| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส उन भगवान, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध को नमस्कार। สํยุตฺตนิกาโย संयुक्त निकाय สคาถาวคฺโค सगाथावग्ग ๑. เทวตาสํยุตฺตํ १. देवता संयुक्त ๑. นฬวคฺโค १. नळ वग्ग ๑. โอฆตรณสุตฺตํ १. ओघतरण सुत्त ๑. เอวํ [Pg.1] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. อถ โข อญฺญตรา เทวตา อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺณา เกวลกปฺปํ เชตวนํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข สา เทวตา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘‘กถํ นุ ตฺวํ, มาริส, โอฆมตรี’ติ? ‘อปฺปติฏฺฐํ ขฺวาหํ, อาวุโส, อนายูหํ โอฆมตริ’นฺติ. ‘ยถา กถํ ปน ตฺวํ, มาริส, อปฺปติฏฺฐํ อนายูหํ โอฆมตรี’ติ? ‘ยทาขฺวาหํ, อาวุโส, สนฺติฏฺฐามิ ตทาสฺสุ สํสีทามิ; ยทาขฺวาหํ, อาวุโส, อายูหามิ ตทาสฺสุ นิพฺพุยฺหามิ. เอวํ ขฺวาหํ, อาวุโส, อปฺปติฏฺฐํ อนายูหํ โอฆมตริ’’’นฺติ. १. ऐसा मैंने सुना है - एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन विहार में विहार कर रहे थे। तब एक अज्ञात देवता, रात बीतने पर, अपनी आभा से संपूर्ण जेतवन को प्रकाशित कर, जहाँ भगवान थे वहाँ आए। आकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े होकर उस देवता ने भगवान से यह कहा - "हे मारिष! आपने ओघ (संसार की बाढ़) को कैसे पार किया?" "हे आवुस! बिना ठहरे और बिना प्रयास किए मैंने ओघ को पार किया।" "हे मारिष! आपने बिना ठहरे और बिना प्रयास किए ओघ को कैसे पार किया?" "हे आवुस! जब मैं ठहरता हूँ, तब डूब जाता हूँ; जब मैं प्रयास करता हूँ, तब बह जाता हूँ। हे आवुस! इस प्रकार बिना ठहरे और बिना प्रयास किए मैंने ओघ को पार किया।" ‘‘จิรสฺสํ วต ปสฺสามิ, พฺราหฺมณํ ปรินิพฺพุตํ; อปฺปติฏฺฐํ อนายูหํ, ติณฺณํ โลเก วิสตฺติก’’นฺติ. – "निश्चित ही बहुत समय बाद मैं ऐसे परिनिर्वृत ब्राह्मण के दर्शन कर रहा हूँ, जो बिना ठहरे और बिना प्रयास किए संसार की तृष्णा को पार कर चुके हैं।" อิทมโวจ [Pg.2] สา เทวตา. สมนุญฺโญ สตฺถา อโหสิ. อถ โข สา เทวตา – ‘‘สมนุญฺโญ เม สตฺถา’’ติ ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายีติ. उस देवता ने यह कहा। शास्ता ने मौन रहकर सहमति दी। तब वह देवता यह जानकर कि "शास्ता ने मेरी बात स्वीकार कर ली है", भगवान को अभिवादन कर, प्रदक्षिणा कर वहीं अंतर्धान हो गए। ๒. นิโมกฺขสุตฺตํ २. निमोक्ख सुत्त ๒. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข อญฺญตรา เทวตา อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺณา เกวลกปฺปํ เชตวนํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข สา เทวตา ภควนฺตํ เอตทโวจ – २. श्रावस्ती का निदान। तब एक अज्ञात देवता, रात बीतने पर, अपनी आभा से संपूर्ण जेतवन को प्रकाशित कर, जहाँ भगवान थे वहाँ आए। आकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े होकर उस देवता ने भगवान से यह कहा - ‘‘ชานาสิ โน ตฺวํ, มาริส, สตฺตานํ นิโมกฺขํ ปโมกฺขํ วิเวก’’นฺติ? "हे मारिष! क्या आप प्राणियों की मुक्ति, पूर्ण मुक्ति और विवेक को जानते हैं?" ‘‘ชานามิ ขฺวาหํ, อาวุโส, สตฺตานํ นิโมกฺขํ ปโมกฺขํ วิเวก’’นฺติ. "हे आवुस! मैं प्राणियों की मुक्ति, पूर्ण मुक्ति और विवेक को जानता हूँ।" ‘‘ยถา กถํ ปน ตฺวํ, มาริส, ชานาสิ สตฺตานํ นิโมกฺขํ ปโมกฺขํ วิเวก’’นฺติ? "हे मारिष! आप प्राणियों की मुक्ति, पूर्ण मुक्ति और विवेक को किस प्रकार जानते हैं?" ‘‘นนฺทีภวปริกฺขยา, สญฺญาวิญฺญาณสงฺขยา, เวทนานํ นิโรธา อุปสมา – เอวํ ขฺวาหํ, อาวุโส, ชานามิ สตฺตานํ นิโมกฺขํ ปโมกฺขํ วิเวก’’นฺติ. "नन्दि और भव के क्षय से, संज्ञा और विज्ञान के विनाश से, और वेदनाओं के निरोध और उपशम से - हे आवुस! इस प्रकार मैं प्राणियों की मुक्ति, पूर्ण मुक्ति और विवेक को जानता हूँ।" ๓. อุปนียสุตฺตํ ३. उपनीय सुत्त ๓. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข สา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – ३. श्रावस्ती का निदान। एक ओर खड़े होकर उस देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही - ‘‘อุปนียติ ชีวิตมปฺปมายุ,ชรูปนีตสฺส น สนฺติ ตาณา; เอตํ ภยํ มรเณ เปกฺขมาโน,ปุญฺญานิ กยิราถ สุขาวหานี’’ติ. "जीवन (मृत्यु के) निकट ले जाया जा रहा है, आयु अल्प है। बुढ़ापे के वश में आए व्यक्ति के लिए कोई रक्षक नहीं है। मृत्यु के इस भय को देखते हुए, सुख देने वाले पुण्यों को करना चाहिए।" ‘‘อุปนียติ ชีวิตมปฺปมายุ,ชรูปนีตสฺส น สนฺติ ตาณา; เอตํ ภยํ มรเณ เปกฺขมาโน,โลกามิสํ ปชเห สนฺติเปกฺโข’’ติ. "जीवन (मृत्यु के) निकट ले जाया जा रहा है, आयु अल्प है। बुढ़ापे के वश में आए व्यक्ति के लिए कोई रक्षक नहीं है। मृत्यु के इस भय को देखते हुए, शांति की चाह रखने वाले को लोक-आमिष का त्याग कर देना चाहिए।" ๔. อจฺเจนฺติสุตฺตํ ४. अच्चेन्ति सुत्त ๔. สาวตฺถินิทานํ[Pg.3]. เอกมนฺตํ ฐิตา โข สา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – ४. श्रावस्ती का निदान। एक ओर खड़े होकर उस देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही - ‘‘อจฺเจนฺติ กาลา ตรยนฺติ รตฺติโย,วโยคุณา อนุปุพฺพํ ชหนฺติ; เอตํ ภยํ มรเณ เปกฺขมาโน,ปุญฺญานิ กยิราถ สุขาวหานี’’ติ. "समय बीत रहा है, रातें गुजर रही हैं। अवस्थाएँ क्रमशः साथ छोड़ रही हैं। मृत्यु के इस भय को देखते हुए, सुख देने वाले पुण्यों को करना चाहिए।" ‘‘อจฺเจนฺติ กาลา ตรยนฺติ รตฺติโย,วโยคุณา อนุปุพฺพํ ชหนฺติ; เอตํ ภยํ มรเณ เปกฺขมาโน,โลกามิสํ ปชเห สนฺติเปกฺโข’’ติ. "समय बीत रहा है, रातें गुजर रही हैं। अवस्थाएँ क्रमशः साथ छोड़ रही हैं। मृत्यु के इस भय को देखते हुए, शांति की चाह रखने वाले को लोक-आमिष का त्याग कर देना चाहिए।" ๕. กติฉินฺทสุตฺตํ ५. कतिछिन्द सुत्त ๕. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข สา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – ५. श्रावस्ती का निदान। एक ओर खड़े होकर उस देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही - ‘‘กติ ฉินฺเท กติ ชเห, กติ จุตฺตริ ภาวเย; กติ สงฺคาติโค ภิกฺขุ, โอฆติณฺโณติ วุจฺจตี’’ติ. "कितनों को काटे, कितनों को त्यागे, और कितनों की आगे भावना करे? कितने संगों को पार करने वाले भिक्षु को 'ओघ-तीर्ण' कहा जाता है?" ‘‘ปญฺจ ฉินฺเท ปญฺจ ชเห, ปญฺจ จุตฺตริ ภาวเย; ปญฺจ สงฺคาติโค ภิกฺขุ, โอฆติณฺโณติ วุจฺจตี’’ติ. "पाँच को काटे, पाँच को त्यागे, और पाँच की आगे भावना करे। पाँच संगों को पार करने वाले भिक्षु को 'ओघ-तीर्ण' कहा जाता है।" ๖. ชาครสุตฺตํ ६. जागर सुत्त ๖. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข สา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – ६. श्रावस्ती का निदान। एक ओर खड़े होकर उस देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही - ‘‘กติ ชาครตํ สุตฺตา, กติ สุตฺเตสุ ชาครา; กติภิ รชมาเทติ, กติภิ ปริสุชฺฌตี’’ติ. "जागने वालों में कितने सोए हुए हैं? सोने वालों में कितने जाग रहे हैं? कितनों से रज ग्रहण किया जाता है? और कितनों से शुद्धि होती है?" ‘‘ปญฺจ ชาครตํ สุตฺตา, ปญฺจ สุตฺเตสุ ชาครา; ปญฺจภิ รชมาเทติ, ปญฺจภิ ปริสุชฺฌตี’’ติ. जागने वालों में पाँच (नीवरण) सोए हुए हैं, सोने वालों में पाँच (इन्द्रियाँ) जागृत हैं; पाँच (नीवरणों) से वह रज (क्लेश) ग्रहण करता है, पाँच (इन्द्रियों) से वह शुद्ध होता है। ๗. อปฺปฏิวิทิตสุตฺตํ ७. ७. अप्पटिविदित सुत्त ๗. สาวตฺถินิทานํ[Pg.4]. เอกมนฺตํ ฐิตา โข สา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – ७. श्रावस्ती निदान। एक ओर खड़ी हुई उस देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही - ‘‘เยสํ ธมฺมา อปฺปฏิวิทิตา, ปรวาเทสุ นียเร ; สุตฺตา เต นปฺปพุชฺฌนฺติ, กาโล เตสํ ปพุชฺฌิตุ’’นฺติ. “जिन्हें (चार आर्य सत्य) धर्मों का बोध नहीं हुआ है, जो पर-वादों (मिथ्या दृष्टियों) में बह जाते हैं; वे सोए हुए हैं, जागते नहीं हैं। उनके जागने का अब समय है।” ‘‘เยสํ ธมฺมา สุปฺปฏิวิทิตา, ปรวาเทสุ น นียเร; เต สมฺพุทฺธา สมฺมทญฺญา, จรนฺติ วิสเม สม’’นฺติ. “जिन्हें धर्मों का भली-भांति बोध हो गया है, जो पर-वादों में नहीं बहते; वे सम्यक् ज्ञान से युक्त बुद्ध (ज्ञानी), इस विषम (संसार) में समता से विचरण करते हैं।” ๘. สุสมฺมุฏฺฐสุตฺตํ ८. ८. सुसम्मुट्ठ सुत्त ๘. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข สา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – ८. श्रावस्ती निदान। एक ओर खड़ी हुई उस देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही - ‘‘เยสํ ธมฺมา สุสมฺมุฏฺฐา, ปรวาเทสุ นียเร; สุตฺตา เต นปฺปพุชฺฌนฺติ, กาโล เตสํ ปพุชฺฌิตุ’’นฺติ. “जिनके लिए (चार आर्य सत्य) धर्म विस्मृत (अज्ञात) हैं, जो पर-वादों में बह जाते हैं; वे सोए हुए हैं, जागते नहीं हैं। उनके जागने का अब समय है।” ‘‘เยสํ ธมฺมา อสมฺมุฏฺฐา, ปรวาเทสุ น นียเร; เต สมฺพุทฺธา สมฺมทญฺญา, จรนฺติ วิสเม สม’’นฺติ. “जिनके लिए धर्म अविस्मृत (ज्ञात) हैं, जो पर-वादों में नहीं बहते; वे सम्यक् ज्ञान से युक्त बुद्ध, इस विषम में समता से विचरण करते हैं।” ๙. มานกามสุตฺตํ ९. ९. मानकाम सुत्त ๙. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข สา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – ९. श्रावस्ती निदान। एक ओर खड़ी हुई उस देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही - ‘‘น มานกามสฺส ทโม อิธตฺถิ,น โมนมตฺถิ อสมาหิตสฺส; เอโก อรญฺเญ วิหรํ ปมตฺโต,น มจฺจุเธยฺยสฺส ตเรยฺย ปาร’’นฺติ. “मान (अहंकार) चाहने वाले के लिए यहाँ दमन (संयम) नहीं है, असमाहित (एकाग्रता रहित) के लिए मौन (ज्ञान) नहीं है; वन में अकेला रहते हुए भी जो प्रमादी है, वह मृत्यु के क्षेत्र (संसार) के पार नहीं जा सकता।” ‘‘มานํ ปหาย สุสมาหิตตฺโต,สุเจตโส สพฺพธิ วิปฺปมุตฺโต; เอโก อรญฺเญ วิหรํ อปฺปมตฺโต,ส มจฺจุเธยฺยสฺส ตเรยฺย ปาร’’นฺติ. “मान को त्याग कर, सुसमाहित चित्त वाला, शुद्ध मन वाला और सब ओर से विमुक्त; वन में अकेला रहते हुए जो अप्रमादी है, वह मृत्यु के क्षेत्र के पार जा सकता है।” ๑๐. อรญฺญสุตฺตํ १०. १०. अरण्य सुत्त ๑๐. สาวตฺถินิทานํ[Pg.5]. เอกมนฺตํ ฐิตา โข สา เทวตา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – १०. श्रावस्ती निदान। एक ओर खड़ी हुई उस देवता ने भगवान को गाथा में संबोधित किया - ‘‘อรญฺเญ วิหรนฺตานํ, สนฺตานํ พฺรหฺมจารินํ; เอกภตฺตํ ภุญฺชมานานํ, เกน วณฺโณ ปสีทตี’’ติ. “वन में विहार करने वाले, शांत, ब्रह्मचारी, जो दिन में केवल एक बार भोजन करते हैं, उनका वर्ण (मुख-मंडल) इतना तेजस्वी क्यों है?” ‘‘อตีตํ นานุโสจนฺติ, นปฺปชปฺปนฺติ นาคตํ; ปจฺจุปฺปนฺเนน ยาเปนฺติ, เตน วณฺโณ ปสีทติ’’. “वे अतीत का शोक नहीं करते, भविष्य की आकांक्षा नहीं करते; वे वर्तमान से ही निर्वाह करते हैं, इसीलिए उनका वर्ण तेजस्वी रहता है।” ‘‘อนาคตปฺปชปฺปาย, อตีตสฺสานุโสจนา; เอเตน พาลา สุสฺสนฺติ, นโฬว หริโต ลุโต’’ติ. “भविष्य की आकांक्षा करने से और अतीत का शोक करने से; मूर्ख लोग उसी तरह सूख जाते हैं जैसे काटा हुआ हरा नरकुल सूख जाता है।” นฬวคฺโค ปฐโม. प्रथम नळ वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान) इस प्रकार है - โอฆํ นิโมกฺขํ อุปเนยฺยํ, อจฺเจนฺติ กติฉินฺทิ จ; ชาครํ อปฺปฏิวิทิตา, สุสมฺมุฏฺฐา มานกามินา; อรญฺเญ ทสโม วุตฺโต, วคฺโค เตน ปวุจฺจติ. ओघ, निमोक्ख, उपनेय्य, अच्चेन्ति, कतिछिन्दि, जागर, अप्पटिविदित, सुसम्मुट्ठ, मानकामी और दसवाँ अरण्य सुत्त; इस प्रकार यह वर्ग कहा गया है। ๒. นนฺทนวคฺโค २. २. नन्दन वर्ग ๑. นนฺทนสุตฺตํ १. १. नन्दन सुत्त ๑๑. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ภิกฺขโว’’ติ. ‘‘ภทนฺเต’’ติ เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – ११. ऐसा मैंने सुना है - एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन विहार में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया - 'भिक्षुओं!' 'भदन्त!' उन भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने यह कहा - ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, อญฺญตรา ตาวตึสกายิกา เทวตา นนฺทเน วเน อจฺฉราสงฺฆปริวุตา ทิพฺเพหิ ปญฺจหิ กามคุเณหิ สมปฺปิตา สมงฺคีภูตา ปริจาริยมานา ตายํ เวลายํ อิมํ คาถํ อภาสิ – “भिक्षुओं! प्राचीन काल की बात है, तावतिंस देवलोक का कोई देवता नन्दन वन में अप्सराओं के समूह से घिरा हुआ, दिव्य पाँच काम-गुणों से युक्त और परिपूर्ण होकर विहार करते हुए, उस समय यह गाथा कही -” ‘‘น [Pg.6] เต สุขํ ปชานนฺติ, เย น ปสฺสนฺติ นนฺทนํ; อาวาสํ นรเทวานํ, ติทสานํ ยสสฺสิน’’นฺติ. “वे सुख को नहीं जानते, जिन्होंने नन्दन वन को नहीं देखा है; जो यशस्वी तीस (तावतिंस) देवपुत्रों का निवास स्थान है।” ‘‘เอวํ วุตฺเต, ภิกฺขเว, อญฺญตรา เทวตา ตํ เทวตํ คาถาย ปจฺจภาสิ – “भिक्षुओं! ऐसा कहने पर, एक अन्य (आर्य श्रावक) देवता ने उस देवता को गाथा में प्रत्युत्तर दिया -” ‘‘น ตฺวํ พาเล ปชานาสิ, ยถา อรหตํ วโจ; อนิจฺจา สพฺพสงฺขารา, อุปฺปาทวยธมฺมิโน; อุปฺปชฺชิตฺวา นิรุชฺฌนฺติ, เตสํ วูปสโม สุโข’’ติ. “हे मूर्ख! तू नहीं जानता कि अर्हतों के वचन क्या हैं; सभी संस्कार अनित्य हैं, वे उत्पन्न होने और नष्ट होने वाले स्वभाव के हैं; वे उत्पन्न होकर निरुद्ध हो जाते हैं, उनका उपशम (शांति) ही सुख है।” ๒. นนฺทติสุตฺตํ २. २. नन्दति सुत्त ๑๒. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข สา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – १२. श्रावस्ती निदान। एक ओर खड़ी हुई उस देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही - ‘‘นนฺทติ ปุตฺเตหิ ปุตฺติมา,โคมา โคหิ ตเถว นนฺทติ; อุปธีหิ นรสฺส นนฺทนา,น หิ โส นนฺทติ โย นิรูปธี’’ติ. "पुत्रों वाला पुत्रों से प्रसन्न होता है, वैसे ही गौओं वाला गौओं से प्रसन्न होता है। मनुष्य की प्रसन्नता उपाधियों (सांसारिक आसक्तियों) से होती है; जिसके पास उपाधियाँ नहीं हैं, वह प्रसन्न नहीं होता।" ‘‘โสจติ ปุตฺเตหิ ปุตฺติมา,โคมา โคหิ ตเถว โสจติ; อุปธีหิ นรสฺส โสจนา,น หิ โส โสจติ โย นิรูปธี’’ติ. "पुत्रों वाला पुत्रों के कारण शोक करता है, वैसे ही गौओं वाला गौओं के कारण शोक करता है। मनुष्य का शोक उपाधियों से होता है; जिसके पास उपाधियाँ नहीं हैं, वह शोक नहीं करता।" ๓. นตฺถิปุตฺตสมสุตฺตํ ३. ३. नत्थिपुत्तसम सुत्त ๑๓. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข สา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – १३. १३. श्रावस्ती का निदान। एक ओर खड़ी उस देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही - ‘‘นตฺถิ ปุตฺตสมํ เปมํ, นตฺถิ โคสมิตํ ธนํ; นตฺถิ สูริยสมา อาภา, สมุทฺทปรมา สรา’’ติ. "पुत्र के समान कोई प्रेम नहीं है, गौओं के समान कोई धन नहीं है; सूर्य के समान कोई आभा (प्रकाश) नहीं है, और समुद्र से बढ़कर कोई जलाशय नहीं है।" ‘‘นตฺถิ อตฺตสมํ เปมํ, นตฺถิ ธญฺญสมํ ธนํ; นตฺถิ ปญฺญาสมา อาภา, วุฏฺฐิ เว ปรมา สรา’’ติ. "आत्म-प्रेम के समान कोई प्रेम नहीं है, धान्य (अनाज) के समान कोई धन नहीं है; प्रज्ञा के समान कोई आभा नहीं है, और वर्षा ही सबसे श्रेष्ठ जलाशय है।" ๔. ขตฺติยสุตฺตํ ४. ४. खत्तिय सुत्त ๑๔. ‘‘ขตฺติโย [Pg.7] ทฺวิปทํ เสฏฺโฐ, พลีพทฺโท จตุปฺปทํ. १४. १४. "दो पैरों वालों (मनुष्यों) में क्षत्रिय श्रेष्ठ है, चार पैरों वालों (पशुओं) में बैल श्रेष्ठ है।" โกมารี เสฏฺฐา ภริยานํ, โย จ ปุตฺตาน ปุพฺพโช’’ติ. "पत्नियों में कुमारी (युवती) श्रेष्ठ है, और पुत्रों में प्रथम जन्मा श्रेष्ठ है।" ‘‘สมฺพุทฺโธ ทฺวิปทํ เสฏฺโฐ, อาชานีโย จตุปฺปทํ; สุสฺสูสา เสฏฺฐา ภริยานํ, โย จ ปุตฺตานมสฺสโว’’ติ. "दो पैरों वालों में सम्यक सम्बुद्ध श्रेष्ठ हैं, चार पैरों वालों में आजानीय (उत्तम नस्ल का पशु) श्रेष्ठ है; पत्नियों में सेवा करने वाली श्रेष्ठ है, और पुत्रों में आज्ञाकारी श्रेष्ठ है।" ๕. สณมานสุตฺตํ ५. ५. सणमान सुत्त ๑๕. ‘‘ฐิเต มชฺฌนฺหิเก กาเล, สนฺนิสีเวสุ ปกฺขิสุ. १५. १५. "दोपहर के समय जब पक्षी शांत होकर बैठे होते हैं," สณเตว พฺรหารญฺญํ, ตํ ภยํ ปฏิภาติ ม’’นฺติ. "तब विशाल वन गूँजता सा प्रतीत होता है, वह मुझे भयभीत करने वाला लगता है।" ‘‘ฐิเต มชฺฌนฺหิเก กาเล, สนฺนิสีเวสุ ปกฺขิสุ; สณเตว พฺรหารญฺญํ, สา รติ ปฏิภาติ ม’’นฺติ. "दोपहर के समय जब पक्षी शांत होकर बैठे होते हैं, तब विशाल वन गूँजता सा प्रतीत होता है, वह मुझे रमणीय (सुखद) लगता है।" ๖. นิทฺทาตนฺทีสุตฺตํ ६. ६. निद्दातन्दी सुत्त ๑๖. ‘‘นิทฺทา ตนฺที วิชมฺภิตา, อรตี ภตฺตสมฺมโท. १६. १६. "निद्रा, तन्द्रा (आलस्य), अंगड़ाई लेना, अरति (उकताहट) और भोजन के बाद का मद (भारीपन)।" เอเตน นปฺปกาสติ, อริยมคฺโค อิธ ปาณิน’’นฺติ. "इनके कारण, इस लोक में प्राणियों के लिए आर्य मार्ग प्रकाशित नहीं होता।" ‘‘นิทฺทํ ตนฺทึ วิชมฺภิตํ, อรตึ ภตฺตสมฺมทํ; วีริเยน นํ ปณาเมตฺวา, อริยมคฺโค วิสุชฺฌตี’’ติ. "निद्रा, तन्द्रा, अंगड़ाई, अरति और भोजन के मद को वीर्य (पुरुषार्थ) से दूर कर देने पर आर्य मार्ग शुद्ध (स्पष्ट) हो जाता है।" ๗. ทุกฺกรสุตฺตํ ७. ७. दुक्कर सुत्त ๑๗. ‘‘ทุกฺกรํ ทุตฺติติกฺขญฺจ, อพฺยตฺเตน จ สามญฺญํ. १७. १७. "अज्ञानी के लिए श्रमण-धर्म (संन्यास) कठिन है और उसे निभाना भी दुष्कर है।" พหูหิ ตตฺถ สมฺพาธา, ยตฺถ พาโล วิสีทตี’’ติ. "वहाँ बहुत सी बाधाएँ हैं, जहाँ मूर्ख व्यक्ति डूब जाता है (असफल हो जाता है)।" ‘‘กติหํ จเรยฺย สามญฺญํ, จิตฺตํ เจ น นิวารเย; ปเท ปเท วิสีเทยฺย, สงฺกปฺปานํ วสานุโค’’ติ. "यदि कोई अपने चित्त को नियंत्रित न करे, तो वह कितने दिनों तक श्रमण-धर्म का पालन कर पाएगा? संकल्पों (विकारों) के वश में होकर वह पग-पग पर डूबता जाएगा।" ‘‘กุมฺโมว องฺคานิ สเก กปาเล,สโมทหํ ภิกฺขุ มโนวิตกฺเก; อนิสฺสิโต อญฺญมเหฐยาโน,ปรินิพฺพุโต นูปวเทยฺย กญฺจี’’ติ. "जैसे कछुआ अपने अंगों को अपनी ढाल (खोल) के भीतर समेट लेता है, वैसे ही भिक्षु को अपने मन के वितर्कों को समेट लेना चाहिए; किसी पर आश्रित न रहते हुए, किसी को कष्ट न पहुँचाते हुए और शांत (परिनिर्वृत) होकर उसे किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए।" ๘. หิรีสุตฺตํ ८. ८. हिरी सुत्त ๑๘. ‘‘หิรีนิเสโธ [Pg.8] ปุริโส, โกจิ โลกสฺมึ วิชฺชติ. १८. १८. "क्या संसार में ऐसा कोई पुरुष है जो लज्जा (ह्री) के कारण पापों से रुक जाता हो?" โย นินฺทํ อปโพธติ, อสฺโส ภทฺโร กสามิวา’’ติ. "जो निंदा के प्रति वैसे ही सचेत रहता है जैसे एक उत्तम घोड़ा चाबुक के प्रति?" ‘‘หิรีนิเสธา ตนุยา, เย จรนฺติ สทา สตา; อนฺตํ ทุกฺขสฺส ปปฺปุยฺย, จรนฺติ วิสเม สม’’นฺติ. "लज्जा के कारण पापों से रुकने वाले और सदा स्मृतिवान होकर विचरण करने वाले लोग थोड़े ही हैं; वे दुःख के अंत (निर्वाण) को प्राप्त कर इस विषम संसार में समता से विचरण करते हैं।" ๙. กุฏิกาสุตฺตํ ९. ९. कुटिका सुत्त ๑๙. १९. ‘‘กจฺจิ เต กุฏิกา นตฺถิ, กจฺจิ นตฺถิ กุลาวกา; กจฺจิ สนฺตานกา นตฺถิ, กจฺจิ มุตฺโตสิ พนฺธนา’’ติ. १९. "क्या आपकी कोई कुटिया नहीं है? क्या आपका कोई घोंसला (घर) नहीं है? क्या आपका कोई जाल (पारिवारिक बंधन) नहीं है? क्या आप बंधनों से मुक्त हैं?" ‘‘ตคฺฆ เม กุฏิกา นตฺถิ, ตคฺฆ นตฺถิ กุลาวกา; ตคฺฆ สนฺตานกา นตฺถิ, ตคฺฆ มุตฺโตมฺหิ พนฺธนา’’ติ. "निश्चित ही मेरी कोई कुटिया नहीं है, निश्चित ही मेरा कोई घोंसला नहीं है, निश्चित ही मेरा कोई जाल नहीं है, और निश्चित ही मैं बंधनों से मुक्त हूँ।" ‘‘กินฺตาหํ กุฏิกํ พฺรูมิ, กึ เต พฺรูมิ กุลาวกํ; กึ เต สนฺตานกํ พฺรูมิ, กินฺตาหํ พฺรูมิ พนฺธน’’นฺติ. "हे भन्ते! मैं आपके लिए किसे 'कुटी' (झोपड़ी) कहूँ? आपके लिए किसे 'घोंसला' कहूँ? आपके लिए किसे 'जाल' कहूँ? आपके लिए किसे 'बंधन' कहूँ?" ‘‘มาตรํ กุฏิกํ พฺรูสิ, ภริยํ พฺรูสิ กุลาวกํ; ปุตฺเต สนฺตานเก พฺรูสิ, ตณฺหํ เม พฺรูสิ พนฺธน’’นฺติ. "तुम माता को 'कुटी' कहते हो, पत्नी को 'घोंसला' कहते हो, पुत्रों को 'जाल' कहते हो, और तृष्णा को मेरे लिए 'बंधन' कहते हो।" ‘‘สาหุ เต กุฏิกา นตฺถิ, สาหุ นตฺถิ กุลาวกา; สาหุ สนฺตานกา นตฺถิ, สาหุ มุตฺโตสิ พนฺธนา’’ติ. "यह अच्छा है कि आपके पास कोई कुटी नहीं है, अच्छा है कि कोई घोंसला नहीं है, अच्छा है कि कोई जाल नहीं है; यह अच्छा है कि आप बंधनों से मुक्त हैं।" ๑๐. สมิทฺธิสุตฺตํ १०. समिद्धि सुत्त ๒๐. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ ตโปทาราเม. อถ โข อายสฺมา สมิทฺธิ รตฺติยา ปจฺจูสสมยํ ปจฺจุฏฺฐาย เยน ตโปทา เตนุปสงฺกมิ คตฺตานิ ปริสิญฺจิตุํ. ตโปเท คตฺตานิ ปริสิญฺจิตฺวา ปจฺจุตฺตริตฺวา เอกจีวโร อฏฺฐาสิ คตฺตานิ ปุพฺพาปยมาโน. อถ โข อญฺญตรา เทวตา อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺณา เกวลกปฺปํ ตโปทํ โอภาเสตฺวา เยน อายสฺมา สมิทฺธิ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เวหาสํ ฐิตา อายสฺมนฺตํ สมิทฺธึ คาถาย อชฺฌภาสิ – २०. ऐसा मैंने सुना है—एक समय भगवान राजगृह के तपोदाराम में विहार कर रहे थे। तब आयुष्मान् समिद्धि रात्रि के अंतिम प्रहर में उठकर, जहाँ तपोदा (नदी) थी, वहाँ शरीर धोने (स्नान करने) के लिए गए। तपोदा में शरीर धोकर, बाहर निकलकर, एक चीवर धारण किए हुए वे शरीर को सुखाते हुए खड़े हो गए। तब रात्रि के बीतने पर, एक आभायुक्त देवता ने संपूर्ण तपोदा को प्रकाशित करते हुए, जहाँ आयुष्मान् समिद्धि थे, वहाँ पहुँचकर आकाश में स्थित होकर आयुष्मान् समिद्धि से गाथा में कहा— ‘‘อภุตฺวา [Pg.9] ภิกฺขสิ ภิกฺขุ, น หิ ภุตฺวาน ภิกฺขสิ; ภุตฺวาน ภิกฺขุ ภิกฺขสฺสุ, มา ตํ กาโล อุปจฺจคา’’ติ. "हे भिक्षु! तुम (काम-भोगों का) उपभोग किए बिना ही भिक्षाटन करते हो; उपभोग किए बिना भिक्षाटन मत करो। हे भिक्षु! पहले उपभोग करो, फिर भिक्षाटन करो; कहीं (भोग का) समय तुम्हें छोड़कर न निकल जाए।" ‘‘กาลํ โวหํ น ชานามิ, ฉนฺโน กาโล น ทิสฺสติ; ตสฺมา อภุตฺวา ภิกฺขามิ, มา มํ กาโล อุปจฺจคา’’ติ. "मैं (मृत्यु के) समय को नहीं जानता, वह समय छिपा हुआ है, दिखाई नहीं देता। इसलिए मैं उपभोग किए बिना ही भिक्षाटन करता हूँ, ताकि (धर्म-साधना का) समय मुझे छोड़कर न निकल जाए।" อถ โข สา เทวตา ปถวิยํ ปติฏฺฐหิตฺวา อายสฺมนฺตํ สมิทฺธึ เอตทโวจ – ‘‘ทหโร ตฺวํ ภิกฺขุ, ปพฺพชิโต สุสุ กาฬเกโส, ภทฺเรน โยพฺพเนน สมนฺนาคโต, ปฐเมน วยสา, อนิกฺกีฬิตาวี กาเมสุ. ภุญฺช, ภิกฺขุ, มานุสเก กาเม; มา สนฺทิฏฺฐิกํ หิตฺวา กาลิกํ อนุธาวี’’ติ. तब वह देवता पृथ्वी पर स्थित होकर आयुष्मान् समिद्धि से यह बोला— "हे भिक्षु! तुम अभी युवा हो, प्रव्रजित हुए हो, तुम्हारे बाल काले हैं, तुम उत्तम यौवन और प्रथम अवस्था से संपन्न हो, तुमने काम-भोगों का आनंद नहीं लिया है। हे भिक्षु! मानुषी काम-भोगों का उपभोग करो; प्रत्यक्ष (सांदृष्टिक) को छोड़कर कालांतर में मिलने वाले (कालिक) के पीछे मत दौड़ो।" ‘‘น ขฺวาหํ, อาวุโส, สนฺทิฏฺฐิกํ หิตฺวา กาลิกํ อนุธาวามิ. กาลิกญฺจ ขฺวาหํ, อาวุโส, หิตฺวา สนฺทิฏฺฐิกํ อนุธาวามิ. กาลิกา หิ, อาวุโส, กามา วุตฺตา ภควตา พหุทุกฺขา พหุปายาสา; อาทีนโว เอตฺถ ภิยฺโย. สนฺทิฏฺฐิโก อยํ ธมฺโม อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’’ติ. "हे मित्र! मैं प्रत्यक्ष को छोड़कर कालांतर में मिलने वाले के पीछे नहीं दौड़ रहा हूँ। बल्कि मैं कालांतर में मिलने वाले (काम-भोगों) को छोड़कर प्रत्यक्ष (लोकोत्तर धर्म) के पीछे दौड़ रहा हूँ। हे मित्र! भगवान ने कालांतर में मिलने वाले काम-भोगों को बहुत दुखों वाला और बहुत कष्टों वाला बताया है; उनमें दोष अधिक हैं। यह (लोकोत्तर) धर्म प्रत्यक्ष (सांदृष्टिक), कालातीत (अकालिक), 'आओ और देखो' (एहिपस्सिक) कहने योग्य, (निर्वाण की ओर) ले जाने वाला (ओपनेय्यिक) और विद्वानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य है।" ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขุ, กาลิกา กามา วุตฺตา ภควตา พหุทุกฺขา พหุปายาสา, อาทีนโว เอตฺถ ภิยฺโย? กถํ สนฺทิฏฺฐิโก อยํ ธมฺโม อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’’ติ? "हे भिक्षु! भगवान ने कालांतर में मिलने वाले काम-भोगों को बहुत दुखों वाला और बहुत कष्टों वाला कैसे बताया है, उनमें दोष अधिक कैसे हैं? और यह धर्म प्रत्यक्ष, कालातीत, 'आओ और देखो' कहने योग्य, ले जाने वाला और विद्वानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य कैसे है?" ‘‘อหํ โข, อาวุโส, นโว อจิรปพฺพชิโต อธุนาคโต อิมํ ธมฺมวินยํ. น ตาหํ สกฺโกมิ วิตฺถาเรน อาจิกฺขิตุํ. อยํ โส ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ราชคเห วิหรติ ตโปทาราเม. ตํ ภควนฺตํ อุปสงฺกมิตฺวา เอตมตฺถํ ปุจฺฉ. ยถา เต ภควา พฺยากโรติ ตถา นํ ธาเรยฺยาสี’’ติ. "हे मित्र! मैं अभी नया हूँ, हाल ही में प्रव्रजित हुआ हूँ, इस धर्म-विनय में अभी-अभी आया हूँ। मैं इसे विस्तार से समझाने में समर्थ नहीं हूँ। वे भगवान अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध राजगृह के तपोदाराम में विहार कर रहे हैं। उन भगवान के पास जाकर यह बात पूछो। जैसे भगवान तुम्हें समझाएँ, वैसे ही उसे धारण करना।" ‘‘น โข, ภิกฺขุ, สุกโร โส ภควา อมฺเหหิ อุปสงฺกมิตุํ, อญฺญาหิ มเหสกฺขาหิ เทวตาหิ ปริวุโต. สเจ โข ตฺวํ, ภิกฺขุ, ตํ ภควนฺตํ อุปสงฺกมิตฺวา เอตมตฺถํ ปุจฺเฉยฺยาสิ, มยมฺปิ อาคจฺเฉยฺยาม ธมฺมสฺสวนายา’’ติ. ‘‘เอวมาวุโส’’ติ โข อายสฺมา สมิทฺธิ ตสฺสา เทวตาย ปฏิสฺสุตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา สมิทฺธิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – "हे भिक्षु! उन भगवान के पास पहुँचना हमारे लिए सुगम नहीं है, क्योंकि वे अन्य प्रभावशाली देवताओं से घिरे रहते हैं। हे भिक्षु! यदि तुम उन भगवान के पास जाकर यह बात पूछो, तो हम भी धर्म-श्रवण के लिए आ जाएँगे।" आयुष्मान् समिद्धि ने "ठीक है मित्र" कहकर उस देवता को उत्तर दिया और जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे। पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान् समिद्धि ने भगवान से यह कहा— ‘‘อิธาหํ[Pg.10], ภนฺเต, รตฺติยา ปจฺจูสสมยํ ปจฺจุฏฺฐาย เยน ตโปทา เตนุปสงฺกมึ คตฺตานิ ปริสิญฺจิตุํ. ตโปเท คตฺตานิ ปริสิญฺจิตฺวา ปจฺจุตฺตริตฺวา เอกจีวโร อฏฺฐาสึ คตฺตานิ ปุพฺพาปยมาโน. อถ โข, ภนฺเต, อญฺญตรา เทวตา อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺณา เกวลกปฺปํ ตโปทํ โอภาเสตฺวา เยนาหํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เวหาสํ ฐิตา อิมาย คาถาย อชฺฌภาสิ – "भन्ते! यहाँ मैं रात्रि के अंतिम प्रहर में उठकर, जहाँ तपोदा थी, वहाँ शरीर धोने के लिए गया। तपोदा में शरीर धोकर, बाहर निकलकर, एक चीवर धारण किए हुए मैं शरीर को सुखाते हुए खड़ा था। तब भन्ते! एक आभायुक्त देवता ने संपूर्ण तपोदा को प्रकाशित करते हुए, जहाँ मैं था, वहाँ पहुँचकर आकाश में स्थित होकर इस गाथा में कहा— ‘‘อภุตฺวา ภิกฺขสิ ภิกฺขุ, น หิ ภุตฺวาน ภิกฺขสิ; ภุตฺวาน ภิกฺขุ ภิกฺขสฺสุ, มา ตํ กาโล อุปจฺจคา’’ติ. 'हे भिक्षु! तुम उपभोग किए बिना ही भिक्षाटन करते हो; उपभोग किए बिना भिक्षाटन मत करो। हे भिक्षु! पहले उपभोग करो, फिर भिक्षाटन करो; कहीं समय तुम्हें छोड़कर न निकल जाए'।" ‘‘เอวํ วุตฺเต อหํ, ภนฺเต, ตํ เทวตํ คาถาย ปจฺจภาสึ – "भन्ते! ऐसा कहे जाने पर मैंने उस देवता को गाथा में उत्तर दिया—" ‘‘กาลํ โวหํ น ชานามิ, ฉนฺโน กาโล น ทิสฺสติ; ตสฺมา อภุตฺวา ภิกฺขามิ, มา มํ กาโล อุปจฺจคา’’ติ. "'मैं समय को नहीं जानता, समय छिपा हुआ है, दिखाई नहीं देता। इसलिए मैं उपभोग किए बिना ही भिक्षाटन करता हूँ, ताकि समय मुझे छोड़कर न निकल जाए'।" ‘‘อถ โข, ภนฺเต, สา เทวตา ปถวิยํ ปติฏฺฐหิตฺวา มํ เอตทโวจ – ‘ทหโร ตฺวํ, ภิกฺขุ, ปพฺพชิโต สุสุ กาฬเกโส, ภทฺเรน โยพฺพเนน สมนฺนาคโต, ปฐเมน วยสา, อนิกฺกีฬิตาวี กาเมสุ. ภุญฺช, ภิกฺขุ, มานุสเก กาเม; มา สนฺทิฏฺฐิกํ หิตฺวา กาลิกํ อนุธาวี’’’ติ. "तब भन्ते! वह देवता पृथ्वी पर स्थित होकर मुझसे यह बोला— 'हे भिक्षु! तुम अभी युवा हो, प्रव्रजित हुए हो, तुम्हारे बाल काले हैं, तुम उत्तम यौवन और प्रथम अवस्था से संपन्न हो, तुमने काम-भोगों का आनंद नहीं लिया है। हे भिक्षु! मानुषी काम-भोगों का उपभोग करो; प्रत्यक्ष को छोड़कर कालांतर में मिलने वाले के पीछे मत दौड़ो'।" ‘‘เอวํ วุตฺตาหํ, ภนฺเต, ตํ เทวตํ เอตทโวจํ – ‘น ขฺวาหํ, อาวุโส, สนฺทิฏฺฐิกํ หิตฺวา กาลิกํ อนุธาวามิ; กาลิกญฺจ ขฺวาหํ, อาวุโส, หิตฺวา สนฺทิฏฺฐิกํ อนุธาวามิ. กาลิกา หิ, อาวุโส, กามา วุตฺตา ภควตา พหุทุกฺขา พหุปายาสา; อาทีนโว เอตฺถ ภิยฺโย. สนฺทิฏฺฐิโก อยํ ธมฺโม อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’’’ติ. "भन्ते! ऐसा कहे जाने पर मैंने उस देवता से यह कहा— 'हे मित्र! मैं प्रत्यक्ष को छोड़कर कालांतर में मिलने वाले के पीछे नहीं दौड़ रहा हूँ। बल्कि मैं कालांतर में मिलने वाले को छोड़कर प्रत्यक्ष के पीछे दौड़ रहा हूँ। हे मित्र! भगवान ने कालांतर में मिलने वाले काम-भोगों को बहुत दुखों वाला और बहुत कष्टों वाला बताया है; उनमें दोष अधिक हैं। यह धर्म प्रत्यक्ष, कालातीत, 'आओ और देखो' कहने योग्य, ले जाने वाला और विद्वानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य है'।" ‘‘เอวํ วุตฺเต, ภนฺเต, สา เทวตา มํ เอตทโวจ – ‘กถญฺจ, ภิกฺขุ, กาลิกา กามา วุตฺตา ภควตา พหุทุกฺขา พหุปายาสา; อาทีนโว เอตฺถ ภิยฺโย? กถํ สนฺทิฏฺฐิโก อยํ ธมฺโม อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ? เอวํ วุตฺตาหํ, ภนฺเต, ตํ เทวตํ เอตทโวจํ – ‘อหํ โข, อาวุโส, นโว อจิรปพฺพชิโต อธุนาคโต อิมํ ธมฺมวินยํ, น ตาหํ สกฺโกมิ วิตฺถาเรน อาจิกฺขิตุํ. อยํ โส ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ราชคเห วิหรติ ตโปทาราเม. ตํ ภควนฺตํ อุปสงฺกมิตฺวา เอตมตฺถํ ปุจฺฉ. ยถา เต ภควา พฺยากโรติ ตถา นํ ธาเรยฺยาสี’’’ติ. भन्ते! ऐसा कहने पर उस देवता ने मुझसे यह कहा— 'हे भिक्षु! भगवान ने कैसे कहा है कि काम-भोग कालिक (समय लेने वाले), बहुत दुखों वाले और बहुत कष्टों वाले हैं; इनमें दोष ही अधिक है? और यह धर्म कैसे सान्दृष्टिक (यहीं प्रत्यक्ष), अकालिक (तत्काल फल देने वाला), एहिपस्सिक (आओ और देखो कहने योग्य), औपनेयिक (निर्वाण की ओर ले जाने वाला) और बुद्धिमानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य है?' भन्ते! ऐसा कहने पर मैंने उस देवता से यह कहा— 'हे मित्र! मैं अभी नया हूँ, प्रव्रजित हुए अधिक समय नहीं हुआ है, अभी-अभी इस धर्म-विनय में आया हूँ। मैं इसे विस्तार से बताने में समर्थ नहीं हूँ। वे भगवान अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध राजगृह के तपोदाराम में विहार कर रहे हैं। उन भगवान के पास जाकर यह बात पूछो। भगवान तुम्हें जैसा उत्तर दें, उसे वैसा ही धारण करना'। ‘‘เอวํ [Pg.11] วุตฺเต, ภนฺเต, สา เทวตา มํ เอตทโวจ – ‘น โข, ภิกฺขุ, สุกโร โส ภควา อมฺเหหิ อุปสงฺกมิตุํ, อญฺญาหิ มเหสกฺขาหิ เทวตาหิ ปริวุโต. สเจ โข, ตฺวํ ภิกฺขุ, ตํ ภควนฺตํ อุปสงฺกมิตฺวา เอตมตฺถํ ปุจฺเฉยฺยาสิ, มยมฺปิ อาคจฺเฉยฺยาม ธมฺมสฺสวนายา’ติ. สเจ, ภนฺเต, ตสฺสา เทวตาย สจฺจํ วจนํ, อิเธว สา เทวตา อวิทูเร’’ติ. भन्ते! ऐसा कहने पर उस देवता ने मुझसे यह कहा— 'हे भिक्षु! उन भगवान के पास जाना हमारे लिए सुलभ नहीं है, क्योंकि वे अन्य प्रभावशाली देवताओं से घिरे रहते हैं। हे भिक्षु! यदि तुम उन भगवान के पास जाकर यह बात पूछो, तो हम भी धर्म-श्रवण के लिए आ सकते हैं।' भन्ते! यदि उस देवता की बात सत्य है, तो वह देवता यहीं पास में ही होगी। เอวํ วุตฺเต, สา เทวตา อายสฺมนฺตํ สมิทฺธึ เอตทโวจ – ‘‘ปุจฺฉ, ภิกฺขุ, ปุจฺฉ, ภิกฺขุ, ยมหํ อนุปฺปตฺตา’’ติ. ऐसा कहने पर, उस देवता ने आयुष्मान समिद्धि से यह कहा— 'पूछिए भिक्षु, पूछिए भिक्षु, मैं यहाँ पहुँच गई हूँ'। อถ โข ภควา ตํ เทวตํ คาถาหิ อชฺฌภาสิ – तब भगवान ने उस देवता को गाथाओं में संबोधित किया— ‘‘อกฺเขยฺยสญฺญิโน สตฺตา, อกฺเขยฺยสฺมึ ปติฏฺฐิตา; อกฺเขยฺยํ อปริญฺญาย, โยคมายนฺติ มจฺจุโน. जो प्राणी कथनीय (नाम-रूप) की संज्ञा वाले हैं और कथनीय में ही प्रतिष्ठित हैं; वे कथनीय को पूर्णतः न जानकर मृत्यु के बंधन में पड़ जाते हैं। ‘‘อกฺเขยฺยญฺจ ปริญฺญาย, อกฺขาตารํ น มญฺญติ; ตญฺหิ ตสฺส น โหตีติ, เยน นํ วชฺชา น ตสฺส อตฺถิ; สเจ วิชานาสิ วเทหิ ยกฺขา’’ติ. कथनीय को पूर्णतः जानकर वह (अर्हत्) स्वयं को 'वक्ता' नहीं मानता; उसके लिए वह (अहंकार) नहीं होता, जिससे कोई उसे (राग आदि से) कह सके, वह उसके पास नहीं है। हे यक्ष! यदि तुम समझती हो, तो कहो। ‘‘น ขฺวาหํ, ภนฺเต, อิมสฺส ภควตา สงฺขิตฺเตน ภาสิตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานามิ. สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา ตถา ภาสตุ ยถาหํ อิมสฺส ภควตา สงฺขิตฺเตน ภาสิตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ ชาเนยฺย’’นฺติ. भन्ते! भगवान द्वारा संक्षेप में कहे गए इस उपदेश का अर्थ मैं विस्तार से नहीं समझ पा रही हूँ। भन्ते! अच्छा हो यदि भगवान मुझे इस प्रकार समझाएं जिससे मैं भगवान द्वारा संक्षेप में कहे गए इस उपदेश का अर्थ विस्तार से समझ सकूँ। ‘‘สโม วิเสสี อุท วา นิหีโน,โย มญฺญตี โส วิวเทถ เตน; ตีสุ วิธาสุ อวิกมฺปมาโน,สโม วิเสสีติ น ตสฺส โหติ; สเจ วิชานาสิ วเทหิ ยกฺขา’’ติ. जो स्वयं को समान, विशिष्ट या हीन मानता है, वह उसी (मान) के कारण विवाद करता है। जो तीनों प्रकार के मानों में विचलित नहीं होता, उसके लिए समान या विशिष्ट (होने का विचार) नहीं होता। हे यक्ष! यदि तुम समझती हो, तो कहो। ‘‘อิมสฺสาปิ ขฺวาหํ, ภนฺเต, ภควตา สงฺขิตฺเตน ภาสิตสฺส น วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานามิ. สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา ตถา ภาสตุ ยถาหํ อิมสฺส ภควตา สงฺขิตฺเตน ภาสิตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ ชาเนยฺย’’นฺติ. भन्ते! भगवान द्वारा संक्षेप में कहे गए इस उपदेश का अर्थ भी मैं विस्तार से नहीं समझ पा रही हूँ। भन्ते! अच्छा हो यदि भगवान मुझे इस प्रकार समझाएं जिससे मैं भगवान द्वारा संक्षेप में कहे गए इस उपदेश का अर्थ विस्तार से समझ सकूँ। ‘‘ปหาสิ สงฺขํ น วิมานมชฺฌคา, อจฺเฉจฺฉิ ตณฺหํ อิธ นามรูเป; ตํ ฉินฺนคนฺถํ อนิฆํ นิราสํ, ปริเยสมานา นาชฺฌคมุํ; เทวา มนุสฺสา อิธ วา หุรํ วา, สคฺเคสุ วา สพฺพนิเวสเนสุ; สเจ วิชานาสิ วเทหิ ยกฺขา’’ติ. जिसने संज्ञा (प्रपंच) को त्याग दिया है, जो मान (पुनर्जन्म) को प्राप्त नहीं हुआ, जिसने इसी नाम-रूप में तृष्णा को काट दिया है; उस ग्रंथियों से मुक्त, दुखरहित और आशारहित (पुरुष) को खोजते हुए देव और मनुष्य, यहाँ या परलोक में, स्वर्गों में या सभी निवास-स्थानों में नहीं पाते। हे यक्ष! यदि तुम समझती हो, तो कहो। ‘‘อิมสฺส [Pg.12] ขฺวาหํ, ภนฺเต, ภควตา สงฺขิตฺเตน ภาสิตสฺส เอวํ วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานามิ – भन्ते! भगवान द्वारा संक्षेप में कहे गए इस उपदेश का अर्थ मैं विस्तार से इस प्रकार समझती हूँ— ‘‘ปาปํ น กยิรา วจสา มนสา,กาเยน วา กิญฺจน สพฺพโลเก; กาเม ปหาย สติมา สมฺปชาโน,ทุกฺขํ น เสเวถ อนตฺถสํหิต’’นฺติ. समस्त लोक में वाणी, मन या शरीर से कोई पाप न करे; काम-भोगों को त्यागकर, स्मृतिवान और प्रज्ञावान होकर, अनर्थकारी दुख का सेवन न करे। นนฺทนวคฺโค ทุติโย. दूसरा नन्दनवग्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान)— นนฺทนา นนฺทติ เจว, นตฺถิปุตฺตสเมน จ; ขตฺติโย สณมาโน จ, นิทฺทาตนฺที จ ทุกฺกรํ; หิรี กุฏิกา นวโม, ทสโม วุตฺโต สมิทฺธินาติ. नन्दना, नन्दति, नत्थिपुत्तसम, खत्तिय, सणमान, निद्दातन्दी, दुक्कर, हिरी नौवां और दसवां समिद्धि सुत्त कहा गया है। ๓. สตฺติวคฺโค ३. सत्तिवग्ग (शक्ति वर्ग) ๑. สตฺติสุตฺตํ १. सत्तिसुत्त (शक्ति सुत्त) ๒๑. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข สา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – २१. श्रावस्ती निदान। एक ओर खड़ी हुई उस देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही— ‘‘สตฺติยา วิย โอมฏฺโฐ, ฑยฺหมาโนว มตฺถเก; กามราคปฺปหานาย, สโต ภิกฺขุ ปริพฺพเช’’ติ. जैसे तलवार से बिंधा हुआ या सिर में आग लगी हुई व्यक्ति, वैसे ही भिक्षु को काम-राग के त्याग के लिए स्मृतिवान होकर विचरण करना चाहिए। ‘‘สตฺติยา วิย โอมฏฺโฐ, ฑยฺหมาโนว มตฺถเก; สกฺกายทิฏฺฐิปฺปหานาย, สโต ภิกฺขุ ปริพฺพเช’’ติ. जैसे तलवार से बिंधा हुआ या सिर में आग लगी हुई व्यक्ति, वैसे ही भिक्षु को सत्कार्य-दृष्टि (आत्म-दृष्टि) के त्याग के लिए स्मृतिवान होकर विचरण करना चाहिए। ๒. ผุสติสุตฺตํ २. फुसतिसुत्त (स्पर्श सुत्त) ๒๒. २२. ‘‘นาผุสนฺตํ ผุสติ จ, ผุสนฺตญฺจ ตโต ผุเส; ตสฺมา ผุสนฺตํ ผุสติ, อปฺปทุฏฺฐปโทสิน’’นฺติ. जो स्पर्श नहीं करता, उसे (विपाक) स्पर्श नहीं करता; और जो स्पर्श करता है, उसे वह स्पर्श करता है। इसलिए, जो निर्दोष व्यक्ति से द्वेष करता है, उस स्पर्श करने वाले (अपराधी) को वह (विपाक) स्पर्श करता है। ‘‘โย [Pg.13] อปฺปทุฏฺฐสฺส นรสฺส ทุสฺสติ,สุทฺธสฺส โปสสฺส อนงฺคณสฺส; ตเมว พาลํ ปจฺเจติ ปาปํ,สุขุโม รโช ปฏิวาตํว ขิตฺโต’’ติ. जो व्यक्ति निर्दोष, शुद्ध और निष्पाप पुरुष (अर्हत्) के प्रति द्वेष करता है, उस मूर्ख को वह पाप उसी प्रकार वापस मिलता है, जैसे हवा के विपरीत फेंकी गई सूक्ष्म धूल। ๓. ชฏาสุตฺตํ ३. जटासुत्त ๒๓. २३. ‘‘อนฺโต ชฏา พหิ ชฏา, ชฏาย ชฏิตา ปชา; ตํ ตํ โคตม ปุจฺฉามิ, โก อิมํ วิชฏเย ชฏ’’นฺติ. भीतर जटा (उलझन), बाहर जटा; यह प्रजा जटाओं से उलझी हुई है। हे गौतम! मैं आपसे यही पूछता हूँ— इस जटा को कौन सुलझा सकता है? ‘‘สีเล ปติฏฺฐาย นโร สปญฺโญ, จิตฺตํ ปญฺญญฺจ ภาวยํ; อาตาปี นิปโก ภิกฺขุ, โส อิมํ วิชฏเย ชฏํ. शील में प्रतिष्ठित, प्रज्ञावान मनुष्य, चित्त और प्रज्ञा को विकसित करते हुए; वह उत्साही और निपुण भिक्षु इस जटा को सुलझा सकता है। ‘‘เยสํ ราโค จ โทโส จ, อวิชฺชา จ วิราชิตา; ขีณาสวา อรหนฺโต, เตสํ วิชฏิตา ชฏา. जिनके राग, द्वेष और अविद्या नष्ट हो गए हैं; वे क्षीणाश्रव अर्हत् हैं, उनकी जटा सुलझ गई है। ‘‘ยตฺถ นามญฺจ รูปญฺจ, อเสสํ อุปรุชฺฌติ; ปฏิฆํ รูปสญฺญา จ, เอตฺเถสา ฉิชฺชเต ชฏา’’ติ. जहाँ नाम और रूप पूर्णतः निरुद्ध हो जाते हैं, और प्रतिघ-संज्ञा तथा रूप-संज्ञा भी; वहीं यह जटा कट जाती है। ๔. มโนนิวารณสุตฺตํ ४. मनोनिवारणसुत्त ๒๔. ‘‘ยโต ยโต มโน นิวารเย, २४. जहाँ-जहाँ से मन को रोके, น ทุกฺขเมติ นํ ตโต ตโต; ส สพฺพโต มโน นิวารเย,ส สพฺพโต ทุกฺขา ปมุจฺจติ’’. वह (व्यक्ति) उन-उन (अकुशल धर्मों) के कारण उस दुःख को प्राप्त नहीं होता। उसे सब ओर से (अकुशल से) मन को रोकना चाहिए, वह सब दुखों से मुक्त हो जाता है। ‘‘น สพฺพโต มโน นิวารเย,น มโน สํยตตฺตมาคตํ; ยโต ยโต จ ปาปกํ,ตโต ตโต มโน นิวารเย’’ติ. सब ओर से मन को नहीं रोकना चाहिए, और न ही उस मन को जो संयम को प्राप्त हो चुका है। जिस-जिस (विषय) से पाप उत्पन्न होता है, उस-उस (विषय) से मन को रोकना चाहिए। ๕. อรหนฺตสุตฺตํ ५. अरहन्त सुत्त ๒๕. २५. ‘‘โย โหติ ภิกฺขุ อรหํ กตาวี,ขีณาสโว อนฺติมเทหธารี; อหํ วทามีติปิ โส วเทยฺย,มมํ วทนฺตีติปิ โส วเทยฺยา’’ติ. जो भिक्षु अरहन्त है, कृतकृत्य है, क्षीणासव है और अन्तिम शरीर को धारण करने वाला है; क्या वह ऐसा कह सकता है कि 'मैं कहता हूँ' या 'वे मुझे कहते हैं'? ‘‘โย [Pg.14] โหติ ภิกฺขุ อรหํ กตาวี,ขีณาสโว อนฺติมเทหธารี; อหํ วทามีติปิ โส วเทยฺย,มมํ วทนฺตีติปิ โส วเทยฺย; โลเก สมญฺญํ กุสโล วิทิตฺวา,โวหารมตฺเตน โส โวหเรยฺยา’’ติ. जो भिक्षु अरहन्त है, कृतकृत्य है, क्षीणासव है और अन्तिम शरीर को धारण करने वाला है; वह 'मैं कहता हूँ' ऐसा भी कह सकता है और 'वे मुझे कहते हैं' ऐसा भी कह सकता है। लोक में संज्ञाओं (नामों) को जानने वाला वह कुशल (अरहन्त) केवल व्यवहार मात्र के लिए वैसा प्रयोग कर सकता है। ‘‘โย โหติ ภิกฺขุ อรหํ กตาวี,ขีณาสโว อนฺติมเทหธารี; มานํ นุ โข โส อุปคมฺม ภิกฺขุ,อหํ วทามีติปิ โส วเทยฺย; มมํ วทนฺตีติปิ โส วเทยฺยา’’ติ. जो भिक्षु अरहन्त है, कृतकृत्य है, क्षीणासव है और अन्तिम शरीर को धारण करने वाला है; क्या वह भिक्षु मान (अहंकार) के वशीभूत होकर 'मैं कहता हूँ' या 'वे मुझे कहते हैं' ऐसा कहता है? ‘‘ปหีนมานสฺส น สนฺติ คนฺถา,วิธูปิตา มานคนฺถสฺส สพฺเพ; ส วีติวตฺโต มญฺญตํ สุเมโธ,อหํ วทามีติปิ โส วเทยฺย. जिसने मान (अहंकार) को त्याग दिया है, उसके लिए कोई ग्रन्थि (बन्धन) नहीं है; उसकी मान रूपी सभी ग्रन्थियाँ नष्ट हो चुकी हैं। वह सुमेध (बुद्धिमान) सभी कल्पनाओं को पार कर चुका है, वह 'मैं कहता हूँ' ऐसा कह सकता है। ‘‘มมํ วทนฺตีติปิ โส วเทยฺย; โลเก สมญฺญํ กุสโล วิทิตฺวา; โวหารมตฺเตน โส โวหเรยฺยา’’ติ. वह 'वे मुझे कहते हैं' ऐसा भी कह सकता है; लोक में संज्ञाओं को जानने वाला वह कुशल (अरहन्त) केवल व्यवहार मात्र के लिए वैसा प्रयोग कर सकता है। ๖. ปชฺโชตสุตฺตํ ६. पज्जोत सुत्त ๒๖. २६. ‘‘กติ โลกสฺมึ ปชฺโชตา, เยหิ โลโก ปกาสติ ; ภควนฺตํ ปุฏฺฐุมาคมฺม, กถํ ชาเนมุ ตํ มย’’นฺติ. लोक में कितने प्रकाश (ज्योति) हैं, जिनसे लोक प्रकाशित होता है? हम भगवान से पूछने आए हैं, हम इसे कैसे जानें? ‘‘จตฺตาโร โลเก ปชฺโชตา, ปญฺจเมตฺถ น วิชฺชติ; ทิวา ตปติ อาทิจฺโจ, รตฺติมาภาติ จนฺทิมา. लोक में चार प्रकाश हैं, पाँचवाँ यहाँ नहीं है। सूर्य दिन में तपता है, चन्द्रमा रात में चमकता है। ‘‘อถ อคฺคิ ทิวารตฺตึ, ตตฺถ ตตฺถ ปกาสติ; สมฺพุทฺโธ ตปตํ เสฏฺโฐ, เอสา อาภา อนุตฺตรา’’ติ. और अग्नि दिन-रात जहाँ-तहाँ प्रकाशित होती है; किन्तु प्रकाशित होने वालों में बुद्ध सर्वश्रेष्ठ हैं, यह आभा (प्रकाश) अनुपम है। ๗. สรสุตฺตํ ७. सर सुत्त ๒๗. २७. ‘‘กุโต [Pg.15] สรา นิวตฺตนฺติ, กตฺถ วฏฺฏํ น วตฺตติ; กตฺถ นามญฺจ รูปญฺจ, อเสสํ อุปรุชฺฌตี’’ติ. कहाँ से (संसार की) धाराएँ लौट जाती हैं? कहाँ (दुःख का) चक्र नहीं चलता? कहाँ नाम और रूप पूर्णतः निरुद्ध हो जाते हैं? ‘‘ยตฺถ อาโป จ ปถวี, เตโช วาโย น คาธติ; อโต สรา นิวตฺตนฺติ, เอตฺถ วฏฺฏํ น วตฺตติ; เอตฺถ นามญฺจ รูปญฺจ, อเสสํ อุปรุชฺฌตี’’ติ. जहाँ जल, पृथ्वी, तेज और वायु की प्रतिष्ठा नहीं है; वहाँ से धाराएँ लौट जाती हैं। यहाँ चक्र नहीं चलता। यहाँ नाम और रूप पूर्णतः निरुद्ध हो जाते हैं। ๘. มหทฺธนสุตฺตํ ८. महद्धन सुत्त ๒๘. २८. ‘‘มหทฺธนา มหาโภคา, รฏฺฐวนฺโตปิ ขตฺติยา; อญฺญมญฺญาภิคิชฺฌนฺติ, กาเมสุ อนลงฺกตา. महान धन और महान भोग वाले, राष्ट्रों के स्वामी क्षत्रिय भी, काम-भोगों से अतृप्त होकर एक-दूसरे (के धन) का लोभ करते हैं। ‘‘เตสุ อุสฺสุกฺกชาเตสุ, ภวโสตานุสาริสุ; เกธ ตณฺหํ ปชหึสุ, เก โลกสฺมึ อนุสฺสุกา’’ติ. उन उत्सुक (चिन्तित) और भव-धारा के अनुगामी लोगों में, किन्होंने तृष्णा को त्याग दिया है? लोक में कौन उत्सुकता (चिन्ता) से रहित हैं? ‘‘หิตฺวา อคารํ ปพฺพชิตา, หิตฺวา ปุตฺตํ ปสุํ วิยํ; หิตฺวา ราคญฺจ โทสญฺจ, อวิชฺชญฺจ วิราชิย; ขีณาสวา อรหนฺโต, เต โลกสฺมึ อนุสฺสุกา’’ติ. घर को छोड़कर प्रव्रजित हुए, पुत्र और पशुओं (प्रिय वस्तुओं) को त्यागकर, राग, द्वेष और अविद्या को नष्ट कर; वे क्षीणासव अरहन्त ही लोक में उत्सुकता (चिन्ता) रहित हैं। ๙. จตุจกฺกสุตฺตํ ९. चतुचक्क सुत्त ๒๙. २९. ‘‘จตุจกฺกํ นวทฺวารํ, ปุณฺณํ โลเภน สํยุตํ; ปงฺกชาตํ มหาวีร, กถํ ยาตฺรา ภวิสฺสตี’’ติ. चार चक्रों वाला, नौ द्वारों वाला, (अशुचि से) पूर्ण, लोभ से युक्त और कीचड़ (गर्भ) में उत्पन्न इस शरीर का, हे महावीर! निर्वाह (निकास) कैसे होगा? ‘‘เฉตฺวา นทฺธึ วรตฺตญฺจ, อิจฺฉา โลภญฺจ ปาปกํ; สมูลํ ตณฺหมพฺพุยฺห, เอวํ ยาตฺรา ภวิสฺสตี’’ติ. नद्धी (क्रोध) और वरत्ता (क्लेश रूपी रस्सी) को काटकर, इच्छा और पापी लोभ को छोड़कर, जड़ सहित तृष्णा को उखाड़कर, इस प्रकार निर्वाह (निकास) होगा। ๑๐. เอณิชงฺฆสุตฺตํ १०. एणिजङ्घ सुत्त ๓๐. ३०. ‘‘เอณิชงฺฆํ กิสํ วีรํ, อปฺปาหารํ อโลลุปํ; สีหํ เวกจรํ นาคํ, กาเมสุ อนเปกฺขินํ; อุปสงฺกมฺม ปุจฺฉาม, กถํ ทุกฺขา ปมุจฺจตี’’ติ. एणि (मृग) के समान जंघाओं वाले, कृश (दुबले), वीर, अल्पाहारी, निर्लोभी, सिंह के समान अकेले विचरने वाले, हाथी के समान और काम-भोगों में अनासक्त (भगवान) के पास आकर हम पूछते हैं—दुःख से मुक्ति कैसे होती है? ‘‘ปญฺจ [Pg.16] กามคุณา โลเก, มโนฉฏฺฐา ปเวทิตา; เอตฺถ ฉนฺทํ วิราเชตฺวา, เอวํ ทุกฺขา ปมุจฺจตี’’ติ. लोक में पाँच काम-गुण कहे गए हैं, जिनमें मन छठा है। यहाँ (इनमें) छन्द (राग) को दूर कर, इस प्रकार दुःख से मुक्ति होती है। สตฺติวคฺโค ตติโย. सत्तिवग्ग (शक्ति वर्ग) तीसरा है। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान) — สตฺติยา ผุสติ เจว, ชฏา มโนนิวารณา; อรหนฺเตน ปชฺโชโต, สรา มหทฺธเนน จ; จตุจกฺเกน นวมํ, เอณิชงฺเฆน เต ทสาติ. सत्तिया, फुसति, जटा, मनोनिवारण, अरहन्त, पज्जोत, सर, महद्धन, नौवाँ चतुचक्क और दसवाँ एणिजङ्घ—ये दस (सुत्त) हैं। ๔. สตุลฺลปกายิกวคฺโค ४. सतुल्लपकायिक वग्ग ๑. สพฺภิสุตฺตํ १. सब्भि सुत्त ๓๑. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. อถ โข สมฺพหุลา สตุลฺลปกายิกา เทวตาโย อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺณา เกวลกปฺปํ เชตวนํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐํสุ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข เอกา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – ३१. मैंने ऐसा सुना है - एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन विहार में विहार कर रहे थे। तब बहुत से सतुल्लपकायिक देवता, रात बीतने पर, अत्यंत सुंदर आभा के साथ संपूर्ण जेतवन को प्रकाशित करते हुए भगवान के पास आए; आकर भगवान का अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े हुए एक देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही - ‘‘สพฺภิเรว สมาเสถ, สพฺภิ กุพฺเพถ สนฺถวํ; สตํ สทฺธมฺมมญฺญาย, เสยฺโย โหติ น ปาปิโย’’ติ. "सज्जनों के साथ ही बैठना चाहिए, सज्जनों के साथ ही संगति करनी चाहिए; सत्पुरुषों के सद्धर्म को जानकर कल्याण होता है, अहित नहीं।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – तब दूसरे देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही - ‘‘สพฺภิเรว สมาเสถ, สพฺภิ กุพฺเพถ สนฺถวํ; สตํ สทฺธมฺมมญฺญาย, ปญฺญา ลพฺภติ นาญฺญโต’’ติ. "सज्जनों के साथ ही बैठना चाहिए, सज्जनों के साथ ही संगति करनी चाहिए; सत्पुरुषों के सद्धर्म को जानकर प्रज्ञा प्राप्त होती है, किसी अन्य से नहीं।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – तब दूसरे देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही - ‘‘สพฺภิเรว สมาเสถ, สพฺภิ กุพฺเพถ สนฺถวํ; สตํ สทฺธมฺมมญฺญาย, โสกมชฺเฌ น โสจตี’’ติ. "सज्जनों के साथ ही बैठना चाहिए, सज्जनों के साथ ही संगति करनी चाहिए; सत्पुरुषों के सद्धर्म को जानकर शोक करने वालों के बीच भी कोई शोक नहीं करता।" อถ [Pg.17] โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – तब दूसरे देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही - ‘‘สพฺภิเรว สมาเสถ, สพฺภิ กุพฺเพถ สนฺถวํ; สตํ สทฺธมฺมมญฺญาย, ญาติมชฺเฌ วิโรจตี’’ติ. "सज्जनों के साथ ही बैठना चाहिए, सज्जनों के साथ ही संगति करनी चाहिए; सत्पुरुषों के सद्धर्म को जानकर व्यक्ति अपने संबंधियों के बीच शोभा पाता है।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – तब दूसरे देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही - ‘‘สพฺภิเรว สมาเสถ, สพฺภิ กุพฺเพถ สนฺถวํ; สตํ สทฺธมฺมมญฺญาย, สตฺตา คจฺฉนฺติ สุคฺคติ’’นฺติ. "सज्जनों के साथ ही बैठना चाहिए, सज्जनों के साथ ही संगति करनी चाहिए; सत्पुरुषों के सद्धर्म को जानकर प्राणी सुगति को प्राप्त होते हैं।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – तब दूसरे देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही - ‘‘สพฺภิเรว สมาเสถ, สพฺภิ กุพฺเพถ สนฺถวํ; สตํ สทฺธมฺมมญฺญาย, สตฺตา ติฏฺฐนฺติ สาตต’’นฺติ. "सज्जनों के साथ ही बैठना चाहिए, सज्जनों के साथ ही संगति करनी चाहिए; सत्पुरुषों के सद्धर्म को जानकर प्राणी निरंतर सुख में स्थित रहते हैं।" อถ โข อปรา เทวตา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กสฺส นุ โข, ภควา, สุภาสิต’’นฺติ? สพฺพาสํ โว สุภาสิตํ ปริยาเยน, อปิ จ มมปิ สุณาถ – तब दूसरे देवता ने भगवान से यह कहा - "हे भगवन! किसका कथन सुभाषित है?" (भगवान ने कहा -) "तुम सभी का कथन अपने-अपने दृष्टिकोण से सुभाषित है, किंतु मेरा भी सुनो -" ‘‘สพฺภิเรว สมาเสถ, สพฺภิ กุพฺเพถ สนฺถวํ; สตํ สทฺธมฺมมญฺญาย, สพฺพทุกฺขา ปมุจฺจตี’’ติ. "सज्जनों के साथ ही बैठना चाहिए, सज्जनों के साथ ही संगति करनी चाहिए; सत्पुरुषों के सद्धर्म को जानकर व्यक्ति सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।" อิทมโวจ ภควา. อตฺตมนา ตา เทวตาโย ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายึสูติ. भगवान ने यह कहा। वे देवता प्रसन्न हुए और भगवान का अभिवादन कर, उनकी प्रदक्षिणा करके वहीं अंतर्धान हो गए। ๒. มจฺฉริสุตฺตํ २. मच्छरि सुत्त (कंजूसी का सूत्र) ๓๒. เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. อถ โข สมฺพหุลา สตุลฺลปกายิกา เทวตาโย อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺณา เกวลกปฺปํ เชตวนํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐํสุ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข เอกา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – ३२. एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन विहार में विहार कर रहे थे। तब बहुत से सतुल्लपकायिक देवता, रात बीतने पर, अत्यंत सुंदर आभा के साथ संपूर्ण जेतवन को प्रकाशित करते हुए भगवान के पास आए; आकर भगवान का अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े हुए एक देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही - ‘‘มจฺเฉรา จ ปมาทา จ, เอวํ ทานํ น ทียติ ; ปุญฺญํ อากงฺขมาเนน, เทยฺยํ โหติ วิชานตา’’ติ. "कंजूसी और प्रमाद के कारण दान नहीं दिया जाता; पुण्य की इच्छा रखने वाले और (पुण्य के फल को) जानने वाले विवेकशील व्यक्ति को दान देना चाहिए।" อถ [Pg.18] โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมา คาถาโย อภาสิ – तब दूसरे देवता ने भगवान के समीप ये गाथाएँ कहीं - ‘‘ยสฺเสว ภีโต น ททาติ มจฺฉรี, ตเทวาททโต ภยํ; ชิฆจฺฉา จ ปิปาสา จ, ยสฺส ภายติ มจฺฉรี; ตเมว พาลํ ผุสติ, อสฺมึ โลเก ปรมฺหิ จ. "कंजूस व्यक्ति जिस (दरिद्रता के) भय से दान नहीं देता, दान न देने के कारण वही भय उसे सताता है। जिस भूख और प्यास से कंजूस डरता है, वही भूख और प्यास उस मूर्ख को इस लोक और परलोक में पीड़ित करती है।" ‘‘ตสฺมา วิเนยฺย มจฺเฉรํ, ทชฺชา ทานํ มลาภิภู; ปุญฺญานิ ปรโลกสฺมึ, ปติฏฺฐา โหนฺติ ปาณิน’’นฺติ. "इसलिए कंजूसी को दूर कर, इस मल को जीतकर दान देना चाहिए। परलोक में पुण्य ही प्राणियों का आधार होते हैं।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมา คาถาโย อภาสิ – तब दूसरे देवता ने भगवान के समीप ये गाथाएँ कहीं - ‘‘เต มเตสุ น มียนฺติ, ปนฺถานํว สหพฺพชํ; อปฺปสฺมึ เย ปเวจฺฉนฺติ, เอส ธมฺโม สนนฺตโน. "वे मृतकों के बीच जीवित के समान हैं, जो मार्ग में साथ चलने वाले यात्रियों की तरह थोड़े में से भी बाँटकर देते हैं; यह सनातन धर्म है।" ‘‘อปฺปสฺเมเก ปเวจฺฉนฺติ, พหุเนเก น ทิจฺฉเร; อปฺปสฺมา ทกฺขิณา ทินฺนา, สหสฺเสน สมํ มิตา’’ติ. "कुछ लोग थोड़े में से भी दान देते हैं, जबकि कुछ बहुत होने पर भी नहीं देना चाहते। थोड़े में से श्रद्धापूर्वक दिया गया दान, हजारों के दान के समान माना जाता है।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมา คาถาโย อภาสิ – तब दूसरे देवता ने भगवान के समीप ये गाथाएँ कहीं - ‘‘ทุทฺททํ ททมานานํ, ทุกฺกรํ กมฺม กุพฺพตํ; อสนฺโต นานุกุพฺพนฺติ, สตํ ธมฺโม ทุรนฺวโย. "दान देने में कठिन वस्तु का दान देने वालों और दुष्कर पुण्य कर्म करने वालों का अनुकरण असज्जन नहीं कर सकते; सत्पुरुषों के धर्म का पालन करना कठिन है।" ‘‘ตสฺมา สตญฺจ อสตํ, นานา โหติ อิโต คติ; อสนฺโต นิรยํ ยนฺติ, สนฺโต สคฺคปรายนา’’ติ. "इसलिए यहाँ से जाने के बाद सज्जनों और असज्जनों की गति अलग-अलग होती है; असज्जन नरक जाते हैं और सज्जन स्वर्गगामी होते हैं।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก เอตทโวจ – ‘‘กสฺส นุ โข, ภควา, สุภาสิต’’นฺติ? तब दूसरे देवता ने भगवान के समीप यह कहा - "हे भगवन! किसका कथन सुभाषित है?" ‘‘สพฺพาสํ โว สุภาสิตํ ปริยาเยน; อปิ จ มมปิ สุณาถ – "तुम सभी का कथन अपने-अपने दृष्टिकोण से सुभाषित है; किंतु मेरा भी सुनो -" ‘‘ธมฺมํ จเร โยปิ สมุญฺชกํ จเร,ทารญฺจ โปสํ ททมปฺปกสฺมึ; สตํ สหสฺสานํ สหสฺสยาคินํ,กลมฺปิ นาคฺฆนฺติ ตถาวิธสฺส เต’’ติ. "जो व्यक्ति (खेतों में गिरे हुए दानों को) बीनकर जीवन यापन करते हुए भी धर्म का आचरण करता है, अपनी पत्नी का भरण-पोषण करता है और थोड़े में से भी दान देता है; हजारों का यज्ञ करने वाले लाखों लोगों के दान, उस व्यक्ति के दान के सौवें हिस्से के बराबर भी नहीं हैं।" อถ [Pg.19] โข อปรา เทวตา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब एक अन्य देवता ने भगवान को गाथा में संबोधित किया - ‘‘เกเนส ยญฺโญ วิปุโล มหคฺคโต,สเมน ทินฺนสฺส น อคฺฆเมติ; กถํ สตํ สหสฺสานํ สหสฺสยาคินํ,กลมฺปิ นาคฺฆนฺติ ตถาวิธสฺส เต’’ติ. "यह विशाल और महान यज्ञ (दान), न्यायपूर्वक (धार्मिक रीति से) दिए गए दान के मूल्य के बराबर क्यों नहीं होता? एक हजार का दान देने वाले एक लाख पुरुषों के वे (करोड़ों के) दान, उस प्रकार के (धार्मिक रीति से दान देने वाले के) दान के सौवें हिस्से के बराबर भी क्यों नहीं होते?" ‘‘ททนฺติ เหเก วิสเม นิวิฏฺฐา,เฉตฺวา วธิตฺวา อถ โสจยิตฺวา; สา ทกฺขิณา อสฺสุมุขา สทณฺฑา,สเมน ทินฺนสฺส น อคฺฆเมติ. "कुछ लोग अधर्म में स्थित होकर, प्रहार करके, वध करके और शोक संतप्त करके दान देते हैं। वह दान, जो आँसुओं से भरे चेहरे और दंड (हिंसा) के साथ दिया जाता है, न्यायपूर्वक दिए गए दान के मूल्य के बराबर नहीं होता। ‘‘เอวํ สตํ สหสฺสานํ สหสฺสยาคินํ; กลมฺปิ นาคฺฆนฺติ ตถาวิธสฺส เต’’ติ. इस प्रकार, एक हजार का दान देने वाले एक लाख पुरुषों के वे दान, उस प्रकार के (धार्मिक रीति से दान देने वाले के) दान के सौवें हिस्से के बराबर भी नहीं होते।" ๓. สาธุสุตฺตํ ३. साधु सुत्त ๓๓. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข สมฺพหุลา สตุลฺลปกายิกา เทวตาโย อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺณา เกวลกปฺปํ เชตวนํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐํสุ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข เอกา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ อุทานํ อุทาเนสิ – ३३. श्रावस्ती निदान। तब 'सतुल्लप' निकाय के अनेक देवता, अत्यंत सुंदर आभा वाले, पूरी जेतवन को प्रकाशित करते हुए, रात के बीतने पर (मध्यरात्रि में) भगवान के पास आए; आकर भगवान को प्रणाम कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े होकर एक देवता ने भगवान के सान्निध्य में यह उदान (हर्षोद्गार) प्रकट किया - ‘‘สาธุ โข, มาริส, ทานํ; มจฺเฉรา จ ปมาทา จ, เอวํ ทานํ น ทียติ; ปุญฺญํ อากงฺขมาเนน, เทยฺยํ โหติ วิชานตา’’ติ. "हे मारिष (मित्र)! दान देना निश्चित ही श्रेष्ठ है। कंजूसी और प्रमाद के कारण दान नहीं दिया जाता। पुण्य की इच्छा रखने वाले और (दान के फल को) जानने वाले विवेकशील व्यक्ति को दान देना चाहिए।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ อุทานํ อุทาเนสิ – तब एक अन्य देवता ने भगवान के सान्निध्य में यह उदान प्रकट किया - ‘‘สาธุ โข, มาริส, ทานํ; อปิ จ อปฺปกสฺมิมฺปิ สาหุ ทานํ’’. "हे मारिष! दान देना निश्चित ही श्रेष्ठ है; और थोड़े में से भी दान देना श्रेष्ठ है।" ‘‘อปฺปสฺเมเก ปเวจฺฉนฺติ, พหุเนเก น ทิจฺฉเร; อปฺปสฺมา ทกฺขิณา ทินฺนา, สหสฺเสน สมํ มิตา’’ติ. "कुछ लोग थोड़े में से भी दान देते हैं, जबकि बहुत होने पर भी कुछ लोग देना नहीं चाहते। थोड़े में से दिए गए दान की तुलना हजार (के दान) से की जाती है।" อถ [Pg.20] โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ อุทานํ อุทาเนสิ – तब एक अन्य देवता ने भगवान के सान्निध्य में यह उदान प्रकट किया - ‘‘สาธุ โข, มาริส, ทานํ; อปฺปกสฺมิมฺปิ สาหุ ทานํ; อปิ จ สทฺธายปิ สาหุ ทานํ’’. "हे मारिष! दान देना श्रेष्ठ है; थोड़े में से भी दान देना श्रेष्ठ है; और श्रद्धापूर्वक दिया गया दान भी श्रेष्ठ है।" ‘‘ทานญฺจ ยุทฺธญฺจ สมานมาหุ,อปฺปาปิ สนฺตา พหุเก ชินนฺติ; อปฺปมฺปิ เจ สทฺทหาโน ททาติ,เตเนว โส โหติ สุขี ปรตฺถา’’ติ. "दान और युद्ध को समान कहा गया है। थोड़े होकर भी (वीर पुरुष) बहुतों को जीत लेते हैं। यदि कोई श्रद्धावान व्यक्ति थोड़ा भी दान देता है, तो उसी से वह परलोक में सुखी होता है।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ อุทานํ อุทาเนสิ – तब एक अन्य देवता ने भगवान के सान्निध्य में यह उदान प्रकट किया - ‘‘สาธุ โข, มาริส, ทานํ; อปฺปกสฺมิมฺปิ สาหุ ทานํ; สทฺธายปิ สาหุ ทานํ; อปิ จ ธมฺมลทฺธสฺสาปิ สาหุ ทานํ’’. "हे मारिष! दान देना श्रेष्ठ है; थोड़े में से भी दान देना श्रेष्ठ है; श्रद्धापूर्वक दान देना श्रेष्ठ है; और धर्मपूर्वक (न्याय से) अर्जित धन का दान देना भी श्रेष्ठ है।" ‘‘โย ธมฺมลทฺธสฺส ททาติ ทานํ,อุฏฺฐานวีริยาธิคตสฺส ชนฺตุ; อติกฺกมฺม โส เวตรณึ ยมสฺส,ทิพฺพานิ ฐานานิ อุเปติ มจฺโจ’’ติ. "जो मनुष्य अपने पुरुषार्थ और वीर्य से धर्मपूर्वक अर्जित धन का दान देता है, वह मर्त्य (मनुष्य) यमराज की वैतरणी नदी को पार कर दिव्य लोकों को प्राप्त करता है।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ อุทานํ อุทาเนสิ – तब एक अन्य देवता ने भगवान के सान्निध्य में यह उदान प्रकट किया - ‘‘สาธุ โข, มาริส, ทานํ; อปฺปกสฺมิมฺปิ สาหุ ทานํ; สทฺธายปิ สาหุ ทานํ; ธมฺมลทฺธสฺสาปิ สาหุ ทานํ; อปิ จ วิเจยฺย ทานมฺปิ สาหุ ทานํ’’. "हे मारिष! दान देना श्रेष्ठ है; थोड़े में से भी दान देना श्रेष्ठ है; श्रद्धापूर्वक दान देना श्रेष्ठ है; धर्मपूर्वक अर्जित धन का दान देना श्रेष्ठ है; और विवेकपूर्वक (पात्र को चुनकर) दिया गया दान भी श्रेष्ठ है।" ‘‘วิเจยฺย ทานํ สุคตปฺปสตฺถํ,เย ทกฺขิเณยฺยา อิธ ชีวโลเก; เอเตสุ ทินฺนานิ มหปฺผลานิ,พีชานิ วุตฺตานิ ยถา สุเขตฺเต’’ติ. "विवेकपूर्वक (पात्र का चयन कर) दिए गए दान की सुगत (बुद्ध) ने प्रशंसा की है। इस जीवलोक में जो दान के योग्य (दक्षिणीय) पात्र हैं, उन्हें दिया गया दान महान फल देने वाला होता है, जैसे उत्तम खेत में बोए गए बीज।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ อุทานํ อุทาเนสิ – तब एक अन्य देवता ने भगवान के सान्निध्य में यह उदान प्रकट किया - ‘‘สาธุ โข, มาริส, ทานํ; อปฺปกสฺมิมฺปิ สาหุ ทานํ; สทฺธายปิ สาหุ ทานํ; ธมฺมลทฺธสฺสาปิ สาหุ ทานํ; วิเจยฺย ทานมฺปิ สาหุ ทานํ; อปิ จ ปาเณสุปิ สาธุ สํยโม’’. "हे मारिष! दान देना श्रेष्ठ है; थोड़े में से भी दान देना श्रेष्ठ है; श्रद्धापूर्वक दान देना श्रेष्ठ है; धर्मपूर्वक अर्जित धन का दान देना श्रेष्ठ है; विवेकपूर्वक दिया गया दान भी श्रेष्ठ है; और प्राणियों के प्रति संयम (अहिंसा) भी श्रेष्ठ है।" ‘‘โย [Pg.21] ปาณภูตานิ อเหฐยํ จรํ,ปรูปวาทา น กโรนฺติ ปาปํ; ภีรุํ ปสํสนฺติ น หิ ตตฺถ สูรํ,ภยา หิ สนฺโต น กโรนฺติ ปาป’’นฺติ. "जो प्राणियों को पीड़ा न पहुँचाते हुए आचरण करता है, और दूसरों की निंदा के भय से पाप नहीं करता; (सज्जन) ऐसे भयभीत (पापभीरु) की प्रशंसा करते हैं, न कि पाप में निर्भीक की। वास्तव में, सज्जन पुरुष (निंदा के) भय से पाप नहीं करते हैं।" อถ โข อปรา เทวตา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กสฺส นุ โข, ภควา, สุภาสิต’’นฺติ? तब एक अन्य देवता ने भगवान से यह कहा - "हे भगवन! इनमें से किसकी बात सुभाषित (भली-भाँति कही गई) है?" ‘‘สพฺพาสํ โว สุภาสิตํ ปริยาเยน, อปิ จ มมปิ สุณาถ – "तुम सभी की बातें अपने-अपने दृष्टिकोण से सुभाषित हैं, फिर भी मेरी बात भी सुनो -" ‘‘สทฺธา หิ ทานํ พหุธา ปสตฺถํ,ทานา จ โข ธมฺมปทํว เสยฺโย; ปุพฺเพ จ หิ ปุพฺพตเร จ สนฺโต,นิพฺพานเมวชฺฌคมุํ สปญฺญา’’ติ. "श्रद्धापूर्वक दिए गए दान की अनेक प्रकार से प्रशंसा की गई है, किंतु दान की अपेक्षा धर्म-पद (निर्वाण) ही श्रेष्ठ है। क्योंकि अतीत में और उससे भी पहले, प्रज्ञावान सज्जन पुरुष निर्वाण को ही प्राप्त हुए हैं।" ๔. นสนฺติสุตฺตํ ४. न संति सुत्त ๓๔. เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. อถ โข สมฺพหุลา สตุลฺลปกายิกา เทวตาโย อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺณา เกวลกปฺปํ เชตวนํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐํสุ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข เอกา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – ३४. एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन विहार में विहार कर रहे थे। तब 'सतुल्लप' निकाय के अनेक देवता, अत्यंत सुंदर आभा वाले, पूरी जेतवन को प्रकाशित करते हुए, रात के बीतने पर भगवान के पास आए; आकर भगवान को प्रणाम कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े होकर एक देवता ने भगवान के सान्निध्य में यह गाथा कही - ‘‘น สนฺติ กามา มนุเชสุ นิจฺจา,สนฺตีธ กมนียานิ เยสุ พทฺโธ; เยสุ ปมตฺโต อปุนาคมนํ,อนาคนฺตา ปุริโส มจฺจุเธยฺยา’’ติ. "मनुष्यों में काम-भोग नित्य (स्थायी) नहीं हैं, यहाँ केवल कमनीय (लुभावनी) वस्तुएँ हैं जिनमें मनुष्य बँधा हुआ है। इनमें प्रमाद करने वाला पुरुष मृत्यु के क्षेत्र (संसार) से पुनरागमन-रहित (निर्वाण) पद को प्राप्त नहीं कर सकता।" ‘‘ฉนฺทชํ อฆํ ฉนฺทชํ ทุกฺขํ; ฉนฺทวินยา อฆวินโย; อฆวินยา ทุกฺขวินโย’’ติ. "दुःख (पंच स्कंध) तृष्णा-छंद से उत्पन्न होता है, कष्ट तृष्णा-छंद से उत्पन्न होता है। तृष्णा-छंद के त्याग से दुःख का त्याग होता है, और दुःख के त्याग से कष्ट का निवारण होता है।" ‘‘น เต กามา ยานิ จิตฺรานิ โลเก,สงฺกปฺปราโค ปุริสสฺส กาโม; ติฏฺฐนฺติ จิตฺรานิ ตเถว โลเก,อเถตฺถ ธีรา วินยนฺติ ฉนฺทํ. "संसार में जो विचित्र (सुंदर) वस्तुएँ हैं, वे 'काम' नहीं हैं; मनुष्य का संकल्प-राग (आसक्तिपूर्ण विचार) ही 'काम' है। संसार में वे विचित्र वस्तुएँ वैसी ही बनी रहती हैं, किंतु धीर पुरुष उनके प्रति अपनी तृष्णा का दमन कर देते हैं।" ‘‘โกธํ [Pg.22] ชเห วิปฺปชเหยฺย มานํ,สํโยชนํ สพฺพมติกฺกเมยฺย; ตํ นามรูปสฺมิมสชฺชมานํ,อกิญฺจนํ นานุปตนฺติ ทุกฺขา. क्रोध को त्याग देना चाहिए, मान (अहंकार) को छोड़ देना चाहिए, सभी संयोजनों (बंधनों) को पार कर लेना चाहिए। नाम-रूप (मन-शरीर) में आसक्ति न रखने वाले और अकिंचन (परिग्रह-रहित) व्यक्ति को दुःख नहीं सताते। ‘‘ปหาสิ สงฺขํ น วิมานมชฺฌคา,อจฺเฉจฺฉิ ตณฺหํ อิธ นามรูเป; ตํ ฉินฺนคนฺถํ อนิฆํ นิราสํ,ปริเยสมานา นาชฺฌคมุํ; เทวา มนุสฺสา อิธ วา หุรํ วา,สคฺเคสุ วา สพฺพนิเวสเนสู’’ติ. (उस अर्हत ने) संज्ञा (नाम-पद्धति) को त्याग दिया है, वह मान (अहंकार) के वशीभूत नहीं होता, उसने इस नाम-रूप में तृष्णा को काट दिया है। ग्रंथियों (बंधनों) को काट चुके, निष्पाप और आशारहित उस (अर्हत) को खोजते हुए देव और मनुष्य न यहाँ, न परलोक में, न स्वर्गों में और न ही किसी निवास-स्थान में देख पाते हैं। ‘‘ตํ เจ หิ นาทฺทกฺขุํ ตถาวิมุตฺตํ (อิจฺจายสฺมา โมฆราชา),เทวา มนุสฺสา อิธ วา หุรํ วา; นรุตฺตมํ อตฺถจรํ นรานํ,เย ตํ นมสฺสนฺติ ปสํสิยา เต’’ติ. यदि देव और मनुष्य उस प्रकार विमुक्त (अर्हत) को यहाँ या परलोक में नहीं देख पाते, तो क्या वे लोग प्रशंसा के पात्र हैं जो मनुष्यों में उत्तम और मनुष्यों का कल्याण करने वाले उस (अर्हत) को नमस्कार करते हैं? (आयुष्मान मोघराज ने पूछा)। ‘‘ปสํสิยา เตปิ ภวนฺติ ภิกฺขู (โมฆราชาติ ภควา),เย ตํ นมสฺสนฺติ ตถาวิมุตฺตํ; อญฺญาย ธมฺมํ วิจิกิจฺฉํ ปหาย,สงฺคาติคา เตปิ ภวนฺติ ภิกฺขู’’ติ. हे भिक्षु (मोघराज)! वे भी प्रशंसा के पात्र हैं जो उस प्रकार विमुक्त (अर्हत) को नमस्कार करते हैं। धर्म को जानकर और विचिकित्सा (संदेह) को त्यागकर, वे भी आसक्ति को पार करने वाले बन जाते हैं। ๕. อุชฺฌานสญฺญิสุตฺตํ ५. ५. उज्झानसञ्ञी सुत्त ๓๕. เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. อถ โข สมฺพหุลา อุชฺฌานสญฺญิกา เทวตาโย อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺณา เกวลกปฺปํ เชตวนํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา เวหาสํ อฏฺฐํสุ. เวหาสํ ฐิตา โข เอกา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – ३५. एक समय भगवान श्रावस्ती के अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे। तब 'उज्झानसञ्ञी' (दोष ढूँढने वाली) नाम की अनेक देवता, रात बीतने पर, अपनी आभा से संपूर्ण जेतवन को आलोकित कर भगवान के पास आए और आकाश में खड़े हो गए। आकाश में खड़े होकर एक देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही— ‘‘อญฺญถา สนฺตมตฺตานํ, อญฺญถา โย ปเวทเย; นิกจฺจ กิตวสฺเสว, ภุตฺตํ เถยฺเยน ตสฺส ตํ. "जो (दुःशील भिक्षु) वास्तव में कुछ और होते हुए भी अपने आप को कुछ और (शुद्ध) प्रकट करता है, उसका (जनता द्वारा श्रद्धा से दिए गए भोजन को) ग्रहण करना कपटी शिकारी द्वारा पक्षियों के मांस खाने के समान चोरी का भोजन है।" ‘‘ยญฺหิ กยิรา ตญฺหิ วเท, ยํ น กยิรา น ตํ วเท; อกโรนฺตํ ภาสมานานํ, ปริชานนฺติ ปณฺฑิตา’’ติ. "जो करे वही कहे, जो न करे वह न कहे। जो बिना किए ही बोलता है, उसे बुद्धिमान लोग पहचान लेते हैं।" ‘‘น ยิทํ ภาสิตมตฺเตน, เอกนฺตสวเนน วา; อนุกฺกมิตเว สกฺกา, ยายํ ปฏิปทา ทฬฺหา; ยาย ธีรา ปมุจฺจนฺติ, ฌายิโน มารพนฺธนา. "यह दृढ़ प्रतिपदा (साधना मार्ग) केवल बोलने मात्र से या केवल सुनने मात्र से प्राप्त नहीं की जा सकती, जिससे ध्यानमग्न बुद्धिमान पुरुष मार के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।" ‘‘น [Pg.23] เว ธีรา ปกุพฺพนฺติ, วิทิตฺวา โลกปริยายํ; อญฺญาย นิพฺพุตา ธีรา, ติณฺณา โลเก วิสตฺติก’’นฺติ. "संसार की गति को जानकर बुद्धिमान पुरुष ऐसा (मिथ्या आचरण) नहीं करते। सत्य को जानकर और शांत (निर्वाण प्राप्त) होकर, वे बुद्धिमान संसार की तृष्णा को पार कर चुके होते हैं।" อถ โข ตา เทวตาโย ปถวิยํ ปติฏฺฐหิตฺวา ภควโต ปาเทสุ สิรสา นิปติตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘อจฺจโย โน, ภนฺเต, อจฺจคมา ยถาพาลํ ยถามูฬฺหํ ยถาอกุสลํ, ยา มยํ ภควนฺตํ อาสาเทตพฺพํ อมญฺญิมฺหา. ตาสํ โน, ภนฺเต, ภควา อจฺจยํ อจฺจยโต ปฏิคฺคณฺหาตุ อายตึ สํวรายา’’ติ. อถ โข ภควา สิตํ ปาตฺวากาสิ. อถ โข ตา เทวตาโย ภิยฺโยโสมตฺตาย อุชฺฌายนฺติโย เวหาสํ อพฺภุคฺคญฺฉุํ. เอกา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – तब वे देवता पृथ्वी पर खड़े होकर भगवान के चरणों में सिर झुकाकर गिर पड़े और भगवान से बोले— "भन्ते! हमसे अपराध हो गया, जैसा कि मूर्खों, मूढ़ों और अकुशलों से होता है, जो हमने भगवान के प्रति दुर्भावना रखी। भन्ते! भगवान हमारे इस अपराध को अपराध के रूप में स्वीकार करें ताकि भविष्य में हम संयमित रह सकें।" तब भगवान ने मुस्कान प्रकट की। तब वे देवता और भी अधिक लज्जित होकर आकाश में उड़ गए। एक देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही— ‘‘อจฺจยํ เทสยนฺตีนํ, โย เจ น ปฏิคณฺหติ; โกปนฺตโร โทสครุ, ส เวรํ ปฏิมุญฺจตี’’ติ. "जो व्यक्ति अपराध स्वीकार करने वालों के अपराध को क्षमा नहीं करता, वह भीतर क्रोध रखने वाला और द्वेष को महत्व देने वाला व्यक्ति स्वयं वैर (शत्रुता) को बढ़ाता है।" ‘‘อจฺจโย เจ น วิชฺเชถ, โนจิธาปคตํ สิยา; เวรานิ น จ สมฺเมยฺยุํ, เกนีธ กุสโล สิยา’’ติ. "यदि अपराध न होता, तो यहाँ कोई दोष भी न होता। यदि वैर शांत न होते, तो यहाँ कोई कैसे कुशल (बुद्धिमान) हो पाता?" ‘‘กสฺสจฺจยา น วิชฺชนฺติ, กสฺส นตฺถิ อปาคตํ; โก น สมฺโมหมาปาทิ, โก จ ธีโร สทา สโต’’ติ. "किसके अपराध नहीं होते? किसका कोई दोष नहीं है? कौन मोह में नहीं पड़ा? और कौन वह बुद्धिमान है जो सदा स्मृतिवान रहता है?" ‘‘ตถาคตสฺส พุทฺธสฺส, สพฺพภูตานุกมฺปิโน; ตสฺสจฺจยา น วิชฺชนฺติ, ตสฺส นตฺถิ อปาคตํ; โส น สมฺโมหมาปาทิ, โสว ธีโร สทา สโต’’ติ. "तथागत बुद्ध, जो समस्त प्राणियों के प्रति अनुकम्पा रखने वाले हैं, उनके कोई अपराध नहीं हैं, उनका कोई दोष नहीं है। वे मोह में नहीं पड़े, वे ही सदा स्मृतिवान और बुद्धिमान हैं।" ‘‘อจฺจยํ เทสยนฺตีนํ, โย เจ น ปฏิคณฺหติ; โกปนฺตโร โทสครุ, ส เวรํ ปฏิมุญฺจติ; ตํ เวรํ นาภินนฺทามิ, ปฏิคฺคณฺหามิ โวจฺจย’’นฺติ. "जो व्यक्ति अपराध स्वीकार करने वालों के अपराध को क्षमा नहीं करता, वह भीतर क्रोध रखने वाला और द्वेष को महत्व देने वाला व्यक्ति स्वयं वैर को बढ़ाता है। मैं उस वैर का अभिनंदन नहीं करता, इसलिए मैं तुम्हारे अपराध को स्वीकार (क्षमा) करता हूँ।" ๖. สทฺธาสุตฺตํ ६. ६. श्रद्धा सुत्त ๓๖. เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. อถ โข สมฺพหุลา สตุลฺลปกายิกา เทวตาโย อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺณา เกวลกปฺปํ เชตวนํ [Pg.24] โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐํสุ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข เอกา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – ३६. एक समय भगवान श्रावस्ती के अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे। तब 'सतुल्लपकायिका' नाम की अनेक देवता, रात बीतने पर, अपनी आभा से संपूर्ण जेतवन को आलोकित कर भगवान के पास आए और भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े होकर एक देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही— ‘‘สทฺธา ทุติยา ปุริสสฺส โหติ,โน เจ อสฺสทฺธิยํ อวติฏฺฐติ; ยโส จ กิตฺตี จ ตตฺวสฺส โหติ,สคฺคญฺจ โส คจฺฉติ สรีรํ วิหายา’’ติ. "श्रद्धा मनुष्य की साथी होती है। यदि अश्रद्धा (अविश्वास) न रहे, तो उसे यश और कीर्ति प्राप्त होती है और वह शरीर त्यागने के बाद स्वर्ग जाता है।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมา คาถาโย อภาสิ – तब एक अन्य देवता ने भगवान के समीप ये गाथाएँ कहीं— ‘‘โกธํ ชเห วิปฺปชเหยฺย มานํ,สํโยชนํ สพฺพมติกฺกเมยฺย; ตํ นามรูปสฺมิมสชฺชมานํ,อกิญฺจนํ นานุปตนฺติ สงฺคา’’ติ. "क्रोध को त्याग देना चाहिए, मान (अहंकार) को छोड़ देना चाहिए, सभी संयोजनों (बंधनों) को पार कर लेना चाहिए। नाम-रूप में आसक्ति न रखने वाले और अकिंचन व्यक्ति को (पाँच प्रकार की) आसक्तियाँ नहीं सतातीं।" ‘‘ปมาทมนุยุญฺชนฺติ, พาลา ทุมฺเมธิโน ชนา; อปฺปมาทญฺจ เมธาวี, ธนํ เสฏฺฐํว รกฺขติ. "मूर्ख और अल्पबुद्धि लोग प्रमाद (असावधानी) में लगे रहते हैं, जबकि बुद्धिमान व्यक्ति अप्रमाद की रक्षा वैसे ही करता है जैसे श्रेष्ठ धन की।" ‘‘มา ปมาทมนุยุญฺเชถ, มา กามรติ สนฺถวํ; อปฺปมตฺโต หิ ฌายนฺโต, ปปฺโปติ ปรมํ สุข’’นฺติ. "प्रमाद में न लगें, काम-भोगों की रति और संसर्ग में न लगें। क्योंकि अप्रमादी और ध्यानमग्न व्यक्ति ही परम सुख (निर्वाण) को प्राप्त करता है।" ๗. สมยสุตฺตํ ७. ७. समय सुत्त ๓๗. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สกฺเกสุ วิหรติ กปิลวตฺถุสฺมึ มหาวเน มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ ปญฺจมตฺเตหิ ภิกฺขุสเตหิ สพฺเพเหว อรหนฺเตหิ; ทสหิ จ โลกธาตูหิ เทวตา เยภุยฺเยน สนฺนิปติตา โหนฺติ ภควนฺตํ ทสฺสนาย ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. อถ โข จตุนฺนํ สุทฺธาวาสกายิกานํ เทวตานํ เอตทโหสิ – ‘‘อยํ โข ภควา สกฺเกสุ วิหรติ กปิลวตฺถุสฺมึ มหาวเน มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ ปญฺจมตฺเตหิ ภิกฺขุสเตหิ สพฺเพเหว อรหนฺเตหิ; ทสหิ จ โลกธาตูหิ เทวตา เยภุยฺเยน สนฺนิปติตา โหนฺติ ภควนฺตํ ทสฺสนาย ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. ยํนูน มยมฺปิ เยน ภควา เตนุปสงฺกเมยฺยาม; อุปสงฺกมิตฺวา ภควโต สนฺติเก ปจฺเจกํ คาถํ ภาเสยฺยามา’’ติ. ३७. ऐसा मैंने सुना— एक समय भगवान शाक्यों के कपिलवस्तु के महावन में लगभग पाँच सौ अर्हत भिक्षुओं के विशाल भिक्षु-संघ के साथ विहार कर रहे थे। दस लोक-धातुओं (ब्रह्मांडों) से देवता प्रायः भगवान और भिक्षु-संघ के दर्शन के लिए एकत्रित हुए थे। तब चार शुद्धावास लोक के देवताओं के मन में यह विचार आया— "यह भगवान शाक्यों के कपिलवस्तु के महावन में लगभग पाँच सौ अर्हत भिक्षुओं के विशाल भिक्षु-संघ के साथ विहार कर रहे हैं और दस लोक-धातुओं से देवता प्रायः भगवान और भिक्षु-संघ के दर्शन के लिए एकत्रित हुए हैं। क्यों न हम भी भगवान के पास चलें और भगवान के समीप प्रत्येक एक-एक गाथा कहें।" อถ [Pg.25] โข ตา เทวตา – เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย. เอวเมว – สุทฺธาวาเสสุ เทเวสุ อนฺตรหิตา ภควโต ปุรโต ปาตุรเหสุํ. อถ โข ตา เทวตา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐํสุ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข เอกา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – तब वे देवता—जैसे कोई बलवान पुरुष अपनी मुड़ी हुई बाँह को फैला दे या फैली हुई बाँह को मोड़ ले—उसी प्रकार शुद्धावास देवलोक से अंतर्धान होकर भगवान के सम्मुख प्रकट हुए। तब उन देवताओं ने भगवान का अभिवादन किया और एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े होकर एक देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही— ‘‘มหาสมโย ปวนสฺมึ, เทวกายา สมาคตา; อาคตมฺห อิมํ ธมฺมสมยํ, ทกฺขิตาเย อปราชิตสงฺฆ’’นฺติ. "महावन में बड़ा समागम है, देव-समूह एकत्रित हुए हैं। हम इस धर्म-सभा में अपराजित संघ के दर्शन के लिए आए हैं।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – तब दूसरी देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही— ‘‘ตตฺร ภิกฺขโว สมาทหํสุ, จิตฺตมตฺตโน อุชุกํ อกํสุ ; สารถีว เนตฺตานิ คเหตฺวา, อินฺทฺริยานิ รกฺขนฺติ ปณฺฑิตา’’ติ. "वहाँ भिक्षुओं ने समाधिस्थ होकर अपने चित्त को सीधा (एकाग्र) कर लिया है। जैसे सारथी लगाम थामे रहता है, वैसे ही वे बुद्धिमान अपनी इन्द्रियों की रक्षा करते हैं।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – तब दूसरी देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही— ‘‘เฉตฺวา ขีลํ เฉตฺวา ปลิฆํ, อินฺทขีลํ อูหจฺจ มเนชา; เต จรนฺติ สุทฺธา วิมลา, จกฺขุมตา สุทนฺตา สุสุนาคา’’ติ. "(राग-द्वेष-मोह रूपी) खूँटे को काटकर, अर्गला (बाधा) को तोड़कर और इन्द्रकील (देहरी की कील) को उखाड़कर वे तृष्णारहित होकर विचरते हैं। वे शुद्ध, निर्मल, चक्षुष्मान (प्रज्ञावान), सुदान्त (भली-भाँति दमित) और तरुण नाग (श्रेष्ठ पुरुष) के समान हैं।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – तब दूसरी देवता ने भगवान के समीप यह गाथा कही— ‘‘เย เกจิ พุทฺธํ สรณํ คตาเส, น เต คมิสฺสนฺติ อปายภูมึ; ปหาย มานุสํ เทหํ, เทวกายํ ปริปูเรสฺสนฺตี’’ติ. "जो कोई भी बुद्ध की शरण में गए हैं, वे अपाय (दुर्गति) को नहीं जाएँगे। वे मनुष्य देह को त्यागकर देव-निकाय को पूर्ण करेंगे (देवलोक में उत्पन्न होंगे)।" ๘. สกลิกสุตฺตํ ८. सकलिक सुत्त ๓๘. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ มทฺทกุจฺฉิสฺมึ มิคทาเย. เตน โข ปน สมเยน ภควโต ปาโท สกลิกาย ขโต โหติ. ภุสา สุทํ ภควโต เวทนา วตฺตนฺติ สารีริกา เวทนา ทุกฺขา ติพฺพา ขรา กฏุกา อสาตา อมนาปา; ตา สุทํ ภควา สโต สมฺปชาโน อธิวาเสติ อวิหญฺญมาโน. อถ โข ภควา จตุคฺคุณํ สงฺฆาฏึ ปญฺญาเปตฺวา ทกฺขิเณน ปสฺเสน สีหเสยฺยํ กปฺเปติ ปาเท ปาทํ อจฺจาธาย สโต สมฺปชาโน. ३८. ऐसा मैंने सुना—एक समय भगवान राजगृह के मद्दकुच्छि मृगदाव में विहार कर रहे थे। उस समय भगवान का पैर पत्थर की एक किरच (सकलिक) से घायल हो गया था। भगवान को शरीर में तीव्र वेदनाएँ होने लगीं—जो दुःखद, तीक्ष्ण, कठोर, कटु, अरुचिकर और अप्रिय थीं। भगवान ने उन वेदनाओं को बिना व्याकुल हुए, स्मृतिवान और सम्प्रजन्ययुक्त होकर सहन किया। तब भगवान ने अपनी संघाटी को चार परत करके बिछाया और दाहिनी करवट लेकर, एक पैर पर दूसरा पैर रखकर, स्मृतिवान और सम्प्रजन्ययुक्त होकर सिंह-शय्या ग्रहण की। อถ [Pg.26] โข สตฺตสตา สตุลฺลปกายิกา เทวตาโย อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺณา เกวลกปฺปํ มทฺทกุจฺฉึ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐํสุ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข เอกา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ อุทานํ อุทาเนสิ – ‘‘นาโค วต, โภ, สมโณ โคตโม; นาควตา จ สมุปฺปนฺนา สารีริกา เวทนา ทุกฺขา ติพฺพา ขรา กฏุกา อสาตา อมนาปา สโต สมฺปชาโน อธิวาเสติ อวิหญฺญมาโน’’ติ. तब सात सौ सतुल्लपक-निकाय के देवता, रात बीतने पर (मध्य रात्रि में), अत्यंत सुंदर आभा के साथ संपूर्ण मद्दकुच्छि को आलोकित करते हुए जहाँ भगवान थे, वहाँ आए। आकर भगवान का अभिवादन किया और एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े होकर एक देवता ने भगवान के समीप यह उदान प्रकट किया— "अहो! श्रमण गौतम नाग (श्रेष्ठ पुरुष) के समान हैं। नाग के समान होने के कारण ही वे उत्पन्न हुई शारीरिक वेदनाओं को—जो दुःखद, तीक्ष्ण, कठोर, कटु, अरुचिकर और अप्रिय हैं—बिना व्याकुल हुए, स्मृतिवान और सम्प्रजन्ययुक्त होकर सहन कर रहे हैं।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ อุทานํ อุทาเนสิ – ‘‘สีโห วต, โภ, สมโณ โคตโม; สีหวตา จ สมุปฺปนฺนา สารีริกา เวทนา ทุกฺขา ติพฺพา ขรา กฏุกา อสาตา อมนาปา สโต สมฺปชาโน อธิวาเสติ อวิหญฺญมาโน’’ติ. तब दूसरी देवता ने भगवान के समीप यह उदान प्रकट किया— "अहो! श्रमण गौतम सिंह के समान हैं। सिंह के समान होने के कारण ही वे उत्पन्न हुई शारीरिक वेदनाओं को—जो दुःखद, तीक्ष्ण, कठोर, कटु, अरुचिकर और अप्रिय हैं—बिना व्याकुल हुए, स्मृतिवान और सम्प्रजन्ययुक्त होकर सहन कर रहे हैं।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ อุทานํ อุทาเนสิ – ‘‘อาชานีโย วต, โภ, สมโณ โคตโม; อาชานียวตา จ สมุปฺปนฺนา สารีริกา เวทนา ทุกฺขา ติพฺพา ขรา กฏุกา อสาตา อมนาปา สโต สมฺปชาโน อธิวาเสติ อวิหญฺญมาโน’’ติ. तब दूसरी देवता ने भगवान के समीप यह उदान प्रकट किया— "अहो! श्रमण गौतम आजानीय (उत्तम नस्ल के अश्व) के समान हैं। आजानीय के समान होने के कारण ही वे उत्पन्न हुई शारीरिक वेदनाओं को—जो दुःखद, तीक्ष्ण, कठोर, कटु, अरुचिकर और अप्रिय हैं—बिना व्याकुल हुए, स्मृतिवान और सम्प्रजन्ययुक्त होकर सहन कर रहे हैं।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ อุทานํ อุทาเนสิ – ‘‘นิสโภ วต, โภ, สมโณ โคตโม; นิสภวตา จ สมุปฺปนฺนา สารีริกา เวทนา ทุกฺขา ติพฺพา ขรา กฏุกา อสาตา อมนาปา สโต สมฺปชาโน อธิวาเสติ อวิหญฺญมาโน’’ติ. तब दूसरी देवता ने भगवान के समीप यह उदान प्रकट किया— "अहो! श्रमण गौतम ऋषभ (श्रेष्ठ बैल) के समान हैं। ऋषभ के समान होने के कारण ही वे उत्पन्न हुई शारीरिक वेदनाओं को—जो दुःखद, तीक्ष्ण, कठोर, कटु, अरुचिकर और अप्रिय हैं—बिना व्याकुल हुए, स्मृतिवान और सम्प्रजन्ययुक्त होकर सहन कर रहे हैं।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ อุทานํ อุทาเนสิ – ‘‘โธรยฺโห วต, โภ, สมโณ โคตโม; โธรยฺหวตา จ สมุปฺปนฺนา สารีริกา เวทนา ทุกฺขา ติพฺพา ขรา กฏุกา อสาตา อมนาปา สโต สมฺปชาโน อธิวาเสติ อวิหญฺญมาโน’’ติ. तब दूसरी देवता ने भगवान के समीप यह उदान प्रकट किया— "अहो! श्रमण गौतम धौरेय (भार ढोने वाले श्रेष्ठ बैल) के समान हैं। धौरेय के समान होने के कारण ही वे उत्पन्न हुई शारीरिक वेदनाओं को—जो दुःखद, तीक्ष्ण, कठोर, कटु, अरुचिकर और अप्रिय हैं—बिना व्याकुल हुए, स्मृतिवान और सम्प्रजन्ययुक्त होकर सहन कर रहे हैं।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ อุทานํ อุทาเนสิ – ‘‘ทนฺโต วต, โภ, สมโณ โคตโม; ทนฺตวตา จ สมุปฺปนฺนา สารีริกา เวทนา ทุกฺขา ติพฺพา ขรา กฏุกา อสาตา อมนาปา สโต สมฺปชาโน อธิวาเสติ อวิหญฺญมาโน’’ติ. तब दूसरी देवता ने भगवान के समीप यह उदान प्रकट किया— "अहो! श्रमण गौतम सुदान्त (भली-भाँति दमित) हैं। सुदान्त होने के कारण ही वे उत्पन्न हुई शारीरिक वेदनाओं को—जो दुःखद, तीक्ष्ण, कठोर, कटु, अरुचिकर और अप्रिय हैं—बिना व्याकुल हुए, स्मृतिवान और सम्प्रजन्ययुक्त होकर सहन कर रहे हैं।" อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ อุทานํ อุทาเนสิ – ‘‘ปสฺส สมาธึ สุภาวิตํ จิตฺตญฺจ สุวิมุตฺตํ, น จาภินตํ น จาปนตํ น [Pg.27] จ สสงฺขารนิคฺคยฺหวาริตคตํ. โย เอวรูปํ ปุริสนาคํ ปุริสสีหํ ปุริสอาชานียํ ปุริสนิสภํ ปุริสโธรยฺหํ ปุริสทนฺตํ อติกฺกมิตพฺพํ มญฺเญยฺย กิมญฺญตฺร อทสฺสนา’’ติ. तब दूसरी देवता ने भगवान के समीप यह उदान प्रकट किया— "देखो, इस सुभावित समाधि को और भली-भाँति मुक्त चित्त को, जो न (राग की ओर) झुका है, न (द्वेष से) दूर हटा है, और न ही संस्कारों को दबाकर रोका गया है। जो ऐसे पुरुष-नाग, पुरुष-सिंह, पुरुष-आजानीय, पुरुष-ऋषभ, पुरुष-धौरेय और पुरुष-दान्त का उल्लंघन करना (या दोष ढूँढना) उचित समझे, वह अज्ञान के अतिरिक्त और क्या हो सकता है?" ‘‘ปญฺจเวทา สตํ สมํ, ตปสฺสี พฺราหฺมณา จรํ; จิตฺตญฺจ เนสํ น สมฺมา วิมุตฺตํ, หีนตฺถรูปา น ปารงฺคมา เต. "पाँचों वेदों के ज्ञाता तपस्वी ब्राह्मण सौ वर्षों तक तपस्या करते हैं, फिर भी उनका चित्त भली-भाँति मुक्त नहीं होता। वे हीन स्वभाव वाले (संसार के) पार नहीं जा पाते।" ‘‘ตณฺหาธิปนฺนา วตสีลพทฺธา, ลูขํ ตปํ วสฺสสตํ จรนฺตา; จิตฺตญฺจ เนสํ น สมฺมา วิมุตฺตํ, หีนตฺถรูปา น ปารงฺคมา เต. "तृष्णा से अभिभूत और व्रत-शील (कुक्कुर-व्रत आदि) में बँधे हुए लोग सौ वर्षों तक कठोर तप करते हैं, फिर भी उनका चित्त भली-भाँति मुक्त नहीं होता। वे हीन स्वभाव वाले (संसार के) पार नहीं जा पाते।" ‘‘น มานกามสฺส ทโม อิธตฺถิ, น โมนมตฺถิ อสมาหิตสฺส; เอโก อรญฺเญ วิหรํ ปมตฺโต, น มจฺจุเธยฺยสฺส ตเรยฺย ปาร’’นฺติ. "मान (अहंकार) चाहने वाले के लिए यहाँ दमन (संयम) नहीं है, और जो समाधिस्थ नहीं है उसके लिए मौन (मुनि-भाव) नहीं है। जंगल में अकेला रहकर भी जो प्रमादी है, वह मृत्यु के क्षेत्र (संसार) के पार नहीं जा सकता।" ‘‘มานํ ปหาย สุสมาหิตตฺโต, สุเจตโส สพฺพธิ วิปฺปมุตฺโต; เอโก อรญฺเญ วิหรมปฺปมตฺโต, ส มจฺจุเธยฺยสฺส ตเรยฺย ปาร’’นฺติ. "मान को त्यागकर, भली-भाँति समाधिस्थ होकर, शुद्ध चित्त वाला और सब ओर से विमुक्त होकर, जो जंगल में अकेला रहकर अप्रमादी (जागरूक) रहता है, वह मृत्यु के क्षेत्र के पार जा सकता है।" ๙. ปฐมปชฺชุนฺนธีตุสุตฺตํ ९. प्रथम पज्जुन्न-धीतु सुत्त ๓๙. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา เวสาลิยํ วิหรติ มหาวเน กูฏาคารสาลายํ. อถ โข โกกนทา ปชฺชุนฺนสฺส ธีตา อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺณา เกวลกปฺปํ มหาวนํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข สา เทวตา โกกนทา ปชฺชุนฺนสฺส ธีตา ภควโต สนฺติเก อิมา คาถาโย อภาสิ – ३९. ऐसा मैंने सुना है - एक समय भगवान वैशाली के महावन में कूटागारशाला में विहार कर रहे थे। तब पज्जुन्न (पर्जन्य) देव की पुत्री कोकनदा, रात्रि के बीतने पर (मध्यरात्रि में), अत्यंत सुंदर आभा के साथ संपूर्ण महावन को आलोकित करते हुए जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँची; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़ी हो गई। एक ओर खड़ी हुई उस कोकनदा नामक पज्जुन्न की पुत्री देवी ने भगवान के समीप ये गाथाएँ कहीं - ‘‘เวสาลิยํ วเน วิหรนฺตํ, อคฺคํ สตฺตสฺส สมฺพุทฺธํ; โกกนทาหมสฺมิ อภิวนฺเท, โกกนทา ปชฺชุนฺนสฺส ธีตา. "वैशाली के वन में विहार करने वाले, प्राणियों में श्रेष्ठ सम्बुद्ध को, मैं कोकनदा अभिवादन करती हूँ, मैं पज्जुन्न की पुत्री कोकनदा हूँ। ‘‘สุตเมว ปุเร อาสิ, ธมฺโม จกฺขุมตานุพุทฺโธ; สาหํ ทานิ สกฺขิ ชานามิ, มุนิโน เทสยโต สุคตสฺส. पहले मैंने केवल सुना था कि चक्षुष्मान (बुद्ध) द्वारा धर्म का साक्षात्कार किया गया है; अब मैं स्वयं साक्षात जानती हूँ, जब सुगत मुनि धर्म का उपदेश कर रहे हैं। ‘‘เย เกจิ อริยํ ธมฺมํ, วิครหนฺตา จรนฺติ ทุมฺเมธา; อุเปนฺติ โรรุวํ โฆรํ, จิรรตฺตํ ทุกฺขํ อนุภวนฺติ. जो कोई भी दुर्बुद्धि आर्य धर्म की निंदा करते हुए विचरण करते हैं, वे घोर रौरव नरक में जाते हैं और दीर्घकाल तक दुःख भोगते हैं। ‘‘เย จ โข อริเย ธมฺเม, ขนฺติยา อุปสเมน อุเปตา; ปหาย มานุสํ เทหํ, เทวกาย ปริปูเรสฺสนฺตี’’ติ. किन्तु जो आर्य धर्म में क्षमा और शांति से युक्त हैं, वे मनुष्य देह को त्याग कर देव-निकाय (स्वर्ग) को पूर्ण करेंगे।" ๑๐. ทุติยปชฺชุนฺนธีตุสุตฺตํ १०. द्वितीय पज्जुन्न-धीतु सुत्त ๔๐. เอวํ [Pg.28] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา เวสาลิยํ วิหรติ มหาวเน กูฏาคารสาลายํ. อถ โข จูฬโกกนทา ปชฺชุนฺนสฺส ธีตา อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺณา เกวลกปฺปํ มหาวนํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข สา เทวตา จูฬโกกนทา ปชฺชุนฺนสฺส ธีตา ภควโต สนฺติเก อิมา คาถาโย อภาสิ – ४०. ऐसा मैंने सुना है - एक समय भगवान वैशाली के महावन में कूटागारशाला में विहार कर रहे थे। तब पज्जुन्न देव की पुत्री चूलकोकनदा, रात्रि के बीतने पर, अत्यंत सुंदर आभा के साथ संपूर्ण महावन को आलोकित करते हुए जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँची; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़ी हो गई। एक ओर खड़ी हुई उस चूलकोकनदा नामक पज्जुन्न की पुत्री देवी ने भगवान के समीप ये गाथाएँ कहीं - ‘‘อิธาคมา วิชฺชุปภาสวณฺณา, โกกนทา ปชฺชุนฺนสฺส ธีตา; พุทฺธญฺจ ธมฺมญฺจ นมสฺสมานา, คาถาจิมา อตฺถวตี อภาสิ. "बिजली की चमक जैसी आभा वाली, पज्जुन्न की पुत्री कोकनदा, बुद्ध और धर्म को नमस्कार करने की इच्छा से यहाँ आई है; और उसने अर्थपूर्ण ये गाथाएँ कहीं। ‘‘พหุนาปิ โข ตํ วิภเชยฺยํ, ปริยาเยน ตาทิโส ธมฺโม; สํขิตฺตมตฺถํ ลปยิสฺสามิ, ยาวตา เม มนสา ปริยตฺตํ. मैं उस धर्म को अनेक प्रकार से विभक्त (व्याख्यायित) कर सकती हूँ, वह धर्म वैसा ही है; किन्तु जितना मैंने मन से सीखा है, उतने अर्थ को मैं संक्षेप में कहूँगी। ‘‘ปาปํ น กยิรา วจสา มนสา,กาเยน วา กิญฺจน สพฺพโลเก; กาเม ปหาย สติมา สมฺปชาโน,ทุกฺขํ น เสเวถ อนตฺถสํหิต’’นฺติ. संपूर्ण लोक में वाणी, मन या शरीर से कोई पाप नहीं करना चाहिए; काम-भोगों को त्याग कर, स्मृतिवान और प्रज्ञावान होकर, अनर्थकारी दुःख का सेवन नहीं करना चाहिए।" สตุลฺลปกายิกวคฺโค จตุตฺโถ. सतुल्लपकायिक वर्ग, चौथा। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान) - สพฺภิมจฺฉรินา สาธุ, น สนฺตุชฺฌานสญฺญิโน; สทฺธา สมโย สกลิกํ, อุโภ ปชฺชุนฺนธีตโรติ. सब्भि, मच्छरी, साधु, न सन्ति, उज्झानसञ्ञी, सद्धा, समय, सखलिक और पज्जुन्न की दोनों पुत्रियाँ - ये दस (सुत्त) हैं। ๕. อาทิตฺตวคฺโค ५. आदित्त वर्ग ๑. อาทิตฺตสุตฺตํ १. आदित्त सुत्त ๔๑. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. อถ โข อญฺญตรา เทวตา อภิกฺกนฺตาย [Pg.29] รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺณา เกวลกปฺปํ เชตวนํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข สา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมา คาถาโย อภาสิ – ४१. ऐसा मैंने सुना है - एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे। तब एक अन्य देवता, रात्रि के बीतने पर, अत्यंत सुंदर आभा के साथ संपूर्ण जेतवन को आलोकित करते हुए जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़ा हो गया। एक ओर खड़े हुए उस देवता ने भगवान के समीप ये गाथाएँ कहीं - ‘‘อาทิตฺตสฺมึ อคารสฺมึ, ยํ นีหรติ ภาชนํ; ตํ ตสฺส โหติ อตฺถาย, โน จ ยํ ตตฺถ ฑยฺหติ. "जलते हुए घर से जो पात्र (सामान) बाहर निकाल लिया जाता है, वह उसके काम आता है, न कि वह जो वहाँ जल जाता है। ‘‘เอวํ อาทิตฺตโก โลโก, ชราย มรเณน จ; นีหเรเถว ทาเนน, ทินฺนํ โหติ สุนีหตํ. इसी प्रकार यह लोक बुढ़ापे और मृत्यु से जल रहा है; दान के द्वारा (अपने धन को) बाहर निकाल लेना चाहिए, दिया हुआ दान ही सुरक्षित निकाला हुआ धन है। ‘‘ทินฺนํ สุขผลํ โหติ, นาทินฺนํ โหติ ตํ ตถา; โจรา หรนฺติ ราชาโน, อคฺคิ ฑหติ นสฺสติ. दिया हुआ दान सुखद फल देने वाला होता है, न दिया हुआ वैसा नहीं होता; उसे चोर ले जाते हैं, राजा छीन लेते हैं, अग्नि जला देती है और वह नष्ट हो जाता है। ‘‘อถ อนฺเตน ชหติ, สรีรํ สปริคฺคหํ; เอตทญฺญาย เมธาวี, ภุญฺเชถ จ ทเทถ จ; ทตฺวา จ ภุตฺวา จ ยถานุภาวํ; อนินฺทิโต สคฺคมุเปติ ฐาน’’นฺติ. अंत में, मृत्यु होने पर शरीर और संपत्ति सब छोड़ना पड़ता है; इसे जानकर बुद्धिमान व्यक्ति (धन का) उपभोग भी करे और दान भी दे; अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान देकर और उपभोग कर, वह अनिन्दित होकर स्वर्ग को प्राप्त करता है।" ๒. กึททสุตฺตํ २. किंदद सुत्त ๔๒. ४२. ‘‘กึทโท พลโท โหติ, กึทโท โหติ วณฺณโท; กึทโท สุขโท โหติ, กึทโท โหติ จกฺขุโท; โก จ สพฺพทโท โหติ, ตํ เม อกฺขาหิ ปุจฺฉิโต’’ติ. "क्या देने वाला बल देने वाला होता है? क्या देने वाला वर्ण (सुंदरता) देने वाला होता है? क्या देने वाला सुख देने वाला होता है? क्या देने वाला चक्षु (दृष्टि) देने वाला होता है? और कौन सब कुछ देने वाला होता है? मेरे पूछने पर आप मुझे यह बताएँ।" ‘‘อนฺนโท พลโท โหติ, วตฺถโท โหติ วณฺณโท; ยานโท สุขโท โหติ, ทีปโท โหติ จกฺขุโท. "अन्न देने वाला बल देने वाला होता है, वस्त्र देने वाला वर्ण देने वाला होता है, सवारी (यान) देने वाला सुख देने वाला होता है और दीपक देने वाला चक्षु देने वाला होता है। ‘‘โส จ สพฺพทโท โหติ, โย ททาติ อุปสฺสยํ; อมตํ ทโท จ โส โหติ, โย ธมฺมมนุสาสตี’’ติ. जो आवास (आश्रय) दान देता है, वह सब कुछ देने वाला होता है; और जो धर्म का उपदेश देता है, वह अमृत (निर्वाण) देने वाला होता है।" ๓. อนฺนสุตฺตํ ३. अन्न सुत्त ๔๓. ४३. ‘‘อนฺนเมวาภินนฺทนฺติ, อุภเย เทวมานุสา; อถ โก นาม โส ยกฺโข, ยํ อนฺนํ นาภินนฺทตี’’ติ. "देवता और मनुष्य दोनों ही अन्न की ही कामना करते हैं; फिर वह कौन सा यक्ष (देव) है जो अन्न की कामना नहीं करता?" ‘‘เย [Pg.30] นํ ททนฺติ สทฺธาย, วิปฺปสนฺเนน เจตสา; ตเมว อนฺนํ ภชติ, อสฺมึ โลเก ปรมฺหิ จ. "जो श्रद्धा और प्रसन्न चित्त से उसे (अन्न को) दान देते हैं, वही अन्न इस लोक और परलोक में उनके साथ रहता है। ‘‘ตสฺมา วิเนยฺย มจฺเฉรํ, ทชฺชา ทานํ มลาภิภู; ปุญฺญานิ ปรโลกสฺมึ, ปติฏฺฐา โหนฺติ ปาณิน’’นฺติ. इसलिए कंजूसी को दूर कर, मल (लोभ) को जीतकर दान देना चाहिए; परलोक में पुण्य ही प्राणियों का आधार होते हैं।" ๔. เอกมูลสุตฺตํ ४. एकमूल सुत्त ๔๔. ४४. ‘‘เอกมูลํ ทฺวิราวฏฺฏํ, ติมลํ ปญฺจปตฺถรํ; สมุทฺทํ ทฺวาทสาวฏฺฏํ, ปาตาลํ อตรี อิสี’’ติ. "एक मूल (तृष्णा) वाले, दो आवर्तों (शाश्वत और उच्छेद दृष्टि) वाले, तीन मलों (राग आदि) वाले, पाँच विस्तारों (कामगुणों) वाले, बारह आवर्तों (आयतन) वाले और अथाह (संसार रूपी) समुद्र को ऋषि (अर्हत) ने पार कर लिया है।" ๕. อโนมสุตฺตํ ५. अनोम सुत्त ๔๕. ४५. ‘‘อโนมนามํ นิปุณตฺถทสฺสึ, ปญฺญาททํ กามาลเย อสตฺตํ; ตํ ปสฺสถ สพฺพวิทุํ สุเมธํ, อริเย ปเถ กมมานํ มเหสิ’’นฺติ. "उत्तम नाम वाले, सूक्ष्म अर्थों को देखने वाले, प्रज्ञा प्रदान करने वाले, काम-भोगों में अनासक्त, सर्वज्ञ, सुमेध (उत्तम प्रज्ञावान), आर्य मार्ग पर चलने वाले उन महर्षि (बुद्ध) के दर्शन करो।" ๖. อจฺฉราสุตฺตํ ६. अच्छरा सुत्त ๔๖. ४६. ‘‘อจฺฉราคณสงฺฆุฏฺฐํ, ปิสาจคณเสวิตํ; วนนฺตํ โมหนํ นาม, กถํ ยาตฺรา ภวิสฺสตี’’ติ. "अप्सराओं के समूहों से गुंजायमान और पिशाच समूहों द्वारा सेवित, 'मोहन' नामक उस वन से कैसे निकला जा सकता है?" ‘‘อุชุโก นาม โส มคฺโค, อภยา นาม สา ทิสา; รโถ อกูชโน นาม, ธมฺมจกฺเกหิ สํยุโต. "वह मार्ग 'सीधा' कहलाता है, वह दिशा 'अभय' कहलाती है; वह रथ 'शब्दरहित' (शांत) है, जो धर्म-रूपी चक्रों से युक्त है।" ‘‘หิรี ตสฺส อปาลมฺโพ, สตฺยสฺส ปริวารณํ; ธมฺมาหํ สารถึ พฺรูมิ, สมฺมาทิฏฺฐิปุเรชวํ. "ह्री (लज्जा) उसका अवलंबन (सहारा) है, स्मृति उसका आवरण (रक्षा) है; मैं धर्म को सारथी कहता हूँ, जिसके आगे-आगे सम्यक्-दृष्टि चलती है।" ‘‘ยสฺส เอตาทิสํ ยานํ, อิตฺถิยา ปุริสสฺส วา; ส เว เอเตน ยาเนน, นิพฺพานสฺเสว สนฺติเก’’ติ. "जिस किसी स्त्री या पुरुष के पास ऐसा यान है, वह निश्चित रूप से इसी यान के द्वारा निर्वाण के समीप पहुँच जाता है।" ๗. วนโรปสุตฺตํ ७. वनरोप सुत्त ๔๗. ४७. ‘‘เกสํ ทิวา จ รตฺโต จ, สทา ปุญฺญํ ปวฑฺฒติ; ธมฺมฏฺฐา สีลสมฺปนฺนา, เก ชนา สคฺคคามิโน’’ติ. "किन लोगों का पुण्य दिन और रात, हर समय बढ़ता रहता है? कौन धर्म में स्थित हैं, कौन शील-संपन्न हैं और कौन लोग स्वर्ग जाने वाले हैं?" ‘‘อารามโรปา วนโรปา, เย ชนา เสตุการกา; ปปญฺจ อุทปานญฺจ, เย ททนฺติ อุปสฺสยํ. "जो लोग आराम (बगीचे) और वन लगाते हैं, जो पुल बनाते हैं, जो प्याऊ और कुएँ बनवाते हैं और जो आश्रय (विहार) दान करते हैं।" ‘‘เตสํ [Pg.31] ทิวา จ รตฺโต จ, สทา ปุญฺญํ ปวฑฺฒติ; ธมฺมฏฺฐา สีลสมฺปนฺนา, เต ชนา สคฺคคามิโน’’ติ. "उनका पुण्य दिन और रात, हर समय बढ़ता रहता है; वे धर्म में स्थित हैं, शील-संपन्न हैं और वे लोग स्वर्ग जाने वाले हैं।" ๘. เชตวนสุตฺตํ ८. जेतवन सुत्त ๔๘. ४८. ‘‘อิทญฺหิ ตํ เชตวนํ, อิสิสงฺฆนิเสวิตํ; อาวุตฺถํ ธมฺมราเชน, ปีติสญฺชนนํ มม. "यह वही जेतवन है, जो ऋषियों के संघ द्वारा सेवित है और धर्मराज (बुद्ध) द्वारा निवासित है; यह मुझे प्रीति (प्रसन्नता) प्रदान करता है।" ‘‘กมฺมํ วิชฺชา จ ธมฺโม จ, สีลํ ชีวิตมุตฺตมํ; เอเตน มจฺจา สุชฺฌนฺติ, น โคตฺเตน ธเนน วา. "कर्म, विद्या, धर्म, शील और उत्तम जीवन—इन्हीं से प्राणी शुद्ध होते हैं, न कि गोत्र या धन से।" ‘‘ตสฺมา หิ ปณฺฑิโต โปโส, สมฺปสฺสํ อตฺถมตฺตโน; โยนิโส วิจิเน ธมฺมํ, เอวํ ตตฺถ วิสุชฺฌติ. "इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को अपना कल्याण देखते हुए, विवेकपूर्वक धर्म का चिंतन करना चाहिए; इस प्रकार वह उसमें शुद्ध हो जाता है।" ‘‘สาริปุตฺโตว ปญฺญาย, สีเลน อุปสเมน จ; โยปิ ปารงฺคโต ภิกฺขุ, เอตาวปรโม สิยา’’ติ. "प्रज्ञा, शील और शांति में सारिपुत्र ही सर्वश्रेष्ठ हैं; जो कोई भिक्षु पारगामी (निर्वाण प्राप्त) है, वह अधिक से अधिक उनके समान ही हो सकता है।" ๙. มจฺฉริสุตฺตํ ९. मच्छरि सुत्त ๔๙. ४९. ‘‘เยธ มจฺฉริโน โลเก, กทริยา ปริภาสกา; อญฺเญสํ ททมานานํ, อนฺตรายกรา นรา. "इस लोक में जो मनुष्य कंजूस हैं, नीच (कृपण) हैं, दूसरों को अपशब्द कहने वाले हैं और दान देने वाले दूसरों के मार्ग में बाधा डालने वाले हैं।" ‘‘กีทิโส เตสํ วิปาโก, สมฺปราโย จ กีทิโส; ภควนฺตํ ปุฏฺฐุมาคมฺม, กถํ ชาเนมุ ตํ มย’’นฺติ. "उनका विपाक (फल) कैसा होता है और परलोक कैसा होता है? हम भगवान से पूछने आए हैं, हम इसे कैसे जानें?" ‘‘เยธ มจฺฉริโน โลเก, กทริยา ปริภาสกา; อญฺเญสํ ททมานานํ, อนฺตรายกรา นรา. "इस लोक में जो मनुष्य कंजूस हैं, नीच (कृपण) हैं, दूसरों को अपशब्द कहने वाले हैं और दान देने वाले दूसरों के मार्ग में बाधा डालने वाले हैं।" ‘‘นิรยํ ติรจฺฉานโยนึ, ยมโลกํ อุปปชฺชเร; สเจ เอนฺติ มนุสฺสตฺตํ, ทลิทฺเท ชายเร กุเล. "वे नरक, तिर्यक योनि (पशु योनि) या यमलोक में उत्पन्न होते हैं। यदि वे मनुष्य योनि में आते हैं, तो दरिद्र कुल में जन्म लेते हैं।" ‘‘โจฬํ ปิณฺโฑ รตี ขิฑฺฑา, ยตฺถ กิจฺเฉน ลพฺภติ; ปรโต อาสีสเร พาลา, ตมฺปิ เตสํ น ลพฺภติ; ทิฏฺเฐ ธมฺเมส วิปาโก, สมฺปราเย จ ทุคฺคตี’’ติ. "जहाँ वस्त्र, भोजन, रति और क्रीड़ा कठिनाई से प्राप्त होते हैं; वे मूर्ख दूसरों से आशा करते हैं, पर उन्हें वह भी नहीं मिलता। यह इस जन्म का विपाक है और परलोक में वे दुर्गति को प्राप्त होते हैं।" ‘‘อิติเหตํ วิชานาม, อญฺญํ ปุจฺฉาม โคตม; เยธ ลทฺธา มนุสฺสตฺตํ, วทญฺญู วีตมจฺฉรา. "हे गौतम! इसे हम इस प्रकार जानते हैं, अब हम दूसरा प्रश्न पूछते हैं; जो मनुष्य योनि प्राप्त कर दानशील और मत्सर (कंजूसी) रहित होते हैं।" ‘‘พุทฺเธ [Pg.32] ปสนฺนา ธมฺเม จ, สงฺเฆ จ ติพฺพคารวา; กีทิโส เตสํ วิปาโก, สมฺปราโย จ กีทิโส; ภควนฺตํ ปุฏฺฐุมาคมฺม, กถํ ชาเนมุ ตํ มย’’นฺติ. "जो बुद्ध, धर्म और संघ में प्रसन्न (श्रद्धावान) हैं और गहरा आदर रखते हैं; उनका विपाक कैसा होता है और परलोक कैसा होता है? हम भगवान से पूछने आए हैं, हम इसे कैसे जानें?" ‘‘เยธ ลทฺธา มนุสฺสตฺตํ, วทญฺญู วีตมจฺฉรา; พุทฺเธ ปสนฺนา ธมฺเม จ, สงฺเฆ จ ติพฺพคารวา; เอเต สคฺคา ปกาสนฺติ, ยตฺถ เต อุปปชฺชเร. "जो मनुष्य योनि प्राप्त कर दानशील और मत्सर रहित होते हैं, बुद्ध, धर्म और संघ में श्रद्धावान और गहरा आदर रखने वाले होते हैं; वे जहाँ उत्पन्न होते हैं, उस स्वर्ग को अपने तेज से प्रकाशित करते हैं।" ‘‘สเจ เอนฺติ มนุสฺสตฺตํ, อฑฺเฒ อาชายเร กุเล; โจฬํ ปิณฺโฑ รตี ขิฑฺฑา, ยตฺถากิจฺเฉน ลพฺภติ. "यदि वे मनुष्य योनि में आते हैं, तो समृद्ध कुल में जन्म लेते हैं; जहाँ वस्त्र, भोजन, रति और क्रीड़ा बिना किसी कठिनाई के प्राप्त होते हैं।" ‘‘ปรสมฺภเตสุ โภเคสุ, วสวตฺตีว โมทเร; ทิฏฺเฐ ธมฺเมส วิปาโก, สมฺปราเย จ สุคฺคตี’’ติ. "वे दूसरों द्वारा संचित भोगों में स्वामी की तरह आनंदित होते हैं; यह इस जन्म का विपाक है और परलोक में वे सुगति को प्राप्त होते हैं।" ๑๐. ฆฏีการสุตฺตํ १०. घटीकार सुत्त ๕๐. ५०. ‘‘อวิหํ อุปปนฺนาเส, วิมุตฺตา สตฺต ภิกฺขโว; ราคโทสปริกฺขีณา, ติณฺณา โลเก วิสตฺติก’’นฺติ. "अविह लोक में उत्पन्न हुए, विमुक्त, राग और द्वेष को क्षीण करने वाले वे सात भिक्षु कौन हैं, जिन्होंने लोक में तृष्णा को पार कर लिया है?" ‘‘เก จ เต อตรุํ ปงฺกํ, มจฺจุเธยฺยํ สุทุตฺตรํ; เก หิตฺวา มานุสํ เทหํ, ทิพฺพโยคํ อุปจฺจคุ’’นฺติ. "वे कौन हैं जिन्होंने मृत्यु के अत्यंत दुस्तर कीचड़ को पार कर लिया है? वे कौन हैं जिन्होंने मनुष्य देह को त्याग कर दिव्य बंधनों (देवलोक) को भी पार कर लिया है?" ‘‘อุปโก ปลคณฺโฑ จ, ปุกฺกุสาติ จ เต ตโย; ภทฺทิโย ขณฺฑเทโว จ, พาหุรคฺคิ จ สิงฺคิโย ; เต หิตฺวา มานุสํ เทหํ, ทิพฺพโยคํ อุปจฺจคุ’’นฺติ. "उपका, पलगण्ड और पुक्कुसाति—ये तीनों; भद्दिय, खण्डदेव, बाहुरग्गि और सिंगिय; ये सातों भिक्षु मनुष्य देह को त्यागकर दिव्य योग (देवलोक) को प्राप्त हुए।" ‘‘กุสลี ภาสสี เตสํ, มารปาสปฺปหายินํ; กสฺส เต ธมฺมมญฺญาย, อจฺฉิทุํ ภวพนฺธน’’นฺติ. "तुम उन मार-पाश को त्यागने वालों के कुशल (गुणों) के बारे में कह रहे हो; किसका धर्म जानकर उन्होंने भव-बंधन को काट दिया?" ‘‘น อญฺญตฺร ภควตา, นาญฺญตฺร ตว สาสนา; ยสฺส เต ธมฺมมญฺญาย, อจฺฉิทุํ ภวพนฺธนํ. "भगवान के अतिरिक्त और कोई नहीं, आपकी शिक्षा के अतिरिक्त और कोई नहीं; जिसका धर्म जानकर उन्होंने भव-बंधन को काट दिया।" ‘‘ยตฺถ นามญฺจ รูปญฺจ, อเสสํ อุปรุชฺฌติ; ตํ เต ธมฺมํ อิธญฺญาย, อจฺฉิทุํ ภวพนฺธน’’นฺติ. "जहाँ नाम और रूप पूर्णतः निरुद्ध हो जाते हैं; इस शासन में उस धर्म को जानकर उन्होंने भव-बंधन को काट दिया।" ‘‘คมฺภีรํ ภาสสี วาจํ, ทุพฺพิชานํ สุทุพฺพุธํ; กสฺส ตฺวํ ธมฺมมญฺญาย, วาจํ ภาสสิ อีทิส’’นฺติ. "तुम गम्भीर वाणी बोल रहे हो, जो समझने में कठिन और अत्यंत दुर्बोध है; किसका धर्म जानकर तुम ऐसी वाणी बोल रहे हो?" ‘‘กุมฺภกาโร [Pg.33] ปุเร อาสึ, เวกฬิงฺเค ฆฏีกโร; มาตาเปตฺติภโร อาสึ, กสฺสปสฺส อุปาสโก. "पूर्व काल में मैं वेकळिंग गाँव में घटिकार नाम का कुम्हार था; मैं माता-पिता का सेवक और कश्यप बुद्ध का उपासक था।" ‘‘วิรโต เมถุนา ธมฺมา, พฺรหฺมจารี นิรามิโส; อหุวา เต สคาเมยฺโย, อหุวา เต ปุเร สขา. "मैं मैथुन धर्म से विरत, ब्रह्मचारी और निरामिष (सांसारिक भोगों से रहित) था; मैं आपका ग्राम-वासी था और पूर्व काल में आपका मित्र था।" ‘‘โสหเมเต ปชานามิ, วิมุตฺเต สตฺต ภิกฺขโว; ราคโทสปริกฺขีเณ, ติณฺเณ โลเก วิสตฺติก’’นฺติ. "मैं उन सात मुक्त भिक्षुओं को जानता हूँ; जिनके राग और द्वेष क्षीण हो गए हैं और जिन्होंने लोक में तृष्णा को पार कर लिया है।" ‘‘เอวเมตํ ตทา อาสิ, ยถา ภาสสิ ภคฺคว; กุมฺภกาโร ปุเร อาสิ, เวกฬิงฺเค ฆฏีกโร; มาตาเปตฺติภโร อาสิ, กสฺสปสฺส อุปาสโก. "हे भग्गव! जैसा तुम कह रहे हो, वैसा ही तब था; पूर्व काल में तुम वेकळिंग गाँव में घटिकार नाम के कुम्हार थे; तुम माता-पिता के सेवक और कश्यप बुद्ध के उपासक थे।" ‘‘วิรโต เมถุนา ธมฺมา, พฺรหฺมจารี นิรามิโส; อหุวา เม สคาเมยฺโย, อหุวา เม ปุเร สขา’’ติ. "तुम मैथुन धर्म से विरत, ब्रह्मचारी और निरामिष थे; तुम मेरे ग्राम-वासी थे और पूर्व काल में मेरे मित्र थे।" ‘‘เอวเมตํ ปุราณานํ, สหายานํ อหุ สงฺคโม; อุภินฺนํ ภาวิตตฺตานํ, สรีรนฺติมธาริน’’นฺติ. "इस प्रकार उन पुराने मित्रों का मिलन हुआ; जो दोनों ही भावना-युक्त चित्त वाले और अपना अंतिम शरीर धारण करने वाले थे।" อาทิตฺตวคฺโค ปญฺจโม. "पाँचवाँ आदित्त वर्ग समाप्त।" ตสฺสุทฺทานํ – "उसकी अनुक्रमणिका (उदान) —" อาทิตฺตํ กึททํ อนฺนํ, เอกมูลอโนมิยํ; อจฺฉราวนโรปเชตํ, มจฺฉเรน ฆฏีกโรติ. "आदित्त, किंदद, अन्न, एकमूल, अनोमिय, अच्छरा, वनरोपण, जेत, मच्छरी और घटिकार—ये दस (सूत्र) हैं।" ๖. ชราวคฺโค ६. "जरा वर्ग" ๑. ชราสุตฺตํ १. "जरा सूत्र" ๕๑. ५१. ‘‘กึสุ ยาว ชรา สาธุ, กึสุ สาธุ ปติฏฺฐิตํ; กึสุ นรานํ รตนํ, กึสุ โจเรหิ ทูหร’’นฺติ. "बुढ़ापे तक क्या अच्छा है? क्या प्रतिष्ठित होने पर अच्छा है? मनुष्यों का रत्न क्या है? चोरों के लिए क्या ले जाना कठिन है?" ‘‘สีลํ ยาว ชรา สาธุ, สทฺธา สาธุ ปติฏฺฐิตา; ปญฺญา นรานํ รตนํ, ปุญฺญํ โจเรหิ ทูหร’’นฺติ. "शील बुढ़ापे तक अच्छा है; श्रद्धा प्रतिष्ठित होने पर अच्छी है; प्रज्ञा मनुष्यों का रत्न है; पुण्य को चोरों द्वारा ले जाना कठिन है।" ๒. อชรสาสุตฺตํ २. "अजरसा सूत्र" ๕๒. ५२. ‘‘กึสุ [Pg.34] อชรสา สาธุ, กึสุ สาธุ อธิฏฺฐิตํ; กึสุ นรานํ รตนํ, กึสุ โจเรหฺยหาริย’’นฺติ. "बिना क्षय हुए क्या अच्छा है? क्या दृढ़ता से स्थित होने पर अच्छा है? मनुष्यों का रत्न क्या है? चोरों द्वारा क्या नहीं छीना जा सकता?" ‘‘สีลํ อชรสา สาธุ, สทฺธา สาธุ อธิฏฺฐิตา; ปญฺญา นรานํ รตนํ, ปุญฺญํ โจเรหฺยหาริย’’นฺติ. "शील बिना क्षय हुए अच्छा है; श्रद्धा दृढ़ता से स्थित होने पर अच्छी है; प्रज्ञा मनुष्यों का रत्न है; पुण्य को चोर नहीं छीन सकते।" ๓. มิตฺตสุตฺตํ ३. "मित्त सूत्र" ๕๓. ५३. ‘‘กึสุ ปวสโต มิตฺตํ, กึสุ มิตฺตํ สเก ฆเร; กึ มิตฺตํ อตฺถชาตสฺส, กึ มิตฺตํ สมฺปรายิก’’นฺติ. "परदेश जाने वाले का मित्र कौन है? अपने घर में मित्र कौन है? प्रयोजन पड़ने पर मित्र कौन है? परलोक में मित्र कौन है?" ‘‘สตฺโถ ปวสโต มิตฺตํ, มาตา มิตฺตํ สเก ฆเร; สหาโย อตฺถชาตสฺส, โหติ มิตฺตํ ปุนปฺปุนํ; สยํกตานิ ปุญฺญานิ, ตํ มิตฺตํ สมฺปรายิก’’นฺติ. "सार्थ (यात्रियों का समूह) परदेश जाने वाले का मित्र है; माता अपने घर में मित्र है; बार-बार सहायक होने वाला साथी मित्र है; स्वयं द्वारा किए गए पुण्य परलोक में मित्र होते हैं।" ๔. วตฺถุสุตฺตํ ४. "वत्थु सूत्र" ๕๔. ५४. ‘‘กึสุ วตฺถุ มนุสฺสานํ, กึสูธ ปรโม สขา; กึสุ ภูตา อุปชีวนฺติ, เย ปาณา ปถวิสฺสิตา’’ติ. "मनुष्यों का आधार क्या है? यहाँ परम मित्र कौन है? पृथ्वी पर आश्रित प्राणी किस पर जीवित रहते हैं?" ‘‘ปุตฺตา วตฺถุ มนุสฺสานํ, ภริยา จ ปรโม สขา; วุฏฺฐึ ภูตา อุปชีวนฺติ, เย ปาณา ปถวิสฺสิตา’’ติ. "पुत्र मनुष्यों का आधार हैं; पत्नी परम मित्र है; पृथ्वी पर आश्रित प्राणी वर्षा पर जीवित रहते हैं।" ๕. ปฐมชนสุตฺตํ ५. "प्रथम जन सूत्र" ๕๕. ५५. ‘‘กึสุ ชเนติ ปุริสํ, กึสุ ตสฺส วิธาวติ; กึสุ สํสารมาปาทิ, กึสุ ตสฺส มหพฺภย’’นฺติ. "पुरुष को क्या उत्पन्न करता है? उसका क्या इधर-उधर दौड़ता है? संसार में कौन पड़ता है? उसका सबसे बड़ा भय क्या है?" ‘‘ตณฺหา ชเนติ ปุริสํ, จิตฺตมสฺส วิธาวติ; สตฺโต สํสารมาปาทิ, ทุกฺขมสฺส มหพฺภย’’นฺติ. "तृष्णा पुरुष को उत्पन्न करती है; उसका चित्त इधर-उधर दौड़ता है; प्राणी संसार में पड़ता है; दुःख उसका सबसे बड़ा भय है।" ๖. ทุติยชนสุตฺตํ ६. द्वितीय जन सुत्त ๕๖. ५६. ‘‘กึสุ [Pg.35] ชเนติ ปุริสํ, กึสุ ตสฺส วิธาวติ; กึสุ สํสารมาปาทิ, กิสฺมา น ปริมุจฺจตี’’ติ. "क्या पुरुष को उत्पन्न करता है? उसका क्या इधर-उधर दौड़ता है? क्या संसार में भटकता है? वह किससे मुक्त नहीं होता?" ‘‘ตณฺหา ชเนติ ปุริสํ, จิตฺตมสฺส วิธาวติ; สตฺโต สํสารมาปาทิ, ทุกฺขา น ปริมุจฺจตี’’ติ. "तृष्णा पुरुष को उत्पन्न करती है, उसका चित्त इधर-उधर दौड़ता है; प्राणी संसार में भटकता है, वह दुःख से मुक्त नहीं होता।" ๗. ตติยชนสุตฺตํ ७. तृतीय जन सुत्त ๕๗. ५७. ‘‘กึสุ ชเนติ ปุริสํ, กึสุ ตสฺส วิธาวติ; กึสุ สํสารมาปาทิ, กึสุ ตสฺส ปรายน’’นฺติ. "क्या पुरुष को उत्पन्न करता है? उसका क्या इधर-उधर दौड़ता है? क्या संसार में भटकता है? उसका आश्रय (अंतिम गति) क्या है?" ‘‘ตณฺหา ชเนติ ปุริสํ, จิตฺตมสฺส วิธาวติ; สตฺโต สํสารมาปาทิ, กมฺมํ ตสฺส ปรายน’’นฺติ. "तृष्णा पुरुष को उत्पन्न करती है, उसका चित्त इधर-उधर दौड़ता है; प्राणी संसार में भटकता है, कर्म ही उसका आश्रय (अंतिम गति) है।" ๘. อุปฺปถสุตฺตํ ८. उप्पथ सुत्त (कुमार्ग सुत्त) ๕๘. ५८. ‘‘กึสุ อุปฺปโถ อกฺขาโต, กึสุ รตฺตินฺทิวกฺขโย; กึ มลํ พฺรหฺมจริยสฺส, กึ สินานมโนทก’’นฺติ. "किसे कुमार्ग कहा गया है? क्या रात-दिन क्षय होता है? ब्रह्मचर्य का मल क्या है? बिना जल का स्नान क्या है?" ‘‘ราโค อุปฺปโถ อกฺขาโต, วโย รตฺตินฺทิวกฺขโย; อิตฺถี มลํ พฺรหฺมจริยสฺส, เอตฺถายํ สชฺชเต ปชา; ตโป จ พฺรหฺมจริยญฺจ, ตํ สินานมโนทก’’นฺติ. "राग को कुमार्ग कहा गया है, आयु रात-दिन क्षय होती है; स्त्री ब्रह्मचर्य का मल है, जिसमें यह प्रजा आसक्त होती है; तप और ब्रह्मचर्य ही बिना जल का स्नान हैं।" ๙. ทุติยสุตฺตํ ९. द्वितीय सुत्त ๕๙. ५९. ‘‘กึสุ ทุติยา ปุริสสฺส โหติ, กึสุ เจนํ ปสาสติ; กิสฺส จาภิรโต มจฺโจ, สพฺพทุกฺขา ปมุจฺจตี’’ติ. "पुरुष का साथी कौन होता है? उसे कौन अनुशासित करता है? किसमें लीन होकर मरणधर्मा प्राणी सभी दुखों से मुक्त हो जाता है?" ‘‘สทฺธา ทุติยา ปุริสสฺส โหติ, ปญฺญา เจนํ ปสาสติ; นิพฺพานาภิรโต มจฺโจ, สพฺพทุกฺขา ปมุจฺจตี’’ติ. "श्रद्धा पुरुष की साथी होती है, प्रज्ञा उसे अनुशासित करती है; निर्वाण में लीन होकर मरणधर्मा प्राणी सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।" ๑๐. กวิสุตฺตํ १०. कवि सुत्त ๖๐. ६०. ‘‘กึสุ นิทานํ คาถานํ, กึสุ ตาสํ วิยญฺชนํ; กึสุ สนฺนิสฺสิตา คาถา, กึสุ คาถานมาสโย’’ติ. "गाथाओं का निदान (स्रोत) क्या है? उनका व्यंजन (अभिव्यक्ति) क्या है? गाथाएं किस पर आश्रित हैं? गाथाओं का आधार क्या है?" ‘‘ฉนฺโท [Pg.36] นิทานํ คาถานํ, อกฺขรา ตาสํ วิยญฺชนํ; นามสนฺนิสฺสิตา คาถา, กวิ คาถานมาสโย’’ติ. "छंद गाथाओं का निदान है, अक्षर उनका व्यंजन हैं; गाथाएं नाम पर आश्रित हैं, और कवि गाथाओं का आधार है।" ชราวคฺโค ฉฏฺโฐ. छठा जरा वर्ग। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश — ชรา อชรสา มิตฺตํ, วตฺถุ ตีณิ ชนานิ จ; อุปฺปโถ จ ทุติโย จ, กวินา ปูริโต วคฺโคติ. जरा, अजरसा, मित्त, वत्थु, तीन जन सुत्त, उप्पथ, द्वितीय और कवि सुत्त के साथ यह वर्ग पूर्ण हुआ। ๗. อทฺธวคฺโค ७. अद्ध वर्ग ๑. นามสุตฺตํ १. नाम सुत्त ๖๑. ६१. ‘‘กึสุ สพฺพํ อทฺธภวิ, กิสฺมา ภิยฺโย น วิชฺชติ; กิสฺสสฺสุ เอกธมฺมสฺส, สพฺเพว วสมนฺวคู’’ติ. "किसने सबको अभिभूत कर रखा है? किससे बढ़कर और कुछ नहीं है? वह कौन सा एक धर्म है, जिसके वश में सब चलते हैं?" ‘‘นามํ สพฺพํ อทฺธภวิ, นามา ภิยฺโย น วิชฺชติ; นามสฺส เอกธมฺมสฺส, สพฺเพว วสมนฺวคู’’ติ. "नाम ने सबको अभिभूत कर रखा है, नाम से बढ़कर और कुछ नहीं है; नाम ही वह एक धर्म है, जिसके वश में सब चलते हैं।" ๒. จิตฺตสุตฺตํ २. चित्त सुत्त ๖๒. ६२. ‘‘เกนสฺสุ นียติ โลโก, เกนสฺสุ ปริกสฺสติ; กิสฺสสฺสุ เอกธมฺมสฺส, สพฺเพว วสมนฺวคู’’ติ. "लोक किसके द्वारा ले जाया जाता है? किसके द्वारा खींचा जाता है? वह कौन सा एक धर्म है, जिसके वश में सब चलते हैं?" ‘‘จิตฺเตน นียติ โลโก, จิตฺเตน ปริกสฺสติ; จิตฺตสฺส เอกธมฺมสฺส, สพฺเพว วสมนฺวคู’’ติ. "लोक चित्त के द्वारा ले जाया जाता है, चित्त के द्वारा ही खींचा जाता है; चित्त ही वह एक धर्म है, जिसके वश में सब चलते हैं।" ๓. ตณฺหาสุตฺตํ ३. तृष्णा सुत्त ๖๓. ६३. ‘‘เกนสฺสุ นียติ โลโก, เกนสฺสุ ปริกสฺสติ; กิสฺสสฺสุ เอกธมฺมสฺส, สพฺเพว วสมนฺวคู’’ติ. "लोक किसके द्वारा ले जाया जाता है? किसके द्वारा खींचा जाता है? वह कौन सा एक धर्म है, जिसके वश में सब चलते हैं?" ‘‘ตณฺหาย นียติ โลโก, ตณฺหาย ปริกสฺสติ; ตณฺหาย เอกธมฺมสฺส, สพฺเพว วสมนฺวคู’’ติ. "लोक तृष्णा के द्वारा ले जाया जाता है, तृष्णा के द्वारा ही खींचा जाता है; तृष्णा ही वह एक धर्म है, जिसके वश में सब चलते हैं।" ๔. สํโยชนสุตฺตํ ४. संयोजन सुत्त ๖๔. ६४. ‘‘กึสุ [Pg.37] สํโยชโน โลโก, กึสุ ตสฺส วิจารณํ; กิสฺสสฺสุ วิปฺปหาเนน, นิพฺพานํ อิติ วุจฺจตี’’ติ. "लोक किससे बंधा हुआ है? उसका विचरण क्या है? किसके त्याग से उसे निर्वाण कहा जाता है?" ‘‘นนฺทีสํโยชโน โลโก, วิตกฺกสฺส วิจารณํ; ตณฺหาย วิปฺปหาเนน, นิพฺพานํ อิติ วุจฺจตี’’ติ. "लोक नंदी (अभिनंदन/तृष्णा) से बंधा हुआ है, वितर्क ही इसका विचरण (पैर) है; तृष्णा के प्रहाण (त्याग) से ही इसे 'निर्वाण' कहा जाता है।" ๕. พนฺธนสุตฺตํ ५. ५. बन्धन सुत्त ๖๕. ६५. ‘‘กึสุ สมฺพนฺธโน โลโก, กึสุ ตสฺส วิจารณํ; กิสฺสสฺสุ วิปฺปหาเนน, สพฺพํ ฉินฺทติ พนฺธน’’นฺติ. "लोक किससे बंधा हुआ है? इसका विचरण क्या है? किसके प्रहाण से सभी बन्धन कट जाते हैं?" ‘‘นนฺทีสมฺพนฺธโน โลโก, วิตกฺกสฺส วิจารณํ; ตณฺหาย วิปฺปหาเนน, สพฺพํ ฉินฺทติ พนฺธน’’นฺติ. "लोक नंदी (अभिनंदन) से बंधा हुआ है, वितर्क ही इसका विचरण है; तृष्णा के प्रहाण से सभी बन्धन कट जाते हैं।" ๖. อตฺตหตสุตฺตํ ६. ६. अत्तहत सुत्त ๖๖. ६६. ‘‘เกนสฺสุพฺภาหโต โลโก, เกนสฺสุ ปริวาริโต; เกน สลฺเลน โอติณฺโณ, กิสฺส ธูปายิโต สทา’’ติ. "लोक किससे आहत (ताड़ित) है? किससे घिरा हुआ है? किस शल्य (बाण) से बिंधा हुआ है? किससे यह सदा प्रज्वलित (धुआँयमान) रहता है?" ‘‘มจฺจุนาพฺภาหโต โลโก, ชราย ปริวาริโต; ตณฺหาสลฺเลน โอติณฺโณ, อิจฺฉาธูปายิโต สทา’’ติ. "लोक मृत्यु से आहत है, जरा (बुढ़ापे) से घिरा हुआ है; तृष्णा-रूपी शल्य से बिंधा हुआ है और इच्छा (लालसा) से सदा प्रज्वलित रहता है।" ๗. อุฑฺฑิตสุตฺตํ ७. ७. उड्डित सुत्त ๖๗. ६७. ‘‘เกนสฺสุ อุฑฺฑิโต โลโก, เกนสฺสุ ปริวาริโต; เกนสฺสุ ปิหิโต โลโก, กิสฺมึ โลโก ปติฏฺฐิโต’’ติ. "लोक किससे फँसा (उड्डित) हुआ है? किससे घिरा हुआ है? लोक किससे ढका (अवरुद्ध) हुआ है? लोक किस पर प्रतिष्ठित है?" ‘‘ตณฺหาย อุฑฺฑิโต โลโก, ชราย ปริวาริโต; มจฺจุนา ปิหิโต โลโก, ทุกฺเข โลโก ปติฏฺฐิโต’’ติ. "लोक तृष्णा से फँसा हुआ है, जरा से घिरा हुआ है; मृत्यु से ढका हुआ है और लोक दुःख पर प्रतिष्ठित है।" ๘. ปิหิตสุตฺตํ ८. ८. पिहित सुत्त ๖๘. ६८. ‘‘เกนสฺสุ ปิหิโต โลโก, กิสฺมึ โลโก ปติฏฺฐิโต; เกนสฺสุ อุฑฺฑิโต โลโก, เกนสฺสุ ปริวาริโต’’ติ. "लोक किससे ढका हुआ है? लोक किस पर प्रतिष्ठित है? लोक किससे फँसा हुआ है? किससे घिरा हुआ है?" ‘‘มจฺจุนา [Pg.38] ปิหิโต โลโก, ทุกฺเข โลโก ปติฏฺฐิโต; ตณฺหาย อุฑฺฑิโต โลโก, ชราย ปริวาริโต’’ติ. "लोक मृत्यु से ढका हुआ है, लोक दुःख पर प्रतिष्ठित है; लोक तृष्णा से फँसा हुआ है और जरा से घिरा हुआ है।" ๙. อิจฺฉาสุตฺตํ ९. ९. इच्छा सुत्त ๖๙. ६९. ‘‘เกนสฺสุ พชฺฌตี โลโก, กิสฺส วินยาย มุจฺจติ; กิสฺสสฺสุ วิปฺปหาเนน, สพฺพํ ฉินฺทติ พนฺธน’’นฺติ. "लोक किससे बंधा हुआ है? किसके दमन (विनय) से मुक्त होता है? किसके प्रहाण से सभी बन्धन कट जाते हैं?" ‘‘อิจฺฉาย พชฺฌตี โลโก, อิจฺฉาวินยาย มุจฺจติ; อิจฺฉาย วิปฺปหาเนน, สพฺพํ ฉินฺทติ พนฺธน’’นฺติ. "लोक इच्छा से बंधा हुआ है, इच्छा के दमन से मुक्त होता है; इच्छा के प्रहाण से सभी बन्धन कट जाते हैं।" ๑๐. โลกสุตฺตํ १०. १०. लोक सुत्त ๗๐. ७०. ‘‘กิสฺมึ โลโก สมุปฺปนฺโน, กิสฺมึ กุพฺพติ สนฺถวํ; กิสฺส โลโก อุปาทาย, กิสฺมึ โลโก วิหญฺญตี’’ติ. "लोक किसमें उत्पन्न होता है? लोक किसके साथ संसर्ग (मेल-जोल) करता है? लोक किसका उपादान (सहारा) लेकर प्रवृत्त होता है? लोक किससे पीड़ित होता है?" ‘‘ฉสุ โลโก สมุปฺปนฺโน, ฉสุ กุพฺพติ สนฺถวํ; ฉนฺนเมว อุปาทาย, ฉสุ โลโก วิหญฺญตี’’ติ. "छह (आयतनों) में लोक उत्पन्न होता है, छह में ही संसर्ग करता है; छह का ही उपादान लेकर प्रवृत्त होता है और छह से ही लोक पीड़ित होता है।" อทฺธวคฺโค สตฺตโม. सातवाँ अद्ध वग्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान) - นามํ จิตฺตญฺจ ตณฺหา จ, สํโยชนญฺจ พนฺธนา; อพฺภาหตุฑฺฑิโต ปิหิโต, อิจฺฉา โลเกน เต ทสาติ. नाम, चित्त, तृष्णा, संयोजन, बन्धन, अभ्याहत, उड्डित, पिहित, इच्छा और लोक - ये दस (सुत्त) हैं। ๘. เฉตฺวาวคฺโค ८. ८. छेत्वा वग्ग ๑. เฉตฺวาสุตฺตํ १. १. छेत्वा सुत्त ๗๑. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข สา เทวตา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – ७१. श्रावस्ती निदान। एक ओर खड़ी हुई उस देवता ने भगवान से गाथा में इस प्रकार कहा - ‘‘กึสุ เฉตฺวา สุขํ เสติ, กึสุ เฉตฺวา น โสจติ; กิสฺสสฺสุ เอกธมฺมสฺส, วธํ โรเจสิ โคตมา’’ติ. "हे गौतम! क्या काटकर मनुष्य सुख से सोता है? क्या काटकर शोक नहीं करता? किस एक धर्म के विनाश को आप पसंद करते हैं?" ‘‘โกธํ [Pg.39] เฉตฺวา สุขํ เสติ, โกธํ เฉตฺวา น โสจติ; โกธสฺส วิสมูลสฺส, มธุรคฺคสฺส เทวเต; วธํ อริยา ปสํสนฺติ, ตญฺหิ เฉตฺวา น โสจตี’’ติ. "हे देवता! क्रोध को काटकर मनुष्य सुख से सोता है, क्रोध को काटकर शोक नहीं करता। विषैली जड़ वाले और मधुर अग्र (नोक) वाले क्रोध के विनाश की आर्य प्रशंसा करते हैं; क्योंकि उसे काटकर मनुष्य शोक नहीं करता।" ๒. รถสุตฺตํ २. २. रथ सुत्त ๗๒. ७२. ‘‘กึสุ รถสฺส ปญฺญาณํ, กึสุ ปญฺญาณมคฺคิโน; กึสุ รฏฺฐสฺส ปญฺญาณํ, กึสุ ปญฺญาณมิตฺถิยา’’ติ. "रथ की पहचान (चिह्न) क्या है? अग्नि की पहचान क्या है? राष्ट्र की पहचान क्या है? स्त्री की पहचान क्या है?" ‘‘ธโช รถสฺส ปญฺญาณํ, ธูโม ปญฺญาณมคฺคิโน; ราชา รฏฺฐสฺส ปญฺญาณํ, ภตฺตา ปญฺญาณมิตฺถิยา’’ติ. "ध्वजा रथ की पहचान है, धुआँ अग्नि की पहचान है; राजा राष्ट्र की पहचान है और पति स्त्री की पहचान है।" ๓. วิตฺตสุตฺตํ ३. वित्त सुत्त ๗๓. ७३. ‘‘กึสูธ วิตฺตํ ปุริสสฺส เสฏฺฐํ, กึสุ สุจิณฺโณ สุขมาวหติ; กึสุ หเว สาทุตรํ รสานํ, กถํชีวึ ชีวิตมาหุ เสฏฺฐ’’นฺติ. "इस संसार में मनुष्य का श्रेष्ठ धन क्या है? किस (धर्म) का अच्छी तरह आचरण करने पर सुख प्राप्त होता है? रसों में सबसे उत्तम रस कौन सा है? किस प्रकार का जीवन जीने वाले को श्रेष्ठ जीवन कहा जाता है?" ‘‘สทฺธีธ วิตฺตํ ปุริสสฺส เสฏฺฐํ, ธมฺโม สุจิณฺโณ สุขมาวหติ; สจฺจํ หเว สาทุตรํ รสานํ, ปญฺญาชีวึ ชีวิตมาหุ เสฏฺฐ’’นฺติ. "इस संसार में मनुष्य का श्रेष्ठ धन 'श्रद्धा' है। धर्म (दश कुशल कर्मपथ) का अच्छी तरह आचरण करने पर सुख प्राप्त होता है। रसों में सबसे उत्तम रस 'सत्य' है। प्रज्ञा (बुद्धि) से आजीविका चलाने वाले के जीवन को श्रेष्ठ जीवन कहा जाता है।" ๔. วุฏฺฐิสุตฺตํ ४. वृष्टि सुत्त ๗๔. ७४. ‘‘กึสุ อุปฺปตตํ เสฏฺฐํ, กึสุ นิปตตํ วรํ; กึสุ ปวชมานานํ, กึสุ ปวทตํ วร’’นฺติ. "उगने वाली वस्तुओं में श्रेष्ठ क्या है? गिरने वाली वस्तुओं में श्रेष्ठ क्या है? चलने वालों में श्रेष्ठ कौन है? बोलने वालों में श्रेष्ठ कौन है?" ‘‘พีชํ อุปฺปตตํ เสฏฺฐํ, วุฏฺฐิ นิปตตํ วรา; คาโว ปวชมานานํ, ปุตฺโต ปวทตํ วโรติ. "उगने वाली वस्तुओं में बीज श्रेष्ठ है। गिरने वाली वस्तुओं में वर्षा (की बूंदें) श्रेष्ठ है। चलने वालों में गौ (पशु) श्रेष्ठ हैं। बोलने वालों में पुत्र श्रेष्ठ है।" ‘‘วิชฺชา อุปฺปตตํ เสฏฺฐา, อวิชฺชา นิปตตํ วรา; สงฺโฆ ปวชมานานํ, พุทฺโธ ปวทตํ วโร’’ติ. "उगने वाली वस्तुओं में विद्या (प्रज्ञा) श्रेष्ठ है। गिरने वाली वस्तुओं में अविद्या (अज्ञान) सबसे प्रबल है। चलने वालों में संघ श्रेष्ठ है। बोलने वालों में बुद्ध श्रेष्ठ हैं।" ๕. ภีตาสุตฺตํ ५. भीता सुत्त ๗๕. ७५. ‘‘กึสูธ ภีตา ชนตา อเนกา,มคฺโค จเนกายตนปฺปวุตฺโต; ปุจฺฉามิ ตํ โคตม ภูริปญฺญ,กิสฺมึ ฐิโต ปรโลกํ น ภาเย’’ติ. "हे विशाल प्रज्ञा वाले गौतम! आपने अनेक प्रकार से (निर्वाण का) मार्ग बताया है, फिर भी यहाँ बहुत से लोग क्यों डरे हुए हैं? मैं आपसे पूछता हूँ कि किसमें स्थित होने पर मनुष्य परलोक से नहीं डरता?" ‘‘วาจํ [Pg.40] มนญฺจ ปณิธาย สมฺมา,กาเยน ปาปานิ อกุพฺพมาโน; พวฺหนฺนปานํ ฆรมาวสนฺโต,สทฺโธ มุทู สํวิภาคี วทญฺญู; เอเตสุ ธมฺเมสุ ฐิโต จตูสุ,ธมฺเม ฐิโต ปรโลกํ น ภาเย’’ติ. "वाणी और मन को सम्यक् रूप से संयमित कर, शरीर से पाप कर्म न करते हुए, प्रचुर अन्न-पान वाले घर में रहते हुए जो श्रद्धालु, मृदु, दानशील और प्रियवादी है—इन चार धर्मों में स्थित व्यक्ति परलोक से नहीं डरता।" ๖. นชีรติสุตฺตํ ६. न जीरति सुत्त ๗๖. ७६. ‘‘กึ ชีรติ กึ น ชีรติ, กึสุ อุปฺปโถติ วุจฺจติ; กึสุ ธมฺมานํ ปริปนฺโถ, กึสุ รตฺตินฺทิวกฺขโย; กึ มลํ พฺรหฺมจริยสฺส, กึ สินานมโนทกํ. "क्या क्षय होता है और क्या क्षय नहीं होता? किसे 'गलत मार्ग' कहा जाता है? धर्म (कुशल कर्मों) का शत्रु क्या है? दिन-रात किसका क्षय होता है? ब्रह्मचर्य का मल क्या है? बिना जल का स्नान क्या है?" ‘‘กติ โลกสฺมึ ฉิทฺทานิ, ยตฺถ วิตฺตํ น ติฏฺฐติ; ภควนฺตํ ปุฏฺฐุมาคมฺม, กถํ ชาเนมุ ตํ มย’’นฺติ. "लोक में कितने छिद्र हैं, जिनमें पुण्य-रूपी धन नहीं टिकता? हम भगवान से पूछने आए हैं, हम इसे कैसे जानें?" ‘‘รูปํ ชีรติ มจฺจานํ, นามโคตฺตํ น ชีรติ; ราโค อุปฺปโถติ วุจฺจติ. "मरणधर्मा प्राणियों का रूप (शरीर) क्षय होता है, किन्तु नाम और गोत्र का क्षय नहीं होता। राग (आसक्ति) को 'गलत मार्ग' कहा जाता है।" ‘‘โลโภ ธมฺมานํ ปริปนฺโถ, วโย รตฺตินฺทิวกฺขโย; อิตฺถี มลํ พฺรหฺมจริยสฺส, เอตฺถายํ สชฺชเต ปชา; ตโป จ พฺรหฺมจริยญฺจ, ตํ สินานมโนทกํ. "लोभ धर्म का शत्रु है। आयु दिन-रात क्षीण होती है। स्त्री ब्रह्मचर्य का मल है, जिसमें यह प्रजा (प्राणी) आसक्त रहती है। तप और ब्रह्मचर्य ही 'बिना जल का स्नान' (शुद्धि का साधन) हैं।" ‘‘ฉ โลกสฺมึ ฉิทฺทานิ, ยตฺถ วิตฺตํ น ติฏฺฐติ; อาลสฺยญฺจ ปมาโท จ, อนุฏฺฐานํ อสํยโม; นิทฺทา ตนฺที จ เต ฉิทฺเท, สพฺพโส ตํ วิวชฺชเย’’ติ. "लोक में छह छिद्र हैं, जिनमें पुण्य-रूपी धन नहीं टिकता: आलस्य, प्रमाद, पुरुषार्थ की कमी, असंयम, अत्यधिक निद्रा और तन्द्रा (सुस्ती)। इन छह छिद्रों का पूरी तरह त्याग कर देना चाहिए।" ๗. อิสฺสริยสุตฺตํ ७. इस्सरिय सुत्त ๗๗. ७७. ‘‘กึสุ อิสฺสริยํ โลเก, กึสุ ภณฺฑานมุตฺตมํ; กึสุ สตฺถมลํ โลเก, กึสุ โลกสฺมิมพฺพุทํ. "लोक में ऐश्वर्य (प्रभुत्व) क्या है? संपत्तियों में उत्तम संपत्ति क्या है? लोक में प्रज्ञा-रूपी शस्त्र का मल क्या है? लोक में उपद्रव (भय) क्या है?" ‘‘กึสุ หรนฺตํ วาเรนฺติ, หรนฺโต ปน โก ปิโย; กึสุ ปุนปฺปุนายนฺตํ, อภินนฺทนฺติ ปณฺฑิตา’’ติ. "किसे (धन) ले जाते हुए लोग रोकते हैं? ले जाने वाला कौन प्रिय होता है? बार-बार आने वाले किसका विद्वान लोग अभिनंदन करते हैं?" ‘‘วโส [Pg.41] อิสฺสริยํ โลเก, อิตฺถี ภณฺฑานมุตฺตมํ; โกโธ สตฺถมลํ โลเก, โจรา โลกสฺมิมพฺพุทา. "लोक में वश (अधिकार) ही ऐश्वर्य है। संपत्तियों में स्त्री उत्तम संपत्ति है। लोक में क्रोध प्रज्ञा-रूपी शस्त्र का मल है। लोक में चोर ही उपद्रव (भय) हैं।" ‘‘โจรํ หรนฺตํ วาเรนฺติ, หรนฺโต สมโณ ปิโย; สมณํ ปุนปฺปุนายนฺตํ, อภินนฺทนฺติ ปณฺฑิตา’’ติ. "(धन) ले जाते हुए चोर को लोग रोकते हैं, किन्तु (भिक्षा आदि) ले जाने वाला श्रमण प्रिय होता है। बार-बार आने वाले श्रमण का विद्वान लोग अभिनंदन करते हैं।" ๘. กามสุตฺตํ ८. काम सुत्त ๗๘. ७८. ‘‘กิมตฺถกาโม น ทเท, กึ มจฺโจ น ปริจฺจเช; กึสุ มุญฺเจยฺย กลฺยาณํ, ปาปิกํ น จ โมจเย’’ติ. "अपना कल्याण चाहने वाले को क्या नहीं देना चाहिए? मनुष्य को किसका परित्याग नहीं करना चाहिए? कैसी वाणी बोलनी चाहिए और कैसी वाणी नहीं बोलनी चाहिए?" ‘‘อตฺตานํ น ทเท โปโส, อตฺตานํ น ปริจฺจเช; วาจํ มุญฺเจยฺย กลฺยาณํ, ปาปิกญฺจ น โมจเย’’ติ. "मनुष्य को स्वयं को (दास के रूप में) नहीं देना चाहिए। उसे स्वयं का (हिंसक पशुओं आदि के लिए) परित्याग नहीं करना चाहिए। उसे कल्याणकारी वाणी बोलनी चाहिए और पापपूर्ण वाणी नहीं बोलनी चाहिए।" ๙. ปาเถยฺยสุตฺตํ ९. पाथेय सुत्त ๗๙. ७९. ‘‘กึสุ พนฺธติ ปาเถยฺยํ, กึสุ โภคานมาสโย; กึสุ นรํ ปริกสฺสติ, กึสุ โลกสฺมิ ทุชฺชหํ; กิสฺมึ พทฺธา ปุถู สตฺตา, ปาเสน สกุณี ยถา’’ติ. "पाथेय (जीवन-यात्रा का संबल/पुण्य) किससे संचित होता है? भोगों (संपत्तियों) का आधार क्या है? मनुष्य को कौन घसीटता है? लोक में किसे त्यागना कठिन है? जाल में फंसी पक्षी की तरह बहुत से प्राणी किसमें बंधे हुए हैं?" ‘‘สทฺธา พนฺธติ ปาเถยฺยํ, สิรี โภคานมาสโย; อิจฺฉา นรํ ปริกสฺสติ, อิจฺฉา โลกสฺมิ ทุชฺชหา; อิจฺฉาพทฺธา ปุถู สตฺตา, ปาเสน สกุณี ยถา’’ติ. "श्रद्धा से पाथेय (पुण्य) संचित होता है। श्री (ऐश्वर्य) भोगों का आधार है। इच्छा (तृष्णा) मनुष्य को घसीटती है। लोक में इच्छा को त्यागना कठिन है। जाल में फंसी पक्षी की तरह बहुत से प्राणी इच्छा में बंधे हुए हैं।" ๑๐. ปชฺโชตสุตฺตํ १०. पज्जोत सुत्त ๘๐. ८०. ‘‘กึสุ โลกสฺมิ ปชฺโชโต, กึสุ โลกสฺมิ ชาคโร; กึสุ กมฺเม สชีวานํ, กิมสฺส อิริยาปโถ. "लोक में प्रकाश क्या है? लोक में जागरण क्या है? आजीविका चलाने वालों के लिए कर्म में सहायक कौन है? प्राणियों की आजीविका का साधन क्या है?" ‘‘กึสุ อลสํ อนลสญฺจ, มาตา ปุตฺตํว โปสติ; กึ ภูตา อุปชีวนฺติ, เย ปาณา ปถวิสฺสิตา’’ติ. "आलसी और परिश्रमी दोनों का, माता की तरह पुत्र के समान, कौन पालन-पोषण करता है? पृथ्वी पर रहने वाले प्राणी किस पर आश्रित होकर जीवित रहते हैं?" ‘‘ปญฺญา โลกสฺมิ ปชฺโชโต, สติ โลกสฺมิ ชาคโร; คาโว กมฺเม สชีวานํ, สีตสฺส อิริยาปโถ. लोक में प्रज्ञा प्रकाश है, लोक में स्मृति जागरण है; जीवित रहने वालों के लिए कर्म में गौएँ (पशु) साथी हैं, और हल उनकी आजीविका का साधन है। ‘‘วุฏฺฐิ อลสํ อนลสญฺจ, มาตา ปุตฺตํว โปสติ; วุฏฺฐึ ภูตา อุปชีวนฺติ, เย ปาณา ปถวิสฺสิตา’’ติ. वर्षा आलसी और उद्यमी दोनों का उसी प्रकार पोषण करती है जैसे माता अपने पुत्र का; पृथ्वी पर आश्रित सभी प्राणी वर्षा के सहारे ही जीवित रहते हैं। ๑๑. อรณสุตฺตํ ११. ११. अरण सूत्र ๘๑. ८१. ‘‘เกสูธ [Pg.42] อรณา โลเก, เกสํ วุสิตํ น นสฺสติ; เกธ อิจฺฉํ ปริชานนฺติ, เกสํ โภชิสฺสิยํ สทา. इस लोक में कौन क्लेश-रहित हैं? किनका ब्रह्मचर्य-वास नष्ट नहीं होता? यहाँ कौन इच्छा (तृष्णा) को पूर्णतः जानते हैं? कौन सदा स्वतंत्र (तृष्णा के दास नहीं) रहते हैं? ‘‘กึสุ มาตา ปิตา ภาตา, วนฺทนฺติ นํ ปติฏฺฐิตํ; กึสุ อิธ ชาติหีนํ, อภิวาเทนฺติ ขตฺติยา’’ติ. शील में प्रतिष्ठित किस व्यक्ति को माता, पिता और भाई वंदना करते हैं? यहाँ नीच कुल में उत्पन्न होने पर भी किस व्यक्ति को क्षत्रिय अभिवादन करते हैं? ‘‘สมณีธ อรณา โลเก, สมณานํ วุสิตํ น นสฺสติ; สมณา อิจฺฉํ ปริชานนฺติ, สมณานํ โภชิสฺสิยํ สทา. इस लोक में श्रमण ही क्लेश-रहित हैं, श्रमणों का ही ब्रह्मचर्य-वास नष्ट नहीं होता; श्रमण ही इच्छा को पूर्णतः जानते हैं और श्रमण ही सदा स्वतंत्र रहते हैं। ‘‘สมณํ มาตา ปิตา ภาตา, วนฺทนฺติ นํ ปติฏฺฐิตํ; สมณีธ ชาติหีนํ, อภิวาเทนฺติ ขตฺติยา’’ติ. शील में प्रतिष्ठित श्रमण को माता, पिता और भाई वंदना करते हैं; यहाँ नीच कुल में उत्पन्न होने पर भी श्रमण को ही क्षत्रिय अभिवादन करते हैं। เฉตฺวาวคฺโค อฏฺฐโม. आठवाँ छेत्वा वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान) इस प्रकार है— เฉตฺวา รถญฺจ จิตฺตญฺจ, วุฏฺฐิ ภีตา นชีรติ; อิสฺสรํ กามํ ปาเถยฺยํ, ปชฺโชโต อรเณน จาติ. छेत्वा, रथ, चित्त, वुिट्ठि, भीता, न जीरति, इस्सर, काम, पाथेय्य, पज्जोत और अरण सूत्र। เทวตาสํยุตฺตํ สมตฺตํ. देवता संयुत्त समाप्त। ๒. เทวปุตฺตสํยุตฺตํ २. २. देवपुत्त संयुत्त ๑. ปฐมวคฺโค १. १. प्रथम वर्ग ๑. ปฐมกสฺสปสุตฺตํ १. १. प्रथम कस्सप सूत्र ๘๒. เอวํ [Pg.43] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. อถ โข กสฺสโป เทวปุตฺโต อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺโณ เกวลกปฺปํ เชตวนํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข กสฺสโป เทวปุตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ภิกฺขุํ ภควา ปกาเสสิ, โน จ ภิกฺขุโน อนุสาส’’นฺติ. ‘‘เตน หิ กสฺสป, ตญฺเญเวตฺถ ปฏิภาตู’’ติ. ८२. ऐसा मैंने सुना है—एक समय भगवान सावत्थी के अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे। तब कस्सप नामक देवपुत्र, रात बीतने पर (मध्यरात्रि में), अत्यंत सुंदर आभा के साथ संपूर्ण जेतवन को आलोकित करते हुए भगवान के पास आया; पास आकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़ा हो गया। एक ओर खड़े होकर कस्सप देवपुत्र ने भगवान से यह कहा— "भगवान ने भिक्षु के स्वरूप को तो प्रकाशित किया है, किंतु भिक्षु के लिए अनुशासन (उपदेश) को नहीं।" (भगवान ने कहा—) "तो कस्सप, यदि ऐसा है तो तुम ही यहाँ उस अनुशासन को स्पष्ट करो।" ‘‘สุภาสิตสฺส สิกฺเขถ, สมณูปาสนสฺส จ; เอกาสนสฺส จ รโห, จิตฺตวูปสมสฺส จา’’ติ. सुभाषित (वचनों) की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए, श्रमणों की सेवा (या कर्मस्थान) का अभ्यास करना चाहिए, एकांत में अकेले बैठने का और चित्त की शांति का अभ्यास करना चाहिए। อิทมโวจ กสฺสโป เทวปุตฺโต; สมนุญฺโญ สตฺถา อโหสิ. อถ โข กสฺสโป เทวปุตฺโต ‘‘สมนุญฺโญ เม สตฺถา’’ติ ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายีติ. कस्सप देवपुत्र ने यह कहा; शास्ता (बुद्ध) ने इसका अनुमोदन किया। तब कस्सप देवपुत्र ने यह सोचकर कि "शास्ता ने मेरी बात का अनुमोदन किया है", भगवान को अभिवादन और प्रदक्षिणा कर वहीं अंतर्ध्यान हो गया। ๒. ทุติยกสฺสปสุตฺตํ २. २. द्वितीय कस्सप सूत्र ๘๓. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข กสฺสโป เทวปุตฺโต ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – ८३. सावत्थी निदान। एक ओर खड़े होकर कस्सप देवपुत्र ने भगवान के समीप यह गाथा कही— ‘‘ภิกฺขุ สิยา ฌายี วิมุตฺตจิตฺโต,อากงฺเข เจ หทยสฺสานุปตฺตึ; โลกสฺส ญตฺวา อุทยพฺพยญฺจ,สุเจตโส อนิสฺสิโต ตทานิสํโส’’ติ. यदि भिक्षु हृदय की प्राप्ति (अर्हत्व) की आकांक्षा करता है, तो उसे ध्यानी और विमुक्त चित्त वाला होना चाहिए; लोक के उदय और व्यय को जानकर, सुचित्त और अनाश्रित (तृष्णा-रहित) होकर वह उस (अर्हत्व) लाभ को प्राप्त करने वाला हो। ๓. มาฆสุตฺตํ ३. ३. माघ सूत्र ๘๔. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข มาโฆ เทวปุตฺโต อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺโณ เกวลกปฺปํ เชตวนํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ[Pg.44]. เอกมนฺตํ ฐิโต โข มาโฆ เทวปุตฺโต ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – ८४. सावत्थी निदान। तब माघ देवपुत्र रात बीतने पर, अत्यंत सुंदर आभा के साथ संपूर्ण जेतवन को आलोकित करते हुए भगवान के पास आया; पास आकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़ा हो गया। एक ओर खड़े होकर माघ देवपुत्र ने भगवान से गाथा में कहा— ‘‘กึสุ เฉตฺวา สุขํ เสติ, กึสุ เฉตฺวา น โสจติ; กิสฺสสฺสุ เอกธมฺมสฺส, วธํ โรเจสิ โคตมา’’ติ. क्या काटकर मनुष्य सुख से सोता है? क्या काटकर वह शोक नहीं करता? हे गौतम! आप किस एक धर्म के विनाश (वध) का अनुमोदन करते हैं? ‘‘โกธํ เฉตฺวา สุขํ เสติ, โกธํ เฉตฺวา น โสจติ; โกธสฺส วิสมูลสฺส, มธุรคฺคสฺส วตฺรภู; วธํ อริยา ปสํสนฺติ, ตญฺหิ เฉตฺวา น โสจตี’’ติ. क्रोध को काटकर मनुष्य सुख से सोता है, क्रोध को काटकर वह शोक नहीं करता। हे वत्रभू (इंद्र)! विषैली जड़ वाले और मधुर अग्र भाग वाले क्रोध के वध की आर्य प्रशंसा करते हैं, क्योंकि उसे काटकर मनुष्य शोक नहीं करता। ๔. มาคธสุตฺตํ ४. ४. मागध सूत्र ๘๕. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข มาคโธ เทวปุตฺโต ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – ८५. सावत्थी निदान। एक ओर खड़े होकर मागध देवपुत्र ने भगवान से गाथा में कहा— ‘‘กติ โลกสฺมึ ปชฺโชตา, เยหิ โลโก ปกาสติ; ภวนฺตํ ปุฏฺฐุมาคมฺม, กถํ ชาเนมุ ตํ มย’’นฺติ. लोक में कितने प्रकाश हैं, जिनसे लोक प्रकाशित होता है? हम भगवान से पूछने आए हैं, हम इसे कैसे जानें? ‘‘จตฺตาโร โลเก ปชฺโชตา, ปญฺจเมตฺถ น วิชฺชติ; ทิวา ตปติ อาทิจฺโจ, รตฺติมาภาติ จนฺทิมา. लोक में चार प्रकाश हैं, पाँचवाँ यहाँ नहीं है। सूर्य दिन में तपता है, चंद्रमा रात में चमकता है। ‘‘อถ อคฺคิ ทิวารตฺตึ, ตตฺถ ตตฺถ ปกาสติ; สมฺพุทฺโธ ตปตํ เสฏฺโฐ, เอสา อาภา อนุตฺตรา’’ติ. और अग्नि दिन-रात जहाँ-तहाँ प्रकाशित होती है। तपने वालों में बुद्ध श्रेष्ठ हैं, यह आभा (प्रकाश) अनुपम है। ๕. ทามลิสุตฺตํ ५. ५. दामलि सूत्र ๘๖. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข ทามลิ เทวปุตฺโต อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺโณ เกวลกปฺปํ เชตวนํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข ทามลิ เทวปุตฺโต ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – ८६. श्रावस्ती। तब दामलि नामक देवपुत्र ने रात बीतने पर (मध्यरात्रि में), अत्यंत सुंदर आभा के साथ संपूर्ण जेतवन को आलोकित करते हुए भगवान के पास जाकर उन्हें अभिवादन किया और एक ओर खड़ा हो गया। एक ओर खड़े होकर दामलि देवपुत्र ने भगवान के समक्ष यह गाथा कही - ‘‘กรณียเมตํ พฺราหฺมเณน, ปธานํ อกิลาสุนา; กามานํ วิปฺปหาเนน, น เตนาสีสเต ภว’’นฺติ. "ब्राह्मण (अर्हत) को आलस्य रहित होकर यह पुरुषार्थ (प्रयत्न) करना चाहिए; काम-भोगों के त्याग से वह फिर अस्तित्व (भव) की आकांक्षा नहीं करता।" ‘‘นตฺถิ กิจฺจํ พฺราหฺมณสฺส (ทามลีติ ภควา),กตกิจฺโจ หิ พฺราหฺมโณ. (भगवान ने कहा-) "हे दामलि! ब्राह्मण (अर्हत) के लिए अब कोई कर्तव्य शेष नहीं है, क्योंकि ब्राह्मण अपना कार्य पूर्ण कर चुका है। ‘‘ยาว [Pg.45] น คาธํ ลภติ นทีสุ,อายูหติ สพฺพคตฺเตภิ ชนฺตุ; คาธญฺจ ลทฺธาน ถเล ฐิโต โย,นายูหตี ปารคโต หิ โสว. जब तक कोई प्राणी नदियों में थाह (आधार) नहीं पाता, तब तक वह अपने सभी अंगों से संघर्ष (तैरने का प्रयास) करता है; किंतु जब वह थाह पाकर स्थल पर खड़ा हो जाता है, तब वह संघर्ष नहीं करता, क्योंकि वह पार पहुँच चुका होता है। ‘‘เอสูปมา ทามลิ พฺราหฺมณสฺส,ขีณาสวสฺส นิปกสฺส ฌายิโน; ปปฺปุยฺย ชาติมรณสฺส อนฺตํ,นายูหตี ปารคโต หิ โส’’ติ. हे दामलि! यह उपमा उस ब्राह्मण (अर्हत) की है, जो क्षीणासव (आस्रवों से मुक्त), बुद्धिमान और ध्यानी है; जन्म और मृत्यु के अंत (निर्वाण) को प्राप्त कर वह अब संघर्ष नहीं करता, क्योंकि वह पार पहुँच चुका है।" ๖. กามทสุตฺตํ ६. कामद सुत्त ๘๗. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข กามโท เทวปุตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ทุกฺกรํ ภควา, สุทุกฺกรํ ภควา’’ติ. ८७. श्रावस्ती। एक ओर खड़े होकर कामद देवपुत्र ने भगवान से यह कहा - "हे भगवन! (श्रमण धर्म का पालन करना) दुष्कर है, हे भगवन! यह अत्यंत दुष्कर है।" ‘‘ทุกฺกรํ วาปิ กโรนฺติ (กามทาติ ภควา),เสขา สีลสมาหิตา; ฐิตตฺตา อนคาริยุเปตสฺส,ตุฏฺฐิ โหติ สุขาวหา’’ติ. (भगवान ने कहा-) "हे कामद! जो शैक्ष (साधना की उच्च अवस्था में स्थित साधक) शील में प्रतिष्ठित और समाहित हैं, वे इस दुष्कर कार्य को भी करते हैं; गृहत्यागी (संन्यासी) के लिए संतोष ही सुखदायक होता है।" ‘‘ทุลฺลภา ภควา ยทิทํ ตุฏฺฐี’’ติ. "हे भगवन! यह जो संतोष है, वह दुर्लभ है।" ‘‘ทุลฺลภํ วาปิ ลภนฺติ (กามทาติ ภควา),จิตฺตวูปสเม รตา; เยสํ ทิวา จ รตฺโต จ,ภาวนาย รโต มโน’’ติ. (भगवान ने कहा-) "हे कामद! जो चित्त की शांति में लीन हैं, वे उस दुर्लभ (संतोष) को भी प्राप्त कर लेते हैं; जिनका मन दिन-रात भावना (ध्यान) में लगा रहता है।" ‘‘ทุสฺสมาทหํ ภควา ยทิทํ จิตฺต’’นฺติ. "हे भगवन! यह जो चित्त है, इसे एकाग्र करना अत्यंत कठिन है।" ‘‘ทุสฺสมาทหํ วาปิ สมาทหนฺติ (กามทาติ ภควา),อินฺทฺริยูปสเม รตา; เต เฉตฺวา มจฺจุโน ชาลํ,อริยา คจฺฉนฺติ กามทา’’ติ. (भगवान ने कहा-) "हे कामद! जो इंद्रियों के दमन (शांति) में लीन हैं, वे उस एकाग्र करने में कठिन चित्त को भी समाहित कर लेते हैं; वे आर्य मृत्यु के जाल को काटकर (संसार से) पार हो जाते हैं।" ‘‘ทุคฺคโม [Pg.46] ภควา วิสโม มคฺโค’’ติ. "हे भगवन! यह मार्ग दुर्गम और विषम (कठिन) है।" ‘‘ทุคฺคเม วิสเม วาปิ, อริยา คจฺฉนฺติ กามท; อนริยา วิสเม มคฺเค, ปปตนฺติ อวํสิรา; อริยานํ สโม มคฺโค, อริยา หิ วิสเม สมา’’ติ. (भगवान ने कहा-) "हे कामद! आर्य उस दुर्गम और विषम मार्ग पर भी चलते हैं; जबकि अनार्य उस विषम मार्ग पर सिर के बल गिर जाते हैं। आर्यों का मार्ग सम (समतल) है, क्योंकि आर्य विषम (प्राणियों) के बीच भी सम रहते हैं।" ๗. ปญฺจาลจณฺฑสุตฺตํ ७. पञ्चालचण्ड सुत्त ๘๘. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข ปญฺจาลจณฺโฑ เทวปุตฺโต ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – ८८. श्रावस्ती। एक ओर खड़े होकर पञ्चालचण्ड देवपुत्र ने भगवान के समक्ष यह गाथा कही - ‘‘สมฺพาเธ วต โอกาสํ, อวินฺทิ ภูริเมธโส; โย ฌานมพุชฺฌิ พุทฺโธ, ปฏิลีนนิสโภ มุนี’’ติ. "निश्चित ही, इस संकीर्णता (नीवरणों की बाधाओं) के बीच उस विशाल प्रज्ञावान (बुद्ध) ने अवकाश (ध्यान का मार्ग) पा लिया है; वे बुद्ध जिन्होंने ध्यान को जान लिया है, वे मान का त्याग करने वाले मुनियों में श्रेष्ठ हैं।" ‘‘สมฺพาเธ วาปิ วินฺทนฺติ (ปญฺจาลจณฺฑาติ ภควา),ธมฺมํ นิพฺพานปตฺติยา; เย สตึ ปจฺจลตฺถํสุ,สมฺมา เต สุสมาหิตา’’ติ. (भगवान ने कहा-) "हे पञ्चालचण्ड! जो निर्वाण की प्राप्ति के लिए सति (स्मृति) रूपी धर्म को प्राप्त कर लेते हैं, वे उस संकीर्णता में भी (मार्ग) पा लेते हैं; वे सम्यक रूप से भली-भांति समाहित होते हैं।" ๘. ตายนสุตฺตํ ८. तायन सुत्त ๘๙. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข ตายโน เทวปุตฺโต ปุราณติตฺถกโร อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺโณ เกวลกปฺปํ เชตวนํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข ตายโน เทวปุตฺโต ภควโต สนฺติเก อิมา คาถาโย อภาสิ – ८९. श्रावस्ती। तब पूर्व में तीर्थंकर (मत-प्रवर्तक) रहे तायन नामक देवपुत्र ने रात बीतने पर, अत्यंत सुंदर आभा के साथ संपूर्ण जेतवन को आलोकित करते हुए भगवान के पास जाकर उन्हें अभिवादन किया और एक ओर खड़ा हो गया। एक ओर खड़े होकर तायन देवपुत्र ने भगवान के समक्ष ये गाथाएं कहीं - ‘‘ฉินฺท โสตํ ปรกฺกมฺม, กาเม ปนุท พฺราหฺมณ; นปฺปหาย มุนี กาเม, เนกตฺตมุปปชฺชติ. "हे ब्राह्मण! पराक्रम (पुरुषार्थ) करके तृष्णा की धारा को काट दो, काम-भोगों को दूर कर दो; काम-भोगों का त्याग किए बिना मुनि एकाग्रता (ध्यान) को प्राप्त नहीं कर सकता। ‘‘กยิรา เจ กยิราเถนํ, ทฬฺหเมนํ ปรกฺกเม; สิถิโล หิ ปริพฺพาโช, ภิยฺโย อากิรเต รชํ. यदि कुछ करना है, तो उसे दृढ़ता से करो; उसमें पूरी शक्ति से पराक्रम करो। क्योंकि शिथिल (ढीला-ढाला) संन्यास केवल क्लेशों की धूल को और अधिक उड़ाता है। ‘‘อกตํ ทุกฺกฏํ เสยฺโย, ปจฺฉา ตปติ ทุกฺกฏํ; กตญฺจ สุกตํ เสยฺโย, ยํ กตฺวา นานุตปฺปติ. कुकर्म का न करना ही श्रेयस्कर है, क्योंकि कुकर्म बाद में संताप (पछतावा) देता है; और सुकर्म का करना ही श्रेष्ठ है, जिसे करके मनुष्य पछताता नहीं है। ‘‘กุโส [Pg.47] ยถา ทุคฺคหิโต, หตฺถเมวานุกนฺตติ; สามญฺญํ ทุปฺปรามฏฺฐํ, นิรยายูปกฑฺฒติ. जैसे गलत तरीके से पकड़ी गई कुशा (घास) हाथ को ही काट देती है, वैसे ही गलत तरीके से पालन किया गया श्रमण-धर्म (संन्यास) नरक की ओर खींच ले जाता है। ‘‘ยํ กิญฺจิ สิถิลํ กมฺมํ, สํกิลิฏฺฐญฺจ ยํ วตํ; สงฺกสฺสรํ พฺรหฺมจริยํ, น ตํ โหติ มหปฺผล’’นฺติ. कोई भी शिथिलता से किया गया कार्य, संक्लिष्ट (अपवित्र) व्रत और संदेहास्पद ब्रह्मचर्य—ये महान फल देने वाले नहीं होते।" อิทมโวจ ตายโน เทวปุตฺโต; อิทํ วตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तायन देवपुत्र ने यह कहा; यह कहकर भगवान को अभिवादन और प्रदक्षिणा कर वह वहीं अंतर्ध्यान हो गया। อถ โข ภควา ตสฺสา รตฺติยา อจฺจเยน ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘อิมํ, ภิกฺขเว, รตฺตึ ตายโน นาม เทวปุตฺโต ปุราณติตฺถกโร อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺโณ เกวลกปฺปํ เชตวนํ โอภาเสตฺวา เยนาหํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข, ภิกฺขเว, ตายโน เทวปุตฺโต มม สนฺติเก อิมา คาถาโย อภาสิ – तब उस रात के बीतने पर भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— "भिक्षुओं! इस रात तायन नामक देवपुत्र, जो पूर्व में तीर्थंकर था, रात बीतने पर अत्यंत सुंदर आभा के साथ संपूर्ण जेतवन को आलोकित करते हुए मेरे पास आया; आकर मुझे अभिवादन कर एक ओर खड़ा हो गया। भिक्षुओं! एक ओर खड़े होकर तायन देवपुत्र ने मेरे समक्ष ये गाथाएं कहीं - ‘‘ฉินฺท โสตํ ปรกฺกมฺม, กาเม ปนุท พฺราหฺมณ; นปฺปหาย มุนี กาเม, เนกตฺตมุปปชฺชติ. "हे ब्राह्मण! पराक्रम करके तृष्णा की धारा को काट दो, काम-भोगों को दूर कर दो; काम-भोगों का त्याग किए बिना मुनि एकाग्रता (ध्यान) को प्राप्त नहीं कर सकता। ‘‘กยิรา เจ กยิราเถนํ, ทฬฺหเมนํ ปรกฺกเม; สิถิโล หิ ปริพฺพาโช, ภิยฺโย อากิรเต รชํ. यदि कुछ करना है, तो उसे दृढ़ता से करो; उसमें पूरी शक्ति से पराक्रम करो। क्योंकि शिथिल संन्यास केवल क्लेशों की धूल को और अधिक उड़ाता है। ‘‘อกตํ ทุกฺกฏํ เสยฺโย, ปจฺฉา ตปติ ทุกฺกฏํ; กตญฺจ สุกตํ เสยฺโย, ยํ กตฺวา นานุตปฺปติ. कुकर्म का न करना ही श्रेयस्कर है, क्योंकि कुकर्म बाद में संताप देता है; और सुकर्म का करना ही श्रेष्ठ है, जिसे करके मनुष्य पछताता नहीं है।" ‘‘กุโส ยถา ทุคฺคหิโต, หตฺถเมวานุกนฺตติ; สามญฺญํ ทุปฺปรามฏฺฐํ, นิรยายูปกฑฺฒติ. जैसे गलत तरीके से पकड़ी गई कुशा घास हाथ को ही काट देती है, वैसे ही गलत तरीके से पालन किया गया श्रमण-धर्म (संन्यास) नरक की ओर खींच ले जाता है। ‘‘ยํ กิญฺจิ สิถิลํ กมฺมํ, สํกิลิฏฺฐญฺจ ยํ วตํ; สงฺกสฺสรํ พฺรหฺมจริยํ, น ตํ โหติ มหปฺผล’’นฺติ. जो भी कर्म शिथिलता से किया गया हो, जो व्रत मलिन हो, और जो ब्रह्मचर्य संदेहास्पद हो, वह महान फल देने वाला नहीं होता। ‘‘อิทมโวจ, ภิกฺขเว, ตายโน เทวปุตฺโต, อิทํ วตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายิ. อุคฺคณฺหาถ, ภิกฺขเว, ตายนคาถา; ปริยาปุณาถ, ภิกฺขเว, ตายนคาถา; ธาเรถ, ภิกฺขเว, ตายนคาถา. อตฺถสํหิตา, ภิกฺขเว, ตายนคาถา อาทิพฺรหฺมจริยิกา’’ติ. भिक्षुओं! तायन देवपुत्र ने यह कहा। यह कहकर, मुझे प्रणाम कर और प्रदक्षिणा कर वह वहीं अंतर्धान हो गया। भिक्षुओं! तायन की गाथाओं को सीखो; भिक्षुओं! तायन की गाथाओं का अध्ययन करो; भिक्षुओं! तायन की गाथाओं को धारण करो। भिक्षुओं! तायन की गाथाएँ हितकारी हैं और ब्रह्मचर्य के आधार स्वरूप हैं। ๙. จนฺทิมสุตฺตํ ९. चन्दिम सुत्त ๙๐. สาวตฺถินิทานํ[Pg.48]. เตน โข ปน สมเยน จนฺทิมา เทวปุตฺโต ราหุนา อสุรินฺเทน คหิโต โหติ. อถ โข จนฺทิมา เทวปุตฺโต ภควนฺตํ อนุสฺสรมาโน ตายํ เวลายํ อิมํ คาถํ อภาสิ – ९०. श्रावस्ती निदान। उस समय चन्दिम देवपुत्र को असुरेंद्र राहु ने पकड़ लिया था। तब चन्दिम देवपुत्र ने भगवान का स्मरण करते हुए उस समय यह गाथा कही— ‘‘นโม เต พุทฺธ วีรตฺถุ, วิปฺปมุตฺโตสิ สพฺพธิ; สมฺพาธปฏิปนฺโนสฺมิ, ตสฺส เม สรณํ ภวา’’ติ. हे वीर बुद्ध! आपको नमस्कार हो, आप सब प्रकार से विमुक्त हैं। मैं संकट में फँस गया हूँ, आप मेरे शरण बनें। อถ โข ภควา จนฺทิมํ เทวปุตฺตํ อารพฺภ ราหุํ อสุรินฺทํ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब भगवान ने चन्दिम देवपुत्र के निमित्त असुरेंद्र राहु से गाथा में कहा— ‘‘ตถาคตํ อรหนฺตํ, จนฺทิมา สรณํ คโต; ราหุ จนฺทํ ปมุญฺจสฺสุ, พุทฺธา โลกานุกมฺปกา’’ติ. चन्दिम अर्हत् तथागत की शरण में गया है। राहु! चंद्रमा को छोड़ दो; बुद्ध लोक पर अनुकम्पा करने वाले होते हैं। อถ โข ราหุ อสุรินฺโท จนฺทิมํ เทวปุตฺตํ มุญฺจิตฺวา ตรมานรูโป เยน เวปจิตฺติ อสุรินฺโท เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา สํวิคฺโค โลมหฏฺฐชาโต เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตํ โข ราหุํ อสุรินฺทํ เวปจิตฺติ อสุรินฺโท คาถาย อชฺฌภาสิ – तब असुरेंद्र राहु चन्दिम देवपुत्र को छोड़कर उद्विग्न होकर जहाँ असुरेंद्र वेपचित्ति था, वहाँ गया; पास जाकर भयभीत और रोमांचित होकर एक ओर खड़ा हो गया। एक ओर खड़े हुए असुरेंद्र राहु से असुरेंद्र वेपचित्ति ने गाथा में कहा— ‘‘กึ นุ สนฺตรมาโนว, ราหุ จนฺทํ ปมุญฺจสิ; สํวิคฺครูโป อาคมฺม, กึ นุ ภีโตว ติฏฺฐสี’’ติ. राहु! तुम इतनी हड़बड़ी में चंद्रमा को क्यों छोड़ रहे हो? भयभीत होकर यहाँ आकर तुम डरे हुए से क्यों खड़े हो? ‘‘สตฺตธา เม ผเล มุทฺธา, ชีวนฺโต น สุขํ ลเภ; พุทฺธคาถาภิคีโตมฺหิ, โน เจ มุญฺเจยฺย จนฺทิม’’นฺติ. यदि मैं चन्दिम को न छोड़ता, तो मेरा सिर सात टुकड़ों में फट जाता; जीवित रहते हुए भी मुझे सुख न मिलता। मैं बुद्ध की गाथा द्वारा प्रभावित हूँ। ๑๐. สูริยสุตฺตํ १०. सूरिय सुत्त ๙๑. สาวตฺถินิทานํ. เตน โข ปน สมเยน สูริโย เทวปุตฺโต ราหุนา อสุรินฺเทน คหิโต โหติ. อถ โข สูริโย เทวปุตฺโต ภควนฺตํ อนุสฺสรมาโน ตายํ เวลายํ อิมํ คาถํ อภาสิ – ९१. श्रावस्ती निदान। उस समय सूरिय देवपुत्र को असुरेंद्र राहु ने पकड़ लिया था। तब सूरिय देवपुत्र ने भगवान का स्मरण करते हुए उस समय यह गाथा कही— ‘‘นโม เต พุทฺธ วีรตฺถุ, วิปฺปมุตฺโตสิ สพฺพธิ; สมฺพาธปฏิปนฺโนสฺมิ, ตสฺส เม สรณํ ภวา’’ติ. हे वीर बुद्ध! आपको नमस्कार हो, आप सब प्रकार से विमुक्त हैं। मैं संकट में फँस गया हूँ, आप मेरे शरण बनें। อถ โข ภควา สูริยํ เทวปุตฺตํ อารพฺภ ราหุํ อสุรินฺทํ คาถาหิ อชฺฌภาสิ – तब भगवान ने सूरिय देवपुत्र के निमित्त असुरेंद्र राहु से गाथाओं में कहा— ‘‘ตถาคตํ [Pg.49] อรหนฺตํ, สูริโย สรณํ คโต; ราหุ สูริยํ ปมุญฺจสฺสุ, พุทฺธา โลกานุกมฺปกา. सूरिय अर्हत् तथागत की शरण में गया है। राहु! सूर्य को छोड़ दो; बुद्ध लोक पर अनुकम्पा करने वाले होते हैं। ‘‘โย อนฺธกาเร ตมสิ ปภงฺกโร,เวโรจโน มณฺฑลี อุคฺคเตโช; มา ราหุ คิลี จรมนฺตลิกฺเข,ปชํ มมํ ราหุ ปมุญฺจ สูริย’’นฺติ. जो अंधकारमय तम में प्रकाश करने वाला है, वह देदीप्यमान, मंडलकार और प्रखर तेज वाला है। राहु! आकाश में चलते हुए उस सूर्य को मत निगलो। राहु! मेरी संतान सूर्य को छोड़ दो। อถ โข ราหุ อสุรินฺโท สูริยํ เทวปุตฺตํ มุญฺจิตฺวา ตรมานรูโป เยน เวปจิตฺติ อสุรินฺโท เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา สํวิคฺโค โลมหฏฺฐชาโต เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตํ โข ราหุํ อสุรินฺทํ เวปจิตฺติ อสุรินฺโท คาถาย อชฺฌภาสิ – तब असुरेंद्र राहु सूरिय देवपुत्र को छोड़कर उद्विग्न होकर जहाँ असुरेंद्र वेपचित्ति था, वहाँ गया; पास जाकर भयभीत और रोमांचित होकर एक ओर खड़ा हो गया। एक ओर खड़े हुए असुरेंद्र राहु से असुरेंद्र वेपचित्ति ने गाथा में कहा— ‘‘กึ นุ สนฺตรมาโนว, ราหุ สูริยํ ปมุญฺจสิ; สํวิคฺครูโป อาคมฺม, กึ นุ ภีโตว ติฏฺฐสี’’ติ. राहु! तुम इतनी हड़बड़ी में सूर्य को क्यों छोड़ रहे हो? भयभीत होकर यहाँ आकर तुम डरे हुए से क्यों खड़े हो? ‘‘สตฺตธา เม ผเล มุทฺธา, ชีวนฺโต น สุขํ ลเภ; พุทฺธคาถาภิคีโตมฺหิ, โน เจ มุญฺเจยฺย สูริย’’นฺติ. यदि मैं सूरिय को न छोड़ता, तो मेरा सिर सात टुकड़ों में फट जाता; जीवित रहते हुए भी मुझे सुख न मिलता। मैं बुद्ध की गाथा द्वारा प्रभावित हूँ। ปฐโม วคฺโค. प्रथम वर्ग। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश— ทฺเว กสฺสปา จ มาโฆ จ, มาคโธ ทามลิ กามโท; ปญฺจาลจณฺโฑ ตายโน, จนฺทิมสูริเยน เต ทสาติ. दो कस्सप, माघ, मागध, दामलि, कामद, पञ्चालचण्ड, तायन, और चन्दिम तथा सूरिय—ये दस सुत्त हैं। ๒. อนาถปิณฺฑิกวคฺโค २. अनाथपिण्डिक वर्ग ๑. จนฺทิมสสุตฺตํ १. चन्दिमस सुत्त ๙๒. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข จนฺทิมโส เทวปุตฺโต อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺโณ เกวลกปฺปํ เชตวนํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ[Pg.50]. เอกมนฺตํ ฐิโต โข จนฺทิมโส เทวปุตฺโต ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – ९२. श्रावस्ती निदान। तब चन्दिमस देवपुत्र ने रात बीतने पर, अत्यंत सुंदर आभा के साथ संपूर्ण जेतवन को आलोकित करते हुए, जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान को प्रणाम कर एक ओर खड़ा हो गया। एक ओर खड़े हुए चन्दिमस देवपुत्र ने भगवान के सम्मुख यह गाथा कही— ‘‘เต หิ โสตฺถึ คมิสฺสนฺติ, กจฺเฉ วามกเส มคา; ฌานานิ อุปสมฺปชฺช, เอโกทิ นิปกา สตา’’ติ. वे ही कल्याण को प्राप्त करेंगे, जैसे मच्छरों से रहित पर्वत की कंदराओं में मृग; जो ध्यानों को प्राप्त कर, एकाग्रचित्त, प्रज्ञावान और स्मृतिमान होकर विहार करते हैं। ‘‘เต หิ ปารํ คมิสฺสนฺติ, เฉตฺวา ชาลํว อมฺพุโช; ฌานานิ อุปสมฺปชฺช, อปฺปมตฺตา รณญฺชหา’’ติ. वे ही पार जाएँगे, जैसे जाल को काटकर मछली; जो ध्यानों को प्राप्त कर, अप्रमादी होकर क्लेशों का त्याग करते हैं। ๒. เวณฺฑุสุตฺตํ २. वेण्डु सुत्त ๙๓. เอกมนฺตํ ฐิโต โข เวณฺฑุ เทวปุตฺโต ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – ९३. एक ओर खड़े हुए वेण्डु देवपुत्र ने भगवान के सम्मुख यह गाथा कही— ‘‘สุขิตาว เต มนุชา, สุคตํ ปยิรุปาสิย; ยุญฺชํ โคตมสาสเน, อปฺปมตฺตา นุ สิกฺขเร’’ติ. "वे मनुष्य सुखी ही होते हैं, जो सुगत (बुद्ध) की सेवा-उपासना करते हैं; जो गौतम बुद्ध के शासन में उद्योग करते हुए, प्रमाद-रहित होकर शिक्षा ग्रहण करते हैं।" ‘‘เย เม ปวุตฺเต สิฏฺฐิปเท (เวณฺฑูติ ภควา),อนุสิกฺขนฺติ ฌายิโน; กาเล เต อปฺปมชฺชนฺตา,น มจฺจุวสคา สิยุ’’นฺติ. "वेणु! जो ध्यानी मेरे द्वारा उपदिष्ट शिक्षा-पदों का अनुशीलन करते हैं; वे समय पर अप्रमादी होकर मृत्यु के वश में नहीं होते—ऐसा भगवान ने कहा।" ๓. ทีฆลฏฺฐิสุตฺตํ ३. ३. दीघलट्ठि सुत्त ๙๔. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. อถ โข ทีฆลฏฺฐิ เทวปุตฺโต อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺโณ เกวลกปฺปํ เวฬุวนํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข ทีฆลฏฺฐิ เทวปุตฺโต ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – ९४. ऐसा मैंने सुना है—एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दक-निवाप में विहार कर रहे थे। तब दीघलट्ठि नामक देवपुत्र, रात बीतने पर (मध्यरात्रि में), अपनी आभा से सम्पूर्ण वेणुवन को आलोकित कर जहाँ भगवान थे, वहाँ आया; आकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़ा हो गया। एक ओर खड़े होकर दीघलट्ठि देवपुत्र ने भगवान के समीप यह गाथा कही— ‘‘ภิกฺขุ สิยา ฌายี วิมุตฺตจิตฺโต,อากงฺเข เจ หทยสฺสานุปตฺตึ; โลกสฺส ญตฺวา อุทยพฺพยญฺจ,สุเจตโส อนิสฺสิโต ตทานิสํโส’’ติ. "यदि भिक्षु हृदय की प्राप्ति (अर्हत्व) की आकांक्षा करता है, तो उसे ध्यानी और विमुक्त चित्त वाला होना चाहिए; लोक के उदय और व्यय (उत्पत्ति और विनाश) को जानकर, शुद्ध चित्त वाला, अनाश्रित (तृष्णा-दृष्टि रहित) होकर वह उस (अर्हत्व) के लाभ वाला होता है।" ๔. นนฺทนสุตฺตํ ४. ४. नन्दन सुत्त ๙๕. เอกมนฺตํ [Pg.51] ฐิโต โข นนฺทโน เทวปุตฺโต ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – ९५. एक ओर खड़े होकर नन्दन देवपुत्र ने भगवान से गाथा में यह कहा— ‘‘ปุจฺฉามิ ตํ โคตม ภูริปญฺญ,อนาวฏํ ภควโต ญาณทสฺสนํ; กถํวิธํ สีลวนฺตํ วทนฺติ,กถํวิธํ ปญฺญวนฺตํ วทนฺติ; กถํวิโธ ทุกฺขมติจฺจ อิริยติ,กถํวิธํ เทวตา ปูชยนฺตี’’ติ. "हे विशाल प्रज्ञा वाले गौतम! मैं आपसे पूछता हूँ, भगवान का ज्ञान-दर्शन अनावरण (बाधा-रहित) है; किस प्रकार के व्यक्ति को 'शीलवान' कहते हैं? किस प्रकार के व्यक्ति को 'प्रज्ञावान' कहते हैं? किस प्रकार का व्यक्ति दुःख को पार कर जीवन व्यतीत करता है? और किस प्रकार के व्यक्ति की देवता पूजा करते हैं?" ‘‘โย สีลวา ปญฺญวา ภาวิตตฺโต,สมาหิโต ฌานรโต สตีมา; สพฺพสฺส โสกา วิคตา ปหีนา,ขีณาสโว อนฺติมเทหธารี. "जो शीलवान है, प्रज्ञावान है, जिसका चित्त भावित (विकसित) है, जो समाहित है, ध्यान में लीन है और स्मृतिमान है; जिसके सभी शोक दूर हो गए हैं, जिसके क्लेश क्षीण हो गए हैं, जो आस्रव-रहित है और जिसने अपना अंतिम शरीर धारण किया है।" ‘‘ตถาวิธํ สีลวนฺตํ วทนฺติ,ตถาวิธํ ปญฺญวนฺตํ วทนฺติ; ตถาวิโธ ทุกฺขมติจฺจ อิริยติ,ตถาวิธํ เทวตา ปูชยนฺตี’’ติ. "वैसे ही व्यक्ति को 'शीलवान' कहते हैं, वैसे ही व्यक्ति को 'प्रज्ञावान' कहते हैं; वैसा ही व्यक्ति दुःख को पार कर जीवन व्यतीत करता है और वैसे ही व्यक्ति की देवता पूजा करते हैं—ऐसा भगवान ने कहा।" ๕. จนฺทนสุตฺตํ ५. ५. चन्दन सुत्त ๙๖. เอกมนฺตํ ฐิโต โข จนฺทโน เทวปุตฺโต ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – ९६. एक ओर खड़े होकर चन्दन देवपुत्र ने भगवान से गाथा में यह कहा— ‘‘กถํสุ ตรติ โอฆํ, รตฺตินฺทิวมตนฺทิโต; อปฺปติฏฺเฐ อนาลมฺเพ, โก คมฺภีเร น สีทตี’’ติ. "रात-दिन आलस्य-रहित होकर बाढ़ (संसार-सागर) को कैसे पार किया जाता है? बिना किसी आधार और बिना किसी सहारे वाले इस गहरे (संसार-सागर) में कौन नहीं डूबता?" ‘‘สพฺพทา สีลสมฺปนฺโน, ปญฺญวา สุสมาหิโต; อารทฺธวีริโย ปหิตตฺโต, โอฆํ ตรติ ทุตฺตรํ. "जो सदा शील-सम्पन्न है, प्रज्ञावान है, भली-भाँति समाहित है, जिसने वीर्य (पुरुषार्थ) आरम्भ किया है और जिसका चित्त (निर्वाण में) समर्पित है, वह इस दुस्तर बाढ़ को पार कर लेता है।" ‘‘วิรโต กามสญฺญาย, รูปสํโยชนาติโค; นนฺทีราคปริกฺขีโณ, โส คมฺภีเร น สีทตี’’ติ. "जो काम-संज्ञा से विरत है, जो रूप-संयोजनों को पार कर गया है, जिसकी नन्दि-राग (आसक्ति) क्षीण हो गई है, वह इस गहरे (संसार-सागर) में नहीं डूबता—ऐसा भगवान ने कहा।" ๖. วาสุทตฺตสุตฺตํ ६. ६. वासुदत्त सुत्त ๙๗. เอกมนฺตํ [Pg.52] ฐิโต โข วาสุทตฺโต เทวปุตฺโต ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – ९७. एक ओर खड़े होकर वासुदत्त देवपुत्र ने भगवान के समीप यह गाथा कही— ‘‘สตฺติยา วิย โอมฏฺโฐ, ฑยฺหมาโนว มตฺถเก; กามราคปฺปหานาย, สโต ภิกฺขุ ปริพฺพเช’’ติ. "जैसे कोई तलवार से बिंधा हो या जिसके सिर में आग लगी हो, वैसे ही भिक्षु को काम-राग के प्रहाण (त्याग) के लिए स्मृतिमान होकर विचरण करना चाहिए।" ‘‘สตฺติยา วิย โอมฏฺโฐ, ฑยฺหมาโนว มตฺถเก; สกฺกายทิฏฺฐิปฺปหานาย, สโต ภิกฺขุ ปริพฺพเช’’ติ. "जैसे कोई तलवार से बिंधा हो या जिसके सिर में आग लगी हो, वैसे ही भिक्षु को सत्काय-दृष्टि (अहंकार) के प्रहाण के लिए स्मृतिमान होकर विचरण करना चाहिए—ऐसा भगवान ने कहा।" ๗. สุพฺรหฺมสุตฺตํ ७. ७. सुब्रह्म सुत्त ๙๘. เอกมนฺตํ ฐิโต โข สุพฺรหฺมา เทวปุตฺโต ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – ९८. एक ओर खड़े होकर सुब्रह्म देवपुत्र ने भगवान से गाथा में यह कहा— ‘‘นิจฺจํ อุตฺรสฺตมิทํ จิตฺตํ, นิจฺจํ อุพฺพิคฺคมิทํ มโน; อนุปฺปนฺเนสุ กิจฺเฉสุ, อโถ อุปฺปติเตสุ จ; สเจ อตฺถิ อนุตฺรสฺตํ, ตํ เม อกฺขาหิ ปุจฺฉิโต’’ติ. "यह चित्त सदा डरा हुआ रहता है, यह मन सदा उद्विग्न रहता है; उन कार्यों (दुखों) के प्रति जो अभी उत्पन्न नहीं हुए हैं और जो उत्पन्न हो चुके हैं। यदि कोई निर्भयता का मार्ग है, तो मेरे पूछने पर मुझे बताएँ।" ‘‘นาญฺญตฺร โพชฺฌา ตปสา, นาญฺญตฺรินฺทฺริยสํวรา; นาญฺญตฺร สพฺพนิสฺสคฺคา, โสตฺถึ ปสฺสามิ ปาณิน’’นฺติ. "बोध्यंगों की भावना और तप के बिना, इंद्रिय-संयम के बिना, और सर्व-त्याग (निर्वाण) के बिना, मैं प्राणियों के लिए कोई कल्याण नहीं देखता हूँ—ऐसा भगवान ने कहा।" ‘‘อิทมโวจ…เป… ตตฺเถวนฺตรธายี’’ติ. भगवान ने यह कहा... (संक्षेप)... वह देवपुत्र वहीं अंतर्धान हो गया। ๘. กกุธสุตฺตํ ८. ८. ककुध सुत्त ๙๙. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สาเกเต วิหรติ อญฺชนวเน มิคทาเย. อถ โข กกุโธ เทวปุตฺโต อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺโณ เกวลกปฺปํ อญฺชนวนํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข กกุโธ เทวปุตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘นนฺทสิ, สมณา’’ติ? ‘‘กึ ลทฺธา, อาวุโส’’ติ? ‘‘เตน หิ, สมณ, โสจสี’’ติ? ‘‘กึ ชียิตฺถ, อาวุโส’’ติ? ‘‘เตน หิ, สมณ, เนว นนฺทสิ น จ โสจสี’’ติ? ‘‘เอวมาวุโส’’ติ. ९९. ऐसा मैंने सुना है—एक समय भगवान साकेत के अंजनवन मृगदाव में विहार कर रहे थे। तब ककुध नामक देवपुत्र, रात बीतने पर, अपनी आभा से सम्पूर्ण अंजनवन को आलोकित कर जहाँ भगवान थे, वहाँ आया; आकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़ा हो गया। एक ओर खड़े होकर ककुध देवपुत्र ने भगवान से यह कहा— 'हे श्रमण! क्या आप प्रसन्न हैं?' 'हे मित्र! क्या पाकर मैं प्रसन्न होऊँ?' 'तो श्रमण! क्या आप शोक करते हैं?' 'हे मित्र! क्या नष्ट हुआ है जिसके लिए मैं शोक करूँ?' 'तो श्रमण! क्या आप न प्रसन्न होते हैं और न शोक करते हैं?' 'हाँ मित्र! ऐसा ही है।' ‘‘กจฺจิ [Pg.53] ตฺวํ อนโฆ ภิกฺขุ, กจฺจิ นนฺที น วิชฺชติ; กจฺจิ ตํ เอกมาสีนํ, อรตี นาภิกีรตี’’ติ. "भिक्षु! क्या आप निष्पाप (दुःख-रहित) हैं? क्या (आपके भीतर) नन्दि (आसक्ति-युक्त प्रसन्नता) नहीं है? क्या अकेले बैठे हुए आपको अरति (ऊब या अरुचि) नहीं सताती?" ‘‘อนโฆ เว อหํ ยกฺข, อโถ นนฺที น วิชฺชติ; อโถ มํ เอกมาสีนํ, อรตี นาภิกีรตี’’ติ. "यक्ष! मैं निश्चय ही निष्पाप हूँ, और नन्दि भी नहीं है। साथ ही, अकेले बैठे हुए मुझे अरति भी नहीं सताती—ऐसा भगवान ने कहा।" ‘‘กถํ ตฺวํ อนโฆ ภิกฺขุ, กถํ นนฺที น วิชฺชติ; กถํ ตํ เอกมาสีนํ, อรตี นาภิกีรตี’’ติ. "भिक्षु! आप कैसे निष्पाप हैं? नन्दि कैसे नहीं है? और अकेले बैठे हुए आपको अरति क्यों नहीं सताती?" ‘‘อฆชาตสฺส เว นนฺที, นนฺทีชาตสฺส เว อฆํ; อนนฺที อนโฆ ภิกฺขุ, เอวํ ชานาหิ อาวุโส’’ติ. "मित्र! जिसे दुःख होता है, उसे ही (सांसारिक) सुख की चाह होती है; और जिसे सुख की चाह होती है, उसे ही दुःख होता है। भिक्षु नन्दि-रहित और दुःख-रहित होता है; हे मित्र! ऐसा जानो—ऐसा भगवान ने कहा।" ‘‘จิรสฺสํ วต ปสฺสามิ, พฺราหฺมณํ ปรินิพฺพุตํ; อนนฺทึ อนฆํ ภิกฺขุํ, ติณฺณํ โลเก วิสตฺติก’’นฺติ. “बहुत समय बाद मैं एक ऐसे ब्राह्मण (पाप-रहित) को देख रहा हूँ, जो पूर्णतः शांत (परिनिर्वृत) है, जो तृष्णा से रहित है, जो दुःख-रहित भिक्षु है और जिसने इस लोक में तृष्णा के जाल को पार कर लिया है।” ๙. อุตฺตรสุตฺตํ ९. ९. उत्तर सुत्त ๑๐๐. ราชคหนิทานํ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข อุตฺตโร เทวปุตฺโต ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – १००. राजगृह का निदान। एक ओर खड़े हुए उत्तर नामक देवपुत्र ने भगवान के समीप यह गाथा कही — ‘‘อุปนียติ ชีวิตมปฺปมายุ,ชรูปนีตสฺส น สนฺติ ตาณา; เอตํ ภยํ มรเณ เปกฺขมาโน,ปุญฺญานิ กยิราถ สุขาวหานี’’ติ. “जीवन (मृत्यु के समीप) ले जाया जा रहा है, आयु अल्प है। बुढ़ापे द्वारा (मृत्यु के) निकट ले जाए गए व्यक्ति के लिए कोई शरण नहीं है। मृत्यु के इस भय को देखते हुए, सुख प्रदान करने वाले पुण्यों को करना चाहिए।” ‘‘อุปนียติ ชีวิตมปฺปมายุ,ชรูปนีตสฺส น สนฺติ ตาณา; เอตํ ภยํ มรเณ เปกฺขมาโน,โลกามิสํ ปชเห สนฺติเปกฺโข’’ติ. “जीवन (मृत्यु के समीप) ले जाया जा रहा है, आयु अल्प है। बुढ़ापे द्वारा (मृत्यु के) निकट ले जाए गए व्यक्ति के लिए कोई शरण नहीं है। मृत्यु के इस भय को देखते हुए, शांति (निर्वाण) की इच्छा रखने वाले को लोक के आमिष (सांसारिक सुखों) का त्याग कर देना चाहिए।” ๑๐. อนาถปิณฺฑิกสุตฺตํ १०. १०. अनाथपिण्डिक सुत्त ๑๐๑. เอกมนฺตํ ฐิโต โข อนาถปิณฺฑิโก เทวปุตฺโต ภควโต สนฺติเก อิมา คาถาโย อภาสิ – १०१. एक ओर खड़े हुए अनाथपिण्डिक देवपुत्र ने भगवान के समीप ये गाथाएं कहीं — ‘‘อิทญฺหิ ตํ เชตวนํ, อิสิสงฺฆนิเสวิตํ; อาวุตฺถํ ธมฺมราเชน, ปีติสญฺชนนํ มม. “यह वही जेतवन है, जो ऋषियों (भिक्षु संघ) के समूह द्वारा सेवित है, जहाँ धर्मराज (बुद्ध) निवास करते हैं; यह मुझे अत्यंत प्रसन्नता प्रदान करता है। ‘‘กมฺมํ [Pg.54] วิชฺชา จ ธมฺโม จ, สีลํ ชีวิตมุตฺตมํ; เอเตน มจฺจา สุชฺฌนฺติ, น โคตฺเตน ธเนน วา. कर्म (चेतना), विद्या (मार्ग-ज्ञान), धर्म (समाधि), शील और उत्तम आजीविका — इन्हीं से प्राणी शुद्ध होते हैं, न कि गोत्र या धन से। ‘‘ตสฺมา หิ ปณฺฑิโต โปโส, สมฺปสฺสํ อตฺถมตฺตโน; โยนิโส วิจิเน ธมฺมํ, เอวํ ตตฺถ วิสุชฺฌติ. इसलिए बुद्धिमान मनुष्य को अपने कल्याण को देखते हुए, विवेकपूर्वक धर्म का चिंतन करना चाहिए; इस प्रकार वह उसमें शुद्ध हो जाता है। ‘‘สาริปุตฺโตว ปญฺญาย, สีเลน อุปสเมน จ; โยปิ ปารงฺคโต ภิกฺขุ, เอตาวปรโม สิยา’’ติ. प्रज्ञा, शील और उपशम (शांति) में सारिपुत्र ही सर्वश्रेष्ठ हैं। जो भी भिक्षु पारगामी (निर्वाण प्राप्त) है, वह अधिक से अधिक सारिपुत्र के समान ही हो सकता है।” อิทมโวจ อนาถปิณฺฑิโก เทวปุตฺโต. อิทํ วตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายีติ. अनाथपिण्डिक देवपुत्र ने यह कहा। यह कहकर, भगवान का अभिवादन कर और उनकी प्रदक्षिणा कर वह वहीं अंतर्धान हो गया। อถ โข ภควา ตสฺสา รตฺติยา อจฺจเยน ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘อิมํ, ภิกฺขเว, รตฺตึ อญฺญตโร เทวปุตฺโต อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺโณ เกวลกปฺปํ เชตวนํ โอภาเสตฺวา เยนาหํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข, ภิกฺขเว, โส เทวปุตฺโต มม สนฺติเก อิมา คาถาโย อภาสิ – तब भगवान ने उस रात्रि के बीतने पर भिक्षुओं को संबोधित किया — “भिक्षुओं! इस रात्रि में, रात्रि के व्यतीत होने पर (मध्यरात्रि में), एक अज्ञात, अत्यंत सुंदर आभा वाले देवपुत्र ने संपूर्ण जेतवन को आलोकित करते हुए जहाँ मैं था, वहाँ आया; आकर मुझे अभिवादन किया और एक ओर खड़ा हो गया। एक ओर खड़े होकर उस देवपुत्र ने मेरे समीप ये गाथाएं कहीं — ‘‘อิทญฺหิ ตํ เชตวนํ, อิสิสงฺฆนิเสวิตํ; อาวุตฺถํ ธมฺมราเชน, ปีติสญฺชนนํ มม. ‘यह वही जेतवन है, जो ऋषियों के समूह द्वारा सेवित है, जहाँ धर्मराज निवास करते हैं; यह मुझे अत्यंत प्रसन्नता प्रदान करता है। ‘‘กมฺมํ วิชฺชา จ ธมฺโม จ, สีลํ ชีวิตมุตฺตมํ; เอเตน มจฺจา สุชฺฌนฺติ, น โคตฺเตน ธเนน วา. कर्म, विद्या, धर्म, शील और उत्तम आजीविका — इन्हीं से प्राणी शुद्ध होते हैं, न कि गोत्र या धन से। ‘‘ตสฺมา หิ ปณฺฑิโต โปโส, สมฺปสฺสํ อตฺถมตฺตโน; โยนิโส วิจิเน ธมฺมํ, เอวํ ตตฺถ วิสุชฺฌติ. इसलिए बुद्धिमान मनुष्य को अपने कल्याण को देखते हुए, विवेकपूर्वक धर्म का चिंतन करना चाहिए; इस प्रकार वह उसमें शुद्ध हो जाता है। ‘‘สาริปุตฺโตว ปญฺญาย, สีเลน อุปสเมน จ; โยปิ ปารงฺคโต ภิกฺขุ, เอตาวปรโม สิยา’’ติ. प्रज्ञा, शील और उपशम में सारिपुत्र ही सर्वश्रेष्ठ हैं। जो भी भिक्षु पारगामी है, वह अधिक से अधिक सारिपुत्र के समान ही हो सकता है।’” ‘‘อิทมโวจ, ภิกฺขเว, โส เทวปุตฺโต. อิทํ วตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายี’’ติ. “भिक्षुओं! उस देवपुत्र ने यह कहा। यह कहकर, मेरा अभिवादन कर और प्रदक्षिणा कर वह वहीं अंतर्धान हो गया।” เอวํ วุตฺเต, อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘โส หิ นูน, ภนฺเต, อนาถปิณฺฑิโก เทวปุตฺโต ภวิสฺสติ. อนาถปิณฺฑิโก คหปติ อายสฺมนฺเต สาริปุตฺเต อภิปฺปสนฺโน อโหสี’’ติ. ‘‘สาธุ [Pg.55] สาธุ, อานนฺท, ยาวตกํ โข, อานนฺท, ตกฺกาย ปตฺตพฺพํ อนุปฺปตฺตํ ตํ ตยา. อนาถปิณฺฑิโก หิ โส, อานนฺท, เทวปุตฺโต’’ติ. ऐसा कहने पर, आयुष्मान आनंद ने भगवान से यह कहा — “भंते! वह निश्चित ही अनाथपिण्डिक देवपुत्र रहा होगा। गृहपति अनाथपिण्डिक आयुष्मान सारिपुत्र के प्रति अत्यंत श्रद्धावान थे।” “साधु, साधु आनंद! आनंद, तर्क (अनुमान) से जहाँ तक पहुँचा जा सकता है, तुम वहाँ तक पहुँच गए हो। आनंद, वह वास्तव में अनाथपिण्डिक देवपुत्र ही था।” อนาถปิณฺฑิกวคฺโค ทุติโย. दूसरा अनाथपिण्डिक वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान) — จนฺทิมโส จ เวณฺฑุ จ, ทีฆลฏฺฐิ จ นนฺทโน; จนฺทโน วาสุทตฺโต จ, สุพฺรหฺมา กกุเธน จ; อุตฺตโร นวโม วุตฺโต, ทสโม อนาถปิณฺฑิโกติ. चन्द्रिमस, वेण्डु, दीर्घलट्ठि, नन्दन, चन्दन, वासुदत्त, सुब्रह्म, ककुध, नौवां उत्तर और दसवां अनाथपिण्डिक सुत्त कहा गया है। ๓. นานาติตฺถิยวคฺโค ३. ३. नानातिथिय वर्ग ๑. สิวสุตฺตํ १. १. शिव सुत्त ๑๐๒. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. อถ โข สิโว เทวปุตฺโต อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺโณ เกวลกปฺปํ เชตวนํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข สิโว เทวปุตฺโต ภควโต สนฺติเก อิมา คาถาโย อภาสิ – १०२. ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे। तब शिव नामक देवपुत्र ने रात्रि के व्यतीत होने पर, अत्यंत सुंदर आभा के साथ संपूर्ण जेतवन को आलोकित करते हुए जहाँ भगवान थे, वहाँ आया; आकर भगवान को अभिवादन किया और एक ओर खड़ा हो गया। एक ओर खड़े होकर शिव देवपुत्र ने भगवान के समीप ये गाथाएं कहीं — ‘‘สพฺภิเรว สมาเสถ, สพฺภิ กุพฺเพถ สนฺถวํ; สตํ สทฺธมฺมมญฺญาย, เสยฺโย โหติ น ปาปิโย. “सत्पुरुषों के साथ ही बैठना चाहिए, सत्पुरुषों के साथ ही संगति करनी चाहिए। सत्पुरुषों के सद्धर्म को जानकर कल्याण होता है, अहित नहीं। ‘‘สพฺภิเรว สมาเสถ, สพฺภิ กุพฺเพถ สนฺถวํ; สตํ สทฺธมฺมมญฺญาย, ปญฺญา ลพฺภติ นาญฺญโต. “सत्पुरुषों के साथ ही बैठना चाहिए, सत्पुरुषों के साथ ही संगति करनी चाहिए। सत्पुरुषों के सद्धर्म को जानकर प्रज्ञा प्राप्त होती है, किसी अन्य से नहीं। ‘‘สพฺภิเรว สมาเสถ, สพฺภิ กุพฺเพถ สนฺถวํ; สตํ สทฺธมฺมมญฺญาย, โสกมชฺเฌ น โสจติ. “सत्पुरुषों के साथ ही बैठना चाहिए, सत्पुरुषों के साथ ही संगति करनी चाहिए। सत्पुरुषों के सद्धर्म को जानकर व्यक्ति शोक करने वालों के बीच भी शोक नहीं करता। ‘‘สพฺภิเรว สมาเสถ, สพฺภิ กุพฺเพถ สนฺถวํ; สตํ สทฺธมฺมมญฺญาย, ญาติมชฺเฌ วิโรจติ. “सत्पुरुषों के साथ ही बैठना चाहिए, सत्पुरुषों के साथ ही संगति करनी चाहिए। सत्पुरुषों के सद्धर्म को जानकर व्यक्ति अपने संबंधियों के बीच शोभा पाता है। ‘‘สพฺภิเรว [Pg.56] สมาเสถ, สพฺภิ กุพฺเพถ สนฺถวํ; สตํ สทฺธมฺมมญฺญาย, สตฺตา คจฺฉนฺติ สุคฺคตึ. “सत्पुरुषों के साथ ही बैठना चाहिए, सत्पुरुषों के साथ ही संगति करनी चाहिए। सत्पुरुषों के सद्धर्म को जानकर प्राणी सुगति को प्राप्त होते हैं।” ‘‘สพฺภิเรว สมาเสถ, สพฺภิ กุพฺเพถ สนฺถวํ; สตํ สทฺธมฺมมญฺญาย, สตฺตา ติฏฺฐนฺติ สาตต’’นฺติ. सज्जनों के साथ ही बैठना चाहिए, सज्जनों के साथ ही संगति करनी चाहिए। सज्जनों के सद्धर्म को जानकर प्राणी निरंतर सुखपूर्वक स्थित रहते हैं। อถ โข ภควา สิวํ เทวปุตฺตํ คาถาย ปจฺจภาสิ – तब भगवान ने शिव देवपुत्र को गाथा में उत्तर दिया— ‘‘สพฺภิเรว สมาเสถ, สพฺภิ กุพฺเพถ สนฺถวํ; สตํ สทฺธมฺมมญฺญาย, สพฺพทุกฺขา ปมุจฺจตี’’ติ. सज्जनों के साथ ही बैठना चाहिए, सज्जनों के साथ ही संगति करनी चाहिए। सज्जनों के सद्धर्म को जानकर मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है। ๒. เขมสุตฺตํ २. खेम सुत्त ๑๐๓. เอกมนฺตํ ฐิโต โข เขโม เทวปุตฺโต ภควโต สนฺติเก อิมา คาถาโย อภาสิ – १०३. एक ओर खड़े हुए खेम देवपुत्र ने भगवान के समीप ये गाथाएं कहीं— ‘‘จรนฺติ พาลา ทุมฺเมธา, อมิตฺเตเนว อตฺตนา; กโรนฺตา ปาปกํ กมฺมํ, ยํ โหติ กฏุกปฺผลํ. अल्पबुद्धि वाले मूर्ख अपने स्वयं के शत्रु बनकर विचरते हैं; वे पाप कर्म करते हैं जिनका फल कड़वा होता है। ‘‘น ตํ กมฺมํ กตํ สาธุ, ยํ กตฺวา อนุตปฺปติ; ยสฺส อสฺสุมุโข โรทํ, วิปากํ ปฏิเสวติ. वह किया हुआ कर्म अच्छा नहीं है, जिसे करके मनुष्य पछताता है; और जिसके फल को वह आँसू भरे चेहरे के साथ रोते हुए भोगता है। ‘‘ตญฺจ กมฺมํ กตํ สาธุ, ยํ กตฺวา นานุตปฺปติ; ยสฺส ปตีโต สุมโน, วิปากํ ปฏิเสวติ. वह किया हुआ कर्म अच्छा है, जिसे करके मनुष्य नहीं पछताता; और जिसके फल को वह प्रसन्न और हर्षित होकर भोगता है। ‘‘ปฏิกจฺเจว ตํ กยิรา, ยํ ชญฺญา หิตมตฺตโน; น สากฏิกจินฺตาย, มนฺตา ธีโร ปรกฺกเม. जिसे वह अपना हित समझे, उसे पहले ही कर लेना चाहिए; बुद्धिमान व्यक्ति को (टूटे हुए अक्ष वाले) गाड़ीवान की तरह सोचकर प्रयास नहीं करना चाहिए। ‘‘ยถา สากฏิโก มฏฺฐํ, สมํ หิตฺวา มหาปถํ; วิสมํ มคฺคมารุยฺห, อกฺขจฺฉินฺโนว ฌายติ. जैसे एक गाड़ीवान चिकने और समतल महापथ को छोड़कर विषम मार्ग पर चढ़कर, धुरी (अक्ष) टूट जाने पर शोक करता है। ‘‘เอวํ ธมฺมา อปกฺกมฺม, อธมฺมมนุวตฺติย; มนฺโท มจฺจุมุขํ ปตฺโต, อกฺขจฺฉินฺโนว ฌายตี’’ติ. उसी प्रकार धर्म से हटकर अधर्म का अनुसरण करने वाला मंदबुद्धि व्यक्ति, मृत्यु के मुख में पहुँचकर, टूटे हुए अक्ष वाले गाड़ीवान की तरह शोक करता है। ๓. เสรีสุตฺตํ ३. सेरी सुत्त ๑๐๔. เอกมนฺตํ ฐิโต โข เสรี เทวปุตฺโต ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – १०४. एक ओर खड़े हुए सेरी देवपुत्र ने भगवान को गाथा द्वारा संबोधित किया— ‘‘อนฺนเมวาภินนฺทนฺติ[Pg.57], อุภเย เทวมานุสา; อถ โก นาม โส ยกฺโข, ยํ อนฺนํ นาภินนฺทตี’’ติ. देवता और मनुष्य दोनों ही अन्न का आनंद लेते हैं; फिर वह कौन सा यक्ष है जो अन्न का आनंद नहीं लेता? ‘‘เย นํ ททนฺติ สทฺธาย, วิปฺปสนฺเนน เจตสา; ตเมว อนฺนํ ภชติ, อสฺมึ โลเก ปรมฺหิ จ. जो श्रद्धा और प्रसन्न चित्त से उसे दान देते हैं; वही अन्न इस लोक और परलोक में उनका साथ देता है। ‘‘ตสฺมา วิเนยฺย มจฺเฉรํ, ทชฺชา ทานํ มลาภิภู; ปุญฺญานิ ปรโลกสฺมึ, ปติฏฺฐา โหนฺติ ปาณิน’’นฺติ. इसलिए कंजूसी को दूर कर, मल को जीतकर दान देना चाहिए; पुण्य ही परलोक में प्राणियों के आधार होते हैं। ‘‘อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต! ยาวสุภาสิตมิทํ, ภนฺเต, ภควตา – आश्चर्य है भन्ते, अद्भुत है भन्ते! भन्ते, भगवान द्वारा यह कितना सुभाषित कहा गया है— ‘‘เย นํ ททนฺติ สทฺธาย, วิปฺปสนฺเนน เจตสา; ตเมว อนฺนํ ภชติ, อสฺมึ โลเก ปรมฺหิ จ. जो श्रद्धा और प्रसन्न चित्त से उसे दान देते हैं; वही अन्न इस लोक और परलोक में उनका साथ देता है। ‘‘ตสฺมา วิเนยฺย มจฺเฉรํ, ทชฺชา ทานํ มลาภิภู; ปุญฺญานิ ปรโลกสฺมึ, ปติฏฺฐา โหนฺติ ปาณิน’’นฺติ. इसलिए कंजूसी को दूर कर, मल को जीतकर दान देना चाहिए; पुण्य ही परलोक में प्राणियों के आधार होते हैं। ‘‘ภูตปุพฺพาหํ, ภนฺเต, สิรี นาม ราชา อโหสึ ทายโก ทานปติ ทานสฺส วณฺณวาที. ตสฺส มยฺหํ, ภนฺเต, จตูสุ ทฺวาเรสุ ทานํ ทียิตฺถ สมณ-พฺราหฺมณ-กปณทฺธิก-วนิพฺพกยาจกานํ. อถ โข มํ, ภนฺเต, อิตฺถาคารํ อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ – ‘เทวสฺส โข ทานํ ทียติ; อมฺหากํ ทานํ น ทียติ. สาธุ มยมฺปิ เทวํ นิสฺสาย ทานานิ ทเทยฺยาม, ปุญฺญานิ กเรยฺยามา’ติ. ตสฺส มยฺหํ, ภนฺเต, เอตทโหสิ – ‘อหํ โขสฺมิ ทายโก ทานปติ ทานสฺส วณฺณวาที. ทานํ ทสฺสามาติ วทนฺเต กินฺติ วเทยฺย’นฺติ? โส ขฺวาหํ, ภนฺเต, ปฐมํ ทฺวารํ อิตฺถาคารสฺส อทาสึ. ตตฺถ อิตฺถาคารสฺส ทานํ ทียิตฺถ; มม ทานํ ปฏิกฺกมิ. भन्ते, प्राचीन काल में मैं सेरी नाम का राजा था, जो दानी, दानपति और दान की प्रशंसा करने वाला था। भन्ते, मेरे चारों द्वारों पर श्रमणों, ब्राह्मणों, निर्धनों, पथिकों, वनिकों और याचकों को दान दिया जाता था। तब भन्ते, रनिवास ने मेरे पास आकर यह कहा— 'महाराज ही दान देते हैं; हमें दान देने का अवसर नहीं मिलता। अच्छा हो यदि हम भी महाराज के आश्रय में दान दें और पुण्य करें।' भन्ते, तब मेरे मन में यह विचार आया— 'मैं दानी हूँ, दानपति हूँ, दान की प्रशंसा करने वाला हूँ। जो यह कह रहे हैं कि 'हम दान देंगे', उन्हें मैं क्या कहूँ?' भन्ते, तब मैंने पहला द्वार रनिवास को दे दिया। वहाँ रनिवास द्वारा दान दिया जाने लगा; मेरा अपना दान (वहाँ से) हट गया। ‘‘อถ โข มํ, ภนฺเต, ขตฺติยา อนุยนฺตา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจุํ – ‘เทวสฺส โข ทานํ ทียติ; อิตฺถาคารสฺส ทานํ ทียติ; อมฺหากํ ทานํ น ทียติ. สาธุ มยมฺปิ เทวํ นิสฺสาย ทานานิ ทเทยฺยาม, ปุญฺญานิ กเรยฺยามา’ติ. ตสฺส มยฺหํ, ภนฺเต, เอตทโหสิ – ‘อหํ โขสฺมิ ทายโก ทานปติ ทานสฺส วณฺณวาที. ทานํ ทสฺสามาติ วทนฺเต กินฺติ วเทยฺย’นฺติ[Pg.58]? โส ขฺวาหํ, ภนฺเต, ทุติยํ ทฺวารํ ขตฺติยานํ อนุยนฺตานํ อทาสึ. ตตฺถ ขตฺติยานํ อนุยนฺตานํ ทานํ ทียิตฺถ, มม ทานํ ปฏิกฺกมิ. तब भन्ते, मेरे अनुयायी क्षत्रियों ने मेरे पास आकर यह कहा— 'महाराज दान देते हैं; रनिवास दान देता है; हमें दान देने का अवसर नहीं मिलता। अच्छा हो यदि हम भी महाराज के आश्रय में दान दें और पुण्य करें।' भन्ते, तब मेरे मन में यह विचार आया— 'मैं दानी हूँ... उन्हें मैं क्या कहूँ?' भन्ते, तब मैंने दूसरा द्वार अनुयायी क्षत्रियों को दे दिया। वहाँ अनुयायी क्षत्रियों द्वारा दान दिया जाने लगा; मेरा अपना दान (वहाँ से) हट गया। ‘‘อถ โข มํ, ภนฺเต, พลกาโย อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ – ‘เทวสฺส โข ทานํ ทียติ; อิตฺถาคารสฺส ทานํ ทียติ; ขตฺติยานํ อนุยนฺตานํ ทานํ ทียติ; อมฺหากํ ทานํ น ทียติ. สาธุ มยมฺปิ เทวํ นิสฺสาย ทานานิ ทเทยฺยาม, ปุญฺญานิ กเรยฺยามา’ติ. ตสฺส มยฺหํ, ภนฺเต, เอตทโหสิ – ‘อหํ โขสฺมิ ทายโก ทานปติ ทานสฺส วณฺณวาที. ทานํ ทสฺสามาติ วทนฺเต กินฺติ วเทยฺย’นฺติ? โส ขฺวาหํ ภนฺเต, ตติยํ ทฺวารํ พลกายสฺส อทาสึ. ตตฺถ พลกายสฺส ทานํ ทียิตฺถ, มม ทานํ ปฏิกฺกมิ. तब भन्ते, सैन्य दल ने मेरे पास आकर यह कहा— 'महाराज दान देते हैं; रनिवास दान देता है; अनुयायी क्षत्रिय दान देते हैं; हमें दान देने का अवसर नहीं मिलता। अच्छा हो यदि हम भी महाराज के आश्रय में दान दें और पुण्य करें।' भन्ते, तब मेरे मन में यह विचार आया— 'मैं दानी हूँ... उन्हें मैं क्या कहूँ?' भन्ते, तब मैंने तीसरा द्वार सैन्य दल को दे दिया। वहाँ सैन्य दल द्वारा दान दिया जाने लगा; मेरा अपना दान (वहाँ से) हट गया। ‘‘อถ โข มํ, ภนฺเต, พฺราหฺมณคหปติกา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจุํ – ‘เทวสฺส โข ทานํ ทียติ; อิตฺถาคารสฺส ทานํ ทียติ; ขตฺติยานํ อนุยนฺตานํ ทานํ ทียติ; พลกายสฺส ทานํ ทียติ; อมฺหากํ ทานํ น ทียติ. สาธุ มยมฺปิ เทวํ นิสฺสาย ทานานิ ทเทยฺยาม, ปุญฺญานิ กเรยฺยามา’ติ. ตสฺส มยฺหํ, ภนฺเต, เอตทโหสิ – ‘อหํ โขสฺมิ ทายโก ทานปติ ทานสฺส วณฺณวาที. ทานํ ทสฺสามาติ วทนฺเต กินฺติ วเทยฺย’นฺติ? โส ขฺวาหํ, ภนฺเต, จตุตฺถํ ทฺวารํ พฺราหฺมณคหปติกานํ อทาสึ. ตตฺถ พฺราหฺมณคหปติกานํ ทานํ ทียิตฺถ, มม ทานํ ปฏิกฺกมิ. तब भन्ते, ब्राह्मणों और गृहपतियों ने मेरे पास आकर यह कहा— 'महाराज दान देते हैं; रनिवास दान देता है; अनुयायी क्षत्रिय दान देते हैं; सैन्य दल दान देता है; हमें दान देने का अवसर नहीं मिलता। अच्छा हो यदि हम भी महाराज के आश्रय में दान दें और पुण्य करें।' भन्ते, तब मेरे मन में यह विचार आया— 'मैं दानी हूँ... उन्हें मैं क्या कहूँ?' भन्ते, तब मैंने चौथा द्वार ब्राह्मणों और गृहपतियों को दे दिया। वहाँ ब्राह्मणों और गृहपतियों द्वारा दान दिया जाने लगा; मेरा अपना दान (वहाँ से) हट गया। ‘‘อถ โข มํ, ภนฺเต, ปุริสา อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจุํ – ‘น โข ทานิ เทวสฺส โกจิ ทานํ ทียตี’ติ. เอวํ วุตฺตาหํ, ภนฺเต, เต ปุริเส เอตทโวจํ – ‘เตน หิ, ภเณ, โย พาหิเรสุ ชนปเทสุ อาโย สญฺชายติ ตโต อุปฑฺฒํ อนฺเตปุเร ปเวเสถ, อุปฑฺฒํ ตตฺเถว ทานํ เทถ สมณ-พฺราหฺมณ-กปณทฺธิก-วนิพฺพก-ยาจกาน’นฺติ. โส ขฺวาหํ, ภนฺเต, เอวํ ทีฆรตฺตํ กตานํ ปุญฺญานํ เอวํ ทีฆรตฺตํ กตานํ กุสลานํ ธมฺมานํ ปริยนฺตํ นาธิคจฺฉามิ – เอตฺตกํ ปุญฺญนฺติ วา เอตฺตโก ปุญฺญวิปาโกติ วา เอตฺตกํ สคฺเค ฐาตพฺพนฺติ วาติ. อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต! ยาวสุภาสิตมิทํ, ภนฺเต, ภควตา – तब, भन्ते! पुरुषों (राजपुरुषों) ने मेरे पास आकर यह कहा— 'अब महाराज का कोई दान नहीं दिया जा रहा है।' भन्ते! ऐसा कहे जाने पर मैंने उन पुरुषों से यह कहा— 'तो फिर, भद्र पुरुषो! बाहरी जनपदों में जो आय (राजस्व) उत्पन्न होती है, उसका आधा हिस्सा अन्तःपुर (राजमहल) में पहुँचाओ और आधा हिस्सा वहीं श्रमणों, ब्राह्मणों, निर्धनों, पथिकों, याचकों और भिखारियों को दान में दे दो।' भन्ते! वह मैं, इस प्रकार दीर्घकाल तक किए गए पुण्यों का, इस प्रकार दीर्घकाल तक किए गए कुशल धर्मों की सीमा को नहीं जानता हूँ कि— 'इतना पुण्य है' अथवा 'पुण्य का इतना विपाक है' अथवा 'स्वर्ग में इतने समय तक रहना होगा'। भन्ते! यह आश्चर्यजनक है, भन्ते! यह अद्भुत है! भन्ते! भगवान द्वारा यह कितना सुभाषित है— ‘‘เย นํ ททนฺติ สทฺธาย, วิปฺปสนฺเนน เจตสา; ตเมว อนฺนํ ภชติ, อสฺมึ โลเก ปรมฺหิ จ. जो श्रद्धापूर्वक और प्रसन्न चित्त से उसे (दान) देते हैं; वही अन्न इस लोक और परलोक में उनका साथ देता है। ‘‘ตสฺมา วิเนยฺย มจฺเฉรํ, ทชฺชา ทานํ มลาภิภู; ปุญฺญานิ ปรโลกสฺมึ, ปติฏฺฐา โหนฺติ ปาณิน’’นฺติ. इसलिए कंजूसी (मत्सर) को दूर कर, मल (लोभ) को जीतकर दान देना चाहिए; परलोक में पुण्य ही प्राणियों का आधार होते हैं। ๔. ฆฏีการสุตฺตํ ४. घटीकार सुत्त ๑๐๕. เอกมนฺตํ [Pg.59] ฐิโต โข ฆฏีกาโร เทวปุตฺโต ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – १०५. एक ओर खड़े हुए घटीकार देवपुत्र ने भगवान के समीप यह गाथा कही— ‘‘อวิหํ อุปปนฺนาเส, วิมุตฺตา สตฺต ภิกฺขโว; ราคโทสปริกฺขีณา, ติณฺณา โลเก วิสตฺติก’’นฺติ. अविह (लोक) में उत्पन्न हुए सात भिक्षु (आस्रवों से) मुक्त हैं; जिनके राग और द्वेष क्षीण हो चुके हैं और जो लोक में तृष्णा (विसत्तिका) को पार कर चुके हैं। ‘‘เก จ เต อตรุํ ปงฺกํ, มจฺจุเธยฺยํ สุทุตฺตรํ; เก หิตฺวา มานุสํ เทหํ, ทิพฺพโยคํ อุปจฺจคุ’’นฺติ. वे कौन हैं जिन्होंने मृत्यु के क्षेत्र रूपी उस दुर्गम कीचड़ को पार कर लिया है? वे कौन हैं जिन्होंने मनुष्य देह को त्याग कर दिव्य योग (देवलोक के बन्धन) को भी पार कर लिया है? ‘‘อุปโก ปลคณฺโฑ จ, ปุกฺกุสาติ จ เต ตโย; ภทฺทิโย ขณฺฑเทโว จ, พาหุรคฺคิ จ สงฺคิโย ; เต หิตฺวา มานุสํ เทหํ, ทิพฺพโยคํ อุปจฺจคุ’’นฺติ. उपको, पलगण्डो और पुक्कुसाति—ये तीन; और भद्दियो, खण्डदेवो, बाहुरग्गि तथा संगियो; इन्होंने मनुष्य देह को त्याग कर दिव्य योग को पार कर लिया है। ‘‘กุสลี ภาสสี เตสํ, มารปาสปฺปหายินํ; กสฺส เต ธมฺมมญฺญาย, อจฺฉิทุํ ภวพนฺธน’’นฺติ. तुम उन मार-पाश को त्यागने वालों के विषय में प्रशंसापूर्ण बात कह रहे हो; किसका धर्म जानकर उन्होंने भव-बन्धन को काट डाला है? ‘‘น อญฺญตฺร ภควตา, นาญฺญตฺร ตว สาสนา; ยสฺส เต ธมฺมมญฺญาย, อจฺฉิทุํ ภวพนฺธนํ. भगवान के बिना नहीं, आपकी शिक्षा (शासन) के बिना नहीं; जिसका धर्म जानकर उन्होंने भव-बन्धन को काट डाला है। ‘‘ยตฺถ นามญฺจ รูปญฺจ, อเสสํ อุปรุชฺฌติ; ตํ เต ธมฺมํ อิธญฺญาย, อจฺฉิทุํ ภวพนฺธน’’นฺติ. जहाँ नाम और रूप पूर्णतः निरुद्ध हो जाते हैं; यहाँ उस धर्म को जानकर उन्होंने भव-बन्धन को काट डाला है। ‘‘คมฺภีรํ ภาสสี วาจํ, ทุพฺพิชานํ สุทุพฺพุธํ; กสฺส ตฺวํ ธมฺมมญฺญาย, วาจํ ภาสสิ อีทิส’’นฺติ. तुम गम्भीर वाणी बोल रहे हो, जो समझने में कठिन और अत्यंत दुर्बोध है; किसका धर्म जानकर तुम ऐसी वाणी बोल रहे हो? ‘‘กุมฺภกาโร ปุเร อาสึ, เวกฬิงฺเค ฆฏีกโร; มาตาเปตฺติภโร อาสึ, กสฺสปสฺส อุปาสโก. मैं पहले वेकळिंग (गाँव) में घटीकार नाम का कुम्हार था; मैं माता-पिता का भरण-पोषण करने वाला और (बुद्ध) कस्सप का उपासक था। ‘‘วิรโต เมถุนา ธมฺมา, พฺรหฺมจารี นิรามิโส; อหุวา เต สคาเมยฺโย, อหุวา เต ปุเร สขา. मैं मैथुन धर्म से विरत, ब्रह्मचारी और निरामिष (सांसारिक भोगों से रहित) था; मैं आपका सह-ग्रामवासी था और पहले आपका मित्र था। ‘‘โสหเมเต ปชานามิ, วิมุตฺเต สตฺต ภิกฺขโว; ราคโทสปริกฺขีเณ, ติณฺเณ โลเก วิสตฺติก’’นฺติ. वही मैं इन सात मुक्त भिक्षुओं को जानता हूँ; जिनके राग और द्वेष क्षीण हो चुके हैं और जो लोक में तृष्णा को पार कर चुके हैं। ‘‘เอวเมตํ ตทา อาสิ, ยถา ภาสสิ ภคฺคว; กุมฺภกาโร ปุเร อาสิ, เวกฬิงฺเค ฆฏีกโร. हे भग्गव! जैसा तुम कह रहे हो, तब वैसा ही था; तुम पहले वेकळिंग में घटीकार कुम्हार थे। ‘‘มาตาเปตฺติภโร [Pg.60] อาสิ, กสฺสปสฺส อุปาสโก; วิรโต เมถุนา ธมฺมา, พฺรหฺมจารี นิรามิโส; อหุวา เม สคาเมยฺโย, อหุวา เม ปุเร สขา’’ติ. तुम माता-पिता के भरण-पोषण करने वाले और कस्सप के उपासक थे; मैथुन धर्म से विरत, ब्रह्मचारी और निरामिष थे; तुम मेरे सह-ग्रामवासी थे और पहले मेरे मित्र थे। ‘‘เอวเมตํ ปุราณานํ, สหายานํ อหุ สงฺคโม; อุภินฺนํ ภาวิตตฺตานํ, สรีรนฺติมธาริน’’นฺติ. इस प्रकार उन पुराने मित्रों का मिलन हुआ; जो दोनों ही भावना-युक्त चित्त वाले और अंतिम शरीर धारण करने वाले हैं। ๕. ชนฺตุสุตฺตํ ५. जन्तु सुत्त ๑๐๖. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ สมฺพหุลา ภิกฺขู, โกสเลสุ วิหรนฺติ หิมวนฺตปสฺเส อรญฺญกุฏิกาย อุทฺธตา อุนฺนฬา จปลา มุขรา วิกิณฺณวาจา มุฏฺฐสฺสติโน อสมฺปชานา อสมาหิตา วิพฺภนฺตจิตฺตา ปากตินฺทฺริยา. १०६. ऐसा मैंने सुना है—एक समय बहुत से भिक्षु कोसल जनपद में हिमालय के पार्श्व (तलहटी) में एक अरण्य-कुटी में विहार कर रहे थे, जो उद्धत (चंचल), अभिमानी, चपल, मुखर (बड़बोले), व्यर्थ प्रलाप करने वाले, विस्मृत-स्मृति वाले, प्रज्ञाहीन, असमाहित, विक्षिप्त चित्त वाले और असंयत इन्द्रियों वाले थे। อถ โข ชนฺตุ เทวปุตฺโต ตทหุโปสเถ ปนฺนรเส เยน เต ภิกฺขู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เต ภิกฺขู คาถาหิ อชฺฌภาสิ – तब जन्तु देवपुत्र पन्द्रहवीं के उपोसथ के दिन जहाँ वे भिक्षु थे, वहाँ गया; और पास जाकर उन भिक्षुओं को गाथाओं में संबोधित किया— ‘‘สุขชีวิโน ปุเร อาสุํ, ภิกฺขู โคตมสาวกา; อนิจฺฉา ปิณฺฑเมสนา, อนิจฺฉา สยนาสนํ; โลเก อนิจฺจตํ ญตฺวา, ทุกฺขสฺสนฺตํ อกํสุ เต. पहले गौतम बुद्ध के श्रावक भिक्षु सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करते थे; वे बिना इच्छा (तृष्णा) के भिक्षा की खोज करते थे और बिना इच्छा के शयनासन (निवास) की खोज करते थे; लोक में अनित्यता को जानकर उन्होंने दुःख का अंत कर दिया। ‘‘ทุปฺโปสํ กตฺวา อตฺตานํ, คาเม คามณิกา วิย; ภุตฺวา ภุตฺวา นิปชฺชนฺติ, ปราคาเรสุ มุจฺฉิตา. गाँव में ग्राम-मुखियाओं की तरह स्वयं का भरण-पोषण कठिन बनाकर; वे खा-खाकर सो जाते हैं और दूसरों के घरों में आसक्त रहते हैं। ‘‘สงฺฆสฺส อญฺชลึ กตฺวา, อิเธกจฺเจ วทามหํ ; อปวิทฺธา อนาถา เต, ยถา เปตา ตเถว เต. संघ को अंजलि (प्रणाम) करके, मैं यहाँ कुछ (भिक्षुओं) के बारे में कहता हूँ; वे त्यागे हुए और अनाथ हैं, जैसे प्रेत होते हैं, वैसे ही वे भी हैं। ‘‘เย โข ปมตฺตา วิหรนฺติ, เต เม สนฺธาย ภาสิตํ; เย อปฺปมตฺตา วิหรนฺติ, นโม เตสํ กโรมห’’นฺติ. जो प्रमादी होकर विहार करते हैं, उन्हें लक्ष्य करके मैंने यह कहा है; जो अप्रमादी होकर विहार करते हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ। ๖. โรหิตสฺสสุตฺตํ ६. रोहितस्स सुत्त ๑๐๗. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข โรหิตสฺโส เทวปุตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ยตฺถ นุ โข, ภนฺเต, น ชายติ น ชียติ น มียติ น จวติ น อุปปชฺชติ, สกฺกา นุ โข โส, ภนฺเต, คมเนน โลกสฺส [Pg.61] อนฺโต ญาตุํ วา ทฏฺฐุํ วา ปาปุณิตุํ วา’’ติ? ‘‘ยตฺถ โข, อาวุโส, น ชายติ น ชียติ น มียติ น จวติ น อุปปชฺชติ, นาหํ ตํ คมเนน โลกสฺส อนฺตํ ญาเตยฺยํ ทฏฺเฐยฺยํ ปตฺเตยฺยนฺติ วทามี’’ติ. १०७. श्रावस्ती निदान। एक ओर खड़े हुए रोहितस्स देवपुत्र ने भगवान से यह कहा— 'भन्ते! जहाँ न जन्म होता है, न बुढ़ापा आता है, न मृत्यु होती है, न च्युति होती है और न पुनर्जन्म होता है; क्या वहाँ, भन्ते! चलकर (यात्रा करके) लोक के अंत को जानना, देखना या पहुँचना संभव है?' 'आवुस! जहाँ न जन्म होता है, न बुढ़ापा आता है, न मृत्यु होती है, न च्युति होती है और न पुनर्जन्म होता है; मैं ऐसा नहीं कहता कि वहाँ चलकर लोक के अंत को जाना, देखा या पहुँचा जा सकता है।' ‘‘อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต! ยาวสุภาสิตมิทํ, ภนฺเต, ภควตา – ‘ยตฺถ โข, อาวุโส, น ชายติ น ชียติ น มียติ น จวติ น อุปปชฺชติ, นาหํ ตํ คมเนน โลกสฺส อนฺตํ ญาเตยฺยํ ทฏฺเฐยฺยํ ปตฺเตยฺยนฺติ วทามี’ติ. भन्ते! यह आश्चर्यजनक है, भन्ते! यह अद्भुत है! भन्ते! भगवान द्वारा यह कितना सुभाषित है— 'आवुस! जहाँ न जन्म होता है, न बुढ़ापा आता है, न मृत्यु होती है, न च्युति होती है और न पुनर्जन्म होता है; मैं ऐसा नहीं कहता कि वहाँ चलकर लोक के अंत को जाना, देखा या पहुँचा जा सकता है।' ‘‘ภูตปุพฺพาหํ, ภนฺเต, โรหิตสฺโส นาม อิสิ อโหสึ โภชปุตฺโต อิทฺธิมา เวหาสงฺคโม. ตสฺส มยฺหํ, ภนฺเต, เอวรูโป ชโว อโหสิ; เสยฺยถาปิ นาม ทฬฺหธมฺมา ธนุคฺคโห สุสิกฺขิโต กตหตฺโถ กตโยคฺโค กตูปาสโน ลหุเกน อสเนน อปฺปกสิเรเนว ติริยํ ตาลจฺฉายํ อติปาเตยฺย. ตสฺส มยฺหํ, ภนฺเต, เอวรูโป ปทวีติหาโร อโหสิ; เสยฺยถาปิ นาม ปุรตฺถิมา สมุทฺทา ปจฺฉิโม สมุทฺโท. ตสฺส มยฺหํ, ภนฺเต, เอวรูปํ อิจฺฉาคตํ อุปฺปชฺชิ – ‘อหํ คมเนน โลกสฺส อนฺตํ ปาปุณิสฺสามี’ติ. โส ขฺวาหํ, ภนฺเต, เอวรูเปน ชเวน สมนฺนาคโต เอวรูเปน จ ปทวีติหาเรน อญฺญตฺเรว อสิต-ปีต-ขายิต-สายิตา อญฺญตฺร อุจฺจาร-ปสฺสาวกมฺมา อญฺญตฺร นิทฺทากิลมถปฏิวิโนทนา วสฺสสตายุโก วสฺสสตชีวี วสฺสสตํ คนฺตฺวา อปฺปตฺวาว โลกสฺส อนฺตํ อนฺตราว กาลงฺกโต. “भन्ते! पूर्वकाल में मैं रोहितस्स नाम का एक ऋषि था, जो एक भोजपुत्र (ग्राम प्रधान का पुत्र) था, ऋद्धिमान था और आकाशगामी था। भन्ते! मेरी गति ऐसी तीव्र थी जैसे कोई सुशिक्षित, अभ्यस्त और कुशल धनुर्धर एक हल्के बाण से बिना किसी कठिनाई के ताड़ के पेड़ की छाया को पार कर दे। भन्ते! मेरा डग (कदम) इतना लंबा था जैसे पूर्वी समुद्र से पश्चिमी समुद्र की दूरी। भन्ते! मेरे मन में ऐसी इच्छा उत्पन्न हुई—‘मैं चलकर लोक के अंत तक पहुँचूँगा।’ भन्ते! ऐसी गति और ऐसे डग से युक्त होकर, खाने-पीने, चबाने-स्वाद लेने, मल-मूत्र त्यागने और निद्रा-थकान दूर करने के समय को छोड़कर, सौ वर्ष की आयु वाला मैं, सौ वर्ष तक जीवित रहकर, सौ वर्ष तक निरंतर चलते रहने पर भी लोक के अंत तक नहीं पहुँच सका और बीच में ही कालकवलित (मृत्यु को प्राप्त) हो गया।” ‘‘อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต! ยาวสุภาสิตมิทํ, ภนฺเต, ภควตา – ‘ยตฺถ โข, อาวุโส, น ชายติ น ชียติ น มียติ น จวติ น อุปปชฺชติ, นาหํ ตํ คมเนน โลกสฺส อนฺตํ ญาเตยฺยํ ทฏฺเฐยฺยํ ปตฺเตยฺยนฺติ วทามี’’’ติ. “भन्ते! यह आश्चर्यजनक है, भन्ते! यह अद्भुत है! भन्ते! भगवान ने यह कितनी अच्छी तरह कहा है—‘हे आयुष्मान! जहाँ न जन्म होता है, न बुढ़ापा आता है, न मृत्यु होती है, न च्युति होती है और न पुनर्जन्म होता है, उस लोक के अंत को चलकर जाना, देखा या पहुँचा नहीं जा सकता, ऐसा मैं कहता हूँ।’” ‘‘น โข ปนาหํ, อาวุโส, อปฺปตฺวา โลกสฺส อนฺตํ ทุกฺขสฺส อนฺตกิริยํ วทามิ. อปิ จ ขฺวาหํ, อาวุโส, อิมสฺมึเยว พฺยามมตฺเต กเฬวเร สสญฺญิมฺหิ สมนเก โลกญฺจ ปญฺญเปมิ โลกสมุทยญฺจ โลกนิโรธญฺจ โลกนิโรธคามินิญฺจ ปฏิปทนฺติ. “परंतु हे आयुष्मान! मैं यह भी कहता हूँ कि लोक के अंत तक पहुँचे बिना दुखों का अंत नहीं किया जा सकता। और हे आयुष्मान! इसी संज्ञावान और मनसहित एक व्याम (लगभग छह फीट) के शरीर में ही मैं लोक, लोक की उत्पत्ति, लोक का निरोध और लोक-निरोध-गामिनी प्रतिपदा (मार्ग) को प्रज्ञापित करता हूँ।” ‘‘คมเนน น ปตฺตพฺโพ, โลกสฺสนฺโต กุทาจนํ; น จ อปฺปตฺวา โลกนฺตํ, ทุกฺขา อตฺถิ ปโมจนํ. “चलकर कभी भी लोक के अंत तक नहीं पहुँचा जा सकता; और लोक के अंत तक पहुँचे बिना दुखों से मुक्ति नहीं मिलती।” ‘‘ตสฺมา [Pg.62] หเว โลกวิทู สุเมโธ,โลกนฺตคู วุสิตพฺรหฺมจริโย; โลกสฺส อนฺตํ สมิตาวิ ญตฺวา,นาสีสติ โลกมิมํ ปรญฺจา’’ติ. “इसलिए, वह बुद्धिमान लोकविद्, जो लोक के अंत तक पहुँच गया है, जिसने ब्रह्मचर्य का पालन किया है, जो शांत है, वह लोक के अंत को जानकर इस लोक या परलोक की आकांक्षा नहीं करता।” ๗. นนฺทสุตฺตํ ७. ७. नन्द सुत्त ๑๐๘. เอกมนฺตํ ฐิโต โข นนฺโท เทวปุตฺโต ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – १०८. एक ओर खड़े होकर नन्द देवपुत्र ने भगवान के समीप यह गाथा कही— ‘‘อจฺเจนฺติ กาลา ตรยนฺติ รตฺติโย,วโยคุณา อนุปุพฺพํ ชหนฺติ; เอตํ ภยํ มรเณ เปกฺขมาโน,ปุญฺญานิ กยิราถ สุขาวหานี’’ติ. “समय बीतता जाता है, रातें निकल जाती हैं, अवस्थाएँ (आयु के भाग) क्रमशः साथ छोड़ती जाती हैं। मृत्यु के इस भय को देखते हुए, सुख देने वाले पुण्यों को करना चाहिए।” ‘‘อจฺเจนฺติ กาลา ตรยนฺติ รตฺติโย,วโยคุณา อนุปุพฺพํ ชหนฺติ; เอตํ ภยํ มรเณ เปกฺขมาโน,โลกามิสํ ปชเห สนฺติเปกฺโข’’ติ. “समय बीतता जाता है, रातें निकल जाती हैं, अवस्थाएँ क्रमशः साथ छोड़ती जाती हैं। मृत्यु के इस भय को देखते हुए, शांति (निर्वाण) की इच्छा रखने वाले को लोक के आमिष (सांसारिक प्रलोभनों) का त्याग कर देना चाहिए।” ๘. นนฺทิวิสาลสุตฺตํ ८. ८. नन्दिविसाल सुत्त ๑๐๙. เอกมนฺตํ ฐิโต โข นนฺทิวิสาโล เทวปุตฺโต ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – १०९. एक ओर खड़े होकर नन्दिविसाल देवपुत्र ने भगवान को गाथा में संबोधित किया— ‘‘จตุจกฺกํ นวทฺวารํ, ปุณฺณํ โลเภน สํยุตํ; ปงฺกชาตํ มหาวีร, กถํ ยาตฺรา ภวิสฺสตี’’ติ. “चार चक्रों वाला, नौ द्वारों वाला, लोभ से भरा हुआ और उससे जुड़ा हुआ, कीचड़ (गर्भ) में उत्पन्न यह शरीर, हे महावीर! इससे पार कैसे पाया जा सकेगा?” ‘‘เฉตฺวา นทฺธึ วรตฺตญฺจ, อิจฺฉาโลภญฺจ ปาปกํ; สมูลํ ตณฺหมพฺพุยฺห, เอวํ ยาตฺรา ภวิสฺสตี’’ติ. “नद्धी (क्रोध) और वरत्ता (क्लेशों) को काटकर, पापपूर्ण इच्छा और लोभ को त्यागकर, तृष्णा को जड़ सहित उखाड़कर, इस प्रकार पार पाया जा सकेगा।” ๙. สุสิมสุตฺตํ ९. ९. सुसिम सुत्त ๑๑๐. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ ภควา เอตทโวจ – ‘‘ตุยฺหมฺปิ โน, อานนฺท, สาริปุตฺโต รุจฺจตี’’ติ? ११०. श्रावस्ती। तब आयुष्मान आनंद जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान आनंद से भगवान ने यह कहा— “आनंद! क्या तुम्हें भी सारिपुत्र प्रिय हैं?” ‘‘กสฺส [Pg.63] หิ นาม, ภนฺเต, อพาลสฺส อทุฏฺฐสฺส อมูฬฺหสฺส อวิปลฺลตฺถจิตฺตสฺส อายสฺมา สาริปุตฺโต น รุจฺเจยฺย? ปณฺฑิโต, ภนฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต. มหาปญฺโญ, ภนฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต. ปุถุปญฺโญ, ภนฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต. หาสปญฺโญ, ภนฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต. ชวนปญฺโญ, ภนฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต. ติกฺขปญฺโญ, ภนฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต. นิพฺเพธิกปญฺโญ, ภนฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต. อปฺปิจฺโฉ, ภนฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต. สนฺตุฏฺโฐ, ภนฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต. ปวิวิตฺโต, ภนฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต. อสํสฏฺโฐ, ภนฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต. อารทฺธวีริโย, ภนฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต. วตฺตา, ภนฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต. วจนกฺขโม, ภนฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต. โจทโก, ภนฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต. ปาปครหี, ภนฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต. กสฺส หิ นาม, ภนฺเต, อพาลสฺส อทุฏฺฐสฺส อมูฬฺหสฺส อวิปลฺลตฺถจิตฺตสฺส อายสฺมา สาริปุตฺโต น รุจฺเจยฺยา’’ติ? “भन्ते! वह कौन होगा जो मूर्ख न हो, द्वेषी न हो, मूढ़ न हो और जिसका चित्त भ्रमित न हो, जिसे आयुष्मान सारिपुत्र प्रिय न हों? भन्ते! आयुष्मान सारिपुत्र पंडित हैं। भन्ते! आयुष्मान सारिपुत्र महाप्रज्ञ हैं। भन्ते! आयुष्मान सारिपुत्र पृथुप्रज्ञ (विस्तृत प्रज्ञा वाले) हैं। भन्ते! आयुष्मान सारिपुत्र हासप्रज्ञ (प्रसन्न प्रज्ञा वाले) हैं। भन्ते! आयुष्मान सारिपुत्र जवनप्रज्ञ (तीव्र प्रज्ञा वाले) हैं। भन्ते! आयुष्मान सारिपुत्र तीक्ष्णप्रज्ञ हैं। भन्ते! आयुष्मान सारिपुत्र निर्वेधिकप्रज्ञ (भेदन करने वाली प्रज्ञा वाले) हैं। भन्ते! आयुष्मान सारिपुत्र अल्पेच्छ हैं। भन्ते! आयुष्मान सारिपुत्र संतुष्ट हैं। भन्ते! आयुष्मान सारिपुत्र प्रविविक्त (एकांतप्रिय) हैं। भन्ते! आयुष्मान सारिपुत्र असंसृष्ट (सांसारिक मेल-जोल से रहित) हैं। भन्ते! आयुष्मान सारिपुत्र आरब्धवीर्य (पुरुषार्थी) हैं। भन्ते! आयुष्मान सारिपुत्र वक्ता (उपदेशक) हैं। भन्ते! आयुष्मान सारिपुत्र वचनक्षम (सहनशील) हैं। भन्ते! आयुष्मान सारिपुत्र चोदक (प्रेरक/सुधारने वाले) हैं। भन्ते! आयुष्मान सारिपुत्र पापगर्ही (पाप की निंदा करने वाले) हैं। भन्ते! वह कौन होगा जो मूर्ख न हो, द्वेषी न हो, मूढ़ न हो और जिसका चित्त भ्रमित न हो, जिसे आयुष्मान सारिपुत्र प्रिय न हों?” ‘‘เอวเมตํ, อานนฺท, เอวเมตํ, อานนฺท! กสฺส หิ นาม, อานนฺท, อพาลสฺส อทุฏฺฐสฺส อมูฬฺหสฺส อวิปลฺลตฺถจิตฺตสฺส สาริปุตฺโต น รุจฺเจยฺย? ปณฺฑิโต, อานนฺท, สาริปุตฺโต. มหาปญฺโญ, อานนฺท, สาริปุตฺโต. ปุถุปญฺโญ, อานนฺท, สาริปุตฺโต. หาสปญฺโญ, อานนฺท, สาริปุตฺโต. ชวนปญฺโญ, อานนฺท, สาริปุตฺโต. ติกฺขปญฺโญ, อานนฺท, สาริปุตฺโต. นิพฺเพธิกปญฺโญ, อานนฺท, สาริปุตฺโต. อปฺปิจฺโฉ, อานนฺท, สาริปุตฺโต. สนฺตุฏฺโฐ, อานนฺท, สาริปุตฺโต. ปวิวิตฺโต, อานนฺท, สาริปุตฺโต. อสํสฏฺโฐ, อานนฺท, สาริปุตฺโต. อารทฺธวีริโย, อานนฺท, สาริปุตฺโต. วตฺตา, อานนฺท, สาริปุตฺโต. วจนกฺขโม, อานนฺท, สาริปุตฺโต. โจทโก, อานนฺท, สาริปุตฺโต. ปาปครหี, อานนฺท, สาริปุตฺโต. กสฺส หิ นาม, อานนฺท, อพาลสฺส อทุฏฺฐสฺส อมูฬฺหสฺส อวิปลฺลตฺถจิตฺตสฺส สาริปุตฺโต น รุจฺเจยฺยา’’ติ? “ऐसा ही है आनंद! ऐसा ही है आनंद! आनंद! वह कौन होगा जो मूर्ख न हो, द्वेषी न हो, मूढ़ न हो और जिसका चित्त भ्रमित न हो, जिसे सारिपुत्र प्रिय न हों? आनंद! सारिपुत्र पंडित हैं। आनंद! सारिपुत्र महाप्रज्ञ हैं। आनंद! सारिपुत्र पृथुप्रज्ञ हैं। आनंद! सारिपुत्र हासप्रज्ञ हैं। आनंद! सारिपुत्र जवनप्रज्ञ हैं। आनंद! सारिपुत्र तीक्ष्णप्रज्ञ हैं। आनंद! सारिपुत्र निर्वेधिकप्रज्ञ हैं। आनंद! सारिपुत्र अल्पेच्छ हैं। आनंद! सारिपुत्र संतुष्ट हैं। आनंद! सारिपुत्र प्रविविक्त हैं। आनंद! सारिपुत्र असंसृष्ट हैं। आनंद! सारिपुत्र आरब्धवीर्य हैं। आनंद! सारिपुत्र वक्ता हैं। आनंद! सारिपुत्र वचनक्षम हैं। आनंद! सारिपुत्र चोदक हैं। आनंद! सारिपुत्र पापगर्ही हैं। आनंद! वह कौन होगा जो मूर्ख न हो, द्वेषी न हो, मूढ़ न हो और जिसका चित्त भ्रमित न हो, जिसे सारिपुत्र प्रिय न हों?” อถ โข สุสิโม เทวปุตฺโต อายสฺมโต สาริปุตฺตสฺส วณฺเณ ภญฺญมาเน มหติยา เทวปุตฺตปริสาย ปริวุโต เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข สุสิโม เทวปุตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – तब सुसिम देवपुत्र, आयुष्मान सारिपुत्र के गुणों की प्रशंसा किए जाने पर, देवपुत्रों की एक बड़ी परिषद से घिरे हुए जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े हुए सुसिम देवपुत्र ने भगवान से यह कहा— ‘‘เอวเมตํ[Pg.64], ภควา, เอวเมตํ, สุคต. กสฺส หิ นาม, ภนฺเต, อพาลสฺส อทุฏฺฐสฺส อมูฬฺหสฺส อวิปลฺลตฺถจิตฺตสฺส อายสฺมา สาริปุตฺโต น รุจฺเจยฺย? ปณฺฑิโต, ภนฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต. มหาปญฺโญ, ภนฺเต, ปุถุปญฺโญ, ภนฺเต, หาสปญฺโญ, ภนฺเต, ชวนปญฺโญ, ภนฺเต, ติกฺขปญฺโญ, ภนฺเต, นิพฺเพธิกปญฺโญ, ภนฺเต, อปฺปิจฺโฉ, ภนฺเต, สนฺตุฏฺโฐ, ภนฺเต, ปวิวิตฺโต, ภนฺเต, อสํสฏฺโฐ, ภนฺเต, อารทฺธวีริโย, ภนฺเต, วตฺตา, ภนฺเต, วจนกฺขโม, ภนฺเต, โจทโก, ภนฺเต, ปาปครหี, ภนฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต. กสฺส หิ นาม, ภนฺเต, อพาลสฺส อทุฏฺฐสฺส อมูฬฺหสฺส อวิปลฺลตฺถจิตฺตสฺส อายสฺมา สาริปุตฺโต น รุจฺเจยฺย? “यह ऐसा ही है, भगवान! यह ऐसा ही है, सुगत! भन्ते, ऐसे किस व्यक्ति को जो मूर्ख नहीं है, द्वेषी नहीं है, मूढ़ नहीं है और जिसका चित्त विपरित (भ्रमित) नहीं है, आयुष्मान सारिपुत्र प्रिय नहीं लगेंगे? भन्ते, आयुष्मान सारिपुत्र पण्डित (विद्वान) हैं। भन्ते, आयुष्मान सारिपुत्र महाप्राज्ञ हैं, भन्ते, पृथु-प्राज्ञ (विस्तृत प्रज्ञा वाले) हैं, भन्ते, हास-प्राज्ञ (प्रसन्न प्रज्ञा वाले) हैं, भन्ते, जवन-प्राज्ञ (तीव्र प्रज्ञा वाले) हैं, भन्ते, तीक्ष्ण-प्राज्ञ हैं, भन्ते, निवेधिक-प्राज्ञ (भेदन करने वाली प्रज्ञा वाले) हैं, भन्ते, अल्पेच्छ हैं, भन्ते, सन्तुष्ट हैं, भन्ते, प्रविविक्त (एकान्तप्रिय) हैं, भन्ते, असंसृष्ट (सांसारिक मेल-जोल से रहित) हैं, भन्ते, आरब्ध-वीर्य (पुरुषार्थी) हैं, भन्ते, वक्ता (उपदेशक) हैं, भन्ते, वचनक्षम (वचनों को सहने वाले) हैं, भन्ते, चोदक (दोष बताने वाले) हैं, और भन्ते, आयुष्मान सारिपुत्र पाप की निन्दा करने वाले हैं। भन्ते, ऐसे किस व्यक्ति को जो मूर्ख नहीं है, द्वेषी नहीं है, मूढ़ नहीं है और जिसका चित्त विपरित नहीं है, आयुष्मान सारिपुत्र प्रिय नहीं लगेंगे?” ‘‘อหมฺปิ หิ, ภนฺเต, ยญฺญเทว เทวปุตฺตปริสํ อุปสงฺกมึ, เอตเทว พหุลํ สทฺทํ สุณามิ – ‘ปณฺฑิโต อายสฺมา สาริปุตฺโต; มหาปญฺโญ อายสฺมา, ปุถุปญฺโญ อายสฺมา, หาสปญฺโญ อายสฺมา, ชวนปญฺโญ อายสฺมา, ติกฺขปญฺโญ อายสฺมา, นิพฺเพธิกปญฺโญ อายสฺมา, อปฺปิจฺโฉ อายสฺมา, สนฺตุฏฺโฐ อายสฺมา, ปวิวิตฺโต อายสฺมา, อสํสฏฺโฐ อายสฺมา, อารทฺธวีริโย อายสฺมา, วตฺตา อายสฺมา, วจนกฺขโม อายสฺมา, โจทโก อายสฺมา, ปาปครหี อายสฺมา สาริปุตฺโต’ติ. กสฺส หิ นาม, ภนฺเต, อพาลสฺส อทุฏฺฐสฺส อมูฬฺหสฺส อวิปลฺลตฺถจิตฺตสฺส อายสฺมา สาริปุตฺโต น รุจฺเจยฺยา’’ติ? “भन्ते, मैं भी जिस-जिस देवपुत्र परिषद के पास जाता हूँ, वहाँ प्रायः यही शब्द सुनता हूँ— ‘आयुष्मान सारिपुत्र पण्डित हैं; आयुष्मान महाप्राज्ञ हैं, पृथु-प्राज्ञ हैं, हास-प्राज्ञ हैं, जवन-प्राज्ञ हैं, तीक्ष्ण-प्राज्ञ हैं, निवेधिक-प्राज्ञ हैं, अल्पेच्छ हैं, सन्तुष्ट हैं, प्रविविक्त हैं, असंसृष्ट हैं, आरब्ध-वीर्य हैं, वक्ता हैं, वचनक्षम हैं, चोदक हैं, आयुष्मान सारिपुत्र पाप की निन्दा करने वाले हैं।’ भन्ते, ऐसे किस व्यक्ति को जो मूर्ख नहीं है, द्वेषी नहीं है, मूढ़ नहीं है और जिसका चित्त विपरित नहीं है, आयुष्मान सारिपुत्र प्रिय नहीं लगेंगे?” อถ โข สุสิมสฺส เทวปุตฺตสฺส เทวปุตฺตปริสา อายสฺมโต สาริปุตฺตสฺส วณฺเณ ภญฺญมาเน อตฺตมนา ปมุทิตา ปีติโสมนสฺสชาตา อุจฺจาวจา วณฺณนิภา อุปทํเสติ. तब सुसिम देवपुत्र की वह देवपुत्र परिषद, आयुष्मान सारिपुत्र के गुणों की प्रशंसा किए जाने पर, प्रसन्न, प्रमुदित और प्रीति-सौमनस्य से युक्त होकर विभिन्न प्रकार की वर्ण-आभा (रंगों की चमक) प्रदर्शित करने लगी। ‘‘เสยฺยถาปิ นาม มณิ เวฬุริโย สุโภ ชาติมา อฏฺฐํโส สุปริกมฺมกโต ปณฺฑุกมฺพเล นิกฺขิตฺโต ภาสเต จ ตปเต จ วิโรจติ จ; เอวเมวํ สุสิมสฺส เทวปุตฺตสฺส เทวปุตฺตปริสา อายสฺมโต สาริปุตฺตสฺส วณฺเณ ภญฺญมาเน อตฺตมนา ปมุทิตา ปีติโสมนสฺสชาตา อุจฺจาวจา วณฺณนิภา อุปทํเสติ. “जैसे कोई शुभ, उत्तम जाति का, आठ पहलुओं वाला, सुसंस्कृत (अच्छी तरह तराशा हुआ) वैदूर्य मणि लाल कम्बल पर रखा होने पर चमकता है, तपता है और सुशोभित होता है; उसी प्रकार सुसिम देवपुत्र की वह देवपुत्र परिषद, आयुष्मान सारिपुत्र के गुणों की प्रशंसा किए जाने पर, प्रसन्न, प्रमुदित और प्रीति-सौमनस्य से युक्त होकर विभिन्न प्रकार की वर्ण-आभा प्रदर्शित करने लगी।” ‘‘เสยฺยถาปิ นาม นิกฺขํ ชมฺโพนทํ ทกฺขกมฺมารปุตฺตอุกฺกามุขสุกุสลสมฺปหฏฺฐํ ปณฺฑุกมฺพเล นิกฺขิตฺตํ ภาสเต จ ตปเต จ วิโรจติ จ; เอวเมวํ สุสิมสฺส เทวปุตฺตสฺส เทวปุตฺตปริสา อายสฺมโต สาริปุตฺตสฺส วณฺเณ ภญฺญมาเน อตฺตมนา ปมุทิตา ปีติโสมนสฺสชาตา อุจฺจาวจา วณฺณนิภา อุปทํเสติ. “जैसे एक कुशल स्वर्णकार द्वारा भट्टी में अच्छी तरह तपाया और शुद्ध किया हुआ जम्बूनद स्वर्ण का निष्क (आभूषण) लाल कम्बल पर रखा होने पर चमकता है, तपता है और सुशोभित होता है; उसी प्रकार सुसिम देवपुत्र की वह देवपुत्र परिषद, आयुष्मान सारिपुत्र के गुणों की प्रशंसा किए जाने पर, प्रसन्न, प्रमुदित और प्रीति-सौमनस्य से युक्त होकर विभिन्न प्रकार की वर्ण-आभा प्रदर्शित करने लगी।” ‘‘เสยฺยถาปิ [Pg.65] นาม สรทสมเย วิทฺเธ วิคตวลาหเก เทเว รตฺติยา ปจฺจูสสมยํ โอสธิตารกา ภาสเต จ ตปเต จ วิโรจติ จ; เอวเมวํ สุสิมสฺส เทวปุตฺตสฺส เทวปุตฺตปริสา อายสฺมโต สาริปุตฺตสฺส วณฺเณ ภญฺญมาเน อตฺตมนา ปมุทิตา ปีติโสมนสฺสชาตา อุจฺจาวจา วณฺณนิภา อุปทํเสติ. “जैसे शरद ऋतु में, बादलों से रहित स्वच्छ आकाश में, रात्रि के प्रत्युष काल (भोर) में ओषधि-तारा (शुक्र तारा) चमकता है, तपता है और सुशोभित होता है; उसी प्रकार सुसिम देवपुत्र की वह देवपुत्र परिषद, आयुष्मान सारिपुत्र के गुणों की प्रशंसा किए जाने पर, प्रसन्न, प्रमुदित और प्रीति-सौमनस्य से युक्त होकर विभिन्न प्रकार की वर्ण-आभा प्रदर्शित करने लगी।” ‘‘เสยฺยถาปิ นาม สรทสมเย วิทฺเธ วิคตวลาหเก เทเว อาทิจฺโจ นภํ อพฺภุสฺสกฺกมาโน สพฺพํ อากาสคตํ ตมคตํ อภิวิหจฺจ ภาสเต จ ตปเต จ วิโรจติ จ; เอวเมวํ สุสิมสฺส เทวปุตฺตสฺส เทวปุตฺตปริสา อายสฺมโต สาริปุตฺตสฺส วณฺเณ ภญฺญมาเน อตฺตมนา ปมุทิตา ปีติโสมนสฺสชาตา อุจฺจาวจา วณฺณนิภา อุปทํเสติ. “जैसे शरद ऋतु में, बादलों से रहित स्वच्छ आकाश में, सूर्य आकाश में ऊपर चढ़ते हुए समस्त आकाश के अन्धकार को दूर कर चमकता है, तपता है और सुशोभित होता है; उसी प्रकार सुसिम देवपुत्र की वह देवपुत्र परिषद, आयुष्मान सारिपुत्र के गुणों की प्रशंसा किए जाने पर, प्रसन्न, प्रमुदित और प्रीति-सौमनस्य से युक्त होकर विभिन्न प्रकार की वर्ण-आभा प्रदर्शित करने लगी।” อถ โข สุสิโม เทวปุตฺโต อายสฺมนฺตํ สาริปุตฺตํ อารพฺภ ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – तब सुसिम देवपुत्र ने आयुष्मान सारिपुत्र के विषय में भगवान के सम्मुख यह गाथा कही— ‘‘ปณฺฑิโตติ สมญฺญาโต, สาริปุตฺโต อโกธโน; อปฺปิจฺโฉ โสรโต ทนฺโต, สตฺถุวณฺณาภโต อิสี’’ติ. “‘पण्डित’ के रूप में विख्यात, अक्रोधी सारिपुत्र; अल्पेच्छ, सौम्य, दान्त (इन्द्रियजयी) और शास्ता (बुद्ध) द्वारा प्रशंसित ऋषि हैं।” อถ โข ภควา อายสฺมนฺตํ สาริปุตฺตํ อารพฺภ สุสิมํ เทวปุตฺตํ คาถาย ปจฺจภาสิ – तब भगवान ने आयुष्मान सारिपुत्र के विषय में सुसिम देवपुत्र को गाथा में उत्तर दिया— ‘‘ปณฺฑิโตติ สมญฺญาโต, สาริปุตฺโต อโกธโน; อปฺปิจฺโฉ โสรโต ทนฺโต, กาลํ กงฺขติ สุทนฺโต’’ ติ. “‘पण्डित’ के रूप में विख्यात, अक्रोधी सारिपुत्र; अल्पेच्छ, सौम्य, दान्त और भली-भाँति संयमित होकर (परिनिर्वाण के) समय की प्रतीक्षा करते हैं।” ๑๐. นานาติตฺถิยสาวกสุตฺตํ १०. नानातिथियसावक सुत्त ๑๑๑. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. อถ โข สมฺพหุลา นานาติตฺถิยสาวกา เทวปุตฺตา อสโม จ สหลิ จ นีโก จ อาโกฏโก จ เวคพฺภริ จ มาณวคามิโย จ อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺณา เกวลกปฺปํ เวฬุวนํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา [Pg.66] เอกมนฺตํ อฏฺฐํสุ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข อสโม เทวปุตฺโต ปูรณํ กสฺสปํ อารพฺภ ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – १११. ऐसा मैंने सुना— एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दक-निवाप में विहार कर रहे थे। तब विभिन्न तीर्थंकरों के श्रावक रहे अनेक देवपुत्र—असम, सहलि, नीक, आकोटक, वेगब्भरि और माणवगामिय—रात्रि के बीतने पर, अपनी आभा से सम्पूर्ण वेणुवन को आलोकित करते हुए जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े हुए असम देवपुत्र ने पूरण कस्सप के विषय में भगवान के सम्मुख यह गाथा कही— ‘‘อิธ ฉินฺทิตมาริเต, หตชานีสุ กสฺสโป; น ปาปํ สมนุปสฺสติ, ปุญฺญํ วา ปน อตฺตโน; ส เว วิสฺสาสมาจิกฺขิ, สตฺถา อรหติ มานน’’นฺติ. “यहाँ (इस लोक में) अंग-भंग करने, वध करने, पीटने और हानि पहुँचाने में कस्सप कोई पाप नहीं देखते, और न ही अपने पुण्य को देखते हैं; उन्होंने (प्राणियों के लिए) विश्वास (निश्चिन्तता) का उपदेश दिया है, वे शास्ता सम्मान के योग्य हैं।” อถ โข สหลิ เทวปุตฺโต มกฺขลึ โคสาลํ อารพฺภ ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – तब सहलि देवपुत्र ने मक्खलि गोसाल के विषय में भगवान के सम्मुख यह गाथा कही— ‘‘ตโปชิคุจฺฉาย สุสํวุตตฺโต,วาจํ ปหาย กลหํ ชเนน; สโมสวชฺชา วิรโต สจฺจวาที,น หิ นูน ตาทิสํ กโรติ ปาป’’นฺติ. “तप और (पाप की) जुगुप्सा (घृणा) से भली-भाँति संयमित, लोगों के साथ कलहकारी वाणी को त्यागकर; समभाव से रहने वाले, विरत और सत्यवादी; वे निश्चय ही ऐसा पाप नहीं करते।” อถ โข นีโก เทวปุตฺโต นิคณฺฐํ นาฏปุตฺตํ อารพฺภ ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – तब नीक देवपुत्र ने निगण्ठ नातपुत्त के विषय में भगवान के सम्मुख यह गाथा कही— ‘‘เชคุจฺฉี นิปโก ภิกฺขุ, จาตุยามสุสํวุโต; ทิฏฺฐํ สุตญฺจ อาจิกฺขํ, น หิ นูน กิพฺพิสี สิยา’’ติ. "बुराई से घृणा करने वाला, बुद्धिमान और परिपक्व भिक्षु (निगण्ठ), जो चार प्रकार के संयम से सुरक्षित है; वह जो कुछ देखता और सुनता है उसे बताता है। निश्चित ही वह पापी नहीं हो सकता।" อถ โข อาโกฏโก เทวปุตฺโต นานาติตฺถิเย อารพฺภ ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – तब आकोटक देवपुत्र ने विभिन्न तीर्थकों (अन्य मतों के गुरुओं) के विषय में भगवान के समीप यह गाथा कही - ‘‘ปกุธโก กาติยาโน นิคณฺโฐ,เย จาปิเม มกฺขลิปูรณาเส; คณสฺส สตฺถาโร สามญฺญปฺปตฺตา,น หิ นูน เต สปฺปุริเสหิ ทูเร’’ติ. "पकुध कच्चायन, निगण्ठ (नातपुत्त), और ये जो मक्खलि (गोसाल) तथा पूरण (कस्सप) हैं; ये गणों के शास्ता (गुरु) हैं जिन्होंने श्रमणत्व में उच्च स्थान प्राप्त किया है, निश्चित ही वे सत्पुरुषों से दूर नहीं हैं।" อถ โข เวคพฺภริ เทวปุตฺโต อาโกฏกํ เทวปุตฺตํ คาถาย ปจฺจภาสิ – तब वेगब्भरि देवपुत्र ने आकोटक देवपुत्र को गाथा में उत्तर दिया - ‘‘สหาจริเตน ฉโว สิคาโล,น โกตฺถุโก สีหสโม กทาจิ; นคฺโค มุสาวาที คณสฺส สตฺถา,สงฺกสฺสราจาโร น สตํ สริกฺโข’’ติ. "एक नीच सियार केवल सिंह के साथ चलने मात्र से कभी सिंह के समान नहीं हो सकता। वह नग्न, मिथ्यावादी गण का शास्ता, जिसका आचरण संदेहास्पद है, सत्पुरुषों के सदृश नहीं है।" อถ [Pg.67] โข มาโร ปาปิมา เพคพฺภรึ เทวปุตฺตํ อนฺวาวิสิตฺวา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – तब पापी मार ने वेगब्भरि देवपुत्र के शरीर में प्रवेश कर भगवान के समीप यह गाथा कही - ‘‘ตโปชิคุจฺฉาย อายุตฺตา, ปาลยํ ปวิเวกิยํ; รูเป จ เย นิวิฏฺฐาเส, เทวโลกาภินนฺทิโน; เต เว สมฺมานุสาสนฺติ, ปรโลกาย มาติยา’’ติ. "जो तपस्या और पाप-घृणा में लगे हैं, एकांतवास की रक्षा करते हैं, किंतु रूप (आकृतियों) में आसक्त हैं और देवलोक की कामना करते हैं; वे मनुष्य वास्तव में परलोक के हित के लिए दूसरों को भली-भांति उपदेश देते हैं।" อถ โข ภควา, ‘มาโร อยํ ปาปิมา’ อิติ วิทิตฺวา, มารํ ปาปิมนฺตํ คาถาย ปจฺจภาสิ – तब भगवान ने यह जानकर कि 'यह पापी मार है', पापी मार को गाथा में उत्तर दिया - ‘‘เย เกจิ รูปา อิธ วา หุรํ วา,เย จนฺตลิกฺขสฺมึ ปภาสวณฺณา; สพฺเพว เต เต นมุจิปฺปสตฺถา,อามิสํว มจฺฉานํ วธาย ขิตฺตา’’ติ. "यहाँ या परलोक में जो कोई भी रूप हैं, और जो आकाश में प्रकाशमान वर्ण वाले हैं; हे नमुचि (मार)! तुम्हारे द्वारा प्रशंसित वे सभी रूप प्राणियों के विनाश के लिए वैसे ही फेंके गए हैं जैसे मछलियों के वध के लिए चारा।" อถ โข มาณวคามิโย เทวปุตฺโต ภควนฺตํ อารพฺภ ภควโต สนฺติเก อิมา คาถาโย อภาสิ – तब माणवगामिय देवपुत्र ने भगवान के विषय में भगवान के समीप ये गाथाएँ कहीं - ‘‘วิปุโล ราชคหียานํ, คิริเสฏฺโฐ ปวุจฺจติ; เสโต หิมวตํ เสฏฺโฐ, อาทิจฺโจ อฆคามินํ. "राजगृह के पर्वतों में विपुुल पर्वत श्रेष्ठ कहा जाता है; हिमवान (हिमालय) पर्वतों में कैलाश श्रेष्ठ है; आकाश में चलने वालों में सूर्य श्रेष्ठ है।" ‘‘สมุทฺโท อุทธินํ เสฏฺโฐ, นกฺขตฺตานญฺจ จนฺทิมา ; สเทวกสฺส โลกสฺส, พุทฺโธ อคฺโค ปวุจฺจตี’’ติ. "जलाशयों में समुद्र श्रेष्ठ है और नक्षत्रों में चंद्रमा; देवों सहित संपूर्ण लोक में बुद्ध को अग्र (सर्वश्रेष्ठ) कहा जाता है।" นานาติตฺถิยวคฺโค ตติโย. तीसरा नानातिथिय वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – इसका सारांश (उद्दान) - สิโว เขโม จ เสรี จ, ฆฏี ชนฺตุ จ โรหิโต; นนฺโท นนฺทิวิสาโล จ, สุสิโม นานาติตฺถิเยน เต ทสาติ. सिव, खेम, सेरी, घटी, जन्तु, रोहित, नन्द, नन्दिविसाल, सुसिम और नानातिथिय - ये दस (सूत्र) हैं। เทวปุตฺตสํยุตฺตํ สมตฺตํ. देवपुत्त संयुत्त समाप्त। ๓. โกสลสํยุตฺตํ ३. कोसल संयुत्त ๑. ปฐมวคฺโค १. प्रथम वर्ग ๑. ทหรสุตฺตํ १. दहर सुत्त ๑๑๒. เอวํ [Pg.68] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ภวมฺปิ โน โคตโม อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุทฺโธติ ปฏิชานาตี’’ติ? ‘‘ยญฺหิ ตํ, มหาราช, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย ‘อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุทฺโธ’ติ, มเมว ตํ สมฺมา วทมาโน วเทยฺย. อหญฺหิ, มหาราช, อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุทฺโธ’’ติ. ११२. ऐसा मैंने सुना है - एक समय भगवान सावत्थी के अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे। तब कोसल नरेश पसेनदि जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान के साथ कुशल-क्षेम पूछा। प्रसन्नतापूर्ण और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वे एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए कोसल नरेश पसेनदि ने भगवान से यह कहा - 'क्या आयुष्मान् गौतम भी यह स्वीकार करते हैं कि उन्होंने अनुत्तर सम्यक-संबोधि प्राप्त कर ली है?' 'महाराज! यदि कोई ठीक कहते हुए किसी के बारे में यह कहे कि उसने अनुत्तर सम्यक-संबोधि प्राप्त कर ली है, तो वह मेरे ही बारे में ठीक कहते हुए ऐसा कहेगा। क्योंकि महाराज! मैंने अनुत्तर सम्यक-संबोधि प्राप्त कर ली है।' ‘‘เยปิ เต, โภ โคตม, สมณพฺราหฺมณา สงฺฆิโน คณิโน คณาจริยา ญาตา ยสสฺสิโน ติตฺถกรา สาธุสมฺมตา พหุชนสฺส, เสยฺยถิทํ – ปูรโณ กสฺสโป, มกฺขลิ โคสาโล, นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต, สญฺจโย เพลฏฺฐปุตฺโต, ปกุโธ กจฺจายโน, อชิโต เกสกมฺพโล; เตปิ มยา ‘อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุทฺโธติ ปฏิชานาถา’ติ ปุฏฺฐา สมานา อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุทฺโธติ น ปฏิชานนฺติ. กึ ปน ภวํ โคตโม ทหโร เจว ชาติยา นโว จ ปพฺพชฺชายา’’ติ? 'हे गौतम! जो वे श्रमण-ब्राह्मण संघ के स्वामी, गण के स्वामी, गणों के आचार्य, विख्यात, यशस्वी, तीर्थकर और जनसाधारण द्वारा सत्पुरुष माने गए हैं; जैसे कि - पूरण कस्सप, मक्खलि गोसाल, निगण्ठ नातपुत्त, संजय बेलट्ठिपुत्त, पकुध कच्चायन, अजित केसकम्बल; वे भी मेरे द्वारा पूछे जाने पर कि 'क्या आपने अनुत्तर सम्यक-संबोधि प्राप्त कर ली है', ऐसा स्वीकार नहीं करते। फिर आयुष्मान् गौतम तो आयु में भी छोटे हैं और प्रव्रज्या (दीक्षा) में भी नए हैं, (तो आप ऐसा कैसे कह सकते हैं)?' ‘‘จตฺตาโร โข เม, มหาราช, ทหราติ น อุญฺญาตพฺพา, ทหราติ น ปริโภตพฺพา. กตเม จตฺตาโร? ขตฺติโย โข, มหาราช, ทหโรติ น อุญฺญาตพฺโพ, ทหโรติ น ปริโภตพฺโพ. อุรโค โข, มหาราช, ทหโรติ น อุญฺญาตพฺโพ, ทหโรติ น ปริโภตพฺโพ. อคฺคิ โข, มหาราช, ทหโรติ น อุญฺญาตพฺโพ, ทหโรติ น ปริโภตพฺโพ. ภิกฺขุ, โข, มหาราช, ทหโรติ น อุญฺญาตพฺโพ, ทหโรติ น ปริโภตพฺโพ. อิเม โข, มหาราช, จตฺตาโร ทหราติ น อุญฺญาตพฺพา, ทหราติ น ปริโภตพฺพา’’ติ. 'महाराज! ये चार 'छोटे' होने के कारण तिरस्कार के योग्य नहीं हैं, छोटे होने के कारण अपमान के योग्य नहीं हैं। वे चार कौन से हैं? महाराज! क्षत्रिय (राजकुमार) छोटा होने पर भी तिरस्कार के योग्य नहीं है। महाराज! सर्प छोटा होने पर भी तिरस्कार के योग्य नहीं है। महाराज! अग्नि छोटी होने पर भी तिरस्कार के योग्य नहीं है। महाराज! भिक्षु युवा होने पर भी तिरस्कार के योग्य नहीं है। महाराज! ये चार छोटे होने के कारण तिरस्कार या अपमान के योग्य नहीं हैं।' อิทมโวจ [Pg.69] ภควา. อิทํ วตฺวาน สุคโต อถาปรํ เอตทโวจ สตฺถา – भगवान ने यह कहा। यह कहकर सुगत शास्ता ने पुनः यह कहा - ‘‘ขตฺติยํ ชาติสมฺปนฺนํ, อภิชาตํ ยสสฺสินํ; ทหโรติ นาวชาเนยฺย, น นํ ปริภเว นโร. "उच्च कुल में उत्पन्न, यशस्वी और अभिजात क्षत्रिय का 'यह छोटा है' कहकर मनुष्य को तिरस्कार नहीं करना चाहिए और न ही उसका अपमान करना चाहिए।" ‘‘ฐานญฺหิ โส มนุชินฺโท, รชฺชํ ลทฺธาน ขตฺติโย; โส กุทฺโธ ราชทณฺเฑน, ตสฺมึ ปกฺกมเต ภุสํ; ตสฺมา ตํ ปริวชฺเชยฺย, รกฺขํ ชีวิตมตฺตโน. "क्योंकि वह मनुष्यों का स्वामी क्षत्रिय जब राज्य प्राप्त कर लेता है, तब क्रोधित होने पर वह राजदंड के द्वारा उस (अपमान करने वाले) पर भारी प्रहार करता है; इसलिए अपने प्राणों की रक्षा चाहने वाले को उससे बचना चाहिए।" ‘‘คาเม วา ยทิ วา รญฺเญ, ยตฺถ ปสฺเส ภุชงฺคมํ; ทหโรติ นาวชาเนยฺย, น นํ ปริภเว นโร. "गाँव में या जंगल में, जहाँ कहीं भी सर्प दिखाई दे, 'यह छोटा है' कहकर मनुष्य को उसका तिरस्कार या अपमान नहीं करना चाहिए।" ‘‘อุจฺจาวเจหิ วณฺเณหิ, อุรโค จรติ เตชสี ; โส อาสชฺช ฑํเส พาลํ, นรํ นาริญฺจ เอกทา; ตสฺมา ตํ ปริวชฺเชยฺย, รกฺขํ ชีวิตมตฺตโน. "तेजस्वी सर्प विभिन्न रूपों और रंगों में विचरण करता है; वह कभी समीप आने पर अज्ञानी स्त्री या पुरुष को डस सकता है; इसलिए अपने प्राणों की रक्षा चाहने वाले को उससे बचना चाहिए।" ‘‘ปหูตภกฺขํ ชาลินํ, ปาวกํ กณฺหวตฺตนึ; ทหโรติ นาวชาเนยฺย, น นํ ปริภเว นโร. "बहुत कुछ भस्म करने वाली, ज्वालाओं वाली और काले मार्ग (राख) वाली अग्नि का 'यह छोटी है' कहकर मनुष्य को तिरस्कार या अपमान नहीं करना चाहिए।" ‘‘ลทฺธา หิ โส อุปาทานํ, มหา หุตฺวาน ปาวโก; โส อาสชฺช ฑเห พาลํ, นรํ นาริญฺจ เอกทา; ตสฺมา ตํ ปริวชฺเชยฺย, รกฺขํ ชีวิตมตฺตโน. "क्योंकि ईंधन पाकर वह अग्नि विशाल हो जाती है और कभी समीप आने पर अज्ञानी स्त्री या पुरुष को जला सकती है; इसलिए अपने प्राणों की रक्षा चाहने वाले को उससे बचना चाहिए।" ‘‘วนํ ยทคฺคิ ฑหติ, ปาวโก กณฺหวตฺตนี; ชายนฺติ ตตฺถ ปาโรหา, อโหรตฺตานมจฺจเย. "काले मार्ग वाली वह अग्नि जिस वन को जला देती है, वहाँ दिन-रात बीतने के बाद पुनः अंकुर (पौधे) उग आते हैं।" ‘‘ยญฺจ โข สีลสมฺปนฺโน, ภิกฺขุ ฑหติ เตชสา; น ตสฺส ปุตฺตา ปสโว, ทายาทา วินฺทเร ธนํ; อนปจฺจา อทายาทา, ตาลาวตฺถู ภวนฺติ เต. "निश्चित ही, शील-संपन्न भिक्षु अपने (शील के) तेज से जिस (अपमान करने वाले) व्यक्ति को जला देता है; उस व्यक्ति के न तो पुत्र होते हैं और न ही पशु (पशुधन), और न ही उत्तराधिकारी धन प्राप्त करते हैं। वे संतानहीन और उत्तराधिकारी-रहित होकर ताड़ के ठूँठ के समान हो जाते हैं।" ‘‘ตสฺมา หิ ปณฺฑิโต โปโส, สมฺปสฺสํ อตฺถมตฺตโน; ภุชงฺคมํ ปาวกญฺจ, ขตฺติยญฺจ ยสสฺสินํ; ภิกฺขุญฺจ สีลสมฺปนฺนํ, สมฺมเทว สมาจเร’’ติ. "इसलिए, अपना कल्याण चाहने वाले बुद्धिमान मनुष्य को सर्प, अग्नि, यशस्वी क्षत्रिय (राजा) और शील-संपन्न भिक्षु के साथ सम्यक (उचित) व्यवहार ही करना चाहिए।" เอวํ วุตฺเต, ราชา ปเสนทิ โกสโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต, อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต! เสยฺยถาปิ ภนฺเต, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย[Pg.70], ปฏิจฺฉนฺนํ วา วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย – ‘จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตี’ติ; เอวเมวํ ภควตา อเนกปริยาเยน ธมฺโม ปกาสิโต. เอสาหํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ สรณํ คจฺฉามิ ธมฺมญฺจ ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. อุปาสกํ มํ, ภนฺเต, ภควา ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ऐसा कहे जाने पर, राजा प्रसेनजित कोसल ने भगवान से यह कहा— 'अति सुंदर, भन्ते! अति सुंदर, भन्ते! जैसे कोई औंधे हुए को सीधा कर दे, या ढके हुए को खोल दे, या मार्ग भूले हुए को रास्ता दिखा दे, या अंधकार में तेल का दीपक जला दे— ताकि आँख वाले रूप को देख सकें; इसी प्रकार भगवान ने अनेक प्रकार से धर्म को प्रकाशित किया है। भन्ते, मैं भगवान, धर्म और भिक्षु-संघ की शरण जाता हूँ। भगवान मुझे आज से जीवन भर के लिए शरणागत उपासक के रूप में स्वीकार करें।' ๒. ปุริสสุตฺตํ २. पुरुष सुत्त ๑๑๓. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กติ นุ โข, ภนฺเต, ปุริสสฺส ธมฺมา อชฺฌตฺตํ อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชนฺติ อหิตาย ทุกฺขาย อผาสุวิหารายา’’ติ? ११३. श्रावस्ती में। तब राजा प्रसेनजित कोसल जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान का अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए राजा प्रसेनजित कोसल ने भगवान से यह कहा— 'भन्ते, मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाले कितने धर्म (गुण/दोष) अहित, दुःख और कष्टपूर्ण जीवन के लिए उत्पन्न होते हैं?' ‘‘ตโย โข, มหาราช, ปุริสสฺส ธมฺมา อชฺฌตฺตํ อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชนฺติ อหิตาย ทุกฺขาย อผาสุวิหาราย. กตเม ตโย? โลโภ โข, มหาราช, ปุริสสฺส ธมฺโม อชฺฌตฺตํ อุปฺปชฺชมาโน อุปฺปชฺชติ อหิตาย ทุกฺขาย อผาสุวิหาราย. โทโส โข, มหาราช, ปุริสสฺส ธมฺโม อชฺฌตฺตํ อุปฺปชฺชมาโน อุปฺปชฺชติ อหิตาย ทุกฺขาย อผาสุวิหาราย. โมโห โข, มหาราช, ปุริสสฺส ธมฺโม อชฺฌตฺตํ อุปฺปชฺชมาโน อุปฺปชฺชติ อหิตาย ทุกฺขาย อผาสุวิหาราย. อิเม โข, มหาราช, ตโย ปุริสสฺส ธมฺมา อชฺฌตฺตํ อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชนฺติ อหิตาย ทุกฺขาย อผาสุวิหารายา’’ติ. อิทมโวจ…เป… 'महाराज, मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाले तीन धर्म अहित, दुःख और कष्टपूर्ण जीवन के लिए उत्पन्न होते हैं। वे तीन कौन से हैं? महाराज, मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाला लोभ अहित, दुःख और कष्टपूर्ण जीवन के लिए उत्पन्न होता है। महाराज, मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाला द्वेष अहित, दुःख और कष्टपूर्ण जीवन के लिए उत्पन्न होता है। महाराज, मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाला मोह अहित, दुःख और कष्टपूर्ण जीवन के लिए उत्पन्न होता है। महाराज, मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाले ये तीन धर्म अहित, दुःख और कष्टपूर्ण जीवन के लिए उत्पन्न होते हैं।' भगवान ने यह कहा... (पे)... ‘‘โลโภ โทโส จ โมโห จ, ปุริสํ ปาปเจตสํ; หึสนฺติ อตฺตสมฺภูตา, ตจสารํว สมฺผล’’นฺติ. "लोभ, द्वेष और मोह—स्वयं के भीतर उत्पन्न होकर—पापी चित्त वाले मनुष्य को उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं, जैसे बाँस या नरकुल (तचसार) को उसका अपना ही फल नष्ट कर देता है।" ๓. ชรามรณสุตฺตํ ३. जरामरण सुत्त ๑๑๔. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อตฺถิ นุ โข, ภนฺเต, ชาตสฺส อญฺญตฺร ชรามรณา’’ติ? ‘‘นตฺถิ โข, มหาราช, ชาตสฺส อญฺญตฺร ชรามรณา. เยปิ เต, มหาราช, ขตฺติยมหาสาลา อฑฺฒา มหทฺธนา มหาโภคา ปหูตชาตรูปรชตา [Pg.71] ปหูตวิตฺตูปกรณา ปหูตธนธญฺญา, เตสมฺปิ ชาตานํ นตฺถิ อญฺญตฺร ชรามรณา. เยปิ เต, มหาราช, พฺราหฺมณมหาสาลา…เป… คหปติมหาสาลา อฑฺฒา มหทฺธนา มหาโภคา ปหูตชาตรูปรชตา ปหูตวิตฺตูปกรณา ปหูตธนธญฺญา, เตสมฺปิ ชาตานํ นตฺถิ อญฺญตฺร ชรามรณา. เยปิ เต, มหาราช, ภิกฺขู อรหนฺโต ขีณาสวา วุสิตวนฺโต กตกรณียา โอหิตภารา อนุปฺปตฺตสทตฺถา ปริกฺขีณภวสํโยชนา สมฺมทญฺญาวิมุตฺตา, เตสํ ปายํ กาโย เภทนธมฺโม นิกฺเขปนธมฺโม’’ติ. อิทมโวจ…เป… ११४. श्रावस्ती में। एक ओर बैठे हुए राजा प्रसेनजित कोसल ने भगवान से यह कहा— 'भन्ते, क्या जन्म लेने वाले के लिए बुढ़ापे और मृत्यु के अतिरिक्त (कोई अन्य गति) है?' 'महाराज, जन्म लेने वाले के लिए बुढ़ापे और मृत्यु के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। महाराज, जो वे धनी, महाधनी, महाभोगी, प्रचुर स्वर्ण-रजत वाले, प्रचुर सुख-साधनों वाले और प्रचुर धन-धान्य वाले क्षत्रिय महाशाल हैं, उनके लिए भी जन्म लेने के बाद बुढ़ापे और मृत्यु से छुटकारा नहीं है। महाराज, जो वे ब्राह्मण महाशाल... (पे)... गृहपति महाशाल हैं, जो धनी, महाधनी, महाभोगी, प्रचुर स्वर्ण-रजत वाले, प्रचुर सुख-साधनों वाले और प्रचुर धन-धान्य वाले हैं, उनके लिए भी जन्म लेने के बाद बुढ़ापे और मृत्यु से छुटकारा नहीं है। महाराज, जो वे भिक्षु अर्हन्त हैं, जिनके आस्रव क्षीण हो चुके हैं, जो ब्रह्मचर्य का पालन कर चुके हैं, जिन्होंने अपना कर्तव्य पूरा कर लिया है, जिन्होंने भार उतार दिया है, जिन्होंने अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया है, जिनके भव-संयोजन नष्ट हो चुके हैं और जो सम्यक ज्ञान से विमुक्त हैं, उनका भी यह शरीर भेदन-धर्मी (नष्ट होने वाला) और निक्षेपण-धर्मी (त्यागने योग्य) है।' भगवान ने यह कहा... (पे)... ‘‘ชีรนฺติ เว ราชรถา สุจิตฺตา,อโถ สรีรมฺปิ ชรํ อุเปติ; สตญฺจ ธมฺโม น ชรํ อุเปติ,สนฺโต หเว สพฺภิ ปเวทยนฺตี’’ติ. "सुसज्जित राज-रथ निश्चय ही जीर्ण हो जाते हैं, और यह शरीर भी बुढ़ापे को प्राप्त होता है; किंतु सत्पुरुषों का धर्म कभी जीर्ण नहीं होता, सत्पुरुष ही सत्पुरुषों को (इस सत्य का) उपदेश देते हैं।" ๔. ปิยสุตฺตํ ४. पिय सुत्त (प्रिय सुत्त) ๑๑๕. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธ มยฺหํ, ภนฺเต, รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘เกสํ นุ โข ปิโย อตฺตา, เกสํ อปฺปิโย อตฺตา’ติ? ตสฺส มยฺหํ, ภนฺเต, เอตทโหสิ – ‘เย จ โข เกจิ กาเยน ทุจฺจริตํ จรนฺติ, วาจาย ทุจฺจริตํ จรนฺติ, มนสา ทุจฺจริตํ จรนฺติ; เตสํ อปฺปิโย อตฺตา’. กิญฺจาปิ เต เอวํ วเทยฺยุํ – ‘ปิโย โน อตฺตา’ติ, อถ โข เตสํ อปฺปิโย อตฺตา. ตํ กิสฺส เหตุ? ยญฺหิ อปฺปิโย อปฺปิยสฺส กเรยฺย, ตํ เต อตฺตนาว อตฺตโน กโรนฺติ; ตสฺมา เตสํ อปฺปิโย อตฺตา. เย จ โข เกจิ กาเยน สุจริตํ จรนฺติ, วาจาย สุจริตํ จรนฺติ, มนสา สุจริตํ จรนฺติ; เตสํ ปิโย อตฺตา. กิญฺจาปิ เต เอวํ วเทยฺยุํ – ‘อปฺปิโย โน อตฺตา’ติ; อถ โข เตสํ ปิโย อตฺตา. ตํ กิสฺส เหตุ? ยญฺหิ ปิโย ปิยสฺส กเรยฺย, ตํ เต อตฺตนาว อตฺตโน กโรนฺติ; ตสฺมา เตสํ ปิโย อตฺตา’’ติ. ११५. श्रावस्ती में। एक ओर बैठे हुए राजा प्रसेनजित कोसल ने भगवान से यह कहा— 'भन्ते, यहाँ एकांत में ध्यानमग्न रहने पर मेरे मन में ऐसा विचार उत्पन्न हुआ— "किनके लिए अपना आप (स्वयं) प्रिय है और किनके लिए अपना आप अप्रिय है?" तब भन्ते, मुझे यह विचार आया— "जो कोई भी काया से दुराचरण करते हैं, वाणी से दुराचरण करते हैं, मन से दुराचरण करते हैं; उनके लिए अपना आप अप्रिय है।" भले ही वे ऐसा कहें कि— "हमें अपना आप प्रिय है", फिर भी उनके लिए अपना आप अप्रिय ही है। वह किस कारण से? क्योंकि जो (बुरा) एक अप्रिय व्यक्ति दूसरे अप्रिय व्यक्ति के साथ करता है, वही वे स्वयं अपने साथ कर रहे होते हैं; इसलिए उनके लिए अपना आप अप्रिय है। और जो कोई काया से सुचरित करते हैं, वाणी से सुचरित करते हैं, मन से सुचरित करते हैं; उनके लिए अपना आप प्रिय है। भले ही वे ऐसा कहें कि— "हमें अपना आप अप्रिय है", फिर भी उनके लिए अपना आप प्रिय ही है। वह किस कारण से? क्योंकि जो (भला) एक प्रिय व्यक्ति दूसरे प्रिय व्यक्ति के लिए करता है, वही वे स्वयं अपने साथ कर रहे होते हैं; इसलिए उनके लिए अपना आप प्रिय है।' ‘‘เอวเมตํ, มหาราช, เอวเมตํ, มหาราช! เย หิ เกจิ, มหาราช, กาเยน ทุจฺจริตํ จรนฺติ, วาจาย ทุจฺจริตํ จรนฺติ, มนสา ทุจฺจริตํ จรนฺติ; เตสํ อปฺปิโย อตฺตา. กิญฺจาปิ เต เอวํ วเทยฺยุํ – ‘ปิโย โน อตฺตา’ติ, อถ โข เตสํ อปฺปิโย อตฺตา. ตํ กิสฺส เหตุ? ยญฺหิ, มหาราช, อปฺปิโย อปฺปิยสฺส กเรยฺย, ตํ เต อตฺตนาว อตฺตโน กโรนฺติ; ตสฺมา เตสํ อปฺปิโย อตฺตา. เย จ โข เกจิ, มหาราช, กาเยน [Pg.72] สุจริตํ จรนฺติ, วาจาย สุจริตํ จรนฺติ, มนสา สุจริตํ จรนฺติ; เตสํ ปิโย อตฺตา. กิญฺจาปิ เต เอวํ วเทยฺยุํ – ‘อปฺปิโย โน อตฺตา’ติ; อถ โข เตสํ ปิโย อตฺตา. ตํ กิสฺส เหตุ? ยญฺหิ มหาราช, ปิโย ปิยสฺส กเรยฺย, ตํ เต อตฺตนาว อตฺตโน กโรนฺติ; ตสฺมา เตสํ ปิโย อตฺตา’’ติ. อิทมโวจ…เป… “महाराज, यह ऐसा ही है; महाराज, यह ऐसा ही है! महाराज, जो कोई भी शरीर से दुराचरण करते हैं, वाणी से दुराचरण करते हैं, मन से दुराचरण करते हैं; उनके लिए अपना आप (स्वयं) अप्रिय है। भले ही वे ऐसा कहें—‘हमें अपना आप प्रिय है’, फिर भी उनके लिए अपना आप अप्रिय ही है। वह किस कारण से? महाराज, क्योंकि जो (बुरा) एक अप्रिय व्यक्ति दूसरे अप्रिय व्यक्ति के साथ करे, वही वे स्वयं अपने साथ करते हैं; इसलिए उनके लिए अपना आप अप्रिय है। और महाराज, जो कोई भी शरीर से सुचरित करते हैं, वाणी से सुचरित करते हैं, मन से सुचरित करते हैं; उनके लिए अपना आप प्रिय है। भले ही वे ऐसा कहें—‘हमें अपना आप अप्रिय है’, फिर भी उनके लिए अपना आप प्रिय ही है। वह किस कारण से? महाराज, क्योंकि जो (भला) एक प्रिय व्यक्ति दूसरे प्रिय व्यक्ति के साथ करे, वही वे स्वयं अपने साथ करते हैं; इसलिए उनके लिए अपना आप प्रिय है।” भगवान ने यह कहा... (पे)... ‘‘อตฺตานญฺเจ ปิยํ ชญฺญา, น นํ ปาเปน สํยุเช; น หิ ตํ สุลภํ โหติ, สุขํ ทุกฺกฏการินา. “यदि कोई अपने आप को प्रिय समझे, तो उसे अपने आप को पाप से नहीं जोड़ना चाहिए; क्योंकि दुष्कर्म करने वाले के लिए वह सुख सुलभ नहीं होता। ‘‘อนฺตเกนาธิปนฺนสฺส, ชหโต มานุสํ ภวํ; กิญฺหิ ตสฺส สกํ โหติ, กิญฺจ อาทาย คจฺฉติ; กิญฺจสฺส อนุคํ โหติ, ฉายาว อนปายินี. “मृत्यु (अंतक) द्वारा दबोचे गए और मनुष्य-भव को छोड़ते हुए व्यक्ति का अपना क्या होता है? वह साथ में क्या लेकर जाता है? और उसके पीछे-पीछे क्या चलता है, जैसे कभी साथ न छोड़ने वाली छाया?" ‘‘อุโภ ปุญฺญญฺจ ปาปญฺจ, ยํ มจฺโจ กุรุเต อิธ; ตญฺหิ ตสฺส สกํ โหติ, ตญฺจ อาทาย คจฺฉติ; ตญฺจสฺส อนุคํ โหติ, ฉายาว อนปายินี. “पुण्य और पाप दोनों, जो मरणधर्मा मनुष्य यहाँ करता है; वही उसका अपना होता है, वही वह साथ लेकर जाता है; और वही उसके पीछे-पीछे चलता है, जैसे कभी साथ न छोड़ने वाली छाया। ‘‘ตสฺมา กเรยฺย กลฺยาณํ, นิจยํ สมฺปรายิกํ; ปุญฺญานิ ปรโลกสฺมึ, ปติฏฺฐา โหนฺติ ปาณิน’’นฺติ. “इसलिए परलोक के लिए संचय के रूप में कल्याणकारी कार्य करने चाहिए; परलोक में पुण्य ही प्राणियों के आधार (प्रतिष्ठा) होते हैं।” ๕. อตฺตรกฺขิตสุตฺตํ ५. अत्तरक्खित सुत्त (आत्म-रक्षित सुत्त) ๑๑๖. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธ มยฺหํ, ภนฺเต, รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘เกสํ นุ โข รกฺขิโต อตฺตา, เกสํ อรกฺขิโต อตฺตา’ติ? ตสฺส มยฺหํ, ภนฺเต, เอตทโหสิ – ‘เย โข เกจิ กาเยน ทุจฺจริตํ จรนฺติ, วาจาย ทุจฺจริตํ จรนฺติ, มนสา ทุจฺจริตํ จรนฺติ; เตสํ อรกฺขิโต อตฺตา. กิญฺจาปิ เต หตฺถิกาโย วา รกฺเขยฺย, อสฺสกาโย วา รกฺเขยฺย, รถกาโย วา รกฺเขยฺย, ปตฺติกาโย วา รกฺเขยฺย; อถ โข เตสํ อรกฺขิโต อตฺตา. ตํ กิสฺส เหตุ? พาหิรา เหสา รกฺขา, เนสา รกฺขา อชฺฌตฺติกา; ตสฺมา เตสํ อรกฺขิโต อตฺตา. เย จ โข เกจิ กาเยน สุจริตํ จรนฺติ, วาจาย สุจริตํ จรนฺติ, มนสา สุจริตํ จรนฺติ; เตสํ รกฺขิโต อตฺตา. กิญฺจาปิ เต เนว หตฺถิกาโย รกฺเขยฺย, น อสฺสกาโย รกฺเขยฺย, น รถกาโย รกฺเขยฺย[Pg.73], น ปตฺติกาโย รกฺเขยฺย; อถ โข เตสํ รกฺขิโต อตฺตา. ตํ กิสฺส เหตุ? อชฺฌตฺติกา เหสา รกฺขา, เนสา รกฺขา พาหิรา; ตสฺมา เตสํ รกฺขิโต อตฺตา’’’ติ. ११६. श्रावस्ती का निदान। एक ओर बैठे हुए राजा प्रसेनजित कोसल ने भगवान से यह कहा— “भन्ते, यहाँ एकांत में ध्यानमग्न रहने के दौरान मेरे मन में ऐसा विचार उत्पन्न हुआ— ‘किनका अपना आप (स्वयं) रक्षित है और किनका अपना आप अरक्षित है?’ भन्ते, तब मुझे यह विचार आया— ‘जो कोई भी शरीर से दुराचरण करते हैं, वाणी से दुराचरण करते हैं, मन से दुराचरण करते हैं; उनका अपना आप अरक्षित है। भले ही उन्हें हाथी-सेना बचाए, घोड़ा-सेना बचाए, रथ-सेना बचाए या पैदल-सेना बचाए; फिर भी उनका अपना आप अरक्षित ही है। वह किस कारण से? क्योंकि यह बाहरी रक्षा है, यह आंतरिक रक्षा नहीं है; इसलिए उनका अपना आप अरक्षित है। और जो कोई भी शरीर से सुचरित करते हैं, वाणी से सुचरित करते हैं, मन से सुचरित करते हैं; उनका अपना आप रक्षित है। भले ही उन्हें न हाथी-सेना बचाए, न घोड़ा-सेना बचाए, न रथ-सेना बचाए और न पैदल-सेना बचाए; फिर भी उनका अपना आप रक्षित ही है। वह किस कारण से? क्योंकि यह आंतरिक रक्षा है, यह बाहरी रक्षा नहीं है; इसलिए उनका अपना आप रक्षित है’।” ‘‘เอวเมตํ, มหาราช, เอวเมตํ, มหาราช! เย หิ เกจิ, มหาราช, กาเยน ทุจฺจริตํ จรนฺติ…เป… เตสํ อรกฺขิโต อตฺตา. ตํ กิสฺส เหตุ? พาหิรา เหสา, มหาราช, รกฺขา, เนสา รกฺขา อชฺฌตฺติกา; ตสฺมา เตสํ อรกฺขิโต อตฺตา. เย จ โข เกจิ, มหาราช, กาเยน สุจริตํ จรนฺติ, วาจาย สุจริตํ จรนฺติ, มนสา สุจริตํ จรนฺติ; เตสํ รกฺขิโต อตฺตา. กิญฺจาปิ เต เนว หตฺถิกาโย รกฺเขยฺย, น อสฺสกาโย รกฺเขยฺย, น รถกาโย รกฺเขยฺย, น ปตฺติกาโย รกฺเขยฺย; อถ โข เตสํ รกฺขิโต อตฺตา. ตํ กิสฺส เหตุ? อชฺฌตฺติกา เหสา, มหาราช, รกฺขา, เนสา รกฺขา พาหิรา; ตสฺมา เตสํ รกฺขิโต อตฺตา’’ติ. อิทมโวจ…เป… “महाराज, यह ऐसा ही है; महाराज, यह ऐसा ही है! महाराज, जो कोई भी शरीर से दुराचरण करते हैं... (पे)... उनका अपना आप अरक्षित है। वह किस कारण से? महाराज, क्योंकि यह बाहरी रक्षा है, यह आंतरिक रक्षा नहीं है; इसलिए उनका अपना आप अरक्षित है। महाराज, जो कोई भी शरीर से सुचरित करते हैं, वाणी से सुचरित करते हैं, मन से सुचरित करते हैं; उनका अपना आप रक्षित है। भले ही उन्हें न हाथी-सेना बचाए, न घोड़ा-सेना बचाए, न रथ-सेना बचाए और न पैदल-सेना बचाए; फिर भी उनका अपना आप रक्षित ही है। वह किस कारण से? महाराज, क्योंकि यह आंतरिक रक्षा है, यह बाहरी रक्षा नहीं है; इसलिए उनका अपना आप रक्षित है।” भगवान ने यह कहा... (पे)... ‘‘กาเยน สํวโร สาธุ, สาธุ วาจาย สํวโร; มนสา สํวโร สาธุ, สาธุ สพฺพตฺถ สํวโร; สพฺพตฺถ สํวุโต ลชฺชี, รกฺขิโตติ ปวุจฺจตี’’ติ. “शरीर से संयम भला है, वाणी से संयम भला है; मन से संयम भला है, सब प्रकार से संयम भला है; जो सब प्रकार से संयमित और लज्जावान (ह्री-सम्पन्न) है, उसे ही ‘आत्म-रक्षित’ कहा जाता है।” ๖. อปฺปกสุตฺตํ ६. अप्पक सुत्त (अल्पक सुत्त) ๑๑๗. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธ มยฺหํ, ภนฺเต, รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘อปฺปกา เต สตฺตา โลกสฺมึ เย อุฬาเร อุฬาเร โภเค ลภิตฺวา น เจว มชฺชนฺติ, น จ ปมชฺชนฺติ, น จ กาเมสุ เคธํ อาปชฺชนฺติ, น จ สตฺเตสุ วิปฺปฏิปชฺชนฺติ. อถ โข เอเตว พหุตรา สตฺตา โลกสฺมึ เย อุฬาเร อุฬาเร โภเค ลภิตฺวา มชฺชนฺติ เจว ปมชฺชนฺติ, จ กาเมสุ จ เคธํ อาปชฺชนฺติ, สตฺเตสุ จ วิปฺปฏิปชฺชนฺตี’’’ติ. ११७. श्रावस्ती का निदान। एक ओर बैठे हुए राजा प्रसेनजित कोसल ने भगवान से यह कहा— “भन्ते, यहाँ एकांत में ध्यानमग्न रहने के दौरान मेरे मन में ऐसा विचार उत्पन्न हुआ— ‘इस लोक में वे प्राणी थोड़े ही हैं जो प्रचुर और महान भोगों को पाकर न तो मदमत्त होते हैं, न प्रमाद करते हैं, न काम-भोगों में आसक्त होते हैं और न ही प्राणियों के प्रति दुर्व्यवहार करते हैं। बल्कि इस लोक में वे ही प्राणी अधिक हैं जो प्रचुर और महान भोगों को पाकर मदमत्त होते हैं, प्रमाद करते हैं, काम-भोगों में आसक्त होते हैं और प्राणियों के प्रति दुर्व्यवहार करते हैं’।” ‘‘เอวเมตํ, มหาราช, เอวเมตํ, มหาราช! อปฺปกา เต, มหาราช, สตฺตา โลกสฺมึ, เย อุฬาเร อุฬาเร โภเค ลภิตฺวา น เจว มชฺชนฺติ, น จ ปมชฺชนฺติ, น จ กาเมสุ เคธํ อาปชฺชนฺติ, น จ สตฺเตสุ วิปฺปฏิปชฺชนฺติ. อถ โข เอเตว พหุตรา สตฺตา โลกสฺมึ, เย อุฬาเร อุฬาเร โภเค ลภิตฺวา [Pg.74] มชฺชนฺติ เจว ปมชฺชนฺติ จ กาเมสุ จ เคธํ อาปชฺชนฺติ, สตฺเตสุ จ วิปฺปฏิปชฺชนฺตี’’ติ. อิทมโวจ…เป… “महाराज, यह ऐसा ही है; महाराज, यह ऐसा ही है! महाराज, इस लोक में वे प्राणी थोड़े ही हैं जो प्रचुर और महान भोगों को पाकर न तो मदमत्त होते हैं, न प्रमाद करते हैं, न काम-भोगों में आसक्त होते हैं और न ही प्राणियों के प्रति दुर्व्यवहार करते हैं। बल्कि इस लोक में वे ही प्राणी अधिक हैं जो प्रचुर और महान भोगों को पाकर मदमत्त होते हैं, प्रमाद करते हैं, काम-भोगों में आसक्त होते हैं और प्राणियों के प्रति दुर्व्यवहार करते हैं।” भगवान ने यह कहा... (पे)... ‘‘สารตฺตา กามโภเคสุ, คิทฺธา กาเมสุ มุจฺฉิตา; อติสารํ น พุชฺฌนฺติ, มิคา กูฏํว โอฑฺฑิตํ; ปจฺฉาสํ กฏุกํ โหติ, วิปาโก หิสฺส ปาปโก’’ติ. “काम-भोगों में अत्यंत आसक्त, काम-वासनाओं में लुब्ध और मोहित हुए लोग अपनी मर्यादा के उल्लंघन को नहीं जानते, जैसे मृग बिछाए हुए जाल को नहीं जानते; बाद में उनके लिए यह कड़वा होता है, क्योंकि उनका विपाक (फल) पापमय होता है।” ๗. อฑฺฑกรณสุตฺตํ ७. अड्डकरण सुत्त (न्याय-करण सुत्त) ๑๑๘. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธาหํ, ภนฺเต, อฑฺฑกรเณ นิสินฺโน ปสฺสามิ ขตฺติยมหาสาเลปิ พฺราหฺมณมหาสาเลปิ คหปติมหาสาเลปิ อฑฺเฒ มหทฺธเน มหาโภเค ปหูตชาตรูปรชเต ปหูตวิตฺตูปกรเณ ปหูตธนธญฺเญ กามเหตุ กามนิทานํ กามาธิกรณํ สมฺปชานมุสา ภาสนฺเต. ตสฺส มยฺหํ, ภนฺเต, เอตทโหสิ – ‘อลํ ทานิ เม อฑฺฑกรเณน, ภทฺรมุโข ทานิ อฑฺฑกรเณน ปญฺญายิสฺสตี’’’ติ. ११८. श्रावस्ती। एक ओर बैठे हुए कोसल नरेश राजा प्रसेनजित ने भगवान से यह कहा— "भन्ते! यहाँ न्याय-सभा (न्याय करने के स्थान) में बैठे हुए मैं देखता हूँ कि क्षत्रिय महाशाल, ब्राह्मण महाशाल और गृहपति महाशाल, जो समृद्ध, महाधनी, महाभोगी, प्रचुर स्वर्ण-रजत वाले, प्रचुर धन-उपकरण वाले और प्रचुर धन-धान्य वाले हैं, वे काम (इच्छाओं) के हेतु, काम के कारण, काम के आधार पर जान-बूझकर झूठ बोलते हैं। भन्ते! तब मुझे ऐसा विचार आया— 'अब मेरे लिए न्याय करने का क्या लाभ? अब न्याय करने के लिए भद्रमुख (विटूडभ) ही जाना जाएगा'।" ‘‘(เอวเมตํ, มหาราช, เอวเมตํ มหาราช!) เยปิ เต, มหาราช, ขตฺติยมหาสาลา พฺราหฺมณมหาสาลา คหปติมหาสาลา อฑฺฒา มหทฺธนา มหาโภคา ปหูตชาตรูปรชตา ปหูตวิตฺตูปกรณา ปหูตธนธญฺญา กามเหตุ กามนิทานํ กามาธิกรณํ สมฺปชานมุสา ภาสนฺติ; เตสํ ตํ ภวิสฺสติ ทีฆรตฺตํ อหิตาย ทุกฺขายา’’ติ. อิทมโวจ…เป… "महाराज! यह ऐसा ही है, महाराज! यह ऐसा ही है। महाराज! जो वे क्षत्रिय महाशाल, ब्राह्मण महाशाल और गृहपति महाशाल, जो समृद्ध, महाधनी, महाभोगी, प्रचुर स्वर्ण-रजत वाले, प्रचुर धन-उपकरण वाले और प्रचुर धन-धान्य वाले हैं, वे काम के हेतु, काम के कारण, काम के आधार पर जान-बूझकर झूठ बोलते हैं; वह उनके लिए दीर्घकाल तक अहित और दुःख का कारण होगा।" भगवान ने यह कहा... ‘‘สารตฺตา กามโภเคสุ, คิทฺธา กาเมสุ มุจฺฉิตา; อติสารํ น พุชฺฌนฺติ, มจฺฉา ขิปฺปํว โอฑฺฑิตํ; ปจฺฉาสํ กฏุกํ โหติ, วิปาโก หิสฺส ปาปโก’’ติ. "जो काम-भोगों में आसक्त हैं, काम-वासनाओं में लुब्ध और मोहित हैं, वे अपनी मर्यादा के उल्लंघन को नहीं जानते, जैसे मछली बिछाए हुए जाल (के भीतर प्रवेश करते समय) को नहीं जानती। बाद में इसका परिणाम कड़वा होता है, क्योंकि इसका विपाक (फल) बुरा होता है।" ๘. มลฺลิกาสุตฺตํ ८. मल्लिका सुत्त ๑๑๙. สาวตฺถินิทานํ. เตน โข ปน สมเยน ราชา ปเสนทิ โกสโล มลฺลิกาย เทวิยา สทฺธึ อุปริปาสาทวรคโต โหติ. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล มลฺลิกํ เทวึ เอตทโวจ – ‘‘อตฺถิ นุ โข เต, มลฺลิเก, โกจญฺโญ อตฺตนา ปิยตโร’’ติ? ‘‘นตฺถิ โข เม, มหาราช, โกจญฺโญ อตฺตนา ปิยตโร. ตุยฺหํ ปน, มหาราช, อตฺถญฺโญ [Pg.75] โกจิ อตฺตนา ปิยตโร’’ติ? ‘‘มยฺหมฺปิ โข, มลฺลิเก, นตฺถญฺโญ โกจิ อตฺตนา ปิยตโร’’ติ. ११९. श्रावस्ती। उस समय कोसल नरेश राजा प्रसेनजित रानी मल्लिका के साथ महल की ऊपरी छत पर थे। तब राजा प्रसेनजित ने रानी मल्लिका से यह कहा— "मल्लिका! क्या तुम्हें अपने आप से अधिक प्रिय कोई दूसरा है?" "महाराज! मुझे अपने आप से अधिक प्रिय कोई दूसरा नहीं है। और महाराज! क्या आपको अपने आप से अधिक प्रिय कोई दूसरा है?" "मल्लिका! मुझे भी अपने आप से अधिक प्रिय कोई दूसरा नहीं है।" อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ปาสาทา โอโรหิตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธาหํ, ภนฺเต, มลฺลิกาย เทวิยา สทฺธึ อุปริปาสาทวรคโต มลฺลิกํ เทวึ เอตทโวจํ – ‘อตฺถิ นุ โข เต, มลฺลิเก, โกจญฺโญ อตฺตนา ปิยตโร’ติ? เอวํ วุตฺเต, ภนฺเต, มลฺลิกา เทวี มํ เอตทโวจ – ‘นตฺถิ โข เม, มหาราช, โกจญฺโญ อตฺตนา ปิยตโร. ตุยฺหํ ปน, มหาราช, อตฺถญฺโญ โกจิ อตฺตนา ปิยตโร’ติ? เอวํ วุตฺตาหํ, ภนฺเต, มลฺลิกํ เทวึ เอตทโวจํ – ‘มยฺหมฺปิ โข, มลฺลิเก, นตฺถญฺโญ โกจิ อตฺตนา ปิยตโร’’ติ. तब राजा प्रसेनजित महल से उतरकर जहाँ भगवान थे, वहाँ गए; जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए राजा प्रसेनजित ने भगवान से यह कहा— "भन्ते! यहाँ मैं रानी मल्लिका के साथ महल की ऊपरी छत पर था, तब मैंने रानी मल्लिका से यह कहा— 'मल्लिका! क्या तुम्हें अपने आप से अधिक प्रिय कोई दूसरा है?' भन्ते! ऐसा कहने पर रानी मल्लिका ने मुझसे यह कहा— 'महाराज! मुझे अपने आप से अधिक प्रिय कोई दूसरा नहीं है। और महाराज! क्या आपको अपने आप से अधिक प्रिय कोई दूसरा है?' भन्ते! ऐसा कहने पर मैंने रानी मल्लिका से यह कहा— 'मल्लिका! मुझे भी अपने आप से अधिक प्रिय कोई दूसरा नहीं है'।" อถ โข ภควา เอตมตฺถํ วิทิตฺวา ตายํ เวลายํ อิมํ คาถํ อภาสิ – तब भगवान ने इस बात को जानकर उस समय यह गाथा कही— ‘‘สพฺพา ทิสา อนุปริคมฺม เจตสา,เนวชฺฌคา ปิยตรมตฺตนา กฺวจิ; เอวํ ปิโย ปุถุ อตฺตา ปเรสํ,ตสฺมา น หึเส ปรมตฺตกาโม’’ติ. "मन से सभी दिशाओं में खोज लेने पर भी, कहीं भी अपने आप से अधिक प्रिय कोई नहीं मिला। इसी प्रकार अन्य सभी प्राणियों को भी अपना आप (स्वयं) प्रिय है, इसलिए जो अपना भला चाहता है, उसे दूसरों की हिंसा नहीं करनी चाहिए।" ๙. ยญฺญสุตฺตํ ९. यज्ञ सुत्त ๑๒๐. สาวตฺถินิทานํ. เตน โข ปน สมเยน รญฺโญ ปเสนทิสฺส โกสลสฺส มหายญฺโญ ปจฺจุปฏฺฐิโต โหติ, ปญฺจ จ อุสภสตานิ ปญฺจ จ วจฺฉตรสตานิ ปญฺจ จ วจฺฉตริสตานิ ปญฺจ จ อชสตานิ ปญฺจ จ อุรพฺภสตานิ ถูณูปนีตานิ โหนฺติ ยญฺญตฺถาย. เยปิสฺส เต โหนฺติ ทาสาติ วา เปสฺสาติ วา กมฺมกราติ วา, เตปิ ทณฺฑตชฺชิตา ภยตชฺชิตา อสฺสุมุขา รุทมานา ปริกมฺมานิ กโรนฺติ. १२०. श्रावस्ती। उस समय कोसल नरेश राजा प्रसेनजित का एक महायज्ञ आयोजित था। यज्ञ के लिए पाँच सौ बैल, पाँच सौ बछड़े, पाँच सौ बछिया, पाँच सौ बकरे और पाँच सौ मेढ़े खूँटों से बाँधे गए थे। उनके जो दास, दूत या कर्मकार (मजदूर) थे, वे भी दण्ड के भय से और त्रास के कारण आँसू भरे चेहरों के साथ रोते हुए यज्ञ की तैयारियाँ कर रहे थे। อถ โข สมฺพหุลา ภิกฺขู ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สาวตฺถึ ปิณฺฑาย ปวิสึสุ. สาวตฺถิยํ ปิณฺฑาย จริตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺตา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข เต ภิกฺขู ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘อิธ, ภนฺเต, รญฺโญ ปเสนทิสฺส โกสลสฺส มหายญฺโญ ปจฺจุปฏฺฐิโต [Pg.76] โหติ, ปญฺจ จ อุสภสตานิ ปญฺจ จ วจฺฉตรสตานิ ปญฺจ จ วจฺฉตริสตานิ ปญฺจ จ อชสตานิ ปญฺจ จ อุรพฺภสตานิ ถูณูปนีตานิ โหนฺติ ยญฺญตฺถาย. เยปิสฺส เต โหนฺติ ทาสาติ วา เปสฺสาติ วา กมฺมกราติ วา, เตปิ ทณฺฑตชฺชิตา ภยตชฺชิตา อสฺสุมุขา รุทมานา ปริกมฺมานิ กโรนฺตี’’ติ. तब बहुत से भिक्षु पूर्वाह्न समय में पहन-ओढ़कर, पात्र-चीवर लेकर श्रावस्ती में भिक्षा के लिए प्रविष्ट हुए। श्रावस्ती में भिक्षाटन कर, भोजन के पश्चात भिक्षाटन से लौटकर वे जहाँ भगवान थे, वहाँ गए; जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए उन भिक्षुओं ने भगवान से यह कहा— "भन्ते! यहाँ कोसल नरेश राजा प्रसेनजित का एक महायज्ञ आयोजित है। यज्ञ के लिए पाँच सौ बैल, पाँच सौ बछड़े, पाँच सौ बछिया, पाँच सौ बकरे और पाँच सौ मेढ़े खूँटों से बाँधे गए हैं। उनके जो दास, दूत या कर्मकार हैं, वे भी दण्ड के भय से और त्रास के कारण आँसू भरे चेहरों के साथ रोते हुए यज्ञ की तैयारियाँ कर रहे हैं।" อถ โข ภควา เอตมตฺถํ วิทิตฺวา ตายํ เวลายํ อิมา คาถาโย อภาสิ – तब भगवान ने इस बात को जानकर उस समय ये गाथाएँ कहीं— ‘‘อสฺสเมธํ ปุริสเมธํ, สมฺมาปาสํ วาชเปยฺยํ นิรคฺคฬฺหํ; มหายญฺญา มหารมฺภา, น เต โหนฺติ มหปฺผลา. "अश्वमेध, पुरुषमेध, सम्मापास, वाजपेय और निरग्गल—ये बड़े-बड़े आयोजन वाले महायज्ञ महाफलदायी नहीं होते।" ‘‘อเชฬกา จ คาโว จ, วิวิธา ยตฺถ หญฺญเร; น ตํ สมฺมคฺคตา ยญฺญํ, อุปยนฺติ มเหสิโน. "जहाँ बकरे, भेड़ और गायें आदि विभिन्न प्राणी मारे जाते हैं, सम्यक् मार्ग पर चलने वाले महर्षि उस यज्ञ में नहीं जाते।" ‘‘เย จ ยญฺญา นิรารมฺภา, ยชนฺติ อนุกุลํ สทา; อเชฬกา จ คาโว จ, วิวิธา เนตฺถ หญฺญเร; เอตํ สมฺมคฺคตา ยญฺญํ, อุปยนฺติ มเหสิโน. "किन्तु जो यज्ञ हिंसा-रहित (निरारम्भ) होते हैं, जो सदा कुल-परम्परा के अनुसार किए जाते हैं, जहाँ बकरे, भेड़ और गायें आदि विभिन्न प्राणी नहीं मारे जाते, सम्यक् मार्ग पर चलने वाले महर्षि उस यज्ञ में जाते हैं।" ‘‘เอตํ ยเชถ เมธาวี, เอโส ยญฺโญ มหปฺผโล; เอตญฺหิ ยชมานสฺส, เสยฺโย โหติ น ปาปิโย; ยญฺโญ จ วิปุโล โหติ, ปสีทนฺติ จ เทวตา’’ติ. "बुद्धिमान व्यक्ति को ऐसा ही यज्ञ करना चाहिए, यह यज्ञ महाफलदायी होता है। ऐसा यज्ञ करने वाले का कल्याण होता है, बुरा नहीं। यह यज्ञ महान होता है और देवता भी प्रसन्न होते हैं।" ๑๐. พนฺธนสุตฺตํ १०. बन्धन सुत्त ๑๒๑. เตน โข ปน สมเยน รญฺญา ปเสนทินา โกสเลน มหาชนกาโย พนฺธาปิโต โหติ, อปฺเปกจฺเจ รชฺชูหิ อปฺเปกจฺเจ อนฺทูหิ อปฺเปกจฺเจ สงฺขลิกาหิ. १२१. उस समय कोसल नरेश राजा प्रसेनजित ने बहुत से लोगों को बन्दी बना रखा था; कुछ को रस्सियों से, कुछ को हथकड़ियों से और कुछ को लोहे की जंजीरों से।" อถ โข สมฺพหุลา ภิกฺขู ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สาวตฺถึ ปิณฺฑาย ปวิสึสุ. สาวตฺถิยํ ปิณฺฑาย จริตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺตา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘อิธ, ภนฺเต, รญฺญา ปเสนทินา โกสเลน มหาชนกาโย พนฺธาปิโต, อปฺเปกจฺเจ รชฺชูหิ อปฺเปกจฺเจ อนฺทูหิ อปฺเปกจฺเจ สงฺขลิกาหี’’ติ. तब बहुत से भिक्षु प्रातःकाल के समय (चीवर) पहनकर और पात्र-चीवर लेकर श्रावस्ती में भिक्षा के लिए प्रविष्ट हुए। श्रावस्ती में भिक्षाटन करके, भोजन के पश्चात भिक्षाटन से लौटकर वे जहाँ भगवान् थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान् का अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए उन भिक्षुओं ने भगवान् से यह कहा— "भन्ते! यहाँ राजा प्रसेनजित कोसल ने बहुत से लोगों को बंदी बना रखा है; कुछ को रस्सियों से, कुछ को हथकड़ियों से और कुछ को बेड़ियों से।" อถ [Pg.77] โข ภควา เอตมตฺถํ วิทิตฺวา ตายํ เวลายํ อิมา คาถาโย อภาสิ – तब भगवान् ने इस बात को जानकर उस समय ये गाथाएँ कहीं— ‘‘น ตํ ทฬฺหํ พนฺธนมาหุ ธีรา,ยทายสํ ทารุชํ ปพฺพชญฺจ; สารตฺตรตฺตา มณิกุณฺฑเลสุ,ปุตฺเตสุ ทาเรสุ จ ยา อเปกฺขา. "बुद्धिमान लोग उसे सुदृढ़ बंधन नहीं कहते, जो लोहे, लकड़ी या मूँज (रस्सी) से बना हो; (किन्तु) मणिकुंडल (रत्नों के कुंडल), पुत्रों और पत्नियों में जो अत्यधिक आसक्ति और मोह है—" ‘‘เอตํ ทฬฺหํ พนฺธนมาหุ ธีรา,โอหารินํ สิถิลํ ทุปฺปมุญฺจํ; เอตมฺปิ เฉตฺวาน ปริพฺพชนฺติ,อนเปกฺขิโน กามสุขํ ปหายา’’ติ. "—बुद्धिमान लोग उसी को सुदृढ़ बंधन कहते हैं, जो नीचे (दुर्गति की ओर) ले जाने वाला, शिथिल (दिखने वाला) किन्तु कठिनता से छूटने वाला है। इसे भी काटकर, काम-सुख का त्याग कर, मोह-रहित होकर (ज्ञानी) प्रव्रजित हो जाते हैं।" ปฐโม วคฺโค. प्रथम वर्ग। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उदान)— ทหโร ปุริโส ชรา, ปิยํ อตฺตานรกฺขิโต; อปฺปกา อฑฺฑกรณํ, มลฺลิกา ยญฺญพนฺธนนฺติ. डहर, पुरुष, जरा, प्रिय, आत्म-रक्षित, अल्पक, अर्थ-करण, मल्लिका और यज्ञ-बंधन। ๒. ทุติยวคฺโค २. द्वितीय वर्ग ๑. สตฺตชฏิลสุตฺตํ १. सप्त-जटिल सूत्र ๑๒๒. เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ ปุพฺพาราเม มิคารมาตุปาสาเท. เตน โข ปน สมเยน ภควา สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต พหิทฺวารโกฏฺฐเก นิสินฺโน โหติ. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. १२२. एक समय भगवान् श्रावस्ती के पूर्वाराम में मृगारमाता (विशाखा) के प्रासाद में विहार कर रहे थे। उस समय भगवान् सायंकाल के समय ध्यान (प्रतिसंलयन) से उठकर द्वार-कोष्ठक के बाहर बैठे हुए थे। तब राजा प्रसेनजित कोसल जहाँ भगवान् थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान् का अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। เตน โข ปน สมเยน สตฺต จ ชฏิลา สตฺต จ นิคณฺฐา สตฺต จ อเจลกา สตฺต จ เอกสาฏกา สตฺต จ ปริพฺพาชกา ปรูฬฺหกจฺฉนขโลมา ขาริวิวิธมาทาย ภควโต อวิทูเร อติกฺกมนฺติ. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล อุฏฺฐายาสนา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา ทกฺขิณชาณุมณฺฑลํ [Pg.78] ปถวิยํ นิหนฺตฺวา เยน เต สตฺต จ ชฏิลา สตฺต จ นิคณฺฐา สตฺต จ อเจลกา สตฺต จ เอกสาฏกา สตฺต จ ปริพฺพาชกา เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา ติกฺขตฺตุํ นามํ สาเวสิ – ‘‘ราชาหํ, ภนฺเต, ปเสนทิ โกสโล…เป… ราชาหํ, ภนฺเต, ปเสนทิ โกสโล’’ติ. उस समय सात जटिल (जटाधारी), सात निगण्ठ, सात अचेलक, सात एकशाटक और सात परिव्राजक—जिनके काँख के बाल, नाखून और रोम बढ़े हुए थे—विविध प्रकार के तपस्वी-उपकरण लेकर भगवान् के पास से होकर जा रहे थे। तब राजा प्रसेनजित कोसल अपने आसन से उठा, एक कंधे पर उत्तरासंग (चादर) किया, दाहिने घुटने को पृथ्वी पर टिकाया और जहाँ वे सात जटिल, सात निगण्ठ, सात अचेलक, सात एकशाटक और सात परिव्राजक थे, उस ओर हाथ जोड़कर तीन बार अपना नाम सुनाया— "भन्ते! मैं कोसल नरेश प्रसेनजित हूँ... (वही)... भन्ते! मैं कोसल नरेश प्रसेनजित हूँ।" อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล อจิรปกฺกนฺเตสุ เตสุ สตฺตสุ จ ชฏิเลสุ สตฺตสุ จ นิคณฺเฐสุ สตฺตสุ จ อเจลเกสุ สตฺตสุ จ เอกสาฏเกสุ สตฺตสุ จ ปริพฺพาชเกสุ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘เย เต, ภนฺเต, โลเก อรหนฺโต วา อรหตฺตมคฺคํ วา สมาปนฺนา เอเต เตสํ อญฺญตรา’’ติ. तब राजा प्रसेनजित कोसल, उन सातों जटिल, सातों निगण्ठ, सातों अचेलक, सातों एकशाटक और सातों परिव्राजकों के चले जाने के कुछ ही देर बाद जहाँ भगवान् थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान् का अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए राजा प्रसेनजित कोसल ने भगवान् से यह कहा— "भन्ते! संसार में जो अर्हत् हैं या जो अर्हत्-मार्ग पर आरूढ़ हैं, क्या ये (तपस्वी) उनमें से कोई हैं?" ‘‘ทุชฺชานํ โข เอตํ, มหาราช, ตยา คิหินา กามโภคินา ปุตฺตสมฺพาธสยนํ อชฺฌาวสนฺเตน กาสิกจนฺทนํ ปจฺจนุโภนฺเตน มาลาคนฺธวิเลปนํ ธารยนฺเตน ชาตรูปรชตํ สาทิยนฺเตน – ‘อิเม วา อรหนฺโต, อิเม วา อรหตฺตมคฺคํ สมาปนฺนา’’’ติ. "महाराज! आप जैसे गृहस्थ के लिए, जो काम-भोगों का उपभोग करते हैं, पुत्रों से घिरे घर में रहते हैं, काशी के चन्दन का उपयोग करते हैं, माला-गन्ध-विलेपन धारण करते हैं और स्वर्ण-रजत (सोना-चाँदी) स्वीकार करते हैं, यह जानना कठिन है कि— 'ये अर्हत् हैं' या 'ये अर्हत्-मार्ग पर आरूढ़ हैं'।'' ‘‘สํวาเสน โข, มหาราช, สีลํ เวทิตพฺพํ. ตญฺจ โข ทีเฆน อทฺธุนา, น อิตฺตรํ; มนสิกโรตา, โน อมนสิกโรตา; ปญฺญวตา, โน ทุปฺปญฺเญน. สํโวหาเรน โข, มหาราช, โสเจยฺยํ เวทิตพฺพํ. ตญฺจ โข ทีเฆน อทฺธุนา, น อิตฺตรํ; มนสิกโรตา, โน อมนสิกโรตา; ปญฺญวตา, โน ทุปฺปญฺเญน. อาปทาสุ โข, มหาราช, ถาโม เวทิตพฺโพ. โส จ โข ทีเฆน อทฺธุนา, น อิตฺตรํ; มนสิกโรตา, โน อมนสิกโรตา; ปญฺญวตา, โน ทุปฺปญฺเญน. สากจฺฉาย, โข, มหาราช, ปญฺญา เวทิตพฺพา. สา จ โข ทีเฆน อทฺธุนา, น อิตฺตรํ; มนสิกโรตา, โน อมนสิกโรตา; ปญฺญวตา, โน ทุปฺปญฺเญนา’’ติ. "महाराज! साथ रहने से ही शील (चरित्र) का पता चलता है। और वह भी दीर्घकाल तक (साथ रहने पर), न कि थोड़े समय में; ध्यान देने वाले को, न कि ध्यान न देने वाले को; प्रज्ञावान् (बुद्धिमान) को, न कि प्रज्ञाहीन को। महाराज! व्यवहार (बातचीत) से ही शुचिता (पवित्रता) का पता चलता है। और वह भी दीर्घकाल तक, न कि थोड़े समय में; ध्यान देने वाले को, न कि ध्यान न देने वाले को; प्रज्ञावान् को, न कि प्रज्ञाहीन को। महाराज! विपत्तियों में ही सामर्थ्य (धैर्य/बल) का पता चलता है। और वह भी दीर्घकाल तक, न कि थोड़े समय में; ध्यान देने वाले को, न कि ध्यान न देने वाले को; प्रज्ञावान् को, न कि प्रज्ञाहीन को। महाराज! चर्चा (संवाद) से ही प्रज्ञा (बुद्धि) का पता चलता है। और वह भी दीर्घकाल तक, न कि थोड़े समय में; ध्यान देने वाले को, न कि ध्यान न देने वाले को; प्रज्ञावान् को, न कि प्रज्ञाहीन को।" ‘‘อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ ภนฺเต! ยาว สุภาสิตมิทํ, ภนฺเต, ภควตา – ‘ทุชฺชานํ โข เอตํ, มหาราช, ตยา คิหินา กามโภคินา ปุตฺตสมฺพาธสยนํ อชฺฌาวสนฺเตน กาสิกจนฺทนํ ปจฺจนุโภนฺเตน มาลาคนฺธวิเลปนํ ธารยนฺเตน ชาตรูปรชตํ สาทิยนฺเตน – อิเม วา อรหนฺโต, อิเม วา อรหตฺตมคฺคํ สมาปนฺนา’ติ. สํวาเสน โข, มหาราช, สีลํ เวทิตพฺพํ. ตญฺจ โข ทีเฆน อทฺธุนา, น อิตฺตรํ; มนสิกโรตา, โน อมนสิกโรตา; ปญฺญวตา, โน ทุปฺปญฺเญน. สํโวหาเรน โข มหาราช[Pg.79], โสเจยฺยํ เวทิตพฺพํ. ตญฺจ โข ทีเฆน อทฺธุนา, น อิตฺตรํ; มนสิกโรตา, โน อมนสิกโรตา; ปญฺญวตา, โน ทุปฺปญฺเญน. อาปทาสุ โข, มหาราช, ถาโม เวทิตพฺโพ. โส จ โข ทีเฆน อทฺธุนา, น อิตฺตรํ; มนสิกโรตา, โน อมนสิกโรตา; ปญฺญวตา, โน ทุปฺปญฺเญน. สากจฺฉาย โข, มหาราช, ปญฺญา เวทิตพฺพา. สา จ โข ทีเฆน อทฺธุนา, น อิตฺตรํ; มนสิกโรตา, โน อมนสิกโรตา; ปญฺญวตา, โน ทุปฺปญฺเญนา’’ติ. "आश्चर्य है भन्ते! अद्भुत है भन्ते! भगवान् ने यह कितनी अच्छी तरह कहा है— 'महाराज! आप जैसे गृहस्थ के लिए, जो काम-भोगों का उपभोग करते हैं, पुत्रों से घिरे घर में रहते हैं, काशी के चन्दन का उपयोग करते हैं, माला-गन्ध-विलेपन धारण करते हैं और स्वर्ण-रजत स्वीकार करते हैं, यह जानना कठिन है कि— ये अर्हत् हैं या ये अर्हत्-मार्ग पर आरूढ़ हैं। महाराज! साथ रहने से ही शील का पता चलता है। और वह भी दीर्घकाल तक, न कि थोड़े समय में; ध्यान देने वाले को, न कि ध्यान न देने वाले को; प्रज्ञावान् को, न कि प्रज्ञाहीन को। महाराज! व्यवहार से ही शुचिता का पता चलता है। और वह भी दीर्घकाल तक, न कि थोड़े समय में; ध्यान देने वाले को, न कि ध्यान न देने वाले को; प्रज्ञावान् को, न कि प्रज्ञाहीन को। महाराज! विपत्तियों में ही सामर्थ्य का पता चलता है। और वह भी दीर्घकाल तक, न कि थोड़े समय में; ध्यान देने वाले को, न कि ध्यान न देने वाले को; प्रज्ञावान् को, न कि प्रज्ञाहीन को। महाराज! चर्चा से ही प्रज्ञा का पता चलता है। और वह भी दीर्घकाल तक, न कि थोड़े समय में; ध्यान देने वाले को, न कि ध्यान न देने वाले को; प्रज्ञावान् को, न कि प्रज्ञाहीन को'।'' ‘‘เอเต, ภนฺเต, มม ปุริสา จรา โอจรกา ชนปทํ โอจริตฺวา อาคจฺฉนฺติ. เตหิ ปฐมํ โอจิณฺณํ อหํ ปจฺฉา โอสาปยิสฺสามิ. อิทานิ เต, ภนฺเต, ตํ รโชชลฺลํ ปวาเหตฺวา สุนฺหาตา สุวิลิตฺตา กปฺปิตเกสมสฺสู โอทาตวตฺถา ปญฺจหิ กามคุเณหิ สมปฺปิตา สมงฺคีภูตา ปริจาเรสฺสนฺตี’’ติ. “भन्ते! मेरे ये पुरुष, जो गुप्तचर (जासूस) हैं, जनपद की छानबीन करके लौटे हैं। उनके द्वारा पहले की गई जाँच-पड़ताल के बाद मैं बाद में निर्णय लेता हूँ। भन्ते! अब वे पुरुष शरीर की धूल-मिट्टी को धोकर, भली-भाँति स्नान कर, सुगन्धित लेप लगाकर, केश और दाढ़ी को संवारकर, श्वेत वस्त्र धारण कर, पाँचों काम-गुणों से संपन्न होकर आनंद मनाएंगे।” อถ โข ภควา เอตมตฺถํ วิทิตฺวา ตายํ เวลายํ อิมา คาถาโย อภาสิ – तब भगवान ने इस बात को जानकर उस समय ये गाथाएँ कहीं— ‘‘น วณฺณรูเปน นโร สุชาโน,น วิสฺสเส อิตฺตรทสฺสเนน; สุสญฺญตานญฺหิ วิยญฺชเนน,อสญฺญตา โลกมิมํ จรนฺติ. “रूप-रंग (बाहरी आकृति) से मनुष्य को पहचानना सुगम नहीं है, और न ही थोड़े समय के दर्शन मात्र से उस पर विश्वास करना चाहिए। क्योंकि असंयमी लोग भी भली-भाँति संयम रखने वालों के वेश (चिह्नों) को धारण कर इस लोक में विचरण करते हैं। ‘‘ปติรูปโก มตฺติกากุณฺฑโลว,โลหฑฺฒมาโสว สุวณฺณฉนฺโน; จรนฺติ โลเก ปริวารฉนฺนา,อนฺโต อสุทฺธา พหิ โสภมานา’’ติ. जैसे मिट्टी का बना कुंडल सोने के कुंडल जैसा दिखता हो, या ताँबे का आधा माशा सोने की परत से ढका हो; वैसे ही भीतर से अशुद्ध लोग बाहर से शोभायमान होकर और अनुयायियों से घिरे रहकर संसार में घूमते हैं।” ๒. ปญฺจราชสุตฺตํ २. पञ्चराज सुत्त ๑๒๓. สาวตฺถินิทานํ. เตน โข ปน สมเยน ปญฺจนฺนํ ราชูนํ ปเสนทิปมุขานํ ปญฺจหิ กามคุเณหิ สมปฺปิตานํ สมงฺคีภูตานํ ปริจารยมานานํ อยมนฺตรากถา อุทปาทิ – ‘‘กึ นุ โข กามานํ อคฺค’’นฺติ? ตตฺเรกจฺเจ เอวมาหํสุ – ‘‘รูปา กามานํ อคฺค’’นฺติ. เอกจฺเจ เอวมาหํสุ [Pg.80] – ‘‘สทฺทา กามานํ อคฺค’’นฺติ. เอกจฺเจ เอวมาหํสุ – ‘‘คนฺธา กามานํ อคฺค’’นฺติ. เอกจฺเจ เอวมาหํสุ – ‘‘รสา กามานํ อคฺค’’นฺติ. เอกจฺเจ เอวมาหํสุ – ‘‘โผฏฺฐพฺพา กามานํ อคฺค’’นฺติ. ยโต โข เต ราชาโน นาสกฺขึสุ อญฺญมญฺญํ สญฺญาเปตุํ. १२३. श्रावस्ती निदान। उस समय राजा प्रसेनजित की अध्यक्षता में पाँच राजाओं के बीच, जो पाँचों काम-गुणों से संपन्न होकर भोग विलास कर रहे थे, यह चर्चा चली— 'काम-भोगों में सबसे श्रेष्ठ क्या है?' उनमें से कुछ ने कहा— 'रूप काम-भोगों में श्रेष्ठ है।' कुछ ने कहा— 'शब्द काम-भोगों में श्रेष्ठ है।' कुछ ने कहा— 'गंध काम-भोगों में श्रेष्ठ है।' कुछ ने कहा— 'रस काम-भोगों में श्रेष्ठ है।' कुछ ने कहा— 'स्पर्श काम-भोगों में श्रेष्ठ है।' जब वे राजा एक-दूसरे को समझाने में असमर्थ रहे। อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล เต ราชาโน เอตทโวจ – ‘‘อายาม, มาริสา, เยน ภควา เตนุปสงฺกมิสฺสาม; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺฉิสฺสาม. ยถา โน ภควา พฺยากริสฺสติ ตถา นํ ธาเรสฺสามา’’ติ. ‘‘เอวํ, มาริสา’’ติ โข เต ราชาโน รญฺโญ ปเสนทิสฺส โกสลสฺส ปจฺจสฺโสสุํ. तब कोसल नरेश राजा प्रसेनजित ने उन राजाओं से कहा— 'मित्रों! आओ, जहाँ भगवान हैं वहाँ चलें; भगवान के पास जाकर हम इस विषय में पूछेंगे। भगवान हमें जैसा उत्तर देंगे, हम उसे वैसा ही धारण करेंगे।' उन राजाओं ने कोसल नरेश राजा प्रसेनजित की बात स्वीकार करते हुए कहा— 'ठीक है, मित्र!' อถ โข เต ปญฺจ ราชาโน ปเสนทิปมุขา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธ, ภนฺเต, อมฺหากํ ปญฺจนฺนํ ราชูนํ ปญฺจหิ กามคุเณหิ สมปฺปิตานํ สมงฺคีภูตานํ ปริจารยมานานํ อยมนฺตรากถา อุทปาทิ – ‘กึ นุ โข กามานํ อคฺค’นฺติ? เอกจฺเจ เอวมาหํสุ – ‘รูปา กามานํ อคฺค’นฺติ. เอกจฺเจ เอวมาหํสุ – ‘สทฺทา กามานํ อคฺค’นฺติ. เอกจฺเจ เอวมาหํสุ – ‘คนฺธา กามานํ อคฺค’นฺติ. เอกจฺเจ เอวมาหํสุ – ‘รสา กามานํ อคฺค’นฺติ. เอกจฺเจ เอวมาหํสุ – ‘โผฏฺฐพฺพา กามานํ อคฺค’นฺติ. กึ นุ โข, ภนฺเต, กามานํ อคฺค’’นฺติ? तब प्रसेनजित आदि वे पाँचों राजा जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान का अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए राजा प्रसेनजित ने भगवान से यह कहा— 'भन्ते! यहाँ हम पाँच राजाओं के बीच, जो पाँचों काम-गुणों से संपन्न होकर भोग विलास कर रहे थे, यह चर्चा चली— 'काम-भोगों में सबसे श्रेष्ठ क्या है?' कुछ ने कहा— 'रूप काम-भोगों में श्रेष्ठ है।' कुछ ने कहा— 'शब्द काम-भोगों में श्रेष्ठ है।' कुछ ने कहा— 'गंध काम-भोगों में श्रेष्ठ है।' कुछ ने कहा— 'रस काम-भोगों में श्रेष्ठ है।' कुछ ने कहा— 'स्पर्श काम-भोगों में श्रेष्ठ है।' भन्ते! काम-भोगों में सबसे श्रेष्ठ क्या है?' ‘‘มนาปปริยนฺตํ ขฺวาหํ, มหาราช, ปญฺจสุ กามคุเณสุ อคฺคนฺติ วทามิ. เตว, มหาราช, รูปา เอกจฺจสฺส มนาปา โหนฺติ, เตว รูปา เอกจฺจสฺส อมนาปา โหนฺติ. เยหิ จ โย รูเปหิ อตฺตมโน โหติ ปริปุณฺณสงฺกปฺโป, โส เตหิ รูเปหิ อญฺญํ รูปํ อุตฺตริตรํ วา ปณีตตรํ วา น ปตฺเถติ. เต ตสฺส รูปา ปรมา โหนฺติ. เต ตสฺส รูปา อนุตฺตรา โหนฺติ. “महाराज! मैं पाँचों काम-गुणों में उसे ही श्रेष्ठ कहता हूँ जो मन को प्रिय लगने की पराकाष्ठा (अंतिम सीमा) हो। महाराज! वे ही रूप किसी के लिए प्रिय होते हैं और वे ही रूप किसी दूसरे के लिए अप्रिय होते हैं। जो व्यक्ति जिन रूपों से संतुष्ट और पूर्ण-संकल्प वाला होता है, वह उन रूपों से बढ़कर किसी अन्य श्रेष्ठ या उत्तम रूप की इच्छा नहीं करता। उसके लिए वे ही रूप परम (श्रेष्ठ) होते हैं, उसके लिए वे ही रूप अनुपम होते हैं। ‘‘เตว, มหาราช, สทฺทา เอกจฺจสฺส มนาปา โหนฺติ, เตว สทฺทา เอกจฺจสฺส อมนาปา โหนฺติ. เยหิ จ โย สทฺเทหิ อตฺตมโน โหติ ปริปุณฺณสงฺกปฺโป, โส เตหิ สทฺเทหิ อญฺญํ สทฺทํ อุตฺตริตรํ วา [Pg.81] ปณีตตรํ วา น ปตฺเถติ. เต ตสฺส สทฺทา ปรมา โหนฺติ. เต ตสฺส สทฺทา อนุตฺตรา โหนฺติ. महाराज! वे ही शब्द किसी के लिए प्रिय होते हैं और वे ही शब्द किसी दूसरे के लिए अप्रिय होते हैं। जो व्यक्ति जिन शब्दों से संतुष्ट और पूर्ण-संकल्प वाला होता है, वह उन शब्दों से बढ़कर किसी अन्य श्रेष्ठ या उत्तम शब्द की इच्छा नहीं करता। उसके लिए वे ही शब्द परम होते हैं, उसके लिए वे ही शब्द अनुपम होते हैं। ‘‘เตว, มหาราช, คนฺธา เอกจฺจสฺส มนาปา โหนฺติ, เตว คนฺธา เอกจฺจสฺส อมนาปา โหนฺติ. เยหิ จ โย คนฺเธหิ อตฺตมโน โหติ ปริปุณฺณสงฺกปฺโป, โส เตหิ คนฺเธหิ อญฺญํ คนฺธํ อุตฺตริตรํ วา ปณีตตรํ วา น ปตฺเถติ. เต ตสฺส คนฺธา ปรมา โหนฺติ. เต ตสฺส คนฺธา อนุตฺตรา โหนฺติ. महाराज! वे ही गंध किसी के लिए प्रिय होते हैं और वे ही गंध किसी दूसरे के लिए अप्रिय होते हैं। जो व्यक्ति जिन गंधों से संतुष्ट और पूर्ण-संकल्प वाला होता है, वह उन गंधों से बढ़कर किसी अन्य श्रेष्ठ या उत्तम गंध की इच्छा नहीं करता। उसके लिए वे ही गंध परम होते हैं, उसके लिए वे ही गंध अनुपम होते हैं। ‘‘เตว, มหาราช, รสา เอกจฺจสฺส มนาปา โหนฺติ, เตว รสา เอกจฺจสฺส อมนาปา โหนฺติ. เยหิ จ โย รเสหิ อตฺตมโน โหติ ปริปุณฺณสงฺกปฺโป, โส เตหิ รเสหิ อญฺญํ รสํ อุตฺตริตรํ วา ปณีตตรํ วา น ปตฺเถติ. เต ตสฺส รสา ปรมา โหนฺติ. เต ตสฺส รสา อนุตฺตรา โหนฺติ. महाराज! वे ही रस किसी के लिए प्रिय होते हैं और वे ही रस किसी दूसरे के लिए अप्रिय होते हैं। जो व्यक्ति जिन रसों से संतुष्ट और पूर्ण-संकल्प वाला होता है, वह उन रसों से बढ़कर किसी अन्य श्रेष्ठ या उत्तम रस की इच्छा नहीं करता। उसके लिए वे ही रस परम होते हैं, उसके लिए वे ही रस अनुपम होते हैं। ‘‘เตว, มหาราช, โผฏฺฐพฺพา เอกจฺจสฺส มนาปา โหนฺติ, เตว โผฏฺฐพฺพา เอกจฺจสฺส อมนาปา โหนฺติ. เยหิ จ โย โผฏฺฐพฺเพหิ อตฺตมโน โหติ ปริปุณฺณสงฺกปฺโป, โส เตหิ โผฏฺฐพฺเพหิ อญฺญํ โผฏฺฐพฺพํ อุตฺตริตรํ วา ปณีตตรํ วา น ปตฺเถติ. เต ตสฺส โผฏฺฐพฺพา ปรมา โหนฺติ. เต ตสฺส โผฏฺฐพฺพา อนุตฺตรา โหนฺตี’’ติ. महाराज! वे ही स्पर्श किसी के लिए प्रिय होते हैं और वे ही स्पर्श किसी दूसरे के लिए अप्रिय होते हैं। जो व्यक्ति जिन स्पर्शों से संतुष्ट और पूर्ण-संकल्प वाला होता है, वह उन स्पर्शों से बढ़कर किसी अन्य श्रेष्ठ या उत्तम स्पर्श की इच्छा नहीं करता। उसके लिए वे ही स्पर्श परम होते हैं, उसके लिए वे ही स्पर्श अनुपम होते हैं।” เตน โข ปน สมเยน จนฺทนงฺคลิโก อุปาสโก ตสฺสํ ปริสายํ นิสินฺโน โหติ. อถ โข จนฺทนงฺคลิโก อุปาสโก อุฏฺฐายาสนา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา เยน ภควา เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ปฏิภาติ มํ ภควา, ปฏิภาติ มํ สุคตา’’ติ. ‘‘ปฏิภาตุ ตํ จนฺทนงฺคลิกา’’ติ ภควา อโวจ. उस समय चन्दनङ्गलिका नामक उपासक उस सभा में बैठा था। तब चन्दनङ्गलिका उपासक अपने आसन से उठा, एक कंधे पर उत्तरासंग (चादर) किया और जहाँ भगवान थे वहाँ हाथ जोड़कर भगवान से यह कहा— 'भन्ते! मुझे कुछ सूझ रहा है, सुगत! मुझे कुछ सूझ रहा है।' भगवान ने कहा— 'चन्दनङ्गलिका! तुम्हें जो सूझ रहा है, वह कहो।' อถ โข จนฺทนงฺคลิโก อุปาสโก ภควโต สมฺมุขา ตทนุรูปาย คาถาย อภิตฺถวิ – तब चन्दनङ्गलिका उपासक ने भगवान के सम्मुख उनके अनुरूप गाथा द्वारा उनकी स्तुति की— ‘‘ปทุมํ ยถา โกกนทํ สุคนฺธํ,ปาโต สิยา ผุลฺลมวีตคนฺธํ; องฺคีรสํ ปสฺส วิโรจมานํ,ตปนฺตมาทิจฺจมิวนฺตลิกฺเข’’ติ. “जैसे सुगंधित कोकनद (लाल) कमल प्रातःकाल खिला हुआ और सुगंध से भरपूर होता है, वैसे ही आकाश में तपते हुए सूर्य के समान देदीप्यमान अंगीरस (भगवान बुद्ध) को देखो।” อถ [Pg.82] โข เต ปญฺจ ราชาโน จนฺทนงฺคลิกํ อุปาสกํ ปญฺจหิ อุตฺตราสงฺเคหิ อจฺฉาเทสุํ. อถ โข จนฺทนงฺคลิโก อุปาสโก เตหิ ปญฺจหิ อุตฺตราสงฺเคหิ ภควนฺตํ อจฺฉาเทสีติ. तब उन पाँच राजाओं ने चन्दनङ्गलिका उपासक को पाँच उत्तरीय वस्त्रों (दुपट्टों) से आच्छादित किया (भेंट दिए)। तब चन्दनङ्गलिका उपासक ने उन पाँच उत्तरीय वस्त्रों से भगवान को आच्छादित किया। ๓. โทณปากสุตฺตํ ३. दोणपाक सुत्त ๑๒๔. สาวตฺถินิทานํ. เตน โข ปน สมเยน ราชา ปเสนทิ โกสโล โทณปากกุรํ ภุญฺชติ. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ภุตฺตาวี มหสฺสาสี เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. १२४. श्रावस्ती निदान। उस समय कोसल नरेश राजा प्रसेनजित एक द्रोण (माप) चावल का भोजन करते थे। तब राजा प्रसेनजित भोजन करने के बाद, भारी साँसें लेते हुए (भोजन की अधिकता के कारण), जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। อถ โข ภควา ราชานํ ปเสนทึ โกสลํ ภุตฺตาวึ มหสฺสาสึ วิทิตฺวา ตายํ เวลายํ อิมํ คาถํ อภาสิ – तब भगवान ने राजा प्रसेनजित को भोजन कर चुके और भारी साँसें लेते हुए जानकर, उस समय यह गाथा कही – ‘‘มนุชสฺส สทา สตีมโต,มตฺตํ ชานโต ลทฺธโภชเน; ตนุกสฺส ภวนฺติ เวทนา,สณิกํ ชีรติ อายุปาลย’’นฺติ. "जो मनुष्य सदा स्मृतिमान (सजग) रहता है और प्राप्त भोजन की मात्रा को जानता है, उसकी वेदनाएँ (कष्ट) कम हो जाती हैं, और उसका भोजन आयु की रक्षा करते हुए धीरे-धीरे पचता है।" เตน โข ปน สมเยน สุทสฺสโน มาณโว รญฺโญ ปเสนทิสฺส โกสลสฺส ปิฏฺฐิโต ฐิโต โหติ. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล สุทสฺสนํ มาณวํ อามนฺเตสิ – ‘‘เอหิ ตฺวํ, ตาต สุทสฺสน, ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ ปริยาปุณิตฺวา มม ภตฺตาภิหาเร (ภตฺตาภิหาเร) ภาส. อหญฺจ เต เทวสิกํ กหาปณสตํ (กหาปณสตํ) นิจฺจํ ภิกฺขํ ปวตฺตยิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ เทวา’’ติ โข สุทสฺสโน มาณโว รญฺโญ ปเสนทิสฺส โกสลสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ ปริยาปุณิตฺวา รญฺโญ ปเสนทิสฺส โกสลสฺส ภตฺตาภิหาเร สุทํ ภาสติ – उस समय सुदर्शन नामक युवक राजा प्रसेनजित के पीछे खड़ा था। तब राजा प्रसेनजित ने सुदर्शन युवक को संबोधित किया – "आओ तात सुदर्शन, भगवान के पास जाकर इस गाथा को सीख लो और मेरे भोजन के समय (हर बार) इसे सुनाओ। मैं तुम्हें प्रतिदिन सौ कार्षापण (मुद्राएँ) नियमित रूप से दूँगा।" सुदर्शन युवक ने "जी देव" कहकर राजा प्रसेनजित की आज्ञा स्वीकार की और भगवान के पास जाकर उस गाथा को सीखा, और राजा प्रसेनजित के भोजन के समय उसे सुनाने लगा – ‘‘มนุชสฺส สทา สตีมโต,มตฺตํ ชานโต ลทฺธโภชเน; ตนุกสฺส ภวนฺติ เวทนา,สณิกํ ชีรติ อายุปาลย’’นฺติ. "जो मनुष्य सदा स्मृतिमान रहता है और प्राप्त भोजन की मात्रा को जानता है, उसकी वेदनाएँ कम हो जाती हैं, और उसका भोजन आयु की रक्षा करते हुए धीरे-धीरे पचता है।" อถ [Pg.83] โข ราชา ปเสนทิ โกสโล อนุปุพฺเพน นาฬิโกทนปรมตาย สณฺฐาสิ. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล อปเรน สมเยน สุสลฺลิขิตคตฺโต ปาณินา คตฺตานิ อนุมชฺชนฺโต ตายํ เวลายํ อิมํ อุทานํ อุทาเนสิ – ‘‘อุภเยน วต มํ โส ภควา อตฺเถน อนุกมฺปิ – ทิฏฺฐธมฺมิเกน เจว อตฺเถน สมฺปรายิเกน จา’’ติ. तब राजा प्रसेनजित धीरे-धीरे एक नाली (माप) चावल की मात्रा पर स्थिर हो गए। बाद में, जब उनका शरीर सुगठित (दुबला) हो गया, तो अपने अंगों को हाथ से सहलाते हुए उन्होंने उस समय यह उदान (हर्षोद्गार) प्रकट किया – "निश्चित ही उन भगवान ने मेरा दोनों प्रकार के अर्थों (हितों) से अनुग्रह किया है – इहलौकिक (वर्तमान जीवन के) हित से और पारलौकिक (परलोक के) हित से भी।" ๔. ปฐมสงฺคามสุตฺตํ ४. प्रथम संग्राम सुत्त ๑๒๕. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข ราชา มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต จตุรงฺคินึ เสนํ สนฺนยฺหิตฺวา ราชานํ ปเสนทึ โกสลํ อพฺภุยฺยาสิ เยน กาสิ. อสฺโสสิ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล – ‘‘ราชา กิร มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต จตุรงฺคินึ เสนํ สนฺนยฺหิตฺวา มมํ อพฺภุยฺยาโต เยน กาสี’’ติ. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล จตุรงฺคินึ เสนํ สนฺนยฺหิตฺวา ราชานํ มาคธํ อชาตสตฺตุํ เวเทหิปุตฺตํ ปจฺจุยฺยาสิ เยน กาสิ. อถ โข ราชา จ มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต ราชา จ ปเสนทิ โกสโล สงฺคาเมสุํ. ตสฺมึ โข ปน สงฺคาเม ราชา มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต ราชานํ ปเสนทึ โกสลํ ปราเชสิ. ปราชิโต จ ราชา ปเสนทิ โกสโล สกเมว ราชธานึ สาวตฺถึ ปจฺจุยฺยาสิ. १२५. श्रावस्ती निदान। तब मगध नरेश वैदेहीपुत्र अजातशत्रु ने चतुरंगिणी सेना तैयार की और राजा प्रसेनजित के विरुद्ध काशी की ओर चढ़ाई कर दी। राजा प्रसेनजित ने सुना – "मगध नरेश वैदेहीपुत्र अजातशत्रु चतुरंगिणी सेना लेकर मुझ पर काशी की ओर चढ़ाई कर रहा है।" तब राजा प्रसेनजित ने भी चतुरंगिणी सेना तैयार की और मगध नरेश वैदेहीपुत्र अजातशत्रु का सामना करने के लिए काशी की ओर प्रस्थान किया। तब मगध नरेश वैदेहीपुत्र अजातशत्रु और राजा प्रसेनजित के बीच युद्ध हुआ। उस युद्ध में मगध नरेश वैदेहीपुत्र अजातशत्रु ने राजा प्रसेनजित को पराजित कर दिया। पराजित होकर राजा प्रसेनजित अपनी राजधानी श्रावस्ती लौट आए। อถ โข สมฺพหุลา ภิกฺขู ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สาวตฺถึ ปิณฺฑาย ปวิสึสุ. สาวตฺถิยํ ปิณฺฑาย จริตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺตา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – तब बहुत से भिक्षु पूर्वाह्न के समय निवसन (अधोवस्त्र) पहनकर, पात्र और चीवर लेकर श्रावस्ती में भिक्षा के लिए प्रविष्ट हुए। श्रावस्ती में भिक्षाटन कर, भोजन के पश्चात भिक्षाटन से लौटकर वे जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए उन भिक्षुओं ने भगवान से यह कहा – ‘‘อิธ, ภนฺเต, ราชา มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต จตุรงฺคินึ เสนํ สนฺนยฺหิตฺวา ราชานํ ปเสนทึ โกสลํ อพฺภุยฺยาสิ เยน กาสิ. อสฺโสสิ โข, ภนฺเต, ราชา ปเสนทิ โกสโล – ‘ราชา กิร มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต จตุรงฺคินึ เสนํ สนฺนยฺหิตฺวา มมํ อพฺภุยฺยาโต เยน กาสี’ติ. อถ โข, ภนฺเต, ราชา ปเสนทิ โกสโล [Pg.84] จตุรงฺคินึ เสนํ สนฺนยฺหิตฺวา ราชานํ มาคธํ อชาตสตฺตุํ เวเทหิปุตฺตํ ปจฺจุยฺยาสิ เยน กาสิ. อถ โข, ภนฺเต, ราชา จ มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต ราชา จ ปเสนทิ โกสโล สงฺคาเมสุํ. ตสฺมึ โข ปน, ภนฺเต, สงฺคาเม ราชา มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต ราชานํ ปเสนทึ โกสลํ ปราเชสิ. ปราชิโต จ, ภนฺเต, ราชา ปเสนทิ โกสโล สกเมว ราชธานึ สาวตฺถึ ปจฺจุยฺยาสี’’ติ. "भन्ते! यहाँ मगध नरेश वैदेहीपुत्र अजातशत्रु ने चतुरंगिणी सेना तैयार कर राजा प्रसेनजित के विरुद्ध काशी की ओर चढ़ाई की है। भन्ते! राजा प्रसेनजित ने सुना – 'मगध नरेश वैदेहीपुत्र अजातशत्रु चतुरंगिणी सेना लेकर मुझ पर काशी की ओर चढ़ाई कर रहा है।' तब भन्ते! राजा प्रसेनजित ने चतुरंगिणी सेना तैयार कर मगध नरेश वैदेहीपुत्र अजातशत्रु का सामना करने के लिए काशी की ओर प्रस्थान किया। भन्ते! तब मगध नरेश वैदेहीपुत्र अजातशत्रु और राजा प्रसेनजित के बीच युद्ध हुआ। भन्ते! उस युद्ध में मगध नरेश वैदेहीपुत्र अजातशत्रु ने राजा प्रसेनजित को पराजित कर दिया। और भन्ते! पराजित राजा प्रसेनजित अपनी राजधानी श्रावस्ती लौट आए हैं।" ‘‘ราชา, ภิกฺขเว, มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต ปาปมิตฺโต ปาปสหาโย ปาปสมฺปวงฺโก; ราชา จ โข, ภิกฺขเว, ปเสนทิ โกสโล กลฺยาณมิตฺโต กลฺยาณสหาโย กลฺยาณสมฺปวงฺโก. อชฺเชว, ภิกฺขเว, ราชา ปเสนทิ โกสโล อิมํ รตฺตึ ทุกฺขํ เสติ ปราชิโต’’ติ. อิทมโวจ…เป… "भिक्षुओं! मगध नरेश वैदेहीपुत्र अजातशत्रु पाप-मित्रों वाला, पाप-सहयोगियों वाला और पापियों की ओर झुकाव रखने वाला है; जबकि भिक्षुओं! राजा प्रसेनजित कल्याण-मित्रों वाला, कल्याण-सहयोगियों वाला और कल्याणकारी पुरुषों की ओर झुकाव रखने वाला है। भिक्षुओं! आज राजा प्रसेनजित पराजित होकर इस रात बड़े दुःख के साथ सोएंगे।" भगवान ने यह कहा... ‘‘ชยํ เวรํ ปสวติ, ทุกฺขํ เสติ ปราชิโต; อุปสนฺโต สุขํ เสติ, หิตฺวา ชยปราชย’’นฺติ. "विजय वैर (शत्रुता) को जन्म देती है, पराजित व्यक्ति दुःख से सोता है; जो शांत है, वह जय और पराजय दोनों को त्याग कर सुख से सोता है।" ๕. ทุติยสงฺคามสุตฺตํ ५. द्वितीय संग्राम सुत्त ๑๒๖. อถ โข ราชา มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต จตุรงฺคินึ เสนํ สนฺนยฺหิตฺวา ราชานํ ปเสนทึ โกสลํ อพฺภุยฺยาสิ เยน กาสิ. อสฺโสสิ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล – ‘‘ราชา กิร มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต จตุรงฺคินึ เสนํ สนฺนยฺหิตฺวา มมํ อพฺภุยฺยาโต เยน กาสี’’ติ. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล จตุรงฺคินึ เสนํ สนฺนยฺหิตฺวา ราชานํ มาคธํ อชาตสตฺตุํ เวเทหิปุตฺตํ ปจฺจุยฺยาสิ เยน กาสิ. อถ โข ราชา จ มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต ราชา จ ปเสนทิ โกสโล สงฺคาเมสุํ. ตสฺมึ โข ปน สงฺคาเม ราชา ปเสนทิ โกสโล ราชานํ มาคธํ อชาตสตฺตุํ เวเทหิปุตฺตํ ปราเชสิ, ชีวคฺคาหญฺจ นํ อคฺคเหสิ. อถ โข รญฺโญ ปเสนทิสฺส โกสลสฺส เอตทโหสิ – ‘‘กิญฺจาปิ โข มฺยายํ [Pg.85] ราชา มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต อทุพฺภนฺตสฺส ทุพฺภติ, อถ จ ปน เม ภาคิเนยฺโย โหติ. ยํนูนาหํ รญฺโญ มาคธสฺส อชาตสตฺตุโน เวเทหิปุตฺตสฺส สพฺพํ หตฺถิกายํ ปริยาทิยิตฺวา สพฺพํ อสฺสกายํ ปริยาทิยิตฺวา สพฺพํ รถกายํ ปริยาทิยิตฺวา สพฺพํ ปตฺติกายํ ปริยาทิยิตฺวา ชีวนฺตเมว นํ โอสชฺเชยฺย’’นฺติ. १२६. तब मगध के राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रु ने चतुरंगिणी सेना तैयार कर कोसल के राजा प्रसेनजित पर आक्रमण करने के लिए काशी की ओर प्रस्थान किया। कोसल के राजा प्रसेनजित ने सुना— "मगध का राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रु चतुरंगिणी सेना तैयार कर मुझ पर आक्रमण करने के लिए काशी की ओर आ रहा है।" तब कोसल के राजा प्रसेनजित ने भी चतुरंगिणी सेना तैयार की और मगध के राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रु का सामना करने के लिए काशी की ओर प्रस्थान किया। तब मगध के राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रु और कोसल के राजा प्रसेनजित के बीच युद्ध हुआ। उस युद्ध में कोसल के राजा प्रसेनजित ने मगध के राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रु को पराजित किया और उसे जीवित बंदी बना लिया। तब कोसल के राजा प्रसेनजित के मन में यह विचार आया— "यद्यपि मगध का यह राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रु मुझ जैसे अद्रोही (अपराध न करने वाले) के प्रति द्रोह करता है, फिर भी वह मेरा भांजा है। क्यों न मैं मगध के राजा अजातशत्रु की संपूर्ण हस्ती-सेना, अश्व-सेना, रथ-सेना और पैदल-सेना को जब्त कर उसे जीवित ही छोड़ दूँ?" อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล รญฺโญ มาคธสฺส อชาตสตฺตุโน เวเทหิปุตฺตสฺส สพฺพํ หตฺถิกายํ ปริยาทิยิตฺวา สพฺพํ อสฺสกายํ ปริยาทิยิตฺวา สพฺพํ รถกายํ ปริยาทิยิตฺวา สพฺพํ ปตฺติกายํ ปริยาทิยิตฺวา ชีวนฺตเมว นํ โอสชฺชิ. तब कोसल के राजा प्रसेनजित ने मगध के राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रु की संपूर्ण हस्ती-सेना, अश्व-सेना, रथ-सेना और पैदल-सेना को जब्त कर उसे जीवित ही छोड़ दिया। อถ โข สมฺพหุลา ภิกฺขู ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สาวตฺถึ ปิณฺฑาย ปวิสึสุ. สาวตฺถิยํ ปิณฺฑาย จริตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺตา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – तब बहुत से भिक्षु पूर्वाह्न समय में निवसन (अधोवस्त्र) पहनकर, पात्र और चीवर लेकर श्रावस्ती में भिक्षा के लिए प्रविष्ट हुए। श्रावस्ती में भिक्षाटन कर, भोजन के पश्चात भिक्षाटन से लौटकर वे जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए उन भिक्षुओं ने भगवान से यह कहा— ‘‘อิธ, ภนฺเต, ราชา มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต จตุรงฺคินึ เสนํ สนฺนยฺหิตฺวา ราชานํ ปเสนทึ โกสลํ อพฺภุยฺยาสิ เยน กาสิ. อสฺโสสิ โข, ภนฺเต, ราชา ปเสนทิ โกสโล – ‘ราชา กิร มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต จตุรงฺคินึ เสนํ สนฺนยฺหิตฺวา มมํ อพฺภุยฺยาโต เยน กาสี’ติ. อถ โข, ภนฺเต, ราชา ปเสนทิ โกสโล จตุรงฺคินึ เสนํ สนฺนยฺหิตฺวา ราชานํ มาคธํ อชาตสตฺตุํ เวเทหิปุตฺตํ ปจฺจุยฺยาสิ เยน กาสิ. อถ โข, ภนฺเต, ราชา จ มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต ราชา จ ปเสนทิ โกสโล สงฺคาเมสุํ. ตสฺมึ โข ปน, ภนฺเต, สงฺคาเม ราชา ปเสนทิ โกสโล ราชานํ มาคธํ อชาตสตฺตุํ เวเทหิปุตฺตํ ปราเชสิ, ชีวคฺคาหญฺจ นํ อคฺคเหสิ. อถ โข, ภนฺเต, รญฺโญ ปเสนทิสฺส โกสลสฺส เอตทโหสิ – ‘กิญฺจาปิ โข มฺยายํ ราชา มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต อทุพฺภนฺตสฺส ทุพฺภติ, อถ จ ปน เม ภาคิเนยฺโย โหติ. ยํนูนาหํ รญฺโญ มาคธสฺส อชาตสตฺตุโน เวเทหิปุตฺตสฺส สพฺพํ หตฺถิกายํ ปริยาทิยิตฺวา สพฺพํ อสฺสกายํ สพฺพํ รถกายํ สพฺพํ ปตฺติกายํ ปริยาทิยิตฺวา ชีวนฺตเมว นํ โอสชฺเชยฺย’’’นฺติ. "भन्ते! यहाँ मगध के राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रु ने चतुरंगिणी सेना तैयार कर कोसल के राजा प्रसेनजित पर आक्रमण करने के लिए काशी की ओर प्रस्थान किया था। भन्ते! कोसल के राजा प्रसेनजित ने सुना— 'मगध का राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रु चतुरंगिणी सेना तैयार कर मुझ पर आक्रमण करने के लिए काशी की ओर आ रहा है।' तब भन्ते! कोसल के राजा प्रसेनजित ने भी चतुरंगिणी सेना तैयार की और मगध के राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रु का सामना करने के लिए काशी की ओर प्रस्थान किया। तब भन्ते! मगध के राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रु और कोसल के राजा प्रसेनजित के बीच युद्ध हुआ। भन्ते! उस युद्ध में कोसल के राजा प्रसेनजित ने मगध के राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रु को पराजित किया और उसे जीवित बंदी बना लिया। तब भन्ते! कोसल के राजा प्रसेनजित के मन में यह विचार आया— 'यद्यपि मगध का यह राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रु मुझ जैसे अद्रोही के प्रति द्रोह करता है, फिर भी वह मेरा भांजा है। क्यों न मैं मगध के राजा अजातशत्रु की संपूर्ण हस्ती-सेना, अश्व-सेना, रथ-सेना और पैदल-सेना को जब्त कर उसे जीवित ही छोड़ दूँ?'" ‘‘อถ [Pg.86] โข, ภนฺเต, ราชา ปเสนทิ โกสโล รญฺโญ มาคธสฺส อชาตสตฺตุโน เวเทหิปุตฺตสฺส สพฺพํ หตฺถิกายํ ปริยาทิยิตฺวา สพฺพํ อสฺสกายํ ปริยาทิยิตฺวา สพฺพํ รถกายํ ปริยาทิยิตฺวา สพฺพํ ปตฺติกายํ ปริยาทิยิตฺวา ชีวนฺตเมว นํ โอสชฺชี’’ติ. อถ โข ภควา เอตมตฺถํ วิทิตฺวา ตายํ เวลายํ อิมา คาถาโย อภาสิ – "तब भन्ते! कोसल के राजा प्रसेनजित ने मगध के राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रु की संपूर्ण हस्ती-सेना, अश्व-सेना, रथ-सेना और पैदल-सेना को जब्त कर उसे जीवित ही छोड़ दिया।" तब भगवान ने इस बात को जानकर उस समय ये गाथाएँ कहीं— ‘‘วิลุมฺปเตว ปุริโส, ยาวสฺส อุปกปฺปติ; ยทา จญฺเญ วิลุมฺปนฺติ, โส วิลุตฺโต วิลุปฺปติ. "मनुष्य तब तक ही लूटता है, जब तक उसे सफलता मिलती है; किन्तु जब दूसरे उसे लूटते हैं, तब वह लुटा हुआ व्यक्ति स्वयं भी लूटा जाता है।" ‘‘ฐานญฺหิ มญฺญติ พาโล, ยาว ปาปํ น ปจฺจติ; ยทา จ ปจฺจติ ปาปํ, อถ ทุกฺขํ นิคจฺฉติ. "मूर्ख व्यक्ति तब तक (पाप को) अवसर मानता है, जब तक पाप का फल नहीं पकता; किन्तु जब पाप का फल पकता है, तब वह दुःख को प्राप्त होता है।" ‘‘หนฺตา ลภติ หนฺตารํ, เชตารํ ลภเต ชยํ; อกฺโกสโก จ อกฺโกสํ, โรเสตารญฺจ โรสโก; อถ กมฺมวิวฏฺเฏน, โส วิลุตฺโต วิลุปฺปตี’’ติ. "वध करने वाला वध करने वाले को प्राप्त करता है, जीतने वाला जीतने वाले को प्राप्त करता है; गाली देने वाला गाली को और क्रोध करने वाला क्रोध को प्राप्त करता है। इस प्रकार कर्म के विपाक से लूटने वाला स्वयं भी लूटा जाता है।" ๖. มลฺลิกาสุตฺตํ ६. मल्लिका सूत्र ๑๒๗. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. อถ โข อญฺญตโร ปุริโส เยน ราชา ปเสนทิ โกสโล เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา รญฺโญ ปเสนทิสฺส โกสลสฺส อุปกณฺณเก อาโรเจสิ – ‘‘มลฺลิกา, เทว, เทวี ธีตรํ วิชาตา’’ติ. เอวํ วุตฺเต, ราชา ปเสนทิ โกสโล อนตฺตมโน อโหสิ. १२७. श्रावस्ती निदान। तब कोसल के राजा प्रसेनजित जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। तब एक पुरुष ने कोसल के राजा प्रसेनजित के पास आकर उनके कान में धीरे से कहा— "देव! रानी मल्लिका ने पुत्री को जन्म दिया है।" ऐसा कहे जाने पर कोसल के राजा प्रसेनजित अप्रसन्न हो गए। อถ โข ภควา ราชานํ ปเสนทึ โกสลํ อนตฺตมนตํ วิทิตฺวา ตายํ เวลายํ อิมา คาถาโย อภาสิ – तब भगवान ने कोसल के राजा प्रसेनजित को अप्रसन्न जानकर उस समय ये गाथाएँ कहीं— ‘‘อิตฺถีปิ หิ เอกจฺจิยา, เสยฺยา โปส ชนาธิป; เมธาวินี สีลวตี, สสฺสุเทวา ปติพฺพตา. "हे नरेश! पुत्री का पालन-पोषण करो, क्योंकि कुछ स्त्रियाँ (पुत्रों से भी) श्रेष्ठ होती हैं; जो बुद्धिमान, शीलवती, सास-ससुर को देवता मानने वाली और पतिव्रता होती हैं।" ‘‘ตสฺสา โย ชายติ โปโส, สูโร โหติ ทิสมฺปติ; ตาทิสา สุภคิยา ปุตฺโต, รชฺชมฺปิ อนุสาสตี’’ติ. "उस स्त्री से जो पुत्र उत्पन्न होता है, वह शूरवीर और दिशाओं का स्वामी होता है; ऐसी सौभाग्यवती स्त्री का पुत्र राज्य का शासन भी कर सकता है।" ๗. อปฺปมาทสุตฺตํ ७. अप्रमाद सूत्र ๑๒๘. สาวตฺถินิทานํ[Pg.87]. เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อตฺถิ นุ โข, ภนฺเต, เอโก ธมฺโม โย อุโภ อตฺเถ สมธิคฺคยฺห ติฏฺฐติ – ทิฏฺฐธมฺมิกญฺเจว อตฺถํ สมฺปรายิกญฺจา’’ติ? १२८. श्रावस्ती। एक ओर बैठे हुए कोसल नरेश राजा प्रसेनजित ने भगवान से यह कहा— "भन्ते! क्या कोई ऐसा एक धर्म है जो दोनों लाभों को—इस लोक के लाभ और परलोक के लाभ को—समेट कर स्थित रहता है?" ‘‘อตฺถิ โข, มหาราช, เอโก ธมฺโม โย อุโภ อตฺเถ สมธิคฺคยฺห ติฏฺฐติ – ทิฏฺฐธมฺมิกญฺเจว อตฺถํ สมฺปรายิกญฺจา’’ติ. "महाराज! ऐसा एक धर्म है जो दोनों लाभों को—इस लोक के लाभ और परलोक के लाभ को—समेट कर स्थित रहता है।" ‘‘กตโม ปน, ภนฺเต, เอโก ธมฺโม, โย อุโภ อตฺเถ สมธิคฺคยฺห ติฏฺฐติ – ทิฏฺฐธมฺมิกญฺเจว อตฺถํ สมฺปรายิกญฺจา’’ติ? "भन्ते! वह एक धर्म कौन सा है जो दोनों लाभों को—इस लोक के लाभ और परलोक के लाभ को—समेट कर स्थित रहता है?" ‘‘อปฺปมาโท โข, มหาราช, เอโก ธมฺโม, โย อุโภ อตฺเถ สมธิคฺคยฺห ติฏฺฐติ – ทิฏฺฐธมฺมิกญฺเจว อตฺถํ สมฺปรายิกญฺจาติ. เสยฺยถาปิ, มหาราช, ยานิ กานิจิ ชงฺคลานํ ปาณานํ ปทชาตานิ, สพฺพานิ ตานิ หตฺถิปเท สโมธานํ คจฺฉนฺติ, หตฺถิปทํ เตสํ อคฺคมกฺขายติ – ยทิทํ มหนฺตตฺเตน; เอวเมว โข, มหาราช, อปฺปมาโท เอโก ธมฺโม, โย อุโภ อตฺเถ สมธิคฺคยฺห ติฏฺฐติ – ทิฏฺฐธมฺมิกญฺเจว อตฺถํ สมฺปรายิกญฺจา’’ติ. อิทมโวจ…เป… "महाराज! वह एक धर्म 'अप्रमाद' है जो दोनों लाभों को—इस लोक के लाभ और परलोक के लाभ को—समेट कर स्थित रहता है। महाराज! जैसे थलचर प्राणियों के जितने भी पद-चिह्न होते हैं, वे सब हाथी के पद-चिह्न में समा जाते हैं और हाथी का पद-चिह्न अपने विशाल आकार के कारण उन सबमें श्रेष्ठ कहा जाता है; इसी प्रकार महाराज! अप्रमाद ही वह एक धर्म है जो दोनों लाभों को—इस लोक के लाभ और परलोक के लाभ को—समेट कर स्थित रहता है।" भगवान ने यह कहा... ‘‘อายุํ อโรคิยํ วณฺณํ, สคฺคํ อุจฺจากุลีนตํ; รติโย ปตฺถยนฺเตน, อุฬารา อปราปรา. "आयु, आरोग्य, वर्ण, स्वर्ग, उच्च कुल में जन्म और बार-बार मिलने वाले महान सुखों की इच्छा रखने वाले को (अप्रमाद करना चाहिए)।" ‘‘อปฺปมาทํ ปสํสนฺติ, ปุญฺญกิริยาสุ ปณฺฑิตา; อปฺปมตฺโต อุโภ อตฺเถ, อธิคฺคณฺหาติ ปณฺฑิโต. "पण्डित जन पुण्य-कर्मों में अप्रमाद की प्रशंसा करते हैं; अप्रमादी पण्डित दोनों लाभों को प्राप्त कर लेता है।" ‘‘ทิฏฺเฐ ธมฺเม จ โย อตฺโถ, โย จตฺโถ สมฺปรายิโก; อตฺถาภิสมยา ธีโร, ปณฺฑิโตติ ปวุจฺจตี’’ติ. "जो लाभ इस लोक में है और जो लाभ परलोक में है; इन दोनों लाभों की प्राप्ति के कारण ही धीर पुरुष को 'पण्डित' कहा जाता है।" ๘. กลฺยาณมิตฺตสุตฺตํ ८. कल्याणमित्र सुत्त ๑๒๙. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธ มยฺหํ, ภนฺเต, รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม, โส จ โข กลฺยาณมิตฺตสฺส กลฺยาณสหายสฺส กลฺยาณสมฺปวงฺกสฺส, โน ปาปมิตฺตสฺส โน ปาปสหายสฺส โน ปาปสมฺปวงฺกสฺสา’’’ติ. १२९. श्रावस्ती। एक ओर बैठे हुए कोसल नरेश राजा प्रसेनजित ने भगवान से यह कहा— "भन्ते! यहाँ एकान्त में ध्यानमग्न बैठे हुए मेरे मन में ऐसा विचार उत्पन्न हुआ— 'भगवान द्वारा धर्म भली-भाँति व्याख्यात है, और वह कल्याणमित्र, कल्याण-सखा और कल्याण-साथी वाले के लिए है, न कि पाप-मित्र, पाप-सखा और पाप-साथी वाले के लिए।'" ‘‘เอวเมตํ, มหาราช, เอวเมตํ, มหาราช! สฺวากฺขาโต[Pg.88], มหาราช, มยา ธมฺโม. โส จ โข กลฺยาณมิตฺตสฺส กลฺยาณสหายสฺส กลฺยาณสมฺปวงฺกสฺส, โน ปาปมิตฺตสฺส โน ปาปสหายสฺส โน ปาปสมฺปวงฺกสฺสาติ. "महाराज! यह ऐसा ही है, महाराज! यह ऐसा ही है। महाराज! मेरे द्वारा धर्म भली-भाँति व्याख्यात है। और वह कल्याणमित्र, कल्याण-सखा और कल्याण-साथी वाले के लिए ही है, न कि पाप-मित्र, पाप-सखा और पाप-साथी वाले के लिए।" ‘‘เอกมิทาหํ, มหาราช, สมยํ สกฺเกสุ วิหรามิ นครกํ นาม สกฺยานํ นิคโม. อถ โข, มหาราช, อานนฺโท ภิกฺขุ เยนาหํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข, มหาราช, อานนฺโท ภิกฺขุ มํ เอตทโวจ – ‘อุปฑฺฒมิทํ, ภนฺเต, พฺรหฺมจริยสฺส – ยทิทํ กลฺยาณมิตฺตตา กลฺยาณสหายตา กลฺยาณสมฺปวงฺกตา’’’ติ. "महाराज! एक समय मैं शाक्यों के देश में नगरक नामक शाक्य निगम में विहार कर रहा था। तब महाराज! आनन्द भिक्षु मेरे पास आए; आकर मुझे अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए महाराज! आनन्द भिक्षु ने मुझसे यह कहा— 'भन्ते! यह जो कल्याणमित्रता, कल्याण-सख्यता और कल्याण-साथीपन है, यह ब्रह्मचर्य का आधा हिस्सा है।'" ‘‘เอวํ วุตฺตาหํ, มหาราช, อานนฺทํ ภิกฺขุํ เอตทโวจํ – ‘มา เหวํ, อานนฺท, มา เหวํ, อานนฺท! สกลเมว หิทํ, อานนฺท, พฺรหฺมจริยํ – ยทิทํ กลฺยาณมิตฺตตา กลฺยาณสหายตา กลฺยาณสมฺปวงฺกตา. กลฺยาณมิตฺตสฺเสตํ, อานนฺท, ภิกฺขุโน ปาฏิกงฺขํ กลฺยาณสหายสฺส กลฺยาณสมฺปวงฺกสฺส อริยํ อฏฺฐงฺคิกํ มคฺคํ ภาเวสฺสติ อริยํ อฏฺฐงฺคิกํ มคฺคํ พหุลีกริสฺสติ’’’. "महाराज! ऐसा कहे जाने पर मैंने आनन्द भिक्षु से यह कहा— 'आनन्द! ऐसा मत कहो, आनन्द! ऐसा मत कहो। आनन्द! यह जो कल्याणमित्रता, कल्याण-सख्यता और कल्याण-साथीपन है, यह पूरा का पूरा ब्रह्मचर्य ही है। आनन्द! कल्याणमित्र, कल्याण-सखा और कल्याण-साथी वाले भिक्षु से यह आशा की जाती है कि वह आर्य अष्टांगिक मार्ग की भावना करेगा और आर्य अष्टांगिक मार्ग का बहुलीकरण करेगा।'" ‘‘กถญฺจ, อานนฺท, ภิกฺขุ กลฺยาณมิตฺโต กลฺยาณสหาโย กลฺยาณสมฺปวงฺโก อริยํ อฏฺฐงฺคิกํ มคฺคํ ภาเวติ, อริยํ อฏฺฐงฺคิกํ มคฺคํ พหุลีกโรติ? อิธานนฺท, ภิกฺขุ สมฺมาทิฏฺฐึ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิตํ วิราคนิสฺสิตํ นิโรธนิสฺสิตํ โวสฺสคฺคปริณามึ, สมฺมาสงฺกปฺปํ ภาเวติ…เป… สมฺมาวาจํ ภาเวติ…เป… สมฺมากมฺมนฺตํ ภาเวติ…เป… สมฺมาอาชีวํ ภาเวติ…เป… สมฺมาวายามํ ภาเวติ…เป… สมฺมาสตึ ภาเวติ…เป… สมฺมาสมาธึ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิตํ วิราคนิสฺสิตํ นิโรธนิสฺสิตํ โวสฺสคฺคปริณามึ. เอวํ โข, อานนฺท, ภิกฺขุ กลฺยาณมิตฺโต กลฺยาณสหาโย กลฺยาณสมฺปวงฺโก อริยํ อฏฺฐงฺคิกํ มคฺคํ ภาเวติ, อริยํ อฏฺฐงฺคิกํ มคฺคํ พหุลีกโรติ. ตทมินาเปตํ, อานนฺท, ปริยาเยน เวทิตพฺพํ ยถา สกลเมวิทํ พฺรหฺมจริยํ – ยทิทํ กลฺยาณมิตฺตตา กลฺยาณสหายตา กลฺยาณสมฺปวงฺกตา’’ติ. "और आनन्द! कल्याणमित्र, कल्याण-सखा और कल्याण-साथी वाला भिक्षु कैसे आर्य अष्टांगिक मार्ग की भावना करता है और कैसे आर्य अष्टांगिक मार्ग का बहुलीकरण करता है? आनन्द! यहाँ भिक्षु विवेक-आश्रित, विराग-आश्रित, निरोध-आश्रित और त्याग में परिणत सम्यक् दृष्टि की भावना करता है, सम्यक् संकल्प की भावना करता है... सम्यक् वाणी की भावना करता है... सम्यक् कर्मान्त की भावना करता है... सम्यक् आजीव की भावना करता है... सम्यक् व्यायाम की भावना करता है... सम्यक् स्मृति की भावना करता है... विवेक-आश्रित, विराग-आश्रित, निरोध-आश्रित और त्याग में परिणत सम्यक् समाधि की भावना करता है। आनन्द! इस प्रकार कल्याणमित्र, कल्याण-सखा और कल्याण-साथी वाला भिक्षु आर्य अष्टांगिक मार्ग की भावना करता है और आर्य अष्टांगिक मार्ग का बहुलीकरण करता है। आनन्द! इस बात को इस विधि से भी समझना चाहिए कि कैसे यह कल्याणमित्रता, कल्याण-सख्यता और कल्याण-साथीपन पूरा का पूरा ब्रह्मचर्य ही है।" ‘‘มมญฺหิ, อานนฺท, กลฺยาณมิตฺตํ อาคมฺม ชาติธมฺมา สตฺตา ชาติยา ปริมุจฺจนฺติ, ชราธมฺมา สตฺตา ชราย ปริมุจฺจนฺติ, พฺยาธิธมฺมา สตฺตา พฺยาธิโต ปริมุจฺจนฺติ, มรณธมฺมา สตฺตา มรเณน ปริมุจฺจนฺติ, โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสธมฺมา สตฺตา โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาเสหิ ปริมุจฺจนฺติ. อิมินา โข เอตํ, อานนฺท, ปริยาเยน เวทิตพฺพํ ยถา สกลเมวิทํ [Pg.89] พฺรหฺมจริยํ – ยทิทํ กลฺยาณมิตฺตตา กลฺยาณสหายตา กลฺยาณสมฺปวงฺกตา’’ติ. "आनन्द! मुझ कल्याणमित्र का आश्रय लेकर ही जन्म-धर्मा प्राणी जन्म से मुक्त होते हैं, जरा-धर्मा प्राणी जरा से मुक्त होते हैं, व्याधि-धर्मा प्राणी व्याधि से मुक्त होते हैं, मरण-धर्मा प्राणी मरण से मुक्त होते हैं, और शोक-परिदेव-दुःख-दौर्मनस्य-उपायास-धर्मा प्राणी शोक-परिदेव-दुःख-दौर्मनस्य-उपायासों से मुक्त होते हैं। आनन्द! इस विधि से भी यह समझना चाहिए कि कैसे यह कल्याणमित्रता, कल्याण-सख्यता और कल्याण-साथीपन पूरा का पूरा ब्रह्मचर्य ही है।" ‘‘ตสฺมาติห เต, มหาราช, เอวํ สิกฺขิตพฺพํ – ‘กลฺยาณมิตฺโต ภวิสฺสามิ กลฺยาณสหาโย กลฺยาณสมฺปวงฺโก’ติ. เอวญฺหิ เต, มหาราช, สิกฺขิตพฺพํ. "इसलिए महाराज! आपको इस प्रकार शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए— 'मैं कल्याणमित्र वाला, कल्याण-सखा वाला और कल्याण-साथी वाला बनूँगा।' महाराज! आपको इसी प्रकार शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।" ‘‘กลฺยาณมิตฺตสฺส เต, มหาราช, กลฺยาณสหายสฺส กลฺยาณสมฺปวงฺกสฺส อยํ เอโก ธมฺโม อุปนิสฺสาย วิหาตพฺโพ – อปฺปมาโท กุสเลสุ ธมฺเมสุ. "महाराज! कल्याणमित्र, कल्याण-सखा और कल्याण-साथी वाले आपको एक धर्म का आश्रय लेकर विहार करना चाहिए— वह है कुशल धर्मों में अप्रमाद।" ‘‘อปฺปมตฺตสฺส เต, มหาราช, วิหรโต อปฺปมาทํ อุปนิสฺสาย, อิตฺถาคารสฺส อนุยนฺตสฺส เอวํ ภวิสฺสติ – ‘ราชา โข อปฺปมตฺโต วิหรติ, อปฺปมาทํ อุปนิสฺสาย. หนฺท, มยมฺปิ อปฺปมตฺตา วิหราม, อปฺปมาทํ อุปนิสฺสายา’’’ติ. "हे महाराज! अप्रमाद (सावधानी) का आश्रय लेकर अप्रमत्त होकर विहार करने वाले आपके अंतःपुर की स्त्रियों के मन में यह विचार आएगा— 'राजा अप्रमाद का आश्रय लेकर अप्रमत्त होकर विहार करते हैं। आओ, हम भी अप्रमाद का आश्रय लेकर अप्रमत्त होकर विहार करें'।" ‘‘อปฺปมตฺตสฺส เต, มหาราช, วิหรโต อปฺปมาทํ อุปนิสฺสาย, ขตฺติยานมฺปิ อนุยนฺตานํ เอวํ ภวิสฺสติ – ‘ราชา โข อปฺปมตฺโต วิหรติ อปฺปมาทํ อุปนิสฺสาย. หนฺท, มยมฺปิ อปฺปมตฺตา วิหราม, อปฺปมาทํ อุปนิสฺสายา’’’ติ. "हे महाराज! अप्रमाद का आश्रय लेकर अप्रमत्त होकर विहार करने वाले आपके अनुगामी क्षत्रियों (सामंतों) के मन में भी यह विचार आएगा— 'राजा अप्रमाद का आश्रय लेकर अप्रमत्त होकर विहार करते हैं। आओ, हम भी अप्रमाद का आश्रय लेकर अप्रमत्त होकर विहार करें'।" ‘‘อปฺปมตฺตสฺส เต, มหาราช, วิหรโต อปฺปมาทํ อุปนิสฺสาย, พลกายสฺสปิ เอวํ ภวิสฺสติ – ‘ราชา โข อปฺปมตฺโต วิหรติ อปฺปมาทํ อุปนิสฺสาย. หนฺท, มยมฺปิ อปฺปมตฺตา วิหราม, อปฺปมาทํ อุปนิสฺสายา’’’ติ. "हे महाराज! अप्रमाद का आश्रय लेकर अप्रमत्त होकर विहार करने वाले आपकी सेना (बलकाय) के मन में भी यह विचार आएगा— 'राजा अप्रमाद का आश्रय लेकर अप्रमत्त होकर विहार करते हैं। आओ, हम भी अप्रमाद का आश्रय लेकर अप्रमत्त होकर विहार करें'।" ‘‘อปฺปมตฺตสฺส เต, มหาราช, วิหรโต อปฺปมาทํ อุปนิสฺสาย, เนคมชานปทสฺสปิ เอวํ ภวิสฺสติ – ‘ราชา โข อปฺปมตฺโต วิหรติ, อปฺปมาทํ อุปนิสฺสาย. หนฺท, มยมฺปิ อปฺปมตฺตา วิหราม, อปฺปมาทํ อุปนิสฺสายา’’’ติ? "हे महाराज! अप्रमाद का आश्रय लेकर अप्रमत्त होकर विहार करने वाले आपके निगम और जनपद के निवासियों के मन में भी यह विचार आएगा— 'राजा अप्रमाद का आश्रय लेकर अप्रमत्त होकर विहार करते हैं। आओ, हम भी अप्रमाद का आश्रय लेकर अप्रमत्त होकर विहार करें'।" ‘‘อปฺปมตฺตสฺส เต, มหาราช, วิหรโต อปฺปมาทํ อุปนิสฺสาย, อตฺตาปิ คุตฺโต รกฺขิโต ภวิสฺสติ – อิตฺถาคารมฺปิ คุตฺตํ รกฺขิตํ ภวิสฺสติ, โกสโกฏฺฐาคารมฺปิ คุตฺตํ รกฺขิตํ ภวิสฺสตี’’ติ. อิทมโวจ…เป… "हे महाराज! अप्रमाद का आश्रय लेकर अप्रमत्त होकर विहार करने वाले आप स्वयं भी सुरक्षित और रक्षित रहेंगे; आपका अंतःपुर भी सुरक्षित और रक्षित रहेगा, और आपका राजकोष तथा अन्नागार भी सुरक्षित और रक्षित रहेगा।" भगवान ने यह कहा...। ‘‘โภเค ปตฺถยมาเนน, อุฬาเร อปราปเร; อปฺปมาทํ ปสํสนฺติ, ปุญฺญกิริยาสุ ปณฺฑิตา. "उत्तरोत्तर महान भोगों (संपत्ति) की इच्छा रखने वाले व्यक्ति के लिए, विद्वान जन पुण्य-कर्मों में अप्रमाद (सावधानी) की प्रशंसा करते हैं।" ‘‘อปฺปมตฺโต อุโภ อตฺเถ, อธิคฺคณฺหาติ ปณฺฑิโต; ทิฏฺเฐ [Pg.90] ธมฺเม จ โย อตฺโถ, โย จตฺโถ สมฺปรายิโก; อตฺถาภิสมยา ธีโร, ปณฺฑิโตติ ปวุจฺจตี’’ติ. "अप्रमत्त विद्वान व्यक्ति दोनों अर्थों (लाभों) को प्राप्त कर लेता है— वह अर्थ जो इसी जन्म (दृष्ट धर्म) में प्राप्त होता है और वह अर्थ जो परलोक (साम्परायिक) से संबंधित है। दोनों अर्थों की प्राप्ति के कारण ही उस धीर पुरुष को 'पण्डित' कहा जाता है।" ๙. ปฐมอปุตฺตกสุตฺตํ ९. प्रथम अपुत्तक सुत्त ๑๓๐. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ทิวา ทิวสฺส เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข ราชานํ ปเสนทึ โกสลํ ภควา เอตทโวจ – ‘‘หนฺท, กุโต นุ ตฺวํ, มหาราช, อาคจฺฉสิ ทิวา ทิวสฺสา’’ติ? १३०. श्रावस्ती। तब कोसल नरेश राजा प्रसेनजित दोपहर के समय जहाँ भगवान बुद्ध थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए राजा प्रसेनजित कोसल से भगवान ने यह कहा— "हे महाराज! आप इस दोपहर के समय कहाँ से आ रहे हैं?" ‘‘อิธ, ภนฺเต, สาวตฺถิยํ เสฏฺฐิ คหปติ กาลงฺกโต. ตมหํ อปุตฺตกํ สาปเตยฺยํ ราชนฺเตปุรํ อติหริตฺวา อาคจฺฉามิ. อสีติ, ภนฺเต, สตสหสฺสานิ หิรญฺญสฺเสว, โก ปน วาโท รูปิยสฺส! ตสฺส โข ปน, ภนฺเต, เสฏฺฐิสฺส คหปติสฺส เอวรูโป ภตฺตโภโค อโหสิ – กณาชกํ ภุญฺชติ พิลงฺคทุติยํ. เอวรูโป วตฺถโภโค อโหสิ – สาณํ ธาเรติ ติปกฺขวสนํ. เอวรูโป ยานโภโค อโหสิ – ชชฺชรรถเกน ยาติ ปณฺณฉตฺตเกน ธาริยมาเนนา’’ติ. "भन्ते! यहाँ श्रावस्ती में एक श्रेष्ठी गृहपति की मृत्यु हो गई है। वह निःसंतान था, इसलिए मैं उसकी संपत्ति को राजमहल में जमा करवाकर आ रहा हूँ। भन्ते! केवल सुवर्ण ही अस्सी लाख था, फिर चाँदी की तो बात ही क्या! भन्ते! उस श्रेष्ठी गृहपति का भोजन ऐसा था— वह कांजी के साथ कनकी (चावल के टुकड़े) खाता था। उसका पहनावा ऐसा था— वह तीन टुकड़ों को जोड़कर सिला हुआ सन (पटुआ) का वस्त्र पहनता था। उसका वाहन ऐसा था— वह पत्तों की छतरी लिए हुए एक पुराने जर्जर रथ से चलता था।" ‘‘เอวเมตํ, มหาราช, เอวเมตํ, มหาราช! อสปฺปุริโส โข, มหาราช, อุฬาเร โภเค ลภิตฺวา เนวตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ, น มาตาปิตโร สุเขติ ปีเณติ, น ปุตฺตทารํ สุเขติ ปีเณติ, น ทาสกมฺมกรโปริเส สุเขติ ปีเณติ, น มิตฺตามจฺเจ สุเขติ ปีเณติ, น สมณพฺราหฺมเณสุ อุทฺธคฺคิกํ ทกฺขิณํ ปติฏฺฐาเปติ โสวคฺคิกํ สุขวิปากํ สคฺคสํวตฺตนิกํ. ตสฺส เต โภเค เอวํ สมฺมา อปริภุญฺชิยมาเน ราชาโน วา หรนฺติ โจรา วา หรนฺติ อคฺคิ วา ฑหติ อุทกํ วา วหติ อปฺปิยา วา ทายาทา หรนฺติ. เอวํส เต, มหาราช, โภคา สมฺมา อปริภุญฺชิยมานา ปริกฺขยํ คจฺฉนฺติ, โน ปริโภคํ. "ऐसा ही है महाराज! ऐसा ही है महाराज! महाराज! असत्पुरुष (दुर्जन) महान भोगों (संपत्ति) को प्राप्त करके न तो स्वयं को सुखी और संतुष्ट करता है, न माता-पिता को, न स्त्री-पुत्रों को, न दास-कर्मकारों को और न ही मित्र-अमात्यों को सुखी और संतुष्ट करता है। वह श्रमणों और ब्राह्मणों को ऐसा दान नहीं देता जो ऊर्ध्वगामी हो, स्वर्गदायक हो, सुखद विपाक वाला हो और स्वर्ग ले जाने वाला हो। उसके उस धन का इस प्रकार सम्यक् उपभोग न होने के कारण, या तो राजा उसे ले लेते हैं, या चोर ले जाते हैं, या अग्नि जला देती है, या जल बहा ले जाता है, या अप्रिय उत्तराधिकारी उसे ले लेते हैं। इस प्रकार, हे महाराज! उसका वह धन सम्यक् उपभोग में न आने के कारण नष्ट हो जाता है, उपयोग में नहीं आता।" ‘‘เสยฺยถาปิ, มหาราช, อมนุสฺสฏฺฐาเน โปกฺขรณี อจฺโฉทกา สีโตทกา สาโตทกา เสโตทกา สุปติตฺถา รมณียา. ตํ ชโน เนว หเรยฺย น ปิเวยฺย น นหาเยยฺย น ยถาปจฺจยํ วา กเรยฺย. เอวญฺหิ ตํ, มหาราช, อุทกํ สมฺมา อปริภุญฺชิยมานํ ปริกฺขยํ คจฺเฉยฺย[Pg.91], โน ปริโภคํ. เอวเมว โข, มหาราช, อสปฺปุริโส อุฬาเร โภเค ลภิตฺวา เนวตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ, น มาตาปิตโร สุเขติ ปีเณติ, น ปุตฺตทารํ สุเขติ ปีเณติ, น ทาสกมฺมกรโปริเส สุเขติ ปีเณติ, น มิตฺตามจฺเจ สุเขติ ปีเณติ, น สมณพฺราหฺมเณสุ อุทฺธคฺคิกํ ทกฺขิณํ ปติฏฺฐาเปติ โสวคฺคิกํ สุขวิปากํ สคฺคสํวตฺตนิกํ. ตสฺส เต โภเค เอวํ สมฺมา อปริภุญฺชิยมาเน ราชาโน วา หรนฺติ โจรา วา หรนฺติ อคฺคิ วา ฑหติ อุทกํ วา วหติ อปฺปิยา วา ทายาทา หรนฺติ. เอวํส เต, มหาราช, โภคา สมฺมา อปริภุญฺชิยมานา ปริกฺขยํ คจฺฉนฺติ, โน ปริโภคํ. "महाराज! जैसे किसी निर्जन स्थान में स्वच्छ जल, शीतल जल, स्वादिष्ट जल, निर्मल जल, सुंदर घाटों वाली और रमणीय पुष्करिणी हो; किंतु लोग न तो वहाँ से जल ले जाएँ, न पीएँ, न स्नान करें और न ही अपनी आवश्यकतानुसार उसका उपयोग करें। तो महाराज! वह जल सम्यक् उपयोग न होने के कारण यों ही समाप्त हो जाएगा, उपयोग में नहीं आएगा। इसी प्रकार महाराज! असत्पुरुष महान भोगों को प्राप्त करके न तो स्वयं को सुखी और संतुष्ट करता है, न माता-पिता को, न स्त्री-पुत्रों को, न दास-कर्मकारों को और न ही मित्र-अमात्यों को सुखी और संतुष्ट करता है। वह श्रमणों और ब्राह्मणों को ऐसा दान नहीं देता जो ऊर्ध्वगामी हो, स्वर्गदायक हो, सुखद विपाक वाला हो और स्वर्ग ले जाने वाला हो। उसके उस धन का इस प्रकार सम्यक् उपभोग न होने के कारण, या तो राजा उसे ले लेते हैं, या चोर ले जाते हैं, या अग्नि जला देती है, या जल बहा ले जाता है, या अप्रिय उत्तराधिकारी उसे ले लेते हैं। इस प्रकार, हे महाराज! उसका वह धन सम्यक् उपभोग में न आने के कारण नष्ट हो जाता है, उपयोग में नहीं आता।" ‘‘สปฺปุริโส จ โข, มหาราช, อุฬาเร โภเค ลภิตฺวา อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ, มาตาปิตโร สุเขติ ปีเณติ, ปุตฺตทารํ สุเขติ ปีเณติ, ทาสกมฺมกรโปริเส สุเขติ ปีเณติ, มิตฺตามจฺเจ สุเขติ ปีเณติ, สมณพฺราหฺมเณสุ อุทฺธคฺคิกํ ทกฺขิณํ ปติฏฺฐาเปติ โสวคฺคิกํ สุขวิปากํ สคฺคสํวตฺตนิกํ. ตสฺส เต โภเค เอวํ สมฺมา ปริภุญฺชิยมาเน เนว ราชาโน หรนฺติ, น โจรา หรนฺติ, น อคฺคิ ฑหติ, น อุทกํ วหติ, น อปฺปิยา ทายาทา หรนฺติ. เอวํส เต, มหาราช, โภคา สมฺมา ปริภุญฺชิยมานา ปริโภคํ คจฺฉนฺติ, โน ปริกฺขยํ. "किंतु महाराज! सत्पुरुष (सज्जन) महान भोगों को प्राप्त करके स्वयं को सुखी और संतुष्ट करता है, माता-पिता को सुखी और संतुष्ट करता है, स्त्री-पुत्रों को सुखी और संतुष्ट करता है, दास-कर्मकारों को सुखी और संतुष्ट करता है, और मित्र-अमात्यों को सुखी और संतुष्ट करता है। वह श्रमणों और ब्राह्मणों को ऐसा दान देता है जो ऊर्ध्वगामी हो, स्वर्गदायक हो, सुखद विपाक वाला हो और स्वर्ग ले जाने वाला हो। उसके उस धन का इस प्रकार सम्यक् उपभोग होने के कारण, न तो राजा उसे छीनते हैं, न चोर ले जाते हैं, न अग्नि जलाती है, न जल बहा ले जाता है और न ही अप्रिय उत्तराधिकारी उसे ले पाते हैं। इस प्रकार, हे महाराज! उसका वह धन सम्यक् उपभोग में आने के कारण उपयोग में आता है, व्यर्थ नष्ट नहीं होता।" ‘‘เสยฺยถาปิ, มหาราช, คามสฺส วา นิคมสฺส วา อวิทูเร โปกฺขรณี อจฺโฉทกา สีโตทกา สาโตทกา เสโตทกา สุปติตฺถา รมณียา. ตญฺจ อุทกํ ชโน หเรยฺยปิ ปิเวยฺยปิ นหาเยยฺยปิ ยถาปจฺจยมฺปิ กเรยฺย. เอวญฺหิ ตํ, มหาราช, อุทกํ สมฺมา ปริภุญฺชิยมานํ ปริโภคํ คจฺเฉยฺย, โน ปริกฺขยํ. เอวเมว โข, มหาราช, สปฺปุริโส อุฬาเร โภเค ลภิตฺวา อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ, มาตาปิตโร สุเขติ ปีเณติ, ปุตฺตทารํ สุเขติ ปีเณติ, ทาสกมฺมกรโปริเส สุเขติ ปีเณติ, มิตฺตามจฺเจ สุเขติ ปีเณติ, สมณพฺราหฺมเณสุ อุทฺธคฺคิกํ ทกฺขิณํ ปติฏฺฐาเปติ โสวคฺคิกํ สุขวิปากํ สคฺคสํวตฺตนิกํ. ตสฺส เต โภเค เอวํ สมฺมา ปริภุญฺชิยมาเน เนว ราชาโน หรนฺติ, น โจรา หรนฺติ, น อคฺคิ ฑหติ, น อุทกํ วหติ, น อปฺปิยา ทายาทา หรนฺติ. เอวํส เต, มหาราช, โภคา สมฺมา ปริภุญฺชิยมานา ปริโภคํ คจฺฉนฺติ, โน ปริกฺขย’’นฺติ. “महाराज, जैसे किसी गाँव या कस्बे के पास एक ऐसी पुष्करिणी (पोखर) हो जिसका जल स्वच्छ, शीतल, मधुर और निर्मल हो, जिसके घाट सुंदर और रमणीय हों। लोग उस जल को ले जाएँ, पिएं, स्नान करें या अपनी आवश्यकतानुसार उपयोग करें। महाराज, इस प्रकार वह जल सही ढंग से उपयोग में आता है, व्यर्थ नहीं जाता। इसी प्रकार, महाराज, जब कोई सत्पुरुष प्रचुर संपत्ति प्राप्त करता है, तो वह स्वयं को सुखी और तृप्त करता है, अपने माता-पिता को सुखी और तृप्त करता है, अपने स्त्री-पुत्रों को सुखी और तृप्त करता है, अपने दास-कर्मचारियों को सुखी और तृप्त करता है, और अपने मित्रों एवं सहयोगियों को सुखी और तृप्त करता है। वह श्रमणों और ब्राह्मणों को ऐसा दान देता है जो ऊर्ध्वगामी (स्वर्ग की ओर ले जाने वाला), सुखद विपाक वाला और स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाला होता है। उसकी उस संपत्ति को, जिसका वह इस प्रकार सही उपयोग करता है, न राजा छीनते हैं, न चोर लूटते हैं, न अग्नि जलाती है, न जल बहा ले जाता है और न ही अप्रिय उत्तराधिकारी उसे ले पाते हैं। महाराज, इस प्रकार उसकी वह संपत्ति सही ढंग से उपयोग में आती है, व्यर्थ नष्ट नहीं होती।” ‘‘อมนุสฺสฏฺฐาเน [Pg.92] อุทกํว สีตํ,ตทเปยฺยมานํ ปริโสสเมติ; เอวํ ธนํ กาปุริโส ลภิตฺวา,เนวตฺตนา ภุญฺชติ โน ททาติ. “जैसे किसी निर्जन स्थान में शीतल जल बिना पिए ही सूख जाता है, वैसे ही नीच पुरुष धन प्राप्त करके न तो स्वयं उसका उपभोग करता है और न ही दूसरों को दान देता है।” ธีโร จ วิญฺญู อธิคมฺม โภเค,โส ภุญฺชติ กิจฺจกโร จ โหติ; โส ญาติสงฺฆํ นิสโภ ภริตฺวา,อนินฺทิโต สคฺคมุเปติ ฐาน’’นฺติ. “किन्तु धैर्यवान और विद्वान व्यक्ति संपत्ति प्राप्त कर उसका उपभोग करता है और अपने कर्तव्यों का पालन करता है। वह श्रेष्ठ पुरुष अपने बंधु-बांधवों का भरण-पोषण कर, अनिन्दित रहकर स्वर्ग लोक को प्राप्त करता है।” ๑๐. ทุติยอปุตฺตกสุตฺตํ १०. द्वितीय अपुत्तक सुत्त ๑๓๑. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ทิวา ทิวสฺส เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข ราชานํ ปเสนทึ โกสลํ ภควา เอตทโวจ – ‘‘หนฺท, กุโต นุ ตฺวํ, มหาราช, อาคจฺฉสิ ทิวา ทิวสฺสา’’ติ? १३१. तब कोसल नरेश राजा प्रसेनजित दोपहर के समय भगवान के पास आए। पास आकर और भगवान का अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए राजा प्रसेनजित से भगवान ने यह कहा— “महाराज, आप इस दोपहर के समय कहाँ से आ रहे हैं?” ‘‘อิธ, ภนฺเต, สาวตฺถิยํ เสฏฺฐิ คหปติ กาลงฺกโต. ตมหํ อปุตฺตกํ สาปเตยฺยํ ราชนฺเตปุรํ อติหริตฺวา อาคจฺฉามิ. สตํ, ภนฺเต, สตสหสฺสานิ หิรญฺญสฺเสว, โก ปน วาโท รูปิยสฺส! ตสฺส โข ปน, ภนฺเต, เสฏฺฐิสฺส คหปติสฺส เอวรูโป ภตฺตโภโค อโหสิ – กณาชกํ ภุญฺชติ พิลงฺคทุติยํ. เอวรูโป วตฺถโภโค อโหสิ – สาณํ ธาเรติ ติปกฺขวสนํ. เอวรูโป ยานโภโค อโหสิ – ชชฺชรรถเกน ยาติ ปณฺณฉตฺตเกน ธาริยมาเนนา’’ติ. “भन्ते, यहाँ श्रावस्ती में एक श्रेष्ठी गृहपति की मृत्यु हो गई है। मैं उसकी उस लावारिस संपत्ति को राजमहल में जमा करवाकर आ रहा हूँ। भन्ते, केवल सुवर्ण ही लाखों की संख्या में है, फिर चाँदी की तो बात ही क्या! भन्ते, उस श्रेष्ठी गृहपति का भोजन ऐसा था— वह कांजी के साथ कनकी (चावल के टुकड़े) खाता था। उसका पहनावा ऐसा था— वह सन के बने तीन टुकड़ों वाले फटे-पुराने वस्त्र पहनता था। उसकी सवारी ऐसी थी— वह पत्तों की छतरी लगाकर जर्जर पुराने रथ से चलता था।” ‘‘เอวเมตํ, มหาราช, เอวเมตํ, มหาราช! ภูตปุพฺพํ โส, มหาราช, เสฏฺฐิ คหปติ ตคฺครสิขึ นาม ปจฺเจกสมฺพุทฺธํ ปิณฺฑปาเตน ปฏิปาเทสิ. ‘เทถ สมณสฺส ปิณฺฑ’นฺติ วตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกามิ. ทตฺวา จ ปน ปจฺฉา วิปฺปฏิสารี อโหสิ – ‘วรเมตํ ปิณฺฑปาตํ ทาสา วา กมฺมกรา วา ภุญฺเชยฺยุ’นฺติ. ภาตุ จ ปน เอกปุตฺตกํ สาปเตยฺยสฺส การณา ชีวิตา โวโรเปสิ. “महाराज, ऐसा ही है! महाराज, ऐसा ही है! महाराज, पूर्वकाल में उस श्रेष्ठी गृहपति ने तग्गरसिखी नामक प्रत्येकबुद्ध को भिक्षा प्रदान की थी। ‘श्रमण को भिक्षा दो’ कहकर वह अपने आसन से उठकर चला गया। किन्तु दान देने के बाद उसे पश्चाताप हुआ— ‘इससे तो अच्छा होता कि इस भोजन को मेरे दास या मजदूर खा लेते।’ और उसने संपत्ति के लोभ में अपने भाई के इकलौते पुत्र की हत्या भी की थी।” ‘‘ยํ โข โส, มหาราช, เสฏฺฐิ คหปติ ตคฺครสิขึ ปจฺเจกสมฺพุทฺธํ ปิณฺฑปาเตน ปฏิปาเทสิ, ตสฺส กมฺมสฺส วิปาเกน สตฺตกฺขตฺตุํ สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิ. ตสฺเสว กมฺมสฺส วิปากาวเสเสน อิมิสฺสาเยว สาวตฺถิยา [Pg.93] สตฺตกฺขตฺตุํ เสฏฺฐิตฺตํ กาเรสิ. ยํ โข โส, มหาราช, เสฏฺฐิ คหปติ ทตฺวา ปจฺฉา วิปฺปฏิสารี อโหสิ – ‘วรเมตํ ปิณฺฑปาตํ ทาสา วา กมฺมกรา วา ภุญฺเชยฺยุ’นฺติ, ตสฺส กมฺมสฺส วิปาเกน นาสฺสุฬาราย ภตฺตโภคาย จิตฺตํ นมติ, นาสฺสุฬาราย วตฺถโภคาย จิตฺตํ นมติ, นาสฺสุฬาราย ยานโภคาย จิตฺตํ นมติ, นาสฺสุฬารานํ ปญฺจนฺนํ กามคุณานํ โภคาย จิตฺตํ นมติ. ยํ โข โส, มหาราช, เสฏฺฐิ คหปติ ภาตุ จ ปน เอกปุตฺตกํ สาปเตยฺยสฺส การณา ชีวิตา โวโรเปสิ, ตสฺส กมฺมสฺส วิปาเกน พหูนิ วสฺสานิ พหูนิ วสฺสสตานิ พหูนิ วสฺสสหสฺสานิ พหูนิ วสฺสสตสหสฺสานิ นิรเย ปจฺจิตฺถ. ตสฺเสว กมฺมสฺส วิปากาวเสเสน อิทํ สตฺตมํ อปุตฺตกํ สาปเตยฺยํ ราชโกสํ ปเวเสติ. ตสฺส โข, มหาราช, เสฏฺฐิสฺส คหปติสฺส ปุราณญฺจ ปุญฺญํ ปริกฺขีณํ, นวญฺจ ปุญฺญํ อนุปจิตํ. อชฺช ปน, มหาราช, เสฏฺฐิ คหปติ มหาโรรุเว นิรเย ปจฺจตี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต, เสฏฺฐิ คหปติ มหาโรรุวํ นิรยํ อุปปนฺโน’’ติ. ‘‘เอวํ, มหาราช, เสฏฺฐิ คหปติ มหาโรรุวํ นิรยํ อุปปนฺโน’’ติ. อิทมโวจ…เป…. “महाराज, उस श्रेष्ठी गृहपति ने जो प्रत्येकबुद्ध तग्गरसिखी को भिक्षा दी थी, उस कर्म के विपाक से वह सात बार सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न हुआ। उसी कर्म के शेष विपाक से वह इसी श्रावस्ती में सात बार श्रेष्ठी बना। महाराज, उस श्रेष्ठी गृहपति को दान देने के बाद जो यह पश्चाताप हुआ था कि ‘इससे अच्छा तो मेरे दास या मजदूर इसे खा लेते’, उस कर्म के विपाक के कारण उसका मन न तो उत्तम भोजन में लगता था, न उत्तम वस्त्रों में, न उत्तम सवारी में और न ही उत्तम पाँच काम-गुणों के उपभोग में। महाराज, उस श्रेष्ठी गृहपति ने जो संपत्ति के कारण अपने भाई के इकलौते पुत्र की हत्या की थी, उस कर्म के विपाक से वह बहुत वर्षों तक, बहुत शताब्दियों तक, बहुत सहस्राब्दियों तक और बहुत लाख वर्षों तक नरक में पका। उसी कर्म के शेष विपाक के कारण यह सातवीं बार उसकी लावारिस संपत्ति राजकोष में जा रही है। महाराज, उस श्रेष्ठी गृहपति का पुराना पुण्य क्षीण हो गया है और नया पुण्य उसने संचित नहीं किया। महाराज, आज वह श्रेष्ठी गृहपति महारौरव नरक में पका जा रहा है।” “भन्ते, क्या वह श्रेष्ठी गृहपति महारौरव नरक में उत्पन्न हुआ है?” “हाँ महाराज, वह श्रेष्ठी गृहपति महारौरव नरक में ही उत्पन्न हुआ है।” भगवान ने यह कहा...। ‘‘ธญฺญํ ธนํ รชตํ ชาตรูปํ, ปริคฺคหํ วาปิ ยทตฺถิ กิญฺจิ; ทาสา กมฺมกรา เปสฺสา, เย จสฺส อนุชีวิโน. “अनाज, धन, चाँदी, सोना या जो कुछ भी परिग्रह (संग्रह) है; दास, कर्मकार, सेवक और जो भी उस पर आश्रित हैं।” ‘‘สพฺพํ นาทาย คนฺตพฺพํ, สพฺพํ นิกฺขิปฺปคามินํ ; ยญฺจ กโรติ กาเยน, วาจาย อุท เจตสา. “इनमें से कुछ भी साथ लेकर नहीं जाना है, सब कुछ यहीं छोड़ जाना है; केवल वही साथ जाता है जो मनुष्य शरीर, वाणी या मन से कर्म करता है।” ‘‘ตญฺหิ ตสฺส สกํ โหติ, ตญฺจ อาทาย คจฺฉติ; ตญฺจสฺส อนุคํ โหติ, ฉายาว อนปายินี. “वही उसकी अपनी संपत्ति होती है, जिसे वह साथ लेकर जाता है; वही छाया की तरह उसका पीछा करता है और कभी साथ नहीं छोड़ता।” ‘‘ตสฺมา กเรยฺย กลฺยาณํ, นิจยํ สมฺปรายิกํ; ปุญฺญานิ ปรโลกสฺมึ, ปติฏฺฐา โหนฺติ ปาณิน’’นฺติ. “इसलिए परलोक के लिए कल्याणकारी पुण्यों का संचय करना चाहिए; क्योंकि परलोक में पुण्य ही प्राणियों का एकमात्र सहारा होते हैं।” ทุติโย วคฺโค. द्वितीय वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान) — ชฏิลา ปญฺจ ราชาโน, โทณปากกุเรน จ; สงฺคาเมน ทฺเว วุตฺตานิ, มลฺลิกา ทฺเว อปฺปมาเทน จ; อปุตฺตเกน ทฺเว วุตฺตา, วคฺโค เตน ปวุจฺจตีติ. जटिल सुत्त, पंचराज सुत्त, दोणपाक सुत्त, दो संग्राम सुत्त, मल्लिका सुत्त, दो अप्पमाद सुत्त और दो अपुत्तक सुत्त—इनसे यह वर्ग कहा गया है। ๓. ตติยวคฺโค ३. तृतीय वर्ग ๑. ปุคฺคลสุตฺตํ १. पुग्गल सुत्त ๑๓๒. สาวตฺถินิทานํ[Pg.94]. อถ โข ราชา ปเสนทิ โกสโล เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข ราชานํ ปเสนทึ โกสลํ ภควา เอตทโวจ – ‘‘จตฺตาโรเม, มหาราช, ปุคฺคลา สนฺโต สํวิชฺชมานา โลกสฺมึ. กตเม จตฺตาโร? ตโมตมปรายโน, ตโมโชติปรายโน, โชติตมปรายโน, โชติโชติปรายโน’’. १३२. श्रावस्ती। तब कोसल नरेश प्रसेनजित जहाँ भगवान बुद्ध थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए कोसल नरेश प्रसेनजित से भगवान ने यह कहा - "महाराज, संसार में ये चार प्रकार के व्यक्ति विद्यमान हैं। कौन से चार? (1) अंधकार से अंधकार की ओर जाने वाला, (2) अंधकार से प्रकाश की ओर जाने वाला, (3) प्रकाश से अंधकार की ओर जाने वाला, और (4) प्रकाश से प्रकाश की ओर जाने वाला।" ‘‘กถญฺจ, มหาราช ปุคฺคโล ตโมตมปรายโน โหติ? อิธ, มหาราช, เอกจฺโจ ปุคฺคโล นีเจ กุเล ปจฺจาชาโต โหติ, จณฺฑาลกุเล วา เวนกุเล วา เนสาทกุเล วา รถการกุเล วา ปุกฺกุสกุเล วา ทลิทฺเท อปฺปนฺนปานโภชเน กสิรวุตฺติเก, ยตฺถ กสิเรน ฆาสจฺฉาโท ลพฺภติ. โส จ โหติ ทุพฺพณฺโณ ทุทฺทสิโก โอโกฏิมโก พวฺหาพาโธ กาโณ วา กุณี วา ขญฺโช วา ปกฺขหโต วา, น ลาภี อนฺนสฺส ปานสฺส วตฺถสฺส ยานสฺส มาลาคนฺธวิเลปนสฺส เสยฺยาวสถปทีเปยฺยสฺส. โส กาเยน ทุจฺจริตํ จรติ, วาจาย ทุจฺจริตํ จรติ, มนสา ทุจฺจริตํ จรติ. โส กาเยน ทุจฺจริตํ จริตฺวา วาจาย ทุจฺจริตํ จริตฺวา มนสา ทุจฺจริตํ จริตฺวา, กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ. "महाराज, कोई व्यक्ति अंधकार से अंधकार की ओर जाने वाला कैसे होता है? महाराज, यहाँ इस संसार में कोई व्यक्ति नीच कुल में जन्म लेता है, जैसे चाण्डाल कुल में, वेण (बाँस का काम करने वाले) कुल में, निषाद (शिकारी) कुल में, रथकार (चर्मकार) कुल में या पुक्कुस (सफाई कर्मी) कुल में; वह निर्धन होता है, जहाँ अन्न-पान और भोजन कम होता है, जहाँ जीवन निर्वाह कठिन होता है और जहाँ बड़ी कठिनाई से भोजन और वस्त्र प्राप्त होते हैं। वह कुरूप, देखने में अप्रिय, बौना और बहुत रोगों वाला होता है; वह काना, लँगड़ा, कुबड़ा या पक्षाघात से पीड़ित होता है। उसे अन्न, पान, वस्त्र, वाहन, माला, गंध, विलेपन, शय्या, आवास और प्रकाश (दीपक) के साधन सुलभ नहीं होते। वह काया से दुराचरण करता है, वाणी से दुराचरण करता है और मन से दुराचरण करता है। वह काया, वाणी और मन से दुराचरण करके, शरीर छूटने के बाद, मृत्यु के पश्चात, अपाय, दुर्गति, विनिपात और नरक में उत्पन्न होता है।" ‘‘เสยฺยถาปิ, มหาราช, ปุริโส อนฺธการา วา อนฺธการํ คจฺเฉยฺย, ตมา วา ตมํ คจฺเฉยฺย, โลหิตมลา วา โลหิตมลํ คจฺเฉยฺย. ตถูปมาหํ, มหาราช, อิมํ ปุคฺคลํ วทามิ. เอวํ โข, มหาราช, ปุคฺคโล ตโมตมปรายโน โหติ. "महाराज, जैसे कोई मनुष्य अंधकार से अंधकार में जाए, या एक अंधेरे से दूसरे अंधेरे में जाए, या रक्त की गंदगी से रक्त की गंदगी में जाए। महाराज, मैं इस व्यक्ति को उसी के समान कहता हूँ। महाराज, इस प्रकार व्यक्ति अंधकार से अंधकार की ओर जाने वाला होता है।" ‘‘กถญฺจ, มหาราช, ปุคฺคโล ตโมโชติปรายโน โหติ? อิธ, มหาราช, เอกจฺโจ ปุคฺคโล นีเจ กุเล ปจฺจาชาโต โหติ, จณฺฑาลกุเล วา เวนกุเล วา เนสาทกุเล วา รถการกุเล วา ปุกฺกุสกุเล วา ทลิทฺเท อปฺปนฺนปานโภชเน กสิรวุตฺติเก, ยตฺถ กสิเรน ฆาสจฺฉาโท ลพฺภติ. โส จ โข โหติ ทุพฺพณฺโณ ทุทฺทสิโก [Pg.95] โอโกฏิมโก พวฺหาพาโธ, กาโณ วา กุณี วา ขญฺโช วา ปกฺขหโต วา, น ลาภี อนฺนสฺส ปานสฺส วตฺถสฺส ยานสฺส มาลาคนฺธวิเลปนสฺส เสยฺยาวสถปทีเปยฺยสฺส. โส กาเยน สุจริตํ จรติ, วาจาย สุจริตํ จรติ, มนสา สุจริตํ จรติ. โส กาเยน สุจริตํ จริตฺวา วาจาย สุจริตํ จริตฺวา มนสา สุจริตํ จริตฺวา, กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. "महाराज, कोई व्यक्ति अंधकार से प्रकाश की ओर जाने वाला कैसे होता है? महाराज, यहाँ इस संसार में कोई व्यक्ति नीच कुल में जन्म लेता है, जैसे चाण्डाल कुल में, वेण कुल में, निषाद कुल में, रथकार कुल में या पुक्कुस कुल में; वह निर्धन होता है, जहाँ अन्न-पान और भोजन कम होता है, जहाँ जीवन निर्वाह कठिन होता है और जहाँ बड़ी कठिनाई से भोजन और वस्त्र प्राप्त होते हैं। वह कुरूप, देखने में अप्रिय, बौना और बहुत रोगों वाला होता है; वह काना, लँगड़ा, कुबड़ा या पक्षाघात से पीड़ित होता है। उसे अन्न, पान, वस्त्र, वाहन, माला, गंध, विलेपन, शय्या, आवास और प्रकाश के साधन सुलभ नहीं होते। वह काया से सुचरित (सदाचरण) करता है, वाणी से सुचरित करता है और मन से सुचरित करता है। वह काया, वाणी और मन से सुचरित करके, शरीर छूटने के बाद, मृत्यु के पश्चात, सुगति और स्वर्ग लोक में उत्पन्न होता है।" ‘‘เสยฺยถาปิ, มหาราช, ปุริโส ปถวิยา วา ปลฺลงฺกํ อาโรเหยฺย, ปลฺลงฺกา วา อสฺสปิฏฺฐึ อาโรเหยฺย, อสฺสปิฏฺฐิยา วา หตฺถิกฺขนฺธํ อาโรเหยฺย, หตฺถิกฺขนฺธา วา ปาสาทํ อาโรเหยฺย. ตถูปมาหํ, มหาราช, อิมํ ปุคฺคลํ วทามิ. เอวํ โข, มหาราช, ปุคฺคโล ตโมโชติปรายโน โหติ. "महाराज, जैसे कोई मनुष्य भूमि से पलंग पर चढ़े, पलंग से घोड़े की पीठ पर चढ़े, घोड़े की पीठ से हाथी के कंधे पर चढ़े, और हाथी के कंधे से महल पर चढ़े। महाराज, मैं इस व्यक्ति को उसी के समान कहता हूँ। महाराज, इस प्रकार व्यक्ति अंधकार से प्रकाश की ओर जाने वाला होता है।" ‘‘กถญฺจ, มหาราช, ปุคฺคโล โชติตมปรายโน โหติ? อิธ, มหาราช, เอกจฺโจ ปุคฺคโล อุจฺเจ กุเล ปจฺจาชาโต โหติ, ขตฺติยมหาสาลกุเล วา พฺราหฺมณมหาสาลกุเล วา คหปติมหาสาลกุเล วา, อฑฺเฒ มหทฺธเน มหาโภเค ปหูตชาตรูปรชเต ปหูตวิตฺตูปกรเณ ปหูตธนธญฺเญ. โส จ โหติ อภิรูโป ทสฺสนีโย ปาสาทิโก, ปรมาย วณฺณโปกฺขรตาย สมนฺนาคโต, ลาภี อนฺนสฺส ปานสฺส วตฺถสฺส ยานสฺส มาลาคนฺธวิเลปนสฺส เสยฺยาวสถปทีเปยฺยสฺส. โส กาเยน ทุจฺจริตํ จรติ, วาจาย ทุจฺจริตํ จรติ, มนสา ทุจฺจริตํ จรติ. โส กาเยน ทุจฺจริตํ จริตฺวา วาจาย ทุจฺจริตํ จริตฺวา มนสา ทุจฺจริตํ จริตฺวา, กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ. "महाराज, कोई व्यक्ति प्रकाश से अंधकार की ओर जाने वाला कैसे होता है? महाराज, यहाँ इस संसार में कोई व्यक्ति उच्च कुल में जन्म लेता है, जैसे क्षत्रिय महाशाल कुल में, ब्राह्मण महाशाल कुल में या गृहपति महाशाल कुल में; वह धनी, महाधनी, महाभोगी होता है, जिसके पास प्रचुर मात्रा में सोना-चाँदी, प्रचुर धन-संपत्ति और प्रचुर धन-धान्य होता है। वह रूपवान, दर्शनीय, चित्ताकर्षक और उत्तम वर्ण-सौन्दर्य से युक्त होता है। उसे अन्न, पान, वस्त्र, वाहन, माला, गंध, विलेपन, शय्या, आवास और प्रकाश के साधन सुलभ होते हैं। वह काया से दुराचरण करता है, वाणी से दुराचरण करता है और मन से दुराचरण करता है। वह काया, वाणी और मन से दुराचरण करके, शरीर छूटने के बाद, मृत्यु के पश्चात, अपाय, दुर्गति, विनिपात और नरक में उत्पन्न होता है।" ‘‘เสยฺยถาปิ, มหาราช, ปุริโส ปาสาทา วา หตฺถิกฺขนฺธํ โอโรเหยฺย, หตฺถิกฺขนฺธา วา อสฺสปิฏฺฐึ โอโรเหยฺย, อสฺสปิฏฺฐิยา วา ปลฺลงฺกํ โอโรเหยฺย, ปลฺลงฺกา วา ปถวึ โอโรเหยฺย, ปถวิยา วา อนฺธการํ ปวิเสยฺย. ตถูปมาหํ, มหาราช, อิมํ ปุคฺคลํ วทามิ. เอวํ โข, มหาราช, ปุคฺคโล โชติตมปรายโน โหติ. "महाराज, जैसे कोई मनुष्य महल से हाथी के कंधे पर उतरे, हाथी के कंधे से घोड़े की पीठ पर उतरे, घोड़े की पीठ से पलंग पर उतरे, पलंग से भूमि पर उतरे, और भूमि से अंधकार में प्रवेश करे। महाराज, मैं इस व्यक्ति को उसी के समान कहता हूँ। महाराज, इस प्रकार व्यक्ति प्रकाश से अंधकार की ओर जाने वाला होता है।" ‘‘กถญฺจ, มหาราช, ปุคฺคโล โชติโชติปรายโน โหติ? อิธ, มหาราช, เอกจฺโจ ปุคฺคโล อุจฺเจ กุเล ปจฺจาชาโต โหติ, ขตฺติยมหาสาลกุเล วา พฺราหฺมณมหาสาลกุเล วา คหปติมหาสาลกุเล [Pg.96] วา, อฑฺเฒ มหทฺธเน มหาโภเค ปหูตชาตรูปรชเต ปหูตวิตฺตูปกรเณ ปหูตธนธญฺเญ. โส จ โหติ อภิรูโป ทสฺสนีโย ปาสาทิโก, ปรมาย วณฺณโปกฺขรตาย สมนฺนาคโต, ลาภี อนฺนสฺส ปานสฺส วตฺถสฺส ยานสฺส มาลาคนฺธวิเลปนสฺส เสยฺยาวสถปทีเปยฺยสฺส. โส กาเยน สุจริตํ จรติ, วาจาย สุจริตํ จรติ, มนสา สุจริตํ จรติ. โส กาเยน สุจริตํ จริตฺวา วาจาย สุจริตํ จริตฺวา มนสา สุจริตํ จริตฺวา, กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. "महाराज, कोई व्यक्ति प्रकाश से प्रकाश की ओर जाने वाला कैसे होता है? महाराज, यहाँ इस संसार में कोई व्यक्ति उच्च कुल में जन्म लेता है, जैसे क्षत्रिय महाशाल कुल में, ब्राह्मण महाशाल कुल में या गृहपति महाशाल कुल में; वह धनी, महाधनी, महाभोगी होता है, जिसके पास प्रचुर मात्रा में सोना-चाँदी, प्रचुर धन-संपत्ति और प्रचुर धन-धान्य होता है। वह रूपवान, दर्शनीय, चित्ताकर्षक और उत्तम वर्ण-सौन्दर्य से युक्त होता है। उसे अन्न, पान, वस्त्र, वाहन, माला, गंध, विलेपन, शय्या, आवास और प्रकाश के साधन सुलभ होते हैं। वह काया से सुचरित करता है, वाणी से सुचरित करता है और मन से सुचरित करता है। वह काया, वाणी और मन से सुचरित करके, शरीर छूटने के बाद, मृत्यु के पश्चात, सुगति और स्वर्ग लोक में उत्पन्न होता है।" ‘‘เสยฺยถาปิ, มหาราช, ปุริโส ปลฺลงฺกา วา ปลฺลงฺกํ สงฺกเมยฺย, อสฺสปิฏฺฐิยา วา อสฺสปิฏฺฐึ สงฺกเมยฺย, หตฺถิกฺขนฺธา วา หตฺถิกฺขนฺธํ สงฺกเมยฺย, ปาสาทา วา ปาสาทํ สงฺกเมยฺย. ตถูปมาหํ, มหาราช, อิมํ ปุคฺคลํ วทามิ. เอวํ โข, มหาราช, ปุคฺคโล โชติโชติปรายโน โหติ. อิเม โข, มหาราช, จตฺตาโร ปุคฺคลา สนฺโต สํวิชฺชมานา โลกสฺมิ’’นฺติ. อิทมโวจ…เป… “महाराज, जैसे कोई पुरुष एक पलंग से दूसरे पलंग पर जाए, या एक घोड़े की पीठ से दूसरे घोड़े की पीठ पर जाए, या हाथी के कंधे से दूसरे हाथी के कंधे पर जाए, या एक प्रासाद से दूसरे प्रासाद पर जाए। महाराज, मैं इस पुद्गल को उसी उपमा के समान कहता हूँ। महाराज, इस प्रकार वह पुद्गल ज्योति से ज्योति की ओर जाने वाला होता है। महाराज, ये चार प्रकार के पुद्गल लोक में विद्यमान हैं।” ‘‘ทลิทฺโท ปุริโส ราช, อสฺสทฺโธ โหติ มจฺฉรี; กทริโย ปาปสงฺกปฺโป, มิจฺฉาทิฏฺฐิ อนาทโร. “हे राजन्! जो पुरुष दरिद्र है, श्रद्धाहीन है, कंजूस है, क्षुद्र है, पाप-संकल्प वाला है, मिथ्यादृष्टि है और अनादर करने वाला है।” ‘‘สมเณ พฺราหฺมเณ วาปิ, อญฺเญ วาปิ วนิพฺพเก; อกฺโกสติ ปริภาสติ, นตฺถิโก โหติ โรสโก. “वह श्रमणों, ब्राह्मणों या अन्य याचकों को गाली देता है, अपमानित करता है, नास्तिक और द्वेषी होता है।” ‘‘ททมานํ นิวาเรติ, ยาจมานาน โภชนํ; ตาทิโส ปุริโส ราช, มียมาโน ชนาธิป; อุเปติ นิรยํ โฆรํ, ตโมตมปรายโน. “वह भोजन माँगने वालों को दान देने से रोकता है। हे प्रजापति राजन्! ऐसा पुरुष मृत्यु के पश्चात घोर नरक में जाता है; वह अंधकार से अंधकार की ओर जाने वाला पुद्गल कहलाता है।” ‘‘ทลิทฺโท ปุริโส ราช, สทฺโธ โหติ อมจฺฉรี; ททาติ เสฏฺฐสงฺกปฺโป, อพฺยคฺคมนโส นโร. “हे राजन्! जो पुरुष दरिद्र है, किंतु श्रद्धावान है, उदार है, दान देता है, श्रेष्ठ संकल्प वाला है और एकाग्र चित्त वाला है।” ‘‘สมเณ พฺราหฺมเณ วาปิ, อญฺเญ วาปิ วนิพฺพเก; อุฏฺฐาย อภิวาเทติ, สมจริยาย สิกฺขติ. “वह श्रमणों, ब्राह्मणों या अन्य याचकों को देखकर उठकर उनका अभिवादन करता है और सदाचार की शिक्षा ग्रहण करता है।” ‘‘ททมานํ น วาเรติ, ยาจมานาน โภชนํ; ตาทิโส ปุริโส ราช, มียมาโน ชนาธิป; อุเปติ ติทิวํ ฐานํ, ตโมโชติปรายโน. “वह भोजन माँगने वालों को दान देने से नहीं रोकता। हे प्रजापति राजन्! ऐसा पुरुष मृत्यु के पश्चात स्वर्ग लोक को प्राप्त करता है; वह अंधकार से ज्योति की ओर जाने वाला पुद्गल कहलाता है।” ‘‘อฑฺโฒ [Pg.97] เจ ปุริโส ราช, อสฺสทฺโธ โหติ มจฺฉรี; กทริโย ปาปสงฺกปฺโป, มิจฺฉาทิฏฺฐิ อนาทโร. “हे राजन्! यदि कोई पुरुष धनवान है, किंतु श्रद्धाहीन है, कंजूस है, क्षुद्र है, पाप-संकल्प वाला है, मिथ्यादृष्टि है और अनादर करने वाला है।” ‘‘สมเณ พฺราหฺมเณ วาปิ, อญฺเญ วาปิ วนิพฺพเก; อกฺโกสติ ปริภาสติ, นตฺถิโก โหติ โรสโก. “वह श्रमणों, ब्राह्मणों या अन्य याचकों को गाली देता है, अपमानित करता है, नास्तिक और द्वेषी होता है।” ‘‘ททมานํ นิวาเรติ, ยาจมานาน โภชนํ; ตาทิโส ปุริโส ราช, มียมาโน ชนาธิป; อุเปติ นิรยํ โฆรํ, โชติตมปรายโน. “वह भोजन माँगने वालों को दान देने से रोकता है। हे प्रजापति राजन्! ऐसा पुरुष मृत्यु के पश्चात घोर नरक में जाता है; वह ज्योति से अंधकार की ओर जाने वाला पुद्गल कहलाता है।” ‘‘อฑฺโฒ เจ ปุริโส ราช, สทฺโธ โหติ อมจฺฉรี; ททาติ เสฏฺฐสงฺกปฺโป, อพฺยคฺคมนโส นโร. “हे राजन्! यदि कोई पुरुष धनवान है और श्रद्धावान भी है, उदार है, दान देता है, श्रेष्ठ संकल्प वाला है और एकाग्र चित्त वाला है।” ‘‘สมเณ พฺราหฺมเณ วาปิ, อญฺเญ วาปิ วนิพฺพเก; อุฏฺฐาย อภิวาเทติ, สมจริยาย สิกฺขติ. “वह श्रमणों, ब्राह्मणों या अन्य याचकों को देखकर उठकर उनका अभिवादन करता है और सदाचार की शिक्षा ग्रहण करता है।” ‘‘ททมานํ น วาเรติ, ยาจมานาน โภชนํ; ตาทิโส ปุริโส ราช, มียมาโน ชนาธิป; อุเปติ ติทิวํ ฐานํ, โชติโชติปรายโน’’ติ. “वह भोजन माँगने वालों को दान देने से नहीं रोकता। हे प्रजापति राजन्! ऐसा पुरुष मृत्यु के पश्चात स्वर्ग लोक को प्राप्त करता है; वह ज्योति से ज्योति की ओर जाने वाला पुद्गल कहलाता है।” ๒. อยฺยิกาสุตฺตํ २. अय्यिका सुत्त ๑๓๓. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข ราชานํ ปเสนทึ โกสลํ ภควา เอตทโวจ – ‘‘หนฺท, กุโต นุ ตฺวํ, มหาราช, อาคจฺฉสิ ทิวาทิวสฺสา’’ติ? १३३. श्रावस्ती में निदान। एक ओर बैठे हुए कोसल नरेश प्रसेनजित से भगवान ने यह कहा— “महाराज, आप इस दोपहर के समय कहाँ से आ रहे हैं?” ‘‘อยฺยิกา เม, ภนฺเต, กาลงฺกตา ชิณฺณา วุฑฺฒา มหลฺลิกา อทฺธคตา วโยอนุปฺปตฺตา วีสวสฺสสติกา ชาติยา. อยฺยิกา โข ปน เม, ภนฺเต, ปิยา โหติ มนาปา. หตฺถิรตเนน เจปาหํ, ภนฺเต, ลเภยฺยํ ‘มา เม อยฺยิกา กาลมกาสี’ติ, หตฺถิรตนมฺปาหํ ทเทยฺยํ – ‘มา เม อยฺยิกา กาลมกาสี’ติ. อสฺสรตเนน เจปาหํ, ภนฺเต, ลเภยฺยํ ‘มา เม อยฺยิกา กาลมกาสี’ติ, อสฺสรตนมฺปาหํ ทเทยฺยํ – ‘มา เม อยฺยิกา กาลมกาสี’ติ. คามวเรน เจปาหํ ภนฺเต, ลเภยฺยํ ‘มา เม อยฺยิกา กาลมกาสี’ติ, คามวรมฺปาหํ ทเทยฺยํ – ‘มา เม อยฺยิกา กาลมกาสี’ติ. ชนปทปเทเสน เจปาหํ, ภนฺเต, ลเภยฺยํ [Pg.98] ‘มา เม อยฺยิกา กาลมกาสี’ติ, ชนปทปเทสมฺปาหํ ทเทยฺยํ – ‘มา เม อยฺยิกา กาลมกาสี’ติ. ‘สพฺเพ สตฺตา, มหาราช, มรณธมฺมา มรณปริโยสานา มรณํ อนตีตา’ติ. ‘อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต! ยาวสุภาสิตมิทํ, ภนฺเต, ภควตา – สพฺเพ สตฺตา มรณธมฺมา มรณปริโยสานา มรณํ อนตีตา’’’ติ. “भन्ते, मेरी दादी का देहांत हो गया है, जो बहुत वृद्ध, वयोवृद्ध, दीर्घायु और अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर थीं, उनकी आयु एक सौ बीस वर्ष थी। भन्ते, मेरी दादी मुझे बहुत प्रिय और मनभावन थीं। भन्ते, यदि हाथी-रत्न देकर भी मैं यह प्राप्त कर सकता कि ‘मेरी दादी की मृत्यु न हो’, तो मैं हाथी-रत्न भी दे देता। भन्ते, यदि अश्व-रत्न देकर... यदि श्रेष्ठ गाँव देकर... यदि किसी जनपद का प्रदेश देकर भी मैं यह प्राप्त कर सकता कि ‘मेरी दादी की मृत्यु न हो’, तो मैं वह भी दे देता।” भगवान ने कहा— “महाराज, सभी प्राणी मरणधर्मा हैं, मरण ही जिनका अंत है और जो मृत्यु का अतिक्रमण नहीं कर सकते।” राजा ने कहा— “भन्ते, यह आश्चर्यजनक है! भन्ते, यह अद्भुत है! भगवान ने यह कितनी अच्छी तरह कहा है कि सभी प्राणी मरणधर्मा हैं, मरण ही जिनका अंत है और जो मृत्यु का अतिक्रमण नहीं कर सकते।” ‘‘เอวเมตํ, มหาราช, เอวเมตํ, มหาราช! สพฺเพ สตฺตา มรณธมฺมา มรณปริโยสานา มรณํ อนตีตา. เสยฺยถาปิ, มหาราช, ยานิ กานิจิ กุมฺภการภาชนานิ อามกานิ เจว ปกฺกานิ จ สพฺพานิ ตานิ เภทนธมฺมานิ เภทนปริโยสานานิ เภทนํ อนตีตานิ; เอวเมว โข, มหาราช, สพฺเพ สตฺตา มรณธมฺมา มรณปริโยสานา มรณํ อนตีตา’’ติ. อิทมโวจ…เป… “महाराज, यह ऐसा ही है! महाराज, यह ऐसा ही है! सभी प्राणी मरणधर्मा हैं, मरण ही जिनका अंत है और जो मृत्यु का अतिक्रमण नहीं कर सकते। महाराज, जैसे कुम्हार के बनाए हुए मिट्टी के बर्तन, चाहे वे कच्चे हों या पक्के, उन सभी का स्वभाव टूटना ही है, टूटना ही उनका अंत है और वे टूटने से बच नहीं सकते; महाराज, ठीक उसी प्रकार सभी प्राणी मरणधर्मा हैं, मरण ही जिनका अंत है और जो मृत्यु का अतिक्रमण नहीं कर सकते।” ‘‘สพฺเพ สตฺตา มริสฺสนฺติ, มรณนฺตญฺหิ ชีวิตํ; ยถากมฺมํ คมิสฺสนฺติ, ปุญฺญปาปผลูปคา; นิรยํ ปาปกมฺมนฺตา, ปุญฺญกมฺมา จ สุคฺคตึ. “सभी प्राणी मरेंगे, क्योंकि जीवन का अंत मृत्यु ही है। वे अपने कर्मों के अनुसार जाएँगे, अपने पुण्य और पाप के फलों को प्राप्त करेंगे। पाप कर्म करने वाले नरक जाएँगे और पुण्य कर्म करने वाले सुगति को प्राप्त होंगे।” ‘‘ตสฺมา กเรยฺย กลฺยาณํ, นิจยํ สมฺปรายิกํ; ปุญฺญานิ ปรโลกสฺมึ, ปติฏฺฐา โหนฺติ ปาณิน’’นฺติ. “इसलिए परलोक के लिए कल्याणकारी पुण्यों का संचय करना चाहिए। परलोक में पुण्य ही प्राणियों का एकमात्र आधार होते हैं।” ๓. โลกสุตฺตํ ३. लोक सुत्त ๑๓๔. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กติ นุ โข, ภนฺเต, โลกสฺส ธมฺมา อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชนฺติ อหิตาย ทุกฺขาย อผาสุวิหารายา’’ติ? ‘‘ตโย โข, มหาราช, โลกสฺส ธมฺมา อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชนฺติ อหิตาย ทุกฺขาย อผาสุวิหาราย. กตเม ตโย? โลโภ โข, มหาราช, โลกสฺส ธมฺโม, อุปฺปชฺชมาโน อุปฺปชฺชติ อหิตาย ทุกฺขาย อผาสุวิหาราย. โทโส โข, มหาราช, โลกสฺส ธมฺโม, อุปฺปชฺชมาโน อุปฺปชฺชติ อหิตาย ทุกฺขาย อผาสุวิหาราย. โมโห โข, มหาราช, โลกสฺส ธมฺโม, อุปฺปชฺชมาโน อุปฺปชฺชติ อหิตาย ทุกฺขาย อผาสุวิหาราย. อิเม โข, มหาราช, ตโย โลกสฺส ธมฺมา อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชนฺติ อหิตาย ทุกฺขาย อผาสุวิหารายา’’ติ. อิทมโวจ…เป… १३४. श्रावस्ती में निदान। एक ओर बैठे हुए कोसल नरेश प्रसेनजित ने भगवान से यह कहा— “भन्ते, लोक में कितने धर्म उत्पन्न होकर अहित, दुःख और कष्टपूर्ण जीवन के लिए होते हैं?” “महाराज, लोक में तीन धर्म उत्पन्न होकर अहित, दुःख और कष्टपूर्ण जीवन के लिए होते हैं। वे तीन कौन से हैं? महाराज, लोभ लोक का वह धर्म है जो उत्पन्न होकर अहित, दुःख और कष्टपूर्ण जीवन का कारण बनता है। महाराज, द्वेष... महाराज, मोह... महाराज, लोक में ये तीन धर्म उत्पन्न होकर अहित, दुःख और कष्टपूर्ण जीवन के लिए होते हैं।” ‘‘โลโภ [Pg.99] โทโส จ โมโห จ, ปุริสํ ปาปเจตสํ; หึสนฺติ อตฺตสมฺภูตา, ตจสารํว สมฺผล’’นฺติ. “लोभ, द्वेष और मोह—ये स्वयं से उत्पन्न होकर पाप-चित्त वाले पुरुष को उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं, जैसे बाँस या सरकंडे का फल स्वयं उसी को नष्ट कर देता है।” ๔. อิสฺสตฺตสุตฺตํ ४. इस्सत्ता सुत्त ๑๓๕. สาวตฺถินิทานํ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ราชา ปเสนทิ โกสโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กตฺถ นุ โข, ภนฺเต, ทานํ ทาตพฺพ’’นฺติ? ‘‘ยตฺถ โข, มหาราช, จิตฺตํ ปสีทตี’’ติ. ‘‘กตฺถ ปน, ภนฺเต, ทินฺนํ มหปฺผล’’นฺติ? ‘‘อญฺญํ โข เอตํ, มหาราช, กตฺถ ทานํ ทาตพฺพํ, อญฺญํ ปเนตํ กตฺถ ทินฺนํ มหปฺผลนฺติ? สีลวโต โข, มหาราช, ทินฺนํ มหปฺผลํ, โน ตถา ทุสฺสีเล. เตน หิ, มหาราช, ตญฺเญเวตฺถ ปฏิปุจฺฉิสฺสามิ. ยถา, เต ขเมยฺย, ตถา นํ พฺยากเรยฺยาสิ. ตํ กึ มญฺญสิ, มหาราช, อิธ ตฺยสฺส ยุทฺธํ ปจฺจุปฏฺฐิตํ สงฺคาโม สมุปพฺยูฬฺโห. อถ อาคจฺเฉยฺย ขตฺติยกุมาโร อสิกฺขิโต อกตหตฺโถ อกตโยคฺโค อกตูปาสโน ภีรุ ฉมฺภี อุตฺราสี ปลายี. ภเรยฺยาสิ ตํ ปุริสํ, อตฺโถ จ เต ตาทิเสน ปุริเสนา’’ติ? ‘‘นาหํ, ภนฺเต, ภเรยฺยํ ตํ ปุริสํ, น จ เม อตฺโถ ตาทิเสน ปุริเสนา’’ติ. ‘‘อถ อาคจฺเฉยฺย พฺราหฺมณกุมาโร อสิกฺขิโต…เป… อถ อาคจฺเฉยฺย เวสฺสกุมาโร อสิกฺขิโต…เป… อถ อาคจฺเฉยฺย สุทฺทกุมาโร อสิกฺขิโต…เป… น จ เม อตฺโถ ตาทิเสน ปุริเสนา’’ติ. १३५. श्रावस्ती। एक ओर बैठे हुए राजा प्रसेनजित कोसल ने भगवान से यह कहा— "भन्ते! दान कहाँ देना चाहिए?" "महाराज! जहाँ चित्त प्रसन्न हो।" "परन्तु भन्ते! कहाँ दिया हुआ दान महाफलदायी होता है?" "महाराज! 'दान कहाँ देना चाहिए' यह एक बात है, और 'कहाँ दिया हुआ दान महाफलदायी होता है' यह दूसरी बात है। महाराज! शीलवान को दिया हुआ दान महाफलदायी होता है, वैसा दुशील को दिया हुआ नहीं। महाराज! इसलिए मैं आपसे ही इस विषय में पुनः पूछता हूँ। जैसा आपको उचित लगे, वैसा ही उत्तर दें। महाराज! आप क्या सोचते हैं, यदि यहाँ युद्ध उपस्थित हो जाए और संग्राम छिड़ जाए। तब कोई ऐसा क्षत्रिय कुमार आए जो धनुर्विद्या में अप्रशिक्षित हो, जिसका हाथ सधा हुआ न हो, जिसने अभ्यास न किया हो, जिसने लक्ष्य-भेदन का प्रदर्शन न किया हो, जो डरपोक हो, कांपने वाला हो, भयभीत हो और भाग जाने वाला हो। क्या आप उस पुरुष को सेना में रखेंगे? क्या आपको ऐसे पुरुष की आवश्यकता होगी?" "नहीं भन्ते! मैं उस पुरुष को नहीं रखूँगा, और न ही मुझे ऐसे पुरुष की आवश्यकता होगी।" "महाराज! यदि कोई अप्रशिक्षित ब्राह्मण कुमार आए... अथवा कोई अप्रशिक्षित वैश्य कुमार आए... अथवा कोई अप्रशिक्षित शूद्र कुमार आए... (तो क्या आप उसे रखेंगे?)" "नहीं भन्ते! मुझे ऐसे पुरुष की आवश्यकता नहीं होगी।" ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, มหาราช, อิธ ตฺยสฺส ยุทฺธํ ปจฺจุปฏฺฐิตํ สงฺคาโม สมุปพฺยูฬฺโห. อถ อาคจฺเฉยฺย ขตฺติยกุมาโร สุสิกฺขิโต กตหตฺโถ กตโยคฺโค กตูปาสโน อภีรุ อจฺฉมฺภี อนุตฺราสี อปลายี. ภเรยฺยาสิ ตํ ปุริสํ, อตฺโถ จ เต ตาทิเสน ปุริเสนา’’ติ? ‘‘ภเรยฺยาหํ, ภนฺเต, ตํ ปุริสํ, อตฺโถ จ เม ตาทิเสน ปุริเสนา’’ติ. ‘‘อถ อาคจฺเฉยฺย พฺราหฺมณกุมาโร…เป… อถ อาคจฺเฉยฺย เวสฺสกุมาโร…เป… อถ อาคจฺเฉยฺย สุทฺทกุมาโร สุสิกฺขิโต กตหตฺโถ กตโยคฺโค กตูปาสโน อภีรุ อจฺฉมฺภี อนุตฺราสี อปลายี. ภเรยฺยาสิ ตํ ปุริสํ, อตฺโถ จ เต ตาทิเสน ปุริเสนา’’ติ? ‘‘ภเรยฺยาหํ, ภนฺเต, ตํ ปุริสํ, อตฺโถ จ เม ตาทิเสน ปุริเสนา’’ติ. "महाराज! आप क्या सोचते हैं, यदि यहाँ युद्ध उपस्थित हो जाए और संग्राम छिड़ जाए। तब कोई ऐसा क्षत्रिय कुमार आए जो धनुर्विद्या में सुशिक्षित हो, जिसका हाथ सधा हुआ हो, जिसने अभ्यास किया हो, जिसने लक्ष्य-भेदन का प्रदर्शन किया हो, जो निडर हो, न कांपने वाला हो, निर्भय हो और न भागने वाला हो। क्या आप उस पुरुष को सेना में रखेंगे? क्या आपको ऐसे पुरुष की आवश्यकता होगी?" "हाँ भन्ते! मैं उस पुरुष को रखूँगा, और मुझे ऐसे पुरुष की आवश्यकता होगी।" "महाराज! यदि कोई सुशिक्षित ब्राह्मण कुमार आए... अथवा कोई सुशिक्षित वैश्य कुमार आए... अथवा कोई ऐसा शूद्र कुमार आए जो सुशिक्षित हो, जिसका हाथ सधा हुआ हो, जिसने अभ्यास किया हो, जिसने लक्ष्य-भेदन का प्रदर्शन किया हो, जो निडर हो, न कांपने वाला हो, निर्भय हो और न भागने वाला हो। क्या आप उस पुरुष को सेना में रखेंगे? क्या आपको ऐसे पुरुष की आवश्यकता होगी?" "हाँ भन्ते! मैं उस पुरुष को रखूँगा, और मुझे ऐसे पुरुष की आवश्यकता होगी।" ‘‘เอวเมว โข, มหาราช, ยสฺมา กสฺมา เจปิ กุลา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิโต โหติ, โส จ โหติ ปญฺจงฺควิปฺปหีโน ปญฺจงฺคสมนฺนาคโต, ตสฺมึ [Pg.100] ทินฺนํ มหปฺผลํ โหติ. กตมานิ ปญฺจงฺคานิ ปหีนานิ โหนฺติ? กามจฺฉนฺโท ปหีโน โหติ, พฺยาปาโท ปหีโน โหติ, ถินมิทฺธํ ปหีนํ โหติ, อุทฺธจฺจกุกฺกุจฺจํ ปหีนํ โหติ, วิจิกิจฺฉา ปหีนา โหติ. อิมานิ ปญฺจงฺคานิ ปหีนานิ โหนฺติ. กตเมหิ ปญฺจหงฺเคหิ สมนฺนาคโต โหติ? อเสกฺเขน สีลกฺขนฺเธน สมนฺนาคโต โหติ, อเสกฺเขน สมาธิกฺขนฺเธน สมนฺนาคโต โหติ, อเสกฺเขน ปญฺญากฺขนฺเธน สมนฺนาคโต โหติ, อเสกฺเขน วิมุตฺติกฺขนฺเธน สมนฺนาคโต โหติ, อเสกฺเขน วิมุตฺติญาณทสฺสนกฺขนฺเธน สมนฺนาคโต โหติ. อิเมหิ ปญฺจหงฺเคหิ สมนฺนาคโต โหติ. อิติ ปญฺจงฺควิปฺปหีเน ปญฺจงฺคสมนฺนาคเต ทินฺนํ มหปฺผล’’นฺติ. อิทมโวจ ภควา…เป… สตฺถา – "इसी प्रकार महाराज! जिस किसी भी कुल से घर से बेघर होकर प्रव्रजित हुआ हो, यदि वह पाँच अंगों से रहित और पाँच अंगों से युक्त हो, तो उसे दिया हुआ दान महाफलदायी होता है। वे कौन से पाँच अंग हैं जिनका त्याग कर दिया गया है? कामछन्द (इन्द्रिय-सुख की इच्छा) का त्याग कर दिया गया है, व्यापाद (द्वेष) का त्याग कर दिया गया है, स्त्यान-मृद्ध (आलस्य और तन्द्रा) का त्याग कर दिया गया है, औद्धत्य-कौकृत्य (उद्धतपन और पश्चाताप) का त्याग कर दिया गया है, और विचिकित्सा (संदेह) का त्याग कर दिया गया है। इन पाँच अंगों का त्याग कर दिया गया है। वह किन पाँच अंगों से युक्त होता है? वह अशैक्ष (अर्हत्) के शील-स्कन्ध से युक्त होता है, अशैक्ष के समाधि-स्कन्ध से युक्त होता है, अशैक्ष के प्रज्ञा-स्कन्ध से युक्त होता है, अशैक्ष के विमुक्ति-स्कन्ध से युक्त होता है, और अशैक्ष के विमुक्ति-ज्ञानदर्शन-स्कन्ध से युक्त होता है। वह इन पाँच अंगों से युक्त होता है। इस प्रकार, इन पाँच अंगों से रहित और पाँच अंगों से युक्त पुरुष को दिया हुआ दान महाफलदायी होता है।" भगवान ने यह कहा... शास्ता ने (पुनः गाथाओं में कहा)— ‘‘อิสฺสตฺตํ พลวีริยญฺจ, ยสฺมึ วิชฺเชถ มาณเว; ตํ ยุทฺธตฺโถ ภเร ราชา, นาสูรํ ชาติปจฺจยา. "जिस युवक में धनुर्विद्या, बल और वीर्य विद्यमान हो; युद्ध की इच्छा रखने वाला राजा उसे ही सेना में रखता है, केवल उच्च जाति के कारण किसी कायर को नहीं।" ‘‘ตเถว ขนฺติโสรจฺจํ, ธมฺมา ยสฺมึ ปติฏฺฐิตา; อริยวุตฺตึ เมธาวึ, หีนชจฺจมฺปิ ปูชเย. "उसी प्रकार, जिसमें क्षमा और सौजन्य (शील) आदि धर्म प्रतिष्ठित हों; उस आर्य-वृत्ति वाले प्रज्ञावान पुरुष की पूजा करनी चाहिए, चाहे वह नीच कुल का ही क्यों न हो।" ‘‘การเย อสฺสเม รมฺเม, วาสเยตฺถ พหุสฺสุเต; ปปญฺจ วิวเน กยิรา, ทุคฺเค สงฺกมนานิ จ. "रमणीय आश्रम बनवाने चाहिए और वहाँ बहुश्रुत विद्वानों को बसाना चाहिए। निर्जल वनों में प्याऊ बनवाने चाहिए और दुर्गम स्थानों पर पुल बनवाने चाहिए।" ‘‘อนฺนํ ปานํ ขาทนียํ, วตฺถเสนาสนานิ จ; ทเทยฺย อุชุภูเตสุ, วิปฺปสนฺเนน เจตสา. "ऋजु (सीधे मार्ग पर चलने वाले) पुरुषों को प्रसन्न चित्त से अन्न, पान, खाद्य, वस्त्र और शयनासन दान करने चाहिए।" ‘‘ยถา หิ เมโฆ ถนยํ, วิชฺชุมาลี สตกฺกกุ; ถลํ นินฺนญฺจ ปูเรติ, อภิวสฺสํ วสุนฺธรํ. "जैसे बिजली की माला वाला, सौ शिखरों वाला गरजता हुआ मेघ वर्षा करके पृथ्वी को तृप्त करता है और थल तथा निम्न (गहरे) स्थानों को भर देता है।" ‘‘ตเถว สทฺโธ สุตวา, อภิสงฺขจฺจ โภชนํ; วนิพฺพเก ตปฺปยติ, อนฺนปาเนน ปณฺฑิโต. "वैसे ही श्रद्धालु, बहुश्रुत और विद्वान पंडित भोजन तैयार कर याचकों को अन्न और पान से तृप्त करता है।" ‘‘อาโมทมาโน ปกิเรติ, เทถ เทถาติ ภาสติ; ตํ หิสฺส คชฺชิตํ โหติ, เทวสฺเสว ปวสฺสโต; สา ปุญฺญธารา วิปุลา, ทาตารํ อภิวสฺสตี’’ติ. "वह प्रसन्न मन से दान देता है और 'दो, दो' कहता है। वर्षा करते हुए मेघ की गर्जना के समान उसकी वह वाणी होती है। वह विपुल पुण्य-धारा दान देने वाले पर बरसती है।" ๕. ปพฺพตูปมสุตฺตํ ५. पर्वतूपम सुत्त ๑๓๖. สาวตฺถินิทานํ[Pg.101]. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข ราชานํ ปเสนทึ โกสลํ ภควา เอตทโวจ – ‘‘หนฺท, กุโต นุ ตฺวํ, มหาราช, อาคจฺฉสิ ทิวา ทิวสฺสา’’ติ? ‘‘ยานิ ตานิ, ภนฺเต, รญฺญํ ขตฺติยานํ มุทฺธาวสิตฺตานํ อิสฺสริยมทมตฺตานํ กามเคธปริยุฏฺฐิตานํ ชนปทตฺถาวริยปฺปตฺตานํ มหนฺตํ ปถวิมณฺฑลํ อภิวิชิย อชฺฌาวสนฺตานํ ราชกรณียานิ ภวนฺติ, เตสุ ขฺวาหํ, เอตรหิ อุสฺสุกฺกมาปนฺโน’’ติ. १३६. श्रावस्ती। एक ओर बैठे हुए राजा प्रसेनजित कोसल से भगवान ने यह कहा— "महाराज! आप इस दोपहर के समय कहाँ से आ रहे हैं?" "भन्ते! जो मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजा ऐश्वर्य के मद में चूर हैं, काम-भोगों में आसक्त हैं, जिन्होंने जनपद में स्थिरता प्राप्त कर ली है और विशाल पृथ्वी मण्डल को जीतकर उस पर शासन कर रहे हैं, उनके जो राज-कार्य होते हैं, उन्हीं कार्यों में मैं अभी व्यस्त था।" ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, มหาราช, อิธ เต ปุริโส อาคจฺเฉยฺย ปุรตฺถิมาย ทิสาย สทฺธายิโก ปจฺจยิโก. โส ตํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวํ วเทยฺย – ‘ยคฺเฆ, มหาราช, ชาเนยฺยาสิ, อหํ อาคจฺฉามิ ปุรตฺถิมาย ทิสาย. ตตฺถทฺทสํ มหนฺตํ ปพฺพตํ อพฺภสมํ สพฺเพ ปาเณ นิปฺโปเถนฺโต อาคจฺฉติ. ยํ เต, มหาราช, กรณียํ, ตํ กโรหี’ติ. อถ ทุติโย ปุริโส อาคจฺเฉยฺย ปจฺฉิมาย ทิสาย…เป… อถ ตติโย ปุริโส อาคจฺเฉยฺย อุตฺตราย ทิสาย…เป… อถ จตุตฺโถ ปุริโส อาคจฺเฉยฺย ทกฺขิณาย ทิสาย สทฺธายิโก ปจฺจยิโก. โส ตํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวํ วเทยฺย – ‘ยคฺเฆ มหาราช, ชาเนยฺยาสิ, อหํ อาคจฺฉามิ ทกฺขิณาย ทิสาย. ตตฺถทฺทสํ มหนฺตํ ปพฺพตํ อพฺภสมํ สพฺเพ ปาเณ นิปฺโปเถนฺโต อาคจฺฉติ. ยํ เต, มหาราช, กรณียํ ตํ กโรหี’ติ. เอวรูเป เต, มหาราช, มหติ มหพฺภเย สมุปฺปนฺเน ทารุเณ มนุสฺสกฺขเย ทุลฺลเภ มนุสฺสตฺเต กิมสฺส กรณีย’’นฺติ? “महाराज, आप क्या सोचते हैं? यदि यहाँ पूर्व दिशा से आपका कोई विश्वसनीय और भरोसेमंद व्यक्ति आए और वह आपके पास आकर इस प्रकार कहे— ‘महाराज, आप जान लें, मैं पूर्व दिशा से आ रहा हूँ। वहाँ मैंने आकाश को छूते हुए एक विशाल पर्वत को देखा है, जो सभी प्राणियों को कुचलता हुआ आ रहा है। महाराज, जो आपका कर्तव्य है, उसे करें।’ फिर पश्चिम दिशा से दूसरा व्यक्ति आए... उत्तर दिशा से तीसरा व्यक्ति आए... फिर दक्षिण दिशा से चौथा विश्वसनीय और भरोसेमंद व्यक्ति आए और वह आपके पास आकर इस प्रकार कहे— ‘महाराज, आप जान लें, मैं दक्षिण दिशा से आ रहा हूँ। वहाँ मैंने आकाश को छूते हुए एक विशाल पर्वत को देखा है, जो सभी प्राणियों को कुचलता हुआ आ रहा है। महाराज, जो आपका कर्तव्य है, उसे करें।’ महाराज, जब ऐसा महान भय उत्पन्न हो जाए, जहाँ मनुष्यों का विनाश निश्चित हो और मनुष्य जन्म दुर्लभ हो, तो वहाँ क्या करना चाहिए?” ‘‘เอวรูเป เม, ภนฺเต, มหติ มหพฺภเย สมุปฺปนฺเน ทารุเณ มนุสฺสกฺขเย ทุลฺลเภ มนุสฺสตฺเต กิมสฺส กรณียํ อญฺญตฺร ธมฺมจริยาย อญฺญตฺร สมจริยาย อญฺญตฺร กุสลกิริยาย อญฺญตฺร ปุญฺญกิริยายา’’ติ? “भन्ते, जब ऐसा महान भय उत्पन्न हो जाए, जहाँ मनुष्यों का विनाश निश्चित हो और मनुष्य जन्म दुर्लभ हो, तो वहाँ धर्म-आचरण (धम्मचरिया), सम-आचरण (समचरिया), कुशल कर्म और पुण्य कर्म के अतिरिक्त और क्या करना चाहिए?” ‘‘อาโรเจมิ โข เต, มหาราช, ปฏิเวเทมิ โข เต, มหาราช, อธิวตฺตติ โข ตํ, มหาราช, ชรามรณํ. อธิวตฺตมาเน เจ เต, มหาราช, ชรามรเณ กิมสฺส กรณีย’’นฺติ? ‘‘อธิวตฺตมาเน จ เม, ภนฺเต, ชรามรเณ กิมสฺส กรณียํ อญฺญตฺร ธมฺมจริยาย สมจริยาย กุสลกิริยาย ปุญฺญกิริยาย? ยานิ ตานิ, ภนฺเต, รญฺญํ ขตฺติยานํ มุทฺธาวสิตฺตานํ อิสฺสริยมทมตฺตานํ [Pg.102] กามเคธปริยุฏฺฐิตานํ ชนปทตฺถาวริยปฺปตฺตานํ มหนฺตํ ปถวิมณฺฑลํ อภิวิชิย อชฺฌาวสนฺตานํ หตฺถิยุทฺธานิ ภวนฺติ; เตสมฺปิ, ภนฺเต, หตฺถิยุทฺธานํ นตฺถิ คติ นตฺถิ วิสโย อธิวตฺตมาเน ชรามรเณ. ยานิปิ ตานิ, ภนฺเต, รญฺญํ ขตฺติยานํ มุทฺธาวสิตฺตานํ…เป… อชฺฌาวสนฺตานํ อสฺสยุทฺธานิ ภวนฺติ…เป… รถยุทฺธานิ ภวนฺติ …เป… ปตฺติยุทฺธานิ ภวนฺติ; เตสมฺปิ, ภนฺเต, ปตฺติยุทฺธานํ นตฺถิ คติ นตฺถิ วิสโย อธิวตฺตมาเน ชรามรเณ. สนฺติ โข ปน, ภนฺเต, อิมสฺมึ ราชกุเล มนฺติโน มหามตฺตา, เย ปโหนฺติ อาคเต ปจฺจตฺถิเก มนฺเตหิ เภทยิตุํ. เตสมฺปิ, ภนฺเต, มนฺตยุทฺธานํ นตฺถิ คติ นตฺถิ วิสโย อธิวตฺตมาเน ชรามรเณ. สํวิชฺชติ โข ปน, ภนฺเต, อิมสฺมึ ราชกุเล ปหูตํ หิรญฺญสุวณฺณํ ภูมิคตญฺเจว เวหาสฏฺฐญฺจ, เยน มยํ ปโหม อาคเต ปจฺจตฺถิเก ธเนน อุปลาเปตุํ. เตสมฺปิ, ภนฺเต, ธนยุทฺธานํ นตฺถิ คติ นตฺถิ วิสโย อธิวตฺตมาเน ชรามรเณ. อธิวตฺตมาเน จ เม, ภนฺเต, ชรามรเณ กิมสฺส กรณียํ อญฺญตฺร ธมฺมจริยาย สมจริยาย กุสลกิริยาย ปุญฺญกิริยายา’’ติ? “महाराज, मैं आपको बताता हूँ, महाराज, मैं आपको सूचित करता हूँ— महाराज, बुढ़ापा और मृत्यु (जरा-मरण) आप पर हावी हो रहे हैं। महाराज, जब बुढ़ापा और मृत्यु आप पर हावी हो रहे हों, तो आपको क्या करना चाहिए?” “भन्ते, जब बुढ़ापा और मृत्यु मुझ पर हावी हो रहे हों, तो धर्म-आचरण, सम-आचरण, कुशल कर्म और पुण्य कर्म के अतिरिक्त और क्या करना चाहिए? भन्ते, उन क्षत्रिय राजाओं के पास, जिनका राज्याभिषेक हो चुका है, जो ऐश्वर्य के मद में चूर हैं, जो काम-वासनाओं में लिप्त हैं, जिन्होंने अपने जनपद में स्थिरता प्राप्त कर ली है और जो विशाल पृथ्वी मंडल को जीतकर उस पर शासन कर रहे हैं— उनके पास हाथियों की सेना (हस्तियुद्ध) होती है; लेकिन भन्ते, जब जरा-मरण हावी हो जाता है, तो उन हाथियों की सेना की भी कोई गति नहीं होती, कोई सामर्थ्य नहीं होता। भन्ते, उन राजाओं के पास घोड़ों की सेना, रथों की सेना और पैदल सेना (पत्तियुद्ध) भी होती है; लेकिन भन्ते, जरा-मरण के सामने उनका भी कोई वश नहीं चलता। भन्ते, इस राजकुल में चतुर मंत्री भी हैं, जो आए हुए शत्रुओं को अपनी कूटनीति (मन्त्र) से विभाजित करने में सक्षम हैं; लेकिन भन्ते, जरा-मरण के सामने कूटनीति का भी कोई वश नहीं चलता। भन्ते, इस राजकुल में भूमि के भीतर और ऊपर बहुत सारा सोना-चाँदी (धन) भी है, जिससे हम आए हुए शत्रुओं को प्रलोभन देकर वश में कर सकते हैं; लेकिन भन्ते, जरा-मरण के सामने धन-बल का भी कोई वश नहीं चलता। इसलिए भन्ते, जब जरा-मरण हावी हो रहा हो, तो धर्म-आचरण, सम-आचरण, कुशल कर्म और पुण्य कर्म के अतिरिक्त और क्या करना चाहिए?” ‘‘เอวเมตํ, มหาราช, เอวเมตํ, มหาราช! อธิวตฺตมาเน ชรามรเณ กิมสฺส กรณียํ อญฺญตฺร ธมฺมจริยาย สมจริยาย กุสลกิริยาย ปุญฺญกิริยายา’’ติ? อิทมโวจ ภควา…เป… สตฺถา – “महाराज, यह ऐसा ही है! महाराज, यह ऐसा ही है! जब जरा-मरण हावी हो रहा हो, तो धर्म-आचरण, सम-आचरण, कुशल कर्म और पुण्य कर्म के अतिरिक्त और क्या करना चाहिए?” भगवान ने यह कहा... फिर शास्ता ने (ये गाथाएँ कहीं)— ‘‘ยถาปิ เสลา วิปุลา, นภํ อาหจฺจ ปพฺพตา; สมนฺตานุปริยาเยยฺยุํ, นิปฺโปเถนฺโต จตุทฺทิสา. “जैसे विशाल चट्टानी पर्वत आकाश को छूते हुए चारों दिशाओं से सभी प्राणियों को कुचलते हुए आगे बढ़ते हैं।” ‘‘เอวํ ชรา จ มจฺจุ จ, อธิวตฺตนฺติ ปาณิเน ; ขตฺติเย พฺราหฺมเณ เวสฺเส, สุทฺเท จณฺฑาลปุกฺกุเส; น กิญฺจิ ปริวชฺเชติ, สพฺพเมวาภิมทฺทติ. “उसी प्रकार बुढ़ापा और मृत्यु सभी प्राणियों पर हावी हो जाते हैं— चाहे वे क्षत्रिय हों, ब्राह्मण हों, वैश्य हों, शूद्र हों, चांडाल हों या पुक्कुस। वे किसी को नहीं छोड़ते, सबको कुचल देते हैं।” ‘‘น ตตฺถ หตฺถีนํ ภูมิ, น รถานํ น ปตฺติยา; น จาปิ มนฺตยุทฺเธน, สกฺกา เชตุํ ธเนน วา. “वहाँ न हाथियों का वश चलता है, न रथों का और न पैदल सेना का। न ही कूटनीति से और न ही धन से उन्हें जीता जा सकता है।” ‘‘ตสฺมา หิ ปณฺฑิโต โปโส, สมฺปสฺสํ อตฺถมตฺตโน; พุทฺเธ ธมฺเม จ สงฺเฆ จ, ธีโร สทฺธํ นิเวสเย. “इसलिए, अपना कल्याण चाहने वाले बुद्धिमान और धैर्यवान व्यक्ति को बुद्ध, धम्म और संघ में श्रद्धा स्थापित करनी चाहिए।” ‘‘โย [Pg.103] ธมฺมํ จริ กาเยน, วาจาย อุท เจตสา; อิเธว นํ ปสํสนฺติ, เปจฺจ สคฺเค ปโมทตี’’ติ. “जो व्यक्ति शरीर, वाणी और मन से धर्म का पालन करता है, इस लोक में उसकी प्रशंसा होती है और मृत्यु के बाद वह स्वर्ग में आनंदित होता है।” ตติโย วคฺโค. तीसरा वर्ग (वग्ग)। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान)— ปุคฺคโล อยฺยิกา โลโก, อิสฺสตฺตํ ปพฺพตูปมา; เทสิตํ พุทฺธเสฏฺเฐน, อิมํ โกสลปญฺจกนฺติ. पुग्गल, अय्यिका, लोक, इस्सत्त और पब्बतूपम— बुद्ध श्रेष्ठ द्वारा उपदेशित यह कोसल-पंचक है। โกสลสํยุตฺตํ สมตฺตํ. कोसल संयुत्त समाप्त। ๔. มารสํยุตฺตํ ४. मार संयुत्त ๑. ปฐมวคฺโค १. प्रथम वर्ग ๑. ตโปกมฺมสุตฺตํ १. तपोकम्म सुत्त ๑๓๗. เอวํ [Pg.104] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา อุรุเวลายํ วิหรติ นชฺชา เนรญฺชราย ตีเร อชปาลนิคฺโรธมูเล ปฐมาภิสมฺพุทฺโธ. อถ โข ภควโต รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘‘มุตฺโต วตมฺหิ ตาย ทุกฺกรการิกาย. สาธุ มุตฺโต วตมฺหิ ตาย อนตฺถสํหิตาย ทุกฺกรการิกาย. สาธุ วตมฺหิ มุตฺโต โพธึ สมชฺฌค’’นฺติ. १३७. ऐसा मैंने सुना— एक समय भगवान उरुवेला में निरंजरा नदी के तट पर अजपाल निग्रोध (बरगद) के पेड़ के नीचे विहार कर रहे थे, जब वे अभी-अभी बुद्ध हुए थे। तब एकांत में ध्यानमग्न भगवान के मन में ऐसा विचार उत्पन्न हुआ— ‘मैं उस दुष्कर तपस्या (दुक्करकारिका) से मुक्त हो गया हूँ। यह अच्छा हुआ कि मैं उस अनर्थकारी दुष्कर तपस्या से मुक्त हो गया। यह अच्छा हुआ कि मैं मुक्त होकर बोधि (ज्ञान) को प्राप्त हुआ हूँ।’ อถ โข มาโร ปาปิมา ภควโต เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब पापी मार ने भगवान के मन के विचार को अपने मन से जानकर, जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचा और भगवान को गाथा में संबोधित किया— ‘‘ตโปกมฺมา อปกฺกมฺม, เยน น สุชฺฌนฺติ มาณวา; อสุทฺโธ มญฺญสิ สุทฺโธ, สุทฺธิมคฺคา อปรทฺโธ’’ ติ. “तपस्या के कर्मों को छोड़कर, जिनसे मनुष्य शुद्ध होते हैं, तुम अशुद्ध होते हुए भी स्वयं को शुद्ध मानते हो। तुम शुद्धि के मार्ग से भटक गए हो।” อถ โข ภควา ‘‘มาโร อยํ ปาปิมา’’ อิติ วิทิตฺวา มารํ ปาปิมนฺตํ คาถาหิ อชฺฌภาสิ – तब भगवान ने ‘यह पापी मार है’ ऐसा जानकर, पापी मार को गाथाओं में उत्तर दिया—”}]```of_thought} Here is the JSON requested: ```json [ { ‘‘อนตฺถสํหิตํ ญตฺวา, ยํ กิญฺจิ อมรํ ตปํ ; สพฺพํ นตฺถาวหํ โหติ, ผิยาริตฺตํว ธมฺมนิ. "यह जानकर कि अमरत्व के लिए किया गया कोई भी तप अनर्थकारी (निरर्थक) है, वह सब उसी प्रकार निष्फल होता है जैसे सूखी भूमि पर पतवार (चलाना)।" ‘‘สีลํ สมาธิ ปญฺญญฺจ, มคฺคํ โพธาย ภาวยํ; ปตฺโตสฺมิ ปรมํ สุทฺธึ, นิหโต ตฺวมสิ อนฺตกา’’ติ. "शील, समाधि और प्रज्ञा के मार्ग को बोधि (ज्ञान) के लिए भावित करते हुए, मैंने परम शुद्धि (अर्हत्व) प्राप्त कर ली है। हे अंतक (मार)! तुम पराजित हो गए हो।" อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ ภควา, ชานาติ มํ สุคโต’’ติ, ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार यह सोचकर कि 'भगवान मुझे जानते हैं, सुगत मुझे जानते हैं', दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ๒. หตฺถิราชวณฺณสุตฺตํ २. हत्थिराजवण्ण सुत्त (हस्तिराज रूप सुत्त) ๑๓๘. เอวํ [Pg.105] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา อุรุเวลายํ วิหรติ นชฺชา เนรญฺชราย ตีเร อชปาลนิคฺโรธมูเล ปฐมาภิสมฺพุทฺโธ. เตน โข ปน สมเยน ภควา รตฺตนฺธการติมิสายํ อพฺโภกาเส นิสินฺโน โหติ, เทโว จ เอกเมกํ ผุสายติ. อถ โข มาโร ปาปิมา ภควโต ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํสํ อุปฺปาเทตุกาโม มหนฺตํ หตฺถิราชวณฺณํ อภินิมฺมินิตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ. เสยฺยถาปิ นาม มหาอริฏฺฐโก มณิ, เอวมสฺส สีสํ โหติ. เสยฺยถาปิ นาม สุทฺธํ รูปิยํ, เอวมสฺส ทนฺตา โหนฺติ. เสยฺยถาปิ นาม มหตี นงฺคลีสา, เอวมสฺส โสณฺโฑ โหติ. อถ โข ภควา ‘‘มาโร อยํ ปาปิมา’’ อิติ วิทิตฺวา มารํ ปาปิมนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – १३८. ऐसा मैंने सुना—एक समय भगवान उरुवेला में निरंजना नदी के तट पर अजपाल निग्रोध (बरगद) के नीचे विहार कर रहे थे, जब वे अभी-अभी बुद्ध हुए थे। उस समय भगवान रात के घने अंधकार में खुले आकाश के नीचे बैठे थे और हल्की-हल्की वर्षा हो रही थी। तब पापी मार भगवान के मन में भय, घबराहट और रोमांच उत्पन्न करने की इच्छा से एक विशाल हस्तिराज (हाथी) का रूप धारण कर भगवान के पास आया। उसका सिर एक विशाल काले पत्थर के समान था, उसके दाँत शुद्ध चाँदी के समान थे, और उसकी सूँड एक बड़े हल के हत्थे के समान थी। तब भगवान ने यह जानकर कि 'यह पापी मार है', पापी मार से गाथा में कहा— ‘‘สํสรํ ทีฆมทฺธานํ, วณฺณํ กตฺวา สุภาสุภํ; อลํ เต เตน ปาปิม, นิหโต ตฺวมสิ อนฺตกา’’ติ. "लंबे समय तक संसार में भटकते हुए तुमने शुभ और अशुभ रूप धारण किए हैं। हे पापी! अब बस करो, हे अंतक! तुम पराजित हो गए हो।" อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ ภควา, ชานาติ มํ สุคโต’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार यह सोचकर कि 'भगवान मुझे जानते हैं, सुगत मुझे जानते हैं', दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ๓. สุภสุตฺตํ ३. सुभ सुत्त ๑๓๙. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา อุรุเวลายํ วิหรติ นชฺชา เนรญฺชราย ตีเร อชปาลนิคฺโรธมูเล ปฐมาภิสมฺพุทฺโธ. เตน โข ปน สมเยน ภควา รตฺตนฺธการติมิสายํ อพฺโภกาเส นิสินฺโน โหติ, เทโว จ เอกเมกํ ผุสายติ. อถ โข มาโร ปาปิมา, ภควโต ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํสํ อุปฺปาเทตุกาโม, เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควโต อวิทูเร อุจฺจาวจา วณฺณนิภา อุปทํเสติ, สุภา เจว อสุภา จ. อถ โข ภควา ‘‘มาโร อยํ ปาปิมา’’ อิติ วิทิตฺวา มารํ ปาปิมนฺตํ คาถาหิ อชฺฌภาสิ – १३९. ऐसा मैंने सुना—एक समय भगवान उरुवेला में निरंजना नदी के तट पर अजपाल निग्रोध के नीचे विहार कर रहे थे, जब वे अभी-अभी बुद्ध हुए थे। उस समय भगवान रात के घने अंधकार में खुले आकाश के नीचे बैठे थे और हल्की-हल्की वर्षा हो रही थी। तब पापी मार भगवान के मन में भय, घबराहट और रोमांच उत्पन्न करने की इच्छा से भगवान के पास आया। पास आकर उसने भगवान के समीप ही विविध प्रकार के सुंदर और असुंदर रूप प्रदर्शित किए। तब भगवान ने यह जानकर कि 'यह पापी मार है', पापी मार से गाथाओं में कहा— ‘‘สํสรํ ทีฆมทฺธานํ, วณฺณํ กตฺวา สุภาสุภํ; อลํ เต เตน ปาปิม, นิหโต ตฺวมสิ อนฺตก. "लंबे समय तक संसार में भटकते हुए तुमने शुभ और अशुभ रूप धारण किए हैं। हे पापी! अब बस करो, हे अंतक! तुम पराजित हो गए हो।" ‘‘เย [Pg.106] จ กาเยน วาจาย, มนสา จ สุสํวุตา; น เต มารวสานุคา, น เต มารสฺส พทฺธคู’’ ติ. "जो काया, वाणी और मन से भली-भाँति संयमित हैं, वे मार के वश में नहीं होते और न ही वे मार के दास (अनुगामी) होते हैं।" อถ โข มาโร…เป… ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब मार... (वही पूर्ववत)... वहीं अंतर्धान हो गया। ๔. ปฐมมารปาสสุตฺตํ ४. प्रथम मारपास सुत्त ๑๔๐. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา พาราณสิยํ วิหรติ อิสิปตเน มิคทาเย. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ภิกฺขโว’’ติ. ‘‘ภทนฺเต’’ติ เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – १४०. ऐसा मैंने सुना—एक समय भगवान वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाव में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया—'हे भिक्षुओं!' उन भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया—'भदंत!' भगवान ने यह कहा— ‘‘มยฺหํ โข, ภิกฺขเว, โยนิโส มนสิการา โยนิโส สมฺมปฺปธานา อนุตฺตรา วิมุตฺติ อนุปฺปตฺตา, อนุตฺตรา วิมุตฺติ สจฺฉิกตา. ตุมฺเหปิ, ภิกฺขเว, โยนิโส มนสิการา โยนิโส สมฺมปฺปธานา อนุตฺตรํ วิมุตฺตึ อนุปาปุณาถ, อนุตฺตรํ วิมุตฺตึ สจฺฉิกโรถา’’ติ. อถ โข มาโร ปาปิมา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – "भिक्षुओं! योनिशो मनसिकार (उचित चिंतन) और योनिशो सम्यक प्रधान (उचित प्रयत्न) से मैंने अनुत्तर विमुक्ति प्राप्त की है, अनुत्तर विमुक्ति का साक्षात्कार किया है। भिक्षुओं! तुम भी योनिशो मनसिकार और योनिशो सम्यक प्रधान द्वारा अनुत्तर विमुक्ति को प्राप्त करो, अनुत्तर विमुक्ति का साक्षात्कार करो।" तब पापी मार जहाँ भगवान थे वहाँ आया और पास आकर भगवान से गाथा में कहा— ‘‘พทฺโธสิ มารปาเสน, เย ทิพฺพา เย จ มานุสา; มารพนฺธนพทฺโธสิ, น เม สมณ โมกฺขสี’’ติ. "तुम मार के पाश से बँधे हो, चाहे वे दिव्य हों या मानवीय। तुम मार के बंधन में बँधे हो; हे श्रमण! तुम मुझसे मुक्त नहीं हो पाओगे।" ‘‘มุตฺตาหํ มารปาเสน, เย ทิพฺพา เย จ มานุสา; มารพนฺธนมุตฺโตมฺหิ, นิหโต ตฺวมสิ อนฺตกา’’ติ. "मैं मार के पाश से मुक्त हूँ, चाहे वे दिव्य हों या मानवीय। मैं मार के बंधन से मुक्त हूँ; हे अंतक! तुम पराजित हो गए हो।" อถ โข มาโร ปาปิมา…เป… ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार... (वही पूर्ववत)... वहीं अंतर्धान हो गया। ๕. ทุติยมารปาสสุตฺตํ ५. द्वितीय मारपास सुत्त ๑๔๑. เอกํ สมยํ ภควา พาราณสิยํ วิหรติ อิสิปตเน มิคทาเย. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ภิกฺขโว’’ติ. ‘‘ภทนฺเต’’ติ เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – १४१. एक समय भगवान वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाव में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया—'हे भिक्षुओं!' उन भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया—'भदंत!' भगवान ने यह कहा— ‘‘มุตฺตาหํ, ภิกฺขเว, สพฺพปาเสหิ เย ทิพฺพา เย จ มานุสา. ตุมฺเหปิ, ภิกฺขเว, มุตฺตา สพฺพปาเสหิ เย ทิพฺพา เย จ มานุสา. จรถ, ภิกฺขเว, จาริกํ พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. มา เอเกน ทฺเว อคมิตฺถ. เทเสถ, ภิกฺขเว, ธมฺมํ อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ [Pg.107] เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสถ. สนฺติ สตฺตา อปฺปรชกฺขชาติกา, อสฺสวนตา ธมฺมสฺส ปริหายนฺติ. ภวิสฺสนฺติ ธมฺมสฺส อญฺญาตาโร. อหมฺปิ, ภิกฺขเว, เยน อุรุเวลา เสนานิคโม เตนุปสงฺกมิสฺสามิ ธมฺมเทสนายา’’ติ. อถ โข มาโร ปาปิมา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – "भिक्षुओं! मैं दिव्य और मानवीय सभी पाशों से मुक्त हूँ। भिक्षुओं! तुम भी दिव्य और मानवीय सभी पाशों से मुक्त हो। भिक्षुओं! बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय, लोक पर अनुकंपा के लिए, देवताओं और मनुष्यों के अर्थ, हित और सुख के लिए चारिका करो। एक मार्ग से दो (भिक्षु) मत जाओ। भिक्षुओं! उस धर्म का उपदेश करो जो आदि में कल्याणकारी है, मध्य में कल्याणकारी है और अंत में कल्याणकारी है; जो अर्थपूर्ण है, सुव्यंजित है; पूर्णतः परिपूर्ण और परिशुद्ध ब्रह्मचर्य का प्रकाशन करो। ऐसे प्राणी हैं जिनकी प्रज्ञा-चक्षु में धूल कम है, जो धर्म न सुनने के कारण नष्ट हो रहे हैं; वे धर्म को समझने वाले होंगे। भिक्षुओं! मैं भी धर्मोपदेश के लिए उरुवेला के सेनानिगम की ओर जाऊँगा।" तब पापी मार जहाँ भगवान थे वहाँ आया और पास आकर भगवान से गाथा में कहा— ‘‘พทฺโธสิ สพฺพปาเสหิ, เย ทิพฺพา เย จ มานุสา; มหาพนฺธนพทฺโธสิ, น เม สมณ โมกฺขสี’’ติ. "तुम दिव्य और मानवीय सभी पाशों से बँधे हो। तुम महाबंधन में बँधे हो; हे श्रमण! तुम मुझसे मुक्त नहीं हो पाओगे।" ‘‘มุตฺตาหํ สพฺพปาเสหิ, เย ทิพฺพา เย จ มานุสา; มหาพนฺธนมุตฺโตมฺหิ, นิหโต ตฺวมสิ อนฺตกา’’ติ. "मैं दिव्य और मानवीय सभी पाशों से मुक्त हूँ। मैं महाबंधन से मुक्त हूँ; हे अंतक! तुम पराजित हो गए हो।" อถ โข มาโร ปาปิมา…เป… ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार... (वही पूर्ववत)... वहीं अंतर्धान हो गया। ๖. สปฺปสุตฺตํ ६. सप्प सुत्त (सर्प सुत्त) ๑๔๒. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. เตน โข ปน สมเยน ภควา รตฺตนฺธการติมิสายํ อพฺโภกาเส นิสินฺโน โหติ, เทโว จ เอกเมกํ ผุสายติ. १४२. मैंने ऐसा सुना है - एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दकनिवाप में विहार कर रहे थे। उस समय भगवान रात के घने अंधकार में खुले आकाश के नीचे बैठे थे और वर्षा की बूँदें धीरे-धीरे गिर रही थीं। อถ โข มาโร ปาปิมา ภควโต ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํสํ อุปฺปาเทตุกาโม มหนฺตํ สปฺปราชวณฺณํ อภินิมฺมินิตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ. เสยฺยถาปิ นาม มหตี เอกรุกฺขิกา นาวา, เอวมสฺส กาโย โหติ. เสยฺยถาปิ นาม มหนฺตํ โสณฺฑิกากิฬญฺชํ, เอวมสฺส ผโณ โหติ. เสยฺยถาปิ นาม มหตี โกสลิกา กํสปาติ, เอวมสฺส อกฺขีนิ ภวนฺติ. เสยฺยถาปิ นาม เทเว คฬคฬายนฺเต วิชฺชุลฺลตา นิจฺฉรนฺติ, เอวมสฺส มุขโต ชิวฺหา นิจฺฉรติ. เสยฺยถาปิ นาม กมฺมารคคฺคริยา ธมมานาย สทฺโท โหติ, เอวมสฺส อสฺสาสปสฺสาสานํ สทฺโท โหติ. तब पापी मार ने भगवान के मन में भय, घबराहट और रोमांच (रोंगटे खड़े होना) उत्पन्न करने की इच्छा से एक विशाल सर्पराज का रूप धारण किया और जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा। उस सर्पराज का शरीर एक विशाल नाव (एक ही वृक्ष से बनी) के समान था। उसका फण कलार (शराब बनाने वाले) की बड़ी चटाई के समान था। उसकी आँखें कोसल नरेश की बड़ी काँसे की थाली के समान थीं। उसकी जीभ मुख से वैसे ही निकल रही थी जैसे गरजते बादलों के बीच बिजली चमकती है। उसके श्वास-प्रश्वास की ध्वनि लुहार की धौंकनी चलने की आवाज़ के समान थी। อถ โข ภควา ‘‘มาโร อยํ ปาปิมา’’ อิติ วิทิตฺวา มารํ ปาปิมนฺตํ คาถาหิ อชฺฌภาสิ – तब भगवान ने यह जानकर कि "यह पापी मार है", पापी मार को गाथाओं में संबोधित किया— ‘‘โย สุญฺญเคหานิ เสวติ,เสยฺโย โส มุนิ อตฺตสญฺญโต; โวสฺสชฺช จเรยฺย ตตฺถ โส,ปติรูปญฺหิ ตถาวิธสฺส ตํ. "जो मुनि आत्म-संयमित होकर शून्य घरों (एकांत स्थानों) का सेवन करता है, उसे वहाँ (शरीर के प्रति आसक्ति) त्याग कर विचरण करना चाहिए; ऐसे महापुरुष के लिए यही उचित है।" ‘‘จรกา [Pg.108] พหู เภรวา พหู,อโถ ฑํสสรีสปา พหู; โลมมฺปิ น ตตฺถ อิญฺชเย,สุญฺญาคารคโต มหามุนิ. "वहाँ विचरण करने वाले बहुत से भयानक प्राणी हैं, और बहुत से दंश (डंक मारने वाले) तथा सरीसृप (साँप आदि) भी हैं; किंतु शून्य घर में गया हुआ वह महामुनि वहाँ एक रोंगटा भी नहीं हिलाता।" ‘‘นภํ ผเลยฺย ปถวี จเลยฺย,สพฺเพปิ ปาณา อุท สนฺตเสยฺยุํ; สลฺลมฺปิ เจ อุรสิ ปกปฺปเยยฺยุํ,อุปธีสุ ตาณํ น กโรนฺติ พุทฺธา’’ติ. "चाहे आकाश फट जाए, पृथ्वी काँप उठे, या सभी प्राणी भयभीत हो जाएँ; यहाँ तक कि यदि हृदय में भाला भी चुभो दिया जाए, तो भी बुद्ध (अपने शरीर रूपी) उपाधियों में शरण (बचाव) नहीं ढूँढते।" อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ ภควา, ชานาติ มํ สุคโต’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार यह सोचकर कि "भगवान मुझे जानते हैं, सुगत मुझे जानते हैं", दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ๗. สุปติสุตฺตํ ७. सुपति सुत्त ๑๔๓. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. อถ โข ภควา พหุเทวรตฺตึ อพฺโภกาเส จงฺกมิตฺวา รตฺติยา ปจฺจูสสมยํ ปาเท ปกฺขาเลตฺวา วิหารํ ปวิสิตฺวา ทกฺขิเณน ปสฺเสน สีหเสยฺยํ กปฺเปสิ ปาเท ปาทํ อจฺจาธาย สโต สมฺปชาโน อุฏฺฐานสญฺญํ มนสิ กริตฺวา. อถ โข มาโร ปาปิมา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – १४३. एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दकनिवाप में विहार कर रहे थे। तब भगवान रात के बहुत बड़े भाग तक खुले आकाश में चंक्रमण (टहलने) के बाद, रात के अंतिम प्रहर में पैर धोकर विहार (कुटी) में प्रविष्ट हुए और स्मृतिवान तथा संप्रजन्य युक्त होकर, उठने की संज्ञा को मन में रखकर, दाहिनी करवट से एक पैर पर दूसरा पैर रखकर सिंह-शय्या में लेट गए। तब पापी मार जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा और भगवान को गाथा में संबोधित किया— ‘‘กึ โสปฺปสิ กึ นุ โสปฺปสิ,กิมิทํ โสปฺปสิ ทุพฺภโค วิย; สุญฺญมคารนฺติ โสปฺปสิ,กิมิทํ โสปฺปสิ สูริเย อุคฺคเต’’ติ. "तुम क्यों सो रहे हो? तुम क्यों सो रहे हो? तुम इस प्रकार क्यों सो रहे हो जैसे कोई अभागा (मूर्छित) व्यक्ति हो? क्या तुम यह सोचकर सो रहे हो कि 'घर शून्य है'? सूर्य उगने पर भी तुम क्यों सो रहे हो?" ‘‘ยสฺส ชาลินี วิสตฺติกา,ตณฺหา นตฺถิ กุหิญฺจิ เนตเว; สพฺพูปธิปริกฺขยา พุทฺโธ,โสปฺปติ กึ ตเวตฺถ มารา’’ติ. "जिस बुद्ध के पास किसी भी भव में ले जाने वाली जाल के समान विषैली तृष्णा नहीं है, वह बुद्ध समस्त उपाधियों (आसक्तियों) के क्षय हो जाने के कारण सोता है। हे मार! इसमें तुम्हें क्या (परेशानी) है?" อถ โข มาโร ปาปิมา…เป… ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार... पूर्ववत... वहीं अंतर्धान हो गया। ๘. นนฺทติสุตฺตํ ८. नन्दति सुत्त ๑๔๔. เอวํ [Pg.109] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. อถ โข มาโร ปาปิมา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – १४४. मैंने ऐसा सुना है - एक समय भगवान श्रावस्ती के अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे। तब पापी मार जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा और भगवान के समीप यह गाथा कही— ‘‘นนฺทติ ปุตฺเตหิ ปุตฺติมา, โคมา โคภิ ตเถว นนฺทติ; อุปธีหิ นรสฺส นนฺทนา, น หิ โส นนฺทติ โย นิรูปธี’’ติ. "पुत्रों वाला पुत्रों से आनंदित होता है, वैसे ही गौओं वाला गौओं से आनंदित होता है। मनुष्य को उपाधियों (सांसारिक वस्तुओं) से ही आनंद मिलता है; जिसके पास कोई उपाधि नहीं है, वह आनंदित नहीं होता।" ‘‘โสจติ ปุตฺเตหิ ปุตฺติมา, โคมา โคภิ ตเถว โสจติ; อุปธีหิ นรสฺส โสจนา, น หิ โส โสจติ โย นิรูปธี’’ติ. "पुत्रों वाला पुत्रों के कारण शोक करता है, वैसे ही गौओं वाला गौओं के कारण शोक करता है। मनुष्य को उपाधियों के कारण ही शोक होता है; जिसके पास कोई उपाधि नहीं है, वह शोक नहीं करता।" อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ ภควา, ชานาติ มํ สุคโต’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार यह सोचकर कि "भगवान मुझे जानते हैं, सुगत मुझे जानते हैं", दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ๙. ปฐมอายุสุตฺตํ ९. प्रथम आयु सुत्त ๑๔๕. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ภิกฺขโว’’ติ. ‘‘ภทนฺเต’’ติ เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – १४५. मैंने ऐसा सुना है - एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दकनिवाप में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— "भिक्षुओं!" उन भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया— "भदन्त!" भगवान ने यह कहा— ‘‘อปฺปมิทํ, ภิกฺขเว, มนุสฺสานํ อายุ. คมนีโย สมฺปราโย, กตฺตพฺพํ กุสลํ, จริตพฺพํ พฺรหฺมจริยํ. นตฺถิ ชาตสฺส อมรณํ. โย, ภิกฺขเว, จิรํ ชีวติ, โส วสฺสสตํ อปฺปํ วา ภิยฺโย’’ติ. "भिक्षुओं! मनुष्यों की यह आयु अल्प है। परलोक जाना ही है, कुशल (पुण्य) करना चाहिए, ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। जो जन्मा है, उसकी मृत्यु न हो, ऐसा नहीं है। भिक्षुओं! जो दीर्घकाल तक जीता है, वह सौ वर्ष या उससे कुछ अधिक ही जीता है।" อถ โข มาโร ปาปิมา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब पापी मार जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा और भगवान को गाथा में संबोधित किया— ‘‘ทีฆมายุ มนุสฺสานํ, น นํ หีเฬ สุโปริโส; จเรยฺย ขีรมตฺโตว, นตฺถิ มจฺจุสฺส อาคโม’’ติ. "मनुष्यों की आयु लंबी है, सत्पुरुष को इसकी निंदा नहीं करनी चाहिए। उसे दूध पीकर मस्त रहने वाले बालक की तरह रहना चाहिए; मृत्यु का आगमन नहीं होने वाला है।" ‘‘อปฺปมายุ มนุสฺสานํ, หีเฬยฺย นํ สุโปริโส; จเรยฺยาทิตฺตสีโสว, นตฺถิ มจฺจุสฺส นาคโม’’ติ. "मनुष्यों की आयु अल्प है, सत्पुरुष को इसकी निंदा (तुच्छ समझना) करनी चाहिए। उसे वैसे आचरण करना चाहिए जैसे किसी के सिर में आग लगी हो; मृत्यु का आगमन न हो, ऐसा नहीं है।" อถ โข มาโร…เป… ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब मार... पूर्ववत... वहीं अंतर्धान हो गया। ๑๐. ทุติยอายุสุตฺตํ १०. द्वितीय आयु सुत्त ๑๔๖. เอวํ [Pg.110] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. ตตฺร โข ภควา…เป… เอตทโวจ – १४६. मैंने ऐसा सुना है - एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दकनिवाप में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने... पूर्ववत... यह कहा— ‘‘อปฺปมิทํ, ภิกฺขเว, มนุสฺสานํ อายุ. คมนีโย สมฺปราโย, กตฺตพฺพํ กุสลํ, จริตพฺพํ พฺรหฺมจริยํ. นตฺถิ ชาตสฺส อมรณํ. โย, ภิกฺขเว, จิรํ ชีวติ, โส วสฺสสตํ อปฺปํ วา ภิยฺโย’’ติ. "भिक्षुओं! मनुष्यों की यह आयु अल्प है। परलोक जाना ही है, कुशल करना चाहिए, ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। जो जन्मा है, उसकी मृत्यु न हो, ऐसा नहीं है। भिक्षुओं! जो दीर्घकाल तक जीता है, वह सौ वर्ष या उससे कुछ अधिक ही जीता है।" อถ โข มาโร ปาปิมา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब पापी मार जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा और भगवान को गाथा में संबोधित किया— ‘‘นาจฺจยนฺติ อโหรตฺตา, ชีวิตํ นูปรุชฺฌติ; อายุ อนุปริยายติ, มจฺจานํ เนมีว รถกุพฺพร’’นฺติ. "दिन और रात व्यर्थ नहीं जाते, जीवन रुकता नहीं है। मरणधर्मा मनुष्यों की आयु वैसे ही पीछे-पीछे चलती है जैसे रथ के पहिये का घेरा धुरी के पीछे चलता है।" ‘‘อจฺจยนฺติ อโหรตฺตา, ชีวิตํ อุปรุชฺฌติ; อายุ ขียติ มจฺจานํ, กุนฺนทีนํว โอทก’’นฺติ. "दिन और रात बीतते जाते हैं, जीवन समाप्त होता जाता है। मरणधर्मा मनुष्यों की आयु वैसे ही क्षीण होती है जैसे छोटी नदियों का जल।" อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ ภควา, ชานาติ มํ สุคโต’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार यह सोचकर कि "भगवान मुझे जानते हैं, सुगत मुझे जानते हैं," दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ปฐโม วคฺโค. प्रथम वर्ग। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उदान) इस प्रकार है – ตโปกมฺมญฺจ นาโค จ, สุภํ ปาเสน เต ทุเว; สปฺโป สุปติ นนฺทนํ, อายุนา อปเร ทุเวติ. तपोकम्म और नाग, सुभ और दो पास सुत्त; सप्प, सुपति, नन्दन और दो आयु सुत्त। ๒. ทุติยวคฺโค २. द्वितीय वर्ग ๑. ปาสาณสุตฺตํ १. पासाण सुत्त ๑๔๗. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ คิชฺฌกูเฏ ปพฺพเต. เตน โข ปน สมเยน ภควา รตฺตนฺธการติมิสายํ อพฺโภกาเส นิสินฺโน โหติ, เทโว จ เอกเมกํ ผุสายติ. อถ โข มาโร ปาปิมา ภควโต ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํสํ อุปฺปาเทตุกาโม เยน ภควา [Pg.111] เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควโต อวิทูเร มหนฺเต ปาสาเณ ปทาเลสิ. १४७. एक समय भगवान राजगृह में गृध्रकूट पर्वत पर विहार कर रहे थे। उस समय भगवान रात के घने अंधकार में खुले आकाश के नीचे बैठे थे और हल्की वर्षा हो रही थी। तब पापी मार भगवान के मन में भय, घबराहट और रोमांच (रोंगटे खड़े होना) उत्पन्न करने की इच्छा से जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचा; पहुँचकर उसने भगवान के समीप ही बड़ी-बड़ी शिलाओं को चटकाया। อถ โข ภควา ‘‘มาโร อยํ ปาปิมา’’ อิติ วิทิตฺวา มารํ ปาปิมนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब भगवान ने "यह पापी मार है" ऐसा जानकर पापी मार से गाथा में कहा – ‘‘สเจปิ เกวลํ สพฺพํ, คิชฺฌกูฏํ จเลสฺสสิ ; เนว สมฺมาวิมุตฺตานํ, พุทฺธานํ อตฺถิ อิญฺชิต’’นฺติ. "यदि तुम संपूर्ण गृध्रकूट पर्वत को भी हिला दो, तो भी भली-भाँति विमुक्त बुद्धों में कोई कंपन नहीं होता।" อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ ภควา, ชานาติ มํ สุคโต’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार यह सोचकर कि "भगवान मुझे जानते हैं, सुगत मुझे जानते हैं," दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ๒. กินฺนุสีหสุตฺตํ २. किन्नुसीह सुत्त ๑๔๘. เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. เตน โข ปน สมเยน ภควา มหติยา ปริสาย ปริวุโต ธมฺมํ เทเสติ. १४८. एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे। उस समय भगवान एक बड़ी परिषद से घिरे हुए धर्मोपदेश दे रहे थे। อถ โข มารสฺส ปาปิมโต เอตทโหสิ – ‘‘อยํ โข สมโณ โคตโม มหติยา ปริสาย ปริวุโต ธมฺมํ เทเสติ. ยํนูนาหํ เยน สมโณ โคตโม เตนุปสงฺกเมยฺยํ วิจกฺขุกมฺมายา’’ติ. อถ โข มาโร ปาปิมา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब पापी मार के मन में यह विचार आया – "यह श्रमण गौतम बड़ी परिषद से घिरे हुए धर्मोपदेश दे रहे हैं। क्यों न मैं श्रमण गौतम के पास उनकी परिषद की प्रज्ञा-चक्षु को भ्रमित करने के लिए जाऊँ।" तब पापी मार जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचा; पहुँचकर उसने भगवान से गाथा में कहा – ‘‘กินฺนุ สีโหว นทสิ, ปริสายํ วิสารโท; ปฏิมลฺโล หิ เต อตฺถิ, วิชิตาวี นุ มญฺญสี’’ติ. "तुम परिषद में निर्भय होकर सिंह के समान क्यों गर्जना कर रहे हो? क्या तुम्हारा कोई प्रतिद्वंद्वी है? क्या तुम स्वयं को विजेता मानते हो?" ‘‘นทนฺติ เว มหาวีรา, ปริสาสุ วิสารทา; ตถาคตา พลปฺปตฺตา, ติณฺณา โลเก วิสตฺติก’’นฺติ. "महावीर परिषद में निर्भय होकर गर्जना करते हैं; तथागत बल प्राप्त कर चुके हैं और उन्होंने लोक में तृष्णा को पार कर लिया है।" อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ ภควา, ชานาติ มํ สุคโต’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार यह सोचकर कि "भगवान मुझे जानते हैं, सुगत मुझे जानते हैं," दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ๓. สกลิกสุตฺตํ ३. सकलिक सुत्त ๑๔๙. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ มทฺทกุจฺฉิสฺมึ มิคทาเย. เตน โข ปน สมเยน ภควโต ปาโท สกลิกาย [Pg.112] ขโต โหติ, ภุสา สุทํ ภควโต เวทนา วตฺตนฺติ สารีริกา ทุกฺขา ติพฺพา ขรา กฏุกา อสาตา อมนาปา. ตา สุทํ ภควา สโต สมฺปชาโน อธิวาเสติ อวิหญฺญมาโน. อถ โข ภควา จตุคฺคุณํ สงฺฆาฏึ ปญฺญเปตฺวา ทกฺขิเณน ปสฺเสน สีหเสยฺยํ กปฺเปสิ ปาเท ปาทํ อจฺจาธาย สโต สมฺปชาโน. อถ โข มาโร ปาปิมา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – १४९. ऐसा मैंने सुना है – एक समय भगवान राजगृह में मद्दकुच्छि मृगदाव में विहार कर रहे थे। उस समय भगवान का पैर पत्थर की एक किरच से घायल हो गया था। भगवान को शरीर में बहुत तीव्र, कठोर, कटु, अरुचिकर और अप्रिय वेदनाएँ हो रही थीं। भगवान उन वेदनाओं को स्मृतिवान और संप्रजन्ययुक्त होकर बिना व्याकुल हुए सहन कर रहे थे। तब भगवान ने अपने संघात (दोहरी चादर) को चार परत करके बिछाया और दाहिनी करवट लेकर, एक पैर पर दूसरा पैर रखकर, स्मृतिवान और संप्रजन्ययुक्त होकर सिंह-शय्या लगाई। तब पापी मार जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचा; पहुँचकर उसने भगवान से गाथा में कहा – ‘‘มนฺทิยา นุ โข เสสิ อุทาหุ กาเวยฺยมตฺโต,อตฺถา นุ เต สมฺปจุรา น สนฺติ; เอโก วิวิตฺเต สยนาสนมฺหิ,นิทฺทามุโข กิมิทํ โสปฺปเส วา’’ติ. "क्या तुम सुस्ती के कारण सो रहे हो या काव्य-रचना के मद में? क्या तुम्हारे पास सिद्ध करने के लिए बहुत से अर्थ (प्रयोजन) नहीं हैं? इस एकांत शयनासन में अकेले नींद में डूबे हुए तुम इस प्रकार क्यों सो रहे हो?" ‘‘น มนฺทิยา สยามิ นาปิ กาเวยฺยมตฺโต,อตฺถํ สเมจฺจาหมเปตโสโก; เอโก วิวิตฺเต สยนาสนมฺหิ,สยามหํ สพฺพภูตานุกมฺปี. "न मैं सुस्ती के कारण सोता हूँ और न ही काव्य-रचना के मद में। परम अर्थ (निर्वाण) को प्राप्त कर मैं शोक-रहित हो गया हूँ। एकांत शयनासन में अकेला, सभी प्राणियों के प्रति अनुकम्पा भाव रखते हुए मैं सोता हूँ।" ‘‘เยสมฺปิ สลฺลํ อุรสิ ปวิฏฺฐํ,มุหุํ มุหุํ หทยํ เวธมานํ; เตปีธ โสปฺปํ ลภเร สสลฺลา,ตสฺมา อหํ น สุเป วีตสลฺโล. "जिनके हृदय में शल्य (बाण) घुसा हुआ है और जो बार-बार हृदय को बींध रहा है, वे भी यहाँ शल्य सहित होने पर भी नींद ले लेते हैं। इसलिए मैं, जो शल्य-रहित हूँ, क्यों न सोऊँ?" ‘‘ชคฺคํ น สงฺเก นปิ เภมิ โสตฺตุํ,รตฺตินฺทิวา นานุตปนฺติ มามํ; หานึ น ปสฺสามิ กุหิญฺจิ โลเก,ตสฺมา สุเป สพฺพภูตานุกมฺปี’’ติ. "जागते हुए मुझे कोई आशंका नहीं होती और न ही सोने में मुझे कोई भय है। दिन और रात मुझे संतप्त नहीं करते। मुझे लोक में कहीं भी कोई हानि (अपूर्णता) नहीं दिखती। इसलिए सभी प्राणियों के प्रति अनुकम्पा भाव रखते हुए मैं सोता हूँ।" อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ ภควา, ชานาติ มํ สุคโต’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार यह सोचकर कि "भगवान मुझे जानते हैं, सुगत मुझे जानते हैं," दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ๔. ปติรูปสุตฺตํ ४. पतिरूप सुत्त ๑๕๐. เอกํ สมยํ ภควา โกสเลสุ วิหรติ เอกสาลายํ พฺราหฺมณคาเม. เตน โข ปน สมเยน ภควา มหติยา คิหิปริสาย ปริวุโต ธมฺมํ เทเสติ. १५०. एक समय भगवान कोसल देश में एकसाला नामक ब्राह्मण गाँव में विहार कर रहे थे। उस समय भगवान एक बड़ी गृहस्थ परिषद से घिरे हुए धर्मोपदेश दे रहे थे। อถ [Pg.113] โข มารสฺส ปาปิมโต เอตทโหสิ – ‘‘อยํ โข สมโณ โคตโม มหติยา คิหิปริสาย ปริวุโต ธมฺมํ เทเสติ. ยํนูนาหํ เยน สมโณ โคตโม เตนุปสงฺกเมยฺยํ วิจกฺขุกมฺมายา’’ติ. อถ โข มาโร ปาปิมา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब पापी मार के मन में यह विचार आया – "यह श्रमण गौतम बड़ी गृहस्थ परिषद से घिरे हुए धर्मोपदेश दे रहे हैं। क्यों न मैं श्रमण गौतम के पास उनकी परिषद की प्रज्ञा-चक्षु को भ्रमित करने के लिए जाऊँ।" तब पापी मार जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचा; पहुँचकर उसने भगवान से गाथा में कहा – ‘‘เนตํ ตว ปติรูปํ, ยทญฺญมนุสาสสิ; อนุโรธวิโรเธสุ, มา สชฺชิตฺโถ ตทาจร’’นฺติ. "दूसरों को उपदेश देना आपके लिए उचित नहीं है। उपदेश देते समय आप राग और द्वेष (अनुरोध और विरोध) में आसक्त न हों।" ‘‘หิตานุกมฺปี สมฺพุทฺโธ, ยทญฺญมนุสาสติ; อนุโรธวิโรเธหิ, วิปฺปมุตฺโต ตถาคโต’’ติ. "बुद्ध हित की अनुकम्पा से दूसरों को उपदेश देते हैं। तथागत राग और द्वेष (अनुरोध और विरोध) से पूर्णतः मुक्त हैं।" อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ ภควา, ชานาติ มํ สุคโต’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार यह सोचकर कि "भगवान मुझे जानते हैं, सुगत मुझे जानते हैं," दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ๕. มานสสุตฺตํ ५. मानस सुत्त ๑๕๑. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. อถ โข มาโร ปาปิมา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – १५१. मैंने ऐसा सुना है - एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन विहार में विहार कर रहे थे। तब पापी मार जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर उसने भगवान को गाथा में संबोधित किया - ‘‘อนฺตลิกฺขจโร ปาโส, ยฺวายํ จรติ มานโส; เตน ตํ พาธยิสฺสามิ, น เม สมณ โมกฺขสี’’ติ. "आकाश में विचरने वाला जो यह मानसिक पाश (राग रूपी फंदा) है, उससे मैं तुम्हें बाँध लूँगा। हे श्रमण! तुम मुझसे बच नहीं सकोगे।" ‘‘รูปา สทฺทา รสา คนฺธา, โผฏฺฐพฺพา จ มโนรมา; เอตฺถ เม วิคโต ฉนฺโท, นิหโต ตฺวมสิ อนฺตกา’’ติ. "रूप, शब्द, रस, गंध और मनभावन स्पर्श - इन (पाँचों विषयों) में मेरी तृष्णा समाप्त हो गई है। हे अंतक (मार)! तुम हार गए हो।" อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ ภควา, ชานาติ มํ สุคโต’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार यह सोचकर कि "भगवान मुझे जानते हैं, सुगत मुझे जानते हैं," दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ๖. ปตฺตสุตฺตํ ६. ६. पत्त सुत्त ๑๕๒. สาวตฺถินิทานํ. เตน โข ปน สมเยน ภควา ปญฺจนฺนํ อุปาทานกฺขนฺธานํ อุปาทาย ภิกฺขูนํ ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสติ สมาทเปติ สมุตฺเตเชติ สมฺปหํเสติ. เต จ ภิกฺขู อฏฺฐึ กตฺวา มนสิ [Pg.114] กตฺวา สพฺพเจตสา สมนฺนาหริตฺวา โอหิตโสตา ธมฺมํ สุณนฺติ. १५२. श्रावस्ती निदान। उस समय भगवान पाँच उपादान-स्कंधों के विषय में भिक्षुओं को धार्मिक कथा द्वारा उपदेश दे रहे थे, उन्हें (धर्म में) समाहित कर रहे थे, उत्साहित कर रहे थे और प्रसन्न कर रहे थे। वे भिक्षु भी (उस उपदेश को) अर्थपूर्ण मानकर, मन में धारण कर, पूर्ण चित्त से एकाग्र होकर, कान लगाकर धर्म सुन रहे थे। อถ โข มารสฺส ปาปิมโต เอตทโหสิ – ‘‘อยํ โข สมโณ โคตโม ปญฺจนฺนํ อุปาทานกฺขนฺธานํ อุปาทาย ภิกฺขูนํ ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสติ สมาทเปติ สมุตฺเตเชติ สมฺปหํเสติ. เต จ ภิกฺขู อฏฺฐึ กตฺวา มนสิ กตฺวา สพฺพเจตสา สมนฺนาหริตฺวา โอหิตโสตา ธมฺมํ สุณนฺติ. ยํนูนาหํ เยน สมโณ โคตโม เตนุปสงฺกเมยฺยํ วิจกฺขุกมฺมายา’’ติ. तब पापी मार के मन में यह विचार आया - "यह श्रमण गौतम पाँच उपादान-स्कंधों के विषय में भिक्षुओं को धार्मिक कथा द्वारा उपदेश दे रहे हैं... वे भिक्षु भी... कान लगाकर धर्म सुन रहे हैं। क्यों न मैं श्रमण गौतम के पास उनकी प्रज्ञा-चक्षु को भ्रमित करने के लिए जाऊँ?" เตน โข ปน สมเยน สมฺพหุลา ปตฺตา อพฺโภกาเส นิกฺขิตฺตา โหนฺติ. อถ โข มาโร ปาปิมา พลีพทฺทวณฺณํ อภินิมฺมินิตฺวา เยน เต ปตฺตา เตนุปสงฺกมิ. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ อญฺญตรํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘ภิกฺขุ, ภิกฺขุ, เอโส พลีพทฺโท ปตฺเต ภินฺเทยฺยา’’ติ. เอวํ วุตฺเต ภควา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘น โส, ภิกฺขุ, พลีพทฺโท. มาโร เอโส ปาปิมา ตุมฺหากํ วิจกฺขุกมฺมาย อาคโต’’ติ. อถ โข ภควา ‘‘มาโร อยํ ปาปิมา’’ อิติ วิทิตฺวา มารํ ปาปิมนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – उस समय बहुत से पात्र (भिक्षा-पात्र) खुले स्थान में रखे हुए थे। तब पापी मार ने एक बैल का रूप धारण किया और जहाँ वे पात्र थे, वहाँ पहुँचा। तब एक भिक्षु ने दूसरे भिक्षु से कहा - "भिक्षु! भिक्षु! यह बैल पात्रों को तोड़ सकता है।" ऐसा कहने पर भगवान ने उस भिक्षु से कहा - "भिक्षु! वह बैल नहीं है। वह पापी मार है जो तुम्हारी प्रज्ञा-चक्षु को भ्रमित करने के लिए आया है।" तब भगवान ने "यह पापी मार है" जानकर पापी मार को गाथा में संबोधित किया - ‘‘รูปํ เวทยิตํ สญฺญา, วิญฺญาณํ ยญฺจ สงฺขตํ; เนโสหมสฺมิ เนตํ เม, เอวํ ตตฺถ วิรชฺชติ. "रूप, वेदना, संज्ञा, विज्ञान और जो कुछ भी संस्कृत (संस्कार) है; वह 'मैं' नहीं हूँ, वह 'मेरा' नहीं है - इस प्रकार देखने वाला उनमें विरक्त हो जाता है।" ‘‘เอวํ วิรตฺตํ เขมตฺตํ, สพฺพสํโยชนาติคํ; อนฺเวสํ สพฺพฏฺฐาเนสุ, มารเสนาปิ นาชฺฌคา’’ติ. "इस प्रकार विरक्त, क्षेम-युक्त (भयमुक्त) और सभी संयोजनों को पार कर चुके (अर्हत) को सभी स्थानों पर खोजने पर भी मार की सेना नहीं देख पाती।" อถ โข มาโร ปาปิมา…เป… ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार... पूर्ववत... वहीं अंतर्धान हो गया। ๗. ฉผสฺสายตนสุตฺตํ ७. ७. छफस्सायतन सुत्त ๑๕๓. เอกํ สมยํ ภควา เวสาลิยํ วิหรติ มหาวเน กูฏาคารสาลายํ. เตน โข ปน สมเยน ภควา ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ อุปาทาย ภิกฺขูนํ ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสติ สมาทเปติ สมุตฺเตเชติ สมฺปหํเสติ. เต จ ภิกฺขู อฏฺฐึ กตฺวา มนสิ กตฺวา สพฺพเจตสา สมนฺนาหริตฺวา โอหิตโสตา ธมฺมํ สุณนฺติ. १५३. एक समय भगवान वैशाली के महावन में कूटागारशाला में विहार कर रहे थे। उस समय भगवान छह स्पर्श-आयतनों के विषय में भिक्षुओं को धार्मिक कथा द्वारा उपदेश दे रहे थे, उन्हें (धर्म में) समाहित कर रहे थे, उत्साहित कर रहे थे और प्रसन्न कर रहे थे। वे भिक्षु भी (उस उपदेश को) अर्थपूर्ण मानकर, मन में धारण कर, पूर्ण चित्त से एकाग्र होकर, कान लगाकर धर्म सुन रहे थे। อถ [Pg.115] โข มารสฺส ปาปิมโต เอตทโหสิ – ‘‘อยํ โข สมโณ โคตโม ฉนฺนํ ผสฺสายตนานํ อุปาทาย ภิกฺขูนํ ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสติ สมาทเปติ สมุตฺเตเชติ สปฺปหํเสติ. เต จ ภิกฺขู อฏฺฐึ กตฺวา มนสิ กตฺวา สพฺพเจตสา สมนฺนาหริตฺวา โอหิตโสตา ธมฺมํ สุณนฺติ. ยํนูนาหํ เยน สมโณ โคตโม เตนุปสงฺกเมยฺยํ วิจกฺขุกมฺมายา’’ติ. อถ โข มาโร ปาปิมา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควโต อวิทูเร มหนฺตํ ภยเภรวํ สทฺทมกาสิ, อปิสฺสุทํ ปถวี มญฺเญ อุนฺทฺรียติ. อถ โข อญฺญตโร ภิกฺขุ อญฺญตรํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘ภิกฺขุ, ภิกฺขุ, เอสา ปถวี มญฺเญ อุนฺทฺรียตี’’ติ. เอวํ วุตฺเต, ภควา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘เนสา ภิกฺขุ ปถวี อุนฺทฺรียติ. มาโร เอโส ปาปิมา ตุมฺหากํ วิจกฺขุกมฺมาย อาคโต’’ติ. อถ โข ภควา ‘‘มาโร อยํ ปาปิมา’’ อิติ วิทิตฺวา มารํ ปาปิมนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब पापी मार के मन में यह विचार आया - "यह श्रमण गौतम छह स्पर्श-आयतनों के विषय में भिक्षुओं को धार्मिक कथा द्वारा उपदेश दे रहे हैं... वे भिक्षु भी... कान लगाकर धर्म सुन रहे हैं। क्यों न मैं श्रमण गौतम के पास उनकी प्रज्ञा-चक्षु को भ्रमित करने के लिए जाऊँ?" तब पापी मार जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर उसने भगवान के समीप एक अत्यंत भयानक शब्द किया, जिससे ऐसा लगा मानो पृथ्वी फट रही हो। तब एक भिक्षु ने दूसरे भिक्षु से कहा - "भिक्षु! भिक्षु! ऐसा लगता है कि यह पृथ्वी फट रही है।" ऐसा कहने पर भगवान ने उस भिक्षु से कहा - "भिक्षु! यह पृथ्वी नहीं फट रही है। यह पापी मार है जो तुम्हारी प्रज्ञा-चक्षु को भ्रमित करने के लिए आया है।" तब भगवान ने "यह पापी मार है" जानकर पापी मार को गाथा में संबोधित किया - ‘‘รูปา สทฺทา รสา คนฺธา, ผสฺสา ธมฺมา จ เกวลา; เอตํ โลกามิสํ โฆรํ, เอตฺถ โลโก วิมุจฺฉิโต. "रूप, शब्द, रस, गंध, स्पर्श और सभी धम्म (विषय) - यह संसार का घोर आमिष (प्रलोभन) है, जिसमें संसार मोहित हुआ है।" ‘‘เอตญฺจ สมติกฺกมฺม, สโต พุทฺธสฺส สาวโก; มารเธยฺยํ อติกฺกมฺม, อาทิจฺโจว วิโรจตี’’ติ. "इन सबको पार कर, स्मृतिवान बुद्ध का श्रावक मार के क्षेत्र (संसार-चक्र) को लाँघकर सूर्य के समान देदीप्यमान होता है।" อถ โข มาโร ปาปิมา…เป… ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार... पूर्ववत... वहीं अंतर्धान हो गया। ๘. ปิณฺฑสุตฺตํ ८. ८. पिण्ड सुत्त ๑๕๔. เอกํ สมยํ ภควา มคเธสุ วิหรติ ปญฺจสาลายํ พฺราหฺมณคาเม. เตน โข ปน สมเยน ปญฺจสาลายํ พฺราหฺมณคาเม กุมาริกานํ ปาหุนกานิ ภวนฺติ. อถ โข ภควา ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย ปญฺจสาลํ พฺราหฺมณคามํ ปิณฺฑาย ปาวิสิ. เตน โข ปน สมเยน ปญฺจสาเลยฺยกา พฺราหฺมณคหปติกา มาเรน ปาปิมตา อนฺวาวิฏฺฐา ภวนฺติ – มา สมโณ โคตโม ปิณฺฑมลตฺถาติ. १५४. एक समय भगवान मगध देश के पंचसाला नामक ब्राह्मण गाँव में विहार कर रहे थे। उस समय पंचसाला ब्राह्मण गाँव में कन्याओं के लिए उपहार देने का उत्सव था। तब भगवान पूर्वाह्न के समय निवसन पहनकर, पात्र और चीवर लेकर पंचसाला ब्राह्मण गाँव में भिक्षा के लिए प्रविष्ट हुए। उस समय पंचसाला के ब्राह्मण गृहपति पापी मार द्वारा वशीभूत थे कि "श्रमण गौतम को भिक्षा न मिले।" อถ โข ภควา ยถาโธเตน ปตฺเตน ปญฺจสาลํ พฺราหฺมณคามํ ปิณฺฑาย ปาวิสิ ตถาโธเตน ปตฺเตน ปฏิกฺกมิ. อถ โข มาโร ปาปิมา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อปิ [Pg.116] ตฺวํ, สมณ, ปิณฺฑมลตฺถา’’ติ? ‘‘ตถา นุ ตฺวํ, ปาปิม, อกาสิ ยถาหํ ปิณฺฑํ น ลเภยฺย’’นฺติ. ‘‘เตน หิ, ภนฺเต, ภควา ทุติยมฺปิ ปญฺจสาลํ พฺราหฺมณคามํ ปิณฺฑาย ปวิสตุ. ตถาหํ กริสฺสามิ ยถา ภควา ปิณฺฑํ ลจฺฉตี’’ติ. तब भगवान जैसे धुले हुए पात्र के साथ पंचसाला ब्राह्मण गाँव में भिक्षा के लिए प्रविष्ट हुए थे, वैसे ही धुले हुए पात्र के साथ वापस लौट आए। तब पापी मार जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर उसने भगवान से यह कहा - "श्रमण! क्या तुम्हें भिक्षा मिली?" (भगवान ने कहा-) "हे पापी! क्या तुमने ऐसा नहीं किया जिससे मुझे भिक्षा न मिले?" (मार ने कहा-) "भन्ते! तो फिर भगवान दूसरी बार भी पंचसाला ब्राह्मण गाँव में भिक्षा के लिए प्रविष्ट हों। मैं ऐसा करूँगा जिससे भगवान को भिक्षा मिल जाए।" ‘‘อปุญฺญํ ปสวิ มาโร, อาสชฺช นํ ตถาคตํ; กึ นุ มญฺญสิ ปาปิม, น เม ปาปํ วิปจฺจติ. “तथागत को सताकर मार ने पाप (अपुण्य) अर्जित किया है। हे पापी! तुम ऐसा क्यों सोचते हो कि 'मेरे लिए पाप का फल नहीं होगा'?” ‘‘สุสุขํ วต ชีวาม, เยสํ โน นตฺถิ กิญฺจนํ; ปีติภกฺขา ภวิสฺสาม, เทวา อาภสฺสรา ยถา’’ติ. “हम निश्चित ही बड़े सुख से जीते हैं, जिनके पास कोई परिग्रह (आसक्ति) नहीं है। हम आभास्वर देवों के समान प्रीति का आहार करने वाले होंगे।” อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ ภควา, ชานาติ มํ สุคโต’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार यह सोचकर कि “भगवान मुझे जानते हैं, सुगत मुझे जानते हैं”, दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ๙. กสฺสกสุตฺตํ ९. ९. कस्सक सुत्त (कृषक सूत्र) ๑๕๕. สาวตฺถินิทานํ. เตน โข ปน สมเยน ภควา ภิกฺขูนํ นิพฺพานปฏิสํยุตฺตาย ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสติ สมาทเปติ สมุตฺเตเชติ สมฺปหํเสติ. เต จ ภิกฺขู อฏฺฐึ กตฺวา มนสิ กตฺวา สพฺพเจตสา สมนฺนาหริตฺวา โอหิตโสตา ธมฺมํ สุณนฺติ. १५५. श्रावस्ती में। उस समय भगवान भिक्षुओं को निर्वाण से संबंधित धर्म-कथा द्वारा उपदेश दे रहे थे, उन्हें उत्साहित कर रहे थे, प्रेरित कर रहे थे और प्रसन्न कर रहे थे। वे भिक्षु भी आदरपूर्वक, मन लगाकर, एकाग्रचित्त होकर और कान लगाकर धर्म सुन रहे थे। อถ โข มารสฺส ปาปิมโต เอตทโหสิ – ‘‘อยํ โข สมโณ โคตโม ภิกฺขูนํ นิพฺพานปฏิสํยุตฺตาย ธมฺมิยา กถาย…เป… ยํนูนาหํ เยน สมโณ โคตโม เตนุปสงฺกเมยฺยํ วิจกฺขุกมฺมายา’’ติ. อถ โข มาโร ปาปิมา กสฺสกวณฺณํ อภินิมฺมินิตฺวา มหนฺตํ นงฺคลํ ขนฺเธ กริตฺวา ทีฆปาจนยฏฺฐึ คเหตฺวา หฏหฏเกโส สาณสาฏินิวตฺโถ กทฺทมมกฺขิเตหิ ปาเทหิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อปิ, สมณ, พลีพทฺเท อทฺทสา’’ติ? ‘‘กึ ปน, ปาปิม, เต พลีพทฺเทหี’’ติ? ‘‘มเมว, สมณ, จกฺขุ, มม รูปา, มม จกฺขุสมฺผสฺสวิญฺญาณายตนํ. กุหึ เม, สมณ, คนฺตฺวา โมกฺขสิ? มเมว, สมณ, โสตํ, มม สทฺทา…เป… มเมว, สมณ, ฆานํ, มม คนฺธา; มเมว, สมณ, ชิวฺหา, มม รสา; มเมว, สมณ, กาโย, มม โผฏฺฐพฺพา; มเมว, สมณ, มโน, มม ธมฺมา, มม มโนสมฺผสฺสวิญฺญาณายตนํ. กุหึ เม, สมณ, คนฺตฺวา โมกฺขสี’’ติ? तब पापी मार के मन में यह विचार आया— “यह श्रमण गौतम भिक्षुओं को निर्वाण से संबंधित धर्म-कथा द्वारा... (पे)... क्यों न मैं श्रमण गौतम के पास उनकी प्रज्ञा-चक्षु को भ्रमित करने के लिए जाऊँ।” तब पापी मार ने एक किसान का रूप धारण किया, कंधे पर एक बड़ा हल रखा, हाथ में एक लंबा चाबुक लिया, बिखरे हुए बालों वाला, सन के वस्त्र पहने हुए और कीचड़ से सने पैरों के साथ जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचा। पहुँचकर भगवान से यह कहा— “हे श्रमण! क्या आपने बैलों को देखा है?” “हे पापी! तुझे बैलों से क्या प्रयोजन?” “हे श्रमण! आँख मेरी है, रूप मेरे हैं, चक्षु-संपर्श-विज्ञान-आयतन मेरा है। हे श्रमण! तू मुझसे बचकर कहाँ जाएगा? कान मेरा है, शब्द मेरे हैं... (पे)... नाक मेरी है, गंध मेरी है; जीभ मेरी है, रस मेरे हैं; शरीर मेरा है, स्पर्श मेरे हैं; मन मेरा है, धम्म (विचार) मेरे हैं, मन-संपर्श-विज्ञान-आयतन मेरा है। हे श्रमण! तू मुझसे बचकर कहाँ जाएगा?” ‘‘ตเวว[Pg.117], ปาปิม, จกฺขุ, ตว รูปา, ตว จกฺขุสมฺผสฺสวิญฺญาณายตนํ. ยตฺถ จ โข, ปาปิม, นตฺถิ จกฺขุ, นตฺถิ รูปา, นตฺถิ จกฺขุสมฺผสฺสวิญฺญาณายตนํ, อคติ ตว ตตฺถ, ปาปิม. ตเวว, ปาปิม, โสตํ, ตว สทฺทา, ตว โสตสมฺผสฺสวิญฺญาณายตนํ. ยตฺถ จ โข, ปาปิม, นตฺถิ โสตํ, นตฺถิ สทฺทา, นตฺถิ โสตสมฺผสฺสวิญฺญาณายตนํ, อคติ ตว ตตฺถ, ปาปิม. ตเวว, ปาปิม, ฆานํ, ตว คนฺธา, ตว ฆานสมฺผสฺสวิญฺญาณายตนํ. ยตฺถ จ โข, ปาปิม, นตฺถิ ฆานํ, นตฺถิ คนฺธา, นตฺถิ ฆานสมฺผสฺสวิญฺญาณายตนํ, อคติ ตว ตตฺถ, ปาปิม. ตเวว, ปาปิม, ชิวฺหา, ตว รสา, ตว ชิวฺหาสมฺผสฺสวิญฺญาณายตนํ…เป… ตเวว, ปาปิม, กาโย, ตว โผฏฺฐพฺพา, ตว กายสมฺผสฺสวิญฺญาณายตนํ…เป… ตเวว, ปาปิม, มโน, ตว ธมฺมา, ตว มโนสมฺผสฺสวิญฺญาณายตนํ. ยตฺถ จ โข, ปาปิม, นตฺถิ มโน, นตฺถิ ธมฺมา, นตฺถิ มโนสมฺผสฺสวิญฺญาณายตนํ, อคติ ตว ตตฺถ, ปาปิมา’’ติ. “हे पापी! आँख तेरी ही रहे, रूप तेरे ही रहें, चक्षु-संपर्श-विज्ञान-आयतन तेरा ही रहे। किंतु हे पापी! जहाँ आँख नहीं है, रूप नहीं हैं, चक्षु-संपर्श-विज्ञान-आयतन नहीं है, वहाँ तेरी पहुँच नहीं है। हे पापी! कान तेरा ही रहे, शब्द तेरे ही रहें, श्रोत्र-संपर्श-विज्ञान-आयतन तेरा ही रहे। किंतु हे पापी! जहाँ कान नहीं है, शब्द नहीं हैं, श्रोत्र-संपर्श-विज्ञान-आयतन नहीं है, वहाँ तेरी पहुँच नहीं है। हे पापी! नाक तेरी ही रहे, गंध तेरी ही रहे, घ्राण-संपर्श-विज्ञान-आयतन तेरा ही रहे। किंतु हे पापी! जहाँ नाक नहीं है, गंध नहीं है, घ्राण-संपर्श-विज्ञान-आयतन नहीं है, वहाँ तेरी पहुँच नहीं है। हे पापी! जीभ तेरी ही रहे, रस तेरे ही रहें, जिह्वा-संपर्श-विज्ञान-आयतन तेरा ही रहे... (पे)... हे पापी! शरीर तेरा ही रहे, स्पर्श तेरे ही रहें, काय-संपर्श-विज्ञान-आयतन तेरा ही रहे... (पे)... हे पापी! मन तेरा ही रहे, धम्म तेरे ही रहें, मन-संपर्श-विज्ञान-आयतन तेरा ही रहे। किंतु हे पापी! जहाँ मन नहीं है, धम्म नहीं हैं, मन-संपर्श-विज्ञान-आयतन नहीं है, वहाँ तेरी पहुँच नहीं है।” ‘‘ยํ วทนฺติ มม ยิทนฺติ, เย วทนฺติ มมนฺติ จ; เอตฺถ เจ เต มโน อตฺถิ, น เม สมณ โมกฺขสี’’ติ. “जो कहते हैं 'यह मेरा है' और जो कहते हैं 'मैं हूँ', यदि तुम्हारा मन इनमें है, तो हे श्रमण! तुम मुझसे नहीं बच पाओगे।” ‘‘ยํ วทนฺติ น ตํ มยฺหํ, เย วทนฺติ น เต อหํ; เอวํ ปาปิม ชานาหิ, น เม มคฺคมฺปิ ทกฺขสี’’ติ. “वे जिसके बारे में कहते हैं, वह मेरा नहीं है; जो कहते हैं, वह मैं नहीं हूँ। हे पापी! ऐसा जान ले, तू मेरा मार्ग भी नहीं देख पाएगा।” อถ โข มาโร ปาปิมา…เป… ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार... (पे)... वहीं अंतर्धान हो गया। ๑๐. รชฺชสุตฺตํ १०. १०. रज्ज सुत्त (राज्य सूत्र) ๑๕๖. เอกํ สมยํ ภควา โกสเลสุ วิหรติ หิมวนฺตปเทเส อรญฺญกุฏิกายํ. อถ โข ภควโต รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘‘สกฺกา นุ โข รชฺชํ กาเรตุํ อหนํ อฆาตยํ อชินํ อชาปยํ อโสจํ อโสจาปยํ ธมฺเมนา’’ติ? १५६. एक समय भगवान कोसल देश के हिमालय क्षेत्र में एक वन-कुटी में विहार कर रहे थे। तब एकांत में ध्यानमग्न भगवान के मन में यह विचार उत्पन्न हुआ— “क्या बिना मारे, बिना मरवाए, बिना जीते, बिना जितवाए, बिना शोक किए और बिना शोक करवाए, धर्मपूर्वक राज्य करना संभव है?” อถ โข มาโร ปาปิมา ภควโต เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กาเรตุ, ภนฺเต, ภควา รชฺชํ, กาเรตุ, สุคโต, รชฺชํ อหนํ อฆาตยํ อชินํ อชาปยํ อโสจํ อโสจาปยํ ธมฺเมนา’’ติ. ‘‘กึ ปน เม ตฺวํ, ปาปิม, ปสฺสสิ ยํ มํ ตฺวํ เอวํ วเทสิ – ‘กาเรตุ, ภนฺเต, ภควา รชฺชํ, กาเรตุ สุคโต, รชฺชํ อหนํ อฆาตยํ อชินํ อชาปยํ อโสจํ อโสจาปยํ [Pg.118] ธมฺเมนา’’’ติ? ‘‘ภควตา โข, ภนฺเต, จตฺตาโร อิทฺธิปาทา ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา. อากงฺขมาโน จ, ภนฺเต, ภควา หิมวนฺตํ ปพฺพตราชํ สุวณฺณํ ตฺเวว อธิมุจฺเจยฺย สุวณฺณญฺจ ปนสฺสา’’ติ. तब पापी मार ने भगवान के मन के विचार को जानकर भगवान के पास पहुँचकर उनसे यह कहा— “भंते! भगवान धर्मपूर्वक राज्य करें; सुगत बिना मारे, बिना मरवाए, बिना जीते, बिना जितवाए, बिना शोक किए और बिना शोक करवाए धर्मपूर्वक राज्य करें।” “हे पापी! तू मुझमें ऐसा क्या देखता है जो तू मुझसे ऐसा कहता है?” “भंते! भगवान ने चार ऋद्धि-पादों को भावित किया है, बहुलीकृत किया है, उन्हें यान बनाया है, आधार बनाया है, अनुष्ठित किया है, संचित किया है और भली-भाँति आरम्भ किया है। भंते! यदि भगवान चाहें, तो हिमालय पर्वतराज को सुवर्ण (सोना) मान लें, तो वह सुवर्ण ही हो जाएगा।” ‘‘ปพฺพตสฺส สุวณฺณสฺส, ชาตรูปสฺส เกวโล; ทฺวิตฺตาว นาลเมกสฺส, อิติ วิทฺวา สมญฺจเร. “सोने का पूरा पर्वत, यहाँ तक कि दो पर्वत भी, एक व्यक्ति की इच्छा पूर्ति के लिए पर्याप्त नहीं हैं। ऐसा जानकर मनुष्य को सम्यक आचरण करना चाहिए।” ‘‘โย ทุกฺขมทฺทกฺขิ ยโตนิทานํ,กาเมสุ โส ชนฺตุ กถํ นเมยฺย; อุปธึ วิทิตฺวา สงฺโคติ โลเก,ตสฺเสว ชนฺตุ วินยาย สิกฺเข’’ติ. “जिसने दुःख और उसके कारण को देख लिया है, वह व्यक्ति काम-भोगों की ओर कैसे झुक सकता है? यह जानकर कि संसार में उपधि (आसक्ति) ही बंधन है, मनुष्य को उसी के विनाश के लिए शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।” อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ ภควา, ชานาติ มํ สุคโต’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार यह सोचकर कि “भगवान मुझे जानते हैं, सुगत मुझे जानते हैं”, दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ทุติโย วคฺโค. द्वितीय वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका उद्दान (विषय-सूची) — ปาสาโณ สีโห สกลิกํ, ปติรูปญฺจ มานสํ; ปตฺตํ อายตนํ ปิณฺฑํ, กสฺสกํ รชฺเชน เต ทสาติ. पासाण, सीह, सकलिक, पतिरूप, मानस, पत्त, आयतन, पिण्ड, कस्सक और रज्ज—ये दस सुत्त हैं। ๓. ตติยวคฺโค ३. तृतीय वर्ग ๑. สมฺพหุลสุตฺตํ १. १. सम्बहुल सुत्त ๑๕๗. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สกฺเกสุ วิหรติ สิลาวติยํ. เตน โข ปน สมเยน สมฺพหุลา ภิกฺขู ภควโต อวิทูเร อปฺปมตฺตา อาตาปิโน ปหิตตฺตา วิหรนฺติ. อถ โข มาโร ปาปิมา พฺราหฺมณวณฺณํ อภินิมฺมินิตฺวา มหนฺเตน ชฏณฺฑุเวน อชินกฺขิปนิวตฺโถ ชิณฺโณ โคปานสิวงฺโก ฆุรุฆุรุปสฺสาสี อุทุมฺพรทณฺฑํ คเหตฺวา เยน เต ภิกฺขู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เต ภิกฺขู เอตทโวจ – ‘‘ทหรา ภวนฺโต [Pg.119] ปพฺพชิตา สุสู กาฬเกสา ภทฺเรน โยพฺพเนน สมนฺนาคตา ปฐเมน วยสา อนิกฺกีฬิตาวิโน กาเมสุ. ภุญฺชนฺตุ ภวนฺโต มานุสเก กาเม. มา สนฺทิฏฺฐิกํ หิตฺวา กาลิกํ อนุธาวิตฺถา’’ติ. ‘‘น โข มยํ, พฺราหฺมณ, สนฺทิฏฺฐิกํ หิตฺวา กาลิกํ อนุธาวาม. กาลิกญฺจ โข มยํ, พฺราหฺมณ, หิตฺวา สนฺทิฏฺฐิกํ อนุธาวาม. กาลิกา หิ, พฺราหฺมณ, กามา วุตฺตา ภควตา พหุทุกฺขา พหุปายาสา, อาทีนโว เอตฺถ ภิยฺโย. สนฺทิฏฺฐิโก อยํ ธมฺโม อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’’ติ. เอวํ วุตฺเต, มาโร ปาปิมา สีสํ โอกมฺเปตฺวา ชิวฺหํ นิลฺลาเลตฺวา ติวิสาขํ นลาเฏ นลาฏิกํ วุฏฺฐาเปตฺวา ทณฺฑโมลุพฺภ ปกฺกามิ. १५७. ऐसा मैंने सुना - एक समय भगवान शाक्यों के देश में शिलावती में विहार कर रहे थे। उस समय बहुत से भिक्षु भगवान के पास ही अप्रमत्त, उत्साही और दृढ़निश्चयी होकर विहार कर रहे थे। तब पापी मार ने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया, जिसकी बड़ी जटाएँ थीं, जिसने मृगचर्म धारण किया हुआ था, जो बूढ़ा था, घर की कड़ियों की तरह झुका हुआ था, घरघराहट के साथ सांस ले रहा था और गूलर की लकड़ी का डंडा पकड़े हुए था। वह उन भिक्षुओं के पास गया और उनसे यह कहा - "हे भिक्षुओं! आप अभी युवा हैं, तरुण हैं, काले बालों वाले हैं, सुंदर यौवन से संपन्न हैं, प्रथम अवस्था में हैं और आपने अभी तक काम-भोगों का आनंद नहीं लिया है। आप मानवीय काम-भोगों का आनंद लें। प्रत्यक्ष (वर्तमान) को छोड़कर काल-सापेक्ष (भविष्य के सुखों) के पीछे न दौड़ें।" भिक्षुओं ने कहा - "हे ब्राह्मण! हम प्रत्यक्ष को छोड़कर काल-सापेक्ष के पीछे नहीं दौड़ते। बल्कि हम काल-सापेक्ष को छोड़कर प्रत्यक्ष के पीछे दौड़ते हैं। क्योंकि भगवान ने कहा है कि काम-भोग काल-सापेक्ष हैं, बहुत दुखों और कष्टों वाले हैं, जिनमें दोष अधिक हैं। यह धर्म प्रत्यक्ष है, कालातीत है, 'आओ और देखो' कहने योग्य है, निर्वाण की ओर ले जाने वाला है और बुद्धिमानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य है।" ऐसा कहने पर पापी मार ने अपना सिर हिलाया, जीभ बाहर निकाली, माथे पर तीन बल (झुर्रियां) डाले और लाठी के सहारे टेक लगाकर चला गया। อถ โข เต ภิกฺขู เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘อิธ มยํ, ภนฺเต, ภควโต อวิทูเร อปฺปมตฺตา อาตาปิโน ปหิตตฺตา วิหราม. อถ โข, ภนฺเต, อญฺญตโร พฺราหฺมโณ มหนฺเตน ชฏณฺฑุเวน อชินกฺขิปนิวตฺโถ ชิณฺโณ โคปานสิวงฺโก ฆุรุฆุรุปสฺสาสี อุทุมฺพรทณฺฑํ คเหตฺวา เยน มยํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อมฺเห เอตทโวจ – ‘ทหรา ภวนฺโต ปพฺพชิตา สุสู กาฬเกสา ภทฺเรน โยพฺพเนน สมนฺนาคตา ปฐเมน วยสา อนิกฺกีฬิตาวิโน กาเมสุ. ภุญฺชนฺตุ ภวนฺโต มานุสเก กาเม. มา สนฺทิฏฺฐิกํ หิตฺวา กาลิกํ อนุธาวิตฺถา’ติ. เอวํ วุตฺเต, มยํ, ภนฺเต, ตํ พฺราหฺมณํ เอตทโวจุมฺห – ‘น โข มยํ, พฺราหฺมณ, สนฺทิฏฺฐิกํ หิตฺวา กาลิกํ อนุธาวาม. กาลิกญฺจ โข มยํ, พฺราหฺมณ, หิตฺวา สนฺทิฏฺฐิกํ อนุธาวาม. กาลิกา หิ, พฺราหฺมณ, กามา วุตฺตา ภควตา พหุทุกฺขา พหุปายาสา, อาทีนโว เอตฺถ ภิยฺโย. สนฺทิฏฺฐิโก อยํ ธมฺโม อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. เอวํ วุตฺเต, ภนฺเต, โส พฺราหฺมโณ สีสํ โอกมฺเปตฺวา ชิวฺหํ นิลฺลาเลตฺวา ติวิสาขํ นลาเฏ นลาฏิกํ วุฏฺฐาเปตฺวา ทณฺฑโมลุพฺภ ปกฺกนฺโต’’ติ. तब वे भिक्षु जहाँ भगवान थे, वहाँ गए; जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए उन भिक्षुओं ने भगवान से यह कहा - "भन्ते! यहाँ हम भगवान के पास ही अप्रमत्त, उत्साही और दृढ़निश्चयी होकर विहार कर रहे थे। तब भन्ते! एक ब्राह्मण बड़ी जटाओं वाला, मृगचर्म धारण किए हुए, बूढ़ा, घर की कड़ियों की तरह झुका हुआ, घरघराहट के साथ सांस लेता हुआ और गूलर की लकड़ी का डंडा पकड़े हुए हमारे पास आया। आकर उसने हमसे यह कहा - 'हे भिक्षुओं! आप अभी युवा हैं, तरुण हैं, काले बालों वाले हैं, सुंदर यौवन से संपन्न हैं, प्रथम अवस्था में हैं और आपने अभी तक काम-भोगों का आनंद नहीं लिया है। आप मानवीय काम-भोगों का आनंद लें। प्रत्यक्ष को छोड़कर काल-सापेक्ष के पीछे न दौड़ें।' ऐसा कहने पर भन्ते! हमने उस ब्राह्मण से यह कहा - 'हे ब्राह्मण! हम प्रत्यक्ष को छोड़कर काल-सापेक्ष के पीछे नहीं दौड़ते। बल्कि हम काल-सापेक्ष को छोड़कर प्रत्यक्ष के पीछे दौड़ते हैं। क्योंकि भगवान ने कहा है कि काम-भोग काल-सापेक्ष हैं, बहुत दुखों और कष्टों वाले हैं, जिनमें दोष अधिक हैं। यह धर्म प्रत्यक्ष है, कालातीत है, 'आओ और देखो' कहने योग्य है, निर्वाण की ओर ले जाने वाला है और बुद्धिमानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य है।' ऐसा कहने पर भन्ते! उस ब्राह्मण ने अपना सिर हिलाया, जीभ बाहर निकाली, माथे पर तीन बल डाले और लाठी के सहारे टेक लगाकर चला गया।" ‘‘เนโส, ภิกฺขเว, พฺราหฺมโณ. มาโร เอโส ปาปิมา ตุมฺหากํ วิจกฺขุกมฺมาย อาคโต’’ติ. อถ โข ภควา เอตมตฺถํ วิทิตฺวา ตายํ เวลายํ อิมํ คาถํ อภาสิ – "भिक्षुओं! वह ब्राह्मण नहीं था। वह पापी मार था जो तुम्हारी प्रज्ञा-चक्षु को नष्ट करने के लिए आया था।" तब भगवान ने इस बात को जानकर उस समय यह गाथा कही - ‘‘โย [Pg.120] ทุกฺขมทฺทกฺขิ ยโตนิทานํ,กาเมสุ โส ชนฺตุ กถํ นเมยฺย; อุปธึ วิทิตฺวา สงฺโคติ โลเก,ตสฺเสว ชนฺตุ วินยาย สิกฺเข’’ติ. "जिसने दुख को देखा और उसके कारण (काम-भोगों) को जान लिया, वह प्राणी काम-भोगों की ओर कैसे झुक सकता है? संसार में 'उपधि' (आसक्ति के आधार) को बंधन जानकर, उस प्राणी को उसी (उपधि) के विनाश के लिए अभ्यास करना चाहिए।" ๒. สมิทฺธิสุตฺตํ २. समिद्धि सुत्त ๑๕๘. เอกํ สมยํ ภควา สกฺเกสุ วิหรติ สิลาวติยํ. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา สมิทฺธิ ภควโต อวิทูเร อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรติ. อถ โข อายสฺมโต สมิทฺธิสฺส รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘‘ลาภา วต เม, สุลทฺธํ วต เม, ยสฺส เม สตฺถา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ. ลาภา วต เม, สุลทฺธํ วต เม, ยฺวาหํ เอวํ สฺวากฺขาเต ธมฺมวินเย ปพฺพชิโต. ลาภา วต เม, สุลทฺธํ วต เม, ยสฺส เม สพฺรหฺมจาริโน สีลวนฺโต กลฺยาณธมฺมา’’ติ. อถ โข มาโร ปาปิมา อายสฺมโต สมิทฺธิสฺส เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย เยนายสฺมา สมิทฺธิ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมโต สมิทฺธิสฺส อวิทูเร มหนฺตํ ภยเภรวํ สทฺทมกาสิ, อปิสฺสุทํ ปถวี มญฺเญ อุนฺทฺรียติ. १५८. एक समय भगवान शाक्यों के देश में शिलावती में विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान समिद्धि भगवान के पास ही अप्रमत्त, उत्साही और दृढ़निश्चयी होकर विहार कर रहे थे। तब एकांत में ध्यानमग्न आयुष्मान समिद्धि के मन में ऐसा विचार उत्पन्न हुआ - "यह मेरे लिए बड़े लाभ की बात है, यह मेरे लिए बड़े सौभाग्य की बात है कि मुझे भगवान अर्हत् सम्यक-सम्बुद्ध जैसे शास्ता मिले हैं। यह मेरे लिए बड़े लाभ की बात है, यह मेरे लिए बड़े सौभाग्य की बात है कि मैंने ऐसे सुव्याख्यात धर्म-विनय में प्रव्रज्या ली है। यह मेरे लिए बड़े लाभ की बात है, यह मेरे लिए बड़े सौभाग्य की बात है कि मेरे साथी भिक्षु शीलवान और कल्याणकारी स्वभाव वाले हैं।" तब पापी मार ने आयुष्मान समिद्धि के मन के विचार को अपने मन से जानकर, जहाँ आयुष्मान समिद्धि थे, वहाँ गया। जाकर आयुष्मान समिद्धि के पास एक महान भयानक शब्द किया, मानो पृथ्वी फट रही हो। อถ โข อายสฺมา สมิทฺธิ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน อายสฺมา สมิทฺธิ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธาหํ, ภนฺเต, ภควโต อวิทูเร อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรามิ. ตสฺส มยฺหํ, ภนฺเต, รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘ลาภา วต เม, สุลทฺธํ วต เม, ยสฺส เม สตฺถา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ. ลาภา วต เม, สุลทฺธํ วต เม, ยฺวาหํ เอวํ สฺวากฺขาเต ธมฺมวินเย ปพฺพชิโต. ลาภา วต เม, สุลทฺธํ วต เม, ยสฺส เม สพฺรหฺมจาริโน สีลวนฺโต กลฺยาณธมฺมา’ติ. ตสฺส มยฺหํ, ภนฺเต, อวิทูเร มหาภยเภรวสทฺโท อโหสิ, อปิสฺสุทํ ปถวี มญฺเญ อุนฺทฺรียตี’’ติ. तब आयुष्मान समिद्धि जहाँ भगवान थे, वहाँ गए; जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान समिद्धि ने भगवान से यह कहा - "भन्ते! यहाँ मैं भगवान के पास ही अप्रमत्त, उत्साही और दृढ़निश्चयी होकर विहार कर रहा हूँ। भन्ते! एकांत में ध्यानमग्न मेरे मन में ऐसा विचार उत्पन्न हुआ - 'यह मेरे लिए बड़े लाभ की बात है, यह मेरे लिए बड़े सौभाग्य की बात है कि मुझे भगवान अर्हत् सम्यक-सम्बुद्ध जैसे शास्ता मिले हैं। यह मेरे लिए बड़े लाभ की बात है, यह मेरे लिए बड़े सौभाग्य की बात है कि मैंने ऐसे सुव्याख्यात धर्म-विनय में प्रव्रज्या ली है। यह मेरे लिए बड़े लाभ की बात है, यह मेरे लिए बड़े सौभाग्य की बात है कि मेरे साथी भिक्षु शीलवान और कल्याणकारी स्वभाव वाले हैं।' भन्ते! तब मेरे पास एक महान भयानक शब्द हुआ, मानो पृथ्वी फट रही हो।" ‘‘เนสา, สมิทฺธิ, ปถวี อุนฺทฺรียติ. มาโร เอโส ปาปิมา ตุยฺหํ วิจกฺขุกมฺมาย อาคโต. คจฺฉ ตฺวํ, สมิทฺธิ, ตตฺเถว อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหราหี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา สมิทฺธิ ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา [Pg.121] อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. ทุติยมฺปิ โข อายสฺมา สมิทฺธิ ตตฺเถว อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหาสิ. ทุติยมฺปิ โข อายสฺมโต สมิทฺธิสฺส รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส…เป… ทุติยมฺปิ โข มาโร ปาปิมา อายสฺมโต สมิทฺธิสฺส เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย…เป… อปิสฺสุทํ ปถวี มญฺเญ อุนฺทฺรียติ. อถ โข อายสฺมา สมิทฺธิ มารํ ปาปิมนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – “समिद्धि, यह पृथ्वी फट नहीं रही है। यह पापी मार है जो तुम्हारी प्रज्ञा-चक्षु को नष्ट करने के लिए आया है। जाओ, समिद्धि, वहीं अप्रमत्त, उत्साही और दृढ़निश्चयी होकर विहार करो।” आयुष्मान समिद्धि ने भगवान को “जी हाँ, भन्ते” कहकर उत्तर दिया और अपने आसन से उठकर, भगवान का अभिवादन कर और उनकी प्रदक्षिणा कर वहाँ से चले गए। दूसरी बार भी आयुष्मान समिद्धि वहीं अप्रमत्त, उत्साही और दृढ़निश्चयी होकर विहार करने लगे। दूसरी बार भी जब आयुष्मान समिद्धि एकांत में ध्यानमग्न थे... दूसरी बार भी पापी मार ने आयुष्मान समिद्धि के मन के विचार को अपने चित्त से जानकर... मानो पृथ्वी फट रही हो ऐसा भयानक शब्द किया। तब आयुष्मान समिद्धि ने पापी मार से गाथा में कहा— ‘‘สทฺธายาหํ ปพฺพชิโต, อคารสฺมา อนคาริยํ; สติ ปญฺญา จ เม พุทฺธา, จิตฺตญฺจ สุสมาหิตํ; กามํ กรสฺสุ รูปานิ, เนว มํ พฺยาธยิสฺสสี’’ติ. “मैं श्रद्धापूर्वक घर से बेघर होकर प्रव्रजित हुआ हूँ; स्मृति और प्रज्ञा मुझे ज्ञात हैं, और मेरा चित्त भली-भाँति समाहित है; तुम अपनी इच्छानुसार डरावने रूप बनाओ, तुम मुझे विचलित नहीं कर पाओगे।” อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ สมิทฺธิ ภิกฺขู’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार यह सोचकर कि 'भिक्षु समिद्धि मुझे जान गया है', दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्ध्यान हो गया। ๓. โคธิกสุตฺตํ ३. गोधिक सुत्त ๑๕๙. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา โคธิโก อิสิคิลิปสฺเส วิหรติ กาฬสิลายํ. อถ โข อายสฺมา โคธิโก อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรนฺโต สามยิกํ เจโตวิมุตฺตึ ผุสิ. อถ โข อายสฺมา โคธิโก ตมฺหา สามยิกาย เจโตวิมุตฺติยา ปริหายิ. ทุติยมฺปิ โข อายสฺมา โคธิโก อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรนฺโต สามยิกํ เจโตวิมุตฺตึ ผุสิ. ทุติยมฺปิ โข อายสฺมา โคธิโก ตมฺหา สามยิกาย เจโตวิมุตฺติยา ปริหายิ. ตติยมฺปิ โข อายสฺมา โคธิโก อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรนฺโต สามยิกํ เจโตวิมุตฺตึ ผุสิ. ตติยมฺปิ โข อายสฺมา โคธิโก ตมฺหา…เป… ปริหายิ. จตุตฺถมฺปิ โข อายสฺมา โคธิโก อปฺปมตฺโต…เป… วิมุตฺตึ ผุสิ. จตุตฺถมฺปิ โข อายสฺมา โคธิโก ตมฺหา…เป… ปริหายิ. ปญฺจมมฺปิ โข อายสฺมา โคธิโก…เป… เจโตวิมุตฺตึ ผุสิ. ปญฺจมมฺปิ โข อายสฺมา…เป… วิมุตฺติยา ปริหายิ. ฉฏฺฐมฺปิ โข อายสฺมา โคธิโก อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรนฺโต สามยิกํ เจโตวิมุตฺตึ ผุสิ. ฉฏฺฐมฺปิ โข อายสฺมา โคธิโก ตมฺหา สามยิกาย เจโตวิมุตฺติยา ปริหายิ. สตฺตมมฺปิ [Pg.122] โข อายสฺมา โคธิโก อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรนฺโต สามยิกํ เจโตวิมุตฺตึ ผุสิ. १५९. ऐसा मैंने सुना है—एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दकनिवाप में विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान गोधिक इसिगिलि पर्वत के पार्श्व में काली शिला पर विहार कर रहे थे। तब आयुष्मान गोधिक ने अप्रमत्त, उत्साही और दृढ़निश्चयी होकर विहार करते हुए सामयिक चेतोविमुक्ति (लौकिक समाधि) प्राप्त की। फिर आयुष्मान गोधिक उस सामयिक चेतोविमुक्ति से गिर गए। दूसरी बार भी आयुष्मान गोधिक ने अप्रमत्त, उत्साही और दृढ़निश्चयी होकर विहार करते हुए सामयिक चेतोविमुक्ति प्राप्त की। दूसरी बार भी आयुष्मान गोधिक उस सामयिक चेतोविमुक्ति से गिर गए। तीसरी बार भी आयुष्मान गोधिक ने अप्रमत्त, उत्साही और दृढ़निश्चयी होकर विहार करते हुए सामयिक चेतोविमुक्ति प्राप्त की। तीसरी बार भी आयुष्मान गोधिक उससे... गिर गए। चौथी बार भी आयुष्मान गोधिक ने अप्रमत्त... विमुक्ति प्राप्त की। चौथी बार भी आयुष्मान गोधिक उससे... गिर गए। पाँचवीं बार भी आयुष्मान गोधिक ने... चेतोविमुक्ति प्राप्त की। पाँचवीं बार भी आयुष्मान गोधिक... विमुक्ति से गिर गए। छठी बार भी आयुष्मान गोधिक ने अप्रमत्त, उत्साही और दृढ़निश्चयी होकर विहार करते हुए सामयिक चेतोविमुक्ति प्राप्त की। छठी बार भी आयुष्मान गोधिक उस सामयिक चेतोविमुक्ति से गिर गए। सातवीं बार भी आयुष्मान गोधिक ने अप्रमत्त, उत्साही और दृढ़निश्चयी होकर विहार करते हुए सामयिक चेतोविमुक्ति प्राप्त की। อถ โข อายสฺมโต โคธิกสฺส เอตทโหสิ – ‘‘ยาว ฉฏฺฐํ ขฺวาหํ สามยิกาย เจโตวิมุตฺติยา ปริหีโน. ยํนูนาหํ สตฺถํ อาหเรยฺย’’นฺติ. อถ โข มาโร ปาปิมา อายสฺมโต โคธิกสฺส เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ คาถาหิ อชฺฌภาสิ – तब आयुष्मान गोधिक के मन में यह विचार आया—'मैं छह बार सामयिक चेतोविमुक्ति से गिर चुका हूँ। क्यों न मैं शस्त्र (छुरी) का प्रयोग करूँ (अपने प्राण त्याग दूँ)?' तब पापी मार ने आयुष्मान गोधिक के चित्त के विचार को अपने चित्त से जानकर जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर उसने भगवान से गाथाओं में कहा— ‘‘มหาวีร มหาปญฺญ, อิทฺธิยา ยสสา ชล; สพฺพเวรภยาตีต, ปาเท วนฺทามิ จกฺขุม. “हे महावीर! हे महाप्रज्ञावान! आप अपनी ऋद्धि और यश से देदीप्यमान हैं; समस्त वैर और भयों से अतीत, हे चक्षुमान (बुद्ध)! मैं आपके चरणों की वंदना करता हूँ। ‘‘สาวโก เต มหาวีร, มรณํ มรณาภิภู; อากงฺขติ เจตยติ, ตํ นิเสธ ชุตินฺธร. हे महावीर! आपका श्रावक मृत्यु से अभिभूत होकर मृत्यु की आकांक्षा कर रहा है, वह ऐसा विचार कर रहा है; हे दीप्तिमान! आप उसे रोकें। ‘‘กถญฺหิ ภควา ตุยฺหํ, สาวโก สาสเน รโต; อปฺปตฺตมานโส เสกฺโข, กาลํ กยิรา ชเนสุตา’’ติ. हे भगवान! आपका श्रावक जो शासन में रत है, जो अभी अर्हत्व को प्राप्त नहीं हुआ है और शैक्ष (साधक) है, वह लोगों में प्रसिद्ध होकर कैसे मृत्यु को प्राप्त हो सकता है?” เตน โข ปน สมเยน อายสฺมโต โคธิเกน สตฺถํ อาหริตํ โหติ. อถ โข ภควา ‘‘มาโร อยํ ปาปิมา’’ อิติ วิทิตฺวา มารํ ปาปิมนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – उस समय आयुष्मान गोधिक ने शस्त्र का प्रयोग कर लिया था। तब भगवान ने यह जानकर कि 'यह पापी मार है', पापी मार से गाथा में कहा— ‘‘เอวญฺหิ ธีรา กุพฺพนฺติ, นาวกงฺขนฺติ ชีวิตํ; สมูลํ ตณฺหมพฺพุยฺห, โคธิโก ปรินิพฺพุโต’’ติ. “धीर पुरुष ऐसा ही करते हैं, वे जीवन की आकांक्षा नहीं करते; तृष्णा को जड़ सहित उखाड़कर गोधिक परिनिर्वाण को प्राप्त हो गया है।” อถ โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘อายาม, ภิกฺขเว, เยน อิสิคิลิปสฺสํ กาฬสิลา เตนุปสงฺกมิสฺสาม ยตฺถ โคธิเกน กุลปุตฺเตน สตฺถํ อาหริต’’นฺติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. तब भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— “आओ भिक्षुओं, हम इसिगिलि पर्वत के पार्श्व में काली शिला की ओर चलें, जहाँ कुलपुत्र गोधिक ने शस्त्र का प्रयोग किया है।” भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया— “जी हाँ, भन्ते!” อถ โข ภควา สมฺพหุเลหิ ภิกฺขูหิ สทฺธึ เยน อิสิคิลิปสฺสํ กาฬสิลา เตนุปสงฺกมิ. อทฺทสา โข ภควา อายสฺมนฺตํ โคธิกํ ทูรโตว มญฺจเก วิวตฺตกฺขนฺธํ เสมานํ. เตน โข ปน สมเยน ธูมายิตตฺตํ ติมิรายิตตฺตํ คจฺฉเตว ปุริมํ ทิสํ, คจฺฉติ ปจฺฉิมํ ทิสํ, คจฺฉติ อุตฺตรํ ทิสํ, คจฺฉติ ทกฺขิณํ ทิสํ, คจฺฉติ อุทฺธํ, คจฺฉติ อโธ, คจฺฉติ อนุทิสํ. तब भगवान बहुत से भिक्षुओं के साथ इसिगिलि पर्वत के पार्श्व में काली शिला की ओर गए। भगवान ने दूर से ही आयुष्मान गोधिक को मंच (शैया) पर गर्दन मुड़ी हुई अवस्था में लेटे हुए देखा। उस समय धुएँ जैसा और अंधकार जैसा कुछ पूर्व दिशा की ओर जा रहा था, पश्चिम दिशा की ओर जा रहा था, उत्तर दिशा की ओर जा रहा था, दक्षिण दिशा की ओर जा रहा था, ऊपर की ओर जा रहा था, नीचे की ओर जा रहा था और विदिशाओं की ओर जा रहा था। อถ [Pg.123] โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ปสฺสถ โน ตุมฺเห, ภิกฺขเว, เอตํ ธูมายิตตฺตํ ติมิรายิตตฺตํ คจฺฉเตว ปุริมํ ทิสํ, คจฺฉติ ปจฺฉิมํ ทิสํ, คจฺฉติ อุตฺตรํ ทิสํ, คจฺฉติ ทกฺขิณํ ทิสํ, คจฺฉติ อุทฺธํ, คจฺฉติ อโธ, คจฺฉติ อนุทิส’’นฺติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. ‘‘เอโส โข, ภิกฺขเว, มาโร ปาปิมา โคธิกสฺส กุลปุตฺตสฺส วิญฺญาณํ สมนฺเวสติ – ‘กตฺถ โคธิกสฺส กุลปุตฺตสฺส วิญฺญาณํ ปติฏฺฐิต’นฺติ? อปฺปติฏฺฐิเตน จ, ภิกฺขเว, วิญฺญาเณน โคธิโก กุลปุตฺโต ปรินิพฺพุโต’’ติ. อถ โข มาโร ปาปิมา เพลุวปณฺฑุวีณํ อาทาย เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— “भिक्षुओं, क्या तुम उस धुएँ जैसे और अंधकार जैसे दृश्य को पूर्व दिशा की ओर, पश्चिम दिशा की ओर, उत्तर दिशा की ओर, दक्षिण दिशा की ओर, ऊपर की ओर, नीचे की ओर और विदिशाओं की ओर जाते हुए देख रहे हो?” “हाँ, भन्ते!” “भिक्षुओं, वह पापी मार है जो कुलपुत्र गोधिक के विज्ञान को खोज रहा है कि— 'कुलपुत्र गोधिक का विज्ञान कहाँ प्रतिष्ठित हुआ है?' परन्तु भिक्षुओं, बिना किसी स्थान पर प्रतिष्ठित हुए विज्ञान के ही कुलपुत्र गोधिक परिनिर्वाण को प्राप्त हो गया है।” तब पापी मार पके हुए बेल के फल के समान पीले रंग की वीणा लेकर जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर उसने भगवान से गाथा में कहा—”}]``` ‘‘อุทฺธํ อโธ จ ติริยํ, ทิสา อนุทิสา สฺวหํ; อนฺเวสํ นาธิคจฺฉามิ, โคธิโก โส กุหึ คโต’’ติ. “ऊपर, नीचे और तिरछे, दिशाओं और विदिशाओं में खोजते हुए भी मैं उसे नहीं पा रहा हूँ; वह गोधिक कहाँ चला गया है?” ‘‘โย ธีโร ธิติสมฺปนฺโน, ฌายี ฌานรโต สทา; อโหรตฺตํ อนุยุญฺชํ, ชีวิตํ อนิกามยํ. “जो धीर, धृति-सम्पन्न (धैर्यवान), सदैव ध्यान में लीन और ध्यान-रत है; जो दिन-रात पुरुषार्थ करता है और जीवन के प्रति आसक्ति नहीं रखता।” ‘‘เชตฺวาน มจฺจุโน เสนํ, อนาคนฺตฺวา ปุนพฺภวํ; สมูลํ ตณฺหมพฺพุยฺห, โคธิโก ปรินิพฺพุโต’’ติ. “मृत्यु (मार) की सेना को जीतकर, पुनर्जन्म को प्राप्त न होकर, जड़ सहित तृष्णा को उखाड़कर, गोधिक परिनिर्वृत्त हो गया है।” ‘‘ตสฺส โสกปเรตสฺส, วีณา กจฺฉา อภสฺสถ; ตโต โส ทุมฺมโน ยกฺโข, ตตฺเถวนฺตรธายถา’’ติ. “उस शोक-ग्रस्त (मार) की बगल से वीणा गिर गई; तब वह दुखी यक्ष वहीं अंतर्ध्यान हो गया।” ๔. สตฺตวสฺสานุพนฺธสุตฺตํ ४. सप्तवर्षानुबन्ध सुत्त ๑๖๐. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา อุรุเวลายํ วิหรติ นชฺชา เนรญฺชราย ตีเร อชปาลนิคฺโรเธ. เตน โข ปน สมเยน มาโร ปาปิมา สตฺตวสฺสานิ ภควนฺตํ อนุพนฺโธ โหติ โอตาราเปกฺโข โอตารํ อลภมาโน. อถ โข มาโร ปาปิมา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – १६०. ऐसा मैंने सुना है—एक समय भगवान उरुवेला में निरंजना नदी के तट पर अजपाल निग्रोध (बरगद के पेड़) के नीचे विहार कर रहे थे। उस समय पापी मार सात वर्षों से भगवान के पीछे लगा हुआ था, किसी छिद्र (अवसर) की ताक में, पर उसे कोई अवसर नहीं मिल रहा था। तब पापी मार जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचा; पहुँचकर उसने भगवान से गाथा में कहा— ‘‘โสกาวติณฺโณ นุ วนมฺหิ ฌายสิ,วิตฺตํ นุ ชีโน อุท ปตฺถยาโน; อาคุํ นุ คามสฺมิมกาสิ กิญฺจิ,กสฺมา ชเนน น กโรสิ สกฺขึ; สกฺขี น สมฺปชฺชติ เกนจิ เต’’ติ. “क्या तुम शोक में डूबे हुए वन में ध्यान कर रहे हो? क्या तुम्हारा धन खो गया है या तुम उसकी कामना कर रहे हो? क्या तुमने गाँव में कोई अपराध किया है? तुम लोगों के साथ मित्रता क्यों नहीं करते? क्या तुम्हारा किसी के साथ मैत्री-संबंध नहीं बनता?” ‘‘โสกสฺส [Pg.124] มูลํ ปลิขาย สพฺพํ,อนาคุ ฌายามิ อโสจมาโน; เฉตฺวาน สพฺพํ ภวโลภชปฺปํ,อนาสโว ฌายามิ ปมตฺตพนฺธู’’ติ. “शोक की समस्त जड़ को खोदकर, मैं निष्पाप और शोक-रहित होकर ध्यान करता हूँ; भव-लोभ की समस्त तृष्णा को काटकर, मैं आस्रव-रहित होकर ध्यान करता हूँ, ओ प्रमादियों के बंधु (मार)!” ‘‘ยํ วทนฺติ มม ยิทนฺติ, เย วทนฺติ มมนฺติ จ; เอตฺถ เจ เต มโน อตฺถิ, น เม สมณ โมกฺขสี’’ติ. “जो कहते हैं कि 'यह मेरा है' और जो कहते हैं कि 'यह मैं हूँ'; यदि तुम्हारा मन इनमें है, तो हे श्रमण! तुम मुझसे बच नहीं पाओगे।” ‘‘ยํ วทนฺติ น ตํ มยฺหํ, เย วทนฺติ น เต อหํ; เอวํ ปาปิม ชานาหิ, น เม มคฺคมฺปิ ทกฺขสี’’ติ. “वे जो कहते हैं, वह मेरा नहीं है; जो वे कहते हैं, वह मैं नहीं हूँ। हे पापी! ऐसा जान लो, तुम मेरा मार्ग भी नहीं देख पाओगे।” ‘‘สเจ มคฺคํ อนุพุทฺธํ, เขมํ อมตคามินํ; อเปหิ คจฺฉ ตฺวเมเวโก, กิมญฺญมนุสาสสี’’ติ. “यदि तुमने क्षेमकारी अमृत-गामी मार्ग को जान लिया है, तो तुम अकेले ही जाओ; दूसरों को उपदेश क्यों देते हो?” ‘‘อมจฺจุเธยฺยํ ปุจฺฉนฺติ, เย ชนา ปารคามิโน; เตสาหํ ปุฏฺโฐ อกฺขามิ, ยํ สจฺจํ ตํ นิรูปธิ’’นฺติ. “जो लोग पार जाने के इच्छुक हैं, वे मुझसे मृत्यु-रहित (निर्वाण) के बारे में पूछते हैं; उनके पूछने पर मैं उन्हें वह सत्य बताता हूँ जो उपाधि-रहित है।” ‘‘เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, คามสฺส วา นิคมสฺส วา อวิทูเร โปกฺขรณี. ตตฺรสฺส กกฺกฏโก. อถ โข, ภนฺเต, สมฺพหุลา กุมารกา วา กุมาริกาโย วา ตมฺหา คามา วา นิคมา วา นิกฺขมิตฺวา เยน สา โปกฺขรณี เตนุปสงฺกเมยฺยุํ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ กกฺกฏกํ อุทกา อุทฺธริตฺวา ถเล ปติฏฺฐเปยฺยุํ. ยํ ยเทว หิ โส, ภนฺเต, กกฺกฏโก อฬํ อภินินฺนาเมยฺย ตํ ตเทว เต กุมารกา วา กุมาริกาโย วา กฏฺเฐน วา กถลาย วา สญฺฉินฺเทยฺยุํ สมฺภญฺเชยฺยุํ สมฺปลิภญฺเชยฺยุํ. เอวญฺหิ โส, ภนฺเต, กกฺกฏโก สพฺเพหิ อเฬหิ สญฺฉินฺเนหิ สมฺภคฺเคหิ สมฺปลิภคฺเคหิ อภพฺโพ ตํ โปกฺขรณึ โอตริตุํ. เอวเมว โข, ภนฺเต, ยานิ กานิจิ วิสูกายิกานิ วิเสวิตานิ วิปฺผนฺทิตานิ, สพฺพานิ ตานิ ภควตา สญฺฉินฺนานิ สมฺภคฺคานิ สมฺปลิภคฺคานิ. อภพฺโพ ทานาหํ, ภนฺเต, ปุน ภควนฺตํ อุปสงฺกมิตุํ ยทิทํ โอตาราเปกฺโข’’ติ. อถ โข มาโร ปาปิมา ภควโต สนฺติเก อิมา นิพฺเพชนียา คาถาโย อภาสิ – “भन्ते! जैसे किसी गाँव या कस्बे के पास कोई पोखर हो और उसमें एक केकड़ा हो। तब बहुत से लड़के या लड़कियाँ उस गाँव या कस्बे से निकलकर उस पोखर के पास आएँ; और उस केकड़े को पानी से निकालकर जमीन पर रख दें। भन्ते! वह केकड़ा अपना जो-जो पैर (डाँड़) बाहर निकाले, वे लड़के या लड़कियाँ उसे लकड़ी या पत्थर के टुकड़े से काट दें, तोड़ दें या खंडित कर दें। भन्ते! इस प्रकार वह केकड़ा, जिसके सभी पैर काट दिए गए हों, तोड़ दिए गए हों, खंडित कर दिए गए हों, उस पोखर में फिर से उतरने में असमर्थ हो जाता है। इसी प्रकार, भन्ते! मार की जो भी विद्रूपताएँ, चेष्टाएँ और छटपटाहटें थीं, वे सभी भगवान द्वारा काट दी गई हैं, तोड़ दी गई हैं और खंडित कर दी गई हैं। भन्ते! अब मैं फिर से भगवान के पास किसी छिद्र (अवसर) की ताक में आने के अयोग्य हूँ।” तब पापी मार ने भगवान के समीप ये निर्वेद-युक्त (वैराग्यपूर्ण) गाथाएँ कहीं— ‘‘เมทวณฺณญฺจ ปาสาณํ, วายโส อนุปริยคา; อเปตฺถ มุทุํ วินฺเทม, อปิ อสฺสาทนา สิยา. “एक कौआ चर्बी के समान रंग वाली शिला के पास गया (यह सोचकर कि) 'शायद यहाँ कुछ कोमल मिले, शायद यहाँ कुछ स्वाद मिले'।” ‘‘อลทฺธา [Pg.125] ตตฺถ อสฺสาทํ, วายเสตฺโต อปกฺกเม; กาโกว เสลมาสชฺช, นิพฺพิชฺชาเปม โคตมา’’ติ. “वहाँ कोई स्वाद न पाकर वह कौआ वहाँ से उड़ गया; उसी कौए की तरह हम भी शिला-समान गौतम पर आक्रमण कर, (कोई स्वाद न पाकर) निराश होकर गौतम के पास से जा रहे हैं।” ๕. มารธีตุสุตฺตํ ५. मारधीतु सुत्त ๑๖๑. อถ โข มาโร ปาปิมา ภควโต สนฺติเก อิมา นิพฺเพชนียา คาถาโย อภาสิตฺวา ตมฺหา ฐานา อปกฺกมฺม ภควโต อวิทูเร ปถวิยํ ปลฺลงฺเกน นิสีทิ ตุณฺหีภูโต มงฺกุภูโต ปตฺตกฺขนฺโธ อโธมุโข ปชฺฌายนฺโต อปฺปฏิภาโน กฏฺเฐน ภูมึ วิลิขนฺโต. อถ โข ตณฺหา จ อรติ จ รคา จ มารธีตโร เยน มาโร ปาปิมา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา มารํ ปาปิมนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสึสุ – १६१. तब पापी मार भगवान के समीप इन निर्वेद-युक्त गाथाओं को कहकर, उस स्थान से हटकर भगवान से कुछ दूर जमीन पर पालथी मारकर चुपचाप, उदास, कंधे झुकाए, मुँह नीचे किए, चिंतामग्न, निरुत्तर होकर लकड़ी से जमीन कुरेदता हुआ बैठ गया। तब तण्हा (तृष्णा), अरति और रगा (राग) नामक मार की पुत्रियाँ जहाँ पापी मार था वहाँ आईं; और पापी मार से गाथा में बोलीं— ‘‘เกนาสิ ทุมฺมโน ตาต, ปุริสํ กํ นุ โสจสิ; มยํ ตํ ราคปาเสน, อารญฺญมิว กุญฺชรํ; พนฺธิตฺวา อานยิสฺสาม, วสโค เต ภวิสฺสตี’’ติ. “पिताजी! आप दुखी क्यों हैं? आप किस पुरुष के लिए शोक कर रहे हैं? हम उस पुरुष को राग-पाश (काम-वासना के जाल) से बाँधकर वैसे ही ले आएँगी जैसे वन के हाथी को बाँधकर लाया जाता है; वह आपके वश में हो जाएगा।” ‘‘อรหํ สุคโต โลเก, น ราเคน สุวานโย; มารเธยฺยํ อติกฺกนฺโต, ตสฺมา โสจามหํ ภุส’’นฺติ. “वह लोक में अर्हत् और सुगत है, उसे राग द्वारा वश में करना सरल नहीं है; वह मार के क्षेत्र को पार कर गया है, इसीलिए मैं बहुत शोक कर रहा हूँ।” อถ โข ตณฺหา จ อรติ จ รคา จ มารธีตโร เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘ปาเท เต, สมณ, ปริจาเรมา’’ติ. อถ โข ภควา น มนสากาสิ, ยถา ตํ อนุตฺตเร อุปธิสงฺขเย วิมุตฺโต. तब तण्हा, अरति और रगा नामक मार की पुत्रियाँ जहाँ भगवान थे वहाँ आईं; और भगवान से यह बोलीं— “श्रमण! हम आपके चरणों की सेवा करना चाहती हैं।” तब भगवान ने उन पर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि वे अनुपम उपाधि-क्षय (निर्वाण) में विमुक्त थे। อถ โข ตณฺหา จ อรติ จ รคา จ มารธีตโร เอกมนฺตํ อปกฺกมฺม เอวํ สมจินฺเตสุํ – ‘‘อุจฺจาวจา โข ปุริสานํ อธิปฺปายา. ยํนูน มยํ เอกสตํ เอกสตํ กุมาริวณฺณสตํ อภินิมฺมิเนยฺยามา’’ติ. อถ โข ตณฺหา จ อรติ จ รคา จ มารธีตโร เอกสตํ เอกสตํ กุมาริวณฺณสตํ อภินิมฺมินิตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘ปาเท เต, สมณ, ปริจาเรมา’’ติ. ตมฺปิ ภควา น มนสากาสิ, ยถา ตํ อนุตฺตเร อุปธิสงฺขเย วิมุตฺโต. तब तण्हा, अरति और रगा नामक मार की पुत्रियाँ एक ओर हट गईं और आपस में विचार करने लगीं— “पुरुषों की रुचियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं। क्यों न हम प्रत्येक सौ-सौ कुमारियों का रूप धारण कर लें?” तब तण्हा, अरति और रगा नामक मार की पुत्रियों ने प्रत्येक सौ-सौ कुमारियों का रूप धारण किया और जहाँ भगवान थे वहाँ आईं; और भगवान से यह बोलीं— “श्रमण! हम आपके चरणों की सेवा करना चाहती हैं।” भगवान ने उस पर भी ध्यान नहीं दिया, क्योंकि वे अनुपम उपाधि-क्षय (निर्वाण) में विमुक्त थे। อถ โข ตณฺหา จ อรติ จ รคา จ มารธีตโร เอกมนฺตํ อปกฺกมฺม เอวํ สมจินฺเตสุํ – ‘‘อุจฺจาวจา โข ปุริสานํ อธิปฺปายา. ยํนูน มยํ เอกสตํ เอกสตํ อวิชาตวณฺณสตํ อภินิมฺมิเนยฺยามา’’ติ. อถ โข ตณฺหา จ อรติ จ รคา จ มารธีตโร เอกสตํ เอกสตํ [Pg.126] อวิชาตวณฺณสตํ อภินิมฺมินิตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘ปาเท เต, สมณ, ปริจาเรมา’’ติ. ตมฺปิ ภควา น มนสากาสิ, ยถา ตํ อนุตฺตเร อุปธิสงฺขเย วิมุตฺโต. तब तृष्णा, अरति और राग नामक मार-पुत्रियों ने एक ओर हटकर इस प्रकार विचार किया— "मनुष्यों की रुचियाँ विविध प्रकार की होती हैं। क्यों न हम प्रत्येक सौ-सौ ऐसी युवतियों का रूप धारण करें जिन्होंने अभी तक संतान को जन्म नहीं दिया है?" तब तृष्णा, अरति और राग नामक मार-पुत्रियों ने प्रत्येक सौ-सौ ऐसी युवतियों का रूप धारण किया जिन्होंने अभी तक संतान को जन्म नहीं दिया था और जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचीं। पहुँचकर भगवान से यह कहा— "हे श्रमण! हम आपके चरणों की सेवा करना चाहती हैं।" भगवान ने उस पर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि वे अनुपम 'उपधिसंक्षय' (निर्वाण) में विमुक्त थे। อถ โข ตณฺหา จ…เป… ยํนูน มยํ เอกสตํ เอกสตํ สกึ วิชาตวณฺณสตํ อภินิมฺมิเนยฺยามาติ. อถ โข ตณฺหา จ…เป… สกึ วิชาตวณฺณสตํ อภินิมฺมินิตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘ปาเท เต, สมณ, ปริจาเรมา’’ติ. ตมฺปิ ภควา น มนสากาสิ, ยถา ตํ อนุตฺตเร อุปธิสงฺขเย วิมุตฺโต. तब तृष्णा... (वही)... क्यों न हम प्रत्येक सौ-सौ ऐसी स्त्रियों का रूप धारण करें जिन्होंने एक बार संतान को जन्म दिया है? तब तृष्णा... (वही)... एक बार संतान को जन्म देने वाली स्त्रियों का रूप धारण कर जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचीं और कहा— "हे श्रमण! हम आपके चरणों की सेवा करना चाहती हैं।" भगवान ने उस पर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि वे अनुपम 'उपधिसंक्षय' में विमुक्त थे। อถ โข ตณฺหา จ…เป… ยํนูน มยํ เอกสตํ เอกสตํ ทุวิชาตวณฺณสตํ อภินิมฺมิเนยฺยามาติ. อถ โข ตณฺหา จ…เป… ทุวิชาตวณฺณสตํ อภินิมฺมินิตฺวา เยน ภควา…เป… ยถา ตํ อนุตฺตเร อุปธิสงฺขเย วิมุตฺโต. อถ โข ตณฺหา จ…เป… มชฺฌิมิตฺถิวณฺณสตํ อภินิมฺมิเนยฺยามาติ. อถ โข ตณฺหา จ…เป… มชฺฌิมิตฺถิวณฺณสตํ อภินิมฺมินิตฺวา…เป… อนุตฺตเร อุปธิสงฺขเย วิมุตฺโต. तब तृष्णा... (वही)... क्यों न हम प्रत्येक सौ-सौ ऐसी स्त्रियों का रूप धारण करें जिन्होंने दो बार संतान को जन्म दिया है? ... (वही) ... भगवान ने उस पर ध्यान नहीं दिया। तब तृष्णा... (वही)... क्यों न हम प्रत्येक सौ-सौ मध्यम आयु की स्त्रियों का रूप धारण करें? ... (वही) ... भगवान ने उस पर ध्यान नहीं दिया। อถ โข ตณฺหา จ…เป… มหิตฺถิวณฺณสตํ อภินิมฺมิเนยฺยามาติ. อถ โข ตณฺหา จ…เป… มหิตฺถิวณฺณสตํ อภินิมฺมินิตฺวา เยน ภควา…เป… อนุตฺตเร อุปธิสงฺขเย วิมุตฺโต. อถ โข ตณฺหา จ อรติ จ รคา จ มารธีตโร เอกมนฺตํ อปกฺกมฺม เอตทโวจุํ – สจฺจํ กิร โน ปิตา อโวจ – तब तृष्णा... (वही)... क्यों न हम प्रत्येक सौ-सौ वृद्ध स्त्रियों का रूप धारण करें? तब तृष्णा... (वही)... वृद्ध स्त्रियों का रूप धारण कर जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचीं... (वही) ... भगवान ने उस पर ध्यान नहीं दिया। तब तृष्णा, अरति और राग नामक मार-पुत्रियों ने एक ओर हटकर यह कहा— "हमारे पिता ने सच ही कहा था—" ‘‘อรหํ สุคโต โลเก, น ราเคน สุวานโย; มารเธยฺยํ อติกฺกนฺโต, ตสฺมา โสจามหํ ภุส’’นฺติ. "संसार में जो अर्हत् और सुगत हैं, उन्हें राग के द्वारा वश में करना सरल नहीं है; वे मार के क्षेत्र को पार कर चुके हैं, इसीलिए मैं बहुत शोक कर रहा हूँ।" ‘‘ยญฺหิ มยํ สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา อวีตราคํ อิมินา อุปกฺกเมน อุปกฺกเมยฺยาม หทยํ วาสฺส ผเลยฺย, อุณฺหํ โลหิตํ วา มุขโต อุคฺคจฺเฉยฺย, อุมฺมาทํ วา ปาปุเณยฺย จิตฺตกฺเขปํ วา. เสยฺยถา วา ปน นโฬ หริโต ลุโต อุสฺสุสฺสติ วิสุสฺสติ มิลายติ; เอวเมว อุสฺสุสฺเสยฺย วิสุสฺเสยฺย มิลาเยยฺยา’’ติ. "यदि हम किसी ऐसे श्रमण या ब्राह्मण पर यह प्रयास करतीं जो राग-रहित न हो, तो या तो उसका हृदय फट जाता, या उसके मुख से गर्म रक्त निकलता, या वह पागल हो जाता या विक्षिप्त हो जाता। जैसे काटा हुआ हरा नरकुल सूख जाता है, कुम्हला जाता है, वैसे ही वह भी सूख जाता और कुम्हला जाता।" อถ [Pg.127] โข ตณฺหา จ อรติ จ รคา จ มารธีตโร เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐํสุ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข ตณฺหา มารธีตา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब तृष्णा, अरति और राग नामक मार-पुत्रियाँ जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचीं और एक ओर खड़ी हो गईं। एक ओर खड़ी होकर मार-पुत्री तृष्णा ने भगवान से गाथा में कहा— ‘‘โสกาวติณฺโณ นุ วนมฺหิ ฌายสิ,วิตฺตํ นุ ชีโน อุท ปตฺถยาโน; อาคุํ นุ คามสฺมิมกาสิ กิญฺจิ,กสฺมา ชเนน น กโรสิ สกฺขึ; สกฺขี น สมฺปชฺชติ เกนจิ เต’’ติ. "क्या आप शोक में डूबे हुए वन में ध्यान कर रहे हैं? क्या आप धन हार गए हैं या धन की इच्छा कर रहे हैं? क्या आपने गाँव में कोई अपराध किया है? आप लोगों के साथ मित्रता क्यों नहीं करते? क्या आपकी किसी के साथ मित्रता नहीं जमती?" ‘‘อตฺถสฺส ปตฺตึ หทยสฺส สนฺตึ,เชตฺวาน เสนํ ปิยสาตรูปํ; เอโกหํ ฌายํ สุขมนุโพธึ,ตสฺมา ชเนน น กโรมิ สกฺขึ; สกฺขี น สมฺปชฺชติ เกนจิ เม’’ติ. "परम अर्थ की प्राप्ति और हृदय की शांति पाकर, प्रिय और सुखद रूप वाली (मार) सेना को जीतकर, मैं अकेला ध्यान करते हुए सुख का अनुभव कर रहा हूँ। इसलिए मैं लोगों के साथ मित्रता नहीं करता; मेरी किसी के साथ मित्रता नहीं जमती।" อถ โข อรติ มารธีตา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब मार-पुत्री अरति ने भगवान से गाथा में कहा— ‘‘กถํ วิหารีพหุโลธ ภิกฺขุ,ปญฺโจฆติณฺโณ อตรีธ ฉฏฺฐํ; กถํ ฌายึ พหุลํ กามสญฺญา,ปริพาหิรา โหนฺติ อลทฺธ โย ต’’นฺติ. "यहाँ भिक्षु किस प्रकार के विहार में अधिक रहने वाला होकर पाँच ओघों को पार कर लेता है और छठे को भी पार कर जाता है? किस प्रकार के ध्यान में अधिक रहने वाले उस पुरुष को काम-संज्ञाएँ प्राप्त नहीं होतीं और बाहर ही रह जाती हैं?" ‘‘ปสฺสทฺธกาโย สุวิมุตฺตจิตฺโต,อสงฺขราโน สติมา อโนโก; อญฺญาย ธมฺมํ อวิตกฺกฌายี,น กุปฺปติ น สรติ น ถิโน. "प्रशांत शरीर वाला, भली-भाँति विमुक्त चित्त वाला, (कर्मों का) संस्कार न करने वाला, स्मृतिमान और अनालय (तृष्णा-रहित) पुरुष, धर्म को जानकर वितर्क-रहित चतुर्थ ध्यान में स्थित रहता है। वह न क्रोध करता है, न (रागपूर्वक) स्मरण करता है, न ही आलस्य से युक्त होता है।" ‘‘เอวํวิหารีพหุโลธ ภิกฺขุ,ปญฺโจฆติณฺโณ อตรีธ ฉฏฺฐํ; เอวํ ฌายึ พหุลํ กามสญฺญา,ปริพาหิรา โหนฺติ อลทฺธ โย ต’’นฺติ. "यहाँ भिक्षु इस प्रकार के विहार में अधिक रहने वाला होकर पाँच ओघों को पार कर लेता है और छठे को भी पार कर जाता है। इस प्रकार के ध्यान में अधिक रहने वाले उस पुरुष को काम-संज्ञाएँ प्राप्त नहीं होतीं और बाहर ही रह जाती हैं।"—ऐसा भगवान ने कहा। อถ [Pg.128] โข รคา มารธีตา ภควโต สนฺติเก คาถาย อชฺฌภาสิ – तब मार-पुत्री राग ने भगवान के समीप गाथा में कहा— ‘‘อจฺเฉชฺช ตณฺหํ คณสงฺฆจารี,อทฺธา จริสฺสนฺติ พหู จ สทฺธา; พหุํ วตายํ ชนตํ อโนโก,อจฺเฉชฺช เนสฺสติ มจฺจุราชสฺส ปาร’’นฺติ. "तृष्णा को काटकर, गण और संघ में विचरण करने वाले (बुद्ध) के पीछे निश्चय ही बहुत से श्रद्धालु चलेंगे। यह अनालय (तृष्णा-रहित बुद्ध) बहुत से लोगों को मृत्युराज के हाथ से छुड़ाकर पार (निर्वाण) ले जाएगा।" ‘‘นยนฺติ เว มหาวีรา, สทฺธมฺเมน ตถาคตา; ธมฺเมน นยมานานํ, กา อุสูยา วิชานต’’นฺติ. "महावीर तथागत सद्धर्म के द्वारा (प्राणियों को) ले जाते हैं। धर्म के द्वारा ले जाए जाने वाले उन प्रज्ञावानों के प्रति ईर्ष्या करने का क्या लाभ?" อถ โข ตณฺหา จ อรติ จ รคา จ มารธีตโร เยน มาโร ปาปิมา เตนุปสงฺกมึสุ. อทฺทสา โข มาโร ปาปิมา ตณฺหญฺจ อรติญฺจ รคญฺจ มารธีตโร ทูรโตว อาคจฺฉนฺติโย. ทิสฺวาน คาถาหิ อชฺฌภาสิ – तब तृष्णा, अरति और राग नामक मार-पुत्रियाँ जहाँ पापी मार था वहाँ पहुँचीं। पापी मार ने तृष्णा, अरति और राग को दूर से ही आते देखा। देखकर उसने गाथाओं में कहा— ‘‘พาลา กุมุทนาเฬหิ, ปพฺพตํ อภิมตฺถถ ; คิรึ นเขน ขนถ, อโย ทนฺเตหิ ขาทถ. "मूर्खों! तुम कमल की डंडियों से पहाड़ को कुचलना चाहती हो। तुम अपने नाखूनों से पर्वत को खोद रही हो और अपने दाँतों से लोहे को चबा रही हो।" ‘‘เสลํว สิรสูหจฺจ, ปาตาเล คาธเมสถ; ขาณุํว อุรสาสชฺช, นิพฺพิชฺชาเปถ โคตมา’’ติ. "जैसे सिर पर चट्टान रखकर पाताल में आधार ढूँढना हो, या अपनी छाती से खूँटे को टकराना हो, (वैसा ही तुम्हारा यह प्रयास है)। अतः गौतम से निराश होकर दूर हट जाओ।" ‘‘ททฺทลฺลมานา อาคญฺฉุํ, ตณฺหา จ อรตี รคา; ตา ตตฺถ ปนุที สตฺถา, ตูลํ ภฏฺฐํว มาลุโต’’ติ. तृष्णा, अरति और राग देदीप्यमान होकर आईं, किंतु शास्ता ने उन्हें वहाँ से वैसे ही उड़ा दिया जैसे हवा गिरे हुए रुई के फाहे को उड़ा देती है। ตติโย วคฺโค. तीसरा वर्ग। ตสฺสุทฺทานํ – उसकी अनुक्रमणिका इस प्रकार है— สมฺพหุลา สมิทฺธิ จ, โคธิกํ สตฺตวสฺสานิ; ธีตรํ เทสิตํ พุทฺธ, เสฏฺเฐน อิมํ มารปญฺจกนฺติ. सम्बहुला, समिद्धि, गोधिक, सप्तवर्ष और पुत्री—बुद्ध श्रेष्ठ द्वारा यह 'मार-पंचक' उपदिष्ट है। มารสํยุตฺตํ สมตฺตํ. मार-संयुत्त समाप्त। ๕. ภิกฺขุนีสํยุตฺตํ ५. भिक्षुणी-संयुत्त ๑. อาฬวิกาสุตฺตํ १. आलविका सुत्त ๑๖๒. เอวํ [Pg.129] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. อถ โข อาฬวิกา ภิกฺขุนี ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สาวตฺถึ ปิณฺฑาย ปาวิสิ. สาวตฺถิยํ ปิณฺฑาย จริตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺตา เยน อนฺธวนํ เตนุปสงฺกมิ วิเวกตฺถินี. อถ โข มาโร ปาปิมา อาฬวิกาย ภิกฺขุนิยา ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํสํ อุปฺปาเทตุกาโม วิเวกมฺหา จาเวตุกาโม เยน อาฬวิกา ภิกฺขุนี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อาฬวิกํ ภิกฺขุนึ คาถาย อชฺฌภาสิ – १६२. ऐसा मैंने सुना है - एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे। तब आलविका भिक्षुणी पूर्वाह्न समय में (चीवर) पहनकर, पात्र और चीवर लेकर श्रावस्ती में भिक्षा के लिए प्रविष्ट हुईं। श्रावस्ती में भिक्षाटन कर, भोजन के पश्चात भिक्षापात्र से निवृत्त होकर, वे विवेक (एकान्त) की इच्छा से जहाँ अन्धवन था, वहाँ गईं। तब पापी मार ने आलविका भिक्षुणी में भय, घबराहट और रोमांच (रोंगटे खड़े होना) उत्पन्न करने की इच्छा से और उन्हें विवेक से विचलित करने की इच्छा से, जहाँ आलविका भिक्षुणी थीं, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर आलविका भिक्षुणी को गाथा में कहा — ‘‘นตฺถิ นิสฺสรณํ โลเก, กึ วิเวเกน กาหสิ; ภุญฺชสฺสุ กามรติโย, มาหุ ปจฺฉานุตาปินี’’ติ. “लोक में (दुखों से) कोई मुक्ति नहीं है, विवेक (एकान्तवास) से तुम क्या करोगी? काम-रतियों (इन्द्रिय सुखों) का भोग करो, कहीं ऐसा न हो कि बाद में तुम्हें पश्चाताप करना पड़े।” อถ โข อาฬวิกาย ภิกฺขุนิยา เอตทโหสิ – ‘‘โก นุ ขฺวายํ มนุสฺโส วา อมนุสฺโส วา คาถํ ภาสตี’’ติ? อถ โข อาฬวิกาย ภิกฺขุนิยา เอตทโหสิ – ‘‘มาโร โข อยํ ปาปิมา มม ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํสํ อุปฺปาเทตุกาโม วิเวกมฺหา จาเวตุกาโม คาถํ ภาสตี’’ติ. อถ โข อาฬวิกา ภิกฺขุนี ‘‘มาโร อยํ ปาปิมา’’ อิติ วิทิตฺวา มารํ ปาปิมนฺตํ คาถาหิ ปจฺจภาสิ – तब आलविका भिक्षुणी को यह विचार हुआ — 'यह कौन मनुष्य या अमनुष्य गाथा कह रहा है?' तब आलविका भिक्षुणी को यह विचार हुआ — 'यह पापी मार ही है जो मुझमें भय, घबराहट और रोमांच उत्पन्न करने की इच्छा से और मुझे विवेक से विचलित करने की इच्छा से गाथा कह रहा है।' तब आलविका भिक्षुणी ने 'यह पापी मार है' ऐसा जानकर पापी मार को गाथाओं में प्रत्युत्तर दिया — ‘‘อตฺถิ นิสฺสรณํ โลเก, ปญฺญาย เม สุผุสฺสิตํ ; ปมตฺตพนฺธุ ปาปิม, น ตฺวํ ชานาสิ ตํ ปทํ. “लोक में मुक्ति (निर्वाण) है, जिसे मैंने प्रज्ञा से भली-भाँति स्पर्श किया (अनुभव किया) है। ओ पापी! प्रमादियों के बंधु (मार)! तुम उस पद को नहीं जानते। ‘‘สตฺติสูลูปมา กามา, ขนฺธาสํ อธิกุฏฺฏนา; ยํ ตฺวํ กามรตึ พฺรูสิ, อรติ มยฺห สา อหู’’ติ. काम-भोग तलवार और शूल के समान हैं, (पंच) स्कंध उनके लिए कसाई के पीढ़े (वध-स्थान) के समान हैं। जिस काम-रति की तुम बात करते हो, वह मेरे लिए अरति (अरुचिकर) हो गई है।” อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ อาฬวิกา ภิกฺขุนี’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार यह जानकर कि 'आलविका भिक्षुणी मुझे जान गई है', दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ๒. โสมาสุตฺตํ २. सोमा सुत्त ๑๖๓. สาวตฺถินิทานํ[Pg.130]. อถ โข โสมา ภิกฺขุนี ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สาวตฺถึ ปิณฺฑาย ปาวิสิ. สาวตฺถิยํ ปิณฺฑาย จริตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺตา เยน อนฺธวนํ เตนุปสงฺกมิ ทิวาวิหาราย. อนฺธวนํ อชฺโฌคาเหตฺวา อญฺญตรสฺมึ รุกฺขมูเล ทิวาวิหารํ นิสีทิ. อถ โข มาโร ปาปิมา โสมาย ภิกฺขุนิยา ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํสํ อุปฺปาเทตุกาโม สมาธิมฺหา จาเวตุกาโม เยน โสมา ภิกฺขุนี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา โสมํ ภิกฺขุนึ คาถาย อชฺฌภาสิ – १६३. श्रावस्ती निदान। तब सोमा भिक्षुणी पूर्वाह्न समय में (चीवर) पहनकर, पात्र और चीवर लेकर श्रावस्ती में भिक्षा के लिए प्रविष्ट हुईं। श्रावस्ती में भिक्षाटन कर, भोजन के पश्चात भिक्षापात्र से निवृत्त होकर, वे दिवा-विहार (दिन के विश्राम) के लिए जहाँ अन्धवन था, वहाँ गईं। अन्धवन में प्रवेश कर एक वृक्ष के नीचे दिवा-विहार के लिए बैठ गईं। तब पापी मार ने सोमा भिक्षुणी में भय, घबराहट और रोमांच उत्पन्न करने की इच्छा से और उन्हें समाधि से विचलित करने की इच्छा से, जहाँ सोमा भिक्षुणी थीं, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर सोमा भिक्षुणी को गाथा में कहा — ‘‘ยํ ตํ อิสีหิ ปตฺตพฺพํ, ฐานํ ทุรภิสมฺภวํ; น ตํ ทฺวงฺคุลปญฺญาย, สกฺกา ปปฺโปตุมิตฺถิยา’’ติ. “वह स्थान (अर्हत्व) जिसे ऋषियों द्वारा प्राप्त किया जाना है और जो अत्यंत कठिनता से प्राप्त होता है, उसे दो अंगुल की प्रज्ञा वाली स्त्री प्राप्त नहीं कर सकती।” อถ โข โสมาย ภิกฺขุนิยา เอตทโหสิ – ‘‘โก นุ ขฺวายํ มนุสฺโส วา อมนุสฺโส วา คาถํ ภาสตี’’ติ? อถ โข โสมาย ภิกฺขุนิยา เอตทโหสิ – ‘‘มาโร โข อยํ ปาปิมา มม ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํสํ อุปฺปาเทตุกาโม สมาธิมฺหา จาเวตุกาโม คาถํ ภาสตี’’ติ. อถ โข โสมา ภิกฺขุนี ‘‘มาโร อยํ ปาปิมา’’ อิติ วิทิตฺวา มารํ ปาปิมนฺตํ คาถาหิ ปจฺจภาสิ – तब सोमा भिक्षुणी को यह विचार हुआ — 'यह कौन मनुष्य या अमनुष्य गाथा कह रहा है?' तब सोमा भिक्षुणी को यह विचार हुआ — 'यह पापी मार ही है जो मुझमें भय, घबराहट और रोमांच उत्पन्न करने की इच्छा से और मुझे समाधि से विचलित करने की इच्छा से गाथा कह रहा है।' तब सोमा भिक्षुणी ने 'यह पापी मार है' ऐसा जानकर पापी मार को गाथाओं में प्रत्युत्तर दिया — ‘‘อิตฺถิภาโว กึ กยิรา, จิตฺตมฺหิ สุสมาหิเต; ญาณมฺหิ วตฺตมานมฺหิ, สมฺมา ธมฺมํ วิปสฺสโต. “जब चित्त भली-भाँति समाहित हो, ज्ञान प्रवृत्त हो और जो सम्यक् प्रकार से धर्म का विपश्यना (दर्शन) कर रहा हो, उसके लिए स्त्री-भाव क्या करेगा? ‘‘ยสฺส นูน สิยา เอวํ, อิตฺถาหํ ปุริโสติ วา; กิญฺจิ วา ปน อญฺญสฺมิ, ตํ มาโร วตฺตุมรหตี’’ติ. जिसके मन में यह विचार हो कि 'मैं स्त्री हूँ' या 'मैं पुरुष हूँ' अथवा 'मैं कुछ और हूँ', मार को उसी से ऐसा कहना शोभा देता है।” อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ โสมา ภิกฺขุนี’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार यह जानकर कि 'सोमा भिक्षुणी मुझे जान गई है', दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ๓. กิสาโคตมีสุตฺตํ ३. किसागोतमी सुत्त ๑๖๔. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข กิสาโคตมี ภิกฺขุนี ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สาวตฺถึ ปิณฺฑาย ปาวิสิ. สาวตฺถิยํ ปิณฺฑาย จริตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺตา เยน อนฺธวนํ เตนุปสงฺกมิ[Pg.131], ทิวาวิหาราย. อนฺธวนํ อชฺโฌคาเหตฺวา อญฺญตรสฺมึ รุกฺขมูเล ทิวาวิหารํ นิสีทิ. อถ โข มาโร ปาปิมา กิสาโคตมิยา ภิกฺขุนิยา ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํสํ อุปฺปาเทตุกาโม สมาธิมฺหา จาเวตุกาโม เยน กิสาโคตมี ภิกฺขุนี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา กิสาโคตมึ ภิกฺขุนึ คาถาย อชฺฌภาสิ – १६४. श्रावस्ती निदान। तब किसागोतमी भिक्षुणी पूर्वाह्न समय में (चीवर) पहनकर, पात्र और चीवर लेकर श्रावस्ती में भिक्षा के लिए प्रविष्ट हुईं। श्रावस्ती में भिक्षाटन कर, भोजन के पश्चात भिक्षापात्र से निवृत्त होकर, वे दिवा-विहार के लिए जहाँ अन्धवन था, वहाँ गईं। अन्धवन में प्रवेश कर एक वृक्ष के नीचे दिवा-विहार के लिए बैठ गईं। तब पापी मार ने किसागोतमी भिक्षुणी में भय, घबराहट और रोमांच उत्पन्न करने की इच्छा से और उन्हें समाधि से विचलित करने की इच्छा से, जहाँ किसागोतमी भिक्षुणी थीं, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर किसागोतमी भिक्षुणी को गाथा में कहा — ‘‘กึ นุ ตฺวํ มตปุตฺตาว, เอกมาสิ รุทมฺมุขี; วนมชฺฌคตา เอกา, ปุริสํ นุ คเวสสี’’ติ. “तुम मृत पुत्र वाली (स्त्री) के समान रोते हुए मुख वाली होकर अकेली क्यों बैठी हो? इस वन के मध्य में अकेली आई हुई क्या तुम किसी पुरुष को खोज रही हो?” อถ โข กิสาโคตมิยา ภิกฺขุนิยา เอตทโหสิ – ‘‘โก นุ ขฺวายํ มนุสฺโส วา อมนุสฺโส วา คาถํ ภาสตี’’ติ? อถ โข กิสาโคตมิยา ภิกฺขุนิยา เอตทโหสิ – ‘‘มาโร โข อยํ ปาปิมา มม ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํสํ อุปฺปาเทตุกาโม สมาธิมฺหา จาเวตุกาโม คาถํ ภาสตี’’ติ. तब किसागोतमी भिक्षुणी को यह विचार हुआ — 'यह कौन मनुष्य या अमनुष्य गाथा कह रहा है?' तब किसागोतमी भिक्षुणी को यह विचार हुआ — 'यह पापी मार ही है जो मुझमें भय, घबराहट और रोमांच उत्पन्न करने की इच्छा से और मुझे समाधि से विचलित करने की इच्छा से गाथा कह रहा है।' อถ โข กิสาโคตมี ภิกฺขุนี ‘‘มาโร อยํ ปาปิมา’’ อิติ วิทิตฺวา มารํ ปาปิมนฺตํ คาถาหิ ปจฺจภาสิ – तब किसागोतमी भिक्षुणी ने 'यह पापी मार है' ऐसा जानकर पापी मार को गाथाओं में प्रत्युत्तर दिया — ‘‘อจฺจนฺตํ มตปุตฺตามฺหิ, ปุริสา เอตทนฺติกา; น โสจามิ น โรทามิ, น ตํ ภายามิ อาวุโส. “पुत्रों की मृत्यु का समय बीत चुका है, और पुरुषों (की खोज) का भी अंत हो चुका है। ओ पापी! मैं न शोक करती हूँ, न रोती हूँ और न ही तुमसे डरती हूँ। ‘‘สพฺพตฺถ วิหตา นนฺที, ตโมกฺขนฺโธ ปทาลิโต; เชตฺวาน มจฺจุโน เสนํ, วิหรามิ อนาสวา’’ติ. सब जगह से नन्दि (तृष्णा) नष्ट हो गई है, अविद्या का अंधकार छिन्न-भिन्न हो गया है। मृत्यु की सेना को जीतकर, मैं आस्रव-रहित होकर विहार करती हूँ।” อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ กิสาโคตมี ภิกฺขุนี’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार यह जानकर कि 'किसागोतमी भिक्षुणी मुझे जान गई है', दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ๔. วิชยาสุตฺตํ ४. विजया सुत्त ๑๖๕. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข วิชยา ภิกฺขุนี ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา…เป… อญฺญตรสฺมึ รุกฺขมูเล ทิวาวิหารํ นิสีทิ. อถ โข มาโร ปาปิมา วิชยาย ภิกฺขุนิยา ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํสํ อุปฺปาเทตุกาโม สมาธิมฺหา จาเวตุกาโม เยน วิชยา ภิกฺขุนี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา วิชยํ ภิกฺขุนึ คาถาย อชฺฌภาสิ – १६५. श्रावस्ती में निदान। तब विजया भिक्षुणी पूर्वाह्न समय में निवसन (चीवर) पहनकर... एक वृक्ष के नीचे दिन के विहार के लिए बैठीं। तब पापी मार ने विजया भिक्षुणी के मन में भय, घबराहट और रोमांच उत्पन्न करने की इच्छा से और उन्हें समाधि से च्युत करने की इच्छा से, जहाँ विजया भिक्षुणी थीं, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर विजया भिक्षुणी से गाथा में कहा— ‘‘ทหรา [Pg.132] ตฺวํ รูปวตี, อหญฺจ ทหโร สุสุ; ปญฺจงฺคิเกน ตุริเยน, เอหยฺเยภิรมามเส’’ติ. "तुम युवा हो और रूपवती हो, और मैं भी युवा और तरुण हूँ; आओ आर्य, हम पाँच प्रकार के वाद्यों के साथ रमण करें।" อถ โข วิชยาย ภิกฺขุนิยา เอตทโหสิ – ‘‘โก นุ ขฺวายํ มนุสฺโส วา อมนุสฺโส วา คาถํ ภาสตี’’ติ? อถ โข วิชยาย ภิกฺขุนิยา เอตทโหสิ – ‘‘มาโร โข อยํ ปาปิมา มม ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํสํ อุปฺปาเทตุกาโม สมาธิมฺหา จาเวตุกาโม คาถํ ภาสตี’’ติ. อถ โข วิชยา ภิกฺขุนี ‘‘มาโร อยํ ปาปิมา’’ อิติ วิทิตฺวา มารํ ปาปิมนฺตํ คาถาหิ ปจฺจภาสิ – तब विजया भिक्षुणी को यह विचार हुआ— "यह कौन है, मनुष्य या अमनुष्य, जो गाथा कह रहा है?" तब विजया भिक्षुणी को यह विचार हुआ— "यह पापी मार है जो मेरे मन में भय, घबराहट और रोमांच उत्पन्न करने की इच्छा से और मुझे समाधि से च्युत करने की इच्छा से गाथा कह रहा है।" तब विजया भिक्षुणी ने "यह पापी मार है" ऐसा जानकर पापी मार को गाथाओं में उत्तर दिया— ‘‘รูปา สทฺทา รสา คนฺธา, โผฏฺฐพฺพา จ มโนรมา; นิยฺยาตยามิ ตุยฺเหว, มาร นาหํ เตนตฺถิกา. "रूप, शब्द, रस, गंध और मनभावन स्पर्श; हे मार! ये सब मैं तुम्हें ही सौंपती हूँ, मुझे इनकी कोई आवश्यकता नहीं है।" ‘‘อิมินา ปูติกาเยน, ภินฺทเนน ปภงฺคุนา; อฏฺฏียามิ หรายามิ, กามตณฺหา สมูหตา. "इस सड़ने वाले शरीर से, जो टूटने वाला और नष्ट होने वाला है; मैं उद्विग्न हूँ और लज्जित हूँ, काम-तृष्णा समूल नष्ट कर दी गई है।" ‘‘เย จ รูปูปคา สตฺตา, เย จ อรูปฏฺฐายิโน ; ยา จ สนฺตา สมาปตฺติ, สพฺพตฺถ วิหโต ตโม’’ติ. "जो रूप-लोक में जाने वाले प्राणी हैं, और जो अरूप-लोक में स्थित हैं; और जो शांत समापत्तियाँ हैं, उन सबमें (अविद्या का) अंधकार नष्ट हो गया है।" อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ วิชยา ภิกฺขุนี’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार "विजया भिक्षुणी मुझे जानती है" ऐसा सोचकर दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ๕. อุปฺปลวณฺณาสุตฺตํ ५. उत्पलवर्णा सुत्त ๑๖๖. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข อุปฺปลวณฺณา ภิกฺขุนี ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา…เป… อญฺญตรสฺมึ สุปุปฺผิตสาลรุกฺขมูเล อฏฺฐาสิ. อถ โข มาโร ปาปิมา อุปฺปลวณฺณาย ภิกฺขุนิยา ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํสํ อุปฺปาเทตุกาโม สมาธิมฺหา จาเวตุกาโม เยน อุปฺปลวณฺณา ภิกฺขุนี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อุปฺปลวณฺณํ ภิกฺขุนึ คาถาย อชฺฌภาสิ – १६६. श्रावस्ती में निदान। तब उत्पलवर्णा भिक्षुणी पूर्वाह्न समय में निवसन पहनकर... एक भली-भाँति खिले हुए साल वृक्ष के नीचे खड़ी हुईं। तब पापी मार ने उत्पलवर्णा भिक्षुणी के मन में भय, घबराहट और रोमांच उत्पन्न करने की इच्छा से और उन्हें समाधि से च्युत करने की इच्छा से, जहाँ उत्पलवर्णा भिक्षुणी थीं, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर उत्पलवर्णा भिक्षुणी से गाथा में कहा— ‘‘สุปุปฺผิตคฺคํ อุปคมฺม ภิกฺขุนิ,เอกา ตุวํ ติฏฺฐสิ สาลมูเล; น จตฺถิ เต ทุติยา วณฺณธาตุ,พาเล น ตฺวํ ภายสิ ธุตฺตกาน’’นฺติ. "भिक्षुणी! तुम इस भली-भाँति खिले हुए साल वृक्ष के नीचे अकेली खड़ी हो; तुम्हारे समान रूप वाली कोई दूसरी साथी नहीं है। हे भोली लड़की! क्या तुम्हें धूर्तों से डर नहीं लगता?" อถ [Pg.133] โข อุปฺปลวณฺณาย ภิกฺขุนิยา เอตทโหสิ – ‘‘โก นุ ขฺวายํ มนุสฺโส วา อมนุสฺโส วา คาถํ ภาสตี’’ติ? อถ โข อุปฺปลวณฺณาย ภิกฺขุนิยา เอตทโหสิ – ‘‘มาโร โข อยํ ปาปิมา มม ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํสํ อุปฺปาเทตุกาโม สมาธิมฺหา จาเวตุกาโม คาถํ ภาสตี’’ติ. อถ โข อุปฺปลวณฺณา ภิกฺขุนี ‘‘มาโร อยํ ปาปิมา’’ อิติ วิทิตฺวา มารํ ปาปิมนฺตํ คาถาหิ ปจฺจภาสิ – तब उत्पलवर्णा भिक्षुणी को यह विचार हुआ— "यह कौन है, मनुष्य या अमनुष्य, जो गाथा कह रहा है?" तब उत्पलवर्णा भिक्षुणी को यह विचार हुआ— "यह पापी मार है जो मेरे मन में भय, घबराहट और रोमांच उत्पन्न करने की इच्छा से और मुझे समाधि से च्युत करने की इच्छा से गाथा कह रहा है।" तब उत्पलवर्णा भिक्षुणी ने "यह पापी मार है" ऐसा जानकर पापी मार को गाथाओं में उत्तर दिया— ‘‘สตํ สหสฺสานิปิ ธุตฺตกานํ,อิธาคตา ตาทิสกา ภเวยฺยุํ; โลมํ น อิญฺชามิ น สนฺตสามิ,น มาร ภายามิ ตเมกิกาปิ. "यदि तुम्हारे जैसे सैकड़ों-हजारों धूर्त भी यहाँ आ जाएँ; तो भी मेरा एक रोम तक नहीं हिलेगा, न मैं घबराऊँगी। हे मार! मैं अकेली होकर भी तुमसे नहीं डरती।" ‘‘เอสา อนฺตรธายามิ, กุจฺฉึ วา ปวิสามิ เต; ปขุมนฺตริกายมฺปิ, ติฏฺฐนฺตึ มํ น ทกฺขสิ. "मैं अंतर्धान हो सकती हूँ, या तुम्हारे पेट में प्रवेश कर सकती हूँ; तुम्हारी भौंहों के बीच खड़ी होने पर भी तुम मुझे नहीं देख पाओगे।" ‘‘จิตฺตสฺมึ วสีภูตามฺหิ, อิทฺธิปาทา สุภาวิตา; สพฺพพนฺธนมุตฺตามฺหิ, น ตํ ภายามิ อาวุโส’’ติ. "मैं अपने चित्त पर वश रखने वाली हूँ, ऋद्धिपाद भली-भाँति भावित हैं; मैं सभी बंधनों से मुक्त हूँ, हे मित्र! मैं तुमसे नहीं डरती।" อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ อุปฺปลวณฺณา ภิกฺขุนี’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार "उत्पलवर्णा भिक्षुणी मुझे जानती है" ऐसा सोचकर दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ๖. จาลาสุตฺตํ ६. चाला सुत्त ๑๖๗. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข จาลา ภิกฺขุนี ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา…เป… อญฺญตรสฺมึ รุกฺขมูเล ทิวาวิหารํ นิสีทิ. อถ โข มาโร ปาปิมา เยน จาลา ภิกฺขุนี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา จาลํ ภิกฺขุนึ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ ตฺวํ, ภิกฺขุนิ, น โรเจสี’’ติ? ‘‘ชาตึ ขฺวาหํ, อาวุโส, น โรเจมี’’ติ. १६७. श्रावस्ती में निदान। तब चाला भिक्षुणी पूर्वाह्न समय में निवसन पहनकर... एक वृक्ष के नीचे दिन के विहार के लिए बैठीं। तब पापी मार जहाँ चाला भिक्षुणी थीं, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर चाला भिक्षुणी से यह कहा— "भिक्षुणी, तुम क्या पसंद नहीं करती हो?" "हे मित्र, मैं जन्म को पसंद नहीं करती हूँ।" ‘‘กึ นุ ชาตึ น โรเจสิ, ชาโต กามานิ ภุญฺชติ; โก นุ ตํ อิทมาทปยิ, ชาตึ มา โรจ ภิกฺขุนี’’ติ. "तुम जन्म को क्यों पसंद नहीं करती हो? जन्म लेने वाला काम-भोगों का आनंद लेता है। तुम्हें यह किसने सिखाया? भिक्षुणी, जन्म को नापसंद मत करो।" ‘‘ชาตสฺส มรณํ โหติ, ชาโต ทุกฺขานิ ผุสฺสติ ; พนฺธํ วธํ ปริกฺเลสํ, ตสฺมา ชาตึ น โรจเย. "जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु होती है, जन्म लेने वाला दुखों को भोगता है; बंधन, वध और क्लेश, इसलिए मैं जन्म को पसंद नहीं करती।" ‘‘พุทฺโธ [Pg.134] ธมฺมมเทเสสิ, ชาติยา สมติกฺกมํ; สพฺพทุกฺขปฺปหานาย, โส มํ สจฺเจ นิเวสยิ. "बुद्ध ने जन्म के अतिक्रमण के लिए धर्म का उपदेश दिया है; सभी दुखों के प्रहाण के लिए उन्होंने मुझे सत्य में प्रतिष्ठित किया है।" ‘‘เย จ รูปูปคา สตฺตา, เย จ อรูปฏฺฐายิโน; นิโรธํ อปฺปชานนฺตา, อาคนฺตาโร ปุนพฺภว’’นฺติ. "जो रूप-लोक में जाने वाले प्राणी हैं, और जो अरूप-लोक में स्थित हैं; निरोध को न जानते हुए, वे पुनः जन्म को प्राप्त होते हैं।" อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ จาลา ภิกฺขุนี’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार "चाला भिक्षुणी मुझे जानती है" ऐसा सोचकर दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ๗. อุปจาลาสุตฺตํ ७. उपचाला सुत्त ๑๖๘. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข อุปจาลา ภิกฺขุนี ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา…เป… อญฺญตรสฺมึ รุกฺขมูเล ทิวาวิหารํ นิสีทิ. อถ โข มาโร ปาปิมา เยน อุปจาลา ภิกฺขุนี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อุปจาลํ ภิกฺขุนึ เอตทโวจ – ‘‘กตฺถ นุ ตฺวํ, ภิกฺขุนิ, อุปฺปชฺชิตุกามา’’ติ? ‘‘น ขฺวาหํ, อาวุโส, กตฺถจิ อุปฺปชฺชิตุกามา’’ติ. १६८. श्रावस्ती में निदान। तब उपचाला भिक्षुणी पूर्वाह्न समय में निवसन पहनकर... एक वृक्ष के नीचे दिन के विहार के लिए बैठीं। तब पापी मार जहाँ उपचाला भिक्षुणी थीं, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर उपचाला भिक्षुणी से यह कहा— "भिक्षुणी, तुम कहाँ उत्पन्न होना चाहती हो?" "हे मित्र, मैं कहीं भी उत्पन्न होना नहीं चाहती हूँ।" ‘‘ตาวตึสา จ ยามา จ, ตุสิตา จาปิ เทวตา; นิมฺมานรติโน เทวา, เย เทวา วสวตฺติโน; ตตฺถ จิตฺตํ ปณิเธหิ, รตึ ปจฺจนุโภสฺสสี’’ติ. "तावतींस, याम और तुषित देवता; निम्माणरती और वसवर्ती देवता; वहाँ अपना चित्त लगाओ, तुम वहाँ सुख का अनुभव करोगी।" ‘‘ตาวตึสา จ ยามา จ, ตุสิตา จาปิ เทวตา; นิมฺมานรติโน เทวา, เย เทวา วสวตฺติโน; กามพนฺธนพทฺธา เต, เอนฺติ มารวสํ ปุน. "तावतींस, याम और तुषित देवता; निम्माणरती और वसवर्ती देवता; वे काम-बंधनों में बँधे हुए पुनः मार के वश में आ जाते हैं।" ‘‘สพฺโพ อาทีปิโต โลโก, สพฺโพ โลโก ปธูปิโต; สพฺโพ ปชฺชลิโต โลโก, สพฺโพ โลโก ปกมฺปิโต. "सारा संसार प्रज्वलित है, सारा संसार धुआँ छोड़ रहा है; सारा संसार जल रहा है, सारा संसार काँप रहा है।" ‘‘อกมฺปิตํ อปชฺชลิตํ, อปุถุชฺชนเสวิตํ; อคติ ยตฺถ มารสฺส, ตตฺถ เม นิรโต มโน’’ติ. "जहाँ न कंपन है, न जलन है, जो आर्यों द्वारा सेवित है; जहाँ मार की पहुँच नहीं है, वहाँ मेरा मन रमता है।" อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ อุปจาลา ภิกฺขุนี’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार यह सोचकर कि "उपचाला भिक्षुणी मुझे जानती है," दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ๘. สีสุปจาลาสุตฺตํ ८. सीसुपचाला सुत्त ๑๖๙. สาวตฺถินิทานํ[Pg.135]. อถ โข สีสุปจาลา ภิกฺขุนี ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา …เป… อญฺญตรสฺมึ รุกฺขมูเล ทิวาวิหารํ นิสีทิ. อถ โข มาโร ปาปิมา เยน สีสุปจาลา ภิกฺขุนี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา สีสุปจาลํ ภิกฺขุนึ เอตทโวจ – ‘‘กสฺส นุ ตฺวํ, ภิกฺขุนิ, ปาสณฺฑํ โรเจสี’’ติ? ‘‘น ขฺวาหํ, อาวุโส, กสฺสจิ ปาสณฺฑํ โรเจมี’’ติ. १६९. श्रावस्ती निदान। तब सीसुपचाला भिक्षुणी पूर्वाह्न समय में निवसन (चीवर) पहनकर... एक वृक्ष के नीचे दिन के विहार (विश्राम) के लिए बैठ गई। तब पापी मार जहाँ सीसुपचाला भिक्षुणी थी, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर उसने सीसुपचाला भिक्षुणी से यह कहा— "भिक्षुणी, तुम किसके पाषण्ड (मत/सिद्धांत) को पसंद करती हो?" "आयुष्मान् मार, मैं किसी के भी पाषण्ड को पसंद नहीं करती।" ‘‘กํ นุ อุทฺทิสฺส มุณฺฑาสิ, สมณี วิย ทิสฺสสิ; น จ โรเจสิ ปาสณฺฑํ, กิมิว จรสิ โมมูหา’’ติ. "तुमने किसके उद्देश्य से मुंडन कराया है? तुम एक श्रमणी की तरह दिखती हो; फिर भी तुम किसी पाषण्ड को पसंद नहीं करती, तो तुम एक अत्यंत मूढ़ व्यक्ति की तरह क्यों विचरण करती हो?" ‘‘อิโต พหิทฺธา ปาสณฺฑา, ทิฏฺฐีสุ ปสีทนฺติ เต; น เตสํ ธมฺมํ โรเจมิ, เต ธมฺมสฺส อโกวิทา. "इस (शासन) के बाहर ही पाषण्ड हैं, वे अपनी दृष्टियों में ही आसक्त रहते हैं; मैं उनके धर्म को पसंद नहीं करती, वे धर्म में कुशल नहीं हैं। ‘‘อตฺถิ สกฺยกุเล ชาโต, พุทฺโธ อปฺปฏิปุคฺคโล; สพฺพาภิภู มารนุโท, สพฺพตฺถมปราชิโต. "शाक्य कुल में उत्पन्न एक बुद्ध हैं, जो अद्वितीय हैं; सब पर विजय प्राप्त करने वाले, मार को भगाने वाले, सर्वत्र अपराजित। ‘‘สพฺพตฺถ มุตฺโต อสิโต, สพฺพํ ปสฺสติ จกฺขุมา; สพฺพกมฺมกฺขยํ ปตฺโต, วิมุตฺโต อุปธิสงฺขเย; โส มยฺหํ ภควา สตฺถา, ตสฺส โรเจมิ สาสน’’นฺติ. "वे सर्वत्र मुक्त और अनाश्रित हैं, वे चक्षुष्मान् सब कुछ देखते हैं; उन्होंने समस्त कर्मों के क्षय को प्राप्त कर लिया है, वे उपधि-क्षय (निर्वाण) में विमुक्त हैं; वे भगवान् मेरे शास्ता (गुरु) हैं, मैं उनके शासन को पसंद करती हूँ।" อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ สีสุปจาลา ภิกฺขุนี’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार यह सोचकर कि "सीसुपचाला भिक्षुणी मुझे जानती है," दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ๙. เสลาสุตฺตํ ९. सेला सुत्त ๑๗๐. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข เสลา ภิกฺขุนี ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา…เป… อญฺญตรสฺมึ รุกฺขมูเล ทิวาวิหารํ นิสีทิ. อถ โข มาโร ปาปิมา เสลาย ภิกฺขุนิยา ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํสํ อุปฺปาเทตุกาโม…เป… เสลํ ภิกฺขุนึ คาถาย อชฺฌภาสิ – १७०. श्रावस्ती निदान। तब सेला भिक्षुणी पूर्वाह्न समय में निवसन पहनकर... एक वृक्ष के नीचे दिन के विहार के लिए बैठ गई। तब पापी मार सेला भिक्षुणी के मन में भय, घबराहट और रोमांच उत्पन्न करने की इच्छा से... सेला भिक्षुणी से गाथा में बोला— ‘‘เกนิทํ ปกตํ พิมฺพํ, กฺวนุ พิมฺพสฺส การโก; กฺวนุ พิมฺพํ สมุปฺปนฺนํ, กฺวนุ พิมฺพํ นิรุชฺฌตี’’ติ. "यह बिम्ब (शरीर) किसने बनाया है? बिम्ब का कर्ता कहाँ है? बिम्ब कहाँ से उत्पन्न हुआ है? बिम्ब कहाँ निरुद्ध होता है?" อถ โข เสลาย ภิกฺขุนิยา เอตทโหสิ – ‘‘โก นุ ขฺวายํ มนุสฺโส วา อมนุสฺโส วา คาถํ ภาสตี’’ติ? อถ โข เสลาย ภิกฺขุนิยา [Pg.136] เอตทโหสิ – ‘‘มาโร โข อยํ ปาปิมา มม ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํสํ อุปฺปาเทตุกาโม สมาธิมฺหา จาเวตุกาโม คาถํ ภาสตี’’ติ. อถ โข เสลา ภิกฺขุนี ‘‘มาโร อยํ ปาปิมา’’ อิติ วิทิตฺวา มารํ ปาปิมนฺตํ คาถาหิ ปจฺจภาสิ – तब सेला भिक्षुणी को यह विचार आया— "यह कौन मनुष्य या अमनुष्य है जो गाथा बोल रहा है?" फिर उसे यह विचार आया— "यह पापी मार ही है जो मेरे मन में भय, घबराहट और रोमांच उत्पन्न करने की इच्छा से और मुझे समाधि से विचलित करने की इच्छा से गाथा बोल रहा है।" तब सेला भिक्षुणी ने "यह पापी मार है" ऐसा जानकर, पापी मार को गाथाओं में उत्तर दिया— ‘‘นยิทํ อตฺตกตํ พิมฺพํ, นยิทํ ปรกตํ อฆํ; เหตุํ ปฏิจฺจ สมฺภูตํ, เหตุภงฺคา นิรุชฺฌติ. "यह बिम्ब (शरीर) स्वयं के द्वारा कृत नहीं है, न ही यह दुःख (अघ) दूसरे के द्वारा कृत है; यह हेतु (कारण) के आश्रित होकर उत्पन्न हुआ है, और हेतु के भंग होने पर निरुद्ध हो जाता है। ‘‘ยถา อญฺญตรํ พีชํ, เขตฺเต วุตฺตํ วิรูหติ; ปถวีรสญฺจาคมฺม, สิเนหญฺจ ตทูภยํ. "जैसे कोई बीज खेत में बोया जाने पर अंकुरित होता है; पृथ्वी के रस और स्नेह (नमी) दोनों के आश्रय से। ‘‘เอวํ ขนฺธา จ ธาตุโย, ฉ จ อายตนา อิเม; เหตุํ ปฏิจฺจ สมฺภูตา, เหตุภงฺคา นิรุชฺฌเร’’ติ. "इसी प्रकार ये स्कंध, धातुएँ और ये छह आयतन; हेतु के आश्रित होकर उत्पन्न हुए हैं, और हेतु के भंग होने पर निरुद्ध हो जाते हैं।" อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ เสลา ภิกฺขุนี’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार यह सोचकर कि "सेला भिक्षुणी मुझे जानती है," दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ๑๐. วชิราสุตฺตํ १०. वजिरा सुत्त ๑๗๑. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข วชิรา ภิกฺขุนี ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สาวตฺถึ ปิณฺฑาย ปาวิสิ. สาวตฺถิยํ ปิณฺฑาย จริตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺตา เยน อนฺธวนํ เตนุปสงฺกมิ ทิวาวิหาราย. อนฺธวนํ อชฺโฌคาเหตฺวา อญฺญตรสฺมึ รุกฺขมูเล ทิวาวิหารํ นิสีทิ. อถ โข มาโร ปาปิมา วชิราย ภิกฺขุนิยา ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํสํ อุปฺปาเทตุกาโม สมาธิมฺหา จาเวตุกาโม เยน วชิรา ภิกฺขุนี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา วชิรํ ภิกฺขุนึ คาถาย อชฺฌภาสิ – १७१. श्रावस्ती निदान। तब वजिरा भिक्षुणी पूर्वाह्न समय में निवसन पहनकर, पात्र और चीवर लेकर श्रावस्ती में भिक्षा के लिए प्रविष्ट हुई। श्रावस्ती में भिक्षाटन करके, भोजन के पश्चात भिक्षाटन से लौटकर, वह दिन के विहार के लिए जहाँ अंधवन था, वहाँ गई। अंधवन में प्रवेश कर वह एक वृक्ष के नीचे दिन के विहार के लिए बैठ गई। तब पापी मार वजिरा भिक्षुणी के मन में भय, घबराहट और रोमांच उत्पन्न करने की इच्छा से और उसे समाधि से विचलित करने की इच्छा से जहाँ वजिरा भिक्षुणी थी, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर उसने वजिरा भिक्षुणी से गाथा में कहा— ‘‘เกนายํ ปกโต สตฺโต, กุวํ สตฺตสฺส การโก; กุวํ สตฺโต สมุปฺปนฺโน, กุวํ สตฺโต นิรุชฺฌตี’’ติ. "यह 'सत्त्व' (प्राणी) किसने बनाया है? सत्त्व का कर्ता कहाँ है? सत्त्व कहाँ से उत्पन्न हुआ है? सत्त्व कहाँ निरुद्ध होता है?" อถ โข วชิราย ภิกฺขุนิยา เอตทโหสิ – ‘‘โก นุ ขฺวายํ มนุสฺโส วา อมนุสฺโส วา คาถํ ภาสตี’’ติ? อถ โข วชิราย ภิกฺขุนิยา เอตทโหสิ – ‘‘มาโร โข อยํ ปาปิมา มม ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํสํ อุปฺปาเทตุกาโม สมาธิมฺหา จาเวตุกาโม คาถํ ภาสตี’’ติ. อถ โข [Pg.137] วชิรา ภิกฺขุนี ‘‘มาโร อยํ ปาปิมา’’ อิติ วิทิตฺวา, มารํ ปาปิมนฺตํ คาถาหิ ปจฺจภาสิ – तब वजिरा भिक्षुणी को यह विचार आया— "यह कौन मनुष्य या अमनुष्य है जो गाथा बोल रहा है?" फिर उसे यह विचार आया— "यह पापी मार ही है जो मेरे मन में भय, घबराहट और रोमांच उत्पन्न करने की इच्छा से और मुझे समाधि से विचलित करने की इच्छा से गाथा बोल रहा है।" तब वजिरा भिक्षुणी ने "यह पापी मार है" ऐसा जानकर, पापी मार को गाथाओं में उत्तर दिया— ‘‘กึ นุ สตฺโตติ ปจฺเจสิ, มาร ทิฏฺฐิคตํ นุ เต; สุทฺธสงฺขารปุญฺโชยํ, นยิธ สตฺตุปลพฺภติ. "मार, तुम 'सत्त्व' (प्राणी) ऐसा क्यों मानते हो? क्या यह तुम्हारी मिथ्या दृष्टि है? यह केवल शुद्ध संस्कारों का पुंज है, यहाँ कोई 'सत्त्व' उपलब्ध नहीं होता। ‘‘ยถา หิ องฺคสมฺภารา, โหติ สทฺโท รโถ อิติ; เอวํ ขนฺเธสุ สนฺเตสุ, โหติ สตฺโตติ สมฺมุติ. "जैसे अंगों के समूह के कारण 'रथ' यह संज्ञा होती है; वैसे ही स्कंधों के होने पर 'सत्त्व' यह सम्मति (लोक-व्यवहार की संज्ञा) होती है। ‘‘ทุกฺขเมว หิ สมฺโภติ, ทุกฺขํ ติฏฺฐติ เวติ จ; นาญฺญตฺร ทุกฺขา สมฺโภติ, นาญฺญํ ทุกฺขา นิรุชฺฌตี’’ติ. "केवल दुःख ही उत्पन्न होता है, दुःख ही ठहरता है और व्यय होता है; दुःख के अतिरिक्त कुछ उत्पन्न नहीं होता, दुःख के अतिरिक्त कुछ निरुद्ध नहीं होता।" อถ โข มาโร ปาปิมา ‘‘ชานาติ มํ วชิรา ภิกฺขุนี’’ติ ทุกฺขี ทุมฺมโน ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब पापी मार यह सोचकर कि "वजिरा भिक्षुणी मुझे जानती है," दुखी और उदास होकर वहीं अंतर्धान हो गया। ภิกฺขุนีสํยุตฺตํ สมตฺตํ. भिक्षुणी संयुत्त समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – इसका उदान (विषय-सूची)— อาฬวิกา จ โสมา จ, โคตมี วิชยา สห; อุปฺปลวณฺณา จ จาลา, อุปจาลา สีสุปจาลา จ; เสลา วชิราย เต ทสาติ. आलविका, सोमा, गोतमी, विजया, उप्पलवण्णा, चाला, उपचाला, सीसुपचाला, सेला और वजिरा—ये दस (सुत्त) हैं। ๖. พฺรหฺมสํยุตฺตํ ६. ब्रह्म संयुत्त ๑. ปฐมวคฺโค १. प्रथम वर्ग ๑. พฺรหฺมายาจนสุตฺตํ १. ब्रह्मायाचन सुत्त ๑๗๒. เอวํ [Pg.138] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา อุรุเวลายํ วิหรติ นชฺชา เนรญฺชราย ตีเร อชปาลนิคฺโรธมูเล ปฐมาภิสมฺพุทฺโธ. อถ โข ภควโต รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘‘อธิคโต โข มฺยายํ ธมฺโม คมฺภีโร ทุทฺทโส ทุรนุโพโธ สนฺโต ปณีโต อตกฺกาวจโร นิปุโณ ปณฺฑิตเวทนีโย. อาลยรามา โข ปนายํ ปชา อาลยรตา อาลยสมฺมุทิตา. อาลยรามาย โข ปน ปชาย อาลยรตาย อาลยสมฺมุทิตาย ทุทฺทสํ อิทํ ฐานํ ยทิทํ อิทปฺปจฺจยตาปฏิจฺจสมุปฺปาโท. อิทมฺปิ โข ฐานํ ทุทฺทสํ ยทิทํ สพฺพสงฺขารสมโถ สพฺพูปธิปฏินิสฺสคฺโค ตณฺหากฺขโย วิราโค นิโรโธ นิพฺพานํ. อหญฺเจว โข ปน ธมฺมํ เทเสยฺยํ; ปเร จ เม น อาชาเนยฺยุํ; โส มมสฺส กิลมโถ, สา มมสฺส วิเหสา’’ติ. อปิสฺสุ ภควนฺตํ อิมา อนจฺฉริยา คาถาโย ปฏิภํสุ ปุพฺเพ อสฺสุตปุพฺพา – १७२. ऐसा मैंने सुना है - एक समय भगवान उरुवेला में निरंजना नदी के तट पर अजपाल निग्रोध (बरगद) के वृक्ष के नीचे विहार कर रहे थे, जब वे अभी-अभी बुद्धत्व प्राप्त हुए थे। तब एकांत में ध्यानमग्न भगवान के मन में ऐसा विचार उत्पन्न हुआ - 'मैंने जो यह धर्म प्राप्त किया है, वह गंभीर है, दुर्दर्श (देखने में कठिन) है, दुरनुबोध (समझने में कठिन) है, शांत है, प्रणीत (उत्कृष्ट) है, तर्क से परे है, निपुण है और केवल पंडितों द्वारा ही जानने योग्य है। किंतु यह प्रजा (जनसमूह) तो आसक्ति (आलय) में रमण करने वाली है, आसक्ति में रत है, आसक्ति में ही आनंदित है। आसक्ति में रमण करने वाली, आसक्ति में रत और आसक्ति में आनंदित रहने वाली इस प्रजा के लिए यह विषय दुर्दर्श है, जिसे 'इदप्पच्चयता-प्रतीत्यसमुत्पाद' (हेतु-प्रत्ययता पर आधारित उत्पत्ति) कहते हैं। यह विषय भी अत्यंत दुर्दर्श है, जो 'सब संस्कारों का शमन', 'सब उपाधियों का त्याग', 'तृष्णा का क्षय', 'विराग', 'निरोध' और 'निर्वाण' है। यदि मैं धर्म का उपदेश दूँ और दूसरे उसे न समझ सकें, तो वह मेरे लिए केवल थकान और कष्ट ही होगा।' इसके अतिरिक्त, भगवान के मन में ये अद्भुत गाथाएँ भी प्रकट हुईं, जो पहले कभी नहीं सुनी गई थीं— ‘‘กิจฺเฉน เม อธิคตํ, หลํ ทานิ ปกาสิตุํ; ราคโทสปเรเตหิ, นายํ ธมฺโม สุสมฺพุโธ. 'कठिनाई से मैंने इसे प्राप्त किया है, अब इसे प्रकाशित करने की क्या आवश्यकता है? राग और द्वेष से घिरे हुए लोगों के लिए यह धर्म सुगमता से समझने योग्य नहीं है। ‘‘ปฏิโสตคามึ นิปุณํ, คมฺภีรํ ทุทฺทสํ อณุํ; ราครตฺตา น ทกฺขนฺติ, ตโมขนฺเธน อาวุฏา’’ติ. संसार की धारा के विपरीत जाने वाले, निपुण, गंभीर, दुर्दर्श और सूक्ष्म (धर्म) को राग में रंगे हुए लोग नहीं देख पाएंगे, क्योंकि वे अविद्या के अंधकार से ढके हुए हैं।' อิติห ภควโต ปฏิสญฺจิกฺขโต อปฺโปสฺสุกฺกตาย จิตฺตํ นมติ, โน ธมฺมเทสนาย. इस प्रकार विचार करते हुए भगवान का चित्त अल्पोत्सुकता (उदासीनता) की ओर झुक गया, धर्मोपदेश की ओर नहीं। อถ โข พฺรหฺมุโน สหมฺปติสฺส ภควโต เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย เอตทโหสิ – ‘‘นสฺสติ วต โภ โลโก, วินสฺสติ วต โภ โลโก, ยตฺร หิ นาม ตถาคตสฺส อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อปฺโปสฺสุกฺกตาย จิตฺตํ นมติ, โน ธมฺมเทสนายา’’ติ. อถ [Pg.139] โข พฺรหฺมา สหมฺปติ – เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย, ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย เอวเมว – พฺรหฺมโลเก อนฺตรหิโต ภควโต ปุรโต ปาตุรโหสิ. อถ โข พฺรหฺมา สหมฺปติ เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา ทกฺขิณชาณุมณฺฑลํ ปถวิยํ นิหนฺตฺวา เยน ภควา เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘เทเสตุ, ภนฺเต, ภควา ธมฺมํ, เทเสตุ สุคโต ธมฺมํ. สนฺติ สตฺตา อปฺปรชกฺขชาติกา, อสฺสวนตา ธมฺมสฺส ปริหายนฺติ. ภวิสฺสนฺติ ธมฺมสฺส อญฺญาตาโร’’ติ. อิทมโวจ พฺรหฺมา สหมฺปติ, อิทํ วตฺวา อถาปรํ เอตทโวจ – तब ब्रह्मा सहम्पति ने भगवान के मन के विचार को अपने मन से जानकर सोचा— 'अरे! यह लोक नष्ट हो जाएगा, अरे! यह लोक विनष्ट हो जाएगा, क्योंकि तथागत अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध का चित्त अल्पोत्सुकता की ओर झुक रहा है, धर्मोपदेश की ओर नहीं।' तब ब्रह्मा सहम्पति—जैसे कोई बलवान पुरुष अपनी मुड़ी हुई भुजा को फैलाए या फैली हुई भुजा को सिकोड़े—वैसे ही ब्रह्मलोक से अंतर्धान होकर भगवान के सम्मुख प्रकट हुए। तब ब्रह्मा सहम्पति ने अपने उत्तरासंग (ऊपरी वस्त्र) को एक कंधे पर किया और दाहिने घुटने को पृथ्वी पर टिकाकर, जहाँ भगवान थे, उस दिशा में हाथ जोड़कर भगवान से यह कहा— 'भन्ते! भगवान धर्म का उपदेश दें, सुगत धर्म का उपदेश दें। ऐसे प्राणी हैं जिनकी आँखों में धूल (क्लेश) कम है, धर्म को न सुनने के कारण वे नष्ट हो रहे हैं। धर्म को समझने वाले लोग अवश्य होंगे।' ब्रह्मा सहम्पति ने यह कहा, और यह कहकर पुनः यह भी कहा— ‘‘ปาตุรโหสิ มคเธสุ ปุพฺเพ,ธมฺโม อสุทฺโธ สมเลหิ จินฺติโต; อปาปุเรตํ อมตสฺส ทฺวารํ,สุณนฺตุ ธมฺมํ วิมเลนานุพุทฺธํ. 'पहले मगध में अशुद्ध और मलिन (दोषपूर्ण) लोगों द्वारा कल्पित धर्म प्रचलित था। आप अमृत (निर्वाण) के द्वार को खोलें। विमल (बुद्ध) द्वारा साक्षात्कृत इस धर्म को लोग सुनें। ‘‘เสเล ยถา ปพฺพตมุทฺธนิฏฺฐิโต,ยถาปิ ปสฺเส ชนตํ สมนฺตโต; ตถูปมํ ธมฺมมยํ สุเมธ,ปาสาทมารุยฺห สมนฺตจกฺขุ; โสกาวติณฺณํ ชนตมเปตโสโก,อเวกฺขสฺสุ ชาติชราภิภูตํ. जैसे पर्वत के शिखर पर खड़ा व्यक्ति चारों ओर के लोगों को देखता है, वैसे ही हे सुमेध! हे सर्वद्रष्टा! आप इस धर्ममयी प्रासाद (महल) पर चढ़कर, स्वयं शोक-रहित होकर, शोक में डूबे हुए और जन्म-जरा से अभिभूत जनसमूह को देखें। ‘‘อุฏฺเฐหิ วีร วิชิตสงฺคาม,สตฺถวาห อนณ วิจร โลเก; เทสสฺสุ ภควา ธมฺมํ,อญฺญาตาโร ภวิสฺสนฺตี’’ติ. उठिए हे वीर! संग्राम-विजेता! हे सार्थवाह! हे ऋण-मुक्त! लोक में विचरण करें। भगवान धर्म का उपदेश दें, इसे समझने वाले अवश्य होंगे।' อถ โข ภควา พฺรหฺมุโน จ อชฺเฌสนํ วิทิตฺวา สตฺเตสุ จ การุญฺญตํ ปฏิจฺจ พุทฺธจกฺขุนา โลกํ โวโลเกสิ. อทฺทสา โข ภควา พุทฺธจกฺขุนา โลกํ โวโลเกนฺโต สตฺเต อปฺปรชกฺเข มหารชกฺเข ติกฺขินฺทฺริเย มุทินฺทฺริเย สฺวากาเร ทฺวากาเร สุวิญฺญาปเย ทุวิญฺญาปเย, อปฺเปกจฺเจ ปรโลกวชฺชภยทสฺสาวิเน วิหรนฺเต, อปฺเปกจฺเจ น ปรโลกวชฺชภยทสฺสาวิเน [Pg.140] วิหรนฺเต. เสยฺยถาปิ นาม อุปฺปลินิยํ วา ปทุมินิยํ วา ปุณฺฑรีกินิยํ วา อปฺเปกจฺจานิ อุปฺปลานิ วา ปทุมานิ วา ปุณฺฑรีกานิ วา อุทเก ชาตานิ อุทเก สํวฑฺฒานิ อุทกานุคฺคตานิ อนฺโต นิมุคฺคโปสีนิ, อปฺเปกจฺจานิ อุปฺปลานิ วา ปทุมานิ วา ปุณฺฑรีกานิ วา อุทเก ชาตานิ อุทเก สํวฑฺฒานิ สโมทกํ ฐิตานิ, อปฺเปกจฺจานิ อุปฺปลานิ วา ปทุมานิ วา ปุณฺฑรีกานิ วา อุทเก ชาตานิ อุทเก สํวฑฺฒานิ อุทกา อจฺจุคฺคมฺม ฐิตานิ อนุปลิตฺตานิ อุทเกน; เอวเมว ภควา พุทฺธจกฺขุนา โลกํ โวโลเกนฺโต อทฺทส สตฺเต อปฺปรชกฺเข มหารชกฺเข ติกฺขินฺทฺริเย มุทินฺทฺริเย สฺวากาเร ทฺวากาเร สุวิญฺญาปเย ทุวิญฺญาปเย, อปฺเปกจฺเจ ปรโลกวชฺชภยทสฺสาวิเน วิหรนฺเต, อปฺเปกจฺเจ น ปรโลกวชฺชภยทสฺสาวิเน วิหรนฺเต. ทิสฺวาน พฺรหฺมานํ สหมฺปตึ คาถาย ปจฺจภาสิ – तब भगवान ने ब्रह्मा की प्रार्थना को जानकर और प्राणियों के प्रति करुणा के कारण 'बुद्ध-चक्षु' से लोक का अवलोकन किया। बुद्ध-चक्षु से लोक का अवलोकन करते हुए भगवान ने उन प्राणियों को देखा जिनकी आँखों में धूल कम थी और जिनकी आँखों में धूल अधिक थी, जिनकी इंद्रियाँ तीक्ष्ण थीं और जिनकी इंद्रियाँ मृदु थीं, जो उत्तम स्वभाव के थे और जो अधम स्वभाव के थे, जिन्हें समझाना सरल था और जिन्हें समझाना कठिन था, और कुछ ऐसे थे जो परलोक और पाप के भय को देखने वाले थे, और कुछ ऐसे थे जो परलोक और पाप के भय को नहीं देखने वाले थे। जैसे किसी नीले, लाल या सफेद कमलों के तालाब में कुछ कमल जल में ही उत्पन्न होते हैं, जल में ही बढ़ते हैं, जल से ऊपर नहीं निकलते और जल के भीतर ही डूबे रहकर विकसित होते हैं; कुछ कमल जल में उत्पन्न होते हैं, जल में बढ़ते हैं और जल की सतह के बराबर रहते हैं; और कुछ कमल जल में उत्पन्न होते हैं, जल में बढ़ते हैं और जल से ऊपर निकलकर खड़े रहते हैं और जल से लिप्त नहीं होते। इसी प्रकार, भगवान ने बुद्ध-चक्षु से लोक का अवलोकन करते हुए उन प्राणियों को देखा जिनकी आँखों में धूल कम थी और जिनकी आँखों में धूल अधिक थी, जिनकी इंद्रियाँ तीक्ष्ण थीं और जिनकी इंद्रियाँ मृदु थीं, जो उत्तम स्वभाव के थे और जो अधम स्वभाव के थे, जिन्हें समझाना सरल था और जिन्हें समझाना कठिन था, और कुछ ऐसे थे जो परलोक और पाप के भय को देखने वाले थे। यह देखकर उन्होंने ब्रह्मा सहम्पति को गाथा में उत्तर दिया— ‘‘อปารุตา เตสํ อมตสฺส ทฺวารา,เย โสตวนฺโต ปมุญฺจนฺตุ สทฺธํ; วิหึสสญฺญี ปคุณํ น ภาสึ,ธมฺมํ ปณีตํ มนุเชสุ พฺรหฺเม’’ติ. 'उनके लिए अमृत के द्वार खुल गए हैं। जो सुनने वाले हैं, वे अपनी श्रद्धा प्रकट करें। हे ब्रह्मा! मैंने कष्ट की आशंका से मनुष्यों के बीच इस प्रणीत और निपुण धर्म का उपदेश नहीं दिया था।' อถ โข พฺรหฺมา สหมฺปติ ‘‘กตาวกาโส โขมฺหิ ภควตา ธมฺมเทสนายา’’ติ ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब ब्रह्मा सहम्पति ने यह सोचकर कि 'भगवान ने धर्मोपदेश के लिए अनुमति दे दी है', भगवान का अभिवादन किया और उनकी प्रदक्षिणा करके वहीं अंतर्धान हो गए। ๒. คารวสุตฺตํ २. गारव सुत्त ๑๗๓. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา อุรุเวลายํ วิหรติ นชฺชา เนรญฺชราย ตีเร อชปาลนิคฺโรธมูเล ปฐมาภิสมฺพุทฺโธ. อถ โข ภควโต รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘‘ทุกฺขํ โข อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส, กํ นุ ขฺวาหํ สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา สกฺกตฺวา ครุํ กตฺวา อุปนิสฺสาย วิหเรยฺย’’นฺติ? १७३. ऐसा मैंने सुना है - एक समय भगवान उरुवेला में निरंजना नदी के तट पर अजपाल निग्रोध के वृक्ष के नीचे विहार कर रहे थे, जब वे अभी-अभी बुद्धत्व प्राप्त हुए थे। तब एकांत में ध्यानमग्न भगवान के मन में ऐसा विचार उत्पन्न हुआ - 'बिना आदर और बिना गौरव के रहना दुखद है। मैं किस श्रमण या ब्राह्मण का सत्कार, सम्मान और आश्रय लेकर विहार करूँ?' อถ [Pg.141] โข ภควโต เอตทโหสิ – ‘‘อปริปุณฺณสฺส โข สีลกฺขนฺธสฺส ปาริปูริยา อญฺญํ สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา สกฺกตฺวา ครุํ กตฺวา อุปนิสฺสาย วิหเรยฺยํ. น โข ปนาหํ ปสฺสามิ สเทวเก โลเก สมารเก สพฺรหฺมเก สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย อตฺตนา สีลสมฺปนฺนตรํ อญฺญํ สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา, ยมหํ สกฺกตฺวา ครุํ กตฺวา อุปนิสฺสาย วิหเรยฺยํ. तब भगवान के मन में यह विचार आया - "अपूर्ण शील-स्कंध की परिपूर्णता के लिए मुझे किसी अन्य श्रमण या ब्राह्मण का सत्कार कर, गौरव कर, और उनके आश्रय में रहना चाहिए। किंतु मैं देवों, मारों और ब्रह्माओं सहित इस लोक में, श्रमणों, ब्राह्मणों, देवों और मनुष्यों सहित इस प्रजा में, अपने से अधिक शील-संपन्न किसी अन्य श्रमण या ब्राह्मण को नहीं देखता हूँ, जिसका मैं सत्कार कर, गौरव कर और आश्रय लेकर रह सकूँ।" ‘‘อปริปุณฺณสฺส โข สมาธิกฺขนฺธสฺส ปาริปูริยา อญฺญํ สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา สกฺกตฺวา ครุํ กตฺวา อุปนิสฺสาย วิหเรยฺยํ. น โข ปนาหํ ปสฺสามิ สเทวเก โลเก…เป… อตฺตนา สมาธิสมฺปนฺนตรํ อญฺญํ สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา, ยมหํ สกฺกตฺวา ครุํ กตฺวา อุปนิสฺสาย วิหเรยฺยํ. "अपूर्ण समाधि-स्कंध की परिपूर्णता के लिए मुझे किसी अन्य श्रमण या ब्राह्मण का सत्कार कर, गौरव कर, और उनके आश्रय में रहना चाहिए। किंतु मैं देवों, मारों और ब्रह्माओं सहित इस लोक में... (पूर्ववत) ...अपने से अधिक समाधि-संपन्न किसी अन्य श्रमण या ब्राह्मण को नहीं देखता हूँ, जिसका मैं सत्कार कर, गौरव कर और आश्रय लेकर रह सकूँ।" ‘‘อปริปุณฺณสฺส ปญฺญากฺขนฺธสฺส ปาริปูริยา อญฺญํ สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา สกฺกตฺวา ครุํ กตฺวา อุปนิสฺสาย วิหเรยฺยํ. น โข ปนาหํ ปสฺสามิ สเทวเก…เป… อตฺตนา ปญฺญาสมฺปนฺนตรํ อญฺญํ สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา, ยมหํ สกฺกตฺวา ครุํ กตฺวา อุปนิสฺสาย วิหเรยฺยํ. "अपूर्ण प्रज्ञा-स्कंध की परिपूर्णता के लिए मुझे किसी अन्य श्रमण या ब्राह्मण का सत्कार कर, गौरव कर, और उनके आश्रय में रहना चाहिए। किंतु मैं देवों, मारों और ब्रह्माओं सहित इस लोक में... (पूर्ववत) ...अपने से अधिक प्रज्ञा-संपन्न किसी अन्य श्रमण या ब्राह्मण को नहीं देखता हूँ, जिसका मैं सत्कार कर, गौरव कर और आश्रय लेकर रह सकूँ।" ‘‘อปริปุณฺณสฺส โข วิมุตฺติกฺขนฺธสฺส ปาริปูริยา อญฺญํ สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา สกฺกตฺวา ครุํ กตฺวา อุปนิสฺสาย วิหเรยฺยํ. น โข ปนาหํ ปสฺสามิ สเทวเก…เป… อตฺตนา วิมุตฺติสมฺปนฺนตรํ อญฺญํ สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา, ยมหํ สกฺกตฺวา ครุํ กตฺวา อุปนิสฺสาย วิหเรยฺยํ. "अपूर्ण विमुक्ति-स्कंध की परिपूर्णता के लिए मुझे किसी अन्य श्रमण या ब्राह्मण का सत्कार कर, गौरव कर, और उनके आश्रय में रहना चाहिए। किंतु मैं देवों, मारों और ब्रह्माओं सहित इस लोक में... (पूर्ववत) ...अपने से अधिक विमुक्ति-संपन्न किसी अन्य श्रमण या ब्राह्मण को नहीं देखता हूँ, जिसका मैं सत्कार कर, गौरव कर और आश्रय लेकर रह सकूँ।" ‘‘อปริปุณฺณสฺส โข วิมุตฺติญาณทสฺสนกฺขนฺธสฺส ปาริปูริยา อญฺญํ สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา สกฺกตฺวา ครุํ กตฺวา อุปนิสฺสาย วิหเรยฺยํ. น โข ปนาหํ ปสฺสามิ สเทวเก โลเก สมารเก สพฺรหฺมเก สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย อตฺตนา วิมุตฺติญาณทสฺสนสมฺปนฺนตรํ อญฺญํ สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา, ยมหํ สกฺกตฺวา ครุํ กตฺวา อุปนิสฺสาย วิหเรยฺยํ. ยํนูนาหํ ยฺวายํ ธมฺโม มยา อภิสมฺพุทฺโธ ตเมว ธมฺมํ สกฺกตฺวา ครุํ กตฺวา อุปนิสฺสาย วิหเรยฺย’’นฺติ. "अपूर्ण विमुक्ति-ज्ञानदर्शन-स्कंध की परिपूर्णता के लिए मुझे किसी अन्य श्रमण या ब्राह्मण का सत्कार कर, गौरव कर, और उनके आश्रय में रहना चाहिए। किंतु मैं देवों, मारों और ब्रह्माओं सहित इस लोक में, श्रमणों, ब्राह्मणों, देवों और मनुष्यों सहित इस प्रजा में, अपने से अधिक विमुक्ति-ज्ञानदर्शन-संपन्न किसी अन्य श्रमण या ब्राह्मण को नहीं देखता हूँ, जिसका मैं सत्कार कर, गौरव कर और आश्रय लेकर रह सकूँ। क्यों न मैं उसी धर्म का सत्कार कर, गौरव कर और आश्रय लेकर रहूँ, जिसका मैंने साक्षात्कार (अभिसंबोध) किया है।" อถ โข พฺรหฺมา สหมฺปติ ภควโต เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย – เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย เอวเมว – พฺรหฺมโลเก อนฺตรหิโต ภควโต ปุรโต ปาตุรโหสิ. อถ โข พฺรหฺมา สหมฺปติ เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา เยน ภควา เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘เอวเมตํ, ภควา, เอวเมตํ, สุคต! เยปิ เต, ภนฺเต, อเหสุํ อตีตมทฺธานํ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา, เตปิ [Pg.142] ภควนฺโต ธมฺมญฺเญว สกฺกตฺวา ครุํ กตฺวา อุปนิสฺสาย วิหรึสุ; เยปิ เต, ภนฺเต, ภวิสฺสนฺติ อนาคตมทฺธานํ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา เตปิ ภควนฺโต ธมฺมญฺเญว สกฺกตฺวา ครุํ กตฺวา อุปนิสฺสาย วิหริสฺสนฺติ. ภควาปิ, ภนฺเต, เอตรหิ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ธมฺมญฺเญว สกฺกตฺวา ครุํ กตฺวา อุปนิสฺสาย วิหรตู’’ติ. อิทมโวจ พฺรหฺมา สหมฺปติ, อิทํ วตฺวา อถาปรํ เอตทโวจ – तब ब्रह्मा सहम्पति ने भगवान के मन के विचार को अपने मन से जानकर—जैसे कोई बलवान पुरुष अपनी मुड़ी हुई बाँह को फैला दे या फैली हुई बाँह को सिकोड़ ले, वैसे ही—ब्रह्मलोक से अंतर्धान होकर भगवान के सम्मुख प्रकट हुए। तब ब्रह्मा सहम्पति ने अपने उत्तरासंग (ऊपरी वस्त्र) को एक कंधे पर कर, जहाँ भगवान थे वहाँ हाथ जोड़कर प्रणाम किया और भगवान से यह कहा— "हे भगवन, यह ऐसा ही है! हे सुगत, यह ऐसा ही है! हे भदंत, अतीत काल में जो अर्हत् सम्यक-संबुद्ध हुए थे, उन भगवानों ने भी धर्म का ही सत्कार कर, गौरव कर और आश्रय लेकर निवास किया था। हे भदंत, अनागत काल में जो अर्हत् सम्यक-संबुद्ध होंगे, वे भगवान भी धर्म का ही सत्कार कर, गौरव कर और आश्रय लेकर निवास करेंगे। हे भदंत, वर्तमान में अर्हत् सम्यक-संबुद्ध भगवान भी धर्म का ही सत्कार कर, गौरव कर और आश्रय लेकर निवास करें।" ब्रह्मा सहम्पति ने यह कहा, और यह कहकर फिर यह भी कहा— ‘‘เย จ อตีตา สมฺพุทฺธา, เย จ พุทฺธา อนาคตา; โย เจตรหิ สมฺพุทฺโธ, พหูนํ โสกนาสโน. "जो अतीत के संबुद्ध हैं, जो अनागत के बुद्ध हैं, और जो वर्तमान के संबुद्ध हैं, जो बहुतों के शोक का नाश करने वाले हैं।" ‘‘สพฺเพ สทฺธมฺมครุโน, วิหํสุ วิหรนฺติ จ; ตถาปิ วิหริสฺสนฺติ, เอสา พุทฺธาน ธมฺมตา. "वे सभी सद्धर्म का गौरव करते हुए रहे हैं, रह रहे हैं और वैसे ही रहेंगे; यह बुद्धों की धर्मता (स्वभाव) है।" ‘‘ตสฺมา หิ อตฺตกาเมน, มหตฺตมภิกงฺขตา; สทฺธมฺโม ครุกาตพฺโพ, สรํ พุทฺธาน สาสน’’นฺติ. "इसलिए, अपना कल्याण चाहने वाले और महानता की आकांक्षा रखने वाले व्यक्ति को बुद्धों के शासन का स्मरण करते हुए सद्धर्म का गौरव करना चाहिए।" ๓. พฺรหฺมเทวสุตฺตํ ३. ब्रह्मदेव सुत्त ๑๗๔. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. เตน โข ปน สมเยน อญฺญตริสฺสา พฺราหฺมณิยา พฺรหฺมเทโว นาม ปุตฺโต ภควโต สนฺติเก อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิโต โหติ. १७४. ऐसा मैंने सुना है—एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे। उस समय किसी ब्राह्मणी का ब्रह्मदेव नाम का पुत्र भगवान के पास घर से बेघर होकर प्रव्रजित हुआ था। อถ โข อายสฺมา พฺรหฺมเทโว เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรนฺโต นจิรสฺเสว – ยสฺสตฺถาย กุลปุตฺตา สมฺมเทว อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชนฺติ, ตทนุตฺตรํ พฺรหฺมจริยปริโยสานํ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหาสิ. ‘‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’’ติ อพฺภญฺญาสิ. อญฺญตโร จ ปนายสฺมา พฺรหฺมเทโว อรหตํ อโหสิ. तब आयुष्मान ब्रह्मदेव अकेले, एकांत में, अप्रमत्त, उद्योगी और दृढ़-निश्चयी होकर विहार करते हुए शीघ्र ही—जिसके लिए कुलपुत्र भली-भाँति घर से बेघर होकर प्रव्रजित होते हैं, उस अनुत्तर ब्रह्मचर्य की पूर्णता (अर्हत्व) को इसी जन्म में स्वयं विशेष ज्ञान से जानकर, साक्षात्कार कर और प्राप्त कर विहार करने लगे। उन्होंने जान लिया— "जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है।" और आयुष्मान ब्रह्मदेव अर्हतों में से एक हुए। อถ โข อายสฺมา พฺรหฺมเทโว ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สาวตฺถึ ปิณฺฑาย ปาวิสิ. สาวตฺถิยํ สปทานํ ปิณฺฑาย จรมาโน เยน สกมาตุ นิเวสนํ เตนุปสงฺกมิ. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมโต พฺรหฺมเทวสฺส มาตา พฺราหฺมณี พฺรหฺมุโน อาหุตึ นิจฺจํ ปคฺคณฺหาติ[Pg.143]. อถ โข พฺรหฺมุโน สหมฺปติสฺส เอตทโหสิ – ‘‘อยํ โข อายสฺมโต พฺรหฺมเทวสฺส มาตา พฺราหฺมณี พฺรหฺมุโน อาหุตึ นิจฺจํ ปคฺคณฺหาติ. ยํนูนาหํ ตํ อุปสงฺกมิตฺวา สํเวเชยฺย’’นฺติ. อถ โข พฺรหฺมา สหมฺปติ – เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย, ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย เอวเมว – พฺรหฺมโลเก อนฺตรหิโต อายสฺมโต พฺรหฺมเทวสฺส มาตุ นิเวสเน ปาตุรโหสิ. อถ โข พฺรหฺมา สหมฺปติ เวหาสํ ฐิโต อายสฺมโต พฺรหฺมเทวสฺส มาตรํ พฺราหฺมณึ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब आयुष्मान ब्रह्मदेव प्रातःकाल चीवर धारण कर, पात्र और चीवर लेकर श्रावस्ती में भिक्षा के लिए प्रविष्ट हुए। श्रावस्ती में क्रमवार भिक्षाटन करते हुए वे अपनी माता के घर पहुँचे। उस समय आयुष्मान ब्रह्मदेव की माता ब्राह्मणी, ब्रह्मा को नित्य आहुति अर्पित कर रही थी। तब ब्रह्मा सहम्पति को यह विचार आया— "आयुष्मान ब्रह्मदेव की यह माता ब्राह्मणी ब्रह्मा को नित्य आहुति दे रही है। क्यों न मैं उसके पास जाकर उसे संवेग (प्रेरणा) दूँ।" तब ब्रह्मा सहम्पति—जैसे कोई बलवान पुरुष अपनी मुड़ी हुई बाँह को फैलाए या फैली हुई बाँह को सिकोड़े—वैसे ही ब्रह्मलोक से अंतर्धान होकर आयुष्मान ब्रह्मदेव की माता के घर में प्रकट हुए। तब ब्रह्मा सहम्पति आकाश में स्थित होकर आयुष्मान ब्रह्मदेव की माता ब्राह्मणी को गाथा में संबोधित करने लगे— ‘‘ทูเร อิโต พฺราหฺมณิ พฺรหฺมโลโก,ยสฺสาหุตึ ปคฺคณฺหาสิ นิจฺจํ; เนตาทิโส พฺราหฺมณิ พฺรหฺมภกฺโข,กึ ชปฺปสิ พฺรหฺมปถํ อชานํ. "हे ब्राह्मणी! यहाँ से ब्रह्मलोक बहुत दूर है, जिसके लिए तुम नित्य आहुति अर्पित करती हो। हे ब्राह्मणी! यह आहुति ब्रह्मा का भोजन नहीं है। तुम ब्रह्म-मार्ग को न जानते हुए क्यों व्यर्थ प्रार्थना कर रही हो?" ‘‘เอโส หิ เต พฺราหฺมณิ พฺรหฺมเทโว,นิรูปธิโก อติเทวปตฺโต; อกิญฺจโน ภิกฺขุ อนญฺญโปสี,โย เต โส ปิณฺฑาย ฆรํ ปวิฏฺโฐ. "हे ब्राह्मणी! यह तुम्हारा पुत्र ब्रह्मदेव ही है, जो क्लेश-मुक्त है और देवों से भी श्रेष्ठ अवस्था को प्राप्त है। वह अपरिग्रही भिक्षु है, जो किसी अन्य पर आश्रित नहीं है, और वही तुम्हारे घर में भिक्षा के लिए प्रविष्ट हुआ है।" ‘‘อาหุเนยฺโย เวทคุ ภาวิตตฺโต,นรานํ เทวานญฺจ ทกฺขิเณยฺโย; พาหิตฺวา ปาปานิ อนูปลิตฺโต,ฆาเสสนํ อิริยติ สีติภูโต. "वह दान के योग्य है, ज्ञान का ज्ञाता है और स्वयं को विकसित कर चुका है। वह मनुष्यों और देवों के लिए श्रेष्ठ दान के योग्य है। पापों को दूर कर वह निर्लिप्त हो गया है और शांत होकर भोजन की खोज में विचरण करता है।" ‘‘น ตสฺส ปจฺฉา น ปุรตฺถมตฺถิ,สนฺโต วิธูโม อนิโฆ นิราโส; นิกฺขิตฺตทณฺโฑ ตสถาวเรสุ,โส ตฺยาหุตึ ภุญฺชตุ อคฺคปิณฺฑํ. "उसके लिए न अतीत का मोह है और न भविष्य की चिंता। वह शांत है, क्रोध-रहित है, दुखरहित और तृष्णारहित है। चराचर प्राणियों के प्रति उसने दंड का त्याग कर दिया है। वह तुम्हारी श्रेष्ठ आहुति को ग्रहण करे।" ‘‘วิเสนิภูโต อุปสนฺตจิตฺโต,นาโคว ทนฺโต จรติ อเนโช; ภิกฺขุ สุสีโล สุวิมุตฺตจิตฺโต,โส ตฺยาหุตึ ภุญฺชตุ อคฺคปิณฺฑํ. "क्लेशों की सेना से मुक्त, शांत चित्त वाला, वह दमित हाथी के समान तृष्णारहित होकर विचरण करता है। वह सुसंयमित शील वाला और भली-भाँति विमुक्त चित्त वाला भिक्षु तुम्हारी श्रेष्ठ आहुति को ग्रहण करे।" ‘‘ตสฺมึ [Pg.144] ปสนฺนา อวิกมฺปมานา,ปติฏฺฐเปหิ ทกฺขิณํ ทกฺขิเณยฺเย; กโรหิ ปุญฺญํ สุขมายติกํ,ทิสฺวา มุนึ พฺราหฺมณิ โอฆติณฺณ’’นฺติ. "उस दान के योग्य भिक्षु में प्रसन्न और अडिग होकर तुम अपनी दक्षिणा अर्पित करो। हे ब्राह्मणी! संसार-सागर को पार कर चुके इस मुनि के दर्शन कर, भविष्य में सुख देने वाले पुण्य का अर्जन करो।" ‘‘ตสฺมึ ปสนฺนา อวิกมฺปมานา,ปติฏฺฐเปสิ ทกฺขิณํ ทกฺขิเณยฺเย; อกาสิ ปุญฺญํ สุขมายติกํ,ทิสฺวา มุนึ พฺราหฺมณี โอฆติณฺณ’’นฺติ. उस दान के योग्य भिक्षु में प्रसन्न और अडिग होकर उसने अपनी दक्षिणा अर्पित की। संसार-सागर को पार कर चुके उस मुनि के दर्शन कर, उस ब्राह्मणी ने भविष्य में सुख देने वाले पुण्य का अर्जन किया। ๔. พกพฺรหฺมสุตฺตํ ४. बकब्रह्म सुत्त ๑๗๕. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. เตน โข ปน สมเยน พกสฺส พฺรหฺมุโน เอวรูปํ ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ อุปฺปนฺนํ โหติ – ‘‘อิทํ นิจฺจํ, อิทํ ธุวํ, อิทํ สสฺสตํ, อิทํ เกวลํ, อิทํ อจวนธมฺมํ, อิทญฺหิ น ชายติ น ชียติ น มียติ น จวติ น อุปปชฺชติ, อิโต จ ปนญฺญํ อุตฺตรึ นิสฺสรณํ นตฺถี’’ติ. १७५. ऐसा मैंने सुना—एक समय भगवान श्रावस्ती के अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे। उस समय बक ब्रह्मा के मन में इस प्रकार की मिथ्या दृष्टि उत्पन्न हुई— "यह ब्रह्मलोक नित्य है, यह ध्रुव है, यह शाश्वत है, यह पूर्ण है, यह अविनाशी है। यहाँ न जन्म होता है, न बुढ़ापा आता है, न मृत्यु होती है, न यहाँ से च्युति होती है और न पुनर्जन्म होता है। और इससे परे कोई अन्य श्रेष्ठ मुक्ति नहीं है।" อถ โข ภควา พกสฺส พฺรหฺมุโน เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย – เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย, ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย เอวเมว – เชตวเน อนฺตรหิโต ตสฺมึ พฺรหฺมโลเก ปาตุรโหสิ. อทฺทสา โข พโก พฺรหฺมา ภควนฺตํ ทูรโตว อาคจฺฉนฺตํ. ทิสฺวาน ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘เอหิ โข มาริส, สฺวาคตํ เต, มาริส! จิรสฺสํ โข มาริส! อิมํ ปริยายมกาสิ ยทิทํ อิธาคมนาย. อิทญฺหิ, มาริส, นิจฺจํ, อิทํ ธุวํ, อิทํ สสฺสตํ, อิทํ เกวลํ, อิทํ อจวนธมฺมํ, อิทญฺหิ น ชายติ น ชียติ น มียติ น จวติ น อุปปชฺชติ. อิโต จ ปนญฺญํ อุตฺตริ นิสฺสรณํ นตฺถี’’ติ. तब भगवान ने बक ब्रह्मा के मानसिक विचार को अपने चित्त से जानकर—जैसे कोई बलवान पुरुष अपनी मुड़ी हुई बाँह को फैलाए या फैली हुई बाँह को सिकोड़े—वैसे ही जेतवन से अंतर्धान होकर उस ब्रह्मलोक में प्रकट हुए। बक ब्रह्मा ने भगवान को दूर से ही आते देखा। भगवान को देखकर उसने यह कहा— "हे मारिष! आइए, आपका स्वागत है। हे मारिष! बहुत समय बाद आपने यहाँ आने का अवसर निकाला है। हे मारिष! यह ब्रह्मलोक नित्य है, यह ध्रुव है, यह शाश्वत है, यह पूर्ण है, यह अविनाशी है। यहाँ न जन्म होता है, न बुढ़ापा आता है, न मृत्यु होती है, न च्युति होती है और न पुनर्जन्म होता है। इससे परे कोई अन्य श्रेष्ठ मुक्ति नहीं है।" เอวํ วุตฺเต, ภควา พกํ พฺรหฺมานํ เอตทโวจ – ‘‘อวิชฺชาคโต วต, โภ, พโก พฺรหฺมา; อวิชฺชาคโต วต, โภ, พโก พฺรหฺมา. ยตฺร [Pg.145] หิ นาม อนิจฺจํเยว สมานํ นิจฺจนฺติ วกฺขติ, อธุวํเยว สมานํ ธุวนฺติ วกฺขติ, อสสฺสตํเยว สมานํ สสฺสตนฺติ วกฺขติ, อเกวลํเยว สมานํ เกวลนฺติ วกฺขติ, จวนธมฺมํเยว สมานํ อจวนธมฺมนฺติ วกฺขติ. ยตฺถ จ ปน ชายติ จ ชียติ จ มียติ จ จวติ จ อุปปชฺชติ จ, ตญฺจ ตถา วกฺขติ – ‘อิทญฺหิ น ชายติ น ชียติ น มียติ น จวติ น อุปปชฺชติ’. สนฺตญฺจ ปนญฺญํ อุตฺตริ นิสฺสรณํ, ‘นตฺถญฺญํ อุตฺตริ นิสฺสรณ’นฺติ วกฺขตี’’ติ. ऐसा कहने पर, भगवान ने बक ब्रह्मा से यह कहा— "अरे! बक ब्रह्मा अविद्या के वश में हो गया है; अरे! बक ब्रह्मा अविद्या के वश में हो गया है। क्योंकि वह अनित्य को ही 'नित्य' कह रहा है, अध्रुव को ही 'ध्रुव' कह रहा है, अशाश्वत को ही 'शाश्वत' कह रहा है, अपूर्ण को ही 'पूर्ण' कह रहा है, और विनाशी स्वभाव वाले को 'अविनाशी' कह रहा है। जहाँ जन्म, बुढ़ापा, मृत्यु, च्युति और पुनर्जन्म होता है, उसके विषय में वह कहता है— 'यहाँ न जन्म होता है, न बुढ़ापा, न मृत्यु, न च्युति और न पुनर्जन्म होता है'। और इससे परे श्रेष्ठ मुक्ति के विद्यमान होते हुए भी वह कहता है— 'इससे परे कोई अन्य श्रेष्ठ मुक्ति नहीं है'।" ‘‘ทฺวาสตฺตติ โคตม ปุญฺญกมฺมา,วสวตฺติโน ชาติชรํ อตีตา; อยมนฺติมา เวทคู พฺรหฺมุปปตฺติ,อสฺมาภิชปฺปนฺติ ชนา อเนกา’’ติ. "हे गौतम! हम बहत्तर पुण्यकर्मा यहाँ उत्पन्न हुए हैं, जो दूसरों पर शासन करते हैं और जन्म-मरण से परे हैं। यह हमारी अंतिम ब्रह्म-उत्पत्ति है जो ज्ञान से प्राप्त हुई है। अनेक लोग हमारी ही प्रार्थना करते हैं।" ‘‘อปฺปญฺหิ เอตํ น หิ ทีฆมายุ,ยํ ตฺวํ พก มญฺญสิ ทีฆมายุํ; สตํ สหสฺสานํ นิรพฺพุทานํ,อายุํ ปชานามิ ตวาหํ พฺรหฺเม’’ติ. "हे बक! जिसे तुम लंबी आयु मान रहे हो, वह वास्तव में अल्प ही है, लंबी नहीं। हे ब्रह्मा! मैं तुम्हारी आयु को लाखों 'निरब्बुद' की गणना के अनुसार जानता हूँ।" ‘‘อนนฺตทสฺสี ภควาหมสฺมิ,ชาติชรํ โสกมุปาติวตฺโต; กึ เม ปุราณํ วตสีลวตฺตํ,อาจิกฺข เม ตํ ยมหํ วิชญฺญา’’ติ. "भगवान कहते हैं कि वे अनंतदर्शी हैं और जन्म, बुढ़ापा तथा शोक से पार पा चुके हैं। तो मेरा वह पुराना व्रत, शील और आचरण क्या था? मुझे वह बताएँ ताकि मैं उसे जान सकूँ।" ‘‘ยํ ตฺวํ อปาเยสิ พหู มนุสฺเส,ปิปาสิเต ฆมฺมนิ สมฺปเรเต; ตํ เต ปุราณํ วตสีลวตฺตํ,สุตฺตปฺปพุทฺโธว อนุสฺสรามิ. "ग्रीष्म ऋतु की तपती धूप में जब बहुत से मनुष्य प्यास से व्याकुल थे, तब तुमने उन्हें पानी पिलाया था। तुम्हारा वह पुराना व्रत और शील मुझे वैसे ही याद है जैसे कोई सोकर उठा हुआ व्यक्ति अपनी बातों को याद करता है।" ‘‘ยํ เอณิกูลสฺมึ ชนํ คหีตํ,อโมจยี คยฺหกํ นียมานํ; ตํ เต ปุราณํ วตสีลวตฺตํ,สุตฺตปฺปพุทฺโธว อนุสฺสรามิ. "एणिकूल पर जब लोगों को बंदी बनाकर ले जाया जा रहा था, तब तुमने उन बंदियों को मुक्त कराया था। तुम्हारा वह पुराना व्रत और शील मुझे वैसे ही याद है जैसे कोई सोकर उठा हुआ व्यक्ति याद करता है।" ‘‘คงฺคาย [Pg.146] โสตสฺมึ คหีตนาวํ,ลุทฺเทน นาเคน มนุสฺสกมฺยา; ปโมจยิตฺถ พลสา ปสยฺห,ตํ เต ปุราณํ วตสีลวตฺตํ,สุตฺตปฺปพุทฺโธว อนุสฺสรามิ. "गंगा की धारा में जब एक क्रूर नाग ने मनुष्यों को सताने के लिए उनकी नाव पकड़ ली थी, तब तुमने अपने बल से उसे दबाकर उन्हें मुक्त कराया था। तुम्हारा वह पुराना व्रत और शील मुझे वैसे ही याद है जैसे कोई सोकर उठा हुआ व्यक्ति याद करता है।" ‘‘กปฺโป จ เต พทฺธจโร อโหสึ,สมฺพุทฺธิมนฺตํ วตินํ อมญฺญิ; ตํ เต ปุราณํ วตสีลวตฺตํ,สุตฺตปฺปพุทฺโธว อนุสฺสรามี’’ติ. “मैं तुम्हारा 'कप्प' नाम का शिष्य था। मैंने तुम्हें उत्तम प्रज्ञावान और शीलवान माना था। वह तुम्हारा प्राचीन शील और व्रत है। मैं उसे वैसे ही याद करता हूँ जैसे कोई नींद से जागा हुआ व्यक्ति।” ‘‘อทฺธา ปชานาสิ มเมตมายุํ,อญฺเญปิ ชานาสิ ตถา หิ พุทฺโธ; ตถา หิ ตฺยายํ ชลิตานุภาโว,โอภาสยํ ติฏฺฐติ พฺรหฺมโลก’’นฺติ. “भन्ते! आप निश्चित रूप से मेरी इस आयु को जानते हैं। आप अन्य बातों को भी जानते हैं, इसीलिए आप 'बुद्ध' कहलाते हैं। बुद्ध होने के कारण ही आपका यह प्रज्वलित प्रभाव ब्रह्मलोक को प्रकाशित करते हुए स्थित है।” ๕. อญฺญตรพฺรหฺมสุตฺตํ ५. ५. अञ्ञतरब्रह्म सुत्त ๑๗๖. สาวตฺถินิทานํ. เตน โข ปน สมเยน อญฺญตรสฺส พฺรหฺมุโน เอวรูปํ ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ อุปฺปนฺนํ โหติ – ‘‘นตฺถิ โส สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา โย อิธ อาคจฺเฉยฺยา’’ติ. อถ โข ภควา ตสฺส พฺรหฺมุโน เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย – เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส…เป… ตสฺมึ พฺรหฺมโลเก ปาตุรโหสิ. อถ โข ภควา ตสฺส พฺรหฺมุโน อุปริ เวหาสํ ปลฺลงฺเกน นิสีทิ เตโชธาตุํ สมาปชฺชิตฺวา. १७६. सावत्थी में। उस समय एक ब्रह्म के मन में ऐसी पापपूर्ण मिथ्या-दृष्टि उत्पन्न हुई— “ऐसा कोई श्रमण या ब्राह्मण नहीं है जो यहाँ (इस ब्रह्मलोक में) आ सके।” तब भगवान ने उस ब्रह्म के मन के विचार को अपने मन से जानकर—जैसे कोई बलवान पुरुष मुड़ी हुई बाँह को फैला दे या फैली हुई बाँह को सिकोड़ ले, वैसे ही—उस ब्रह्मलोक में प्रकट हुए। तब भगवान उस ब्रह्म के ऊपर आकाश में पालथी मारकर तेजोधातु (अग्नि-तत्व) में समाहित होकर बैठ गए। อถ โข อายสฺมโต มหาโมคฺคลฺลานสฺส เอตทโหสิ – ‘‘กหํ นุ โข ภควา เอตรหิ วิหรตี’’ติ? อทฺทสา โข อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน ภควนฺตํ ทิพฺเพน จกฺขุนา วิสุทฺเธน อติกฺกนฺตมานุสเกน ตสฺส พฺรหฺมุโน อุปริ เวหาสํ ปลฺลงฺเกน นิสินฺนํ เตโชธาตุํ สมาปนฺนํ. ทิสฺวาน – เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย, ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย เอวเมว – เชตวเน อนฺตรหิโต ตสฺมึ พฺรหฺมโลเก ปาตุรโหสิ. อถ โข อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน [Pg.147] ปุรตฺถิมํ ทิสํ นิสฺสาย ตสฺส พฺรหฺมุโน อุปริ เวหาสํ ปลฺลงฺเกน นิสีทิ เตโชธาตุํ สมาปชฺชิตฺวา นีจตรํ ภควโต. तब आयुष्मान महामोग्गल्लान को यह विचार आया— “इस समय भगवान कहाँ विहार कर रहे हैं?” आयुष्मान महामोग्गल्लान ने विशुद्ध दिव्य-चक्षु से, जो मानवीय दृष्टि से परे है, भगवान को उस ब्रह्म के ऊपर आकाश में पालथी मारकर तेजोधातु में समाहित होकर बैठे देखा। देखकर—जैसे कोई बलवान पुरुष मुड़ी हुई बाँह को फैला दे या फैली हुई बाँह को सिकोड़ ले, वैसे ही—जेतवन से अंतर्ध्यान होकर उस ब्रह्मलोक में प्रकट हुए। तब आयुष्मान महामोग्गल्लान पूर्व दिशा का आश्रय लेकर उस ब्रह्म के ऊपर आकाश में पालथी मारकर तेजोधातु में समाहित होकर भगवान से कुछ नीचे बैठ गए। อถ โข อายสฺมโต มหากสฺสปสฺส เอตทโหสิ – ‘‘กหํ นุ โข ภควา เอตรหิ วิหรตี’’ติ? อทฺทสา โข อายสฺมา มหากสฺสโป ภควนฺตํ ทิพฺเพน จกฺขุนา…เป… ทิสฺวาน – เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส…เป… เอวเมว – เชตวเน อนฺตรหิโต ตสฺมึ พฺรหฺมโลเก ปาตุรโหสิ. อถ โข อายสฺมา มหากสฺสโป ทกฺขิณํ ทิสํ นิสฺสาย ตสฺส พฺรหฺมุโน อุปริ เวหาสํ ปลฺลงฺเกน นิสีทิ เตโชธาตุํ สมาปชฺชิตฺวา นีจตรํ ภควโต. तब आयुष्मान महाकस्सप को यह विचार आया— “इस समय भगवान कहाँ विहार कर रहे हैं?” आयुष्मान महाकस्सप ने दिव्य-चक्षु से भगवान को तेजोधातु में समाहित होकर बैठे देखा। देखकर—जैसे कोई बलवान पुरुष मुड़ी हुई बाँह को फैला दे या फैली हुई बाँह को सिकोड़ ले, वैसे ही—जेतवन से अंतर्ध्यान होकर उस ब्रह्मलोक में प्रकट हुए। तब आयुष्मान महाकस्सप दक्षिण दिशा का आश्रय लेकर उस ब्रह्म के ऊपर आकाश में पालथी मारकर तेजोधातु में समाहित होकर भगवान से कुछ नीचे बैठ गए। อถ โข อายสฺมโต มหากปฺปินสฺส เอตทโหสิ – ‘‘กหํ นุ โข ภควา เอตรหิ วิหรตี’’ติ? อทฺทสา โข อายสฺมา มหากปฺปิโน ภควนฺตํ ทิพฺเพน จกฺขุนา…เป… เตโชธาตุํ สมาปนฺนํ. ทิสฺวาน – เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส…เป… เอวเมว – เชตวเน อนฺตรหิโต ตสฺมึ พฺรหฺมโลเก ปาตุรโหสิ. อถ โข อายสฺมา มหากปฺปิโน ปจฺฉิมํ ทิสํ นิสฺสาย ตสฺส พฺรหฺมุโน อุปริ เวหาสํ ปลฺลงฺเกน นิสีทิ เตโชธาตุํ สมาปชฺชิตฺวา นีจตรํ ภควโต. तब आयुष्मान महाकप्पिन को यह विचार आया— “इस समय भगवान कहाँ विहार कर रहे हैं?” आयुष्मान महाकप्पिन ने दिव्य-चक्षु से भगवान को तेजोधातु में समाहित होकर बैठे देखा। देखकर—जैसे कोई बलवान पुरुष मुड़ी हुई बाँह को फैला दे या फैली हुई बाँह को सिकोड़ ले, वैसे ही—जेतवन से अंतर्ध्यान होकर उस ब्रह्मलोक में प्रकट हुए। तब आयुष्मान महाकप्पिन पश्चिम दिशा का आश्रय लेकर उस ब्रह्म के ऊपर आकाश में पालथी मारकर तेजोधातु में समाहित होकर भगवान से कुछ नीचे बैठ गए। อถ โข อายสฺมโต อนุรุทฺธสฺส เอตทโหสิ – ‘‘กหํ นุ โข ภควา เอตรหิ วิหรตี’’ติ? อทฺทสา โข อายสฺมา อนุรุทฺโธ…เป… เตโชธาตุํ สมาปนฺนํ. ทิสฺวาน – เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส…เป… ตสฺมึ พฺรหฺมโลเก ปาตุรโหสิ. อถ โข อายสฺมา อนุรุทฺโธ อุตฺตรํ ทิสํ นิสฺสาย ตสฺส พฺรหฺมุโน อุปริ เวหาสํ ปลฺลงฺเกน นิสีทิ เตโชธาตุํ สมาปชฺชิตฺวา นีจตรํ ภควโต. तब आयुष्मान अनुरुद्ध को यह विचार आया— “इस समय भगवान कहाँ विहार कर रहे हैं?” आयुष्मान अनुरुद्ध ने दिव्य-चक्षु से भगवान को तेजोधातु में समाहित होकर बैठे देखा। देखकर—जैसे कोई बलवान पुरुष मुड़ी हुई बाँह को फैला दे या फैली हुई बाँह को सिकोड़ ले, वैसे ही—उस ब्रह्मलोक में प्रकट हुए। तब आयुष्मान अनुरुद्ध उत्तर दिशा का आश्रय लेकर उस ब्रह्म के ऊपर आकाश में पालथी मारकर तेजोधातु में समाहित होकर भगवान से कुछ नीचे बैठ गए। อถ โข อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน ตํ พฺรหฺมานํ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब आयुष्मान महामोग्गल्लान ने उस ब्रह्म को गाथा में संबोधित किया— ‘‘อชฺชาปิ เต อาวุโส สา ทิฏฺฐิ, ยา เต ทิฏฺฐิ ปุเร อหุ; ปสฺสสิ วีติวตฺตนฺตํ, พฺรหฺมโลเก ปภสฺสร’’นฺติ. “हे मित्र! क्या तुम्हारी आज भी वही दृष्टि है, जो पहले थी? क्या तुम ब्रह्मलोक में (सबको) पार कर जाने वाली इस प्रभास्वर ज्योति को देख रहे हो?” ‘‘น เม มาริส สา ทิฏฺฐิ, ยา เม ทิฏฺฐิ ปุเร อหุ; ปสฺสามิ วีติวตฺตนฺตํ, พฺรหฺมโลเก ปภสฺสรํ; สฺวาหํ อชฺช กถํ วชฺชํ, อหํ นิจฺโจมฺหิ สสฺสโต’’ติ. “हे महानुभाव! मेरी अब वह दृष्टि नहीं है, जो पहले थी। मैं ब्रह्मलोक में (सबको) पार कर जाने वाली प्रभास्वर ज्योति को देख रहा हूँ। आज मैं भला यह कैसे कह सकता हूँ कि 'मैं नित्य हूँ, मैं शाश्वत हूँ'?” อถ [Pg.148] โข ภควา ตํ พฺรหฺมานํ สํเวเชตฺวา – เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย, ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย เอวเมว – ตสฺมึ พฺรหฺมโลเก อนฺตรหิโต เชตวเน ปาตุรโหสิ. อถ โข โส พฺรหฺมา อญฺญตรํ พฺรหฺมปาริสชฺชํ อามนฺเตสิ – ‘‘เอหิ ตฺวํ, มาริส, เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกม; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ เอวํ วเทหิ – ‘อตฺถิ นุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, อญฺเญปิ ตสฺส ภควโต สาวกา เอวํมหิทฺธิกา เอวํมหานุภาวา; เสยฺยถาปิ ภวํ โมคฺคลฺลาโน กสฺสโป กปฺปิโน อนุรุทฺโธ’’’ติ? ‘‘เอวํ, มาริสา’’ติ โข โส พฺรหฺมปาริสชฺโช ตสฺส พฺรหฺมุโน ปฏิสฺสุตฺวา เยนายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ เอตทโวจ – ‘‘อตฺถิ นุ โข, มาริส โมคฺคลฺลาน, อญฺเญปิ ตสฺส ภควโต สาวกา เอวํมหิทฺธิกา เอวํมหานุภาวา; เสยฺยถาปิ ภวํ โมคฺคลฺลาโน กสฺสโป กปฺปิโน อนุรุทฺโธ’’ติ? อถ โข อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน ตํ พฺรหฺมปาริสชฺชํ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब भगवान उस ब्रह्म को संवेगित कर—जैसे कोई बलवान पुरुष मुड़ी हुई बाँह को फैला दे या फैली हुई बाँह को सिकोड़ ले, वैसे ही—उस ब्रह्मलोक से अंतर्ध्यान होकर जेतवन में प्रकट हुए। तब उस ब्रह्म ने अपने एक पार्षद ब्रह्म को संबोधित किया— “हे मित्र! आओ, जहाँ आयुष्मान महामोग्गल्लान हैं, वहाँ जाओ और उनसे ऐसा कहो— 'हे महानुभाव मोग्गल्लान! क्या भगवान के अन्य शिष्य भी आयुष्मान मोग्गल्लान, कस्सप, कप्पिन और अनुरुद्ध के समान ही महा-ऋद्धिमान और महा-प्रभावशाली हैं?'” “जी, महानुभाव” कहकर उस पार्षद ब्रह्म ने उस ब्रह्म की आज्ञा स्वीकार की और जहाँ आयुष्मान महामोग्गल्लान थे, वहाँ गया। पास जाकर आयुष्मान महामोग्गल्लान से यह कहा— “हे महानुभाव मोग्गल्लान! क्या भगवान के अन्य शिष्य भी आयुष्मान मोग्गल्लान, कस्सप, कप्पिन और अनुरुद्ध के समान ही महा-ऋद्धिमान और महा-प्रभावशाली हैं?” तब आयुष्मान महामोग्गल्लान ने उस पार्षद ब्रह्म को गाथा में उत्तर दिया— ‘‘เตวิชฺชา อิทฺธิปตฺตา จ, เจโตปริยายโกวิทา; ขีณาสวา อรหนฺโต, พหู พุทฺธสฺส สาวกา’’ติ. “त्रिविद्या-सम्पन्न, ऋद्धि-प्राप्त, दूसरों के चित्त को जानने में कुशल, क्षीणास्त्रव और अर्हत्—बुद्ध के ऐसे बहुत से शिष्य हैं।” อถ โข โส พฺรหฺมปาริสชฺโช อายสฺมโต มหาโมคฺคลฺลานสฺส ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา เยน โส พฺรหฺมา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ พฺรหฺมานํ เอตทโวจ – ‘‘อายสฺมา มาริส, มหาโมคฺคลฺลาโน เอวมาห – तब वह पार्षद ब्रह्म आयुष्मान महामोग्गल्लान के कहे हुए वचनों का अभिनंदन और अनुमोदन कर जहाँ वह ब्रह्म था, वहाँ गया। पास जाकर उस ब्रह्म से यह कहा— “हे महानुभाव! आयुष्मान महामोग्गल्लान ने ऐसा कहा है—” ‘‘เตวิชฺชา อิทฺธิปตฺตา จ, เจโตปริยายโกวิทา; ขีณาสวา อรหนฺโต, พหู พุทฺธสฺส สาวกา’’ติ. “बुद्ध के बहुत से ऐसे श्रावक हैं जो तीन विद्याओं से संपन्न हैं, ऋद्धियों को प्राप्त हैं, दूसरों के चित्त को जानने में कुशल हैं, क्षीणासव (आस्रवों से मुक्त) और अर्हन्त हैं।” อิทมโวจ โส พฺรหฺมปาริสชฺโช. อตฺตมโน จ โส พฺรหฺมา ตสฺส พฺรหฺมปาริสชฺชสฺส ภาสิตํ อภินนฺทีติ. उस ब्रह्म-पार्षद (ब्रह्मा के सेवक) ने यह कहा। वह महाब्रह्मा प्रसन्न हुआ और उसने उस ब्रह्म-पार्षद के कहे हुए वचनों का अभिनन्दन किया। ๖. พฺรหฺมโลกสุตฺตํ ६. ब्रह्मलोक सुत्त ๑๗๗. สาวตฺถินิทานํ. เตน โข ปน สมเยน ภควา ทิวาวิหารคโต โหติ ปฏิสลฺลีโน. อถ โข สุพฺรหฺมา จ ปจฺเจกพฺรหฺมา สุทฺธาวาโส [Pg.149] จ ปจฺเจกพฺรหฺมา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ปจฺเจกํ ทฺวารพาหํ อุปนิสฺสาย อฏฺฐํสุ. อถ โข สุพฺรหฺมา ปจฺเจกพฺรหฺมา สุทฺธาวาสํ ปจฺเจกพฺรหฺมานํ เอตทโวจ – ‘‘อกาโล โข ตาว, มาริส, ภควนฺตํ ปยิรุปาสิตุํ; ทิวาวิหารคโต ภควา ปฏิสลฺลีโน จ. อสุโก จ พฺรหฺมโลโก อิทฺโธ เจว ผีโต จ, พฺรหฺมา จ ตตฺร ปมาทวิหารํ วิหรติ. อายาม, มาริส, เยน โส พฺรหฺมโลโก เตนุปสงฺกมิสฺสาม; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ พฺรหฺมานํ สํเวเชยฺยามา’’ติ. ‘‘เอวํ, มาริสา’’ติ โข สุทฺธาวาโส ปจฺเจกพฺรหฺมา สุพฺรหฺมุโน ปจฺเจกพฺรหฺมุโน ปจฺจสฺโสสิ. १७७. श्रावस्ती में निदान। उस समय भगवान एकांतवास में दिन का विहार (विश्राम) कर रहे थे। तब सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मा और शुद्धावास प्रत्येकब्रह्मा जहाँ भगवान थे, वहाँ आए; आकर प्रत्येक (गन्धकुटी के) द्वार-स्तम्भ के सहारे खड़े हो गए। तब सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मा ने शुद्धावास प्रत्येकब्रह्मा से यह कहा— ‘हे मित्र! अभी भगवान की सेवा-उपासना करने का समय नहीं है; भगवान एकांतवास में दिन का विहार कर रहे हैं। अमुक ब्रह्मलोक समृद्ध और वैभवशाली है, और वहाँ का ब्रह्मा प्रमादपूर्ण विहार कर रहा है। आओ मित्र! जहाँ वह ब्रह्मलोक है, वहाँ चलें; वहाँ पहुँचकर उस ब्रह्मा को संवेग (प्रेरणा) प्रदान करें।’ शुद्धावास प्रत्येकब्रह्मा ने सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मा के वचनों को स्वीकार किया— ‘ठीक है, मित्र!’ อถ โข สุพฺรหฺมา จ ปจฺเจกพฺรหฺมา สุทฺธาวาโส จ ปจฺเจกพฺรหฺมา – เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส…เป… เอวเมว – ภควโต ปุรโต อนฺตรหิตา ตสฺมึ พฺรหฺมโลเก ปาตุรเหสุํ. อทฺทสา โข โส พฺรหฺมา เต พฺรหฺมาโน ทูรโตว อาคจฺฉนฺเต. ทิสฺวาน เต พฺรหฺมาโน เอตทโวจ – ‘‘หนฺท กุโต นุ ตุมฺเห, มาริสา, อาคจฺฉถา’’ติ? ‘‘อาคตา โข มยํ, มาริส, อมฺห ตสฺส ภควโต สนฺติกา อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส. คจฺเฉยฺยาสิ ปน ตฺวํ, มาริส, ตสฺส ภควโต อุปฏฺฐานํ อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺสา’’ติ? तब सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मा और शुद्धावास प्रत्येकब्रह्मा—जैसे कोई बलवान पुरुष अपनी मुड़ी हुई भुजा को फैला दे या फैली हुई भुजा को सिकोड़ ले—वैसे ही भगवान के सामने से अंतर्ध्यान होकर उस ब्रह्मलोक में प्रकट हुए। उस ब्रह्मा ने उन ब्रह्माओं को दूर से ही आते देखा। देखकर उन ब्रह्माओं से यह कहा— ‘अरे! हे मित्रों, आप लोग कहाँ से आ रहे हैं?’ ‘हे मित्र! हम उन भगवान अर्हन्त सम्यक्सम्बुद्ध के पास से आए हैं। हे मित्र! क्या आप उन भगवान अर्हन्त सम्यक्सम्बुद्ध की सेवा-उपासना के लिए नहीं जाएँगे?’ เอวํ วุตฺโต โข โส พฺรหฺมา ตํ วจนํ อนธิวาเสนฺโต สหสฺสกฺขตฺตุํ อตฺตานํ อภินิมฺมินิตฺวา สุพฺรหฺมานํ ปจฺเจกพฺรหฺมานํ เอตทโวจ – ‘‘ปสฺสสิ เม โน ตฺวํ, มาริส, เอวรูปํ อิทฺธานุภาว’’นฺติ? ‘‘ปสฺสามิ โข ตฺยาหํ, มาริส, เอวรูปํ อิทฺธานุภาว’’นฺติ. ‘‘โส ขฺวาหํ, มาริส, เอวํมหิทฺธิโก เอวํมหานุภาโว กสฺส อญฺญสฺส สมณสฺส วา พฺราหฺมณสฺส วา อุปฏฺฐานํ คมิสฺสามี’’ติ? ऐसा कहे जाने पर, वह ब्रह्मा उन वचनों को स्वीकार न करते हुए, स्वयं को एक हजार रूपों में निर्मित कर सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मा से बोला— ‘हे मित्र! क्या तुम मेरा ऐसा ऋद्धि-अनुभाव (चमत्कारिक शक्ति) देख रहे हो?’ ‘हाँ मित्र! मैं तुम्हारा ऐसा ऋद्धि-अनुभाव देख रहा हूँ।’ ‘हे मित्र! जब मैं इतना महान ऋद्धिमान और महान अनुभाव वाला हूँ, तो मैं किसी अन्य श्रमण या ब्राह्मण की सेवा-उपासना के लिए क्यों जाऊँगा?’ อถ โข สุพฺรหฺมา ปจฺเจกพฺรหฺมา ทฺวิสหสฺสกฺขตฺตุํ อตฺตานํ อภินิมฺมินิตฺวา ตํ พฺรหฺมานํ เอตทโวจ – ‘‘ปสฺสสิ เม โน ตฺวํ, มาริส, เอวรูปํ อิทฺธานุภาว’’นฺติ? ‘‘ปสฺสามิ โข ตฺยาหํ, มาริส, เอวรูปํ อิทฺธานุภาว’’นฺติ. ‘‘ตยา จ โข, มาริส, มยา จ สฺเวว ภควา มหิทฺธิกตโร เจว มหานุภาวตโร จ. คจฺเฉยฺยาสิ ตฺวํ, มาริส, ตสฺส ภควโต อุปฏฺฐานํ อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺสา’’ติ? อถ โข โส พฺรหฺมา สุพฺรหฺมานํ ปจฺเจกพฺรหฺมานํ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मा ने स्वयं को दो हजार रूपों में निर्मित कर उस ब्रह्मा से कहा— ‘हे मित्र! क्या तुम मेरा ऐसा ऋद्धि-अनुभाव देख रहे हो?’ ‘हाँ मित्र! मैं तुम्हारा ऐसा ऋद्धि-अनुभाव देख रहा हूँ।’ ‘हे मित्र! तुमसे और मुझसे भी अधिक वे भगवान ही अधिक ऋद्धिमान और अधिक महान अनुभाव वाले हैं। हे मित्र! तुम्हें उन भगवान अर्हन्त सम्यक्सम्बुद्ध की सेवा-उपासना के लिए जाना चाहिए।’ तब उस ब्रह्मा ने सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मा को गाथा में संबोधित किया— ‘‘ตโย [Pg.150] สุปณฺณา จตุโร จ หํสา,พฺยคฺฆีนิสา ปญฺจสตา จ ฌายิโน; ตยิทํ วิมานํ ชลเต จ พฺรหฺเม,โอภาสยํ อุตฺตรสฺสํ ทิสาย’’นฺติ. ‘(मेरे इस विमान में) तीन सौ सुपर्ण, चार सौ हंस और पाँच सौ व्याघ्रीनिसा (बाघ जैसे प्राणी) हैं; हे ब्रह्मा! ध्यानमग्न मेरा यह विमान उत्तर दिशा को प्रकाशित करता हुआ देदीप्यमान है।’ ‘‘กิญฺจาปิ เต ตํ ชลเต วิมานํ,โอภาสยํ อุตฺตรสฺสํ ทิสายํ; รูเป รณํ ทิสฺวา สทา ปเวธิตํ,ตสฺมา น รูเป รมตี สุเมโธ’’ติ. ‘यद्यपि तुम्हारा वह विमान उत्तर दिशा को प्रकाशित करता हुआ देदीप्यमान है; किन्तु रूप में दोष (जन्म-जरा-मृत्यु) को देखकर और उसे सदा चलायमान (अस्थिर) पाकर, उत्तम प्रज्ञावान (बुद्ध) रूप में रमण नहीं करते।’ อถ โข สุพฺรหฺมา จ ปจฺเจกพฺรหฺมา สุทฺธาวาโส จ ปจฺเจกพฺรหฺมา ตํ พฺรหฺมานํ สํเวเชตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายึสุ. อคมาสิ จ โข โส พฺรหฺมา อปเรน สมเยน ภควโต อุปฏฺฐานํ อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺสาติ. तब सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मा और शुद्धावास प्रत्येकब्रह्मा उस ब्रह्मा को संवेग प्रदान कर वहीं अंतर्ध्यान हो गए। और बाद में वह ब्रह्मा उन भगवान अर्हन्त सम्यक्सम्बुद्ध की सेवा-उपासना के लिए गया। ๗. โกกาลิกสุตฺตํ ७. कोकालिक सुत्त ๑๗๘. สาวตฺถินิทานํ. เตน โข ปน สมเยน ภควา ทิวาวิหารคโต โหติ ปฏิสลฺลีโน. อถ โข สุพฺรหฺมา จ ปจฺเจกพฺรหฺมา สุทฺธาวาโส จ ปจฺเจกพฺรหฺมา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ปจฺเจกํ ทฺวารพาหํ นิสฺสาย อฏฺฐํสุ. อถ โข สุพฺรหฺมา ปจฺเจกพฺรหฺมา โกกาลิกํ ภิกฺขุํ อารพฺภ ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – १७८. श्रावस्ती में निदान। उस समय भगवान एकांतवास में दिन का विहार कर रहे थे। तब सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मा और शुद्धावास प्रत्येकब्रह्मा जहाँ भगवान थे, वहाँ आए; आकर प्रत्येक द्वार-स्तम्भ के सहारे खड़े हो गए। तब सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मा ने कोकालिक भिक्षु के विषय में भगवान के समीप यह गाथा कही— ‘‘อปฺปเมยฺยํ ปมินนฺโต, โกธ วิทฺวา วิกปฺปเย; อปฺปเมยฺยํ ปมายินํ, นิวุตํ ตํ มญฺเญ ปุถุชฺชน’’นฺติ. ‘अप्रमेय (अर्हन्त) को मापने वाला कौन विद्वान यहाँ तुलना करेगा? जो उस अप्रमेय को मापता है, उस पृथग्जन को हम मोह से ढका हुआ (अज्ञानी) मानते हैं।’ ๘. กตโมทกติสฺสสุตฺตํ ८. कतमौदकतिस्स सुत्त ๑๗๙. สาวตฺถินิทานํ. เตน โข ปน สมเยน ภควา ทิวาวิหารคโต โหติ ปฏิสลฺลีโน. อถ โข สุพฺรหฺมา จ ปจฺเจกพฺรหฺมา สุทฺธาวาโส จ ปจฺเจกพฺรหฺมา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ปจฺเจกํ ทฺวารพาหํ นิสฺสาย อฏฺฐํสุ. อถ โข สุทฺธาวาโส ปจฺเจกพฺรหฺมา กตโมทกติสฺสกํ ภิกฺขุํ อารพฺภ ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – १७९. श्रावस्ती में निदान। उस समय भगवान एकांतवास में दिन का विहार कर रहे थे। तब सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मा और शुद्धावास प्रत्येकब्रह्मा जहाँ भगवान थे, वहाँ आए; आकर प्रत्येक द्वार-स्तम्भ के सहारे खड़े हो गए। तब शुद्धावास प्रत्येकब्रह्मा ने कतमौदकतिस्सक भिक्षु के विषय में भगवान के समीप यह गाथा कही— ‘‘อปฺปเมยฺยํ [Pg.151] ปมินนฺโต, โกธ วิทฺวา วิกปฺปเย; อปฺปเมยฺยํ ปมายินํ, นิวุตํ ตํ มญฺเญ อกิสฺสว’’นฺติ. ‘अप्रमेय को मापने वाला कौन विद्वान यहाँ तुलना करेगा? जो उस अप्रमेय को मापता है, उस अल्प-प्रज्ञा वाले (अज्ञानी) को हम मोह से ढका हुआ मानते हैं।’ ๙. ตุรูพฺรหฺมสุตฺตํ ९. तुरुब्रह्म सुत्त ๑๘๐. สาวตฺถินิทานํ. เตน โข ปน สมเยน โกกาลิโก ภิกฺขุ อาพาธิโก โหติ ทุกฺขิโต พาฬฺหคิลาโน. อถ โข ตุรู ปจฺเจกพฺรหฺมา อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺโณ เกวลกปฺปํ เชตวนํ โอภาเสตฺวา เยน โกกาลิโก ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เวหาสํ ฐิโต โกกาลิกํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘ปสาเทหิ, โกกาลิก, สาริปุตฺตโมคฺคลฺลาเนสุ จิตฺตํ. เปสลา สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานา’’ติ. ‘‘โกสิ ตฺวํ, อาวุโส’’ติ? ‘‘อหํ ตุรู ปจฺเจกพฺรหฺมา’’ติ. ‘‘นนุ ตฺวํ, อาวุโส, ภควตา อนาคามี พฺยากโต, อถ กิญฺจรหิ อิธาคโต? ปสฺส, ยาวญฺจ เต อิทํ อปรทฺธ’’นฺติ. १८०. श्रावस्ती। उस समय कोकालिक भिक्षु बीमार, दुखी और गंभीर रूप से अस्वस्थ था। तब तुरु प्रत्येकब्रह्मा, रात बीतने पर (आधी रात के समय), अत्यंत सुंदर आभा के साथ संपूर्ण जेतवन को आलोकित करते हुए जहाँ कोकालिक भिक्षु था, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर आकाश में स्थित होकर कोकालिक भिक्षु से यह कहा— "कोकालिक! सारिपुत्र और मोग्गल्लान के प्रति अपने चित्त को प्रसन्न (श्रद्धावान) करो। सारिपुत्र और मोग्गल्लान शीलवान हैं।" "आयुष्मान्, आप कौन हैं?" "मैं तुरु प्रत्येकब्रह्मा हूँ।" "आयुष्मान्, क्या भगवान ने आपको अनागामी घोषित नहीं किया था? फिर आप यहाँ क्यों आए हैं? देखो, आपने कितना बड़ा अपराध किया है (या अपनी इस त्रुटि को देखो)।" ‘‘ปุริสสฺส หิ ชาตสฺส, กุฐารี ชายเต มุเข; ยาย ฉินฺทติ อตฺตานํ, พาโล ทุพฺภาสิตํ ภณํ. "निश्चित ही, जब मनुष्य जन्म लेता है, तो उसके मुख में एक कुल्हाड़ी पैदा होती है; जिससे वह मूर्ख, दुर्भाष्य (बुरे वचन) बोलते हुए स्वयं को ही काट डालता है।" ‘‘โย นินฺทิยํ ปสํสติ,ตํ วา นินฺทติ โย ปสํสิโย; วิจินาติ มุเขน โส กลึ,กลินา เตน สุขํ น วินฺทติ. "जो निंदनीय की प्रशंसा करता है, या जो प्रशंसनीय है उसकी निंदा करता है; वह अपने मुख से पाप (कलि) का संचय करता है, और उस पाप के कारण वह सुख प्राप्त नहीं करता।" ‘‘อปฺปมตฺตโก อยํ กลิ,โย อกฺเขสุ ธนปราชโย; สพฺพสฺสาปิ สหาปิ อตฺตนา,อยเมว มหนฺตตโร กลิ; โย สุคเตสุ มนํ ปโทสเย. "जुआ (पाँसों) में धन की हार होना, यहाँ तक कि अपने सर्वस्व और स्वयं के साथ भी, यह एक छोटा सा पाप (कलि) है। परंतु यह कहीं अधिक बड़ा पाप है, जो सुगतों (पवित्र पुरुषों) के प्रति मन में द्वेष रखता है।" ‘‘สตํ สหสฺสานํ นิรพฺพุทานํ,ฉตฺตึสติ ปญฺจ จ อพฺพุทานิ; ยมริยครหี นิรยํ อุเปติ,วาจํ มนญฺจ ปณิธาย ปาปก’’นฺติ. "एक लाख निरर्बुद, और छत्तीस तथा पाँच अर्बुद (काल तक); वह मूर्ख नरक में जाता है जो आर्यों की निंदा करता है और अपने वचन तथा मन को पाप में लगाता है।" ๑๐. โกกาลิกสุตฺตํ १०. कोकालिक सुत्त ๑๘๑. สาวตฺถินิทานํ[Pg.152]. อถ โข โกกาลิโก ภิกฺขุ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข โกกาลิโก ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ปาปิจฺฉา, ภนฺเต, สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานา ปาปิกานํ อิจฺฉานํ วสํ คตา’’ติ. เอวํ วุตฺเต, ภควา โกกาลิกํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘มา เหวํ, โกกาลิก, อวจ; มา เหวํ, โกกาลิก, อวจ. ปสาเทหิ, โกกาลิก, สาริปุตฺตโมคฺคลฺลาเนสุ จิตฺตํ. เปสลา สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานา’’ติ. ทุติยมฺปิ โข โกกาลิโก ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กิญฺจาปิ เม, ภนฺเต, ภควา สทฺธายิโก ปจฺจยิโก; อถ โข ปาปิจฺฉาว ภนฺเต, สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานา ปาปิกานํ อิจฺฉานํ วสํ คตา’’ติ. ทุติยมฺปิ โข ภควา โกกาลิกํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘มา เหวํ, โกกาลิก, อวจ; มา เหวํ, โกกาลิก, อวจ. ปสาเทหิ, โกกาลิก, สาริปุตฺตโมคฺคลฺลาเนสุ จิตฺตํ. เปสลา สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานา’’ติ. ตติยมฺปิ โข โกกาลิโก ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กิญฺจาปิ…เป… อิจฺฉานํ วสํ คตา’’ติ. ตติยมฺปิ โข ภควา โกกาลิกํ ภิกฺขุํ เอตทโวจ – ‘‘มา เหวํ…เป… เปสลา สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานา’’ติ. १८१. श्रावस्ती। तब कोकालिक भिक्षु जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए कोकालिक भिक्षु ने भगवान से यह कहा— "भन्ते! सारिपुत्र और मोग्गल्लान बुरी इच्छाओं वाले हैं, वे पापपूर्ण इच्छाओं के वश में हो गए हैं।" ऐसा कहने पर, भगवान ने कोकालिक भिक्षु से यह कहा— "कोकालिक! ऐसा मत कहो; कोकालिक! ऐसा मत कहो। कोकालिक! सारिपुत्र और मोग्गल्लान के प्रति अपने चित्त को प्रसन्न करो। सारिपुत्र और मोग्गल्लान शीलवान हैं।" दूसरी बार भी कोकालिक भिक्षु ने भगवान से यह कहा— "भन्ते! यद्यपि भगवान मेरे लिए विश्वसनीय और प्रामाणिक हैं, फिर भी भन्ते, सारिपुत्र और मोग्गल्लान बुरी इच्छाओं वाले ही हैं, वे पापपूर्ण इच्छाओं के वश में हो गए हैं।" दूसरी बार भी भगवान ने कोकालिक भिक्षु से यह कहा— "कोकालिक! ऐसा मत कहो; कोकालिक! ऐसा मत कहो। कोकालिक! सारिपुत्र और मोग्गल्लान के प्रति अपने चित्त को प्रसन्न करो। सारिपुत्र और मोग्गल्लान शीलवान हैं।" तीसरी बार भी कोकालिक भिक्षु ने भगवान से यह कहा— "भन्ते! यद्यपि भगवान मेरे लिए विश्वसनीय और प्रामाणिक हैं... पे ... वे पापपूर्ण इच्छाओं के वश में हो गए हैं।" तीसरी बार भी भगवान ने कोकालिक भिक्षु से यह कहा— "कोकालिक! ऐसा मत कहो... पे ... सारिपुत्र और मोग्गल्लान शीलवान हैं।" อถ โข โกกาลิโก ภิกฺขุ อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. อจิรปกฺกนฺตสฺส จ โกกาลิกสฺส ภิกฺขุโน สาสปมตฺตีหิ ปีฬกาหิ สพฺโพ กาโย ผุโฏ อโหสิ. สาสปมตฺติโย หุตฺวา มุคฺคมตฺติโย อเหสุํ, มุคฺคมตฺติโย หุตฺวา กลายมตฺติโย อเหสุํ, กลายมตฺติโย หุตฺวา โกลฏฺฐิมตฺติโย อเหสุํ, โกลฏฺฐิมตฺติโย หุตฺวา โกลมตฺติโย อเหสุํ, โกลมตฺติโย หุตฺวา อามลกมตฺติโย อเหสุํ, อามลกมตฺติโย หุตฺวา เพลุวสลาฏุกมตฺติโย อเหสุํ, เพลุวสลาฏุกมตฺติโย หุตฺวา พิลฺลมตฺติโย อเหสุํ, พิลฺลมตฺติโย หุตฺวา ปภิชฺชึสุ. ปุพฺพญฺจ โลหิตญฺจ ปคฺฆรึสุ. อถ โข โกกาลิโก ภิกฺขุ เตเนว อาพาเธน กาลมกาสิ. กาลงฺกโต จ โกกาลิโก ภิกฺขุ ปทุมํ นิรยํ อุปปชฺชิ สาริปุตฺตโมคฺคลฺลาเนสุ จิตฺตํ อาฆาเตตฺวา. तब कोकालिक भिक्षु आसन से उठकर, भगवान को अभिवादन कर और प्रदक्षिणा कर चला गया। कोकालिक भिक्षु के जाने के कुछ ही समय बाद, उसके पूरे शरीर पर सरसों के दाने के बराबर फुंसियाँ निकल आईं। वे सरसों के दाने से मूँग के दाने के बराबर हो गईं, मूँग के दाने से मटर के दाने के बराबर, मटर के दाने से बेर की गुठली के बराबर, बेर की गुठली से बेर के बराबर, बेर से आँवले के बराबर, आँवले से कच्चे बेल के फल के बराबर, और कच्चे बेल से पके हुए बेल के फल के बराबर होकर फट गईं। उनसे पीप और रक्त बहने लगा। तब कोकालिक भिक्षु की उसी बीमारी से मृत्यु हो गई। मृत्यु के पश्चात, सारिपुत्र और मोग्गल्लान के प्रति मन में द्वेष रखने के कारण, कोकालिक भिक्षु 'पदुम' नरक में उत्पन्न हुआ। อถ [Pg.153] โข พฺรหฺมา สหมฺปติ อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺโณ เกวลกปฺปํ เชตวนํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข พฺรหฺมา สหมฺปติ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘โกกาลิโก, ภนฺเต, ภิกฺขุ กาลงฺกโต. กาลงฺกโต จ, ภนฺเต, โกกาลิโก ภิกฺขุ ปทุมํ นิรยํ อุปปนฺโน สาริปุตฺตโมคฺคลฺลาเนสุ จิตฺตํ อาฆาเตตฺวา’’ติ. อิทมโวจ พฺรหฺมา สหมฺปติ, อิทํ วตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายีติ. तब ब्रह्मा सहम्पति, रात बीतने पर, अत्यंत सुंदर आभा के साथ संपूर्ण जेतवन को आलोकित करते हुए जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े हुए ब्रह्मा सहम्पति ने भगवान से यह कहा— "भन्ते! कोकालिक भिक्षु की मृत्यु हो गई है। और भन्ते, मृत्यु के पश्चात सारिपुत्र और मोग्गल्लान के प्रति मन में द्वेष रखने के कारण कोकालिक भिक्षु 'पदुम' नरक में उत्पन्न हुआ है।" ब्रह्मा सहम्पति ने यह कहा, और यह कहकर भगवान को अभिवादन कर और प्रदक्षिणा कर वहीं अंतर्ध्यान हो गए। อถ โข ภควา ตสฺสา รตฺติยา อจฺจเยน ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘อิมํ, ภิกฺขเว, รตฺตึ พฺรหฺมา สหมฺปติ อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺโณ เกวลกปฺปํ เชตวนํ โอภาเสตฺวา เยนาหํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข, ภิกฺขเว, พฺรหฺมา สหมฺปติ มํ เอตทโวจ – ‘โกกาลิโก, ภนฺเต, ภิกฺขุ กาลงฺกโต. กาลงฺกโต จ, ภนฺเต, โกกาลิโก ภิกฺขุ ปทุมํ นิรยํ อุปปนฺโน สาริปุตฺตโมคฺคลฺลาเนสุ จิตฺตํ อาฆาเตตฺวา’ติ. อิทมโวจ, ภิกฺขเว, พฺรหฺมา สหมฺปติ, อิทํ วตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายี’’ติ. तब भगवान ने उस रात के बीतने पर भिक्षुओं को संबोधित किया— "भिक्षुओ! इस रात, ब्रह्मा सहम्पति, रात बीतने पर, अत्यंत सुंदर आभा के साथ संपूर्ण जेतवन को आलोकित करते हुए जहाँ मैं था, वहाँ आए; आकर मुझे अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े हुए भिक्षुओ, ब्रह्मा सहम्पति ने मुझसे यह कहा— 'भन्ते! कोकालिक भिक्षु की मृत्यु हो गई है। और भन्ते, मृत्यु के पश्चात सारिपुत्र और मोग्गल्लान के प्रति मन में द्वेष रखने के कारण कोकालिक भिक्षु पदुम नरक में उत्पन्न हुआ है।' भिक्षुओ, ब्रह्मा सहम्पति ने यह कहा, और यह कहकर मुझे अभिवादन कर और प्रदक्षिणा कर वहीं अंतर्ध्यान हो गए।" เอวํ วุตฺเต, อญฺญตโร ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กีวทีฆํ นุ โข, ภนฺเต, ปทุเม นิรเย อายุปฺปมาณ’’นฺติ? ‘‘ทีฆํ โข, ภิกฺขุ, ปทุเม นิรเย อายุปฺปมาณํ. ตํ น สุกรํ สงฺขาตุํ – เอตฺตกานิ วสฺสานิ อิติ วา, เอตฺตกานิ วสฺสสตานิ อิติ วา, เอตฺตกานิ วสฺสสหสฺสานิ อิติ วา, เอตฺตกานิ วสฺสสตสหสฺสานิ อิติ วา’’ติ. ‘‘สกฺกา ปน, ภนฺเต, อุปมํ กาตุ’’นฺติ? ‘‘สกฺกา, ภิกฺขู’’ติ ภควา อโวจ – ऐसा कहे जाने पर, एक भिक्षु ने भगवान से यह कहा— “भन्ते! पदुम निरय (नरक) में आयु का प्रमाण कितना लंबा है?” “भिक्षु! पदुम निरय में आयु का प्रमाण बहुत लंबा है। उसे वर्षों में, या सैकड़ों वर्षों में, या हजारों वर्षों में, या लाखों वर्षों में गिनना आसान नहीं है।” “भन्ते! क्या कोई उपमा दी जा सकती है?” भगवान ने कहा— “भिक्षु! दी जा सकती है।” ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขุ วีสติขาริโก โกสลโก ติลวาโห. ตโต ปุริโส วสฺสสตสฺส วสฺสสตสฺส อจฺจเยน เอกเมกํ ติลํ อุทฺธเรยฺย; ขิปฺปตรํ โข โส, ภิกฺขุ, วีสติขาริโก โกสลโก ติลวาโห อิมินา อุปกฺกเมน ปริกฺขยํ ปริยาทานํ คจฺเฉยฺย, น ตฺเวว เอโก อพฺพุโท นิรโย. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขุ, วีสติ อพฺพุทา นิรยา, เอวเมโก นิรพฺพุทนิรโย. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขุ, วีสติ นิรพฺพุทา นิรยา, เอวเมโก อพโพ นิรโย. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขุ, วีสติ อพพา นิรยา, เอวเมโก [Pg.154] อฏโฏ นิรโย. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขุ, วีสติ อฏฏา นิรยา, เอวเมโก อหโห นิรโย. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขุ, วีสติ อหหา นิรยา, เอวเมโก กุมุโท นิรโย. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขุ, วีสติ กุมุทา นิรยา, เอวเมโก โสคนฺธิโก นิรโย. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขุ, วีสติ โสคนฺธิกา นิรยา, เอวเมโก อุปฺปลนิรโย. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขุ, วีสติ อุปฺปลา นิรยา, เอวเมโก ปุณฺฑริโก นิรโย. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขุ, วีสติ ปุณฺฑริกา นิรยา, เอวเมโก ปทุโม นิรโย. ปทุเม ปน, ภิกฺขุ, นิรเย โกกาลิโก ภิกฺขุ อุปปนฺโน สาริปุตฺตโมคฺคลฺลาเนสุ จิตฺตํ อาฆาเตตฺวา’’ติ. อิทมโวจ ภควา, อิทํ วตฺวาน สุคโต อถาปรํ เอตทโวจ สตฺถา – “भिक्षु! जैसे कोसल देश की बीस 'खारी' (एक माप) तिल की एक गाड़ी हो। उसमें से कोई पुरुष प्रत्येक सौ वर्ष बीतने पर एक-एक तिल निकाले; तो भिक्षु! इस विधि से वह कोसल की बीस खारी तिल की गाड़ी जल्दी खाली हो जाएगी, समाप्त हो जाएगी, किंतु एक 'अब्बुद' निरय समाप्त नहीं होगा। भिक्षु! जैसे बीस अब्बुद निरय होते हैं, वैसा एक 'निरब्बुद' निरय होता है। जैसे बीस निरब्बुद निरय होते हैं, वैसा एक 'अबब' निरय होता है। जैसे बीस अबब निरय होते हैं, वैसा एक 'अटट' निरय होता है। जैसे बीस अटट निरय होते हैं, वैसा एक 'अहह' निरय होता है। जैसे बीस अहह निरय होते हैं, वैसा एक 'कुमुद' निरय होता है। जैसे बीस कुमुद निरय होते हैं, वैसा एक 'सोगन्धिक' निरय होता है। जैसे बीस सोगन्धिक निरय होते हैं, वैसा एक 'उप्पल' निरय होता है। जैसे बीस उप्पल निरय होते हैं, वैसा एक 'पुण्डरीक' निरय होता है। जैसे बीस पुण्डरीक निरय होते हैं, वैसा एक 'पदुम' निरय होता है। भिक्षु! कोकालिक भिक्षु सारिपुत्र और मोग्गल्लान के प्रति मन में द्वेष रखने के कारण उसी पदुम निरय में उत्पन्न हुआ है।” भगवान ने यह कहा। यह कहकर सुगत शास्ता ने फिर यह कहा— ‘‘ปุริสสฺส หิ ชาตสฺส,กุฐารี ชายเต มุเข; ยาย ฉินฺทติ อตฺตานํ,พาโล ทุพฺภาสิตํ ภณํ. “निश्चित ही, उत्पन्न हुए मनुष्य के मुख में कुल्हाड़ी पैदा होती है; जिससे वह मूर्ख, अपशब्द (दुर्भाषित) बोलते हुए स्वयं को ही काट डालता है।” ‘‘โย นินฺทิยํ ปสํสติ,ตํ วา นินฺทติ โย ปสํสิโย; วิจินาติ มุเขน โส กลึ,กลินา เตน สุขํ น วินฺทติ. “जो निंदा के योग्य की प्रशंसा करता है, या जो प्रशंसा के योग्य है उसकी निंदा करता है; वह अपने मुख से पाप (कलि) का संचय करता है, और उस पाप के कारण वह सुख प्राप्त नहीं करता।” ‘‘อปฺปมตฺตโก อยํ กลิ,โย อกฺเขสุ ธนปราชโย; สพฺพสฺสาปิ สหาปิ อตฺตนา,อยเมว มหนฺตโร กลิ; โย สุคเตสุ มนํ ปโทสเย. “जुआ खेलने में जो धन की हार होती है, वह पाप (कलि) तो बहुत थोड़ा है; यहाँ तक कि अपना सर्वस्व और स्वयं को भी हार जाना (छोटा पाप है), किंतु जो सुगतों (बुद्धों/महापुरुषों) के प्रति मन में द्वेष करता है, वही सबसे बड़ा पाप है।” ‘‘สตํ สหสฺสานํ นิรพฺพุทานํ,ฉตฺตึสติ ปญฺจ จ อพฺพุทานิ; ยมริยครหี นิรยํ อุเปติ,วาจํ มนญฺจ ปณิธาย ปาปก’’นฺติ. “एक लाख छत्तीस हजार निरब्बुद और पाँच अब्बुद वर्षों तक वह मूर्ख नरक में रहता है, जो पापपूर्ण वाणी और मन के साथ आर्यों की निंदा करता है।” ปฐโม วคฺโค. प्रथम वर्ग समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसकी विषय-सूची (उद्दान)— อายาจนํ [Pg.155] คารโว พฺรหฺมเทโว,พโก จ พฺรหฺมา อปรา จ ทิฏฺฐิ; ปมาทโกกาลิกติสฺสโก จ,ตุรู จ พฺรหฺมา อปโร จ โกกาลิโกติ. आयाचन, गारव, ब्रह्मदेव, बक ब्रह्मा, और दूसरा दिट्ठि सुत्त; पमाद, कोकालिक, तिस्सक, तुरु ब्रह्मा और दूसरा कोकालिक सुत्त—ये दस सुत्त हैं। ๒. ทุติยวคฺโค २. द्वितीय वर्ग ๑. สนงฺกุมารสุตฺตํ १. सनंकुमार सुत्त ๑๘๒. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ สปฺปินีตีเร. อถ โข พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺโณ เกวลกปฺปํ สปฺปินีตีรํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – १८२. ऐसा मैंने सुना—एक समय भगवान राजगृह में सप्पिनी नदी के तट पर विहार कर रहे थे। तब ब्रह्मा सनंकुमार, रात बीतने पर (मध्यरात्रि में), अत्यंत सुंदर आभा के साथ संपूर्ण सप्पिनी तट को आलोकित करते हुए भगवान के पास आए; आकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े होकर ब्रह्मा सनंकुमार ने भगवान के सम्मुख यह गाथा कही— ‘‘ขตฺติโย เสฏฺโฐ ชเนตสฺมึ, เย โคตฺตปฏิสาริโน; วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน, โส เสฏฺโฐ เทวมานุเส’’ติ. “मनुष्यों में, जो कुल-गोत्र को मानने वाले हैं, उनमें क्षत्रिय श्रेष्ठ है; किंतु जो विद्या और आचरण से संपन्न है, वही देवों और मनुष्यों में श्रेष्ठ है।” อิทมโวจ พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร. สมนุญฺโญ สตฺถา อโหสิ. อถ โข พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร ‘‘สมนุญฺโญ เม สตฺถา’’ติ ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายีติ. ब्रह्मा सनंकुमार ने यह कहा। शास्ता (बुद्ध) ने इसका अनुमोदन किया। तब ब्रह्मा सनंकुमार ने यह जानकर कि “शास्ता ने मेरा अनुमोदन किया है”, भगवान को अभिवादन किया और प्रदक्षिणा कर वहीं अंतर्ध्यान हो गए। ๒. เทวทตฺตสุตฺตํ २. देवदत्त सुत्त ๑๘๓. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ คิชฺฌกูเฏ ปพฺพเต อจิรปกฺกนฺเต เทวทตฺเต. อถ โข พฺรหฺมา สหมฺปติ อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺโณ เกวลกปฺปํ คิชฺฌกูฏํ ปพฺพตํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข พฺรหฺมา สหมฺปติ เทวทตฺตํ อารพฺภ ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – १८३. ऐसा मैंने सुना—एक समय भगवान राजगृह में गृध्रकूट पर्वत पर विहार कर रहे थे, देवदत्त के (संघ छोड़कर) चले जाने के कुछ ही समय बाद। तब ब्रह्मा सहम्पति, रात बीतने पर, अत्यंत सुंदर आभा के साथ संपूर्ण गृध्रकूट पर्वत को आलोकित करते हुए भगवान के पास आए; आकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े होकर ब्रह्मा सहम्पति ने देवदत्त के विषय में भगवान के सम्मुख यह गाथा कही— ‘‘ผลํ [Pg.156] เว กทลึ หนฺติ, ผลํ เวฬุํ ผลํ นฬํ; สกฺกาโร กาปุริสํ หนฺติ, คพฺโภ อสฺสตรึ ยถา’’ติ. “निश्चित ही, फल केले के पेड़ को नष्ट कर देता है, फल बाँस को और फल नरकुल को नष्ट कर देता है; वैसे ही सत्कार (पूजा-प्रतिष्ठा) नीच पुरुष को नष्ट कर देता है, जैसे गर्भ खच्चरी को नष्ट कर देता है।” ๓. อนฺธกวินฺทสุตฺตํ ३. अन्धकविन्द सुत्त ๑๘๔. เอกํ สมยํ ภควา มาคเธสุ วิหรติ อนฺธกวินฺเท. เตน โข ปน สมเยน ภควา รตฺตนฺธการติมิสายํ อพฺโภกาเส นิสินฺโน โหติ, เทโว จ เอกเมกํ ผุสายติ. อถ โข พฺรหฺมา สหมฺปติ อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺโณ เกวลกปฺปํ อนฺธกวินฺทํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข พฺรหฺมา สหมฺปติ ภควโต สนฺติเก อิมา คาถาโย อภาสิ – १८४. एक समय भगवान मगध देश के अन्धकविन्द गाँव में विहार कर रहे थे। उस समय भगवान रात के घने अंधकार में खुले आकाश के नीचे बैठे थे और हल्की वर्षा (बूंदाबांदी) हो रही थी। तब ब्रह्मा सहम्पति, रात बीतने पर, अत्यंत सुंदर आभा के साथ संपूर्ण अन्धकविन्द को आलोकित करते हुए भगवान के पास आए; आकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े होकर ब्रह्मा सहम्पति ने भगवान के सम्मुख ये गाथाएँ कहीं— ‘‘เสเวถ ปนฺตานิ เสนาสนานิ,จเรยฺย สํโยชนวิปฺปโมกฺขา; สเจ รตึ นาธิคจฺเฉยฺย ตตฺถ,สงฺเฆ วเส รกฺขิตตฺโต สตีมา. “भिक्षु को एकांत शयनासनों का सेवन करना चाहिए और संयोजनों से मुक्ति के लिए साधना करनी चाहिए। यदि वहाँ (एकांत में) मन न लगे, तो संयमित होकर और स्मृतिवान (सजग) रहकर संघ में निवास करना चाहिए।” ‘‘กุลากุลํ ปิณฺฑิกาย จรนฺโต,อินฺทฺริยคุตฺโต นิปโก สตีมา; เสเวถ ปนฺตานิ เสนาสนานิ,ภยา ปมุตฺโต อภเย วิมุตฺโต. “भिक्षा के लिए घर-घर जाते हुए, इंद्रियों को संयमित रखकर, बुद्धिमान और स्मृतिवान होकर, भय (संसार के दुखों) से मुक्त और अभय (निर्वाण) में विमुक्त होकर पुनः एकांत शयनासनों का सेवन करना चाहिए।” ‘‘ยตฺถ เภรวา สรีสปา,วิชฺชุ สญฺจรติ ถนยติ เทโว; อนฺธการติมิสาย รตฺติยา,นิสีทิ ตตฺถ ภิกฺขุ วิคตโลมหํโส. “जहाँ भयानक हिंसक पशु और सर्प आदि हों, जहाँ रात के घने अंधकार में बिजली चमकती हो और बादल गरजते हों, वहाँ भिक्षु को बिना रोमांचित हुए (बिना डरे) स्थिर होकर बैठना चाहिए।” ‘‘อิทญฺหิ ชาตุ เม ทิฏฺฐํ, นยิทํ อิติหีติหํ; เอกสฺมึ พฺรหฺมจริยสฺมึ, สหสฺสํ มจฺจุหายินํ. निश्चित ही यह मेरे द्वारा देखा गया है, यह केवल सुनी-सुनाई बात नहीं है; एक ही धर्म-सभा (ब्रह्मचर्य) में मृत्यु को त्यागने वाले (अर्हतों) की संख्या एक हजार थी। ‘‘ภิยฺโย ปญฺจสตา เสกฺขา, ทสา จ ทสธา ทส; สพฺเพ โสตสมาปนฺนา, อติรจฺฉานคามิโน. पाँच सौ से अधिक शैक्ष (साधक) और एक सौ दस अन्य थे; वे सभी स्रोत-आपन्न (सोतापन्न) थे, जो दुर्गति (अपाय) में नहीं जाने वाले थे। ‘‘อถายํ [Pg.157] อิตรา ปชา, ปุญฺญภาคาติ เม มโน; สงฺขาตุํ โนปิ สกฺโกมิ, มุสาวาทสฺส โอตฺตป’’นฺติ. इसके अतिरिक्त अन्य जो प्रजा (प्राणी) पुण्य के भागी हैं, उन्हें गिनने में मैं समर्थ नहीं हूँ, क्योंकि मुझे मृषावाद (असत्य बोलने) का भय है। ๔. อรุณวตีสุตฺตํ ४. ४. अरुणवती सुत्त ๑๘๕. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ…เป… ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ภิกฺขโว’’ติ. ‘‘ภทนฺเต’’ติ เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – १८५. ऐसा मैंने सुना है—एक समय भगवान श्रावस्ती में विहार कर रहे थे... वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— 'हे भिक्षुओं!' उन भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया— 'भदन्त!' भगवान ने यह कहा— ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, ราชา อโหสิ อรุณวา นาม. รญฺโญ โข ปน, ภิกฺขเว, อรุณวโต อรุณวตี นาม ราชธานี อโหสิ. อรุณวตึ โข ปน, ภิกฺขเว, ราชธานึ สิขี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ อุปนิสฺสาย วิหาสิ. สิขิสฺส โข ปน, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อภิภูสมฺภวํ นาม สาวกยุคํ อโหสิ อคฺคํ ภทฺทยุคํ. อถ โข, ภิกฺขเว, สิขี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ อภิภุํ ภิกฺขุํ อามนฺเตสิ – ‘อายาม, พฺราหฺมณ, เยน อญฺญตโร พฺรหฺมโลโก เตนุปสงฺกมิสฺสาม, ยาว ภตฺตสฺส กาโล ภวิสฺสตี’ติ. ‘เอวํ, ภนฺเต’ติ โข ภิกฺขเว, อภิภู ภิกฺขุ สิขิสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ปจฺจสฺโสสิ. อถ โข, ภิกฺขเว, สิขี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ อภิภู จ ภิกฺขุ – เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย, ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย เอวเมว – อรุณวติยา ราชธานิยา อนฺตรหิตา ตสฺมึ พฺรหฺมโลเก ปาตุรเหสุํ. भिक्षुओं! प्राचीन काल में अरुणवा नाम के एक राजा थे। भिक्षुओं! राजा अरुणवा की अरुणवती नाम की राजधानी थी। भिक्षुओं! अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध शिखी भगवान अरुणवती राजधानी के आश्रय में विहार करते थे। भिक्षुओं! अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध शिखी भगवान के अभिभू और सम्भव नाम के शिष्यों की एक श्रेष्ठ और उत्तम जोड़ी थी। तब भिक्षुओं! अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध शिखी भगवान ने अभिभू भिक्षु को संबोधित किया— 'आओ ब्राह्मण! जहाँ कोई ब्रह्मलोक है, वहाँ हम चलें, जब तक कि भोजन का समय न हो जाए।' भिक्षुओं! अभिभू भिक्षु ने शिखी भगवान को उत्तर दिया— 'जी भदन्त!' तब भिक्षुओं! शिखी भगवान और अभिभू भिक्षु—जैसे कोई बलवान पुरुष अपनी मुड़ी हुई भुजा को फैलाए या फैली हुई भुजा को सिकोड़े—वैसे ही अरुणवती राजधानी से अंतर्धान होकर उस ब्रह्मलोक में प्रकट हो गए। ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, สิขี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ อภิภุํ ภิกฺขุํ อามนฺเตสิ – ‘ปฏิภาตุ, พฺราหฺมณ, ตํ พฺรหฺมุโน จ พฺรหฺมปริสาย จ พฺรหฺมปาริสชฺชานญฺจ ธมฺมี กถา’ติ. ‘เอวํ, ภนฺเต’ติ โข, ภิกฺขเว, อภิภู ภิกฺขุ สิขิสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ปฏิสฺสุตฺวา, พฺรหฺมานญฺจ พฺรหฺมปริสญฺจ พฺรหฺมปาริสชฺเช จ ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสสิ สมาทเปสิ สมุตฺเตเชสิ สมฺปหํเสสิ. ตตฺร สุทํ, ภิกฺขเว, พฺรหฺมา จ พฺรหฺมปริสา จ พฺรหฺมปาริสชฺชา จ อุชฺฌายนฺติ ขิยฺยนฺติ วิปาเจนฺติ – ‘อจฺฉริยํ วต[Pg.158], โภ, อพฺภุตํ วต โภ, กถญฺหิ นาม สตฺถริ สมฺมุขีภูเต สาวโก ธมฺมํ เทเสสฺสตี’’’ติ! तब भिक्षुओं! अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध शिखी भगवान ने अभिभू भिक्षु को संबोधित किया— 'ब्राह्मण! ब्रह्मा, ब्रह्म-परिषद और ब्रह्म-पार्षदों को धर्म-कथा सुनाना तुम्हारे ज्ञान में प्रतिभासित हो।' भिक्षुओं! अभिभू भिक्षु ने शिखी भगवान को 'जी भदन्त' कहकर उत्तर दिया और ब्रह्मा, ब्रह्म-परिषद तथा ब्रह्म-पार्षदों को धर्म-कथा द्वारा उपदेश दिया, उन्हें समाहित किया, उत्साहित किया और प्रसन्न किया। वहाँ भिक्षुओं! ब्रह्मा, ब्रह्म-परिषद और ब्रह्म-पार्षद दोष निकालने लगे, निंदा करने लगे और आलोचना करने लगे— 'आश्चर्य है भो! अद्भुत है भो! शास्ता (गुरु) के साक्षात् उपस्थित होने पर भी शिष्य धर्म का उपदेश कैसे दे सकता है!' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, สิขี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ อภิภุํ ภิกฺขุํ อามนฺเตสิ – ‘อุชฺฌายนฺติ โข เต, พฺราหฺมณ, พฺรหฺมา จ พฺรหฺมปริสา จ พฺรหฺมปาริสชฺชา จ – อจฺฉริยํ วต, โภ, อพฺภุตํ วต, โภ, กถญฺหิ นาม สตฺถริ สมฺมุขีภูเต สาวโก ธมฺมํ เทเสสฺสตีติ! เตน หิ ตฺวํ พฺราหฺมณ, ภิยฺโยโสมตฺตาย พฺรหฺมานญฺจ พฺรหฺมปริสญฺจ พฺรหฺมปาริสชฺเช จ สํเวเชหี’ติ. ‘เอวํ, ภนฺเต’ติ โข, ภิกฺขเว, อภิภู ภิกฺขุ สิขิสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ทิสฺสมาเนนปิ กาเยน ธมฺมํ เทเสสิ, อทิสฺสมาเนนปิ กาเยน ธมฺมํ เทเสสิ, ทิสฺสมาเนนปิ เหฏฺฐิเมน อุปฑฺฒกาเยน อทิสฺสมาเนน อุปริเมน อุปฑฺฒกาเยน ธมฺมํ เทเสสิ, ทิสฺสมาเนนปิ อุปริเมน อุปฑฺฒกาเยน อทิสฺสมาเนน เหฏฺฐิเมน อุปฑฺฒกาเยน ธมฺมํ เทเสสิ. ตตฺร สุทํ, ภิกฺขเว, พฺรหฺมา จ พฺรหฺมปริสา จ พฺรหฺมปาริสชฺชา จ อจฺฉริยพฺภุตจิตฺตชาตา อเหสุํ – ‘อจฺฉริยํ วต, โภ, อพฺภุตํ วต, โภ, สมณสฺส มหิทฺธิกตา มหานุภาวตา’’’ติ! तब भिक्षुओं! अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध शिखी भगवान ने अभिभू भिक्षु को संबोधित किया— 'ब्राह्मण! ब्रह्मा, ब्रह्म-परिषद और ब्रह्म-पार्षद तुम्हारी आलोचना कर रहे हैं कि शास्ता के साक्षात् उपस्थित होने पर भी शिष्य धर्म का उपदेश कैसे दे सकता है! इसलिए ब्राह्मण! तुम ब्रह्मा, ब्रह्म-परिषद और ब्रह्म-पार्षदों को और अधिक संवेगित (प्रभावित) करो।' भिक्षुओं! अभिभू भिक्षु ने शिखी भगवान को 'जी भदन्त' कहकर उत्तर दिया और दृश्य शरीर से भी धर्मोपदेश दिया, अदृश्य शरीर से भी धर्मोपदेश दिया, शरीर के निचले आधे भाग को दृश्य और ऊपरी आधे भाग को अदृश्य रखकर भी धर्मोपदेश दिया, तथा शरीर के ऊपरी आधे भाग को दृश्य और निचले आधे भाग को अदृश्य रखकर भी धर्मोपदेश दिया। वहाँ भिक्षुओं! ब्रह्मा, ब्रह्म-परिषद और ब्रह्म-पार्षद आश्चर्य और अद्भुत चित्त वाले हो गए— 'आश्चर्य है भो! अद्भुत है भो! श्रमण की कितनी बड़ी ऋद्धि है, कितना बड़ा प्रभाव है!' ‘‘อถ โข อภิภู ภิกฺขุ สิขึ ภควนฺตํ อรหนฺตํ สมฺมาสมฺพุทฺธํ เอตทโวจ – ‘อภิชานามิ ขฺวาหํ, ภนฺเต, ภิกฺขุสงฺฆสฺส มชฺเฌ เอวรูปึ วาจํ ภาสิตา – ปโหมิ ขฺวาหํ อาวุโส, พฺรหฺมโลเก ฐิโต สหสฺสิโลกธาตุํ สเรน วิญฺญาเปตุ’นฺติ. ‘เอตสฺส, พฺราหฺมณ, กาโล, เอตสฺส, พฺราหฺมณ, กาโล; ยํ ตฺวํ, พฺราหฺมณ, พฺรหฺมโลเก ฐิโต สหสฺสิโลกธาตุํ สเรน วิญฺญาเปยฺยาสี’ติ. ‘เอวํ, ภนฺเต’ติ โข, ภิกฺขเว, อภิภู ภิกฺขุ สิขิสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ปฏิสฺสุตฺวา พฺรหฺมโลเก ฐิโต อิมา คาถาโย อภาสิ – तब अभिभू भिक्षु ने अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध शिखी भगवान से यह कहा— 'भदन्त! मुझे याद है कि मैंने भिक्षु-संघ के मध्य में ऐसी बात कही थी— आयुष्मानों! मैं ब्रह्मलोक में स्थित होकर अपनी वाणी से एक हजार लोकधातुओं को सुनाने में समर्थ हूँ।' 'ब्राह्मण! यह उसका समय है, ब्राह्मण! यह उसका समय है; कि तुम ब्रह्मलोक में स्थित होकर अपनी वाणी से एक हजार लोकधातुओं को सुनाओ।' भिक्षुओं! अभिभू भिक्षु ने शिखी भगवान को 'जी भदन्त' कहकर उत्तर दिया और ब्रह्मलोक में स्थित होकर ये गाथाएँ कहीं— ‘‘อารมฺภถ นิกฺกมถ, ยุญฺชถ พุทฺธสาสเน; ธุนาถ มจฺจุโน เสนํ, นฬาคารํว กุญฺชโร. आरंभ करो, निष्क्रमण करो, बुद्ध के शासन में स्वयं को लगाओ; मृत्यु की सेना (क्लेशों) को वैसे ही नष्ट कर दो, जैसे हाथी सरकंडों के घर को कुचल देता है। ‘‘โย อิมสฺมึ ธมฺมวินเย, อปฺปมตฺโต วิหสฺสติ; ปหาย ชาติสํสารํ, ทุกฺขสฺสนฺตํ กริสฺสตี’’ติ. जो इस धर्म-विनय में अप्रमादी होकर विहार करेगा, वह जन्म-मरण के संसार को त्याग कर दुखों का अंत कर देगा। ‘‘อถ [Pg.159] โข, ภิกฺขเว, สิขี จ ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ อภิภู จ ภิกฺขุ พฺรหฺมานญฺจ พฺรหฺมปริสญฺจ พฺรหฺมปาริสชฺเช จ สํเวเชตฺวา – เสยฺยถาปิ นาม…เป… ตสฺมึ พฺรหฺมโลเก อนฺตรหิตา อรุณวติยา ราชธานิยา ปาตุรเหสุํ. อถ โข, ภิกฺขเว, สิขี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘อสฺสุตฺถ โน, ตุมฺเห, ภิกฺขเว, อภิภุสฺส ภิกฺขุโน พฺรหฺมโลเก ฐิตสฺส คาถาโย ภาสมานสฺสา’ติ? ‘อสฺสุมฺห โข มยํ, ภนฺเต, อภิภุสฺส ภิกฺขุโน พฺรหฺมโลเก ฐิตสฺส คาถาโย ภาสมานสฺสา’ติ. ‘ยถา กถํ ปน ตุมฺเห, ภิกฺขเว, อสฺสุตฺถ อภิภุสฺส ภิกฺขุโน พฺรหฺมโลเก ฐิตสฺส คาถาโย ภาสมานสฺสา’’’ติ? เอวํ โข มยํ, ภนฺเต, อสฺสุมฺห อภิภุสฺส ภิกฺขุโน พฺรหฺมโลเก ฐิตสฺส คาถาโย ภาสมานสฺส – तब, भिक्षुओं! अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध शिखी भगवान और अभिभू भिक्षु ने ब्रह्मा, ब्रह्म-परिषद और ब्रह्म-पार्षदों को संवेजित (प्रेरित) कर—जैसे कि... आदि... उस ब्रह्मलोक से अंतर्धान होकर अरुणवती राजधानी में प्रकट हुए। तब, भिक्षुओं! अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध शिखी भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— 'भिक्षुओं! क्या तुमने ब्रह्मलोक में स्थित अभिभू भिक्षु द्वारा गाई गई गाथाओं को सुना?' 'हाँ, भन्ते! हमने ब्रह्मलोक में स्थित अभिभू भिक्षु द्वारा गाई गई गाथाओं को सुना।' 'भिक्षुओं! तुमने ब्रह्मलोक में स्थित अभिभू भिक्षु द्वारा गाई गई गाथाओं को किस प्रकार सुना?' 'भन्ते! हमने ब्रह्मलोक में स्थित अभिभू भिक्षु द्वारा गाई गई गाथाओं को इस प्रकार सुना—' ‘‘อารมฺภถ นิกฺกมถ, ยุญฺชถ พุทฺธสาสเน; ธุนาถ มจฺจุโน เสนํ, นฬาคารํว กุญฺชโร. 'आरम्भ करो, निष्क्रमण करो, बुद्ध के शासन में स्वयं को लगाओ; मृत्यु की सेना को वैसे ही नष्ट कर दो, जैसे हाथी नरकुल (घास) के घर को कुचल देता है। ‘‘โย อิมสฺมึ ธมฺมวินเย, อปฺปมตฺโต วิหสฺสติ; ปหาย ชาติสํสารํ, ทุกฺขสฺสนฺตํ กริสฺสตี’’ติ. जो इस धर्म-विनय में अप्रमादी होकर विहार करेगा, वह जन्म-मरण के संसार को त्याग कर दुखों का अंत कर देगा।' ‘‘‘เอวํ โข มยํ, ภนฺเต, อสฺสุมฺห อภิภุสฺส ภิกฺขุโน พฺรหฺมโลเก ฐิตสฺส คาถาโย ภาสมานสฺสา’ติ. ‘สาธุ สาธุ, ภิกฺขเว; สาธุ โข ตุมฺเห, ภิกฺขเว! อสฺสุตฺถ อภิภุสฺส ภิกฺขุโน พฺรหฺมโลเก ฐิตสฺส คาถาโย ภาสมานสฺสา’’’ติ. 'भन्ते! हमने ब्रह्मलोक में स्थित अभिभू भिक्षु द्वारा गाई गई गाथाओं को इसी प्रकार सुना।' 'साधु! साधु! भिक्षुओं! यह बहुत अच्छा है कि तुमने ब्रह्मलोक में स्थित अभिभू भिक्षु द्वारा गाई गई गाथाओं को सुना।' อิทมโวจ ภควา, อตฺตมนา เต ภิกฺขู ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทุนฺติ. भगवान ने यह कहा। उन भिक्षुओं ने प्रसन्न होकर भगवान के प्रवचन का अभिनंदन किया। ๕. ปรินิพฺพานสุตฺตํ ५. परिनिब्बान सुत्त ๑๘๖. เอกํ สมยํ ภควา กุสินารายํ วิหรติ อุปวตฺตเน มลฺลานํ สาลวเน อนฺตเรน ยมกสาลานํ ปรินิพฺพานสมเย. อถ โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘หนฺท ทานิ, ภิกฺขเว, อามนฺตยามิ โว – ‘วยธมฺมา สงฺขารา, อปฺปมาเทน สมฺปาเทถา’ติ. อยํ ตถาคตสฺส ปจฺฉิมา วาจา’’. १८६. एक समय भगवान कुशीनारा में मल्लों के उपवत्तन नामक शालवन में दो यमक शाल वृक्षों के बीच परिनिर्वाण के समय विहार कर रहे थे। तब भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— 'भिक्षुओं! अब मैं तुम्हें संबोधित करता हूँ— संस्कार व्ययधर्मी (नष्ट होने वाले) हैं, अप्रमाद के साथ (अपने लक्ष्य को) सिद्ध करो।' यह तथागत के अंतिम वचन थे। อถ [Pg.160] โข ภควา ปฐมํ ฌานํ สมาปชฺชิ. ปฐมา ฌานา วุฏฺฐหิตฺวา ทุติยํ ฌานํ สมาปชฺชิ. ทุติยา ฌานา วุฏฺฐหิตฺวา ตติยํ ฌานํ สมาปชฺชิ. ตติยา ฌานา วุฏฺฐหิตฺวา จตุตฺถํ ฌานํ สมาปชฺชิ. จตุตฺถา ฌานา วุฏฺฐหิตฺวา อากาสานญฺจายตนํ สมาปชฺชิ. อากาสานญฺจายตนา วุฏฺฐหิตฺวา วิญฺญาณญฺจายตนํ สมาปชฺชิ. วิญฺญาณญฺจายตนา วุฏฺฐหิตฺวา อากิญฺจญฺญายตนํ สมาปชฺชิ. อากิญฺจญฺญายตนา วุฏฺฐหิตฺวา เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ สมาปชฺชิ. เนวสญฺญานาสญฺญายตนา วุฏฺฐหิตฺวา สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปชฺชิ. तब भगवान प्रथम ध्यान में समाहित हुए। प्रथम ध्यान से उठकर द्वितीय ध्यान में समाहित हुए। द्वितीय ध्यान से उठकर तृतीय ध्यान में समाहित हुए। तृतीय ध्यान से उठकर चतुर्थ ध्यान में समाहित हुए। चतुर्थ ध्यान से उठकर आकाशानन्त्यायतन में समाहित हुए। आकाशानन्त्यायतन से उठकर विज्ञानानन्त्यायतन में समाहित हुए। विज्ञानानन्त्यायतन से उठकर आकिंचन्यायतन में समाहित हुए। आकिंचन्यायतन से उठकर नैवसंज्ञानासंज्ञायतन में समाहित हुए। नैवसंज्ञानासंज्ञायतन से उठकर संज्ञा-वेदयित-निरोध (निरोध समापत्ति) में समाहित हुए। สญฺญาเวทยิตนิโรธา วุฏฺฐหิตฺวา เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ สมาปชฺชิ. เนวสญฺญานาสญฺญายตนา วุฏฺฐหิตฺวา อากิญฺจญฺญายตนํ สมาปชฺชิ. อากิญฺจญฺญายตนา วุฏฺฐหิตฺวา วิญฺญาณญฺจายตนํ สมาปชฺชิ. วิญฺญาณญฺจายตนา วุฏฺฐหิตฺวา อากาสานญฺจายตนํ สมาปชฺชิ. อากาสานญฺจายตนา วุฏฺฐหิตฺวา จตุตฺถํ ฌานํ สมาปชฺชิ. จตุตฺถา ฌานา วุฏฺฐหิตฺวา ตติยํ ฌานํ สมาปชฺชิ. ตติยา ฌานา วุฏฺฐหิตฺวา ทุติยํ ฌานํ สมาปชฺชิ. ทุติยา ฌานา วุฏฺฐหิตฺวา ปฐมํ ฌานํ สมาปชฺชิ. ปฐมา ฌานา วุฏฺฐหิตฺวา ทุติยํ ฌานํ สมาปชฺชิ. ทุติยา ฌานา วุฏฺฐหิตฺวา ตติยํ ฌานํ สมาปชฺชิ. ตติยา ฌานา วุฏฺฐหิตฺวา จตุตฺถํ ฌานํ สมาปชฺชิ. จตุตฺถา ฌานา วุฏฺฐหิตฺวา สมนนฺตรํ ภควา ปรินิพฺพายิ. ปรินิพฺพุเต ภควติ สห ปรินิพฺพานา พฺรหฺมา สหมฺปติ อิมํ คาถํ อภาสิ – संज्ञा-वेदयित-निरोध से उठकर नैवसंज्ञानासंज्ञायतन में समाहित हुए। नैवसंज्ञानासंज्ञायतन से उठकर आकिंचन्यायतन में समाहित हुए। आकिंचन्यायतन से उठकर विज्ञानानन्त्यायतन में समाहित हुए। विज्ञानानन्त्यायतन से उठकर आकाशानन्त्यायतन में समाहित हुए। आकाशानन्त्यायतन से उठकर चतुर्थ ध्यान में समाहित हुए। चतुर्थ ध्यान से उठकर तृतीय ध्यान में समाहित हुए। तृतीय ध्यान से उठकर द्वितीय ध्यान में समाहित हुए। द्वितीय ध्यान से उठकर प्रथम ध्यान में समाहित हुए। प्रथम ध्यान से उठकर द्वितीय ध्यान में समाहित हुए। द्वितीय ध्यान से उठकर तृतीय ध्यान में समाहित हुए। तृतीय ध्यान से उठकर चतुर्थ ध्यान में समाहित हुए। चतुर्थ ध्यान के तुरंत बाद भगवान परिनिर्वाण को प्राप्त हुए। भगवान के परिनिर्वाण प्राप्त करने पर, परिनिर्वाण के साथ ही ब्रह्मा सहम्पति ने यह गाथा कही— ‘‘สพฺเพว นิกฺขิปิสฺสนฺติ, ภูตา โลเก สมุสฺสยํ; ยตฺถ เอตาทิโส สตฺถา, โลเก อปฺปฏิปุคฺคโล; ตถาคโต พลปฺปตฺโต, สมฺพุทฺโธ ปรินิพฺพุโต’’ติ. 'इस लोक में सभी प्राणी अपने शरीर (समुच्चय) को त्याग देंगे; जहाँ ऐसे शास्ता, जो लोक में अद्वितीय हैं, बल-प्राप्त तथागत सम्यक्सम्बुद्ध भी परिनिर्वाण को प्राप्त हो गए।' ปรินิพฺพุเต ภควติ สห ปรินิพฺพานา สกฺโก เทวานมินฺโท อิมํ คาถํ อภาสิ – भगवान के परिनिर्वाण प्राप्त करने पर, परिनिर्वाण के साथ ही देवराज शक्र ने यह गाथा कही— ‘‘อนิจฺจา วต สงฺขารา, อุปฺปาทวยธมฺมิโน; อุปฺปชฺชิตฺวา นิรุชฺฌนฺติ, เตสํ วูปสโม สุโข’’ติ. 'निश्चित ही संस्कार अनित्य हैं, वे उत्पन्न होने और नष्ट होने के स्वभाव वाले हैं। उत्पन्न होकर वे निरुद्ध हो जाते हैं, उनका उपशम (शांत होना) ही सुख है।' ปรินิพฺพุเต [Pg.161] ภควติ สห ปรินิพฺพานา อายสฺมา อานนฺโท อิมํ คาถํ อภาสิ – भगवान के परिनिर्वाण प्राप्त करने पर, परिनिर्वाण के साथ ही आयुष्मान आनंद ने यह गाथा कही— ‘‘ตทาสิ ยํ ภึสนกํ, ตทาสิ โลมหํสนํ; สพฺพาการวรูเปเต, สมฺพุทฺเธ ปรินิพฺพุเต’’ติ. 'तब वह भयानक था, तब वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था; जब सभी उत्तम गुणों से संपन्न सम्यक्सम्बुद्ध परिनिर्वाण को प्राप्त हुए।' ปรินิพฺพุเต ภควติ สห ปรินิพฺพานา อายสฺมา อนุรุทฺโธ อิมา คาถาโย อภาสิ – भगवान के परिनिर्वाण प्राप्त करने पर, परिनिर्वाण के साथ ही आयुष्मान अनिरुद्ध ने ये गाथाएँ कहीं— ‘‘นาหุ อสฺสาสปสฺสาโส, ฐิตจิตฺตสฺส ตาทิโน; อเนโช สนฺติมารพฺภ, จกฺขุมา ปรินิพฺพุโต. 'स्थिर चित्त वाले, उस तादी (अचल) पुरुष की श्वास-प्रश्वास रुक गई; वे तृष्णा-रहित चक्षुमान (बुद्ध) शांति (निर्वाण) के उद्देश्य से परिनिर्वाण को प्राप्त हुए। ‘‘อสลฺลีเนน จิตฺเตน, เวทนํ อชฺฌวาสยิ; ปชฺโชตสฺเสว นิพฺพานํ, วิโมกฺโข เจตโส อหู’’ติ. अदीन (अविचलित) चित्त से उन्होंने वेदना को सहन किया; जैसे दीपक बुझ जाता है, वैसे ही उनके चित्त का विमोक्ष (मुक्ति) हुआ।' ทุติโย วคฺโค. द्वितीय वर्ग। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान)— พฺรหฺมาสนํ เทวทตฺโต, อนฺธกวินฺโท อรุณวตี; ปรินิพฺพาเนน จ เทสิตํ, อิทํ พฺรหฺมปญฺจกนฺติ. ब्रह्मासन, देवदत्त, अन्धकविन्द, अरुणवती और परिनिर्वाण के साथ उपदिष्ट यह ब्रह्म-पंचक है। พฺรหฺมสํยุตฺตํ สมตฺตํ. ब्रह्म-संयुत्त समाप्त। ๗. พฺราหฺมณสํยุตฺตํ ७. ब्राह्मण-संयुत्त ๑. อรหนฺตวคฺโค १. अर्हत् वर्ग ๑. ธนญฺชานีสุตฺตํ १. धनंजानी सुत्त ๑๘๗. เอวํ [Pg.162] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. เตน โข ปน สมเยน อญฺญตรสฺส ภารทฺวาชโคตฺตสฺส พฺราหฺมณสฺส ธนญฺชานี นาม พฺราหฺมณี อภิปฺปสนฺนา โหติ พุทฺเธ จ ธมฺเม จ สงฺเฆ จ. อถ โข ธนญฺชานี พฺราหฺมณี ภารทฺวาชโคตฺตสฺส พฺราหฺมณสฺส ภตฺตํ อุปสํหรนฺตี อุปกฺขลิตฺวา ติกฺขตฺตุํ อุทานํ อุทาเนสิ – १८७. ऐसा मैंने सुना— एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दक-निवाप में विहार कर रहे थे। उस समय भारद्वाज गोत्र के एक ब्राह्मण की धनंजानी नामक ब्राह्मणी बुद्ध, धर्म और संघ में अत्यंत श्रद्धा रखती थी। तब धनंजानी ब्राह्मणी भारद्वाज गोत्र के ब्राह्मण के लिए भोजन लाते समय फिसल गई और उसने तीन बार यह उदान प्रकट किया— ‘‘นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส; นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส; นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺสา’’ติ. "उन भगवान, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध को नमस्कार। उन भगवान, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध को नमस्कार। उन भगवान, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध को नमस्कार।" เอวํ วุตฺเต, ภารทฺวาชโคตฺโต พฺราหฺมโณ ธนญฺชานึ พฺราหฺมณึ เอตทโวจ – ‘‘เอวเมวํ ปนายํ วสลี ยสฺมึ วา ตสฺมึ วา ตสฺส มุณฺฑกสฺส สมณสฺส วณฺณํ ภาสติ. อิทานิ ตฺยาหํ, วสลิ, ตสฺส สตฺถุโน วาทํ อาโรเปสฺสามี’’ติ. ‘‘น ขฺวาหํ ตํ, พฺราหฺมณ, ปสฺสามิ สเทวเก โลเก สมารเก สพฺรหฺมเก สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย, โย ตสฺส ภควโต วาทํ อาโรเปยฺย อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส. อปิ จ ตฺวํ, พฺราหฺมณ, คจฺฉ, คนฺตฺวา วิชานิสฺสสี’’ติ. ऐसा कहने पर, भारद्वाज गोत्र के ब्राह्मण ने धनञ्जानी ब्राह्मणी से यह कहा— "यह नीच स्त्री (वृषली) हर अवसर पर उस मुण्डक श्रमण (मुँडे हुए सिर वाले श्रमण) की प्रशंसा करती है। हे वृषली! अब मैं तुम्हारे उस शास्ता (गुरु) के मत को चुनौती दूँगा।" (ब्राह्मणी ने कहा—) "हे ब्राह्मण! मैं देवों, मारों और ब्रह्मा सहित इस लोक में, श्रमणों और ब्राह्मणों सहित इस प्रजा में, तथा देवों और मनुष्यों के बीच ऐसा किसी को नहीं देखती जो उन अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध भगवान के मत को चुनौती दे सके। फिर भी, हे ब्राह्मण! आप जाएँ, जाकर स्वयं जान जाएँगे।" อถ โข ภารทฺวาชโคตฺโต พฺราหฺมโณ กุปิโต อนตฺตมโน เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ภารทฺวาชโคตฺโต พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब भारद्वाज गोत्र का वह ब्राह्मण क्रोधित और अप्रसन्न होकर जहाँ भगवान थे, वहाँ गया। पहुँचकर उसने भगवान के साथ कुशल-क्षेम पूछा। आनंददायक और स्मरणीय बातें करने के बाद वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए भारद्वाज गोत्र के ब्राह्मण ने भगवान को गाथा में संबोधित किया— ‘‘กึสุ เฉตฺวา สุขํ เสติ, กึสุ เฉตฺวา น โสจติ; กิสฺสสฺสุ เอกธมฺมสฺส, วธํ โรเจสิ โคตมา’’ติ. "हे गौतम! किसका विनाश करके मनुष्य सुख से सोता है? किसका विनाश करके वह शोक नहीं करता? आप किस एक धर्म के विनाश की प्रशंसा करते हैं?" ‘‘โกธํ [Pg.163] เฉตฺวา สุขํ เสติ, โกธํ เฉตฺวา น โสจติ; โกธสฺส วิสมูลสฺส, มธุรคฺคสฺส พฺราหฺมณ; วธํ อริยา ปสํสนฺติ, ตญฺหิ เฉตฺวา น โสจตี’’ติ. "हे ब्राह्मण! क्रोध का विनाश करके मनुष्य सुख से सोता है, क्रोध का विनाश करके वह शोक नहीं करता। विषैली जड़ वाले और मधुर अग्र (ऊपरी भाग) वाले क्रोध के विनाश की आर्य जन प्रशंसा करते हैं; क्योंकि उसका विनाश करके मनुष्य शोक नहीं करता।" เอวํ วุตฺเต, ภารทฺวาชโคตฺโต พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม, อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม! เสยฺยถาปิ, โภ โคตม, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย, ปฏิจฺฉนฺนํ วา วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย – จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตีติ; เอวเมวํ โภตา โคตเมน อเนกปริยาเยน ธมฺโม ปกาสิโต. เอสาหํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ โคตมํ สรณํ คจฺฉามิ ธมฺมญฺจ ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. ลเภยฺยาหํ โภโต โคตมสฺส สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, ลเภยฺยํ อุปสมฺปท’’นฺติ. ऐसा कहने पर, भारद्वाज गोत्र के ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा— "अति सुंदर, हे गौतम! अति सुंदर, हे गौतम! जैसे कोई औंधे हुए को सीधा कर दे, या ढके हुए को खोल दे, या राह भूले को रास्ता दिखा दे, या अंधकार में तेल का दीपक जला दे ताकि आँख वाले रूप को देख सकें; वैसे ही आप गौतम ने अनेक प्रकार से धर्म को प्रकाशित किया है। हे भन्ते! मैं उन भगवान गौतम, धर्म और भिक्षु संघ की शरण जाता हूँ। मैं भगवान गौतम के सान्निध्य में प्रव्रज्या और उपसम्पदा प्राप्त करना चाहता हूँ।" อลตฺถ โข ภารทฺวาชโคตฺโต พฺราหฺมโณ ภควโต สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, อลตฺถ อุปสมฺปทํ. อจิรูปสมฺปนฺโน โข ปนายสฺมา ภารทฺวาโช เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรนฺโต นจิรสฺเสว – ยสฺสตฺถาย กุลปุตฺตา สมฺมเทว อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชนฺติ ตทนุตฺตรํ – พฺรหฺมจริยปริโยสานํ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหาสิ. ‘‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’’ติ อพฺภญฺญาสิ. อญฺญตโร จ ปนายสฺมา ภารทฺวาโช อรหตํ อโหสีติ. भारद्वाज गोत्र के ब्राह्मण ने भगवान के सान्निध्य में प्रव्रज्या और उपसम्पदा प्राप्त की। उपसम्पदा प्राप्त करने के कुछ ही समय बाद, आयुष्मान् भारद्वाज अकेले, एकांत में, प्रमाद-रहित, उद्योगी और दृढ़निश्चयी होकर विहार करने लगे। जिस लक्ष्य के लिए कुलपुत्र घर से बेघर होकर प्रव्रजित होते हैं, उस अनुपम ब्रह्मचर्य की पूर्णता (अरहंत पद) को उन्होंने इसी जन्म में स्वयं के विशेष ज्ञान से जानकर, साक्षात्कार कर और प्राप्त कर विहार किया। उन्होंने जान लिया— 'जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है।' और आयुष्मान् भारद्वाज अरहंतों में से एक हो गए। ๒. อกฺโกสสุตฺตํ २. अक्कोस सुत्त ๑๘๘. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. อสฺโสสิ โข อกฺโกสกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ – ‘‘ภารทฺวาชโคตฺโต กิร พฺราหฺมโณ สมณสฺส โคตมสฺส สนฺติเก อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิโต’’ติ กุปิโต อนตฺตมโน เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อสพฺภาหิ ผรุสาหิ วาจาหิ อกฺโกสติ ปริภาสติ. १८८. एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन में कलन्दक-निवाप में विहार कर रहे थे। अक्कोसक भारद्वाज ब्राह्मण ने सुना कि भारद्वाज गोत्र का ब्राह्मण श्रमण गौतम के पास घर से बेघर होकर प्रव्रजित हो गया है। यह सुनकर वह क्रोधित और अप्रसन्न होकर जहाँ भगवान थे, वहाँ गया। पहुँचकर उसने भगवान को अभद्र और कठोर शब्दों में अपशब्द कहे और उन्हें धमकाया। เอวํ วุตฺเต, ภควา อกฺโกสกภารทฺวาชํ พฺราหฺมณํ เอตทโวจ – ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, พฺราหฺมณ, อปิ นุ โข เต อาคจฺฉนฺติ มิตฺตามจฺจา ญาติสาโลหิตา อติถิโย ’’ติ? ‘‘อปฺเปกทา เม, โภ โคตม, อาคจฺฉนฺติ มิตฺตามจฺจา [Pg.164] ญาติสาโลหิตา อติถิโย’’ติ. ‘‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, พฺราหฺมณ, อปิ นุ เตสํ อนุปฺปเทสิ ขาทนียํ วา โภชนียํ วา สายนียํ วา’’’ติ? ‘‘‘อปฺเปกทา เนสาหํ, โภ โคตม, อนุปฺปเทมิ ขาทนียํ วา โภชนียํ วา สายนียํ วา’’’ติ. ‘‘‘สเจ โข ปน เต, พฺราหฺมณ, นปฺปฏิคฺคณฺหนฺติ, กสฺส ตํ โหตี’’’ติ? ‘‘‘สเจ เต, โภ โคตม, นปฺปฏิคฺคณฺหนฺติ, อมฺหากเมว ตํ โหตี’’’ติ. ‘‘เอวเมว โข, พฺราหฺมณ, ยํ ตฺวํ อมฺเห อนกฺโกสนฺเต อกฺโกสสิ, อโรเสนฺเต โรเสสิ, อภณฺฑนฺเต ภณฺฑสิ, ตํ เต มยํ นปฺปฏิคฺคณฺหาม. ตเวเวตํ, พฺราหฺมณ, โหติ; ตเวเวตํ, พฺราหฺมณ, โหติ’’. ऐसा कहने पर, भगवान ने अक्कोसक भारद्वाज ब्राह्मण से यह कहा— "हे ब्राह्मण! तुम क्या सोचते हो? क्या तुम्हारे मित्र, साथी, नाते-रिश्तेदार और अतिथि तुम्हारे यहाँ आते हैं?" "हे गौतम! कभी-कभी मेरे मित्र, साथी, नाते-रिश्तेदार और अतिथि मेरे यहाँ आते हैं।" "हे ब्राह्मण! तुम क्या सोचते हो? क्या तुम उन्हें खाद्य, भोज्य या स्वाद्य पदार्थ देते हो?" "हे गौतम! कभी-कभी मैं उन्हें खाद्य, भोज्य या स्वाद्य पदार्थ देता हूँ।" "हे ब्राह्मण! यदि वे उसे स्वीकार न करें, तो वह किसका होता है?" "हे गौतम! यदि वे उसे स्वीकार न करें, तो वह हमारा ही होता है।" "इसी प्रकार, हे ब्राह्मण! हम जो गाली नहीं देते, तुम हमें गाली देते हो; हम जो क्रोध नहीं करते, तुम हम पर क्रोध करते हो; हम जो झगड़ा नहीं करते, तुम हमसे झगड़ा करते हो— उसे हम स्वीकार नहीं करते। हे ब्राह्मण! वह तुम्हारा ही है; हे ब्राह्मण! वह तुम्हारा ही है।" ‘‘โย โข, พฺราหฺมณ, อกฺโกสนฺตํ ปจฺจกฺโกสติ, โรเสนฺตํ ปฏิโรเสติ, ภณฺฑนฺตํ ปฏิภณฺฑติ, อยํ วุจฺจติ, พฺราหฺมณ, สมฺภุญฺชติ วีติหรตีติ. เต มยํ ตยา เนว สมฺภุญฺชาม น วีติหราม. ตเวเวตํ, พฺราหฺมณ, โหติ; ตเวเวตํ, พฺราหฺมณ, โหตี’’ติ. ‘‘ภวนฺตํ โข โคตมํ สราชิกา ปริสา เอวํ ชานาติ – ‘อรหํ สมโณ โคตโม’ติ. อถ จ ปน ภวํ โคตโม กุชฺฌตี’’ติ. "हे ब्राह्मण! जो गाली देने वाले को पलटकर गाली देता है, क्रोध करने वाले पर पलटकर क्रोध करता है, झगड़ने वाले से पलटकर झगड़ता है; उसे कहा जाता है कि वह उसके साथ भोजन कर रहा है, उसके साथ आदान-प्रदान कर रहा है। हम तुम्हारे साथ न तो भोजन कर रहे हैं और न ही आदान-प्रदान कर रहे हैं। हे ब्राह्मण! वह तुम्हारा ही है; हे ब्राह्मण! वह तुम्हारा ही है।" (ब्राह्मण ने कहा—) "राजा सहित यह परिषद भगवान गौतम को इस प्रकार जानती है कि 'श्रमण गौतम अरहंत हैं'। फिर भी आप गौतम क्रोध करते हैं?" ‘‘อกฺโกธสฺส กุโต โกโธ, ทนฺตสฺส สมชีวิโน; สมฺมทญฺญา วิมุตฺตสฺส, อุปสนฺตสฺส ตาทิโน. "जो क्रोध नहीं करता, जो संयमित है और धर्मानुसार जीवन जीता है, जो सम्यक् ज्ञान से मुक्त है, जो शांत है और समतावान (तादि) है— उसे क्रोध कहाँ से आएगा?" ‘‘ตสฺเสว เตน ปาปิโย, โย กุทฺธํ ปฏิกุชฺฌติ; กุทฺธํ อปฺปฏิกุชฺฌนฺโต, สงฺคามํ เชติ ทุชฺชยํ. "जो क्रोध करने वाले पर पलटकर क्रोध करता है, वह स्वयं ही बुरा हो जाता है। जो क्रोध करने वाले पर पलटकर क्रोध नहीं करता, वह उस संग्राम को जीत लेता है जिसे जीतना अत्यंत कठिन है।" ‘‘อุภินฺนมตฺถํ จรติ, อตฺตโน จ ปรสฺส จ; ปรํ สงฺกุปิตํ ญตฺวา, โย สโต อุปสมฺมติ. "वह अपने और दूसरे— दोनों के कल्याण के लिए आचरण करता है, जो दूसरे को क्रोधित जानकर स्मृतिवान होकर स्वयं शांत हो जाता है।" ‘‘อุภินฺนํ ติกิจฺฉนฺตานํ, อตฺตโน จ ปรสฺส จ; ชนา มญฺญนฺติ พาโลติ, เย ธมฺมสฺส อโกวิทา’’ติ. "जो अपने और दूसरे— दोनों की चिकित्सा करता है, उसे वे लोग मूर्ख समझते हैं जो धर्म के ज्ञाता नहीं हैं।" เอวํ วุตฺเต, อกฺโกสกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม…เป… เอสาหํ ภวนฺตํ โคตมํ สรณํ คจฺฉามิ ธมฺมญฺจ ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. ลเภยฺยาหํ, ภนฺเต, โภโต โคตมสฺส สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, ลเภยฺยํ อุปสมฺปท’’นฺติ. ऐसा कहे जाने पर, अक्कोसकभारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा— "अति सुंदर, हे गौतम! ... मैं आप गौतम की शरण में जाता हूँ, धर्म की और भिक्षु संघ की भी शरण में जाता हूँ। भन्ते! मैं आप गौतम के सान्निध्य में प्रव्रज्या प्राप्त करना चाहता हूँ, उपसंपदा प्राप्त करना चाहता हूँ।" อลตฺถ โข อกฺโกสกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ภควโต สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, อลตฺถ อุปสมฺปทํ. อจิรูปสมฺปนฺโน โข ปนายสฺมา อกฺโกสกภารทฺวาโช เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรนฺโต [Pg.165] นจิรสฺเสว – ยสฺสตฺถาย กุลปุตฺตา สมฺมเทว อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชนฺติ ตทนุตฺตรํ – พฺรหฺมจริยปริโยสานํ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหาสิ. ‘‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ นาปรํ อิตฺถตฺตายา’’ติ อพฺภญฺญาสิ. อญฺญตโร จ ปนายสฺมา ภารทฺวาโช อรหตํ อโหสีติ. अक्कोसकभारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान के सान्निध्य में प्रव्रज्या प्राप्त की, उपसंपदा प्राप्त की। उपसंपदा प्राप्त करने के कुछ ही समय बाद, आयुष्मान अक्कोसकभारद्वाज अकेले, एकांत में, अप्रमादी, उद्योगी और दृढ़निश्चयी होकर विहार करते हुए शीघ्र ही—जिसके लिए कुलपुत्र सम्यक रूप से घर से बेघर होकर प्रव्रजित होते हैं—उस अनुत्तर ब्रह्मचर्य की पूर्णता (अर्हत्व) को इसी जन्म में स्वयं अभिज्ञा द्वारा साक्षात् कर, उसमें प्रतिष्ठित होकर विहार करने लगे। उन्होंने जान लिया— "जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है।" और आयुष्मान भारद्वाज अर्हन्तों में से एक हो गए। ๓. อสุรินฺทกสุตฺตํ ३. असुरिन्दक सुत्त ๑๘๙. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. อสฺโสสิ โข อสุรินฺทกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ – ‘‘ภารทฺวาชโคตฺโต พฺราหฺมโณ กิร สมณสฺส โคตมสฺส สนฺติเก อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิโต’’ติ กุปิโต อนตฺตมโน เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อสพฺภาหิ ผรุสาหิ วาจาหิ อกฺโกสติ ปริภาสติ. เอวํ วุตฺเต, ภควา ตุณฺหี อโหสิ. อถ โข อสุรินฺทกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ชิโตสิ, สมณ, ชิโตสิ, สมณา’’ติ. १८९. एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दकनिवाप में विहार कर रहे थे। असुरिन्दकभारद्वाज ब्राह्मण ने सुना— "भारद्वाज गोत्र का ब्राह्मण श्रमण गौतम के सान्निध्य में घर से बेघर होकर प्रव्रजित हो गया है।" यह सुनकर वह क्रुद्ध और अप्रसन्न होकर जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान को अभद्र और कठोर वचनों से गाली देने लगा और अपशब्द कहने लगा। ऐसा कहे जाने पर भगवान मौन रहे। तब असुरिन्दकभारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा— "श्रमण! तुम हार गए, श्रमण! तुम हार गए।" ‘‘ชยํ เว มญฺญติ พาโล, วาจาย ผรุสํ ภณํ; ชยญฺเจวสฺส ตํ โหติ, ยา ติติกฺขา วิชานโต. "मूर्ख व्यक्ति कठोर वचन बोलकर समझता है कि वह जीत गया है; किंतु वास्तव में जीत उसी की होती है जो (सत्य को) जानते हुए क्षमा करता है।" ‘‘ตสฺเสว เตน ปาปิโย, โย กุทฺธํ ปฏิกุชฺฌติ; กุทฺธํ อปฺปฏิกุชฺฌนฺโต, สงฺคามํ เชติ ทุชฺชยํ. "जो क्रोध करने वाले पर प्रति-क्रोध करता है, वह स्वयं के लिए बुरा करता है; जो क्रोध करने वाले पर क्रोध नहीं करता, वह उस संग्राम को जीत लेता है जिसे जीतना कठिन है।" ‘‘อุภินฺนมตฺถํ จรติ, อตฺตโน จ ปรสฺส จ; ปรํ สงฺกุปิตํ ญตฺวา, โย สโต อุปสมฺมติ. "वह अपने और दूसरे, दोनों के कल्याण के लिए आचरण करता है; जो दूसरे को क्रुद्ध जानकर स्मृतिवान होकर शांत हो जाता है।" ‘‘อุภินฺนํ ติกิจฺฉนฺตานํ, อตฺตโน จ ปรสฺส จ; ชนา มญฺญนฺติ พาโลติ, เย ธมฺมสฺส อโกวิทา’’ติ. "जो अपने और दूसरे, दोनों की चिकित्सा (क्रोध का उपचार) करता है, उसे वे लोग मूर्ख समझते हैं जो धर्म में कुशल नहीं हैं।" เอวํ วุตฺเต, อสุรินฺทกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม…เป… อพฺภญฺญาสิ. อญฺญตโร จ ปนายสฺมา ภารทฺวาโช อรหตํ อโหสี’’ติ. ऐसा कहे जाने पर, असुरिन्दकभारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा— "अति सुंदर, हे गौतम! ... उन्होंने जान लिया। और आयुष्मान भारद्वाज अर्हन्तों में से एक हो गए।" ๔. พิลงฺคิกสุตฺตํ ४. बिलङ्गिक सुत्त ๑๙๐. เอกํ [Pg.166] สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. อสฺโสสิ โข พิลงฺคิกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ – ‘‘ภารทฺวาชโคตฺโต กิร พฺราหฺมโณ สมณสฺส โคตมสฺส สนฺติเก อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิโต’’ติ กุปิโต อนตฺตมโน เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตุณฺหีภูโต เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. อถ โข ภควา พิลงฺคิกสฺส ภารทฺวาชสฺส พฺราหฺมณสฺส เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย พิลงฺคิกํ ภารทฺวาชํ พฺราหฺมณํ คาถาย อชฺฌภาสิ – १९०. एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दकनिवाप में विहार कर रहे थे। बिलङ्गिकभारद्वाज ब्राह्मण ने सुना— "भारद्वाज गोत्र का ब्राह्मण श्रमण गौतम के सान्निध्य में घर से बेघर होकर प्रव्रजित हो गया है।" यह सुनकर वह क्रुद्ध और अप्रसन्न होकर जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचा; पहुँचकर मौन होकर एक ओर खड़ा हो गया। तब भगवान ने बिलङ्गिकभारद्वाज ब्राह्मण के मन के विचार को अपने चित्त से जानकर बिलङ्गिकभारद्वाज ब्राह्मण को गाथा में संबोधित किया— ‘‘โย อปฺปทุฏฺฐสฺส นรสฺส ทุสฺสติ,สุทฺธสฺส โปสสฺส อนงฺคณสฺส; ตเมว พาลํ ปจฺเจติ ปาปํ,สุขุโม รโช ปฏิวาตํว ขิตฺโต’’ติ. "जो व्यक्ति उस निर्दोष, शुद्ध और निष्पाप पुरुष (अर्हन्त) के प्रति अपराध करता है, वह पाप उसी मूर्ख को वापस मिलता है, जैसे हवा के विपरीत फेंकी गई सूक्ष्म धूल।" เอวํ วุตฺเต, วิลงฺคิกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม…เป… อพฺภญฺญาสิ. อญฺญตโร จ ปนายสฺมา ภารทฺวาโช อรหตํ อโหสี’’ติ. ऐसा कहे जाने पर, बिलङ्गिकभारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा— "अति सुंदर, हे गौतम! ... उन्होंने जान लिया। और आयुष्मान भारद्वाज अर्हन्तों में से एक हो गए।" ๕. อหึสกสุตฺตํ ५. अहिंसक सुत्त ๑๙๑. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข อหึสกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อหึสกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อหึสกาหํ, โภ โคตม, อหึสกาหํ, โภ โคตมา’’ติ. १९१. श्रावस्ती निदान। तब अहिंसकभारद्वाज ब्राह्मण जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान के साथ कुशल-क्षेम पूछा। सुखद और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए अहिंसकभारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा— "हे गौतम! मैं अहिंसक हूँ, हे गौतम! मैं अहिंसक हूँ।" ‘‘ยถา นามํ ตถา จสฺส, สิยา โข ตฺวํ อหึสโก; โย จ กาเยน วาจาย, มนสา จ น หึสติ; ส เว อหึสโก โหติ, โย ปรํ น วิหึสตี’’ติ. "जैसा तुम्हारा नाम है, वैसा ही तुम्हारा आचरण भी हो, तब तुम वास्तव में अहिंसक होगे। जो काया, वाणी और मन से किसी की हिंसा नहीं करता, वही वास्तव में अहिंसक है, जो दूसरों को पीड़ित नहीं करता।" เอวํ วุตฺเต, อหึสกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม…เป… อพฺภญฺญาสิ. อญฺญตโร จ ปนายสฺมา อหึสกภารทฺวาโช อรหตํ อโหสี’’ติ. ऐसा कहे जाने पर, अहिंसकभारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा— "अति सुंदर, हे गौतम! ... उन्होंने जान लिया। और आयुष्मान अहिंसकभारद्वाज अर्हन्तों में से एक हो गए।" ๖. ชฏาสุตฺตํ ६. जटा सुत्त ๑๙๒. สาวตฺถินิทานํ[Pg.167]. อถ โข ชฏาภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ชฏาภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – १९२. श्रावस्ती निदान। तब जटाभारद्वाज ब्राह्मण जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान के साथ कुशल-क्षेम पूछा। सुखद और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए जटाभारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान को गाथा में संबोधित किया— ‘‘อนฺโตชฏา พหิชฏา, ชฏาย ชฏิตา ปชา; ตํ ตํ โคตม ปุจฺฉามิ, โก อิมํ วิชฏเย ชฏ’’นฺติ. "भीतर जटा है, बाहर जटा है; प्रजा जटाओं से उलझी हुई है। हे गौतम! मैं आपसे यही पूछता हूँ— इस जटा को कौन सुलझा सकता है?" ‘‘สีเล ปติฏฺฐาย นโร สปญฺโญ, จิตฺตํ ปญฺญญฺจ ภาวยํ; อาตาปี นิปโก ภิกฺขุ, โส อิมํ วิชฏเย ชฏํ. "शील में प्रतिष्ठित होकर, प्रज्ञावान मनुष्य, चित्त और प्रज्ञा की भावना करते हुए, वह उद्योगी और बुद्धिमान भिक्षु इस जटा को सुलझा सकता है।" ‘‘เยสํ ราโค จ โทโส จ, อวิชฺชา จ วิราชิตา; ขีณาสวา อรหนฺโต, เตสํ วิชฏิตา ชฏา. "जिनके राग, द्वेष और अविद्या नष्ट हो गए हैं, वे क्षीणास्त्रव अर्हन्त ही इस जटा को सुलझा चुके हैं।" ‘‘ยตฺถ นามญฺจ รูปญฺจ, อเสสํ อุปรุชฺฌติ; ปฏิฆํ รูปสญฺญา จ, เอตฺเถสา ฉิชฺชเต ชฏา’’ติ. "जहाँ नाम और रूप पूर्णतः निरुद्ध हो जाते हैं, और प्रतिघ-संज्ञा तथा रूप-संज्ञा भी, वहीं यह जटा कट जाती है।" เอวํ วุตฺเต, ชฏาภารทฺวาโช ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม…เป… อญฺญตโร จ ปนายสฺมา ภารทฺวาโช อรหตํ อโหสี’’ติ. ऐसा कहे जाने पर, जटाभारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा— "अति सुंदर, हे गौतम! ... और आयुष्मान भारद्वाज अर्हन्तों में से एक हो गए।" ๗. สุทฺธิกสุตฺตํ ७. शुद्धिक सुत्त ๑๙๓. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข สุทฺธิกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข สุทฺธิกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อชฺฌภาสิ – १९३. श्रावस्ती का निदान। तब शुद्धिकभारद्वाज ब्राह्मण जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया; जाकर भगवान् के साथ कुशल-क्षेम की चर्चा की। प्रसन्नतापूर्ण और स्मरणीय बातें करके वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए शुद्धिकभारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान् के समीप यह गाथा कही — ‘‘น พฺราหฺมโณ สุชฺฌติ โกจิ, โลเก สีลวาปิ ตโปกรํ; วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน, โส สุชฺฌติ น อญฺญา อิตรา ปชา’’ติ. "इस लोक में कोई भी ब्राह्मण केवल जन्म से शुद्ध नहीं होता, चाहे वह शीलवान हो या तपस्वी हो। जो विद्या और चरण (आचरण) से संपन्न है, वही शुद्ध होता है; अन्य साधारण प्रजा शुद्ध नहीं होती।" ‘‘พหุมฺปิ ปลปํ ชปฺปํ, น ชจฺจา โหติ พฺราหฺมโณ; อนฺโตกสมฺพุ สงฺกิลิฏฺโฐ, กุหนํ อุปนิสฺสิโต. "बहुत अधिक व्यर्थ प्रलाप करने मात्र से कोई जन्म से ब्राह्मण नहीं होता; जो भीतर से मलिन (सड़ा हुआ) है, संक्लिष्ट है और पाखंड का सहारा लिए हुए है (वह ब्राह्मण नहीं है)।" ‘‘ขตฺติโย [Pg.168] พฺราหฺมโณ เวสฺโส, สุทฺโท จณฺฑาลปุกฺกุโส; อารทฺธวีริโย ปหิตตฺโต, นิจฺจํ ทฬฺหปรกฺกโม; ปปฺโปติ ปรมํ สุทฺธึ, เอวํ ชานาหิ พฺราหฺมณา’’ติ. "क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र, चण्डाल या पुक्कुस—जो भी उद्योगी, दृढ़निश्चयी और निरंतर कठोर पुरुषार्थ करने वाला है, वह परम शुद्धि को प्राप्त करता है। हे ब्राह्मण! ऐसा जानो।" เอวํ วุตฺเต, สุทฺธิกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม…เป… อญฺญตโร จ ปนายสฺมา ภารทฺวาโช อรหตํ อโหสี’’ติ. ऐसा कहे जाने पर, शुद्धिकभारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान् से यह कहा— "अति सुंदर, भो गौतम! ... और आयुष्मान् भारद्वाज अर्हतों में से एक हुए।" ๘. อคฺคิกสุตฺตํ ८. अग्निक सुत्त ๑๙๔. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. เตน โข ปน สมเยน อคฺคิกภารทฺวาชสฺส พฺราหฺมณสฺส สปฺปินา ปายโส สนฺนิหิโต โหติ – ‘‘อคฺคึ ชุหิสฺสามิ, อคฺคิหุตฺตํ ปริจริสฺสามี’’ติ. १९४. एक समय भगवान् राजगृह के वेणुवन कलन्दकनिवाप में विहार कर रहे थे। उस समय अग्निकभारद्वाज ब्राह्मण ने घी के साथ खीर (पायस) तैयार की थी— "मैं अग्नि में आहुति दूँगा, अग्निहोत्र की परिचर्या करूँगा।" อถ โข ภควา ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย ราชคหํ ปิณฺฑาย ปาวิสิ. ราชคเห สปทานํ ปิณฺฑาย จรมาโน เยน อคฺคิกภารทฺวาชสฺส พฺราหฺมณสฺส นิเวสนํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. อทฺทสา โข อคฺคิกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ ปิณฺฑาย ฐิตํ. ทิสฺวาน ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब भगवान् पूर्वाह्न समय में निवसन पहनकर, पात्र और चीवर लेकर राजगृह में पिण्डपात के लिए प्रविष्ट हुए। राजगृह में क्रम से भिक्षाटन करते हुए जहाँ अग्निकभारद्वाज ब्राह्मण का घर था, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर एक ओर खड़े हो गए। अग्निकभारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान् को भिक्षा के लिए खड़े देखा। भगवान् को देखकर उसने गाथा में कहा — ‘‘ตีหิ วิชฺชาหิ สมฺปนฺโน, ชาติมา สุตวา พหู; วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน, โสมํ ภุญฺเชยฺย ปายส’’นฺติ. "जो तीन विद्याओं (वेदों) से संपन्न हो, उत्तम कुल वाला हो, बहुत सुना हुआ (बहुश्रुत) हो; जो विद्या और चरण से संपन्न हो, वही इस खीर को खाए।" ‘‘พหุมฺปิ ปลปํ ชปฺปํ, น ชจฺจา โหติ พฺราหฺมโณ; อนฺโตกสมฺพุ สํกิลิฏฺโฐ, กุหนาปริวาริโต. "बहुत अधिक व्यर्थ प्रलाप करने मात्र से कोई जन्म से ब्राह्मण नहीं होता; जो भीतर से मलिन है, संक्लिष्ट है और पाखंड से घिरा हुआ है (वह ब्राह्मण नहीं है)।" ‘‘ปุพฺเพนิวาสํ โย เวที, สคฺคาปายญฺจ ปสฺสติ; อโถ ชาติกฺขยํ ปตฺโต, อภิญฺญาโวสิโต มุนิ. "जो पूर्वजन्मों को जानता है, स्वर्ग और अपाय (नरक) को देखता है, और जिसने जन्म के क्षय (अर्हत् पद) को प्राप्त कर लिया है, वह अभिज्ञाओं से पूर्ण मुनि है।" ‘‘เอตาหิ ตีหิ วิชฺชาหิ, เตวิชฺโช โหติ พฺราหฺมโณ; วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน, โสมํ ภุญฺเชยฺย ปายส’’นฺติ. "इन तीन विद्याओं के कारण ही कोई 'त्रैविद्य' ब्राह्मण होता है; जो विद्या और चरण से संपन्न है, वही इस खीर को खाए।" ‘‘ภุญฺชตุ ภวํ โคตโม. พฺราหฺมโณ ภว’’นฺติ. "आप गौतम इसे ग्रहण करें। आप (वास्तविक) ब्राह्मण हैं।" ‘‘คาถาภิคีตํ [Pg.169] เม อโภชเนยฺยํ,สมฺปสฺสตํ พฺราหฺมณ เนส ธมฺโม; คาถาภิคีตํ ปนุทนฺติ พุทฺธา,ธมฺเม สติ พฺราหฺมณ วุตฺติเรสา. "गाथाओं के गायन द्वारा प्राप्त भोजन मेरे लिए अभोज्य है। हे ब्राह्मण! सत्य को देखने वालों का यह धर्म नहीं है। बुद्ध गाथाओं द्वारा प्राप्त भोजन का त्याग करते हैं। हे ब्राह्मण! जब तक सद्धर्म विद्यमान है, यही उनकी आजीविका है।" ‘‘อญฺเญน จ เกวลินํ มเหสึ,ขีณาสวํ กุกฺกุจฺจวูปสนฺตํ; อนฺเนน ปาเนน อุปฏฺฐหสฺสุ,เขตฺตญฺหิ ตํ ปุญฺญเปกฺขสฺส โหตี’’ติ. "तुम अन्य (भोजन) से उस पूर्ण महर्षि, क्षीणास्त्रव (विकाररहित) और कौकृत्य (पश्चाताप) से शांत मुनि की सेवा करो। पुण्य की इच्छा रखने वाले के लिए वह उत्तम खेत के समान है।" เอวํ วุตฺเต, อคฺคิกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม…เป… อญฺญตโร จ ปนายสฺมา อคฺคิกภารทฺวาโช อรหตํ อโหสี’’ติ. ऐसा कहे जाने पर, अग्निकभारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान् से यह कहा— "अति सुंदर, भो गौतम! ... और आयुष्मान् अग्निकभारद्वाज अर्हतों में से एक हुए।" ๙. สุนฺทริกสุตฺตํ ९. सुन्दरिक सुत्त ๑๙๕. เอกํ สมยํ ภควา โกสเลสุ วิหรติ สุนฺทริกาย นทิยา ตีเร. เตน โข ปน สมเยน สุนฺทริกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ สุนฺทริกาย นทิยา ตีเร อคฺคึ ชุหติ, อคฺคิหุตฺตํ ปริจรติ. อถ โข สุนฺทริกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ อคฺคึ ชุหิตฺวา อคฺคิหุตฺตํ ปริจริตฺวา อุฏฺฐายาสนา สมนฺตา จตุทฺทิสา อนุวิโลเกสิ – ‘‘โก นุ โข อิมํ หพฺยเสสํ ภุญฺเชยฺยา’’ติ? อทฺทสา โข สุนฺทริกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ อญฺญตรสฺมึ รุกฺขมูเล สสีสํ ปารุตํ นิสินฺนํ. ทิสฺวาน วาเมน หตฺเถน หพฺยเสสํ คเหตฺวา ทกฺขิเณน หตฺเถน กมณฺฑลุํ คเหตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ. อถ โข ภควา สุนฺทริกภารทฺวาชสฺส พฺราหฺมณสฺส ปทสทฺเทน สีสํ วิวริ. อถ โข สุนฺทริกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ‘มุณฺโฑ อยํ ภวํ, มุณฺฑโก อยํ ภว’นฺติ ตโตว ปุน นิวตฺติตุกาโม อโหสิ. อถ โข สุนฺทริกภารทฺวาชสฺส พฺราหฺมณสฺส เอตทโหสิ – ‘มุณฺฑาปิ หิ อิเธกจฺเจ พฺราหฺมณา ภวนฺติ; ยํนูนาหํ ตํ อุปสงฺกมิตฺวา ชาตึ ปุจฺเฉยฺย’นฺติ. १९५. एक समय भगवान् कोसल जनपद में सुन्दरिका नदी के तट पर विहार कर रहे थे। उस समय सुन्दरिकभारद्वाज ब्राह्मण सुन्दरिका नदी के तट पर अग्नि में आहुति दे रहा था, अग्निहोत्र की परिचर्या कर रहा था। तब सुन्दरिकभारद्वाज ब्राह्मण अग्नि में आहुति देकर और अग्निहोत्र की परिचर्या करके अपने आसन से उठा और चारों दिशाओं में देखने लगा— "इस यज्ञ के अवशेष (हव्यशेष) को कौन खाएगा?" सुन्दरिकभारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान् को एक वृक्ष के नीचे सिर सहित ओढ़कर बैठे हुए देखा। देखकर, बाएँ हाथ में हव्यशेष लेकर और दाहिने हाथ में कमंडलु लेकर जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया। तब भगवान् ने सुन्दरिकभारद्वाज ब्राह्मण के पैरों की आहट से अपना सिर खोला। तब सुन्दरिकभारद्वाज ब्राह्मण ने सोचा, 'यह तो मुण्डित है, यह तो मुण्डक है' और वहीं से वापस लौट जाना चाहा। तब सुन्दरिकभारद्वाज ब्राह्मण को यह विचार आया— 'यहाँ इस लोक में कुछ ब्राह्मण भी मुण्डित होते हैं; क्यों न मैं इसके पास जाकर इसकी जाति पूछूँ?' อถ โข สุนฺทริกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘กึชจฺโจ ภว’นฺติ? तब सुन्दरिकभारद्वाज ब्राह्मण जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया; जाकर भगवान् से यह कहा— "आप किस जाति के हैं?" ‘‘มา [Pg.170] ชาตึ ปุจฺฉ จรณญฺจ ปุจฺฉ,กฏฺฐา หเว ชายติ ชาตเวโท; นีจากุลีโนปิ มุนิ ธิติมา,อาชานีโย โหติ หิรีนิเสโธ. "जाति मत पूछो, आचरण (चरण) पूछो। अग्नि निश्चित रूप से लकड़ी से उत्पन्न होती है। नीच कुल में उत्पन्न होकर भी मुनि धैर्यवान, बुद्धिमान और लज्जा (ह्री) से पापों को रोकने वाला होता है।" ‘‘สจฺเจน ทนฺโต ทมสา อุเปโต,เวทนฺตคู วุสิตพฺรหฺมจริโย; ยญฺโญปนีโต ตมุปวฺหเยถ,กาเลน โส ชุหติ ทกฺขิเณยฺเย’’ติ. "जो सत्य से दमित है, इंद्रिय-संयम से युक्त है, वेदों के पारगामी है और जिसने ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया है; यज्ञ करने वाले को समय पर उसे ही आमंत्रित करना चाहिए। वह दक्षिणा के योग्य पात्रों में आहुति देता है।" ‘‘อทฺธา สุยิฏฺฐํ สุหุตํ มม ยิทํ,ยํ ตาทิสํ เวทคุมทฺทสามิ; ตุมฺหาทิสานญฺหิ อทสฺสเนน,อญฺโญ ชโน ภุญฺชติ หพฺยเสส’’นฺติ. "निश्चित ही मेरा यह यज्ञ सुयिष्ट और सुहुत हुआ, क्योंकि मैंने आप जैसे वेदज्ञ के दर्शन किए। आप जैसों के दर्शन न होने के कारण ही अन्य लोग इस हव्यशेष को खाते थे।" ‘‘ภุญฺชตุ ภวํ โคตโม. พฺราหฺมโณ ภว’’นฺติ. "आप गौतम इसे ग्रहण करें। आप (वास्तविक) ब्राह्मण हैं।" ‘‘คาถาภิคีตํ เม อโภชเนยฺยํ,สมฺปสฺสตํ พฺราหฺมณ เนส ธมฺโม; คาถาภิคีตํ ปนุทนฺติ พุทฺธา,ธมฺเม สติ พฺราหฺมณ วุตฺติเรสา. "गाथाओं के गायन द्वारा प्राप्त भोजन मेरे लिए अभोज्य है। हे ब्राह्मण! सत्य को देखने वालों का यह धर्म नहीं है। बुद्ध गाथाओं द्वारा प्राप्त भोजन का त्याग करते हैं। हे ब्राह्मण! जब तक सद्धर्म विद्यमान है, यही उनकी आजीविका है।" ‘‘อญฺเญน จ เกวลินํ มเหสึ,ขีณาสวํ กุกฺกุจฺจวูปสนฺตํ; อนฺเนน ปาเนน อุปฏฺฐหสฺสุ,เขตฺตญฺหิ ตํ ปุญฺญเปกฺขสฺส โหตี’’ติ. "तुम अन्य (भोजन) से उस पूर्ण महर्षि, क्षीणास्त्रव और कौकृत्य से शांत मुनि की सेवा करो। पुण्य की इच्छा रखने वाले के लिए वह उत्तम खेत के समान है।" ‘‘อถ กสฺส จาหํ, โภ โคตม, อิมํ หพฺยเสสํ ทมฺมี’’ติ? ‘‘น ขฺวาหํ, พฺราหฺมณ, ปสฺสามิ สเทวเก โลเก สมารเก สพฺรหฺมเก สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย ยสฺเสโส หพฺยเสโส ภุตฺโต สมฺมา ปริณามํ คจฺเฉยฺย อญฺญตฺร, พฺราหฺมณ, ตถาคตสฺส วา ตถาคตสาวกสฺส วา. เตน หิ ตฺวํ, พฺราหฺมณ, ตํ หพฺยเสสํ อปฺปหริเต วา ฉฑฺเฑหิ อปฺปาณเก วา อุทเก โอปิลาเปหี’’ติ. “हे गौतम! तो फिर मैं इस यज्ञ के अवशेष (खीर) को किसे दूँ?” “ब्राह्मण! देवों, मारों और ब्रह्मा सहित इस लोक में, श्रमणों, ब्राह्मणों, राजाओं और मनुष्यों सहित इस प्रजा में, मैं किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं देखता जो इस यज्ञ के अवशेष को खाकर उसे भली-भांति पचा सके, सिवाय तथागत या तथागत के श्रावक के। इसलिए ब्राह्मण, तुम इस यज्ञ के अवशेष को या तो ऐसी जगह फेंक दो जहाँ हरी घास न हो, या बिना जीवों वाले जल में विसर्जित कर दो।” อถ โข สุนฺทริกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ตํ หพฺยเสสํ อปฺปาณเก อุทเก โอปิลาเปสิ. อถ โข โส หพฺยเสโส อุทเก ปกฺขิตฺโต จิจฺจิฏายติ [Pg.171] จิฏิจิฏายติ สนฺธูปายติ สมฺปธูปายติ. เสยฺยถาปิ นาม ผาโล ทิวสํสนฺตตฺโต อุทเก ปกฺขิตฺโต จิจฺจิฏายติ จิฏิจิฏายติ สนฺธูปายติ สมฺปธูปายติ; เอวเมว โส หพฺยเสโส อุทเก ปกฺขิตฺโต จิจฺจิฏายติ จิฏิจิฏายติ สนฺธูปายติ สมฺปธูปายติ. तब सुन्दरीक भारद्वाज ब्राह्मण ने उस यज्ञ के अवशेष को बिना जीवों वाले जल में विसर्जित कर दिया। तब वह यज्ञ का अवशेष जल में डाले जाने पर 'चिट-चिट' की आवाज़ करने लगा, बहुत अधिक आवाज़ करने लगा और चारों ओर से धुआँ छोड़ने लगा। जैसे दिन भर तपाया हुआ लोहे का फाल जल में डाले जाने पर 'चिट-चिट' की आवाज़ करता है, बहुत अधिक आवाज़ करता है और चारों ओर से धुआँ छोड़ता है; वैसे ही वह यज्ञ का अवशेष जल में डाले जाने पर 'चिट-चिट' की आवाज़ करने लगा, बहुत अधिक आवाज़ करने लगा और चारों ओर से धुआँ छोड़ने लगा। อถ โข สุนฺทริกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ สํวิคฺโค โลมหฏฺฐชาโต เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตํ โข สุนฺทริกภารทฺวาชํ พฺราหฺมณํ ภควา คาถาหิ อชฺฌภาสิ – तब सुन्दरीक भारद्वाज ब्राह्मण भयभीत होकर और रोमांचित होकर जहाँ भगवान थे, वहाँ गया; पास जाकर एक ओर खड़ा हो गया। एक ओर खड़े हुए सुन्दरीक भारद्वाज ब्राह्मण को भगवान ने गाथाओं में संबोधित किया— ‘‘มา พฺราหฺมณ ทารุ สมาทหาโน,สุทฺธึ อมญฺญิ พหิทฺธา หิ เอตํ; น หิ เตน สุทฺธึ กุสลา วทนฺติ,โย พาหิเรน ปริสุทฺธิมิจฺเฉ. “हे ब्राह्मण! लकड़ी जलाकर (यज्ञ करके) यह मत समझो कि शुद्धि हो जाएगी, क्योंकि यह बाहरी क्रिया है। जो बाहरी क्रिया से शुद्धि चाहता है, उसे ज्ञानी जन शुद्ध नहीं कहते। ‘‘หิตฺวา อหํ พฺราหฺมณ ทารุทาหํอชฺฌตฺตเมวุชฺชลยามิ โชตึ; นิจฺจคฺคินี นิจฺจสมาหิตตฺโต,อรหํ อหํ พฺรหฺมจริยํ จรามิ. हे ब्राह्मण! लकड़ी जलाने को त्यागकर, मैं अपने भीतर ही (ज्ञान की) ज्योति प्रज्वलित करता हूँ। निरंतर प्रज्वलित अग्नि वाला, निरंतर समाहित चित्त वाला और अर्हत् होकर मैं ब्रह्मचर्य का पालन करता हूँ। ‘‘มาโน หิ เต พฺราหฺมณ ขาริภาโร,โกโธ ธุโม ภสฺมนิ โมสวชฺชํ; ชิวฺหา สุชา หทยํ โชติฐานํ,อตฺตา สุทนฺโต ปุริสสฺส โชติ. हे ब्राह्मण! तुम्हारा मान (अहंकार) ही भार ढोने वाला काँवर है, क्रोध धुआँ है, और असत्य बोलना राख है। जिह्वा स्रुवा (यज्ञ की कलछी) है, हृदय अग्नि-स्थान है, और मनुष्य का भली-भांति दमित चित्त ही ज्योति (अग्नि) है। ‘‘ธมฺโม รหโท พฺราหฺมณ สีลติตฺโถ,อนาวิโล สพฺภิ สตํ ปสตฺโถ; ยตฺถ หเว เวทคุโน สินาตา,อนลฺลคตฺตาว ตรนฺติ ปารํ. हे ब्राह्मण! धर्म ही सरोवर है और शील ही उसका घाट है, जो निर्मल है और सत्पुरुषों द्वारा प्रशंसित है। जहाँ वेदज्ञ (ज्ञानी) स्नान करते हैं और बिना भीगे ही (संसार के) पार उतर जाते हैं। ‘‘สจฺจํ ธมฺโม สํยโม พฺรหฺมจริยํ,มชฺเฌ สิตา พฺราหฺมณ พฺรหฺมปตฺติ; ส ตุชฺชุภูเตสุ นโม กโรหิ,ตมหํ นรํ ธมฺมสารีติ พฺรูมี’’ติ. सत्य, धर्म, संयम और ब्रह्मचर्य—हे ब्राह्मण! मध्य मार्ग पर स्थित यही ब्रह्म-प्राप्ति (श्रेष्ठ अवस्था) है। तुम उन ऋजु (सरल) पुरुषों को नमस्कार करो; मैं उस मनुष्य को 'धर्म-सारथी' कहता हूँ।” เอวํ [Pg.172] วุตฺเต, สุนฺทริกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม…เป… อญฺญตโร จ ปนายสฺมา ภารทฺวาโช อรหตํ อโหสี’’ติ. ऐसा कहे जाने पर, सुन्दरीक भारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा— “अद्भुत, हे गौतम! ... और आयुष्मान भारद्वाज अर्हतों में से एक हुए।” ๑๐. พหุธีตรสุตฺตํ १०. बहुधीतर सुत्त ๑๙๖. เอกํ สมยํ ภควา โกสเลสุ วิหรติ อญฺญตรสฺมึ วนสณฺเฑ. เตน โข ปน สมเยน อญฺญตรสฺส ภารทฺวาชโคตฺตสฺส พฺราหฺมณสฺส จตุทฺทส พลีพทฺทา นฏฺฐา โหนฺติ. อถ โข ภารทฺวาชโคตฺโต พฺราหฺมโณ เต พลีพทฺเท คเวสนฺโต เยน โส วนสณฺโฑ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อทฺทส ภควนฺตํ ตสฺมึ วนสณฺเฑ นิสินฺนํ ปลฺลงฺกํ อาภุชิตฺวา อุชุํ กายํ ปณิธาย ปริมุขํ สตึ อุปฏฺฐเปตฺวา. ทิสฺวาน เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควโต สนฺติเก อิมา คาถาโย อภาสิ – १९६. एक समय भगवान कोसल देश के किसी वन-खंड में विहार कर रहे थे। उस समय भारद्वाज गोत्र के किसी ब्राह्मण के चौदह बैल खो गए थे। तब भारद्वाज गोत्र का वह ब्राह्मण उन बैलों को खोजते हुए उस वन-खंड की ओर गया; वहाँ जाकर उसने भगवान को उस वन-खंड में पालथी मारकर, शरीर को सीधा रखकर और सामने स्मृति स्थापित कर बैठे हुए देखा। देखकर वह भगवान के पास गया; पास जाकर भगवान के समीप ये गाथाएँ कहीं— ‘‘น หิ นูนิมสฺส สมณสฺส, พลีพทฺทา จตุทฺทส; อชฺชสฏฺฐึ น ทิสฺสนฺติ, เตนายํ สมโณ สุขี. “निश्चित ही इस श्रमण के चौदह बैल आज छह दिनों से खोए हुए नहीं हैं, इसीलिए यह श्रमण सुखी है। ‘‘น หิ นูนิมสฺส สมณสฺส, ติลาเขตฺตสฺมิ ปาปกา; เอกปณฺณา ทุปณฺณา จ, เตนายํ สมโณ สุขี. निश्चित ही इस श्रमण के तिल के खेत में एक-दो पत्तों वाले खराब तिल के पौधे नहीं हैं, इसीलिए यह श्रमण सुखी है। ‘‘น หิ นูนิมสฺส สมณสฺส, ตุจฺฉโกฏฺฐสฺมิ มูสิกา; อุสฺโสฬฺหิกาย นจฺจนฺติ, เตนายํ สมโณ สุขี. निश्चित ही इस श्रमण के खाली कोठार में चूहे उछल-कूद नहीं कर रहे हैं, इसीलिए यह श्रमण सुखी है। ‘‘น หิ นูนิมสฺส สมณสฺส, สนฺถาโร สตฺตมาสิโก; อุปฺปาฏเกหิ สญฺฉนฺโน, เตนายํ สมโณ สุขี. निश्चित ही इस श्रमण का सात महीने पुराना बिछौना कीड़ों से भरा हुआ नहीं है, इसीलिए यह श्रमण सुखी है। ‘‘น หิ นูนิมสฺส สมณสฺส, วิธวา สตฺต ธีตโร; เอกปุตฺตา ทุปุตฺตา จ, เตนายํ สมโณ สุขี. निश्चित ही इस श्रमण की सात विधवा बेटियाँ नहीं हैं, जिनके एक-दो बच्चे हों, इसीलिए यह श्रमण सुखी है। ‘‘น หิ นูนิมสฺส สมณสฺส, ปิงฺคลา ติลกาหตา; โสตฺตํ ปาเทน โพเธติ, เตนายํ สมโณ สุขี. निश्चित ही इस श्रमण की भूरी आँखों वाली और झाइयों वाली पत्नी सोते हुए इसे लात मारकर नहीं जगाती है, इसीलिए यह श्रमण सुखी है। ‘‘น หิ นูนิมสฺส สมณสฺส, ปจฺจูสมฺหิ อิณายิกา; เทถ เทถาติ โจเทนฺติ, เตนายํ สมโณ สุขี’’ติ. निश्चित ही इस श्रमण को भोर के समय कर्जदार 'दो, दो' कहकर तंग नहीं करते हैं, इसीलिए यह श्रमण सुखी है।” ‘‘น [Pg.173] หิ มยฺหํ พฺราหฺมณ, พลีพทฺทา จตุทฺทส; อชฺชสฏฺฐึ น ทิสฺสนฺติ, เตนาหํ พฺราหฺมณา สุขี. “हे ब्राह्मण! निश्चित ही मेरे चौदह बैल आज छह दिनों से खोए हुए नहीं हैं, इसीलिए हे ब्राह्मण, मैं सुखी हूँ। ‘‘น หิ มยฺหํ พฺราหฺมณ, ติลาเขตฺตสฺมิ ปาปกา; เอกปณฺณา ทุปณฺณา จ, เตนาหํ พฺราหฺมณา สุขี. हे ब्राह्मण! निश्चित ही मेरे तिल के खेत में एक-दो पत्तों वाले खराब तिल के पौधे नहीं हैं, इसीलिए हे ब्राह्मण, मैं सुखी हूँ। ‘‘น หิ มยฺหํ พฺราหฺมณ, ตุจฺฉโกฏฺฐสฺมิ มูสิกา; อุสฺโสฬฺหิกาย นจฺจนฺติ, เตนาหํ พฺราหฺมณา สุขี. हे ब्राह्मण! निश्चित ही मेरे खाली कोठार में चूहे उछल-कूद नहीं कर रहे हैं, इसीलिए हे ब्राह्मण, मैं सुखी हूँ। ‘‘น หิ มยฺหํ พฺราหฺมณ, สนฺถาโร สตฺตมาสิโก; อุปฺปาฏเกหิ สญฺฉนฺโน, เตนาหํ พฺราหฺมณา สุขี. हे ब्राह्मण! निश्चित ही मेरा सात महीने पुराना बिछौना कीड़ों से भरा हुआ नहीं है, इसीलिए हे ब्राह्मण, मैं सुखी हूँ। ‘‘น หิ มยฺหํ พฺราหฺมณ, วิธวา สตฺต ธีตโร; เอกปุตฺตา ทุปุตฺตา จ, เตนาหํ พฺราหฺมณา สุขี. हे ब्राह्मण! निश्चित ही मेरी सात विधवा बेटियाँ नहीं हैं, जिनके एक-दो बच्चे हों, इसीलिए हे ब्राह्मण, मैं सुखी हूँ। ‘‘น หิ มยฺหํ พฺราหฺมณ, ปิงฺคลา ติลกาหตา; โสตฺตํ ปาเทน โพเธติ, เตนาหํ พฺราหฺมณา สุขี. हे ब्राह्मण! निश्चित ही मेरी भूरी आँखों वाली और झाइयों वाली पत्नी सोते हुए मुझे लात मारकर नहीं जगाती है, इसीलिए हे ब्राह्मण, मैं सुखी हूँ। ‘‘น หิ มยฺหํ พฺราหฺมณ, ปจฺจูสมฺหิ อิณายิกา; เทถ เทถาติ โจเทนฺติ, เตนาหํ พฺราหฺมณา สุขี’’ติ. हे ब्राह्मण! निश्चित ही मुझे भोर के समय कर्जदार 'दो, दो' कहकर तंग नहीं करते हैं, इसीलिए हे ब्राह्मण, मैं सुखी हूँ।” เอวํ วุตฺเต, ภารทฺวาชโคตฺโต พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม, อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม! เสยฺยถาปิ, โภ โคตม, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย, ปฏิจฺฉนฺนํ วา วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย – จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตีติ; เอวเมว โภตา โคตเมน อเนกปริยาเยน ธมฺโม ปกาสิโต. เอสาหํ ภวนฺตํ โคตมํ สรณํ คจฺฉามิ ธมฺมญฺจ ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. ลเภยฺยาหํ โภโต โคตมสฺส สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, ลเภยฺยํ อุปสมฺปท’’นฺติ. ऐसा कहे जाने पर, भारद्वाज गोत्र के ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा— “अद्भुत, हे गौतम! अद्भुत, हे गौतम! जैसे कोई औंधे हुए को सीधा कर दे, या ढके हुए को खोल दे, या राह भूले को रास्ता दिखा दे, या अंधेरे में तेल का दीपक जला दे कि आँख वाले रूप देख सकें; वैसे ही आप गौतम ने अनेक प्रकार से धर्म प्रकाशित किया है। मैं आप गौतम, धर्म और भिक्षु संघ की शरण जाता हूँ। मैं आप गौतम के समीप प्रव्रज्या और उपसंपदा प्राप्त करना चाहता हूँ।” อลตฺถ โข ภารทฺวาชโคตฺโต พฺราหฺมโณ ภควโต สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, อลตฺถ อุปสมฺปทํ. อจิรูปสมฺปนฺโน ปนายสฺมา ภารทฺวาโช เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรนฺโต นจิรสฺเสว – ยสฺสตฺถาย กุลปุตฺตา สมฺมเทว อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชนฺติ, ตทนุตฺตรํ – พฺรหฺมจริยปริโยสานํ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหาสิ. ‘‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ [Pg.174] อิตฺถตฺตายา’’ติ อพฺภญฺญาสิ. อญฺญตโร จ ปนายสฺมา ภารทฺวาโช อรหตํ อโหสีติ. भारद्वाज गोत्र के ब्राह्मण ने भगवान के सान्निध्य में प्रव्रज्या प्राप्त की, उपसम्पदा प्राप्त की। उपसम्पदा प्राप्त करने के कुछ ही समय बाद, आयुष्मान भारद्वाज अकेले, एकांत में, प्रमाद रहित, उद्योगी और दृढ़ संकल्पी होकर विहार करते हुए शीघ्र ही—जिसके लिए कुलपुत्र भली-भाँति घर से बेघर होकर प्रव्रजित होते हैं, उस अनुत्तर ब्रह्मचर्य की पूर्णता (अर्हत्व) को इसी जन्म में स्वयं के विशेष ज्ञान से जानकर, साक्षात्कार कर और प्राप्त कर विहार करने लगे। उन्होंने जान लिया—"जन्म क्षीण हो गया है, ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया गया है, जो करना था वह कर लिया गया है, अब इस जीवन के लिए कुछ शेष नहीं है।" और आयुष्मान भारद्वाज अर्हन्तों में से एक हुए। อรหนฺตวคฺโค ปฐโม. प्रथम अर्हन्त वर्ग। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान)— ธนญฺชานี จ อกฺโกสํ, อสุรินฺทํ พิลงฺคิกํ; อหึสกํ ชฏา เจว, สุทฺธิกญฺเจว อคฺคิกา; สุนฺทริกํ พหุธีตเรน จ เต ทสาติ. धनञ्जानी, अक्कोस, असुरिन्द, बिलङ्गिक, अहिंसक, जटा, सुद्धिक, अग्गिक, सुन्दरिक और बहुधीतर—ये दस (सूत्र) हैं। ๒. อุปาสกวคฺโค २. उपासक वर्ग ๑. กสิภารทฺวาชสุตฺตํ १. कसिभारद्वाज सुत्त ๑๙๗. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา มคเธสุ วิหรติ ทกฺขิณาคิริสฺมึ เอกนาฬายํ พฺราหฺมณคาเม. เตน โข ปน สมเยน กสิภารทฺวาชสฺส พฺราหฺมณสฺส ปญฺจมตฺตานิ นงฺคลสตานิ ปยุตฺตานิ โหนฺติ วปฺปกาเล. อถ โข ภควา ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย เยน กสิภารทฺวาชสฺส พฺราหฺมณสฺส กมฺมนฺโต เตนุปสงฺกมิ. १९७. ऐसा मैंने सुना है—एक समय भगवान मगध देश के दक्षिणगिरि के एकनाला नामक ब्राह्मण गाँव में विहार कर रहे थे। उस समय, बुआई के मौसम में कसिभारद्वाज ब्राह्मण के लगभग पाँच सौ हल जुते हुए थे। तब भगवान पूर्वाह्न के समय निवसन पहनकर, पात्र और चीवर लेकर जहाँ कसिभारद्वाज ब्राह्मण का कार्य-स्थल था, वहाँ पहुँचे। เตน โข ปน สมเยน กสิภารทฺวาชสฺส พฺราหฺมณสฺส ปริเวสนา วตฺตติ. อถ โข ภควา เยน ปริเวสนา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. อทฺทสา โข กสิภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ ปิณฺฑาย ฐิตํ. ทิสฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อหํ โข, สมณ, กสามิ จ วปามิ จ, กสิตฺวา จ วปิตฺวา จ ภุญฺชามิ. ตฺวมฺปิ, สมณ, กสสฺสุ จ วปสฺสุ จ, กสิตฺวา จ วปิตฺวา จ ภุญฺชสฺสู’’ติ. ‘‘อหมฺปิ โข, พฺราหฺมณ, กสามิ จ วปามิ จ, กสิตฺวา จ วปิตฺวา จ ภุญฺชามี’’ติ. น โข มยํ ปสฺสาม โภโต โคตมสฺส ยุคํ วา นงฺคลํ วา ผาลํ วา ปาจนํ วา พลีพทฺเท วา, อถ จ ปน ภวํ โคตโม เอวมาห – ‘‘อหมฺปิ โข, พฺราหฺมณ, กสามิ จ วปามิ จ, กสิตฺวา จ วปิตฺวา จ ภุญฺชามี’’ติ[Pg.175]. อถ โข กสิภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – उस समय कसिभारद्वाज ब्राह्मण का भोजन वितरण चल रहा था। तब भगवान जहाँ भोजन वितरण हो रहा था, वहाँ पहुँचे और एक ओर खड़े हो गए। कसिभारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान को भिक्षा के लिए खड़े देखा। देखकर भगवान से यह कहा—"हे श्रमण! मैं तो जोतता हूँ और बोता हूँ, और जोतकर तथा बोकर खाता हूँ। हे श्रमण! तुम भी जोतो और बोओ, और जोतकर तथा बोकर खाओ।" (भगवान ने कहा—) "हे ब्राह्मण! मैं भी जोतता हूँ और बोता हूँ, और जोतकर तथा बोकर खाता हूँ।" (ब्राह्मण ने कहा—) "हम आयुष्मान गौतम का न तो जुआ, न हल, न फाल, न पैना और न ही बैल देखते हैं, फिर भी आप ऐसा कहते हैं—'हे ब्राह्मण! मैं भी जोतता हूँ और बोता हूँ, और जोतकर तथा बोकर खाता हूँ'।" तब कसिभारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान को गाथा में संबोधित किया— ‘‘กสฺสโก ปฏิชานาสิ, น จ ปสฺสามิ เต กสึ; กสฺสโก ปุจฺฉิโต พฺรูหิ, กถํ ชาเนมุ ตํ กสิ’’นฺติ. "आप स्वयं को किसान बताते हैं, किन्तु मैं आपकी खेती नहीं देखता। किसान के रूप में पूछे जाने पर बताइये, हम आपकी उस खेती को कैसे जानें?" ‘‘สทฺธา พีชํ ตโป วุฏฺฐิ, ปญฺญา เม ยุคนงฺคลํ; หิรี อีสา มโน โยตฺตํ, สติ เม ผาลปาจนํ. "श्रद्धा बीज है, तप वर्षा है, प्रज्ञा मेरा जुआ और हल है; ह्री (लज्जा) हल की डंडी है, मन जोतने की रस्सी है, और स्मृति मेरा फाल और पैना है।" ‘‘กายคุตฺโต วจีคุตฺโต, อาหาเร อุทเร ยโต; สจฺจํ กโรมิ นิทฺทานํ, โสรจฺจํ เม ปโมจนํ. "काया से सुरक्षित, वाणी से सुरक्षित, आहार और उदर के विषय में संयमित; मैं सत्य से निराई करता हूँ, और सौम्यता (शांति) मेरा मोक्ष है।" ‘‘วีริยํ เม ธุรโธรยฺหํ, โยคกฺเขมาธิวาหนํ; คจฺฉติ อนิวตฺตนฺตํ, ยตฺถ คนฺตฺวา น โสจติ. "वीर्य मेरा बोझ ढोने वाला बैल है, जो योगक्षेम (निर्वाण) की ओर ले जाता है; वह बिना पीछे मुड़े चलता जाता है, जहाँ पहुँचकर कोई शोक नहीं करता।" ‘‘เอวเมสา กสี กฏฺฐา, สา โหติ อมตปฺผลา; เอตํ กสึ กสิตฺวาน, สพฺพทุกฺขา ปมุจฺจตี’’ติ. "इस प्रकार यह खेती की जाती है, जो अमृत-फल देने वाली होती है; इस प्रकार की खेती करके मनुष्य सब दुखों से मुक्त हो जाता है।" ‘‘ภุญฺชตุ ภวํ โคตโม. กสฺสโก ภวํ. ยญฺหิ ภวํ โคตโม อมตปฺผลมฺปิ กสึ กสตี’’ติ. "आयुष्मान गौतम भोजन ग्रहण करें। आप वास्तव में किसान हैं, क्योंकि आप अमृत-फल देने वाली खेती करते हैं।" ‘‘คาถาภิคีตํ เม อโภชเนยฺยํ,สมฺปสฺสตํ พฺราหฺมณ เนส ธมฺโม; คาถาภิคีตํ ปนุทนฺติ พุทฺธา,ธมฺเม สติ พฺราหฺมณ วุตฺติเรสา. "गाथा गाकर प्राप्त किया हुआ भोजन मेरे लिए अभोज्य है; हे ब्राह्मण! सत्य को देखने वालों का यह धर्म नहीं है। बुद्ध गाथा गाकर प्राप्त किए हुए भोजन का त्याग करते हैं; हे ब्राह्मण! जब तक सद्धर्म विद्यमान है, यही उनकी आजीविका है।" ‘‘อญฺเญน จ เกวลินํ มเหสึ,ขีณาสวํ กุกฺกุจฺจวูปสนฺตํ; อนฺเนน ปาเนน อุปฏฺฐหสฺสุ,เขตฺตญฺหิ ตํ ปุญฺญเปกฺขสฺส โหตี’’ติ. "किन्तु जो पूर्ण, महर्षि, क्षीणाश्रव और कौकृत्य को शांत कर चुके हैं, उनकी सेवा अन्य अन्न और पान से करो; क्योंकि पुण्य की इच्छा रखने वाले के लिए वे ही उत्तम खेत हैं।" เอวํ วุตฺเต, กสิภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม…เป… อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ऐसा कहे जाने पर, कसिभारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा—"अति सुंदर, हे गौतम! ... आज से मुझे जीवन भर के लिए शरणागत उपासक स्वीकार करें।" ๒. อุทยสุตฺตํ २. उदय सुत्त ๑๙๘. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข ภควา ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย เยน อุทยสฺส พฺราหฺมณสฺส นิเวสนํ เตนุปสงฺกมิ. อถ [Pg.176] โข อุทโย พฺราหฺมโณ ภควโต ปตฺตํ โอทเนน ปูเรสิ. ทุติยมฺปิ โข ภควา ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย เยน อุทยสฺส พฺราหฺมณสฺส นิเวสนํ เตนุปสงฺกมิ…เป… ตติยมฺปิ โข อุทโย พฺราหฺมโณ ภควโต ปตฺตํ โอทเนน ปูเรตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ปกฏฺฐโกยํ สมโณ โคตโม ปุนปฺปุนํ อาคจฺฉตี’’ติ. १९८. श्रावस्ती निदान। तब भगवान पूर्वाह्न के समय निवसन पहनकर, पात्र और चीवर लेकर जहाँ उदय ब्राह्मण का घर था, वहाँ पहुँचे। तब उदय ब्राह्मण ने भगवान के पात्र को भात से भर दिया। दूसरी बार भी भगवान पूर्वाह्न के समय निवसन पहनकर, पात्र और चीवर लेकर जहाँ उदय ब्राह्मण का घर था, वहाँ पहुँचे... तीसरी बार भी उदय ब्राह्मण ने भगवान के पात्र को भात से भरकर भगवान से यह कहा—"यह श्रमण गौतम स्वाद का लोभी है जो बार-बार आता है।" ‘‘ปุนปฺปุนญฺเจว วปนฺติ พีชํ, ปุนปฺปุนํ วสฺสติ เทวราชา; ปุนปฺปุนํ เขตฺตํ กสนฺติ กสฺสกา, ปุนปฺปุนํ ธญฺญมุเปติ รฏฺฐํ. "किसान बार-बार बीज बोते हैं, देवराज बार-बार वर्षा करते हैं; किसान बार-बार खेत जोतते हैं, और राष्ट्र को बार-बार अन्न प्राप्त होता है।" ‘‘ปุนปฺปุนํ ยาจกา ยาจยนฺติ, ปุนปฺปุนํ ทานปตี ททนฺติ; ปุนปฺปุนํ ทานปตี ททิตฺวา, ปุนปฺปุนํ สคฺคมุเปนฺติ ฐานํ. "याचक बार-बार माँगते हैं, दानपति बार-बार दान देते हैं; दानपति बार-बार दान देकर बार-बार स्वर्ग लोक को प्राप्त करते हैं।" ‘‘ปุนปฺปุนํ ขีรนิกา ทุหนฺติ, ปุนปฺปุนํ วจฺโฉ อุเปติ มาตรํ; ปุนปฺปุนํ กิลมติ ผนฺทติ จ, ปุนปฺปุนํ คพฺภมุเปติ มนฺโท. "ग्वाले बार-बार दूध दुहते हैं, बछड़ा बार-बार माँ के पास जाता है; अज्ञानी बार-बार थकता है और तड़पता है, और मंदबुद्धि बार-बार गर्भ में आता है।" ‘‘ปุนปฺปุนํ ชายติ มียติ จ, ปุนปฺปุนํ สิวถิกํ หรนฺติ; มคฺคญฺจ ลทฺธา อปุนพฺภวาย, น ปุนปฺปุนํ ชายติ ภูริปญฺโญ’’ติ. "वह बार-बार जन्म लेता है और मरता है, उसे बार-बार श्मशान ले जाया जाता है; किन्तु महाप्रज्ञ निर्वाण मार्ग को प्राप्त कर पुनर्जन्म न होने के लिए फिर बार-बार जन्म नहीं लेता।" เอวํ วุตฺเต, อุทโย พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม…เป… อุปาสกํ มํ ภวํ โคตโม ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ऐसा कहे जाने पर, उदय ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा—"अति सुंदर, हे गौतम! ... आयुष्मान गौतम मुझे आज से जीवन भर के लिए शरणागत उपासक स्वीकार करें।" ๓. เทวหิตสุตฺตํ ३. देवहित सुत्त ๑๙๙. สาวตฺถินิทานํ. เตน โข ปน สมเยน ภควา วาเตหาพาธิโก โหติ; อายสฺมา จ อุปวาโณ ภควโต อุปฏฺฐาโก โหติ. อถ โข ภควา อายสฺมนฺตํ อุปวาณํ อามนฺเตสิ – ‘‘อิงฺฆ เม ตฺวํ, อุปวาณ, อุณฺโหทกํ ชานาหี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อุปวาโณ ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย เยน เทวหิตสฺส พฺราหฺมณสฺส นิเวสนํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตุณฺหีภูโต เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. อทฺทสา โข เทวหิโต พฺราหฺมโณ อายสฺมนฺตํ อุปวาณํ ตุณฺหีภูตํ เอกมนฺตํ ฐิตํ. ทิสฺวาน อายสฺมนฺตํ อุปวาณํ คาถาย อชฺฌภาสิ – १९९. श्रावस्ती। उस समय भगवान वायु-विकार (पेट दर्द) से पीड़ित थे; और आयुष्मान उपवाण भगवान के सेवक थे। तब भगवान ने आयुष्मान उपवाण को संबोधित किया— "उपवाण! जाओ, मेरे लिए गर्म पानी का प्रबंध करो।" आयुष्मान उपवाण ने "जी भन्ते" कहकर भगवान की आज्ञा मानी और चीवर पहनकर, पात्र-चीवर लेकर जहाँ देवहित ब्राह्मण का घर था, वहाँ गए; और चुपचाप एक ओर खड़े हो गए। देवहित ब्राह्मण ने आयुष्मान उपवाण को चुपचाप एक ओर खड़ा देखा। देखकर आयुष्मान उपवाण से गाथा में कहा— ‘‘ตุณฺหีภูโต [Pg.177] ภวํ ติฏฺฐํ, มุณฺโฑ สงฺฆาฏิปารุโต; กึ ปตฺถยาโน กึ เอสํ, กึ นุ ยาจิตุมาคโต’’ติ. "मुंडित सिर वाले, संघाटी ओढ़े हुए, आप चुपचाप खड़े हैं; आप क्या चाहते हैं, क्या खोज रहे हैं, यहाँ क्या माँगने आए हैं?" ‘‘อรหํ สุคโต โลเก, วาเตหาพาธิโก มุนิ; สเจ อุณฺโหทกํ อตฺถิ, มุนิโน เทหิ พฺราหฺมณ. "संसार में जो अर्हत् और सुगत हैं, वे मुनि वायु-विकार से पीड़ित हैं; हे ब्राह्मण! यदि गर्म पानी हो, तो मुनि को दें।" ‘‘ปูชิโต ปูชเนยฺยานํ, สกฺกเรยฺยาน สกฺกโต; อปจิโต อปเจยฺยานํ, ตสฺส อิจฺฉามิ หาตเว’’ติ. "जो पूजनीयों द्वारा पूजित हैं, सत्कार के योग्य जनों द्वारा सत्कृत हैं, आदरणीयों द्वारा आदृत हैं; मैं उनके लिए (यह गर्म पानी) ले जाना चाहता हूँ।" อถ โข เทวหิโต พฺราหฺมโณ อุณฺโหทกสฺส กาชํ ปุริเสน คาหาเปตฺวา ผาณิตสฺส จ ปุฏํ อายสฺมโต อุปวาณสฺส ปาทาสิ. อถ โข อายสฺมา อุปวาโณ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อุณฺโหทเกน นฺหาเปตฺวา อุณฺโหทเกน ผาณิตํ อาโลเลตฺวา ภควโต ปาทาสิ. อถ โข ภควโต อาพาโธ ปฏิปฺปสฺสมฺภิ. तब देवहित ब्राह्मण ने एक पुरुष के द्वारा गर्म पानी का भार (काँवर) उठवाया और गुड़ की एक पोटली आयुष्मान उपवाण को दी। तब आयुष्मान उपवाण जहाँ भगवान थे, वहाँ गए; और भगवान को गर्म पानी से स्नान कराया और गर्म पानी में गुड़ घोलकर भगवान को दिया। तब भगवान का वह रोग शांत हो गया। อถ โข เทวหิโต พฺราหฺมโณ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข เทวหิโต พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब देवहित ब्राह्मण जहाँ भगवान थे, वहाँ गया; और भगवान के साथ कुशल-क्षेम पूछा। सुखद और स्मरणीय बातें करके वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए देवहित ब्राह्मण ने भगवान से गाथा में कहा— ‘‘กตฺถ ทชฺชา เทยฺยธมฺมํ, กตฺถ ทินฺนํ มหปฺผลํ; กถญฺหิ ยชมานสฺส, กถํ อิชฺฌติ ทกฺขิณา’’ติ. "दान कहाँ देना चाहिए? कहाँ दिया हुआ दान महाफलदायी होता है? यज्ञ करने वाले का यज्ञ कैसे सफल होता है और दक्षिणा कैसे फलीभूत होती है?" ‘‘ปุพฺเพนิวาสํ โย เวที, สคฺคาปายญฺจ ปสฺสติ; อโถ ชาติกฺขยํ ปตฺโต, อภิญฺญาโวสิโต มุนิ. "जो पूर्व-जन्मों को जानता है, स्वर्ग और नरक को देखता है, और जो जन्मों के क्षय (अर्हत् पद) को प्राप्त कर चुका है, वह मुनि अभिज्ञा (उच्च ज्ञान) से पूर्ण है।" ‘‘เอตฺถ ทชฺชา เทยฺยธมฺมํ, เอตฺถ ทินฺนํ มหปฺผลํ; เอวญฺหิ ยชมานสฺส, เอวํ อิชฺฌติ ทกฺขิณา’’ติ. "ऐसे (मुनि) को दान देना चाहिए, यहाँ दिया हुआ दान महाफलदायी होता है; इस प्रकार यज्ञ करने वाले का यज्ञ सफल होता है और दक्षिणा फलीभूत होती है।" เอวํ วุตฺเต, เทวหิโต พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ โภ โคตม…เป… อุปาสกํ มํ ภวํ โคตโม ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ऐसा कहने पर, देवहित ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा— "अति सुंदर, भो गौतम! ... आज से मुझे भगवान गौतम अपना ऐसा उपासक स्वीकार करें, जिसने जीवन भर के लिए शरण ग्रहण की है।" ๔. มหาสาลสุตฺตํ ४. महाशाल सुत्त। ๒๐๐. สาวตฺถินิทานํ[Pg.178]. อถ โข อญฺญตโร พฺราหฺมณมหาสาโล ลูโข ลูขปาวุรโณ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข ตํ พฺราหฺมณมหาสาลํ ภควา เอตทโวจ – ‘‘กินฺนุ ตฺวํ, พฺราหฺมณ, ลูโข ลูขปาวุรโณ’’ติ? ‘‘อิธ เม, โภ โคตม, จตฺตาโร ปุตฺตา. เต มํ ทาเรหิ สํปุจฺฉ ฆรา นิกฺขาเมนฺตี’’ติ. ‘‘เตน หิ ตฺวํ, พฺราหฺมณ, อิมา คาถาโย ปริยาปุณิตฺวา สภายํ มหาชนกาเย สนฺนิปติเต ปุตฺเตสุ จ สนฺนิสินฺเนสุ ภาสสฺสุ – २००. श्रावस्ती। तब एक अन्य महाशाल (धनी) ब्राह्मण, जो बहुत ही जीर्ण-शीर्ण और फटे-पुराने वस्त्र पहने हुए था, जहाँ भगवान थे वहाँ आया; और भगवान के साथ कुशल-क्षेम पूछा। सुखद और स्मरणीय बातें करके वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए उस महाशाल ब्राह्मण से भगवान ने यह कहा— "हे ब्राह्मण! तुम इतने जीर्ण-शीर्ण और फटे-पुराने वस्त्रों में क्यों हो?" "भो गौतम! यहाँ मेरे चार पुत्र हैं। वे अपनी पत्नियों के साथ मिलकर मुझे घर से निकाल चुके हैं।" "तो ब्राह्मण! तुम इन गाथाओं को याद कर लो और जब सभा में बहुत से लोग इकट्ठे हों और तुम्हारे पुत्र भी वहाँ बैठे हों, तब इन्हें कहना—" ‘‘เยหิ ชาเตหิ นนฺทิสฺสํ, เยสญฺจ ภวมิจฺฉิสํ; เต มํ ทาเรหิ สํปุจฺฉ, สาว วาเรนฺติ สูกรํ. "जिनके जन्म पर मैं प्रसन्न हुआ था और जिनकी उन्नति की मैंने कामना की थी; वे ही अपनी पत्नियों के साथ मिलकर मुझे वैसे ही खदेड़ रहे हैं जैसे कुत्ते सूअर को खदेड़ते हैं।" ‘‘อสนฺตา กิร มํ ชมฺมา, ตาต ตาตาติ ภาสเร; รกฺขสา ปุตฺตรูเปน, เต ชหนฺติ วโยคตํ. "वे दुष्ट और नीच मुझे 'पिता-पिता' कहते थे; पुत्र के रूप में वे राक्षस हैं, जो वृद्ध होने पर मेरा त्याग कर रहे हैं।" ‘‘อสฺโสว ชิณฺโณ นิพฺโภโค, ขาทนา อปนียติ; พาลกานํ ปิตา เถโร, ปราคาเรสุ ภิกฺขติ. "जैसे बूढ़ा और अनुपयोगी होने पर घोड़े को चारे से हटा दिया जाता है; वैसे ही इन मूर्खों का वृद्ध पिता दूसरों के घरों में भीख माँगता है।" ‘‘ทณฺโฑว กิร เม เสยฺโย, ยญฺเจ ปุตฺตา อนสฺสวา; จณฺฑมฺปิ โคณํ วาเรติ, อโถ จณฺฑมฺปิ กุกฺกุรํ. "इन आज्ञा न मानने वाले पुत्रों से तो मेरा यह डंडा ही श्रेष्ठ है; यह क्रूर बैल को रोकता है और खूँखार कुत्ते को भी दूर रखता है।" ‘‘อนฺธกาเร ปุเร โหติ, คมฺภีเร คาธเมธติ; ทณฺฑสฺส อานุภาเวน, ขลิตฺวา ปติติฏฺฐตี’’ติ. "अंधेरे में यह आगे चलता है, गहरे पानी में सहारा (थाह) देता है; डंडे के प्रभाव से फिसलने पर भी मनुष्य फिर से संभल जाता है।" อถ โข โส พฺราหฺมณมหาสาโล ภควโต สนฺติเก อิมา คาถาโย ปริยาปุณิตฺวา สภายํ มหาชนกาเย สนฺนิปติเต ปุตฺเตสุ จ สนฺนิสินฺเนสุ อภาสิ – तब उस महाशाल ब्राह्मण ने भगवान के पास इन गाथाओं को सीखा और जब सभा में बहुत से लोग इकट्ठे हुए और पुत्र भी वहाँ बैठे थे, तब उसने ये गाथाएँ कहीं— ‘‘เยหิ ชาเตหิ นนฺทิสฺสํ, เยสญฺจ ภวมิจฺฉิสํ; เต มํ ทาเรหิ สํปุจฺฉ, สาว วาเรนฺติ สูกรํ. "जिनके जन्म पर मैं प्रसन्न हुआ था और जिनकी उन्नति की मैंने कामना की थी; वे ही अपनी पत्नियों के साथ मिलकर मुझे वैसे ही खदेड़ रहे हैं जैसे कुत्ते सूअर को खदेड़ते हैं।" ‘‘อสนฺตา กิร มํ ชมฺมา, ตาต ตาตาติ ภาสเร; รกฺขสา ปุตฺตรูเปน, เต ชหนฺติ วโยคตํ. "वे दुष्ट और नीच मुझे 'पिता-पिता' कहते थे; पुत्र के रूप में वे राक्षस हैं, जो वृद्ध होने पर मेरा त्याग कर रहे हैं।" ‘‘อสฺโสว [Pg.179] ชิณฺโณ นิพฺโภโค, ขาทนา อปนียติ; พาลกานํ ปิตา เถโร, ปราคาเรสุ ภิกฺขติ. "जैसे बूढ़ा और अनुपयोगी होने पर घोड़े को चारे से हटा दिया जाता है; वैसे ही इन मूर्खों का वृद्ध पिता दूसरों के घरों में भीख माँगता है।" ‘‘ทณฺโฑว กิร เม เสยฺโย, ยญฺเจ ปุตฺตา อนสฺสวา; จณฺฑมฺปิ โคณํ วาเรติ, อโถ จณฺฑมฺปิ กุกฺกุรํ. "इन आज्ञा न मानने वाले पुत्रों से तो मेरा यह डंडा ही श्रेष्ठ है; यह क्रूर बैल को रोकता है और खूँखार कुत्ते को भी दूर रखता है।" ‘‘อนฺธกาเร ปุเร โหติ, คมฺภีเร คาธเมธติ; ทณฺฑสฺส อานุภาเวน, ขลิตฺวา ปติติฏฺฐตี’’ติ. "अंधेरे में यह आगे चलता है, गहरे पानी में सहारा (थाह) देता है; डंडे के प्रभाव से फिसलने पर भी मनुष्य फिर से संभल जाता है।" อถ โข นํ พฺราหฺมณมหาสาลํ ปุตฺตา ฆรํ เนตฺวา นฺหาเปตฺวา ปจฺเจกํ ทุสฺสยุเคน อจฺฉาเทสุํ. อถ โข โส พฺราหฺมณมหาสาโล เอกํ ทุสฺสยุคํ อาทาย เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข พฺราหฺมณมหาสาโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘มยํ, โภ โคตม, พฺราหฺมณา นาม อาจริยสฺส อาจริยธนํ ปริเยสาม. ปฏิคฺคณฺหตุ เม ภวํ โคตโม อาจริยธน’’นฺติ. ปฏิคฺคเหสิ ภควา อนุกมฺปํ อุปาทาย. อถ โข โส พฺราหฺมณมหาสาโล ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม…เป… อุปาสกํ มํ ภวํ โคตโม ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. तब उन पुत्रों ने उस महाशाल ब्राह्मण को घर ले जाकर स्नान कराया और प्रत्येक ने उसे वस्त्रों की एक-एक जोड़ी दी। तब वह महाशाल ब्राह्मण वस्त्रों की एक जोड़ी लेकर जहाँ भगवान थे वहाँ आया; और भगवान के साथ कुशल-क्षेम पूछा। सुखद और स्मरणीय बातें करके वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए उस महाशाल ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा— "भो गौतम! हम ब्राह्मण अपने गुरु के लिए गुरु-दक्षिणा (आचार्य-धन) खोजते हैं। भगवान गौतम मेरी यह गुरु-दक्षिणा स्वीकार करें।" भगवान ने अनुकम्पावश उसे स्वीकार कर लिया। तब उस महाशाल ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा— "अति सुंदर, भो गौतम! ... आज से मुझे भगवान गौतम अपना ऐसा उपासक स्वीकार करें, जिसने जीवन भर के लिए शरण ग्रहण की है।" ๕. มานตฺถทฺธสุตฺตํ ५. ५. मानत्थद्ध सुत्त ๒๐๑. สาวตฺถินิทานํ. เตน โข ปน สมเยน มานตฺถทฺโธ นาม พฺราหฺมโณ สาวตฺถิยํ ปฏิวสติ. โส เนว มาตรํ อภิวาเทติ, น ปิตรํ อภิวาเทติ, น อาจริยํ อภิวาเทติ, น เชฏฺฐภาตรํ อภิวาเทติ. เตน โข ปน สมเยน ภควา มหติยา ปริสาย ปริวุโต ธมฺมํ เทเสติ. อถ โข มานตฺถทฺธสฺส พฺราหฺมณสฺส เอตทโหสิ – ‘‘อยํ โข สมโณ โคตโม มหติยา ปริสาย ปริวุโต ธมฺมํ เทเสติ. ยํนูนาหํ เยน สมโณ โคตโม เตนุปสงฺกเมยฺยํ. สเจ มํ สมโณ โคตโม อาลปิสฺสติ, อหมฺปิ ตํ อาลปิสฺสามิ. โน เจ มํ สมโณ โคตโม อาลปิสฺสติ, อหมฺปิ นาลปิสฺสามี’’ติ. อถ โข มานตฺถทฺโธ พฺราหฺมโณ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตุณฺหีภูโต เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. อถ โข ภควา ตํ นาลปิ. อถ โข มานตฺถทฺโธ พฺราหฺมโณ – ‘นายํ สมโณ [Pg.180] โคตโม กิญฺจิ ชานาตี’ติ ตโตว ปุน นิวตฺติตุกาโม อโหสิ. อถ โข ภควา มานตฺถทฺธสฺส พฺราหฺมณสฺส เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย มานตฺถทฺธํ พฺราหฺมณํ คาถาย อชฺฌภาสิ – २०१. २०१. श्रावस्ती में। उस समय मानत्थद्ध (अहंकार से जकड़ा हुआ) नामक एक ब्राह्मण श्रावस्ती में रहता था। वह न तो अपनी माता का अभिवादन करता था, न पिता का, न आचार्य का और न ही अपने बड़े भाई का। उस समय भगवान एक बड़ी सभा से घिरे हुए धर्मोपदेश दे रहे थे। तब मानत्थद्ध ब्राह्मण को यह विचार आया— “यह श्रमण गौतम बड़ी सभा से घिरे हुए धर्मोपदेश दे रहे हैं। क्यों न मैं श्रमण गौतम के पास जाऊँ? यदि श्रमण गौतम मुझसे बात करेंगे, तो मैं भी उनसे बात करूँगा। यदि श्रमण गौतम मुझसे बात नहीं करेंगे, तो मैं भी उनसे बात नहीं करूँगा।” तब मानत्थद्ध ब्राह्मण जहाँ भगवान थे, वहाँ गया; और पास जाकर चुपचाप एक ओर खड़ा हो गया। तब भगवान उससे नहीं बोले। तब मानत्थद्ध ब्राह्मण ने सोचा— “यह श्रमण गौतम कुछ नहीं जानते,” और वह वहीं से वापस लौट जाना चाहता था। तब भगवान ने मानत्थद्ध ब्राह्मण के मन के विचार को अपने चित्त से जानकर उसे गाथा में संबोधित किया— ‘‘น มานํ พฺราหฺมณ สาธุ, อตฺถิกสฺสีธ พฺราหฺมณ; เยน อตฺเถน อาคจฺฉิ, ตเมวมนุพฺรูหเย’’ติ. “हे ब्राह्मण! अभिमान करना अच्छा नहीं है। हे ब्राह्मण! यहाँ (इस लोक में) जो व्यक्ति अपने हित का इच्छुक है, वह जिस प्रयोजन (उद्देश्य) के लिए आया है, उसे उसी हित की वृद्धि करनी चाहिए।” อถ โข มานตฺถทฺโธ พฺราหฺมโณ – ‘‘จิตฺตํ เม สมโณ โคตโม ชานาตี’’ติ ตตฺเถว ภควโต ปาเทสุ สิรสา นิปติตฺวา ภควโต ปาทานิ มุเขน จ ปริจุมฺพติ ปาณีหิ จ ปริสมฺพาหติ, นามญฺจ สาเวติ – ‘‘มานตฺถทฺธาหํ, โภ โคตม, มานตฺถทฺธาหํ, โภ โคตมา’’ติ. อถ โข สา ปริสา อพฺภุตจิตฺตชาตา อโหสิ – ‘อจฺฉริยํ วต โภ, อพฺภุตํ วต โภ! อยญฺหิ มานตฺถทฺโธ พฺราหฺมโณ เนว มาตรํ อภิวาเทติ, น ปิตรํ อภิวาเทติ, น อาจริยํ อภิวาเทติ, น เชฏฺฐภาตรํ อภิวาเทติ; อถ จ ปน สมเณ โคตเม เอวรูปํ ปรมนิปจฺจการํ กโรตี’ติ. อถ โข ภควา มานตฺถทฺธํ พฺราหฺมณํ เอตทโวจ – ‘‘อลํ, พฺราหฺมณ, อุฏฺเฐหิ, สเก อาสเน นิสีท. ยโต เต มยิ จิตฺตํ ปสนฺน’’นฺติ. อถ โข มานตฺถทฺโธ พฺราหฺมโณ สเก อาสเน นิสีทิตฺวา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब मानत्थद्ध ब्राह्मण ने सोचा— “श्रमण गौतम मेरे चित्त को जानते हैं,” और वह तुरंत भगवान के चरणों में सिर रखकर गिर पड़ा और भगवान के चरणों को मुख से चूमने लगा, हाथों से सहलाने लगा और अपना नाम बताने लगा— “हे गौतम! मैं मानत्थद्ध हूँ; हे गौतम! मैं मानत्थद्ध हूँ।” तब वह सभा आश्चर्यचकित हो गई— “अहो! आश्चर्य है, अहो! अद्भुत है! यह मानत्थद्ध ब्राह्मण न तो अपनी माता का अभिवादन करता था, न पिता का, न आचार्य का और न ही अपने बड़े भाई का; फिर भी श्रमण गौतम के प्रति इस प्रकार का परम आदर भाव प्रदर्शित कर रहा है!” तब भगवान ने मानत्थद्ध ब्राह्मण से यह कहा— “बस ब्राह्मण, उठो, अपने आसन पर बैठो। क्योंकि तुम्हारा चित्त मेरे प्रति प्रसन्न (श्रद्धावान) हो गया है।” तब मानत्थद्ध ब्राह्मण अपने आसन पर बैठकर भगवान से गाथा में बोला— ‘‘เกสุ น มานํ กยิราถ, เกสุ จสฺส สคารโว; กฺยสฺส อปจิตา อสฺสุ, กฺยสฺสุ สาธุ สุปูชิตา’’ติ. “किनके प्रति अभिमान नहीं करना चाहिए? किनके प्रति आदर भाव रखना चाहिए? किनका सम्मान करना चाहिए? और किनकी भली-भाँति पूजा करनी चाहिए?” ‘‘มาตริ ปิตริ จาปิ, อโถ เชฏฺฐมฺหิ ภาตริ; อาจริเย จตุตฺถมฺหิ,เตสุ น มานํ กยิราถ; เตสุ อสฺส สคารโว,ตฺยสฺส อปจิตา อสฺสุ; ตฺยสฺสุ สาธุ สุปูชิตา. “माता और पिता के प्रति, और बड़े भाई के प्रति भी; तथा चौथे आचार्य के प्रति— इनके प्रति अभिमान नहीं करना चाहिए; इनके प्रति आदर भाव रखना चाहिए; इनका सम्मान करना चाहिए और इनकी भली-भाँति पूजा करनी चाहिए। ‘‘อรหนฺเต สีตีภูเต, กตกิจฺเจ อนาสเว; นิหจฺจ มานํ อถทฺโธ, เต นมสฺเส อนุตฺตเร’’ติ. जो अर्हन्त हैं, शांत (शीतलीभूत) हैं, कृतकृत्य हैं और आस्रव-रहित हैं; उन अतुलनीय अर्हन्तों के प्रति मान (अहंकार) को त्यागकर और विनम्र होकर तुम्हें उन्हें नमस्कार करना चाहिए।” เอวํ [Pg.181] วุตฺเต, มานตฺถทฺโธ พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม…เป… อุปาสกํ มํ ภวํ โคตโม ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ऐसा कहे जाने पर, मानत्थद्ध ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा— “अति सुंदर, हे गौतम! ... आज से मुझे भगवान गौतम अपना ऐसा उपासक स्वीकार करें, जिसने जीवनपर्यंत शरण ग्रहण की है।” ๖. ปจฺจนีกสุตฺตํ ६. ६. पच्चनीक सुत्त ๒๐๒. สาวตฺถินิทานํ. เตน โข ปน สมเยน ปจฺจนีกสาโต นาม พฺราหฺมโณ สาวตฺถิยํ ปฏิวสติ. อถ โข ปจฺจนีกสาตสฺส พฺราหฺมณสฺส เอตทโหสิ – ‘‘ยํนูนาหํ เยน สมโณ โคตโม เตนุปสงฺกเมยฺยํ. ยํ ยเทว สมโณ โคตโม ภาสิสฺสติ ตํ ตเทวสฺสาหํ ปจฺจนีกาสฺส’’นฺติ. เตน โข ปน สมเยน ภควา อพฺโภกาเส จงฺกมติ. อถ โข ปจฺจนีกสาโต พฺราหฺมโณ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ จงฺกมนฺตํ เอตทโวจ – ‘ภณ สมณธมฺม’นฺติ. २०२. २०२. श्रावस्ती में। उस समय पच्चनीकसात नामक एक ब्राह्मण श्रावस्ती में रहता था। तब पच्चनीकसात ब्राह्मण को यह विचार आया— “क्यों न मैं श्रमण गौतम के पास जाऊँ? श्रमण गौतम जो-जो भी कहेंगे, मैं उसका विरोध (प्रतिकूलता) ही करूँगा।” उस समय भगवान खुले स्थान में चंक्रमण (टहल) कर रहे थे। तब पच्चनीकसात ब्राह्मण जहाँ भगवान थे, वहाँ गया; और पास जाकर चंक्रमण करते हुए भगवान से यह कहा— “हे श्रमण! धर्म का उपदेश दें।” ‘‘น ปจฺจนีกสาเตน, สุวิชานํ สุภาสิตํ; อุปกฺกิลิฏฺฐจิตฺเตน, สารมฺภพหุเลน จ. “जो विरोध करने में सुख मानता है, जिसका चित्त मलिन है और जो अत्यंत आक्रामक (कलहप्रिय) है, उसके द्वारा सुभाषित (भली-भाँति कहे गए धर्म) को समझना सरल नहीं है। ‘‘โย จ วิเนยฺย สารมฺภํ, อปฺปสาทญฺจ เจตโส; อาฆาตํ ปฏินิสฺสชฺช, ส เว ชญฺญา สุภาสิต’’นฺติ. किन्तु जो आक्रामकता और चित्त की अप्रसन्नता को दूर कर देता है, और द्वेष (क्रोध) को त्याग देता है, वही वास्तव में सुभाषित को जान सकता है।” เอวํ วุตฺเต, ปจฺจนีกสาโต พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม, อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม…เป… อุปาสกํ มํ ภวํ โคตโม ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ऐसा कहे जाने पर, पच्चनीकसात ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा— “अति सुंदर, हे गौतम! अति सुंदर, हे गौतम! ... आज से मुझे भगवान गौतम अपना ऐसा उपासक स्वीकार करें, जिसने जीवनपर्यंत शरण ग्रहण की है।” ๗. นวกมฺมิกสุตฺตํ ७. ७. नवकम्मिक सुत्त ๒๐๓. เอกํ สมยํ ภควา โกสเลสุ วิหรติ อญฺญตรสฺมึ วนสณฺเฑ. เตน โข ปน สมเยน นวกมฺมิกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ตสฺมึ วนสณฺเฑ กมฺมนฺตํ การาเปติ. อทฺทสา โข นวกมฺมิกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ อญฺญตรสฺมึ สาลรุกฺขมูเล นิสินฺนํ ปลฺลงฺกํ อาภุชิตฺวา อุชุํ กายํ ปณิธาย ปริมุขํ สตึ อุปฏฺฐเปตฺวา. ทิสฺวานสฺส เอตทโหสิ – ‘‘อหํ โข อิมสฺมึ วนสณฺเฑ กมฺมนฺตํ การาเปนฺโต รมามิ. อยํ สมโณ โคตโม กึ การาเปนฺโต รมตี’’ติ? อถ [Pg.182] โข นวกมฺมิกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ. อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – २०३. २०३. एक समय भगवान कोसल देश के किसी वन-खंड में विहार कर रहे थे। उस समय नवकम्मिक भारद्वाज ब्राह्मण उस वन-खंड में कार्य करवा रहा था। नवकम्मिक भारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान को एक साल-वृक्ष के नीचे पालथी मारकर, शरीर को सीधा रखकर और सामने स्मृति (सजगता) स्थापित कर बैठे हुए देखा। देखकर उसे यह विचार आया— “मैं तो इस वन-खंड में काम करवाकर आनंद लेता हूँ। यह श्रमण गौतम क्या काम करवाकर आनंद लेते हैं?” तब नवकम्मिक भारद्वाज ब्राह्मण जहाँ भगवान थे, वहाँ गया। पास जाकर उसने भगवान को गाथा में संबोधित किया— ‘‘เก นุ กมฺมนฺตา กรียนฺติ, ภิกฺขุ สาลวเน ตว; ยเทกโก อรญฺญสฺมึ, รตึ วินฺทติ โคตโม’’ติ. “हे भिक्षु! इस साल-वन में आपके कौन-से कार्य हो रहे हैं? हे गौतम! आप इस अरण्य में अकेले ही किस प्रकार का आनंद प्राप्त करते हैं?” ‘‘น เม วนสฺมึ กรณียมตฺถิ,อุจฺฉินฺนมูลํ เม วนํ วิสูกํ; สฺวาหํ วเน นิพฺพนโถ วิสลฺโล,เอโก รเม อรตึ วิปฺปหายา’’ติ. “वन में मेरा कोई कार्य शेष नहीं है। मेरा (तृष्णा रूपी) वन जड़ से उखड़ चुका है और साफ हो गया है। वह मैं, वन (तृष्णा) से रहित और शल्य (दुःख के काँटे) से मुक्त होकर, अरति (ऊब) को त्यागकर वन में अकेला ही आनंद लेता हूँ।” เอวํ วุตฺเต, นวกมฺมิกภารทฺวาโช พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม…เป… อุปาสกํ มํ ภวํ โคตโม ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ऐसा कहने पर, नवकम्मिक भारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा - "अति सुंदर, हे गौतम! ... आप मुझे आज से जीवन भर के लिए शरणागत उपासक के रूप में स्वीकार करें।" ๘. กฏฺฐหารสุตฺตํ ८. कट्ठहार सुत्त ๒๐๔. เอกํ สมยํ ภควา โกสเลสุ วิหรติ อญฺญตรสฺมึ วนสณฺเฑ. เตน โข ปน สมเยน อญฺญตรสฺส ภารทฺวาชโคตฺตสฺส พฺราหฺมณสฺส สมฺพหุลา อนฺเตวาสิกา กฏฺฐหารกา มาณวกา เยน วนสณฺโฑ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา อทฺทสํสุ ภควนฺตํ ตสฺมึ วนสณฺเฑ นิสินฺนํ ปลฺลงฺกํ อาภุชิตฺวา อุชุํ กายํ ปณิธาย ปริมุขํ สตึ อุปฏฺฐเปตฺวา. ทิสฺวาน เยน ภารทฺวาชโคตฺโต พฺราหฺมโณ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภารทฺวาชโคตฺตํ พฺราหฺมณํ เอตทโวจุํ – ‘‘ยคฺเฆ, ภวํ ชาเนยฺยาสิ! อสุกสฺมึ วนสณฺเฑ สมโณ นิสินฺโน ปลฺลงฺกํ อาภุชิตฺวา อุชุํ กายํ ปณิธาย ปริมุขํ สตึ อุปฏฺฐเปตฺวา’’. อถ โข ภารทฺวาชโคตฺโต พฺราหฺมโณ เตหิ มาณวเกหิ สทฺธึ เยน โส วนสณฺโฑ เตนุปสงฺกมิ. อทฺทสา โข ภควนฺตํ ตสฺมึ วนสณฺเฑ นิสินฺนํ ปลฺลงฺกํ อาภุชิตฺวา อุชุํ กายํ ปณิธาย ปริมุขํ สตึ อุปฏฺฐเปตฺวา. ทิสฺวาน เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – २०४. एक समय भगवान कोसल देश के एक वनखंड में विहार कर रहे थे। उस समय भारद्वाज गोत्र के एक ब्राह्मण के बहुत से शिष्य, जो लकड़ी बीनने वाले (कट्ठहारक) युवक थे, उस वनखंड की ओर गए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने भगवान को उस वनखंड में पालथी मारकर, शरीर को सीधा रखकर और सामने स्मृति स्थापित कर बैठे हुए देखा। देखकर वे भारद्वाज गोत्र के ब्राह्मण के पास गए और उससे कहा - "हे आर्य, आप जानें! अमुक वनखंड में एक श्रमण पालथी मारकर, शरीर को सीधा रखकर और सामने स्मृति स्थापित कर बैठा है।" तब भारद्वाज गोत्र का वह ब्राह्मण उन युवकों के साथ उस वनखंड में गया। उसने भगवान को उस वनखंड में पालथी मारकर, शरीर को सीधा रखकर और सामने स्मृति स्थापित कर बैठे हुए देखा। देखकर वह भगवान के पास गया और भगवान को गाथा में संबोधित किया - ‘‘คมฺภีรรูเป พหุเภรเว วเน,สุญฺญํ อรญฺญํ วิชนํ วิคาหิย; อนิญฺชมาเนน ฐิเตน วคฺคุนา,สุจารุรูปํ วต ภิกฺขุ ฌายสิ. "गहन और अत्यंत भयानक वन में, इस शून्य, निर्जन अरण्य में प्रवेश कर, आप अचल और शांत शरीर से स्थित होकर ध्यान कर रहे हैं। हे भिक्षु! आप वास्तव में अत्यंत सुंदर रूप से ध्यानमग्न हैं।" ‘‘น [Pg.183] ยตฺถ คีตํ นปิ ยตฺถ วาทิตํ,เอโก อรญฺเญ วนวสฺสิโต มุนิ; อจฺเฉรรูปํ ปฏิภาติ มํ อิทํ,ยเทกโก ปีติมโน วเน วเส. "जहाँ न कोई गीत है और न ही कोई वादन, वहाँ वन के आश्रय में यह मुनि अकेला रहता है। मुझे यह आश्चर्यजनक प्रतीत होता है कि आप अकेले ही प्रसन्न मन से वन में निवास करते हैं।" ‘‘มญฺญามหํ โลกาธิปติสหพฺยตํ,อากงฺขมาโน ติทิวํ อนุตฺตรํ; กสฺมา ภวํ วิชนมรญฺญมสฺสิโต,ตโป อิธ กุพฺพสิ พฺรหฺมปตฺติยา’’ติ. "मैं समझता हूँ कि आप लोक के अधिपति (ब्रह्मा) के साथ सहवास की इच्छा रखते हुए उस अनुत्तर स्वर्ग की आकांक्षा कर रहे हैं। आप इस निर्जन अरण्य का आश्रय लेकर ब्रह्म-पद की प्राप्ति के लिए यहाँ तप क्यों कर रहे हैं?" ‘‘ยา กาจิ กงฺขา อภินนฺทนา วา,อเนกธาตูสุ ปุถู สทาสิตา; อญฺญาณมูลปฺปภวา ปชปฺปิตา,สพฺพา มยา พฺยนฺติกตา สมูลิกา. "जो भी कोई तृष्णा या नन्दि (अभिनन्दन) है, जो अनेक धातुओं (विषयों) में सदा आश्रित और विस्तृत है, जो अज्ञान रूपी मूल से उत्पन्न और प्रजल्पित (लालसायुक्त) है, उन सबको मैंने जड़ सहित समाप्त कर दिया है।" ‘‘สฺวาหํ อกงฺโข อสิโต อนูปโย,สพฺเพสุ ธมฺเมสุ วิสุทฺธทสฺสโน; ปปฺปุยฺย สมฺโพธิมนุตฺตรํ สิวํ,ฌายามหํ พฺรหฺม รโห วิสารโท’’ติ. "वह मैं, तृष्णा-रहित, अनाश्रित और आसक्ति-मुक्त होकर, सभी धर्मों में विशुद्ध दृष्टि वाला हूँ। उस अनुत्तर और कल्याणकारी संबोधि को प्राप्त कर, मैं इस एकांत वन में निर्भय होकर ध्यान करता हूँ।" เอวํ วุตฺเต, ภารทฺวาชโคตฺโต พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม…เป… อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ऐसा कहने पर, भारद्वाज गोत्र के ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा - "अति सुंदर, हे गौतम! अति सुंदर, हे गौतम! ... आप मुझे आज से जीवन भर के लिए शरणागत उपासक के रूप में स्वीकार करें।" ๙. มาตุโปสกสุตฺตํ ९. मातुपोसक सुत्त ๒๐๕. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข มาตุโปสโก พฺราหฺมโณ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข มาตุโปสโก พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อหญฺหิ, โภ โคตม, ธมฺเมน ภิกฺขํ ปริเยสามิ, ธมฺเมน ภิกฺขํ ปริเยสิตฺวา มาตาปิตโร โปเสมิ. กจฺจาหํ, โภ โคตม, เอวํการี กิจฺจการี โหมี’’ติ? ‘‘ตคฺฆ ตฺวํ, พฺราหฺมณ, เอวํการี กิจฺจการี โหสิ. โย โข, พฺราหฺมณ, ธมฺเมน ภิกฺขํ ปริเยสติ, ธมฺเมน ภิกฺขํ ปริเยสิตฺวา มาตาปิตโร โปเสติ, พหุํ โส ปุญฺญํ ปสวตี’’ติ. २०५. श्रावस्ती निदान। तब माता-पिता का भरण-पोषण करने वाला (मातुपोसक) ब्राह्मण जहाँ भगवान थे, वहाँ गया। पहुँचकर उसने भगवान के साथ कुशल-क्षेम पूछा। सुखद और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए उस मातुपोसक ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा - "हे गौतम, मैं धर्मपूर्वक भिक्षा माँगता हूँ और धर्मपूर्वक भिक्षा माँगकर अपने माता-पिता का भरण-पोषण करता हूँ। हे गौतम, क्या मैं ऐसा करते हुए अपना कर्तव्य पूरा करने वाला हूँ?" "निश्चित ही, ब्राह्मण, तुम ऐसा करते हुए अपना कर्तव्य पूरा करने वाले हो। ब्राह्मण, जो कोई धर्मपूर्वक भिक्षा माँगता है और धर्मपूर्वक भिक्षा माँगकर अपने माता-पिता का भरण-पोषण करता है, वह बहुत पुण्य अर्जित करता है।" ‘‘โย [Pg.184] มาตรํ ปิตรํ วา, มจฺโจ ธมฺเมน โปสติ; ตาย นํ ปาริจริยาย, มาตาปิตูสุ ปณฺฑิตา; อิเธว นํ ปสํสนฺติ, เปจฺจ สคฺเค ปโมทตี’’ติ. "जो मनुष्य धर्मपूर्वक अपनी माता या पिता का भरण-पोषण करता है, माता-पिता की उस सेवा के कारण विद्वान लोग इसी लोक में उसकी प्रशंसा करते हैं और मृत्यु के बाद वह स्वर्ग में आनंदित होता है।" เอวํ วุตฺเต, มาตุโปสโก พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ โภ โคตม, อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม…เป… อุปาสกํ มํ ภวํ โคตโม ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ऐसा कहने पर, मातुपोसक ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा - "अति सुंदर, हे गौतम! अति सुंदर, हे गौतम! ... आप मुझे आज से जीवन भर के लिए शरणागत उपासक के रूप में स्वीकार करें।" ๑๐. ภิกฺขกสุตฺตํ १०. भिक्खक सुत्त ๒๐๖. สาวตฺถินิทานํ. อถ โข ภิกฺขโก พฺราหฺมโณ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ภิกฺขโก พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อหมฺปิ โข, โภ โคตม, ภิกฺขโก, ภวมฺปิ ภิกฺขโก, อิธ โน กึ นานากรณ’’นฺติ? २०६. श्रावस्ती निदान। तब भिक्खक (भिक्षा माँगने वाला) ब्राह्मण जहाँ भगवान थे, वहाँ गया। पहुँचकर उसने भगवान के साथ कुशल-क्षेम पूछा। सुखद और स्मरणीय बातचीत समाप्त कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए उस भिक्खक ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा - "हे गौतम, मैं भी भिक्षा माँगने वाला हूँ और आप भी भिक्षा माँगने वाले हैं। यहाँ हम दोनों में क्या अंतर है?" ‘‘น เตน ภิกฺขโก โหติ, ยาวตา ภิกฺขเต ปเร; วิสฺสํ ธมฺมํ สมาทาย, ภิกฺขุ โหติ น ตาวตา. "केवल दूसरों से भिक्षा माँगने मात्र से कोई 'भिक्षु' नहीं हो जाता। दुर्गंधयुक्त (अकुशल) धर्मों को अपनाकर कोई भिक्षु नहीं बनता।" ‘‘โยธ ปุญฺญญฺจ ปาปญฺจ, พาหิตฺวา พฺรหฺมจริยํ; สงฺขาย โลเก จรติ, ส เว ภิกฺขูติ วุจฺจตี’’ติ. "जो इस लोक में पुण्य और पाप दोनों को त्याग कर, ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, ज्ञानपूर्वक विचरण करता है, वास्तव में वही 'भिक्षु' कहलाता है।" เอวํ วุตฺเต, ภิกฺขโก พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม, อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม…เป… อุปาสกํ มํ ภวํ โคตโม ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ऐसा कहने पर, भिक्खक ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा - "अति सुंदर, हे गौतम! अति सुंदर, हे गौतम! ... आप मुझे आज से जीवन भर के लिए शरणागत उपासक के रूप में स्वीकार करें।" ๑๑. สงฺคารวสุตฺตํ ११. संगारव सुत्त ๒๐๗. สาวตฺถินิทานํ. เตน โข ปน สมเยน สงฺคารโว นาม พฺราหฺมโณ สาวตฺถิยํ ปฏิวสติ อุทกสุทฺธิโก, อุทเกน ปริสุทฺธึ ปจฺเจติ, สายํ ปาตํ อุทโกโรหนานุโยคมนุยุตฺโต วิหรติ. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สาวตฺถึ ปิณฺฑาย ปาวิสิ. สาวตฺถิยํ ปิณฺฑาย จริตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺโต เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิธ, ภนฺเต, สงฺคารโว นาม พฺราหฺมโณ สาวตฺถิยํ ปฏิวสติ อุทกสุทฺธิโก[Pg.185], อุทเกน สุทฺธึ ปจฺเจติ, สายํ ปาตํ อุทโกโรหนานุโยคมนุยุตฺโต วิหรติ. สาธุ, ภนฺเต, ภควา เยน สงฺคารวสฺส พฺราหฺมณสฺส นิเวสนํ เตนุปสงฺกมตุ อนุกมฺปํ อุปาทายา’’ติ. อธิวาเสสิ ภควา ตุณฺหีภาเวน. २०७. श्रावस्ती निदान। उस समय संगारव नामक ब्राह्मण श्रावस्ती में रहता था, जो जल-शुद्धिवादी था, जल से शुद्धि में विश्वास करता था, और सुबह-शाम जल में उतरने (स्नान) के अभ्यास में लगा रहता था। तब आयुष्मान आनन्द पूर्वाह्न समय में निवसन पहनकर, पात्र और चीवर लेकर श्रावस्ती में पिण्डपात के लिए प्रविष्ट हुए। श्रावस्ती में पिण्डपात के लिए विचरण कर, भोजन के पश्चात पिण्डपात से लौटकर जहाँ भगवान् थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान आनन्द ने भगवान् से यह कहा — "भन्ते, यहाँ श्रावस्ती में संगारव नामक ब्राह्मण रहता है, जो जल-शुद्धिवादी है, जल से शुद्धि में विश्वास करता है, और सुबह-शाम जल में उतरने के अभ्यास में लगा रहता है। भन्ते, अच्छा हो यदि भगवान् अनुकम्पा करके संगारव ब्राह्मण के निवास पर चलें।" भगवान् ने मौन रहकर स्वीकार किया। อถ โข ภควา ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย เยน สงฺคารวสฺส พฺราหฺมณสฺส นิเวสนํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. อถ โข สงฺคารโว พฺราหฺมโณ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข สงฺคารวํ พฺราหฺมณํ ภควา เอตทโวจ – ‘‘สจฺจํ กิร ตฺวํ, พฺราหฺมณ, อุทกสุทฺธิโก, อุทเกน สุทฺธึ ปจฺเจสิ, สายํ ปาตํ อุทโกโรหนานุโยคมนุยุตฺโต วิหรสี’’ติ? ‘‘เอวํ, โภ โคตม’’. ‘‘กึ ปน ตฺวํ, พฺราหฺมณ, อตฺถวสํ สมฺปสฺสมาโน อุทกสุทฺธิโก, อุทกสุทฺธึ ปจฺเจสิ, สายํ ปาตํ อุทโกโรหนานุโยคมนุยุตฺโต วิหรสี’’ติ? ‘‘อิธ เม, โภ โคตม, ยํ ทิวา ปาปกมฺมํ กตํ โหติ, ตํ สายํ นฺหาเนน ปวาเหมิ, ยํ รตฺตึ ปาปกมฺมํ กตํ โหติ ตํ ปาตํ นฺหาเนน ปวาเหมิ. อิมํ ขฺวาหํ, โภ โคตม, อตฺถวสํ สมฺปสฺสมาโน อุทกสุทฺธิโก, อุทเกน สุทฺธึ ปจฺเจมิ, สายํ ปาตํ อุทโกโรหนานุโยคมนุยุตฺโต วิหรามี’’ติ. तब भगवान् पूर्वाह्न समय में निवसन पहनकर, पात्र और चीवर लेकर जहाँ संगारव ब्राह्मण का निवास था, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर बिछाए हुए आसन पर बैठ गए। तब संगारव ब्राह्मण जहाँ भगवान् थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान् के साथ कुशल-क्षेम पूछा। संमोदनीय और स्मरणीय चर्चा समाप्त कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए संगारव ब्राह्मण से भगवान् ने यह कहा — "ब्राह्मण, क्या यह सच है कि तुम जल-शुद्धिवादी हो, जल से शुद्धि में विश्वास करते हो, और सुबह-शाम जल में उतरने के अभ्यास में लगे रहते हो?" "हाँ, भो गौतम।" "ब्राह्मण, तुम किस लाभ को देखते हुए जल-शुद्धिवादी हो, जल से शुद्धि में विश्वास करते हो, और सुबह-शाम जल में उतरने के अभ्यास में लगे रहते हो?" "भो गौतम, यहाँ दिन में जो भी पाप-कर्म मुझसे हो जाता है, उसे मैं शाम को स्नान द्वारा बहा देता हूँ; रात में जो भी पाप-कर्म मुझसे हो जाता है, उसे मैं सुबह स्नान द्वारा बहा देता हूँ। भो गौतम, इसी लाभ को देखते हुए मैं जल-शुद्धिवादी हूँ, जल से शुद्धि में विश्वास करता हूँ, और सुबह-शाम जल में उतरने के अभ्यास में लगा रहता हूँ।" ‘‘ธมฺโม รหโท พฺราหฺมณ สีลติตฺโถ,อนาวิโล สพฺภิ สตํ ปสตฺโถ; ยตฺถ หเว เวทคุโน สินาตา,อนลฺลคตฺตาว ตรนฺติ ปาร’’นฺติ. "ब्राह्मण! धर्म ही सरोवर है और शील ही उसका घाट है, जो निर्मल है और सत्पुरुषों द्वारा प्रशंसित है। जहाँ वेदज्ञ (ज्ञानी) स्नान करते हैं, वे बिना भीगे ही (अनासक्त होकर) पार उतर जाते हैं।" เอวํ วุตฺเต, สงฺคารโว พฺราหฺมโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม, อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม…เป… อุปาสกํ มํ ภวํ โคตโม ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. ऐसा कहे जाने पर, संगारव ब्राह्मण ने भगवान् से यह कहा — "अति सुंदर, भो गौतम! अति सुंदर, भो गौतम! ... आप मुझे आज से जीवन भर के लिए शरणागत उपासक स्वीकार करें।" ๑๒. โขมทุสฺสสุตฺตํ १२. खोमदुस्स सुत्त ๒๐๘. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สกฺเกสุ วิหรติ โขมทุสฺสํ นามํ สกฺยานํ นิคโม. อถ โข ภควา ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา [Pg.186] ปตฺตจีวรมาทาย โขมทุสฺสํ นิคมํ ปิณฺฑาย ปาวิสิ. เตน โข ปน สมเยน โขมทุสฺสกา พฺราหฺมณคหปติกา สภายํ สนฺนิปติตา โหนฺติ เกนจิเทว กรณีเยน, เทโว จ เอกเมกํ ผุสายติ. อถ โข ภควา เยน สา สภา เตนุปสงฺกมิ. อทฺทสํสุ โขมทุสฺสกา พฺราหฺมณคหปติกา ภควนฺตํ ทูรโตว อาคจฺฉนฺตํ. ทิสฺวาน เอตทโวจุํ – ‘‘เก จ มุณฺฑกา สมณกา, เก จ สภาธมฺมํ ชานิสฺสนฺตี’’ติ? อถ โข ภควา โขมทุสฺสเก พฺราหฺมณคหปติเก คาถาย อชฺฌภาสิ – २०८. ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान् शाक्यों के जनपद में खोमदुस्स नामक शाक्यों के कस्बे (निगम) में विहार कर रहे थे। तब भगवान् पूर्वाह्न समय में निवसन पहनकर, पात्र और चीवर लेकर खोमदुस्स कस्बे में पिण्डपात के लिए प्रविष्ट हुए। उस समय खोमदुस्स के ब्राह्मण और गृहपति किसी कार्यवश सभा-भवन में एकत्रित थे, और हल्की वर्षा की बूँदें पड़ रही थीं। तब भगवान् जहाँ वह सभा थी, वहाँ पहुँचे। खोमदुस्स के ब्राह्मणों और गृहपतियों ने भगवान् को दूर से ही आते देखा। देखकर उन्होंने यह कहा — "ये मुण्डक (सिर मुँडाए हुए) श्रमण कौन हैं? ये सभा के नियमों को क्या जानेंगे?" तब भगवान् ने खोमदुस्स के ब्राह्मणों और गृहपतियों को गाथा में संबोधित किया — ‘‘เนสา สภา ยตฺถ น สนฺติ สนฺโต,สนฺโต น เต เย น วทนฺติ ธมฺมํ; ราคญฺจ โทสญฺจ ปหาย โมหํ,ธมฺมํ วทนฺตา จ ภวนฺติ สนฺโต’’ติ. "वह सभा नहीं जहाँ सत्पुरुष नहीं होते, वे सत्पुरुष नहीं जो धर्म की बात नहीं करते; जो राग, द्वेष और मोह को त्याग कर धर्म का उपदेश देते हैं, वे ही सत्पुरुष होते हैं।" เอวํ วุตฺเต, โขมทุสฺสกา พฺราหฺมณคหปติกา ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม, อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม; เสยฺยถาปิ, โภ โคตม, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย, ปฏิจฺฉนฺนํ วา วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย – จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตีติ, เอวเมวํ โภตา โคตเมน อเนกปริยาเยน ธมฺโม ปกาสิโต. เอเต มยํ ภวนฺตํ โคตมํ สรณํ คจฺฉาม ธมฺมญฺจ ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. อุปาสเก โน ภวํ โคตโม ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปเต สรณํ คเต’’ติ. ऐसा कहे जाने पर, खोमदुस्स के ब्राह्मणों और गृहपतियों ने भगवान् से यह कहा — "अति सुंदर, भो गौतम! अति सुंदर, भो गौतम! जैसे कोई औंधे हुए को सीधा कर दे, ढके हुए को खोल दे, राह भूले को रास्ता दिखा दे, या अंधेरे में तेल का दीपक जला दे कि आँख वाले रूप देख सकें; वैसे ही आप गौतम ने अनेक प्रकार से धर्म प्रकाशित किया है। हम आप गौतम, धर्म और भिक्षु-संघ की शरण में जाते हैं। आप हमें आज से जीवन भर के लिए शरणागत उपासक स्वीकार करें।" อุปาสกวคฺโค ทุติโย. द्वितीय उपासक वर्ग। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान) — กสิ อุทโย เทวหิโต, อญฺญตรมหาสาลํ; มานถทฺธํ ปจฺจนีกํ, นวกมฺมิกกฏฺฐหารํ; มาตุโปสกํ ภิกฺขโก, สงฺคารโว จ โขมทุสฺเสน ทฺวาทสาติ. कसि, उदय, देवहित, अन्यतर महासाल, मानत्थद्ध, पच्चनीक, नवकम्मिक, कट्ठहार, मातुपोसक, भिक्खक, संगारव और खोमदुस्स — ये बारह (सुत्त) हैं। พฺราหฺมณสํยุตฺตํ สมตฺตํ. ब्राह्मण संयुक्त समाप्त। ๘. วงฺคีสสํยุตฺตํ ८. वंगीस संयुक्त ๑. นิกฺขนฺตสุตฺตํ १. निक्खन्त सुत्त ๒๐๙. เอวํ [Pg.187] เม สุตํ – เอกํ สมยํ อายสฺมา วงฺคีโส อาฬวิยํ วิหรติ อคฺคาฬเว เจติเย อายสฺมตา นิคฺโรธกปฺเปน อุปชฺฌาเยน สทฺธึ. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา วงฺคีโส นวโก โหติ อจิรปพฺพชิโต โอหิยฺยโก วิหารปาโล. อถ โข สมฺพหุลา อิตฺถิโย สมลงฺกริตฺวา เยน อคฺคาฬวโก อาราโม เตนุปสงฺกมึสุ วิหารเปกฺขิกาโย. อถ โข อายสฺมโต วงฺคีสสฺส ตา อิตฺถิโย ทิสฺวา อนภิรติ อุปฺปชฺชติ, ราโค จิตฺตํ อนุทฺธํเสติ. อถ โข อายสฺมโต วงฺคีสสฺส เอตทโหสิ – ‘‘อลาภา วต เม, น วต เม ลาภา; ทุลฺลทฺธํ วต เม, น วต เม สุลทฺธํ; ยสฺส เม อนภิรติ อุปฺปนฺนา, ราโค จิตฺตํ อนุทฺธํเสติ, ตํ กุเตตฺถ ลพฺภา, ยํ เม ปโร อนภิรตึ วิโนเทตฺวา อภิรตึ อุปฺปาเทยฺย. ยํนูนาหํ อตฺตนาว อตฺตโน อนภิรตึ วิโนเทตฺวา อภิรตึ อุปฺปาเทยฺย’’นฺติ. อถ โข อายสฺมา วงฺคีโส อตฺตนาว อตฺตโน อนภิรตึ วิโนเทตฺวา อภิรตึ อุปฺปาเทตฺวา ตายํ เวลายํ อิมา คาถาโย อภาสิ – २०९. ऐसा मैंने सुना है - एक समय आयुष्मान वंगिस आलवी में अग्गालव चैत्य में आयुष्मान निग्रोधकप्प उपाध्याय के साथ विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान वंगिस नए-नए प्रव्रजित हुए थे और विहार की देखभाल के लिए पीछे रह गए थे। तब अनेक स्त्रियाँ सज-धजकर विहार देखने के लिए अग्गालव आराम की ओर आईं। उन स्त्रियों को देखकर आयुष्मान वंगिस के मन में अरति (असन्तोष) उत्पन्न हुई और राग ने उनके चित्त को दूषित कर दिया। तब आयुष्मान वंगिस के मन में यह विचार आया - 'यह मेरे लिए बड़े घाटे की बात है, लाभ की नहीं; यह मेरे लिए दुर्भाग्य है, सौभाग्य नहीं; कि मुझमें अरति उत्पन्न हुई है और राग मेरे चित्त को दूषित कर रहा है। भला यहाँ ऐसा कौन है जो मेरी अरति को दूर कर मुझमें रति (प्रसन्नता) उत्पन्न कर सके? क्यों न मैं स्वयं ही अपनी अरति को दूर कर रति उत्पन्न करूँ।' तब आयुष्मान वंगिस ने स्वयं ही अपनी अरति को दूर कर रति उत्पन्न की और उस समय ये गाथाएँ कहीं - ‘‘นิกฺขนฺตํ วต มํ สนฺตํ, อคารสฺมานคาริยํ; วิตกฺกา อุปธาวนฺติ, ปคพฺภา กณฺหโต อิเม. 'घर से बेघर होकर प्रव्रजित हुए मुझ शान्त व्यक्ति के पीछे ये धृष्ट वितर्क (काम-विचार) दौड़ रहे हैं, जो कृष्ण (मार) के पक्ष के हैं। ‘‘อุคฺคปุตฺตา มหิสฺสาสา, สิกฺขิตา ทฬฺหธมฺมิโน; สมนฺตา ปริกิเรยฺยุํ, สหสฺสํ อปลายินํ. चाहे महान धनुर्धारी, प्रशिक्षित और सुदृढ़ धनुष वाले एक हजार राजकुमार चारों ओर से घेर लें और पीछे न हटें। ‘‘สเจปิ เอตโต ภิยฺโย, อาคมิสฺสนฺติ อิตฺถิโย; เนว มํ พฺยาธยิสฺสนฺติ, ธมฺเม สมฺหิ ปติฏฺฐิตํ. यदि इससे भी अधिक स्त्रियाँ आएँ, तो भी वे अपने धर्म में प्रतिष्ठित मुझको विचलित नहीं कर सकेंगी। ‘‘สกฺขี หิ เม สุตํ เอตํ, พุทฺธสฺสาทิจฺจพนฺธุโน; นิพฺพานคมนํ มคฺคํ, ตตฺถ เม นิรโต มโน. मैंने स्वयं सूर्य-वंशज बुद्ध के सम्मुख निर्वाणगामी मार्ग के विषय में सुना है; मेरा मन उसी में लीन है। ‘‘เอวญฺเจ มํ วิหรนฺตํ, ปาปิม อุปคจฺฉสิ; ตถา มจฺจุ กริสฺสามิ, น เม มคฺคมฺปิ ทกฺขสี’’ติ. हे पापी (मार)! यदि तुम इस प्रकार विहार करते हुए मेरे पास आओगे, तो हे मृत्यु! मैं ऐसा करूँगा कि तुम मेरा मार्ग भी नहीं देख पाओगे।' ๒. อรติสุตฺตํ २. अरति सुत्त ๒๑๐. เอกํ [Pg.188] สมยํ…เป… อายสฺมา วงฺคีโส อาฬวิยํ วิหรติ อคฺคาฬเว เจติเย อายสฺมตา นิคฺโรธกปฺเปน อุปชฺฌาเยน สทฺธึ. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา นิคฺโรธกปฺโป ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺโต วิหารํ ปวิสติ, สายํ วา นิกฺขมติ อปรชฺชุ วา กาเล. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมโต วงฺคีสสฺส อนภิรติ อุปฺปนฺนา โหติ, ราโค จิตฺตํ อนุทฺธํเสติ. อถ โข อายสฺมโต วงฺคีสสฺส เอตทโหสิ – ‘‘อลาภา วต เม, น วต เม ลาภา; ทุลฺลทฺธํ วต เม, น วต เม สุลทฺธํ; ยสฺส เม อนภิรติ อุปฺปนฺนา, ราโค จิตฺตํ อนุทฺธํเสติ; ตํ กุเตตฺถ ลพฺภา, ยํ เม ปโร อนภิรตึ วิโนเทตฺวา อภิรตึ อุปฺปาเทยฺย. ยํนูนาหํ อตฺตนาว อตฺตโน อนภิรตึ วิโนเทตฺวา อภิรตึ อุปฺปาเทยฺย’’นฺติ. อถ โข อายสฺมา วงฺคีโส อตฺตนาว อตฺตโน อนภิรตึ วิโนเทตฺวา อภิรตึ อุปฺปาเทตฺวา ตายํ เวลายํ อิมา คาถาโย อภาสิ – २१०. एक समय... आयुष्मान वंगिस आलवी में अग्गालव चैत्य में आयुष्मान निग्रोधकप्प उपाध्याय के साथ विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान निग्रोधकप्प भोजन के पश्चात भिक्षाटन से लौटकर विहार में प्रवेश करते थे और शाम को या अगले दिन समय पर बाहर निकलते थे। उस समय आयुष्मान वंगिस के मन में अरति उत्पन्न हुई और राग ने उनके चित्त को दूषित कर दिया। तब आयुष्मान वंगिस के मन में यह विचार आया - 'यह मेरे लिए बड़े घाटे की बात है, लाभ की नहीं; यह मेरे लिए दुर्भाग्य है, सौभाग्य नहीं; कि मुझमें अरति उत्पन्न हुई है और राग मेरे चित्त को दूषित कर रहा है। भला यहाँ ऐसा कौन है जो मेरी अरति को दूर कर मुझमें रति उत्पन्न कर सके? क्यों न मैं स्वयं ही अपनी अरति को दूर कर रति उत्पन्न करूँ।' तब आयुष्मान वंगिस ने स्वयं ही अपनी अरति को दूर कर रति उत्पन्न की और उस समय ये गाथाएँ कहीं - ‘‘อรติญฺจ รติญฺจ ปหาย, สพฺพโส เคหสิตญฺจ วิตกฺกํ; วนถํ น กเรยฺย กุหิญฺจิ, นิพฺพนโถ อรโต ส หิ ภิกฺขุ. 'जो अरति (धर्म में अरुचि) और रति (काम-भोगों में रुचि) को त्यागकर, घर-गृहस्थी से जुड़े सभी वितर्कों को पूरी तरह छोड़ देता है, वह कहीं भी तृष्णा रूपी वन (क्लेश) नहीं बनाता; वह तृष्णा-रहित और आसक्ति-मुक्त व्यक्ति ही वास्तव में भिक्षु है। ‘‘ยมิธ ปถวิญฺจ เวหาสํ, รูปคตญฺจ ชคโตคธํ; กิญฺจิ ปริชียติ สพฺพมนิจฺจํ, เอวํ สเมจฺจ จรนฺติ มุตตฺตา. इस पृथ्वी पर, आकाश में या पाताल में जो कुछ भी रूपवान है, वह सब क्षयशील और अनित्य है; ऐसा जानकर मुक्त-चित्त महापुरुष विचरण करते हैं। ‘‘อุปธีสุ ชนา คธิตาเส, ทิฏฺฐสุเต ปฏิเฆ จ มุเต จ; เอตฺถ วิโนทย ฉนฺทมเนโช, โย เอตฺถ น ลิมฺปติ ตํ มุนิมาหุ. लोग उपाधियों (आसक्तियों) में, देखे हुए, सुने हुए, सूंघे-चखे हुए और छुए हुए विषयों में आसक्त रहते हैं। यहाँ अपनी इच्छाओं को दूर कर जो निष्कंप (तृष्णा-रहित) होकर रहता है और इनमें लिप्त नहीं होता, उसे ही मुनि कहा जाता है। ‘‘อถ สฏฺฐินิสฺสิตา สวิตกฺกา, ปุถู ชนตาย อธมฺมา นิวิฏฺฐา; น จ วคฺคคตสฺส กุหิญฺจิ, โน ปน ทุฏฺฐุลฺลภาณี ส ภิกฺขุ. अनेक लोग छह इन्द्रिय-विषयों के आश्रित होकर मिथ्या वितर्कों और अधर्म में लीन रहते हैं। जो किसी भी गुट (क्लेशों के समूह) में शामिल नहीं होता और जो अश्लील या व्यर्थ बातें नहीं करता, वही भिक्षु है। ‘‘ทพฺโพ จิรรตฺตสมาหิโต, อกุหโก นิปโก อปิหาลุ; สนฺตํ ปทํ อชฺฌคมา มุนิ ปฏิจฺจ, ปรินิพฺพุโต กงฺขติ กาล’’นฺติ. वह मुनि जो दृढ़-प्रज्ञ है, दीर्घकाल से समाहित-चित्त है, निष्कपट है, बुद्धिमान है और तृष्णा-रहित है, उसने शान्त पद (निर्वाण) को प्राप्त कर लिया है; वह क्लेशों से मुक्त होकर केवल (देह-त्याग के) समय की प्रतीक्षा करता है।' ๓. เปสลสุตฺตํ ३. पेसल सुत्त ๒๑๑. เอกํ สมยํ อายสฺมา วงฺคีโส อาฬวิยํ วิหรติ อคฺคาฬเว เจติเย อายสฺมตา นิคฺโรธกปฺเปน อุปชฺฌาเยน สทฺธึ. เตน โข ปน สมเยน [Pg.189] อายสฺมา วงฺคีโส อตฺตโน ปฏิภาเนน อญฺเญ เปสเล ภิกฺขู อติมญฺญติ. อถ โข อายสฺมโต วงฺคีสสฺส เอตทโหสิ – ‘‘อลาภา วต เม, น วต เม ลาภา; ทุลฺลทฺธํ วต เม, น วต เม สุลทฺธํ; ยฺวาหํ อตฺตโน ปฏิภาเนน อญฺเญ เปสเล ภิกฺขู อติมญฺญามี’’ติ. อถ โข อายสฺมา วงฺคีโส อตฺตนาว อตฺตโน วิปฺปฏิสารํ อุปฺปาเทตฺวา ตายํ เวลายํ อิมา คาถาโย อภาสิ – २११. एक समय आयुष्मान वंगिस आलवी में अग्गालव चैत्य में आयुष्मान निग्रोधकप्प उपाध्याय के साथ विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान वंगिस अपनी प्रतिभा (पाण्डित्य) के कारण अन्य शीलवान भिक्षुओं का तिरस्कार करते थे। तब आयुष्मान वंगिस के मन में यह विचार आया - 'यह मेरे लिए बड़े घाटे की बात है, लाभ की नहीं; यह मेरे लिए दुर्भाग्य है, सौभाग्य नहीं; कि मैं अपनी प्रतिभा के कारण अन्य शीलवान भिक्षुओं का तिरस्कार करता हूँ।' तब आयुष्मान वंगिस ने स्वयं ही अपने मन में पश्चाताप उत्पन्न किया और उस समय ये गाथाएँ कहीं - ‘‘มานํ ปชหสฺสุ โคตม, มานปถญฺจ ปชหสฺสุ; อเสสํ มานปถสฺมึ, สมุจฺฉิโต วิปฺปฏิสารีหุวา จิรรตฺตํ. 'हे गौतम (वंगिस)! मान (अहंकार) को त्यागो और मान के मार्ग को भी पूरी तरह छोड़ दो। मान के मार्ग में मोहित होकर तुम दीर्घकाल तक पश्चाताप करते रहे हो। ‘‘มกฺเขน มกฺขิตา ปชา, มานหตา นิรยํ ปปตนฺติ; โสจนฺติ ชนา จิรรตฺตํ, มานหตา นิรยํ อุปปนฺนา. दूसरों के गुणों को छिपाने (मक्ख) से दूषित और अहंकार से दबे हुए प्राणी नरक में गिरते हैं। अहंकार के कारण नरक में उत्पन्न हुए लोग दीर्घकाल तक शोक करते हैं। ‘‘น หิ โสจติ ภิกฺขุ กทาจิ, มคฺคชิโน สมฺมาปฏิปนฺโน; กิตฺติญฺจ สุขญฺจ อนุโภติ, ธมฺมทโสติ ตมาหุ ปหิตตฺตํ. मार्ग के द्वारा क्लेशों को जीतने वाला और सम्यक प्रतिपन्न भिक्षु कभी शोक नहीं करता; वह कीर्ति और सुख का अनुभव करता है। ऐसे दृढ़-निश्चयी व्यक्ति को विद्वान 'धर्म का ज्ञाता' कहते हैं। ‘‘ตสฺมา อขิโลธ ปธานวา, นีวรณานิ ปหาย วิสุทฺโธ; มานญฺจ ปหาย อเสสํ, วิชฺชายนฺตกโร สมิตาวี’’ติ. इसलिए, इस शासन में दोष-रहित, उद्योगी और शुद्ध होकर, नीवरणों को त्यागकर और अहंकार को पूरी तरह छोड़कर, वह शान्त मुनि विद्या (अर्हत्व-ज्ञान) के द्वारा क्लेशों का अन्त कर देता है।' ๔. อานนฺทสุตฺตํ ४. आनन्द सुत्त ๒๑๒. เอกํ สมยํ อายสฺมา อานนฺโท สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สาวตฺถึ ปิณฺฑาย ปาวิสิ อายสฺมตา วงฺคีเสน ปจฺฉาสมเณน. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมโต วงฺคีสสฺส อนภิรติ อุปฺปนฺนา โหติ, ราโค จิตฺตํ อนุทฺธํเสติ. อถ โข อายสฺมา วงฺคีโส อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ คาถาย อชฺฌภาสิ – २१२. एक समय आयुष्मान आनन्द श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे। तब आयुष्मान आनन्द पूर्वाह्न के समय निवसन (अधोवस्त्र) पहनकर और पात्र-चीवर लेकर आयुष्मान वंगिस को अपना अनुचर (पीछे चलने वाला भिक्षु) बनाकर श्रावस्ती में भिक्षा के लिए प्रविष्ट हुए। उस समय आयुष्मान वंगिस के मन में अरति उत्पन्न हुई और राग ने उनके चित्त को दूषित कर दिया। तब आयुष्मान वंगिस ने आयुष्मान आनन्द से गाथा में कहा - ‘‘กามราเคน ฑยฺหามิ, จิตฺตํ เม ปริฑยฺหติ; สาธุ นิพฺพาปนํ พฺรูหิ, อนุกมฺปาย โคตมา’’ติ. “मैं काम-राग की अग्नि से जल रहा हूँ, मेरा चित्त चारों ओर से जल रहा है। हे गौतम! मुझ पर अनुकम्पा करते हुए, कृपा कर (इस राग को) शांत करने का उपाय बताएँ।” ‘‘สญฺญาย วิปริเยสา, จิตฺตํ เต ปริฑยฺหติ; นิมิตฺตํ ปริวชฺเชหิ, สุภํ ราคูปสํหิตํ. “संज्ञा (पहचान) के विपर्यास (भ्रम) के कारण तुम्हारा चित्त जल रहा है। राग से युक्त 'शुभ' (सुंदरता) के निमित्त (आभास) का त्याग करो। ‘‘สงฺขาเร ปรโต ปสฺส, ทุกฺขโต มา จ อตฺตโต; นิพฺพาเปหิ มหาราคํ, มา ฑยฺหิตฺโถ ปุนปฺปุนํ. संस्कारों को पराया (अनित्य) और दुःख के रूप में देखो, उन्हें 'आत्मा' के रूप में मत देखो। इस महान राग को शांत करो, बार-बार मत जलो। ‘‘อสุภาย [Pg.190] จิตฺตํ ภาเวหิ, เอกคฺคํ สุสมาหิตํ; สติ กายคตา ตฺยตฺถุ, นิพฺพิทาพหุโล ภว. अशुभ (असुन्दरता) की भावना से चित्त को एकाग्र और सुसमाहित करो। तुम्हारे भीतर कायानुगत स्मृति (कायगता सति) बनी रहे और तुम (राग के प्रति) वैराग्य से ओत-प्रोत हो जाओ। ‘‘อนิมิตฺตญฺจ ภาเวหิ, มานานุสยมุชฺชห; ตโต มานาภิสมยา, อุปสนฺโต จริสฺสสี’’ติ. अनिमित्त (विपश्यना) की भावना करो और मान (अहंकार) के अनुशय को त्याग दो। उस मान के पूर्ण प्रहाण से तुम शांत होकर विचरण करोगे।” ๕. สุภาสิตสุตฺตํ ५. ५. सुभाषित सुत्त ๒๑๓. สาวตฺถินิทานํ. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ภิกฺขโว’’ติ. ‘‘ภทนฺเต’’ติ เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – २१३. २१३. श्रावस्ती निदान। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— “हे भिक्षुओं!” उन भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया— “भदन्त!” भगवान ने यह कहा— ‘‘จตูหิ, ภิกฺขเว, องฺเคหิ สมนฺนาคตา วาจา สุภาสิตา โหติ, โน ทุพฺภาสิตา; อนวชฺชา จ อนนุวชฺชา จ วิญฺญูนํ. กตเมหิ จตูหิ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สุภาสิตํเยว ภาสติ โน ทุพฺภาสิตํ, ธมฺมํเยว ภาสติ โน อธมฺมํ, ปิยํเยว ภาสติ โน อปฺปิยํ, สจฺจํเยว ภาสติ โน อลิกํ. อิเมหิ โข, ภิกฺขเว, จตูหิ องฺเคหิ สมนฺนาคตา วาจา สุภาสิตา โหติ, โน ทุพฺภาสิตา, อนวชฺชา จ อนนุวชฺชา จ วิญฺญูน’’นฺติ. อิทมโวจ ภควา, อิทํ วตฺวาน สุคโต อถาปรํ เอตทโวจ สตฺถา – “भिक्षुओं! चार अंगों से युक्त वाणी सुभाषित (अच्छी तरह कही गई) होती है, दुर्भाषित नहीं; वह निर्दोष होती है और विद्वानों द्वारा प्रशंसित होती है। किन चार अंगों से? भिक्षुओं! यहाँ भिक्षु केवल सुभाषित ही बोलता है, दुर्भाषित नहीं; वह धर्मयुक्त ही बोलता है, अधर्मयुक्त नहीं; वह प्रिय ही बोलता है, अप्रिय नहीं; वह सत्य ही बोलता है, असत्य नहीं। भिक्षुओं! इन चार अंगों से युक्त वाणी सुभाषित होती है, दुर्भाषित नहीं; वह निर्दोष होती है और विद्वानों द्वारा प्रशंसित होती है।” भगवान ने यह कहा। यह कहकर सुगत शास्ता ने पुनः यह कहा— ‘‘สุภาสิตํ อุตฺตมมาหุ สนฺโต,ธมฺมํ ภเณ นาธมฺมํ ตํ ทุติยํ; ปิยํ ภเณ นาปฺปิยํ ตํ ตติยํ,สจฺจํ ภเณ นาลิกํ ตํ จตุตฺถ’’นฺติ. “सत्पुरुष सुभाषित को ही उत्तम कहते हैं। धर्मयुक्त वाणी बोले, अधर्मयुक्त नहीं—यह दूसरा अंग है। प्रिय वाणी बोले, अप्रिय नहीं—यह तीसरा अंग है। सत्य वाणी बोले, असत्य नहीं—यह चौथा अंग है।” อถ โข อายสฺมา วงฺคีโส อุฏฺฐายาสนา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา เยน ภควา เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ปฏิภาติ มํ ภควา, ปฏิภาติ มํ สุคตา’’ติ. ‘‘ปฏิภาตุ ตํ วงฺคีสา’’ติ ภควา อโวจ. อถ โข อายสฺมา วงฺคีโส ภควนฺตํ สมฺมุขา สารุปฺปาหิ คาถาหิ อภิตฺถวิ – तब आयुष्मान वंगीश अपने आसन से उठे, एक कंधे पर चीवर धारण किया और जहाँ भगवान थे, वहाँ हाथ जोड़कर प्रणाम किया और भगवान से यह कहा— “हे भगवान! मुझे कुछ सूझ रहा है, हे सुगत! मुझे कुछ सूझ रहा है।” भगवान ने कहा— “हे वंगीश! तुम्हें जो सूझ रहा है, उसे कहो।” तब आयुष्मान वंगीश ने भगवान के सम्मुख उपयुक्त गाथाओं से उनकी स्तुति की— ‘‘ตเมว วาจํ ภาเสยฺย, ยายตฺตานํ น ตาปเย; ปเร จ น วิหึเสยฺย, สา เว วาจา สุภาสิตา. “मनुष्य को वही वाणी बोलनी चाहिए जिससे वह स्वयं को संताप न दे और दूसरों को कष्ट न पहुँचाए; वही वाणी वास्तव में सुभाषित है। ‘‘ปิยวาจํว ภาเสยฺย, ยา วาจา ปฏินนฺทิตา; ยํ อนาทาย ปาปานิ, ปเรสํ ภาสเต ปิยํ. प्रिय वाणी ही बोलनी चाहिए, जो वाणी आनंद देने वाली हो। दूसरों के प्रति कठोर वचनों का प्रयोग न करते हुए, जो प्रिय वचन बोले जाते हैं, वही बोलने चाहिए। ‘‘สจฺจํ [Pg.191] เว อมตา วาจา, เอส ธมฺโม สนนฺตโน; สจฺเจ อตฺเถ จ ธมฺเม จ, อาหุ สนฺโต ปติฏฺฐิตา. सत्य ही वास्तव में अमृतमयी वाणी है, यही सनातन धर्म है। सत्पुरुषों ने कहा है कि वे सत्य, अर्थ (कल्याण) और धर्म में प्रतिष्ठित रहते हैं। ‘‘ยํ พุทฺโธ ภาสเต วาจํ, เขมํ นิพฺพานปตฺติยา; ทุกฺขสฺสนฺตกิริยาย, สา เว วาจานมุตฺตมา’’ติ. बुद्ध जो वाणी निर्वाण की प्राप्ति के लिए, दुखों के अंत के लिए और क्षेम (कल्याण) के लिए बोलते हैं, वह वाणी वास्तव में सभी वाणियों में उत्तम है।” ๖. สาริปุตฺตสุตฺตํ ६. ६. सारिपुत्त सुत्त ๒๑๔. เอกํ สมยํ อายสฺมา สาริปุตฺโต สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา สาริปุตฺโต ภิกฺขู ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสติ สมาทเปติ สมุตฺเตเชติ สมฺปหํเสติ โปริยา วาจาย วิสฺสฏฺฐาย อเนลคลาย อตฺถสฺส วิญฺญาปนิยา. เต จ ภิกฺขู อฏฺฐึ กตฺวา มนสิ กตฺวา สพฺพเจตสา สมนฺนาหริตฺวา โอหิตโสตา ธมฺมํ สุณนฺติ. อถ โข อายสฺมโต วงฺคีสสฺส เอตทโหสิ – ‘‘อยํ โข อายสฺมา สาริปุตฺโต ภิกฺขู ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสติ สมาทเปติ สมุตฺเตเชติ สมฺปหํเสติ โปริยา วาจาย วิสฺสฏฺฐาย อเนลคลาย อตฺถสฺส วิญฺญาปนิยา. เต จ ภิกฺขู อฏฺฐึ กตฺวา มนสิ กตฺวา สพฺพเจตสา สมนฺนาหริตฺวา โอหิตโสตา ธมฺมํ สุณนฺติ. ยํนูนาหํ อายสฺมนฺตํ สาริปุตฺตํ สมฺมุขา สารุปฺปาหิ คาถาหิ อภิตฺถเวยฺย’’นฺติ. २१४. २१४. एक समय आयुष्मान सारिपुत्त श्रावस्ती के अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन विहार में विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान सारिपुत्त भिक्षुओं को धर्म-कथा के माध्यम से उपदेश दे रहे थे, उन्हें धर्म में प्रतिष्ठित कर रहे थे, उत्साहित कर रहे थे और प्रसन्न कर रहे थे। उनकी वाणी स्पष्ट, दोषरहित, अर्थपूर्ण और समझने योग्य थी। वे भिक्षु भी आदरपूर्वक, मन लगाकर, एकाग्र चित्त होकर और ध्यानपूर्वक धर्म सुन रहे थे। तब आयुष्मान वंगीश के मन में यह विचार आया— “ये आयुष्मान सारिपुत्त भिक्षुओं को धर्म-कथा से उपदेश दे रहे हैं... वे भिक्षु भी ध्यानपूर्वक सुन रहे हैं। क्यों न मैं आयुष्मान सारिपुत्त के सम्मुख उपयुक्त गाथाओं से उनकी स्तुति करूँ?” อถ โข อายสฺมา วงฺคีโส อุฏฺฐายาสนา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา เยนายสฺมา สาริปุตฺโต เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา อายสฺมนฺตํ สาริปุตฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ปฏิภาติ มํ, อาวุโส สาริปุตฺต, ปฏิภาติ มํ, อาวุโส สาริปุตฺตา’’ติ. ‘‘ปฏิภาตุ ตํ, อาวุโส วงฺคีสา’’ติ. อถ โข อายสฺมา วงฺคีโส อายสฺมนฺตํ สาริปุตฺตํ สมฺมุขา สารุปฺปาหิ คาถาหิ อภิตฺถวิ – तब आयुष्मान वंगीश अपने आसन से उठे, एक कंधे पर चीवर धारण किया और जहाँ आयुष्मान सारिपुत्त थे, वहाँ हाथ जोड़कर प्रणाम किया और आयुष्मान सारिपुत्त से यह कहा— “हे आयुष्मान सारिपुत्त! मुझे कुछ सूझ रहा है, हे आयुष्मान सारिपुत्त! मुझे कुछ सूझ रहा है।” (सारिपुत्त ने कहा—) “हे आयुष्मान वंगीश! तुम्हें जो सूझ रहा है, उसे कहो।” तब आयुष्मान वंगीश ने आयुष्मान सारिपुत्त के सम्मुख उपयुक्त गाथाओं से उनकी स्तुति की— ‘‘คมฺภีรปญฺโญ เมธาวี, มคฺคามคฺคสฺส โกวิโท; สาริปุตฺโต มหาปญฺโญ, ธมฺมํ เทเสติ ภิกฺขุนํ. “गंभीर प्रज्ञा वाले, मेधावी, मार्ग और कुमार्ग के ज्ञाता, महाप्रज्ञावान सारिपुत्त भिक्षुओं को धर्म का उपदेश देते हैं। ‘‘สํขิตฺเตนปิ เทเสติ, วิตฺถาเรนปิ ภาสติ; สาฬิกายิว นิคฺโฆโส, ปฏิภานํ อุทีรยิ. वे संक्षेप में भी उपदेश देते हैं और विस्तार से भी बताते हैं। उनकी वाणी सारिका पक्षी की मधुर गूँज के समान है, जो प्रज्ञा को जागृत करती है। ‘‘ตสฺส [Pg.192] ตํ เทสยนฺตสฺส, สุณนฺติ มธุรํ คิรํ; สเรน รชนีเยน, สวนีเยน วคฺคุนา; อุทคฺคจิตฺตา มุทิตา, โสตํ โอเธนฺติ ภิกฺขโว’’ติ. जब वे उपदेश देते हैं, तब भिक्षु उनकी मधुर वाणी को सुनते हैं। उनके आकर्षक, सुनने योग्य और सुंदर स्वर से भिक्षु प्रफुल्लित और प्रसन्न होकर ध्यानपूर्वक सुनते हैं।” ๗. ปวารณาสุตฺตํ ७. ७. पवारणा सुत्त ๒๑๕. เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ ปุพฺพาราเม มิคารมาตุปาสาเท มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ ปญฺจมตฺเตหิ ภิกฺขุสเตหิ สพฺเพเหว อรหนฺเตหิ. เตน โข ปน สมเยน ภควา ตทหุโปสเถ ปนฺนรเส ปวารณาย ภิกฺขุสงฺฆปริวุโต อพฺโภกาเส นิสินฺโน โหติ. อถ โข ภควา ตุณฺหีภูตํ ภิกฺขุสงฺฆํ อนุวิโลเกตฺวา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘หนฺท ทานิ, ภิกฺขเว, ปวาเรมิ โว. น จ เม กิญฺจิ ครหถ กายิกํ วา วาจสิกํ วา’’ติ. २१५. २१५. एक समय भगवान श्रावस्ती के पूर्वाराम में मृगारमाता (विशाखा) के प्रासाद में लगभग पाँच सौ भिक्षुओं के विशाल संघ के साथ विहार कर रहे थे, जो सभी अर्हन्त थे। उस समय भगवान पूर्णिमा के उपोसथ के दिन पवारणा के लिए भिक्षु संघ से घिरे हुए खुले आकाश के नीचे बैठे थे। तब भगवान ने शांत भिक्षु संघ को देखते हुए भिक्षुओं को संबोधित किया— “हे भिक्षुओं! अब मैं तुम्हें आमंत्रित (पवारणा) करता हूँ। क्या तुम मेरे किसी कायिक या वाचिक कर्म में कोई दोष देखते हो?” เอวํ วุตฺเต, อายสฺมา สาริปุตฺโต อุฏฺฐายาสนา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา เยน ภควา เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘น โข มยํ, ภนฺเต, ภควโต กิญฺจิ ครหาม กายิกํ วา วาจสิกํ วา. ภควา หิ, ภนฺเต, อนุปฺปนฺนสฺส มคฺคสฺส อุปฺปาเทตา, อสญฺชาตสฺส มคฺคสฺส สญฺชเนตา, อนกฺขาตสฺส มคฺคสฺส อกฺขาตา, มคฺคญฺญู มคฺควิทู มคฺคโกวิโท. มคฺคานุคา จ, ภนฺเต, เอตรหิ สาวกา วิหรนฺติ ปจฺฉา สมนฺนาคตา; อหญฺจ โข, ภนฺเต, ภควนฺตํ ปวาเรมิ. น จ เม ภควา กิญฺจิ ครหติ กายิกํ วา วาจสิกํ วา’’ติ. ऐसा कहे जाने पर, आयुष्मान सारिपुत्र अपने आसन से उठे, एक कंधे पर उत्तरासंग (ऊपरी वस्त्र) किया और जहाँ भगवान थे, उस ओर हाथ जोड़कर भगवान से यह बोले - "भन्ते, हम भगवान के किसी भी कायिक या वाचिक (शारीरिक या वाचिक) कर्म की निंदा नहीं करते हैं। भन्ते, भगवान अनुत्पन्न मार्ग के उत्पादक हैं, अज्ञात मार्ग के ज्ञाता (प्रकट करने वाले) हैं, अकथित मार्ग के आख्याता (उपदेशक) हैं, वे मार्गज्ञ, मार्गविद् और मार्गकोविद हैं। और भन्ते, अब उनके पीछे चलने वाले श्रावक मार्ग का अनुसरण करते हुए विहार करते हैं। भन्ते, मैं भी भगवान को आमंत्रित (प्रवारणा) करता हूँ। क्या भगवान मेरे किसी कायिक या वाचिक कर्म की निंदा करते हैं?" ‘‘น ขฺวาหํ เต, สาริปุตฺต, กิญฺจิ ครหามิ กายิกํ วา วาจสิกํ วา. ปณฺฑิโต ตฺวํ, สาริปุตฺต, มหาปญฺโญ ตฺวํ, สาริปุตฺต, ปุถุปญฺโญ ตฺวํ, สาริปุตฺต, หาสปญฺโญ ตฺวํ, สาริปุตฺต, ชวนปญฺโญ ตฺวํ, สาริปุตฺต, ติกฺขปญฺโญ ตฺวํ, สาริปุตฺต, นิพฺเพธิกปญฺโญ ตฺวํ, สาริปุตฺต. เสยฺยถาปิ, สาริปุตฺต, รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส เชฏฺฐปุตฺโต ปิตรา ปวตฺติตํ จกฺกํ สมฺมเทว อนุปฺปวตฺเตติ; เอวเมว โข ตฺวํ, สาริปุตฺต, มยา อนุตฺตรํ ธมฺมจกฺกํ ปวตฺติตํ สมฺมเทว อนุปฺปวตฺเตสี’’ติ. "सारिपुत्र, मैं तुम्हारे किसी भी कायिक या वाचिक कर्म की निंदा नहीं करता हूँ। सारिपुत्र, तुम पंडित हो; सारिपुत्र, तुम महाप्रज्ञ हो; सारिपुत्र, तुम पृथुप्रज्ञ (विस्तृत प्रज्ञा वाले) हो; सारिपुत्र, तुम हासप्रज्ञ (प्रसन्न प्रज्ञा वाले) हो; सारिपुत्र, तुम जवनप्रज्ञ (तीव्र प्रज्ञा वाले) हो; सारिपुत्र, तुम तीक्ष्णप्रज्ञ हो; सारिपुत्र, तुम निर्वेधिकप्रज्ञ (भेदन करने वाली प्रज्ञा वाले) हो। सारिपुत्र, जैसे चक्रवर्ती राजा का ज्येष्ठ पुत्र अपने पिता द्वारा चलाए गए चक्र को सम्यक रूप से अनुवर्तित करता है (चलाता है); वैसे ही सारिपुत्र, तुम मेरे द्वारा प्रवर्तित इस अनुत्तर धर्मचक्र को सम्यक रूप से अनुवर्तित करते हो।" ‘‘โน เจ กิร เม, ภนฺเต, ภควา กิญฺจิ ครหติ กายิกํ วา วาจสิกํ วา. อิเมสํ ปน, ภนฺเต, ภควา ปญฺจนฺนํ ภิกฺขุสตานํ น กิญฺจิ ครหติ กายิกํ วา วาจสิกํ วา’’ติ. ‘‘อิเมสมฺปิ ขฺวาหํ, สาริปุตฺต, ปญฺจนฺนํ ภิกฺขุสตานํ น [Pg.193] กิญฺจิ ครหามิ กายิกํ วา วาจสิกํ วา. อิเมสญฺหิ, สาริปุตฺต, ปญฺจนฺนํ ภิกฺขุสตานํ สฏฺฐิ ภิกฺขู เตวิชฺชา, สฏฺฐิ ภิกฺขู ฉฬภิญฺญา, สฏฺฐิ ภิกฺขู อุภโตภาควิมุตฺตา, อถ อิตเร ปญฺญาวิมุตฺตา’’ติ. "भन्ते, यदि भगवान मेरे किसी कायिक या वाचिक कर्म की निंदा नहीं करते हैं, तो भन्ते, क्या भगवान इन पाँच सौ भिक्षुओं के किसी कायिक या वाचिक कर्म की निंदा करते हैं?" "सारिपुत्र, मैं इन पाँच सौ भिक्षुओं के भी किसी कायिक या वाचिक कर्म की निंदा नहीं करता हूँ। क्योंकि सारिपुत्र, इन पाँच सौ भिक्षुओं में से साठ भिक्षु त्रैविद्य (तीन विद्याओं वाले) हैं, साठ भिक्षु षडभिज्ञ (छह अभिज्ञाओं वाले) हैं, साठ भिक्षु उभतोभागविमुक्त हैं, और शेष प्रज्ञाविमुक्त हैं।" อถ โข อายสฺมา วงฺคีโส อุฏฺฐายาสนา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา เยน ภควา เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ปฏิภาติ มํ ภควา, ปฏิภาติ มํ สุคตา’’ติ. ‘‘ปฏิภาตุ ตํ, วงฺคีสา’’ติ ภควา อโวจ. อถ โข อายสฺมา วงฺคีโส ภควนฺตํ สมฺมุขา สารุปฺปาหิ คาถาหิ อภิตฺถวิ – तब आयुष्मान वंगीस अपने आसन से उठे, एक कंधे पर उत्तरासंग किया और जहाँ भगवान थे, उस ओर हाथ जोड़कर भगवान से यह बोले - "भगवन, मुझे कुछ प्रतिभासित हो रहा है; सुगत, मुझे कुछ प्रतिभासित हो रहा है।" भगवान ने कहा - "वंगीस, तुम्हें प्रतिभासित हो।" तब आयुष्मान वंगीस ने भगवान के सम्मुख उपयुक्त गाथाओं से उनकी स्तुति की - ‘‘อชฺช ปนฺนรเส วิสุทฺธิยา, ภิกฺขู ปญฺจสตา สมาคตา; สํโยชนพนฺธนจฺฉิทา, อนีฆา ขีณปุนพฺภวา อิสี. "आज इस पंद्रहवीं (पूर्णिमा) की विशुद्धि (प्रवारणा) के लिए पाँच सौ भिक्षु एकत्रित हुए हैं; जो संयोजन के बंधनों को काटने वाले, दुखरहित, पुनर्जन्म को क्षीण करने वाले ऋषि (अर्हत) हैं।" ‘‘จกฺกวตฺตี ยถา ราชา, อมจฺจปริวาริโต; สมนฺตา อนุปริเยติ, สาครนฺตํ มหึ อิมํ. "जैसे चक्रवर्ती राजा, मंत्रियों से घिरा हुआ, समुद्र तक फैली इस पृथ्वी का चारों ओर चक्कर लगाता है।" ‘‘เอวํ วิชิตสงฺคามํ, สตฺถวาหํ อนุตฺตรํ; สาวกา ปยิรุปาสนฺติ, เตวิชฺชา มจฺจุหายิโน. "वैसे ही, संग्राम को जीतने वाले, अनुत्तर सार्थवाह (भगवान) की, मृत्यु को त्यागने वाले त्रैविद्य श्रावक सेवा-उपासना करते हैं।" ‘‘สพฺเพ ภควโต ปุตฺตา, ปลาเปตฺถ น วิชฺชติ; ตณฺหาสลฺลสฺส หนฺตารํ, วนฺเท อาทิจฺจพนฺธุน’’นฺติ. "सभी भगवान के पुत्र हैं, यहाँ कोई भी तुच्छ (असार) नहीं है; तृष्णा रूपी शल्य का नाश करने वाले, आदित्य-बंधु (सूर्य के वंशज बुद्ध) को मैं वंदन करता हूँ।" ๘. ปโรสหสฺสสุตฺตํ ८. परोसहस्स सुत्त ๒๑๖. เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ อฑฺฒเตลเสหิ ภิกฺขุสเตหิ. เตน โข ปน สมเยน ภควา ภิกฺขู นิพฺพานปฏิสํยุตฺตาย ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสติ สมาทเปติ สมุตฺเตเชติ สมฺปหํเสติ. เต จ ภิกฺขู อฏฺฐึ กตฺวา มนสิ กตฺวา สพฺพเจตสา สมนฺนาหริตฺวา โอหิตโสตา ธมฺมํ สุณนฺติ. อถ โข อายสฺมโต วงฺคีสสฺส เอตทโหสิ – ‘‘อยํ โข ภควา ภิกฺขู นิพฺพานปฏิสํยุตฺตาย ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสติ สมาทเปติ สมุตฺเตเชติ สมฺปหํเสติ. เต จ ภิกฺขู อฏฺฐึ กตฺวา มนสิ กตฺวา สพฺพเจตสา สมนฺนาหริตฺวา โอหิตโสตา ธมฺมํ สุณนฺติ. ยํนูนาหํ ภควนฺตํ สมฺมุขา สารุปฺปาหิ คาถาหิ อภิตฺถเวยฺย’’นฺติ. २१६. एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन विहार में साढ़े बारह सौ भिक्षुओं के विशाल भिक्षु संघ के साथ विहार कर रहे थे। उस समय भगवान भिक्षुओं को निर्वाण से संबंधित धार्मिक कथा द्वारा उपदेश दे रहे थे, उन्हें उत्साहित कर रहे थे, उन्हें दृढ़ कर रहे थे और उन्हें प्रसन्न कर रहे थे। वे भिक्षु भी आदरपूर्वक, मन लगाकर, एकाग्रचित्त होकर और कान लगाकर धर्म सुन रहे थे। तब आयुष्मान वंगीस के मन में यह विचार आया - "ये भगवान भिक्षुओं को निर्वाण से संबंधित धार्मिक कथा द्वारा उपदेश दे रहे हैं... और ये भिक्षु भी... कान लगाकर धर्म सुन रहे हैं। क्यों न मैं भगवान के सम्मुख उपयुक्त गाथाओं से उनकी स्तुति करूँ।" อถ [Pg.194] โข อายสฺมา วงฺคีโส อุฏฺฐายาสนา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา เยน ภควา เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ปฏิภาติ มํ ภควา, ปฏิภาติ มํ สุคตา’’ติ. ‘‘ปฏิภาตุ ตํ, วงฺคีสา’’ติ ภควา อโวจ. อถ โข อายสฺมา วงฺคีโส ภควนฺตํ สมฺมุขา สารุปฺปาหิ คาถาหิ อภิตฺถวิ – तब आयुष्मान वंगीस अपने आसन से उठे, एक कंधे पर उत्तरासंग किया और जहाँ भगवान थे, उस ओर हाथ जोड़कर भगवान से यह बोले - "भगवन, मुझे कुछ प्रतिभासित हो रहा है; सुगत, मुझे कुछ प्रतिभासित हो रहा है।" भगवान ने कहा - "वंगीस, तुम्हें प्रतिभासित हो।" तब आयुष्मान वंगीस ने भगवान के सम्मुख उपयुक्त गाथाओं से उनकी स्तुति की - ‘‘ปโรสหสฺสํ ภิกฺขูนํ, สุคตํ ปยิรุปาสติ; เทเสนฺตํ วิรชํ ธมฺมํ, นิพฺพานํ อกุโตภยํ. "एक हजार से अधिक भिक्षु सुगत की सेवा-उपासना कर रहे हैं; जो विरज (निर्मल) धर्म और भयरहित निर्वाण का उपदेश दे रहे हैं।" ‘‘สุณนฺติ ธมฺมํ วิมลํ, สมฺมาสมฺพุทฺธเทสิตํ; โสภติ วต สมฺพุทฺโธ, ภิกฺขุสงฺฆปุรกฺขโต. "वे सम्यक-संबुद्ध द्वारा उपदिष्ट विमल धर्म को सुन रहे हैं; भिक्षु संघ से घिरे हुए सम्यक-संबुद्ध वास्तव में सुशोभित हो रहे हैं।" ‘‘นาคนาโมสิ ภควา, อิสีนํ อิสิสตฺตโม; มหาเมโฆว หุตฺวาน, สาวเก อภิวสฺสติ. "भगवन, आप 'नाग' नाम वाले हैं, ऋषियों में सातवें ऋषि हैं; महामेघ के समान होकर आप श्रावकों पर (धर्म की) वर्षा करते हैं।" ‘‘ทิวาวิหารา นิกฺขมฺม, สตฺถุทสฺสนกมฺยตา ; สาวโก เต มหาวีร, ปาเท วนฺทติ วงฺคีโส’’ติ. "दिवा-विहार (दिन के विश्राम) से निकलकर, शास्ता के दर्शन की इच्छा से, हे महावीर, आपका श्रावक वंगीस आपके चरणों की वंदना करता है।" ‘‘กึ นุ เต, วงฺคีส, อิมา คาถาโย ปุพฺเพ ปริวิตกฺกิตา, อุทาหุ ฐานโสว ตํ ปฏิภนฺตี’’ติ? ‘น โข เม, ภนฺเต, อิมา คาถาโย ปุพฺเพ ปริวิตกฺกิตา, อถ โข ฐานโสว มํ ปฏิภนฺตี’ติ. ‘เตน หิ ตํ, วงฺคีส, ภิยฺโยโสมตฺตาย ปุพฺเพ อปริวิตกฺกิตา คาถาโย ปฏิภนฺตู’ติ. ‘เอวํ, ภนฺเต’ติ โข อายสฺมา วงฺคีโส ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา ภิยฺโยโสมตฺตาย ภควนฺตํ ปุพฺเพ อปริวิตกฺกิตาหิ คาถาหิ อภิตฺถวิ – "वंगीस, क्या ये गाथाएँ तुमने पहले सोची थीं, या ये तुम्हें उसी क्षण प्रतिभासित हुई हैं?" "भन्ते, ये गाथाएँ मैंने पहले नहीं सोची थीं, बल्कि ये मुझे उसी क्षण प्रतिभासित हुई हैं।" "तो वंगीस, तुम्हें पहले न सोची गई और भी अधिक गाथाएँ प्रतिभासित हों।" "जी भन्ते," कहकर आयुष्मान वंगीस ने भगवान की आज्ञा मानकर, पहले न सोची गई और भी अधिक गाथाओं से भगवान की स्तुति की - ‘‘อุมฺมคฺคปถํ มารสฺส อภิภุยฺย, จรติ ปภิชฺช ขิลานิ; ตํ ปสฺสถ พนฺธปมุญฺจกรํ, อสิตํ ภาคโส ปวิภชํ. "मार के कुमार्ग को अभिभूत कर, (राग आदि) कीलों को तोड़कर वे विचरण करते हैं; उन बंधन-मुक्त करने वाले, अनासक्त और धर्म को भागों में विभक्त कर (विस्तार से) उपदेश देने वाले भगवान को देखो।" ‘‘โอฆสฺส นิตฺถรณตฺถํ, อเนกวิหิตํ มคฺคํ อกฺขาสิ; ตสฺมิญฺเจ อมเต อกฺขาเต, ธมฺมทฺทสา ฐิตา อสํหีรา. चारों ओघों (संसार के प्रवाहों) को पार करने के लिए, भगवान ने अनेक प्रकार के मार्गों (सतिपट्ठान आदि) का उपदेश दिया है। उस अमृत (निर्वाण) के उपदिष्ट होने पर, धर्म को देखने वाले (साधक) अडिग और अविचल होकर स्थित रहते हैं। ‘‘ปชฺโชตกโร อติวิชฺฌ, สพฺพฏฺฐิตีนํ อติกฺกมมทฺทส; ญตฺวา จ สจฺฉิกตฺวา จ, อคฺคํ โส เทสยิ ทสทฺธานํ. प्रकाश करने वाले (ज्ञान रूपी प्रकाश फैलाने वाले) उन भगवान ने सभी दृष्टियों के स्थानों को भेदकर, (संसार से) पार जाने वाले निर्वाण को देखा। उस श्रेष्ठ धर्म को जानकर और साक्षात् कर, उन्होंने उसे पाँचों (पंचवर्गीय भिक्षुओं) को उपदेश दिया। ‘‘เอวํ [Pg.195] สุเทสิเต ธมฺเม,โก ปมาโท วิชานตํ ธมฺมํ ; ตสฺมา หิ ตสฺส ภควโต สาสเน; อปฺปมตฺโต สทา นมสฺสมนุสิกฺเข’’ติ. इस प्रकार धर्म के भली-भाँति उपदिष्ट होने पर, धर्म को जानने वाले प्रज्ञावानों के लिए प्रमाद (असावधानी) कहाँ हो सकता है? इसलिए, उन भगवान के शासन में सदा अप्रमत्त (जागरूक) रहकर, मैं वंदना करते हुए (शिक्षाओं का) अनुशीलन करूँगा। ๙. โกณฺฑญฺญสุตฺตํ ९. कोण्डञ्ञ सुत्त ๒๑๗. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. อถ โข อายสฺมา อญฺญาสิโกณฺฑญฺโญ สุจิรสฺเสว เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควโต ปาเทสุ สิรสา นิปติตฺวา ภควโต ปาทานิ มุเขน จ ปริจุมฺพติ, ปาณีหิ จ ปริสมฺพาหติ, นามญฺจ สาเวติ – ‘‘โกณฺฑญฺโญหํ, ภควา, โกณฺฑญฺโญหํ, สุคตา’’ติ. อถ โข อายสฺมโต วงฺคีสสฺส เอตทโหสิ – ‘‘อยํ โข อายสฺมา อญฺญาสิโกณฺฑญฺโญ สุจิรสฺเสว เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควโต ปาเทสุ สิรสา นิปติตฺวา ภควโต ปาทานิ มุเขน จ ปริจุมฺพติ, ปาณีหิ จ ปริสมฺพาหติ, นามญฺจ สาเวติ – ‘โกณฺฑญฺโญหํ, ภควา, โกณฺฑญฺโญหํ, สุคตา’ติ. ยํนูนาหํ อายสฺมนฺตํ อญฺญาสิโกณฺฑญฺญํ ภควโต สมฺมุขา สารุปฺปาหิ คาถาหิ อภิตฺถเวยฺย’’นฺติ. २१७. एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दकनिवाप में विहार कर रहे थे। तब आयुष्मान् अञ्ञासिकोण्डञ्ञ बहुत समय के बाद जहाँ भगवान थे, वहाँ आए; आकर भगवान के चरणों में सिर झुकाकर गिर पड़े और भगवान के चरणों को मुख से चूमने लगे, हाथों से सहलाने लगे और अपना नाम सुनाने लगे— 'भगवन्, मैं कोण्डञ्ञ हूँ; सुगत, मैं कोण्डञ्ञ हूँ।' तब आयुष्मान् वङ्गीस के मन में यह विचार आया— 'ये आयुष्मान् अञ्ञासिकोण्डञ्ञ बहुत समय के बाद जहाँ भगवान हैं, वहाँ आए हैं... और अपना नाम सुना रहे हैं... क्यों न मैं आयुष्मान् अञ्ञासिकोण्डञ्ञ की भगवान के सम्मुख उपयुक्त गाथाओं से स्तुति करूँ?' อถ โข อายสฺมา วงฺคีโส อุฏฺฐายาสนา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา เยน ภควา เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ปฏิภาติ มํ, ภควา, ปฏิภาติ มํ, สุคตา’’ติ. ‘‘ปฏิภาตุ ตํ, วงฺคีสา’’ติ ภควา อโวจ. อถ โข อายสฺมา วงฺคีโส อายสฺมนฺตํ อญฺญาสิโกณฺฑญฺญํ ภควโต สมฺมุขา สารุปฺปาหิ คาถาหิ อภิตฺถวิ – तब आयुष्मान् वङ्गीस आसन से उठकर, एक कंधे पर उत्तरासंग (चीवर) कर, जहाँ भगवान थे वहाँ हाथ जोड़कर प्रणाम किया और भगवान से यह कहा— 'भगवन्, मुझे कुछ सूझ रहा है; सुगत, मुझे कुछ सूझ रहा है।' भगवान ने कहा— 'वङ्गीस, तुम्हें जो सूझ रहा है, वह कहो।' तब आयुष्मान् वङ्गीस ने आयुष्मान् अञ्ञासिकोण्डञ्ञ की भगवान के सम्मुख उपयुक्त गाथाओं से स्तुति की— ‘‘พุทฺธานุพุทฺโธ โส เถโร, โกณฺฑญฺโญ ติพฺพนิกฺกโม; ลาภี สุขวิหารานํ, วิเวกานํ อภิณฺหโส. वे स्थविर कोण्डञ्ञ, बुद्ध के पश्चात बुद्ध (सत्य को जानने वाले) हैं, जो तीव्र पुरुषार्थ से युक्त हैं। वे सुखद विहारों (ध्यान-समापत्तियों) और एकांतवास के निरंतर लाभ लेने वाले हैं। ‘‘ยํ สาวเกน ปตฺตพฺพํ, สตฺถุสาสนการินา; สพฺพสฺส ตํ อนุปฺปตฺตํ, อปฺปมตฺตสฺส สิกฺขโต. शास्ता के शासन का पालन करने वाले श्रावक द्वारा जो कुछ भी प्राप्त किया जाना चाहिए, अप्रमत्त होकर साधना करने वाले (कोण्डञ्ञ) ने वह सब प्राप्त कर लिया है। ‘‘มหานุภาโว เตวิชฺโช, เจโตปริยายโกวิโท; โกณฺฑญฺโญ พุทฺธทายาโท, ปาเท วนฺทติ สตฺถุโน’’ติ. महानुभाव, त्रैविद्य (तीन विद्याओं से युक्त), दूसरों के चित्त को जानने में कुशल और बुद्ध के उत्तराधिकारी कोण्डञ्ञ शास्ता के चरणों की वंदना करते हैं। ๑๐. โมคฺคลฺลานสุตฺตํ १०. मोग्गल्लान सुत्त ๒๑๘. เอกํ [Pg.196] สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ อิสิคิลิปสฺเส กาฬสิลายํ มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ ปญฺจมตฺเตหิ ภิกฺขุสเตหิ สพฺเพเหว อรหนฺเตหิ. เตสํ สุทํ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เจตสา จิตฺตํ สมนฺเนสติ วิปฺปมุตฺตํ นิรุปธึ. อถ โข อายสฺมโต วงฺคีสสฺส เอตทโหสิ – ‘‘อยํ โข ภควา ราชคเห วิหรติ อิสิคิลิปสฺเส กาฬสิลายํ มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ ปญฺจมตฺเตหิ ภิกฺขุสเตหิ สพฺเพเหว อรหนฺเตหิ. เตสํ สุทํ อายสฺมา มหาโมคฺคลฺลาโน เจตสา จิตฺตํ สมนฺเนสติ วิปฺปมุตฺตํ นิรุปธึ. ยํนูนาหํ อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ ภควโต สมฺมุขา สารุปฺปาหิ คาถาหิ อภิตฺถเวยฺย’’นฺติ. २१८. एक समय भगवान राजगृह के इसिगिलि पर्वत के पार्श्व में कालशिला पर पाँच सौ भिक्षुओं के विशाल संघ के साथ विहार कर रहे थे, जो सभी अर्हत् थे। वहाँ आयुष्मान् महामोग्गल्लान अपने चित्त से उनके (भिक्षुओं के) उपाधि-रहित और (क्लेशों से) विमुक्त चित्तों का अवलोकन कर रहे थे। तब आयुष्मान् वङ्गीस के मन में यह विचार आया— 'ये भगवान राजगृह के इसिगिलि पर्वत के पार्श्व में कालशिला पर... विहार कर रहे हैं... आयुष्मान् महामोग्गल्लान उनके चित्तों का अवलोकन कर रहे हैं। क्यों न मैं आयुष्मान् महामोग्गल्लान की भगवान के सम्मुख उपयुक्त गाथाओं से स्तुति करूँ?' อถ โข อายสฺมา วงฺคีโส อุฏฺฐายาสนา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา เยน ภควา เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ปฏิภาติ มํ, ภควา, ปฏิภาติ มํ, สุคตา’’ติ. ‘‘ปฏิภาตุ ตํ, วงฺคีสา’’ติ ภควา อโวจ. อถ โข อายสฺมา วงฺคีโส อายสฺมนฺตํ มหาโมคฺคลฺลานํ ภควโต สมฺมุขา สารุปฺปาหิ คาถาหิ อภิตฺถวิ – तब आयुष्मान् वङ्गीस आसन से उठकर, एक कंधे पर उत्तरासंग कर, जहाँ भगवान थे वहाँ हाथ जोड़कर प्रणाम किया और भगवान से यह कहा— 'भगवन्, मुझे कुछ सूझ रहा है; सुगत, मुझे कुछ सूझ रहा है।' भगवान ने कहा— 'वङ्गीस, तुम्हें जो सूझ रहा है, वह कहो।' तब आयुष्मान् वङ्गीस ने आयुष्मान् महामोग्गल्लान की भगवान के सम्मुख उपयुक्त गाथाओं से स्तुति की— ‘‘นคสฺส ปสฺเส อาสีนํ, มุนึ ทุกฺขสฺส ปารคุํ; สาวกา ปยิรุปาสนฺติ, เตวิชฺชา มจฺจุหายิโน. पर्वत के पार्श्व में विराजमान, दुःख के पार पहुँचे हुए मुनि (बुद्ध) की, मृत्यु (मार) को जीतने वाले और त्रैविद्य पाँच सौ श्रावक सेवा-उपासना कर रहे हैं। ‘‘เต เจตสา อนุปริเยติ, โมคฺคลฺลาโน มหิทฺธิโก; จิตฺตํ เนสํ สมนฺเนสํ, วิปฺปมุตฺตํ นิรูปธึ. महान ऋद्धिमान मोग्गल्लान अपने चित्त से उनके (उन अर्हतों के) चित्तों का अवलोकन कर रहे हैं और उनके विमुक्त एवं उपाधि-रहित चित्तों को जान रहे हैं। ‘‘เอวํ สพฺพงฺคสมฺปนฺนํ, มุนึ ทุกฺขสฺส ปารคุํ; อเนกาการสมฺปนฺนํ, ปยิรุปาสนฺติ โคตม’’นฺติ. इस प्रकार सभी अंगों (गुणों) से संपन्न, दुःख के पार पहुँचे हुए और अनेक प्रकार की विशेषताओं से युक्त मुनि गौतम की श्रावकगण उपासना करते हैं। ๑๑. คคฺคราสุตฺตํ ११. गग्गरा सुत्त ๒๑๙. เอกํ สมยํ ภควา จมฺปายํ วิหรติ คคฺคราย โปกฺขรณิยา ตีเร มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ ปญฺจมตฺเตหิ ภิกฺขุสเตหิ สตฺตหิ จ อุปาสกสเตหิ สตฺตหิ จ อุปาสิกาสเตหิ อเนเกหิ จ เทวตาสหสฺเสหิ. ตฺยาสฺสุทํ ภควา อติโรจติ วณฺเณน เจว ยสสา จ. อถ โข อายสฺมโต วงฺคีสสฺส เอตทโหสิ – ‘‘อยํ โข [Pg.197] ภควา จมฺปายํ วิหรติ คคฺคราย โปกฺขรณิยา ตีเร มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ ปญฺจมตฺเตหิ ภิกฺขุสเตหิ สตฺตหิ จ อุปาสกสเตหิ สตฺตหิ จ อุปาสิกาสเตหิ อเนเกหิ จ เทวตาสหสฺเสหิ. ตฺยาสฺสุทํ ภควา อติโรจติ วณฺเณน เจว ยสสา จ. ยํนูนาหํ ภควนฺตํ สมฺมุขา สารุปฺปาย คาถาย อภิตฺถเวยฺย’’นฺติ. २१९. एक समय भगवान चम्पा में गग्गरा पुष्करिणी के तट पर पाँच सौ भिक्षुओं के विशाल संघ, सात सौ उपासकों, सात सौ उपासिकाओं और अनेक सहस्र देवताओं के साथ विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान अपने वर्ण (आभा) और यश से उन सबको अतिशय सुशोभित कर रहे थे। तब आयुष्मान् वङ्गीस के मन में यह विचार आया— 'ये भगवान चम्पा में गग्गरा पुष्करिणी के तट पर... विहार कर रहे हैं... भगवान अपने वर्ण और यश से अतिशय सुशोभित हो रहे हैं। क्यों न मैं भगवान की उनके सम्मुख उपयुक्त गाथा से स्तुति करूँ?' อถ โข อายสฺมา วงฺคีโส อุฏฺฐายาสนา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา เยน ภควา เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ปฏิภาติ มํ, ภควา, ปฏิภาติ มํ, สุคตา’’ติ. ‘‘ปฏิภาตุ ตํ, วงฺคีสา’’ติ ภควา อโวจ. อถ โข อายสฺมา วงฺคีโส ภควนฺตํ สมฺมุขา สารุปฺปาย คาถาย อภิตฺถวิ – तब आयुष्मान् वङ्गीस आसन से उठकर, एक कंधे पर उत्तरासंग कर, जहाँ भगवान थे वहाँ हाथ जोड़कर प्रणाम किया और भगवान से यह कहा— 'भगवन्, मुझे कुछ सूझ रहा है; सुगत, मुझे कुछ सूझ रहा है।' भगवान ने कहा— 'वङ्गीस, तुम्हें जो सूझ रहा है, वह कहो।' तब आयुष्मान् वङ्गीस ने भगवान के सम्मुख उपयुक्त गाथा से उनकी स्तुति की— ‘‘จนฺโท ยถา วิคตวลาหเก นเภ,วิโรจติ วิคตมโลว ภาณุมา; เอวมฺปิ องฺคีรส ตฺวํ มหามุนิ,อติโรจสิ ยสสา สพฺพโลก’’นฺติ. जैसे बादलों से रहित आकाश में चंद्रमा सुशोभित होता है, अथवा जैसे मल (धुंध) से रहित सूर्य प्रकाशित होता है; हे अङ्गीरस! हे महामुनि! वैसे ही आप भी अपने यश से समस्त लोक में अतिशय सुशोभित हो रहे हैं। ๑๒. วงฺคีสสุตฺตํ १२. वङ्गीस सुत्त ๒๒๐. เอกํ สมยํ อายสฺมา วงฺคีโส สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา วงฺคีโส อจิรอรหตฺตปฺปตฺโต หุตฺวา วิมุตฺติสุขํ ปฏิสํเวที ตายํ เวลายํ อิมา คาถาโย อภาสิ – २२०. एक समय आयुष्मान वंगीस सावत्थी में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान वंगीस, जो हाल ही में अर्हत्व प्राप्त कर चुके थे, विमुक्ति-सुख का अनुभव करते हुए उस समय ये गाथाएँ बोले— ‘‘กาเวยฺยมตฺตา วิจริมฺห ปุพฺเพ, คามา คามํ ปุรา ปุรํ; อถทฺทสาม สมฺพุทฺธํ, สทฺธา โน อุปปชฺชถ. "पहले हम काव्य-रचना में मग्न होकर एक गाँव से दूसरे गाँव और एक नगर से दूसरे नगर घूमते थे। फिर हमने सम्बुद्ध के दर्शन किए और हमारे भीतर श्रद्धा उत्पन्न हुई। ‘‘โส เม ธมฺมมเทเสสิ, ขนฺธายตนธาตุโย ; ตสฺสาหํ ธมฺมํ สุตฺวาน, ปพฺพชึ อนคาริยํ. उन्होंने मुझे धर्म का उपदेश दिया—स्कन्ध, आयतन और धातु। उनके धर्म को सुनकर मैंने गृहत्याग कर प्रव्रज्या ग्रहण की। ‘‘พหุนฺนํ วต อตฺถาย, โพธึ อชฺฌคมา มุนิ; ภิกฺขูนํ ภิกฺขุนีนญฺจ, เย นิยามคตทฺทสา. निश्चित ही मुनि ने बहुतों के कल्याण के लिए बोधि प्राप्त की—उन भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए, जो नियत मार्ग (निर्वाण) को देखने वाले हैं। ‘‘สฺวาคตํ [Pg.198] วต เม อาสิ, มม พุทฺธสฺส สนฺติเก; ติสฺโส วิชฺชา อนุปฺปตฺตา, กตํ พุทฺธสฺส สาสนํ. बुद्ध के सान्निध्य में मेरा आना वास्तव में सुआगत (सार्थक) रहा। मैंने तीनों विद्याएँ प्राप्त कर ली हैं और बुद्ध के शासन का पालन किया है। ‘‘ปุพฺเพนิวาสํ ชานามิ, ทิพฺพจกฺขุํ วิโสธิตํ; เตวิชฺโช อิทฺธิปตฺโตมฺหิ, เจโตปริยายโกวิโท’’ติ. मैं पूर्व-निवास (पिछले जन्मों) को जानता हूँ, दिव्य-चक्षु विशुद्ध हो चुके हैं। मैं त्रैविद्य हूँ, ऋद्धि प्राप्त हूँ और दूसरों के चित्त को जानने में कुशल हूँ।" วงฺคีสสํยุตฺตํ สมตฺตํ. वंगीस-संयुत्त समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – इसका सारांश (उद्दान)— นิกฺขนฺตํ อรติ เจว, เปสลา อติมญฺญนา; อานนฺเทน สุภาสิตา, สาริปุตฺตปวารณา; ปโรสหสฺสํ โกณฺฑญฺโญ, โมคฺคลฺลาเนน คคฺครา; วงฺคีเสน ทฺวาทสาติ. निक्खन्त, अरति, पेसला, अतिमञ्ञना, आनन्द, सुभासित, सारिपुत्त, पवारणा, परोसहस्स, कोण्डञ्ञ, मोग्गलान, गग्गरा और वंगीस—ये बारह (सूक्त) हैं। ๙. วนสํยุตฺตํ ९. वन-संयुत्त ๑. วิเวกสุตฺตํ १. विवेक-सुत्त ๒๒๑. เอวํ [Pg.199] เม สุตํ – เอกํ สมยํ อญฺญตโร ภิกฺขุ โกสเลสุ วิหรติ อญฺญตรสฺมึ วนสณฺเฑ. เตน โข ปน สมเยน โส ภิกฺขุ ทิวาวิหารคโต ปาปเก อกุสเล วิตกฺเก วิตกฺเกติ เคหนิสฺสิเต. อถ โข ยา ตสฺมึ วนสณฺเฑ อธิวตฺถา เทวตา ตสฺส ภิกฺขุโน อนุกมฺปิกา อตฺถกามา ตํ ภิกฺขุํ สํเวเชตุกามา เยน โส ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ คาถาหิ อชฺฌภาสิ – २२१. ऐसा मैंने सुना है—एक समय एक भिक्षु कोसल देश के किसी वन-खण्ड में विहार कर रहा था। उस समय वह भिक्षु दिन के विहार (ध्यान) के समय घर-गृहस्थी से संबंधित पापपूर्ण अकुशल वितर्कों (विचारों) में डूबा हुआ था। तब उस वन-खण्ड में रहने वाली एक देवता, जो उस भिक्षु की हितैषी और अनुकम्पा करने वाली थी, उसे संवेगित (जागृत) करने की इच्छा से उसके पास आई और गाथाओं में उससे यह कहा— ‘‘วิเวกกาโมสิ วนํ ปวิฏฺโฐ,อถ เต มโน นิจฺฉรตี พหิทฺธา; ชโน ชนสฺมึ วินยสฺสุ ฉนฺทํ,ตโต สุขี โหหิสิ วีตราโค. "तुम विवेक (एकान्त) की इच्छा से वन में प्रविष्ट हुए हो, फिर भी तुम्हारा मन बाहर भटक रहा है। लोगों के प्रति अपनी आसक्ति (छन्द) को दूर करो, तब तुम वीतराग होकर सुखी होगे। ‘‘อรตึ ปชหาสิ สโต, ภวาสิ สตํ ตํ สารยามเส; ปาตาลรโช หิ ทุตฺตโร, มา ตํ กามรโช อวาหริ. स्मृतिमान (सचेत) होकर अरति (अरुचि) का त्याग करो; हम तुम्हें उस स्मृति की याद दिलाते हैं। पाताल की धूल (गहरे क्लेश) को पार करना कठिन है, काम-रूपी धूल तुम्हें (अपाय की ओर) न ले जाए। ‘‘สกุโณ ยถา ปํสุกุนฺถิโต, วิธุนํ ปาตยติ สิตํ รชํ; เอวํ ภิกฺขุ ปธานวา สติมา, วิธุนํ ปาตยติ สิตํ รช’’นฺติ. जैसे धूल से सना हुआ पक्षी अपने शरीर को झटक कर धूल झाड़ देता है, वैसे ही उद्योगी और स्मृतिमान भिक्षु अपने भीतर लगी (क्लेश-रूपी) धूल को झटक कर गिरा दे।" อถ โข โส ภิกฺขุ ตาย เทวตาย สํเวชิโต สํเวคมาปาทีติ. तब वह भिक्षु उस देवता द्वारा संवेगित किए जाने पर संवेग (वैराग्य/जागृति) को प्राप्त हुआ। ๒. อุปฏฺฐานสุตฺตํ २. उपट्ठान-सुत्त ๒๒๒. เอกํ สมยํ อญฺญตโร ภิกฺขุ โกสเลสุ วิหรติ อญฺญตรสฺมึ วนสณฺเฑ. เตน โข ปน สมเยน โส ภิกฺขุ ทิวาวิหารคโต สุปติ. อถ โข ยา ตสฺมึ วนสณฺเฑ อธิวตฺถา เทวตา ตสฺส ภิกฺขุโน อนุกมฺปิกา อตฺถกามา ตํ ภิกฺขุํ สํเวเชตุกามา เยน โส ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ คาถาหิ อชฺฌภาสิ – २२२. एक समय एक भिक्षु कोसल देश के किसी वन-खण्ड में विहार कर रहा था। उस समय वह भिक्षु दिन के समय सो रहा था। तब उस वन-खण्ड में रहने वाली एक देवता, जो उस भिक्षु की हितैषी और अनुकम्पा करने वाली थी, उसे संवेगित करने की इच्छा से उसके पास आई और गाथाओं में उससे यह कहा— ‘‘อุฏฺเฐหิ ภิกฺขุ กึ เสสิ, โก อตฺโถ สุปิเตน เต; อาตุรสฺส หิ กา นิทฺทา, สลฺลวิทฺธสฺส รุปฺปโต. "भिक्षु! उठो, क्यों सो रहे हो? तुम्हारे सोने से क्या लाभ? जो क्लेशों से आतुर है और तृष्णा-रूपी बाण से बिंधा हुआ तड़प रहा है, उसे नींद कैसे आ सकती है? ‘‘ยาย [Pg.200] สทฺธาย ปพฺพชิโต, อคารสฺมานคาริยํ; ตเมว สทฺธํ พฺรูเหหิ, มา นิทฺทาย วสํ คมี’’ติ. जिस श्रद्धा के कारण तुम घर से बेघर होकर प्रव्रजित हुए हो, उसी श्रद्धा को बढ़ाओ; निद्रा के वश में मत हो।" ‘‘อนิจฺจา อทฺธุวา กามา, เยสุ มนฺโทว มุจฺฉิโต; พทฺเธสุ มุตฺตํ อสิตํ, กสฺมา ปพฺพชิตํ ตเป. "(भिक्षु ने कहा:) काम-भोग अनित्य और अध्रुव (अस्थिर) हैं, जिनमें केवल मंदबुद्धि ही आसक्त होते हैं। जो बंधनों से मुक्त और अनासक्त है, उस प्रव्रजित को (दिन की निद्रा) क्यों संतप्त करेगी? ‘‘ฉนฺทราคสฺส วินยา, อวิชฺชาสมติกฺกมา; ตํ ญาณํ ปรโมทานํ, กสฺมา ปพฺพชิตํ ตเป. छन्द-राग (आसक्ति) के दमन से और अविद्या के अतिक्रमण से जिसे परम परिशुद्ध ज्ञान प्राप्त हो गया है, उस प्रव्रजित को (निद्रा) क्यों संतप्त करेगी? ‘‘เฉตฺวา อวิชฺชํ วิชฺชาย, อาสวานํ ปริกฺขยา; อโสกํ อนุปายาสํ, กสฺมา ปพฺพชิตํ ตเป. विद्या (ज्ञान) के द्वारा अविद्या को काटकर और आस्रवों का क्षय कर जो शोक-रहित और संताप-रहित हो गया है, उस प्रव्रजित को (निद्रा) क्यों संतप्त करेगी? ‘‘อารทฺธวีริยํ ปหิตตฺตํ, นิจฺจํ ทฬฺหปรกฺกมํ; นิพฺพานํ อภิกงฺขนฺตํ, กสฺมา ปพฺพชิตํ ตเป’’ติ. जो आरब्ध-वीर्य (उद्यमी), दृढ़-निश्चयी और सदैव निर्वाण की आकांक्षा रखने वाला प्रव्रजित है, उसे (निद्रा) क्यों संतप्त करेगी?" ๓. กสฺสปโคตฺตสุตฺตํ ३. कस्सपगोत्त-सुत्त ๒๒๓. เอกํ สมยํ อายสฺมา กสฺสปโคตฺโต โกสเลสุ วิหรติ อญฺญตรสฺมึ วนสณฺเฑ. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา กสฺสปโคตฺโต ทิวาวิหารคโต อญฺญตรํ เฉตํ โอวทติ. อถ โข ยา ตสฺมึ วนสณฺเฑ อธิวตฺถา เทวตา อายสฺมนฺตํ กสฺสปโคตฺตํ สํเวเชตุกามา เยนายสฺมา กสฺสปโคตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ กสฺสปโคตฺตํ คาถาหิ อชฺฌภาสิ – २२३. एक समय आयुष्मान कस्सपगोत्त कोसल देश के किसी वन-खण्ड में विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान कस्सपगोत्त दिन के समय किसी व्याध (शिकारी) को उपदेश दे रहे थे। तब उस वन-खण्ड में रहने वाली एक देवता, जो आयुष्मान कस्सपगोत्त को संवेगित करना चाहती थी, उनके पास आई और गाथाओं में उनसे यह कहा— ‘‘คิริทุคฺคจรํ เฉตํ, อปฺปปญฺญํ อเจตสํ; อกาเล โอวทํ ภิกฺขุ, มนฺโทว ปฏิภาติ มํ. "पहाड़ों की कंदराओं में घूमने वाले, अल्पबुद्धि और विवेकहीन शिकारी को असमय उपदेश देना, मुझे किसी मूर्ख के कार्य जैसा प्रतीत होता है। ‘‘สุณาติ น วิชานาติ, อาโลเกติ น ปสฺสติ; ธมฺมสฺมึ ภญฺญมานสฺมึ, อตฺถํ พาโล น พุชฺฌติ. वह सुनता है पर समझता नहीं, देखता है पर उसे बोध नहीं होता। धर्म का उपदेश दिए जाने पर भी वह मूर्ख उसके अर्थ को नहीं समझ पाता। ‘‘สเจปิ ทส ปชฺโชเต, ธารยิสฺสสิ กสฺสป; เนว ทกฺขติ รูปานิ, จกฺขุ หิสฺส น วิชฺชตี’’ติ. कस्सप! यदि तुम दस मशालें भी जलाकर रख दो, तो भी वह शिकारी रूप (सत्य) को नहीं देख पाएगा, क्योंकि उसके पास (प्रज्ञा की) आँख ही नहीं है।" อถ โข อายสฺมา กสฺสปโคตฺโต ตาย เทวตาย สํเวชิโต สํเวคมาปาทีติ. तब आयुष्मान कस्सपगोत्त उस देवता द्वारा संवेगित किए जाने पर संवेग को प्राप्त हुए। ๔. สมฺพหุลสุตฺตํ ४. सम्बहुला सुत्त ๒๒๔. เอกํ [Pg.201] สมยํ สมฺพหุลา ภิกฺขู โกสเลสุ วิหรนฺติ อญฺญตรสฺมึ วนสณฺเฑ. อถ โข เต ภิกฺขู วสฺสํวุฏฺฐา เตมาสจฺจเยน จาริกํ ปกฺกมึสุ. อถ โข ยา ตสฺมึ วนสณฺเฑ อธิวตฺถา เทวตา เต ภิกฺขู อปสฺสนฺตี ปริเทวมานา ตายํ เวลายํ อิมํ คาถํ อภาสิ – २२४. एक समय बहुत से भिक्षु कोसल देश के किसी वन-खण्ड में विहार कर रहे थे। तब वे भिक्षु वर्षावास पूरा कर तीन महीने बीतने पर चारिका के लिए निकल गए। तब उस वन-खण्ड में रहने वाली देवता ने उन भिक्षुओं को न देख कर, विलाप करते हुए उस समय यह गाथा कही — ‘‘อรติ วิย เมชฺช ขายติ,พหุเก ทิสฺวาน วิวิตฺเต อาสเน; เต จิตฺตกถา พหุสฺสุตา,โกเม โคตมสาวกา คตา’’ติ. “आज इन बहुत से सूने आसनों को देखकर मुझे अरति (बेचैनी) सी हो रही है। वे अद्भुत कथा करने वाले और बहुश्रुत गौतम के श्रावक कहाँ चले गए?” เอวํ วุตฺเต, อญฺญตรา เทวตา ตํ เทวตํ คาถาย ปจฺจภาสิ – ऐसा कहने पर, एक अन्य देवता ने उस देवता को गाथा में उत्तर दिया — ‘‘มาคธํ คตา โกสลํ คตา, เอกจฺจิยา ปน วชฺชิภูมิยา; มคา วิย อสงฺคจาริโน, อนิเกตา วิหรนฺติ ภิกฺขโว’’ติ. “कुछ मगध चले गए, कुछ कोसल चले गए और कुछ वज्जि भूमि की ओर। मृगों के समान आसक्ति-रहित विचरण करने वाले वे भिक्षु अनिकेत (बिना घर के) होकर विहार करते हैं।” ๕. อานนฺทสุตฺตํ ५. आनन्द सुत्त ๒๒๕. เอกํ สมยํ อายสฺมา อานนฺโท โกสเลสุ วิหรติ อญฺญตรสฺมึ วนสณฺเฑ. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา อานนฺโท อติเวลํ คิหิสญฺญตฺติพหุโล วิหรติ. อถ โข ยา ตสฺมึ วนสณฺเฑ อธิวตฺถา เทวตา อายสฺมโต อานนฺทสฺส อนุกมฺปิกา อตฺถกามา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ สํเวเชตุกามา เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ คาถาย อชฺฌภาสิ – २२५. एक समय आयुष्मान आनन्द कोसल देश के किसी वन-खण्ड में विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान आनन्द बहुत अधिक समय गृहस्थों को उपदेश देने (सम्बोधित करने) में बिता रहे थे। तब उस वन-खण्ड में रहने वाली देवता ने आयुष्मान आनन्द के प्रति अनुकम्पा और उनका हित चाहने के कारण, उन्हें संवेगित करने की इच्छा से आयुष्मान आनन्द के पास जाकर गाथा में कहा — ‘‘รุกฺขมูลคหนํ ปสกฺกิย, นิพฺพานํ หทยสฺมึ โอปิย; ฌา โคตม มา ปมาโท, กึ เต พิฬิพิฬิกา กริสฺสตี’’ติ. “वृक्ष के मूल में गहन वन में प्रवेश कर, निर्वाण को हृदय में धारण कर, हे गौतम! ध्यान करो, प्रमाद मत करो। यह व्यर्थ की बातें (गृहस्थों के साथ वार्तालाप) तुम्हारा क्या भला करेंगी?” อถ โข อายสฺมา อานนฺโท ตาย เทวตาย สํเวชิโต สํเวคมาปาทีติ. तब आयुष्मान आनन्द उस देवता द्वारा संवेगित किए जाने पर संवेग को प्राप्त हुए। ๖. อนุรุทฺธสุตฺตํ ६. अनुरुद्ध सुत्त ๒๒๖. เอกํ สมยํ อายสฺมา อนุรุทฺโธ โกสเลสุ วิหรติ อญฺญตรสฺมึ วนสณฺเฑ. อถ โข อญฺญตรา ตาวตึสกายิกา เทวตา ชาลินี [Pg.202] นาม อายสฺมโต อนุรุทฺธสฺส ปุราณทุติยิกา เยนายสฺมา อนุรุทฺโธ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อนุรุทฺธํ คาถาย อชฺฌภาสิ – २२६. एक समय आयुष्मान अनुरुद्ध कोसल देश के किसी वन-खण्ड में विहार कर रहे थे। तब जालिनी नाम की एक तावतिंस लोक की देवता, जो आयुष्मान अनुरुद्ध की पूर्व जन्म की पत्नी थी, आयुष्मान अनुरुद्ध के पास आई और गाथा में कहा — ‘‘ตตฺถ จิตฺตํ ปณิเธหิ, ยตฺถ เต วุสิตํ ปุเร; ตาวตึเสสุ เทเวสุ, สพฺพกามสมิทฺธิสุ; ปุรกฺขโต ปริวุโต, เทวกญฺญาหิ โสภสี’’ติ. “अपना चित्त वहीं लगाओ जहाँ तुम पहले रहते थे। तावतिंस देवलोक में, जहाँ सभी काम-भोग सुलभ हैं, तुम अप्सराओं से घिरे हुए शोभा पाते थे।” ‘‘ทุคฺคตา เทวกญฺญาโย, สกฺกายสฺมึ ปติฏฺฐิตา; เต จาปิ ทุคฺคตา สตฺตา, เทวกญฺญาหิ ปตฺถิตา’’ติ. “अप्सराएँ दुर्गति में हैं क्योंकि वे सत्काय-दृष्टि (अहंकार) में स्थित हैं; और वे प्राणी भी दुर्गति में ही हैं जो अप्सराओं की कामना करते हैं।” ‘‘น เต สุขํ ปชานนฺติ, เย น ปสฺสนฺติ นนฺทนํ; อาวาสํ นรเทวานํ, ติทสานํ ยสสฺสิน’’นฺติ. “वे सुख को नहीं जानते जिन्होंने नन्दन वन नहीं देखा, जो यशस्वी तावतिंस देवों का निवास स्थान है।” ‘‘น ตฺวํ พาเล วิชานาสิ, ยถา อรหตํ วโจ; อนิจฺจา สพฺพสงฺขารา, อุปฺปาทวยธมฺมิโน; อุปฺปชฺชิตฺวา นิรุชฺฌนฺติ, เตสํ วูปสโม สุโข. “अरी नासमझ! तू अर्हतों के वचनों को नहीं जानती। सभी संस्कार अनित्य हैं, उत्पन्न होना और नष्ट होना उनका स्वभाव है। वे उत्पन्न होकर निरुद्ध हो जाते हैं, उनका उपशम (शान्त होना) ही सुख है।” ‘‘นตฺถิ ทานิ ปุนาวาโส, เทวกายสฺมิ ชาลินิ; วิกฺขีโณ ชาติสํสาโร, นตฺถิ ทานิ ปุนพฺภโว’’ติ. “हे जालिनी! अब देवलोक में मेरा पुनः निवास नहीं होगा। जन्म-संसार क्षीण हो गया है, अब पुनर्जन्म नहीं है।” ๗. นาคทตฺตสุตฺตํ ७. नागदत्त सुत्त ๒๒๗. เอกํ สมยํ อายสฺมา นาคทตฺโต โกสเลสุ วิหรติ อญฺญตรสฺมึ วนสณฺเฑ. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา นาคทตฺโต อติกาเลน คามํ ปวิสติ, อติทิวา ปฏิกฺกมติ. อถ โข ยา ตสฺมึ วนสณฺเฑ อธิวตฺถา เทวตา อายสฺมโต นาคทตฺตสฺส อนุกมฺปิกา อตฺถกามา อายสฺมนฺตํ นาคทตฺตํ สํเวเชตุกามา เยนายสฺมา นาคทตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ นาคทตฺตํ คาถาหิ อชฺฌภาสิ – २२७. एक समय आयुष्मान नागदत्त कोसल देश के किसी वन-खण्ड में विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान नागदत्त बहुत सवेरे गाँव में प्रवेश करते थे और बहुत देर से वापस लौटते थे। तब उस वन-खण्ड में रहने वाली देवता ने आयुष्मान नागदत्त के प्रति अनुकम्पा और उनका हित चाहने के कारण, उन्हें संवेगित करने की इच्छा से आयुष्मान नागदत्त के पास जाकर गाथाओं में कहा — ‘‘กาเล ปวิส นาคทตฺต, ทิวา จ อาคนฺตฺวา อติเวลจารี; สํสฏฺโฐ คหฏฺเฐหิ, สมานสุขทุกฺโข. “हे नागदत्त! सही समय पर (गाँव में) प्रवेश करो। देर से लौटने वाले तुम अति-वेला (अनुचित समय) में विचरण करने वाले हो। तुम गृहस्थों के साथ घुल-मिल गए हो और उनके सुख-दुःख में समान रूप से भागीदार हो गए हो।” ‘‘ภายามิ นาคทตฺตํ สุปฺปคพฺภํ, กุเลสุ วินิพทฺธํ; มา เหว มจฺจุรญฺโญ พลวโต, อนฺตกสฺส วสํ อุเปสี’’ติ. “मैं कुलों (परिवारों) में बँधे हुए और प्रगल्भ (ढीठ) नागदत्त के लिए डरती हूँ। कहीं तुम बलवान अंतक मृत्युराज के वश में न हो जाओ।” อถ [Pg.203] โข อายสฺมา นาคทตฺโต ตาย เทวตาย สํเวชิโต สํเวคมาปาทีติ. तब आयुष्मान नागदत्त उस देवता द्वारा संवेगित किए जाने पर संवेग को प्राप्त हुए। ๘. กุลฆรณีสุตฺตํ ८. कुलघरणी सुत्त ๒๒๘. เอกํ สมยํ อญฺญตโร ภิกฺขุ โกสเลสุ วิหรติ อญฺญตรสฺมึ วนสณฺเฑ. เตน โข ปน สมเยน โส ภิกฺขุ อญฺญตรสฺมึ กุเล อติเวลํ อชฺโฌคาฬฺหปฺปตฺโต วิหรติ. อถ โข ยา ตสฺมึ วนสณฺเฑ อธิวตฺถา เทวตา ตสฺส ภิกฺขุโน อนุกมฺปิกา อตฺถกามา ตํ ภิกฺขุํ สํเวเชตุกามา ยา ตสฺมึ กุเล กุลฆรณี, ตสฺสา วณฺณํ อภินิมฺมินิตฺวา เยน โส ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ คาถาย อชฺฌภาสิ – २२८. एक समय कोई भिक्षु कोसल देश के किसी वन-खण्ड में विहार कर रहा था। उस समय वह भिक्षु किसी परिवार में बहुत अधिक घुल-मिल गया था। तब उस वन-खण्ड में रहने वाली देवता ने उस भिक्षु के प्रति अनुकम्पा और उसका हित चाहने के कारण, उसे संवेगित करने की इच्छा से, उस परिवार की गृहस्वामिनी का रूप धारण कर उस भिक्षु के पास जाकर गाथा में कहा — ‘‘นทีตีเรสุ สณฺฐาเน, สภาสุ รถิยาสุ จ; ชนา สงฺคมฺม มนฺเตนฺติ, มญฺจ ตญฺจ กิมนฺตร’’นฺติ. “नदी के किनारों पर, विश्राम स्थलों पर, सभाओं में और गलियों में लोग इकट्ठा होकर मेरे और तुम्हारे बारे में कानाफूसी करते हैं। इसका क्या कारण है?” ‘‘พหูหิ สทฺทา ปจฺจูหา, ขมิตพฺพา ตปสฺสินา; น เตน มงฺกุ โหตพฺพํ, น หิ เตน กิลิสฺสติ. “तपस्वी को लोक में प्रचलित बहुत से प्रतिकूल शब्दों (निंदा) को सहन करना चाहिए। उससे मन को खिन्न नहीं करना चाहिए, क्योंकि उससे कोई मलिन नहीं होता।” ‘‘โย จ สทฺทปริตฺตาสี, วเน วาตมิโค ยถา; ลหุจิตฺโตติ ตํ อาหุ, นาสฺส สมฺปชฺชเต วต’’นฺติ. “जो केवल शब्दों से ही डर जाता है, जैसे वन में हवा से डरने वाला मृग, उसे विद्वान ‘लघुचित्त’ (चंचल मन वाला) कहते हैं। उसका व्रत (साधना) सफल नहीं होता।” ๙. วชฺชิปุตฺตสุตฺตํ ९. वज्जिपुत्त सुत्त ๒๒๙. เอกํ สมยํ อญฺญตโร วชฺชิปุตฺตโก ภิกฺขุ เวสาลิยํ วิหรติ อญฺญตรสฺมึ วนสณฺเฑ. เตน โข ปน สมเยน เวสาลิยํ วชฺชิปุตฺตโก สพฺพรตฺติจาโร โหติ. อถ โข โส ภิกฺขุ เวสาลิยา ตูริย-ตาฬิต-วาทิต-นิคฺโฆสสทฺทํ สุตฺวา ปริเทวมาโน ตายํ เวลายํ อิมํ คาถํ อภาสิ – २२९. एक समय कोई वज्जिपुत्र भिक्षु वैशाली के किसी वन-खण्ड में विहार कर रहा था। उस समय वैशाली में वज्जिपुत्रों का रात भर चलने वाला उत्सव हो रहा था। तब वह भिक्षु वैशाली से आने वाले वाद्यों, तालों और संगीत के शोर को सुनकर विलाप करते हुए उस समय यह गाथा बोला — ‘‘เอกกา มยํ อรญฺเญ วิหราม,อปวิทฺธํว วนสฺมึ ทารุกํ; เอตาทิสิกาย รตฺติยา,โก สุ นามมฺเหหิ ปาปิโย’’ติ. “हम वन में अकेले वैसे ही विहार कर रहे हैं जैसे वन में फेंकी हुई कोई लकड़ी। ऐसी (उत्सव की) रात में हमसे अधिक अभागा और कौन होगा?” อถ โข ยา ตสฺมึ วนสณฺเฑ อธิวตฺถา เทวตา ตสฺส ภิกฺขุโน อนุกมฺปิกา อตฺถกามา ตํ ภิกฺขุํ สํเวเชตุกามา เยน โส ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ คาถาย อชฺฌภาสิ – तब उस वन-खण्ड में रहने वाली देवता ने उस भिक्षु के प्रति अनुकम्पा और उसका हित चाहने के कारण, उसे संवेगित करने की इच्छा से उस भिक्षु के पास जाकर गाथा में कहा — ‘‘เอกโกว [Pg.204] ตฺวํ อรญฺเญ วิหรสิ, อปวิทฺธํว วนสฺมึ ทารุกํ; ตสฺส เต พหุกา ปิหยนฺติ, เนรยิกา วิย สคฺคคามิน’’นฺติ. “हे भिक्षु! तुम वन में एक परित्यक्त लकड़ी के टुकड़े के समान अकेले रहते हो। जैसे नरक के प्राणी स्वर्ग जाने वालों की अभिलाषा करते हैं, वैसे ही बहुत से लोग तुम्हारी अभिलाषा करते हैं।” อถ โข โส ภิกฺขุ ตาย เทวตาย สํเวชิโต สํเวคมาปาทีติ. तब वह भिक्षु उस देवता द्वारा संवेजित (प्रेरित) होकर संवेग को प्राप्त हुआ। ๑๐. สชฺฌายสุตฺตํ १०. सज्झाय सुत्त (स्वाध्याय सूत्र) ๒๓๐. เอกํ สมยํ อญฺญตโร ภิกฺขุ โกสเลสุ วิหรติ อญฺญตรสฺมึ วนสณฺเฑ. เตน โข ปน สมเยน โส ภิกฺขุ ยํ สุทํ ปุพฺเพ อติเวลํ สชฺฌายพหุโล วิหรติ โส อปเรน สมเยน อปฺโปสฺสุกฺโก ตุณฺหีภูโต สงฺกสายติ. อถ โข ยา ตสฺมึ วนสณฺเฑ อธิวตฺถา เทวตา ตสฺส ภิกฺขุโน ธมฺมํ อสุณนฺตี เยน โส ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ คาถาย อชฺฌภาสิ – २३०. एक समय एक भिक्षु कोसल देश के किसी वन-खंड में विहार कर रहे थे। उस समय वह भिक्षु पहले बहुत अधिक स्वाध्याय (सज्झाय) किया करते थे, किन्तु बाद में वे अल्पोत्सुक और मौन होकर (फल-समापत्ति के सुख में) समय बिताने लगे। तब उस वन-खंड में रहने वाले देवता ने, उस भिक्षु के स्वाध्याय को न सुनकर, जहाँ वह भिक्षु थे वहाँ जाकर गाथा में कहा— ‘‘กสฺมา ตุวํ ธมฺมปทานิ ภิกฺขุ, นาธียสิ ภิกฺขูหิ สํวสนฺโต; สุตฺวาน ธมฺมํ ลภติปฺปสาทํ, ทิฏฺเฐว ธมฺเม ลภติปฺปสํส’’นฺติ. “हे भिक्षु! तुम भिक्षुओं के साथ रहते हुए धर्म-पदों का स्वाध्याय क्यों नहीं करते? धर्म को सुनकर वर्तमान जीवन में ही प्रसन्नता प्राप्त होती है और प्रशंसा भी मिलती है।” ‘‘อหุ ปุเร ธมฺมปเทสุ ฉนฺโท, ยาว วิราเคน สมาคมิมฺห; ยโต วิราเคน สมาคมิมฺห, ยํ กิญฺจิ ทิฏฺฐํว สุตํ มุตํ วา; อญฺญาย นิกฺเขปนมาหุ สนฺโต’’ติ. “पहले धर्म-पदों के प्रति उत्साह था, जब तक कि विराग (अरिहंत मार्ग) प्राप्त नहीं हुआ था। जब से विराग प्राप्त हुआ है, तब से जो कुछ भी देखा, सुना या अनुभव किया गया है, उसे जानकर संतों ने (स्वाध्याय के) त्याग की ही प्रशंसा की है।” ๑๑. อกุสลวิตกฺกสุตฺตํ ११. अकुसलवितक्क सुत्त (अकुशल वितर्क सूत्र) ๒๓๑. เอกํ สมยํ อญฺญตโร ภิกฺขุ โกสเลสุ วิหรติ อญฺญตรสฺมึ วนสณฺเฑ. เตน โข ปน สมเยน โส ภิกฺขุ ทิวาวิหารคโต ปาปเก อกุสเล วิตกฺเก วิตกฺเกติ, เสยฺยถิทํ – กามวิตกฺกํ, พฺยาปาทวิตกฺกํ, วิหึสาวิตกฺกํ. อถ โข ยา ตสฺมึ วนสณฺเฑ อธิวตฺถา เทวตา ตสฺส ภิกฺขุโน อนุกมฺปิกา อตฺถกามา ตํ ภิกฺขุํ สํเวเชตุกามา เยน โส ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ คาถาหิ อชฺฌภาสิ – २३१. एक समय एक भिक्षु कोसल देश के किसी वन-खंड में विहार कर रहे थे। उस समय वह भिक्षु दिन के विश्राम के समय पापपूर्ण अकुशल वितर्कों—काम-वितर्क, व्यापाद-वितर्क और विहिंसा-वितर्क—में डूबे हुए थे। तब उस वन-खंड में रहने वाले देवता ने, उस भिक्षु के प्रति अनुकम्पा और हित की इच्छा से, उन्हें संवेजित करने के लिए जहाँ वह भिक्षु थे वहाँ जाकर गाथाओं में कहा— ‘‘อโยนิโส มนสิการา, โส วิตกฺเกหิ ขชฺชสิ; อโยนิโส ปฏินิสฺสชฺช, โยนิโส อนุจินฺตย. “अयोनिशो मनसिकार (अनुचित चिंतन) के कारण तुम इन वितर्कों द्वारा खाए जा रहे हो। अयोनिशो मनसिकार को छोड़ो और योनिशो मनसिकार (उचित चिंतन) करो। ‘‘สตฺถารํ [Pg.205] ธมฺมมารพฺภ, สงฺฆํ สีลานิ อตฺตโน; อธิคจฺฉสิ ปาโมชฺชํ, ปีติสุขมสํสยํ; ตโต ปาโมชฺชพหุโล, ทุกฺขสฺสนฺตํ กริสฺสสี’’ติ. शास्ता (बुद्ध), धर्म, संघ और अपने शीलों का आलम्बन लेकर तुम निश्चित ही प्रमोद, प्रीति और सुख प्राप्त करोगे। तब प्रमोद की अधिकता से तुम दुःख का अंत कर सकोगे।” อถ โข โส ภิกฺขุ ตาย เทวตาย สํเวชิโต สํเวคมาปาทีติ. तब वह भिक्षु उस देवता द्वारा संवेजित होकर संवेग को प्राप्त हुआ। ๑๒. มชฺฌนฺหิกสุตฺตํ १२. मज्झन्हिक सुत्त (मध्याह्न सूत्र) ๒๓๒. เอกํ สมยํ อญฺญตโร ภิกฺขุ โกสเลสุ วิหรติ อญฺญตรสฺมึ วนสณฺเฑ. อถ โข ตสฺมึ วนสณฺเฑ อธิวตฺถา เทวตา เยน โส ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตสฺส ภิกฺขุโน สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – २३२. एक समय एक भिक्षु कोसल देश के किसी वन-खंड में विहार कर रहे थे। तब उस वन-खंड में रहने वाले देवता ने जहाँ वह भिक्षु थे वहाँ जाकर उनके समीप यह गाथा कही— ‘‘ฐิเต มชฺฌนฺหิเก กาเล, สนฺนิสีเวสุ ปกฺขิสุ; สณเตว พฺรหารญฺญํ, ตํ ภยํ ปฏิภาติ มํ. “मध्याह्न के समय जब पक्षी शांत होकर बैठे होते हैं, तब यह विशाल वन मानो गूँजता सा प्रतीत होता है; वह (ध्वनि) मुझे भयभीत करने वाली लगती है।” ‘‘ฐิเต มชฺฌนฺหิเก กาเล, สนฺนิสีเวสุ ปกฺขิสุ; สณเตว พฺรหารญฺญํ, สา รติ ปฏิภาติ ม’’นฺติ. “मध्याह्न के समय जब पक्षी शांत होकर बैठे होते हैं, तब यह विशाल वन मानो गूँजता सा प्रतीत होता है; वह (एकांत का सुख) मुझे रमणीय (आनंददायक) प्रतीत होता है।” ๑๓. ปากตินฺทฺริยสุตฺตํ १३. पाकतइन्द्रिय सुत्त (प्रकट इन्द्रिय सूत्र) ๒๓๓. เอกํ สมยํ สมฺพหุลา ภิกฺขู โกสเลสุ วิหรนฺติ อญฺญตรสฺมึ วนสณฺเฑ อุทฺธตา อุนฺนฬา จปลา มุขรา วิกิณฺณวาจา มุฏฺฐสฺสติโน อสมฺปชานา อสมาหิตา วิพฺภนฺตจิตฺตา ปากตินฺทฺริยา. อถ โข ยา ตสฺมึ วนสณฺเฑ อธิวตฺถา เทวตา เตสํ ภิกฺขูนํ อนุกมฺปิกา อตฺถกามา เต ภิกฺขู สํเวเชตุกามา เยน เต ภิกฺขู เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เต ภิกฺขู คาถาหิ อชฺฌภาสิ – २३३. एक समय बहुत से भिक्षु कोसल देश के किसी वन-खंड में विहार कर रहे थे, जो चंचल, अभिमानी, चपल, मुखर, व्यर्थ बोलने वाले, स्मृति-हीन, प्रज्ञा-रहित, असमाहित, विक्षिप्त चित्त वाले और असंयत इन्द्रियों वाले थे। तब उस वन-खंड में रहने वाले देवता ने उन भिक्षुओं के प्रति अनुकम्पा और हित की इच्छा से, उन्हें संवेजित करने के लिए जहाँ वे भिक्षु थे वहाँ जाकर गाथाओं में कहा— ‘‘สุขชีวิโน ปุเร อาสุํ, ภิกฺขู โคตมสาวกา; อนิจฺฉา ปิณฺฑเมสนา, อนิจฺฉา สยนาสนํ; โลเก อนิจฺจตํ ญตฺวา, ทุกฺขสฺสนฺตํ อกํสุ เต. “पहले गौतम बुद्ध के श्रावक भिक्षु सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करते थे। वे बिना किसी तृष्णा के भिक्षा और शयनासन की खोज करते थे। संसार में अनित्यता को जानकर उन्होंने दुःख का अंत किया। ‘‘ทุปฺโปสํ กตฺวา อตฺตานํ, คาเม คามณิกา วิย; ภุตฺวา ภุตฺวา นิปชฺชนฺติ, ปราคาเรสุ มุจฺฉิตา. किन्तु यहाँ कुछ भिक्षु गाँव के मुखिया के समान स्वयं का भरण-पोषण कठिन बनाकर, बार-बार खाकर दूसरों के घरों में आसक्त होकर सोए रहते हैं। ‘‘สงฺฆสฺส [Pg.206] อญฺชลึ กตฺวา, อิเธกจฺเจ วทามหํ; อปวิทฺธา อนาถา เต, ยถา เปตา ตเถว เต. मैं संघ को हाथ जोड़कर यहाँ कुछ भिक्षुओं के विषय में कहता हूँ—जैसे शवों को त्याग दिया जाता है, वैसे ही वे असहाय भिक्षु त्याग दिए जाने योग्य हैं। ‘‘เย โข ปมตฺตา วิหรนฺติ, เต เม สนฺธาย ภาสิตํ; เย อปฺปมตฺตา วิหรนฺติ, นโม เตสํ กโรมห’’นฺติ. जो प्रमादी होकर विहार करते हैं, उन्हें लक्ष्य करके मैंने यह कहा है। जो अप्रमादी होकर विहार करते हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।” อถ โข เต ภิกฺขู ตาย เทวตาย สํเวชิตา สํเวคมาปาทุนฺติ. तब वे भिक्षु उस देवता द्वारा संवेजित होकर संवेग को प्राप्त हुए। ๑๔. คนฺธตฺเถนสุตฺตํ १४. गन्धत्थेन सुत्त (गंध-चोर सूत्र) ๒๓๔. เอกํ สมยํ อญฺญตโร ภิกฺขุ โกสเลสุ วิหรติ อญฺญตรสฺมึ วนสณฺเฑ. เตน โข ปน สมเยน โส ภิกฺขุ ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺโต โปกฺขรณึ โอคาเหตฺวา ปทุมํ อุปสิงฺฆติ. อถ โข ยา ตสฺมึ วนสณฺเฑ อธิวตฺถา เทวตา ตสฺส ภิกฺขุโน อนุกมฺปิกา อตฺถกามา ตํ ภิกฺขุํ สํเวเชตุกามา เยน โส ภิกฺขุ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ คาถาย อชฺฌภาสิ – २३४. एक समय एक भिक्षु कोसल देश के किसी वन-खंड में विहार कर रहे थे। उस समय वह भिक्षु भोजन के पश्चात भिक्षाटन से लौटकर एक सरोवर में उतरकर कमल को सूंघ रहे थे। तब उस वन-खंड में रहने वाले देवता ने उस भिक्षु के प्रति अनुकम्पा और हित की इच्छा से, उन्हें संवेजित करने के लिए जहाँ वह भिक्षु थे वहाँ जाकर गाथा में कहा— ‘‘ยเมตํ วาริชํ ปุปฺผํ, อทินฺนํ อุปสิงฺฆสิ; เอกงฺคเมตํ เถยฺยานํ, คนฺธตฺเถโนสิ มาริสา’’ติ. “हे भिक्षु! तुम इस जल में उत्पन्न फूल को, जो तुम्हें दिया नहीं गया है, सूंघ रहे हो। यह चोरी का एक अंश है; तुम गंध-चोर हो।” ‘‘น หรามิ น ภญฺชามิ, อารา สิงฺฆามิ วาริชํ; อถ เกน นุ วณฺเณน, คนฺธตฺเถโนติ วุจฺจติ. “न तो मैं इसे ले जा रहा हूँ और न ही इसे तोड़ रहा हूँ, मैं तो दूर से ही इस कमल को सूंघ रहा हूँ। फिर किस कारण से मुझे गंध-चोर कहा जा रहा है?” ‘‘ยฺวายํ ภิสานิ ขนติ, ปุณฺฑรีกานิ ภญฺชติ; เอวํ อากิณฺณกมฺมนฺโต, กสฺมา เอโส น วุจฺจตี’’ติ. “जो व्यक्ति कमल की जड़ें खोदता है और श्वेत कमलों को तोड़ता है, ऐसे अशुद्ध कर्म करने वाले को चोर क्यों नहीं कहा जाता?” ‘‘อากิณฺณลุทฺโท ปุริโส, ธาติเจลํว มกฺขิโต; ตสฺมึ เม วจนํ นตฺถิ, ตฺวญฺจารหามิ วตฺตเว. “जो पुरुष पापों से भरा हुआ है, जैसे धाय (परिचारिका) का वस्त्र मैला होता है, उसके विषय में मुझे कुछ नहीं कहना है। किन्तु तुम्हें कहना उचित है। ‘‘อนงฺคณสฺส โปสสฺส, นิจฺจํ สุจิคเวสิโน; วาลคฺคมตฺตํ ปาปสฺส, อพฺภามตฺตํว ขายตี’’ติ. जो निष्पाप पुरुष सदैव शुचिता (पवित्रता) की खोज में रहता है, उसे बाल की नोक के बराबर का पाप भी बादल के समान बड़ा दिखाई देता है।” ‘‘อทฺธา มํ ยกฺข ชานาสิ, อโถ เม อนุกมฺปสิ; ปุนปิ ยกฺข วชฺชาสิ, ยทา ปสฺสสิ เอทิส’’นฺติ. “हे यक्ष! निश्चय ही तुम मुझे जानते हो और मुझ पर अनुकम्पा करते हो। हे यक्ष! जब भी तुम ऐसा (दोष) देखो, तो मुझे पुनः कहना।” ‘‘เนว [Pg.207] ตํ อุปชีวาม, นปิ เต ภตกามฺหเส; ตฺวเมว ภิกฺขุ ชาเนยฺย, เยน คจฺเฉยฺย สุคฺคติ’’นฺติ. “हे भिक्षु! हम तुम पर आश्रित होकर नहीं जीते हैं, और न ही हम तुम्हारे सेवक हैं। हे भिक्षु! जिस कर्म से सुगति प्राप्त होती है, उसे तुम स्वयं ही जानो।” อถ โข โส ภิกฺขุ ตาย เทวตาย สํเวชิโต สํเวคมาปาทีติ. तब वह भिक्षु उस देवता द्वारा संवेजित (प्रेरित) होकर संवेग को प्राप्त हुआ। วนสํยุตฺตํ สมตฺตํ. वन-संयुत्त समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका उद्दान (विषय-सूची) — วิเวกํ อุปฏฺฐานญฺจ, กสฺสปโคตฺเตน สมฺพหุลา; อานนฺโท อนุรุทฺโธ จ, นาคทตฺตญฺจ กุลฆรณี. विवेक सुत्त, उपट्ठान सुत्त, कस्सपगोत्त सुत्त, सम्बहुला सुत्त, आनन्द सुत्त, अनुरुद्ध सुत्त, नागदत्त सुत्त और कुलघरणी सुत्त। วชฺชิปุตฺโต จ เวสาลี, สชฺฌาเยน อโยนิโส; มชฺฌนฺหิกาลมฺหิ ปากตินฺทฺริย, ปทุมปุปฺเผน จุทฺทส ภเวติ. वज्जिपुत्त सुत्त, वेसाली सुत्त, सज्झाय सुत्त, अयोनिसो सुत्त, मज्झन्हिकाल सुत्त, पाकतइन्द्रिय सुत्त और पदुमपुप्फ सुत्त—ये चौदह सुत्त होते हैं। ๑๐. ยกฺขสํยุตฺตํ १०. १०. यक्ख-संयुत्त ๑. อินฺทกสุตฺตํ १. १. इन्दक सुत्त ๒๓๕. เอวํ [Pg.208] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ อินฺทกูเฏ ปพฺพเต, อินฺทกสฺส ยกฺขสฺส ภวเน. อถ โข อินฺทโก ยกฺโข เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – २३५. ऐसा मैंने सुना है—एक समय भगवान राजगृह में इन्दकूट पर्वत पर इन्दक यक्ष के भवन में विहार कर रहे थे। तब इन्दक यक्ष जहाँ भगवान थे, वहाँ गया; पास जाकर उसने भगवान को गाथा में संबोधित किया— ‘‘รูปํ น ชีวนฺติ วทนฺติ พุทฺธา, กถํ นฺวยํ วินฺทติมํ สรีรํ; กุตสฺส อฏฺฐียกปิณฺฑเมติ, กถํ นฺวยํ สชฺชติ คพฺภรสฺมิ’’นฺติ. “बुद्ध कहते हैं कि रूप 'जीव' नहीं है, तो फिर यह प्राणी इस शरीर को कैसे प्राप्त करता है? इसके पास अस्थि और मांस का पिंड कहाँ से आता है? और यह प्राणी माता के गर्भ में कैसे स्थित होता है?” ‘‘ปฐมํ กลลํ โหติ, กลลา โหติ อพฺพุทํ; อพฺพุทา ชายเต เปสิ, เปสิ นิพฺพตฺตตี ฆโน; ฆนา ปสาขา ชายนฺติ, เกสา โลมา นขาปิ จ. “पहले 'कलल' (तरल बिंदु) होता है, कलल से 'अब्बुद' (अर्बुद) होता है; अब्बुद से 'पेसी' (मांस-पेशी) उत्पन्न होती है, पेसी से 'घन' (पिंड) बनता है; घन से शाखाएँ (अंग-प्रत्यंग) उत्पन्न होती हैं, और फिर केश, रोम तथा नख भी उत्पन्न होते हैं। ‘‘ยญฺจสฺส ภุญฺชตี มาตา, อนฺนํ ปานญฺจ โภชนํ; เตน โส ตตฺถ ยาเปติ, มาตุกุจฺฉิคโต นโร’’ติ. “उसकी माता जो भी अन्न, पान और भोजन ग्रहण करती है, माता के गर्भ में स्थित वह प्राणी उसी से वहाँ जीवन-यापन करता है।” ๒. สกฺกนามสุตฺตํ २. २. सक्कनाम सुत्त ๒๓๖. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ คิชฺฌกูเฏ ปพฺพเต. อถ โข สกฺกนามโก ยกฺโข เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – २३६. एक समय भगवान राजगृह में गृध्रकूट पर्वत पर विहार कर रहे थे। तब सक्क नामक यक्ष जहाँ भगवान थे, वहाँ गया; पास जाकर उसने भगवान को गाथा में संबोधित किया— ‘‘สพฺพคนฺถปฺปหีนสฺส, วิปฺปมุตฺตสฺส เต สโต; สมณสฺส น ตํ สาธุ, ยทญฺญมนุสาสสี’’ติ. “आप सभी ग्रंथियों (बंधनों) से मुक्त हैं, विमुक्त हैं और स्मृतिवान हैं; ऐसे श्रमण के लिए दूसरों को उपदेश देना उचित नहीं है।” ‘‘เยน เกนจิ วณฺเณน, สํวาโส สกฺก ชายติ; น ตํ อรหติ สปฺปญฺโญ, มนสา อนุกมฺปิตุํ. “हे सक्क! जिस किसी भी कारण से (दूसरों के साथ) संवास होता है, प्रज्ञावान व्यक्ति के लिए मन से अनुकंपा करना अनुचित नहीं है। ‘‘มนสา เจ ปสนฺเนน, ยทญฺญมนุสาสติ; น เตน โหติ สํยุตฺโต, ยานุกมฺปา อนุทฺทยา’’ติ. “यदि कोई प्रसन्न मन से दूसरों को उपदेश देता है, तो वह उस (उपदेश देने की क्रिया) से बंधता नहीं है; क्योंकि वह केवल अनुकंपा और दया के कारण होता है।” ๓. สูจิโลมสุตฺตํ ३. ३. सूचिलोम सुत्त ๒๓๗. เอกํ สมยํ ภควา คยายํ วิหรติ ฏงฺกิตมญฺเจ สูจิโลมสฺส ยกฺขสฺส ภวเน. เตน โข ปน สมเยน ขโร จ ยกฺโข สูจิโลโม [Pg.209] จ ยกฺโข ภควโต อวิทูเร อติกฺกมนฺติ. อถ โข ขโร ยกฺโข สูจิโลมํ ยกฺขํ เอตทโวจ – ‘‘เอโส สมโณ’’ติ! ‘‘เนโส สมโณ, สมณโก เอโส’’. ‘‘ยาว ชานามิ ยทิ วา โส สมโณ ยทิ วา ปน โส สมณโก’’ติ. २३७. एक समय भगवान गया में सूचिलोम यक्ष के भवन में टंकितमंच (पत्थर की चौकी) पर विहार कर रहे थे। उस समय खर यक्ष और सूचिलोम यक्ष भगवान के पास से गुजर रहे थे। तब खर यक्ष ने सूचिलोम यक्ष से कहा— “यह श्रमण है!” (सूचिलोम ने कहा—) “यह श्रमण नहीं है, यह श्रमणक (श्रमण जैसा दिखने वाला) है। मैं तब तक (इसे श्रमण नहीं मानूँगा) जब तक यह जान न लूँ कि यह श्रमण है या श्रमणक।” อถ โข สูจิโลโม ยกฺโข เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควโต กายํ อุปนาเมสิ. อถ โข ภควา กายํ อปนาเมสิ. อถ โข สูจิโลโม ยกฺโข ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ภายสิ มํ สมณา’’ติ? ‘‘น ขฺวาหํ ตํ, อาวุโส, ภายามิ; อปิ จ เต สมฺผสฺโส ปาปโก’’ติ. ‘‘ปญฺหํ ตํ, สมณ ปุจฺฉิสฺสามิ. สเจ เม น พฺยากริสฺสสิ, จิตฺตํ วา เต ขิปิสฺสามิ, หทยํ วา เต ผาเลสฺสามิ, ปาเทสุ วา คเหตฺวา ปารคงฺคาย ขิปิสฺสามี’’ติ. ‘‘น ขฺวาหํ ตํ, อาวุโส, ปสฺสามิ สเทวเก โลเก สมารเก สพฺรหฺมเก สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย, โย เม จิตฺตํ วา ขิเปยฺย หทยํ วา ผาเลยฺย ปาเทสุ วา คเหตฺวา ปารคงฺคาย ขิเปยฺย; อปิ จ ตฺวํ, อาวุโส, ปุจฺฉ ยทา กงฺขสี’’ติ. อถ โข สูจิโลโม ยกฺโข ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – ( ) तब सूचिलोम यक्ष जहाँ भगवान थे, वहाँ गया; पास जाकर उसने अपना शरीर भगवान के शरीर की ओर झुकाया। तब भगवान ने अपना शरीर थोड़ा पीछे हटा लिया। तब सूचिलोम यक्ष ने भगवान से कहा— “श्रमण! क्या तुम मुझसे डरते हो?” (भगवान ने कहा—) “हे आवुस! मैं तुमसे नहीं डरता, किंतु तुम्हारा स्पर्श दुखद (अशुभ) है।” (यक्ष ने कहा—) “श्रमण! मैं तुमसे एक प्रश्न पूछूँगा। यदि तुम मुझे उत्तर नहीं दोगे, तो मैं तुम्हारा चित्त विक्षिप्त कर दूँगा, या तुम्हारा हृदय फाड़ दूँगा, या तुम्हें पैरों से पकड़कर गंगा के उस पार फेंक दूँगा।” (भगवान ने कहा—) “हे आवुस! देवों, मारों और ब्रह्मा सहित इस लोक में, श्रमणों, ब्राह्मणों, देवों और मनुष्यों सहित इस प्रजा में, मैं ऐसे किसी को नहीं देखता जो मेरा चित्त विक्षिप्त कर सके, या मेरा हृदय फाड़ सके, या मुझे पैरों से पकड़कर गंगा के उस पार फेंक सके। फिर भी, हे आवुस! जो तुम चाहते हो, पूछो।” ‘‘ราโค จ โทโส จ กุโตนิทานา,อรตี รตี โลมหํโส กุโตชา; กุโต สมุฏฺฐาย มโนวิตกฺกา,กุมารกา ธงฺกมิโวสฺสชนฺตี’’ติ. “राग और द्वेष का कारण क्या है? अरति, रति और रोमांच कहाँ से उत्पन्न होते हैं? मन के वितर्क कहाँ से उठकर चित्त को वैसे ही उद्वेलित करते हैं जैसे बालक कौवे को पकड़कर छोड़ देते हैं?” ‘‘ราโค จ โทโส จ อิโตนิทานา,อรตี รตี โลมหํโส อิโตชา; อิโต สมุฏฺฐาย มโนวิตกฺกา,กุมารกา ธงฺกมิโวสฺสชนฺติ. “राग और द्वेष इसी (शरीर) से उत्पन्न होते हैं। अरति, रति और रोमांच इसी से उत्पन्न होते हैं। मन के वितर्क यहीं से उठकर चित्त को वैसे ही उद्वेलित करते हैं जैसे बालक कौवे को पकड़कर छोड़ देते हैं। ‘‘สฺเนหชา อตฺตสมฺภูตา, นิคฺโรธสฺเสว ขนฺธชา; ปุถู วิสตฺตา กาเมสุ, มาลุวาว วิตตา วเน. “ये स्नेह (तृष्णा) से उत्पन्न होते हैं, स्वयं से पैदा होते हैं, जैसे बरगद के तने से जटाएँ निकलती हैं। ये काम-भोगों में वैसे ही फैले हुए हैं जैसे जंगल में मालुवा लता वृक्ष को चारों ओर से घेर लेती है। ‘‘เย [Pg.210] นํ ปชานนฺติ ยโตนิทานํ,เต นํ วิโนเทนฺติ สุโณหิ ยกฺข; เต ทุตฺตรํ โอฆมิมํ ตรนฺติ,อติณฺณปุพฺพํ อปุนพฺภวายา’’ติ. “हे यक्ष! सुनो, जो लोग इसके मूल कारण को जान लेते हैं, वे इसे दूर कर देते हैं। वे इस दुस्तर ओघ (संसार सागर) को पार कर जाते हैं, जिसे पहले कभी पार नहीं किया गया था, ताकि फिर से जन्म न लेना पड़े।” ๔. มณิภทฺทสุตฺตํ ४. ४. मणिभद्र सुत्त ๒๓๘. เอกํ สมยํ ภควา มคเธสุ วิหรติ มณิมาลิเก เจติเย มณิภทฺทสฺส ยกฺขสฺส ภวเน. อถ โข มณิภทฺโท ยกฺโข เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – २३८. एक समय भगवान मगध देश में मणिमालिक चैत्य में मणिभद्र यक्ष के भवन में विहार कर रहे थे। तब मणिभद्र यक्ष जहाँ भगवान थे, वहाँ गया; पास जाकर उसने भगवान के सम्मुख यह गाथा कही— ‘‘สตีมโต สทา ภทฺทํ, สติมา สุขเมธติ; สตีมโต สุเว เสยฺโย, เวรา จ ปริมุจฺจตี’’ติ. “स्मृतिवान का सदा कल्याण होता है, स्मृतिवान सुख प्राप्त करता है। स्मृतिवान के लिए भविष्य श्रेष्ठ होता है और वह वैर से मुक्त हो जाता है।” ‘‘สตีมโต สทา ภทฺทํ, สติมา สุขเมธติ; สตีมโต สุเว เสยฺโย, เวรา น ปริมุจฺจติ. “स्मृतिवान का सदा कल्याण होता है, स्मृतिवान सुख प्राप्त करता है। स्मृतिवान के लिए भविष्य श्रेष्ठ होता है, (किंतु) वह वैर से मुक्त नहीं होता। ‘‘ยสฺส สพฺพมโหรตฺตํ, อหึสาย รโต มโน; เมตฺตํ โส สพฺพภูเตสุ, เวรํ ตสฺส น เกนจี’’ติ. “जिसका मन दिन-रात अहिंसा में लगा रहता है और जो सभी प्राणियों के प्रति मैत्री भाव रखता है, उसका किसी के साथ वैर नहीं होता।” ๕. สานุสุตฺตํ ५. ५. सानु सुत्त ๒๓๙. เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. เตน โข ปน สมเยน อญฺญตริสฺสา อุปาสิกาย สานุ นาม ปุตฺโต ยกฺเขน คหิโต โหติ. อถ โข สา อุปาสิกา ปริเทวมานา ตายํ เวลายํ อิมา คาถาโย อภาสิ – २३९. एक समय भगवान सावत्थी में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे। उस समय सानु नामक एक उपासिका के पुत्र को एक यक्ष ने पकड़ लिया (आविष्ट कर लिया) था। तब वह उपासिका विलाप करती हुई उस समय ये गाथाएँ बोली— ‘‘จาตุทฺทสึ ปญฺจทสึ, ยา จ ปกฺขสฺส อฏฺฐมี; ปาฏิหาริยปกฺขญฺจ, อฏฺฐงฺคสุสมาคตํ. "पक्ष की चतुर्दशी, पञ्चदशी और जो अष्टमी है, तथा जो प्रातिहार्य पक्ष है, उसमें आठ अंगों से भली-भाँति युक्त— ‘‘อุโปสถํ อุปวสนฺติ, พฺรหฺมจริยํ จรนฺติ เย; น เตหิ ยกฺขา กีฬนฺติ, อิติ เม อรหตํ สุตํ; สา ทานิ อชฺช ปสฺสามิ, ยกฺขา กีฬนฺติ สานุนา’’ติ. —जो उपोसथ का पालन करते हैं और ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, यक्ष उनके साथ क्रीड़ा (तंग) नहीं करते—ऐसा मैंने अर्हतों से सुना है। आज मैं साक्षात् देख रही हूँ कि यक्ष सानु के साथ क्रीड़ा कर रहे हैं (उसे कष्ट दे रहे हैं)।" ‘‘จาตุทฺทสึ [Pg.211] ปญฺจทสึ, ยา จ ปกฺขสฺส อฏฺฐมี; ปาฏิหาริยปกฺขญฺจ, อฏฺฐงฺคสุสมาคตํ; อุโปสถํ อุปวสนฺติ, พฺรหฺมจริยํ จรนฺติ เย. "पक्ष की चतुर्दशी, पञ्चदशी और जो अष्टमी है, तथा जो प्रातिहार्य पक्ष है, उसमें आठ अंगों से भली-भाँति युक्त उपोसथ का जो पालन करते हैं और ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं। ‘‘น เตหิ ยกฺขา กีฬนฺติ, สาหุ เต อรหตํ สุตํ; สานุํ ปพุทฺธํ วชฺชาสิ, ยกฺขานํ วจนํ อิทํ; มากาสิ ปาปกํ กมฺมํ, อาวิ วา ยทิ วา รโห. यक्ष उनके साथ क्रीड़ा नहीं करते—अर्हतों से सुना हुआ तुम्हारा यह वचन सत्य है। जागे हुए सानु से यक्षों का यह वचन कहना—'चाहे प्रकट रूप में हो या एकांत में, कोई पाप कर्म मत करो। ‘‘สเจ จ ปาปกํ กมฺมํ, กริสฺสสิ กโรสิ วา; น เต ทุกฺขา ปมุตฺยตฺถิ, อุปฺปจฺจาปิ ปลายโต’’ติ. यदि तुम पाप कर्म करोगे या कर रहे हो, तो दुःख से तुम्हारी मुक्ति नहीं है, चाहे तुम आकाश में उड़कर ही क्यों न भाग जाओ।'" ‘‘มตํ วา อมฺม โรทนฺติ, โย วา ชีวํ น ทิสฺสติ; ชีวนฺตํ อมฺม ปสฺสนฺตี, กสฺมา มํ อมฺม โรทสี’’ติ. "माँ! लोग या तो मरे हुए के लिए रोते हैं, या उसके लिए जो जीवित दिखाई नहीं देता। माँ! मुझे जीवित देखते हुए भी तुम मेरे लिए क्यों रो रही हो?" ‘‘มตํ วา ปุตฺต โรทนฺติ, โย วา ชีวํ น ทิสฺสติ; โย จ กาเม จชิตฺวาน, ปุนราคจฺฉเต อิธ; ตํ วาปิ ปุตฺต โรทนฺติ, ปุน ชีวํ มโต หิ โส. "पुत्र! लोग या तो मरे हुए के लिए रोते हैं, या उसके लिए जो जीवित दिखाई नहीं देता। और जो काम-भोगों को त्याग कर पुनः यहाँ (गृहस्थ जीवन में) लौट आता है, पुत्र! उसके लिए भी लोग रोते हैं, क्योंकि वह पुनः जीवित होते हुए भी मरे हुए के समान है। ‘‘กุกฺกุฬา อุพฺภโต ตาต, กุกฺกุฬํ ปติตุมิจฺฉสิ; นรกา อุพฺภโต ตาต, นรกํ ปติตุมิจฺฉสิ. तात! तुम अंगारों (गृहस्थ जीवन) से निकलकर पुनः अंगारों में गिरना चाहते हो। तात! तुम नरक से निकलकर पुनः नरक में गिरना चाहते हो। ‘‘อภิธาวถ ภทฺทนฺเต, กสฺส อุชฺฌาปยามเส; อาทิตฺตา นีหตํ ภณฺฑํ, ปุน ฑยฺหิตุมิจฺฉสี’’ติ. दौड़ो (धर्म की ओर), तुम्हारा कल्याण हो! हम किससे शिकायत करें? जलते हुए घर से निकाले गए सामान को तुम पुनः जलाना चाहते हो।" ๖. ปิยงฺกรสุตฺตํ ६. पियङ्कर सुत्त ๒๔๐. เอกํ สมยํ อายสฺมา อนุรุทฺโธ สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา อนุรุทฺโธ รตฺติยา ปจฺจูสสมยํ ปจฺจุฏฺฐาย ธมฺมปทานิ ภาสติ. อถ โข ปิยงฺกรมาตา ยกฺขินี ปุตฺตกํ เอวํ โตเสสิ – २४०. एक समय आयुष्मान् अनुरुद्ध सावत्थी में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान् अनुरुद्ध रात्रि के प्रत्युष काल (भोर) में उठकर धम्मपद की गाथाओं का पाठ कर रहे थे। तब पियङ्कर-माता यक्षिणी ने अपने पुत्र को इस प्रकार शांत किया— ‘‘มา สทฺทํ กริ ปิยงฺกร, ภิกฺขุ ธมฺมปทานิ ภาสติ; อปิ จ ธมฺมปทํ วิชานิย, ปฏิปชฺเชม หิตาย โน สิยา. "पियङ्कर! शोर मत करो, भिक्षु धम्मपद की गाथाएँ पढ़ रहे हैं। धम्मपद को जानकर यदि हम उसका पालन करें, तो वह हमारे हित के लिए होगा। ‘‘ปาเณสุ จ สํยมามเส, สมฺปชานมุสา น ภณามเส; สิกฺเขม สุสีลฺยมตฺตโน, อปิ มุจฺเจม ปิสาจโยนิยา’’ติ. हम प्राणियों के प्रति संयम रखें, जानबूझकर झूठ न बोलें, अपने सदाचार की शिक्षा ग्रहण करें, तो शायद हम पिशाच-योनि से मुक्त हो जाएँ।" ๗. ปุนพฺพสุสุตฺตํ ७. पुनब्बसु सुत्त ๒๔๑. เอกํ [Pg.212] สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. เตน โข ปน สมเยน ภควา ภิกฺขู นิพฺพานปฏิสํยุตฺตาย ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสติ สมาทเปติ สมุตฺเตเชติ สมฺปหํเสติ. เต จ ภิกฺขู อฏฺฐึ กตฺวา มนสิ กตฺวา สพฺพเจตสา สมนฺนาหริตฺวา โอหิตโสตา ธมฺมํ สุณนฺติ. อถ โข ปุนพฺพสุมาตา ยกฺขินี ปุตฺตเก เอวํ โตเสสิ – २४१. एक समय भगवान सावत्थी में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे। उस समय भगवान भिक्षुओं को निर्वाण से संबंधित धार्मिक कथा द्वारा उपदेश दे रहे थे, समाहित कर रहे थे, उत्साहित कर रहे थे और प्रसन्न कर रहे थे। वे भिक्षु भी आदरपूर्वक, मन लगाकर, एकाग्र चित्त होकर और कान लगाकर धम्म सुन रहे थे। तब पुनब्बसु-माता यक्षिणी ने अपने बच्चों को इस प्रकार शांत किया— ‘‘ตุณฺหี อุตฺตริเก โหหิ, ตุณฺหี โหหิ ปุนพฺพสุ; ยาวาหํ พุทฺธเสฏฺฐสฺส, ธมฺมํ โสสฺสามิ สตฺถุโน. "उत्तरिके! चुप रहो। पुनब्बसु! तुम भी चुप रहो। जब तक मैं शास्ता, बुद्धों में श्रेष्ठ, के धम्म को सुन रही हूँ। ‘‘นิพฺพานํ ภควา อาห, สพฺพคนฺถปฺปโมจนํ; อติเวลา จ เม โหติ, อสฺมึ ธมฺเม ปิยายนา. भगवान ने निर्वाण को सभी बंधनों से मुक्ति बताया है। इस धम्म के प्रति मेरा प्रेम असीम है। ‘‘ปิโย โลเก สโก ปุตฺโต, ปิโย โลเก สโก ปติ; ตโต ปิยตรา มยฺหํ, อสฺส ธมฺมสฺส มคฺคนา. लोक में अपना पुत्र प्रिय होता है, लोक में अपना पति प्रिय होता है; किंतु मुझे इस धम्म की खोज (श्रवण) उनसे भी अधिक प्रिय है। ‘‘น หิ ปุตฺโต ปติ วาปิ, ปิโย ทุกฺขา ปโมจเย; ยถา สทฺธมฺมสฺสวนํ, ทุกฺขา โมเจติ ปาณินํ. न तो पुत्र और न ही पति दुःख से मुक्त कर सकता है, जैसा कि सद्धम्म का श्रवण प्राणियों को दुःख से मुक्त करता है। ‘‘โลเก ทุกฺขปเรตสฺมึ, ชรามรณสํยุเต; ชรามรณโมกฺขาย, ยํ ธมฺมํ อภิสมฺพุธํ; ตํ ธมฺมํ โสตุมิจฺฉามิ, ตุณฺหี โหหิ ปุนพฺพสู’’ติ. दुःख से पीड़ित और जरा-मरण से युक्त इस लोक में, जरा-मरण से मुक्ति के लिए भगवान ने जिस धम्म का साक्षात्कार किया है, मैं उस धम्म को सुनना चाहती हूँ। पुनब्बसु! चुप रहो।" ‘‘อมฺมา น พฺยาหริสฺสามิ, ตุณฺหีภูตายมุตฺตรา; ธมฺมเมว นิสาเมหิ, สทฺธมฺมสฺสวนํ สุขํ; สทฺธมฺมสฺส อนญฺญาย, อมฺมา ทุกฺขํ จรามเส. "माँ! मैं नहीं बोलूँगा, उत्तरा भी चुप है। आप धम्म को ही मन में धारण करें, सद्धम्म का श्रवण सुखद है। माँ! सद्धम्म को न जानने के कारण ही हम दुःख में भटक रहे हैं। ‘‘เอส เทวมนุสฺสานํ, สมฺมูฬฺหานํ ปภงฺกโร; พุทฺโธ อนฺติมสารีโร, ธมฺมํ เทเสติ จกฺขุมา’’ติ. ये बुद्ध, जो मोहग्रस्त देवों और मनुष्यों के लिए प्रकाश करने वाले हैं, अपने अंतिम शरीर में हैं, वे चक्षुष्मान् धम्म का उपदेश दे रहे हैं।" ‘‘สาธุ โข ปณฺฑิโต นาม, ปุตฺโต ชาโต อุเรสโย; ปุตฺโต เม พุทฺธเสฏฺฐสฺส, ธมฺมํ สุทฺธํ ปิยายติ. "मेरे गर्भ से जन्मा पुत्र वास्तव में बुद्धिमान और श्रेष्ठ है। मेरा पुत्र बुद्धों में श्रेष्ठ के निर्मल धम्म से प्रेम करता है। ‘‘ปุนพฺพสุ สุขี โหหิ, อชฺชาหมฺหิ สมุคฺคตา; ทิฏฺฐานิ อริยสจฺจานิ, อุตฺตราปิ สุณาตุ เม’’ติ. पुनब्बसु! सुखी होओ, आज मैं (संसार चक्र से) ऊपर उठ गई हूँ। आर्य सत्यों का दर्शन हो गया है, उत्तरा भी मेरी बात सुने।" ๘. สุทตฺตสุตฺตํ ८. सुदत्त सुत्त ๒๔๒. เอกํ [Pg.213] สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ สีตวเน. เตน โข ปน สมเยน อนาถปิณฺฑิโก คหปติ ราชคหํ อนุปฺปตฺโต โหติ เกนจิเทว กรณีเยน. อสฺโสสิ โข อนาถปิณฺฑิโก คหปติ – ‘‘พุทฺโธ กิร โลเก อุปฺปนฺโน’’ติ. ตาวเทว จ ปน ภควนฺตํ ทสฺสนาย อุปสงฺกมิตุกาโม โหติ. อถสฺส อนาถปิณฺฑิกสฺส คหปติสฺส เอตทโหสิ – ‘‘อกาโล โข อชฺช ภควนฺตํ ทสฺสนาย อุปสงฺกมิตุํ. สฺเว ทานาหํ กาเลน ภควนฺตํ ทสฺสนาย คมิสฺสามี’’ติ พุทฺธคตาย สติยา นิปชฺชิ. รตฺติยา สุทํ ติกฺขตฺตุํ วุฏฺฐาสิ ปภาตนฺติ มญฺญมาโน. อถ โข อนาถปิณฺฑิโก คหปติ เยน สิวถิกทฺวารํ เตนุปสงฺกมิ. อมนุสฺสา ทฺวารํ วิวรึสุ. อถ โข อนาถปิณฺฑิกสฺส คหปติสฺส นครมฺหา นิกฺขมนฺตสฺส อาโลโก อนฺตรธายิ, อนฺธกาโร ปาตุรโหสิ, ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํโส อุทปาทิ, ตโตว ปุน นิวตฺติตุกาโม อโหสิ. อถ โข สิวโก ยกฺโข อนฺตรหิโต สทฺทมนุสฺสาเวสิ – २४२. एक समय भगवान राजगृह के शीतवन में विहार कर रहे थे। उस समय अनाथपिण्डिक गृहपति किसी कार्यवश राजगृह आया हुआ था। अनाथपिण्डिक गृहपति ने सुना—"लोक में बुद्ध उत्पन्न हुए हैं।" वह उसी क्षण भगवान के दर्शन के लिए जाना चाहता था। तब अनाथपिण्डिक गृहपति को यह विचार आया—"आज भगवान के दर्शन के लिए जाने का समय नहीं है। कल मैं समय पर भगवान के दर्शन के लिए जाऊँगा।" वह बुद्ध-विषयक स्मृति के साथ सो गया। रात्रि में वह तीन बार यह सोचकर उठा कि भोर हो गई है। तब अनाथपिण्डिक गृहपति जहाँ श्मशान का द्वार था, वहाँ पहुँचा। अमनुष्यों (यक्षों) ने द्वार खोल दिया। जब अनाथपिण्डिक गृहपति नगर से बाहर निकल रहा था, तब प्रकाश ओझल हो गया और अंधकार छा गया। उसे भय, घबराहट और रोमांच (रोंगटे खड़े होना) हुआ, जिससे वह वहीं से वापस लौट जाना चाहता था। तब शिवक नामक यक्ष ने अदृश्य रहकर यह शब्द सुनाया— ‘‘สตํ หตฺถี สตํ อสฺสา, สตํ อสฺสตรีรถา; สตํ กญฺญาสหสฺสานิ, อามุกฺกมณิกุณฺฑลา; เอกสฺส ปทวีติหารสฺส, กลํ นาคฺฆนฺติ โสฬสึ. "एक लाख हाथी, एक लाख घोड़े, एक लाख खच्चरों वाले रथ और मणियों के कुंडल पहने हुए एक लाख कन्याएँ—(बुद्ध की ओर बढ़ाए गए) एक कदम के सोलहवें भाग के बराबर भी मूल्यवान नहीं हैं।" ‘‘อภิกฺกม คหปติ, อภิกฺกม คหปติ; อภิกฺกมนํ เต เสยฺโย, โน ปฏิกฺกมน’’นฺติ. “आगे बढ़ो गृहपति, आगे बढ़ो गृहपति; तुम्हारा आगे बढ़ना ही श्रेयस्कर है, पीछे हटना नहीं।” อถ โข อนาถปิณฺฑิกสฺส คหปติสฺส อนฺธกาโร อนฺตรธายิ, อาโลโก ปาตุรโหสิ, ยํ อโหสิ ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํโส, โส ปฏิปฺปสฺสมฺภิ. ทุติยมฺปิ โข อนาถปิณฺฑิกสฺส คหปติสฺส อาโลโก อนฺตรธายิ, อนฺธกาโร ปาตุรโหสิ, ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํโส อุทปาทิ, ตโตว ปุน นิวตฺติตุกาโม อโหสิ. ทุติยมฺปิ โข สิวโก ยกฺโข อนฺตรหิโต สทฺทมนุสฺสาเวสิ – तब अनाथपिण्डिक गृहपति के लिए अंधकार अंतर्धान हो गया और प्रकाश प्रकट हुआ; जो भय, जड़ता और रोमांच (रोंगटे खड़े होना) था, वह शांत हो गया। दूसरी बार भी अनाथपिण्डिक गृहपति के लिए प्रकाश अंतर्धान हो गया और अंधकार प्रकट हुआ; भय, जड़ता और रोमांच उत्पन्न हुआ, और वह वहीं से पुनः लौट जाना चाहता था। दूसरी बार भी शिवक यक्ष ने अदृश्य रहते हुए यह शब्द सुनाया— ‘‘สตํ [Pg.214] หตฺถี สตํ อสฺสา…เป…กลํ นาคฺฆนฺติ โสฬสึ. “सौ हाथी, सौ घोड़े... (इत्यादि), एक कदम आगे बढ़ने के फल के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं हैं।” ‘‘อภิกฺกม คหปติ, อภิกฺกม คหปติ; อภิกฺกมนํ เต เสยฺโย, โน ปฏิกฺกมน’’นฺติ. “आगे बढ़ो गृहपति, आगे बढ़ो गृहपति; तुम्हारा आगे बढ़ना ही श्रेयस्कर है, पीछे हटना नहीं।” อถ โข อนาถปิณฺฑิกสฺส คหปติสฺส อนฺธกาโร อนฺตรธายิ, อาโลโก ปาตุรโหสิ, ยํ อโหสิ ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํโส, โส ปฏิปฺปสฺสมฺภิ. ตติยมฺปิ โข อนาถปิณฺฑิกสฺส คหปติสฺส อาโลโก อนฺตรธายิ, อนฺธกาโร ปาตุรโหสิ, ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํโส อุทปาทิ, ตโตว ปุน นิวตฺติตุกาโม อโหสิ. ตติยมฺปิ โข สิวโก ยกฺโข อนฺตรหิโต สทฺทมนุสฺสาเวสิ – तब अनाथपिण्डिक गृहपति के लिए अंधकार अंतर्धान हो गया और प्रकाश प्रकट हुआ; जो भय, जड़ता और रोमांच था, वह शांत हो गया। तीसरी बार भी अनाथपिण्डिक गृहपति के लिए प्रकाश अंतर्धान हो गया और अंधकार प्रकट हुआ; भय, जड़ता और रोमांच उत्पन्न हुआ, और वह वहीं से पुनः लौट जाना चाहता था। तीसरी बार भी शिवक यक्ष ने अदृश्य रहते हुए यह शब्द सुनाया— ‘‘สตํ หตฺถี สตํ อสฺสา…เป…กลํ นาคฺฆนฺติ โสฬสึ. “सौ हाथी, सौ घोड़े... (इत्यादि), एक कदम आगे बढ़ने के फल के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं हैं।” ‘‘อภิกฺกม คหปติ, อภิกฺกม คหปติ; อภิกฺกมนํ เต เสยฺโย, โน ปฏิกฺกมน’’นฺติ. “आगे बढ़ो गृहपति, आगे बढ़ो गृहपति; तुम्हारा आगे बढ़ना ही श्रेयस्कर है, पीछे हटना नहीं।” อถ โข อนาถปิณฺฑิกสฺส คหปติสฺส อนฺธกาโร อนฺตรธายิ, อาโลโก ปาตุรโหสิ, ยํ อโหสิ ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํโส, โส ปฏิปฺปสฺสมฺภิ. อถ โข อนาถปิณฺฑิโก คหปติ เยน สีตวนํ เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ. तब अनाथपिण्डिक गृहपति के लिए अंधकार अंतर्धान हो गया और प्रकाश प्रकट हुआ; जो भय, जड़ता और रोमांच था, वह शांत हो गया। तब अनाथपिण्डिक गृहपति जहाँ शीतवन था और जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा। เตน โข ปน สมเยน ภควา รตฺติยา ปจฺจูสสมยํ ปจฺจุฏฺฐาย อพฺโภกาเส จงฺกมติ. อทฺทสา โข ภควา อนาถปิณฺฑิกํ คหปตึ ทูรโตว อาคจฺฉนฺตํ. ทิสฺวาน จงฺกมา โอโรหิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. นิสชฺช โข ภควา อนาถปิณฺฑิกํ คหปตึ เอตทโวจ – ‘‘เอหิ สุทตฺตา’’ติ. อถ โข อนาถปิณฺฑิโก คหปติ, นาเมน มํ ภควา อาลปตีติ, หฏฺโฐ อุทคฺโค ตตฺเถว ภควโต ปาเทสุ สิรสา นิปติตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กจฺจิ, ภนฺเต, ภควา สุขมสยิตฺถา’’ติ? उस समय भगवान रात्रि के प्रत्युष काल (भोर) में उठकर खुले आकाश के नीचे चंक्रमण कर रहे थे। भगवान ने अनाथपिण्डिक गृहपति को दूर से ही आते देखा। देखकर चंक्रमण से उतरकर बिछाए हुए आसन पर बैठ गए। बैठकर भगवान ने अनाथपिण्डिक गृहपति से यह कहा— "आओ सुदत्त!" तब अनाथपिण्डिक गृहपति यह सोचकर कि 'भगवान मुझे नाम से पुकार रहे हैं', हर्षित और प्रफुल्लित होकर वहीं भगवान के चरणों में सिर झुकाकर वंदना की और भगवान से यह कहा— "भन्ते! क्या भगवान सुखपूर्वक सोए?" ‘‘สพฺพทา เว สุขํ เสติ, พฺราหฺมโณ ปรินิพฺพุโต; โย น ลิมฺปติ กาเมสุ, สีติภูโต นิรูปธิ. “जो काम-भोगों में लिप्त नहीं होता, जो शीतल (शांत) हो गया है और उपाधि-रहित है, वह परिनिर्वृत ब्राह्मण (ज्ञानी) सदैव सुखपूर्वक सोता है। ‘‘สพฺพา อาสตฺติโย เฉตฺวา, วิเนยฺย หทเย ทรํ; อุปสนฺโต สุขํ เสติ, สนฺตึ ปปฺปุยฺย เจตสา’’ติ. सभी आसक्तियों को काटकर, हृदय की जलन (पीड़ा) को दूर कर, चित्त से शांति प्राप्त कर वह उपशांत पुरुष सुखपूर्वक सोता है।” ๙. ปฐมสุกฺกาสุตฺตํ ९. प्रथम सुक्का सुत्त ๒๔๓. เอกํ [Pg.215] สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. เตน โข ปน สมเยน สุกฺกา ภิกฺขุนี มหติยา ปริสาย ปริวุตา ธมฺมํ เทเสติ. อถ โข สุกฺกาย ภิกฺขุนิยา อภิปฺปสนฺโน ยกฺโข ราชคเห รถิกาย รถิกํ สิงฺฆาฏเกน สิงฺฆาฏกํ อุปสงฺกมิตฺวา ตายํ เวลายํ อิมา คาถาโย อภาสิ – २४३. एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दक-निवाप में विहार कर रहे थे। उस समय सुक्का भिक्षुणी एक बड़ी परिषद से घिरी हुई धर्म-देशना दे रही थी। तब सुक्का भिक्षुणी पर अत्यंत प्रसन्न एक यक्ष ने राजगृह में एक गली से दूसरी गली और एक चौराहे से दूसरे चौराहे पर जाकर उस समय ये गाथाएं कहीं— ‘‘กึ เม กตา ราชคเห มนุสฺสา, มธุปีตาว เสยเร; เย สุกฺกํ น ปยิรุปาสนฺติ, เทเสนฺตึ อมตํ ปทํ. “राजगृह के इन मनुष्यों को क्या हो गया है, जो मधु (मदिरा) पिए हुए के समान सो रहे हैं? जो अमृत पद (निर्वाण) का उपदेश देने वाली सुक्का की सेवा (सत्संग) नहीं करते। ‘‘ตญฺจ ปน อปฺปฏิวานียํ, อเสจนกโมชวํ; ปิวนฺติ มญฺเญ สปฺปญฺญา, วลาหกมิว ปนฺถคู’’ติ. उस अतृप्तिकर (जिससे मन न भरे) और अकृत्रिम ओजस्वी धर्म को बुद्धिमान लोग वैसे ही पीते हैं, जैसे पथिक बादलों से बरसते जल को पीते हैं।” ๑๐. ทุติยสุกฺกาสุตฺตํ १०. द्वितीय सुक्का सुत्त ๒๔๔. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. เตน โข ปน สมเยน อญฺญตโร อุปาสโก สุกฺกาย ภิกฺขุนิยา โภชนํ อทาสิ. อถ โข สุกฺกาย ภิกฺขุนิยา อภิปฺปสนฺโน ยกฺโข ราชคเห รถิกาย รถิกํ สิงฺฆาฏเกน สิงฺฆาฏกํ อุปสงฺกมิตฺวา ตายํ เวลายํ อิมํ คาถํ อภาสิ – २४४. एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दक-निवाप में विहार कर रहे थे। उस समय किसी उपासक ने सुक्का भिक्षुणी को भोजन दान दिया। तब सुक्का भिक्षुणी पर अत्यंत प्रसन्न एक यक्ष ने राजगृह में एक गली से दूसरी गली और एक चौराहे से दूसरे चौराहे पर जाकर उस समय यह गाथा कही— ‘‘ปุญฺญํ วต ปสวิ พหุํ, สปฺปญฺโญ วตายํ อุปาสโก; โย สุกฺกาย อทาสิ โภชนํ, สพฺพคนฺเถหิ วิปฺปมุตฺติยา’’ติ. “निश्चित ही इस बुद्धिमान उपासक ने बहुत पुण्य अर्जित किया है, जिसने सभी ग्रंथियों (बंधनों) से विमुक्ति के लिए सुक्का को भोजन दान दिया है।” ๑๑. จีราสุตฺตํ ११. चीरा सुत्त ๒๔๕. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. เตน โข ปน สมเยน อญฺญตโร อุปาสโก จีราย ภิกฺขุนิยา จีวรํ อทาสิ. อถ โข จีราย ภิกฺขุนิยา อภิปฺปสนฺโน ยกฺโข ราชคเห รถิกาย รถิกํ สิงฺฆาฏเกน สิงฺฆาฏกํ อุปสงฺกมิตฺวา ตายํ เวลายํ อิมํ คาถํ อภาสิ – २४५. ऐसा मैंने सुना—एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दक-निवाप में विहार कर रहे थे। उस समय किसी उपासक ने चीरा भिक्षुणी को चीवर दान दिया। तब चीरा भिक्षुणी पर अत्यंत प्रसन्न एक यक्ष ने राजगृह में एक गली से दूसरी गली और एक चौराहे से दूसरे चौराहे पर जाकर उस समय यह गाथा कही— ‘‘ปุญฺญํ [Pg.216] วต ปสวิ พหุํ, สปฺปญฺโญ วตายํ อุปาสโก; โย จีราย อทาสิ จีวรํ, สพฺพโยเคหิ วิปฺปมุตฺติยา’’ติ. “निश्चित ही इस बुद्धिमान उपासक ने बहुत पुण्य अर्जित किया है, जिसने सभी योगों (बंधनों) से विमुक्ति के लिए चीरा को चीवर दान दिया है।” ๑๒. อาฬวกสุตฺตํ १२. आलवक सुत्त ๒๔๖. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา อาฬวิยํ วิหรติ อาฬวกสฺส ยกฺขสฺส ภวเน. อถ โข อาฬวโก ยกฺโข เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘นิกฺขม, สมณา’’ติ. ‘‘สาธาวุโส’’ติ ภควา นิกฺขมิ. ‘‘ปวิส, สมณา’’ติ. ‘‘สาธาวุโส’’ติ ภควา ปาวิสิ. ทุติยมฺปิ โข อาฬวโก ยกฺโข ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘นิกฺขม, สมณา’’ติ. ‘‘สาธาวุโส’’ติ ภควา นิกฺขมิ. ‘‘ปวิส, สมณา’’ติ. ‘‘สาธาวุโส’’ติ ภควา ปาวิสิ. ตติยมฺปิ โข อาฬวโก ยกฺโข ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘นิกฺขม, สมณา’’ติ. ‘‘สาธาวุโส’’ติ ภควา นิกฺขมิ. ‘‘ปวิส, สมณา’’ติ. ‘‘สาธาวุโส’’ติ ภควา ปาวิสิ. จตุตฺถมฺปิ โข อาฬวโก ยกฺโข ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘นิกฺขม, สมณา’’ติ. ‘‘น ขฺวาหํ ตํ, อาวุโส, นิกฺขมิสฺสามิ. ยํ เต กรณียํ ตํ กโรหี’’ติ. ‘‘ปญฺหํ ตํ, สมณ, ปุจฺฉิสฺสามิ. สเจ เม น พฺยากริสฺสสิ, จิตฺตํ วา เต ขิปิสฺสามิ, หทยํ วา เต ผาเลสฺสามิ, ปาเทสุ วา คเหตฺวา ปารคงฺคาย ขิปิสฺสามี’’ติ. ‘‘น ขฺวาหํ ตํ, อาวุโส, ปสฺสามิ สเทวเก โลเก สมารเก สพฺรหฺมเก สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย, เย เม จิตฺตํ วา ขิเปยฺย หทยํ วา ผาเลยฺย, ปาเทสุ วา คเหตฺวา ปารคงฺคาย ขิเปยฺย. อปิ จ ตฺวํ, อาวุโส, ปุจฺฉ ยทา กงฺขสี’’ติ. २४६. ऐसा मैंने सुना—एक समय भगवान आलवी में आलवक यक्ष के भवन में विहार कर रहे थे। तब आलवक यक्ष जहाँ भगवान थे, वहाँ आया; आकर भगवान से यह बोला— 'हे श्रमण, बाहर निकलो।' भगवान ने 'ठीक है, मित्र' कहकर बाहर प्रस्थान किया। 'हे श्रमण, भीतर आओ।' भगवान ने 'ठीक है, मित्र' कहकर भीतर प्रवेश किया। दूसरी बार भी आलवक यक्ष ने भगवान से यही कहा— 'हे श्रमण, बाहर निकलो।' भगवान ने 'ठीक है, मित्र' कहकर बाहर प्रस्थान किया। 'हे श्रमण, भीतर आओ।' भगवान ने 'ठीक है, मित्र' कहकर भीतर प्रवेश किया। तीसरी बार भी आलवक यक्ष ने भगवान से यही कहा— 'हे श्रमण, बाहर निकलो।' भगवान ने 'ठीक है, मित्र' कहकर बाहर प्रस्थान किया। 'हे श्रमण, भीतर आओ।' भगवान ने 'ठीक है, मित्र' कहकर भीतर प्रवेश किया। चौथी बार भी आलवक यक्ष ने भगवान से यह कहा— 'हे श्रमण, बाहर निकलो।' 'मित्र, मैं अब बाहर नहीं निकलूँगा। तुम्हें जो करना हो, वह करो।' 'हे श्रमण, मैं तुमसे प्रश्न पूछूँगा। यदि तुम मुझे उत्तर नहीं दोगे, तो मैं तुम्हारा चित्त विक्षिप्त कर दूँगा, या तुम्हारा हृदय फाड़ दूँगा, या तुम्हें पैरों से पकड़कर गंगा के पार फेंक दूँगा।' 'मित्र, मैं देवों, मारों और ब्रह्मा सहित इस लोक में, श्रमणों और ब्राह्मणों सहित इस प्रजा में, देवों और मनुष्यों के बीच ऐसा किसी को नहीं देखता जो मेरा चित्त विक्षिप्त कर सके, या हृदय फाड़ सके, या पैरों से पकड़कर गंगा के पार फेंक सके। फिर भी मित्र, जो तुम चाहते हो, पूछो।' ‘‘กึสูธ วิตฺตํ ปุริสสฺส เสฏฺฐํ, กึสุ สุจิณฺณํ สุขมาวหาติ; กึสุ หเว สาทุตรํ รสานํ, กถํชีวึ ชีวิตมาหุ เสฏฺฐ’’นฺติ. 'इस लोक में मनुष्य का श्रेष्ठ धन क्या है? किसका भली-भाँति आचरण करने पर सुख प्राप्त होता है? स्वादों में सबसे मधुर स्वाद क्या है? किस प्रकार का जीवन जीना श्रेष्ठ कहा गया है?' ‘‘สทฺธีธ วิตฺตํ ปุริสฺส เสฏฺฐํ, ธมฺโม สุจิณฺโณ สุขมาวหาติ; สจฺจํ หเว สาทุตรํ รสานํ, ปญฺญาชีวึ ชีวิตมาหุ เสฏฺฐ’’นฺติ. 'इस लोक में मनुष्य का श्रेष्ठ धन श्रद्धा है। धर्म का भली-भाँति आचरण करने पर सुख प्राप्त होता है। सत्य ही स्वादों में सबसे मधुर है। प्रज्ञा (विवेक) से जीना ही श्रेष्ठ जीवन कहा गया है।' ‘‘กถํสุ ตรติ โอฆํ, กถํสุ ตรติ อณฺณวํ; กถํสุ ทุกฺขมจฺเจติ, กถํสุ ปริสุชฺฌตี’’ติ. 'बाढ़ (ओघ) को कैसे पार किया जाता है? सागर को कैसे पार किया जाता है? दुःख से कैसे मुक्त हुआ जाता है? मनुष्य कैसे शुद्ध होता है?' ‘‘สทฺธาย [Pg.217] ตรติ โอฆํ, อปฺปมาเทน อณฺณวํ; วีริเยน ทุกฺขมจฺเจติ, ปญฺญาย ปริสุชฺฌตี’’ติ. 'श्रद्धा से बाढ़ को पार किया जाता है। अप्रमाद (सावधानी) से सागर को पार किया जाता है। वीर्य (पुरुषार्थ) से दुःख से मुक्त हुआ जाता है। प्रज्ञा से मनुष्य शुद्ध होता है।' ‘‘กถํสุ ลภเต ปญฺญํ, กถํสุ วินฺทเต ธนํ; กถํสุ กิตฺตึ ปปฺโปติ, กถํ มิตฺตานิ คนฺถติ; อสฺมา โลกา ปรํ โลกํ, กถํ เปจฺจ น โสจตี’’ติ. 'प्रज्ञा कैसे प्राप्त होती है? धन कैसे मिलता है? कीर्ति कैसे प्राप्त होती है? मित्रों को कैसे जोड़ा जाता है? इस लोक से परलोक जाने पर मनुष्य कैसे शोक नहीं करता?' ‘‘สทฺทหาโน อรหตํ, ธมฺมํ นิพฺพานปตฺติยา; สุสฺสูสํ ลภเต ปญฺญํ, อปฺปมตฺโต วิจกฺขโณ. 'निर्वाण प्राप्ति के लिए अर्हतों के धर्म में श्रद्धा रखने वाला, सावधान और विवेकी मनुष्य, सुनने की इच्छा रखने पर प्रज्ञा प्राप्त करता है। ‘‘ปติรูปการี ธุรวา, อุฏฺฐาตา วินฺทเต ธนํ; สจฺเจน กิตฺตึ ปปฺโปติ, ททํ มิตฺตานิ คนฺถติ; อสฺมา โลกา ปรํ โลกํ, เอวํ เปจฺจ น โสจติ. उपयुक्त कार्य करने वाला, उत्तरदायी और उद्यमी मनुष्य धन प्राप्त करता है। सत्य से कीर्ति प्राप्त होती है। दान देने वाला मित्रों को जोड़ता है। इस प्रकार इस लोक से परलोक जाने पर वह शोक नहीं करता। ‘‘ยสฺเสเต จตุโร ธมฺมา, สทฺธสฺส ฆรเมสิโน; สจฺจํ ทมฺโม ธิติ จาโค, ส เว เปจฺจ น โสจติ. जिस श्रद्धावान गृहस्थ में ये चार धर्म होते हैं—सत्य, दम (इन्द्रिय संयम), धृति (धैर्य) और त्याग, वह परलोक जाने पर शोक नहीं करता। ‘‘อิงฺฆ อญฺเญปิ ปุจฺฉสฺสุ, ปุถู สมณพฺราหฺมเณ; ยทิ สจฺจา ทมฺมา จาคา, ขนฺตฺยา ภิยฺโยธ วิชฺชตี’’ติ. चाहो तो अन्य बहुत से श्रमणों और ब्राह्मणों से भी पूछ लो कि क्या सत्य, दम, त्याग और क्षमा से बढ़कर भी यहाँ कुछ है।' ‘‘กถํ นุ ทานิ ปุจฺเฉยฺยํ, ปุถู สมณพฺราหฺมเณ; โยหํ อชฺช ปชานามิ, โย อตฺโถ สมฺปรายิโก. 'अब मैं भला अन्य बहुत से श्रमणों और ब्राह्मणों से क्यों पूछूँ? आज मैंने जान लिया है कि परलोक के लिए क्या हितकारी है। ‘‘อตฺถาย วต เม พุทฺโธ, วาสายาฬวิมาคมา ; โยหํ อชฺช ปชานามิ, ยตฺถ ทินฺนํ มหปฺผลํ. निश्चित ही भगवान मेरे कल्याण के लिए और यहाँ रहने के लिए आलवी आए। आज मैंने जान लिया है कि कहाँ दिया हुआ दान महाफलदायी होता है। ‘‘โส อหํ วิจริสฺสามิ, คามา คามํ ปุรา ปุรํ; นมสฺสมาโน สมฺพุทฺธํ, ธมฺมสฺส จ สุธมฺมต’’นฺติ. अब मैं गाँव-गाँव और नगर-नगर घूमूँगा, सम्यक सम्बुद्ध को नमस्कार करते हुए और धर्म की उत्तमता का गुणगान करते हुए।' ยกฺขสํยุตฺตํ สมตฺตํ. यक्ष संयुक्त समाप्त। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान)— อินฺทโก สกฺก สูจิ จ, มณิภทฺโท จ สานุ จ; ปิยงฺกร ปุนพฺพสุ สุทตฺโต จ, ทฺเว สุกฺกา จีรอาฬวีติ ทฺวาทส. इन्दक, सक्क, सूचि, मणिभद्र, सानु, पियंकर, पुनब्बसु, सुदत्त, दो सुक्का, चीर और आलवी—ये बारह हैं। ๑๑. สกฺกสํยุตฺตํ ११. सक्क संयुक्त ๑. ปฐมวคฺโค १. प्रथम वर्ग ๑. สุวีรสุตฺตํ १. सुवीर सुत्त ๒๔๗. เอวํ [Pg.218] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ภิกฺขโว’’ติ. ‘‘ภทนฺเต’’ติ เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – २४७. ऐसा मैंने सुना—एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— 'भिक्षुओं!' 'भदन्त!' उन भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने यह कहा— ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, อสุรา เทเว อภิยํสุ. อถ โข, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท สุวีรํ เทวปุตฺตํ อามนฺเตสิ – ‘เอเต, ตาต สุวีร, อสุรา เทเว อภิยนฺติ. คจฺฉ, ตาต สุวีร, อสุเร ปจฺจุยฺยาหี’ติ. ‘เอวํ ภทฺทนฺตวา’ติ โข, ภิกฺขเว, สุวีโร เทวปุตฺโต สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ปมาทํ อาปาเทสิ. ทุติยมฺปิ โข, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท สุวีรํ เทวปุตฺตํ อามนฺเตสิ – ‘เอเต, ตาต สุวีร, อสุรา เทเว อภิยนฺติ. คจฺฉ, ตาต สุวีร, อสุเร ปจฺจุยฺยาหี’ติ. ‘เอวํ ภทฺทนฺตวา’ติ โข, ภิกฺขเว, สุวีโร เทวปุตฺโต สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ทุติยมฺปิ ปมาทํ อาปาเทสิ. ตติยมฺปิ โข, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท สุวีรํ เทวปุตฺตํ อามนฺเตสิ – ‘เอเต, ตาต สุวีร, อสุรา เทเว อภิยนฺติ. คจฺฉ, ตาต สุวีร, อสุเร ปจฺจุยฺยาหี’ติ. ‘เอวํ ภทฺทนฺตวา’ติ โข, ภิกฺขเว, สุวีโร เทวปุตฺโต สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ตติยมฺปิ ปมาทํ อาปาเทสิ. อถ โข, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท สุวีรํ เทวปุตฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – 'भिक्षुओं, प्राचीन काल में असुरों ने देवों पर आक्रमण किया। तब देवराज शक्र ने सुवीर देवपुत्र को बुलाया— "प्रिय सुवीर, ये असुर देवों पर आक्रमण कर रहे हैं। जाओ प्रिय सुवीर, असुरों का सामना करो।" "जो आज्ञा, भदन्त" कहकर सुवीर देवपुत्र ने देवराज शक्र की बात मान ली, किन्तु फिर वह प्रमाद करने लगा। दूसरी बार भी... तीसरी बार भी... तब देवराज शक्र ने सुवीर देवपुत्र से गाथा में कहा— ‘‘อนุฏฺฐหํ อวายามํ, สุขํ ยตฺราธิคจฺฉติ; สุวีร ตตฺถ คจฺฉาหิ, มญฺจ ตตฺเถว ปาปยา’’ติ. "जहाँ बिना उद्योग किए, बिना प्रयास किए सुख प्राप्त होता हो, सुवीर! तुम वहाँ जाओ और मुझे भी वहीं पहुँचा दो।" ‘‘อลสฺวสฺส อนุฏฺฐาตา, น จ กิจฺจานิ การเย; สพฺพกามสมิทฺธสฺส, ตํ เม สกฺก วรํ ทิสา’’ติ. "जो आलसी हो, उद्योगहीन हो, और कोई कार्य न करता हो, फिर भी जिसकी सभी कामनाएँ पूरी होती हों—हे शक्र! मुझे वह श्रेष्ठ स्थान बताएँ।" ‘‘ยตฺถาลโส [Pg.219] อนุฏฺฐาตา, อจฺจนฺตํ สุขเมธติ; สุวีร ตตฺถ คจฺฉาหิ, มญฺจ ตตฺเถว ปาปยา’’ติ. “हे सुवीर! जहाँ आलसी और पुरुषार्थहीन व्यक्ति निश्चित रूप से सुख प्राप्त करता है, तुम वहाँ जाओ और मुझे भी वहीं पहुँचा दो।” ‘‘อกมฺมุนา เทวเสฏฺฐ, สกฺก วินฺเทมุ ยํ สุขํ; อโสกํ อนุปายาสํ, ตํ เม สกฺก วรํ ทิสา’’ติ. “हे देवश्रेष्ठ शक्र! जहाँ बिना किसी कर्म के हम उस सुख को प्राप्त कर सकें जो शोक रहित और क्लेश रहित है, हे शक्र! मुझे उस श्रेष्ठ स्थान का मार्ग बताएँ।” ‘‘สเจ อตฺถิ อกมฺเมน, โกจิ กฺวจิ น ชีวติ; นิพฺพานสฺส หิ โส มคฺโค, สุวีร ตตฺถ คจฺฉาหิ; มญฺจ ตตฺเถว ปาปยา’’ติ. “हे सुवीर! यदि बिना कर्म के कोई भी कहीं जीवित नहीं रहता; यदि ऐसा कोई स्थान है, तो वह निश्चित रूप से निर्वाण का मार्ग है। अतः सुवीर, तुम वहाँ जाओ और मुझे भी वहीं पहुँचा दो।” ‘‘โส หิ นาม, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท สกํ ปุญฺญผลํ อุปชีวมาโน เทวานํ ตาวตึสานํ อิสฺสริยาธิปจฺจํ รชฺชํ กาเรนฺโต อุฏฺฐานวีริยสฺส วณฺณวาที ภวิสฺสติ. อิธ โข ตํ, ภิกฺขเว, โสเภถ, ยํ ตุมฺเห เอวํ สฺวากฺขาเต ธมฺมวินเย ปพฺพชิตา สมานา อุฏฺฐเหยฺยาถ ฆเฏยฺยาถ วายเมยฺยาถ อปฺปตฺตสฺส ปตฺติยา อนธิคตสฺส อธิคมาย, อสจฺฉิกตสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. “भिक्षुओं! वह देवताओं का राजा शक्र, अपने पुण्यों के फल पर जीवित रहते हुए और त्रायस्त्रिंश देवों पर आधिपत्य और राज्य करते हुए भी, पुरुषार्थ और वीर्य की प्रशंसा करने वाला है। भिक्षुओं! इस भली-भाँति उपदिष्ट धर्म और विनय में प्रव्रजित होकर, तुम्हें भी पुरुषार्थ करना चाहिए, प्रयत्न करना चाहिए और उद्योग करना चाहिए ताकि जो प्राप्त नहीं हुआ है उसे प्राप्त किया जा सके, जो अधिगत नहीं हुआ है उसे अधिगत किया जा सके और जिसका साक्षात्कार नहीं हुआ है उसका साक्षात्कार किया जा सके।” ๒. สุสีมสุตฺตํ २. सुसीम सुत्त ๒๔๘. สาวตฺถิยํ. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ภิกฺขโว’’ติ. ‘‘ภทนฺเต’’ติ เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – २४८. श्रावस्ती में। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— “भिक्षुओं!” “भदन्त!” उन भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने यह कहा— ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, อสุรา เทเว อภิยํสุ. อถ โข, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท สุสีมํ เทวปุตฺตํ อามนฺเตสิ – ‘เอเต, ตาต สุสีม, อสุรา เทเว อภิยนฺติ. คจฺฉ, ตาต สุสีม, อสุเร ปจฺจุยฺยาหี’ติ. ‘เอวํ ภทฺทนฺตวา’ติ โข, ภิกฺขเว, สุสีโม เทวปุตฺโต สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ปมาทํ อาปาเทสิ. ทุติยมฺปิ โข, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท สุสีมํ เทวปุตฺตํ อามนฺเตสิ…เป… ทุติยมฺปิ ปมาทํ อาปาเทสิ. ตติยมฺปิ โข, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท สุสีมํ เทวปุตฺตํ อามนฺเตสิ…เป… ตติยมฺปิ ปมาทํ อาปาเทสิ. อถ โข, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท สุสีมํ เทวปุตฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – “भिक्षुओं! प्राचीन काल में असुरों ने देवताओं पर आक्रमण किया। तब देवताओं के राजा शक्र ने सुसीम देवपुत्र को बुलाया और कहा— ‘तात सुसीम! ये असुर देवताओं पर आक्रमण कर रहे हैं। जाओ तात सुसीम, असुरों का सामना करो।’ भिक्षुओं! ‘जो आज्ञा, भदन्त’ कहकर सुसीम देवपुत्र ने शक्र की आज्ञा तो मान ली, पर वह प्रमाद (लापरवाही) में पड़ गया। दूसरी बार भी... तीसरी बार भी सुसीम देवपुत्र प्रमाद में पड़ गया। तब भिक्षुओं, देवताओं के राजा शक्र ने सुसीम देवपुत्र से गाथा में कहा— ‘‘อนุฏฺฐหํ อวายามํ, สุขํ ยตฺราธิคจฺฉติ; สุสีม ตตฺถ คจฺฉาหิ, มญฺจ ตตฺเถว ปาปยา’’ติ. “हे सुसीम! जहाँ बिना पुरुषार्थ और बिना प्रयत्न के सुख प्राप्त होता है, तुम वहाँ जाओ और मुझे भी वहीं पहुँचा दो।” ‘‘อลสฺวสฺส [Pg.220] อนุฏฺฐาตา, น จ กิจฺจานิ การเย; สพฺพกามสมิทฺธสฺส, ตํ เม สกฺก วรํ ทิสา’’ติ. “जहाँ व्यक्ति आलसी और पुरुषार्थहीन हो सके, जहाँ कोई कार्य न करना पड़े और जहाँ सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाएँ, हे शक्र! मुझे उस श्रेष्ठ स्थान का मार्ग बताएँ।” ‘‘ยตฺถาลโส อนุฏฺฐาตา, อจฺจนฺตํ สุขเมธติ; สุสีม ตตฺถ คจฺฉาหิ, มญฺจ ตตฺเถว ปาปยา’’ติ. “हे सुसीम! जहाँ आलसी और पुरुषार्थहीन व्यक्ति निश्चित रूप से सुख प्राप्त करता है, तुम वहाँ जाओ और मुझे भी वहीं पहुँचा दो।” ‘‘อกมฺมุนา เทวเสฏฺฐ, สกฺก วินฺเทมุ ยํ สุขํ; อโสกํ อนุปายาสํ, ตํ เม สกฺก วรํ ทิสา’’ติ. “हे देवश्रेष्ठ शक्र! जहाँ बिना किसी कर्म के हम उस सुख को प्राप्त कर सकें जो शोक रहित और क्लेश रहित है, हे शक्र! मुझे उस श्रेष्ठ स्थान का मार्ग बताएँ।” ‘‘สเจ อตฺถิ อกมฺเมน, โกจิ กฺวจิ น ชีวติ; นิพฺพานสฺส หิ โส มคฺโค, สุสีม ตตฺถ คจฺฉาหิ; มญฺจ ตตฺเถว ปาปยา’’ติ. “हे सुसीम! यदि बिना कर्म के कोई भी कहीं जीवित नहीं रहता; यदि ऐसा कोई स्थान है, तो वह निश्चित रूप से निर्वाण का मार्ग है। अतः सुसीम, तुम वहाँ जाओ और मुझे भी वहीं पहुँचा दो।” ‘‘โส หิ นาม, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท สกํ ปุญฺญผลํ อุปชีวมาโน เทวานํ ตาวตึสานํ อิสฺสริยาธิปจฺจํ รชฺชํ กาเรนฺโต อุฏฺฐานวีริยสฺส วณฺณวาที ภวิสฺสติ. อิธ โข ตํ, ภิกฺขเว, โสเภถ, ยํ ตุมฺเห เอวํ สฺวากฺขาเต ธมฺมวินเย ปพฺพชิตา สมานา อุฏฺฐเหยฺยาถ ฆเฏยฺยาถ วายเมยฺยาถ อปฺปตฺตสฺส ปตฺติยา, อนธิคตสฺส อธิคมาย, อสจฺฉิกตสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ. “भिक्षुओं! वह देवताओं का राजा शक्र, अपने पुण्यों के फल पर जीवित रहते हुए और त्रायस्त्रिंश देवों पर आधिपत्य और राज्य करते हुए भी, पुरुषार्थ और वीर्य की प्रशंसा करने वाला है। भिक्षुओं! इस भली-भाँति उपदिष्ट धर्म और विनय में प्रव्रजित होकर, तुम्हें भी पुरुषार्थ करना चाहिए, प्रयत्न करना चाहिए और उद्योग करना चाहिए ताकि जो प्राप्त नहीं हुआ है उसे प्राप्त किया जा सके, जो अधिगत नहीं हुआ है उसे अधिगत किया जा सके और जिसका साक्षात्कार नहीं हुआ है उसका साक्षात्कार किया जा सके।” ๓. ธชคฺคสุตฺตํ ३. ध्वजग्ग सुत्त (ध्वज-शिखर सुत्त) ๒๔๙. สาวตฺถิยํ. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ภิกฺขโว’’ติ. ‘‘ภทนฺเต’’ติ เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – २४९. श्रावस्ती में। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— “भिक्षुओं!” “भदन्त!” उन भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने यह कहा— ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, เทวาสุรสงฺคาโม สมุปพฺยูฬฺโห อโหสิ. อถ โข, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท เทเว ตาวตึเส อามนฺเตสิ – “भिक्षुओं! प्राचीन काल में देवताओं और असुरों के बीच युद्ध छिड़ा। तब देवताओं के राजा शक्र ने त्रायस्त्रिंश देवों को संबोधित किया— ‘สเจ, มาริสา, เทวานํ สงฺคามคตานํ อุปฺปชฺเชยฺย ภยํ วา ฉมฺภิตตฺตํ วา โลมหํโส วา, มเมว ตสฺมึ สมเย ธชคฺคํ อุลฺโลเกยฺยาถ. มมญฺหิ โว ธชคฺคํ อุลฺโลกยตํ ยํ ภวิสฺสติ ภยํ วา ฉมฺภิตตฺตํ วา โลมหํโส วา, โส ปหียิสฺสติ’. ‘हे मित्रों! यदि युद्ध में गए हुए देवताओं को भय, घबराहट या रोमांच उत्पन्न हो, तो उस समय तुम मेरे ही ध्वज-शिखर को देखना। मेरे ध्वज-शिखर को देखने से तुम्हारा जो भय, घबराहट या रोमांच होगा, वह दूर हो जाएगा। ‘โน เจ เม ธชคฺคํ อุลฺโลเกยฺยาถ, อถ ปชาปติสฺส เทวราชสฺส ธชคฺคํ อุลฺโลเกยฺยาถ. ปชาปติสฺส หิ โว เทวราชสฺส ธชคฺคํ อุลฺโลกยตํ ยํ ภวิสฺสติ ภยํ วา ฉมฺภิตตฺตํ วา โลมหํโส วา, โส ปหียิสฺสติ’. यदि तुम मेरे ध्वज-शिखर को न देख सको, तो देवराज प्रजापति के ध्वज-शिखर को देखना। देवराज प्रजापति के ध्वज-शिखर को देखने से तुम्हारा जो भय, घबराहट या रोमांच होगा, वह दूर हो जाएगा। ‘โน [Pg.221] เจ ปชาปติสฺส เทวราชสฺส ธชคฺคํ อุลฺโลเกยฺยาถ, อถ วรุณสฺส เทวราชสฺส ธชคฺคํ อุลฺโลเกยฺยาถ. วรุณสฺส หิ โว เทวราชสฺส ธชคฺคํ อุลฺโลกยตํ ยํ ภวิสฺสติ ภยํ วา ฉมฺภิตตฺตํ วา โลมหํโส วา, โส ปหียิสฺสติ’. यदि तुम देवराज प्रजापति के ध्वज-शिखर को न देख सको, तो देवराज वरुण के ध्वज-शिखर को देखना। देवराज वरुण के ध्वज-शिखर को देखने से तुम्हारा जो भय, घबराहट या रोमांच होगा, वह दूर हो जाएगा। ‘โน เจ วรุณสฺส เทวราชสฺส ธชคฺคํ อุลฺโลเกยฺยาถ, อถ อีสานสฺส เทวราชสฺส ธชคฺคํ อุลฺโลเกยฺยาถ. อีสานสฺส หิ โว เทวราชสฺส ธชคฺคํ อุลฺโลกยตํ ยํ ภวิสฺสติ ภยํ วา ฉมฺภิตตฺตํ วา โลมหํโส วา, โส ปหียิสฺสตี’’’ติ. यदि तुम देवराज वरुण के ध्वज-शिखर को न देख सको, तो देवराज ईशान के ध्वज-शिखर को देखना। देवराज ईशान के ध्वज-शिखर को देखने से तुम्हारा जो भय, घबराहट या रोमांच होगा, वह दूर हो जाएगा।’”},{ ‘‘ตํ โข ปน, ภิกฺขเว, สกฺกสฺส วา เทวานมินฺทสฺส ธชคฺคํ อุลฺโลกยตํ, ปชาปติสฺส วา เทวราชสฺส ธชคฺคํ อุลฺโลกยตํ, วรุณสฺส วา เทวราชสฺส ธชคฺคํ อุลฺโลกยตํ, อีสานสฺส วา เทวราชสฺส ธชคฺคํ อุลฺโลกยตํ ยํ ภวิสฺสติ ภยํ วา ฉมฺภิตตฺตํ วา โลมหํโส วา, โส ปหีเยถาปิ โนปิ ปหีเยถ. हे भिक्षुओं! देवताओं के अधिपति शक्र की ध्वजा के अग्रभाग को देखते हुए, अथवा देवराज प्रजापति की ध्वजा के अग्रभाग को देखते हुए, अथवा देवराज वरुण की ध्वजा के अग्रभाग को देखते हुए, अथवा देवराज ईशान की ध्वजा के अग्रभाग को देखते हुए, जो भी भय, घबराहट या रोमांच (रोंगटे खड़े होना) होगा, वह दूर हो भी सकता है और नहीं भी। ‘‘ตํ กิสฺส เหตุ? สกฺโก หิ, ภิกฺขเว, เทวานมินฺโท อวีตราโค อวีตโทโส อวีตโมโห ภีรุ ฉมฺภี อุตฺราสี ปลายีติ. ऐसा किस कारण से है? हे भिक्षुओं! क्योंकि देवताओं का अधिपति शक्र अभी राग-मुक्त नहीं है, द्वेष-मुक्त नहीं है, मोह-मुक्त नहीं है; वह भयभीत होने वाला, घबराने वाला, त्रस्त होने वाला और भाग जाने वाला है। ‘‘อหญฺจ โข, ภิกฺขเว, เอวํ วทามิ – ‘สเจ ตุมฺหากํ, ภิกฺขเว, อรญฺญคตานํ วา รุกฺขมูลคตานํ วา สุญฺญาคารคตานํ วา อุปฺปชฺเชยฺย ภยํ วา ฉมฺภิตตฺตํ วา โลมหํโส วา, มเมว ตสฺมึ สมเย อนุสฺสเรยฺยาถ – อิติปิ โส ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน สุคโต โลกวิทู อนุตฺตโร ปุริสทมฺมสารถิ สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. มมญฺหิ โว, ภิกฺขเว, อนุสฺสรตํ ยํ ภวิสฺสติ ภยํ วา ฉมฺภิตตฺตํ วา โลมหํโส วา, โส ปหียิสฺสติ. परंतु हे भिक्षुओं! मैं ऐसा कहता हूँ— 'हे भिक्षुओं! यदि वन में गए हुए, वृक्ष के नीचे गए हुए, अथवा शून्य स्थानों (एकांत) में गए हुए तुम्हें कभी भय, घबराहट या रोमांच उत्पन्न हो, तो उस समय मेरा ही अनुस्मरण करना— 'वे भगवान अर्हत् हैं, सम्यक-सम्बुद्ध हैं, विद्या और चरण से संपन्न हैं, सुगत हैं, लोकविद् हैं, दमन करने योग्य पुरुषों के अनुपम सारथी हैं, देवों और मनुष्यों के शास्ता हैं, बुद्ध हैं, भगवान हैं।' हे भिक्षुओं! मेरा अनुस्मरण करने वाले तुम्हारा जो भी भय, घबराहट या रोमांच होगा, वह दूर हो जाएगा। ‘‘โน เจ มํ อนุสฺสเรยฺยาถ, อถ ธมฺมํ อนุสฺสเรยฺยาถ – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม สนฺทิฏฺฐิโก อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. ธมฺมญฺหิ โว, ภิกฺขเว, อนุสฺสรตํ ยํ ภวิสฺสติ ภยํ วา ฉมฺภิตตฺตํ วา โลมหํโส วา, โส ปหียิสฺสติ. यदि तुम मेरा अनुस्मरण न कर सको, तो धर्म का अनुस्मरण करना— 'भगवान द्वारा धर्म स्वाख्यात (भली-भाँति उपदिष्ट) है, संदृष्टिक (प्रत्यक्ष फल देने वाला) है, अकालिक है, 'आओ और देखो' (एहिपस्सिक) कहने योग्य है, उपनेयिक (निर्वाण की ओर ले जाने वाला) है, और विद्वानों द्वारा स्वयं अनुभव करने योग्य है।' हे भिक्षुओं! धर्म का अनुस्मरण करने वाले तुम्हारा जो भी भय, घबराहट या रोमांच होगा, वह दूर हो जाएगा। ‘‘โน เจ ธมฺมํ อนุสฺสเรยฺยาถ, อถ สงฺฆํ อนุสฺสเรยฺยาถ – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ อุชุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ [Pg.222] ญายปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ สามีจิปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, ยทิทํ จตฺตาริ ปุริสยุคานิ อฏฺฐ ปุริสปุคฺคลา เอส ภควโต สาวกสงฺโฆ, อาหุเนยฺโย ปาหุเนยฺโย ทกฺขิเณยฺโย อญฺชลิกรณีโย อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสา’ติ. สงฺฆญฺหิ โว, ภิกฺขเว, อนุสฺสรตํ ยํ ภวิสฺสติ ภยํ วา ฉมฺภิตตฺตํ วา โลมหํโส วา, โส ปหียิสฺสติ. यदि तुम धर्म का अनुस्मरण न कर सको, तो संघ का अनुस्मरण करना— 'भगवान का श्रावक संघ सुप्रतिपन्न (अच्छे मार्ग पर चलने वाला) है, ऋजु-प्रतिपन्न (सीधे मार्ग पर चलने वाला) है, न्याय-प्रतिपन्न (निर्वाण के लिए चलने वाला) है, सामीचि-प्रतिपन्न (उचित मार्ग पर चलने वाला) है; यह जो चार पुरुष-युग्म और आठ पुरुष-पुद्गल हैं, यही भगवान का श्रावक संघ है, जो आह्वनीय (आदर के योग्य), पाहुनीय (सत्कार के योग्य), दक्षिणीय (दान के योग्य), अंजलि-करणीय (हाथ जोड़कर प्रणाम करने योग्य) और लोक का अनुपम पुण्य-क्षेत्र है।' हे भिक्षुओं! संघ का अनुस्मरण करने वाले तुम्हारा जो भी भय, घबराहट या रोमांच होगा, वह दूर हो जाएगा। ‘‘ตํ กิสฺส เหตุ? ตถาคโต หิ, ภิกฺขเว, อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ วีตราโค วีตโทโส วีตโมโห อภีรุ อจฺฉมฺภี อนุตฺราสี อปลายี’’ติ. อิทมโวจ ภควา. อิทํ วตฺวาน สุคโต อถาปรํ เอตทโวจ สตฺถา – ऐसा किस कारण से है? हे भिक्षुओं! क्योंकि तथागत अर्हत् और सम्यक-सम्बुद्ध हैं, वे राग-मुक्त, द्वेष-मुक्त और मोह-मुक्त हैं; वे निर्भय हैं, अकम्पित हैं, त्रस्त न होने वाले और पलायन न करने वाले हैं। भगवान ने यह कहा। यह कहकर सुगत शास्ता ने पुनः यह कहा— ‘‘อรญฺเญ รุกฺขมูเล วา, สุญฺญาคาเรว ภิกฺขโว; อนุสฺสเรถ สมฺพุทฺธํ, ภยํ ตุมฺหาก โน สิยา. हे भिक्षुओं! वन में, वृक्ष के नीचे, अथवा शून्य स्थान में सम्बुद्ध का अनुस्मरण करो, तुम्हें भय नहीं होगा। ‘‘โน เจ พุทฺธํ สเรยฺยาถ, โลกเชฏฺฐํ นราสภํ; อถ ธมฺมํ สเรยฺยาถ, นิยฺยานิกํ สุเทสิตํ. यदि तुम लोक के ज्येष्ठ और मनुष्यों में श्रेष्ठ बुद्ध का स्मरण न कर सको, तो उस धर्म का स्मरण करो जो भली-भाँति उपदिष्ट है और (संसार से) बाहर ले जाने वाला है। ‘‘โน เจ ธมฺมํ สเรยฺยาถ, นิยฺยานิกํ สุเทสิตํ; อถ สงฺฆํ สเรยฺยาถ, ปุญฺญกฺเขตฺตํ อนุตฺตรํ. यदि तुम उस भली-भाँति उपदिष्ट और बाहर ले जाने वाले धर्म का स्मरण न कर सको, तो उस संघ का स्मरण करो जो अनुपम पुण्य-क्षेत्र है। ‘‘เอวํ พุทฺธํ สรนฺตานํ, ธมฺมํ สงฺฆญฺจ ภิกฺขโว; ภยํ วา ฉมฺภิตตฺตํ วา, โลมหํโส น เหสฺสตี’’ติ. हे भिक्षुओं! इस प्रकार बुद्ध, धर्म और संघ का स्मरण करने वालों को न भय होगा, न घबराहट और न ही रोमांच होगा। ๔. เวปจิตฺติสุตฺตํ ४. वेपचित्ति सुत्त ๒๕๐. สาวตฺถินิทานํ. ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, เทวาสุรสงฺคาโม สมุปพฺยูฬฺโห อโหสิ. อถ โข, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติ อสุรินฺโท อสุเร อามนฺเตสิ – ‘สเจ, มาริสา, เทวานํ อสุรสงฺคาเม สมุปพฺยูฬฺเห อสุรา ชิเนยฺยุํ เทวา ปราชิเนยฺยุํ, เยน นํ สกฺกํ เทวานมินฺทํ กณฺฐปญฺจเมหิ พนฺธเนหิ พนฺธิตฺวา มม สนฺติเก อาเนยฺยาถ อสุรปุร’นฺติ. สกฺโกปิ โข, ภิกฺขเว, เทวานมินฺโท เทเว ตาวตึเส อามนฺเตสิ – ‘สเจ, มาริสา, เทวานํ อสุรสงฺคาเม สมุปพฺยูฬฺเห เทวา ชิเนยฺยุํ อสุรา ปราชิเนยฺยุํ, เยน นํ เวปจิตฺตึ อสุรินฺทํ กณฺฐปญฺจเมหิ พนฺธเนหิ พนฺธิตฺวา มม สนฺติเก อาเนยฺยาถ สุธมฺมสภ’’’นฺติ. ตสฺมึ โข ปน, ภิกฺขเว, สงฺคาเม เทวา ชินึสุ[Pg.223], อสุรา ปราชินึสุ. อถ โข, ภิกฺขเว, เทวา ตาวตึสา เวปจิตฺตึ อสุรินฺทํ กณฺฐปญฺจเมหิ พนฺธเนหิ พนฺธิตฺวา สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส สนฺติเก อาเนสุํ สุธมฺมสภํ. ตตฺร สุทํ, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติ อสุรินฺโท กณฺฐปญฺจเมหิ พนฺธเนหิ พทฺโธ สกฺกํ เทวานมินฺทํ สุธมฺมสภํ ปวิสนฺตญฺจ นิกฺขมนฺตญฺจ อสพฺภาหิ ผรุสาหิ วาจาหิ อกฺโกสติ ปริภาสติ. อถ โข, ภิกฺขเว, มาตลิ สงฺคาหโก สกฺกํ เทวานมินฺทํ คาถาหิ อชฺฌภาสิ – २५०. श्रावस्ती निदान। हे भिक्षुओं! प्राचीन काल में देवों और असुरों का युद्ध छिड़ा था। तब असुरों के अधिपति वेपचित्ति ने असुरों को संबोधित किया— 'हे मित्रों! यदि देव-असुर युद्ध में असुर जीतें और देव हारें, तो तुम देवताओं के अधिपति शक्र को गले सहित पाँच बंधनों से बाँधकर मेरे पास असुर-पुरी ले आना।' हे भिक्षुओं! देवताओं के अधिपति शक्र ने भी त्रायस्त्रिंश देवों को संबोधित किया— 'हे मित्रों! यदि देव-असुर युद्ध में देव जीतें और असुर हारें, तो तुम असुरों के अधिपति वेपचित्ति को गले सहित पाँच बंधनों से बाँधकर मेरे पास सुधर्मा सभा में ले आना।' हे भिक्षुओं! उस युद्ध में देवों की विजय हुई और असुर हार गए। तब त्रायस्त्रिंश देव असुरों के अधिपति वेपचित्ति को गले सहित पाँच बंधनों से बाँधकर देवताओं के अधिपति शक्र के पास सुधर्मा सभा में ले आए। हे भिक्षुओं! वहाँ पाँच बंधनों से बँधा हुआ असुरराज वेपचित्ति, सुधर्मा सभा में प्रवेश करते और निकलते हुए देवराज शक्र को अभद्र और कठोर वचनों से गाली देता था और अपशब्द कहता था। तब मातलि सारथी ने देवराज शक्र को गाथाओं में संबोधित किया— ‘‘ภยา นุ มฆวา สกฺก, ทุพฺพลฺยา โน ติติกฺขสิ; สุณนฺโต ผรุสํ วาจํ, สมฺมุขา เวปจิตฺติโน’’ติ. हे मघवा शक्र! क्या आप भय के कारण अथवा दुर्बलता के कारण वेपचित्ति के इन कठोर वचनों को अपने सामने सुनते हुए सहन कर रहे हैं? ‘‘นาหํ ภยา น ทุพฺพลฺยา, ขมามิ เวปจิตฺติโน; กถญฺหิ มาทิโส วิญฺญู, พาเลน ปฏิสํยุเช’’ติ. मैं न तो भय के कारण और न ही दुर्बलता के कारण वेपचित्ति को क्षमा कर रहा हूँ। मुझ जैसा विद्वान किसी मूर्ख के साथ विवाद में कैसे उलझ सकता है? ‘‘ภิยฺโย พาลา ปภิชฺเชยฺยุํ, โน จสฺส ปฏิเสธโก; ตสฺมา ภุเสน ทณฺเฑน, ธีโร พาลํ นิเสธเย’’ติ. यदि मूर्ख को रोकने वाला कोई न हो, तो वे और भी अधिक बिगड़ जाते हैं। इसलिए बुद्धिमान को चाहिए कि वह कठोर दंड से मूर्ख को रोके। ‘‘เอตเทว อหํ มญฺเญ, พาลสฺส ปฏิเสธนํ; ปรํ สงฺกุปิตํ ญตฺวา, โย สโต อุปสมฺมตี’’ติ. मैं तो यही मानता हूँ कि मूर्ख को रोकने का यही उपाय है कि जब दूसरे को अत्यंत क्रोधित देखे, तो स्वयं स्मृतिवान होकर शांत हो जाए। ‘‘เอตเทว ติติกฺขาย, วชฺชํ ปสฺสามิ วาสว; ยทา นํ มญฺญติ พาโล, ภยา มฺยายํ ติติกฺขติ; อชฺฌารุหติ ทุมฺเมโธ, โคว ภิยฺโย ปลายิน’’นฺติ. हे वासव! मैं इस सहनशीलता में यही दोष देखता हूँ— जब मूर्ख यह समझता है कि 'यह मुझसे डरकर सहन कर रहा है', तब वह मंदबुद्धि और भी अधिक हावी हो जाता है, जैसे कोई बैल भागते हुए बैल पर और भी चढ़ बैठता है। ‘‘กามํ มญฺญตุ วา มา วา, ภยา มฺยายํ ติติกฺขติ; สทตฺถปรมา อตฺถา, ขนฺตฺยา ภิยฺโย น วิชฺชติ. वह मूर्ख चाहे ऐसा समझे या न समझे कि 'यह मुझसे डरकर सहन कर रहा है', अपने कल्याण के लिए सहनशीलता से बढ़कर कोई अन्य श्रेष्ठ लाभ नहीं है। ‘‘โย หเว พลวา สนฺโต, ทุพฺพลสฺส ติติกฺขติ; ตมาหุ ปรมํ ขนฺตึ, นิจฺจํ ขมติ ทุพฺพโล. जो वास्तव में बलवान होते हुए भी निर्बल के प्रति सहनशीलता रखता है, उसे ही श्रेष्ठ क्षमा कहा गया है; क्योंकि निर्बल तो सदैव ही सहन करता है। ‘‘อพลํ ตํ พลํ อาหุ, ยสฺส พาลพลํ พลํ; พลสฺส ธมฺมคุตฺตสฺส, ปฏิวตฺตา น วิชฺชติ. जिसका बल मूर्खों वाला बल है, उसे 'अबल' (बलहीनता) कहा गया है; धर्म द्वारा रक्षित बलवान व्यक्ति का कोई प्रतिपक्षी (सामना करने वाला) नहीं होता। ‘‘ตสฺเสว เตน ปาปิโย, โย กุทฺธํ ปฏิกุชฺฌติ; กุทฺธํ อปฺปฏิกุชฺฌนฺโต, สงฺคามํ เชติ ทุชฺชยํ. जो क्रोध करने वाले पर प्रति-क्रोध करता है, वह उस क्रोध के कारण स्वयं ही अधिक बुरा (पापी) हो जाता है; क्रोध करने वाले पर प्रति-क्रोध न करने वाला व्यक्ति उस संग्राम को जीत लेता है जिसे जीतना अत्यंत कठिन है। ‘‘อุภินฺนมตฺถํ [Pg.224] จรติ, อตฺตโน จ ปรสฺส จ; ปรํ สงฺกุปิตํ ญตฺวา, โย สโต อุปสมฺมติ. जो दूसरे को क्रोधित जानकर स्मृतिवान (सचेत) होकर शांत हो जाता है, वह अपने और दूसरे—दोनों के कल्याण के लिए आचरण करता है। ‘‘อุภินฺนํ ติกิจฺฉนฺตานํ, อตฺตโน จ ปรสฺส จ; ชนา มญฺญนฺติ พาโลติ, เย ธมฺมสฺส อโกวิทา’’ติ. जो लोग धर्म में कुशल नहीं हैं, वे अपने और दूसरे—दोनों के हित की रक्षा करने वाले व्यक्ति को 'मूर्ख' समझते हैं। ‘‘โส หิ นาม, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท สกํ ปุญฺญผลํ อุปชีวมาโน เทวานํ ตาวตึสานํ อิสฺสริยาธิปจฺจํ รชฺชํ กาเรนฺโต ขนฺติโสรจฺจสฺส วณฺณวาที ภวิสฺสติ. อิธ โข ตํ, ภิกฺขเว, โสเภถ ยํ ตุมฺเห เอวํ สฺวากฺขาเต ธมฺมวินเย ปพฺพชิตา สมานา ขมา จ ภเวยฺยาถ โสรตา จา’’ติ. “हे भिक्षुओं, वह देवताओं का राजा शक्र, अपने पुण्य-फल पर आश्रित रहते हुए और तावतिंस देवताओं पर आधिपत्य और राज्य करते हुए भी क्षमा और सौम्यता (विनम्रता) का प्रशंसक है। हे भिक्षुओं, यहाँ यह तुम्हारे लिए शोभनीय होगा कि तुम इस प्रकार भली-भांति उपदिष्ट धर्म-विनय में प्रव्रजित होकर क्षमावान और सौम्य बनो।” ๕. สุภาสิตชยสุตฺตํ ५. ५. सुभाषितजय सुत्त ๒๕๑. สาวตฺถินิทานํ. ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, เทวาสุรสงฺคาโม สมุปพฺยูฬฺโห อโหสิ. อถ โข, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติ อสุรินฺโท สกฺกํ เทวานมินฺทํ เอตทโวจ – ‘โหตุ, เทวานมินฺท, สุภาสิเตน ชโย’ติ. ‘โหตุ, เวปจิตฺติ, สุภาสิเตน ชโย’ติ. อถ โข, ภิกฺขเว, เทวา จ อสุรา จ ปาริสชฺเช ฐเปสุํ – ‘อิเม โน สุภาสิตทุพฺภาสิตํ อาชานิสฺสนฺตี’ติ. อถ โข, ภิกฺขเว, เวปจิตฺตึ อสุรินฺโท สกฺกํ เทวานมินฺทํ เอตทโวจ – ‘ภณ, เทวานมินฺท, คาถ’นฺติ. เอวํ วุตฺเต, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท เวปจิตฺติ อสุรินฺทํ เอตทโวจ – ‘ตุมฺเห ขฺเวตฺถ, เวปจิตฺติ, ปุพฺพเทวา. ภณ, เวปจิตฺติ, คาถ’นฺติ. เอวํ วุตฺเต, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติ อสุรินฺโท อิมํ คาถํ อภาสิ – २५१. २५१. श्रावस्ती निदान। “हे भिक्षुओं, प्राचीन काल में देवताओं और असुरों के बीच युद्ध छिड़ा था। तब, हे भिक्षुओं, असुरराज वेपचित्ति ने देवताओं के राजा शक्र से यह कहा— ‘हे देवराज शक्र, सुभाषित (अच्छी तरह से कही गई बातों) से ही विजय हो।’ शक्र ने कहा— ‘हे वेपचित्ति, सुभाषित से ही विजय हो।’ तब, हे भिक्षुओं, देवताओं और असुरों ने अपने-अपने पार्षदों (सभासदों) को साक्षी नियुक्त किया— ‘ये हमारे सुभाषित और दुर्भाषित का निर्णय करेंगे।’ तब, हे भिक्षुओं, असुरराज वेपचित्ति ने देवराज शक्र से कहा— ‘हे देवराज शक्र, गाथा कहो।’ ऐसा कहने पर, हे भिक्षुओं, देवराज शक्र ने असुरराज वेपचित्ति से कहा— ‘हे वेपचित्ति, यहाँ तुम ही प्राचीन देवता (पूर्वदेव) हो। हे वेपचित्ति, तुम ही गाथा कहो।’ ऐसा कहने पर, हे भिक्षुओं, असुरराज वेपचित्ति ने यह गाथा कही— ‘‘ภิยฺโย พาลา ปภิชฺเชยฺยุํ, โน จสฺส ปฏิเสธโก; ตสฺมา ภุเสน ทณฺเฑน, ธีโร พาลํ นิเสธเย’’ติ. ‘मूर्ख और भी अधिक उद्दंड हो जाएँगे यदि उन्हें कोई रोकने वाला न हो; इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को कठोर दंड के द्वारा मूर्ख को रोकना चाहिए।’ ‘‘ภาสิตาย โข ปน, ภิกฺขเว, เวปจิตฺตินา อสุรินฺเทน คาถาย อสุรา อนุโมทึสุ, เทวา ตุณฺหี อเหสุํ. อถ โข, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติ อสุรินฺโท สกฺกํ เทวานมินฺทํ เอตทโวจ – ‘ภณ, เทวานมินฺท, คาถ’นฺติ. เอวํ วุตฺเต, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท อิมํ คาถํ อภาสิ – हे भिक्षुओं, असुरराज वेपचित्ति द्वारा गाथा कहे जाने पर असुरों ने अनुमोदन किया और देवता मौन रहे। तब, हे भिक्षुओं, असुरराज वेपचित्ति ने देवराज शक्र से कहा— ‘हे देवराज शक्र, गाथा कहो।’ ऐसा कहने पर, हे भिक्षुओं, देवराज शक्र ने यह गाथा कही— ‘‘เอตเทว อหํ มญฺเญ, พาลสฺส ปฏิเสธนํ; ปรํ สงฺกุปิตํ ญตฺวา, โย สโต อุปสมฺมตี’’ติ. ‘मैं मूर्ख को रोकने का यही उपाय मानता हूँ कि दूसरे को अत्यंत क्रोधित जानकर जो स्मृतिवान (सचेत) होकर शांत हो जाता है।’ ‘‘ภาสิตาย [Pg.225] โข ปน, ภิกฺขเว, สกฺเกน เทวานมินฺเทน คาถาย, เทวา อนุโมทึสุ, อสุรา ตุณฺหี อเหสุํ. อถ โข, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท เวปจิตฺตึ อสุรินฺทํ เอตทโวจ – ‘ภณ, เวปจิตฺติ, คาถ’นฺติ. เอวํ วุตฺเต, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติ อสุรินฺโท อิมํ คาถํ อภาสิ – हे भिक्षुओं, देवराज शक्र द्वारा गाथा कहे जाने पर देवताओं ने अनुमोदन किया और असुर मौन रहे। तब, हे भिक्षुओं, देवराज शक्र ने असुरराज वेपचित्ति से कहा— ‘हे वेपचित्ति, गाथा कहो।’ ऐसा कहने पर, हे भिक्षुओं, असुरराज वेपचित्ति ने यह गाथा कही— ‘‘เอตเทว ติติกฺขาย, วชฺชํ ปสฺสามิ วาสว; ยทา นํ มญฺญติ พาโล, ภยา มฺยายํ ติติกฺขติ; อชฺฌารุหติ ทุมฺเมโธ, โคว ภิยฺโย ปลายิน’’นฺติ. ‘हे वासव (शक्र), मैं सहनशीलता में यही दोष देखता हूँ; जब मूर्ख यह समझता है कि ‘यह मुझसे डर के कारण सहन कर रहा है’, तब वह बुद्धिहीन व्यक्ति और भी अधिक हावी हो जाता है, जैसे कोई बैल भागने वाले के पीछे और भी अधिक पड़ता है।’ ‘‘ภาสิตาย โข ปน, ภิกฺขเว, เวปจิตฺตินา อสุรินฺเทน คาถาย อสุรา อนุโมทึสุ, เทวา ตุณฺหี อเหสุํ. อถ โข, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติ อสุรินฺโท สกฺกํ เทวานมินฺทํ เอตทโวจ – ‘ภณ, เทวานมินฺท, คาถ’นฺติ. เอวํ วุตฺเต, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท อิมา คาถาโย อภาสิ – हे भिक्षुओं, असुरराज वेपचित्ति द्वारा गाथा कहे जाने पर असुरों ने अनुमोदन किया और देवता मौन रहे। तब, हे भिक्षुओं, असुरराज वेपचित्ति ने देवराज शक्र से कहा— ‘हे देवराज शक्र, गाथा कहो।’ ऐसा कहने पर, हे भिक्षुओं, देवराज शक्र ने ये गाथाएँ कहीं— ‘‘กามํ มญฺญตุ วา มา วา, ภยา มฺยายํ ติติกฺขติ; สทตฺถปรมา อตฺถา, ขนฺตฺยา ภิยฺโย น วิชฺชติ. ‘वह चाहे ऐसा माने या न माने कि ‘यह मुझसे डर के कारण सहन कर रहा है’; अपने कल्याण से बढ़कर कोई अन्य लक्ष्य नहीं है, और क्षमा से बढ़कर कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है। ‘‘โย หเว พลวา สนฺโต, ทุพฺพลสฺส ติติกฺขติ; ตมาหุ ปรมํ ขนฺตึ, นิจฺจํ ขมติ ทุพฺพโล. जो वास्तव में बलवान होते हुए भी निर्बल के प्रति सहनशीलता रखता है, उसे ही श्रेष्ठ क्षमा कहा गया है; निर्बल को तो सदैव सहन करना ही पड़ता है। ‘‘อพลํ ตํ พลํ อาหุ, ยสฺส พาลพลํ พลํ; พลสฺส ธมฺมคุตฺตสฺส, ปฏิวตฺตา น วิชฺชติ. उस बल को निर्बलता (अबल) कहा गया है जो मूर्ख का बल है; जो धर्म द्वारा रक्षित और बलवान है, उसका कोई प्रतिवादी (विरोध करने वाला) नहीं होता। ‘‘ตสฺเสว เตน ปาปิโย, โย กุทฺธํ ปฏิกุชฺฌติ; กุทฺธํ อปฺปฏิกุชฺฌนฺโต, สงฺคามํ เชติ ทุชฺชยํ. जो क्रोध करने वाले के प्रति स्वयं क्रोध करता है, वह उससे भी अधिक बुरा हो जाता है; क्रोध करने वाले के प्रति क्रोध न करने वाला व्यक्ति उस युद्ध को जीत लेता है जिसे जीतना अत्यंत कठिन है। ‘‘อุภินฺนมตฺถํ จรติ, อตฺตโน จ ปรสฺส จ; ปรํ สงฺกุปิตํ ญตฺวา, โย สโต อุปสมฺมติ. वह अपने और दूसरे—दोनों के हित के लिए आचरण करता है, जो दूसरे को अत्यंत क्रोधित जानकर स्मृतिवान होकर शांत हो जाता है। ‘‘อุภินฺนํ ติกิจฺฉนฺตานํ, อตฺตโน จ ปรสฺส จ; ชนา มญฺญนฺติ พาโลติ, เย ธมฺมสฺส อโกวิทา’’ติ. जो लोग धर्म में कुशल नहीं हैं, वे उसे मूर्ख समझते हैं, जबकि वह अपने और दूसरे—दोनों के (क्रोध रूपी रोग की) चिकित्सा कर रहा होता है।’ ‘‘ภาสิตาสุ โข ปน, ภิกฺขเว, สกฺเกน เทวานมินฺเทน คาถาสุ, เทวา อนุโมทึสุ, อสุรา ตุณฺหี อเหสุํ. อถ โข, ภิกฺขเว, เทวานญฺจ อสุรานญฺจ ปาริสชฺชา เอตทโวจุํ – ‘ภาสิตา โข เวปจิตฺตินา อสุรินฺเทน คาถาโย. ตา จ โข สทณฺฑาวจรา สสตฺถาวจรา, อิติ ภณฺฑนํ อิติ [Pg.226] วิคฺคโห อิติ กลโห. ภาสิตา โข สกฺเกน เทวานมินฺเทน คาถาโย. ตา จ โข อทณฺฑาวจรา อสตฺถาวจรา, อิติ อภณฺฑนํ อิติ อวิคฺคโห อิติ อกลโห. สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส สุภาสิเตน ชโย’ติ. อิติ โข, ภิกฺขเว สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส สุภาสิเตน ชโย อโหสี’’ติ. हे भिक्षुओं, देवराज शक्र द्वारा गाथाएँ कहे जाने पर देवताओं ने अनुमोदन किया और असुर मौन रहे। तब देवताओं और असुरों के पार्षदों ने यह कहा— ‘असुरराज वेपचित्ति द्वारा कही गई गाथाएँ दंड और शस्त्रों से युक्त हैं, जिनसे कलह, विग्रह और झगड़ा बढ़ता है। देवराज शक्र द्वारा कही गई गाथाएँ दंड और शस्त्रों से रहित हैं, जिनसे न कलह होता है, न विग्रह और न झगड़ा। देवराज शक्र की सुभाषित वचनों से विजय हो।’ हे भिक्षुओं, इस प्रकार देवराज शक्र की सुभाषित वचनों से विजय हुई।” ๖. กุลาวกสุตฺตํ ६. ६. कुलावक सुत्त ๒๕๒. สาวตฺถิยํ. ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, เทวาสุรสงฺคาโม สมุปพฺยูฬฺโห อโหสิ. ตสฺมึ โข ปน, ภิกฺขเว, สงฺคาเม อสุรา ชินึสุ, เทวา ปราชินึสุ. ปราชิตา จ โข, ภิกฺขเว, เทวา อปายํสฺเวว อุตฺตเรนมุขา, อภิยํสฺเวว เน อสุรา. อถ โข, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท มาตลิ สงฺคาหกํ คาถาย อชฺฌภาสิ – २५२. श्रावस्ती में। “हे भिक्षुओं, प्राचीन काल में देवताओं और असुरों के बीच युद्ध छिड़ा था। उस युद्ध में असुर जीत गए और देवता हार गए। हे भिक्षुओं, पराजित होकर देवता उत्तर दिशा की ओर भागने लगे और असुर उनका पीछा करने लगे। तब, हे भिक्षुओं, देवराज शक्र ने अपने सारथि मातलि से गाथा में कहा— ‘‘กุลาวกา มาตลิ สิมฺพลิสฺมึ,อีสามุเขน ปริวชฺชยสฺสุ; กามํ จชาม อสุเรสุ ปาณํ,มายิเม ทิชา วิกุลาวกา อเหสุ’’นฺติ. ‘हे मातलि, इस शाल्मली (सेमल) वन में पक्षियों के घोंसले हैं; रथ के जुए (अग्रभाग) से उन्हें बचाकर ले चलो। भले ही असुरों के हाथों हमारे प्राण चले जाएँ, पर ये पक्षी घोंसलों से रहित न हों।’ ‘‘‘เอวํ ภทฺทนฺตวา’ติ โข, ภิกฺขเว, มาตลิ สงฺคาหโก สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปฏิสฺสุตฺวา สหสฺสยุตฺตํ อาชญฺญรถํ ปจฺจุทาวตฺเตสิ. อถ โข, ภิกฺขเว, อสุรานํ เอตทโหสิ – ‘ปจฺจุทาวตฺโต โข ทานิ สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส สหสฺสยุตฺโต อาชญฺญรโถ. ทุติยมฺปิ โข เทวา อสุเรหิ สงฺคาเมสฺสนฺตีติ ภีตา อสุรปุรเมว ปาวิสึสุ. อิติ โข, ภิกฺขเว, สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ธมฺเมน ชโย อโหสี’’’ติ. हे भिक्षुओं, ‘जो आज्ञा, देव’ कहकर सारथि मातलि ने देवराज शक्र की बात मानकर एक हजार घोड़ों वाले श्रेष्ठ रथ को वापस मोड़ लिया। तब, हे भिक्षुओं, असुरों को यह विचार आया— ‘अब देवराज शक्र का एक हजार घोड़ों वाला श्रेष्ठ रथ वापस लौट आया है। देवता दूसरी बार असुरों के साथ युद्ध करेंगे।’ ऐसा सोचकर वे भयभीत होकर असुर-पुर में ही घुस गए। हे भिक्षुओं, इस प्रकार देवराज शक्र की धर्मपूर्वक विजय हुई।” ๗. นทุพฺภิยสุตฺตํ ७. नदुब्भिय सुत्त ๒๕๓. สาวตฺถิยํ. ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘โยปิ เม อสฺส สุปจฺจตฺถิโก ตสฺสปาหํ น ทุพฺเภยฺย’นฺติ. อถ โข, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติ อสุรินฺโท สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย เยน สกฺโก เทวานมินฺโท เตนุปสงฺกมิ. อทฺทสา [Pg.227] โข, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท เวปจิตฺตึ อสุรินฺทํ ทูรโตว อาคจฺฉนฺตํ. ทิสฺวาน เวปจิตฺตึ อสุรินฺทํ เอตทโวจ – ‘ติฏฺฐ, เวปจิตฺติ, คหิโตสี’’’ติ. २५३. श्रावस्ती में। "भिक्षुओं, प्राचीन काल में, एकांत में ध्यानमग्न देवताओं के राजा शक्र के मन में ऐसा विचार उत्पन्न हुआ— 'चाहे कोई मेरा घोर शत्रु ही क्यों न हो, मैं उसके प्रति द्रोह नहीं करूँगा।' तब, भिक्षुओं, असुरराज वेपचित्ति ने देवताओं के राजा शक्र के मन के विचार को अपने मन से जानकर, जहाँ देवताओं के राजा शक्र थे, वहाँ पहुँचा। भिक्षुओं, देवताओं के राजा शक्र ने असुरराज वेपचित्ति को दूर से ही आते देखा। असुरराज वेपचित्ति को देखकर उन्होंने यह कहा— 'ठहरो, वेपचित्ति! तुम पकड़े गए हो'।" ‘‘ยเทว เต, มาริส, ปุพฺเพ จิตฺตํ, ตเทว ตฺวํ มา ปชหาสี’’ติ. "हे मित्र! पहले तुम्हारे मन में जो विचार था, उसे तुम मत छोड़ो।" ‘‘สปสฺสุ จ เม, เวปจิตฺติ, อทุพฺภายา’’ติ. "वेपचित्ति, मेरे प्रति द्रोह न करने की शपथ लो।" ‘‘ยํ มุสา ภณโต ปาปํ, ยํ ปาปํ อริยูปวาทิโน; มิตฺตทฺทุโน จ ยํ ปาปํ, ยํ ปาปํ อกตญฺญุโน; ตเมว ปาปํ ผุสตุ, โย เต ทุพฺเภ สุชมฺปตี’’ติ. "झूठ बोलने वाले का जो पाप है, आर्यों की निंदा करने वाले का जो पाप है, मित्र-द्रोही का जो पाप है, और कृतघ्न का जो पाप है; हे सुजम्पति! जो तुम्हारे प्रति द्रोह करे, उसे वही पाप लगे।" ๘. เวโรจนอสุรินฺทสุตฺตํ ८. वेरोचन असुरिन्द सुत्त ๒๕๔. สาวตฺถิยํ เชตวเน. เตน โข ปน สมเยน ภควา ทิวาวิหารคโต โหติ ปฏิสลฺลีโน. อถ โข สกฺโก จ เทวานมินฺโท เวโรจโน จ อสุรินฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ปจฺเจกํ ทฺวารพาหํ นิสฺสาย อฏฺฐํสุ. อถ โข เวโรจโน อสุรินฺโท ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – २५४. श्रावस्ती के जेतवन में। उस समय भगवान दिन के विहार के लिए एकांत में विराजमान थे। तब देवताओं के राजा शक्र और असुरराज वेरोचन जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर वे अलग-अलग द्वार की चौखट के सहारे खड़े हो गए। तब असुरराज वेरोचन ने भगवान के समीप यह गाथा कही— ‘‘วายเมเถว ปุริโส, ยาว อตฺถสฺส นิปฺผทา; นิปฺผนฺนโสภโน อตฺโถ, เวโรจนวโจ อิท’’นฺติ. "मनुष्य को तब तक प्रयत्न करना चाहिए जब तक कार्य सिद्ध न हो जाए; सिद्ध हुआ कार्य ही शोभनीय होता है—यह वेरोचन का वचन है।" ‘‘วายเมเถว ปุริโส, ยาว อตฺถสฺส นิปฺผทา; นิปฺผนฺนโสภโน อตฺโถ, ขนฺตฺยา ภิยฺโย น วิชฺชตี’’ติ. "मनुष्य को तब तक प्रयत्न करना चाहिए जब तक कार्य सिद्ध न हो जाए; सिद्ध हुआ कार्य ही शोभनीय होता है, (किन्तु) क्षमा से बढ़कर और कुछ नहीं है—यह शक्र का वचन है।" ‘‘สพฺเพ สตฺตา อตฺถชาตา, ตตฺถ ตตฺถ ยถารหํ; สํโยคปรมา ตฺเวว, สมฺโภคา สพฺพปาณินํ; นิปฺผนฺนโสภโน อตฺโถ, เวโรจนวโจ อิท’’นฺติ. "सभी प्राणी जहाँ-तहाँ अपनी आवश्यकता के अनुसार कार्यों में लगे हैं; सभी प्राणियों के उपभोग की वस्तुएँ उनके संयोजन पर ही निर्भर करती हैं; सिद्ध हुआ कार्य ही शोभनीय होता है—यह वेरोचन का वचन है।" ‘‘สพฺเพ สตฺตา อตฺถชาตา, ตตฺถ ตตฺถ ยถารหํ; สํโยคปรมา ตฺเวว, สมฺโภคา สพฺพปาณินํ; นิปฺผนฺนโสภโน อตฺโถ, ขนฺตฺยา ภิยฺโย น วิชฺชตี’’ติ. "सभी प्राणी जहाँ-तहाँ अपनी आवश्यकता के अनुसार कार्यों में लगे हैं; सभी प्राणियों के उपभोग की वस्तुएँ उनके संयोजन पर ही निर्भर करती हैं; सिद्ध हुआ कार्य ही शोभनीय होता है, (किन्तु) क्षमा से बढ़कर और कुछ नहीं है—यह शक्र का वचन है।" ๙. อรญฺญายตนอิสิสุตฺตํ ९. अरञ्ञायतन इसि सुत्त ๒๕๕. สาวตฺถิยํ[Pg.228]. ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, สมฺพหุลา อิสโย สีลวนฺโต กลฺยาณธมฺมา อรญฺญายตเน ปณฺณกุฏีสุ สมฺมนฺติ. อถ โข, ภิกฺขเว, สกฺโก จ เทวานมินฺโท เวปจิตฺติ จ อสุรินฺโท เยน เต อิสโย สีลวนฺโต กลฺยาณธมฺมา เตนุปสงฺกมึสุ. อถ โข, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติ อสุรินฺโท ปฏลิโย อุปาหนา อาโรหิตฺวา ขคฺคํ โอลคฺเคตฺวา ฉตฺเตน ธาริยมาเนน อคฺคทฺวาเรน อสฺสมํ ปวิสิตฺวา เต อิสโย สีลวนฺเต กลฺยาณธมฺเม อปพฺยามโต กริตฺวา อติกฺกมิ. อถ โข, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท ปฏลิโย อุปาหนา โอโรหิตฺวา ขคฺคํ อญฺเญสํ ทตฺวา ฉตฺตํ อปนาเมตฺวา ทฺวาเรเนว อสฺสมํ ปวิสิตฺวา เต อิสโย สีลวนฺเต กลฺยาณธมฺเม อนุวาตํ ปญฺชลิโก นมสฺสมาโน อฏฺฐาสิ’’. อถ โข, ภิกฺขเว, เต อิสโย สีลวนฺโต กลฺยาณธมฺมา สกฺกํ เทวานมินฺทํ คาถาย อชฺฌภาสึสุ – २५५. श्रावस्ती में। "भिक्षुओं, प्राचीन काल में, अनेक शीलवान और कल्याणधर्मी ऋषि वन के आश्रम में पर्णकुटियों में शांतिपूर्वक रहते थे। तब, भिक्षुओं, देवताओं के राजा शक्र और असुरराज वेपचित्ति जहाँ वे शीलवान और कल्याणधर्मी ऋषि थे, वहाँ पहुँचे। भिक्षुओं, तब असुरराज वेपचित्ति ने कई परतों वाले जूते पहनकर, तलवार लटकाकर और छत्र धारण किए हुए मुख्य द्वार से आश्रम में प्रवेश किया और उन शीलवान, कल्याणधर्मी ऋषियों के प्रति बिना झुके उनके पास से निकल गया। भिक्षुओं, तब देवताओं के राजा शक्र ने जूते उतारकर, तलवार दूसरों को देकर, छत्र हटाकर द्वार से ही आश्रम में प्रवेश किया और उन शीलवान, कल्याणधर्मी ऋषियों के सामने हवा के नीचे की ओर हाथ जोड़कर नमस्कार करते हुए खड़े हो गए। तब, भिक्षुओं, उन शीलवान और कल्याणधर्मी ऋषियों ने देवताओं के राजा शक्र से गाथा में यह कहा—" ‘‘คนฺโธ อิสีนํ จิรทิกฺขิตานํ,กายา จุโต คจฺฉติ มาลุเตน; อิโต ปฏิกฺกมฺม สหสฺสเนตฺต,คนฺโธ อิสีนํ อสุจิ เทวราชา’’ติ. "दीर्घकाल से दीक्षित ऋषियों के शरीर की गंध वायु के साथ उड़ती है; हे सहस्रनेत्र! यहाँ से हट जाओ, हे देवराज! ऋषियों की गंध अशुचि होती है।" ‘‘คนฺโธ อิสีนํ จิรทิกฺขิตานํ,กายา จุโต คจฺฉตุ มาลุเตน,สุจิตฺรปุปฺผํ สิรสฺมึว มาลํ; คนฺธํ เอตํ ปฏิกงฺขาม ภนฺเต,น เหตฺถ เทวา ปฏิกูลสญฺญิโน’’ติ. "भन्ते! दीर्घकाल से दीक्षित ऋषियों के शरीर की गंध वायु के साथ भले ही उड़े, हम उस गंध की वैसे ही इच्छा करते हैं जैसे सिर पर धारण की गई अत्यंत सुंदर फूलों की माला की; भन्ते! इस गंध में देवता प्रतिकूलता का अनुभव नहीं करते।" ๑๐. สมุทฺทกสุตฺตํ १०. समुद्दक सुत्त ๒๕๖. สาวตฺถิยํ. ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, สมฺพหุลา อิสโย สีลวนฺโต กลฺยาณธมฺมา สมุทฺทตีเร ปณฺณกุฏีสุ สมฺมนฺติ. เตน โข ปน สมเยน เทวาสุรสงฺคาโม สมุปพฺยูฬฺโห อโหสิ. อถ โข, ภิกฺขเว, เตสํ อิสีนํ สีลวนฺตานํ กลฺยาณธมฺมานํ เอตทโหสิ – ‘ธมฺมิกา โข เทวา, อธมฺมิกา อสุรา. สิยาปิ โน อสุรโต ภยํ. ยํนูน มยํ สมฺพรํ อสุรินฺทํ อุปสงฺกมิตฺวา [Pg.229] อภยทกฺขิณํ ยาเจยฺยามา’’’ติ. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, เต อิสโย สีลวนฺโต กลฺยาณธมฺมา – เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย, ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย เอวเมว – สมุทฺทตีเร ปณฺณกุฏีสุ อนฺตรหิตา สมฺพรสฺส อสุรินฺทสฺส สมฺมุเข ปาตุรเหสุํ. อถ โข, ภิกฺขเว, เต อิสโย สีลวนฺโต กลฺยาณธมฺมา สมฺพรํ อสุรินฺทํ คาถาย อชฺฌภาสึสุ – २५६. श्रावस्ती में। "भिक्षुओं, प्राचीन काल में, अनेक शीलवान और कल्याणधर्मी ऋषि समुद्र के तट पर पर्णकुटियों में शांतिपूर्वक रहते थे। उस समय देवताओं और असुरों का युद्ध छिड़ा हुआ था। भिक्षुओं, तब उन शीलवान और कल्याणधर्मी ऋषियों को यह विचार आया— 'देवता धार्मिक हैं, असुर अधार्मिक हैं। हमें असुरों से भय हो सकता है। क्यों न हम असुरराज सम्बर के पास जाकर अभय-दान की याचना करें?' भिक्षुओं, तब वे शीलवान और कल्याणधर्मी ऋषि—जैसे कोई बलवान पुरुष अपनी मुड़ी हुई भुजा को फैला दे या फैली हुई भुजा को सिकोड़ ले, वैसे ही—समुद्र तट की पर्णकुटियों से अंतर्धान होकर असुरराज सम्बर के सामने प्रकट हो गए। भिक्षुओं, तब उन शीलवान और कल्याणधर्मी ऋषियों ने असुरराज सम्बर से गाथा में यह कहा—" ‘‘อิสโย สมฺพรํ ปตฺตา, ยาจนฺติ อภยทกฺขิณํ; กามํกโร หิ เต ทาตุํ, ภยสฺส อภยสฺส วา’’ติ. "ऋषि सम्बर के पास आए हैं और अभय-दान की याचना करते हैं; भय देना या अभय देना, यह तुम्हारी इच्छा पर निर्भर है।" ‘‘อิสีนํ อภยํ นตฺถิ, ทุฏฺฐานํ สกฺกเสวินํ; อภยํ ยาจมานานํ, ภยเมว ททามิ โว’’ติ. "शक्र की सेवा करने वाले दुष्ट ऋषियों के लिए कोई अभय नहीं है; अभय की याचना करने वाले तुम लोगों को मैं भय ही देता हूँ।" ‘‘อภยํ ยาจมานานํ, ภยเมว ททาสิ โน; ปฏิคฺคณฺหาม เต เอตํ, อกฺขยํ โหตุ เต ภยํ. "अभय की याचना करने वाले हमें तुम भय ही देते हो; हम तुम्हारे इस दान को स्वीकार करते हैं, तुम्हारा भय कभी समाप्त न हो।" ‘‘ยาทิสํ วปเต พีชํ, ตาทิสํ หรเต ผลํ; กลฺยาณการี กลฺยาณํ, ปาปการี จ ปาปกํ; ปวุตฺตํ ตาต เต พีชํ, ผลํ ปจฺจนุโภสฺสสี’’ติ. "जैसा बीज बोया जाता है, वैसा ही फल प्राप्त होता है; कल्याणकारी कल्याण भोगता है और पाप करने वाला पाप भोगता है। हे तात! तुमने बीज बो दिया है, अब तुम फल भोगोगे।" ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, เต อิสโย สีลวนฺโต กลฺยาณธมฺมา สมฺพรํ อสุรินฺทํ อภิสปิตฺวา – เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย, ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย เอวเมว – สมฺพรสฺส อสุรินฺทสฺส สมฺมุเข อนฺตรหิตา สมุทฺทตีเร ปณฺณกุฏีสุ ปาตุรเหสุํ. อถ โข, ภิกฺขเว, สมฺพโร อสุรินฺโท เตหิ อิสีหิ สีลวนฺเตหิ กลฺยาณธมฺเมหิ อภิสปิโต รตฺติยา สุทํ ติกฺขตฺตุํ อุพฺพิชฺชี’’ติ. हे भिक्षुओं! तब उन शीलवान और कल्याणकारी स्वभाव वाले ऋषियों ने सम्बर असुरेन्द्र को शाप दिया और—जैसे कोई बलवान पुरुष अपनी मुड़ी हुई बाँह को फैला दे या फैली हुई बाँह को सिकोड़ ले, वैसे ही—वे सम्बर असुरेन्द्र के सामने से अंतर्धान होकर समुद्र के किनारे पत्तों की कुटियों (पर्णकुटियों) में प्रकट हो गए। हे भिक्षुओं! तब सम्बर असुरेन्द्र उन शीलवान और कल्याणकारी स्वभाव वाले ऋषियों द्वारा शापित होकर रात में तीन बार (भय से) काँप उठा। ปฐโม วคฺโค. प्रथम वर्ग। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश (उद्दान) – สุวีรํ สุสีมญฺเจว, ธชคฺคํ เวปจิตฺติโน; สุภาสิตํ ชยญฺเจว, กุลาวกํ นทุพฺภิยํ; เวโรจน อสุรินฺโท, อิสโย อรญฺญกญฺเจว; อิสโย จ สมุทฺทกาติ. सुवीर, सुसीम, ध्वजग्ग, वेपचित्ति, सुभाषितजय, कुलावक, नदुब्भिय, विरोचन असुरेन्द्र, ऋषि अरण्यक और ऋषि सामुद्रक—ये दस (सूत्र) हैं। ๒. ทุติยวคฺโค २. द्वितीय वर्ग ๑. วตปทสุตฺตํ १. व्रतपद सूत्र ๒๕๗. สาวตฺถิยํ[Pg.230]. ‘‘สกฺกสฺส, ภิกฺขเว, เทวานมินฺทสฺส ปุพฺเพ มนุสฺสภูตสฺส สตฺต วตปทานิ สมตฺตานิ สมาทินฺนานิ อเหสุํ, เยสํ สมาทินฺนตฺตา สกฺโก สกฺกตฺตํ อชฺฌคา. กตมานิ สตฺต วตปทานิ? ยาวชีวํ มาตาเปตฺติภโร อสฺสํ, ยาวชีวํ กุเล เชฏฺฐาปจายี อสฺสํ, ยาวชีวํ สณฺหวาโจ อสฺสํ, ยาวชีวํ อปิสุณวาโจ อสฺสํ, ยาวชีวํ วิคตมลมจฺเฉเรน เจตสา อคารํ อชฺฌาวเสยฺยํ มุตฺตจาโค ปยตปาณิ โวสฺสคฺครโต ยาจโยโค ทานสํวิภาครโต, ยาวชีวํ สจฺจวาโจ อสฺสํ, ยาวชีวํ อกฺโกธโน อสฺสํ – สเจปิ เม โกโธ อุปฺปชฺเชยฺย, ขิปฺปเมว นํ ปฏิวิเนยฺย’’นฺติ. ‘‘สกฺกสฺส, ภิกฺขเว, เทวานมินฺทสฺส ปุพฺเพ มนุสฺสภูตสฺส อิมานิ สตฺต วตปทานิ สมตฺตานิ สมาทินฺนานิ อเหสุํ, เยสํ สมาทินฺนตฺตา สกฺโก สกฺกตฺตํ อชฺฌคา’’ติ. २५७. श्रावस्ती में। 'हे भिक्षुओं! देवताओं के अधिपति शक्र ने पूर्व में मनुष्य होने पर सात व्रतों को पूर्ण रूप से स्वीकार किया था, जिन्हें अपनाने के कारण शक्र ने शक्रत्व (इन्द्र पद) प्राप्त किया। वे सात व्रत कौन से हैं? (१) जीवन भर मैं माता-पिता की सेवा करने वाला बनूँ, (२) जीवन भर मैं कुल के वृद्धों का आदर करने वाला बनूँ, (३) जीवन भर मैं मृदुभाषी बनूँ, (४) जीवन भर मैं चुगली न करने वाला बनूँ, (५) जीवन भर मैं लोभ-रहित चित्त से घर में रहूँ, मुक्त-त्यागी (दान देने वाला), खुले हाथों वाला, दान में रत, याचना के योग्य और दान-संविभाग में प्रसन्न रहने वाला बनूँ, (६) जीवन भर मैं सत्यवादी बनूँ, (७) जीवन भर मैं क्रोध-रहित बनूँ—यदि मुझे क्रोध उत्पन्न भी हो, तो मैं उसे शीघ्र ही दूर कर दूँ।' हे भिक्षुओं! देवताओं के अधिपति शक्र ने पूर्व में मनुष्य होने पर इन सात व्रतों को पूर्ण रूप से स्वीकार किया था, जिन्हें अपनाने के कारण शक्र ने शक्रत्व प्राप्त किया। ‘‘มาตาเปตฺติภรํ ชนฺตุํ, กุเล เชฏฺฐาปจายินํ; สณฺหํ สขิลสมฺภาสํ, เปสุเณยฺยปฺปหายินํ. जो मनुष्य माता-पिता का भरण-पोषण करता है, कुल के वृद्धों का आदर करता है, कोमल और मधुर वाणी बोलता है, चुगली का त्याग करता है, ‘‘มจฺเฉรวินเย ยุตฺตํ, สจฺจํ โกธาภิภุํ นรํ; ตํ เว เทวา ตาวตึสา, อาหุ สปฺปุริโส อิตี’’ติ. कंजूसी को दूर करने में लगा रहता है, सत्यवादी है और क्रोध को जीतने वाला है, उस मनुष्य को निश्चित ही तावतिंस (त्रयस्त्रिंश) लोक के देवता 'सत्पुरुष' कहते हैं। ๒. สกฺกนามสุตฺตํ २. शक्र-नाम सूत्र ๒๕๘. สาวตฺถิยํ เชตวเน. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู เอตทโวจ – ‘‘สกฺโก, ภิกฺขเว, เทวานมินฺโท ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน มโฆ นาม มาณโว อโหสิ, ตสฺมา มฆวาติ วุจฺจติ. २५८. श्रावस्ती के जेतवन में। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं से यह कहा— 'हे भिक्षुओं! देवताओं का अधिपति शक्र पूर्व में मनुष्य होने पर मघ नाम का माणवक (युवक) था, इसलिए उसे मघवा कहा जाता है। ‘‘สกฺโก, ภิกฺขเว, เทวานมินฺโท ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน ปุเร ทานํ อทาสิ, ตสฺมา ปุรินฺทโทติ วุจฺจติ. हे भिक्षुओं! देवताओं का अधिपति शक्र पूर्व में मनुष्य होने पर पहले (नगरों में) दान देता था, इसलिए उसे पुरिन्दद कहा जाता है। ‘‘สกฺโก, ภิกฺขเว, เทวานมินฺโท ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน สกฺกจฺจํ ทานํ อทาสิ, ตสฺมา สกฺโกติ วุจฺจติ. हे भिक्षुओं! देवताओं का अधिपति शक्र पूर्व में मनुष्य होने पर आदरपूर्वक (सत्कृत्य) दान देता था, इसलिए उसे शक्र कहा जाता है। ‘‘สกฺโก[Pg.231], ภิกฺขเว, เทวานมินฺโท ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน อาวสถํ อทาสิ, ตสฺมา วาสโวติ วุจฺจติ. हे भिक्षुओं! देवताओं का अधिपति शक्र पूर्व में मनुष्य होने पर आवास (विश्राम गृह) दान देता था, इसलिए उसे वासव कहा जाता है। ‘‘สกฺโก, ภิกฺขเว, เทวานมินฺโท สหสฺสมฺปิ อตฺถานํ มุหุตฺเตน จินฺเตติ, ตสฺมา สหสฺสกฺโขติ วุจฺจติ. हे भिक्षुओं! देवताओं का अधिपति शक्र एक क्षण में एक हजार विषयों (बातों) को सोच लेता है, इसलिए उसे सहस्राक्ष (सहस्सक्ख) कहा जाता है। ‘‘สกฺกสฺส, ภิกฺขเว, เทวานมินฺทสฺส สุชา นาม อสุรกญฺญา ปชาปติ, ตสฺมา สุชมฺปตีติ วุจฺจติ. हे भिक्षुओं! देवताओं के अधिपति शक्र की पत्नी सुजा नाम की असुर-कन्या थी, इसलिए उसे सुजम्पति कहा जाता है। ‘‘สกฺโก, ภิกฺขเว, เทวานมินฺโท เทวานํ ตาวตึสานํ อิสฺสริยาธิปจฺจํ รชฺชํ กาเรติ, ตสฺมา เทวานมินฺโทติ วุจฺจติ. हे भिक्षुओं! देवताओं का अधिपति शक्र तावतिंस (त्रयस्त्रिंश) देवताओं पर ऐश्वर्य और आधिपत्य के साथ राज्य करता है, इसलिए उसे देवानामिन्द्र (देवराज) कहा जाता है। ‘‘สกฺกสฺส, ภิกฺขเว เทวานมินฺทสฺส ปุพฺเพ มนุสฺสภูตสฺส สตฺต วตปทานิ สมตฺตานิ สมาทินฺนานิ อเหสุํ, เยสํ สมาทินฺนตฺตา สกฺโก สกฺกตฺตํ อชฺฌคา. กตมานิ สตฺต วตปทานิ? ยาวชีวํ มาตาเปตฺติภโร อสฺสํ, ยาวชีวํ กุเล เชฏฺฐาปจายี อสฺสํ, ยาวชีวํ สณฺหวาโจ อสฺสํ, ยาวชีวํ อปิสุณวาโจ อสฺสํ, ยาวชีวํ วิคตมลมจฺเฉเรน เจตสา อคารํ อชฺฌาวเสยฺยํ มุตฺตจาโค ปยตปาณิ โวสฺสคฺครโต ยาจโยโค ทานสํวิภาครโต, ยาวชีวํ สจฺจวาโจ อสฺสํ, ยาวชีวํ อกฺโกธโน อสฺสํ – สเจปิ เม โกโธ อุปฺปชฺเชยฺย, ขิปฺปเมว นํ ปฏิวิเนยฺย’’นฺติ. ‘‘สกฺกสฺส, ภิกฺขเว, เทวานมินฺทสฺส ปุพฺเพ มนุสฺสภูตสฺส อิมานิ สตฺต วตปทานิ สมตฺตานิ สมาทินฺนานิ อเหสุํ, เยสํ สมาทินฺนตฺตา สกฺโก สกฺกตฺตํ อชฺฌคา’’ติ. हे भिक्षुओं! देवताओं के अधिपति शक्र ने पूर्व में मनुष्य होने पर सात व्रतों को पूर्ण रूप से स्वीकार किया था, जिन्हें अपनाने के कारण शक्र ने शक्रत्व प्राप्त किया। वे सात व्रत कौन से हैं? (१) जीवन भर मैं माता-पिता की सेवा करने वाला बनूँ, (२) जीवन भर मैं कुल के वृद्धों का आदर करने वाला बनूँ, (३) जीवन भर मैं मृदुभाषी बनूँ, (४) जीवन भर मैं चुगली न करने वाला बनूँ, (५) जीवन भर मैं लोभ-रहित चित्त से घर में रहूँ, मुक्त-त्यागी, खुले हाथों वाला, दान में रत, याचना के योग्य और दान-संविभाग में प्रसन्न रहने वाला बनूँ, (६) जीवन भर मैं सत्यवादी बनूँ, (७) जीवन भर मैं क्रोध-रहित बनूँ—यदि मुझे क्रोध उत्पन्न भी हो, तो मैं उसे शीघ्र ही दूर कर दूँ।' हे भिक्षुओं! देवताओं के अधिपति शक्र ने पूर्व में मनुष्य होने पर इन सात व्रतों को पूर्ण रूप से स्वीकार किया था, जिन्हें अपनाने के कारण शक्र ने शक्रत्व प्राप्त किया। ‘‘มาตาเปตฺติภรํ ชนฺตุํ, กุเล เชฏฺฐาปจายินํ; สณฺหํ สขิลสมฺภาสํ, เปสุเณยฺยปฺปหายินํ. जो मनुष्य माता-पिता का भरण-पोषण करता है, कुल के वृद्धों का आदर करता है, कोमल और मधुर वाणी बोलता है, चुगली का त्याग करता है, ‘‘มจฺเฉรวินเย ยุตฺตํ, สจฺจํ โกธาภิภุํ นรํ; ตํ เว เทวา ตาวตึสา, อาหุ สปฺปุริโส อิตี’’ติ. कंजूसी को दूर करने में लगा रहता है, सत्यवादी है और क्रोध को जीतने वाला है, उस मनुष्य को निश्चित ही तावतिंस लोक के देवता 'सत्पुरुष' कहते हैं। ๓. มหาลิสุตฺตํ ३. महालि सूत्र ๒๕๙. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา เวสาลิยํ วิหรติ มหาวเน กูฏาคารสาลายํ. อถ โข มหาลิ ลิจฺฉวี เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข มหาลิ ลิจฺฉวี ภควนฺตํ เอตทโวจ – २५९. ऐसा मैंने सुना है—एक समय भगवान वैशाली के महावन में कूटागारशाला में विहार कर रहे थे। तब महालि लिच्छवि जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचा; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए महालि लिच्छवि ने भगवान से यह कहा— ‘‘ทิฏฺโฐ โข[Pg.232], ภนฺเต, ภควตา สกฺโก เทวานมินฺโท’’ติ? भन्ते! क्या भगवान ने देवताओं के अधिपति शक्र को देखा है? ‘‘ทิฏฺโฐ โข เม, มหาลิ, สกฺโก เทวานมินฺโท’’ติ. महालि! मैंने देवताओं के अधिपति शक्र को देखा है। ‘‘โส หิ นูน, ภนฺเต, สกฺกปติรูปโก ภวิสฺสติ. ทุทฺทโส หิ, ภนฺเต, สกฺโก เทวานมินฺโท’’ติ. भन्ते! वह निश्चय ही शक्र के समान कोई दूसरा (नकली शक्र) होगा। क्योंकि भन्ते, देवताओं के अधिपति शक्र का दर्शन दुर्लभ है। ‘‘สกฺกญฺจ ขฺวาหํ, มหาลิ, ปชานามิ สกฺกกรเณ จ ธมฺเม, เยสํ ธมฺมานํ สมาทินฺนตฺตา สกฺโก สกฺกตฺตํ อชฺฌคา, ตญฺจ ปชานามิ. महालि! मैं शक्र को भी जानता हूँ और शक्र बनाने वाले धर्मों (गुणों) को भी, जिन्हें अपनाने के कारण शक्र ने शक्रत्व प्राप्त किया, उन्हें भी मैं जानता हूँ। ‘‘สกฺโก, มหาลิ, เทวานมินฺโท ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน มโฆ นาม มาณโว อโหสิ, ตสฺมา มฆวาติ วุจฺจติ. महालि! देवताओं का अधिपति शक्र पूर्व में मनुष्य होने पर मघ नाम का माणवक था, इसलिए उसे मघवा कहा जाता है। ‘‘สกฺโก, มหาลิ, เทวานมินฺโท ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน สกฺกจฺจํ ทานํ อทาสิ, ตสฺมา สกฺโกติ วุจฺจติ. महालि! देवताओं का अधिपति शक्र पूर्व में मनुष्य होने पर आदरपूर्वक दान देता था, इसलिए उसे शक्र कहा जाता है। ‘‘สกฺโก, มหาลิ, เทวานมินฺโท ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน ปุเร ทานํ อทาสิ, ตสฺมา ปุรินฺทโทติ วุจฺจติ. हे महालि! देवराज शक्र ने पूर्व में मनुष्य होते हुए सर्वप्रथम दान दिया था, इसलिए उन्हें 'पुरिन्दद' कहा जाता है। ‘‘สกฺโก, มหาลิ, เทวานมินฺโท ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน อาวสถํ อทาสิ, ตสฺมา วาสโวติ วุจฺจติ. हे महालि! देवराज शक्र ने पूर्व में मनुष्य होते हुए (यात्रियों के लिए) आवास (विश्राम गृह) दान किया था, इसलिए उन्हें 'वासव' कहा जाता है। ‘‘สกฺโก, มหาลิ, เทวานมินฺโท สหสฺสมฺปิ อตฺถานํ มุหุตฺเตน จินฺเตติ, ตสฺมา สหสฺสกฺโขติ วุจฺจติ. हे महालि! देवराज शक्र एक क्षण में एक हजार विषयों पर विचार कर सकते हैं, इसलिए उन्हें 'सहस्रनेत्र' (सहस्सक्ख) कहा जाता है। ‘‘สกฺกสฺส, มหาลิ, เทวานมินฺทสฺส สุชา นาม อสุรกญฺญา ปชาปติ, ตสฺมา สุชมฺปตีติ วุจฺจติ. हे महालि! देवराज शक्र की पत्नी सुजा नाम की असुर कन्या थी, इसलिए उन्हें 'सुजम्पति' (सुजा का पति) कहा जाता है। ‘‘สกฺโก, มหาลิ, เทวานมินฺโท เทวานํ ตาวตึสานํ อิสฺสริยาธิปจฺจํ รชฺชํ กาเรติ, ตสฺมา เทวานมินฺโทติ วุจฺจติ. हे महालि! देवराज शक्र तावतिंस देवों पर आधिपत्य और शासन करते हैं, इसलिए उन्हें 'देवानामणिन्द' (देवों का इन्द्र) कहा जाता है। ‘‘สกฺกสฺส, มหาลิ, เทวานมินฺทสฺส ปุพฺเพ มนุสฺสภูตสฺส สตฺต วตปทานิ สมตฺตานิ สมาทินฺนานิ อเหสุํ, เยสํ สมาทินฺนตฺตา สกฺโก สกฺกตฺตํ อชฺฌคา. กตมานิ สตฺต วตปทานิ? ยาวชีวํ มาตาเปตฺติภโร อสฺสํ, ยาวชีวํ กุเล เชฏฺฐาปจายี อสฺสํ, ยาวชีวํ สณฺหวาโจ อสฺสํ, ยาวชีวํ อปิสุณวาโจ อสฺสํ, ยาวชีวํ วิคตมลมจฺเฉเรน เจตสา อคารํ อชฺฌาวเสยฺยํ มุตฺตจาโค ปยตปาณิ โวสฺสคฺครโต ยาจโยโค ทานสํวิภาครโต, ยาวชีวํ สจฺจวาโจ อสฺสํ, ยาวชีวํ อกฺโกธโน อสฺสํ – สเจปิ เม โกโธ อุปฺปเชยฺย, ขิปฺปเมว นํ ปฏิวิเนยฺย’’นฺติ. ‘‘สกฺกสฺส, มหาลิ, เทวานมินฺทสฺส ปุพฺเพ มนุสฺสภูตสฺส อิมานิ [Pg.233] สตฺต วตปทานิ สมตฺตานิ สมาทินฺนานิ อเหสุํ, เยสํ สมาทินฺนตฺตา สกฺโก สกฺกตฺตํ อชฺฌคา’’ติ. हे महालि! देवराज शक्र ने पूर्व में मनुष्य होते हुए सात व्रतों का पूर्णतः पालन किया था, जिनके कारण उन्होंने शक्रत्व (इन्द्र पद) प्राप्त किया। वे सात व्रत कौन से हैं? (१) जीवन भर माता-पिता की सेवा करूँ, (२) जीवन भर कुल के वृद्धों का सम्मान करूँ, (३) जीवन भर मृदुभाषी रहूँ, (४) जीवन भर चुगली (पिशुन वचन) न करूँ, (५) जीवन भर लोभ-रहित चित्त से घर में रहूँ, दान देने के लिए तत्पर रहूँ, त्याग में रत रहूँ और दान-संविभाग में आनंद लूँ, (६) जीवन भर सत्यवादी रहूँ, (७) जीवन भर क्रोध-रहित रहूँ—यदि क्रोध उत्पन्न भी हो, तो उसे शीघ्र ही दूर कर दूँ। हे महालि! देवराज शक्र ने पूर्व में मनुष्य होते हुए इन सात व्रतों का पूर्णतः पालन किया था, जिनके कारण उन्होंने शक्रत्व प्राप्त किया। ‘‘มาตาเปตฺติภรํ ชนฺตุํ, กุเล เชฏฺฐาปจายินํ; สณฺหํ สขิลสมฺภาสํ, เปสุเณยฺยปฺปหายินํ. जो व्यक्ति माता-पिता की सेवा करता है, कुल के वृद्धों का सम्मान करता है, कोमल और मधुर वाणी बोलता है, चुगली का त्याग करता है, ‘‘มจฺเฉรวินเย ยุตฺตํ, สจฺจํ โกธาภิภุํ นรํ; ตํ เว เทวา ตาวตึสา, อาหุ สปฺปุริโส อิตี’’ติ. मत्सर (कंजूसी) को दूर करने में लगा रहता है, सत्यवादी है और क्रोध को जीतने वाला है, उस मनुष्य को तावतिंस देव निश्चित रूप से 'सत्पुरुष' कहते हैं। ๔. ทลิทฺทสุตฺตํ ४. दरिद्र सुत्त ๒๖๐. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ภิกฺขโว’’ติ. ‘‘ภทนฺเต’’ติ เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – २६०. एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन कलन्दकनिवाप में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— 'हे भिक्षुओं!' उन भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया— 'भदन्त!' भगवान ने यह कहा— ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, อญฺญตโร ปุริโส อิมสฺมึเยว ราชคเห มนุสฺสทลิทฺโท อโหสิ มนุสฺสกปโณ มนุสฺสวราโก. โส ตถาคตปฺปเวทิเต ธมฺมวินเย สทฺธํ สมาทิยิ, สีลํ สมาทิยิ, สุตํ สมาทิยิ, จาคํ สมาทิยิ, ปญฺญํ สมาทิยิ. โส ตถาคตปฺปเวทิเต ธมฺมวินเย สทฺธํ สมาทิยิตฺวา สีลํ สมาทิยิตฺวา สุตํ สมาทิยิตฺวา จาคํ สมาทิยิตฺวา ปญฺญํ สมาทิยิตฺวา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิ เทวานํ ตาวตึสานํ สหพฺยตํ. โส อญฺเญ เทเว อติโรจติ วณฺเณน เจว ยสสา จ. ตตฺร สุทํ, ภิกฺขเว, เทวา ตาวตึสา อุชฺฌายนฺติ ขิยฺยนฺติ วิปาเจนฺติ – ‘อจฺฉริยํ วต โภ, อพฺภุตํ วต โภ! อยญฺหิ เทวปุตฺโต ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน มนุสฺสทลิทฺโท อโหสิ มนุสฺสกปโณ มนุสฺสวราโก; โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปนฺโน เทวานํ ตาวตึสานํ สหพฺยตํ. โส อญฺเญ เทเว อติโรจติ วณฺเณน เจว ยสสา จา’’’ติ. भिक्षुओं! प्राचीन काल में इसी राजगृह में एक व्यक्ति था जो अत्यंत दरिद्र, दयनीय और तुच्छ था। उसने तथागत द्वारा उपदिष्ट धर्म-विनय में श्रद्धा, शील, श्रुत, त्याग और प्रज्ञा को ग्रहण किया। उस धर्म-विनय में श्रद्धा, शील, श्रुत, त्याग और प्रज्ञा को ग्रहण करने के कारण, शरीर छूटने के बाद मृत्यु के उपरांत वह सुगति स्वर्ग लोक में तावतिंस देवों के बीच उत्पन्न हुआ। वह वर्ण (आभा) और यश में अन्य देवों से बढ़कर शोभायमान था। भिक्षुओं! वहाँ तावतिंस देव इस पर असंतोष प्रकट करते थे, निंदा करते थे और आलोचना करते थे— 'अहो आश्चर्य! अहो अद्भुत! यह देवपुत्र पहले मनुष्य होते हुए अत्यंत दरिद्र, दयनीय और तुच्छ था; वह शरीर छूटने के बाद मृत्यु के उपरांत सुगति स्वर्ग लोक में तावतिंस देवों के बीच उत्पन्न हुआ है और वर्ण तथा यश में अन्य देवों से बढ़कर शोभायमान है!' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท เทเว ตาวตึเส อามนฺเตสิ – ‘มา โข ตุมฺเห, มาริสา, เอตสฺส เทวปุตฺตสฺส อุชฺฌายิตฺถ. เอโส โข, มาริสา, เทวปุตฺโต ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน ตถาคตปฺปเวทิเต [Pg.234] ธมฺมวินเย สทฺธํ สมาทิยิ, สีลํ สมาทิยิ, สุตํ สมาทิยิ, จาคํ สมาทิยิ, ปญฺญํ สมาทิยิ. โส ตถาคตปฺปเวทิเต ธมฺมวินเย สทฺธํ สมาทิยิตฺวา สีลํ สมาทิยิตฺวา สุตํ สมาทิยิตฺวา จาคํ สมาทิยิตฺวา ปญฺญํ สมาทิยิตฺวา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปนฺโน เทวานํ ตาวตึสานํ สหพฺยตํ. โส อญฺเญ เทเว อติโรจติ วณฺเณน เจว ยสสา จา’’’ติ. อถ โข, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท เทเว ตาวตึเส อนุนยมาโน ตายํ เวลายํ อิมา คาถาโย อภาสิ – तब भिक्षुओं! देवराज शक्र ने तावतिंस देवों को संबोधित किया— 'हे मित्रों! आप इस देवपुत्र की निंदा न करें। हे मित्रों! यह देवपुत्र पहले मनुष्य होते हुए तथागत द्वारा उपदिष्ट धर्म-विनय में श्रद्धा, शील, श्रुत, त्याग और प्रज्ञा से युक्त हुआ था। तथागत द्वारा उपदिष्ट धर्म-विनय में श्रद्धा, शील, श्रुत, त्याग और प्रज्ञा से युक्त होने के कारण ही वह शरीर छूटने के बाद मृत्यु के उपरांत सुगति स्वर्ग लोक में तावतिंस देवों के बीच उत्पन्न हुआ है और वर्ण तथा यश में अन्य देवों से बढ़कर शोभायमान है।' तब भिक्षुओं! देवराज शक्र ने तावतिंस देवों को समझाते हुए उस समय ये गाथाएं कहीं— ‘‘ยสฺส สทฺธา ตถาคเต, อจลา สุปฺปติฏฺฐิตา; สีลญฺจ ยสฺส กลฺยาณํ, อริยกนฺตํ ปสํสิตํ. जिसकी तथागत में श्रद्धा अचल और सुप्रतिष्ठित है, और जिसका शील कल्याणकारी, आर्यों को प्रिय तथा प्रशंसित है, ‘‘สงฺเฆ ปสาโท ยสฺสตฺถิ, อุชุภูตญฺจ ทสฺสนํ; อทลิทฺโทติ ตํ อาหุ, อโมฆํ ตสฺส ชีวิตํ. जिसकी संघ में प्रसन्नता (श्रद्धा) है और जिसकी दृष्टि ऋजु (सीधी/सम्यक्) है, उसे विद्वान 'अदरिद्र' (धनी) कहते हैं; उसका जीवन सफल है। ‘‘ตสฺมา สทฺธญฺจ สีลญฺจ, ปสาทํ ธมฺมทสฺสนํ; อนุยุญฺเชถ เมธาวี, สรํ พุทฺธาน สาสน’’นฺติ. इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति बुद्धों के शासन का स्मरण करते हुए श्रद्धा, शील, चित्त की प्रसन्नता और धर्म-दर्शन (सत्य के साक्षात्कार) में निरंतर प्रयत्नशील रहे। ๕. รามเณยฺยกสุตฺตํ ५. रामणेय्यक सुत्त ๒๖๑. สาวตฺถิยํ เชตวเน. อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข สกฺโก เทวานมินฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข, ภนฺเต, ภูมิรามเณยฺยก’’นฺติ? २६१. श्रावस्ती के जेतवन में। तब देवताओं के राजा शक्र जहाँ भगवान् थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े होकर देवताओं के राजा शक्र ने भगवान् से यह कहा— “भन्ते! कौन सा स्थान रमणीय है?” ‘‘อารามเจตฺยา วนเจตฺยา, โปกฺขรญฺโญ สุนิมฺมิตา; มนุสฺสรามเณยฺยสฺส, กลํ นาคฺฆนฺติ โสฬสึ. “भली-भाँति निर्मित आराम-चैत्य (उद्यान), वन-चैत्य और पुष्करिणियाँ (सरोवर), मनुष्यों की रमणीयता के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं हैं।” ‘‘คาเม วา ยทิ วารญฺเญ, นินฺเน วา ยทิ วา ถเล; ยตฺถ อรหนฺโต วิหรนฺติ, ตํ ภูมิรามเณยฺยก’’นฺติ. “चाहे गाँव हो या जंगल, चाहे नीची भूमि हो या ऊँची भूमि; जहाँ अर्हन्त विहार करते हैं, वह स्थान रमणीय है।” ๖. ยชมานสุตฺตํ ६. यजमान सुत्त ๒๖๒. เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ คิชฺฌกูเฏ ปพฺพเต. อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ [Pg.235] อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข สกฺโก เทวานมินฺโท ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – २६२. एक समय भगवान राजगृह में गृध्रकूट पर्वत पर विहार कर रहे थे। तब देवताओं के राजा शक्र जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े होकर देवताओं के राजा शक्र ने भगवान को गाथा में संबोधित किया— ‘‘ยชมานานํ มนุสฺสานํ, ปุญฺญเปกฺขาน ปาณินํ; กโรตํ โอปธิกํ ปุญฺญํ, กตฺถ ทินฺนํ มหปฺผล’’นฺติ. "यज्ञ करने वाले मनुष्यों के लिए, पुण्य की इच्छा रखने वाले प्राणियों के लिए, जो औपधिक (पुनर्जन्म का आधार बनने वाला) पुण्य करते हैं, कहाँ दिया गया दान महान फल देने वाला होता है?" ‘‘จตฺตาโร จ ปฏิปนฺนา, จตฺตาโร จ ผเล ฐิตา; เอส สงฺโฆ อุชุภูโต, ปญฺญาสีลสมาหิโต. "चार (मार्ग पर) प्रतिपन्न और चार फल में स्थित; यह संघ ऋजुभूत (सीधा) है, जो प्रज्ञा, शील और समाधि से युक्त है।" ‘‘ยชมานานํ มนุสฺสานํ, ปุญฺญเปกฺขาน ปาณินํ; กโรตํ โอปธิกํ ปุญฺญํ, สงฺเฆ ทินฺนํ มหปฺผล’’นฺติ. "यज्ञ करने वाले मनुष्यों के लिए, पुण्य की इच्छा रखने वाले प्राणियों के लिए, जो औपधिक पुण्य करते हैं, संघ में दिया गया दान महान फल देने वाला होता है।" ๗. พุทฺธวนฺทนาสุตฺตํ ७. बुद्धवन्दना सुत्त ๒๖๓. สาวตฺถิยํ เชตวเน. เตน โข ปน สมเยน ภควา ทิวาวิหารคโต โหติ ปฏิสลฺลีโน. อถ โข สกฺโก จ เทวานมินฺโท พฺรหฺมา จ สหมฺปติ เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ปจฺเจกํ ทฺวารพาหํ นิสฺสาย อฏฺฐํสุ. อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – २६३. श्रावस्ती के जेतवन में। उस समय भगवान दिवा-विहार (दिन के विश्राम) के लिए एकांत में ध्यानमग्न थे। तब देवताओं के राजा शक्र और ब्रह्मा सहम्पति जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर वे अलग-अलग द्वार के खंभों का सहारा लेकर खड़े हो गए। तब देवताओं के राजा शक्र ने भगवान के समीप यह गाथा कही— ‘‘อุฏฺเฐหิ วีร วิชิตสงฺคาม,ปนฺนภาร อนณ วิจร โลเก; จิตฺตญฺจ เต สุวิมุตฺตํ,จนฺโท ยถา ปนฺนรสาย รตฺติ’’นฺติ. "हे वीर! उठिए, संग्राम को जीतने वाले, भार को उतार देने वाले, ऋण-मुक्त (क्लेश-रहित), लोक में विचरण कीजिए; आपका चित्त पूर्णतः विमुक्त है, जैसे पूर्णिमा की रात में चंद्रमा।" ‘‘น โข, เทวานมินฺท, ตถาคตา เอวํ วนฺทิตพฺพา. เอวญฺจ โข, เทวานมินฺท, ตถาคตา วนฺทิตพฺพา – "हे देवेन्द्र! तथागतों की इस प्रकार वन्दना नहीं करनी चाहिए। हे देवेन्द्र! तथागतों की वन्दना तो इस प्रकार करनी चाहिए—" ‘‘อุฏฺเฐหิ วีร วิชิตสงฺคาม,สตฺถวาห อนณ วิจร โลเก; เทสสฺสุ ภควา ธมฺมํ,อญฺญาตาโร ภวิสฺสนฺตี’’ติ. "हे वीर! उठिए, संग्राम को जीतने वाले, सार्थवाह (मार्गदर्शक), ऋण-मुक्त, लोक में विचरण कीजिए; भगवन! धर्म का उपदेश दें, (धर्म को) समझने वाले लोग होंगे।" ๘. คหฏฺฐวนฺทนาสุตฺตํ ८. गृहस्थवन्दना सुत्त ๒๖๔. สาวตฺถิยํ. ตตฺร…เป… เอตทโวจ – ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท มาตลึ สงฺคาหกํ อามนฺเตสิ – ‘โยเชหิ, สมฺม มาตลิ, สหสฺสยุตฺตํ [Pg.236] อาชญฺญรถํ. อุยฺยานภูมึ คจฺฉาม สุภูมึ ทสฺสนายา’ติ. ‘เอวํ ภทฺทนฺตวา’ติ โข, ภิกฺขเว, มาตลิ สงฺคาหโก สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปฏิสฺสุตฺวา สหสฺสยุตฺตํ อาชญฺญรถํ โยเชตฺวา สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปฏิเวเทสิ – ‘ยุตฺโต โข เต, มาริส, สหสฺสยุตฺโต อาชญฺญรโถ. ยสฺส ทานิ กาลํ มญฺญสี’’’ติ. อถ โข, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท เวชยนฺตปาสาทา โอโรหนฺโต อญฺชลึ กตฺวา สุทํ ปุถุทฺทิสา นมสฺสติ. อถ โข, ภิกฺขเว, มาตลิ สงฺคาหโก สกฺกํ เทวานมินฺทํ คาถาย อชฺฌภาสิ – २६४. श्रावस्ती में। वहाँ... (भगवान ने) यह कहा— "भिक्षुओं! प्राचीन काल में देवताओं के राजा शक्र ने अपने सारथी मातलि को संबोधित किया— 'हे मित्र मातलि! एक हजार घोड़ों वाले श्रेष्ठ रथ को तैयार करो। हम सुंदर भूमि देखने के लिए उद्यान-भूमि चलेंगे।' भिक्षुओं! 'जैसी आपकी आज्ञा, देव' कहकर सारथी मातलि ने देवताओं के राजा शक्र की आज्ञा मानकर एक हजार घोड़ों वाले श्रेष्ठ रथ को तैयार किया और देवताओं के राजा शक्र को सूचित किया— 'हे देव! आपका एक हजार घोड़ों वाला श्रेष्ठ रथ तैयार है। अब आप जैसा उचित समझें (प्रस्थान करें)।' तब भिक्षुओं! देवताओं के राजा शक्र वैजयंत प्रासाद से उतरते हुए हाथ जोड़कर दसों दिशाओं को नमस्कार करने लगे। तब भिक्षुओं! सारथी मातलि ने देवताओं के राजा शक्र को गाथा में संबोधित किया—" ‘‘ตํ นมสฺสนฺติ เตวิชฺชา, สพฺเพ ภุมฺมา จ ขตฺติยา; จตฺตาโร จ มหาราชา, ติทสา จ ยสสฺสิโน; อถ โก นาม โส ยกฺโข, ยํ ตฺวํ สกฺก นมสฺสสี’’ติ. "आपको त्रिविद्य (तीनों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण), सभी भूमिवासी और क्षत्रिय नमस्कार करते हैं; चारों महाराज और यशस्वी त्रयस्त्रिंश देव भी नमस्कार करते हैं; फिर वह कौन सा यक्ष (देव) है, जिसे हे शक्र! आप नमस्कार कर रहे हैं?" ‘‘มํ นมสฺสนฺติ เตวิชฺชา, สพฺเพ ภุมฺมา จ ขตฺติยา; จตฺตาโร จ มหาราชา, ติทสา จ ยสสฺสิโน. "मुझे त्रिविद्य, सभी भूमिवासी और क्षत्रिय नमस्कार करते हैं; चारों महाराज और यशस्वी त्रयस्त्रिंश देव भी नमस्कार करते हैं।" ‘‘อหญฺจ สีลสมฺปนฺเน, จิรรตฺตสมาหิเต; สมฺมาปพฺพชิเต วนฺเท, พฺรหฺมจริยปรายเน. "किन्तु मैं शील-संपन्न, दीर्घकाल से समाहित-चित्त, सम्यक् रूप से प्रव्रजित और ब्रह्मचर्य-परायण (भिक्षुओं) को नमस्कार करता हूँ।" ‘‘เย คหฏฺฐา ปุญฺญกรา, สีลวนฺโต อุปาสกา; ธมฺเมน ทารํ โปเสนฺติ, เต นมสฺสามิ มาตลี’’ติ. "हे मातलि! जो गृहस्थ पुण्य करने वाले हैं, शीलवान उपासक हैं और धर्मपूर्वक अपनी पत्नी (परिवार) का भरण-पोषण करते हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।" ‘‘เสฏฺฐา หิ กิร โลกสฺมึ, เย ตฺวํ สกฺก นมสฺสสิ; อหมฺปิ เต นมสฺสามิ, เย นมสฺสสิ วาสวา’’ติ. "हे शक्र! जिन्हें आप नमस्कार करते हैं, वे निश्चय ही लोक में श्रेष्ठ हैं; हे वासव! जिन्हें आप नमस्कार करते हैं, उन्हें मैं भी नमस्कार करता हूँ।" ‘‘อิทํ วตฺวาน มฆวา, เทวราชา สุชมฺปติ; ปุถุทฺทิสา นมสฺสิตฺวา, ปมุโข รถมารุหี’’ติ. "यह कहकर मघवा, सुजाता के पति देवराज (शक्र) ने दसों दिशाओं को नमस्कार किया और फिर वे श्रेष्ठ रथ पर सवार हुए।" ๙. สตฺถารวนฺทนาสุตฺตํ ९. शास्तृवन्दना सुत्त ๒๖๕. สาวตฺถิยํ เชตวเน. ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท มาตลึ สงฺคาหกํ อามนฺเตสิ – ‘โยเชหิ, สมฺม มาตลิ, สหสฺสยุตฺตํ อาชญฺญรถํ, อุยฺยานภูมึ คจฺฉาม สุภูมึ ทสฺสนายา’ติ. ‘เอวํ ภทฺทนฺตวา’ติ โข, ภิกฺขเว, มาตลิ สงฺคาหโก สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปฏิสฺสุตฺวา [Pg.237] สหสฺสยุตฺตํ อาชญฺญรถํ โยเชตฺวา สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปฏิเวเทสิ – ‘ยุตฺโต โข เต, มาริส, สหสฺสยุตฺโต อาชญฺญรโถ. ยสฺส ทานิ กาลํ มญฺญสี’’’ติ. อถ โข, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท เวชยนฺตปาสาทา โอโรหนฺโต อญฺชลึ กตฺวา สุทํ ภควนฺตํ นมสฺสติ. อถ โข, ภิกฺขเว, มาตลิ สงฺคาหโก สกฺกํ เทวานมินฺทํ คาถาย อชฺฌภาสิ – २६५. श्रावस्ती के जेतवन में। "भिक्षुओं! प्राचीन काल में देवताओं के राजा शक्र ने अपने सारथी मातलि को संबोधित किया— 'हे मित्र मातलि! एक हजार घोड़ों वाले श्रेष्ठ रथ को तैयार करो। हम सुंदर भूमि देखने के लिए उद्यान-भूमि चलेंगे।' भिक्षुओं! 'जैसी आपकी आज्ञा, देव' कहकर सारथी मातलि ने देवताओं के राजा शक्र की आज्ञा मानकर एक हजार घोड़ों वाले श्रेष्ठ रथ को तैयार किया और देवताओं के राजा शक्र को सूचित किया— 'हे देव! आपका एक हजार घोड़ों वाला श्रेष्ठ रथ तैयार है। अब आप जैसा उचित समझें।' तब भिक्षुओं! देवताओं के राजा शक्र वैजयंत प्रासाद से उतरते हुए हाथ जोड़कर भगवान को नमस्कार करने लगे। तब भिक्षुओं! सारथी मातलि ने देवताओं के राजा शक्र को गाथा में संबोधित किया—" ‘‘ยญฺหิ เทวา มนุสฺสา จ, ตํ นมสฺสนฺติ วาสว; อถ โก นาม โส ยกฺโข, ยํ ตฺวํ สกฺก นมสฺสสี’’ติ. "हे वासव! जिसे देवता और मनुष्य नमस्कार करते हैं, वह आप (स्वयं) हैं; फिर वह कौन सा यक्ष है, जिसे हे शक्र! आप नमस्कार कर रहे हैं?" ‘‘โย อิธ สมฺมาสมฺพุทฺโธ, อสฺมึ โลเก สเทวเก; อโนมนามํ สตฺถารํ, ตํ นมสฺสามิ มาตลิ. "हे मातलि! इस देवों सहित लोक में जो यहाँ सम्यक्-सम्बुद्ध हैं, उन अनोमनाम (उत्तम नाम वाले) शास्ता को मैं नमस्कार करता हूँ।" ‘‘เยสํ ราโค จ โทโส จ, อวิชฺชา จ วิราชิตา; ขีณาสวา อรหนฺโต, เต นมสฺสามิ มาตลิ. "हे मातलि! जिनके राग, द्वेष और अविद्या नष्ट हो चुके हैं, जो क्षीणास्त्रव अर्हन्त हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।" ‘‘เย ราคโทสวินยา, อวิชฺชาสมติกฺกมา; เสกฺขา อปจยารามา, อปฺปมตฺตานุสิกฺขเร; เต นมสฺสามิ มาตลี’’ติ. "हे मातलि! जो राग और द्वेष के दमन में लगे हैं, अविद्या का अतिक्रमण कर चुके हैं, जो शैक्ष (साधक) हैं, जो भव-क्षय (निर्वाण) में रमण करते हैं और प्रमाद-रहित होकर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।" ‘‘เสฏฺฐา หิ กิร โลกสฺมึ, เย ตฺวํ สกฺก นมสฺสสิ; อหมฺปิ เต นมสฺสามิ, เย นมสฺสสิ วาสวา’’ติ. "हे शक्र! जिन्हें आप नमस्कार करते हैं, वे निश्चय ही लोक में श्रेष्ठ हैं; हे वासव! जिन्हें आप नमस्कार करते हैं, उन्हें मैं भी नमस्कार करता हूँ।" ‘‘อิทํ วตฺวาน มฆวา, เทวราชา สุชมฺปติ; ภควนฺตํ นมสฺสิตฺวา, ปมุโข รถมารุหี’’ติ. "यह कहकर मघवा, सुजाता के पति देवराज (शक्र) ने भगवान को नमस्कार किया और फिर वे श्रेष्ठ रथ पर सवार हुए।" ๑๐. สงฺฆวนฺทนาสุตฺตํ १०. संघवन्दना सुत्त ๒๖๖. สาวตฺถิยํ เชตวเน. ตตฺร โข…เป… เอตทโวจ – ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท มาตลึ สงฺคาหกํ อามนฺเตสิ – ‘โยเชหิ, สมฺม มาตลิ, สหสฺสยุตฺตํ อาชญฺญรถํ, อุยฺยานภูมึ คจฺฉาม สุภูมึ ทสฺสนายา’ติ. ‘เอวํ ภทฺทนฺตวา’ติ โข, ภิกฺขเว, มาตลิ สงฺคาหโก สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปฏิสฺสุตฺวา, สหสฺสยุตฺตํ อาชญฺญรถํ โยเชตฺวา สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปฏิเวเทสิ – ‘ยุตฺโต โข เต, มาริส, สหสฺสยุตฺโต อาชญฺญรโถ, ยสฺส ทานิ กาลํ มญฺญสี’’’ติ. อถ โข, ภิกฺขเว[Pg.238], สกฺโก เทวานมินฺโท เวชยนฺตปาสาทา โอโรหนฺโต อญฺชลึ กตฺวา สุทํ ภิกฺขุสงฺฆํ นมสฺสติ. อถ โข, ภิกฺขเว, มาตลิ สงฺคาหโก สกฺกํ เทวานมินฺทํ คาถาย อชฺฌภาสิ – २६६. श्रावस्ती के जेतवन में। वहाँ भगवान ने यह कहा— "भिक्षुओं, पूर्वकाल में देवताओं के राजा शक्र ने अपने सारथि मातलि को आमंत्रित किया— 'मित्र मातलि, एक हजार घोड़ों वाले श्रेष्ठ रथ को तैयार करो, हम सुंदर भूमि देखने के लिए उद्यान की ओर चलेंगे।' 'जो आज्ञा, देव,' कहकर मातलि सारथि ने देवताओं के राजा शक्र की बात मानकर एक हजार घोड़ों वाले श्रेष्ठ रथ को तैयार किया और शक्र को सूचित किया— 'देव, आपका एक हजार घोड़ों वाला श्रेष्ठ रथ तैयार है, अब आप जैसा उचित समझें।' तब, भिक्षुओं, देवताओं के राजा शक्र वैजयंत प्रासाद से उतरते हुए हाथ जोड़कर भिक्षु-संघ को नमस्कार करने लगे। तब मातलि सारथि ने देवताओं के राजा शक्र से गाथा में कहा—" ‘‘ตญฺหิ เอเต นมสฺเสยฺยุํ, ปูติเทหสยา นรา; นิมุคฺคา กุณปมฺเหเต, ขุปฺปิปาสสมปฺปิตา. “वे (मनुष्य) ही आपको नमस्कार करें, जो दुर्गंधयुक्त शरीर में रहने वाले मनुष्य हैं; जो शवों (अशुचि) में डूबे हुए हैं और भूख-प्यास से पीड़ित हैं।” ‘‘กึ นุ เตสํ ปิหยสิ, อนาคาราน วาสว; อาจารํ อิสินํ พฺรูหิ, ตํ สุโณม วโจ ตวา’’ติ. “हे वासव! आप इन गृहत्यागी (भिक्षुओं) की क्यों अभिलाषा (वंदना) करते हैं? इन ऋषियों के आचरण के बारे में कहें, हम आपके वचनों को सुनना चाहते हैं।” ‘‘เอตํ เตสํ ปิหยามิ, อนาคาราน มาตลิ; ยมฺหา คามา ปกฺกมนฺติ, อนเปกฺขา วชนฺติ เต. “हे मातलि! मैं इन गृहत्यागी (भिक्षुओं) के इस आचरण की प्रशंसा करता हूँ; वे जिस गाँव से निकलते हैं, बिना किसी मोह (आसक्ति) के चले जाते हैं।” ‘‘น เตสํ โกฏฺเฐ โอเปนฺติ, น กุมฺภิ น กโฬปิยํ ; ปรนิฏฺฐิตเมสานา, เตน ยาเปนฺติ สุพฺพตา. “वे न तो कोठारों में अनाज जमा करते हैं, न घड़ों में और न ही टोकरियों में; वे दूसरों द्वारा तैयार किए गए भोजन की खोज करते हैं और उसी से ये उत्तम व्रत वाले (भिक्षु) अपना निर्वाह करते हैं।” ‘‘สุมนฺตมนฺติโน ธีรา, ตุณฺหีภูตา สมญฺจรา; เทวา วิรุทฺธา อสุเรหิ, ปุถุ มจฺจา จ มาตลิ. “वे धीर पुरुष उत्तम मंत्रणा (धर्म-चर्चा) करने वाले होते हैं, वे मौन रहकर समता का आचरण करते हैं। हे मातलि! जहाँ देवता असुरों के साथ और बहुत से मनुष्य आपस में एक-दूसरे के विरुद्ध (बैर भाव में) रहते हैं—” ‘‘อวิรุทฺธา วิรุทฺเธสุ, อตฺตทณฺเฑสุ นิพฺพุตา; สาทาเนสุ อนาทานา, เต นมสฺสามิ มาตลี’’ติ. “वहाँ जो विरोधियों के बीच अविरोधी हैं, शस्त्रधारियों के बीच शांत (शस्त्ररहित) हैं, और आसक्ति रखने वालों के बीच अनासक्त हैं, उन ऋषियों को मैं नमस्कार करता हूँ, मातलि।” ‘‘เสฏฺฐา หิ กิร โลกสฺมึ, เย ตฺวํ สกฺก นมสฺสสิ; อหมฺปิ เต นมสฺสามิ, เย นมสฺสสิ วาสวา’’ติ. “हे वासव! जिन्हें आप नमस्कार करते हैं, वे निश्चय ही लोक में श्रेष्ठ हैं; जिन्हें आप नमस्कार करते हैं, उन्हें मैं भी नमस्कार करता हूँ।” ‘‘อิทํ วตฺวาน มฆวา, เทวราชา สุชมฺปติ; ภิกฺขุสงฺฆํ นมสฺสิตฺวา, ปมุโข รถมารุหี’’ติ. “सुजा के पति, देवराज मघवा (शक्र) ने यह कहकर और भिक्षु-संघ को नमस्कार कर, देवताओं में प्रमुख होकर रथ पर आरोहण किया।” ทุติโย วคฺโค. “दूसरा वर्ग (वग्ग) समाप्त।” ตสฺสุทฺทานํ – “इसका सारांश (उद्दान)—” เทวา ปน ตโย วุตฺตา, ทลิทฺทญฺจ รามเณยฺยกํ; ยชมานญฺจ วนฺทนา, ตโย สกฺกนมสฺสนาติ. “तीन देव सुत्त, दरिद्र, रामणेय्यक, यजमान, वंदना और तीन शक्र-नमस्यन सुत्त कहे गए हैं।” ๓. ตติยวคฺโค ३. “तृतीय वर्ग (वग्ग)” ๑. เฉตฺวาสุตฺตํ १. “छेत्वा सुत्त” ๒๖๗. สาวตฺถิยํ [Pg.239] เชตวเน. อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข สกฺโก เทวานมินฺโท ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสิ – २६७. “श्रावस्ती के जेतवन में। तब देवताओं के राजा शक्र जहाँ भगवान थे, वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े होकर देवताओं के राजा शक्र ने भगवान से गाथा में पूछा—” ‘‘กึสุ เฉตฺวา สุขํ เสติ, กึสุ เฉตฺวา น โสจติ; กิสฺสสฺสุ เอกธมฺมสฺส, วธํ โรเจสิ โคตมา’’ติ. “क्या काटकर मनुष्य सुख से सोता है? क्या काटकर वह शोक नहीं करता? हे गौतम! आप किस एक धर्म (चीज) के विनाश का अनुमोदन करते हैं?” ‘‘โกธํ เฉตฺวา สุขํ เสติ, โกธํ เฉตฺวา น โสจติ; โกธสฺส วิสมูลสฺส, มธุรคฺคสฺส วาสว; วธํ อริยา ปสํสนฺติ, ตญฺหิ เฉตฺวา น โสจตี’’ติ. “क्रोध को काटकर मनुष्य सुख से सोता है, क्रोध को काटकर वह शोक नहीं करता। हे वासव! विषैली जड़ वाले और मधुर फल (शिखर) वाले क्रोध के विनाश की आर्य प्रशंसा करते हैं; क्योंकि उसे काटकर मनुष्य शोक नहीं करता।” ๒. ทุพฺพณฺณิยสุตฺตํ २. “दुब्बण्णिय सुत्त” ๒๖๘. สาวตฺถิยํ เชตวเน. ตตฺร โข…เป… เอตทโวจ – ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, อญฺญตโร ยกฺโข ทุพฺพณฺโณ โอโกฏิมโก สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส อาสเน นิสินฺโน อโหสิ. ตตฺร สุทํ, ภิกฺขเว, เทวา ตาวตึสา อุชฺฌายนฺติ ขิยฺยนฺติ วิปาเจนฺติ – ‘อจฺฉริยํ วต โภ, อพฺภุตํ วต, โภ! อยํ ยกฺโข ทุพฺพณฺโณ โอโกฏิมโก สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส อาสเน นิสินฺโน’’’ติ! ยถา ยถา โข, ภิกฺขเว, เทวา ตาวตึสา อุชฺฌายนฺติ ขิยฺยนฺติ วิปาเจนฺติ, ตถา ตถา โส ยกฺโข อภิรูปตโร เจว โหติ ทสฺสนียตโร จ ปาสาทิกตโร จ. २६८. “श्रावस्ती के जेतवन में। वहाँ भगवान ने यह कहा— 'भिक्षुओं, पूर्वकाल में एक कुरूप और बौना यक्ष देवताओं के राजा शक्र के आसन पर बैठ गया। तब, भिक्षुओं, तावतिंस लोक के देवता क्रोधित हुए, निंदा करने लगे और कहने लगे— 'आश्चर्य है! अद्भुत है! यह कुरूप और बौना यक्ष देवताओं के राजा शक्र के आसन पर बैठा है!' भिक्षुओं, जैसे-जैसे तावतिंस के देवता क्रोधित होते और निंदा करते, वैसे-वैसे वह यक्ष और अधिक सुंदर, दर्शनीय और मनमोहक होता गया।” ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, เทวา ตาวตึสา เยน สกฺโก เทวานมินฺโท เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา สกฺกํ เทวานมินฺทํ เอตทโวจุํ – ‘อิธ เต, มาริส, อญฺญตโร ยกฺโข ทุพฺพณฺโณ โอโกฏิมโก สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส อาสเน นิสินฺโน. ตตฺร สุทํ, มาริส, เทวา ตาวตึสา อุชฺฌายนฺติ ขิยฺยนฺติ วิปาเจนฺติ – อจฺฉริยํ วต, โภ, อพฺภุตํ วต, โภ! อยํ ยกฺโข ทุพฺพณฺโณ โอโกฏิมโก สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส อาสเน นิสินฺโนติ. ยถา ยถา โข, มาริส, เทวา อุชฺฌายนฺติ ขิยฺยนฺติ วิปาเจนฺติ, ตถา ตถา โส ยกฺโข อภิรูปตโร เจว โหติ ทสฺสนียตโร [Pg.240] จ ปาสาทิกตโร จาติ. โส หิ นูน, มาริส, โกธภกฺโข ยกฺโข ภวิสฺสตี’’’ติ. “तब, भिक्षुओं, तावतिंस के देवता जहाँ देवताओं के राजा शक्र थे, वहाँ गए और उनसे यह कहा— 'हे देव! यहाँ एक कुरूप और बौना यक्ष आपके आसन पर बैठा है। उसे देखकर तावतिंस के देवता क्रोधित होकर निंदा कर रहे हैं... पर जैसे-जैसे वे क्रोधित होते हैं, वह यक्ष और अधिक सुंदर होता जाता है। हे देव! वह निश्चय ही 'क्रोध-भक्षी' (कोधभक्ख) यक्ष होगा।' ” ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท เยน โส โกธภกฺโข ยกฺโข เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา ทกฺขิณชาณุมณฺฑลํ ปถวิยํ นิหนฺตฺวา เยน โส โกธภกฺโข ยกฺโข เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา ติกฺขตฺตุํ นามํ สาเวติ – ‘สกฺโกหํ มาริส, เทวานมินฺโท, สกฺโกหํ, มาริส, เทวานมินฺโท’ติ. ยถา ยถา โข, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท นามํ สาเวสิ, ตถา ตถา โส ยกฺโข ทุพฺพณฺณตโร เจว อโหสิ โอโกฏิมกตโร จ. ทุพฺพณฺณตโร เจว หุตฺวา โอโกฏิมกตโร จ ตตฺเถวนฺตรธายี’’ติ. อถ โข, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท สเก อาสเน นิสีทิตฺวา เทเว ตาวตึเส อนุนยมาโน ตายํ เวลายํ อิมา คาถาโย อภาสิ – “तब, भिक्षुओं, देवताओं के राजा शक्र जहाँ वह क्रोध-भक्षी यक्ष था, वहाँ गए; पहुँचकर अपना उत्तरासंग एक कंधे पर किया, दाहिना घुटना जमीन पर टिकाया और उस क्रोध-भक्षी यक्ष की ओर हाथ जोड़कर तीन बार अपना नाम सुनाया— 'हे देव! मैं देवताओं का राजा शक्र हूँ, मैं देवताओं का राजा शक्र हूँ।' भिक्षुओं, जैसे-जैसे देवताओं के राजा शक्र ने अपना नाम सुनाया (विनम्रता दिखाई), वैसे-वैसे वह यक्ष और अधिक कुरूप और बौना होता गया। और अधिक कुरूप और बौना होकर वह वहीं अंतर्धान हो गया। तब, भिक्षुओं, देवताओं के राजा शक्र ने अपने आसन पर बैठकर तावतिंस के देवताओं को समझाते हुए उस समय ये गाथाएँ कहीं—” ‘‘น สูปหตจิตฺโตมฺหิ, นาวตฺเตน สุวานโย; น โว จิราหํ กุชฺฌามิ, โกโธ มยิ นาวติฏฺฐติ. “मेरा चित्त आसानी से दूषित नहीं होता, न ही मैं क्रोध के वश में आसानी से आता हूँ। मैं लंबे समय तक क्रोधित नहीं रहता, क्रोध मुझमें टिकता नहीं है।” ‘‘กุทฺธาหํ น ผรุสํ พฺรูมิ, น จ ธมฺมานิ กิตฺตเย; สนฺนิคฺคณฺหามิ อตฺตานํ, สมฺปสฺสํ อตฺถมตฺตโน’’ติ. “क्रोधित होने पर भी मैं कठोर वचन नहीं बोलता, और न ही अधर्म की बातें करता हूँ। अपने हित को देखते हुए, मैं स्वयं को वश में रखता हूँ।” ๓. สมฺพริมายาสุตฺตํ ३. “सम्बरिमाया सुत्त” ๒๖๙. สาวตฺถิยํ…เป… ภควา เอตทโวจ – ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติ อสุรินฺโท อาพาธิโก อโหสิ ทุกฺขิโต พาฬฺหคิลาโน. อถ โข ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท เยน เวปจิตฺติ อสุรินฺโท เตนุปสงฺกมิ คิลานปุจฺฉโก. อทฺทสา โข, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติ อสุรินฺโท สกฺกํ เทวานมินฺทํ ทูรโตว อาคจฺฉนฺตํ. ทิสฺวาน สกฺกํ เทวานมินฺทํ เอตทโวจ – ‘ติกิจฺฉ มํ เทวานมินฺทา’ติ. ‘วาเจหิ มํ, เวปจิตฺติ, สมฺพริมาย’นฺติ. ‘น ตาวาหํ วาเจมิ, ยาวาหํ, มาริส, อสุเร ปฏิปุจฺฉามี’’’ติ. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติ อสุรินฺโท อสุเร ปฏิปุจฺฉิ – ‘วาเจมหํ, มาริสา, สกฺกํ เทวานมินฺทํ สมฺพริมาย’นฺติ? ‘มา โข ตฺวํ, มาริส, วาเจสิ สกฺกํ เทวานมินฺทํ สมฺพริมาย’’’นฺติ. อถ โข, ภิกฺขเว, เวปจิตฺติ อสุรินฺโท สกฺกํ เทวานมินฺทํ คาถาย อชฺฌภาสิ – २६९. श्रावस्ती में... भगवान ने यह कहा - 'भिक्षुओं, प्राचीन काल में वेपचित्ति असुरेन्द्र बीमार, दुखी और गंभीर रूप से अस्वस्थ था। तब, भिक्षुओं, देवों के इन्द्र शक्र, वेपचित्ति असुरेन्द्र के पास उसकी बीमारी का हाल पूछने के लिए गए। भिक्षुओं, वेपचित्ति असुरेन्द्र ने देवों के इन्द्र शक्र को दूर से ही आते देखा। देखकर उसने देवों के इन्द्र शक्र से यह कहा - "हे देवेन्द्र, मेरा उपचार करें।" (शक्र ने कहा) "हे वेपचित्ति, मुझे सम्बरी माया सिखाओ।" (वेपचित्ति ने कहा) "हे मित्र, मैं तब तक नहीं सिखाऊँगा जब तक मैं असुरों से पूछ न लूँ।" तब, भिक्षुओं, वेपचित्ति असुरेन्द्र ने असुरों से पूछा - "हे मित्रों, क्या मैं देवों के इन्द्र शक्र को सम्बरी माया सिखा दूँ?" (असुरों ने कहा) "हे मित्र, आप देवों के इन्द्र शक्र को सम्बरी माया न सिखाएँ।" तब, भिक्षुओं, वेपचित्ति असुरेन्द्र ने देवों के इन्द्र शक्र को गाथा में संबोधित किया -' ‘‘มายาวี [Pg.241] มฆวา สกฺก, เทวราช สุชมฺปติ; อุเปติ นิรยํ โฆรํ, สมฺพโรว สตํ สม’’นฺติ. 'हे मायावी मघवा शक्र, सुजा के पति देवराज! (जो माया सीखता है वह) सम्बरी के समान सौ वर्षों तक घोर नरक में जाता है।' ๔. อจฺจยสุตฺตํ ४. अच्चय सुत्त ๒๗๐. สาวตฺถิยํ…เป… อาราเม. เตน โข ปน สมเยน ทฺเว ภิกฺขู สมฺปโยเชสุํ. ตตฺเรโก ภิกฺขุ อจฺจสรา. อถ โข โส ภิกฺขุ ตสฺส ภิกฺขุโน สนฺติเก อจฺจยํ อจฺจยโต เทเสติ; โส ภิกฺขุ นปฺปฏิคฺคณฺหาติ. อถ โข สมฺพหุลา ภิกฺขู เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข เต ภิกฺขู ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘อิธ, ภนฺเต, ทฺเว ภิกฺขู สมฺปโยเชสุํ, ตตฺเรโก ภิกฺขุ อจฺจสรา. อถ โข โส, ภนฺเต, ภิกฺขุ ตสฺส ภิกฺขุโน สนฺติเก อจฺจยํ อจฺจยโต เทเสติ, โส ภิกฺขุ นปฺปฏิคฺคณฺหาตี’’ติ. २७०. श्रावस्ती के... आराम (जेतवन) में। उस समय दो भिक्षुओं के बीच विवाद हुआ। उनमें से एक भिक्षु ने (दूसरे को) अपशब्द कहे। तब उस भिक्षु ने उस (दूसरे) भिक्षु के पास जाकर अपने अपराध को अपराध के रूप में स्वीकार किया; परंतु उस भिक्षु ने उसे स्वीकार नहीं किया। तब बहुत से भिक्षु भगवान के पास गए; जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे उन भिक्षुओं ने भगवान से यह कहा - 'भन्ते, यहाँ दो भिक्षुओं के बीच विवाद हुआ, उनमें से एक भिक्षु ने अतिक्रमण किया। भन्ते, तब उस भिक्षु ने उस भिक्षु के पास जाकर अपने अपराध को अपराध के रूप में स्वीकार किया, परंतु उस भिक्षु ने उसे स्वीकार नहीं किया।' ‘‘ทฺเวเม, ภิกฺขเว, พาลา. โย จ อจฺจยํ อจฺจยโต น ปสฺสติ, โย จ อจฺจยํ เทเสนฺตสฺส ยถาธมฺมํ นปฺปฏิคฺคณฺหา’’ติ – อิเม โข, ภิกฺขเว, ทฺเว พาลา. ‘‘ทฺเวเม, ภิกฺขเว, ปณฺฑิตา. โย จ อจฺจยํ อจฺจยโต ปสฺสติ, โย จ อจฺจยํ เทเสนฺตสฺส ยถาธมฺมํ ปฏิคฺคณฺหา’’ติ – อิเม โข, ภิกฺขเว, ทฺเว ปณฺฑิตา. 'भिक्षुओं, ये दो मूर्ख हैं। वह जो अपराध को अपराध के रूप में नहीं देखता, और वह जो अपराध स्वीकार करने वाले की (क्षमा) को धर्मानुसार स्वीकार नहीं करता - भिक्षुओं, ये दो मूर्ख हैं। भिक्षुओं, ये दो पंडित हैं। वह जो अपराध को अपराध के रूप में देखता है, और वह जो अपराध स्वीकार करने वाले की (क्षमा) को धर्मानुसार स्वीकार करता है - भिक्षुओं, ये दो पंडित हैं।' ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท สุธมฺมายํ สภายํ เทเว ตาวตึเส อนุนยมาโน ตายํ เวลายํ อิมํ คาถํ อภาสิ – 'भिक्षुओं, प्राचीन काल में देवों के इन्द्र शक्र ने सुधर्मा सभा में त्रायस्त्रिंश देवों को समझाते हुए उस समय यह गाथा कही -' ‘‘โกโธ โว วสมายาตุ, มา จ มิตฺเตหิ โว ชรา; อครหิยํ มา ครหิตฺถ, มา จ ภาสิตฺถ เปสุณํ; อถ ปาปชนํ โกโธ, ปพฺพโตวาภิมทฺทตี’’ติ. 'क्रोध को अपने वश में करो, मित्रों के साथ तुम्हारा संबंध जर्जर न हो; जो निंदा के योग्य नहीं है उसकी निंदा न करो, और चुगली न करो; अन्यथा क्रोध दुर्जन व्यक्ति को वैसे ही कुचल देता है जैसे पर्वत।' ๕. อกฺโกธสุตฺตํ ५. अक्कोध सुत्त ๒๗๑. เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู…เป… ภควา เอตทโวจ – ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, สกฺโก เทวานมินฺโท สุธมฺมายํ สภายํ เทเว ตาวตึเส อนุนยมาโน ตายํ เวลายํ อิมํ คาถํ อภาสิ – २७१. ऐसा मैंने सुना है - एक समय भगवान श्रावस्ती के जेतवन में अनाथपिण्डिक के आराम में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को... भगवान ने यह कहा - 'भिक्षुओं, प्राचीन काल में देवों के इन्द्र शक्र ने सुधर्मा सभा में त्रायस्त्रिंश देवों को समझाते हुए उस समय यह गाथा कही -' ‘‘มา [Pg.242] โว โกโธ อชฺฌภวิ, มา จ กุชฺฌิตฺถ กุชฺฌตํ; อกฺโกโธ อวิหึสา จ, อริเยสุ จ ปฏิปทา ; อถ ปาปชนํ โกโธ, ปพฺพโตวาภิมทฺทตี’’ติ. 'क्रोध तुम पर हावी न हो, क्रोध करने वालों पर प्रति-क्रोध न करो; अक्रोध और अहिंसा ही आर्यों का मार्ग है; अन्यथा क्रोध दुर्जन व्यक्ति को वैसे ही कुचल देता है जैसे पर्वत।' ตติโย วคฺโค. तीसरा वर्ग। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश - เฉตฺวา ทุพฺพณฺณิยมายา, อจฺจเยน อโกธโน; เทสิตํ พุทฺธเสฏฺเฐน, อิทญฺหิ สกฺกปญฺจกนฺติ. छेत्वा, दुब्बण्णिय, माया, अच्चय और अकोधन; बुद्ध श्रेष्ठ द्वारा उपदिष्ट ये शक्र-पंचक हैं। สกฺกสํยุตฺตํ สมตฺตํ. शक्र संयुत्त समाप्त। สคาถาวคฺโค ปฐโม. सगाथावग्ग प्रथम। ตสฺสุทฺทานํ – उसका सारांश - เทวตา เทวปุตฺโต จ, ราชา มาโร จ ภิกฺขุนี; พฺรหฺมา พฺราหฺมณ วงฺคีโส, วนยกฺเขน วาสโวติ. देवता, देवपुत्र, राजा, मार, भिक्षुणी, ब्रह्मा, ब्राह्मण, वंगीस, वन, यक्ष और वासव (शक्र)। สคาถาวคฺคสํยุตฺตปาฬิ นิฏฺฐิตา. सगाथावग्ग संयुत्त पालि समाप्त। | |||
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |