उस जौ के गट्ठर को उन छह लाठियों से पीटें। भिक्षुओं, इस प्रकार वह जौ का गट्ठर उन छह लाठियों से पीटे जाने पर अच्छी तरह कुचल जाएगा। तब सातवाँ पुरुष हाथ में लाठी लेकर आए और वह उस जौ के गट्ठर को सातवीं लाठी से पीटे। भिक्षुओं, इस प्रकार वह जौ का गट्ठर सातवीं लाठी से पीटे जाने पर और भी अधिक कुचल जाएगा। इसी प्रकार, भिक्षुओं, अश्रुतवान (अज्ञानी) पृथग्जन आँख में प्रिय और अप्रिय रूपों द्वारा आहत होता है... जीभ में प्रिय और अप्रिय रसों द्वारा आहत होता है... मन में प्रिय और अप्रिय धर्मों द्वारा आहत होता है। भिक्षुओं, यदि वह अश्रुतवान पृथग्जन भविष्य में पुनर्जन्म के लिए संकल्प (चेतना) करता है, तो वह मोघपुरुष (व्यर्थ पुरुष) और भी अधिक आहत होता है, ठीक वैसे ही जैसे वह जौ का गट्ठर सातवीं लाठी से पीटे जाने पर और अधिक कुचल गया था। ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, เทวาสุรสงฺคาโม สมุปพฺยูฬฺโห อโหสิ. อถ โข, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติ อสุรินฺโท อสุเร อามนฺเตสิ – ‘สเจ, มาริสา, เทวาสุรสงฺคาเม สมุปพฺยูฬฺเห อสุรา ชิเนยฺยุํ เทวา ปราชิเนยฺยุํ, เยน นํ สกฺกํ เทวานมินฺทํ กณฺฐปญฺจเมหิ พนฺธเนหิ พนฺธิตฺวา มม สนฺติเก อาเนยฺยาถ อสุรปุร’นฺติ. สกฺโกปิ โข, ภิกฺขเว, เทวานมินฺโท เทเว ตาวตึเส อามนฺเตสิ – ‘สเจ, มาริสา, เทวาสุรสงฺคาเม สมุปพฺยูฬฺเห เทวา ชิเนยฺยุํ อสุรา ปราชิเนยฺยุํ, เยน นํ เวปจิตฺตึ อสุรินฺทํ กณฺฐปญฺจเมหิ พนฺธเนหิ พนฺธิตฺวา มม สนฺติเก อาเนยฺยาถ สุธมฺมํ เทวสภ’นฺติ. ตสฺมึ โข ปน, ภิกฺขเว, สงฺคาเม เทวา ชินึสุ, อสุรา ปราชินึสุ. อถ โข, ภิกฺขเว, เทวา ตาวตึสา เวปจิตฺตึ อสุรินฺทํ กณฺฐปญฺจเมหิ พนฺธเนหิ พนฺธิตฺวา สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส สนฺติเก อาเนสุํ สุธมฺมํ เทวสภํ. ตตฺร สุทํ, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติ อสุรินฺโท กณฺฐปญฺจเมหิ พนฺธเนหิ พทฺโธ โหติ. ยทา โข, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติสฺส อสุรินฺทสฺส เอวํ โหติ – ‘ธมฺมิกา โข เทวา, อธมฺมิกา อสุรา[Pg.405], อิเธว ทานาหํ เทวปุรํ คจฺฉามี’ติ. อถ กณฺฐปญฺจเมหิ พนฺธเนหิ มุตฺตํ อตฺตานํ สมนุปสฺสติ, ทิพฺเพหิ จ ปญฺจหิ กามคุเณหิ สมปฺปิโต สมงฺคีภูโต ปริจาเรติ. ยทา จ โข, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติสฺส อสุรินฺทสฺส เอวํ โหติ – ‘ธมฺมิกา โข อสุรา, อธมฺมิกา เทวา, ตตฺเถว ทานาหํ อสุรปุรํ คมิสฺสามี’ติ, อถ กณฺฐปญฺจเมหิ พนฺธเนหิ พทฺธํ อตฺตานํ สมนุปสฺสติ. ทิพฺเพหิ จ ปญฺจหิ กามคุเณหิ ปริหายติ. เอวํ สุขุมํ โข, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติพนฺธนํ. ตโต สุขุมตรํ มารพนฺธนํ. มญฺญมาโน โข, ภิกฺขเว, พทฺโธ มารสฺส, อมญฺญมาโน มุตฺโต ปาปิมโต. भिक्षुओं, प्राचीन काल में देवताओं और असुरों के बीच युद्ध छिड़ गया था। तब, भिक्षुओं, असुरराज वेपचित्ति ने असुरों को संबोधित किया— 'हे मित्रों! यदि देवताओं और असुरों के युद्ध में असुर जीतें और देवता हारें, तो देवराज शक्र को गले सहित पाँच बंधनों (पाँच-गुना गले के बंधनों) से बाँधकर मेरे पास असुरपुर ले आना।' भिक्षुओं, देवराज शक्र ने भी त्रायस्त्रिंश देवताओं को संबोधित किया— 'हे मित्रों! यदि देवताओं और असुरों के युद्ध में देवता जीतें और असुर हारें, तो असुरराज वेपचित्ति को गले सहित पाँच बंधनों से बाँधकर मेरे पास सुधर्मा देवसभा में ले आना।' भिक्षुओं, उस युद्ध में देवता जीत गए और असुर हार गए। तब, भिक्षुओं, त्रायस्त्रिंश देवताओं ने असुरराज वेपचित्ति को गले सहित पाँच बंधनों से बाँधकर देवराज शक्र के पास सुधर्मा देवसभा में पहुँचाया। भिक्षुओं, वहाँ असुरराज वेपचित्ति गले सहित पाँच बंधनों से बँधा हुआ था। भिक्षुओं, जब असुरराज वेपचित्ति को ऐसा विचार आता— 'देवता धार्मिक हैं, असुर अधार्मिक हैं; अब मैं यहीं देवपुर में ही रहूँगा', तब वह स्वयं को उन बंधनों से मुक्त पाता है और पाँच दिव्य काम-गुणों से युक्त होकर उनका आनंद लेता है। और भिक्षुओं, जब असुरराज वेपचित्ति को ऐसा विचार आता— 'असुर धार्मिक हैं, देवता अधार्मिक हैं; अब मैं वहीं असुरपुर जाऊँगा', तब वह स्वयं को उन बंधनों से बँधा हुआ पाता है और दिव्य पाँच काम-गुणों से वंचित हो जाता है। भिक्षुओं, वेपचित्ति का यह बंधन इतना सूक्ष्म है; मार का बंधन तो इससे भी अधिक सूक्ष्म है। भिक्षुओं, जो कल्पना (अभिमान) करता है, वह मार से बँधा है; जो कल्पना नहीं करता, वह पापी (मार) से मुक्त है। ‘‘‘อสฺมี’ติ, ภิกฺขเว, มญฺญิตเมตํ, ‘อยมหมสฺมี’ติ มญฺญิตเมตํ, ‘ภวิสฺส’นฺติ มญฺญิตเมตํ, ‘น ภวิสฺส’นฺติ มญฺญิตเมตํ, ‘รูปี ภวิสฺส’นฺติ มญฺญิตเมตํ, ‘อรูปี ภวิสฺส’นฺติ มญฺญิตเมตํ, ‘สญฺญี ภวิสฺส’นฺติ มญฺญิตเมตํ, ‘อสญฺญี ภวิสฺส’นฺติ มญฺญิตเมตํ, ‘เนวสญฺญีนาสญฺญี ภวิสฺส’นฺติ มญฺญิตเมตํ. มญฺญิตํ, ภิกฺขเว, โรโค, มญฺญิตํ คณฺโฑ, มญฺญิตํ สลฺลํ. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ‘อมญฺญมาเนน เจตสา วิหริสฺสามา’ติ – เอวญฺหิ โว, ภิกฺขเว, สิกฺขิตพฺพํ. भिक्षुओं, 'मैं हूँ'—यह एक कल्पना है; 'यह मैं हूँ'—यह एक कल्पना है; 'मैं होऊँगा'—यह एक कल्पना है; 'मैं नहीं होऊँगा'—यह एक कल्पना है; 'मैं रूपवान होऊँगा'—यह एक कल्पना है; 'मैं अरूप होऊँगा'—यह एक कल्पना है; 'मैं संज्ञावान होऊँगा'—यह एक कल्पना है; 'मैं संज्ञा-रहित होऊँगा'—यह एक कल्पना है; 'मैं न संज्ञावान और न संज्ञा-रहित होऊँगा'—यह एक कल्पना है। भिक्षुओं, कल्पना एक रोग है, कल्पना एक फोड़ा है, कल्पना एक शल्य (काँटा) है। इसलिए, भिक्षुओं, तुम्हें इस प्रकार सीखना चाहिए— 'हम कल्पना-रहित चित्त से विहार करेंगे।' भिक्षुओं, तुम्हें इसी प्रकार शिक्षा लेनी चाहिए। ‘‘‘อสฺมี’ติ, ภิกฺขเว, อิญฺชิตเมตํ, ‘อยมหมสฺมี’ติ อิญฺชิตเมตํ, ‘ภวิสฺส’นฺติ อิญฺชิตเมตํ, ‘น ภวิสฺส’นฺติ อิญฺชิตเมตํ, ‘รูปี ภวิสฺส’นฺติ อิญฺชิตเมตํ, ‘อรูปี ภวิสฺส’นฺติ อิญฺชิตเมตํ, ‘สญฺญี ภวิสฺส’นฺติ อิญฺชิตเมตํ, ‘อสญฺญี ภวิสฺส’นฺติ อิญฺชิตเมตํ, ‘เนวสญฺญีนาสญฺญี ภวิสฺส’นฺติ อิญฺชิตเมตํ. อิญฺชิตํ, ภิกฺขเว, โรโค, อิญฺชิตํ คณฺโฑ, อิญฺชิตํ สลฺลํ. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ‘อนิญฺชมาเนน เจตสา วิหริสฺสามา’ติ – เอวญฺหิ โว, ภิกฺขเว, สิกฺขิตพฺพํ. भिक्षुओं, 'मैं हूँ'—यह एक कंपन (चंचलता) है; 'यह मैं हूँ'—यह एक कंपन है; 'मैं होऊँगा'—यह एक कंपन है; 'मैं नहीं होऊँगा'—यह एक कंपन है; 'मैं रूपवान होऊँगा'—यह एक कंपन है; 'मैं अरूप होऊँगा'—यह एक कंपन है; 'मैं संज्ञावान होऊँगा'—यह एक कंपन है; 'मैं संज्ञा-रहित होऊँगा'—यह एक कंपन है; 'मैं न संज्ञावान और न संज्ञा-रहित होऊँगा'—यह एक कंपन है। भिक्षुओं, कंपन एक रोग है, कंपन एक फोड़ा है, कंपन एक शल्य है। इसलिए, भिक्षुओं, तुम्हें इस प्रकार सीखना चाहिए— 'हम कंपन-रहित चित्त से विहार करेंगे।' भिक्षुओं, तुम्हें इसी प्रकार शिक्षा लेनी चाहिए। ‘‘‘อสฺมี’ติ, ภิกฺขเว, ผนฺทิตเมตํ, ‘อยมหมสฺมี’ติ ผนฺทิตเมตํ, ‘ภวิสฺส’นฺติ…เป… ‘น ภวิสฺส’นฺติ… ‘รูปี ภวิสฺส’นฺติ… ‘อรูปี ภวิสฺส’นฺติ… ‘สญฺญี ภวิสฺส’นฺติ… ‘อสญฺญี ภวิสฺส’นฺติ… ‘เนวสญฺญีนาสญฺญี ภวิสฺส’นฺติ ผนฺทิตเมตํ. ผนฺทิตํ, ภิกฺขเว, โรโค, ผนฺทิตํ คณฺโฑ, ผนฺทิตํ สลฺลํ. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ‘อผนฺทมาเนน เจตสา วิหริสฺสามา’ติ – เอวญฺหิ โว, ภิกฺขเว, สิกฺขิตพฺพํ. भिक्षुओं, 'मैं हूँ'—यह एक स्पंदन (तड़पन) है; 'यह मैं हूँ'—यह एक स्पंदन है; 'मैं होऊँगा'... पे... 'मैं नहीं होऊँगा'... 'मैं रूपवान होऊँगा'... 'मैं अरूप होऊँगा'... 'मैं संज्ञावान होऊँगा'... 'मैं संज्ञा-रहित होऊँगा'... 'मैं न संज्ञावान और न संज्ञा-रहित होऊँगा'—यह एक स्पंदन है। भिक्षुओं, स्पंदन एक रोग है, स्पंदन एक फोड़ा है, स्पंदन एक शल्य है। इसलिए, भिक्षुओं, तुम्हें इस प्रकार सीखना चाहिए— 'हम स्पंदन-रहित चित्त से विहार करेंगे।' भिक्षुओं, तुम्हें इसी प्रकार शिक्षा लेनी चाहिए। ‘‘‘อสฺมี’ติ, ภิกฺขเว, ปปญฺจิตเมตํ, ‘อยมหมสฺมี’ติ ปปญฺจิตเมตํ, ‘ภวิสฺส’นฺติ…เป… ‘น ภวิสฺส’นฺติ… ‘รูปี ภวิสฺส’นฺติ… ‘อรูปี ภวิสฺส’นฺติ… ‘สญฺญี ภวิสฺส’นฺติ… ‘อสญฺญี ภวิสฺส’นฺติ… ‘เนวสญฺญีนาสญฺญี ภวิสฺส’นฺติ ปปญฺจิตเมตํ[Pg.406]. ปปญฺจิตํ, ภิกฺขเว, โรโค, ปปญฺจิตํ คณฺโฑ, ปปญฺจิตํ สลฺลํ. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ‘นิปฺปปญฺเจน เจตสา วิหริสฺสามา’ติ – เอวญฺหิ โว, ภิกฺขเว, สิกฺขิตพฺพํ. भिक्षुओं, 'मैं हूँ'—यह एक प्रपंच (विस्तार) है; 'यह मैं हूँ'—यह एक प्रपंच है; 'मैं होऊँगा'... पे... 'मैं नहीं होऊँगा'... 'मैं रूपवान होऊँगा'... 'मैं अरूप होऊँगा'... 'मैं संज्ञावान होऊँगा'... 'मैं संज्ञा-रहित होऊँगा'... 'मैं न संज्ञावान और न संज्ञा-रहित होऊँगा'—यह एक प्रपंच है। भिक्षुओं, प्रपंच एक रोग है, प्रपंच एक फोड़ा है, प्रपंच एक शल्य है। इसलिए, भिक्षुओं, तुम्हें इस प्रकार सीखना चाहिए— 'हम प्रपंच-रहित चित्त से विहार करेंगे।' भिक्षुओं, तुम्हें इसी प्रकार शिक्षा लेनी चाहिए। ‘‘‘อสฺมี’ติ, ภิกฺขเว, มานคตเมตํ, ‘อยมหมสฺมี’ติ มานคตเมตํ, ‘ภวิสฺส’นฺติ มานคตเมตํ, ‘น ภวิสฺส’นฺติ มานคตเมตํ, ‘รูปี ภวิสฺส’นฺติ มานคตเมตํ, ‘อรูปี ภวิสฺส’นฺติ มานคตเมตํ, ‘สญฺญี ภวิสฺส’นฺติ มานคตเมตํ, ‘อสญฺญี ภวิสฺส’นฺติ มานคตเมตํ, ‘เนวสญฺญีนาสญฺญี ภวิสฺส’นฺติ มานคตเมตํ. มานคตํ, ภิกฺขเว, โรโค, มานคตํ คณฺโฑ, มานคตํ สลฺลํ. ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, ‘นิหตมาเนน เจตสา วิหริสฺสามา’ติ – เอวญฺหิ โว, ภิกฺขเว, สิกฺขิตพฺพ’’นฺติ. เอกาทสมํ. भिक्षुओं, 'मैं हूँ'—यह एक मान (अभिमान) है; 'यह मैं हूँ'—यह एक मान है; 'मैं होऊँगा'—यह एक मान है; 'मैं नहीं होऊँगा'—यह एक मान है; 'मैं रूपवान होऊँगा'—यह एक मान है; 'मैं अरूप होऊँगा'—यह एक मान है; 'मैं संज्ञावान होऊँगा'—यह एक मान है; 'मैं संज्ञा-रहित होऊँगा'—यह एक मान है; 'मैं न संज्ञावान और न संज्ञा-रहित होऊँगा'—यह एक मान है। भिक्षुओं, मान एक रोग है, मान एक फोड़ा है, मान एक शल्य है। इसलिए, भिक्षुओं, तुम्हें इस प्रकार सीखना चाहिए— 'हम मान-रहित चित्त से विहार करेंगे।' भिक्षुओं, तुम्हें इसी प्रकार शिक्षा लेनी चाहिए। ग्यारहवाँ सूत्र समाप्त। อาสีวิสวคฺโค เอกูนวีสติโม. उन्नीसवाँ आसीविस वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान) इस प्रकार है— อาสีวิโส รโถ กุมฺโม, ทฺเว ทารุกฺขนฺธา อวสฺสุโต; ทุกฺขธมฺมา กึสุกา วีณา, ฉปฺปาณา ยวกลาปีติ. आसीविस, रथ, कुम्म, दो दारुक्खन्ध, अवस्सुत, दुक्खधम्म, किसुक, वीणा, छप्पाण और यवकलापी। สฬายตนวคฺเค จตุตฺถปณฺณาสโก สมตฺโต. सळायतन वर्ग में चौथा पन्नासक समाप्त हुआ। ตสฺส วคฺคุทฺทานํ – उसका वर्ग-सारांश— นนฺทิกฺขโย สฏฺฐินโย, สมุทฺโท อุรเคน จ; จตุปณฺณาสกา เอเต, นิปาเตสุ ปกาสิตาติ. नन्दिक्खय, सट्ठिनय, समुद्द और उरग; ये चार पन्नासक इन निपातों में भली-भाँति प्रकाशित किए गए हैं। สฬายตนสํยุตฺตํ สมตฺตํ. षळायतन संयुक्त समाप्त हुआ। ๒. เวทนาสํยุตฺตํ २. वेदना संयुक्त ๑. สคาถาวคฺโค १. सगाथा वग्ग ๑. สมาธิสุตฺตํ १. समाधि सुत्त ๒๔๙. ‘‘ติสฺโส [Pg.407] อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา. กตมา ติสฺโส? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา โข, ภิกฺขเว, ติสฺโส เวทนาติ. २४९. "भिक्षुओं, ये तीन वेदनाएँ हैं। कौन सी तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना और न-दुःख-न-सुख वेदना—भिक्षुओं, ये ही तीन वेदनाएँ हैं।" ‘‘สมาหิโต สมฺปชาโน, สโต พุทฺธสฺส สาวโก; เวทนา จ ปชานาติ, เวทนานญฺจ สมฺภวํ. "समाहित, सम्प्रजन्य और स्मृतिमान बुद्ध का श्रावक वेदनाओं को जानता है और वेदनाओं की उत्पत्ति को भी जानता है।" ‘‘ยตฺถ เจตา นิรุชฺฌนฺติ, มคฺคญฺจ ขยคามินํ; เวทนานํ ขยา ภิกฺขุ, นิจฺฉาโต ปรินิพฺพุโต’’ติ. ปฐมํ; "जहाँ ये वेदनाएँ निरुद्ध होती हैं, और क्षय तक ले जाने वाले मार्ग को भी वह जानता है। वेदनाओं के क्षय होने से वह भिक्षु तृष्णा-रहित होकर परिनिर्वृत हो जाता है। प्रथम सुत्त।" ๒. สุขสุตฺตํ २. "सुख सुत्त" ๒๕๐. ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา. กตมา ติสฺโส? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา โข, ภิกฺขเว, ติสฺโส เวทนาติ. २५०. "भिक्षुओं, ये तीन वेदनाएँ हैं। कौन सी तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना और न-दुःख-न-सुख वेदना—भिक्षुओं, ये ही तीन वेदनाएँ हैं।" ‘‘สุขํ วา ยทิ วา ทุกฺขํ, อทุกฺขมสุขํ สห; อชฺฌตฺตญฺจ พหิทฺธา จ, ยํ กิญฺจิ อตฺถิ เวทิตํ. "चाहे सुख हो या दुःख, अथवा न-दुःख-न-सुख के साथ, जो कुछ भी आन्तरिक या बाह्य अनुभव है," ‘‘เอตํ ทุกฺขนฺติ ญตฺวาน, โมสธมฺมํ ปโลกินํ; ผุสฺส ผุสฺส วยํ ปสฺสํ, เอวํ ตตฺถ วิรชฺชตี’’ติ. ทุติยํ; "उसे 'दुःख' जानकर, जो मिट जाने वाला और नष्ट होने वाला है, बार-बार स्पर्श कर उनके विनाश को देखते हुए, वह भिक्षु उनमें विरक्त हो जाता है। द्वितीय सुत्त।" ๓. ปหานสุตฺตํ ३. "पहाण सुत्त" ๒๕๑. ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา. กตมา ติสฺโส? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา. สุขาย, ภิกฺขเว, เวทนาย ราคานุสโย ปหาตพฺโพ, ทุกฺขาย เวทนาย ปฏิฆานุสโย ปหาตพฺโพ, อทุกฺขมสุขาย เวทนาย อวิชฺชานุสโย ปหาตพฺโพ. ยโต โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน สุขาย เวทนาย ราคานุสโย ปหีโน โหติ, ทุกฺขาย เวทนาย ปฏิฆานุสโย ปหีโน โหติ, อทุกฺขมสุขาย [Pg.408] เวทนาย อวิชฺชานุสโย ปหีโน โหติ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ‘ภิกฺขุ นิรนุสโย สมฺมทฺทโส อจฺเฉจฺฉิ ตณฺหํ, วิวตฺตยิ สํโยชนํ, สมฺมา มานาภิสมยา อนฺตมกาสิ ทุกฺขสฺสา’’’ติ. २५१. "भिक्षुओं, ये तीन वेदनाएँ हैं। कौन सी तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना और न-दुःख-न-सुख वेदना। भिक्षुओं, सुखद वेदना में राग-अनुशय का त्याग करना चाहिए, दुःखद वेदना में प्रतिघ-अनुशय का त्याग करना चाहिए, और न-दुःख-न-सुख वेदना में अविद्या-अनुशय का त्याग करना चाहिए। भिक्षुओं, जब भिक्षु के सुखद वेदना में राग-अनुशय प्रहीण हो जाता है, दुःखद वेदना में प्रतिघ-अनुशय प्रहीण हो जाता है, और न-दुःख-न-सुख वेदना में अविद्या-अनुशय प्रहीण हो जाता है, तब वह भिक्षु 'अनुशय-रहित', 'सम्यक-दर्शी' कहलाता है; उसने तृष्णा को काट दिया है, संयोजनों को उलट दिया है, और मान के सम्यक अभिसमय से दुःख का अन्त कर दिया है।" ‘‘สุขํ เวทยมานสฺส, เวทนํ อปฺปชานโต; โส ราคานุสโย โหติ, อนิสฺสรณทสฺสิโน. "सुख का अनुभव करते हुए भी जो वेदना को नहीं जानता, और जो मुक्ति का मार्ग नहीं देखता, उसमें राग-अनुशय बना रहता है।" ‘‘ทุกฺขํ เวทยมานสฺส, เวทนํ อปฺปชานโต; ปฏิฆานุสโย โหติ, อนิสฺสรณทสฺสิโน. "दुःख का अनुभव करते हुए भी जो वेदना को नहीं जानता, और जो मुक्ति का मार्ग नहीं देखता, उसमें प्रतिघ-अनुशय बना रहता है।" ‘‘อทุกฺขมสุขํ สนฺตํ, ภูริปญฺเญน เทสิตํ; ตญฺจาปิ อภินนฺทติ, เนว ทุกฺขา ปมุจฺจติ. "विशाल प्रज्ञा वाले बुद्ध द्वारा उपदिष्ट जो शान्त न-दुःख-न-सुख वेदना है, यदि कोई उसका भी अभिनन्दन करता है, तो वह दुःख से मुक्त नहीं होता।" ‘‘ยโต จ ภิกฺขุ อาตาปี, สมฺปชญฺญํ น ริญฺจติ; ตโต โส เวทนา สพฺพา, ปริชานาติ ปณฺฑิโต. "जब भिक्षु उद्योगी होकर सम्प्रजन्य को नहीं छोड़ता, तब वह पण्डित भिक्षु सभी वेदनाओं को पूर्णतः जान लेता है।" ‘‘โส เวทนา ปริญฺญาย, ทิฏฺเฐ ธมฺเม อนาสโว; กายสฺส เภทา ธมฺมฏฺโฐ, สงฺขฺยํ โนเปติ เวทคู’’ติ. ตติยํ; "वह वेदनाओं को पूर्णतः जानकर इसी जन्म में आस्रव-रहित हो जाता है। धर्म में स्थित वह वेदज्ञ, शरीर के टूटने के बाद किसी गणना को प्राप्त नहीं होता। तृतीय सुत्त।" ๔. ปาตาลสุตฺตํ ४. "पाताल सुत्त" ๒๕๒. ‘‘อสฺสุตวา, ภิกฺขเว, ปุถุชฺชโน ยํ วาจํ ภาสติ – ‘อตฺถิ มหาสมุทฺเท ปาตาโล’ติ. ตํ โข ปเนตํ, ภิกฺขเว, อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน อสนฺตํ อวิชฺชมานํ เอวํ วาจํ ภาสติ – ‘อตฺถิ มหาสมุทฺเท ปาตาโล’ติ. สารีริกานํ โข เอตํ, ภิกฺขเว, ทุกฺขานํ เวทนานํ อธิวจนํ ยทิทํ ‘ปาตาโล’ติ. อสฺสุตวา, ภิกฺขเว, ปุถุชฺชโน สารีริกาย ทุกฺขาย เวทนาย ผุฏฺโฐ สมาโน โสจติ กิลมติ ปริเทวติ อุรตฺตาฬึ กนฺทติ สมฺโมหํ อาปชฺชติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ‘อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน ปาตาเล น ปจฺจุฏฺฐาสิ, คาธญฺจ นาชฺฌคา’. สุตวา จ โข, ภิกฺขเว, อริยสาวโก สารีริกาย ทุกฺขาย เวทนาย ผุฏฺโฐ สมาโน เนว โสจติ, น กิลมติ, น ปริเทวติ, น อุรตฺตาฬึ กนฺทติ, น สมฺโมหํ อาปชฺชติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ‘สุตวา อริยสาวโก ปาตาเล ปจฺจุฏฺฐาสิ, คาธญฺจ อชฺฌคา’’’ติ. २५२. "भिक्षुओं, अश्रुतवान पृथग्जन ऐसी बात कहता है—'महासागर में पाताल है'। भिक्षुओं, वह अश्रुतवान पृथग्जन जो असत्य और अविद्यमान है, उसके बारे में ऐसा कहता है। भिक्षुओं, यह 'पाताल' शारीरिक दुःखद वेदनाओं का ही एक नाम है। भिक्षुओं, जब अश्रुतवान पृथग्जन शारीरिक दुःखद वेदना से पीड़ित होता है, तो वह शोक करता है, थकता है, विलाप करता है, छाती पीटता है और सम्मोह को प्राप्त होता है। भिक्षुओं, इसे कहते हैं—'अश्रुतवान पृथग्जन पाताल में खड़ा नहीं रह सका और उसे आधार नहीं मिला'। परन्तु भिक्षुओं, श्रुतवान आर्यश्रावक जब शारीरिक दुःखद वेदना से पीड़ित होता है, तो वह न शोक करता है, न थकता है, न विलाप करता है, न छाती पीटता है और न सम्मोह को प्राप्त होता है। भिक्षुओं, इसे कहते हैं—'श्रुतवान आर्यश्रावक पाताल में खड़ा रह सका और उसे आधार मिल गया'।" ‘‘โย [Pg.409] เอตา นาธิวาเสติ, อุปฺปนฺนา เวทนา ทุขา; สารีริกา ปาณหรา, ยาหิ ผุฏฺโฐ ปเวธติ. "जो उत्पन्न हुई इन दुःखद, प्राणघाती शारीरिक वेदनाओं को सहन नहीं करता, जिनसे पीड़ित होकर वह काँपता है," ‘‘อกฺกนฺทติ ปโรทติ, ทุพฺพโล อปฺปถามโก; น โส ปาตาเล ปจฺจุฏฺฐาสิ, อโถ คาธมฺปิ นาชฺฌคา. "वह विलाप करता है, रोता है, वह दुर्बल और अल्प-शक्ति वाला है; वह पाताल में खड़ा नहीं रह सका और न ही उसे कोई आधार मिला।" ‘‘โย เจตา อธิวาเสติ, อุปฺปนฺนา เวทนา ทุขา; สารีริกา ปาณหรา, ยาหิ ผุฏฺโฐ น เวธติ; ส เว ปาตาเล ปจฺจุฏฺฐาสิ, อโถ คาธมฺปิ อชฺฌคา’’ติ. จตุตฺถํ; "परन्तु जो उत्पन्न हुई इन दुःखद, प्राणघाती शारीरिक वेदनाओं को सहन करता है, जिनसे पीड़ित होकर वह नहीं काँपता; वह निश्चय ही पाताल में खड़ा रह सका और उसे आधार भी मिल गया। चतुर्थ सुत्त।" ๕. ทฏฺฐพฺพสุตฺตํ ५. "दट्ठब्ब सुत्त" ๒๕๓. ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา. กตมา ติสฺโส? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา. สุขา, ภิกฺขเว, เวทนา ทุกฺขโต ทฏฺฐพฺพา, ทุกฺขา เวทนา สลฺลโต ทฏฺฐพฺพา, อทุกฺขมสุขา เวทนา อนิจฺจโต ทฏฺฐพฺพา. ยโต โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน สุขา เวทนา ทุกฺขโต ทิฏฺฐา โหติ, ทุกฺขา เวทนา สลฺลโต ทิฏฺฐา โหติ, อทุกฺขมสุขา เวทนา อนิจฺจโต ทิฏฺฐา โหติ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ‘ภิกฺขุ สมฺมทฺทโส อจฺเฉจฺฉิ ตณฺหํ, วิวตฺตยิ สํโยชนํ, สมฺมา มานาภิสมยา อนฺตมกาสิ ทุกฺขสฺสา’’’ติ. २५३. "भिक्षुओं, ये तीन वेदनाएँ हैं। कौन सी तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना और न-दुःख-न-सुख वेदना। भिक्षुओं, सुखद वेदना को दुःख के रूप में देखना चाहिए, दुःखद वेदना को शल्य के रूप में देखना चाहिए, और न-दुःख-न-सुख वेदना को अनित्य के रूप में देखना चाहिए। भिक्षुओं, जब भिक्षु द्वारा सुखद वेदना दुःख के रूप में देख ली जाती है, दुःखद वेदना शल्य के रूप में देख ली जाती है, और न-दुःख-न-सुख वेदना अनित्य के रूप में देख ली जाती है—तब वह भिक्षु 'सम्यक-दर्शी' कहलाता है; उसने तृष्णा को काट दिया है, संयोजनों को उलट दिया है, और मान के सम्यक अभिसमय से दुःख का अन्त कर दिया है।" ‘‘โย สุขํ ทุกฺขโต อทฺท, ทุกฺขมทฺทกฺขิ สลฺลโต; อทุกฺขมสุขํ สนฺตํ, อทฺทกฺขิ นํ อนิจฺจโต. "जिसने सुख को दुःख के रूप में देखा, दुःख को शल्य के रूप में देखा, और शान्त न-दुःख-न-सुख वेदना को अनित्य के रूप में देखा," ‘‘ส เว สมฺมทฺทโส ภิกฺขุ, ปริชานาติ เวทนา; โส เวทนา ปริญฺญาย, ทิฏฺเฐ ธมฺเม อนาสโว; กายสฺส เภทา ธมฺมฏฺโฐ, สงฺขฺยํ โนเปติ เวทคู’’ติ. ปญฺจมํ; "वह निश्चय ही सम्यक-दर्शी भिक्षु वेदनाओं को पूर्णतः जानता है। वह वेदनाओं को पूर्णतः जानकर इसी जन्म में आस्रव-रहित हो जाता है। धर्म में स्थित वह वेदज्ञ, शरीर के टूटने के बाद किसी गणना को प्राप्त नहीं होता। पंचम सुत्त।" ๖. สลฺลสุตฺตํ ६. "शल्य सुत्त" ๒๕๔. ‘‘อสฺสุตวา, ภิกฺขเว, ปุถุชฺชโน สุขมฺปิ เวทนํ เวทยติ, ทุกฺขมฺปิ เวทนํ เวทยติ, อทุกฺขมสุขมฺปิ เวทนํ เวทยติ. สุตวา, ภิกฺขเว, อริยสาวโก สุขมฺปิ เวทนํ เวทยติ, ทุกฺขมฺปิ เวทนํ เวทยติ, อทุกฺขมสุขมฺปิ [Pg.410] เวทนํ เวทยติ. ตตฺร, ภิกฺขเว, โก วิเสโส โก อธิปฺปยาโส กึ นานากรณํ สุตวโต อริยสาวกสฺส อสฺสุตวตา ปุถุชฺชเนนา’’ติ? ภควํมูลกา โน, ภนฺเต, ธมฺมา…เป… อสฺสุตวา. ภิกฺขเว, ปุถุชฺชโน ทุกฺขาย เวทนาย ผุฏฺโฐ สมาโน โสจติ กิลมติ ปริเทวติ อุรตฺตาฬึ กนฺทติ สมฺโมหํ อาปชฺชติ. โส ทฺเว เวทนา เวทยติ – กายิกญฺจ, เจตสิกญฺจ. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ปุริสํ สลฺเลน วิชฺเฌยฺย. ตเมนํ ทุติเยน สลฺเลน อนุเวธํ วิชฺเฌยฺย. เอวญฺหิ โส, ภิกฺขเว, ปุริโส ทฺวิสลฺเลน เวทนํ เวทยติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน ทุกฺขาย เวทนาย ผุฏฺโฐ สมาโน โสจติ กิลมติ ปริเทวติ อุรตฺตาฬึ กนฺทติ สมฺโมหํ อาปชฺชติ. โส ทฺเว เวทนา เวทยติ – กายิกญฺจ, เจตสิกญฺจ. ตสฺสาเยว โข ปน ทุกฺขาย เวทนาย ผุฏฺโฐ สมาโน ปฏิฆวา โหติ. ตเมนํ ทุกฺขาย เวทนาย ปฏิฆวนฺตํ, โย ทุกฺขาย เวทนาย ปฏิฆานุสโย, โส อนุเสติ. โส ทุกฺขาย เวทนาย ผุฏฺโฐ สมาโน กามสุขํ อภินนฺทติ. ตํ กิสฺส เหตุ? น หิ โส, ภิกฺขเว, ปชานาติ อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน อญฺญตฺร กามสุขา ทุกฺขาย เวทนาย นิสฺสรณํ, ตสฺส กามสุขญฺจ อภินนฺทโต, โย สุขาย เวทนาย ราคานุสโย, โส อนุเสติ. โส ตาสํ เวทนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ. ตสฺส ตาสํ เวทนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ อปฺปชานโต, โย อทุกฺขมสุขาย เวทนาย อวิชฺชานุสโย, โส อนุเสติ. โส สุขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, สญฺญุตฺโต นํ เวทยติ. ทุกฺขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, สญฺญุตฺโต นํ เวทยติ. อทุกฺขมสุขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, สญฺญุตฺโต นํ เวทยติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ‘อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน สญฺญุตฺโต ชาติยา ชราย มรเณน โสเกหิ ปริเทเวหิ ทุกฺเขหิ โทมนสฺเสหิ อุปายาเสหิ, สญฺญุตฺโต ทุกฺขสฺมา’ติ วทามิ. २५४. ‘‘भिक्षुओं! एक अश्रुतवान (अज्ञानी) पृथग्जन सुखद वेदना का भी अनुभव करता है, दुःखद वेदना का भी अनुभव करता है और अदुःख-असुख (उपेक्षा) वेदना का भी अनुभव करता है। भिक्षुओं! एक श्रुतवान (ज्ञानी) आर्यश्रावक भी सुखद वेदना का अनुभव करता है, दुःखद वेदना का भी और अदुःख-असुख वेदना का भी। तो भिक्षुओं! श्रुतवान आर्यश्रावक और अश्रुतवान पृथग्जन में क्या विशेषता है, क्या अभिप्राय है, क्या अंतर है?’’ ‘‘भन्ते! हमारे धर्म भगवान् (बुद्ध) ही जिनके मूल हैं... पे... भिक्षुओं! जब अश्रुतवान पृथग्जन दुःखद वेदना से स्पर्शित होता है, तो वह शोक करता है, थकता है, विलाप करता है, छाती पीटता है और सम्मोह (मूर्च्छा) को प्राप्त होता है। वह दो प्रकार की वेदनाओं का अनुभव करता है—कायिक (शारीरिक) और चैतसिक (मानसिक)। जैसे भिक्षुओं! किसी मनुष्य को एक बाण से बींधा जाए और फिर उसे दूसरे बाण से भी बींध दिया जाए। इस प्रकार वह मनुष्य दो बाणों की वेदना का अनुभव करता है। इसी प्रकार, भिक्षुओं! अश्रुतवान पृथग्जन दुःखद वेदना से स्पर्शित होने पर शोक करता है, थकता है, विलाप करता है, छाती पीटता है और सम्मोह को प्राप्त होता है। वह दो प्रकार की वेदनाओं का अनुभव करता है—कायिक और चैतसिक। वह उस दुःखद वेदना से स्पर्शित होने पर प्रतिघ (द्वेष) युक्त होता है। उस दुःखद वेदना के प्रति प्रतिघ युक्त होने वाले उस व्यक्ति में, जो दुःखद वेदना का प्रतिघानुशय (द्वेष की सुप्त प्रवृत्ति) है, वह अनुशयित (पुष्ट) होता है। वह दुःखद वेदना से स्पर्शित होने पर काम-सुख का अभिनन्दन (भोग की इच्छा) करता है। वह किस कारण से? भिक्षुओं! वह अश्रुतवान पृथग्जन काम-सुख के अतिरिक्त दुःखद वेदना से निस्सरण (मुक्ति) के मार्ग को नहीं जानता। उस काम-सुख का अभिनन्दन करने वाले व्यक्ति में, जो सुखद वेदना का रागानुशय (राग की सुप्त प्रवृत्ति) है, वह अनुशयित होता है। वह उन वेदनाओं की उत्पत्ति, विनाश, आस्वाद (तृप्ति), दोष और निस्सरण को यथार्थ रूप में नहीं जानता। उन वेदनाओं की उत्पत्ति, विनाश, आस्वाद, दोष और निस्सरण को यथार्थ रूप में न जानने वाले उस व्यक्ति में, जो अदुःख-असुख वेदना का अविद्यानुशय (अज्ञान की सुप्त प्रवृत्ति) है, वह अनुशयित होता है। यदि वह सुखद वेदना का अनुभव करता है, तो वह उससे संयुक्त (आसक्त) होकर अनुभव करता है। यदि वह दुःखद वेदना का अनुभव करता है, तो वह उससे संयुक्त होकर अनुभव करता है। यदि वह अदुःख-असुख वेदना का अनुभव करता है, तो वह उससे संयुक्त होकर अनुभव करता है। भिक्षुओं! इसे ही कहा जाता है—‘अश्रुतवान पृथग्जन जो जन्म, जरा, मरण, शोक, विलाप, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास (हताशा) से संयुक्त है; वह दुःख से संयुक्त है’, ऐसा मैं कहता हूँ।" ‘‘สุตวา จ โข, ภิกฺขเว, อริยสาวโก ทุกฺขาย เวทนาย ผุฏฺโฐ สมาโน น โสจติ, น กิลมติ, น ปริเทวติ, น อุรตฺตาฬึ กนฺทติ, น [Pg.411] สมฺโมหํ อาปชฺชติ. โส เอกํ เวทนํ เวทยติ – กายิกํ, น เจตสิกํ. ‘‘परंतु भिक्षुओं! श्रुतवान आर्यश्रावक दुःखद वेदना से स्पर्शित होने पर शोक नहीं करता, थकता नहीं, विलाप नहीं करता, छाती नहीं पीटता और सम्मोह को प्राप्त नहीं होता। वह केवल एक ही वेदना का अनुभव करता है—कायिक, चैतसिक नहीं।" ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ปุริสํ สลฺเลน วิชฺเฌยฺย. ตเมนํ ทุติเยน สลฺเลน อนุเวธํ น วิชฺเฌยฺย. เอวญฺหิ โส, ภิกฺขเว, ปุริโส เอกสลฺเลน เวทนํ เวทยติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก ทุกฺขาย เวทนาย ผุฏฺโฐ สมาโน น โสจติ, น กิลมติ, น ปริเทวติ, น อุรตฺตาฬึ กนฺทติ, น สมฺโมหํ อาปชฺชติ. โส เอกํ เวทนํ เวทยติ – กายิกํ, น เจตสิกํ. ตสฺสาเยว โข ปน ทุกฺขาย เวทนาย ผุฏฺโฐ สมาโน ปฏิฆวา น โหติ. ตเมนํ ทุกฺขาย เวทนาย อปฺปฏิฆวนฺตํ, โย ทุกฺขาย เวทนาย ปฏิฆานุสโย, โส นานุเสติ. โส ทุกฺขาย เวทนาย ผุฏฺโฐ สมาโน กามสุขํ นาภินนฺทติ. ตํ กิสฺส เหตุ? ปชานาติ หิ โส, ภิกฺขเว, สุตวา อริยสาวโก อญฺญตฺร กามสุขา ทุกฺขาย เวทนาย นิสฺสรณํ. ตสฺส กามสุขํ นาภินนฺทโต โย สุขาย เวทนาย ราคานุสโย, โส นานุเสติ. โส ตาสํ เวทนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวํ จ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ. ตสฺส ตาสํ เวทนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ ปชานโต, โย อทุกฺขมสุขาย เวทนาย อวิชฺชานุสโย, โส นานุเสติ. โส สุขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, วิสญฺญุตฺโต นํ เวทยติ. ทุกฺขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, วิสญฺญุตฺโต นํ เวทยติ. อทุกฺขมสุขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, วิสญฺญุตฺโต นํ เวทยติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ‘สุตวา อริยสาวโก วิสญฺญุตฺโต ชาติยา ชราย มรเณน โสเกหิ ปริเทเวหิ ทุกฺเขหิ โทมนสฺเสหิ อุปายาเสหิ, วิสญฺญุตฺโต ทุกฺขสฺมา’ติ วทามิ. อยํ โข, ภิกฺขเว, วิเสโส, อยํ อธิปฺปยาโส, อิทํ นานากรณํ สุตวโต อริยสาวกสฺส อสฺสุตวตา ปุถุชฺชเนนา’’ติ. ‘‘जैसे भिक्षुओं! किसी मनुष्य को एक बाण से बींधा जाए, लेकिन उसे दूसरे बाण से न बींधा जाए। इस प्रकार वह मनुष्य केवल एक ही बाण की वेदना का अनुभव करता है। इसी प्रकार, भिक्षुओं! श्रुतवान आर्यश्रावक दुःखद वेदना से स्पर्शित होने पर शोक नहीं करता, थकता नहीं, विलाप नहीं करता, छाती नहीं पीटता और सम्मोह को प्राप्त नहीं होता। वह केवल एक ही वेदना का अनुभव करता है—कायिक, चैतसिक नहीं। वह उस दुःखद वेदना से स्पर्शित होने पर प्रतिघ युक्त नहीं होता। उस दुःखद वेदना के प्रति प्रतिघ युक्त न होने वाले उस व्यक्ति में, जो दुःखद वेदना का प्रतिघानुशय है, वह अनुशयित नहीं होता। वह दुःखद वेदना से स्पर्शित होने पर काम-सुख का अभिनन्दन नहीं करता। वह किस कारण से? भिक्षुओं! वह श्रुतवान आर्यश्रावक काम-सुख के अतिरिक्त दुःखद वेदना से निस्सरण के मार्ग को जानता है। उस काम-सुख का अभिनन्दन न करने वाले व्यक्ति में, जो सुखद वेदना का रागानुशय है, वह अनुशयित नहीं होता। वह उन वेदनाओं की उत्पत्ति, विनाश, आस्वाद, दोष और निस्सरण को यथार्थ रूप में जानता है। उन वेदनाओं की उत्पत्ति, विनाश, आस्वाद, दोष और निस्सरण को यथार्थ रूप में जानने वाले उस व्यक्ति में, जो अदुःख-असुख वेदना का अविद्यानुशय है, वह अनुशयित नहीं होता। यदि वह सुखद वेदना का अनुभव करता है, तो वह उससे विसंयुक्त (अनासक्त) होकर अनुभव करता है। यदि वह दुःखद वेदना का अनुभव करता है, तो वह उससे विसंयुक्त होकर अनुभव करता है। यदि वह अदुःख-असुख वेदना का अनुभव करता है, तो वह उससे विसंयुक्त होकर अनुभव करता है। भिक्षुओं! इसे ही कहा जाता है—‘श्रुतवान आर्यश्रावक जो जन्म, जरा, मरण, शोक, विलाप, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास से विसंयुक्त है; वह दुःख से विसंयुक्त है’, ऐसा मैं कहता हूँ। भिक्षुओं! श्रुतवान आर्यश्रावक और अश्रुतवान पृथग्जन में यही विशेषता है, यही अभिप्राय है, यही अंतर है।" ‘‘น เวทนํ เวทยติ สปญฺโญ,สุขมฺปิ ทุกฺขมฺปิ พหุสฺสุโตปิ; อยญฺจ ธีรสฺส ปุถุชฺชเนน,มหา วิเสโส กุสลสฺส โหติ. ‘‘प्रज्ञावान और बहुश्रुत व्यक्ति सुख और दुःख की (मानसिक) वेदना का अनुभव नहीं करता। धीर और कुशल आर्यश्रावक का पृथग्जन से यही महान अंतर है।" ‘‘สงฺขาตธมฺมสฺส [Pg.412] พหุสฺสุตสฺส,วิปสฺสโต โลกมิมํ ปรญฺจ; อิฏฺฐสฺส ธมฺมา น มเถนฺติ จิตฺตํ,อนิฏฺฐโต โน ปฏิฆาตเมติ. ‘‘जिसने धर्म का भली-भाँति विचार कर लिया है, जो बहुश्रुत है और इस लोक तथा परलोक को (यथार्थ रूप में) देखता है, उसके चित्त को इष्ट (प्रिय) विषय विचलित नहीं करते और न ही वह अनिष्ट (अप्रिय) के प्रति प्रतिघात (द्वेष) को प्राप्त होता है।" ‘‘ตสฺสานุโรธา อถวา วิโรธา,วิธูปิตา อตฺถคตา น สนฺติ; ปทญฺจ ญตฺวา วิรชํ อโสกํ,สมฺมา ปชานาติ ภวสฺส ปารคู’’ติ. ฉฏฺฐํ; ‘‘उसके लिए अनुनय (राग) और विरोध (द्वेष) दोनों ही नष्ट हो चुके हैं, अस्त हो चुके हैं, वे अब विद्यमान नहीं हैं। उस रज-रहित और शोक-रहित पद (निर्वाण) को जानकर, वह भव के पार पहुँचा हुआ पुरुष भली-भाँति जानता है।’’ छठा सुत्त समाप्त। ๗. ปฐมเคลญฺญสุตฺตํ ७. प्रथम गेलञ्ञ सुत्त ๒๕๕. เอกํ สมยํ ภควา เวสาลิยํ วิหรติ มหาวเน กูฏาคารสาลายํ. อถ โข ภควา สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต เยน คิลานสาลา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. นิสชฺช โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – २५५. एक समय भगवान वैशाली के महावन में कूटागारशाला में विहार कर रहे थे। तब भगवान सायंकाल के समय एकांत-साधना (प्रतिसंलयन) से उठकर जहाँ रुग्णशाला थी, वहाँ गए; पहुँचकर बिछाए हुए आसन पर बैठ गए। बैठकर भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— ‘‘สโต, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺปชาโน กาลํ อาคเมยฺย. อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนี. “भिक्षुओं! भिक्षु को स्मृतिमान और संप्रजन्ययुक्त होकर समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। यह तुम्हारे लिए हमारा अनुशासन है। ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สโต โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา, วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ; เวทนาสุ เวทนานุปสฺสี วิหรติ…เป… จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสี วิหรติ…เป… ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา, วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สโต โหติ. “और भिक्षुओं! भिक्षु कैसे स्मृतिमान होता है? यहाँ, भिक्षुओं! भिक्षु काया में कायानुपश्यी होकर विहार करता है—आतपी, संप्रजन्ययुक्त और स्मृतिमान होकर, लोक में अभिध्या और दौर्मनस्य को दूर कर; वेदनाओं में वेदनानुपश्यी होकर विहार करता है... चित्त में चित्तनुपश्यी होकर विहार करता है... धर्मों में धर्मानुपश्यी होकर विहार करता है—आतपी, संप्रजन्ययुक्त और स्मृतिमान होकर, लोक में अभिध्या और दौर्मनस्य को दूर कर। भिक्षुओं! इस प्रकार भिक्षु स्मृतिमान होता है। ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺปชาโน โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อภิกฺกนฺเต ปฏิกฺกนฺเต สมฺปชานการี โหติ, อาโลกิเต วิโลกิเต สมฺปชานการี โหติ, สมิญฺชิเต ปสาริเต สมฺปชานการี โหติ, สงฺฆาฏิปตฺตจีวรธารเณ สมฺปชานการี โหติ, อสิเต ปีเต ขายิเต สายิเต สมฺปชานการี โหติ, อุจฺจารปสฺสาวกมฺเม สมฺปชานการี โหติ, คเต ฐิเต นิสินฺเน สุตฺเต ชาคริเต ภาสิเต ตุณฺหีภาเว [Pg.413] สมฺปชานการี โหติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺปชานการี โหติ. สโต, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺปชาโน กาลํ อาคเมยฺย. อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนี. “और भिक्षुओं! भिक्षु कैसे संप्रजन्ययुक्त होता है? यहाँ, भिक्षुओं! भिक्षु आगे बढ़ने और पीछे हटने में संप्रजन्यकारी होता है; सामने देखने और इधर-उधर देखने में संप्रजन्यकारी होता है; अंगों को सिकोड़ने और फैलाने में संप्रजन्यकारी होता है; संघाटी, पात्र और चीवर धारण करने में संप्रजन्यकारी होता है; खाने, पीने, चबाने और स्वाद लेने में संप्रजन्यकारी होता है; मल-मूत्र त्याग करने में संप्रजन्यकारी होता है; चलने, खड़े होने, बैठने, सोने, जागने, बोलने और मौन रहने में संप्रजन्यकारी होता है। भिक्षुओं! इस प्रकार भिक्षु संप्रजन्यकारी होता है। भिक्षुओं! भिक्षु को स्मृतिमान और संप्रजन्ययुक्त होकर समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। यह तुम्हारे लिए हमारा अनुशासन है। ‘‘ตสฺส เจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน เอวํ สตสฺส สมฺปชานสฺส อปฺปมตฺตสฺส อาตาปิโน ปหิตตฺตสฺส วิหรโต อุปฺปชฺชติ สุขา เวทนา, โส เอวํ ปชานาติ – ‘อุปฺปนฺนา โข มฺยายํ สุขา เวทนา. สา จ โข ปฏิจฺจ, โน อปฺปฏิจฺจ. กึ ปฏิจฺจ? อิมเมว กายํ ปฏิจฺจ. อยํ โข ปน กาโย อนิจฺโจ สงฺขโต ปฏิจฺจสมุปฺปนฺโน. อนิจฺจํ โข ปน สงฺขตํ ปฏิจฺจสมุปฺปนฺนํ กายํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนา สุขา เวทนา กุโต นิจฺจา ภวิสฺสตี’ติ! โส กาเย จ สุขาย จ เวทนาย อนิจฺจานุปสฺสี วิหรติ, วยานุปสฺสี วิหรติ, วิราคานุปสฺสี วิหรติ, นิโรธานุปสฺสี วิหรติ, ปฏินิสฺสคฺคานุปสฺสี วิหรติ. ตสฺส กาเย จ สุขาย จ เวทนาย อนิจฺจานุปสฺสิโน วิหรโต, วยานุปสฺสิโน วิหรโต, วิราคานุปสฺสิโน วิหรโต, นิโรธานุปสฺสิโน วิหรโต, ปฏินิสฺสคฺคานุปสฺสิโน วิหรโต, โย กาเย จ สุขาย จ เวทนาย ราคานุสโย, โส ปหียติ. “भिक्षुओं! इस प्रकार स्मृतिमान, संप्रजन्ययुक्त, अप्रमादी, आतपी और दृढ़-संकल्पित होकर विहार करते हुए उस भिक्षु को यदि सुखद वेदना उत्पन्न होती है, तो वह इस प्रकार जानता है—‘मुझे यह सुखद वेदना उत्पन्न हुई है। वह भी किसी कारण से उत्पन्न हुई है, बिना कारण के नहीं। किस कारण से? इसी काया के कारण। यह काया तो अनित्य, संस्कृत और प्रतीत्यसमुत्पन्न है। भला, अनित्य, संस्कृत और प्रतीत्यसमुत्पन्न काया के आश्रित उत्पन्न हुई सुखद वेदना नित्य कैसे होगी!’ वह काया में और सुखद वेदना में अनित्यानुपश्यी होकर विहार करता है, व्ययानुपश्यी होकर विहार करता है, विरागानुपश्यी होकर विहार करता है, निरोधानुपश्यी होकर विहार करता है, प्रतिनिसर्गानुपश्यी होकर विहार करता है। काया में और सुखद वेदना में अनित्यानुपश्यी, व्ययानुपश्यी, विरागानुपश्यी, निरोधानुपश्यी, प्रतिनिसर्गानुपश्यी होकर विहार करते हुए उस भिक्षु का काया और सुखद वेदना के प्रति जो रागानुशय है, वह क्षीण हो जाता है। ‘‘ตสฺส เจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน เอวํ สตสฺส สมฺปชานสฺส อปฺปมตฺตสฺส อาตาปิโน ปหิตตฺตสฺส วิหรโต อุปฺปชฺชติ ทุกฺขา เวทนา. โส เอวํ ปชานาติ – ‘อุปฺปนฺนา โข มฺยายํ ทุกฺขา เวทนา. สา จ โข ปฏิจฺจ, โน อปฺปฏิจฺจ. กึ ปฏิจฺจ? อิมเมว กายํ ปฏิจฺจ. อยํ โข ปน กาโย อนิจฺโจ สงฺขโต ปฏิจฺจสมุปฺปนฺโน. อนิจฺจํ โข ปน สงฺขตํ ปฏิจฺจสมุปฺปนฺนํ กายํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนา ทุกฺขา เวทนา กุโต นิจฺจา ภวิสฺสตี’ติ! โส กาเย จ ทุกฺขาย เวทนาย อนิจฺจานุปสฺสี วิหรติ, วยานุปสฺสี วิหรติ, วิราคานุปสฺสี วิหรติ, นิโรธานุปสฺสี วิหรติ, ปฏินิสฺสคฺคานุปสฺสี วิหรติ. ตสฺส กาเย จ ทุกฺขาย จ เวทนาย อนิจฺจานุปสฺสิโน วิหรโต…เป… ปฏินิสฺสคฺคานุปสฺสิโน วิหรโต, โย กาเย จ ทุกฺขาย จ เวทนาย ปฏิฆานุสโย, โส ปหียติ. “भिक्षुओं! इस प्रकार स्मृतिमान, संप्रजन्ययुक्त, अप्रमादी, आतपी और दृढ़-संकल्पित होकर विहार करते हुए उस भिक्षु को यदि दुःखद वेदना उत्पन्न होती है, तो वह इस प्रकार जानता है—‘मुझे यह दुःखद वेदना उत्पन्न हुई है। वह भी किसी कारण से उत्पन्न हुई है, बिना कारण के नहीं। किस कारण से? इसी काया के कारण। यह काया तो अनित्य, संस्कृत और प्रतीत्यसमुत्पन्न है। भला, अनित्य, संस्कृत और प्रतीत्यसमुत्पन्न काया के आश्रित उत्पन्न हुई दुःखद वेदना नित्य कैसे होगी!’ वह काया में और दुःखद वेदना में अनित्यानुपश्यी होकर विहार करता है, व्ययानुपश्यी होकर विहार करता है, विरागानुपश्यी होकर विहार करता है, निरोधानुपश्यी होकर विहार करता है, प्रतिनिसर्गानुपश्यी होकर विहार करता है। काया में और दुःखद वेदना में अनित्यानुपश्यी... प्रतिनिसर्गानुपश्यी होकर विहार करते हुए उस भिक्षु का काया और दुःखद वेदना के प्रति जो प्रतिघानुशय है, वह क्षीण हो जाता है। ‘‘ตสฺส เจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน เอวํ สตสฺส สมฺปชานสฺส อปฺปมตฺตสฺส อาตาปิโน ปหิตตฺตสฺส วิหรโต อุปฺปชฺชติ อทุกฺขมสุขา เวทนา, โส เอวํ ปชานาติ – ‘อุปฺปนฺนา โข มฺยายํ อทุกฺขมสุขา เวทนา. สา จ โข ปฏิจฺจ, โน อปฺปฏิจฺจ. กึ ปฏิจฺจ? อิมเมว กายํ ปฏิจฺจ. อยํ โข ปน กาโย อนิจฺโจ สงฺขโต ปฏิจฺจสมุปฺปนฺโน. อนิจฺจํ โข ปน สงฺขตํ ปฏิจฺจสมุปฺปนฺนํ กายํ [Pg.414] ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนา อทุกฺขมสุขา เวทนา กุโต นิจฺจา ภวิสฺสตี’ติ! โส กาเย จ อทุกฺขมสุขาย จ เวทนาย อนิจฺจานุปสฺสี วิหรติ, วยานุปสฺสี วิหรติ, วิราคานุปสฺสี วิหรติ, นิโรธานุปสฺสี วิหรติ, ปฏินิสฺสคฺคานุปสฺสี วิหรติ. ตสฺส กาเย จ อทุกฺขมสุขาย จ เวทนาย อนิจฺจานุปสฺสิโน วิหรโต…เป… ปฏินิสฺสคฺคานุปสฺสิโน วิหรโต, โย กาเย จ อทุกฺขมสุขาย จ เวทนาย อวิชฺชานุสโย, โส ปหียติ. “भिक्षुओं! इस प्रकार स्मृतिमान, संप्रजन्ययुक्त, अप्रमादी, आतपी और दृढ़-संकल्पित होकर विहार करते हुए उस भिक्षु को यदि अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होती है, तो वह इस प्रकार जानता है—‘मुझे यह अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न हुई है। वह भी किसी कारण से उत्पन्न हुई है, बिना कारण के नहीं। किस कारण से? इसी काया के कारण। यह काया तो अनित्य, संस्कृत और प्रतीत्यसमुत्पन्न है। भला, अनित्य, संस्कृत और प्रतीत्यसमुत्पन्न काया के आश्रित उत्पन्न हुई अदुःख-असुख वेदना नित्य कैसे होगी!’ वह काया में और अदुःख-असुख वेदना में अनित्यानुपश्यी होकर विहार करता है, व्ययानुपश्यी होकर विहार करता है, विरागानुपश्यी होकर विहार करता है, निरोधानुपश्यी होकर विहार करता है, प्रतिनिसर्गानुपश्यी होकर विहार करता है। काया में और अदुःख-असुख वेदना में अनित्यानुपश्यी... प्रतिनिसर्गानुपश्यी होकर विहार करते हुए उस भिक्षु का काया और अदुःख-असुख वेदना के प्रति जो अविद्यानुशय है, वह क्षीण हो जाता है। ‘‘โส สุขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, สา อนิจฺจาติ ปชานาติ, อนชฺโฌสิตาติ ปชานาติ, อนภินนฺทิตาติ ปชานาติ; ทุกฺขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, สา อนิจฺจาติ ปชานาติ, อนชฺโฌสิตาติ ปชานาติ, อนภินนฺทิตาติ ปชานาติ; อทุกฺขมสุขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, สา อนิจฺจาติ ปชานาติ, อนชฺโฌสิตาติ ปชานาติ, อนภินนฺทิตาติ ปชานาติ. โส สุขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, วิสญฺญุตฺโต นํ เวทยติ; ทุกฺขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, วิสญฺญุตฺโต นํ เวทยติ; อทุกฺขมสุขญฺเจ เวทนํ เวทยติ, วิสญฺญุตฺโต นํ เวทยติ. โส กายปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยมาโน ‘กายปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ, ชีวิตปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยมาโน ‘ชีวิตปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ. ‘กายสฺส เภทา อุทฺธํ ชีวิตปริยาทานา อิเธว สพฺพเวทยิตานิ อนภินนฺทิตานิ สีตีภวิสฺสนฺตี’ติ ปชานาติ. यदि वह सुखद वेदना का अनुभव करता है, तो वह जानता है कि 'यह अनित्य है', वह जानता है कि 'यह आसक्ति रहित है', वह जानता है कि 'यह अभिनंदित नहीं है'; यदि वह दुःखद वेदना का अनुभव करता है, तो वह जानता है कि 'यह अनित्य है', वह जानता है कि 'यह आसक्ति रहित है', वह जानता है कि 'यह अभिनंदित नहीं है'; यदि वह अदुःख-असुख वेदना का अनुभव करता है, तो वह जानता है कि 'यह अनित्य है', वह जानता है कि 'यह आसक्ति रहित है', वह जानता है कि 'यह अभिनंदित नहीं है'। यदि वह सुखद वेदना का अनुभव करता है, तो वह उससे विमुक्त होकर उसका अनुभव करता है; यदि वह दुःखद वेदना का अनुभव करता है, तो वह उससे विमुक्त होकर उसका अनुभव करता है; यदि वह अदुःख-असुख वेदना का अनुभव करता है, तो वह उससे विमुक्त होकर उसका अनुभव करता है। वह शरीर की सीमा तक की वेदना का अनुभव करते हुए जानता है कि 'मैं शरीर की सीमा तक की वेदना का अनुभव कर रहा हूँ', जीवन की सीमा तक की वेदना का अनुभव करते हुए जानता है कि 'मैं जीवन की सीमा तक की वेदना का अनुभव कर रहा हूँ'। वह जानता है कि 'शरीर के भेद के बाद, जीवन के समाप्त होने पर, यहीं सभी वेदनाएँ, जिनमें अब आनंद नहीं लिया जाता, शीतल हो जाएँगी'। ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, เตลญฺจ ปฏิจฺจ วฏฺฏิญฺจ ปฏิจฺจ เตลปฺปทีโป ฌาเยยฺย, ตสฺเสว เตลสฺส จ วฏฺฏิยา จ ปริยาทานา อนาหาโร นิพฺพาเยยฺย; เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กายปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยมาโน ‘กายปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ. ชีวิตปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยมาโน ‘ชีวิตปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ. ‘กายสฺส เภทา อุทฺธํ ชีวิตปริยาทานา อิเธว สพฺพเวทยิตานิ อนภินนฺทิตานิ สีตีภวิสฺสนฺตี’ติ ปชานาตี’’ติ. สตฺตมํ. भिक्षुओं! जैसे तेल और बत्ती के आश्रय से तेल का दीपक जलता है, और उस तेल तथा बत्ती के समाप्त हो जाने पर, आहार न मिलने के कारण वह बुझ जाता है; उसी प्रकार, भिक्षुओं! भिक्षु शरीर की सीमा तक की वेदना का अनुभव करते हुए जानता है कि 'मैं शरीर की सीमा तक की वेदना का अनुभव कर रहा हूँ'। जीवन की सीमा तक की वेदना का अनुभव करते हुए जानता है कि 'मैं जीवन की सीमा तक की वेदना का अनुभव कर रहा हूँ'। वह जानता है कि 'शरीर के भेद के बाद, जीवन के समाप्त होने पर, यहीं सभी वेदनाएँ, जिनमें अब आनंद नहीं लिया जाता, शीतल हो जाएँगी'। सातवाँ। ๘. ทุติยเคลญฺญสุตฺตํ ८. द्वितीय गेलञ्ञ सुत्त ๒๕๖. เอกํ สมยํ ภควา เวสาลิยํ วิหรติ มหาวเน กูฏาคารสาลายํ. อถ โข ภควา สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต เยน คิลานสาลา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. นิสชฺช โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – २५६. एक समय भगवान वैशाली के महावन में कूटागार शाला में विहार कर रहे थे। तब भगवान सायंकाल के समय प्रतिसंलयन (ध्यान) से उठकर जहाँ रुग्णशाला थी, वहाँ गए; वहाँ जाकर वे बिछाए हुए आसन पर बैठ गए। बैठकर भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— ‘‘สโต[Pg.415], ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺปชาโน กาลํ อาคเมยฺย. อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนี. भिक्षुओं! भिक्षु को स्मृतिवान और संप्रजन्य होकर समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। यह तुम्हारे लिए हमारा अनुशासन है। ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สโต โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา, วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ; เวทนาสุ เวทนานุปสฺสี วิหรติ… จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสี วิหรติ… ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา, วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สโต โหติ. और भिक्षुओं! भिक्षु स्मृतिवान कैसे होता है? यहाँ, भिक्षुओं! भिक्षु काया में कायानुपश्यी होकर विहार करता है—आतपी, संप्रजन्य और स्मृतिवान होकर, लोक में अभिध्या और दौर्मनस्य को दूर करके; वेदनाओं में वेदनानुपश्यी होकर विहार करता है... चित्त में चित्तनुपश्यी होकर विहार करता है... धर्मों में धर्मानुपश्यी होकर विहार करता है—आतपी, संप्रजन्य और स्मृतिवान होकर, लोक में अभिध्या और दौर्मनस्य को दूर करके। भिक्षुओं! इस प्रकार भिक्षु स्मृतिवान होता है। ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺปชาโน โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อภิกฺกนฺเต ปฏิกฺกนฺเต สมฺปชานการี โหติ…เป… ภาสิเต ตุณฺหีภาเว สมฺปชานการี โหติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺปชาโน โหติ. สโต, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺปชาโน กาลํ อาคเมยฺย. อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนี. और भिक्षुओं! भिक्षु संप्रजन्य कैसे होता है? यहाँ, भिक्षुओं! भिक्षु आगे बढ़ने और पीछे हटने में संप्रजन्यकारी होता है... बोलने और मौन रहने में संप्रजन्यकारी होता है। भिक्षुओं! इस प्रकार भिक्षु संप्रजन्य होता है। भिक्षुओं! भिक्षु को स्मृतिवान और संप्रजन्य होकर समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। यह तुम्हारे लिए हमारा अनुशासन है। ‘‘ตสฺส เจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน เอวํ สตสฺส สมฺปชานสฺส อปฺปมตฺตสฺส อาตาปิโน ปหิตตฺตสฺส วิหรโต อุปฺปชฺชติ สุขา เวทนา. โส เอวํ ปชานาติ – ‘อุปฺปนฺนา โข มฺยายํ สุขา เวทนา; สา จ โข ปฏิจฺจ, โน อปฺปฏิจฺจ. กึ ปฏิจฺจ? อิมเมว ผสฺสํ ปฏิจฺจ. อยํ โข ปน ผสฺโส อนิจฺโจ สงฺขโต ปฏิจฺจสมุปฺปนฺโน. อนิจฺจํ โข ปน สงฺขตํ ปฏิจฺจสมุปฺปนฺนํ ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนา สุขา เวทนา กุโต นิจฺจา ภวิสฺสตี’ติ! โส ผสฺเส จ สุขาย จ เวทนาย อนิจฺจานุปสฺสี วิหรติ, วยานุปสฺสี วิหรติ, วิราคานุปสฺสี วิหรติ, นิโรธานุปสฺสี วิหรติ, ปฏินิสฺสคฺคานุปสฺสี วิหรติ. ตสฺส ผสฺเส จ สุขาย จ เวทนาย อนิจฺจานุปสฺสิโน วิหรโต, วยานุปสฺสิโน วิหรโต, วิราคานุปสฺสิโน วิหรโต, นิโรธานุปสฺสิโน วิหรโต, ปฏินิสฺสคฺคานุปสฺสิโน วิหรโต โย ผสฺเส จ สุขาย จ เวทนาย ราคานุสโย, โส ปหียติ. भिक्षुओं! इस प्रकार स्मृतिवान, संप्रजन्य, अप्रमादी, आतपी और दृढ़निश्चयी होकर विहार करते हुए उस भिक्षु को यदि सुखद वेदना उत्पन्न होती है, तो वह इस प्रकार जानता है—'मुझे यह सुखद वेदना उत्पन्न हुई है; और वह हेतु-प्रत्यय से उत्पन्न हुई है, बिना हेतु के नहीं। किसके हेतु? इसी स्पर्श के हेतु। और यह स्पर्श अनित्य है, संस्कृत है, प्रतीत्यसमुत्पन्न है। अनित्य, संस्कृत और प्रतीत्यसमुत्पन्न स्पर्श के कारण उत्पन्न हुई सुखद वेदना नित्य कैसे हो सकती है?' वह स्पर्श और सुखद वेदना में अनित्यानुपश्यी होकर विहार करता है, व्ययानुपश्यी होकर विहार करता है, विरागानुपश्यी होकर विहार करता है, निरोधानुपश्यी होकर विहार करता है, प्रतिनिसर्गानुपश्यी होकर विहार करता है। स्पर्श और सुखद वेदना में अनित्यानुपश्यी... प्रतिनिसर्गानुपश्यी होकर विहार करते हुए उस भिक्षु का स्पर्श और सुखद वेदना के प्रति जो रागानुशय है, वह प्रहीण हो जाता है। ‘‘ตสฺส เจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน เอวํ สตสฺส…เป… วิหรโต อุปฺปชฺชติ ทุกฺขา เวทนา…เป… อุปฺปชฺชติ อทุกฺขมสุขา เวทนา. โส เอวํ ปชานาติ – ‘อุปฺปนฺนา โข มฺยายํ อทุกฺขมสุขา เวทนา; สา จ โข ปฏิจฺจ, โน อปฺปฏิจฺจ. กึ ปฏิจฺจ? อิมเมว ผสฺสํ ปฏิจฺจ…เป… กายสฺส [Pg.416] เภทา อุทฺธํ ชีวิตปริยาทานา อิเธว สพฺพเวทยิตานิ อนภินนฺทิตานิ สีตีภวิสฺสนฺตี’ติ ปชานาติ’’. भिक्षुओं! यदि उस स्मृतिवान... विहार करते हुए भिक्षु को दुःखद वेदना उत्पन्न होती है... अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होती है, तो वह इस प्रकार जानता है—'मुझे यह अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न हुई है; और वह हेतु-प्रत्यय से उत्पन्न हुई है, बिना हेतु के नहीं। किसके हेतु? इसी स्पर्श के हेतु... वह जानता है कि 'शरीर के भेद के बाद, जीवन के समाप्त होने पर, यहीं सभी वेदनाएँ, जिनमें अब आनंद नहीं लिया जाता, शीतल हो जाएँगी'। ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, เตลญฺจ ปฏิจฺจ วฏฺฏิญฺจ ปฏิจฺจ เตลปฺปทีโป ฌาเยยฺย, ตสฺเสว เตลสฺส จ วฏฺฏิยา จ ปริยาทานา อนาหาโร นิพฺพาเยยฺย; เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กายปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยมาโน ‘กายปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ. ชีวิตปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยมาโน ‘ชีวิตปริยนฺติกํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ. ‘กายสฺส เภทา อุทฺธํ ชีวิตปริยาทานา อิเธว สพฺพเวทยิตานิ อนภินนฺทิตานิ สีตีภวิสฺสนฺตี’ติ ปชานาตี’’ติ. อฏฺฐมํ. भिक्षुओं! जैसे तेल और बत्ती के आश्रय से तेल का दीपक जलता है, और उस तेल तथा बत्ती के समाप्त हो जाने पर, आहार न मिलने के कारण वह बुझ जाता है; उसी प्रकार, भिक्षुओं! भिक्षु शरीर की सीमा तक की वेदना का अनुभव करते हुए जानता है कि 'मैं शरीर की सीमा तक की वेदना का अनुभव कर रहा हूँ'। जीवन की सीमा तक की वेदना का अनुभव करते हुए जानता है कि 'मैं जीवन की सीमा तक की वेदना का अनुभव कर रहा हूँ'। वह जानता है कि 'शरीर के भेद के बाद, जीवन के समाप्त होने पर, यहीं सभी वेदनाएँ, जिनमें अब आनंद नहीं लिया जाता, शीतल हो जाएँगी'। आठवाँ। ๙. อนิจฺจสุตฺตํ ९. अनित्य सुत्त ๒๕๗. ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา อนิจฺจา สงฺขตา ปฏิจฺจสมุปฺปนฺนา ขยธมฺมา วยธมฺมา วิราคธมฺมา นิโรธธมฺมา. กตมา ติสฺโส? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา โข, ภิกฺขเว, ติสฺโส เวทนา อนิจฺจา สงฺขตา ปฏิจฺจสมุปฺปนฺนา ขยธมฺมา วยธมฺมา วิราคธมฺมา นิโรธธมฺมา’’ติ. นวมํ. २५७. भिक्षुओं! ये तीन वेदनाएँ अनित्य, संस्कृत (संस्कारित), प्रतीत्यसमुत्पन्न, क्षयधर्मा, वयधर्मा, विरागधर्मा और निरोधधर्मा हैं। कौन सी तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना और अदुःख-असुखद वेदना - भिक्षुओं! ये ही तीन वेदनाएँ अनित्य, संस्कृत, प्रतीत्यसमुत्पन्न, क्षयधर्मा, वयधर्मा, विरागधर्मा और निरोधधर्मा हैं। नौवां सूक्त। ๑๐. ผสฺสมูลกสุตฺตํ १०. फस्समूलक सुत्त ๒๕๘. ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา ผสฺสชา ผสฺสมูลกา ผสฺสนิทานา ผสฺสปจฺจยา. กตมา ติสฺโส? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา. สุขเวทนิยํ, ภิกฺขเว, ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขา เวทนา. ตสฺเสว สุขเวทนิยสฺส ผสฺสสฺส นิโรธา, ยํ ตชฺชํ เวทยิตํ สุขเวทนิยํ ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนา สุขา เวทนา, สา นิรุชฺฌติ, สา วูปสมฺมติ. ทุกฺขเวทนิยํ, ภิกฺขเว, ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ทุกฺขา เวทนา. ตสฺเสว ทุกฺขเวทนิยสฺส ผสฺสสฺส นิโรธา, ยํ ตชฺชํ เวทยิตํ ทุกฺขเวทนิยํ ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนา ทุกฺขา เวทนา, สา นิรุชฺฌติ, สา วูปสมฺมติ. อทุกฺขมสุขเวทนิยํ, ภิกฺขเว, ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ อทุกฺขมสุขา เวทนา. ตสฺเสว อทุกฺขมสุขเวทนิยสฺส ผสฺสสฺส นิโรธา, ยํ ตชฺชํ เวทยิตํ อทุกฺขมสุขเวทนิยํ ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนา อทุกฺขมสุขา เวทนา, สา นิรุชฺฌติ, สา วูปสมฺมติ. เสยฺยถาปิ[Pg.417], ภิกฺขเว, ทฺวินฺนํ กฏฺฐานํ สงฺฆฏฺฏนสโมธานา อุสฺมา ชายติ, เตโช อภินิพฺพตฺตติ. เตสํเยว กฏฺฐานํ นานาภาวา วินิกฺเขปา, ยา ตชฺชา อุสฺมา, สา นิรุชฺฌติ, สา วูปสมฺมติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, อิมา ติสฺโส เวทนา ผสฺสชา ผสฺสมูลกา ผสฺสนิทานา ผสฺสปจฺจยา. ตชฺชํ ผสฺสํ ปฏิจฺจ ตชฺชา เวทนา อุปฺปชฺชนฺติ. ตชฺชสฺส ผสฺสสฺส นิโรธา ตชฺชา เวทนา นิรุชฺฌนฺตี’’ติ. ทสมํ. २५८. भिक्षुओं! ये तीन वेदनाएँ स्पर्श-जन्य (फस्सजा), स्पर्श-मूलक, स्पर्श-निदान और स्पर्श-प्रत्यय हैं। कौन सी तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना और अदुःख-असुखद वेदना। भिक्षुओं! सुखद-वेदनीय स्पर्श के कारण सुखद वेदना उत्पन्न होती है। उसी सुखद-वेदनीय स्पर्श के निरोध से, उस स्पर्श पर आधारित जो सुखद वेदना उत्पन्न हुई थी, वह निरुद्ध हो जाती है, वह शांत हो जाती है। भिक्षुओं! दुःखद-वेदनीय स्पर्श के कारण दुःखद वेदना उत्पन्न होती है। उसी दुःखद-वेदनीय स्पर्श के निरोध से, उस स्पर्श पर आधारित जो दुःखद वेदना उत्पन्न हुई थी, वह निरुद्ध हो जाती है, वह शांत हो जाती है। भिक्षुओं! अदुःख-असुखद-वेदनीय स्पर्श के कारण अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होती है। उसी अदुःख-असुखद-वेदनीय स्पर्श के निरोध से, उस स्पर्श पर आधारित जो अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न हुई थी, वह निरुद्ध हो जाती है, वह शांत हो जाती है। भिक्षुओं! जैसे दो लकड़ियों के रगड़ने और आपस में मिलने से ऊष्मा उत्पन्न होती है, अग्नि प्रकट होती है। उन्हीं लकड़ियों के अलग होने और दूर होने से, उससे उत्पन्न वह ऊष्मा निरुद्ध हो जाती है, शांत हो जाती है। इसी प्रकार, भिक्षुओं! ये तीन वेदनाएँ स्पर्श-जन्य, स्पर्श-मूलक, स्पर्श-निदान और स्पर्श-प्रत्यय हैं। संबंधित स्पर्श के कारण संबंधित वेदनाएँ उत्पन्न होती हैं। संबंधित स्पर्श के निरोध से संबंधित वेदनाएँ निरुद्ध हो जाती हैं। दसवां सूक्त। สคาถาวคฺโค ปฐโม. प्रथम सगाथावग्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – इसका सारांश (उद्दान) - สมาธิ สุขํ ปหาเนน, ปาตาลํ ทฏฺฐพฺเพน จ; สลฺเลน เจว เคลญฺญา, อนิจฺจ ผสฺสมูลกาติ. समाधि, सुख, पहान, पाताल, दट्टब्ब, सल्लेन, गेलञ्ञ, अनित्य और फस्समूलक। ๒. รโหคตวคฺโค २. रहोगत वग्ग ๑. รโหคตสุตฺตํ १. रहोगत सुत्त ๒๕๙. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธ มยฺหํ, ภนฺเต, รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘ติสฺโส เวทนา วุตฺตา ภควตา. สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา ติสฺโส เวทนา วุตฺตา ภควตา. วุตฺตํ โข ปเนตํ ภควตา – ‘ยํ กิญฺจิ เวทยิตํ ตํ ทุกฺขสฺมิ’นฺติ. กึ นุ โข เอตํ ภควตา สนฺธาย ภาสิตํ – ‘ยํ กิญฺจิ เวทยิตํ ตํ ทุกฺขสฺมิ’’’นฺติ? २५९. तब एक भिक्षु जहाँ भगवान् थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए उस भिक्षु ने भगवान् से यह कहा - 'भन्ते! यहाँ एकांत में ध्यानमग्न (प्रतिसंलीन) रहते हुए मेरे मन में ऐसा विचार उत्पन्न हुआ - भगवान् ने तीन वेदनाएँ कही हैं: सुखद वेदना, दुःखद वेदना और अदुःख-असुखद वेदना - ये तीन वेदनाएँ भगवान् द्वारा कही गई हैं। फिर भगवान् ने यह भी कहा है - 'जो कुछ भी अनुभव (वेदित) किया जाता है, वह दुःख में है'। भगवान् ने किस बात को लक्ष्य में रखकर यह कहा है कि 'जो कुछ भी अनुभव किया जाता है, वह दुःख में है'?' ‘‘สาธุ สาธุ, ภิกฺขุ! ติสฺโส อิมา, ภิกฺขุ, เวทนา วุตฺตา มยา. สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา ติสฺโส เวทนา วุตฺตา มยา. วุตฺตํ โข ปเนตํ, ภิกฺขุ, มยา – ‘ยํ กิญฺจิ เวทยิตํ, ตํ ทุกฺขสฺมิ’นฺติ. ตํ โข ปเนตํ, ภิกฺขุ, มยา สงฺขารานํเยว อนิจฺจตํ สนฺธาย ภาสิตํ – ‘ยํ กิญฺจิ เวทยิตํ ตํ ทุกฺขสฺมิ’นฺติ[Pg.418]. ตํ โข ปเนตํ, ภิกฺขุ, มยา สงฺขารานํเยว ขยธมฺมตํ…เป… วยธมฺมตํ…เป… วิราคธมฺมตํ …เป… นิโรธธมฺมตํ…เป… วิปริณามธมฺมตํ สนฺธาย ภาสิตํ – ‘ยํ กิญฺจิ เวทยิตํ ตํ ทุกฺขสฺมิ’นฺติ. อถ โข ปน, ภิกฺขุ, มยา อนุปุพฺพสงฺขารานํ นิโรโธ อกฺขาโต. ปฐมํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วาจา นิรุทฺธา โหติ. ทุติยํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วิตกฺกวิจารา นิรุทฺธา โหนฺติ. ตติยํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส ปีติ นิรุทฺธา โหติ. จตุตฺถํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส อสฺสาสปสฺสาสา นิรุทฺธา โหนฺติ. อากาสานญฺจายตนํ สมาปนฺนสฺส รูปสญฺญา นิรุทฺธา โหติ. วิญฺญาณญฺจายตนํ สมาปนฺนสฺส อากาสานญฺจายตนสญฺญา นิรุทฺธา โหติ. อากิญฺจญฺญายตนํ สมาปนฺนสฺส วิญฺญาณญฺจายตนสญฺญา นิรุทฺธา โหติ. เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ สมาปนฺนสฺส อากิญฺจญฺญายตนสญฺญา นิรุทฺธา โหติ. สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺนสฺส สญฺญา จ เวทนา จ นิรุทฺธา โหนฺติ. ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราโค นิรุทฺโธ โหติ, โทโส นิรุทฺโธ โหติ, โมโห นิรุทฺโธ โหติ. อถ โข, ภิกฺขุ, มยา อนุปุพฺพสงฺขารานํ วูปสโม อกฺขาโต. ปฐมํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วาจา วูปสนฺตา โหติ. ทุติยํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วิตกฺกวิจารา วูปสนฺตา โหนฺติ…เป… สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺนสฺส สญฺญา จ เวทนา จ วูปสนฺตา โหนฺติ. ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราโค วูปสนฺโต โหติ, โทโส วูปสนฺโต โหติ, โมโห วูปสนฺโต โหติ. ฉยิมา, ภิกฺขุ, ปสฺสทฺธิโย. ปฐมํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วาจา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหติ. ทุติยํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วิตกฺกวิจารา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหนฺติ. ตติยํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส ปีติ ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหติ. จตุตฺถํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส อสฺสาสปสฺสาสา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหนฺติ. สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺนสฺส สญฺญา จ เวทนา จ ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหนฺติ. ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราโค ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหติ, โทโส ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหติ, โมโห ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหตี’’ติ. ปฐมํ. “साधु, साधु, भिक्षु! भिक्षु, मैंने ये तीन वेदनाएँ कही हैं। सुखद वेदना, दुःखद वेदना, और न-दुःखद-न-सुखद वेदना—ये तीन वेदनाएँ मैंने कही हैं। भिक्षु, मैंने यह भी कहा है—‘जो कुछ भी अनुभव किया जाता है, वह दुःख में है’। भिक्षु, मैंने यह संस्कारों की अनित्यता को ही लक्ष्य करके कहा है—‘जो कुछ भी अनुभव किया जाता है, वह दुःख में है’। भिक्षु, मैंने यह संस्कारों के क्षय-धर्म... विनाश-धर्म... विराग-धर्म... निरोध-धर्म... और विपरिणाम-धर्म (परिवर्तनशीलता) को ही लक्ष्य करके कहा है—‘जो कुछ भी अनुभव किया जाता है, वह दुःख में है’। भिक्षु, इसके अतिरिक्त, मैंने संस्कारों के अनुक्रमिक निरोध (क्रमिक निरोध) का वर्णन किया है। प्रथम ध्यान में प्रविष्ट व्यक्ति की वाणी निरुद्ध हो जाती है। द्वितीय ध्यान में प्रविष्ट व्यक्ति के वितर्क और विचार निरुद्ध हो जाते हैं। तृतीय ध्यान में प्रविष्ट व्यक्ति की प्रीति निरुद्ध हो जाती है। चतुर्थ ध्यान में प्रविष्ट व्यक्ति के श्वास-प्रश्वास निरुद्ध हो जाते हैं। आकाशानन्त्यायतन में प्रविष्ट व्यक्ति की रूप-संज्ञा निरुद्ध हो जाती है। विज्ञानानन्त्यायतन में प्रविष्ट व्यक्ति की आकाशानन्त्यायतन-संज्ञा निरुद्ध हो जाती है। आकिंचन्यायतन में प्रविष्ट व्यक्ति की विज्ञानानन्त्यायतन-संज्ञा निरुद्ध हो जाती है। नैवसंज्ञानासंज्ञायतन में प्रविष्ट व्यक्ति की आकिंचन्यायतन-संज्ञा निरुद्ध हो जाती है। संज्ञा-वेदयित-निरोध में प्रविष्ट व्यक्ति की संज्ञा और वेदना निरुद्ध हो जाती हैं। क्षीणास्त्रव भिक्षु के राग, द्वेष और मोह निरुद्ध हो जाते हैं। भिक्षु, इसके अतिरिक्त, मैंने संस्कारों के अनुक्रमिक उपशम (शांति) का वर्णन किया है। प्रथम ध्यान में प्रविष्ट व्यक्ति की वाणी उपशांत हो जाती है। द्वितीय ध्यान में प्रविष्ट व्यक्ति के वितर्क और विचार उपशांत हो जाते हैं... संज्ञा-वेदयित-निरोध में प्रविष्ट व्यक्ति की संज्ञा और वेदना उपशांत हो जाती हैं। क्षीणास्त्रव भिक्षु के राग, द्वेष और मोह उपशांत हो जाते हैं। भिक्षु, ये छह प्रशान्तियाँ हैं। प्रथम ध्यान में प्रविष्ट व्यक्ति की वाणी प्रशान्त हो जाती है। द्वितीय ध्यान में प्रविष्ट व्यक्ति के वितर्क और विचार प्रशान्त हो जाते हैं। तृतीय ध्यान में प्रविष्ट व्यक्ति की प्रीति प्रशान्त हो जाती है। चतुर्थ ध्यान में प्रविष्ट व्यक्ति के श्वास-प्रश्वास प्रशान्त हो जाते हैं। संज्ञा-वेदयित-निरोध में प्रविष्ट व्यक्ति की संज्ञा और वेदना प्रशान्त हो जाती हैं। क्षीणास्त्रव भिक्षु के राग, द्वेष और मोह प्रशान्त हो जाते हैं।” ๒. ปฐมอากาสสุตฺตํ २. प्रथम आकाश सूत्र ๒๖๐. ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, อากาเส วิวิธา วาตา วายนฺติ. ปุรตฺถิมาปิ วาตา วายนฺติ, ปจฺฉิมาปิ วาตา วายนฺติ, อุตฺตราปิ วาตา วายนฺติ, ทกฺขิณาปิ วาตา วายนฺติ, สรชาปิ วาตา วายนฺติ, อรชาปิ วาตา วายนฺติ, สีตาปิ วาตา วายนฺติ, อุณฺหาปิ วาตา วายนฺติ, ปริตฺตาปิ วาตา วายนฺติ, อธิมตฺตาปิ วาตา [Pg.419] วายนฺติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, อิมสฺมึ กายสฺมึ วิวิธา เวทนา อุปฺปชฺชนฺติ, สุขาปิ เวทนา อุปฺปชฺชติ, ทุกฺขาปิ เวทนา อุปฺปชฺชติ, อทุกฺขมสุขาปิ เวทนา อุปฺปชฺชตี’’ติ. २६०. “भिक्षुओं, जैसे आकाश में विविध हवाएँ चलती हैं। पूर्व की हवाएँ भी चलती हैं, पश्चिम की हवाएँ भी चलती हैं, उत्तर की हवाएँ भी चलती हैं, दक्षिण की हवाएँ भी चलती हैं, धूल भरी हवाएँ भी चलती हैं, धूल रहित हवाएँ भी चलती हैं, ठंडी हवाएँ भी चलती हैं, गर्म हवाएँ भी चलती हैं, मन्द हवाएँ भी चलती हैं, और तीव्र हवाएँ भी चलती हैं। इसी प्रकार, भिक्षुओं, इस शरीर में विविध वेदनाएँ उत्पन्न होती हैं—सुखद वेदना भी उत्पन्न होती है, दुःखद वेदना भी उत्पन्न होती है, और न-दुःखद-न-सुखद वेदना भी उत्पन्न होती है।” ‘‘ยถาปิ วาตา อากาเส, วายนฺติ วิวิธา ปุถู; ปุรตฺถิมา ปจฺฉิมา จาปิ, อุตฺตรา อถ ทกฺขิณา. “जैसे आकाश में अनेक प्रकार की विविध हवाएँ चलती हैं; पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण से।” ‘‘สรชา อรชา จปิ, สีตา อุณฺหา จ เอกทา; อธิมตฺตา ปริตฺตา จ, ปุถู วายนฺติ มาลุตา. “धूल भरी और धूल रहित भी, कभी ठंडी और कभी गर्म; तीव्र और मन्द, अनेक हवाएँ चलती हैं।” ‘‘ตเถวิมสฺมึ กายสฺมึ, สมุปฺปชฺชนฺติ เวทนา; สุขทุกฺขสมุปฺปตฺติ, อทุกฺขมสุขา จ ยา. “उसी प्रकार इस शरीर में वेदनाएँ उत्पन्न होती हैं; सुख और दुःख की उत्पत्ति, और जो न-दुःखद-न-सुखद है।” ‘‘ยโต จ ภิกฺขุ อาตาปี, สมฺปชญฺญํ น ริญฺจติ ; ตโต โส เวทนา สพฺพา, ปริชานาติ ปณฺฑิโต. “जब भिक्षु उत्साही (आतपी) होता है और सम्प्रजन्य (होश) को नहीं छोड़ता; तब वह पण्डित भिक्षु सभी वेदनाओं को पूर्णतः जान लेता है।” ‘‘โส เวทนา ปริญฺญาย, ทิฏฺเฐ ธมฺเม อนาสโว; กายสฺส เภทา ธมฺมฏฺโฐ, สงฺขฺยํ โนเปติ เวทคู’’ติ. ทุติยํ; “वह वेदनाओं को पूर्णतः जानकर इसी जन्म में आस्रव-रहित हो जाता है; धर्म में स्थित और ज्ञान-पारंगत वह भिक्षु, शरीर के टूटने (मृत्यु) के बाद पुनर्जन्म की गणना में नहीं आता।” ๓. ทุติยอากาสสุตฺตํ ३. द्वितीय आकाश सूत्र ๒๖๑. ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, อากาเส วิวิธา วาตา วายนฺติ. ปุรตฺถิมาปิ วาตา วายนฺติ…เป… อธิมตฺตาปิ วาตา วายนฺติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, อิมสฺมึ กายสฺมึ วิวิธา เวทนา อุปฺปชฺชนฺติ, สุขาปิ เวทนา อุปฺปชฺชติ, ทุกฺขาปิ เวทนา อุปฺปชฺชติ, อทุกฺขมสุขาปิ เวทนา อุปฺปชฺชตี’’ติ. ตติยํ. २६१. “भिक्षुओं, जैसे आकाश में विविध हवाएँ चलती हैं। पूर्व की हवाएँ भी चलती हैं... तीव्र हवाएँ भी चलती हैं। इसी प्रकार, भिक्षुओं, इस शरीर में विविध वेदनाएँ उत्पन्न होती हैं—सुखद वेदना भी उत्पन्न होती है, दुःखद वेदना भी उत्पन्न होती है, और न-दुःखद-न-सुखद वेदना भी उत्पन्न होती है।” ๔. อคารสุตฺตํ ४. अगार सूत्र ๒๖๒. ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, อาคนฺตุกาคารํ. ตตฺถ ปุรตฺถิมายปิ ทิสาย อาคนฺตฺวา วาสํ กปฺเปนฺติ, ปจฺฉิมายปิ ทิสาย อาคนฺตฺวา วาสํ กปฺเปนฺติ, อุตฺตรายปิ ทิสาย อาคนฺตฺวา วาสํ กปฺเปนฺติ, ทกฺขิณายปิ ทิสาย อาคนฺตฺวา วาสํ กปฺเปนฺติ. ขตฺติยาปิ อาคนฺตฺวา วาสํ กปฺเปนฺติ, พฺราหฺมณาปิ อาคนฺตฺวา วาสํ กปฺเปนฺติ, เวสฺสาปิ อาคนฺตฺวา วาสํ กปฺเปนฺติ, สุทฺทาปิ อาคนฺตฺวา วาสํ กปฺเปนฺติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, อิมสฺมึ กายสฺมึ วิวิธา เวทนา [Pg.420] อุปฺปชฺชนฺติ. สุขาปิ เวทนา อุปฺปชฺชติ, ทุกฺขาปิ เวทนา อุปฺปชฺชติ, อทุกฺขมสุขาปิ เวทนา อุปฺปชฺชติ. สามิสาปิ สุขา เวทนา อุปฺปชฺชติ, สามิสาปิ ทุกฺขา เวทนา อุปฺปชฺชติ, สามิสาปิ อทุกฺขมสุขา เวทนา อุปฺปชฺชติ. นิรามิสาปิ สุขา เวทนา อุปฺปชฺชติ, นิรามิสาปิ ทุกฺขา เวทนา อุปฺปชฺชติ, นิรามิสาปิ อทุกฺขมสุขา เวทนา อุปฺปชฺชตี’’ติ. จตุตฺถํ. २६२. "भिक्षुओं! जैसे एक अतिथिशाला (सराय) होती है। वहाँ पूर्व दिशा से भी आकर लोग निवास करते हैं, पश्चिम दिशा से भी आकर निवास करते हैं, उत्तर दिशा से भी आकर निवास करते हैं, और दक्षिण दिशा से भी आकर निवास करते हैं। क्षत्रिय भी आकर निवास करते हैं, ब्राह्मण भी आकर निवास करते हैं, वैश्य भी आकर निवास करते हैं, और शूद्र भी आकर निवास करते हैं। भिक्षुओं! इसी प्रकार इस शरीर में विविध वेदनाएँ उत्पन्न होती हैं। सुखद वेदना भी उत्पन्न होती है, दुःखद वेदना भी उत्पन्न होती है, और अदुःखमसुख वेदना भी उत्पन्न होती है। सामिष (सांसारिक) सुखद वेदना भी उत्पन्न होती है, सामिष दुःखद वेदना भी उत्पन्न होती है, सामिष अदुःखमसुख वेदना भी उत्पन्न होती है। निरामिष (आध्यात्मिक) सुखद वेदना भी उत्पन्न होती है, निरामिष दुःखद वेदना भी उत्पन्न होती है, और निरामिष अदुःखमसुख वेदना भी उत्पन्न होती है।" चौथा। ๕. ปฐมอานนฺทสุตฺตํ ५. प्रथम आनन्द सुत्त ๒๖๓. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ, เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กตมา นุ โข, ภนฺเต, เวทนา, กตโม เวทนาสมุทโย, กตโม เวทนานิโรโธ, กตมา เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา? โก เวทนาย อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณนฺติ? ติสฺโส อิมา, อานนฺท, เวทนา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา วุจฺจนฺติ, อานนฺท, เวทนา. ผสฺสสมุทยา เวทนาสมุทโย; ผสฺสนิโรธา เวทนานิโรโธ. อยเมว อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ…เป… สมฺมาสมาธิ. ยํ เวทนํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อยํ เวทนาย อสฺสาโท. ยา เวทนา อนิจฺจา ทุกฺขา วิปริณามธมฺมา, อยํ เวทนาย อาทีนโว. โย เวทนาย ฉนฺทราควินโย ฉนฺทราคปฺปหานํ, อิทํ เวทนาย นิสฺสรณํ. อถ โข ปนานนฺท, มยา อนุปุพฺพสงฺขารานํ นิโรโธ อกฺขาโต. ปฐมํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วาจา นิรุทฺธา โหติ…เป… สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺนสฺส สญฺญา จ เวทนา จ นิรุทฺธา โหนฺติ. ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราโค นิรุทฺโธ โหติ, โทโส นิรุทฺโธ โหติ, โมโห นิรุทฺโธ โหติ. อถ โข ปนานนฺท, มยา อนุปุพฺพสงฺขารานํ วูปสโม อกฺขาโต. ปฐมํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วาจา วูปสนฺตา โหติ…เป… สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺนสฺส สญฺญา จ เวทนา จ วูปสนฺตา โหนฺติ. ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราโค วูปสนฺโต โหติ, โทโส วูปสนฺโต โหติ, โมโห วูปสนฺโต โหติ. อถ โข ปนานนฺท, มยา อนุปุพฺพสงฺขารานํ ปฏิปฺปสฺสทฺธิ อกฺขาตา. ปฐมํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วาจา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหติ…เป… อากาสานญฺจายตนํ สมาปนฺนสฺส รูปสญฺญา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหติ. วิญฺญาณญฺจายตนํ สมาปนฺนสฺส อากาสานญฺจายตนสญฺญา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหติ. อากิญฺจญฺญายตนํ สมาปนฺนสฺส [Pg.421] วิญฺญาณญฺจายตนสญฺญา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหติ. เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ สมาปนฺนสฺส อากิญฺจญฺญายตนสญฺญา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหติ. สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺนสฺส สญฺญา จ เวทนา จ ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหนฺติ. ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราโค ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหติ, โทโส ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหติ, โมโห ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหตี’’ติ. ปญฺจมํ. २६३. तब आयुष्मान आनन्द जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान आनन्द ने भगवान से यह कहा— "भन्ते! वेदना क्या है? वेदना का समुदय क्या है? वेदना का निरोध क्या है? वेदना-निरोध-गामिनी प्रतिपदा क्या है? वेदना का आस्वाद क्या है? उसका आदिम (दोष) क्या है? उसका निस्सरण (मुक्ति) क्या है?" "आनन्द! ये तीन वेदनाएँ हैं— सुखद वेदना, दुःखद वेदना, और अदुःखमसुख वेदना— आनन्द! इन्हें वेदना कहा जाता है। स्पर्श के समुदय से वेदना का समुदय होता है; स्पर्श के निरोध से वेदना का निरोध होता है। यही आर्य अष्टांगिक मार्ग वेदना-निरोध-गामिनी प्रतिपदा है, जैसे कि— सम्यक दृष्टि... पे... सम्यक समाधि। वेदना के कारण जो सुख और सौमनस्य उत्पन्न होता है, वह वेदना का आस्वाद है। जो वेदना अनित्य, दुःखमय और विपरिणामधर्मी (परिवर्तनशील) है, वह वेदना का आदिम है। वेदना के प्रति जो छन्द-राग (इच्छा और आसक्ति) का विनय (दमन) और छन्द-राग का प्रहाण (त्याग) है, वह वेदना का निस्सरण है। और फिर आनन्द! मेरे द्वारा अनुक्रमिक संस्कारों के निरोध का वर्णन किया गया है। प्रथम ध्यान में प्रविष्ट व्यक्ति की वाणी निरुद्ध हो जाती है... पे... संज्ञा-वेदयित-निरोध (निरोध समापत्ति) में प्रविष्ट व्यक्ति की संज्ञा और वेदना निरुद्ध हो जाती हैं। क्षीणास्त्रव (अर्हत) भिक्षु का राग निरुद्ध हो जाता है, द्वेष निरुद्ध हो जाता है, मोह निरुद्ध हो जाता है। और फिर आनन्द! मेरे द्वारा अनुक्रमिक संस्कारों के व्युपशम (शान्त होने) का वर्णन किया गया है। प्रथम ध्यान में प्रविष्ट व्यक्ति की वाणी व्युपशान्त हो जाती है... पे... संज्ञा-वेदयित-निरोध में प्रविष्ट व्यक्ति की संज्ञा और वेदना व्युपशान्त हो जाती हैं। क्षीणास्त्रव भिक्षु का राग व्युपशान्त हो जाता है, द्वेष व्युपशान्त हो जाता है, मोह व्युपशान्त हो जाता है। और फिर आनन्द! मेरे द्वारा अनुक्रमिक संस्कारों की प्रतिप्रश्रब्धि (पूर्ण शान्ति) का वर्णन किया गया है। प्रथम ध्यान में प्रविष्ट व्यक्ति की वाणी प्रतिप्रश्रब्ध हो जाती है... पे... आकाशानन्त्यायतन में प्रविष्ट व्यक्ति की रूप-संज्ञा प्रतिप्रश्रब्ध हो जाती है। विज्ञानानन्त्यायतन में प्रविष्ट व्यक्ति की आकाशानन्त्यायतन-संज्ञा प्रतिप्रश्रब्ध हो जाती है। आकिंचन्यायतन में प्रविष्ट व्यक्ति की विज्ञानानन्त्यायतन-संज्ञा प्रतिप्रश्रब्ध हो जाती है। नैवसंज्ञानासंज्ञायतन में प्रविष्ट व्यक्ति की आकिंचन्यायतन-संज्ञा प्रतिप्रश्रब्ध हो जाती है। संज्ञा-वेदयित-निरोध में प्रविष्ट व्यक्ति की संज्ञा और वेदना प्रतिप्रश्रब्ध हो जाती हैं। क्षीणास्त्रव भिक्षु का राग प्रतिप्रश्रब्ध हो जाता है, द्वेष प्रतिप्रश्रब्ध हो जाता है, मोह प्रतिप्रश्रब्ध हो जाता है।" पाँचवाँ। ๖. ทุติยอานนฺทสุตฺตํ ६. द्वितीय आनन्द सुत्त ๒๖๔. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ ภควา เอตทโวจ – ‘‘กตมา นุ โข, อานนฺท, เวทนา, กตโม เวทนาสมุทโย, กตโม เวทนานิโรโธ, กตมา เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา? โก เวทนาย อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณ’’นฺติ? ‘‘ภควํมูลกา โน, ภนฺเต, ธมฺมา ภควนฺเนตฺติกา ภควมฺปฏิสรณา. สาธุ, ภนฺเต, ภควนฺตญฺเญว ปฏิภาตุ เอตสฺส ภาสิตสฺส อตฺโถ. ภควโต สุตฺวา ภิกฺขู ธาเรสฺสนฺตี’’ติ. ‘‘เตน หิ, อานนฺท, สุโณหิ, สาธุกํ มนสิ กโรหิ; ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. ภควา เอตทโวจ – ‘‘ติสฺโส อิมา, อานนฺท, เวทนา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา วุจฺจนฺติ, อานนฺท, เวทนา…เป… ผสฺสสมุทยา…เป… ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราโค ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหติ, โทโส ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหติ, โมโห ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหตี’’ติ. ฉฏฺฐํ. २६४. तब आयुष्मान आनन्द जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान आनन्द से भगवान ने यह कहा— "आनन्द! वेदना क्या है? वेदना का समुदय क्या है? वेदना का निरोध क्या है? वेदना-निरोध-गामिनी प्रतिपदा क्या है? वेदना का आस्वाद क्या है? उसका आदिम क्या है? उसका निस्सरण क्या है?" "भन्ते! हमारे धर्म (शिक्षाएँ) भगवान-मूलक हैं, भगवान-नेत्रिक (मार्गदर्शक) हैं, और भगवान-प्रतिशरण (शरण) हैं। भन्ते! अच्छा होगा यदि भगवान स्वयं इस कथन का अर्थ स्पष्ट करें। भगवान से सुनकर भिक्षु इसे धारण करेंगे।" "तो आनन्द! सुनो, अच्छी तरह मन में धारण करो; मैं कहूँगा।" "जी भन्ते!" आयुष्मान आनन्द ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने यह कहा— "आनन्द! ये तीन वेदनाएँ हैं— सुखद वेदना, दुःखद वेदना, और अदुःखमसुख वेदना— आनन्द! इन्हें वेदना कहा जाता है... पे... स्पर्श के समुदय से... पे... क्षीणास्त्रव भिक्षु का राग प्रतिप्रश्रब्ध हो जाता है, द्वेष प्रतिप्रश्रब्ध हो जाता है, मोह प्रतिप्रश्रब्ध हो जाता है।" छठा। ๗. ปฐมสมฺพหุลสุตฺตํ ७. प्रथम सम्बहुुल सुत्त ๒๖๕. อถ โข สมฺพหุลา ภิกฺขู เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘กตมา นุ โข, ภนฺเต, เวทนา, กตโม เวทนาสมุทโย, กตโม เวทนานิโรโธ, กตมา เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา? โก เวทนาย อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณ’’นฺติ? ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, เวทนา. ผสฺสสมุทยา [Pg.422] เวทนาสมุทโย; ผสฺสนิโรธา เวทนานิโรโธ. อยเมว อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ…เป… สมฺมาสมาธิ. ยํ เวทนํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อยํ เวทนาย อสฺสาโท. ยา เวทนา อนิจฺจา ทุกฺขา วิปริณามธมฺมา, อยํ เวทนาย อาทีนโว. โย เวทนาย ฉนฺทราควินโย ฉนฺทราคปฺปหานํ, อิทํ เวทนาย นิสฺสรณํ. २६५. तब बहुत से भिक्षु जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए उन भिक्षुओं ने भगवान से यह कहा - "भन्ते! वेदना क्या है? वेदना का उदय क्या है? वेदना का निरोध क्या है? वेदना-निरोध-गामिनी प्रतिपदा क्या है? वेदना का आस्वाद क्या है? उसका आदिनव क्या है? उसका निस्सरण क्या है?" "भिक्षुओं! ये तीन वेदनाएँ हैं - सुखद वेदना, दुःखद वेदना, और अदुक्खमसुख (न-दुःख-न-सुख) वेदना। भिक्षुओं! इन्हें वेदना कहा जाता है। स्पर्श के उदय से वेदना का उदय होता है; स्पर्श के निरोध से वेदना का निरोध होता है। यही आर्य अष्टांगिक मार्ग वेदना-निरोध-गामिनी प्रतिपदा है, जैसे कि - सम्यक दृष्टि... आदि... सम्यक समाधि। वेदना के कारण जो सुख और सौमनस्य उत्पन्न होता है, वह वेदना का आस्वाद है। जो वेदना अनित्य, दुःखद और परिवर्तनशील स्वभाव वाली है, वह वेदना का आदिनव है। वेदना के प्रति जो छंद-राग का दमन और छंद-राग का त्याग है, वह वेदना का निस्सरण है।" ‘‘อถ โข ปน, ภิกฺขเว, มยา อนุปุพฺพสงฺขารานํ นิโรโธ อกฺขาโต. ปฐมํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วาจา นิรุทฺธา โหติ…เป… ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราโค นิรุทฺโธ โหติ, โทโส นิรุทฺโธ โหติ, โมโห นิรุทฺโธ โหติ. อถ โข ปน, ภิกฺขเว, มยา อนุปุพฺพสงฺขารานํ วูปสโม อกฺขาโต. ปฐมํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วาจา วูปสนฺตา โหติ…เป… ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราโค วูปสนฺโต โหติ, โทโส วูปสนฺโต โหติ, โมโห วูปสนฺโต โหติ. ฉยิมา, ภิกฺขเว, ปสฺสทฺธิโย. ปฐมํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วาจา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหติ. ทุติยํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วิตกฺกวิจารา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหนฺติ. ตติยํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส ปีติ ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหติ. จตุตฺถํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส อสฺสาสปสฺสาสา ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหนฺติ. สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺนสฺส สญฺญา จ เวทนา จ ปฏิปฺปสฺสทฺธา โหนฺติ. ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราโค ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหติ, โทโส ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหติ, โมโห ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหตี’’ติ. สตฺตมํ. "भिक्षुओं! इसके अतिरिक्त, मैंने संस्कारों के अनुक्रमिक निरोध के बारे में बताया है। प्रथम ध्यान में समापन्न व्यक्ति की वाणी निरुद्ध हो जाती है... आदि... क्षीणास्त्रव भिक्षु के राग, द्वेष और मोह निरुद्ध हो जाते हैं। भिक्षुओं! इसके अतिरिक्त, मैंने संस्कारों के अनुक्रमिक व्युपशम (शांति) के बारे में बताया है। प्रथम ध्यान में समापन्न व्यक्ति की वाणी शांत हो जाती है... आदि... क्षीणास्त्रव भिक्षु के राग, द्वेष और मोह शांत हो जाते हैं। भिक्षुओं! ये छह प्रश्रब्धियाँ हैं। प्रथम ध्यान में समापन्न व्यक्ति की वाणी शांत हो जाती है। द्वितीय ध्यान में समापन्न व्यक्ति के वितर्क और विचार शांत हो जाते हैं। तृतीय ध्यान में समापन्न व्यक्ति की प्रीति शांत हो जाती है। चतुर्थ ध्यान में समापन्न व्यक्ति के श्वास-प्रश्वास शांत हो जाते हैं। संज्ञा-वेदयित-निरोध में समापन्न व्यक्ति की संज्ञा और वेदना शांत हो जाती हैं। क्षीणास्त्रव भिक्षु के राग, द्वेष और मोह शांत हो जाते हैं।" सातवाँ। ๘. ทุติยสมฺพหุลสุตฺตํ ८. द्वितीय सम्बहुला सुत्त ๒๖๖. อถ โข สมฺพหุลา ภิกฺขู เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู ภควา เอตทโวจ – ‘‘กตมา นุ โข, ภิกฺขเว, เวทนา, กตโม เวทนาสมุทโย, กตโม เวทนานิโรโธ, กตมา เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา? โก เวทนาย อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณ’’นฺติ? ‘‘ภควํมูลกา โน, ภนฺเต, ธมฺมา…เป…’’ ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, เวทนา…เป… ผสฺสสมุทยา…เป…. (ยถา ปุริมสุตฺตนฺเต, ตถา วิตฺถาเรตพฺโพ.) อฏฺฐมํ. २६६. तब बहुत से भिक्षु जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे... आदि... एक ओर बैठे हुए उन भिक्षुओं से भगवान ने यह कहा - "भिक्षुओं! वेदना क्या है? वेदना का उदय क्या है? वेदना का निरोध क्या है? वेदना-निरोध-गामिनी प्रतिपदा क्या है? वेदना का आस्वाद क्या है? उसका आदिनव क्या है? उसका निस्सरण क्या है?" "भन्ते! हमारे धर्म भगवान ही जिनके मूल हैं... आदि..." "भिक्षुओं! ये तीन वेदनाएँ हैं - सुखद वेदना, दुःखद वेदना, और अदुक्खमसुख वेदना। भिक्षुओं! इन्हें वेदना कहा जाता है... आदि... स्पर्श के उदय से... आदि... (जैसे पिछले सुत्त में है, वैसे ही विस्तार करना चाहिए)।" आठवाँ। ๙. ปญฺจกงฺคสุตฺตํ ९. पंचकंग सुत्त ๒๖๗. อถ [Pg.423] โข ปญฺจกงฺโค ถปติ เยนายสฺมา อุทายี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อุทายึ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ปญฺจกงฺโค ถปติ อายสฺมนฺตํ อุทายึ เอตทโวจ – ‘‘กติ นุ โข, ภนฺเต อุทายิ, เวทนา วุตฺตา ภควตา’’ติ? ‘‘ติสฺโส โข, ถปติ, เวทนา วุตฺตา ภควตา. สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา โข, ถปติ, ติสฺโส เวทนา วุตฺตา ภควตา’’ติ. เอวํ วุตฺเต, ปญฺจกงฺโค ถปติ อายสฺมนฺตํ อุทายึ เอตทโวจ – ‘‘น โข, ภนฺเต อุทายิ, ติสฺโส เวทนา วุตฺตา ภควตา. ทฺเว เวทนา วุตฺตา ภควตา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา. ยายํ, ภนฺเต, อทุกฺขมสุขา เวทนา, สนฺตสฺมึ เอสา ปณีเต สุเข วุตฺตา ภควตา’’ติ. ทุติยมฺปิ โข อายสฺมา อุทายี ปญฺจกงฺคํ ถปตึ เอตทโวจ – ‘‘น โข, ถปติ, ทฺเว เวทนา วุตฺตา ภควตา. ติสฺโส เวทนา วุตฺตา ภควตา. สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา ติสฺโส เวทนา วุตฺตา ภควตา’’ติ. ทุติยมฺปิ โข ปญฺจกงฺโค ถปติ อายสฺมนฺตํ อุทายึ เอตทโวจ – ‘‘น โข, ภนฺเต อุทายิ, ติสฺโส เวทนา วุตฺตา ภควตา. ทฺเว เวทนา วุตฺตา ภควตา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา. ยายํ, ภนฺเต, อทุกฺขมสุขา เวทนา, สนฺตสฺมึ เอสา ปณีเต สุเข วุตฺตา ภควตา’’ติ. ตติยมฺปิ โข อายสฺมา อุทายี ปญฺจกงฺคํ ถปตึ เอตทโวจ – ‘‘น โข, ถปติ, ทฺเว เวทนา วุตฺตา ภควตา. ติสฺโส เวทนา วุตฺตา ภควตา. สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา ติสฺโส เวทนา วุตฺตา ภควตา’’ติ. ตติยมฺปิ โข ปญฺจกงฺโค ถปติ อายสฺมนฺตํ อุทายึ เอตทโวจ – ‘‘น โข, ภนฺเต อุทายิ, ติสฺโส เวทนา วุตฺตา ภควตา. ทฺเว เวทนา วุตฺตา ภควตา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา. ยายํ, ภนฺเต, อทุกฺขมสุขา เวทนา, สนฺตสฺมึ เอสา ปณีเต สุเข วุตฺตา ภควตา’’ติ. เนว สกฺขิ อายสฺมา อุทายี ปญฺจกงฺคํ ถปตึ สญฺญาเปตุํ, น ปนาสกฺขิ ปญฺจกงฺโค ถปติ อายสฺมนฺตํ อุทายึ สญฺญาเปตุํ. อสฺโสสิ โข อายสฺมา อานนฺโท อายสฺมโต อุทายิสฺส ปญฺจกงฺเคน ถปตินา สทฺธึ อิมํ กถาสลฺลาปํ. २६७. तब पंचकंग स्थपति (बढ़ई) जहाँ आयुष्मान उदायी थे, वहाँ गया; पहुँचकर आयुष्मान उदायी को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए पंचकंग स्थपति ने आयुष्मान उदायी से यह कहा— “भन्ते उदायी, भगवान ने कितनी वेदनाएँ कही हैं?” “स्थपति, भगवान ने तीन वेदनाएँ कही हैं—सुखद वेदना, दुखद वेदना और न-दुखद-न-सुखद वेदना। स्थपति, भगवान ने ये तीन वेदनाएँ कही हैं।” ऐसा कहने पर, पंचकंग स्थपति ने आयुष्मान उदायी से यह कहा— “भन्ते उदायी, भगवान ने तीन वेदनाएँ नहीं कही हैं। भगवान ने दो वेदनाएँ कही हैं—सुखद वेदना और दुखद वेदना। भन्ते, यह जो न-दुखद-न-सुखद वेदना है, उसे भगवान ने शांत और प्रणीत सुख के अंतर्गत कहा है।” दूसरी बार भी आयुष्मान उदायी ने पंचकंग स्थपति से यह कहा— “स्थपति, भगवान ने दो वेदनाएँ नहीं कही हैं। भगवान ने तीन वेदनाएँ कही हैं—सुखद वेदना, दुखद वेदना और न-दुखद-न-सुखद वेदना। ये तीन वेदनाएँ भगवान ने कही हैं।” दूसरी बार भी पंचकंग स्थपति ने आयुष्मान उदायी से यह कहा— “भन्ते उदायी, भगवान ने तीन वेदनाएँ नहीं कही हैं। भगवान ने दो वेदनाएँ कही हैं—सुखद वेदना और दुखद वेदना। भन्ते, यह जो न-दुखद-न-सुखद वेदना है, उसे भगवान ने शांत और प्रणीत सुख के अंतर्गत कहा है।” तीसरी बार भी आयुष्मान उदायी ने पंचकंग स्थपति से यह कहा— “स्थपति, भगवान ने दो वेदनाएँ नहीं कही हैं। भगवान ने तीन वेदनाएँ कही हैं—सुखद वेदना, दुखद वेदना और न-दुखद-न-सुखद वेदना। ये तीन वेदनाएँ भगवान ने कही हैं।” तीसरी बार भी पंचकंग स्थपति ने आयुष्मान उदायी से यह कहा— “भन्ते उदायी, भगवान ने तीन वेदनाएँ नहीं कही हैं। भगवान ने दो वेदनाएँ कही हैं—सुखद वेदना और दुखद वेदना। भन्ते, यह जो न-दुखद-न-सुखद वेदना है, उसे भगवान ने शांत और प्रणीत सुख के अंतर्गत कहा है।” न तो आयुष्मान उदायी पंचकंग स्थपति को समझा सके, और न ही पंचकंग स्थपति आयुष्मान उदायी को समझा सके। आयुष्मान आनंद ने आयुष्मान उदायी और पंचकंग स्थपति के इस संवाद को सुना। อถ โข อายสฺมา อานนฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อานนฺโท ยาวตโก [Pg.424] อายสฺมโต อุทายิสฺส ปญฺจกงฺเคน ถปตินา สทฺธึ อโหสิ กถาสลฺลาโป ตํ สพฺพํ ภควโต อาโรเจสิ. तब आयुष्मान आनंद जहाँ भगवान थे, वहाँ गए; पहुँचकर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान आनंद ने आयुष्मान उदायी और पंचकंग स्थपति के बीच जो भी बातचीत हुई थी, वह सब भगवान को निवेदित की। ‘‘สนฺตเมว, อานนฺท, ปริยายํ ปญฺจกงฺโค ถปติ อุทายิสฺส ภิกฺขุโน นาพฺภนุโมทิ; สนฺตญฺจ ปนานนฺท, ปริยายํ อุทายี ภิกฺขุ ปญฺจกงฺคสฺส ถปติโน นาพฺภนุโมทิ. ทฺเวปิ มยา, อานนฺท, เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน. ติสฺโสปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน. ปญฺจปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน. ฉปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน. อฏฺฐารสาปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน. ฉตฺตึสาปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน. อฏฺฐสตมฺปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน. เอวํ ปริยายเทสิโต โข, อานนฺท, มยา ธมฺโม. เอวํ ปริยายเทสิเต โข, อานนฺท, มยา ธมฺเม เย อญฺญมญฺญสฺส สุภาสิตํ สุลปิตํ, น สมนุมญฺญิสฺสนฺติ, น สมนุชานิสฺสนฺติ, น สมนุโมทิสฺสนฺติ, เตสํ เอตํ ปาฏิกงฺขํ – ภณฺฑนชาตา กลหชาตา วิวาทาปนฺนา อญฺญมญฺญํ มุขสตฺตีหิ วิตุทนฺตา วิหริสฺสนฺตีติ. เอวํ ปริยายเทสิโต โข, อานนฺท, มยา ธมฺโม. เอวํ ปริยายเทสิเต โข, อานนฺท, มยา ธมฺเม เย อญฺญมญฺญสฺส สุภาสิตํ สุลปิตํ สมนุมญฺญิสฺสนฺติ สมนุชานิสฺสนฺติ สมนุโมทิสฺสนฺติ, เตสํ เอตํ ปาฏิกงฺขํ – สมคฺคา สมฺโมทมานา อวิวทมานา ขีโรทกีภูตา อญฺญมญฺญํ ปิยจกฺขูหิ สมฺปสฺสนฺตา วิหริสฺสนฺตี’’ติ. “आनंद, पंचकंग स्थपति ने भिक्षु उदायी के सही पर्याय (दृष्टिकोण) का अनुमोदन नहीं किया; और आनंद, भिक्षु उदायी ने भी पंचकंग स्थपति के सही पर्याय का अनुमोदन नहीं किया। आनंद, मैंने पर्याय से दो वेदनाएँ भी कही हैं। मैंने पर्याय से तीन वेदनाएँ भी कही हैं। मैंने पर्याय से पाँच वेदनाएँ भी कही हैं। मैंने पर्याय से छह वेदनाएँ भी कही हैं। मैंने पर्याय से अठारह वेदनाएँ भी कही हैं। मैंने पर्याय से छत्तीस वेदनाएँ भी कही हैं। मैंने पर्याय से एक सौ आठ वेदनाएँ भी कही हैं। आनंद, इस प्रकार मेरे द्वारा पर्याय से धर्म उपदिष्ट है। आनंद, इस प्रकार मेरे द्वारा पर्याय से उपदिष्ट धर्म में, जो एक-दूसरे के सुभाषित और सुकथित वचनों को न मानेंगे, न स्वीकार करेंगे और न ही उनका अनुमोदन करेंगे, उनके लिए यह निश्चित है कि वे कलह और झगड़ों में पड़कर, विवादग्रस्त होकर, एक-दूसरे को मुख-रूपी शस्त्रों (वाक-बाणों) से बींधते हुए विहार करेंगे। आनंद, इस प्रकार मेरे द्वारा पर्याय से धर्म उपदिष्ट है। आनंद, इस प्रकार मेरे द्वारा पर्याय से उपदिष्ट धर्म में, जो एक-दूसरे के सुभाषित और सुकथित वचनों को मानेंगे, स्वीकार करेंगे और उनका अनुमोदन करेंगे, उनके लिए यह निश्चित है कि वे एकजुट, आनंदित और निर्विवाद होकर, दूध और पानी की तरह मिलकर, एक-दूसरे को प्रेमपूर्ण दृष्टि से देखते हुए विहार करेंगे।” ‘‘ปญฺจิเม, อานนฺท, กามคุณา. กตเม ปญฺจ? จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา…เป… กายวิญฺเญยฺยา โผฏฺฐพฺพา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. อิเม โข, อานนฺท, ปญฺจ กามคุณา. ยํ โข, อานนฺท, อิเม ปญฺจ กามคุเณ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ – อิทํ วุจฺจติ กามสุขํ. เย โข, อานนฺท, เอวํ วเทยฺยุํ – ‘เอตํปรมํ สนฺตํ สุขํ โสมนสฺสํ ปฏิสํเวเทนฺตี’ติ – อิทํ เนสาหํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อตฺถานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. “आनंद, ये पाँच काम-गुण हैं। कौन से पाँच? चक्षु-विज्ञेय रूप जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय, काम-युक्त और लुभावने हैं... (पे)... काय-विज्ञेय स्प्रष्टव्य (स्पर्श) जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रिय, काम-युक्त और लुभावने हैं। आनंद, ये पाँच काम-गुण हैं। आनंद, इन पाँच काम-गुणों के कारण जो सुख और सौमनस्य उत्पन्न होता है, उसे 'काम-सुख' कहा जाता है। आनंद, जो ऐसा कहें— 'वे इस परम शांत सुख और सौमनस्य का अनुभव कर रहे हैं'—तो मैं उनकी इस बात को स्वीकार नहीं करता। ऐसा क्यों? क्योंकि आनंद, इस सुख से भी अन्य सुख अधिक उत्कृष्ट और अधिक प्रणीत है।” ‘‘กตมญฺจานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ? อิธานนฺท, ภิกฺขุ วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ โข, อานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. เย โข, อานนฺท, เอวํ [Pg.425] วเทยฺยุํ – ‘เอตํปรมํ สนฺตํ สุขํ โสมนสฺสํ ปฏิสํเวเทนฺตี’ติ – อิทํ เนสาหํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อตฺถานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. “आनंद, इस (काम-सुख) से भिन्न वह कौन सा सुख है जो अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत है? आनंद, यहाँ भिक्षु काम-भोगों से विलग होकर, अकुशल धर्मों से विलग होकर, वितर्क और विचार सहित, विवेक से उत्पन्न प्रीति और सुख वाले प्रथम ध्यान को प्राप्त कर विहार करता है। आनंद, यह उस (काम-सुख) से भिन्न अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत सुख है। आनंद, जो लोग ऐसा कहें—‘वे इस परम शांत सुख और सौमनस्य का अनुभव कर रहे हैं’—मैं उनकी इस बात को स्वीकार नहीं करता। ऐसा किसलिए? आनंद, क्योंकि इस सुख से भी भिन्न अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत सुख विद्यमान है।” ‘‘กตมญฺจานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ? อิธานนฺท, ภิกฺขุ, วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา อชฺฌตฺตํ สมฺปสาทนํ เจตโส เอโกทิภาวํ อวิตกฺกํ อวิจารํ สมาธิชํ ปีติสุขํ ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ โข, อานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. เย โข, อานนฺท, เอวํ วเทยฺยุํ – ‘เอตํปรมํ สนฺตํ สุขํ โสมนสฺสํ ปฏิสํเวเทนฺตี’ติ – อิทํ เนสาหํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อตฺถานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. “आनंद, इस (प्रथम ध्यान के) सुख से भिन्न वह कौन सा सुख है जो अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत है? आनंद, यहाँ भिक्षु वितर्क और विचार के शांत हो जाने पर, आंतरिक प्रसन्नता और चित्त की एकाग्रता युक्त, वितर्क-रहित, विचार-रहित, समाधि से उत्पन्न प्रीति और सुख वाले द्वितीय ध्यान को प्राप्त कर विहार करता है। आनंद, यह उस सुख से भिन्न अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत सुख है। आनंद, जो लोग ऐसा कहें—‘वे इस परम शांत सुख और सौमनस्य का अनुभव कर रहे हैं’—मैं उनकी इस बात को स्वीकार नहीं करता। ऐसा किसलिए? आनंद, क्योंकि इस सुख से भी भिन्न अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत सुख विद्यमान है।” ‘‘กตมญฺจานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ? อิธานนฺท, ภิกฺขุ ปีติยา จ วิราคา อุเปกฺขโก จ วิหรติ สโต จ สมฺปชาโน, สุขญฺจ กาเยน ปฏิสํเวเทติ, ยํ ตํ อริยา อาจิกฺขนฺติ – ‘อุเปกฺขโก สติมา สุขวิหารี’ติ ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ โข, อานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. เย โข, อานนฺท, เอวํ วเทยฺยุํ – ‘เอตํปรมํ สนฺตํ สุขํ โสมนสฺสํ ปฏิสํเวเทนฺตี’ติ – อิทํ เนสาหํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อตฺถานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. “आनंद, इस (द्वितीय ध्यान के) सुख से भिन्न वह कौन सा सुख है जो अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत है? आनंद, यहाँ भिक्षु प्रीति के भी विराग से उपेक्षावान होकर विहार करता है और स्मृतिवान तथा संप्रजन्ययुक्त होकर काया से उस सुख का अनुभव करता है, जिसके विषय में आर्य कहते हैं—‘उपेक्षावान, स्मृतिवान और सुख-विहारी’। वह तृतीय ध्यान को प्राप्त कर विहार करता है। आनंद, यह उस सुख से भिन्न अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत सुख है। आनंद, जो लोग ऐसा कहें—‘वे इस परम शांत सुख और सौमनस्य का अनुभव कर रहे हैं’—मैं उनकी इस बात को स्वीकार नहीं करता। ऐसा किसलिए? आनंद, क्योंकि इस सुख से भी भिन्न अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत सुख विद्यमान है।” ‘‘กตมญฺจานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ? อิธานนฺท, ภิกฺขุ สุขสฺส จ ปหานา ทุกฺขสฺส จ ปหานา ปุพฺเพว โสมนสฺสโทมนสฺสานํ อตฺถงฺคมา อทุกฺขมสุขํ อุเปกฺขาสติปาริสุทฺธึ จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ โข, อานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. เย โข, อานนฺท, เอวํ วเทยฺยุํ – ‘เอตํปรมํ สนฺตํ สุขํ โสมนสฺสํ ปฏิสํเวเทนฺตี’ติ – อิทํ เนสาหํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อตฺถานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. “आनंद, इस (तृतीय ध्यान के) सुख से भिन्न वह कौन सा सुख है जो अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत है? आनंद, यहाँ भिक्षु सुख के प्रहाण से और दुःख के प्रहाण से, तथा पहले ही सौमनस्य और दौर्मनस्य के अस्त हो जाने से, न-दुःख न-सुख वाली, उपेक्षा के कारण स्मृति की शुद्धता युक्त चतुर्थ ध्यान को प्राप्त कर विहार करता है। आनंद, यह उस सुख से भिन्न अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत सुख है। आनंद, जो लोग ऐसा कहें—‘वे इस परम शांत सुख और सौमनस्य का अनुभव कर रहे हैं’—मैं उनकी इस बात को स्वीकार नहीं करता। ऐसा किसलिए? आनंद, क्योंकि इस सुख से भी भिन्न अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत सुख विद्यमान है।” ‘‘กตมญฺจานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ? อิธานนฺท, ภิกฺขุ สพฺพโส รูปสญฺญานํ สมติกฺกมา, ปฏิฆสญฺญานํ อตฺถงฺคมา, นานตฺตสญฺญานํ อมนสิการา, ‘อนนฺโต อากาโส’ติ อากาสานญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ โข, อานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. เย โข, อานนฺท, เอวํ วเทยฺยุํ – ‘เอตํปรมํ สนฺตํ [Pg.426] สุขํ โสมนสฺสํ ปฏิสํเวเทนฺตี’ติ – อิทํ เนสาหํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อตฺถานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. “आनंद, इस (चतुर्थ ध्यान के) सुख से भिन्न वह कौन सा सुख है जो अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत है? आनंद, यहाँ भिक्षु सर्वथा रूप-संज्ञाओं के अतिक्रमण से, प्रतिघ-संज्ञाओं के अस्त हो जाने से, नानात्व-संज्ञाओं पर मनस्कार न करने से, ‘आकाश अनंत है’—ऐसा (अनुभव करते हुए) आकाशानन्त्यायतन को प्राप्त कर विहार करता है। आनंद, यह उस सुख से भिन्न अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत सुख है। आनंद, जो लोग ऐसा कहें—‘वे इस परम शांत सुख और सौमनस्य का अनुभव कर रहे हैं’—मैं उनकी इस बात को स्वीकार नहीं करता। ऐसा किसलिए? आनंद, क्योंकि इस सुख से भी भिन्न अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत सुख विद्यमान है।” ‘‘กตมญฺจานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ? อิธานนฺท, ภิกฺขุ สพฺพโส อากาสานญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม, ‘อนนฺตํ วิญฺญาณ’นฺติ วิญฺญาณญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ โข, อานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. เย โข, อานนฺท, เอวํ วเทยฺยุํ – ‘เอตํปรมํ สนฺตํ สุขํ โสมนสฺสํ ปฏิสํเวเทนฺตี’ติ – อิทํ เนสาหํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อตฺถานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. “आनंद, इस (आकाशानन्त्यायतन के) सुख से भिन्न वह कौन सा सुख है जो अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत है? आनंद, यहाँ भिक्षु सर्वथा आकाशानन्त्यायतन का अतिक्रमण कर, ‘विज्ञान अनंत है’—ऐसा (अनुभव करते हुए) विज्ञानानन्त्यायतन को प्राप्त कर विहार करता है। आनंद, यह उस सुख से भिन्न अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत सुख है। आनंद, जो लोग ऐसा कहें—‘वे इस परम शांत सुख और सौमनस्य का अनुभव कर रहे हैं’—मैं उनकी इस बात को स्वीकार नहीं करता। ऐसा किसलिए? आनंद, क्योंकि इस सुख से भी भिन्न अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत सुख विद्यमान है।” ‘‘กตมญฺจานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ? อิธานนฺท, ภิกฺขุ สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม, ‘นตฺถิ กิญฺจี’ติ อากิญฺจญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ โข, อานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. เย โข, อานนฺท, เอวํ วเทยฺยุํ – ‘เอตํปรมํ สนฺตํ สุขํ โสมนสฺสํ ปฏิสํเวเทนฺตี’ติ – อิทํ เนสาหํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อตฺถานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. “आनंद, इस (विज्ञानानन्त्यायतन के) सुख से भिन्न वह कौन सा सुख है जो अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत है? आनंद, यहाँ भिक्षु सर्वथा विज्ञानानन्त्यायतन का अतिक्रमण कर, ‘यहाँ कुछ भी नहीं है’—ऐसा (अनुभव करते हुए) आकिंचन्यायतन को प्राप्त कर विहार करता है। आनंद, यह उस सुख से भिन्न अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत सुख है। आनंद, जो लोग ऐसा कहें—‘वे इस परम शांत सुख और सौमनस्य का अनुभव कर रहे हैं’—मैं उनकी इस बात को स्वीकार नहीं करता। ऐसा किसलिए? आनंद, क्योंकि इस सुख से भी भिन्न अधिक उत्तम और अधिक प्रणीत सुख विद्यमान है।” ‘‘กตมญฺจานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ? อิธานนฺท, ภิกฺขุ สพฺพโส อากิญฺจญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ โข, อานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. เย โข, อานนฺท, เอวํ วเทยฺยุํ – ‘เอตํปรมํ สนฺตํ สุขํ โสมนสฺสํ ปฏิสํเวเทนฺตี’ติ – อิทํ เนสาหํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อตฺถานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. “आनंद, इस (आकिंचन्यायतन) सुख से अन्य कौन सा सुख अधिक उत्कृष्ट और अधिक प्रणीत है? आनंद, यहाँ भिक्षु पूर्णतः आकिंचन्यायतन का अतिक्रमण कर नैवसंज्ञानासंज्ञायतन को प्राप्त कर विहार करता है। आनंद, यही वह सुख है जो इस सुख से अधिक उत्कृष्ट और अधिक प्रणीत है। आनंद, जो ऐसा कहें— ‘वे इस परम शांत सुख और सौमनस्य का अनुभव करते हैं’—तो मैं उनकी इस बात को स्वीकार नहीं करता। वह किस कारण से? आनंद, क्योंकि इस सुख से अन्य भी अधिक उत्कृष्ट और अधिक प्रणीत सुख विद्यमान है।” ‘‘กตมญฺจานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ? อิธานนฺท, ภิกฺขุ สพฺพโส เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม สญฺญาเวทยิตนิโรธํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ โข, อานนฺท, เอตมฺหา สุขา อญฺญํ สุขํ อภิกฺกนฺตตรญฺจ ปณีตตรญฺจ. “आनंद, इस (नैवसंज्ञानासंज्ञायतन) सुख से अन्य कौन सा सुख अधिक उत्कृष्ट और अधिक प्रणीत है? आनंद, यहाँ भिक्षु पूर्णतः नैवसंज्ञानासंज्ञायतन का अतिक्रमण कर संज्ञा-वेदयित-निरोध (निरोध समापत्ति) को प्राप्त कर विहार करता है। आनंद, यही वह सुख है जो इस सुख से अधिक उत्कृष्ट और अधिक प्रणीत है।” ‘‘ฐานํ โข ปเนตํ, อานนฺท, วิชฺชติ ยํ อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ วเทยฺยุํ – ‘สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมโณ โคตโม อาห, ตญฺจ สุขสฺมึ [Pg.427] ปญฺญเปติ. ตยิทํ กึสุ, ตยิทํ กถํสู’ติ? เอวํวาทิโน, อานนฺท, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวมสฺสุ วจนียา – ‘น โข, อาวุโส, ภควา สุขญฺเญว เวทนํ สนฺธาย สุขสฺมึ ปญฺญเปติ. ยตฺถ ยตฺถ, อาวุโส, สุขํ อุปลพฺภติ, ยหึ ยหึ, ตํ ตํ ตถาคโต สุขสฺมึ ปญฺญเปตี’’’ติ. นวมํ. “आनंद, यह संभव है कि अन्य मतों के परिव्राजक ऐसा कहें— ‘श्रमण गौतम संज्ञा-वेदयित-निरोध की बात करते हैं और उसे सुख में प्रज्ञप्त करते हैं। यह क्या है और यह कैसे है?’ आनंद, ऐसा कहने वाले अन्य मतों के परिव्राजकों को ऐसा कहना चाहिए— ‘आवुसो, भगवान केवल सुखद वेदना के संदर्भ में ही सुख की प्रज्ञप्ति नहीं करते। आवुसो, जहाँ-जहाँ भी सुख उपलब्ध होता है, जहाँ कहीं भी, उसे तथागत सुख के रूप में प्रज्ञप्त करते हैं’।” नौवाँ सुत्त। ๑๐. ภิกฺขุสุตฺตํ १०. १०. भिक्षु सुत्त ๒๖๘. ‘‘ทฺเวปิ มยา, ภิกฺขเว, เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน, ติสฺโสปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน, ปญฺจปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน, ฉปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน, อฏฺฐารสาปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน, ฉตฺตึสาปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน, อฏฺฐสตมฺปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน. เอวํ ปริยายเทสิโต, ภิกฺขเว, มยา ธมฺโม. เอวํ ปริยายเทสิเต โข, ภิกฺขเว, มยา ธมฺเม เย อญฺญมญฺญสฺส สุภาสิตํ สุลปิตํ น สมนุมญฺญิสฺสนฺติ, น สมนุชานิสฺสนฺติ, น สมนุโมทิสฺสนฺติ, เตสํ เอตํ ปาฏิกงฺขํ – ภณฺฑนชาตา กลหชาตา วิวาทาปนฺนา อญฺญมญฺญํ มุขสตฺตีหิ วิตุทนฺตา วิหริสฺสนฺตีติ. เอวํ ปริยายเทสิโต, ภิกฺขเว, มยา ธมฺโม. เอวํ ปริยายเทสิเต โข, ภิกฺขเว, มยา ธมฺเม เย อญฺญมญฺญสฺส สุภาสิตํ สุลปิตํ สมนุมญฺญิสฺสนฺติ สมนุชานิสฺสนฺติ สมนุโมทิสฺสนฺติ, เตสํ เอตํ ปาฏิกงฺขํ – สมคฺคา สมฺโมทมานา อวิวทมานา ขีโรทกีภูตา อญฺญมญฺญํ ปิยจกฺขูหิ สมฺปสฺสนฺตา วิหริสฺสนฺตีติ. २६८. “भिक्षुओं, मैंने पर्याय (विधि) से दो वेदनाएँ भी कही हैं, पर्याय से तीन वेदनाएँ भी कही हैं, पर्याय से पाँच वेदनाएँ भी कही हैं, पर्याय से छह वेदनाएँ भी कही हैं, पर्याय से अठारह वेदनाएँ भी कही हैं, पर्याय से छत्तीस वेदनाएँ भी कही हैं, और पर्याय से एक सौ आठ वेदनाएँ भी कही हैं। भिक्षुओं, इस प्रकार मेरे द्वारा धर्म पर्याय से उपदिष्ट है। भिक्षुओं, इस प्रकार मेरे द्वारा पर्याय से उपदिष्ट धर्म में, जो एक-दूसरे के सुभाषित और सुकथित वचनों को स्वीकार नहीं करेंगे, अनुमोदन नहीं करेंगे, उनसे यह अपेक्षित है कि वे कलहकारी, झगड़ालू और विवाद में पड़कर एक-दूसरे को मुख-रूपी शस्त्रों से बींधते हुए विहार करेंगे। भिक्षुओं, इस प्रकार मेरे द्वारा धर्म पर्याय से उपदिष्ट है। भिक्षुओं, इस प्रकार मेरे द्वारा पर्याय से उपदिष्ट धर्म में, जो एक-दूसरे के सुभाषित और सुकथित वचनों को स्वीकार करेंगे, अनुमोदन करेंगे, उनसे यह अपेक्षित है कि वे एकजुट, प्रसन्न, निर्विवाद होकर, दूध और पानी की तरह मिलकर, एक-दूसरे को प्रिय चक्षुओं से देखते हुए विहार करेंगे।” ‘‘ปญฺจิเม, ภิกฺขเว, กามคุณา…เป… ฐานํ โข ปเนตํ, ภิกฺขเว, วิชฺชติ ยํ อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ วเทยฺยุํ – ‘สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมโณ โคตโม อาห, ตญฺจ สุขสฺมึ ปญฺญเปติ. ตยิทํ กึสุ, ตยิทํ กถํสู’ติ? เอวํวาทิโน, ภิกฺขเว, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวมสฺสุ วจนียา – ‘น โข, อาวุโส, ภควา สุขญฺเญว เวทนํ สนฺธาย สุขสฺมึ ปญฺญเปติ. ยตฺถ ยตฺถ, อาวุโส, สุขํ อุปลพฺภติ ยหึ ยหึ, ตํ ตํ ตถาคโต สุขสฺมึ ปญฺญเปตี’’ติ. ทสมํ. “भिक्षुओं, ये पाँच कामगुण हैं... (विस्तार)... भिक्षुओं, यह संभव है कि अन्य मतों के परिव्राजक ऐसा कहें— ‘श्रमण गौतम संज्ञा-वेदयित-निरोध की बात करते हैं और उसे सुख में प्रज्ञप्त करते हैं। यह क्या है और यह कैसे है?’ भिक्षुओं, ऐसा कहने वाले अन्य मतों के परिव्राजकों को ऐसा कहना चाहिए— ‘आवुसो, भगवान केवल सुखद वेदना के संदर्भ में ही सुख की प्रज्ञप्ति नहीं करते। आवुसो, जहाँ-जहाँ भी सुख उपलब्ध होता है, जहाँ कहीं भी, उसे तथागत सुख के रूप में प्रज्ञप्त करते हैं’।” दसवाँ सुत्त। รโหคตวคฺโค ทุติโย. दूसरा रहोगत वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका उद्दान (विषय-सूची): รโหคตํ [Pg.428] ทฺเว อากาสํ, อคารํ ทฺเว จ อานนฺทา; สมฺพหุลา ทุเว วุตฺตา, ปญฺจกงฺโค จ ภิกฺขุนาติ. रहोगत, दो आकाश, अगार, दो आनंद, दो संबहुला, पंचकंग और भिक्षु सुत्त कहे गए हैं। ๓. อฏฺฐสตปริยายวคฺโค ३. ३. अष्टशत-पर्याय वर्ग ๑. สีวกสุตฺตํ १. १. सीवक सुत्त ๒๖๙. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. อถ โข โมฬิยสีวโก ปริพฺพาชโก เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โมฬิยสีวโก ปริพฺพาชโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สนฺติ, โภ โคตม, เอเก สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘ยํ กิญฺจายํ ปุริสปุคฺคโล ปฏิสํเวเทติ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา สพฺพํ ตํ ปุพฺเพกตเหตู’ติ. อิธ ภวํ โคตโม กิมาหา’’ติ? २६९. २६९. एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दक-निवाप में विहार कर रहे थे। तब मोलिय सीवक परिव्राजक जहाँ भगवान थे, वहाँ गया; जाकर भगवान के साथ कुशल-क्षेम पूछा। संमोदनीय और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए मोलिय सीवक परिव्राजक ने भगवान से यह कहा— “हे गौतम, कुछ ऐसे श्रमण-ब्राह्मण हैं जो ऐसा कहते हैं और ऐसा मानते हैं— ‘यह पुरुष जो कुछ भी अनुभव करता है, चाहे वह सुख हो, दुःख हो या अदुःख-असुख हो, वह सब पूर्व-कृत कर्मों के कारण होता है।’ यहाँ आप गौतम क्या कहते हैं?” ‘‘ปิตฺตสมุฏฺฐานานิปิ โข, สีวก, อิเธกจฺจานิ เวทยิตานิ อุปฺปชฺชนฺติ. สามมฺปิ โข เอตํ, สีวก, เวทิตพฺพํ ยถา ปิตฺตสมุฏฺฐานานิปิ อิเธกจฺจานิ เวทยิตานิ อุปฺปชฺชนฺติ; โลกสฺสปิ โข เอตํ, สีวก, สจฺจสมฺมตํ ยถา ปิตฺตสมุฏฺฐานานิปิ อิเธกจฺจานิ เวทยิตานิ อุปฺปชฺชนฺติ. ตตฺร, สีวก, เย เต สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘ยํ กิญฺจายํ ปุริสปุคฺคโล ปฏิสํเวเทติ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา สพฺพํ ตํ ปุพฺเพกตเหตู’ติ. ยญฺจ สามํ ญาตํ ตญฺจ อติธาวนฺติ, ยญฺจ โลเก สจฺจสมฺมตํ ตญฺจ อติธาวนฺติ. ตสฺมา เตสํ สมณพฺราหฺมณานํ มิจฺฉาติ วทามิ. “सीवक, यहाँ (इस शरीर में) कुछ वेदनाएँ पित्त के कुपित होने से भी उत्पन्न होती हैं। सीवक, यह स्वयं भी जाना जा सकता है कि कैसे यहाँ कुछ वेदनाएँ पित्त के कुपित होने से उत्पन्न होती हैं; और सीवक, लोक में भी इसे सत्य माना जाता है कि कैसे यहाँ कुछ वेदनाएँ पित्त के कुपित होने से उत्पन्न होती हैं। वहाँ, सीवक, जो वे श्रमण-ब्राह्मण ऐसा कहते हैं और ऐसा मानते हैं— ‘यह पुरुष जो कुछ भी अनुभव करता है... वह सब पूर्व-कृत कर्मों के कारण होता है’—वे उस बात का भी उल्लंघन करते हैं जो स्वयं ज्ञात है और उस बात का भी उल्लंघन करते हैं जिसे लोक में सत्य माना जाता है। इसलिए, मैं उन श्रमण-ब्राह्मणों की बात को ‘मिथ्या’ कहता हूँ।” ‘‘เสมฺหสมุฏฺฐานานิปิ โข, สีวก…เป… วาตสมุฏฺฐานานิปิ โข, สีวก…เป… สนฺนิปาติกานิปิ โข, สีวก…เป… อุตุปริณามชานิปิ โข, สีวก…เป… วิสมปริหารชานิปิ โข, สีวก…เป… โอปกฺกมิกานิปิ โข, สีวก…เป… กมฺมวิปากชานิปิ โข, สีวก, อิเธกจฺจานิ เวทยิตานิ อุปฺปชฺชนฺติ. สามมฺปิ โข เอตํ, สีวก, เวทิตพฺพํ. ยถา กมฺมวิปากชานิปิ อิเธกจฺจานิ [Pg.429] เวทยิตานิ อุปฺปชฺชนฺติ; โลกสฺสปิ โข เอตํ, สีวก, สจฺจสมฺมตํ. ยถา กมฺมวิปากชานิปิ อิเธกจฺจานิ เวทยิตานิ อุปฺปชฺชนฺติ; ตตฺร, สีวก, เย เต สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘ยํ กิญฺจายํ ปุริสปุคฺคโล ปฏิสํเวเทติ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา สพฺพํ ตํ ปุพฺเพกตเหตู’ติ. ยญฺจ สามํ ญาตํ ตญฺจ อติธาวนฺติ ยญฺจ โลเก สจฺจสมฺมตํ ตญฺจ อติธาวนฺติ. ตสฺมา เตสํ สมณพฺราหฺมณานํ มิจฺฉาติ วทามีติ. เอวํ วุตฺเต, โมฬิยสีวโก ปริพฺพาชโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม, อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม …เป… อุปาสกํ มํ ภวํ โคตโม ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’’นฺติ. “हे सीवक! इस संसार में कफ के कारण उत्पन्न होने वाली... वायु के कारण उत्पन्न होने वाली... सन्निपात (तीनों दोषों के मिलने) के कारण उत्पन्न होने वाली... ऋतु परिवर्तन के कारण उत्पन्न होने वाली... विषम व्यवहार (असंतुलित आचरण) के कारण उत्पन्न होने वाली... बाह्य आक्रमण (प्रहार) के कारण उत्पन्न होने वाली... और हे सीवक! कर्म-विपाक (कर्मों के फल) के कारण उत्पन्न होने वाली कुछ वेदनाएँ उत्पन्न होती हैं। हे सीवक! यह स्वयं भी जानने योग्य है कि कैसे कर्म-विपाक के कारण भी यहाँ कुछ वेदनाएँ उत्पन्न होती हैं; और हे सीवक! संसार में भी इसे सत्य माना जाता है। हे सीवक! चूँकि कर्म-विपाक के कारण भी यहाँ कुछ वेदनाएँ उत्पन्न होती हैं, इसलिए जो श्रमण और ब्राह्मण ऐसा कहने वाले और ऐसी दृष्टि रखने वाले हैं कि—'यह पुरुष पुद्गल जो कुछ भी सुख, दुःख या अदुःख-असुख (उपेक्षा) अनुभव करता है, वह सब पूर्व-कृत (पिछले कर्मों) के कारण है'—वे उस बात का भी उल्लंघन करते हैं जो स्वयं ज्ञात है और उस बात का भी उल्लंघन करते हैं जिसे संसार में सत्य माना जाता है। इसलिए, मैं उन श्रमण-ब्राह्मणों की उस बात को 'मिथ्या' कहता हूँ।” ऐसा कहने पर, मोलियसीवक परिव्राजक ने भगवान से यह कहा— “अति सुंदर, हे गौतम! अति सुंदर, हे गौतम! ... आज से मुझे आप भगवान गौतम अपना ऐसा उपासक स्वीकार करें, जिसने जीवन भर के लिए शरण ग्रहण की है।” ‘‘ปิตฺตํ เสมฺหญฺจ วาโต จ, สนฺนิปาตา อุตูนิ จ; วิสมํ โอปกฺกมิกํ, กมฺมวิปาเกน อฏฺฐมี’’ติ. ปฐมํ; “पित्त, कफ और वायु, सन्निपात, ऋतु, विषम व्यवहार, बाह्य आक्रमण और आठवाँ कर्म-विपाक है।” (प्रथम सूत्र समाप्त) ๒. อฏฺฐสตสุตฺตํ २. अट्ठसत सुत्त (एक सौ आठ वेदनाओं का सूत्र) ๒๗๐. ‘‘อฏฺฐสตปริยายํ โว, ภิกฺขเว, ธมฺมปริยายํ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, อฏฺฐสตปริยาโย, ธมฺมปริยาโย? ทฺเวปิ มยา, ภิกฺขเว, เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน; ติสฺโสปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน; ปญฺจปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน; ฉปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน; อฏฺฐารสาปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน; ฉตฺตึสาปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน; อฏฺฐสตมฺปิ มยา เวทนา วุตฺตา ปริยาเยน. ‘‘กตมา จ, ภิกฺขเว, ทฺเว เวทนา? กายิกา จ เจตสิกา จ – อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, ทฺเว เวทนา. กตมา จ, ภิกฺขเว, ติสฺโส เวทนา? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, ติสฺโส เวทนา. กตมา จ, ภิกฺขเว, ปญฺจ เวทนา? สุขินฺทฺริยํ, ทุกฺขินฺทฺริยํ, โสมนสฺสินฺทฺริยํ, โทมนสฺสินฺทฺริยํ, อุเปกฺขินฺทฺริยํ – อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, ปญฺจ เวทนา. กตมา จ, ภิกฺขเว, ฉ เวทนา? จกฺขุสมฺผสฺสชา เวทนา…เป… มโนสมฺผสฺสชา เวทนา – อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, ฉ เวทนา. กตมา จ, ภิกฺขเว, อฏฺฐารส เวทนา? ฉ โสมนสฺสูปวิจารา, ฉ โทมนสฺสูปวิจารา, ฉ อุเปกฺขูปวิจารา – อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, อฏฺฐารส เวทนา. กตมา จ, ภิกฺขเว, ฉตฺตึส เวทนา? ฉ เคหสิตานิ โสมนสฺสานิ, ฉ เนกฺขมฺมสิตานิ โสมนสฺสานิ, ฉ เคหสิตานิ โทมนสฺสานิ, ฉ เนกฺขมฺมสิตานิ [Pg.430] โทมนสฺสานิ, ฉ เคหสิตา อุเปกฺขา, ฉ เนกฺขมฺมสิตา อุเปกฺขา – อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, ฉตฺตึส เวทนา. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อฏฺฐสตํ เวทนา? อตีตา ฉตฺตึส เวทนา, อนาคตา ฉตฺตึส เวทนา, ปจฺจุปฺปนฺนา ฉตฺตึส เวทนา – อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, อฏฺฐสตํ เวทนา. อยํ, ภิกฺขเว, อฏฺฐสตปริยาโย ธมฺมปริยาโย’’ติ. ทุติยํ. २७०. “भिक्षुओं! मैं तुम्हें एक सौ आठ प्रकार की वेदनाओं के धर्म-पर्याय का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! वह एक सौ आठ प्रकार का धर्म-पर्याय क्या है? भिक्षुओं! मैंने पर्याय (विधि) से दो वेदनाएँ भी कही हैं; पर्याय से तीन वेदनाएँ भी कही हैं; पर्याय से पाँच वेदनाएँ भी कही हैं; पर्याय से छह वेदनाएँ भी कही हैं; पर्याय से अठारह वेदनाएँ भी कही हैं; पर्याय से छत्तीस वेदनाएँ भी कही हैं; और पर्याय से एक सौ आठ वेदनाएँ भी कही हैं। भिक्षुओं! वे दो वेदनाएँ कौन सी हैं? कायिक (शारीरिक) और चैतसिक (मानसिक)—भिक्षुओं! इन्हें दो वेदनाएँ कहा जाता है। भिक्षुओं! वे तीन वेदनाएँ कौन सी हैं? सुखद वेदना, दुःखद वेदना और अदुःख-असुख (उपेक्षा) वेदना—भिक्षुओं! इन्हें तीन वेदनाएँ कहा जाता है। भिक्षुओं! वे पाँच वेदनाएँ कौन सी हैं? सुखिन्द्रिय, दुक्खिन्द्रिय, सोमनस्सिन्द्रिय, दोमनस्सिन्द्रिय और उपेक्खिन्द्रिय—भिक्षुओं! इन्हें पाँच वेदनाएँ कहा जाता है। भिक्षुओं! वे छह वेदनाएँ कौन सी हैं? चक्षु-संस्पर्श से उत्पन्न वेदना... मन-संस्पर्श से उत्पन्न वेदना—भिक्षुओं! इन्हें छह वेदनाएँ कहा जाता है। भिक्षुओं! वे अठारह वेदनाएँ कौन सी हैं? छह सोमनस्य-उपविचार, छह दोमनस्य-उपविचार और छह उपेक्षा-उपविचार—भिक्षुओं! इन्हें अठारह वेदनाएँ कहा जाता है। भिक्षुओं! वे छत्तीस वेदनाएँ कौन सी हैं? छह गृह-आश्रित (सांसारिक) सोमनस्य, छह नैष्क्रम्य-आश्रित (अध्यात्मिक) सोमनस्य, छह गृह-आश्रित दोमनस्य, छह नैष्क्रम्य-आश्रित दोमनस्य, छह गृह-आश्रित उपेक्षा और छह नैष्क्रम्य-आश्रित उपेक्षा—भिक्षुओं! इन्हें छत्तीस वेदनाएँ कहा जाता है। भिक्षुओं! वे एक सौ आठ वेदनाएँ कौन सी हैं? छत्तीस अतीत वेदनाएँ, छत्तीस अनागत वेदनाएँ और छत्तीस प्रत्युत्पन्न (वर्तमान) वेदनाएँ—भिक्षुओं! इन्हें एक सौ आठ वेदनाएँ कहा जाता है। भिक्षुओं! यही एक सौ आठ प्रकार का धर्म-पर्याय है।” (द्वितीय सूत्र समाप्त) ๓. อญฺญตรภิกฺขุสุตฺตํ ३. अञ्ञतरभिक्खु सुत्त (किसी भिक्षु का सूत्र) ๒๗๑. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โส ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กตมา นุ โข, ภนฺเต, เวทนา, กตโม เวทนาสมุทโย, กตมา เวทนาสมุทยคามินี ปฏิปทา? กตโม เวทนานิโรโธ, กตมา เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา? โก เวทนาย อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณ’’นฺติ? २७१. तब कोई भिक्षु जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए उस भिक्षु ने भगवान से यह कहा— “भन्ते! वेदना क्या है? वेदना का समुदय (उत्पत्ति) क्या है? वेदना के समुदय तक ले जाने वाला मार्ग क्या है? वेदना का निरोध क्या है? वेदना के निरोध तक ले जाने वाला मार्ग क्या है? वेदना का आस्वाद क्या है? उसका दोष क्या है? और उससे निःसरण (मुक्ति) क्या है?” ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขุ, เวทนา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา. อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขุ, เวทนา. ผสฺสสมุทยา เวทนาสมุทโย. ตณฺหา เวทนาสมุทยคามินี ปฏิปทา. ผสฺสนิโรธา เวทนานิโรโธ. อยเมว อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ…เป… สมฺมาสมาธิ. ยํ เวทนํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อยํ เวทนาย อสฺสาโท; ยา เวทนา อนิจฺจา ทุกฺขา วิปริณามธมฺมา, อยํ เวทนาย อาทีนโว; โย เวทนาย ฉนฺทราควินโย ฉนฺทราคปฺปหานํ, อิทํ เวทนาย นิสฺสรณ’’นฺติ. ตติยํ. “भिक्षु! ये तीन वेदनाएँ हैं—सुखद वेदना, दुःखद वेदना और अदुःख-असुख वेदना। भिक्षु! इन्हें वेदना कहा जाता है। स्पर्श के समुदय से वेदना का समुदय होता है। तृष्णा वेदना के समुदय तक ले जाने वाला मार्ग है। स्पर्श के निरोध से वेदना का निरोध होता है। यह आर्य अष्टांगिक मार्ग ही वेदना के निरोध तक ले जाने वाला मार्ग है, जैसे कि—सम्यक् दृष्टि... सम्यक् समाधि। वेदना के कारण जो सुख और सोमनस्य उत्पन्न होता है, वह वेदना का आस्वाद है; जो वेदना अनित्य, दुःखमय और परिवर्तनशील स्वभाव वाली है, वह वेदना का दोष है; वेदना के प्रति जो छंद-राग (इच्छा और आसक्ति) का दमन और त्याग है, वह वेदना से निःसरण है।” (तृतीय सूत्र समाप्त) ๔. ปุพฺพสุตฺตํ ४. पुब्ब सुत्त (पूर्व सूत्र) ๒๗๒. ‘‘ปุพฺเพว เม, ภิกฺขเว, สมฺโพธา อนภิสมฺพุทฺธสฺส โพธิสตฺตสฺเสว สโต เอตทโหสิ – ‘กตมา นุ โข เวทนา, กตโม เวทนาสมุทโย, กตมา เวทนาสมุทยคามินี ปฏิปทา, กตโม เวทนานิโรโธ, กตมา เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา? โก เวทนาย อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณ’นฺติ? ตสฺส มยฺหํ, ภิกฺขเว, เอตทโหสิ – ‘ติสฺโส อิมา เวทนา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา. อิมา วุจฺจนฺติ เวทนา. ผสฺสสมุทยา เวทนาสมุทโย. ตณฺหา เวทนาสมุทยคามินี ปฏิปทา…เป… โย เวทนาย ฉนฺทราควินโย ฉนฺทราคปฺปหานํ. อิทํ เวทนาย นิสฺสรณ’’’นฺติ. จตุตฺถํ. २७२. "भिक्षुओं, संबोधि से पूर्व, जब मैं अभी बुद्ध नहीं हुआ था और केवल बोधिसत्व ही था, तब मेरे मन में यह विचार आया— 'वेदना क्या है? वेदना का उदय क्या है? वेदना के उदय तक पहुँचाने वाला मार्ग क्या है? वेदना का निरोध क्या है? वेदना के निरोध तक पहुँचाने वाला मार्ग क्या है? वेदना का आस्वाद क्या है? उसका दोष क्या है? उससे निस्तरण (मुक्ति) क्या है?' भिक्षुओं, तब मुझे यह विचार हुआ— 'ये तीन वेदनाएँ हैं— सुखद वेदना, दुःखद वेदना और अदुःख-असुखद (उपेक्षा) वेदना। इन्हें वेदना कहा जाता है। स्पर्श के उदय से वेदना का उदय होता है। तृष्णा वेदना के उदय तक पहुँचाने वाला मार्ग है... (पे)... वेदना के प्रति जो छंद-राग का विनय (दमन) है, छंद-राग का प्रहाण (त्याग) है, वही वेदना का निस्तरण है'।" ๕. ญาณสุตฺตํ ५. ज्ञान सुत्त ๒๗๓. ‘‘‘อิมา [Pg.431] เวทนา’ติ เม, ภิกฺขเว, ปุพฺเพ อนนุสฺสุเตสุ ธมฺเมสุ จกฺขุํ อุทปาทิ, ญาณํ อุทปาทิ, ปญฺญา อุทปาทิ, วิชฺชา อุทปาทิ, อาโลโก อุทปาทิ. ‘อยํ เวทนาสมุทโย’ติ เม, ภิกฺขเว, ปุพฺเพ อนนุสฺสุเตสุ ธมฺเมสุ จกฺขุํ อุทปาทิ…เป… อาโลโก อุทปาทิ. ‘อยํ เวทนาสมุทยคามินี ปฏิปทา’ติ เม, ภิกฺขเว, ปุพฺเพ อนนุสฺสุเตสุ ธมฺเมสุ จกฺขุํ อุทปาทิ…เป… ‘อยํ เวทนานิโรโธ’ติ เม, ภิกฺขเว, ปุพฺเพ อนนุสฺสุเตสุ ธมฺเมสุ จกฺขุํ อุทปาทิ …เป… ‘อยํ เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา’ติ เม, ภิกฺขเว, ปุพฺเพ อนนุสฺสุเตสุ ธมฺเมสุ จกฺขุํ อุทปาทิ…เป… ‘อยํ เวทนาย อสฺสาโท’ติ เม, ภิกฺขเว, ปุพฺเพ อนนุสฺสุเตสุ ธมฺเมสุ…เป… ‘อยํ เวทนาย อาทีนโว’ติ เม, ภิกฺขเว, ปุพฺเพ อนนุสฺสุเตสุ ธมฺเมสุ…เป… ‘อิทํ โข นิสฺสรณ’นฺติ เม, ภิกฺขเว, ปุพฺเพ อนนุสฺสุเตสุ ธมฺเมสุ จกฺขุํ อุทปาทิ, ญาณํ อุทปาทิ, ปญฺญา อุทปาทิ, วิชฺชา อุทปาทิ, อาโลโก อุทปาที’’ติ. ปญฺจมํ. २७३. "'ये वेदनाएँ हैं'—भिक्षुओं, ऐसे पहले न सुने गए धर्मों में मेरे भीतर चक्षु उत्पन्न हुआ, ज्ञान उत्पन्न हुआ, प्रज्ञा उत्पन्न हुई, विद्या उत्पन्न हुई, आलोक उत्पन्न हुआ। 'यह वेदना का उदय है'—भिक्षुओं, ऐसे पहले न सुने गए धर्मों में मेरे भीतर चक्षु उत्पन्न हुआ... (पे)... आलोक उत्पन्न हुआ। 'यह वेदना के उदय तक पहुँचाने वाला मार्ग है'—भिक्षुओं, ऐसे पहले न सुने गए धर्मों में मेरे भीतर चक्षु उत्पन्न हुआ... (पे)... 'यह वेदना का निरोध है'—भिक्षुओं, ऐसे पहले न सुने गए धर्मों में मेरे भीतर चक्षु उत्पन्न हुआ... (पे)... 'यह वेदना के निरोध तक पहुँचाने वाला मार्ग है'—भिक्षुओं, ऐसे पहले न सुने गए धर्मों में मेरे भीतर चक्षु उत्पन्न हुआ... (पे)... 'यह वेदना का आस्वाद है'—भिक्षुओं, ऐसे पहले न सुने गए धर्मों में... (पे)... 'यह वेदना का दोष है'—भिक्षुओं, ऐसे पहले न सुने गए धर्मों में... (पे)... 'यह निस्तरण है'—भिक्षुओं, ऐसे पहले न सुने गए धर्मों में मेरे भीतर चक्षु उत्पन्न हुआ, ज्ञान उत्पन्न हुआ, प्रज्ञा उत्पन्न हुई, विद्या उत्पन्न हुई, आलोक उत्पन्न हुआ।" ๖. สมฺพหุลภิกฺขุสุตฺตํ ६. संबहुल भिक्षु सुत्त ๒๗๔. อถ โข สมฺพหุลา ภิกฺขู เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘กตมา นุ โข, ภนฺเต, เวทนา, กตโม เวทนาสมุทโย, กตมา เวทนาสมุทยคามินี ปฏิปทา? กตโม เวทนานิโรโธ, กตมา เวทนานิโรธคามินี ปฏิปทา? โก เวทนาย อสฺสาโท, โก อาทีนโว, กึ นิสฺสรณ’’นฺติ? ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา. อิมา วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, เวทนา. ผสฺสสมุทยา เวทนาสมุทโย. ตณฺหา เวทนาสมุทยคามินี ปฏิปทา. ผสฺสนิโรธา…เป… โย เวทนาย ฉนฺทราควินโย ฉนฺทราคปฺปหานํ. อิทํ เวทนาย นิสฺสรณ’’นฺติ. ฉฏฺฐํ. २७४. तब बहुत से भिक्षु जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर... (पे)... एक ओर बैठे हुए उन भिक्षुओं ने भगवान से यह कहा— "भन्ते, वेदना क्या है? वेदना का उदय क्या है? वेदना के उदय तक पहुँचाने वाला मार्ग क्या है? वेदना का निरोध क्या है? वेदना के निरोध तक पहुँचाने वाला मार्ग क्या है? वेदना का आस्वाद क्या है? उसका दोष क्या है? उससे निस्तरण क्या है?" "भिक्षुओं, ये तीन वेदनाएँ हैं— सुखद वेदना, दुःखद वेदना और अदुःख-असुखद वेदना। भिक्षुओं, इन्हें वेदना कहा जाता है। स्पर्श के उदय से वेदना का उदय होता है। तृष्णा वेदना के उदय तक पहुँचाने वाला मार्ग है। स्पर्श के निरोध से... (पे)... वेदना के प्रति जो छंद-राग का विनय है, छंद-राग का प्रहाण है, वही वेदना का निस्तरण है।" ๗. ปฐมสมณพฺราหฺมณสุตฺตํ ७. प्रथम श्रमण-ब्राह्मण सुत्त ๒๗๕. ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา. กตมา ติสฺโส? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา. เย หิ เกจิ, ภิกฺขเว, สมณา [Pg.432] วา พฺราหฺมณา วา อิมาสํ ติสฺสนฺนํ เวทนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ นปฺปชานนฺติ. น เม เต, ภิกฺขเว, สมณา วา พฺราหฺมณา วา สมเณสุ วา สมณสมฺมตา พฺราหฺมเณสุ วา พฺราหฺมณสมฺมตา, น จ ปน เต อายสฺมนฺโต สามญฺญตฺถํ วา พฺรหฺมญฺญตฺถํ วา ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหรนฺติ. เย จ โข เกจิ, ภิกฺขเว, สมณา วา พฺราหฺมณา วา อิมาสํ ติสฺสนฺนํ เวทนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวํ จ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ ปชานนฺติ. เต โข เม, ภิกฺขเว, สมณา วา พฺราหฺมณา วา สมเณสุ เจว สมณสมฺมตา พฺราหฺมเณสุ จ พฺราหฺมณสมฺมตา. เต จ ปนายสฺมนฺโต สามญฺญตฺถญฺจ พฺรหฺมญฺญตฺถญฺจ, ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหรนฺตี’’ติ. สตฺตมํ. २७५. "भिक्षुओं, ये तीन वेदनाएँ हैं। कौन सी तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना और अदुःख-असुखद वेदना। भिक्षुओं, जो कोई भी श्रमण या ब्राह्मण इन तीन वेदनाओं के उदय, अस्त (निरोध), आस्वाद, दोष और निस्तरण को यथाभूत (जैसा है वैसा) नहीं जानते, वे श्रमणों में श्रमण नहीं माने जाते और न ही ब्राह्मणों में ब्राह्मण माने जाते हैं; और न ही वे आयुष्मान इसी जन्म में स्वयं के विशेष ज्ञान (अभिज्ञा) से साक्षात्कार कर, उसे प्राप्त कर विहार करते हैं। किन्तु भिक्षुओं, जो कोई भी श्रमण या ब्राह्मण इन तीन वेदनाओं के उदय, अस्त, आस्वाद, दोष और निस्तरण को यथाभूत जानते हैं, वे श्रमणों में श्रमण माने जाते हैं और ब्राह्मणों में ब्राह्मण माने जाते हैं। और वे आयुष्मान इसी जन्म में स्वयं के विशेष ज्ञान से साक्षात्कार कर, उसे प्राप्त कर विहार करते हैं।" ๘. ทุติยสมณพฺราหฺมณสุตฺตํ ८. द्वितीय श्रमण-ब्राह्मण सुत्त ๒๗๖. ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา. กตมา ติสฺโส? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา. เย หิ เกจิ, ภิกฺขเว, สมณา วา พฺราหฺมณา วา อิมาสํ ติสฺสนฺนํ เวทนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ นปฺปชานนฺติ…เป… ปชานนฺติ…เป… สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหรนฺตี’’ติ. อฏฺฐมํ. २७६. "भिक्षुओं, ये तीन वेदनाएँ हैं। कौन सी तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना और अदुःख-असुखद वेदना। भिक्षुओं, जो कोई भी श्रमण या ब्राह्मण इन तीन वेदनाओं के उदय, अस्त, आस्वाद, दोष और निस्तरण को यथाभूत नहीं जानते... (पे)... जानते हैं... (पे)... स्वयं के विशेष ज्ञान से साक्षात्कार कर, उसे प्राप्त कर विहार करते हैं।" ๙. ตติยสมณพฺราหฺมณสุตฺตํ ९. तृतीय श्रमण-ब्राह्मण सुत्त ๒๗๗. ‘‘เย หิ เกจิ, ภิกฺขเว, สมณา วา พฺราหฺมณา วา เวทนํ นปฺปชานนฺติ, เวทนาสมุทยํ นปฺปชานนฺติ, เวทนานิโรธํ นปฺปชานนฺติ, เวทนานิโรธคามินึ ปฏิปทํ นปฺปชานนฺติ…เป… ปชานนฺติ…เป… สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหรนฺตี’’ติ. นวมํ. २७७. "भिक्षुओं, जो कोई भी श्रमण या ब्राह्मण वेदना को नहीं जानते, वेदना के उदय को नहीं जानते, वेदना के निरोध को नहीं जानते, वेदना के निरोध तक पहुँचाने वाले मार्ग को नहीं जानते... (पे)... जानते हैं... (पे)... स्वयं के विशेष ज्ञान से साक्षात्कार कर, उसे प्राप्त कर विहार करते हैं।" ๑๐. สุทฺธิกสุตฺตํ १०. शुद्धिक सुत्त ๒๗๘. ‘‘ติสฺโส อิมา, ภิกฺขเว, เวทนา. กตมา ติสฺโส? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา โข, ภิกฺขเว, ติสฺโส เวทนา’’ติ. ทสมํ. २७८. "भिक्षुओं, ये तीन वेदनाएँ हैं। कौन सी तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना और अदुःख-असुखद वेदना—भिक्षुओं, ये ही तीन वेदनाएँ हैं।" ๑๑. นิรามิสสุตฺตํ ११. निरामिष सुत्त ๒๗๙. ‘‘อตฺถิ[Pg.433], ภิกฺขเว, สามิสา ปีติ, อตฺถิ นิรามิสา ปีติ, อตฺถิ นิรามิสา นิรามิสตรา ปีติ; อตฺถิ สามิสํ สุขํ, อตฺถิ นิรามิสํ สุขํ, อตฺถิ นิรามิสา นิรามิสตรํ สุขํ; อตฺถิ สามิสา อุเปกฺขา, อตฺถิ นิรามิสา อุเปกฺขา, อตฺถิ นิรามิสา นิรามิสตรา อุเปกฺขา; อตฺถิ สามิโส วิโมกฺโข, อตฺถิ นิรามิโส วิโมกฺโข, อตฺถิ นิรามิสา นิรามิสตโร วิโมกฺโข. กตมา จ, ภิกฺขเว, สามิสา ปีติ? ปญฺจิเม, ภิกฺขเว, กามคุณา. กตเม ปญฺจ? จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา…เป… กายวิญฺเญยฺยา โผฏฺฐพฺพา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. อิเม โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ กามคุณา. ยา โข, ภิกฺขเว, อิเม ปญฺจ กามคุเณ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ปีติ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, สามิสา ปีติ. २७९. "भिक्षुओं! सामिष प्रीति है, निरामिष प्रीति है, और निरामिष से भी अधिक निरामिष प्रीति है; सामिष सुख है, निरामिष सुख है, और निरामिष से भी अधिक निरामिष सुख है; सामिष उपेक्षा है, निरामिष उपेक्षा है, और निरामिष से भी अधिक निरामिष उपेक्षा है; सामिष विमोक्ष है, निरामिष विमोक्ष है, और निरामिष से भी अधिक निरामिष विमोक्ष है। भिक्षुओं! सामिष प्रीति क्या है? भिक्षुओं! ये पाँच कामगुण हैं। कौन से पाँच? चक्षु-विज्ञेय रूप जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं... (पे)... काय-विज्ञेय स्प्रष्टव्य जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। भिक्षुओं! ये पाँच कामगुण हैं। भिक्षुओं! इन पाँच कामगुणों के कारण जो प्रीति उत्पन्न होती है, उसे सामिष प्रीति कहा जाता है।" ‘‘กตมา จ, ภิกฺขเว, นิรามิสา ปีติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา อชฺฌตฺตํ สมฺปสาทนํ เจตโส เอโกทิภาวํ อวิตกฺกํ อวิจารํ สมาธิชํ ปีติสุขํ ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, นิรามิสา ปีติ. "भिक्षुओं! निरामिष प्रीति क्या है? भिक्षुओं! यहाँ कोई भिक्षु काम-भोगों से विविक्त होकर, अकुशल धर्मों से विविक्त होकर, वितर्क और विचार सहित, विवेक से उत्पन्न प्रीति और सुख वाले प्रथम ध्यान को प्राप्त कर विहार करता है। वितर्क और विचार के शांत हो जाने पर, अध्यात्म में संप्रसाद और चित्त की एकाग्रता वाले, वितर्क-रहित, विचार-रहित, समाधि से उत्पन्न प्रीति और सुख वाले द्वितीय ध्यान को प्राप्त कर विहार करता है। भिक्षुओं! इसे निरामिष प्रीति कहा जाता है।" ‘‘กตมา จ, ภิกฺขเว, นิรามิสา นิรามิสตรา ปีติ? ยา โข, ภิกฺขเว, ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราคา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต, โทสา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต, โมหา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต อุปฺปชฺชติ ปีติ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, นิรามิสา นิรามิสตรา ปีติ. "भिक्षुओं! निरामिष से भी अधिक निरामिष प्रीति क्या है? भिक्षुओं! क्षीणासव भिक्षु को अपने चित्त को राग से विमुक्त देखते हुए, द्वेष से विमुक्त देखते हुए, और मोह से विमुक्त देखते हुए जो प्रीति उत्पन्न होती है, भिक्षुओं! उसे निरामिष से भी अधिक निरामिष प्रीति कहा जाता है।" ‘‘กตมญฺจ, ภิกฺขเว, สามิสํ สุขํ? ปญฺจิเม, ภิกฺขเว, กามคุณา. กตเม ปญฺจ? จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา…เป… กายวิญฺเญยฺยา โผฏฺฐพฺพา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. อิเม โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ กามคุณา. ยํ โข, ภิกฺขเว, อิเม ปญฺจ กามคุเณ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, สามิสํ สุขํ. "भिक्षुओं! सामिष सुख क्या है? भिक्षुओं! ये पाँच कामगुण हैं। कौन से पाँच? चक्षु-विज्ञेय रूप जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं... (पे)... काय-विज्ञेय स्प्रष्टव्य जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। भिक्षुओं! ये पाँच कामगुण हैं। भिक्षुओं! इन पाँच कामगुणों के कारण जो सुख और सौमनस्य उत्पन्न होता है, उसे सामिष सुख कहा जाता है।" ‘‘กตมญฺจ[Pg.434], ภิกฺขเว, นิรามิสํ สุขํ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา อชฺฌตฺตํ สมฺปสาทนํ เจตโส เอโกทิภาวํ อวิตกฺกํ อวิจารํ สมาธิชํ ปีติสุขํ ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. ปีติยา จ วิราคา อุเปกฺขโก จ วิหรติ สโต จ สมฺปชาโน สุขญฺจ กาเยน ปฏิสํเวเทติ, ยํ ตํ อริยา อาจิกฺขนฺติ – ‘อุเปกฺขโก สติมา สุขวิหารี’ติ ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, นิรามิสํ สุขํ. "भिक्षुओं! निरामिष सुख क्या है? भिक्षुओं! यहाँ कोई भिक्षु काम-भोगों से विविक्त होकर, अकुशल धर्मों से विविक्त होकर, वितर्क और विचार सहित, विवेक से उत्पन्न प्रीति और सुख वाले प्रथम ध्यान को प्राप्त कर विहार करता है। वितर्क और विचार के शांत हो जाने पर, अध्यात्म में संप्रसाद और चित्त की एकाग्रता वाले, वितर्क-रहित, विचार-रहित, समाधि से उत्पन्न प्रीति और सुख वाले द्वितीय ध्यान को प्राप्त कर विहार करता है। प्रीति के भी विराग से वह उपेक्षक होकर विहार करता है, और स्मृतिवान तथा संप्रजन्य युक्त होकर काया से उस सुख का अनुभव करता है, जिसके विषय में आर्य कहते हैं— 'वह उपेक्षक, स्मृतिवान और सुख-विहारी है', ऐसे तृतीय ध्यान को प्राप्त कर विहार करता है। भिक्षुओं! इसे निरामिष सुख कहा जाता है।" ‘‘กตมญฺจ, ภิกฺขเว, นิรามิสา นิรามิสตรํ สุขํ? ยํ โข, ภิกฺขเว, ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราคา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต, โทสา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต, โมหา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, นิรามิสา นิรามิสตรํ สุขํ. "भिक्षुओं! निरामिष से भी अधिक निरामिष सुख क्या है? भिक्षुओं! क्षीणासव भिक्षु को अपने चित्त को राग से विमुक्त देखते हुए, द्वेष से विमुक्त देखते हुए, और मोह से विमुक्त देखते हुए जो सुख और सौमनस्य उत्पन्न होता है, भिक्षुओं! उसे निरामिष से भी अधिक निरामिष सुख कहा जाता है।" ‘‘กตมา จ, ภิกฺขเว, สามิสา อุเปกฺขา? ปญฺจิเม, ภิกฺขเว, กามคุณา. กตเม ปญฺจ? จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา…เป… กายวิญฺเญยฺยา โผฏฺฐพฺพา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสํหิตา รชนียา. อิเม โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ กามคุณา. ยา โข, ภิกฺขเว, อิเม ปญฺจ กามคุเณ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ อุเปกฺขา, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, สามิสา อุเปกฺขา. "भिक्षुओं! सामिष उपेक्षा क्या है? भिक्षुओं! ये पाँच कामगुण हैं। कौन से पाँच? चक्षु-विज्ञेय रूप जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं... (पे)... काय-विज्ञेय स्प्रष्टव्य जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित और रजनीय हैं। भिक्षुओं! ये पाँच कामगुण हैं। भिक्षुओं! इन पाँच कामगुणों के कारण जो उपेक्षा उत्पन्न होती है, उसे सामिष उपेक्षा कहा जाता है।" ‘‘กตมา จ, ภิกฺขเว, นิรามิสา อุเปกฺขา? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สุขสฺส จ ปหานา, ทุกฺขสฺส จ ปหานา, ปุพฺเพว โสมนสฺสโทมนสฺสานํ อตฺถงฺคมา, อทุกฺขมสุขํ อุเปกฺขาสติปาริสุทฺธึ จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, นิรามิสา อุเปกฺขา. "भिक्षुओं! निरामिष उपेक्षा क्या है? भिक्षुओं! यहाँ कोई भिक्षु सुख के प्रहाण से और दुःख के प्रहाण से, तथा पहले ही सौमनस्य और दौर्मनस्य के अस्त हो जाने से, न-दुःख न-सुख वाली, उपेक्षा के कारण स्मृति की परिशुद्धि वाले चतुर्थ ध्यान को प्राप्त कर विहार करता है। भिक्षुओं! इसे निरामिष उपेक्षा कहा जाता है।" ‘‘กตมา จ, ภิกฺขเว, นิรามิสา นิรามิสตรา อุเปกฺขา? ยา โข, ภิกฺขเว, ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราคา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต, โทสา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต, โมหา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต อุปฺปชฺชติ อุเปกฺขา, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, นิรามิสา นิรามิสตรา อุเปกฺขา. "भिक्षुओं! निरामिष से भी अधिक निरामिष उपेक्षा क्या है? भिक्षुओं! क्षीणासव भिक्षु को अपने चित्त को राग से विमुक्त देखते हुए, द्वेष से विमुक्त देखते हुए, और मोह से विमुक्त देखते हुए जो उपेक्षा उत्पन्न होती है, भिक्षुओं! उसे निरामिष से भी अधिक निरामिष उपेक्षा कहा जाता है।" ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, สามิโส วิโมกฺโข? รูปปฺปฏิสํยุตฺโต วิโมกฺโข สามิโส วิโมกฺโข. "भिक्षुओं! सामिष विमोक्ष क्या है? रूप से संबंधित विमोक्ष सामिष विमोक्ष है।" ‘‘กตโม [Pg.435] จ, ภิกฺขเว, นิรามิโส วิโมกฺโข? อรูปปฺปฏิสํยุตฺโต วิโมกฺโข นิรามิโส วิโมกฺโข. "भिक्षुओं! निरामिष विमोक्ष क्या है? अरूप से संबंधित विमोक्ष निरामिष विमोक्ष है।" ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, นิรามิสา นิรามิสตโร วิโมกฺโข? โย โข, ภิกฺขเว, ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ราคา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต, โทสา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต, โมหา จิตฺตํ วิมุตฺตํ ปจฺจเวกฺขโต อุปฺปชฺชติ วิโมกฺโข, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, นิรามิสา นิรามิสตโร วิโมกฺโข’’ติ. เอกาทสมํ. "भिक्षुओं! निरामिष से भी अधिक निरामिष विमोक्ष क्या है? भिक्षुओं! क्षीणासव भिक्षु को अपने चित्त को राग से विमुक्त देखते हुए, द्वेष से विमुक्त देखते हुए, और मोह से विमुक्त देखते हुए जो विमोक्ष उत्पन्न होता है, भिक्षुओं! उसे निरामिष से भी अधिक निरामिष विमोक्ष कहा जाता है।" อฏฺฐสตปริยายวคฺโค ตติโย. अष्टशत-परियाय वर्ग तीसरा (समाप्त)। ตสฺสุทฺทานํ – इसका सारांश (उदान) – สีวกอฏฺฐสตํ ภิกฺขุ, ปุพฺเพ ญาณญฺจ ภิกฺขุนา; สมณพฺราหฺมณา ตีณิ, สุทฺธิกญฺจ นิรามิสนฺติ. सीवक, अष्टशत, भिक्खु, तीन पुब्बे-ञाण, भिक्खुना, तीन समण-ब्राह्मण, सुद्धिक और निरामिष। เวทนาสํยุตฺตํ สมตฺตํ. वेदना-संयुत्त समाप्त। ๓. มาตุคามสํยุตฺตํ ३. मातृग्राम-संयुत्त ๑. ปฐมเปยฺยาลวคฺโค १. प्रथम पेय्याल वर्ग ๑. มาตุคามสุตฺตํ १. मातृग्राम सुत्त ๒๘๐. ‘‘ปญฺจหิ[Pg.436], ภิกฺขเว, องฺเคหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม เอกนฺตอมนาโป โหติ ปุริสสฺส. กตเมหิ ปญฺจหิ? น จ รูปวา โหติ, น จ โภควา โหติ, น จ สีลวา โหติ, อลโส จ โหติ, ปชญฺจสฺส น ลภติ – อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจหิ องฺเคหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม เอกนฺตอมนาโป โหติ ปุริสสฺส. ปญฺจหิ, ภิกฺขเว, องฺเคหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม เอกนฺตมนาโป โหติ ปุริสสฺส. กตเมหิ ปญฺจหิ? รูปวา จ โหติ, โภควา จ โหติ, สีลวา จ โหติ, ทกฺโข จ โหติ อนลโส, ปชญฺจสฺส ลภติ – อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจหิ องฺเคหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม เอกนฺตมนาโป โหติ ปุริสสฺสา’’ติ. ปฐมํ. २८०. "भिक्षुओं! पाँच अंगों से युक्त स्त्री पुरुष के लिए सर्वथा अप्रिय होती है। किन पाँच से? वह रूपवती नहीं होती, धनवती नहीं होती, शीलवती नहीं होती, आलसी होती है, और वह संतान प्राप्त नहीं करती—भिक्षुओं! इन पाँच अंगों से युक्त स्त्री पुरुष के लिए सर्वथा अप्रिय होती है। भिक्षुओं! पाँच अंगों से युक्त स्त्री पुरुष के लिए सर्वथा प्रिय होती है। किन पाँच से? वह रूपवती होती है, धनवती होती है, शीलवती होती है, चतुर और परिश्रमी होती है, और संतान प्राप्त करती है—भिक्षुओं! इन पाँच अंगों से युक्त स्त्री पुरुष के लिए सर्वथा प्रिय होती है।" प्रथम। ๒. ปุริสสุตฺตํ २. पुरुष सुत्त ๒๘๑. ‘‘ปญฺจหิ, ภิกฺขเว, องฺเคหิ สมนฺนาคโต ปุริโส เอกนฺตอมนาโป โหติ มาตุคามสฺส. กตเมหิ ปญฺจหิ? น จ รูปวา โหติ, น จ โภควา โหติ, น จ สีลวา โหติ, อลโส จ โหติ, ปชญฺจสฺส น ลภติ – อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจหิ องฺเคหิ สมนฺนาคโต ปุริโส เอกนฺตอมนาโป โหติ มาตุคามสฺส. ปญฺจหิ, ภิกฺขเว, องฺเคหิ สมนฺนาคโต ปุริโส เอกนฺตมนาโป โหติ มาตุคามสฺส. กตเมหิ ปญฺจหิ? รูปวา จ โหติ, โภควา จ โหติ, สีลวา จ โหติ, ทกฺโข จ โหติ อนลโส, ปชญฺจสฺส ลภติ – อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจหิ องฺเคหิ สมนฺนาคโต ปุริโส เอกนฺตมนาโป โหติ มาตุคามสฺสา’’ติ. ทุติยํ. २८१. "भिक्षुओं! पाँच अंगों से युक्त पुरुष स्त्री के लिए सर्वथा अप्रिय होता है। किन पाँच से? वह रूपवान नहीं होता, धनवान नहीं होता, शीलवान नहीं होता, आलसी होता है, और वह संतान प्राप्त नहीं करता—भिक्षुओं! इन पाँच अंगों से युक्त पुरुष स्त्री के लिए सर्वथा अप्रिय होता है। भिक्षुओं! पाँच अंगों से युक्त पुरुष स्त्री के लिए सर्वथा प्रिय होती है। किन पाँच से? वह रूपवान होता है, धनवान होता है, शीलवान होता है, चतुर और परिश्रमी होता है, और संतान प्राप्त करता है—भिक्षुओं! इन पाँच अंगों से युक्त पुरुष स्त्री के लिए सर्वथा प्रिय होता है।" द्वितीय। ๓. อาเวณิกทุกฺขสุตฺตํ ३. आवेणिक-दुःख सुत्त ๒๘๒. ‘‘ปญฺจิมานิ, ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส อาเวณิกานิ ทุกฺขานิ, ยานิ มาตุคาโม ปจฺจนุโภติ, อญฺญตฺเรว ปุริเสหิ. กตมานิ ปญฺจ? อิธ, ภิกฺขเว[Pg.437], มาตุคาโม ทหโรว สมาโน ปติกุลํ คจฺฉติ, ญาตเกหิ วินา โหติ. อิทํ, ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส ปฐมํ อาเวณิกํ ทุกฺขํ, ยํ มาตุคาโม ปจฺจนุโภติ, อญฺญตฺเรว ปุริเสหิ. ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม อุตุนี โหติ. อิทํ, ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส ทุติยํ อาเวณิกํ ทุกฺขํ, ยํ มาตุคาโม ปจฺจนุโภติ, อญฺญตฺเรว ปุริเสหิ. ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม คพฺภินี โหติ. อิทํ, ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส ตติยํ อาเวณิกํ ทุกฺขํ, ยํ มาตุคาโม ปจฺจนุโภติ, อญฺญตฺเรว ปุริเสหิ. ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม วิชายติ. อิทํ, ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส จตุตฺถํ อาเวณิกํ ทุกฺขํ, ยํ มาตุคาโม ปจฺจนุโภติ, อญฺญตฺเรว ปุริเสหิ. ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม ปุริสสฺส ปาริจริยํ อุเปติ. อิทํ โข, ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส ปญฺจมํ อาเวณิกํ ทุกฺขํ, ยํ มาตุคาโม ปจฺจนุโภติ, อญฺญตฺเรว ปุริเสหิ. อิมานิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ มาตุคามสฺส อาเวณิกานิ ทุกฺขานิ, ยานิ มาตุคาโม ปจฺจนุโภติ, อญฺญตฺเรว ปุริเสหี’’ติ. ตติยํ. २८२. "भिक्षुओं! स्त्री के ये पाँच विशिष्ट दुःख हैं, जिन्हें स्त्री पुरुषों से अलग स्वयं अनुभव करती है। कौन से पाँच? भिक्षुओं! यहाँ स्त्री युवावस्था में ही पति के घर जाती है और अपने संबंधियों से अलग हो जाती है। भिक्षुओं! यह स्त्री का पहला विशिष्ट दुःख है, जिसे वह पुरुषों से अलग अनुभव करती है। फिर, भिक्षुओं! स्त्री रजस्वला होती है। भिक्षुओं! यह स्त्री का दूसरा विशिष्ट दुःख है... फिर, भिक्षुओं! स्त्री गर्भवती होती है। भिक्षुओं! यह स्त्री का तीसरा विशिष्ट दुःख है... फिर, भिक्षुओं! स्त्री संतान को जन्म देती है। भिक्षुओं! यह स्त्री का चौथा विशिष्ट दुःख है... फिर, भिक्षुओं! स्त्री पुरुष की सेवा में लग जाती है। भिक्षुओं! यह स्त्री का पाँचवाँ विशिष्ट दुःख है, जिसे वह पुरुषों से अलग अनुभव करती है। भिक्षुओं! स्त्री के ये पाँच विशिष्ट दुःख हैं, जिन्हें स्त्री पुरुषों से अलग अनुभव करती है।" तृतीय। ๔. ตีหิธมฺเมหิสุตฺตํ ४. तीहि-धम्मेहि सुत्त ๒๘๓. ‘‘ตีหิ, ภิกฺขเว, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม เยภุยฺเยน กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ตีหิ? อิธ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม ปุพฺพณฺหสมยํ มจฺเฉรมลปริยุฏฺฐิเตน เจตสา อคารํ อชฺฌาวสติ. มชฺฌนฺหิกสมยํ อิสฺสาปริยุฏฺฐิเตน เจตสา อคารํ อชฺฌาวสติ. สายนฺหสมยํ กามราคปริยุฏฺฐิเตน เจตสา อคารํ อชฺฌาวสติ. อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ตีหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม เยภุยฺเยน กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ. จตุตฺถํ. २८३. "भिक्षुओं! तीन धर्मों से युक्त स्त्री प्रायः शरीर टूटने पर, मृत्यु के बाद, अपाय, दुर्गति, विनिपात, नरक में उत्पन्न होती है। किन तीन से? भिक्षुओं! यहाँ स्त्री प्रातःकाल कंजूसी के मल से घिरे चित्त के साथ घर में रहती है। मध्याह्न के समय ईर्ष्या से घिरे चित्त के साथ घर में रहती है। सायंकाल काम-राग से घिरे चित्त के साथ घर में रहती है। भिक्षुओं! इन तीन धर्मों से युक्त स्त्री प्रायः शरीर टूटने पर, मृत्यु के बाद, अपाय, दुर्गति, विनिपात, नरक में उत्पन्न होती है।" चतुर्थ। ๕. โกธนสุตฺตํ ५. कोधन सुत्त ๒๘๔. อถ โข อายสฺมา อนุรุทฺโธ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อนุรุทฺโธ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธาหํ, ภนฺเต, มาตุคามํ ปสฺสามิ ทิพฺเพน จกฺขุนา วิสุทฺเธน อติกฺกนฺตมานุสเกน กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชนฺตํ. กตีหิ นุ โข, ภนฺเต, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม [Pg.438] กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ? २८४. तब आयुष्मान अनिरुद्ध जहाँ भगवान् थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान अनिरुद्ध ने भगवान् से यह कहा— "भन्ते! यहाँ मैं विशुद्ध और अलौकिक दिव्य-चक्षु से स्त्रियों को शरीर टूटने पर, मृत्यु के बाद, अपाय, दुर्गति, विनिपात, नरक में उत्पन्न होते देखता हूँ। भन्ते! कितने धर्मों से युक्त स्त्री शरीर टूटने पर, मृत्यु के बाद, अपाय, दुर्गति, विनिपात, नरक में उत्पन्न होती है?" ‘‘ปญฺจหิ โข, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? อสฺสทฺโธ จ โหติ, อหิริโก จ โหติ, อโนตฺตปฺปี จ โหติ, โกธโน จ โหติ, ทุปฺปญฺโญ จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ. ปญฺจมํ. "अनिरुद्ध! पाँच धर्मों से युक्त स्त्री शरीर टूटने पर, मृत्यु के बाद, अपाय, दुर्गति, विनिपात, नरक में उत्पन्न होती है। किन पाँच से? वह अश्रद्धालु होती है, निर्लज्ज होती है, पाप से न डरने वाली होती है, क्रोधी होती है, और प्रज्ञाहीन होती है—अनिरुद्ध! इन पाँच धर्मों से युक्त स्त्री शरीर टूटने पर, मृत्यु के बाद, अपाय, दुर्गति, विनिपात, नरक में उत्पन्न होती है।" पंचम। ๖. อุปนาหีสุตฺตํ ६. उपनाही सुत्त ๒๘๕. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? อสฺสทฺโธ จ โหติ, อหิริโก จ โหติ, อโนตฺตปฺปี จ โหติ, อุปนาหี จ โหติ, ทุปฺปญฺโญ จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ. ฉฏฺฐํ. २८५. हे अनुरुद्ध! पाँच धर्मों से युक्त स्त्री, शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, अपाय, दुर्गति, विनिपात और नरक में उत्पन्न होती है। वे पाँच कौन से हैं? वह श्रद्धाहीन होती है, निर्लज्ज होती है, निर्भय होती है, बैर रखने वाली (उपनाही) होती है, और प्रज्ञाहीन होती है। हे अनुरुद्ध! इन पाँच धर्मों से युक्त स्त्री शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, अपाय, दुर्गति, विनिपात और नरक में उत्पन्न होती है। छठा सुत्त। ๗. อิสฺสุกีสุตฺตํ ७. इस्सुकी सुत्त (ईर्ष्यालु सुत्त) ๒๘๖. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? อสฺสทฺโธ จ โหติ, อหิริโก จ โหติ, อโนตฺตปฺปี จ โหติ, อิสฺสุกี จ โหติ, ทุปฺปญฺโญ จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ. สตฺตมํ. २८६. हे अनुरुद्ध! पाँच धर्मों से युक्त स्त्री, शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, अपाय, दुर्गति, विनिपात और नरक में उत्पन्न होती है। वे पाँच कौन से हैं? वह श्रद्धाहीन होती है, निर्लज्ज होती है, निर्भय होती है, ईर्ष्यालु होती है, और प्रज्ञाहीन होती है। हे अनुरुद्ध! इन पाँच धर्मों से युक्त स्त्री शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, अपाय, दुर्गति, विनिपात और नरक में उत्पन्न होती है। सातवाँ सुत्त। ๘. มจฺฉรีสุตฺตํ ८. मच्छरी सुत्त (कंजूस सुत्त) ๒๘๗. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? อสฺสทฺโธ จ โหติ, อหิริโก จ โหติ, อโนตฺตปฺปี จ โหติ, มจฺฉรี จ โหติ, ทุปฺปญฺโญ จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ [Pg.439] ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ. อฏฺฐมํ. २८७. हे अनुरुद्ध! पाँच धर्मों से युक्त स्त्री, शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, अपाय, दुर्गति, विनिपात और नरक में उत्पन्न होती है। वे पाँच कौन से हैं? वह श्रद्धाहीन होती है, निर्लज्ज होती है, निर्भय होती है, कंजूस होती है, और प्रज्ञाहीन होती है। हे अनुरुद्ध! इन पाँच धर्मों से युक्त स्त्री... पे... अपाय, दुर्गति, विनिपात और नरक में उत्पन्न होती है। आठवाँ सुत्त। ๙. อติจารีสุตฺตํ ९. अतिचारी सुत्त (व्यभिचारिणी सुत्त) ๒๘๘. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? อสฺสทฺโธ จ โหติ, อหิริโก จ โหติ, อโนตฺตปฺปี จ โหติ, อติจารี จ โหติ, ทุปฺปญฺโญ จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… อุปปชฺชตี’’ติ. นวมํ. २८८. हे अनुरुद्ध! पाँच धर्मों से युक्त स्त्री... पे... अपाय, दुर्गति, विनिपात और नरक में उत्पन्न होती है। वे पाँच कौन से हैं? वह श्रद्धाहीन होती है, निर्लज्ज होती है, निर्भय होती है, व्यभिचारिणी (अतिचारी) होती है, और प्रज्ञाहीन होती है। हे अनुरुद्ध! इन पाँच धर्मों से युक्त स्त्री... पे... उत्पन्न होती है। नौवाँ सुत्त। ๑๐. ทุสฺสีลสุตฺตํ १०. दुस्सीली सुत्त (शीलहीन सुत्त) ๒๘๙. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? อสฺสทฺโธ จ โหติ, อหิริโก จ โหติ, อโนตฺตปฺปี จ โหติ, ทุสฺสีโล จ โหติ, ทุปฺปญฺโญ จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ. ทสมํ. २८९. हे अनुरुद्ध! पाँच धर्मों से युक्त स्त्री... पे... नरक में उत्पन्न होती है। वे पाँच कौन से हैं? वह श्रद्धाहीन होती है, निर्लज्ज होती है, निर्भय होती है, शीलहीन (दुस्सीली) होती है, और प्रज्ञाहीन होती है। हे अनुरुद्ध! इन पाँच धर्मों से युक्त स्त्री... पे... नरक में उत्पन्न होती है। दसवाँ सुत्त। ๑๑. อปฺปสฺสุตสุตฺตํ ११. अप्पस्सुत सुत्त (अल्पश्रुत सुत्त) ๒๙๐. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? อสฺสทฺโธ จ โหติ, อหิริโก จ โหติ, อโนตฺตปฺปี จ โหติ, อปฺปสฺสุโต จ โหติ, ทุปฺปญฺโญ จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ. เอกาทสมํ. २९०. हे अनुरुद्ध! पाँच धर्मों से युक्त स्त्री... पे... नरक में उत्पन्न होती है। वे पाँच कौन से हैं? वह श्रद्धाहीन होती है, निर्लज्ज होती है, निर्भय होती है, अल्पश्रुत होती है, और प्रज्ञाहीन होती है। हे अनुरुद्ध! इन पाँच धर्मों से युक्त स्त्री... पे... नरक में उत्पन्न होती है। ग्यारहवाँ सुत्त। ๑๒. กุสีตสุตฺตํ १२. कुसीत सुत्त (आलसी सुत्त) ๒๙๑. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? อสฺสทฺโธ จ โหติ, อหิริโก จ โหติ, อโนตฺตปฺปี จ โหติ, กุสีโต จ โหติ, ทุปฺปญฺโญ จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ. ทฺวาทสมํ. २९१. हे अनुरुद्ध! पाँच धर्मों से युक्त स्त्री... पे... नरक में उत्पन्न होती है। वे पाँच कौन से हैं? वह श्रद्धाहीन होती है, निर्लज्ज होती है, निर्भय होती है, आलसी (कुसीत) होती है, और प्रज्ञाहीन होती है। हे अनुरुद्ध! इन पाँच धर्मों से युक्त स्त्री... पे... अपाय, दुर्गति, विनिपात और नरक में उत्पन्न होती है। बारहवाँ सुत्त। ๑๓. มุฏฺฐสฺสติสุตฺตํ १३. मुट्ठस्सति सुत्त (विस्मृति सुत्त) ๒๙๒. ‘‘ปญฺจหิ[Pg.440], อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? อสฺสทฺโธ จ โหติ, อหิริโก จ โหติ, อโนตฺตปฺปี จ โหติ, มุฏฺฐสฺสติ จ โหติ, ทุปฺปญฺโญ จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ. เตรสมํ. २९२. हे अनुरुद्ध! पाँच धर्मों से युक्त स्त्री... पे... नरक में उत्पन्न होती है। वे पाँच कौन से हैं? वह श्रद्धाहीन होती है, निर्लज्ज होती है, निर्भय होती है, स्मृतिहीन (मुट्ठस्सति) होती है, और प्रज्ञाहीन होती है। हे अनुरुद्ध! इन पाँच धर्मों से युक्त स्त्री... पे... नरक में उत्पन्न होती है। तेरहवाँ सुत्त। ๑๔. ปญฺจเวรสุตฺตํ १४. पञ्चवेर सुत्त (पाँच वैर सुत्त) ๒๙๓. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม…เป… นิรยํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? ปาณาติปาตี จ โหติ, อทินฺนาทายี จ โหติ, กาเมสุมิจฺฉาจารี จ โหติ, มุสาวาที จ โหติ, สุราเมรยมชฺชปฺปมาทฏฺฐายี จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติ. จุทฺทสมํ. २९३. हे अनुरुद्ध! पाँच धर्मों से युक्त स्त्री... पे... नरक में उत्पन्न होती है। वे पाँच कौन से हैं? वह प्राणातिपाती होती है, अदत्तादायी होती है, काम-मिथ्याचारी होती है, मृषावादी होती है, और सुरा-मेरय-मद्य के प्रमाद के स्थान में रहने वाली होती है। हे अनुरुद्ध! इन पाँच धर्मों से युक्त स्त्री शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, अपाय, दुर्गति, विनिपात और नरक में उत्पन्न होती है। चौदहवाँ सुत्त। ปฐมเปยฺยาลวคฺโค. प्रथम पेयाला वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान) इस प्रकार है - มาตุคาโม ปุริโส จ, อาเวณิกา ติธมฺโม จ ; โกธโน อุปนาหี จ, อิสฺสุกี มจฺฉเรน จ; อติจารี จ ทุสฺสีโล, อปฺปสฺสุโต จ กุสีโต; มุฏฺฐสฺสติ ปญฺจเวรํ, กณฺหปกฺเข ปกาสิโต. स्त्री और पुरुष, आवेणिक और तीन धर्म; क्रोधी, उपनाही, ईर्ष्यालु और कंजूस; अतिचारी और दुस्सीली, अल्पश्रुत और आलसी; स्मृतिहीन और पाँच वैर - ये कृष्ण पक्ष में प्रकाशित किए गए हैं। ๒. ทุติยเปยฺยาลวคฺโค २. द्वितीय पेयाला वर्ग ๑. อกฺโกธนสุตฺตํ १. अक्कोधन सुत्त (अक्रोधी सुत्त) ๒๙๔. อถ โข อายสฺมา อนุรุทฺโธ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อนุรุทฺโธ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธาหํ, ภนฺเต, มาตุคามํ ปสฺสามิ ทิพฺเพน จกฺขุนา วิสุทฺเธน อติกฺกนฺตมานุสเกน [Pg.441] กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺตํ. กตีหิ นุ โข, ภนฺเต, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชตี’’ติ? २९४. तब आयुष्मान अनुरुद्ध जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे। पहुँचकर... एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान अनुरुद्ध ने भगवान से यह कहा— 'भन्ते! यहाँ मैं दिव्य चक्षु से, जो विशुद्ध है और मनुष्यों की दृष्टि से परे है, स्त्रियों को शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते देखता हूँ। भन्ते! कितने धर्मों से युक्त स्त्री शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होती है?' ‘‘ปญฺจหิ โข, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? สทฺโธ จ โหติ, หิริมา จ โหติ, โอตฺตปฺปี จ โหติ, อกฺโกธโน จ โหติ, ปญฺญวา จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชตี’’ติ. ปฐมํ. “हे अनुरुद्ध! पाँच धर्मों से युक्त स्त्री शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होती है। वे पाँच कौन से हैं? वह श्रद्धालु होती है, लज्जावान (ह्री-युक्त) होती है, ओत्तप्प (पाप-भीरुता) युक्त होती है, अक्रोधी होती है, और प्रज्ञावान होती है—हे अनुरुद्ध! इन पाँच धर्मों से युक्त स्त्री शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होती है।” प्रथम। ๒. อนุปนาหีสุตฺตํ २. अनुपनाही सुत्त ๒๙๕. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? สทฺโธ จ โหติ, หิริมา จ โหติ, โอตฺตปฺปี จ โหติ, อนุปนาหี จ โหติ, ปญฺญวา จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชตี’’ติ. ทุติยํ. २९५. “हे अनुरुद्ध! पाँच धर्मों से युक्त स्त्री शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होती है। वे पाँच कौन से हैं? वह श्रद्धालु होती है, लज्जावान होती है, ओत्तप्प युक्त होती है, बैर न रखने वाली (अनुपनाही) होती है, और प्रज्ञावान होती है—हे अनुरुद्ध! इन पाँच धर्मों से युक्त स्त्री शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होती है।” द्वितीय। ๓. อนิสฺสุกีสุตฺตํ ३. अनिस्सुकी सुत्त ๒๙๖. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? สทฺโธ จ โหติ, หิริมา จ โหติ, โอตฺตปฺปี จ โหติ, อนิสฺสุกี จ โหติ, ปญฺญวา จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชตี’’ติ. ตติยํ. २९६. “हे अनुरुद्ध! पाँच धर्मों से युक्त स्त्री शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होती है। वे पाँच कौन से हैं? वह श्रद्धालु होती है, लज्जावान होती है, ओत्तप्प युक्त होती है, ईर्ष्या न करने वाली (अनिस्सुकी) होती है, और प्रज्ञावान होती है... (शेष पूर्ववत)।” तृतीय। ๔. อมจฺฉรีสุตฺตํ ४. अमच्छरी सुत्त ๒๙๗. อมจฺฉรี จ โหติ, ปญฺญวา จ โหติ…เป…. จตุตฺถํ. २९७. वह मत्सर-रहित (अमच्छरी) होती है और प्रज्ञावान होती है... (शेष पूर्ववत)। चतुर्थ। ๕. อนติจารีสุตฺตํ ५. अनतिचारी सुत्त ๒๙๘. อนติจารี จ โหติ, ปญฺญวา จ โหติ…เป…. ปญฺจมํ. २९८. वह व्यभिचार न करने वाली (अनतिचारी) होती है और प्रज्ञावान होती है... (शेष पूर्ववत)। पञ्चम। ๖. สุสีลสุตฺตํ ६. सुसील सुत्त ๒๙๙. สีลวา จ โหติ, ปญฺญวา จ โหติ…เป…. ฉฏฺฐํ. २९९. वह शीलवान होती है और प्रज्ञावान होती है... (शेष पूर्ववत)। छठा। ๗. พหุสฺสุตสุตฺตํ ७. बहुस्सुत सुत्त ๓๐๐. พหุสฺสุโต [Pg.442] จ โหติ, ปญฺญวา จ โหติ…เป…. สตฺตมํ. ३००. वह बहुश्रुत होती है और प्रज्ञावान होती है... (शेष पूर्ववत)। सातवाँ। ๘. อารทฺธวีริยสุตฺตํ ८. आरद्धवीरिय सुत्त ๓๐๑. อารทฺธวีริโย จ โหติ, ปญฺญวา จ โหติ…เป…. อฏฺฐมํ. ३०१. वह वीर्यवान (उद्यमी) होती है और प्रज्ञावान होती है... (शेष पूर्ववत)। आठवाँ। ๙. อุปฏฺฐิตสฺสติสุตฺตํ ९. उपट्टितस्सति सुत्त ๓๐๒. ‘‘อุปฏฺฐิตสฺสติ จ โหติ, ปญฺญวา จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชตี’’ติ. นวมํ. ३०२. “वह स्मृतिवान (उपस्थित-स्मृति) होती है और प्रज्ञावान होती है—हे अनुरुद्ध! इन पाँच धर्मों से युक्त स्त्री शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होती है।” नौवाँ। อิเม อฏฺฐ สุตฺตนฺตสงฺเขปา. ये आठ संक्षिप्त सुत्त हैं। ๑๐. ปญฺจสีลสุตฺตํ १०. पञ्चसील सुत्त ๓๐๓. ‘‘ปญฺจหิ, อนุรุทฺธ, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? ปาณาติปาตา ปฏิวิรโต จ โหติ, อทินฺนาทานา ปฏิวิรโต จ โหติ, กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรโต จ โหติ, มุสาวาทา ปฏิวิรโต จ โหติ, สุราเมรยมชฺชปฺปมาทฏฺฐานา ปฏิวิรโต จ โหติ – อิเมหิ โข, อนุรุทฺธ, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชตี’’ติ. ทสมํ. ३०३. “हे अनुरुद्ध! पाँच धर्मों से युक्त स्त्री शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होती है। वे पाँच कौन से हैं? वह प्राणातिपात (जीव-हत्या) से विरत होती है, अदत्तादान (चोरी) से विरत होती है, काम-मिथ्याचार से विरत होती है, मृषावाद (झूठ) से विरत होती है, और सुरा-मेरय-मज्ज-प्रमादस्थान (नशा) से विरत होती है—हे अनुरुद्ध! इन पाँच धर्मों से युक्त स्त्री शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होती है।” दसवाँ। ทุติยเปยฺยาลวคฺโค. द्वितीय पेय्याल वग्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान) इस प्रकार है— ทุติเย จ อกฺโกธโน, อนุปนาหี อนิสฺสุกี; อมจฺฉรี อนติจารี, สีลวา จ พหุสฺสุโต; วีริยํ สติ สีลญฺจ, สุกฺกปกฺเข ปกาสิโต. दूसरे (वग्ग) में अक्रोधी, अनुपनाही (बैर-रहित), अनिस्सुकी (ईर्ष्या-रहित), अमच्छरी (मत्सर-रहित), अनतिचारी (व्यभिचार-रहित), शीलवान, बहुश्रुत, वीर्य, स्मृति और पञ्चसील—इन शुक्ल पक्ष के धर्मों को प्रकाशित किया गया है। ๓. พลวคฺโค ३. बल वग्ग ๑. วิสารทสุตฺตํ १. विसारद सुत्त ๓๐๔. ‘‘ปญฺจิมานิ[Pg.443], ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส พลานิ. กตมานิ ปญฺจ? รูปพลํ, โภคพลํ, ญาติพลํ, ปุตฺตพลํ, สีลพลํ – อิมานิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ มาตุคามสฺส พลานิ. อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจหิ พเลหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม วิสารโท อคารํ อชฺฌาวสตี’’ติ. ปฐมํ. ३०४. “भिक्षुओं! स्त्री के ये पाँच बल हैं। कौन से पाँच? रूप-बल, भोग-बल (सम्पत्ति), ज्ञाति-बल (सम्बन्धी), पुत्र-बल, और शील-बल—भिक्षुओं! ये ही स्त्री के पाँच बल हैं। भिक्षुओं! इन पाँच बलों से युक्त स्त्री निर्भय (विसारद) होकर घर में निवास करती है।” प्रथम। ๒. ปสยฺหสุตฺตํ २. पसह्य सुत्त ๓๐๕. ‘‘ปญฺจิมานิ, ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส พลานิ. กตมานิ ปญฺจ? รูปพลํ, โภคพลํ, ญาติพลํ, ปุตฺตพลํ, สีลพลํ – อิมานิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ มาตุคามสฺส พลานิ. อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจหิ พเลหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม สามิกํ ปสยฺห อคารํ อชฺฌาวสตี’’ติ. ทุติยํ. ३०५. “भिक्षुओं! स्त्री के ये पाँच बल हैं। कौन से पाँच? रूप-बल, भोग-बल, ज्ञाति-बल, पुत्र-बल, और शील-बल—भिक्षुओं! ये ही स्त्री के पाँच बल हैं। भिक्षुओं! इन पाँच बलों से युक्त स्त्री पति को वश में करके (दबाकर) घर में निवास करती है।” द्वितीय। ๓. อภิภุยฺยสุตฺตํ ३. अभिभुय्य सुत्त ๓๐๖. ‘‘ปญฺจิมานิ, ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส พลานิ. กตมานิ ปญฺจ? รูปพลํ, โภคพลํ, ญาติพลํ, ปุตฺตพลํ, สีลพลํ – อิมานิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ มาตุคามสฺส พลานิ. อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจหิ พเลหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม สามิกํ อภิภุยฺย วตฺตตี’’ติ. ตติยํ. ३०६. “भिक्षुओं! स्त्री के ये पाँच बल हैं। कौन से पाँच? रूप-बल, भोग-बल, ज्ञाति-बल, पुत्र-बल, और शील-बल—भिक्षुओं! ये ही स्त्री के पाँच बल हैं। भिक्षुओं! इन पाँच बलों से युक्त स्त्री पति को अभिभूत करके (दबाकर) रहती है।” तृतीय। ๔. เอกสุตฺตํ ४. एक सुत्त ๓๐๗. ‘‘เอเกน จ โข, ภิกฺขเว, พเลน สมนฺนาคโต ปุริโส มาตุคามํ อภิภุยฺย วตฺตติ. กตเมน เอเกน พเลน? อิสฺสริยพเลน อภิภูตํ มาตุคามํ เนว รูปพลํ ตายติ, น โภคพลํ ตายติ, น ญาติพลํ ตายติ, น ปุตฺตพลํ ตายติ, น สีลพลํ ตายตี’’ติ. จตุตฺถํ. ३०७. "भिक्षुओं! केवल एक बल से संपन्न पुरुष स्त्री को अभिभूत (वश में) कर लेता है। वह एक बल कौन सा है? आधिपत्य का बल (ऐश्वर्य बल)। आधिपत्य के बल से अभिभूत स्त्री की न तो रूप-बल रक्षा करता है, न भोग-बल (धन-बल), न ज्ञाति-बल (सगे-संबंधी), न पुत्र-बल और न ही शील-बल रक्षा करता है।" चौथा। ๕. องฺคสุตฺตํ ५. अंग सुत्त ๓๐๘. ‘‘ปญฺจิมานิ, ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส พลานิ. กตมานิ ปญฺจ? รูปพลํ, โภคพลํ, ญาติพลํ, ปุตฺตพลํ, สีลพลํ. รูปพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, น จ โภคพเลน – เอวํ โส เตนงฺเคน อปริปูโร โหติ. ยโต จ โข, ภิกฺขเว, มาตุคาโม รูปพเลน จ สมนฺนาคโต โหติ, โภคพเลน จ – เอวํ โส เตนงฺเคน ปริปูโร โหติ. รูปพเลน [Pg.444] จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, โภคพเลน จ, น จ ญาติพเลน – เอวํ โส เตนงฺเคน อปริปูโร โหติ. ยโต จ โข, ภิกฺขเว, มาตุคาโม รูปพเลน จ สมนฺนาคโต โหติ, โภคพเลน จ, ญาติพเลน จ – เอวํ โส เตนงฺเคน ปริปูโร โหติ. รูปพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, โภคพเลน จ, ญาติพเลน จ, น จ ปุตฺตพเลน – เอวํ โส เตนงฺเคน อปริปูโร โหติ. ยโต จ โข, ภิกฺขเว, มาตุคาโม รูปพเลน จ สมนฺนาคโต โหติ, โภคพเลน จ, ญาติพเลน จ, ปุตฺตพเลน จ – เอวํ โส เตนงฺเคน ปริปูโร โหติ. รูปพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, โภคพเลน จ, ญาติพเลน จ, ปุตฺตพเลน จ, น จ สีลพเลน – เอวํ โส เตนงฺเคน อปริปูโร โหติ. ยโต จ โข, ภิกฺขเว, มาตุคาโม รูปพเลน จ สมนฺนาคโต โหติ, โภคพเลน จ, ญาติพเลน จ, ปุตฺตพเลน จ, สีลพเลน จ – เอวํ โส เตนงฺเคน ปริปูโร โหติ. อิมานิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ มาตุคามสฺส พลานี’’ติ. ปญฺจมํ. ३०८. "भिक्षुओं! स्त्री के ये पाँच बल हैं। कौन से पाँच? रूप-बल, भोग-बल, ज्ञाति-बल, पुत्र-बल और शील-बल। भिक्षुओं! यदि स्त्री रूप-बल से संपन्न हो, किंतु भोग-बल से नहीं, तो वह उस अंग से अपूर्ण होती है। भिक्षुओं! जब स्त्री रूप-बल और भोग-बल दोनों से संपन्न होती है, तब वह उस अंग से पूर्ण होती है। भिक्षुओं! यदि स्त्री रूप-बल और भोग-बल से संपन्न हो, किंतु ज्ञाति-बल से नहीं, तो वह उस अंग से अपूर्ण होती है। भिक्षुओं! जब स्त्री रूप-बल, भोग-बल और ज्ञाति-बल से संपन्न होती है, तब वह उस अंग से पूर्ण होती है। भिक्षुओं! यदि स्त्री रूप-बल, भोग-बल और ज्ञाति-बल से संपन्न हो, किंतु पुत्र-बल से नहीं, तो वह उस अंग से अपूर्ण होती है। भिक्षुओं! जब स्त्री रूप-बल, भोग-बल, ज्ञाति-बल और पुत्र-बल से संपन्न होती है, तब वह उस अंग से पूर्ण होती है। भिक्षुओं! यदि स्त्री रूप-बल, भोग-बल, ज्ञाति-बल और पुत्र-बल से संपन्न हो, किंतु शील-बल से नहीं, तो वह उस अंग से अपूर्ण होती है। भिक्षुओं! जब स्त्री रूप-बल, भोग-बल, ज्ञाति-बल, पुत्र-बल और शील-बल—इन पाँचों से संपन्न होती है, तब वह उस अंग से पूर्ण होती है। भिक्षुओं! ये ही स्त्री के पाँच बल हैं।" पाँचवाँ। ๖. นาเสนฺติสุตฺตํ ६. नासेन्ति सुत्त ๓๐๙. ‘‘ปญฺจิมานิ, ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส พลานิ. กตมานิ ปญฺจ? รูปพลํ, โภคพลํ, ญาติพลํ, ปุตฺตพลํ, สีลพลํ. รูปพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, น จ สีลพเลน, นาเสนฺเตว นํ, กุเล น วาเสนฺติ. รูปพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, โภคพเลน จ, น จ สีลพเลน, นาเสนฺเตว นํ, กุเล น วาเสนฺติ. รูปพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, โภคพเลน จ, ญาติพเลน จ, น จ สีลพเลน, นาเสนฺเตว นํ, กุเล น วาเสนฺติ. รูปพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, โภคพเลน จ, ญาติพเลน จ, ปุตฺตพเลน จ, น จ สีลพเลน, นาเสนฺเตว นํ, กุเล น วาเสนฺติ. สีลพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, น จ รูปพเลน, วาเสนฺเตว นํ, กุเล น นาเสนฺติ. สีลพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, น จ โภคพเลน, วาเสนฺเตว นํ, กุเล น นาเสนฺติ. สีลพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, น จ ญาติพเลน, วาเสนฺเตว นํ, กุเล น นาเสนฺติ. สีลพเลน จ, ภิกฺขเว, มาตุคาโม สมนฺนาคโต โหติ, น จ ปุตฺตพเลน, วาเสนฺเตว นํ, กุเล น นาเสนฺติ. อิมานิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ มาตุคามสฺส พลานี’’ติ. ฉฏฺฐํ. ३०९. "भिक्षुओं! स्त्री के ये पाँच बल हैं। कौन से पाँच? रूप-बल, भोग-बल, ज्ञाति-बल, पुत्र-बल और शील-बल। भिक्षुओं! यदि स्त्री रूप-बल से संपन्न हो, किंतु शील-बल से नहीं, तो उसे कुल (परिवार) से निकाल दिया जाता है, उसे रहने नहीं दिया जाता। भिक्षुओं! यदि स्त्री रूप-बल और भोग-बल से संपन्न हो, किंतु शील-बल से नहीं, तो उसे कुल से निकाल दिया जाता है, उसे रहने नहीं दिया जाता। भिक्षुओं! यदि स्त्री रूप-बल, भोग-बल और ज्ञाति-बल से संपन्न हो, किंतु शील-बल से नहीं, तो उसे कुल से निकाल दिया जाता है, उसे रहने नहीं दिया जाता। भिक्षुओं! यदि स्त्री रूप-बल, भोग-बल, ज्ञाति-बल और पुत्र-बल से संपन्न हो, किंतु शील-बल से नहीं, तो उसे कुल से निकाल दिया जाता है, उसे रहने नहीं दिया जाता। भिक्षुओं! यदि स्त्री शील-बल से संपन्न हो, भले ही वह रूप-बल से संपन्न न हो, तो उसे कुल में रहने दिया जाता है, उसे निकाला नहीं जाता। भिक्षुओं! यदि स्त्री शील-बल से संपन्न हो, भले ही वह भोग-बल से संपन्न न हो, तो उसे कुल में रहने दिया जाता है, उसे निकाला नहीं जाता। भिक्षुओं! यदि स्त्री शील-बल से संपन्न हो, भले ही वह ज्ञाति-बल से संपन्न न हो, तो उसे कुल में रहने दिया जाता है, उसे निकाला नहीं जाता। भिक्षुओं! यदि स्त्री शील-बल से संपन्न हो, भले ही वह पुत्र-बल से संपन्न न हो, तो उसे कुल में रहने दिया जाता है, उसे निकाला नहीं जाता। भिक्षुओं! ये ही स्त्री के पाँच बल हैं।" छठा। ๗. เหตุสุตฺตํ ७. हेतु सुत्त ๓๑๐. ‘‘ปญฺจิมานิ[Pg.445], ภิกฺขเว, มาตุคามสฺส พลานิ. กตมานิ ปญฺจ? รูปพลํ, โภคพลํ, ญาติพลํ, ปุตฺตพลํ, สีลพลํ. น, ภิกฺขเว, มาตุคาโม รูปพลเหตุ วา โภคพลเหตุ วา ญาติพลเหตุ วา ปุตฺตพลเหตุ วา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. สีลพลเหตุ โข, ภิกฺขเว, มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. อิมานิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ มาตุคามสฺส พลานี’’ติ. สตฺตมํ. ३१०. "भिक्षुओं! स्त्री के ये पाँच बल हैं। कौन से पाँच? रूप-बल, भोग-बल, ज्ञाति-बल, पुत्र-बल और शील-बल। भिक्षुओं! स्त्री रूप-बल के कारण, या भोग-बल के कारण, या ज्ञाति-बल के कारण, या पुत्र-बल के कारण, शरीर छूटने के बाद, मृत्यु के उपरांत सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न नहीं होती। भिक्षुओं! स्त्री शील-बल के कारण ही शरीर छूटने के बाद, मृत्यु के उपरांत सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होती है। भिक्षुओं! ये ही स्त्री के पाँच बल हैं।" सातवाँ। ๘. ฐานสุตฺตํ ८. ठान सुत्त ๓๑๑. ‘‘ปญฺจิมานิ, ภิกฺขเว, ฐานานิ ทุลฺลภานิ อกตปุญฺเญน มาตุคาเมน. กตมานิ ปญฺจ? ปติรูเป กุเล ชาเยยฺยนฺติ – อิทํ, ภิกฺขเว, ปฐมํ ฐานํ ทุลฺลภํ อกตปุญฺเญน มาตุคาเมน. ปติรูเป กุเล ชายิตฺวา ปติรูปํ กุลํ คจฺเฉยฺยนฺติ – อิทํ, ภิกฺขเว, ทุติยํ ฐานํ ทุลฺลภํ อกตปุญฺเญน มาตุคาเมน. ปติรูเป กุเล ชายิตฺวา, ปติรูปํ กุลํ คนฺตฺวา, อสปตฺติ อคารํ อชฺฌาวเสยฺยนฺติ – อิทํ, ภิกฺขเว, ตติยํ ฐานํ ทุลฺลภํ อกตปุญฺเญน มาตุคาเมน. ปติรูเป กุเล ชายิตฺวา, ปติรูปํ กุลํ คนฺตฺวา, อสปตฺติ อคารํ อชฺฌาวสนฺตี ปุตฺตวตี อสฺสนฺติ – อิทํ, ภิกฺขเว, จตุตฺถํ ฐานํ ทุลฺลภํ อกตปุญฺเญน มาตุคาเมน. ปติรูเป กุเล ชายิตฺวา, ปติรูปํ กุลํ คนฺตฺวา, อสปตฺติ อคารํ อชฺฌาวสนฺตี ปุตฺตวตี สมานา สามิกํ อภิภุยฺย วตฺเตยฺยนฺติ – อิทํ, ภิกฺขเว, ปญฺจมํ ฐานํ ทุลฺลภํ อกตปุญฺเญน มาตุคาเมน. อิมานิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ ฐานานิ ทุลฺลภานิ อกตปุญฺเญน มาตุคาเมนาติ. ३११. "भिक्षुओं! पुण्य न करने वाली स्त्री के लिए ये पाँच बातें दुर्लभ हैं। कौन सी पाँच? 'मैं उपयुक्त कुल में जन्म लूँ'—यह पहली बात पुण्यहीन स्त्री के लिए दुर्लभ है। 'उपयुक्त कुल में जन्म लेकर उपयुक्त कुल (ससुराल) में जाऊँ'—यह दूसरी बात पुण्यहीन स्त्री के लिए दुर्लभ है। 'उपयुक्त कुल में जन्म लेकर, उपयुक्त कुल में जाकर, बिना सौत (प्रतिद्वंद्वी) के घर में रहूँ'—यह तीसरी बात पुण्यहीन स्त्री के लिए दुर्लभ है। 'उपयुक्त कुल में जन्म लेकर, उपयुक्त कुल में जाकर, बिना सौत के घर में रहते हुए पुत्रवती होऊँ'—यह चौथी बात पुण्यहीन स्त्री के लिए दुर्लभ है। 'उपयुक्त कुल में जन्म लेकर, उपयुक्त कुल में जाकर, बिना सौत के घर में रहते हुए पुत्रवती होकर पति को वश में रखकर (प्रभावित कर) रहूँ'—यह पाँचवीं बात पुण्यहीन स्त्री के लिए दुर्लभ है। भिक्षुओं! पुण्य न करने वाली स्त्री के लिए ये पाँच बातें दुर्लभ हैं।" ‘‘ปญฺจิมานิ, ภิกฺขเว, ฐานานิ สุลภานิ กตปุญฺเญน มาตุคาเมน. กตมานิ ปญฺจ? ปติรูเป กุเล ชาเยยฺยนฺติ – อิทํ, ภิกฺขเว, ปฐมํ ฐานํ สุลภํ กตปุญฺเญน มาตุคาเมน. ปติรูเป กุเล ชายิตฺวา ปติรูปํ กุลํ คจฺเฉยฺยนฺติ – อิทํ, ภิกฺขเว, ทุติยํ ฐานํ สุลภํ กตปุญฺเญน มาตุคาเมน. ปติรูเป กุเล ชายิตฺวา ปติรูปํ กุลํ คนฺตฺวา อสปตฺติ อคารํ อชฺฌาวเสยฺยนฺติ – อิทํ, ภิกฺขเว, ตติยํ ฐานํ สุลภํ กตปุญฺเญน มาตุคาเมน. ปติรูเป กุเล ชายิตฺวา ปติรูปํ กุลํ คนฺตฺวา อสปตฺติ อคารํ อชฺฌาวสนฺตี ปุตฺตวตี อสฺสนฺติ – อิทํ, ภิกฺขเว, จตุตฺถํ ฐานํ สุลภํ กตปุญฺเญน มาตุคาเมน. ปติรูเป กุเล ชายิตฺวา ปติรูปํ กุลํ คนฺตฺวา อสปตฺติ อคารํ อชฺฌาวสนฺตี [Pg.446] ปุตฺตวตี สมานา สามิกํ อภิภุยฺย วตฺเตยฺยนฺติ – อิทํ, ภิกฺขเว, ปญฺจมํ ฐานํ สุลภํ กตปุญฺเญน มาตุคาเมน. อิมานิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจ ฐานานิ สุลภานิ กตปุญฺเญน มาตุคาเมนา’’ติ. อฏฺฐมํ. “भिक्षुओं, पुण्य करने वाली स्त्री के लिए ये पाँच बातें सुलभ (आसानी से प्राप्त होने वाली) होती हैं। कौन सी पाँच? 'मैं एक उपयुक्त कुल में जन्म लूँ' - भिक्षुओं, पुण्य करने वाली स्त्री के लिए यह पहली बात सुलभ है। 'उपयुक्त कुल में जन्म लेकर मैं एक उपयुक्त कुल (ससुराल) में जाऊँ' - भिक्षुओं, पुण्य करने वाली स्त्री के लिए यह दूसरी बात सुलभ है। 'उपयुक्त कुल में जन्म लेकर और उपयुक्त कुल में जाकर मैं बिना किसी सौत (प्रतिद्वंद्वी) के घर में रहूँ' - भिक्षुओं, पुण्य करने वाली स्त्री के लिए यह तीसरी बात सुलभ है। 'उपयुक्त कुल में जन्म लेकर, उपयुक्त कुल में जाकर और बिना सौत के घर में रहते हुए मैं पुत्रवती (संतान वाली) होऊँ' - भिक्षुओं, पुण्य करने वाली स्त्री के लिए यह चौथी बात सुलभ है। 'उपयुक्त कुल में जन्म लेकर, उपयुक्त कुल में जाकर, बिना सौत के घर में रहते हुए और पुत्रवती होकर मैं पति पर प्रभाव रखते हुए (अभिभूत कर) रहूँ' - भिक्षुओं, पुण्य करने वाली स्त्री के लिए यह पाँचवीं बात सुलभ है। भिक्षुओं, पुण्य करने वाली स्त्री के लिए ये पाँच बातें सुलभ होती हैं।” आठवाँ। ๙. ปญฺจสีลวิสารทสุตฺตํ ९. पञ्चशील विसारद सुत्त ๓๑๒. ‘‘ปญฺจหิ, ภิกฺขเว, ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม วิสารโท อคารํ อชฺฌาวสติ. กตเมหิ ปญฺจหิ? ปาณาติปาตา ปฏิวิรโต จ โหติ, อทินฺนาทานา ปฏิวิรโต จ โหติ, กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรโต จ โหติ, มุสาวาทา ปฏิวิรโต จ โหติ, สุราเมรยมชฺชปฺปมาทฏฺฐานา ปฏิวิรโต จ โหติ – อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม วิสารโท อคารํ อชฺฌาวสตี’’ติ. นวมํ. ३१२. “भिक्षुओं, पाँच धर्मों से युक्त स्त्री आत्मविश्वास के साथ (निर्भय होकर) घर में रहती है। किन पाँच से? वह प्राणातिपात (हिंसा) से विरत होती है, अदत्तादान (चोरी) से विरत होती है, काम-मिथ्याचार से विरत होती है, मृषावाद (झूठ) से विरत होती है, और सुरा-मेरय-मज्ज-प्रमादस्थान (नशीले पदार्थों के सेवन) से विरत होती है - भिक्षुओं, इन पाँच धर्मों से युक्त स्त्री आत्मविश्वास के साथ घर में रहती है।” नवाँ। ๑๐. วฑฺฒีสุตฺตํ १०. वड्ढी सुत्त (वृद्धि सुत्त) ๓๑๓. ‘‘ปญฺจหิ, ภิกฺขเว, วฑฺฒีหิ วฑฺฒมานา อริยสาวิกา อริยาย วฑฺฒิยา วฑฺฒติ สาราทายินี จ โหติ วราทายินี จ กายสฺส. กตเมหิ ปญฺจหิ? สทฺธาย วฑฺฒติ, สีเลน วฑฺฒติ, สุเตน วฑฺฒติ, จาเคน วฑฺฒติ, ปญฺญาย วฑฺฒติ – อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจหิ วฑฺฒีหิ วฑฺฒมานา อริยสาวิกา อริยาย วฑฺฒิยา วฑฺฒติ, สาราทายินี จ โหติ, วราทายินี จ กายสฺสา’’ติ. ३१३. “भिक्षुओं, पाँच वृद्धियों से बढ़ने वाली आर्या श्राविका आर्य वृद्धि से बढ़ती है और वह शरीर के लिए सार (उत्तम फल) और वर (अभीष्ट) प्राप्त करने वाली होती है। किन पाँच से? वह श्रद्धा से बढ़ती है, शील से बढ़ती है, श्रुत (ज्ञान) से बढ़ती है, त्याग से बढ़ती है, और प्रज्ञा से बढ़ती है - भिक्षुओं, इन पाँच वृद्धियों से बढ़ने वाली आर्या श्राविका आर्य वृद्धि से बढ़ती है और वह शरीर के लिए सार और वर प्राप्त करने वाली होती है।” ‘‘สทฺธาย สีเลน จ ยาธ วฑฺฒติ,ปญฺญาย จาเคน สุเตน จูภยํ; สา ตาทิสี สีลวตี อุปาสิกา,อาทียติ สารมิเธว อตฺตโน’’ติ. ทสมํ; “जो यहाँ श्रद्धा, शील, प्रज्ञा, त्याग और श्रुत - इन दोनों (प्रकार के गुणों) से बढ़ती है, वैसी शीलवती उपासिका इसी जीवन में अपने लिए सार (जीवन का वास्तविक लाभ) ग्रहण करती है।” दसवाँ। พลวคฺโค ตติโย. बल वग्ग, तीसरा। ตสฺสุทฺทานํ – उसका उद्दान (विषय-सूची) - วิสารทา ปสยฺห อภิภุยฺย, เอกํ องฺเคน ปญฺจมํ; นาเสนฺติ เหตุ ฐานญฺจ, วิสารโท วฑฺฒินา ทสาติ. विसारदा, पसय्ह, अभिभुय्य, एक अङ्ग के साथ पाँचवाँ; नासेन्ति, हेतु, ठाण, विसारद और वड्ढी - ये दस (सुत्त) हैं। มาตุคามสํยุตฺตํ สมตฺตํ. मातुगाम संयुत्त समाप्त। ๔. ชมฺพุขาทกสํยุตฺตํ ४. जम्बुखादक संयुत्त ๑. นิพฺพานปญฺหาสุตฺตํ १. निर्वाण-प्रश्न सुत्त ๓๑๔. เอกํ [Pg.447] สมยํ อายสฺมา สาริปุตฺโต มคเธสุ วิหรติ นาลกคามเก. อถ โข ชมฺพุขาทโก ปริพฺพาชโก เยนายสฺมา สาริปุตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา สาริปุตฺเตน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ชมฺพุขาทโก ปริพฺพาชโก อายสฺมนฺตํ สาริปุตฺตํ เอตทโวจ – ३१४. एक समय आयुष्मान सारिपुत्र मगध देश के नालक गाँव में विहार कर रहे थे। तब जम्बुखादक परिव्राजक जहाँ आयुष्मान सारिपुत्र थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर आयुष्मान सारिपुत्र के साथ कुशल-क्षेम पूछा। आनंददायक और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए जम्बुखादक परिव्राजक ने आयुष्मान सारिपुत्र से यह कहा - ‘‘‘นิพฺพานํ, นิพฺพาน’นฺติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตมํ นุ โข, อาวุโส, นิพฺพาน’’นฺติ? ‘‘โย โข, อาวุโส, ราคกฺขโย โทสกฺขโย โมหกฺขโย – อิทํ วุจฺจติ นิพฺพาน’’นฺติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. ปฐมํ. “‘आवुस सारिपुत्र, निर्वाण, निर्वाण’ ऐसा कहा जाता है। आवुस, निर्वाण क्या है?” “आवुस, जो राग का क्षय है, द्वेष का क्षय है, मोह का क्षय है - इसे निर्वाण कहा जाता है।” “आवुस, क्या इस निर्वाण के साक्षात्कार के लिए कोई मार्ग है, कोई प्रतिपदा (पद्धति) है?” “आवुस, इस निर्वाण के साक्षात्कार के लिए मार्ग है, प्रतिपदा है।” “आवुस, वह मार्ग कौन सा है, वह प्रतिपदा कौन सी है?” “आवुस, इस निर्वाण के साक्षात्कार के लिए यही आर्य अष्टांगिक मार्ग है, जैसे कि - सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि। आवुस, यही वह मार्ग है, यही वह प्रतिपदा है इस निर्वाण के साक्षात्कार के लिए।” “आवुस, इस निर्वाण के साक्षात्कार के लिए मार्ग कल्याणकारी है, प्रतिपदा कल्याणकारी है। और आवुस सारिपुत्र, अप्रमाद (जागरूकता) के लिए यह पर्याप्त और उचित ही है।” पहला। ๒. อรหตฺตปญฺหาสุตฺตํ २. अरहत्व-प्रश्न सुत्त ๓๑๕. ‘‘‘อรหตฺตํ, อรหตฺต’นฺติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตมํ นุ โข, อาวุโส, อรหตฺต’’นฺติ? ‘‘โย โข, อาวุโส, ราคกฺขโย โทสกฺขโย โมหกฺขโย – อิทํ วุจฺจติ อรหตฺต’’นฺติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา เอตสฺส อรหตฺตสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา เอตสฺส อรหตฺตสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. ‘‘กตโม [Pg.448] ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา เอตสฺส อรหตฺตสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เอตสฺส อรหตฺตสฺส สจฺฉิกิริยาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข อาวุโส, มคฺโค, อยํ ปฏิปทา เอตสฺส อรหตฺตสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา เอตสฺส อรหตฺตสฺส สจฺฉิกิริยาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. ทุติยํ. ३१५. “‘आवुस सारिपुत्र, अरहत्व, अरहत्व’ ऐसा कहा जाता है। आवुस, अरहत्व क्या है?” “आवुस, जो राग का क्षय है, द्वेष का क्षय है, मोह का क्षय है - इसे अरहत्व कहा जाता है।” “आवुस, क्या इस अरहत्व के साक्षात्कार के लिए कोई मार्ग है, कोई प्रतिपदा है?” “आवुस, इस अरहत्व के साक्षात्कार के लिए मार्ग है, प्रतिपदा है।” “आवुस, वह मार्ग कौन सा है, वह प्रतिपदा कौन सी है?” “आवुस, इस अरहत्व के साक्षात्कार के लिए यही आर्य अष्टांगिक मार्ग है, जैसे कि - सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि। आवुस, यही वह मार्ग है, यही वह प्रतिपदा है इस अरहत्व के साक्षात्कार के लिए।” “आवुस, इस अरहत्व के साक्षात्कार के लिए मार्ग कल्याणकारी है, प्रतिपदा कल्याणकारी है। और आवुस सारिपुत्र, अप्रमाद के लिए यह पर्याप्त और उचित ही है।” दूसरा। ๓. ธมฺมวาทีปญฺหาสุตฺตํ ३. धम्मवादी-प्रश्न सुत्त ๓๑๖. ‘‘เก นุ โข, อาวุโส สาริปุตฺต, โลเก ธมฺมวาทิโน, เก โลเก สุปฺปฏิปนฺนา, เก โลเก สุคตา’’ติ? ‘‘เย โข, อาวุโส, ราคปฺปหานาย ธมฺมํ เทเสนฺติ, โทสปฺปหานาย ธมฺมํ เทเสนฺติ, โมหปฺปหานาย ธมฺมํ เทเสนฺติ, เต โลเก ธมฺมวาทิโน. เย โข, อาวุโส, ราคสฺส ปหานาย ปฏิปนฺนา, โทสสฺส ปหานาย ปฏิปนฺนา, โมหสฺส ปหานาย ปฏิปนฺนา, เต โลเก สุปฺปฏิปนฺนา. เยสํ โข, อาวุโส, ราโค ปหีโน อุจฺฉินฺนมูโล ตาลาวตฺถุกโต อนภาวงฺกโต อายตึ อนุปฺปาทธมฺโม, โทโส ปหีโน อุจฺฉินฺนมูโล ตาลาวตฺถุกโต อนภาวงฺกโต อายตึ อนุปฺปาทธมฺโม, โมโห ปหีโน อุจฺฉินฺนมูโล ตาลาวตฺถุกโต อนภาวงฺกโต อายตึ อนุปฺปาทธมฺโม, เต โลเก สุคตา’’ติ. ३१६. “हे आयुष्मान सारिपुत्र! लोक में धर्मवादी कौन हैं? लोक में सुप्रतिपन्न (भली-भाँति आचरण करने वाले) कौन हैं? लोक में सुगत (भली-भाँति जाने वाले) कौन हैं?” “हे आयुष्मान! जो राग के प्रहाण (त्याग) के लिए धर्म का उपदेश देते हैं, द्वेष के प्रहाण के लिए धर्म का उपदेश देते हैं, मोह के प्रहाण के लिए धर्म का उपदेश देते हैं, वे लोक में धर्मवादी हैं। हे आयुष्मान! जो राग के प्रहाण के लिए प्रतिपन्न (अभ्यासरत) हैं, द्वेष के प्रहाण के लिए प्रतिपन्न हैं, मोह के प्रहाण के लिए प्रतिपन्न हैं, वे लोक में सुप्रतिपन्न हैं। हे आयुष्मान! जिनके राग प्रहीण (नष्ट) हो गए हैं, समूल उच्छिन्न हो गए हैं, कटे हुए ताड़ के वृक्ष के समान (पुनः न उगने वाले) हो गए हैं, अभाव को प्राप्त हो गए हैं और भविष्य में पुनः उत्पन्न न होने वाले स्वभाव के हो गए हैं; जिनके द्वेष प्रहीण हो गए हैं... जिनके मोह प्रहीण हो गए हैं, समूल उच्छिन्न हो गए हैं, कटे हुए ताड़ के वृक्ष के समान हो गए हैं, अभाव को प्राप्त हो गए हैं और भविष्य में पुनः उत्पन्न न होने वाले स्वभाव के हो गए हैं, वे लोक में सुगत हैं।” ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา เอตสฺส ราคสฺส โทสสฺส โมหสฺส ปหานายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา เอตสฺส ราคสฺส โทสสฺส โมหสฺส ปหานายา’’ติ. ‘‘กตโม, ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา เอตสฺส ราคสฺส โทสสฺส โมหสฺส ปหานายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เอตสฺส ราคสฺส โทสสฺส โมหสฺส ปหานาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา เอตสฺส ราคสฺส โทสสฺส โมหสฺส ปหานายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอตสฺส ราคสฺส โทสสฺส โมหสฺส ปหานาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. ตติยํ. “हे आयुष्मान! क्या इस राग, द्वेष और मोह के प्रहाण के लिए कोई मार्ग है, कोई प्रतिपदा (पद्धति) है?” “हे आयुष्मान! इस राग, द्वेष और मोह के प्रहाण के लिए मार्ग है, प्रतिपदा है।” “हे आयुष्मान! वह मार्ग कौन सा है, वह प्रतिपदा कौन सी है?” “हे आयुष्मान! इस राग, द्वेष और मोह के प्रहाण के लिए यही आर्य अष्टांगिक मार्ग है, जैसे कि—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि। हे आयुष्मान! यही वह मार्ग है, यही वह प्रतिपदा है।” “हे आयुष्मान! इस राग, द्वेष और मोह के प्रहाण के लिए मार्ग कल्याणकारी है, प्रतिपदा कल्याणकारी है। हे आयुष्मान सारिपुत्र! अप्रमाद के लिए यह पर्याप्त और उचित ही है।” तीसरा सूत्र। ๔. กิมตฺถิยสุตฺตํ ४. किमत्थिय सुत्त ๓๑๗. ‘‘กิมตฺถิยํ[Pg.449], อาวุโส สาริปุตฺต, สมเณ โคตเม พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’’ติ? ‘‘ทุกฺขสฺส โข, อาวุโส, ปริญฺญตฺถํ ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา เอตสฺส ทุกฺขสฺส ปริญฺญายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตสฺส ทุกฺขสฺส ปริญฺญายา’’ติ? ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอตสฺส ทุกฺขสฺส ปริญฺญายา’’ติ? ३१७. “हे आयुष्मान सारिपुत्र! श्रमण गौतम के पास किस प्रयोजन के लिए ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है?” “हे आयुष्मान! दुःख के परिज्ञान (पूर्ण ज्ञान) के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है।” “हे आयुष्मान! क्या इस दुःख के परिज्ञान के लिए कोई मार्ग है, कोई प्रतिपदा है?” “हे आयुष्मान! इस दुःख के परिज्ञान के लिए मार्ग है, प्रतिपदा है।” “हे आयुष्मान! वह मार्ग कौन सा है, वह प्रतिपदा कौन सी है?” ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอตสฺส ทุกฺขสฺส ปริญฺญาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา เอตสฺส ทุกฺขสฺส ปริญฺญายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอตสฺส ทุกฺขสฺส ปริญฺญาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. จตุตฺถํ. “हे आयुष्मान! इस दुःख के परिज्ञान के लिए यही आर्य अष्टांगिक मार्ग है, जैसे कि—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि। हे आयुष्मान! यही वह मार्ग है, यही वह प्रतिपदा है।” “हे आयुष्मान! इस दुःख के परिज्ञान के लिए मार्ग कल्याणकारी है, प्रतिपदा कल्याणकारी है। हे आयुष्मान सारिपुत्र! अप्रमाद के लिए यह पर्याप्त और उचित ही है।” चौथा सूत्र। ๕. อสฺสาสปฺปตฺตสุตฺตํ ५. अस्सासप्पत्त सुत्त ๓๑๘. ‘‘‘อสฺสาสปฺปตฺโต, อสฺสาสปฺปตฺโต’ติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, อาวุโส, อสฺสาสปฺปตฺโต โหตี’’ติ? ‘‘ยโต โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ ปชานาติ, เอตฺตาวตา โข, อาวุโส, อสฺสาสปฺปตฺโต โหตี’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตสฺส อสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตสฺส อสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอตสฺส อสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เอตสฺส อสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอตสฺส อสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอตสฺส อสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. ปญฺจมํ. ३१८. “‘आश्वास-प्राप्त, आश्वास-प्राप्त’ ऐसा कहा जाता है, हे आयुष्मान सारिपुत्र! कितने से (किस सीमा तक) आश्वास-प्राप्त होता है?” “हे आयुष्मान! जब भिक्षु छह स्पर्श-आयतनों के उदय, अस्त, स्वाद, दोष और निस्सरण (मुक्ति) को यथाभूत (जैसा है वैसा) जान लेता है, हे आयुष्मान! इतने से ही वह आश्वास-प्राप्त होता है।” “हे आयुष्मान! क्या इस आश्वास के साक्षात्कार के लिए कोई मार्ग है, कोई प्रतिपदा है?” “हे आयुष्मान! इस आश्वास के साक्षात्कार के लिए मार्ग है, प्रतिपदा है।” “हे आयुष्मान! वह मार्ग कौन सा है, वह प्रतिपदा कौन सी है?” “हे आयुष्मान! इस आश्वास के साक्षात्कार के लिए यही आर्य अष्टांगिक मार्ग है, जैसे कि—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि। हे आयुष्मान! यही वह मार्ग है, यही वह प्रतिपदा है।” “हे आयुष्मान! इस आश्वास के साक्षात्कार के लिए मार्ग कल्याणकारी है, प्रतिपदा कल्याणकारी है। हे आयुष्मान सारिपुत्र! अप्रमाद के लिए यह पर्याप्त और उचित ही है।” पाँचवाँ सूत्र। ๖. ปรมสฺสาสปฺปตฺตสุตฺตํ ६. परमस्सासप्पत्त सुत्त ๓๑๙. ‘‘‘ปรมสฺสาสปฺปตฺโต, ปรมสฺสาสปฺปตฺโต’ติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, อาวุโส, ปรมสฺสาสปฺปตฺโต โหตี’’ติ? ‘‘ยโต [Pg.450] โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ วิทิตฺวา อนุปาทาวิมุตฺโต โหติ, เอตฺตาวตา โข, อาวุโส, ปรมสฺสาสปฺปตฺโต โหตี’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตสฺส ปรมสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตสฺส ปรมสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. ‘‘กตโม ปน, อาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอตสฺส ปรมสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เอตสฺส ปรมสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอตสฺส ปรมสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอตสฺส ปรมสฺสาสสฺส สจฺฉิกิริยาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. ฉฏฺฐํ. ३१९. “‘परम आश्वास-प्राप्त, परम आश्वास-प्राप्त’ ऐसा कहा जाता है, हे आयुष्मान सारिपुत्र! कितने से परम आश्वास-प्राप्त होता है?” “हे आयुष्मान! जब भिक्षु छह स्पर्श-आयतनों के उदय, अस्त, स्वाद, दोष और निस्सरण को यथाभूत जानकर, बिना किसी उपादान (आसक्ति) के विमुक्त हो जाता है, हे आयुष्मान! इतने से ही वह परम आश्वास-प्राप्त होता है।” “हे आयुष्मान! क्या इस परम आश्वास के साक्षात्कार के लिए कोई मार्ग है, कोई प्रतिपदा है?” “हे आयुष्मान! इस परम आश्वास के साक्षात्कार के लिए मार्ग है, प्रतिपदा है।” “हे आयुष्मान! वह मार्ग कौन सा है, वह प्रतिपदा कौन सी है?” “हे आयुष्मान! इस परम आश्वास के साक्षात्कार के लिए यही आर्य अष्टांगिक मार्ग है, जैसे कि—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि। हे आयुष्मान! यही वह मार्ग है, यही वह प्रतिपदा है।” “हे आयुष्मान! इस परम आश्वास के साक्षात्कार के लिए मार्ग कल्याणकारी है, प्रतिपदा कल्याणकारी है। हे आयुष्मान सारिपुत्र! अप्रमाद के लिए यह पर्याप्त और उचित ही है।” छठा सूत्र। ๗. เวทนาปญฺหาสุตฺตํ ७. वेदनापञ्हा सुत्त ๓๒๐. ‘‘‘เวทนา, เวทนา’ติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตมา นุ โข, อาวุโส, เวทนา’’ติ? ‘‘ติสฺโส อิมาวุโส, เวทนา. กตมา ติสฺโส? สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา – อิมา โข, อาวุโส, ติสฺโส เวทนา’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตาสํ ติสฺสนฺนํ เวทนานํ ปริญฺญายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตาสํ ติสฺสนฺนํ เวทนานํ ปริญฺญายา’’ติ. ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอตาสํ ติสฺสนฺนํ เวทนานํ ปริญฺญายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอตาสํ ติสฺสนฺนํ เวทนานํ ปริญฺญาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอตาสํ ติสฺสนฺนํ เวทนานํ ปริญฺญายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอตาสํ ติสฺสนฺนํ เวทนานํ ปริญฺญาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. สตฺตมํ. ३२०. “आयुष्मान् सारिपुत्र! ‘वेदना, वेदना’ ऐसा कहा जाता है। आयुष्मान्! वेदना क्या है?” “आयुष्मान्! ये तीन वेदनाएँ हैं। कौन सी तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना और अदुःखमसुख वेदना—आयुष्मान्! ये ही तीन वेदनाएँ हैं।” “आयुष्मान्! क्या इन तीन वेदनाओं के पूर्ण ज्ञान के लिए कोई मार्ग है, कोई प्रतिपदा है?” “आयुष्मान्! इन तीन वेदनाओं के पूर्ण ज्ञान के लिए मार्ग है, प्रतिपदा है।” “आयुष्मान्! इन तीन वेदनाओं के पूर्ण ज्ञान के लिए वह मार्ग कौन सा है, वह प्रतिपदा कौन सी है?” “आयुष्मान्! इन तीन वेदनाओं के पूर्ण ज्ञान के लिए यही आर्य अष्टांगिक मार्ग है, जैसे कि—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि। आयुष्मान्! यही वह मार्ग है, यही वह प्रतिपदा है, इन तीन वेदनाओं के पूर्ण ज्ञान के लिए।” “आयुष्मान्! इन तीन वेदनाओं के पूर्ण ज्ञान के लिए मार्ग कल्याणकारी है, प्रतिपदा कल्याणकारी है। और आयुष्मान् सारिपुत्र! अप्रमाद के लिए यह पर्याप्त है।” सातवाँ। ๘. อาสวปญฺหาสุตฺตํ ८. आसवपञ्हा सुत्त ๓๒๑. ‘‘‘อาสโว, อาสโว’ติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตโม นุ โข, อาวุโส, อาสโว’’ติ? ‘‘ตโย เม, อาวุโส, อาสวา[Pg.451]. กามาสโว, ภวาสโว, อวิชฺชาสโว – อิเม โข, อาวุโส, ตโย อาสวา’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา เอเตสํ อาสวานํ ปหานายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา เอเตสํ อาสวานํ ปหานายา’’ติ. ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา เอเตสํ อาสวานํ ปหานายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เอเตสํ อาสวานํ ปหานาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอเตสํ อาสวานํ ปหานายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอเตสํ อาสวานํ ปหานาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. อฏฺฐมํ. ३२१. “आयुष्मान् सारिपुत्र! ‘आसव, आसव’ ऐसा कहा जाता है। आयुष्मान्! आसव क्या है?” “आयुष्मान्! ये तीन आसव हैं। कामासव, भवासव और अविद्यासव—आयुष्मान्! ये ही तीन आसव हैं।” “आयुष्मान्! क्या इन आसवों के प्रहाण के लिए कोई मार्ग है, कोई प्रतिपदा है?” “आयुष्मान्! इन आसवों के प्रहाण के लिए मार्ग है, प्रतिपदा है।” “आयुष्मान्! इन आसवों के प्रहाण के लिए वह मार्ग कौन सा है, वह प्रतिपदा कौन सी है?” “आयुष्मान्! इन आसवों के प्रहाण के लिए यही आर्य अष्टांगिक मार्ग है, जैसे कि—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि। आयुष्मान्! यही वह मार्ग है, यही वह प्रतिपदा है, इन आसवों के प्रहाण के लिए।” “आयुष्मान्! इन आसवों के प्रहाण के लिए मार्ग कल्याणकारी है, प्रतिपदा कल्याणकारी है। और आयुष्मान् सारिपुत्र! अप्रमाद के लिए यह पर्याप्त है।” आठवाँ। ๙. อวิชฺชาปญฺหาสุตฺตํ ९. अविद्यापञ्हा सुत्त ๓๒๒. ‘‘‘อวิชฺชา, อวิชฺชา’ติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตมา นุ โข, อาวุโส, อวิชฺชา’’ติ? ‘‘ยํ โข, อาวุโส, ทุกฺเข อญฺญาณํ, ทุกฺขสมุทเย อญฺญาณํ, ทุกฺขนิโรเธ อญฺญาณํ, ทุกฺขนิโรธคามินิยา ปฏิปทาย อญฺญาณํ – อยํ วุจฺจตาวุโส, อวิชฺชา’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอติสฺสา อวิชฺชาย ปหานายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอติสฺสา อวิชฺชาย ปหานายา’’ติ. ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอติสฺสา อวิชฺชาย ปหานายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอติสฺสา อวิชฺชาย ปหานาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอติสฺสา อวิชฺชาย ปหานายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอติสฺสา อวิชฺชาย ปหานาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. นวมํ. ३२२. “आयुष्मान् सारिपुत्र! ‘अविद्या, अविद्या’ ऐसा कहा जाता है। आयुष्मान्! अविद्या क्या है?” “आयुष्मान्! जो दुःख में अज्ञान है, दुःख-समुदय में अज्ञान है, दुःख-निरोध में अज्ञान है और दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपदा में अज्ञान है—आयुष्मान्! इसे ही अविद्या कहा जाता है।” “आयुष्मान्! क्या इस अविद्या के प्रहाण के लिए कोई मार्ग है, कोई प्रतिपदा है?” “आयुष्मान्! इस अविद्या के प्रहाण के लिए मार्ग है, प्रतिपदा है।” “आयुष्मान्! इस अविद्या के प्रहाण के लिए वह मार्ग कौन सा है, वह प्रतिपदा कौन सी है?” “आयुष्मान्! इस अविद्या के प्रहाण के लिए यही आर्य अष्टांगिक मार्ग है, जैसे कि—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि। आयुष्मान्! यही वह मार्ग है, यही वह प्रतिपदा है, इस अविद्या के प्रहाण के लिए।” “आयुष्मान्! इस अविद्या के प्रहाण के लिए मार्ग कल्याणकारी है, प्रतिपदा कल्याणकारी है। और आयुष्मान् सारिपुत्र! अप्रमाद के लिए यह पर्याप्त है।” नवाँ। ๑๐. ตณฺหาปญฺหาสุตฺตํ १०. तण्हापञ्हा सुत्त ๓๒๓. ‘‘‘ตณฺหา, ตณฺหา’ติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตมา นุ โข, อาวุโส, ตณฺหา’’ติ? ‘‘ติสฺโส อิมา, อาวุโส, ตณฺหา. กามตณฺหา, ภวตณฺหา, วิภวตณฺหา – อิมา โข, อาวุโส, ติสฺโส ตณฺหา’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตาสํ ตณฺหานํ ปหานายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตาสํ ตณฺหานํ ปหานายา’’ติ. ‘‘กตโม [Pg.452] ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอตาสํ ตณฺหานํ ปหานายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอตาสํ ตณฺหานํ ปหานาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอตาสํ ตณฺหานํ ปหานายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอตาสํ ตณฺหานํ ปหานาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. ทสมํ. ३२३. “आयुष्मान् सारिपुत्र! ‘तृष्णा, तृष्णा’ ऐसा कहा जाता है। आयुष्मान्! तृष्णा क्या है?” “आयुष्मान्! ये तीन तृष्णाएँ हैं। काम-तृष्णा, भव-तृष्णा और विभव-तृष्णा—आयुष्मान्! ये ही तीन तृष्णाएँ हैं।” “आयुष्मान्! क्या इन तृष्णाओं के प्रहाण के लिए कोई मार्ग है, कोई प्रतिपदा है?” “आयुष्मान्! इन तृष्णाओं के प्रहाण के लिए मार्ग है, प्रतिपदा है।” “आयुष्मान्! इन तृष्णाओं के प्रहाण के लिए वह मार्ग कौन सा है, वह प्रतिपदा कौन सी है?” “आयुष्मान्! इन तृष्णाओं के प्रहाण के लिए यही आर्य अष्टांगिक मार्ग है, जैसे कि—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि। आयुष्मान्! यही वह मार्ग है, यही वह प्रतिपदा है, इन तृष्णाओं के प्रहाण के लिए।” “आयुष्मान्! इन तृष्णाओं के प्रहाण के लिए मार्ग कल्याणकारी है, प्रतिपदा कल्याणकारी है। और आयुष्मान् सारिपुत्र! अप्रमाद के लिए यह पर्याप्त है।” दसवाँ। ๑๑. โอฆปญฺหาสุตฺตํ ११. ओघपञ्हा सुत्त ๓๒๔. ‘‘‘โอโฆ, โอโฆ’ติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตโม นุ โข, อาวุโส, โอโฆ’’ติ? ‘‘จตฺตาโรเม, อาวุโส, โอฆา. กาโมโฆ, ภโวโฆ, ทิฏฺโฐโฆ, อวิชฺโชโฆ – อิเม โข, อาวุโส, จตฺตาโร โอฆา’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอเตสํ โอฆานํ ปหานายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอเตสํ โอฆานํ ปหานายา’’ติ. ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอเตสํ โอฆานํ ปหานายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอเตสํ โอฆานํ ปหานาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอเตสํ โอฆานํ ปหานายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอเตสํ โอฆานํ ปหานาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. เอกาทสมํ. ३२४. ‘ओघ, ओघ’ ऐसा, आयुष्मान सारिपुत्र, कहा जाता है। आयुष्मान! ओघ क्या है? आयुष्मान! ये चार ओघ हैं—कामोघ, भवोघ, दिट्ठोघ और अविज्जोघ। आयुष्मान! ये ही चार ओघ हैं। आयुष्मान! क्या इन ओघों के प्रहाण के लिए कोई मार्ग है, कोई प्रतिपदा है? आयुष्मान! इन ओघों के प्रहाण के लिए मार्ग है, प्रतिपदा है। आयुष्मान! इन ओघों के प्रहाण के लिए वह मार्ग क्या है, वह प्रतिपदा क्या है? आयुष्मान! इन ओघों के प्रहाण के लिए यह आर्य अष्टांगिक मार्ग ही है, जैसे कि—सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक्, सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि। आयुष्मान! इन ओघों के प्रहाण के लिए यही मार्ग है, यही प्रतिपदा है। आयुष्मान! इन ओघों के प्रहाण के लिए मार्ग कल्याणकारी है, प्रतिपदा कल्याणकारी है। आयुष्मान सारिपुत्र! अप्रमाद के लिए यह पर्याप्त और उचित ही है। ग्यारहवाँ। ๑๒. อุปาทานปญฺหาสุตฺตํ १२. उपादान-प्रश्न सूत्र ๓๒๕. ‘‘‘อุปาทานํ, อุปาทาน’นฺติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตมํ นุ โข, อาวุโส, อุปาทาน’’นฺติ? ‘‘จตฺตาริมานิ, อาวุโส, อุปาทานานิ. กามุปาทานํ, ทิฏฺฐุปาทานํ สีลพฺพตุปาทานํ, อตฺตวาทุปาทานํ – อิมานิ โข, อาวุโส, จตฺตาริ อุปาทานานี’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอเตสํ อุปาทานานํ ปหานายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอเตสํ อุปาทานานํ ปหานายา’’ติ. ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอเตสํ อุปาทานานํ ปหานายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอเตสํ อุปาทานานํ ปหานาย, เสยฺยถิทํ [Pg.453] – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอเตสํ อุปาทานานํ ปหานายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอเตสํ อุปาทานานํ ปหานาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. ทฺวาทสมํ. ३२५. ‘उपादान, उपादान’ ऐसा, आयुष्मान सारिपुत्र, कहा जाता है। आयुष्मान! उपादान क्या है? आयुष्मान! ये चार उपादान हैं—कामुपादान, दिट्ठुपादान, सीलब्बतुपादान और अत्तवादुपादान। आयुष्मान! ये ही चार उपादान हैं। आयुष्मान! क्या इन उपादानों के प्रहाण के लिए कोई मार्ग है, कोई प्रतिपदा है? आयुष्मान! इन उपादानों के प्रहाण के लिए मार्ग है, प्रतिपदा है। आयुष्मान! इन उपादानों के प्रहाण के लिए वह मार्ग क्या है, वह प्रतिपदा क्या है? आयुष्मान! इन उपादानों के प्रहाण के लिए यह आर्य अष्टांगिक मार्ग ही है, जैसे कि—सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक्, सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि। आयुष्मान! इन उपादानों के प्रहाण के लिए यही मार्ग है, यही प्रतिपदा है। आयुष्मान! इन उपादानों के प्रहाण के लिए मार्ग कल्याणकारी है, प्रतिपदा कल्याणकारी है। आयुष्मान सारिपुत्र! अप्रमाद के लिए यह पर्याप्त और उचित ही है। बारहवाँ। ๑๓. ภวปญฺหาสุตฺตํ १३. भव-प्रश्न सूत्र ๓๒๖. ‘‘‘ภโว, ภโว’ติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตโม นุ โข, อาวุโส, ภโว’’ติ? ‘‘ตโย เม, อาวุโส, ภวา. กามภโว, รูปภโว, อรูปภโว – อิเม โข, อาวุโส, ตโย ภวา’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอเตสํ ภวานํ ปริญฺญายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอเตสํ ภวานํ ปริญฺญายา’’ติ. ‘‘กตโม, ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอเตสํ ภวานํ ปริญฺญายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอเตสํ ภวานํ ปริญฺญาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอเตสํ ภวานํ ปริญฺญายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอเตสํ ภวานํ ปริญฺญาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. เตรสมํ. ३२६. ‘भव, भव’ ऐसा, आयुष्मान सारिपुत्र, कहा जाता है। आयुष्मान! भव क्या है? आयुष्मान! ये तीन भव हैं—कामभव, रूपभव और अरूपभव। आयुष्मान! ये ही तीन भव हैं। आयुष्मान! क्या इन भवों के परिज्ञान के लिए कोई मार्ग है, कोई प्रतिपदा है? आयुष्मान! इन भवों के परिज्ञान के लिए मार्ग है, प्रतिपदा है। आयुष्मान! इन भवों के परिज्ञान के लिए वह मार्ग क्या है, वह प्रतिपदा क्या है? आयुष्मान! इन भवों के परिज्ञान के लिए यह आर्य अष्टांगिक मार्ग ही है, जैसे कि—सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक्, सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि। आयुष्मान! इन भवों के परिज्ञान के लिए यही मार्ग है, यही प्रतिपदा है। आयुष्मान! इन भवों के परिज्ञान के लिए मार्ग कल्याणकारी है, प्रतिपदा कल्याणकारी है। आयुष्मान सारिपुत्र! अप्रमाद के लिए यह पर्याप्त और उचित ही है। तेरहवाँ। ๑๔. ทุกฺขปญฺหาสุตฺตํ १४. दुःख-प्रश्न सूत्र ๓๒๗. ‘‘‘ทุกฺขํ, ทุกฺข’นฺติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตมํ นุ โข, อาวุโส, ทุกฺข’’นฺติ? ‘‘ติสฺโส อิมา, อาวุโส, ทุกฺขตา. ทุกฺขทุกฺขตา, สงฺขารทุกฺขตา, วิปริณามทุกฺขตา – อิมา โข, อาวุโส, ติสฺโส ทุกฺขตา’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตาสํ ทุกฺขตานํ ปริญฺญายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตาสํ ทุกฺขตานํ ปริญฺญายา’’ติ. ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอตาสํ ทุกฺขตานํ ปริญฺญายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอตาสํ ทุกฺขตานํ ปริญฺญาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอตาสํ ทุกฺขตานํ ปริญฺญายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอตาสํ ทุกฺขตานํ ปริญฺญาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. จุทฺทสมํ. ३२७. ‘दुःख, दुःख’ ऐसा, आयुष्मान सारिपुत्र, कहा जाता है। आयुष्मान! दुःख क्या है? आयुष्मान! ये तीन दुःखताएँ हैं—दुःख-दुःखता, संस्कार-दुःखता और विपरिणाम-दुःखता। आयुष्मान! ये ही तीन दुःखताएँ हैं। आयुष्मान! क्या इन दुःखताओं के परिज्ञान के लिए कोई मार्ग है, कोई प्रतिपदा है? आयुष्मान! इन दुःखताओं के परिज्ञान के लिए मार्ग है, प्रतिपदा है। आयुष्मान! इन दुःखताओं के परिज्ञान के लिए वह मार्ग क्या है, वह प्रतिपदा क्या है? आयुष्मान! इन दुःखताओं के परिज्ञान के लिए यह आर्य अष्टांगिक मार्ग ही है, जैसे कि—सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक्, सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि। आयुष्मान! इन दुःखताओं के परिज्ञान के लिए यही मार्ग है, यही प्रतिपदा है। आयुष्मान! इन दुःखताओं के परिज्ञान के लिए मार्ग कल्याणकारी है, प्रतिपदा कल्याणकारी है। आयुष्मान सारिपुत्र! अप्रमाद के लिए यह पर्याप्त और उचित ही है। चौदहवाँ। ๑๕. สกฺกายปญฺหาสุตฺตํ १५. सक्काय-प्रश्न सूत्र ๓๒๘. ‘‘‘สกฺกาโย[Pg.454], สกฺกาโย’ติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตโม นุ โข, อาวุโส, สกฺกาโย’’ติ? ‘‘ปญฺจิเม, อาวุโส, อุปาทานกฺขนฺธา สกฺกาโย วุตฺโต ภควตา, เสยฺยถิทํ – รูปุปาทานกฺขนฺโธ, เวทนุปาทานกฺขนฺโธ, สญฺญุปาทานกฺขนฺโธ, สงฺขารุปาทานกฺขนฺโธ, วิญฺญาณุปาทานกฺขนฺโธ. อิเม โข, อาวุโส, ปญฺจุปาทานกฺขนฺธา สกฺกาโย วุตฺโต ภควตา’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตสฺส สกฺกายสฺส ปริญฺญายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตสฺส สกฺกายสฺส ปริญฺญายา’’ติ. ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา, เอตสฺส สกฺกายสฺส ปริญฺญายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอตสฺส สกฺกายสฺส ปริญฺญาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอตสฺส สกฺกายสฺส ปริญฺญายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอตสฺส สกฺกายสฺส ปริญฺญาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. ปนฺนรสมํ. ३२८. "हे आयुष्मान सारिपुत्र! 'सत्काय, सत्काय' (सक्काय) ऐसा कहा जाता है। आयुष्मान! सत्काय क्या है?" "आयुष्मान! इन पाँच उपादान-स्कन्धों को भगवान ने सत्काय कहा है, जैसे कि—रूप-उपादान-स्कन्ध, वेदना-उपादान-स्कन्ध, संज्ञा-उपादान-स्कन्ध, संस्कार-उपादान-स्कन्ध और विज्ञान-उपादान-स्कन्ध। आयुष्मान! इन पाँच उपादान-स्कन्धों को ही भगवान ने सत्काय कहा है।" "आयुष्मान! क्या इस सत्काय के पूर्ण परिज्ञान (परिज्ञा) के लिए कोई मार्ग है, कोई प्रतिपदा है?" "आयुष्मान! इस सत्काय के पूर्ण परिज्ञान के लिए मार्ग है, प्रतिपदा है।" "आयुष्मान! वह मार्ग क्या है, वह प्रतिपदा क्या है?" "आयुष्मान! यह आर्य अष्टांगिक मार्ग ही इस सत्काय के पूर्ण परिज्ञान के लिए मार्ग है, जैसे कि—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाक्, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि। आयुष्मान! यही वह मार्ग है, यही वह प्रतिपदा है।" "आयुष्मान! इस सत्काय के पूर्ण परिज्ञान के लिए मार्ग कल्याणकारी है, प्रतिपदा कल्याणकारी है। आयुष्मान सारिपुत्र! अप्रमाद के लिए यह पर्याप्त और उचित ही है।" पन्द्रहवाँ (सूक्त)। ๑๖. ทุกฺกรปญฺหาสุตฺตํ १६. दुष्कर-प्रश्न सुत्त ๓๒๙. ‘‘กึ นุ โข, อาวุโส สาริปุตฺต, อิมสฺมึ ธมฺมวินเย ทุกฺกร’’นฺติ? ‘‘ปพฺพชฺชา โข, อาวุโส, อิมสฺมึ ธมฺมวินเย ทุกฺกรา’’ติ. ‘‘ปพฺพชิเตน ปนาวุโส, กึ ทุกฺกร’’นฺติ? ‘‘ปพฺพชิเตน โข, อาวุโส, อภิรติ ทุกฺกรา’’ติ. ‘‘อภิรเตน ปนาวุโส, กึ ทุกฺกร’’นฺติ? ‘‘อภิรเตน โข, อาวุโส, ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปตฺติ ทุกฺกรา’’ติ. ‘‘กีวจิรํ ปนาวุโส, ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺโน ภิกฺขุ อรหํ อสฺสา’’ติ? ‘‘นจิรํ, อาวุโส’’ติ. โสฬสมํ. ३२९. "हे आयुष्मान सारिपुत्र! इस धर्म-विनय में क्या दुष्कर (कठिन) है?" "आयुष्मान! इस धर्म-विनय में प्रव्रज्या दुष्कर है।" "आयुष्मान! प्रव्रजित व्यक्ति के लिए क्या दुष्कर है?" "आयुष्मान! प्रव्रजित व्यक्ति के लिए (प्रव्रज्या में) अभिरति (मन लगना) दुष्कर है।" "आयुष्मान! अभिरत व्यक्ति के लिए क्या दुष्कर है?" "आयुष्मान! अभिरत व्यक्ति के लिए धर्मानुकूल धर्म-प्रतिपत्ति (धम्मानुधम्मप्पटिपत्ति) दुष्कर है।" "आयुष्मान! धर्मानुकूल धर्म-प्रतिपत्ति में लगा हुआ भिक्षु कितने समय में अर्हत् हो जाता है?" "आयुष्मान! शीघ्र ही (अधिक समय नहीं लगता)।" सोलहवाँ (सूक्त)। ชมฺพุขาทกสํยุตฺตํ สมตฺตํ. जम्बुखादक-संयुत्त समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका उद्दान (विषय-सूची)— นิพฺพานํ อรหตฺตญฺจ, ธมฺมวาที กิมตฺถิยํ; อสฺสาโส ปรมสฺสาโส, เวทนา อาสวาวิชฺชา; ตณฺหา โอฆา อุปาทานํ, ภโว ทุกฺขญฺจ สกฺกาโย.อิมสฺมึ ธมฺมวินเย ทุกฺกรนฺติ. निर्वाण, अर्हत्त्व, धर्मवादी, किमत्थिय (किस प्रयोजन से), आश्वास, परम आश्वास, वेदना, आस्रव, अविद्या, तृष्णा, ओघ, उपादान, भव, दुःख और सत्काय। इस धर्म-विनय में दुष्कर—यही उद्दान है। ๕. สามณฺฑกสํยุตฺตํ ५. सामण्डक-संयुत्त ๑. สามณฺฑกสุตฺตํ १. सामण्डक सुत्त ๓๓๐. เอกํ [Pg.455] สมยํ อายสฺมา สาริปุตฺโต วชฺชีสุ วิหรติ อุกฺกเจลายํ คงฺคาย นทิยา ตีเร. อถ โข สามณฺฑโก ปริพฺพาชโก เยนายสฺมา สาริปุตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา สาริปุตฺเตน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข สามณฺฑโก ปริพฺพาชโก อายสฺมนฺตํ สาริปุตฺตํ เอตทโวจ – ३३०. एक समय आयुष्मान सारिपुत्र वज्जी देश में उक्कचेला नामक स्थान पर गंगा नदी के तट पर विहार कर रहे थे। तब सामण्डक परिव्राजक जहाँ आयुष्मान सारिपुत्र थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर आयुष्मान सारिपुत्र के साथ कुशल-क्षेम पूछा। संमोदनीय और स्मरणीय चर्चा समाप्त कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए सामण्डक परिव्राजक ने आयुष्मान सारिपुत्र से यह कहा— ‘‘‘นิพฺพานํ, นิพฺพาน’นฺติ, อาวุโส สาริปุตฺต, วุจฺจติ. กตมํ นุ โข, อาวุโส, นิพฺพาน’’นฺติ? ‘‘โย โข, อาวุโส, ราคกฺขโย โทสกฺขโย โมหกฺขโย – อิทํ วุจฺจติ นิพฺพาน’’นฺติ. ‘‘อตฺถิ ปนาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ? ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, มคฺโค อตฺถิ ปฏิปทา, เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. "हे आयुष्मान सारिपुत्र! 'निर्वाण, निर्वाण' ऐसा कहा जाता है। आयुष्मान! निर्वाण क्या है?" "आयुष्मान! जो राग का क्षय है, द्वेष का क्षय है, मोह का क्षय है—इसे निर्वाण कहा जाता है।" "आयुष्मान! क्या इस निर्वाण के साक्षात्कार के लिए कोई मार्ग है, कोई प्रतिपदा है?" "आयुष्मान! इस निर्वाण के साक्षात्कार के लिए मार्ग है, प्रतिपदा है।" ‘‘กตโม ปนาวุโส, มคฺโค กตมา ปฏิปทา เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ? ‘‘อยเมว โข, อาวุโส, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยาย, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อยํ โข, อาวุโส, มคฺโค อยํ ปฏิปทา, เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. ‘‘ภทฺทโก, อาวุโส, มคฺโค ภทฺทิกา ปฏิปทา, เอตสฺส นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยาย. อลญฺจ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อปฺปมาทายา’’ติ. ปฐมํ. "आयुष्मान! वह मार्ग क्या है, वह प्रतिपदा क्या है, इस निर्वाण के साक्षात्कार के लिए?" "आयुष्मान! यह आर्य अष्टांगिक मार्ग ही इस निर्वाण के साक्षात्कार के लिए मार्ग है, जैसे कि—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाक्, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि। आयुष्मान! यही वह मार्ग है, यही वह प्रतिपदा है, इस निर्वाण के साक्षात्कार के लिए।" "आयुष्मान! इस निर्वाण के साक्षात्कार के लिए मार्ग कल्याणकारी है, प्रतिपदा कल्याणकारी है। आयुष्मान सारिपुत्र! अप्रमाद के लिए यह पर्याप्त और उचित ही है।" पहला (सूक्त)। (ยถา ชมฺพุขาทกสํยุตฺตํ, ตถา วิตฺถาเรตพฺพํ). (जैसे जम्बुखादक-संयुत्त है, वैसे ही विस्तार करना चाहिए)। ๒. ทุกฺกรสุตฺตํ २. दुष्कर सुत्त ๓๓๑. ‘‘กึ [Pg.456] นุ โข, อาวุโส สาริปุตฺต, อิมสฺมึ ธมฺมวินเย ทุกฺกร’’นฺติ? ‘‘ปพฺพชฺชา โข, อาวุโส, อิมสฺมึ ธมฺมวินเย ทุกฺกรา’’ติ. ‘‘ปพฺพชิเตน ปนาวุโส, กึ ทุกฺกร’’นฺติ? ‘‘ปพฺพชิเตน โข, อาวุโส, อภิรติ ทุกฺกรา’’ติ. ‘‘อภิรเตน ปนาวุโส, กึ ทุกฺกร’’นฺติ? ‘‘อภิรเตน โข, อาวุโส, ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปตฺติ ทุกฺกรา’’ติ. ‘‘กีวจิรํ ปนาวุโส, ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺโน ภิกฺขุ อรหํ อสฺสา’’ติ? ‘‘นจิรํ, อาวุโส’’ติ. โสฬสมํ. ३३१. "हे आयुष्मान सारिपुत्र! इस धर्म-विनय में क्या दुष्कर है?" "आयुष्मान! इस धर्म-विनय में प्रव्रज्या दुष्कर है।" "आयुष्मान! प्रव्रजित व्यक्ति के लिए क्या दुष्कर है?" "आयुष्मान! प्रव्रजित व्यक्ति के लिए अभिरति दुष्कर है।" "आयुष्मान! अभिरत व्यक्ति के लिए क्या दुष्कर है?" "आयुष्मान! अभिरत व्यक्ति के लिए धर्मानुकूल धर्म-प्रतिपत्ति दुष्कर है।" "आयुष्मान! धर्मानुकूल धर्म-प्रतिपत्ति में लगा हुआ भिक्षु कितने समय में अर्हत् हो जाता है?" "आयुष्मान! शीघ्र ही।" सोलहवाँ (सूक्त)। (ปุริมกสทิสํ อุทฺทานํ.) (पहले के समान ही उद्दान है।) สามณฺฑกสํยุตฺตํ สมตฺตํ. सामण्डक-संयुत्त समाप्त। ๖. โมคฺคลฺลานสํยุตฺตํ ६. मोग्गल्लान-संयुत्त ๑. ปฐมฌานปญฺหาสุตฺตํ १. प्रथम-ध्यान-प्रश्न सुत्त ๓๓๒. เอกํ [Pg.457] สมยํ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. ตตฺร โข อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘อาวุโส, ภิกฺขเว’’ติ. ‘‘อาวุโส’’ติ โข เต ภิกฺขู อายสฺมโต มหาโมคฺคลฺลานสฺส ปจฺจสฺโสสุํ. อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – ३३२. एक समय आयुष्मान महामोग्गल्लान श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन विहार में विहार कर रहे थे। वहाँ आयुष्मान महामोग्गल्लान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— "आयुष्मान भिक्षुओं!" "आयुष्मान!" उन भिक्षुओं ने आयुष्मान महामोग्गल्लान को उत्तर दिया। आयुष्मान महामोग्गल्लान ने यह कहा— ‘‘อิธ มยฺหํ, อาวุโส, รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘ปฐมํ ฌานํ, ปฐมํ ฌาน’นฺติ วุจฺจติ. กตมํ นุ โข ปฐมํ ฌานนฺติ? ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, เอตทโหสิ – ‘อิธ ภิกฺขุ วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ วุจฺจติ ปฐมํ ฌาน’นฺติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, อิมินา วิหาเรน วิหรโต กามสหคตา สญฺญามนสิการา สมุทาจรนฺติ. "हे मित्रों, यहाँ एकांत में ध्यानमग्न मेरे मन में ऐसा विचार उत्पन्न हुआ— 'प्रथम ध्यान, प्रथम ध्यान' कहा जाता है। यह प्रथम ध्यान क्या है? तब हे मित्रों, मुझे यह विचार आया— 'यहाँ भिक्षु काम-भोगों से विलग होकर, अकुशल धर्मों से विलग होकर, वितर्क और विचार सहित, विवेक से उत्पन्न प्रीति और सुख वाले प्रथम ध्यान को प्राप्त कर विहार करता है। इसे प्रथम ध्यान कहा जाता है।' सो हे मित्रों, मैं काम-भोगों से विलग होकर, अकुशल धर्मों से विलग होकर, वितर्क और विचार सहित, विवेक से उत्पन्न प्रीति और सुख वाले प्रथम ध्यान को प्राप्त कर विहार कर रहा था। हे मित्रों, इस विहार से विहार करते हुए मुझे काम-भोगों से संबंधित संज्ञा और मनसिकार (विचार) हावी होने लगे।" ‘‘อถ โข มํ, อาวุโส, ภควา อิทฺธิยา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ – ‘โมคฺคลฺลาน, โมคฺคลฺลาน! มา, พฺราหฺมณ, ปฐมํ ฌานํ ปมาโท, ปฐเม ฌาเน จิตฺตํ สณฺฐเปหิ, ปฐเม ฌาเน จิตฺตํ เอโกทึ กโรหิ, ปฐเม ฌาเน จิตฺตํ สมาทหา’ติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, อปเรน สมเยน วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหาสึ. ยญฺหิ ตํ, อาวุโส, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘สตฺถารานุคฺคหิโต สาวโก มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’ติ, มมํ ตํ สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘สตฺถารานุคฺคหิโต สาวโก มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’’’ติ. ปฐมํ. "तब हे मित्रों, भगवान ने अपनी ऋद्धि से मेरे पास आकर यह कहा— 'मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मण, प्रथम ध्यान में प्रमाद मत करो, प्रथम ध्यान में चित्त को भली-भाँति स्थापित करो, प्रथम ध्यान में चित्त को एकाग्र करो, प्रथम ध्यान में चित्त को समाहित करो।' तब हे मित्रों, कुछ समय बाद मैं काम-भोगों से विलग होकर, अकुशल धर्मों से विलग होकर, वितर्क और विचार सहित, विवेक से उत्पन्न प्रीति और सुख वाले प्रथम ध्यान को प्राप्त कर विहार करने लगा। हे मित्रों, यदि कोई किसी के बारे में ठीक ही कहे कि 'शास्ता द्वारा अनुगृहीत श्रावक ने महान अभिज्ञा प्राप्त कर ली है', तो वह मेरे बारे में ही ठीक कहते हुए कहेगा कि 'शास्ता द्वारा अनुगृहीत श्रावक ने महान अभिज्ञा प्राप्त कर ली है'—प्रथम।" ๒. ทุติยฌานปญฺหาสุตฺตํ २. द्वितीय ध्यान प्रश्न सूत्र ๓๓๓. ‘‘‘ทุติยํ [Pg.458] ฌานํ, ทุติยํ ฌาน’นฺติ วุจฺจติ. กตมํ นุ โข ทุติยํ ฌานนฺติ? ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, เอตทโหสิ – ‘อิธ ภิกฺขุ วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา อชฺฌตฺตํ สมฺปสาทนํ เจตโส เอโกทิภาวํ อวิตกฺกํ อวิจารํ สมาธิชํ ปีติสุขํ ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ วุจฺจติ ทุติยํ ฌาน’นฺติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา อชฺฌตฺตํ สมฺปสาทนํ เจตโส เอโกทิภาวํ อวิตกฺกํ อวิจารํ สมาธิชํ ปีติสุขํ ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, อิมินา วิหาเรน วิหรโต วิตกฺกสหคตา สญฺญามนสิการา สมุทาจรนฺติ. ३३३. "'द्वितीय ध्यान, द्वितीय ध्यान' कहा जाता है। यह द्वितीय ध्यान क्या है? तब हे मित्रों, मुझे यह विचार आया— 'यहाँ भिक्षु वितर्क और विचार के शांत हो जाने पर, भीतर की प्रसन्नता और चित्त की एकाग्रता वाले, वितर्क-रहित, विचार-रहित, समाधि से उत्पन्न प्रीति और सुख वाले द्वितीय ध्यान को प्राप्त कर विहार करता है। इसे द्वितीय ध्यान कहा जाता है।' सो हे मित्रों, मैं वितर्क और विचार के शांत हो जाने पर, भीतर की प्रसन्नता और चित्त की एकाग्रता वाले, वितर्क-रहित, विचार-रहित, समाधि से उत्पन्न प्रीति और सुख वाले द्वितीय ध्यान को प्राप्त कर विहार कर रहा था। हे मित्रों, इस विहार से विहार करते हुए मुझे वितर्क से संबंधित संज्ञा और मनसिकार हावी होने लगे।" ‘‘อถ โข มํ, อาวุโส, ภควา อิทฺธิยา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ – ‘โมคฺคลฺลาน, โมคฺคลฺลาน! มา, พฺราหฺมณ, ทุติยํ ฌานํ ปมาโท, ทุติเย ฌาเน จิตฺตํ สณฺฐเปหิ, ทุติเย ฌาเน จิตฺตํ เอโกทึ กโรหิ, ทุติเย ฌาเน จิตฺตํ สมาทหา’ติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, อปเรน สมเยน วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา อชฺฌตฺตํ สมฺปสาทนํ เจตโส เอโกทิภาวํ อวิตกฺกํ อวิจารํ สมาธิชํ ปีติสุขํ ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหาสึ. ยญฺหิ ตํ, อาวุโส, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘สตฺถารานุคฺคหิโต สาวโก มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’ติ, มมํ ตํ สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘สตฺถารานุคฺคหิโต สาวโก มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’’’ติ. ทุติยํ. "तब हे मित्रों, भगवान ने अपनी ऋद्धि से मेरे पास आकर यह कहा— 'मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मण, द्वितीय ध्यान में प्रमाद मत करो, द्वितीय ध्यान में चित्त को भली-भाँति स्थापित करो, द्वितीय ध्यान में चित्त को एकाग्र करो, द्वितीय ध्यान में चित्त को समाहित करो।' तब हे मित्रों, कुछ समय बाद मैं वितर्क और विचार के शांत हो जाने पर, भीतर की प्रसन्नता और चित्त की एकाग्रता वाले, वितर्क-रहित, विचार-रहित, समाधि से उत्पन्न प्रीति और सुख वाले द्वितीय ध्यान को प्राप्त कर विहार करने लगा। हे मित्रों, यदि कोई किसी के बारे में ठीक ही कहे कि 'शास्ता द्वारा अनुगृहीत श्रावक ने महान अभिज्ञा प्राप्त कर ली है', तो वह मेरे बारे में ही ठीक कहते हुए कहेगा कि 'शास्ता द्वारा अनुगृहीत श्रावक ने महान अभिज्ञा प्राप्त कर ली है'—द्वितीय।" ๓. ตติยฌานปญฺหาสุตฺตํ ३. तृतीय ध्यान प्रश्न सूत्र ๓๓๔. ‘‘‘ตติยํ ฌานํ, ตติยํ ฌาน’นฺติ วุจฺจติ. กตมํ นุ โข ตติยํ ฌานนฺติ? ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, เอตทโหสิ – อิธ ภิกฺขุ ปีติยา จ วิราคา อุเปกฺขโก จ วิหรติ สโต จ สมฺปชาโน สุขญฺจ กาเยน ปฏิสํเวเทติ, ยํ ตํ อริยา อาจิกฺขนฺติ – ‘อุเปกฺขโก สติมา สุขวิหารี’ติ ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ วุจฺจติ ตติยํ ฌานนฺติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, ปีติยา จ วิราคา อุเปกฺขโก จ วิหรามิ สโต จ สมฺปชาโน สุขญฺจ กาเยน ปฏิสํเวเทมิ. ยํ ตํ อริยา อาจิกฺขนฺติ – ‘อุเปกฺขโก สติมา สุขวิหารี’ติ ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, อิมินา วิหาเรน วิหรโต ปีติสหคตา สญฺญามนสิการา สมุทาจรนฺติ. ३३४. "'तृतीय ध्यान, तृतीय ध्यान' कहा जाता है। यह तृतीय ध्यान क्या है? तब हे मित्रों, मुझे यह विचार आया— 'यहाँ भिक्षु प्रीति के प्रति भी विराग होने से उपेक्षावान होकर विहार करता है, और स्मृतिवान तथा संप्रजन्य होकर काया से सुख का अनुभव करता है, जिसके विषय में आर्य कहते हैं— "उपेक्षावान, स्मृतिवान और सुखपूर्वक विहार करने वाला", ऐसे तृतीय ध्यान को प्राप्त कर विहार करता है। इसे तृतीय ध्यान कहा जाता है।' सो हे मित्रों, मैं प्रीति के प्रति विराग होने से उपेक्षावान होकर विहार कर रहा था, और स्मृतिवान तथा संप्रजन्य होकर काया से सुख का अनुभव कर रहा था। जिसके विषय में आर्य कहते हैं— "उपेक्षावान, स्मृतिवान और सुखपूर्वक विहार करने वाला", ऐसे तृतीय ध्यान को प्राप्त कर मैं विहार कर रहा था। हे मित्रों, इस विहार से विहार करते हुए मुझे प्रीति से संबंधित संज्ञा और मनसिकार हावी होने लगे।" ‘‘อถ [Pg.459] โข มํ, อาวุโส, ภควา อิทฺธิยา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ – ‘โมคฺคลฺลาน, โมคฺคลฺลาน! มา, พฺราหฺมณ, ตติยํ ฌานํ ปมาโท, ตติเย ฌาเน จิตฺตํ สณฺฐเปหิ, ตติเย ฌาเน จิตฺตํ เอโกทึ กโรหิ, ตติเย ฌาเน จิตฺตํ สมาทหา’ติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, อปเรน สมเยน ปีติยา จ วิราคา อุเปกฺขโก จ วิหรามิ สโต จ สมฺปชาโน สุขญฺจ กาเยน ปฏิสํเวเทมิ, ยํ ตํ อริยา อาจิกฺขนฺติ – ‘อุเปกฺขโก สติมา สุขวิหารี’ติ ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหาสึ. ยญฺหิ ตํ อาวุโส สมฺมา วทมาโน วเทยฺย…เป… มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’’ติ. ตติยํ. "तब हे मित्रों, भगवान ने अपनी ऋद्धि से मेरे पास आकर यह कहा— 'मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मण, तृतीय ध्यान में प्रमाद मत करो, तृतीय ध्यान में चित्त को भली-भाँति स्थापित करो, तृतीय ध्यान में चित्त को एकाग्र करो, तृतीय ध्यान में चित्त को समाहित करो।' तब हे मित्रों, कुछ समय बाद मैं प्रीति के प्रति विराग होने से उपेक्षावान होकर विहार करने लगा, और स्मृतिवान तथा संप्रजन्य होकर काया से सुख का अनुभव करने लगा, जिसके विषय में आर्य कहते हैं— "उपेक्षावान, स्मृतिवान और सुखपूर्वक विहार करने वाला", ऐसे तृतीय ध्यान को प्राप्त कर मैं विहार करने लगा। हे मित्रों, यदि कोई किसी के बारे में ठीक ही कहे... महान अभिज्ञा प्राप्त कर ली है—तृतीय।" ๔. จตุตฺถฌานปญฺหาสุตฺตํ ४. चतुर्थ ध्यान प्रश्न सूत्र ๓๓๕. ‘‘‘จตุตฺถํ ฌานํ, จตุตฺถํ ฌาน’นฺติ วุจฺจติ. กตมํ นุ โข จตุตฺถํ ฌานนฺติ? ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, เอตทโหสิ – ‘อิธ ภิกฺขุ สุขสฺส จ ปหานา ทุกฺขสฺส จ ปหานา ปุพฺเพว โสมนสฺสโทมนสฺสานํ อตฺถงฺคมา อทุกฺขมสุขํ อุเปกฺขาสติปาริสุทฺธึ จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ วุจฺจติ จตุตฺถํ ฌาน’นฺติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, สุขสฺส จ ปหานา ทุกฺขสฺส จ ปหานา ปุพฺเพว โสมนสฺสโทมนสฺสานํ อตฺถงฺคมา อทุกฺขมสุขํ อุเปกฺขาสติปาริสุทฺธึ จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, อิมินา วิหาเรน วิหรโต สุขสหคตา สญฺญามนสิการา สมุทาจรนฺติ. ३३५. 'चतुर्थ ध्यान, चतुर्थ ध्यान' कहा जाता है। यह चतुर्थ ध्यान क्या है? हे आवुसो! तब मुझे यह विचार हुआ— 'यहाँ भिक्षु सुख और दुःख के प्रहाण से, तथा पहले ही सौमनस्य और दौर्मनस्य के अस्त हो जाने से, दुःख-सुख रहित, उपेक्षा के कारण स्मृति की शुद्धि वाले चतुर्थ ध्यान को प्राप्त कर विहार करता है। इसे चतुर्थ ध्यान कहा जाता है।' हे आवुसो! सो मैं सुख और दुःख के प्रहाण से, तथा पहले ही सौमनस्य और दौर्मनस्य के अस्त हो जाने से, दुःख-सुख रहित, उपेक्षा के कारण स्मृति की शुद्धि वाले चतुर्थ ध्यान को प्राप्त कर विहार करने लगा। हे आवुसो! उस विहार से विहार करते हुए मुझे सुख-सहगत संज्ञाएँ और मनसिकार अभिभूत करने लगे। ‘‘อถ โข มํ, อาวุโส, ภควา อิทฺธิยา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ – ‘โมคฺคลฺลาน, โมคฺคลฺลาน! มา, พฺราหฺมณ, จตุตฺถํ ฌานํ ปมาโท, จตุตฺเถ ฌาเน จิตฺตํ สณฺฐเปหิ, จตุตฺเถ ฌาเน จิตฺตํ เอโกทึ กโรหิ, จตุตฺเถ ฌาเน จิตฺตํ สมาทหา’ติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, อปเรน สมเยน สุขสฺส จ ปหานา ทุกฺขสฺส จ ปหานา ปุพฺเพว โสมนสฺสโทมนสฺสานํ อตฺถงฺคมา อทุกฺขมสุขํ อุเปกฺขาสติปาริสุทฺธึ จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหาสึ. ยญฺหิ ตํ, อาวุโส, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย…เป… มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’’ติ. จตุตฺถํ. तब हे आवुसो! भगवान ने अपनी ऋद्धि से मेरे पास आकर यह कहा— 'मोग्गल्लान! मोग्गल्लान! हे ब्राह्मण! चतुर्थ ध्यान में प्रमाद मत करो, चतुर्थ ध्यान में चित्त को स्थिर करो, चतुर्थ ध्यान में चित्त को एकाग्र करो, चतुर्थ ध्यान में चित्त को समाहित करो।' तब हे आवुसो! कुछ समय बाद मैं सुख और दुःख के प्रहाण से, तथा पहले ही सौमनस्य और दौर्मनस्य के अस्त हो जाने से, दुःख-सुख रहित, उपेक्षा के कारण स्मृति की शुद्धि वाले चतुर्थ ध्यान को प्राप्त कर विहार करने लगा। हे आवुसो! जिसे सम्यक् रूप से कहते हुए कोई कहे... (पे)... महा-अभिज्ञा को प्राप्त। चतुर्थ (सुत्त)। ๕. อากาสานญฺจายตนปญฺหาสุตฺตํ ५. आकासानञ्चायतन-प्रश्न सूत्र ๓๓๖. ‘‘‘อากาสานญฺจายตนํ, อากาสานญฺจายตน’นฺติ วุจฺจติ. กตมํ นุ โข อากาสานญฺจายตนนฺติ? ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, เอตทโหสิ – ‘อิธ [Pg.460] ภิกฺขุ สพฺพโส รูปสญฺญานํ สมติกฺกมา ปฏิฆสญฺญานํ อตฺถงฺคมา นานตฺตสญฺญานํ อมนสิการา อนนฺโต อากาโสติ อากาสานญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ วุจฺจติ อากาสานญฺจายตน’นฺติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, สพฺพโส รูปสญฺญานํ สมติกฺกมา ปฏิฆสญฺญานํ อตฺถงฺคมา นานตฺตสญฺญานํ อมนสิการา อนนฺโต อากาโสติ อากาสานญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, อิมินา วิหาเรน วิหรโต รูปสหคตา สญฺญามนสิการา สมุทาจรนฺติ. ३३६. 'आकासानञ्चायतन, आकासानञ्चायतन' कहा जाता है। यह आकासानञ्चायतन क्या है? हे आवुसो! तब मुझे यह विचार हुआ— 'यहाँ भिक्षु सर्वथा रूप-संज्ञाओं के अतिक्रमण से, प्रतिघ-संज्ञाओं के अस्त हो जाने से, नानात्व-संज्ञाओं को मन में न लाने से, 'आकाश अनन्त है' ऐसा (जानकर) आकासानञ्चायतन को प्राप्त कर विहार करता है। इसे आकासानञ्चायतन कहा जाता है।' हे आवुसो! सो मैं सर्वथा रूप-संज्ञाओं के अतिक्रमण से, प्रतिघ-संज्ञाओं के अस्त हो जाने से, नानात्व-संज्ञाओं को मन में न लाने से, 'आकाश अनन्त है' ऐसा (जानकर) आकासानञ्चायतन को प्राप्त कर विहार करने लगा। हे आवुसो! उस विहार से विहार करते हुए मुझे रूप-सहगत संज्ञाएँ और मनसिकार अभिभूत करने लगे। ‘‘อถ โข มํ, อาวุโส, ภควา อิทฺธิยา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ – ‘โมคฺคลฺลาน, โมคฺคลฺลาน! มา, พฺราหฺมณ, อากาสานญฺจายตนํ ปมาโท, อากาสานญฺจายตเน จิตฺตํ สณฺฐเปหิ, อากาสานญฺจายตเน จิตฺตํ เอโกทึ กโรหิ, อากาสานญฺจายตเน จิตฺตํ สมาทหา’ติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, อปเรน สมเยน สพฺพโส รูปสญฺญานํ สมติกฺกมา ปฏิฆสญฺญานํ อตฺถงฺคมา นานตฺตสญฺญานํ อมนสิการา อนนฺโต อากาโสติ อากาสานญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหาสึ. ยญฺหิ ตํ, อาวุโส, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย…เป… มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’’ติ. ปญฺจมํ. तब हे आवुसो! भगवान ने अपनी ऋद्धि से मेरे पास आकर यह कहा— 'मोग्गल्लान! मोग्गल्लान! हे ब्राह्मण! आकासानञ्चायतन में प्रमाद मत करो, आकासानञ्चायतन में चित्त को स्थिर करो, आकासानञ्चायतन में चित्त को एकाग्र करो, आकासानञ्चायतन में चित्त को समाहित करो।' तब हे आवुसो! कुछ समय बाद मैं सर्वथा रूप-संज्ञाओं के अतिक्रमण से, प्रतिघ-संज्ञाओं के अस्त हो जाने से, नानात्व-संज्ञाओं को मन में न लाने से, 'आकाश अनन्त है' ऐसा (जानकर) आकासानञ्चायतन को प्राप्त कर विहार करने लगा। हे आवुसो! जिसे सम्यक् रूप से कहते हुए कोई कहे... (पे)... महा-अभिज्ञा को प्राप्त। पाँचवाँ (सुत्त)। ๖. วิญฺญาณญฺจายตนปญฺหาสุตฺตํ ६. विञ्ञाणञ्चायतन-प्रश्न सूत्र ๓๓๗. ‘‘‘วิญฺญาณญฺจายตนํ, วิญฺญาณญฺจายตน’นฺติ วุจฺจติ. กตมํ นุ โข วิญฺญาณญฺจายตนนฺติ? ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, เอตทโหสิ – ‘อิธ ภิกฺขุ สพฺพโส อากาสานญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม อนนฺตํ วิญฺญาณนฺติ วิญฺญาณญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ วุจฺจติ วิญฺญาณญฺจายตน’นฺติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, สพฺพโส อากาสานญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม อนนฺตํ วิญฺญาณนฺติ วิญฺญาณญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, อิมินา วิหาเรน วิหรโต อากาสานญฺจายตนสหคตา สญฺญามนสิการา สมุทาจรนฺติ. ३३७. 'विञ्ञाणञ्चायतन, विञ्ञाणञ्चायतन' कहा जाता है। यह विञ्ञाणञ्चायतन क्या है? हे आवुसो! तब मुझे यह विचार हुआ— 'यहाँ भिक्षु सर्वथा आकासानञ्चायतन का अतिक्रमण कर 'विज्ञान अनन्त है' ऐसा (जानकर) विञ्ञाणञ्चायतन को प्राप्त कर विहार करता है। इसे विञ्ञाणञ्चायतन कहा जाता है।' हे आवुसो! सो मैं सर्वथा आकासानञ्चायतन का अतिक्रमण कर 'विज्ञान अनन्त है' ऐसा (जानकर) विञ्ञाणञ्चायतन को प्राप्त कर विहार करने लगा। हे आवुसो! उस विहार से विहार करते हुए मुझे आकासानञ्चायतन-सहगत संज्ञाएँ और मनसिकार अभिभूत करने लगे। ‘‘อถ โข มํ, อาวุโส, ภควา อิทฺธิยา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ – ‘โมคฺคลฺลาน, โมคฺคลฺลาน! มา, พฺราหฺมณ, วิญฺญาณญฺจายตนํ ปมาโท, วิญฺญาณญฺจายตเน จิตฺตํ สณฺฐเปหิ, วิญฺญาณญฺจายตเน จิตฺตํ เอโกทึ กโรหิ, วิญฺญาณญฺจายตเน จิตฺตํ สมาทหา’ติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, อปเรน สมเยน สพฺพโส อากาสานญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม อนนฺตํ วิญฺญาณนฺติ [Pg.461] วิญฺญาณญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหาสึ. ยญฺหิ ตํ, อาวุโส, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย…เป… มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’’ติ. ฉฏฺฐํ. तब हे आवुसो! भगवान ने अपनी ऋद्धि से मेरे पास आकर यह कहा— 'मोग्गल्लान! मोग्गल्लान! हे ब्राह्मण! विञ्ञाणञ्चायतन में प्रमाद मत करो, विञ्ञाणञ्चायतन में चित्त को स्थिर करो, विञ्ञाणञ्चायतन में चित्त को एकाग्र करो, विञ्ञाणञ्चायतन में चित्त को समाहित करो।' तब हे आवुसो! कुछ समय बाद मैं सर्वथा आकासानञ्चायतन का अतिक्रमण कर 'विज्ञान अनन्त है' ऐसा (जानकर) विञ्ञाणञ्चायतन को प्राप्त कर विहार करने लगा। हे आवुसो! जिसे सम्यक् रूप से कहते हुए कोई कहे... (पे)... महा-अभिज्ञा को प्राप्त। छठा (सुत्त)। ๗. อากิญฺจญฺญายตนปญฺหาสุตฺตํ ७. आकिञ्चञ्ञायतन-प्रश्न सूत्र ๓๓๘. ‘‘‘อากิญฺจญฺญายตนํ, อากิญฺจญฺญายตน’นฺติ วุจฺจติ. กตมํ นุ โข อากิญฺจญฺญายตนนฺติ? ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, เอตทโหสิ – ‘อิธ ภิกฺขุ สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม นตฺถิ กิญฺจีติ อากิญฺจญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ วุจฺจติ อากิญฺจญฺญายตน’นฺติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม นตฺถิ กิญฺจีติ อากิญฺจญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, อิมินา วิหาเรน วิหรโต วิญฺญาณญฺจายตนสหคตา สญฺญามนสิการา สมุทาจรนฺติ. ३३८. 'आकिञ्चञ्ञायतन, आकिञ्चञ्ञायतन' कहा जाता है। यह आकिञ्चञ्ञायतन क्या है? हे आवुसो! तब मुझे यह विचार हुआ— 'यहाँ भिक्षु सर्वथा विञ्ञाणञ्चायतन का अतिक्रमण कर 'कुछ भी नहीं है' ऐसा (जानकर) आकिञ्चञ्ञायतन को प्राप्त कर विहार करता है। इसे आकिञ्चञ्ञायतन कहा जाता है।' हे आवुसो! सो मैं सर्वथा विञ्ञाणञ्चायतन का अतिक्रमण कर 'कुछ भी नहीं है' ऐसा (जानकर) आकिञ्चञ्ञायतन को प्राप्त कर विहार करने लगा। हे आवुसो! उस विहार से विहार करते हुए मुझे विञ्ञाणञ्चायतन-सहगत संज्ञाएँ और मनसिकार अभिभूत करने लगे। ‘‘อถ โข มํ, อาวุโส, ภควา อิทฺธิยา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ – ‘โมคฺคลฺลาน, โมคฺคลฺลาน! มา, พฺราหฺมณ, อากิญฺจญฺญายตนํ ปมาโท, อากิญฺจญฺญายตเน จิตฺตํ สณฺฐเปหิ, อากิญฺจญฺญายตเน จิตฺตํ เอโกทึ กโรหิ, อากิญฺจญฺญายตเน จิตฺตํ สมาทหา’ติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, อปเรน สมเยน สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม นตฺถิ กิญฺจีติ อากิญฺจญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหาสึ. ยญฺหิ ตํ, อาวุโส, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย…เป… มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’’ติ. สตฺตมํ. तब, हे मित्रों, भगवान ने अपनी ऋद्धि से मेरे पास आकर मुझसे यह कहा— 'मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मण, अकिंचन्यायतन (शून्यता का आयतन) के प्रति प्रमाद मत करो, अकिंचन्यायतन में चित्त को भली-भांति स्थापित करो, अकिंचन्यायतन में चित्त को एकाग्र करो, अकिंचन्यायतन में चित्त को समाहित करो।' तब, हे मित्रों, कुछ समय बाद मैंने पूर्णतः विज्ञानानन्त्यायतन का अतिक्रमण कर 'कुछ भी नहीं है' इस प्रकार अकिंचन्यायतन को प्राप्त कर विहार किया। हे मित्रों, जिसे ठीक से कहते हुए कोई कहे... (वही) महान अभिज्ञा को प्राप्त हुआ है। सातवाँ सूत्र। ๘. เนวสญฺญานาสญฺญายตนปญฺหาสุตฺตํ ८. ८. नेवसञ्ञानासञ्ञायतन-प्रश्न सूत्र ๓๓๙. ‘‘‘เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ, เนวสญฺญานาสญฺญายตน’นฺติ วุจฺจติ. กตมํ นุ โข เนวสญฺญานาสญฺญายตนนฺติ? ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, เอตทโหสิ – ‘อิธ ภิกฺขุ สพฺพโส อากิญฺจญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ วุจฺจติ เนวสญฺญานาสญฺญายตน’นฺติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, สพฺพโส อากิญฺจญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, อิมินา วิหาเรน วิหรโต อากิญฺจญฺญายตนสหคตา สญฺญามนสิการา สมุทาจรนฺติ. ३३९. 'नेवसञ्ञानासञ्ञायतन, नेवसञ्ञानासञ्ञायतन' ऐसा कहा जाता है। यह नेवसञ्ञानासञ्ञायतन क्या है? तब, हे मित्रों, मुझे यह विचार आया— 'यहाँ भिक्षु पूर्णतः अकिंचन्यायतन का अतिक्रमण कर नेवसञ्ञानासञ्ञायतन को प्राप्त कर विहार करता है। इसे नेवसञ्ञानासञ्ञायतन कहा जाता है।' तब, हे मित्रों, मैं पूर्णतः अकिंचन्यायतन का अतिक्रमण कर नेवसञ्ञानासञ्ञायतन को प्राप्त कर विहार करने लगा। हे मित्रों, इस विहार से विहार करते हुए मुझे अकिंचन्यायतन से संबंधित संज्ञा और मनसिकार (विचार) उत्पन्न होने लगे। ‘‘อถ [Pg.462] โข มํ, อาวุโส, ภควา อิทฺธิยา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ – ‘โมคฺคลฺลาน, โมคฺคลฺลาน! มา, พฺราหฺมณ, เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ ปมาโท, เนวสญฺญานาสญฺญายตเน จิตฺตํ สณฺฐเปหิ, เนวสญฺญานาสญฺญายตเน จิตฺตํ เอโกทึ กโรหิ, เนวสญฺญานาสญฺญายตเน จิตฺตํ สมาทหา’ติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, อปเรน สมเยน สพฺพโส อากิญฺจญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหาสึ. ยญฺหิ ตํ, อาวุโส, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย…เป… มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’’ติ. อฏฺฐมํ. तब, हे मित्रों, भगवान ने अपनी ऋद्धि से मेरे पास आकर मुझसे यह कहा— 'मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मण, नेवसञ्ञानासञ्ञायतन के प्रति प्रमाद मत करो, नेवसञ्ञानासञ्ञायतन में चित्त को भली-भांति स्थापित करो, नेवसञ्ञानासञ्ञायतन में चित्त को एकाग्र करो, नेवसञ्ञानासञ्ञायतन में चित्त को समाहित करो।' तब, हे मित्रों, कुछ समय बाद मैंने पूर्णतः अकिंचन्यायतन का अतिक्रमण कर नेवसञ्ञानासञ्ञायतन को प्राप्त कर विहार किया। हे मित्रों, जिसे ठीक से कहते हुए कोई कहे... (वही) महान अभिज्ञा को प्राप्त हुआ है। आठवाँ सूत्र। ๙. อนิมิตฺตปญฺหาสุตฺตํ ९. ९. अनिमित्त-प्रश्न सूत्र ๓๔๐. ‘‘‘อนิมิตฺโต เจโตสมาธิ, อนิมิตฺโต เจโตสมาธี’ติ วุจฺจติ. กตโม นุ โข อนิมิตฺโต เจโตสมาธีติ? ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, เอตทโหสิ – ‘อิธ ภิกฺขุ สพฺพนิมิตฺตานํ อมนสิการา อนิมิตฺตํ เจโตสมาธึ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ วุจฺจติ อนิมิตฺโต เจโตสมาธี’ติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, สพฺพนิมิตฺตานํ อมนสิการา อนิมิตฺตํ เจโตสมาธึ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. ตสฺส มยฺหํ, อาวุโส, อิมินา วิหาเรน วิหรโต นิมิตฺตานุสาริ วิญฺญาณํ โหติ. ३४०. 'अनिमित्त चेतोसमाधि, अनिमित्त चेतोसमाधि' ऐसा कहा जाता है। यह अनिमित्त चेतोसमाधि क्या है? तब, हे मित्रों, मुझे यह विचार आया— 'यहाँ भिक्षु सभी निमित्तों (संकेतों) का मनसिकार न करने से अनिमित्त चेतोसमाधि को प्राप्त कर विहार करता है। इसे अनिमित्त चेतोसमाधि कहा जाता है।' तब, हे मित्रों, मैं सभी निमित्तों का मनसिकार न करने से अनिमित्त चेतोसमाधि को प्राप्त कर विहार करने लगा। हे मित्रों, इस विहार से विहार करते हुए मुझे निमित्तों का अनुसरण करने वाला विज्ञान (चेतना) उत्पन्न होने लगा। ‘‘อถ โข มํ, อาวุโส, ภควา อิทฺธิยา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ – ‘โมคฺคลฺลาน, โมคฺคลฺลาน! มา, พฺราหฺมณ, อนิมิตฺตํ เจโตสมาธึ ปมาโท, อนิมิตฺเต เจโตสมาธิสฺมึ จิตฺตํ สณฺฐเปหิ, อนิมิตฺเต เจโตสมาธิสฺมึ จิตฺตํ เอโกทึ กโรหิ, อนิมิตฺเต เจโตสมาธิสฺมึ จิตฺตํ สมาทหา’ติ. โส ขฺวาหํ, อาวุโส, อปเรน สมเยน สพฺพนิมิตฺตานํ อมนสิการา อนิมิตฺตํ เจโตสมาธึ อุปสมฺปชฺช วิหาสึ. ยญฺหิ ตํ, อาวุโส, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘สตฺถารานุคฺคหิโต สาวโก มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’ติ, มมํ ตํ สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘สตฺถารานุคฺคหิโต สาวโก มหาภิญฺญตํ ปตฺโต’’’ติ. นวมํ. तब, हे मित्रों, भगवान ने अपनी ऋद्धि से मेरे पास आकर मुझसे यह कहा— 'मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मण, अनिमित्त चेतोसमाधि के प्रति प्रमाद मत करो, अनिमित्त चेतोसमाधि में चित्त को भली-भांति स्थापित करो, अनिमित्त चेतोसमाधि में चित्त को एकाग्र करो, अनिमित्त चेतोसमाधि में चित्त को समाहित करो।' तब, हे मित्रों, कुछ समय बाद मैंने सभी निमित्तों का मनसिकार न करने से अनिमित्त चेतोसमाधि को प्राप्त कर विहार किया। हे मित्रों, जिसे ठीक से कहते हुए कोई कहे— 'शास्ता (बुद्ध) द्वारा अनुगृहीत श्रावक महान अभिज्ञा को प्राप्त हुआ है', तो वह मेरे बारे में ठीक से कहते हुए यही कहेगा— 'शास्ता द्वारा अनुगृहीत श्रावक महान अभिज्ञा को प्राप्त हुआ है'। नवाँ सूत्र। ๑๐. สกฺกสุตฺตํ १०. १०. सक्क सूत्र ๓๔๑. อถ โข อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน – เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย, ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย; เอวเมว – เชตวเน อนฺตรหิโต เทเวสุ ตาวตึเสสุ ปาตุรโหสิ[Pg.463]. อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท ปญฺจหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตํ โข สกฺกํ เทวานมินฺทํ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – ३४१. तब आयुष्मान महामोग्गल्लान—जैसे कोई बलवान पुरुष अपनी मुड़ी हुई भुजा को फैला दे या फैली हुई भुजा को सिकोड़ ले; वैसे ही—जेतवन से अंतर्धान होकर तावतिंस देवलोक में प्रकट हुए। तब देवताओं के राजा सक्क (इंद्र) पाँच सौ देवताओं के साथ वहाँ आए जहाँ आयुष्मान महामोग्गल्लान थे; आकर आयुष्मान महामोग्गल्लान को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े हुए देवताओं के राजा सक्क से आयुष्मान महामोग्गल्लान ने यह कहा— ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, พุทฺธสรณคมนํ โหติ. พุทฺธสรณคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. สาธุ โข, เทวานมินฺท, ธมฺมสรณคมนํ โหติ. ธมฺมสรณคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. สาธุ โข, เทวานมินฺท, สงฺฆสรณคมนํ โหติ. สงฺฆสรณคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺตี’’ติ. “हे देवेन्द्र! बुद्ध की शरण में जाना श्रेष्ठ है। हे देवेन्द्र! बुद्ध की शरण में जाने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। हे देवेन्द्र! धम्म की शरण में जाना श्रेष्ठ है। हे देवेन्द्र! धम्म की शरण में जाने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। हे देवेन्द्र! संघ की शरण में जाना श्रेष्ठ है। हे देवेन्द्र! संघ की शरण में जाने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं।” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, พุทฺธสรณคมนํ โหติ. พุทฺธสรณคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, ธมฺมสรณคมนํ โหติ. ธมฺมสรณคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, สงฺฆ…เป… สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺตี’’ติ. “हे प्रिय मोग्गल्लान! बुद्ध की शरण में जाना श्रेष्ठ है। हे प्रिय मोग्गल्लान! बुद्ध की शरण में जाने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। हे प्रिय मोग्गल्लान! धम्म की शरण में जाना श्रेष्ठ है। हे प्रिय मोग्गल्लान! धम्म की शरण में जाने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। हे प्रिय मोग्गल्लान! संघ... (वही)... सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं।” อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท ฉหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป… อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท สตฺตหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป… อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท อฏฺฐหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป… อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท อสีติยา เทวตาสหสฺเสหิ สทฺธึ เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตํ โข สกฺกํ เทวานมินฺทํ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – तब देवताओं के राजा शक्र छह सौ देवताओं के साथ... सात सौ देवताओं के साथ... आठ सौ देवताओं के साथ... अस्सी हजार देवताओं के साथ जहाँ आयुष्मान महामौद्गल्यायन थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर आयुष्मान महामौद्गल्यायन को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े हुए देवताओं के राजा शक्र से आयुष्मान महामौद्गल्यायन ने यह कहा — ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, พุทฺธสรณคมนํ โหติ. พุทฺธสรณคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. สาธุ โข, เทวานมินฺท, ธมฺมสรณคมนํ โหติ. ธมฺมสรณคมนเหตุ [Pg.464] โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. สาธุ โข, เทวานมินฺท, สงฺฆสรณคมนํ โหติ. สงฺฆสรณคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺตี’’ติ. “हे देवेन्द्र! बुद्ध की शरण में जाना कल्याणकारी है। हे देवेन्द्र! बुद्ध की शरण में जाने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। हे देवेन्द्र! धर्म की शरण में जाना कल्याणकारी है। हे देवेन्द्र! धर्म की शरण में जाने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। हे देवेन्द्र! संघ की शरण में जाना कल्याणकारी है। हे देवेन्द्र! संघ की शरण में जाने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं।” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, พุทฺธสรณคมนํ โหติ. พุทฺธสรณคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, ธมฺมสรณคมนํ โหติ…เป… สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, สงฺฆสรณคมนํ โหติ. สงฺฆสรณคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺตี’’ติ. “हे मारिष मौद्गल्यायन! बुद्ध की शरण में जाना कल्याणकारी है। हे मारिष मौद्गल्यायन! बुद्ध की शरण में जाने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। हे मारिष मौद्गल्यायन! धर्म की शरण में जाना कल्याणकारी है... हे मारिष मौद्गल्यायन! संघ की शरण में जाना कल्याणकारी है। हे मारिष मौद्गल्यायन! संघ की शरण में जाने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं।” อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท ปญฺจหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตํ โข สกฺกํ เทวานมินฺทํ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – तब देवताओं के राजा शक्र पाँच सौ देवताओं के साथ जहाँ आयुष्मान महामौद्गल्यायन थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर आयुष्मान महामौद्गल्यायन को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े हुए देवताओं के राजा शक्र से आयुष्मान महामौद्गल्यायन ने यह कहा — ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘อิติปิ โส ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน สุคโต โลกวิทู อนุตฺตโร ปุริสทมฺมสารถิ สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. “हे देवेन्द्र! बुद्ध में अचल श्रद्धा से युक्त होना कल्याणकारी है — ‘वे भगवान इस कारण से भी अर्हत् हैं, सम्यक्सम्बुद्ध हैं, विद्या और आचरण से संपन्न हैं, सुगत हैं, लोकविद् हैं, पुरुषों को वश में करने वाले अतुलनीय सारथि हैं, देवों और मनुष्यों के शास्ता हैं, बुद्ध हैं, भगवान हैं।’ हे देवेन्द्र! बुद्ध में अचल श्रद्धा से युक्त होने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม สนฺทิฏฺฐิโก อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. “हे देवेन्द्र! धर्म में अचल श्रद्धा से युक्त होना कल्याणकारी है — ‘भगवान द्वारा धर्म स्वाख्यात है, सान्दृष्टिक है, अकालिक है, एहिपस्सिक (आओ और देखो) है, उपनेयिक है, और विद्वानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य है।’ हे देवेन्द्र! धर्म में अचल श्रद्धा से युक्त होने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, อุชุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ[Pg.465], ญายปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, สามีจิปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, ยทิทํ จตฺตาริ ปุริสยุคานิ อฏฺฐ ปุริสปุคฺคลา เอส ภควโต สาวกสงฺโฆ อาหุเนยฺโย ปาหุเนยฺโย ทกฺขิเณยฺโย อญฺชลิกรณีโย อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสา’ติ. สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. “हे देवेन्द्र! संघ में अचल श्रद्धा से युक्त होना कल्याणकारी है — ‘भगवान का श्रावक संघ सुप्रतिपन्न है, ऋजुप्रतिपन्न है, न्यायप्रतिपन्न है, सामीचिप्रतिपन्न है; अर्थात् ये चार पुरुष-युग्म और आठ पुरुष-पुद्गल; यह भगवान का श्रावक संघ आह्वनीय है, पाहुनीय है, दक्षिणीय है, अंजलि करने योग्य है और लोक का अनुपम पुण्य-क्षेत्र है।’ हे देवेन्द्र! संघ में अचल श्रद्धा से युक्त होने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนํ โหติ อขณฺเฑหิ อจฺฉิทฺเทหิ อสพเลหิ อกมฺมาเสหิ ภุชิสฺเสหิ วิญฺญุปฺปสตฺเถหิ อปรามฏฺเฐหิ สมาธิสํวตฺตนิเกหิ. อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺตี’’ติ. “हे देवेन्द्र! आर्यों को प्रिय शीलों से युक्त होना कल्याणकारी है, जो अखंड, अछिद्र, अशबल, अकल्माष, मुक्त, विद्वानों द्वारा प्रशंसित, अपरामृष्ट और समाधि की ओर ले जाने वाले हैं। हे देवेन्द्र! आर्यों को प्रिय शीलों से युक्त होने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं।” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘อิติปิ โส…เป… สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. “हे मारिष मौद्गल्यायन! बुद्ध में अचल श्रद्धा से युक्त होना कल्याणकारी है — ‘वे भगवान इस कारण से भी... देवों और मनुष्यों के शास्ता हैं, बुद्ध हैं, भगवान हैं।’ बुद्ध में अचल श्रद्धा से युक्त होने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม…เป… ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. “हे मारिष मौद्गल्यायन! धर्म में अचल श्रद्धा से युक्त होना कल्याणकारी है — ‘भगवान द्वारा धर्म स्वाख्यात है... विद्वानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य है।’ धर्म में अचल श्रद्धा से युक्त होने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ…เป… อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสา’ติ. สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. “हे मारिष मौद्गल्यायन! संघ में अचल श्रद्धा से युक्त होना कल्याणकारी है — ‘भगवान का श्रावक संघ सुप्रतिपन्न है... लोक का अनुपम पुण्य-क्षेत्र है।’ संघ में अचल श्रद्धा से युक्त होने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं।” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนํ โหติ อขณฺเฑหิ…เป… สมาธิสํวตฺตนิเกหิ. อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺตี’’ติ. "हे प्रिय मोग्गल्लान, आर्यों को प्रिय, अखण्ड... समाधि की ओर ले जाने वाले शीलों से युक्त होना कल्याणकारी है। हे प्रिय मोग्गल्लान, आर्यों को प्रिय शीलों से युक्त होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं।" อถ [Pg.466] โข สกฺโก เทวานมินฺโท ฉหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป…. อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท สตฺตหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป…. อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท อฏฺฐหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป…. อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท อสีติยา เทวตาสหสฺเสหิ สทฺธึ เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตํ โข สกฺกํ เทวานมินฺทํ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – तब देवताओं के राजा शक्र छह सौ देवताओं के साथ... सात सौ देवताओं के साथ... आठ सौ देवताओं के साथ... अस्सी हजार देवताओं के साथ जहाँ आयुष्मान महामोग्गल्लान थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर आयुष्मान महामोग्गल्लान को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े हुए देवताओं के राजा शक्र से आयुष्मान महामोग्गल्लान ने यह कहा — ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘อิติปิ โส ภควา…เป… สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. "देवराज शक्र, बुद्ध में अचल श्रद्धा से युक्त होना कल्याणकारी है — ‘वे भगवान ऐसे हैं... देवों और मनुष्यों के शास्ता, बुद्ध, भगवान हैं’। देवराज, बुद्ध में अचल श्रद्धा से युक्त होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं।" ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม…เป… ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. "देवराज शक्र, धर्म में अचल श्रद्धा से युक्त होना कल्याणकारी है — ‘भगवान द्वारा धर्म स्वाख्यात है... विद्वानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य है’। देवराज, धर्म में अचल श्रद्धा से युक्त होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं।" ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ…เป… อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสา’ติ. สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. "देवराज शक्र, संघ में अचल श्रद्धा से युक्त होना कल्याणकारी है — ‘भगवान का श्रावक संघ सुप्रतिपन्न है... लोक का अनुत्तर पुण्यक्षेत्र है’। देवराज, संघ में अचल श्रद्धा से युक्त होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं।" ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนํ โหติ อขณฺเฑหิ…เป… สมาธิสํวตฺตนิเกหิ. อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺตี’’ติ. "देवराज शक्र, आर्यों को प्रिय, अखण्ड... समाधि की ओर ले जाने वाले शीलों से युक्त होना कल्याणकारी है। देवराज, आर्यों को प्रिय शीलों से युक्त होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं।" ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘อิติปิ โส ภควา…เป… สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. "हे प्रिय मोग्गल्लान, बुद्ध में अचल श्रद्धा से युक्त होना कल्याणकारी है — ‘वे भगवान ऐसे हैं... देवों और मनुष्यों के शास्ता, बुद्ध, भगवान हैं’। हे प्रिय मोग्गल्लान, बुद्ध में अचल श्रद्धा से युक्त होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं।" ‘‘สาธุ [Pg.467] โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม…เป… ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. "हे प्रिय मोग्गल्लान, धर्म में अचल श्रद्धा से युक्त होना कल्याणकारी है — ‘भगवान द्वारा धर्म स्वाख्यात है... विद्वानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य है’। हे प्रिय मोग्गल्लान, धर्म में अचल श्रद्धा से युक्त होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं।" ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ…เป… อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสา’ติ. สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. "हे प्रिय मोग्गल्लान, संघ में अचल श्रद्धा से युक्त होना कल्याणकारी है — ‘भगवान का श्रावक संघ सुप्रतिपन्न है... लोक का अनुत्तर पुण्यक्षेत्र है’। हे प्रिय मोग्गल्लान, संघ में अचल श्रद्धा से युक्त होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं।" ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนํ โหติ อขณฺเฑหิ…เป… สมาธิสํวตฺตนิเกหิ. อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺตี’’ติ. "हे प्रिय मोग्गल्लान, आर्यों को प्रिय, अखण्ड... समाधि की ओर ले जाने वाले शीलों से युक्त होना कल्याणकारी है। हे प्रिय मोग्गल्लान, आर्यों को प्रिय शीलों से युक्त होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं।" อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท ปญฺจหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ …เป… เอกมนฺตํ ฐิตํ โข สกฺกํ เทวานมินฺทํ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – तब देवताओं के राजा शक्र पाँच सौ देवताओं के साथ जहाँ आयुष्मान महामोग्गल्लान थे, वहाँ पहुँचे... एक ओर खड़े हुए देवताओं के राजा शक्र से आयुष्मान महामोग्गल्लान ने यह कहा — ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, พุทฺธสรณคมนํ โหติ. พุทฺธสรณคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา, ทิพฺเพน วณฺเณน, ทิพฺเพน สุเขน, ทิพฺเพน ยเสน, ทิพฺเพน อาธิปเตยฺเยน, ทิพฺเพหิ รูเปหิ, ทิพฺเพหิ สทฺเทหิ, ทิพฺเพหิ คนฺเธหิ, ทิพฺเพหิ รเสหิ, ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. "देवराज शक्र, बुद्ध की शरण में जाना कल्याणकारी है। देवराज, बुद्ध की शरण में जाने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवताओं से दस बातों में बढ़कर होते हैं — दिव्य आयु से, दिव्य वर्ण से, दिव्य सुख से, दिव्य यश से, दिव्य आधिपत्य से, दिव्य रूपों से, दिव्य शब्दों से, दिव्य गंधों से, दिव्य रसों से और दिव्य स्पर्शों से।" ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, ธมฺมสรณคมนํ โหติ. ธมฺมสรณคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา, ทิพฺเพน วณฺเณน, ทิพฺเพน สุเขน, ทิพฺเพน ยเสน, ทิพฺเพน อาธิปเตยฺเยน, ทิพฺเพหิ รูเปหิ, ทิพฺเพหิ สทฺเทหิ, ทิพฺเพหิ คนฺเธหิ, ทิพฺเพหิ รเสหิ, ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. "देवराज शक्र, धर्म की शरण में जाना कल्याणकारी है। देवराज, धर्म की शरण में जाने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवताओं से दस बातों में बढ़कर होते हैं — दिव्य आयु से, दिव्य वर्ण से, दिव्य सुख से, दिव्य यश से, दिव्य आधिपत्य से, दिव्य रूपों से, दिव्य शब्दों से, दिव्य गंधों से, दिव्य रसों से और दिव्य स्पर्शों से।" ‘‘สาธุ [Pg.468] โข, เทวานมินฺท, สงฺฆสรณคมนํ โหติ. สงฺฆสรณคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา, ทิพฺเพน วณฺเณน, ทิพฺเพน สุเขน, ทิพฺเพน ยเสน, ทิพฺเพน อาธิปเตยฺเยน, ทิพฺเพหิ รูเปหิ, ทิพฺเพหิ สทฺเทหิ, ทิพฺเพหิ คนฺเธหิ, ทิพฺเพหิ รเสหิ, ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหี’’ติ. “हे देवराज इंद्र! संघ की शरण में जाना निश्चित ही अच्छा है। हे देवराज इंद्र! संघ की शरण में जाने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवों को दस स्थानों में पीछे छोड़ देते हैं - दिव्य आयु से, दिव्य वर्ण से, दिव्य सुख से, दिव्य यश से, दिव्य आधिपत्य से, दिव्य रूपों से, दिव्य शब्दों से, दिव्य गंधों से, दिव्य रसों से और दिव्य स्पर्शों से।” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, พุทฺธสรณคมนํ โหติ. พุทฺธสรณคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. “हे प्रिय मोग्गलान! बुद्ध की शरण में जाना निश्चित ही अच्छा है। हे प्रिय मोग्गलान! बुद्ध की शरण में जाने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवों को दस स्थानों में पीछे छोड़ देते हैं - दिव्य आयु से... (पे)... दिव्य स्पर्शों से।” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, ธมฺมสรณคมนํ โหติ…เป…. “हे प्रिय मोग्गलान! धर्म की शरण में जाना निश्चित ही अच्छा है... (पे)...।” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, สงฺฆสรณคมนํ โหติ. สงฺฆสรณคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา, ทิพฺเพน วณฺเณน, ทิพฺเพน สุเขน, ทิพฺเพน ยเสน, ทิพฺเพน อาธิปเตยฺเยน, ทิพฺเพหิ รูเปหิ, ทิพฺเพหิ สทฺเทหิ, ทิพฺเพหิ คนฺเธหิ, ทิพฺเพหิ รเสหิ, ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหี’’ติ. “हे प्रिय मोग्गलान! संघ की शरण में जाना निश्चित ही अच्छा है। हे प्रिय मोग्गलान! संघ की शरण में जाने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवों को दस स्थानों में पीछे छोड़ देते हैं - दिव्य आयु से, दिव्य वर्ण से, दिव्य सुख से, दिव्य यश से, दिव्य आधिपत्य से, दिव्य रूपों से, दिव्य शब्दों से, दिव्य गंधों से, दिव्य रसों से और दिव्य स्पर्शों से।” อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท ฉหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป… อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท สตฺตหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป… อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท อฏฺฐหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป… อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท อสีติยา เทวตาสหสฺเสหิ สทฺธึ เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตํ โข สกฺกํ เทวานมินฺทํ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – तब देवराज इंद्र छह सौ देवताओं के साथ... (पे)... तब देवराज इंद्र सात सौ देवताओं के साथ... (पे)... तब देवराज इंद्र आठ सौ देवताओं के साथ... (पे)... तब देवराज इंद्र अस्सी हजार देवताओं के साथ जहाँ आयुष्मान महामोग्गलान थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर आयुष्मान महामोग्गलान को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े हुए देवराज इंद्र से आयुष्मान महामोग्गलान ने यह कहा — ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, พุทฺธสรณคมนํ โหติ. พุทฺธสรณคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. “हे देवराज इंद्र! बुद्ध की शरण में जाना निश्चित ही अच्छा है। हे देवराज इंद्र! बुद्ध की शरण में जाने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवों को दस स्थानों में पीछे छोड़ देते हैं - दिव्य आयु से... (पे)... दिव्य स्पर्शों से।” ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, ธมฺมสรณคมนํ โหติ…เป…. “हे देवराज इंद्र! धर्म की शरण में जाना निश्चित ही अच्छा है... (पे)...।” ‘‘สาธุ [Pg.469] โข, เทวานมินฺท, สงฺฆสรณคมนํ โหติ. สงฺฆสรณคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา, ทิพฺเพน วณฺเณน, ทิพฺเพน สุเขน, ทิพฺเพน ยเสน, ทิพฺเพน อาธิปเตยฺเยน, ทิพฺเพหิ รูเปหิ, ทิพฺเพหิ สทฺเทหิ, ทิพฺเพหิ คนฺเธหิ, ทิพฺเพหิ รเสหิ, ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหี’’ติ. “हे देवराज इंद्र! संघ की शरण में जाना निश्चित ही अच्छा है। हे देवराज इंद्र! संघ की शरण में जाने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवों को दस स्थानों में पीछे छोड़ देते हैं - दिव्य आयु से, दिव्य वर्ण से, दिव्य सुख से, दिव्य यश से, दिव्य आधिपत्य से, दिव्य रूपों से, दिव्य शब्दों से, दिव्य गंधों से, दिव्य रसों से और दिव्य स्पर्शों से।” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, พุทฺธสรณคมนํ โหติ…เป… สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, ธมฺมสรณคมนํ โหติ…เป… สาธุ โข มาริส โมคฺคลฺลาน, สงฺฆสรณคมนํ โหติ. สงฺฆสรณคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา, ทิพฺเพน วณฺเณน, ทิพฺเพน สุเขน, ทิพฺเพน ยเสน, ทิพฺเพน อาธิปเตยฺเยน, ทิพฺเพหิ รูเปหิ, ทิพฺเพหิ สทฺเทหิ, ทิพฺเพหิ คนฺเธหิ, ทิพฺเพหิ รเสหิ, ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหี’’ติ. “हे प्रिय मोग्गलान! बुद्ध की शरण में जाना निश्चित ही अच्छा है... (पे)... हे प्रिय मोग्गलान! धर्म की शरण में जाना निश्चित ही अच्छा है... (पे)... हे प्रिय मोग्गलान! संघ की शरण में जाना निश्चित ही अच्छा है। हे प्रिय मोग्गलान! संघ की शरण में जाने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवों को दस स्थानों में पीछे छोड़ देते हैं - दिव्य आयु से, दिव्य वर्ण से, दिव्य सुख से, दिव्य यश से, दिव्य आधिपत्य से, दिव्य रूपों से, दिव्य शब्दों से, दिव्य गंधों से, दिव्य रसों से और दिव्य स्पर्शों से।” อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท ปญฺจหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตํ โข สกฺกํ เทวานมินฺทํ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – तब देवराज इंद्र पाँच सौ देवताओं के साथ जहाँ आयुष्मान महामोग्गलान थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर आयुष्मान महामोग्गलान को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े हुए देवराज इंद्र से आयुष्मान महामोग्गलान ने यह कहा — ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘อิติปิ โส ภควา…เป… สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. “हे देवराज इंद्र! बुद्ध में अचल श्रद्धा से युक्त होना निश्चित ही अच्छा है — ‘वे भगवान इस कारण से भी... (पे)... देवों और मनुष्यों के शास्ता, बुद्ध, भगवान हैं।’ हे देवराज इंद्र! बुद्ध में अचल श्रद्धा से युक्त होने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवों को दस स्थानों में पीछे छोड़ देते हैं - दिव्य आयु से... (पे)... दिव्य स्पर्शों से।” ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม…เป… ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ…เป…. “हे देवराज इंद्र! धर्म में अचल श्रद्धा से युक्त होना निश्चित ही अच्छा है — ‘भगवान द्वारा धर्म स्वाख्यात है... (पे)... विद्वानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य है।’ हे देवराज इंद्र! धर्म में अचल श्रद्धा से युक्त होने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं... (पे)...।” ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ…เป… โลกสฺสา’ติ. สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน [Pg.470] สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ…เป…. “हे देवराज इंद्र! संघ में अचल श्रद्धा से युक्त होना निश्चित ही अच्छा है — ‘भगवान का श्रावक संघ सुप्रतिपन्न है... (पे)... लोक का (अनुत्तर पुण्यक्षेत्र है)।’ हे देवराज इंद्र! संघ में अचल श्रद्धा से युक्त होने के कारण ही इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं... (पे)...।” ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนํ โหติ อขณฺเฑหิ…เป… สมาธิสํวตฺตนิเกหิ. อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหี’’ติ. "हे देवताओं के स्वामी इंद्र! आर्यों को प्रिय, अखंड... और समाधि की ओर ले जाने वाले शीलों से संपन्न होना वास्तव में कल्याणकारी है। हे देवताओं के स्वामी इंद्र! आर्यों को प्रिय शीलों से संपन्न होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवताओं को दस स्थानों से पीछे छोड़ देते हैं - दिव्य आयु... दिव्य स्पर्श द्वारा।" ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘อิติปิ โส ภควา…เป… สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. "हे प्रिय मौद्गल्यायन! बुद्ध में अचल श्रद्धा से संपन्न होना वास्तव में कल्याणकारी है - 'वे भगवान इस कारण से भी... देवताओं और मनुष्यों के शास्ता, बुद्ध, भगवान हैं।' हे प्रिय मौद्गल्यायन! बुद्ध में अचल श्रद्धा से संपन्न होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवताओं को दस स्थानों से पीछे छोड़ देते हैं - दिव्य आयु... दिव्य स्पर्श द्वारा।" ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม…เป… ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. "हे प्रिय मौद्गल्यायन! धर्म में अचल श्रद्धा से संपन्न होना वास्तव में कल्याणकारी है - 'भगवान द्वारा धर्म स्वाख्यात है... विद्वानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य है।' हे प्रिय मौद्गल्यायन! धर्म में अचल श्रद्धा से संपन्न होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवताओं को दस स्थानों से पीछे छोड़ देते हैं - दिव्य आयु... दिव्य स्पर्श द्वारा।" ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ…เป… โลกสฺสา’ติ. สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ…เป…. "हे प्रिय मौद्गल्यायन! संघ में अचल श्रद्धा से संपन्न होना वास्तव में कल्याणकारी है - 'भगवान का श्रावक संघ सुप्रतिपन्न है... लोक के लिए (अतुलनीय पुण्यक्षेत्र है)।' हे प्रिय मौद्गल्यायन! संघ में अचल श्रद्धा से संपन्न होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं...।" ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนํ โหติ อขณฺเฑหิ…เป… สมาธิสํวตฺตนิเกหิ. อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหี’’ติ. "हे प्रिय मौद्गल्यायन! आर्यों को प्रिय, अखंड... और समाधि की ओर ले जाने वाले शीलों से संपन्न होना वास्तव में कल्याणकारी है। हे प्रिय मौद्गल्यायन! आर्यों को प्रिय शीलों से संपन्न होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवताओं को दस स्थानों से पीछे छोड़ देते हैं - दिव्य आयु... दिव्य स्पर्श द्वारा।" อถ [Pg.471] โข สกฺโก เทวานมินฺโท ฉหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป… อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท สตฺตหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป… อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท อฏฺฐหิ เทวตาสเตหิ สทฺธึ…เป… อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท อสีติยา เทวตาสหสฺเสหิ สทฺธึ เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตํ โข สกฺกํ เทวานมินฺทํ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เอตทโวจ – तब देवताओं के स्वामी शक्र छह सौ देवताओं के साथ... सात सौ देवताओं के साथ... आठ सौ देवताओं के साथ... अस्सी हजार देवताओं के साथ जहाँ आयुष्मान महामौद्गल्यायन थे, वहाँ पहुँचे। पहुँचकर आयुष्मान महामौद्गल्यायन को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े हुए देवताओं के स्वामी शक्र से आयुष्मान महामौद्गल्यायन ने यह कहा — ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘อิติปิ โส ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน สุคโต โลกวิทู อนุตฺตโร ปุริสทมฺมสารถิ สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา, ทิพฺเพน วณฺเณน, ทิพฺเพน สุเขน, ทิพฺเพน ยเสน, ทิพฺเพน อาธิปเตยฺเยน, ทิพฺเพหิ รูเปหิ, ทิพฺเพหิ สทฺเทหิ, ทิพฺเพหิ คนฺเธหิ, ทิพฺเพหิ รเสหิ, ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. "हे देवताओं के स्वामी इंद्र! बुद्ध में अचल श्रद्धा से संपन्न होना वास्तव में कल्याणकारी है - 'वे भगवान इस कारण से भी अर्हत्, सम्यक-सम्बुद्ध, विद्या-चरण संपन्न, सुगत, लोकविद्, अनुत्तर पुरुष-दम्य-सारथि, देवताओं और मनुष्यों के शास्ता, बुद्ध और भगवान हैं।' हे देवताओं के स्वामी इंद्र! बुद्ध में अचल श्रद्धा से संपन्न होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवताओं को दस स्थानों से पीछे छोड़ देते हैं - दिव्य आयु, दिव्य वर्ण, दिव्य सुख, दिव्य यश, दिव्य आधिपत्य, दिव्य रूप, दिव्य शब्द, दिव्य गंध, दिव्य रस और दिव्य स्पर्श द्वारा।" ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม สนฺทิฏฺฐิโก อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. "हे देवताओं के स्वामी इंद्र! धर्म में अचल श्रद्धा से संपन्न होना वास्तव में कल्याणकारी है - 'भगवान द्वारा धर्म स्वाख्यात है, सांदृष्टिक, अकालिक, एहिपस्सिक, उपनेयिक और विद्वानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य है।' हे देवताओं के स्वामी इंद्र! धर्म में अचल श्रद्धा से संपन्न होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवताओं को दस स्थानों से पीछे छोड़ देते हैं - दिव्य आयु... दिव्य स्पर्श द्वारा।" ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, อุชุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, ญายปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, สามีจิปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, ยทิทํ จตฺตาริ ปุริสยุคานิ อฏฺฐ ปุริสปุคฺคลา เอส ภควโต สาวกสงฺโฆ อาหุเนยฺโย ปาหุเนยฺโย ทกฺขิเณยฺโย อญฺชลิกรณีโย อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสา’ติ. สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต [Pg.472] อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. "हे देवताओं के स्वामी इंद्र! संघ में अचल श्रद्धा से संपन्न होना वास्तव में कल्याणकारी है - 'भगवान का श्रावक संघ सुप्रतिपन्न है, ऋजु-प्रतिपन्न है, न्याय-प्रतिपन्न है, सामीचि-प्रतिपन्न है। यह जो चार पुरुष-युगल और आठ पुरुष-पुद्गल हैं, यह भगवान का श्रावक संघ आहुनेय, पाहुनेय, दक्षिणेय, अंजलि-करणीय और लोक के लिए अनुत्तर पुण्यक्षेत्र है।' हे देवताओं के स्वामी इंद्र! संघ में अचल श्रद्धा से संपन्न होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवताओं को दस स्थानों से पीछे छोड़ देते हैं - दिव्य आयु... दिव्य स्पर्श द्वारा।" ‘‘สาธุ โข, เทวานมินฺท, อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนํ โหติ อขณฺเฑหิ อจฺฉิทฺเทหิ อสพเลหิ อกมฺมาเสหิ ภุชิสฺเสหิ วิญฺญุปฺปสตฺเถหิ อปรามฏฺเฐหิ สมาธิสํวตฺตนิเกหิ. อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนเหตุ โข, เทวานมินฺท, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา, ทิพฺเพน วณฺเณน, ทิพฺเพน สุเขน, ทิพฺเพน ยเสน, ทิพฺเพน อาธิปเตยฺเยน, ทิพฺเพหิ รูเปหิ, ทิพฺเพหิ สทฺเทหิ, ทิพฺเพหิ คนฺเธหิ, ทิพฺเพหิ รเสหิ, ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหี’’ติ. “हे देवराज! आर्यों को प्रिय, अखंड, अछिद्र, अशबल, अकल्माष, (तृष्णा की दासता से) मुक्त, विद्वानों द्वारा प्रशंसित, (गलत धारणाओं से) अछूते और समाधि की ओर ले जाने वाले शीलों से संपन्न होना वास्तव में कल्याणकारी है। हे देवराज! आर्यों को प्रिय शीलों से संपन्न होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवों को दस स्थानों में पीछे छोड़ देते हैं—दिव्य आयु, दिव्य वर्ण, दिव्य सुख, दिव्य यश, दिव्य आधिपत्य, दिव्य रूप, दिव्य शब्द, दिव्य गंध, दिव्य रस और दिव्य स्पर्श द्वारा।” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘อิติปิ โส ภควา…เป… สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. “हे प्रिय मोग्गलान! बुद्ध में अचल श्रद्धा से संपन्न होना वास्तव में कल्याणकारी है—‘वे भगवान इस कारण से भी... देवताओं और मनुष्यों के शास्ता, बुद्ध, भगवान हैं।’ हे प्रिय मोग्गलान! बुद्ध में अचल श्रद्धा से संपन्न होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवों को दस स्थानों में पीछे छोड़ देते हैं—दिव्य आयु... दिव्य स्पर्श द्वारा।” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม…เป… ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. “हे प्रिय मोग्गलान! धर्म में अचल श्रद्धा से संपन्न होना वास्तव में कल्याणकारी है—‘भगवान द्वारा धर्म स्वाख्यात है... विद्वानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य है।’ हे प्रिय मोग्गलान! धर्म में अचल श्रद्धा से संपन्न होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवों को दस स्थानों में पीछे छोड़ देते हैं—दिव्य आयु... दिव्य स्पर्श द्वारा।” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนํ โหติ – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ…เป… อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสา’ติ. สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคมนเหตุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา…เป… ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. “हे प्रिय मोग्गलान! संघ में अचल श्रद्धा से संपन्न होना वास्तव में कल्याणकारी है—‘भगवान का श्रावक संघ सुप्रतिपन्न है... लोक का अनुत्तर पुण्यक्षेत्र है।’ हे प्रिय मोग्गलान! संघ में अचल श्रद्धा से संपन्न होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवों को दस स्थानों में पीछे छोड़ देते हैं—दिव्य आयु... दिव्य स्पर्श द्वारा।” ‘‘สาธุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนํ โหติ อขณฺเฑหิ…เป… สมาธิสํวตฺตนิเกหิ. อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคมนเหตุ [Pg.473] โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. เต อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหนฺติ – ทิพฺเพน อายุนา, ทิพฺเพน วณฺเณน, ทิพฺเพน สุเขน, ทิพฺเพน ยเสน, ทิพฺเพน อาธิปเตยฺเยน, ทิพฺเพหิ รูเปหิ, ทิพฺเพหิ สทฺเทหิ, ทิพฺเพหิ คนฺเธหิ, ทิพฺเพหิ รเสหิ, ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหี’’ติ. ทสมํ. “हे प्रिय मोग्गलान! आर्यों को प्रिय, अखंड... समाधि की ओर ले जाने वाले शीलों से संपन्न होना वास्तव में कल्याणकारी है। हे प्रिय मोग्गलान! आर्यों को प्रिय शीलों से संपन्न होने के कारण ही, इस लोक में कुछ प्राणी शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवों को दस स्थानों में पीछे छोड़ देते हैं—दिव्य आयु, दिव्य वर्ण, दिव्य सुख, दिव्य यश, दिव्य आधिपत्य, दिव्य रूप, दिव्य शब्द, दिव्य गंध, दिव्य रस और दिव्य स्पर्श द्वारा।” दसवाँ सुत्त। ๑๑. จนฺทนสุตฺตํ ११. चन्दन सुत्त ๓๔๒. อถ โข จนฺทโน เทวปุตฺโต…เป…. ३४२. तब चन्दन देवपुत्र...। อถ โข สุยาโม เทวปุตฺโต…เป…. तब सुयाम देवपुत्र...। อถ โข สนฺตุสิโต เทวปุตฺโต…เป…. तब संतुषित देवपुत्र...। อถ โข สุนิมฺมิโต เทวปุตฺโต…เป…. तब सुनिर्मित देवपुत्र...। อถ โข วสวตฺติ เทวปุตฺโต…เป…. तब वशवर्ती देवपुत्र...। (ยถา สกฺกสุตฺตํ ตถา อิเม ปญฺจ เปยฺยาลา วิตฺถาเรตพฺพา). เอกาทสมํ. (जैसे सक्क सुत्त है, वैसे ही इन पाँचों पेयालों का विस्तार करना चाहिए)। ग्यारहवाँ सुत्त। โมคฺคลฺลานสํยุตฺตํ สมตฺตํ. मोग्गलान संयुत्त समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका उद्दान (विषय-सूची) — สวิตกฺกาวิตกฺกญฺจ, สุเขน จ อุเปกฺขโก; อากาสญฺเจว วิญฺญาณํ, อากิญฺจํ เนวสญฺญินา; อนิมิตฺโต จ สกฺโก จ, จนฺทเนกาทเสน จาติ. सविर्तक-अवितर्क, सुख और उपेक्षक; आकाश और विज्ञान, आकिंचन्य और नैवसंज्ञा-नासंज्ञा; अनिमित्त, सक्क और ग्यारहवाँ चन्दन। ๗. จิตฺตสํยุตฺตํ ७. चित्त संयुत्त ๑. สํโยชนสุตฺตํ १. संयोजन सुत्त ๓๔๓. เอกํ [Pg.474] สมยํ สมฺพหุลา เถรา ภิกฺขู มจฺฉิกาสณฺเฑ วิหรนฺติ อมฺพาฏกวเน. เตน โข ปน สมเยน สมฺพหุลานํ เถรานํ ภิกฺขูนํ ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺตานํ มณฺฑลมาเฬ สนฺนิสินฺนานํ สนฺนิปติตานํ อยมนฺตรากถา อุทปาทิ – ‘‘‘สํโยชน’นฺติ วา, อาวุโส, ‘สํโยชนิยา ธมฺมา’ติ วา อิเม ธมฺมา นานตฺถา นานาพฺยญฺชนา อุทาหุ เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นาน’’นฺติ? ตตฺเรกจฺเจหิ เถเรหิ ภิกฺขูหิ เอวํ พฺยากตํ โหติ – ‘‘‘สํโยชน’นฺติ วา, อาวุโส, ‘สํโยชนิยา ธมฺมา’ติ วา อิเม ธมฺมา นานตฺถา เจว นานาพฺยญฺชนา จา’’ติ. เอกจฺเจหิ เถเรหิ ภิกฺขูหิ เอวํ พฺยากตํ โหติ – ‘‘‘สํโยชน’นฺติ วา, อาวุโส, ‘สํโยชนิยา ธมฺมา’ติ วา อิเม ธมฺมา เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นาน’’นฺติ. ३४३. एक समय बहुत से स्थविर भिक्षु मच्छिकासण्ड के अम्बाटक वन में विहार कर रहे थे। उस समय, भोजन के पश्चात भिक्षाटन से लौटे हुए, मण्डप में एक साथ बैठे और एकत्रित हुए बहुत से स्थविर भिक्षुओं के बीच यह चर्चा छिड़ी— “हे आयुष्मानों! क्या ये धर्म— जिन्हें ‘संयोजन’ कहा जाता है और जिन्हें ‘संयोजनीय धर्म’ कहा जाता है— अर्थ में भिन्न और शब्द में भिन्न हैं, अथवा अर्थ में एक ही हैं और केवल शब्द में भिन्न हैं?” वहाँ कुछ स्थविर भिक्षुओं ने इस प्रकार उत्तर दिया— “हे आयुष्मानों! ‘संयोजन’ और ‘संयोजनीय धर्म’ कहे जाने वाले ये धर्म अर्थ में भी भिन्न हैं और शब्द में भी भिन्न हैं।” कुछ स्थविर भिक्षुओं ने इस प्रकार उत्तर दिया— “हे आयुष्मानों! ‘संयोजन’ और ‘संयोजनीय धर्म’ कहे जाने वाले ये धर्म अर्थ में एक ही हैं, केवल शब्द में भिन्न हैं।” เตน โข ปน สมเยน จิตฺโต คหปติ มิคปถกํ อนุปฺปตฺโต โหติ เกนจิเทว กรณีเยน. อสฺโสสิ โข จิตฺโต คหปติ สมฺพหุลานํ กิร เถรานํ ภิกฺขูนํ ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺตานํ มณฺฑลมาเฬ สนฺนิสินฺนานํ สนฺนิปติตานํ อยมนฺตรากถา อุทปาทิ – ‘‘‘สํโยชน’นฺติ วา, อาวุโส, ‘สํโยชนิยา ธมฺมา’ติ วา อิเม ธมฺมา นานตฺถา นานาพฺยญฺชนา อุทาหุ เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นาน’’นฺติ? ตตฺเรกจฺเจหิ เถเรหิ ภิกฺขูหิ เอวํ พฺยากตํ – ‘‘‘สํโยชน’นฺติ วา, อาวุโส, ‘สํโยชนิยา ธมฺมา’ติ วา อิเม ธมฺมา นานตฺถา เจว นานาพฺยญฺชนา จา’’ติ. เอกจฺเจหิ เถเรหิ ภิกฺขูหิ เอวํ พฺยากตํ ‘สํโยชน’นฺติ วา, อาวุโส ‘สํโยชนิยา ธมฺมา’ติ วา อิเม ธมฺมา เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นานนฺติ. อถ โข จิตฺโต คหปติ เยน เถรา ภิกฺขู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เถเร ภิกฺขู อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จิตฺโต คหปติ เถเร ภิกฺขู เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต, สมฺพหุลานํ กิร เถรานํ ภิกฺขูนํ ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺตานํ มณฺฑลมาเฬ สนฺนิสินฺนานํ สนฺนิปติตานํ อยมนฺตรากถา อุทปาทิ – ‘สํโยชน’นฺติ วา, อาวุโส, ‘สํโยชนิยา ธมฺมา’ติ วา อิเม ธมฺมา นานตฺถา นานาพฺยญฺชนา อุทาหุ เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นาน’’นฺติ? เอกจฺเจหิ เถเรหิ ภิกฺขูหิ [Pg.475] เอวํ พฺยากตํ – ‘‘‘สํโยชน’นฺติ วา, อาวุโส, ‘สํโยชนิยา ธมฺมา’ติ วา อิเม ธมฺมา นานตฺถา เจว นานาพฺยญฺชนา จา’’ติ. เอกจฺเจหิ เถเรหิ ภิกฺขูหิ เอวํ พฺยากตํ ‘‘‘สํโยชน’นฺติ วา, อาวุโส, ‘สํโยชนิยา ธมฺมา’ติ วา อิเม ธมฺมา เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นาน’’นฺติ. ‘‘เอวํ, คหปตี’’ติ. उस समय चित्त गृहपति किसी कार्यवश मिगपथक पहुँचा हुआ था। चित्त गृहपति ने सुना कि भोजन के पश्चात भिक्षाटन से लौटे हुए बहुत से स्थविर भिक्षु मण्डप (मण्डलमल) में एक साथ बैठे हुए थे और उनके बीच यह चर्चा छिड़ी थी— "हे आयुष्मानों! क्या 'संयोजन' और 'संयोजनीय धर्म'—ये धर्म अर्थ में भिन्न और व्यंजन (शब्द) में भिन्न हैं, अथवा अर्थ में एक ही हैं और केवल व्यंजन में भिन्न हैं?" वहाँ कुछ स्थविर भिक्षुओं ने इस प्रकार उत्तर दिया— "हे आयुष्मानों! 'संयोजन' और 'संयोजनीय धर्म'—ये धर्म अर्थ में भी भिन्न हैं और व्यंजन में भी भिन्न हैं।" कुछ स्थविर भिक्षुओं ने इस प्रकार उत्तर दिया— "हे आयुष्मानों! 'संयोजन' और 'संयोजनीय धर्म'—ये धर्म अर्थ में एक ही हैं, केवल व्यंजन में भिन्न हैं।" तब चित्त गृहपति जहाँ वे स्थविर भिक्षु थे, वहाँ गया; जाकर स्थविर भिक्षुओं का अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए चित्त गृहपति ने स्थविर भिक्षुओं से यह कहा— "भन्ते! मैंने सुना है कि भोजन के पश्चात भिक्षाटन से लौटे हुए बहुत से स्थविर भिक्षु मण्डप में एक साथ बैठे हुए थे और उनके बीच यह चर्चा छिड़ी थी— 'क्या संयोजन और संयोजनीय धर्म—ये धर्म अर्थ में भिन्न और व्यंजन में भिन्न हैं, अथवा अर्थ में एक ही हैं और केवल व्यंजन में भिन्न हैं?' कुछ स्थविर भिक्षुओं ने इस प्रकार उत्तर दिया— 'संयोजन और संयोजनीय धर्म—ये धर्म अर्थ में भी भिन्न हैं और व्यंजन में भी भिन्न हैं।' कुछ स्थविर भिक्षुओं ने इस प्रकार उत्तर दिया— 'संयोजन और संयोजनीय धर्म—ये धर्म अर्थ में एक ही हैं, केवल व्यंजन में भिन्न हैं।'" स्थविरों ने कहा— "हाँ, गृहपति!" ‘‘‘สํโยชน’นฺติ วา, ภนฺเต, ‘สํโยชนิยา ธมฺมา’ติ วา อิเม ธมฺมา นานตฺถา เจว นานาพฺยญฺชนา จ. เตน หิ, ภนฺเต, อุปมํ โว กริสฺสามิ. อุปมายปิเธกจฺเจ วิญฺญู ปุริสา ภาสิตสฺส อตฺถํ อาชานนฺติ. เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, กาโฬ จ พลีพทฺโท โอทาโต จ พลีพทฺโท เอเกน ทาเมน วา โยตฺเตน วา สํยุตฺตา อสฺสุ. โย นุ โข เอวํ วเทยฺย – ‘กาโฬ พลีพทฺโท โอทาตสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชนํ, โอทาโต พลีพทฺโท กาฬสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชน’นฺติ, สมฺมา นุ โข โส วทมาโน วเทยฺยา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, คหปติ! น โข, คหปติ, กาโฬ พลีพทฺโท โอทาตสฺส พลีพทฺทสฺส สํโยชนํ, นปิ โอทาโต พลีพทฺโท กาฬสฺส พฬีพทฺทสฺส สํโยชนํ; เยน โข เต เอเกน ทาเมน วา โยตฺเตน วา สํยุตฺตา ตํ ตตฺถ สํโยชน’’นฺติ. ‘‘เอวเมว โข, ภนฺเต, น จกฺขุ รูปานํ สํโยชนํ, น รูปา จกฺขุสฺส สํโยชนํ; ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. น โสตํ สทฺทานํ… น ฆานํ คนฺธานํ… น ชิวฺหา รสานํ… น กาโย โผฏฺฐพฺพานํ สํโยชนํ, น โผฏฺฐพฺพา กายสฺส สํโยชนํ; ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ สํโยชนํ. น มโน ธมฺมานํ สํโยชนํ, น ธมฺมา มนสฺส สํโยชนํ; ยญฺจ ตตฺถ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทราโค ตํ ตตฺถ สํโยชน’’นฺติ. ‘‘ลาภา เต, คหปติ, สุลทฺธํ เต, คหปติ, ยสฺส เต คมฺภีเร พุทฺธวจเน ปญฺญาจกฺขุ กมตี’’ติ. ปฐมํ. "भन्ते! 'संयोजन' और 'संयोजनीय धर्म'—ये धर्म अर्थ में भी भिन्न हैं और व्यंजन में भी भिन्न हैं। तो भन्ते! मैं आपके लिए एक उपमा दूँगा। उपमा के माध्यम से भी यहाँ कुछ बुद्धिमान पुरुष कही गई बात का अर्थ समझ लेते हैं। भन्ते! जैसे एक काला बैल और एक सफेद बैल एक ही रस्सी या जोत से बँधे हों। यदि कोई ऐसा कहे— 'काला बैल सफेद बैल का संयोजन है, और सफेद बैल काले बैल का संयोजन है', तो क्या वह सही कह रहा होगा?" "नहीं, गृहपति! काला बैल सफेद बैल का संयोजन नहीं है, और न ही सफेद बैल काले बैल का संयोजन है; बल्कि जिस एक रस्सी या जोत से वे दोनों बँधे हैं, वही वहाँ संयोजन है।" "इसी प्रकार भन्ते! न तो आँख रूपों का संयोजन है, न ही रूप आँख का संयोजन है; बल्कि उन दोनों के आश्रय से जो छन्द-राग (इच्छा और आसक्ति) उत्पन्न होता है, वही वहाँ संयोजन है। न कान शब्दों का... न नाक गंधों का... न जीभ रसों का... न शरीर स्पर्शों का संयोजन है, न ही स्पर्श शरीर का संयोजन है; बल्कि उन दोनों के आश्रय से जो छन्द-राग उत्पन्न होता है, वही वहाँ संयोजन है। न मन धर्मों का संयोजन है, न ही धर्म मन का संयोजन है; बल्कि उन दोनों के आश्रय से जो छन्द-राग उत्पन्न होता है, वही वहाँ संयोजन है।" स्थविरों ने कहा— "गृहपति! यह तुम्हारे लिए लाभ की बात है, यह तुम्हारे लिए सुलब्ध (सौभाग्य) है कि तुम्हारी प्रज्ञा-चक्षु बुद्ध के गंभीर वचनों में प्रवेश करती है।" प्रथम सुत्त समाप्त। ๒. ปฐมอิสิทตฺตสุตฺตํ २. प्रथम इसिदत्त सुत्त ๓๔๔. เอกํ สมยํ สมฺพหุลา เถรา ภิกฺขู มจฺฉิกาสณฺเฑ วิหรนฺติ อมฺพาฏกวเน. อถ โข จิตฺโต คหปติ เยน เถรา ภิกฺขู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เถเร ภิกฺขู อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จิตฺโต คหปติ เถเร ภิกฺขู เอตทโวจ – ‘‘อธิวาเสนฺตุ เม, ภนฺเต, เถรา สฺวาตนาย ภตฺต’’นฺติ. อธิวาเสสุํ โข เถรา ภิกฺขู ตุณฺหีภาเวน[Pg.476]. อถ โข จิตฺโต คหปติ เถรานํ ภิกฺขูนํ อธิวาสนํ วิทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา เถเร ภิกฺขู อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. อถ โข เถรา ภิกฺขู ตสฺสา รตฺติยา อจฺจเยน ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย เยน จิตฺตสฺส คหปติสฺส นิเวสนํ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทึสุ. ३४४. एक समय बहुत से स्थविर भिक्षु मच्छिकासण्ड के अम्बाटक वन में विहार कर रहे थे। तब चित्त गृहपति जहाँ वे स्थविर भिक्षु थे, वहाँ गया; जाकर स्थविर भिक्षुओं का अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए चित्त गृहपति ने स्थविर भिक्षुओं से यह कहा— "भन्ते! स्थविरगण कल के लिए मेरा भोजन स्वीकार करें।" स्थविर भिक्षुओं ने मौन रहकर स्वीकार कर लिया। तब चित्त गृहपति स्थविर भिक्षुओं की स्वीकृति जानकर आसन से उठा, स्थविर भिक्षुओं का अभिवादन किया, प्रदक्षिणा की और चला गया। फिर वे स्थविर भिक्षु उस रात के बीतने पर, पूर्वाह्न समय में चीवर पहनकर, पात्र और चीवर लेकर जहाँ चित्त गृहपति का निवास था, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर बिछाए गए आसनों पर बैठ गए। อถ โข จิตฺโต คหปติ เยน เถรา ภิกฺขู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เถเร ภิกฺขู อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมนฺตํ เถรํ เอตทโวจ – ‘‘‘ธาตุนานตฺตํ, ธาตุนานตฺต’นฺติ, ภนฺเต เถร, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, ธาตุนานตฺตํ วุตฺตํ ภควตา’’ติ? เอวํ วุตฺเต อายสฺมา เถโร ตุณฺหี อโหสิ. ทุติยมฺปิ โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมนฺตํ เถรํ เอตทโวจ – ‘‘‘ธาตุนานตฺตํ, ธาตุนานตฺต’นฺติ, ภนฺเต เถร, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, ธาตุนานตฺตํ วุตฺตํ ภควตา’’ติ? ทุติยมฺปิ โข อายสฺมา เถโร ตุณฺหี อโหสิ. ตติยมฺปิ โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมนฺตํ เถรํ เอตทโวจ – ‘‘‘ธาตุนานตฺตํ, ธาตุนานตฺต’นฺติ, ภนฺเต เถร, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, ธาตุนานตฺตํ วุตฺตํ ภควตา’’ติ? ตติยมฺปิ โข อายสฺมา เถโร ตุณฺหี อโหสิ. तब चित्त गृहपति जहाँ स्थविर भिक्षु थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर स्थविर भिक्षुओं का अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए चित्त गृहपति ने आयुष्मान स्थविर से यह कहा— “भन्ते स्थविर, 'धातु-विविधता, धातु-विविधता' ऐसा कहा जाता है। भन्ते, भगवान ने किस सीमा तक धातु-विविधता का वर्णन किया है?” ऐसा कहने पर आयुष्मान स्थविर मौन रहे। दूसरी बार भी चित्त गृहपति ने आयुष्मान स्थविर से यह कहा— “भन्ते स्थविर, 'धातु-विविधता, धातु-विविधता' ऐसा कहा जाता है। भन्ते, भगवान ने किस सीमा तक धातु-विविधता का वर्णन किया है?” दूसरी बार भी आयुष्मान स्थविर मौन रहे। तीसरी बार भी चित्त गृहपति ने आयुष्मान स्थविर से यह कहा— “भन्ते स्थविर, 'धातु-विविधता, धातु-विविधता' ऐसा कहा जाता है। भन्ते, भगवान ने किस सीमा तक धातु-विविधता का वर्णन किया है?” तीसरी बार भी आयुष्मान स्थविर मौन रहे। เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา อิสิทตฺโต ตสฺมึ ภิกฺขุสงฺเฆ สพฺพนวโก โหติ. อถ โข อายสฺมา อิสิทตฺโต อายสฺมนฺตํ เถรํ เอตทโวจ – ‘‘พฺยากโรมหํ, ภนฺเต เถร, จิตฺตสฺส คหปติโน เอตํ ปญฺห’’นฺติ? ‘‘พฺยากโรหิ ตฺวํ, อาวุโส อิสิทตฺต, จิตฺตสฺส คหปติโน เอตํ ปญฺห’’นฺติ. ‘‘เอวญฺหิ ตฺวํ, คหปติ, ปุจฺฉสิ – ‘ธาตุนานตฺตํ, ธาตุนานตฺตนฺติ, ภนฺเต เถร, วุจฺจติ. กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, ธาตุนานตฺตํ, วุตฺตํ ภควตา’’’ติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. ‘‘อิทํ โข, คหปติ, ธาตุนานตฺตํ วุตฺตํ ภควตา – จกฺขุธาตุ, รูปธาตุ, จกฺขุวิญฺญาณธาตุ…เป… มโนธาตุ, ธมฺมธาตุ, มโนวิญฺญาณธาตุ. เอตฺตาวตา โข, คหปติ, ธาตุนานตฺตํ วุตฺตํ ภควตา’’ติ. उस समय आयुष्मान इसिदत्त उस भिक्षु-संघ में सबसे नए (कनिष्ठ) थे। तब आयुष्मान इसिदत्त ने आयुष्मान स्थविर से यह कहा— “भन्ते स्थविर, क्या मैं चित्त गृहपति के इस प्रश्न का उत्तर दूँ?” “आयुष्मान इसिदत्त, तुम चित्त गृहपति के इस प्रश्न का उत्तर दो।” “गृहपति, क्या तुम इस प्रकार पूछते हो— 'भन्ते स्थविर, धातु-विविधता, धातु-विविधता ऐसा कहा जाता है। भन्ते, भगवान ने किस सीमा तक धातु-विविधता का वर्णन किया है?'” “हाँ, भन्ते।” “गृहपति, भगवान ने इस धातु-विविधता का वर्णन किया है— चक्षु-धातु, रूप-धातु, चक्षु-विज्ञान-धातु... पे... मन-धातु, धर्म-धातु, मन-विज्ञान-धातु। गृहपति, इतनी सीमा तक भगवान ने धातु-विविधता का वर्णन किया है।” อถ โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมโต อิสิทตฺตสฺส ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา เถเร ภิกฺขู ปณีเตน ขาทนีเยน โภชนีเยน สหตฺถา สนฺตปฺเปสิ สมฺปวาเรสิ. อถ โข เถรา ภิกฺขู ภุตฺตาวิโน โอนีตปตฺตปาณิโน อุฏฺฐายาสนา ปกฺกมึสุ. อถ โข อายสฺมา เถโร อายสฺมนฺตํ อิสิทตฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ โข ตํ, อาวุโส อิสิทตฺต[Pg.477], เอโส ปญฺโห ปฏิภาสิ, เนโส ปญฺโห มํ ปฏิภาสิ. เตนหาวุโส อิสิทตฺต, ยทา อญฺญถาปิ เอวรูโป ปญฺโห อาคจฺเฉยฺย, ตญฺเญเวตฺถ ปฏิภาเสยฺยา’’ติ. ทุติยํ. तब चित्त गृहपति आयुष्मान इसिदत्त के भाषण का अभिनन्दन और अनुमोदन कर, स्थविर भिक्षुओं को उत्तम खाद्य और भोज्य पदार्थों से अपने हाथों से संतृप्त और संतुष्ट किया। तब स्थविर भिक्षु भोजन कर चुकने पर, पात्रों से हाथ हटा लेने के बाद, आसन से उठकर चले गए। तब आयुष्मान स्थविर ने आयुष्मान इसिदत्त से यह कहा— “साधु आयुष्मान इसिदत्त, यह प्रश्न तुम्हें अच्छी तरह प्रतिभासित हुआ, यह प्रश्न मुझे प्रतिभासित नहीं हुआ। इसलिए आयुष्मान इसिदत्त, जब कभी फिर इस प्रकार का प्रश्न आए, तो तुम ही उसका उत्तर देना।” द्वितीय। ๓. ทุติยอิสิทตฺตสุตฺตํ ३. द्वितीय इसिदत्त सुत्त ๓๔๕. เอกํ สมยํ สมฺพหุลา เถรา ภิกฺขู มจฺฉิกาสณฺเฑ วิหรนฺติ อมฺพาฏกวเน. อถ โข จิตฺโต คหปติ เยน เถรา ภิกฺขู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เถเร ภิกฺขู อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จิตฺโต คหปติ เถเร ภิกฺขู เอตทโวจ – ‘‘อธิวาเสนฺตุ เม, ภนฺเต เถรา, สฺวาตนาย ภตฺต’’นฺติ. อธิวาเสสุํ โข เถรา ภิกฺขู ตุณฺหีภาเวน. อถ โข จิตฺโต คหปติ เถรานํ ภิกฺขูนํ อธิวาสนํ วิทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา เถเร ภิกฺขู อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. อถ โข เถรา ภิกฺขู ตสฺสา รตฺติยา อจฺจเยน ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย เยน จิตฺตสฺส คหปติสฺส นิเวสนํ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทึสุ. ३४५. एक समय बहुत से स्थविर भिक्षु मच्छिकासण्ड के अम्बाटक वन में विहार कर रहे थे। तब चित्त गृहपति जहाँ स्थविर भिक्षु थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर स्थविर भिक्षुओं का अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए चित्त गृहपति ने स्थविर भिक्षुओं से यह कहा— “भन्ते स्थविरों, आप कल के भोजन के लिए मेरा निमंत्रण स्वीकार करें।” स्थविर भिक्षुओं ने मौन रहकर स्वीकार किया। तब चित्त गृहपति स्थविर भिक्षुओं की स्वीकृति जानकर, आसन से उठकर, स्थविर भिक्षुओं का अभिवादन कर और प्रदक्षिणा कर चला गया। तब स्थविर भिक्षु उस रात के बीतने पर, पूर्वाह्न समय में निवसन (चीवर) पहनकर और पात्र-चीवर लेकर जहाँ चित्त गृहपति का निवास था, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर बिछाए गए आसनों पर बैठ गए। อถ โข จิตฺโต คหปติ เยน เถรา ภิกฺขู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เถเร ภิกฺขู อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมนฺตํ เถรํ เอตทโวจ – ‘‘ยา อิมา, ภนฺเต เถร, อเนกวิหิตา ทิฏฺฐิโย โลเก อุปฺปชฺชนฺติ – ‘สสฺสโต โลโกติ วา, อสสฺสโต โลโกติ วา, อนฺตวา โลโกติ วา, อนนฺตวา โลโกติ วา, ตํ ชีวํ ตํ สรีรนฺติ วา, อญฺญํ ชีวํ อญฺญํ สรีรนฺติ วา, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา. ยานิ จิมานิ ทฺวาสฏฺฐิ ทิฏฺฐิคตานิ พฺรหฺมชาเล ภณิตานิ; อิมา นุ โข, ภนฺเต, ทิฏฺฐิโย กิสฺมึ สติ โหนฺติ, กิสฺมึ อสติ น โหนฺตี’’ติ? तब चित्त गृहपति जहाँ स्थविर भिक्षु थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर स्थविर भिक्षुओं का अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए चित्त गृहपति ने आयुष्मान स्थविर से यह कहा— “भन्ते स्थविर, लोक में जो ये अनेक प्रकार की दृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं— 'लोक शाश्वत है' या 'लोक अशाश्वत है', 'लोक अन्तवान है' या 'लोक अनन्तवान है', 'जो जीव है वही शरीर है' या 'जीव अन्य है और शरीर अन्य है', 'तथागत मृत्यु के बाद होते हैं' या 'तथागत मृत्यु के बाद नहीं होते हैं', 'तथागत मृत्यु के बाद होते भी हैं और नहीं भी होते हैं' या 'तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं'। और जो ये बासठ (६२) दृष्टि-गत ब्रह्मजाल सुत्त में भगवान द्वारा कहे गए हैं; भन्ते, ये दृष्टियाँ किसके होने पर होती हैं, और किसके न होने पर नहीं होती हैं?” เอวํ วุตฺเต, อายสฺมา เถโร ตุณฺหี อโหสิ. ทุติยมฺปิ โข จิตฺโต คหปติ…เป… ตติยมฺปิ โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมนฺตํ เถรํ เอตทโวจ – ‘‘ยา อิมา, ภนฺเต เถร, อเนกวิหิตา ทิฏฺฐิโย โลเก [Pg.478] อุปฺปชฺชนฺติ – สสฺสโต โลโกติ วา, อสสฺสโต โลโกติ วา, อนฺตวา โลโกติ วา, อนนฺตวา โลโกติ วา, ตํ ชีวํ ตํ สรีรนฺติ วา, อญฺญํ ชีวํ อญฺญํ สรีรนฺติ วา, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา. ยานิ จิมานิ ทฺวาสฏฺฐิ ทิฏฺฐิคตานิ พฺรหฺมชาเล ภณิตานิ; อิมา นุ โข, ภนฺเต, ทิฏฺฐิโย กิสฺมึ สติ โหนฺติ, กิสฺมึ อสติ น โหนฺตี’’ติ? ตติยมฺปิ โข อายสฺมา เถโร ตุณฺหี อโหสิ. ऐसा कहने पर आयुष्मान स्थविर मौन रहे। दूसरी बार भी चित्त गृहपति... पे... तीसरी बार भी चित्त गृहपति ने आयुष्मान स्थविर से यह कहा— “भन्ते स्थविर, लोक में जो ये अनेक प्रकार की दृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं— लोक शाश्वत है या लोक अशाश्वत है, लोक अन्तवान है या लोक अनन्तवान है, जो जीव है वही शरीर है या जीव अन्य है और शरीर अन्य है, तथागत मृत्यु के बाद होते हैं या तथागत मृत्यु के बाद नहीं होते हैं, तथागत मृत्यु के बाद होते भी हैं और नहीं भी होते हैं या तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं। और जो ये बासठ (६२) दृष्टि-गत ब्रह्मजाल सुत्त में भगवान द्वारा कहे गए हैं; भन्ते, ये दृष्टियाँ किसके होने पर होती हैं, और किसके न होने पर नहीं होती हैं?” तीसरी बार भी आयुष्मान स्थविर मौन रहे। เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา อิสิทตฺโต ตสฺมึ ภิกฺขุสงฺเฆ สพฺพนวโก โหติ. อถ โข อายสฺมา อิสิทตฺโต อายสฺมนฺตํ เถรํ เอตทโวจ – ‘‘พฺยากโรมหํ, ภนฺเต เถร, จิตฺตสฺส คหปติโน เอตํ ปญฺห’’นฺติ? ‘‘พฺยากโรหิ ตฺวํ, อาวุโส อิสิทตฺต, จิตฺตสฺส คหปติโน เอตํ ปญฺห’’นฺติ. ‘‘เอวญฺหิ ตฺวํ, คหปติ, ปุจฺฉสิ – ‘ยา อิมา, ภนฺเต เถร, อเนกวิหิตา ทิฏฺฐิโย โลเก อุปฺปชฺชนฺติ – สสฺสโต โลโกติ วา…เป…; อิมา นุ โข, ภนฺเต, ทิฏฺฐิโย กิสฺมึ สติ โหนฺติ, กิสฺมึ อสติ น โหนฺตี’’’ติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. ‘‘ยา อิมา, คหปติ, อเนกวิหิตา ทิฏฺฐิโย โลเก อุปฺปชฺชนฺติ – ‘สสฺสโต โลโกติ วา, อสสฺสโต โลโกติ วา, อนฺตวา โลโกติ วา อนนฺตวา โลโกติ วา, ตํ ชีวํ ตํ สรีรนฺติ วา, อญฺญํ ชีวํ อญฺญํ สรีรนฺติ วา, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา. ยานิ จิมานิ ทฺวาสฏฺฐิ ทิฏฺฐิคตานิ พฺรหฺมชาเล ภณิตานิ; อิมา โข, คหปติ, ทิฏฺฐิโย สกฺกายทิฏฺฐิยา สติ โหนฺติ, สกฺกายทิฏฺฐิยา อสติ น โหนฺตี’’’ติ. उस समय आयुष्मान इसिदत्त उस भिक्षु-संघ में सबसे कनिष्ठ थे। तब आयुष्मान इसिदत्त ने आयुष्मान स्थविर से यह कहा— "भन्ते स्थविर! क्या मैं गृहपति चित्त के इस प्रश्न का उत्तर दूँ?" "आयुष्मान इसिदत्त! तुम गृहपति चित्त के इस प्रश्न का उत्तर दो।" "गृहपति! क्या तुम इस प्रकार पूछ रहे हो— 'भन्ते स्थविर! लोक में जो ये अनेक प्रकार की दृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं— जैसे लोक शाश्वत है... आदि; भन्ते! ये दृष्टियाँ किसके होने पर होती हैं और किसके न होने पर नहीं होतीं?'" "हाँ, भन्ते।" "गृहपति! लोक में जो ये अनेक प्रकार की दृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं— 'लोक शाश्वत है' या 'लोक अशाश्वत है', 'लोक अन्तवान है' या 'लोक अनन्त है', 'जो जीव है वही शरीर है' या 'जीव अन्य है और शरीर अन्य है', 'तथागत मृत्यु के बाद होते हैं' या 'तथागत मृत्यु के बाद नहीं होते' या 'तथागत मृत्यु के बाद होते भी हैं और नहीं भी होते' या 'तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते'। और जो ये बासठ दृष्टियाँ ब्रह्मजाल में कही गई हैं; गृहपति! ये दृष्टियाँ सत्काय-दृष्टि के होने पर होती हैं और सत्काय-दृष्टि के न होने पर नहीं होतीं।" ‘‘กถํ ปน, ภนฺเต, สกฺกายทิฏฺฐิ โหตี’’ติ? ‘‘อิธ, คหปติ, อสฺสุตวา ปุถุชฺชโน อริยานํ อทสฺสาวี อริยธมฺมสฺส อโกวิโท อริยธมฺเม อวินีโต, สปฺปุริสานํ อทสฺสาวี สปฺปุริสธมฺมสฺส อโกวิโท สปฺปุริสธมฺเม อวินีโต รูปํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, รูปวนฺตํ วา อตฺตานํ, อตฺตนิ วา รูปํ, รูปสฺมึ วา อตฺตานํ; เวทนํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ…เป… สญฺญํ… สงฺขาเร… วิญฺญาณํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, วิญฺญาณวนฺตํ วา อตฺตานํ, อตฺตนิ [Pg.479] วา วิญฺญาณํ, วิญฺญาณสฺมึ วา อตฺตานํ. เอวํ โข, คหปติ, สกฺกายทิฏฺฐิ โหตี’’ติ. "भन्ते! सत्काय-दृष्टि कैसे होती है?" "गृहपति! यहाँ कोई अश्रुतवान पृथग्जन, जो आर्यों का दर्शन न करने वाला, आर्य धर्म में अकुशल और आर्य धर्म में अविनीत है; सत्पुरुषों का दर्शन न करने वाला, सत्पुरुष धर्म में अकुशल और सत्पुरुष धर्म में अविनीत है— वह रूप को आत्मा के रूप में देखता है, या आत्मा को रूपवान देखता है, या आत्मा में रूप को देखता है, या रूप में आत्मा को देखता है। वह वेदना को आत्मा के रूप में देखता है... संज्ञा को... संस्कारों को... विज्ञान को आत्मा के रूप में देखता है, या आत्मा को विज्ञानवान देखता है, या आत्मा में विज्ञान को देखता है, या विज्ञान में आत्मा को देखता है। गृहपति! इस प्रकार सत्काय-दृष्टि होती है।" ‘‘กถํ ปน, ภนฺเต, สกฺกายทิฏฺฐิ น โหตี’’ติ? ‘‘อิธ, คหปติ, สุตวา อริยสาวโก อริยานํ ทสฺสาวี อริยธมฺมสฺส โกวิโท อริยธมฺเม สุวินีโต สปฺปุริสานํ ทสฺสาวี สปฺปุริสธมฺมสฺส โกวิโท สปฺปุริสธมฺเม สุวินีโต น รูปํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, น รูปวนฺตํ วา อตฺตานํ, น อตฺตนิ วา รูปํ, น รูปสฺมึ วา อตฺตานํ; น เวทนํ… น สญฺญํ… น สงฺขาเร… น วิญฺญาณํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, น วิญฺญาณวนฺตํ วา อตฺตานํ, น อตฺตนิ วา วิญฺญาณํ, น วิญฺญาณสฺมึ วา อตฺตานํ. เอวํ โข, คหปติ, สกฺกายทิฏฺฐิ น โหตี’’ติ. "भन्ते! सत्काय-दृष्टि कैसे नहीं होती है?" "गृहपति! यहाँ कोई श्रुतवान आर्य श्रावक, जो आर्यों का दर्शन करने वाला, आर्य धर्म में कुशल और आर्य धर्म में सुविनीत है; सत्पुरुषों का दर्शन करने वाला, सत्पुरुष धर्म में कुशल और सत्पुरुष धर्म में सुविनीत है— वह न तो रूप को आत्मा के रूप में देखता है, न आत्मा को रूपवान देखता है, न आत्मा में रूप को देखता है, और न रूप में आत्मा को देखता है। वह न वेदना को... न संज्ञा को... न संस्कारों को... न विज्ञान को आत्मा के रूप में देखता है, न आत्मा को विज्ञानवान देखता है, न आत्मा में विज्ञान को देखता है, और न विज्ञान में आत्मा को देखता है। गृहपति! इस प्रकार सत्काय-दृष्टि नहीं होती है।" ‘‘กุโต, ภนฺเต, อยฺโย อิสิทตฺโต อาคจฺฉตี’’ติ? ‘‘อวนฺติยา โข, คหปติ, อาคจฺฉามี’’ติ. ‘‘อตฺถิ, ภนฺเต, อวนฺติยา อิสิทตฺโต นาม กุลปุตฺโต อมฺหากํ อทิฏฺฐสหาโย ปพฺพชิโต? ทิฏฺโฐ โส อายสฺมตา’’ติ? ‘‘เอวํ, คหปตี’’ติ. ‘‘กหํ นุ โข โส, ภนฺเต, อายสฺมา เอตรหิ วิหรตี’’ติ? เอวํ วุตฺเต, อายสฺมา อิสิทตฺโต ตุณฺหี อโหสิ. ‘‘อยฺโย โน, ภนฺเต, อิสิทตฺโต’’ติ? ‘‘เอวํ, คหปตี’’ติ. ‘‘อภิรมตุ, ภนฺเต, อยฺโย อิสิทตฺโต มจฺฉิกาสณฺเฑ. รมณียํ อมฺพาฏกวนํ. อหํ อยฺยสฺส อิสิทตฺตสฺส อุสฺสุกฺกํ กริสฺสามิ จีวรปิณฺฑปาตเสนาสนคิลานปฺปจฺจยเภสชฺชปริกฺขาราน’’นฺติ. ‘‘กลฺยาณํ วุจฺจติ, คหปตี’’ติ. "भन्ते! आर्य इसिदत्त कहाँ से आ रहे हैं?" "गृहपति! मैं अवन्ती से आ रहा हूँ।" "भन्ते! अवन्ती में इसिदत्त नाम का एक कुलपुत्र है, जो हमारा बिना देखा हुआ मित्र है और प्रव्रजित हो गया है। क्या आयुष्मान ने उसे देखा है?" "हाँ, गृहपति।" "भन्ते! वे आयुष्मान इस समय कहाँ विहार कर रहे हैं?" ऐसा कहने पर आयुष्मान इसिदत्त मौन रहे। "भन्ते! क्या आप ही हमारे इसिदत्त हैं?" "हाँ, गृहपति।" "भन्ते! आर्य इसिदत्त मच्छिकासण्ड में ही विहार करें। यह अम्बाटकवन रमणीय है। मैं आर्य इसिदत्त के लिए चीवर, पिण्डपात, शयनासन और ग्लान-प्रत्यय-भैषज्य-परिष्कारों की व्यवस्था करूँगा।" "गृहपति! तुमने बहुत अच्छा कहा।" อถ โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมโต อิสิทตฺตสฺส ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา เถเร ภิกฺขู ปณีเตน ขาทนีเยน โภชนีเยน สหตฺถา สนฺตปฺเปสิ สมฺปวาเรสิ. อถ โข เถรา ภิกฺขู ภุตฺตาวิโน โอนีตปตฺตปาณิโน อุฏฺฐายาสนา ปกฺกมึสุ. อถ โข อายสฺมา เถโร อายสฺมนฺตํ อิสิทตฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ โข ตํ, อาวุโส อิสิทตฺต, เอโส ปญฺโห ปฏิภาสิ. เนโส ปญฺโห มํ ปฏิภาสิ. เตนหาวุโส อิสิทตฺต, ยทา อญฺญถาปิ เอวรูโป ปญฺโห อาคจฺเฉยฺย, ตญฺเญเวตฺถ ปฏิภาเสยฺยา’’ติ. อถ โข อายสฺมา อิสิทตฺโต เสนาสนํ สํสาเมตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย มจฺฉิกาสณฺฑมฺหา ปกฺกามิ. ยํ มจฺฉิกาสณฺฑมฺหา ปกฺกามิ, ตถา ปกฺกนฺโตว อโหสิ, น ปุน ปจฺจาคจฺฉีติ. ตติยํ. तब गृहपति चित्त ने आयुष्मान इसिदत्त के वचन का अभिनन्दन और अनुमोदन कर, स्थविर भिक्षुओं को उत्तम खाद्य और भोज्य पदार्थों से अपने हाथों से संतृप्त और संतुष्ट किया। तब वे स्थविर भिक्षु भोजन कर चुकने के बाद, पात्रों से हाथ हटाकर, आसन से उठकर चले गए। तब आयुष्मान स्थविर ने आयुष्मान इसिदत्त से यह कहा— "आयुष्मान इसिदत्त! यह प्रश्न तुम्हारे ज्ञान में अच्छी तरह प्रतिभासित हुआ। यह प्रश्न मेरे ज्ञान में प्रतिभासित नहीं हुआ था। इसलिए आयुष्मान इसिदत्त! जब कभी फिर इस प्रकार का प्रश्न आए, तो तुम ही उसका उत्तर देना।" तब आयुष्मान इसिदत्त ने अपने शयनासन को व्यवस्थित किया और पात्र-चीवर लेकर मच्छिकासण्ड से प्रस्थान कर गए। वे मच्छिकासण्ड से जिस प्रकार गए, वैसे ही चले गए और फिर कभी वापस नहीं आए। ๔. มหกปาฏิหาริยสุตฺตํ ४. महक-प्रातिहार्य सुत्त ๓๔๖. เอกํ [Pg.480] สมยํ สมฺพหุลา เถรา ภิกฺขู มจฺฉิกาสณฺเฑ วิหรนฺติ อมฺพาฏกวเน. อถ โข จิตฺโต คหปติ เยน เถรา ภิกฺขู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เถเร ภิกฺขู อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จิตฺโต คหปติ เถเร ภิกฺขู เอตทโวจ – ‘‘อธิวาเสนฺตุ เม, ภนฺเต เถรา, สฺวาตนาย โคกุเล ภตฺต’’นฺติ. อธิวาเสสุํ โข เถรา ภิกฺขู ตุณฺหีภาเวน. อถ โข จิตฺโต คหปติ เถรานํ ภิกฺขูนํ อธิวาสนํ วิทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา เถเร ภิกฺขู อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. อถ โข เถรา ภิกฺขู ตสฺสา รตฺติยา อจฺจเยน ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย เยน จิตฺตสฺส คหปติโน โคกุลํ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทึสุ. ३४६. एक समय बहुत से स्थविर भिक्षु मच्छिकासण्ड के अम्बाटकवन में विहार कर रहे थे। तब गृहपति चित्त जहाँ वे स्थविर भिक्षु थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर स्थविर भिक्षुओं को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए गृहपति चित्त ने स्थविर भिक्षुओं से यह कहा— "भन्ते स्थविर! आप लोग कल के लिए मेरी गोशाला में भोजन स्वीकार करें।" स्थविर भिक्षुओं ने मौन रहकर स्वीकार कर लिया। तब गृहपति चित्त स्थविर भिक्षुओं की स्वीकृति जानकर, आसन से उठकर, स्थविर भिक्षुओं को अभिवादन और प्रदक्षिणा कर चला गया। तब वे स्थविर भिक्षु उस रात के बीतने पर, पूर्वाह्न समय में निवसन पहनकर और पात्र-चीवर लेकर जहाँ गृहपति चित्त की गोशाला थी, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर बिछाए हुए आसनों पर बैठ गए। อถ โข จิตฺโต คหปติ เถเร ภิกฺขู ปณีเตน สปฺปิปายาเสน สหตฺถา สนฺตปฺเปสิ สมฺปวาเรสิ. อถ โข เถรา ภิกฺขู ภุตฺตาวิโน โอนีตปตฺตปาณิโน อุฏฺฐายาสนา ปกฺกมึสุ. จิตฺโตปิ โข คหปติ ‘เสสกํ วิสฺสชฺเชถา’ติ วตฺวา เถเร ภิกฺขู ปิฏฺฐิโต ปิฏฺฐิโต อนุพนฺธิ. เตน โข ปน สมเยน อุณฺหํ โหติ กุถิตํ ; เต จ เถรา ภิกฺขู ปเวลิยมาเนน มญฺเญ กาเยน คจฺฉนฺติ, ยถา ตํ โภชนํ ภุตฺตาวิโน. तब चित्त गृहपति ने स्थविर भिक्षुओं को उत्तम घृत-पायस (घी वाली खीर) से अपने हाथों से संतृप्त किया और संतुष्ट किया। तब वे स्थविर भिक्षु भोजन कर चुकने पर, पात्रों से हाथ हटाकर, आसनों से उठकर चल दिए। चित्त गृहपति ने भी 'बचे हुए को विसर्जित कर दो' ऐसा कहकर स्थविर भिक्षुओं के पीछे-पीछे अनुगमन किया। उस समय बहुत गर्मी थी और भूमि तप रही थी; और वे स्थविर भिक्षु मानो कांपते हुए शरीर से चल रहे थे, जैसा कि भोजन करने के बाद होता है। เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา มหโก ตสฺมึ ภิกฺขุสงฺเฆ สพฺพนวโก โหติ. อถ โข อายสฺมา มหโก อายสฺมนฺตํ เถรํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ ขฺวสฺส, ภนฺเต เถร, สีตโก จ วาโต วาเยยฺย, อพฺภสมฺปิลาโป จ อสฺส, เทโว จ เอกเมกํ ผุสาเยยฺยา’’ติ. उस समय आयुष्मान महक उस भिक्षु-संघ में सबसे कनिष्ठ (नवागंतुक) थे। तब आयुष्मान महक ने आयुष्मान स्थविर से यह कहा— "भन्ते स्थविर! कितना अच्छा होता यदि शीतल वायु चलती, बादल छा जाते और वर्षा की एक-एक बूंद गिरती।" ‘‘สาธุ ขฺวสฺส, อาวุโส มหก, ยํ สีตโก จ วาโต วาเยยฺย, อพฺภสมฺปิลาโป จ อสฺส, เทโว จ เอกเมกํ ผุสาเยยฺยา’’ติ. อถ โข อายสฺมา มหโก ตถารูปํ อิทฺธาภิสงฺขารํ อภิสงฺขริ ยถา สีตโก จ วาโต วายิ, อพฺภสมฺปิลาโป จ อสฺส, เทโว จ เอกเมกํ ผุสิ. อถ โข จิตฺตสฺส คหปติโน เอตทโหสิ – ‘‘โย โข อิมสฺมึ ภิกฺขุสงฺเฆ สพฺพนวโก ภิกฺขุ ตสฺสายํ เอวรูโป อิทฺธานุภาโว’’ติ[Pg.481]. อถ โข อายสฺมา มหโก อารามํ สมฺปาปุณิตฺวา อายสฺมนฺตํ เถรํ เอตทโวจ – ‘‘อลเมตฺตาวตา, ภนฺเต เถรา’’ติ? ‘‘อลเมตฺตาวตา, อาวุโส มหก! กตเมตฺตาวตา, อาวุโส มหก! ปูชิตเมตฺตาวตา, อาวุโส มหกา’’ติ. อถ โข เถรา ภิกฺขู ยถาวิหารํ อคมํสุ. อายสฺมาปิ มหโก สกํ วิหารํ อคมาสิ. "आयुष्मान महक! यह अच्छा होता यदि शीतल वायु चलती, बादल छा जाते और वर्षा की एक-एक बूंद गिरती।" तब आयुष्मान महक ने वैसा ही ऋद्धि-अभिसंस्कार (चमत्कार) किया जिससे शीतल वायु चलने लगी, बादल छा गए और वर्षा की एक-एक बूंद गिरने लगी। तब चित्त गृहपति को यह विचार आया— "जो इस भिक्षु-संघ में सबसे कनिष्ठ भिक्षु है, उसका ऐसा ऋद्धि-अनुभाव (प्रभाव) है!" तब आयुष्मान महक ने आराम (विहार) पहुँचकर आयुष्मान स्थविर से यह कहा— "भन्ते स्थविर! क्या इतने से पर्याप्त है?" "आयुष्मान महक! इतने से पर्याप्त है; आयुष्मान महक! इतने से (कार्य) हो गया; आयुष्मान महक! इतने से पूजा हो गई।" तब स्थविर भिक्षु अपने-अपने विहारों को चले गए। आयुष्मान महक भी अपने विहार को चले गए। อถ โข จิตฺโต คหปติ เยนายสฺมา มหโก เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหกํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมนฺตํ มหกํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต, อยฺโย มหโก อุตฺตริมนุสฺสธมฺมํ อิทฺธิปาฏิหาริยํ ทสฺเสตู’’ติ. ‘‘เตน หิ ตฺวํ, คหปติ, อาลินฺเท อุตฺตราสงฺคํ ปญฺญเปตฺวา ติณกลาปํ โอกาเสหี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมโต มหกสฺส ปฏิสฺสุตฺวา อาลินฺเท อุตฺตราสงฺคํ ปญฺญเปตฺวา ติณกลาปํ โอกาเสสิ. อถ โข อายสฺมา มหโก วิหารํ ปวิสิตฺวา สูจิฆฏิกํ ทตฺวา ตถารูปํ อิทฺธาภิสงฺขารํ อภิสงฺขริ ยถา ตาลจฺฉิคฺคเฬน จ อคฺคฬนฺตริกาย จ อจฺจิ นิกฺขมิตฺวา ติณานิ ฌาเปสิ, อุตฺตราสงฺคํ น ฌาเปสิ. อถ โข จิตฺโต คหปติ อุตฺตราสงฺคํ ปปฺโผเฏตฺวา สํวิคฺโค โลมหฏฺฐชาโต เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. อถ โข อายสฺมา มหโก วิหารา นิกฺขมิตฺวา จิตฺตํ คหปตึ เอตทโวจ – ‘‘อลเมตฺตาวตา, คหปตี’’ติ? तब चित्त गृहपति जहाँ आयुष्मान महक थे, वहाँ गया; पहुँचकर आयुष्मान महक को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए चित्त गृहपति ने आयुष्मान महक से यह कहा— "भन्ते! अच्छा हो यदि आयुष्मान महक मुझे उत्तर-मनुष्य-धर्म (अलौकिक) ऋद्धि-प्रातिहार्य दिखाएं।" "तो गृहपति! तुम बरामदे में अपना उत्तरासंग (ऊपरी वस्त्र) बिछाकर उस पर घास का एक गट्ठर फैला दो।" "जी भन्ते!" कहकर चित्त गृहपति ने आयुष्मान महक की बात मानकर बरामदे में उत्तरासंग बिछाकर घास का गट्ठर फैला दिया। तब आयुष्मान महक ने विहार (कुटी) में प्रवेश कर द्वार की कुंडी लगा दी और वैसा ऋद्धि-अभिसंस्कार किया जिससे चाबी के छेद और द्वार की दरारों से अग्नि की लपटें निकलकर घास को जला दिया, किंतु उत्तरासंग को नहीं जलाया। तब चित्त गृहपति उत्तरासंग को झाड़कर, संविग्न (भयभीत) और रोमांचित होकर एक ओर खड़ा हो गया। तब आयुष्मान महक ने विहार से निकलकर चित्त गृहपति से यह कहा— "गृहपति! क्या इतने से पर्याप्त है?" ‘‘อลเมตฺตาวตา, ภนฺเต มหก! กตเมตฺตาวตา, ภนฺเต, มหก! ปูชิตเมตฺตาวตา, ภนฺเต มหก! อภิรมตุ, ภนฺเต, อยฺโย มหโก มจฺฉิกาสณฺเฑ. รมณียํ อมฺพาฏกวนํ. อหํ อยฺยสฺส มหกสฺส อุสฺสุกฺกํ กริสฺสามิ จีวรปิณฺฑปาตเสนาสนคิลานปฺปจฺจยเภสชฺชปริกฺขาราน’’นฺติ. ‘‘กลฺยาณํ วุจฺจติ, คหปตี’’ติ. อถ โข อายสฺมา มหโก เสนาสนํ สํสาเมตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย มจฺฉิกาสณฺฑมฺหา ปกฺกามิ. ยํ มจฺฉิกาสณฺฑมฺหา ปกฺกามิ, ตถา ปกฺกนฺโตว อโหสิ; น ปุน ปจฺจาคจฺฉีติ. จตุตฺถํ. "भन्ते महक! इतने से पर्याप्त है; भन्ते महक! इतने से (कार्य) हो गया; भन्ते महक! इतने से पूजा हो गई। भन्ते! आयुष्मान महक मच्छिकासण्ड में ही विहार करें। अम्बाटक वन रमणीय है। मैं आयुष्मान महक के लिए चीवर, पिण्डपात, शयनासन और ग्लान-प्रत्यय-भैषज्य-परिष्कारों (दवाइयों) की व्यवस्था करूँगा।" "गृहपति! तुमने कल्याणकारी बात कही है।" तब आयुष्मान महक ने अपने शयनासन को समेटा और पात्र-चीवर लेकर मच्छिकासण्ड से प्रस्थान कर गए। वे जो मच्छिकासण्ड से गए, सो चले ही गए; फिर कभी वापस नहीं आए। चौथा (सूक्त)। ๕. ปฐมกามภูสุตฺตํ ५. प्रथम कामभू सुत्त ๓๔๗. เอกํ สมยํ อายสฺมา กามภู มจฺฉิกาสณฺเฑ วิหรติ อมฺพาฏกวเน. อถ โข จิตฺโต คหปติ เยนายสฺมา กามภู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ กามภุํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ[Pg.482]. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข จิตฺตํ คหปตึ อายสฺมา กามภู เอตทโวจ – ३४७. एक समय आयुष्मान कामभू मच्छिकासण्ड के अम्बाटक वन में विहार कर रहे थे। तब चित्त गृहपति जहाँ आयुष्मान कामभू थे, वहाँ गया; पहुँचकर आयुष्मान कामभू को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए चित्त गृहपति से आयुष्मान कामभू ने यह कहा— ‘‘วุตฺตมิทํ, คหปติ – "गृहपति! यह कहा गया है—" ‘‘เนลงฺโค เสตปจฺฉาโท, เอกาโร วตฺตตี รโถ; อนีฆํ ปสฺส อายนฺตํ, ฉินฺนโสตํ อพนฺธน’’นฺติ. "निर्दोष अंगों वाला, श्वेत छत्र वाला, एक धुरी वाला रथ चल रहा है; उस निष्पाप (दुःख रहित) को आते हुए देखो, जिसकी तृष्णा का स्रोत कट गया है और जो बंधनों से मुक्त है।" ‘‘อิมสฺส นุ โข, คหปติ, สํขิตฺเตน ภาสิตสฺส กถํ วิตฺถาเรน อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ’’ติ? ‘‘กึ นุ โข เอตํ, ภนฺเต, ภควตา ภาสิต’’นฺติ? ‘‘เอวํ, คหปตี’’ติ. ‘‘เตน หิ, ภนฺเต, มุหุตฺตํ อาคเมหิ ยาวสฺส อตฺถํ เปกฺขามี’’ติ. อถ โข จิตฺโต คหปติ มุหุตฺตํ ตุณฺหี หุตฺวา อายสฺมนฺตํ กามภุํ เอตทโวจ – "गृहपति! संक्षेप में कहे गए इस कथन का अर्थ विस्तार से कैसे समझना चाहिए?" "भन्ते! क्या यह भगवान द्वारा कहा गया है?" "हाँ गृहपति!" "तो भन्ते! एक क्षण प्रतीक्षा करें जब तक मैं इसके अर्थ पर विचार करता हूँ।" तब चित्त गृहपति एक क्षण मौन रहकर आयुष्मान कामभू से यह बोला— ‘‘‘เนลงฺค’นฺติ โข, ภนฺเต, สีลานเมตํ อธิวจนํ. ‘เสตปจฺฉาโท’ติ โข, ภนฺเต, วิมุตฺติยา เอตํ อธิวจนํ. ‘เอกาโร’ติ โข, ภนฺเต, สติยา เอตํ อธิวจนํ. ‘วตฺตตี’ติ โข, ภนฺเต, อภิกฺกมปฏิกฺกมสฺเสตํ อธิวจนํ. ‘รโถ’ติ โข, ภนฺเต, อิมสฺเสตํ จาตุมหาภูติกสฺส กายสฺส อธิวจนํ มาตาเปตฺติกสมฺภวสฺส โอทนกุมฺมาสูปจยสฺส อนิจฺจุจฺฉาทนปริมทฺทนเภทนวิทฺธํสนธมฺมสฺส. ราโค โข, ภนฺเต, นีโฆ, โทโส นีโฆ, โมโห นีโฆ. เต ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ปหีนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. ตสฺมา ขีณาสโว ภิกฺขุ ‘อนีโฆ’ติ วุจฺจติ. ‘อายนฺต’นฺติ โข, ภนฺเต, อรหโต เอตํ อธิวจนํ. ‘โสโต’ติ โข, ภนฺเต, ตณฺหาเยตํ อธิวจนํ. สา ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ปหีนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. ตสฺมา ขีณาสโว ภิกฺขุ ‘ฉินฺนโสโต’ติ วุจฺจติ. ราโค โข, ภนฺเต, พนฺธนํ, โทโส พนฺธนํ, โมโห พนฺธนํ. เต ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ปหีนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. ตสฺมา ขีณาสโว ภิกฺขุ ‘อพนฺธโน’ติ วุจฺจติ. อิติ โข, ภนฺเต, ยํ ตํ ภควตา วุตฺตํ – "भन्ते! 'नेलग' (निर्दोष अंगों वाला) यह शील का नाम है। भन्ते! 'श्वेत-छत्र' यह विमुक्ति (अर्हत्व फल) का नाम है। भन्ते! 'एक-अक्ष' (एक धुरी वाला) यह स्मृति का नाम है। भन्ते! 'चलता है' यह आगे बढ़ने और पीछे हटने का नाम है। भन्ते! 'रथ' यह चार महाभूतों से बने, माता-पिता के संयोग से उत्पन्न, अन्न-कवल से पुष्ट, अनित्य, उबटन-मालिश, मर्दन, भेदन और विनाश के स्वभाव वाले इस शरीर का नाम है। भन्ते! राग दुःख है, द्वेष दुःख है, मोह दुःख है। क्षीणास्त्रव भिक्षु के लिए ये प्रहीण हो चुके हैं, जड़ से कट चुके हैं, ताड़ के ठूँठ की तरह हो गए हैं, अभाव को प्राप्त हो चुके हैं और भविष्य में पुनः उत्पन्न न होने वाले स्वभाव के हैं। इसलिए क्षीणास्त्रव भिक्षु को 'अनीघ' (दुःख-रहित) कहा जाता है। भन्ते! 'आने वाला' (आयान्त) यह अर्हन्त का नाम है। भन्ते! 'स्रोत' यह तृष्णा का नाम है। क्षीणास्त्रव भिक्षु के लिए वह तृष्णा प्रहीण हो चुकी है, जड़ से कट चुकी है, ताड़ के ठूँठ की तरह हो गई है, अभाव को प्राप्त हो चुकी है और भविष्य में पुनः उत्पन्न न होने वाले स्वभाव की है। इसलिए क्षीणास्त्रव भिक्षु को 'छिन्न-स्रोत' कहा जाता है। भन्ते! राग बंधन है, द्वेष बंधन है, मोह बंधन है। क्षीणास्त्रव भिक्षु के लिए वे प्रहीण हो चुके हैं, जड़ से कट चुके हैं, ताड़ के ठूँठ की तरह हो गए हैं, अभाव को प्राप्त हो चुके हैं और भविष्य में पुनः उत्पन्न न होने वाले स्वभाव के हैं। इसलिए क्षीणास्त्रव भिक्षु को 'अबंधन' कहा जाता है। भन्ते! भगवान ने जो यह कहा था—" ‘‘เนลงฺโค เสตปจฺฉาโท, เอกาโร วตฺตตี รโถ; อนีฆํ ปสฺส อายนฺตํ, ฉินฺนโสตํ อพนฺธน’’นฺติ. "निर्दोष अंगों वाला, श्वेत-छत्र युक्त, एक धुरी वाला रथ चलता है; उस दुःख-रहित, छिन्न-स्रोत और बंधन-मुक्त आने वाले (अर्हन्त) को देखो।" ‘‘อิมสฺส [Pg.483] โข, ภนฺเต, ภควตา สํขิตฺเตน ภาสิตสฺส เอวํ วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานามี’’ติ. ‘‘ลาภา เต, คหปติ, สุลทฺธํ เต, คหปติ! ยสฺส เต คมฺภีเร พุทฺธวจเน ปญฺญาจกฺขุ กมตี’’ติ. ปญฺจมํ. "भन्ते! भगवान द्वारा संक्षेप में कहे गए इस कथन का अर्थ मैं विस्तार से इस प्रकार समझता हूँ।" "गृहपति! यह तुम्हारे लिए लाभ की बात है, गृहपति! यह तुम्हारे लिए सुलब्ध है कि तुम्हारी प्रज्ञा-चक्षु भगवान के गंभीर वचनों में प्रवेश करती है।" पाँचवाँ। ๖. ทุติยกามภูสุตฺตํ ६. द्वितीय कामभू सुत्त ๓๔๘. เอกํ สมยํ อายสฺมา กามภู มจฺฉิกาสณฺเฑ วิหรติ อมฺพาฏกวเน. อถ โข จิตฺโต คหปติ เยนายสฺมา กามภู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมนฺตํ กามภุํ เอตทโวจ – ‘‘กติ นุ โข, ภนฺเต, สงฺขารา’’ติ? ‘‘ตโย โข, คหปติ, สงฺขารา – กายสงฺขาโร, วจีสงฺขาโร, จิตฺตสงฺขาโร’’ติ. ‘‘สาธุ, ภนฺเต’’ติ โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมโต กามภุสฺส ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา อายสฺมนฺตํ กามภุํ อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ‘‘กตโม ปน, ภนฺเต, กายสงฺขาโร, กตโม วจีสงฺขาโร, กตโม จิตฺตสงฺขาโร’’ติ? ‘‘อสฺสาสปสฺสาสา โข, คหปติ, กายสงฺขาโร, วิตกฺกวิจารา วจีสงฺขาโร, สญฺญา จ เวทนา จ จิตฺตสงฺขาโร’’ติ. ३४८. एक समय आयुष्मान कामभू मच्छिकासण्ड के अम्बाटक वन में विहार कर रहे थे। तब चित्त गृहपति आयुष्मान कामभू के पास आए और एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए चित्त गृहपति ने आयुष्मान कामभू से यह पूछा— "भन्ते! संस्कार कितने हैं?" "गृहपति! तीन संस्कार हैं— काय-संस्कार, वची-संस्कार और चित्त-संस्कार।" "साधु, भन्ते!" कहकर चित्त गृहपति ने आयुष्मान कामभू के भाषण का अभिनंदन और अनुमोदन किया और उनसे आगे प्रश्न पूछा— "भन्ते! काय-संस्कार क्या है, वची-संस्कार क्या है और चित्त-संस्कार क्या है?" "गृहपति! श्वास-प्रश्वास काय-संस्कार है, वितर्क-विचार वची-संस्कार है, और संज्ञा तथा वेदना चित्त-संस्कार हैं।" ‘‘สาธุ, ภนฺเต’’ติ โข จิตฺโต คหปติ…เป… อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ‘‘กสฺมา ปน, ภนฺเต, อสฺสาสปสฺสาสา กายสงฺขาโร, กสฺมา วิตกฺกวิจารา วจีสงฺขาโร, กสฺมา สญฺญา จ เวทนา จ จิตฺตสงฺขาโร’’ติ? ‘‘อสฺสาสปสฺสาสา โข, คหปติ, กายิกา. เอเต ธมฺมา กายปฺปฏิพทฺธา, ตสฺมา อสฺสาสปสฺสาสา กายสงฺขาโร. ปุพฺเพ โข, คหปติ, วิตกฺเกตฺวา วิจาเรตฺวา ปจฺฉา วาจํ ภินฺทติ, ตสฺมา วิตกฺกวิจารา วจีสงฺขาโร. สญฺญา จ เวทนา จ เจตสิกา. เอเต ธมฺมา จิตฺตปฺปฏิพทฺธา, ตสฺมา สญฺญา จ เวทนา จ จิตฺตสงฺขาโร’’ติ. "साधु, भन्ते!" कहकर चित्त गृहपति ने... आगे प्रश्न पूछा— "भन्ते! श्वास-प्रश्वास काय-संस्कार क्यों है? वितर्क-विचार वची-संस्कार क्यों है? संज्ञा और वेदना चित्त-संस्कार क्यों हैं?" "गृहपति! श्वास-प्रश्वास कायिक हैं। ये धर्म शरीर से आबद्ध हैं, इसलिए श्वास-प्रश्वास काय-संस्कार हैं। गृहपति! पहले वितर्क और विचार करके ही बाद में वाणी निकलती है, इसलिए वितर्क-विचार वची-संस्कार हैं। संज्ञा और वेदना चैतसिक हैं। ये धर्म चित्त से आबद्ध हैं, इसलिए संज्ञा और वेदना चित्त-संस्कार हैं।" สาธุ…เป… อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ‘‘กถํ ปน, ภนฺเต, สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติ โหตี’’ติ? ‘‘น โข, คหปติ, สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปชฺชนฺตสฺส ภิกฺขุโน เอวํ โหติ – ‘อหํ สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปชฺชิสฺส’นฺติ วา ‘อหํ สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปชฺชามี’ติ วา ‘อหํ สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺโน’ติ วา. อถ ขฺวสฺส ปุพฺเพว ตถา จิตฺตํ ภาวิตํ โหติ ยํ ตํ ตถตฺตาย อุปเนตี’’ติ. "साधु..." आगे प्रश्न पूछा— "भन्ते! संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्ति कैसे होती है?" "गृहपति! संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्ति में प्रवेश करने वाले भिक्षु को ऐसा विचार नहीं होता कि 'मैं निरोध समापत्ति में प्रवेश करूँगा' या 'मैं प्रवेश कर रहा हूँ' या 'मैं प्रविष्ट हो गया हूँ'। बल्कि, उसका चित्त पहले से ही इस प्रकार भावित होता है जो उसे उस अवस्था (तथत्व) की ओर ले जाता है।" สาธุ [Pg.484] …เป… อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ‘‘สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปชฺชนฺตสฺส ปน, ภนฺเต, ภิกฺขุโน กตเม ธมฺมา ปฐมํ นิรุชฺฌนฺติ, ยทิ วา กายสงฺขาโร, ยทิ วา วจีสงฺขาโร, ยทิ วา จิตฺตสงฺขาโร’’ติ? ‘‘สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปชฺชนฺตสฺส โข, คหปติ, ภิกฺขุโน วจีสงฺขาโร ปฐมํ นิรุชฺฌติ, ตโต กายสงฺขาโร, ตโต จิตฺตสงฺขาโร’’ติ. "साधु..." आगे प्रश्न पूछा— "भन्ते! संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्ति में प्रवेश करने वाले भिक्षु के कौन से धर्म पहले निरुद्ध होते हैं— काय-संस्कार, वची-संस्कार या चित्त-संस्कार?" "गृहपति! संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्ति में प्रवेश करने वाले भिक्षु का वची-संस्कार पहले निरुद्ध होता है, उसके बाद काय-संस्कार और उसके बाद चित्त-संस्कार।" สาธุ…เป… อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ‘‘ยฺวายํ, ภนฺเต, มโต กาลงฺกโต, โย จายํ ภิกฺขุ สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺโน, อิเมสํ กึ นานากรณ’’นฺติ? ‘‘ยฺวายํ คหปติ, มโต กาลงฺกโต ตสฺส กายสงฺขาโร นิรุทฺโธ ปฏิปฺปสฺสทฺโธ, วจีสงฺขาโร นิรุทฺโธ ปฏิปฺปสฺสทฺโธ, จิตฺตสงฺขาโร นิรุทฺโธ ปฏิปฺปสฺสทฺโธ, อายุ ปริกฺขีโณ, อุสฺมา วูปสนฺตา, อินฺทฺริยานิ วิปริภินฺนานิ. โย จ ขฺวายํ, คหปติ, ภิกฺขุ สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺโน, ตสฺสปิ กายสงฺขาโร นิรุทฺโธ ปฏิปฺปสฺสทฺโธ, วจีสงฺขาโร นิรุทฺโธ ปฏิปฺปสฺสทฺโธ, จิตฺตสงฺขาโร นิรุทฺโธ ปฏิปฺปสฺสทฺโธ, อายุ อปริกฺขีโณ, อุสฺมา อวูปสนฺตา, อินฺทฺริยานิ วิปฺปสนฺนานิ. ยฺวายํ, คหปติ, มโต กาลงฺกโต, โย จายํ ภิกฺขุ สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺโน, อิทํ เนสํ นานากรณ’’นฺติ. "साधु... (पूर्ववत)... फिर उन्होंने आगे प्रश्न पूछा— 'भन्ते! जो यह मृत है, काल कर गया है, और जो यह भिक्षु संज्ञा-वेदयित-निरोध (संज्ञा और वेदना के निरोध की समापत्ति) को प्राप्त है, इन दोनों में क्या अंतर है?' 'गृहपति! जो यह मृत है, काल कर गया है, उसके काय-संस्कार निरुद्ध और शांत हो गए हैं, वची-संस्कार निरुद्ध और शांत हो गए हैं, चित्त-संस्कार निरुद्ध और शांत हो गए हैं, आयु क्षीण हो गई है, ऊष्मा (गर्मी) शांत हो गई है, और इंद्रियाँ नष्ट हो गई हैं। परंतु गृहपति! जो यह भिक्षु संज्ञा-वेदयित-निरोध को प्राप्त है, उसके भी काय-संस्कार निरुद्ध और शांत हो गए हैं, वची-संस्कार निरुद्ध और शांत हो गए हैं, चित्त-संस्कार निरुद्ध और शांत हो गए हैं, किंतु आयु क्षीण नहीं हुई है, ऊष्मा शांत नहीं हुई है, और इंद्रियाँ अत्यंत प्रसन्न (निर्मल) हैं। गृहपति! जो यह मृत है, काल कर गया है, और जो यह भिक्षु संज्ञा-वेदयित-निरोध को प्राप्त है, यही इनमें अंतर है।'" สาธุ…เป… อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ‘‘กถํ ปน, ภนฺเต, สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐานํ โหตี’’ติ? ‘‘น โข, คหปติ, สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐหนฺตสฺส ภิกฺขุโน เอวํ โหติ – ‘อหํ สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐหิสฺส’นฺติ วา ‘อหํ สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐหามี’ติ วา ‘อหํ สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐิโต’ติ วา. อถ ขฺวสฺส ปุพฺเพว ตถา จิตฺตํ ภาวิตํ โหติ, ยํ ตํ ตถตฺตาย อุปเนตี’’ติ. "साधु... (पूर्ववत)... फिर उन्होंने आगे प्रश्न पूछा— 'भन्ते! संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्ति से उत्थान (निकलना) कैसे होता है?' 'गृहपति! संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्ति से व्युत्थित (निकलते हुए) भिक्षु को ऐसा विचार नहीं होता— "मैं संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्ति से व्युत्थित होऊँगा" अथवा "मैं संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्ति से व्युत्थित हो रहा हूँ" अथवा "मैं संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्ति से व्युत्थित हो गया हूँ"। बल्कि उसका चित्त पहले से ही उस प्रकार भावित होता है, जो उसे उस अवस्था (व्युत्थान) की ओर ले जाता है।'" สาธุ, ภนฺเต…เป… อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ‘‘สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐหนฺตสฺส ปน, ภนฺเต, ภิกฺขุโน กตเม ธมฺมา ปฐมํ อุปฺปชฺชนฺติ, ยทิ วา กายสงฺขาโร, ยทิ วา วจีสงฺขาโร, ยทิ วา จิตฺตสงฺขาโร’’ติ? ‘‘สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐหนฺตสฺส, คหปติ, ภิกฺขุโน จิตฺตสงฺขาโร ปฐมํ อุปฺปชฺชติ, ตโต กายสงฺขาโร, ตโต วจีสงฺขาโร’’ติ. "साधु, भन्ते!... (पूर्ववत)... फिर उन्होंने आगे प्रश्न पूछा— 'भन्ते! संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्ति से व्युत्थित होते हुए भिक्षु के कौन से धर्म पहले उत्पन्न होते हैं— काय-संस्कार, वची-संस्कार या चित्त-संस्कार?' 'गृहपति! संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्ति से व्युत्थित होते हुए भिक्षु के चित्त-संस्कार पहले उत्पन्न होते हैं, उसके बाद काय-संस्कार, और उसके बाद वची-संस्कार।'" สาธุ…เป… อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ‘‘สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐิตํ ปน, ภนฺเต, ภิกฺขุํ กติ ผสฺสา ผุสนฺติ’’? ‘‘สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐิตํ [Pg.485] โข, คหปติ, ภิกฺขุํ ตโย ผสฺสา ผุสนฺติ – สุญฺญโต ผสฺโส, อนิมิตฺโต ผสฺโส, อปฺปณิหิโต ผสฺโส’’ติ. "साधु... (पूर्ववत)... फिर उन्होंने आगे प्रश्न पूछा— 'भन्ते! संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्ति से व्युत्थित भिक्षु को कितने स्पर्श स्पर्श करते हैं?' 'गृहपति! संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्ति से व्युत्थित भिक्षु को तीन स्पर्श स्पर्श करते हैं— शून्यत स्पर्श, अनिमित्त स्पर्श और अप्रणिहित स्पर्श।'" สาธุ…เป… อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ‘‘สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐิตสฺส ปน, ภนฺเต, ภิกฺขุโน กึนินฺนํ จิตฺตํ โหติ, กึโปณํ, กึปพฺภาร’’นฺติ? ‘‘สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐิตสฺส โข, คหปติ, ภิกฺขุโน วิเวกนินฺนํ จิตฺตํ โหติ วิเวกโปณํ วิเวกปพฺภาร’’นฺติ. "साधु... (पूर्ववत)... फिर उन्होंने आगे प्रश्न पूछा— 'भन्ते! संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्ति से व्युत्थित भिक्षु का चित्त किस ओर झुकता है, किस ओर प्रवण होता है, किस ओर झुका होता है?' 'गृहपति! संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्ति से व्युत्थित भिक्षु का चित्त विवेक (निर्वाण) की ओर झुकता है, विवेक की ओर प्रवण होता है, विवेक की ओर झुका होता है।'" ‘‘สาธุ, ภนฺเต’’ติ โข จิตฺโต คหปติ อายสฺมโต กามภุสฺส ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา อายสฺมนฺตํ กามภุํ อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ‘‘สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา ปน, ภนฺเต, กติ ธมฺมา พหูปการา’’ติ? ‘‘อทฺธา โข ตฺวํ, คหปติ, ยํ ปฐมํ ปุจฺฉิตพฺพํ ตํ ปุจฺฉสิ. อปิ จ ตฺยาหํ พฺยากริสฺสามิ. สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา โข, คหปติ, ทฺเว ธมฺมา พหูปการา – สมโถ จ วิปสฺสนา จา’’ติ. ฉฏฺฐํ. "'साधु, भन्ते!'—इस प्रकार चित्त गृहपति ने आयुष्मान कामभू के भाषण का अभिनंदन और अनुमोदन कर आयुष्मान कामभू से आगे प्रश्न पूछा— 'भन्ते! संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्ति के लिए कितने धर्म बहुत उपकारक हैं?' 'गृहपति! निश्चय ही तुम वह प्रश्न बाद में पूछ रहे हो जो पहले पूछा जाना चाहिए था। फिर भी मैं तुम्हें उत्तर दूँगा। गृहपति! संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्ति के लिए दो धर्म बहुत उपकारक हैं— शमथ और विपश्यना।' छठा (सूक्त)।" ๗. โคทตฺตสุตฺตํ ७. "गोदत्त सुत्त" ๓๔๙. เอกํ สมยํ อายสฺมา โคทตฺโต มจฺฉิกาสณฺเฑ วิหรติ อมฺพาฏกวเน. อถ โข จิตฺโต คหปติ เยนายสฺมา โคทตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ โคทตฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข จิตฺตํ คหปตึ อายสฺมา โคทตฺโต เอตทโวจ – ‘‘ยา จายํ, คหปติ, อปฺปมาณา เจโตวิมุตฺติ, ยา จ อากิญฺจญฺญา เจโตวิมุตฺติ, ยา จ สุญฺญตา เจโตวิมุตฺติ, ยา จ อนิมิตฺตา เจโตวิมุตฺติ, อิเม ธมฺมา นานตฺถา นานาพฺยญฺชนา อุทาหุ เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นาน’’นฺติ? ‘‘อตฺถิ, ภนฺเต, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม อิเม ธมฺมา นานตฺถา เจว นานาพฺยญฺชนา จ. อตฺถิ ปน, ภนฺเต, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม อิเม ธมฺมา เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นาน’’นฺติ. ३४९. "एक समय आयुष्मान गोदत्त मच्छिकासण्ड के अम्बाटक वन में विहार कर रहे थे। तब चित्त गृहपति जहाँ आयुष्मान गोदत्त थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर आयुष्मान गोदत्त को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए चित्त गृहपति से आयुष्मान गोदत्त ने यह कहा— 'गृहपति! जो यह अप्रमाण चेतोविमुक्ति है, जो आकिंचन्य चेतोविमुक्ति है, जो शून्यत चेतोविमुक्ति है और जो अनिमित्त चेतोविमुक्ति है— क्या ये धर्म अर्थ में भिन्न और व्यंजन (शब्द) में भिन्न हैं, अथवा अर्थ में एक ही हैं और केवल व्यंजन (शब्द) में भिन्न हैं?' 'भन्ते! एक पर्याय (विधि) है जिससे ये धर्म अर्थ में भी भिन्न हैं और व्यंजन में भी भिन्न हैं। और भन्ते! एक पर्याय ऐसी भी है जिससे ये धर्म अर्थ में एक ही हैं और केवल व्यंजन में भिन्न हैं।'" ‘‘กตโม จ, ภนฺเต, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม อิเม ธมฺมา นานตฺถา เจว นานาพฺยญฺชนา จ? อิธ, ภนฺเต, ภิกฺขุ เมตฺตาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ. อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ [Pg.486] เมตฺตาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. กรุณาสหคเตน เจตสา…เป… มุทิตาสหคเตน เจตสา…เป… อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ. อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. อยํ วุจฺจติ, ภนฺเต, อปฺปมาณา เจโตวิมุตฺติ. "'भन्ते! वह कौन सी पर्याय है जिससे ये धर्म अर्थ में भी भिन्न हैं और व्यंजन में भी भिन्न हैं?' 'भन्ते! यहाँ भिक्षु मैत्री-युक्त चित्त से एक दिशा को व्याप्त कर विहार करता है, वैसे ही दूसरी, वैसे ही तीसरी, वैसे ही चौथी। इस प्रकार ऊपर, नीचे, तिरछा, सर्वत्र, सबको अपनी आत्मा के समान मानते हुए, संपूर्ण लोक को मैत्री-युक्त, विस्तृत, महान, अप्रमाण, वैर-रहित और द्वेष-रहित चित्त से व्याप्त कर विहार करता है। करुणा-युक्त चित्त से... (पूर्ववत)... मुदिता-युक्त चित्त से... (पूर्ववत)... उपेक्षा-युक्त चित्त से एक दिशा को व्याप्त कर विहार करता है, वैसे ही दूसरी, वैसे ही तीसरी, वैसे ही चौथी। इस प्रकार ऊपर, नीचे, तिरछा, सर्वत्र, सबको अपनी आत्मा के समान मानते हुए, संपूर्ण लोक को उपेक्षा-युक्त, विस्तृत, महान, अप्रमाण, वैर-रहित और द्वेष-रहित चित्त से व्याप्त कर विहार करता है। भन्ते! इसे अप्रमाण चेतोविमुक्ति कहा जाता है।'" ‘‘กตมา จ, ภนฺเต, อากิญฺจญฺญา เจโตวิมุตฺติ? อิธ, ภนฺเต, ภิกฺขุ สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม, ‘นตฺถิ กิญฺจี’ติ อากิญฺจญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ วุจฺจติ, ภนฺเต, อากิญฺจญฺญา เจโตวิมุตฺติ. "भन्ते! आकिंचन्यायतन चेतोविमुक्ति क्या है? भन्ते! यहाँ भिक्षु सर्वथा विज्ञानानन्त्यायतन का अतिक्रमण कर, 'कुछ भी नहीं है' इस प्रकार आकिंचन्यायतन को प्राप्त कर विहार करता है। भन्ते! इसे आकिंचन्यायतन चेतोविमुक्ति कहा जाता है।" ‘‘กตมา จ, ภนฺเต, สุญฺญตา เจโตวิมุตฺติ? อิธ, ภนฺเต, ภิกฺขุ อรญฺญคโต วา รุกฺขมูลคโต วา สุญฺญาคารคโต วา อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘สุญฺญมิทํ อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา’ติ. อยํ วุจฺจติ, ภนฺเต, สุญฺญตา เจโตวิมุตฺติ. "भन्ते! शून्यता चेतोविमुक्ति क्या है? भन्ते! यहाँ भिक्षु वन में गया हुआ, या वृक्ष के नीचे गया हुआ, या शून्य घर (एकांत स्थान) में गया हुआ इस प्रकार विचार करता है— 'यह (संसार) आत्मा से या आत्मीय (आत्मा से संबंधित) से शून्य है।' भन्ते! इसे शून्यता चेतोविमुक्ति कहा जाता है।" ‘‘กตมา จ, ภนฺเต, อนิมิตฺตา เจโตวิมุตฺติ? อิธ, ภนฺเต, ภิกฺขุ สพฺพนิมิตฺตานํ อมนสิการา อนิมิตฺตํ เจโตสมาธึ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ วุจฺจติ, ภนฺเต, อนิมิตฺตา เจโตวิมุตฺติ. อยํ โข, ภนฺเต, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม อิเม ธมฺมา นานตฺถา เจว นานาพฺยญฺชนา จ. "भन्ते! अनिमित्त चेतोविमुक्ति क्या है? भन्ते! यहाँ भिक्षु सभी निमित्तों का मनस्कार न करने से अनिमित्त चेतोसमाधि को प्राप्त कर विहार करता है। भन्ते! इसे अनिमित्त चेतोविमुक्ति कहा जाता है। भन्ते! यह वह पर्याय (विधि) है, जिसके कारण ये धर्म अर्थ में भी भिन्न हैं और व्यंजन (शब्द) में भी भिन्न हैं।" ‘‘กตโม จ, ภนฺเต, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม อิเม ธมฺมา เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นานํ? ราโค, ภนฺเต, ปมาณกรโณ, โทโส ปมาณกรโณ, โมโห ปมาณกรโณ. เต ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ปหีนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. ยาวตา โข, ภนฺเต, อปฺปมาณา เจโตวิมุตฺติโย, อกุปฺปา ตาสํ เจโตวิมุตฺติ อคฺคมกฺขายติ. สา โข ปน อกุปฺปา เจโตวิมุตฺติ สุญฺญา ราเคน, สุญฺญา โทเสน, สุญฺญา โมเหน. ราโค โข, ภนฺเต, กิญฺจนํ, โทโส กิญฺจนํ, โมโห กิญฺจนํ. เต ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ปหีนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. ยาวตา โข, ภนฺเต, อากิญฺจญฺญา เจโตวิมุตฺติโย, อกุปฺปา ตาสํ เจโตวิมุตฺติ อคฺคมกฺขายติ. สา โข [Pg.487] ปน อกุปฺปา เจโตวิมุตฺติ สุญฺญา ราเคน, สุญฺญา โทเสน, สุญฺญา โมเหน. ราโค โข, ภนฺเต, นิมิตฺตกรโณ, โทโส นิมิตฺตกรโณ, โมโห นิมิตฺตกรโณ. เต ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ปหีนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. ยาวตา โข, ภนฺเต, อนิมิตฺตา เจโตวิมุตฺติโย, อกุปฺปา ตาสํ เจโตวิมุตฺติ อคฺคมกฺขายติ. สา โข ปน อกุปฺปา เจโตวิมุตฺติ สุญฺญา ราเคน, สุญฺญา โทเสน, สุญฺญา โมเหน. อยํ โข, ภนฺเต, ปริยาโย ยํ ปริยายํ อาคมฺม อิเม ธมฺมา เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นาน’’นฺติ. ‘‘ลาภา เต, คหปติ, สุลทฺธํ เต, คหปติ! ยสฺส เต คมฺภีเร พุทฺธวจเน ปญฺญาจกฺขุ กมตี’’ติ. สตฺตมํ. "भन्ते! वह कौन सा पर्याय है जिसके कारण ये धर्म एक ही अर्थ वाले हैं और केवल व्यंजन (शब्द) ही भिन्न हैं? भन्ते! राग प्रमाण करने वाला (सीमित करने वाला) है, द्वेष प्रमाण करने वाला है, मोह प्रमाण करने वाला है। क्षीणास्त्रव भिक्षु के लिए वे प्रहीण (नष्ट) हो गए हैं, उच्छिन्नमूल (जड़ से कटे हुए) हो गए हैं, ताड़ के वृक्ष के समान (पुनः न उगने वाले) कर दिए गए हैं, अभाव को प्राप्त हो गए हैं और भविष्य में उत्पन्न न होने वाले स्वभाव वाले हैं। भन्ते! जितनी भी अप्रमाण चेतोविमुक्तियाँ हैं, उनमें अकुप्या (अचल) चेतोविमुक्ति सर्वश्रेष्ठ कही जाती है। वह अकुप्या चेतोविमुक्ति राग से शून्य है, द्वेष से शून्य है, मोह से शून्य है। भन्ते! राग एक किंचन (बाधा) है, द्वेष एक किंचन है, मोह एक किंचन है। क्षीणास्त्रव भिक्षु के लिए वे प्रहीण हो गए हैं... भविष्य में उत्पन्न न होने वाले स्वभाव वाले हैं। भन्ते! जितनी भी आकिंचन्यायतन चेतोविमुक्तियाँ हैं, उनमें अकुप्या चेतोविमुक्ति सर्वश्रेष्ठ कही जाती है। वह अकुप्या चेतोविमुक्ति राग से शून्य है, द्वेष से शून्य है, मोह से शून्य है। भन्ते! राग निमित्त बनाने वाला है, द्वेष निमित्त बनाने वाला है, मोह निमित्त बनाने वाला है। क्षीणास्त्रव भिक्षु के लिए वे प्रहीण हो गए हैं... भविष्य में उत्पन्न न होने वाले स्वभाव वाले हैं। भन्ते! जितनी भी अनिमित्त चेतोविमुक्तियाँ हैं, उनमें अकुप्या चेतोविमुक्ति सर्वश्रेष्ठ कही जाती है। वह अकुप्या चेतोविमुक्ति राग से शून्य है, द्वेष से शून्य है, मोह से शून्य है। भन्ते! यह वह पर्याय है जिसके कारण ये धर्म एक ही अर्थ वाले हैं और केवल व्यंजन ही भिन्न हैं।" "गृहपति! तुम्हें लाभ है, गृहपति! तुम्हें सुलब्ध (उत्तम लाभ) है, जिसकी प्रज्ञा-चक्षु गम्भीर बुद्ध-वचनों में प्रवेश करती है।" सातवाँ। ๘. นิคณฺฐนาฏปุตฺตสุตฺตํ ८. ८. निगण्ठ नाटपुत्त सुत्त ๓๕๐. เตน โข ปน สมเยน นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต มจฺฉิกาสณฺฑํ อนุปฺปตฺโต โหติ มหติยา นิคณฺฐปริสาย สทฺธึ. อสฺโสสิ โข จิตฺโต คหปติ – ‘‘นิคณฺโฐ กิร นาฏปุตฺโต มจฺฉิกาสณฺฑํ อนุปฺปตฺโต มหติยา นิคณฺฐปริสาย สทฺธิ’’นฺติ. อถ โข จิตฺโต คหปติ สมฺพหุเลหิ อุปาสเกหิ สทฺธึ เยน นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา นิคณฺเฐน นาฏปุตฺเตน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข จิตฺตํ คหปตึ นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต เอตทโวจ – ‘‘สทฺทหสิ ตฺวํ, คหปติ, สมณสฺส โคตมสฺส – อตฺถิ อวิตกฺโก อวิจาโร สมาธิ, อตฺถิ วิตกฺกวิจารานํ นิโรโธ’’ติ? ३५०. उस समय निगण्ठ नाटपुत्त एक बड़ी निगण्ठ परिषद के साथ मच्छिकासण्ड पहुँचा हुआ था। चित्त गृहपति ने सुना— 'निगण्ठ नाटपुत्त एक बड़ी निगण्ठ परिषद के साथ मच्छिकासण्ड पहुँचा हुआ है।' तब चित्त गृहपति अनेक उपासकों के साथ जहाँ निगण्ठ नाटपुत्त था, वहाँ गया। जाकर निगण्ठ नाटपुत्त के साथ कुशल-क्षेम पूछा। संमोदनीय और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए चित्त गृहपति से निगण्ठ नाटपुत्त ने यह कहा— 'गृहपति! क्या तुम श्रमण गौतम की इस बात पर श्रद्धा करते हो कि— अवितर्क-अविचार समाधि होती है, वितर्क और विचार का निरोध होता है?' ‘‘น ขฺวาหํ เอตฺถ, ภนฺเต, ภควโต สทฺธาย คจฺฉามิ. อตฺถิ อวิตกฺโก อวิจาโร สมาธิ, อตฺถิ วิตกฺกวิจารานํ นิโรโธ’’ติ. เอวํ วุตฺเต, นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต อุลฺโลเกตฺวา เอตทโวจ – ‘‘อิทํ ภวนฺโต ปสฺสนฺตุ, ยาว อุชุโก จายํ จิตฺโต คหปติ, ยาว อสโฐ จายํ จิตฺโต คหปติ, ยาว อมายาวี จายํ จิตฺโต คหปติ, วาตํ วา โส ชาเลน พาเธตพฺพํ มญฺเญยฺย, โย วิตกฺกวิจาเร นิโรเธตพฺพํ มญฺเญยฺย[Pg.488], สกมุฏฺฐินา วา โส คงฺคาย โสตํ อาวาเรตพฺพํ มญฺเญยฺย, โย วิตกฺกวิจาเร นิโรเธตพฺพํ มญฺเญยฺยา’’ติ. "भन्ते! मैं इस विषय में भगवान की श्रद्धा के आधार पर नहीं चलता कि— अवितर्क-अविचार समाधि होती है, वितर्क और विचार का निरोध होता है।" ऐसा कहने पर, निगण्ठ नाटपुत्त ने (अपनी परिषद की ओर) ऊपर देखकर यह कहा— "महानुभावों! देखो, यह चित्त गृहपति कितना सीधा है, यह चित्त गृहपति कितना निष्कपट है, यह चित्त गृहपति कितना माया-रहित है। जो यह मानता है कि वितर्क और विचार का निरोध किया जा सकता है, वह वैसा ही है जैसे कोई सोचे कि हवा को जाल से रोका जा सकता है, या अपनी मुट्ठी से गंगा की धारा को रोका जा सकता है।" ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, ภนฺเต, กตมํ นุ โข ปณีตตรํ – ญาณํ วา สทฺธา วา’’ติ? ‘‘สทฺธาย โข, คหปติ, ญาณํเยว ปณีตตร’’นฺติ. ‘‘อหํ โข, ภนฺเต, ยาวเทว อากงฺขามิ, วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. อหํ โข, ภนฺเต, ยาวเทว อากงฺขามิ, วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา…เป… ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. อหํ โข, ภนฺเต, ยาวเทว อากงฺขามิ, ปีติยา จ วิราคา…เป… ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. อหํ โข, ภนฺเต, ยาวเทว อากงฺขามิ, สุขสฺส จ ปหานา…เป… จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. น โส ขฺวาหํ, ภนฺเต, เอวํ ชานนฺโต เอวํ ปสฺสนฺโต กสฺส อญฺญสฺส สมณสฺส วา พฺราหฺมณสฺส วา สทฺธาย คมิสฺสามิ? อตฺถิ อวิตกฺโก อวิจาโร สมาธิ, อตฺถิ วิตกฺกวิจารานํ นิโรโธ’’ติ. "भन्ते! आप क्या मानते हैं, ज्ञान और श्रद्धा में से कौन अधिक श्रेष्ठ है?" "गृहपति! श्रद्धा की अपेक्षा ज्ञान ही अधिक श्रेष्ठ है।" "भन्ते! मैं जब चाहता हूँ, काम-भोगों से विविक्त (अलग) होकर, अकुशल धर्मों से विविक्त होकर, वितर्क और विचार सहित, विवेक से उत्पन्न प्रीति और सुख वाले प्रथम ध्यान को प्राप्त कर विहार करता हूँ। भन्ते! मैं जब चाहता हूँ, वितर्क और विचार के शांत होने से... द्वितीय ध्यान को प्राप्त कर विहार करता हूँ। भन्ते! मैं जब चाहता हूँ, प्रीति के विराग से... तृतीय ध्यान को प्राप्त कर विहार करता हूँ। भन्ते! मैं जब चाहता हूँ, सुख के प्रहाण से... चतुर्थ ध्यान को प्राप्त कर विहार करता हूँ। भन्ते! इस प्रकार जानते हुए और इस प्रकार देखते हुए, मैं किस अन्य श्रमण या ब्राह्मण की श्रद्धा के आधार पर चलूँगा कि— अवितर्क-अविचार समाधि होती है, वितर्क और विचार का निरोध होता है?" เอวํ วุตฺเต, นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต สกํ ปริสํ อปโลเกตฺวา เอตทโวจ – ‘‘อิทํ ภวนฺโต ปสฺสนฺตุ, ยาว อนุชุโก จายํ จิตฺโต คหปติ, ยาว สโฐ จายํ จิตฺโต คหปติ, ยาว มายาวี จายํ จิตฺโต คหปตี’’ติ. ऐसा कहे जाने पर, निगण्ठ नाठपुत्त ने अपनी परिषद की ओर देखते हुए यह कहा— "महानुभावों, इसे देखें! यह गृहपति चित्त कितना अधिक कुटिल (असरल) है, यह गृहपति चित्त कितना अधिक धूर्त है, यह गृहपति चित्त कितना अधिक मायावी (छली) है।" ‘‘อิทาเนว โข เต มยํ, ภนฺเต, ภาสิตํ – ‘เอวํ อาชานาม อิทํ ภวนฺโต ปสฺสนฺตุ, ยาว อุชุโก จายํ จิตฺโต คหปติ, ยาว อสโฐ จายํ จิตฺโต คหปติ, ยาว อมายาวี จายํ จิตฺโต คหปตี’ติ. อิทาเนว จ ปน มยํ, ภนฺเต, ภาสิตํ – ‘เอวํ อาชานาม อิทํ ภวนฺโต ปสฺสนฺตุ, ยาว อนุชุโก จายํ จิตฺโต คหปติ, ยาว สโฐ จายํ จิตฺโต คหปติ, ยาว มายาวี จายํ จิตฺโต คหปตี’ติ. สเจ เต, ภนฺเต, ปุริมํ สจฺจํ, ปจฺฉิมํ เต มิจฺฉา. สเจ ปน เต, ภนฺเต, ปุริมํ มิจฺฉา, ปจฺฉิมํ เต สจฺจํ. อิเม โข ปน, ภนฺเต, ทส สหธมฺมิกา ปญฺหา อาคจฺฉนฺติ. ยทา เนสํ อตฺถํ อาชาเนยฺยาสิ, อถ มํ ปฏิหเรยฺยาสิ สทฺธึ นิคณฺฐปริสาย. เอโก ปญฺโห, เอโก อุทฺเทโส, เอกํ เวยฺยากรณํ. ทฺเว ปญฺหา, ทฺเว อุทฺเทสา, ทฺเว เวยฺยากรณานิ. ตโย ปญฺหา, ตโย อุทฺเทสา, ตีณิ เวยฺยากรณานิ. จตฺตาโร ปญฺหา, จตฺตาโร อุทฺเทสา, จตฺตาริ [Pg.489] เวยฺยากรณานิ. ปญฺจ ปญฺหา, ปญฺจ อุทฺเทสา, ปญฺจ เวยฺยากรณานิ. ฉ ปญฺหา, ฉ อุทฺเทสา, ฉ เวยฺยากรณานิ. สตฺต ปญฺหา, สตฺต อุทฺเทสา, สตฺต เวยฺยากรณานิ. อฏฺฐ ปญฺหา, อฏฺฐ อุทฺเทสา, อฏฺฐ เวยฺยากรณานิ. นว ปญฺหา, นว อุทฺเทสา, นว เวยฺยากรณานิ. ทส ปญฺหา, ทส อุทฺเทสา, ทส เวยฺยากรณานี’’ติ. อถ โข จิตฺโต คหปติ นิคณฺฐํ นาฏปุตฺตํ อิเม ทส สหธมฺมิเก ปญฺเห อาปุจฺฉิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกามีติ. อฏฺฐมํ. "भन्ते! अभी-अभी हमने आपके इस कथन को इस प्रकार समझा था— 'महानुभावों, इसे देखें! यह गृहपति चित्त कितना अधिक सरल है, यह गृहपति चित्त कितना अधिक निष्कपट है, यह गृहपति चित्त कितना अधिक अमयावी (छलरहित) है।' और अभी-अभी हमने आपके इस कथन को इस प्रकार समझा है— 'महानुभावों, इसे देखें! यह गृहपति चित्त कितना अधिक कुटिल है, यह गृहपति चित्त कितना अधिक धूर्त है, यह गृहपति चित्त कितना अधिक मायावी है।' भन्ते! यदि आपका पहला कथन सत्य है, तो आपका पिछला कथन मिथ्या है। और भन्ते! यदि आपका पहला कथन मिथ्या है, तो आपका पिछला कथन सत्य है। भन्ते! ये दस सकारण (युक्तियुक्त) प्रश्न उपस्थित होते हैं। जब आप इनका अर्थ जान लें, तब अपनी निगण्ठ परिषद के साथ मुझे उत्तर दें। एक प्रश्न, एक उद्देश (संक्षेप), एक व्याकरण (उत्तर)। दो प्रश्न, दो उद्देश, दो व्याकरण। तीन प्रश्न, तीन उद्देश, तीन व्याकरण। चार प्रश्न, चार उद्देश, चार व्याकरण। पाँच प्रश्न, पाँच उद्देश, पाँच व्याकरण। छह प्रश्न, छह उद्देश, छह व्याकरण। सात प्रश्न, सात उद्देश, सात व्याकरण। आठ प्रश्न, आठ उद्देश, आठ व्याकरण। नौ प्रश्न, नौ उद्देश, नौ व्याकरण। दस प्रश्न, दस उद्देश, दस व्याकरण।" तब गृहपति चित्त निगण्ठ नाठपुत्त से इन दस सकारण प्रश्नों को पूछकर आसन से उठकर चले गए। आठवाँ (सूक्त) समाप्त। ๙. อเจลกสฺสปสุตฺตํ ९. अचेलकस्सप सुत्त ๓๕๑. เตน โข ปน สมเยน อเจโล กสฺสโป มจฺฉิกาสณฺฑํ อนุปฺปตฺโต โหติ จิตฺตสฺส คหปติโน ปุราณคิหิสหาโย. อสฺโสสิ โข จิตฺโต คหปติ – ‘‘อเจโล กิร กสฺสโป มจฺฉิกาสณฺฑํ อนุปฺปตฺโต อมฺหากํ ปุราณคิหิสหาโย’’ติ. อถ โข จิตฺโต คหปติ เยน อเจโล กสฺสโป เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อเจเลน กสฺสเปน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จิตฺโต คหปติ อเจลํ กสฺสปํ เอตทโวจ – ‘‘กีวจิรํ ปพฺพชิตสฺส, ภนฺเต, กสฺสปา’’ติ? ‘‘ตึสมตฺตานิ โข เม, คหปติ, วสฺสานิ ปพฺพชิตสฺสา’’ติ. ‘‘อิเมหิ ปน เต, ภนฺเต, ตึสมตฺเตหิ วสฺเสหิ อตฺถิ โกจิ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสโส อธิคโต ผาสุวิหาโร’’ติ? ‘‘อิเมหิ โข เม, คหปติ, ตึสมตฺเตหิ วสฺเสหิ ปพฺพชิตสฺส นตฺถิ โกจิ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสโส อธิคโต ผาสุวิหาโร, อญฺญตฺร นคฺเคยฺยา จ มุณฺเฑยฺยา จ ปาวฬนิปฺโผฏนาย จา’’ติ. เอวํ วุตฺเต, จิตฺโต คหปติ อเจลํ กสฺสปํ เอตทโวจ – ‘‘อจฺฉริยํ วต, โภ, อพฺภุตํ วต, โภ! ธมฺมสฺส สฺวากฺขาตตา ยตฺร หิ นาม ตึสมตฺเตหิ วสฺเสหิ น โกจิ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสโส อธิคโต อภวิสฺส ผาสุวิหาโร, อญฺญตฺร นคฺเคยฺยา จ มุณฺเฑยฺยา จ ปาวฬนิปฺโผฏนาย จา’’ติ! ३५१. उस समय गृहपति चित्त का पुराना गृहस्थ-मित्र अचेल कस्सप मच्छिकासण्ड पहुँचा हुआ था। गृहपति चित्त ने सुना— "सुना है कि हमारा पुराना गृहस्थ-मित्र अचेल कस्सप मच्छिकासण्ड आया हुआ है।" तब गृहपति चित्त जहाँ अचेल कस्सप था, वहाँ गया; पहुँचकर अचेल कस्सप के साथ कुशल-क्षेम पूछा। सुखद एवं स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए गृहपति चित्त ने अचेल कस्सप से यह कहा— "भन्ते कस्सप! आपको प्रव्रजित हुए कितना समय हुआ है?" "गृहपति! मुझे प्रव्रजित हुए लगभग तीस वर्ष हो गए हैं।" "भन्ते! इन तीस वर्षों में क्या आपको मनुष्यों के (साधारण) धर्म से ऊपर कोई आर्यों के योग्य ज्ञान-दर्शन विशेष जैसा सुखद विहार प्राप्त हुआ है?" "गृहपति! इन तीस वर्षों में प्रव्रजित रहते हुए मुझे नग्न रहने, मुण्डित रहने और (आसन की) धूल झाड़ने के अतिरिक्त मनुष्यों के धर्म से ऊपर कोई आर्यों के योग्य ज्ञान-दर्शन विशेष जैसा सुखद विहार प्राप्त नहीं हुआ है।" ऐसा कहे जाने पर, गृहपति चित्त ने अचेल कस्सप से यह कहा— "आश्चर्य है भो! अद्भुत है भो! धर्म की स्वाख्यातता (सुन्दर व्याख्या) ही है कि जहाँ तीस वर्षों में नग्न रहने, मुण्डित रहने और धूल झाड़ने के अतिरिक्त मनुष्यों के धर्म से ऊपर कोई आर्यों के योग्य ज्ञान-दर्शन विशेष जैसा सुखद विहार प्राप्त नहीं हुआ!" ‘‘ตุยฺหํ ปน, คหปติ, กีวจิรํ อุปาสกตฺตํ อุปคตสฺสา’’ติ? ‘‘มยฺหมฺปิ โข ปน, ภนฺเต, ตึสมตฺตานิ วสฺสานิ อุปาสกตฺตํ อุปคตสฺสา’’ติ. ‘‘อิเมหิ ปน เต, คหปติ, ตึสมตฺเตหิ วสฺเสหิ อตฺถิ โกจิ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสโส [Pg.490] อธิคโต ผาสุวิหาโร’’ติ? ‘‘คิหิโนปิ สิยา, ภนฺเต. อหญฺหิ, ภนฺเต, ยาวเทว อากงฺขามิ, วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. อหญฺหิ, ภนฺเต, ยาวเทว อากงฺขามิ, วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา …เป… ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. อหญฺหิ, ภนฺเต, ยาวเทว อากงฺขามิ, ปีติยา จ วิราคา…เป… ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. อหญฺหิ, ภนฺเต, ยาวเทว อากงฺขามิ, สุขสฺส จ ปหานา…เป… จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ. สเจ โข ปนาหํ, ภนฺเต, ภควโต ปฐมตรํ กาลํ กเรยฺยํ, อนจฺฉริยํ โข ปเนตํ ยํ มํ ภควา เอวํ พฺยากเรยฺย – ‘นตฺถิ ตํ สํโยชนํ เยน สํโยชเนน สํยุตฺโต จิตฺโต คหปติ ปุน อิมํ โลกํ อาคจฺเฉยฺยา’’’ติ. เอวํ วุตฺเต, อเจโล กสฺสโป จิตฺตํ คหปตึ เอตทโวจ – ‘‘อจฺฉริยํ วต โภ, อพฺภุตํ วต โภ! ธมฺมสฺส สฺวากฺขาตตา, ยตฺร หิ นาม คิหี โอทาตวสโน เอวรูปํ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ อธิคมิสฺสติ ผาสุวิหารํ. ลเภยฺยาหํ, คหปติ, อิมสฺมึ ธมฺมวินเย ปพฺพชฺชํ, ลเภยฺยํ อุปสมฺปท’’นฺติ. "गृहपति! आपको उपासक बने कितना समय हुआ है?" "भन्ते! मुझे भी उपासक बने लगभग तीस वर्ष हो गए हैं।" "गृहपति! इन तीस वर्षों में क्या आपको मनुष्यों के धर्म से ऊपर कोई आर्यों के योग्य ज्ञान-दर्शन विशेष जैसा सुखद विहार प्राप्त हुआ है?" "भन्ते! गृहस्थ को भी हो सकता है। भन्ते! मैं जब कभी चाहता हूँ, काम-भोगों से विविक्त (अलग) होकर, अकुशल धर्मों से विविक्त होकर, वितर्क और विचार सहित, विवेक से उत्पन्न प्रीति और सुख वाले प्रथम ध्यान को प्राप्त कर विहार करता हूँ। भन्ते! मैं जब कभी चाहता हूँ, वितर्क और विचार के शान्त हो जाने पर... द्वितीय ध्यान... तृतीय ध्यान... चतुर्थ ध्यान को प्राप्त कर विहार करता हूँ। भन्ते! यदि मैं भगवान् से पहले काल करूँ (मृत्यु को प्राप्त होऊँ), तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि भगवान् मेरे विषय में ऐसा कहें— 'ऐसा कोई संयोजन (बन्धन) नहीं है जिससे बँधा हुआ गृहपति चित्त पुनः इस लोक में वापस आए'।" ऐसा कहे जाने पर, अचेल कस्सप ने गृहपति चित्त से यह कहा— "आश्चर्य है भो! अद्भुत है भो! धर्म की स्वाख्यातता ही है कि जहाँ श्वेत वस्त्र धारण करने वाला गृहस्थ इस प्रकार के मनुष्य-धर्म से ऊपर आर्यों के योग्य ज्ञान-दर्शन विशेष रूपी सुखद विहार को प्राप्त कर लेता है। गृहपति! मैं इस धर्म-विनय में प्रव्रज्या प्राप्त करना चाहता हूँ, उपसम्पदा प्राप्त करना चाहता हूँ।" อถ โข จิตฺโต คหปติ อเจลํ กสฺสปํ อาทาย เยน เถรา ภิกฺขู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เถเร ภิกฺขู เอตทโวจ – ‘‘อยํ, ภนฺเต, อเจโล กสฺสโป อมฺหากํ ปุราณคิหิสหาโย. อิมํ เถรา ปพฺพาเชนฺตุ อุปสมฺปาเทนฺตุ. อหมสฺส อุสฺสุกฺกํ กริสฺสามิ จีวรปิณฺฑปาตเสนาสนคิลานปฺปจฺจยเภสชฺชปริกฺขาราน’’นฺติ. อลตฺถ โข อเจโล กสฺสโป อิมสฺมึ ธมฺมวินเย ปพฺพชฺชํ, อลตฺถ อุปสมฺปทํ. อจิรูปสมฺปนฺโน จ ปนายสฺมา กสฺสโป เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรนฺโต นจิรสฺเสว – ยสฺสตฺถาย กุลปุตฺตา สมฺมเทว อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชนฺติ, ตทนุตฺตรํ พฺรหฺมจริยปริโยสานํ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหาสิ. ‘‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’’ติ อพฺภญฺญาสิ. อญฺญตโร จ ปนายสฺมา กสฺสโป อรหตํ อโหสีติ. นวมํ. तब चित्त गृहपति अचेल कश्यप को साथ लेकर जहाँ स्थविर भिक्षु थे, वहाँ पहुँचा। पहुँचकर उसने स्थविर भिक्षुओं से यह कहा— "भन्ते, यह अचेल कश्यप हमारे गृहस्थ जीवन के पुराने मित्र हैं। स्थविर इन्हें प्रव्रज्या दें और उपसंपदा प्रदान करें। मैं इनके लिए चीवर, पिण्डपात, शयनासन और रुग्ण-प्रत्यय-भेषज-परिष्कारों (दवाइयों) की व्यवस्था करूँगा।" तब अचेल कश्यप ने इस धर्म-विनय में प्रव्रज्या प्राप्त की और उपसंपदा प्राप्त की। उपसंपदा प्राप्त करने के कुछ ही समय बाद आयुष्मान कश्यप अकेले, एकांत में, प्रमाद रहित, तपस्वी और आत्म-संयमी होकर विहार करने लगे। और शीघ्र ही—जिसके लिए कुलपुत्र भली-भाँति घर से बेघर होकर प्रव्रजित होते हैं—उस अनुत्तर ब्रह्मचर्य की पूर्णता को इसी जन्म में स्वयं अभिज्ञा (उच्च ज्ञान) से जानकर, साक्षात्कार कर और प्राप्त कर विहार करने लगे। उन्होंने जान लिया— "जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ और शेष नहीं है।" और आयुष्मान कश्यप अर्हतों में से एक हो गए। नौवाँ (सूत्र)। ๑๐. คิลานทสฺสนสุตฺตํ १०. ग्लान-दर्शन सुत्त ๓๕๒. เตน [Pg.491] โข ปน สมเยน จิตฺโต คหปติ อาพาธิโก โหติ ทุกฺขิโต พาฬฺหคิลาโน. อถ โข สมฺพหุลา อารามเทวตา วนเทวตา รุกฺขเทวตา โอสธิติณวนปฺปตีสุ อธิวตฺถา เทวตา สงฺคมฺม สมาคมฺม จิตฺตํ คหปตึ เอตทโวจุํ – ‘‘ปณิเธหิ, คหปติ, อนาคตมทฺธานํ ราชา อสฺสํ จกฺกวตฺตี’’ติ. ३५२. उस समय चित्त गृहपति बीमार, दुखी और गंभीर रूप से अस्वस्थ था। तब बहुत से आराम-देवता, वन-देवता, वृक्ष-देवता और औषधियों, तृणों एवं वनस्पतियों में रहने वाले देवताओं ने एकत्रित होकर चित्त गृहपति से यह कहा— "गृहपति, ऐसी आकांक्षा करें कि भविष्य में आप चक्रवर्ती राजा बनें।" เอวํ วุตฺเต, จิตฺโต คหปติ ตา อารามเทวตา วนเทวตา รุกฺขเทวตา โอสธิติณวนปฺปตีสุ อธิวตฺถา เทวตา เอตทโวจ – ‘‘ตมฺปิ อนิจฺจํ, ตมฺปิ อทฺธุวํ, ตมฺปิ ปหาย คมนีย’’นฺติ. เอวํ วุตฺเต, จิตฺตสฺส คหปติโน มิตฺตามจฺจา ญาติสาโลหิตา จิตฺตํ คหปตึ เอตทโวจุํ – ‘‘สตึ, อยฺยปุตฺต, อุปฏฺฐเปหิ, มา วิปฺปลปี’’ติ. ‘‘กึ ตาหํ วทามิ ยํ มํ ตุมฺเห เอวํ วเทถ – ‘สตึ, อยฺยปุตฺต, อุปฏฺฐเปหิ, มา วิปฺปลปี’’’ติ? ‘‘เอวํ โข ตฺวํ, อยฺยปุตฺต, วเทสิ – ‘ตมฺปิ อนิจฺจํ, ตมฺปิ อทฺธุวํ, ตมฺปิ ปหาย คมนีย’’’นฺติ. ‘‘ตถา หิ ปน มํ อารามเทวตา วนเทวตา รุกฺขเทวตา โอสธิติณวนปฺปตีสุ อธิวตฺถา เทวตา เอวมาหํสุ – ‘ปณิเธหิ, คหปติ, อนาคตมทฺธานํ ราชา อสฺสํ จกฺกวตฺตี’ติ. ตาหํ เอวํ วทามิ – ‘ตมฺปิ อนิจฺจํ…เป… ตมฺปิ ปหาย คมนีย’’’นฺติ. ‘‘กึ ปน ตา, อยฺยปุตฺต, อารามเทวตา วนเทวตา รุกฺขเทวตา โอสธิติณวนปฺปตีสุ อธิวตฺถา เทวตา อตฺถวสํ สมฺปสฺสมานา เอวมาหํสุ – ‘ปณิเธหิ, คหปติ, อนาคตมทฺธานํ ราชา อสฺสํ จกฺกวตฺตี’’’ติ? ‘‘ตาสํ โข อารามเทวตานํ วนเทวตานํ รุกฺขเทวตานํ โอสธิติณวนปฺปตีสุ อธิวตฺถานํ เทวตานํ เอวํ โหติ – ‘อยํ โข จิตฺโต คหปติ, สีลวา กลฺยาณธมฺโม. สเจ ปณิทหิสฺสติ – อนาคตมทฺธานํ ราชา อสฺสํ จกฺกวตฺตี’ติ, ‘ตสฺส โข อยํ อิชฺฌิสฺสติ, สีลวโต เจโตปณิธิ วิสุทฺธตฺตา ธมฺมิโก ธมฺมิกํ ผลํ อนุปสฺสตี’ติ. อิมํ โข ตา อารามเทวตา วนเทวตา รุกฺขเทวตา โอสธิติณวนปฺปตีสุ อธิวตฺถา เทวตา อตฺถวสํ สมฺปสฺสมานา เอวมาหํสุ – ‘ปณิเธหิ, คหปติ, อนาคตมทฺธานํ ราชา อสฺสํ จกฺกวตฺตี’ติ. ตาหํ เอวํ วทามิ – ‘ตมฺปิ อนิจฺจํ, ตมฺปิ อทฺธุวํ, ตมฺปิ ปหาย คมนีย’’’นฺติ. ऐसा कहने पर, चित्त गृहपति ने उन आराम-देवताओं, वन-देवताओं, वृक्ष-देवताओं और औषधियों, तृणों एवं वनस्पतियों में रहने वाले देवताओं से यह कहा— "वह (चक्रवर्ती पद) भी अनित्य है, वह भी अध्रुव (अस्थायी) है, उसे भी छोड़कर जाना ही होगा।" ऐसा कहने पर, चित्त गृहपति के मित्रों, अमात्यों और सगे-संबंधियों ने चित्त गृहपति से कहा— "आर्यपुत्र, स्मृति (होश) बनाए रखें, प्रलाप न करें।" (चित्त ने पूछा—) "मैंने ऐसा क्या कहा कि आप मुझसे ऐसा कह रहे हैं— 'आर्यपुत्र, स्मृति बनाए रखें, प्रलाप न करें'?" (उन्होंने कहा—) "आर्यपुत्र, आपने ऐसा कहा— 'वह भी अनित्य है, वह भी अध्रुव है, उसे भी छोड़कर जाना ही होगा'।" (चित्त ने कहा—) "वास्तव में, आराम-देवताओं, वन-देवताओं, वृक्ष-देवताओं और औषधियों, तृणों एवं वनस्पतियों में रहने वाले देवताओं ने मुझसे ऐसा कहा था— 'गृहपति, ऐसी आकांक्षा करें कि भविष्य में आप चक्रवर्ती राजा बनें'। तब मैंने उनसे कहा— 'वह भी अनित्य है... उसे भी छोड़कर जाना ही होगा'।" (रिश्तेदारों ने पूछा—) "आर्यपुत्र, उन देवताओं ने किस लाभ को देखते हुए आपसे ऐसा कहा— 'गृहपति, ऐसी आकांक्षा करें कि भविष्य में आप चक्रवर्ती राजा बनें'?" (चित्त ने कहा—) "उन देवताओं को ऐसा लगा— 'यह चित्त गृहपति शीलवान और कल्याणधर्मी है। यदि वह यह आकांक्षा करेगा कि भविष्य में वह चक्रवर्ती राजा बने, तो उसकी यह आकांक्षा पूरी होगी, क्योंकि शीलवान के चित्त की आकांक्षा शुद्ध होने के कारण सफल होती है; धार्मिक व्यक्ति धर्म के फल को प्राप्त करता है'। इसी लाभ को देखते हुए उन देवताओं ने मुझसे ऐसा कहा था। तब मैंने उनसे कहा— 'वह भी अनित्य है, वह भी अध्रुव है, उसे भी छोड़कर जाना ही होगा'।" ‘‘เตน [Pg.492] หิ, อยฺยปุตฺต, อมฺเหปิ โอวทาหี’’ติ. ‘‘ตสฺมา หิ โว เอวํ สิกฺขิตพฺพํ – พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคตา ภวิสฺสาม – ‘อิติปิ โส ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน สุคโต โลกวิทู อนุตฺตโร ปุริสทมฺมสารถิ สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคตา ภวิสฺสาม – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม สนฺทิฏฺฐิโก อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคตา ภวิสฺสาม – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, อุชุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, ญายปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, สามีจิปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, ยทิทํ จตฺตาริ ปุริสยุคานิ อฏฺฐ ปุริสปุคฺคลา เอส ภควโต สาวกสงฺโฆ อาหุเนยฺโย ปาหุเนยฺโย ทกฺขิเณยฺโย อญฺชลิกรณีโย อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสา’ติ. ยํ โข ปน กิญฺจิ กุเล เทยฺยธมฺมํ สพฺพํ ตํ อปฺปฏิวิภตฺตํ ภวิสฺสติ สีลวนฺเตหิ กลฺยาณธมฺเมหีติ เอวญฺหิ โว สิกฺขิตพฺพ’’นฺติ. อถ โข จิตฺโต คหปติ มิตฺตามจฺเจ ญาติสาโลหิเต พุทฺเธ จ ธมฺเม จ สงฺเฆ จ จาเค จ สมาทเปตฺวา กาลมกาสีติ. ทสมํ. "तो आर्यपुत्र, हमें भी उपदेश दें।" "इसलिए तुम्हें इस प्रकार सीखना (अभ्यास करना) चाहिए— 'हम बुद्ध के प्रति अटूट श्रद्धा से युक्त होंगे— वे भगवान अर्हत् हैं, सम्यक सम्बुद्ध हैं, विद्या और आचरण से संपन्न हैं, सुगत हैं, लोकविद् हैं, पुरुषों को वश में करने वाले अतुलनीय सारथी हैं, देवों और मनुष्यों के शास्ता हैं, बुद्ध हैं, भगवान हैं'। 'हम धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा से युक्त होंगे— भगवान द्वारा धर्म स्वाख्यात (भली-भाँति उपदिष्ट) है, इसी जन्म में फल देने वाला है, कालातीत है, 'आओ और देखो' कहने योग्य है, निर्वाण की ओर ले जाने वाला है, और बुद्धिमानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य है'। 'हम संघ के प्रति अटूट श्रद्धा से युक्त होंगे— भगवान का श्रावक संघ सुप्रतिपन्न (अच्छे मार्ग पर चलने वाला) है, ऋजु-प्रतिपन्न (सीधे मार्ग पर चलने वाला) है, न्याय-प्रतिपन्न (सत्य मार्ग पर चलने वाला) है, सामीचि-प्रतिपन्न (उचित मार्ग पर चलने वाला) है; यह जो चार पुरुष-युग्म और आठ पुरुष-पुद्गल हैं, यही भगवान का श्रावक संघ है, जो आह्वनीय है, पाहुनीय है, दक्षिणीय है, अंजलि करने योग्य है और लोक का अनुत्तर पुण्य-क्षेत्र है'। और कुल (परिवार) में जो कुछ भी दान देने योग्य वस्तु होगी, वह सब शीलवान और कल्याणधर्मी व्यक्तियों के साथ बिना किसी भेदभाव के साझा की जाएगी— तुम्हें इस प्रकार सीखना चाहिए।" तब चित्त गृहपति ने अपने मित्रों, अमात्यों और सगे-संबंधियों को बुद्ध, धर्म, संघ और त्याग (दान) में प्रतिष्ठित कर काल-कवलित (मृत्यु को प्राप्त) हो गया। दसवाँ (सूत्र)। จิตฺตสํยุตฺตํ สมตฺตํ. चित्त-संयुत्त समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – इसका उद्दान (विषय-सूची)— สํโยชนํ ทฺเว อิสิทตฺตา, มหโก กามภูปิ จ; โคทตฺโต จ นิคณฺโฐ จ, อเจเลน คิลานทสฺสนนฺติ. संयोजन, दो इसिदत्त, महक, कामभू, गोदत्त, निगण्ठ, अचेल और ग्लान-दर्शन। ๘. คามณิสํยุตฺตํ ८. गामणि-संयुत्त ๑. จณฺฑสุตฺตํ १. चण्ड सुत्त ๓๕๓. สาวตฺถินิทานํ[Pg.493]. อถ โข จณฺโฑ คามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จณฺโฑ คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘โก นุ โข, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺโจ จณฺโฑ จณฺโฑตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ. โก ปน, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน มิเธกจฺโจ โสรโต โสรโตตฺเวว สงฺขํ คจฺฉตี’’ติ? ‘‘อิธ, คามณิ, เอกจฺจสฺส ราโค อปฺปหีโน โหติ. ราคสฺส อปฺปหีนตฺตา ปเร โกเปนฺติ, ปเรหิ โกปิยมาโน โกปํ ปาตุกโรติ. โส จณฺโฑตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ. โทโส อปฺปหีโน โหติ. โทสสฺส อปฺปหีนตฺตา ปเร โกเปนฺติ, ปเรหิ โกปิยมาโน โกปํ ปาตุกโรติ. โส จณฺโฑตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ. โมโห อปฺปหีโน โหติ. โมหสฺส อปฺปหีนตฺตา ปเร โกเปนฺติ, ปเรหิ โกปิยมาโน โกปํ ปาตุกโรติ. โส จณฺโฑตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ. อยํ โข, คามณิ, เหตุ, อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺโจ จณฺโฑ จณฺโฑตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ’’. ३५३. श्रावस्ती निदान। तब चण्ड ग्रामणी जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए चण्ड ग्रामणी ने भगवान से यह कहा— "भन्ते! क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे यहाँ कोई 'चण्ड' (क्रूर)— 'चण्ड' ही कहलाता है? और भन्ते! क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे यहाँ कोई 'सोरत' (सौम्य)— 'सोरत' ही कहलाता है?" "ग्रामणी! यहाँ किसी का राग प्रहीण नहीं होता। राग के प्रहीण न होने के कारण दूसरे उसे क्रोधित करते हैं, और दूसरों द्वारा क्रोधित किए जाने पर वह क्रोध प्रकट करता है। वह 'चण्ड' ही कहलाता है। द्वेष प्रहीण नहीं होता... मोह प्रहीण नहीं होता... ग्रामणी! यही हेतु है, यही प्रत्यय है, जिससे यहाँ कोई 'चण्ड'— 'चण्ड' ही कहलाता है।" ‘‘อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺจสฺส ราโค ปหีโน โหติ. ราคสฺส ปหีนตฺตา ปเร น โกเปนฺติ, ปเรหิ โกปิยมาโน โกปํ น ปาตุกโรติ. โส โสรโตตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ. โทโส ปหีโน โหติ. โทสสฺส ปหีนตฺตา ปเร น โกเปนฺติ, ปเรหิ โกปิยมาโน โกปํ น ปาตุกโรติ. โส โสรโตตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ. โมโห ปหีโน โหติ. โมหสฺส ปหีนตฺตา ปเร น โกเปนฺติ, ปเรหิ โกปิยมาโน โกปํ น ปาตุกโรติ. โส โสรโตตฺเวว สงฺขํ คจฺฉติ. อยํ โข, คามณิ, เหตุ อยํ ปจฺจโย เยน มิเธกจฺโจ โสรโต โสรโตตฺเวว สงฺขํ คจฺฉตี’’ติ. "परन्तु ग्रामणी! यहाँ किसी का राग प्रहीण होता है। राग के प्रहीण होने के कारण दूसरे उसे क्रोधित नहीं करते, और दूसरों द्वारा क्रोधित किए जाने पर भी वह क्रोध प्रकट नहीं करता। वह 'सोरत' ही कहलाता है। द्वेष प्रहीण होता है... मोह प्रहीण होता है... ग्रामणी! यही हेतु है, यही प्रत्यय है, जिससे यहाँ कोई 'सोरत'— 'सोरत' ही कहलाता है।" เอวํ วุตฺเต, จณฺโฑ คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต, อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต! เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย, ปฏิจฺฉนฺนํ วา [Pg.494] วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย – จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตีติ; เอวเมวํ ภควตา อเนกปริยาเยน ธมฺโม ปกาสิโต. เอสาหํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ สรณํ คจฺฉามิ ธมฺมญฺจ ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. อุปาสกํ มํ ภควา ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ปฐมํ. ऐसा कहे जाने पर, चण्ड ग्रामणी ने भगवान से यह कहा— "अति सुंदर, भन्ते! अति सुंदर, भन्ते! जैसे, भन्ते! कोई औंधे हुए को सीधा कर दे, ढके हुए को खोल दे, राह भूले को रास्ता दिखा दे, या अंधेरे में तेल का दीपक जला दे— ताकि आँख वाले रूप देख सकें; वैसे ही भगवान ने अनेक प्रकार से धर्म प्रकाशित किया है। भन्ते! मैं भगवान, धर्म और भिक्षु संघ की शरण जाता हूँ। भगवान मुझे आज से जीवन भर के लिए शरणागत उपासक स्वीकार करें।" प्रथम। ๒. ตาลปุฏสุตฺตํ २. तालपुट सुत्त ๓๕๔. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. อถ โข ตาลปุโฏ นฏคามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ตาลปุโฏ นฏคามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต, ปุพฺพกานํ อาจริยปาจริยานํ นฏานํ ภาสมานานํ – ‘โย โส นโฏ รงฺคมชฺเฌ สมชฺชมชฺเฌ สจฺจาลิเกน ชนํ หาเสติ รเมติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปหาสานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’ติ. อิธ ภควา กิมาหา’’ติ? ‘‘อลํ, คามณิ, ติฏฺฐเตตํ. มา มํ เอตํ ปุจฺฉี’’ติ. ทุติยมฺปิ โข ตาลปุโฏ นฏคามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต, ปุพฺพกานํ อาจริยปาจริยานํ นฏานํ ภาสมานานํ – ‘โย โส นโฏ รงฺคมชฺเฌ สมชฺชมชฺเฌ สจฺจาลิเกน ชนํ หาเสติ รเมติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปหาสานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’ติ. อิธ ภควา กิมาหา’’ติ? ‘‘อลํ, คามณิ, ติฏฺฐเตตํ. มา มํ เอตํ ปุจฺฉี’’ติ. ตติยมฺปิ โข ตาลปุโฏ นฏคามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต, ปุพฺพกานํ อาจริยปาจริยานํ นฏานํ ภาสมานานํ – ‘โย โส นโฏ รงฺคมชฺเฌ สมชฺชมชฺเฌ สจฺจาลิเกน ชนํ หาเสติ รเมติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปหาสานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’ติ. อิธ ภควา กิมาหา’’ติ? ३५४. एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दकनिवाप में विहार कर रहे थे। तब तालपुट नट-ग्रामणी जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए तालपुट नट-ग्रामणी ने भगवान से यह कहा— "भन्ते! मैंने पूर्ववर्ती आचार्यों और प्राचार्यों, नटों को कहते सुना है— 'जो नट रंगमंच के बीच में, सभा के बीच में सत्य और असत्य (अभिनय) द्वारा लोगों को हँसाता है, प्रसन्न करता है, वह काया के भेद होने पर, मृत्यु के बाद पहास देवताओं की संगति में उत्पन्न होता है।' यहाँ भगवान क्या कहते हैं?" "बस ग्रामणी, इसे रहने दें। मुझसे यह मत पूछें।" दूसरी बार भी... तीसरी बार भी तालपुट नट-ग्रामणी ने भगवान से यह कहा— "भन्ते! मैंने पूर्ववर्ती आचार्यों और प्राचार्यों, नटों को कहते सुना है— 'जो नट रंगमंच के बीच में, सभा के बीच में सत्य और असत्य द्वारा लोगों को हँसाता है, प्रसन्न करता है, वह काया के भेद होने पर, मृत्यु के बाद पहास देवताओं की संगति में उत्पन्न होता है।' यहाँ भगवान क्या कहते हैं?" ‘‘อทฺธา โข ตฺยาหํ, คามณิ, น ลภามิ – ‘อลํ, คามณิ, ติฏฺฐเตตํ, มา มํ เอตํ ปุจฺฉี’ติ. อปิ จ ตฺยาหํ พฺยากริสฺสามิ. ปุพฺเพ โข, คามณิ, สตฺตา อวีตราคา ราคพนฺธนพทฺธา. เตสํ นโฏ รงฺคมชฺเฌ สมชฺชมชฺเฌ เย ธมฺมา รชนียา เต อุปสํหรติ ภิยฺโยโสมตฺตาย. ปุพฺเพ โข, คามณิ, สตฺตา อวีตโทสา โทสพนฺธนพทฺธา. เตสํ นโฏ รงฺคมชฺเฌ สมชฺชมชฺเฌ เย ธมฺมา [Pg.495] โทสนียา เต อุปสํหรติ ภิยฺโยโสมตฺตาย. ปุพฺเพ โข, คามณิ, สตฺตา อวีตโมหา โมหพนฺธนพทฺธา. เตสํ นโฏ รงฺคมชฺเฌ สมชฺชมชฺเฌ เย ธมฺมา โมหนียา เต อุปสํหรติ ภิยฺโยโสมตฺตาย. โส อตฺตนา มตฺโต ปมตฺโต ปเร มเทตฺวา ปมาเทตฺวา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปหาโส นาม นิรโย ตตฺถ อุปปชฺชติ. สเจ โข ปนสฺส เอวํทิฏฺฐิ โหติ – ‘โย โส นโฏ รงฺคมชฺเฌ สมชฺชมชฺเฌ สจฺจาลิเกน ชนํ หาเสติ รเมติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปหาสานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’ติ, สาสฺส โหติ มิจฺฉาทิฏฺฐิ. มิจฺฉาทิฏฺฐิกสฺส โข ปนาหํ, คามณิ, ปุริสปุคฺคลสฺส ทฺวินฺนํ คตีนํ อญฺญตรํ คตึ วทามิ – นิรยํ วา ติรจฺฉานโยนึ วา’’ติ. निश्चित रूप से, ग्रामणी, मुझे (यह उत्तर देने की अनुमति) नहीं मिल रही थी— 'रहने दो, ग्रामणी, इसे यहीं रहने दो; मुझसे यह मत पूछो।' फिर भी, मैं तुम्हें उत्तर दूँगा। ग्रामणी, पूर्व में ही प्राणी राग से मुक्त नहीं होते, वे राग के बंधन में बँधे होते हैं। उनके लिए नट रंगमंच के बीच में, सभा के बीच में, जो धर्म (विषय) राग उत्पन्न करने वाले होते हैं, उन्हें और अधिक मात्रा में प्रस्तुत करता है। ग्रामणी, पूर्व में ही प्राणी द्वेष से मुक्त नहीं होते, वे द्वेष के बंधन में बँधे होते हैं। उनके लिए नट रंगमंच के बीच में, सभा के बीच में, जो धर्म द्वेष उत्पन्न करने वाले होते हैं, उन्हें और अधिक मात्रा में प्रस्तुत करता है। ग्रामणी, पूर्व में ही प्राणी मोह से मुक्त नहीं होते, वे मोह के बंधन में बँधे होते हैं। उनके लिए नट रंगमंच के बीच में, सभा के बीच में, जो धर्म मोह उत्पन्न करने वाले होते हैं, उन्हें और अधिक मात्रा में प्रस्तुत करता है। वह स्वयं मदमत्त और प्रमादी होकर दूसरों को मदमत्त और प्रमादी बनाता है, शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, 'पहास' नामक नरक में उत्पन्न होता है। यदि उसकी ऐसी दृष्टि होती है— 'जो नट रंगमंच के बीच में, सभा के बीच में, सत्य और असत्य के मिश्रण से लोगों को हँसाता है और प्रसन्न करता है, वह शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, पहास नामक देवों की सभा में उत्पन्न होता है', तो यह उसकी मिथ्या दृष्टि है। ग्रामणी, मिथ्या दृष्टि वाले व्यक्ति के लिए मैं दो गतियों में से एक गति कहता हूँ— या तो नरक या तिर्यक योनि। เอวํ วุตฺเต, ตาลปุโฏ นฏคามณิ, ปโรทิ, อสฺสูนิ ปวตฺเตสิ. ‘‘เอตํ โข ตฺยาหํ, คามณิ, นาลตฺถํ – ‘อลํ, คามณิ, ติฏฺฐเตตํ; มา มํ เอตํ ปุจฺฉี’’’ติ. ‘‘นาหํ, ภนฺเต, เอตํ โรทามิ ยํ มํ ภควา เอวมาห; อปิ จาหํ, ภนฺเต, ปุพฺพเกหิ อาจริยปาจริเยหิ นเฏหิ ทีฆรตฺตํ นิกโต วญฺจิโต ปลุทฺโธ – ‘โย โส นโฏ รงฺคมชฺเฌ สมชฺชมชฺเฌ สจฺจาลิเกน ชนํ หาเสติ รเมติ โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปหาสานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’’’ติ. ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต, อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต! เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย, ปฏิจฺฉนฺนํ วา วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย – จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตีติ; เอวเมวํ ภควตา อเนกปริยาเยน ธมฺโม ปกาสิโต. เอสาหํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ สรณํ คจฺฉามิ ธมฺมญฺจ ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. ลเภยฺยาหํ, ภนฺเต, ภควโต สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, ลเภยฺยํ อุปสมฺปท’’นฺติ. อลตฺถ โข ตาลปุโฏ นฏคามณิ ภควโต สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, อลตฺถ อุปสมฺปทํ. อจิรูปสมฺปนฺโน จ ปนายสฺมา ตาลปุโฏ…เป… อรหตํ อโหสีติ. ทุติยํ. ऐसा कहे जाने पर, तालपुट नट-ग्रामणी रोने लगा और आँसू बहाने लगा। (भगवान ने कहा—) 'ग्रामणी, इसीलिए मुझे (अनुमति) नहीं मिल रही थी— रहने दो, ग्रामणी, इसे यहीं रहने दो; मुझसे यह मत पूछो।' (तालपुट ने कहा—) 'भन्ते, मैं इसलिए नहीं रो रहा हूँ जो भगवान ने मुझसे कहा है; बल्कि भन्ते, मुझे पूर्व के आचार्यों और प्रधान आचार्यों द्वारा, जो नट थे, दीर्घकाल तक छला गया, धोखा दिया गया और प्रलोभन दिया गया कि— जो नट रंगमंच के बीच में, सभा के बीच में, सत्य और असत्य के मिश्रण से लोगों को हँसाता है और प्रसन्न करता है, वह शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, पहास नामक देवों की सभा में उत्पन्न होता है। भन्ते, अद्भुत! भन्ते, अद्भुत! जैसे कोई औंधे हुए को सीधा कर दे, ढके हुए को खोल दे, मार्ग भूले हुए को रास्ता दिखा दे, या अंधकार में तेल का दीपक जला दे ताकि आँख वाले रूप देख सकें; वैसे ही भगवान द्वारा अनेक प्रकार से धर्म प्रकाशित किया गया है। भन्ते, मैं भगवान की शरण जाता हूँ, धर्म और भिक्षु-संघ की शरण जाता हूँ। मैं भगवान के सान्निध्य में प्रव्रज्या प्राप्त करूँ, उपसंपदा प्राप्त करूँ।' तालपुट नट-ग्रामणी ने भगवान के सान्निध्य में प्रव्रज्या प्राप्त की, उपसंपदा प्राप्त की। और उपसंपदा प्राप्त करने के कुछ ही समय बाद आयुष्मान तालपुट... अर्हतों में से एक हो गए। द्वितीय (सुत्त समाप्त)। ๓. โยธาชีวสุตฺตํ ३. योद्धाजीव सुत्त ๓๕๕. อถ โข โยธาชีโว คามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา…เป… เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โยธาชีโว คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต, ปุพฺพกานํ อาจริยปาจริยานํ โยธาชีวานํ ภาสมานานํ – ‘โย โส โยธาชีโว สงฺคาเม อุสฺสหติ วายมติ, ตเมนํ [Pg.496] อุสฺสหนฺตํ วายมนฺตํ ปเร หนนฺติ ปริยาปาเทนฺติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรชิตานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’ติ. อิธ ภควา กิมาหา’’ติ? ‘‘อลํ, คามณิ, ติฏฺฐเตตํ; มา มํ เอตํ ปุจฺฉี’’ติ. ทุติยมฺปิ โข…เป… ตติยมฺปิ โข โยธาชีโว คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต, ปุพฺพกานํ อาจริยปาจริยานํ โยธาชีวานํ ภาสมานานํ – ‘โย โส โยธาชีโว สงฺคาเม อุสฺสหติ วายมติ, ตเมนํ อุสฺสหนฺตํ วายมนฺตํ ปเร หนนฺติ ปริยาปาเทนฺติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรชิตานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’ติ. อิธ ภควา กิมาหา’’ติ? ३५५. तब योद्धाजीव ग्रामणी जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर... एक ओर बैठकर योद्धाजीव ग्रामणी ने भगवान से यह कहा— 'भन्ते, मैंने पूर्व के आचार्यों और प्रधान आचार्यों, जो योद्धा थे, उन्हें यह कहते सुना है— जो योद्धा संग्राम में उत्साह और प्रयत्न करता है, उस उत्साह और प्रयत्न करने वाले को यदि दूसरे मार देते हैं या समाप्त कर देते हैं, तो वह शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, पराजित नामक देवों की सभा में उत्पन्न होता है। इस विषय में भगवान क्या कहते हैं?' 'रहने दो, ग्रामणी, इसे यहीं रहने दो; मुझसे यह मत पूछो।' दूसरी बार भी... तीसरी बार भी योद्धाजीव ग्रामणी ने भगवान से यही कहा— 'भन्ते, मैंने पूर्व के आचार्यों और प्रधान आचार्यों... पराजित नामक देवों की सभा में उत्पन्न होता है। इस विषय में भगवान क्या कहते हैं?' ‘‘อทฺธา โข ตฺยาหํ, คามณิ, น ลภามิ – ‘อลํ, คามณิ, ติฏฺฐเตตํ; มา มํ เอตํ ปุจฺฉี’ติ. อปิ จ ตฺยาหํ พฺยากริสฺสามิ. โย โส, คามณิ, โยธาชีโว สงฺคาเม อุสฺสหติ วายมติ, ตสฺส ตํ จิตฺตํ ปุพฺเพ คหิตํ ทุกฺกฏํ ทุปฺปณิหิตํ – ‘อิเม สตฺตา หญฺญนฺตุ วา พชฺฌนฺตุ วา อุจฺฉิชฺชนฺตุ วา วินสฺสนฺตุ วา มา วา อเหสุํ อิติ วา’ติ. ตเมนํ อุสฺสหนฺตํ วายมนฺตํ ปเร หนนฺติ ปริยาปาเทนฺติ; โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรชิโต นาม นิรโย ตตฺถ อุปปชฺชตีติ. สเจ โข ปนสฺส เอวํ ทิฏฺฐิ โหติ – ‘โย โส โยธาชีโว สงฺคาเม อุสฺสหติ วายมติ ตเมนํ อุสฺสหนฺตํ วายมนฺตํ ปเร หนนฺติ ปริยาปาเทนฺติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรชิตานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’ติ, สาสฺส โหติ มิจฺฉาทิฏฺฐิ. มิจฺฉาทิฏฺฐิกสฺส โข ปนาหํ, คามณิ, ปุริสปุคฺคลสฺส ทฺวินฺนํ คตีนํ อญฺญตรํ คตึ วทามิ – นิรยํ วา ติรจฺฉานโยนึ วา’’ติ. निश्चित रूप से, ग्रामणी, मुझे (अनुमति) नहीं मिल रही थी— 'रहने दो, ग्रामणी, इसे यहीं रहने दो; मुझसे यह मत पूछो।' फिर भी, मैं तुम्हें उत्तर दूँगा। ग्रामणी, जो योद्धा संग्राम में उत्साह और प्रयत्न करता है, उसका वह चित्त पहले से ही गलत तरीके से ग्रहण किया हुआ, दूषित और दुर्भावनापूर्ण होता है कि— 'ये प्राणी मारे जाएँ, या बाँधे जाएँ, या नष्ट किए जाएँ, या विनाश को प्राप्त हों, या ये न रहें।' उस उत्साह और प्रयत्न करने वाले को यदि दूसरे मार देते हैं या समाप्त कर देते हैं, तो वह शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, 'पराजित' नामक नरक में उत्पन्न होता है। यदि उसकी ऐसी दृष्टि होती है— 'जो योद्धा संग्राम में उत्साह और प्रयत्न करता है, उस उत्साह और प्रयत्न करने वाले को यदि दूसरे मार देते हैं या समाप्त कर देते हैं, तो वह शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, पराजित नामक देवों की सभा में उत्पन्न होता है', तो यह उसकी मिथ्या दृष्टि है। ग्रामणी, मिथ्या दृष्टि वाले व्यक्ति के लिए मैं दो गतियों में से एक गति कहता हूँ— या तो नरक या तिर्यक योनि। เอวํ วุตฺเต, โยธาชีโว คามณิ ปโรทิ, อสฺสูนิ ปวตฺเตสิ. ‘‘เอตํ โข ตฺยาหํ, คามณิ, นาลตฺถํ – ‘อลํ, คามณิ, ติฏฺฐเตตํ; มา มํ เอตํ ปุจฺฉี’’’ติ. ‘‘นาหํ, ภนฺเต, เอตํ โรทามิ ยํ มํ ภควา เอวมาห; อปิจาหํ, ภนฺเต, ปุพฺพเกหิ อาจริยปาจริเยหิ โยธาชีเวหิ ทีฆรตฺตํ นิกโต วญฺจิโต ปลุทฺโธ – ‘โย โส โยธาชีโว สงฺคาเม อุสฺสหติ วายมติ, ตเมนํ อุสฺสหนฺตํ วายมนฺตํ ปเร หนนฺติ ปริยาปาเทนฺติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรชิตานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’’’ติ. ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต…เป… อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ตติยํ. ऐसा कहने पर, योद्धाजीवक ग्रामणी रोने लगा, उसके आँसू बहने लगे। "ग्रामणी, मैंने तुमसे यही कहा था— 'बस करो ग्रामणी, इसे रहने दो; मुझसे यह मत पूछो'।" "भन्ते, भगवान ने मुझसे जो कहा, मैं उसके कारण नहीं रो रहा हूँ; बल्कि भन्ते, पुराने आचार्यों और प्राचार्यों, जो योद्धाजीवक थे, उन्होंने मुझे लंबे समय तक ठगा, धोखा दिया और भ्रमित किया (यह कहकर)— 'जो योद्धा युद्ध में उत्साह और प्रयास करता है, और उस उत्साह और प्रयास करते हुए को दूसरे मार देते हैं या समाप्त कर देते हैं, वह शरीर टूटने के बाद, मृत्यु के उपरांत पराजित नामक देवों की संगति में उत्पन्न होता है'।" "अति सुंदर, भन्ते... आज से मुझे जीवन भर के लिए शरणागत उपासक स्वीकार करें।" तीसरा (सूत्त)। ๔. หตฺถาโรหสุตฺตํ ४. हत्थारोह सुत्त ๓๕๖. อถ [Pg.497] โข หตฺถาโรโห คามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา…เป… อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คตนฺติ. จตุตฺถํ. ३५६. तब हत्थारोह (हाथी सवार) ग्रामणी जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर... आज से मुझे जीवन भर के लिए शरणागत उपासक स्वीकार करें। चौथा (सूत्त)। ๕. อสฺสาโรหสุตฺตํ ५. अस्सारोह सुत्त ๓๕๗. อถ โข อสฺสาโรโห คามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อสฺสาโรโห คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต, ปุพฺพกานํ อาจริยปาจริยานํ อสฺสาโรหานํ ภาสมานานํ – ‘โย โส อสฺสาโรโห สงฺคาเม อุสฺสหติ วายมติ, ตเมนํ อุสฺสหนฺตํ วายมนฺตํ ปเร หนนฺติ ปริยาปาเทนฺติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรชิตานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’ติ. อิธ ภควา กิมาหา’’ติ? ‘‘อลํ, คามณิ, ติฏฺฐเตตํ; มา มํ เอตํ ปุจฺฉี’’ติ. ทุติยมฺปิ โข…เป… ตติยมฺปิ โข อสฺสาโรโห คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต, ปุพฺพกานํ อาจริยปาจริยานํ อสฺสาโรหานํ ภาสมานานํ – ‘โย โส อสฺสาโรโห สงฺคาเม อุสฺสหติ วายมติ, ตเมนํ อุสฺสหนฺตํ วายมนฺตํ ปเร หนนฺติ ปริยาปาเทนฺติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรชิตานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’ติ. อิธ ภควา กิมาหา’’ติ? ३५७. तब अस्सारोह (घुड़सवार) ग्रामणी जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए अस्सारोह ग्रामणी ने भगवान से यह कहा— "भन्ते, मैंने पुराने आचार्यों और प्राचार्यों, जो घुड़सवार थे, उन्हें यह कहते सुना है— 'जो घुड़सवार युद्ध में उत्साह और प्रयास करता है, और उस उत्साह और प्रयास करते हुए को दूसरे मार देते हैं या समाप्त कर देते हैं, वह शरीर टूटने के बाद, मृत्यु के उपरांत पराजित नामक देवों की संगति में उत्पन्न होता है'। इस विषय में भगवान क्या कहते हैं?" "बस करो ग्रामणी, इसे रहने दो; मुझसे यह मत पूछो।" दूसरी बार भी... तीसरी बार भी अस्सारोह ग्रामणी ने भगवान से यह कहा— "भन्ते, मैंने पुराने आचार्यों और प्राचार्यों, जो घुड़सवार थे, उन्हें यह कहते सुना है— 'जो घुड़सवार युद्ध में उत्साह और प्रयास करता है, और उस उत्साह और प्रयास करते हुए को दूसरे मार देते हैं या समाप्त कर देते हैं, वह शरीर टूटने के बाद, मृत्यु के उपरांत पराजित नामक देवों की संगति में उत्पन्न होता है'। इस विषय में भगवान क्या कहते हैं?" ‘‘อทฺธา โข ตฺยาหํ, คามณิ, น ลภามิ – ‘อลํ, คามณิ, ติฏฺฐเตตํ; มา มํ เอตํ ปุจฺฉี’ติ. อปิ จ โข ตฺยาหํ พฺยากริสฺสามิ. โย โส, คามณิ, อสฺสาโรโห สงฺคาเม อุสฺสหติ วายมติ ตสฺส ตํ จิตฺตํ ปุพฺเพ คหิตํ ทุกฺกฏํ ทุปฺปณิหิตํ – ‘อิเม สตฺตา หญฺญนฺตุ วา พชฺฌนฺตุ วา อุจฺฉิชฺชนฺตุ วา วินสฺสนฺตุ วา มา อเหสุํ อิติ วา’ติ. ตเมนํ อุสฺสหนฺตํ วายมนฺตํ ปเร หนนฺติ ปริยาปาเทนฺติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรชิโต นาม นิรโย ตตฺถ อุปปชฺชติ. สเจ โข ปนสฺส เอวํ ทิฏฺฐิ โหติ – ‘โย โส อสฺสาโรโห สงฺคาเม อุสฺสหติ วายมติ, ตเมนํ อุสฺสหนฺตํ วายมนฺตํ ปเร หนนฺติ ปริยาปาเทนฺติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรชิตานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’ติ, สาสฺส โหติ มิจฺฉาทิฏฺฐิ. มิจฺฉาทิฏฺฐิกสฺส โข ปนาหํ คามณิ, ปุริสปุคฺคลสฺส ทฺวินฺนํ คตีนํ อญฺญตรํ คตึ วทามิ – นิรยํ วา ติรจฺฉานโยนึ วา’’ติ. "निश्चित रूप से ग्रामणी, मुझे तुमसे यह (अनुमति) नहीं मिली कि 'बस करो ग्रामणी, इसे रहने दो; मुझसे यह मत पूछो'। फिर भी, मैं तुम्हें उत्तर दूँगा। ग्रामणी, जो घुड़सवार युद्ध में उत्साह और प्रयास करता है, उसका वह चित्त पहले से ही गलत तरीके से लगा हुआ, दूषित और दुर्भावनापूर्ण होता है— 'ये प्राणी मारे जाएँ, बाँधे जाएँ, नष्ट हो जाएँ, विनाश को प्राप्त हों या अस्तित्वहीन हो जाएँ'। उस उत्साह और प्रयास करते हुए को जब दूसरे मार देते हैं या समाप्त कर देते हैं, तो वह शरीर टूटने के बाद, मृत्यु के उपरांत पराजित नामक नरक में उत्पन्न होता है। लेकिन यदि उसकी ऐसी दृष्टि है— 'जो घुड़सवार युद्ध में उत्साह और प्रयास करता है, और उस उत्साह और प्रयास करते हुए को दूसरे मार देते हैं या समाप्त कर देते हैं, वह शरीर टूटने के बाद, मृत्यु के उपरांत पराजित नामक देवों की संगति में उत्पन्न होता है', तो यह उसकी मिथ्या-दृष्टि है। ग्रामणी, मिथ्या-दृष्टि वाले व्यक्ति के लिए मैं दो गतियों में से एक गति बताता हूँ— या तो नरक या तिर्यक योनि।" เอวํ [Pg.498] วุตฺเต, อสฺสาโรโห คามณิ ปโรทิ, อสฺสูนิ ปวตฺเตสิ. ‘‘เอตํ โข ตฺยาหํ, คามณิ, นาลตฺถํ – ‘อลํ, คามณิ, ติฏฺฐเตตํ; มา มํ เอตํ ปุจฺฉี’’’ติ. ‘‘นาหํ, ภนฺเต, เอตํ โรทามิ ยํ มํ ภควา เอวมาห. อปิจาหํ, ภนฺเต, ปุพฺพเกหิ อาจริยปาจริเยหิ อสฺสาโรเหหิ ทีฆรตฺตํ นิกโต วญฺจิโต ปลุทฺโธ – ‘โย โส อสฺสาโรโห สงฺคาเม อุสฺสหติ วายมติ, ตเมนํ อุสฺสหนฺตํ วายมนฺตํ ปเร หนนฺติ ปริยาปาเทนฺติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรชิตานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชตี’’’ติ. ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต…เป… อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ปญฺจมํ. ऐसा कहने पर, अस्सारोह ग्रामणी रोने लगा, उसके आँसू बहने लगे। "ग्रामणी, मैंने तुमसे यही कहा था— 'बस करो ग्रामणी, इसे रहने दो; मुझसे यह मत पूछो'।" "भन्ते, भगवान ने मुझसे जो कहा, मैं उसके कारण नहीं रो रहा हूँ। बल्कि भन्ते, पुराने आचार्यों और प्राचार्यों, जो घुड़सवार थे, उन्होंने मुझे लंबे समय तक ठगा, धोखा दिया और भ्रमित किया (यह कहकर)— 'जो घुड़सवार युद्ध में उत्साह और प्रयास करता है, और उस उत्साह और प्रयास करते हुए को दूसरे मार देते हैं या समाप्त कर देते हैं, वह शरीर टूटने के बाद, मृत्यु के उपरांत पराजित नामक देवों की संगति में उत्पन्न होता है'। "अति सुंदर, भन्ते... आज से मुझे जीवन भर के लिए शरणागत उपासक स्वीकार करें।" पाँचवाँ (सूत्त)। ๖. อสิพนฺธกปุตฺตสุตฺตํ ६. असिबन्धकपुत्त सुत्त ๓๕๘. เอกํ สมยํ ภควา นาฬนฺทายํ วิหรติ ปาวาริกมฺพวเน. อถ โข อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘พฺราหฺมณา, ภนฺเต, ปจฺฉา ภูมกา กามณฺฑลุกา เสวาลมาลิกา อุทโกโรหกา อคฺคิปริจารกา. เต มตํ กาลงฺกตํ อุยฺยาเปนฺติ นาม สญฺญาเปนฺติ นาม สคฺคํ นาม โอกฺกาเมนฺติ. ภควา ปน, ภนฺเต, อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ปโหติ ตถา กาตุํ ยถา สพฺโพ โลโก กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺเชยฺยา’’ติ? ‘‘เตน หิ, คามณิ, ตญฺเญเวตฺถ ปฏิปุจฺฉิสฺสามิ. ยถา เต ขเมยฺย ตถา นํ พฺยากเรยฺยาสี’’ติ. ३५८. एक समय भगवान नालंदा के पावारिक आम्रवन में विहार कर रहे थे। तब असिबन्धकपुत्र ग्रामणी जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए असिबन्धकपुत्र ग्रामणी ने भगवान से यह कहा— "भन्ते, पश्चिम भूमि के ब्राह्मण जो कमंडलु धारण करते हैं, सेवाल की माला पहनते हैं, जल में स्नान करते हैं और अग्नि की परिचर्या करते हैं; वे मृत व्यक्ति को ऊपर ले जाते हैं, उसे स्वर्ग का मार्ग समझाते हैं और स्वर्ग में पहुँचा देते हैं। भन्ते, क्या अर्हत् सम्यक-सम्बुद्ध भगवान ऐसा कुछ कर सकते हैं जिससे सारा संसार शरीर टूटने के बाद, मृत्यु के उपरांत सुगति, स्वर्ग लोक में उत्पन्न हो सके?" "तो ग्रामणी, मैं तुमसे इस विषय में प्रति-प्रश्न पूछूँगा। जैसा तुम्हें ठीक लगे, वैसा उत्तर देना।" ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อิธสฺส ปุริโส ปาณาติปาตี อทินฺนาทายี กาเมสุมิจฺฉาจารี มุสาวาที ปิสุณวาโจ ผรุสวาโจ สมฺผปฺปลาปี อภิชฺฌาลุ พฺยาปนฺนจิตฺโต มิจฺฉาทิฏฺฐิโก. ตเมนํ มหา ชนกาโย สงฺคมฺม สมาคมฺม อายาเจยฺย โถเมยฺย ปญฺชลิโก อนุปริสกฺเกยฺย – ‘อยํ ปุริโส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชตู’ติ. ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อปิ นุ โส ปุริโส มหโต ชนกายสฺส อายาจนเหตุ วา โถมนเหตุ วา ปญฺชลิกา อนุปริสกฺกนเหตุ วา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺเชยฺยา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “हे ग्रामणी! तुम इसके बारे में क्या सोचते हो? यदि यहाँ कोई पुरुष प्राणी-हिंसा करने वाला, चोरी करने वाला, काम-भोगों में व्यभिचारी, झूठ बोलने वाला, चुगली करने वाला, कठोर वचन बोलने वाला, व्यर्थ प्रलाप करने वाला, लोभी, द्वेषपूर्ण चित्त वाला और मिथ्या-दृष्टि वाला हो। और यदि बहुत से लोग इकट्ठे होकर, हाथ जोड़कर प्रार्थना करें, प्रशंसा करें और बार-बार कहें— ‘यह पुरुष शरीर टूटने के बाद, मृत्यु के उपरांत, सुगति, स्वर्ग लोक में उत्पन्न हो।’ हे ग्रामणी! तुम क्या सोचते हो? क्या वह पुरुष उन बहुत से लोगों की प्रार्थना के कारण, प्रशंसा के कारण या हाथ जोड़कर बार-बार कहने के कारण, शरीर टूटने के बाद, मृत्यु के उपरांत, सुगति, स्वर्ग लोक में उत्पन्न होगा?” “नहीं, भन्ते!” ‘‘เสยฺยถาปิ, คามณิ, ปุริโส มหตึ ปุถุสิลํ คมฺภีเร อุทกรหเท ปกฺขิเปยฺย. ตเมนํ มหา ชนกาโย สงฺคมฺม สมาคมฺม อายาเจยฺย โถเมยฺย [Pg.499] ปญฺชลิโก อนุปริสกฺเกยฺย – ‘อุมฺมุชฺช, โภ ปุถุสิเล, อุปฺลว, โภ ปุถุสิเล, ถลมุปฺลว, โภ ปุถุสิเล’ติ. ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อปิ นุ สา ปุถุสิลา มหโต ชนกายสฺส อายาจนเหตุ วา โถมนเหตุ วา ปญฺชลิกา อนุปริสกฺกนเหตุ วา อุมฺมุชฺเชยฺย วา อุปฺลเวยฺย วา ถลํ วา อุปฺลเวยฺยา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘เอวเมว โข, คามณิ, โย โส ปุริโส ปาณาติปาตี อทินฺนาทายี กาเมสุมิจฺฉาจารี มุสาวาที ปิสุณวาโจ ผรุสวาโจ สมฺผปฺปลาปี อภิชฺฌาลุ พฺยาปนฺนจิตฺโต มิจฺฉาทิฏฺฐิโก. กิญฺจาปิ ตํ มหา ชนกาโย สงฺคมฺม สมาคมฺม อายาเจยฺย โถเมยฺย ปญฺชลิโก อนุปริสกฺเกยฺย – ‘อยํ ปุริโส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชตู’’’ติ, อถ โข โส ปุริโส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺเชยฺย. “हे ग्रामणी! जैसे कोई पुरुष एक बड़ी शिला को गहरे जलाशय में डाल दे। और यदि बहुत से लोग इकट्ठे होकर, हाथ जोड़कर प्रार्थना करें, प्रशंसा करें और बार-बार कहें— ‘हे शिला! ऊपर आओ, हे शिला! तैरो, हे शिला! किनारे पर आ जाओ।’ हे ग्रामणी! तुम क्या सोचते हो? क्या वह शिला उन बहुत से लोगों की प्रार्थना के कारण, प्रशंसा के कारण या हाथ जोड़कर बार-बार कहने के कारण ऊपर आएगी, तैरेगी या किनारे पर आएगी?” “नहीं, भन्ते!” “इसी प्रकार, हे ग्रामणी! जो पुरुष प्राणी-हिंसा करने वाला, चोरी करने वाला, काम-भोगों में व्यभिचारी, झूठ बोलने वाला, चुगली करने वाला, कठोर वचन बोलने वाला, व्यर्थ प्रलाप करने वाला, लोभी, द्वेषपूर्ण चित्त वाला और मिथ्या-दृष्टि वाला है। भले ही बहुत से लोग इकट्ठे होकर, हाथ जोड़कर प्रार्थना करें, प्रशंसा करें और बार-बार कहें— ‘यह पुरुष शरीर टूटने के बाद, मृत्यु के उपरांत, सुगति, स्वर्ग लोक में उत्पन्न हो’, फिर भी वह पुरुष शरीर टूटने के बाद, मृत्यु के उपरांत, अपाय, दुर्गति, विनिपात, नरक में ही उत्पन्न होगा।” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อิธสฺส ปุริโส ปาณาติปาตา ปฏิวิรโต อทินฺนาทานา ปฏิวิรโต กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรโต มุสาวาทา ปฏิวิรโต ปิสุณาย วาจาย ปฏิวิรโต ผรุสาย วาจาย ปฏิวิรโต สมฺผปฺปลาปา ปฏิวิรโต อนภิชฺฌาลุ อพฺยาปนฺนจิตฺโต สมฺมาทิฏฺฐิโก. ตเมนํ มหา ชนกาโย สงฺคมฺม สมาคมฺม อายาเจยฺย โถเมยฺย ปญฺชลิโก อนุปริสกฺเกยฺย – ‘อยํ ปุริโส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตู’ติ. ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อปิ นุ โส ปุริโส มหโต ชนกายสฺส อายาจนเหตุ วา โถมนเหตุ วา ปญฺชลิกา อนุปริสกฺกนเหตุ วา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺเชยฺยา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “हे ग्रामणी! तुम इसके बारे में क्या सोचते हो? यदि यहाँ कोई पुरुष प्राणी-हिंसा से विरत हो, चोरी से विरत हो, काम-भोगों में व्यभिचार से विरत हो, झूठ बोलने से विरत हो, चुगली करने से विरत हो, कठोर वचन बोलने से विरत हो, व्यर्थ प्रलाप से विरत हो, लोभ-रहित हो, द्वेष-रहित चित्त वाला हो और सम्यक्-दृष्टि वाला हो। और यदि बहुत से लोग इकट्ठे होकर, हाथ जोड़कर प्रार्थना करें, प्रशंसा करें और बार-बार कहें— ‘यह पुरुष शरीर टूटने के बाद, मृत्यु के उपरांत, अपाय, दुर्गति, विनिपात, नरक में उत्पन्न हो।’ हे ग्रामणी! तुम क्या सोचते हो? क्या वह पुरुष उन बहुत से लोगों की प्रार्थना के कारण, प्रशंसा के कारण या हाथ जोड़कर बार-बार कहने के कारण, शरीर टूटने के बाद, मृत्यु के उपरांत, अपाय, दुर्गति, विनिपात, नरक में उत्पन्न होगा?” “नहीं, भन्ते!” ‘‘เสยฺยถาปิ, คามณิ, ปุริโส สปฺปิกุมฺภํ วา เตลกุมฺภํ วา คมฺภีเร อุทกรหเท โอคาเหตฺวา ภินฺเทยฺย. ตตฺร ยาสฺส สกฺขรา วา กฐลา วา สา อโธคามี อสฺส; ยญฺจ ขฺวสฺส ตตฺร สปฺปิ วา เตลํ วา ตํ อุทฺธํ คามิ อสฺส. ตเมนํ มหา ชนกาโย สงฺคมฺม สมาคมฺม อายาเจยฺย โถเมยฺย ปญฺชลิโก อนุปริสกฺเกยฺย – ‘โอสีท, โภ สปฺปิเตล, สํสีท, โภ สปฺปิเตล, อโธ คจฺฉ, โภ สปฺปิเตลา’ติ. ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อปิ [Pg.500] นุ ตํ สปฺปิเตลํ มหโต ชนกายสฺส อายาจนเหตุ วา โถมนเหตุ วา ปญฺชลิกา อนุปริสกฺกนเหตุ วา โอสีเทยฺย วา สํสีเทยฺย วา อโธ วา คจฺเฉยฺยา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘เอวเมว โข, คามณิ, โย โส ปุริโส ปาณาติปาตา ปฏิวิรโต, อทินฺนาทานา ปฏิวิรโต, กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรโต, มุสาวาทา ปฏิวิรโต, ปิสุณาย วาจาย ปฏิวิรโต, ผรุสาย วาจาย ปฏิวิรโต, สมฺผปฺปลาปา ปฏิวิรโต, อนภิชฺฌาลุ, อพฺยาปนฺนจิตฺโต, สมฺมาทิฏฺฐิโก, กิญฺจาปิ ตํ มหา ชนกาโย สงฺคมฺม สมาคมฺม อายาเจยฺย โถเมยฺย ปญฺชลิโก อนุปริสกฺเกยฺย – ‘อยํ ปุริโส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตู’ติ, อถ โข โส ปุริโส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺเชยฺยา’’ติ. เอวํ วุตฺเต, อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต…เป… อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ฉฏฺฐํ. “हे ग्रामणी! जैसे कोई पुरुष घी के घड़े या तेल के घड़े को गहरे जलाशय में डुबोकर फोड़ दे। वहाँ जो कंकड़ या ठीकरा होगा, वह नीचे चला जाएगा; और जो घी या तेल होगा, वह ऊपर तैरने लगेगा। और यदि बहुत से लोग इकट्ठे होकर, हाथ जोड़कर प्रार्थना करें, प्रशंसा करें और बार-बार कहें— ‘हे घी-तेल! डूब जाओ, हे घी-तेल! नीचे बैठ जाओ, हे घी-तेल! नीचे चले जाओ।’ हे ग्रामणी! तुम क्या सोचते हो? क्या वह घी-तेल उन बहुत से लोगों की प्रार्थना के कारण, प्रशंसा के कारण या हाथ जोड़कर बार-बार कहने के कारण डूब जाएगा, नीचे बैठ जाएगा या नीचे चला जाएगा?” “नहीं, भन्ते!” “इसी प्रकार, हे ग्रामणी! जो पुरुष प्राणी-हिंसा से विरत है, चोरी से विरत है, काम-भोगों में व्यभिचार से विरत है, झूठ बोलने से विरत है, चुगली करने से विरत है, कठोर वचन बोलने से विरत है, व्यर्थ प्रलाप से विरत है, लोभ-रहित है, द्वेष-रहित चित्त वाला है, सम्यक्-दृष्टि वाला है; भले ही बहुत से लोग इकट्ठे होकर, हाथ जोड़कर प्रार्थना करें, प्रशंसा करें और बार-बार कहें— ‘यह पुरुष शरीर टूटने के बाद, मृत्यु के उपरांत, अपाय, दुर्गति, विनिपात, नरक में उत्पन्न हो’, फिर भी वह पुरुष शरीर टूटने के बाद, मृत्यु के उपरांत, सुगति, स्वर्ग लोक में ही उत्पन्न होगा।” ऐसा कहे जाने पर, असिबन्धकपुत्र ग्रामणी ने भगवान से यह कहा— “अति सुंदर, भन्ते! ... आज से मुझे आप जीवन भर के लिए शरणागत उपासक स्वीकार करें।” छठा (सूत्र)। ๗. เขตฺตูปมสุตฺตํ ७. खेत्तूपम सुत्त (खेत की उपमा का सूत्र) ๓๕๙. เอกํ สมยํ ภควา นาฬนฺทายํ วิหรติ ปาวาริกมฺพวเน. อถ โข อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘นนุ, ภนฺเต, ภควา สพฺพปาณภูตหิตานุกมฺปี วิหรตี’’ติ? ‘‘เอวํ, คามณิ, ตถาคโต สพฺพปาณภูตหิตานุกมฺปี วิหรตี’’ติ. ‘‘อถ กิญฺจรหิ, ภนฺเต, ภควา เอกจฺจานํ สกฺกจฺจํ ธมฺมํ เทเสติ, เอกจฺจานํ โน ตถา สกฺกจฺจํ ธมฺมํ เทเสตี’’ติ? ‘‘เตน หิ, คามณิ, ตญฺเญเวตฺถ ปฏิปุจฺฉิสฺสามิ. ยถา เต ขเมยฺย ตถา นํ พฺยากเรยฺยาสิ. ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อิธสฺสุ กสฺสกสฺส คหปติโน ตีณิ เขตฺตานิ – เอกํ เขตฺตํ อคฺคํ, เอกํ เขตฺตํ มชฺฌิมํ, เอกํ เขตฺตํ หีนํ ชงฺคลํ อูสรํ ปาปภูมิ. ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อสุ กสฺสโก คหปติ พีชานิ ปติฏฺฐาเปตุกาโม กตฺถ ปฐมํ ปติฏฺฐาเปยฺย, ยํ วา อทุํ เขตฺตํ อคฺคํ, ยํ วา อทุํ เขตฺตํ มชฺฌิมํ, ยํ วา อทุํ เขตฺตํ หีนํ ชงฺคลํ อูสรํ ปาปภูมี’’ติ? ‘‘อสุ, ภนฺเต, กสฺสโก คหปติ พีชานิ ปติฏฺฐาเปตุกาโม ยํ อทุํ เขตฺตํ อคฺคํ ตตฺถ ปติฏฺฐาเปยฺย[Pg.501]. ตตฺถ ปติฏฺฐาเปตฺวา ยํ อทุํ เขตฺตํ มชฺฌิมํ ตตฺถ ปติฏฺฐาเปยฺย. ตตฺถ ปติฏฺฐาเปตฺวา ยํ อทุํ เขตฺตํ หีนํ ชงฺคลํ อูสรํ ปาปภูมิ ตตฺถ ปติฏฺฐาเปยฺยปิ, โนปิ ปติฏฺฐาเปยฺย. ตํ กิสฺส เหตุ? อนฺตมโส โคภตฺตมฺปิ ภวิสฺสตี’’ติ. ३५९. एक समय भगवान बुद्ध नालंदा में पावारिक के आम्रवन में विहार कर रहे थे। तब असिबन्धक का पुत्र ग्रामणी जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए असिबन्धक के पुत्र ग्रामणी ने भगवान से यह कहा— "भन्ते! क्या भगवान सभी प्राणी-भूतों के प्रति अनुकम्पा और उनके हित के लिए विहार नहीं करते?" "हाँ ग्रामणी, तथागत सभी प्राणी-भूतों के प्रति अनुकम्पा और उनके हित के लिए विहार करते हैं।" "भन्ते! यदि ऐसा है, तो भगवान क्यों कुछ लोगों को आदरपूर्वक धर्म उपदेश देते हैं और कुछ को उस प्रकार आदरपूर्वक धर्म उपदेश नहीं देते?" "तो ग्रामणी, मैं तुमसे ही इस विषय में प्रतिप्रश्न करूँगा। जैसा तुम्हें ठीक लगे, वैसा उत्तर देना। ग्रामणी, तुम क्या सोचते हो? मान लो यहाँ किसी किसान गृहपति के तीन खेत हैं— एक खेत उत्तम है, एक खेत मध्यम है, और एक खेत हीन, कठोर, ऊसर और बुरी मिट्टी वाला है। ग्रामणी, तुम क्या सोचते हो? वह किसान गृहपति बीज बोने की इच्छा से पहले कहाँ बोएगा— उस उत्तम खेत में, उस मध्यम खेत में, या उस हीन, कठोर, ऊसर और बुरी मिट्टी वाले खेत में?" "भन्ते! वह किसान गृहपति बीज बोने की इच्छा से पहले उस उत्तम खेत में बोएगा। वहाँ बोने के बाद, उस मध्यम खेत में बोएगा। वहाँ बोने के बाद, उस हीन, कठोर, ऊसर और बुरी मिट्टी वाले खेत में बो भी सकता है और नहीं भी। ऐसा क्यों? क्योंकि कम से कम वह पशुओं का चारा तो हो ही जाएगा।" ‘‘เสยฺยถาปิ, คามณิ, ยํ อทุํ เขตฺตํ อคฺคํ; เอวเมว มยฺหํ ภิกฺขุภิกฺขุนิโย. เตสาหํ ธมฺมํ เทเสมิ – อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ, สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสมิ. ตํ กิสฺส เหตุ? เอเต หิ, คามณิ, มํทีปา มํเลณา มํตาณา มํสรณา วิหรนฺติ. เสยฺยถาปิ, คามณิ, ยํ อทุํ เขตฺตํ มชฺฌิมํ; เอวเมว มยฺหํ อุปาสกอุปาสิกาโย. เตสํ ปาหํ ธมฺมํ เทเสมิ – อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ, สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสมิ. ตํ กิสฺส เหตุ? เอเต หิ, คามณิ, มํทีปา มํเลณา มํตาณา มํสรณา วิหรนฺติ. เสยฺยถาปิ, คามณิ, ยํ อทุํ เขตฺตํ หีนํ ชงฺคลํ อูสรํ ปาปภูมิ; เอวเมว มยฺหํ อญฺญติตฺถิยา สมณพฺราหฺมณปริพฺพาชกา. เตสํ ปาหํ ธมฺมํ เทเสมิ – อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ, เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสมิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อปฺเปว นาม เอกํ ปทมฺปิ อาชาเนยฺยุํ ตํ เนสํ อสฺส ทีฆรตฺตํ หิตาย สุขายา’’ติ. "ग्रामणी! जैसे वह उत्तम खेत है, वैसे ही मेरे भिक्षु और भिक्षुणियाँ हैं। उन्हें मैं धर्म का उपदेश देता हूँ— जो आदि में कल्याणकारी है, मध्य में कल्याणकारी है, और अंत में कल्याणकारी है; जो अर्थ सहित है और व्यंजन (शब्द) सहित है; मैं पूर्णतः परिपूर्ण और परिशुद्ध ब्रह्मचर्य को प्रकाशित करता हूँ। ऐसा क्यों? क्योंकि ग्रामणी, ये मुझे ही अपना द्वीप, मुझे ही अपना आश्रय, मुझे ही अपना त्राण और मुझे ही अपनी शरण मानकर विहार करते हैं। ग्रामणी! जैसे वह मध्यम खेत है, वैसे ही मेरे उपासक और उपासिकाएँ हैं। उन्हें भी मैं धर्म का उपदेश देता हूँ— जो आदि में कल्याणकारी है, मध्य में कल्याणकारी है, और अंत में कल्याणकारी है; जो अर्थ सहित है और व्यंजन सहित है; मैं पूर्णतः परिपूर्ण और परिशुद्ध ब्रह्मचर्य को प्रकाशित करता हूँ। ऐसा क्यों? क्योंकि ग्रामणी, ये भी मुझे ही अपना द्वीप, मुझे ही अपना आश्रय, मुझे ही अपना त्राण और मुझे ही अपनी शरण मानकर विहार करते हैं। ग्रामणी! जैसे वह हीन, कठोर, ऊसर और बुरी मिट्टी वाला खेत है, वैसे ही मेरे लिए अन्य मतों के श्रमण, ब्राह्मण और परिव्राजक हैं। उन्हें भी मैं धर्म का उपदेश देता हूँ— जो आदि में कल्याणकारी है, मध्य में कल्याणकारी है, और अंत में कल्याणकारी है; जो अर्थ सहित है और व्यंजन सहित है; मैं पूर्णतः परिपूर्ण और परिशुद्ध ब्रह्मचर्य को प्रकाशित करता हूँ। ऐसा क्यों? क्योंकि यदि वे एक पद भी जान लें, तो वह उनके लिए दीर्घकाल तक हित और सुख के लिए होगा।" ‘‘เสยฺยถาปิ, คามณิ, ปุริสสฺส ตโย อุทกมณิกา – เอโก อุทกมณิโก อจฺฉิทฺโท อหารี อปริหารี, เอโก อุทกมณิโก อจฺฉิทฺโท หารี ปริหารี, เอโก อุทกมณิโก ฉิทฺโท หารี ปริหารี. ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อสุ ปุริโส อุทกํ นิกฺขิปิตุกาโม กตฺถ ปฐมํ นิกฺขิเปยฺย, โย วา โส อุทกมณิโก อจฺฉิทฺโท อหารี อปริหารี, โย วา โส อุทกมณิโก อจฺฉิทฺโท หารี ปริหารี, โย วา โส อุทกมณิโก ฉิทฺโท หารี ปริหารี’’ติ? ‘‘อสุ, ภนฺเต, ปุริโส อุทกํ นิกฺขิปิตุกาโม, โย โส อุทกมณิโก อจฺฉิทฺโท อหารี อปริหารี ตตฺถ นิกฺขิเปยฺย, ตตฺถ นิกฺขิปิตฺวา, โย โส อุทกมณิโก อจฺฉิทฺโท หารี ปริหารี ตตฺถ นิกฺขิเปยฺย, ตตฺถ นิกฺขิปิตฺวา, โย โส อุทกมณิโก ฉิทฺโท หารี ปริหารี ตตฺถ นิกฺขิเปยฺยปิ, โนปิ นิกฺขิเปยฺย. ตํ กิสฺส เหตุ? อนฺตมโส ภณฺฑโธวนมฺปิ ภวิสฺสตี’’ติ. "ग्रामणी! जैसे किसी पुरुष के पास पानी के तीन घड़े हों— एक घड़ा बिना छेद वाला हो, जिससे पानी न रिसता हो और न बाहर निकलता हो; एक घड़ा बिना छेद वाला हो, पर जिससे पानी रिसता और बाहर निकलता हो; और एक घड़ा छेद वाला हो, जिससे पानी रिसता और बाहर निकलता हो। ग्रामणी, तुम क्या सोचते हो? वह पुरुष पानी भरने की इच्छा से पहले किसमें पानी भरेगा— उस घड़े में जो बिना छेद वाला है और जिससे पानी नहीं रिसता; उस घड़े में जो बिना छेद वाला है पर जिससे पानी रिसता है; या उस घड़े में जो छेद वाला है और जिससे पानी रिसता है?" "भन्ते! वह पुरुष पानी भरने की इच्छा से पहले उस घड़े में पानी भरेगा जो बिना छेद वाला है और जिससे पानी नहीं रिसता। वहाँ भरने के बाद, उस घड़े में भरेगा जो बिना छेद वाला है पर जिससे पानी रिसता है। वहाँ भरने के बाद, उस घड़े में जो छेद वाला है और जिससे पानी रिसता है, वह पानी भर भी सकता है और नहीं भी। ऐसा क्यों? क्योंकि कम से कम वह बर्तन धोने के काम तो आ ही जाएगा।" ‘‘เสยฺยถาปิ, คามณิ, โย โส อุทกมณิโก อจฺฉิทฺโท อหารี อปริหารี; เอวเมว มยฺหํ ภิกฺขุภิกฺขุนิโย. เตสาหํ ธมฺมํ เทเสมิ – อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ [Pg.502] สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ, เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสมิ. ตํ กิสฺส เหตุ? เอเต หิ, คามณิ, มํทีปา มํเลณา มํตาณา มํสรณา วิหรนฺติ. เสยฺยถาปิ, คามณิ, โย โส อุทกมณิโก อจฺฉิทฺโท หารี ปริหารี; เอวเมว มยฺหํ อุปาสกอุปาสิกาโย. เตสาหํ ธมฺมํ เทเสมิ – อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ, เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสมิ. ตํ กิสฺส เหตุ? เอเต หิ, คามณิ, มํทีปา มํเลณา มํตาณา มํสรณา วิหรนฺติ. เสยฺยถาปิ, คามณิ, โย โส อุทกมณิโก ฉิทฺโท หารี ปริหารี; เอวเมว มยฺหํ อญฺญติตฺถิยา สมณพฺราหฺมณปริพฺพาชกา. เตสาหํ ธมฺมํ เทเสมิ – อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสมิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อปฺเปว นาม เอกํ ปทมฺปิ อาชาเนยฺยุํ, ตํ เนสํ อสฺส ทีฆรตฺตํ หิตาย สุขายา’’ติ. เอวํ วุตฺเต, อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต…เป… อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. สตฺตมํ. "हे ग्रामणी! जैसे वह जल का पात्र जो छिद्ररहित है, न रिसता है और न ही बाहर बहता है; उसी प्रकार मेरे भिक्षु और भिक्षुणियाँ हैं। उन्हें मैं धर्म का उपदेश देता हूँ—जो आदि में कल्याणकारी है, मध्य में कल्याणकारी है और अंत में कल्याणकारी है, जो अर्थपूर्ण है और सुव्यंजित है; मैं पूर्णतः परिपूर्ण और परिशुद्ध ब्रह्मचर्य को प्रकाशित करता हूँ। वह किस कारण से? हे ग्रामणी! क्योंकि ये मुझे ही अपना द्वीप, मुझे ही अपना आश्रय, मुझे ही अपना त्राण और मुझे ही अपनी शरण मानकर विहार करते हैं। हे ग्रामणी! जैसे वह जल का पात्र जो छिद्ररहित है, (किन्तु) जल ले जाने वाला और धारण करने वाला है; उसी प्रकार मेरे उपासक और उपासिकाएँ हैं। उन्हें मैं धर्म का उपदेश देता हूँ—जो आदि में कल्याणकारी है, मध्य में कल्याणकारी है और अंत में कल्याणकारी है, जो अर्थपूर्ण है और सुव्यंजित है; मैं पूर्णतः परिपूर्ण और परिशुद्ध ब्रह्मचर्य को प्रकाशित करता हूँ। वह किस कारण से? हे ग्रामणी! क्योंकि ये मुझे ही अपना द्वीप, मुझे ही अपना आश्रय, मुझे ही अपना त्राण और मुझे ही अपनी शरण मानकर विहार करते हैं। हे ग्रामणी! जैसे वह जल का पात्र जो छिद्रयुक्त है, जल बहाने वाला और रिसने वाला है; उसी प्रकार मेरे लिए अन्य मतों के श्रमण, ब्राह्मण और परिव्राजक हैं। उन्हें भी मैं धर्म का उपदेश देता हूँ—जो आदि में कल्याणकारी है, मध्य में कल्याणकारी है और अंत में कल्याणकारी है, जो अर्थपूर्ण है और सुव्यंजित है; मैं पूर्णतः परिपूर्ण और परिशुद्ध ब्रह्मचर्य को प्रकाशित करता हूँ। वह किस कारण से? कि कदाचित वे एक पद को भी जान लें, तो वह उनके लिए दीर्घकाल तक हित और सुख के लिए होगा।" ऐसा कहे जाने पर, असिबंधकपुत्र ग्रामणी ने भगवान से यह कहा— "अति सुंदर, भंते! ... आज से मुझे आप जीवन भर के लिए शरणागत उपासक स्वीकार करें।" सातवाँ सुत्त समाप्त। ๘. สงฺขธมสุตฺตํ ८. शंखधम सुत्त ๓๖๐. เอกํ สมยํ ภควา นาฬนฺทายํ วิหรติ ปาวาริกมฺพวเน. อถ โข อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ นิคณฺฐสาวโก เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข อสิพนฺธกปุตฺตํ คามณึ ภควา เอตทโวจ – ‘‘กถํ นุ โข, คามณิ, นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต สาวกานํ ธมฺมํ เทเสตี’’ติ? ‘‘เอวํ โข, ภนฺเต, นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต สาวกานํ ธมฺมํ เทเสติ – ‘โย โกจิ ปาณํ อติปาเตติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโก, โย โกจิ อทินฺนํ อาทิยติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโก, โย โกจิ กาเมสุ มิจฺฉา จรติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโก, โย โกจิ มุสา ภณติ สพฺโพ, โส อาปายิโก เนรยิโก. ยํพหุลํ ยํพหุลํ วิหรติ, เตน เตน นียตี’ติ. เอวํ โข, ภนฺเต, นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต สาวกานํ ธมฺมํ เทเสตี’’ติ. ‘‘‘ยํพหุลํ ยํพหุลญฺจ, คามณิ, วิหรติ, เตน เตน นียติ’, เอวํ สนฺเต น โกจิ อาปายิโก เนรยิโก ภวิสฺสติ, ยถา นิคณฺฐสฺส นาฏปุตฺตสฺส วจนํ’’. ३६०. एक समय भगवान नालंदा के पावारिक आम्रवन में विहार कर रहे थे। तब निगंठ (निर्ग्रंथ) का श्रावक, असिबंधकपुत्र ग्रामणी, जहाँ भगवान थे वहाँ आया; आकर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए असिबंधकपुत्र ग्रामणी से भगवान ने यह कहा— "हे ग्रामणी! निगंठ नातपुत्त अपने श्रावकों को किस प्रकार धर्म का उपदेश देते हैं?" "भंते! निगंठ नातपुत्त अपने श्रावकों को इस प्रकार धर्म का उपदेश देते हैं— 'जो कोई भी प्राणी की हत्या करता है, वह सब अपायगामी और नारकीय है; जो कोई भी बिना दिया हुआ लेता है, वह सब अपायगामी और नारकीय है; जो कोई भी काम-भोगों में मिथ्याचार करता है, वह सब अपायगामी और नारकीय है; जो कोई भी झूठ बोलता है, वह सब अपायगामी और नारकीय है। वह जिस (कर्म) में बहुत समय बिताता है, उसी के द्वारा वह ले जाया जाता है।' भंते! इस प्रकार निगंठ नातपुत्त अपने श्रावकों को धर्म का उपदेश देते हैं।" "हे ग्रामणी! यदि 'जिसमें वह बहुत समय बिताता है, उसी के द्वारा वह ले जाया जाता है'—ऐसा है, तो निगंठ नातपुत्त के वचनों के अनुसार कोई भी अपायगामी या नारकीय नहीं होगा।" ‘‘ตํ [Pg.503] กึ มญฺญสิ, คามณิ, โย โส ปุริโส ปาณาติปาตี รตฺติยา วา ทิวสสฺส วา สมยาสมยํ อุปาทาย, กตโม พหุตโร สมโย, ยํ วา โส ปาณมติปาเตติ, ยํ วา โส ปาณํ นาติปาเตตี’’ติ? ‘‘โย โส, ภนฺเต, ปุริโส ปาณาติปาตี รตฺติยา วา ทิวสสฺส วา สมยาสมยํ อุปาทาย, อปฺปตโร โส สมโย ยํ โส ปาณมติปาเตติ, อถ โข สฺเวว พหุตโร สมโย ยํ โส ปาณํ นาติปาเตตี’’ติ. ‘‘‘ยํพหุลํ ยํพหุลญฺจ, คามณิ, วิหรติ เตน เตน นียตี’ติ, เอวํ สนฺเต น โกจิ อาปายิโก เนรยิโก ภวิสฺสติ, ยถา นิคณฺฐสฺส นาฏปุตฺตสฺส วจนํ’’. "हे ग्रामणी! तुम क्या सोचते हो? जो मनुष्य प्राणातिपाती (हत्यारा) है, रात या दिन के समय के अनुसार, कौन सा समय अधिक होता है—जब वह प्राणी की हत्या करता है या जब वह प्राणी की हत्या नहीं करता है?" "भंते! जो मनुष्य प्राणातिपाती है, रात या दिन के समय के अनुसार, वह समय कम होता है जब वह प्राणी की हत्या करता है, बल्कि वही समय अधिक होता है जब वह प्राणी की हत्या नहीं करता है।" "हे ग्रामणी! यदि 'जिसमें वह बहुत समय बिताता है, उसी के द्वारा वह ले जाया जाता है'—ऐसा है, तो निगंठ नातपुत्त के वचनों के अनुसार कोई भी अपायगामी या नारकीय नहीं होगा।" ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, โย โส ปุริโส อทินฺนาทายี รตฺติยา วา ทิวสสฺส วา สมยาสมยํ อุปาทาย, กตโม พหุตโร สมโย, ยํ วา โส อทินฺนํ อาทิยติ, ยํ วา โส อทินฺนํ นาทิยตี’’ติ. ‘‘โย โส, ภนฺเต, ปุริโส อทินฺนาทายี รตฺติยา วา ทิวสสฺส วา สมยาสมยํ อุปาทาย อปฺปตโร โส สมโย, ยํ โส อทินฺนํ อาทิยติ, อถ โข สฺเวว พหุตโร สมโย, ยํ โส อทินฺนํ นาทิยตี’’ติ. ‘‘‘ยํพหุลํ ยํพหุลญฺจ, คามณิ, วิหรติ เตน เตน นียตี’ติ, เอวํ สนฺเต น โกจิ อาปายิโก เนรยิโก ภวิสฺสติ, ยถา นิคณฺฐสฺส นาฏปุตฺตสฺส วจนํ’’. "हे ग्रामणी! तुम क्या सोचते हो? जो मनुष्य अदत्तादायी (चोर) है, रात या दिन के समय के अनुसार, कौन सा समय अधिक होता है—जब वह बिना दिया हुआ लेता है या जब वह बिना दिया हुआ नहीं लेता है?" "भंते! जो मनुष्य अदत्तादायी है, रात या दिन के समय के अनुसार, वह समय कम होता है जब वह बिना दिया हुआ लेता है, बल्कि वही समय अधिक होता है जब वह बिना दिया हुआ नहीं लेता है।" "हे ग्रामणी! यदि 'जिसमें वह बहुत समय बिताता है, उसी के द्वारा वह ले जाया जाता है'—ऐसा है, तो निगंठ नातपुत्त के वचनों के अनुसार कोई भी अपायगामी या नारकीय नहीं होगा।" ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, โย โส ปุริโส กาเมสุมิจฺฉาจารี รตฺติยา วา ทิวสสฺส วา สมยาสมยํ อุปาทาย, กตโม พหุตโร สมโย, ยํ วา โส กาเมสุ มิจฺฉา จรติ, ยํ วา โส กาเมสุ มิจฺฉา น จรตี’’ติ? ‘‘โย โส, ภนฺเต, ปุริโส กาเมสุมิจฺฉาจารี รตฺติยา วา ทิวสสฺส วา สมยาสมยํ อุปาทาย, อปฺปตโร โส สมโย ยํ โส กาเมสุ มิจฺฉา จรติ, อถ โข สฺเวว พหุตโร สมโย, ยํ โส กาเมสุ มิจฺฉา น จรตี’’ติ. ‘‘‘ยํพหุลํ ยํพหุลญฺจ, คามณิ, วิหรติ เตน เตน นียตี’ติ, เอวํ สนฺเต น โกจิ อาปายิโก เนรยิโก ภวิสฺสติ, ยถา นิคณฺฐสฺส นาฏปุตฺตสฺส วจนํ’’. "हे ग्रामणी! तुम क्या सोचते हो? जो मनुष्य काम-मिथ्याचारी है, रात या दिन के समय के अनुसार, कौन सा समय अधिक होता है—जब वह काम-मिथ्याचार करता है या जब वह काम-मिथ्याचार नहीं करता है?" "भंते! जो मनुष्य काम-मिथ्याचारी है, रात या दिन के समय के अनुसार, वह समय कम होता है जब वह काम-मिथ्याचार करता है, बल्कि वही समय अधिक होता है जब वह काम-मिथ्याचार नहीं करता है।" "हे ग्रामणी! यदि 'जिसमें वह बहुत समय बिताता है, उसी के द्वारा वह ले जाया जाता है'—ऐसा है, तो निगंठ नातपुत्त के वचनों के अनुसार कोई भी अपायगामी या नारकीय नहीं होगा।" ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, โย โส ปุริโส มุสาวาที รตฺติยา วา ทิวสสฺส วา สมยาสมยํ อุปาทาย, กตโม พหุตโร สมโย, ยํ วา โส มุสา ภณติ, ยํ วา โส มุสา น ภณตี’’ติ? ‘‘โย โส, ภนฺเต, ปุริโส มุสาวาที รตฺติยา วา ทิวสสฺส วา สมยาสมยํ อุปาทาย[Pg.504], อปฺปตโร โส สมโย, ยํ โส มุสา ภณติ, อถ โข สฺเวว พหุตโร สมโย, ยํ โส มุสา น ภณตี’’ติ. ‘‘‘ยํพหุลํ ยํพหุลญฺจ, คามณิ, วิหรติ เตน เตน นียตี’ติ, เอวํ สนฺเต น โกจิ อาปายิโก เนรยิโก ภวิสฺสติ, ยถา นิคณฺฐสฺส นาฏปุตฺตสฺส วจนํ’’. “हे ग्रामणी! तुम क्या सोचते हो? वह मनुष्य जो झूठ बोलने वाला है, चाहे रात हो या दिन, समय-असमय को देखते हुए, कौन सा समय अधिक होता है—जब वह झूठ बोलता है या जब वह झूठ नहीं बोलता है?” “भन्ते! वह मनुष्य जो झूठ बोलने वाला है, चाहे रात हो या दिन, समय-असमय को देखते हुए, वह समय कम होता है जब वह झूठ बोलता है, बल्कि वही समय अधिक होता है जब वह झूठ नहीं बोलता है।” “हे ग्रामणी! ‘जिस (कर्म) की बहुलता में कोई विहार करता है, उसी के द्वारा वह ले जाया जाता है’—यदि ऐसा है, तो निर्ग्रन्थ नातपुत्त के वचनों के अनुसार कोई भी अपायगामी या नरकगामी नहीं होगा।” ‘‘อิธ, คามณิ, เอกจฺโจ สตฺถา เอวํวาที โหติ เอวํทิฏฺฐิ – ‘โย โกจิ ปาณมติปาเตติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโก, โย โกจิ อทินฺนํ อาทิยติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโก, โย โกจิ กาเมสุ มิจฺฉา จรติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโก, โย โกจิ มุสา ภณติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโก’ติ. ตสฺมึ โข ปน, คามณิ, สตฺถริ สาวโก อภิปฺปสนฺโน โหติ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘มยฺหํ โข สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – โย โกจิ ปาณมติปาเตติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโกติ. อตฺถิ โข ปน มยา ปาโณ อติปาติโต, อหมฺปมฺหิ อาปายิโก เนรยิโกติ ทิฏฺฐึ ปฏิลภติ. ตํ, คามณิ, วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา ยถาภตํ นิกฺขิตฺโต เอวํ นิรเย. มยฺหํ โข สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – โย โกจิ อทินฺนํ อาทิยติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโกติ. อตฺถิ โข ปน มยา อทินฺนํ อาทินฺนํ อหมฺปมฺหิ อาปายิโก เนรยิโกติ ทิฏฺฐึ ปฏิลภติ. ตํ, คามณิ, วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา ยถาภตํ นิกฺขิตฺโต เอวํ นิรเย. มยฺหํ โข สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – โย โกจิ กาเมสุ มิจฺฉา จรติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโก’ติ. อตฺถิ โข ปน มยา กาเมสุ มิจฺฉา จิณฺณํ. ‘อหมฺปมฺหิ อาปายิโก เนรยิโก’ติ ทิฏฺฐึ ปฏิลภติ. ตํ, คามณิ, วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา ยถาภตํ นิกฺขิตฺโต เอวํ นิรเย. มยฺหํ โข สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – โย โกจิ มุสา ภณติ, สพฺโพ โส อาปายิโก เนรยิโกติ. อตฺถิ โข ปน มยา มุสา ภณิตํ. ‘อหมฺปมฺหิ อาปายิโก เนรยิโก’ติ ทิฏฺฐึ ปฏิลภติ. ตํ, คามณิ, วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา ยถาภตํ นิกฺขิตฺโต เอวํ นิรเย. “हे ग्रामणी! यहाँ इस संसार में कोई शास्ता ऐसा कहने वाला और ऐसी दृष्टि वाला होता है—‘जो कोई भी प्राणी की हत्या करता है, वह सब अपायगामी और नरकगामी होता है; जो कोई भी चोरी करता है, वह सब अपायगामी और नरकगामी होता है; जो कोई भी काम-भोगों में मिथ्याचार करता है, वह सब अपायगामी और नरकगामी होता है; जो कोई भी झूठ बोलता है, वह सब अपायगामी और नरकगामी होता है’। हे ग्रामणी! उस शास्ता में कोई श्रावक अत्यंत श्रद्धावान होता है। उसे ऐसा विचार आता है—‘मेरे शास्ता ऐसे कहने वाले और ऐसी दृष्टि वाले हैं कि जो कोई भी प्राणी की हत्या करता है, वह सब अपायगामी और नरकगामी होता है। और मैंने भी प्राणी की हत्या की है, इसलिए मैं भी अपायगामी और नरकगामी हूँ’—ऐसी दृष्टि वह प्राप्त कर लेता है। हे ग्रामणी! उस वाणी को न छोड़कर, उस चित्त को न छोड़कर, उस दृष्टि का त्याग न करके, वह उसी प्रकार नरक में डाल दिया जाता है जैसे कोई लाया हुआ बोझ रख दिया जाता है। ‘मेरे शास्ता ऐसे कहने वाले और ऐसी दृष्टि वाले हैं कि जो कोई भी चोरी करता है, वह सब अपायगामी और नरकगामी होता है। और मैंने भी चोरी की है, इसलिए मैं भी अपायगामी और नरकगामी हूँ’—ऐसी दृष्टि वह प्राप्त कर लेता है। हे ग्रामणी! उस वाणी को न छोड़कर, उस चित्त को न छोड़कर, उस दृष्टि का त्याग न करके, वह उसी प्रकार नरक में डाल दिया जाता है जैसे कोई लाया हुआ बोझ रख दिया जाता है। ‘मेरे शास्ता ऐसे कहने वाले और ऐसी दृष्टि वाले हैं कि जो कोई भी काम-भोगों में मिथ्याचार करता है, वह सब अपायगामी और नरकगामी होता है। और मैंने भी काम-मिथ्याचार किया है, इसलिए मैं भी अपायगामी और नरकगामी हूँ’—ऐसी दृष्टि वह प्राप्त कर लेता है। हे ग्रामणी! उस वाणी को न छोड़कर, उस चित्त को न छोड़कर, उस दृष्टि का त्याग न करके, वह उसी प्रकार नरक में डाल दिया जाता है जैसे कोई लाया हुआ बोझ रख दिया जाता है। ‘मेरे शास्ता ऐसे कहने वाले और ऐसी दृष्टि वाले हैं कि जो कोई भी झूठ बोलता है, वह सब अपायगामी और नरकगामी होता है। और मैंने भी झूठ बोला है, इसलिए मैं भी अपायगामी और नरकगामी हूँ’—ऐसी दृष्टि वह प्राप्त कर लेता है। हे ग्रामणी! उस वाणी को न छोड़कर, उस चित्त को न छोड़कर, उस दृष्टि का त्याग न करके, वह उसी प्रकार नरक में डाल दिया जाता है जैसे कोई लाया हुआ बोझ रख दिया जाता है।” ‘‘อิธ [Pg.505] ปน, คามณิ, ตถาคโต โลเก อุปฺปชฺชติ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน สุคโต โลกวิทู อนุตฺตโร ปุริสทมฺมสารถิ สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา. โส อเนกปริยาเยน ปาณาติปาตํ ครหติ วิครหติ, ‘ปาณาติปาตา วิรมถา’ติ จาห. อทินฺนาทานํ ครหติ วิครหติ, ‘อทินฺนาทานา วิรมถา’ติ จาห. กาเมสุมิจฺฉาจารํ ครหติ, วิครหติ ‘กาเมสุมิจฺฉาจารา วิรมถา’ติ จาห. มุสาวาทํ ครหติ วิครหติ ‘มุสาวาทา วิรมถา’ติ จาห. ตสฺมึ โข ปน, คามณิ, สตฺถริ สาวโก อภิปฺปสนฺโน โหติ. โส อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘ภควา โข อเนกปริยาเยน ปาณาติปาตํ ครหติ วิครหติ, ปาณาติปาตา วิรมถาติ จาห. อตฺถิ โข ปน มยา ปาโณ อติปาติโต ยาวตโก วา ตาวตโก วา. โย โข ปน มยา ปาโณ อติปาติโต ยาวตโก วา ตาวตโก วา, ตํ น สุฏฺฐุ, ตํ น สาธุ. อหญฺเจว โข ปน ตปฺปจฺจยา วิปฺปฏิสารี อสฺสํ. น เมตํ ปาปํ กมฺมํ อกตํ ภวิสฺสตี’ติ. โส อิติ ปฏิสงฺขาย ตญฺเจว ปาณาติปาตํ ปชหติ. อายติญฺจ ปาณาติปาตา ปฏิวิรโต โหติ. เอวเมตสฺส ปาปสฺส กมฺมสฺส ปหานํ โหติ. เอวเมตสฺส ปาปสฺส กมฺมสฺส สมติกฺกโม โหติ. “परन्तु हे ग्रामणी! इस लोक में तथागत उत्पन्न होते हैं, जो अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध, विद्या और चरण से सम्पन्न, सुगत, लोकविद्, पुरुषों को दमित करने वाले अनुपम सारथि, देवों और मनुष्यों के शास्ता, बुद्ध और भगवान हैं। वे अनेक प्रकार से प्राणी-हत्या की निंदा करते हैं, विशेष रूप से निंदा करते हैं, और कहते हैं—‘प्राणी-हत्या से विरत हो जाओ’। वे चोरी की निंदा करते हैं, विशेष रूप से निंदा करते हैं, और कहते हैं—‘चोरी से विरत हो जाओ’। वे काम-मिथ्याचार की निंदा करते हैं, विशेष रूप से निंदा करते हैं, और कहते हैं—‘काम-मिथ्याचार से विरत हो जाओ’। वे झूठ बोलने की निंदा करते हैं, विशेष रूप से निंदा करते हैं, और कहते हैं—‘झूठ बोलने से विरत हो जाओ’। हे ग्रामणी! उस शास्ता में कोई श्रावक अत्यंत श्रद्धावान होता है। वह इस प्रकार विचार करता है—‘भगवान ने अनेक प्रकार से प्राणी-हत्या की निंदा की है और कहा है कि प्राणी-हत्या से विरत हो जाओ। मैंने भी कम या अधिक मात्रा में प्राणी की हत्या की है। जो मैंने प्राणी की हत्या की है, वह अच्छा नहीं हुआ, वह श्रेष्ठ नहीं हुआ। यदि मैं उस कारण से पश्चाताप करूँ, तो भी वह पाप कर्म अनकिया नहीं हो जाएगा’। वह ऐसा विचार कर उस प्राणी-हत्या को छोड़ देता है और भविष्य के लिए प्राणी-हत्या से विरत हो जाता है। इस प्रकार उसके उस पाप कर्म का प्रहाण होता है और उस पाप कर्म का अतिक्रमण होता है।” ‘‘‘ภควา โข อเนกปริยาเยน อทินฺนาทานํ ครหติ วิครหติ, อทินฺนาทานา วิรมถาติ จาห. อตฺถิ โข ปน มยา อทินฺนํ อาทินฺนํ ยาวตกํ วา ตาวตกํ วา. ยํ โข ปน มยา อทินฺนํ อาทินฺนํ ยาวตกํ วา ตาวตกํ วา ตํ น สุฏฺฐุ, ตํ น สาธุ. อหญฺเจว โข ปน ตปฺปจฺจยา วิปฺปฏิสารี อสฺสํ, น เมตํ ปาปํ กมฺมํ อกตํ ภวิสฺสตี’ติ. โส อิติ ปฏิสงฺขาย ตญฺเจว อทินฺนาทานํ ปชหติ. อายติญฺจ อทินฺนาทานา ปฏิวิรโต โหติ. เอวเมตสฺส ปาปสฺส กมฺมสฺส ปหานํ โหติ. เอวเมตสฺส ปาปสฺส กมฺมสฺส สมติกฺกโม โหติ. “भगवान ने अनेक प्रकार से चोरी की निंदा की है और कहा है कि चोरी से विरत हो जाओ। मैंने भी कम या अधिक मात्रा में चोरी की है। जो मैंने चोरी की है, वह अच्छा नहीं हुआ, वह श्रेष्ठ नहीं हुआ। यदि मैं उस कारण से पश्चाताप करूँ, तो भी वह पाप कर्म अनकिया नहीं हो जाएगा। वह ऐसा विचार कर उस चोरी को छोड़ देता है और भविष्य के लिए चोरी से विरत हो जाता है। इस प्रकार उसके उस पाप कर्म का प्रहाण होता है और उस पाप कर्म का अतिक्रमण होता है।” ‘‘‘ภควา โข ปน อเนกปริยาเยน กาเมสุมิจฺฉาจารํ ครหติ วิครหติ, กาเมสุมิจฺฉาจารา วิรมถาติ จาห. อตฺถิ โข ปน มยา กาเมสุ มิจฺฉา จิณฺณํ ยาวตกํ วา ตาวตกํ วา. ยํ โข ปน มยา กาเมสุ มิจฺฉา จิณฺณํ ยาวตกํ วา ตาวตกํ วา ตํ น สุฏฺฐุ, ตํ น สาธุ. อหญฺเจว โข ปน ตปฺปจฺจยา วิปฺปฏิสารี อสฺสํ, น [Pg.506] เมตํ ปาปํ กมฺมํ อกตํ ภวิสฺสตี’ติ. โส อิติ ปฏิสงฺขาย ตญฺเจว กาเมสุมิจฺฉาจารํ ปชหติ, อายติญฺจ กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรโต โหติ. เอวเมตสฺส ปาปสฺส กมฺมสฺส ปหานํ โหติ. เอวเมตสฺส ปาปสฺส กมฺมสฺส สมติกฺกโม โหติ. "भगवान अनेक प्रकार से काम-भोगों में मिथ्याचार की निंदा करते हैं, विशेष रूप से निंदा करते हैं, और कहते हैं—'काम-भोगों में मिथ्याचार से विरत रहो।' मैंने काम-भोगों में जितना भी मिथ्याचार किया है, वह न तो अच्छा है और न ही कल्याणकारी है। यदि मैं उस कारण से पश्चाताप करता हूँ, तो वह पाप कर्म अनकिया (न किया हुआ) नहीं हो जाएगा। वह इस प्रकार विचार कर उस काम-मिथ्याचार को त्याग देता है और भविष्य में काम-मिथ्याचार से विरत हो जाता है। इस प्रकार इस पाप कर्म का प्रहाण (त्याग) होता है। इस प्रकार इस पाप कर्म का अतिक्रमण होता है।" ‘‘‘ภควา โข ปน อเนกปริยาเยน มุสาวาทํ ครหติ วิครหติ, มุสาวาทา วิรมถาติ จาห. อตฺถิ โข ปน มยา มุสา ภณิตํ ยาวตกํ วา ตาวตกํ วา. ยํ โข ปน มยา มุสา ภณิตํ ยาวตกํ วา ตาวตกํ วา ตํ น สุฏฺฐุ, ตํ น สาธุ. อหญฺเจว โข ปน ตปฺปจฺจยา วิปฺปฏิสารี อสฺสํ, น เมตํ ปาปํ กมฺมํ อกตํ ภวิสฺสตี’ติ. โส อิติ ปฏิสงฺขาย ตญฺเจว มุสาวาทํ ปชหติ, อายติญฺจ มุสาวาทา ปฏิวิรโต โหติ. เอวเมตสฺส ปาปสฺส กมฺมสฺส ปหานํ โหติ. เอวเมตสฺส ปาปสฺส กมฺมสฺส สมติกฺกโม โหติ. "भगवान अनेक प्रकार से मृषावाद (झूठ बोलने) की निंदा करते हैं, विशेष रूप से निंदा करते हैं, और कहते हैं—'मृषावाद से विरत रहो।' मैंने जितना भी झूठ बोला है, वह न तो अच्छा है और न ही कल्याणकारी है। यदि मैं उस कारण से पश्चाताप करता हूँ, तो वह पाप कर्म अनकिया नहीं हो जाएगा। वह इस प्रकार विचार कर उस मृषावाद को त्याग देता है और भविष्य में मृषावाद से विरत हो जाता है। इस प्रकार इस पाप कर्म का प्रहाण होता है। इस प्रकार इस पाप कर्म का अतिक्रमण होता है।" ‘‘โส ปาณาติปาตํ ปหาย ปาณาติปาตา ปฏิวิรโต โหติ. อทินฺนาทานํ ปหาย อทินฺนาทานา ปฏิวิรโต โหติ. กาเมสุมิจฺฉาจารํ ปหาย กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรโต โหติ. มุสาวาทํ ปหาย มุสาวาทา ปฏิวิรโต โหติ. ปิสุณํ วาจํ ปหาย ปิสุณาย วาจาย ปฏิวิรโต โหติ. ผรุสํ วาจํ ปหาย ผรุสาย วาจาย ปฏิวิรโต โหติ. สมฺผปฺปลาปํ ปหาย สมฺผปฺปลาปา ปฏิวิรโต โหติ. อภิชฺฌํ ปหาย อนภิชฺฌาลุ โหติ. พฺยาปาทปฺปโทสํ ปหาย อพฺยาปนฺนจิตฺโต โหติ. มิจฺฉาทิฏฺฐึ ปหาย สมฺมาทิฏฺฐิโก โหติ. "वह प्राणातिपात (हिंसा) को त्याग कर प्राणातिपात से विरत होता है। अदत्तादान (चोरी) को त्याग कर अदत्तादान से विरत होता है। काम-मिथ्याचार को त्याग कर काम-मिथ्याचार से विरत होता है। मृषावाद को त्याग कर मृषावाद से विरत होता है। पिशुन वचन (चुगली) को त्याग कर पिशुन वचन से विरत होता है। परुष वचन (कठोर वाणी) को त्याग कर परुष वचन से विरत होता है। सम्फप्पलाप (व्यर्थ प्रलाप) को त्याग कर सम्फप्पलाप से विरत होता है। अभिध्या (लोभ) को त्याग कर अनभिध्यालु (लोभ रहित) होता है। व्यापाद (द्वेष) के दोष को त्याग कर अव्यापन्नचित्त (द्वेष रहित चित्त वाला) होता है। मिथ्यादृष्टि को त्याग कर सम्यग्दृष्टि होता है।" ‘‘ส โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต เมตฺตาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ. อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ เมตฺตาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. เสยฺยถาปิ, คามณิ, พลวา สงฺขธโม อปฺปกสิเรเนว จตุทฺทิสา วิญฺญาเปยฺย; เอวเมว โข, คามณิ, เอวํ ภาวิตาย เมตฺตาย เจโตวิมุตฺติยา เอวํ พหุลีกตาย ยํ ปมาณกตํ กมฺมํ, น ตํ ตตฺราวสิสฺสติ, น ตํ ตตฺราวติฏฺฐติ. "हे ग्रामणी! वह आर्य श्रावक इस प्रकार लोभ रहित, द्वेष रहित, मोह रहित, सम्प्रजन्य (विवेकपूर्ण ज्ञान) युक्त और स्मृतिमान होकर मैत्रीपूर्ण चित्त से एक दिशा को व्याप्त कर विहार करता है, वैसे ही दूसरी, वैसे ही तीसरी और वैसे ही चौथी दिशा को। इस प्रकार ऊपर, नीचे, तिरछे, सब ओर, सबको अपने समान मानते हुए, संपूर्ण लोक को विशाल, महान, अप्रमाण, वैर रहित और व्यापाद रहित मैत्रीपूर्ण चित्त से व्याप्त कर विहार करता है। हे ग्रामणी! जैसे कोई बलवान शंख बजाने वाला बिना किसी कठिनाई के चारों दिशाओं को (शंख ध्वनि) सुना देता है; वैसे ही, हे ग्रामणी! इस प्रकार मैत्रीपूर्ण चेतोविमुक्ति के भावित और बहुलीकृत होने पर, जो कोई भी प्रमाणकृत (सीमित) कर्म है, वह वहाँ शेष नहीं रहता, वह वहाँ टिकता नहीं है।" ‘‘ส [Pg.507] โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต กรุณาสหคเตน เจตสา…เป… มุทิตาสหคเตน เจตสา…เป…. อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ. อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. เสยฺยถาปิ, คามณิ, พลวา สงฺขธโม อปฺปกสิเรเนว จตุทฺทิสา วิญฺญาเปยฺย; เอวเมว โข, คามณิ, เอวํ ภาวิตาย อุเปกฺขาย เจโตวิมุตฺติยา เอวํ พหุลีกตาย ยํ ปมาณกตํ กมฺมํ น ตํ ตตฺราวสิสฺสติ, น ตํ ตตฺราวติฏฺฐตี’’ติ. เอวํ วุตฺเต, อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต, อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต…เป… อุปาสกํ มํ ภควา ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. อฏฺฐมํ. "हे ग्रामणी! वह आर्य श्रावक इस प्रकार लोभ रहित, द्वेष रहित, मोह रहित, सम्प्रजन्य युक्त और स्मृतिमान होकर करुणापूर्ण चित्त से... पे... मुदितापूर्ण चित्त से... पे... उपेक्षापूर्ण चित्त से एक दिशा को व्याप्त कर विहार करता है, वैसे ही दूसरी, वैसे ही तीसरी और वैसे ही चौथी दिशा को। इस प्रकार ऊपर, नीचे, तिरछे, सब ओर, सबको अपने समान मानते हुए, संपूर्ण लोक को विशाल, महान, अप्रमाण, वैर रहित और व्यापाद रहित उपेक्षापूर्ण चित्त से व्याप्त कर विहार करता है। हे ग्रामणी! जैसे कोई बलवान शंख बजाने वाला बिना किसी कठिनाई के चारों दिशाओं को सुना देता है; वैसे ही, हे ग्रामणी! इस प्रकार उपेक्षापूर्ण चेतोविमुक्ति के भावित और बहुलीकृत होने पर, जो कोई भी प्रमाणकृत कर्म है, वह वहाँ शेष नहीं रहता, वह वहाँ टिकता नहीं है।" ऐसा कहे जाने पर, असिबन्धकपुत्र ग्रामणी ने भगवान से यह कहा— "अद्भुत है, भन्ते! अद्भुत है, भन्ते! ... भगवान मुझे आज से जीवन भर के लिए शरणागत उपासक के रूप में स्वीकार करें।" (आठवाँ सूत्त समाप्त) ๙. กุลสุตฺตํ ९. कुल सुत्त ๓๖๑. เอกํ สมยํ ภควา โกสเลสุ จาริกํ จรมาโน มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ เยน นาฬนฺทา ตทวสริ. ตตฺร สุทํ ภควา นาฬนฺทายํ วิหรติ ปาวาริกมฺพวเน. ३६१. एक समय भगवान कोसल जनपद में भिक्षु संघ के साथ चारिका करते हुए नालंदा पहुँचे। वहाँ भगवान नालंदा में पावारिक के आम्रवन (पावारिकाम्बवन) में विहार कर रहे थे। เตน โข ปน สมเยน นาฬนฺทา ทุพฺภิกฺขา โหติ ทฺวีหิติกา เสตฏฺฐิกา สลากาวุตฺตา. เตน โข ปน สมเยน นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต นาฬนฺทายํ ปฏิวสติ มหติยา นิคณฺฐปริสาย สทฺธึ. อถ โข อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ นิคณฺฐสาวโก เยน นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา นิคณฺฐํ นาฏปุตฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข อสิพนฺธกปุตฺตํ คามณึ นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต เอตทโวจ – ‘‘เอหิ ตฺวํ, คามณิ, สมณสฺส โคตมสฺส วาทํ อาโรเปหิ. เอวํ เต กลฺยาโณ กิตฺติสทฺโท อพฺภุคฺคจฺฉิสฺสติ – ‘อสิพนฺธกปุตฺเตน คามณินา สมณสฺส โคตมสฺส เอวํมหิทฺธิกสฺส เอวํมหานุภาวสฺส วาโท อาโรปิโต’’’ติ. उस समय नालंदा में दुर्भिक्ष (अकाल) था, भोजन मिलना कठिन था, लोग हड्डियों के ढाँचे मात्र रह गए थे और शलाका (राशन टिकट) के माध्यम से जीवन निर्वाह हो रहा था। उस समय निगण्ठ नातपुत्त नालंदा में एक बड़ी निगण्ठ परिषद के साथ रह रहे थे। तब निगण्ठ का श्रावक असिबन्धकपुत्र ग्रामणी जहाँ निगण्ठ नातपुत्त थे, वहाँ गया; जाकर निगण्ठ नातपुत्त को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए असिबन्धकपुत्र ग्रामणी से निगण्ठ नातपुत्त ने यह कहा— 'आओ ग्रामणी, तुम श्रमण गौतम के साथ वाद (शास्त्रार्थ) करो। इससे तुम्हारी अच्छी कीर्ति फैलेगी कि— असिबन्धकपुत्र ग्रामणी ने इतने महान ऋद्धिमान और महान प्रभावशाली श्रमण गौतम के साथ वाद किया है।' ‘‘กถํ ปนาหํ, ภนฺเต, สมณสฺส โคตมสฺส เอวํมหิทฺธิกสฺส เอวํมหานุภาวสฺส วาทํ อาโรเปสฺสามี’’ติ? ‘‘เอหิ ตฺวํ, คามณิ, เยน สมโณ โคตโม เตนุปสงฺกม; อุปสงฺกมิตฺวา สมณํ โคตมํ เอวํ [Pg.508] วเทหิ – ‘นนุ, ภนฺเต, ภควา อเนกปริยาเยน กุลานํ อนุทฺทยํ วณฺเณติ, อนุรกฺขํ วณฺเณติ, อนุกมฺปํ วณฺเณตี’ติ? สเจ โข, คามณิ, สมโณ โคตโม เอวํ ปุฏฺโฐ เอวํ พฺยากโรติ – ‘เอวํ, คามณิ, ตถาคโต อเนกปริยาเยน กุลานํ อนุทฺทยํ วณฺเณติ, อนุรกฺขํ วณฺเณติ, อนุกมฺปํ วณฺเณตี’ติ, ตเมนํ ตฺวํ เอวํ วเทยฺยาสิ – ‘อถ กิญฺจรหิ, ภนฺเต, ภควา ทุพฺภิกฺเข ทฺวีหิติเก เสตฏฺฐิเก สลากาวุตฺเต มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ จาริกํ จรติ? อุจฺเฉทาย ภควา กุลานํ ปฏิปนฺโน, อนยาย ภควา กุลานํ ปฏิปนฺโน, อุปฆาตาย ภควา กุลานํ ปฏิปนฺโน’ติ! อิมํ โข เต, คามณิ, สมโณ โคตโม อุภโตโกฏิกํ ปญฺหํ ปุฏฺโฐ เนว สกฺขติ อุคฺคิลิตุํ, เนว สกฺขติ โอคิลิตุ’’นฺติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ นิคณฺฐสฺส นาฏปุตฺตสฺส ปฏิสฺสุตฺวา อุฏฺฐายาสนา นิคณฺฐํ นาฏปุตฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – "भन्ते, मैं श्रमण गौतम जैसे महान ऋद्धिमान और महान प्रभावशाली व्यक्ति के साथ वाद-विवाद कैसे कर सकता हूँ?" "आओ ग्रामणी, तुम श्रमण गौतम के पास जाओ और उनसे इस प्रकार कहो— 'भन्ते, क्या भगवान अनेक प्रकार से कुलों (गृहस्थों) के प्रति दया, रक्षा और अनुकम्पा की प्रशंसा नहीं करते?' यदि श्रमण गौतम इस प्रकार पूछे जाने पर उत्तर दें— 'हाँ ग्रामणी, तथागत अनेक प्रकार से कुलों के प्रति दया, रक्षा और अनुकम्पा की प्रशंसा करते हैं', तो तुम उनसे इस प्रकार कहना— 'तो फिर भन्ते, भगवान इस अकाल के समय में, जब जीवन निर्वाह कठिन है, हड्डियाँ सफेद हो गई हैं और शलाका (राशन टिकट) पर जीवन चल रहा है, इतने बड़े भिक्षु-संघ के साथ चारिका क्यों कर रहे हैं? क्या भगवान कुलों के विनाश के लिए, उनके अनर्थ के लिए, और उनके घात के लिए प्रवृत्त हुए हैं?' ग्रामणी, जब श्रमण गौतम से यह दो-धारी प्रश्न पूछा जाएगा, तो वे न तो इसे उगल पाएंगे और न ही निगल पाएंगे।" "जी भन्ते," कहकर असिबन्धकपुत्र ग्रामणी निगण्ठ नातपुत्त की बात मानकर आसन से उठा, उन्हें अभिवादन कर प्रदक्षिणा की और जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचा। पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए असिबन्धकपुत्र ग्रामणी ने भगवान से यह कहा— ‘‘นนุ, ภนฺเต, ภควา อเนกปริยาเยน กุลานํ อนุทฺทยํ วณฺเณติ, อนุรกฺขํ วณฺเณติ, อนุกมฺปํ วณฺเณตี’’ติ? ‘‘เอวํ, คามณิ, ตถาคโต อเนกปริยาเยน กุลานํ อนุทฺทยํ วณฺเณติ, อนุรกฺขํ วณฺเณติ, อนุกมฺปํ วณฺเณตี’’ติ. ‘‘อถ กิญฺจรหิ, ภนฺเต, ภควา ทุพฺภิกฺเข ทฺวีหิติเก เสตฏฺฐิเก สลากาวุตฺเต มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ จาริกํ จรติ? อุจฺเฉทาย ภควา กุลานํ ปฏิปนฺโน, อนยาย ภควา กุลานํ ปฏิปนฺโน, อุปฆาตาย ภควา กุลานํ ปฏิปนฺโน’’ติ. ‘‘อิโต โส, คามณิ, เอกนวุติกปฺเป ยมหํ อนุสฺสรามิ, นาภิชานามิ กิญฺจิ กุลํ ปกฺกภิกฺขานุปฺปทานมตฺเตน อุปหตปุพฺพํ. อถ โข ยานิ ตานิ กุลานิ อฑฺฒานิ มหทฺธนานิ มหาโภคานิ ปหูตชาตรูปรชตานิ ปหูตวิตฺตูปกรณานิ ปหูตธนธญฺญานิ, สพฺพานิ ตานิ ทานสมฺภูตานิ เจว สจฺจสมฺภูตานิ จ สามญฺญสมฺภูตานิ จ. อฏฺฐ โข, คามณิ, เหตู, อฏฺฐ ปจฺจยา กุลานํ อุปฆาตาย. ราชโต วา กุลานิ อุปฆาตํ คจฺฉนฺติ, โจรโต วา กุลานิ อุปฆาตํ คจฺฉนฺติ, อคฺคิโต วา กุลานิ อุปฆาตํ คจฺฉนฺติ[Pg.509], อุทกโต วา กุลานิ อุปฆาตํ คจฺฉนฺติ, นิหิตํ วา ฐานา วิคจฺฉติ, ทุปฺปยุตฺตา วา กมฺมนฺตา วิปชฺชนฺติ, กุเล วา กุลงฺคาโรติ อุปฺปชฺชติ, โย เต โภเค วิกิรติ วิธมติ วิทฺธํเสติ, อนิจฺจตาเย อฏฺฐมีติ. อิเม โข, คามณิ, อฏฺฐ เหตู, อฏฺฐ ปจฺจยา กุลานํ อุปฆาตาย. อิเมสุ โข, คามณิ, อฏฺฐสุ เหตูสุ, อฏฺฐสุ ปจฺจเยสุ สํวิชฺชมาเนสุ โย มํ เอวํ วเทยฺย – ‘อุจฺเฉทาย ภควา กุลานํ ปฏิปนฺโน, อนยาย ภควา กุลานํ ปฏิปนฺโน, อุปฆาตาย ภควา กุลานํ ปฏิปนฺโน’ติ, ตํ, คามณิ, วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา ยถาภตํ นิกฺขิตฺโต เอวํ นิรเย’’ติ. เอวํ วุตฺเต, อสิพนฺธกปุตฺโต คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต, อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต…เป… อุปาสกํ มํ ภควา ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. นวมํ. "भन्ते, क्या भगवान अनेक प्रकार से कुलों के प्रति दया, रक्षा और अनुकम्पा की प्रशंसा नहीं करते?" "हाँ ग्रामणी, तथागत अनेक प्रकार से कुलों के प्रति दया, रक्षा और अनुकम्पा की प्रशंसा करते हैं।" "तो फिर भन्ते, भगवान इस अकाल के समय में, जब जीवन निर्वाह कठिन है, हड्डियाँ सफेद हो गई हैं और शलाका पर जीवन चल रहा है, इतने बड़े भिक्षु-संघ के साथ चारिका क्यों कर रहे हैं? क्या भगवान कुलों के विनाश के लिए, उनके अनर्थ के लिए, और उनके घात के लिए प्रवृत्त हुए हैं?" "ग्रामणी, इन इक्यानवे कल्पों में, जिन्हें मैं याद करता हूँ, मैं ऐसे किसी भी कुल को नहीं जानता जो केवल पके हुए भोजन के दान मात्र से नष्ट हुआ हो। इसके विपरीत, जो कुल समृद्ध हैं, महाधनी हैं, महाभोगी हैं, जिनके पास प्रचुर स्वर्ण-रजत, प्रचुर संपत्ति और प्रचुर धन-धान्य है, वे सब दान के कारण, सत्य के कारण और संयम (श्रमण-धर्म) के कारण ही समृद्ध हुए हैं। ग्रामणी, कुलों के विनाश के आठ हेतु और आठ प्रत्यय (कारण) होते हैं। कुलों का विनाश राजा के कारण होता है, चोर के कारण होता है, अग्नि के कारण होता है, जल के कारण होता है, गड़ा हुआ धन स्थान से लुप्त हो जाता है, गलत तरीके से किए गए कार्य विफल हो जाते हैं, या कुल में कोई 'कुल-अंगार' (कुल को नष्ट करने वाला) पैदा हो जाता है जो संपत्ति को बिखेर देता है, नष्ट कर देता है और बर्बाद कर देता है; और आठवां कारण अनित्यता (विनाशशीलता) ही है। ग्रामणी, कुलों के विनाश के ये आठ हेतु और आठ प्रत्यय हैं। ग्रामणी, इन आठ हेतुओं और आठ प्रत्ययों के विद्यमान रहते हुए भी जो कोई मुझे इस प्रकार कहे— 'भगवान कुलों के विनाश के लिए, उनके अनर्थ के लिए, और उनके घात के लिए प्रवृत्त हुए हैं', तो ग्रामणी, यदि वह उस वाणी को नहीं छोड़ता, उस चित्त को नहीं छोड़ता और उस दृष्टि का त्याग नहीं करता, तो वह (नरक में) फेंक दिए गए बोझ की तरह नरक में गिरता है।" ऐसा कहने पर असिबन्धकपुत्र ग्रामणी ने भगवान से यह कहा— "अति सुंदर, भन्ते! अति सुंदर, भन्ते! ... आज से भगवान मुझे अपना वह उपासक स्वीकार करें जिसने जीवन भर के लिए शरण ग्रहण की है।" नौवां (सूत्र)। ๑๐. มณิจูฬกสุตฺตํ १०. मणिचूलक सुत्त ๓๖๒. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. เตน โข ปน สมเยน ราชนฺเตปุเร ราชปริสาย สนฺนิสินฺนานํ สนฺนิปติตานํ อยมนฺตรากถา อุทปาทิ – ‘‘กปฺปติ สมณานํ สกฺยปุตฺติยานํ ชาตรูปรชตํ, สาทิยนฺติ สมณา สกฺยปุตฺติยา ชาตรูปรชตํ, ปฏิคฺคณฺหนฺติ สมณา สกฺยปุตฺติยา ชาตรูปรชต’’นฺติ! ३६२. एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दक-निवाप में विहार कर रहे थे। उस समय राजभवन में, राज-परिषद में बैठे हुए और एकत्रित हुए लोगों के बीच यह चर्चा चली— "शाक्यपुत्रीय श्रमणों के लिए सोना-चाँदी कल्प्य (उचित) है; शाक्यपुत्रीय श्रमण सोना-चाँदी स्वीकार करते हैं; शाक्यपुत्रीय श्रमण सोना-चाँदी ग्रहण करते हैं।" เตน โข ปน สมเยน มณิจูฬโก คามณิ ตสฺสํ ปริสายํ นิสินฺโน โหติ. อถ โข มณิจูฬโก คามณิ ตํ ปริสํ เอตทโวจ – ‘‘มา อยฺโย เอวํ อวจุตฺถ. น กปฺปติ สมณานํ สกฺยปุตฺติยานํ ชาตรูปรชตํ, น สาทิยนฺติ สมณา สกฺยปุตฺติยา ชาตรูปรชตํ, นปฺปฏิคฺคณฺหนฺติ สมณา สกฺยปุตฺติยา ชาตรูปรชตํ, นิกฺขิตฺตมณิสุวณฺณา สมณา สกฺยปุตฺติยา อเปตชาตรูปรชตา’’ติ. อสกฺขิ โข มณิจูฬโก คามณิ ตํ ปริสํ สญฺญาเปตุํ. อถ โข มณิจูฬโก คามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข มณิจูฬโก คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธ, ภนฺเต, ราชนฺเตปุเร ราชปริสาย สนฺนิสินฺนานํ สนฺนิปติตานํ อยมนฺตรากถา อุทปาทิ – ‘กปฺปติ สมณานํ สกฺยปุตฺติยานํ ชาตรูปรชตํ, สาทิยนฺติ สมณา สกฺยปุตฺติยา ชาตรูปรชตํ, ปฏิคฺคณฺหนฺติ สมณา สกฺยปุตฺติยา ชาตรูปรชต’นฺติ. เอวํ วุตฺเต, อหํ, ภนฺเต, ตํ ปริสํ เอตทโวจํ – ‘มา อยฺโย เอวํ อวจุตฺถ. น กปฺปติ สมณานํ สกฺยปุตฺติยานํ ชาตรูปรชตํ, น สาทิยนฺติ สมณา สกฺยปุตฺติยา ชาตรูปรชตํ, นปฺปฏิคฺคณฺหนฺติ สมณา สกฺยปุตฺติยา [Pg.510] ชาตรูปรชตํ, นิกฺขิตฺตมณิสุวณฺณา สมณา สกฺยปุตฺติยา อเปตชาตรูปรชตา’ติ. อสกฺขึ ขฺวาหํ, ภนฺเต, ตํ ปริสํ สญฺญาเปตุํ. กจฺจาหํ, ภนฺเต, เอวํ พฺยากรมาโน วุตฺตวาที เจว ภควโต โหมิ, น จ ภควนฺตํ อภูเตน อพฺภาจิกฺขามิ, ธมฺมสฺส จานุธมฺมํ พฺยากโรมิ, น จ โกจิ สหธมฺมิโก วาทานุวาโท คารยฺหํ ฐานํ อาคจฺฉตี’’ติ? उस समय मणिचूलक ग्रामणी उस सभा में बैठा था। तब मणिचूलक ग्रामणी ने उस सभा से यह कहा— "आर्यो! ऐसा न कहें। शाक्यपुत्रीय श्रमणों के लिए सोना-चाँदी कल्प्य (उचित) नहीं है। शाक्यपुत्रीय श्रमण सोना-चाँदी स्वीकार नहीं करते, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोना-चाँदी ग्रहण नहीं करते। शाक्यपुत्रीय श्रमणों ने मणि और स्वर्ण का त्याग कर दिया है, वे सोना-चाँदी से दूर रहते हैं।" मणिचूलक ग्रामणी उस सभा को समझाने में समर्थ हुआ। फिर मणिचूलक ग्रामणी जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया; जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए मणिचूलक ग्रामणी ने भगवान् से यह कहा— "भन्ते! यहाँ राजभवन में राजसभा में बैठे हुए और एकत्रित हुए लोगों के बीच यह चर्चा चली— 'शाक्यपुत्रीय श्रमणों के लिए सोना-चाँदी कल्प्य है, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोना-चाँदी स्वीकार करते हैं, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोना-चाँदी ग्रहण करते हैं'। ऐसा कहे जाने पर, भन्ते! मैंने उस सभा से यह कहा— 'आर्यो! ऐसा न कहें। शाक्यपुत्रीय श्रमणों के लिए सोना-चाँदी कल्प्य नहीं है, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोना-चाँदी स्वीकार नहीं करते, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोना-चाँदी ग्रहण नहीं करते, शाक्यपुत्रीय श्रमणों ने मणि और स्वर्ण का त्याग कर दिया है, वे सोना-चाँदी से दूर रहते हैं'। भन्ते! मैं उस सभा को समझाने में समर्थ हुआ। भन्ते! क्या इस प्रकार उत्तर देते हुए मैं भगवान् के वचनों को ही कहने वाला हूँ? क्या मैं भगवान् पर असत्य आरोप तो नहीं लगा रहा हूँ? क्या मैं धर्म के अनुकूल धर्म की व्याख्या कर रहा हूँ? और क्या कोई सहधर्मी मेरे इस कथन में निंदा का कोई स्थान नहीं पाएगा?" ‘‘ตคฺฆ ตฺวํ, คามณิ, เอวํ พฺยากรมาโน วุตฺตวาที เจว เม โหสิ, น จ มํ อภูเตน อพฺภาจิกฺขสิ, ธมฺมสฺส จานุธมฺมํ พฺยากโรสิ, น จ โกจิ สหธมฺมิโก วาทานุวาโท คารยฺหํ ฐานํ อาคจฺฉติ. น หิ, คามณิ, กปฺปติ สมณานํ สกฺยปุตฺติยานํ ชาตรูปรชตํ, น สาทิยนฺติ สมณา สกฺยปุตฺติยา ชาตรูปรชตํ, นปฺปฏิคฺคณฺหนฺติ สมณา สกฺยปุตฺติยา ชาตรูปรชตํ, นิกฺขิตฺตมณิสุวณฺณา สมณา สกฺยปุตฺติยา อเปตชาตรูปรชตา. ยสฺส โข, คามณิ, ชาตรูปรชตํ กปฺปติ, ปญฺจปิ ตสฺส กามคุณา กปฺปนฺติ. ยสฺส ปญฺจ กามคุณา กปฺปนฺติ ( ), เอกํเสเนตํ, คามณิ, ธาเรยฺยาสิ อสฺสมณธมฺโม อสกฺยปุตฺติยธมฺโมติ. อปิ จาหํ, คามณิ, เอวํ วทามิ – ติณํ ติณตฺถิเกน ปริเยสิตพฺพํ, ทารุ ทารุตฺถิเกน ปริเยสิตพฺพํ, สกฏํ สกฏตฺถิเกน ปริเยสิตพฺพํ, ปุริโส ปุริสตฺถิเกน ปริเยสิตพฺโพ. นตฺเววาหํ, คามณิ, เกนจิ ปริยาเยน ‘ชาตรูปรชตํ สาทิตพฺพํ ปริเยสิตพฺพ’นฺติ วทามี’’ติ. ทสมํ. "निश्चित ही, ग्रामणी! इस प्रकार उत्तर देते हुए तुम मेरे वचनों को ही कहने वाले हो, तुम मुझ पर असत्य आरोप नहीं लगा रहे हो, तुम धर्म के अनुकूल धर्म की व्याख्या कर रहे हो, और कोई भी सहधर्मी तुम्हारे इस कथन में निंदा का कोई स्थान नहीं पाएगा। क्योंकि ग्रामणी! शाक्यपुत्रीय श्रमणों के लिए सोना-चाँदी कल्प्य नहीं है, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोना-चाँदी स्वीकार नहीं करते, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोना-चाँदी ग्रहण नहीं करते, शाक्यपुत्रीय श्रमणों ने मणि और स्वर्ण का त्याग कर दिया है, वे सोना-चाँदी से दूर रहते हैं। ग्रामणी! जिसके लिए सोना-चाँदी कल्प्य है, उसके लिए पाँचों काम-गुण भी कल्प्य हैं। ग्रामणी! जिसके लिए पाँचों काम-गुण कल्प्य हैं, उसे तुम निश्चित रूप से 'अ-श्रमण धर्म' और 'अ-शाक्यपुत्रीय धर्म' समझो। परन्तु ग्रामणी! मैं ऐसा कहता हूँ— जिसे घास की आवश्यकता हो, वह घास खोजे; जिसे लकड़ी की आवश्यकता हो, वह लकड़ी खोजे; जिसे गाड़ी की आवश्यकता हो, वह गाड़ी खोजे; जिसे पुरुष (सेवक) की आवश्यकता हो, वह पुरुष खोजे। किन्तु ग्रामणी! मैं किसी भी प्रकार से यह नहीं कहता कि सोना-चाँदी स्वीकार करना चाहिए या खोजना चाहिए।" दसवाँ (सूत्र)। ๑๑. ภทฺรกสุตฺตํ ११. भद्रक सुत्त ๓๖๓. เอกํ สมยํ ภควา มลฺเลสุ วิหรติ อุรุเวลกปฺปํ นาม มลฺลานํ นิคโม. อถ โข ภทฺรโก คามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ภทฺรโก คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา ทุกฺขสฺส สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ เทเสตู’’ติ. ‘‘อหญฺเจ เต, คามณิ, อตีตมทฺธานํ อารพฺภ [Pg.511] ทุกฺขสฺส สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ เทเสยฺยํ – ‘เอวํ อโหสิ อตีตมทฺธาน’นฺติ, ตตฺร เต สิยา กงฺขา, สิยา วิมติ. อหํ เจ เต, คามณิ, อนาคตมทฺธานํ อารพฺภ ทุกฺขสฺส สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ เทเสยฺยํ – ‘เอวํ ภวิสฺสติ อนาคตมทฺธาน’นฺติ, ตตฺราปิ เต สิยา กงฺขา, สิยา วิมติ. อปิ จาหํ, คามณิ, อิเธว นิสินฺโน เอตฺเถว เต นิสินฺนสฺส ทุกฺขสฺส สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ เทเสสฺสามิ. ตํ สุณาหิ, สาธุกํ มนสิ กโรหิ; ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข ภทฺรโก คามณิ ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. ภควา เอตทโวจ – ३६३. एक समय भगवान् मल्लों के देश में उरुवेलकप्प नामक मल्लों के निगम (कस्बे) में विहार कर रहे थे। तब भद्रक ग्रामणी जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया; जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए भद्रक ग्रामणी ने भगवान् से यह कहा— "भन्ते! अच्छा हो यदि भगवान् मुझे दुःख की उत्पत्ति और उसके निरोध के विषय में उपदेश दें।" "ग्रामणी! यदि मैं तुम्हें अतीत काल के विषय में दुःख की उत्पत्ति और उसके निरोध का उपदेश दूँ कि 'अतीत काल में ऐसा था', तो तुम्हें उसमें शंका हो सकती है, संशय हो सकता है। ग्रामणी! यदि मैं तुम्हें अनागत (भविष्य) काल के विषय में दुःख की उत्पत्ति और उसके निरोध का उपदेश दूँ कि 'भविष्य काल में ऐसा होगा', तो उसमें भी तुम्हें शंका हो सकती है, संशय हो सकता है। परन्तु ग्रामणी! मैं यहीं बैठे हुए, यहीं बैठे हुए तुम्हें दुःख की उत्पत्ति और उसके निरोध का उपदेश दूँँगा। उसे सुनो, अच्छी तरह मन में धारण करो; मैं कहूँगा।" "जी भन्ते!" कहकर भद्रक ग्रामणी ने भगवान् को उत्तर दिया। भगवान् ने यह कहा— ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อตฺถิ เต อุรุเวลกปฺเป มนุสฺสา เยสํ เต วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา อุปฺปชฺเชยฺยุํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา’’ติ? ‘‘อตฺถิ เม, ภนฺเต, อุรุเวลกปฺเป มนุสฺสา เยสํ เม วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา อุปฺปชฺเชยฺยุํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปน เต, คามณิ, อุรุเวลกปฺเป มนุสฺสา เยสํ เต วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา นุปฺปชฺเชยฺยุํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา’’ติ? ‘‘อตฺถิ เม, ภนฺเต, อุรุเวลกปฺเป มนุสฺสา เยสํ เม วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา นุปฺปชฺเชยฺยุํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา’’ติ. ‘‘โก นุ โข, คามณิ, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน เต เอกจฺจานํ อุรุเวลกปฺปิยานํ มนุสฺสานํ วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา อุปฺปชฺเชยฺยุํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา’’ติ? ‘‘เยสํ เม, ภนฺเต, อุรุเวลกปฺปิยานํ มนุสฺสานํ วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา อุปฺปชฺเชยฺยุํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา, อตฺถิ เม เตสุ ฉนฺทราโค. เยสํ ปน, ภนฺเต, อุรุเวลกปฺปิยานํ มนุสฺสานํ วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา นุปฺปชฺเชยฺยุํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา, นตฺถิ เม เตสุ ฉนฺทราโค’’ติ. ‘‘อิมินา ตฺวํ, คามณิ, ธมฺเมน ทิฏฺเฐน วิทิเตน อกาลิเกน ปตฺเตน ปริโยคาฬฺเหน อตีตานาคเต นยํ เนหิ – ‘ยํ โข กิญฺจิ อตีตมทฺธานํ ทุกฺขํ อุปฺปชฺชมานํ อุปฺปชฺชิ สพฺพํ ตํ ฉนฺทมูลกํ ฉนฺทนิทานํ. ฉนฺโท หิ มูลํ ทุกฺขสฺส. ยมฺปิ หิ กิญฺจิ อนาคตมทฺธานํ ทุกฺขํ อุปฺปชฺชมานํ อุปฺปชฺชิสฺสติ, สพฺพํ ตํ ฉนฺทมูลกํ ฉนฺทนิทานํ. ฉนฺโท หิ มูลํ ทุกฺขสฺสา’’’ติ[Pg.512]. ‘‘อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต! ยาว สุภาสิตํ จิทํ, ภนฺเต, ภควตา – ‘ยํ กิญฺจิ ทุกฺขํ อุปฺปชฺชมานํ อุปฺปชฺชติ, สพฺพํ ตํ ฉนฺทมูลกํ ฉนฺทนิทานํ. ฉนฺโท หิ มูลํ ทุกฺขสฺสา’ติ. อตฺถิ เม, ภนฺเต, จิรวาสี นาม กุมาโร พหิ อาวสเถ ปฏิวสติ. โส ขฺวาหํ, ภนฺเต, กาลสฺเสว วุฏฺฐาย ปุริสํ อุยฺโยเชมิ – ‘คจฺฉ, ภเณ, จิรวาสึ กุมารํ ชานาหี’ติ. ยาวกีวญฺจ, ภนฺเต, โส ปุริโส นาคจฺฉติ, ตสฺส เม โหเตว อญฺญถตฺตํ – ‘มา เหว จิรวาสิสฺส กุมารสฺส กิญฺจิ อาพาธยิตฺถา’’’ติ. हे ग्रामणी! तुम क्या सोचते हो? क्या उरुवेलाकप्प में ऐसे मनुष्य हैं जिनके वध, बंधन, हानि या निंदा होने पर तुम्हें शोक, परिदेव (विलाप), दुःख, दौर्मनस्य और उपायास (हताशा) उत्पन्न होंगे? भन्ते! उरुवेलाकप्प में ऐसे मनुष्य हैं जिनके वध, बंधन, हानि या निंदा होने पर मुझे शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास उत्पन्न होंगे। परंतु ग्रामणी, क्या उरुवेलाकप्प में ऐसे भी मनुष्य हैं जिनके वध, बंधन, हानि या निंदा होने पर तुम्हें शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास उत्पन्न नहीं होंगे? भन्ते! उरुवेलाकप्प में ऐसे भी मनुष्य हैं जिनके वध, बंधन, हानि या निंदा होने पर मुझे शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास उत्पन्न नहीं होंगे। ग्रामणी! वह क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है जिसके कारण उरुवेलाकप्प के कुछ मनुष्यों के वध, बंधन, हानि या निंदा होने पर तुम्हें शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास उत्पन्न होते हैं? भन्ते! उरुवेलाकप्प के जिन मनुष्यों के वध, बंधन, हानि या निंदा होने पर मुझे शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास उत्पन्न होते हैं, उनके प्रति मेरा छंद-राग (इच्छा और आसक्ति) है। परंतु भन्ते, उरुवेलाकप्प के जिन मनुष्यों के वध, बंधन, हानि या निंदा होने पर मुझे शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास उत्पन्न नहीं होते, उनके प्रति मेरा छंद-राग नहीं है। ग्रामणी! इस देखे हुए, जाने हुए, अकालिक, प्राप्त और गहराई से समझे हुए धर्म के द्वारा तुम अतीत और अनागत (भविष्य) के विषय में यह निष्कर्ष निकालो— 'अतीत काल में जो कुछ भी दुःख उत्पन्न हुआ, वह सब छंद-मूलक (इच्छा पर आधारित) और छंद-निदान (इच्छा के कारण) था। छंद ही दुःख का मूल है। भविष्य में भी जो कुछ दुःख उत्पन्न होगा, वह सब छंद-मूलक और छंद-निदान ही होगा। छंद ही दुःख का मूल है।' आश्चर्य है भन्ते! अद्भुत है भन्ते! भगवान ने यह कितना सुभाषित कहा है— 'जो कुछ भी दुःख उत्पन्न होता है, वह सब छंद-मूलक और छंद-निदान है। छंद ही दुःख का मूल है।' भन्ते! मेरा चिरवासी नाम का एक पुत्र है जो नगर के बाहर एक आवास में रहता है। भन्ते! मैं प्रातःकाल उठकर एक पुरुष को यह कहकर भेजता हूँ— 'अरे! जाओ, चिरवासी कुमार का समाचार लाओ।' भन्ते! जब तक वह पुरुष लौटकर नहीं आता, तब तक मेरा मन व्याकुल रहता है कि कहीं चिरवासी कुमार को कुछ कष्ट न हो गया हो। ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, จิรวาสิสฺส กุมารสฺส วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา อุปฺปชฺเชยฺยุํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา’’ติ? ‘‘จิรวาสิสฺส เม, ภนฺเต, กุมารสฺส วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา ชีวิตสฺสปิ สิยา อญฺญถตฺตํ, กึ ปน เม นุปฺปชฺชิสฺสนฺติ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา’’ติ. ‘‘อิมินาปิ โข เอตํ, คามณิ, ปริยาเยน เวทิตพฺพํ – ‘ยํ กิญฺจิ ทุกฺขํ อุปฺปชฺชมานํ อุปฺปชฺชติ, สพฺพํ ตํ ฉนฺทมูลกํ ฉนฺทนิทานํ. ฉนฺโท หิ มูลํ ทุกฺขสฺสา’’’ติ. ग्रामणी! तुम क्या सोचते हो? क्या चिरवासी कुमार के वध, बंधन, हानि या निंदा होने पर तुम्हें शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास उत्पन्न होंगे? भन्ते! चिरवासी कुमार के वध, बंधन, हानि या निंदा होने पर तो मेरे जीवन पर ही संकट आ सकता है, फिर शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास क्यों नहीं उत्पन्न होंगे? ग्रामणी! इस कारण से भी यह जानना चाहिए— 'जो कुछ भी दुःख उत्पन्न होता है, वह सब छंद-मूलक और छंद-निदान है। छंद ही दुःख का मूल है।' ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, ยทา เต จิรวาสิมาตา อทิฏฺฐา อโหสิ, อสฺสุตา อโหสิ, เต จิรวาสิมาตุยา ฉนฺโท วา ราโค วา เปมํ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ทสฺสนํ วา เต, คามณิ, อาคมฺม สวนํ วา เอวํ เต อโหสิ – ‘จิรวาสิมาตุยา ฉนฺโท วา ราโค วา เปมํ วา’’’ติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. ग्रामणी! तुम क्या सोचते हो? जब तुमने चिरवासी की माता को न देखा था और न उसके बारे में सुना था, तब क्या चिरवासी की माता के प्रति तुम्हारा छंद, राग या प्रेम था? नहीं भन्ते! ग्रामणी! तो क्या देखने या सुनने के कारण ही चिरवासी की माता के प्रति तुम्हारा छंद, राग या प्रेम उत्पन्न हुआ? हाँ भन्ते! ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, จิรวาสิมาตุยา เต วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา อุปฺปชฺเชยฺยุํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา’’ติ? ‘‘จิรวาสิมาตุยา เม, ภนฺเต, วเธน วา พนฺเธน วา ชานิยา วา ครหาย วา ชีวิตสฺสปิ สิยา อญฺญถตฺตํ, กึ ปน เม นุปฺปชฺชิสฺสนฺติ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา’’ติ! ‘‘อิมินาปิ โข เอตํ, คามณิ, ปริยาเยน เวทิตพฺพํ – ‘ยํ กิญฺจิ ทุกฺขํ อุปฺปชฺชมานํ อุปฺปชฺชติ, สพฺพํ ตํ ฉนฺทมูลกํ ฉนฺทนิทานํ. ฉนฺโท หิ มูลํ ทุกฺขสฺสา’’’ติ. เอกาทสมํ. ग्रामणी! तुम क्या सोचते हो? क्या चिरवासी की माता के वध, बंधन, हानि या निंदा होने पर तुम्हें शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास उत्पन्न होंगे? भन्ते! चिरवासी की माता के वध, बंधन, हानि या निंदा होने पर तो मेरे जीवन पर ही संकट आ सकता है, फिर शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास क्यों नहीं उत्पन्न होंगे! ग्रामणी! इस कारण से भी यह जानना चाहिए— 'जो कुछ भी दुःख उत्पन्न होता है, वह सब छंद-मूलक और छंद-निदान है। छंद ही दुःख का मूल है।' ग्यारहवाँ। ๑๒. ราสิยสุตฺตํ १२. रासिय सुत्त ๓๖๔. อถ [Pg.513] โข ราสิโย คามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราสิโย คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต, ‘สมโณ โคตโม สพฺพํ ตปํ ครหติ, สพฺพํ ตปสฺสึ ลูขชีวึ เอกํเสน อุปวทติ อุปกฺโกสตี’ติ. เย เต, ภนฺเต, เอวมาหํสุ – ‘สมโณ โคตโม สพฺพํ ตปํ ครหติ, สพฺพํ ตปสฺสึ ลูขชีวึ เอกํเสน อุปวทติ อุปกฺโกสตี’ติ, กจฺจิ เต, ภนฺเต, ภควโต วุตฺตวาทิโน, น จ ภควนฺตํ อภูเตน อพฺภาจิกฺขนฺติ, ธมฺมสฺส จานุธมฺมํ พฺยากโรนฺติ, น จ โกจิ สหธมฺมิโก วาทานุวาโท คารยฺหํ ฐานํ อาคจฺฉตี’’ติ? ‘‘เย เต, คามณิ, เอวมาหํสุ – ‘สมโณ โคตโม สพฺพํ ตปํ ครหติ, สพฺพํ ตปสฺสึ ลูขชีวึ เอกํเสน อุปวทติ อุปกฺโกสตี’ติ, น เม เต วุตฺตวาทิโน, อพฺภาจิกฺขนฺติ จ ปน มํ เต อสตา ตุจฺฉา อภูเตน’’. ३६४. तब रासिय ग्रामणी जहाँ भगवान थे वहाँ गया; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए रासिय ग्रामणी ने भगवान से यह कहा— "भन्ते, मैंने ऐसा सुना है— 'श्रमण गौतम समस्त तपस्या की निंदा करते हैं, समस्त तपस्वियों और रूक्ष जीवन जीने वालों की स्पष्ट रूप से आलोचना और भर्त्सना करते हैं'। भन्ते, जिन्होंने ऐसा कहा है कि 'श्रमण गौतम समस्त तपस्या की निंदा करते हैं...', क्या वे भगवान के वचनों को सही रूप में कहने वाले हैं, क्या वे भगवान पर असत्य आरोप तो नहीं लगा रहे हैं, क्या वे धर्म के अनुकूल व्याख्या कर रहे हैं, और क्या उनके तर्क में कोई ऐसी बात तो नहीं है जो निंदनीय हो?" "ग्रामणी, जिन्होंने ऐसा कहा है कि 'श्रमण गौतम समस्त तपस्या की निंदा करते हैं...', वे मेरे वचनों को सही रूप में कहने वाले नहीं हैं, बल्कि वे मुझ पर असत्य, तुच्छ और निराधार आरोप लगा रहे हैं।" ‘‘ทฺเวเม, คามณิ, อนฺตา ปพฺพชิเตน น เสวิตพฺพา – โย จายํ กาเมสุ กามสุขลฺลิกานุโยโค หีโน คมฺโม โปถุชฺชนิโก อนริโย อนตฺถสํหิโต, โย จายํ อตฺตกิลมถานุโยโค ทุกฺโข อนริโย อนตฺถสํหิโต. เอเต เต, คามณิ, อุโภ อนฺเต อนุปคมฺม มชฺฌิมา ปฏิปทา ตถาคเตน อภิสมฺพุทฺธา – จกฺขุกรณี ญาณกรณี อุปสมาย อภิญฺญาย สมฺโพธาย นิพฺพานาย สํวตฺตติ. กตมา จ สา, คามณิ, มชฺฌิมา ปฏิปทา ตถาคเตน อภิสมฺพุทฺธา – จกฺขุกรณี ญาณกรณี อุปสมาย อภิญฺญาย สมฺโพธาย นิพฺพานาย สํวตฺตติ? อยเมว อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ…เป… สมฺมาสมาธิ. อยํ โข สา, คามณิ, มชฺฌิมา ปฏิปทา ตถาคเตน อภิสมฺพุทฺธา – จกฺขุกรณี ญาณกรณี อุปสมาย อภิญฺญาย สมฺโพธาย นิพฺพานาย สํวตฺตติ. "ग्रामणी, प्रव्रजित को इन दो अंतों (अतिवादों) का सेवन नहीं करना चाहिए—एक वह जो कामभोगों में सुख ढूँढने का अभ्यास है, जो हीन, ग्राम्य, साधारण मनुष्यों का, अनार्य और अनर्थकारी है; और दूसरा वह जो स्वयं को कष्ट देने (आत्म-पीड़न) का अभ्यास है, जो दुःखद, अनार्य और अनर्थकारी है। ग्रामणी, इन दोनों अंतों में न पड़कर तथागत ने मध्यम प्रतिपदा का साक्षात्कार किया है, जो चक्षु देने वाली, ज्ञान देने वाली है और जो शांति, अभिज्ञा, संबोधि और निर्वाण की ओर ले जाती है। ग्रामणी, तथागत द्वारा साक्षात्कृत वह मध्यम प्रतिपदा क्या है? यह वही आर्य अष्टांगिक मार्ग है, जैसे कि—सम्यक दृष्टि... सम्यक समाधि। ग्रामणी, यही वह मध्यम प्रतिपदा है जो तथागत द्वारा साक्षात्कृत है, जो चक्षु देने वाली, ज्ञान देने वाली है और जो शांति, अभिज्ञा, संबोधि और निर्वाण की ओर ले जाती है।" ‘‘ตโย โข เม, คามณิ, กามโภคิโน สนฺโต สํวิชฺชมานา โลกสฺมึ. กตเม ตโย? อิธ, คามณิ, เอกจฺโจ กามโภคี อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ, สาหเสน อธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสน น อตฺตานํ สุเขติ น ปีเณติ น สํวิภชติ น ปุญฺญานิ กโรติ. อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺโจ กามโภคี อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสน. อธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสน อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ, น สํวิภชติ น ปุญฺญานิ กโรติ. อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺโจ กามโภคี อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ [Pg.514] สาหเสน. อธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสน อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรติ. "ग्रामणी, लोक में ये तीन प्रकार के कामभोगी विद्यमान हैं। कौन से तीन? ग्रामणी, यहाँ कोई कामभोगी अधर्म से, बलपूर्वक भोगों की खोज करता है। अधर्म से, बलपूर्वक भोगों को प्राप्त कर वह न स्वयं को सुखी करता है, न तृप्त करता है, न बाँटता है और न पुण्य कर्म करता है। ग्रामणी, यहाँ कोई कामभोगी अधर्म से, बलपूर्वक भोगों की खोज करता है। अधर्म से, बलपूर्वक भोगों को प्राप्त कर वह स्वयं को सुखी और तृप्त तो करता है, पर न बाँटता है और न पुण्य कर्म करता है। ग्रामणी, यहाँ कोई कामभोगी अधर्म से, बलपूर्वक भोगों की खोज करता है। अधर्म से, बलपूर्वक भोगों को प्राप्त कर वह स्वयं को सुखी और तृप्त भी करता है, बाँटता भी है और पुण्य कर्म भी करता है।" ‘‘อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺโจ กามโภคี ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนปิ อสาหเสนปิ. ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสนปิ อสาหเสนปิ น อตฺตานํ สุเขติ, น ปีเณติ, น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรติ. อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺโจ กามโภคี ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนปิ อสาหเสนปิ. ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสนปิ อสาหเสนปิ อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ, น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรติ. อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺโจ กามโภคี ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสติ, สาหเสนปิ อสาหเสนปิ. ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสนปิ อสาหเสนปิ อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรติ. "ग्रामणी, यहाँ कोई कामभोगी धर्म और अधर्म दोनों से, बलपूर्वक और बिना बल प्रयोग के भोगों की खोज करता है। धर्म-अधर्म से भोगों को प्राप्त कर वह न स्वयं को सुखी करता है, न तृप्त करता है, न बाँटता है और न पुण्य कर्म करता है। ग्रामणी, यहाँ कोई कामभोगी धर्म और अधर्म दोनों से, बलपूर्वक और बिना बल प्रयोग के भोगों की खोज करता है। धर्म-अधर्म से भोगों को प्राप्त कर वह स्वयं को सुखी और तृप्त तो करता है, पर न बाँटता है और न पुण्य कर्म करता है। ग्रामणी, यहाँ कोई कामभोगी धर्म और अधर्म दोनों से, बलपूर्वक और बिना बल प्रयोग के भोगों की खोज करता है। धर्म-अधर्म से भोगों को प्राप्त कर वह स्वयं को सुखी और तृप्त भी करता है, बाँटता भी है और पुण्य कर्म भी करता है।" ‘‘อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺโจ กามโภคี ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสน. ธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา อสาหเสน น อตฺตานํ สุเขติ, น ปีเณติ, น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรติ. อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺโจ กามโภคี ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสน. ธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา อสาหเสน อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ, น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรติ. อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺโจ กามโภคี ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสน. ธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา อสาหเสน อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรติ. เต จ โภเค คธิโต มุจฺฉิโต อชฺโฌปนฺโน อนาทีนวทสฺสาวี อนิสฺสรณปญฺโญ ปริภุญฺชติ. อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺโจ กามโภคี ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสน. ธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา อสาหเสน อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรติ. เต จ โภเค อคธิโต อมุจฺฉิโต อนชฺโฌปนฺโน อาทีนวทสฺสาวี นิสฺสรณปญฺโญ ปริภุญฺชติ. "ग्रामणी, यहाँ कोई कामभोगी धर्मपूर्वक, बिना बल प्रयोग के भोगों की खोज करता है। धर्मपूर्वक भोगों को प्राप्त कर वह न स्वयं को सुखी करता है, न तृप्त करता है, न बाँटता है और न पुण्य कर्म करता है। ग्रामणी, यहाँ कोई कामभोगी धर्मपूर्वक, बिना बल प्रयोग के भोगों की खोज करता है। धर्मपूर्वक भोगों को प्राप्त कर वह स्वयं को सुखी और तृप्त तो करता है, पर न बाँटता है और न पुण्य कर्म करता है। ग्रामणी, यहाँ कोई कामभोगी धर्मपूर्वक, बिना बल प्रयोग के भोगों की खोज करता है। धर्मपूर्वक भोगों को प्राप्त कर वह स्वयं को सुखी और तृप्त भी करता है, बाँटता भी है और पुण्य कर्म भी करता है; परन्तु वह उन भोगों में आसक्त, मोहित और लिप्त होकर, उनमें दोष न देखते हुए और उनसे मुक्त होने की प्रज्ञा के बिना उनका उपभोग करता है। ग्रामणी, यहाँ कोई कामभोगी धर्मपूर्वक, बिना बल प्रयोग के भोगों की खोज करता है। धर्मपूर्वक भोगों को प्राप्त कर वह स्वयं को सुखी और तृप्त भी करता है, बाँटता भी है और पुण्य कर्म भी करता है; और वह उन भोगों में बिना आसक्त हुए, बिना मोहित हुए, बिना लिप्त हुए, उनमें दोष देखते हुए और उनसे मुक्त होने की प्रज्ञा के साथ उनका उपभोग करता है।" ‘‘ตตฺร[Pg.515], คามณิ, ยฺวายํ กามโภคี อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสน, อธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสน น อตฺตานํ สุเขติ, น ปีเณติ, น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรติ. อยํ, คามณิ, กามโภคี ตีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห. กตเมหิ ตีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห? อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนาติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน คารยฺโห. น อตฺตานํ สุเขติ น ปีเณตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน คารยฺโห. น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรตีติ, อิมินา ตติเยน ฐาเนน คารยฺโห. อยํ, คามณิ, กามโภคี อิเมหิ ตีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห. हे ग्रामणी! उन (कामभोगियों) में, जो कामभोगी अधर्म और बलपूर्वक धन-सम्पत्ति अर्जित करता है, और अधर्म तथा बलपूर्वक धन-सम्पत्ति अर्जित करके न तो स्वयं को सुखी करता है, न तृप्त करता है, न ही (दूसरों के साथ) बाँटता है और न ही पुण्य कर्म करता है। हे ग्रामणी! वह कामभोगी तीन कारणों से निंदनीय है। किन तीन कारणों से निंदनीय है? 'अधर्म और बलपूर्वक धन-सम्पत्ति अर्जित करता है'—इस पहले कारण से वह निंदनीय है। 'स्वयं को सुखी और तृप्त नहीं करता'—इस दूसरे कारण से वह निंदनीय है। 'न बाँटता है और न पुण्य कर्म करता है'—इस तीसरे कारण से वह निंदनीय है। हे ग्रामणी! वह कामभोगी इन तीन कारणों से निंदनीय है। ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ กามโภคี อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสน, อธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสน อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ, น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรติ. อยํ, คามณิ, กามโภคี ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห, เอเกน ฐาเนน ปาสํโส. กตเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห? อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนาติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน คารยฺโห. น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน คารยฺโห. กตเมน เอเกน ฐาเนน ปาสํโส? อตฺตานํ สุเขติ ปีเณตีติ, อิมินา เอเกน ฐาเนน ปาสํโส. อยํ, คามณิ, กามโภคี อิเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห, อิมินา เอเกน ฐาเนน ปาสํโส. हे ग्रामणी! उन (कामभोगियों) में, जो कामभोगी अधर्म और बलपूर्वक धन-सम्पत्ति अर्जित करता है, और अधर्म तथा बलपूर्वक धन-सम्पत्ति अर्जित करके स्वयं को सुखी और तृप्त तो करता है, किंतु न तो बाँटता है और न ही पुण्य कर्म करता है। हे ग्रामणी! वह कामभोगी दो कारणों से निंदनीय है और एक कारण से प्रशंसनीय है। किन दो कारणों से निंदनीय है? 'अधर्म और बलपूर्वक धन-सम्पत्ति अर्जित करता है'—इस पहले कारण से वह निंदनीय है। 'न बाँटता है और न पुण्य कर्म करता है'—इस दूसरे कारण से वह निंदनीय है। किस एक कारण से प्रशंसनीय है? 'स्वयं को सुखी और तृप्त करता है'—इस एक कारण से वह प्रशंसनीय है। हे ग्रामणी! वह कामभोगी इन दो कारणों से निंदनीय है और इस एक कारण से प्रशंसनीय है। ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ กามโภคี อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสน, อธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสน อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรติ. อยํ, คามณิ, กามโภคี เอเกน ฐาเนน คารยฺโห, ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส. กตเมน เอเกน ฐาเนน คารยฺโห? อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนาติ, อิมินา เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. กตเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส? อตฺตานํ สุเขติ ปีเณตีติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน ปาสํโส. สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน ปาสํโส. อยํ, คามณิ, กามโภคี, อิมินา เอเกน ฐาเนน คารยฺโห, อิเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส. हे ग्रामणी! उन (कामभोगियों) में, जो कामभोगी अधर्म और बलपूर्वक धन-सम्पत्ति अर्जित करता है, और अधर्म तथा बलपूर्वक धन-सम्पत्ति अर्जित करके स्वयं को सुखी और तृप्त करता है, तथा (दूसरों के साथ) बाँटता है और पुण्य कर्म भी करता है। हे ग्रामणी! वह कामभोगी एक कारण से निंदनीय है और दो कारणों से प्रशंसनीय है। किस एक कारण से निंदनीय है? 'अधर्म और बलपूर्वक धन-सम्पत्ति अर्जित करता है'—इस एक कारण से वह निंदनीय है। किन दो कारणों से प्रशंसनीय है? 'स्वयं को सुखी और तृप्त करता है'—इस पहले कारण से वह प्रशंसनीय है। 'बाँटता है और पुण्य कर्म करता है'—इस दूसरे कारण से वह प्रशंसनीय है। हे ग्रामणी! वह कामभोगी इस एक कारण से निंदनीय है और इन दो कारणों से प्रशंसनीय है। ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ กามโภคี ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนปิ อสาหเสนปิ, ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสนปิ อสาหเสนปิ น อตฺตานํ สุเขติ, น ปีเณติ, น สํวิภชติ, น [Pg.516] ปุญฺญานิ กโรติ. อยํ, คามณิ, กามโภคี เอเกน ฐาเนน ปาสํโส, ตีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห. กตเมน เอเกน ฐาเนน ปาสํโส? ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสนาติ, อิมินา เอเกน ฐาเนน ปาสํโส. กตเมหิ ตีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห? อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนาติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน คารยฺโห. น อตฺตานํ สุเขติ, น ปีเณตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน คารยฺโห. น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรตีติ, อิมินา ตติเยน ฐาเนน คารยฺโห. อยํ, คามณิ, กามโภคี อิมินา เอเกน ฐาเนน ปาสํโส, อิเมหิ ตีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห. हे ग्रामणी! उन (कामभोगियों) में, जो कामभोगी धर्म और अधर्म दोनों से, बलपूर्वक और बिना बल प्रयोग के भी धन-सम्पत्ति अर्जित करता है, और धर्म-अधर्म तथा बलपूर्वक व बिना बल प्रयोग के धन-सम्पत्ति अर्जित करके न तो स्वयं को सुखी करता है, न तृप्त करता है, न बाँटता है और न ही पुण्य कर्म करता है। हे ग्रामणी! वह कामभोगी एक कारण से प्रशंसनीय है और तीन कारणों से निंदनीय है। किस एक कारण से प्रशंसनीय है? 'धर्मपूर्वक और बिना बल प्रयोग के धन-सम्पत्ति अर्जित करता है'—इस एक कारण से वह प्रशंसनीय है। किन तीन कारणों से निंदनीय है? 'अधर्म और बलपूर्वक धन-सम्पत्ति अर्जित करता है'—इस पहले कारण से वह निंदनीय है। 'स्वयं को सुखी और तृप्त नहीं करता'—इस दूसरे कारण से वह निंदनीय है। 'न बाँटता है और न पुण्य कर्म करता है'—इस तीसरे कारण से वह निंदनीय है। हे ग्रामणी! वह कामभोगी इस एक कारण से प्रशंसनीय है और इन तीन कारणों से निंदनीय है। ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ กามโภคี ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนปิ อสาหเสนปิ, ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสนปิ อสาหเสนปิ อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ, น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรติ. อยํ, คามณิ, กามโภคี ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส, ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห. กตเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส? ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสนาติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน ปาสํโส. อตฺตานํ สุเขติ ปีเณตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน ปาสํโส. กตเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห? อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนาติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน คารยฺโห. น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน คารยฺโห. อยํ, คามณิ, กามโภคี อิเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส, อิเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห. हे ग्रामणी! उन (कामभोगियों) में, जो कामभोगी धर्म और अधर्म दोनों से, बलपूर्वक और बिना बल प्रयोग के भी धन-सम्पत्ति अर्जित करता है, और धर्म-अधर्म तथा बलपूर्वक व बिना बल प्रयोग के धन-सम्पत्ति अर्जित करके स्वयं को सुखी और तृप्त तो करता है, किंतु न तो बाँटता है और न ही पुण्य कर्म करता है। हे ग्रामणी! वह कामभोगी दो कारणों से प्रशंसनीय है और दो कारणों से निंदनीय है। किन दो कारणों से प्रशंसनीय है? 'धर्मपूर्वक और बिना बल प्रयोग के धन-सम्पत्ति अर्जित करता है'—इस पहले कारण से वह प्रशंसनीय है। 'स्वयं को सुखी और तृप्त करता है'—इस दूसरे कारण से वह प्रशंसनीय है। किन दो कारणों से निंदनीय है? 'अधर्म और बलपूर्वक धन-सम्पत्ति अर्जित करता है'—इस पहले कारण से वह निंदनीय है। 'न बाँटता है और न पुण्य कर्म करता है'—इस दूसरे कारण से वह निंदनीय है। हे ग्रामणी! वह कामभोगी इन दो कारणों से प्रशंसनीय है और इन दो कारणों से निंदनीय है। ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ กามโภคี ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนปิ อสาหเสนปิ, ธมฺมาธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา สาหเสนปิ อสาหเสนปิ อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรติ. อยํ, คามณิ, กามโภคี ตีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส, เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. กตเมหิ ตีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส? ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสนาติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน ปาสํโส. อตฺตานํ สุเขติ ปีเณตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน ปาสํโส. สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรตีติ, อิมินา ตติเยน ฐาเนน ปาสํโส. กตเมน เอเกน ฐาเนน คารยฺโห? อธมฺเมน โภเค ปริเยสติ สาหเสนาติ[Pg.517], อิมินา เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. อยํ, คามณิ, กามโภคี อิเมหิ ตีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส, อิมินา เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. हे ग्रामणी! उन (कामभोगियों) में, जो कामभोगी धर्म और अधर्म दोनों से, बलपूर्वक और बिना बल प्रयोग के भी धन-सम्पत्ति अर्जित करता है, और धर्म-अधर्म तथा बलपूर्वक व बिना बल प्रयोग के धन-सम्पत्ति अर्जित करके स्वयं को सुखी और तृप्त करता है, तथा बाँटता है और पुण्य कर्म भी करता है। हे ग्रामणी! वह कामभोगी तीन कारणों से प्रशंसनीय है और एक कारण से निंदनीय है। किन तीन कारणों से प्रशंसनीय है? 'धर्मपूर्वक और बिना बल प्रयोग के धन-सम्पत्ति अर्जित करता है'—इस पहले कारण से वह प्रशंसनीय है। 'स्वयं को सुखी और तृप्त करता है'—इस दूसरे कारण से वह प्रशंसनीय है। 'बाँटता है और पुण्य कर्म करता है'—इस तीसरे कारण से वह प्रशंसनीय है। किस एक कारण से निंदनीय है? 'अधर्म और बलपूर्वक धन-सम्पत्ति अर्जित करता है'—इस एक कारण से वह निंदनीय है। हे ग्रामणी! वह कामभोगी इन तीन कारणों से प्रशंसनीय है और इस एक कारण से निंदनीय है। ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ กามโภคี ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสน, ธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา อสาหเสน, น อตฺตานํ สุเขติ, น ปีเณติ, น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรติ. อยํ, คามณิ, กามโภคี เอเกน ฐาเนน ปาสํโส, ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห. กตเมน เอเกน ฐาเนน ปาสํโส? ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสนาติ, อิมินา เอเกน ฐาเนน ปาสํโส. กตเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห? น อตฺตานํ สุเขติ, น ปีเณตีติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน คารยฺโห. น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน คารยฺโห. อยํ, คามณิ, กามโภคี อิมินา เอเกน ฐาเนน ปาสํโส, อิเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห. हे ग्रामणी! उन (कामभोगियों) में, जो कामभोगी धर्मपूर्वक और बिना किसी हिंसा के भोगों (सम्पत्ति) की खोज करता है, और धर्मपूर्वक तथा बिना हिंसा के भोगों को खोजकर न स्वयं को सुखी करता है, न तृप्त करता है, न (दूसरों में) बाँटता है और न ही पुण्य कर्म करता है। हे ग्रामणी! वह कामभोगी एक कारण से प्रशंसनीय है और दो कारणों से निन्दनीय है। किस एक कारण से प्रशंसनीय है? 'धर्मपूर्वक और बिना हिंसा के भोगों की खोज करता है'—इस एक कारण से प्रशंसनीय है। किन दो कारणों से निन्दनीय है? 'स्वयं को सुखी नहीं करता, तृप्त नहीं करता'—इस पहले कारण से निन्दनीय है। 'न बाँटता है, न पुण्य कर्म करता है'—इस दूसरे कारण से निन्दनीय है। हे ग्रामणी! वह कामभोगी इस एक कारण से प्रशंसनीय है और इन दो कारणों से निन्दनीय है। ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ กามโภคี ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสน, ธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา อสาหเสน อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ, น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรติ. อยํ, คามณิ, กามโภคี ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส, เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. กตเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส? ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสนาติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน ปาสํโส. อตฺตานํ สุเขติ ปีเณตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน ปาสํโส. กตเมน เอเกน ฐาเนน คารยฺโห? น สํวิภชติ, น ปุญฺญานิ กโรตีติ, อิมินา เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. อยํ, คามณิ, กามโภคี อิเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส, อิมินา เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. हे ग्रामणी! उन (कामभोगियों) में, जो कामभोगी धर्मपूर्वक और बिना किसी हिंसा के भोगों की खोज करता है, और धर्मपूर्वक तथा बिना हिंसा के भोगों को खोजकर स्वयं को सुखी करता है, तृप्त करता है, (किन्तु) न बाँटता है और न ही पुण्य कर्म करता है। हे ग्रामणी! वह कामभोगी दो कारणों से प्रशंसनीय है और एक कारण से निन्दनीय है। किन दो कारणों से प्रशंसनीय है? 'धर्मपूर्वक और बिना हिंसा के भोगों की खोज करता है'—इस पहले कारण से प्रशंसनीय है। 'स्वयं को सुखी करता है, तृप्त करता है'—इस दूसरे कारण से प्रशंसनीय है। किस एक कारण से निन्दनीय है? 'न बाँटता है, न पुण्य कर्म करता है'—इस एक कारण से निन्दनीय है। हे ग्रामणी! वह कामभोगी इन दो कारणों से प्रशंसनीय है और इस एक कारण से निन्दनीय है। ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ กามโภคี ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสน, ธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา อสาหเสน อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรติ, เต จ โภเค คธิโต มุจฺฉิโต อชฺโฌปนฺโน อนาทีนวทสฺสาวี อนิสฺสรณปญฺโญ ปริภุญฺชติ. อยํ, คามณิ, กามโภคี ตีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส, เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. กตเมหิ ตีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส? ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสนาติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน ปาสํโส. อตฺตานํ สุเขติ ปีเณตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน ปาสํโส. สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรตีติ, อิมินา ตติเยน ฐาเนน ปาสํโส[Pg.518]. กตเมน เอเกน ฐาเนน คารยฺโห? เต จ โภเค คธิโต มุจฺฉิโต อชฺโฌปนฺโน อนาทีนวทสฺสาวี อนิสฺสรณปญฺโญ ปริภุญฺชตีติ, อิมินา เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. อยํ, คามณิ, กามโภคี อิเมหิ ตีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส, อิมินา เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. हे ग्रामणी! उन (कामभोगियों) में, जो कामभोगी धर्मपूर्वक और बिना किसी हिंसा के भोगों की खोज करता है, और धर्मपूर्वक तथा बिना हिंसा के भोगों को खोजकर स्वयं को सुखी करता है, तृप्त करता है, बाँटता है और पुण्य कर्म करता है, (किन्तु) उन भोगों में आसक्त, मुग्ध, लिप्त होकर, उनके दोषों को न देखते हुए और (उनसे) निकलने की प्रज्ञा के बिना उनका उपभोग करता है। हे ग्रामणी! वह कामभोगी तीन कारणों से प्रशंसनीय है और एक कारण से निन्दनीय है। किन तीन कारणों से प्रशंसनीय है? 'धर्मपूर्वक और बिना हिंसा के भोगों की खोज करता है'—इस पहले कारण से प्रशंसनीय है। 'स्वयं को सुखी करता है, तृप्त करता है'—इस दूसरे कारण से प्रशंसनीय है। 'बाँटता है और पुण्य कर्म करता है'—इस तीसरे कारण से प्रशंसनीय है। किस एक कारण से निन्दनीय है? 'उन भोगों में आसक्त, मुग्ध, लिप्त होकर, उनके दोषों को न देखते हुए और निकलने की प्रज्ञा के बिना उनका उपभोग करता है'—इस एक कारण से निन्दनीय है। हे ग्रामणी! वह कामभोगी इन तीन कारणों से प्रशंसनीय है और इस एक कारण से निन्दनीय है। ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ กามโภคี ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสน, ธมฺเมน โภเค ปริเยสิตฺวา อสาหเสน อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรติ. เต จ โภเค อคธิโต อมุจฺฉิโต อนชฺโฌปนฺโน อาทีนวทสฺสาวี นิสฺสรณปญฺโญ ปริภุญฺชติ. อยํ, คามณิ, กามโภคี จตูหิ ฐาเนหิ ปาสํโส. กตเมหิ จตูหิ ฐาเนหิ ปาสํโส? ธมฺเมน โภเค ปริเยสติ อสาหเสนาติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน ปาสํโส. อตฺตานํ สุเขติ ปีเณตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน ปาสํโส. สํวิภชติ ปุญฺญานิ กโรตีติ, อิมินา ตติเยน ฐาเนน ปาสํโส. เต จ โภเค อคธิโต อมุจฺฉิโต อนชฺโฌปนฺโน อาทีนวทสฺสาวี นิสฺสรณปญฺโญ ปริภุญฺชตีติ, อิมินา จตุตฺเถน ฐาเนน ปาสํโส. อยํ, คามณิ, กามโภคี อิเมหิ จตูหิ ฐาเนหิ ปาสํโส. हे ग्रामणी! उन (कामभोगियों) में, जो कामभोगी धर्मपूर्वक और बिना किसी हिंसा के भोगों की खोज करता है, और धर्मपूर्वक तथा बिना हिंसा के भोगों को खोजकर स्वयं को सुखी करता है, तृप्त करता है, बाँटता है और पुण्य कर्म करता है। और उन भोगों में अनासक्त, अमुग्ध, अलिप्त होकर, उनके दोषों को देखते हुए और (उनसे) निकलने की प्रज्ञा के साथ उनका उपभोग करता है। हे ग्रामणी! वह कामभोगी चार कारणों से प्रशंसनीय है। किन चार कारणों से प्रशंसनीय है? 'धर्मपूर्वक और बिना हिंसा के भोगों की खोज करता है'—इस पहले कारण से प्रशंसनीय है। 'स्वयं को सुखी करता है, तृप्त करता है'—इस दूसरे कारण से प्रशंसनीय है। 'बाँटता है और पुण्य कर्म करता है'—इस तीसरे कारण से प्रशंसनीय है। 'उन भोगों में अनासक्त, अमुग्ध, अलिप्त होकर, उनके दोषों को देखते हुए और निकलने की प्रज्ञा के साथ उनका उपभोग करता है'—इस चौथे कारण से प्रशंसनीय है। हे ग्रामणी! वह कामभोगी इन चार कारणों से प्रशंसनीय है। ‘‘ตโยเม, คามณิ, ตปสฺสิโน ลูขชีวิโน สนฺโต สํวิชฺชมานา โลกสฺมึ. กตเม ตโย? อิธ, คามณิ, เอกจฺโจ ตปสฺสี ลูขชีวี สทฺธา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิโต โหติ – ‘อปฺเปว นาม กุสลํ ธมฺมํ อธิคจฺเฉยฺยํ, อปฺเปว นาม อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ สจฺฉิกเรยฺย’นฺติ. โส อตฺตานํ อาตาเปติ ปริตาเปติ, กุสลญฺจ ธมฺมํ นาธิคจฺฉติ, อุตฺตริ จ มนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ น สจฺฉิกโรติ. हे ग्रामणी! संसार में ये तीन प्रकार के तपस्वी और रूक्ष-जीवी (कठिन जीवन जीने वाले) विद्यमान हैं। वे तीन कौन से हैं? हे ग्रामणी! यहाँ कोई तपस्वी और रूक्ष-जीवी श्रद्धापूर्वक घर से बेघर होकर प्रव्रजित होता है (यह सोचकर)—'शायद मैं कुशल धर्म को प्राप्त कर सकूँ, शायद मैं उत्तर-मनुष्य धर्म (मानवीय गुणों से श्रेष्ठ) आर्यों के योग्य ज्ञान-दर्शन के विशेष लाभ का साक्षात्कार कर सकूँ'। वह स्वयं को तपाता है, संतप्त करता है, (किन्तु) न तो कुशल धर्म को प्राप्त करता है और न ही उत्तर-मनुष्य धर्म आर्यों के योग्य ज्ञान-दर्शन के विशेष लाभ का साक्षात्कार करता है। ‘‘อิธ ปน, คามณิ, เอกจฺโจ ตปสฺสี ลูขชีวี สทฺธา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิโต โหติ – ‘อปฺเปว นาม กุสลํ ธมฺมํ อธิคจฺเฉยฺยํ, อปฺเปว นาม อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ สจฺฉิกเรยฺย’นฺติ. โส อตฺตานํ อาตาเปติ ปริตาเปติ, กุสลญฺหิ โข ธมฺมํ อธิคจฺฉติ, อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ น สจฺฉิกโรติ. हे ग्रामणी! यहाँ फिर कोई तपस्वी और रूक्ष-जीवी श्रद्धापूर्वक घर से बेघर होकर प्रव्रजित होता है—'शायद मैं कुशल धर्म को प्राप्त कर सकूँ, शायद मैं उत्तर-मनुष्य धर्म आर्यों के योग्य ज्ञान-दर्शन के विशेष लाभ का साक्षात्कार कर सकूँ'। वह स्वयं को तपाता है, संतप्त करता है, वह कुशल धर्म को तो प्राप्त कर लेता है, किन्तु उत्तर-मनुष्य धर्म आर्यों के योग्य ज्ञान-दर्शन के विशेष लाभ का साक्षात्कार नहीं करता। ‘‘อิธ [Pg.519] ปน, คามณิ, เอกจฺโจ ตปสฺสี ลูขชีวี สทฺธา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิโต โหติ – ‘อปฺเปว นาม กุสลํ ธมฺมํ อธิคจฺเฉยฺยํ, อปฺเปว นาม อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ สจฺฉิกเรยฺย’นฺติ. โส อตฺตานํ อาตาเปติ ปริตาเปติ, กุสลญฺจ ธมฺมํ อธิคจฺฉติ, อุตฺตริ จ มนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ สจฺฉิกโรติ. हे ग्रामणी! यहाँ फिर कोई तपस्वी और रूक्ष-जीवी श्रद्धापूर्वक घर से बेघर होकर प्रव्रजित होता है—'शायद मैं कुशल धर्म को प्राप्त कर सकूँ, शायद मैं उत्तर-मनुष्य धर्म आर्यों के योग्य ज्ञान-दर्शन के विशेष लाभ का साक्षात्कार कर सकूँ'। वह स्वयं को तपाता है, संतप्त करता है, वह कुशल धर्म को भी प्राप्त करता है और उत्तर-मनुष्य धर्म आर्यों के योग्य ज्ञान-दर्शन के विशेष लाभ का साक्षात्कार भी करता है। ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ ตปสฺสี ลูขชีวี อตฺตานํ อาตาเปติ ปริตาเปติ, กุสลญฺจ ธมฺมํ นาธิคจฺฉติ, อุตฺตริ จ มนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ น สจฺฉิกโรติ. อยํ, คามณิ, ตปสฺสี ลูขชีวี ตีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห. กตเมหิ ตีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห? อตฺตานํ อาตาเปติ ปริตาเปตีติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน คารยฺโห. กุสลญฺจ ธมฺมํ นาธิคจฺฉตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน คารยฺโห. อุตฺตริ จ มนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ น สจฺฉิกโรตีติ, อิมินา ตติเยน ฐาเนน คารยฺโห. อยํ, คามณิ, ตปสฺสี ลูขชีวี, อิเมหิ ตีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห. हे ग्रामणी! उन (तीन प्रकार के तपस्वियों) में से, जो यह तपस्वी रूक्षजीवी (कठोर जीवन जीने वाला) है, जो स्वयं को तपाता है, संतप्त करता है, और न तो कुशल धर्म को प्राप्त करता है और न ही मानवीय धर्मों से परे श्रेष्ठ आर्य ज्ञान-दर्शन विशेष का साक्षात्कार करता है। हे ग्रामणी! यह तपस्वी रूक्षजीवी तीन कारणों से निन्दनीय है। किन तीन कारणों से निन्दनीय है? 'स्वयं को तपाता है, संतप्त करता है' - इस पहले कारण से निन्दनीय है। 'कुशल धर्म को प्राप्त नहीं करता' - इस दूसरे कारण से निन्दनीय है। 'मानवीय धर्मों से परे श्रेष्ठ आर्य ज्ञान-दर्शन विशेष का साक्षात्कार नहीं करता' - इस तीसरे कारण से निन्दनीय है। हे ग्रामणी! यह तपस्वी रूक्षजीवी इन तीन कारणों से निन्दनीय है। ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ ตปสฺสี ลูขชีวี อตฺตานํ อาตาเปติ ปริตาเปติ, กุสลญฺหิ โข ธมฺมํ อธิคจฺฉติ, อุตฺตริ จ มนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ น สจฺฉิกโรติ. อยํ, คามณิ, ตปสฺสี ลูขชีวี ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห, เอเกน ฐาเนน ปาสํโส. กตเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห? อตฺตานํ อาตาเปติ ปริตาเปตีติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน คารยฺโห. อุตฺตริ จ มนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ น สจฺฉิกโรตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน คารยฺโห. กตเมน เอเกน ฐาเนน ปาสํโส? กุสลญฺหิ โข ธมฺมํ อธิคจฺฉตีติ, อิมินา เอเกน ฐาเนน ปาสํโส. อยํ, คามณิ, ตปสฺสี ลูขชีวี อิเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ คารยฺโห, อิมินา เอเกน ฐาเนน ปาสํโส. हे ग्रामणी! उन (तीन) में से, जो यह तपस्वी रूक्षजीवी स्वयं को तपाता है, संतप्त करता है, किन्तु कुशल धर्म को प्राप्त कर लेता है, पर मानवीय धर्मों से परे श्रेष्ठ आर्य ज्ञान-दर्शन विशेष का साक्षात्कार नहीं करता। हे ग्रामणी! यह तपस्वी रूक्षजीवी दो कारणों से निन्दनीय है और एक कारण से प्रशंसनीय है। किन दो कारणों से निन्दनीय है? 'स्वयं को तपाता है, संतप्त करता है' - इस पहले कारण से निन्दनीय है। 'मानवीय धर्मों से परे श्रेष्ठ आर्य ज्ञान-दर्शन विशेष का साक्षात्कार नहीं करता' - इस दूसरे कारण से निन्दनीय है। किस एक कारण से प्रशंसनीय है? 'कुशल धर्म को प्राप्त कर लेता है' - इस एक कारण से प्रशंसनीय है। हे ग्रामणी! यह तपस्वी रूक्षजीवी इन दो कारणों से निन्दनीय है और इस एक कारण से प्रशंसनीय है। ‘‘ตตฺร, คามณิ, ยฺวายํ ตปสฺสี ลูขชีวี อตฺตานํ อาตาเปติ ปริตาเปติ, กุสลญฺจ ธมฺมํ อธิคจฺฉติ, อุตฺตริ จ มนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ สจฺฉิกโรติ. อยํ, คามณิ, ตปสฺสี ลูขชีวี เอเกน ฐาเนน คารยฺโห, ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส. กตเมน เอเกน ฐาเนน คารยฺโห? อตฺตานํ อาตาเปติ ปริตาเปตีติ, อิมินา เอเกน ฐาเนน คารยฺโห. กตเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส? กุสลญฺจ ธมฺมํ อธิคจฺฉตีติ, อิมินา ปฐเมน ฐาเนน ปาสํโส. อุตฺตริ จ มนุสฺสธมฺมา อลมริยญาณทสฺสนวิเสสํ สจฺฉิกโรตีติ, อิมินา ทุติเยน ฐาเนน ปาสํโส[Pg.520]. อยํ, คามณิ, ตปสฺสี ลูขชีวี อิมินา เอเกน ฐาเนน คารยฺโห, อิเมหิ ทฺวีหิ ฐาเนหิ ปาสํโส. हे ग्रामणी! उन (तीन) में से, जो यह तपस्वी रूक्षजीवी स्वयं को तपाता है, संतप्त करता है, कुशल धर्म को भी प्राप्त करता है, और मानवीय धर्मों से परे श्रेष्ठ आर्य ज्ञान-दर्शन विशेष का साक्षात्कार भी करता है। हे ग्रामणी! यह तपस्वी रूक्षजीवी एक कारण से निन्दनीय है और दो कारणों से प्रशंसनीय है। किस एक कारण से निन्दनीय है? 'स्वयं को तपाता है, संतप्त करता है' - इस एक कारण से निन्दनीय है। किन दो कारणों से प्रशंसनीय है? 'कुशल धर्म को प्राप्त करता है' - इस पहले कारण से प्रशंसनीय है। 'मानवीय धर्मों से परे श्रेष्ठ आर्य ज्ञान-दर्शन विशेष का साक्षात्कार करता है' - इस दूसरे कारण से प्रशंसनीय है। हे ग्रामणी! यह तपस्वी रूक्षजीवी इस एक कारण से निन्दनीय है और इन दो कारणों से प्रशंसनीय है। ‘‘ติสฺโส อิมา, คามณิ, สนฺทิฏฺฐิกา นิชฺชรา อกาลิกา เอหิปสฺสิกา โอปเนยฺยิกา ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺพา วิญฺญูหิ. กตมา ติสฺโส? ยํ รตฺโต ราคาธิกรณํ อตฺตพฺยาพาธายปิ เจเตติ, ปรพฺยาพาธายปิ เจเตติ, อุภยพฺยาพาธายปิ เจเตติ. ราเค ปหีเน เนวตฺตพฺยาพาธาย เจเตติ, น ปรพฺยาพาธาย เจเตติ, น อุภยพฺยาพาธาย เจเตติ. สนฺทิฏฺฐิกา นิชฺชรา อกาลิกา เอหิปสฺสิกา โอปเนยฺยิกา ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺพา วิญฺญูหิ. ยํ ทุฏฺโฐ โทสาธิกรณํ อตฺตพฺยาพาธายปิ เจเตติ, ปรพฺยาพาธายปิ เจเตติ, อุภยพฺยาพาธายปิ เจเตติ. โทเส ปหีเน เนวตฺตพฺยาพาธาย เจเตติ, น ปรพฺยาพาธาย เจเตติ, น อุภยพฺยาพาธาย เจเตติ. สนฺทิฏฺฐิกา นิชฺชรา อกาลิกา เอหิปสฺสิกา โอปเนยฺยิกา ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺพา วิญฺญูหิ. ยํ มูฬฺโห โมหาธิกรณํ อตฺตพฺยาพาธายปิ เจเตติ, ปรพฺยาพาธายปิ เจเตติ, อุภยพฺยาพาธายปิ เจเตติ. โมเห ปหีเน เนวตฺตพฺยาพาธาย เจเตติ, น ปรพฺยาพาธาย เจเตติ, น อุภยพฺยาพาธาย เจเตติ. สนฺทิฏฺฐิกา นิชฺชรา อกาลิกา เอหิปสฺสิกา โอปเนยฺยิกา ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺพา วิญฺญูหิ. อิมา โข, คามณิ, ติสฺโส สนฺทิฏฺฐิกา นิชฺชรา อกาลิกา เอหิปสฺสิกา โอปเนยฺยิกา ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺพา วิญฺญูหี’’ติ. हे ग्रामणी! ये तीन (क्लेशों का) क्षय करने वाली निर्जराएँ इसी जन्म में फल देने वाली, कालातीत, 'आओ और देखो' कहने योग्य, ले जाने वाली और विद्वानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य हैं। वे तीन कौन सी हैं? जो रागी व्यक्ति राग के कारण अपने कष्ट के लिए भी संकल्प करता है, दूसरों के कष्ट के लिए भी संकल्प करता है, और दोनों के कष्ट के लिए भी संकल्प करता है। राग के नष्ट हो जाने पर, वह न तो अपने कष्ट के लिए संकल्प करता है, न दूसरों के कष्ट के लिए, और न ही दोनों के कष्ट के लिए। यह इसी जन्म में फल देने वाली, निर्जरा करने वाली, कालातीत, 'आओ और देखो' कहने योग्य, ले जाने वाली और विद्वानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य है। जो द्वेषी व्यक्ति द्वेष के कारण अपने कष्ट के लिए भी संकल्प करता है, दूसरों के कष्ट के लिए भी संकल्प करता है, और दोनों के कष्ट के लिए भी संकल्प करता है। द्वेष के नष्ट हो जाने पर, वह न तो अपने कष्ट के लिए संकल्प करता है, न दूसरों के कष्ट के लिए, और न ही दोनों के कष्ट के लिए। यह इसी जन्म में फल देने वाली, निर्जरा करने वाली, कालातीत, 'आओ और देखो' कहने योग्य, ले जाने वाली और विद्वानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य है। जो मोहग्रस्त व्यक्ति मोह के कारण अपने कष्ट के लिए भी संकल्प करता है, दूसरों के कष्ट के लिए भी संकल्प करता है, और दोनों के कष्ट के लिए भी संकल्प करता है। मोह के नष्ट हो जाने पर, वह न तो अपने कष्ट के लिए संकल्प करता है, न दूसरों के कष्ट के लिए, और न ही दोनों के कष्ट के लिए। यह इसी जन्म में फल देने वाली, निर्जरा करने वाली, कालातीत, 'आओ और देखो' कहने योग्य, ले जाने वाली और विद्वानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य है। हे ग्रामणी! ये ही वे तीन इसी जन्म में फल देने वाली, निर्जरा करने वाली, कालातीत, 'आओ और देखो' कहने योग्य, ले जाने वाली और विद्वानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य निर्जराएँ हैं। เอวํ วุตฺเต, ราสิโย คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต…เป… อุปาสกํ มํ ภควา ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ทฺวาทสมํ. ऐसा कहे जाने पर, रासिय ग्रामणी ने भगवान से यह कहा— 'अति सुंदर, भन्ते! ...पे ... भगवान मुझे आज से जीवन भर के लिए शरणागत उपासक के रूप में स्वीकार करें।' बारहवाँ (सुत्त समाप्त)। ๑๓. ปาฏลิยสุตฺตํ १३. पाटलीय सुत्त ๓๖๕. เอกํ สมยํ ภควา โกลิเยสุ วิหรติ อุตฺตรํ นาม โกลิยานํ นิคโม. อถ โข ปาฏลิโย คามณิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ปาฏลิโย คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต – ‘สมโณ โคตโม มายํ ชานาตี’ติ. เย เต, ภนฺเต, เอวมาหํสุ – ‘สมโณ โคตโม มายํ ชานาตี’ติ, กจฺจิ เต, ภนฺเต, ภควโต [Pg.521] วุตฺตวาทิโน, น จ ภควนฺตํ อภูเตน อพฺภาจิกฺขนฺติ, ธมฺมสฺส จานุธมฺมํ พฺยากโรนฺติ, น จ โกจิ สหธมฺมิโก วาทานุวาโท คารยฺหํ ฐานํ อาคจฺฉติ? อนพฺภาจิกฺขิตุกามา หิ มยํ, ภนฺเต, ภควนฺต’’นฺติ. ‘‘เย เต, คามณิ, เอวมาหํสุ – ‘สมโณ โคตโม มายํ ชานาตี’ติ, วุตฺตวาทิโน เจว เม, เต น จ มํ อภูเตน อพฺภาจิกฺขนฺติ, ธมฺมสฺส จานุธมฺมํ พฺยากโรนฺติ, น จ โกจิ สหธมฺมิโก วาทานุวาโท คารยฺหํ ฐานํ อาคจฺฉตีติ, สจฺจํเยว กิร, โภ, มยํ เตสํ สมณพฺราหฺมณานํ น สทฺทหาม – ‘สมโณ โคตโม มายํ ชานาตีติ, สมโณ ขลุ โภ โคตโม มายาวี’ติ. โย นุ โข, คามณิ, เอวํ วเทติ – ‘อหํ มายํ ชานามี’ติ, โส เอวํ วเทติ – ‘อหํ มายาวี’ติ. ตเถว ตํ ภควา โหติ, ตเถว ตํ สุคต โหตี’’ติ. เตน หิ, คามณิ, ตญฺเญเวตฺถ ปฏิปุจฺฉิสฺสามิ; ยถา เต ขเมยฺย, ตถา ตํ พฺยากเรยฺยาสิ – ३६५. एक समय भगवान कोलियों के बीच 'उत्तर' नामक कोलियों के एक कस्बे (निगम) में विहार कर रहे थे। तब पाटलि ग्रामणी जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए पाटलि ग्रामणी ने भगवान से यह कहा— "भन्ते! मैंने ऐसा सुना है— 'श्रमण गौतम माया (छल-कपट) को जानते हैं'। भन्ते! जो ऐसा कहते हैं— 'श्रमण गौतम माया को जानते हैं', क्या वे भन्ते! भगवान के वचनों को ही कहने वाले हैं? क्या वे भगवान पर असत्य आरोप तो नहीं लगा रहे हैं? क्या वे धर्म के अनुकूल धर्म की व्याख्या कर रहे हैं? और क्या उनके इस कथन से किसी भी धर्म-सम्मत वाद-विवाद में निंदा का अवसर तो नहीं आता? क्योंकि भन्ते! हम भगवान पर झूठा आरोप नहीं लगाना चाहते।" "ग्रामणी! जो ऐसा कहते हैं— 'श्रमण गौतम माया को जानते हैं', वे मेरे वचनों को ही कहने वाले हैं। वे मुझ पर असत्य आरोप नहीं लगा रहे हैं। वे धर्म के अनुकूल धर्म की व्याख्या कर रहे हैं और उनके इस कथन से किसी भी धर्म-सम्मत वाद-विवाद में निंदा का अवसर नहीं आता।" (ग्रामणी कहता है:) "हे महानुभाव! वास्तव में यह सच है, हम उन श्रमण-ब्राह्मणों की बात पर विश्वास नहीं करते थे जो कहते थे— 'श्रमण गौतम माया को जानते हैं', क्योंकि (हमें लगता था) 'श्रमण गौतम स्वयं मायावी (छली) हैं'।" "ग्रामणी! जो कोई ऐसा कहता है— 'मैं माया को जानता हूँ', क्या वह ऐसा कहता है— 'मैं मायावी हूँ'? भगवान के विषय में भी वैसा ही है, सुगत के विषय में भी वैसा ही है। तो फिर ग्रामणी! मैं तुमसे ही इस विषय में पूछता हूँ; जैसा तुम्हें ठीक लगे, वैसा उत्तर देना—" ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, ชานาสิ ตฺวํ โกลิยานํ ลมฺพจูฬเก ภเฏ’’ติ? ‘‘ชานามหํ, ภนฺเต, โกลิยานํ ลมฺพจูฬเก ภเฏ’’ติ. ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, กิมตฺถิยา โกลิยานํ ลมฺพจูฬกา ภฏา’’ติ? ‘‘เย จ, ภนฺเต, โกลิยานํ โจรา เต จ ปฏิเสเธตุํ, ยานิ จ โกลิยานํ ทูเตยฺยานิ ตานิ จ วหาตุํ, เอตทตฺถิยา, ภนฺเต, โกลิยานํ ลมฺพจูฬกา ภฏา’’ติ. ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, ชานาสิ ตฺวํ โกลิยานํ ลมฺพจูฬเก ภเฏ สีลวนฺเต วา เต ทุสฺสีเล วา’’ติ? ‘‘ชานามหํ, ภนฺเต, โกลิยานํ ลมฺพจูฬเก ภเฏ ทุสฺสีเล ปาปธมฺเม; เย จ โลเก ทุสฺสีลา ปาปธมฺมา โกลิยานํ ลมฺพจูฬกา ภฏา เตสํ อญฺญตรา’’ติ. ‘‘โย นุ โข, คามณิ, เอวํ วเทยฺย – ‘ปาฏลิโย คามณิ ชานาติ โกลิยานํ ลมฺพจูฬเก ภเฏ ทุสฺสีเล ปาปธมฺเม, ปาฏลิโยปิ คามณิ ทุสฺสีโล ปาปธมฺโม’ติ, สมฺมา นุ โข โส วทมาโน วเทยฺยา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต! อญฺเญ, ภนฺเต, โกลิยานํ ลมฺพจูฬกา ภฏา, อญฺโญหมสฺมิ. อญฺญถาธมฺมา โกลิยานํ ลมฺพจูฬกา ภฏา, อญฺญถาธมฺโมหมสฺมี’’ติ. ‘‘ตฺวญฺหิ นาม, คามณิ, ลจฺฉสิ – ‘ปาฏลิโย คามณิ ชานาติ โกลิยานํ ลมฺพจูฬเก ภเฏ ทุสฺสีเล ปาปธมฺเม, น จ ปาฏลิโย คามณิ ทุสฺสีโล ปาปธมฺโม’ติ, กสฺมา ตถาคโต น ลจฺฉติ – ‘ตถาคโต มายํ ชานาติ, น จ ตถาคโต มายาวี’ติ? มายํ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, มายาย [Pg.522] จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ มายาวี กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ’’. "ग्रामणी! तुम क्या सोचते हो? क्या तुम कोलियों के 'लम्बचूलक' नामक सैनिकों (अधिकारियों) को जानते हो?" "हाँ भन्ते! मैं कोलियों के लम्बचूलक सैनिकों को जानता हूँ।" "ग्रामणी! तुम क्या सोचते हो? कोलियों के लम्बचूलक सैनिक किस प्रयोजन के लिए हैं?" "भन्ते! कोलियों के जो चोर हैं उन्हें रोकने के लिए और कोलियों के जो दूत-कार्य हैं उन्हें करने के लिए; भन्ते! कोलियों के लम्बचूलक सैनिक इसी प्रयोजन के लिए हैं।" "ग्रामणी! तुम क्या सोचते हो? क्या तुम कोलियों के लम्बचूलक सैनिकों को शीलवान् जानते हो या दुःशील?" "भन्ते! मैं कोलियों के लम्बचूलक सैनिकों को दुःशील और पापी स्वभाव वाला जानता हूँ। संसार में जो दुःशील और पापी स्वभाव वाले हैं, कोलियों के लम्बचूलक सैनिक उन्हीं में से एक हैं।" "ग्रामणी! यदि कोई ऐसा कहे— 'पाटलि ग्रामणी कोलियों के दुःशील और पापी लम्बचूलक सैनिकों को जानता है, इसलिए पाटलि ग्रामणी भी दुःशील और पापी है', तो क्या वह ठीक कहेगा?" "नहीं भन्ते! भन्ते! कोलियों के लम्बचूलक सैनिक दूसरे हैं और मैं दूसरा हूँ। कोलियों के लम्बचूलक सैनिकों का स्वभाव अलग है और मेरा स्वभाव अलग है।" "ग्रामणी! जब तुम्हारे विषय में यह संभव है कि 'पाटलि ग्रामणी कोलियों के दुःशील और पापी लम्बचूलक सैनिकों को जानता है, फिर भी पाटलि ग्रामणी दुःशील और पापी नहीं है', तो तथागत के विषय में यह क्यों संभव नहीं होगा कि 'तथागत माया को जानते हैं, फिर भी तथागत मायावी नहीं हैं'? ग्रामणी! मैं माया को भी जानता हूँ और माया के विपाक (फल) को भी। और जिस प्रकार का आचरण करने वाला मायावी व्यक्ति शरीर टूटने के बाद, मृत्यु के उपरांत, अपाय, दुर्गति, विनिपात और नरक में उत्पन्न होता है, उसे भी मैं जानता हूँ।" ‘‘ปาณาติปาตํ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, ปาณาติปาตสฺส จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ ปาณาติปาตี กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ. อทินฺนาทานํ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, อทินฺนาทานสฺส จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ อทินฺนาทายี กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ. กาเมสุมิจฺฉาจารํ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, กาเมสุมิจฺฉาจารสฺส จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ กาเมสุมิจฺฉาจารี กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ. มุสาวาทํ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, มุสาวาทสฺส จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ มุสาวาที กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ. ปิสุณวาจํ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, ปิสุณวาจาย จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ ปิสุณวาโจ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ. ผรุสวาจํ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, ผรุสวาจาย จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ ผรุสวาโจ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ. สมฺผปฺปลาปํ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, สมฺผปฺปลาปสฺส จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ สมฺผปฺปลาปี กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ. อภิชฺฌํ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, อภิชฺฌาย จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ อภิชฺฌาลุ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ. พฺยาปาทปโทสํ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, พฺยาปาทปโทสสฺส จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ พฺยาปนฺนจิตฺโต กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ. มิจฺฉาทิฏฺฐึ จาหํ, คามณิ, ปชานามิ, มิจฺฉาทิฏฺฐิยา จ วิปากํ, ยถาปฏิปนฺโน จ มิจฺฉาทิฏฺฐิโก กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ ตญฺจ ปชานามิ. हे ग्रामणी! मैं प्राणातिपात (प्राण-हिंसा) को जानता हूँ और प्राणातिपात के विपाक (फल) को भी जानता हूँ; और जिस प्रकार के आचरण से प्राणातिपाती व्यक्ति शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, अपाय, दुर्गति, विनिपात और निरय (नरक) में उत्पन्न होता है, उसे भी मैं जानता हूँ। हे ग्रामणी! मैं अदत्तादान (चोरी) को जानता हूँ और अदत्तादान के विपाक को भी जानता हूँ; और जिस प्रकार के आचरण से अदत्तादान करने वाला व्यक्ति शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, अपाय, दुर्गति, विनिपात और निरय में उत्पन्न होता है, उसे भी मैं जानता हूँ। हे ग्रामणी! मैं काम-मिथ्याचार को जानता हूँ और काम-मिथ्याचार के विपाक को भी जानता हूँ; और जिस प्रकार के आचरण से काम-मिथ्याचारी व्यक्ति शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, अपाय, दुर्गति, विनिपात और निरय में उत्पन्न होता है, उसे भी मैं जानता हूँ। हे ग्रामणी! मैं मृषावाद (झूठ बोलना) को जानता हूँ और मृषावाद के विपाक को भी जानता हूँ; और जिस प्रकार के आचरण से मृषावादी व्यक्ति शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, अपाय, दुर्गति, विनिपात और निरय में उत्पन्न होता है, उसे भी मैं जानता हूँ। हे ग्रामणी! मैं पिशुनवाचा (चुगली) को जानता हूँ और पिशुनवाचा के विपाक को भी जानता हूँ; और जिस प्रकार के आचरण से चुगली करने वाला व्यक्ति शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, अपाय, दुर्गति, विनिपात और निरय में उत्पन्न होता है, उसे भी मैं जानता हूँ। हे ग्रामणी! मैं परुषवाचा (कठोर वचन) को जानता हूँ और परुषवाचा के विपाक को भी जानता हूँ; और जिस प्रकार के आचरण से कठोर वचन बोलने वाला व्यक्ति शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, अपाय, दुर्गति, विनिपात और निरय में उत्पन्न होता है, उसे भी मैं जानता हूँ। हे ग्रामणी! मैं सम्फप्पलाप (व्यर्थ प्रलाप) को जानता हूँ और सम्फप्पलाप के विपाक को भी जानता हूँ; और जिस प्रकार के आचरण से व्यर्थ प्रलाप करने वाला व्यक्ति शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, अपाय, दुर्गति, विनिपात और निरय में उत्पन्न होता है, उसे भी मैं जानता हूँ। हे ग्रामणी! मैं अभिध्या (लोभ) को जानता हूँ और अभिध्या के विपाक को भी जानता हूँ; और जिस प्रकार के आचरण से लोभी व्यक्ति शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, अपाय, दुर्गति, विनिपात और निरय में उत्पन्न होता है, उसे भी मैं जानता हूँ। हे ग्रामणी! मैं व्यापाद (द्वेषपूर्ण विचार) को जानता हूँ और व्यापाद के विपाक को भी जानता हूँ; और जिस प्रकार के आचरण से व्यापादयुक्त चित्त वाला व्यक्ति शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, अपाय, दुर्गति, विनिपात और निरय में उत्पन्न होता है, उसे भी मैं जानता हूँ। हे ग्रामणी! मैं मिथ्यादृष्टि को जानता हूँ और मिथ्यादृष्टि के विपाक को भी जानता हूँ; और जिस प्रकार के आचरण से मिथ्यादृष्टि वाला व्यक्ति शरीर के टूटने पर, मृत्यु के बाद, अपाय, दुर्गति, विनिपात और निरय में उत्पन्न होता है, उसे भी मैं जानता हूँ। ‘‘สนฺติ หิ, คามณิ, เอเก สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘โย โกจิ ปาณมติปาเตติ, สพฺโพ โส ทิฏฺเฐว ธมฺเม ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวทยติ. โย โกจิ อทินฺนํ อาทิยติ, สพฺโพ โส ทิฏฺเฐว ธมฺเม [Pg.523] ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวทยติ. โย โกจิ กาเมสุ มิจฺฉา จรติ, สพฺโพ โส ทิฏฺเฐว ธมฺเม ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวทยติ. โย โกจิ มุสา ภณติ, สพฺโพ โส ทิฏฺเฐว ธมฺเม ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวทยตี’’’ติ. हे ग्रामणी! कुछ ऐसे श्रमण और ब्राह्मण हैं जो ऐसा कहने वाले और ऐसी दृष्टि रखने वाले हैं— 'जो कोई भी प्राणातिपात करता है, वह सब इसी जन्म में दुःख और दौर्मनस्य (मानसिक कष्ट) का अनुभव करता है। जो कोई भी अदत्तादान करता है, वह सब इसी जन्म में दुःख और दौर्मनस्य का अनुभव करता है। जो कोई भी काम-मिथ्याचार करता है, वह सब इसी जन्म में दुःख और दौर्मनस्य का अनुभव करता है। जो कोई भी मृषावाद बोलता है, वह सब इसी जन्म में दुःख और दौर्मनस्य का अनुभव करता है'। ‘‘ทิสฺสติ โข ปน, คามณิ, อิเธกจฺโจ มาลี กุณฺฑลี สุนฺหาโต สุวิลิตฺโต กปฺปิตเกสมสฺสุ อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรนฺโต. ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส กึ อกาสิ มาลี กุณฺฑลี สุนฺหาโต สุวิลิตฺโต กปฺปิตเกสมสฺสุ อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรตี’ติ? ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส รญฺโญ ปจฺจตฺถิกํ ปสยฺห ชีวิตา โวโรเปสิ. ตสฺส ราชา อตฺตมโน อภิหารมทาสิ. เตนายํ ปุริโส มาลี กุณฺฑลี สุนฺหาโต สุวิลิตฺโต กปฺปิตเกสมสฺสุ, อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรตี’’’ติ. हे ग्रामणी! यहाँ इस लोक में कोई व्यक्ति माला पहने हुए, कुंडल पहने हुए, अच्छी तरह स्नान किया हुआ, सुगंधित लेप लगाए हुए, संवारे हुए बाल और दाढ़ी वाला, स्त्रियों के साथ काम-भोगों में मानो राजा के समान विहार करता हुआ देखा जाता है। तब लोग उसके बारे में ऐसा कहते हैं— 'अरे! इस व्यक्ति ने क्या किया है जो यह माला पहने, कुंडल पहने, अच्छी तरह स्नान किए, सुगंधित लेप लगाए, संवारे हुए बाल और दाढ़ी वाला होकर स्त्रियों के साथ मानो राजा के समान विहार कर रहा है?' तब लोग उसके बारे में ऐसा कहते हैं— 'अरे! इस व्यक्ति ने राजा के शत्रु को परास्त कर उसे जीवन से वंचित कर दिया (मार दिया)। उससे राजा प्रसन्न हुआ और उसे पुरस्कार दिया। इसी कारण यह व्यक्ति माला पहने, कुंडल पहने... स्त्रियों के साथ मानो राजा के समान विहार कर रहा है'। ‘‘ทิสฺสติ โข, คามณิ, อิเธกจฺโจ ทฬฺหาย รชฺชุยา ปจฺฉาพาหํ คาฬฺหพนฺธนํ พนฺธิตฺวา ขุรมุณฺฑํ กริตฺวา ขรสฺสเรน ปณเวน รถิยาย รถิยํ สิงฺฆาฏเกน สิงฺฆาฏกํ ปริเนตฺวา, ทกฺขิเณน ทฺวาเรน นิกฺขาเมตฺวา, ทกฺขิณโต นครสฺส สีสํ ฉิชฺชมาโน. ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส กึ อกาสิ, ทฬฺหาย รชฺชุยา ปจฺฉาพาหํ คาฬฺหพนฺธนํ พนฺธิตฺวา ขุรมุณฺฑํ กริตฺวา ขรสฺสเรน ปณเวน รถิยาย รถิยํ สิงฺฆาฏเกน สิงฺฆาฏกํ ปริเนตฺวา ทกฺขิเณน ทฺวาเรน นิกฺขาเมตฺวา ทกฺขิณโต นครสฺส สีสํ ฉินฺทตี’ติ ? ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส ราชเวรี อิตฺถึ วา ปุริสํ วา ชีวิตา โวโรเปสิ, เตน นํ ราชาโน คเหตฺวา เอวรูปํ กมฺมการณํ กาเรนฺตี’’’ติ. हे ग्रामणी! यहाँ इस लोक में कोई व्यक्ति मजबूत रस्सी से पीछे की ओर हाथ बांधकर, मजबूती से जकड़ा हुआ, उस्तरे से सिर मुंडाया हुआ, कर्कश स्वर वाले ढोल के साथ एक गली से दूसरी गली और एक चौराहे से दूसरे चौराहे घुमाया जाता हुआ, दक्षिण द्वार से बाहर ले जाकर, नगर के दक्षिण में सिर काटा जाता हुआ देखा जाता है। तब लोग उसके बारे में ऐसा कहते हैं— 'अरे! इस व्यक्ति ने क्या किया है जो इसे मजबूत रस्सी से पीछे की ओर हाथ बांधकर... नगर के दक्षिण में सिर काटा जा रहा है?' तब लोग उसके बारे में ऐसा कहते हैं— 'अरे! यह व्यक्ति राजा का अपराधी है, इसने किसी स्त्री या पुरुष को जीवन से वंचित कर दिया (मार दिया) है, इसलिए राजा इसे पकड़कर इस प्रकार का दंड दे रहे हैं'। ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อปิ นุ เต เอวรูปํ ทิฏฺฐํ วา สุตํ วา’’ติ? ‘‘ทิฏฺฐญฺจ โน, ภนฺเต, สุตญฺจ สุยฺยิสฺสติ จา’’ติ. ‘‘ตตฺร, คามณิ, เย เต สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘โย โกจิ ปาณมติปาเตติ, สพฺโพ โส ทิฏฺเฐว ธมฺเม ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวทยตี’ติ, สจฺจํ วา เต อาหํสุ มุสา วา’’ติ? ‘‘มุสา, ภนฺเต’’. ‘‘เย ปน เต ตุจฺฉํ มุสา วิลปนฺติ, สีลวนฺโต วา เต ทุสฺสีลา วา’’ติ? ‘‘ทุสฺสีลา, ภนฺเต’’. ‘‘เย ปน เต ทุสฺสีลา [Pg.524] ปาปธมฺมา มิจฺฉาปฏิปนฺนา วา เต สมฺมาปฏิปนฺนา วา’’ติ? ‘‘มิจฺฉาปฏิปนฺนา, ภนฺเต’’. ‘‘เย ปน เต มิจฺฉาปฏิปนฺนา มิจฺฉาทิฏฺฐิกา วา เต สมฺมาทิฏฺฐิกา วา’’ติ? ‘‘มิจฺฉาทิฏฺฐิกา, ภนฺเต’’. ‘‘เย ปน เต มิจฺฉาทิฏฺฐิกา กลฺลํ นุ เตสุ ปสีทิตุ’’นฺติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “हे ग्रामणी! तुम इसके बारे में क्या सोचते हो? क्या तुमने कभी ऐसा देखा या सुना है?” “भन्ते! हमने देखा भी है, सुना भी है और आगे भी सुनेंगे।” “ग्रामणी! वहाँ जो श्रमण और ब्राह्मण ऐसा कहने वाले और ऐसी दृष्टि रखने वाले हैं कि—'जो कोई भी प्राणी की हत्या करता है, वह सब इसी जन्म में दुःख और मानसिक कष्ट का अनुभव करता है'—क्या वे सच कहते हैं या झूठ?” “भन्ते! वे झूठ कहते हैं।” “जो व्यर्थ का झूठ बोलते हैं, क्या वे शीलवान हैं या दुःशील?” “भन्ते! वे दुःशील हैं।” “जो दुःशील, पापी और गलत मार्ग पर चलने वाले हैं, क्या वे सही मार्ग पर चलने वाले हैं या गलत मार्ग पर?” “भन्ते! वे गलत मार्ग पर चलने वाले हैं।” “जो गलत मार्ग पर चलने वाले हैं, क्या वे मिथ्या-दृष्टि वाले हैं या सम्यक्-दृष्टि वाले?” “भन्ते! वे मिथ्या-दृष्टि वाले हैं।” “जो मिथ्या-दृष्टि वाले हैं, क्या उनमें श्रद्धा रखना उचित है?” “नहीं भन्ते! यह उचित नहीं है।” ‘‘ทิสฺสติ โข ปน, คามณิ, อิเธกจฺโจ มาลี กุณฺฑลี…เป… อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรนฺโต. ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส กึ อกาสิ มาลี กุณฺฑลี…เป… อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรตี’ติ? ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส รญฺโญ ปจฺจตฺถิกสฺส ปสยฺห รตนํ อหาสิ. ตสฺส ราชา อตฺตมโน อภิหารมทาสิ. เตนายํ ปุริโส มาลี กุณฺฑลี…เป… อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรตี’’’ติ. “ग्रामणी! यहाँ इस लोक में कोई व्यक्ति माला पहने, कुंडल धारण किए... स्त्रियों और काम-भोगों के साथ राजा के समान आनंद मनाते हुए देखा जाता है। लोग उसके बारे में ऐसा कहते हैं—'अरे! इस व्यक्ति ने क्या किया है जो यह माला पहने, कुंडल धारण किए... स्त्रियों और काम-भोगों के साथ राजा के समान आनंद मना रहा है?' लोग उसके बारे में ऐसा कहते हैं—'अरे! इस व्यक्ति ने राजा के शत्रु से बलपूर्वक रत्न छीन लिया है। राजा ने प्रसन्न होकर उसे उपहार दिया है। इसी कारण यह व्यक्ति माला पहने, कुंडल धारण किए... स्त्रियों और काम-भोगों के साथ राजा के समान आनंद मना रहा है।'” ‘‘ทิสฺสติ โข, คามณิ, อิเธกจฺโจ ทฬฺหาย รชฺชุยา…เป… ทกฺขิณโต นครสฺส สีสํ ฉิชฺชมาโน ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส กึ อกาสิ ทฬฺหาย รชฺชุยา…เป… ทกฺขิณโต นครสฺส สีสํ ฉินฺทตี’ติ? ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส คามา วา อรญฺญา วา อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยิ. เตน นํ ราชาโน คเหตฺวา เอวรูปํ กมฺมการณํ กาเรนฺตี’ติ. ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อปิ นุ เต เอวรูปํ ทิฏฺฐํ วา สุตํ วา’’ติ? ‘‘ทิฏฺฐญฺจ โน, ภนฺเต, สุตญฺจ สุยฺยิสฺสติ จา’’ติ. ‘‘ตตฺร, คามณิ, เย เต สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘โย โกจิ อทินฺนํ อาทิยติ, สพฺโพ โส ทิฏฺเฐว ธมฺเม ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวทยตี’ติ, สจฺจํ วา เต อาหํสุ มุสา วาติ…เป… กลฺลํ นุ เตสุ ปสีทิตุ’’นฺติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “ग्रामणी! यहाँ इस लोक में कोई व्यक्ति मजबूत रस्सी से बँधा हुआ... नगर के दक्षिण में सिर कटवाते हुए देखा जाता है। लोग उसके बारे में ऐसा कहते हैं—'अरे! इस व्यक्ति ने क्या किया है जो मजबूत रस्सी से बँधा हुआ... नगर के दक्षिण में सिर कटवा रहा है?' लोग उसके बारे में ऐसा कहते हैं—'अरे! इस व्यक्ति ने गाँव या जंगल से चोरी की नीयत से वह धन लिया है जो उसे दिया नहीं गया था। इसलिए राजाओं ने इसे पकड़कर ऐसी सजा दी है।' ग्रामणी! तुम इसके बारे में क्या सोचते हो? क्या तुमने कभी ऐसा देखा या सुना है?” “भन्ते! हमने देखा भी है, सुना भी है और आगे भी सुनेंगे।” “ग्रामणी! वहाँ जो श्रमण और ब्राह्मण ऐसा कहने वाले और ऐसी दृष्टि रखने वाले हैं कि—'जो कोई भी चोरी करता है, वह सब इसी जन्म में दुःख और मानसिक कष्ट का अनुभव करता है'—क्या वे सच कहते हैं या झूठ? ... क्या उनमें श्रद्धा रखना उचित है?” “नहीं भन्ते! यह उचित नहीं है।” ‘‘ทิสฺสติ โข ปน, คามณิ, อิเธกจฺโจ มาลี กุณฺฑลี…เป… อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรนฺโต. ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส กึ อกาสิ มาลี กุณฺฑลี…เป… อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรตี’ติ? ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส รญฺโญ ปจฺจตฺถิกสฺส ทาเรสุ จาริตฺตํ อาปชฺชิ. ตสฺส ราชา อตฺตมโน อภิหารมทาสิ. เตนายํ ปุริโส มาลี กุณฺฑลี…เป… อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรตี’’’ติ. “ग्रामणी! यहाँ इस लोक में कोई व्यक्ति माला पहने, कुंडल धारण किए... स्त्रियों और काम-भोगों के साथ राजा के समान आनंद मनाते हुए देखा जाता है। लोग उसके बारे में ऐसा कहते हैं—'अरे! इस व्यक्ति ने क्या किया है जो यह माला पहने, कुंडल धारण किए... स्त्रियों और काम-भोगों के साथ राजा के समान आनंद मना रहा है?' लोग उसके बारे में ऐसा कहते हैं—'अरे! इस व्यक्ति ने राजा के शत्रु की पत्नियों के साथ व्यभिचार किया है। राजा ने प्रसन्न होकर उसे उपहार दिया है। इसी कारण यह व्यक्ति माला पहने, कुंडल धारण किए... स्त्रियों और काम-भोगों के साथ राजा के समान आनंद मना रहा है।'” ‘‘ทิสฺสติ [Pg.525] โข, คามณิ, อิเธกจฺโจ ทฬฺหาย รชฺชุยา…เป… ทกฺขิณโต นครสฺส สีสํ ฉิชฺชมาโน. ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส กึ อกาสิ ทฬฺหาย รชฺชุยา…เป… ทกฺขิณโต นครสฺส สีสํ ฉินฺทตี’ติ? ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส กุลิตฺถีสุ กุลกุมารีสุ จาริตฺตํ อาปชฺชิ, เตน นํ ราชาโน คเหตฺวา เอวรูปํ กมฺมการณํ กาเรนฺตี’ติ. ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อปิ นุ เต เอวรูปํ ทิฏฺฐํ วา สุตํ วา’’ติ? ‘‘ทิฏฺฐญฺจ โน, ภนฺเต, สุตญฺจ สุยฺยิสฺสติ จา’’ติ. ‘‘ตตฺร, คามณิ, เย เต สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘โย โกจิ กาเมสุ มิจฺฉา จรติ, สพฺโพ โส ทิฏฺเฐว ธมฺเม ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวทยตี’ติ, สจฺจํ วา เต อาหํสุ มุสา วาติ…เป… กลฺลํ นุ เตสุ ปสีทิตุ’’นฺติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “ग्रामणी! यहाँ इस लोक में कोई व्यक्ति मजबूत रस्सी से बँधा हुआ... नगर के दक्षिण में सिर कटवाते हुए देखा जाता है। लोग उसके बारे में ऐसा कहते हैं—'अरे! इस व्यक्ति ने क्या किया है जो मजबूत रस्सी से बँधा हुआ... नगर के दक्षिण में सिर कटवा रहा है?' लोग उसके बारे में ऐसा कहते हैं—'अरे! इस व्यक्ति ने कुलीन स्त्रियों और कुलीन कन्याओं के साथ व्यभिचार किया है, इसलिए राजाओं ने इसे पकड़कर ऐसी सजा दी है।' ग्रामणी! तुम इसके बारे में क्या सोचते हो? क्या तुमने कभी ऐसा देखा या सुना है?” “भन्ते! हमने देखा भी है, सुना भी है और आगे भी सुनेंगे।” “ग्रामणी! वहाँ जो श्रमण और ब्राह्मण ऐसा कहने वाले और ऐसी दृष्टि रखने वाले हैं कि—'जो कोई भी काम-भोगों में मिथ्याचार करता है, वह सब इसी जन्म में दुःख और मानसिक कष्ट का अनुभव करता है'—क्या वे सच कहते हैं या झूठ? ... क्या उनमें श्रद्धा रखना उचित है?” “नहीं भन्ते! यह उचित नहीं है।” ‘‘ทิสฺสติ โข ปน, คามณิ, อิเธกจฺโจ มาลี กุณฺฑลี สุนฺหาโต สุวิลิตฺโต กปฺปิตเกสมสฺสุ อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรนฺโต. ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส กึ อกาสิ มาลี กุณฺฑลี สุนฺหาโต สุวิลิตฺโต กปฺปิตเกสมสฺสุ อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรตี’ติ? ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส ราชานํ มุสาวาเทน หาเสสิ. ตสฺส ราชา อตฺตมโน อภิหารมทาสิ. เตนายํ ปุริโส มาลี กุณฺฑลี สุนฺหาโต สุวิลิตฺโต กปฺปิตเกสมสฺสุ อิตฺถิกาเมหิ ราชา มญฺเญ ปริจาเรตี’’’ติ. “ग्रामणी! यहाँ इस लोक में कोई व्यक्ति माला पहने, कुंडल धारण किए, अच्छी तरह स्नान किए, सुगंधित लेप लगाए, सँवारे हुए बाल और दाढ़ी के साथ, स्त्रियों और काम-भोगों के साथ राजा के समान आनंद मनाते हुए देखा जाता है। लोग उसके बारे में ऐसा कहते हैं—'अरे! इस व्यक्ति ने क्या किया है जो माला पहने, कुंडल धारण किए, अच्छी तरह स्नान किए, सुगंधित लेप लगाए, सँवारे हुए बाल और दाढ़ी के साथ, स्त्रियों और काम-भोगों के साथ राजा के समान आनंद मना रहा है?' लोग उसके बारे में ऐसा कहते हैं—'अरे! इस व्यक्ति ने झूठ बोलकर राजा को प्रसन्न किया है। राजा ने प्रसन्न होकर उसे उपहार दिया है। इसी कारण यह व्यक्ति माला पहने, कुंडल धारण किए, अच्छी तरह स्नान किए, सुगंधित लेप लगाए, सँवारे हुए बाल और दाढ़ी के साथ, स्त्रियों और काम-भोगों के साथ राजा के समान आनंद मना रहा है।'” ‘‘ทิสฺสติ โข, คามณิ, อิเธกจฺโจ ทฬฺหาย รชฺชุยา ปจฺฉาพาหํ คาฬฺหพนฺธนํ พนฺธิตฺวา ขุรมุณฺฑํ กริตฺวา ขรสฺสเรน ปณเวน รถิยาย รถิยํ สิงฺฆาฏเกน สิงฺฆาฏกํ ปริเนตฺวา ทกฺขิเณน ทฺวาเรน นิกฺขาเมตฺวา ทกฺขิณโต นครสฺส สีสํ ฉิชฺชมาโน. ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส กึ อกาสิ ทฬฺหาย รชฺชุยา ปจฺฉาพาหํ คาฬฺหพนฺธนํ พนฺธิตฺวา ขุรมุณฺฑํ กริตฺวา ขรสฺสเรน ปณเวน รถิยาย รถิยํ สิงฺฆาฏเกน สิงฺฆาฏกํ ปริเนตฺวา, ทกฺขิเณน ทฺวาเรน นิกฺขาเมตฺวา, ทกฺขิณโต นครสฺส สีสํ ฉินฺทตี’ติ? ตเมนํ เอวมาหํสุ – ‘อมฺโภ! อยํ ปุริโส คหปติสฺส วา คหปติปุตฺตสฺส วา มุสาวาเทน อตฺถํ ภญฺชิ, เตน นํ ราชาโน คเหตฺวา เอวรูปํ กมฺมการณํ กาเรนฺตี’ติ. ตํ กึ มญฺญสิ, คามณิ, อปิ นุ เต เอวรูปํ ทิฏฺฐํ วา สุตํ วา’’ติ? ‘‘ทิฏฺฐญฺจ โน[Pg.526], ภนฺเต, สุตญฺจ สุยฺยิสฺสติ จา’’ติ. ‘‘ตตฺร, คามณิ, เย เต สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘โย โกจิ มุสา ภณติ, สพฺโพ โส ทิฏฺเฐว ธมฺเม ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวทยตี’ติ, สจฺจํ วา เต อาหํสุ มุสา วา’’ติ? ‘‘มุสา, ภนฺเต’’. ‘‘เย ปน เต ตุจฺฉํ มุสา วิลปนฺติ สีลวนฺโต วา เต ทุสฺสีลา วา’’ติ? ‘‘ทุสฺสีลา, ภนฺเต’’. ‘‘เย ปน เต ทุสฺสีลา ปาปธมฺมา มิจฺฉาปฏิปนฺนา วา เต สมฺมาปฏิปนฺนา วา’’ติ? ‘‘มิจฺฉาปฏิปนฺนา, ภนฺเต’’. ‘‘เย ปน เต มิจฺฉาปฏิปนฺนา มิจฺฉาทิฏฺฐิกา วา เต สมฺมาทิฏฺฐิกา วา’’ติ? ‘‘มิจฺฉาทิฏฺฐิกา, ภนฺเต’’. ‘‘เย ปน เต มิจฺฉาทิฏฺฐิกา กลฺลํ นุ เตสุ ปสีทิตุ’’นฺติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. हे ग्रामणी, यहाँ इस संसार में देखा जाता है कि किसी व्यक्ति को मजबूत रस्सी से पीछे हाथ बाँधकर, सिर मुंडवाकर, कर्कश स्वर वाले नगाड़े के साथ एक गली से दूसरी गली और एक चौराहे से दूसरे चौराहे पर घुमाया जाता है, फिर दक्षिण द्वार से बाहर ले जाकर नगर के दक्षिण में उसका सिर काट दिया जाता है। तब लोग उसके बारे में ऐसा कहते हैं— 'अरे! इस व्यक्ति ने क्या किया है कि इसे मजबूत रस्सी से पीछे हाथ बाँधकर, सिर मुंडवाकर, कर्कश स्वर वाले नगाड़े के साथ एक गली से दूसरी गली और एक चौराहे से दूसरे चौराहे पर घुमाया गया, और दक्षिण द्वार से बाहर ले जाकर नगर के दक्षिण में इसका सिर काटा जा रहा है?' तब लोग उसके बारे में ऐसा कहते हैं— 'अरे! इस व्यक्ति ने किसी गृहपति या गृहपति-पुत्र के विरुद्ध झूठ बोलकर उसका अहित किया है, इसलिए राजाओं ने इसे पकड़कर इस प्रकार का दंड दिया है।' हे ग्रामणी, तुम क्या सोचते हो, क्या तुमने ऐसा कभी देखा या सुना है?" "भन्ते, हमने देखा भी है, सुना भी है और आगे भी सुनेंगे।" "ग्रामणी, वहाँ जो वे श्रमण-ब्राह्मण ऐसा कहने वाले और ऐसी दृष्टि वाले हैं कि— 'जो कोई भी झूठ बोलता है, वह सब इसी जन्म में दुःख और मानसिक कष्ट का अनुभव करता है', तो क्या उन्होंने सच कहा है या झूठ?" "भन्ते, झूठ कहा है।" "परंतु जो वे व्यर्थ का झूठ बोलते हैं, वे शीलवान हैं या दुःशील?" "भन्ते, दुःशील हैं।" "जो वे दुःशील, पापी और मिथ्या-प्रतिपन्न (गलत आचरण वाले) हैं, वे क्या सम्यक्-प्रतिपन्न हैं?" "भन्ते, वे मिथ्या-प्रतिपन्न हैं।" "जो वे मिथ्या-प्रतिपन्न हैं, वे मिथ्या-दृष्टि वाले हैं या सम्यक्-दृष्टि वाले?" "भन्ते, वे मिथ्या-दृष्टि वाले हैं।" "जो वे मिथ्या-दृष्टि वाले हैं, क्या उनमें प्रसन्न होना (श्रद्धा रखना) उचित है?" "भन्ते, यह उचित नहीं है।" ‘‘อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต! อตฺถิ เม, ภนฺเต, อาวสถาคารํ. ตตฺถ อตฺถิ มญฺจกานิ, อตฺถิ อาสนานิ, อตฺถิ อุทกมณิโก, อตฺถิ เตลปฺปทีโป. ตตฺถ โย สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา วาสํ อุเปติ, เตนาหํ ยถาสตฺติ ยถาพลํ สํวิภชามิ. ภูตปุพฺพํ, ภนฺเต, จตฺตาโร สตฺถาโร นานาทิฏฺฐิกา นานาขนฺติกา นานารุจิกา, ตสฺมึ อาวสถาคาเร วาสํ อุปคจฺฉุํ’’. आश्चर्य है, भन्ते! अद्भुत है, भन्ते! भन्ते, मेरा एक विश्रामालय (सराय) है। वहाँ पलंग हैं, आसन हैं, पानी का घड़ा है और तेल का दीपक है। वहाँ जो भी श्रमण या ब्राह्मण ठहरने के लिए आता है, मैं अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार उसके साथ (इन वस्तुओं का) विभाजन करता हूँ (उन्हें उपलब्ध कराता हूँ)। भन्ते, पहले की बात है, अलग-अलग दृष्टि, अलग-अलग रुचि और अलग-अलग पसंद वाले चार शास्ता (गुरु) उस विश्रामालय में ठहरने के लिए आए थे। ‘‘เอโก สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – ‘นตฺถิ ทินฺนํ, นตฺถิ ยิฏฺฐํ, นตฺถิ หุตํ, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก. นตฺถิ อยํ โลโก, นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ มาตา, นตฺถิ ปิตา, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ โลเก สมณพฺราหฺมณา สมฺมคฺคตา สมฺมาปฏิปนฺนา เย อิมญฺจ โลกํ ปรญฺจ โลกํ สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา ปเวเทนฺตี’’’ติ. एक शास्ता (गुरु) इस वाद और इस दृष्टि वाले थे— 'दान का कोई फल नहीं है, यज्ञ का कोई फल नहीं है, हवन का कोई फल नहीं है, अच्छे और बुरे कर्मों का कोई फल या परिणाम नहीं है। न यह लोक है, न परलोक है, न माता है, न पिता है, न औपपातिक (स्वयं उत्पन्न होने वाले) प्राणी हैं; लोक में ऐसे कोई सम्यक् मार्ग पर चलने वाले और सम्यक् आचरण करने वाले श्रमण-ब्राह्मण नहीं हैं, जो इस लोक और परलोक को स्वयं उच्च ज्ञान से जानकर और साक्षात्कार कर प्रज्ञापित (उपदेश) करते हों।' ‘‘เอโก สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – ‘อตฺถิ ทินฺนํ, อตฺถิ ยิฏฺฐํ, อตฺถิ หุตํ, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก, อตฺถิ อยํ โลโก, อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ มาตา, อตฺถิ ปิตา, อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ โลเก สมณพฺราหฺมณา สมฺมคฺคตา สมฺมาปฏิปนฺนา, เย อิมญฺจ โลกํ ปรญฺจ โลกํ สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา ปเวเทนฺตี’’’ติ. एक शास्ता इस वाद और इस दृष्टि वाले थे— 'दान का फल है, यज्ञ का फल है, हवन का फल है, अच्छे और बुरे कर्मों का फल और परिणाम है, यह लोक है, परलोक है, माता है, पिता है, औपपातिक प्राणी हैं; लोक में ऐसे सम्यक् मार्ग पर चलने वाले और सम्यक् आचरण करने वाले श्रमण-ब्राह्मण हैं, जो इस लोक और परलोक को स्वयं उच्च ज्ञान से जानकर और साक्षात्कार कर प्रज्ञापित करते हों।' ‘‘เอโก สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – ‘กโรโต การยโต, ฉินฺทโต เฉทาปยโต, ปจโต ปาจาปยโต, โสจยโต โสจาปยโต, กิลมโต กิลมาปยโต, ผนฺทโต ผนฺทาปยโต, ปาณมติปาตยโต, อทินฺนํ อาทิยโต, สนฺธึ ฉินฺทโต, นิลฺโลปํ หรโต, เอกาคาริกํ [Pg.527] กโรโต, ปริปนฺเถ ติฏฺฐโต, ปรทารํ คจฺฉโต, มุสา ภณโต, กโรโต น กรียติ ปาปํ. ขุรปริยนฺเตน เจปิ จกฺเกน โย อิมิสฺสา ปถวิยา ปาเณ เอกํ มํสขลํ เอกํ มํสปุญฺชํ กเรยฺย, นตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, นตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. ทกฺขิณํ เจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย หนนฺโต ฆาเตนฺโต ฉินฺทนฺโต เฉทาเปนฺโต ปจนฺโต ปาจาเปนฺโต, นตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, นตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. อุตฺตรํ เจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย ททนฺโต ทาเปนฺโต ยชนฺโต ยชาเปนฺโต, นตฺถิ ตโตนิทานํ ปุญฺญํ, นตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม. ทาเนน ทเมน สํยเมน สจฺจวชฺเชน นตฺถิ ปุญฺญํ, นตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม’’’ติ. एक शास्ता इस वाद और इस दृष्टि वाले थे— 'करने वाले, कराने वाले, काटने वाले, कटाने वाले, कष्ट देने वाले, कष्ट दिलवाने वाले, शोक करने वाले, शोक करवाने वाले, थकाने वाले, थकवाने वाले, कँपाने वाले, कँपवाने वाले, प्राण हरने वाले, चोरी करने वाले, सेंध लगाने वाले, लूटपाट करने वाले, डकैती करने वाले, राहजनी करने वाले, परस्त्री-गमन करने वाले और झूठ बोलने वाले को कोई पाप नहीं लगता। यदि कोई छुरे की धार जैसे चक्र से इस पृथ्वी के प्राणियों का मांस का एक ढेर बना दे, तो भी उससे कोई पाप नहीं होता, न ही पाप का आगमन होता है। यदि कोई गंगा के दक्षिण तट पर जाकर हत्या करे, घात करे, काटे, कटवाए, कष्ट दे, कष्ट दिलवाए, तो भी उससे कोई पाप नहीं होता, न ही पाप का आगमन होता है। यदि कोई गंगा के उत्तर तट पर जाकर दान दे, दिलवाए, यज्ञ करे, करवाए, तो भी उससे कोई पुण्य नहीं होता, न ही पुण्य का आगमन होता है। दान, दम (इंद्रिय संयम), संयम और सत्य वचन से कोई पुण्य नहीं होता, न ही पुण्य का आगमन होता है।' ‘‘เอโก สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – ‘กโรโต การยโต, ฉินฺทโต เฉทาปยโต, ปจโต ปาจาปยโต, โสจยโต โสจาปยโต, กิลมโต กิลมาปยโต, ผนฺทโต ผนฺทาปยโต, ปาณมติปาตยโต, อทินฺนํ อาทิยโต, สนฺธึ ฉินฺทโต, นิลฺโลปํ หรโต, เอกาคาริกํ กโรโต, ปริปนฺเถ ติฏฺฐโต, ปรทารํ คจฺฉโต, มุสา ภณโต, กโรโต กรียติ ปาปํ. ขุรปริยนฺเตน เจปิ จกฺเกน โย อิมิสฺสา ปถวิยา ปาเณ เอกํ มํสขลํ เอกํ มํสปุญฺชํ กเรยฺย, อตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, อตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. ทกฺขิณํ เจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย หนนฺโต ฆาเตนฺโต ฉินฺทนฺโต เฉทาเปนฺโต ปจนฺโต ปาจาเปนฺโต, อตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, อตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. อุตฺตรํ เจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย ททนฺโต ทาเปนฺโต, ยชนฺโต ยชาเปนฺโต, อตฺถิ ตโตนิทานํ ปุญฺญํ, อตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม. ทาเนน ทเมน สํยเมน สจฺจวชฺเชน อตฺถิ ปุญฺญํ, อตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม’’’ติ. एक शास्ता (गुरु) का ऐसा वाद है, ऐसी दृष्टि है— 'करने वाले, कराने वाले, काटने वाले, कटाने वाले, पीटने वाले, पिटवाने वाले, शोक करने वाले, शोक कराने वाले, थकाने वाले, थकवाने वाले, कँपाने वाले, कँपवाने वाले, प्राणों का घात करने वाले, चोरी करने वाले, सेंध लगाने वाले, लूटपाट करने वाले, डकैती करने वाले, राहजनी करने वाले, परस्त्रीगमन करने वाले, झूठ बोलने वाले के द्वारा पाप किया जाता है (परन्तु वास्तव में पाप नहीं होता)। यदि कोई छुरे के समान धार वाले चक्र से इस पृथ्वी के प्राणियों का मांस का एक ढेर, मांस का एक पुंज बना दे, तो उस कारण से न तो पाप होता है और न ही पाप का आगमन होता है। यदि कोई गंगा के दक्षिण तट पर वध करता हुआ, वध कराता हुआ, काटता हुआ, कटाता हुआ, पीटता हुआ, पिटवाता हुआ जाए, तो उस कारण से न तो पाप होता है और न ही पाप का आगमन होता है। यदि कोई गंगा के उत्तर तट पर दान देता हुआ, दान दिलवाता हुआ, यज्ञ करता हुआ, यज्ञ करवाता हुआ जाए, तो उस कारण से न तो पुण्य होता है और न ही पुण्य का आगमन होता है। दान, दम, संयम और सत्य-वचन से न तो पुण्य होता है और न ही पुण्य का आगमन होता है'। ‘‘ตสฺส มยฺหํ, ภนฺเต, อหุเทว กงฺขา, อหุ วิจิกิจฺฉา – ‘โกสุ นาม อิเมสํ ภวตํ สมณพฺราหฺมณานํ สจฺจํ อาห, โก มุสา’’’ติ? भन्ते! इस विषय में मुझे शंका हुई, संदेह हुआ— 'इन पूजनीय श्रमण-ब्राह्मणों में से कौन सत्य कह रहा है और कौन झूठ?' ‘‘อลญฺหิ เต, คามณิ, กงฺขิตุํ, อลํ วิจิกิจฺฉิตุํ. กงฺขนีเย จ ปน เต ฐาเน วิจิกิจฺฉา อุปฺปนฺนา’’ติ. ‘‘เอวํ ปสนฺโนหํ, ภนฺเต, ภควติ. ปโหติ เม ภควา ตถา ธมฺมํ เทเสตุํ ยถาหํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺย’’นฺติ. गामणी! तुम्हें शंका होना उचित ही है, संदेह होना उचित ही है। संदेह करने योग्य स्थान पर ही तुम्हें संदेह उत्पन्न हुआ है। भन्ते! मैं भगवान् पर इस प्रकार प्रसन्न (श्रद्धावान) हूँ। भगवान् मुझे इस प्रकार धर्म का उपदेश देने में समर्थ हैं जिससे मैं इस शंका-रूपी धर्म (अवस्था) को त्याग सकूँ। ‘‘อตฺถิ, คามณิ, ธมฺมสมาธิ. ตตฺร เจ ตฺวํ จิตฺตสมาธึ ปฏิลเภยฺยาสิ. เอวํ ตฺวํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺยาสิ. กตโม จ, คามณิ, ธมฺมสมาธิ? อิธ, คามณิ, อริยสาวโก ปาณาติปาตํ ปหาย ปาณาติปาตา ปฏิวิรโต [Pg.528] โหติ, อทินฺนาทานํ ปหาย อทินฺนาทานา ปฏิวิรโต โหติ, กาเมสุมิจฺฉาจารํ ปหาย กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรโต โหติ, มุสาวาทํ ปหาย มุสาวาทา ปฏิวิรโต โหติ, ปิสุณํ วาจํ ปหาย ปิสุณาย วาจาย ปฏิวิรโต โหติ, ผรุสํ วาจํ ปหาย ผรุสาย วาจาย ปฏิวิรโต โหติ, สมฺผปฺปลาปํ ปหาย สมฺผปฺปลาปา ปฏิวิรโต โหติ, อภิชฺฌํ ปหาย อนภิชฺฌาลุ โหติ, พฺยาปาทปโทสํ ปหาย อพฺยาปนฺนจิตฺโต โหติ, มิจฺฉาทิฏฺฐึ ปหาย สมฺมาทิฏฺฐิโก โหติ. गामणी! 'धर्म-समाधि' होती है। यदि तुम उसमें 'चित्त-समाधि' प्राप्त कर लो, तो तुम इस शंका-रूपी धर्म को त्याग दोगे। और गामणी! धर्म-समाधि क्या है? गामणी! यहाँ आर्य श्रावक प्राणातिपात (हिंसा) को छोड़कर प्राणातिपात से विरत होता है; अदत्तादान (चोरी) को छोड़कर अदत्तादान से विरत होता है; काम-मिथ्याचार को छोड़कर काम-मिथ्याचार से विरत होता है; मृषावाद (झूठ) को छोड़कर मृषावाद से विरत होता है; पिशुन-वाचा (चुगली) को छोड़कर पिशुन-वाचा से विरत होता है; परुष-वाचा (कठोर वचन) को छोड़कर परुष-वाचा से विरत होता है; सम्फप्पलाप (व्यर्थ प्रलाप) को छोड़कर सम्फप्पलाप से विरत होता है; अभिध्या (लोभ) को छोड़कर अनभिध्यालु (लोभ-रहित) होता है; व्यापाद-प्रदोष (द्वेष) को छोड़कर अव्यापन्न-चित्त (द्वेष-रहित) होता है; और मिथ्या-दृष्टि को छोड़कर सम्यक्-दृष्टि वाला होता है। ‘‘ส โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต เมตฺตาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ, อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ เมตฺตาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. โส อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘ยฺวายํ สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – นตฺถิ ทินฺนํ, นตฺถิ ยิฏฺฐํ, นตฺถิ หุตํ, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก, นตฺถิ อยํ โลโก, นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ มาตา, นตฺถิ ปิตา, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ โลเก สมณพฺราหฺมณา, สมฺมคฺคตา สมฺมาปฏิปนฺนา เย อิมญฺจ โลกํ ปรญฺจ โลกํ สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา ปเวเทนฺตี’ติ. ‘สเจ ตสฺส โภโต สตฺถุโน สจฺจํ วจนํ, อปณฺณกตาย มยฺหํ, ยฺวาหํ น กิญฺจิ พฺยาพาเธมิ ตสํ วา ถาวรํ วา? อุภยเมตฺถ กฏคฺคาโห, ยํ จมฺหิ กาเยน สํวุโต วาจาย สํวุโต มนสา สํวุโต, ยญฺจ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิสฺสามี’ติ. ตสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ. ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ. ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวทยติ. สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อยํ โข, คามณิ, ธมฺมสมาธิ. ตตฺร เจ ตฺวํ จิตฺตสมาธึ ปฏิลเภยฺยาสิ, เอวํ ตฺวํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺยาสิ. गामणी! वह आर्य श्रावक इस प्रकार लोभ-रहित, द्वेष-रहित, मोह-रहित, सम्प्रजन्य (विवेक) युक्त और स्मृतिवान होकर मैत्री-पूर्ण चित्त से एक दिशा को व्याप्त कर विहार करता है, वैसे ही दूसरी, तीसरी और चौथी दिशा को। इस प्रकार ऊपर, नीचे, तिरछे, सर्वत्र, सभी प्राणियों को अपने समान मानते हुए, सम्पूर्ण लोक को मैत्री-पूर्ण चित्त से, जो विस्तृत, महान, अप्रमाण, वैर-रहित और द्वेष-रहित है, व्याप्त कर विहार करता है। वह इस प्रकार विचार करता है— 'जो यह शास्ता ऐसा कहने वाले और ऐसी दृष्टि वाले हैं कि— दान का कोई फल नहीं, यज्ञ का कोई फल नहीं, हवन का कोई फल नहीं, सुकृत और दुष्कृत कर्मों का कोई फल या विपाक नहीं, यह लोक नहीं है, परलोक नहीं है, माता नहीं है, पिता नहीं है, औपपातिक (स्वयं उत्पन्न होने वाले) प्राणी नहीं हैं, लोक में ऐसे सम्यक् मार्ग पर चलने वाले और सम्यक् प्रतिपन्न श्रमण-ब्राह्मण नहीं हैं जो इस लोक और परलोक को स्वयं अभिज्ञा (उच्च ज्ञान) से साक्षात् कर प्रवेदित (प्रकट) करते हों। यदि उन पूजनीय शास्ता का वचन सत्य है, तो भी मैं सुरक्षित हूँ क्योंकि मैं किसी भी त्रस (भयभीत होने वाले) या स्थावर (स्थिर) प्राणी को कष्ट नहीं पहुँचाता। यहाँ दोनों ही स्थितियों में मेरी जीत है— एक तो यह कि मैं काया, वाणी और मन से संयमित हूँ, और दूसरा यह कि शरीर टूटने पर मृत्यु के बाद मैं सुगति, स्वर्ग लोक में उत्पन्न होऊँगा।' ऐसा विचार करने पर उसे प्रमोद (हर्ष) उत्पन्न होता है। प्रमुदित होने पर प्रीति उत्पन्न होती है। प्रीति-युक्त मन वाले का शरीर शांत हो जाता है। शांत शरीर वाला सुख का अनुभव करता है। सुखी व्यक्ति का चित्त समाहित हो जाता है। गामणी! यही 'धर्म-समाधि' है। यदि तुम इसमें 'चित्त-समाधि' प्राप्त कर लो, तो तुम इस शंका-रूपी धर्म को त्याग दोगे। ‘‘ส โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต เมตฺตาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา [Pg.529] จตุตฺถํ, อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ เมตฺตาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. โส อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘ยฺวายํ สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – อตฺถิ ทินฺนํ, อตฺถิ ยิฏฺฐํ, อตฺถิ หุตํ, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก, อตฺถิ อยํ โลโก, อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ มาตา, อตฺถิ ปิตา, อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ โลเก สมณพฺราหฺมณา, สมฺมคฺคตา สมฺมาปฏิปนฺนา เย อิมญฺจ โลกํ ปรญฺจ โลกํ สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา ปเวเทนฺตี’ติ. ‘สเจ ตสฺส โภโต สตฺถุโน สจฺจํ วจนํ, อปณฺณกตาย มยฺหํ, ยฺวาหํ น กิญฺจิ พฺยาพาเธมิ ตสํ วา ถาวรํ วา? อุภยเมตฺถ กฏคฺคาโห, ยํ จมฺหิ กาเยน สํวุโต วาจาย สํวุโต มนสา สํวุโต, ยญฺจ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิสฺสามี’ติ. ตสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ. ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ. ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวทยติ. สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อยํ โข, คามณิ, ธมฺมสมาธิ. ตตฺร เจ ตฺวํ จิตฺตสมาธึ ปฏิลเภยฺยาสิ, เอวํ ตฺวํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺยาสิ. हे ग्रामणी! वह आर्य श्रावक इस प्रकार लोभ-रहित, द्वेष-रहित, मोह-रहित, सम्प्रजन्य (विवेकयुक्त) और स्मृतिमान होकर मैत्रीपूर्ण चित्त से एक दिशा को व्याप्त कर विहार करता है; वैसे ही दूसरी, वैसे ही तीसरी और वैसे ही चौथी दिशा को। इस प्रकार ऊपर, नीचे, तिरछे, सर्वत्र, सभी प्राणियों को अपने समान मानकर, सम्पूर्ण लोक को विशाल, महान, अप्रमाण, वैर-रहित और द्वेष-रहित मैत्रीपूर्ण चित्त से व्याप्त कर विहार करता है। वह इस प्रकार विचार करता है— 'जो यह शास्ता (गुरु) ऐसा कहने वाले और ऐसी दृष्टि वाले हैं कि— दान का फल है, यज्ञ का फल है, हवन का फल है, सुकृत और दुष्कृत कर्मों का फल और विपाक है, यह लोक है, परलोक है, माता है, पिता है, औपपातिक (स्वयं उत्पन्न होने वाले) प्राणी हैं; लोक में ऐसे श्रमण-ब्राह्मण हैं जो सम्यक् मार्ग पर स्थित और सम्यक् प्रतिपन्न हैं, जो इस लोक और परलोक को स्वयं उच्च ज्ञान (अभिज्ञा) से साक्षात् कर प्रज्ञापित करते हैं।' 'यदि उन आदरणीय शास्ता का वचन सत्य है, तो मेरे लिए यह सुरक्षित मार्ग है, क्योंकि मैं किसी भी त्रस (भयभीत होने वाले) या स्थावर (स्थिर) प्राणी को पीड़ित नहीं करता हूँ। यहाँ दोनों प्रकार से मेरी जीत है— क्योंकि मैं काया, वाणी और मन से संयमित हूँ, और शरीर छूटने के बाद, मृत्यु के उपरान्त मैं सुगति, स्वर्ग लोक में उत्पन्न होऊँगा।' उसे प्रमोद (प्रसन्नता) उत्पन्न होता है। प्रमोद होने पर प्रीति उत्पन्न होती है। प्रीति-युक्त चित्त वाले की काया शांत हो जाती है। शांत काया वाला सुख का अनुभव करता है। सुखी व्यक्ति का चित्त समाहित (एकाग्र) हो जाता है। हे ग्रामणी! यह 'धर्म-समाधि' है। यदि तुम इसमें 'चित्त-समाधि' प्राप्त कर लो, तो तुम इस संशय रूपी धर्म (संदेह) को त्याग दोगे। ‘‘ส โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต เมตฺตาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ, อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ เมตฺตาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. โส อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘ยฺวายํ สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – กโรโต การยโต, ฉินฺทโต เฉทาปยโต, ปจโต ปาจาปยโต, โสจยโต โสจาปยโต, กิลมโต กิลมาปยโต, ผนฺทโต ผนฺทาปยโต, ปาณมติปาตยโต, อทินฺนํ อาทิยโต, สนฺธึ ฉินฺทโต, นิลฺโลปํ หรโต, เอกาคาริกํ กโรโต, ปริปนฺเถ ติฏฺฐโต, ปรทารํ คจฺฉโต, มุสา ภณโต, กโรโต น กรียติ ปาปํ. ขุรปริยนฺเตน เจปิ จกฺเกน โย อิมิสฺสา ปถวิยา ปาเณ เอกํ มํสขลํ เอกํ มํสปุญฺชํ กเรยฺย, นตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, นตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. ทกฺขิณญฺเจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย หนนฺโต ฆาเตนฺโต ฉินฺทนฺโต เฉทาเปนฺโต ปจนฺโต ปาจาเปนฺโต, นตฺถิ ตโตนิทานํ [Pg.530] ปาปํ, นตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. อุตฺตรญฺเจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย ททนฺโต ทาเปนฺโต, ยชนฺโต ยชาเปนฺโต, นตฺถิ ตโตนิทานํ ปุญฺญํ, นตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม. ทาเนน ทเมน สํยเมน สจฺจวชฺเชน นตฺถิ ปุญฺญํ, นตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม’ติ. ‘สเจ ตสฺส โภโต สตฺถุโน สจฺจํ วจนํ, อปณฺณกตาย มยฺหํ, ยฺวาหํ น กิญฺจิ พฺยาพาเธมิ ตสํ วา ถาวรํ วา? อุภยเมตฺถ กฏคฺคาโห, ยํ จมฺหิ กาเยน สํวุโต วาจาย สํวุโต มนสา สํวุโต, ยญฺจ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิสฺสามี’ติ. ตสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ. ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ. ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวทยติ. สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อยํ โข, คามณิ, ธมฺมสมาธิ ตตฺร เจ ตฺวํ จิตฺตสมาธึ ปฏิลเภยฺยาสิ, เอวํ ตฺวํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺยาสิ. हे ग्रामणी! वह आर्य श्रावक इस प्रकार लोभ-रहित, द्वेष-रहित, मोह-रहित, सम्प्रजन्य और स्मृतिमान होकर मैत्रीपूर्ण चित्त से एक दिशा को व्याप्त कर विहार करता है; वैसे ही दूसरी, वैसे ही तीसरी और वैसे ही चौथी दिशा को। इस प्रकार ऊपर, नीचे, तिरछे, सर्वत्र, सभी प्राणियों को अपने समान मानकर, सम्पूर्ण लोक को विशाल, महान, अप्रमाण, वैर-रहित और द्वेष-रहित मैत्रीपूर्ण चित्त से व्याप्त कर विहार करता है। वह इस प्रकार विचार करता है— 'जो यह शास्ता ऐसा कहने वाले और ऐसी दृष्टि वाले हैं कि— करने वाले, कराने वाले, काटने वाले, कटाने वाले, पीटने वाले, पिटवाने वाले, शोक करने वाले, शोक कराने वाले, थकाने वाले, थकवाने वाले, कँपाने वाले, कँपवाने वाले, प्राण हरने वाले, चोरी करने वाले, सेंध लगाने वाले, लूटने वाले, डकैती करने वाले, राहजनी करने वाले, पर-स्त्री गमन करने वाले, झूठ बोलने वाले के लिए— पाप करने पर भी पाप नहीं होता। यदि कोई छुरे के समान धार वाले चक्र से इस पृथ्वी के प्राणियों का मांस का ढेर बना दे, तो भी उससे कोई पाप नहीं होता, न पाप का आगमन होता है। यदि कोई गंगा के दक्षिण तट पर जाकर वध करे, घात करे, छेदन करे, तो भी पाप नहीं होता। यदि कोई गंगा के उत्तर तट पर जाकर दान दे, यज्ञ करे, तो भी पुण्य नहीं होता। दान, दम, संयम और सत्य वचन से कोई पुण्य नहीं होता।' 'यदि उन आदरणीय शास्ता का वचन सत्य है, तो भी मेरे लिए यह सुरक्षित मार्ग है, क्योंकि मैं किसी भी त्रस या स्थावर प्राणी को पीड़ित नहीं करता हूँ। यहाँ दोनों प्रकार से मेरी जीत है— क्योंकि मैं काया, वाणी और मन से संयमित हूँ, और शरीर छूटने के बाद, मृत्यु के उपरान्त मैं सुगति, स्वर्ग लोक में उत्पन्न होऊँगा।' उसे प्रमोद उत्पन्न होता है। प्रमोद होने पर प्रीति उत्पन्न होती है। प्रीति-युक्त चित्त वाले की काया शांत हो जाती है। शांत काया वाला सुख का अनुभव करता है। सुखी व्यक्ति का चित्त समाहित हो जाता है। हे ग्रामणी! यह 'धर्म-समाधि' है। यदि तुम इसमें 'चित्त-समाधि' प्राप्त कर लो, तो तुम इस संशय रूपी धर्म को त्याग दोगे। ‘‘ส โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต เมตฺตาสหคเต เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ, อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ เมตฺตาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. โส อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘ยฺวายํ สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – กโรโต การยโต, ฉินฺทโต เฉทาปยโต, ปจโต ปาจาปยโต, โสจยโต โสจาปยโต, กิลมโต กิลมาปยโต, ผนฺทโต ผนฺทาปยโต, ปาณมติปาตยโต, อทินฺนํ อาทิยโต, สนฺธึ ฉินฺทโต, นิลฺโลปํ หรโต, เอกาคาริกํ กโรโต, ปริปนฺเถ ติฏฺฐโต, ปรทารํ คจฺฉโต, มุสา ภณโต, กโรโต กรียติ ปาปํ. ขุรปริยนฺเตน เจปิ จกฺเกน โย อิมิสฺสา ปถวิยา ปาเณ เอกํ มํสขลํ เอกํ มํสปุญฺชํ กเรยฺย, อตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, อตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. ทกฺขิณญฺเจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย หนนฺโต ฆาเตนฺโต ฉินฺทนฺโต เฉทาเปนฺโต ปจนฺโต ปาจาเปนฺโต, อตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, อตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. อุตฺตรญฺเจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย ททนฺโต ทาเปนฺโต, ยชนฺโต ยชาเปนฺโต, อตฺถิ ตโตนิทานํ [Pg.531] ปุญฺญํ, อตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม. ทาเนน ทเมน สํยเมน สจฺจวชฺเชน อตฺถิ ปุญฺญํ อตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโมติ. สเจ ตสฺส โภโต สตฺถุโน สจฺจํ วจนํ, อปณฺณกตาย มยฺหํ, ยฺวาหํ น กิญฺจิ พฺยาพาเธมิ ตสํ วา ถาวรํ วา? อุภยเมตฺถ กฏคฺคาโห, ยํ จมฺหิ กาเยน สํวุโต วาจาย สํวุโต มนสา สํวุโต, ยญฺจ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิสฺสามี’ติ. ตสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ. ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ. ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวทยติ. สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อยํ โข, คามณิ, ธมฺมสมาธิ. ตตฺร เจ ตฺวํ จิตฺตสมาธึ ปฏิลเภยฺยาสิ, เอวํ ตฺวํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺยาสิ. हे ग्रामणी! वह आर्य श्रावक इस प्रकार लोभ-रहित, द्वेष-रहित, मोह-रहित, सम्प्रजन्य-युक्त और स्मृतिमान होकर मैत्रीपूर्ण चित्त से एक दिशा को व्याप्त कर विहार करता है; वैसे ही दूसरी, वैसे ही तीसरी, वैसे ही चौथी। इस प्रकार ऊपर, नीचे, तिरछा, सर्वत्र, सबको अपने समान मानकर, इस सम्पूर्ण लोक को विशाल, महद्गत, अप्रमाण, वैर-रहित और व्यापाद-रहित मैत्रीपूर्ण चित्त से व्याप्त कर विहार करता है। वह इस प्रकार विचार करता है— 'यदि कोई शास्ता ऐसा कहने वाला और ऐसा देखने वाला हो कि— करने वाले, कराने वाले, काटने वाले, कटवाने वाले, यातना देने वाले, यातना दिलवाने वाले, शोक करने वाले, शोक करवाने वाले, थकाने वाले, थकवाने वाले, कँपाने वाले, कँपवाने वाले, प्राणघात करने वाले, चोरी करने वाले, सेंध लगाने वाले, लूटने वाले, एक घर में डकैती करने वाले, राहजनी करने वाले, परस्त्री-गमन करने वाले, झूठ बोलने वाले को पाप नहीं लगता। यदि कोई छुरे के समान तीक्ष्ण धार वाले चक्र से इस पृथ्वी के प्राणियों का मांस का एक ढेर बना दे, तो भी उससे पाप नहीं होता, न पाप का आगमन होता है। यदि कोई गंगा के दक्षिण तट पर जाकर हत्या करे, घात करे, छेदन करे, छेदवाए, यातना दे, यातना दिलवाए, तो भी उससे पाप नहीं होता, न पाप का आगमन होता है। यदि कोई गंगा के उत्तर तट पर जाकर दान दे, दिलवाए, यज्ञ करे, करवाए, तो भी उससे पुण्य नहीं होता, न पुण्य का आगमन होता है। दान, दम, संयम और सत्य-भाषण से पुण्य नहीं होता, न पुण्य का आगमन होता है। यदि उस शास्ता का वचन सत्य है, तो भी मैं सुरक्षित हूँ, क्योंकि मैं किसी भी त्रस (भयभीत होने वाले) या स्थावर (स्थिर) प्राणी को कष्ट नहीं पहुँचाता हूँ। यहाँ दोनों प्रकार से मेरी ही जीत है—एक तो यह कि मैं काया, वाणी और मन से संयमित हूँ, और दूसरा यह कि काया के भेद होने पर, मृत्यु के बाद मैं सुगति, स्वर्ग लोक में उत्पन्न होऊँगा।' इससे उसे प्रमोद उत्पन्न होता है। प्रमुदित होने पर प्रीति उत्पन्न होती है। प्रीति-युक्त चित्त वाले की काया प्रशान्त हो जाती है। प्रशान्त काया वाला सुख का अनुभव करता है। सुखी व्यक्ति का चित्त समाहित हो जाता है। हे ग्रामणी! यह 'धर्म-समाधि' है। यदि तुम इस (धर्म-समाधि) में चित्त-समाधि प्राप्त कर लो, तो तुम इस संशय रूपी धर्म का त्याग कर दोगे। ‘‘ส โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต กรุณาสหคเต เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ…เป… มุทิตาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ…เป…. हे ग्रामणी! वह आर्य श्रावक इस प्रकार लोभ-रहित, द्वेष-रहित, मोह-रहित, सम्प्रजन्य-युक्त और स्मृतिमान होकर करुणापूर्ण चित्त से एक दिशा को व्याप्त कर विहार करता है... (पे)... मुदितापूर्ण चित्त से एक दिशा को व्याप्त कर विहार करता है... (पे)... ‘‘ส โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต อุเปกฺขาสหคเต เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ, อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. โส อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘ยฺวายํ สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – นตฺถิ ทินฺนํ, นตฺถิ ยิฏฺฐํ, นตฺถิ หุตํ นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก, นตฺถิ อยํ โลโก นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ มาตา นตฺถิ ปิตา นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ โลเก สมณพฺราหฺมณา สมฺมคฺคตา สมฺมาปฏิปนฺนา เย อิมญฺจ โลกํ ปรญฺจ โลกํ สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา ปเวเทนฺตีติ. สเจ ตสฺส โภโต สตฺถุโน สจฺจํ วจนํ, อปณฺณกตาย มยฺหํ, ยฺวาหํ น กิญฺจิ พฺยาพาเธมิ ตสํ วา ถาวรํ วา? อุภยเมตฺถ กฏคฺคาโห, ยํ จมฺหิ กาเยน สํวุโต วาจาย สํวุโต มนสา สํวุโต, ยญฺจ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิสฺสามี’ติ. ตสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ. ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ. ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวทยติ. สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อยํ [Pg.532] โข, คามณิ, ธมฺมสมาธิ. ตตฺร เจ ตฺวํ จิตฺตสมาธึ ปฏิลเภยฺยาสิ, เอวํ ตฺวํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺยาสิ. हे ग्रामणी! वह आर्य श्रावक इस प्रकार लोभ-रहित, द्वेष-रहित, मोह-रहित, सम्प्रजन्य-युक्त और स्मृतिमान होकर उपेक्षापूर्ण चित्त से एक दिशा को व्याप्त कर विहार करता है; वैसे ही दूसरी, वैसे ही तीसरी, वैसे ही चौथी। इस प्रकार ऊपर, नीचे, तिरछा, सर्वत्र, सबको अपने समान मानकर, इस सम्पूर्ण लोक को विशाल, महद्गत, अप्रमाण, वैर-रहित और व्यापाद-रहित उपेक्षापूर्ण चित्त से व्याप्त कर विहार करता है। वह इस प्रकार विचार करता है— 'यदि कोई शास्ता ऐसा कहने वाला और ऐसा देखने वाला हो कि— दान का कोई फल नहीं है, यज्ञ का कोई फल नहीं है, हवन का कोई फल नहीं है, सुकृत और दुष्कृत कर्मों का कोई फल या विपाक नहीं है, यह लोक नहीं है, परलोक नहीं है, माता नहीं है, पिता नहीं है, औपपातिक प्राणी नहीं हैं, लोक में ऐसे सम्यक् मार्ग पर स्थित और सम्यक् प्रतिपन्न श्रमण-ब्राह्मण नहीं हैं जो इस लोक और परलोक को स्वयं जानकर और साक्षात्कार कर उपदेश देते हों। यदि उस शास्ता का वचन सत्य है, तो भी मैं सुरक्षित हूँ, क्योंकि मैं किसी भी त्रस या स्थावर प्राणी को कष्ट नहीं पहुँचाता हूँ। यहाँ दोनों प्रकार से मेरी ही जीत है—एक तो यह कि मैं काया, वाणी और मन से संयमित हूँ, और दूसरा यह कि काया के भेद होने पर, मृत्यु के बाद मैं सुगति, स्वर्ग लोक में उत्पन्न होऊँगा।' इससे उसे प्रमोद उत्पन्न होता है। प्रमुदित होने पर प्रीति उत्पन्न होती है। प्रीति-युक्त चित्त वाले की काया प्रशान्त हो जाती है। प्रशान्त काया वाला सुख का अनुभव करता है। सुखी व्यक्ति का चित्त समाहित हो जाता है। हे ग्रामणी! यह 'धर्म-समाधि' है। यदि तुम इसमें चित्त-समाधि प्राप्त कर लो, तो तुम इस संशय रूपी धर्म का त्याग कर दोगे। ‘‘ส โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต อุเปกฺขาสหคเต เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ, อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. โส อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘ยฺวายํ สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – อตฺถิ ทินฺนํ, อตฺถิ ยิฏฺฐํ, อตฺถิ หุตํ, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก, อตฺถิ อยํ โลโก อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ มาตา อตฺถิ ปิตา อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ โลเก สมณพฺราหฺมณา สมฺมคฺคตา สมฺมาปฏิปนฺนา เย อิมญฺจ โลกํ ปรญฺจ โลกํ สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา ปเวเทนฺตีติ. สเจ ตสฺส โภโต สตฺถุโน สจฺจํ วจนํ, อปณฺณกตาย มยฺหํ, ยฺวาหํ น กิญฺจิ พฺยาพาเธมิ ตสํ วา ถาวรํ วา? อุภยเมตฺถ กฏคฺคาโห, ยํ จมฺหิ กาเยน สํวุโต วาจาย สํวุโต มนสา สํวุโต, ยญฺจ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิสฺสามี’ติ. ตสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ. ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ. ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวทยติ. สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อยํ โข, คามณิ, ธมฺมสมาธิ. ตตฺร เจ ตฺวํ จิตฺตสมาธึ ปฏิลเภยฺยาสิ, เอวํ ตฺวํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺยาสิ. “हे ग्रामणी! वह आर्य श्रावक इस प्रकार लोभ-रहित, द्वेष-रहित, मोह-रहित, सम्प्रजन्य-युक्त और स्मृतिमान होकर उपेक्षा-युक्त चित्त से एक दिशा को व्याप्त कर विहार करता है; वैसे ही दूसरी, वैसे ही तीसरी और वैसे ही चौथी दिशा को। इस प्रकार ऊपर, नीचे, तिरछी, सर्वत्र, सबको अपने समान मानकर, सम्पूर्ण लोक को विशाल, महद्गत, अप्रमाण, वैर-रहित और व्यापाद-रहित उपेक्षा-युक्त चित्त से व्याप्त कर विहार करता है। वह इस प्रकार विचार करता है— ‘जो यह शास्ता ऐसा कहने वाले और ऐसी दृष्टि वाले हैं कि— दान (का फल) है, यज्ञ (का फल) है, हवन (का फल) है, सुकृत और दुष्कृत कर्मों का फल और विपाक है, यह लोक है, परलोक है, माता है, पिता है, औपपातिक सत्त्व हैं; लोक में ऐसे सम्यक् मार्ग पर स्थित और सम्यक् प्रतिपन्न श्रमण-ब्राह्मण हैं जो इस लोक और परलोक को स्वयं अभिज्ञा से साक्षात् कर प्रवेदित करते हैं। यदि उन आदरणीय शास्ता का वचन सत्य है, तो मेरा यह आचरण अचूक (सफल) होगा, क्योंकि मैं किसी भी त्रस (भयभीत होने वाले) या स्थावर (स्थिर) प्राणी को पीड़ित नहीं करता हूँ। यहाँ दोनों प्रकार से मेरी जीत (सफलता) है— क्योंकि मैं काय से संयमित हूँ, वाणी से संयमित हूँ, मन से संयमित हूँ; और क्योंकि काया के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात्, मैं सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होऊँगा।’ उसे प्रमोद उत्पन्न होता है। प्रमुदित होने पर प्रीति उत्पन्न होती है। प्रीति-युक्त मन वाले की काया प्रश्रब्ध (शांत) हो जाती है। प्रश्रब्ध-काय सुख का अनुभव करता है। सुखी पुरुष का चित्त समाहित हो जाता है। हे ग्रामणी! यह ‘धर्म-समाधि’ है। यदि तुम वहाँ ‘चित्त-समाधि’ को प्राप्त कर लो, तो तुम इस संशय रूपी धर्म का त्याग कर दोगे।” ‘‘ส โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต อุเปกฺขาสหคเต เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ, อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. โส อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘ยฺวายํ สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – กโรโต การยโต, เฉทโต เฉทาปยโต, ปจโต ปาจาปยโต, โสจยโต โสจาปยโต, กิลมโต กิลมาปยโต, ผนฺทโต ผนฺทาปยโต, ปาณมติปาตยโต, อทินฺนํ อาทิยโต, สนฺธึ ฉินฺทโต, นิลฺโลปํ หรโต, เอกาคาริกํ [Pg.533] กโรโต, ปริปนฺเถ ติฏฺฐโต, ปรทารํ คจฺฉโต, มุสา ภณโต, กโรโต น กรียติ ปาปํ. ขุรปริยนฺเตน เจปิ จกฺเกน โย อิมิสฺสา ปถวิยา ปาเณ เอกํ มํสขลํ เอกํ มํสปุญฺชํ กเรยฺย, นตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, นตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. ทกฺขิณญฺเจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย หนนฺโต ฆาเตนฺโต ฉินฺทนฺโต เฉทาเปนฺโต ปจนฺโต ปาจาเปนฺโต, นตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, นตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. อุตฺตรญฺเจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย ททนฺโต ทาเปนฺโต, ยชนฺโต ยชาเปนฺโต, นตฺถิ ตโตนิทานํ ปุญฺญํ, นตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม. ทาเนน ทเมน สํยเมน สจฺจวชฺเชน นตฺถิ ปุญฺญํ, นตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม’ติ. ‘สเจ ตสฺส โภโต สตฺถุโน สจฺจํ วจนํ, อปณฺณกตาย มยฺหํ, ยฺวาหํ น กิญฺจิ พฺยาพาเธมิ ตสํ วา ถาวรํ วา? อุภยเมตฺถ กฏคฺคาโห, ยํ จมฺหิ กาเยน สํวุโต วาจาย สํวุโต มนสา สํวุโต, ยญฺจ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิสฺสามี’ติ. ตสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ. ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ. ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวทยติ. สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อยํ โข, คามณิ, ธมฺมสมาธิ. ตตฺร เจ ตฺวํ จิตฺตสมาธึ ปฏิลเภยฺยาสิ, เอวํ ตฺวํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺยาสิ. “हे ग्रामणी! वह आर्य श्रावक इस प्रकार लोभ-रहित, द्वेष-रहित, मोह-रहित, सम्प्रजन्य-युक्त और स्मृतिमान होकर उपेक्षा-युक्त चित्त से एक दिशा को व्याप्त कर विहार करता है; वैसे ही दूसरी, वैसे ही तीसरी और वैसे ही चौथी दिशा को। इस प्रकार ऊपर, नीचे, तिरछी, सर्वत्र, सबको अपने समान मानकर, सम्पूर्ण लोक को विशाल, महद्गत, अप्रमाण, वैर-रहित और व्यापाद-रहित उपेक्षा-युक्त चित्त से व्याप्त कर विहार करता है। वह इस प्रकार विचार करता है— ‘जो यह शास्ता ऐसा कहने वाले और ऐसी दृष्टि वाले हैं कि— करने वाले, कराने वाले, काटने वाले, कटाने वाले, पकाने वाले, पकवाने वाले, शोक करने वाले, शोक कराने वाले, थकाने वाले, थकवाने वाले, कँपाने वाले, कँपवाने वाले, प्राणों का घात करने वाले, चोरी करने वाले, सेंध लगाने वाले, लूटने वाले, एक घर की डकैती करने वाले, राहजनी करने वाले, पर-स्त्री गमन करने वाले, झूठ बोलने वाले के लिए—पाप नहीं होता। यदि कोई छुरे की धार वाले चक्र से इस पृथ्वी के प्राणियों का मांस का ढेर बना दे, तो भी उससे होने वाला कोई पाप नहीं है, न पाप का आगमन है। यदि कोई गंगा के दक्षिण तट पर जाए और वध करे, घात करे, काटे, कटवाए, पकाए, पकवाए, तो भी उससे होने वाला कोई पाप नहीं है, न पाप का आगमन है। यदि कोई गंगा के उत्तर तट पर जाए और दान दे, दिलवाए, यज्ञ करे, करवाए, तो भी उससे होने वाला कोई पुण्य नहीं है, न पुण्य का आगमन है। दान, दम, संयम और सत्य-वचन से कोई पुण्य नहीं होता, न पुण्य का आगमन होता है।’ (वह विचार करता है—) ‘यदि उन आदरणीय शास्ता का वचन सत्य है, तो भी मेरा यह आचरण अचूक होगा, क्योंकि मैं किसी भी त्रस या स्थावर प्राणी को पीड़ित नहीं करता हूँ। यहाँ दोनों प्रकार से मेरी जीत है— क्योंकि मैं काय से संयमित हूँ, वाणी से संयमित हूँ, मन से संयमित हूँ; और क्योंकि काया के भेद होने पर, मृत्यु के पश्चात्, मैं सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होऊँगा।’ उसे प्रमोद उत्पन्न होता है। प्रमुदित होने पर प्रीति उत्पन्न होती है। प्रीति-युक्त मन वाले की काया प्रश्रब्ध हो जाती है। प्रश्रब्ध-काय सुख का अनुभव करता है। सुखी पुरुष का चित्त समाहित हो जाता है। हे ग्रामणी! यह ‘धर्म-समाधि’ है। यदि तुम वहाँ ‘चित्त-समाधि’ को प्राप्त कर लो, तो तुम इस संशय रूपी धर्म का त्याग कर दोगे।” ‘‘ส โข โส, คามณิ, อริยสาวโก เอวํ วิคตาภิชฺโฌ วิคตพฺยาปาโท อสมฺมูฬฺโห สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต อุเปกฺขาสหคเต เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ, อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. โส อิติ ปฏิสญฺจิกฺขติ – ‘ยฺวายํ สตฺถา เอวํวาที เอวํทิฏฺฐิ – กโรโต การยโต, ฉินฺทโต เฉทาปยโต, ปจโต ปาจาปยโต, โสจยโต โสจาปยโต, กิลมโต กิลมาปยโต, ผนฺทโต ผนฺทาปยโต, ปาณมติปาตยโต, อทินฺนํ อาทิยโต, สนฺธึ ฉินฺทโต, นิลฺโลปํ หรโต, เอกาคาริกํ กโรโต, ปริปนฺเถ ติฏฺฐโต, ปรทารํ คจฺฉโต, มุสา ภณโต, กโรโต กรียติ ปาปํ. ขุรปริยนฺเตน เจปิ จกฺเกน โย อิมิสฺสา ปถวิยา ปาเณ เอกํ มํสขลํ เอกํ มํสปุญฺชํ กเรยฺย, อตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, อตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. ทกฺขิณญฺเจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย หนนฺโต [Pg.534] ฆาเตนฺโต ฉินฺทนฺโต เฉทาเปนฺโต ปจนฺโต ปาจาเปนฺโต, อตฺถิ ตโตนิทานํ ปาปํ, อตฺถิ ปาปสฺส อาคโม. อุตฺตรญฺเจปิ คงฺคาย ตีรํ คจฺเฉยฺย ททนฺโต ทาเปนฺโต, ยชนฺโต ยชาเปนฺโต, อตฺถิ ตโตนิทานํ ปุญฺญํ, อตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม. ทาเนน ทเมน สํยเมน สจฺจวชฺเชน อตฺถิ ปุญฺญํ, อตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม’ติ. ‘สเจ ตสฺส โภโต สตฺถุโน สจฺจํ วจนํ, อปณฺณกตาย มยฺหํ, ยฺวาหํ น กิญฺจิ พฺยาพาเธมิ ตสํ วา ถาวรํ วา? อุภยเมตฺถ กฏคฺคาโห, ยํ จมฺหิ กาเยน สํวุโต วาจาย สํวุโต มนสา สํวุโต, ยญฺจ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิสฺสามี’ติ. ตสฺส ปาโมชฺชํ ชายติ. ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ. ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ. ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวทยติ. สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อยํ โข, คามณิ, ธมฺมสมาธิ. ตตฺร เจ ตฺวํ จิตฺตสมาธึ ปฏิลเภยฺยาสิ, เอวํ ตฺวํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺยาสี’’ติ. “हे गामणि, वह आर्य श्रावक इस प्रकार लोभ-रहित, द्वेष-रहित, मोह-रहित, सम्प्रजन्ययुक्त (सजग) और स्मृतिमान होकर उपेक्षा-युक्त चित्त से एक दिशा को व्याप्त कर विहार करता है, वैसे ही दूसरी, वैसे ही तीसरी और वैसे ही चौथी दिशा को; इस प्रकार ऊपर, नीचे, तिरछे, सर्वत्र, सभी प्राणियों को अपने समान समझते हुए, सम्पूर्ण लोक को उपेक्षा-युक्त चित्त से, जो विस्तृत, महान, अप्रमाण, वैर-रहित और व्यापाद-रहित (द्वेष-रहित) है, व्याप्त कर विहार करता है। वह इस प्रकार विचार करता है— ‘जो यह शास्ता (गुरु) इस प्रकार के वादी और ऐसी दृष्टि वाले हैं कि— करने वाले, कराने वाले, काटने वाले, कटवाने वाले, पकाने वाले, पकवाने वाले, शोक करने वाले, शोक करवाने वाले, थकाने वाले, थकवाने वाले, कँपाने वाले, कँपवाने वाले, प्राणों का घात करने वाले, चोरी करने वाले, सेंध लगाने वाले, लूटने वाले, डकैती करने वाले, राहजनी करने वाले, परस्त्रीगमन करने वाले, झूठ बोलने वाले के द्वारा पाप किया जाने पर भी पाप नहीं होता। यदि कोई छुरे के समान धार वाले चक्र से इस पृथ्वी के प्राणियों का एक मांस का ढेर या मांस का पुंज बना दे, तो भी उस कारण से कोई पाप नहीं होता, न ही पाप का आगमन होता है। यदि कोई गंगा के दक्षिण तट पर वध करता हुआ, वध करवाता हुआ, काटता हुआ, कटवाता हुआ, पकाता हुआ, पकवाता हुआ जाए, तो भी उस कारण से कोई पाप नहीं होता, न ही पाप का आगमन होता है। यदि कोई गंगा के उत्तर तट पर दान देता हुआ, दान दिलवाता हुआ, यज्ञ करता हुआ, यज्ञ करवाता हुआ जाए, तो भी उस कारण से कोई पुण्य नहीं होता, न ही पुण्य का आगमन होता है। दान, दम (इन्द्रिय संयम), संयम और सत्य वचन से न पुण्य होता है, न पुण्य का आगमन होता है’— यदि उन पूज्य शास्ता के वचन सत्य हैं, तो मुझ जैसे व्यक्ति के लिए, जो किसी भी त्रस (चलायमान) या स्थावर (स्थिर) प्राणी को कष्ट नहीं पहुँचाता, यह प्रतिपदा (आचरण) निष्पाप होने के कारण कल्याणकारी है। यहाँ दोनों ही स्थितियों में मेरी जीत है— क्योंकि मैं काया से संयमित हूँ, वाणी से संयमित हूँ, मन से संयमित हूँ; और शरीर टूटने के बाद, मृत्यु के उपरांत मैं सुगति, स्वर्ग लोक में उत्पन्न होऊँगा।’ ऐसा विचार करने पर उसे प्रमोद (प्रसन्नता) उत्पन्न होता है। प्रमुदित व्यक्ति को प्रीति उत्पन्न होती है। प्रीति-युक्त मन वाले की काया शांत हो जाती है। शांत काया वाला सुख का अनुभव करता है। सुखी व्यक्ति का चित्त समाहित हो जाता है। हे गामणि, यही धर्म-समाधि है। यदि तुम इस धर्म-समाधि में स्थित होकर चित्त की समाधि (लोकोत्तर मार्ग समाधि) प्राप्त कर लो, तो तुम इस संशय रूपी धर्म का त्याग कर दोगे।” เอวํ วุตฺเต, ปาฏลิโย คามณิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต, อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต…เป… อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. เตรสมํ. ऐसा कहे जाने पर, पाटलि गामणि ने भगवान से यह कहा— “अद्भुत, भन्ते! अद्भुत, भन्ते! ... आज से मुझे जीवन भर के लिए शरण में आया हुआ उपासक स्वीकार करें।” तेरहवाँ (सुत्त समाप्त)। คามณิสํยุตฺตํ สมตฺตํ. गामणि संयुत्त समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – इसका सारांश (उदान) इस प्रकार है— จณฺโฑ ปุโฏ โยธาชีโว, หตฺถสฺโส อสิพนฺธโก; เทสนา สงฺขกุลํ มณิจูฬํ, ภทฺรราสิยปาฏลีติ. चण्ड, पुट, योधानीव, हत्थिस्स, असिबन्धक; देसना, संखकुल, मणिचूळ, भद्ररासिय और पाटलि। ๙. อสงฺขตสํยุตฺตํ ९. असंस्कृत संयुत्त ๑. ปฐมวคฺโค १. प्रथम वर्ग ๑. กายคตาสติสุตฺตํ १. कायगतासति सुत्त ๓๖๖. สาวตฺถินิทานํ[Pg.535]. ‘‘อสงฺขตญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อสงฺขตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อสงฺขตํ? โย, ภิกฺขเว, ราคกฺขโย โทสกฺขโย โมหกฺขโย – อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตํ. กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? กายคตาสติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค’’. ३६६. श्रावस्ती निदान। “भिक्षुओं, मैं तुम्हें असंस्कृत (निर्वाण) और असंस्कृत तक जाने वाले मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, असंस्कृत क्या है? भिक्षुओं, जो राग का क्षय है, द्वेष का क्षय है, मोह का क्षय है— भिक्षुओं, इसे असंस्कृत कहा जाता है। और भिक्षुओं, असंस्कृतगामी मार्ग क्या है? कायगतासति (शरीर के प्रति स्मृति)। भिक्षुओं, इसे असंस्कृतगामी मार्ग कहा जाता है।” ‘‘อิติ โข, ภิกฺขเว, เทสิตํ โว มยา อสงฺขตํ, เทสิโต อสงฺขตคามิมคฺโค. ยํ, ภิกฺขเว, สตฺถารา กรณียํ สาวกานํ หิเตสินา อนุกมฺปเกน อนุกมฺปํ อุปาทาย, กตํ โว ตํ มยา. เอตานิ, ภิกฺขเว, รุกฺขมูลานิ, เอตานิ สุญฺญาคารานิ. ฌายถ, ภิกฺขเว, มา ปมาทตฺถ; มา ปจฺฉา วิปฺปฏิสาริโน อหุวตฺถ. อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนี’’ติ. ปฐมํ. “भिक्षुओं, इस प्रकार मैंने तुम्हें असंस्कृत का उपदेश दिया, असंस्कृतगामी मार्ग का उपदेश दिया। भिक्षुओं, जो एक हितैषी और अनुकम्पा करने वाले शास्ता को अपने श्रावकों के लिए अनुकम्पा वश करना चाहिए, वह मैंने तुम्हारे लिए कर दिया है। भिक्षुओं, ये वृक्षों के मूल हैं, ये शून्यागार (एकांत स्थान) हैं। भिक्षुओं, ध्यान करो, प्रमाद मत करो; बाद में पश्चाताप करने वाले मत बनो। यही तुम्हारे लिए हमारा अनुशासन (शिक्षा) है।” प्रथम (सुत्त)। ๒. สมถวิปสฺสนาสุตฺตํ २. शमथ-विपश्यना सुत्त ๓๖๗. ‘‘อสงฺขตญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อสงฺขตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อสงฺขตํ? โย, ภิกฺขเว, ราคกฺขโย โทสกฺขโย โมหกฺขโย – อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตํ. กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? สมโถ จ วิปสฺสนา จ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. ทุติยํ. ३६७. “भिक्षुओं, मैं तुम्हें असंस्कृत और असंस्कृतगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, असंस्कृत क्या है? भिक्षुओं, जो राग का क्षय, द्वेष का क्षय और मोह का क्षय है— इसे असंस्कृत कहा जाता है। और भिक्षुओं, असंस्कृतगामी मार्ग क्या है? शमथ और विपश्यना। भिक्षुओं, इसे असंस्कृतगामी मार्ग कहा जाता है...।” द्वितीय (सुत्त)। ๓. สวิตกฺกสวิจารสุตฺตํ ३. सवितर्क-सविचार सुत्त ๓๖๘. ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? สวิตกฺกสวิจาโร สมาธิ, อวิตกฺกวิจารมตฺโต สมาธิ, อวิตกฺกอวิจาโร สมาธิ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. ตติยํ. ३६८. “भिक्षुओं, असंस्कृतगामी मार्ग क्या है? सवितर्क-सविचार समाधि, अवितर्क-विचारमात्र समाधि, और अवितर्क-अविचार समाधि— भिक्षुओं, इसे असंस्कृतगामी मार्ग कहा जाता है...।” तृतीय (सुत्त)। ๔. สุญฺญตสมาธิสุตฺตํ ४. शून्यता समाधि सुत्त ๓๖๙. ‘‘กตโม [Pg.536] จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? สุญฺญโต สมาธิ, อนิมิตฺโต สมาธิ, อปฺปณิหิโต สมาธิ – อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. จตุตฺถํ. ३६९. “भिक्षुओं, असंस्कृतगामी मार्ग क्या है? शून्यता समाधि, अनिमित्त समाधि और अप्रणिहित समाधि— भिक्षुओं, इसे असंस्कृतगामी मार्ग कहा जाता है...।” चतुर्थ (सुत्त)। ๕. สติปฏฺฐานสุตฺตํ ५. स्मृतिप्रस्थान सुत्त ๓๗๐. ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? จตฺตาโร สติปฏฺฐานา. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. ปญฺจมํ. ३७०. “भिक्षुओं, असंस्कृतगामी मार्ग क्या है? चार स्मृतिप्रस्थान। भिक्षुओं, इसे असंस्कृतगामी मार्ग कहा जाता है...।” पंचम (सुत्त)। ๖. สมฺมปฺปธานสุตฺตํ ६. सम्यक् प्रधान सुत्त ๓๗๑. ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? จตฺตาโร สมฺมปฺปธานา. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. ฉฏฺฐํ. ३७१. “भिक्षुओं, असंस्कृतगामी मार्ग क्या है? चार सम्यक् प्रधान। भिक्षुओं, इसे असंस्कृतगामी मार्ग कहा जाता है...।” छठा (सुत्त)। ๗. อิทฺธิปาทสุตฺตํ ७. ऋद्धिपाद सुत्त ๓๗๒. ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? จตฺตาโร อิทฺธิปาทา. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. สตฺตมํ. ३७२. “भिक्षुओं, असंस्कृतगामी मार्ग क्या है? चार ऋद्धिपाद। भिक्षुओं, इसे असंस्कृतगामी मार्ग कहा जाता है...।” सातवाँ (सुत्त)। ๘. อินฺทฺริยสุตฺตํ ८. इन्द्रिय सुत्त ๓๗๓. ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? ปญฺจินฺทฺริยานิ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. อฏฺฐมํ. ३७३. “भिक्षुओं, असंस्कृतगामी मार्ग क्या है? पाँच इन्द्रियाँ। भिक्षुओं, इसे असंस्कृतगामी मार्ग कहा जाता है...।” आठवाँ (सुत्त)। ๙. พลสุตฺตํ ९. बल सुत्त ๓๗๔. ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? ปญฺจ พลานิ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. นวมํ. ३७४. भिक्षुओं! असंस्कृत (निर्वाण) की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? पाँच बल। भिक्षुओं! इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है... (विस्तार)... नौवाँ। ๑๐. โพชฺฌงฺคสุตฺตํ १०. बोध्यंग सुत्त ๓๗๕. ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? สตฺต โพชฺฌงฺคา. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. ทสมํ. ३७५. भिक्षुओं! असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? सात बोध्यंग। भिक्षुओं! इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है... (विस्तार)... दसवाँ। ๑๑. มคฺคงฺคสุตฺตํ ११. मार्ग सुत्त ๓๗๖. ‘‘กตโม [Pg.537] จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค. อิติ โข, ภิกฺขเว, เทสิตํ โว มยา อสงฺขตํ, เทสิโต อสงฺขตคามิมคฺโค. ยํ, ภิกฺขเว, สตฺถารา กรณียํ สาวกานํ หิเตสินา อนุกมฺปเกน อนุกมฺปํ อุปาทาย กตํ โว ตํ มยา. เอตานิ, ภิกฺขเว, รุกฺขมูลานิ, เอตานิ สุญฺญาคารานิ. ฌายถ, ภิกฺขเว, มา ปมาทตฺถ; มา ปจฺฉา วิปฺปฏิสาริโน อหุวตฺถ. อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนี’’ติ. เอกาทสมํ. ३७६. भिक्षुओं! असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? आर्य अष्टांगिक मार्ग। भिक्षुओं! इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है। इस प्रकार, भिक्षुओं! मैंने तुम्हें असंस्कृत का उपदेश दिया है, और असंस्कृत की ओर ले जाने वाले मार्ग का उपदेश दिया है। भिक्षुओं! शिष्यों का हित चाहने वाले, अनुकम्पा करने वाले शास्ता द्वारा अनुकम्पा के कारण जो किया जाना चाहिए, वह मैंने तुम्हारे लिए कर दिया है। भिक्षुओं! ये वृक्षों की जड़ें हैं, ये शून्य आवास हैं। भिक्षुओं! ध्यान करो, प्रमाद मत करो; बाद में पश्चाताप करने वाले मत बनो। यही तुम्हारे लिए हमारा अनुशासन है। ग्यारहवाँ। ปฐโม วคฺโค. प्रथम वर्ग। ตสฺสุทฺทานํ – उसका उदान (सारांश) — กาโย สมโถ สวิตกฺโก, สุญฺญโต สติปฏฺฐานา; สมฺมปฺปธานา อิทฺธิปาทา, อินฺทฺริยพลโพชฺฌงฺคา; มคฺเคน เอกาทสมํ, ตสฺสุทฺทานํ ปวุจฺจติ. काया, शमथ, सवितर्क, शून्यत, स्मृतिप्रस्थान, सम्यक् प्रधान, ऋद्धिपाद, इन्द्रिय, बल, बोध्यंग और मार्ग के साथ ग्यारहवाँ; यह उदान कहा जाता है। ๒. ทุติยวคฺโค २. द्वितीय वर्ग ๑. อสงฺขตสุตฺตํ १. असंस्कृत सुत्त ๓๗๗. ‘‘อสงฺขตญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อสงฺขตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อสงฺขตํ? โย, ภิกฺขเว, ราคกฺขโย โทสกฺขโย โมหกฺขโย – อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตํ. กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? สมโถ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค. อิติ โข, ภิกฺขเว, เทสิตํ โว มยา อสงฺขตํ, เทสิโต อสงฺขตคามิมคฺโค. ยํ, ภิกฺขเว, สตฺถารา กรณียํ สาวกานํ หิเตสินา อนุกมฺปเกน อนุกมฺปํ อุปาทาย, กตํ โว ตํ มยา. เอตานิ, ภิกฺขเว, รุกฺขมูลานิ, เอตานิ สุญฺญาคารานิ. ฌายถ, ภิกฺขเว, มา ปมาทตฺถ; มา ปจฺฉา วิปฺปฏิสาริโน อหุวตฺถ. อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนีติ. ३७७. भिक्षुओं! मैं तुम्हें असंस्कृत और असंस्कृत की ओर ले जाने वाले मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। और भिक्षुओं! असंस्कृत क्या है? भिक्षुओं! जो राग का क्षय, द्वेष का क्षय और मोह का क्षय है—इसे असंस्कृत कहा जाता है। और भिक्षुओं! असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? शमथ। भिक्षुओं! इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है। इस प्रकार, भिक्षुओं! मैंने तुम्हें असंस्कृत का उपदेश दिया है, और असंस्कृत की ओर ले जाने वाले मार्ग का उपदेश दिया है। भिक्षुओं! शिष्यों का हित चाहने वाले, अनुकम्पा करने वाले शास्ता द्वारा अनुकम्पा के कारण जो किया जाना चाहिए, वह मैंने तुम्हारे लिए कर दिया है। भिक्षुओं! ये वृक्षों की जड़ें हैं, ये शून्य आवास हैं। भिक्षुओं! ध्यान करो, प्रमाद मत करो; बाद में पश्चाताप करने वाले मत बनो। यही तुम्हारे लिए हमारा अनुशासन है। ‘‘อสงฺขตญฺจ [Pg.538] โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อสงฺขตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อสงฺขตํ? โย, ภิกฺขเว, ราคกฺขโย โทสกฺขโย โมหกฺขโย – อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตํ. กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? วิปสฺสนา. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค. อิติ โข, ภิกฺขเว, เทสิตํ โว มยา อสงฺขตํ…เป… อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนีติ. भिक्षुओं! मैं तुम्हें असंस्कृत और असंस्कृत की ओर ले जाने वाले मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। और भिक्षुओं! असंस्कृत क्या है? भिक्षुओं! जो राग का क्षय, द्वेष का क्षय और मोह का क्षय है—इसे असंस्कृत कहा जाता है। और भिक्षुओं! असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? विपश्यना। भिक्षुओं! इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है। इस प्रकार, भिक्षुओं! मैंने तुम्हें असंस्कृत का उपदेश दिया है... (विस्तार)... यही तुम्हारे लिए हमारा अनुशासन है। ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? สวิตกฺโก สวิจาโร สมาธิ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อวิตกฺโก วิจารมตฺโต สมาธิ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อวิตกฺโก อวิจาโร สมาธิ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. भिक्षुओं! असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? सवितर्क सविचार समाधि। भिक्षुओं! इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है... और भिक्षुओं! असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? अवितर्क विचारमात्र समाधि। भिक्षुओं! इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है... और भिक्षुओं! असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? अवितर्क अविचार समाधि। भिक्षुओं! इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है...। ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? สุญฺญโต สมาธิ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อนิมิตฺโต สมาธิ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อปฺปณิหิโต สมาธิ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. भिक्षुओं! असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? शून्यत समाधि। भिक्षुओं! इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है... और भिक्षुओं! असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? अनिमित्त समाधि। भिक्षुओं! इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है... और भिक्षुओं! असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? अप्रणिहित समाधि। भिक्षुओं! इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है...। ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เวทนาสุ เวทนานุปสฺสี วิหรติ…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสี…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. भिक्षुओं! असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? भिक्षुओं! यहाँ एक भिक्षु काया में कायानुपश्यी होकर विहार करता है, जो उत्साही, सम्प्रजन्ययुक्त और स्मृतिमान होता है, और लोक में अभिध्या और दौर्मनस्य को दूर कर देता है। भिक्षुओं! इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है... और भिक्षुओं! असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? भिक्षुओं! यहाँ एक भिक्षु वेदनाओं में वेदनानुपश्यी होकर विहार करता है... (विस्तार)... इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है... और भिक्षुओं! असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? भिक्षुओं! यहाँ एक भिक्षु चित्त में चित्तानुपश्यी होकर विहार करता है... (विस्तार)... इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है... और भिक्षुओं! असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? भिक्षुओं! यहाँ एक भिक्षु धर्मों में धर्मानुपश्यी होकर विहार करता है... (विस्तार)... इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है...। ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อนุปฺปนฺนานํ ปาปกานํ อกุสลานํ ธมฺมานํ อนุปฺปาทา ฉนฺทํ ชเนติ วายมติ วีริยํ อารภติ จิตฺตํ ปคฺคณฺหาติ ปทหติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อุปฺปนฺนานํ [Pg.539] ปาปกานํ อกุสลานํ ธมฺมานํ ปหานา ฉนฺทํ ชเนติ วายมติ วีริยํ อารภติ จิตฺตํ ปคฺคณฺหาติ ปทหติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อนุปฺปนฺนานํ กุสลานํ ธมฺมานํ อุปฺปาทา ฉนฺทํ ชเนติ วายมติ วีริยํ อารภติ จิตฺตํ ปคฺคณฺหาติ ปทหติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อุปฺปนฺนานํ กุสลานํ ธมฺมานํ ฐิติยา อสมฺโมสาย ภิยฺโยภาวาย เวปุลฺลาย ภาวนาย ปาริปูริยา ฉนฺทํ ชเนติ วายมติ วีริยํ อารภติ จิตฺตํ ปคฺคณฺหาติ ปทหติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. "भिक्षुओं, असंस्कृत (असंखत) की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? यहाँ, भिक्षुओं, एक भिक्षु अनुत्पन्न पापमय अकुशल धर्मों के अनुत्पाद के लिए छन्द (इच्छा) उत्पन्न करता है, प्रयत्न करता है, वीर्य आरम्भ करता है, चित्त को प्रगृहीत करता है और परिश्रम (प्रधान) करता है। भिक्षुओं, इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है। ...पे... भिक्षुओं, असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? यहाँ, भिक्षुओं, एक भिक्षु उत्पन्न पापमय अकुशल धर्मों के प्रहाण के लिए छन्द उत्पन्न करता है, प्रयत्न करता है, वीर्य आरम्भ करता है, चित्त को प्रगृहीत करता है और परिश्रम करता है। भिक्षुओं, इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है। ...पे... भिक्षुओं, असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? यहाँ, भिक्षुओं, एक भिक्षु अनुत्पन्न कुशल धर्मों के उत्पाद के लिए छन्द उत्पन्न करता है, प्रयत्न करता है, वीर्य आरम्भ करता है, चित्त को प्रगृहीत करता है और परिश्रम करता है। भिक्षुओं, इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है। ...पे... भिक्षुओं, असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? यहाँ, भिक्षुओं, एक भिक्षु उत्पन्न कुशल धर्मों की स्थिति, असंमोह (न भूलने), वृद्धि, विपुलता, भावना और परिपूर्णता के लिए छन्द उत्पन्न करता है, प्रयत्न करता है, वीर्य आरम्भ करता है, चित्त को प्रगृहीत करता है और परिश्रम करता है। भिक्षुओं, इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है।" ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ฉนฺทสมาธิปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค …เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ วีริยสมาธิปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จิตฺตสมาธิปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ วีมํสสมาธิปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. "भिक्षुओं, असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? यहाँ, भिक्षुओं, एक भिक्षु छन्द-समाधि-प्रधान-संस्कार से युक्त ऋद्धिपाद की भावना करता है। भिक्षुओं, इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है। ...पे... भिक्षुओं, असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? यहाँ, भिक्षुओं, एक भिक्षु वीर्य-समाधि-प्रधान-संस्कार से युक्त ऋद्धिपाद की भावना करता है। भिक्षुओं, इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है। ...पे... भिक्षुओं, असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? यहाँ, भिक्षुओं, एक भिक्षु चित्त-समाधि-प्रधान-संस्कार से युक्त ऋद्धिपाद की भावना करता है। भिक्षुओं, इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है। ...पे... भिक्षुओं, असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? यहाँ, भिक्षुओं, एक भिक्षु विमंसा-समाधि-प्रधान-संस्कार से युक्त ऋद्धिपाद की भावना करता है। भिक्षुओं, इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है।" ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สทฺธินฺทฺริยํ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิตํ วิราคนิสฺสิตํ นิโรธนิสฺสิตํ โวสฺสคฺคปริณามึ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ วีริยินฺทฺริยํ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิตํ…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สตินฺทฺริยํ ภาเวติ…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมาธินฺทฺริยํ ภาเวติ…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ปญฺญินฺทฺริยํ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิตํ วิราคนิสฺสิตํ [Pg.540] นิโรธนิสฺสิตํ โวสฺสคฺคปริณามึ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. "भिक्षुओं, असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? यहाँ, भिक्षुओं, एक भिक्षु श्रद्धा-इन्द्रिय की भावना करता है, जो विवेक-निश्रित, विराग-निश्रित, निरोध-निश्रित और व्युत्सर्ग-परिणामी है। भिक्षुओं, इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है। ...पे... भिक्षुओं, असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? यहाँ, भिक्षुओं, एक भिक्षु वीर्य-इन्द्रिय की भावना करता है... स्मृति-इन्द्रिय की भावना करता है... समाधि-इन्द्रिय की भावना करता है... प्रज्ञा-इन्द्रिय की भावना करता है, जो विवेक-निश्रित, विराग-निश्रित, निरोध-निश्रित और व्युत्सर्ग-परिणामी है। भिक्षुओं, इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है।" ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สทฺธาพลํ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิตํ…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ วีริยพลํ ภาเวติ…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สติพลํ ภาเวติ…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมาธิพลํ ภาเวติ…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ปญฺญาพลํ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิตํ วิราคนิสฺสิตํ นิโรธนิสฺสิตํ โวสฺสคฺคปริณามึ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. "भिक्षुओं, असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? यहाँ, भिक्षुओं, एक भिक्षु श्रद्धा-बल की भावना करता है... वीर्य-बल की भावना करता है... स्मृति-बल की भावना करता है... समाधि-बल की भावना करता है... प्रज्ञा-बल की भावना करता है, जो विवेक-निश्रित, विराग-निश्रित, निरोध-निश्रित और व्युत्सर्ग-परिणामी है। भिक्षुओं, इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है।" ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สติสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ…เป… อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ธมฺมวิจยสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ…เป… วีริยสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ…เป… ปีติสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ…เป… ปสฺสทฺธิสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ…เป… สมาธิสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ…เป… อุเปกฺขาสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิตํ วิราคนิสฺสิตํ นิโรธนิสฺสิตํ โวสฺสคฺคปริณามึ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป…. "भिक्षुओं, असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कौन सा है? यहाँ, भिक्षुओं, एक भिक्षु स्मृति-सम्बोज्झंग की भावना करता है... धर्म-विचय-सम्बोज्झंग की भावना करता है... वीर्य-सम्बोज्झंग की भावना करता है... प्रीति-सम्बोज्झंग की भावना करता है... प्रश्रब्धि-सम्बोज्झंग की भावना करता है... समाधि-सम्बोज्झंग की भावना करता है... उपेक्षा-सम्बोज्झंग की भावना करता है, जो विवेक-निश्रित, विराग-निश्रित, निरोध-निश्रित और व्युत्सर्ग-परिणामी है। भिक्षुओं, इसे असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग कहा जाता है।" ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺมาทิฏฺฐึ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิตํ วิราคนิสฺสิตํ นิโรธนิสฺสิตํ โวสฺสคฺคปริณามึ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค…เป… กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺมาสงฺกปฺปํ ภาเวติ …เป… สมฺมาวาจํ ภาเวติ…เป… สมฺมากมฺมนฺตํ ภาเวติ…เป… สมฺมาอาชีวํ ภาเวติ…เป… สมฺมาวายามํ ภาเวติ…เป… สมฺมาสตึ ภาเวติ…เป… อสงฺขตญฺจ โว ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อสงฺขตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อสงฺขตํ…เป…? กตโม จ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺมาสมาธึ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิตํ วิราคนิสฺสิตํ นิโรธนิสฺสิตํ โวสฺสคฺคปริณามึ[Pg.541]. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อสงฺขตคามิมคฺโค. อิติ โข, ภิกฺขเว, เทสิตํ โว มยา อสงฺขตํ, เทสิโต อสงฺขตคามิมคฺโค. ยํ, ภิกฺขเว, สตฺถารา กรณียํ สาวกานํ หิเตสินา อนุกมฺปเกน อนุกมฺปํ อุปาทาย, กตํ โว ตํ มยา. เอตานิ, ภิกฺขเว, รุกฺขมูลานิ, เอตานิ สุญฺญาคารานิ. ฌายถ, ภิกฺขเว, มา ปมาทตฺถ; มา ปจฺฉา วิปฺปฏิสาริโน อหุวตฺถ. อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนี’’ติ. ปฐมํ. "भिक्षुओं, असंस्कृतगामी मार्ग (असंस्कृत की ओर ले जाने वाला मार्ग) कौन सा है? यहाँ, भिक्षुओं, एक भिक्षु सम्यक दृष्टि की भावना करता है, जो विवेक पर आश्रित है, विराग पर आश्रित है, निरोध पर आश्रित है और त्याग में परिणत होने वाली है। भिक्षुओं, इसे असंस्कृतगामी मार्ग कहा जाता है... भिक्षुओं, असंस्कृतगामी मार्ग कौन सा है? यहाँ, भिक्षुओं, एक भिक्षु सम्यक संकल्प की भावना करता है... सम्यक वाणी की भावना करता है... सम्यक कर्मान्त की भावना करता है... सम्यक आजीव की भावना करता है... सम्यक व्यायाम की भावना करता है... सम्यक स्मृति की भावना करता है... भिक्षुओं, मैं तुम्हें असंस्कृत और असंस्कृतगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, असंस्कृत क्या है?... भिक्षुओं, असंस्कृतगामी मार्ग कौन सा है? यहाँ, भिक्षुओं, एक भिक्षु सम्यक समाधि की भावना करता है, जो विवेक पर आश्रित है, विराग पर आश्रित है, निरोध पर आश्रित है और त्याग में परिणत होने वाली है। भिक्षुओं, इसे असंस्कृतगामी मार्ग कहा जाता है। भिक्षुओं, इस प्रकार मैंने तुम्हें असंस्कृत का उपदेश दिया है और असंस्कृतगामी मार्ग का उपदेश दिया है। भिक्षुओं, शिष्यों के हित की इच्छा रखने वाले, अनुकम्पा करने वाले शास्ता को अनुकम्पा के कारण जो करना चाहिए, वह मैंने तुम्हारे लिए कर दिया है। भिक्षुओं, ये वृक्षों के मूल हैं, ये शून्य आवास हैं। भिक्षुओं, ध्यान करो, प्रमाद मत करो; बाद में पश्चाताप मत करना। यह तुम्हारे लिए हमारा अनुशासन है।" प्रथम। ๒. อนตสุตฺตํ २. अनत सुत्त ๓๗๘. ‘‘อนตญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ, อนตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อนตํ…เป…’’. (ยถา อสงฺขตํ ตถา วิตฺถาเรตพฺพํ). ทุติยํ. ३७८. "भिक्षुओं, मैं तुम्हें अनत और अनतगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, अनत क्या है?... (जैसे असंस्कृत सुत्त में है, वैसे ही विस्तार करना चाहिए)। दूसरा।" ๓-๓๒. อนาสวาทิสุตฺตํ ३-३२. अनासव आदि सुत्त ๓๗๙-๔๐๘. ‘‘อนาสวญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อนาสวคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อนาสวํ…เป… สจฺจญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ สจฺจคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, สจฺจํ…เป… ปารญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ ปารคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ปารํ…เป… นิปุณญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ นิปุณคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, นิปุณํ…เป… สุทุทฺทสญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ สุทุทฺทสคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, สุทุทฺทสํ…เป… อชชฺชรญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อชชฺชรคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อชชฺชรํ…เป… ธุวญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ ธุวคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ธุวํ…เป… อปโลกิตญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อปโลกิตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อปโลกิตํ…เป… อนิทสฺสนญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อนิทสฺสนคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อนิทสฺสนํ…เป… นิปฺปปญฺจญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ นิปฺปปญฺจคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, นิปฺปปญฺจํ…เป…? 379-408. "भिक्षुओं, मैं तुम्हें अनासव और अनासवगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, अनासव क्या है?... भिक्षुओं, मैं तुम्हें सत्य और सत्यगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, सत्य क्या है?... भिक्षुओं, मैं तुम्हें पार और पारगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, पार क्या है?... भिक्षुओं, मैं तुम्हें निपुण और निपुणगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, निपुण क्या है?... भिक्षुओं, मैं तुम्हें सुदुर्दर्श और सुदुर्दर्शगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, सुदुर्दर्श क्या है?... भिक्षुओं, मैं तुम्हें अजज्जर और अजज्जरगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, अजज्जर क्या है?... भिक्षुओं, मैं तुम्हें ध्रुव और ध्रुवगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, ध्रुव क्या है?... भिक्षुओं, मैं तुम्हें अपलोकित और अपलोकितगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, अपलोकित क्या है?... भिक्षुओं, मैं तुम्हें अनिदर्शन और अनिदर्शनगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, अनिदर्शन क्या है?... भिक्षुओं, मैं तुम्हें निष्प्रपंच और निष्प्रपंचगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, निष्प्रपंच क्या है?..." ‘‘สนฺตญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ สนฺตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, สนฺตํ…เป… อมตญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อมตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อมตํ…เป… ปณีตญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ ปณีตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ปณีตํ…เป… สิวญฺจ โว, ภิกฺขเว[Pg.542], เทเสสฺสามิ สิวคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, สิวํ…เป… เขมญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ เขมคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, เขมํ…เป… ตณฺหากฺขยญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ ตณฺหากฺขยคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ตณฺหากฺขยํ…เป…? "भिक्षुओं, मैं तुम्हें शांत और शांतगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, शांत क्या है?... भिक्षुओं, मैं तुम्हें अमृत और अमृतगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, अमृत क्या है?... भिक्षुओं, मैं तुम्हें प्रणीत और प्रणीतगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, प्रणीत क्या है?... भिक्षुओं, मैं तुम्हें शिव और शिवगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, शिव क्या है?... भिक्षुओं, मैं तुम्हें क्षेम और क्षेमगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, क्षेम क्या है?... भिक्षुओं, मैं तुम्हें तृष्णा-क्षय और तृष्णा-क्षयगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, तृष्णा-क्षय क्या है?..." ‘‘อจฺฉริยญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อจฺฉริยคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อจฺฉริยํ…เป… อพฺภุตญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อพฺภุตคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อพฺภุตํ…เป… อนีติกญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อนีติกคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อนีติกํ…เป… อนีติกธมฺมญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อนีติกธมฺมคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อนีติกธมฺมํ…เป… นิพฺพานญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ นิพฺพานคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, นิพฺพานํ…เป… อพฺยาปชฺฌญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อพฺยาปชฺฌคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, อพฺยาปชฺฌํ…เป… วิราคญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ วิราคคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, วิราโค…เป…? "भिक्षुओं, मैं तुम्हें आश्चर्य और आश्चर्यगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, आश्चर्य क्या है?... भिक्षुओं, मैं तुम्हें अद्भुत और अद्भुतगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, अद्भुत क्या है?... भिक्षुओं, मैं तुम्हें अनीतिक और अनीतिकगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, अनीतिक क्या है?... भिक्षुओं, मैं तुम्हें अनीतिक-धर्म और अनीतिक-धर्मगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, अनीतिक-धर्म क्या है?... भिक्षुओं, मैं तुम्हें निर्वाण और निर्वाणगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, निर्वाण क्या है?... भिक्षुओं, मैं तुम्हें अव्यापज्झ और अव्यापज्झगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, अव्यापज्झ क्या है?... भिक्षुओं, मैं तुम्हें विराग और विरागगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं, विराग क्या है?..." ‘‘สุทฺธิญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ สุทฺธิคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมา จ, ภิกฺขเว, สุทฺธิ…เป… มุตฺติญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ มุตฺติคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมา จ, ภิกฺขเว, มุตฺติ…เป… อนาลยญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อนาลยคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตโม จ, ภิกฺขเว, อนาลโย…เป… ทีปญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ ทีปคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ทีปํ…เป… เลณญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ เลณคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, เลณํ…เป… ตาณญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ ตาณคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ตาณํ…เป… สรณญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ สรณคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, สรณํ…เป…อนุสาสนี’’ติ? พาตฺตึสติมํ. "भिक्षुओं! मैं तुम्हें शुद्धि और शुद्धिगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! शुद्धि क्या है? ... भिक्षुओं! मैं तुम्हें मुक्ति और मुक्तिगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! मुक्ति क्या है? ... भिक्षुओं! मैं तुम्हें अनालय और अनालयगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! अनालय क्या है? ... भिक्षुओं! मैं तुम्हें द्वीप और द्वीपगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! द्वीप क्या है? ... भिक्षुओं! मैं तुम्हें लेण और लेणगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! लेण क्या है? ... भिक्षुओं! मैं तुम्हें ताण और ताणगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! ताण क्या है? ... भिक्षुओं! मैं तुम्हें शरण और शरणगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! शरण क्या है? ... यह अनुशासन है।" (बत्तीसवाँ सुत्त) ๓๓. ปรายนสุตฺตํ ३३. परायण सुत्त ๔๐๙. ‘‘ปรายนญฺจ โว, ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ ปรายนคามิญฺจ มคฺคํ. ตํ สุณาถ. กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ปรายนํ? โย, ภิกฺขเว, ราคกฺขโย โทสกฺขโย [Pg.543] โมหกฺขโย – อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ปรายนํ. กตโม จ, ภิกฺขเว, ปรายนคามี มคฺโค? กายคตาสติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ปรายนคามิมคฺโค. อิติ โข, ภิกฺขเว, เทสิตํ โว มยา ปรายนํ, เทสิโต ปรายนคามิมคฺโค. ยํ, ภิกฺขเว, สตฺถารา กรณียํ สาวกานํ หิเตสินา อนุกมฺปเกน อนุกมฺปํ อุปาทาย, กตํ โว ตํ มยา. เอตานิ, ภิกฺขเว, รุกฺขมูลานิ, เอตานิ สุญฺญาคารานิ. ฌายถ, ภิกฺขเว, มา ปมาทตฺถ; มา ปจฺฉา วิปฺปฏิสาริโน อหุวตฺถ. อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนี’’ติ. (ยถา อสงฺขตํ ตถา วิตฺถาเรตพฺพํ). เตตฺตึสติมํ. ४०९. "भिक्षुओं! मैं तुम्हें परायण और परायणगामी मार्ग का उपदेश दूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं! परायण क्या है? भिक्षुओं! जो राग का क्षय, द्वेष का क्षय और मोह का क्षय है—इसे ही परायण कहा जाता है। भिक्षुओं! परायणगामी मार्ग क्या है? कायगतासति। भिक्षुओं! इसे ही परायणगामी मार्ग कहा जाता है। इस प्रकार, भिक्षुओं! मैंने तुम्हें परायण और परायणगामी मार्ग का उपदेश दिया है। भिक्षुओं! अपने शिष्यों का हित चाहने वाले और उन पर अनुकम्पा करने वाले शास्ता को अनुकम्पावश जो करना चाहिए, वह मैंने तुम्हारे लिए कर दिया है। भिक्षुओं! ये वृक्षों की जड़ें हैं, ये शून्य आवास हैं। भिक्षुओं! ध्यान करो, प्रमाद मत करो; बाद में पश्चाताप मत करना। यह तुम्हारे लिए हमारा अनुशासन है।" (जैसे असंस्कृत सुत्त में है, वैसे ही विस्तार करना चाहिए)। (तैंतीसवाँ सुत्त) ทุติโย วคฺโค. द्वितीय वर्ग। ตสฺสุทฺทานํ – उसका उदान (सारांश) — อสงฺขตํ อนตํ อนาสวํ, สจฺจญฺจ ปารํ นิปุณํ สุทุทฺทสํ; อชชฺชรํ ธุวํ อปโลกิตํ, อนิทสฺสนํ นิปฺปปญฺจ สนฺตํ. असंस्कृत, अनत, अनासव, सत्य, पार, निपुण, सुदुर्दर्श, अजर, ध्रुव, अपलोकित, अनिदर्शन, निष्प्रपंच, शांत। อมตํ ปณีตญฺจ สิวญฺจ เขมํ, ตณฺหากฺขโย อจฺฉริยญฺจ อพฺภุตํ; อนีติกํ อนีติกธมฺมํ, นิพฺพานเมตํ สุคเตน เทสิตํ. अमृत, प्रणीत, शिव, क्षेम, तृष्णा-क्षय, आश्चर्य, अद्भुत, अनीतिक, अनीतिक-धर्म, यह निर्वाण सुगत द्वारा उपदिष्ट है। อพฺยาปชฺโฌ วิราโค จ, สุทฺธิ มุตฺติ อนาลโย; ทีโป เลณญฺจ ตาณญฺจ, สรณญฺจ ปรายนนฺติ. अव्यापज्झ, विराग, शुद्धि, मुक्ति, अनालय, द्वीप, लेण, ताण, शरण और परायण। อสงฺขตสํยุตฺตํ สมตฺตํ. असंस्कृत संयुत्त समाप्त। ๑๐. อพฺยากตสํยุตฺตํ १०. अव्याकृत संयुत्त ๑. เขมาสุตฺตํ १. खेमा सुत्त ๔๑๐. เอกํ [Pg.544] สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. เตน โข ปน สมเยน เขมา ภิกฺขุนี โกสเลสุ จาริกํ จรมานา อนฺตรา จ สาวตฺถึ อนฺตรา จ สาเกตํ โตรณวตฺถุสฺมึ วาสํ อุปคตา โหติ. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล สาเกตา สาวตฺถึ คจฺฉนฺโต, อนฺตรา จ สาเกตํ อนฺตรา จ สาวตฺถึ โตรณวตฺถุสฺมึ เอกรตฺติวาสํ อุปคจฺฉิ. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล อญฺญตรํ ปุริสํ อามนฺเตสิ – ‘‘เอหิ ตฺวํ, อมฺโภ ปุริส, โตรณวตฺถุสฺมึ ตถารูปํ สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา ชาน ยมหํ อชฺช ปยิรุปาเสยฺย’’นฺติ. ४१०. एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे। उस समय खेमा भिक्षुणी कोसल जनपद में चारिका करते हुए श्रावस्ती और साकेत के बीच तोरणवस्तु में ठहरी हुई थीं। तब राजा प्रसेनजित कोसल साकेत से श्रावस्ती जाते हुए, साकेत और श्रावस्ती के बीच तोरणवस्तु में एक रात के लिए रुके। तब राजा प्रसेनजित कोसल ने एक पुरुष को बुलाया— 'आओ पुरुष! तोरणवस्तु में किसी ऐसे श्रमण या ब्राह्मण का पता लगाओ, जिसकी मैं आज सेवा-उपासना कर सकूँ'। ‘‘เอวํ, เทวา’’ติ โข โส ปุริโส รญฺโญ ปเสนทิสฺส โกสลสฺส ปฏิสฺสุตฺวา เกวลกปฺปํ โตรณวตฺถุํ อาหิณฺฑนฺโต นาทฺทส ตถารูปํ สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา ยํ ราชา ปเสนทิ โกสโล ปยิรุปาเสยฺย. อทฺทสา โข โส ปุริโส เขมํ ภิกฺขุนึ โตรณวตฺถุสฺมึ วาสํ อุปคตํ. ทิสฺวาน เยน ราชา ปเสนทิ โกสโล เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ราชานํ ปเสนทึ โกสลํ เอตทโวจ – 'जी देव!' कहकर उस पुरुष ने राजा प्रसेनजित कोसल की आज्ञा स्वीकार की और पूरे तोरणवस्तु में खोजते हुए उसे ऐसा कोई श्रमण या ब्राह्मण नहीं दिखा जिसकी राजा प्रसेनजित कोसल सेवा-उपासना कर सकें। उस पुरुष ने खेमा भिक्षुणी को तोरणवस्तु में ठहरी हुई देखा। देखकर जहाँ राजा प्रसेनजित कोसल थे, वहाँ गया और राजा प्रसेनजित कोसल से यह कहा— ‘‘นตฺถิ โข, เทว, โตรณวตฺถุสฺมึ ตถารูโป สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา ยํ เทโว ปยิรุปาเสยฺย. อตฺถิ จ โข, เทว, เขมา นาม ภิกฺขุนี, ตสฺส ภควโต สาวิกา อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส. ตสฺสา โข ปน อยฺยาย เอวํ กลฺยาโณ กิตฺติสทฺโท อพฺภุคฺคโต – ‘ปณฺฑิตา, วิยตฺตา เมธาวินี พหุสฺสุตา จิตฺตกถา กลฺยาณปฏิภานา’ติ. ตํ เทโว ปยิรุปาสตู’’ติ. 'देव! तोरणवस्तु में ऐसा कोई श्रमण या ब्राह्मण नहीं है जिसकी आप सेवा-उपासना कर सकें। किंतु देव! उन भगवान अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध की शिष्या खेमा नाम की भिक्षुणी हैं। उन आर्या का ऐसा कल्याणकारी यश फैला हुआ है— 'वे पण्डिता हैं, निपुण हैं, मेधाविनी हैं, बहुश्रुत हैं, चित्रकथा कहने वाली हैं और कल्याणकारी प्रतिभा वाली हैं'। देव उनकी सेवा-उपासना करें'। อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล เยน เขมา ภิกฺขุนี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เขมํ ภิกฺขุนึ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ [Pg.545] นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราชา ปเสนทิ โกสโล เขมํ ภิกฺขุนึ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข, อยฺเย, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, มหาราช, ภควตา – ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ ปนยฺเย, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, มหาราช, อพฺยากตํ ภควตา – ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ นุ โข, อยฺเย, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, มหาราช, ภควตา – ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ ปนยฺเย, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ. ‘‘เอตมฺปิ โข, มหาราช, อพฺยากตํ ภควตา – ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. तब राजा प्रसेनजित कोसल जहाँ खेमा भिक्षुणी थीं, वहाँ गए। जाकर खेमा भिक्षुणी का अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए राजा प्रसेनजित कोसल ने खेमा भिक्षुणी से यह कहा— 'आर्ये! क्या तथागत मृत्यु के बाद होते हैं?' 'महाराज! भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है कि तथागत मृत्यु के बाद होते हैं।' 'तो आर्ये! क्या तथागत मृत्यु के बाद नहीं होते हैं?' 'महाराज! भगवान ने इसे भी अव्याकृत रखा है कि तथागत मृत्यु के बाद नहीं होते हैं।' 'तो आर्ये! क्या तथागत मृत्यु के बाद होते भी हैं और नहीं भी होते हैं?' 'महाराज! भगवान ने इसे भी अव्याकृत रखा है कि तथागत मृत्यु के बाद होते भी हैं और नहीं भी होते हैं।' 'तो आर्ये! क्या तथागत मृत्यु के बाद न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं?' 'महाराज! भगवान ने इसे भी अव्याकृत रखा है कि तथागत मृत्यु के बाद न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं'। ‘‘‘กึ นุ โข, อยฺเย, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ, อิติ ปุฏฺฐา สมานา – ‘อพฺยากตํ โข เอตํ, มหาราช, ภควตา – โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ. ‘กึ ปนยฺเย, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ อิติ ปุฏฺฐา สมานา – ‘เอตมฺปิ โข, มหาราช, อพฺยากตํ ภควตา – น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ. ‘กึ นุ โข, อยฺเย, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ อิติ ปุฏฺฐา สมานา – ‘อพฺยากตํ โข เอตํ, มหาราช, ภควตา – โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ. ‘กึ ปนยฺเย, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ อิติ ปุฏฺฐา สมานา – ‘เอตมฺปิ โข, มหาราช, อพฺยากตํ ภควตา – เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ. ‘โก นุ โข, อยฺเย, เหตุ, โก ปจฺจโย เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’’ติ? “‘आर्ये! क्या मृत्यु के पश्चात तथागत होते हैं?’ इस प्रकार पूछे जाने पर (आपने कहा)— ‘महाराज! भगवान ने यह अव्याकृत (अघोषित) रखा है कि मृत्यु के पश्चात तथागत होते हैं।’ ‘आर्ये! तो क्या मृत्यु के पश्चात तथागत नहीं होते हैं?’ इस प्रकार पूछे जाने पर— ‘महाराज! भगवान ने यह भी अव्याकृत रखा है कि मृत्यु के पश्चात तथागत नहीं होते हैं।’ ‘आर्ये! क्या मृत्यु के पश्चात तथागत होते भी हैं और नहीं भी होते हैं?’ इस प्रकार पूछे जाने पर— ‘महाराज! भगवान ने यह अव्याकृत रखा है कि मृत्यु के पश्चात तथागत होते भी हैं और नहीं भी होते हैं।’ ‘आर्ये! तो क्या मृत्यु के पश्चात तथागत न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं?’ इस प्रकार पूछे जाने पर— ‘महाराज! भगवान ने यह भी अव्याकृत रखा है कि मृत्यु के पश्चात तथागत न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं।’ ‘आर्ये! वह क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है?’” ‘‘เตน หิ, มหาราช, ตญฺเญเวตฺถ ปฏิปุจฺฉิสฺสามิ. ยถา เต ขเมยฺย ตถา นํ พฺยากเรยฺยาสิ. ตํ กึ มญฺญสิ, มหาราช, อตฺถิ เต โกจิ คณโก วา มุทฺทิโก วา สงฺขายโก วา โย ปโหติ คงฺคาย วาลุกํ คเณตุํ – เอตฺตกา วาลุกา อิติ วา, เอตฺตกานิ วาลุกสตานิ อิติ วา, เอตฺตกานิ วาลุกสหสฺสานิ อิติ วา, เอตฺตกานิ วาลุกสตสหสฺสานิ อิติ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, อยฺเย’’. ‘‘อตฺถิ ปน เต โกจิ คณโก วา มุทฺทิโก วา สงฺขายโก วา โย ปโหติ มหาสมุทฺเท [Pg.546] อุทกํ คเณตุํ – เอตฺตกานิ อุทกาฬฺหกานิ อิติ วา, เอตฺตกานิ อุทกาฬฺหกสตานิ อิติ วา, เอตฺตกานิ อุทกาฬฺหกสหสฺสานิ อิติ วา, เอตฺตกานิ อุทกาฬฺหกสตสหสฺสานิ อิติ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, อยฺเย’’. ‘‘ตํ กิสฺส เหตุ’’? ‘‘มหายฺเย, สมุทฺโท คมฺภีโร อปฺปเมยฺโย ทุปฺปริโยคาโห’’ติ. ‘‘เอวเมว โข, มหาราช, เยน รูเป ตถาคตํ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย ตํ รูปํ ตถาคตสฺส ปหีนํ อุจฺฉินฺนมูลํ ตาลาวตฺถุกตํ อนภาวงฺกตํ อายตึ อนุปฺปาทธมฺมํ. รูปสงฺขายวิมุตฺโต โข, มหาราช, ตถาคโต คมฺภีโร อปฺปเมยฺโย ทุปฺปริโยคาโห – เสยฺยถาปิ มหาสมุทฺโท. ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ. “महाराज! तो मैं आपसे ही इस विषय में पुनः प्रश्न पूछूँगी। जैसा आपको ठीक लगे, वैसा आप उत्तर दें। महाराज! आप क्या सोचते हैं? क्या आपके पास कोई ऐसा गणक (गणितज्ञ), मुद्रा-विशेषज्ञ (अंगुलियों पर गिनने वाला) या संख्या-विशेषज्ञ है, जो गंगा की बालू को गिन सके— कि इतनी बालू है, या इतने सौ बालू के कण हैं, या इतने हजार बालू के कण हैं, या इतने लाख बालू के कण हैं?” “नहीं, आर्ये!” “महाराज! क्या आपके पास कोई ऐसा गणक, मुद्रा-विशेषज्ञ या संख्या-विशेषज्ञ है, जो महासमुद्र के जल को माप सके— कि इतने आढक (जल की माप) जल है, या इतने सौ आढक जल है, या इतने हजार आढक जल है, या इतने लाख आढक जल है?” “नहीं, आर्ये!” “वह किस कारण से?” “आर्ये! महासमुद्र गहरा है, अप्रमेय है और अथाह (दुःप्रवेश) है।” “महाराज! इसी प्रकार, जिस रूप के द्वारा तथागत को प्रज्ञप्त (परिभाषित) किया जा सकता था, वह रूप तथागत द्वारा प्रहीण (त्याग) कर दिया गया है, समूल नष्ट कर दिया गया है, कटे हुए ताड़ के वृक्ष के ठूँठ की भाँति बना दिया गया है, अभाव को प्राप्त करा दिया गया है और भविष्य में पुनः उत्पन्न न होने वाला बना दिया गया है। महाराज! रूप की संज्ञा (गणना) से मुक्त तथागत महासमुद्र की भाँति गहरे, अप्रमेय और अथाह हैं। ‘मृत्यु के पश्चात तथागत होते हैं’—यह भी लागू नहीं होता; ‘मृत्यु के पश्चात तथागत नहीं होते हैं’—यह भी लागू नहीं होता; ‘मृत्यु के पश्चात तथागत होते भी हैं और नहीं भी होते हैं’—यह भी लागू नहीं होता; ‘मृत्यु के पश्चात तथागत न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं’—यह भी लागू नहीं होता।” ‘‘ยาย เวทนาย ตถาคตํ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย, สา เวทนา ตถาคตสฺส ปหีนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. เวทนาสงฺขายวิมุตฺโต, มหาราช, ตถาคโต คมฺภีโร อปฺปเมยฺโย ทุปฺปริโยคาโห – เสยฺยถาปิ มหาสมุทฺโท. ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ. “जिस वेदना के द्वारा तथागत को प्रज्ञप्त किया जा सकता था, वह वेदना तथागत द्वारा प्रहीण कर दी गई है, समूल नष्ट कर दी गई है, कटे हुए ताड़ के वृक्ष के ठूँठ की भाँति बना दी गई है, अभाव को प्राप्त करा दी गई है और भविष्य में पुनः उत्पन्न न होने वाली बना दी गई है। महाराज! वेदना की संज्ञा से मुक्त तथागत महासमुद्र की भाँति गहरे, अप्रमेय और अथाह हैं। ‘मृत्यु के पश्चात तथागत होते हैं’—यह भी लागू नहीं होता; ‘मृत्यु के पश्चात तथागत नहीं होते हैं’—यह भी लागू नहीं होता; ‘मृत्यु के पश्चात तथागत होते भी हैं और नहीं भी होते हैं’—यह भी लागू नहीं होता; ‘मृत्यु के पश्चात तथागत न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं’—यह भी लागू नहीं होता।” ‘‘ยาย สญฺญา ตถาคตํ…เป… เยหิ สงฺขาเรหิ ตถาคตํ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย, เต สงฺขารา ตถาคตสฺส ปหีนา อุจฺฉินฺนมูลา ตาลาวตฺถุกตา อนภาวงฺกตา อายตึ อนุปฺปาทธมฺมา. สงฺขารสงฺขายวิมุตฺโต โข, มหาราช, ตถาคโต คมฺภีโร อปฺปเมยฺโย ทุปฺปริโยคาโห – เสยฺยถาปิ มหาสมุทฺโท. ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ. “जिस संज्ञा के द्वारा तथागत को... (पेय्याल)... जिन संस्कारों के द्वारा तथागत को प्रज्ञप्त किया जा सकता था, वे संस्कार तथागत द्वारा प्रहीण कर दिए गए हैं, समूल नष्ट कर दिए गए हैं, कटे हुए ताड़ के वृक्ष के ठूँठ की भाँति बना दिए गए हैं, अभाव को प्राप्त करा दिए गए हैं और भविष्य में पुनः उत्पन्न न होने वाले बना दिए गए हैं। महाराज! संस्कारों की संज्ञा से मुक्त तथागत महासमुद्र की भाँति गहरे, अप्रमेय और अथाह हैं। ‘मृत्यु के पश्चात तथागत होते हैं’—यह भी लागू नहीं होता; ‘मृत्यु के पश्चात तथागत नहीं होते हैं’—यह भी लागू नहीं होता; ‘मृत्यु के पश्चात तथागत होते भी हैं और नहीं भी होते हैं’—यह भी लागू नहीं होता; ‘मृत्यु के पश्चात तथागत न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं’—यह भी लागू नहीं होता।” ‘‘เยน วิญฺญาเณ ตถาคตํ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย ตํ วิญฺญาณํ ตถาคตสฺส ปหีนํ อุจฺฉินฺนมูลํ ตาลาวตฺถุกตํ อนภาวงฺกตํ อายตึ [Pg.547] อนุปฺปาทธมฺมํ. วิญฺญาณสงฺขายวิมุตฺโต โข, มหาราช, ตถาคโต คมฺภีโร อปฺปเมยฺโย ทุปฺปริโยคาโห – เสยฺยถาปิ มหาสมุทฺโท. ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปตี’’ติ. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล เขมาย ภิกฺขุนิยา ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา เขมํ ภิกฺขุนึ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. “जिस विज्ञान के द्वारा तथागत को प्रज्ञप्त किया जा सकता था, वह विज्ञान तथागत द्वारा प्रहीण कर दिया गया है, समूल नष्ट कर दिया गया है, कटे हुए ताड़ के वृक्ष के ठूँठ की भाँति बना दिया गया है, अभाव को प्राप्त करा दिया गया है और भविष्य में पुनः उत्पन्न न होने वाला बना दिया गया है। महाराज! विज्ञान की संज्ञा से मुक्त तथागत महासमुद्र की भाँति गहरे, अप्रमेय और अथाह हैं। ‘मृत्यु के पश्चात तथागत होते हैं’—यह भी लागू नहीं होता; ‘मृत्यु के पश्चात तथागत नहीं होते हैं’—यह भी लागू नहीं होता; ‘मृत्यु के पश्चात तथागत होते भी हैं और नहीं भी होते हैं’—यह भी लागू नहीं होता; ‘मृत्यु के पश्चात तथागत न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं’—यह भी लागू नहीं होता।” ऐसा (खेमा भिक्षुणी ने) कहा। तब कोसल नरेश प्रसेनजित ने भिक्षुणी खेमा के भाषण का अभिनन्दन किया, अनुमोदन किया और आसन से उठकर भिक्षुणी खेमा का अभिवादन कर, प्रदक्षिणा कर चले गए। อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล อปเรน สมเยน เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข, ภนฺเต, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, มหาราช, มยา – ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ ปน, ภนฺเต, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, มหาราช, อพฺยากตํ มยา – ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ นุ โข, ภนฺเต, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, มหาราช, มยา – ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ ปน, ภนฺเต, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, มหาราช, อพฺยากตํ มยา – ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ นุ โข, ภนฺเต, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ อิติ ปุฏฺโฐ สมาโน – ‘อพฺยากตํ โข เอตํ, มหาราช, มยา – โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ…เป…. ‘‘‘กึ ปน, ภนฺเต, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ อิติ ปุฏฺโฐ สมาโน – ‘‘‘เอตมฺปิ โข, มหาราช, อพฺยากตํ มยา – เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ. โก นุ โข, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ? तब राजा प्रसेनदि कोसल किसी अन्य समय जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए राजा प्रसेनदि कोसल ने भगवान से यह कहा— "भन्ते, क्या तथागत मृत्यु के बाद होते हैं?" "महाराज, यह मेरे द्वारा अव्याकृत (अस्पष्टीकृत) है कि तथागत मृत्यु के बाद होते हैं।" "भन्ते, तो क्या तथागत मृत्यु के बाद नहीं होते हैं?" "महाराज, यह भी मेरे द्वारा अव्याकृत है कि तथागत मृत्यु के बाद नहीं होते हैं।" "भन्ते, क्या तथागत मृत्यु के बाद होते भी हैं और नहीं भी होते हैं?" "महाराज, यह भी मेरे द्वारा अव्याकृत है कि तथागत मृत्यु के बाद होते भी हैं और नहीं भी होते हैं।" "भन्ते, क्या तथागत मृत्यु के बाद न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं?" "महाराज, यह भी मेरे द्वारा अव्याकृत है कि तथागत मृत्यु के बाद न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं।" "भन्ते, क्या तथागत मृत्यु के बाद होते हैं"—ऐसा पूछे जाने पर आपने कहा— "महाराज, यह मेरे द्वारा अव्याकृत है कि तथागत मृत्यु के बाद होते हैं"... "भन्ते, क्या तथागत मृत्यु के बाद न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं"—ऐसा पूछे जाने पर आपने कहा— "महाराज, यह भी मेरे द्वारा अव्याकृत है कि तथागत मृत्यु के बाद न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं।" भन्ते, इसका क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है? ‘‘เตน หิ, มหาราช, ตญฺเญเวตฺถ ปฏิปุจฺฉิสฺสามิ. ยถา เต ขเมยฺย ตถา นํ พฺยากเรยฺยาสิ. ตํ กึ มญฺญสิ, มหาราช, อตฺถิ เต โกจิ คณโก วา มุทฺทิโก วา สงฺขายโก วา โย ปโหติ คงฺคาย วาลุกํ คเณตุํ [Pg.548] – เอตฺตกา วาลุกา อิติ วา…เป… เอตฺตกานิ วาลุกสตสหสฺสานิ อิติ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘อตฺถิ ปน เต โกจิ คณโก วา มุทฺทิโก วา สงฺขายโก วา โย ปโหติ มหาสมุทฺเท อุทกํ คเณตุํ – เอตฺตกานิ อุทกาฬฺหกานิ อิติ วา…เป… เอตฺตกานิ อุทกาฬฺหกสตสหสฺสานิ อิติ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตํ กิสฺส เหตุ’’? ‘‘มหา, ภนฺเต, สมุทฺโท คมฺภีโร อปฺปเมยฺโย ทุปฺปริโยคาโห. เอวเมว โข, มหาราช, เยน รูเปน ตถาคตํ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย, ตํ รูปํ ตถาคตสฺส ปหีนํ อุจฺฉินฺนมูลํ ตาลาวตฺถุกตํ อนภาวงฺกตํ อายตึ อนุปฺปาทธมฺมํ. รูปสงฺขายวิมุตฺโต โข, มหาราช, ตถาคโต คมฺภีโร อปฺปเมยฺโย ทุปฺปริโยคาโห – เสยฺยถาปิ มหาสมุทฺโท. ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ. ยาย เวทนาย…เป… ยาย สญฺญาย…เป… เยหิ สงฺขาเรหิ…เป…’’. "तो महाराज, मैं आपसे ही इस विषय में पुनः प्रश्न करूँगा। जैसा आपको ठीक लगे, वैसा आप उत्तर दें। महाराज, आप क्या सोचते हैं, क्या आपके पास कोई ऐसा गणक (गणितज्ञ), मुद्रा-विशेषज्ञ या संख्या-विशेषज्ञ है जो गंगा की रेत को गिन सके—कि इतनी रेत है... या इतने लाख रेत के कण हैं?" "नहीं भन्ते।" "क्या आपके पास कोई ऐसा गणक, मुद्रा-विशेषज्ञ या संख्या-विशेषज्ञ है जो महासमुद्र के जल को माप सके—कि इतने आढ़क (माप) जल है... या इतने लाख आढ़क जल है?" "नहीं भन्ते।" "वह किस कारण से?" "भन्ते, महासमुद्र महान है, गहरा है, अप्रमेय (अथाह) है और दुष्प्रगाह (पार करना कठिन) है।" "महाराज, इसी प्रकार जिस रूप के द्वारा तथागत को प्रज्ञप्त (परिभाषित) किया जा सके, वह रूप तथागत द्वारा प्रहीण (त्याग) कर दिया गया है, समूल नष्ट कर दिया गया है, कटे हुए ताड़ के वृक्ष के ठूँठ की तरह बना दिया गया है, अभाव को प्राप्त करा दिया गया है और भविष्य में पुनः उत्पन्न न होने वाला बना दिया गया है। महाराज, तथागत रूप की संज्ञा (गणना) से मुक्त हैं, वे गहरे, अप्रमेय और दुष्प्रगाह हैं—जैसे कि महासमुद्र। 'तथागत मृत्यु के बाद होते हैं'—यह भी लागू नहीं होता... 'तथागत मृत्यु के बाद न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं'—यह भी लागू नहीं होता। जिस वेदना से... जिस संज्ञा से... जिन संस्कारों से...।" ‘‘เยน วิญฺญาเณน ตถาคตํ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย, ตํ วิญฺญาณํ ตถาคตสฺส ปหีนํ อุจฺฉินฺนมูลํ ตาลาวตฺถุกตํ อนภาวงฺกตํ อายตึ อนุปฺปาทธมฺมํ. วิญฺญาณสงฺขายวิมุตฺโต โข, มหาราช, ตถาคโต คมฺภีโร อปฺปเมยฺโย ทุปฺปริโยคาโห – เสยฺยถาปิ มหาสมุทฺโท. ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปติ, ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ น อุเปตี’’ติ. "जिस विज्ञान के द्वारा तथागत को प्रज्ञप्त किया जा सके, वह विज्ञान तथागत द्वारा प्रहीण कर दिया गया है, समूल नष्ट कर दिया गया है, कटे हुए ताड़ के वृक्ष के ठूँठ की तरह बना दिया गया है, अभाव को प्राप्त करा दिया गया है और भविष्य में पुनः उत्पन्न न होने वाला बना दिया गया है। महाराज, तथागत विज्ञान की संज्ञा से मुक्त हैं, वे गहरे, अप्रमेय और दुष्प्रगाह हैं—जैसे कि महासमुद्र। 'तथागत मृत्यु के बाद होते हैं'—यह भी लागू नहीं होता, 'तथागत मृत्यु के बाद नहीं होते हैं'—यह भी लागू नहीं होता, 'तथागत मृत्यु के बाद होते भी हैं और नहीं भी होते हैं'—यह भी लागू नहीं होता, 'तथागत मृत्यु के बाद न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं'—यह भी लागू नहीं होता।" ‘‘อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต! ยตฺร หิ นาม สตฺถุ เจว สาวิกาย จ อตฺเถน อตฺโถ พฺยญฺชเนน พฺยญฺชนํ สํสนฺทิสฺสติ, สเมสฺสติ, น วิโรธยิสฺสติ ยทิทํ อคฺคปทสฺมึ. เอกมิทาหํ, ภนฺเต, สมยํ เขมํ ภิกฺขุนึ อุปสงฺกมิตฺวา เอตมตฺถํ อปุจฺฉึ. สาปิ เม อยฺยา เอเตหิ ปเทหิ เอเตหิ พฺยญฺชเนหิ เอตมตฺถํ พฺยากาสิ, เสยฺยถาปิ ภควา. อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต! ยตฺร หิ นาม สตฺถุ เจว สาวิกาย จ อตฺเถน อตฺโถ พฺยญฺชเนน พฺยญฺชนํ สํสนฺทิสฺสติ, สเมสฺสติ, น วิโรธยิสฺสติ ยทิทํ อคฺคปทสฺมึ. หนฺท ทานิ มยํ, ภนฺเต, คจฺฉาม. พหุกิจฺจา มยํ พหุกรณียา’’ติ. ‘‘ยสฺส ทานิ ตฺวํ, มหาราช, กาลํ มญฺญสี’’ติ. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ภควโต [Pg.549] ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามีติ. ปฐมํ. "आश्चर्य है भन्ते, अद्भुत है भन्ते! जहाँ शास्ता (गुरु) और उनकी श्राविका (शिष्या) के अर्थ से अर्थ और व्यंजन (शब्द) से व्यंजन इस अग्रपद (श्रेष्ठ उपदेश) के विषय में परस्पर मिलते हैं, समान हैं और विरोध नहीं करते। भन्ते, एक समय मैं भिक्षुणी खेमा के पास गया था और उनसे यही बात पूछी थी। उस आर्या ने भी इन्हीं पदों और इन्हीं व्यंजनों के साथ मुझे यही अर्थ बताया था, जैसा कि भगवान ने बताया है। आश्चर्य है भन्ते, अद्भुत है भन्ते! जहाँ शास्ता और उनकी श्राविका के अर्थ से अर्थ और व्यंजन से व्यंजन इस अग्रपद के विषय में परस्पर मिलते हैं, समान हैं और विरोध नहीं करते। भन्ते, अब हम चलते हैं। हमारे पास बहुत कार्य हैं, बहुत से कर्तव्य हैं।" "महाराज, अब आप जैसा उचित समझें।" तब राजा प्रसेनदि कोसल ने भगवान के भाषण का अभिनन्दन और अनुमोदन किया और आसन से उठकर भगवान को अभिवादन कर, प्रदक्षिणा करके चले गए। प्रथम। ๒. อนุราธสุตฺตํ २. अनुराध सुत्त ๔๑๑. เอกํ สมยํ ภควา เวสาลิยํ วิหรติ มหาวเน กูฏาคารสาลายํ. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา อนุราโธ ภควโต อวิทูเร อรญฺญกุฏิกายํ วิหรติ. อถ โข สมฺพหุลา อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เยนายสฺมา อนุราโธ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา อนุราเธน สทฺธึ สมฺโมทึสุ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา อายสฺมนฺตํ อนุราธํ เอตทโวจุํ – ‘‘โย โส, อาวุโส อนุราธ, ตถาคโต อุตฺตมปุริโส ปรมปุริโส ปรมปตฺติปตฺโต, ตํ ตถาคโต อิเมสุ จตูสุ ฐาเนสุ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปติ – ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา, ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา, ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา, ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา’’ติ? ‘‘โย โส, อาวุโส, ตถาคโต อุตฺตมปุริโส ปรมปุริโส ปรมปตฺติปตฺโต, ตํ ตถาคโต อญฺญตฺร อิเมหิ จตูหิ ฐาเนหิ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปติ – ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา, ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา’’ติ. เอวํ วุตฺเต, เต อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา อายสฺมนฺตํ อนุราธํ เอตทโวจุํ – ‘‘โส จายํ ภิกฺขุ นโว ภวิสฺสติ อจิรปพฺพชิโต, เถโร วา ปน พาโล อพฺยตฺโต’’ติ. อถ โข เต อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา อายสฺมนฺตํ อนุราธํ นววาเทน จ พาลวาเทน จ อปสาเทตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกมึสุ. ४११. एक समय भगवान वैशाली के महावन में कूटागारशाला में विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान अनुराधा भगवान से कुछ ही दूरी पर एक अरण्य-कुटी में विहार कर रहे थे। तब अनेक अन्य-तीर्थिय परिव्राजक जहाँ आयुष्मान अनुराधा थे, वहाँ आए; आकर आयुष्मान अनुराधा के साथ कुशल-क्षेम पूछा। आनंददायक और स्मरणीय बातें पूरी कर वे एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए उन अन्य-तीर्थिय परिव्राजकों ने आयुष्मान अनुराधा से यह कहा— 'हे आयुष्मान अनुराधा, जो वे तथागत हैं—उत्तम पुरुष, परम पुरुष, परम-प्राप्ति को प्राप्त—क्या तथागत इन चार स्थितियों में प्रज्ञापित करते हैं— मृत्यु के बाद तथागत होते हैं, या मृत्यु के बाद तथागत नहीं होते हैं, या मृत्यु के बाद तथागत होते भी हैं और नहीं भी होते हैं, या मृत्यु के बाद तथागत न होते हैं और न ही नहीं होते हैं?' (अनुराधा ने उत्तर दिया—) 'हे आयुष्मन्, जो वे तथागत हैं—उत्तम पुरुष, परम पुरुष, परम-प्राप्ति को प्राप्त—तथागत इन चार स्थितियों से अलग प्रज्ञापित करते हैं— मृत्यु के बाद तथागत होते हैं... या मृत्यु के बाद तथागत न होते हैं और न ही नहीं होते हैं।' ऐसा कहने पर, उन अन्य-तीर्थिय परिव्राजकों ने आयुष्मान अनुराधा से यह कहा— 'यह भिक्षु या तो नया होगा, जिसे प्रव्रजित हुए अधिक समय नहीं हुआ है, या फिर कोई वृद्ध मूर्ख और अकुशल होगा।' तब वे अन्य-तीर्थिय परिव्राजक आयुष्मान अनुराधा को नया कहकर और मूर्ख कहकर तिरस्कृत कर, आसन से उठकर चले गए। อถ โข อายสฺมโต อนุราธสฺส อจิรปกฺกนฺเตสุ อญฺญติตฺถิเยสุ ปริพฺพาชเกสุ เอตทโหสิ – ‘‘สเจ โข มํ เต อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา อุตฺตรึ ปุจฺเฉยฺยุํ, กถํ พฺยากรมาโน นุ ขฺวาหํ เตสํ อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ วุตฺตวาที เจว ภควโต อสฺสํ, น [Pg.550] จ ภควนฺตํ อภูเตน อพฺภาจิกฺเขยฺยํ, ธมฺมสฺส จานุธมฺมํ พฺยากเรยฺยํ, น จ โกจิ สหธมฺมิโก วาทานุวาโท คารยฺหํ ฐานํ อาคจฺเฉยฺยา’’ติ? อถ โข อายสฺมา อนุราโธ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อนุราโธ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธาหํ, ภนฺเต, ภควโต อวิทูเร อรญฺญกุฏิกายํ วิหรามิ. อถ โข, ภนฺเต, สมฺพหุลา อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เยนาหํ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา มยา สทฺธึ สมฺโมทึสุ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข, ภนฺเต, เต อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา มํ เอตทโวจุํ – ‘‘โย โส, อาวุโส อนุราธ, ตถาคโต อุตฺตมปุริโส ปรมปุริโส ปรมปตฺติปตฺโต, ตํ ตถาคโต อิเมสุ จตูสุ ฐาเนสุ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปติ – ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา’’ติ? เอวํ วุตฺตาหํ, ภนฺเต, เต อญฺญติตฺถิเย ปริพฺพาชเก เอตทโวจํ – ‘‘โย โส, อาวุโส, ตถาคโต อุตฺตมปุริโส ปรมปุริโส ปรมปตฺติปตฺโต, ตํ ตถาคโต อญฺญตฺร อิเมหิ จตูหิ ฐาเนหิ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปติ – ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา’’ติ. เอวํ วุตฺเต, ภนฺเต, เต อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา มํ เอตทโวจุํ – ‘‘โส จายํ ภิกฺขุ นโว ภวิสฺสติ อจิรปพฺพชิโต เถโร วา ปน พาโล อพฺยตฺโต’’ติ. อถ โข มํ, ภนฺเต, เต อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา นววาเทน จ พาลวาเทน จ อปสาเทตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกมึสุ. ตสฺส มยฺหํ, ภนฺเต, อจิรปกฺกนฺเตสุ เตสุ อญฺญติตฺถิเยสุ ปริพฺพาชเกสุ เอตทโหสิ – ‘‘สเจ โข มํ เต อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา อุตฺตรึ ปุจฺเฉยฺยุํ, กถํ พฺยากรมาโน นุ ขฺวาหํ เตสํ อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ วุตฺตวาที เจว ภควโต อสฺสํ, น จ ภควนฺตํ อภูเตน อพฺภาจิกฺเขยฺยํ, ธมฺมสฺส จานุธมฺมํ พฺยากเรยฺยํ, น จ โกจิ สหธมฺมิโก วาทานุวาโท คารยฺหํ ฐานํ อาคจฺเฉยฺยา’’ติ? तब आयुष्मान अनुराधा को, उन अन्य-तीर्थिय परिव्राजकों के जाने के कुछ ही समय बाद, यह विचार आया— 'यदि वे अन्य-तीर्थिय परिव्राजक मुझसे और अधिक पूछें, तो मैं उन अन्य-तीर्थिय परिव्राजकों को किस प्रकार उत्तर दूँ कि मैं भगवान के वचनों के अनुसार बोलने वाला बनूँ, भगवान पर असत्य आरोप न लगाऊँ, धर्म के अनुकूल धर्म की व्याख्या करूँ, और कोई भी सहधर्मी तर्क-वितर्क में निंदा के योग्य स्थान पर न पहुँचे?' तब आयुष्मान अनुराधा जहाँ भगवान थे, वहाँ गए; जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान अनुराधा ने भगवान से यह कहा— 'भन्ते, यहाँ मैं भगवान से कुछ ही दूरी पर एक अरण्य-कुटी में विहार कर रहा हूँ। तब, भन्ते, अनेक अन्य-तीर्थिय परिव्राजक जहाँ मैं था, वहाँ आए; आकर मेरे साथ कुशल-क्षेम पूछा। आनंददायक और स्मरणीय बातें पूरी कर वे एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए, भन्ते, उन अन्य-तीर्थिय परिव्राजकों ने मुझसे यह कहा— हे आयुष्मान अनुराधा, जो वे तथागत हैं—उत्तम पुरुष, परम पुरुष, परम-प्राप्ति को प्राप्त—क्या तथागत इन चार स्थितियों में प्रज्ञापित करते हैं— मृत्यु के बाद तथागत होते हैं... या मृत्यु के बाद तथागत न होते हैं और न ही नहीं होते हैं? भन्ते, ऐसा कहे जाने पर मैंने उन अन्य-तीर्थिय परिव्राजकों से यह कहा— हे आयुष्मन्, जो वे तथागत हैं—उत्तम पुरुष, परम पुरुष, परम-प्राप्ति को प्राप्त—तथागत इन चार स्थितियों से अलग प्रज्ञापित करते हैं— मृत्यु के बाद तथागत होते हैं... या मृत्यु के बाद तथागत न होते हैं और न ही नहीं होते हैं। भन्ते, ऐसा कहने पर, उन अन्य-तीर्थिय परिव्राजकों ने मुझसे यह कहा— यह भिक्षु या तो नया होगा, जिसे प्रव्रजित हुए अधिक समय नहीं हुआ है, या फिर कोई वृद्ध मूर्ख और अकुशल होगा। भन्ते, वे अन्य-तीर्थिय परिव्राजक मुझे नया और मूर्ख कहकर तिरस्कृत कर, आसन से उठकर चले गए। भन्ते, उन अन्य-तीर्थिय परिव्राजकों के जाने के कुछ ही समय बाद मुझे यह विचार आया— यदि वे अन्य-तीर्थिय परिव्राजक मुझसे और अधिक पूछें, तो मैं उन अन्य-तीर्थिय परिव्राजकों को किस प्रकार उत्तर दूँ कि मैं भगवान के वचनों के अनुसार बोलने वाला बनूँ, भगवान पर असत्य आरोप न लगाऊँ, धर्म के अनुकूल धर्म की व्याख्या करूँ, और कोई भी सहधर्मी तर्क-वितर्क में निंदा के योग्य स्थान पर न पहुँचे?' ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, อนุราธ, รูปํ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? "अनुराधा, तुम क्या सोचते हो, रूप नित्य है या अनित्य?" ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. "अनित्य है, भन्ते।" ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? "जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?" ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. "दुःख है, भन्ते।" ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? "जो अनित्य, दुःखद और परिवर्तनशील है, क्या उसे ऐसा मानना उचित है— 'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है'?" ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "नहीं, भन्ते।" ‘‘เวทนา นิจฺจา วา อนิจฺจา วา’’ติ?…เป… สญฺญา [Pg.551] …เป… สงฺขารา…เป… ‘‘วิญฺญาณํ นิจฺจํ วา อนิจฺจํ วา’’ติ? "वेदना नित्य है या अनित्य? ... संज्ञा ... संस्कार ... विज्ञान नित्य है या अनित्य?" ‘‘อนิจฺจํ, ภนฺเต’’. "अनित्य है, भन्ते।" ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วา ตํ สุขํ วา’’ติ? "जो अनित्य है, वह दुःख है या सुख?" ‘‘ทุกฺขํ, ภนฺเต’’. "दुःख है, भन्ते।" ‘‘ยํ ปนานิจฺจํ ทุกฺขํ วิปริณามธมฺมํ, กลฺลํ นุ ตํ สมนุปสฺสิตุํ – ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’’ติ? "जो अनित्य, दुःखद और परिवर्तनशील है, क्या उसे ऐसा मानना उचित है— 'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है'?" ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "ऐसा नहीं है, भन्ते।" ‘‘ตสฺมาติห, อนุราธ, ยํ กิญฺจิ รูปํ อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺนํ อชฺฌตฺตํ วา พหิทฺธา วา โอฬาริกํ วา สุขุมํ วา หีนํ วา ปณีตํ วา ยํ ทูเร สนฺติเก วา, สพฺพํ รูปํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. ยา กาจิ เวทนา อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺนา…เป… ยา กาจิ สญฺญา…เป… เย เกจิ สงฺขารา…เป… ยํ กิญฺจิ วิญฺญาณํ อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺนํ อชฺฌตฺตํ วา พหิทฺธา วา โอฬาริกํ วา สุขุมํ วา หีนํ วา ปณีตํ วา ยํ ทูเร สนฺติเก วา, สพฺพํ วิญฺญาณํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ เอวเมตํ ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ ปสฺสํ, อนุราธ, สุตวา อริยสาวโก รูปสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ, เวทนายปิ นิพฺพินฺทติ, สญฺญายปิ นิพฺพินฺทติ, สงฺขาเรสุปิ นิพฺพินฺทติ, วิญฺญาณสฺมิมฺปิ นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ; วิราคา วิมุจฺจติ; วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหติ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาติ. "इसलिए, अनुराध, जो कुछ भी रूप है—चाहे वह अतीत, अनागत या वर्तमान हो; आंतरिक हो या बाह्य; स्थूल हो या सूक्ष्म; हीन हो या प्रणीत; दूर हो या समीप—उस समस्त रूप को इस प्रकार यथार्थ रूप में सम्यक प्रज्ञा से देखना चाहिए: 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है।' जो कुछ भी वेदना है... जो कुछ भी संज्ञा है... जो कुछ भी संस्कार हैं... जो कुछ भी विज्ञान है—चाहे वह अतीत, अनागत या वर्तमान हो; आंतरिक हो या बाह्य; स्थूल हो या सूक्ष्म; हीन हो या प्रणीत; दूर हो या समीप—उस समस्त विज्ञान को इस प्रकार यथार्थ रूप में सम्यक प्रज्ञा से देखना चाहिए: 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है।' अनुराध, इस प्रकार देखते हुए श्रुतवान आर्य श्रावक रूप से भी निर्वेद प्राप्त करता है, वेदना से भी निर्वेद प्राप्त करता है, संज्ञा से भी निर्वेद प्राप्त करता है, संस्कारों से भी निर्वेद प्राप्त करता है, विज्ञान से भी निर्वेद प्राप्त करता है। निर्वेद होने पर वह विरक्त होता है; विरक्ति से वह विमुक्त होता है; विमुक्त होने पर 'मैं विमुक्त हूँ' ऐसा ज्ञान होता है। वह जान लेता है: 'जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है'।" ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, อนุราธ, รูปํ ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘เวทนํ ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘สญฺญํ ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘สงฺขาเร ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘วิญฺญาณํ ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, อนุราธ, รูปสฺมึ ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘อญฺญตฺร รูปา ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘เวทนาย…เป… อญฺญตฺร เวทนาย…เป… สญฺญาย…เป… อญฺญตฺร สญฺญาย…เป… สงฺขาเรสุ…เป… อญฺญตฺร สงฺขาเรหิ…เป… วิญฺญาณสฺมึ ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘อญฺญตฺร วิญฺญาณา ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "अनुराध, तुम क्या सोचते हो? क्या तुम रूप को तथागत के रूप में देखते हो?" "नहीं, भन्ते।" "क्या तुम वेदना को तथागत के रूप में देखते हो?" "नहीं, भन्ते।" "क्या तुम संज्ञा को तथागत के रूप में देखते हो?" "नहीं, भन्ते।" "क्या तुम संस्कारों को तथागत के रूप में देखते हो?" "नहीं, भन्ते।" "क्या तुम विज्ञान को तथागत के रूप में देखते हो?" "नहीं, भन्ते।" "अनुराध, तुम क्या सोचते हो? क्या तुम तथागत को रूप में देखते हो?" "नहीं, भन्ते।" "क्या तुम तथागत को रूप से अलग देखते हो?" "नहीं, भन्ते।" "क्या तुम तथागत को वेदना में... वेदना से अलग... संज्ञा में... संज्ञा से अलग... संस्कारों में... संस्कारों से अलग... विज्ञान में देखते हो?" "नहीं, भन्ते।" "क्या तुम तथागत को विज्ञान से अलग देखते हो?" "नहीं, भन्ते।" ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, อนุราธ, รูปํ, เวทนํ, สญฺญํ, สงฺขาเร, วิญฺญาณํ ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, อนุราธ, อยํ โส อรูปี อเวทโน อสญฺญี อสงฺขาโร อวิญฺญาโณ ตถาคโตติ สมนุปสฺสสี’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘เอตฺถ จ เต, อนุราธ, ทิฏฺเฐว [Pg.552] ธมฺเม สจฺจโต เถตโต ตถาคเต อนุปลพฺภิยมาเน กลฺลํ นุ เต ตํ เวยฺยากรณํ – โย โส, อาวุโส, ตถาคโต อุตฺตมปุริโส ปรมปุริโส ปรมปตฺติปตฺโต, ตํ ตถาคโต อญฺญตฺร อิเมหิ จตูหิ ฐาเนหิ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปติ – ‘‘‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘สาธุ สาธุ, อนุราธ! ปุพฺเพ จาหํ, อนุราธ, เอตรหิ จ ทุกฺขญฺเจว ปญฺญาเปมิ ทุกฺขสฺส จ นิโรธ’’นฺติ. ทุติยํ. "अनुराध, तुम क्या सोचते हो? क्या तुम रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान को तथागत के रूप में देखते हो?" "नहीं, भन्ते।" "अनुराध, तुम क्या सोचते हो? क्या तुम उसे तथागत के रूप में देखते हो जो रूप-रहित, वेदना-रहित, संज्ञा-रहित, संस्कार-रहित और विज्ञान-रहित है?" "नहीं, भन्ते।" "अनुराध, जब इसी जीवन में तथागत सत्यतः और यथार्थतः नहीं पाए जाते, तो क्या तुम्हारा यह कहना उचित होगा कि—'आवुसो, जो वह तथागत हैं—उत्तम पुरुष, परम पुरुष, परम प्राप्ति को प्राप्त—वे इन चार स्थितियों के अतिरिक्त (किसी अन्य प्रकार से) प्रज्ञप्त करते हैं कि—तथागत मृत्यु के बाद होते हैं... या तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं'?" "नहीं, भन्ते।" "साधु, साधु, अनुराध! पहले भी और अब भी, मैं केवल दुःख और दुःख के निरोध की ही प्रज्ञप्ति करता हूँ।" ๓. ปฐมสาริปุตฺตโกฏฺฐิกสุตฺตํ ३. प्रथम सारिपुत्त-कोट्ट्ठिक सुत्त ๔๑๒. เอกํ สมยํ อายสฺมา จ สาริปุตฺโต, อายสฺมา จ มหาโกฏฺฐิโก พาราณสิยํ วิหรนฺติ อิสิปตเน มิคทาเย. อถ โข อายสฺมา มหาโกฏฺฐิโก สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต เยนายสฺมา สาริปุตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา สาริปุตฺเตน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา มหาโกฏฺฐิโก อายสฺมนฺตํ สาริปุตฺตํ เอตทโวจ – ४१२. एक समय आयुष्मान सारिपुत्त और आयुष्मान महाकोट्ट्ठिक वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाव में विहार कर रहे थे। तब आयुष्मान महाकोट्ट्ठिक सायंकाल के समय एकांत-वास से उठकर जहाँ आयुष्मान सारिपुत्त थे, वहाँ गए। पहुँचकर आयुष्मान सारिपुत्त के साथ कुशल-क्षेम पूछा। आनंददायक और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वे एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान महाकोट्ट्ठिक ने आयुष्मान सारिपुत्त से यह कहा— ‘‘กึ นุ โข, อาวุโส สาริปุตฺต, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, อาวุโส, ภควตา – ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ ปนาวุโส, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, อาวุโส, อพฺยากตํ ภควตา – ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ นุ โข, อาวุโส, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, อาวุโส, ภควตา – ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ ปนาวุโส, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, อาวุโส, อพฺยากตํ ภควตา – ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. "आवुसो सारिपुत्त, क्या तथागत मृत्यु के बाद होते हैं?" "आवुसो, भगवान ने यह घोषित नहीं किया है कि 'तथागत मृत्यु के बाद होते हैं'।" "आवुसो, क्या तथागत मृत्यु के बाद नहीं होते हैं?" "आवुसो, भगवान ने यह भी घोषित नहीं किया है कि 'तथागत मृत्यु के बाद नहीं होते हैं'।" "आवुसो, क्या तथागत मृत्यु के बाद होते भी हैं और नहीं भी होते हैं?" "आवुसो, भगवान ने यह घोषित नहीं किया है कि 'तथागत मृत्यु के बाद होते भी हैं और नहीं भी होते हैं'।" "आवुसो, क्या तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं?" "आवुसो, भगवान ने यह भी घोषित नहीं किया है कि 'तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं'।" ‘‘‘กึ นุ โข, อาวุโส, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ อิติ ปุฏฺโฐ สมาโน, ‘อพฺยากตํ โข เอตํ, อาวุโส, ภควตา – โหติ ตถาคโต [Pg.553] ปรํ มรณา’ติ วเทสิ…เป… ‘กึ ปนาวุโส, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ อิติ ปุฏฺโฐ สมาโน – ‘เอตมฺปิ โข, อาวุโส, อพฺยากตํ ภควตา – เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ. โก นุ โข, อาวุโส, เหตุ, โก ปจฺจโย เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ? "'आवुसो, क्या तथागत मृत्यु के बाद होते हैं?' ऐसा पूछे जाने पर आपने कहा—'आवुसो, भगवान ने यह घोषित नहीं किया है कि तथागत मृत्यु के बाद होते हैं'... 'आवुसो, क्या तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं?' ऐसा पूछे जाने पर आपने कहा—'आवुसो, भगवान ने यह भी घोषित नहीं किया है कि तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं'। आवुसो, इसका क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है कि भगवान ने इसे घोषित नहीं किया है?" ‘‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ โข, อาวุโส, รูปคตเมตํ. น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, รูปคตเมตํ. โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, รูปคตเมตํ. เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, รูปคตเมตํ. โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ โข, อาวุโส, เวทนาคตเมตํ. น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, เวทนาคตเมตํ. โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, เวทนาคตเมตํ. เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, เวทนาคตเมตํ. โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ โข, อาวุโส, สญฺญาคตเมตํ. น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, สญฺญาคตเมตํ. โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, สญฺญาคตเมตํ. เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, สญฺญาคตเมตํ. โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ โข, อาวุโส, สงฺขารคตเมตํ. น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, สงฺขารคตเมตํ. โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, สงฺขารคตเมตํ. เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, สงฺขารคตเมตํ. โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ โข, อาวุโส, วิญฺญาณคตเมตํ. น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, วิญฺญาณคตเมตํ. โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, วิญฺญาณคตเมตํ. เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ, วิญฺญาณคตเมตํ. อยํ โข, อาวุโส, เหตุ อยํ ปจฺจโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ. ตติยํ. “हे आयुष्मान्! ‘तथागत मृत्यु के बाद होते हैं’, यह केवल रूप के विषय में है। ‘तथागत मृत्यु के बाद नहीं होते हैं’, यह केवल रूप के विषय में है। ‘तथागत मृत्यु के बाद होते भी हैं और नहीं भी होते हैं’, यह केवल रूप के विषय में है। ‘तथागत मृत्यु के बाद न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं’, यह केवल रूप के विषय में है। हे आयुष्मान्! ‘तथागत मृत्यु के बाद होते हैं’, यह केवल वेदना के विषय में है। ‘तथागत मृत्यु के बाद नहीं होते हैं’, यह केवल वेदना के विषय में है। ‘तथागत मृत्यु के बाद होते भी हैं और नहीं भी होते हैं’, यह केवल वेदना के विषय में है। ‘तथागत मृत्यु के बाद न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं’, यह केवल वेदना के विषय में है। हे आयुष्मान्! ‘तथागत मृत्यु के बाद होते हैं’, यह केवल संज्ञा के विषय में है। ‘तथागत मृत्यु के बाद नहीं होते हैं’, यह केवल संज्ञा के विषय में है। ‘तथागत मृत्यु के बाद होते भी हैं और नहीं भी होते हैं’, यह केवल संज्ञा के विषय में है। ‘तथागत मृत्यु के बाद न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं’, यह केवल संज्ञा के विषय में है। हे आयुष्मान्! ‘तथागत मृत्यु के बाद होते हैं’, यह केवल संस्कार के विषय में है। ‘तथागत मृत्यु के बाद नहीं होते हैं’, यह केवल संस्कार के विषय में है। ‘तथागत मृत्यु के बाद होते भी हैं और नहीं भी होते हैं’, यह केवल संस्कार के विषय में है। ‘तथागत मृत्यु के बाद न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं’, यह केवल संस्कार के विषय में है। हे आयुष्मान्! ‘तथागत मृत्यु के बाद होते हैं’, यह केवल विज्ञान के विषय में है। ‘तथागत मृत्यु के बाद नहीं होते हैं’, यह केवल विज्ञान के विषय में है। ‘तथागत मृत्यु के बाद होते भी हैं और नहीं भी होते हैं’, यह केवल विज्ञान के विषय में है। ‘तथागत मृत्यु के बाद न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं’, यह केवल विज्ञान के विषय में है। हे आयुष्मान्! यही वह हेतु है, यही वह प्रत्यय है, जिसके कारण भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है।” तृतीय। ๔. ทุติยสาริปุตฺตโกฏฺฐิกสุตฺตํ ४. द्वितीय सारिपुत्त-कोट्ट्ठिक सुत्त ๔๑๓. เอกํ สมยํ อายสฺมา จ สาริปุตฺโต, อายสฺมา จ มหาโกฏฺฐิโก พาราณสิยํ วิหรนฺติ อิสิปตเน มิคทาเย…เป… (สาเยว [Pg.554] ปุจฺฉา) ‘‘โก นุ โข, อาวุโส, เหตุ, โก ปจฺจโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ? ‘‘รูปํ โข, อาวุโส, อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, รูปสมุทยํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, รูปนิโรธํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, รูปนิโรธคามินึ ปฏิปทํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ; ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ; ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ; ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ. เวทนํ…เป… สญฺญํ…เป… สงฺขาเร…เป… วิญฺญาณํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, วิญฺญาณสมุทยํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, วิญฺญาณนิโรธํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, วิญฺญาณนิโรธคามินึ ปฏิปทํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ; ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ; ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ; ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติปิสฺส โหติ. ४१३. एक समय आयुष्मान् सारिपुत्त और आयुष्मान् महाकोट्ट्ठिक वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाव में विहार कर रहे थे... (वही प्रश्न) “हे आयुष्मान्! क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिसके कारण भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है?” “हे आयुष्मान्! रूप को यथार्थ रूप से न जानने और न देखने वाले के लिए, रूप के उदय को यथार्थ रूप से न जानने और न देखने वाले के लिए, रूप के निरोध को यथार्थ रूप से न जानने और न देखने वाले के लिए, रूप-निरोध-गामिनी प्रतिपदा को यथार्थ रूप से न जानने और न देखने वाले के लिए—‘तथागत मृत्यु के बाद होते हैं’ ऐसा भी उसे होता है; ‘तथागत मृत्यु के बाद नहीं होते हैं’ ऐसा भी उसे होता है; ‘तथागत मृत्यु के बाद होते भी हैं और नहीं भी होते हैं’ ऐसा भी उसे होता है; ‘तथागत मृत्यु के बाद न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं’ ऐसा भी उसे होता है। वेदना... संज्ञा... संस्कार... विज्ञान को यथार्थ रूप से न जानने और न देखने वाले के लिए, विज्ञान के उदय को यथार्थ रूप से न जानने और न देखने वाले के लिए, विज्ञान के निरोध को यथार्थ रूप से न जानने और न देखने वाले के लिए, विज्ञान-निरोध-गामिनी प्रतिपदा को यथार्थ रूप से न जानने और न देखने वाले के लिए—‘तथागत मृत्यु के बाद होते हैं’ ऐसा भी उसे होता है; ‘तथागत मृत्यु के बाद नहीं होते हैं’ ऐसा भी उसे होता है; ‘तथागत मृत्यु के बाद होते भी हैं और नहीं भी होते हैं’ ऐसा भी उसे होता है; ‘तथागत मृत्यु के बाद न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं’ ऐसा भी उसे होता है।” ‘‘รูปญฺจ โข, อาวุโส, ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, รูปสมุทยํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, รูปนิโรธํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, รูปนิโรธคามินึ ปฏิปทํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ. เวทนํ…เป… สญฺญํ…เป… สงฺขาเร…เป… วิญฺญาณํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, วิญฺญาณสมุทยํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, วิญฺญาณนิโรธํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, วิญฺญาณนิโรธคามินึ ปฏิปทํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ; ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ; ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ; ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ. อยํ โข, อาวุโส, เหตุ อยํ ปจฺจโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ. จตุตฺถํ. “परंतु हे आयुष्मान्! रूप को यथार्थ रूप से जानने और देखने वाले के लिए, रूप के उदय को यथार्थ रूप से जानने और देखने वाले के लिए, रूप के निरोध को यथार्थ रूप से जानने और देखने वाले के लिए, रूप-निरोध-गामिनी प्रतिपदा को यथार्थ रूप से जानने और देखने वाले के लिए—‘तथागत मृत्यु के बाद होते हैं’ ऐसा उसे नहीं होता है... ‘तथागत मृत्यु के बाद न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं’ ऐसा उसे नहीं होता है। वेदना... संज्ञा... संस्कार... विज्ञान को यथार्थ रूप से जानने और देखने वाले के लिए, विज्ञान के उदय को यथार्थ रूप से जानने और देखने वाले के लिए, विज्ञान के निरोध को यथार्थ रूप से जानने और देखने वाले के लिए, विज्ञान-निरोध-गामिनी प्रतिपदा को यथार्थ रूप से जानने और देखने वाले के लिए—‘तथागत मृत्यु के बाद होते हैं’ ऐसा उसे नहीं होता है; ‘तथागत मृत्यु के बाद नहीं होते हैं’ ऐसा उसे नहीं होता है; ‘तथागत मृत्यु के बाद होते भी हैं और नहीं भी होते हैं’ ऐसा उसे नहीं होता है; ‘तथागत मृत्यु के बाद न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं’ ऐसा उसे नहीं होता है। हे आयुष्मान्! यही वह हेतु है, यही वह प्रत्यय है, जिसके कारण भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है।” चतुर्थ। ๕. ตติยสาริปุตฺตโกฏฺฐิกสุตฺตํ ५. तृतीय सारिपुत्त-कोट्ट्ठिक सुत्त ๔๑๔. เอกํ [Pg.555] สมยํ อายสฺมา จ สาริปุตฺโต, อายสฺมา จ มหาโกฏฺฐิโก พาราณสิยํ วิหรนฺติ อิสิปตเน มิคทาเย…เป… (สาเยว ปุจฺฉา) ‘‘โก นุ โข, อาวุโส, เหตุ โก ปจฺจโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ? ‘‘รูเป โข, อาวุโส, อวิคตราคสฺส อวิคตจฺฉนฺทสฺส อวิคตเปมสฺส อวิคตปิปาสสฺส อวิคตปริฬาหสฺส อวิคตตณฺหสฺส ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ. เวทนาย…เป… สญฺญาย…เป… สงฺขาเรสุ…เป… วิญฺญาเณ อวิคตราคสฺส อวิคตจฺฉนฺทสฺส อวิคตเปมสฺส อวิคตปิปาสสฺส อวิคตปริฬาหสฺส อวิคตตณฺหสฺส ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ. รูเป จ โข, อาวุโส, วิคตราคสฺส…เป… เวทนาย…เป… สญฺญาย…เป… สงฺขาเรสุ…เป… วิญฺญาเณ วิคตราคสฺส วิคตจฺฉนฺทสฺส วิคตเปมสฺส วิคตปิปาสสฺส วิคตปริฬาหสฺส วิคตตณฺหสฺส ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ. อยํ โข, อาวุโส, เหตุ, อยํ ปจฺจโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ. ปญฺจมํ. ४१४. एक समय आयुष्मान सारिपुत्र और आयुष्मान महाकोट्ठिक वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाव में विहार कर रहे थे... (वही प्रश्न) "हे आयुष्मान! क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है?" "हे आयुष्मान! रूप में जिसका राग दूर नहीं हुआ है, जिसकी इच्छा दूर नहीं हुई है, जिसका प्रेम दूर नहीं हुआ है, जिसकी पिपासा दूर नहीं हुई है, जिसका परिदाह दूर नहीं हुआ है, जिसकी तृष्णा दूर नहीं हुई है, उसके मन में यह विचार आता है कि— 'तथागत मृत्यु के बाद होते हैं'... आदि... 'तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं'। वेदना... संज्ञा... संस्कार... विज्ञान में जिसका राग दूर नहीं हुआ है, जिसकी इच्छा दूर नहीं हुई है, जिसका प्रेम दूर नहीं हुआ है, जिसकी पिपासा दूर नहीं हुई है, जिसका परिदाह दूर नहीं हुआ है, जिसकी तृष्णा दूर नहीं हुई है, उसके मन में यह विचार आता है कि— 'तथागत मृत्यु के बाद होते हैं'... आदि... 'तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं'। हे आयुष्मान! रूप में जिसका राग दूर हो गया है... वेदना... संज्ञा... संस्कार... विज्ञान में जिसका राग दूर हो गया है, जिसकी इच्छा दूर हो गई है, जिसका प्रेम दूर हो गया है, जिसकी पिपासा दूर हो गई है, जिसका परिदाह दूर हो गया है, जिसकी तृष्णा दूर हो गई है, उसके मन में यह विचार नहीं आता कि— 'तथागत मृत्यु के बाद होते हैं'... आदि... 'तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं'। हे आयुष्मान! यही हेतु है, यही प्रत्यय है, जिससे भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है।" पाँचवाँ। ๖. จตุตฺถสาริปุตฺตโกฏฺฐิกสุตฺตํ ६. चतुर्थ सारिपुत्र-कोट्ठिक सुत्त। ๔๑๕. เอกํ สมยํ อายสฺมา จ สาริปุตฺโต, อายสฺมา จ มหาโกฏฺฐิโก พาราณสิยํ วิหรนฺติ อิสิปตเน มิคทาเย. อถ โข อายสฺมา สาริปุตฺโต สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต เยนายสฺมา มหาโกฏฺฐิโก เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา มหาโกฏฺฐิเกน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา สาริปุตฺโต อายสฺมนฺตํ มหาโกฏฺฐิกํ เอตทโวจ – ‘‘‘กึ นุ โข, อาวุโส โกฏฺฐิก, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ…เป… ‘กึ ปนาวุโส, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ อิติ ปุฏฺโฐ สมาโน – ‘เอตมฺปิ โข, อาวุโส, อพฺยากตํ ภควตา – เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต [Pg.556] ปรํ มรณา’ติ วเทสิ’’. ‘‘โก นุ โข, อาวุโส, เหตุ, โก ปจฺจโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ? ४१५. एक समय आयुष्मान सारिपुत्र और आयुष्मान महाकोट्ठिक वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाव में विहार कर रहे थे। तब आयुष्मान सारिपुत्र सायंकाल के समय ध्यान से उठकर जहाँ आयुष्मान महाकोट्ठिक थे, वहाँ गए। वहाँ पहुँचकर आयुष्मान महाकोट्ठिक के साथ कुशल-क्षेम पूछा। सुखद और स्मरणीय बातचीत करने के बाद वे एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान सारिपुत्र ने आयुष्मान महाकोट्ठिक से यह कहा— "हे आयुष्मान कोट्ठिक! क्या तथागत मृत्यु के बाद होते हैं?... या हे आयुष्मान! क्या तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं? इस प्रकार पूछे जाने पर आपने कहा— 'हे आयुष्मान! भगवान ने इसे भी अव्याकृत रखा है कि तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं'।" "हे आयुष्मान! क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है?" ‘‘รูปารามสฺส โข, อาวุโส, รูปรตสฺส รูปสมฺมุทิตสฺส รูปนิโรธํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ; ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ; ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ; ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ. เวทนารามสฺส โข, อาวุโส, เวทนารตสฺส เวทนาสมฺมุทิตสฺส, เวทนานิโรธํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ…เป… สญฺญารามสฺส โข, อาวุโส…เป… สงฺขารารามสฺส โข อาวุโส…เป… วิญฺญาณารามสฺส โข, อาวุโส, วิญฺญาณรตสฺส วิญฺญาณสมฺมุทิตสฺส วิญฺญาณนิโรธํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ’’. "हे आयुष्मान! जो रूप में रमण करने वाला है, रूप में लीन है, रूप में आनंदित है, और जो रूप के निरोध को यथार्थ रूप से नहीं जानता और नहीं देखता, उसके मन में यह विचार आता है कि— 'तथागत मृत्यु के बाद होते हैं'; 'तथागत मृत्यु के बाद नहीं होते हैं'; 'तथागत मृत्यु के बाद होते भी हैं और नहीं भी होते हैं'; 'तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं'। हे आयुष्मान! जो वेदना में रमण करने वाला है, वेदना में लीन है, वेदना में आनंदित है, और जो वेदना के निरोध को यथार्थ रूप से नहीं जानता और नहीं देखता, उसके मन में यह विचार आता है कि— 'तथागत मृत्यु के बाद होते हैं'... आदि... हे आयुष्मान! जो संज्ञा में रमण करने वाला है... हे आयुष्मान! जो संस्कारों में रमण करने वाला है... हे आयुष्मान! जो विज्ञान में रमण करने वाला है, विज्ञान में लीन है, विज्ञान में आनंदित है, और जो विज्ञान के निरोध को यथार्थ रूप से नहीं जानता और नहीं देखता, उसके मन में यह विचार आता है कि— 'तथागत मृत्यु के बाद होते हैं'... आदि... 'तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं'।" ‘‘น รูปารามสฺส โข, อาวุโส, น รูปรตสฺส น รูปสมฺมุทิตสฺส, รูปนิโรธํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ. น เวทนารามสฺส โข, อาวุโส…เป… น สญฺญารามสฺส โข, อาวุโส…เป… น สงฺขารารามสฺส โข, อาวุโส…เป… น วิญฺญาณารามสฺส โข, อาวุโส, น วิญฺญาณรตสฺส น วิญฺญาณสมฺมุทิตสฺส, วิญฺญาณนิโรธํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ. อยํ โข, อาวุโส, เหตุ, อยํ ปจฺจโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ. "हे आयुष्मान! जो रूप में रमण करने वाला नहीं है, रूप में लीन नहीं है, रूप में आनंदित नहीं है, और जो रूप के निरोध को यथार्थ रूप से जानता और देखता है, उसके मन में यह विचार नहीं आता कि— 'तथागत मृत्यु के बाद होते हैं'... आदि... 'तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं'। हे आयुष्मान! जो वेदना में रमण करने वाला नहीं है... हे आयुष्मान! जो संज्ञा में रमण करने वाला नहीं है... हे आयुष्मान! जो संस्कारों में रमण करने वाला नहीं है... हे आयुष्मान! जो विज्ञान में रमण करने वाला नहीं है, विज्ञान में लीन नहीं है, विज्ञान में आनंदित नहीं है, और जो विज्ञान के निरोध को यथार्थ रूप से जानता और देखता है, उसके मन में यह विचार नहीं आता कि— 'तथागत मृत्यु के बाद होते हैं'... आदि... 'तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं'। हे आयुष्मान! यही हेतु है, यही प्रत्यय है, जिससे भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है।" ‘‘สิยา ปนาวุโส, อญฺโญปิ ปริยาโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ? ‘‘สิยา, อาวุโส. ภวารามสฺส โข, อาวุโส, ภวรตสฺส ภวสมฺมุทิตสฺส, ภวนิโรธํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ. น [Pg.557] ภวารามสฺส โข, อาวุโส, น ภวรตสฺส น ภวสมฺมุทิตสฺส, ภวนิโรธํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ. อยมฺปิ โข, อาวุโส, ปริยาโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ. "हे आयुष्मान! क्या कोई अन्य पर्याय भी हो सकता है, जिससे भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है?" "हे आयुष्मान! हो सकता है। हे आयुष्मान! जो भव में रमण करने वाला है, भव में लीन है, भव में आनंदित है, और जो भव के निरोध को यथार्थ रूप से नहीं जानता और नहीं देखता, उसके मन में यह विचार आता है कि— 'तथागत मृत्यु के बाद होते हैं'... आदि... 'तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं'। हे आयुष्मान! जो भव में रमण करने वाला नहीं है, भव में लीन नहीं है, भव में आनंदित नहीं है, और जो भव के निरोध को यथार्थ रूप से जानता और देखता है, उसके मन में यह विचार नहीं आता कि— 'तथागत मृत्यु के बाद होते हैं'... आदि... 'तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं'। हे आयुष्मान! यह भी एक पर्याय है, जिससे भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है।" ‘‘สิยา ปนาวุโส, อญฺโญปิ ปริยาโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ? ‘‘สิยา, อาวุโส. อุปาทานารามสฺส โข, อาวุโส, อุปาทานรตสฺส อุปาทานสมฺมุทิตสฺส, อุปาทานนิโรธํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ. น อุปาทานารามสฺส โข, อาวุโส, น อุปาทานรตสฺส น อุปาทานสมฺมุทิตสฺส, อุปาทานนิโรธํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ…เป… ‘เนว, โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ. อยมฺปิ โข อาวุโส, ปริยาโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ. "हे आयुष्मान! क्या कोई और भी कारण है, जिससे भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है?" "हे आयुष्मान! है। हे आयुष्मान! जो उपादान में रमण करने वाला है, उपादान में रत है, उपादान में प्रसन्न है, और जो उपादान के निरोध को यथार्थ रूप से नहीं जानता और नहीं देखता, उसके मन में यह विचार आता है कि 'तथागत मृत्यु के पश्चात होते हैं'... आदि... 'तथागत मृत्यु के पश्चात न होते हैं और न नहीं होते हैं'। हे आयुष्मान! जो उपादान में रमण नहीं करता, उपादान में रत नहीं है, उपादान में प्रसन्न नहीं है, और जो उपादान के निरोध को यथार्थ रूप से जानता और देखता है, उसके मन में यह विचार नहीं आता कि 'तथागत मृत्यु के पश्चात होते हैं'... आदि... 'तथागत मृत्यु के पश्चात न होते हैं और न नहीं होते हैं'। हे आयुष्मान! यह भी एक कारण है, जिससे भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है।" ‘‘สิยา ปนาวุโส, อญฺโญปิ ปริยาโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ? ‘‘สิยา, อาวุโส. ตณฺหารามสฺส โข, อาวุโส, ตณฺหารตสฺส ตณฺหาสมฺมุทิตสฺส, ตณฺหานิโรธํ อชานโต อปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส โหติ. น ตณฺหารามสฺส โข, อาวุโส, น ตณฺหารตสฺส น ตณฺหาสมฺมุทิตสฺส, ตณฺหานิโรธํ ชานโต ปสฺสโต ยถาภูตํ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ…เป. … ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิสฺส น โหติ. อยมฺปิ โข, อาวุโส, ปริยาโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ. "हे आयुष्मान! क्या कोई और भी कारण है, जिससे भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है?" "हे आयुष्मान! है। हे आयुष्मान! जो तृष्णा में रमण करने वाला है, तृष्णा में रत है, तृष्णा में प्रसन्न है, और जो तृष्णा के निरोध को यथार्थ रूप से नहीं जानता और नहीं देखता, उसके मन में यह विचार आता है कि 'तथागत मृत्यु के पश्चात होते हैं'... आदि... 'तथागत मृत्यु के पश्चात न होते हैं और न नहीं होते हैं'। हे आयुष्मान! जो तृष्णा में रमण नहीं करता, तृष्णा में रत नहीं है, तृष्णा में प्रसन्न नहीं है, और जो तृष्णा के निरोध को यथार्थ रूप से जानता और देखता है, उसके मन में यह विचार नहीं आता कि 'तथागत मृत्यु के पश्चात होते हैं'... आदि... 'तथागत मृत्यु के पश्चात न होते हैं और न नहीं होते हैं'। हे आयुष्मान! यह भी एक कारण है, जिससे भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है।" ‘‘สิยา ปนาวุโส, อญฺโญปิ ปริยาโย, เยเนตํ อพฺยากตํ ภควตา’’ติ? ‘‘เอตฺถ ทานิ, อาวุโส สาริปุตฺต, อิโต อุตฺตริ กึ อิจฺฉสิ? ตณฺหาสงฺขยวิมุตฺตสฺส, อาวุโส สาริปุตฺต, ภิกฺขุโน วฏฺฏํ นตฺถิ ปญฺญาปนายา’’ติ. ฉฏฺฐํ. "हे आयुष्मान! क्या कोई और भी कारण है, जिससे भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है?" "हे आयुष्मान सारिपुत्र! अब यहाँ इससे आगे आप और क्या चाहते हैं? हे आयुष्मान सारिपुत्र! तृष्णा के क्षय से विमुक्त भिक्षु के लिए प्रज्ञप्ति (वर्णन) हेतु कोई संसार-चक्र शेष नहीं रहता।" छठा। ๗. โมคฺคลฺลานสุตฺตํ ७. मोग्गल्लान सुत्त ๔๑๖. อถ [Pg.558] โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา มหาโมคฺคลฺลาเนน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ เอตทโวจ – ४१६. तब वत्सगोत्र परिव्राजक जहाँ आयुष्मान महामोग्गल्लान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर आयुष्मान महामोग्गल्लान के साथ कुशल-क्षेम पूछा। आनंददायक और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए वत्सगोत्र परिव्राजक ने आयुष्मान महामोग्गल्लान से यह कहा— ‘‘กึ นุ โข, โภ โมคฺคลฺลาน, สสฺสโต โลโก’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – ‘สสฺสโต โลโก’’’ติ. ‘‘กึ ปน, โภ โมคฺคลฺลาน, อสสฺสโต โลโก’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ ภควตา – ‘อสสฺสโต โลโก’’’ติ. ‘‘กึ นุ โข, โภ โมคฺคลฺลาน, อนฺตวา โลโก’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – ‘อนฺตวา โลโก’’’ติ. ‘‘กึ ปน, โภ โมคฺคลฺลาน, อนนฺตวา โลโก’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ ภควตา – ‘อนนฺตวา โลโก’’’ติ. ‘‘กึ นุ โข, โภ โมคฺคลฺลาน, ตํ ชีวํ ตํ สรีร’’นฺติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – ‘ตํ ชีวํ ตํ สรีร’’’นฺติ. ‘‘กึ ปน, โภ โมคฺคลฺลาน, อญฺญํ ชีวํ อญฺญํ สรีร’’นฺติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ ภควตา – ‘อญฺญํ ชีวํ อญฺญํ สรีร’’’นฺติ. ‘‘กึ นุ โข, โภ โมคฺคลฺลาน, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ ปน, โภ โมคฺคลฺลาน, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ ภควตา – ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ นุ โข, โภ โมคฺคลฺลาน, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ ปน, โภ โมคฺคลฺลาน, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ ภควตา – ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. "हे मोग्गल्लान! क्या लोक शाश्वत है?" "वत्स! भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है कि 'लोक शाश्वत है'।" "हे मोग्गल्लान! तो क्या लोक अशाश्वत है?" "वत्स! भगवान ने इसे भी अव्याकृत रखा है कि 'लोक अशाश्वत है'।" "हे मोग्गल्लान! क्या लोक अन्तवान है?" "वत्स! भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है कि 'लोक अन्तवान है'।" "हे मोग्गल्लान! तो क्या लोक अनन्त है?" "वत्स! भगवान ने इसे भी अव्याकृत रखा है कि 'लोक अनन्त है'।" "हे मोग्गल्लान! क्या जो जीव है वही शरीर है?" "वत्स! भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है कि 'जो जीव है वही शरीर है'।" "हे मोग्गल्लान! क्या जीव अन्य है और शरीर अन्य है?" "वत्स! भगवान ने इसे भी अव्याकृत रखा है कि 'जीव अन्य है और शरीर अन्य है'।" "हे मोग्गल्लान! क्या तथागत मृत्यु के पश्चात होते हैं?" "वत्स! भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है कि 'तथागत मृत्यु के पश्चात होते हैं'।" "हे मोग्गल्लान! क्या तथागत मृत्यु के पश्चात नहीं होते हैं?" "वत्स! भगवान ने इसे भी अव्याकृत रखा है कि 'तथागत मृत्यु के पश्चात नहीं होते हैं'।" "हे मोग्गल्लान! क्या तथागत मृत्यु के पश्चात होते भी हैं और नहीं भी होते हैं?" "वत्स! भगवान ने इसे अव्याकृत रखा है कि 'तथागत मृत्यु के पश्चात होते भी हैं और नहीं भी होते हैं'।" "हे मोग्गल्लान! क्या तथागत मृत्यु के पश्चात न होते हैं और न नहीं होते हैं?" "वत्स! भगवान ने इसे भी अव्याकृत रखा है कि 'तथागत मृत्यु के पश्चात न होते हैं और न नहीं होते हैं'।" ‘‘โก นุ โข, โภ โมคฺคลฺลาน, เหตุ โก ปจฺจโย, เยน อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ ปุฏฺฐานํ เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – สสฺสโต โลโกติ วา, อสสฺสโต โลโกติ วา, อนฺตวา โลโกติ วา, อนนฺตวา โลโกติ วา, ตํ ชีวํ ตํ สรีรนฺติ วา, อญฺญํ ชีวํ อญฺญํ สรีรนฺติ วา, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, น โหติ ตถาคโต ปรํ [Pg.559] มรณาติ วา, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา? โก ปน, โภ โมคฺคลฺลาน, เหตุ โก ปจฺจโย, เยน สมณสฺส โคตมสฺส เอวํ ปุฏฺฐสฺส น เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – สสฺสโต โลโกติปิ, อสสฺสโต โลโกติปิ, อนฺตวา โลโกติปิ, อนนฺตวา โลโกติปิ, ตํ ชีวํ ตํ สรีรนฺติปิ, อญฺญํ ชีวํ อญฺญํ สรีรนฺติปิ, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติปิ, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติปิ, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติปิ, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติปี’’ติ? "हे मोग्गल्लान! वह क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे अन्य मतों के परिव्राजकों से इस प्रकार पूछे जाने पर वे इस प्रकार उत्तर देते हैं—'लोक शाश्वत है' अथवा 'लोक अशाश्वत है', 'लोक अन्तवान है' अथवा 'लोक अनन्त है', 'जो जीव है वही शरीर है' अथवा 'जीव अन्य है और शरीर अन्य है', 'तथागत मृत्यु के पश्चात होते हैं' अथवा 'नहीं होते हैं' अथवा 'होते भी हैं और नहीं भी होते हैं' अथवा 'न होते हैं और न नहीं होते हैं'? और हे मोग्गल्लान! वह क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे श्रमण गौतम से इस प्रकार पूछे जाने पर वे इस प्रकार उत्तर नहीं देते—'लोक शाश्वत है', 'लोक अशाश्वत है', 'लोक अन्तवान है', 'लोक अनन्त है', 'जो जीव है वही शरीर है', 'जीव अन्य है और शरीर अन्य है', 'तथागत मृत्यु के पश्चात होते हैं', 'तथागत मृत्यु के पश्चात नहीं होते हैं', 'तथागत मृत्यु के पश्चात होते भी हैं और नहीं भी होते हैं', 'तथागत मृत्यु के पश्चात न होते हैं और न नहीं होते हैं'?" ‘‘อญฺญติตฺถิยา โข, วจฺฉ, ปริพฺพาชกา จกฺขุํ ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสนฺติ…เป… ชิวฺหํ ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสนฺติ…เป… มนํ ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสนฺติ. ตสฺมา อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ ปุฏฺฐานํ เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – สสฺสโต โลโกติ วา…เป… เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติ วา. ตถาคโต จ โข, วจฺฉ, อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ จกฺขุํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสติ…เป… ชิวฺหํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสติ…เป… มนํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสติ. ตสฺมา ตถาคตสฺส เอวํ ปุฏฺฐสฺส น เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – สสฺสโต โลโกติปิ…เป… เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณาติปี’’ติ. "हे वच्छ! अन्य मतों के परिव्राजक चक्षु को 'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है' इस प्रकार देखते हैं... जिह्वा को 'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है' इस प्रकार देखते हैं... मन को 'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है' इस प्रकार देखते हैं। इसलिए उन अन्य मतों के परिव्राजकों से ऐसा पूछे जाने पर वे ऐसा उत्तर देते हैं - 'लोक शाश्वत है'... या 'तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं'। किन्तु हे वच्छ! अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध तथागत चक्षु को 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है' इस प्रकार देखते हैं... जिह्वा को 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है' इस प्रकार देखते हैं... मन को 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है' इस प्रकार देखते हैं। इसलिए तथागत से ऐसा पूछे जाने पर वे ऐसा उत्तर नहीं देते हैं - 'लोक शाश्वत है'... या 'तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं'।" อถ โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก อุฏฺฐายาสนา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข, โภ โคตม, สสฺสโต โลโก’’ติ? อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, มยา – ‘สสฺสโต โลโก’ติ…เป…. ‘‘กึ ปน, โภ โคตม, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ มยา – ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. तब वच्छगोत्त परिव्राजक अपने आसन से उठकर जहाँ भगवान थे वहाँ गया; जाकर भगवान के साथ कुशल-क्षेम की चर्चा की। प्रसन्नतापूर्ण और स्मरणीय बातें करके वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए वच्छगोत्त परिव्राजक ने भगवान से यह कहा - "हे गौतम! क्या लोक शाश्वत है?" "हे वच्छ! मेरे द्वारा यह अव्याकृत है कि लोक शाश्वत है"... "हे गौतम! क्या तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं?" "हे वच्छ! मेरे द्वारा यह भी अव्याकृत है कि तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं।" ‘‘โก [Pg.560] นุ โข, โภ โคตม, เหตุ โก ปจฺจโย, เยน อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ ปุฏฺฐานํ เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติ วา…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา? โก ปน, โภ โคตม, เหตุ โก ปจฺจโย, เยน โภโต โคตมสฺส เอวํ ปุฏฺฐสฺส น เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติปิ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปี’’ติ? "हे गौतम! वह क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे अन्य मतों के परिव्राजकों से ऐसा पूछे जाने पर वे ऐसा उत्तर देते हैं - 'लोक शाश्वत है'... या 'तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं'? और हे गौतम! वह क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे आप गौतम से ऐसा पूछे जाने पर आप ऐसा उत्तर नहीं देते हैं - 'लोक शाश्वत है'... या 'तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं'?" ‘‘อญฺญติตฺถิยา โข, วจฺฉ, ปริพฺพาชกา จกฺขุํ ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสนฺติ…เป… ชิวฺหํ ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสนฺติ…เป… มนํ ‘เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสนฺติ. ตสฺมา อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ ปุฏฺฐานํ เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติ วา…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา. ตถาคโต จ โข, วจฺฉ, อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ จกฺขุํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสติ…เป… ชิวฺหํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสติ…เป… มนํ ‘เนตํ มม, เนโสหมสฺมิ, น เมโส อตฺตา’ติ สมนุปสฺสติ. ตสฺมา ตถาคตสฺส เอวํ ปุฏฺฐสฺส น เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติปิ, ‘อสสฺสโต โลโก’ติปิ, ‘อนฺตวา โลโก’ติปิ, ‘อนนฺตวา โลโก’ติปิ, ‘ตํ ชีวํ ตํ สรีร’นฺติปิ, ‘อญฺญํ ชีวํ อญฺญํ สรีร’นฺติปิ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ, ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ, ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ, ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปี’’ติ. "हे वच्छ! अन्य मतों के परिव्राजक चक्षु को 'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है' इस प्रकार देखते हैं... जिह्वा को 'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है' इस प्रकार देखते हैं... मन को 'यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है' इस प्रकार देखते हैं। इसलिए उन अन्य मतों के परिव्राजकों से ऐसा पूछे जाने पर वे ऐसा उत्तर देते हैं - 'लोक शाश्वत है'... या 'तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं'। किन्तु हे वच्छ! अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध तथागत चक्षु को 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है' इस प्रकार देखते हैं... जिह्वा को 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है' इस प्रकार देखते हैं... मन को 'यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है' इस प्रकार देखते हैं। इसलिए तथागत से ऐसा पूछे जाने पर वे ऐसा उत्तर नहीं देते हैं - 'लोक शाश्वत है', 'लोक अशाश्वत है', 'लोक अन्तवान है', 'लोक अनन्त है', 'जो जीव है वही शरीर है', 'जीव अन्य है और शरीर अन्य है', 'तथागत मृत्यु के बाद होते हैं', 'तथागत मृत्यु के बाद नहीं होते हैं', 'तथागत मृत्यु के बाद होते भी हैं और नहीं भी होते हैं', 'तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं'।" ‘‘อจฺฉริยํ, โภ โคตม, อพฺภุตํ, โภ โคตม! ยตฺร หิ นาม สตฺถุ จ สาวกสฺส จ อตฺเถน อตฺโถ พฺยญฺชเนน พฺยญฺชนํ สํสนฺทิสฺสติ สเมสฺสติ น วิโรธยิสฺสติ, ยทิทํ อคฺคปทสฺมึ. อิทานาหํ, โภ โคตม, สมณํ มหาโมคฺคลฺลานํ อุปสงฺกมิตฺวา เอตมตฺถํ อปุจฺฉึ. สมโณปิ เม โมคฺคลฺลาโน เอเตหิ ปเทหิ เอเตหิ พฺยญฺชเนหิ ตมตฺถํ พฺยากาสิ, เสยฺยถาปิ ภวํ โคตโม. อจฺฉริยํ, โภ โคตม, อพฺภุตํ, โภ โคตม[Pg.561]! ยตฺร หิ นาม สตฺถุ จ สาวกสฺส จ อตฺเถน อตฺโถ พฺยญฺชเนน พฺยญฺชนํ สํสนฺทิสฺสติ สเมสฺสติ น วิโรธยิสฺสติ, ยทิทํ อคฺคปทสฺมิ’’นฺติ. สตฺตมํ. "आश्चर्य है, हे गौतम! अद्भुत है, हे गौतम! जहाँ शास्ता और श्रावक के अर्थ से अर्थ और व्यंजन से व्यंजन मिलते हैं, मेल खाते हैं, विरोध नहीं करते, जो कि इस अग्र पद के विषय में है। हे गौतम! अभी मैंने श्रमण महामौद्गल्यायन के पास जाकर यही बात पूछी थी। श्रमण मौद्गल्यायन ने भी इन्हीं पदों और इन्हीं व्यंजनों के साथ मुझे वही अर्थ बताया, जैसा कि आप गौतम ने बताया है। आश्चर्य है, हे गौतम! अद्भुत है, हे गौतम! जहाँ शास्ता और श्रावक के अर्थ से अर्थ और व्यंजन से व्यंजन मिलते हैं, मेल खाते हैं, विरोध नहीं करते, जो कि इस अग्र पद के विषय में है।" सातवाँ। ๘. วจฺฉโคตฺตสุตฺตํ ८. वच्छगोत्त सुत्त ๔๑๗. อถ โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข, โภ โคตม, สสฺสโต โลโก’’ติ? อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, มยา – ‘สสฺสโต โลโก’ติ…เป…. ‘‘กึ ปน, โภ โคตม, ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ มยา – ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ४१७. तब वच्छगोत्त परिव्राजक जहाँ भगवान थे वहाँ गया; जाकर भगवान के साथ कुशल-क्षेम की चर्चा की। प्रसन्नतापूर्ण और स्मरणीय बातें करके वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए वच्छगोत्त परिव्राजक ने भगवान से यह कहा - "हे गौतम! क्या लोक शाश्वत है?" "हे वच्छ! मेरे द्वारा यह अव्याकृत है कि लोक शाश्वत है"... "हे गौतम! क्या तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं?" "हे वच्छ! मेरे द्वारा यह भी अव्याकृत है कि तथागत मृत्यु के बाद न होते हैं और न नहीं होते हैं।" ‘‘โก นุ โข, โภ โคตม, เหตุ, โก ปจฺจโย, เยน อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ ปุฏฺฐานํ เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติ วา…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา? โก ปน, โภ โคตม, เหตุ, โก ปจฺจโย, เยน โภโต โคตมสฺส เอวํ ปุฏฺฐสฺส น เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติปิ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปี’’ติ? "हे गौतम! वह क्या हेतु है, वह क्या प्रत्यय है, जिससे अन्य मतों के परिव्राजकों से इस प्रकार पूछे जाने पर वे ऐसा उत्तर देते हैं— 'लोक शाश्वत है' ... अथवा 'मृत्यु के पश्चात तथागत न होते हैं, न नहीं होते हैं'? और हे गौतम! वह क्या हेतु है, वह क्या प्रत्यय है, जिससे आप गौतम से इस प्रकार पूछे जाने पर आप ऐसा उत्तर नहीं देते— 'लोक शाश्वत है' ... अथवा 'मृत्यु के पश्चात तथागत न होते हैं, न नहीं होते हैं'?" ‘‘อญฺญติตฺถิยา โข, วจฺฉ, ปริพฺพาชกา รูปํ อตฺตโต สมนุปสฺสนฺติ, รูปวนฺตํ วา อตฺตานํ, อตฺตนิ วา รูปํ, รูปสฺมึ วา อตฺตานํ. เวทนํ อตฺตโต สมนุปสฺสนฺติ…เป… สญฺญํ…เป… สงฺขาเร…เป… วิญฺญาณํ อตฺตโต สมนุปสฺสนฺติ, วิญฺญาณวนฺตํ วา อตฺตานํ, อตฺตนิ วา วิญฺญาณํ, วิญฺญาณสฺมึ วา อตฺตานํ. ตสฺมา อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ ปุฏฺฐานํ เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติ วา…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา. ตถาคโต จ โข, วจฺฉ, อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ น รูปํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, น รูปวนฺตํ วา อตฺตานํ, น อตฺตนิ วา รูปํ, น รูปสฺมึ วา อตฺตานํ. น เวทนํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ…เป… น สญฺญํ…เป… น สงฺขาเร…เป… น วิญฺญาณํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, น [Pg.562] วิญฺญาณวนฺตํ วา อตฺตานํ, น อตฺตนิ วา วิญฺญาณํ, น วิญฺญาณสฺมึ วา อตฺตานํ. ตสฺมา ตถาคตสฺส เอวํ ปุฏฺฐสฺส น เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติปิ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปี’’ติ. "वच्छ! अन्य मतों के परिव्राजक रूप को आत्मा के रूप में देखते हैं, या आत्मा को रूपवान देखते हैं, या आत्मा में रूप को देखते हैं, या रूप में आत्मा को देखते हैं। वे वेदना को... संज्ञा को... संस्कारों को... विज्ञान को आत्मा के रूप में देखते हैं, या आत्मा को विज्ञानवान देखते हैं, या आत्मा में विज्ञान को देखते हैं, या विज्ञान में आत्मा को देखते हैं। इसलिए, अन्य मतों के परिव्राजकों से इस प्रकार पूछे जाने पर वे ऐसा उत्तर देते हैं— 'लोक शाश्वत है' ... अथवा 'मृत्यु के पश्चात तथागत न होते हैं, न नहीं होते हैं'। किन्तु वच्छ! तथागत, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध रूप को आत्मा के रूप में नहीं देखते, न आत्मा को रूपवान देखते हैं, न आत्मा में रूप को देखते हैं, न रूप में आत्मा को देखते हैं। वे वेदना को... संज्ञा को... संस्कारों को... विज्ञान को आत्मा के रूप में नहीं देखते, न आत्मा को विज्ञानवान देखते हैं, न आत्मा में विज्ञान को देखते हैं, न विज्ञान में आत्मा को देखते हैं। इसलिए, तथागत से इस प्रकार पूछे जाने पर वे ऐसा उत्तर नहीं देते— 'लोक शाश्वत है' ... अथवा 'मृत्यु के पश्चात तथागत न होते हैं, न नहीं होते हैं'।" อถ โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก อุฏฺฐายาสนา เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา มหาโมคฺคลฺลาเนน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข, โภ โมคฺคลฺลาน, สสฺสโต โลโก’’ติ? อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – ‘สสฺสโต โลโก’ติ…เป…. ‘‘กึ ปน, โภ โมคฺคลฺลาน, ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ ภควตา – ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. तब वच्छगोत्त परिव्राजक अपने आसन से उठकर जहाँ आयुष्मान महामौद्गल्यायन थे, वहाँ गया। पास जाकर आयुष्मान महामौद्गल्यायन के साथ कुशल-क्षेम पूछा। आनंददायक और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए वच्छगोत्त परिव्राजक ने आयुष्मान महामौद्गल्यायन से यह कहा— "हे मौद्गल्यायन! क्या लोक शाश्वत है?" "वच्छ! भगवान ने यह घोषित नहीं किया है कि लोक शाश्वत है" ... "हे मौद्गल्यायन! क्या मृत्यु के पश्चात तथागत न होते हैं, न नहीं होते हैं?" "वच्छ! भगवान ने यह भी घोषित नहीं किया है कि मृत्यु के पश्चात तथागत न होते हैं, न नहीं होते हैं।" ‘‘โก นุ โข, โภ โมคฺคลฺลาน, เหตุ, โก ปจฺจโย, เยน อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ ปุฏฺฐานํ เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติ วา…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา? โก ปน, โภ โมคฺคลฺลาน, เหตุ, โก ปจฺจโย เยน สมณสฺส โคตมสฺส เอวํ ปุฏฺฐสฺส น เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติปิ…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปี’’ติ? "हे मौद्गल्यायन! वह क्या हेतु है, वह क्या प्रत्यय है, जिससे अन्य मतों के परिव्राजकों से इस प्रकार पूछे जाने पर वे ऐसा उत्तर देते हैं— 'लोक शाश्वत है' ... अथवा 'मृत्यु के पश्चात तथागत न होते हैं, न नहीं होते हैं'? और हे मौद्गल्यायन! वह क्या हेतु है, वह क्या प्रत्यय है, जिससे श्रमण गौतम से इस प्रकार पूछे जाने पर वे ऐसा उत्तर नहीं देते— 'लोक शाश्वत है' ... अथवा 'मृत्यु के पश्चात तथागत न होते हैं, न नहीं होते हैं'?" ‘‘อญฺญติตฺถิยา โข, วจฺฉ, ปริพฺพาชกา รูปํ อตฺตโต สมนุปสฺสนฺติ, รูปวนฺตํ วา อตฺตานํ, อตฺตนิ วา รูปํ, รูปสฺมึ วา อตฺตานํ. เวทนํ อตฺตโต สมนุปสฺสนฺติ…เป… สญฺญํ…เป… สงฺขาเร…เป… วิญฺญาณํ อตฺตโต สมนุปสฺสนฺติ, วิญฺญาณวนฺตํ วา อตฺตานํ, อตฺตนิ วา วิญฺญาณํ, วิญฺญาณสฺมึ วา อตฺตานํ. ตสฺมา อญฺญติตฺถิยานํ ปริพฺพาชกานํ เอวํ ปุฏฺฐานํ เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติ วา…เป… ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วา. ตถาคโต จ โข, วจฺฉ, อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ น รูปํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, น รูปวนฺตํ วา อตฺตานํ, น อตฺตนิ วา รูปํ, น รูปสฺมึ วา อตฺตานํ. น เวทนํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ…เป… น [Pg.563] สญฺญํ…เป… น สงฺขาเร…เป… น วิญฺญาณํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ, น วิญฺญาณวนฺตํ วา อตฺตานํ, น อตฺตนิ วา วิญฺญาณํ, น วิญฺญาณสฺมึ วา อตฺตานํ. ตสฺมา ตถาคตสฺส เอวํ ปุฏฺฐสฺส น เอวํ เวยฺยากรณํ โหติ – ‘สสฺสโต โลโก’ติปิ, ‘อสสฺสโต โลโก’ติปิ, ‘อนฺตวา โลโก’ติปิ, ‘อนนฺตวา โลโก’ติปิ, ‘ตํ ชีวํ ตํ สรีร’นฺติปิ, ‘อญฺญํ ชีวํ อญฺญํ สรีร’นฺติปิ, ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ, ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ, ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปิ, ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติปี’’ติ. "वच्छ! अन्य मतों के परिव्राजक रूप को आत्मा के रूप में देखते हैं, या आत्मा को रूपवान देखते हैं, या आत्मा में रूप को देखते हैं, या रूप में आत्मा को देखते हैं। वे वेदना को... संज्ञा को... संस्कारों को... विज्ञान को आत्मा के रूप में देखते हैं, या आत्मा को विज्ञानवान देखते हैं, या आत्मा में विज्ञान को देखते हैं, या विज्ञान में आत्मा को देखते हैं। इसलिए, अन्य मतों के परिव्राजकों से इस प्रकार पूछे जाने पर वे ऐसा उत्तर देते हैं— 'लोक शाश्वत है' ... अथवा 'मृत्यु के पश्चात तथागत न होते हैं, न नहीं होते हैं'। किन्तु वच्छ! तथागत, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध रूप को आत्मा के रूप में नहीं देखते, न आत्मा को रूपवान देखते हैं, न आत्मा में रूप को देखते हैं, न रूप में आत्मा को देखते हैं। वे वेदना को... संज्ञा को... संस्कारों को... विज्ञान को आत्मा के रूप में नहीं देखते, न आत्मा को विज्ञानवान देखते हैं, न आत्मा में विज्ञान को देखते हैं, न विज्ञान में आत्मा को देखते हैं। इसलिए, तथागत से इस प्रकार पूछे जाने पर वे ऐसा उत्तर नहीं देते— 'लोक शाश्वत है', 'लोक अशाश्वत है', 'लोक अन्तवान है', 'लोक अनन्त है', 'जो जीव है वही शरीर है', 'जीव अन्य है और शरीर अन्य है', 'मृत्यु के पश्चात तथागत होते हैं', 'मृत्यु के पश्चात तथागत नहीं होते हैं', 'मृत्यु के पश्चात तथागत होते भी हैं और नहीं भी होते हैं', 'मृत्यु के पश्चात तथागत न होते हैं, न नहीं होते हैं'।" ‘‘อจฺฉริยํ, โภ โมคฺคลฺลาน, อพฺภุตํ, โภ โมคฺคลฺลาน! ยตฺร หิ นาม สตฺถุ จ สาวกสฺส จ อตฺเถน อตฺโถ พฺยญฺชเนน พฺยญฺชนํ สํสนฺทิสฺสติ, สเมสฺสติ, น วิโรธยิสฺสติ, ยทิทํ อคฺคปทสฺมึ. อิทานาหํ, โภ โมคฺคลฺลาน, สมณํ โคตมํ อุปสงฺกมิตฺวา เอตมตฺถํ อปุจฺฉึ. สมโณปิ เม โคตโม เอเตหิ ปเทหิ เอเตหิ พฺยญฺชเนหิ เอตมตฺถํ พฺยากาสิ, เสยฺยถาปิ ภวํ โมคฺคลฺลาโน. อจฺฉริยํ, โภ โมคฺคลฺลาน, อพฺภุตํ, โภ โมคฺคลฺลาน! ยตฺร หิ นาม สตฺถุ จ สาวกสฺส จ อตฺเถน อตฺโถ พฺยญฺชเนน พฺยญฺชนํ สํสนฺทิสฺสติ สเมสฺสติ น วิโรธยิสฺสติ, ยทิทํ อคฺคปทสฺมิ’’นฺติ. อฏฺฐมํ. "आश्चर्य है, हे मौद्गल्यायन! अद्भुत है, हे मौद्गल्यायन! जहाँ शास्ता और श्रावक के अर्थ से अर्थ और व्यंजन से व्यंजन मेल खाते हैं, समान हैं, और विरोध नहीं करते, विशेषकर इस परम पद के विषय में। हे मौद्गल्यायन! अभी मैंने श्रमण गौतम के पास जाकर यही बात पूछी थी। श्रमण गौतम ने भी इन्हीं पदों और इन्हीं व्यंजनों के साथ इसी अर्थ की व्याख्या की थी, जैसे कि आप मौद्गल्यायन ने की है। आश्चर्य है, हे मौद्गल्यायन! अद्भुत है, हे मौद्गल्यायन! जहाँ शास्ता और श्रावक के अर्थ से अर्थ और व्यंजन से व्यंजन मेल खाते हैं, समान हैं, और विरोध नहीं करते, विशेषकर इस परम पद के विषय में।" ๙. กุตูหลสาลาสุตฺตํ ९. कुतूहलशाला सुत्त ๔๑๘. อถ โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ४१८. तब वत्सगोत्र परिव्राजक जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान के साथ कुशल-क्षेम पूछा। सुखद और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए वत्सगोत्र परिव्राजक ने भगवान से यह कहा — ‘‘ปุริมานิ, โภ โคตม, ทิวสานิ ปุริมตรานิ สมฺพหุลานํ นานาติตฺถิยานํ สมณพฺราหฺมณานํ ปริพฺพาชกานํ กุตูหลสาลายํ สนฺนิสินฺนานํ สนฺนิปติตานํ อยมนฺตรากถา อุทปาทิ – ‘อยํ โข ปูรโณ กสฺสโป สงฺฆี เจว คณี จ คณาจริโย จ ญาโต ยสสฺสี ติตฺถกโร สาธุสมฺมโต พหุชนสฺส. โสปิ สาวกํ อพฺภตีตํ กาลงฺกตํ อุปปตฺตีสุ พฺยากโรติ – ‘อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน, อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน’ติ. โยปิสฺส [Pg.564] สาวโก อุตฺตมปุริโส ปรมปุริโส ปรมปตฺติปตฺโต ตมฺปิ สาวกํ อพฺภตีตํ กาลงฺกตํ อุปปตฺตีสุ พฺยากโรติ – ‘อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน, อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน’’’ติ. “हे गौतम! पिछले दिनों, बहुत पहले, कुतूहलशाला में एकत्रित और बैठे हुए अनेक नाना मतों के श्रमणों, ब्राह्मणों और परिव्राजकों के बीच यह चर्चा उठी — ‘यह पूरण कस्सप संघ के स्वामी, गण के स्वामी, गणाचार्य, प्रसिद्ध, यशस्वी, तीर्थंकर और बहुत से लोगों द्वारा सत्पुरुष माने गए हैं। वे अपने मृत शिष्यों के पुनर्जन्म के बारे में बताते हैं — अमुक वहाँ उत्पन्न हुआ है, अमुक वहाँ उत्पन्न हुआ है। उनका जो शिष्य उत्तम पुरुष, परम पुरुष, परम प्राप्ति को प्राप्त होता है, उसके बारे में भी वे बताते हैं — अमुक वहाँ उत्पन्न हुआ है, अमुक वहाँ उत्पन्न हुआ है।’” ‘‘อยมฺปิ โข มกฺขลิ โคสาโล…เป… อยมฺปิ โข นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต…เป… อยมฺปิ โข สญฺจโย เพลฏฺฐปุตฺโต…เป… อยมฺปิ โข ปกุโธ กจฺจาโน…เป… อยมฺปิ โข อชิโต เกสกมฺพโล สงฺฆี เจว คณี จ คณาจริโย จ ญาโต ยสสฺสี ติตฺถกโร สาธุสมฺมโต พหุชนสฺส. โสปิ สาวกํ อพฺภตีตํ กาลงฺกตํ อุปปตฺตีสุ พฺยากโรติ – ‘อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน, อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน’ติ. โยปิสฺส สาวโก อุตฺตมปุริโส ปรมปุริโส ปรมปตฺติปตฺโต ตมฺปิ สาวกํ อพฺภตีตํ กาลงฺกตํ อุปปตฺตีสุ พฺยากโรติ – ‘อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน, อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน’’’ติ. “यही बात मक्खलि गोसाल... निगण्ठ नातपुत्त... संजय बेलट्ठिपुत्त... पकुध कच्चायन... और अजित केसकम्बल के बारे में भी है, जो संघ के स्वामी, गण के स्वामी, गणाचार्य, प्रसिद्ध, यशस्वी, तीर्थंकर और बहुत से लोगों द्वारा सत्पुरुष माने गए हैं। वे भी अपने मृत शिष्यों के पुनर्जन्म के बारे में बताते हैं — अमुक वहाँ उत्पन्न हुआ है, अमुक वहाँ उत्पन्न हुआ है। उनका जो शिष्य उत्तम पुरुष, परम पुरुष, परम प्राप्ति को प्राप्त होता है, उसके बारे में भी वे बताते हैं — अमुक वहाँ उत्पन्न हुआ है, अमुक वहाँ उत्पन्न हुआ है।” ‘‘อยมฺปิ โข สมโณ โคตโม สงฺฆี เจว คณี จ คณาจริโย จ ญาโต ยสสฺสี ติตฺถกโร สาธุสมฺมโต พหุชนสฺส. โสปิ สาวกํ อพฺภตีตํ กาลงฺกตํ อุปปตฺตีสุ พฺยากโรติ – ‘อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน, อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน’ติ. โยปิสฺส สาวโก อุตฺตมปุริโส ปรมปุริโส ปรมปตฺติปตฺโต ตญฺจ สาวกํ อพฺภตีตํ กาลงฺกตํ อุปปตฺตีสุ น พฺยากโรติ – ‘อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน, อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน’ติ. อปิ จ โข นํ เอวํ พฺยากโรติ – ‘อจฺเฉจฺฉิ ตณฺหํ, วิวตฺตยิ สํโยชนํ, สมฺมา มานาภิสมยา อนฺตมกาสิ ทุกฺขสฺสา’ติ. ตสฺส มยฺหํ, โภ โคตม, อหุ เทว กงฺขา, อหุ วิจิกิจฺฉา – ‘กถํ นาม สมณสฺส โคตมสฺส ธมฺโม อภิญฺเญยฺโย’’’ติ ? “यह श्रमण गौतम भी संघ के स्वामी, गण के स्वामी, गणाचार्य, प्रसिद्ध, यशस्वी, तीर्थंकर और बहुत से लोगों द्वारा सत्पुरुष माने गए हैं। वे भी अपने मृत शिष्यों के पुनर्जन्म के बारे में बताते हैं — अमुक वहाँ उत्पन्न हुआ है, अमुक वहाँ उत्पन्न हुआ है। लेकिन उनका जो शिष्य उत्तम पुरुष, परम पुरुष, परम प्राप्ति को प्राप्त होता है, उसके बारे में वे यह नहीं बताते कि वह अमुक स्थान पर उत्पन्न हुआ है। बल्कि वे उसके बारे में इस प्रकार कहते हैं — ‘उसने तृष्णा को काट दिया है, संयोजनों (बंधनों) को उलट दिया है, मान का सम्यक् रूप से क्षय कर दुःख का अंत कर दिया है।’ हे गौतम! तब मुझे यह शंका हुई, यह संदेह हुआ — ‘श्रमण गौतम के धर्म को कैसे समझा जाए?’” ‘‘อลญฺหิ เต, วจฺฉ, กงฺขิตุํ, อลํ วิจิกิจฺฉิตุํ. กงฺขนีเย จ ปน เต ฐาเน วิจิกิจฺฉา อุปฺปนฺนา. สอุปาทานสฺส ขฺวาหํ, วจฺฉ, อุปปตฺตึ ปญฺญาเปมิ โน อนุปาทานสฺส. เสยฺยถาปิ, วจฺฉ, อคฺคิ สอุปาทาโน ชลติ, โน อนุปาทาโน; เอวเมว ขฺวาหํ, วจฺฉ, สอุปาทานสฺส อุปปตฺตึ ปญฺญาเปมิ, โน อนุปาทานสฺสา’’ติ. “वत्स! तुम्हें शंका होना स्वाभाविक है, संदेह होना स्वाभाविक है। संदेह के स्थान पर ही तुम्हें संदेह उत्पन्न हुआ है। वत्स! मैं ‘स-उपादान’ (आसक्ति/ईंधन सहित) के लिए पुनर्जन्म प्रज्ञप्त करता हूँ, ‘अनुपादान’ (आसक्ति/ईंधन रहित) के लिए नहीं। जैसे, वत्स! अग्नि ईंधन (उपादान) होने पर जलती है, बिना ईंधन के नहीं; वैसे ही, वत्स! मैं स-उपादान के लिए पुनर्जन्म प्रज्ञप्त करता हूँ, अनुपादान के लिए नहीं।” ‘‘ยสฺมึ[Pg.565], โภ โคตม, สมเย อจฺจิ วาเตน ขิตฺตา ทูรมฺปิ คจฺฉติ, อิมสฺส ปน ภวํ โคตโม กึ อุปาทานสฺมึ ปญฺญาเปตี’’ติ? ‘‘ยสฺมึ โข, วจฺฉ, สมเย อจฺจิ วาเตน ขิตฺตา ทูรมฺปิ คจฺฉติ, ตมหํ วาตูปาทานํ ปญฺญาเปมิ. วาโต หิสฺส, วจฺฉ, ตสฺมึ สมเย อุปาทานํ โหตี’’ติ. ‘‘ยสฺมิญฺจ ปน, โภ โคตม, สมเย อิมญฺจ กายํ นิกฺขิปติ, สตฺโต จ อญฺญตรํ กายํ อนุปปนฺโน โหติ, อิมสฺส ปน ภวํ โคตโม กึ อุปาทานสฺมึ ปญฺญาเปตี’’ติ? ‘‘ยสฺมึ โข, วจฺฉ, สมเย อิมญฺจ กายํ นิกฺขิปติ, สตฺโต จ อญฺญตรํ กายํ อนุปปนฺโน โหติ, ตมหํ ตณฺหูปาทานํ วทามิ. ตณฺหา หิสฺส, วจฺฉ, ตสฺมึ สมเย อุปาทานํ โหตี’’ติ. นวมํ. “हे गौतम! जिस समय ज्वाला वायु द्वारा उड़ाई जाकर दूर तक जाती है, उस समय आप उसका उपादान (ईंधन) किसे मानते हैं?” “वत्स! जिस समय ज्वाला वायु द्वारा उड़ाई जाकर दूर तक जाती है, उसे मैं ‘वायु-रूपी उपादान’ वाला कहता हूँ। क्योंकि वत्स! उस समय वायु ही उसका उपादान (ईंधन) होती है।” “हे गौतम! जिस समय कोई प्राणी इस शरीर को छोड़ता है और दूसरे शरीर में उत्पन्न नहीं हुआ होता है, उस समय आप उसका उपादान किसे मानते हैं?” “वत्स! जिस समय कोई प्राणी इस शरीर को छोड़ता है और दूसरे शरीर में उत्पन्न नहीं हुआ होता है, उसे मैं ‘तृष्णा-रूपी उपादान’ वाला कहता हूँ। क्योंकि वत्स! उस समय तृष्णा ही उसका उपादान होती है।” (नौवां सूत्र समाप्त) ๑๐. อานนฺทสุตฺตํ १०. आनन्द सुत्त ๔๑๙. อถ โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข, โภ โคตม, อตฺถตฺตา’’ติ? เอวํ วุตฺเต, ภควา ตุณฺหี อโหสิ. ‘‘กึ ปน, โภ โคตม, นตฺถตฺตา’’ติ? ทุติยมฺปิ โข ภควา ตุณฺหี อโหสิ. อถ โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก อุฏฺฐายาสนา ปกฺกามิ. ४१९. तब वत्सगोत्र परिव्राजक जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान के साथ कुशल-क्षेम पूछा। सुखद और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए वत्सगोत्र परिव्राजक ने भगवान से यह कहा — “हे गौतम! क्या आत्मा है?” ऐसा कहने पर भगवान मौन रहे। “हे गौतम! तो क्या आत्मा नहीं है?” दूसरी बार भी भगवान मौन रहे। तब वत्सगोत्र परिव्राजक आसन से उठकर चला गया। อถ โข อายสฺมา อานนฺโท อจิรปกฺกนฺเต วจฺฉโคตฺเต ปริพฺพาชเก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข, ภนฺเต, ภควา วจฺฉโคตฺตสฺส ปริพฺพาชกสฺส ปญฺหํ ปุฏฺโฐ น พฺยากาสี’’ติ? ‘‘อหญฺจานนฺท, วจฺฉโคตฺตสฺส ปริพฺพาชกสฺส ‘อตฺถตฺตา’ติ ปุฏฺโฐ สมาโน ‘อตฺถตฺตา’ติ พฺยากเรยฺยํ, เย เต, อานนฺท, สมณพฺราหฺมณา สสฺสตวาทา เตสเมตํ สทฺธึ อภวิสฺส. อหญฺจานนฺท, วจฺฉโคตฺตสฺส ปริพฺพาชกสฺส ‘นตฺถตฺตา’ติ ปุฏฺโฐ สมาโน ‘นตฺถตฺตา’ติ พฺยากเรยฺยํ, เย เต, อานนฺท, สมณพฺราหฺมณา อุจฺเฉทวาทา เตสเมตํ สทฺธึ อภวิสฺส. อหญฺจานนฺท, วจฺฉโคตฺตสฺส ปริพฺพาชกสฺส ‘อตฺถตฺตา’ติ ปุฏฺโฐ สมาโน ‘อตฺถตฺตา’ติ พฺยากเรยฺยํ, อปิ นุ เม ตํ, อานนฺท, อนุโลมํ อภวิสฺส ญาณสฺส อุปฺปาทาย – ‘สพฺเพ ธมฺมา อนตฺตา’’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘อหญฺจานนฺท, วจฺฉโคตฺตสฺส ปริพฺพาชกสฺส [Pg.566] ‘นตฺถตฺตา’ติ ปุฏฺโฐ สมาโน ‘นตฺถตฺตา’ติ พฺยากเรยฺยํ, สมฺมูฬฺหสฺส, อานนฺท, วจฺฉโคตฺตสฺส ปริพฺพาชกสฺส ภิยฺโย สมฺโมหาย อภวิสฺส – ‘อหุวา เม นูน ปุพฺเพ อตฺตา, โส เอตรหิ นตฺถี’’’ติ. ทสมํ. तब आयुष्मान आनन्द ने, परिव्राजक वच्छगोत्त के चले जाने के कुछ ही समय बाद, भगवान से यह कहा— "भन्ते! भगवान ने परिव्राजक वच्छगोत्त द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर क्यों नहीं दिया?" "आनन्द! यदि मैं परिव्राजक वच्छगोत्त के 'क्या आत्मा है?' इस प्रश्न के उत्तर में 'आत्मा है' ऐसा कहता, तो आनन्द! यह उन श्रमण-ब्राह्मणों के (मत) के समान होता जो शाश्वतवादी हैं। और आनन्द! यदि मैं परिव्राजक वच्छगोत्त के 'क्या आत्मा नहीं है?' इस प्रश्न के उत्तर में 'आत्मा नहीं है' ऐसा कहता, तो आनन्द! यह उन श्रमण-ब्राह्मणों के (मत) के समान होता जो उच्छेदवादी हैं। आनन्द! यदि मैं परिव्राजक वच्छगोत्त के 'क्या आत्मा है?' इस प्रश्न के उत्तर में 'आत्मा है' ऐसा कहता, तो क्या यह मेरे उस ज्ञान की उत्पत्ति के अनुकूल होता कि 'सभी धर्म अनात्मा हैं'?" "नहीं, भन्ते!" "आनन्द! यदि मैं परिव्राजक वच्छगोत्त के 'क्या आत्मा नहीं है?' इस प्रश्न के उत्तर में 'आत्मा नहीं है' ऐसा कहता, तो पहले से ही भ्रमित परिव्राजक वच्छगोत्त और अधिक भ्रमित हो जाता कि 'निश्चित ही पहले मेरी आत्मा थी, जो अब नहीं है'।'' दसवाँ (सुत्त)। ๑๑. สภิยกจฺจานสุตฺตํ ११. सभियकच्चान सुत्त। ๔๒๐. เอกํ สมยํ อายสฺมา สภิโย กจฺจาโน ญาติเก วิหรติ คิญฺชกาวสเถ. อถ โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก เยนายสฺมา สภิโย กจฺจาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา สภิเยน กจฺจาเนน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข วจฺฉโคตฺโต ปริพฺพาชโก อายสฺมนฺตํ สภิยํ กจฺจานํ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข โภ, กจฺจาน, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ ปน, โภ กจฺจาน, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ ภควตา – ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ४२०. एक समय आयुष्मान सभिय कच्चान ज्ञाति (गाँव) के ईंटों के घर (गिञ्जकावसथ) में विहार कर रहे थे। तब परिव्राजक वच्छगोत्त जहाँ आयुष्मान सभिय कच्चान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर आयुष्मान सभिय कच्चान के साथ कुशल-क्षेम पूछा। संमोदनीय और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए परिव्राजक वच्छगोत्त ने आयुष्मान सभिय कच्चान से यह कहा— "हे कच्चान! क्या मृत्यु के बाद तथागत होते हैं?" "वच्छ! भगवान ने यह घोषित नहीं किया है कि 'मृत्यु के बाद तथागत होते हैं'।'' "तो क्या, हे कच्चान! मृत्यु के बाद तथागत नहीं होते हैं?" "वच्छ! भगवान ने यह भी घोषित नहीं किया है कि 'मृत्यु के बाद तथागत नहीं होते हैं'।'' ‘‘กึ นุ โข, โภ กจฺจาน, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. ‘‘กึ ปน, โภ กจฺจาน, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ? ‘‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ ภควตา – ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’’ติ. "हे कच्चान! क्या मृत्यु के बाद तथागत होते भी हैं और नहीं भी होते हैं?" "वच्छ! भगवान ने यह घोषित नहीं किया है कि 'मृत्यु के बाद तथागत होते भी हैं और नहीं भी होते हैं'।'' "तो क्या, हे कच्चान! मृत्यु के बाद तथागत न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं?" "वच्छ! भगवान ने यह भी घोषित नहीं किया है कि 'मृत्यु के बाद तथागत न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं'।'' ‘‘‘กึ นุ โข, โภ กจฺจาน, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ, อิติ ปุฏฺโฐ สมาโน – ‘อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ. ‘กึ ปน, โภ กจฺจาน, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ, อิติ ปุฏฺโฐ สมาโน – ‘อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ. ‘กึ นุ โข, โภ กจฺจาน, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ, อิติ ปุฏฺโฐ สมาโน – ‘อพฺยากตํ โข เอตํ, วจฺฉ, ภควตา – โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ. ‘กึ ปน, โภ กจฺจาน, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ, อิติ ปุฏฺโฐ สมาโน – ‘เอตมฺปิ โข, วจฺฉ, อพฺยากตํ ภควตา – เนว โหติ น [Pg.567] น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’ติ วเทสิ. โก นุ โข, โภ กจฺจาน, เหตุ, โก ปจฺจโย, เยเนตํ อพฺยากตํ สมเณน โคตเมนา’’ติ? ‘‘โย จ, วจฺฉ, เหตุ, โย จ ปจฺจโย ปญฺญาปนาย รูปีติ วา อรูปีติ วา สญฺญีติ วา อสญฺญีติ วา เนวสญฺญีนาสญฺญีติ วา, โส จ เหตุ, โส จ ปจฺจโย สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ อปริเสสํ นิรุชฺเฌยฺย. เกน นํ ปญฺญาปยมาโน ปญฺญาเปยฺย รูปีติ วา อรูปีติ วา สญฺญีติ วา อสญฺญีติ วา เนวสญฺญีนาสญฺญีติ วา’’ติ. ‘‘กีวจิรํ ปพฺพชิโตสิ, โภ กจฺจานา’’ติ? ‘‘นจิรํ, อาวุโส, ตีณิ วสฺสานี’’ติ. ‘‘ยสฺสป’สฺส, อาวุโส, เอตเมตฺตเกน เอตฺตกเมว ตํป’สฺส พหุ, โก ปน วาโท เอวํ อภิกฺกนฺเต’’ติ! เอกาทสมํ. "'हे कच्चान! क्या मृत्यु के बाद तथागत होते हैं?' ऐसा पूछे जाने पर आपने कहा— 'वच्छ! भगवान ने यह घोषित नहीं किया है कि मृत्यु के बाद तथागत होते हैं'। 'क्या मृत्यु के बाद तथागत नहीं होते हैं?' ऐसा पूछे जाने पर आपने कहा— 'वच्छ! भगवान ने यह घोषित नहीं किया है कि मृत्यु के बाद तथागत नहीं होते हैं'। 'क्या मृत्यु के बाद तथागत होते भी हैं और नहीं भी होते हैं?' ऐसा पूछे जाने पर आपने कहा— 'वच्छ! भगवान ने यह घोषित नहीं किया है कि मृत्यु के बाद तथागत होते भी हैं और नहीं भी होते हैं'। 'क्या मृत्यु के बाद तथागत न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं?' ऐसा पूछे जाने पर आपने कहा— 'वच्छ! भगवान ने यह भी घोषित नहीं किया है कि मृत्यु के बाद तथागत न तो होते हैं और न ही नहीं होते हैं'। हे कच्चान! वह क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे श्रमण गौतम ने इसे घोषित नहीं किया है?" "वच्छ! जिस हेतु और जिस प्रत्यय से 'रूपी' या 'अरूपी' या 'संज्ञी' या 'असंज्ञी' या 'न-संज्ञी-न-असंज्ञी' के रूप में प्रज्ञप्त (परिभाषित) किया जा सकता है, वह हेतु और वह प्रत्यय पूरी तरह से, हर प्रकार से, बिना किसी अवशेष के निरुद्ध हो गया है। फिर किस आधार पर प्रज्ञप्त करते हुए कोई उसे 'रूपी' या 'अरूपी' या 'संज्ञी' या 'असंज्ञी' या 'न-संज्ञी-न-असंज्ञी' के रूप में प्रज्ञप्त करेगा?" "हे कच्चान! आपको प्रव्रजित हुए कितना समय हुआ है?" "आयुष्मान! अधिक समय नहीं, तीन वर्ष हुए हैं।'' "आयुष्मान! जिसके लिए इतने समय में इतना (ज्ञान) ही पर्याप्त है, उसके लिए यह बहुत है; फिर इस प्रकार के उत्तम (धर्म-उपदेश) के विषय में तो कहना ही क्या!" ग्यारहवाँ (सुत्त)। อพฺยากตสํยุตฺตํ สมตฺตํ. अव्याकृत संयुक्त समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – इसका उद्दान (विषय-सूची)— เขมาเถรี อนุราโธ, สาริปุตฺโตติ โกฏฺฐิโก; โมคฺคลฺลาโน จ วจฺโฉ จ, กุตูหลสาลานนฺโท; สภิโย เอกาทสมนฺติ; खेमा थेरी, अनुराध, सारिपुत्त, कोट्टिक (तीन सुत्त), मोग्गलान, वच्छ, कुतूहलशाला, आनन्द और सभिय—ये ग्यारह (सुत्त) हैं। สฬายตนวคฺโค จตุตฺโถ. सळायतन वग्ग चौथा (समाप्त)। ตสฺสุทฺทานํ – इसका उद्दान— สฬายตนเวทนา, มาตุคาโม ชมฺพุขาทโก; สามณฺฑโก โมคฺคลฺลาโน, จิตฺโต คามณิ สงฺขตํ; อพฺยากตนฺติ ทสธาติ. सळायतन, वेदना, मातुगाम, जम्बुखादक, सामण्डक, मोग्गलान, चित्त, गामणि, संस्कृत और अव्याकृत—ये दस (संयुक्त) हैं। สฬายตนวคฺคสํยุตฺตปาฬิ นิฏฺฐิตา. सळायतन वग्ग संयुक्त पालि समाप्त। | |||
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |