| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| Français | |||
| Canon Pali | Commentaires | Sous-commentaires | Autres |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| Deutsch | |||
| Pali-Kanon | Kommentare | Subkommentare | Sonstige |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
1 නමො තස්ස භගවතො අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්ස त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धाला नमस्कार असो. සංයුත්තනිකායො संयुत्तनिकाय සගාථාවග්ගො सगाथावग्ग 1. දෙවතාසංයුත්තං १. देवतासंयुत्त 1. නළවග්ගො १. नळवग्ग 1. ඔඝතරණසුත්තං १. ओघतरणसुत्त 1. එවං [Pg.1] මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. අථ ඛො අඤ්ඤතරා දෙවතා අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණා කෙවලකප්පං ජෙතවනං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතා ඛො සා දෙවතා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘‘කථං නු ත්වං, මාරිස, ඔඝමතරී’ති? ‘අප්පතිට්ඨං ඛ්වාහං, ආවුසො, අනායූහං ඔඝමතරි’න්ති. ‘යථා කථං පන ත්වං, මාරිස, අප්පතිට්ඨං අනායූහං ඔඝමතරී’ති? ‘යදාඛ්වාහං, ආවුසො, සන්තිට්ඨාමි තදාස්සු සංසීදාමි; යදාඛ්වාහං, ආවුසො, ආයූහාමි තදාස්සු නිබ්බුය්හාමි. එවං ඛ්වාහං, ආවුසො, අප්පතිට්ඨං අනායූහං ඔඝමතරි’’’න්ති. १. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान श्रावस्ती येथील अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेव्हा, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, अत्यंत देदीप्यमान कांतीची एक देवता संपूर्ण जेतवनाला आपल्या प्रकाशाने उजळून टाकत भगवंतांच्या समीप आली. समीप येऊन, भगवंतांना अभिवादन करून ती एका बाजूला उभी राहिली. एका बाजूला उभी राहिलेली ती देवता भगवंतांना म्हणाली – 'हे महाशय, आपण ओघ (संसार-प्रवाह) कसा पार केलात?' 'मित्रा, न थांबता आणि प्रयत्न न करता मी ओघ पार केला.' 'पण हे महाशय, न थांबता आणि प्रयत्न न करता आपण ओघ कसा पार केलात?' 'मित्रा, जेव्हा मी थांबत असे, तेव्हा मी बुडत असे; आणि जेव्हा मी प्रयत्न करत असे, तेव्हा मी वाहून जात असे. अशा प्रकारे, मित्रा, न थांबता आणि प्रयत्न न करता मी ओघ पार केला.' ‘‘චිරස්සං වත පස්සාමි, බ්රාහ්මණං පරිනිබ්බුතං; අප්පතිට්ඨං අනායූහං, තිණ්ණං ලොකෙ විසත්තික’’න්ති. – ‘खरोखर, दीर्घकाळानंतर मी अशा परिनिर्वृत ब्राह्मणाला पाहत आहे, जे न थांबता, प्रयत्न न करता, या जगातील तृष्णेला पार करून गेले आहेत.’ ඉදමවොච [Pg.2] සා දෙවතා. සමනුඤ්ඤො සත්ථා අහොසි. අථ ඛො සා දෙවතා – ‘‘සමනුඤ්ඤො මෙ සත්ථා’’ති භගවන්තං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා තත්ථෙවන්තරධායීති. ती देवता असे म्हणाली. शास्त्यांनी (बुद्धांनी) याला संमती दिली. तेव्हा ती देवता 'शास्त्यांनी मला संमती दिली आहे' असे जाणून भगवंतांना अभिवादन करून, प्रदक्षिणा घालून तिथेच अंतर्धान पावली. 2. නිමොක්ඛසුත්තං २. निमोक्खसुत्त 2. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො අඤ්ඤතරා දෙවතා අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණා කෙවලකප්පං ජෙතවනං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතා ඛො සා දෙවතා භගවන්තං එතදවොච – २. श्रावस्ती येथील निदान. तेव्हा, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, अत्यंत देदीप्यमान कांतीची एक देवता संपूर्ण जेतवनाला आपल्या प्रकाशाने उजळून टाकत भगवंतांच्या समीप आली. समीप येऊन, भगवंतांना अभिवादन करून ती एका बाजूला उभी राहिली. एका बाजूला उभी राहिलेली ती देवता भगवंतांना म्हणाली – ‘‘ජානාසි නො ත්වං, මාරිස, සත්තානං නිමොක්ඛං පමොක්ඛං විවෙක’’න්ති? ‘हे महाशय, आपण प्राण्यांचे निमोक्ख (बंधनमुक्ती), पमोक्ख (पूर्ण मुक्ती) आणि विवेक (अलिप्तता) जाणता का?’ ‘‘ජානාමි ඛ්වාහං, ආවුසො, සත්තානං නිමොක්ඛං පමොක්ඛං විවෙක’’න්ති. ‘मित्रा, मी प्राण्यांचे निमोक्ख, पमोक्ख आणि विवेक जाणतो.’ ‘‘යථා කථං පන ත්වං, මාරිස, ජානාසි සත්තානං නිමොක්ඛං පමොක්ඛං විවෙක’’න්ති? ‘पण हे महाशय, आपण प्राण्यांचे निमोक्ख, पमोक्ख आणि विवेक कशा प्रकारे जाणता?’ ‘‘නන්දීභවපරික්ඛයා, සඤ්ඤාවිඤ්ඤාණසඞ්ඛයා, වෙදනානං නිරොධා උපසමා – එවං ඛ්වාහං, ආවුසො, ජානාමි සත්තානං නිමොක්ඛං පමොක්ඛං විවෙක’’න්ති. ‘नंदी (आसक्ती) आणि भव यांच्या पूर्ण क्षयामुळे, संज्ञा आणि विज्ञानाचा नाश झाल्यामुळे, वेदनांचा निरोध व उपशम झाल्यामुळे – मित्रा, अशा प्रकारे मी प्राण्यांचे निमोक्ख, पमोक्ख आणि विवेक जाणतो.’ 3. උපනීයසුත්තං ३. उपनीयसुत्त 3. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං ඨිතා ඛො සා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – ३. श्रावस्ती येथील निदान. एका बाजूला उभी राहिलेली ती देवता भगवंतांच्या सन्निध ही गाथा म्हणाली – ‘‘උපනීයති ජීවිතමප්පමායු,ජරූපනීතස්ස න සන්ති තාණා; එතං භයං මරණෙ පෙක්ඛමානො,පුඤ්ඤානි කයිරාථ සුඛාවහානී’’ති. ‘आयुष्य कमी होत आहे, जीवन ओढून नेले जात आहे. वृद्धत्वाकडे नेल्या गेलेल्या माणसाला कोणतेही रक्षण नसते. मृत्यूचे हे भय पाहत, माणसाने सुख देणारी पुण्यकर्मे करावीत.’ ‘‘උපනීයති ජීවිතමප්පමායු,ජරූපනීතස්ස න සන්ති තාණා; එතං භයං මරණෙ පෙක්ඛමානො,ලොකාමිසං පජහෙ සන්තිපෙක්ඛො’’ති. ‘आयुष्य कमी होत आहे, जीवन ओढून नेले जात आहे. वृद्धत्वाकडे नेल्या गेलेल्या माणसाला कोणतेही रक्षण नसते. मृत्यूचे हे भय पाहत, शांतीची इच्छा करणाऱ्याने लौकिक आमिषांचा त्याग करावा.’ 4. අච්චෙන්තිසුත්තං ४. अच्चेन्तिसुत्त 4. සාවත්ථිනිදානං[Pg.3]. එකමන්තං ඨිතා ඛො සා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – ४. श्रावस्ती येथील निदान. एका बाजूला उभी राहिलेली ती देवता भगवंतांच्या सन्निध ही गाथा म्हणाली – ‘‘අච්චෙන්ති කාලා තරයන්ති රත්තියො,වයොගුණා අනුපුබ්බං ජහන්ති; එතං භයං මරණෙ පෙක්ඛමානො,පුඤ්ඤානි කයිරාථ සුඛාවහානී’’ති. ‘काळ निघून जात आहे, रात्री वेगाने सरत आहेत, वयाच्या अवस्था एकामागून एक सोडून जात आहेत. मृत्यूचे हे भय पाहत, माणसाने सुख देणारी पुण्यकर्मे करावीत.’ ‘‘අච්චෙන්ති කාලා තරයන්ති රත්තියො,වයොගුණා අනුපුබ්බං ජහන්ති; එතං භයං මරණෙ පෙක්ඛමානො,ලොකාමිසං පජහෙ සන්තිපෙක්ඛො’’ති. ‘काळ निघून जात आहे, रात्री वेगाने सरत आहेत, वयाच्या अवस्था एकामागून एक सोडून जात आहेत. मृत्यूचे हे भय पाहत, शांतीची इच्छा करणाऱ्याने लौकिक आमिषांचा त्याग करावा.’ 5. කතිඡින්දසුත්තං ५. कतिछिन्दसुत्त 5. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං ඨිතා ඛො සා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – ५. श्रावस्ती येथील निदान. एका बाजूला उभी राहिलेली ती देवता भगवंतांच्या सन्निध ही गाथा म्हणाली – ‘‘කති ඡින්දෙ කති ජහෙ, කති චුත්තරි භාවයෙ; කති සඞ්ගාතිගො භික්ඛු, ඔඝතිණ්ණොති වුච්චතී’’ති. ‘किती बंधने तोडावीत, किती सोडावीत आणि आणखी किती विकसित करावीत? किती आसक्ती पार केलेल्या भिक्खूला ओघ पार केलेला म्हटले जाते?’ ‘‘පඤ්ච ඡින්දෙ පඤ්ච ජහෙ, පඤ්ච චුත්තරි භාවයෙ; පඤ්ච සඞ්ගාතිගො භික්ඛු, ඔඝතිණ්ණොති වුච්චතී’’ති. ‘पाच तोडावीत, पाच सोडावीत आणि आणखी पाच विकसित करावीत. पाच आसक्ती पार केलेल्या भिक्खूला ओघ पार केलेला म्हटले जाते.’ 6. ජාගරසුත්තං ६. जागरसुत्त 6. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං ඨිතා ඛො සා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – ६. श्रावस्ती येथील निदान. एका बाजूला उभी राहिलेली ती देवता भगवंतांच्या सन्निध ही गाथा म्हणाली – ‘‘කති ජාගරතං සුත්තා, කති සුත්තෙසු ජාගරා; කතිභි රජමාදෙති, කතිභි පරිසුජ්ඣතී’’ති. ‘जागे असणाऱ्यांमध्ये किती झोपलेले असतात? झोपलेल्यांमध्ये किती जागे असतात? किती गोष्टींमुळे माणूस मळ गोळा करतो? आणि किती गोष्टींमुळे तो शुद्ध होतो?’ ‘‘පඤ්ච ජාගරතං සුත්තා, පඤ්ච සුත්තෙසු ජාගරා; පඤ්චභි රජමාදෙති, පඤ්චභි පරිසුජ්ඣතී’’ති. ‘जागे असणाऱ्यांमध्ये पाच झोपलेले असतात; झोपलेल्यांमध्ये पाच जागे असतात. पाच गोष्टींमुळे माणूस मळ गोळा करतो आणि पाच गोष्टींमुळे तो शुद्ध होतो.’ 7. අප්පටිවිදිතසුත්තං ७. अप्पटिविदितसुत्त 7. සාවත්ථිනිදානං[Pg.4]. එකමන්තං ඨිතා ඛො සා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – ७. श्रावस्ती येथील निदान. एका बाजूला उभी राहिलेली ती देवता भगवंतांच्या सन्निध ही गाथा म्हणाली – ‘‘යෙසං ධම්මා අප්පටිවිදිතා, පරවාදෙසු නීයරෙ ; සුත්තා තෙ නප්පබුජ්ඣන්ති, කාලො තෙසං පබුජ්ඣිතු’’න්ති. ‘ज्यांनी धम्माचे आकलन केले नाही, जे इतरांच्या सिद्धांतांकडे ओढले जातात; ते गाढ झोपलेले आहेत, ते जागे होत नाहीत. आता त्यांच्या जागे होण्याची वेळ आली आहे.’ ‘‘යෙසං ධම්මා සුප්පටිවිදිතා, පරවාදෙසු න නීයරෙ; තෙ සම්බුද්ධා සම්මදඤ්ඤා, චරන්ති විසමෙ සම’’න්ති. ‘ज्यांनी धम्माचे उत्तम आकलन केले आहे, जे इतरांच्या सिद्धांतांकडे ओढले जात नाहीत; ते सम्यक ज्ञानाने युक्त बुद्ध होऊन, या विषम जगात समतेने वावरतात.’ 8. සුසම්මුට්ඨසුත්තං ८. सुसम्मुट्ठसुत्त 8. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං ඨිතා ඛො සා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – ८. श्रावस्ती येथील निदान. एका बाजूला उभी राहिलेली ती देवता भगवंतांच्या सन्निध ही गाथा म्हणाली – ‘‘යෙසං ධම්මා සුසම්මුට්ඨා, පරවාදෙසු නීයරෙ; සුත්තා තෙ නප්පබුජ්ඣන්ති, කාලො තෙසං පබුජ්ඣිතු’’න්ති. ‘ज्यांचे धम्माविषयीचे ज्ञान पूर्णपणे लुप्त झाले आहे, जे इतरांच्या सिद्धांतांकडे ओढले जातात; ते गाढ झोपलेले आहेत, ते जागे होत नाहीत. आता त्यांच्या जागे होण्याची वेळ आली आहे.’ ‘‘යෙසං ධම්මා අසම්මුට්ඨා, පරවාදෙසු න නීයරෙ; තෙ සම්බුද්ධා සම්මදඤ්ඤා, චරන්ති විසමෙ සම’’න්ති. ‘ज्यांचे धम्माविषयीचे ज्ञान लुप्त झालेले नाही, जे इतरांच्या सिद्धांतांकडे ओढले जात नाहीत; ते सम्यक ज्ञानाने युक्त बुद्ध होऊन, या विषम जगात समतेने वावरतात.’ 9. මානකාමසුත්තං ९. मानकामसुत्त 9. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං ඨිතා ඛො සා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – ९. श्रावस्ती येथील प्रसंग. एका बाजूला उभी राहिलेली ती देवता भगवंतांच्या सन्निध ही गाथा म्हणाली – ‘‘න මානකාමස්ස දමො ඉධත්ථි,න මොනමත්ථි අසමාහිතස්ස; එකො අරඤ්ඤෙ විහරං පමත්තො,න මච්චුධෙය්යස්ස තරෙය්ය පාර’’න්ති. "येथे (या लोकात) मानाची (अहंकाराची) इच्छा करणाऱ्याला इंद्रियसंयम (दम) प्राप्त होत नाही, आणि जो असंयत (असमाहित) आहे त्याला मुनिभाव (मौन/ज्ञान) प्राप्त होत नाही. अरण्यात एकटा राहूनही जो प्रमादी (सावध नसलेला) आहे, तो मृत्यूच्या राज्याच्या (संसारचक्राच्या) पलीकडच्या तीराला (निर्वाणाला) पार करू शकत नाही." ‘‘මානං පහාය සුසමාහිතත්තො,සුචෙතසො සබ්බධි විප්පමුත්තො; එකො අරඤ්ඤෙ විහරං අප්පමත්තො,ස මච්චුධෙය්යස්ස තරෙය්ය පාර’’න්ති. "मान (अहंकार) सोडून, सुसमाहित (उत्तम प्रकारे एकाग्र) चित्त असलेला, शुद्ध मनाचा आणि सर्व प्रकारे (आसक्तीपासून) विमुक्त झालेला; अरण्यात एकटा राहून जो अप्रमादी (जागरूक) राहतो, तो मृत्यूच्या राज्याच्या पलीकडच्या तीराला पार करू शकतो." 10. අරඤ්ඤසුත්තං १०. अरण्यसुत्त 10. සාවත්ථිනිදානං[Pg.5]. එකමන්තං ඨිතා ඛො සා දෙවතා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – १०. श्रावस्ती येथील प्रसंग. एका बाजूला उभी राहिलेली ती देवता भगवंतांना गाथेने संबोधित करती झाली – ‘‘අරඤ්ඤෙ විහරන්තානං, සන්තානං බ්රහ්මචාරිනං; එකභත්තං භුඤ්ජමානානං, කෙන වණ්ණො පසීදතී’’ති. "अरण्यात राहणाऱ्या, शांत आणि ब्रह्मचर्य पाळणाऱ्या, दिवसातून केवळ एकच वेळ भोजन करणाऱ्या (भिक्षूंचा) वर्ण (चेहऱ्याची कांती) एवढा प्रसन्न का दिसतो?" ‘‘අතීතං නානුසොචන්ති, නප්පජප්පන්ති නාගතං; පච්චුප්පන්නෙන යාපෙන්ති, තෙන වණ්ණො පසීදති’’. "ते भूतकाळाबद्दल शोक करत नाहीत, आणि भविष्यकाळाची आकांक्षा धरत नाहीत. जे काही वर्तमानकाळात प्राप्त होते, त्यावरच ते जीवन जगतात; म्हणूनच त्यांचा वर्ण प्रसन्न दिसतो." ‘‘අනාගතප්පජප්පාය, අතීතස්සානුසොචනා; එතෙන බාලා සුස්සන්ති, නළොව හරිතො ලුතො’’ති. "भविष्यकाळाच्या आकांक्षेमुळे आणि भूतकाळाच्या शोकामुळे, मूर्ख लोक वाळून जातात; जणू काही कापून टाकलेले हिरवे बोर (वेळू) वाळून जावे." නළවග්ගො පඨමො. पहिला नळवर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याचा सारांश (उद्दान) – ඔඝං නිමොක්ඛං උපනෙය්යං, අච්චෙන්ති කතිඡින්දි ච; ජාගරං අප්පටිවිදිතා, සුසම්මුට්ඨා මානකාමිනා; අරඤ්ඤෙ දසමො වුත්තො, වග්ගො තෙන පවුච්චති. ओघ, निमोक्ख, उपनेय्य, अच्चेन्ति आणि कतिछिन्दि; जागर, अप्पटिविदिता, सुसम्मुट्ठा, मानकामी; आणि दहावे अरण्यसुत्त सांगितले आहे, म्हणूनच याला (नळ) वर्ग म्हटले जाते. 2. නන්දනවග්ගො २. नंदनवर्ग 1. නන්දනසුත්තං १. नंदनसुत्त 11. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. තත්ර ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘භික්ඛවො’’ති. ‘‘භදන්තෙ’’ති තෙ භික්ඛූ භගවතො පච්චස්සොසුං. භගවා එතදවොච – ११. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान श्रावस्ती येथील अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेथे भगवंतांनी भिक्षूंना संबोधित केले – \"भिक्षूंनो!\" \"भदंत (पूज्य महोदय)!\" अशा शब्दांत त्या भिक्षूंनी भगवंतांना प्रतिसाद दिला. भगवान म्हणाले – ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, අඤ්ඤතරා තාවතිංසකායිකා දෙවතා නන්දනෙ වනෙ අච්ඡරාසඞ්ඝපරිවුතා දිබ්බෙහි පඤ්චහි කාමගුණෙහි සමප්පිතා සමඞ්ගීභූතා පරිචාරියමානා තායං වෙලායං ඉමං ගාථං අභාසි – "भिक्षूंनो, पूर्वी कधीतरी तावतिंस देवलोकातील एक देवपुत्र नंदनवनात अप्सरांच्या समूहाने वेढलेला, पाच प्रकारच्या दिव्य कामगुणांनी युक्त होऊन विलास करत असताना, त्या वेळी ही गाथा म्हणाला – ‘‘න [Pg.6] තෙ සුඛං පජානන්ති, යෙ න පස්සන්ති නන්දනං; ආවාසං නරදෙවානං, තිදසානං යසස්සින’’න්ති. "ज्यांनी यशस्वी अशा तीस (तावतिंस) देवपुत्रांचे निवासस्थान असलेले नंदनवन पाहिले नाही, त्यांना सुखाचा अनुभव काय असतो हे ठाऊकच नाही." ‘‘එවං වුත්තෙ, භික්ඛවෙ, අඤ්ඤතරා දෙවතා තං දෙවතං ගාථාය පච්චභාසි – "भिक्षूंनो, असे म्हटले असता, एका दुसऱ्या देवपुत्राने त्या देवपुत्राला गाथेने प्रत्युत्तर दिले – ‘‘න ත්වං බාලෙ පජානාසි, යථා අරහතං වචො; අනිච්චා සබ්බසඞ්ඛාරා, උප්පාදවයධම්මිනො; උප්පජ්ජිත්වා නිරුජ්ඣන්ති, තෙසං වූපසමො සුඛො’’ති. "हे मूर्खा, अर्हतांचे वचन काय आहे हे तुला ठाऊक नाही. सर्व संस्कार (उत्पन्न झालेल्या गोष्टी) अनित्य आहेत, उत्पन्न होणे आणि नष्ट होणे हा त्यांचा स्वभाव आहे. उत्पन्न होऊन ते निरुद्ध (नष्ट) होतात; त्यांचा उपशम (शांत होणे/निर्वाण) हेच खरे सुख आहे." 2. නන්දතිසුත්තං २. नन्दतिसुत्त 12. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං ඨිතා ඛො සා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – १२. श्रावस्ती येथील प्रसंग. एका बाजूला उभी राहिलेली ती देवता भगवंतांच्या सन्निध ही गाथा म्हणाली – ‘‘නන්දති පුත්තෙහි පුත්තිමා,ගොමා ගොහි තථෙව නන්දති; උපධීහි නරස්ස නන්දනා,න හි සො නන්දති යො නිරූපධී’’ති. "पुत्र असलेला मनुष्य पुत्रांमुळे आनंदित होतो, तसेच गायी (पशू) असलेला मनुष्य गायींमुळे आनंदित होतो. मनुष्याला उपाधींमुळेच (आसक्तीच्या वस्तूंमुळे) आनंद मिळतो; ज्याच्याकडे कोणतीही उपाधी (आसक्ती) नाही, तो कधीही आनंदित (संसार सुखात मग्न) होत नाही." ‘‘සොචති පුත්තෙහි පුත්තිමා,ගොමා ගොහි තථෙව සොචති; උපධීහි නරස්ස සොචනා,න හි සො සොචති යො නිරූපධී’’ති. "पुत्र असलेला मनुष्य पुत्रांमुळेच शोक करतो, तसेच गायी असलेला मनुष्य गायींमुळेच शोक करतो. मनुष्याला उपाधींमुळेच (आसक्तीच्या वस्तूंमुळे) शोक प्राप्त होतो; ज्याच्याकडे कोणतीही उपाधी (आसक्ती) नाही, तो कधीही शोक करत नाही." 3. නත්ථිපුත්තසමසුත්තං ३. नत्थिपुत्तसमसुत्त 13. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං ඨිතා ඛො සා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – १३. श्रावस्ती येथील प्रसंग. एका बाजूला उभी राहिलेली ती देवता भगवंतांच्या सन्निध ही गाथा म्हणाली – ‘‘නත්ථි පුත්තසමං පෙමං, නත්ථි ගොසමිතං ධනං; නත්ථි සූරියසමා ආභා, සමුද්දපරමා සරා’’ති. "पुत्रासारखे दुसरे प्रेम नाही, गायींसारखे (पशूंसारखे) दुसरे धन नाही, सूर्यासारखा दुसरा प्रकाश नाही आणि समुद्रापेक्षा मोठा दुसरा जलाशय नाही." ‘‘නත්ථි අත්තසමං පෙමං, නත්ථි ධඤ්ඤසමං ධනං; නත්ථි පඤ්ඤාසමා ආභා, වුට්ඨි වෙ පරමා සරා’’ති. "स्वतःसारखे दुसरे प्रेम नाही, धान्यासारखे दुसरे धन नाही, प्रज्ञेसारखा दुसरा प्रकाश नाही आणि पावसाच्या पाण्यापेक्षा मोठा दुसरा जलाशय नाही." 4. ඛත්තියසුත්තං ४. खत्तियसुत्त 14. ‘‘ඛත්තියො [Pg.7] ද්විපදං සෙට්ඨො, බලීබද්දො චතුප්පදං. १४. "दोन पायांच्या प्राण्यांमध्ये (मनुष्यांमध्ये) क्षत्रिय श्रेष्ठ आहे, चार पायांच्या प्राण्यांमध्ये बैल श्रेष्ठ आहे." කොමාරී සෙට්ඨා භරියානං, යො ච පුත්තාන පුබ්බජො’’ති. "पत्नींमध्ये कुमारी (तरुण वधू) श्रेष्ठ आहे, आणि पुत्रांमध्ये ज्येष्ठ (पहिला जन्मलेला) पुत्र श्रेष्ठ आहे." ‘‘සම්බුද්ධො ද්විපදං සෙට්ඨො, ආජානීයො චතුප්පදං; සුස්සූසා සෙට්ඨා භරියානං, යො ච පුත්තානමස්සවො’’ති. "दोन पायांच्या प्राण्यांमध्ये सम्यक्संबुद्ध श्रेष्ठ आहेत, चार पायांच्या प्राण्यांमध्ये आजानीय (उत्कृष्ट घोडा किंवा हत्ती) श्रेष्ठ आहे; पत्नींमध्ये पतीची सेवा करणारी (शुश्रूषा करणारी) पत्नी श्रेष्ठ आहे, आणि पुत्रांमध्ये आज्ञाधारक पुत्र श्रेष्ठ आहे." 5. සණමානසුත්තං ५. सणमानसुत्त 15. ‘‘ඨිතෙ මජ්ඣන්හිකෙ කාලෙ, සන්නිසීවෙසු පක්ඛිසු. १५. "दुपारची वेळ झाली असता आणि पक्षी शांत बसले असता," සණතෙව බ්රහාරඤ්ඤං, තං භයං පටිභාති ම’’න්ති. "हे मोठे अरण्य जणू काही गुंजारव (आवाज) करत आहे; हे मला अत्यंत भयावह वाटते." ‘‘ඨිතෙ මජ්ඣන්හිකෙ කාලෙ, සන්නිසීවෙසු පක්ඛිසු; සණතෙව බ්රහාරඤ්ඤං, සා රති පටිභාති ම’’න්ති. "दुपारची वेळ झाली असता आणि पक्षी शांत बसले असता, हे मोठे अरण्य जणू काही गुंजारव करत आहे; हे मला अत्यंत रमणीय (आनंददायी) वाटते." 6. නිද්දාතන්දීසුත්තං ६. निद्दातन्दीसुत्त 16. ‘‘නිද්දා තන්දී විජම්භිතා, අරතී භත්තසම්මදො. १६. "झोप (तंद्रा), आळस, अंग ताणणे (जांभई देणे), अरती (असमाधान/धर्मात मन न लागणे) आणि जेवणानंतरची सुस्ती (भक्तसंमद);" එතෙන නප්පකාසති, අරියමග්ගො ඉධ පාණින’’න්ති. "या कारणांमुळे, या लोकात प्राण्यांना आर्यमार्ग स्पष्टपणे दिसत नाही (प्रकट होत नाही)." ‘‘නිද්දං තන්දිං විජම්භිතං, අරතිං භත්තසම්මදං; වීරියෙන නං පණාමෙත්වා, අරියමග්ගො විසුජ්ඣතී’’ති. "झोप, आळस, अंग ताणणे, अरती आणि जेवणानंतरची सुस्ती; जेव्हा मनुष्य वीर्याने (प्रयत्नाने/उत्साहाने) या सर्वांना दूर करतो, तेव्हा त्याचा आर्यमार्ग शुद्ध (प्रकट) होतो." 7. දුක්කරසුත්තං ७. दुक्करसुत्त 17. ‘‘දුක්කරං දුත්තිතික්ඛඤ්ච, අබ්යත්තෙන ච සාමඤ්ඤං. १७. "अकुशल (अज्ञानी) व्यक्तीसाठी श्रमणत्व (संन्यासी जीवन) आचरणात आणणे कठीण आहे आणि ते सहन करणेही अत्यंत कठीण आहे." බහූහි තත්ථ සම්බාධා, යත්ථ බාලො විසීදතී’’ති. ज्या (श्रमणधर्मात) अज्ञानी मनुष्य खचून जातो, तिथे अनेक अडथळे असतात. ‘‘කතිහං චරෙය්ය සාමඤ්ඤං, චිත්තං චෙ න නිවාරයෙ; පදෙ පදෙ විසීදෙය්ය, සඞ්කප්පානං වසානුගො’’ති. जर एखाद्याने आपल्या मनावर नियंत्रण ठेवले नाही, आणि तो आपल्या संकल्पांच्या आहारी जाऊन पाऊलोपाऊल खचत गेला, तर तो किती दिवस श्रमणधर्माचे आचरण करू शकेल? ‘‘කුම්මොව අඞ්ගානි සකෙ කපාලෙ,සමොදහං භික්ඛු මනොවිතක්කෙ; අනිස්සිතො අඤ්ඤමහෙඨයානො,පරිනිබ්බුතො නූපවදෙය්ය කඤ්චී’’ති. ज्याप्रमाणे कासव आपले अवयव स्वतःच्या पाठीच्या कवचात सुरक्षितपणे ओढून घेतो, त्याचप्रमाणे भिक्खूने आपल्या मनातील विचारांना (वितर्कांना) आवरून धरावे. तो कशावरही अवलंबून न राहता (तृष्णा व दृष्टीपासून अलिप्त राहून), कोणालाही त्रास न देता, पूर्णपणे शांत (परिनिर्वृत) होऊन कोणाचीही निंदा करणार नाही. 8. හිරීසුත්තං ८. हिरी सुत्त (लज्जा सूत्र) 18. ‘‘හිරීනිසෙධො [Pg.8] පුරිසො, කොචි ලොකස්මිං විජ්ජති. १८. या जगात असा एखादा मनुष्य आढळतो का, जो लज्जेने (पापभीरुतेने) स्वतःला आवरतो, යො නින්දං අපබොධති, අස්සො භද්රො කසාමිවා’’ති. जो निंदेला तसाच टाळतो, ज्याप्रमाणे एक उत्तम घोडा चाबकाच्या फटक्याला टाळतो? ‘‘හිරීනිසෙධා තනුයා, යෙ චරන්ති සදා සතා; අන්තං දුක්ඛස්ස පප්පුය්ය, චරන්ති විසමෙ සම’’න්ති. असे लोक फार थोडे आहेत जे नेहमी जागरूक (स्मृतिमान) राहून लज्जेने स्वतःला आवरतात. ते दुःखाचा अंत गाठून, या विषम जगात समतेने वावरतात. 9. කුටිකාසුත්තං ९. कुटिका सुत्त (झोपडी सूत्र) 19. १९. ‘‘කච්චි තෙ කුටිකා නත්ථි, කච්චි නත්ථි කුලාවකා; කච්චි සන්තානකා නත්ථි, කච්චි මුත්තොසි බන්ධනා’’ති. काय आपली एखादी झोपडी नाही? आपले एखादे घरटे नाही? आपले कोणतेही धागे पसरलेले नाहीत? आपण बंधनातून मुक्त आहात का? ‘‘තග්ඝ මෙ කුටිකා නත්ථි, තග්ඝ නත්ථි කුලාවකා; තග්ඝ සන්තානකා නත්ථි, තග්ඝ මුත්තොම්හි බන්ධනා’’ති. नक्कीच, माझी कोणतीही झोपडी नाही; नक्कीच, माझे कोणतेही घरटे नाही; नक्कीच, माझे कोणतेही धागे पसरलेले नाहीत; आणि नक्कीच, मी बंधनातून मुक्त आहे. ‘‘කින්තාහං කුටිකං බ්රූමි, කිං තෙ බ්රූමි කුලාවකං; කිං තෙ සන්තානකං බ්රූමි, කින්තාහං බ්රූමි බන්ධන’’න්ති. मी कशाला 'झोपडी' म्हणतो असे आपल्याला वाटते? मी कशाला 'घरटे' म्हणतो? मी कशाला 'पसरलेले धागे' म्हणतो? आणि मी कशाला 'बंधन' म्हणतो? ‘‘මාතරං කුටිකං බ්රූසි, භරියං බ්රූසි කුලාවකං; පුත්තෙ සන්තානකෙ බ්රූසි, තණ්හං මෙ බ්රූසි බන්ධන’’න්ති. तू मातेला 'झोपडी' म्हणतोस, पत्नीला 'घरटे' म्हणतोस, पुत्रांना 'पसरलेले धागे' म्हणतोस, आणि तृष्णेला तू माझ्यासाठी 'बंधन' म्हणतोस. ‘‘සාහු තෙ කුටිකා නත්ථි, සාහු නත්ථි කුලාවකා; සාහු සන්තානකා නත්ථි, සාහු මුත්තොසි බන්ධනා’’ති. हे उत्तम आहे की आपली कोणतीही झोपडी नाही; उत्तम आहे की आपले कोणतेही घरटे नाही; उत्तम आहे की आपले कोणतेही पसरलेले धागे नाहीत; आणि उत्तम आहे की आपण बंधनातून मुक्त आहात. 10. සමිද්ධිසුත්තං १०. समिद्धि सुत्त 20. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති තපොදාරාමෙ. අථ ඛො ආයස්මා සමිද්ධි රත්තියා පච්චූසසමයං පච්චුට්ඨාය යෙන තපොදා තෙනුපසඞ්කමි ගත්තානි පරිසිඤ්චිතුං. තපොදෙ ගත්තානි පරිසිඤ්චිත්වා පච්චුත්තරිත්වා එකචීවරො අට්ඨාසි ගත්තානි පුබ්බාපයමානො. අථ ඛො අඤ්ඤතරා දෙවතා අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණා කෙවලකප්පං තපොදං ඔභාසෙත්වා යෙන ආයස්මා සමිද්ධි තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා වෙහාසං ඨිතා ආයස්මන්තං සමිද්ධිං ගාථාය අජ්ඣභාසි – २०. असे मी ऐकले आहे – एक वेळ भगवान राजगृह येथील तपोदाराम (उष्ण पाण्याच्या झऱ्यांच्या उद्यानात) विहार करत होते. तेव्हा आयुष्यमान समिद्धि रात्रीच्या पहाटेच्या वेळी उठून, जेथे तपोदा (उष्ण पाण्याचा झरा) होती, तिथे स्नान करण्यासाठी गेले. तपोदामध्ये स्नान करून, बाहेर येऊन, ते एकाच चीवरात आपले शरीर सुकवत उभे राहिले. तेव्हा, रात्र संपत आली असताना, अत्यंत देदीप्यमान कांती असलेली एक देवता संपूर्ण तपोदा परिसर प्रकाशित करत आयुष्यमान समिद्धि यांच्याजवळ आली. जवळ येऊन, ती आकाशात उभी राहिली आणि तिने आयुष्यमान समिद्धि यांना गाथेने संबोधित केले – ‘‘අභුත්වා [Pg.9] භික්ඛසි භික්ඛු, න හි භුත්වාන භික්ඛසි; භුත්වාන භික්ඛු භික්ඛස්සු, මා තං කාලො උපච්චගා’’ති. ‘हे भिक्खू! तू उपभोग न घेताच भिक्षा मागत आहेस, उपभोग घेऊन भिक्षा मागत नाहीस. हे भिक्खू! आधी उपभोग घे आणि मग भिक्षा माग; तुझी वेळ निघून जाऊ देऊ नकोस!’ ‘‘කාලං වොහං න ජානාමි, ඡන්නො කාලො න දිස්සති; තස්මා අභුත්වා භික්ඛාමි, මා මං කාලො උපච්චගා’’ති. ‘मी वेळ जाणत नाही, ती वेळ गुप्त आहे आणि दिसत नाही. म्हणूनच, उपभोग न घेता मी भिक्षा मागत आहे, जेणेकरून माझी वेळ निघून जाऊ नये.’ අථ ඛො සා දෙවතා පථවියං පතිට්ඨහිත්වා ආයස්මන්තං සමිද්ධිං එතදවොච – ‘‘දහරො ත්වං භික්ඛු, පබ්බජිතො සුසු කාළකෙසො, භද්රෙන යොබ්බනෙන සමන්නාගතො, පඨමෙන වයසා, අනික්කීළිතාවී කාමෙසු. භුඤ්ජ, භික්ඛු, මානුසකෙ කාමෙ; මා සන්දිට්ඨිකං හිත්වා කාලිකං අනුධාවී’’ති. त्यानंतर ती देवता जमिनीवर उतरली आणि आयुष्यमान समिद्धि यांना म्हणाली – ‘हे भिक्खू! तू तरुण आहेस, नुकताच प्रव्रजित झालेला, काळेभोर केस असलेला, तारुण्याच्या सौंदर्याने युक्त आणि आयुष्याच्या पहिल्या टप्प्यात असलेला आहेस. तू कामभोगांचा कधी उपभोग घेतलेला नाहीस. हे भिक्खू! मानवी कामभोगांचा उपभोग घे; प्रत्यक्ष दिसणाऱ्या सुखाचा त्याग करून काळाच्या ओघात मिळणाऱ्या सुखाच्या मागे धावू नकोस.’ ‘‘න ඛ්වාහං, ආවුසො, සන්දිට්ඨිකං හිත්වා කාලිකං අනුධාවාමි. කාලිකඤ්ච ඛ්වාහං, ආවුසො, හිත්වා සන්දිට්ඨිකං අනුධාවාමි. කාලිකා හි, ආවුසො, කාමා වුත්තා භගවතා බහුදුක්ඛා බහුපායාසා; ආදීනවො එත්ථ භිය්යො. සන්දිට්ඨිකො අයං ධම්මො අකාලිකො එහිපස්සිකො ඔපනෙය්යිකො පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’’ති. ‘हे मित्रा, मी प्रत्यक्ष दिसणाऱ्या सुखाचा त्याग करून काळाच्या ओघात मिळणाऱ्या सुखाच्या मागे धावत नाही. उलट, मी काळाच्या ओघात मिळणाऱ्या सुखाचा त्याग करून प्रत्यक्ष दिसणाऱ्या सुखाच्या मागे धावत आहे. कारण, हे मित्रा, भगवंतांनी सांगितले आहे की कामभोग हे काळाच्या ओघात मिळणारे, अत्यंत दुःखद, अत्यंत क्लेशकारक आहेत आणि त्यांमधील दोष फार मोठा आहे. तर हा धम्म प्रत्यक्ष दिसणारा, तात्काळ फळ देणारा, स्वतः येऊन पाहण्यास योग्य, मनामध्ये धारण करण्यास योग्य आणि सुज्ञांनी आपापल्या परीने अनुभवण्याजोगा आहे.’ ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛු, කාලිකා කාමා වුත්තා භගවතා බහුදුක්ඛා බහුපායාසා, ආදීනවො එත්ථ භිය්යො? කථං සන්දිට්ඨිකො අයං ධම්මො අකාලිකො එහිපස්සිකො ඔපනෙය්යිකො පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’’ති? ‘पण हे भिक्खू, भगवंतांनी कामभोगांना काळाच्या ओघात मिळणारे, अत्यंत दुःखद, अत्यंत क्लेशकारक आणि त्यांमधील दोष फार मोठा आहे असे कसे म्हटले आहे? आणि हा धम्म प्रत्यक्ष दिसणारा, तात्काळ फळ देणारा, स्वतः येऊन पाहण्यास योग्य, मनामध्ये धारण करण्यास योग्य आणि सुज्ञांनी आपापल्या परीने अनुभवण्याजोगा कसा आहे?’ ‘‘අහං ඛො, ආවුසො, නවො අචිරපබ්බජිතො අධුනාගතො ඉමං ධම්මවිනයං. න තාහං සක්කොමි විත්ථාරෙන ආචික්ඛිතුං. අයං සො භගවා අරහං සම්මාසම්බුද්ධො රාජගහෙ විහරති තපොදාරාමෙ. තං භගවන්තං උපසඞ්කමිත්වා එතමත්ථං පුච්ඡ. යථා තෙ භගවා බ්යාකරොති තථා නං ධාරෙය්යාසී’’ති. ‘हे मित्रा, मी नवीन आहे, नुकताच प्रव्रजित झालेलो आणि या धम्म-विनयात नवखा आलेलो आहे. मी याचे सविस्तर स्पष्टीकरण देण्यास असमर्थ आहे. परंतु ते भगवान, जे अर्हत आणि सम्यक्संबुद्ध आहेत, ते राजगृहातील तपोदाराम येथे विहार करत आहेत. तू त्या भगवंतांकडे जा आणि त्यांना हा प्रश्न विचार. भगवान तुला जसे उत्तर देतील, तसे तू लक्षात ठेव.’ ‘‘න ඛො, භික්ඛු, සුකරො සො භගවා අම්හෙහි උපසඞ්කමිතුං, අඤ්ඤාහි මහෙසක්ඛාහි දෙවතාහි පරිවුතො. සචෙ ඛො ත්වං, භික්ඛු, තං භගවන්තං උපසඞ්කමිත්වා එතමත්ථං පුච්ඡෙය්යාසි, මයම්පි ආගච්ඡෙය්යාම ධම්මස්සවනායා’’ති. ‘‘එවමාවුසො’’ති ඛො ආයස්මා සමිද්ධි තස්සා දෙවතාය පටිස්සුත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා සමිද්ධි භගවන්තං එතදවොච – ‘हे भिक्खू, त्या भगवंतांच्या दर्शनाला जाणे आमच्यासाठी सोपे नाही, कारण ते इतर महान प्रभावशाली देवतांनी वेढलेले असतात. जर तू स्वतः भगवंतांकडे जाऊन त्यांना हा प्रश्न विचारलास, तर आम्हीसुद्धा धम्म ऐकण्यासाठी तिथे येऊ.’ आयुष्यमान समिद्धि यांनी ‘ठीक आहे, मित्रा’ असे म्हणून त्या देवतेला संमती दिली आणि ते भगवंतांकडे गेले. तिथे जाऊन त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसल्यावर आयुष्यमान समिद्धि भगवंतांना म्हणाले – ‘‘ඉධාහං[Pg.10], භන්තෙ, රත්තියා පච්චූසසමයං පච්චුට්ඨාය යෙන තපොදා තෙනුපසඞ්කමිං ගත්තානි පරිසිඤ්චිතුං. තපොදෙ ගත්තානි පරිසිඤ්චිත්වා පච්චුත්තරිත්වා එකචීවරො අට්ඨාසිං ගත්තානි පුබ්බාපයමානො. අථ ඛො, භන්තෙ, අඤ්ඤතරා දෙවතා අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණා කෙවලකප්පං තපොදං ඔභාසෙත්වා යෙනාහං තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා වෙහාසං ඨිතා ඉමාය ගාථාය අජ්ඣභාසි – ‘भन्ते! मी आज पहाटेच्या वेळी उठून तपोदा येथे स्नान करण्यासाठी गेलो होतो. तपोदामध्ये स्नान करून, बाहेर येऊन, मी एकाच चीवरात माझे शरीर सुकवत उभा होतो. तेव्हा, भन्ते! रात्र संपत आली असताना, अत्यंत देदीप्यमान कांती असलेली एक देवता संपूर्ण तपोदा परिसर प्रकाशित करत माझ्याजवळ आली. जवळ येऊन, ती आकाशात उभी राहिली आणि तिने मला या गाथेने संबोधित केले – ‘‘අභුත්වා භික්ඛසි භික්ඛු, න හි භුත්වාන භික්ඛසි; භුත්වාන භික්ඛු භික්ඛස්සු, මා තං කාලො උපච්චගා’’ති. ‘हे भिक्खू! तू उपभोग न घेताच भिक्षा मागत आहेस, उपभोग घेऊन भिक्षा मागत नाहीस. हे भिक्खू! आधी उपभोग घे आणि मग भिक्षा माग; तुझी वेळ निघून जाऊ देऊ नकोस!’ ‘‘එවං වුත්තෙ අහං, භන්තෙ, තං දෙවතං ගාථාය පච්චභාසිං – ‘असे म्हटल्यावर, भन्ते! मी त्या देवतेला गाथेने प्रत्युत्तर दिले – ‘‘කාලං වොහං න ජානාමි, ඡන්නො කාලො න දිස්සති; තස්මා අභුත්වා භික්ඛාමි, මා මං කාලො උපච්චගා’’ති. ‘मी वेळ जाणत नाही, ती वेळ गुप्त आहे आणि दिसत नाही. म्हणूनच, उपभोग न घेता मी भिक्षा मागत आहे, जेणेकरून माझी वेळ निघून जाऊ नये.’ ‘‘අථ ඛො, භන්තෙ, සා දෙවතා පථවියං පතිට්ඨහිත්වා මං එතදවොච – ‘දහරො ත්වං, භික්ඛු, පබ්බජිතො සුසු කාළකෙසො, භද්රෙන යොබ්බනෙන සමන්නාගතො, පඨමෙන වයසා, අනික්කීළිතාවී කාමෙසු. භුඤ්ජ, භික්ඛු, මානුසකෙ කාමෙ; මා සන්දිට්ඨිකං හිත්වා කාලිකං අනුධාවී’’’ති. ‘त्यानंतर, भन्ते! ती देवता जमिनीवर उतरली आणि मला म्हणाली – «हे भिक्खू! तू तरुण आहेस, नुकताच प्रव्रजित झालेला, काळेभोर केस असलेला, तारुण्याच्या सौंदर्याने युक्त आणि आयुष्याच्या पहिल्या टप्प्यात असलेला आहेस. तू कामभोगांचा कधी उपभोग घेतलेला नाहीस. हे भिक्खू! मानवी कामभोगांचा उपभोग घे; प्रत्यक्ष दिसणाऱ्या सुखाचा त्याग करून काळाच्या ओघात मिळणाऱ्या सुखाच्या मागे धावू नकोस.»’ ‘‘එවං වුත්තාහං, භන්තෙ, තං දෙවතං එතදවොචං – ‘න ඛ්වාහං, ආවුසො, සන්දිට්ඨිකං හිත්වා කාලිකං අනුධාවාමි; කාලිකඤ්ච ඛ්වාහං, ආවුසො, හිත්වා සන්දිට්ඨිකං අනුධාවාමි. කාලිකා හි, ආවුසො, කාමා වුත්තා භගවතා බහුදුක්ඛා බහුපායාසා; ආදීනවො එත්ථ භිය්යො. සන්දිට්ඨිකො අයං ධම්මො අකාලිකො එහිපස්සිකො ඔපනෙය්යිකො පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’’’ති. ‘असे म्हटल्यावर, भन्ते! मी त्या देवतेला म्हणालो – «हे मित्रा, मी प्रत्यक्ष दिसणाऱ्या सुखाचा त्याग करून काळाच्या ओघात मिळणाऱ्या सुखाच्या मागे धावत नाही. उलट, मी काळाच्या ओघात मिळणाऱ्या सुखाचा त्याग करून प्रत्यक्ष दिसणाऱ्या सुखाच्या मागे धावत आहे. कारण, हे मित्रा, भगवंतांनी सांगितले आहे की कामभोग हे काळाच्या ओघात मिळणारे, अत्यंत दुःखद, अत्यंत क्लेशकारक आहेत आणि त्यांमधील दोष फार मोठा आहे. तर हा धम्म प्रत्यक्ष दिसणारा, तात्काळ फळ देणारा, स्वतः येऊन पाहण्यास योग्य, मनामध्ये धारण करण्यास योग्य आणि सुज्ञांनी आपापल्या परीने अनुभवण्याजोगा आहे.»’ ‘‘එවං වුත්තෙ, භන්තෙ, සා දෙවතා මං එතදවොච – ‘කථඤ්ච, භික්ඛු, කාලිකා කාමා වුත්තා භගවතා බහුදුක්ඛා බහුපායාසා; ආදීනවො එත්ථ භිය්යො? කථං සන්දිට්ඨිකො අයං ධම්මො අකාලිකො එහිපස්සිකො ඔපනෙය්යිකො පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’ති? එවං වුත්තාහං, භන්තෙ, තං දෙවතං එතදවොචං – ‘අහං ඛො, ආවුසො, නවො අචිරපබ්බජිතො අධුනාගතො ඉමං ධම්මවිනයං, න තාහං සක්කොමි විත්ථාරෙන ආචික්ඛිතුං. අයං සො භගවා අරහං සම්මාසම්බුද්ධො රාජගහෙ විහරති තපොදාරාමෙ. තං භගවන්තං උපසඞ්කමිත්වා එතමත්ථං පුච්ඡ. යථා තෙ භගවා බ්යාකරොති තථා නං ධාරෙය්යාසී’’’ති. “भन्ते, असे विचारले असता, ती देवता मला म्हणाली—‘भिक्खू, भगवंतांनी काळाच्या अंतराने मिळणारे कामभोग (कालिक काम) हे अत्यंत दुःखदायक, अत्यंत त्रासदायक आणि दोषांनी भरलेले आहेत असे का म्हटले आहे? आणि हा धम्म संदिट्ठिको (प्रत्यक्ष अनुभवता येणारा), अकालिको (तात्काळ फळ देणारा), एहिपस्सिको (स्वतः येऊन पाहण्याजोगा), ओपनेय्यिको (अंतःकरणात धारण करण्याजोगा) आणि विद्वानांनी आपापल्या परीने स्वतः अनुभवण्याजोगा (पच्चत्तं वेदितब्बो विञ्ञूहि) कसा आहे?’ भन्ते, असे विचारले असता मी त्या देवतेला म्हणालो—‘हे आवुसो, मी तर नवदीक्षित आहे, नुकताच प्रव्रजित झालेला आहे आणि या धम्म-विनयात नवीनच आलो आहे. मी हा धम्म-विनय विस्ताराने सांगण्यास असमर्थ आहे. ते अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध भगवान राजगृहातील तपोदाराम विहारामध्ये विहार करत आहेत. तू त्या भगवंतांकडे जाऊन हा प्रश्न विचार. भगवान तुला जसे स्पष्टीकरण देतील, तसे तू लक्षात ठेव.’” ‘‘එවං [Pg.11] වුත්තෙ, භන්තෙ, සා දෙවතා මං එතදවොච – ‘න ඛො, භික්ඛු, සුකරො සො භගවා අම්හෙහි උපසඞ්කමිතුං, අඤ්ඤාහි මහෙසක්ඛාහි දෙවතාහි පරිවුතො. සචෙ ඛො, ත්වං භික්ඛු, තං භගවන්තං උපසඞ්කමිත්වා එතමත්ථං පුච්ඡෙය්යාසි, මයම්පි ආගච්ඡෙය්යාම ධම්මස්සවනායා’ති. සචෙ, භන්තෙ, තස්සා දෙවතාය සච්චං වචනං, ඉධෙව සා දෙවතා අවිදූරෙ’’ති. “भन्ते, असे म्हटले असता ती देवता मला म्हणाली—‘भिक्खू, इतर महान प्रभावशाली देवतांनी वेढलेले असल्यामुळे त्या भगवंतांकडे जाणे आमच्यासाठी सोपे नाही. परंतु, हे भिक्खू, जर तू त्या भगवंतांकडे जाऊन हा प्रश्न विचारलास, तर आम्हीसुद्धा धम्मश्रवणासाठी तिथे येऊ.’ भन्ते, जर त्या देवतेचे बोलणे खरे असेल, तर ती देवता इथेच जवळच कुठेतरी असावी.” එවං වුත්තෙ, සා දෙවතා ආයස්මන්තං සමිද්ධිං එතදවොච – ‘‘පුච්ඡ, භික්ඛු, පුච්ඡ, භික්ඛු, යමහං අනුප්පත්තා’’ති. असे म्हटले असता, ती देवता आयुष्यमान समिद्धींना म्हणाली—“विचारा, भिक्खू, विचारा! कारण मी इथे आलेली आहे.” අථ ඛො භගවා තං දෙවතං ගාථාහි අජ්ඣභාසි – त्यानंतर भगवंतांनी त्या देवतेला गाथांनी संबोधित केले— ‘‘අක්ඛෙය්යසඤ්ඤිනො සත්තා, අක්ඛෙය්යස්මිං පතිට්ඨිතා; අක්ඛෙය්යං අපරිඤ්ඤාය, යොගමායන්ති මච්චුනො. “जे प्राणी व्यक्त होणाऱ्या (पाच स्कंधांच्या) संज्ञेमध्ये गुंतलेले आहेत आणि त्या व्यक्त होणाऱ्यातच प्रतिष्ठित आहेत; ते त्या व्यक्त होणाऱ्याला (स्कंधांना) पूर्णपणे न जाणल्यामुळे मृत्यूच्या बंधनात पडतात.” ‘‘අක්ඛෙය්යඤ්ච පරිඤ්ඤාය, අක්ඛාතාරං න මඤ්ඤති; තඤ්හි තස්ස න හොතීති, යෙන නං වජ්ජා න තස්ස අත්ථි; සචෙ විජානාසි වදෙහි යක්ඛා’’ති. “परंतु व्यक्त होणाऱ्याला (पाच स्कंधांना) पूर्णपणे जाणून घेऊन, जो स्वतःला ‘व्यक्त करणारा’ मानत नाही; कारण त्याच्यासाठी असे काही उरत नाही ज्याद्वारे त्याचे वर्णन केले जाऊ शकेल. हे यक्षिणी (देवते), जर तुला हे समजले असेल तर बोल.” ‘‘න ඛ්වාහං, භන්තෙ, ඉමස්ස භගවතා සඞ්ඛිත්තෙන භාසිතස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං ආජානාමි. සාධු මෙ, භන්තෙ, භගවා තථා භාසතු යථාහං ඉමස්ස භගවතා සඞ්ඛිත්තෙන භාසිතස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං ජානෙය්ය’’න්ති. “भन्ते, भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ मला समजत नाही. भन्ते, भगवंतांनी मला अशा प्रकारे उपदेश करावा, जेणेकरून मला या संक्षिप्त उपदेशाचा सविस्तर अर्थ समजेल.” ‘‘සමො විසෙසී උද වා නිහීනො,යො මඤ්ඤතී සො විවදෙථ තෙන; තීසු විධාසු අවිකම්පමානො,සමො විසෙසීති න තස්ස හොති; සචෙ විජානාසි වදෙහි යක්ඛා’’ති. “जो स्वतःला ‘समान’, ‘श्रेष्ठ’ किंवा ‘कनिष्ठ’ मानतो, तो त्या मान (अहंकार) मुळे वादविवाद करतो. परंतु जो या तिन्ही प्रकारच्या मानाने विचलित होत नाही, त्याच्या मनात ‘मी समान आहे’ किंवा ‘मी श्रेष्ठ आहे’ असा विचार येत नाही. हे यक्षिणी, जर तुला हे समजले असेल तर बोल.” ‘‘ඉමස්සාපි ඛ්වාහං, භන්තෙ, භගවතා සඞ්ඛිත්තෙන භාසිතස්ස න විත්ථාරෙන අත්ථං ආජානාමි. සාධු මෙ, භන්තෙ, භගවා තථා භාසතු යථාහං ඉමස්ස භගවතා සඞ්ඛිත්තෙන භාසිතස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං ජානෙය්ය’’න්ති. “भन्ते, याही भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ मला समजत नाही. भन्ते, भगवंतांनी मला अशा प्रकारे उपदेश करावा, जेणेकरून मला या संक्षिप्त उपदेशाचा सविस्तर अर्थ समजेल.” ‘‘පහාසි සඞ්ඛං න විමානමජ්ඣගා, අච්ඡෙච්ඡි තණ්හං ඉධ නාමරූපෙ; තං ඡින්නගන්ථං අනිඝං නිරාසං, පරියෙසමානා නාජ්ඣගමුං; දෙවා මනුස්සා ඉධ වා හුරං වා, සග්ගෙසු වා සබ්බනිවෙසනෙසු; සචෙ විජානාසි වදෙහි යක්ඛා’’ති. “ज्याने संज्ञा (अहंकारयुक्त संकल्पना) सोडून दिली आहे आणि जो नऊ प्रकारच्या मानाच्या आहारी गेला नाही, ज्याने या नाम-रूपातील तृष्णा तोडून टाकली आहे; त्या ग्रंथीमुक्त (बंधनांपासून मुक्त), दुःखविरहित आणि तृष्णारहित पुरुषाला शोधणारे देव किंवा मनुष्य त्याला या लोकात वा परलोकात, स्वर्गात वा इतर कोणत्याही निवासस्थानात शोधू शकत नाहीत. हे यक्षिणी, जर तुला हे समजले असेल तर बोल.” ‘‘ඉමස්ස [Pg.12] ඛ්වාහං, භන්තෙ, භගවතා සඞ්ඛිත්තෙන භාසිතස්ස එවං විත්ථාරෙන අත්ථං ආජානාමි – “भन्ते, भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ मला या प्रकारे समजला आहे—” ‘‘පාපං න කයිරා වචසා මනසා,කායෙන වා කිඤ්චන සබ්බලොකෙ; කාමෙ පහාය සතිමා සම්පජානො,දුක්ඛං න සෙවෙථ අනත්ථසංහිත’’න්ති. “सर्व लोकात कायेने, वाचेने किंवा मनाने थोडेही पाप करू नये. कामभोगांचा त्याग करून, स्मृतिमान (सतीमान) आणि प्रज्ञावान (सम्पजानो) होऊन, अनर्थकारक दुःखाचे सेवन करू नये.” නන්දනවග්ගො දුතියො. दुसरा नंदनवर्ग समाप्त झाला. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) याप्रमाणे आहे— නන්දනා නන්දති චෙව, නත්ථිපුත්තසමෙන ච; ඛත්තියො සණමානො ච, නිද්දාතන්දී ච දුක්කරං; හිරී කුටිකා නවමො, දසමො වුත්තො සමිද්ධිනාති. नंदना, नन्दति, नत्थिपुत्तसम, खत्तिय, सणमान, निद्दातन्दी, दुक्कर, हिरी, नववे कुटिका आणि दहावे समिद्धि सुत्त सांगितले आहे. 3. සත්තිවග්ගො ३. सत्तिवर्ग 1. සත්තිසුත්තං १. सत्तिसुत्त 21. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං ඨිතා ඛො සා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – २१. श्रावस्ती येथील प्रसंग. एका बाजूला उभी राहिलेली ती देवता भगवंतांच्या सन्निध ही गाथा म्हणाली— ‘‘සත්තියා විය ඔමට්ඨො, ඩය්හමානොව මත්ථකෙ; කාමරාගප්පහානාය, සතො භික්ඛු පරිබ්බජෙ’’ති. “ज्याप्रमाणे भाल्याने जखमी झालेला मनुष्य किंवा डोक्याला आग लागलेला मनुष्य (ती विझवण्यासाठी तत्पर असतो), त्याचप्रमाणे भिक्खूने कामरागाचा त्याग करण्यासाठी स्मृतिमान (जागरूक) होऊन विहार करावा.” ‘‘සත්තියා විය ඔමට්ඨො, ඩය්හමානොව මත්ථකෙ; සක්කායදිට්ඨිප්පහානාය, සතො භික්ඛු පරිබ්බජෙ’’ති. “ज्याप्रमाणे भाल्याने जखमी झालेला मनुष्य किंवा डोक्याला आग लागलेला मनुष्य तत्पर असतो, त्याचप्रमाणे भिक्खूने सत्कायदृष्टीचा (सक्कायदिव्ठि) त्याग करण्यासाठी स्मृतिमान होऊन विहार करावा.” 2. ඵුසතිසුත්තං २. फुसतिसुत्त 22. २२. ‘‘නාඵුසන්තං ඵුසති ච, ඵුසන්තඤ්ච තතො ඵුසෙ; තස්මා ඵුසන්තං ඵුසති, අප්පදුට්ඨපදොසින’’න්ති. “जो कर्म करत नाही त्याला त्याचे फळ स्पर्श करत नाही, परंतु जो कर्म करतो त्याला त्याचे फळ स्पर्श करते. म्हणूनच, जो निष्पाप व्यक्तीचा द्वेष करतो, त्यालाच कर्माचे फळ स्पर्श करते.” ‘‘යො [Pg.13] අප්පදුට්ඨස්ස නරස්ස දුස්සති,සුද්ධස්ස පොසස්ස අනඞ්ගණස්ස; තමෙව බාලං පච්චෙති පාපං,සුඛුමො රජො පටිවාතංව ඛිත්තො’’ති. “जो मनुष्य निष्पाप, शुद्ध आणि दोषरहित अर्हताचा द्वेष करतो, त्या मूर्खावरच ते पाप उलटते; ज्याप्रमाणे वाऱ्याच्या विरुद्ध दिशेने फेकलेली बारीक धूळ फेकणाऱ्यावरच परत येते.” 3. ජටාසුත්තං ३. जटासुत्त 23. २३. ‘‘අන්තො ජටා බහි ජටා, ජටාය ජටිතා පජා; තං තං ගොතම පුච්ඡාමි, කො ඉමං විජටයෙ ජට’’න්ති. “आत जटा (गुंतागुंत) आहे, बाहेर जटा आहे; ही प्रजा जटेने वेढलेली आहे. हे गौतम, मी आपल्याला विचारतो की, ही जटा कोण सोडवू शकेल?” ‘‘සීලෙ පතිට්ඨාය නරො සපඤ්ඤො, චිත්තං පඤ්ඤඤ්ච භාවයං; ආතාපී නිපකො භික්ඛු, සො ඉමං විජටයෙ ජටං. “जो प्रज्ञावान मनुष्य शीलावर प्रतिष्ठित होऊन, चित्त आणि प्रज्ञेची भावना (विकास) करतो; तो उद्योगी आणि बुद्धिमान भिक्खू ही जटा सोडवू शकतो.” ‘‘යෙසං රාගො ච දොසො ච, අවිජ්ජා ච විරාජිතා; ඛීණාසවා අරහන්තො, තෙසං විජටිතා ජටා. “ज्यांचे राग, द्वेष आणि अविद्या नष्ट झाली आहे, जे आसवमुक्त अर्हत आहेत, त्यांची जटा सुटलेली आहे.” ‘‘යත්ථ නාමඤ්ච රූපඤ්ච, අසෙසං උපරුජ්ඣති; පටිඝං රූපසඤ්ඤා ච, එත්ථෙසා ඡිජ්ජතෙ ජටා’’ති. “ज्या निर्वाणामध्ये नाम आणि रूप पूर्णपणे निरुद्ध होते, तसेच प्रतिघसंज्ञा आणि रूपसंज्ञा नष्ट होते, तिथेच ही जटा तुटून जाते.” 4. මනොනිවාරණසුත්තං ४. मनोनिवारणसुत्त 24. ‘‘යතො යතො මනො නිවාරයෙ, २४. “ज्या ज्या गोष्टींपासून मनाला रोखले जाते,” න දුක්ඛමෙති නං තතො තතො; ස සබ්බතො මනො නිවාරයෙ,ස සබ්බතො දුක්ඛා පමුච්චති’’. “त्या त्या गोष्टींमुळे दुःख प्राप्त होत नाही. जर एखाद्याने मनाला सर्व गोष्टींपासून रोखले, तर तो सर्व दुःखांतून मुक्त होतो.” ‘‘න සබ්බතො මනො නිවාරයෙ,න මනො සංයතත්තමාගතං; යතො යතො ච පාපකං,තතො තතො මනො නිවාරයෙ’’ති. “मनाला सर्व गोष्टींपासून रोखू नये, तसेच संयमित झालेल्या मनालाही रोखू नये. परंतु ज्या ज्या गोष्टींमुळे पाप उत्पन्न होते, त्या त्या गोष्टींपासून मनाला रोखावे.” 5. අරහන්තසුත්තං ५. अर्हतसुत्त 25. २५. ‘‘යො හොති භික්ඛු අරහං කතාවී,ඛීණාසවො අන්තිමදෙහධාරී; අහං වදාමීතිපි සො වදෙය්ය,මමං වදන්තීතිපි සො වදෙය්යා’’ති. “जो भिक्खू अर्हत आहे, ज्याने आपले कर्तव्य पूर्ण केले आहे, जो आसवमुक्त आहे आणि अंतिम शरीर धारण करणारा आहे; तो ‘मी बोलतो’ असे म्हणू शकतो का? आणि ‘ते मला बोलतात’ असे म्हणू शकतो का?” ‘‘යො [Pg.14] හොති භික්ඛු අරහං කතාවී,ඛීණාසවො අන්තිමදෙහධාරී; අහං වදාමීතිපි සො වදෙය්ය,මමං වදන්තීතිපි සො වදෙය්ය; ලොකෙ සමඤ්ඤං කුසලො විදිත්වා,වොහාරමත්තෙන සො වොහරෙය්යා’’ති. “जो भिक्खू अर्हत आहे, ज्याने आपले कर्तव्य पूर्ण केले आहे, जो आसवमुक्त आहे आणि अंतिम शरीर धारण करणारा आहे; तो ‘मी बोलतो’ असे म्हणू शकतो आणि ‘ते मला बोलतात’ असेही म्हणू शकतो. जगातील संज्ञांमध्ये कुशल असलेला तो अर्हत केवळ व्यवहारासाठी अशा शब्दांचा वापर करू शकतो.” ‘‘යො හොති භික්ඛු අරහං කතාවී,ඛීණාසවො අන්තිමදෙහධාරී; මානං නු ඛො සො උපගම්ම භික්ඛු,අහං වදාමීතිපි සො වදෙය්ය; මමං වදන්තීතිපි සො වදෙය්යා’’ති. “जो भिक्खू अर्हत आहे, ज्याने आपले कर्तव्य पूर्ण केले आहे, जो आसवमुक्त आहे आणि अंतिम शरीर धारण करणारा आहे; तो भिक्खू मानाच्या (अहंकाराच्या) आहारी जाऊन ‘मी बोलतो’ किंवा ‘ते मला बोलतात’ असे म्हणतो का?” ‘‘පහීනමානස්ස න සන්ති ගන්ථා,විධූපිතා මානගන්ථස්ස සබ්බෙ; ස වීතිවත්තො මඤ්ඤතං සුමෙධො,අහං වදාමීතිපි සො වදෙය්ය. “ज्याचा मान नष्ट झाला आहे, त्याला कोणतीही बंधने (ग्रंथी) नसतात; त्याच्या मानाची सर्व बंधने नष्ट झालेली असतात. तो प्रज्ञावान मनुष्य सर्व प्रकारच्या कल्पनांच्या पलीकडे गेलेला असतो. तरीही तो ‘मी बोलतो’ असे म्हणू शकतो,” ‘‘මමං වදන්තීතිපි සො වදෙය්ය; ලොකෙ සමඤ්ඤං කුසලො විදිත්වා; වොහාරමත්තෙන සො වොහරෙය්යා’’ති. “आणि ‘ते मला बोलतात’ असेही म्हणू शकतो. जगातील संज्ञांमध्ये कुशल असलेला तो अर्हत केवळ व्यवहारासाठी अशा शब्दांचा वापर करू शकतो.” 6. පජ්ජොතසුත්තං ६. पज्जोतसुत्त 26. २६. ‘‘කති ලොකස්මිං පජ්ජොතා, යෙහි ලොකො පකාසති ; භගවන්තං පුට්ඨුමාගම්ම, කථං ජානෙමු තං මය’’න්ති. “या जगात किती प्रकाशस्रोत (पज्जोत) आहेत, ज्यांच्यामुळे जग प्रकाशित होते? आम्ही भगवंतांना विचारण्यासाठी आलो आहोत, आम्ही हे कसे जाणून घ्यावे?” ‘‘චත්තාරො ලොකෙ පජ්ජොතා, පඤ්චමෙත්ථ න විජ්ජති; දිවා තපති ආදිච්චො, රත්තිමාභාති චන්දිමා. जगात चार प्रकाश आहेत, पाचवा येथे आढळत नाही. सूर्य दिवसा तळपतो, चंद्र रात्री चमकतो. ‘‘අථ අග්ගි දිවාරත්තිං, තත්ථ තත්ථ පකාසති; සම්බුද්ධො තපතං සෙට්ඨො, එසා ආභා අනුත්තරා’’ති. आणि अग्नी दिवसा व रात्री ठिकठिकाणी प्रकाशतो. परंतु तळपणाऱ्यांमध्ये सम्यक्संबुद्ध सर्वश्रेष्ठ आहेत; हा प्रकाश सर्वश्रेष्ठ (अनुत्तर) आहे. 7. සරසුත්තං ७. सर सुत्त 27. २७. ‘‘කුතො [Pg.15] සරා නිවත්තන්ති, කත්ථ වට්ටං න වත්තති; කත්ථ නාමඤ්ච රූපඤ්ච, අසෙසං උපරුජ්ඣතී’’ති. प्रवाह कोठून मागे फिरतात? संसारचक्र कोठे फिरत नाही? नाम आणि रूप कोठे पूर्णपणे निरुद्ध होते? ‘‘යත්ථ ආපො ච පථවී, තෙජො වායො න ගාධති; අතො සරා නිවත්තන්ති, එත්ථ වට්ටං න වත්තති; එත්ථ නාමඤ්ච රූපඤ්ච, අසෙසං උපරුජ්ඣතී’’ති. जिथे जल, पृथ्वी, तेज आणि वायू यांना स्थान मिळत नाही; तिथूनच हे प्रवाह मागे फिरतात, तिथे संसारचक्र फिरत नाही; तिथे नाम आणि रूप पूर्णपणे निरुद्ध होते. 8. මහද්ධනසුත්තං ८. महद्धन सुत्त 28. २८. ‘‘මහද්ධනා මහාභොගා, රට්ඨවන්තොපි ඛත්තියා; අඤ්ඤමඤ්ඤාභිගිජ්ඣන්ති, කාමෙසු අනලඞ්කතා. महाधनी, महाभोगी आणि राष्ट्राचे स्वामी असलेले क्षत्रिय सुद्धा कामभोगांनी अतृप्त राहून एकमेकांच्या संपत्तीची हाव धरतात. ‘‘තෙසු උස්සුක්කජාතෙසු, භවසොතානුසාරිසු; කෙධ තණ්හං පජහිංසු, කෙ ලොකස්මිං අනුස්සුකා’’ති. अशा चिंताग्रस्त आणि भवप्रवाहाच्या मागे वाहून जाणाऱ्या लोकांमध्ये, कोणी तृष्णेचा त्याग केला आहे? या जगात कोण चिंतामुक्त आहेत? ‘‘හිත්වා අගාරං පබ්බජිතා, හිත්වා පුත්තං පසුං වියං; හිත්වා රාගඤ්ච දොසඤ්ච, අවිජ්ජඤ්ච විරාජිය; ඛීණාසවා අරහන්තො, තෙ ලොකස්මිං අනුස්සුකා’’ති. जे घरादाराचा त्याग करून प्रव्रजित झाले आहेत, ज्यांनी प्रिय पुत्र आणि पशूंचा त्याग केला आहे, ज्यांनी राग आणि द्वेष सोडून दिले आहेत आणि अविद्येचा नाश केला आहे; ते आसवमुक्त अर्हतच या जगात चिंतामुक्त आहेत. 9. චතුචක්කසුත්තං ९. चतुचक्क सुत्त 29. २९. ‘‘චතුචක්කං නවද්වාරං, පුණ්ණං ලොභෙන සංයුතං; පඞ්කජාතං මහාවීර, කථං යාත්රා භවිස්සතී’’ති. हे महावीरा! चार चाके आणि नऊ द्वारे असलेले, अशुद्धतेने भरलेले, लोभाने युक्त आणि चिखलातून उत्पन्न झालेल्या या शरीराची सुटका कशी होईल? ‘‘ඡෙත්වා නද්ධිං වරත්තඤ්ච, ඉච්ඡා ලොභඤ්ච පාපකං; සමූලං තණ්හමබ්බුය්හ, එවං යාත්රා භවිස්සතී’’ති. क्रोधरूपी दोरी आणि क्लेशरूपी कातडी दोरी तोडून, वाईट इच्छा व लोभ नष्ट करून, आणि मुळासकट तृष्णेचा उपटून नाश करून, अशा प्रकारे सुटका होईल. 10. එණිජඞ්ඝසුත්තං १०. एणिजंघ सुत्त 30. ३०. ‘‘එණිජඞ්ඝං කිසං වීරං, අප්පාහාරං අලොලුපං; සීහං වෙකචරං නාගං, කාමෙසු අනපෙක්ඛිනං; උපසඞ්කම්ම පුච්ඡාම, කථං දුක්ඛා පමුච්චතී’’ති. हरणाच्या पायांसारखे पाय असलेले, कृश शरीर असलेले, पराक्रमी, अल्पाहारी, निर्लोभी, सिंहासारखे किंवा हत्तीसारखे एकाकी विहार करणारे आणि कामभोगांविषयी अनासक्त असलेल्या भगवंतांच्या जवळ येऊन आम्ही विचारतो की, दुःखातून कशी मुक्ती मिळते? ‘‘පඤ්ච [Pg.16] කාමගුණා ලොකෙ, මනොඡට්ඨා පවෙදිතා; එත්ථ ඡන්දං විරාජෙත්වා, එවං දුක්ඛා පමුච්චතී’’ති. जगात मन हे सहावे असलेले पाच कामगुण सांगितले आहेत. याविषयीची इच्छा नष्ट करून, अशा प्रकारे दुःखातून मुक्ती मिळते. සත්තිවග්ගො තතියො. तिसरा सत्ति वर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका - සත්තියා ඵුසති චෙව, ජටා මනොනිවාරණා; අරහන්තෙන පජ්ජොතො, සරා මහද්ධනෙන ච; චතුචක්කෙන නවමං, එණිජඞ්ඝෙන තෙ දසාති. सत्ति, फुसति, जटा, मनोनिवारणा, अर्हत, पज्जोत, सर, mahaddhanena (महद्धन), नववे चतुचक्क आणि दहावे एणिजंघ - हे दहा सुत्त आहेत. 4. සතුල්ලපකායිකවග්ගො ४. सतुल्लपकायिक वर्ग 1. සබ්භිසුත්තං १. सब्भि सुत्त 31. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. අථ ඛො සම්බහුලා සතුල්ලපකායිකා දෙවතායො අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණා කෙවලකප්පං ජෙතවනං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨංසු. එකමන්තං ඨිතා ඛො එකා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – ३१. असे मी ऐकले आहे - एक वेळ भगवान श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेव्हा, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, अत्यंत देखण्या रूपाच्या अनेक सतुल्लपकायिक देवता संपूर्ण जेतवनाला आपल्या प्रकाशाने उजळवून जिथे भगवान होते तिथे आल्या. जवळ येऊन त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि त्या एका बाजूला उभ्या राहिल्या. एका बाजूला उभी राहिलेली एक देवता भगवंतांच्या समोर ही गाथा म्हणाली - ‘‘සබ්භිරෙව සමාසෙථ, සබ්භි කුබ්බෙථ සන්ථවං; සතං සද්ධම්මමඤ්ඤාය, සෙය්යො හොති න පාපියො’’ති. सज्जनांसोबतच उठावे-बसावे, सज्जनांशीच मैत्री करावी. सज्जनांचा सद्धम्म जाणून घेतल्याने कल्याणच होते, अकल्याण होत नाही. අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – त्यानंतर दुसरी एक देवता भगवंतांच्या समोर ही गाथा म्हणाली - ‘‘සබ්භිරෙව සමාසෙථ, සබ්භි කුබ්බෙථ සන්ථවං; සතං සද්ධම්මමඤ්ඤාය, පඤ්ඤා ලබ්භති නාඤ්ඤතො’’ති. सज्जनांसोबतच उठावे-बसावे, सज्जनांशीच मैत्री करावी. सज्जनांचा सद्धम्म जाणून घेतल्याने प्रज्ञा प्राप्त होते, इतरांकडून नाही. අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – त्यानंतर दुसरी एक देवता भगवंतांच्या समोर ही गाथा म्हणाली - ‘‘සබ්භිරෙව සමාසෙථ, සබ්භි කුබ්බෙථ සන්ථවං; සතං සද්ධම්මමඤ්ඤාය, සොකමජ්ඣෙ න සොචතී’’ති. सज्जनांसोबतच उठावे-बसावे, सज्जनांशीच मैत्री करावी. सज्जनांचा सद्धम्म जाणून घेतल्याने माणूस शोकाकुल लोकांच्या मध्ये असूनही शोक करत नाही. අථ [Pg.17] ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – त्यानंतर दुसरी एक देवता भगवंतांच्या समोर ही गाथा म्हणाली - ‘‘සබ්භිරෙව සමාසෙථ, සබ්භි කුබ්බෙථ සන්ථවං; සතං සද්ධම්මමඤ්ඤාය, ඤාතිමජ්ඣෙ විරොචතී’’ති. सज्जनांसोबतच उठावे-बसावे, सज्जनांशीच मैत्री करावी. सज्जनांचा सद्धम्म जाणून घेतल्याने माणूस आपल्या नातेवाईकांमध्ये शोभून दिसतो. අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – त्यानंतर दुसरी एक देवता भगवंतांच्या समोर ही गाथा म्हणाली - ‘‘සබ්භිරෙව සමාසෙථ, සබ්භි කුබ්බෙථ සන්ථවං; සතං සද්ධම්මමඤ්ඤාය, සත්තා ගච්ඡන්ති සුග්ගති’’න්ති. सज्जनांसोबतच उठावे-बसावे, सज्जनांशीच मैत्री करावी. सज्जनांचा सद्धम्म जाणून घेतल्याने प्राणी सुगतीला जातात. අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – त्यानंतर दुसरी एक देवता भगवंतांच्या समोर ही गाथा म्हणाली - ‘‘සබ්භිරෙව සමාසෙථ, සබ්භි කුබ්බෙථ සන්ථවං; සතං සද්ධම්මමඤ්ඤාය, සත්තා තිට්ඨන්ති සාතත’’න්ති. सज्जनांसोबतच उठावे-बसावे, सज्जनांशीच मैत्री करावी. सज्जनांचा सद्धम्म जाणून घेतल्याने प्राणी नेहमी सुखात राहतात. අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කස්ස නු ඛො, භගවා, සුභාසිත’’න්ති? සබ්බාසං වො සුභාසිතං පරියායෙන, අපි ච මමපි සුණාථ – त्यानंतर दुसरी एक देवता भगवंतांना म्हणाली - 'हे भगवंत! कोणाचे बोलणे सर्वात सुभाषित आहे?' 'तुम्हा सर्वांचे बोलणे आपापल्या परीने सुभाषित आहे, परंतु माझेही ऐका -' ‘‘සබ්භිරෙව සමාසෙථ, සබ්භි කුබ්බෙථ සන්ථවං; සතං සද්ධම්මමඤ්ඤාය, සබ්බදුක්ඛා පමුච්චතී’’ති. सज्जनांसोबतच उठावे-बसावे, सज्जनांशीच मैत्री करावी. सज्जनांचा सद्धम्म जाणून घेतल्याने माणूस सर्व दुःखांतून मुक्त होतो. ඉදමවොච භගවා. අත්තමනා තා දෙවතායො භගවන්තං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා තත්ථෙවන්තරධායිංසූති. भगवान असे म्हणाले. संतुष्ट झालेल्या त्या देवतांनी भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि तिथेच त्या अंतर्धान पावल्या. 2. මච්ඡරිසුත්තං २. मच्छरि सुत्त 32. එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. අථ ඛො සම්බහුලා සතුල්ලපකායිකා දෙවතායො අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණා කෙවලකප්පං ජෙතවනං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨංසු. එකමන්තං ඨිතා ඛො එකා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – ३२. एक वेळ भगवान श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेव्हा, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, अत्यंत देखण्या रूपाच्या अनेक सतुल्लपकायिक देवता संपूर्ण जेतवनाला आपल्या प्रकाशाने उजळवून जिथे भगवान होते तिथे आल्या. जवळ येऊन त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि त्या एका बाजूला उभ्या राहिल्या. एका बाजूला उभी राहिलेली एक देवता भगवंतांच्या समोर ही गाथा म्हणाली - ‘‘මච්ඡෙරා ච පමාදා ච, එවං දානං න දීයති ; පුඤ්ඤං ආකඞ්ඛමානෙන, දෙය්යං හොති විජානතා’’ති. कृपणतेमुळे आणि प्रमादामुळे दान दिले जात नाही. परंतु पुण्याची इच्छा करणाऱ्या आणि दानाचे फळ जाणणाऱ्या सुज्ञाने दान दिलेच पाहिजे. අථ [Pg.18] ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමා ගාථායො අභාසි – त्यानंतर दुसरी एक देवता भगवंतांच्या समोर या गाथा म्हणाली - ‘‘යස්සෙව භීතො න දදාති මච්ඡරී, තදෙවාදදතො භයං; ජිඝච්ඡා ච පිපාසා ච, යස්ස භායති මච්ඡරී; තමෙව බාලං ඵුසති, අස්මිං ලොකෙ පරම්හි ච. ज्या भीतीपोटी कृपण माणूस दान देत नाही, दान न दिल्यामुळे तीच भीती त्याला ग्रासते. ज्या भूक आणि तहानेला कृपण माणूस घाबरतो, तीच भूक आणि तहान त्या मूर्खाला या लोकात आणि परलोकात छळते. ‘‘තස්මා විනෙය්ය මච්ඡෙරං, දජ්ජා දානං මලාභිභූ; පුඤ්ඤානි පරලොකස්මිං, පතිට්ඨා හොන්ති පාණින’’න්ති. म्हणूनच, मत्सराचा (कंजूषपणाचा) त्याग करून, मळावर (अशुद्धतेवर) विजय मिळवून दान दिले पाहिजे. परलोकात पुण्य हेच प्राण्यांचे (सजीवांचे) आधार असते. අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමා ගාථායො අභාසි – त्यानंतर दुसरी एक देवता भगवंतांच्या जवळ ही गाथा म्हणाली – ‘‘තෙ මතෙසු න මීයන්ති, පන්ථානංව සහබ්බජං; අප්පස්මිං යෙ පවෙච්ඡන්ති, එස ධම්මො සනන්තනො. जसे प्रवासात सोबत प्रवास करणारे प्रवासी आपल्याजवळील थोड्याशा अन्नातूनही इतरांना वाटा देतात, तसेच जे संसारात थोडे असतानाही इतरांना वाटून देतात, ते मृत लोकांमध्ये मृत मानले जात नाहीत. हा सनातन नियम आहे. ‘‘අප්පස්මෙකෙ පවෙච්ඡන්ති, බහුනෙකෙ න දිච්ඡරෙ; අප්පස්මා දක්ඛිණා දින්නා, සහස්සෙන සමං මිතා’’ති. काही लोक थोडे असतानाही दान देतात, तर काही भरपूर संपत्ती असूनही दान देण्याची इच्छा करत नाहीत. थोड्यातून दिलेले दान हे हजारो दानांच्या बरोबरीचे मानले जाते. අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමා ගාථායො අභාසි – त्यानंतर दुसरी एक देवता भगवंतांच्या जवळ या गाथा म्हणाली – ‘‘දුද්දදං දදමානානං, දුක්කරං කම්ම කුබ්බතං; අසන්තො නානුකුබ්බන්ති, සතං ධම්මො දුරන්වයො. जे देणे कठीण आहे ते देणाऱ्यांचे आणि जे करणे कठीण आहे ते कर्म करणाऱ्यांचे अनुकरण दुर्जन करू शकत नाहीत. सज्जनांचा धर्म (मार्ग) आचरणे कठीण आहे. ‘‘තස්මා සතඤ්ච අසතං, නානා හොති ඉතො ගති; අසන්තො නිරයං යන්ති, සන්තො සග්ගපරායනා’’ති. म्हणूनच, या जगातून गेल्यानंतर सज्जन आणि दुर्जनांची गती वेगवेगळी होते. दुर्जन नरकात जातात, तर सज्जन स्वर्गात जातात. අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ එතදවොච – ‘‘කස්ස නු ඛො, භගවා, සුභාසිත’’න්ති? त्यानंतर दुसरी एक देवता भगवंतांना म्हणाली – "हे भगवंत, कोणाचे वचन सुभाषित (उत्तम प्रकारे म्हटलेले) आहे?" ‘‘සබ්බාසං වො සුභාසිතං පරියායෙන; අපි ච මමපි සුණාථ – "तुम्हा सर्वांचेच वचन वेगवेगळ्या दृष्टिकोनातून सुभाषित आहे. परंतु माझेही वचन ऐका –" ‘‘ධම්මං චරෙ යොපි සමුඤ්ජකං චරෙ,දාරඤ්ච පොසං දදමප්පකස්මිං; සතං සහස්සානං සහස්සයාගිනං,කලම්පි නාග්ඝන්ති තථාවිධස්ස තෙ’’ති. "जो मनुष्य शेतात पडलेले दाणे वेचून (उदरनिर्वाह करत) धर्माचे आचरण करतो, आपल्या पत्नीचे व कुटुंबाचे पालनपोषण करतो आणि थोड्यातूनही दान देतो; हजारो रुपयांचे यज्ञ करणाऱ्या लाखो लोकांचे दान अशा व्यक्तीच्या दानाच्या शंभराव्या भागाच्याही (कलेच्याही) तोडीचे नसते." අථ [Pg.19] ඛො අපරා දෙවතා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – त्यानंतर दुसरी एक देवता भगवंतांना गाथेने उद्देशून म्हणाली – ‘‘කෙනෙස යඤ්ඤො විපුලො මහග්ගතො,සමෙන දින්නස්ස න අග්ඝමෙති; කථං සතං සහස්සානං සහස්සයාගිනං,කලම්පි නාග්ඝන්ති තථාවිධස්ස තෙ’’ති. "हा विशाल आणि भव्य यज्ञ, न्याय्य मार्गाने दिलेल्या दानाच्या मूल्याची बरोबरी का करू शकत नाही? हजारो रुपयांचे यज्ञ करणाऱ्या लाखो लोकांचे दान अशा व्यक्तीच्या दानाच्या शंभराव्या भागाच्याही तोडीचे का ठरत नाही?" ‘‘දදන්ති හෙකෙ විසමෙ නිවිට්ඨා,ඡෙත්වා වධිත්වා අථ සොචයිත්වා; සා දක්ඛිණා අස්සුමුඛා සදණ්ඩා,සමෙන දින්නස්ස න අග්ඝමෙති. "काही लोक अधर्मामध्ये (अयोग्य कर्मात) मग्न राहून, इतरांना मारहाण करून, ठार मारून आणि दुःख देऊन दान देतात. अश्रू गाळत आणि हिंसेने (दंडाने) युक्त असलेले ते दान, न्याय्य मार्गाने दिलेल्या दानाच्या मूल्याची बरोबरी करू शकत नाही." ‘‘එවං සතං සහස්සානං සහස්සයාගිනං; කලම්පි නාග්ඝන්ති තථාවිධස්ස තෙ’’ති. "या कारणास्तव, हजारो रुपयांचे यज्ञ करणाऱ्या लाखो लोकांचे दान अशा व्यक्तीच्या दानाच्या शंभराव्या भागाच्याही तोडीचे नसते." 3. සාධුසුත්තං ३. साधु सुत्त 33. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො සම්බහුලා සතුල්ලපකායිකා දෙවතායො අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණා කෙවලකප්පං ජෙතවනං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨංසු. එකමන්තං ඨිතා ඛො එකා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං උදානං උදානෙසි – ३३. श्रावस्ती येथील घटना. रात्रीचा पूर्वप्रहर उलटून गेल्यावर, अत्यंत देखण्या रूपाच्या, सातुलप नावाच्या देवलोकातील अनेक देवता संपूर्ण जेतवन प्रकाशित करत भगवंतांकडे आल्या. जवळ येऊन त्यांनी भगवंतांना वंदन केले आणि त्या एका बाजूला उभ्या राहिल्या. एका बाजूला उभ्या असलेल्या एका देवतेने भगवंतांच्या समोर हा उद्गार (उदान) काढला – ‘‘සාධු ඛො, මාරිස, දානං; මච්ඡෙරා ච පමාදා ච, එවං දානං න දීයති; පුඤ්ඤං ආකඞ්ඛමානෙන, දෙය්යං හොති විජානතා’’ති. "हे प्रिय महोदय, दान देणे खरोखरच उत्तम आहे! मत्सरामुळे (कंजूषपणामुळे) आणि प्रमादामुळे (बेसावधपणामुळे) दान दिले जात नाही. पुण्याची इच्छा करणाऱ्या आणि दानाचे फळ जाणणाऱ्या सुज्ञाने दान दिलेच पाहिजे." අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං උදානං උදානෙසි – त्यानंतर दुसऱ्या एका देवतेने भगवंतांच्या समोर हा उद्गार काढला – ‘‘සාධු ඛො, මාරිස, දානං; අපි ච අප්පකස්මිම්පි සාහු දානං’’. "हे प्रिय महोदय, दान देणे खरोखरच उत्तम आहे! आणि आणखी असे की, थोडे असतानाही दान देणे उत्तमच आहे." ‘‘අප්පස්මෙකෙ පවෙච්ඡන්ති, බහුනෙකෙ න දිච්ඡරෙ; අප්පස්මා දක්ඛිණා දින්නා, සහස්සෙන සමං මිතා’’ති. "काही लोक थोडे असतानाही दान देतात, तर काही भरपूर संपत्ती असूनही दान देण्याची इच्छा करत नाहीत. थोड्यातून दिलेले दान हे हजारो दानांच्या बरोबरीचे मानले जाते." අථ [Pg.20] ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං උදානං උදානෙසි – त्यानंतर दुसऱ्या एका देवतेने भगवंतांच्या समोर हा उद्गार काढला – ‘‘සාධු ඛො, මාරිස, දානං; අප්පකස්මිම්පි සාහු දානං; අපි ච සද්ධායපි සාහු දානං’’. "हे प्रिय महोदय, दान देणे खरोखरच उत्तम आहे! थोडे असतानाही दान देणे उत्तमच आहे; आणि आणखी असे की, श्रद्धेने दिलेले दानही उत्तमच आहे." ‘‘දානඤ්ච යුද්ධඤ්ච සමානමාහු,අප්පාපි සන්තා බහුකෙ ජිනන්ති; අප්පම්පි චෙ සද්දහානො දදාති,තෙනෙව සො හොති සුඛී පරත්ථා’’ති. "दान देणे आणि युद्ध करणे हे समान मानले जाते; थोडे वीरही अनेक शत्रूंवर विजय मिळवतात. जर एखादा श्रद्धावान मनुष्य थोडे जरी दान देतो, तर त्यामुळेच तो परलोकात सुखी होतो." අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං උදානං උදානෙසි – त्यानंतर दुसऱ्या एका देवतेने भगवंतांच्या समोर हा उद्गार काढला – ‘‘සාධු ඛො, මාරිස, දානං; අප්පකස්මිම්පි සාහු දානං; සද්ධායපි සාහු දානං; අපි ච ධම්මලද්ධස්සාපි සාහු දානං’’. "हे प्रिय महोदय, दान देणे खरोखरच उत्तम आहे! थोडे असतानाही दान देणे उत्तमच आहे; श्रद्धेने दिलेले दानही उत्तमच आहे; आणि आणखी असे की, न्याय्य मार्गाने (धर्माने) मिळवलेल्या संपत्तीचे दान देणेही उत्तमच आहे." ‘‘යො ධම්මලද්ධස්ස දදාති දානං,උට්ඨානවීරියාධිගතස්ස ජන්තු; අතික්කම්ම සො වෙතරණිං යමස්ස,දිබ්බානි ඨානානි උපෙති මච්චො’’ති. "जो मनुष्य आपल्या उद्योग आणि वीर्याने (परिश्रमाने) न्याय्य मार्गाने मिळवलेल्या संपत्तीचे दान देतो, तो मर्त्य मनुष्य यमाच्या वैतरणी नदीला पार करून दिव्य लोकांमध्ये (स्वर्गात) प्रवेश करतो." අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං උදානං උදානෙසි – त्यानंतर दुसऱ्या एका देवतेने भगवंतांच्या समोर हा उद्गार काढला – ‘‘සාධු ඛො, මාරිස, දානං; අප්පකස්මිම්පි සාහු දානං; සද්ධායපි සාහු දානං; ධම්මලද්ධස්සාපි සාහු දානං; අපි ච විචෙය්ය දානම්පි සාහු දානං’’. "हे प्रिय महोदय, दान देणे खरोखरच उत्तम आहे! थोडे असतानाही दान देणे उत्तमच आहे; श्रद्धेने दिलेले दानही उत्तमच आहे; न्याय्य मार्गाने मिळवलेल्या संपत्तीचे दान देणेही उत्तमच आहे; आणि आणखी असे की, विचारपूर्वक (पात्र-अपात्र निवडून) दिलेले दानही उत्तमच आहे." ‘‘විචෙය්ය දානං සුගතප්පසත්ථං,යෙ දක්ඛිණෙය්යා ඉධ ජීවලොකෙ; එතෙසු දින්නානි මහප්ඵලානි,බීජානි වුත්තානි යථා සුඛෙත්තෙ’’ති. "विचारपूर्वक (पात्र निवडून) दिलेले दान सुगतांनी (बुद्धांनी) प्रशंसिले आहे. या जगात जे दानास पात्र (दक्षिणेय) आहेत, त्यांना दिलेले दान सुपीक शेतात पेरलेल्या बियांप्रमाणे महाफळ देणारे ठरते." අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං උදානං උදානෙසි – त्यानंतर दुसऱ्या एका देवतेने भगवंतांच्या समोर हा उद्गार काढला – ‘‘සාධු ඛො, මාරිස, දානං; අප්පකස්මිම්පි සාහු දානං; සද්ධායපි සාහු දානං; ධම්මලද්ධස්සාපි සාහු දානං; විචෙය්ය දානම්පි සාහු දානං; අපි ච පාණෙසුපි සාධු සංයමො’’. "हे प्रिय महोदय, दान देणे खरोखरच उत्तम आहे! थोडे असतानाही दान देणे उत्तमच आहे; श्रद्धेने दिलेले दानही उत्तमच आहे; न्याय्य मार्गाने मिळवलेल्या संपत्तीचे दान देणेही उत्तमच आहे; विचारपूर्वक दिलेले दानही उत्तमच आहे; आणि आणखी असे की, प्राण्यांच्या प्रति संयम (अहिंसा) बाळगणेही उत्तमच आहे." ‘‘යො [Pg.21] පාණභූතානි අහෙඨයං චරං,පරූපවාදා න කරොන්ති පාපං; භීරුං පසංසන්ති න හි තත්ථ සූරං,භයා හි සන්තො න කරොන්ති පාප’’න්ති. "जो प्राण्यांना इजा न करता जीवन जगतो, आणि इतरांच्या निंदेच्या भयाने पाप करत नाही; अशा ठिकाणी भित्र्यांची (पापभीरूंची) प्रशंसा केली जाते, हिंसक शूरवीरांची नाही. कारण सज्जन लोक निंदेच्या भयाने पाप करत नाहीत." අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කස්ස නු ඛො, භගවා, සුභාසිත’’න්ති? त्यानंतर दुसरी एक देवता भगवंतांना म्हणाली – "हे भगवंत, कोणाचे वचन सुभाषित आहे?" ‘‘සබ්බාසං වො සුභාසිතං පරියායෙන, අපි ච මමපි සුණාථ – "तुम्हा सर्वांचेच वचन वेगवेगळ्या दृष्टिकोनातून सुभाषित आहे. परंतु माझेही वचन ऐका –" ‘‘සද්ධා හි දානං බහුධා පසත්ථං,දානා ච ඛො ධම්මපදංව සෙය්යො; පුබ්බෙ ච හි පුබ්බතරෙ ච සන්තො,නිබ්බානමෙවජ්ඣගමුං සපඤ්ඤා’’ති. "श्रद्धेने दिलेले दान अनेक प्रकारे प्रशंसिले गेले आहे, परंतु दानापेक्षा 'धम्मपद' (निर्वाणाचा मार्ग) श्रेष्ठ आहे. कारण भूतकाळात आणि त्याहूनही पूर्वी, प्रज्ञावान सज्जन निर्वाणालाच प्राप्त झाले." 4. නසන්තිසුත්තං ४. न संति सुत्त 34. එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. අථ ඛො සම්බහුලා සතුල්ලපකායිකා දෙවතායො අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණා කෙවලකප්පං ජෙතවනං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨංසු. එකමන්තං ඨිතා ඛො එකා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – ३४. एका वेळी भगवान बुद्ध श्रावस्ती येथील अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. रात्रीचा पूर्वप्रहर उलटून गेल्यावर, अत्यंत देखण्या रूपाच्या, सातुलप नावाच्या देवलोकातील अनेक देवता संपूर्ण जेतवन प्रकाशित करत भगवंतांकडे आल्या. जवळ येऊन त्यांनी भगवंतांना वंदन केले आणि त्या एका बाजूला उभ्या राहिल्या. एका बाजूला उभ्या असलेल्या एका देवतेने भगवंतांच्या समोर ही गाथा म्हटली – ‘‘න සන්ති කාමා මනුජෙසු නිච්චා,සන්තීධ කමනීයානි යෙසු බද්ධො; යෙසු පමත්තො අපුනාගමනං,අනාගන්තා පුරිසො මච්චුධෙය්යා’’ති. "मनुष्यांमध्ये कामभोग (इंद्रियसुख) नित्य नसतात. या जगात केवळ प्रिय वाटणाऱ्या गोष्टी असतात, ज्यांच्यामध्ये मनुष्य बांधला जातो. त्यांच्यात मग्न आणि बेसावध असलेला मनुष्य मृत्यूच्या साम्राज्यातून (संसारचक्रातून) कधीही परत न येणाऱ्या अवस्थेला (निर्वाणाला) प्राप्त करू शकत नाही." ‘‘ඡන්දජං අඝං ඡන්දජං දුක්ඛං; ඡන්දවිනයා අඝවිනයො; අඝවිනයා දුක්ඛවිනයො’’ති. "पाप (दुःख) हे इच्छेतून (तृष्णेतून) निर्माण होते, दुःख हे इच्छेतून निर्माण होते. इच्छेच्या निरोधाने पापाचा निरोध होतो; पापाच्या निरोधाने दुःखाचा निरोध होतो." ‘‘න තෙ කාමා යානි චිත්රානි ලොකෙ,සඞ්කප්පරාගො පුරිසස්ස කාමො; තිට්ඨන්ති චිත්රානි තථෙව ලොකෙ,අථෙත්ථ ධීරා විනයන්ති ඡන්දං. "जगातील सुंदर व विविधांगी वस्तू म्हणजे कामभोग नव्हेत; मनुष्याची कामवासना ही संकल्पातून निर्माण होणारी आसक्ती (राग) आहे. जगातील सुंदर वस्तू जशा आहेत तशाच राहतात, परंतु प्रज्ञावान लोक त्यांच्याबद्दलची इच्छा (तृष्णा) नष्ट करतात." ‘‘කොධං [Pg.22] ජහෙ විප්පජහෙය්ය මානං,සංයොජනං සබ්බමතික්කමෙය්ය; තං නාමරූපස්මිමසජ්ජමානං,අකිඤ්චනං නානුපතන්ති දුක්ඛා. मनुष्याने क्रोधाचा त्याग करावा, मानाचा (अहंकाराचा) सर्वस्वी त्याग करावा आणि सर्व संयोजनांचे (बंधनांचे) उल्लंघन करावे. नाम आणि रूपात आसक्त न होणाऱ्या आणि अकिंचन (आसक्तीरहित) असणाऱ्या त्या व्यक्तीला कोणतेही दुःख ग्रासत नाही. ‘‘පහාසි සඞ්ඛං න විමානමජ්ඣගා,අච්ඡෙච්ඡි තණ්හං ඉධ නාමරූපෙ; තං ඡින්නගන්ථං අනිඝං නිරාසං,පරියෙසමානා නාජ්ඣගමුං; දෙවා මනුස්සා ඉධ වා හුරං වා,සග්ගෙසු වා සබ්බනිවෙසනෙසූ’’ති. ज्याने (संज्ञा/अभिधान) प्रपंचाचा त्याग केला आहे, जो नऊ प्रकारच्या मानाच्या आहारी गेला नाही, ज्याने या नाम-रूपातील तृष्णेचा समूळ छेद केला आहे; अशा ग्रंथीमुक्त (बंधनांपासून मुक्त), दुःखविरहित आणि तृष्णारहित अर्हंताला शोधणारे देव किंवा मनुष्य, या लोकात वा परलोकात, स्वर्गात वा इतर कोणत्याही निवासस्थानात शोधू शकत नाहीत. ‘‘තං චෙ හි නාද්දක්ඛුං තථාවිමුත්තං (ඉච්චායස්මා මොඝරාජා),දෙවා මනුස්සා ඉධ වා හුරං වා; නරුත්තමං අත්ථචරං නරානං,යෙ තං නමස්සන්ති පසංසියා තෙ’’ති. आयुष्यमान मोघराज म्हणाले – 'जर देव आणि मनुष्य अशा प्रकारे विमुक्त झालेल्या, या लोकात वा परलोकात न आढळणाऱ्या, मानवांमध्ये श्रेष्ठ आणि मानवांच्या कल्याणासाठी आचरण करणाऱ्या त्या अर्हंताला पाहू शकत नाहीत, तर जे त्यांना वंदन करतात, ते प्रशंसनीय ठरतात का?' ‘‘පසංසියා තෙපි භවන්ති භික්ඛූ (මොඝරාජාති භගවා),යෙ තං නමස්සන්ති තථාවිමුත්තං; අඤ්ඤාය ධම්මං විචිකිච්ඡං පහාය,සඞ්ගාතිගා තෙපි භවන්ති භික්ඛූ’’ති. भगवान म्हणाले – 'हे मोघराज! जे अशा प्रकारे विमुक्त झालेल्या अर्हंताला वंदन करतात, ते भिक्खू देखील प्रशंसनीय ठरतात. धम्माला जाणून आणि शंका-कुशंकांचा (विचिकित्सेचा) त्याग करून, ते भिक्खू सर्व आसक्तींच्या (संगांच्या) पलीकडे जाणारे बनतात.' 5. උජ්ඣානසඤ්ඤිසුත්තං ५. उज्झानसञ्ञी सुत्त (दोष शोधणाऱ्या देवतांचे सुत्त) 35. එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. අථ ඛො සම්බහුලා උජ්ඣානසඤ්ඤිකා දෙවතායො අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණා කෙවලකප්පං ජෙතවනං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා වෙහාසං අට්ඨංසු. වෙහාසං ඨිතා ඛො එකා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – ३५. एकदा भगवान श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेव्हा, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, अत्यंत देखण्या रूपाच्या अनेक 'उज्झानसञ्ञी' (दोष शोधणाऱ्या) देवता संपूर्ण जेतवनाला आपल्या प्रकाशाने उजळून टाकत भगवंतांकडे आल्या. जवळ येऊन त्या आकाशात उभ्या राहिल्या. आकाशात उभ्या असलेल्या एका देवतेने भगवंतांच्या सन्मुख ही गाथा म्हटली – ‘‘අඤ්ඤථා සන්තමත්තානං, අඤ්ඤථා යො පවෙදයෙ; නිකච්ච කිතවස්සෙව, භුත්තං ථෙය්යෙන තස්ස තං. जो स्वतः प्रत्यक्षात वेगळा असूनही स्वतःला दुसऱ्याच रूपात (सदाचारी म्हणून) दाखवतो, त्याचे ते उपभोग घेणे म्हणजे कपटी शिकाऱ्याप्रमाणे चोरीचेच अन्न खाण्यासारखे आहे. ‘‘යඤ්හි කයිරා තඤ්හි වදෙ, යං න කයිරා න තං වදෙ; අකරොන්තං භාසමානානං, පරිජානන්ති පණ්ඩිතා’’ති. मनुष्याने जे करावे तेच बोलावे, जे करू शकत नाही ते बोलू नये. कृती न करता केवळ बोलणाऱ्या माणसाला सुज्ञ लोक (पंडित) अचूक ओळखतात. ‘‘න යිදං භාසිතමත්තෙන, එකන්තසවනෙන වා; අනුක්කමිතවෙ සක්කා, යායං පටිපදා දළ්හා; යාය ධීරා පමුච්චන්ති, ඣායිනො මාරබන්ධනා. केवळ बोलण्याने किंवा केवळ ऐकण्याने या दृढ प्रतिपदेवर (साधनेच्या मार्गावर) मार्गक्रमण करता येत नाही; ज्या प्रतिपदेचे आचरण करून ध्यानमग्न सुज्ञ लोक मारबंधनातून मुक्त होतात. ‘‘න [Pg.23] වෙ ධීරා පකුබ්බන්ති, විදිත්වා ලොකපරියායං; අඤ්ඤාය නිබ්බුතා ධීරා, තිණ්ණා ලොකෙ විසත්තික’’න්ති. संसाराचे स्वरूप जाणून सुज्ञ लोक असे (ढोंग) करत नाहीत. सत्य जाणून शांत झालेले ते सुज्ञ लोक या जगातील तृष्णेला (आसक्तीला) पार करून गेले आहेत. අථ ඛො තා දෙවතායො පථවියං පතිට්ඨහිත්වා භගවතො පාදෙසු සිරසා නිපතිත්වා භගවන්තං එතදවොචුං – ‘‘අච්චයො නො, භන්තෙ, අච්චගමා යථාබාලං යථාමූළ්හං යථාඅකුසලං, යා මයං භගවන්තං ආසාදෙතබ්බං අමඤ්ඤිම්හා. තාසං නො, භන්තෙ, භගවා අච්චයං අච්චයතො පටිග්ගණ්හාතු ආයතිං සංවරායා’’ති. අථ ඛො භගවා සිතං පාත්වාකාසි. අථ ඛො තා දෙවතායො භිය්යොසොමත්තාය උජ්ඣායන්තියො වෙහාසං අබ්භුග්ගඤ්ඡුං. එකා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – त्यानंतर त्या देवता जमिनीवर उतरल्या आणि भगवंतांच्या चरणांवर डोके ठेवून लीन होत म्हणाल्या – 'भंते! अज्ञानामुळे, मोहामुळे आणि अकुशलतेमुळे आमच्याकडून अपराध झाला आहे, ज्यामुळे आम्ही भगवंतांवर आक्षेप घेण्याचे धाडस केले. भंते! भविष्यात स्वतःवर संयम ठेवण्यासाठी भगवंतांनी आमचा हा अपराध अपराध म्हणून स्वीकारून आम्हाला क्षमा करावी.' तेव्हा भगवंतांनी मंदस्मित केले. त्यावर त्या देवता आणखीनच असंतुष्ट (दोष शोधणाऱ्या) होऊन आकाशात उडून गेल्या. मग एका देवतेने भगवंतांच्या सन्मुख ही गाथा म्हटली – ‘‘අච්චයං දෙසයන්තීනං, යො චෙ න පටිගණ්හති; කොපන්තරො දොසගරු, ස වෙරං පටිමුඤ්චතී’’ති. जो मनुष्य आपला अपराध कबूल करणाऱ्यांना क्षमा करत नाही, तो मनात क्रोध बाळगणारा आणि द्वेषाला महत्त्व देणारा मनुष्य स्वतःमध्ये वैरच वाढवतो. ‘‘අච්චයො චෙ න විජ්ජෙථ, නොචිධාපගතං සියා; වෙරානි න ච සම්මෙය්යුං, කෙනීධ කුසලො සියා’’ති. जर जगात अपराधच झाला नसता, किंवा जर कोणाकडून चूकच झाली नसती, आणि जर वैर शांत झाले नसते, तर या जगात कोणी कुशल (सुज्ञ) कसा बरे झाला असता? ‘‘කස්සච්චයා න විජ්ජන්ති, කස්ස නත්ථි අපාගතං; කො න සම්මොහමාපාදි, කො ච ධීරො සදා සතො’’ති. असा कोण आहे ज्याच्याकडून कधीच अपराध होत नाही? कोणाकडून कधीच चूक होत नाही? कोण कधीच मोहात पडत नाही? आणि असा कोण सुज्ञ आहे जो सदैव जागरूक (स्मृतिमान) असतो? ‘‘තථාගතස්ස බුද්ධස්ස, සබ්බභූතානුකම්පිනො; තස්සච්චයා න විජ්ජන්ති, තස්ස නත්ථි අපාගතං; සො න සම්මොහමාපාදි, සොව ධීරො සදා සතො’’ති. सर्व प्राणिमात्रांवर अनुकंपा करणाऱ्या बुद्ध तथागतांकडून कधीही अपराध होत नाही, त्यांच्याकडून कधीही चूक होत नाही. ते कधीही मोहात पडत नाहीत आणि तेच सदैव जागरूक असणारे खरे सुज्ञ आहेत. ‘‘අච්චයං දෙසයන්තීනං, යො චෙ න පටිගණ්හති; කොපන්තරො දොසගරු, ස වෙරං පටිමුඤ්චති; තං වෙරං නාභිනන්දාමි, පටිග්ගණ්හාමි වොච්චය’’න්ති. जो मनुष्य आपला अपराध कबूल करणाऱ्यांना क्षमा करत नाही, तो मनात क्रोध बाळगणारा आणि द्वेषाला महत्त्व देणारा मनुष्य स्वतःमध्ये वैरच वाढवतो. मी त्या वैराची इच्छा करत नाही, म्हणून मी तुमचा अपराध क्षमा करतो. 6. සද්ධාසුත්තං ६. सद्धा सुत्त (श्रद्धा सुत्त) 36. එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. අථ ඛො සම්බහුලා සතුල්ලපකායිකා දෙවතායො අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණා කෙවලකප්පං ජෙතවනං [Pg.24] ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨංසු. එකමන්තං ඨිතා ඛො එකා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – ३६. एकदा भगवान श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेव्हा, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, 'सतुल्लपकायिक' समूहातील अनेक अत्यंत देखण्या रूपाच्या देवता संपूर्ण जेतवनाला आपल्या प्रकाशाने उजळून टाकत भगवंतांकडे आल्या. जवळ येऊन त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि त्या एका बाजूला उभ्या राहिल्या. एका बाजूला उभ्या असलेल्या एका देवतेने भगवंतांच्या सन्मुख ही गाथा म्हटली – ‘‘සද්ධා දුතියා පුරිසස්ස හොති,නො චෙ අස්සද්ධියං අවතිට්ඨති; යසො ච කිත්තී ච තත්වස්ස හොති,සග්ගඤ්ච සො ගච්ඡති සරීරං විහායා’’ති. श्रद्धा ही मनुष्याची सोबती असते. जर त्याच्या मनात अश्रद्धा टिकून राहिली नाही, तर त्याला यश आणि कीर्ती प्राप्त होते आणि शरीराचा त्याग केल्यानंतर तो स्वर्गात जातो. අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමා ගාථායො අභාසි – त्यानंतर दुसऱ्या एका देवतेने भगवंतांच्या सन्मुख या गाथा म्हटल्या – ‘‘කොධං ජහෙ විප්පජහෙය්ය මානං,සංයොජනං සබ්බමතික්කමෙය්ය; තං නාමරූපස්මිමසජ්ජමානං,අකිඤ්චනං නානුපතන්ති සඞ්ගා’’ති. मनुष्याने क्रोधाचा त्याग करावा, मानाचा (अहंकाराचा) सर्वस्वी त्याग करावा आणि सर्व संयोजनांचे (बंधनांचे) उल्लंघन करावे. नाम आणि रूपात आसक्त न होणाऱ्या आणि अकिंचन (आसक्तीरहित) असणाऱ्या त्या व्यक्तीला कोणतीही आसक्ती (संग) ग्रासत नाही. ‘‘පමාදමනුයුඤ්ජන්ති, බාලා දුම්මෙධිනො ජනා; අප්පමාදඤ්ච මෙධාවී, ධනං සෙට්ඨංව රක්ඛති. मूर्ख आणि प्रज्ञाहीन लोक प्रमादात (बेसावधपणात) मग्न राहतात. परंतु बुद्धिमान मनुष्य अप्रमादाचे (जागरूकतेचे) रक्षण एखाद्या श्रेष्ठ धनाप्रमाणे करतो. ‘‘මා පමාදමනුයුඤ්ජෙථ, මා කාමරති සන්ථවං; අප්පමත්තො හි ඣායන්තො, පප්පොති පරමං සුඛ’’න්ති. प्रमादाच्या आहारी जाऊ नका, कामभोगाच्या आसक्तीमध्ये गुंतू नका. कारण जो अप्रमादी राहून ध्यान करतो, तोच परम सुखाला (निर्वाणाला) प्राप्त करतो. 7. සමයසුත්තං ७. समय सुत्त (महासमय सुत्त) 37. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා සක්කෙසු විහරති කපිලවත්ථුස්මිං මහාවනෙ මහතා භික්ඛුසඞ්ඝෙන සද්ධිං පඤ්චමත්තෙහි භික්ඛුසතෙහි සබ්බෙහෙව අරහන්තෙහි; දසහි ච ලොකධාතූහි දෙවතා යෙභුය්යෙන සන්නිපතිතා හොන්ති භගවන්තං දස්සනාය භික්ඛුසඞ්ඝඤ්ච. අථ ඛො චතුන්නං සුද්ධාවාසකායිකානං දෙවතානං එතදහොසි – ‘‘අයං ඛො භගවා සක්කෙසු විහරති කපිලවත්ථුස්මිං මහාවනෙ මහතා භික්ඛුසඞ්ඝෙන සද්ධිං පඤ්චමත්තෙහි භික්ඛුසතෙහි සබ්බෙහෙව අරහන්තෙහි; දසහි ච ලොකධාතූහි දෙවතා යෙභුය්යෙන සන්නිපතිතා හොන්ති භගවන්තං දස්සනාය භික්ඛුසඞ්ඝඤ්ච. යංනූන මයම්පි යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමෙය්යාම; උපසඞ්කමිත්වා භගවතො සන්තිකෙ පච්චෙකං ගාථං භාසෙය්යාමා’’ති. ३७. असे मी ऐकले आहे – एकदा भगवान शाक्य देशातील कपिलवस्तू येथील महावनात सुमारे पाचशे भिक्खूंच्या मोठ्या भिक्खू संघासह विहार करत होते, जे सर्वच्या सर्व अर्हंत होते. दहा हजार लोकधातूंतून (विश्वप्रणालींतून) अनेक देवता भगवंतांचे आणि भिक्खू संघाचे दर्शन घेण्यासाठी मोठ्या संख्येने एकत्र आल्या होत्या. तेव्हा शुद्धावास लोकातील चार देवतांच्या मनात असा विचार आला – 'हे भगवान शाक्य देशातील कपिलवस्तू येथील महावनात सुमारे पाचशे भिक्खूंच्या मोठ्या भिक्खू संघासह विहार करत आहेत, जे सर्वच्या सर्व अर्हंत होते. दहा हजार लोकधातूंतून अनेक देवता भगवंतांचे आणि भिक्खू संघाचे दर्शन घेण्यासाठी मोठ्या संख्येने एकत्र आल्या आहेत. तर मग आम्हीही भगवंतांकडे का जाऊ नये? तिथे जाऊन भगवंतांच्या सन्मुख आम्हा प्रत्येकाने आपापली एक गाथा म्हणावी.' අථ [Pg.25] ඛො තා දෙවතා – සෙය්යථාපි නාම බලවා පුරිසො සමිඤ්ජිතං වා බාහං පසාරෙය්ය පසාරිතං වා බාහං සමිඤ්ජෙය්ය. එවමෙව – සුද්ධාවාසෙසු දෙවෙසු අන්තරහිතා භගවතො පුරතො පාතුරහෙසුං. අථ ඛො තා දෙවතා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨංසු. එකමන්තං ඨිතා ඛො එකා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – त्यानंतर, ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य आपला दुमडलेला हात पसरतो किंवा पसरलेला हात दुमडतो, इतक्या वेगाने त्या देवता शुद्धावास देवलोकातून अंतर्धान पावल्या आणि भगवंतांच्या समोर प्रकट झाल्या. मग त्या देवतांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि त्या एका बाजूला उभ्या राहिल्या. एका बाजूला उभ्या असलेल्या एका देवतेने भगवंतांच्या सन्मुख ही गाथा म्हटली – ‘‘මහාසමයො පවනස්මිං, දෙවකායා සමාගතා; ආගතම්හ ඉමං ධම්මසමයං, දක්ඛිතායෙ අපරාජිතසඞ්ඝ’’න්ති. या महावनात मोठा मेळावा (महासमय) भरला आहे, देवगणांचे समूह एकत्र आले आहेत. आम्ही देखील या धम्मसभेला, या अजिंक्य (अपराजित) भिक्खू संघाचे दर्शन घेण्यासाठी आलो आहोत. අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – त्यानंतर दुसऱ्या एका देवतेने भगवंतांच्या सन्मुख ही गाथा म्हटली – ‘‘තත්ර භික්ඛවො සමාදහංසු, චිත්තමත්තනො උජුකං අකංසු ; සාරථීව නෙත්තානි ගහෙත්වා, ඉන්ද්රියානි රක්ඛන්ති පණ්ඩිතා’’ති. तिथे भिक्खूंनी आपले चित्त एकाग्र केले आहे आणि आपले मन सरळ (प्रामाणिक) केले आहे. ज्याप्रमाणे सारथी घोड्यांचे लगाम हातात धरून रथ नियंत्रित करतो, त्याचप्रमाणे ते सुज्ञ भिक्खू आपल्या इंद्रियांचे रक्षण करतात. අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – त्यानंतर, दुसऱ्या एका देवतेने भगवंतांच्या सन्निध ही गाथा म्हटली – ‘‘ඡෙත්වා ඛීලං ඡෙත්වා පලිඝං, ඉන්දඛීලං ඌහච්ච මනෙජා; තෙ චරන්ති සුද්ධා විමලා, චක්ඛුමතා සුදන්තා සුසුනාගා’’ති. “खिट (राग, द्वेष, मोहाचे अडथळे) तोडून, अडसर (राग, द्वेष, मोहाचे कवाड) तोडून आणि इंद्रखील (राग, द्वेष, मोहाचा खांब) उपटून टाकून, ते तृष्णारहित होऊन विचरतात; ते शुद्ध, निर्मळ, दिव्यचक्षू असलेल्या (बुद्धांद्वारे) उत्तम प्रकारे दमित केलेले तरुण नाग (श्रेष्ठ अरहंत) आहेत.” අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – त्यानंतर, दुसऱ्या एका देवतेने भगवंतांच्या सन्निध ही गाथा म्हटली – ‘‘යෙ කෙචි බුද්ධං සරණං ගතාසෙ, න තෙ ගමිස්සන්ති අපායභූමිං; පහාය මානුසං දෙහං, දෙවකායං පරිපූරෙස්සන්තී’’ති. “जे कोणी बुद्धांना शरण गेले आहेत, ते अपायभूमीला (दुर्गतीला) जाणार नाहीत. मानवी देहाचा त्याग करून, ते देवलोकाला परिपूर्ण करतील.” 8. සකලිකසුත්තං ८. सकलिक सुत्त 38. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති මද්දකුච්ඡිස්මිං මිගදායෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවතො පාදො සකලිකාය ඛතො හොති. භුසා සුදං භගවතො වෙදනා වත්තන්ති සාරීරිකා වෙදනා දුක්ඛා තිබ්බා ඛරා කටුකා අසාතා අමනාපා; තා සුදං භගවා සතො සම්පජානො අධිවාසෙති අවිහඤ්ඤමානො. අථ ඛො භගවා චතුග්ගුණං සඞ්ඝාටිං පඤ්ඤාපෙත්වා දක්ඛිණෙන පස්සෙන සීහසෙය්යං කප්පෙති පාදෙ පාදං අච්චාධාය සතො සම්පජානො. ३८. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान राजगृहातील मद्दकुच्छी मृगदायात विहार करत होते. त्या वेळी भगवंतांच्या पायाला दगडाच्या कपचीने जखम झाली होती. भगवंतांना तीव्र, दुःखद, प्रखर, कठीण, कटू, अप्रिय आणि अमनाप अशा शारीरिक वेदना होत होत्या. परंतु, भगवान व्याकुळ न होता, स्मृतिमान व संप्रजन्यशील राहून त्या वेदना सहन करत होते. त्यानंतर भगवंतांनी आपली चारपदरी संघाटी अंथरून, उजव्या कुशीवर, एका पायावर दुसरा पाय ठेवून, स्मृतिमान व संप्रजन्यशील राहून सिंहशय्या ग्रहण केली. අථ [Pg.26] ඛො සත්තසතා සතුල්ලපකායිකා දෙවතායො අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණා කෙවලකප්පං මද්දකුච්ඡිං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨංසු. එකමන්තං ඨිතා ඛො එකා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං උදානං උදානෙසි – ‘‘නාගො වත, භො, සමණො ගොතමො; නාගවතා ච සමුප්පන්නා සාරීරිකා වෙදනා දුක්ඛා තිබ්බා ඛරා කටුකා අසාතා අමනාපා සතො සම්පජානො අධිවාසෙති අවිහඤ්ඤමානො’’ති. त्यानंतर, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, अतिशय देखण्या रूपाच्या, सतुल्लप गणातील सातशे देवता संपूर्ण मद्दकुच्छी मृगदायाला आपल्या प्रकाशाने उजळून टाकत भगवंतांकडे आल्या. जवळ येऊन त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि त्या एका बाजूला उभ्या राहिल्या. एका बाजूला उभी राहिलेली एक देवता भगवंतांच्या सन्निध हे उदान बोलली – ‘अहो! श्रमण गौतम खरोखरच नागासारखे (श्रेष्ठ हत्तीसारखे) आहेत! नागत्वामुळेच, उत्पन्न झालेल्या तीव्र, दुःखद, प्रखर, कठीण, कटू, अप्रिय आणि अमनाप अशा शारीरिक वेदनांना ते व्याकुळ न होता, स्मृतिमान व संप्रजन्यशील राहून सहन करत आहेत.’ අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං උදානං උදානෙසි – ‘‘සීහො වත, භො, සමණො ගොතමො; සීහවතා ච සමුප්පන්නා සාරීරිකා වෙදනා දුක්ඛා තිබ්බා ඛරා කටුකා අසාතා අමනාපා සතො සම්පජානො අධිවාසෙති අවිහඤ්ඤමානො’’ති. त्यानंतर, दुसऱ्या एका देवतेने भगवंतांच्या सन्निध हे उदान बोलले – ‘अहो! श्रमण गौतम खरोखरच सिंहासारखे आहेत! सिंहत्वामुळेच, उत्पन्न झालेल्या तीव्र, दुःखद, प्रखर, कठीण, कटू, अप्रिय आणि अमनाप अशा शारीरिक वेदनांना ते व्याकुळ न होता, स्मृतिमान व संप्रजन्यशील राहून सहन करत आहेत.’ අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං උදානං උදානෙසි – ‘‘ආජානීයො වත, භො, සමණො ගොතමො; ආජානීයවතා ච සමුප්පන්නා සාරීරිකා වෙදනා දුක්ඛා තිබ්බා ඛරා කටුකා අසාතා අමනාපා සතො සම්පජානො අධිවාසෙති අවිහඤ්ඤමානො’’ති. त्यानंतर, दुसऱ्या एका देवतेने भगवंतांच्या सन्निध हे उदान बोलले – ‘अहो! श्रमण गौतम खरोखरच आजानीय (उत्कृष्ट जातीच्या घोड्यासारखे) आहेत! आजानीयत्वामुळेच, उत्पन्न झालेल्या तीव्र, दुःखद, प्रखर, कठीण, कटू, अप्रिय आणि अमनाप अशा शारीरिक वेदनांना ते व्याकुळ न होता, स्मृतिमान व संप्रजन्यशील राहून सहन करत आहेत.’ අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං උදානං උදානෙසි – ‘‘නිසභො වත, භො, සමණො ගොතමො; නිසභවතා ච සමුප්පන්නා සාරීරිකා වෙදනා දුක්ඛා තිබ්බා ඛරා කටුකා අසාතා අමනාපා සතො සම්පජානො අධිවාසෙති අවිහඤ්ඤමානො’’ති. त्यानंतर, दुसऱ्या एका देवतेने भगवंतांच्या सन्निध हे उदान बोलले – ‘अहो! श्रमण गौतम खरोखरच ऋषभ (श्रेष्ठ बैलासारखे) आहेत! ऋषभत्वामुळेच, उत्पन्न झालेल्या तीव्र, दुःखद, प्रखर, कठीण, कटू, अप्रिय आणि अमनाप अशा शारीरिक वेदनांना ते व्याकुळ न होता, स्मृतिमान व संप्रजन्यशील राहून सहन करत आहेत.’ අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං උදානං උදානෙසි – ‘‘ධොරය්හො වත, භො, සමණො ගොතමො; ධොරය්හවතා ච සමුප්පන්නා සාරීරිකා වෙදනා දුක්ඛා තිබ්බා ඛරා කටුකා අසාතා අමනාපා සතො සම්පජානො අධිවාසෙති අවිහඤ්ඤමානො’’ති. त्यानंतर, दुसऱ्या एका देवतेने भगवंतांच्या सन्निध हे उदान बोलले – ‘अहो! श्रमण गौतम खरोखरच धोरय्ह (ओझे वाहणाऱ्या श्रेष्ठ बैलासारखे) आहेत! धोरय्हत्वामुळेच, उत्पन्न झालेल्या तीव्र, दुःखद, प्रखर, कठीण, कटू, अप्रिय आणि अमनाप अशा शारीरिक वेदनांना ते व्याकुळ न होता, स्मृतिमान व संप्रजन्यशील राहून सहन करत आहेत.’ අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං උදානං උදානෙසි – ‘‘දන්තො වත, භො, සමණො ගොතමො; දන්තවතා ච සමුප්පන්නා සාරීරිකා වෙදනා දුක්ඛා තිබ්බා ඛරා කටුකා අසාතා අමනාපා සතො සම්පජානො අධිවාසෙති අවිහඤ්ඤමානො’’ති. त्यानंतर, दुसऱ्या एका देवतेने भगवंतांच्या सन्निध हे उदान बोलले – ‘अहो! श्रमण गौतम खरोखरच दंत (उत्तम प्रकारे दमित) आहेत! दंतत्वामुळेच, उत्पन्न झालेल्या तीव्र, दुःखद, प्रखर, कठीण, कटू, अप्रिय आणि अमनाप अशा शारीरिक वेदनांना ते व्याकुळ न होता, स्मृतिमान व संप्रजन्यशील राहून सहन करत आहेत.’ අථ ඛො අපරා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං උදානං උදානෙසි – ‘‘පස්ස සමාධිං සුභාවිතං චිත්තඤ්ච සුවිමුත්තං, න චාභිනතං න චාපනතං න [Pg.27] ච සසඞ්ඛාරනිග්ගය්හවාරිතගතං. යො එවරූපං පුරිසනාගං පුරිසසීහං පුරිසආජානීයං පුරිසනිසභං පුරිසධොරය්හං පුරිසදන්තං අතික්කමිතබ්බං මඤ්ඤෙය්ය කිමඤ්ඤත්ර අදස්සනා’’ති. त्यानंतर, दुसऱ्या एका देवतेने भगवंतांच्या सन्निध हे उदान बोलले – ‘त्यांची सुविकसित समाधी आणि सुविमुक्त चित्त पहा – जे (रागाकडे) झुकलेले नाही, (द्वेषाकडे) वळलेले नाही आणि जे बळजबरीने दाबून रोखलेले नाही. अशा पुरुष-नाग, पुरुष-सिंह, पुरुष-आजानीय, पुरुष-ऋषभ, पुरुष-धोरय्ह आणि पुरुष-दंत असलेल्या महापुरुषाचे उल्लंघन केले जाऊ शकते (त्यांना त्रास दिला जाऊ शकतो) असे जर कोणाला वाटत असेल, तर ते केवळ त्याच्या अज्ञानाशिवाय (दृष्टीच्या अभावाशिवाय) दुसरे काय असू शकते?’ ‘‘පඤ්චවෙදා සතං සමං, තපස්සී බ්රාහ්මණා චරං; චිත්තඤ්ච නෙසං න සම්මා විමුත්තං, හීනත්ථරූපා න පාරඞ්ගමා තෙ. “पाच वेदांचे ज्ञाते असलेले तपस्वी ब्राह्मण जरी शंभर वर्षे तपश्चर्या करत राहिले, तरी त्यांचे चित्त सम्यक प्रकारे विमुक्त होत नाही; हीन स्वभावाचे ते लोक (निर्वाणाच्या) पलीकडच्या तीराला पोहोचू शकत नाहीत.” ‘‘තණ්හාධිපන්නා වතසීලබද්ධා, ලූඛං තපං වස්සසතං චරන්තා; චිත්තඤ්ච නෙසං න සම්මා විමුත්තං, හීනත්ථරූපා න පාරඞ්ගමා තෙ. “तृष्णेने ग्रासलेले, व्रत आणि शील (नियम) यांनी बांधलेले लोक जरी शंभर वर्षे कठोर तप करत राहिले, तरी त्यांचे चित्त सम्यक प्रकारे विमुक्त होत नाही; हीन स्वभावाचे ते लोक पलीकडच्या तीराला पोहोचू शकत नाहीत.” ‘‘න මානකාමස්ස දමො ඉධත්ථි, න මොනමත්ථි අසමාහිතස්ස; එකො අරඤ්ඤෙ විහරං පමත්තො, න මච්චුධෙය්යස්ස තරෙය්ය පාර’’න්ති. “या जगात मानाची (अहंकाराची) इच्छा करणाऱ्याला दमन (संयम) लाभत नाही, आणि समाधी नसलेल्याला मौन (सत्यज्ञान) प्राप्त होत नाही. अरण्यात एकटा राहत असूनही जो प्रमादी (असावध) आहे, तो मृत्यूच्या साम्राज्याच्या (संसाराच्या) पलीकडच्या तीराला जाऊ शकत नाही.” ‘‘මානං පහාය සුසමාහිතත්තො, සුචෙතසො සබ්බධි විප්පමුත්තො; එකො අරඤ්ඤෙ විහරමප්පමත්තො, ස මච්චුධෙය්යස්ස තරෙය්ය පාර’’න්ති. “अहंकार सोडून, उत्तम प्रकारे समाधीस्थ होऊन, शुद्ध चित्ताने सर्व बंधनांतून विमुक्त झालेला, अरण्यात एकटा राहणारा आणि अप्रमादी (सावध) असलेला मनुष्य मृत्यूच्या साम्राज्याच्या पलीकडच्या तीराला जाऊ शकतो.” 9. පඨමපජ්ජුන්නධීතුසුත්තං ९. प्रथम पज्जुन्नधीतू सुत्त 39. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා වෙසාලියං විහරති මහාවනෙ කූටාගාරසාලායං. අථ ඛො කොකනදා පජ්ජුන්නස්ස ධීතා අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණා කෙවලකප්පං මහාවනං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතා ඛො සා දෙවතා කොකනදා පජ්ජුන්නස්ස ධීතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමා ගාථායො අභාසි – ३९. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान वैशाली येथील महावनातील कूटागारशाळेत विहार करत होते. त्या वेळी पज्जुन्न देवाची कन्या कोकनदा नावाची देवी, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, अतिशय देखण्या रूपाने संपूर्ण महावनाला आपल्या प्रकाशाने उजळून टाकत भगवंतांकडे आली. जवळ येऊन तिने भगवंतांना अभिवादन केले आणि ती एका बाजूला उभी राहिली. एका बाजूला उभी राहिलेली ती पज्जुन्न देवाची कन्या कोकनदा देवी भगवंतांच्या सन्निध या गाथा म्हणाली – ‘‘වෙසාලියං වනෙ විහරන්තං, අග්ගං සත්තස්ස සම්බුද්ධං; කොකනදාහමස්මි අභිවන්දෙ, කොකනදා පජ්ජුන්නස්ස ධීතා. “वैशालीच्या वनात विहार करणाऱ्या, सर्व प्राण्यांमध्ये श्रेष्ठ असलेल्या सम्यक संबुद्धांना मी वंदन करते. मी कोकनदा आहे, पज्जुन्न देवाची कन्या कोकनदा.” ‘‘සුතමෙව පුරෙ ආසි, ධම්මො චක්ඛුමතානුබුද්ධො; සාහං දානි සක්ඛි ජානාමි, මුනිනො දෙසයතො සුගතස්ස. “पूर्वी मी केवळ ऐकलेच होते की दिव्यचक्षू असलेल्या (बुद्धांनी) धर्माचा साक्षात्कार केला आहे; परंतु आता, सुगत मुनी उपदेश करत असताना, मी स्वतः त्याची प्रत्यक्ष साक्षीदार झाले आहे.” ‘‘යෙ කෙචි අරියං ධම්මං, විගරහන්තා චරන්ති දුම්මෙධා; උපෙන්ති රොරුවං ඝොරං, චිරරත්තං දුක්ඛං අනුභවන්ති. “जे कोणी दुर्बुद्धी लोक आर्य धर्माची निंदा करत विचरतात, ते भयानक रोरुव नरकात पडतात आणि दीर्घकाळपर्यंत दुःख भोगतात.” ‘‘යෙ ච ඛො අරියෙ ධම්මෙ, ඛන්තියා උපසමෙන උපෙතා; පහාය මානුසං දෙහං, දෙවකාය පරිපූරෙස්සන්තී’’ති. “परंतु जे आर्य धर्मात क्षमा (सहनशीलता) आणि उपशम (शांतता) यांनी युक्त आहेत, ते मानवी देहाचा त्याग करून देवलोकाला परिपूर्ण करतील.” 10. දුතියපජ්ජුන්නධීතුසුත්තං १०. द्वितीय पज्जुन्नधीतू सुत्त 40. එවං [Pg.28] මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා වෙසාලියං විහරති මහාවනෙ කූටාගාරසාලායං. අථ ඛො චූළකොකනදා පජ්ජුන්නස්ස ධීතා අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණා කෙවලකප්පං මහාවනං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතා ඛො සා දෙවතා චූළකොකනදා පජ්ජුන්නස්ස ධීතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමා ගාථායො අභාසි – ४०. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान वैशाली येथील महावनातील कूटागारशाळेत विहार करत होते. त्या वेळी पज्जुन्न देवाची कन्या चूळकोकनदा नावाची देवी, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, अतिशय देखण्या रूपाने संपूर्ण महावनाला आपल्या प्रकाशाने उजळून टाकत भगवंतांकडे आली. जवळ येऊन तिने भगवंतांना अभिवादन केले आणि ती एका बाजूला उभी राहिली. एका बाजूला उभी राहिलेली ती पज्जुन्न देवाची कन्या चूळकोकनदा देवी भगवंतांच्या सन्निध या गाथा म्हणाली – ‘‘ඉධාගමා විජ්ජුපභාසවණ්ණා, කොකනදා පජ්ජුන්නස්ස ධීතා; බුද්ධඤ්ච ධම්මඤ්ච නමස්සමානා, ගාථාචිමා අත්ථවතී අභාසි. “विजेच्या प्रकाशासारखी कांती असलेली, पज्जुन्न देवाची कन्या कोकनदा येथे आली आहे; बुद्ध आणि धम्माला वंदन करत, तिने अर्थपूर्ण अशा या गाथा म्हटल्या.” ‘‘බහුනාපි ඛො තං විභජෙය්යං, පරියායෙන තාදිසො ධම්මො; සංඛිත්තමත්ථං ලපයිස්සාමි, යාවතා මෙ මනසා පරියත්තං. जरी हा धम्म असा आहे की मी त्याचे अनेक प्रकारे विश्लेषण करू शकेन, तरीही मी माझ्या मनाने जितका ग्रहण केला आहे, तितका त्याचा संक्षिप्त अर्थ सांगेन. ‘‘පාපං න කයිරා වචසා මනසා,කායෙන වා කිඤ්චන සබ්බලොකෙ; කාමෙ පහාය සතිමා සම්පජානො,දුක්ඛං න සෙවෙථ අනත්ථසංහිත’’න්ති. या संपूर्ण जगात वाणीने, मनाने किंवा शरीराने कोणतेही पाप करू नये. कामभोगांचा त्याग करून, स्मृतिमान (सजक) आणि प्रज्ञावान (संप्रजन्ययुक्त) होऊन, अनर्थकारक (हानिकारक) आणि दुःखद गोष्टींचे सेवन करू नये. සතුල්ලපකායිකවග්ගො චතුත්ථො. सतुल्लपकायिक वर्ग चौथा समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याचा सारांश (उद्दान) - සබ්භිමච්ඡරිනා සාධු, න සන්තුජ්ඣානසඤ්ඤිනො; සද්ධා සමයො සකලිකං, උභො පජ්ජුන්නධීතරොති. सब्भि, मच्छरी, साधु, न सन्ति, उज्झानसञ्ञी, सद्धा, समय, सकलिक आणि दोन्ही पज्जुन्नधीतू - हे दहा (सुत्त) आहेत. 5. ආදිත්තවග්ගො ५. आदित्त वर्ग 1. ආදිත්තසුත්තං १. आदित्त सुत्त 41. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. අථ ඛො අඤ්ඤතරා දෙවතා අභික්කන්තාය [Pg.29] රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණා කෙවලකප්පං ජෙතවනං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතා ඛො සා දෙවතා භගවතො සන්තිකෙ ඉමා ගාථායො අභාසි – ४१. असे मी ऐकले आहे – एक वेळ भगवान श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेव्हा, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, अत्यंत देदीप्यमान कांती असलेल्या एका देवतेने संपूर्ण जेतवन उजळून टाकले आणि ती भगवंतांकडे आली. जवळ येऊन भगवंतांना अभिवादन करून ती एका बाजूला उभी राहिली. एका बाजूला उभी राहिलेली ती देवता भगवंतांच्या सन्निध या गाथा म्हणाली – ‘‘ආදිත්තස්මිං අගාරස්මිං, යං නීහරති භාජනං; තං තස්ස හොති අත්ථාය, නො ච යං තත්ථ ඩය්හති. घर पेटलेले असताना, जे भांडे (किंवा वस्तू) बाहेर काढले जाते, तेच त्याच्या उपयोगाचे ठरते; जे आत जळून खाक होते ते उपयोगाचे ठरत नाही. ‘‘එවං ආදිත්තකො ලොකො, ජරාය මරණෙන ච; නීහරෙථෙව දානෙන, දින්නං හොති සුනීහතං. त्याचप्रमाणे हा संसार जरा (वृद्धत्व) आणि मरणाने पेटलेला आहे. दानाच्या माध्यमातून स्वतःचे कल्याण बाहेर काढून घ्यावे; जे दान दिले जाते, तेच सुरक्षितपणे बाहेर काढल्यासारखे असते. ‘‘දින්නං සුඛඵලං හොති, නාදින්නං හොති තං තථා; චොරා හරන්ති රාජානො, අග්ගි ඩහති නස්සති. दिलेले दान सुखद फळ देणारे असते, परंतु न दिलेले धन तसे सुख देत नाही. ते धन चोर लुटून नेतात, राजे जप्त करतात, आग जळवून टाकते किंवा ते नष्ट होते. ‘‘අථ අන්තෙන ජහති, සරීරං සපරිග්ගහං; එතදඤ්ඤාය මෙධාවී, භුඤ්ජෙථ ච දදෙථ ච; දත්වා ච භුත්වා ච යථානුභාවං; අනින්දිතො සග්ගමුපෙති ඨාන’’න්ති. शेवटी माणसाला आपल्या संपत्तीसह हे शरीर सोडून जावेच लागते. हे जाणून बुद्धिमान माणसाने स्वतःही उपभोग घ्यावा आणि दानही करावे. आपल्या क्षमतेनुसार दान करून आणि उपभोग घेऊन, तो निंदारहित होऊन स्वर्गीय स्थानाला प्राप्त करतो. 2. කිංදදසුත්තං २. किंदद सुत्त 42. ४२. ‘‘කිංදදො බලදො හොති, කිංදදො හොති වණ්ණදො; කිංදදො සුඛදො හොති, කිංදදො හොති චක්ඛුදො; කො ච සබ්බදදො හොති, තං මෙ අක්ඛාහි පුච්ඡිතො’’ති. काय देणारा बल देणारा ठरतो? काय देणारा वर्ण (सौंदर्य) देणारा ठरतो? काय देणारा सुख देणारा ठरतो? काय देणारा चक्षू (दृष्टी) देणारा ठरतो? आणि सर्व काही देणारा कोण असतो? मी विचारत आहे, कृपया मला सांगा. ‘‘අන්නදො බලදො හොති, වත්ථදො හොති වණ්ණදො; යානදො සුඛදො හොති, දීපදො හොති චක්ඛුදො. अन्न देणारा बल देणारा ठरतो; वस्त्र देणारा वर्ण (सौंदर्य) देणारा ठरतो; वाहन देणारा सुख देणारा ठरतो; आणि दिवा (प्रकाश) देणारा चक्षू (दृष्टी) देणारा ठरतो. ‘‘සො ච සබ්බදදො හොති, යො දදාති උපස්සයං; අමතං දදො ච සො හොති, යො ධම්මමනුසාසතී’’ති. जो निवारा (आवास) देतो, तो सर्व काही देणारा ठरतो; आणि जो धम्माचा उपदेश करतो, तो अमृत (निर्वाण) देणारा ठरतो. 3. අන්නසුත්තං ३. अन्न सुत्त 43. ४३. ‘‘අන්නමෙවාභිනන්දන්ති, උභයෙ දෙවමානුසා; අථ කො නාම සො යක්ඛො, යං අන්නං නාභිනන්දතී’’ති. देव आणि मानव हे दोन्ही अन्नाचेच अभिनंदन करतात (अन्नाचीच इच्छा करतात). मग असा कोणता यक्ष (देवता) असेल, जो अन्नाचे अभिनंदन करत नाही? ‘‘යෙ [Pg.30] නං දදන්ති සද්ධාය, විප්පසන්නෙන චෙතසා; තමෙව අන්නං භජති, අස්මිං ලොකෙ පරම්හි ච. जे श्रद्धेने आणि प्रसन्न चित्ताने अन्नदान करतात, तेच अन्न या लोकात आणि परलोकातही त्यांच्या पाठीशी राहते (त्यांना सुख देते). ‘‘තස්මා විනෙය්ය මච්ඡෙරං, දජ්ජා දානං මලාභිභූ; පුඤ්ඤානි පරලොකස්මිං, පතිට්ඨා හොන්ති පාණින’’න්ති. म्हणूनच, कंजूषपणाचा त्याग करून, मळावर (अशुद्धतेवर) विजय मिळवून दान करावे. परलोकात पुण्य हेच प्राण्यांचा आधार असते. 4. එකමූලසුත්තං ४. एकमूल सुत्त 44. ४४. ‘‘එකමූලං ද්විරාවට්ටං, තිමලං පඤ්චපත්ථරං; සමුද්දං ද්වාදසාවට්ටං, පාතාලං අතරී ඉසී’’ති. ज्याला एक मूळ (तृष्णा), दोन आवर्त (शाश्वत व उच्छेद दृष्टी), तीन मळ (राग, द्वेष, मोह), पाच विस्तार (पंचकामगुण), बारा भोवरे (आयतन) आहेत, अशा अथांग (संसाररूपी) समुद्राला ऋषींनी (अरिहंतांनी) पार केले आहे. 5. අනොමසුත්තං ५. अनोम सुत्त 45. ४५. ‘‘අනොමනාමං නිපුණත්ථදස්සිං, පඤ්ඤාදදං කාමාලයෙ අසත්තං; තං පස්සථ සබ්බවිදුං සුමෙධං, අරියෙ පථෙ කමමානං මහෙසි’’න්ති. उत्कृष्ट नाव असलेल्या, सूक्ष्म अर्थ पाहणाऱ्या, प्रज्ञा देणाऱ्या, कामभोगांच्या आळयात आसक्त नसलेल्या, सर्वज्ञ, सुमेध (उत्तम प्रज्ञावान) आणि आर्य मार्गावर चालणाऱ्या त्या महर्षींचे (भगवंतांचे) दर्शन घ्या. 6. අච්ඡරාසුත්තං ६. अच्छरा सुत्त 46. ४६. ‘‘අච්ඡරාගණසඞ්ඝුට්ඨං, පිසාචගණසෙවිතං; වනන්තං මොහනං නාම, කථං යාත්රා භවිස්සතී’’ති. अप्सरांच्या समूहाने गुंजणारे, पिशाचांच्या समूहाने वेढलेले, आणि 'मोहन' नावाचे हे वन; यातून बाहेर पडण्याचा मार्ग कसा सापडेल? ‘‘උජුකො නාම සො මග්ගො, අභයා නාම සා දිසා; රථො අකූජනො නාම, ධම්මචක්කෙහි සංයුතො. तो मार्ग 'ऋजू' (सरळ) नावाचा आहे, ती दिशा 'अभय' (भयमुक्त) नावाची आहे. तो रथ 'अकूजन' (आवाज न करणारा) नावाचा असून धम्मरूपी चाकांनी युक्त आहे. ‘‘හිරී තස්ස අපාලම්බො, සත්යස්ස පරිවාරණං; ධම්මාහං සාරථිං බ්රූමි, සම්මාදිට්ඨිපුරෙජවං. लज्जा (ह्री) हा त्याचा टेकण्याचा भाग आहे, स्मृती (सती) हे त्याचे आवरण आहे. सम्यक् दृष्टी ज्याच्या पुढे चालते, अशा धम्माला मी सारथी म्हणतो. ‘‘යස්ස එතාදිසං යානං, ඉත්ථියා පුරිසස්ස වා; ස වෙ එතෙන යානෙන, නිබ්බානස්සෙව සන්තිකෙ’’ති. ज्या स्त्री किंवा पुरुषाकडे असे वाहन असते, ती व्यक्ती या वाहनाच्या साहाय्याने नक्कीच निर्वाणाच्या समीप पोहोचते. 7. වනරොපසුත්තං ७. वनरोप सुत्त 47. ४७. ‘‘කෙසං දිවා ච රත්තො ච, සදා පුඤ්ඤං පවඩ්ඪති; ධම්මට්ඨා සීලසම්පන්නා, කෙ ජනා සග්ගගාමිනො’’ති. कोणाची पुण्य दिवस-रात्र नेहमी वाढत राहते? धम्मामध्ये स्थित असलेले, शीलसंपन्न असलेले कोणते लोक स्वर्गात जाणारे ठरतात? ‘‘ආරාමරොපා වනරොපා, යෙ ජනා සෙතුකාරකා; පපඤ්ච උදපානඤ්ච, යෙ දදන්ති උපස්සයං. जे लोक बागा लावतात, वने लावतात, पूल बांधतात, पाणपोई आणि विहिरी खोदतात, आणि जे निवारा (आवास) दान करतात; ‘‘තෙසං [Pg.31] දිවා ච රත්තො ච, සදා පුඤ්ඤං පවඩ්ඪති; ධම්මට්ඨා සීලසම්පන්නා, තෙ ජනා සග්ගගාමිනො’’ති. त्यांचे पुण्य दिवस-रात्र नेहमी वाढत राहते. ते धम्मामध्ये स्थित असलेले, शीलसंपन्न असलेले लोक स्वर्गात जाणारे ठरतात. 8. ජෙතවනසුත්තං ८. जेतवन सुत्त 48. ४८. ‘‘ඉදඤ්හි තං ජෙතවනං, ඉසිසඞ්ඝනිසෙවිතං; ආවුත්ථං ධම්මරාජෙන, පීතිසඤ්ජනනං මම. हेच ते जेतवन आहे, जे ऋषींच्या (भिक्खूंच्या) संघाने सेवित आहे, जिथे धम्मराज (बुद्ध) वास्तव्य करत होते; हे माझ्या मनात प्रीती (आनंद) निर्माण करते. ‘‘කම්මං විජ්ජා ච ධම්මො ච, සීලං ජීවිතමුත්තමං; එතෙන මච්චා සුජ්ඣන්ති, න ගොත්තෙන ධනෙන වා. कर्म (सदाचरण), विद्या (ज्ञान), धम्म, शील आणि उत्तम जीवन; यानेच मनुष्य शुद्ध होतो, कुळामुळे किंवा धनाने नाही. ‘‘තස්මා හි පණ්ඩිතො පොසො, සම්පස්සං අත්ථමත්තනො; යොනිසො විචිනෙ ධම්මං, එවං තත්ථ විසුජ්ඣති. म्हणूनच, बुद्धिमान माणसाने स्वतःचे कल्याण पाहून, योग्य प्रकारे धम्माचे चिंतन करावे; अशा प्रकारे तो त्यात शुद्ध होतो. ‘‘සාරිපුත්තොව පඤ්ඤාය, සීලෙන උපසමෙන ච; යොපි පාරඞ්ගතො භික්ඛු, එතාවපරමො සියා’’ති. प्रज्ञा, शील आणि उपशम (शांती) यामध्ये सारिपुत्तच सर्वश्रेष्ठ आहेत. जो भिक्खू पार गेला आहे (निर्वाण प्राप्त केला आहे), तो जास्तीत जास्त त्यांच्या समान असू शकतो. 9. මච්ඡරිසුත්තං ९. मच्छरी सुत्त 49. ४९. ‘‘යෙධ මච්ඡරිනො ලොකෙ, කදරියා පරිභාසකා; අඤ්ඤෙසං දදමානානං, අන්තරායකරා නරා. या जगात जे लोक कंजूष, क्षुद्र मनाचे आणि निंदा करणारे आहेत, आणि जे दान देणाऱ्या इतरांच्या कार्यात अडथळे निर्माण करतात; ‘‘කීදිසො තෙසං විපාකො, සම්පරායො ච කීදිසො; භගවන්තං පුට්ඨුමාගම්ම, කථං ජානෙමු තං මය’’න්ති. “त्यांचा विपाक (परिणाम) कसा असतो आणि त्यांचा परलोक (पुढील जन्म) कसा असतो? आम्ही भगवंतांना हे विचारण्यासाठी आलो आहोत; आम्ही हे कसे जाणून घ्यावे?” ‘‘යෙධ මච්ඡරිනො ලොකෙ, කදරියා පරිභාසකා; අඤ්ඤෙසං දදමානානං, අන්තරායකරා නරා. “या जगात जे लोक कंजूष, क्षुद्र मनाचे आणि इतरांना दूषणे देणारे असतात, तसेच दान देणाऱ्या इतरांच्या दानात अडथळा निर्माण करतात;” ‘‘නිරයං තිරච්ඡානයොනිං, යමලොකං උපපජ්ජරෙ; සචෙ එන්ති මනුස්සත්තං, දලිද්දෙ ජායරෙ කුලෙ. “ते नरकात, प्राणीयोनित किंवा यमलोकात उत्पन्न होतात. जर ते पुन्हा मनुष्यत्वाला प्राप्त झाले, तर दरिद्री कुळात जन्माला येतात;” ‘‘චොළං පිණ්ඩො රතී ඛිඩ්ඩා, යත්ථ කිච්ඡෙන ලබ්භති; පරතො ආසීසරෙ බාලා, තම්පි තෙසං න ලබ්භති; දිට්ඨෙ ධම්මෙස විපාකො, සම්පරායෙ ච දුග්ගතී’’ති. “जिथे वस्त्र, अन्न, आनंद आणि क्रीडा अत्यंत कष्टाने मिळतात. ते मूर्ख लोक इतरांकडून आशेने याचना करतात, पण त्यांना तेही मिळत नाही. हा या जन्मातील विपाक आहे आणि मृत्यूनंतर त्यांना दुर्गती प्राप्त होते.” ‘‘ඉතිහෙතං විජානාම, අඤ්ඤං පුච්ඡාම ගොතම; යෙධ ලද්ධා මනුස්සත්තං, වදඤ්ඤූ වීතමච්ඡරා. “हे आम्ही अशा प्रकारे जाणतो. हे गोतमा, आम्ही दुसरा प्रश्न विचारतो: जे लोक मनुष्यत्व प्राप्त करून, दानशूर आणि मत्सररहित होतात;” ‘‘බුද්ධෙ [Pg.32] පසන්නා ධම්මෙ ච, සඞ්ඝෙ ච තිබ්බගාරවා; කීදිසො තෙසං විපාකො, සම්පරායො ච කීදිසො; භගවන්තං පුට්ඨුමාගම්ම, කථං ජානෙමු තං මය’’න්ති. “बुद्ध, धम्म आणि संघ यांच्यावर श्रद्धा ठेवणारे व त्यांच्याविषयी तीव्र आदर बाळगणारे असतात; त्यांचा विपाक कसा असतो आणि त्यांचा परलोक कसा असतो? आम्ही भगवंतांना हे विचारण्यासाठी आलो आहोत; आम्ही हे कसे जाणून घ्यावे?” ‘‘යෙධ ලද්ධා මනුස්සත්තං, වදඤ්ඤූ වීතමච්ඡරා; බුද්ධෙ පසන්නා ධම්මෙ ච, සඞ්ඝෙ ච තිබ්බගාරවා; එතෙ සග්ගා පකාසන්ති, යත්ථ තෙ උපපජ්ජරෙ. “जे लोक मनुष्यत्व प्राप्त करून, दानशूर आणि मत्सररहित होतात, बुद्ध, धम्म आणि संघ यांच्यावर श्रद्धा ठेवणारे व त्यांच्याविषयी तीव्र आदर बाळगणारे असतात; ते ज्या स्वर्गात उत्पन्न होतात, तिथे आपल्या तेजाने प्रकाशतात.” ‘‘සචෙ එන්ති මනුස්සත්තං, අඩ්ඪෙ ආජායරෙ කුලෙ; චොළං පිණ්ඩො රතී ඛිඩ්ඩා, යත්ථාකිච්ඡෙන ලබ්භති. “जर ते पुन्हा मनुष्यत्वाला प्राप्त झाले, तर श्रीमंत कुळात जन्माला येतात; जिथे वस्त्र, अन्न, आनंद आणि क्रीडा विनासायास (सहजपणे) मिळतात.” ‘‘පරසම්භතෙසු භොගෙසු, වසවත්තීව මොදරෙ; දිට්ඨෙ ධම්මෙස විපාකො, සම්පරායෙ ච සුග්ගතී’’ති. “इतरांनी गोळा केलेल्या भोगांवर ते स्वतःच्या इच्छेनुसार नियंत्रण ठेवून आनंद उपभोगतात. हा या जन्मातील विपाक आहे आणि मृत्यूनंतर त्यांना सुगती प्राप्त होते.” 10. ඝටීකාරසුත්තං १०. घटीकार सुत्त 50. ५०. ‘‘අවිහං උපපන්නාසෙ, විමුත්තා සත්ත භික්ඛවො; රාගදොසපරික්ඛීණා, තිණ්ණා ලොකෙ විසත්තික’’න්ති. “अविह स्वर्गात उत्पन्न झालेले, विमुक्त झालेले, राग आणि द्वेष पूर्णपणे नष्ट केलेले आणि जगातील तृष्णेला पार केलेले ते सात भिक्खू कोण आहेत?” ‘‘කෙ ච තෙ අතරුං පඞ්කං, මච්චුධෙය්යං සුදුත්තරං; කෙ හිත්වා මානුසං දෙහං, දිබ්බයොගං උපච්චගු’’න්ති. “मृत्यूच्या साम्राज्यातील पार करण्यास अत्यंत कठीण असा चिखल कोणी पार केला आहे? मानवी देहाचा त्याग करून दिव्य बंधनांच्या पलीकडे कोण गेले आहे?” ‘‘උපකො පලගණ්ඩො ච, පුක්කුසාති ච තෙ තයො; භද්දියො ඛණ්ඩදෙවො ච, බාහුරග්ගි ච සිඞ්ගියො ; තෙ හිත්වා මානුසං දෙහං, දිබ්බයොගං උපච්චගු’’න්ති. “उपक, पलगंड आणि पुक्कुसाती हे तिघे; तसेच भद्दिय, खंडदेव, बाहुरग्गी आणि सिंगिय; हे मानवी देहाचा त्याग करून दिव्य बंधनांच्या पलीकडे गेले आहेत.” ‘‘කුසලී භාසසී තෙසං, මාරපාසප්පහායිනං; කස්ස තෙ ධම්මමඤ්ඤාය, අච්ඡිදුං භවබන්ධන’’න්ති. “मारपाशाचा त्याग करणाऱ्या त्यांच्याबद्दल तुम्ही प्रशंसनीय शब्द बोलत आहात. कोणाचा धम्म जाणून त्यांनी भवबंधन तोडून टाकले आहे?” ‘‘න අඤ්ඤත්ර භගවතා, නාඤ්ඤත්ර තව සාසනා; යස්ස තෙ ධම්මමඤ්ඤාය, අච්ඡිදුං භවබන්ධනං. “भगवंतांशिवाय अन्य कोणाचेही नाही, आपल्या शासनाशिवाय अन्य कोणाचेही नाही; ज्यांचा धम्म जाणून त्यांनी भवबंधन तोडून टाकले आहे.” ‘‘යත්ථ නාමඤ්ච රූපඤ්ච, අසෙසං උපරුජ්ඣති; තං තෙ ධම්මං ඉධඤ්ඤාය, අච්ඡිදුං භවබන්ධන’’න්ති. “जिथे नाम आणि रूप पूर्णपणे निरुद्ध होते; या शासनात तो धम्म जाणून त्यांनी भवबंधन तोडून टाकले आहे.” ‘‘ගම්භීරං භාසසී වාචං, දුබ්බිජානං සුදුබ්බුධං; කස්ස ත්වං ධම්මමඤ්ඤාය, වාචං භාසසි ඊදිස’’න්ති. “तू अत्यंत गंभीर, समजण्यास कठीण आणि आकलन करण्यास अतिशय अवघड अशी वाणी बोलत आहेस. कोणाचा धम्म जाणून तू अशी वाणी बोलत आहेस?” ‘‘කුම්භකාරො [Pg.33] පුරෙ ආසිං, වෙකළිඞ්ගෙ ඝටීකරො; මාතාපෙත්තිභරො ආසිං, කස්සපස්ස උපාසකො. “मी पूर्वी वेहळिंग येथे घटीकार नावाचा कुंभार होतो. मी आई-वडिलांचे पालनपोषण करणारा, कश्यप बुद्धांचा उपासक होतो.” ‘‘විරතො මෙථුනා ධම්මා, බ්රහ්මචාරී නිරාමිසො; අහුවා තෙ සගාමෙය්යො, අහුවා තෙ පුරෙ සඛා. “मैथुनधर्मापासून अलिप्त राहून, मी ब्रह्मचारी व निरपेक्ष होतो. मी आपल्याच गावातील रहिवासी होतो आणि पूर्वी आपला मित्र होतो.” ‘‘සොහමෙතෙ පජානාමි, විමුත්තෙ සත්ත භික්ඛවො; රාගදොසපරික්ඛීණෙ, තිණ්ණෙ ලොකෙ විසත්තික’’න්ති. “तो मी, विमुक्त झालेल्या, राग आणि द्वेष पूर्णपणे नष्ट केलेल्या आणि जगातील तृष्णेला पार केलेल्या या सात भिक्खूंना ओळखतो.” ‘‘එවමෙතං තදා ආසි, යථා භාසසි භග්ගව; කුම්භකාරො පුරෙ ආසි, වෙකළිඞ්ගෙ ඝටීකරො; මාතාපෙත්තිභරො ආසි, කස්සපස්ස උපාසකො. “हे भग्गव, तू जसे सांगत आहेस, ते तेव्हा तसेच होते. तू पूर्वी वेहळिंग येथे घटीकार नावाचा कुंभार होतास. तू आई-वडिलांचे पालनपोषण करणारा, कश्यप बुद्धांचा उपासक होतास.” ‘‘විරතො මෙථුනා ධම්මා, බ්රහ්මචාරී නිරාමිසො; අහුවා මෙ සගාමෙය්යො, අහුවා මෙ පුරෙ සඛා’’ති. “मैथुनधर्मापासून अलिप्त राहून, तू ब्रह्मचारी व निरपेक्ष होतास. तू माझ्याच गावातील रहिवासी होतास आणि पूर्वी माझा मित्र होतास.” ‘‘එවමෙතං පුරාණානං, සහායානං අහු සඞ්ගමො; උභින්නං භාවිතත්තානං, සරීරන්තිමධාරින’’න්ති. “अशा प्रकारे, पूर्वीच्या दोन मित्रांची ही भेट झाली आहे, जे दोघेही चित्त विकसित केलेले आणि अंतिम शरीर धारण करणारे आहेत.” ආදිත්තවග්ගො පඤ්චමො. पाचवा आदित्त वर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका - ආදිත්තං කිංදදං අන්නං, එකමූලඅනොමියං; අච්ඡරාවනරොපජෙතං, මච්ඡරෙන ඝටීකරොති. आदित्त, किंदद, अन्न, एकमूल, अनोमिय, अच्छरा, वनरोप, जेत, मच्छरी आणि घटीकार - हे दहा सुत्त आहेत. 6. ජරාවග්ගො ६. जरा वर्ग 1. ජරාසුත්තං १. जरा सुत्त 51. ५१. ‘‘කිංසු යාව ජරා සාධු, කිංසු සාධු පතිට්ඨිතං; කිංසු නරානං රතනං, කිංසු චොරෙහි දූහර’’න්ති. “वृद्धत्वापर्यंत काय चांगले असते? काय प्रस्थापित झाल्यावर चांगले असते? मनुष्यांचे रत्न कोणते आहे? आणि चोरांना चोरण्यास कठीण काय आहे?” ‘‘සීලං යාව ජරා සාධු, සද්ධා සාධු පතිට්ඨිතා; පඤ්ඤා නරානං රතනං, පුඤ්ඤං චොරෙහි දූහර’’න්ති. “वृद्धत्वापर्यंत शील चांगले असते; प्रस्थापित झालेली श्रद्धा चांगली असते; प्रज्ञा हे मनुष्यांचे रत्न आहे; आणि पुण्य चोरांना चोरण्यास कठीण आहे.” 2. අජරසාසුත්තං २. अजरसा सुत्त 52. ५२. ‘‘කිංසු [Pg.34] අජරසා සාධු, කිංසු සාධු අධිට්ඨිතං; කිංසු නරානං රතනං, කිංසු චොරෙහ්යහාරිය’’න්ති. “काय न कुजणारे (अक्षय) म्हणून चांगले असते? काय दृढपणे प्रस्थापित झाल्यावर चांगले असते? मनुष्यांचे रत्न कोणते आहे? आणि चोरांना काय हिरावून घेता येत नाही?” ‘‘සීලං අජරසා සාධු, සද්ධා සාධු අධිට්ඨිතා; පඤ්ඤා නරානං රතනං, පුඤ්ඤං චොරෙහ්යහාරිය’’න්ති. “शील हे न कुजणारे म्हणून चांगले असते; दृढपणे प्रस्थापित झालेली श्रद्धा चांगली असते; प्रज्ञा हे मनुष्यांचे रत्न आहे; आणि पुण्य चोरांना हिरावून घेता येत नाही.” 3. මිත්තසුත්තං ३. मित्त सुत्त 53. ५३. ‘‘කිංසු පවසතො මිත්තං, කිංසු මිත්තං සකෙ ඝරෙ; කිං මිත්තං අත්ථජාතස්ස, කිං මිත්තං සම්පරායික’’න්ති. “प्रवासाला निघालेल्याचा मित्र कोण असतो? स्वतःच्या घरात मित्र कोण असतो? गरज पडल्यास मित्र कोण असतो? आणि परलोकात मित्र कोण असतो?” ‘‘සත්ථො පවසතො මිත්තං, මාතා මිත්තං සකෙ ඝරෙ; සහායො අත්ථජාතස්ස, හොති මිත්තං පුනප්පුනං; සයංකතානි පුඤ්ඤානි, තං මිත්තං සම්පරායික’’න්ති. “प्रवासाला निघालेल्याचा मित्र सार्थ (प्रवासी संघ) असतो; स्वतःच्या घरात आई ही मित्र असते; गरज पडल्यास सहकारी हा पुन्हा पुन्हा मित्र ठरतो; आणि स्वतः केलेली पुण्ये हाच परलोकातील मित्र असतो.” 4. වත්ථුසුත්තං ४. वत्थु सुत्त 54. ५४. ‘‘කිංසු වත්ථු මනුස්සානං, කිංසූධ පරමො සඛා; කිංසු භූතා උපජීවන්ති, යෙ පාණා පථවිස්සිතා’’ති. “मनुष्यांचा आधार काय आहे? या जगात सर्वश्रेष्ठ मित्र कोण आहे? पृथ्वीवर राहणारे जे प्राणी आहेत, ते कशाच्या आधारे जगतात?” ‘‘පුත්තා වත්ථු මනුස්සානං, භරියා ච පරමො සඛා; වුට්ඨිං භූතා උපජීවන්ති, යෙ පාණා පථවිස්සිතා’’ති. “पुत्र (संतान) हा मनुष्यांचा आधार आहे; पत्नी ही सर्वश्रेष्ठ मित्र आहे; आणि पृथ्वीवर राहणारे जे प्राणी आहेत, ते पावसाच्या आधारे जगतात.” 5. පඨමජනසුත්තං ५. पठमजन सुत्त 55. ५५. ‘‘කිංසු ජනෙති පුරිසං, කිංසු තස්ස විධාවති; කිංසු සංසාරමාපාදි, කිංසු තස්ස මහබ්භය’’න්ති. "मनुष्याला काय उत्पन्न करते? त्याचे काय इकडेतिकडे धावते? संसारात कोण प्रवेश करते? त्याचे सर्वात मोठे भय कोणते आहे?" ‘‘තණ්හා ජනෙති පුරිසං, චිත්තමස්ස විධාවති; සත්තො සංසාරමාපාදි, දුක්ඛමස්ස මහබ්භය’’න්ති. "तृष्णा मनुष्याला उत्पन्न करते; त्याचे चित्त इकडेतिकडे धावते; प्राणी संसारात प्रवेश करतो; दुःख हे त्याचे सर्वात मोठे भय आहे." 6. දුතියජනසුත්තං ६. "दुतीयजन सुत्त" 56. ५६. ‘‘කිංසු [Pg.35] ජනෙති පුරිසං, කිංසු තස්ස විධාවති; කිංසු සංසාරමාපාදි, කිස්මා න පරිමුච්චතී’’ති. "मनुष्याला काय उत्पन्न करते? त्याचे काय इकडेतिकडे धावते? संसारात कोण प्रवेश करते? तो कशापासून मुक्त होत नाही?" ‘‘තණ්හා ජනෙති පුරිසං, චිත්තමස්ස විධාවති; සත්තො සංසාරමාපාදි, දුක්ඛා න පරිමුච්චතී’’ති. "तृष्णा मनुष्याला उत्पन्न करते; त्याचे चित्त इकडेतिकडे धावते; प्राणी संसारात प्रवेश करतो; तो दुःखापासून मुक्त होत नाही." 7. තතියජනසුත්තං ७. "ततीयजन सुत्त" 57. ५७. ‘‘කිංසු ජනෙති පුරිසං, කිංසු තස්ස විධාවති; කිංසු සංසාරමාපාදි, කිංසු තස්ස පරායන’’න්ති. "मनुष्याला काय उत्पन्न करते? त्याचे काय इकडेतिकडे धावते? संसारात कोण प्रवेश करते? त्याचे अंतिम गंतव्य (आश्रयस्थान) कोणते आहे?" ‘‘තණ්හා ජනෙති පුරිසං, චිත්තමස්ස විධාවති; සත්තො සංසාරමාපාදි, කම්මං තස්ස පරායන’’න්ති. "तृष्णा मनुष्याला उत्पन्न करते; त्याचे चित्त इकडेतिकडे धावते; प्राणी संसारात प्रवेश करतो; कर्म हेच त्याचे अंतिम गंतव्य (आश्रयस्थान) आहे." 8. උප්පථසුත්තං ८. "उप्पथ सुत्त" 58. ५८. ‘‘කිංසු උප්පථො අක්ඛාතො, කිංසු රත්තින්දිවක්ඛයො; කිං මලං බ්රහ්මචරියස්ස, කිං සිනානමනොදක’’න්ති. "कुमार्ग कोणता म्हटला गेला आहे? रात्रंदिवस कशाचा क्षय होतो? ब्रह्मचर्याचा मळ कोणता आहे? पाण्याशिवाय स्नान कोणते आहे?" ‘‘රාගො උප්පථො අක්ඛාතො, වයො රත්තින්දිවක්ඛයො; ඉත්ථී මලං බ්රහ්මචරියස්ස, එත්ථායං සජ්ජතෙ පජා; තපො ච බ්රහ්මචරියඤ්ච, තං සිනානමනොදක’’න්ති. "राग (आसक्ती) हा कुमार्ग म्हटला गेला आहे; वय रात्रंदिवस क्षीण होत जाते; स्त्री हा ब्रह्मचर्याचा मळ आहे, ज्यामध्ये ही प्रजा आसक्त होते; तप आणि ब्रह्मचर्य हेच पाण्याशिवाय स्नान आहे." 9. දුතියසුත්තං ९. "दुतीय सुत्त" 59. ५९. ‘‘කිංසු දුතියා පුරිසස්ස හොති, කිංසු චෙනං පසාසති; කිස්ස චාභිරතො මච්චො, සබ්බදුක්ඛා පමුච්චතී’’ති. "मनुष्याचा सोबती कोण असतो? त्याला कोण उपदेश करते? कशामध्ये रममाण होऊन मर्त्य मनुष्य सर्व दुःखांतून मुक्त होतो?" ‘‘සද්ධා දුතියා පුරිසස්ස හොති, පඤ්ඤා චෙනං පසාසති; නිබ්බානාභිරතො මච්චො, සබ්බදුක්ඛා පමුච්චතී’’ති. "श्रद्धा हा मनुष्याचा सोबती असतो, आणि प्रज्ञा त्याला उपदेश करते; निर्वाणामध्ये रममाण होऊन मर्त्य मनुष्य सर्व दुःखांतून मुक्त होतो." 10. කවිසුත්තං १०. "कवि सुत्त" 60. ६०. ‘‘කිංසු නිදානං ගාථානං, කිංසු තාසං වියඤ්ජනං; කිංසු සන්නිස්සිතා ගාථා, කිංසු ගාථානමාසයො’’ති. "गाथांचे उगमस्थान काय आहे? त्यांचे व्यंजन (प्रकटीकरण) काय आहे? गाथा कशावर आश्रित असतात? गाथांचे अधिष्ठान काय आहे?" ‘‘ඡන්දො [Pg.36] නිදානං ගාථානං, අක්ඛරා තාසං වියඤ්ජනං; නාමසන්නිස්සිතා ගාථා, කවි ගාථානමාසයො’’ති. "छंद हे गाथांचे उगमस्थान आहे, अक्षरे हे त्यांचे व्यंजन आहे; गाथा नामावर आश्रित असतात, आणि कवी हे गाथांचे अधिष्ठान आहे." ජරාවග්ගො ඡට්ඨො. "जरावग्ग सहावा." තස්සුද්දානං – "त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) -" ජරා අජරසා මිත්තං, වත්ථු තීණි ජනානි ච; උප්පථො ච දුතියො ච, කවිනා පූරිතො වග්ගොති. "जरा, अजरसा, मित्त, वत्थु, तीन जन सुत्ते, उप्पथ, दुतीय आणि कवि सुत्तासह हा वर्ग पूर्ण झाला आहे." 7. අද්ධවග්ගො ७. "अद्धवग्ग" 1. නාමසුත්තං १. "नाम सुत्त" 61. ६१. ‘‘කිංසු සබ්බං අද්ධභවි, කිස්මා භිය්යො න විජ්ජති; කිස්සස්සු එකධම්මස්ස, සබ්බෙව වසමන්වගූ’’ති. "कशाने सर्वांना व्यापून टाकले आहे? कशापेक्षा मोठे काहीही नाही? असा कोणता एक धर्म आहे, ज्याच्या वशामध्ये सर्व काही चालते?" ‘‘නාමං සබ්බං අද්ධභවි, නාමා භිය්යො න විජ්ජති; නාමස්ස එකධම්මස්ස, සබ්බෙව වසමන්වගූ’’ති. "नामाने सर्वांना व्यापून टाकले आहे, नामापेक्षा मोठे काहीही नाही; नाम या एकाच धर्माच्या वशामध्ये सर्व काही चालते." 2. චිත්තසුත්තං २. "चित्त सुत्त" 62. ६२. ‘‘කෙනස්සු නීයති ලොකො, කෙනස්සු පරිකස්සති; කිස්සස්සු එකධම්මස්ස, සබ්බෙව වසමන්වගූ’’ති. "जगाला कोण चालवते? त्याला कोण इकडेतिकडे ओढते? असा कोणता एक धर्म आहे, ज्याच्या वशामध्ये सर्व काही चालते?" ‘‘චිත්තෙන නීයති ලොකො, චිත්තෙන පරිකස්සති; චිත්තස්ස එකධම්මස්ස, සබ්බෙව වසමන්වගූ’’ති. "चित्ताने जग चालवले जाते, चित्तानेच ते इकडेतिकडे ओढले जाते; चित्त या एकाच धर्माच्या वशामध्ये सर्व काही चालते." 3. තණ්හාසුත්තං ३. "तृष्णा सुत्त" 63. ६३. ‘‘කෙනස්සු නීයති ලොකො, කෙනස්සු පරිකස්සති; කිස්සස්සු එකධම්මස්ස, සබ්බෙව වසමන්වගූ’’ති. "जगाला कोण चालवते? त्याला कोण इकडेतिकडे ओढते? असा कोणता एक धर्म आहे, ज्याच्या वशामध्ये सर्व काही चालते?" ‘‘තණ්හාය නීයති ලොකො, තණ්හාය පරිකස්සති; තණ්හාය එකධම්මස්ස, සබ්බෙව වසමන්වගූ’’ති. "तृष्णेने जग चालवले जाते, तृष्णेनेच ते इकडेतिकडे ओढले जाते; तृष्णा या एकाच धर्माच्या वशामध्ये सर्व काही चालते." 4. සංයොජනසුත්තං ४. "संयोजन सुत्त" 64. ६४. ‘‘කිංසු [Pg.37] සංයොජනො ලොකො, කිංසු තස්ස විචාරණං; කිස්සස්සු විප්පහානෙන, නිබ්බානං ඉති වුච්චතී’’ති. "जग कशाने बांधले गेले आहे? त्याचे इकडेतिकडे फिरणे कशामुळे होते? कशाचा त्याग केल्याने 'निर्वाण' असे म्हटले जाते?" ‘‘නන්දීසංයොජනො ලොකො, විතක්කස්ස විචාරණං; තණ්හාය විප්පහානෙන, නිබ්බානං ඉති වුච්චතී’’ති. "जग नंदीने (आसक्तीने) बांधले गेले आहे, वितर्क (विचार) हा त्याचा संचार आहे; तृष्णेचा त्याग केल्याने 'निर्वाण' असे म्हटले जाते." 5. බන්ධනසුත්තං ५. "बंधन सुत्त" 65. ६५. ‘‘කිංසු සම්බන්ධනො ලොකො, කිංසු තස්ස විචාරණං; කිස්සස්සු විප්පහානෙන, සබ්බං ඡින්දති බන්ධන’’න්ති. "जग कशाने बंधनात पडले आहे? त्याचे इकडेतिकडे फिरणे कशामुळे होते? कशाचा त्याग केल्याने सर्व बंधने तुटतात?" ‘‘නන්දීසම්බන්ධනො ලොකො, විතක්කස්ස විචාරණං; තණ්හාය විප්පහානෙන, සබ්බං ඡින්දති බන්ධන’’න්ති. "जग नंदीने (आसक्तीने) बंधनात पडले आहे, वितर्क (विचार) हा त्याचा संचार आहे; तृष्णेचा त्याग केल्याने सर्व बंधने तुटतात." 6. අත්තහතසුත්තං ६. "अत्तहत सुत्त" 66. ६६. ‘‘කෙනස්සුබ්භාහතො ලොකො, කෙනස්සු පරිවාරිතො; කෙන සල්ලෙන ඔතිණ්ණො, කිස්ස ධූපායිතො සදා’’ති. "जग कशाने पीडित आहे? ते कशाने वेढलेले आहे? कोणत्या शल्याने ते विद्ध झाले आहे? ते नेहमी कशाने धुमसत असते?" ‘‘මච්චුනාබ්භාහතො ලොකො, ජරාය පරිවාරිතො; තණ්හාසල්ලෙන ඔතිණ්ණො, ඉච්ඡාධූපායිතො සදා’’ති. "जग मृत्यूने पीडित आहे, जरेने वेढलेले आहे; तृष्णारूपी शल्याने ते विद्ध झाले आहे, आणि इच्छेने ते नेहमी धुमसत असते." 7. උඩ්ඩිතසුත්තං ७. "उड्डित सुत्त" 67. ६७. ‘‘කෙනස්සු උඩ්ඩිතො ලොකො, කෙනස්සු පරිවාරිතො; කෙනස්සු පිහිතො ලොකො, කිස්මිං ලොකො පතිට්ඨිතො’’ති. “जग कशाने जखडले गेले आहे? जग कशाने वेढले गेले आहे? जग कशाने बंदिस्त झाले आहे? जग कशावर प्रतिष्ठित आहे?” ‘‘තණ්හාය උඩ්ඩිතො ලොකො, ජරාය පරිවාරිතො; මච්චුනා පිහිතො ලොකො, දුක්ඛෙ ලොකො පතිට්ඨිතො’’ති. “जग तृष्णेने जखडले गेले आहे, जरेने वेढले गेले आहे; जग मृत्यूने बंदिस्त झाले आहे, जग दुःखावर प्रतिष्ठित आहे.” 8. පිහිතසුත්තං ८. पिहित सुत्त 68. ६८. ‘‘කෙනස්සු පිහිතො ලොකො, කිස්මිං ලොකො පතිට්ඨිතො; කෙනස්සු උඩ්ඩිතො ලොකො, කෙනස්සු පරිවාරිතො’’ති. “जग कशाने बंदिस्त झाले आहे? जग कशावर प्रतिष्ठित आहे? जग कशाने जखडले गेले आहे? जग कशाने वेढले गेले आहे?” ‘‘මච්චුනා [Pg.38] පිහිතො ලොකො, දුක්ඛෙ ලොකො පතිට්ඨිතො; තණ්හාය උඩ්ඩිතො ලොකො, ජරාය පරිවාරිතො’’ති. “जग मृत्यूने बंदिस्त झाले आहे, जग दुःखावर प्रतिष्ठित आहे; जग तृष्णेने जखडले गेले आहे, जरेने वेढले गेले आहे.” 9. ඉච්ඡාසුත්තං ९. इच्छा सुत्त 69. ६९. ‘‘කෙනස්සු බජ්ඣතී ලොකො, කිස්ස විනයාය මුච්චති; කිස්සස්සු විප්පහානෙන, සබ්බං ඡින්දති බන්ධන’’න්ති. “जग कशाने बांधले गेले आहे? कशाच्या त्यागाने ते मुक्त होते? कशाचा पूर्णपणे त्याग केल्याने सर्व बंधने तुटतात?” ‘‘ඉච්ඡාය බජ්ඣතී ලොකො, ඉච්ඡාවිනයාය මුච්චති; ඉච්ඡාය විප්පහානෙන, සබ්බං ඡින්දති බන්ධන’’න්ති. “जग इच्छेने बांधले गेले आहे, इच्छेच्या त्यागाने ते मुक्त होते; इच्छेचा पूर्णपणे त्याग केल्याने सर्व बंधने तुटतात.” 10. ලොකසුත්තං १०. लोक सुत्त 70. ७०. ‘‘කිස්මිං ලොකො සමුප්පන්නො, කිස්මිං කුබ්බති සන්ථවං; කිස්ස ලොකො උපාදාය, කිස්මිං ලොකො විහඤ්ඤතී’’ති. “कशाच्या उत्पत्तीने जग उत्पन्न होते? जग कशाशी जवळीक साधते? कशाचा उपादान करून जग अस्तित्वात राहते? जग कशामुळे पीडित होते?” ‘‘ඡසු ලොකො සමුප්පන්නො, ඡසු කුබ්බති සන්ථවං; ඡන්නමෙව උපාදාය, ඡසු ලොකො විහඤ්ඤතී’’ති. “सहा (इंद्रियांच्या) उत्पत्तीने जग उत्पन्न होते, सहामध्येच ते जवळीक साधते; सहाचाच उपादान करून जग अस्तित्वात राहते आणि सहामुळेच जग पीडित होते.” අද්ධවග්ගො සත්තමො. सातवा अद्धवर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) - නාමං චිත්තඤ්ච තණ්හා ච, සංයොජනඤ්ච බන්ධනා; අබ්භාහතුඩ්ඩිතො පිහිතො, ඉච්ඡා ලොකෙන තෙ දසාති. नाम, चित्त, तृष्णा, संयोजन, बंधन, अब्भाहत, उड्डित, पिहित, इच्छा आणि लोक - हे दहा सुत्त आहेत. 8. ඡෙත්වාවග්ගො ८. छेत्वा वर्ग 1. ඡෙත්වාසුත්තං १. छेत्वा सुत्त 71. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං ඨිතා ඛො සා දෙවතා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – ७१. श्रावस्ती येथील घटना. एका बाजूला उभा राहिलेला तो देवपुत्र भगवंतांना गाथेने म्हणाला - ‘‘කිංසු ඡෙත්වා සුඛං සෙති, කිංසු ඡෙත්වා න සොචති; කිස්සස්සු එකධම්මස්ස, වධං රොචෙසි ගොතමා’’ති. “हे गौतम, कशाचा नाश करून मनुष्य सुखाने झोपतो? कशाचा नाश करून तो शोक करत नाही? कोणत्या एका गोष्टीचा वध करणे आपल्याला मान्य आहे?” ‘‘කොධං [Pg.39] ඡෙත්වා සුඛං සෙති, කොධං ඡෙත්වා න සොචති; කොධස්ස විසමූලස්ස, මධුරග්ගස්ස දෙවතෙ; වධං අරියා පසංසන්ති, තඤ්හි ඡෙත්වා න සොචතී’’ති. “हे देवपुत्रा, क्रोधाचा नाश करून मनुष्य सुखाने झोपतो; क्रोधाचा नाश करून तो शोक करत नाही. ज्याचे मूळ विषारी आहे आणि टोक गोड आहे, अशा क्रोधाचा वध करण्याची प्रशंसा आर्य करतात; कारण त्याचा नाश केल्यावर मनुष्य शोक करत नाही.” 2. රථසුත්තං २. रथ सुत्त 72. ७२. ‘‘කිංසු රථස්ස පඤ්ඤාණං, කිංසු පඤ්ඤාණමග්ගිනො; කිංසු රට්ඨස්ස පඤ්ඤාණං, කිංසු පඤ්ඤාණමිත්ථියා’’ති. “रथाची ओळख काय आहे? अग्नीची ओळख काय आहे? राष्ट्राची ओळख काय आहे? स्त्रीची ओळख काय आहे?” ‘‘ධජො රථස්ස පඤ්ඤාණං, ධූමො පඤ්ඤාණමග්ගිනො; රාජා රට්ඨස්ස පඤ්ඤාණං, භත්තා පඤ්ඤාණමිත්ථියා’’ති. “ध्वज ही रथाची ओळख आहे, धूर ही अग्नीची ओळख आहे; राजा ही राष्ट्राची ओळख आहे, पती ही स्त्रीची ओळख आहे.” 3. විත්තසුත්තං ३. वित्त सुत्त 73. ७३. ‘‘කිංසූධ විත්තං පුරිසස්ස සෙට්ඨං, කිංසු සුචිණ්ණො සුඛමාවහති; කිංසු හවෙ සාදුතරං රසානං, කථංජීවිං ජීවිතමාහු සෙට්ඨ’’න්ති. “या जगात मनुष्याची सर्वश्रेष्ठ संपत्ती कोणती आहे? कशाचे उत्तम आचरण सुखावह ठरते? सर्व रसांमध्ये सर्वात मधुर रस कोणता आहे? कशा प्रकारे जगणाऱ्याचे जीवन सर्वश्रेष्ठ म्हटले जाते?” ‘‘සද්ධීධ විත්තං පුරිසස්ස සෙට්ඨං, ධම්මො සුචිණ්ණො සුඛමාවහති; සච්චං හවෙ සාදුතරං රසානං, පඤ්ඤාජීවිං ජීවිතමාහු සෙට්ඨ’’න්ති. “या जगात श्रद्धा ही मनुष्याची सर्वश्रेष्ठ संपत्ती आहे; धम्माचे उत्तम आचरण सुखावह ठरते; सत्य हाच सर्व रसांमध्ये सर्वात मधुर रस आहे; आणि प्रज्ञेने जगणाऱ्याचे जीवन सर्वश्रेष्ठ म्हटले जाते.” 4. වුට්ඨිසුත්තං ४. वुठ्ठि सुत्त 74. ७४. ‘‘කිංසු උප්පතතං සෙට්ඨං, කිංසු නිපතතං වරං; කිංසු පවජමානානං, කිංසු පවදතං වර’’න්ති. “उगवणाऱ्या गोष्टींमध्ये सर्वश्रेष्ठ काय आहे? खाली पडणाऱ्या गोष्टींमध्ये उत्तम काय आहे? चालणाऱ्यांमध्ये सर्वश्रेष्ठ काय आहे? बोलणाऱ्यांमध्ये उत्तम कोण आहे?” ‘‘බීජං උප්පතතං සෙට්ඨං, වුට්ඨි නිපතතං වරා; ගාවො පවජමානානං, පුත්තො පවදතං වරොති. “उगवणाऱ्या गोष्टींमध्ये बीज सर्वश्रेष्ठ आहे; खाली पडणाऱ्या गोष्टींमध्ये पाऊस उत्तम आहे; चालणाऱ्यांमध्ये गायी सर्वश्रेष्ठ आहेत; बोलणाऱ्यांमध्ये पुत्र उत्तम आहे.” ‘‘විජ්ජා උප්පතතං සෙට්ඨා, අවිජ්ජා නිපතතං වරා; සඞ්ඝො පවජමානානං, බුද්ධො පවදතං වරො’’ති. “उगवणाऱ्या गोष्टींमध्ये विद्या सर्वश्रेष्ठ आहे; खाली पडणाऱ्या गोष्टींमध्ये अविद्या सर्वात मोठी आहे; चालणाऱ्यांमध्ये संघ सर्वश्रेष्ठ आहे; आणि बोलणाऱ्यांमध्ये बुद्ध सर्वश्रेष्ठ आहेत.” 5. භීතාසුත්තං ५. भीता सुत्त 75. ७५. ‘‘කිංසූධ භීතා ජනතා අනෙකා,මග්ගො චනෙකායතනප්පවුත්තො; පුච්ඡාමි තං ගොතම භූරිපඤ්ඤ,කිස්මිං ඨිතො පරලොකං න භායෙ’’ති. “अनेक मार्गांनी मार्ग सांगितलेला असतानाही, या जगात बहुसंख्य लोक का घाबरतात? हे महाप्रज्ञ गौतम, मी आपल्याला विचारतो: कशावर स्थित राहिल्याने मनुष्य परलोकाला घाबरत नाही?” ‘‘වාචං [Pg.40] මනඤ්ච පණිධාය සම්මා,කායෙන පාපානි අකුබ්බමානො; බව්හන්නපානං ඝරමාවසන්තො,සද්ධො මුදූ සංවිභාගී වදඤ්ඤූ; එතෙසු ධම්මෙසු ඨිතො චතූසු,ධම්මෙ ඨිතො පරලොකං න භායෙ’’ති. “वाणी आणि मनाला योग्य प्रकारे सन्मार्गावर लावून, शरीराने कोणतीही पापकर्मे न करता, विपुल अन्न-पाणी असलेल्या घरात राहून, जो श्रद्धावान, मृदू, दानशूर आणि प्रिय बोलणारा असतो; या चार गुणांवर प्रतिष्ठित असलेला आणि धम्मावर दृढ असलेला मनुष्य परलोकाला घाबरत नाही.” 6. නජීරතිසුත්තං ६. न जीरति सुत्त 76. ७६. ‘‘කිං ජීරති කිං න ජීරති, කිංසු උප්පථොති වුච්චති; කිංසු ධම්මානං පරිපන්ථො, කිංසු රත්තින්දිවක්ඛයො; කිං මලං බ්රහ්මචරියස්ස, කිං සිනානමනොදකං. “काय जीर्ण होते आणि काय जीर्ण होत नाही? चुकीचा मार्ग कशाला म्हटले जाते? धम्माच्या मार्गातील अडथळा कोणता आहे? रात्रंदिवस कशाचा क्षय होतो? ब्रह्मचर्याचा मळ काय आहे? विनापाण्याचे स्नान कोणते आहे?” ‘‘කති ලොකස්මිං ඡිද්දානි, යත්ථ විත්තං න තිට්ඨති; භගවන්තං පුට්ඨුමාගම්ම, කථං ජානෙමු තං මය’’න්ති. “जगात अशी किती छिद्रे आहेत, जिथे संपत्ती टिकून राहत नाही? आम्ही भगवंतांना विचारण्यासाठी आलो आहोत, आम्ही हे कसे जाणून घ्यावे?” ‘‘රූපං ජීරති මච්චානං, නාමගොත්තං න ජීරති; රාගො උප්පථොති වුච්චති. “मर्त्य मानवांचे शरीर जीर्ण होते, परंतु त्यांचे नाव आणि गोत्र जीर्ण होत नाही. रागाला चुकीचा मार्ग म्हटले जाते.” ‘‘ලොභො ධම්මානං පරිපන්ථො, වයො රත්තින්දිවක්ඛයො; ඉත්ථී මලං බ්රහ්මචරියස්ස, එත්ථායං සජ්ජතෙ පජා; තපො ච බ්රහ්මචරියඤ්ච, තං සිනානමනොදකං. “लोभ हा धम्माच्या मार्गातील अडथळा आहे, वय रात्रंदिवस क्षीण होत जाते; स्त्री हा ब्रह्मचर्याचा मळ आहे, ज्यामध्ये ही प्रजा अडकून पडते. तप आणि ब्रह्मचर्य हेच विनापाण्याचे स्नान आहे.” ‘‘ඡ ලොකස්මිං ඡිද්දානි, යත්ථ විත්තං න තිට්ඨති; ආලස්යඤ්ච පමාදො ච, අනුට්ඨානං අසංයමො; නිද්දා තන්දී ච තෙ ඡිද්දෙ, සබ්බසො තං විවජ්ජයෙ’’ති. “जगात सहा छिद्रे आहेत, जिथे संपत्ती टिकून राहत नाही: आळस, प्रमाद, निरुद्योगीपणा, असंयम, अतिनिद्रा आणि सुस्ती. या सहा छिद्रांचा पूर्णपणे त्याग करावा.” 7. ඉස්සරියසුත්තං ७. इस्सरिय सुत्त 77. ७७. ‘‘කිංසු ඉස්සරියං ලොකෙ, කිංසු භණ්ඩානමුත්තමං; කිංසු සත්ථමලං ලොකෙ, කිංසු ලොකස්මිමබ්බුදං. “जगात ऐश्वर्य काय आहे? संपत्तीमध्ये सर्वश्रेष्ठ संपत्ती कोणती आहे? जगात शस्त्राचा मळ काय आहे? जगात संकट काय आहे?” ‘‘කිංසු හරන්තං වාරෙන්ති, හරන්තො පන කො පියො; කිංසු පුනප්පුනායන්තං, අභිනන්දන්ති පණ්ඩිතා’’ති. "घेऊन जाणाऱ्या कोणत्या व्यक्तीला लोक अडवतात? परंतु घेऊन जाणारा असा कोण आहे जो प्रिय वाटतो? वारंवार येणाऱ्या कोणाचे प्राज्ञ (पंडित) स्वागत करतात?" ‘‘වසො [Pg.41] ඉස්සරියං ලොකෙ, ඉත්ථී භණ්ඩානමුත්තමං; කොධො සත්ථමලං ලොකෙ, චොරා ලොකස්මිමබ්බුදා. "जगात वश असणे (अधिकार असणे) हेच ऐश्वर्य आहे; स्त्रिया या सर्व संपत्तीमध्ये उत्तम संपत्ती आहेत; जगात क्रोध हा शस्त्राचा गंज (मळ) आहे; आणि जगात चोर हे संकट (उपद्रव) आहेत." ‘‘චොරං හරන්තං වාරෙන්ති, හරන්තො සමණො පියො; සමණං පුනප්පුනායන්තං, අභිනන්දන්ති පණ්ඩිතා’’ති. "घेऊन जाणाऱ्या चोराला लोक अडवतात, परंतु (भिक्षा इत्यादी) घेऊन जाणारे श्रमण प्रिय वाटतात. वारंवार येणाऱ्या श्रमणांचे प्राज्ञ (पंडित) स्वागत करतात." 8. කාමසුත්තං ८. "कामसुत्त" 78. ७८. ‘‘කිමත්ථකාමො න දදෙ, කිං මච්චො න පරිච්චජෙ; කිංසු මුඤ්චෙය්ය කල්යාණං, පාපිකං න ච මොචයෙ’’ති. "कल्याण इच्छिणाऱ्याने काय देऊ नये? मर्त्य मानवाने कशाचा त्याग करू नये? कोणत्या चांगल्या गोष्टीचा उच्चार करावा आणि कोणत्या वाईट गोष्टीचा उच्चार करू नये?" ‘‘අත්තානං න දදෙ පොසො, අත්තානං න පරිච්චජෙ; වාචං මුඤ්චෙය්ය කල්යාණං, පාපිකඤ්ච න මොචයෙ’’ති. "मनुष्याने स्वतःला (गुलाम म्हणून) देऊ नये, स्वतःचा (नाशासाठी) त्याग करू नये. त्याने कल्याणकारी वाणीचा उच्चार करावा आणि पापी (वाईट) वाणीचा उच्चार करू नये." 9. පාථෙය්යසුත්තං ९. "पाथेयसुत्त" 79. ७९. ‘‘කිංසු බන්ධති පාථෙය්යං, කිංසු භොගානමාසයො; කිංසු නරං පරිකස්සති, කිංසු ලොකස්මි දුජ්ජහං; කිස්මිං බද්ධා පුථූ සත්තා, පාසෙන සකුණී යථා’’ති. "प्रवासाची शिदोरी कशाने बांधली जाते? भोगांचे (संपत्तीचे) आश्रयस्थान काय आहे? मनुष्याला कोण ओढून नेते? जगात कशाचा त्याग करणे कठीण आहे? पाशात (जाळ्यात) अडकलेल्या पक्ष्याप्रमाणे बहुसंख्य प्राणी कशाने बांधलेले आहेत?" ‘‘සද්ධා බන්ධති පාථෙය්යං, සිරී භොගානමාසයො; ඉච්ඡා නරං පරිකස්සති, ඉච්ඡා ලොකස්මි දුජ්ජහා; ඉච්ඡාබද්ධා පුථූ සත්තා, පාසෙන සකුණී යථා’’ති. "श्रद्धा प्रवासाची शिदोरी बांधते; श्री (लक्ष्मी/वैभव) हे भोगांचे आश्रयस्थान आहे; इच्छा (तृष्णा) मनुष्याला ओढून नेते; जगात इच्छेचा त्याग करणे कठीण आहे. पाशात अडकलेल्या पक्ष्याप्रमाणे बहुसंख्य प्राणी इच्छेनेच बांधलेले आहेत." 10. පජ්ජොතසුත්තං १०. "पज्जोतसुत्त" 80. ८०. ‘‘කිංසු ලොකස්මි පජ්ජොතො, කිංසු ලොකස්මි ජාගරො; කිංසු කම්මෙ සජීවානං, කිමස්ස ඉරියාපථො. "जगात प्रकाश देणारे काय आहे? जगात जागे राहणारे (जागरूक) काय आहे? काम करून जगणाऱ्यांचे सोबती कोण आहेत? आणि त्यांच्या उपजीविकेचे साधन काय आहे?" ‘‘කිංසු අලසං අනලසඤ්ච, මාතා පුත්තංව පොසති; කිං භූතා උපජීවන්ති, යෙ පාණා පථවිස්සිතා’’ති. "आळशी आणि उद्योगी दोघांचेही, आई जशी आपल्या पुत्राचे पालनपोषण करते तसे पालनपोषण कोण करते? पृथ्वीवर राहणारे जे प्राणी आहेत, ते कशाच्या आधारे जगतात?" ‘‘පඤ්ඤා ලොකස්මි පජ්ජොතො, සති ලොකස්මි ජාගරො; ගාවො කම්මෙ සජීවානං, සීතස්ස ඉරියාපථො. "प्रज्ञा हा जगात प्रकाश आहे; स्मृती (सती) ही जगात जागी राहणारी आहे; काम करून जगणाऱ्यांचे सोबती गायी (बैल) आहेत; आणि नांगर हे त्यांच्या उपजीविकेचे साधन आहे." ‘‘වුට්ඨි අලසං අනලසඤ්ච, මාතා පුත්තංව පොසති; වුට්ඨිං භූතා උපජීවන්ති, යෙ පාණා පථවිස්සිතා’’ති. "वृष्टी (पाऊस) आळशी आणि उद्योगी दोघांचेही, आई जशी आपल्या पुत्राचे पालनपोषण करते तसे पालनपोषण करते. पृथ्वीवर राहणारे प्राणी वृष्टीच्या (पावसाच्या) आधारेच जगतात." 11. අරණසුත්තං ११. "अरणसुत्त" 81. ८१. ‘‘කෙසූධ [Pg.42] අරණා ලොකෙ, කෙසං වුසිතං න නස්සති; කෙධ ඉච්ඡං පරිජානන්ති, කෙසං භොජිස්සියං සදා. "या जगात क्लेशरहित (अरण) कोण आहेत? कोणाचे ब्रह्मचर्य (आचरण) नष्ट होत नाही? या जगात इच्छेला (तृष्णेला) पूर्णपणे जाणणारे कोण आहेत? आणि कोणाला सदैव स्वातंत्र्य (मुक्ती) लाभते?" ‘‘කිංසු මාතා පිතා භාතා, වන්දන්ති නං පතිට්ඨිතං; කිංසු ඉධ ජාතිහීනං, අභිවාදෙන්ති ඛත්තියා’’ති. "कोण (धर्मात) प्रतिष्ठित झाल्यावर आई, वडील आणि भाऊ त्याला वंदन करतात? या जगात जन्माने हीन असलेल्या कोणाला क्षत्रिय देखील अभिवादन करतात?" ‘‘සමණීධ අරණා ලොකෙ, සමණානං වුසිතං න නස්සති; සමණා ඉච්ඡං පරිජානන්ති, සමණානං භොජිස්සියං සදා. "या जगात श्रमण हेच क्लेशरहित (अरण) आहेत; श्रमणांचे ब्रह्मचर्य (आचरण) नष्ट होत नाही; श्रमण इच्छेला (तृष्णेला) पूर्णपणे जाणतात; आणि श्रमणांना सदैव स्वातंत्र्य (मुक्ती) लाभते." ‘‘සමණං මාතා පිතා භාතා, වන්දන්ති නං පතිට්ඨිතං; සමණීධ ජාතිහීනං, අභිවාදෙන්ති ඛත්තියා’’ති. "श्रमण (धर्मात) प्रतिष्ठित झाल्यावर आई, वडील आणि भाऊ त्याला वंदन करतात. श्रमण जन्माने हीन असले तरी क्षत्रिय देखील त्यांना अभिवादन करतात." ඡෙත්වාවග්ගො අට්ඨමො. "आठवा चेत्वावग्ग समाप्त." තස්සුද්දානං – "त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) -" ඡෙත්වා රථඤ්ච චිත්තඤ්ච, වුට්ඨි භීතා නජීරති; ඉස්සරං කාමං පාථෙය්යං, පජ්ජොතො අරණෙන චාති. "चेत्वा, रथ, चित्त, वृष्टी, भीत, न जीरति, इस्सर, काम, पाथेय, पज्जोत आणि अरण सुत्त." දෙවතාසංයුත්තං සමත්තං. "देवतासंयुत्त समाप्त झाले." 2. දෙවපුත්තසංයුත්තං २. "देवपुत्तसंयुत्त" 1. පඨමවග්ගො १. "पहिला वग्ग" 1. පඨමකස්සපසුත්තං १. "प्रथम कस्सपसुत्त" 82. එවං [Pg.43] මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. අථ ඛො කස්සපො දෙවපුත්තො අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණො කෙවලකප්පං ජෙතවනං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතො ඛො කස්සපො දෙවපුත්තො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘භික්ඛුං භගවා පකාසෙසි, නො ච භික්ඛුනො අනුසාස’’න්ති. ‘‘තෙන හි කස්සප, තඤ්ඤෙවෙත්ථ පටිභාතූ’’ති. ८२. "असे मी ऐकले आहे - एक वेळ भगवान श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेव्हा, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, अत्यंत देखण्या रूपाचा कस्सप देवपुत्र संपूर्ण जेतवनाला आपल्या प्रकाशाने उजळवून टाकत भगवंतांकडे आला. जवळ येऊन, भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेला कस्सप देवपुत्र भगवंतांना म्हणाला - 'भगवंतांनी भिक्खूचे स्वरूप तर प्रकट केले, परंतु भिक्खूला द्यावयाचा उपदेश (अनुशासणी) प्रकट केला नाही.' (भगवान म्हणाले -) 'तर मग कस्सप, तूच याविषयी येथे प्रकाश टाक.'" ‘‘සුභාසිතස්ස සික්ඛෙථ, සමණූපාසනස්ස ච; එකාසනස්ස ච රහො, චිත්තවූපසමස්ස චා’’ති. "सुभाषित (सुंदर वचनांचे) आचरण करावे, श्रमणांच्या सेवेचे (किंवा उपासनेचे) आचरण करावे, एकांतात एकाच आसनावर बसून ध्यान करावे आणि चित्ताच्या शांततेचा अभ्यास करावा." ඉදමවොච කස්සපො දෙවපුත්තො; සමනුඤ්ඤො සත්ථා අහොසි. අථ ඛො කස්සපො දෙවපුත්තො ‘‘සමනුඤ්ඤො මෙ සත්ථා’’ති භගවන්තං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා තත්ථෙවන්තරධායීති. "कस्सप देवपुत्राने असे म्हटले. शास्त्यांनी (बुद्धांनी) त्याला संमती दिली. तेव्हा कस्सप देवपुत्राने 'शास्त्यांनी माझ्या वचनाला संमती दिली आहे' असे जाणून भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि तो तिथेच अंतर्धान पावला." 2. දුතියකස්සපසුත්තං २. "द्वितीय कस्सपसुत्त" 83. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං ඨිතො ඛො කස්සපො දෙවපුත්තො භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – ८३. "श्रावस्ती येथील प्रसंग. एका बाजूला उभा राहिलेला कस्सप देवपुत्र भगवंतांच्या सन्निध ही गाथा म्हणाला -" ‘‘භික්ඛු සියා ඣායී විමුත්තචිත්තො,ආකඞ්ඛෙ චෙ හදයස්සානුපත්තිං; ලොකස්ස ඤත්වා උදයබ්බයඤ්ච,සුචෙතසො අනිස්සිතො තදානිසංසො’’ති. "जर भिक्खू हृदयस्थ ध्येयाची (अर्हत्त्वाची) प्राप्ती इच्छित असेल, तर त्याने ध्यानी आणि विमुक्तचित्त व्हावे. जगाचा उदय आणि व्यय (उत्पत्ती आणि विनाश) जाणून, शुद्ध मनाचा, अनासक्त (तृष्णा-दृष्टी विरहित) होऊन त्याने त्या फलाचा लाभ घ्यावा." 3. මාඝසුත්තං ३. "माघसुत्त" 84. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො මාඝො දෙවපුත්තො අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණො කෙවලකප්පං ජෙතවනං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි[Pg.44]. එකමන්තං ඨිතො ඛො මාඝො දෙවපුත්තො භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – ८४. "श्रावस्ती येथील प्रसंग. तेव्हा, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, अत्यंत देखण्या रूपाचा माघ देवपुत्र संपूर्ण जेतवनाला आपल्या प्रकाशाने उजळवून टाकत भगवंतांकडे आला. जवळ येऊन, भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेला माघ देवपुत्र भगवंतांना गाथेने म्हणाला -" ‘‘කිංසු ඡෙත්වා සුඛං සෙති, කිංසු ඡෙත්වා න සොචති; කිස්සස්සු එකධම්මස්ස, වධං රොචෙසි ගොතමා’’ති. "हे गौतम, कशाचा नाश (उन्मूलन) करून मनुष्य सुखाने झोपतो? कशाचा नाश करून तो शोक करत नाही? कोणत्या एका गोष्टीचा नाश करणे तुम्हाला आवडते?" ‘‘කොධං ඡෙත්වා සුඛං සෙති, කොධං ඡෙත්වා න සොචති; කොධස්ස විසමූලස්ස, මධුරග්ගස්ස වත්රභූ; වධං අරියා පසංසන්ති, තඤ්හි ඡෙත්වා න සොචතී’’ති. "हे वत्रभू (इंद्र), क्रोधाचा नाश करून मनुष्य सुखाने झोपतो; क्रोधाचा नाश करून तो शोक करत नाही. ज्याचे मूळ विषारी आहे आणि टोक गोड आहे, अशा क्रोधाचा नाश करण्याची आर्य प्रशंसा करतात; कारण त्याचा नाश केल्यावर मनुष्य शोक करत नाही." 4. මාගධසුත්තං ४. "मागधसुत्त" 85. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං ඨිතො ඛො මාගධො දෙවපුත්තො භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – ८५. "श्रावस्ती येथील प्रसंग. एका बाजूला उभा राहिलेला मागध देवपुत्र भगवंतांना गाथेने म्हणाला -" ‘‘කති ලොකස්මිං පජ්ජොතා, යෙහි ලොකො පකාසති; භවන්තං පුට්ඨුමාගම්ම, කථං ජානෙමු තං මය’’න්ති. "जगात किती प्रकाश (प्रकाशस्रोत) आहेत, ज्यांच्यामुळे जग प्रकाशित होते? आम्ही भगवंतांना विचारण्यासाठी आलो आहोत, आम्ही हे कसे समजून घ्यावे?" ‘‘චත්තාරො ලොකෙ පජ්ජොතා, පඤ්චමෙත්ථ න විජ්ජති; දිවා තපති ආදිච්චො, රත්තිමාභාති චන්දිමා. "जगात चार प्रकाशस्रोत आहेत, पाचवा येथे आढळत नाही. सूर्य दिवसा तळपतो, चंद्र रात्री प्रकाशतो," ‘‘අථ අග්ගි දිවාරත්තිං, තත්ථ තත්ථ පකාසති; සම්බුද්ධො තපතං සෙට්ඨො, එසා ආභා අනුත්තරා’’ති. "तसेच, अग्नी हा दिवस आणि रात्र वेगवेगळ्या ठिकाणी प्रकाशतो; परंतु प्रकाशणाऱ्यांमध्ये सम्यक्संबुद्ध हे सर्वश्रेष्ठ आहेत, हाच सर्वोत्तम (अनुत्तर) प्रकाश आहे." 5. දාමලිසුත්තං ५. "दामलि सुत्त" 86. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො දාමලි දෙවපුත්තො අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණො කෙවලකප්පං ජෙතවනං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතො ඛො දාමලි දෙවපුත්තො භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – ८६. "श्रावस्ती येथील प्रसंग. त्यानंतर, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, अत्यंत देखण्या रूपाचा दामलि नावाचा देवपुत्र संपूर्ण जेतवन आपल्या प्रभेने प्रकाशित करत जेथे भगवान होते तेथे आला. जवळ येऊन, भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेला दामलि देवपुत्र भगवंतांच्या सन्मुख ही गाथा म्हणाला –" ‘‘කරණීයමෙතං බ්රාහ්මණෙන, පධානං අකිලාසුනා; කාමානං විප්පහානෙන, න තෙනාසීසතෙ භව’’න්ති. "“कामवासनांचा त्याग केलेल्या, आळस नसलेल्या ब्राह्मणाने (अर्हताने) हेच प्रयत्न (प्रधान) केले पाहिजेत; या प्रयत्नांमुळे तो पुन्हा अस्तित्वाची (भवाची) आकांक्षा धरत नाही.”" ‘‘නත්ථි කිච්චං බ්රාහ්මණස්ස (දාමලීති භගවා),කතකිච්චො හි බ්රාහ්මණො. "“हे दामलि,” भगवान म्हणाले, “ब्राह्मणासाठी (अर्हतासाठी) कोणतेही कर्तव्य उरलेले नसते, कारण ब्राह्मणाने आपले कर्तव्य पूर्ण केलेले असते." ‘‘යාව [Pg.45] න ගාධං ලභති නදීසු,ආයූහති සබ්බගත්තෙභි ජන්තු; ගාධඤ්ච ලද්ධාන ථලෙ ඨිතො යො,නායූහතී පාරගතො හි සොව. "जोपर्यंत नदीमध्ये पाय टेकवायला जागा (थांग) मिळत नाही, तोपर्यंत मनुष्य आपल्या सर्व अवयवांनी (हातपाय मारून) संघर्ष करतो; परंतु थांग मिळाल्यावर, कोरड्या जमिनीवर उभा राहिल्यावर तो संघर्ष करत नाही, कारण तो पलीकडच्या तीरावर पोहोचलेला असतो." ‘‘එසූපමා දාමලි බ්රාහ්මණස්ස,ඛීණාසවස්ස නිපකස්ස ඣායිනො; පප්පුය්ය ජාතිමරණස්ස අන්තං,නායූහතී පාරගතො හි සො’’ති. "“हे दामलि, हीच उपमा त्या ब्राह्मणाची (अर्हताची) आहे, जो आसवमुक्त (क्षीणासव), प्रज्ञावान आणि ध्यानी आहे. जन्म-मरणाचा अंत गाठल्यावर तो आता संघर्ष करत नाही, कारण तो पलीकडच्या तीरावर पोहोचलेला आहे.”" 6. කාමදසුත්තං ६. "कामद सुत्त" 87. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං ඨිතො ඛො කාමදො දෙවපුත්තො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘දුක්කරං භගවා, සුදුක්කරං භගවා’’ති. ८७. "श्रावस्ती येथील प्रसंग. एका बाजूला उभा राहिलेला कामद देवपुत्र भगवंतांना म्हणाला – “भगवंत, (श्रमणधर्म आचरणे) कठीण आहे! भगवंत, हे अत्यंत कठीण आहे!”" ‘‘දුක්කරං වාපි කරොන්ති (කාමදාති භගවා),සෙඛා සීලසමාහිතා; ඨිතත්තා අනගාරියුපෙතස්ස,තුට්ඨි හොති සුඛාවහා’’ති. "“हे कामद,” भगवान म्हणाले, “जे शीलवान आणि दृढनिश्चयी शैक्ष (साधना करणारे) आहेत, ते हे कठीण कार्यही करतात. गृहत्याग करून अनगारिक (श्रमण) झालेल्या व्यक्तीला मिळणारे समाधान सुख देणारे असते.”" ‘‘දුල්ලභා භගවා යදිදං තුට්ඨී’’ති. "“भगवंत, हे जे समाधान आहे, ते मिळणे अत्यंत दुर्मिळ आहे.”" ‘‘දුල්ලභං වාපි ලභන්ති (කාමදාති භගවා),චිත්තවූපසමෙ රතා; යෙසං දිවා ච රත්තො ච,භාවනාය රතො මනො’’ති. "“हे कामद,” भगवान म्हणाले, “जे चित्ताच्या शांततेत रममाण होतात, ज्यांचे मन दिवस-रात्र भावनेमध्ये (साधनेत) रमते, ते हे दुर्मिळ समाधानही प्राप्त करतात.”" ‘‘දුස්සමාදහං භගවා යදිදං චිත්ත’’න්ති. "“भगवंत, हे जे चित्त आहे, ते एकाग्र करणे (समाहित करणे) अत्यंत कठीण आहे.”" ‘‘දුස්සමාදහං වාපි සමාදහන්ති (කාමදාති භගවා),ඉන්ද්රියූපසමෙ රතා; තෙ ඡෙත්වා මච්චුනො ජාලං,අරියා ගච්ඡන්ති කාමදා’’ති. "“हे कामद,” भगवान म्हणाले, “जे इंद्रियांच्या शांततेत रमतात, ते या कठीण चित्तालाही एकाग्र करतात. ते आर्य मृत्यूचे जाळे तोडून पुढे निघून जातात.”" ‘‘දුග්ගමො [Pg.46] භගවා විසමො මග්ගො’’ති. "“भगवंत, हा मार्ग दुर्गम आणि विषम (अडथळ्यांचा) आहे.”" ‘‘දුග්ගමෙ විසමෙ වාපි, අරියා ගච්ඡන්ති කාමද; අනරියා විසමෙ මග්ගෙ, පපතන්ති අවංසිරා; අරියානං සමො මග්ගො, අරියා හි විසමෙ සමා’’ති. "“हे कामद, जरी मार्ग दुर्गम आणि विषम असला, तरी आर्य त्यावर चालतात. अनार्य (सामान्य लोक) मात्र या विषम मार्गावर डोके खाली करून कोसळतात. आर्यांचा मार्ग सम (समतोल) असतो, कारण विषम जगातही आर्य स्वतः समतोल राहतात.”" 7. පඤ්චාලචණ්ඩසුත්තං ७. "पंचालचंड सुत्त" 88. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං ඨිතො ඛො පඤ්චාලචණ්ඩො දෙවපුත්තො භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – ८८. "श्रावस्ती येथील प्रसंग. एका बाजूला उभा राहिलेला पंचालचंड देवपुत्र भगवंतांच्या सन्मुख ही गाथा म्हणाला –" ‘‘සම්බාධෙ වත ඔකාසං, අවින්දි භූරිමෙධසො; යො ඣානමබුජ්ඣි බුද්ධො, පටිලීනනිසභො මුනී’’ති. "“अडथळ्यांनी कोंडलेल्या (संकुचित) अवस्थेतही त्या अगाध प्रज्ञावंताने मार्ग शोधून काढला; ज्या बुद्धांनी ध्यान जाणले, ते एकांतात रमणारे श्रेष्ठ मुनी आहेत.”" ‘‘සම්බාධෙ වාපි වින්දන්ති (පඤ්චාලචණ්ඩාති භගවා),ධම්මං නිබ්බානපත්තියා; යෙ සතිං පච්චලත්ථංසු,සම්මා තෙ සුසමාහිතා’’ති. "“हे पंचालचंड,” भगवान म्हणाले, “अडथळ्यांनी कोंडलेल्या अवस्थेतही ते निर्वाण प्राप्तीसाठी धम्माचा शोध घेतात; ज्यांनी स्मृती (सती) प्राप्त केली आहे, ते सम्यक् प्रकारे समाहित (एकाग्र) होतात.”" 8. තායනසුත්තං ८. "तायन सुत्त" 89. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො තායනො දෙවපුත්තො පුරාණතිත්ථකරො අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණො කෙවලකප්පං ජෙතවනං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතො ඛො තායනො දෙවපුත්තො භගවතො සන්තිකෙ ඉමා ගාථායො අභාසි – ८९. "श्रावस्ती येथील प्रसंग. त्यानंतर, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, पूर्वी एका पंथाचा संस्थापक असलेला तायन नावाचा देवपुत्र अत्यंत देखण्या रूपाने संपूर्ण जेतवन आपल्या प्रभेने प्रकाशित करत जेथे भगवान होते तेथे आला. जवळ येऊन, भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेला तायन देवपुत्र भगवंतांच्या सन्मुख या गाथा म्हणाला –" ‘‘ඡින්ද සොතං පරක්කම්ම, කාමෙ පනුද බ්රාහ්මණ; නප්පහාය මුනී කාමෙ, නෙකත්තමුපපජ්ජති. "“हे ब्राह्मण, पराक्रम करून (तृष्णेचा) प्रवाह तोडून टाक! कामवासनांना दूर सार! कामवासनांचा त्याग केल्याशिवाय मुनी एकाग्रता (ध्यान) प्राप्त करू शकत नाही." ‘‘කයිරා චෙ කයිරාථෙනං, දළ්හමෙනං පරක්කමෙ; සිථිලො හි පරිබ්බාජො, භිය්යො ආකිරතෙ රජං. "जर काही करायचे असेल, तर ते दृढतेने करावे, त्यात पूर्ण पराक्रम करावा. कारण शिथिल झालेला संन्यासी (परिव्राजक) स्वतःवर अधिकच (क्लेशांची) धूळ उडवून घेतो." ‘‘අකතං දුක්කටං සෙය්යො, පච්ඡා තපති දුක්කටං; කතඤ්ච සුකතං සෙය්යො, යං කත්වා නානුතප්පති. "वाईट कृत्य न केलेलेच बरे, कारण वाईट कृत्यामुळे नंतर पश्चात्ताप होतो. चांगले कृत्य केलेलेच बरे, जे केल्यावर पश्चात्ताप होत नाही." ‘‘කුසො [Pg.47] යථා දුග්ගහිතො, හත්ථමෙවානුකන්තති; සාමඤ්ඤං දුප්පරාමට්ඨං, නිරයායූපකඩ්ඪති. "ज्याप्रमाणे चुकीच्या पद्धतीने पकडलेले कुस (गवत) हातालाच कापते, त्याचप्रमाणे चुकीच्या पद्धतीने आचरलेले श्रमणत्व (साधुत्व) नरकाकडे खेचून नेते." ‘‘යං කිඤ්චි සිථිලං කම්මං, සංකිලිට්ඨඤ්ච යං වතං; සඞ්කස්සරං බ්රහ්මචරියං, න තං හොති මහප්ඵල’’න්ති. "कोणतेही शिथिलतेने केलेले कार्य, मलीन झालेले व्रत आणि संशयास्पद ब्रह्मचर्य हे मोठे फळ देणारे ठरत नाही.”" ඉදමවොච තායනො දෙවපුත්තො; ඉදං වත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා තත්ථෙවන්තරධායීති. "तायन देवपुत्र असे म्हणाला; हे बोलून, भगवंतांना अभिवादन करून आणि प्रदक्षिणा घालून तो तेथेच अंतर्धान पावला." අථ ඛො භගවා තස්සා රත්තියා අච්චයෙන භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘ඉමං, භික්ඛවෙ, රත්තිං තායනො නාම දෙවපුත්තො පුරාණතිත්ථකරො අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණො කෙවලකප්පං ජෙතවනං ඔභාසෙත්වා යෙනාහං තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා මං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතො ඛො, භික්ඛවෙ, තායනො දෙවපුත්තො මම සන්තිකෙ ඉමා ගාථායො අභාසි – "त्यानंतर, ती रात्र संपल्यावर भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – “भिक्खूंनो, काल रात्री, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, पूर्वी एका पंथाचा संस्थापक असलेला तायन नावाचा देवपुत्र अत्यंत देखण्या रूपाने संपूर्ण जेतवन आपल्या प्रभेने प्रकाशित करत जेथे मी होतो तेथे आला. जवळ येऊन, मला अभिवादन करून तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेला तायन देवपुत्र माझ्या सन्मुख या गाथा म्हणाला –" ‘‘ඡින්ද සොතං පරක්කම්ම, කාමෙ පනුද බ්රාහ්මණ; නප්පහාය මුනී කාමෙ, නෙකත්තමුපපජ්ජති. "“हे ब्राह्मण, पराक्रम करून प्रवाह तोडून टाक! कामवासनांना दूर सार! कामवासनांचा त्याग केल्याशिवाय मुनी एकाग्रता प्राप्त करू शकत नाही." ‘‘කයිරා චෙ කයිරාථෙනං, දළ්හමෙනං පරක්කමෙ; සිථිලො හි පරිබ්බාජො, භිය්යො ආකිරතෙ රජං. "जर काही करायचे असेल, तर ते दृढतेने करावे, त्यात पूर्ण पराक्रम करावा. कारण शिथिल झालेला संन्यासी स्वतःवर अधिकच धूळ उडवून घेतो." ‘‘අකතං දුක්කටං සෙය්යො, පච්ඡා තපති දුක්කටං; කතඤ්ච සුකතං සෙය්යො, යං කත්වා නානුතප්පති. "वाईट कृत्य न केलेलेच बरे, कारण वाईट कृत्यामुळे नंतर पश्चात्ताप होतो. चांगले कृत्य केलेलेच बरे, जे केल्यावर पश्चात्ताप होत नाही." ‘‘කුසො යථා දුග්ගහිතො, හත්ථමෙවානුකන්තති; සාමඤ්ඤං දුප්පරාමට්ඨං, නිරයායූපකඩ්ඪති. "ज्याप्रमाणे चुकीच्या पद्धतीने पकडलेले कुस हातालाच कापते, त्याचप्रमाणे चुकीच्या पद्धतीने आचरलेले श्रमणत्व नरकाकडे खेचून नेते." ‘‘යං කිඤ්චි සිථිලං කම්මං, සංකිලිට්ඨඤ්ච යං වතං; සඞ්කස්සරං බ්රහ්මචරියං, න තං හොති මහප්ඵල’’න්ති. "कोणतेही शिथिलतेने केलेले कार्य, मलीन झालेले व्रत आणि संशयास्पद ब्रह्मचर्य हे मोठे फळ देणारे ठरत नाही.”" ‘‘ඉදමවොච, භික්ඛවෙ, තායනො දෙවපුත්තො, ඉදං වත්වා මං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා තත්ථෙවන්තරධායි. උග්ගණ්හාථ, භික්ඛවෙ, තායනගාථා; පරියාපුණාථ, භික්ඛවෙ, තායනගාථා; ධාරෙථ, භික්ඛවෙ, තායනගාථා. අත්ථසංහිතා, භික්ඛවෙ, තායනගාථා ආදිබ්රහ්මචරියිකා’’ති. "“भिक्खूंनो, तायन देवपुत्र असे म्हणाला; हे बोलून, मला अभिवादन करून आणि प्रदक्षिणा घालून तो तेथेच अंतर्धान पावला. भिक्खूंनो, तायनाच्या या गाथा शिका; भिक्खूंनो, तायनाच्या या गाथा आत्मसात करा; भिक्खूंनो, तायनाच्या या गाथा स्मरणात ठेवा. भिक्खूंनो, तायनाच्या या गाथा कल्याणकारी आहेत आणि त्या ब्रह्मचर्याच्या पायाशी संबंधित आहेत.”" 9. චන්දිමසුත්තං ९. "चंदिम सुत्त" 90. සාවත්ථිනිදානං[Pg.48]. තෙන ඛො පන සමයෙන චන්දිමා දෙවපුත්තො රාහුනා අසුරින්දෙන ගහිතො හොති. අථ ඛො චන්දිමා දෙවපුත්තො භගවන්තං අනුස්සරමානො තායං වෙලායං ඉමං ගාථං අභාසි – ९०. "श्रावस्ती येथील प्रसंग. त्या वेळी चंद्रदेवपुत्राला (चंदिम देवपुत्राला) असुरराज राहूने पकडले होते. तेव्हा भगवंतांचे स्मरण करत चंद्रदेवपुत्राने त्या वेळी ही गाथा म्हटली –" ‘‘නමො තෙ බුද්ධ වීරත්ථු, විප්පමුත්තොසි සබ්බධි; සම්බාධපටිපන්නොස්මි, තස්ස මෙ සරණං භවා’’ති. "“हे वीर बुद्ध, आपल्याला नमस्कार असो! आपण सर्व बंधनांतून पूर्णपणे मुक्त आहात. मी संकटात (बंधनात) सापडलो आहे, आपण माझे शरण व्हावे!”" අථ ඛො භගවා චන්දිමං දෙවපුත්තං ආරබ්භ රාහුං අසුරින්දං ගාථාය අජ්ඣභාසි – "त्यानंतर भगवंतांनी चंद्रदेवपुत्राच्या संदर्भात असुरराज राहूला उद्देशून गाथेत म्हटले –" ‘‘තථාගතං අරහන්තං, චන්දිමා සරණං ගතො; රාහු චන්දං පමුඤ්චස්සු, බුද්ධා ලොකානුකම්පකා’’ති. "“चंद्रदेवपुत्र हा अर्हत तथागतांच्या शरणी गेला आहे. हे राहू, चंद्राला मुक्त कर; बुद्ध हे जगावर अनुकंपा करणारे (दयाळू) असतात.”" අථ ඛො රාහු අසුරින්දො චන්දිමං දෙවපුත්තං මුඤ්චිත්වා තරමානරූපො යෙන වෙපචිත්ති අසුරින්දො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා සංවිග්ගො ලොමහට්ඨජාතො එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතං ඛො රාහුං අසුරින්දං වෙපචිත්ති අසුරින්දො ගාථාය අජ්ඣභාසි – त्यानंतर राहू असुरेंद्राने चंद्रदेवपुत्राला मुक्त केले आणि घाईघाईने जेथे वेपचित्ती असुरेंद्र होता तेथे तो गेला. तेथे जाऊन, भयभीत व अंगावर रोमांच उभे राहिलेला तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभे राहिलेल्या राहू असुरेंद्राला वेपचित्ती असुरेंद्राने गाथेने म्हटले – ‘‘කිං නු සන්තරමානොව, රාහු චන්දං පමුඤ්චසි; සංවිග්ගරූපො ආගම්ම, කිං නු භීතොව තිට්ඨසී’’ති. “हे राहू, तू एवढ्या घाईघाईने चंद्राला का मुक्त केलेस? भयभीत होऊन येथे आल्यावर तू असा घाबरल्यासारखा का उभा आहेस?” ‘‘සත්තධා මෙ ඵලෙ මුද්ධා, ජීවන්තො න සුඛං ලභෙ; බුද්ධගාථාභිගීතොම්හි, නො චෙ මුඤ්චෙය්ය චන්දිම’’න්ති. “जर मी चंद्रदेवपुत्राला मुक्त केले नसते, तर माझ्या मस्तकाचे सात तुकडे झाले असते आणि जिवंत असूनही मला सुख लाभले नसते; कारण मी बुद्धांच्या गाथेने अत्यंत भयभीत झालो होतो।” 10. සූරියසුත්තං १०. सूर्यसुत्त 91. සාවත්ථිනිදානං. තෙන ඛො පන සමයෙන සූරියො දෙවපුත්තො රාහුනා අසුරින්දෙන ගහිතො හොති. අථ ඛො සූරියො දෙවපුත්තො භගවන්තං අනුස්සරමානො තායං වෙලායං ඉමං ගාථං අභාසි – ९१. श्रावस्ती येथील प्रसंग. त्या वेळी सूर्यदेवपुत्राला राहू असुरेंद्राने पकडले होते. तेव्हा सूर्यदेवपुत्राने भगवंतांचे स्मरण करत त्या वेळी ही गाथा म्हटली – ‘‘නමො තෙ බුද්ධ වීරත්ථු, විප්පමුත්තොසි සබ්බධි; සම්බාධපටිපන්නොස්මි, තස්ස මෙ සරණං භවා’’ති. “हे वीर बुद्ध! आपल्याला माझा नमस्कार असो. आपण सर्व प्रकारे मुक्त आहात. मी संकटात सापडलो आहे, आपण माझे शरण व्हावे.” අථ ඛො භගවා සූරියං දෙවපුත්තං ආරබ්භ රාහුං අසුරින්දං ගාථාහි අජ්ඣභාසි – त्यानंतर भगवंतांनी सूर्यदेवपुत्राच्या संदर्भात राहू असुरेंद्राला गाथांनी संबोधित केले – ‘‘තථාගතං [Pg.49] අරහන්තං, සූරියො සරණං ගතො; රාහු සූරියං පමුඤ්චස්සු, බුද්ධා ලොකානුකම්පකා. “सूर्य हा अर्हत तथागतांच्या शरणी गेला आहे. हे राहू, सूर्याला मुक्त कर; बुद्ध हे जगावर अनुकंपा करणारे असतात. ‘‘යො අන්ධකාරෙ තමසි පභඞ්කරො,වෙරොචනො මණ්ඩලී උග්ගතෙජො; මා රාහු ගිලී චරමන්තලික්ඛෙ,පජං මමං රාහු පමුඤ්ච සූරිය’’න්ති. “जो अंधकारात प्रकाश निर्माण करणारा, देदीप्यमान, मंडलकार आणि प्रखर तेजस्वी आहे, अशा आकाशात संचार करणाऱ्या सूर्याला, हे राहू, तू गिळू नकोस. हे राहू, माझ्या पुत्राला, सूर्याला मुक्त कर.” අථ ඛො රාහු අසුරින්දො සූරියං දෙවපුත්තං මුඤ්චිත්වා තරමානරූපො යෙන වෙපචිත්ති අසුරින්දො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා සංවිග්ගො ලොමහට්ඨජාතො එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතං ඛො රාහුං අසුරින්දං වෙපචිත්ති අසුරින්දො ගාථාය අජ්ඣභාසි – त्यानंतर राहू असुरेंद्राने सूर्यदेवपुत्राला मुक्त केले आणि घाईघाईने जेथे वेपचित्ती असुरेंद्र होता तेथे तो गेला. तेथे जाऊन, भयभीत व अंगावर रोमांच उभे राहिलेला तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभे राहिलेल्या राहू असुरेंद्राला वेपचित्ती असुरेंद्राने गाथेने म्हटले – ‘‘කිං නු සන්තරමානොව, රාහු සූරියං පමුඤ්චසි; සංවිග්ගරූපො ආගම්ම, කිං නු භීතොව තිට්ඨසී’’ති. “हे राहू, तू एवढ्या घाईघाईने सूर्याला का मुक्त केलेस? भयभीत होऊन येथे आल्यावर तू असा घाबरल्यासारखा का उभा आहेस?” ‘‘සත්තධා මෙ ඵලෙ මුද්ධා, ජීවන්තො න සුඛං ලභෙ; බුද්ධගාථාභිගීතොම්හි, නො චෙ මුඤ්චෙය්ය සූරිය’’න්ති. “जर मी सूर्याला मुक्त केले नसते, तर माझ्या मस्तकाचे सात तुकडे झाले असते आणि जिवंत असूनही मला सुख लाभले नसते; कारण मी बुद्धांच्या गाथेने अत्यंत भयभीत झालो होतो.” පඨමො වග්ගො. पहिला वर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – ද්වෙ කස්සපා ච මාඝො ච, මාගධො දාමලි කාමදො; පඤ්චාලචණ්ඩො තායනො, චන්දිමසූරියෙන තෙ දසාති. दोन कस्सप सुत्ते, माघ, मागध, दामली, कामद, पंचालचंड, तायन आणि चंद्र व सूर्य सुत्तांसह ही दहा सुत्ते आहेत. 2. අනාථපිණ්ඩිකවග්ගො २. अनाथपिंडिक वर्ग 1. චන්දිමසසුත්තං १. चंदिमस सुत्त 92. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො චන්දිමසො දෙවපුත්තො අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණො කෙවලකප්පං ජෙතවනං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි[Pg.50]. එකමන්තං ඨිතො ඛො චන්දිමසො දෙවපුත්තො භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – ९२. श्रावस्ती येथील प्रसंग. रात्रीचा प्रहर उलटून गेल्यावर, अत्यंत देदीप्यमान कांती असलेला चंदिमस देवपुत्र संपूर्ण जेतवन प्रकाशित करत जेथे भगवंत होते तेथे आला. आल्यानंतर त्याने भगवंतांना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेल्या चंदिमस देवपुत्राने भगवंतांच्या सन्मुख ही गाथा म्हटली – ‘‘තෙ හි සොත්ථිං ගමිස්සන්ති, කච්ඡෙ වාමකසෙ මගා; ඣානානි උපසම්පජ්ජ, එකොදි නිපකා සතා’’ති. “जे ध्यानाची प्राप्ती करून, एकाग्रचित्त, प्रज्ञावान आणि स्मृतिमान होऊन विहार करतात, तेच डास-माशांशिवाय असलेल्या पर्वताच्या दरीत किंवा नदीकाठच्या जंगलात हरिणांप्रमाणे सुखरूपपणे पार पडतील.” ‘‘තෙ හි පාරං ගමිස්සන්ති, ඡෙත්වා ජාලංව අම්බුජො; ඣානානි උපසම්පජ්ජ, අප්පමත්තා රණඤ්ජහා’’ති. भगवंत म्हणाले: “जे ध्यानाची प्राप्ती करून, अप्रमादी (जागरूक) राहून क्लेशांचा त्याग करतात, तेच जाळे तोडून सुखरूप जाणाऱ्या माशाप्रमाणे संसाराच्या पलीकडच्या तीराला (निर्वाणाला) पोहोचतील.” 2. වෙණ්ඩුසුත්තං २. वेण्डू सुत्त 93. එකමන්තං ඨිතො ඛො වෙණ්ඩු දෙවපුත්තො භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – ९३. एका बाजूला उभा राहिलेल्या वेण्डू देवपुत्राने भगवंतांच्या सन्मुख ही गाथा म्हटली – ‘‘සුඛිතාව තෙ මනුජා, සුගතං පයිරුපාසිය; යුඤ්ජං ගොතමසාසනෙ, අප්පමත්තා නු සික්ඛරෙ’’ති. “जे मनुष्य सुगतांची (बुद्धांची) सेवा-उपासना करून, गोतम बुद्धांच्या शासनात (धम्मात) प्रयत्नशील राहतात आणि अप्रमादी होऊन आचरण करतात, ते खरोखरच सुखी होतात.” ‘‘යෙ මෙ පවුත්තෙ සිට්ඨිපදෙ (වෙණ්ඩූති භගවා),අනුසික්ඛන්ති ඣායිනො; කාලෙ තෙ අප්පමජ්ජන්තා,න මච්චුවසගා සියු’’න්ති. भगवंत म्हणाले: “हे वेण्डू, जे ध्यानी पुरुष माझ्याद्वारे उपदेशिलेल्या धम्मपदांचे (शिक्षणाचे) अनुकरण करतात, ते योग्य वेळी अप्रमादी राहून मृत्यूच्या स्वाधीन होणार नाहीत.” 3. දීඝලට්ඨිසුත්තං ३. दीघलट्ठि सुत्त 94. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. අථ ඛො දීඝලට්ඨි දෙවපුත්තො අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණො කෙවලකප්පං වෙළුවනං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතො ඛො දීඝලට්ඨි දෙවපුත්තො භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – ९४. मी असे ऐकले आहे – एक वेळ भगवंत राजगृह येथील वेळुवनातील कलंदकनिवाप येथे विहार करत होते. तेव्हा रात्रीचा प्रहर उलटून गेल्यावर, अत्यंत देदीप्यमान कांती असलेला दीघलट्ठि देवपुत्र संपूर्ण वेळुवन प्रकाशित करत जेथे भगवंत होते तेथे आला. आल्यानंतर त्याने भगवंतांना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेल्या दीघलट्ठि देवपुत्राने भगवंतांच्या सन्मुख ही गाथा म्हटली – ‘‘භික්ඛු සියා ඣායී විමුත්තචිත්තො,ආකඞ්ඛෙ චෙ හදයස්සානුපත්තිං; ලොකස්ස ඤත්වා උදයබ්බයඤ්ච,සුචෙතසො අනිස්සිතො තදානිසංසො’’ති. “जर भिक्खू मनाच्या अंतिम मुक्तीची (अर्हत्त्वाची) आकांक्षा बाळगत असेल, तर त्याने ध्यानमग्न व विमुक्तचित्त व्हावे. जगाची उत्पत्ती आणि विनाश जाणून, शुद्ध चित्त ठेवून, कशावरही अवलंबून न राहता (तृष्णा व दृष्टीरहित होऊन) त्याने त्या मुक्तीच्या लाभासाठी प्रयत्नशील असावे.” 4. නන්දනසුත්තං ४. नंदन सुत्त 95. එකමන්තං [Pg.51] ඨිතො ඛො නන්දනො දෙවපුත්තො භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – ९५. एका बाजूला उभा राहिलेल्या नंदन देवपुत्राने भगवंतांना गाथेने विचारले – ‘‘පුච්ඡාමි තං ගොතම භූරිපඤ්ඤ,අනාවටං භගවතො ඤාණදස්සනං; කථංවිධං සීලවන්තං වදන්ති,කථංවිධං පඤ්ඤවන්තං වදන්ති; කථංවිධො දුක්ඛමතිච්ච ඉරියති,කථංවිධං දෙවතා පූජයන්තී’’ති. “हे अगाध प्रज्ञा असलेले गोतम! मी आपल्याला विचारतो – भगवंतांचे ज्ञान आणि दर्शन हे अनावरण (अप्रतिहत) आहे. लोक कशा प्रकारच्या व्यक्तीला शीलवान म्हणतात? कशा प्रकारच्या व्यक्तीला प्रज्ञावान म्हणतात? कशा प्रकारचा मनुष्य दुःखाचा पार करून जगतो? आणि देव कशा प्रकारच्या व्यक्तीची पूजा करतात?” ‘‘යො සීලවා පඤ්ඤවා භාවිතත්තො,සමාහිතො ඣානරතො සතීමා; සබ්බස්ස සොකා විගතා පහීනා,ඛීණාසවො අන්තිමදෙහධාරී. भगवंत म्हणाले: “जो शीलवान, प्रज्ञावान, भावनाशील (चित्त विकसित केलेला), समाधीस्थ, ध्यानात रमणारा आणि स्मृतिमान आहे; ज्याचे सर्व शोक नाहीसे झाले आहेत व क्लेश नष्ट झाले आहेत; जो आसवमुक्त (क्षीणासव) आहे आणि ज्याने हा अंतिम देह धारण केला आहे; ‘‘තථාවිධං සීලවන්තං වදන්ති,තථාවිධං පඤ්ඤවන්තං වදන්ති; තථාවිධො දුක්ඛමතිච්ච ඉරියති,තථාවිධං දෙවතා පූජයන්තී’’ති. “अशा प्रकारच्या व्यक्तीला लोक शीलवान म्हणतात, अशा प्रकारच्या व्यक्तीला प्रज्ञावान म्हणतात; असाच मनुष्य दुःखाचा पार करून जगतो आणि देवही अशाच व्यक्तीची पूजा करतात.” 5. චන්දනසුත්තං ५. चंदन सुत्त 96. එකමන්තං ඨිතො ඛො චන්දනො දෙවපුත්තො භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – ९६. एका बाजूला उभा राहिलेल्या चंदन देवपुत्राने भगवंतांना गाथेने विचारले – ‘‘කථංසු තරති ඔඝං, රත්තින්දිවමතන්දිතො; අප්පතිට්ඨෙ අනාලම්බෙ, කො ගම්භීරෙ න සීදතී’’ති. “दिवस-रात्र आळस न करता मनुष्य संसाराच्या महापुराला कसा पार करतो? जिथे खाली उभे राहण्यास आधार नाही आणि वर धरून ठेवण्यास काही नाही, अशा अथांग संसारात कोण बुडत नाही?” ‘‘සබ්බදා සීලසම්පන්නො, පඤ්ඤවා සුසමාහිතො; ආරද්ධවීරියො පහිතත්තො, ඔඝං තරති දුත්තරං. भगवंत म्हणाले: “जो नेहमी शीलसंपन्न, प्रज्ञावान, सुसमाधीस्थ, दृढ पराक्रमी (वीर्यवान) आणि दृढनिश्चयी असतो, तोच या पार करण्यास कठीण अशा संसाराच्या महापुराला पार करतो. ‘‘විරතො කාමසඤ්ඤාය, රූපසංයොජනාතිගො; නන්දීරාගපරික්ඛීණො, සො ගම්භීරෙ න සීදතී’’ති. “जो कामवासनेच्या संज्ञेपासून अलिप्त आहे, ज्याने रूप-संयोजनांचे उल्लंघन केले आहे आणि ज्याची अस्तित्वाची आसक्ती (नंदीराग) नष्ट झाली आहे, तो या अथांग संसारात बुडत नाही.” 6. වාසුදත්තසුත්තං ६. वासुदत्त सुत्त 97. එකමන්තං [Pg.52] ඨිතො ඛො වාසුදත්තො දෙවපුත්තො භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – ९७. एका बाजूला उभा राहिलेल्या वासुदत्त देवपुत्राने भगवंतांच्या सन्मुख ही गाथा म्हटली – ‘‘සත්තියා විය ඔමට්ඨො, ඩය්හමානොව මත්ථකෙ; කාමරාගප්පහානාය, සතො භික්ඛු පරිබ්බජෙ’’ති. “ज्याप्रमाणे एखाद्याच्या शरीरात भाला खुपसला गेला असेल किंवा डोक्याला आग लागली असेल (आणि तो ती विझवण्यासाठी त्वरित प्रयत्न करतो), त्याचप्रमाणे भिक्खूने कामरागाचा त्याग करण्यासाठी स्मृतिमान होऊन विहार करावा.” ‘‘සත්තියා විය ඔමට්ඨො, ඩය්හමානොව මත්ථකෙ; සක්කායදිට්ඨිප්පහානාය, සතො භික්ඛු පරිබ්බජෙ’’ති. ज्याप्रमाणे भाल्याने भोसकलेला मनुष्य किंवा डोक्याला आग लागलेला मनुष्य (ती विझवण्यासाठी त्वरित प्रयत्न करतो), त्याचप्रमाणे भिक्खूने सत्कायदृष्टी (सक्कायदिव्ठि) नष्ट करण्यासाठी स्मृतिमान (जागरूक) होऊन विहार करावा. 7. සුබ්රහ්මසුත්තං ७. सुब्रह्म सुत्त 98. එකමන්තං ඨිතො ඛො සුබ්රහ්මා දෙවපුත්තො භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – ९८. एका बाजूला उभा राहिलेला सुब्रह्म देवपुत्र भगवंतांना गाथेने म्हणाला – ‘‘නිච්චං උත්රස්තමිදං චිත්තං, නිච්චං උබ්බිග්ගමිදං මනො; අනුප්පන්නෙසු කිච්ඡෙසු, අථො උප්පතිතෙසු ච; සචෙ අත්ථි අනුත්රස්තං, තං මෙ අක්ඛාහි පුච්ඡිතො’’ති. "माझे हे चित्त नेहमी भयभीत असते, माझे हे मन नेहमी उद्विग्न असते; न उद्भवलेल्या संकटांमुळे आणि उद्भवलेल्या संकटांमुळेही. जर भयमुक्त होण्याचा काही मार्ग असेल, तर मी विचारत आहे, कृपया मला तो सांगावा." ‘‘නාඤ්ඤත්ර බොජ්ඣා තපසා, නාඤ්ඤත්රින්ද්රියසංවරා; නාඤ්ඤත්ර සබ්බනිස්සග්ගා, සොත්ථිං පස්සාමි පාණින’’න්ති. "बोध्यंगांची भावना आणि तप यांशिवाय, इंद्रिय-संयमाशिवाय आणि सर्वस्वाच्या त्यागाशिवाय (निर्वाणाशिवाय), मी प्राण्यांचे कल्याण पाहत नाही." ‘‘ඉදමවොච…පෙ… තත්ථෙවන්තරධායී’’ති. "भगवंत असे म्हणाले... आणि तो देवपुत्र तिथेच अंतर्धान पावला." 8. කකුධසුත්තං ८. ककुध सुत्त 99. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා සාකෙතෙ විහරති අඤ්ජනවනෙ මිගදායෙ. අථ ඛො කකුධො දෙවපුත්තො අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණො කෙවලකප්පං අඤ්ජනවනං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතො ඛො කකුධො දෙවපුත්තො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘නන්දසි, සමණා’’ති? ‘‘කිං ලද්ධා, ආවුසො’’ති? ‘‘තෙන හි, සමණ, සොචසී’’ති? ‘‘කිං ජීයිත්ථ, ආවුසො’’ති? ‘‘තෙන හි, සමණ, නෙව නන්දසි න ච සොචසී’’ති? ‘‘එවමාවුසො’’ති. ९९. असे मी ऐकले आहे – एक वेळ भगवंत साकेत येथील अंजनवनातील मृगदायात विहार करत होते. तेव्हा, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, अत्यंत कांतिमान ककुध देवपुत्राने संपूर्ण अंजनवन आपल्या प्रकाशाने उजळून टाकले आणि तो भगवंतांकडे गेला. जवळ जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेला ककुध देवपुत्र भगवंतांना म्हणाला – 'श्रमणा, तुम्ही आनंदित आहात का?' 'मित्रा, काय मिळवून मी आनंदित होऊ?' 'तर मग, श्रमणा, तुम्ही शोक करत आहात का?' 'मित्रा, माझे काय नष्ट झाले आहे की मी शोक करू?' 'तर मग, श्रमणा, तुम्ही आनंदितही नाही आणि शोकही करत नाही का?' 'होय मित्रा, तसेच आहे.' ‘‘කච්චි [Pg.53] ත්වං අනඝො භික්ඛු, කච්චි නන්දී න විජ්ජති; කච්චි තං එකමාසීනං, අරතී නාභිකීරතී’’ති. "हे भिक्खू, तुम्ही दुःखमुक्त आहात ना? तुमच्यात कोणतीही आसक्ती नाही ना? एकांतात बसलेल्या तुम्हाला अरती (उदासीनता) पीडित करत नाही ना?" ‘‘අනඝො වෙ අහං යක්ඛ, අථො නන්දී න විජ්ජති; අථො මං එකමාසීනං, අරතී නාභිකීරතී’’ති. "हे यक्षा, मी खरोखरच दुःखमुक्त आहे, तसेच माझ्यात कोणतीही आसक्ती नाही. आणि एकांतात बसलेल्या मला अरती पीडित करत नाही." ‘‘කථං ත්වං අනඝො භික්ඛු, කථං නන්දී න විජ්ජති; කථං තං එකමාසීනං, අරතී නාභිකීරතී’’ති. "हे भिक्खू, तुम्ही दुःखमुक्त कसे आहात? तुमच्यात आसक्ती कशी नाही? आणि एकांतात बसलेल्या तुम्हाला अरती पीडित का करत नाही?" ‘‘අඝජාතස්ස වෙ නන්දී, නන්දීජාතස්ස වෙ අඝං; අනන්දී අනඝො භික්ඛු, එවං ජානාහි ආවුසො’’ති. "ज्याला दुःख आहे त्यालाच आसक्ती असते, आणि ज्याला आसक्ती आहे त्यालाच दुःख होते. भिक्खू हा आसक्तीरहित आणि दुःखमुक्त असतो; हे मित्रा, तू असे समज." ‘‘චිරස්සං වත පස්සාමි, බ්රාහ්මණං පරිනිබ්බුතං; අනන්දිං අනඝං භික්ඛුං, තිණ්ණං ලොකෙ විසත්තික’’න්ති. "खरोखर, दीर्घकाळानंतर मी अशा एका परिनिर्वाण प्राप्त ब्राह्मणाला (श्रेष्ठ पुरुषाला) पाहत आहे, जो आसक्तीरहित, दुःखमुक्त भिक्खू आहे आणि ज्याने जगातील तृष्णेला (विसत्तिका) पार केले आहे." 9. උත්තරසුත්තං ९. उत्तर सुत्त 100. රාජගහනිදානං. එකමන්තං ඨිතො ඛො උත්තරො දෙවපුත්තො භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – १००. राजगृह येथील प्रसंग. एका बाजूला उभा राहिलेला उत्तर देवपुत्र भगवंतांच्या सन्मुख ही गाथा म्हणाला – ‘‘උපනීයති ජීවිතමප්පමායු,ජරූපනීතස්ස න සන්ති තාණා; එතං භයං මරණෙ පෙක්ඛමානො,පුඤ්ඤානි කයිරාථ සුඛාවහානී’’ති. "आयुष्य वेगाने संपत चालले आहे, जीवन अल्प आहे. वृद्धत्वाकडे खेचल्या जाणाऱ्या माणसाला कोणतेही संरक्षण नसते. मृत्यूचे हे भय पाहून, सुखावह ठरणारी पुण्यकर्मे करावीत." ‘‘උපනීයති ජීවිතමප්පමායු,ජරූපනීතස්ස න සන්ති තාණා; එතං භයං මරණෙ පෙක්ඛමානො,ලොකාමිසං පජහෙ සන්තිපෙක්ඛො’’ති. "आयुष्य वेगाने संपत चालले आहे, जीवन अल्प आहे. वृद्धत्वाकडे खेचल्या जाणाऱ्या माणसाला कोणतेही संरक्षण नसते. मृत्यूचे हे भय पाहून, शांतीची (निर्वाणाची) इच्छा करणाऱ्याने लौकिक आमिषांचा त्याग करावा." 10. අනාථපිණ්ඩිකසුත්තං १०. अनाथपिंडिक सुत्त 101. එකමන්තං ඨිතො ඛො අනාථපිණ්ඩිකො දෙවපුත්තො භගවතො සන්තිකෙ ඉමා ගාථායො අභාසි – १०१. एका बाजूला उभा राहिलेला अनाथपिंडिक देवपुत्र भगवंतांच्या सन्मुख या गाथा म्हणाला – ‘‘ඉදඤ්හි තං ජෙතවනං, ඉසිසඞ්ඝනිසෙවිතං; ආවුත්ථං ධම්මරාජෙන, පීතිසඤ්ජනනං මම. "हेच ते जेतवन, जे ऋषींच्या संघाने सेवित आहे; जिथे धर्मराज वास्तव्य करत होते, जे माझ्या मनात प्रीती निर्माण करते. ‘‘කම්මං [Pg.54] විජ්ජා ච ධම්මො ච, සීලං ජීවිතමුත්තමං; එතෙන මච්චා සුජ්ඣන්ති, න ගොත්තෙන ධනෙන වා. "कर्म, विद्या, धर्म, शील आणि उत्तम जीवन; यांमुळेच मनुष्य शुद्ध होतो, कुळामुळे किंवा धनाने नाही. ‘‘තස්මා හි පණ්ඩිතො පොසො, සම්පස්සං අත්ථමත්තනො; යොනිසො විචිනෙ ධම්මං, එවං තත්ථ විසුජ්ඣති. "म्हणूनच, स्वतःचे कल्याण पाहणाऱ्या सुज्ञ मनुष्याने योग्य प्रकारे धर्माचे चिंतन करावे; अशा प्रकारे तो त्यात शुद्ध होतो. ‘‘සාරිපුත්තොව පඤ්ඤාය, සීලෙන උපසමෙන ච; යොපි පාරඞ්ගතො භික්ඛු, එතාවපරමො සියා’’ති. "प्रज्ञा, शील आणि उपशम (शांती) यांमध्ये सारिपुत्तच सर्वश्रेष्ठ आहेत. जो भिक्खू पारंगत झाला आहे, तो जास्तीत जास्त त्यांच्या समान होऊ शकतो." ඉදමවොච අනාථපිණ්ඩිකො දෙවපුත්තො. ඉදං වත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා තත්ථෙවන්තරධායීති. अनाथपिंडिक देवपुत्र असे म्हणाला. हे बोलून, भगवंतांना अभिवादन करून, प्रदक्षिणा घालून तो तिथेच अंतर्धान पावला. අථ ඛො භගවා තස්සා රත්තියා අච්චයෙන භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘ඉමං, භික්ඛවෙ, රත්තිං අඤ්ඤතරො දෙවපුත්තො අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණො කෙවලකප්පං ජෙතවනං ඔභාසෙත්වා යෙනාහං තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා මං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතො ඛො, භික්ඛවෙ, සො දෙවපුත්තො මම සන්තිකෙ ඉමා ගාථායො අභාසි – त्यानंतर, रात्र संपल्यावर भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – "भिक्खूंनो, आज रात्री, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, एक अत्यंत कांतिमान देवपुत्र संपूर्ण जेतवन आपल्या प्रकाशाने उजळून टाकत माझ्याकडे आला. जवळ येऊन, मला अभिवादन करून तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेल्या त्या देवपुत्राने माझ्या सन्मुख या गाथा म्हटल्या – ‘‘ඉදඤ්හි තං ජෙතවනං, ඉසිසඞ්ඝනිසෙවිතං; ආවුත්ථං ධම්මරාජෙන, පීතිසඤ්ජනනං මම. "हेच ते जेतवन, जे ऋषींच्या संघाने सेवित आहे; जिथे धर्मराज वास्तव्य करत होते, जे माझ्या मनात प्रीती निर्माण करते. ‘‘කම්මං විජ්ජා ච ධම්මො ච, සීලං ජීවිතමුත්තමං; එතෙන මච්චා සුජ්ඣන්ති, න ගොත්තෙන ධනෙන වා. "कर्म, विद्या, धर्म, शील आणि उत्तम जीवन; यांमुळेच मनुष्य शुद्ध होतो, कुळामुळे किंवा धनाने नाही. ‘‘තස්මා හි පණ්ඩිතො පොසො, සම්පස්සං අත්ථමත්තනො; යොනිසො විචිනෙ ධම්මං, එවං තත්ථ විසුජ්ඣති. "म्हणूनच, स्वतःचे कल्याण पाहणाऱ्या सुज्ञ मनुष्याने योग्य प्रकारे धर्माचे चिंतन करावे; अशा प्रकारे तो त्यात शुद्ध होतो. ‘‘සාරිපුත්තොව පඤ්ඤාය, සීලෙන උපසමෙන ච; යොපි පාරඞ්ගතො භික්ඛු, එතාවපරමො සියා’’ති. "प्रज्ञा, शील आणि उपशम यांमध्ये सारिपुत्तच सर्वश्रेष्ठ आहेत. जो भिक्खू पारंगत झाला आहे, तो जास्तीत जास्त त्यांच्या समान होऊ शकतो." ‘‘ඉදමවොච, භික්ඛවෙ, සො දෙවපුත්තො. ඉදං වත්වා මං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා තත්ථෙවන්තරධායී’’ති. "भिक्खूंनो, तो देवपुत्र असे म्हणाला. हे बोलून, मला अभिवादन करून, प्रदक्षिणा घालून तो तिथेच अंतर्धान पावला." එවං වුත්තෙ, ආයස්මා ආනන්දො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘සො හි නූන, භන්තෙ, අනාථපිණ්ඩිකො දෙවපුත්තො භවිස්සති. අනාථපිණ්ඩිකො ගහපති ආයස්මන්තෙ සාරිපුත්තෙ අභිප්පසන්නො අහොසී’’ති. ‘‘සාධු [Pg.55] සාධු, ආනන්ද, යාවතකං ඛො, ආනන්ද, තක්කාය පත්තබ්බං අනුප්පත්තං තං තයා. අනාථපිණ්ඩිකො හි සො, ආනන්ද, දෙවපුත්තො’’ති. असे म्हटल्यावर, आयुष्यमान आनंद भगवंतांना म्हणाले – "भंते, तो निश्चितच अनाथपिंडिक देवपुत्र असावा. कारण गृहपती अनाथपिंडिक आयुष्यमान सारिपुत्तांवर अत्यंत प्रसन्न (श्रद्धावान) होते." "साधू, साधू, आनंदा! आनंदा, तर्काने जेवढे जाणता येणे शक्य आहे, तेवढे तू जाणले आहेस. आनंदा, तो खरोखरच अनाथपिंडिक देवपुत्र होता." අනාථපිණ්ඩිකවග්ගො දුතියො. दुसरा अनाथपिंडिक वर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – या वर्गाची अनुक्रमणिका (उद्दान) – චන්දිමසො ච වෙණ්ඩු ච, දීඝලට්ඨි ච නන්දනො; චන්දනො වාසුදත්තො ච, සුබ්රහ්මා කකුධෙන ච; උත්තරො නවමො වුත්තො, දසමො අනාථපිණ්ඩිකොති. चंद्रिमस, वेण्डु, दीर्घलठ्ठि, नंदन, चंदन, वासुदत्त, सुब्रह्म, ककुध, नववे उत्तर आणि दहावे अनाथपिंडिक सुत्त सांगितले आहे. 3. නානාතිත්ථියවග්ගො ३. नानातिथ्य वर्ग 1. සිවසුත්තං १. शिव सुत्त 102. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. අථ ඛො සිවො දෙවපුත්තො අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණො කෙවලකප්පං ජෙතවනං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතො ඛො සිවො දෙවපුත්තො භගවතො සන්තිකෙ ඉමා ගාථායො අභාසි – १०२. असे मी ऐकले आहे – एक वेळ भगवंत श्रावस्ती येथील अनाथपिंडिकांच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेव्हा, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, अत्यंत कांतिमान शिव देवपुत्राने संपूर्ण जेतवन आपल्या प्रकाशाने उजळून टाकले आणि तो भगवंतांकडे गेला. जवळ जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेला शिव देवपुत्र भगवंतांच्या सन्मुख या गाथा म्हणाला – ‘‘සබ්භිරෙව සමාසෙථ, සබ්භි කුබ්බෙථ සන්ථවං; සතං සද්ධම්මමඤ්ඤාය, සෙය්යො හොති න පාපියො. "सत्पुरुषांचीच (सज्जनांचीच) संगत करावी, सत्पुरुषांशीच मैत्री करावी. सत्पुरुषांचा सद्धर्म जाणून घेतल्याने कल्याणच होते, अहित होत नाही." ‘‘සබ්භිරෙව සමාසෙථ, සබ්භි කුබ්බෙථ සන්ථවං; සතං සද්ධම්මමඤ්ඤාය, පඤ්ඤා ලබ්භති නාඤ්ඤතො. "सत्पुरुषांचीच संगत करावी, सत्पुरुषांशीच मैत्री करावी. सत्पुरुषांचा सद्धर्म जाणून घेतल्याने प्रज्ञा प्राप्त होते, इतर कोणाकडूनही नाही." ‘‘සබ්භිරෙව සමාසෙථ, සබ්භි කුබ්බෙථ සන්ථවං; සතං සද්ධම්මමඤ්ඤාය, සොකමජ්ඣෙ න සොචති. "सत्पुरुषांचीच संगत करावी, सत्पुरुषांशीच मैत्री करावी. सत्पुरुषांचा सद्धर्म जाणून घेतल्याने माणूस शोकाकुल लोकांच्या मध्ये असूनही शोक करत नाही." ‘‘සබ්භිරෙව සමාසෙථ, සබ්භි කුබ්බෙථ සන්ථවං; සතං සද්ධම්මමඤ්ඤාය, ඤාතිමජ්ඣෙ විරොචති. केवळ सज्जनांचीच संगत करावी, सज्जनांशीच मैत्री करावी. सज्जनांचा सद्धम्म जाणून घेतल्यावर मनुष्य आपल्या नातेवाईकांमध्ये शोभून दिसतो. ‘‘සබ්භිරෙව [Pg.56] සමාසෙථ, සබ්භි කුබ්බෙථ සන්ථවං; සතං සද්ධම්මමඤ්ඤාය, සත්තා ගච්ඡන්ති සුග්ගතිං. केवळ सज्जनांचीच संगत करावी, सज्जनांशीच मैत्री करावी. सज्जनांचा सद्धम्म जाणून घेतल्यावर प्राणी सुगतीला जातात. ‘‘සබ්භිරෙව සමාසෙථ, සබ්භි කුබ්බෙථ සන්ථවං; සතං සද්ධම්මමඤ්ඤාය, සත්තා තිට්ඨන්ති සාතත’’න්ති. केवळ सज्जनांचीच संगत करावी, सज्जनांशीच मैत्री करावी. सज्जनांचा सद्धम्म जाणून घेतल्यावर प्राणी नेहमी सुखात राहतात. අථ ඛො භගවා සිවං දෙවපුත්තං ගාථාය පච්චභාසි – त्यानंतर भगवंतांनी शिव देवपुत्राला गाथेने प्रत्युत्तर दिले – ‘‘සබ්භිරෙව සමාසෙථ, සබ්භි කුබ්බෙථ සන්ථවං; සතං සද්ධම්මමඤ්ඤාය, සබ්බදුක්ඛා පමුච්චතී’’ති. केवळ सज्जनांचीच संगत करावी, सज्जनांशीच मैत्री करावी. सज्जनांचा सद्धम्म जाणून घेतल्यावर मनुष्य सर्व दुःखांतून मुक्त होतो. 2. ඛෙමසුත්තං २. खेम सुत्त 103. එකමන්තං ඨිතො ඛො ඛෙමො දෙවපුත්තො භගවතො සන්තිකෙ ඉමා ගාථායො අභාසි – १०३. एका बाजूला उभा राहून खेम देवपुत्राने भगवंतांच्या सन्निध या गाथा म्हटल्या – ‘‘චරන්ති බාලා දුම්මෙධා, අමිත්තෙනෙව අත්තනා; කරොන්තා පාපකං කම්මං, යං හොති කටුකප්ඵලං. अल्पबुद्धीचे मूर्ख लोक स्वतःचेच शत्रू बनून वावरतात; ते अशी पापकर्मे करत फिरतात, ज्यांचे फळ अत्यंत कडू असते. ‘‘න තං කම්මං කතං සාධු, යං කත්වා අනුතප්පති; යස්ස අස්සුමුඛො රොදං, විපාකං පටිසෙවති. ते कर्म केलेले चांगले नाही, जे केल्यावर पश्चात्ताप होतो; आणि ज्याचे फळ डोळ्यात अश्रू आणून, रडत-रडत भोगावे लागते. ‘‘තඤ්ච කම්මං කතං සාධු, යං කත්වා නානුතප්පති; යස්ස පතීතො සුමනො, විපාකං පටිසෙවති. परंतु ते कर्म केलेले चांगले आहे, जे केल्यावर पश्चात्ताप होत नाही; आणि ज्याचे फळ मनुष्य प्रसन्न व आनंदी मनाने भोगतो. ‘‘පටිකච්චෙව තං කයිරා, යං ජඤ්ඤා හිතමත්තනො; න සාකටිකචින්තාය, මන්තා ධීරො පරක්කමෙ. ज्या कर्माने आपले हित होईल हे ठाऊक असेल, ते कर्म सुज्ञाने आधीच करावे. विचारशील बुद्धिमान माणसाने गाडीवानासारखा विचार करून प्रयत्न करू नये. ‘‘යථා සාකටිකො මට්ඨං, සමං හිත්වා මහාපථං; විසමං මග්ගමාරුය්හ, අක්ඛච්ඡින්නොව ඣායති. ज्याप्रमाणे एखादा गाडीवान सपाट व चांगला महामार्ग सोडून खडबडीत मार्गावर जातो आणि गाडीचा आस तुटल्यामुळे चिंताग्रस्त होऊन बसतो— ‘‘එවං ධම්මා අපක්කම්ම, අධම්මමනුවත්තිය; මන්දො මච්චුමුඛං පත්තො, අක්ඛච්ඡින්නොව ඣායතී’’ති. त्याचप्रमाणे सद्धम्मापासून दूर जाऊन अधम्माचे आचरण करणारा मंदबुद्धी मनुष्य जेव्हा मृत्यूच्या मुखात पडतो, तेव्हा तो आस तुटलेल्या गाडीवानासारखाच शोक करतो. 3. සෙරීසුත්තං ३. सेरी सुत्त 104. එකමන්තං ඨිතො ඛො සෙරී දෙවපුත්තො භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – १०४. एका बाजूला उभा राहून सेरी देवपुत्राने भगवंतांना गाथेने विचारले – ‘‘අන්නමෙවාභිනන්දන්ති[Pg.57], උභයෙ දෙවමානුසා; අථ කො නාම සො යක්ඛො, යං අන්නං නාභිනන්දතී’’ති. देव आणि मनुष्य हे दोन्हीही अन्नाचेच कौतुक करतात. मग असा कोणता यक्ष आहे, जो अन्नाचे कौतुक करत नाही? ‘‘යෙ නං දදන්ති සද්ධාය, විප්පසන්නෙන චෙතසා; තමෙව අන්නං භජති, අස්මිං ලොකෙ පරම්හි ච. जे लोक श्रद्धेने आणि प्रसन्न चित्ताने अन्नदान करतात, तेच अन्न या लोकात आणि परलोकातही त्यांच्या पाठीशी राहते. ‘‘තස්මා විනෙය්ය මච්ඡෙරං, දජ්ජා දානං මලාභිභූ; පුඤ්ඤානි පරලොකස්මිං, පතිට්ඨා හොන්ති පාණින’’න්ති. म्हणूनच, कंजूषपणाचा त्याग करून, मळावर विजय मिळवून दान करावे. परलोकात पुण्य हेच प्राण्यांचे आधार असते. ‘‘අච්ඡරියං, භන්තෙ, අබ්භුතං, භන්තෙ! යාවසුභාසිතමිදං, භන්තෙ, භගවතා – आश्चर्य आहे, भंते! अद्भुत आहे, भंते! भगवंतांनी हे किती सुभाषित सांगितले आहे, भंते – ‘‘යෙ නං දදන්ති සද්ධාය, විප්පසන්නෙන චෙතසා; තමෙව අන්නං භජති, අස්මිං ලොකෙ පරම්හි ච. जे लोक श्रद्धेने आणि प्रसन्न चित्ताने अन्नदान करतात, तेच अन्न या लोकात आणि परलोकातही त्यांच्या पाठीशी राहते. ‘‘තස්මා විනෙය්ය මච්ඡෙරං, දජ්ජා දානං මලාභිභූ; පුඤ්ඤානි පරලොකස්මිං, පතිට්ඨා හොන්ති පාණින’’න්ති. म्हणूनच, कंजूषपणाचा त्याग करून, मळावर विजय मिळवून दान करावे. परलोकात पुण्य हेच प्राण्यांचे आधार असते. ‘‘භූතපුබ්බාහං, භන්තෙ, සිරී නාම රාජා අහොසිං දායකො දානපති දානස්ස වණ්ණවාදී. තස්ස මය්හං, භන්තෙ, චතූසු ද්වාරෙසු දානං දීයිත්ථ සමණ-බ්රාහ්මණ-කපණද්ධික-වනිබ්බකයාචකානං. අථ ඛො මං, භන්තෙ, ඉත්ථාගාරං උපසඞ්කමිත්වා එතදවොච – ‘දෙවස්ස ඛො දානං දීයති; අම්හාකං දානං න දීයති. සාධු මයම්පි දෙවං නිස්සාය දානානි දදෙය්යාම, පුඤ්ඤානි කරෙය්යාමා’ති. තස්ස මය්හං, භන්තෙ, එතදහොසි – ‘අහං ඛොස්මි දායකො දානපති දානස්ස වණ්ණවාදී. දානං දස්සාමාති වදන්තෙ කින්ති වදෙය්ය’න්ති? සො ඛ්වාහං, භන්තෙ, පඨමං ද්වාරං ඉත්ථාගාරස්ස අදාසිං. තත්ථ ඉත්ථාගාරස්ස දානං දීයිත්ථ; මම දානං පටික්කමි. पूर्वीच्या काळी, भंते, मी 'सेरी' नावाचा राजा होतो. मी दाता, दानशूर आणि दानाचा गौरव करणारा होतो. भंते, माझ्या नगराच्या चारही वेशींवर श्रमण, ब्राह्मण, गरीब, प्रवासी, याचक आणि भिक्षेकरी यांना दान दिले जात असे. त्यानंतर, भंते, अंतःपुरातील स्त्रिया माझ्याकडे आल्या आणि म्हणाल्या – 'महाराजच दान देतात, आम्हाला दान देण्याची संधी मिळत नाही. बरे होईल जर आम्हीही महाराजांच्या आश्रयाने दाने देऊ शकू आणि पुण्यकर्मे करू शकू.' भंते, तेव्हा माझ्या मनात विचार आला – 'मी तर दाता, दानशूर आणि दानाचा गौरव करणारा आहे. मग 'आम्ही दान देऊ इच्छितो' असे म्हणणाऱ्यांना मी नाही कसे म्हणू?' म्हणून, भंते, मी पहिले द्वार अंतःपुरातील स्त्रियांना दिले. तिथे अंतःपुरातील स्त्रियांनी दान दिले आणि माझे स्वतःचे दान देणे तिथून थांबले. ‘‘අථ ඛො මං, භන්තෙ, ඛත්තියා අනුයන්තා උපසඞ්කමිත්වා එතදවොචුං – ‘දෙවස්ස ඛො දානං දීයති; ඉත්ථාගාරස්ස දානං දීයති; අම්හාකං දානං න දීයති. සාධු මයම්පි දෙවං නිස්සාය දානානි දදෙය්යාම, පුඤ්ඤානි කරෙය්යාමා’ති. තස්ස මය්හං, භන්තෙ, එතදහොසි – ‘අහං ඛොස්මි දායකො දානපති දානස්ස වණ්ණවාදී. දානං දස්සාමාති වදන්තෙ කින්ති වදෙය්ය’න්ති[Pg.58]? සො ඛ්වාහං, භන්තෙ, දුතියං ද්වාරං ඛත්තියානං අනුයන්තානං අදාසිං. තත්ථ ඛත්තියානං අනුයන්තානං දානං දීයිත්ථ, මම දානං පටික්කමි. त्यानंतर, भंते, माझे मांडलिक क्षत्रिय राजे माझ्याकडे आले आणि म्हणाले – 'महाराज दान देतात, अंतःपुरातील स्त्रिया दान देतात, पण आम्हाला दान देण्याची संधी मिळत नाही. बरे होईल जर आम्हीही महाराजांच्या आश्रयाने दाने देऊ शकू आणि पुण्यकर्मे करू शकू.' भंते, तेव्हा माझ्या मनात विचार आला – 'मी तर दाता, दानशूर आणि दानाचा गौरव करणारा आहे. मग 'आम्ही दान देऊ इच्छितो' असे म्हणणाऱ्यांना मी नाही कसे म्हणू?' म्हणून, भंते, मी दुसरे द्वार मांडलिक क्षत्रिय राजांना दिले. तिथे मांडलिक क्षत्रिय राजांनी दान दिले आणि माझे स्वतःचे दान देणे तिथून थांबले. ‘‘අථ ඛො මං, භන්තෙ, බලකායො උපසඞ්කමිත්වා එතදවොච – ‘දෙවස්ස ඛො දානං දීයති; ඉත්ථාගාරස්ස දානං දීයති; ඛත්තියානං අනුයන්තානං දානං දීයති; අම්හාකං දානං න දීයති. සාධු මයම්පි දෙවං නිස්සාය දානානි දදෙය්යාම, පුඤ්ඤානි කරෙය්යාමා’ති. තස්ස මය්හං, භන්තෙ, එතදහොසි – ‘අහං ඛොස්මි දායකො දානපති දානස්ස වණ්ණවාදී. දානං දස්සාමාති වදන්තෙ කින්ති වදෙය්ය’න්ති? සො ඛ්වාහං භන්තෙ, තතියං ද්වාරං බලකායස්ස අදාසිං. තත්ථ බලකායස්ස දානං දීයිත්ථ, මම දානං පටික්කමි. त्यानंतर, भंते, माझे सैन्यदल माझ्याकडे आले आणि म्हणाले – 'महाराज दान देतात, अंतःपुरातील स्त्रिया दान देतात, मांडलिक क्षत्रिय राजे दान देतात, पण आम्हाला दान देण्याची संधी मिळत नाही. बरे होईल जर आम्हीही महाराजांच्या आश्रयाने दाने देऊ शकू आणि पुण्यकर्मे करू शकू.' भंते, तेव्हा माझ्या मनात विचार आला – 'मी तर दाता, दानशूर आणि दानाचा गौरव करणारा आहे. मग 'आम्ही दान देऊ इच्छितो' असे म्हणणाऱ्यांना मी नाही कसे म्हणू?' म्हणून, भंते, मी तिसरे द्वार सैन्यदलाला दिले. तिथे सैन्यदलाने दान दिले आणि माझे स्वतःचे दान देणे तिथून थांबले. ‘‘අථ ඛො මං, භන්තෙ, බ්රාහ්මණගහපතිකා උපසඞ්කමිත්වා එතදවොචුං – ‘දෙවස්ස ඛො දානං දීයති; ඉත්ථාගාරස්ස දානං දීයති; ඛත්තියානං අනුයන්තානං දානං දීයති; බලකායස්ස දානං දීයති; අම්හාකං දානං න දීයති. සාධු මයම්පි දෙවං නිස්සාය දානානි දදෙය්යාම, පුඤ්ඤානි කරෙය්යාමා’ති. තස්ස මය්හං, භන්තෙ, එතදහොසි – ‘අහං ඛොස්මි දායකො දානපති දානස්ස වණ්ණවාදී. දානං දස්සාමාති වදන්තෙ කින්ති වදෙය්ය’න්ති? සො ඛ්වාහං, භන්තෙ, චතුත්ථං ද්වාරං බ්රාහ්මණගහපතිකානං අදාසිං. තත්ථ බ්රාහ්මණගහපතිකානං දානං දීයිත්ථ, මම දානං පටික්කමි. त्यानंतर, भंते, ब्राह्मण आणि गृहपती माझ्याकडे आले आणि म्हणाले – 'महाराज दान देतात, अंतःपुरातील स्त्रिया दान देतात, मांडलिक क्षत्रिय राजे दान देतात, सैन्यदल दान देते, पण आम्हाला दान देण्याची संधी मिळत नाही. बरे होईल जर आम्हीही महाराजांच्या आश्रयाने दाने देऊ शकू आणि पुण्यकर्मे करू शकू.' भंते, तेव्हा माझ्या मनात विचार आला – 'मी तर दाता, दानशूर आणि दानाचा गौरव करणारा आहे. मग 'आम्ही दान देऊ इच्छितो' असे म्हणणाऱ्यांना मी नाही कसे म्हणू?' म्हणून, भंते, मी चौथे द्वार ब्राह्मण आणि गृहपतींना दिले. तिथे ब्राह्मण आणि गृहपतींनी दान दिले आणि माझे स्वतःचे दान देणे तिथून थांबले. ‘‘අථ ඛො මං, භන්තෙ, පුරිසා උපසඞ්කමිත්වා එතදවොචුං – ‘න ඛො දානි දෙවස්ස කොචි දානං දීයතී’ති. එවං වුත්තාහං, භන්තෙ, තෙ පුරිසෙ එතදවොචං – ‘තෙන හි, භණෙ, යො බාහිරෙසු ජනපදෙසු ආයො සඤ්ජායති තතො උපඩ්ඪං අන්තෙපුරෙ පවෙසෙථ, උපඩ්ඪං තත්ථෙව දානං දෙථ සමණ-බ්රාහ්මණ-කපණද්ධික-වනිබ්බක-යාචකාන’න්ති. සො ඛ්වාහං, භන්තෙ, එවං දීඝරත්තං කතානං පුඤ්ඤානං එවං දීඝරත්තං කතානං කුසලානං ධම්මානං පරියන්තං නාධිගච්ඡාමි – එත්තකං පුඤ්ඤන්ති වා එත්තකො පුඤ්ඤවිපාකොති වා එත්තකං සග්ගෙ ඨාතබ්බන්ති වාති. අච්ඡරියං, භන්තෙ, අබ්භුතං, භන්තෙ! යාවසුභාසිතමිදං, භන්තෙ, භගවතා – त्यानंतर, भंते, माझे सेवक माझ्याकडे आले आणि म्हणाले – 'आता महाराज कुठेही दान देत नाहीत.' असे म्हटल्यावर, भंते, मी त्या सेवकांना म्हणालो – 'अरे मित्रांनो, मग असे करा, बाहेरील प्रांतांतून जो काही महसूल गोळा होतो, त्यातील अर्धा भाग राजवाड्यात पाठवा आणि अर्धा भाग तिथेच श्रमण, ब्राह्मण, गरीब, प्रवासी, याचक आणि भिक्षेकरी यांना दान म्हणून द्या.' भंते, मी इतका प्रदीर्घ काळ केलेल्या पुण्याचा आणि प्रदीर्घ काळ केलेल्या कुशल धर्माचा अंत मला सांगता येत नाही की, 'एवढे पुण्य आहे' किंवा 'पुण्याचा एवढा विपाक आहे' किंवा 'स्वर्गात एवढा काळ राहावे लागेल.' आश्चर्य आहे, भंते! अद्भुत आहे, भंते! भगवंतांनी हे किती सुभाषित सांगितले आहे, भंते – ‘‘යෙ නං දදන්ති සද්ධාය, විප්පසන්නෙන චෙතසා; තමෙව අන්නං භජති, අස්මිං ලොකෙ පරම්හි ච. जे लोक श्रद्धेने आणि प्रसन्न चित्ताने अन्नदान करतात, तेच अन्न या लोकात आणि परलोकातही त्यांच्या पाठीशी राहते. ‘‘තස්මා විනෙය්ය මච්ඡෙරං, දජ්ජා දානං මලාභිභූ; පුඤ්ඤානි පරලොකස්මිං, පතිට්ඨා හොන්ති පාණින’’න්ති. म्हणूनच, मत्सराचा (कंजूषपणाचा) त्याग करून, मळ (अशुद्धता) जिंकून दान दिले पाहिजे. परलोकात पुण्य हेच प्राण्यांचे (सजीवांचे) आधार असते. 4. ඝටීකාරසුත්තං ४. घटीकार सुत्त 105. එකමන්තං [Pg.59] ඨිතො ඛො ඝටීකාරො දෙවපුත්තො භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – १०५. एका बाजूला उभा राहिलेला घटीकार देवपुत्र भगवंतांच्या सन्निध ही गाथा म्हणाला – ‘‘අවිහං උපපන්නාසෙ, විමුත්තා සත්ත භික්ඛවො; රාගදොසපරික්ඛීණා, තිණ්ණා ලොකෙ විසත්තික’’න්ති. अविह लोकात उत्पन्न झालेले, विमुक्त झालेले, राग आणि द्वेष पूर्णपणे क्षीण झालेले, आणि जगातील तृष्णेला पार केलेले सात भिक्खू आहेत. ‘‘කෙ ච තෙ අතරුං පඞ්කං, මච්චුධෙය්යං සුදුත්තරං; කෙ හිත්වා මානුසං දෙහං, දිබ්බයොගං උපච්චගු’’න්ති. मृत्यूच्या साम्राज्यातील पार करण्यास अत्यंत कठीण असा चिखल पार करून गेलेले ते कोण आहेत? मानवी देहाचा त्याग करून दिव्य बंधनांना पार करून गेलेले ते कोण आहेत? ‘‘උපකො පලගණ්ඩො ච, පුක්කුසාති ච තෙ තයො; භද්දියො ඛණ්ඩදෙවො ච, බාහුරග්ගි ච සඞ්ගියො ; තෙ හිත්වා මානුසං දෙහං, දිබ්බයොගං උපච්චගු’’න්ති. उपक, पलगंड आणि पुक्कुसाति हे तिघे; आणि भद्दिय, खंडदेव, बाहुरग्गि व संगिय; हे मानवी देहाचा त्याग करून दिव्य बंधनांना पार करून गेले आहेत. ‘‘කුසලී භාසසී තෙසං, මාරපාසප්පහායිනං; කස්ස තෙ ධම්මමඤ්ඤාය, අච්ඡිදුං භවබන්ධන’’න්ති. मारपाश तोडणाऱ्या त्या भिक्खूंच्या कल्याणाबद्दल तू बोलत आहेस. कोणाचा धम्म जाणून त्यांनी भवबंधन तोडले आहे? ‘‘න අඤ්ඤත්ර භගවතා, නාඤ්ඤත්ර තව සාසනා; යස්ස තෙ ධම්මමඤ්ඤාය, අච්ඡිදුං භවබන්ධනං. भगवंतांशिवाय अन्य कोणाचाही नाही, आपल्या शासनाशिवाय (शिकवणुकीशिवाय) अन्य कोणाचाही नाही; ज्यांचा धम्म जाणून त्यांनी भवबंधन तोडले आहे. ‘‘යත්ථ නාමඤ්ච රූපඤ්ච, අසෙසං උපරුජ්ඣති; තං තෙ ධම්මං ඉධඤ්ඤාය, අච්ඡිදුං භවබන්ධන’’න්ති. जिथे नाम आणि रूप पूर्णपणे निरुद्ध होते, तो धम्म येथे जाणून त्यांनी भवबंधन तोडले आहे. ‘‘ගම්භීරං භාසසී වාචං, දුබ්බිජානං සුදුබ්බුධං; කස්ස ත්වං ධම්මමඤ්ඤාය, වාචං භාසසි ඊදිස’’න්ති. तू अत्यंत गंभीर, समजण्यास कठीण आणि दुर्बोध अशी वाणी बोलत आहेस. कोणाचा धम्म जाणून तू अशी वाणी बोलत आहेस? ‘‘කුම්භකාරො පුරෙ ආසිං, වෙකළිඞ්ගෙ ඝටීකරො; මාතාපෙත්තිභරො ආසිං, කස්සපස්ස උපාසකො. मी पूर्वी वेकळिंग येथे घटीकार नावाचा कुंभार होतो. मी मातापित्यांचे पोषण करणारा, कश्यप बुद्धांचा उपासक होतो. ‘‘විරතො මෙථුනා ධම්මා, බ්රහ්මචාරී නිරාමිසො; අහුවා තෙ සගාමෙය්යො, අහුවා තෙ පුරෙ සඛා. मैथुन धर्मापासून विरत राहून, मी निरामिष (आसक्तीरहित) ब्रह्मचर्य पाळत होतो. मी आपल्याच गावातील रहिवासी होतो आणि पूर्वी आपला मित्र होतो. ‘‘සොහමෙතෙ පජානාමි, විමුත්තෙ සත්ත භික්ඛවො; රාගදොසපරික්ඛීණෙ, තිණ්ණෙ ලොකෙ විසත්තික’’න්ති. तो मी, राग आणि द्वेष पूर्णपणे क्षीण झालेल्या, जगातील तृष्णेला पार केलेल्या आणि विमुक्त झालेल्या या सात भिक्खूंना ओळखतो. ‘‘එවමෙතං තදා ආසි, යථා භාසසි භග්ගව; කුම්භකාරො පුරෙ ආසි, වෙකළිඞ්ගෙ ඝටීකරො. हे भग्गव! तू जसे सांगत आहेस, ते तेव्हा तसेच होते. तू पूर्वी वेकळिंग येथे घटीकार नावाचा कुंभार होतास. ‘‘මාතාපෙත්තිභරො [Pg.60] ආසි, කස්සපස්ස උපාසකො; විරතො මෙථුනා ධම්මා, බ්රහ්මචාරී නිරාමිසො; අහුවා මෙ සගාමෙය්යො, අහුවා මෙ පුරෙ සඛා’’ති. तू मातापित्यांचे पोषण करणारा, कश्यप बुद्धांचा उपासक होतास. मैथुन धर्मापासून विरत राहून, निरामिष ब्रह्मचर्य पाळत होतास. तू माझ्याच गावातील रहिवासी होतोस आणि पूर्वी माझा मित्र होतास. ‘‘එවමෙතං පුරාණානං, සහායානං අහු සඞ්ගමො; උභින්නං භාවිතත්තානං, සරීරන්තිමධාරින’’න්ති. अशा प्रकारे, चित्त विकसित केलेल्या आणि अंतिम शरीर धारण करणाऱ्या दोन जुन्या मित्रांची ही भेट झाली. 5. ජන්තුසුත්තං ५. जंतु सुत्त 106. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං සම්බහුලා භික්ඛූ, කොසලෙසු විහරන්ති හිමවන්තපස්සෙ අරඤ්ඤකුටිකාය උද්ධතා උන්නළා චපලා මුඛරා විකිණ්ණවාචා මුට්ඨස්සතිනො අසම්පජානා අසමාහිතා විබ්භන්තචිත්තා පාකතින්ද්රියා. १०६. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी अनेक भिक्खू कोसल देशात हिमालयाच्या पायथ्याशी असलेल्या एका अरण्यकुटीत राहत होते. ते उद्धट, गर्विष्ठ, चंचल, वाचाळ, निरर्थक बडबड करणारे, स्मृतिभ्रष्ट (असावध), प्रज्ञाहीन, असंयत, विचलित चित्त असलेले आणि इंद्रियांवर ताबा नसलेले (असंयत इंद्रियांचे) होते. අථ ඛො ජන්තු දෙවපුත්තො තදහුපොසථෙ පන්නරසෙ යෙන තෙ භික්ඛූ තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා තෙ භික්ඛූ ගාථාහි අජ්ඣභාසි – तेव्हा जंतु नावाचा देवपुत्र पंधराव्या (पौर्णिमेच्या) उपोसथ दिवशी जेथे ते भिक्खू होते तेथे गेला; आणि जवळ जाऊन त्याने त्या भिक्खूंना गाथांनी संबोधित केले – ‘‘සුඛජීවිනො පුරෙ ආසුං, භික්ඛූ ගොතමසාවකා; අනිච්ඡා පිණ්ඩමෙසනා, අනිච්ඡා සයනාසනං; ලොකෙ අනිච්චතං ඤත්වා, දුක්ඛස්සන්තං අකංසු තෙ. पूर्वी गौतम बुद्धांचे श्रावक असलेले भिक्खू सुखाने जीवन जगत असत. ते कोणतीही तृष्णा न बाळगता भिक्षा शोधत असत आणि कोणतीही तृष्णा न बाळगता शयनासन (निवासस्थान) शोधत असत. जगातील अनित्यता जाणून त्यांनी दुःखाचा अंत केला. ‘‘දුප්පොසං කත්වා අත්තානං, ගාමෙ ගාමණිකා විය; භුත්වා භුත්වා නිපජ්ජන්ති, පරාගාරෙසු මුච්ඡිතා. परंतु आता, गावातील प्रमुखांप्रमाणे स्वतःचे पोषण करणे कठीण करून, ते वारंवार खातात आणि इतरांच्या घरांमध्ये आसक्त होऊन झोपून राहतात. ‘‘සඞ්ඝස්ස අඤ්ජලිං කත්වා, ඉධෙකච්චෙ වදාමහං ; අපවිද්ධා අනාථා තෙ, යථා පෙතා තථෙව තෙ. मी संघाला हात जोडून (आदरपूर्वक नमस्कार करून) येथे केवळ काही भिक्खूंबद्दल बोलत आहे: ते फेकून दिलेल्या, अनाथ आणि प्रेतांसारखेच झाले आहेत. ‘‘යෙ ඛො පමත්තා විහරන්ති, තෙ මෙ සන්ධාය භාසිතං; යෙ අප්පමත්තා විහරන්ති, නමො තෙසං කරොමහ’’න්ති. जे प्रमादामध्ये (असावधतेत) राहतात, त्यांना उद्देशून मी हे बोललो आहे. जे अप्रमादामध्ये (सावधतेत) राहतात, त्यांना मी वंदन करतो. 6. රොහිතස්සසුත්තං ६. रोहितस्स सुत्त 107. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං ඨිතො ඛො රොහිතස්සො දෙවපුත්තො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘යත්ථ නු ඛො, භන්තෙ, න ජායති න ජීයති න මීයති න චවති න උපපජ්ජති, සක්කා නු ඛො සො, භන්තෙ, ගමනෙන ලොකස්ස [Pg.61] අන්තො ඤාතුං වා දට්ඨුං වා පාපුණිතුං වා’’ති? ‘‘යත්ථ ඛො, ආවුසො, න ජායති න ජීයති න මීයති න චවති න උපපජ්ජති, නාහං තං ගමනෙන ලොකස්ස අන්තං ඤාතෙය්යං දට්ඨෙය්යං පත්තෙය්යන්ති වදාමී’’ති. १०७. श्रावस्ती येथील घटना. एका बाजूला उभा राहिलेला रोहितस्स देवपुत्र भगवंतांना म्हणाला – "भन्ते! जिथे जन्म होत नाही, म्हातारपण येत नाही, मृत्यू होत नाही, च्युती (पतन) होत नाही आणि पुनर्जन्म होत नाही, अशा लोकाच्या (विश्वाच्या) अंताला प्रवासाने जाणून घेणे, पाहणे किंवा तिथे पोहोचणे शक्य आहे का?" "मित्रा! जिथे जन्म होत नाही, म्हातारपण येत नाही, मृत्यू होत नाही, च्युती होत नाही आणि पुनर्जन्म होत नाही, तिथे प्रवासाने लोकाच्या अंताला जाणून घेता येते, पाहता येते किंवा पोहोचता येते, असे मी म्हणत नाही." ‘‘අච්ඡරියං, භන්තෙ, අබ්භුතං, භන්තෙ! යාවසුභාසිතමිදං, භන්තෙ, භගවතා – ‘යත්ථ ඛො, ආවුසො, න ජායති න ජීයති න මීයති න චවති න උපපජ්ජති, නාහං තං ගමනෙන ලොකස්ස අන්තං ඤාතෙය්යං දට්ඨෙය්යං පත්තෙය්යන්ති වදාමී’ති. "आश्चर्यकारक आहे भन्ते, अद्भुत आहे भन्ते! भगवंतांनी हे किती सुभाषित (उत्कृष्टपणे) सांगितले आहे: 'मित्रा! जिथे जन्म होत नाही, म्हातारपण येत नाही, मृत्यू होत नाही, च्युती होत नाही आणि पुनर्जन्म होत नाही, तिथे प्रवासाने लोकाच्या अंताला जाणून घेता येते, पाहता येते किंवा पोहोचता येते, असे मी म्हणत नाही.'" ‘‘භූතපුබ්බාහං, භන්තෙ, රොහිතස්සො නාම ඉසි අහොසිං භොජපුත්තො ඉද්ධිමා වෙහාසඞ්ගමො. තස්ස මය්හං, භන්තෙ, එවරූපො ජවො අහොසි; සෙය්යථාපි නාම දළ්හධම්මා ධනුග්ගහො සුසික්ඛිතො කතහත්ථො කතයොග්ගො කතූපාසනො ලහුකෙන අසනෙන අප්පකසිරෙනෙව තිරියං තාලච්ඡායං අතිපාතෙය්ය. තස්ස මය්හං, භන්තෙ, එවරූපො පදවීතිහාරො අහොසි; සෙය්යථාපි නාම පුරත්ථිමා සමුද්දා පච්ඡිමො සමුද්දො. තස්ස මය්හං, භන්තෙ, එවරූපං ඉච්ඡාගතං උප්පජ්ජි – ‘අහං ගමනෙන ලොකස්ස අන්තං පාපුණිස්සාමී’ති. සො ඛ්වාහං, භන්තෙ, එවරූපෙන ජවෙන සමන්නාගතො එවරූපෙන ච පදවීතිහාරෙන අඤ්ඤත්රෙව අසිත-පීත-ඛායිත-සායිතා අඤ්ඤත්ර උච්චාර-පස්සාවකම්මා අඤ්ඤත්ර නිද්දාකිලමථපටිවිනොදනා වස්සසතායුකො වස්සසතජීවී වස්සසතං ගන්ත්වා අප්පත්වාව ලොකස්ස අන්තං අන්තරාව කාලඞ්කතො. "भन्ते! पूर्वीच्या काळी मी रोहितस्स नावाचा ऋषी होतो, जो भोजपुत्र (ग्रामप्रमुखाचा मुलगा), ऋद्धीमान (चमत्कारी शक्ती असलेला) आणि आकाशातून प्रवास करू शकणारा होता. भन्ते! माझा वेग असा होता की, जणू एखादा दृढधनुष्यधारी, सुशिक्षित, निष्णात, अनुभवी आणि सरावलेला धनुर्धारी हलक्या बाणाने ताडाच्या झाडाची सावली सहज पार करू शकेल. भन्ते! माझे पाऊल असे होते की, जणू पूर्व समुद्रापासून पश्चिम समुद्रापर्यंतचे अंतर असावे. भन्ते! माझ्या मनात अशी इच्छा निर्माण झाली – 'मी प्रवासाने लोकाच्या (विश्वाच्या) अंतापर्यंत पोहोचेन.' भन्ते! अशा वेगाने आणि अशा पावलाने युक्त असलेला मी, खाणे, पिणे, चघळणे, चाखणे याशिवाय; मलमूत्र विसर्जन करण्याशिवाय; आणि झोप व थकवा दूर करण्याशिवाय; शंभर वर्षांचे आयुष्य असलेला, शंभर वर्षे जगणारा, शंभर वर्षे सतत चालत राहूनही लोकाच्या अंतापर्यंत न पोहोचता वाटेतच मरण पावलो." ‘‘අච්ඡරියං, භන්තෙ, අබ්භුතං, භන්තෙ! යාවසුභාසිතමිදං, භන්තෙ, භගවතා – ‘යත්ථ ඛො, ආවුසො, න ජායති න ජීයති න මීයති න චවති න උපපජ්ජති, නාහං තං ගමනෙන ලොකස්ස අන්තං ඤාතෙය්යං දට්ඨෙය්යං පත්තෙය්යන්ති වදාමී’’’ති. "आश्चर्यकारक आहे भन्ते, अद्भुत आहे भन्ते! भगवंतांनी हे किती सुभाषित (उत्कृष्टपणे) सांगितले आहे: 'मित्रा! जिथे जन्म होत नाही, म्हातारपण येत नाही, मृत्यू होत नाही, च्युती होत नाही आणि पुनर्जन्म होत नाही, तिथे प्रवासाने लोकाच्या अंताला जाणून घेता येते, पाहता येते किंवा पोहोचता येते, असे मी म्हणत नाही.'" ‘‘න ඛො පනාහං, ආවුසො, අප්පත්වා ලොකස්ස අන්තං දුක්ඛස්ස අන්තකිරියං වදාමි. අපි ච ඛ්වාහං, ආවුසො, ඉමස්මිංයෙව බ්යාමමත්තෙ කළෙවරෙ සසඤ්ඤිම්හි සමනකෙ ලොකඤ්ච පඤ්ඤපෙමි ලොකසමුදයඤ්ච ලොකනිරොධඤ්ච ලොකනිරොධගාමිනිඤ්ච පටිපදන්ති. "परंतु मित्रा, लोकाच्या (विश्वाच्या) अंतापर्यंत न पोहोचता दुःखाचा अंत करता येतो, असे मी म्हणत नाही. तर मित्रा, संज्ञा (जाणीव) आणि मन असलेल्या याच व्याममात्र (एक हात लांब/पुरुषभर उंच) शरीरात मी लोक (दुःख), लोकाचा उदय (समुदय), लोकाचा निरोध आणि लोकनिरोधाकडे नेणारी प्रतिपदा (मार्ग) प्रज्ञापित करतो." ‘‘ගමනෙන න පත්තබ්බො, ලොකස්සන්තො කුදාචනං; න ච අප්පත්වා ලොකන්තං, දුක්ඛා අත්ථි පමොචනං. प्रवासाने लोकाचा अंत कधीही गाठता येत नाही; आणि लोकाच्या अंतापर्यंत पोहोचल्याशिवाय दुःखातून मुक्ती मिळत नाही. ‘‘තස්මා [Pg.62] හවෙ ලොකවිදූ සුමෙධො,ලොකන්තගූ වුසිතබ්රහ්මචරියො; ලොකස්ස අන්තං සමිතාවි ඤත්වා,නාසීසති ලොකමිමං පරඤ්චා’’ති. म्हणूनच, खरोखरच लोकविदू (लोकाला जाणणारा), सुमेध (उत्कृष्ट प्रज्ञा असलेला), लोकाचा अंत गाठलेला, ब्रह्मचर्य पूर्ण केलेला आणि शांत झालेला ज्ञानी पुरुष लोकाचा अंत जाणून या लोकाची किंवा परलोकाची आकांक्षा धरत नाही. 7. නන්දසුත්තං ७. नंद सुत्त 108. එකමන්තං ඨිතො ඛො නන්දො දෙවපුත්තො භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – १०८. एका बाजूला उभा राहिलेला नंद देवपुत्र भगवंतांच्या सन्निध ही गाथा म्हणाला – ‘‘අච්චෙන්ති කාලා තරයන්ති රත්තියො,වයොගුණා අනුපුබ්බං ජහන්ති; එතං භයං මරණෙ පෙක්ඛමානො,පුඤ්ඤානි කයිරාථ සුඛාවහානී’’ති. काळ निघून जातो, रात्री वेगाने निघून जातात, वयाच्या अवस्था एकामागून एक आपल्याला सोडून जातात. मृत्यूचे हे भय पाहत असताना, माणसाने सुख देणारे पुण्यकर्म केले पाहिजे. ‘‘අච්චෙන්ති කාලා තරයන්ති රත්තියො,වයොගුණා අනුපුබ්බං ජහන්ති; එතං භයං මරණෙ පෙක්ඛමානො,ලොකාමිසං පජහෙ සන්තිපෙක්ඛො’’ති. "काळ निघून जातो, रात्री वेगाने निघून जातात; आयुष्याचे टप्पे एकामागून एक आपल्याला सोडून जातात. मृत्यूचे हे भय स्पष्टपणे पाहून, शांतीची (निर्वाणाची) इच्छा करणाऱ्याने लौकिक आमिषाचा त्याग करावा." 8. නන්දිවිසාලසුත්තං ८. "नंदिविसाल सुत्त" 109. එකමන්තං ඨිතො ඛො නන්දිවිසාලො දෙවපුත්තො භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – १०९. एका बाजूला उभा राहून, नंदिविसाल नावाचा देवपुत्र भगवंतांना गाथेने म्हणाला – ‘‘චතුචක්කං නවද්වාරං, පුණ්ණං ලොභෙන සංයුතං; පඞ්කජාතං මහාවීර, කථං යාත්රා භවිස්සතී’’ති. "चार चाके (चार इरियापथ) आणि नऊ द्वारे असलेले, अशुद्धतेने भरलेले आणि लोभाने युक्त असलेले, चिखलातून (गर्भातून) उत्पन्न झालेले हे शरीर आहे; हे महावीरा! यातून सुटका कशी होईल?" ‘‘ඡෙත්වා නද්ධිං වරත්තඤ්ච, ඉච්ඡාලොභඤ්ච පාපකං; සමූලං තණ්හමබ්බුය්හ, එවං යාත්රා භවිස්සතී’’ති. "चामड्याची दोरी (क्रोध) आणि चाबूक (क्लेश) तोडून, वाईट इच्छा व लोभ नष्ट करून, आणि तृष्णेला मुळासकट उपटून टाकून; अशा प्रकारे यातून सुटका होईल." 9. සුසිමසුත්තං ९. "सुसिम सुत्त" 110. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො ආයස්මා ආනන්දො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නං ඛො ආයස්මන්තං ආනන්දං භගවා එතදවොච – ‘‘තුය්හම්පි නො, ආනන්ද, සාරිපුත්තො රුච්චතී’’ති? ११०. श्रावस्ती येथील प्रसंग. तेव्हा आयुष्यमान आनंद भगवंतांच्या जवळ गेले; जवळ जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान आनंदांना भगवंत म्हणाले – "आनंदा, तुलाही सारिपुत्त आवडतात का?" ‘‘කස්ස [Pg.63] හි නාම, භන්තෙ, අබාලස්ස අදුට්ඨස්ස අමූළ්හස්ස අවිපල්ලත්ථචිත්තස්ස ආයස්මා සාරිපුත්තො න රුච්චෙය්ය? පණ්ඩිතො, භන්තෙ, ආයස්මා සාරිපුත්තො. මහාපඤ්ඤො, භන්තෙ, ආයස්මා සාරිපුත්තො. පුථුපඤ්ඤො, භන්තෙ, ආයස්මා සාරිපුත්තො. හාසපඤ්ඤො, භන්තෙ, ආයස්මා සාරිපුත්තො. ජවනපඤ්ඤො, භන්තෙ, ආයස්මා සාරිපුත්තො. තික්ඛපඤ්ඤො, භන්තෙ, ආයස්මා සාරිපුත්තො. නිබ්බෙධිකපඤ්ඤො, භන්තෙ, ආයස්මා සාරිපුත්තො. අප්පිච්ඡො, භන්තෙ, ආයස්මා සාරිපුත්තො. සන්තුට්ඨො, භන්තෙ, ආයස්මා සාරිපුත්තො. පවිවිත්තො, භන්තෙ, ආයස්මා සාරිපුත්තො. අසංසට්ඨො, භන්තෙ, ආයස්මා සාරිපුත්තො. ආරද්ධවීරියො, භන්තෙ, ආයස්මා සාරිපුත්තො. වත්තා, භන්තෙ, ආයස්මා සාරිපුත්තො. වචනක්ඛමො, භන්තෙ, ආයස්මා සාරිපුත්තො. චොදකො, භන්තෙ, ආයස්මා සාරිපුත්තො. පාපගරහී, භන්තෙ, ආයස්මා සාරිපුත්තො. කස්ස හි නාම, භන්තෙ, අබාලස්ස අදුට්ඨස්ස අමූළ්හස්ස අවිපල්ලත්ථචිත්තස්ස ආයස්මා සාරිපුත්තො න රුච්චෙය්යා’’ති? "भंते! जो मूर्ख नाही, द्वेषी नाही, मोहित नाही आणि ज्याचे चित्त विचलित नाही, अशा कोणत्या व्यक्तीला आयुष्यमान सारिपुत्त आवडणार नाहीत? भंते! आयुष्यमान सारिपुत्त हे पंडित आहेत. भंते! आयुष्यमान सारिपुत्त हे महाप्रज्ञावान आहेत. भंते! आयुष्यमान सारिपुत्त हे पृथुप्रज्ञावान आहेत. भंते! आयुष्यमान सारिपुत्त हे हासप्रज्ञावान आहेत. भंते! आयुष्यमान सारिपुत्त हे जवनप्रज्ञावान आहेत. भंते! आयुष्यमान सारिपुत्त हे तीक्ष्णप्रज्ञावान आहेत. भंते! आयुष्यमान सारिपुत्त हे निर्वेधिकप्रज्ञावान आहेत. भंते! आयुष्यमान सारिपुत्त हे अल्पेच्छ आहेत. भंते! आयुष्यमान सारिपुत्त हे संतुष्ट आहेत. भंते! आयुष्यमान सारिपुत्त हे प्रविविक्त आहेत. भंते! आयुष्यमान सारिपुत्त हे असंसृष्ट आहेत. भंते! आयुष्यमान सारिपुत्त हे आरब्धवीर्य आहेत. भंते! आयुष्यमान सारिपुत्त हे वक्ता आहेत. भंते! आयुष्यमान सारिपुत्त हे वचनक्षम आहेत. भंते! आयुष्यमान सारिपुत्त हे चोदक आहेत. भंते! आयुष्यमान सारिपुत्त हे पापगर्ही आहेत. भंते! जो मूर्ख नाही, द्वेषी नाही, मोहित नाही आणि ज्याचे चित्त विचलित नाही, अशा कोणत्या व्यक्तीला आयुष्यमान सारिपुत्त आवडणार नाहीत?" ‘‘එවමෙතං, ආනන්ද, එවමෙතං, ආනන්ද! කස්ස හි නාම, ආනන්ද, අබාලස්ස අදුට්ඨස්ස අමූළ්හස්ස අවිපල්ලත්ථචිත්තස්ස සාරිපුත්තො න රුච්චෙය්ය? පණ්ඩිතො, ආනන්ද, සාරිපුත්තො. මහාපඤ්ඤො, ආනන්ද, සාරිපුත්තො. පුථුපඤ්ඤො, ආනන්ද, සාරිපුත්තො. හාසපඤ්ඤො, ආනන්ද, සාරිපුත්තො. ජවනපඤ්ඤො, ආනන්ද, සාරිපුත්තො. තික්ඛපඤ්ඤො, ආනන්ද, සාරිපුත්තො. නිබ්බෙධිකපඤ්ඤො, ආනන්ද, සාරිපුත්තො. අප්පිච්ඡො, ආනන්ද, සාරිපුත්තො. සන්තුට්ඨො, ආනන්ද, සාරිපුත්තො. පවිවිත්තො, ආනන්ද, සාරිපුත්තො. අසංසට්ඨො, ආනන්ද, සාරිපුත්තො. ආරද්ධවීරියො, ආනන්ද, සාරිපුත්තො. වත්තා, ආනන්ද, සාරිපුත්තො. වචනක්ඛමො, ආනන්ද, සාරිපුත්තො. චොදකො, ආනන්ද, සාරිපුත්තො. පාපගරහී, ආනන්ද, සාරිපුත්තො. කස්ස හි නාම, ආනන්ද, අබාලස්ස අදුට්ඨස්ස අමූළ්හස්ස අවිපල්ලත්ථචිත්තස්ස සාරිපුත්තො න රුච්චෙය්යා’’ති? "तसेच आहे आनंदा, तसेच आहे आनंदा! आनंदा, जो मूर्ख नाही, द्वेषी नाही, मोहित नाही आणि ज्याचे चित्त विचलित नाही, अशा कोणत्या व्यक्तीला सारिपुत्त आवडणार नाहीत? आनंदा, सारिपुत्त हे पंडित आहेत. आनंदा, सारिपुत्त हे महाप्रज्ञावान आहेत. आनंदा, सारिपुत्त हे पृथुप्रज्ञावान आहेत. आनंदा, सारिपुत्त हे हासप्रज्ञावान आहेत. आनंदा, सारिपुत्त हे जवनप्रज्ञावान आहेत. आनंदा, सारिपुत्त हे तीक्ष्णप्रज्ञावान आहेत. आनंदा, सारिपुत्त हे निर्वेधिकप्रज्ञावान आहेत. आनंदा, सारिपुत्त हे अल्पेच्छ आहेत. आनंदा, सारिपुत्त हे संतुष्ट आहेत. आनंदा, सारिपुत्त हे प्रविविक्त आहेत. आनंदा, सारिपुत्त हे असंसृष्ट आहेत. आनंदा, सारिपुत्त हे आरब्धवीर्य आहेत. आनंदा, सारिपुत्त हे वक्ता आहेत. आनंदा, सारिपुत्त हे वचनक्षम आहेत. आनंदा, सारिपुत्त हे चोदक आहेत. आनंदा, सारिपुत्त हे पापगर्ही आहेत. आनंदा, जो मूर्ख नाही, द्वेषी नाही, मोहित नाही आणि ज्याचे चित्त विचलित नाही, अशा कोणत्या व्यक्तीला सारिपुत्त आवडणार नाहीत?" අථ ඛො සුසිමො දෙවපුත්තො ආයස්මතො සාරිපුත්තස්ස වණ්ණෙ භඤ්ඤමානෙ මහතියා දෙවපුත්තපරිසාය පරිවුතො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතො ඛො සුසිමො දෙවපුත්තො භගවන්තං එතදවොච – तेव्हा, आयुष्यमान सारिपुत्तांची ही स्तुती केली जात असताना, सुसिम नावाचा देवपुत्र देवपुत्रांच्या मोठ्या समुदायासह भगवंतांच्या जवळ गेला; जवळ जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहून सुसिम देवपुत्र भगवंतांना म्हणाला – ‘‘එවමෙතං[Pg.64], භගවා, එවමෙතං, සුගත. කස්ස හි නාම, භන්තෙ, අබාලස්ස අදුට්ඨස්ස අමූළ්හස්ස අවිපල්ලත්ථචිත්තස්ස ආයස්මා සාරිපුත්තො න රුච්චෙය්ය? පණ්ඩිතො, භන්තෙ, ආයස්මා සාරිපුත්තො. මහාපඤ්ඤො, භන්තෙ, පුථුපඤ්ඤො, භන්තෙ, හාසපඤ්ඤො, භන්තෙ, ජවනපඤ්ඤො, භන්තෙ, තික්ඛපඤ්ඤො, භන්තෙ, නිබ්බෙධිකපඤ්ඤො, භන්තෙ, අප්පිච්ඡො, භන්තෙ, සන්තුට්ඨො, භන්තෙ, පවිවිත්තො, භන්තෙ, අසංසට්ඨො, භන්තෙ, ආරද්ධවීරියො, භන්තෙ, වත්තා, භන්තෙ, වචනක්ඛමො, භන්තෙ, චොදකො, භන්තෙ, පාපගරහී, භන්තෙ, ආයස්මා සාරිපුත්තො. කස්ස හි නාම, භන්තෙ, අබාලස්ස අදුට්ඨස්ස අමූළ්හස්ස අවිපල්ලත්ථචිත්තස්ස ආයස්මා සාරිපුත්තො න රුච්චෙය්ය? "तसेच आहे भगवंत! तसेच आहे सुगत! भंते! जो मूर्ख नाही, द्वेषी नाही, मोहित नाही आणि ज्याचे चित्त विचलित नाही, अशा कोणत्या व्यक्तीला आयुष्यमान सारिपुत्त आवडणार नाहीत? भंते! आयुष्यमान सारिपुत्त हे पंडित आहेत. भंते! आयुष्यमान सारिपुत्त हे महाप्रज्ञावान, पृथुप्रज्ञावान, हासप्रज्ञावान, जवनप्रज्ञावान, तीक्ष्णप्रज्ञावान, निर्वेधिकप्रज्ञावान, अल्पेच्छ, संतुष्ट, प्रविविक्त, असंसृष्ट, आरब्धवीर्य, वक्ता, वचनक्षम, चोदक आणि पापगर्ही आहेत. भंते! जो मूर्ख नाही, द्वेषी नाही, मोहित नाही आणि ज्याचे चित्त विचलित नाही, अशा कोणत्या व्यक्तीला आयुष्यमान सारिपुत्त आवडणार नाहीत?" ‘‘අහම්පි හි, භන්තෙ, යඤ්ඤදෙව දෙවපුත්තපරිසං උපසඞ්කමිං, එතදෙව බහුලං සද්දං සුණාමි – ‘පණ්ඩිතො ආයස්මා සාරිපුත්තො; මහාපඤ්ඤො ආයස්මා, පුථුපඤ්ඤො ආයස්මා, හාසපඤ්ඤො ආයස්මා, ජවනපඤ්ඤො ආයස්මා, තික්ඛපඤ්ඤො ආයස්මා, නිබ්බෙධිකපඤ්ඤො ආයස්මා, අප්පිච්ඡො ආයස්මා, සන්තුට්ඨො ආයස්මා, පවිවිත්තො ආයස්මා, අසංසට්ඨො ආයස්මා, ආරද්ධවීරියො ආයස්මා, වත්තා ආයස්මා, වචනක්ඛමො ආයස්මා, චොදකො ආයස්මා, පාපගරහී ආයස්මා සාරිපුත්තො’ති. කස්ස හි නාම, භන්තෙ, අබාලස්ස අදුට්ඨස්ස අමූළ්හස්ස අවිපල්ලත්ථචිත්තස්ස ආයස්මා සාරිපුත්තො න රුච්චෙය්යා’’ති? "भंते! मी ज्या ज्या देवपुत्रांच्या सभेत गेलो, तिथे बहुतांश करून मला हाच शब्द ऐकायला मिळाला – 'आयुष्यमान सारिपुत्त हे पंडित आहेत; आयुष्यमान सारिपुत्त हे महाप्रज्ञावान, पृथुप्रज्ञावान, हासप्रज्ञावान, जवनप्रज्ञावान, तीक्ष्णप्रज्ञावान, निर्वेधिकप्रज्ञावान, अल्पेच्छ, संतुष्ट, प्रविविक्त, असंसृष्ट, आरब्धवीर्य, वक्ता, वचनक्षम, चोदक आणि पापगर्ही आहेत.' भंते! जो मूर्ख नाही, द्वेषी नाही, मोहित नाही आणि ज्याचे चित्त विचलित नाही, अशा कोणत्या व्यक्तीला आयुष्यमान सारिपुत्त आवडणार नाहीत?" අථ ඛො සුසිමස්ස දෙවපුත්තස්ස දෙවපුත්තපරිසා ආයස්මතො සාරිපුත්තස්ස වණ්ණෙ භඤ්ඤමානෙ අත්තමනා පමුදිතා පීතිසොමනස්සජාතා උච්චාවචා වණ්ණනිභා උපදංසෙති. तेव्हा, आयुष्यमान सारिपुत्तांची ही स्तुती केली जात असताना, सुसिम देवपुत्राच्या सभेतील देवपुत्र – अत्यंत आनंदित, प्रफुल्लित आणि प्रीती व सौमनस्याने युक्त होऊन – विविध प्रकारच्या तेजस्वी रंगांचे प्रदर्शन करू लागले. ‘‘සෙය්යථාපි නාම මණි වෙළුරියො සුභො ජාතිමා අට්ඨංසො සුපරිකම්මකතො පණ්ඩුකම්බලෙ නික්ඛිත්තො භාසතෙ ච තපතෙ ච විරොචති ච; එවමෙවං සුසිමස්ස දෙවපුත්තස්ස දෙවපුත්තපරිසා ආයස්මතො සාරිපුත්තස්ස වණ්ණෙ භඤ්ඤමානෙ අත්තමනා පමුදිතා පීතිසොමනස්සජාතා උච්චාවචා වණ්ණනිභා උපදංසෙති. "ज्याप्रमाणे एखादा सुंदर, उत्तम जातीचा, आठ पैलू असलेला, अत्यंत कुशलतेने घडवलेला वैडूर्य मणी लाल रंगाच्या लोकरीच्या वस्त्रावर ठेवला असता चमकतो, तळपतो आणि प्रकाशमान होतो; त्याचप्रमाणे आयुष्यमान सारिपुत्तांची ही स्तुती केली जात असताना, सुसिम देवपुत्राच्या सभेतील देवपुत्र – अत्यंत आनंदित, प्रफुल्लित आणि प्रीती व सौमनस्याने युक्त होऊन – विविध प्रकारच्या तेजस्वी रंगांचे प्रदर्शन करू लागले." ‘‘සෙය්යථාපි නාම නික්ඛං ජම්බොනදං දක්ඛකම්මාරපුත්තඋක්කාමුඛසුකුසලසම්පහට්ඨං පණ්ඩුකම්බලෙ නික්ඛිත්තං භාසතෙ ච තපතෙ ච විරොචති ච; එවමෙවං සුසිමස්ස දෙවපුත්තස්ස දෙවපුත්තපරිසා ආයස්මතො සාරිපුත්තස්ස වණ්ණෙ භඤ්ඤමානෙ අත්තමනා පමුදිතා පීතිසොමනස්සජාතා උච්චාවචා වණ්ණනිභා උපදංසෙති. "आणि ज्याप्रमाणे एखाद्या कुशल सुवर्णकाराने भट्टीत उत्तम प्रकारे शुद्ध केलेले व घडवलेले जांबूनद सोन्याचे निष्क लाल रंगाच्या लोकरीच्या वस्त्रावर ठेवले असता चमकते, तळपते आणि प्रकाशमान होतो; त्याचप्रमाणे आयुष्यमान सारिपुत्तांची ही स्तुती केली जात असताना, सुसिम देवपुत्राच्या सभेतील देवपुत्र – अत्यंत आनंदित, प्रफुल्लित आणि प्रीती व सौमनस्याने युक्त होऊन – विविध प्रकारच्या तेजस्वी रंगांचे प्रदर्शन करू लागले." ‘‘සෙය්යථාපි [Pg.65] නාම සරදසමයෙ විද්ධෙ විගතවලාහකෙ දෙවෙ රත්තියා පච්චූසසමයං ඔසධිතාරකා භාසතෙ ච තපතෙ ච විරොචති ච; එවමෙවං සුසිමස්ස දෙවපුත්තස්ස දෙවපුත්තපරිසා ආයස්මතො සාරිපුත්තස්ස වණ්ණෙ භඤ්ඤමානෙ අත්තමනා පමුදිතා පීතිසොමනස්සජාතා උච්චාවචා වණ්ණනිභා උපදංසෙති. ज्याप्रमाणे शरद ऋतूत, ढग विरहित आणि स्वच्छ आकाशात, पहाटेच्या वेळी ओषधी-तारा (शुक्राचा तारा) चमकतो, प्रकाशतो आणि शोभायमान होतो; त्याचप्रमाणे, जेव्हा आयुष्यमान सारिपुत्तांच्या गुणांचे वर्णन केले जात होते, तेव्हा सुसिम देवपुत्राची देवपुत्र-परिषद अत्यंत आनंदित, प्रफुल्लित आणि प्रीती-सोमनस्याने युक्त होऊन विविध प्रकारचे दैदिप्यमान रंग प्रकट करू लागली. ‘‘සෙය්යථාපි නාම සරදසමයෙ විද්ධෙ විගතවලාහකෙ දෙවෙ ආදිච්චො නභං අබ්භුස්සක්කමානො සබ්බං ආකාසගතං තමගතං අභිවිහච්ච භාසතෙ ච තපතෙ ච විරොචති ච; එවමෙවං සුසිමස්ස දෙවපුත්තස්ස දෙවපුත්තපරිසා ආයස්මතො සාරිපුත්තස්ස වණ්ණෙ භඤ්ඤමානෙ අත්තමනා පමුදිතා පීතිසොමනස්සජාතා උච්චාවචා වණ්ණනිභා උපදංසෙති. ज्याप्रमाणे शरद ऋतूत, ढग विरहित आणि स्वच्छ आकाशात, सूर्य आकाशात वर चढताना अंतराळातील सर्व अंधार नष्ट करून चमकतो, प्रकाशतो आणि शोभायमान होतो; त्याचप्रमाणे, जेव्हा आयुष्यमान सारिपुत्तांच्या गुणांचे वर्णन केले जात होते, तेव्हा सुसिम देवपुत्राची देवपुत्र-परिषद अत्यंत आनंदित, प्रफुल्लित आणि प्रीती-सोमनस्याने युक्त होऊन विविध प्रकारचे दैदिप्यमान रंग प्रकट करू लागली. අථ ඛො සුසිමො දෙවපුත්තො ආයස්මන්තං සාරිපුත්තං ආරබ්භ භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – त्यानंतर, सुसिम देवपुत्राने आयुष्यमान सारिपुत्तांच्या संदर्भात भगवंतांच्या समक्ष ही गाथा म्हटली – ‘‘පණ්ඩිතොති සමඤ්ඤාතො, සාරිපුත්තො අකොධනො; අප්පිච්ඡො සොරතො දන්තො, සත්ථුවණ්ණාභතො ඉසී’’ති. 'जे प्रज्ञावान (पंडित) म्हणून ओळखले जातात, ते क्रोधाने रहित असलेले सारिपुत्त आहेत; अल्प-इच्छा असणारे, शांत, संयमित, शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) प्रशंसेला पात्र ठरलेले ते ऋषी (अर्हत) आहेत.' අථ ඛො භගවා ආයස්මන්තං සාරිපුත්තං ආරබ්භ සුසිමං දෙවපුත්තං ගාථාය පච්චභාසි – त्यानंतर, भगवंतांनी आयुष्यमान सारिपुत्तांच्या संदर्भात सुसिम देवपुत्राला गाथेने प्रत्युत्तर दिले – ‘‘පණ්ඩිතොති සමඤ්ඤාතො, සාරිපුත්තො අකොධනො; අප්පිච්ඡො සොරතො දන්තො, කාලං කඞ්ඛති සුදන්තො’’ ති. 'जे प्रज्ञावान (पंडित) म्हणून ओळखले जातात, ते क्रोधाने रहित असलेले सारिपुत्त आहेत; अल्प-इच्छा असणारे, शांत, संयमित आणि उत्तम प्रकारे दमन केलेले ते (परिनिर्वाणाच्या) काळाची प्रतीक्षा करत आहेत.' 10. නානාතිත්ථියසාවකසුත්තං १०. नानातिथ्यसावक सुत्त (विविध पंथांचे श्रावक) 111. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. අථ ඛො සම්බහුලා නානාතිත්ථියසාවකා දෙවපුත්තා අසමො ච සහලි ච නීකො ච ආකොටකො ච වෙගබ්භරි ච මාණවගාමියො ච අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණා කෙවලකප්පං වෙළුවනං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා [Pg.66] එකමන්තං අට්ඨංසු. එකමන්තං ඨිතො ඛො අසමො දෙවපුත්තො පූරණං කස්සපං ආරබ්භ භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – १११. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान राजगृह येथील वेळुवनातील कलंदकनिवाप येथे विहार करत होते. तेव्हा, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, विविध पंथांचे अनुयायी असलेले अनेक देवपुत्र – असम, सहली, नीक, आकोटकर, वेगब्भरी आणि माणवगामिय – अत्यंत विलोभनीय कांतीने संपूर्ण वेळुवन प्रकाशित करून जेथे भगवान होते तेथे आले. जवळ येऊन त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि ते एका बाजूला उभे राहिले. एका बाजूला उभे राहून असम देवपुत्राने पूरण कस्सपाच्या संदर्भात भगवंतांच्या समक्ष ही गाथा म्हटली – ‘‘ඉධ ඡින්දිතමාරිතෙ, හතජානීසු කස්සපො; න පාපං සමනුපස්සති, පුඤ්ඤං වා පන අත්තනො; ස වෙ විස්සාසමාචික්ඛි, සත්ථා අරහති මානන’’න්ති. 'या जगात अंगच्छेद करणे, मारणे, मारहाण करणे किंवा हानी पोहोचवणे यात कस्सप पाप पाहत नाही, तसेच स्वतःचे पुण्यही पाहत नाही. त्यांनी खरोखरच विश्वासास पात्र असा उपदेश केला आहे; ते शास्ते (गुरू) आदरास पात्र आहेत.' අථ ඛො සහලි දෙවපුත්තො මක්ඛලිං ගොසාලං ආරබ්භ භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – त्यानंतर, सहली देवपुत्राने मक्खलि गोसालाच्या संदर्भात भगवंतांच्या समक्ष ही गाथा म्हटली – ‘‘තපොජිගුච්ඡාය සුසංවුතත්තො,වාචං පහාය කලහං ජනෙන; සමොසවජ්ජා විරතො සච්චවාදී,න හි නූන තාදිසං කරොති පාප’’න්ති. 'तपश्चर्या आणि पापाची घृणा याद्वारे ज्यांनी स्वतःला उत्तम प्रकारे संयमित केले आहे, ज्यांनी लोकांशी वादविवाद करणे सोडून दिले आहे, जे पापापासून अलिप्त आणि सत्यवादी आहेत; असे पुरुष खरोखरच कोणतेही पाप करत नाहीत.' අථ ඛො නීකො දෙවපුත්තො නිගණ්ඨං නාටපුත්තං ආරබ්භ භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – त्यानंतर, नीक देवपुत्राने निगण्ठ नाटपुत्ताच्या संदर्भात भगवंतांच्या समक्ष ही गाथा म्हटली – ‘‘ජෙගුච්ඡී නිපකො භික්ඛු, චාතුයාමසුසංවුතො; දිට්ඨං සුතඤ්ච ආචික්ඛං, න හි නූන කිබ්බිසී සියා’’ති. 'पापाची घृणा करणारे, प्रज्ञावान भिक्खू, जे चार प्रकारच्या संवरांनी (चातुर्याम संवर) सुसंयमित आहेत, जे पाहिलेले आणि ऐकलेले जसेच्या तसे सांगतात; ते खरोखरच पापी असू शकत नाहीत.' අථ ඛො ආකොටකො දෙවපුත්තො නානාතිත්ථියෙ ආරබ්භ භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – त्यानंतर, आकोटक देवपुत्राने विविध पंथांच्या आचार्यांच्या संदर्भात भगवंतांच्या समक्ष ही गाथा म्हटली – ‘‘පකුධකො කාතියානො නිගණ්ඨො,යෙ චාපිමෙ මක්ඛලිපූරණාසෙ; ගණස්ස සත්ථාරො සාමඤ්ඤප්පත්තා,න හි නූන තෙ සප්පුරිසෙහි දූරෙ’’ති. 'पकुध कात्यायन, निगण्ठ, तसेच मक्खलि आणि पूरण; हे सर्व गणांचे शास्ते (गुरू) असून श्रमणत्वाला प्राप्त झालेले आहेत. ते खरोखरच सत्पुरुषांपासून दूर नाहीत.' අථ ඛො වෙගබ්භරි දෙවපුත්තො ආකොටකං දෙවපුත්තං ගාථාය පච්චභාසි – त्यानंतर, वेगब्भरी देवपुत्राने आकोटक देवपुत्राला गाथेने प्रत्युत्तर दिले – ‘‘සහාචරිතෙන ඡවො සිගාලො,න කොත්ථුකො සීහසමො කදාචි; නග්ගො මුසාවාදී ගණස්ස සත්ථා,සඞ්කස්සරාචාරො න සතං සරික්ඛො’’ති. 'केवळ सिंहासारखा आवाज काढल्याने क्षुद्र कोल्हा कधीही सिंहासारखा होऊ शकत नाही. त्याचप्रमाणे, नग्न राहणारा, असत्य बोलणारा, संशयास्पद आचरण करणारा आणि गणाचा शास्ता (गुरू) असलेला हा पंथप्रमुख कधीही सत्पुरुषांसारखा असू शकत नाही.' අථ [Pg.67] ඛො මාරො පාපිමා බෙගබ්භරිං දෙවපුත්තං අන්වාවිසිත්වා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – त्यानंतर, पापी मार याने वेगब्भरी देवपुत्राच्या शरीरात प्रवेश करून भगवंतांच्या समक्ष ही गाथा म्हटली – ‘‘තපොජිගුච්ඡාය ආයුත්තා, පාලයං පවිවෙකියං; රූපෙ ච යෙ නිවිට්ඨාසෙ, දෙවලොකාභිනන්දිනො; තෙ වෙ සම්මානුසාසන්ති, පරලොකාය මාතියා’’ති. 'जे तपश्चर्या आणि पापाच्या घृणेमध्ये मग्न आहेत, जे एकांताचे रक्षण करतात, जे रूपामध्ये प्रतिष्ठित आहेत आणि देवलोकाची आकांक्षा बाळगतात; ते मर्त्य मानव खरोखरच परलोकाच्या कल्याणासाठी योग्य उपदेश करतात.' අථ ඛො භගවා, ‘මාරො අයං පාපිමා’ ඉති විදිත්වා, මාරං පාපිමන්තං ගාථාය පච්චභාසි – त्यानंतर, 'हा पापी मार आहे' हे ओळखून भगवंतांनी पापी माराला गाथेने प्रत्युत्तर दिले – ‘‘යෙ කෙචි රූපා ඉධ වා හුරං වා,යෙ චන්තලික්ඛස්මිං පභාසවණ්ණා; සබ්බෙව තෙ තෙ නමුචිප්පසත්ථා,ආමිසංව මච්ඡානං වධාය ඛිත්තා’’ති. 'या जगात किंवा परलोकात जे काही रूप आहेत, आणि आकाशात जे दैदिप्यमान कांतीचे रूप आहेत; हे नमुची (मार)! तू प्रशंसा करत असलेले हे सर्व रूप माशांना मारण्यासाठी टाकलेल्या आमिषासारखे (गळासारखे) प्राण्यांच्या विनाशासाठीच टाकलेले आहेत.' අථ ඛො මාණවගාමියො දෙවපුත්තො භගවන්තං ආරබ්භ භගවතො සන්තිකෙ ඉමා ගාථායො අභාසි – त्यानंतर, माणवगामिय देवपुत्राने भगवंतांच्या संदर्भात भगवंतांच्या समक्ष या गाथा म्हटल्या – ‘‘විපුලො රාජගහීයානං, ගිරිසෙට්ඨො පවුච්චති; සෙතො හිමවතං සෙට්ඨො, ආදිච්චො අඝගාමිනං. 'राजगृहाच्या पर्वतांमध्ये विपुल पर्वत हा सर्वश्रेष्ठ पर्वत म्हटला जातो. हिमवंताच्या (हिमालय) पर्वतांमध्ये श्वेत (कैलास) पर्वत श्रेष्ठ आहे. आकाशात गमन करणाऱ्यांमध्ये सूर्य श्रेष्ठ आहे.' ‘‘සමුද්දො උදධිනං සෙට්ඨො, නක්ඛත්තානඤ්ච චන්දිමා ; සදෙවකස්ස ලොකස්ස, බුද්ධො අග්ගො පවුච්චතී’’ති. 'जलाशयांमध्ये समुद्र श्रेष्ठ आहे, नक्षत्रांमध्ये चंद्र श्रेष्ठ आहे; आणि देवलोकासह संपूर्ण जगात बुद्ध हे सर्वश्रेष्ठ म्हटले जातात.' නානාතිත්ථියවග්ගො තතියො. तिसरा नानातिथ्य वर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – සිවො ඛෙමො ච සෙරී ච, ඝටී ජන්තු ච රොහිතො; නන්දො නන්දිවිසාලො ච, සුසිමො නානාතිත්ථියෙන තෙ දසාති. सिवो, खेमो, सेरी, घटी, जन्तु, रोहितो, नन्दो, nन्दिविसालो, सुसिमो आणि नानातिथ्य मिळून हे दहा सुत्त आहेत. දෙවපුත්තසංයුත්තං සමත්තං. देवपुत्त संयुत्त समाप्त झाले. 3. කොසලසංයුත්තං ३. कोसल संयुत्त 1. පඨමවග්ගො १. पहिला वर्ग 1. දහරසුත්තං १. दहर सुत्त (तरुण सुत्त) 112. එවං [Pg.68] මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතා සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘භවම්පි නො ගොතමො අනුත්තරං සම්මාසම්බොධිං අභිසම්බුද්ධොති පටිජානාතී’’ති? ‘‘යඤ්හි තං, මහාරාජ, සම්මා වදමානො වදෙය්ය ‘අනුත්තරං සම්මාසම්බොධිං අභිසම්බුද්ධො’ති, මමෙව තං සම්මා වදමානො වදෙය්ය. අහඤ්හි, මහාරාජ, අනුත්තරං සම්මාසම්බොධිං අභිසම්බුද්ධො’’ති. ११२. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान श्रावस्ती येथील अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेव्हा कोसलचा राजा प्रसेनजित जेथे भगवान होते तेथे आला. जवळ येऊन त्याने भगवंतांशी कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या कोसलचा राजा प्रसेनजितने भगवंतांना विचारले – 'काय आपण, आदरणीय गौतम, असे घोषित करता की आपण अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त केली आहे?' भगवंतांनी उत्तर दिले, 'महाराज! जर एखाद्या व्यक्तीने योग्य रीतीने असे म्हणावे की, त्याने अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त केली आहे, तर ते माझ्याबद्दलच योग्य ठरेल. कारण महाराज, मी खरोखरच अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त केली आहे.' ‘‘යෙපි තෙ, භො ගොතම, සමණබ්රාහ්මණා සඞ්ඝිනො ගණිනො ගණාචරියා ඤාතා යසස්සිනො තිත්ථකරා සාධුසම්මතා බහුජනස්ස, සෙය්යථිදං – පූරණො කස්සපො, මක්ඛලි ගොසාලො, නිගණ්ඨො නාටපුත්තො, සඤ්චයො බෙලට්ඨපුත්තො, පකුධො කච්චායනො, අජිතො කෙසකම්බලො; තෙපි මයා ‘අනුත්තරං සම්මාසම්බොධිං අභිසම්බුද්ධොති පටිජානාථා’ති පුට්ඨා සමානා අනුත්තරං සම්මාසම්බොධිං අභිසම්බුද්ධොති න පටිජානන්ති. කිං පන භවං ගොතමො දහරො චෙව ජාතියා නවො ච පබ්බජ්ජායා’’ති? 'हे गौतम! जे श्रमण-ब्राह्मण संघाचे प्रमुख आहेत, गणांचे प्रमुख आहेत, गणांचे आचार्य आहेत, प्रसिद्ध आहेत, कीर्तिमान आहेत, पंथसंस्थापक आहेत आणि बहुजन समाजात सत्पुरुष मानले जातात; जसे की – पूरण कस्सप, मक्खलि गोसाल, निगण्ठ नाटपुत्त, संजय बेलट्ठिपुत्त, पकुध कात्यायन, अजित केसकंबली; त्यांनाही जेव्हा मी विचारले की, तुम्ही अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त केली आहे का, तेव्हा त्यांनी तसा दावा केला नाही. मग आपण, आदरणीय गौतम, जे वयाने तरुण आहात आणि प्रव्रज्या घेऊन नुकताच थोडा काळ झाला आहे, असा दावा कसा काय करत आहात?' ‘‘චත්තාරො ඛො මෙ, මහාරාජ, දහරාති න උඤ්ඤාතබ්බා, දහරාති න පරිභොතබ්බා. කතමෙ චත්තාරො? ඛත්තියො ඛො, මහාරාජ, දහරොති න උඤ්ඤාතබ්බො, දහරොති න පරිභොතබ්බො. උරගො ඛො, මහාරාජ, දහරොති න උඤ්ඤාතබ්බො, දහරොති න පරිභොතබ්බො. අග්ගි ඛො, මහාරාජ, දහරොති න උඤ්ඤාතබ්බො, දහරොති න පරිභොතබ්බො. භික්ඛු, ඛො, මහාරාජ, දහරොති න උඤ්ඤාතබ්බො, දහරොති න පරිභොතබ්බො. ඉමෙ ඛො, මහාරාජ, චත්තාරො දහරාති න උඤ්ඤාතබ්බා, දහරාති න පරිභොතබ්බා’’ති. "महाराज! चार गोष्टी अशा आहेत ज्या 'तरुण' किंवा 'लहान' म्हणून तुच्छ मानू नयेत आणि त्यांचा अनादर करू नये. कोणत्या चार? महाराज! क्षत्रिय (राजपुत्र) लहान आहे म्हणून त्याचा तिरस्कार करू नये आणि त्याचा अनादर करू नये. महाराज! सर्प लहान आहे म्हणून त्याचा तिरस्कार करू नये आणि त्याचा अनादर करू नये. महाराज! अग्नी लहान आहे म्हणून त्याचा तिरस्कार करू नये आणि त्याचा अनादर करू नये. महाराज! भिक्खू तरुण आहे म्हणून त्यांचा तिरस्कार करू नये आणि त्यांचा अनादर करू नये. महाराज! या चार गोष्टी आहेत ज्या लहान किंवा तरुण म्हणून तुच्छ मानू नयेत आणि त्यांचा अनादर करू नये." ඉදමවොච [Pg.69] භගවා. ඉදං වත්වාන සුගතො අථාපරං එතදවොච සත්ථා – भगवान असे म्हणाले. हे बोलून सुगत, शास्ता (गुरू) पुढे असे म्हणाले – ‘‘ඛත්තියං ජාතිසම්පන්නං, අභිජාතං යසස්සිනං; දහරොති නාවජානෙය්ය, න නං පරිභවෙ නරො. "उच्च कुळात जन्मलेल्या, थोर व कीर्तिमान अशा क्षत्रियाला (राजपुत्राला) तो तरुण किंवा लहान आहे म्हणून माणसाने तुच्छ मानू नये आणि त्याचा अनादर करू नये." ‘‘ඨානඤ්හි සො මනුජින්දො, රජ්ජං ලද්ධාන ඛත්තියො; සො කුද්ධො රාජදණ්ඩෙන, තස්මිං පක්කමතෙ භුසං; තස්මා තං පරිවජ්ජෙය්ය, රක්ඛං ජීවිතමත්තනො. "कारण जेव्हा तो मानवांचा स्वामी असलेला क्षत्रिय राज्य प्राप्त करतो, तेव्हा क्रुद्ध होऊन तो राजदंडान्वये त्या (अपमान करणाऱ्या) मनुष्याला कठोर शिक्षा करू शकतो. म्हणून, स्वतःच्या प्राणांचे रक्षण करू इच्छिणाऱ्याने त्याच्याशी वैर करणे टाळावे." ‘‘ගාමෙ වා යදි වා රඤ්ඤෙ, යත්ථ පස්සෙ භුජඞ්ගමං; දහරොති නාවජානෙය්ය, න නං පරිභවෙ නරො. "गावात असो वा अरण्यात, जिथे कुठे सर्प दिसेल, तो लहान आहे म्हणून माणसाने त्याला तुच्छ मानू नये आणि त्याला त्रास देणे टाळावे." ‘‘උච්චාවචෙහි වණ්ණෙහි, උරගො චරති තෙජසී ; සො ආසජ්ජ ඩංසෙ බාලං, නරං නාරිඤ්ච එකදා; තස්මා තං පරිවජ්ජෙය්ය, රක්ඛං ජීවිතමත්තනො. "कारण तो तेजस्वी सर्प विविध रूपे व रंग धारण करून वावरतो. तो कधीतरी जवळ येऊन अज्ञानी स्त्री किंवा पुरुषाला दंश करू शकतो. म्हणून, स्वतःच्या प्राणांचे रक्षण करू इच्छिणाऱ्याने त्याला छेडणे टाळावे." ‘‘පහූතභක්ඛං ජාලිනං, පාවකං කණ්හවත්තනිං; දහරොති නාවජානෙය්ය, න නං පරිභවෙ නරො. "पुष्कळ भक्षण करणाऱ्या, ज्वाळांनी युक्त आणि काळा मार्ग मागे सोडणाऱ्या अग्नीला तो लहान आहे म्हणून माणसाने तुच्छ मानू नये आणि त्याचा अनादर करू नये." ‘‘ලද්ධා හි සො උපාදානං, මහා හුත්වාන පාවකො; සො ආසජ්ජ ඩහෙ බාලං, නරං නාරිඤ්ච එකදා; තස්මා තං පරිවජ්ජෙය්ය, රක්ඛං ජීවිතමත්තනො. "कारण जेव्हा त्या अग्नीला इंधन मिळते, तेव्हा तो विशाल रूप धारण करतो आणि जवळ येऊन अज्ञानी स्त्री किंवा पुरुषाला जाळून टाकू शकतो. म्हणून, स्वतःच्या प्राणांचे रक्षण करू इच्छिणाऱ्याने त्याच्याशी खेळणे टाळावे." ‘‘වනං යදග්ගි ඩහති, පාවකො කණ්හවත්තනී; ජායන්ති තත්ථ පාරොහා, අහොරත්තානමච්චයෙ. "काळा मार्ग मागे सोडणारा अग्नी जेव्हा जंगलाला जाळून खाक करतो, तेव्हा काही दिवस आणि रात्री उलटल्यानंतर तिथे पुन्हा नवीन अंकुर फुटतात आणि वनस्पती वाढतात." ‘‘යඤ්ච ඛො සීලසම්පන්නො, භික්ඛු ඩහති තෙජසා; න තස්ස පුත්තා පසවො, දායාදා වින්දරෙ ධනං; අනපච්චා අදායාදා, තාලාවත්ථූ භවන්ති තෙ. "परंतु, जेव्हा शीलसंपन्न भिक्खू आपल्या शीलतेजाने (अपमान करणाऱ्याला) भस्म करतात, तेव्हा त्या मनुष्याला पुत्र किंवा पशू लाभत नाहीत, आणि त्याच्या वारसांना संपत्ती मिळत नाही. ते निपुत्रिक आणि वारसहीन होऊन ताडाच्या कापलेल्या झाडाच्या बुंध्यासारखे (निष्प्राण व नष्ट) होतात." ‘‘තස්මා හි පණ්ඩිතො පොසො, සම්පස්සං අත්ථමත්තනො; භුජඞ්ගමං පාවකඤ්ච, ඛත්තියඤ්ච යසස්සිනං; භික්ඛුඤ්ච සීලසම්පන්නං, සම්මදෙව සමාචරෙ’’ති. "म्हणून, स्वतःचे कल्याण पाहणाऱ्या सुज्ञ माणसाने सर्प, अग्नी, कीर्तिमान क्षत्रिय आणि शीलसंपन्न भिक्खू या चौघांशी नेहमी अत्यंत आदराने आणि योग्य प्रकारेच वर्तन करावे." එවං වුත්තෙ, රාජා පසෙනදි කොසලො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භන්තෙ, අභික්කන්තං, භන්තෙ! සෙය්යථාපි භන්තෙ, නික්කුජ්ජිතං වා උක්කුජ්ජෙය්ය[Pg.70], පටිච්ඡන්නං වා විවරෙය්ය, මූළ්හස්ස වා මග්ගං ආචික්ඛෙය්ය, අන්ධකාරෙ වා තෙලපජ්ජොතං ධාරෙය්ය – ‘චක්ඛුමන්තො රූපානි දක්ඛන්තී’ති; එවමෙවං භගවතා අනෙකපරියායෙන ධම්මො පකාසිතො. එසාහං, භන්තෙ, භගවන්තං සරණං ගච්ඡාමි ධම්මඤ්ච භික්ඛුසඞ්ඝඤ්ච. උපාසකං මං, භන්තෙ, භගවා ධාරෙතු අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. असे म्हटले असता, कोसलचा राजा प्रसेनजित भगवंतांना म्हणाला, "अतिशय सुंदर, भन्ते! अतिशय सुंदर, भन्ते! ज्याप्रमाणे कोणी उपडा ठेवलेला घडा उताणा करावा, झाकलेली गोष्ट उघडी करावी, वाट चुकलेल्याला मार्ग दाखवावा, किंवा अंधारात तेलाचा दिवा लावावा जेणेकरून डोळे असणाऱ्यांना वस्तू दिसाव्यात; त्याचप्रमाणे भगवंतांनी अनेक प्रकारे धम्म प्रकाशित केला आहे. भन्ते! मी भगवंतांना शरण जातो, धम्माला शरण जातो आणि भिक्खू संघाला शरण जातो. भगवंतांनी मला आजपासून जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे." 2. පුරිසසුත්තං २. पुरुष सुत्त 113. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කති නු ඛො, භන්තෙ, පුරිසස්ස ධම්මා අජ්ඣත්තං උප්පජ්ජමානා උප්පජ්ජන්ති අහිතාය දුක්ඛාය අඵාසුවිහාරායා’’ති? ११३. श्रावस्ती येथील प्रसंग. तेव्हा कोसलचा राजा प्रसेनजित भगवंतांकडे गेला. जवळ जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या कोसलराज प्रसेनजितने भगवंतांना विचारले, "भन्ते! मनुष्याच्या मनात उत्पन्न होणाऱ्या अशा किती गोष्टी आहेत, ज्या त्याच्या अहितासाठी, दुःखासाठी आणि असुखासाठी कारणीभूत ठरतात?" ‘‘තයො ඛො, මහාරාජ, පුරිසස්ස ධම්මා අජ්ඣත්තං උප්පජ්ජමානා උප්පජ්ජන්ති අහිතාය දුක්ඛාය අඵාසුවිහාරාය. කතමෙ තයො? ලොභො ඛො, මහාරාජ, පුරිසස්ස ධම්මො අජ්ඣත්තං උප්පජ්ජමානො උප්පජ්ජති අහිතාය දුක්ඛාය අඵාසුවිහාරාය. දොසො ඛො, මහාරාජ, පුරිසස්ස ධම්මො අජ්ඣත්තං උප්පජ්ජමානො උප්පජ්ජති අහිතාය දුක්ඛාය අඵාසුවිහාරාය. මොහො ඛො, මහාරාජ, පුරිසස්ස ධම්මො අජ්ඣත්තං උප්පජ්ජමානො උප්පජ්ජති අහිතාය දුක්ඛාය අඵාසුවිහාරාය. ඉමෙ ඛො, මහාරාජ, තයො පුරිසස්ස ධම්මා අජ්ඣත්තං උප්පජ්ජමානා උප්පජ්ජන්ති අහිතාය දුක්ඛාය අඵාසුවිහාරායා’’ති. ඉදමවොච…පෙ… "महाराज! मनुष्याच्या मनात उत्पन्न होणाऱ्या तीन गोष्टी आहेत, ज्या त्याच्या अहितासाठी, दुःखासाठी आणि असुखासाठी कारणीभूत ठरतात. कोणत्या तीन? महाराज! मनुष्याच्या मनात उत्पन्न होणारा 'लोभ' हा धम्म त्याच्या अहितासाठी, दुःखासाठी आणि असुखासाठी कारणीभूत ठरतो. महाराज! मनुष्याच्या मनात उत्पन्न होणारा 'द्वेष' हा धम्म त्याच्या अहितासाठी, दुःखासाठी आणि असुखासाठी कारणीभूत ठरतो. महाराज! मनुष्याच्या मनात उत्पन्न होणारा 'मोह' हा धम्म त्याच्या अहितासाठी, दुःखासाठी आणि असुखासाठी कारणीभूत ठरतो. महाराज! मनुष्याच्या मनात उत्पन्न होणाऱ्या या तीन गोष्टी आहेत, ज्या त्याच्या अहितासाठी, दुःखासाठी आणि असुखासाठी कारणीभूत ठरतात." भगवान असे म्हणाले... ‘‘ලොභො දොසො ච මොහො ච, පුරිසං පාපචෙතසං; හිංසන්ති අත්තසම්භූතා, තචසාරංව සම්ඵල’’න්ති. "स्वतःच्याच मनात उत्पन्न झालेले लोभ, द्वेष आणि मोह हे दुर्बुद्धी मनुष्याला त्याचप्रमाणे नष्ट करतात, ज्याप्रमाणे बांबू किंवा लव्हाळ्याचे स्वतःचेच फळ त्याला नष्ट करते." 3. ජරාමරණසුත්තං ३. जरामरण सुत्त 114. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං නිසින්නො ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අත්ථි නු ඛො, භන්තෙ, ජාතස්ස අඤ්ඤත්ර ජරාමරණා’’ති? ‘‘නත්ථි ඛො, මහාරාජ, ජාතස්ස අඤ්ඤත්ර ජරාමරණා. යෙපි තෙ, මහාරාජ, ඛත්තියමහාසාලා අඩ්ඪා මහද්ධනා මහාභොගා පහූතජාතරූපරජතා [Pg.71] පහූතවිත්තූපකරණා පහූතධනධඤ්ඤා, තෙසම්පි ජාතානං නත්ථි අඤ්ඤත්ර ජරාමරණා. යෙපි තෙ, මහාරාජ, බ්රාහ්මණමහාසාලා…පෙ… ගහපතිමහාසාලා අඩ්ඪා මහද්ධනා මහාභොගා පහූතජාතරූපරජතා පහූතවිත්තූපකරණා පහූතධනධඤ්ඤා, තෙසම්පි ජාතානං නත්ථි අඤ්ඤත්ර ජරාමරණා. යෙපි තෙ, මහාරාජ, භික්ඛූ අරහන්තො ඛීණාසවා වුසිතවන්තො කතකරණීයා ඔහිතභාරා අනුප්පත්තසදත්ථා පරික්ඛීණභවසංයොජනා සම්මදඤ්ඤාවිමුත්තා, තෙසං පායං කායො භෙදනධම්මො නික්ඛෙපනධම්මො’’ති. ඉදමවොච…පෙ… ११४. श्रावस्ती येथील प्रसंग. एका बाजूला बसलेल्या कोसलराज प्रसेनजितने भगवंतांना विचारले, "भन्ते! जन्म घेतलेल्या प्राण्याला वृद्धत्व आणि मृत्यू याशिवाय दुसरा काही मार्ग आहे का?" "महाराज! जन्म घेतलेल्या प्राण्याला वृद्धत्व आणि मृत्यू याशिवाय दुसरा कोणताही मार्ग नाही. महाराज! जे श्रीमंत, अफाट संपत्ती व वैभव असलेले, विपुल सोने-चांदी, विपुल साधनसामग्री आणि विपुल धनधान्य असलेले मोठे क्षत्रिय आहेत, त्यांनी जन्म घेतला असल्यामुळे त्यांनाही वृद्धत्व आणि मृत्यू टाळता येत नाही. महाराज! जे मोठे ब्राह्मण... आणि मोठे गृहपती आहेत, जे अत्यंत श्रीमंत, अफाट संपत्ती व वैभव असलेले, विपुल सोने-चांदी आणि धनधान्य असलेले आहेत, त्यांनी जन्म घेतला असल्यामुळे त्यांनाही वृद्धत्व आणि मृत्यू टाळता येत नाही. महाराज! जे भिक्खू अर्हत आहेत, ज्यांचे आसव नष्ट झाले आहेत, ज्यांनी ब्रह्मचर्य पूर्ण केले आहे, आपले कर्तव्य पार पाडले आहे, संसाराचा भार उतरवून ठेवला आहे, आपले परम कल्याण साधले आहे, भव-बंधने पूर्णपणे तोडली आहेत आणि जे सम्यक ज्ञानाने मुक्त झाले आहेत; त्यांच्यासाठीही हा शरीररूपी देह नाश पावणारा आणि शेवटी मातीत मिळणाराच आहे." भगवान असे म्हणाले... ‘‘ජීරන්ති වෙ රාජරථා සුචිත්තා,අථො සරීරම්පි ජරං උපෙති; සතඤ්ච ධම්මො න ජරං උපෙති,සන්තො හවෙ සබ්භි පවෙදයන්තී’’ති. "राजांचे सुंदर सजवलेले रथही कालांतराने जीर्ण होतात, आणि हे शरीरही वृद्धत्वाकडे जाते. परंतु सत्पुरुषांचा धम्म कधीही जीर्ण होत नाही; सत्पुरुषच सत्पुरुषांना हा धम्म उपदेशितात." 4. පියසුත්තං ४. पिय सुत्त 115. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං නිසින්නො ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘ඉධ මය්හං, භන්තෙ, රහොගතස්ස පටිසල්ලීනස්ස එවං චෙතසො පරිවිතක්කො උදපාදි – ‘කෙසං නු ඛො පියො අත්තා, කෙසං අප්පියො අත්තා’ති? තස්ස මය්හං, භන්තෙ, එතදහොසි – ‘යෙ ච ඛො කෙචි කායෙන දුච්චරිතං චරන්ති, වාචාය දුච්චරිතං චරන්ති, මනසා දුච්චරිතං චරන්ති; තෙසං අප්පියො අත්තා’. කිඤ්චාපි තෙ එවං වදෙය්යුං – ‘පියො නො අත්තා’ති, අථ ඛො තෙසං අප්පියො අත්තා. තං කිස්ස හෙතු? යඤ්හි අප්පියො අප්පියස්ස කරෙය්ය, තං තෙ අත්තනාව අත්තනො කරොන්ති; තස්මා තෙසං අප්පියො අත්තා. යෙ ච ඛො කෙචි කායෙන සුචරිතං චරන්ති, වාචාය සුචරිතං චරන්ති, මනසා සුචරිතං චරන්ති; තෙසං පියො අත්තා. කිඤ්චාපි තෙ එවං වදෙය්යුං – ‘අප්පියො නො අත්තා’ති; අථ ඛො තෙසං පියො අත්තා. තං කිස්ස හෙතු? යඤ්හි පියො පියස්ස කරෙය්ය, තං තෙ අත්තනාව අත්තනො කරොන්ති; තස්මා තෙසං පියො අත්තා’’ති. ११५. श्रावस्ती येथील प्रसंग. एका बाजूला बसलेले कोसल नरेश प्रसेनजित भगवंतांना म्हणाले – "भंते, येथे एकांतात ध्यानस्थ बसलो असताना माझ्या मनात असा विचार आला – 'असे कोणते लोक आहेत ज्यांना स्वतः प्रिय असतो, आणि असे कोणते लोक आहेत ज्यांना स्वतः अप्रिय असतो?' भंते, तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला – 'जे कोणी शरीराने दुराचरण करतात, वाणीने दुराचरण करतात, मनाने दुराचरण करतात; त्यांना स्वतः अप्रिय असतो. जरी ते असे म्हणत असले की – "आम्हाला स्वतः प्रिय आहे," तरीही त्यांना स्वतः अप्रियच असतो. त्याचे कारण काय? कारण एखादा शत्रू दुसऱ्या शत्रूचे जे काही वाईट करेल, तेच ते स्वतः स्वतःचे करत असतात; म्हणून त्यांना स्वतः अप्रिय असतो. परंतु जे कोणी शरीराने सदाचरण करतात, वाणीने सदाचरण करतात, मनाने सदाचरण करतात; त्यांना स्वतः प्रिय असतो. जरी ते असे म्हणत असले की – "आम्हाला स्वतः अप्रिय आहे," तरीही त्यांना स्वतः प्रियच असतो. त्याचे कारण काय? कारण एखादा प्रिय मित्र आपल्या प्रिय मित्राचे जे काही भले करेल, तेच ते स्वतः स्वतःचे करत असतात; म्हणून त्यांना स्वतः प्रिय असतो.'" ‘‘එවමෙතං, මහාරාජ, එවමෙතං, මහාරාජ! යෙ හි කෙචි, මහාරාජ, කායෙන දුච්චරිතං චරන්ති, වාචාය දුච්චරිතං චරන්ති, මනසා දුච්චරිතං චරන්ති; තෙසං අප්පියො අත්තා. කිඤ්චාපි තෙ එවං වදෙය්යුං – ‘පියො නො අත්තා’ති, අථ ඛො තෙසං අප්පියො අත්තා. තං කිස්ස හෙතු? යඤ්හි, මහාරාජ, අප්පියො අප්පියස්ස කරෙය්ය, තං තෙ අත්තනාව අත්තනො කරොන්ති; තස්මා තෙසං අප්පියො අත්තා. යෙ ච ඛො කෙචි, මහාරාජ, කායෙන [Pg.72] සුචරිතං චරන්ති, වාචාය සුචරිතං චරන්ති, මනසා සුචරිතං චරන්ති; තෙසං පියො අත්තා. කිඤ්චාපි තෙ එවං වදෙය්යුං – ‘අප්පියො නො අත්තා’ති; අථ ඛො තෙසං පියො අත්තා. තං කිස්ස හෙතු? යඤ්හි මහාරාජ, පියො පියස්ස කරෙය්ය, තං තෙ අත්තනාව අත්තනො කරොන්ති; තස්මා තෙසං පියො අත්තා’’ති. ඉදමවොච…පෙ… "हे अगदी तसेच आहे, महाराज! हे अगदी तसेच आहे, महाराज! महाराज, जे कोणी शरीराने दुराचरण करतात, वाणीने दुराचरण करतात, मनाने दुराचरण करतात; त्यांना स्वतः अप्रिय असतो. जरी ते असे म्हणत असले की, 'आम्हाला स्वतः प्रिय आहे', तरीही त्यांना स्वतः अप्रियच असतो. त्याचे कारण काय? कारण महाराज, एखादा शत्रू दुसऱ्या शत्रूचे जे काही वाईट करेल, तेच ते स्वतः स्वतःचे करत असतात; म्हणून त्यांना स्वतः अप्रिय असतो. महाराज, जे कोणी शरीराने सदाचरण करतात, वाणीने सदाचरण करतात, मनाने सदाचरण करतात; त्यांना स्वतः प्रिय असतो. जरी ते असे म्हणत असले की, 'आम्हाला स्वतः अप्रिय आहे', तरीही त्यांना स्वतः प्रियच असतो. त्याचे कारण काय? कारण महाराज, एखादा प्रिय मित्र आपल्या प्रिय मित्राचे जे काही भले करेल, तेच ते स्वतः स्वतःचे करत असतात; म्हणून त्यांना स्वतः प्रिय असतो." भगवंत असे म्हणाले... आणि पुढे... ‘‘අත්තානඤ්චෙ පියං ජඤ්ඤා, න නං පාපෙන සංයුජෙ; න හි තං සුලභං හොති, සුඛං දුක්කටකාරිනා. "जर एखाद्याला स्वतः प्रिय आहे असे वाटत असेल, तर त्याने स्वतःला पापाशी जोडू नये (पापकृत्ये करू नयेत); कारण वाईट कर्मे करणाऱ्याला सुख सहज मिळत नाही." ‘‘අන්තකෙනාධිපන්නස්ස, ජහතො මානුසං භවං; කිඤ්හි තස්ස සකං හොති, කිඤ්ච ආදාය ගච්ඡති; කිඤ්චස්ස අනුගං හොති, ඡායාව අනපායිනී. "जेव्हा मृत्यू माणसाला ग्रासतो आणि तो या मानवी जन्माचा त्याग करतो, तेव्हा त्याचे स्वतःचे काय उरते? तो सोबत काय घेऊन जातो? आणि सावलीप्रमाणे कधीही न सोडता त्याच्या मागे मागे काय जाते?" ‘‘උභො පුඤ්ඤඤ්ච පාපඤ්ච, යං මච්චො කුරුතෙ ඉධ; තඤ්හි තස්ස සකං හොති, තඤ්ච ආදාය ගච්ඡති; තඤ්චස්ස අනුගං හොති, ඡායාව අනපායිනී. "या जगात मर्त्य मनुष्य जे काही पुण्य आणि पाप करतो; तेच त्याचे स्वतःचे असते, तेच तो सोबत घेऊन जातो; आणि सावलीप्रमाणे कधीही न सोडता तेच त्याच्या मागे मागे जाते." ‘‘තස්මා කරෙය්ය කල්යාණං, නිචයං සම්පරායිකං; පුඤ්ඤානි පරලොකස්මිං, පතිට්ඨා හොන්ති පාණින’’න්ති. "म्हणून माणसाने परलोकातील कल्याणासाठी पुण्यसंचय केला पाहिजे; कारण परलोकात पुण्य हेच प्राण्यांचा आधार असते." 5. අත්තරක්ඛිතසුත්තං ५. "आत्मरक्षित सुत्त" 116. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං නිසින්නො ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘ඉධ මය්හං, භන්තෙ, රහොගතස්ස පටිසල්ලීනස්ස එවං චෙතසො පරිවිතක්කො උදපාදි – ‘කෙසං නු ඛො රක්ඛිතො අත්තා, කෙසං අරක්ඛිතො අත්තා’ති? තස්ස මය්හං, භන්තෙ, එතදහොසි – ‘යෙ ඛො කෙචි කායෙන දුච්චරිතං චරන්ති, වාචාය දුච්චරිතං චරන්ති, මනසා දුච්චරිතං චරන්ති; තෙසං අරක්ඛිතො අත්තා. කිඤ්චාපි තෙ හත්ථිකායො වා රක්ඛෙය්ය, අස්සකායො වා රක්ඛෙය්ය, රථකායො වා රක්ඛෙය්ය, පත්තිකායො වා රක්ඛෙය්ය; අථ ඛො තෙසං අරක්ඛිතො අත්තා. තං කිස්ස හෙතු? බාහිරා හෙසා රක්ඛා, නෙසා රක්ඛා අජ්ඣත්තිකා; තස්මා තෙසං අරක්ඛිතො අත්තා. යෙ ච ඛො කෙචි කායෙන සුචරිතං චරන්ති, වාචාය සුචරිතං චරන්ති, මනසා සුචරිතං චරන්ති; තෙසං රක්ඛිතො අත්තා. කිඤ්චාපි තෙ නෙව හත්ථිකායො රක්ඛෙය්ය, න අස්සකායො රක්ඛෙය්ය, න රථකායො රක්ඛෙය්ය[Pg.73], න පත්තිකායො රක්ඛෙය්ය; අථ ඛො තෙසං රක්ඛිතො අත්තා. තං කිස්ස හෙතු? අජ්ඣත්තිකා හෙසා රක්ඛා, නෙසා රක්ඛා බාහිරා; තස්මා තෙසං රක්ඛිතො අත්තා’’’ති. ११६. श्रावस्ती येथील प्रसंग. एका बाजूला बसलेले कोसल नरेश प्रसेनजित भगवंतांना म्हणाले – "भंते, येथे एकांतात ध्यानस्थ बसलो असताना माझ्या मनात असा विचार आला – 'असे कोणते लोक आहेत जे स्वतःचे रक्षण करतात, आणि असे कोणते लोक आहेत जे स्वतःला असुरक्षित ठेवतात?' भंते, तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला – 'जे कोणी शरीराने दुराचरण करतात, वाणीने दुराचरण करतात, मनाने दुराचरण करतात; त्यांनी स्वतःला असुरक्षित ठेवले आहे. जरी हत्तींचे सैन्य, घोड्यांचे सैन्य, रथांचे सैन्य किंवा पायदळ सैन्य त्यांचे रक्षण करत असले, तरीही ते स्वतः असुरक्षितच असतात. त्याचे कारण काय? कारण हे रक्षण बाह्य आहे, आंतरिक नाही; म्हणून ते स्वतः असुरक्षितच असतात. परंतु जे कोणी शरीराने सदाचरण करतात, वाणीने सदाचरण करतात, मनाने सदाचरण करतात; त्यांनी स्वतःचे रक्षण केले आहे. जरी हत्तींचे सैन्य, घोड्यांचे सैन्य, रथांचे सैन्य किंवा पायदळ सैन्य त्यांचे रक्षण करत नसले, तरीही ते स्वतः सुरक्षितच असतात. त्याचे कारण काय? कारण हे रक्षण आंतरिक आहे, बाह्य नाही; म्हणून त्यांनी स्वतःचे रक्षण केले आहे.'" ‘‘එවමෙතං, මහාරාජ, එවමෙතං, මහාරාජ! යෙ හි කෙචි, මහාරාජ, කායෙන දුච්චරිතං චරන්ති…පෙ… තෙසං අරක්ඛිතො අත්තා. තං කිස්ස හෙතු? බාහිරා හෙසා, මහාරාජ, රක්ඛා, නෙසා රක්ඛා අජ්ඣත්තිකා; තස්මා තෙසං අරක්ඛිතො අත්තා. යෙ ච ඛො කෙචි, මහාරාජ, කායෙන සුචරිතං චරන්ති, වාචාය සුචරිතං චරන්ති, මනසා සුචරිතං චරන්ති; තෙසං රක්ඛිතො අත්තා. කිඤ්චාපි තෙ නෙව හත්ථිකායො රක්ඛෙය්ය, න අස්සකායො රක්ඛෙය්ය, න රථකායො රක්ඛෙය්ය, න පත්තිකායො රක්ඛෙය්ය; අථ ඛො තෙසං රක්ඛිතො අත්තා. තං කිස්ස හෙතු? අජ්ඣත්තිකා හෙසා, මහාරාජ, රක්ඛා, නෙසා රක්ඛා බාහිරා; තස්මා තෙසං රක්ඛිතො අත්තා’’ති. ඉදමවොච…පෙ… "हे अगदी तसेच आहे, महाराज! हे अगदी तसेच आहे, महाराज! महाराज, जे कोणी शरीराने दुराचरण करतात... आणि पुढे... त्यांनी स्वतःला असुरक्षित ठेवले आहे. त्याचे कारण काय? कारण महाराज, हे रक्षण बाह्य आहे, आंतरिक नाही; म्हणून ते स्वतः असुरक्षितच असतात. महाराज, जे कोणी शरीराने सदाचरण करतात, वाणीने सदाचरण करतात, मनाने सदाचरण करतात; त्यांनी स्वतःचे रक्षण केले आहे. जरी हत्तींचे सैन्य, घोड्यांचे सैन्य, रथांचे सैन्य किंवा पायदळ सैन्य त्यांचे रक्षण करत नसले, तरीही ते स्वतः सुरक्षितच असतात. त्याचे कारण काय? कारण महाराज, हे रक्षण आंतरिक आहे, बाह्य नाही; म्हणून त्यांनी स्वतःचे रक्षण केले आहे." भगवंत असे म्हणाले... आणि पुढे... ‘‘කායෙන සංවරො සාධු, සාධු වාචාය සංවරො; මනසා සංවරො සාධු, සාධු සබ්බත්ථ සංවරො; සබ්බත්ථ සංවුතො ලජ්ජී, රක්ඛිතොති පවුච්චතී’’ති. "शरीरावर संयम ठेवणे चांगले आहे, वाणीवर संयम ठेवणेही चांगले आहे; मनावर संयम ठेवणे चांगले आहे, सर्व बाबतीत संयम ठेवणे चांगले आहे; जो सर्व बाबतीत संयमित आणि लज्जाशील आहे, त्यालाच 'सुरक्षित' म्हटले जाते." 6. අප්පකසුත්තං ६. "अल्पक सुत्त" 117. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං නිසින්නො ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘ඉධ මය්හං, භන්තෙ, රහොගතස්ස පටිසල්ලීනස්ස එවං චෙතසො පරිවිතක්කො උදපාදි – ‘අප්පකා තෙ සත්තා ලොකස්මිං යෙ උළාරෙ උළාරෙ භොගෙ ලභිත්වා න චෙව මජ්ජන්ති, න ච පමජ්ජන්ති, න ච කාමෙසු ගෙධං ආපජ්ජන්ති, න ච සත්තෙසු විප්පටිපජ්ජන්ති. අථ ඛො එතෙව බහුතරා සත්තා ලොකස්මිං යෙ උළාරෙ උළාරෙ භොගෙ ලභිත්වා මජ්ජන්ති චෙව පමජ්ජන්ති, ච කාමෙසු ච ගෙධං ආපජ්ජන්ති, සත්තෙසු ච විප්පටිපජ්ජන්තී’’’ති. ११७. श्रावस्ती येथील प्रसंग. एका बाजूला बसलेले कोसल नरेश प्रसेनजित भगवंतांना म्हणाले – "भंते, येथे एकांतात ध्यानस्थ बसलो असताना माझ्या मनात असा विचार आला – 'या जगात असे फार थोडे लोक आहेत जे विपुल संपत्ती मिळवूनही गर्विष्ठ होत नाहीत, गाफील होत नाहीत, कामभोगांच्या आहारी जात नाहीत आणि इतर प्राण्यांवर अन्याय करत नाहीत. याउलट, या जगात असेच लोक बहुसंख्येने आहेत जे विपुल संपत्ती मिळवून मदांध होतात, गाफील होतात, कामभोगांच्या आहारी जातात आणि इतर प्राण्यांवर अन्याय करतात.'" ‘‘එවමෙතං, මහාරාජ, එවමෙතං, මහාරාජ! අප්පකා තෙ, මහාරාජ, සත්තා ලොකස්මිං, යෙ උළාරෙ උළාරෙ භොගෙ ලභිත්වා න චෙව මජ්ජන්ති, න ච පමජ්ජන්ති, න ච කාමෙසු ගෙධං ආපජ්ජන්ති, න ච සත්තෙසු විප්පටිපජ්ජන්ති. අථ ඛො එතෙව බහුතරා සත්තා ලොකස්මිං, යෙ උළාරෙ උළාරෙ භොගෙ ලභිත්වා [Pg.74] මජ්ජන්ති චෙව පමජ්ජන්ති ච කාමෙසු ච ගෙධං ආපජ්ජන්ති, සත්තෙසු ච විප්පටිපජ්ජන්තී’’ති. ඉදමවොච…පෙ… तसेच आहे, महाराज! तसेच आहे, महाराज! या जगात असे प्राणी फार थोडे आहेत, महाराज, जे विपुल आणि उत्कृष्ट भोग प्राप्त करूनही मदांध होत नाहीत, प्रमाद करत नाहीत, कामभोगांमध्ये आसक्त होत नाहीत आणि इतर प्राण्यांशी गैरवर्तन करत नाहीत. याउलट, या जगात असेच प्राणी बहुसंख्येने आहेत, जे विपुल आणि उत्कृष्ट भोग प्राप्त करून मदांध होतात, प्रमाद करतात, कामभोगांमध्ये आसक्त होतात आणि इतर प्राण्यांशी गैरवर्तन करतात. भगवंतांनी असे म्हटले... ‘‘සාරත්තා කාමභොගෙසු, ගිද්ධා කාමෙසු මුච්ඡිතා; අතිසාරං න බුජ්ඣන්ති, මිගා කූටංව ඔඩ්ඩිතං; පච්ඡාසං කටුකං හොති, විපාකො හිස්ස පාපකො’’ති. जे कामभोगांमध्ये अतिशय आसक्त आहेत, कामवासनांनी ग्रस्त आणि मोहित झाले आहेत, त्यांना आपल्या अतिरेकाचे भान राहत नाही; ज्याप्रमाणे सापळ्यात अडकणारे हरीण त्या सापळ्याला ओळखत नाही. त्यांच्यासाठी याचा परिणाम नंतर अत्यंत कडू होतो, कारण त्यांच्या या कर्माचा विपाक वाईट असतो. 7. අඩ්ඩකරණසුත්තං ७. अढकरण सुत्त 118. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං නිසින්නො ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘ඉධාහං, භන්තෙ, අඩ්ඩකරණෙ නිසින්නො පස්සාමි ඛත්තියමහාසාලෙපි බ්රාහ්මණමහාසාලෙපි ගහපතිමහාසාලෙපි අඩ්ඪෙ මහද්ධනෙ මහාභොගෙ පහූතජාතරූපරජතෙ පහූතවිත්තූපකරණෙ පහූතධනධඤ්ඤෙ කාමහෙතු කාමනිදානං කාමාධිකරණං සම්පජානමුසා භාසන්තෙ. තස්ස මය්හං, භන්තෙ, එතදහොසි – ‘අලං දානි මෙ අඩ්ඩකරණෙන, භද්රමුඛො දානි අඩ්ඩකරණෙන පඤ්ඤායිස්සතී’’’ති. ११८. श्रावस्ती येथील घटना. एका बाजूला बसलेले कोसलचा राजा प्रसेनजित भगवंतांना म्हणाले – 'भंते, आज मी न्यायालयात बसलो असताना पाहिले की, क्षत्रिय महाशाल, ब्राह्मण महाशाल आणि गृहपती महाशाल, जे अत्यंत श्रीमंत, महाधनी, महाभोगी, विपुल सोने-चांदी असलेले, विपुल साधनसंपत्ती असलेले आणि विपुल धनधान्य असलेले आहेत, ते केवळ कामभोगांच्या कारणास्तव, कामभोगांच्या निमित्ताने आणि कामभोगांच्या आधारावर जाणूनबुजून असत्य बोलतात. भंते, तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला – आता मला या न्यायालयाच्या कामाची काही गरज नाही. आता भद्रमुख न्यायालयात न्यायनिवाडा करण्यासाठी प्रसिद्ध होईल.' ‘‘(එවමෙතං, මහාරාජ, එවමෙතං මහාරාජ!) යෙපි තෙ, මහාරාජ, ඛත්තියමහාසාලා බ්රාහ්මණමහාසාලා ගහපතිමහාසාලා අඩ්ඪා මහද්ධනා මහාභොගා පහූතජාතරූපරජතා පහූතවිත්තූපකරණා පහූතධනධඤ්ඤා කාමහෙතු කාමනිදානං කාමාධිකරණං සම්පජානමුසා භාසන්ති; තෙසං තං භවිස්සති දීඝරත්තං අහිතාය දුක්ඛායා’’ති. ඉදමවොච…පෙ… तसेच आहे, महाराज! तसेच आहे, महाराज! जे क्षत्रिय महाशाल, ब्राह्मण महाशाल आणि गृहपती महाशाल अत्यंत श्रीमंत, महाधनी, महाभोगी, विपुल सोने-चांदी असलेले, विपुल साधनसंपत्ती असलेले आणि विपुल धनधान्य असलेले आहेत, ते कामभोगांच्या कारणास्तव, कामभोगांच्या निमित्ताने आणि कामभोगांच्या आधारावर जाणूनबुजून असत्य बोलतात; त्यांचे ते असत्य बोलणे दीर्घकाळापर्यंत त्यांच्या अहितासाठी आणि दुःखासाठी ठरेल. भगवंतांनी असे म्हटले... ‘‘සාරත්තා කාමභොගෙසු, ගිද්ධා කාමෙසු මුච්ඡිතා; අතිසාරං න බුජ්ඣන්ති, මච්ඡා ඛිප්පංව ඔඩ්ඩිතං; පච්ඡාසං කටුකං හොති, විපාකො හිස්ස පාපකො’’ති. जे कामभोगांमध्ये अतिशय आसक्त आहेत, कामवासनांनी ग्रस्त आणि मोहित झाले आहेत, त्यांना आपल्या अतिरेकाचे भान राहत नाही; ज्याप्रमाणे जाळ्यात अडकणारे मासे त्या पसरलेल्या जाळ्याला ओळखत नाहीत. त्यांच्यासाठी याचा परिणाम नंतर अत्यंत कडू होतो, कारण त्यांच्या या कर्माचा विपाक वाईट असतो. 8. මල්ලිකාසුත්තං ८. मल्लिका सुत्त 119. සාවත්ථිනිදානං. තෙන ඛො පන සමයෙන රාජා පසෙනදි කොසලො මල්ලිකාය දෙවියා සද්ධිං උපරිපාසාදවරගතො හොති. අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො මල්ලිකං දෙවිං එතදවොච – ‘‘අත්ථි නු ඛො තෙ, මල්ලිකෙ, කොචඤ්ඤො අත්තනා පියතරො’’ති? ‘‘නත්ථි ඛො මෙ, මහාරාජ, කොචඤ්ඤො අත්තනා පියතරො. තුය්හං පන, මහාරාජ, අත්ථඤ්ඤො [Pg.75] කොචි අත්තනා පියතරො’’ති? ‘‘මය්හම්පි ඛො, මල්ලිකෙ, නත්ථඤ්ඤො කොචි අත්තනා පියතරො’’ති. ११९. श्रावस्ती येथील घटना. त्या वेळी कोसलचा राजा प्रसेनजित राणी मल्लिका हिच्यासोबत राजवाड्याच्या वरच्या मजल्यावर गेला होता. तेव्हा राजा प्रसेनजितने राणी मल्लिकाला विचारले – 'मल्लिका, तुला स्वतःपेक्षा अधिक प्रिय असलेली दुसरी कोणतीही व्यक्ती आहे का?' 'महाराज, मला स्वतःपेक्षा अधिक प्रिय असलेली दुसरी कोणतीही व्यक्ती नाही. पण महाराज, तुम्हाला स्वतःपेक्षा अधिक प्रिय असलेली दुसरी कोणतीही व्यक्ती आहे का?' 'मल्लिका, माझ्यासाठीही स्वतःपेक्षा अधिक प्रिय असलेली दुसरी कोणतीही व्यक्ती नाही.' අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො පාසාදා ඔරොහිත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘ඉධාහං, භන්තෙ, මල්ලිකාය දෙවියා සද්ධිං උපරිපාසාදවරගතො මල්ලිකං දෙවිං එතදවොචං – ‘අත්ථි නු ඛො තෙ, මල්ලිකෙ, කොචඤ්ඤො අත්තනා පියතරො’ති? එවං වුත්තෙ, භන්තෙ, මල්ලිකා දෙවී මං එතදවොච – ‘නත්ථි ඛො මෙ, මහාරාජ, කොචඤ්ඤො අත්තනා පියතරො. තුය්හං පන, මහාරාජ, අත්ථඤ්ඤො කොචි අත්තනා පියතරො’ති? එවං වුත්තාහං, භන්තෙ, මල්ලිකං දෙවිං එතදවොචං – ‘මය්හම්පි ඛො, මල්ලිකෙ, නත්ථඤ්ඤො කොචි අත්තනා පියතරො’’ති. त्यानंतर कोसलचा राजा प्रसेनजित राजवाड्यातून खाली उतरला आणि जेथे भगवंत होते तेथे गेला. जवळ जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या राजा प्रसेनजितने भगवंतांना सांगितले – 'भंते, मी राणी मल्लिका हिच्यासोबत राजवाड्याच्या वरच्या मजल्यावर असताना राणी मल्लिकाला विचारले – मल्लिका, तुला स्वतःपेक्षा अधिक प्रिय असलेली दुसरी कोणतीही व्यक्ती आहे का? असे विचारल्यावर, भंते, राणी मल्लिका मला म्हणाली – महाराज, मला स्वतःपेक्षा अधिक प्रिय असलेली दुसरी कोणतीही व्यक्ती नाही. पण महाराज, तुम्हाला स्वतःपेक्षा अधिक प्रिय असलेली दुसरी कोणतीही व्यक्ती आहे का? भंते, असे विचारल्यावर मी राणी मल्लिकाला सांगितले – मल्लिका, माझ्यासाठीही स्वतःपेक्षा अधिक प्रिय असलेली दुसरी कोणतीही व्यक्ती नाही.' අථ ඛො භගවා එතමත්ථං විදිත්වා තායං වෙලායං ඉමං ගාථං අභාසි – तेव्हा भगवंतांनी ही बाब जाणून घेऊन त्या वेळी ही गाथा म्हटली – ‘‘සබ්බා දිසා අනුපරිගම්ම චෙතසා,නෙවජ්ඣගා පියතරමත්තනා ක්වචි; එවං පියො පුථු අත්තා පරෙසං,තස්මා න හිංසෙ පරමත්තකාමො’’ති. मनाने सर्व दिशांचा शोध घेतला तरी स्वतःपेक्षा अधिक प्रिय असलेली व्यक्ती कुठेही आढळत नाही. त्याचप्रमाणे, इतर सर्व प्राण्यांनाही स्वतःचा जीव अत्यंत प्रिय असतो; म्हणून ज्याला स्वतःचे कल्याण हवे आहे, त्याने दुसऱ्या कोणालाही इजा करू नये. 9. යඤ්ඤසුත්තං ९. यज्ञ सुत्त 120. සාවත්ථිනිදානං. තෙන ඛො පන සමයෙන රඤ්ඤො පසෙනදිස්ස කොසලස්ස මහායඤ්ඤො පච්චුපට්ඨිතො හොති, පඤ්ච ච උසභසතානි පඤ්ච ච වච්ඡතරසතානි පඤ්ච ච වච්ඡතරිසතානි පඤ්ච ච අජසතානි පඤ්ච ච උරබ්භසතානි ථූණූපනීතානි හොන්ති යඤ්ඤත්ථාය. යෙපිස්ස තෙ හොන්ති දාසාති වා පෙස්සාති වා කම්මකරාති වා, තෙපි දණ්ඩතජ්ජිතා භයතජ්ජිතා අස්සුමුඛා රුදමානා පරිකම්මානි කරොන්ති. १२०. श्रावस्ती येथील घटना. त्या वेळी कोसलचा राजा प्रसेनजित याने एका मोठ्या यज्ञाचे आयोजन केले होते. यज्ञासाठी पाचशे बैल, पाचशे खोंड, पाचशे कालवडी, पाचशे बकरे आणि पाचशे मेंढे यज्ञाच्या खांबाला बांधले होते. त्याचे जे दास, सेवक आणि कामगार होते, तेही शिक्षेच्या आणि भयाने घाबरलेले, डोळ्यात अश्रू आणून रडत रडत यज्ञाची कामे करत होते. අථ ඛො සම්බහුලා භික්ඛූ පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය සාවත්ථිං පිණ්ඩාය පවිසිංසු. සාවත්ථියං පිණ්ඩාය චරිත්වා පච්ඡාභත්තං පිණ්ඩපාතපටික්කන්තා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදිංසු. එකමන්තං නිසින්නො ඛො තෙ භික්ඛූ භගවන්තං එතදවොචුං – ‘‘ඉධ, භන්තෙ, රඤ්ඤො පසෙනදිස්ස කොසලස්ස මහායඤ්ඤො පච්චුපට්ඨිතො [Pg.76] හොති, පඤ්ච ච උසභසතානි පඤ්ච ච වච්ඡතරසතානි පඤ්ච ච වච්ඡතරිසතානි පඤ්ච ච අජසතානි පඤ්ච ච උරබ්භසතානි ථූණූපනීතානි හොන්ති යඤ්ඤත්ථාය. යෙපිස්ස තෙ හොන්ති දාසාති වා පෙස්සාති වා කම්මකරාති වා, තෙපි දණ්ඩතජ්ජිතා භයතජ්ජිතා අස්සුමුඛා රුදමානා පරිකම්මානි කරොන්තී’’ති. त्यानंतर अनेक भिक्खू सकाळच्या वेळी चिवर परिधान करून, पात्र व चिवर घेऊन श्रावस्तीमध्ये पिंडपातासाठी गेले. श्रावस्तीमध्ये भिक्षेसाठी फिरून आल्यावर, भोजनोत्तर पिंडपातावरून परतलेले ते भिक्खू जेथे भगवंत होते तेथे गेले. जवळ जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेले ते भिक्खू भगवंतांना म्हणाले – 'भंते, येथे कोसलचा राजा प्रसेनजित याने एका मोठ्या यज्ञाचे आयोजन केले आहे. यज्ञासाठी पाचशे बैल, पाचशे खोंड, पाचशे कालवडी, पाचशे बकरे आणि पाचशे मेंढे यज्ञाच्या खांबाला बांधले आहेत. त्याचे जे दास, सेवक आणि कामगार आहेत, तेही शिक्षेच्या आणि भयाने घाबरलेले, डोळ्यात अश्रू आणून रडत रडत यज्ञाची कामे करत आहेत.' අථ ඛො භගවා එතමත්ථං විදිත්වා තායං වෙලායං ඉමා ගාථායො අභාසි – तेव्हा भगवंतांनी ही बाब जाणून घेऊन त्या वेळी या गाथा म्हटल्या – ‘‘අස්සමෙධං පුරිසමෙධං, සම්මාපාසං වාජපෙය්යං නිරග්ගළ්හං; මහායඤ්ඤා මහාරම්භා, න තෙ හොන්ති මහප්ඵලා. अश्वमेध, पुरुषमेध, सम्मापास, वाजपेय आणि निरग्गल – हे मोठे आणि हिंसेने युक्त असलेले यज्ञ मोठे फळ देणारे ठरत नाहीत. ‘‘අජෙළකා ච ගාවො ච, විවිධා යත්ථ හඤ්ඤරෙ; න තං සම්මග්ගතා යඤ්ඤං, උපයන්ති මහෙසිනො. ज्या यज्ञांमध्ये शेळ्या, मेंढ्या आणि गाई अशा विविध प्राण्यांची हत्या केली जाते, अशा यज्ञाकडे सन्मार्गावर चालणारे महर्षी जात नाहीत. ‘‘යෙ ච යඤ්ඤා නිරාරම්භා, යජන්ති අනුකුලං සදා; අජෙළකා ච ගාවො ච, විවිධා නෙත්ථ හඤ්ඤරෙ; එතං සම්මග්ගතා යඤ්ඤං, උපයන්ති මහෙසිනො. परंतु जे यज्ञ हिंसेशिवाय असतात, जे कुळाच्या परंपरेनुसार नेहमी दिले जातात, जेथे शेळ्या, मेंढ्या आणि गाई अशा विविध प्राण्यांची हत्या केली जात नाही; अशा यज्ञाकडे सन्मार्गावर चालणारे महर्षी जातात. ‘‘එතං යජෙථ මෙධාවී, එසො යඤ්ඤො මහප්ඵලො; එතඤ්හි යජමානස්ස, සෙය්යො හොති න පාපියො; යඤ්ඤො ච විපුලො හොති, පසීදන්ති ච දෙවතා’’ති. बुद्धिमान माणसाने असाच यज्ञ करावा, हा यज्ञ मोठे फळ देणारा असतो. असा यज्ञ करणाऱ्याचे कल्याणच होते, अहित होत नाही. हा यज्ञ खरोखरच महान आहे आणि यामुळे देवही प्रसन्न होतात. 10. බන්ධනසුත්තං १०. बंधन सुत्त 121. තෙන ඛො පන සමයෙන රඤ්ඤා පසෙනදිනා කොසලෙන මහාජනකායො බන්ධාපිතො හොති, අප්පෙකච්චෙ රජ්ජූහි අප්පෙකච්චෙ අන්දූහි අප්පෙකච්චෙ සඞ්ඛලිකාහි. १२१. त्या वेळी कोसलचा राजा प्रसेनजित याने अनेक लोकांना बंधनात ठेवले होते – काहींना दोऱ्यांनी, काहींना बेड्यांनी तर काहींना लोखंडी साखळ्यांनी बांधले होते. අථ ඛො සම්බහුලා භික්ඛූ පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය සාවත්ථිං පිණ්ඩාය පවිසිංසු. සාවත්ථියං පිණ්ඩාය චරිත්වා පච්ඡාභත්තං පිණ්ඩපාතපටික්කන්තා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදිංසු. එකමන්තං නිසින්නා ඛො තෙ භික්ඛූ භගවන්තං එතදවොචුං – ‘‘ඉධ, භන්තෙ, රඤ්ඤා පසෙනදිනා කොසලෙන මහාජනකායො බන්ධාපිතො, අප්පෙකච්චෙ රජ්ජූහි අප්පෙකච්චෙ අන්දූහි අප්පෙකච්චෙ සඞ්ඛලිකාහී’’ති. त्यानंतर, सकाळी अनेक भिक्खू वस्त्रे परिधान करून, पात्र व चीवर घेऊन श्रावस्तीमध्ये भिक्षेसाठी प्रविष्ट झाले. श्रावस्तीमध्ये भिक्षेसाठी हिंडून आल्यावर, भोजनोत्तर भिक्षाटनाहून परतल्यावर ते भगवंतांकडे गेले; तिथे जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेले ते भिक्खू भगवंतांना म्हणाले – “भंते, येथे कोसलचा राजा पसेनदी याने अनेक लोकांना बंधनात टाकले आहे, काहींना दोऱ्यांनी, काहींना बेड्यांनी तर काहींना साखळदंडांनी बांधले आहे.” අථ [Pg.77] ඛො භගවා එතමත්ථං විදිත්වා තායං වෙලායං ඉමා ගාථායො අභාසි – त्यानंतर भगवंतांनी ही बाब जाणून घेऊन त्या वेळी या गाथा म्हटल्या – ‘‘න තං දළ්හං බන්ධනමාහු ධීරා,යදායසං දාරුජං පබ්බජඤ්ච; සාරත්තරත්තා මණිකුණ්ඩලෙසු,පුත්තෙසු දාරෙසු ච යා අපෙක්ඛා. “जे लोखंडाचे, लाकडाचे किंवा दोरीचे बनलेले असते, त्याला ज्ञानी लोक मजबूत बंधन म्हणत नाहीत; परंतु मणिकुंडलांविषयी (दागिन्यांबद्दल) आणि मुले व पत्नी यांच्याविषयी जी तीव्र आसक्ती व ओढ असते, ‘‘එතං දළ්හං බන්ධනමාහු ධීරා,ඔහාරිනං සිථිලං දුප්පමුඤ්චං; එතම්පි ඡෙත්වාන පරිබ්බජන්ති,අනපෙක්ඛිනො කාමසුඛං පහායා’’ති. त्यालाच ज्ञानी लोक मजबूत बंधन म्हणतात, जे खाली खेचणारे (अधोगतीला नेणारे), सैल वाटणारे पण सुटण्यास कठीण असते. या बंधनालाही तोडून, कोणतीही आसक्ती न ठेवता, कामसुखाचा त्याग करून लोक गृहत्याग (प्रव्रज्या) करतात.” පඨමො වග්ගො. पहिला वर्ग. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – දහරො පුරිසො ජරා, පියං අත්තානරක්ඛිතො; අප්පකා අඩ්ඩකරණං, මල්ලිකා යඤ්ඤබන්ධනන්ති. दहर, पुरिस, जरा, पिय, अत्तारक्खित, अप्पक, अढकरण, मल्लिका आणि यञ्ञबंधन. 2. දුතියවග්ගො २. दुसरा वर्ग 1. සත්තජටිලසුත්තං १. सत्तजटिल सुत्त (सात जटाधारी संन्यासी) 122. එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති පුබ්බාරාමෙ මිගාරමාතුපාසාදෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා සායන්හසමයං පටිසල්ලානා වුට්ඨිතො බහිද්වාරකොට්ඨකෙ නිසින්නො හොති. අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. १२२. एकदा भगवंत श्रावस्तीमध्ये पूर्वाराम येथील मिगारमाता प्रासादात विहार करत होते. त्या वेळी भगवंत संध्याकाळच्या वेळी ध्यानसाधनेतून उठून बाहेरील प्रवेशद्वाराजवळ बसले होते. तेव्हा कोसलचा राजा पसेनदी भगवंतांकडे आला; तिथे येऊन त्याने भगवंतांना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला बसला. තෙන ඛො පන සමයෙන සත්ත ච ජටිලා සත්ත ච නිගණ්ඨා සත්ත ච අචෙලකා සත්ත ච එකසාටකා සත්ත ච පරිබ්බාජකා පරූළ්හකච්ඡනඛලොමා ඛාරිවිවිධමාදාය භගවතො අවිදූරෙ අතික්කමන්ති. අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො උට්ඨායාසනා එකංසං උත්තරාසඞ්ගං කරිත්වා දක්ඛිණජාණුමණ්ඩලං [Pg.78] පථවියං නිහන්ත්වා යෙන තෙ සත්ත ච ජටිලා සත්ත ච නිගණ්ඨා සත්ත ච අචෙලකා සත්ත ච එකසාටකා සත්ත ච පරිබ්බාජකා තෙනඤ්ජලිං පණාමෙත්වා තික්ඛත්තුං නාමං සාවෙසි – ‘‘රාජාහං, භන්තෙ, පසෙනදි කොසලො…පෙ… රාජාහං, භන්තෙ, පසෙනදි කොසලො’’ති. त्या वेळी सात जटाधारी (जटिल), सात निगंठ (जैन मुनी), सात अचेलक (नग्न संन्यासी), सात एकशाटक (एकच वस्त्र परिधान करणारे) आणि सात परिव्राजक, ज्यांच्या काखेतील केस, नखे आणि अंगावरील केस वाढलेले होते, ते आपले विविध सामान घेऊन भगवंतांच्या जवळून जात होते. तेव्हा कोसलचा राजा पसेनदी आपल्या आसनावरून उठला, त्याने आपले उपरणे एका खांद्यावर घेतले, आपला उजवा गुडघा जमिनीवर टेकवला आणि त्या सात जटाधारी, सात निगंठ, सात अचेलक, सात एकशाटक व सात परिव्राजकांकडे हात जोडून तीन वेळा आपले नाव घोषित केले – “भंते, मी कोसलचा राजा पसेनदी आहे! ... भंते, मी कोसलचा राजा पसेनदी आहे!” අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො අචිරපක්කන්තෙසු තෙසු සත්තසු ච ජටිලෙසු සත්තසු ච නිගණ්ඨෙසු සත්තසු ච අචෙලකෙසු සත්තසු ච එකසාටකෙසු සත්තසු ච පරිබ්බාජකෙසු යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘යෙ තෙ, භන්තෙ, ලොකෙ අරහන්තො වා අරහත්තමග්ගං වා සමාපන්නා එතෙ තෙසං අඤ්ඤතරා’’ති. त्यानंतर, ते सात जटाधारी, सात निगंठ, सात अचेलक, सात एकशाटक आणि सात परिव्राजक निघून गेल्यावर थोड्याच वेळात कोसलचा राजा पसेनदी भगवंतांकडे आला; तिथे येऊन त्याने भगवंतांना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या कोसलच्या राजा पसेनदीने भगवंतांना विचारले – “भंते, या जगात जे अर्हत आहेत किंवा ज्यांनी अर्हतपदाचा मार्ग प्राप्त केला आहे, हे लोक त्यांपैकीच काही आहेत का?” ‘‘දුජ්ජානං ඛො එතං, මහාරාජ, තයා ගිහිනා කාමභොගිනා පුත්තසම්බාධසයනං අජ්ඣාවසන්තෙන කාසිකචන්දනං පච්චනුභොන්තෙන මාලාගන්ධවිලෙපනං ධාරයන්තෙන ජාතරූපරජතං සාදියන්තෙන – ‘ඉමෙ වා අරහන්තො, ඉමෙ වා අරහත්තමග්ගං සමාපන්නා’’’ති. “महाराज, तुम्ही गृहस्थ आहात, कामभोगांचा उपभोग घेणारे आहात, मुलाबाळांनी भरलेल्या घरात राहणारे आहात, काशीच्या चंदनाचा वापर करणारे आहात, पुष्पमाला, सुगंधी द्रव्ये व उटणे लावणारे आहात आणि सोने-चांदी स्वीकारणारे आहात; अशा तुमच्यासाठी ‘हे अर्हत आहेत किंवा यांनी अर्हतपदाचा मार्ग प्राप्त केला आहे’ हे जाणून घेणे कठीणच आहे. ‘‘සංවාසෙන ඛො, මහාරාජ, සීලං වෙදිතබ්බං. තඤ්ච ඛො දීඝෙන අද්ධුනා, න ඉත්තරං; මනසිකරොතා, නො අමනසිකරොතා; පඤ්ඤවතා, නො දුප්පඤ්ඤෙන. සංවොහාරෙන ඛො, මහාරාජ, සොචෙය්යං වෙදිතබ්බං. තඤ්ච ඛො දීඝෙන අද්ධුනා, න ඉත්තරං; මනසිකරොතා, නො අමනසිකරොතා; පඤ්ඤවතා, නො දුප්පඤ්ඤෙන. ආපදාසු ඛො, මහාරාජ, ථාමො වෙදිතබ්බො. සො ච ඛො දීඝෙන අද්ධුනා, න ඉත්තරං; මනසිකරොතා, නො අමනසිකරොතා; පඤ්ඤවතා, නො දුප්පඤ්ඤෙන. සාකච්ඡාය, ඛො, මහාරාජ, පඤ්ඤා වෙදිතබ්බා. සා ච ඛො දීඝෙන අද්ධුනා, න ඉත්තරං; මනසිකරොතා, නො අමනසිකරොතා; පඤ්ඤවතා, නො දුප්පඤ්ඤෙනා’’ති. महाराज, एकत्र राहिल्यानेच एखाद्याचे शील (नैतिक आचरण) समजते; आणि तेही दीर्घकाळ एकत्र राहिल्यावरच समजते, थोड्या काळात नाही; लक्षपूर्वक निरीक्षण करणाऱ्यालाच ते समजते, दुर्लक्ष करणाऱ्याला नाही; आणि प्रज्ञावंतालाच ते समजते, मतिमंदाला नाही. महाराज, व्यवहारावरूनच एखाद्याची प्रामाणिकता समजते; आणि तीही दीर्घकाळ व्यवहार केल्यावरच समजते, थोड्या काळात नाही; लक्षपूर्वक निरीक्षण करणाऱ्यालाच ती समजते, दुर्लक्ष करणाऱ्याला नाही; आणि प्रज्ञावंतालाच ती समजते, मतिमंदाला नाही. महाराज, संकटाच्या वेळीच एखाद्याचे धैर्य (मनोबल) समजते; आणि तेही दीर्घकाळातच समजते, थोड्या काळात नाही; लक्षपूर्वक निरीक्षण करणाऱ्यालाच ते समजते, दुर्लक्ष करणाऱ्याला नाही; आणि प्रज्ञावंतालाच ते समजते, मतिमंदाला नाही. महाराज, संभाषणातूनच एखाद्याची प्रज्ञा समजते; आणि तीही दीर्घकाळ चर्चा केल्यावरच समजते, थोड्या काळात नाही; लक्षपूर्वक निरीक्षण करणाऱ्यालाच ती समजते, दुर्लक्ष करणाऱ्याला नाही; आणि प्रज्ञावंतालाच ती समजते, मतिमंदाला नाही.” ‘‘අච්ඡරියං, භන්තෙ, අබ්භුතං භන්තෙ! යාව සුභාසිතමිදං, භන්තෙ, භගවතා – ‘දුජ්ජානං ඛො එතං, මහාරාජ, තයා ගිහිනා කාමභොගිනා පුත්තසම්බාධසයනං අජ්ඣාවසන්තෙන කාසිකචන්දනං පච්චනුභොන්තෙන මාලාගන්ධවිලෙපනං ධාරයන්තෙන ජාතරූපරජතං සාදියන්තෙන – ඉමෙ වා අරහන්තො, ඉමෙ වා අරහත්තමග්ගං සමාපන්නා’ති. සංවාසෙන ඛො, මහාරාජ, සීලං වෙදිතබ්බං. තඤ්ච ඛො දීඝෙන අද්ධුනා, න ඉත්තරං; මනසිකරොතා, නො අමනසිකරොතා; පඤ්ඤවතා, නො දුප්පඤ්ඤෙන. සංවොහාරෙන ඛො මහාරාජ[Pg.79], සොචෙය්යං වෙදිතබ්බං. තඤ්ච ඛො දීඝෙන අද්ධුනා, න ඉත්තරං; මනසිකරොතා, නො අමනසිකරොතා; පඤ්ඤවතා, නො දුප්පඤ්ඤෙන. ආපදාසු ඛො, මහාරාජ, ථාමො වෙදිතබ්බො. සො ච ඛො දීඝෙන අද්ධුනා, න ඉත්තරං; මනසිකරොතා, නො අමනසිකරොතා; පඤ්ඤවතා, නො දුප්පඤ්ඤෙන. සාකච්ඡාය ඛො, මහාරාජ, පඤ්ඤා වෙදිතබ්බා. සා ච ඛො දීඝෙන අද්ධුනා, න ඉත්තරං; මනසිකරොතා, නො අමනසිකරොතා; පඤ්ඤවතා, නො දුප්පඤ්ඤෙනා’’ති. “आश्चर्यकारक आहे भंते, अद्भुत आहे भंते! भगवंतांनी किती सुंदर सांगितले आहे – ‘महाराज, तुम्ही गृहस्थ आहात, कामभोगांचा उपभोग घेणारे आहात, मुलाबाळांनी भरलेल्या घरात राहणारे आहात, काशीच्या चंदनाचा वापर करणारे आहात, पुष्पमाला, सुगंधी द्रव्ये व उटणे लावणारे आहात आणि सोने-चांदी स्वीकारणारे आहात; अशा तुमच्यासाठी ‘हे अर्हत आहेत किंवा यांनी अर्हतपदाचा मार्ग प्राप्त केला आहे’ हे जाणून घेणे कठीणच आहे. महाराज, एकत्र राहिल्यानेच एखाद्याचे शील समजते; आणि तेही दीर्घकाळ एकत्र राहिल्यावरच समजते, थोड्या काळात नाही; लक्षपूर्वक निरीक्षण करणाऱ्यालाच ते समजते, दुर्लक्ष करणाऱ्याला नाही; आणि प्रज्ञावंतालाच ते समजते, मतिमंदाला नाही. महाराज, व्यवहारावरूनच एखाद्याची प्रामाणिकता समजते; आणि तीही दीर्घकाळ व्यवहार केल्यावरच समजते, थोड्या काळात नाही; लक्षपूर्वक निरीक्षण करणाऱ्यालाच ती समजते, दुर्लक्ष करणाऱ्याला नाही; आणि प्रज्ञावंतालाच ती समजते, मतिमंदाला नाही. महाराज, संकटाच्या वेळीच एखाद्याचे धैर्य समजते; आणि तेही दीर्घकाळातच समजते, थोड्या काळात नाही; लक्षपूर्वक निरीक्षण करणाऱ्यालाच ते समजते, दुर्लक्ष करणाऱ्याला नाही; आणि प्रज्ञावंतालाच ते समजते, मतिमंदाला नाही. महाराज, संभाषणातूनच एखाद्याची प्रज्ञा समजते; आणि तीही दीर्घकाळ चर्चा केल्यावरच समजते, थोड्या काळात नाही; लक्षपूर्वक निरीक्षण करणाऱ्यालाच ती समजते, दुर्लक्ष करणाऱ्याला नाही; आणि प्रज्ञावंतालाच ती समजते, मतिमंदाला नाही.’” ‘‘එතෙ, භන්තෙ, මම පුරිසා චරා ඔචරකා ජනපදං ඔචරිත්වා ආගච්ඡන්ති. තෙහි පඨමං ඔචිණ්ණං අහං පච්ඡා ඔසාපයිස්සාමි. ඉදානි තෙ, භන්තෙ, තං රජොජල්ලං පවාහෙත්වා සුන්හාතා සුවිලිත්තා කප්පිතකෙසමස්සූ ඔදාතවත්ථා පඤ්චහි කාමගුණෙහි සමප්පිතා සමඞ්ගීභූතා පරිචාරෙස්සන්තී’’ති. “भंते, हे माझे गुप्तहेर आहेत, जे देशात गुप्तपणे फिरून माहिती मिळवून परत आले आहेत. त्यांनी आधी माहिती गोळा केली आहे, आता मी नंतर त्यावर विचार करून निर्णय घेईन. भंते, आता ते आपल्या शरीरावरील धूळ व मळ धुवून टाकतील, स्वच्छ स्नान करतील, सुगंधी द्रव्ये लावतील, आपले केस व दाढी व्यवस्थित कापतील, पांढरी वस्त्रे परिधान करतील आणि पाच प्रकारच्या कामभोगांनी युक्त होऊन आनंद उपभोगतील.” අථ ඛො භගවා එතමත්ථං විදිත්වා තායං වෙලායං ඉමා ගාථායො අභාසි – त्यानंतर भगवंतांनी ही बाब जाणून घेऊन त्या वेळी या गाथा म्हटल्या – ‘‘න වණ්ණරූපෙන නරො සුජානො,න විස්සසෙ ඉත්තරදස්සනෙන; සුසඤ්ඤතානඤ්හි වියඤ්ජනෙන,අසඤ්ඤතා ලොකමිමං චරන්ති. “केवळ बाह्य रूपावरून माणसाची खरी ओळख पटत नाही, आणि क्षणभराच्या दर्शनाने कोणावरही विश्वास ठेवू नये. कारण, संयमी लोकांचे सोंग घेऊन असंयमी लोक या जगात वावरत असतात. ‘‘පතිරූපකො මත්තිකාකුණ්ඩලොව,ලොහඩ්ඪමාසොව සුවණ්ණඡන්නො; චරන්ති ලොකෙ පරිවාරඡන්නා,අන්තො අසුද්ධා බහි සොභමානා’’ති. ज्याप्रमाणे मातीचे बनवलेले कुंडल सोन्याच्या कुंडलासारखे दिसते, किंवा तांब्याचे नाणे सोन्याचा मुलामा चढवून सोन्यासारखे भासते; त्याचप्रमाणे आतून अपवित्र पण बाहेरून सुंदर दिसणारे लोक अनुयायांच्या घोळक्यात या जगात वावरत असतात.” 2. පඤ්චරාජසුත්තං २. पंचराज सुत्त 123. සාවත්ථිනිදානං. තෙන ඛො පන සමයෙන පඤ්චන්නං රාජූනං පසෙනදිපමුඛානං පඤ්චහි කාමගුණෙහි සමප්පිතානං සමඞ්ගීභූතානං පරිචාරයමානානං අයමන්තරාකථා උදපාදි – ‘‘කිං නු ඛො කාමානං අග්ග’’න්ති? තත්රෙකච්චෙ එවමාහංසු – ‘‘රූපා කාමානං අග්ග’’න්ති. එකච්චෙ එවමාහංසු [Pg.80] – ‘‘සද්දා කාමානං අග්ග’’න්ති. එකච්චෙ එවමාහංසු – ‘‘ගන්ධා කාමානං අග්ග’’න්ති. එකච්චෙ එවමාහංසු – ‘‘රසා කාමානං අග්ග’’න්ති. එකච්චෙ එවමාහංසු – ‘‘ඵොට්ඨබ්බා කාමානං අග්ග’’න්ති. යතො ඛො තෙ රාජානො නාසක්ඛිංසු අඤ්ඤමඤ්ඤං සඤ්ඤාපෙතුං. १२३. श्रावस्ती येथील प्रसंग. त्या वेळी राजा प्रसेनजितच्या नेतृत्वाखाली पाच राजे पाच कामगुणांनी (इंद्रियभोगांनी) युक्त, समृद्ध आणि त्यात रममाण झालेले असताना, त्यांच्यामध्ये असा संवाद सुरू झाला – "कामगुणांमध्ये सर्वात श्रेष्ठ काय आहे?" त्यांपैकी काही जण म्हणाले – "रूप हे कामगुणांमध्ये श्रेष्ठ आहे." काही जण म्हणाले – "शब्द हे कामगुणांमध्ये श्रेष्ठ आहे." काही जण म्हणाले – "गंध हे कामगुणांमध्ये श्रेष्ठ आहे." काही जण म्हणाले – "रस हे कामगुणांमध्ये श्रेष्ठ आहे." काही जण म्हणाले – "स्पर्श हे कामगुणांमध्ये श्रेष्ठ आहे." जेव्हा ते राजे एकमेकांचे मतपरिवर्तन करू शकले नाहीत (एकमेकांना पटवून देऊ शकले नाहीत), අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො තෙ රාජානො එතදවොච – ‘‘ආයාම, මාරිසා, යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිස්සාම; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං එතමත්ථං පටිපුච්ඡිස්සාම. යථා නො භගවා බ්යාකරිස්සති තථා නං ධාරෙස්සාමා’’ති. ‘‘එවං, මාරිසා’’ති ඛො තෙ රාජානො රඤ්ඤො පසෙනදිස්ස කොසලස්ස පච්චස්සොසුං. तेव्हा कोसलचा राजा प्रसेनजित त्या राजांना म्हणाला – "चला, मित्रांनो! आपण भगवंतांकडे जाऊ या. भगवंतांकडे जाऊन आपण त्यांना याविषयी विचारू या. भगवंत आपल्याला जसे उत्तर देतील, तसे आपण ते लक्षात ठेवू या." "ठीक आहे, मित्रांनो," असे म्हणून त्या राजांनी कोसलचा राजा प्रसेनजितच्या बोलण्याला संमती दिली. අථ ඛො තෙ පඤ්ච රාජානො පසෙනදිපමුඛා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදිංසු. එකමන්තං නිසින්නො ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘ඉධ, භන්තෙ, අම්හාකං පඤ්චන්නං රාජූනං පඤ්චහි කාමගුණෙහි සමප්පිතානං සමඞ්ගීභූතානං පරිචාරයමානානං අයමන්තරාකථා උදපාදි – ‘කිං නු ඛො කාමානං අග්ග’න්ති? එකච්චෙ එවමාහංසු – ‘රූපා කාමානං අග්ග’න්ති. එකච්චෙ එවමාහංසු – ‘සද්දා කාමානං අග්ග’න්ති. එකච්චෙ එවමාහංසු – ‘ගන්ධා කාමානං අග්ග’න්ති. එකච්චෙ එවමාහංසු – ‘රසා කාමානං අග්ග’න්ති. එකච්චෙ එවමාහංසු – ‘ඵොට්ඨබ්බා කාමානං අග්ග’න්ති. කිං නු ඛො, භන්තෙ, කාමානං අග්ග’’න්ති? त्यानंतर राजा प्रसेनजितच्या नेतृत्वाखाली ते पाच राजे भगवंतांकडे गेले. भगवंतांकडे जाऊन, त्यांना अभिवादन करून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या कोसलचा राजा प्रसेनजितने भगवंतांना विचारले – "भन्ते, येथे आम्ही पाच राजे पाच कामगुणांनी युक्त, समृद्ध आणि त्यात रममाण झालेले असताना, आमच्यामध्ये असा संवाद सुरू झाला – 'कामगुणांमध्ये सर्वात श्रेष्ठ काय आहे?' काही जण म्हणाले – 'रूप हे कामगुणांमध्ये श्रेष्ठ आहे.' काही जण म्हणाले – 'शब्द हे कामगुणांमध्ये श्रेष्ठ आहे.' काही जण म्हणाले – 'गंध हे कामगुणांमध्ये श्रेष्ठ आहे.' काही जण म्हणाले – 'रस हे कामगुणांमध्ये श्रेष्ठ आहे.' काही जण म्हणाले – 'स्पर्श हे कामगुणांमध्ये श्रेष्ठ आहे.' भन्ते, कामगुणांमध्ये सर्वात श्रेष्ठ काय आहे?" ‘‘මනාපපරියන්තං ඛ්වාහං, මහාරාජ, පඤ්චසු කාමගුණෙසු අග්ගන්ති වදාමි. තෙව, මහාරාජ, රූපා එකච්චස්ස මනාපා හොන්ති, තෙව රූපා එකච්චස්ස අමනාපා හොන්ති. යෙහි ච යො රූපෙහි අත්තමනො හොති පරිපුණ්ණසඞ්කප්පො, සො තෙහි රූපෙහි අඤ්ඤං රූපං උත්තරිතරං වා පණීතතරං වා න පත්ථෙති. තෙ තස්ස රූපා පරමා හොන්ති. තෙ තස්ස රූපා අනුත්තරා හොන්ති. "महाराज, मी असे सांगतो की, पाच कामगुणांमध्ये जे सर्वात जास्त प्रिय (मनपसंत) असते, तेच श्रेष्ठ ठरते. महाराज, तेच रूप एखाद्यासाठी प्रिय असते, तर तेच रूप दुसऱ्यासाठी अप्रिय असते. जेव्हा एखादा मनुष्य विशिष्ट रूपाने संतुष्ट आणि पूर्णपणे तृप्त होतो, तेव्हा तो त्या रूपापेक्षा अधिक श्रेष्ठ किंवा अधिक उत्तम अशा दुसऱ्या कोणत्याही रूपाची इच्छा करत नाही. त्याच्यासाठी तीच रूपे परम (सर्वोच्च) असतात; त्याच्यासाठी तीच रूपे अनुत्तर (सर्वोत्कृष्ट) असतात." ‘‘තෙව, මහාරාජ, සද්දා එකච්චස්ස මනාපා හොන්ති, තෙව සද්දා එකච්චස්ස අමනාපා හොන්ති. යෙහි ච යො සද්දෙහි අත්තමනො හොති පරිපුණ්ණසඞ්කප්පො, සො තෙහි සද්දෙහි අඤ්ඤං සද්දං උත්තරිතරං වා [Pg.81] පණීතතරං වා න පත්ථෙති. තෙ තස්ස සද්දා පරමා හොන්ති. තෙ තස්ස සද්දා අනුත්තරා හොන්ති. "महाराज, तेच शब्द एखाद्यासाठी प्रिय असतात, तर तेच शब्द दुसऱ्यासाठी अप्रिय असतात. जेव्हा एखादा मनुष्य विशिष्ट शब्दांनी संतुष्ट आणि पूर्णपणे तृप्त होतो, तेव्हा तो त्या शब्दांपेक्षा अधिक श्रेष्ठ किंवा अधिक उत्तम अशा दुसऱ्या कोणत्याही शब्दांची इच्छा करत नाही. त्याच्यासाठी तेच शब्द परम असतात; त्याच्यासाठी तेच शब्द अनुत्तर असतात." ‘‘තෙව, මහාරාජ, ගන්ධා එකච්චස්ස මනාපා හොන්ති, තෙව ගන්ධා එකච්චස්ස අමනාපා හොන්ති. යෙහි ච යො ගන්ධෙහි අත්තමනො හොති පරිපුණ්ණසඞ්කප්පො, සො තෙහි ගන්ධෙහි අඤ්ඤං ගන්ධං උත්තරිතරං වා පණීතතරං වා න පත්ථෙති. තෙ තස්ස ගන්ධා පරමා හොන්ති. තෙ තස්ස ගන්ධා අනුත්තරා හොන්ති. "महाराज, तेच गंध एखाद्यासाठी प्रिय असतात, तर तेच गंध दुसऱ्यासाठी अप्रिय असतात. जेव्हा एखादा मनुष्य विशिष्ट गंधांनी संतुष्ट आणि पूर्णपणे तृप्त होतो, तेव्हा तो त्या गंधांपेक्षा अधिक श्रेष्ठ किंवा अधिक उत्तम अशा दुसऱ्या कोणत्याही गंधाची इच्छा करत नाही. त्याच्यासाठी तेच गंध परम असतात; त्याच्यासाठी तेच गंध अनुत्तर असतात." ‘‘තෙව, මහාරාජ, රසා එකච්චස්ස මනාපා හොන්ති, තෙව රසා එකච්චස්ස අමනාපා හොන්ති. යෙහි ච යො රසෙහි අත්තමනො හොති පරිපුණ්ණසඞ්කප්පො, සො තෙහි රසෙහි අඤ්ඤං රසං උත්තරිතරං වා පණීතතරං වා න පත්ථෙති. තෙ තස්ස රසා පරමා හොන්ති. තෙ තස්ස රසා අනුත්තරා හොන්ති. "महाराज, तेच रस एखाद्यासाठी प्रिय असतात, तर तेच रस दुसऱ्यासाठी अप्रिय असतात. जेव्हा एखादा मनुष्य विशिष्ट रसांनी संतुष्ट आणि पूर्णपणे तृप्त होतो, तेव्हा तो त्या रसांपेक्षा अधिक श्रेष्ठ किंवा अधिक उत्तम अशा दुसऱ्या कोणत्याही रसाची इच्छा करत नाही. त्याच्यासाठी तेच रस परम असतात; त्याच्यासाठी तेच रस अनुत्तर असतात." ‘‘තෙව, මහාරාජ, ඵොට්ඨබ්බා එකච්චස්ස මනාපා හොන්ති, තෙව ඵොට්ඨබ්බා එකච්චස්ස අමනාපා හොන්ති. යෙහි ච යො ඵොට්ඨබ්බෙහි අත්තමනො හොති පරිපුණ්ණසඞ්කප්පො, සො තෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහි අඤ්ඤං ඵොට්ඨබ්බං උත්තරිතරං වා පණීතතරං වා න පත්ථෙති. තෙ තස්ස ඵොට්ඨබ්බා පරමා හොන්ති. තෙ තස්ස ඵොට්ඨබ්බා අනුත්තරා හොන්තී’’ති. "महाराज, तेच स्पर्श एखाद्यासाठी प्रिय असतात, तर तेच स्पर्श दुसऱ्यासाठी अप्रिय असतात. जेव्हा एखादा मनुष्य विशिष्ट स्पर्शांनी संतुष्ट आणि पूर्णपणे तृप्त होतो, तेव्हा तो त्या स्पर्शांपेक्षा अधिक श्रेष्ठ किंवा अधिक उत्तम अशा दुसऱ्या कोणत्याही स्पर्शाची इच्छा करत नाही. त्याच्यासाठी तेच स्पर्श परम असतात; त्याच्यासाठी तेच स्पर्श अनुत्तर असतात." තෙන ඛො පන සමයෙන චන්දනඞ්ගලිකො උපාසකො තස්සං පරිසායං නිසින්නො හොති. අථ ඛො චන්දනඞ්ගලිකො උපාසකො උට්ඨායාසනා එකංසං උත්තරාසඞ්ගං කරිත්වා යෙන භගවා තෙනඤ්ජලිං පණාමෙත්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘පටිභාති මං භගවා, පටිභාති මං සුගතා’’ති. ‘‘පටිභාතු තං චන්දනඞ්ගලිකා’’ති භගවා අවොච. त्या वेळी चंदनांगलिका नावाचा उपासक त्या सभेत बसलेला होता. तेव्हा चंदनांगलिका उपासक आपल्या आसनावरून उठला, त्याने आपले उपरणे एका खांद्यावर घेतले आणि भगवंतांच्या दिशेने हात जोडून नमस्कार करत तो म्हणाला – "भगवन्, मला काही सुचत आहे! सुगत, मला काही सुचत आहे!" भगवंत म्हणाले – "चंदनांगलिका, तुला जे सुचत आहे ते व्यक्त कर." අථ ඛො චන්දනඞ්ගලිකො උපාසකො භගවතො සම්මුඛා තදනුරූපාය ගාථාය අභිත්ථවි – त्यानंतर चंदनांगलिका उपासकाने भगवंतांच्या समोर त्यांना साजेसा अशा गाथेने त्यांची स्तुती केली – ‘‘පදුමං යථා කොකනදං සුගන්ධං,පාතො සියා ඵුල්ලමවීතගන්ධං; අඞ්ගීරසං පස්ස විරොචමානං,තපන්තමාදිච්චමිවන්තලික්ඛෙ’’ති. "ज्याप्रमाणे सुगंधी तांबडे कमळ (कोकनद) पहाटेच्या वेळी उमलते आणि त्याचा सुगंध दरवळत राहतो; त्याप्रमाणे आकाशात तळपणाऱ्या सूर्यासारखे देदीप्यमान आणि तेजस्वी असणाऱ्या अंगीरसांना (भगवंतांना) पहा." අථ [Pg.82] ඛො තෙ පඤ්ච රාජානො චන්දනඞ්ගලිකං උපාසකං පඤ්චහි උත්තරාසඞ්ගෙහි අච්ඡාදෙසුං. අථ ඛො චන්දනඞ්ගලිකො උපාසකො තෙහි පඤ්චහි උත්තරාසඞ්ගෙහි භගවන්තං අච්ඡාදෙසීති. तेव्हा त्या पाच राजांनी चंदनांगलिका उपासकाला पाच उपरणे (वस्त्रे) भेट दिली. परंतु चंदनांगलिका उपासकाने ती पाचही उपरणे भगवंतांना अर्पण केली. 3. දොණපාකසුත්තං ३. दोणपाक सुत्त 124. සාවත්ථිනිදානං. තෙන ඛො පන සමයෙන රාජා පසෙනදි කොසලො දොණපාකකුරං භුඤ්ජති. අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො භුත්තාවී මහස්සාසී යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. १२४. श्रावस्ती येथील प्रसंग. त्या वेळी कोसलचा राजा प्रसेनजित एका द्रोण (मापाचे) अन्न आणि भाजी खात असे. एकदा राजा प्रसेनजित जेवण झाल्यावर, अतिशय जड वाटत असल्यामुळे धापा टाकत भगवंतांकडे गेला. भगवंतांकडे जाऊन, त्यांना अभिवादन करून तो एका बाजूला बसला. අථ ඛො භගවා රාජානං පසෙනදිං කොසලං භුත්තාවිං මහස්සාසිං විදිත්වා තායං වෙලායං ඉමං ගාථං අභාසි – तेव्हा भगवंतांनी कोसलचा राजा प्रसेनजित जेवण झाल्यामुळे जड होऊन धापा टाकत असल्याचे जाणून त्या वेळी ही गाथा म्हटली – ‘‘මනුජස්ස සදා සතීමතො,මත්තං ජානතො ලද්ධභොජනෙ; තනුකස්ස භවන්ති වෙදනා,සණිකං ජීරති ආයුපාලය’’න්ති. "जो मनुष्य नेहमी जागरूक राहतो आणि मिळालेल्या अन्नाचे योग्य प्रमाण जाणतो, त्याचे शारीरिक त्रास कमी होतात; त्याचे अन्न हळूहळू पचते आणि त्याचे आयुष्य सुरक्षित राहते." තෙන ඛො පන සමයෙන සුදස්සනො මාණවො රඤ්ඤො පසෙනදිස්ස කොසලස්ස පිට්ඨිතො ඨිතො හොති. අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො සුදස්සනං මාණවං ආමන්තෙසි – ‘‘එහි ත්වං, තාත සුදස්සන, භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං පරියාපුණිත්වා මම භත්තාභිහාරෙ (භත්තාභිහාරෙ) භාස. අහඤ්ච තෙ දෙවසිකං කහාපණසතං (කහාපණසතං) නිච්චං භික්ඛං පවත්තයිස්සාමී’’ති. ‘‘එවං දෙවා’’ති ඛො සුදස්සනො මාණවො රඤ්ඤො පසෙනදිස්ස කොසලස්ස පටිස්සුත්වා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං පරියාපුණිත්වා රඤ්ඤො පසෙනදිස්ස කොසලස්ස භත්තාභිහාරෙ සුදං භාසති – त्या वेळी सुदर्शन नावाचा तरुण कोसलचा राजा प्रसेनजितच्या मागे उभा होता. तेव्हा राजा प्रसेनजितने सुदर्शन तरुणाला बोलावले आणि म्हटले – "प्रिय सुदर्शन, इकडे ये. तू भगवंतांकडून ही गाथा शिकून घे आणि मी जेव्हा जेव्हा जेवायला बसेन, तेव्हा तेव्हा ती माझ्यासमोर म्हणत जा. मी तुला दररोज शंभर कहापण (नाणी) नियमित भत्ता म्हणून देईन." "होय, महाराज," असे म्हणून सुदर्शन तरुणाने कोसलचा राजा प्रसेनजितच्या आज्ञेचे पालन केले. त्याने भगवंतांकडून ती गाथा शिकून घेतली आणि राजा प्रसेनजित जेव्हा जेव्हा जेवायला बसायचा, तेव्हा तेव्हा तो ती गाथा म्हणायचा – ‘‘මනුජස්ස සදා සතීමතො,මත්තං ජානතො ලද්ධභොජනෙ; තනුකස්ස භවන්ති වෙදනා,සණිකං ජීරති ආයුපාලය’’න්ති. "जो मनुष्य नेहमी स्मृतिमान (जागरूक) असतो, आणि मिळालेल्या भोजनाचे योग्य प्रमाण जाणतो, त्याच्या वेदना (शारीरिक त्रास) कमी होतात, आणि त्याचे आयुष्य सुरक्षित ठेवत अन्न हळूहळू पचते." අථ [Pg.83] ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො අනුපුබ්බෙන නාළිකොදනපරමතාය සණ්ඨාසි. අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො අපරෙන සමයෙන සුසල්ලිඛිතගත්තො පාණිනා ගත්තානි අනුමජ්ජන්තො තායං වෙලායං ඉමං උදානං උදානෙසි – ‘‘උභයෙන වත මං සො භගවා අත්ථෙන අනුකම්පි – දිට්ඨධම්මිකෙන චෙව අත්ථෙන සම්පරායිකෙන චා’’ති. "त्यानंतर कोसलचा राजा पसेनदी हळूहळू एका नाळी (एक लहान माप) भाताच्या प्रमाणावर आला. त्यानंतर काही काळाने, जेव्हा त्याचे शरीर उत्तम प्रकारे सडपातळ झाले, तेव्हा आपल्या हाताने आपल्या शरीरावरून हात फिरवत त्याने त्या वेळी हे उदान (स्फूर्तीचे उद्गार) काढले – 'खरोखरच, त्या भगवंतांनी माझ्यावर दोन्ही प्रकारच्या कल्याणासाठी अनुकंपा केली आहे – या जन्मातील (दृष्टधार्मिक) कल्याणासाठी आणि परलोकातील (सांपरायिक) कल्याणासाठी सुद्धा.'" 4. පඨමසඞ්ගාමසුත්තං ४. "प्रथम संग्राम सुत्त" 125. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො රාජා මාගධො අජාතසත්තු වෙදෙහිපුත්තො චතුරඞ්ගිනිං සෙනං සන්නය්හිත්වා රාජානං පසෙනදිං කොසලං අබ්භුය්යාසි යෙන කාසි. අස්සොසි ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො – ‘‘රාජා කිර මාගධො අජාතසත්තු වෙදෙහිපුත්තො චතුරඞ්ගිනිං සෙනං සන්නය්හිත්වා මමං අබ්භුය්යාතො යෙන කාසී’’ති. අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො චතුරඞ්ගිනිං සෙනං සන්නය්හිත්වා රාජානං මාගධං අජාතසත්තුං වෙදෙහිපුත්තං පච්චුය්යාසි යෙන කාසි. අථ ඛො රාජා ච මාගධො අජාතසත්තු වෙදෙහිපුත්තො රාජා ච පසෙනදි කොසලො සඞ්ගාමෙසුං. තස්මිං ඛො පන සඞ්ගාමෙ රාජා මාගධො අජාතසත්තු වෙදෙහිපුත්තො රාජානං පසෙනදිං කොසලං පරාජෙසි. පරාජිතො ච රාජා පසෙනදි කොසලො සකමෙව රාජධානිං සාවත්ථිං පච්චුය්යාසි. १२५. "श्रावस्ती येथील घटना. तेव्हा मगधचा राजा अजातशत्रू वैदेहीपुत्र याने चतुरंग सेना गोळा केली आणि कोसलचा राजा पसेनदी याच्याविरुद्ध काशीच्या देशाने चाल केली. कोसलचा राजा पसेनदी याने ऐकले – 'असे ऐकिवात आहे की मगधचा राजा अजातशत्रू वैदेहीपुत्र याने चतुरंग सेना गोळा करून माझ्याविरुद्ध काशीच्या दिशेने चाल केली आहे.' तेव्हा कोसलचा राजा पसेनदी यानेही चतुरंग सेना गोळा केली आणि मगधचा राजा अजातशत्रू वैदेहीपुत्र याच्याविरुद्ध काशीच्या दिशेने मुकाबला करण्यासाठी कूच केले. त्यानंतर मगधचा राजा अजातशत्रू वैदेहीपुत्र आणि कोसलचा राजा पसेनदी यांच्यात युद्ध झाले. त्या युद्धात मगधचा राजा अजातशत्रू वैदेहीपुत्र याने कोसलचा राजा पसेनदी याचा पराभव केला. पराभूत झालेला राजा पसेनदी आपल्या स्वतःच्या श्रावस्ती या राजधानीकडे परत निघून गेला." අථ ඛො සම්බහුලා භික්ඛූ පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය සාවත්ථිං පිණ්ඩාය පවිසිංසු. සාවත්ථියං පිණ්ඩාය චරිත්වා පච්ඡාභත්තං පිණ්ඩපාතපටික්කන්තා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදිංසු. එකමන්තං නිසින්නා ඛො තෙ භික්ඛූ භගවන්තං එතදවොචුං – "त्यानंतर अनेक भिक्खू सकाळच्या वेळी चिवर परिधान करून, पात्र व चिवर घेऊन श्रावस्तीमध्ये भिक्षेसाठी शिरले. श्रावस्तीमध्ये भिक्षेसाठी फिरून आल्यावर, भोजनोत्तर भिक्षाटनाहून परतल्यावर ते जेथे भगवंत होते तेथे गेले; आणि भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या त्या भिक्खूंनी भगवंतांना असे म्हटले –" ‘‘ඉධ, භන්තෙ, රාජා මාගධො අජාතසත්තු වෙදෙහිපුත්තො චතුරඞ්ගිනිං සෙනං සන්නය්හිත්වා රාජානං පසෙනදිං කොසලං අබ්භුය්යාසි යෙන කාසි. අස්සොසි ඛො, භන්තෙ, රාජා පසෙනදි කොසලො – ‘රාජා කිර මාගධො අජාතසත්තු වෙදෙහිපුත්තො චතුරඞ්ගිනිං සෙනං සන්නය්හිත්වා මමං අබ්භුය්යාතො යෙන කාසී’ති. අථ ඛො, භන්තෙ, රාජා පසෙනදි කොසලො [Pg.84] චතුරඞ්ගිනිං සෙනං සන්නය්හිත්වා රාජානං මාගධං අජාතසත්තුං වෙදෙහිපුත්තං පච්චුය්යාසි යෙන කාසි. අථ ඛො, භන්තෙ, රාජා ච මාගධො අජාතසත්තු වෙදෙහිපුත්තො රාජා ච පසෙනදි කොසලො සඞ්ගාමෙසුං. තස්මිං ඛො පන, භන්තෙ, සඞ්ගාමෙ රාජා මාගධො අජාතසත්තු වෙදෙහිපුත්තො රාජානං පසෙනදිං කොසලං පරාජෙසි. පරාජිතො ච, භන්තෙ, රාජා පසෙනදි කොසලො සකමෙව රාජධානිං සාවත්ථිං පච්චුය්යාසී’’ති. "“भंते, येथे मगधचा राजा अजातशत्रू वैदेहीपुत्र याने चतुरंग सेना गोळा करून कोसलचा राजा पसेनदी याच्याविरुद्ध काशीच्या दिशेने चाल केली आहे. भंते, कोसलचा राजा पसेनदी याने ऐकले – ‘असे ऐकिवात आहे की मगधचा राजा अजातशत्रू वैदेहीपुत्र याने चतुरंग सेना गोळा करून माझ्याविरुद्ध काशीच्या दिशेने चाल केली आहे.’ तेव्हा, भंते, कोसलचा राजा पसेनदी याने चतुरंग सेना गोळा केली आणि मगधचा राजा अजातशत्रू वैदेहीपुत्र याच्याविरुद्ध काशीच्या दिशेने मुकाबला करण्यासाठी कूच केले. त्यानंतर, भंते, मगधचा राजा अजातशत्रू वैदेहीपुत्र आणि कोसलचा राजा पसेनदी यांच्यात युद्ध झाले. भंते, त्या युद्धात मगधचा राजा अजातशत्रू वैदेहीपुत्र याने कोसलचा राजा पसेनदी याचा पराभव केला. आणि भंते, पराभूत झालेला राजा पसेनदी आपल्या स्वतःच्या श्रावस्ती या राजधानीकडे परत निघून गेला आहे.’” ‘‘රාජා, භික්ඛවෙ, මාගධො අජාතසත්තු වෙදෙහිපුත්තො පාපමිත්තො පාපසහායො පාපසම්පවඞ්කො; රාජා ච ඛො, භික්ඛවෙ, පසෙනදි කොසලො කල්යාණමිත්තො කල්යාණසහායො කල්යාණසම්පවඞ්කො. අජ්ජෙව, භික්ඛවෙ, රාජා පසෙනදි කොසලො ඉමං රත්තිං දුක්ඛං සෙති පරාජිතො’’ති. ඉදමවොච…පෙ… "“भिक्खूंनो, मगधचा राजा अजातशत्रू वैदेहीपुत्र हा पापी मित्रांचा, पापी सोबत्यांचा आणि पापी संगतीचा आहे; परंतु भिक्खूंनो, कोसलचा राजा पसेनदी हा कल्याणमित्रांचा, कल्याणसोबत्यांचा आणि कल्याणसंगतीचा आहे. भिक्खूंनो, आज पराभूत झाल्यामुळे राजा पसेनदी ही रात्र अत्यंत दुःखाने (अस्वस्थतेने) झोपेल.” भगवंत असे म्हणाले... आणि पुढे..." ‘‘ජයං වෙරං පසවති, දුක්ඛං සෙති පරාජිතො; උපසන්තො සුඛං සෙති, හිත්වා ජයපරාජය’’න්ති. "“विजय वैराला जन्म देतो, पराभूत झालेला दुःखाने झोपतो; जो शांत झाला आहे, तो जय आणि पराजय दोन्ही सोडून सुखाने झोपतो.”" 5. දුතියසඞ්ගාමසුත්තං ५. "द्वितीय संग्राम सुत्त" 126. අථ ඛො රාජා මාගධො අජාතසත්තු වෙදෙහිපුත්තො චතුරඞ්ගිනිං සෙනං සන්නය්හිත්වා රාජානං පසෙනදිං කොසලං අබ්භුය්යාසි යෙන කාසි. අස්සොසි ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො – ‘‘රාජා කිර මාගධො අජාතසත්තු වෙදෙහිපුත්තො චතුරඞ්ගිනිං සෙනං සන්නය්හිත්වා මමං අබ්භුය්යාතො යෙන කාසී’’ති. අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො චතුරඞ්ගිනිං සෙනං සන්නය්හිත්වා රාජානං මාගධං අජාතසත්තුං වෙදෙහිපුත්තං පච්චුය්යාසි යෙන කාසි. අථ ඛො රාජා ච මාගධො අජාතසත්තු වෙදෙහිපුත්තො රාජා ච පසෙනදි කොසලො සඞ්ගාමෙසුං. තස්මිං ඛො පන සඞ්ගාමෙ රාජා පසෙනදි කොසලො රාජානං මාගධං අජාතසත්තුං වෙදෙහිපුත්තං පරාජෙසි, ජීවග්ගාහඤ්ච නං අග්ගහෙසි. අථ ඛො රඤ්ඤො පසෙනදිස්ස කොසලස්ස එතදහොසි – ‘‘කිඤ්චාපි ඛො ම්යායං [Pg.85] රාජා මාගධො අජාතසත්තු වෙදෙහිපුත්තො අදුබ්භන්තස්ස දුබ්භති, අථ ච පන මෙ භාගිනෙය්යො හොති. යංනූනාහං රඤ්ඤො මාගධස්ස අජාතසත්තුනො වෙදෙහිපුත්තස්ස සබ්බං හත්ථිකායං පරියාදියිත්වා සබ්බං අස්සකායං පරියාදියිත්වා සබ්බං රථකායං පරියාදියිත්වා සබ්බං පත්තිකායං පරියාදියිත්වා ජීවන්තමෙව නං ඔසජ්ජෙය්ය’’න්ති. १२६. "त्यानंतर मगधचा राजा अजातशत्रू वैदेहीपुत्र याने चतुरंग सेना गोळा केली आणि कोसलचा राजा पसेनदी याच्याविरुद्ध काशीच्या दिशेने चाल केली. कोसलचा राजा पसेनदी याने ऐकले – 'असे ऐकिवात आहे की मगधचा राजा अजातशत्रू वैदेहीपुत्र याने चतुरंग सेना गोळा करून माझ्याविरुद्ध काशीच्या दिशेने चाल केली आहे.' तेव्हा कोसलचा राजा पसेनदी याने चतुरंग सेना गोळा केली आणि मगधचा राजा अजातशत्रू वैदेहीपुत्र याच्याविरुद्ध काशीच्या दिशेने मुकाबला करण्यासाठी कूच केले. त्यानंतर मगधचा राजा अजातशत्रू वैदेहीपुत्र आणि कोसलचा राजा पसेनदी यांच्यात युद्ध झाले. त्या युद्धात कोसलच्या राजा पसेनदी याने मगधचा राजा अजातशत्रू वैदेहीपुत्र याचा पराभव केला आणि त्याला जिवंत पकडले. तेव्हा कोसलचा राजा पसेनदी याच्या मनात असा विचार आला – 'जरी हा मगधचा राजा अजातशत्रू वैदेहीपुत्र माझ्यासारख्या निरपराध माणसाशी द्रोह करत असला, तरी तो माझा भाचा आहे. मग मी मगधचा राजा अजातशत्रू वैदेहीपुत्र याचे सर्व हत्तीदळ, सर्व घोडेदळ, सर्व रथदळ आणि सर्व पायदळ जप्त करून त्याला जिवंतच सोडून दिले तर किती बरे होईल!'" අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො රඤ්ඤො මාගධස්ස අජාතසත්තුනො වෙදෙහිපුත්තස්ස සබ්බං හත්ථිකායං පරියාදියිත්වා සබ්බං අස්සකායං පරියාදියිත්වා සබ්බං රථකායං පරියාදියිත්වා සබ්බං පත්තිකායං පරියාදියිත්වා ජීවන්තමෙව නං ඔසජ්ජි. "त्यानंतर कोसलचा राजा पसेनदी याने मगधचा राजा अजातशत्रू वैदेहीपुत्र याचे सर्व हत्तीदळ, सर्व घोडेदळ, सर्व रथदळ आणि सर्व पायदळ जप्त करून त्याला जिवंतच सोडून दिले." අථ ඛො සම්බහුලා භික්ඛූ පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය සාවත්ථිං පිණ්ඩාය පවිසිංසු. සාවත්ථියං පිණ්ඩාය චරිත්වා පච්ඡාභත්තං පිණ්ඩපාතපටික්කන්තා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදිංසු. එකමන්තං නිසින්නා ඛො තෙ භික්ඛූ භගවන්තං එතදවොචුං – "त्यानंतर अनेक भिक्खू सकाळच्या वेळी चिवर परिधान करून, पात्र व चिवर घेऊन श्रावस्तीमध्ये भिक्षेसाठी शिरले. श्रावस्तीमध्ये भिक्षेसाठी फिरून आल्यावर, भोजनोत्तर भिक्षाटनाहून परतल्यावर ते जेथे भगवंत होते तेथे गेले; आणि भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या त्या भिक्खूंनी भगवंतांना असे म्हटले –" ‘‘ඉධ, භන්තෙ, රාජා මාගධො අජාතසත්තු වෙදෙහිපුත්තො චතුරඞ්ගිනිං සෙනං සන්නය්හිත්වා රාජානං පසෙනදිං කොසලං අබ්භුය්යාසි යෙන කාසි. අස්සොසි ඛො, භන්තෙ, රාජා පසෙනදි කොසලො – ‘රාජා කිර මාගධො අජාතසත්තු වෙදෙහිපුත්තො චතුරඞ්ගිනිං සෙනං සන්නය්හිත්වා මමං අබ්භුය්යාතො යෙන කාසී’ති. අථ ඛො, භන්තෙ, රාජා පසෙනදි කොසලො චතුරඞ්ගිනිං සෙනං සන්නය්හිත්වා රාජානං මාගධං අජාතසත්තුං වෙදෙහිපුත්තං පච්චුය්යාසි යෙන කාසි. අථ ඛො, භන්තෙ, රාජා ච මාගධො අජාතසත්තු වෙදෙහිපුත්තො රාජා ච පසෙනදි කොසලො සඞ්ගාමෙසුං. තස්මිං ඛො පන, භන්තෙ, සඞ්ගාමෙ රාජා පසෙනදි කොසලො රාජානං මාගධං අජාතසත්තුං වෙදෙහිපුත්තං පරාජෙසි, ජීවග්ගාහඤ්ච නං අග්ගහෙසි. අථ ඛො, භන්තෙ, රඤ්ඤො පසෙනදිස්ස කොසලස්ස එතදහොසි – ‘කිඤ්චාපි ඛො ම්යායං රාජා මාගධො අජාතසත්තු වෙදෙහිපුත්තො අදුබ්භන්තස්ස දුබ්භති, අථ ච පන මෙ භාගිනෙය්යො හොති. යංනූනාහං රඤ්ඤො මාගධස්ස අජාතසත්තුනො වෙදෙහිපුත්තස්ස සබ්බං හත්ථිකායං පරියාදියිත්වා සබ්බං අස්සකායං සබ්බං රථකායං සබ්බං පත්තිකායං පරියාදියිත්වා ජීවන්තමෙව නං ඔසජ්ජෙය්ය’’’න්ති. भन्ते! येथे मगधचा राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रू चतुरंग सेना गोळा करून कोसलचा राजा प्रसेनजीत याच्याविरुद्ध काशीच्या दिशेने चालून गेला आहे. भन्ते! कोसलचा राजा प्रसेनजीत याने ऐकले की— 'असे समजते की मगधचा राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रू चतुरंग सेना गोळा करून माझ्याविरुद्ध काशीच्या दिशेने चालून आला आहे.' तेव्हा, भन्ते! कोसलचा राजा प्रसेनजीत याने चतुरंग सेना गोळा करून मगधचा राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रू याच्याविरुद्ध काशीच्या दिशेने कूच केले. त्यानंतर, भन्ते! मगधचा राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रू आणि कोसलचा राजा प्रसेनजीत यांच्यात युद्ध झाले. भन्ते! त्या युद्धात कोसलचा राजा प्रसेनजीत याने मगधचा राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रू याचा पराभव केला आणि त्याला जिवंत पकडले. त्यानंतर, भन्ते! कोसलचा राजा प्रसेनजीत याच्या मनात असा विचार आला— 'जरी हा मगधचा राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रू माझ्यासारख्या निरपराध व्यक्तीशी द्रोह करत असला, तरी तो माझा भाचा आहे. मग मी मगधचा राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रू याचे संपूर्ण हत्तीदळ, संपूर्ण घोडेदळ, संपूर्ण रथदळ आणि संपूर्ण पायदळ जप्त करून त्याला जिवंतच सोडून दिले तर किती बरे होईल!' ‘‘අථ [Pg.86] ඛො, භන්තෙ, රාජා පසෙනදි කොසලො රඤ්ඤො මාගධස්ස අජාතසත්තුනො වෙදෙහිපුත්තස්ස සබ්බං හත්ථිකායං පරියාදියිත්වා සබ්බං අස්සකායං පරියාදියිත්වා සබ්බං රථකායං පරියාදියිත්වා සබ්බං පත්තිකායං පරියාදියිත්වා ජීවන්තමෙව නං ඔසජ්ජී’’ති. අථ ඛො භගවා එතමත්ථං විදිත්වා තායං වෙලායං ඉමා ගාථායො අභාසි – त्यानंतर, भन्ते! कोसलचा राजा प्रसेनजीत याने मगधचा राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रू याचे संपूर्ण हत्तीदळ, संपूर्ण घोडेदळ, संपूर्ण रथदळ आणि संपूर्ण पायदळ जप्त करून त्याला जिवंतच सोडून दिले. तेव्हा भगवंतांनी हा विषय जाणून त्या प्रसंगी या गाथा म्हटल्या— ‘‘විලුම්පතෙව පුරිසො, යාවස්ස උපකප්පති; යදා චඤ්ඤෙ විලුම්පන්ති, සො විලුත්තො විලුප්පති. माणूस तोपर्यंतच इतरांना लुटतो, जोपर्यंत ते त्याला अनुकूल असते; परंतु जेव्हा दुसरे त्याला लुटतात, तेव्हा तो लुटणारा स्वतः लुटला जातो. ‘‘ඨානඤ්හි මඤ්ඤති බාලො, යාව පාපං න පච්චති; යදා ච පච්චති පාපං, අථ දුක්ඛං නිගච්ඡති. मूर्ख माणूस तोपर्यंतच आपल्या कर्माला योग्य मानतो, जोपर्यंत पापाचा विपाक होत नाही; परंतु जेव्हा पापाचा विपाक होतो, तेव्हा तो मूर्ख दुःखाला प्राप्त होतो. ‘‘හන්තා ලභති හන්තාරං, ජෙතාරං ලභතෙ ජයං; අක්කොසකො ච අක්කොසං, රොසෙතාරඤ්ච රොසකො; අථ කම්මවිවට්ටෙන, සො විලුත්තො විලුප්පතී’’ති. घात करणाऱ्याला घात करणाराच मिळतो, जिंकणाऱ्याला जिंकणाराच मिळतो; शिवीगाळ करणाऱ्याला शिवीगाळच मिळते आणि त्रास देणाऱ्याला त्रास देणाराच मिळतो. अशा प्रकारे, कर्माच्या विपाकाने लुटणारा स्वतः लुटला जातो. 6. මල්ලිකාසුත්තං ६. मल्लिकासूत्र 127. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. අථ ඛො අඤ්ඤතරො පුරිසො යෙන රාජා පසෙනදි කොසලො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා රඤ්ඤො පසෙනදිස්ස කොසලස්ස උපකණ්ණකෙ ආරොචෙසි – ‘‘මල්ලිකා, දෙව, දෙවී ධීතරං විජාතා’’ති. එවං වුත්තෙ, රාජා පසෙනදි කොසලො අනත්තමනො අහොසි. १२७. श्रावस्ती येथील घटना. तेव्हा कोसलचा राजा प्रसेनजीत जेथे भगवंत होते तेथे गेला; गेल्यावर भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला बसला. तेव्हा एक माणूस कोसलचा राजा प्रसेनजीत याच्याजवळ आला आणि त्याने राजा प्रसेनजीतच्या कानात सांगितले— 'महाराज! राणी मल्लिका हिने एका कन्येला जन्म दिला आहे.' असे म्हटल्यावर कोसलचा राजा प्रसेनजीत अप्रसन्न झाला. අථ ඛො භගවා රාජානං පසෙනදිං කොසලං අනත්තමනතං විදිත්වා තායං වෙලායං ඉමා ගාථායො අභාසි – तेव्हा भगवंतांनी कोसलचा राजा प्रसेनजीत याला अप्रसन्न झालेले पाहून त्या प्रसंगी या गाथा म्हटल्या— ‘‘ඉත්ථීපි හි එකච්චියා, සෙය්යා පොස ජනාධිප; මෙධාවිනී සීලවතී, සස්සුදෙවා පතිබ්බතා. हे जननायक! काही स्त्रिया सुद्धा पुरुषांपेक्षा श्रेष्ठ ठरू शकतात; जर त्या बुद्धिमान, शीलवान, सासूला पूज्य मानणाऱ्या आणि पतिव्रता असतील. ‘‘තස්සා යො ජායති පොසො, සූරො හොති දිසම්පති; තාදිසා සුභගියා පුත්තො, රජ්ජම්පි අනුසාසතී’’ති. हे भूपती! अशा स्त्रीपासून जन्माला येणारा पुत्र शूरवीर होतो; अशा भाग्यवान स्त्रीचा पुत्र राज्याचे शासनही चालवू शकतो. 7. අප්පමාදසුත්තං ७. अप्पमादसूत्र 128. සාවත්ථිනිදානං[Pg.87]. එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අත්ථි නු ඛො, භන්තෙ, එකො ධම්මො යො උභො අත්ථෙ සමධිග්ගය්හ තිට්ඨති – දිට්ඨධම්මිකඤ්චෙව අත්ථං සම්පරායිකඤ්චා’’ති? १२८. श्रावस्ती येथील घटना. तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या कोसलच्या राजा प्रसेनजीतने भगवंतांना विचारले— 'भन्ते! असा एखादा धर्म आहे का, जो या दोन्ही प्रकारच्या हिताला— इहलोकातील हित आणि परलोकातील हित— साध्य करून देतो?' ‘‘අත්ථි ඛො, මහාරාජ, එකො ධම්මො යො උභො අත්ථෙ සමධිග්ගය්හ තිට්ඨති – දිට්ඨධම්මිකඤ්චෙව අත්ථං සම්පරායිකඤ්චා’’ති. महाराज! असा एक धर्म आहे, जो या दोन्ही प्रकारच्या हिताला— इहलोकातील हित आणि परलोकातील हित— साध्य करून देतो. ‘‘කතමො පන, භන්තෙ, එකො ධම්මො, යො උභො අත්ථෙ සමධිග්ගය්හ තිට්ඨති – දිට්ඨධම්මිකඤ්චෙව අත්ථං සම්පරායිකඤ්චා’’ති? परंतु भन्ते! तो एक धर्म कोणता आहे, जो या दोन्ही प्रकारच्या हिताला— इहलोकातील हित आणि परलोकातील हित— साध्य करून देतो? ‘‘අප්පමාදො ඛො, මහාරාජ, එකො ධම්මො, යො උභො අත්ථෙ සමධිග්ගය්හ තිට්ඨති – දිට්ඨධම්මිකඤ්චෙව අත්ථං සම්පරායිකඤ්චාති. සෙය්යථාපි, මහාරාජ, යානි කානිචි ජඞ්ගලානං පාණානං පදජාතානි, සබ්බානි තානි හත්ථිපදෙ සමොධානං ගච්ඡන්ති, හත්ථිපදං තෙසං අග්ගමක්ඛායති – යදිදං මහන්තත්තෙන; එවමෙව ඛො, මහාරාජ, අප්පමාදො එකො ධම්මො, යො උභො අත්ථෙ සමධිග්ගය්හ තිට්ඨති – දිට්ඨධම්මිකඤ්චෙව අත්ථං සම්පරායිකඤ්චා’’ති. ඉදමවොච…පෙ… महाराज! तो एक धर्म म्हणजे 'अप्पमाद' (जागरूकता) होय, जो या दोन्ही प्रकारच्या हिताला— इहलोकातील हित आणि परलोकातील हित— साध्य करून देतो. महाराज! ज्याप्रमाणे जमिनीवर चालणाऱ्या सर्व प्राण्यांच्या पावलांचे ठसे हत्तीच्या पावलाच्या ठशामध्ये सामावून जातात आणि हत्तीच्या पावलाचा ठसा त्याच्या विशालतेमुळे त्या सर्वांमध्ये श्रेष्ठ मानला जातो; त्याचप्रमाणे, महाराज! अप्पमाद हाच तो एक धर्म आहे, जो या दोन्ही प्रकारच्या हिताला— इहलोकातील हित आणि परलोकातील हित— साध्य करून देतो. भगवंत असे म्हणाले... ‘‘ආයුං අරොගියං වණ්ණං, සග්ගං උච්චාකුලීනතං; රතියො පත්ථයන්තෙන, උළාරා අපරාපරා. दीर्घायुष्य, आरोग्य, सौंदर्य, स्वर्ग, उच्च कुळात जन्म आणि एकामागून एक मिळणारे श्रेष्ठ आनंद यांची इच्छा करणाऱ्याने— ‘‘අප්පමාදං පසංසන්ති, පුඤ්ඤකිරියාසු පණ්ඩිතා; අප්පමත්තො උභො අත්ථෙ, අධිග්ගණ්හාති පණ්ඩිතො. पुण्यकर्मांमध्ये 'अप्पमाद' (जागरूकता) राखण्याची शहाणे लोक प्रशंसा करतात. जागरूक राहणारा शहाणा माणूस दोन्ही प्रकारचे हित साध्य करतो— ‘‘දිට්ඨෙ ධම්මෙ ච යො අත්ථො, යො චත්ථො සම්පරායිකො; අත්ථාභිසමයා ධීරො, පණ්ඩිතොති පවුච්චතී’’ති. याच जन्मात प्रत्यक्ष दिसणारे हित आणि परलोकातील हित. या दोन्ही हितांना प्राप्त केल्यामुळे त्या धैर्यवान व्यक्तीला 'पंडित' (शहाणा) म्हटले जाते. 8. කල්යාණමිත්තසුත්තං ८. कल्याणमित्तसूत्र 129. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං නිසින්නො ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘ඉධ මය්හං, භන්තෙ, රහොගතස්ස පටිසල්ලීනස්ස එවං චෙතසො පරිවිතක්කො උදපාදි – ‘ස්වාක්ඛාතො භගවතා ධම්මො, සො ච ඛො කල්යාණමිත්තස්ස කල්යාණසහායස්ස කල්යාණසම්පවඞ්කස්ස, නො පාපමිත්තස්ස නො පාපසහායස්ස නො පාපසම්පවඞ්කස්සා’’’ති. १२९. श्रावस्ती येथील घटना. एका बाजूला बसलेल्या कोसलच्या राजा प्रसेनजीतने भगवंतांना विचारले— 'भन्ते! येथे एकांतात ध्यानस्थ बसलो असताना माझ्या मनात असा विचार आला— 'भगवंतांनी धर्माची सुंदर प्रकारे मांडणी केली आहे, आणि तो धर्म कल्याणमित्र (चांगले मित्र), कल्याणसहायक (चांगले सोबती) आणि चांगल्या लोकांकडे कल असणाऱ्यांसाठीच आहे; पापमित्र (वाईट मित्र), वाईट सोबती आणि वाईट लोकांकडे कल असणाऱ्यांसाठी नाही.' ‘‘එවමෙතං, මහාරාජ, එවමෙතං, මහාරාජ! ස්වාක්ඛාතො[Pg.88], මහාරාජ, මයා ධම්මො. සො ච ඛො කල්යාණමිත්තස්ස කල්යාණසහායස්ස කල්යාණසම්පවඞ්කස්ස, නො පාපමිත්තස්ස නො පාපසහායස්ස නො පාපසම්පවඞ්කස්සාති. हे अगदी तसेच आहे, महाराज! हे अगदी तसेच आहे, महाराज! मी धर्माची सुव्याख्यात मांडणी केली आहे. आणि तो धर्म कल्याणमित्र, कल्याणसहायक आणि चांगल्या लोकांकडे कल असणाऱ्यांसाठीच आहे; पापमित्र, वाईट सोबती आणि वाईट लोकांकडे कल असणाऱ्यांसाठी नाही. ‘‘එකමිදාහං, මහාරාජ, සමයං සක්කෙසු විහරාමි නගරකං නාම සක්යානං නිගමො. අථ ඛො, මහාරාජ, ආනන්දො භික්ඛු යෙනාහං තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා මං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො, මහාරාජ, ආනන්දො භික්ඛු මං එතදවොච – ‘උපඩ්ඪමිදං, භන්තෙ, බ්රහ්මචරියස්ස – යදිදං කල්යාණමිත්තතා කල්යාණසහායතා කල්යාණසම්පවඞ්කතා’’’ති. महाराज! एका वेळी मी शाक्यांच्या देशात 'नगरक' नावाच्या शाक्य नगरामध्ये विहार करत होतो. तेव्हा, महाराज! भिक्खू आनंद माझ्याकडे आले; आल्यावर त्यांनी मला अभिवादन केले आणि ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेले भिक्खू आनंद मला म्हणाले— 'भन्ते! हे कल्याणमित्र असणे, कल्याणसहायक असणे आणि चांगल्या लोकांकडे कल असणे, हे ब्रह्मचर्याचे निम्मे (अर्धे) अंग आहे.' ‘‘එවං වුත්තාහං, මහාරාජ, ආනන්දං භික්ඛුං එතදවොචං – ‘මා හෙවං, ආනන්ද, මා හෙවං, ආනන්ද! සකලමෙව හිදං, ආනන්ද, බ්රහ්මචරියං – යදිදං කල්යාණමිත්තතා කල්යාණසහායතා කල්යාණසම්පවඞ්කතා. කල්යාණමිත්තස්සෙතං, ආනන්ද, භික්ඛුනො පාටිකඞ්ඛං කල්යාණසහායස්ස කල්යාණසම්පවඞ්කස්ස අරියං අට්ඨඞ්ගිකං මග්ගං භාවෙස්සති අරියං අට්ඨඞ්ගිකං මග්ගං බහුලීකරිස්සති’’’. “महाराज, असे म्हटले असता मी आनंद भिक्खूला असे म्हणालो—‘आनंदा, असे म्हणू नकोस! आनंदा, असे म्हणू नकोस! आनंदा, हे संपूर्ण ब्रह्मचर्यच आहे—जे हे कल्याणमित्रता, कल्याणसहायता आणि कल्याणप्रवणता आहे. आनंदा, ज्या भिक्खूचे कल्याणमित्र आहेत, कल्याणसहायक आहेत, कल्याणप्रवण आहेत, त्याच्याकडून हीच अपेक्षा केली पाहिजे की तो आर्य अष्टांगिक मार्गाची भावना (विकास) करेल आणि आर्य अष्टांगिक मार्गाचा बहुशः सराव करेल.’” ‘‘කථඤ්ච, ආනන්ද, භික්ඛු කල්යාණමිත්තො කල්යාණසහායො කල්යාණසම්පවඞ්කො අරියං අට්ඨඞ්ගිකං මග්ගං භාවෙති, අරියං අට්ඨඞ්ගිකං මග්ගං බහුලීකරොති? ඉධානන්ද, භික්ඛු සම්මාදිට්ඨිං භාවෙති විවෙකනිස්සිතං විරාගනිස්සිතං නිරොධනිස්සිතං වොස්සග්ගපරිණාමිං, සම්මාසඞ්කප්පං භාවෙති…පෙ… සම්මාවාචං භාවෙති…පෙ… සම්මාකම්මන්තං භාවෙති…පෙ… සම්මාආජීවං භාවෙති…පෙ… සම්මාවායාමං භාවෙති…පෙ… සම්මාසතිං භාවෙති…පෙ… සම්මාසමාධිං භාවෙති විවෙකනිස්සිතං විරාගනිස්සිතං නිරොධනිස්සිතං වොස්සග්ගපරිණාමිං. එවං ඛො, ආනන්ද, භික්ඛු කල්යාණමිත්තො කල්යාණසහායො කල්යාණසම්පවඞ්කො අරියං අට්ඨඞ්ගිකං මග්ගං භාවෙති, අරියං අට්ඨඞ්ගිකං මග්ගං බහුලීකරොති. තදමිනාපෙතං, ආනන්ද, පරියායෙන වෙදිතබ්බං යථා සකලමෙවිදං බ්රහ්මචරියං – යදිදං කල්යාණමිත්තතා කල්යාණසහායතා කල්යාණසම්පවඞ්කතා’’ති. “आणि आनंदा, कल्याणमित्र, कल्याणसहायक आणि कल्याणप्रवण असलेला भिक्खू कशा प्रकारे आर्य अष्टांगिक मार्गाची भावना करतो आणि आर्य अष्टांगिक मार्गाचा बहुशः सराव करतो? आनंदा, या शासनात भिक्खू विवेक-निश्रित (एकांततेवर आधारित), विराग-निश्रित, निरोध-निश्रित आणि त्याग-परिणामी (मुक्तीकडे झुकणाऱ्या) सम्यक् दृष्टीची भावना करतो; सम्यक् संकल्पाची भावना करतो...पे... सम्यक् वाचेची भावना करतो...पे... सम्यक् कर्मांताची भावना करतो...पे... सम्यक् आजीविकेची भावना करतो...पे... सम्यक् व्यायामाची भावना करतो...पे... सम्यक् सतीची (स्मृतीची) भावना करतो...पे... विवेक-निश्रित, विराग-निश्रित, निरोध-निश्रित आणि त्याग-परिणामी सम्यक् समाधीची भावना करतो. आनंदा, अशा प्रकारे कल्याणमित्र, कल्याणसहायक आणि कल्याणप्रवण असलेला भिक्खू आर्य अष्टांगिक मार्गाची भावना करतो आणि आर्य अष्टांगिक मार्गाचा बहुशः सराव करतो. आनंदा, यावरूनही हे याच पद्धतीने समजून घेतले पाहिजे की हे संपूर्ण ब्रह्मचर्यच आहे—जे हे कल्याणमित्रता, कल्याणसहायता आणि कल्याणप्रवणता आहे.’” ‘‘මමඤ්හි, ආනන්ද, කල්යාණමිත්තං ආගම්ම ජාතිධම්මා සත්තා ජාතියා පරිමුච්චන්ති, ජරාධම්මා සත්තා ජරාය පරිමුච්චන්ති, බ්යාධිධම්මා සත්තා බ්යාධිතො පරිමුච්චන්ති, මරණධම්මා සත්තා මරණෙන පරිමුච්චන්ති, සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසධම්මා සත්තා සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසෙහි පරිමුච්චන්ති. ඉමිනා ඛො එතං, ආනන්ද, පරියායෙන වෙදිතබ්බං යථා සකලමෙවිදං [Pg.89] බ්රහ්මචරියං – යදිදං කල්යාණමිත්තතා කල්යාණසහායතා කල්යාණසම්පවඞ්කතා’’ති. “आनंदा, कल्याणमित्र असलेल्या माझा आश्रय घेऊनच जन्म-स्वभाव असलेले प्राणी जन्मापासून मुक्त होतात; जरा-स्वभाव (वृद्धत्व) असलेले प्राणी जरापासून मुक्त होतात; व्याधी-स्वभाव (आजारपण) असलेले प्राणी व्याधीपासून मुक्त होतात; मरण-स्वभाव असलेले प्राणी मरणापासून मुक्त होतात; आणि शोक, परिदेव (रडणे-ओढणे), दुःख, डोमनस्य (मानसिक दुःख) व उपायास (हताशपणा) स्वभाव असलेले प्राणी शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य व उपायासापासून मुक्त होतात. आनंदा, यावरूनही हे याच पद्धतीने समजून घेतले पाहिजे की हे संपूर्ण ब्रह्मचर्यच आहे—जे हे कल्याणमित्रता, कल्याणसहायता आणि कल्याणप्रवणता आहे.’” ‘‘තස්මාතිහ තෙ, මහාරාජ, එවං සික්ඛිතබ්බං – ‘කල්යාණමිත්තො භවිස්සාමි කල්යාණසහායො කල්යාණසම්පවඞ්කො’ති. එවඤ්හි තෙ, මහාරාජ, සික්ඛිතබ්බං. “त्यामुळे, महाराज, आपण अशीच शिक्षा ग्रहण केली पाहिजे (असाच सराव केला पाहिजे)—‘मी कल्याणमित्र होईन, कल्याणसहायक होईन, कल्याणप्रवण होईन.’ महाराज, आपण अशीच शिक्षा ग्रहण केली पाहिजे.” ‘‘කල්යාණමිත්තස්ස තෙ, මහාරාජ, කල්යාණසහායස්ස කල්යාණසම්පවඞ්කස්ස අයං එකො ධම්මො උපනිස්සාය විහාතබ්බො – අප්පමාදො කුසලෙසු ධම්මෙසු. “महाराज, कल्याणमित्र, कल्याणसहायक आणि कल्याणप्रवण असलेल्या आपण एका गोष्टीचा आश्रय घेऊन राहिले पाहिजे—ती म्हणजे कुशल धर्मांमध्ये ‘अप्पमाद’ (अप्रमाद/जागरूकता).” ‘‘අප්පමත්තස්ස තෙ, මහාරාජ, විහරතො අප්පමාදං උපනිස්සාය, ඉත්ථාගාරස්ස අනුයන්තස්ස එවං භවිස්සති – ‘රාජා ඛො අප්පමත්තො විහරති, අප්පමාදං උපනිස්සාය. හන්ද, මයම්පි අප්පමත්තා විහරාම, අප්පමාදං උපනිස්සායා’’’ති. “महाराज, जेव्हा आपण अप्पमादाचा आश्रय घेऊन अप्रमत्त (जागरूक) होऊन राहाल, तेव्हा आपल्या अंतःपुरातील स्त्रियांना असा विचार येईल—‘राजे तर अप्पमादाचा आश्रय घेऊन अप्रमत्त होऊन राहतात. चला, आपणही अप्पमादाचा आश्रय घेऊन अप्रमत्त होऊन राहू या.’” ‘‘අප්පමත්තස්ස තෙ, මහාරාජ, විහරතො අප්පමාදං උපනිස්සාය, ඛත්තියානම්පි අනුයන්තානං එවං භවිස්සති – ‘රාජා ඛො අප්පමත්තො විහරති අප්පමාදං උපනිස්සාය. හන්ද, මයම්පි අප්පමත්තා විහරාම, අප්පමාදං උපනිස්සායා’’’ති. “महाराज, जेव्हा आपण अप्पमादाचा आश्रय घेऊन अप्रमत्त होऊन राहाल, तेव्हा आपल्या अधीन असलेल्या क्षत्रिय मांडलिक राजांनाही असा विचार येईल—‘राजे तर अप्पमादाचा आश्रय घेऊन अप्रमत्त होऊन राहतात. चला, आपणही अप्पमादाचा आश्रय घेऊन अप्रमत्त होऊन राहू या.’” ‘‘අප්පමත්තස්ස තෙ, මහාරාජ, විහරතො අප්පමාදං උපනිස්සාය, බලකායස්සපි එවං භවිස්සති – ‘රාජා ඛො අප්පමත්තො විහරති අප්පමාදං උපනිස්සාය. හන්ද, මයම්පි අප්පමත්තා විහරාම, අප්පමාදං උපනිස්සායා’’’ති. “महाराज, जेव्हा आपण अप्पमादाचा आश्रय घेऊन अप्रमत्त होऊन राहाल, तेव्हा आपल्या सैन्यदलालाही असा विचार येईल—‘राजे तर अप्पमादाचा आश्रय घेऊन अप्रमत्त होऊन राहतात. चला, आपणही अप्पमादाचा आश्रय घेऊन अप्रमत्त होऊन राहू या.’” ‘‘අප්පමත්තස්ස තෙ, මහාරාජ, විහරතො අප්පමාදං උපනිස්සාය, නෙගමජානපදස්සපි එවං භවිස්සති – ‘රාජා ඛො අප්පමත්තො විහරති, අප්පමාදං උපනිස්සාය. හන්ද, මයම්පි අප්පමත්තා විහරාම, අප්පමාදං උපනිස්සායා’’’ති? “महाराज, जेव्हा आपण अप्पमादाचा आश्रय घेऊन अप्रमत्त होऊन राहाल, तेव्हा आपल्या नगरातील व जनपदातील प्रजेलाही असा विचार येईल—‘राजे तर अप्पमादाचा आश्रय घेऊन अप्रमत्त होऊन राहतात. चला, आपणही अप्पमादाचा आश्रय घेऊन अप्रमत्त होऊन राहू या.’” ‘‘අප්පමත්තස්ස තෙ, මහාරාජ, විහරතො අප්පමාදං උපනිස්සාය, අත්තාපි ගුත්තො රක්ඛිතො භවිස්සති – ඉත්ථාගාරම්පි ගුත්තං රක්ඛිතං භවිස්සති, කොසකොට්ඨාගාරම්පි ගුත්තං රක්ඛිතං භවිස්සතී’’ති. ඉදමවොච…පෙ… “महाराज, जेव्हा आपण अप्पमादाचा आश्रय घेऊन अप्रमत्त होऊन राहाल, तेव्हा आपण स्वतःही सुरक्षित व रक्षित व्हाल; आपले अंतःपूरही सुरक्षित व रक्षित होईल आणि आपला खजिना व कोठारही सुरक्षित व रक्षित होईल.” असे भगवान म्हणाले...पे... ‘‘භොගෙ පත්ථයමානෙන, උළාරෙ අපරාපරෙ; අප්පමාදං පසංසන්ති, පුඤ්ඤකිරියාසු පණ්ඩිතා. “उत्कृष्ट आणि उत्तरोत्तर श्रेष्ठ अशा भोगांची (संपत्तीची) इच्छा करणाऱ्याने (अप्रमत्त राहिले पाहिजे); पुण्यकर्मांच्या बाबतीत अप्रमत्त राहण्याची प्रशंसा पंडित लोक करतात.” ‘‘අප්පමත්තො උභො අත්ථෙ, අධිග්ගණ්හාති පණ්ඩිතො; දිට්ඨෙ [Pg.90] ධම්මෙ ච යො අත්ථො, යො චත්ථො සම්පරායිකො; අත්ථාභිසමයා ධීරො, පණ්ඩිතොති පවුච්චතී’’ති. “अप्रमत्त असलेला पंडित दोन्ही प्रकारचे हित (लाभ) प्राप्त करून घेतो: या जन्मात प्रत्यक्ष दिसणारे हित आणि परलोकातील हित. दोन्ही हितांची प्राप्ती करून घेणाऱ्या त्या धीर पुरुषालाच ‘पंडित’ असे म्हटले जाते.” 9. පඨමඅපුත්තකසුත්තං ९. प्रथम अपुत्तक सुत्त 130. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො දිවා දිවස්ස යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නං ඛො රාජානං පසෙනදිං කොසලං භගවා එතදවොච – ‘‘හන්ද, කුතො නු ත්වං, මහාරාජ, ආගච්ඡසි දිවා දිවස්සා’’ති? १३०. श्रावस्ती येथील प्रसंग. तेव्हा कोसलचा राजा प्रसेनजित भरदुपारी जेथे भगवान होते तेथे आला; आल्यानंतर भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या राजा प्रसेनजितला भगवान म्हणाले—‘महाराज, आपण भरदुपारी कोठून येत आहात?’ ‘‘ඉධ, භන්තෙ, සාවත්ථියං සෙට්ඨි ගහපති කාලඞ්කතො. තමහං අපුත්තකං සාපතෙය්යං රාජන්තෙපුරං අතිහරිත්වා ආගච්ඡාමි. අසීති, භන්තෙ, සතසහස්සානි හිරඤ්ඤස්සෙව, කො පන වාදො රූපියස්ස! තස්ස ඛො පන, භන්තෙ, සෙට්ඨිස්ස ගහපතිස්ස එවරූපො භත්තභොගො අහොසි – කණාජකං භුඤ්ජති බිලඞ්ගදුතියං. එවරූපො වත්ථභොගො අහොසි – සාණං ධාරෙති තිපක්ඛවසනං. එවරූපො යානභොගො අහොසි – ජජ්ජරරථකෙන යාති පණ්ණඡත්තකෙන ධාරියමානෙනා’’ති. “भंते, येथे श्रावस्तीमध्ये एक निपुत्रिक श्रेष्ठी गृहपती मरण पावला आहे. त्याची ती वारस नसलेली संपत्ती राजवाड्यात जमा करून मी येत आहे. भंते, केवळ सोन्याचीच ऐंशी लाख नाणी आहेत, मग चांदीबद्दल तर काय बोलावे! परंतु भंते, त्या श्रेष्ठी गृहपतीचे भोजन अशा प्रकारचे होते—तो आंबट कांजीसोबत कण्यांचा (तांदळाच्या तुकड्यांचा) भात खात असे. त्याचे वस्त्रप्रावरण अशा प्रकारचे होते—तो तीन तुकडे जोडून शिवलेले तागाचे वस्त्र नेसत असे. त्याचे वाहन अशा प्रकारचे होते—तो पानांची छत्री धरून एका मोडकळीस आलेल्या लहान रथातून प्रवास करत असे.” ‘‘එවමෙතං, මහාරාජ, එවමෙතං, මහාරාජ! අසප්පුරිසො ඛො, මහාරාජ, උළාරෙ භොගෙ ලභිත්වා නෙවත්තානං සුඛෙති පීණෙති, න මාතාපිතරො සුඛෙති පීණෙති, න පුත්තදාරං සුඛෙති පීණෙති, න දාසකම්මකරපොරිසෙ සුඛෙති පීණෙති, න මිත්තාමච්චෙ සුඛෙති පීණෙති, න සමණබ්රාහ්මණෙසු උද්ධග්ගිකං දක්ඛිණං පතිට්ඨාපෙති සොවග්ගිකං සුඛවිපාකං සග්ගසංවත්තනිකං. තස්ස තෙ භොගෙ එවං සම්මා අපරිභුඤ්ජියමානෙ රාජානො වා හරන්ති චොරා වා හරන්ති අග්ගි වා ඩහති උදකං වා වහති අප්පියා වා දායාදා හරන්ති. එවංස තෙ, මහාරාජ, භොගා සම්මා අපරිභුඤ්ජියමානා පරික්ඛයං ගච්ඡන්ති, නො පරිභොගං. “महाराज, हे अगदी असेच आहे! महाराज, हे अगदी असेच आहे! महाराज, दुर्जन (असतपुरुष) मनुष्य विपुल संपत्ती मिळवूनही स्वतःला सुखी व समाधानी करत नाही, आई-वडिलांना सुखी व समाधानी करत नाही, पत्नी व मुलांना सुखी व समाधानी करत नाही, दास, कामगार व नोकरांना सुखी व समाधानी करत नाही, मित्र व सहकाऱ्यांना सुखी व समाधानी करत नाही; तसेच श्रमण व ब्राह्मणांना ऊर्ध्वगामी (उच्च लोकात नेणारे), स्वर्गदायक, सुखद परिणाम देणारे आणि स्वर्गाप्रत नेणारे दान देत नाही. त्याच्या त्या संपत्तीचा अशा प्रकारे योग्य उपभोग न घेतला गेल्यामुळे, एकतर राजे ती हिरावून घेतात, किंवा चोर ती चोरून नेतात, किंवा आग ती जाळून टाकते, किंवा पाणी ती वाहून नेते, किंवा अप्रिय वारसदार ती घेऊन जातात. महाराज, अशा प्रकारे योग्य उपभोग न घेतला गेल्यामुळे त्याची ती संपत्ती नष्ट होऊन जाते, उपयोगात येत नाही.” ‘‘සෙය්යථාපි, මහාරාජ, අමනුස්සට්ඨානෙ පොක්ඛරණී අච්ඡොදකා සීතොදකා සාතොදකා සෙතොදකා සුපතිත්ථා රමණීයා. තං ජනො නෙව හරෙය්ය න පිවෙය්ය න නහායෙය්ය න යථාපච්චයං වා කරෙය්ය. එවඤ්හි තං, මහාරාජ, උදකං සම්මා අපරිභුඤ්ජියමානං පරික්ඛයං ගච්ඡෙය්ය[Pg.91], නො පරිභොගං. එවමෙව ඛො, මහාරාජ, අසප්පුරිසො උළාරෙ භොගෙ ලභිත්වා නෙවත්තානං සුඛෙති පීණෙති, න මාතාපිතරො සුඛෙති පීණෙති, න පුත්තදාරං සුඛෙති පීණෙති, න දාසකම්මකරපොරිසෙ සුඛෙති පීණෙති, න මිත්තාමච්චෙ සුඛෙති පීණෙති, න සමණබ්රාහ්මණෙසු උද්ධග්ගිකං දක්ඛිණං පතිට්ඨාපෙති සොවග්ගිකං සුඛවිපාකං සග්ගසංවත්තනිකං. තස්ස තෙ භොගෙ එවං සම්මා අපරිභුඤ්ජියමානෙ රාජානො වා හරන්ති චොරා වා හරන්ති අග්ගි වා ඩහති උදකං වා වහති අප්පියා වා දායාදා හරන්ති. එවංස තෙ, මහාරාජ, භොගා සම්මා අපරිභුඤ්ජියමානා පරික්ඛයං ගච්ඡන්ති, නො පරිභොගං. “महाराज, ज्याप्रमाणे एखाद्या निर्जन ठिकाणी स्वच्छ पाणी, थंड पाणी, गोड पाणी, पांढरे शुभ्र पाणी, सुंदर घाट असलेला आणि रमणीय असा कमळांचा तलाव असावा. परंतु लोकांनी ते पाणी नेले नाही, प्यायले नाही, त्यात स्नान केले नाही किंवा आपल्या गरजेनुसार त्याचा वापर केला नाही. महाराज, अशा प्रकारे ते पाणी योग्य रीतीने न वापरल्यामुळे वाया जाईल, उपयोगात येणार नाही. महाराज, त्याचप्रमाणे जेव्हा एखादा असत्पुरुष विपुल संपत्ती प्राप्त करतो, तेव्हा तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करत नाही, आपल्या आई-वडिलांना सुखी व संतुष्ट करत नाही, आपल्या पत्नी-मुलांना सुखी व संतुष्ट करत नाही, आपल्या दास, कामगार व नोकरांना सुखी व संतुष्ट करत नाही, आपल्या मित्र व सहकाऱ्यांना सुखी व संतुष्ट करत नाही; आणि श्रमण व ब्राह्मणांना ऊर्ध्वगामी, स्वर्ग देणारे, सुखद विपाक देणारे आणि स्वर्गाप्रत नेणारे दान देत नाही. अशा प्रकारे त्याच्या त्या संपत्तीचा योग्य वापर न केल्यामुळे, एकतर राजे ती हिरावून घेतात, किंवा चोर ती चोरून नेतात, किंवा आग ती जाळून टाकते, किंवा पाणी ती वाहून नेते, किंवा अप्रिय वारसदार ती हिरावून घेतात. महाराज, अशा प्रकारे त्याची ती संपत्ती योग्य रीतीने न वापरल्यामुळे नष्ट होते, उपयोगात येत नाही.” ‘‘සප්පුරිසො ච ඛො, මහාරාජ, උළාරෙ භොගෙ ලභිත්වා අත්තානං සුඛෙති පීණෙති, මාතාපිතරො සුඛෙති පීණෙති, පුත්තදාරං සුඛෙති පීණෙති, දාසකම්මකරපොරිසෙ සුඛෙති පීණෙති, මිත්තාමච්චෙ සුඛෙති පීණෙති, සමණබ්රාහ්මණෙසු උද්ධග්ගිකං දක්ඛිණං පතිට්ඨාපෙති සොවග්ගිකං සුඛවිපාකං සග්ගසංවත්තනිකං. තස්ස තෙ භොගෙ එවං සම්මා පරිභුඤ්ජියමානෙ නෙව රාජානො හරන්ති, න චොරා හරන්ති, න අග්ගි ඩහති, න උදකං වහති, න අප්පියා දායාදා හරන්ති. එවංස තෙ, මහාරාජ, භොගා සම්මා පරිභුඤ්ජියමානා පරිභොගං ගච්ඡන්ති, නො පරික්ඛයං. “परंतु महाराज, जेव्हा एखादा सत्पुरुष विपुल संपत्ती प्राप्त करतो, तेव्हा तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो, आपल्या आई-वडिलांना सुखी व संतुष्ट करतो, आपल्या पत्नी-मुलांना सुखी व संतुष्ट करतो, आपल्या दास, कामगार व नोकरांना सुखी व संतुष्ट करतो, आपल्या मित्र व सहकाऱ्यांना सुखी व संतुष्ट करतो; आणि श्रमण व ब्राह्मणांना ऊर्ध्वगामी, स्वर्ग देणारे, सुखद विपाक देणारे आणि स्वर्गाप्रत नेणारे दान देतो. अशा प्रकारे त्याच्या त्या संपत्तीचा योग्य वापर केला जात असताना, राजे ती हिरावून घेत नाहीत, चोर ती चोरून नेत नाहीत, आग ती जाळत नाही, पाणी ती वाहून नेत नाही आणि अप्रिय वारसदार ती हिरावून घेत नाहीत. महाराज, अशा प्रकारे त्याची ती संपत्ती योग्य रीतीने वापरली गेल्यामुळे उपयोगात येते, नष्ट होत नाही.” ‘‘සෙය්යථාපි, මහාරාජ, ගාමස්ස වා නිගමස්ස වා අවිදූරෙ පොක්ඛරණී අච්ඡොදකා සීතොදකා සාතොදකා සෙතොදකා සුපතිත්ථා රමණීයා. තඤ්ච උදකං ජනො හරෙය්යපි පිවෙය්යපි නහායෙය්යපි යථාපච්චයම්පි කරෙය්ය. එවඤ්හි තං, මහාරාජ, උදකං සම්මා පරිභුඤ්ජියමානං පරිභොගං ගච්ඡෙය්ය, නො පරික්ඛයං. එවමෙව ඛො, මහාරාජ, සප්පුරිසො උළාරෙ භොගෙ ලභිත්වා අත්තානං සුඛෙති පීණෙති, මාතාපිතරො සුඛෙති පීණෙති, පුත්තදාරං සුඛෙති පීණෙති, දාසකම්මකරපොරිසෙ සුඛෙති පීණෙති, මිත්තාමච්චෙ සුඛෙති පීණෙති, සමණබ්රාහ්මණෙසු උද්ධග්ගිකං දක්ඛිණං පතිට්ඨාපෙති සොවග්ගිකං සුඛවිපාකං සග්ගසංවත්තනිකං. තස්ස තෙ භොගෙ එවං සම්මා පරිභුඤ්ජියමානෙ නෙව රාජානො හරන්ති, න චොරා හරන්ති, න අග්ගි ඩහති, න උදකං වහති, න අප්පියා දායාදා හරන්ති. එවංස තෙ, මහාරාජ, භොගා සම්මා පරිභුඤ්ජියමානා පරිභොගං ගච්ඡන්ති, නො පරික්ඛය’’න්ති. “महाराज, ज्याप्रमाणे एखाद्या गावाच्या किंवा नगराच्या जवळच स्वच्छ पाणी, थंड पाणी, गोड पाणी, पांढरे शुभ्र पाणी, सुंदर घाट असलेला आणि रमणीय असा कमळांचा तलाव असावा. आणि लोकांनी ते पाणी नेले, प्यायले, त्यात स्नान केले आणि आपल्या गरजेनुसार त्याचा वापर केला. महाराज, अशा प्रकारे ते पाणी योग्य रीतीने वापरल्यामुळे उपयोगात येईल, वाया जाणार नाही. महाराज, त्याचप्रमाणे जेव्हा एखादा सत्पुरुष विपुल संपत्ती प्राप्त करतो, तेव्हा तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो, आपल्या आई-वडिलांना सुखी व संतुष्ट करतो, आपल्या पत्नी-मुलांना सुखी व संतुष्ट करतो, आपल्या दास, कामगार व नोकरांना सुखी व संतुष्ट करतो, आपल्या मित्र व सहकाऱ्यांना सुखी व संतुष्ट करतो; आणि श्रमण व ब्राह्मणांना ऊर्ध्वगामी, स्वर्ग देणारे, सुखद विपाक देणारे आणि स्वर्गाप्रत नेणारे दान देतो. अशा प्रकारे त्याच्या त्या संपत्तीचा योग्य वापर केला जात असताना, राजे ती हिरावून घेत नाहीत, चोर ती चोरून नेत नाहीत, आग ती जाळत नाही, पाणी ती वाहून नेत नाही आणि अप्रिय वारसदार ती हिरावून घेत नाहीत. महाराज, अशा प्रकारे त्याची ती संपत्ती योग्य रीतीने वापरली गेल्यामुळे उपयोगात येते, नष्ट होत नाही.” ‘‘අමනුස්සට්ඨානෙ [Pg.92] උදකංව සීතං,තදපෙය්යමානං පරිසොසමෙති; එවං ධනං කාපුරිසො ලභිත්වා,නෙවත්තනා භුඤ්ජති නො දදාති. “ज्याप्रमाणे निर्जन ठिकाणी असलेले थंड पाणी न प्यायल्यामुळे सुकून जाते, त्याचप्रमाणे नीच माणूस संपत्ती मिळवूनही स्वतः तिचा उपभोग घेत नाही आणि इतरांनाही देत नाही.” ධීරො ච විඤ්ඤූ අධිගම්ම භොගෙ,සො භුඤ්ජති කිච්චකරො ච හොති; සො ඤාතිසඞ්ඝං නිසභො භරිත්වා,අනින්දිතො සග්ගමුපෙති ඨාන’’න්ති. “परंतु धीर आणि सुज्ञ मनुष्य संपत्ती प्राप्त करून तिचा उपभोग घेतो आणि आपले कर्तव्य पार पाडतो. तो श्रेष्ठ पुरुष आपल्या नातेवाईकांचे पोषण करून, निष्कलंक राहून स्वर्गीय स्थानाला प्राप्त होतो.” 10. දුතියඅපුත්තකසුත්තං १०. “दुसरे अपुत्तक सुत्त” 131. අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො දිවා දිවස්ස යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා එකමන්තං නිසින්නං ඛො රාජානං පසෙනදිං කොසලං භගවා එතදවොච – ‘‘හන්ද, කුතො නු ත්වං, මහාරාජ, ආගච්ඡසි දිවා දිවස්සා’’ති? १३१. “त्यानंतर कोसलचा राजा प्रसेनजित भर दुपारी जेथे भगवान होते तेथे गेला. तेथे जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या राजा प्रसेनजितला भगवान म्हणाले – ‘महाराज, तुम्ही भर दुपारी कोठून येत आहात?’” ‘‘ඉධ, භන්තෙ, සාවත්ථියං සෙට්ඨි ගහපති කාලඞ්කතො. තමහං අපුත්තකං සාපතෙය්යං රාජන්තෙපුරං අතිහරිත්වා ආගච්ඡාමි. සතං, භන්තෙ, සතසහස්සානි හිරඤ්ඤස්සෙව, කො පන වාදො රූපියස්ස! තස්ස ඛො පන, භන්තෙ, සෙට්ඨිස්ස ගහපතිස්ස එවරූපො භත්තභොගො අහොසි – කණාජකං භුඤ්ජති බිලඞ්ගදුතියං. එවරූපො වත්ථභොගො අහොසි – සාණං ධාරෙති තිපක්ඛවසනං. එවරූපො යානභොගො අහොසි – ජජ්ජරරථකෙන යාති පණ්ණඡත්තකෙන ධාරියමානෙනා’’ති. “‘भंते, येथे श्रावस्तीमध्ये एक श्रीमंत गृहपती मरण पावला आहे. त्याला कोणीही वारस नसल्यामुळे त्याची ती संपत्ती राजवाड्यात जमा करून मी येत आहे. भंते, केवळ सोन्याचीच एक लाख नाणी आहेत, मग चांदीबद्दल तर काय बोलावे! परंतु भंते, त्या श्रेष्ठी गृहपतीचे खाणेपिणे अशा प्रकारचे होते – तो आंबट कांजीसोबत कण्यांचा भात खात असे. त्याचे कपडे अशा प्रकारचे होते – तो तीन तुकडे जोडून शिवलेले तागाचे वस्त्र नेसत असे. त्याचे वाहन अशा प्रकारचे होते – तो पानांची छत्री धरून एका जुन्या मोडकळीस आलेल्या रथातून प्रवास करत असे.’” ‘‘එවමෙතං, මහාරාජ, එවමෙතං, මහාරාජ! භූතපුබ්බං සො, මහාරාජ, සෙට්ඨි ගහපති තග්ගරසිඛිං නාම පච්චෙකසම්බුද්ධං පිණ්ඩපාතෙන පටිපාදෙසි. ‘දෙථ සමණස්ස පිණ්ඩ’න්ති වත්වා උට්ඨායාසනා පක්කාමි. දත්වා ච පන පච්ඡා විප්පටිසාරී අහොසි – ‘වරමෙතං පිණ්ඩපාතං දාසා වා කම්මකරා වා භුඤ්ජෙය්යු’න්ති. භාතු ච පන එකපුත්තකං සාපතෙය්යස්ස කාරණා ජීවිතා වොරොපෙසි. “‘तसेच आहे महाराज, तसेच आहे महाराज! महाराज, पूर्वीच्या काळी त्या श्रेष्ठी गृहपतीने तग्गरशिखी नावाच्या प्रत्येकबुद्धांना पिंडपात दिला होता. श्रमणाला भिक्षा द्या असे सांगून तो आपल्या आसनावरून उठून निघून गेला. परंतु दान दिल्यानंतर त्याला पश्चात्ताप झाला – या भिक्षेपेक्षा ती माझ्या दासांनी किंवा कामगारांनी खाल्ली असती तर बरे झाले असते! शिवाय, त्याने संपत्तीच्या लोभापायी आपल्या भावाच्या एकुलत्या एक मुलाचा जीव घेतला होता.’” ‘‘යං ඛො සො, මහාරාජ, සෙට්ඨි ගහපති තග්ගරසිඛිං පච්චෙකසම්බුද්ධං පිණ්ඩපාතෙන පටිපාදෙසි, තස්ස කම්මස්ස විපාකෙන සත්තක්ඛත්තුං සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජි. තස්සෙව කම්මස්ස විපාකාවසෙසෙන ඉමිස්සායෙව සාවත්ථියා [Pg.93] සත්තක්ඛත්තුං සෙට්ඨිත්තං කාරෙසි. යං ඛො සො, මහාරාජ, සෙට්ඨි ගහපති දත්වා පච්ඡා විප්පටිසාරී අහොසි – ‘වරමෙතං පිණ්ඩපාතං දාසා වා කම්මකරා වා භුඤ්ජෙය්යු’න්ති, තස්ස කම්මස්ස විපාකෙන නාස්සුළාරාය භත්තභොගාය චිත්තං නමති, නාස්සුළාරාය වත්ථභොගාය චිත්තං නමති, නාස්සුළාරාය යානභොගාය චිත්තං නමති, නාස්සුළාරානං පඤ්චන්නං කාමගුණානං භොගාය චිත්තං නමති. යං ඛො සො, මහාරාජ, සෙට්ඨි ගහපති භාතු ච පන එකපුත්තකං සාපතෙය්යස්ස කාරණා ජීවිතා වොරොපෙසි, තස්ස කම්මස්ස විපාකෙන බහූනි වස්සානි බහූනි වස්සසතානි බහූනි වස්සසහස්සානි බහූනි වස්සසතසහස්සානි නිරයෙ පච්චිත්ථ. තස්සෙව කම්මස්ස විපාකාවසෙසෙන ඉදං සත්තමං අපුත්තකං සාපතෙය්යං රාජකොසං පවෙසෙති. තස්ස ඛො, මහාරාජ, සෙට්ඨිස්ස ගහපතිස්ස පුරාණඤ්ච පුඤ්ඤං පරික්ඛීණං, නවඤ්ච පුඤ්ඤං අනුපචිතං. අජ්ජ පන, මහාරාජ, සෙට්ඨි ගහපති මහාරොරුවෙ නිරයෙ පච්චතී’’ති. ‘‘එවං, භන්තෙ, සෙට්ඨි ගහපති මහාරොරුවං නිරයං උපපන්නො’’ති. ‘‘එවං, මහාරාජ, සෙට්ඨි ගහපති මහාරොරුවං නිරයං උපපන්නො’’ති. ඉදමවොච…පෙ…. “महाराज, त्या श्रेष्ठी गृहपतीने तग्गरशिखी प्रत्येकबुद्धांना पिंडपाताने (भोजनाने) संतुष्ट केले, त्या कर्माच्या विपाकामुळे तो सात वेळा सुगती स्वर्गलोकात उत्पन्न झाला. त्याच कर्माच्या उर्वरित विपाकामुळे याच श्रावस्तीमध्ये तो सात वेळा श्रेष्ठी झाला. महाराज, त्या श्रेष्ठी गृहपतीने दान दिल्यानंतर जो पश्चात्ताप केला की—'या पिंडपाताचे भोजन दासांनी किंवा कामगारांनी केले असते तर बरे झाले असते'—त्या कर्माच्या विपाकामुळे त्याचे मन उत्तम भोजनाचा उपभोग घेण्याकडे वळत नाही, त्याचे मन उत्तम वस्त्रे परिधान करण्याकडे वळत नाही, त्याचे मन उत्तम वाहनांचा उपभोग घेण्याकडे वळत नाही, त्याचे मन उत्तम अशा पाच कामगुणांच्या उपभोगाकडे वळत नाही. महाराज, त्या श्रेष्ठी गृहपतीने संपत्तीच्या लोभापायी आपल्या भावाच्या एकुलत्या एक पुत्राला जीवे मारले, त्या कर्माच्या विपाकामुळे तो अनेक वर्षे, अनेक शतके, अनेक सहस्र वर्षे, अनेक लक्ष वर्षे निरयात यातना भोगत राहिला. त्याच कर्माच्या उर्वरित विपाकामुळे त्याची ही सातवी अपुत्रक (वारस नसलेली) संपत्ती राजकोषात जमा केली जात आहे. महाराज, त्या श्रेष्ठी गृहपतीचे जुने पुण्य आता पूर्णपणे संपले आहे आणि नवीन पुण्य त्याने संचित केले नाही. महाराज, आज तो श्रेष्ठी गृहपती महारोरुव निरयात यातना भोगत आहे.” “भन्ते, काय तो श्रेष्ठी गृहपती महारोरुव निरयात उत्पन्न झाला आहे?” “होय महाराज, तो श्रेष्ठी गृहपती महारोरुव निरयात उत्पन्न झाला आहे.” असे भगवान म्हणाले... ‘‘ධඤ්ඤං ධනං රජතං ජාතරූපං, පරිග්ගහං වාපි යදත්ථි කිඤ්චි; දාසා කම්මකරා පෙස්සා, යෙ චස්ස අනුජීවිනො. “धान्य, धन, चांदी, सोने किंवा जे काही इतर परिग्रह (मालमत्ता) आहे; दास, कामगार, सेवक आणि जे कोणी त्याच्यावर अवलंबून जगणारे आहेत. ‘‘සබ්බං නාදාය ගන්තබ්බං, සබ්බං නික්ඛිප්පගාමිනං ; යඤ්ච කරොති කායෙන, වාචාය උද චෙතසා. “हे सर्व काहीही सोबत न घेता जावे लागते, सर्व काही मागे सोडून जावे लागते; आणि जे काही मनुष्य शरीराने, वाचेने किंवा मनाने करतो. ‘‘තඤ්හි තස්ස සකං හොති, තඤ්ච ආදාය ගච්ඡති; තඤ්චස්ස අනුගං හොති, ඡායාව අනපායිනී. “तेच त्याचे स्वतःचे असते, तेच तो सोबत घेऊन जातो; आणि तेच सावलीप्रमाणे कधीही न सोडता त्याच्या मागे मागे येते. ‘‘තස්මා කරෙය්ය කල්යාණං, නිචයං සම්පරායිකං; පුඤ්ඤානි පරලොකස්මිං, පතිට්ඨා හොන්ති පාණින’’න්ති. “म्हणून परलोकासाठी कल्याणकारी कर्मांचा संचय करावा; कारण परलोकात पुण्य हेच प्राण्यांचा आधार असते.” දුතියො වග්ගො. दुसरा वग्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) - ජටිලා පඤ්ච රාජානො, දොණපාකකුරෙන ච; සඞ්ගාමෙන ද්වෙ වුත්තානි, මල්ලිකා ද්වෙ අප්පමාදෙන ච; අපුත්තකෙන ද්වෙ වුත්තා, වග්ගො තෙන පවුච්චතීති. जटिल सुत्त, पंचराज सुत्त, दोणपाककुर सुत्त, संगाम सुत्ताचे दोन भाग, मल्लिका सुत्त, अप्पमाद सुत्ताचे दोन भाग, अपुत्तक सुत्ताचे दोन भाग; या सुत्तांनी हा वग्ग बनला आहे असे म्हटले जाते. 3. තතියවග්ගො ३. तिसरा वग्ग 1. පුග්ගලසුත්තං १. पुग्गल सुत्त 132. සාවත්ථිනිදානං[Pg.94]. අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නං ඛො රාජානං පසෙනදිං කොසලං භගවා එතදවොච – ‘‘චත්තාරොමෙ, මහාරාජ, පුග්ගලා සන්තො සංවිජ්ජමානා ලොකස්මිං. කතමෙ චත්තාරො? තමොතමපරායනො, තමොජොතිපරායනො, ජොතිතමපරායනො, ජොතිජොතිපරායනො’’. १३२. श्रावस्ती येथील प्रसंग. तेव्हा कोसलचा राजा प्रसेनजित जेथे भगवान होते तेथे आला; आल्यानंतर भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या राजा प्रसेनजित कोसलला भगवान म्हणाले—“महाराज, जगात हे चार प्रकारचे पुग्गल (व्यक्ती) अस्तित्वात आहेत. कोणते चार? अंधाराकडून अंधाराकडे जाणारा, अंधाराकडून प्रकाशाकडे जाणारा, प्रकाशाकडून अंधाराकडे जाणारा आणि प्रकाशाकडून प्रकाशाकडे जाणारा.” ‘‘කථඤ්ච, මහාරාජ පුග්ගලො තමොතමපරායනො හොති? ඉධ, මහාරාජ, එකච්චො පුග්ගලො නීචෙ කුලෙ පච්චාජාතො හොති, චණ්ඩාලකුලෙ වා වෙනකුලෙ වා නෙසාදකුලෙ වා රථකාරකුලෙ වා පුක්කුසකුලෙ වා දලිද්දෙ අප්පන්නපානභොජනෙ කසිරවුත්තිකෙ, යත්ථ කසිරෙන ඝාසච්ඡාදො ලබ්භති. සො ච හොති දුබ්බණ්ණො දුද්දසිකො ඔකොටිමකො බව්හාබාධො කාණො වා කුණී වා ඛඤ්ජො වා පක්ඛහතො වා, න ලාභී අන්නස්ස පානස්ස වත්ථස්ස යානස්ස මාලාගන්ධවිලෙපනස්ස සෙය්යාවසථපදීපෙය්යස්ස. සො කායෙන දුච්චරිතං චරති, වාචාය දුච්චරිතං චරති, මනසා දුච්චරිතං චරති. සො කායෙන දුච්චරිතං චරිත්වා වාචාය දුච්චරිතං චරිත්වා මනසා දුච්චරිතං චරිත්වා, කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජති. “आणि महाराज, एखादी व्यक्ती अंधाराकडून अंधाराकडे जाणारी कशी होते? महाराज, या जगात एखादी व्यक्ती नीच कुळात जन्म घेते—चंडाल कुळात, वेणू (बांबू कामगार) कुळात, निषाद (शिकारी) कुळात, रथकार (चर्मकार) कुळात किंवा पुक्कुस (कचरा उचलणारे) कुळात; अशा गरीब कुळात जेथे अन्न-पाणी कमी असते आणि अत्यंत कष्टाने जीवन जगावे लागते, जेथे अन्न आणि वस्त्र कष्टाने मिळते. तो कुरूप, दिसायला अप्रिय, बुटका, अनेक रोगांनी ग्रस्त, काणा किंवा लुळा किंवा लंगडा किंवा अर्धांगवायू झालेला असतो. त्याला अन्न, पाणी, वस्त्र, वाहन, माळा, गंध, विलेपन, बिछाना, घर आणि दिवा मिळत नाही. तो शरीराने दुश्चरित करतो, वाचेने दुश्चरित करतो, मनाने दुश्चरित करतो. तो शरीराने, वाचेने आणि मनाने दुश्चरित करून, शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा निरयात उत्पन्न होतो.” ‘‘සෙය්යථාපි, මහාරාජ, පුරිසො අන්ධකාරා වා අන්ධකාරං ගච්ඡෙය්ය, තමා වා තමං ගච්ඡෙය්ය, ලොහිතමලා වා ලොහිතමලං ගච්ඡෙය්ය. තථූපමාහං, මහාරාජ, ඉමං පුග්ගලං වදාමි. එවං ඛො, මහාරාජ, පුග්ගලො තමොතමපරායනො හොති. “महाराज, जसे एखाद्या माणसाने अंधारातून अंधारात जावे, किंवा काळोखातून काळोखात जावे, किंवा रक्ताने माखलेल्या घाणीतून रक्ताने माखलेल्या घाणीत जावे. महाराज, मी या व्यक्तीला त्याच उपमेसारखे मानतो. महाराज, अशा प्रकारे व्यक्ती अंधाराकडून अंधाराकडे जाणारी होते.” ‘‘කථඤ්ච, මහාරාජ, පුග්ගලො තමොජොතිපරායනො හොති? ඉධ, මහාරාජ, එකච්චො පුග්ගලො නීචෙ කුලෙ පච්චාජාතො හොති, චණ්ඩාලකුලෙ වා වෙනකුලෙ වා නෙසාදකුලෙ වා රථකාරකුලෙ වා පුක්කුසකුලෙ වා දලිද්දෙ අප්පන්නපානභොජනෙ කසිරවුත්තිකෙ, යත්ථ කසිරෙන ඝාසච්ඡාදො ලබ්භති. සො ච ඛො හොති දුබ්බණ්ණො දුද්දසිකො [Pg.95] ඔකොටිමකො බව්හාබාධො, කාණො වා කුණී වා ඛඤ්ජො වා පක්ඛහතො වා, න ලාභී අන්නස්ස පානස්ස වත්ථස්ස යානස්ස මාලාගන්ධවිලෙපනස්ස සෙය්යාවසථපදීපෙය්යස්ස. සො කායෙන සුචරිතං චරති, වාචාය සුචරිතං චරති, මනසා සුචරිතං චරති. සො කායෙන සුචරිතං චරිත්වා වාචාය සුචරිතං චරිත්වා මනසා සුචරිතං චරිත්වා, කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජති. “आणि महाराज, एखादी व्यक्ती अंधाराकडून प्रकाशाकडे जाणारी कशी होते? महाराज, या जगात एखादी व्यक्ती नीच कुळात जन्म घेते—चंडाल कुळात, वेणू कुळात, निषाद कुळात, रथकार कुळात किंवा पुक्कुस कुळात; अशा गरीब कुळात जेथे अन्न-पाणी कमी असते आणि अत्यंत कष्टाने जीवन जगावे लागते, जेथे अन्न आणि वस्त्र कष्टाने मिळते. तो कुरूप, दिसायला अप्रिय, बुटका, अनेक रोगांनी ग्रस्त, काणा किंवा लुळा किंवा लंगडा किंवा अर्धांगवायू झालेला असतो. त्याला अन्न, पाणी, वस्त्र, वाहन, माळा, गंध, विलेपन, बिछाना, घर आणि दिवा मिळत नाही. परंतु तो शरीराने सुचरित करतो, वाचेने सुचरित करतो, मनाने सुचरित करतो. तो शरीराने, वाचेने आणि मनाने सुचरित करून, शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती स्वर्गलोकात उत्पन्न होतो.” ‘‘සෙය්යථාපි, මහාරාජ, පුරිසො පථවියා වා පල්ලඞ්කං ආරොහෙය්ය, පල්ලඞ්කා වා අස්සපිට්ඨිං ආරොහෙය්ය, අස්සපිට්ඨියා වා හත්ථික්ඛන්ධං ආරොහෙය්ය, හත්ථික්ඛන්ධා වා පාසාදං ආරොහෙය්ය. තථූපමාහං, මහාරාජ, ඉමං පුග්ගලං වදාමි. එවං ඛො, මහාරාජ, පුග්ගලො තමොජොතිපරායනො හොති. “महाराज, जसे एखाद्या माणसाने जमिनीवरून पालखीत चढावे, पालखीतून घोड्याच्या पाठीवर चढावे, घोड्याच्या पाठीवरून हत्तीच्या पाठीवर चढावे, आणि हत्तीच्या पाठीवरून प्रासादावर (महालावर) चढावे. महाराज, मी या व्यक्तीला त्याच उपमेसारखे मानतो. महाराज, अशा प्रकारे व्यक्ती अंधाराकडून प्रकाशाकडे जाणारी होते.” ‘‘කථඤ්ච, මහාරාජ, පුග්ගලො ජොතිතමපරායනො හොති? ඉධ, මහාරාජ, එකච්චො පුග්ගලො උච්චෙ කුලෙ පච්චාජාතො හොති, ඛත්තියමහාසාලකුලෙ වා බ්රාහ්මණමහාසාලකුලෙ වා ගහපතිමහාසාලකුලෙ වා, අඩ්ඪෙ මහද්ධනෙ මහාභොගෙ පහූතජාතරූපරජතෙ පහූතවිත්තූපකරණෙ පහූතධනධඤ්ඤෙ. සො ච හොති අභිරූපො දස්සනීයො පාසාදිකො, පරමාය වණ්ණපොක්ඛරතාය සමන්නාගතො, ලාභී අන්නස්ස පානස්ස වත්ථස්ස යානස්ස මාලාගන්ධවිලෙපනස්ස සෙය්යාවසථපදීපෙය්යස්ස. සො කායෙන දුච්චරිතං චරති, වාචාය දුච්චරිතං චරති, මනසා දුච්චරිතං චරති. සො කායෙන දුච්චරිතං චරිත්වා වාචාය දුච්චරිතං චරිත්වා මනසා දුච්චරිතං චරිත්වා, කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජති. आणि महाराज, एखादी व्यक्ती प्रकाशाकडून अंधाराकडे जाणारी कशी होते? महाराज, या जगात एखादी व्यक्ती उच्च कुळात जन्मलेली असते—समृद्ध क्षत्रिय महाशाल कुळात, समृद्ध ब्राह्मण महाशाल कुळात किंवा समृद्ध गृहपती महाशाल कुळात; जी अत्यंत श्रीमंत, विपुल धनसंपत्ती व ऐश्वर्य असलेली, भरपूर सोने-चांदी असलेली, विपुल सुखसोयी व उपकरणे असलेली आणि विपुल धान्य व संपत्ती असलेली असते. ती व्यक्ती देखणी, दर्शनीय, प्रसन्न व्यक्तिमत्त्वाची आणि अत्यंत सुंदर शरीरवर्ण लाभलेली असते. तिला अन्न, पेय, वस्त्र, वाहन, पुष्पमाला, गंध, विलेपन, शय्या, निवास आणि दीप-साधने सहज प्राप्त होतात. परंतु, ती व्यक्ती कायेने दुराचरण करते, वाचेने दुराचरण करते आणि मनाने दुराचरण करते. ती कायेने, वाचेने आणि मनाने दुराचरण करून, शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय (दुःखद अवस्था), दुर्गती, विनिपात आणि नरकात उत्पन्न होते. ‘‘සෙය්යථාපි, මහාරාජ, පුරිසො පාසාදා වා හත්ථික්ඛන්ධං ඔරොහෙය්ය, හත්ථික්ඛන්ධා වා අස්සපිට්ඨිං ඔරොහෙය්ය, අස්සපිට්ඨියා වා පල්ලඞ්කං ඔරොහෙය්ය, පල්ලඞ්කා වා පථවිං ඔරොහෙය්ය, පථවියා වා අන්ධකාරං පවිසෙය්ය. තථූපමාහං, මහාරාජ, ඉමං පුග්ගලං වදාමි. එවං ඛො, මහාරාජ, පුග්ගලො ජොතිතමපරායනො හොති. महाराज, जसे एखाद्या माणसाने प्रासादावरून हत्तीच्या पाठीवर उतरावे, हत्तीच्या पाठीवरून घोड्याच्या पाठीवर उतरावे, घोड्याच्या पाठीवरून पालखीत उतरावे, पालखीतून जमिनीवर उतरावे आणि जमिनीवरून एखाद्या अंधारात प्रवेश करावा; महाराज, मी या व्यक्तीला अगदी त्याचप्रमाणे मानतो. महाराज, अशा प्रकारे एखादी व्यक्ती प्रकाशाकडून अंधाराकडे जाणारी होते. ‘‘කථඤ්ච, මහාරාජ, පුග්ගලො ජොතිජොතිපරායනො හොති? ඉධ, මහාරාජ, එකච්චො පුග්ගලො උච්චෙ කුලෙ පච්චාජාතො හොති, ඛත්තියමහාසාලකුලෙ වා බ්රාහ්මණමහාසාලකුලෙ වා ගහපතිමහාසාලකුලෙ [Pg.96] වා, අඩ්ඪෙ මහද්ධනෙ මහාභොගෙ පහූතජාතරූපරජතෙ පහූතවිත්තූපකරණෙ පහූතධනධඤ්ඤෙ. සො ච හොති අභිරූපො දස්සනීයො පාසාදිකො, පරමාය වණ්ණපොක්ඛරතාය සමන්නාගතො, ලාභී අන්නස්ස පානස්ස වත්ථස්ස යානස්ස මාලාගන්ධවිලෙපනස්ස සෙය්යාවසථපදීපෙය්යස්ස. සො කායෙන සුචරිතං චරති, වාචාය සුචරිතං චරති, මනසා සුචරිතං චරති. සො කායෙන සුචරිතං චරිත්වා වාචාය සුචරිතං චරිත්වා මනසා සුචරිතං චරිත්වා, කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජති. आणि महाराज, एखादी व्यक्ती प्रकाशाकडून प्रकाशाकडे जाणारी कशी होते? महाराज, या जगात एखादी व्यक्ती उच्च कुळात जन्मलेली असते—समृद्ध क्षत्रिय महाशाल कुळात, समृद्ध ब्राह्मण महाशाल कुळात किंवा समृद्ध गृहपती महाशाल कुळात; जी अत्यंत श्रीमंत, विपुल धनसंपत्ती व ऐश्वर्य असलेली, भरपूर सोने-चांदी असलेली, विपुल सुखसोयी व उपकरणे असलेली आणि विपुल धान्य व संपत्ती असलेली असते. ती व्यक्ती देखणी, दर्शनीय, प्रसन्न व्यक्तिमत्त्वाची आणि अत्यंत सुंदर शरीरवर्ण लाभलेली असते. तिला अन्न, पेय, वस्त्र, वाहन, पुष्पमाला, गंध, विलेपन, शय्या, निवास आणि दीप-साधने सहज प्राप्त होतात. ती व्यक्ती कायेने सदाचरण करते, वाचेने सदाचरण करते आणि मनाने सदाचरण करते. ती कायेने, वाचेने आणि मनाने सदाचरण करून, शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होते. ‘‘සෙය්යථාපි, මහාරාජ, පුරිසො පල්ලඞ්කා වා පල්ලඞ්කං සඞ්කමෙය්ය, අස්සපිට්ඨියා වා අස්සපිට්ඨිං සඞ්කමෙය්ය, හත්ථික්ඛන්ධා වා හත්ථික්ඛන්ධං සඞ්කමෙය්ය, පාසාදා වා පාසාදං සඞ්කමෙය්ය. තථූපමාහං, මහාරාජ, ඉමං පුග්ගලං වදාමි. එවං ඛො, මහාරාජ, පුග්ගලො ජොතිජොතිපරායනො හොති. ඉමෙ ඛො, මහාරාජ, චත්තාරො පුග්ගලා සන්තො සංවිජ්ජමානා ලොකස්මි’’න්ති. ඉදමවොච…පෙ… महाराज, जसे एखाद्या माणसाने एका पालखीतून दुसऱ्या पालखीत जावे, किंवा घोड्याच्या पाठीवरून दुसऱ्या घोड्याच्या पाठीवर जावे, किंवा हत्तीच्या पाठीवरून दुसऱ्या हत्तीच्या पाठीवर जावे, किंवा एका प्रासादातून दुसऱ्या प्रासादात जावे; महाराज, मी या व्यक्तीला अगदी त्याचप्रमाणे मानतो. महाराज, अशा प्रकारे एखादी व्यक्ती प्रकाशाकडून प्रकाशाकडे जाणारी होते. महाराज, हेच ते चार प्रकारचे लोक जगात अस्तित्वात आहेत. असे भगवंतांनी सांगितले. ‘‘දලිද්දො පුරිසො රාජ, අස්සද්ධො හොති මච්ඡරී; කදරියො පාපසඞ්කප්පො, මිච්ඡාදිට්ඨි අනාදරො. हे राजा, जो मनुष्य दरिद्री आहे, श्रद्धाहीन आहे, कंजूष आहे, लोभी आहे, वाईट विचार करणारा (पापसंकल्प) आहे, मिथ्यादृष्टी आणि अनादर करणारा आहे; ‘‘සමණෙ බ්රාහ්මණෙ වාපි, අඤ්ඤෙ වාපි වනිබ්බකෙ; අක්කොසති පරිභාසති, නත්ථිකො හොති රොසකො. जो श्रमण, ब्राह्मण किंवा इतर याचकांचा अपमान करतो, त्यांना शिवीगाळ करतो, नास्तिक आणि क्रोधी असतो; ‘‘දදමානං නිවාරෙති, යාචමානාන භොජනං; තාදිසො පුරිසො රාජ, මීයමානො ජනාධිප; උපෙති නිරයං ඝොරං, තමොතමපරායනො. जो याचकांना अन्न देणाऱ्यांना अडवतो; हे राजा, हे प्रजेच्या पालका, असा मनुष्य मृत्यूनंतर घोर नरकात जातो. तो अंधाराकडून अंधाराकडे जाणारा मनुष्य होय. ‘‘දලිද්දො පුරිසො රාජ, සද්ධො හොති අමච්ඡරී; දදාති සෙට්ඨසඞ්කප්පො, අබ්යග්ගමනසො නරො. हे राजा, जो मनुष्य दरिद्री असूनही श्रद्धावान आहे, कंजूषपणा न करणारा आहे, दान देणारा आहे, श्रेष्ठ संकल्प करणारा आणि स्थिर मनाचा आहे; ‘‘සමණෙ බ්රාහ්මණෙ වාපි, අඤ්ඤෙ වාපි වනිබ්බකෙ; උට්ඨාය අභිවාදෙති, සමචරියාය සික්ඛති. जो श्रमण, ब्राह्मण किंवा इतर याचकांना पाहून उठून उभा राहतो, त्यांना अभिवादन करतो आणि समतापूर्ण आचरणाची दीक्षा घेतो; ‘‘දදමානං න වාරෙති, යාචමානාන භොජනං; තාදිසො පුරිසො රාජ, මීයමානො ජනාධිප; උපෙති තිදිවං ඨානං, තමොජොතිපරායනො. जो याचकांना अन्न देणाऱ्यांना अडवत नाही; हे राजा, हे प्रजेच्या पालका, असा मनुष्य मृत्यूनंतर स्वर्गलोकात जातो. तो अंधाराकडून प्रकाशाकडे जाणारा मनुष्य होय. ‘‘අඩ්ඪො [Pg.97] චෙ පුරිසො රාජ, අස්සද්ධො හොති මච්ඡරී; කදරියො පාපසඞ්කප්පො, මිච්ඡාදිට්ඨි අනාදරො. हे राजा, जर एखादा श्रीमंत मनुष्य श्रद्धाहीन असेल, कंजूष असेल, लोभी असेल, वाईट विचार करणारा (पापसंकल्प) असेल, मिथ्यादृष्टी आणि अनादर करणारा असेल; ‘‘සමණෙ බ්රාහ්මණෙ වාපි, අඤ්ඤෙ වාපි වනිබ්බකෙ; අක්කොසති පරිභාසති, නත්ථිකො හොති රොසකො. जो श्रमण, ब्राह्मण किंवा इतर याचकांचा अपमान करतो, त्यांना शिवीगाळ करतो, नास्तिक आणि क्रोधी असतो; ‘‘දදමානං නිවාරෙති, යාචමානාන භොජනං; තාදිසො පුරිසො රාජ, මීයමානො ජනාධිප; උපෙති නිරයං ඝොරං, ජොතිතමපරායනො. जो याचकांना अन्न देणाऱ्यांना अडवतो; हे राजा, हे प्रजेच्या पालका, असा मनुष्य मृत्यूनंतर घोर नरकात जातो. तो प्रकाशाकडून अंधाराकडे जाणारा मनुष्य होय. ‘‘අඩ්ඪො චෙ පුරිසො රාජ, සද්ධො හොති අමච්ඡරී; දදාති සෙට්ඨසඞ්කප්පො, අබ්යග්ගමනසො නරො. हे राजा, जर एखादा श्रीमंत मनुष्य श्रद्धावान असेल, कंजूषपणा न करणारा असेल, दान देणारा असेल, श्रेष्ठ संकल्प करणारा आणि स्थिर मनाचा असेल; ‘‘සමණෙ බ්රාහ්මණෙ වාපි, අඤ්ඤෙ වාපි වනිබ්බකෙ; උට්ඨාය අභිවාදෙති, සමචරියාය සික්ඛති. जो श्रमण, ब्राह्मण किंवा इतर याचकांना पाहून उठून उभा राहतो, त्यांना अभिवादन करतो आणि समतापूर्ण आचरणाची दीक्षा घेतो; ‘‘දදමානං න වාරෙති, යාචමානාන භොජනං; තාදිසො පුරිසො රාජ, මීයමානො ජනාධිප; උපෙති තිදිවං ඨානං, ජොතිජොතිපරායනො’’ති. जो याचकांना अन्न देणाऱ्यांना अडवत नाही; हे राजा, हे प्रजेच्या पालका, असा मनुष्य मृत्यूनंतर स्वर्गलोकात जातो. तो प्रकाशाकडून प्रकाशाकडे जाणारा मनुष्य होय. 2. අය්යිකාසුත්තං २. अय्यिका सुत्त 133. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං නිසින්නං ඛො රාජානං පසෙනදිං කොසලං භගවා එතදවොච – ‘‘හන්ද, කුතො නු ත්වං, මහාරාජ, ආගච්ඡසි දිවාදිවස්සා’’ති? १३३. श्रावस्ती येथील प्रसंग. एका बाजूला बसलेल्या कोसलचा राजा प्रसेनजित याला भगवान म्हणाले—'महाराज, तुम्ही या भर दुपारी कुठून येत आहात?' ‘‘අය්යිකා මෙ, භන්තෙ, කාලඞ්කතා ජිණ්ණා වුඩ්ඪා මහල්ලිකා අද්ධගතා වයොඅනුප්පත්තා වීසවස්සසතිකා ජාතියා. අය්යිකා ඛො පන මෙ, භන්තෙ, පියා හොති මනාපා. හත්ථිරතනෙන චෙපාහං, භන්තෙ, ලභෙය්යං ‘මා මෙ අය්යිකා කාලමකාසී’ති, හත්ථිරතනම්පාහං දදෙය්යං – ‘මා මෙ අය්යිකා කාලමකාසී’ති. අස්සරතනෙන චෙපාහං, භන්තෙ, ලභෙය්යං ‘මා මෙ අය්යිකා කාලමකාසී’ති, අස්සරතනම්පාහං දදෙය්යං – ‘මා මෙ අය්යිකා කාලමකාසී’ති. ගාමවරෙන චෙපාහං භන්තෙ, ලභෙය්යං ‘මා මෙ අය්යිකා කාලමකාසී’ති, ගාමවරම්පාහං දදෙය්යං – ‘මා මෙ අය්යිකා කාලමකාසී’ති. ජනපදපදෙසෙන චෙපාහං, භන්තෙ, ලභෙය්යං [Pg.98] ‘මා මෙ අය්යිකා කාලමකාසී’ති, ජනපදපදෙසම්පාහං දදෙය්යං – ‘මා මෙ අය්යිකා කාලමකාසී’ති. ‘සබ්බෙ සත්තා, මහාරාජ, මරණධම්මා මරණපරියොසානා මරණං අනතීතා’ති. ‘අච්ඡරියං, භන්තෙ, අබ්භුතං, භන්තෙ! යාවසුභාසිතමිදං, භන්තෙ, භගවතා – සබ්බෙ සත්තා මරණධම්මා මරණපරියොසානා මරණං අනතීතා’’’ති. “भंते, माझी आजी मरण पावली आहे. ती वृद्ध, वयोवृद्ध, दीर्घायुषी, आयुष्याच्या शेवटच्या टप्प्यावर पोहोचलेली आणि जन्मापासून १२० वर्षांची होती. भंते, माझी आजी मला अत्यंत प्रिय आणि आवडती होती. भंते, जर हत्ती-रत्नाच्या बदल्यात मला असे मिळवता आले असते की, 'माझी आजी मरण पावू नये,' तर मी हत्ती-रत्नसुद्धा देऊन टाकले असते—'माझी आजी मरण पावू नये' म्हणून. भंते, जर घोडा-रत्नाच्या बदल्यात मला असे मिळवता आले असते की, 'माझी आजी मरण पावू नये,' तर मी घोडा-रत्नसुद्धा देऊन टाकले असते—'माझी आजी मरण पावू नये' म्हणून. भंते, जर एखाद्या उत्तम गावाच्या बदल्यात मला असे मिळवता आले असते की, 'माझी आजी मरण पावू नये,' तर मी ते उत्तम गावसुद्धा देऊन टाकले असते—'माझी आजी मरण पावू नये' म्हणून. भंते, जर एखाद्या संपूर्ण जनपदाच्या बदल्यात मला असे मिळवता आले असते की, 'माझी आजी मरण पावू नये,' तर मी ते जनपदसुद्धा देऊन टाकले असते—'माझी आजी मरण पावू नये' म्हणून.” “महाराज, सर्व प्राणी मरणधर्मी आहेत, त्यांचा अंत मृत्यूमध्येच होतो आणि ते मृत्यूला टाळू शकत नाहीत.” “भंते, हे आश्चर्यकारक आहे! भंते, हे अद्भुत आहे! भगवंतांनी हे किती सुंदर सांगितले आहे: 'सर्व प्राणी मरणधर्मी आहेत, त्यांचा अंत मृत्यूमध्येच होतो आणि ते मृत्यूला टाळू शकत नाहीत.'” ‘‘එවමෙතං, මහාරාජ, එවමෙතං, මහාරාජ! සබ්බෙ සත්තා මරණධම්මා මරණපරියොසානා මරණං අනතීතා. සෙය්යථාපි, මහාරාජ, යානි කානිචි කුම්භකාරභාජනානි ආමකානි චෙව පක්කානි ච සබ්බානි තානි භෙදනධම්මානි භෙදනපරියොසානානි භෙදනං අනතීතානි; එවමෙව ඛො, මහාරාජ, සබ්බෙ සත්තා මරණධම්මා මරණපරියොසානා මරණං අනතීතා’’ති. ඉදමවොච…පෙ… "हे महाराज, हे असेच आहे! हे महाराज, हे असेच आहे! सर्व प्राणी मरणधर्मी आहेत, मरणातच शेवट होणारे आहेत आणि मरणाचे उल्लंघन करू शकत नाहीत. हे महाराज, ज्याप्रमाणे कुंभाराची कच्ची किंवा पक्की सर्व भांडी फुटण्याच्या स्वभावाची असतात, फुटण्यातच त्यांचा शेवट होतो आणि ती फुटणे टाळू शकत नाहीत; त्याचप्रमाणे, हे महाराज, सर्व प्राणी मरणधर्मी आहेत, मरणातच शेवट होणारे आहेत आणि मरणाचे उल्लंघन करू शकत नाहीत." भगवान असे म्हणाले... ‘‘සබ්බෙ සත්තා මරිස්සන්ති, මරණන්තඤ්හි ජීවිතං; යථාකම්මං ගමිස්සන්ති, පුඤ්ඤපාපඵලූපගා; නිරයං පාපකම්මන්තා, පුඤ්ඤකම්මා ච සුග්ගතිං. "सर्व प्राणी मरणार आहेत, कारण जीवनाचा शेवट मरणातच होतो. आपापल्या कर्मांनुसार, पुण्य आणि पापाचे फळ भोगत ते गती प्राप्त करतील; पापकर्म करणारे नरकात जातील आणि पुण्यकर्म करणारे सुगतीला जातील." ‘‘තස්මා කරෙය්ය කල්යාණං, නිචයං සම්පරායිකං; පුඤ්ඤානි පරලොකස්මිං, පතිට්ඨා හොන්ති පාණින’’න්ති. "म्हणूनच, परलोकातील कल्याणासाठी मनुष्याने पुण्य कर्मांचा संचय केला पाहिजे. परलोकात पुण्य हेच प्राण्यांचा आधार असते." 3. ලොකසුත්තං ३. "लोकसुत्त" 134. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං නිසින්නො ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කති නු ඛො, භන්තෙ, ලොකස්ස ධම්මා උප්පජ්ජමානා උප්පජ්ජන්ති අහිතාය දුක්ඛාය අඵාසුවිහාරායා’’ති? ‘‘තයො ඛො, මහාරාජ, ලොකස්ස ධම්මා උප්පජ්ජමානා උප්පජ්ජන්ති අහිතාය දුක්ඛාය අඵාසුවිහාරාය. කතමෙ තයො? ලොභො ඛො, මහාරාජ, ලොකස්ස ධම්මො, උප්පජ්ජමානො උප්පජ්ජති අහිතාය දුක්ඛාය අඵාසුවිහාරාය. දොසො ඛො, මහාරාජ, ලොකස්ස ධම්මො, උප්පජ්ජමානො උප්පජ්ජති අහිතාය දුක්ඛාය අඵාසුවිහාරාය. මොහො ඛො, මහාරාජ, ලොකස්ස ධම්මො, උප්පජ්ජමානො උප්පජ්ජති අහිතාය දුක්ඛාය අඵාසුවිහාරාය. ඉමෙ ඛො, මහාරාජ, තයො ලොකස්ස ධම්මා උප්පජ්ජමානා උප්පජ්ජන්ති අහිතාය දුක්ඛාය අඵාසුවිහාරායා’’ති. ඉදමවොච…පෙ… १३४. "श्रावस्ती येथील घटना. एका बाजूला बसलेल्या कोसलचा राजा प्रसेनजितने भगवंतांना विचारले – \"भंते, जगात अशा किती गोष्टी आहेत, ज्या उत्पन्न झाल्या असता माणसाच्या अहितासाठी, दुःखासाठी आणि त्रासासाठी कारणीभूत ठरतात?\" \"महाराज, जगात अशा तीन गोष्टी आहेत, ज्या उत्पन्न झाल्या असता माणसाच्या अहितासाठी, दुःखासाठी आणि त्रासासाठी कारणीभूत ठरतात. कोणत्या तीन? महाराज, लोभ हा जगातील असा धर्म आहे, जो उत्पन्न झाला असता अहितासाठी, दुःखासाठी आणि त्रासासाठी कारणीभूत ठरतो. महाराज, द्वेष हा जगातील असा धर्म आहे, जो उत्पन्न झाला असता अहितासाठी, दुःखासाठी आणि त्रासासाठी कारणीभूत ठरतो. महाराज, मोह हा जगातील असा धर्म आहे, जो उत्पन्न झाला असता अहितासाठी, दुःखासाठी आणि त्रासासाठी कारणीभूत ठरतो. महाराज, जगातील हे three धर्म आहेत, जे उत्पन्न झाले असता माणसाच्या अहितासाठी, दुःखासाठी आणि त्रासासाठी कारणीभूत ठरतात.\" भगवान असे म्हणाले..." ‘‘ලොභො [Pg.99] දොසො ච මොහො ච, පුරිසං පාපචෙතසං; හිංසන්ති අත්තසම්භූතා, තචසාරංව සම්ඵල’’න්ති. "लोभ, द्वेष आणि मोह हे स्वतःच्या आतूनच उत्पन्न होऊन, दुर्बुद्धी माणसाचा तसाच नाश करतात, ज्याप्रमाणे बांबूचे स्वतःचेच फळ बांबूच्या झाडाचा नाश करते." 4. ඉස්සත්තසුත්තං ४. "इस्सत्तसुत्त" 135. සාවත්ථිනිදානං. එකමන්තං නිසින්නො ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කත්ථ නු ඛො, භන්තෙ, දානං දාතබ්බ’’න්ති? ‘‘යත්ථ ඛො, මහාරාජ, චිත්තං පසීදතී’’ති. ‘‘කත්ථ පන, භන්තෙ, දින්නං මහප්ඵල’’න්ති? ‘‘අඤ්ඤං ඛො එතං, මහාරාජ, කත්ථ දානං දාතබ්බං, අඤ්ඤං පනෙතං කත්ථ දින්නං මහප්ඵලන්ති? සීලවතො ඛො, මහාරාජ, දින්නං මහප්ඵලං, නො තථා දුස්සීලෙ. තෙන හි, මහාරාජ, තඤ්ඤෙවෙත්ථ පටිපුච්ඡිස්සාමි. යථා, තෙ ඛමෙය්ය, තථා නං බ්යාකරෙය්යාසි. තං කිං මඤ්ඤසි, මහාරාජ, ඉධ ත්යස්ස යුද්ධං පච්චුපට්ඨිතං සඞ්ගාමො සමුපබ්යූළ්හො. අථ ආගච්ඡෙය්ය ඛත්තියකුමාරො අසික්ඛිතො අකතහත්ථො අකතයොග්ගො අකතූපාසනො භීරු ඡම්භී උත්රාසී පලායී. භරෙය්යාසි තං පුරිසං, අත්ථො ච තෙ තාදිසෙන පුරිසෙනා’’ති? ‘‘නාහං, භන්තෙ, භරෙය්යං තං පුරිසං, න ච මෙ අත්ථො තාදිසෙන පුරිසෙනා’’ති. ‘‘අථ ආගච්ඡෙය්ය බ්රාහ්මණකුමාරො අසික්ඛිතො…පෙ… අථ ආගච්ඡෙය්ය වෙස්සකුමාරො අසික්ඛිතො…පෙ… අථ ආගච්ඡෙය්ය සුද්දකුමාරො අසික්ඛිතො…පෙ… න ච මෙ අත්ථො තාදිසෙන පුරිසෙනා’’ති. १३५. "श्रावस्ती येथील घटना. एका बाजूला बसलेल्या कोसलचा राजा प्रसेनजितने भगवंतांना विचारले – \"भंते, दान कोणाला दिले पाहिजे?\" \"महाराज, जिथे मनाला प्रसन्नता वाटेल तिथे.\" \"पण भंते, दिलेले दान महाफळदायी कोठे होते?\" \"महाराज, 'दान कोठे दिले पाहिजे?' हा एक प्रश्न आहे आणि 'दिलेले दान महाफळदायी कोठे होते?' हा दुसरा प्रश्न आहे. महाराज, शीलवान व्यक्तीला दिलेले दान महाफळदायी होते, दुःशील व्यक्तीला दिलेले दान तसे होत नाही. महाराज, या संदर्भात मी तुम्हालाच एक प्रश्न विचारतो. तुम्हाला जसे योग्य वाटेल तसे उत्तर द्या. महाराज, तुम्हाला काय वाटते? समजा, युद्ध सुरू झाले आहे आणि रणसंग्राम पेटला आहे. अशा वेळी एक क्षत्रिय तरुण तिथे आला, जो धनुर्विद्येत अप्रशिक्षित आहे, अकुशल आहे, ज्याने सराव केलेला नाही, जो अननुभवी आहे, भित्रा आहे, घाबरणारा आहे, थरथरणारा आहे आणि पळून जाणारा आहे. तुम्ही अशा माणसाला सैन्यात ठेवाल का? आणि तुम्हाला अशा माणसाची काही गरज पडेल का?\" \"भंते, मी अशा माणसाला सैन्यात ठेवणार नाही आणि मला अशा माणसाची काहीच गरज नाही.\" \"समजा, एखादा ब्राह्मण तरुण अप्रशिक्षित आला... किंवा एखादा वैश्य तरुण अप्रशिक्षित आला... किंवा एखादा शूद्र तरुण अप्रशिक्षित आला... तर तुम्ही त्याला सैन्यात ठेवाल का? तुम्हाला अशा माणसाची गरज पडेल का?\" \"भंते, मी त्याला सैन्यात ठेवणार नाही आणि मला अशा माणसाची काहीच गरज नाही.\"" ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, මහාරාජ, ඉධ ත්යස්ස යුද්ධං පච්චුපට්ඨිතං සඞ්ගාමො සමුපබ්යූළ්හො. අථ ආගච්ඡෙය්ය ඛත්තියකුමාරො සුසික්ඛිතො කතහත්ථො කතයොග්ගො කතූපාසනො අභීරු අච්ඡම්භී අනුත්රාසී අපලායී. භරෙය්යාසි තං පුරිසං, අත්ථො ච තෙ තාදිසෙන පුරිසෙනා’’ති? ‘‘භරෙය්යාහං, භන්තෙ, තං පුරිසං, අත්ථො ච මෙ තාදිසෙන පුරිසෙනා’’ති. ‘‘අථ ආගච්ඡෙය්ය බ්රාහ්මණකුමාරො…පෙ… අථ ආගච්ඡෙය්ය වෙස්සකුමාරො…පෙ… අථ ආගච්ඡෙය්ය සුද්දකුමාරො සුසික්ඛිතො කතහත්ථො කතයොග්ගො කතූපාසනො අභීරු අච්ඡම්භී අනුත්රාසී අපලායී. භරෙය්යාසි තං පුරිසං, අත්ථො ච තෙ තාදිසෙන පුරිසෙනා’’ති? ‘‘භරෙය්යාහං, භන්තෙ, තං පුරිසං, අත්ථො ච මෙ තාදිසෙන පුරිසෙනා’’ති. "\"महाराज, तुम्हाला काय वाटते? समजा, युद्ध सुरू झाले आहे आणि रणसंग्राम पेटला आहे. अशा वेळी एक क्षत्रिय तरुण तिथे आला, जो धनुर्विद्येत सुशिक्षित आहे, कुशल आहे, ज्याने चांगला सराव केला आहे, जो अनुभवी आहे, निर्भय आहे, न घाबरणारा आहे, न थरथरणारा आहे आणि पळून न जाणारा आहे. तुम्ही अशा माणसाला सैन्यात ठेवाल का? आणि तुम्हाला अशा माणसाची काही गरज पडेल का?\" \"भंते, मी अशा माणसाला नक्कीच सैन्यात ठेवीन आणि मला अशा माणसाची गरजही आहे.\" \"समजा, एखादा ब्राह्मण तरुण आला... किंवा एखादा वैश्य तरुण आला... किंवा एखादा शूद्र तरुण आला, जो धनुर्विद्येत सुशिक्षित आहे, कुशल आहे, ज्याने चांगला सराव केला आहे, जो अनुभवी आहे, निर्भय आहे, न घाबरणारा आहे, न थरथरणारा आहे आणि पळून न जाणारा आहे. तुम्ही अशा माणसाला सैन्यात ठेवाल का? आणि तुम्हाला अशा माणसाची काही गरज पडेल का?\" \"भंते, मी अशा माणसाला नक्कीच सैन्यात ठेवीन आणि मला अशा माणसाची गरजही आहे.\"" ‘‘එවමෙව ඛො, මහාරාජ, යස්මා කස්මා චෙපි කුලා අගාරස්මා අනගාරියං පබ්බජිතො හොති, සො ච හොති පඤ්චඞ්ගවිප්පහීනො පඤ්චඞ්ගසමන්නාගතො, තස්මිං [Pg.100] දින්නං මහප්ඵලං හොති. කතමානි පඤ්චඞ්ගානි පහීනානි හොන්ති? කාමච්ඡන්දො පහීනො හොති, බ්යාපාදො පහීනො හොති, ථිනමිද්ධං පහීනං හොති, උද්ධච්චකුක්කුච්චං පහීනං හොති, විචිකිච්ඡා පහීනා හොති. ඉමානි පඤ්චඞ්ගානි පහීනානි හොන්ති. කතමෙහි පඤ්චහඞ්ගෙහි සමන්නාගතො හොති? අසෙක්ඛෙන සීලක්ඛන්ධෙන සමන්නාගතො හොති, අසෙක්ඛෙන සමාධික්ඛන්ධෙන සමන්නාගතො හොති, අසෙක්ඛෙන පඤ්ඤාක්ඛන්ධෙන සමන්නාගතො හොති, අසෙක්ඛෙන විමුත්තික්ඛන්ධෙන සමන්නාගතො හොති, අසෙක්ඛෙන විමුත්තිඤාණදස්සනක්ඛන්ධෙන සමන්නාගතො හොති. ඉමෙහි පඤ්චහඞ්ගෙහි සමන්නාගතො හොති. ඉති පඤ්චඞ්ගවිප්පහීනෙ පඤ්චඞ්ගසමන්නාගතෙ දින්නං මහප්ඵල’’න්ති. ඉදමවොච භගවා…පෙ… සත්ථා – "\"त्याचप्रमाणे, हे महाराज, कोणत्याही कुळातून गृहत्याग करून जो कोणी बेघर होऊन प्रव्रजित झाला असेल, आणि जर त्याने पाच अंगे नष्ट केली असतील व तो पाच अंगांनी युक्त असेल, तर त्याला दिलेले दान महाफळदायी ठरते. कोणती पाच अंगे नष्ट केलेली असतात? कामच्छंद नष्ट झालेला असतो, व्यापाद नष्ट झालेला असतो, थिनमिद्ध नष्ट झालेले असते, उद्धच्च-कुक्कुच्च नष्ट झालेले असते, आणि विचिकित्सा नष्ट झालेली असते. ही पाच अंगे नष्ट झालेली असतात. कोणत्या पाच अंगांनी तो युक्त असतो? तो अशैक्ष शीलस्कंधाने युक्त असतो, अशैक्ष समाधिस्कंधाने युक्त असतो, अशैक्ष प्रज्ञास्कंधाने युक्त असतो, अशैक्ष विमुक्तिस्कंधाने युक्त असतो, आणि अशैक्ष विमुक्तिज्ञानदर्शनस्कंधाने युक्त असतो. तो या पाच अंगांनी युक्त असतो. अशा प्रकारे, पाच अंगे नष्ट केलेल्या आणि पाच अंगांनी युक्त असलेल्या व्यक्तीला दिलेले दान महाफळदायी ठरते.\" भगवान असे म्हणाले... शास्ता म्हणाले –" ‘‘ඉස්සත්තං බලවීරියඤ්ච, යස්මිං විජ්ජෙථ මාණවෙ; තං යුද්ධත්ථො භරෙ රාජා, නාසූරං ජාතිපච්චයා. "\"ज्याप्रमाणे युद्धाची इच्छा असणारा राजा, ज्या तरुणाकडे धनुर्विद्या आणि शारीरिक बल व पराक्रम आहे, त्यालाच सैन्यात ठेवतो; केवळ उच्च कुळात जन्मला आहे म्हणून भित्र्या माणसाला तो सैन्यात ठेवत नाही—" ‘‘තථෙව ඛන්තිසොරච්චං, ධම්මා යස්මිං පතිට්ඨිතා; අරියවුත්තිං මෙධාවිං, හීනජච්චම්පි පූජයෙ. "\"त्याचप्रमाणे, ज्या व्यक्तीमध्ये क्षमा आणि सौजन्य हे गुण प्रस्थापित आहेत, अशा आर्य आचरण करणाऱ्या बुद्धिमान व्यक्तीची, ती नीच कुळातील असली तरीही, पूजा केली पाहिजे." ‘‘කාරයෙ අස්සමෙ රම්මෙ, වාසයෙත්ථ බහුස්සුතෙ; පපඤ්ච විවනෙ කයිරා, දුග්ගෙ සඞ්කමනානි ච. "\"मनुष्याने रमणीय पर्णकुटी बांधाव्यात आणि तिथे बहुश्रुत लोकांना राहण्यास आमंत्रित करावे; निर्जल वनात पाण्याचे साठे तयार करावेत आणि दुर्गम ठिकाणी पूल व रस्ते बांधावेत." ‘‘අන්නං පානං ඛාදනීයං, වත්ථසෙනාසනානි ච; දදෙය්ය උජුභූතෙසු, විප්පසන්නෙන චෙතසා. "\"सरळ मार्गाने चालणाऱ्या व्यक्तींना प्रसन्न चित्ताने अन्न, पाणी, खाद्यपदार्थ, वस्त्रे आणि शय्या-आसने दान करावीत." ‘‘යථා හි මෙඝො ථනයං, විජ්ජුමාලී සතක්කකු; ථලං නින්නඤ්ච පූරෙති, අභිවස්සං වසුන්ධරං. "\"ज्याप्रमाणे विजेच्या माळांनी नटलेला आणि शेकडो शिखरे असलेला ढग गर्जना करत पृथ्वीवर पाऊस पाडतो आणि उंच व सखल भाग पाण्याने भरून टाकतो—" ‘‘තථෙව සද්ධො සුතවා, අභිසඞ්ඛච්ච භොජනං; වනිබ්බකෙ තප්පයති, අන්නපානෙන පණ්ඩිතො. "\"त्याचप्रमाणे, श्रद्धावान, बहुश्रुत आणि बुद्धिमान मनुष्य उत्तम भोजन तयार करून, याचक व भिक्षूंना अन्न आणि पाण्याने तृप्त करतो." ‘‘ආමොදමානො පකිරෙති, දෙථ දෙථාති භාසති; තං හිස්ස ගජ්ජිතං හොති, දෙවස්සෙව පවස්සතො; සා පුඤ්ඤධාරා විපුලා, දාතාරං අභිවස්සතී’’ති. "\"तो अत्यंत आनंदी मनाने दान वाटतो आणि 'द्या, द्या' असे म्हणतो. पाऊस पाडणाऱ्या ढगाच्या गर्जनेसारखीच त्याची ही गर्जना असते. ती विशाल पुण्यधारा त्या दान देणाऱ्या दात्यावरच वर्षाव करते.\"" 5. පබ්බතූපමසුත්තං ५. "पब्बतूपमसुत्त" 136. සාවත්ථිනිදානං[Pg.101]. එකමන්තං නිසින්නං ඛො රාජානං පසෙනදිං කොසලං භගවා එතදවොච – ‘‘හන්ද, කුතො නු ත්වං, මහාරාජ, ආගච්ඡසි දිවා දිවස්සා’’ති? ‘‘යානි තානි, භන්තෙ, රඤ්ඤං ඛත්තියානං මුද්ධාවසිත්තානං ඉස්සරියමදමත්තානං කාමගෙධපරියුට්ඨිතානං ජනපදත්ථාවරියප්පත්තානං මහන්තං පථවිමණ්ඩලං අභිවිජිය අජ්ඣාවසන්තානං රාජකරණීයානි භවන්ති, තෙසු ඛ්වාහං, එතරහි උස්සුක්කමාපන්නො’’ති. १३६. श्रावस्ती येथील प्रसंग. एका बाजूला बसलेल्या कोसलचा राजा प्रसेनजीत याला भगवान म्हणाले – "महाराज, भर दुपारी आपण कोठून येत आहात?" "भंते, ज्यांचे मस्तकावर राज्याभिषेक झाला आहे, जे ऐश्वर्याच्या मदाने धुंद आहेत, जे कामभोगांच्या आसक्तीने ग्रासलेले आहेत, ज्यांनी आपल्या देशात स्थिर नियंत्रण मिळवले आहे आणि जे या विशाल पृथ्वीवर विजय मिळवून राज्य करत आहेत, अशा क्षत्रिय राजांची जी राजकर्तव्ये असतात, त्या कामांमध्ये मी सध्या व्यस्त होतो." ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, මහාරාජ, ඉධ තෙ පුරිසො ආගච්ඡෙය්ය පුරත්ථිමාය දිසාය සද්ධායිකො පච්චයිකො. සො තං උපසඞ්කමිත්වා එවං වදෙය්ය – ‘යග්ඝෙ, මහාරාජ, ජානෙය්යාසි, අහං ආගච්ඡාමි පුරත්ථිමාය දිසාය. තත්ථද්දසං මහන්තං පබ්බතං අබ්භසමං සබ්බෙ පාණෙ නිප්පොථෙන්තො ආගච්ඡති. යං තෙ, මහාරාජ, කරණීයං, තං කරොහී’ති. අථ දුතියො පුරිසො ආගච්ඡෙය්ය පච්ඡිමාය දිසාය…පෙ… අථ තතියො පුරිසො ආගච්ඡෙය්ය උත්තරාය දිසාය…පෙ… අථ චතුත්ථො පුරිසො ආගච්ඡෙය්ය දක්ඛිණාය දිසාය සද්ධායිකො පච්චයිකො. සො තං උපසඞ්කමිත්වා එවං වදෙය්ය – ‘යග්ඝෙ මහාරාජ, ජානෙය්යාසි, අහං ආගච්ඡාමි දක්ඛිණාය දිසාය. තත්ථද්දසං මහන්තං පබ්බතං අබ්භසමං සබ්බෙ පාණෙ නිප්පොථෙන්තො ආගච්ඡති. යං තෙ, මහාරාජ, කරණීයං තං කරොහී’ති. එවරූපෙ තෙ, මහාරාජ, මහති මහබ්භයෙ සමුප්පන්නෙ දාරුණෙ මනුස්සක්ඛයෙ දුල්ලභෙ මනුස්සත්තෙ කිමස්ස කරණීය’’න්ති? "महाराज, तुम्हाला काय वाटते? समजा, पूर्व दिशेकडून तुमचा एक विश्वासू आणि खात्रीशीर सेवक आला. त्याने तुमच्याजवळ येऊन असे म्हटले – 'महाराज, आपणास माहित असावे, मी पूर्व दिशेकडून येत आहे. तिथे मी ढगांएवढा प्रचंड पर्वत पाहिला आहे, जो सर्व प्राण्यांना चिरडत या दिशेने येत आहे. महाराज, आता आपल्याला जे काही करणे आवश्यक आहे, ते आपण करावे.' त्यानंतर दुसरा माणूस पश्चिम दिशेकडून आला... तसेच तिसरा माणूस उत्तर दिशेकडून आला... आणि चौथा विश्वासू व खात्रीशीर माणूस दक्षिण दिशेकडून आला. त्याने तुमच्याजवळ येऊन असे म्हटले – 'महाराज, आपणास माहित असावे, मी दक्षिण दिशेकडून येत आहे. तिथे मी ढगांएवढा प्रचंड पर्वत पाहिला आहे, जो सर्व प्राण्यांना चिरडत या दिशेने येत आहे. महाराज, आता आपल्याला जे काही करणे आवश्यक आहे, ते आपण करावे.' महाराज, जेव्हा अशी मोठी आपत्ती ओढवेल, मानवी जीवनाचा असा भयंकर विनाश होईल आणि मानवी जन्म मिळणे अत्यंत कठीण असताना, अशा वेळी काय केले पाहिजे?" ‘‘එවරූපෙ මෙ, භන්තෙ, මහති මහබ්භයෙ සමුප්පන්නෙ දාරුණෙ මනුස්සක්ඛයෙ දුල්ලභෙ මනුස්සත්තෙ කිමස්ස කරණීයං අඤ්ඤත්ර ධම්මචරියාය අඤ්ඤත්ර සමචරියාය අඤ්ඤත්ර කුසලකිරියාය අඤ්ඤත්ර පුඤ්ඤකිරියායා’’ති? "भंते, जेव्हा अशी मोठी आपत्ती ओढवेल, मानवी जीवनाचा असा भयंकर विनाश होईल आणि मानवी जन्म मिळणे अत्यंत कठीण असताना, धम्माचरण, समचरण, कुशलकर्म आणि पुण्यकर्म करण्याव्यतिरिक्त दुसरे काय केले जाऊ शकते?" ‘‘ආරොචෙමි ඛො තෙ, මහාරාජ, පටිවෙදෙමි ඛො තෙ, මහාරාජ, අධිවත්තති ඛො තං, මහාරාජ, ජරාමරණං. අධිවත්තමානෙ චෙ තෙ, මහාරාජ, ජරාමරණෙ කිමස්ස කරණීය’’න්ති? ‘‘අධිවත්තමානෙ ච මෙ, භන්තෙ, ජරාමරණෙ කිමස්ස කරණීයං අඤ්ඤත්ර ධම්මචරියාය සමචරියාය කුසලකිරියාය පුඤ්ඤකිරියාය? යානි තානි, භන්තෙ, රඤ්ඤං ඛත්තියානං මුද්ධාවසිත්තානං ඉස්සරියමදමත්තානං [Pg.102] කාමගෙධපරියුට්ඨිතානං ජනපදත්ථාවරියප්පත්තානං මහන්තං පථවිමණ්ඩලං අභිවිජිය අජ්ඣාවසන්තානං හත්ථියුද්ධානි භවන්ති; තෙසම්පි, භන්තෙ, හත්ථියුද්ධානං නත්ථි ගති නත්ථි විසයො අධිවත්තමානෙ ජරාමරණෙ. යානිපි තානි, භන්තෙ, රඤ්ඤං ඛත්තියානං මුද්ධාවසිත්තානං…පෙ… අජ්ඣාවසන්තානං අස්සයුද්ධානි භවන්ති…පෙ… රථයුද්ධානි භවන්ති …පෙ… පත්තියුද්ධානි භවන්ති; තෙසම්පි, භන්තෙ, පත්තියුද්ධානං නත්ථි ගති නත්ථි විසයො අධිවත්තමානෙ ජරාමරණෙ. සන්ති ඛො පන, භන්තෙ, ඉමස්මිං රාජකුලෙ මන්තිනො මහාමත්තා, යෙ පහොන්ති ආගතෙ පච්චත්ථිකෙ මන්තෙහි භෙදයිතුං. තෙසම්පි, භන්තෙ, මන්තයුද්ධානං නත්ථි ගති නත්ථි විසයො අධිවත්තමානෙ ජරාමරණෙ. සංවිජ්ජති ඛො පන, භන්තෙ, ඉමස්මිං රාජකුලෙ පහූතං හිරඤ්ඤසුවණ්ණං භූමිගතඤ්චෙව වෙහාසට්ඨඤ්ච, යෙන මයං පහොම ආගතෙ පච්චත්ථිකෙ ධනෙන උපලාපෙතුං. තෙසම්පි, භන්තෙ, ධනයුද්ධානං නත්ථි ගති නත්ථි විසයො අධිවත්තමානෙ ජරාමරණෙ. අධිවත්තමානෙ ච මෙ, භන්තෙ, ජරාමරණෙ කිමස්ස කරණීයං අඤ්ඤත්ර ධම්මචරියාය සමචරියාය කුසලකිරියාය පුඤ්ඤකිරියායා’’ති? "महाराज, मी तुम्हाला सांगतो, महाराज, मी तुम्हाला जाहीर करतो की, जरा (वृद्धत्व) आणि मरण तुमच्यावर चालून येत आहेत. महाराज, जेव्हा जरा आणि मरण तुमच्यावर चालून येत आहेत, तेव्हा काय केले पाहिजे?" "भंते, जेव्हा जरा आणि मरण माझ्यावर चालून येत आहेत, तेव्हा धम्माचरण, समचरण, कुशलकर्म आणि पुण्यकर्म करण्याव्यतिरिक्त दुसरे काय केले जाऊ शकते? भंते, ज्यांचे मस्तकावर राज्याभिषेक झाला आहे, जे ऐश्वर्याच्या मदाने धुंद आहेत, जे कामभोगांच्या आसक्तीने ग्रासलेले आहेत, ज्यांनी आपल्या देशात स्थिर नियंत्रण मिळवले आहे आणि जे या विशाल पृथ्वीवर विजय मिळवून राज्य करत आहेत, अशा क्षत्रिय राजांची हत्तींची युद्धे होतात; परंतु भंते, जेव्हा जरा आणि मरण चालून येतात, तेव्हा त्या हत्तींच्या युद्धांना काही वाव उरत नाही, काही उपयोग उरत नाही. भंते, अशा राजांची जी घोड्यांची युद्धे... रथांची युद्धे... पायदळाची युद्धे होतात; भंते, जेव्हा जरा आणि मरण चालून येतात, तेव्हा त्या पायदळाच्या युद्धांनाही काही वाव उरत नाही, काही उपयोग उरत नाही. भंते, या राजघराण्यात असे बुद्धिमान मंत्री आहेत, जे शत्रू आल्यावर त्यांना आपल्या मसलतीने (मंत्रयुद्धाने) आपसात भेद पाडण्यास समर्थ आहेत; परंतु भंते, जेव्हा जरा आणि मरण चालून येतात, तेव्हा त्या मसलतीच्या युद्धांनाही काही वाव उरत नाही, काही उपयोग उरत नाही. भंते, या राजघराण्यात जमिनीखाली पुरलेले आणि वर टांगलेले विपुल सोने-नाणे (धन) उपलब्ध आहे, ज्या धनाच्या बळावर आम्ही आलेल्या शत्रूंना वश करण्यास समर्थ आहोत; परंतु भंते, जेव्हा जरा आणि मरण चालून येतात, तेव्हा त्या धनाच्या युद्धांनाही काही वाव उरत नाही, काही उपयोग उरत नाही. भंते, जेव्हा जरा आणि मरण माझ्यावर चालून येत आहेत, तेव्हा धम्माचरण, समचरण, कुशलकर्म आणि पुण्यकर्म करण्याव्यतिरिक्त दुसरे काय केले जाऊ शकते?" ‘‘එවමෙතං, මහාරාජ, එවමෙතං, මහාරාජ! අධිවත්තමානෙ ජරාමරණෙ කිමස්ස කරණීයං අඤ්ඤත්ර ධම්මචරියාය සමචරියාය කුසලකිරියාය පුඤ්ඤකිරියායා’’ති? ඉදමවොච භගවා…පෙ… සත්ථා – "हे अगदी असेच आहे, महाराज! हे अगदी असेच आहे, महाराज! जेव्हा जरा आणि मरण चालून येत आहेत, तेव्हा धम्माचरण, समचरण, कुशलकर्म आणि पुण्यकर्म करण्याव्यतिरिक्त दुसरे काय केले जाऊ शकते?" भगवान असे म्हणाले... शास्त्यांनी पुढे असे म्हटले – ‘‘යථාපි සෙලා විපුලා, නභං ආහච්ච පබ්බතා; සමන්තානුපරියායෙය්යුං, නිප්පොථෙන්තො චතුද්දිසා. "ज्याप्रमाणे आकाशाला भिडणारे, विशाल आणि कठीण खडकांचे पर्वत चारी दिशांनी सर्व प्राण्यांना चिरडत पुढे सरकतात;" ‘‘එවං ජරා ච මච්චු ච, අධිවත්තන්ති පාණිනෙ ; ඛත්තියෙ බ්රාහ්මණෙ වෙස්සෙ, සුද්දෙ චණ්ඩාලපුක්කුසෙ; න කිඤ්චි පරිවජ්ජෙති, සබ්බමෙවාභිමද්දති. "त्याचप्रमाणे जरा (वृद्धत्व) आणि मृत्यू सर्व प्राण्यांवर चालून येतात – मग ते क्षत्रिय असोत, ब्राह्मण असोत, वैश्य असोत, शूद्र असोत, चंडाल असोत वा कचरा उचलणारे असोत; ते कोणालाही सोडत नाहीत, सर्वांनाच चिरडून टाकतात." ‘‘න තත්ථ හත්ථීනං භූමි, න රථානං න පත්තියා; න චාපි මන්තයුද්ධෙන, සක්කා ජෙතුං ධනෙන වා. "तिथे हत्तींच्या सैन्याला वाव नाही, रथांना नाही आणि पायदळालाही नाही. तिथे मसलतीने (मंत्रयुद्धाने) किंवा धनाच्या बळावर विजय मिळवणे शक्य नाही." ‘‘තස්මා හි පණ්ඩිතො පොසො, සම්පස්සං අත්ථමත්තනො; බුද්ධෙ ධම්මෙ ච සඞ්ඝෙ ච, ධීරො සද්ධං නිවෙසයෙ. "म्हणूनच, स्वतःचे कल्याण पाहणाऱ्या बुद्धिमान आणि धीर गंभीर मनुष्याने बुद्ध, धम्म आणि संघ यांच्यावर आपली श्रद्धा दृढ केली पाहिजे." ‘‘යො [Pg.103] ධම්මං චරි කායෙන, වාචාය උද චෙතසා; ඉධෙව නං පසංසන්ති, පෙච්ච සග්ගෙ පමොදතී’’ති. "जो मनुष्य काया, वाचा आणि मनाने धम्माचे आचरण करतो, त्याची या लोकात प्रशंसा केली जाते आणि मृत्यूनंतर तो स्वर्गात आनंदित होतो." තතියො වග්ගො. "तिसरा वर्ग (वग्ग)." තස්සුද්දානං – "त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) –" පුග්ගලො අය්යිකා ලොකො, ඉස්සත්තං පබ්බතූපමා; දෙසිතං බුද්ධසෙට්ඨෙන, ඉමං කොසලපඤ්චකන්ති. "पुग्गल, अय्यिका, लोक, इस्सत्त आणि पब्बतूपम; श्रेष्ठ बुद्धांनी उपदेशिलेली ही कोसल संयुक्तातील पाच सुत्ते आहेत." කොසලසංයුත්තං සමත්තං. "कोसल संयुक्त समाप्त." 4. මාරසංයුත්තං ४. "मार संयुक्त" 1. පඨමවග්ගො १. "पहिला वर्ग (वग्ग)" 1. තපොකම්මසුත්තං १. "तपोकम्म सुत्त (तपस्या सुत्त)" 137. එවං [Pg.104] මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා උරුවෙලායං විහරති නජ්ජා නෙරඤ්ජරාය තීරෙ අජපාලනිග්රොධමූලෙ පඨමාභිසම්බුද්ධො. අථ ඛො භගවතො රහොගතස්ස පටිසල්ලීනස්ස එවං චෙතසො පරිවිතක්කො උදපාදි – ‘‘මුත්තො වතම්හි තාය දුක්කරකාරිකාය. සාධු මුත්තො වතම්හි තාය අනත්ථසංහිතාය දුක්කරකාරිකාය. සාධු වතම්හි මුත්තො බොධිං සමජ්ඣග’’න්ති. १३७. "असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान बुद्धत्व प्राप्त झाल्यानंतर सुरुवातीला उरुवेला येथे निरंजना नदीच्या काठी अजपाल वडाच्या झाडाखाली (अजपालनिग्रोधमुले) विहार करत होते. तेव्हा एकांतात ध्यानस्थ बसलेल्या भगवंतांच्या मनात असा विचार आला – 'मी खरोखरच त्या अत्यंत कठीण तपस्येतून (दुष्करचर्येतून) मुक्त झालो आहे! अनर्थकारक असलेल्या त्या दुष्करचर्येतून मी मुक्त झालो हे किती चांगले झाले! मी मुक्त होऊन बोधी (ज्ञान) प्राप्त केली हे किती उत्तम झाले!'" අථ ඛො මාරො පාපිමා භගවතො චෙතසා චෙතොපරිවිතක්කමඤ්ඤාය යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – "तेव्हा पापी माराने भगवंतांच्या मनातील हा विचार आपल्या मनाने जाणून घेतला आणि तो भगवंतांकडे आला. जवळ येऊन त्याने भगवंतांना गाथेने असे म्हटले –" ‘‘තපොකම්මා අපක්කම්ම, යෙන න සුජ්ඣන්ති මාණවා; අසුද්ධො මඤ්ඤසි සුද්ධො, සුද්ධිමග්ගා අපරද්ධො’’ ති. "'ज्या तपस्येमुळे मनुष्य शुद्ध होतो, त्या तपस्येचा त्याग करून, तू अशुद्ध असतानाही स्वतःला शुद्ध मानत आहेस; तू शुद्धीच्या मार्गापासून भटकला आहेस.'" අථ ඛො භගවා ‘‘මාරො අයං පාපිමා’’ ඉති විදිත්වා මාරං පාපිමන්තං ගාථාහි අජ්ඣභාසි – "तेव्हा भगवंतांनी 'हा पापी मार आहे' हे ओळखून, त्या पापी माराला गाथांनी उत्तर दिले –" ‘‘අනත්ථසංහිතං ඤත්වා, යං කිඤ්චි අමරං තපං ; සබ්බං නත්ථාවහං හොති, ඵියාරිත්තංව ධම්මනි. "'अमरत्व मिळवण्यासाठी केली जाणारी कोणतीही तपस्या ही निरर्थक आहे हे जाणून, कोरड्या जमिनीवर वल्हे आणि सुकाणू चालवण्यासारखी ती सर्व तपस्या निष्फळ ठरते, हे मी जाणले आहे.'" ‘‘සීලං සමාධි පඤ්ඤඤ්ච, මග්ගං බොධාය භාවයං; පත්තොස්මි පරමං සුද්ධිං, නිහතො ත්වමසි අන්තකා’’ති. शील, समाधी आणि प्रज्ञा या (अष्टांगिक) मार्गाची बोधीसाठी (ज्ञानासाठी) भावना (विकास) करत, मी परम शुद्धीला (अर्हतत्त्वाला) प्राप्त झालो आहे. हे अंतक (मार)! तू पराभूत झाला आहेस. අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං භගවා, ජානාති මං සුගතො’’ති, දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. तेव्हा तो पापी मार, "भगवंतांना माझी माहिती झाली आहे, सुगतांनी मला ओळखले आहे," असे समजून दुःखी व खिन्न मनाने तेथेच अंतर्धान पावला. 2. හත්ථිරාජවණ්ණසුත්තං २. हत्थिराजवण्ण सुत्त (गजराज रूप सुत्त) 138. එවං [Pg.105] මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා උරුවෙලායං විහරති නජ්ජා නෙරඤ්ජරාය තීරෙ අජපාලනිග්රොධමූලෙ පඨමාභිසම්බුද්ධො. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා රත්තන්ධකාරතිමිසායං අබ්භොකාසෙ නිසින්නො හොති, දෙවො ච එකමෙකං ඵුසායති. අථ ඛො මාරො පාපිමා භගවතො භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසං උප්පාදෙතුකාමො මහන්තං හත්ථිරාජවණ්ණං අභිනිම්මිනිත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි. සෙය්යථාපි නාම මහාඅරිට්ඨකො මණි, එවමස්ස සීසං හොති. සෙය්යථාපි නාම සුද්ධං රූපියං, එවමස්ස දන්තා හොන්ති. සෙය්යථාපි නාම මහතී නඞ්ගලීසා, එවමස්ස සොණ්ඩො හොති. අථ ඛො භගවා ‘‘මාරො අයං පාපිමා’’ ඉති විදිත්වා මාරං පාපිමන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – १३८. असे मी ऐकले आहे – एक वेळ भगवंत उरुवेला येथे नेरंजरा नदीच्या तीरावर अजपाल वटवृक्षाच्या मुळाशी नुकतेच पूर्ण संबोधी प्राप्त करून विहरत होते. त्या वेळी भगवंत रात्रीच्या घनघोर अंधारात उघड्या मैदानावर बसलेले होते आणि पावसाचे एकेक थेंब पडत होते. तेव्हा पापी मार भगवंतांच्या मनात भय, थरकाप आणि रोमांच (अंगावर काटा) उभे करण्याच्या इच्छेने एका विशाल गजराजाचे (हत्तीचे) रूप धारण करून भगवंतांकडे आला. त्याचे डोके एखाद्या मोठ्या काळ्या पाषाणासारखे (अरिष्टक मणी) होते. त्याचे सुळे शुद्ध चांदीसारखे होते. त्याची सोंड एखाद्या मोठ्या नांगराच्या दांड्यासारखी होती. तेव्हा भगवंतांनी "हा पापी मार आहे" हे ओळखून, त्या पापी माराला गाथेने संबोधित केले – ‘‘සංසරං දීඝමද්ධානං, වණ්ණං කත්වා සුභාසුභං; අලං තෙ තෙන පාපිම, නිහතො ත්වමසි අන්තකා’’ති. "दीर्घकाळ संसारात भटकत तू सुंदर आणि कुरूप रूपे धारण केलीस. हे पापी मारा! आता तुझे हे खेळ पुरे झाले. हे अंतक! तू पराभूत झाला आहेस." අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං භගවා, ජානාති මං සුගතො’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. तेव्हा तो पापी मार, "भगवंतांना माझी माहिती झाली आहे, सुगतांनी मला ओळखले आहे," असे समजून दुःखी व खिन्न मनाने तेथेच अंतर्धान पावला. 3. සුභසුත්තං ३. सुभ सुत्त (शुभ सुत्त) 139. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා උරුවෙලායං විහරති නජ්ජා නෙරඤ්ජරාය තීරෙ අජපාලනිග්රොධමූලෙ පඨමාභිසම්බුද්ධො. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා රත්තන්ධකාරතිමිසායං අබ්භොකාසෙ නිසින්නො හොති, දෙවො ච එකමෙකං ඵුසායති. අථ ඛො මාරො පාපිමා, භගවතො භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසං උප්පාදෙතුකාමො, යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතො අවිදූරෙ උච්චාවචා වණ්ණනිභා උපදංසෙති, සුභා චෙව අසුභා ච. අථ ඛො භගවා ‘‘මාරො අයං පාපිමා’’ ඉති විදිත්වා මාරං පාපිමන්තං ගාථාහි අජ්ඣභාසි – १३९. असे मी ऐकले आहे – एक वेळ भगवंत उरुवेला येथे नेरंजरा नदीच्या तीरावर अजपाल वटवृक्षाच्या मुळाशी नुकतेच पूर्ण संबोधी प्राप्त करून विहरत होते. त्या वेळी भगवंत रात्रीच्या घनघोर अंधारात उघड्या मैदानावर बसलेले होते आणि पावसाचे एकेक थेंब पडत होते. तेव्हा पापी मार भगवंतांच्या मनात भय, थरकाप आणि रोमांच उभे करण्याच्या इच्छेने भगवंतांकडे आला; आणि जवळ येऊन भगवंतांच्या अगदी जवळ विविध प्रकारचे बरे-वाईट, सुंदर आणि कुरूप रंग व रूपे दाखवू लागला. तेव्हा भगवंतांनी "हा पापी मार आहे" हे ओळखून, त्या पापी माराला गाथांनी संबोधित केले – ‘‘සංසරං දීඝමද්ධානං, වණ්ණං කත්වා සුභාසුභං; අලං තෙ තෙන පාපිම, නිහතො ත්වමසි අන්තක. "दीर्घकाळ संसारात भटकत तू सुंदर आणि कुरूप रूपे धारण केलीस. हे पापी मारा! आता तुझे हे खेळ पुरे झाले. हे अंतक! तू पराभूत झाला आहेस." ‘‘යෙ [Pg.106] ච කායෙන වාචාය, මනසා ච සුසංවුතා; න තෙ මාරවසානුගා, න තෙ මාරස්ස බද්ධගූ’’ ති. "जे लोक काया, वाचा आणि मनाने उत्तम प्रकारे संयमित आहेत, ते माराच्या वशमध्ये जात नाहीत आणि ते माराचे दास (अनुयायी) बनत नाहीत." අථ ඛො මාරො…පෙ… තත්ථෙවන්තරධායීති. Teव्हा तो मार... पे... तेथेच अंतर्धान पावला. 4. පඨමමාරපාසසුත්තං ४. पठममारपास सुत्त (प्रथम मारपाश सुत्त) 140. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා බාරාණසියං විහරති ඉසිපතනෙ මිගදායෙ. තත්ර ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘භික්ඛවො’’ති. ‘‘භදන්තෙ’’ති තෙ භික්ඛූ භගවතො පච්චස්සොසුං. භගවා එතදවොච – १४०. असे मी ऐकले आहे – एक वेळ भगवंत वाराणसी येथील इसिपतन (ऋषिपत्तन) मिगदायात (मृगदावात) विहरत होते. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – "भिक्खूंनो!" "भंते!" त्या भिक्खूंनी भगवंतांना प्रतिसाद दिला. भगवंत म्हणाले – ‘‘මය්හං ඛො, භික්ඛවෙ, යොනිසො මනසිකාරා යොනිසො සම්මප්පධානා අනුත්තරා විමුත්ති අනුප්පත්තා, අනුත්තරා විමුත්ති සච්ඡිකතා. තුම්හෙපි, භික්ඛවෙ, යොනිසො මනසිකාරා යොනිසො සම්මප්පධානා අනුත්තරං විමුත්තිං අනුපාපුණාථ, අනුත්තරං විමුත්තිං සච්ඡිකරොථා’’ති. අථ ඛො මාරො පාපිමා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – "भिक्खूंनो, योग्य (योनीसो) मनसिकार आणि योग्य सम्यक प्रयत्नांमुळे मी अनुत्तर विमुक्तीला (सर्वोच्च मुक्तीला) प्राप्त झालो आहे, अनुत्तर विमुक्तीचा मी साक्षात्कार केला आहे. भिक्खूंनो, तुम्हीही योग्य मनसिकार आणि योग्य सम्यक प्रयत्नांद्वारे अनुत्तर विमुक्तीला प्राप्त व्हा, अनुत्तर विमुक्तीचा साक्षात्कार करा." तेव्हा पापी मार भगवंतांकडे आला आणि जवळ येऊन त्याने भगवंतांना गाथेने संबोधित केले – ‘‘බද්ධොසි මාරපාසෙන, යෙ දිබ්බා යෙ ච මානුසා; මාරබන්ධනබද්ධොසි, න මෙ සමණ මොක්ඛසී’’ති. "तू दिव्य आणि मानवी अशा दोन्ही प्रकारच्या मारपाशांनी (माराच्या जाळ्याने) बांधला गेला आहेस. तू माराच्या बंधनात जखडला गेला आहेस. हे श्रमणा! तू माझ्या तावडीतून सुटू शकणार नाहीस." ‘‘මුත්තාහං මාරපාසෙන, යෙ දිබ්බා යෙ ච මානුසා; මාරබන්ධනමුත්තොම්හි, නිහතො ත්වමසි අන්තකා’’ති. "मी दिव्य आणि मानवी अशा दोन्ही प्रकारच्या मारपाशांपासून मुक्त झालो आहे. मी माराच्या बंधनातून मुक्त आहे. हे अंतक! तू पराभूत झाला आहेस." අථ ඛො මාරො පාපිමා…පෙ… තත්ථෙවන්තරධායීති. तेव्हा तो पापी मार... पे... तेथेच अंतर्धान पावला. 5. දුතියමාරපාසසුත්තං ५. दुतियमारपास सुत्त (द्वितीय मारपाश सुत्त) 141. එකං සමයං භගවා බාරාණසියං විහරති ඉසිපතනෙ මිගදායෙ. තත්ර ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘භික්ඛවො’’ති. ‘‘භදන්තෙ’’ති තෙ භික්ඛූ භගවතො පච්චස්සොසුං. භගවා එතදවොච – १४१. एक वेळ भगवंत वाराणसी येथील इसिपतन मिगदायात विहरत होते. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – "भिक्खूंनो!" "भंते!" त्या भिक्खूंनी भगवंतांना प्रतिसाद दिला. भगवंत म्हणाले – ‘‘මුත්තාහං, භික්ඛවෙ, සබ්බපාසෙහි යෙ දිබ්බා යෙ ච මානුසා. තුම්හෙපි, භික්ඛවෙ, මුත්තා සබ්බපාසෙහි යෙ දිබ්බා යෙ ච මානුසා. චරථ, භික්ඛවෙ, චාරිකං බහුජනහිතාය බහුජනසුඛාය ලොකානුකම්පාය අත්ථාය හිතාය සුඛාය දෙවමනුස්සානං. මා එකෙන ද්වෙ අගමිත්ථ. දෙසෙථ, භික්ඛවෙ, ධම්මං ආදිකල්යාණං මජ්ඣෙකල්යාණං පරියොසානකල්යාණං සාත්ථං සබ්යඤ්ජනං [Pg.107] කෙවලපරිපුණ්ණං පරිසුද්ධං බ්රහ්මචරියං පකාසෙථ. සන්ති සත්තා අප්පරජක්ඛජාතිකා, අස්සවනතා ධම්මස්ස පරිහායන්ති. භවිස්සන්ති ධම්මස්ස අඤ්ඤාතාරො. අහම්පි, භික්ඛවෙ, යෙන උරුවෙලා සෙනානිගමො තෙනුපසඞ්කමිස්සාමි ධම්මදෙසනායා’’ති. අථ ඛො මාරො පාපිමා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – "भिक्खूंनो, मी दिव्य आणि मानवी अशा सर्व पाशांमधून मुक्त झालो आहे. भिक्खूंनो, तुम्हीही दिव्य आणि मानवी अशा सर्व पाशांमधून मुक्त झाला आहात. भिक्खूंनो, बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय, जगावर अनुकंपा करण्यासाठी, देव आणि मानवांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी चारिका (धर्मयात्रा) करा. एकाच मार्गाने दोघे एकत्र जाऊ नका. भिक्खूंनो, आदि-कल्याण (सुरुवातीला कल्याणकारी), मध्य-कल्याण (मध्ये कल्याणकारी) आणि परियोसान-कल्याण (शेवटी कल्याणकारी) असा, अर्थयुक्त आणि व्यंजनयुक्त (स्पष्ट शब्दांत) धर्माचा उपदेश करा. संपूर्ण परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचे प्रकटीकरण करा. असे काही प्राणी आहेत ज्यांच्या डोळ्यांत (प्रज्ञेच्या डोळ्यांत) धुळीचे प्रमाण खूप कमी आहे, परंतु धम्म न ऐकल्यामुळे त्यांचे नुकसान होत आहे. ते धम्म समजून घेणारे बनतील. भिक्खूंनो, मीसुद्धा धम्माचा उपदेश करण्यासाठी उरुवेला येथील सेनानिगम (सेनानी गाव) कडे जाईन." तेव्हा पापी मार भगवंतांकडे आला आणि जवळ येऊन त्याने भगवंतांना गाथेने संबोधित केले – ‘‘බද්ධොසි සබ්බපාසෙහි, යෙ දිබ්බා යෙ ච මානුසා; මහාබන්ධනබද්ධොසි, න මෙ සමණ මොක්ඛසී’’ති. "तू दिव्य आणि मानवी अशा सर्व पाशांनी बांधला गेला आहेस. तू महाबंधनात जखडला गेला आहेस. हे श्रमणा! तू माझ्या तावडीतून सुटू शकणार नाहीस." ‘‘මුත්තාහං සබ්බපාසෙහි, යෙ දිබ්බා යෙ ච මානුසා; මහාබන්ධනමුත්තොම්හි, නිහතො ත්වමසි අන්තකා’’ති. "मी दिव्य आणि मानवी अशा सर्व पाशांपासून मुक्त झालो आहे. मी महाबंधनातून मुक्त आहे. हे अंतक! तू पराभूत झाला आहेस." අථ ඛො මාරො පාපිමා…පෙ… තත්ථෙවන්තරධායීති. तेव्हा तो पापी मार... पे... तेथेच अंतर्धान पावला. 6. සප්පසුත්තං ६. सप्प सुत्त (सर्प सुत्त) 142. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා රත්තන්ධකාරතිමිසායං අබ්භොකාසෙ නිසින්නො හොති, දෙවො ච එකමෙකං ඵුසායති. १४२. असे मी ऐकले आहे – एक वेळ भगवंत राजगृह येथे वेळुवनातील कलंदकनिवाप (खारुतांना अन्न देण्याची जागा) येथे विहरत होते. त्या वेळी भगवंत रात्रीच्या घनघोर अंधारात उघड्या मैदानावर बसलेले होते आणि पावसाचे एकेक थेंब पडत होते. අථ ඛො මාරො පාපිමා භගවතො භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසං උප්පාදෙතුකාමො මහන්තං සප්පරාජවණ්ණං අභිනිම්මිනිත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි. සෙය්යථාපි නාම මහතී එකරුක්ඛිකා නාවා, එවමස්ස කායො හොති. සෙය්යථාපි නාම මහන්තං සොණ්ඩිකාකිළඤ්ජං, එවමස්ස ඵණො හොති. සෙය්යථාපි නාම මහතී කොසලිකා කංසපාති, එවමස්ස අක්ඛීනි භවන්ති. සෙය්යථාපි නාම දෙවෙ ගළගළායන්තෙ විජ්ජුල්ලතා නිච්ඡරන්ති, එවමස්ස මුඛතො ජිව්හා නිච්ඡරති. සෙය්යථාපි නාම කම්මාරගග්ගරියා ධමමානාය සද්දො හොති, එවමස්ස අස්සාසපස්සාසානං සද්දො හොති. तेव्हा पापी मार भगवंतांच्या मनात भय, थरकाप आणि रोमांच उभे करण्याच्या इच्छेने एका विशाल नागराजाचे (सर्पराज) रूप धारण करून भगवंतांकडे आला. त्या नागराजाचे शरीर एखाद्या मोठ्या एकाच लाकडापासून कोरलेल्या नौकेसारखे (एकवृक्षिक नौका) होते. त्याचा फणा मद्य गाळणाऱ्यांच्या मोठ्या चटईसारखा (सोंडिकाकिळंज) होता. त्याचे डोळे कोसल देशातील मोठ्या कांस्यपात्रासारखे (काशाच्या ताटासारखे) होते. ढगांच्या गडगडाटात जशी वीज चमकावी, तशी त्याची जीभ मुखातून बाहेर पडत होती. लोहाराच्या भात्यातून हवा फुंकताना जसा आवाज येतो, तसा त्याच्या श्वासोच्छ्वासाचा आवाज येत होता. අථ ඛො භගවා ‘‘මාරො අයං පාපිමා’’ ඉති විදිත්වා මාරං පාපිමන්තං ගාථාහි අජ්ඣභාසි – तेव्हा भगवंतांनी "हा पापी मार आहे" हे ओळखून, त्या पापी माराला गाथांनी संबोधित केले – ‘‘යො සුඤ්ඤගෙහානි සෙවති,සෙය්යො සො මුනි අත්තසඤ්ඤතො; වොස්සජ්ජ චරෙය්ය තත්ථ සො,පතිරූපඤ්හි තථාවිධස්ස තං. जो स्वतःवर संयम ठेवून राहण्यासाठी निर्जन घरांचा (शून्यगृहांचा) आश्रय घेतो, तो मुनी आत्मसंयत असतो. त्याने त्या शरीरावरील (किंवा त्या ठिकाणी) सर्व आसक्ती सोडून विहार करावा; अशा प्रकारच्या मुनीसाठी हेच योग्य आहे. ‘‘චරකා [Pg.108] බහූ භෙරවා බහූ,අථො ඩංසසරීසපා බහූ; ලොමම්පි න තත්ථ ඉඤ්ජයෙ,සුඤ්ඤාගාරගතො මහාමුනි. तेथे अनेक हिंस्र पशू फिरत असतात, अनेक भयानक संकटे असतात, तसेच डास आणि सर्पही पुष्कळ असतात; तरीही निर्जन घरात गेलेले ते महामुनी तेथे आपले एक लव (अंगावरील केस) देखील हलवत नाहीत (किंचितही घाबरत नाहीत). ‘‘නභං ඵලෙය්ය පථවී චලෙය්ය,සබ්බෙපි පාණා උද සන්තසෙය්යුං; සල්ලම්පි චෙ උරසි පකප්පයෙය්යුං,උපධීසු තාණං න කරොන්ති බුද්ධා’’ති. आकाश दुभंगले तरी, पृथ्वी कंपित झाली तरी, आणि सर्व प्राणी भयभीत झाले तरी, किंवा छातीवर तीक्ष्ण भाला चालवला तरीही, बुद्ध (सर्व आसक्ती नष्ट झाल्यामुळे) उपाधींमध्ये (शरीरादी उपाधींमध्ये) स्वतःच्या संरक्षणाची चिंता करत नाहीत. අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං භගවා, ජානාති මං සුගතො’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. त्यानंतर पापी मार “भगवंतांना माझी माहिती झाली आहे, सुगतांनी मला ओळखले आहे” असे समजून दुःखी व खिन्न मनाने तेथेच अंतर्धान पावला. 7. සුපතිසුත්තං ७. सुपति सुत्त (उत्तम निद्रेविषयीचे सुत्त) 143. එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. අථ ඛො භගවා බහුදෙවරත්තිං අබ්භොකාසෙ චඞ්කමිත්වා රත්තියා පච්චූසසමයං පාදෙ පක්ඛාලෙත්වා විහාරං පවිසිත්වා දක්ඛිණෙන පස්සෙන සීහසෙය්යං කප්පෙසි පාදෙ පාදං අච්චාධාය සතො සම්පජානො උට්ඨානසඤ්ඤං මනසි කරිත්වා. අථ ඛො මාරො පාපිමා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – १४३. एकदा भगवान राजगृह येथे वेळुवनातील कलंदकनिवाप येथे विहार करत होते. तेव्हा भगवंतांनी रात्रीचा बराचसा वेळ उघड्या जागेवर चंक्रमण (चालण्याचा सराव) करण्यात घालवला. रात्रीच्या शेवटच्या प्रहरात (पहाटेच्या वेळी) आपले पाय धुवून त्यांनी विहारात प्रवेश केला आणि एका पायावर दुसरा पाय ठेवून, स्मृती व संप्रजन्य (जागरूकता) जागृत ठेवून, उठण्याची वेळ मनात निश्चित करून, उजव्या कुशीवर सिंहशय्या (सिंहासारखी झोपण्याची मुद्रा) घेतली. त्यानंतर पापी मार भगवंतांच्या जवळ आला आणि त्याने भगवंतांना गाथेने विचारले – ‘‘කිං සොප්පසි කිං නු සොප්පසි,කිමිදං සොප්පසි දුබ්භගො විය; සුඤ්ඤමගාරන්ති සොප්පසි,කිමිදං සොප්පසි සූරියෙ උග්ගතෙ’’ති. “तुम्ही का झोपला आहात? तुम्ही का बरे झोपत आहात? एखाद्या हतबल माणसासारखे हे काय झोपणे आहे? ‘घर रिकामे आहे’ असे समजून तुम्ही झोपला आहात का? सूर्य उगवला असतानाही हे तुमचे झोपणे काय आहे?” ‘‘යස්ස ජාලිනී විසත්තිකා,තණ්හා නත්ථි කුහිඤ්චි නෙතවෙ; සබ්බූපධිපරික්ඛයා බුද්ධො,සොප්පති කිං තවෙත්ථ මාරා’’ති. “ज्यांच्यामध्ये कोणत्याही जन्मात खेचून नेणारी, जाळ्यासारखी पसरलेली आणि विषारी असणारी तृष्णा उरलेली नाही, ते बुद्ध सर्व उपाधींचा (आसक्तींचा) क्षय झाल्यामुळे शांतपणे निजले आहेत. हे मारा! यात तुला काय त्रास होत आहे?” අථ ඛො මාරො පාපිමා…පෙ… තත්ථෙවන්තරධායීති. त्यानंतर पापी मार... पूर्ववत... तेथेच अंतर्धान पावला. 8. නන්දතිසුත්තං ८. नंदति सुत्त (आनंदाविषयीचे सुत्त) 144. එවං [Pg.109] මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. අථ ඛො මාරො පාපිමා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – १४४. मी असे ऐकले आहे – एकदा भगवान श्रावस्ती येथे अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेव्हा पापी मार भगवंतांच्या जवळ आला आणि त्याने भगवंतांच्या समोर ही गाथा म्हटली – ‘‘නන්දති පුත්තෙහි පුත්තිමා, ගොමා ගොභි තථෙව නන්දති; උපධීහි නරස්ස නන්දනා, න හි සො නන්දති යො නිරූපධී’’ති. “पुत्रवान मनुष्य पुत्रांमुळे आनंदित होतो, त्याचप्रमाणे गोधन असलेला मनुष्य गाईंमुळे आनंदित होतो. मनुष्याला उपाधींमुळेच (भौतिक साधनांमुळे) आनंद मिळतो; ज्याच्याकडे कोणतीही उपाधी नाही, तो कधीही आनंदित होऊ शकत नाही.” ‘‘සොචති පුත්තෙහි පුත්තිමා, ගොමා ගොභි තථෙව සොචති; උපධීහි නරස්ස සොචනා, න හි සො සොචති යො නිරූපධී’’ති. “पुत्रवान मनुष्य पुत्रांमुळेच शोकाकुल होतो, त्याचप्रमाणे गोधन असलेला मनुष्य गाईंमुळेच शोकाकुल होतो. मनुष्याला उपाधींमुळेच शोक प्राप्त होतो; ज्याच्याकडे कोणतीही उपाधी नाही, तो कधीही शोक करत नाही.” අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං භගවා, ජානාති මං සුගතො’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. त्यानंतर पापी मार “भगवंतांना माझी माहिती झाली आहे, सुगतांनी मला ओळखले आहे” असे समजून दुःखी व खिन्न मनाने तेथेच अंतर्धान पावला. 9. පඨමආයුසුත්තං ९. प्रथम आयु सुत्त (आयुष्याविषयीचे पहिले सुत्त) 145. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. තත්ර ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘භික්ඛවො’’ති. ‘‘භදන්තෙ’’ති තෙ භික්ඛූ භගවතො පච්චස්සොසුං. භගවා එතදවොච – १४५. मी असे ऐकले आहे – एकदा भगवान राजगृह येथे वेळुवनातील कलंदकनिवाप येथे विहार करत होते. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – “भिक्खूंनो!” ते भिक्खू भगवंतांना प्रत्युत्तर देत म्हणाले, “भदंत (पूजनीय महोदय)!” भगवंतांनी पुढीलप्रमाणे सांगितले – ‘‘අප්පමිදං, භික්ඛවෙ, මනුස්සානං ආයු. ගමනීයො සම්පරායො, කත්තබ්බං කුසලං, චරිතබ්බං බ්රහ්මචරියං. නත්ථි ජාතස්ස අමරණං. යො, භික්ඛවෙ, චිරං ජීවති, සො වස්සසතං අප්පං වා භිය්යො’’ති. “भिक्खूंनो, मनुष्यांचे हे आयुष्य अल्प आहे. परलोकात जाणे अटळ आहे, म्हणून कुशल कर्म केले पाहिजे आणि ब्रह्मचर्य पाळले पाहिजे. जन्माला आलेल्या कोणालाही मृत्यू टाळता येत नाही. भिक्खूंनो, जो दीर्घकाळ जगतो, तो शंभर वर्षे किंवा त्याहून थोडे अधिक काळ जगतो.” අථ ඛො මාරො පාපිමා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – त्यानंतर पापी मार भगवंतांच्या जवळ आला आणि त्याने भगवंतांना गाथेने विचारले – ‘‘දීඝමායු මනුස්සානං, න නං හීළෙ සුපොරිසො; චරෙය්ය ඛීරමත්තොව, නත්ථි මච්චුස්ස ආගමො’’ති. “मनुष्यांचे आयुष्य दीर्घ आहे, सज्जन माणसाने त्याचा तिरस्कार करू नये. आईचे दूध पिणाऱ्या लहान बालकाप्रमाणे (निश्चिंतपणे) जगावे; मृत्यूचे येणे अद्याप झालेले नाही.” ‘‘අප්පමායු මනුස්සානං, හීළෙය්ය නං සුපොරිසො; චරෙය්යාදිත්තසීසොව, නත්ථි මච්චුස්ස නාගමො’’ති. “मनुष्यांचे आयुष्य अल्प आहे, सज्जन माणसाने त्याचा तिरस्कारच केला पाहिजे. डोक्याला आग लागलेल्या माणसाप्रमाणे (ती विझवण्यासाठी जशी घाई करावी लागते तसे) तत्परतेने जगावे; कारण मृत्यूचे आगमन अटळ आहे.” අථ ඛො මාරො…පෙ… තත්ථෙවන්තරධායීති. त्यानंतर पापी मार... पूर्ववत... तेथेच अंतर्धान पावला. 10. දුතියආයුසුත්තං १०. द्वितीय आयु सुत्त (आयुष्याविषयीचे दुसरे सुत्त) 146. එවං [Pg.110] මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. තත්ර ඛො භගවා…පෙ… එතදවොච – १४६. मी असे ऐकले आहे – एकदा भगवान राजगृह येथे वेळुवनातील कलंदकनिवाप येथे विहार करत होते. तेथे भगवंतांनी... पूर्ववत... पुढीलप्रमाणे सांगितले – ‘‘අප්පමිදං, භික්ඛවෙ, මනුස්සානං ආයු. ගමනීයො සම්පරායො, කත්තබ්බං කුසලං, චරිතබ්බං බ්රහ්මචරියං. නත්ථි ජාතස්ස අමරණං. යො, භික්ඛවෙ, චිරං ජීවති, සො වස්සසතං අප්පං වා භිය්යො’’ති. “भिक्खूंनो, मनुष्यांचे हे आयुष्य अल्प आहे. परलोकात जाणे अटळ आहे, म्हणून कुशल कर्म केले पाहिजे आणि ब्रह्मचर्य पाळले पाहिजे. जन्माला आलेल्या कोणालाही मृत्यू टाळता येत नाही. भिक्खूंनो, जो दीर्घकाळ जगतो, तो शंभर वर्षे किंवा त्याहून थोडे अधिक काळ जगतो.” අථ ඛො මාරො පාපිමා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – त्यानंतर पापी मार भगवंतांच्या जवळ आला आणि त्याने भगवंतांना गाथेने विचारले – ‘‘නාච්චයන්ති අහොරත්තා, ජීවිතං නූපරුජ්ඣති; ආයු අනුපරියායති, මච්චානං නෙමීව රථකුබ්බර’’න්ති. “दिवस आणि रात्र कधीही थांबत नाहीत, जीवन कधीही खंडित होत नाही. रथाच्या चाकाची धाव जशी रथाच्या कण्याभोवती फिरत राहते, तसेच मर्त्य मानवांचे आयुष्य अविरतपणे पुढे सरकत राहते.” ‘‘අච්චයන්ති අහොරත්තා, ජීවිතං උපරුජ්ඣති; ආයු ඛීයති මච්චානං, කුන්නදීනංව ඔදක’’න්ති. “दिवस आणि रात्र वेगाने निघून जातात, जीवन संपुष्टात येते. लहान नद्यांमधील पाणी जसे हळूहळू आटून जाते, तसेच मर्त्य मानवांचे आयुष्यही क्षीण होत जाते.” අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං භගවා, ජානාති මං සුගතො’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. त्यानंतर पापी मार “भगवंतांना माझी माहिती झाली आहे, सुगतांनी मला ओळखले आहे” असे समजून दुःखी व खिन्न मनाने तेथेच अंतर्धान पावला. පඨමො වග්ගො. पहिला वर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्या वर्गाचा सारांश (उद्दान) पुढीलप्रमाणे आहे – තපොකම්මඤ්ච නාගො ච, සුභං පාසෙන තෙ දුවෙ; සප්පො සුපති නන්දනං, ආයුනා අපරෙ දුවෙති. तपोकम्म सुत्त, नाग सुत्त, सुभ सुत्त, पास सुत्त (हे दोन), सप्प सुत्त, सुपति सुत्त, नंदन सुत्त आणि आयुष्याविषयीची इतर दोन सुत्ते (आयु सुत्त). 2. දුතියවග්ගො २. दुसरा वर्ग 1. පාසාණසුත්තං १. पासाण सुत्त (मोठ्या खडकाविषयीचे सुत्त) 147. එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති ගිජ්ඣකූටෙ පබ්බතෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා රත්තන්ධකාරතිමිසායං අබ්භොකාසෙ නිසින්නො හොති, දෙවො ච එකමෙකං ඵුසායති. අථ ඛො මාරො පාපිමා භගවතො භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසං උප්පාදෙතුකාමො යෙන භගවා [Pg.111] තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතො අවිදූරෙ මහන්තෙ පාසාණෙ පදාලෙසි. १४७. एकदा भगवान राजगृह येथे गिद्धकूट पर्वतावर विहार करत होते. त्या वेळी भगवान रात्रीच्या घनदाट अंधारात उघड्या जागेवर बसले होते आणि पावसाचे थेंब एकेक करून पडत होते. तेव्हा पापी माराने भगवंतांच्या मनात भीती, थरकाप आणि अंगावर काटा उभा करण्याची इच्छा धरून भगवंतांच्या जवळ धाव घेतली; आणि जवळ येऊन भगवंतांच्या अगदी जवळच मोठे मोठे खडक फोडले (किंवा कड्यावरून खाली पाडले). අථ ඛො භගවා ‘‘මාරො අයං පාපිමා’’ ඉති විදිත්වා මාරං පාපිමන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – तेव्हा भगवंतांनी “हा पापी मार आहे” हे ओळखून पापी माराला गाथेने म्हटले – ‘‘සචෙපි කෙවලං සබ්බං, ගිජ්ඣකූටං චලෙස්සසි ; නෙව සම්මාවිමුත්තානං, බුද්ධානං අත්ථි ඉඤ්ජිත’’න්ති. “हे मारा! तू जरी संपूर्ण गिद्धकूट पर्वत हलवून सोडलास, तरीही जे पूर्णपणे विमुक्त झाले आहेत अशा बुद्धांना किंचितही कंप सुटणार नाही (ते विचलित होणार नाहीत).” අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං භගවා, ජානාති මං සුගතො’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. त्यानंतर पापी मार “भगवंतांना माझी माहिती झाली आहे, सुगतांनी मला ओळखले आहे” असे समजून दुःखी व खिन्न मनाने तेथेच अंतर्धान पावला. 2. කින්නුසීහසුත්තං २. किन्नुसीह सुत्त (सिंहासारख्या गर्जनेविषयीचे सुत्त) 148. එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා මහතියා පරිසාය පරිවුතො ධම්මං දෙසෙති. १४८. एकदा भगवान श्रावस्ती येथे अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. त्या वेळी भगवान मोठ्या जनसमुदायाने वेढलेले असताना धम्म उपदेश करत होते. අථ ඛො මාරස්ස පාපිමතො එතදහොසි – ‘‘අයං ඛො සමණො ගොතමො මහතියා පරිසාය පරිවුතො ධම්මං දෙසෙති. යංනූනාහං යෙන සමණො ගොතමො තෙනුපසඞ්කමෙය්යං විචක්ඛුකම්මායා’’ති. අථ ඛො මාරො පාපිමා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – तेव्हा पापी माराच्या मनात असा विचार आला – ‘हा श्रमण गौतम मोठ्या जनसमुदायाने वेढलेला असताना धम्म उपदेश करत आहे. मी श्रमण गौतमाच्या जवळ जाऊन लोकांच्या प्रज्ञाचक्षूंना भ्रमित (नष्ट) करावे का?’ त्यानंतर पापी मार भगवंतांच्या जवळ आला आणि त्याने भगवंतांना गाथेने विचारले – ‘‘කින්නු සීහොව නදසි, පරිසායං විසාරදො; පටිමල්ලො හි තෙ අත්ථි, විජිතාවී නු මඤ්ඤසී’’ති. "तू सभेमध्ये निर्भय होऊन सिंहासारखी गर्जना का करत आहेस? तुझा कोणी प्रतिस्पर्धी आहे का, की तू स्वतःलाच विजयी समजत आहेस?" ‘‘නදන්ති වෙ මහාවීරා, පරිසාසු විසාරදා; තථාගතා බලප්පත්තා, තිණ්ණා ලොකෙ විසත්තික’’න්ති. "महान वीर सभेमध्ये निर्भय होऊन गर्जना करतात. बलांनी युक्त असलेले तथागत या जगातील तृष्णेला (आसक्तीला) पार करून गेले आहेत." අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං භගවා, ජානාති මං සුගතො’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. तेव्हा पापी मार "भगवंतांना माझी माहिती झाली आहे, सुगतांनी मला ओळखले आहे" असे म्हणून दुःखी व खिन्न मनाने तिथेच अंतर्धान पावला. 3. සකලිකසුත්තං ३. सकलिक सुत्त 149. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති මද්දකුච්ඡිස්මිං මිගදායෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවතො පාදො සකලිකාය [Pg.112] ඛතො හොති, භුසා සුදං භගවතො වෙදනා වත්තන්ති සාරීරිකා දුක්ඛා තිබ්බා ඛරා කටුකා අසාතා අමනාපා. තා සුදං භගවා සතො සම්පජානො අධිවාසෙති අවිහඤ්ඤමානො. අථ ඛො භගවා චතුග්ගුණං සඞ්ඝාටිං පඤ්ඤපෙත්වා දක්ඛිණෙන පස්සෙන සීහසෙය්යං කප්පෙසි පාදෙ පාදං අච්චාධාය සතො සම්පජානො. අථ ඛො මාරො පාපිමා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – १४९. असे मी ऐकले आहे – एक वेळ भगवान राजगृह येथे मद्दकुच्छी मृगदायात (हरिण वनात) विहार करत होते. त्या वेळी भगवंतांच्या पायाला एका दगडाच्या कपचीने (तुकड्याने) जखम झाली होती. भगवंतांना शरीरात तीव्र, कठीण, उग्र, कटू, अप्रिय आणि मनाविरुद्ध अशा अत्यंत वेदना होत होत्या. भगवंतांनी सजग (स्मृतिमान) आणि जागरूक (संप्रजन्ययुक्त) राहून, विचलित न होता त्या वेदना सहन केल्या. त्यानंतर भगवंतांनी आपली संघाटी (दुहेरी वस्त्र) चार पदरी करून अंथरली आणि उजव्या कुशीवर, एका पायावर दुसरा पाय ठेवून, सजग व जागरूक राहून सिंहशय्या धारण केली. तेव्हा पापी मार जेथे भगवान होते तेथे आला आणि भगवंतांजवळ येऊन गाथेने म्हणाला – ‘‘මන්දියා නු ඛො සෙසි උදාහු කාවෙය්යමත්තො,අත්ථා නු තෙ සම්පචුරා න සන්ති; එකො විවිත්තෙ සයනාසනම්හි,නිද්දාමුඛො කිමිදං සොප්පසෙ වා’’ති. "तू सुस्तीमुळे (मोहामुळे) झोपला आहेस की काव्याच्या नशेत? तुझे साध्य करण्यासाठी पुष्कळ उद्देश शिल्लक राहिलेले नाहीत का? या एकांत शयनासनावर एकटाच सुस्त चेहरा करून तू असा का झोपला आहेस?" ‘‘න මන්දියා සයාමි නාපි කාවෙය්යමත්තො,අත්ථං සමෙච්චාහමපෙතසොකො; එකො විවිත්තෙ සයනාසනම්හි,සයාමහං සබ්බභූතානුකම්පී. "मी सुस्तीमुळे झोपलेलो नाही, ना काव्याच्या नशेत. परम ध्येयाला (निर्वाणाला) प्राप्त करून मी शोकमुक्त झालो आहे. या एकांत शयनासनावर एकटाच, सर्व प्राणिमात्रांबद्दल अनुकंपा बाळगून मी झोपलो आहे." ‘‘යෙසම්පි සල්ලං උරසි පවිට්ඨං,මුහුං මුහුං හදයං වෙධමානං; තෙපීධ සොප්පං ලභරෙ සසල්ලා,තස්මා අහං න සුපෙ වීතසල්ලො. "ज्यांच्या छातीत बाण (शल्य) रुतलेला आहे आणि ज्यांचे हृदय क्षणोक्षणी थरथरत आहे, ते देखील बाण रुतलेला असताना येथे झोपू शकतात; मग ज्याचा बाण उपटून काढला आहे असा मी का बरे झोपू नये?" ‘‘ජග්ගං න සඞ්කෙ නපි භෙමි සොත්තුං,රත්තින්දිවා නානුතපන්ති මාමං; හානිං න පස්සාමි කුහිඤ්චි ලොකෙ,තස්මා සුපෙ සබ්බභූතානුකම්පී’’ති. "जागे राहताना मला कोणतीही शंका (भय) नसते, आणि झोपायलाही मी घाबरत नाही. दिवस आणि रात्री मला पश्चात्ताप किंवा चिंता देत नाहीत. या जगात मला स्वतःची कोणतीही हानी दिसत नाही. म्हणूनच, सर्व प्राणिमात्रांबद्दल अनुकंपा बाळगून मी शांतपणे झोपतो." අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං භගවා, ජානාති මං සුගතො’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. तेव्हा पापी मार "भगवंतांना माझी माहिती झाली आहे, सुगतांनी मला ओळखले आहे" असे म्हणून दुःखी व खिन्न मनाने तिथेच अंतर्धान पावला. 4. පතිරූපසුත්තං ४. पतिरूप सुत्त 150. එකං සමයං භගවා කොසලෙසු විහරති එකසාලායං බ්රාහ්මණගාමෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා මහතියා ගිහිපරිසාය පරිවුතො ධම්මං දෙසෙති. १५०. एक वेळ भगवान कोसल देशातील 'एकसाला' नावाच्या ब्राह्मण गावात विहार करत होते. त्या वेळी भगवान गृहस्थांच्या (उपासकांच्या) मोठ्या समुदायाने वेढलेले असून त्यांना धम्म उपदेश करत होते. අථ [Pg.113] ඛො මාරස්ස පාපිමතො එතදහොසි – ‘‘අයං ඛො සමණො ගොතමො මහතියා ගිහිපරිසාය පරිවුතො ධම්මං දෙසෙති. යංනූනාහං යෙන සමණො ගොතමො තෙනුපසඞ්කමෙය්යං විචක්ඛුකම්මායා’’ති. අථ ඛො මාරො පාපිමා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – तेव्हा पापी माराच्या मनात असा विचार आला – 'हा श्रमण गौतम गृहस्थांच्या मोठ्या समुदायाने वेढलेला असून धम्म उपदेश करत आहे. मी श्रमण गौतमाकडे जाऊन लोकांचे ज्ञानचक्षू भ्रमित करावे.' मग पापी मार जेथे भगवान होते तेथे आला आणि भगवंतांजवळ येऊन गाथेने म्हणाला – ‘‘නෙතං තව පතිරූපං, යදඤ්ඤමනුසාසසි; අනුරොධවිරොධෙසු, මා සජ්ජිත්ථො තදාචර’’න්ති. "तुम्ही इतरांना उपदेश करता, हे तुमच्यासाठी योग्य नाही. असे करत असताना तुम्ही अनुकूलता (राग) आणि प्रतिकूलता (द्वेष) यामध्ये अडकू नका." ‘‘හිතානුකම්පී සම්බුද්ධො, යදඤ්ඤමනුසාසති; අනුරොධවිරොධෙහි, විප්පමුත්තො තථාගතො’’ති. "कल्याण आणि अनुकंपा बाळगूनच सम्यक संबुद्ध इतरांना उपदेश करतात. तथागत हे अनुकूलता आणि प्रतिकूलता (राग व द्वेष) यांपासून पूर्णपणे मुक्त आहेत." අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං භගවා, ජානාති මං සුගතො’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. तेव्हा पापी मार "भगवंतांना माझी माहिती झाली आहे, सुगतांनी मला ओळखले आहे" असे म्हणून दुःखी व खिन्न मनाने तिथेच अंतर्धान पावला. 5. මානසසුත්තං ५. मानस सुत्त 151. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. අථ ඛො මාරො පාපිමා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – १५१. असे मी ऐकले आहे – एक वेळ भगवान श्रावस्ती येथे अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेव्हा पापी मार जेथे भगवान होते तेथे आला आणि भगवंतांजवळ येऊन गाथेने म्हणाला – ‘‘අන්තලික්ඛචරො පාසො, ය්වායං චරති මානසො; තෙන තං බාධයිස්සාමි, න මෙ සමණ මොක්ඛසී’’ති. "आकाशात फिरणारा आणि मनात संचार करणारा जो हा (रागरूपी) पाश आहे, त्याने मी तुला बांधीन. हे श्रमणा, तू माझ्यापासून सुटू शकणार नाहीस!" ‘‘රූපා සද්දා රසා ගන්ධා, ඵොට්ඨබ්බා ච මනොරමා; එත්ථ මෙ විගතො ඡන්දො, නිහතො ත්වමසි අන්තකා’’ති. "मनोरम रूप, शब्द, रस, गंध आणि स्पर्श या सर्वांविषयीची माझी आसक्ती (इच्छा) नष्ट झाली आहे. हे अंतका (मार), तू पराभूत झाला आहेस!" අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං භගවා, ජානාති මං සුගතො’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. तेव्हा पापी मार "भगवंतांना माझी माहिती झाली आहे, सुगतांनी मला ओळखले आहे" असे म्हणून दुःखी व खिन्न मनाने तिथेच अंतर्धान पावला. 6. පත්තසුත්තං ६. पत्त सुत्त 152. සාවත්ථිනිදානං. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා පඤ්චන්නං උපාදානක්ඛන්ධානං උපාදාය භික්ඛූනං ධම්මියා කථාය සන්දස්සෙති සමාදපෙති සමුත්තෙජෙති සම්පහංසෙති. තෙ ච භික්ඛූ අට්ඨිං කත්වා මනසි [Pg.114] කත්වා සබ්බචෙතසා සමන්නාහරිත්වා ඔහිතසොතා ධම්මං සුණන්ති. १५२. श्रावस्ती येथील प्रसंग. त्या वेळी भगवान पाच उपादानस्कंधांविषयी भिक्खूंना धम्म उपदेशाद्वारे मार्गदर्शन करत होते, त्यांना धम्मात प्रवृत्त करत होते, त्यांना उत्साहित करत होते आणि आनंदित करत होते. ते भिक्खू देखील धम्माला अत्यंत महत्त्वाचे मानून, मनात धारण करून, संपूर्ण चित्ताने एकाग्र होऊन आणि कान देऊन धम्म ऐकत होते. අථ ඛො මාරස්ස පාපිමතො එතදහොසි – ‘‘අයං ඛො සමණො ගොතමො පඤ්චන්නං උපාදානක්ඛන්ධානං උපාදාය භික්ඛූනං ධම්මියා කථාය සන්දස්සෙති සමාදපෙති සමුත්තෙජෙති සම්පහංසෙති. තෙ ච භික්ඛූ අට්ඨිං කත්වා මනසි කත්වා සබ්බචෙතසා සමන්නාහරිත්වා ඔහිතසොතා ධම්මං සුණන්ති. යංනූනාහං යෙන සමණො ගොතමො තෙනුපසඞ්කමෙය්යං විචක්ඛුකම්මායා’’ති. तेव्हा पापी माराच्या मनात असा विचार आला – 'हा श्रमण गौतम पाच उपादानस्कंधांविषयी भिक्खूंना धम्म उपदेशाद्वारे मार्गदर्शन करत आहे, त्यांना धम्मात प्रवृत्त करत आहे, त्यांना उत्साहित करत आहे आणि आनंदित करत आहे. ते भिक्खू देखील धम्माला अत्यंत महत्त्वाचे मानून, मनात धारण करून, संपूर्ण चित्ताने एकाग्र होऊन आणि कान देऊन धम्म ऐकत आहेत. मी श्रमण गौतमाकडे जाऊन भिक्खूंचे ज्ञानचक्षू भ्रमित करावे.' තෙන ඛො පන සමයෙන සම්බහුලා පත්තා අබ්භොකාසෙ නික්ඛිත්තා හොන්ති. අථ ඛො මාරො පාපිමා බලීබද්දවණ්ණං අභිනිම්මිනිත්වා යෙන තෙ පත්තා තෙනුපසඞ්කමි. අථ ඛො අඤ්ඤතරො භික්ඛු අඤ්ඤතරං භික්ඛුං එතදවොච – ‘‘භික්ඛු, භික්ඛු, එසො බලීබද්දො පත්තෙ භින්දෙය්යා’’ති. එවං වුත්තෙ භගවා තං භික්ඛුං එතදවොච – ‘‘න සො, භික්ඛු, බලීබද්දො. මාරො එසො පාපිමා තුම්හාකං විචක්ඛුකම්මාය ආගතො’’ති. අථ ඛො භගවා ‘‘මාරො අයං පාපිමා’’ ඉති විදිත්වා මාරං පාපිමන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – त्या वेळी अनेक भिक्षापात्रे (पत्त) उघड्या मैदानावर ठेवली होती. तेव्हा पापी माराने एका बैलाचे रूप धारण केले आणि तो त्या पात्रांकडे गेला. तेव्हा एका भिक्खूने दुसऱ्या भिक्खूला म्हटले – 'भिक्खू, भिक्खू! हा बैल भिक्षापात्रे फोडून टाकेल.' असे म्हटल्यावर भगवान त्या भिक्खूला म्हणाले – 'भिक्खू, तो बैल नाही. तो पापी मार आहे, जो तुमचे ज्ञानचक्षू भ्रमित करण्यासाठी आला आहे.' त्यानंतर भगवंतांनी 'हा पापी मार आहे' हे ओळखून पापी माराला गाथेने म्हटले – ‘‘රූපං වෙදයිතං සඤ්ඤා, විඤ්ඤාණං යඤ්ච සඞ්ඛතං; නෙසොහමස්මි නෙතං මෙ, එවං තත්ථ විරජ්ජති. "रूप, वेदना, संज्ञा, विज्ञान आणि जे काही संस्कार (संखत) आहेत – 'मी हा नाही, हे माझे नाही,' असे पाहून मनुष्य त्यांच्यापासून अलिप्त (विरागयुक्त) होतो." ‘‘එවං විරත්තං ඛෙමත්තං, සබ්බසංයොජනාතිගං; අන්වෙසං සබ්බට්ඨානෙසු, මාරසෙනාපි නාජ්ඣගා’’ති. "अशा प्रकारे अलिप्त झालेल्या, सुरक्षित (क्षेम) झालेल्या आणि सर्व संयोजनांच्या (बंधनांच्या) पलीकडे गेलेल्या व्यक्तीला सर्व ठिकाणी शोधूनही माराचे सैन्य शोधू शकत नाही." අථ ඛො මාරො පාපිමා…පෙ… තත්ථෙවන්තරධායීති. तेव्हा पापी मार... तिथेच अंतर्धान पावला. 7. ඡඵස්සායතනසුත්තං ७. छफस्सायतन सुत्त 153. එකං සමයං භගවා වෙසාලියං විහරති මහාවනෙ කූටාගාරසාලායං. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා ඡන්නං ඵස්සායතනානං උපාදාය භික්ඛූනං ධම්මියා කථාය සන්දස්සෙති සමාදපෙති සමුත්තෙජෙති සම්පහංසෙති. තෙ ච භික්ඛූ අට්ඨිං කත්වා මනසි කත්වා සබ්බචෙතසා සමන්නාහරිත්වා ඔහිතසොතා ධම්මං සුණන්ති. १५३. एक वेळ भगवान वैशाली येथील महावनात कूटागारशाळेत विहार करत होते. त्या वेळी भगवान सहा स्पर्शायतनांविषयी भिक्खूंना धम्म उपदेशाद्वारे मार्गदर्शन करत होते, त्यांना धम्मात प्रवृत्त करत होते, त्यांना उत्साहित करत होते आणि आनंदित करत होते. ते भिक्खू देखील धम्माला अत्यंत महत्त्वाचे मानून, मनात धारण करून, संपूर्ण चित्ताने एकाग्र होऊन आणि कान देऊन धम्म ऐकत होते. අථ [Pg.115] ඛො මාරස්ස පාපිමතො එතදහොසි – ‘‘අයං ඛො සමණො ගොතමො ඡන්නං ඵස්සායතනානං උපාදාය භික්ඛූනං ධම්මියා කථාය සන්දස්සෙති සමාදපෙති සමුත්තෙජෙති සප්පහංසෙති. තෙ ච භික්ඛූ අට්ඨිං කත්වා මනසි කත්වා සබ්බචෙතසා සමන්නාහරිත්වා ඔහිතසොතා ධම්මං සුණන්ති. යංනූනාහං යෙන සමණො ගොතමො තෙනුපසඞ්කමෙය්යං විචක්ඛුකම්මායා’’ති. අථ ඛො මාරො පාපිමා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතො අවිදූරෙ මහන්තං භයභෙරවං සද්දමකාසි, අපිස්සුදං පථවී මඤ්ඤෙ උන්ද්රීයති. අථ ඛො අඤ්ඤතරො භික්ඛු අඤ්ඤතරං භික්ඛුං එතදවොච – ‘‘භික්ඛු, භික්ඛු, එසා පථවී මඤ්ඤෙ උන්ද්රීයතී’’ති. එවං වුත්තෙ, භගවා තං භික්ඛුං එතදවොච – ‘‘නෙසා භික්ඛු පථවී උන්ද්රීයති. මාරො එසො පාපිමා තුම්හාකං විචක්ඛුකම්මාය ආගතො’’ති. අථ ඛො භගවා ‘‘මාරො අයං පාපිමා’’ ඉති විදිත්වා මාරං පාපිමන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – तेव्हा पापी माराच्या मनात असा विचार आला – “हा श्रमण गोतम सहा स्पर्शायतनांच्या (फस्सायतनांच्या) आधारे भिक्खूंना धम्मचर्चेद्वारे उपदेश करीत आहे, त्यांना धम्मात प्रवृत्त करीत आहे, उत्साहित करीत आहे आणि आनंदित करीत आहे. आणि ते भिक्खू देखील आदरपूर्वक, मन लावून, संपूर्ण चित्ताने एकाग्र होऊन, कान देऊन धम्म ऐकत आहेत. मग मी श्रमण गोतमांकडे त्यांच्या प्रज्ञाचक्षूंचा नाश करण्यासाठी का जाऊ नये?” त्यानंतर पापी मार जेथे भगवान होते तेथे गेला; जवळ जाऊन त्याने भगवंतांच्या अगदी जवळ एक मोठा, अत्यंत भयानक आणि भयंकर आवाज केला, जणू काही पृथ्वीच दुभंगत आहे. तेव्हा एका भिक्खूने दुसऱ्या भिक्खूला असे म्हटले – “भिक्खू, भिक्खू, ही पृथ्वी जणू काही दुभंगत आहे!” असे म्हटले असता, भगवंतांनी त्या भिक्खूला असे म्हटले – “भिक्खू, ही पृथ्वी दुभंगत नाही. हा पापी मार तुम्हांला भ्रमित करण्यासाठी आला आहे.” त्यानंतर भगवंतांनी “हा पापी मार आहे” हे ओळखून, पापी माराला गाथेने संबोधित केले – ‘‘රූපා සද්දා රසා ගන්ධා, ඵස්සා ධම්මා ච කෙවලා; එතං ලොකාමිසං ඝොරං, එත්ථ ලොකො විමුච්ඡිතො. “रूप, शब्द, रस, गंध, स्पर्श आणि सर्व धम्म (मानसिक विषय); हे जगाचे भयंकर आमिष आहे, ज्यामध्ये हे जग मोहित झाले आहे. ‘‘එතඤ්ච සමතික්කම්ම, සතො බුද්ධස්ස සාවකො; මාරධෙය්යං අතික්කම්ම, ආදිච්චොව විරොචතී’’ති. “परंतु या सर्वांचे उल्लंघन करून, बुद्धांचा जागरूक श्रावक माराच्या साम्राज्याला पार करून सूर्यासारखा तळपतो.” අථ ඛො මාරො පාපිමා…පෙ… තත්ථෙවන්තරධායීති. त्यानंतर पापी मार... तिथेच अंतर्धान पावला. 8. පිණ්ඩසුත්තං ८. पिंड सुत्त 154. එකං සමයං භගවා මගධෙසු විහරති පඤ්චසාලායං බ්රාහ්මණගාමෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන පඤ්චසාලායං බ්රාහ්මණගාමෙ කුමාරිකානං පාහුනකානි භවන්ති. අථ ඛො භගවා පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය පඤ්චසාලං බ්රාහ්මණගාමං පිණ්ඩාය පාවිසි. තෙන ඛො පන සමයෙන පඤ්චසාලෙය්යකා බ්රාහ්මණගහපතිකා මාරෙන පාපිමතා අන්වාවිට්ඨා භවන්ති – මා සමණො ගොතමො පිණ්ඩමලත්ථාති. १५४. एकदा भगवान मगध देशातील पंचसाला नावाच्या ब्राह्मण गावात विहार करत होते. त्या वेळी पंचसाला ब्राह्मण गावात तरुण मुलींच्या भेटवस्तू देण्याचा उत्सव सुरू होता. तेव्हा भगवान सकाळी वस्त्र परिधान करून, पात्र व चीवर घेऊन पंचसाला ब्राह्मण गावात भिक्षेसाठी प्रवेश करते झाले. त्या वेळी पंचसाला येथील ब्राह्मण गृहस्थांवर पापी माराने ताबा मिळवला होता – “श्रमण गोतमांना भिक्षा मिळू नये” या विचाराने. අථ ඛො භගවා යථාධොතෙන පත්තෙන පඤ්චසාලං බ්රාහ්මණගාමං පිණ්ඩාය පාවිසි තථාධොතෙන පත්තෙන පටික්කමි. අථ ඛො මාරො පාපිමා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අපි [Pg.116] ත්වං, සමණ, පිණ්ඩමලත්ථා’’ති? ‘‘තථා නු ත්වං, පාපිම, අකාසි යථාහං පිණ්ඩං න ලභෙය්ය’’න්ති. ‘‘තෙන හි, භන්තෙ, භගවා දුතියම්පි පඤ්චසාලං බ්රාහ්මණගාමං පිණ්ඩාය පවිසතු. තථාහං කරිස්සාමි යථා භගවා පිණ්ඩං ලච්ඡතී’’ති. त्यानंतर भगवान जसे धुतलेल्या पात्रासह पंचसाला ब्राह्मण गावात भिक्षेसाठी गेले होते, तसेच रिकाम्या पात्रासह परत आले. तेव्हा पापी मार भगवंतांकडे आला आणि भगवंतांना म्हणाला – “शमणा, तुला भिक्षा मिळाली का?” “पापी मारा, तूच असे केलेस ना, जेणेकरून मला भिक्षा मिळू नये?” “भंते, मग भगवंतांनी दुसऱ्यांदाही पंचसाला ब्राह्मण गावात भिक्षेसाठी प्रवेश करावा. मी अशी व्यवस्था करीन जेणेकरून भगवंतांना भिक्षा मिळेल.” ‘‘අපුඤ්ඤං පසවි මාරො, ආසජ්ජ නං තථාගතං; කිං නු මඤ්ඤසි පාපිම, න මෙ පාපං විපච්චති. “तथागतांवर हल्ला करून माराने पापाची प्राप्ती केली आहे. हे पापी मारा, तुला काय वाटते, ‘माझ्या पापाचे फळ मला मिळणार नाही’? ‘‘සුසුඛං වත ජීවාම, යෙසං නො නත්ථි කිඤ්චනං; පීතිභක්ඛා භවිස්සාම, දෙවා ආභස්සරා යථා’’ති. “आम्ही खरोखरच अत्यंत सुखात जगत आहोत, ज्यांच्याकडे काहीही नाही. आभास्सर देवांप्रमाणे आम्ही प्रीतीचे भक्षण करणारे होऊ.” අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං භගවා, ජානාති මං සුගතො’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. त्यानंतर “भगवान मला ओळखतात, सुगत मला ओळखतात” असे समजून पापी मार दुःखी व खिन्न होऊन तिथेच अंतर्धान पावला. 9. කස්සකසුත්තං ९. कस्सक सुत्त 155. සාවත්ථිනිදානං. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා භික්ඛූනං නිබ්බානපටිසංයුත්තාය ධම්මියා කථාය සන්දස්සෙති සමාදපෙති සමුත්තෙජෙති සම්පහංසෙති. තෙ ච භික්ඛූ අට්ඨිං කත්වා මනසි කත්වා සබ්බචෙතසා සමන්නාහරිත්වා ඔහිතසොතා ධම්මං සුණන්ති. १५५. श्रावस्ती येथील प्रसंग. त्या वेळी भगवान भिक्खूंना निर्वाणाशी संबंधित धम्मचर्चेद्वारे उपदेश करीत होते, त्यांना धम्मात प्रवृत्त करीत होते, उत्साहित करीत होते आणि आनंदित करीत होते. आणि ते भिक्खू देखील आदरपूर्वक, मन लावून, संपूर्ण चित्ताने एकाग्र होऊन, कान देऊन धम्म ऐकत होते. අථ ඛො මාරස්ස පාපිමතො එතදහොසි – ‘‘අයං ඛො සමණො ගොතමො භික්ඛූනං නිබ්බානපටිසංයුත්තාය ධම්මියා කථාය…පෙ… යංනූනාහං යෙන සමණො ගොතමො තෙනුපසඞ්කමෙය්යං විචක්ඛුකම්මායා’’ති. අථ ඛො මාරො පාපිමා කස්සකවණ්ණං අභිනිම්මිනිත්වා මහන්තං නඞ්ගලං ඛන්ධෙ කරිත්වා දීඝපාචනයට්ඨිං ගහෙත්වා හටහටකෙසො සාණසාටිනිවත්ථො කද්දමමක්ඛිතෙහි පාදෙහි යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අපි, සමණ, බලීබද්දෙ අද්දසා’’ති? ‘‘කිං පන, පාපිම, තෙ බලීබද්දෙහී’’ති? ‘‘මමෙව, සමණ, චක්ඛු, මම රූපා, මම චක්ඛුසම්ඵස්සවිඤ්ඤාණායතනං. කුහිං මෙ, සමණ, ගන්ත්වා මොක්ඛසි? මමෙව, සමණ, සොතං, මම සද්දා…පෙ… මමෙව, සමණ, ඝානං, මම ගන්ධා; මමෙව, සමණ, ජිව්හා, මම රසා; මමෙව, සමණ, කායො, මම ඵොට්ඨබ්බා; මමෙව, සමණ, මනො, මම ධම්මා, මම මනොසම්ඵස්සවිඤ්ඤාණායතනං. කුහිං මෙ, සමණ, ගන්ත්වා මොක්ඛසී’’ති? तेव्हा पापी माराच्या मनात असा विचार आला – “हा श्रमण गोतम भिक्खूंना निर्वाणाशी संबंधित धम्मचर्चेद्वारे... मग मी श्रमण गोतमांकडे त्यांच्या प्रज्ञाचक्षूंचा नाश करण्यासाठी का जाऊ नये?” त्यानंतर पापी माराने एका शेतकऱ्याचे रूप धारण केले, खांद्यावर मोठे नांगर घेतले, हातात लांब चाबूक धरली, विस्कटलेले केस, तागाचे वस्त्र परिधान केलेले आणि चिखलाने माखलेल्या पायांनी तो भगवंतांकडे आला; जवळ येऊन तो भगवंतांना म्हणाला – “शमणा, तू माझे बैल पाहिलेस का?” “पापी मारा, तुला बैलांशी काय करायचे आहे?” “शमणा, डोळे माझेच आहेत, रूप माझेच आहे, चक्षु-स्पर्श-विज्ञान-आयतन माझेच आहे. शमणा, तू माझ्यापासून सुटून कुठे जाणार? शमणा, कान माझेच आहेत, शब्द माझेच आहेत... शमणा, नाक माझेच आहे, गंध माझेच आहे; शमणा, जीभ माझीच आहे, रस माझेच आहेत; शमणा, शरीर माझेच आहे, स्पर्श माझेच आहेत; शमणा, मन माझेच आहे, धम्म माझेच आहेत, मन-स्पर्श-विज्ञान-आयतन माझेच आहे. शमणा, तू माझ्यापासून सुटून कुठे जाणार?” ‘‘තවෙව[Pg.117], පාපිම, චක්ඛු, තව රූපා, තව චක්ඛුසම්ඵස්සවිඤ්ඤාණායතනං. යත්ථ ච ඛො, පාපිම, නත්ථි චක්ඛු, නත්ථි රූපා, නත්ථි චක්ඛුසම්ඵස්සවිඤ්ඤාණායතනං, අගති තව තත්ථ, පාපිම. තවෙව, පාපිම, සොතං, තව සද්දා, තව සොතසම්ඵස්සවිඤ්ඤාණායතනං. යත්ථ ච ඛො, පාපිම, නත්ථි සොතං, නත්ථි සද්දා, නත්ථි සොතසම්ඵස්සවිඤ්ඤාණායතනං, අගති තව තත්ථ, පාපිම. තවෙව, පාපිම, ඝානං, තව ගන්ධා, තව ඝානසම්ඵස්සවිඤ්ඤාණායතනං. යත්ථ ච ඛො, පාපිම, නත්ථි ඝානං, නත්ථි ගන්ධා, නත්ථි ඝානසම්ඵස්සවිඤ්ඤාණායතනං, අගති තව තත්ථ, පාපිම. තවෙව, පාපිම, ජිව්හා, තව රසා, තව ජිව්හාසම්ඵස්සවිඤ්ඤාණායතනං…පෙ… තවෙව, පාපිම, කායො, තව ඵොට්ඨබ්බා, තව කායසම්ඵස්සවිඤ්ඤාණායතනං…පෙ… තවෙව, පාපිම, මනො, තව ධම්මා, තව මනොසම්ඵස්සවිඤ්ඤාණායතනං. යත්ථ ච ඛො, පාපිම, නත්ථි මනො, නත්ථි ධම්මා, නත්ථි මනොසම්ඵස්සවිඤ්ඤාණායතනං, අගති තව තත්ථ, පාපිමා’’ති. “पापी मारा, डोळे तुझेच आहेत, रूप तुझेच आहे, चक्षु-स्पर्श-विज्ञान-आयतन तुझेच आहे. परंतु पापी मारा, जेथे डोळे नाहीत, रूप नाही, चक्षु-स्पर्श-विज्ञान-आयतन नाही, तेथे तुला प्रवेश नाही. पापी मारा, कान तुझेच आहेत, शब्द तुझेच आहेत, श्रोत्र-स्पर्श-विज्ञान-आयतन तुझेच आहे. परंतु पापी मारा, जेथे कान नाहीत, शब्द नाहीत, श्रोत्र-स्पर्श-विज्ञान-आयतन नाही, तेथे तुला प्रवेश नाही. पापी मारा, नाक तुझेच आहे, गंध तुझेच आहे, घ्राण-स्पर्श-विज्ञान-आयतन तुझेच आहे. परंतु पापी मारा, जेथे नाक नाही, गंध नाही, घ्राण-स्पर्श-विज्ञान-आयतन नाही, तेथे तुला प्रवेश नाही. पापी मारा, जीभ तुझीच आहे, रस तुझेच आहेत, जिव्हा-स्पर्श-विज्ञान-आयतन तुझेच आहे... पापी मारा, शरीर तुझेच आहे, स्पर्श तुझेच आहेत, काय-स्पर्श-विज्ञान-आयतन तुझेच आहे... पापी मारा, मन तुझेच आहे, धम्म तुझेच आहेत, मन-स्पर्श-विज्ञान-आयतन तुझेच आहे. परंतु पापी मारा, जेथे मन नाही, धम्म नाहीत, मन-स्पर्श-विज्ञान-आयतन नाही, तेथे तुला प्रवेश नाही.” ‘‘යං වදන්ති මම යිදන්ති, යෙ වදන්ති මමන්ති ච; එත්ථ චෙ තෙ මනො අත්ථි, න මෙ සමණ මොක්ඛසී’’ති. “जे लोक ज्या वस्तूला ‘हे माझे आहे’ असे म्हणतात, आणि जे ‘माझे’ या भावनेने बोलतात; जर तुझे मन या गोष्टींमध्ये अडकले असेल, तर श्रमणा, तू माझ्या तावडीतून सुटू शकणार नाहीस.” ‘‘යං වදන්ති න තං මය්හං, යෙ වදන්ති න තෙ අහං; එවං පාපිම ජානාහි, න මෙ මග්ගම්පි දක්ඛසී’’ති. “ते ज्या गोष्टींविषयी बोलतात, त्या माझ्या नाहीत; आणि जे तसे बोलतात, त्यांच्यापैकी मी नाही. हे पापी मारा, हे लक्षात ठेव, तू माझा मार्ग देखील पाहू शकणार नाहीस.” අථ ඛො මාරො පාපිමා…පෙ… තත්ථෙවන්තරධායීති. त्यानंतर पापी मार... तिथेच अंतर्धान पावला. 10. රජ්ජසුත්තං १०. रज्ज सुत्त 156. එකං සමයං භගවා කොසලෙසු විහරති හිමවන්තපදෙසෙ අරඤ්ඤකුටිකායං. අථ ඛො භගවතො රහොගතස්ස පටිසල්ලීනස්ස එවං චෙතසො පරිවිතක්කො උදපාදි – ‘‘සක්කා නු ඛො රජ්ජං කාරෙතුං අහනං අඝාතයං අජිනං අජාපයං අසොචං අසොචාපයං ධම්මෙනා’’ති? १५६. एकदा भगवान कोसल देशात हिमालयाच्या पायथ्याशी एका अरण्यकुटीत विहार करत होते. तेव्हा एकांतात ध्यानस्थ बसलेल्या भगवंतांच्या मनात असा विचार आला – 'स्वतः कोणाची हत्या न करता, इतरांकडून हत्या न करवता, स्वतः कोणाचे नुकसान न करता, इतरांकडून नुकसान न करवता, स्वतः शोक न करता, इतरांना शोक न देता, धर्मानुसार राज्य करणे शक्य आहे का?' අථ ඛො මාරො පාපිමා භගවතො චෙතසා චෙතොපරිවිතක්කමඤ්ඤාය යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කාරෙතු, භන්තෙ, භගවා රජ්ජං, කාරෙතු, සුගතො, රජ්ජං අහනං අඝාතයං අජිනං අජාපයං අසොචං අසොචාපයං ධම්මෙනා’’ති. ‘‘කිං පන මෙ ත්වං, පාපිම, පස්සසි යං මං ත්වං එවං වදෙසි – ‘කාරෙතු, භන්තෙ, භගවා රජ්ජං, කාරෙතු සුගතො, රජ්ජං අහනං අඝාතයං අජිනං අජාපයං අසොචං අසොචාපයං [Pg.118] ධම්මෙනා’’’ති? ‘‘භගවතා ඛො, භන්තෙ, චත්තාරො ඉද්ධිපාදා භාවිතා බහුලීකතා යානීකතා වත්ථුකතා අනුට්ඨිතා පරිචිතා සුසමාරද්ධා. ආකඞ්ඛමානො ච, භන්තෙ, භගවා හිමවන්තං පබ්බතරාජං සුවණ්ණං ත්වෙව අධිමුච්චෙය්ය සුවණ්ණඤ්ච පනස්සා’’ති. तेव्हा पापी मार भगवंतांच्या मनातील हा विचार स्वतःच्या मनाने जाणून जेथे भगवान होते तेथे आला; आणि भगवंतांना अभिवादन करून म्हणाला – 'भंते, भगवान स्वतः कोणाची हत्या न करता, इतरांकडून हत्या न करवता, स्वतः कोणाचे नुकसान न करता, इतरांकडून नुकसान न करवता, स्वतः शोक न करता, इतरांना शोक न देता, धर्मानुसार राज्य करोत; सुगत राज्य करोत!' (भगवंतांनी विचारले) 'हे पापी मारा, तू माझ्यात असे काय पाहिलेस की मला असे म्हणत आहेस – भंते, भगवान स्वतः कोणाची हत्या न करता... धर्मानुसार राज्य करोत?' (मार म्हणाला) 'भंते, भगवंतांनी चार ऋद्धिपाद विकसित केले आहेत, त्यांचा वारंवार सराव केला आहे, त्यांना वाहनासारखे बनवले आहे, त्यांना आधार बनवले आहे, त्यांचे सातत्य राखले आहे, त्यांचा संचय केला आहे आणि ते चांगल्या प्रकारे आरंभीले आहेत. भंते, भगवंतांनी इच्छा केली, तर ते पर्वतराज हिमालयाला केवळ सुवर्ण (सोने) बनवण्याचा संकल्प करू शकतात आणि तो सोन्याचा होईल.' ‘‘පබ්බතස්ස සුවණ්ණස්ස, ජාතරූපස්ස කෙවලො; ද්විත්තාව නාලමෙකස්ස, ඉති විද්වා සමඤ්චරෙ. 'जरी संपूर्ण पर्वत शुद्ध सोन्याचा झाला, किंवा तो दुप्पट मोठा झाला, तरीही तो एका व्यक्तीच्या तृष्णेसाठी पुरेसा होणार नाही; हे जाणून माणसाने सम्यक आचरण करावे.' ‘‘යො දුක්ඛමද්දක්ඛි යතොනිදානං,කාමෙසු සො ජන්තු කථං නමෙය්ය; උපධිං විදිත්වා සඞ්ගොති ලොකෙ,තස්සෙව ජන්තු විනයාය සික්ඛෙ’’ති. 'ज्या मनुष्याने दुःखाचे मूळ कारण कामभोगात पाहिले आहे, तो मनुष्य कामभोगांकडे कसा बरे वळेल? जगामध्ये उपधी (आसक्ती) हेच बंधनाचे कारण आहे हे जाणून, मनुष्याने त्या उपधीच्या नाशासाठीच साधना करावी.' අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං භගවා, ජානාති මං සුගතො’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. तेव्हा 'भगवान मला ओळखतात, सुगत मला ओळखतात' असे समजून पापी मार दुःखी व खिन्न होऊन तेथेच अंतर्धान पावला. දුතියො වග්ගො. दुसरा वर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका – පාසාණො සීහො සකලිකං, පතිරූපඤ්ච මානසං; පත්තං ආයතනං පිණ්ඩං, කස්සකං රජ්ජෙන තෙ දසාති. पासाण, सीह, सकलिक, पतिरूप, मानस, पत्त, आयतन, पिंड, कस्सक आणि रज्ज – हे दहा सुत्त आहेत. 3. තතියවග්ගො ३. तिसरा वर्ग 1. සම්බහුලසුත්තං १. सम्बहुल सुत्त 157. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා සක්කෙසු විහරති සිලාවතියං. තෙන ඛො පන සමයෙන සම්බහුලා භික්ඛූ භගවතො අවිදූරෙ අප්පමත්තා ආතාපිනො පහිතත්තා විහරන්ති. අථ ඛො මාරො පාපිමා බ්රාහ්මණවණ්ණං අභිනිම්මිනිත්වා මහන්තෙන ජටණ්ඩුවෙන අජිනක්ඛිපනිවත්ථො ජිණ්ණො ගොපානසිවඞ්කො ඝුරුඝුරුපස්සාසී උදුම්බරදණ්ඩං ගහෙත්වා යෙන තෙ භික්ඛූ තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා තෙ භික්ඛූ එතදවොච – ‘‘දහරා භවන්තො [Pg.119] පබ්බජිතා සුසූ කාළකෙසා භද්රෙන යොබ්බනෙන සමන්නාගතා පඨමෙන වයසා අනික්කීළිතාවිනො කාමෙසු. භුඤ්ජන්තු භවන්තො මානුසකෙ කාමෙ. මා සන්දිට්ඨිකං හිත්වා කාලිකං අනුධාවිත්ථා’’ති. ‘‘න ඛො මයං, බ්රාහ්මණ, සන්දිට්ඨිකං හිත්වා කාලිකං අනුධාවාම. කාලිකඤ්ච ඛො මයං, බ්රාහ්මණ, හිත්වා සන්දිට්ඨිකං අනුධාවාම. කාලිකා හි, බ්රාහ්මණ, කාමා වුත්තා භගවතා බහුදුක්ඛා බහුපායාසා, ආදීනවො එත්ථ භිය්යො. සන්දිට්ඨිකො අයං ධම්මො අකාලිකො එහිපස්සිකො ඔපනෙය්යිකො පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’’ති. එවං වුත්තෙ, මාරො පාපිමා සීසං ඔකම්පෙත්වා ජිව්හං නිල්ලාලෙත්වා තිවිසාඛං නලාටෙ නලාටිකං වුට්ඨාපෙත්වා දණ්ඩමොලුබ්භ පක්කාමි. १५७. असे मी ऐकले आहे – एकदा भगवान शाक्य देशात सिलावती येथे विहार करत होते. त्या वेळी अनेक भिक्खू भगवंतांच्या जवळच अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करत होते. तेव्हा पापी माराने एका ब्राह्मणाचे रूप धारण केले. त्याने डोक्यावर जटांचा मोठा अंबाडा बांधला होता, अंगावर काळवीटाचे चामडे पांघरले होते, तो म्हातारा, घराच्या वाशासारखा वाकलेला, घोरल्यासारखा श्वास घेणारा आणि हातात उंबराच्या लाकडाची काठी घेतलेला होता. तो त्या भिक्खूंच्या जवळ आला आणि त्यांना म्हणाला – 'अहो भदंत! तुम्ही तरुण वयातच प्रव्रजित झाला आहात, तुमचे केस काळेभोर आहेत, तुम्ही तारुण्याने संपन्न आहात, पहिल्या वयात तुम्ही कामभोगांचा आनंद घेतला नाही. तुम्ही मानवी कामभोगांचा उपभोग घ्या. प्रत्यक्ष दिसणारे सोडून काळाच्या अधीन असलेल्या सुखाच्या मागे धावू नका.' (भिक्खू म्हणाले) 'हे ब्राह्मणा, आम्ही प्रत्यक्ष दिसणारे सोडून काळाच्या अधीन असलेल्या सुखाच्या मागे धावत नाही. उलट, आम्ही काळाच्या अधीन असलेले सुख सोडून प्रत्यक्ष दिसणाऱ्या धम्माच्या मागे धावतो. कारण, हे ब्राह्मणा, भगवंतांनी सांगितले आहे की कामभोग हे काळाच्या अधीन असणारे, अत्यंत दुःखद, अत्यंत क्लेशकारक आहेत आणि त्यामध्ये अनेक दोष आहेत. तर हा धम्म प्रत्यक्ष दिसणारा, तात्काळ फळ देणारा, स्वतः येऊन पाहण्याजोगा, स्वतःमध्ये धारण करण्याजोगा आणि सुज्ञांनी आपापल्या परीने अनुभवण्याजोगा आहे.' असे म्हटल्यावर, पापी माराने आपले डोके हलवले, जीभ बाहेर काढली, कपाळावर तीन आट्या आणल्या आणि काठी टेकवत निघून गेला. අථ ඛො තෙ භික්ඛූ යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදිංසු. එකමන්තං නිසින්නා ඛො තෙ භික්ඛූ භගවන්තං එතදවොචුං – ‘‘ඉධ මයං, භන්තෙ, භගවතො අවිදූරෙ අප්පමත්තා ආතාපිනො පහිතත්තා විහරාම. අථ ඛො, භන්තෙ, අඤ්ඤතරො බ්රාහ්මණො මහන්තෙන ජටණ්ඩුවෙන අජිනක්ඛිපනිවත්ථො ජිණ්ණො ගොපානසිවඞ්කො ඝුරුඝුරුපස්සාසී උදුම්බරදණ්ඩං ගහෙත්වා යෙන මයං තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා අම්හෙ එතදවොච – ‘දහරා භවන්තො පබ්බජිතා සුසූ කාළකෙසා භද්රෙන යොබ්බනෙන සමන්නාගතා පඨමෙන වයසා අනික්කීළිතාවිනො කාමෙසු. භුඤ්ජන්තු භවන්තො මානුසකෙ කාමෙ. මා සන්දිට්ඨිකං හිත්වා කාලිකං අනුධාවිත්ථා’ති. එවං වුත්තෙ, මයං, භන්තෙ, තං බ්රාහ්මණං එතදවොචුම්හ – ‘න ඛො මයං, බ්රාහ්මණ, සන්දිට්ඨිකං හිත්වා කාලිකං අනුධාවාම. කාලිකඤ්ච ඛො මයං, බ්රාහ්මණ, හිත්වා සන්දිට්ඨිකං අනුධාවාම. කාලිකා හි, බ්රාහ්මණ, කාමා වුත්තා භගවතා බහුදුක්ඛා බහුපායාසා, ආදීනවො එත්ථ භිය්යො. සන්දිට්ඨිකො අයං ධම්මො අකාලිකො එහිපස්සිකො ඔපනෙය්යිකො පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’ති. එවං වුත්තෙ, භන්තෙ, සො බ්රාහ්මණො සීසං ඔකම්පෙත්වා ජිව්හං නිල්ලාලෙත්වා තිවිසාඛං නලාටෙ නලාටිකං වුට්ඨාපෙත්වා දණ්ඩමොලුබ්භ පක්කන්තො’’ති. त्यानंतर ते भिक्खू जेथे भगवान होते तेथे गेले; भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या त्या भिक्खूंनी भगवंतांना सांगितले – 'भंते, आम्ही येथे भगवंतांच्या जवळच अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करत होतो. तेव्हा, भंते, एका ब्राह्मणाने डोक्यावर जटांचा मोठा अंबाडा बांधलेला, अंगावर काळवीटाचे चामडे पांघरलेला, म्हातारा, घराच्या वाशासारखा वाकलेला, घोरल्यासारखा श्वास घेणारा आणि हातात उंबराच्या लाकडाची काठी घेतलेला आमच्याजवळ आला; आणि आम्हाला म्हणाला – "अहो भदंत! तुम्ही तरुण वयातच प्रव्रजित झाला आहात... प्रत्यक्ष दिसणारे सोडून काळाच्या अधीन असलेल्या सुखाच्या मागे धावू नका." भंते, असे म्हटल्यावर आम्ही त्या ब्राह्मणाला म्हणालो – "हे ब्राह्मणा, आम्ही प्रत्यक्ष दिसणारे सोडून काळाच्या अधीन असलेल्या सुखाच्या मागे धावत नाही... हा धम्म प्रत्यक्ष दिसणारा, तात्काळ फळ देणारा, स्वतः येऊन पाहण्याजोगा, स्वतःमध्ये धारण करण्याजोगा आणि सुज्ञांनी आपापल्या परीने अनुभवण्याजोगा आहे." भंते, असे म्हटल्यावर तो ब्राह्मण आपले डोके हलवून, जीभ बाहेर काढून, कपाळावर तीन आट्या आणून आणि काठी टेकवत निघून गेला.' ‘‘නෙසො, භික්ඛවෙ, බ්රාහ්මණො. මාරො එසො පාපිමා තුම්හාකං විචක්ඛුකම්මාය ආගතො’’ති. අථ ඛො භගවා එතමත්ථං විදිත්වා තායං වෙලායං ඉමං ගාථං අභාසි – 'भिक्खूंनो, तो ब्राह्मण नव्हता. तो पापी मार होता, जो तुमच्या प्रज्ञाचक्षूंना नष्ट करण्यासाठी आला होता.' त्यानंतर भगवंतांनी ही बाब जाणून घेऊन त्या वेळी ही गाथा म्हटली – ‘‘යො [Pg.120] දුක්ඛමද්දක්ඛි යතොනිදානං,කාමෙසු සො ජන්තු කථං නමෙය්ය; උපධිං විදිත්වා සඞ්ගොති ලොකෙ,තස්සෙව ජන්තු විනයාය සික්ඛෙ’’ති. 'ज्या मनुष्याने दुःखाचे मूळ कारण कामभोगात पाहिले आहे, तो मनुष्य कामभोगांकडे कसा बरे वळेल? जगामध्ये उपधी (आसक्ती) हेच बंधनाचे कारण आहे हे जाणून, मनुष्याने त्या उपधीच्या नाशासाठीच साधना करावी.' 2. සමිද්ධිසුත්තං २. समिद्धि सुत्त 158. එකං සමයං භගවා සක්කෙසු විහරති සිලාවතියං. තෙන ඛො පන සමයෙන ආයස්මා සමිද්ධි භගවතො අවිදූරෙ අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරති. අථ ඛො ආයස්මතො සමිද්ධිස්ස රහොගතස්ස පටිසල්ලීනස්ස එවං චෙතසො පරිවිතක්කො උදපාදි – ‘‘ලාභා වත මෙ, සුලද්ධං වත මෙ, යස්ස මෙ සත්ථා අරහං සම්මාසම්බුද්ධො. ලාභා වත මෙ, සුලද්ධං වත මෙ, ය්වාහං එවං ස්වාක්ඛාතෙ ධම්මවිනයෙ පබ්බජිතො. ලාභා වත මෙ, සුලද්ධං වත මෙ, යස්ස මෙ සබ්රහ්මචාරිනො සීලවන්තො කල්යාණධම්මා’’ති. අථ ඛො මාරො පාපිමා ආයස්මතො සමිද්ධිස්ස චෙතසා චෙතොපරිවිතක්කමඤ්ඤාය යෙනායස්මා සමිද්ධි තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මතො සමිද්ධිස්ස අවිදූරෙ මහන්තං භයභෙරවං සද්දමකාසි, අපිස්සුදං පථවී මඤ්ඤෙ උන්ද්රීයති. १५८. एकदा भगवान शाक्य देशात सिलावती येथे विहार करत होते. त्या वेळी आयुष्यमान समिद्धि भगवंतांच्या जवळच अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करत होते. तेव्हा एकांतात ध्यानस्थ बसलेल्या आयुष्यमान समिद्धि यांच्या मनात असा विचार आला – 'माझा मोठा लाभ आहे, माझे भाग्य थोर आहे, की माझे शास्ता अर्हत, सम्यक संबुद्ध आहेत! माझा मोठा लाभ आहे, माझे भाग्य थोर आहे, की मी अशा सुविख्यात धम्म आणि विनयात प्रव्रजित झालो आहे! माझा मोठा लाभ आहे, माझे भाग्य थोर आहे, की माझे सहकारी भिक्खू शीलवान आणि कल्याणकारी स्वभावाचे आहेत!' तेव्हा पापी माराने आयुष्यमान समिद्धि यांच्या मनातील हा विचार स्वतःच्या मनाने जाणून जेथे आयुष्यमान समिद्धि होते तेथे आला; आणि त्यांच्या जवळ येऊन त्याने एक मोठा भयानक आणि थरकाप उडवणारा आवाज केला, जणू काही पृथ्वीच दुभंगून जात आहे असे वाटले। අථ ඛො ආයස්මා සමිද්ධි යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ආයස්මා සමිද්ධි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘ඉධාහං, භන්තෙ, භගවතො අවිදූරෙ අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරාමි. තස්ස මය්හං, භන්තෙ, රහොගතස්ස පටිසල්ලීනස්ස එවං චෙතසො පරිවිතක්කො උදපාදි – ‘ලාභා වත මෙ, සුලද්ධං වත මෙ, යස්ස මෙ සත්ථා අරහං සම්මාසම්බුද්ධො. ලාභා වත මෙ, සුලද්ධං වත මෙ, ය්වාහං එවං ස්වාක්ඛාතෙ ධම්මවිනයෙ පබ්බජිතො. ලාභා වත මෙ, සුලද්ධං වත මෙ, යස්ස මෙ සබ්රහ්මචාරිනො සීලවන්තො කල්යාණධම්මා’ති. තස්ස මය්හං, භන්තෙ, අවිදූරෙ මහාභයභෙරවසද්දො අහොසි, අපිස්සුදං පථවී මඤ්ඤෙ උන්ද්රීයතී’’ති. तेव्हा आयुष्यमान समिद्धी जेथे भगवान होते तेथे गेले; जवळ जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेले आयुष्यमान समिद्धी भगवंतांना असे म्हणाले – "भंते, मी येथे भगवंतांच्या जवळच अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करत आहे. भंते, एकांतात ध्यानस्थ बसलो असताना माझ्या मनात असा विचार आला – 'माझे मोठे भाग्य आहे, मला उत्तम लाभ झाला आहे की माझे शास्ता अर्हत, सम्यकसबुद्ध आहेत. माझे मोठे भाग्य आहे, मला उत्तम लाभ झाला आहे की मी अशा सुविख्यात धम्म-विनयात प्रवज्जित झालो आहे. माझे मोठे भाग्य आहे, मला उत्तम लाभ झाला आहे की माझे सहकारी भिक्खू शीलवान आणि कल्याणकारी स्वभावाचे आहेत.' भंते, त्यानंतर माझ्या अगदी जवळ एक अत्यंत भयानक आणि भीतीदायक आवाज झाला, जणू काही पृथ्वी दुभंगत आहे." ‘‘නෙසා, සමිද්ධි, පථවී උන්ද්රීයති. මාරො එසො පාපිමා තුය්හං විචක්ඛුකම්මාය ආගතො. ගච්ඡ ත්වං, සමිද්ධි, තත්ථෙව අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරාහී’’ති. ‘‘එවං, භන්තෙ’’ති ඛො ආයස්මා සමිද්ධි භගවතො පටිස්සුත්වා [Pg.121] උට්ඨායාසනා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා පක්කාමි. දුතියම්පි ඛො ආයස්මා සමිද්ධි තත්ථෙව අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහාසි. දුතියම්පි ඛො ආයස්මතො සමිද්ධිස්ස රහොගතස්ස පටිසල්ලීනස්ස…පෙ… දුතියම්පි ඛො මාරො පාපිමා ආයස්මතො සමිද්ධිස්ස චෙතසා චෙතොපරිවිතක්කමඤ්ඤාය…පෙ… අපිස්සුදං පථවී මඤ්ඤෙ උන්ද්රීයති. අථ ඛො ආයස්මා සමිද්ධි මාරං පාපිමන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – भगवंतांनी सांगितले – "समिद्धी, ही पृथ्वी दुभंगत नाही आहे. तो पापी मार तुझ्या प्रज्ञेचा डोळा नष्ट करण्यासाठी आला आहे. जा, समिद्धी, तू तिथेच अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार कर." "होय भंते," असे म्हणून आयुष्यमान समिद्धींनी भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार केला, आपल्या आसनावरून उठून भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि ते निघून गेले. दुसऱ्यांदाही आयुष्यमान समिद्धी तिथेच अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करू लागले. दुसऱ्यांदाही एकांतात ध्यानस्थ बसलेल्या आयुष्यमान समिद्धींच्या मनात... पे... दुसऱ्यांदाही पापी माराने आयुष्यमान समिद्धींच्या मनातील विचार स्वतःच्या मनाने जाणून... पे... जणू काही पृथ्वी दुभंगत असल्यासारखा भयानक आवाज केला. तेव्हा आयुष्यमान समिद्धींनी पापी माराला गाथेने संबोधित केले – ‘‘සද්ධායාහං පබ්බජිතො, අගාරස්මා අනගාරියං; සති පඤ්ඤා ච මෙ බුද්ධා, චිත්තඤ්ච සුසමාහිතං; කාමං කරස්සු රූපානි, නෙව මං බ්යාධයිස්සසී’’ති. "श्रद्धेने मी घराबाहेर पडून अनगारिक (गृहहीन) प्रवज्जेचा स्वीकार केला आहे; माझी स्मृती आणि प्रज्ञा जागृत झाली आहे, आणि माझे चित्त सुसमाहित झाले आहे; तू तुझ्या इच्छेनुसार भयानक रूपे धारण कर, पण तू मला मुळीच विचलित करू शकणार नाहीस." අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං සමිද්ධි භික්ඛූ’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. तेव्हा "भिक्खू समिद्धी मला ओळखतो," हे जाणून पापी मार दुःखी व खिन्न होऊन तिथेच अंतर्धान पावला. 3. ගොධිකසුත්තං ३. गोधिकसुत्त 159. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන ආයස්මා ගොධිකො ඉසිගිලිපස්සෙ විහරති කාළසිලායං. අථ ඛො ආයස්මා ගොධිකො අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරන්තො සාමයිකං චෙතොවිමුත්තිං ඵුසි. අථ ඛො ආයස්මා ගොධිකො තම්හා සාමයිකාය චෙතොවිමුත්තියා පරිහායි. දුතියම්පි ඛො ආයස්මා ගොධිකො අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරන්තො සාමයිකං චෙතොවිමුත්තිං ඵුසි. දුතියම්පි ඛො ආයස්මා ගොධිකො තම්හා සාමයිකාය චෙතොවිමුත්තියා පරිහායි. තතියම්පි ඛො ආයස්මා ගොධිකො අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරන්තො සාමයිකං චෙතොවිමුත්තිං ඵුසි. තතියම්පි ඛො ආයස්මා ගොධිකො තම්හා…පෙ… පරිහායි. චතුත්ථම්පි ඛො ආයස්මා ගොධිකො අප්පමත්තො…පෙ… විමුත්තිං ඵුසි. චතුත්ථම්පි ඛො ආයස්මා ගොධිකො තම්හා…පෙ… පරිහායි. පඤ්චමම්පි ඛො ආයස්මා ගොධිකො…පෙ… චෙතොවිමුත්තිං ඵුසි. පඤ්චමම්පි ඛො ආයස්මා…පෙ… විමුත්තියා පරිහායි. ඡට්ඨම්පි ඛො ආයස්මා ගොධිකො අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරන්තො සාමයිකං චෙතොවිමුත්තිං ඵුසි. ඡට්ඨම්පි ඛො ආයස්මා ගොධිකො තම්හා සාමයිකාය චෙතොවිමුත්තියා පරිහායි. සත්තමම්පි [Pg.122] ඛො ආයස්මා ගොධිකො අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරන්තො සාමයිකං චෙතොවිමුත්තිං ඵුසි. १५९. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान राजगृह येथे वेळुवनातील कलंदकनिवाप येथे विहार करत होते. त्या वेळी आयुष्यमान गोधिक इसिगिली पर्वताच्या कुशीत काळसिला येथे विहार करत होते. तेव्हा आयुष्यमान गोधिक अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करत असताना त्यांनी सामयिक चेतोविमुक्ती प्राप्त केली. परंतु, आयुष्यमान गोधिक त्या सामयिक चेतोविमुक्तीपासून घसरले. दुसऱ्यांदाही आयुष्यमान गोधिक अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करत असताना त्यांनी सामयिक चेतोविमुक्ती प्राप्त केली. दुसऱ्यांदाही आयुष्यमान गोधिक त्या सामयिक चेतोविमुक्तीपासून घसरले. तिसऱ्यांदाही आयुष्यमान गोधिक अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करत असताना त्यांनी सामयिक चेतोविमुक्ती प्राप्त केली. तिसऱ्यांदाही आयुष्यमान गोधिक त्या... पे... घसरले. चौथ्यांदाही आयुष्यमान गोधिक अप्रमत्त... पे... विमुक्ती प्राप्त केली. चौथ्यांदाही आयुष्यमान गोधिक त्या... पे... घसरले. पाचव्यांदाही आयुष्यमान... पे... चेतोविमुक्ती प्राप्त केली. पाचव्यांदाही आयुष्यमान... पे... विमुक्तीपासून घसरले. सहाव्यांदाही आयुष्यमान गोधिक अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करत असताना त्यांनी सामयिक चेतोविमुक्ती प्राप्त केली. सहाव्यांदाही आयुष्यमान गोधिक त्या सामयिक चेतोविमुक्तीपासून घसरले. सातव्यांदाही आयुष्यमान गोधिक अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करत असताना त्यांनी सामयिक चेतोविमुक्ती प्राप्त केली. අථ ඛො ආයස්මතො ගොධිකස්ස එතදහොසි – ‘‘යාව ඡට්ඨං ඛ්වාහං සාමයිකාය චෙතොවිමුත්තියා පරිහීනො. යංනූනාහං සත්ථං ආහරෙය්ය’’න්ති. අථ ඛො මාරො පාපිමා ආයස්මතො ගොධිකස්ස චෙතසා චෙතොපරිවිතක්කමඤ්ඤාය යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං ගාථාහි අජ්ඣභාසි – तेव्हा आयुष्यमान गोधिकांच्या मनात असा विचार आला – "मी तब्बल सहा वेळा सामयिक चेतोविमुक्तीपासून घसरलो आहे. आता मी शस्त्राचा वापर का करू नये?" तेव्हा पापी माराने आयुष्यमान गोधिकांच्या मनातील हा विचार स्वतःच्या मनाने जाणून घेतला आणि तो जेथे भगवान होते तेथे गेला; जवळ जाऊन त्याने भगवंतांना गाथांनी संबोधित केले – ‘‘මහාවීර මහාපඤ්ඤ, ඉද්ධියා යසසා ජල; සබ්බවෙරභයාතීත, පාදෙ වන්දාමි චක්ඛුම. "हे महावीरा, महाप्रज्ञावंता, ऋद्धी आणि यशाने प्रदीप्त असणाऱ्या! सर्व वैर आणि भयावर मात केलेल्या, हे दिव्यचक्षू असणाऱ्या भगवंता, मी आपल्या चरणांना वंदन करतो. ‘‘සාවකො තෙ මහාවීර, මරණං මරණාභිභූ; ආකඞ්ඛති චෙතයති, තං නිසෙධ ජුතින්ධර. "हे महावीरा, आपला श्रावक मृत्यूने ग्रस्त होऊन मृत्यूची इच्छा करत आहे, तो स्वतःचे जीवन संपवण्याचा विचार करत आहे; हे तेजस्वी भगवंता, त्याला रोखा! ‘‘කථඤ්හි භගවා තුය්හං, සාවකො සාසනෙ රතො; අප්පත්තමානසො සෙක්ඛො, කාලං කයිරා ජනෙසුතා’’ති. "हे भगवंता, आपल्या शासनात रममाण असणारा, अंतिम ध्येयाप्रत न पोहोचलेला, अजूनही साधना करत असलेला (सेख) आणि लोकांमध्ये प्रसिद्ध असलेला आपला श्रावक स्वतःचे जीवन कसे काय संपवू शकतो?" තෙන ඛො පන සමයෙන ආයස්මතො ගොධිකෙන සත්ථං ආහරිතං හොති. අථ ඛො භගවා ‘‘මාරො අයං පාපිමා’’ ඉති විදිත්වා මාරං පාපිමන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – त्याच वेळी आयुष्यमान गोधिकांनी शस्त्राचा वापर केला होता. तेव्हा भगवंतांनी "हा पापी मार आहे" हे ओळखून पापी माराला गाथेने उत्तर दिले – ‘‘එවඤ්හි ධීරා කුබ්බන්ති, නාවකඞ්ඛන්ති ජීවිතං; සමූලං තණ්හමබ්බුය්හ, ගොධිකො පරිනිබ්බුතො’’ති. "धीर पुरुष असेच करतात, ते जीवाची आस धरत नाहीत; तृष्णेला तिच्या मुळासकट उपटून टाकून, गोधिक परिनिर्वाण पावले आहेत." අථ ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘ආයාම, භික්ඛවෙ, යෙන ඉසිගිලිපස්සං කාළසිලා තෙනුපසඞ්කමිස්සාම යත්ථ ගොධිකෙන කුලපුත්තෙන සත්ථං ආහරිත’’න්ති. ‘‘එවං, භන්තෙ’’ති ඛො තෙ භික්ඛූ භගවතො පච්චස්සොසුං. तेव्हा भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – "चला भिक्खूंनो, आपण इसिगिली पर्वताच्या कुशीत काळसिला येथे जाऊ या, जेथे कुलपुत्र गोधिकांनी शस्त्राचा वापर केला आहे." "होय भंते," असे म्हणून त्या भिक्खूंनी भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार केला. අථ ඛො භගවා සම්බහුලෙහි භික්ඛූහි සද්ධිං යෙන ඉසිගිලිපස්සං කාළසිලා තෙනුපසඞ්කමි. අද්දසා ඛො භගවා ආයස්මන්තං ගොධිකං දූරතොව මඤ්චකෙ විවත්තක්ඛන්ධං සෙමානං. තෙන ඛො පන සමයෙන ධූමායිතත්තං තිමිරායිතත්තං ගච්ඡතෙව පුරිමං දිසං, ගච්ඡති පච්ඡිමං දිසං, ගච්ඡති උත්තරං දිසං, ගච්ඡති දක්ඛිණං දිසං, ගච්ඡති උද්ධං, ගච්ඡති අධො, ගච්ඡති අනුදිසං. तेव्हा भगवान अनेक भिक्खूंसह इसिगिली पर्वताच्या कुशीत काळसिला येथे गेले. भगवंतांनी दुरूनच आयुष्यमान गोधिकांना मंचकावर मान वळवून पडलेले पाहिले. त्या वेळी धूर आणि अंधाराचा एक पुंजका पूर्व देशाकडे जात होता, पश्चिम देशाकडे जात होता, उत्तर देशाकडे जात होता, दक्षिण देशाकडे जात होता, वरच्या दिशेला जात होता, खालच्या दिशेला जात होता आणि उपदिशेला जात होता। අථ [Pg.123] ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘පස්සථ නො තුම්හෙ, භික්ඛවෙ, එතං ධූමායිතත්තං තිමිරායිතත්තං ගච්ඡතෙව පුරිමං දිසං, ගච්ඡති පච්ඡිමං දිසං, ගච්ඡති උත්තරං දිසං, ගච්ඡති දක්ඛිණං දිසං, ගච්ඡති උද්ධං, ගච්ඡති අධො, ගච්ඡති අනුදිස’’න්ති? ‘‘එවං, භන්තෙ’’. ‘‘එසො ඛො, භික්ඛවෙ, මාරො පාපිමා ගොධිකස්ස කුලපුත්තස්ස විඤ්ඤාණං සමන්වෙසති – ‘කත්ථ ගොධිකස්ස කුලපුත්තස්ස විඤ්ඤාණං පතිට්ඨිත’න්ති? අප්පතිට්ඨිතෙන ච, භික්ඛවෙ, විඤ්ඤාණෙන ගොධිකො කුලපුත්තො පරිනිබ්බුතො’’ති. අථ ඛො මාරො පාපිමා බෙලුවපණ්ඩුවීණං ආදාය යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – तेव्हा भगवान भिक्खूंना म्हणाले – "भिक्खूंनो, तुम्हाला तो धुरासारखा आणि अंधकारासारखा पुंजका पूर्व दिशेकडे, पश्चिम दिशेकडे, उत्तर दिशेकडे, दक्षिण दिशेकडे, वर, खाली आणि उपदिशेकडे जाताना दिसत आहे का?" "होय, भंते." "भिक्खूंनो, तो पापी मार कुलपुत्र गोधिकच्या विज्ञानाचा (चेतनेचा) शोध घेत आहे की – 'कुलपुत्र गोधिकचे विज्ञान कोठे प्रतिष्ठित झाले आहे?' परंतु, भिक्खूंनो, विज्ञान कोठेही प्रतिष्ठित न झाल्यामुळे कुलपुत्र गोधिक परिनिर्वाण पावले आहेत." तेव्हा पापी मार पिवळसर रंगाची बेलफळाच्या लाकडाची वीणा घेऊन भगवंतांकडे गेला; आणि भगवंतांजवळ जाऊन त्याने गाथेने त्यांना संबोधित केले – ‘‘උද්ධං අධො ච තිරියං, දිසා අනුදිසා ස්වහං; අන්වෙසං නාධිගච්ඡාමි, ගොධිකො සො කුහිං ගතො’’ති. "वर, खाली, आडवे, दिशा आणि उपदिशांमध्ये शोध घेऊनही मला तो सापडत नाही; तो गोधिक कोठे गेला आहे?" ‘‘යො ධීරො ධිතිසම්පන්නො, ඣායී ඣානරතො සදා; අහොරත්තං අනුයුඤ්ජං, ජීවිතං අනිකාමයං. [भगवान म्हणाले:] "जो धीर (बुद्धिमान), धैर्यसंपन्न, ध्यानी आणि सदैव ध्यानात रमणारा होता; ज्याने दिवस-रात्र उद्योग केला आणि ज्याला स्वतःच्या जीवाचीही आसक्ती नव्हती. ‘‘ජෙත්වාන මච්චුනො සෙනං, අනාගන්ත්වා පුනබ්භවං; සමූලං තණ්හමබ්බුය්හ, ගොධිකො පරිනිබ්බුතො’’ති. "मृत्यूच्या सेनेवर विजय मिळवून, पुनर्जन्मात परत न येता, मुळासकट तृष्णा उपटून टाकून, गोधिक परिनिर्वाण पावले आहेत." ‘‘තස්ස සොකපරෙතස්ස, වීණා කච්ඡා අභස්සථ; තතො සො දුම්මනො යක්ඛො, තත්ථෙවන්තරධායථා’’ති. "शोकाने व्याकुळ झालेल्या त्या माराच्या काखेतून वीणा खाली गळून पडली. त्यानंतर तो खिन्न झालेला यक्ष (मार) तिथेच अंतर्धान पावला." 4. සත්තවස්සානුබන්ධසුත්තං ४. सत्त्वस्सानुबंध सुत्त (सात वर्षांच्या पाठलागाचे सुत्त) 160. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා උරුවෙලායං විහරති නජ්ජා නෙරඤ්ජරාය තීරෙ අජපාලනිග්රොධෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන මාරො පාපිමා සත්තවස්සානි භගවන්තං අනුබන්ධො හොති ඔතාරාපෙක්ඛො ඔතාරං අලභමානො. අථ ඛො මාරො පාපිමා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – १६०. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान उरुवेला येथे निरंजरा नदीच्या काठी अजपाल वडाच्या झाडाखाली विहार करत होते. त्या वेळी पापी मार भगवंतांच्या चुका शोधण्याची संधी शोधत सात वर्षांपासून त्यांच्या मागे लागला होता, परंतु त्याला कोणतीही संधी मिळत नव्हती. तेव्हा पापी मार भगवंतांकडे गेला; आणि भगवंतांजवळ जाऊन त्याने गाथेने त्यांना संबोधित केले – ‘‘සොකාවතිණ්ණො නු වනම්හි ඣායසි,විත්තං නු ජීනො උද පත්ථයානො; ආගුං නු ගාමස්මිමකාසි කිඤ්චි,කස්මා ජනෙන න කරොසි සක්ඛිං; සක්ඛී න සම්පජ්ජති කෙනචි තෙ’’ති. "तुम्ही शोकात बुडून अरण्यात ध्यान करत आहात का? तुमचे धन नष्ट झाले आहे म्हणून की धनाची इच्छा धरून तुम्ही ध्यान करत आहात? तुम्ही गावात काही अपराध केला आहे का? तुम्ही लोकांशी मैत्री का करत नाही? तुमची कोणाशीही जवळीक का निर्माण होत नाही?" ‘‘සොකස්ස [Pg.124] මූලං පලිඛාය සබ්බං,අනාගු ඣායාමි අසොචමානො; ඡෙත්වාන සබ්බං භවලොභජප්පං,අනාසවො ඣායාමි පමත්තබන්ධූ’’ති. [भगवान म्हणाले:] "शोकाचे सर्व मूळ उपटून टाकून, मी निष्पाप व शोकरहित होऊन ध्यान करत आहे. भव-लोभाची (अस्तित्वाची तृष्णा) सर्व बंधने तोडून, मी आसवविरहित (अनास्रव) होऊन ध्यान करत आहे, हे प्रमत्तांच्या (बेसावधांच्या) बांधवा (मारा)!" ‘‘යං වදන්ති මම යිදන්ති, යෙ වදන්ති මමන්ති ච; එත්ථ චෙ තෙ මනො අත්ථි, න මෙ සමණ මොක්ඛසී’’ති. [मार म्हणाला:] "ज्या गोष्टींना लोक 'हे माझे आहे' म्हणतात, आणि जे 'माझे' या भावनेने बोलतात—जर तुमचे मन या गोष्टींमध्ये अडकले असेल, तर हे श्रमणा, तुम्ही माझ्या तावडीतून सुटू शकणार नाही." ‘‘යං වදන්ති න තං මය්හං, යෙ වදන්ති න තෙ අහං; එවං පාපිම ජානාහි, න මෙ මග්ගම්පි දක්ඛසී’’ති. [भगवान म्हणाले:] "ते ज्या गोष्टींविषयी बोलतात, त्या माझ्या नाहीत; आणि जे तसे बोलतात, त्यांच्यापैकी मी नाही. हे पापी मारा, हे लक्षात ठेव की तू माझा मार्गही पाहू शकणार नाहीस." ‘‘සචෙ මග්ගං අනුබුද්ධං, ඛෙමං අමතගාමිනං; අපෙහි ගච්ඡ ත්වමෙවෙකො, කිමඤ්ඤමනුසාසසී’’ති. [मार म्हणाला:] "जर तुम्ही तो अमृतपदाकडे (निर्वाणाकडे) नेणारा सुरक्षित मार्ग शोधून काढला असेल, तर तुम्ही स्वतःच त्या मार्गाने जा; इतरांना उपदेश करण्याचे काय प्रयोजन?" ‘‘අමච්චුධෙය්යං පුච්ඡන්ති, යෙ ජනා පාරගාමිනො; තෙසාහං පුට්ඨො අක්ඛාමි, යං සච්චං තං නිරූපධි’’න්ති. [भगवान म्हणाले:] "जे लोक पलीकडच्या तीरावर (निर्वाणाकडे) जाऊ इच्छितात आणि मृत्यूच्या क्षेत्रापलीकडच्या मार्गाविषयी विचारतात, त्यांनी विचारले असता मी त्यांना उपाधिरहित (आसक्तीरहित) असे सत्य सांगतो." ‘‘සෙය්යථාපි, භන්තෙ, ගාමස්ස වා නිගමස්ස වා අවිදූරෙ පොක්ඛරණී. තත්රස්ස කක්කටකො. අථ ඛො, භන්තෙ, සම්බහුලා කුමාරකා වා කුමාරිකායො වා තම්හා ගාමා වා නිගමා වා නික්ඛමිත්වා යෙන සා පොක්ඛරණී තෙනුපසඞ්කමෙය්යුං; උපසඞ්කමිත්වා තං කක්කටකං උදකා උද්ධරිත්වා ථලෙ පතිට්ඨපෙය්යුං. යං යදෙව හි සො, භන්තෙ, කක්කටකො අළං අභිනින්නාමෙය්ය තං තදෙව තෙ කුමාරකා වා කුමාරිකායො වා කට්ඨෙන වා කථලාය වා සඤ්ඡින්දෙය්යුං සම්භඤ්ජෙය්යුං සම්පලිභඤ්ජෙය්යුං. එවඤ්හි සො, භන්තෙ, කක්කටකො සබ්බෙහි අළෙහි සඤ්ඡින්නෙහි සම්භග්ගෙහි සම්පලිභග්ගෙහි අභබ්බො තං පොක්ඛරණිං ඔතරිතුං. එවමෙව ඛො, භන්තෙ, යානි කානිචි විසූකායිකානි විසෙවිතානි විප්ඵන්දිතානි, සබ්බානි තානි භගවතා සඤ්ඡින්නානි සම්භග්ගානි සම්පලිභග්ගානි. අභබ්බො දානාහං, භන්තෙ, පුන භගවන්තං උපසඞ්කමිතුං යදිදං ඔතාරාපෙක්ඛො’’ති. අථ ඛො මාරො පාපිමා භගවතො සන්තිකෙ ඉමා නිබ්බෙජනීයා ගාථායො අභාසි – "भंते, समजा एखाद्या गावाच्या किंवा नगराच्या जवळ एक कमळाचे तळे आहे आणि त्यात एक खेकडा राहत आहे. तेव्हा गावातील किंवा नगरातील अनेक मुले-मुली तिथे येतील. ते त्या खेकड्याला पाण्यातून बाहेर काढून जमिनीवर ठेवतील. मग तो खेकडा जेव्हा जेव्हा आपली नांगी बाहेर काढेल, तेव्हा तेव्हा ती मुले-मुली काठीने किंवा दगडाने ती नांगी कापून टाकतील, मोडून टाकतील किंवा तिचे तुकडे करतील. भंते, अशा प्रकारे ज्याच्या सर्व नांग्या कापल्या, मोडल्या आणि नष्ट केल्या आहेत, तो खेकडा पुन्हा त्या तळ्यात जाण्यास असमर्थ ठरेल. भंते, त्याचप्रमाणे माझे जे काही कुटिल डावपेच, हालचाली आणि प्रपंच होते, ते सर्व भगवंतांनी कापून, मोडून आणि नष्ट करून टाकले आहेत. भंते, आता मी भगवंतांच्या चुका शोधण्याच्या उद्देशाने पुन्हा त्यांच्याजवळ जाण्यास असमर्थ आहे." त्यानंतर पापी माराने भगवंतांच्या समोर या नैराश्याच्या गाथा म्हटल्या – ‘‘මෙදවණ්ණඤ්ච පාසාණං, වායසො අනුපරියගා; අපෙත්ථ මුදුං වින්දෙම, අපි අස්සාදනා සියා. "एक कावळा चरबीच्या गोळ्यासारख्या दिसणाऱ्या दगडाभोवती फिरला आणि त्याने विचार केला, 'कदाचित इथे काहीतरी मऊ मिळेल, कदाचित काहीतरी चवदार खायला मिळेल.' ‘‘අලද්ධා [Pg.125] තත්ථ අස්සාදං, වායසෙත්තො අපක්කමෙ; කාකොව සෙලමාසජ්ජ, නිබ්බිජ්ජාපෙම ගොතමා’’ති. "परंतु तिथे काहीही चवदार न मिळाल्यामुळे तो कावळा तिथून निघून गेला. दगडावर चोच मारणाऱ्या त्या कावळ्याप्रमाणेच, आम्हीही श्रमण गोतमांकडून निराश होऊन परत जात आहोत." 5. මාරධීතුසුත්තං ५. मारधीतु सुत्त (माराच्या कन्यांचे सुत्त) 161. අථ ඛො මාරො පාපිමා භගවතො සන්තිකෙ ඉමා නිබ්බෙජනීයා ගාථායො අභාසිත්වා තම්හා ඨානා අපක්කම්ම භගවතො අවිදූරෙ පථවියං පල්ලඞ්කෙන නිසීදි තුණ්හීභූතො මඞ්කුභූතො පත්තක්ඛන්ධො අධොමුඛො පජ්ඣායන්තො අප්පටිභානො කට්ඨෙන භූමිං විලිඛන්තො. අථ ඛො තණ්හා ච අරති ච රගා ච මාරධීතරො යෙන මාරො පාපිමා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා මාරං පාපිමන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසිංසු – १६१. तेव्हा पापी माराने भगवंतांच्या समोर या नैराश्याच्या गाथा म्हटल्यानंतर तो तिथून निघून गेला आणि भगवंतांच्या जवळच जमिनीवर मांडी घालून बसला. तो शांत, खिन्न, खांदे पाडलेला, मान खाली घातलेला, विचारमग्न, निरुत्तर होऊन काठीने जमीन खरडत बसला होता. तेव्हा माराच्या तण्हा (तृष्णा), अरती आणि रागा या कन्या पापी माराकडे आल्या; आणि जवळ येऊन त्यांनी पापी माराला गाथेने विचारले – ‘‘කෙනාසි දුම්මනො තාත, පුරිසං කං නු සොචසි; මයං තං රාගපාසෙන, ආරඤ්ඤමිව කුඤ්ජරං; බන්ධිත්වා ආනයිස්සාම, වසගො තෙ භවිස්සතී’’ති. "पिताजी, तुम्ही का खिन्न आहात? तुम्ही कोणत्या पुरुषासाठी शोक करत आहात? आम्ही त्याला रागाच्या (वासनेच्या) पाशाने बांधून आणू, जसे अरण्यातील हत्तीला पकडून आणतात. आम्ही त्याला घट्ट बांधून तुमच्या स्वाधीन करू, तो तुमच्या नियंत्रणात येईल." ‘‘අරහං සුගතො ලොකෙ, න රාගෙන සුවානයො; මාරධෙය්යං අතික්කන්තො, තස්මා සොචාමහං භුස’’න්ති. "जगातील तो अर्हत, सुगत, वासनेने सहज वश होणारा नाही. त्याने माराच्या क्षेत्राचे (संसाराचे) उल्लंघन केले आहे; म्हणूनच मी इतका तीव्र शोक करत आहे." අථ ඛො තණ්හා ච අරති ච රගා ච මාරධීතරො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං එතදවොචුං – ‘‘පාදෙ තෙ, සමණ, පරිචාරෙමා’’ති. අථ ඛො භගවා න මනසාකාසි, යථා තං අනුත්තරෙ උපධිසඞ්ඛයෙ විමුත්තො. तेव्हा तण्हा, अरती आणि रागा या माराच्या कन्या भगवंतांकडे गेल्या; आणि भगवंतांजवळ जाऊन त्यांनी म्हटले – "श्रमणा, आम्ही तुमच्या चरणांची सेवा करू इच्छितो." परंतु भगवंतांनी त्यांच्याकडे लक्ष दिले नाही, कारण ते उपाधींच्या अत्यंत क्षयामध्ये (सर्वश्रेष्ठ निर्वाणामध्ये) मुक्त झाले होते. අථ ඛො තණ්හා ච අරති ච රගා ච මාරධීතරො එකමන්තං අපක්කම්ම එවං සමචින්තෙසුං – ‘‘උච්චාවචා ඛො පුරිසානං අධිප්පායා. යංනූන මයං එකසතං එකසතං කුමාරිවණ්ණසතං අභිනිම්මිනෙය්යාමා’’ති. අථ ඛො තණ්හා ච අරති ච රගා ච මාරධීතරො එකසතං එකසතං කුමාරිවණ්ණසතං අභිනිම්මිනිත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං එතදවොචුං – ‘‘පාදෙ තෙ, සමණ, පරිචාරෙමා’’ති. තම්පි භගවා න මනසාකාසි, යථා තං අනුත්තරෙ උපධිසඞ්ඛයෙ විමුත්තො. तेव्हा तण्हा, अरती आणि रागा या माराच्या कन्या एका बाजूला गेल्या आणि त्यांनी आपसात विचार केला – "पुरुषांच्या आवडीनिवडी वेगवेगळ्या असतात. आपण प्रत्येकीने शंभर-शंभर तरुण कन्यांचे रूप धारण केले तर किती बरे होईल!" मग तण्हा, अरती आणि रागा या माराच्या कन्यांनी प्रत्येकी शंभर-शंभर तरुण कन्यांचे रूप धारण केले आणि त्या भगवंतांकडे गेल्या; आणि भगवंतांजवळ जाऊन त्यांनी म्हटले – "श्रमणा, आम्ही तुमच्या चरणांची सेवा करू इच्छितो." परंतु भगवंतांनी त्यावरही लक्ष दिले नाही, कारण ते उपाधींच्या अत्यंत क्षयामध्ये (सर्वश्रेष्ठ निर्वाणामध्ये) मुक्त झाले होते. අථ ඛො තණ්හා ච අරති ච රගා ච මාරධීතරො එකමන්තං අපක්කම්ම එවං සමචින්තෙසුං – ‘‘උච්චාවචා ඛො පුරිසානං අධිප්පායා. යංනූන මයං එකසතං එකසතං අවිජාතවණ්ණසතං අභිනිම්මිනෙය්යාමා’’ති. අථ ඛො තණ්හා ච අරති ච රගා ච මාරධීතරො එකසතං එකසතං [Pg.126] අවිජාතවණ්ණසතං අභිනිම්මිනිත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං එතදවොචුං – ‘‘පාදෙ තෙ, සමණ, පරිචාරෙමා’’ති. තම්පි භගවා න මනසාකාසි, යථා තං අනුත්තරෙ උපධිසඞ්ඛයෙ විමුත්තො. त्यानंतर तण्हा (तृष्णा), अरती आणि रगा (राग) या मारकन्या एका बाजूला गेल्या आणि त्यांनी आपसात असा विचार केला – “पुरुषांच्या आवडीनिवडी वेगवेगळ्या असतात. आपण प्रत्येकीने शंभर-शंभर अशा कन्यांचे रूप धारण करावे ज्यांनी कधीही अपत्याला जन्म दिला नाही (कुमारी).” त्यानंतर तण्हा, अरती आणि रगा या मारकन्यांनी प्रत्येकी शंभर-शंभर अशा अपत्य न जन्मलेल्या स्त्रियांचे रूप धारण केले आणि ज्या ठिकाणी भगवान होते तिथे त्या आल्या. जवळ येऊन त्या भगवंतांना म्हणाल्या – “हे श्रमणा, आम्ही आपल्या चरणांची सेवा करू इच्छितो.” परंतु भगवंतांनी त्यांच्याकडे अजिबात लक्ष दिले नाही, कारण ते सर्वश्रेष्ठ उपधिक्षयात (सर्व उपाधींचा क्षय झालेल्या निर्वाणात) विमुक्त झाले होते. අථ ඛො තණ්හා ච…පෙ… යංනූන මයං එකසතං එකසතං සකිං විජාතවණ්ණසතං අභිනිම්මිනෙය්යාමාති. අථ ඛො තණ්හා ච…පෙ… සකිං විජාතවණ්ණසතං අභිනිම්මිනිත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං එතදවොචුං – ‘‘පාදෙ තෙ, සමණ, පරිචාරෙමා’’ති. තම්පි භගවා න මනසාකාසි, යථා තං අනුත්තරෙ උපධිසඞ්ඛයෙ විමුත්තො. त्यानंतर तण्हा...पे... “आपण प्रत्येकीने शंभर-शंभर अशा स्त्रियांचे रूप धारण करावे ज्यांनी एकदा अपत्याला जन्म दिला आहे.” त्यानंतर तण्हा...पे... एकदा अपत्य जन्मलेल्या शंभर-शंभर स्त्रियांचे रूप धारण करून ज्या ठिकाणी भगवान होते तिथे त्या आल्या. जवळ येऊन त्या भगवंतांना म्हणाल्या – “हे श्रमणा, आम्ही आपल्या चरणांची सेवा करू इच्छितो.” परंतु भगवंतांनी त्यांच्याकडे अजिबात लक्ष दिले नाही, कारण ते सर्वश्रेष्ठ उपधिक्षयात विमुक्त झाले होते. අථ ඛො තණ්හා ච…පෙ… යංනූන මයං එකසතං එකසතං දුවිජාතවණ්ණසතං අභිනිම්මිනෙය්යාමාති. අථ ඛො තණ්හා ච…පෙ… දුවිජාතවණ්ණසතං අභිනිම්මිනිත්වා යෙන භගවා…පෙ… යථා තං අනුත්තරෙ උපධිසඞ්ඛයෙ විමුත්තො. අථ ඛො තණ්හා ච…පෙ… මජ්ඣිමිත්ථිවණ්ණසතං අභිනිම්මිනෙය්යාමාති. අථ ඛො තණ්හා ච…පෙ… මජ්ඣිමිත්ථිවණ්ණසතං අභිනිම්මිනිත්වා…පෙ… අනුත්තරෙ උපධිසඞ්ඛයෙ විමුත්තො. त्यानंतर तण्हा...पे... “आपण प्रत्येकीने शंभर-शंभर अशा स्त्रियांचे रूप धारण करावे ज्यांनी दोनदा अपत्याला जन्म दिला आहे.” त्यानंतर तण्हा...पे... दोनदा अपत्य जन्मलेल्या शंभर-शंभर स्त्रियांचे रूप धारण करून ज्या ठिकाणी भगवान होते...पे... कारण ते सर्वश्रेष्ठ उपधिक्षयात विमुक्त झाले होते. त्यानंतर तण्हा...पे... “आपण प्रत्येकीने शंभर-शंभर मध्यमवयीन स्त्रियांचे रूप धारण करावे.” त्यानंतर तण्हा...पे... मध्यमवयीन स्त्रियांचे रूप धारण करून...पे... सर्वश्रेष्ठ उपधिक्षयात विमुक्त झाले होते. අථ ඛො තණ්හා ච…පෙ… මහිත්ථිවණ්ණසතං අභිනිම්මිනෙය්යාමාති. අථ ඛො තණ්හා ච…පෙ… මහිත්ථිවණ්ණසතං අභිනිම්මිනිත්වා යෙන භගවා…පෙ… අනුත්තරෙ උපධිසඞ්ඛයෙ විමුත්තො. අථ ඛො තණ්හා ච අරති ච රගා ච මාරධීතරො එකමන්තං අපක්කම්ම එතදවොචුං – සච්චං කිර නො පිතා අවොච – त्यानंतर तण्हा...पे... “आपण प्रत्येकीने शंभर-शंभर वृद्ध स्त्रियांचे रूप धारण करावे.” त्यानंतर तण्हा...पे... वृद्ध स्त्रियांचे रूप धारण करून ज्या ठिकाणी भगवान होते...पे... सर्वश्रेष्ठ उपधिक्षयात विमुक्त झाले होते. त्यानंतर तण्हा, अरती आणि रगा या मारकन्या एका बाजूला गेल्या आणि म्हणाल्या – “आमचे वडील खरोखरच सत्य बोलले होते –” ‘‘අරහං සුගතො ලොකෙ, න රාගෙන සුවානයො; මාරධෙය්යං අතික්කන්තො, තස්මා සොචාමහං භුස’’න්ති. “जगामध्ये जे अर्हत आणि सुगत आहेत, त्यांना रागाने वश करणे सोपे नाही; ते माराच्या साम्राज्यापलीकडे (मारधेय ओलांडून) गेले आहेत, म्हणूनच मी अत्यंत शोक करत आहे.” ‘‘යඤ්හි මයං සමණං වා බ්රාහ්මණං වා අවීතරාගං ඉමිනා උපක්කමෙන උපක්කමෙය්යාම හදයං වාස්ස ඵලෙය්ය, උණ්හං ලොහිතං වා මුඛතො උග්ගච්ඡෙය්ය, උම්මාදං වා පාපුණෙය්ය චිත්තක්ඛෙපං වා. සෙය්යථා වා පන නළො හරිතො ලුතො උස්සුස්සති විසුස්සති මිලායති; එවමෙව උස්සුස්සෙය්ය විසුස්සෙය්ය මිලායෙය්යා’’ති. “कारण जर आपण अशा उपायांनी (प्रयत्नांनी) कोणत्याही अशा श्रमणावर किंवा ब्राह्मणावर हल्ला केला असता जो वीतराग (रागरहित) नाही, तर त्याचे हृदय फाटले असते, किंवा त्याच्या मुखातून गरम रक्त बाहेर पडले असते, किंवा तो वेडा झाला असता किंवा त्याचे चित्त विचलित झाले असते. ज्याप्रमाणे कापलेले हिरवे लव्हाळे सुकते, कोमेजून जाते आणि सुकून नष्ट होते; त्याचप्रमाणे तोही सुकला असता, कोमेजला असता आणि नष्ट झाला असता.” අථ [Pg.127] ඛො තණ්හා ච අරති ච රගා ච මාරධීතරො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා එකමන්තං අට්ඨංසු. එකමන්තං ඨිතා ඛො තණ්හා මාරධීතා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – त्यानंतर तण्हा, अरती आणि रगा या मारकन्या ज्या ठिकाणी भगवान होते तिथे आल्या; जवळ येऊन त्या एका बाजूला उभ्या राहिल्या. एका बाजूला उभी राहिलेली मारकन्या तण्हा भगवंतांना गाथेने म्हणाली – ‘‘සොකාවතිණ්ණො නු වනම්හි ඣායසි,විත්තං නු ජීනො උද පත්ථයානො; ආගුං නු ගාමස්මිමකාසි කිඤ්චි,කස්මා ජනෙන න කරොසි සක්ඛිං; සක්ඛී න සම්පජ්ජති කෙනචි තෙ’’ති. “तुम्ही शोकात बुडून या वनात ध्यान करत आहात का? तुमचे धन नष्ट झाले आहे की तुम्ही धनाची इच्छा करत आहात? तुम्ही गावात काही अपराध केला आहे का? तुम्ही लोकांशी मैत्री का करत नाही? तुमची कोणाशीही मैत्री का जमत नाही?” ‘‘අත්ථස්ස පත්තිං හදයස්ස සන්තිං,ජෙත්වාන සෙනං පියසාතරූපං; එකොහං ඣායං සුඛමනුබොධිං,තස්මා ජනෙන න කරොමි සක්ඛිං; සක්ඛී න සම්පජ්ජති කෙනචි මෙ’’ති. “प्रिय आणि सुखद वाटणाऱ्या (क्लेशांच्या) सेनेवर विजय मिळवून, एकांतात ध्यान करत मी परम कल्याणाची प्राप्ती आणि हृदयाची शांती (अर्हतफळ सुख) अनुभवली आहे. म्हणूनच मी लोकांशी मैत्री करत नाही आणि माझी कोणाशीही मैत्री जमत नाही.” අථ ඛො අරති මාරධීතා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – त्यानंतर मारकन्या अरतीने भगवंतांना गाथेने विचारले – ‘‘කථං විහාරීබහුලොධ භික්ඛු,පඤ්චොඝතිණ්ණො අතරීධ ඡට්ඨං; කථං ඣායිං බහුලං කාමසඤ්ඤා,පරිබාහිරා හොන්ති අලද්ධ යො ත’’න්ති. “या जगात भिक्खूने कशा प्रकारे विहार (जीवन जगणे) करावा जेणेकरून तो पाच ओघ (क्लेशप्रवाह) पार करून सहावा (मनोद्वार क्लेश) देखील पार करेल? कशा प्रकारे ध्यान करणाऱ्या भिक्खूला कामसंज्ञा स्पर्श करू शकत नाहीत आणि त्या बाहेरच राहतात?” ‘‘පස්සද්ධකායො සුවිමුත්තචිත්තො,අසඞ්ඛරානො සතිමා අනොකො; අඤ්ඤාය ධම්මං අවිතක්කඣායී,න කුප්පති න සරති න ථිනො. “ज्याचा काय (शरीर) शांत आहे, ज्याचे चित्त पूर्णपणे विमुक्त आहे, जो नवीन संस्कार निर्माण करत नाही (असंस्कारित), जो स्मृतिमान आणि अनालय (आसक्तीरहित) आहे; जो धम्माला जाणून वितर्करहित चतुर्थ ध्यानात लीन असतो, तो क्रोधाने संतप्त होत नाही, रागाने स्मरण करत नाही आणि आळसाने (थीन-मिद्धने) ग्रस्त होत नाही. ‘‘එවංවිහාරීබහුලොධ භික්ඛු,පඤ්චොඝතිණ්ණො අතරීධ ඡට්ඨං; එවං ඣායිං බහුලං කාමසඤ්ඤා,පරිබාහිරා හොන්ති අලද්ධ යො ත’’න්ති. “अशा प्रकारे विहार करणारा भिक्खू पाच ओघ पार करून सहावा देखील पार करतो. अशा प्रकारे ध्यान करणाऱ्या भिक्खूला कामसंज्ञा स्पर्श करू शकत नाहीत आणि त्या बाहेरच राहतात.” අථ [Pg.128] ඛො රගා මාරධීතා භගවතො සන්තිකෙ ගාථාය අජ්ඣභාසි – त्यानंतर मारकन्या रगाने भगवंतांच्या सन्निध गाथेने म्हटले – ‘‘අච්ඡෙජ්ජ තණ්හං ගණසඞ්ඝචාරී,අද්ධා චරිස්සන්ති බහූ ච සද්ධා; බහුං වතායං ජනතං අනොකො,අච්ඡෙජ්ජ නෙස්සති මච්චුරාජස්ස පාර’’න්ති. “तृष्णेचा छेद करून, संघामध्ये विहार करणारे हे (भगवान) नक्कीच अनेक श्रद्धाळू लोकांना सोबत घेऊन चालतील. आसक्तीरहित असलेले हे भगवान अनेक लोकांना मृत्यूराजाच्या (माराच्या) हातातून सोडवून निर्वाणाच्या पलीकडच्या तीरावर नेतील.” ‘‘නයන්ති වෙ මහාවීරා, සද්ධම්මෙන තථාගතා; ධම්මෙන නයමානානං, කා උසූයා විජානත’’න්ති. “महान वीर असलेले तथागत सद्धम्माद्वारे लोकांना सन्मार्गावर नेतात. धम्माद्वारे नेले जात असताना, जाणकार (ज्ञानी) लोकांनी मत्सर का करावा?” අථ ඛො තණ්හා ච අරති ච රගා ච මාරධීතරො යෙන මාරො පාපිමා තෙනුපසඞ්කමිංසු. අද්දසා ඛො මාරො පාපිමා තණ්හඤ්ච අරතිඤ්ච රගඤ්ච මාරධීතරො දූරතොව ආගච්ඡන්තියො. දිස්වාන ගාථාහි අජ්ඣභාසි – त्यानंतर तण्हा, अरती आणि रगा या मारकन्या पापी माराकडे गेल्या. पापी माराने तण्हा, अरती आणि रगा या मारकन्यांना दुरूनच येताना पाहिले. त्यांना पाहून त्याने गाथांनी म्हटले – ‘‘බාලා කුමුදනාළෙහි, පබ්බතං අභිමත්ථථ ; ගිරිං නඛෙන ඛනථ, අයො දන්තෙහි ඛාදථ. “मूर्खांनो! तुम्ही कमळाच्या देठांनी पर्वताला मारण्याचा प्रयत्न करत आहात; नखांनी डोंगर खणत आहात आणि दातांनी लोखंड चावत आहात. ‘‘සෙලංව සිරසූහච්ච, පාතාලෙ ගාධමෙසථ; ඛාණුංව උරසාසජ්ජ, නිබ්බිජ්ජාපෙථ ගොතමා’’ති. “जणू काही डोक्यावर मोठा खडक घेऊन तुम्ही अथांग डोहात आधार शोधत आहात; किंवा छातीवर लाकडी खुंटा मारून घेत आहात. म्हणून गौतम बुद्धांपासून निराश होऊन दूर व्हा.” ‘‘දද්දල්ලමානා ආගඤ්ඡුං, තණ්හා ච අරතී රගා; තා තත්ථ පනුදී සත්ථා, තූලං භට්ඨංව මාලුතො’’ති. “तण्हा, अरती आणि रगा या अत्यंत देदीप्यमान रूप घेऊन आल्या होत्या; परंतु शास्त्यांनी (बुद्धांनी) त्यांना तिथून असे उडवून लावले, जसे वारा कापसाचा सुटलेला पुंजका उडवून लावतो.” තතියො වග්ගො. तिसरा वर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) याप्रमाणे आहे – සම්බහුලා සමිද්ධි ච, ගොධිකං සත්තවස්සානි; ධීතරං දෙසිතං බුද්ධ, සෙට්ඨෙන ඉමං මාරපඤ්චකන්ති. संबहुला, समिद्धी, गोधिक, सत्तवस्सानी (सात वर्षे) आणि धीतर (कन्या) – हे मारपंचक बुद्धश्रेष्ठांनी देशित केले आहे. මාරසංයුත්තං සමත්තං. मारसंयुत्त समाप्त. 5. භික්ඛුනීසංයුත්තං ५. भिक्खुणीसंयुत्त 1. ආළවිකාසුත්තං १. आळविका सुत्त 162. එවං [Pg.129] මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. අථ ඛො ආළවිකා භික්ඛුනී පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය සාවත්ථිං පිණ්ඩාය පාවිසි. සාවත්ථියං පිණ්ඩාය චරිත්වා පච්ඡාභත්තං පිණ්ඩපාතපටික්කන්තා යෙන අන්ධවනං තෙනුපසඞ්කමි විවෙකත්ථිනී. අථ ඛො මාරො පාපිමා ආළවිකාය භික්ඛුනියා භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසං උප්පාදෙතුකාමො විවෙකම්හා චාවෙතුකාමො යෙන ආළවිකා භික්ඛුනී තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආළවිකං භික්ඛුනිං ගාථාය අජ්ඣභාසි – १६२. असे मी ऐकले आहे – एक वेळ भगवान श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेव्हा आळविका भिक्खुणी सकाळच्या वेळी चिवर परिधान करून, पात्र व चिवर घेऊन श्रावस्तीमध्ये भिक्षेसाठी प्रविष्ट झाली. श्रावस्तीमध्ये भिक्षाटन करून, भोजनोत्तर भिक्षेहून परतल्यावर, ती एकांताच्या इच्छेने अंधवनाकडे गेली. तेव्हा पापी माराला आळविका भिक्खुणीच्या मनात भय, थरकाप आणि अंगावर काटा उभा करायचा होता, तिला एकांतापासून विचलित करायचे होते. म्हणून तो आळविका भिक्खुणीजवळ आला आणि जवळ येऊन त्याने आळविका भिक्खुणीला गाथेने म्हटले – ‘‘නත්ථි නිස්සරණං ලොකෙ, කිං විවෙකෙන කාහසි; භුඤ්ජස්සු කාමරතියො, මාහු පච්ඡානුතාපිනී’’ති. “जगात निसरण (मुक्ती) नाही, एकांताने तू काय करणार आहेस? कामसुखांचा उपभोग घे, नंतर पश्चात्ताप करण्याची वेळ येऊ देऊ नकोस.” අථ ඛො ආළවිකාය භික්ඛුනියා එතදහොසි – ‘‘කො නු ඛ්වායං මනුස්සො වා අමනුස්සො වා ගාථං භාසතී’’ති? අථ ඛො ආළවිකාය භික්ඛුනියා එතදහොසි – ‘‘මාරො ඛො අයං පාපිමා මම භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසං උප්පාදෙතුකාමො විවෙකම්හා චාවෙතුකාමො ගාථං භාසතී’’ති. අථ ඛො ආළවිකා භික්ඛුනී ‘‘මාරො අයං පාපිමා’’ ඉති විදිත්වා මාරං පාපිමන්තං ගාථාහි පච්චභාසි – तेव्हा आळविका भिक्खुणीच्या मनात असा विचार आला – “हा गाथा म्हणणारा कोण असावा, मनुष्य की अमनुष्य?” त्यानंतर आळविका भिक्खुणीला असे वाटले – “हा पापी मारच आहे, जो माझ्या मनात भय, थरकाप आणि अंगावर काटा उभा करू इच्छितो आणि मला एकांतातून विचलित करू इच्छितो, म्हणूनच तो ही गाथा म्हणत आहे.” मग आळविका भिक्खुणीने “हा पापी मार आहे” असे जाणून पापी माराला गाथांनी प्रत्युत्तर दिले – ‘‘අත්ථි නිස්සරණං ලොකෙ, පඤ්ඤාය මෙ සුඵුස්සිතං ; පමත්තබන්ධු පාපිම, න ත්වං ජානාසි තං පදං. “या जगात (संसारातून) सुटकेचा मार्ग (निसरण) अस्तित्वात आहे, ज्याचा मी प्रज्ञेने चांगला अनुभव घेतला आहे. हे पापी मारा, प्रमाद्यांच्या (सावध नसलेल्यांच्या) मित्रा! तुला त्या पदाविषयी (निर्वाणाविषयी) काहीच माहिती नाही. ‘‘සත්තිසූලූපමා කාමා, ඛන්ධාසං අධිකුට්ටනා; යං ත්වං කාමරතිං බ්රූසි, අරති මය්හ සා අහූ’’ති. “कामभोग हे भाले आणि शूलांसारखे तीक्ष्ण आहेत, आणि हे (पंच)स्कंध त्यांच्यासाठी खाटीकखान्यातील लाकडी ठोकळ्यासारखे आहेत. ज्या कामभोगांतील आनंदाविषयी तू बोलत आहेस, तो आनंद माझ्यासाठी आता निरानंद (अरती) झाला आहे.” අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං ආළවිකා භික්ඛුනී’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. तेव्हा “आळविका भिक्खुणीने मला ओळखले आहे” हे जाणून पापी मार दुःखी व खिन्न होऊन तिथेच अंतर्धान पावला. 2. සොමාසුත්තං २. सोमा सुत्त 163. සාවත්ථිනිදානං[Pg.130]. අථ ඛො සොමා භික්ඛුනී පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය සාවත්ථිං පිණ්ඩාය පාවිසි. සාවත්ථියං පිණ්ඩාය චරිත්වා පච්ඡාභත්තං පිණ්ඩපාතපටික්කන්තා යෙන අන්ධවනං තෙනුපසඞ්කමි දිවාවිහාරාය. අන්ධවනං අජ්ඣොගාහෙත්වා අඤ්ඤතරස්මිං රුක්ඛමූලෙ දිවාවිහාරං නිසීදි. අථ ඛො මාරො පාපිමා සොමාය භික්ඛුනියා භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසං උප්පාදෙතුකාමො සමාධිම්හා චාවෙතුකාමො යෙන සොමා භික්ඛුනී තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා සොමං භික්ඛුනිං ගාථාය අජ්ඣභාසි – १६३. श्रावस्ती येथील प्रसंग. तेव्हा सोमा भिक्खुणीने सकाळच्या वेळी चीवर परिधान करून, पात्र व संघटी घेऊन श्रावस्तीमध्ये भिक्षेसाठी प्रवेश केला. श्रावस्तीत भिक्षाटन करून, भोजनोत्तर भिक्षेहून परतल्यावर त्या दुपारच्या विश्रांतीसाठी (दिवाविहारासाठी) अंधवनाकडे गेल्या. अंधवनात प्रवेश करून त्या एका झाडाच्या मुळाशी दुपारच्या विश्रांतीसाठी बसल्या. तेव्हा पापी माराने सोमा भिक्खुणीच्या मनात भय, थरकाप आणि अंगावर काटा उभा करण्याच्या आणि तिला समाधीपासून विचलित करण्याच्या उद्देशाने, जेथे सोमा भिक्खुणी होत्या तेथे तो गेला; आणि जवळ जाऊन त्याने सोमा भिक्खुणीला गाथेने म्हटले – ‘‘යං තං ඉසීහි පත්තබ්බං, ඨානං දුරභිසම්භවං; න තං ද්වඞ්ගුලපඤ්ඤාය, සක්කා පප්පොතුමිත්ථියා’’ති. “ऋषी-मुनींनी प्राप्त केलेले ते अत्यंत कठीण असे (अरिहंत) पद, दोन बोटांच्या अल्प प्रज्ञेच्या स्त्रीला प्राप्त करणे शक्य नाही.” අථ ඛො සොමාය භික්ඛුනියා එතදහොසි – ‘‘කො නු ඛ්වායං මනුස්සො වා අමනුස්සො වා ගාථං භාසතී’’ති? අථ ඛො සොමාය භික්ඛුනියා එතදහොසි – ‘‘මාරො ඛො අයං පාපිමා මම භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසං උප්පාදෙතුකාමො සමාධිම්හා චාවෙතුකාමො ගාථං භාසතී’’ති. අථ ඛො සොමා භික්ඛුනී ‘‘මාරො අයං පාපිමා’’ ඉති විදිත්වා මාරං පාපිමන්තං ගාථාහි පච්චභාසි – तेव्हा सोमा भिक्खुणीच्या मनात असा विचार आला – “हा गाथा म्हणणारा कोण असावा, मनुष्य की अमनुष्य?” त्यानंतर सोमा भिक्खुणीला असे वाटले – “हा पापी मारच आहे, जो माझ्या मनात भय, थरकाप आणि अंगावर काटा उभा करू इच्छितो आणि मला समाधीपासून विचलित करू इच्छितो, म्हणूनच तो ही गाथा म्हणत आहे.” मग सोमा भिक्खुणीने “हा पापी मार आहे” असे जाणून पापी माराला गाथांनी प्रत्युत्तर दिले – ‘‘ඉත්ථිභාවො කිං කයිරා, චිත්තම්හි සුසමාහිතෙ; ඤාණම්හි වත්තමානම්හි, සම්මා ධම්මං විපස්සතො. “जेव्हा चित्त चांगल्या प्रकारे समाहित (एकाग्र) असते, ज्ञान प्रवृत्त होत असते आणि धम्माचे योग्य प्रकारे विपश्यन घडत असते, तेव्हा स्त्रीभाव काय अडथळा आणू शकणार? ‘‘යස්ස නූන සියා එවං, ඉත්ථාහං පුරිසොති වා; කිඤ්චි වා පන අඤ්ඤස්මි, තං මාරො වත්තුමරහතී’’ති. “ज्याच्या मनात ‘मी स्त्री आहे’ किंवा ‘मी पुरुष आहे’ किंवा ‘मी काहीतरी वेगळा आहे’ असा (तृष्णा, मान आणि दृष्टीमुळे) विचार येतो, त्यालाच मार असे बोलण्यास पात्र आहे.” අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං සොමා භික්ඛුනී’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. तेव्हा पापी मार “सोमा भिक्खुणीने मला ओळखले आहे” हे जाणून दुःखी व खिन्न होऊन तिथेच अंतर्धान पावला. 3. කිසාගොතමීසුත්තං ३. किसागोतमी सुत्त 164. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො කිසාගොතමී භික්ඛුනී පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය සාවත්ථිං පිණ්ඩාය පාවිසි. සාවත්ථියං පිණ්ඩාය චරිත්වා පච්ඡාභත්තං පිණ්ඩපාතපටික්කන්තා යෙන අන්ධවනං තෙනුපසඞ්කමි[Pg.131], දිවාවිහාරාය. අන්ධවනං අජ්ඣොගාහෙත්වා අඤ්ඤතරස්මිං රුක්ඛමූලෙ දිවාවිහාරං නිසීදි. අථ ඛො මාරො පාපිමා කිසාගොතමියා භික්ඛුනියා භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසං උප්පාදෙතුකාමො සමාධිම්හා චාවෙතුකාමො යෙන කිසාගොතමී භික්ඛුනී තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා කිසාගොතමිං භික්ඛුනිං ගාථාය අජ්ඣභාසි – १६४. श्रावस्ती येथील प्रसंग. तेव्हा किसागोतमी भिक्खुणीने सकाळच्या वेळी चीवर परिधान करून, पात्र व संघटी घेऊन श्रावस्तीमध्ये भिक्षेसाठी प्रवेश केला. श्रावस्तीत भिक्षाटन करून, भोजनोत्तर भिक्षेहून परतल्यावर त्या दुपारच्या विश्रांतीसाठी अंधवनाकडे गेल्या. अंधवनात प्रवेश करून त्या एका झाडाच्या मुळाशी दुपारच्या विश्रांतीसाठी बसल्या. तेव्हा पापी माराने किसागोतमी भिक्खुणीच्या मनात भय, थरकाप आणि अंगावर काटा उभा करण्याच्या आणि तिला समाधीपासून विचलित करण्याच्या उद्देशाने, जेथे किसागोतमी भिक्खुणी होत्या तेथे तो गेला; आणि जवळ जाऊन त्याने किसागोतमी भिक्खुणीला गाथेने म्हटले – ‘‘කිං නු ත්වං මතපුත්තාව, එකමාසි රුදම්මුඛී; වනමජ්ඣගතා එකා, පුරිසං නු ගවෙසසී’’ති. “पुत्र मरण पावलेल्या स्त्रीप्रमाणे तू रडवेला चेहरा करून एकटीच का बसली आहेस? या घनदाट अरण्यात एकटीच येऊन तू कोण्या पुरुषाचा शोध घेत आहेस का?” අථ ඛො කිසාගොතමියා භික්ඛුනියා එතදහොසි – ‘‘කො නු ඛ්වායං මනුස්සො වා අමනුස්සො වා ගාථං භාසතී’’ති? අථ ඛො කිසාගොතමියා භික්ඛුනියා එතදහොසි – ‘‘මාරො ඛො අයං පාපිමා මම භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසං උප්පාදෙතුකාමො සමාධිම්හා චාවෙතුකාමො ගාථං භාසතී’’ති. तेव्हा किसागोतमी भिक्खुणीच्या मनात असा विचार आला – “हा गाथा म्हणणारा कोण असावा, मनुष्य की अमनुष्य?” त्यानंतर किसागोतमी भिक्खुणीला असे वाटले – “हा पापी मारच आहे, जो माझ्या मनात भय, थरकाप आणि अंगावर काटा उभा करू इच्छितो आणि मला समाधीपासून विचलित करू इच्छितो, म्हणूनच तो ही गाथा म्हणत आहे.” අථ ඛො කිසාගොතමී භික්ඛුනී ‘‘මාරො අයං පාපිමා’’ ඉති විදිත්වා මාරං පාපිමන්තං ගාථාහි පච්චභාසි – मग किसागोतमी भिक्खुणीने “हा पापी मार आहे” असे जाणून पापी माराला गाथांनी प्रत्युत्तर दिले – ‘‘අච්චන්තං මතපුත්තාම්හි, පුරිසා එතදන්තිකා; න සොචාමි න රොදාමි, න තං භායාමි ආවුසො. “माझ्या पुत्रांच्या मृत्यूचा काळ आता पूर्णपणे निघून गेला आहे (मी त्या दुःखाच्या पलीकडे गेले आहे), आणि पुरुषांचा शोध घेणेही आता संपले आहे. हे मित्रा (मारा)! मी आता शोक करत नाही, रडत नाही आणि तुला मुळीच घाबरत नाही. ‘‘සබ්බත්ථ විහතා නන්දී, තමොක්ඛන්ධො පදාලිතො; ජෙත්වාන මච්චුනො සෙනං, විහරාමි අනාසවා’’ති. “सर्व ठिकाणी (सर्व अस्तित्वात) माझी तृष्णा नष्ट झाली आहे, अज्ञानाचा अंधकार (तमोस्कंध) छिन्नभिन्न झाला आहे. मृत्यूच्या सैन्यावर विजय मिळवून मी आता आसवरहित (अनास्रव) होऊन विहरत आहे.” අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං කිසාගොතමී භික්ඛුනී’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. तेव्हा “किसागोतमी भिक्खुणीने मला ओळखले आहे” हे जाणून पापी मार दुःखी व खिन्न होऊन तिथेच अंतर्धान पावला. 4. විජයාසුත්තං ४. विजया सुत्त 165. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො විජයා භික්ඛුනී පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා…පෙ… අඤ්ඤතරස්මිං රුක්ඛමූලෙ දිවාවිහාරං නිසීදි. අථ ඛො මාරො පාපිමා විජයාය භික්ඛුනියා භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසං උප්පාදෙතුකාමො සමාධිම්හා චාවෙතුකාමො යෙන විජයා භික්ඛුනී තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා විජයං භික්ඛුනිං ගාථාය අජ්ඣභාසි – १६५. श्रावस्ती येथील प्रसंग. तेव्हा विजया भिक्खुणीने सकाळच्या वेळी चीवर परिधान करून...पे०... एका झाडाच्या मुळाशी दुपारच्या विश्रांतीसाठी बसल्या. तेव्हा पापी माराने विजया भिक्खुणीच्या मनात भय, थरकाप आणि अंगावर काटा उभा करण्याच्या आणि तिला समाधीपासून विचलित करण्याच्या उद्देशाने, जेथे विजया भिक्खुणी होत्या तेथे तो गेला; आणि जवळ जाऊन त्याने विजया भिक्खुणीला गाथेने म्हटले – ‘‘දහරා [Pg.132] ත්වං රූපවතී, අහඤ්ච දහරො සුසු; පඤ්චඞ්ගිකෙන තුරියෙන, එහය්යෙභිරමාමසෙ’’ති. “तू तरुण आणि रूपवती आहेस, आणि मीसुद्धा तरुण व नवयुवक आहे. ये, हे आदरणीय स्त्री! आपण पाच प्रकारच्या वाद्यांच्या संगीतासह एकत्र येऊन आनंद उपभोगूया.” අථ ඛො විජයාය භික්ඛුනියා එතදහොසි – ‘‘කො නු ඛ්වායං මනුස්සො වා අමනුස්සො වා ගාථං භාසතී’’ති? අථ ඛො විජයාය භික්ඛුනියා එතදහොසි – ‘‘මාරො ඛො අයං පාපිමා මම භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසං උප්පාදෙතුකාමො සමාධිම්හා චාවෙතුකාමො ගාථං භාසතී’’ති. අථ ඛො විජයා භික්ඛුනී ‘‘මාරො අයං පාපිමා’’ ඉති විදිත්වා මාරං පාපිමන්තං ගාථාහි පච්චභාසි – तेव्हा विजया भिक्खुणीच्या मनात असा विचार आला – “हा गाथा म्हणणारा कोण असावा, मनुष्य की अमनुष्य?” त्यानंतर विजया भिक्खुणीला असे वाटले – “हा पापी मारच आहे, जो माझ्या मनात भय, थरकाप आणि अंगावर काटा उभा करू इच्छितो आणि मला समाधीपासून विचलित करू इच्छितो, म्हणूनच तो ही गाथा म्हणत आहे.” मग विजया भिक्खुणीने “हा पापी मार आहे” असे जाणून पापी माराला गाथांनी प्रत्युत्तर दिले – ‘‘රූපා සද්දා රසා ගන්ධා, ඵොට්ඨබ්බා ච මනොරමා; නිය්යාතයාමි තුය්හෙව, මාර නාහං තෙනත්ථිකා. “मनोरम रूप, शब्द, रस, गंध आणि स्पर्श हे सर्व मी तुलाच परत करते. हे मारा! मला त्यांची काहीच गरज नाही. ‘‘ඉමිනා පූතිකායෙන, භින්දනෙන පභඞ්ගුනා; අට්ටීයාමි හරායාමි, කාමතණ්හා සමූහතා. “या सडणाऱ्या, नाशवंत आणि क्षणभंगुर शरीराचा मला कंटाळा आला आहे आणि लाज वाटते. माझी कामतृष्णा समूळ नष्ट झाली आहे. ‘‘යෙ ච රූපූපගා සත්තා, යෙ ච අරූපට්ඨායිනො ; යා ච සන්තා සමාපත්ති, සබ්බත්ථ විහතො තමො’’ති. “जे प्राणी रूपलोकात उत्पन्न झाले आहेत, जे अरूपलोकात स्थित आहेत, आणि ज्या शांत समापत्ती आहेत, त्या सर्व ठिकाणी माझा अज्ञानाचा अंधकार नष्ट झाला आहे.” අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං විජයා භික්ඛුනී’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. तेव्हा “विजया भिक्खुणीने मला ओळखले आहे” हे जाणून पापी मार दुःखी व खिन्न होऊन तिथेच अंतर्धान पावला. 5. උප්පලවණ්ණාසුත්තං ५. उप्पलवण्णा सुत्त 166. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො උප්පලවණ්ණා භික්ඛුනී පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා…පෙ… අඤ්ඤතරස්මිං සුපුප්ඵිතසාලරුක්ඛමූලෙ අට්ඨාසි. අථ ඛො මාරො පාපිමා උප්පලවණ්ණාය භික්ඛුනියා භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසං උප්පාදෙතුකාමො සමාධිම්හා චාවෙතුකාමො යෙන උප්පලවණ්ණා භික්ඛුනී තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා උප්පලවණ්ණං භික්ඛුනිං ගාථාය අජ්ඣභාසි – १६६. श्रावस्ती येथील निदान. त्यानंतर, उप्पलवण्णा भिक्खुणीने सकाळच्या वेळी चीवर परिधान करून... एका पूर्णपणे बहरलेल्या साल वृक्षाच्या खाली त्या उभ्या राहिल्या. त्यानंतर पापी मार याने उप्पलवण्णा भिक्खुणीच्या मनात भय, थरकाप आणि अंगावर काटा उभा करण्याची इच्छा धरून, तसेच तिला समाधीपासून विचलित करण्याच्या उद्देशाने, जेथे उप्पलवण्णा भिक्खुणी होत्या तेथे तो गेला; आणि जवळ जाऊन त्याने उप्पलवण्णा भिक्खुणीला गाथेने संबोधित केले – ‘‘සුපුප්ඵිතග්ගං උපගම්ම භික්ඛුනි,එකා තුවං තිට්ඨසි සාලමූලෙ; න චත්ථි තෙ දුතියා වණ්ණධාතු,බාලෙ න ත්වං භායසි ධුත්තකාන’’න්ති. "हे भिक्खुणी! पूर्णपणे बहरलेल्या साल वृक्षाच्या खाली तू एकटीच उभी आहेस. तुझ्या सौंदर्याची बरोबरी करणारी दुसरी कोणीही सोबत नाही. हे मूर्ख मुली, तुला लफंग्यांची भीती वाटत नाही का?" අථ [Pg.133] ඛො උප්පලවණ්ණාය භික්ඛුනියා එතදහොසි – ‘‘කො නු ඛ්වායං මනුස්සො වා අමනුස්සො වා ගාථං භාසතී’’ති? අථ ඛො උප්පලවණ්ණාය භික්ඛුනියා එතදහොසි – ‘‘මාරො ඛො අයං පාපිමා මම භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසං උප්පාදෙතුකාමො සමාධිම්හා චාවෙතුකාමො ගාථං භාසතී’’ති. අථ ඛො උප්පලවණ්ණා භික්ඛුනී ‘‘මාරො අයං පාපිමා’’ ඉති විදිත්වා මාරං පාපිමන්තං ගාථාහි පච්චභාසි – त्यानंतर उप्पलवण्णा भिक्खुणीच्या मनात असा विचार आला – 'हा गाथा म्हणणारा कोण मनुष्य आहे की अमनुष्य?' त्यानंतर उप्पलवण्णा भिक्खुणीच्या मनात विचार आला – 'हा पापी मारच आहे, जो माझ्या मनात भय, थरकाप आणि अंगावर काटा उभा करू इच्छितो आणि समाधीपासून विचलित करण्यासाठी ही गाथा म्हणत आहे.' त्यानंतर उप्पलवण्णा भिक्खुणीने 'हा पापी मार आहे' हे ओळखून, पापी माराला गाथांनी प्रत्युत्तर दिले – ‘‘සතං සහස්සානිපි ධුත්තකානං,ඉධාගතා තාදිසකා භවෙය්යුං; ලොමං න ඉඤ්ජාමි න සන්තසාමි,න මාර භායාමි තමෙකිකාපි. "तुझ्यासारखे शेकडो-हजारो लफंगे जरी येथे आले, तरी माझ्या अंगाचा एक केसही हलणार नाही आणि मी घाबरणार नाही. हे मारा! मी एकटी असले तरी तुला मुळीच भीत नाही. ‘‘එසා අන්තරධායාමි, කුච්ඡිං වා පවිසාමි තෙ; පඛුමන්තරිකායම්පි, තිට්ඨන්තිං මං න දක්ඛසි. "मी आता अदृश्य होऊ शकते किंवा तुझ्या उदरात प्रवेश करू शकते; अथवा तुझ्या पापण्यांच्या मध्यभागी जरी मी उभी राहिले, तरी तू मला पाहू शकणार नाहीस. ‘‘චිත්තස්මිං වසීභූතාම්හි, ඉද්ධිපාදා සුභාවිතා; සබ්බබන්ධනමුත්තාම්හි, න තං භායාමි ආවුසො’’ති. "मी माझ्या मनावर पूर्ण ताबा मिळवला आहे, ऋद्धिपाद चांगल्या प्रकारे विकसित केले आहेत; मी सर्व बंधनांतून मुक्त झाले आहे. हे मित्रा, मी तुला भीत नाही." අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං උප්පලවණ්ණා භික්ඛුනී’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. त्यानंतर 'उप्पलवण्णा भिक्खुणीने मला ओळखले आहे' हे जाणून पापी मार दुःखी व खिन्न होऊन तेथेच अंतर्धान पावला. 6. චාලාසුත්තං ६. चाला सुत्त 167. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො චාලා භික්ඛුනී පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා…පෙ… අඤ්ඤතරස්මිං රුක්ඛමූලෙ දිවාවිහාරං නිසීදි. අථ ඛො මාරො පාපිමා යෙන චාලා භික්ඛුනී තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා චාලං භික්ඛුනිං එතදවොච – ‘‘කිං නු ත්වං, භික්ඛුනි, න රොචෙසී’’ති? ‘‘ජාතිං ඛ්වාහං, ආවුසො, න රොචෙමී’’ති. १६७. श्रावस्ती येथील निदान. त्यानंतर, चाला भिक्खुणीने सकाळच्या वेळी चीवर परिधान करून... एका वृक्षाच्या खाली दिवसाच्या विहारासाठी त्या बसल्या. त्यानंतर पापी मार जेथे चाला भिक्खुणी होत्या तेथे गेला; आणि जवळ जाऊन त्याने चाला भिक्खुणीला असे म्हटले – 'हे भिक्खुणी, तुला काय आवडत नाही?' 'हे मित्रा, मला जन्म आवडत नाही.' ‘‘කිං නු ජාතිං න රොචෙසි, ජාතො කාමානි භුඤ්ජති; කො නු තං ඉදමාදපයි, ජාතිං මා රොච භික්ඛුනී’’ති. "तू जन्माला का नापसंत करतेस? जन्माला आलेला मनुष्य कामभोगांचा उपभोग घेतो. तुला हे कोणी शिकवले की, 'हे भिक्खुणी, जन्माचा स्वीकार करू नकोस'?" ‘‘ජාතස්ස මරණං හොති, ජාතො දුක්ඛානි ඵුස්සති ; බන්ධං වධං පරික්ලෙසං, තස්මා ජාතිං න රොචයෙ. "जन्माला आलेल्याला मृत्यू ठरलेला असतो; जन्माला आलेला मनुष्य दुःख भोगतो – बंधन, वध आणि विविध क्लेश; म्हणूनच मी जन्माला नापसंत करते. ‘‘බුද්ධො [Pg.134] ධම්මමදෙසෙසි, ජාතියා සමතික්කමං; සබ්බදුක්ඛප්පහානාය, සො මං සච්චෙ නිවෙසයි. "बुद्धांनी जन्माच्या पलीकडे जाण्याचा धम्म उपदेशिला आहे; सर्व दुःखांच्या नाशासाठी त्यांनी मला परम सत्यात स्थापित केले आहे. ‘‘යෙ ච රූපූපගා සත්තා, යෙ ච අරූපට්ඨායිනො; නිරොධං අප්පජානන්තා, ආගන්තාරො පුනබ්භව’’න්ති. "जे प्राणी रूपलोकात उत्पन्न होतात आणि जे अरूपलोकात राहतात, ते निरोधाला न जाणल्यामुळे पुन्हा पुन्हा पुनर्जन्माला प्राप्त होतात." අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං චාලා භික්ඛුනී’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. त्यानंतर 'चाला भिक्खुणीने मला ओळखले आहे' हे जाणून पापी मार दुःखी व खिन्न होऊन तेथेच अंतर्धान पावला. 7. උපචාලාසුත්තං ७. उपचाला सुत्त 168. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො උපචාලා භික්ඛුනී පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා…පෙ… අඤ්ඤතරස්මිං රුක්ඛමූලෙ දිවාවිහාරං නිසීදි. අථ ඛො මාරො පාපිමා යෙන උපචාලා භික්ඛුනී තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා උපචාලං භික්ඛුනිං එතදවොච – ‘‘කත්ථ නු ත්වං, භික්ඛුනි, උප්පජ්ජිතුකාමා’’ති? ‘‘න ඛ්වාහං, ආවුසො, කත්ථචි උප්පජ්ජිතුකාමා’’ති. १६८. श्रावस्ती येथील निदान. त्यानंतर, उपचाला भिक्खुणीने सकाळच्या वेळी चीवर परिधान करून... एका वृक्षाच्या खाली दिवसाच्या विहारासाठी त्या बसल्या. त्यानंतर पापी मार जेथे उपचाला भिक्खुणी होत्या तेथे गेला; आणि जवळ जाऊन त्याने उपचाला भिक्खुणीला असे म्हटले – 'हे भिक्खुणी, तुला कोठे उत्पन्न होण्याची इच्छा आहे?' 'हे मित्रा, मला कोठेही उत्पन्न होण्याची इच्छा नाही.' ‘‘තාවතිංසා ච යාමා ච, තුසිතා චාපි දෙවතා; නිම්මානරතිනො දෙවා, යෙ දෙවා වසවත්තිනො; තත්ථ චිත්තං පණිධෙහි, රතිං පච්චනුභොස්සසී’’ති. "तावतींस, याम आणि तुषित लोकातील देव, तसेच निर्माणरती देव आणि वसवत्ती देव आहेत; तेथे आपले चित्त लाव, तुला तेथे आनंदाचा उपभोग घेता येईल." ‘‘තාවතිංසා ච යාමා ච, තුසිතා චාපි දෙවතා; නිම්මානරතිනො දෙවා, යෙ දෙවා වසවත්තිනො; කාමබන්ධනබද්ධා තෙ, එන්ති මාරවසං පුන. "तावतींस, याम आणि तुषित लोकातील देव, तसेच निर्माणरती देव आणि वसवत्ती देव; हे सर्व कामभोगांच्या बंधनात बांधलेले असून पुन्हा माराच्याच वशमध्ये जातात. ‘‘සබ්බො ආදීපිතො ලොකො, සබ්බො ලොකො පධූපිතො; සබ්බො පජ්ජලිතො ලොකො, සබ්බො ලොකො පකම්පිතො. "हा संपूर्ण लोक पेटलेला आहे, संपूर्ण लोक धगधगत आहे; संपूर्ण लोक प्रज्वलित आहे, संपूर्ण लोक कंपित होत आहे. ‘‘අකම්පිතං අපජ්ජලිතං, අපුථුජ්ජනසෙවිතං; අගති යත්ථ මාරස්ස, තත්ථ මෙ නිරතො මනො’’ති. "जे अकंपित आहे, अप्रज्वलित आहे, ज्याचे सामान्य लोक सेवन करत नाहीत, आणि जेथे माराचा प्रवेश नाही; अशा ठिकाणी माझे मन रमते." අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං උපචාලා භික්ඛුනී’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. त्यानंतर 'उपचाला भिक्खुणीने मला ओळखले आहे' हे जाणून पापी मार दुःखी व खिन्न होऊन तेथेच अंतर्धान पावला. 8. සීසුපචාලාසුත්තං ८. सीसुपचाला सुत्त 169. සාවත්ථිනිදානං[Pg.135]. අථ ඛො සීසුපචාලා භික්ඛුනී පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා …පෙ… අඤ්ඤතරස්මිං රුක්ඛමූලෙ දිවාවිහාරං නිසීදි. අථ ඛො මාරො පාපිමා යෙන සීසුපචාලා භික්ඛුනී තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා සීසුපචාලං භික්ඛුනිං එතදවොච – ‘‘කස්ස නු ත්වං, භික්ඛුනි, පාසණ්ඩං රොචෙසී’’ති? ‘‘න ඛ්වාහං, ආවුසො, කස්සචි පාසණ්ඩං රොචෙමී’’ති. १६९. श्रावस्ती येथील निदान. त्यानंतर, सीसुपचाला भिक्खुणीने सकाळच्या वेळी चीवर परिधान करून... एका वृक्षाच्या खाली दिवसाच्या विहारासाठी त्या बसल्या. त्यानंतर पापी मार जेथे सीसुपचाला भिक्खुणी होत्या तेथे गेला; जवळ जाऊन त्याने सीसुपचाला भिक्खुणीला असे म्हटले – 'हे भिक्खुणी, तू कोणत्या पंथाचा स्वीकार करतेस?' 'हे मित्रा, मी कोणत्याही पंथाचा स्वीकार करत नाही.' ‘‘කං නු උද්දිස්ස මුණ්ඩාසි, සමණී විය දිස්සසි; න ච රොචෙසි පාසණ්ඩං, කිමිව චරසි මොමූහා’’ති. "कोणाला उद्देशून तू मुंडण केले आहेस? तू श्रमणीसारखी दिसतेस, तरीही कोणत्याही पंथाचा स्वीकार करत नाहीस; मग तू अशी संभ्रमित असल्यासारखी का फिरतेस?" ‘‘ඉතො බහිද්ධා පාසණ්ඩා, දිට්ඨීසු පසීදන්ති තෙ; න තෙසං ධම්මං රොචෙමි, තෙ ධම්මස්ස අකොවිදා. "या धम्माच्या बाहेर जे पंथ आहेत, ते विविध मतांमध्ये अडकलेले आहेत. मला त्यांचा धम्म मान्य नाही, कारण ते धम्मामध्ये कुशल नाहीत. ‘‘අත්ථි සක්යකුලෙ ජාතො, බුද්ධො අප්පටිපුග්ගලො; සබ්බාභිභූ මාරනුදො, සබ්බත්ථමපරාජිතො. "शाक्य कुळात जन्मलेले, अद्वितीय, सर्वांवर विजय मिळवणारे, माराचा पराभव करणारे, सर्वत्र अजिंक्य असणारे बुद्ध आहेत. ‘‘සබ්බත්ථ මුත්තො අසිතො, සබ්බං පස්සති චක්ඛුමා; සබ්බකම්මක්ඛයං පත්තො, විමුත්තො උපධිසඞ්ඛයෙ; සො මය්හං භගවා සත්ථා, තස්ස රොචෙමි සාසන’’න්ති. "ते सर्व बंधनांतून मुक्त, कशावरही अवलंबून नसलेले, सर्व काही पाहणारे ज्ञानचक्षू संपन्न आहेत. सर्व कर्मांच्या क्षयाला प्राप्त झालेले आणि उपाधींच्या नाशाने मुक्त झालेले आहेत. ते भगवान माझे शास्ता आहेत आणि मला त्यांचाच उपदेश प्रिय आहे." අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං සීසුපචාලා භික්ඛුනී’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. त्यानंतर 'सीसुपचाला भिक्खुणीने मला ओळखले आहे' हे जाणून पापी मार दुःखी व खिन्न होऊन तेथेच अंतर्धान पावला. 9. සෙලාසුත්තං ९. सेला सुत्त 170. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො සෙලා භික්ඛුනී පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා…පෙ… අඤ්ඤතරස්මිං රුක්ඛමූලෙ දිවාවිහාරං නිසීදි. අථ ඛො මාරො පාපිමා සෙලාය භික්ඛුනියා භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසං උප්පාදෙතුකාමො…පෙ… සෙලං භික්ඛුනිං ගාථාය අජ්ඣභාසි – १७०. श्रावस्ती येथील निदान. त्यानंतर, सेला भिक्खुणीने सकाळच्या वेळी चीवर परिधान करून... एका वृक्षाच्या खाली दिवसाच्या विहारासाठी त्या बसल्या. त्यानंतर पापी मार याने सेला भिक्खुणीच्या मनात भय, थरकाप आणि अंगावर काटा उभा करण्याची इच्छा धरून... सेला भिक्खुणीला गाथेने संबोधित केले – ‘‘කෙනිදං පකතං බිම්බං, ක්වනු බිම්බස්ස කාරකො; ක්වනු බිම්බං සමුප්පන්නං, ක්වනු බිම්බං නිරුජ්ඣතී’’ති. "हे बाहुले कोणी निर्माण केले आहे? या बाहुल्याचा निर्माता कोठे आहे? हे बाहुले कोठून उत्पन्न झाले आहे आणि हे बाहुले कोठे नष्ट होते?" අථ ඛො සෙලාය භික්ඛුනියා එතදහොසි – ‘‘කො නු ඛ්වායං මනුස්සො වා අමනුස්සො වා ගාථං භාසතී’’ති? අථ ඛො සෙලාය භික්ඛුනියා [Pg.136] එතදහොසි – ‘‘මාරො ඛො අයං පාපිමා මම භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසං උප්පාදෙතුකාමො සමාධිම්හා චාවෙතුකාමො ගාථං භාසතී’’ති. අථ ඛො සෙලා භික්ඛුනී ‘‘මාරො අයං පාපිමා’’ ඉති විදිත්වා මාරං පාපිමන්තං ගාථාහි පච්චභාසි – त्यानंतर सेला भिक्खुणीच्या मनात असा विचार आला – 'हा गाथा म्हणणारा कोण मनुष्य आहे की अमनुष्य?' त्यानंतर सेला भिक्खुणीच्या मनात विचार आला – 'हा पापी मारच आहे, जो माझ्या मनात भय, थरकाप आणि अंगावर काटा उभा करू इच्छितो आणि समाधीपासून विचलित करण्यासाठी ही गाथा म्हणत आहे.' त्यानंतर सेला भिक्खुणीने 'हा पापी मार आहे' हे ओळखून, पापी माराला गाथांनी प्रत्युत्तर दिले – ‘‘නයිදං අත්තකතං බිම්බං, නයිදං පරකතං අඝං; හෙතුං පටිච්ච සම්භූතං, හෙතුභඞ්ගා නිරුජ්ඣති. "हे बाहुले स्वतः बनवलेले नाही, आणि हे दुःख दुसऱ्याने निर्माण केलेले नाही. हे कारणावर अवलंबून उत्पन्न झाले आहे, आणि कारणाचा नाश झाल्यावर ते नष्ट होते." ‘‘යථා අඤ්ඤතරං බීජං, ඛෙත්තෙ වුත්තං විරූහති; පථවීරසඤ්චාගම්ම, සිනෙහඤ්ච තදූභයං. "ज्याप्रमाणे शेतात पेरलेले एखादे बीज, मातीचा रस (पोषकद्रव्ये) आणि ओलावा या दोन्हीवर अवलंबून अंकुरित होते आणि वाढते;" ‘‘එවං ඛන්ධා ච ධාතුයො, ඡ ච ආයතනා ඉමෙ; හෙතුං පටිච්ච සම්භූතා, හෙතුභඞ්ගා නිරුජ්ඣරෙ’’ති. "त्याचप्रमाणे हे स्कंध, धातू आणि ही सहा आयतने कारणावर अवलंबून उत्पन्न होतात, आणि कारणाचा नाश झाल्याने निरुद्ध होतात." අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං සෙලා භික්ඛුනී’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. "त्यानंतर, 'सेला भिक्षुणी मला ओळखते' हे जाणून पापी मार दुःखी व खिन्न होऊन तिथेच अंतर्धान पावला." 10. වජිරාසුත්තං १०. "वजिरा सुत्त" 171. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො වජිරා භික්ඛුනී පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය සාවත්ථිං පිණ්ඩාය පාවිසි. සාවත්ථියං පිණ්ඩාය චරිත්වා පච්ඡාභත්තං පිණ්ඩපාතපටික්කන්තා යෙන අන්ධවනං තෙනුපසඞ්කමි දිවාවිහාරාය. අන්ධවනං අජ්ඣොගාහෙත්වා අඤ්ඤතරස්මිං රුක්ඛමූලෙ දිවාවිහාරං නිසීදි. අථ ඛො මාරො පාපිමා වජිරාය භික්ඛුනියා භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසං උප්පාදෙතුකාමො සමාධිම්හා චාවෙතුකාමො යෙන වජිරා භික්ඛුනී තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා වජිරං භික්ඛුනිං ගාථාය අජ්ඣභාසි – १७१. "श्रावस्ती येथील प्रसंग. एके दिवशी सकाळी वजिरा भिक्षुणींनी वस्त्र परिधान करून, पात्र व चीवर घेऊन श्रावस्तीमध्ये भिक्षेसाठी प्रवेश केला. श्रावस्तीमध्ये भिक्षाटन करून, भोजनोत्तर भिक्षेवरून परतल्यावर त्या अंधवनाकडे दिवसाच्या विहारासाठी (विश्रांतीसाठी) गेल्या. अंधवनात प्रवेश करून त्या एका वृक्षाच्या मुळाशी दिवसाच्या विहारासाठी बसल्या. त्यानंतर पापी माराने वजिरा भिक्षुणींच्या मनात भय, थरकाप आणि अंगावर काटा उभा करण्याची इच्छा धरून, तसेच त्यांना समाधीपासून विचलित करण्याच्या उद्देशाने, जेथे वजिरा भिक्षुणी होत्या तेथे तो गेला; आणि जवळ जाऊन वजिरा भिक्षुणींना गाथेने म्हणाला –" ‘‘කෙනායං පකතො සත්තො, කුවං සත්තස්ස කාරකො; කුවං සත්තො සමුප්පන්නො, කුවං සත්තො නිරුජ්ඣතී’’ති. "'हा प्राणी (सत्त्व) कोणी निर्माण केला आहे? प्राण्याचा निर्माता कोण आहे? प्राणी कोठून उत्पन्न झाला आहे? आणि प्राणी कोठे निरुद्ध होतो?'" අථ ඛො වජිරාය භික්ඛුනියා එතදහොසි – ‘‘කො නු ඛ්වායං මනුස්සො වා අමනුස්සො වා ගාථං භාසතී’’ති? අථ ඛො වජිරාය භික්ඛුනියා එතදහොසි – ‘‘මාරො ඛො අයං පාපිමා මම භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසං උප්පාදෙතුකාමො සමාධිම්හා චාවෙතුකාමො ගාථං භාසතී’’ති. අථ ඛො [Pg.137] වජිරා භික්ඛුනී ‘‘මාරො අයං පාපිමා’’ ඉති විදිත්වා, මාරං පාපිමන්තං ගාථාහි පච්චභාසි – "त्यानंतर वजिरा भिक्षुणींच्या मनात असा विचार आला – 'हा गाथा म्हणणारा कोण आहे, मनुष्य की अमनुष्य?' पुन्हा वजिरा भिक्षुणींच्या मनात विचार आला – 'हा पापी मारच आहे, जो माझ्या मनात भय, थरकाप आणि अंगावर काटा उभा करण्यासाठी आणि मला समाधीपासून विचलित करण्यासाठी ही गाथा म्हणत आहे.' त्यानंतर वजिरा भिक्षुणींनी 'हा पापी मार आहे' हे ओळखून, पापी माराला गाथांनी प्रत्युत्तर दिले –" ‘‘කිං නු සත්තොති පච්චෙසි, මාර දිට්ඨිගතං නු තෙ; සුද්ධසඞ්ඛාරපුඤ්ජොයං, නයිධ සත්තුපලබ්භති. "'हे मारा, तू कशाला 'प्राणी' (सत्त्व) मानत आहेस? ही तुझी चुकीची दृष्टी (दृष्टिगत) आहे का? हा केवळ शुद्ध संस्कारांचा समूह आहे, येथे कोणीही 'प्राणी' (सत्त्व) आढळत नाही." ‘‘යථා හි අඞ්ගසම්භාරා, හොති සද්දො රථො ඉති; එවං ඛන්ධෙසු සන්තෙසු, හොති සත්තොති සම්මුති. "ज्याप्रमाणे विविध भागांच्या जोडणीमुळे 'रथ' हा शब्द (संज्ञा) वापरला जातो, त्याचप्रमाणे स्कंध अस्तित्वात असताना 'प्राणी' (सत्त्व) अशी व्यावहारिक संज्ञा वापरली जाते." ‘‘දුක්ඛමෙව හි සම්භොති, දුක්ඛං තිට්ඨති වෙති ච; නාඤ්ඤත්ර දුක්ඛා සම්භොති, නාඤ්ඤං දුක්ඛා නිරුජ්ඣතී’’ති. "केवळ दुःखच उत्पन्न होते, दुःखच टिकून राहते आणि नष्ट होते; दुःखाशिवाय दुसरे काही उत्पन्न होत नाही आणि दुःखाशिवाय दुसरे काही निरुद्ध होत नाही.'" අථ ඛො මාරො පාපිමා ‘‘ජානාති මං වජිරා භික්ඛුනී’’ති දුක්ඛී දුම්මනො තත්ථෙවන්තරධායීති. "त्यानंतर, 'वजिरा भिक्षुणी मला ओळखते' हे जाणून पापी मार दुःखी व खिन्न होऊन तिथेच अंतर्धान पावला." භික්ඛුනීසංයුත්තං සමත්තං. "भिक्षुणी संयुत्त समाप्त झाले." තස්සුද්දානං – "त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) –" ආළවිකා ච සොමා ච, ගොතමී විජයා සහ; උප්පලවණ්ණා ච චාලා, උපචාලා සීසුපචාලා ච; සෙලා වජිරාය තෙ දසාති. "आळविका, सोमा, गोतमी, विजया, उप्पलवण्णा, चाला, उपचाला, सीसुपचाला, सेला आणि वजिरा – ही ती दहा सुत्ते होत." 6. බ්රහ්මසංයුත්තං ६. "ब्रह्म संयुत्त" 1. පඨමවග්ගො १. "प्रथम वग्ग" 1. බ්රහ්මායාචනසුත්තං १. "ब्रह्मयाचन सुत्त" 172. එවං [Pg.138] මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා උරුවෙලායං විහරති නජ්ජා නෙරඤ්ජරාය තීරෙ අජපාලනිග්රොධමූලෙ පඨමාභිසම්බුද්ධො. අථ ඛො භගවතො රහොගතස්ස පටිසල්ලීනස්ස එවං චෙතසො පරිවිතක්කො උදපාදි – ‘‘අධිගතො ඛො ම්යායං ධම්මො ගම්භීරො දුද්දසො දුරනුබොධො සන්තො පණීතො අතක්කාවචරො නිපුණො පණ්ඩිතවෙදනීයො. ආලයරාමා ඛො පනායං පජා ආලයරතා ආලයසම්මුදිතා. ආලයරාමාය ඛො පන පජාය ආලයරතාය ආලයසම්මුදිතාය දුද්දසං ඉදං ඨානං යදිදං ඉදප්පච්චයතාපටිච්චසමුප්පාදො. ඉදම්පි ඛො ඨානං දුද්දසං යදිදං සබ්බසඞ්ඛාරසමථො සබ්බූපධිපටිනිස්සග්ගො තණ්හාක්ඛයො විරාගො නිරොධො නිබ්බානං. අහඤ්චෙව ඛො පන ධම්මං දෙසෙය්යං; පරෙ ච මෙ න ආජානෙය්යුං; සො මමස්ස කිලමථො, සා මමස්ස විහෙසා’’ති. අපිස්සු භගවන්තං ඉමා අනච්ඡරියා ගාථායො පටිභංසු පුබ්බෙ අස්සුතපුබ්බා – १७२. "असे मी ऐकले आहे – एक वेळ भगवान उरुवेला येथे निरंजरा नदीच्या काठी, नुकतेच पूर्ण संबोधी प्राप्त केल्यानंतर, अजपाल वटवृक्षाच्या मुळाशी विहार करत होते. तेव्हा एकांतात ध्यानस्थ बसलेल्या भगवंतांच्या मनात असा विचार आला – 'मी प्राप्त केलेला हा धर्म अत्यंत गंभीर, दुर्बोध, समजण्यास कठीण, शांत, प्रणीत (उत्कृष्ट), केवळ तर्काने न समजणारा, सूक्ष्म आणि विद्वानांनाच समजणारा आहे. परंतु ही प्रजा (लोक) आसक्तीमध्ये (कामगुणांमध्ये) रमणारी, आसक्तीत मग्न असणारी आणि आसक्तीतच आनंद मानणारी आहे. अशा आसक्तीत रमणाऱ्या, मग्न असणाऱ्या आणि आनंद मानणाऱ्या प्रजेसाठी हे स्थान समजणे कठीण आहे, म्हणजेच 'इदप्पच्चयता-प्रतीत्यसमुत्पाद' (कारण-परिणाम भाव). तसेच हे स्थानही समजण्यास अत्यंत कठीण आहे, म्हणजेच सर्व संस्कारांचा उपशम, सर्व उपाधींचा त्याग, तृष्णेचा क्षय, विराग, निरोध आणि निर्वाण. जर मी या धर्माचा उपदेश केला आणि इतरांना तो समजला नाही, तर तो माझ्यासाठी केवळ थकवा आणि त्रास ठरेल.' याशिवाय, भगवंतांना पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या या अत्यंत आश्चर्यकारक गाथा स्फुरल्या –" ‘‘කිච්ඡෙන මෙ අධිගතං, හලං දානි පකාසිතුං; රාගදොසපරෙතෙහි, නායං ධම්මො සුසම්බුධො. "'मी अत्यंत कष्टाने प्राप्त केलेला हा धर्म आता प्रकट करणे योग्य नाही; कारण राग आणि द्वेषाने ग्रासलेल्या लोकांना हा धर्म सहज समजणारा नाही." ‘‘පටිසොතගාමිං නිපුණං, ගම්භීරං දුද්දසං අණුං; රාගරත්තා න දක්ඛන්ති, තමොඛන්ධෙන ආවුටා’’ති. "प्रवाहच्या विरुद्ध जाणारा, सूक्ष्म, गंभीर, दुर्बोध आणि अतिसूक्ष्म असलेला हा धर्म रागाने अंध झालेले आणि अज्ञानाच्या अंधकाराने वेढलेले लोक पाहू शकणार नाहीत.'" ඉතිහ භගවතො පටිසඤ්චික්ඛතො අප්පොස්සුක්කතාය චිත්තං නමති, නො ධම්මදෙසනාය. "अशा प्रकारे विचार करत असताना भगवंतांचे मन धर्मोपदेश करण्याऐवजी उदासीनतेकडे (मौन राहण्याकडे) वळले." අථ ඛො බ්රහ්මුනො සහම්පතිස්ස භගවතො චෙතසා චෙතොපරිවිතක්කමඤ්ඤාය එතදහොසි – ‘‘නස්සති වත භො ලොකො, විනස්සති වත භො ලොකො, යත්ර හි නාම තථාගතස්ස අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්ස අප්පොස්සුක්කතාය චිත්තං නමති, නො ධම්මදෙසනායා’’ති. අථ [Pg.139] ඛො බ්රහ්මා සහම්පති – සෙය්යථාපි නාම බලවා පුරිසො සමිඤ්ජිතං වා බාහං පසාරෙය්ය, පසාරිතං වා බාහං සමිඤ්ජෙය්ය එවමෙව – බ්රහ්මලොකෙ අන්තරහිතො භගවතො පුරතො පාතුරහොසි. අථ ඛො බ්රහ්මා සහම්පති එකංසං උත්තරාසඞ්ගං කරිත්වා දක්ඛිණජාණුමණ්ඩලං පථවියං නිහන්ත්වා යෙන භගවා තෙනඤ්ජලිං පණාමෙත්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘දෙසෙතු, භන්තෙ, භගවා ධම්මං, දෙසෙතු සුගතො ධම්මං. සන්ති සත්තා අප්පරජක්ඛජාතිකා, අස්සවනතා ධම්මස්ස පරිහායන්ති. භවිස්සන්ති ධම්මස්ස අඤ්ඤාතාරො’’ති. ඉදමවොච බ්රහ්මා සහම්පති, ඉදං වත්වා අථාපරං එතදවොච – "तेव्हा ब्रह्म सहम्पती यांनी भगवंतांच्या मनातील हा विचार स्वतःच्या मनाने जाणून विचार केला – 'अरेरे! हा लोक (संसार) नष्ट होणार! अरेरे! हा लोक पूर्णपणे नष्ट होणार! कारण तथागत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांचे मन धर्मोपदेश करण्याऐवजी उदासीनतेकडे वळत आहे.' त्यानंतर ब्रह्म सहम्पती – ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य आपला दुमडलेला हात पसरतो किंवा पसरलेला हात दुमडतो, त्याप्रमाणे – ब्रह्मलोकातून अंतर्धान पावून भगवंतांच्या समोर प्रकट झाले. त्यानंतर ब्रह्म सहम्पती यांनी आपले उत्तरासंग (उपरणे) एका खांद्यावर करून, उजवा गुडघा जमिनीवर टेकवून, भगवंतांच्या दिशेने हात जोडून भगवंतांना असे म्हटले – 'भंते, भगवान धर्माचा उपदेश करोत! सुगत धर्माचा उपदेश करोत! जगात असेही प्राणी आहेत ज्यांच्या डोळ्यांत (क्लेशांची) धूळ कमी आहे, धर्माचा उपदेश न ऐकल्यामुळे त्यांचे नुकसान होत आहे. ते धर्माचे आकलन करू शकतील.' ब्रह्म सहम्पती यांनी हे म्हटले, आणि हे बोलून पुढे ते असे म्हणाले –" ‘‘පාතුරහොසි මගධෙසු පුබ්බෙ,ධම්මො අසුද්ධො සමලෙහි චින්තිතො; අපාපුරෙතං අමතස්ස ද්වාරං,සුණන්තු ධම්මං විමලෙනානුබුද්ධං. "'पूर्वी मगध देशामध्ये मळयुक्त (राग-द्वेषाने युक्त) अशा संप्रदायप्रमुखांनी कल्पिलेला अशुद्ध धर्म प्रचलित होता. आता त्या अमृत्ताचे (निर्वाणाचे) द्वार उघडा! निष्कलंक अशा भगवंतांनी जाणलेला हा धर्म लोकांना ऐकू द्या." ‘‘සෙලෙ යථා පබ්බතමුද්ධනිට්ඨිතො,යථාපි පස්සෙ ජනතං සමන්තතො; තථූපමං ධම්මමයං සුමෙධ,පාසාදමාරුය්හ සමන්තචක්ඛු; සොකාවතිණ්ණං ජනතමපෙතසොකො,අවෙක්ඛස්සු ජාතිජරාභිභූතං. "ज्याप्रमाणे पर्वताच्या शिखरावर उभा असलेला मनुष्य सभोवतालच्या सर्व लोकांना पाहू शकतो, त्याचप्रमाणे हे सुमेध (उत्कृष्ट प्रज्ञावंत)! हे समंतचक्षू (सर्वदर्शी)! आपण या धर्ममय प्रासादावर (पायरीवर) चढून, स्वतः शोकरहित होऊन, जन्म आणि जरेने ग्रस्त असलेल्या व शोकात बुडालेल्या या जनसमुदायाकडे पहा." ‘‘උට්ඨෙහි වීර විජිතසඞ්ගාම,සත්ථවාහ අනණ විචර ලොකෙ; දෙසස්සු භගවා ධම්මං,අඤ්ඤාතාරො භවිස්සන්තී’’ති. "'उठा, हे वीर! हे युद्धविजेते! हे सार्थवाह (मार्गदर्शक)! हे ऋणमुक्त भगवन्! जगात संचार करा. भगवन्, धर्माचा उपदेश करा; त्याचे आकलन करणारे लोक नक्कीच मिळतील.'" අථ ඛො භගවා බ්රහ්මුනො ච අජ්ඣෙසනං විදිත්වා සත්තෙසු ච කාරුඤ්ඤතං පටිච්ච බුද්ධචක්ඛුනා ලොකං වොලොකෙසි. අද්දසා ඛො භගවා බුද්ධචක්ඛුනා ලොකං වොලොකෙන්තො සත්තෙ අප්පරජක්ඛෙ මහාරජක්ඛෙ තික්ඛින්ද්රියෙ මුදින්ද්රියෙ ස්වාකාරෙ ද්වාකාරෙ සුවිඤ්ඤාපයෙ දුවිඤ්ඤාපයෙ, අප්පෙකච්චෙ පරලොකවජ්ජභයදස්සාවිනෙ විහරන්තෙ, අප්පෙකච්චෙ න පරලොකවජ්ජභයදස්සාවිනෙ [Pg.140] විහරන්තෙ. සෙය්යථාපි නාම උප්පලිනියං වා පදුමිනියං වා පුණ්ඩරීකිනියං වා අප්පෙකච්චානි උප්පලානි වා පදුමානි වා පුණ්ඩරීකානි වා උදකෙ ජාතානි උදකෙ සංවඩ්ඪානි උදකානුග්ගතානි අන්තො නිමුග්ගපොසීනි, අප්පෙකච්චානි උප්පලානි වා පදුමානි වා පුණ්ඩරීකානි වා උදකෙ ජාතානි උදකෙ සංවඩ්ඪානි සමොදකං ඨිතානි, අප්පෙකච්චානි උප්පලානි වා පදුමානි වා පුණ්ඩරීකානි වා උදකෙ ජාතානි උදකෙ සංවඩ්ඪානි උදකා අච්චුග්ගම්ම ඨිතානි අනුපලිත්තානි උදකෙන; එවමෙව භගවා බුද්ධචක්ඛුනා ලොකං වොලොකෙන්තො අද්දස සත්තෙ අප්පරජක්ඛෙ මහාරජක්ඛෙ තික්ඛින්ද්රියෙ මුදින්ද්රියෙ ස්වාකාරෙ ද්වාකාරෙ සුවිඤ්ඤාපයෙ දුවිඤ්ඤාපයෙ, අප්පෙකච්චෙ පරලොකවජ්ජභයදස්සාවිනෙ විහරන්තෙ, අප්පෙකච්චෙ න පරලොකවජ්ජභයදස්සාවිනෙ විහරන්තෙ. දිස්වාන බ්රහ්මානං සහම්පතිං ගාථාය පච්චභාසි – त्यानंतर भगवंतांनी ब्रह्माची याचना जाणून आणि प्राण्यांविषयीच्या करुणेपोटी बुद्धचक्षूने जगाकडे पाहिले. बुद्धचक्षूने जगाकडे पाहत असताना भगवंतांना असे प्राणी दिसले ज्यांच्या डोळ्यांत कमी धूळ होती, ज्यांच्या डोळ्यांत अधिक धूळ होती, ज्यांची इंद्रिये तीक्ष्ण होती, ज्यांची इंद्रिये मंद होती, जे चांगल्या स्वभावाचे होते, जे वाईट स्वभावाचे होते, ज्यांना समजवणे सोपे होते, ज्यांना समजवणे कठीण होते, आणि काही जे परलोकातील दोषांना भय म्हणून पाहत जगत होते, तर काही जे परलोकातील दोषांना भय म्हणून न पाहता जगत होते. ज्याप्रमाणे निळ्या, तांबड्या किंवा पांढऱ्या कमळांच्या तलावामध्ये काही कमळे पाण्यातच जन्माला येतात, पाण्यातच वाढतात आणि पाण्याच्या आतच बुडून राहून विकसित होतात; काही कमळे पाण्यात जन्माला येतात, पाण्यात वाढतात आणि पाण्याच्या पातळीवर राहतात; काही कमळे पाण्यात जन्माला येतात, पाण्यात वाढतात आणि पाण्याच्या वर येऊन पाण्याने न माखता अलिप्त राहतात; त्याचप्रमाणे भगवंतांनी बुद्धचक्षूने जगाकडे पाहत असताना असे प्राणी पाहिले ज्यांच्या डोळ्यांत कमी धूळ होती, ज्यांच्या डोळ्यांत अधिक धूळ होती, ज्यांची इंद्रिये तीक्ष्ण होती, ज्यांची इंद्रिये मंद होती, जे चांगल्या स्वभावाचे होते, जे वाईट स्वभावाचे होते, ज्यांना समजवणे सोपे होते, ज्यांना समजवणे कठीण होते, काही जे परलोकातील दोषांना भय म्हणून पाहत जगत होते, तर काही जे परलोकातील दोषांना भय म्हणून न पाहता जगत होते. हे पाहून त्यांनी ब्रह्मा सहम्पतीला गाथेने प्रत्युत्तर दिले – ‘‘අපාරුතා තෙසං අමතස්ස ද්වාරා,යෙ සොතවන්තො පමුඤ්චන්තු සද්ධං; විහිංසසඤ්ඤී පගුණං න භාසිං,ධම්මං පණීතං මනුජෙසු බ්රහ්මෙ’’ති. "हे ब्रह्मा! मानवांमध्ये मी या प्रणीत आणि गहन धम्माचा उपदेश केला नाही, कारण मला वाटले की यामुळे केवळ शारीरिक व मानसिक त्रास होईल. ज्यांच्याकडे ऐकण्यासाठी कान आहेत, त्यांनी आपली श्रद्धा जागृत करावी; त्यांच्यासाठी अमृताचे द्वार उघडले गेले आहे." අථ ඛො බ්රහ්මා සහම්පති ‘‘කතාවකාසො ඛොම්හි භගවතා ධම්මදෙසනායා’’ති භගවන්තං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා තත්ථෙවන්තරධායීති. त्यानंतर, 'भगवंतांनी मला धम्मोपदेश करण्यासाठी अनुमती दिली आहे,' असे समजून ब्रह्मा सहम्पतीने भगवंतांना अभिवादन केले, त्यांची प्रदक्षिणा केली आणि तो तिथेच अंतर्धान पावला. 2. ගාරවසුත්තං २. गारव सुत्त 173. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා උරුවෙලායං විහරති නජ්ජා නෙරඤ්ජරාය තීරෙ අජපාලනිග්රොධමූලෙ පඨමාභිසම්බුද්ධො. අථ ඛො භගවතො රහොගතස්ස පටිසල්ලීනස්ස එවං චෙතසො පරිවිතක්කො උදපාදි – ‘‘දුක්ඛං ඛො අගාරවො විහරති අප්පතිස්සො, කං නු ඛ්වාහං සමණං වා බ්රාහ්මණං වා සක්කත්වා ගරුං කත්වා උපනිස්සාය විහරෙය්ය’’න්ති? १७३. असे मी ऐकले आहे – एक वेळ भगवान उरुवेला येथे निरंजना नदीच्या काठी, अजपाल वडाच्या झाडाखाली, नुकतेच बुद्धत्व प्राप्त करून विहार करत होते. तेव्हा एकांतात ध्यानस्थ बसलेल्या भगवंतांच्या मनात असा विचार आला – "आदर आणि सन्मानाशिवाय राहणे हे दुःखदायक आहे. मी कोणत्या श्रमणाला किंवा ब्राह्मणाला आदर देऊन, सन्मान देऊन, त्याच्या आश्रयाने राहावे?" අථ [Pg.141] ඛො භගවතො එතදහොසි – ‘‘අපරිපුණ්ණස්ස ඛො සීලක්ඛන්ධස්ස පාරිපූරියා අඤ්ඤං සමණං වා බ්රාහ්මණං වා සක්කත්වා ගරුං කත්වා උපනිස්සාය විහරෙය්යං. න ඛො පනාහං පස්සාමි සදෙවකෙ ලොකෙ සමාරකෙ සබ්රහ්මකෙ සස්සමණබ්රාහ්මණියා පජාය සදෙවමනුස්සාය අත්තනා සීලසම්පන්නතරං අඤ්ඤං සමණං වා බ්රාහ්මණං වා, යමහං සක්කත්වා ගරුං කත්වා උපනිස්සාය විහරෙය්යං. त्यानंतर भगवंतांच्या मनात असा विचार आला – "माझ्या अपूर्ण असलेल्या शीलस्कंधाच्या परिपूर्तीसाठी मी दुसऱ्या एखाद्या श्रमणाला किंवा ब्राह्मणाला आदर देऊन, सन्मान देऊन, त्याच्या आश्रयाने राहावे. परंतु, देव, मार आणि ब्रह्मा यांच्यासह या लोकात, तसेच श्रमण, ब्राह्मण, देव आणि मानवांसह या प्रजेमध्ये मला स्वतःपेक्षा अधिक शीलसंपन्न असा दुसरा कोणताही श्रमण किंवा ब्राह्मण दिसत नाही, ज्याचा मी आदर व सन्मान करून, त्याच्या आश्रयाने राहावे." ‘‘අපරිපුණ්ණස්ස ඛො සමාධික්ඛන්ධස්ස පාරිපූරියා අඤ්ඤං සමණං වා බ්රාහ්මණං වා සක්කත්වා ගරුං කත්වා උපනිස්සාය විහරෙය්යං. න ඛො පනාහං පස්සාමි සදෙවකෙ ලොකෙ…පෙ… අත්තනා සමාධිසම්පන්නතරං අඤ්ඤං සමණං වා බ්රාහ්මණං වා, යමහං සක්කත්වා ගරුං කත්වා උපනිස්සාය විහරෙය්යං. "माझ्या अपूर्ण असलेल्या समाधीस्कंधाच्या परिपूर्तीसाठी मी दुसऱ्या एखाद्या श्रमणाला किंवा ब्राह्मणाला आदर देऊन, सन्मान देऊन, त्याच्या आश्रयाने राहावे. परंतु, देव, मार आणि ब्रह्मा यांच्यासह या लोकात... पे... मला स्वतःपेक्षा अधिक समाधीसंपन्न असा दुसरा कोणताही श्रमण किंवा ब्राह्मण दिसत नाही, ज्याचा मी आदर व सन्मान करून, त्याच्या आश्रयाने राहावे." ‘‘අපරිපුණ්ණස්ස පඤ්ඤාක්ඛන්ධස්ස පාරිපූරියා අඤ්ඤං සමණං වා බ්රාහ්මණං වා සක්කත්වා ගරුං කත්වා උපනිස්සාය විහරෙය්යං. න ඛො පනාහං පස්සාමි සදෙවකෙ…පෙ… අත්තනා පඤ්ඤාසම්පන්නතරං අඤ්ඤං සමණං වා බ්රාහ්මණං වා, යමහං සක්කත්වා ගරුං කත්වා උපනිස්සාය විහරෙය්යං. "माझ्या अपूर्ण असलेल्या प्रज्ञास्कंधाच्या परिपूर्तीसाठी मी दुसऱ्या एखाद्या श्रमणाला किंवा ब्राह्मणाला आदर देऊन, सन्मान देऊन, त्याच्या आश्रयाने राहावे. परंतु, देव, मार आणि ब्रह्मा यांच्यासह या लोकात... पे... मला स्वतःपेक्षा अधिक प्रज्ञासंपन्न असा दुसरा कोणताही श्रमण किंवा ब्राह्मण दिसत नाही, ज्याचा मी आदर व सन्मान करून, त्याच्या आश्रयाने राहावे." ‘‘අපරිපුණ්ණස්ස ඛො විමුත්තික්ඛන්ධස්ස පාරිපූරියා අඤ්ඤං සමණං වා බ්රාහ්මණං වා සක්කත්වා ගරුං කත්වා උපනිස්සාය විහරෙය්යං. න ඛො පනාහං පස්සාමි සදෙවකෙ…පෙ… අත්තනා විමුත්තිසම්පන්නතරං අඤ්ඤං සමණං වා බ්රාහ්මණං වා, යමහං සක්කත්වා ගරුං කත්වා උපනිස්සාය විහරෙය්යං. "माझ्या अपूर्ण असलेल्या विमुक्तीस्कंधाच्या परिपूर्तीसाठी मी दुसऱ्या एखाद्या श्रमणाला किंवा ब्राह्मणाला आदर देऊन, सन्मान देऊन, त्याच्या आश्रयाने राहावे. परंतु, देव, मार आणि ब्रह्मा यांच्यासह या लोकात... पे... मला स्वतःपेक्षा अधिक विमुक्तीसंपन्न असा दुसरा कोणताही श्रमण किंवा ब्राह्मण दिसत नाही, ज्याचा मी आदर व सन्मान करून, त्याच्या आश्रयाने राहावे." ‘‘අපරිපුණ්ණස්ස ඛො විමුත්තිඤාණදස්සනක්ඛන්ධස්ස පාරිපූරියා අඤ්ඤං සමණං වා බ්රාහ්මණං වා සක්කත්වා ගරුං කත්වා උපනිස්සාය විහරෙය්යං. න ඛො පනාහං පස්සාමි සදෙවකෙ ලොකෙ සමාරකෙ සබ්රහ්මකෙ සස්සමණබ්රාහ්මණියා පජාය සදෙවමනුස්සාය අත්තනා විමුත්තිඤාණදස්සනසම්පන්නතරං අඤ්ඤං සමණං වා බ්රාහ්මණං වා, යමහං සක්කත්වා ගරුං කත්වා උපනිස්සාය විහරෙය්යං. යංනූනාහං ය්වායං ධම්මො මයා අභිසම්බුද්ධො තමෙව ධම්මං සක්කත්වා ගරුං කත්වා උපනිස්සාය විහරෙය්ය’’න්ති. "माझ्या अपूर्ण असलेल्या विमुक्तीज्ञानदर्शनस्कंधाच्या परिपूर्तीसाठी मी दुसऱ्या एखाद्या श्रमणाला किंवा ब्राह्मणाला आदर देऊन, सन्मान देऊन, त्याच्या आश्रयाने राहावे. परंतु, देव, मार आणि ब्रह्मा यांच्यासह या लोकात, तसेच श्रमण, ब्राह्मण, देव आणि मानवांसह या प्रजेमध्ये मला स्वतःपेक्षा अधिक विमुक्तीज्ञानदर्शनसंपन्न असा दुसरा कोणताही श्रमण किंवा ब्राह्मण दिसत नाही, ज्याचा मी आदर व सन्मान करून, त्याच्या आश्रयाने राहावे. मग मी ज्या धम्माचा स्वतः साक्षात्कार केला आहे, त्याच धम्माचा आदर व सन्मान करून, त्याच्याच आश्रयाने का राहू नये?" අථ ඛො බ්රහ්මා සහම්පති භගවතො චෙතසා චෙතොපරිවිතක්කමඤ්ඤාය – සෙය්යථාපි නාම බලවා පුරිසො සමිඤ්ජිතං වා බාහං පසාරෙය්ය පසාරිතං වා බාහං සමිඤ්ජෙය්ය එවමෙව – බ්රහ්මලොකෙ අන්තරහිතො භගවතො පුරතො පාතුරහොසි. අථ ඛො බ්රහ්මා සහම්පති එකංසං උත්තරාසඞ්ගං කරිත්වා යෙන භගවා තෙනඤ්ජලිං පණාමෙත්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘එවමෙතං, භගවා, එවමෙතං, සුගත! යෙපි තෙ, භන්තෙ, අහෙසුං අතීතමද්ධානං අරහන්තො සම්මාසම්බුද්ධා, තෙපි [Pg.142] භගවන්තො ධම්මඤ්ඤෙව සක්කත්වා ගරුං කත්වා උපනිස්සාය විහරිංසු; යෙපි තෙ, භන්තෙ, භවිස්සන්ති අනාගතමද්ධානං අරහන්තො සම්මාසම්බුද්ධා තෙපි භගවන්තො ධම්මඤ්ඤෙව සක්කත්වා ගරුං කත්වා උපනිස්සාය විහරිස්සන්ති. භගවාපි, භන්තෙ, එතරහි අරහං සම්මාසම්බුද්ධො ධම්මඤ්ඤෙව සක්කත්වා ගරුං කත්වා උපනිස්සාය විහරතූ’’ති. ඉදමවොච බ්රහ්මා සහම්පති, ඉදං වත්වා අථාපරං එතදවොච – त्यानंतर ब्रह्मा सहम्पतीने भगवंतांच्या मनातील विचार स्वतःच्या मनाने जाणून घेतला – ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य आपला दुमडलेला हात पसरावा किंवा पसरलेला हात दुमडावा, त्याचप्रमाणे तो ब्रह्मलोकातून अंतर्धान पावून भगवंतांच्या समोर प्रकट झाला. त्यानंतर ब्रह्मा सहम्पतीने आपले उपरणे एका खांद्यावर घेतले आणि भगवंतांच्या दिशेने हात जोडून त्यांना असे म्हटले – "हे भगवंत, हे अगदी तसेच आहे! हे सुगत, हे अगदी तसेच आहे! भंते, भूतकाळात जे अर्हत सम्यक्संबुद्ध होऊन गेले, त्या भगवंतांनी देखील धम्माचाच आदर व सन्मान करून, धम्माच्याच आश्रयाने विहार केला. भंते, भविष्यकाळात जे अर्हत सम्यक्संबुद्ध होतील, ते भगवंत देखील धम्माचाच आदर व सन्मान करून, धम्माच्याच आश्रयाने विहार करतील. भंते, वर्तमानकाळात अर्हत सम्यक्संबुद्ध असलेले भगवंत देखील धम्माचाच आदर व सन्मान करून, धम्माच्याच आश्रयाने विहार करोत." ब्रह्मा सहम्पतीने हे म्हटले, आणि हे बोलून तो पुढे म्हणाला – ‘‘යෙ ච අතීතා සම්බුද්ධා, යෙ ච බුද්ධා අනාගතා; යො චෙතරහි සම්බුද්ධො, බහූනං සොකනාසනො. "जे भूतकाळातील सम्यक्संबुद्ध होते, जे भविष्यकाळातील बुद्ध असतील, आणि जे वर्तमानकाळातील सम्यक्संबुद्ध आहेत, जे बहुतांश लोकांच्या शोकाचा नाश करणारे आहेत –"},{ ‘‘සබ්බෙ සද්ධම්මගරුනො, විහංසු විහරන්ති ච; තථාපි විහරිස්සන්ති, එසා බුද්ධාන ධම්මතා. "ते सर्व सद्धम्माचा आदर करत विहार करते झाले, विहार करत आहेत आणि तसेच विहार करतील; हीच बुद्धांची धर्मता आहे." ‘‘තස්මා හි අත්තකාමෙන, මහත්තමභිකඞ්ඛතා; සද්ධම්මො ගරුකාතබ්බො, සරං බුද්ධාන සාසන’’න්ති. "म्हणूनच, स्वतःचे कल्याण इच्छिणाऱ्या आणि आध्यात्मिक महानतेची आकांक्षा बाळगणाऱ्या व्यक्तीने, बुद्धांच्या शासनाचे स्मरण करत सद्धम्माचा आदर केला पाहिजे." 3. බ්රහ්මදෙවසුත්තං ३. ब्रह्मदेव सुत्त 174. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන අඤ්ඤතරිස්සා බ්රාහ්මණියා බ්රහ්මදෙවො නාම පුත්තො භගවතො සන්තිකෙ අගාරස්මා අනගාරියං පබ්බජිතො හොති. १७४. मी असे ऐकले आहे – एका वेळी भगवान श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. त्या वेळी एका ब्राह्मण स्त्रीचा 'ब्रह्मदेव' नावाचा मुलगा भगवंतांच्या सन्निध्यात गृहत्याग करून अनगारिक (प्रव्रजित) झाला होता. අථ ඛො ආයස්මා බ්රහ්මදෙවො එකො වූපකට්ඨො අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරන්තො නචිරස්සෙව – යස්සත්ථාය කුලපුත්තා සම්මදෙව අගාරස්මා අනගාරියං පබ්බජන්ති, තදනුත්තරං බ්රහ්මචරියපරියොසානං දිට්ඨෙව ධම්මෙ සයං අභිඤ්ඤා සච්ඡිකත්වා උපසම්පජ්ජ විහාසි. ‘‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’’ති අබ්භඤ්ඤාසි. අඤ්ඤතරො ච පනායස්මා බ්රහ්මදෙවො අරහතං අහොසි. त्यानंतर आयुष्यमान ब्रह्मदेव एकांतात, विविक्त (कायविवेकयुक्त), अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करत असताना, फार काळ न लागताच – ज्या ध्येयासाठी कुलपुत्र योग्य प्रकारे गृहत्याग करून अनगारिक प्रवृत्ती स्वीकारतात, ते अनुत्तर ब्रह्मचर्याचे अंतिम फळ (अर्हत्त्व) याच जन्मात स्वतः अभिज्ञापूर्वक (विशेष ज्ञानाने) साक्षात करून, त्यात प्रतिष्ठित होऊन विहार करू लागले. त्यांनी जाणले: “जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे कर्तव्य होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही शेष राहिलेले नाही.” आणि आयुष्यमान ब्रह्मदेव अर्हतांपैकी एक झाले. අථ ඛො ආයස්මා බ්රහ්මදෙවො පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය සාවත්ථිං පිණ්ඩාය පාවිසි. සාවත්ථියං සපදානං පිණ්ඩාය චරමානො යෙන සකමාතු නිවෙසනං තෙනුපසඞ්කමි. තෙන ඛො පන සමයෙන ආයස්මතො බ්රහ්මදෙවස්ස මාතා බ්රාහ්මණී බ්රහ්මුනො ආහුතිං නිච්චං පග්ගණ්හාති[Pg.143]. අථ ඛො බ්රහ්මුනො සහම්පතිස්ස එතදහොසි – ‘‘අයං ඛො ආයස්මතො බ්රහ්මදෙවස්ස මාතා බ්රාහ්මණී බ්රහ්මුනො ආහුතිං නිච්චං පග්ගණ්හාති. යංනූනාහං තං උපසඞ්කමිත්වා සංවෙජෙය්ය’’න්ති. අථ ඛො බ්රහ්මා සහම්පති – සෙය්යථාපි නාම බලවා පුරිසො සමිඤ්ජිතං වා බාහං පසාරෙය්ය, පසාරිතං වා බාහං සමිඤ්ජෙය්ය එවමෙව – බ්රහ්මලොකෙ අන්තරහිතො ආයස්මතො බ්රහ්මදෙවස්ස මාතු නිවෙසනෙ පාතුරහොසි. අථ ඛො බ්රහ්මා සහම්පති වෙහාසං ඨිතො ආයස්මතො බ්රහ්මදෙවස්ස මාතරං බ්රාහ්මණිං ගාථාය අජ්ඣභාසි – त्यानंतर आयुष्यमान ब्रह्मदेव सकाळी वस्त्र परिधान करून, पात्र व चीवर घेऊन श्रावस्तीमध्ये पिंडपातासाठी (भिक्षेसाठी) प्रविष्ट झाले. श्रावस्तीमध्ये घरोघरी पिंडपातासाठी फिरत असताना ते आपल्या स्वतःच्या आईच्या घरापाशी आले. त्या वेळी आयुष्यमान ब्रह्मदेवांची आई, जी एक ब्राह्मण स्त्री होती, ती ब्रह्मासाठी नियमितपणे आहुती (नैवेद्य) अर्पण करत असे. तेव्हा ब्रह्मा सहंपतीला असा विचार आला – “आयुष्यमान ब्रह्मदेवांची आई असलेली ही ब्राह्मण स्त्री नेहमी ब्रह्माला आहुती अर्पण करत असते. मी तिच्याकडे जाऊन तिच्या मनात संवेग (धार्मिक जागृती) निर्माण करावा का?” त्यानंतर ब्रह्मा सहंपती – ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य आपला दुमडलेला हात पसरतो किंवा पसरलेला हात दुमडतो, त्याचप्रमाणे – ब्रह्मलोकातून अंतर्धान पावून आयुष्यमान ब्रह्मदेवांच्या आईच्या घरात प्रकट झाले. मग ब्रह्मा सहंपती आकाशात उभे राहून आयुष्यमान ब्रह्मदेवांच्या आईला, त्या ब्राह्मण स्त्रीला गाथेने संबोधित करते झाले – ‘‘දූරෙ ඉතො බ්රාහ්මණි බ්රහ්මලොකො,යස්සාහුතිං පග්ගණ්හාසි නිච්චං; නෙතාදිසො බ්රාහ්මණි බ්රහ්මභක්ඛො,කිං ජප්පසි බ්රහ්මපථං අජානං. “हे ब्राह्मणी, येथून ब्रह्मलोक फार दूर आहे, ज्याच्यासाठी तू नेहमी आहुती अर्पण करतेस. हा नैवेद्य ब्रह्माचे अन्न नाही. ब्रह्ममार्ग न जाणता तू कशासाठी प्रार्थना करत आहेस? ‘‘එසො හි තෙ බ්රාහ්මණි බ්රහ්මදෙවො,නිරූපධිකො අතිදෙවපත්තො; අකිඤ්චනො භික්ඛු අනඤ්ඤපොසී,යො තෙ සො පිණ්ඩාය ඝරං පවිට්ඨො. “हे ब्राह्मणी, हा तुझा मुलगा ब्रह्मदेवच सर्व उपाधींपासून (क्लेशांपासून) मुक्त होऊन देवांहूनही श्रेष्ठ अशा अर्हत् पदाला प्राप्त झाला आहे. तो अकिंचन (काहीही संग्रह न करणारा), कोणावरही अवलंबून न राहणारा भिक्खू पिंडपातासाठी तुझ्या घरात प्रविष्ट झाला आहे. ‘‘ආහුනෙය්යො වෙදගු භාවිතත්තො,නරානං දෙවානඤ්ච දක්ඛිණෙය්යො; බාහිත්වා පාපානි අනූපලිත්තො,ඝාසෙසනං ඉරියති සීතිභූතො. “तो आहुतीस (दानास) पात्र, वेदगू (ज्ञानाचा पारगामी), भावित आत्मा (चित्त विकसित केलेला) असून मनुष्य व देवांच्या श्रेष्ठ दक्षिणेस पात्र आहे. सर्व पापांना दूर सारून तो अलिप्त झाला आहे आणि शांतचित्त होऊन भिक्षेसाठी फिरत आहे. ‘‘න තස්ස පච්ඡා න පුරත්ථමත්ථි,සන්තො විධූමො අනිඝො නිරාසො; නික්ඛිත්තදණ්ඩො තසථාවරෙසු,සො ත්යාහුතිං භුඤ්ජතු අග්ගපිණ්ඩං. “त्याच्यासाठी मागे किंवा पुढे काहीही उरलेले नाही (भूतकाळ व भविष्यकाळातील आसक्ती नाही). तो शांत, क्रोधाचा धूर नसलेला, दुःखमुक्त आणि तृष्णारहित आहे. त्याने त्रस (भित्रे) आणि स्थावर (धीर) प्राण्यांविषयी हिंसादंड त्यागला आहे. तो तुझी ही आहुती, हा श्रेष्ठ पिंड ग्रहण करो. ‘‘විසෙනිභූතො උපසන්තචිත්තො,නාගොව දන්තො චරති අනෙජො; භික්ඛු සුසීලො සුවිමුත්තචිත්තො,සො ත්යාහුතිං භුඤ්ජතු අග්ගපිණ්ඩං. “क्लेशरूप सैन्यापासून मुक्त, शांत चित्त असलेला, दमित हत्तीप्रमाणे तृष्णारहित होऊन विहरणारा, सुशील आणि विमुक्त चित्त असलेला हा भिक्खू तुझी ही आहुती, हा श्रेष्ठ पिंड ग्रहण करो. ‘‘තස්මිං [Pg.144] පසන්නා අවිකම්පමානා,පතිට්ඨපෙහි දක්ඛිණං දක්ඛිණෙය්යෙ; කරොහි පුඤ්ඤං සුඛමායතිකං,දිස්වා මුනිං බ්රාහ්මණි ඔඝතිණ්ණ’’න්ති. “त्या दानपात्र भिक्खूवर प्रसन्न होऊन, अविचलित मनाने तुझी दक्षिणा (दान) अर्पण कर. हे ब्राह्मणी, ओघ (संसारपूर) पार केलेल्या या मुनींचे दर्शन घेऊन भविष्यात सुख देणारे पुण्य संपादन कर.” ‘‘තස්මිං පසන්නා අවිකම්පමානා,පතිට්ඨපෙසි දක්ඛිණං දක්ඛිණෙය්යෙ; අකාසි පුඤ්ඤං සුඛමායතිකං,දිස්වා මුනිං බ්රාහ්මණී ඔඝතිණ්ණ’’න්ති. त्या दानपात्र भिक्खूवर प्रसन्न होऊन, अविचलित मनाने तिने आपली दक्षिणा अर्पण केली. ओघ पार केलेल्या त्या मुनींचे दर्शन घेऊन त्या ब्राह्मण स्त्रीने भविष्यात सुख देणारे पुण्य संपादन केले. 4. බකබ්රහ්මසුත්තං ४. बकब्रह्म सुत्त 175. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන බකස්ස බ්රහ්මුනො එවරූපං පාපකං දිට්ඨිගතං උප්පන්නං හොති – ‘‘ඉදං නිච්චං, ඉදං ධුවං, ඉදං සස්සතං, ඉදං කෙවලං, ඉදං අචවනධම්මං, ඉදඤ්හි න ජායති න ජීයති න මීයති න චවති න උපපජ්ජති, ඉතො ච පනඤ්ඤං උත්තරිං නිස්සරණං නත්ථී’’ති. १७५. मी असे ऐकले आहे – एका वेळी भगवान श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. त्या वेळी बक नावाच्या ब्रह्माला अशी चुकीची (शाश्वत) दृष्टी उत्पन्न झाली होती – “हे (ब्रह्मलोक) नित्य आहे, हे ध्रुव (स्थिर) आहे, हे शाश्वत आहे, हे परिपूर्ण आहे, हे च्युत न होणाऱ्या स्वभावाचे आहे. येथे कोणी जन्मत नाही, वृद्ध होत नाही, मरत नाही, च्युत होत नाही आणि पुन्हा उत्पन्न होत नाही. आणि याहून श्रेष्ठ असा दुसरा कोणताही मोक्ष (सुटका) नाही.” අථ ඛො භගවා බකස්ස බ්රහ්මුනො චෙතසා චෙතොපරිවිතක්කමඤ්ඤාය – සෙය්යථාපි නාම බලවා පුරිසො සමිඤ්ජිතං වා බාහං පසාරෙය්ය, පසාරිතං වා බාහං සමිඤ්ජෙය්ය එවමෙව – ජෙතවනෙ අන්තරහිතො තස්මිං බ්රහ්මලොකෙ පාතුරහොසි. අද්දසා ඛො බකො බ්රහ්මා භගවන්තං දූරතොව ආගච්ඡන්තං. දිස්වාන භගවන්තං එතදවොච – ‘‘එහි ඛො මාරිස, ස්වාගතං තෙ, මාරිස! චිරස්සං ඛො මාරිස! ඉමං පරියායමකාසි යදිදං ඉධාගමනාය. ඉදඤ්හි, මාරිස, නිච්චං, ඉදං ධුවං, ඉදං සස්සතං, ඉදං කෙවලං, ඉදං අචවනධම්මං, ඉදඤ්හි න ජායති න ජීයති න මීයති න චවති න උපපජ්ජති. ඉතො ච පනඤ්ඤං උත්තරි නිස්සරණං නත්ථී’’ති. तेव्हा भगवंतांनी बक ब्रह्माच्या मनातील विचार आपल्या मनाने जाणून – ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य आपला दुमडलेला हात पसरतो किंवा पसरलेला हात दुमडतो, त्याचप्रमाणे – जेतवनातून अंतर्धान पावून त्या ब्रह्मलोकात प्रकट झाले. बक ब्रह्माने भगवंतांना दुरूनच येत असताना पाहिले. भगवंतांना पाहून तो म्हणाला – “यावे, महाशय! आपले स्वागत आहे, महाशय! आपण खूप दिवसांनी येथे येण्याची वेळ काढली आहे. कारण, महाशय, हे नित्य आहे, हे ध्रुव आहे, हे शाश्वत आहे, हे परिपूर्ण आहे, हे च्युत न होणाऱ्या स्वभावाचे आहे. येथे कोणी जन्मत नाही, वृद्ध होत नाही, मरत नाही, च्युत होत नाही आणि पुन्हा उत्पन्न होत नाही. आणि याहून श्रेष्ठ असा दुसरा कोणताही मोक्ष नाही.” එවං වුත්තෙ, භගවා බකං බ්රහ්මානං එතදවොච – ‘‘අවිජ්ජාගතො වත, භො, බකො බ්රහ්මා; අවිජ්ජාගතො වත, භො, බකො බ්රහ්මා. යත්ර [Pg.145] හි නාම අනිච්චංයෙව සමානං නිච්චන්ති වක්ඛති, අධුවංයෙව සමානං ධුවන්ති වක්ඛති, අසස්සතංයෙව සමානං සස්සතන්ති වක්ඛති, අකෙවලංයෙව සමානං කෙවලන්ති වක්ඛති, චවනධම්මංයෙව සමානං අචවනධම්මන්ති වක්ඛති. යත්ථ ච පන ජායති ච ජීයති ච මීයති ච චවති ච උපපජ්ජති ච, තඤ්ච තථා වක්ඛති – ‘ඉදඤ්හි න ජායති න ජීයති න මීයති න චවති න උපපජ්ජති’. සන්තඤ්ච පනඤ්ඤං උත්තරි නිස්සරණං, ‘නත්ථඤ්ඤං උත්තරි නිස්සරණ’න්ති වක්ඛතී’’ති. असे म्हटले असता, भगवान बक ब्रह्माला म्हणाले – “अरेरे! बक ब्रह्मा अज्ञानात बुडाला आहे; अरेरे! बक ब्रह्मा अज्ञानात बुडाला आहे. कारण जो अनित्य असलेल्या गोष्टीला 'नित्य' म्हणत आहे, अस्थिर असलेल्या गोष्टीला 'ध्रुव' म्हणत आहे, अशाश्वत असलेल्या गोष्टीला 'शाश्वत' म्हणत आहे, अपूर्ण असलेल्या गोष्टीला 'परिपूर्ण' म्हणत आहे, आणि च्युत होणाऱ्या स्वभावाच्या गोष्टीला 'च्युत न होणारी' म्हणत आहे. आणि ज्या ठिकाणी जन्म, जरा, मरण, च्युती आणि पुनरुत्पत्ती होते, त्याविषयी तो म्हणतो – 'येथे कोणी जन्मत नाही, वृद्ध होत नाही, मरत नाही, च्युत होत नाही आणि पुन्हा उत्पन्न होत नाही.' आणि याहून श्रेष्ठ असा दुसरा मोक्ष अस्तित्वात असतानाही तो म्हणतो की, 'याहून श्रेष्ठ असा दुसरा कोणताही मोक्ष नाही'.” ‘‘ද්වාසත්තති ගොතම පුඤ්ඤකම්මා,වසවත්තිනො ජාතිජරං අතීතා; අයමන්තිමා වෙදගූ බ්රහ්මුපපත්ති,අස්මාභිජප්පන්ති ජනා අනෙකා’’ති. “हे गोतमा, आम्ही बहात्तर जण पुण्यकर्म करणारे आहोत, जे इतरांवर सत्ता गाजवतात आणि जन्म-जरेच्या पलीकडे गेले आहेत. ही आमची अंतिम ब्रह्म-उत्पत्ती असून आम्ही ज्ञानाचे पारगामी आहोत. अनेक लोक आमचीच आकांक्षा धरतात.” ‘‘අප්පඤ්හි එතං න හි දීඝමායු,යං ත්වං බක මඤ්ඤසි දීඝමායුං; සතං සහස්සානං නිරබ්බුදානං,ආයුං පජානාමි තවාහං බ්රහ්මෙ’’ති. “हे बक, ज्या आयुष्याला तू दीर्घ समजत आहेस, ते आयुष्य खरोखरच अल्प आहे, दीर्घ नाही. हे ब्रह्मा, मला तुझे आयुष्य माहीत आहे, जे एक लाख निरब्बुद वर्षांचे आहे.” ‘‘අනන්තදස්සී භගවාහමස්මි,ජාතිජරං සොකමුපාතිවත්තො; කිං මෙ පුරාණං වතසීලවත්තං,ආචික්ඛ මෙ තං යමහං විජඤ්ඤා’’ති. “भगवंत म्हणतात: 'मी अनंतदर्शी आहे, जन्म, जरा आणि शोकाच्या पलीकडे गेलो आहे.' माझे ते प्राचीन व्रत, शील आणि आचरण काय होते? मला ते सांगा जेणेकरून मी ते समजू शकेन.” ‘‘යං ත්වං අපායෙසි බහූ මනුස්සෙ,පිපාසිතෙ ඝම්මනි සම්පරෙතෙ; තං තෙ පුරාණං වතසීලවත්තං,සුත්තප්පබුද්ධොව අනුස්සරාමි. “उन्हाळ्याच्या तीव्र उष्णतेने व्याकुळ झालेल्या आणि तहानलेल्या अनेक लोकांना तू पाणी पाजले होतेस. तुझे ते प्राचीन व्रत, शील आणि आचरण मला एखाद्या झोपेतून जागे झालेल्या माणसाप्रमाणे स्पष्टपणे आठवते. ‘‘යං එණිකූලස්මිං ජනං ගහීතං,අමොචයී ගය්හකං නීයමානං; තං තෙ පුරාණං වතසීලවත්තං,සුත්තප්පබුද්ධොව අනුස්සරාමි. “जेव्हा एणीकुलाच्या (हरिण-तीरावर) लोकांना बंदी बनवून नेले जात होते, तेव्हा तू त्या कैद्यांना सोडवले होतेस. तुझे ते प्राचीन व्रत, शील आणि आचरण मला एखाद्या झोपेतून जागे झालेल्या माणसाप्रमाणे स्पष्टपणे आठवते. ‘‘ගඞ්ගාය [Pg.146] සොතස්මිං ගහීතනාවං,ලුද්දෙන නාගෙන මනුස්සකම්යා; පමොචයිත්ථ බලසා පසය්හ,තං තෙ පුරාණං වතසීලවත්තං,සුත්තප්පබුද්ධොව අනුස්සරාමි. “जेव्हा गंगा नदीच्या प्रवाहात मानवी मांसाच्या आशेने एका क्रूर नागाने बळकावलेली नौका तू आपल्या सामर्थ्याने आणि पराक्रमाने सोडवली होतीस. तुझे ते प्राचीन व्रत, शील आणि आचरण मला एखाद्या झोपेतून जागे झालेल्या माणसाप्रमाणे स्पष्टपणे आठवते.” ‘‘කප්පො ච තෙ බද්ධචරො අහොසිං,සම්බුද්ධිමන්තං වතිනං අමඤ්ඤි; තං තෙ පුරාණං වතසීලවත්තං,සුත්තප්පබුද්ධොව අනුස්සරාමී’’ති. "मी तुमचा 'कप्प' नावाचा शिष्य (अंतेवासिक) होतो. तुम्ही त्याला सुबुद्ध आणि शीलवान मानत होतात. ते तुमचे प्राचीन व्रत आणि शील होते, ज्याचे मला आता झोपेतून जागे झाल्यासारखे स्मरण होत आहे." ‘‘අද්ධා පජානාසි මමෙතමායුං,අඤ්ඤෙපි ජානාසි තථා හි බුද්ධො; තථා හි ත්යායං ජලිතානුභාවො,ඔභාසයං තිට්ඨති බ්රහ්මලොක’’න්ති. "भगवंत! आपण माझे हे आयुष्य निश्चितच जाणता. आपण इतर गोष्टीही जाणता, म्हणूनच आपण 'बुद्ध' आहात. म्हणूनच आपला हा प्रज्वलित प्रभाव संपूर्ण ब्रह्मलोकाला प्रकाशित करत आहे." 5. අඤ්ඤතරබ්රහ්මසුත්තං ५. अन्यतरब्रह्मसुत्त 176. සාවත්ථිනිදානං. තෙන ඛො පන සමයෙන අඤ්ඤතරස්ස බ්රහ්මුනො එවරූපං පාපකං දිට්ඨිගතං උප්පන්නං හොති – ‘‘නත්ථි සො සමණො වා බ්රාහ්මණො වා යො ඉධ ආගච්ඡෙය්යා’’ති. අථ ඛො භගවා තස්ස බ්රහ්මුනො චෙතසා චෙතොපරිවිතක්කමඤ්ඤාය – සෙය්යථාපි නාම බලවා පුරිසො…පෙ… තස්මිං බ්රහ්මලොකෙ පාතුරහොසි. අථ ඛො භගවා තස්ස බ්රහ්මුනො උපරි වෙහාසං පල්ලඞ්කෙන නිසීදි තෙජොධාතුං සමාපජ්ජිත්වා. १७६. श्रावस्ती येथील प्रसंग. त्या वेळी एका विशिष्ट ब्रह्माच्या मनात अशी वाईट (पापी) मिथ्या दृष्टी उत्पन्न झाली होती की— 'असा कोणताही श्रमण किंवा ब्राह्मण नाही जो येथे (ब्रह्मलोकात) येऊ शकेल.' तेव्हा भगवंतांनी आपल्या चित्ताने त्या ब्रह्माच्या मनातील विचार जाणून— ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य...पे... त्या ब्रह्मलोकात प्रकट झाले. त्यानंतर भगवंत त्या ब्रह्माच्या वर आकाशात मांडी घालून तेजोधातू समाधीमध्ये लीन होऊन बसले. අථ ඛො ආයස්මතො මහාමොග්ගල්ලානස්ස එතදහොසි – ‘‘කහං නු ඛො භගවා එතරහි විහරතී’’ති? අද්දසා ඛො ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො භගවන්තං දිබ්බෙන චක්ඛුනා විසුද්ධෙන අතික්කන්තමානුසකෙන තස්ස බ්රහ්මුනො උපරි වෙහාසං පල්ලඞ්කෙන නිසින්නං තෙජොධාතුං සමාපන්නං. දිස්වාන – සෙය්යථාපි නාම බලවා පුරිසො සමිඤ්ජිතං වා බාහං පසාරෙය්ය, පසාරිතං වා බාහං සමිඤ්ජෙය්ය එවමෙව – ජෙතවනෙ අන්තරහිතො තස්මිං බ්රහ්මලොකෙ පාතුරහොසි. අථ ඛො ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො [Pg.147] පුරත්ථිමං දිසං නිස්සාය තස්ස බ්රහ්මුනො උපරි වෙහාසං පල්ලඞ්කෙන නිසීදි තෙජොධාතුං සමාපජ්ජිත්වා නීචතරං භගවතො. तेव्हा आयुष्यमान महामोग्गल्लानांच्या मनात असा विचार आला— 'भगवंत सध्या कोठे विहार करत आहेत?' आयुष्यमान महामोग्गल्लानांनी मानवी दृष्टीपेक्षा श्रेष्ठ अशा अत्यंत शुद्ध दिव्य चक्षूंनी भगवंतांना त्या ब्रह्माच्या वर आकाशात मांडी घालून तेजोधातू समाधीमध्ये लीन होऊन बसलेले पाहिले. ते पाहून— ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य आपला दुमडलेला हात पसरतो किंवा पसरलेला हात दुमडतो, त्याचप्रमाणे ते जेतवनातून अंतर्धान पावून त्या ब्रह्मलोकात प्रकट झाले. त्यानंतर आयुष्यमान महामोग्गल्लान पूर्व दिशेचा आश्रय घेऊन, त्या ब्रह्माच्या वर आकाशात, भगवंतांपेक्षा काहीशा खालच्या पातळीवर, मांडी घालून तेजोधातू समाधीमध्ये लीन होऊन बसले. අථ ඛො ආයස්මතො මහාකස්සපස්ස එතදහොසි – ‘‘කහං නු ඛො භගවා එතරහි විහරතී’’ති? අද්දසා ඛො ආයස්මා මහාකස්සපො භගවන්තං දිබ්බෙන චක්ඛුනා…පෙ… දිස්වාන – සෙය්යථාපි නාම බලවා පුරිසො…පෙ… එවමෙව – ජෙතවනෙ අන්තරහිතො තස්මිං බ්රහ්මලොකෙ පාතුරහොසි. අථ ඛො ආයස්මා මහාකස්සපො දක්ඛිණං දිසං නිස්සාය තස්ස බ්රහ්මුනො උපරි වෙහාසං පල්ලඞ්කෙන නිසීදි තෙජොධාතුං සමාපජ්ජිත්වා නීචතරං භගවතො. तेव्हा आयुष्यमान महाकस्सपांच्या मनात असा विचार आला— 'भगवंत सध्या कोठे विहार करत आहेत?' आयुष्यमान महाकस्सपांनी दिव्य चक्षूंनी...पे... पाहून— ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य...पे... त्याचप्रमाणे ते जेतवनातून अंतर्धान पावून त्या ब्रह्मलोकात प्रकट झाले. त्यानंतर आयुष्यमान महाकस्सप दक्षिण दिशेचा आश्रय घेऊन, त्या ब्रह्माच्या वर आकाशात, भगवंतांपेक्षा काहीशा खालच्या पातळीवर, मांडी घालून तेजोधातू समाधीमध्ये लीन होऊन बसले. අථ ඛො ආයස්මතො මහාකප්පිනස්ස එතදහොසි – ‘‘කහං නු ඛො භගවා එතරහි විහරතී’’ති? අද්දසා ඛො ආයස්මා මහාකප්පිනො භගවන්තං දිබ්බෙන චක්ඛුනා…පෙ… තෙජොධාතුං සමාපන්නං. දිස්වාන – සෙය්යථාපි නාම බලවා පුරිසො…පෙ… එවමෙව – ජෙතවනෙ අන්තරහිතො තස්මිං බ්රහ්මලොකෙ පාතුරහොසි. අථ ඛො ආයස්මා මහාකප්පිනො පච්ඡිමං දිසං නිස්සාය තස්ස බ්රහ්මුනො උපරි වෙහාසං පල්ලඞ්කෙන නිසීදි තෙජොධාතුං සමාපජ්ජිත්වා නීචතරං භගවතො. तेव्हा आयुष्यमान महाकप्पिनांच्या मनात असा विचार आला— 'भगवंत सध्या कोठे विहार करत आहेत?' आयुष्यमान महाकप्पिनांनी दिव्य चक्षूंनी...पे... तेजोधातू समाधीमध्ये लीन असलेल्या भगवंतांना पाहिले. ते पाहून— ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य...पे... त्याचप्रमाणे ते जेतवनातून अंतर्धान पावून त्या ब्रह्मलोकात प्रकट झाले. त्यानंतर आयुष्यमान महाकप्पिन पश्चिम दिशेचा आश्रय घेऊन, त्या ब्रह्माच्या वर आकाशात, भगवंतांपेक्षा काहीशा खालच्या पातळीवर, मांडी घालून तेजोधातू समाधीमध्ये लीन होऊन बसले. අථ ඛො ආයස්මතො අනුරුද්ධස්ස එතදහොසි – ‘‘කහං නු ඛො භගවා එතරහි විහරතී’’ති? අද්දසා ඛො ආයස්මා අනුරුද්ධො…පෙ… තෙජොධාතුං සමාපන්නං. දිස්වාන – සෙය්යථාපි නාම බලවා පුරිසො…පෙ… තස්මිං බ්රහ්මලොකෙ පාතුරහොසි. අථ ඛො ආයස්මා අනුරුද්ධො උත්තරං දිසං නිස්සාය තස්ස බ්රහ්මුනො උපරි වෙහාසං පල්ලඞ්කෙන නිසීදි තෙජොධාතුං සමාපජ්ජිත්වා නීචතරං භගවතො. तेव्हा आयुष्यमान अनुरुद्धांच्या मनात असा विचार आला— 'भगवंत सध्या कोठे विहार करत आहेत?' आयुष्यमान अनुरुद्धांनी...पे... तेजोधातू समाधीमध्ये लीन असलेल्या भगवंतांना पाहिले. ते पाहून— ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य...पे... त्या ब्रह्मलोकात प्रकट झाले. त्यानंतर आयुष्यमान अनुरुद्ध उत्तर दिशेचा आश्रय घेऊन, त्या ब्रह्माच्या वर आकाशात, भगवंतांपेक्षा काहीशा खालच्या पातळीवर, मांडी घालून तेजोधातू समाधीमध्ये लीन होऊन बसले. අථ ඛො ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො තං බ්රහ්මානං ගාථාය අජ්ඣභාසි – तेव्हा आयुष्यमान महामोग्गल्लानांनी त्या ब्रह्माला गाथेने संबोधित केले— ‘‘අජ්ජාපි තෙ ආවුසො සා දිට්ඨි, යා තෙ දිට්ඨි පුරෙ අහු; පස්සසි වීතිවත්තන්තං, බ්රහ්මලොකෙ පභස්සර’’න්ති. "हे मित्रा! तुझी जी दृष्टी (विचारसरणी) पूर्वी होती, तीच आजही आहे काय? ब्रह्मलोकातील सर्व तेजाला मागे टाकणारे भगवंतांचे हे दैदिप्यमान तेज तू पाहत आहेस ना?" ‘‘න මෙ මාරිස සා දිට්ඨි, යා මෙ දිට්ඨි පුරෙ අහු; පස්සාමි වීතිවත්තන්තං, බ්රහ්මලොකෙ පභස්සරං; ස්වාහං අජ්ජ කථං වජ්ජං, අහං නිච්චොම්හි සස්සතො’’ති. "हे महाशय! माझी जी दृष्टी पूर्वी होती, ती आता राहिलेली नाही. ब्रह्मलोकातील सर्व तेजाला मागे टाकणारे भगवंतांचे हे दैदिप्यमान तेज मी पाहत आहे. मग मी आज असे कसे म्हणू शकेन की— 'मी नित्य आहे, मी शाश्वत आहे'?" අථ [Pg.148] ඛො භගවා තං බ්රහ්මානං සංවෙජෙත්වා – සෙය්යථාපි නාම බලවා පුරිසො සමිඤ්ජිතං වා බාහං පසාරෙය්ය, පසාරිතං වා බාහං සමිඤ්ජෙය්ය එවමෙව – තස්මිං බ්රහ්මලොකෙ අන්තරහිතො ජෙතවනෙ පාතුරහොසි. අථ ඛො සො බ්රහ්මා අඤ්ඤතරං බ්රහ්මපාරිසජ්ජං ආමන්තෙසි – ‘‘එහි ත්වං, මාරිස, යෙනායස්මා මහාමොග්ගල්ලානො තෙනුපසඞ්කම; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං මහාමොග්ගල්ලානං එවං වදෙහි – ‘අත්ථි නු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, අඤ්ඤෙපි තස්ස භගවතො සාවකා එවංමහිද්ධිකා එවංමහානුභාවා; සෙය්යථාපි භවං මොග්ගල්ලානො කස්සපො කප්පිනො අනුරුද්ධො’’’ති? ‘‘එවං, මාරිසා’’ති ඛො සො බ්රහ්මපාරිසජ්ජො තස්ස බ්රහ්මුනො පටිස්සුත්වා යෙනායස්මා මහාමොග්ගල්ලානො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං මහාමොග්ගල්ලානං එතදවොච – ‘‘අත්ථි නු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, අඤ්ඤෙපි තස්ස භගවතො සාවකා එවංමහිද්ධිකා එවංමහානුභාවා; සෙය්යථාපි භවං මොග්ගල්ලානො කස්සපො කප්පිනො අනුරුද්ධො’’ති? අථ ඛො ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො තං බ්රහ්මපාරිසජ්ජං ගාථාය අජ්ඣභාසි – त्यानंतर भगवंतांनी त्या ब्रह्माच्या मनात संवेग निर्माण करून— ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य आपला दुमडलेला हात पसरतो किंवा पसरलेला हात दुमडतो, त्याचप्रमाणे त्या ब्रह्मलोकातून अंतर्धान पावून जेतवनात प्रकट झाले. त्यानंतर त्या ब्रह्माने आपल्या एका परिचारक ब्रह्माला (ब्रह्मपारिषदाला) बोलावले आणि म्हटले— 'मित्रा, इकडे ये. तू आयुष्यमान महामोग्गल्लानांकडे जा आणि त्यांना असे विचार— "हे महाशय मोग्गल्लान! भगवंतांचे इतरही असे शिष्य आहेत काय, जे महाशय मोग्गल्लान, कस्सप, कप्पिन आणि अनुरुद्ध यांच्यासारखेच महाऋद्धिवान आणि महानुभाव आहेत?"' त्या परिचारक ब्रह्माने 'तसेच असो, महाशय' असे म्हणून त्या ब्रह्माच्या शब्दाचा स्वीकार केला आणि तो आयुष्यमान महामोग्गल्लानांकडे गेला. तेथे जाऊन त्याने आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना विचारले— 'हे महाशय मोग्गल्लान! भगवंतांचे इतरही असे शिष्य आहेत काय, जे महाशय मोग्गल्लान, कस्सप, कप्पिन आणि अनुरुद्ध यांच्यासारखेच महाऋद्धिवान आणि महानुभाव आहेत?' तेव्हा आयुष्यमान महामोग्गल्लानांनी त्या परिचारक ब्रह्माला गाथेने उत्तर दिले— ‘‘තෙවිජ්ජා ඉද්ධිපත්තා ච, චෙතොපරියායකොවිදා; ඛීණාසවා අරහන්තො, බහූ බුද්ධස්ස සාවකා’’ති. "त्रिविद्या प्राप्त केलेले, ऋद्धी प्राप्त केलेले, इतरांच्या चित्ताचे विचार जाणण्यात कुशल, आसव नष्ट केलेले (क्षीणासव) आणि अर्हत असलेले बुद्धांचे अनेक शिष्य आहेत." අථ ඛො සො බ්රහ්මපාරිසජ්ජො ආයස්මතො මහාමොග්ගල්ලානස්ස භාසිතං අභිනන්දිත්වා අනුමොදිත්වා යෙන සො බ්රහ්මා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා තං බ්රහ්මානං එතදවොච – ‘‘ආයස්මා මාරිස, මහාමොග්ගල්ලානො එවමාහ – त्यानंतर तो परिचारक ब्रह्म आयुष्यमान महामोग्गल्लानांच्या भाषणाने अत्यंत आनंदित व प्रसन्न होऊन त्या महाब्रह्माकडे परत गेला. तेथे जाऊन त्याने त्या ब्रह्माला सांगितले— 'महाशय! आयुष्यमान महामोग्गल्लान असे म्हणाले आहेत— ‘‘තෙවිජ්ජා ඉද්ධිපත්තා ච, චෙතොපරියායකොවිදා; ඛීණාසවා අරහන්තො, බහූ බුද්ධස්ස සාවකා’’ති. 'त्रिविद्या प्राप्त केलेले, ऋद्धी प्राप्त केलेले, इतरांच्या चित्ताचे विचार जाणण्यात कुशल, आसव नष्ट केलेले (क्षीणासव) आणि अर्हत असलेले बुद्धांचे अनेक शिष्य आहेत.' ඉදමවොච සො බ්රහ්මපාරිසජ්ජො. අත්තමනො ච සො බ්රහ්මා තස්ස බ්රහ්මපාරිසජ්ජස්ස භාසිතං අභිනන්දීති. त्या परिचारक ब्रह्माने असे सांगितले. ते ऐकून तो महाब्रह्म अत्यंत प्रसन्न झाला आणि त्याने त्या परिचारक ब्रह्माच्या बोलण्याचे मनापासून स्वागत केले. 6. බ්රහ්මලොකසුත්තං ६. ब्रह्मलोकसुत्त 177. සාවත්ථිනිදානං. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා දිවාවිහාරගතො හොති පටිසල්ලීනො. අථ ඛො සුබ්රහ්මා ච පච්චෙකබ්රහ්මා සුද්ධාවාසො [Pg.149] ච පච්චෙකබ්රහ්මා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා පච්චෙකං ද්වාරබාහං උපනිස්සාය අට්ඨංසු. අථ ඛො සුබ්රහ්මා පච්චෙකබ්රහ්මා සුද්ධාවාසං පච්චෙකබ්රහ්මානං එතදවොච – ‘‘අකාලො ඛො තාව, මාරිස, භගවන්තං පයිරුපාසිතුං; දිවාවිහාරගතො භගවා පටිසල්ලීනො ච. අසුකො ච බ්රහ්මලොකො ඉද්ධො චෙව ඵීතො ච, බ්රහ්මා ච තත්ර පමාදවිහාරං විහරති. ආයාම, මාරිස, යෙන සො බ්රහ්මලොකො තෙනුපසඞ්කමිස්සාම; උපසඞ්කමිත්වා තං බ්රහ්මානං සංවෙජෙය්යාමා’’ති. ‘‘එවං, මාරිසා’’ති ඛො සුද්ධාවාසො පච්චෙකබ්රහ්මා සුබ්රහ්මුනො පච්චෙකබ්රහ්මුනො පච්චස්සොසි. १७७. श्रावस्ती येथील प्रसंग. त्या वेळी भगवान (दुपारच्या विश्रांतीसाठी) एकांतात ध्यानस्थ बसले होते. तेव्हा सुब्रह्मा नावाचे प्रत्येकब्रह्मा आणि शुद्धावास नावाचे प्रत्येकब्रह्मा जेथे भगवान होते तेथे आले; आणि आल्यावर गंधकुटीच्या दाराच्या चौकटीला टेकून एकेक बाजूला उभे राहिले. तेव्हा सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मांनी शुद्धावास प्रत्येकब्रह्मांना असे म्हटले – "हे मित्रा, भगवंतांच्या दर्शनाला जाण्याची ही योग्य वेळ नाही; कारण भगवान एकांतात ध्यानस्थ बसले आहेत. अमुक एक ब्रह्मलोक अत्यंत समृद्ध आणि वैभवशाली आहे, आणि तेथील ब्रह्मा प्रमादामध्ये (अविचारात/बेसावधपणे) काळ घालवत आहे. चल मित्रा, आपण त्या ब्रह्मलोकात जाऊ या; आणि तेथे जाऊन त्या ब्रह्माला संवेग (वैराग्य/जागृती) प्राप्त करून देऊ या." शुद्धावास प्रत्येकब्रह्मांनी सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मांच्या बोलण्याला संमती दिली, "तसेच असो, मित्रा." අථ ඛො සුබ්රහ්මා ච පච්චෙකබ්රහ්මා සුද්ධාවාසො ච පච්චෙකබ්රහ්මා – සෙය්යථාපි නාම බලවා පුරිසො…පෙ… එවමෙව – භගවතො පුරතො අන්තරහිතා තස්මිං බ්රහ්මලොකෙ පාතුරහෙසුං. අද්දසා ඛො සො බ්රහ්මා තෙ බ්රහ්මානො දූරතොව ආගච්ඡන්තෙ. දිස්වාන තෙ බ්රහ්මානො එතදවොච – ‘‘හන්ද කුතො නු තුම්හෙ, මාරිසා, ආගච්ඡථා’’ති? ‘‘ආගතා ඛො මයං, මාරිස, අම්හ තස්ස භගවතො සන්තිකා අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්ස. ගච්ඡෙය්යාසි පන ත්වං, මාරිස, තස්ස භගවතො උපට්ඨානං අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්සා’’ති? त्यानंतर सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मा आणि शुद्धावास प्रत्येकब्रह्मा – ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य (आपला दुमडलेला हात सहज पसरतो किंवा पसरलेला हात दुमडतो, त्याप्रमाणे) – भगवंतांच्या समोरून अंतर्धान पावले आणि त्या ब्रह्मलोकात प्रकट झाले. त्या ब्रह्माने त्या दोन्ही ब्रह्मांना दुरूनच येताना पाहिले. त्यांना पाहून तो म्हणाला, "मित्रांनो, तुम्ही आता कोठून येत आहात?" (त्यावर ते म्हणाले,) "मित्रा, आम्ही त्या अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवंतांच्या जवळून आलो आहोत. मित्रा, तू देखील त्या अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवंतांच्या सेवेसाठी (दर्शनासाठी) जायला हवे." එවං වුත්තො ඛො සො බ්රහ්මා තං වචනං අනධිවාසෙන්තො සහස්සක්ඛත්තුං අත්තානං අභිනිම්මිනිත්වා සුබ්රහ්මානං පච්චෙකබ්රහ්මානං එතදවොච – ‘‘පස්සසි මෙ නො ත්වං, මාරිස, එවරූපං ඉද්ධානුභාව’’න්ති? ‘‘පස්සාමි ඛො ත්යාහං, මාරිස, එවරූපං ඉද්ධානුභාව’’න්ති. ‘‘සො ඛ්වාහං, මාරිස, එවංමහිද්ධිකො එවංමහානුභාවො කස්ස අඤ්ඤස්ස සමණස්ස වා බ්රාහ්මණස්ස වා උපට්ඨානං ගමිස්සාමී’’ති? असे विचारल्यावर, तो ब्रह्मा त्यांचे बोलणे सहन न करू शकल्यामुळे, स्वतःची एक हजार रूपे निर्माण करून सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मांना म्हणाला, "मित्रा, तू माझा असा ऋद्धि-प्रभाव (चमत्कारिक शक्ती) पाहत आहेस की नाही?" (सुब्रह्मा म्हणाले,) "मित्रा, मी तुझा असा ऋद्धि-प्रभाव पाहत आहे." (तो ब्रह्मा म्हणाला,) "मित्रा, जेव्हा मी स्वतः इतका महा-ऋद्धिवान आणि महा-प्रभावशाली आहे, तेव्हा मी इतर कोणत्या श्रमणाची किंवा ब्राह्मणाची सेवा करण्यासाठी जाऊ?" අථ ඛො සුබ්රහ්මා පච්චෙකබ්රහ්මා ද්විසහස්සක්ඛත්තුං අත්තානං අභිනිම්මිනිත්වා තං බ්රහ්මානං එතදවොච – ‘‘පස්සසි මෙ නො ත්වං, මාරිස, එවරූපං ඉද්ධානුභාව’’න්ති? ‘‘පස්සාමි ඛො ත්යාහං, මාරිස, එවරූපං ඉද්ධානුභාව’’න්ති. ‘‘තයා ච ඛො, මාරිස, මයා ච ස්වෙව භගවා මහිද්ධිකතරො චෙව මහානුභාවතරො ච. ගච්ඡෙය්යාසි ත්වං, මාරිස, තස්ස භගවතො උපට්ඨානං අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්සා’’ති? අථ ඛො සො බ්රහ්මා සුබ්රහ්මානං පච්චෙකබ්රහ්මානං ගාථාය අජ්ඣභාසි – त्यानंतर सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मांनी स्वतःची दोन हजार रूपे निर्माण करून त्या ब्रह्माला विचारले, "मित्रा, तू माझा असा ऋद्धि-प्रभाव पाहत आहेस की नाही?" (तो म्हणाला,) "मित्रा, मी तुझा असा ऋद्धि-प्रभाव पाहत आहे." (सुब्रह्मा म्हणाले,) "मित्रा, तुझ्यापेक्षा आणि माझ्यापेक्षाही ते भगवान कितीतरी पटीने अधिक ऋद्धिवान आणि अधिक प्रभावशाली आहेत. मित्रा, तू त्या अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवंतांच्या सेवेसाठी जायलाच हवे." त्यानंतर त्या ब्रह्माने सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मांना गाथेने उत्तर दिले – ‘‘තයො [Pg.150] සුපණ්ණා චතුරො ච හංසා,බ්යග්ඝීනිසා පඤ්චසතා ච ඣායිනො; තයිදං විමානං ජලතෙ ච බ්රහ්මෙ,ඔභාසයං උත්තරස්සං දිසාය’’න්ති. "हे ब्रह्मा, ध्यानमग्न असलेल्या माझ्या या विमानामध्ये तीनशे गरुड, चारशे हंस आणि पाचशे वाघांसारखे प्राणी कोरलेले आहेत. हे माझे विमान उत्तर देशात प्रकाशित होत तळपत आहे." ‘‘කිඤ්චාපි තෙ තං ජලතෙ විමානං,ඔභාසයං උත්තරස්සං දිසායං; රූපෙ රණං දිස්වා සදා පවෙධිතං,තස්මා න රූපෙ රමතී සුමෙධො’’ති. "जरी तुझे हे विमान उत्तर दिशेला प्रकाशित करत तळपत असले, तरी रूपामध्ये दोष (उत्पत्ती, जरा आणि नाश) पाहून आणि ते नेहमी कंपायमान (अस्थिर) असल्याचे पाहून, सुज्ञ मनुष्य रूपामध्ये रमत नाही." අථ ඛො සුබ්රහ්මා ච පච්චෙකබ්රහ්මා සුද්ධාවාසො ච පච්චෙකබ්රහ්මා තං බ්රහ්මානං සංවෙජෙත්වා තත්ථෙවන්තරධායිංසු. අගමාසි ච ඛො සො බ්රහ්මා අපරෙන සමයෙන භගවතො උපට්ඨානං අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්සාති. त्यानंतर सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मा आणि शुद्धावास प्रत्येकब्रह्मा त्या ब्रह्माला संवेग (जागृती) प्राप्त करून देऊन तेथेच अंतर्धान पावले. आणि नंतरच्या काळात तो ब्रह्मा त्या अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवंतांच्या सेवेसाठी (दर्शनासाठी) गेला. 7. කොකාලිකසුත්තං ७. कोकालिक सुत्त 178. සාවත්ථිනිදානං. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා දිවාවිහාරගතො හොති පටිසල්ලීනො. අථ ඛො සුබ්රහ්මා ච පච්චෙකබ්රහ්මා සුද්ධාවාසො ච පච්චෙකබ්රහ්මා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා පච්චෙකං ද්වාරබාහං නිස්සාය අට්ඨංසු. අථ ඛො සුබ්රහ්මා පච්චෙකබ්රහ්මා කොකාලිකං භික්ඛුං ආරබ්භ භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – १७८. श्रावस्ती येथील प्रसंग. त्या वेळी भगवान एकांतात ध्यानस्थ बसले होते. तेव्हा सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मा आणि शुद्धावास प्रत्येकब्रह्मा जेथे भगवान होते तेथे आले; आणि आल्यावर गंधकुटीच्या दाराच्या चौकटीला टेकून एकेक बाजूला उभे राहिले. तेव्हा सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मांनी कोकालिक भिक्खूला उद्देशून भगवंतांच्या समोर ही गाथा म्हटली – ‘‘අප්පමෙය්යං පමිනන්තො, කොධ විද්වා විකප්පයෙ; අප්පමෙය්යං පමායිනං, නිවුතං තං මඤ්ඤෙ පුථුජ්ජන’’න්ති. "अपरिमित (मापन न करता येणाऱ्या क्षीणास्रव) व्यक्तीचे मापन करणारा कोणता सुज्ञ मनुष्य येथे तर्क करेल? जो कोणी त्या अपरिमित व्यक्तीचे मापन करण्याचा प्रयत्न करतो, तो अज्ञानाने झाकलेला सामान्य मनुष्य (पुथुज्जन) आहे असे आम्ही मानतो." 8. කතමොදකතිස්සසුත්තං ८. कतमोदकतिस्स सुत्त 179. සාවත්ථිනිදානං. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා දිවාවිහාරගතො හොති පටිසල්ලීනො. අථ ඛො සුබ්රහ්මා ච පච්චෙකබ්රහ්මා සුද්ධාවාසො ච පච්චෙකබ්රහ්මා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා පච්චෙකං ද්වාරබාහං නිස්සාය අට්ඨංසු. අථ ඛො සුද්ධාවාසො පච්චෙකබ්රහ්මා කතමොදකතිස්සකං භික්ඛුං ආරබ්භ භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – १७९. श्रावस्ती येथील प्रसंग. त्या वेळी भगवान एकांतात ध्यानस्थ बसले होते. तेव्हा सुब्रह्मा प्रत्येकब्रह्मा आणि शुद्धावास प्रत्येकब्रह्मा जेथे भगवान होते तेथे आले; आणि आल्यावर गंधकुटीच्या दाराच्या चौकटीला टेकून एकेक बाजूला उभे राहिले. तेव्हा शुद्धावास प्रत्येकब्रह्मांनी कतमोदकतिस्सक भिक्खूला उद्देशून भगवंतांच्या समोर ही गाथा म्हटली – ‘‘අප්පමෙය්යං [Pg.151] පමිනන්තො, කොධ විද්වා විකප්පයෙ; අප්පමෙය්යං පමායිනං, නිවුතං තං මඤ්ඤෙ අකිස්සව’’න්ති. "अपरिमित (मापन न करता येणाऱ्या क्षीणास्रव) व्यक्तीचे मापन करणारा कोणता सुज्ञ मनुष्य येथे तर्क करेल? जो कोणी त्या अपरिमित व्यक्तीचे मापन करण्याचा प्रयत्न करतो, तो अज्ञानाने झाकलेला प्रज्ञाहीन मनुष्य आहे असे आम्ही मानतो." 9. තුරූබ්රහ්මසුත්තං ९. तुरुब्रह्म सुत्त 180. සාවත්ථිනිදානං. තෙන ඛො පන සමයෙන කොකාලිකො භික්ඛු ආබාධිකො හොති දුක්ඛිතො බාළ්හගිලානො. අථ ඛො තුරූ පච්චෙකබ්රහ්මා අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණො කෙවලකප්පං ජෙතවනං ඔභාසෙත්වා යෙන කොකාලිකො භික්ඛු තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා වෙහාසං ඨිතො කොකාලිකං භික්ඛුං එතදවොච – ‘‘පසාදෙහි, කොකාලික, සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානෙසු චිත්තං. පෙසලා සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානා’’ති. ‘‘කොසි ත්වං, ආවුසො’’ති? ‘‘අහං තුරූ පච්චෙකබ්රහ්මා’’ති. ‘‘නනු ත්වං, ආවුසො, භගවතා අනාගාමී බ්යාකතො, අථ කිඤ්චරහි ඉධාගතො? පස්ස, යාවඤ්ච තෙ ඉදං අපරද්ධ’’න්ති. १८०. श्रावस्ती येथील प्रसंग. त्या वेळी कोकालिक भिक्खू आजारी, अत्यंत कष्टी आणि गंभीर आजाराने ग्रस्त होते. तेव्हा रात्रीच्या उत्तरप्रहरी, अत्यंत तेजस्वी कांती असलेले तुरु प्रत्येकब्रह्मा संपूर्ण जेतवन आपल्या प्रकाशाने उजळून टाकत जेथे कोकालिक भिक्खू होते तेथे आले. तेथे आल्यावर आकाशात उभे राहून त्यांनी कोकालिक भिक्खूला असे म्हटले – "कोकालिका, सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान यांच्याविषयी मनात आदर (प्रसन्नता) ठेव. सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान हे शीलवान आहेत." (कोकालिक म्हणाला,) "मित्रा, तू कोण आहेस?" (ते म्हणाले,) "मी तुरु प्रत्येकब्रह्मा आहे." (कोकालिक म्हणाला,) "मित्रा, भगवंतांनी तुला अनागामी म्हणून घोषित केले नव्हते का? मग तू येथे कशासाठी आलास? बघ, तुझा हा किती मोठा अपराध आहे!" ‘‘පුරිසස්ස හි ජාතස්ස, කුඨාරී ජායතෙ මුඛෙ; යාය ඡින්දති අත්තානං, බාලො දුබ්භාසිතං භණං. "मनुष्य जन्माला येतो तेव्हा त्याच्या मुखात एक कुऱ्हाडच जन्माला येते, जिच्याद्वारे तो मूर्ख मनुष्य अपशब्द बोलून स्वतःचाच घात करतो." ‘‘යො නින්දියං පසංසති,තං වා නින්දති යො පසංසියො; විචිනාති මුඛෙන සො කලිං,කලිනා තෙන සුඛං න වින්දති. "जो निंदनीय व्यक्तीची प्रशंसा करतो किंवा जो प्रशंसनीय व्यक्तीची निंदा करतो, तो आपल्या मुखाने पाप गोळा करतो; आणि त्या पापामुळे त्याला कधीही सुख मिळत नाही." ‘‘අප්පමත්තකො අයං කලි,යො අක්ඛෙසු ධනපරාජයො; සබ්බස්සාපි සහාපි අත්තනා,අයමෙව මහන්තතරො කලි; යො සුගතෙසු මනං පදොසයෙ. "द्यूतामध्ये (जुगारात) स्वतःच्या सर्व संपत्तीसह स्वतःचाही पराजय होणे, हा अगदी लहान दोष (पाप) आहे; परंतु सुगतांच्या (सत्पुरुषांच्या) प्रति मनात द्वेष बाळगणे, हा त्याहूनही अत्यंत मोठा दोष (पाप) आहे." ‘‘සතං සහස්සානං නිරබ්බුදානං,ඡත්තිංසති පඤ්ච ච අබ්බුදානි; යමරියගරහී නිරයං උපෙති,වාචං මනඤ්ච පණිධාය පාපක’’න්ති. "जो मनुष्य मनात आणि वाणीत पाप ठेवून आर्यांची (सत्पुरुषांची) निंदा करतो, तो एक लाख छत्तीस निरब्बुद आणि पाच अब्बुद वर्षांपर्यंत नरकात यातना भोगतो." 10. කොකාලිකසුත්තං १०. कोकालिक सुत्त 181. සාවත්ථිනිදානං[Pg.152]. අථ ඛො කොකාලිකො භික්ඛු යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො කොකාලිකො භික්ඛු භගවන්තං එතදවොච – ‘‘පාපිච්ඡා, භන්තෙ, සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානා පාපිකානං ඉච්ඡානං වසං ගතා’’ති. එවං වුත්තෙ, භගවා කොකාලිකං භික්ඛුං එතදවොච – ‘‘මා හෙවං, කොකාලික, අවච; මා හෙවං, කොකාලික, අවච. පසාදෙහි, කොකාලික, සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානෙසු චිත්තං. පෙසලා සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානා’’ති. දුතියම්පි ඛො කොකාලිකො භික්ඛු භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කිඤ්චාපි මෙ, භන්තෙ, භගවා සද්ධායිකො පච්චයිකො; අථ ඛො පාපිච්ඡාව භන්තෙ, සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානා පාපිකානං ඉච්ඡානං වසං ගතා’’ති. දුතියම්පි ඛො භගවා කොකාලිකං භික්ඛුං එතදවොච – ‘‘මා හෙවං, කොකාලික, අවච; මා හෙවං, කොකාලික, අවච. පසාදෙහි, කොකාලික, සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානෙසු චිත්තං. පෙසලා සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානා’’ති. තතියම්පි ඛො කොකාලිකො භික්ඛු භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කිඤ්චාපි…පෙ… ඉච්ඡානං වසං ගතා’’ති. තතියම්පි ඛො භගවා කොකාලිකං භික්ඛුං එතදවොච – ‘‘මා හෙවං…පෙ… පෙසලා සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානා’’ති. १८१. श्रावस्ती येथील प्रसंग. तेव्हा कोकालिक भिक्खू जेथे भगवान होते तेथे गेला; आणि भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या कोकालिक भिक्खूने भगवंतांना असे म्हटले – "भंते, सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान हे पाप-इच्छा बाळगणारे (वाईट वासना असलेले) आहेत; ते वाईट वासनांच्या आहारी गेले आहेत." असे म्हटले असता, भगवान कोकालिक भिक्खूला म्हणाले – "कोकालिका, असे बोलू नकोस! कोकालिका, असे बोलू नकोस! कोकालिका, सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान यांच्याविषयी मनात श्रद्धा (प्रसन्नता) निर्माण कर. सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान हे शीलवान (सदाचारी) आहेत." दुसऱ्यांदाही कोकालिक भिक्खूने भगवंतांना असे म्हटले – "भंते, जरी भगवंतांवर माझी पूर्ण श्रद्धा आणि विश्वास असला, तरीही भंते, सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान हे पाप-इच्छा बाळगणारेच आहेत; ते वाईट वासनांच्या आहारी गेले आहेत." दुसऱ्यांदाही भगवंतांनी कोकालिक भिक्खूला असे म्हटले – "कोकालिका, असे बोलू नकोस! कोकालिका, असे बोलू नकोस! कोकालिका, सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान यांच्याविषयी मनात श्रद्धा निर्माण कर. सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान हे शीलवान आहेत." तिसऱ्यांदाही कोकालिक भिक्खूने भगवंतांना असे म्हटले – "भंते, जरी... (पूर्ववत) ...वाईट वासनांच्या आहारी गेले आहेत." तिसऱ्यांदाही भगवंतांनी कोकालिक भिक्खूला असे म्हटले – "कोकालिका, असे बोलू नकोस... (पूर्ववत) ...सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान हे शीलवान आहेत." අථ ඛො කොකාලිකො භික්ඛු උට්ඨායාසනා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා පක්කාමි. අචිරපක්කන්තස්ස ච කොකාලිකස්ස භික්ඛුනො සාසපමත්තීහි පීළකාහි සබ්බො කායො ඵුටො අහොසි. සාසපමත්තියො හුත්වා මුග්ගමත්තියො අහෙසුං, මුග්ගමත්තියො හුත්වා කලායමත්තියො අහෙසුං, කලායමත්තියො හුත්වා කොලට්ඨිමත්තියො අහෙසුං, කොලට්ඨිමත්තියො හුත්වා කොලමත්තියො අහෙසුං, කොලමත්තියො හුත්වා ආමලකමත්තියො අහෙසුං, ආමලකමත්තියො හුත්වා බෙලුවසලාටුකමත්තියො අහෙසුං, බෙලුවසලාටුකමත්තියො හුත්වා බිල්ලමත්තියො අහෙසුං, බිල්ලමත්තියො හුත්වා පභිජ්ජිංසු. පුබ්බඤ්ච ලොහිතඤ්ච පග්ඝරිංසු. අථ ඛො කොකාලිකො භික්ඛු තෙනෙව ආබාධෙන කාලමකාසි. කාලඞ්කතො ච කොකාලිකො භික්ඛු පදුමං නිරයං උපපජ්ජි සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානෙසු චිත්තං ආඝාතෙත්වා. त्यानंतर कोकालिक भिक्खू आपल्या आसनावरून उठला, भगवंतांना अभिवादन केले आणि प्रदक्षिणा घालून निघून गेला. कोकालिक भिक्खू निघून गेल्यावर फार वेळ झाला नव्हता, तोच त्याच्या संपूर्ण शरीरावर मोहरीच्या दाण्यांच्या आकाराचे फोड आले. मोहरीच्या दाण्यांच्या आकाराचे असलेले ते फोड वाढून मुगाच्या दाण्याएवढे झाले; मुगाच्या दाण्याएवढे वाढून ते वाटाण्याएवढे झाले; वाटाण्याएवढे वाढून ते बोराच्या बियांच्या आकाराचे झाले; बोराच्या बियांच्या आकाराचे वाढून ते बोराएवढे झाले; बोराएवढे वाढून ते आवळ्याएवढे झाले; आवळ्याएवढे वाढून ते बेलफळाच्या कोवळ्या फळाएवढे झाले; बेलफळाच्या कोवळ्या फळाएवढे वाढून ते मोठ्या बेलफळाएवढे झाले; आणि मोठ्या बेलफळाएवढे झाल्यावर ते फुटले. त्यातून पू आणि रक्त वाहू लागले. त्यानंतर कोकालिक भिक्खूचा त्याच आजाराने मृत्यू झाला. मृत्यू पावल्यावर, सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान यांच्याविषयी मनात द्वेष बाळगल्यामुळे, कोकालिक भिक्खू 'पदुम' (पद्म) निरयात (नरकात) उत्पन्न झाला. අථ [Pg.153] ඛො බ්රහ්මා සහම්පති අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණො කෙවලකප්පං ජෙතවනං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතො ඛො බ්රහ්මා සහම්පති භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කොකාලිකො, භන්තෙ, භික්ඛු කාලඞ්කතො. කාලඞ්කතො ච, භන්තෙ, කොකාලිකො භික්ඛු පදුමං නිරයං උපපන්නො සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානෙසු චිත්තං ආඝාතෙත්වා’’ති. ඉදමවොච බ්රහ්මා සහම්පති, ඉදං වත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා තත්ථෙවන්තරධායීති. त्यानंतर, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, अत्यंत देदीप्यमान कांती असलेल्या सहम्पती ब्रह्माने संपूर्ण जेतवन आपल्या प्रभेने प्रकाशित केले आणि तो जेथे भगवान होते तेथे आला; आल्यावर भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेल्या सहम्पती ब्रह्माने भगवंतांना असे म्हटले – "भंते, कोकालिक भिक्खूचा मृत्यू झाला आहे. आणि भंते, मृत्यू पावलेला कोकालिक भिक्खू, सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान यांच्याविषयी मनात द्वेष बाळगल्यामुळे, पदुम निरयात उत्पन्न झाला आहे." सहम्पती ब्रह्माने असे म्हटले. हे बोलून, भगवंतांना अभिवादन करून व प्रदक्षिणा घालून तो तेथेच अंतर्धान पावला. අථ ඛො භගවා තස්සා රත්තියා අච්චයෙන භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘ඉමං, භික්ඛවෙ, රත්තිං බ්රහ්මා සහම්පති අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණො කෙවලකප්පං ජෙතවනං ඔභාසෙත්වා යෙනාහං තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා මං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතො ඛො, භික්ඛවෙ, බ්රහ්මා සහම්පති මං එතදවොච – ‘කොකාලිකො, භන්තෙ, භික්ඛු කාලඞ්කතො. කාලඞ්කතො ච, භන්තෙ, කොකාලිකො භික්ඛු පදුමං නිරයං උපපන්නො සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානෙසු චිත්තං ආඝාතෙත්වා’ති. ඉදමවොච, භික්ඛවෙ, බ්රහ්මා සහම්පති, ඉදං වත්වා මං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා තත්ථෙවන්තරධායී’’ති. त्यानंतर ती रात्र संपल्यावर भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – "भिक्खूंनो, आज रात्री, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, अत्यंत देदीप्यमान कांती असलेल्या सहम्पती ब्रह्माने संपूर्ण जेतवन आपल्या प्रभेने प्रकाशित केले आणि तो जेथे मी होतो तेथे आला; आल्यावर मला अभिवादन करून तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेल्या सहम्पती ब्रह्माने मला असे म्हटले – 'भंते, कोकालिक भिक्खूचा मृत्यू झाला आहे. आणि भंते, मृत्यू पावलेला कोकालिक भिक्खू, सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान यांच्याविषयी मनात द्वेष बाळगल्यामुळे, पदुम निरयात उत्पन्न झाला आहे.' भिक्खूंनो, सहम्पती ब्रह्माने असे म्हटले. हे बोलून, मला अभिवादन करून व प्रदक्षिणा घालून तो तेथेच अंतर्धान पावला." එවං වුත්තෙ, අඤ්ඤතරො භික්ඛු භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කීවදීඝං නු ඛො, භන්තෙ, පදුමෙ නිරයෙ ආයුප්පමාණ’’න්ති? ‘‘දීඝං ඛො, භික්ඛු, පදුමෙ නිරයෙ ආයුප්පමාණං. තං න සුකරං සඞ්ඛාතුං – එත්තකානි වස්සානි ඉති වා, එත්තකානි වස්සසතානි ඉති වා, එත්තකානි වස්සසහස්සානි ඉති වා, එත්තකානි වස්සසතසහස්සානි ඉති වා’’ති. ‘‘සක්කා පන, භන්තෙ, උපමං කාතු’’න්ති? ‘‘සක්කා, භික්ඛූ’’ති භගවා අවොච – असे म्हटले असता, एका भिक्खूने भगवंतांना विचारले – "भंते, पदुम निरयातील आयुष्याचे प्रमाण किती मोठे (दीर्घ) आहे?" "भिक्खू, पदुम निरयातील आयुष्याचे प्रमाण अत्यंत दीर्घ आहे. त्याचे मोजमाप करणे सोपे नाही – की ते इतकी वर्षे आहे, किंवा इतकी शेकडो वर्षे आहे, किंवा इतकी हजारो वर्षे आहे, किंवा इतकी लाखो वर्षे आहे." "भंते, मग एखादी उपमा देऊन ते स्पष्ट करता येईल का?" "शक्य आहे, भिक्खू," भगवान म्हणाले – ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛු වීසතිඛාරිකො කොසලකො තිලවාහො. තතො පුරිසො වස්සසතස්ස වස්සසතස්ස අච්චයෙන එකමෙකං තිලං උද්ධරෙය්ය; ඛිප්පතරං ඛො සො, භික්ඛු, වීසතිඛාරිකො කොසලකො තිලවාහො ඉමිනා උපක්කමෙන පරික්ඛයං පරියාදානං ගච්ඡෙය්ය, න ත්වෙව එකො අබ්බුදො නිරයො. සෙය්යථාපි, භික්ඛු, වීසති අබ්බුදා නිරයා, එවමෙකො නිරබ්බුදනිරයො. සෙය්යථාපි, භික්ඛු, වීසති නිරබ්බුදා නිරයා, එවමෙකො අබබො නිරයො. සෙය්යථාපි, භික්ඛු, වීසති අබබා නිරයා, එවමෙකො [Pg.154] අටටො නිරයො. සෙය්යථාපි, භික්ඛු, වීසති අටටා නිරයා, එවමෙකො අහහො නිරයො. සෙය්යථාපි, භික්ඛු, වීසති අහහා නිරයා, එවමෙකො කුමුදො නිරයො. සෙය්යථාපි, භික්ඛු, වීසති කුමුදා නිරයා, එවමෙකො සොගන්ධිකො නිරයො. සෙය්යථාපි, භික්ඛු, වීසති සොගන්ධිකා නිරයා, එවමෙකො උප්පලනිරයො. සෙය්යථාපි, භික්ඛු, වීසති උප්පලා නිරයා, එවමෙකො පුණ්ඩරිකො නිරයො. සෙය්යථාපි, භික්ඛු, වීසති පුණ්ඩරිකා නිරයා, එවමෙකො පදුමො නිරයො. පදුමෙ පන, භික්ඛු, නිරයෙ කොකාලිකො භික්ඛු උපපන්නො සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානෙසු චිත්තං ආඝාතෙත්වා’’ති. ඉදමවොච භගවා, ඉදං වත්වාන සුගතො අථාපරං එතදවොච සත්ථා – "समजा, भिक्खू, कोसल देशातील वीस खारी (एक माप) क्षमतेची तिळाने भरलेली एक गाडी आहे. त्यातून एखाद्या माणसाने दर शंभर वर्षांनी एक-एक तिळाचा दाणा बाहेर काढला; तर भिक्खू, या प्रयत्नाने ती वीस खारी क्षमतेची कोसल देशातील तिळाची गाडी अधिक वेगाने रिकामी होईल आणि संपून जाईल, परंतु एका 'अब्बुद' निरयाचा काळ संपणार नाही. भिक्खू, समजा वीस अब्बुद निरय म्हणजे एक 'निरब्बुद' निरय; वीस निरब्बुद निरय म्हणजे एक 'अबब' निरय; वीस अबब निरय म्हणजे एक 'अटट' निरय; वीस अटट निरय म्हणजे एक 'अहह' निरय; वीस अहह निरय म्हणजे एक 'कुमुद' निरय; वीस कुमुद निरय म्हणजे एक 'सोगंधिक' निरय; वीस सोगंधिक निरय म्हणजे एक 'उप्पल' निरय; वीस उप्पल निरय म्हणजे एक 'पुंडरीक' निरय; आणि वीस पुंडरीक निरय म्हणजे एक 'पदुम' निरय होय. आणि भिक्खू, कोकालिक भिक्खू सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान यांच्याविषयी मनात द्वेष बाळगल्यामुळे याच पदुम निरयात उत्पन्न झाला आहे." भगवंतांनी असे म्हटले. हे बोलून सुगतांनी, शास्त्यांनी पुढे असे म्हटले – ‘‘පුරිසස්ස හි ජාතස්ස,කුඨාරී ජායතෙ මුඛෙ; යාය ඡින්දති අත්තානං,බාලො දුබ්භාසිතං භණං. "जन्म घेणाऱ्या प्रत्येक माणसाच्या मुखात जणू एक कुऱ्हाडच जन्माला येते; जिच्याद्वारे तो मूर्ख माणूस अपशब्द (वाईट शब्द) बोलून स्वतःलाच कापून काढतो (स्वतःचाच नाश करतो)." ‘‘යො නින්දියං පසංසති,තං වා නින්දති යො පසංසියො; විචිනාති මුඛෙන සො කලිං,කලිනා තෙන සුඛං න වින්දති. "जो निंदनीय व्यक्तीची प्रशंसा करतो, किंवा जो प्रशंसनीय व्यक्तीची निंदा करतो; तो मूर्ख माणूस आपल्या मुखाने पाप (कलह/अकल्याण) गोळा करतो, आणि त्या पापामुळे त्याला कधीही सुख मिळत नाही." ‘‘අප්පමත්තකො අයං කලි,යො අක්ඛෙසු ධනපරාජයො; සබ්බස්සාපි සහාපි අත්තනා,අයමෙව මහන්තරො කලි; යො සුගතෙසු මනං පදොසයෙ. "फाशांच्या खेळात (जुगारात) स्वतःच्या सर्वस्वाचा आणि संपत्तीचा पराभव (नाश) होणे हा अगदी लहान (नगण्य) दोष (अपराध) आहे. परंतु, जो सुगतांच्या (बुद्धांच्या) प्रति मनात द्वेष निर्माण करतो, हाच त्याहूनही मोठा दोष (अपराध) आहे." ‘‘සතං සහස්සානං නිරබ්බුදානං,ඡත්තිංසති පඤ්ච ච අබ්බුදානි; යමරියගරහී නිරයං උපෙති,වාචං මනඤ්ච පණිධාය පාපක’’න්ති. "वाईट वाणी आणि वाईट मन ठेवून आर्यांची निंदा करणारा मूर्ख मनुष्य ज्या नरकात पडतो, तेथे त्याचे आयुष्य एक लाख छत्तीस निरब्बुद आणि पाच अब्बुद वर्षांचे असते." පඨමො වග්ගො. पहिला वर्ग (वग्ग) समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याचे उद्दान (अनुक्रमणिका) – ආයාචනං [Pg.155] ගාරවො බ්රහ්මදෙවො,බකො ච බ්රහ්මා අපරා ච දිට්ඨි; පමාදකොකාලිකතිස්සකො ච,තුරූ ච බ්රහ්මා අපරො ච කොකාලිකොති. आयाचन सुत्त, गारव सुत्त, ब्रह्मदेव सुत्त, बक ब्रह्म सुत्त, दुसरे दिट्ठि सुत्त, पमाद सुत्त, कोकालिक सुत्त, तिस्सक सुत्त, तुरु ब्रह्म सुत्त आणि दुसरे कोकालिक सुत्त; असे हे दहा सुत्त आहेत. 2. දුතියවග්ගො २. दुसरा वर्ग (दुतिय वग्ग) 1. සනඞ්කුමාරසුත්තං १. सनंकुमार सुत्त 182. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති සප්පිනීතීරෙ. අථ ඛො බ්රහ්මා සනඞ්කුමාරො අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණො කෙවලකප්පං සප්පිනීතීරං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතො ඛො බ්රහ්මා සනඞ්කුමාරො භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – १८२. "मी असे ऐकले आहे – एक वेळ भगवान राजगृह येथे सप्पिनी नदीच्या काठावर विहार करत होते. तेव्हा, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, अत्यंत देदीप्यमान कांती असलेला सनंकुमार ब्रह्मा संपूर्ण सप्पिनी नदीचा काठ आपल्या प्रकाशाने उजळून टाकत भगवंतांकडे आला. जवळ येऊन त्याने भगवंतांना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेला सनंकुमार ब्रह्मा भगवंतांच्या सन्मुख ही गाथा म्हणाला –" ‘‘ඛත්තියො සෙට්ඨො ජනෙතස්මිං, යෙ ගොත්තපටිසාරිනො; විජ්ජාචරණසම්පන්නො, සො සෙට්ඨො දෙවමානුසෙ’’ති. "जे लोक कुळगोत्राचा विचार करतात, त्या लोकांमध्ये क्षत्रिय श्रेष्ठ आहे. परंतु जो विद्या आणि चरणाने (ज्ञानाने व शील-सदाचाराने) संपन्न आहे, तो देव आणि मनुष्यांमध्ये श्रेष्ठ आहे." ඉදමවොච බ්රහ්මා සනඞ්කුමාරො. සමනුඤ්ඤො සත්ථා අහොසි. අථ ඛො බ්රහ්මා සනඞ්කුමාරො ‘‘සමනුඤ්ඤො මෙ සත්ථා’’ති භගවන්තං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා තත්ථෙවන්තරධායීති. सनंकुमार ब्रह्मा असे म्हणाला. शास्त्यांनी (बुद्धांनी) याला संमती दिली. तेव्हा 'शास्त्यांनी मला संमती दिली आहे' असे जाणून सनंकुमार ब्रह्माने भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि तो तेथेच अंतर्धान पावला. 2. දෙවදත්තසුත්තං २. देवदत्त सुत्त 183. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති ගිජ්ඣකූටෙ පබ්බතෙ අචිරපක්කන්තෙ දෙවදත්තෙ. අථ ඛො බ්රහ්මා සහම්පති අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණො කෙවලකප්පං ගිජ්ඣකූටං පබ්බතං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතො ඛො බ්රහ්මා සහම්පති දෙවදත්තං ආරබ්භ භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – १८३. "मी असे ऐकले आहे – एक वेळ भगवान राजगृह येथे गिद्धकूट पर्वतावर विहार करत होते. देवदत्त निघून गेल्याला फार काळ झाला नव्हता. तेव्हा, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, अत्यंत देदीप्यमान कांती असलेला सहम्पती ब्रह्मा संपूर्ण गिद्धकूट पर्वत आपल्या प्रकाशाने उजळून टाकत भगवंतांकडे आला. जवळ येऊन त्याने भगवंतांना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेला सहम्पती ब्रह्मा देवदत्ताचा संदर्भ देऊन भगवंतांच्या सन्मुख ही गाथा म्हणाला –" ‘‘ඵලං [Pg.156] වෙ කදලිං හන්ති, ඵලං වෙළුං ඵලං නළං; සක්කාරො කාපුරිසං හන්ති, ගබ්භො අස්සතරිං යථා’’ති. "ज्याप्रमाणे केळीला तिचे फळ नष्ट करते, बांबूला त्याचे फळ नष्ट करते, लव्हाळ्याला (नळाला) त्याचे फळ नष्ट करते आणि खेचरीला (अस्सतरीला) तिचा गर्भ नष्ट करतो; त्याचप्रमाणे सत्कार-सन्मान दुर्जन माणसाचा नाश करतो." 3. අන්ධකවින්දසුත්තං ३. अंधकविन्द सुत्त 184. එකං සමයං භගවා මාගධෙසු විහරති අන්ධකවින්දෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා රත්තන්ධකාරතිමිසායං අබ්භොකාසෙ නිසින්නො හොති, දෙවො ච එකමෙකං ඵුසායති. අථ ඛො බ්රහ්මා සහම්පති අභික්කන්තාය රත්තියා අභික්කන්තවණ්ණො කෙවලකප්පං අන්ධකවින්දං ඔභාසෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතො ඛො බ්රහ්මා සහම්පති භගවතො සන්තිකෙ ඉමා ගාථායො අභාසි – १८४. "एक वेळ भगवान मगध देशातील अंधकविन्द येथे विहार करत होते. त्या वेळी भगवान रात्रीच्या घनदाट अंधारात उघड्या जागेवर बसले होते आणि पावसाचे थेंब पडत होते. तेव्हा, रात्र बरीच उलटून गेल्यावर, अत्यंत देदीप्यमान कांती असलेला सहम्पती ब्रह्मा संपूर्ण अंधकविन्द गाव आपल्या प्रकाशाने उजळून टाकत भगवंतांकडे आला. जवळ येऊन त्याने भगवंतांना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेला सहम्पती ब्रह्मा भगवंतांच्या सन्मुख या गाथा म्हणाला –" ‘‘සෙවෙථ පන්තානි සෙනාසනානි,චරෙය්ය සංයොජනවිප්පමොක්ඛා; සචෙ රතිං නාධිගච්ඡෙය්ය තත්ථ,සඞ්ඝෙ වසෙ රක්ඛිතත්තො සතීමා. "भिक्खूने एकांत व निर्जन अशा शयनासनांचा (निवासस्थानांचा) आश्रय घ्यावा आणि संयोजनांपासून (बंधनांपासून) मुक्त होण्यासाठी साधना करावी. जर त्याला तेथे मन रमवता आले नाही, तर त्याने स्वतःचे रक्षण करत आणि स्मृतिमान (जागरूक) राहून संघात राहावे." ‘‘කුලාකුලං පිණ්ඩිකාය චරන්තො,ඉන්ද්රියගුත්තො නිපකො සතීමා; සෙවෙථ පන්තානි සෙනාසනානි,භයා පමුත්තො අභයෙ විමුත්තො. "घरोघरी भिक्षेसाठी फिरताना, आपल्या इंद्रियांवर ताबा ठेवून, प्रज्ञावान आणि स्मृतिमान राहून, त्याने एकांत शयनासनांचा आश्रय घ्यावा; संसाराच्या भयापासून मुक्त होऊन अभय अशा निर्वाणात विमुक्त व्हावे." ‘‘යත්ථ භෙරවා සරීසපා,විජ්ජු සඤ්චරති ථනයති දෙවො; අන්ධකාරතිමිසාය රත්තියා,නිසීදි තත්ථ භික්ඛු විගතලොමහංසො. "जिथे भयंकर प्राणी आणि सर्प असतात, जेथे रात्रीच्या घनदाट अंधारात विजा चमकतात आणि ढग गडगडतात, अशा ठिकाणी भिक्खू रोमांचरहित (भयमुक्त) होऊन बसतो." ‘‘ඉදඤ්හි ජාතු මෙ දිට්ඨං, නයිදං ඉතිහීතිහං; එකස්මිං බ්රහ්මචරියස්මිං, සහස්සං මච්චුහායිනං. "हे मी स्वतः पाहिले आहे, हे केवळ ऐकीव नाही; एकाच ब्रह्मचर्यात (धम्मशासनात) हजारो भिक्खूंनी मृत्यूवर विजय मिळवला आहे (ते अर्हत झाले आहेत)." ‘‘භිය්යො පඤ්චසතා සෙක්ඛා, දසා ච දසධා දස; සබ්බෙ සොතසමාපන්නා, අතිරච්ඡානගාමිනො. "त्याहून अधिक पाचशे शैक्ष आहेत, आणि ११० स्रोतापन्न आहेत, जे सर्व दुर्गतीला न जाणारे आहेत." ‘‘අථායං [Pg.157] ඉතරා පජා, පුඤ්ඤභාගාති මෙ මනො; සඞ්ඛාතුං නොපි සක්කොමි, මුසාවාදස්ස ඔත්තප’’න්ති. "आणि इतर जी प्रजा (लोक) उरली आहे, ती पुण्याचे वाटेकरी आहेत असे मला वाटते; असत्य बोलण्याच्या भयामुळे मी त्यांची संख्या मोजू शकत नाही." 4. අරුණවතීසුත්තං ४. अरुणवती सुत्त 185. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති…පෙ… තත්ර ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘භික්ඛවො’’ති. ‘‘භදන්තෙ’’ති තෙ භික්ඛූ භගවතො පච්චස්සොසුං. භගවා එතදවොච – १८५. "मी असे ऐकले आहे – एक वेळ भगवान श्रावस्ती येथे विहार करत होते... तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – 'हे भिक्खूंनो!' 'भदंत (पूज्यवर)!' असे त्या भिक्खूंनी भगवंतांना उत्तर दिले. भगवान म्हणाले –" ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, රාජා අහොසි අරුණවා නාම. රඤ්ඤො ඛො පන, භික්ඛවෙ, අරුණවතො අරුණවතී නාම රාජධානී අහොසි. අරුණවතිං ඛො පන, භික්ඛවෙ, රාජධානිං සිඛී භගවා අරහං සම්මාසම්බුද්ධො උපනිස්සාය විහාසි. සිඛිස්ස ඛො පන, භික්ඛවෙ, භගවතො අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්ස අභිභූසම්භවං නාම සාවකයුගං අහොසි අග්ගං භද්දයුගං. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සිඛී භගවා අරහං සම්මාසම්බුද්ධො අභිභුං භික්ඛුං ආමන්තෙසි – ‘ආයාම, බ්රාහ්මණ, යෙන අඤ්ඤතරො බ්රහ්මලොකො තෙනුපසඞ්කමිස්සාම, යාව භත්තස්ස කාලො භවිස්සතී’ති. ‘එවං, භන්තෙ’ති ඛො භික්ඛවෙ, අභිභූ භික්ඛු සිඛිස්ස භගවතො අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්ස පච්චස්සොසි. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සිඛී භගවා අරහං සම්මාසම්බුද්ධො අභිභූ ච භික්ඛු – සෙය්යථාපි නාම බලවා පුරිසො සමිඤ්ජිතං වා බාහං පසාරෙය්ය, පසාරිතං වා බාහං සමිඤ්ජෙය්ය එවමෙව – අරුණවතියා රාජධානියා අන්තරහිතා තස්මිං බ්රහ්මලොකෙ පාතුරහෙසුං. "भिक्खूंनो, प्राचीन काळी अरुणवान नावाचा राजा होता. भिक्खूंनो, राजा अरुणवानाची अरुणवती नावाची राजधानी होती. भिक्खूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध शिखी भगवान अरुणवती राजधानीचा आश्रय घेऊन विहार करत होते. भिक्खूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध शिखी भगवंतांचे 'अभिभू' आणि 'संभव' नावाचे अग्र आणि भद्र (उत्कृष्ट) श्रावकयुगल (शिष्यांची जोडी) होते. तेव्हा, भिक्खूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध शिखी भगवंतांनी अभिभू भिक्खूला संबोधित केले – 'ये ब्राह्मणा, आपण एखाद्या ब्रह्मलोकात जाऊ या, जोपर्यंत भोजनाची वेळ होत नाही.' 'तसेच असो, भदंत,' असे म्हणून अभिभू भिक्खूने अर्हत, सम्यक्संबुद्ध शिखी भगवंतांच्या शब्दांचा आदर केला. तेव्हा, भिक्खूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध शिखी भगवान आणि अभिभू भिक्खू – ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य आपला दुमडलेला हात पसरावा किंवा पसरलेला हात दुमडावा, त्याचप्रमाणे अरुणवती राजधानीतून अंतर्धान पावून त्या ब्रह्मलोकात प्रकट झाले." ‘‘අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සිඛී භගවා අරහං සම්මාසම්බුද්ධො අභිභුං භික්ඛුං ආමන්තෙසි – ‘පටිභාතු, බ්රාහ්මණ, තං බ්රහ්මුනො ච බ්රහ්මපරිසාය ච බ්රහ්මපාරිසජ්ජානඤ්ච ධම්මී කථා’ති. ‘එවං, භන්තෙ’ති ඛො, භික්ඛවෙ, අභිභූ භික්ඛු සිඛිස්ස භගවතො අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්ස පටිස්සුත්වා, බ්රහ්මානඤ්ච බ්රහ්මපරිසඤ්ච බ්රහ්මපාරිසජ්ජෙ ච ධම්මියා කථාය සන්දස්සෙසි සමාදපෙසි සමුත්තෙජෙසි සම්පහංසෙසි. තත්ර සුදං, භික්ඛවෙ, බ්රහ්මා ච බ්රහ්මපරිසා ච බ්රහ්මපාරිසජ්ජා ච උජ්ඣායන්ති ඛිය්යන්ති විපාචෙන්ති – ‘අච්ඡරියං වත[Pg.158], භො, අබ්භුතං වත භො, කථඤ්හි නාම සත්ථරි සම්මුඛීභූතෙ සාවකො ධම්මං දෙසෙස්සතී’’’ති! "त्यानंतर, भिक्खूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध शिखी भगवंतांनी अभिभू भिक्खूला संबोधित केले – 'हे ब्राह्मणा, तू ब्रह्मा, त्याची परिषद आणि त्याचे सेवक यांच्यासमोर धम्म उपदेश कर.' 'तसेच असो, भदंत,' असे म्हणून अभिभू भिक्खूने अर्हत, सम्यक्संबुद्ध शिखी भगवंतांच्या आज्ञेचे पालन केले आणि ब्रह्मा, त्याची परिषद व त्याचे सेवक यांना धम्म उपदेशाद्वारे (धम्माचे) दर्शन घडवले, त्यांना समादृत केले, उत्तेजित केले आणि आनंदित केले. त्यावर, भिक्खूंनो, तो ब्रह्मा, त्याची परिषद आणि त्याचे सेवक निंदा करू लागले, आक्षेप घेऊ लागले आणि कुरकुर करू लागले – 'अहो आश्चर्य! अहो अद्भूत! शास्ते (गुरु) स्वतः समोर उपस्थित असताना श्रावक धम्म उपदेश कसा काय करू शकतो?'" ‘‘අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සිඛී භගවා අරහං සම්මාසම්බුද්ධො අභිභුං භික්ඛුං ආමන්තෙසි – ‘උජ්ඣායන්ති ඛො තෙ, බ්රාහ්මණ, බ්රහ්මා ච බ්රහ්මපරිසා ච බ්රහ්මපාරිසජ්ජා ච – අච්ඡරියං වත, භො, අබ්භුතං වත, භො, කථඤ්හි නාම සත්ථරි සම්මුඛීභූතෙ සාවකො ධම්මං දෙසෙස්සතීති! තෙන හි ත්වං බ්රාහ්මණ, භිය්යොසොමත්තාය බ්රහ්මානඤ්ච බ්රහ්මපරිසඤ්ච බ්රහ්මපාරිසජ්ජෙ ච සංවෙජෙහී’ති. ‘එවං, භන්තෙ’ති ඛො, භික්ඛවෙ, අභිභූ භික්ඛු සිඛිස්ස භගවතො අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්ස පටිස්සුත්වා දිස්සමානෙනපි කායෙන ධම්මං දෙසෙසි, අදිස්සමානෙනපි කායෙන ධම්මං දෙසෙසි, දිස්සමානෙනපි හෙට්ඨිමෙන උපඩ්ඪකායෙන අදිස්සමානෙන උපරිමෙන උපඩ්ඪකායෙන ධම්මං දෙසෙසි, දිස්සමානෙනපි උපරිමෙන උපඩ්ඪකායෙන අදිස්සමානෙන හෙට්ඨිමෙන උපඩ්ඪකායෙන ධම්මං දෙසෙසි. තත්ර සුදං, භික්ඛවෙ, බ්රහ්මා ච බ්රහ්මපරිසා ච බ්රහ්මපාරිසජ්ජා ච අච්ඡරියබ්භුතචිත්තජාතා අහෙසුං – ‘අච්ඡරියං වත, භො, අබ්භුතං වත, භො, සමණස්ස මහිද්ධිකතා මහානුභාවතා’’’ති! “त्यानंतर, भिक्खूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध शिखी भगवंतांनी अभिभू भिक्खूंना संबोधित केले – ‘हे ब्राह्मणा, ब्रह्मा, ब्रह्मपरिषद आणि ब्रह्मसभासद हे असे म्हणून आक्षेप घेत आहेत की – “अहो आश्चर्य! अहो अद्भूत! प्रत्यक्ष शास्ता समोर उपस्थित असताना श्रावक कसा काय धम्म उपदेश करू शकतो?” म्हणूनच, हे ब्राह्मणा, तू ब्रह्मा, ब्रह्मपरिषद आणि ब्रह्मसभासदांमध्ये अधिक तीव्रतेने संवेग निर्माण कर.’ ‘तसेच असो, भंते,’ असे उत्तर देऊन, भिक्खूंनो, अभिभू भिक्खूंनी अर्हत, सम्यक्संबुद्ध शिखी भगवंतांच्या वचनाचे पालन केले आणि आपले शरीर दृश्यमान ठेवून धम्म उपदेश केला, शरीर अदृश्य ठेवूनही धम्म उपदेश केला, शरीराचा खालचा अर्धा भाग दृश्यमान आणि वरचा अर्धा भाग अदृश्य ठेवून धम्म उपदेश केला, तसेच शरीराचा वरचा अर्धा भाग दृश्यमान आणि खालचा अर्धा भाग अदृश्य ठेवून धम्म उपदेश केला. त्यावर, भिक्खूंनो, ब्रह्मा, ब्रह्मपरिषद आणि ब्रह्मसभासद अत्यंत आश्चर्यचकित व विस्मित झाले आणि म्हणाले – “अहो आश्चर्य! अहो अद्भूत! या श्रमणाची ऋद्धी आणि प्रभाव किती महान आहे!”’ ‘‘අථ ඛො අභිභූ භික්ඛු සිඛිං භගවන්තං අරහන්තං සම්මාසම්බුද්ධං එතදවොච – ‘අභිජානාමි ඛ්වාහං, භන්තෙ, භික්ඛුසඞ්ඝස්ස මජ්ඣෙ එවරූපිං වාචං භාසිතා – පහොමි ඛ්වාහං ආවුසො, බ්රහ්මලොකෙ ඨිතො සහස්සිලොකධාතුං සරෙන විඤ්ඤාපෙතු’න්ති. ‘එතස්ස, බ්රාහ්මණ, කාලො, එතස්ස, බ්රාහ්මණ, කාලො; යං ත්වං, බ්රාහ්මණ, බ්රහ්මලොකෙ ඨිතො සහස්සිලොකධාතුං සරෙන විඤ්ඤාපෙය්යාසී’ති. ‘එවං, භන්තෙ’ති ඛො, භික්ඛවෙ, අභිභූ භික්ඛු සිඛිස්ස භගවතො අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්ස පටිස්සුත්වා බ්රහ්මලොකෙ ඨිතො ඉමා ගාථායො අභාසි – “त्यानंतर अभिभू भिक्खूंनी अर्हत, सम्यक्संबुद्ध शिखी भगवंतांना असे म्हटले – ‘भंते, मला आठवते की मी भिक्खू संघाच्या मध्यभागी असे विधान केले होते – “मित्रांनो, मी ब्रह्मलोकात उभे राहून हजारो लोकधातूंमध्ये माझा आवाज पोहोचवू शकतो.”’ ‘हे ब्राह्मणा, हीच त्याची वेळ आहे, हे ब्राह्मणा, हीच त्याची वेळ आहे; जेव्हा तू ब्रह्मलोकात उभा राहून हजारो लोकधातूंमध्ये तुझा आवाज पोहोचवशील.’ ‘तसेच असो, भंते,’ असे म्हणून, भिक्खूंनो, अभिभू भिक्खूंनी अर्हत, सम्यक्संबुद्ध शिखी भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार केला आणि ब्रह्मलोकात उभे राहून या गाथा म्हटल्या – ‘‘ආරම්භථ නික්කමථ, යුඤ්ජථ බුද්ධසාසනෙ; ධුනාථ මච්චුනො සෙනං, නළාගාරංව කුඤ්ජරො. “आरंभ करा, प्रयत्न करा, बुद्धशासनात स्वतःला जोडून घ्या. मृत्यूच्या सेनेचा असा नाश करा, जसा एखादा हत्ती गवताच्या झोपडीचा नाश करतो. ‘‘යො ඉමස්මිං ධම්මවිනයෙ, අප්පමත්තො විහස්සති; පහාය ජාතිසංසාරං, දුක්ඛස්සන්තං කරිස්සතී’’ති. जो कोणी या धम्म आणि विनयात अप्रमादपूर्वक विहरेल, तो जन्म-संसाराचा त्याग करून दुःखाचा अंत करेल.” ‘‘අථ [Pg.159] ඛො, භික්ඛවෙ, සිඛී ච භගවා අරහං සම්මාසම්බුද්ධො අභිභූ ච භික්ඛු බ්රහ්මානඤ්ච බ්රහ්මපරිසඤ්ච බ්රහ්මපාරිසජ්ජෙ ච සංවෙජෙත්වා – සෙය්යථාපි නාම…පෙ… තස්මිං බ්රහ්මලොකෙ අන්තරහිතා අරුණවතියා රාජධානියා පාතුරහෙසුං. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සිඛී භගවා අරහං සම්මාසම්බුද්ධො භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘අස්සුත්ථ නො, තුම්හෙ, භික්ඛවෙ, අභිභුස්ස භික්ඛුනො බ්රහ්මලොකෙ ඨිතස්ස ගාථායො භාසමානස්සා’ති? ‘අස්සුම්හ ඛො මයං, භන්තෙ, අභිභුස්ස භික්ඛුනො බ්රහ්මලොකෙ ඨිතස්ස ගාථායො භාසමානස්සා’ති. ‘යථා කථං පන තුම්හෙ, භික්ඛවෙ, අස්සුත්ථ අභිභුස්ස භික්ඛුනො බ්රහ්මලොකෙ ඨිතස්ස ගාථායො භාසමානස්සා’’’ති? එවං ඛො මයං, භන්තෙ, අස්සුම්හ අභිභුස්ස භික්ඛුනො බ්රහ්මලොකෙ ඨිතස්ස ගාථායො භාසමානස්ස – “त्यानंतर, भिक्खूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध शिखी भगवंतांनी आणि अभिभू भिक्खूंनी ब्रह्मा, ब्रह्मपरिषद आणि ब्रह्मसभासदांना संवेगित करून – ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य आपला दुमडलेला हात पसरतो किंवा पसरलेला हात दुमडतो, त्याप्रमाणे...पे... त्या ब्रह्मलोकातून अंतर्धान पावून ते अरुणवती राजधानीत प्रकट झाले. त्यानंतर, भिक्खूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध शिखी भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – ‘भिक्खूंनो, तुम्ही ब्रह्मलोकात उभे राहून गाथा म्हणणाऱ्या अभिभू भिक्खूंचा आवाज ऐकलात का?’ ‘होय, भंते, आम्ही ब्रह्मलोकात उभे राहून गाथा म्हणणाऱ्या अभिभू भिक्खूंचा आवाज ऐकला.’ ‘भिक्खूंनो, तुम्ही ब्रह्मलोकात उभे राहून गाथा म्हणणाऱ्या अभिभू भिक्खूंचा आवाज कसा ऐकलात?’ ‘भंते, आम्ही ब्रह्मलोकात उभे राहून गाथा म्हणणाऱ्या अभिभू भिक्खूंचा आवाज अशा प्रकारे ऐकला – ‘‘ආරම්භථ නික්කමථ, යුඤ්ජථ බුද්ධසාසනෙ; ධුනාථ මච්චුනො සෙනං, නළාගාරංව කුඤ්ජරො. “आरंभ करा, प्रयत्न करा, बुद्धशासनात स्वतःला जोडून घ्या. मृत्यूच्या सेनेचा असा नाश करा, जसा एखादा हत्ती गवताच्या झोपडीचा नाश करतो. ‘‘යො ඉමස්මිං ධම්මවිනයෙ, අප්පමත්තො විහස්සති; පහාය ජාතිසංසාරං, දුක්ඛස්සන්තං කරිස්සතී’’ති. जो कोणी या धम्म आणि विनयात अप्रमादपूर्वक विहरेल, तो जन्म-संसाराचा त्याग करून दुःखाचा अंत करेल.” ‘‘‘එවං ඛො මයං, භන්තෙ, අස්සුම්හ අභිභුස්ස භික්ඛුනො බ්රහ්මලොකෙ ඨිතස්ස ගාථායො භාසමානස්සා’ති. ‘සාධු සාධු, භික්ඛවෙ; සාධු ඛො තුම්හෙ, භික්ඛවෙ! අස්සුත්ථ අභිභුස්ස භික්ඛුනො බ්රහ්මලොකෙ ඨිතස්ස ගාථායො භාසමානස්සා’’’ති. ‘भंते, आम्ही ब्रह्मलोकात उभे राहून गाथा म्हणणाऱ्या अभिभू भिक्खूंचा आवाज अशा प्रकारे ऐकला.’ ‘साधू, साधू, भिक्खूंनो! भिक्खूंनो, हे उत्तम आहे की तुम्ही ब्रह्मलोकात उभे राहून गाथा म्हणणाऱ्या अभिभू भिक्खूंचा आवाज ऐकलात.’ ඉදමවොච භගවා, අත්තමනා තෙ භික්ඛූ භගවතො භාසිතං අභිනන්දුන්ති. भगवंत असे म्हणाले. संतुष्ट होऊन त्या भिक्खूंनी भगवंतांच्या भाषणाचे मनापासून अभिनंदन केले. 5. පරිනිබ්බානසුත්තං ५. परिनिब्बानसुत्त 186. එකං සමයං භගවා කුසිනාරායං විහරති උපවත්තනෙ මල්ලානං සාලවනෙ අන්තරෙන යමකසාලානං පරිනිබ්බානසමයෙ. අථ ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘හන්ද දානි, භික්ඛවෙ, ආමන්තයාමි වො – ‘වයධම්මා සඞ්ඛාරා, අප්පමාදෙන සම්පාදෙථා’ති. අයං තථාගතස්ස පච්ඡිමා වාචා’’. १८६. एका वेळी भगवंत कुसिनारा येथे मल्लांच्या उपवत्तन नावाच्या सालवनात, दोन जुळ्या साल वृक्षांच्या मध्ये, आपल्या परिनिब्बान समयाला विहरत होते. तेव्हा भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – “भिक्खूंनो, आता मी तुम्हाला सांगतो – ‘सर्व संस्कार व्यय पावणारे आहेत, अप्रमादाने आपले ध्येय साध्य करा.’ हे तथागतांचे अंतिम वचन होते.” අථ [Pg.160] ඛො භගවා පඨමං ඣානං සමාපජ්ජි. පඨමා ඣානා වුට්ඨහිත්වා දුතියං ඣානං සමාපජ්ජි. දුතියා ඣානා වුට්ඨහිත්වා තතියං ඣානං සමාපජ්ජි. තතියා ඣානා වුට්ඨහිත්වා චතුත්ථං ඣානං සමාපජ්ජි. චතුත්ථා ඣානා වුට්ඨහිත්වා ආකාසානඤ්චායතනං සමාපජ්ජි. ආකාසානඤ්චායතනා වුට්ඨහිත්වා විඤ්ඤාණඤ්චායතනං සමාපජ්ජි. විඤ්ඤාණඤ්චායතනා වුට්ඨහිත්වා ආකිඤ්චඤ්ඤායතනං සමාපජ්ජි. ආකිඤ්චඤ්ඤායතනා වුට්ඨහිත්වා නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනං සමාපජ්ජි. නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනා වුට්ඨහිත්වා සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධං සමාපජ්ජි. त्यानंतर भगवंतांनी पहिल्या ध्यानात प्रवेश केला. पहिल्या ध्यानातून बाहेर पडून त्यांनी दुसऱ्या ध्यानात प्रवेश केला. दुसऱ्या ध्यानातून बाहेर पडून त्यांनी तिसऱ्या ध्यानात प्रवेश केला. तिसऱ्या ध्यानातून बाहेर पडून त्यांनी चौथ्या ध्यानात प्रवेश केला. चौथ्या ध्यानातून बाहेर पडून त्यांनी आकाशानंत्यायतनात प्रवेश केला. आकाशानंत्यायतनातून बाहेर पडून त्यांनी विज्ञानानंत्यायतनात प्रवेश केला. विज्ञानानंत्यायतनातून बाहेर पडून त्यांनी आकिंचन्यायतनात प्रवेश केला. आकिंचन्यायतनातून बाहेर पडून त्यांनी नैवसंज्ञानासंज्ञायतनात प्रवेश केला. नैवसंज्ञानासंज्ञायतनातून बाहेर पडून त्यांनी संज्ञावेदयितनिरोधात प्रवेश केला. සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධා වුට්ඨහිත්වා නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනං සමාපජ්ජි. නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනා වුට්ඨහිත්වා ආකිඤ්චඤ්ඤායතනං සමාපජ්ජි. ආකිඤ්චඤ්ඤායතනා වුට්ඨහිත්වා විඤ්ඤාණඤ්චායතනං සමාපජ්ජි. විඤ්ඤාණඤ්චායතනා වුට්ඨහිත්වා ආකාසානඤ්චායතනං සමාපජ්ජි. ආකාසානඤ්චායතනා වුට්ඨහිත්වා චතුත්ථං ඣානං සමාපජ්ජි. චතුත්ථා ඣානා වුට්ඨහිත්වා තතියං ඣානං සමාපජ්ජි. තතියා ඣානා වුට්ඨහිත්වා දුතියං ඣානං සමාපජ්ජි. දුතියා ඣානා වුට්ඨහිත්වා පඨමං ඣානං සමාපජ්ජි. පඨමා ඣානා වුට්ඨහිත්වා දුතියං ඣානං සමාපජ්ජි. දුතියා ඣානා වුට්ඨහිත්වා තතියං ඣානං සමාපජ්ජි. තතියා ඣානා වුට්ඨහිත්වා චතුත්ථං ඣානං සමාපජ්ජි. චතුත්ථා ඣානා වුට්ඨහිත්වා සමනන්තරං භගවා පරිනිබ්බායි. පරිනිබ්බුතෙ භගවති සහ පරිනිබ්බානා බ්රහ්මා සහම්පති ඉමං ගාථං අභාසි – संज्ञावेदयितनिरोधातून बाहेर पडून त्यांनी नैवसंज्ञानासंज्ञायतनात प्रवेश केला. नैवसंज्ञानासंज्ञायतनातून बाहेर पडून त्यांनी आकिंचन्यायतनात प्रवेश केला. आकिंचन्यायतनातून बाहेर पडून त्यांनी विज्ञानानंत्यायतनात प्रवेश केला. विज्ञानानंत्यायतनातून बाहेर पडून त्यांनी आकाशानंत्यायतनात प्रवेश केला. आकाशानंत्यायतनातून बाहेर पडून त्यांनी चौथ्या ध्यानात प्रवेश केला. चौथ्या ध्यानातून बाहेर पडून त्यांनी तिसऱ्या ध्यानात प्रवेश केला. तिसऱ्या ध्यानातून बाहेर पडून त्यांनी दुसऱ्या ध्यानात प्रवेश केला. दुसऱ्या ध्यानातून बाहेर पडून त्यांनी पहिल्या ध्यानात प्रवेश केला. पहिल्या ध्यानातून बाहेर पडून त्यांनी दुसऱ्या ध्यानात प्रवेश केला. दुसऱ्या ध्यानातून बाहेर पडून त्यांनी तिसऱ्या ध्यानात प्रवेश केला. तिसऱ्या ध्यानातून बाहेर पडून त्यांनी चौथ्या ध्यानात प्रवेश केला. चौथ्या ध्यानातून बाहेर पडल्यानंतर लगेचच भगवंतांनी महापरिनिब्बान प्राप्त केले. भगवंतांच्या परिनिब्बानानंतर, परिनिब्बानासोबतच ब्रह्मा सहम्पतींनी ही गाथा म्हटली – ‘‘සබ්බෙව නික්ඛිපිස්සන්ති, භූතා ලොකෙ සමුස්සයං; යත්ථ එතාදිසො සත්ථා, ලොකෙ අප්පටිපුග්ගලො; තථාගතො බලප්පත්තො, සම්බුද්ධො පරිනිබ්බුතො’’ති. “या जगातील सर्व प्राणी शेवटी आपला देह त्याग करतील; कारण जिथे अशा प्रकारचे अद्वितीय शास्ता, जगात अतुलनीय असलेले, बलप्राप्त तथागत, सम्यक्संबुद्ध देखील परिनिब्बान पावले आहेत.” පරිනිබ්බුතෙ භගවති සහ පරිනිබ්බානා සක්කො දෙවානමින්දො ඉමං ගාථං අභාසි – भगवान परिनिर्वाण पावले असता, त्यांच्या परिनिर्वाणासोबतच देवराज शक्राने ही गाथा म्हटली – ‘‘අනිච්චා වත සඞ්ඛාරා, උප්පාදවයධම්මිනො; උප්පජ්ජිත්වා නිරුජ්ඣන්ති, තෙසං වූපසමො සුඛො’’ති. “सर्व संस्कार (संस्कृत गोष्टी) अनित्य आहेत, त्यांचा स्वभावच उत्पन्न होणे आणि नष्ट होणे असा आहे. उत्पन्न होऊन ते निरुद्ध होतात (नष्ट होतात); त्यांचा उपशम (शांत होणे) हाच खरा सुखावह आहे.” පරිනිබ්බුතෙ [Pg.161] භගවති සහ පරිනිබ්බානා ආයස්මා ආනන්දො ඉමං ගාථං අභාසි – भगवान परिनिर्वाण पावले असता, त्यांच्या परिनिर्वाणासोबतच आयुष्यमान आनंदाने ही गाथा म्हटली – ‘‘තදාසි යං භිංසනකං, තදාසි ලොමහංසනං; සබ්බාකාරවරූපෙතෙ, සම්බුද්ධෙ පරිනිබ්බුතෙ’’ති. “जेव्हा सर्व श्रेष्ठ गुणांनी संपन्न असलेले सम्यक्संबुद्ध परिनिर्वाण पावले, तेव्हा अत्यंत भयानक आणि अंगावर काटा आणणारा (रोमहर्षक) धरणीकंप झाला.” පරිනිබ්බුතෙ භගවති සහ පරිනිබ්බානා ආයස්මා අනුරුද්ධො ඉමා ගාථායො අභාසි – भगवान परिनिर्वाण पावले असता, त्यांच्या परिनिर्वाणासोबतच आयुष्यमान अनुरुद्धाने या गाथा म्हटल्या – ‘‘නාහු අස්සාසපස්සාසො, ඨිතචිත්තස්ස තාදිනො; අනෙජො සන්තිමාරබ්භ, චක්ඛුමා පරිනිබ්බුතො. “स्थिर चित्त असलेल्या, समता बाळगणाऱ्या (तादी), तृष्णारहित आणि दिव्य दृष्टी असलेल्या त्या महामुनींचे श्वासोच्छ्वास थांबले; शांतीचा (निर्वाणाचा) आश्रय घेऊन ते परिनिर्वाण पावले.” ‘‘අසල්ලීනෙන චිත්තෙන, වෙදනං අජ්ඣවාසයි; පජ්ජොතස්සෙව නිබ්බානං, විමොක්ඛො චෙතසො අහූ’’ති. “अकंपित (अचल) चित्ताने त्यांनी वेदना सहन केली. दिव्याच्या ज्योतीप्रमाणे त्यांच्या चित्ताचा विमोक्ष (मुक्ती) झाला.” දුතියො වග්ගො. दुसरा वग्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – බ්රහ්මාසනං දෙවදත්තො, අන්ධකවින්දො අරුණවතී; පරිනිබ්බානෙන ච දෙසිතං, ඉදං බ්රහ්මපඤ්චකන්ති. ब्रह्मयाचना, देवदत्त, अंधकविंद, अरुणवती आणि परिनिर्वाण सूत्रांसह हा 'ब्रह्मपंचक' उपदेश केला आहे. බ්රහ්මසංයුත්තං සමත්තං. ब्रह्मसंयुक्त समाप्त. 7. බ්රාහ්මණසංයුත්තං ७. ब्राह्मणसंयुक्त 1. අරහන්තවග්ගො १. अरहंतवग्ग 1. ධනඤ්ජානීසුත්තං १. धनंजानी सुत्त 187. එවං [Pg.162] මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන අඤ්ඤතරස්ස භාරද්වාජගොත්තස්ස බ්රාහ්මණස්ස ධනඤ්ජානී නාම බ්රාහ්මණී අභිප්පසන්නා හොති බුද්ධෙ ච ධම්මෙ ච සඞ්ඝෙ ච. අථ ඛො ධනඤ්ජානී බ්රාහ්මණී භාරද්වාජගොත්තස්ස බ්රාහ්මණස්ස භත්තං උපසංහරන්තී උපක්ඛලිත්වා තික්ඛත්තුං උදානං උදානෙසි – १८७. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान राजगृह येथे वेळुवनातील कलंदकनिवाप येथे विहार करत होते. त्या वेळी भारद्वाज गोत्राच्या एका ब्राह्मणाची 'धनंजानी' नावाची ब्राह्मणी (पत्नी) बुद्ध, धम्म आणि संघावर अत्यंत श्रद्धा ठेवणारी होती. एकदा धनंजानी ब्राह्मणी भारद्वाज गोत्राच्या ब्राह्मणाला भोजन आणून देत असताना तिचा पाय घसरला, तेव्हा तिने तीन वेळा हा उद्गार काढला – ‘‘නමො තස්ස භගවතො අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්ස; නමො තස්ස භගවතො අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්ස; නමො තස්ස භගවතො අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්සා’’ති. “त्या भगवंतांना, अरहंतांना, सम्यक्संबुद्धांना नमस्कार असो! त्या भगवंतांना, अरहंतांना, सम्यक्संबुद्धांना नमस्कार असो! त्या भगवंतांना, अरहंतांना, सम्यक्संबुद्धांना नमस्कार असो!” එවං වුත්තෙ, භාරද්වාජගොත්තො බ්රාහ්මණො ධනඤ්ජානිං බ්රාහ්මණිං එතදවොච – ‘‘එවමෙවං පනායං වසලී යස්මිං වා තස්මිං වා තස්ස මුණ්ඩකස්ස සමණස්ස වණ්ණං භාසති. ඉදානි ත්යාහං, වසලි, තස්ස සත්ථුනො වාදං ආරොපෙස්සාමී’’ති. ‘‘න ඛ්වාහං තං, බ්රාහ්මණ, පස්සාමි සදෙවකෙ ලොකෙ සමාරකෙ සබ්රහ්මකෙ සස්සමණබ්රාහ්මණියා පජාය සදෙවමනුස්සාය, යො තස්ස භගවතො වාදං ආරොපෙය්ය අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්ස. අපි ච ත්වං, බ්රාහ්මණ, ගච්ඡ, ගන්ත්වා විජානිස්සසී’’ති. असे म्हटल्यावर, भारद्वाज गोत्राचा ब्राह्मण धनंजानी ब्राह्मणीला म्हणाला, “ही हीन स्त्री (वृषली) नेहमी त्या मुंडक (मुंडण केलेल्या) श्रमणाचे गुणगान गात असते. हे वृषली! आता मी तुझ्या त्या शास्त्याच्या (गुरूच्या) सिद्धांताचे खंडन करीन.” ती म्हणाली, “हे ब्राह्मणा, देव, मार, ब्रह्मा यांच्यासह या लोकात, तसेच श्रमण, ब्राह्मण, देव आणि मनुष्यांसह या प्रजेमध्ये मला असा कोणीही दिसत नाही, जो त्या पूजनीय सम्यक्संबुद्ध भगवंतांच्या सिद्धांताचे खंडन करू शकेल. तरीही, हे ब्राह्मणा, तू जा आणि स्वतःच जाऊन खात्री करून घे.” අථ ඛො භාරද්වාජගොත්තො බ්රාහ්මණො කුපිතො අනත්තමනො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතා සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො භාරද්වාජගොත්තො බ්රාහ්මණො භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – त्यानंतर भारद्वाज गोत्राचा ब्राह्मण संतप्त आणि अप्रसन्न होऊन भगवंतांकडे गेला. तिथे जाऊन त्याने भगवंतांशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या भारद्वाज गोत्राच्या ब्राह्मणाने भगवंतांना गाथेने विचारले – ‘‘කිංසු ඡෙත්වා සුඛං සෙති, කිංසු ඡෙත්වා න සොචති; කිස්සස්සු එකධම්මස්ස, වධං රොචෙසි ගොතමා’’ති. “हे गौतम! कशाचा नाश केल्याने माणूस सुखाने झोपतो? कशाचा नाश केल्याने तो शोक करत नाही? कोणत्या एका गोष्टीचा नाश करणे तुम्हाला पसंत आहे?” ‘‘කොධං [Pg.163] ඡෙත්වා සුඛං සෙති, කොධං ඡෙත්වා න සොචති; කොධස්ස විසමූලස්ස, මධුරග්ගස්ස බ්රාහ්මණ; වධං අරියා පසංසන්ති, තඤ්හි ඡෙත්වා න සොචතී’’ති. “क्रोधाचा नाश केल्याने माणूस सुखाने झोपतो; क्रोधाचा नाश केल्याने तो शोक करत नाही. ज्याचे मूळ विषारी आहे आणि टोक गोड आहे, अशा क्रोधाचा नाश करण्याचे आर्य लोक कौतुक करतात; कारण त्याचा नाश केल्यावर माणूस शोक करत नाही.” එවං වුත්තෙ, භාරද්වාජගොත්තො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භො ගොතම, අභික්කන්තං, භො ගොතම! සෙය්යථාපි, භො ගොතම, නික්කුජ්ජිතං වා උක්කුජ්ජෙය්ය, පටිච්ඡන්නං වා විවරෙය්ය, මූළ්හස්ස වා මග්ගං ආචික්ඛෙය්ය, අන්ධකාරෙ වා තෙලපජ්ජොතං ධාරෙය්ය – චක්ඛුමන්තො රූපානි දක්ඛන්තීති; එවමෙවං භොතා ගොතමෙන අනෙකපරියායෙන ධම්මො පකාසිතො. එසාහං, භන්තෙ, භගවන්තං ගොතමං සරණං ගච්ඡාමි ධම්මඤ්ච භික්ඛුසඞ්ඝඤ්ච. ලභෙය්යාහං භොතො ගොතමස්ස සන්තිකෙ පබ්බජ්ජං, ලභෙය්යං උපසම්පද’’න්ති. असे म्हटल्यावर भारद्वाज गोत्राचा ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला, “अतिशय सुंदर, हे गौतम! अतिशय सुंदर, हे गौतम! जसे एखाद्याने उपडे ठेवलेले भांडे उताणे करावे, झाकलेले उघडे करावे, वाट चुकलेल्याला वाट दाखवावी किंवा अंधारात तेलाचा दिवा धरावा जेणेकरून डोळे असणाऱ्यांना रूपे दिसू शकतील; त्याचप्रमाणे आदरणीय गौतमांनी अनेक प्रकारे धम्माचा प्रकाश पाडला आहे. मी आदरणीय गौतम, धम्म आणि भिक्खू संघाला शरण जातो. मला आदरणीय गौतमांच्या सानिध्यात प्रवज्जा (दीक्षा) आणि उपसंपदा (भिक्खूत्व) मिळावी.” අලත්ථ ඛො භාරද්වාජගොත්තො බ්රාහ්මණො භගවතො සන්තිකෙ පබ්බජ්ජං, අලත්ථ උපසම්පදං. අචිරූපසම්පන්නො ඛො පනායස්මා භාරද්වාජො එකො වූපකට්ඨො අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරන්තො නචිරස්සෙව – යස්සත්ථාය කුලපුත්තා සම්මදෙව අගාරස්මා අනගාරියං පබ්බජන්ති තදනුත්තරං – බ්රහ්මචරියපරියොසානං දිට්ඨෙව ධම්මෙ සයං අභිඤ්ඤා සච්ඡිකත්වා උපසම්පජ්ජ විහාසි. ‘‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’’ති අබ්භඤ්ඤාසි. අඤ්ඤතරො ච පනායස්මා භාරද්වාජො අරහතං අහොසීති. भारद्वाज गोत्राच्या ब्राह्मणाला भगवंतांच्या सानिध्यात प्रवज्जा मिळाली आणि उपसंपदाही मिळाली. उपसंपदा मिळाल्यानंतर लवकरच, आयुष्यमान भारद्वाज एकटे, जनसमुदायापासून दूर, अप्रमत्त (जागरूक), उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करू लागले. ज्या ध्येयासाठी कुलपुत्र घरादाराचा त्याग करून गृहहीन प्रवज्जा घेतात, ते ब्रह्मचर्याचे सर्वश्रेष्ठ अंतिम ध्येय त्यांनी याच जन्मात स्वतःच्या अभिज्ञाने (उच्च ज्ञानाने) साक्षात करून प्राप्त केले. “जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर दुसरा जन्म नाही,” असे त्यांनी जाणले. अशा प्रकारे आयुष्यमान भारद्वाज अरहंतांपैकी एक झाले. 2. අක්කොසසුත්තං २. अक्कोस सुत्त 188. එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. අස්සොසි ඛො අක්කොසකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො – ‘‘භාරද්වාජගොත්තො කිර බ්රාහ්මණො සමණස්ස ගොතමස්ස සන්තිකෙ අගාරස්මා අනගාරියං පබ්බජිතො’’ති කුපිතො අනත්තමනො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අසබ්භාහි ඵරුසාහි වාචාහි අක්කොසති පරිභාසති. १८८. एका वेळी भगवान राजगृह येथे वेळुवनातील कलंदकनिवाप येथे विहार करत होते. 'अक्कोसक भारद्वाज' नावाच्या ब्राह्मणाने ऐकले की, “भारद्वाज गोत्राच्या ब्राह्मणाने श्रमण गौतमांच्या सानिध्यात गृहत्याग करून गृहहीन प्रवज्जा घेतली आहे.” हे ऐकून तो संतप्त आणि अप्रसन्न झाला आणि भगवंतांकडे गेला. तिथे जाऊन तो भगवंतांना असभ्य आणि कठोर शब्दांत शिवीगाळ व निर्भत्सना करू लागला. එවං වුත්තෙ, භගවා අක්කොසකභාරද්වාජං බ්රාහ්මණං එතදවොච – ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, බ්රාහ්මණ, අපි නු ඛො තෙ ආගච්ඡන්ති මිත්තාමච්චා ඤාතිසාලොහිතා අතිථියො ’’ති? ‘‘අප්පෙකදා මෙ, භො ගොතම, ආගච්ඡන්ති මිත්තාමච්චා [Pg.164] ඤාතිසාලොහිතා අතිථියො’’ති. ‘‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, බ්රාහ්මණ, අපි නු තෙසං අනුප්පදෙසි ඛාදනීයං වා භොජනීයං වා සායනීයං වා’’’ති? ‘‘‘අප්පෙකදා නෙසාහං, භො ගොතම, අනුප්පදෙමි ඛාදනීයං වා භොජනීයං වා සායනීයං වා’’’ති. ‘‘‘සචෙ ඛො පන තෙ, බ්රාහ්මණ, නප්පටිග්ගණ්හන්ති, කස්ස තං හොතී’’’ති? ‘‘‘සචෙ තෙ, භො ගොතම, නප්පටිග්ගණ්හන්ති, අම්හාකමෙව තං හොතී’’’ති. ‘‘එවමෙව ඛො, බ්රාහ්මණ, යං ත්වං අම්හෙ අනක්කොසන්තෙ අක්කොසසි, අරොසෙන්තෙ රොසෙසි, අභණ්ඩන්තෙ භණ්ඩසි, තං තෙ මයං නප්පටිග්ගණ්හාම. තවෙවෙතං, බ්රාහ්මණ, හොති; තවෙවෙතං, බ්රාහ්මණ, හොති’’. असे शिवीगाळ केल्यावर, भगवान अक्कोसक भारद्वाज ब्राह्मणाला म्हणाले, “हे ब्राह्मणा, तुला काय वाटते? तुझे मित्र, स्नेही, नातेवाईक आणि पाहुणे तुझ्याकडे येतात का?” “होय, गौतम, कधीकधी माझे मित्र, स्नेही, नातेवाईक आणि पाहुणे माझ्याकडे येतात.” “हे ब्राह्मणा, तुला काय वाटते? तू त्यांना खाण्याचे पदार्थ, भोजन किंवा फराळ देतोस का?” “होय, गौतम, कधीकधी मी त्यांना खाण्याचे पदार्थ, भोजन किंवा फराळ देतो.” “पण हे ब्राह्मणा, जर त्यांनी ते स्वीकारले नाही, तर ते कोणाचे होते?” “हे गौतम, जर त्यांनी ते स्वीकारले नाही, तर ते आमचेच राहते.” “त्याचप्रमाणे, हे ब्राह्मणा, आम्ही शिवीगाळ न करणारे असताना तू आम्हाला शिवीगाळ करतोस, आम्ही क्रोध न करणारे असताना तू आमच्यावर क्रोध करतोस, आम्ही भांडण न करणारे असताना तू आमच्याशी भांडतोस; ते आम्ही स्वीकारत नाही. म्हणून, हे ब्राह्मणा, ते तुझेच राहते; हे ब्राह्मणा, ते तुझेच राहते.” ‘‘යො ඛො, බ්රාහ්මණ, අක්කොසන්තං පච්චක්කොසති, රොසෙන්තං පටිරොසෙති, භණ්ඩන්තං පටිභණ්ඩති, අයං වුච්චති, බ්රාහ්මණ, සම්භුඤ්ජති වීතිහරතීති. තෙ මයං තයා නෙව සම්භුඤ්ජාම න වීතිහරාම. තවෙවෙතං, බ්රාහ්මණ, හොති; තවෙවෙතං, බ්රාහ්මණ, හොතී’’ති. ‘‘භවන්තං ඛො ගොතමං සරාජිකා පරිසා එවං ජානාති – ‘අරහං සමණො ගොතමො’ති. අථ ච පන භවං ගොතමො කුජ්ඣතී’’ති. "हे ब्राह्मणा, जो शिवीगाळ करणाऱ्याला उलट शिवीगाळ करतो, जो रागवणाऱ्यावर उलट रागवतो, जो भांडणाऱ्याशी उलट भांडतो; त्याला, हे ब्राह्मणा, 'एकत्र भोजन करणारा' (सहभागी होणारा) आणि 'देवाणघेवाण करणारा' असे म्हटले जाते. आम्ही तुझ्याशी असे सहभागी होत नाही आणि अशी देवाणघेवाणही करत नाही. हे ब्राह्मणा, हे सर्व तुझेच आहे; हे ब्राह्मणा, हे तुझेच राहू दे!" "राजासह सर्व सभा असे जाणते की, 'श्रमण गौतम हे अर्हत आहेत.' तरीही श्रमण गौतम रागवत आहेत?" ‘‘අක්කොධස්ස කුතො කොධො, දන්තස්ස සමජීවිනො; සම්මදඤ්ඤා විමුත්තස්ස, උපසන්තස්ස තාදිනො. "जो क्रोधरहित आहे, संयमित आहे, धर्मानुसार जीवन जगणारा आहे, सम्यक ज्ञानाने विमुक्त झालेला आहे, शांत आहे आणि तादि (अविचल) आहे, अशा व्यक्तीला क्रोध कसा येऊ शकतो?" ‘‘තස්සෙව තෙන පාපියො, යො කුද්ධං පටිකුජ්ඣති; කුද්ධං අප්පටිකුජ්ඣන්තො, සඞ්ගාමං ජෙති දුජ්ජයං. "जो क्रोधी माणसावर उलट क्रोध करतो, तो स्वतःचेच अधिक नुकसान करतो. क्रोधी माणसावर उलट क्रोध न करणारा मनुष्य जिंकण्यास कठीण असा संग्राम जिंकतो." ‘‘උභින්නමත්ථං චරති, අත්තනො ච පරස්ස ච; පරං සඞ්කුපිතං ඤත්වා, යො සතො උපසම්මති. "दुसऱ्याला क्रोधीत झालेले पाहून जो मनुष्य स्मृतिमान (सजक) राहून शांत होतो, तो स्वतःच्या आणि दुसऱ्याच्या अशा दोघांच्याही कल्याणासाठी आचरण करत असतो." ‘‘උභින්නං තිකිච්ඡන්තානං, අත්තනො ච පරස්ස ච; ජනා මඤ්ඤන්ති බාලොති, යෙ ධම්මස්ස අකොවිදා’’ති. "स्वतःचा आणि दुसऱ्याचा अशा दोघांचाही (क्रोधापासून) उपचार करणाऱ्याला, जे लोग धर्मात अकुशल आहेत, ते मूर्ख समजतात." එවං වුත්තෙ, අක්කොසකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භො ගොතම…පෙ… එසාහං භවන්තං ගොතමං සරණං ගච්ඡාමි ධම්මඤ්ච භික්ඛුසඞ්ඝඤ්ච. ලභෙය්යාහං, භන්තෙ, භොතො ගොතමස්ස සන්තිකෙ පබ්බජ්ජං, ලභෙය්යං උපසම්පද’’න්ති. असे म्हटल्यावर, अक्कोसकभारद्वाज ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला, "अतिशय सुंदर, आदरणीय गौतम! ... मी आदरणीय गौतमांना, धर्माला आणि भिक्खू संघाला शरण जातो. भंते, मला आदरणीय गौतमांच्या सानिध्यात प्रवज्जा (दीक्षा) मिळावी आणि उपसंपदा मिळावी." අලත්ථ ඛො අක්කොසකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො භගවතො සන්තිකෙ පබ්බජ්ජං, අලත්ථ උපසම්පදං. අචිරූපසම්පන්නො ඛො පනායස්මා අක්කොසකභාරද්වාජො එකො වූපකට්ඨො අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරන්තො [Pg.165] නචිරස්සෙව – යස්සත්ථාය කුලපුත්තා සම්මදෙව අගාරස්මා අනගාරියං පබ්බජන්ති තදනුත්තරං – බ්රහ්මචරියපරියොසානං දිට්ඨෙව ධම්මෙ සයං අභිඤ්ඤා සච්ඡිකත්වා උපසම්පජ්ජ විහාසි. ‘‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං නාපරං ඉත්ථත්තායා’’ති අබ්භඤ්ඤාසි. අඤ්ඤතරො ච පනායස්මා භාරද්වාජො අරහතං අහොසීති. अक्कोसकभारद्वाज ब्राह्मणाला भगवंतांच्या सानिध्यात प्रवज्जा मिळाली आणि उपसंपदाही मिळाली. उपसंपदा मिळाल्यानंतर लवकरच, आयुष्यमान अक्कोसकभारद्वाज एकांतात, अप्रमत्त (जागरूक), उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहरत असताना, ज्या ध्येयासाठी कुलपुत्र योग्य रीतीने घराबाहेर पडून अनगारिक (गृहहीन) प्रवज्जा ग्रहण करतात, ते सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मचर्याचे अंतिम ध्येय (अर्हतपद) त्यांनी याच जन्मात स्वतः अभिज्ञाने (विशिष्ट ज्ञानाने) साक्षात करून प्राप्त केले. "जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरलेले नाही," असे त्यांनी जाणले. आणि आयुष्यमान भारद्वाज अर्हतांपैकी एक झाले. 3. අසුරින්දකසුත්තං ३. असुरिन्दक सुत्त 189. එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. අස්සොසි ඛො අසුරින්දකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො – ‘‘භාරද්වාජගොත්තො බ්රාහ්මණො කිර සමණස්ස ගොතමස්ස සන්තිකෙ අගාරස්මා අනගාරියං පබ්බජිතො’’ති කුපිතො අනත්තමනො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අසබ්භාහි ඵරුසාහි වාචාහි අක්කොසති පරිභාසති. එවං වුත්තෙ, භගවා තුණ්හී අහොසි. අථ ඛො අසුරින්දකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘ජිතොසි, සමණ, ජිතොසි, සමණා’’ති. १८९. एकदा भगवान राजगृह येथे वेळुवनातील कलन्दकनिवाप येथे विहरत होते. असुरिन्दकभारद्वाज ब्राह्मणाने ऐकले की, "भारद्वाज गोत्राचा ब्राह्मण श्रमण गौतमांच्या सानिध्यात घराबाहेर पडून अनगारिक (गृहहीन) प्रवज्जित झाला आहे." हे ऐकून तो क्रोधीत व अप्रसन्न झाला आणि जेथे भगवान होते तेथे गेला. तेथे जाऊन त्याने भगवंतांना असभ्य आणि कठोर शब्दांत शिवीगाळ व निर्भत्सना केली. असे केल्यावर भगवान शांत राहिले. तेव्हा असुरिन्दकभारद्वाज ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला, "श्रमणा, तू पराभूत झालास! श्रमणा, तू पराभूत झालास!" ‘‘ජයං වෙ මඤ්ඤති බාලො, වාචාය ඵරුසං භණං; ජයඤ්චෙවස්ස තං හොති, යා තිතික්ඛා විජානතො. "मूर्ख मनुष्य कठोर शब्द बोलून स्वतःला विजयी समजतो; परंतु जो सत्य जाणतो, त्याची क्षमाशीलता (सहनशीलता) हाच त्याचा खरा विजय असतो." ‘‘තස්සෙව තෙන පාපියො, යො කුද්ධං පටිකුජ්ඣති; කුද්ධං අප්පටිකුජ්ඣන්තො, සඞ්ගාමං ජෙති දුජ්ජයං. "जो क्रोधी माणसावर उलट क्रोध करतो, तो स्वतःचेच अधिक नुकसान करतो. क्रोधी माणसावर उलट क्रोध न करणारा मनुष्य जिंकण्यास कठीण असा संग्राम जिंकतो." ‘‘උභින්නමත්ථං චරති, අත්තනො ච පරස්ස ච; පරං සඞ්කුපිතං ඤත්වා, යො සතො උපසම්මති. "दुसऱ्याला क्रोधीत झालेले पाहून जो मनुष्य स्मृतिमान (सजक) राहून शांत होतो, तो स्वतःच्या आणि दुसऱ्याच्या अशा दोघांच्याही कल्याणासाठी आचरण करत असतो." ‘‘උභින්නං තිකිච්ඡන්තානං, අත්තනො ච පරස්ස ච; ජනා මඤ්ඤන්ති බාලොති, යෙ ධම්මස්ස අකොවිදා’’ති. "स्वतःचा आणि दुसऱ्याचा अशा दोघांचाही (क्रोधापासून) उपचार करणाऱ्याला, जे लोग धर्मात अकुशल आहेत, ते मूर्ख समजतात." එවං වුත්තෙ, අසුරින්දකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භො ගොතම…පෙ… අබ්භඤ්ඤාසි. අඤ්ඤතරො ච පනායස්මා භාරද්වාජො අරහතං අහොසී’’ති. असे म्हटल्यावर, असुरिन्दकभारद्वाज ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला, "अतिशय सुंदर, आदरणीय गौतम! ... त्यांनी जाणले. आणि आयुष्यमान भारद्वाज अर्हतांपैकी एक झाले." 4. බිලඞ්ගිකසුත්තං ४. बिलङ्गिक सुत्त 190. එකං [Pg.166] සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. අස්සොසි ඛො බිලඞ්ගිකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො – ‘‘භාරද්වාජගොත්තො කිර බ්රාහ්මණො සමණස්ස ගොතමස්ස සන්තිකෙ අගාරස්මා අනගාරියං පබ්බජිතො’’ති කුපිතො අනත්තමනො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා තුණ්හීභූතො එකමන්තං අට්ඨාසි. අථ ඛො භගවා බිලඞ්ගිකස්ස භාරද්වාජස්ස බ්රාහ්මණස්ස චෙතසා චෙතොපරිවිතක්කමඤ්ඤාය බිලඞ්ගිකං භාරද්වාජං බ්රාහ්මණං ගාථාය අජ්ඣභාසි – १९०. एकदा भगवान राजगृह येथे वेळुवनातील कलन्दकनिवाप येथे विहरत होते. बिलङ्गिकभारद्वाज ब्राह्मणाने ऐकले की, "भारद्वाज गोत्राचा ब्राह्मण श्रमण गौतमांच्या सानिध्यात घराबाहेर पडून अनगारिक (गृहहीन) प्रवज्जित झाला आहे." हे ऐकून तो क्रोधीत व अप्रसन्न झाला आणि जेथे भगवान होते तेथे गेला. तेथे जाऊन तो शांतपणे एका बाजूला उभा राहिला. तेव्हा भगवंतांनी बिलङ्गिकभारद्वाज ब्राह्मणाच्या मनातील विचार स्वतःच्या मनाने जाणून घेऊन त्याला गाथेने संबोधित केले – ‘‘යො අප්පදුට්ඨස්ස නරස්ස දුස්සති,සුද්ධස්ස පොසස්ස අනඞ්ගණස්ස; තමෙව බාලං පච්චෙති පාපං,සුඛුමො රජො පටිවාතංව ඛිත්තො’’ති. "जो मनुष्य निरपराध, शुद्ध आणि निष्पाप (क्लेशरहित) व्यक्तीचा द्रोह करतो, त्या मूर्खावरच ते पाप उलटते, जसे वाऱ्याच्या विरुद्ध दिशेने फेकलेली बारीक धूळ स्वतःवरच परत येते." එවං වුත්තෙ, විලඞ්ගිකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භො ගොතම…පෙ… අබ්භඤ්ඤාසි. අඤ්ඤතරො ච පනායස්මා භාරද්වාජො අරහතං අහොසී’’ති. असे म्हटल्यावर, बिलङ्गिकभारद्वाज ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला, "अतिशय सुंदर, आदरणीय गौतम! ... त्यांनी जाणले. आणि आयुष्यमान भारद्वाज अर्हतांपैकी एक झाले." 5. අහිංසකසුත්තං ५. अहिंसक सुत्त 191. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො අහිංසකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතා සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො අහිංසකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අහිංසකාහං, භො ගොතම, අහිංසකාහං, භො ගොතමා’’ති. १९१. श्रावस्ती येथील प्रसंग. तेव्हा अहिंसकभारद्वाज ब्राह्मण जेथे भगवान होते तेथे गेला. तेथे जाऊन त्याने भगवंतांसोबत कुशलमंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला अहिंसकभारद्वाज ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला, "आदरणीय गौतम, मी अहिंसक आहे; आदरणीय गौतम, मी अहिंसक आहे." ‘‘යථා නාමං තථා චස්ස, සියා ඛො ත්වං අහිංසකො; යො ච කායෙන වාචාය, මනසා ච න හිංසති; ස වෙ අහිංසකො හොති, යො පරං න විහිංසතී’’ති. "जर तू तुझ्या नावाप्रमाणे असशील, तर खरोखरच तू अहिंसक असशील. जो शरीराने, वाचेने आणि मनाने कोणाचीही हिंसा करत नाही, जो दुसऱ्याला त्रास देत नाही, तोच खरोखर अहिंसक असतो." එවං වුත්තෙ, අහිංසකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භො ගොතම…පෙ… අබ්භඤ්ඤාසි. අඤ්ඤතරො ච පනායස්මා අහිංසකභාරද්වාජො අරහතං අහොසී’’ති. असे म्हटल्यावर, अहिंसकभारद्वाज ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला, "अतिशय सुंदर, आदरणीय गौतम! ... त्यांनी जाणले. आणि आयुष्यमान अहिंसकभारद्वाज अर्हतांपैकी एक झाले." 6. ජටාසුත්තං ६. जटा सुत्त 192. සාවත්ථිනිදානං[Pg.167]. අථ ඛො ජටාභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතා සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො ජටාභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – १९२. श्रावस्ती येथील प्रसंग. तेव्हा जटाभारद्वाज ब्राह्मण जेथे भगवान होते तेथे गेला. तेथे जाऊन त्याने भगवंतांसोबत कुशलमंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या जटाभारद्वाज ब्राह्मणाने भगवंतांना गाथेने विचारले – ‘‘අන්තොජටා බහිජටා, ජටාය ජටිතා පජා; තං තං ගොතම පුච්ඡාමි, කො ඉමං විජටයෙ ජට’’න්ති. "आत जटा (गुंतागुंत) आहे, बाहेर जटा आहे. ही प्रजा जटेने वेढलेली आहे. हे गौतमा, मी आपल्याला विचारतो की, या जटेला (गुंतागुंतीला) कोण सोडवू शकतो?" ‘‘සීලෙ පතිට්ඨාය නරො සපඤ්ඤො, චිත්තං පඤ්ඤඤ්ච භාවයං; ආතාපී නිපකො භික්ඛු, සො ඉමං විජටයෙ ජටං. "जो प्रज्ञावान मनुष्य शीलामध्ये प्रतिष्ठित होऊन, चित्त (समाधी) आणि प्रज्ञा विकसित करतो, असा उद्योगी आणि बुद्धिमान भिक्खू या जटेला (गुंतागुंतीला) सोडवू शकतो." ‘‘යෙසං රාගො ච දොසො ච, අවිජ්ජා ච විරාජිතා; ඛීණාසවා අරහන්තො, තෙසං විජටිතා ජටා. "ज्यांचे राग (आसक्ती), द्वेष आणि अविद्या नष्ट झाली आहे, जे क्षीणासव (आसवरहित) अर्हत आहेत, त्यांची ही जटा (गुंतागुंत) सुटलेली आहे." ‘‘යත්ථ නාමඤ්ච රූපඤ්ච, අසෙසං උපරුජ්ඣති; පටිඝං රූපසඤ්ඤා ච, එත්ථෙසා ඡිජ්ජතෙ ජටා’’ති. "जेथे नाम आणि रूप पूर्णपणे निरुद्ध होते, तसेच प्रतिघ (प्रतिघात) आणि रूपसंज्ञाही निरुद्ध होते, तेथेच ही जटा (गुंतागुंत) तुटून नष्ट होते." එවං වුත්තෙ, ජටාභාරද්වාජො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භො ගොතම…පෙ… අඤ්ඤතරො ච පනායස්මා භාරද්වාජො අරහතං අහොසී’’ති. असे म्हटले असता, जटाभारद्वाज ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला, "अतिशय सुंदर, आदरणीय गोतम! ... आणि आयुष्यमान भारद्वाज अर्हतांपैकी एक झाले." 7. සුද්ධිකසුත්තං ७. सुद्धिक सुत्त 193. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො සුද්ධිකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතා සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො සුද්ධිකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අජ්ඣභාසි – १९३. श्रावस्ती येथील घटना. तेव्हा सुद्धिकभारद्वाज ब्राह्मण जेथे भगवंत होते तेथे गेला; आणि भगवंतांशी कुशलमंगल विचारून संवाद साधला. आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या सुद्धिकभारद्वाज ब्राह्मणाने भगवंतांच्या सन्मुख ही गाथा म्हटली – ‘‘න බ්රාහ්මණො සුජ්ඣති කොචි, ලොකෙ සීලවාපි තපොකරං; විජ්ජාචරණසම්පන්නො, සො සුජ්ඣති න අඤ්ඤා ඉතරා පජා’’ති. “या जगात कोणताही ब्राह्मण केवळ शीलवान आणि तपस्वी असूनही शुद्ध होत नाही; जो विद्या आणि चरणाने (ज्ञान आणि आचरणाने) संपन्न आहे, तोच शुद्ध होतो, इतर सामान्य लोक शुद्ध होत नाहीत.” ‘‘බහුම්පි පලපං ජප්පං, න ජච්චා හොති බ්රාහ්මණො; අන්තොකසම්බු සඞ්කිලිට්ඨො, කුහනං උපනිස්සිතො. “केवळ पुष्कळ बडबड (मंत्रजप) केल्याने कोणी जन्माने ब्राह्मण होत नाही; जो आतून कुजलेला (क्लेशयुक्त), मलीन आणि ढोंगीपणाचा आश्रय घेणारा आहे.” ‘‘ඛත්තියො [Pg.168] බ්රාහ්මණො වෙස්සො, සුද්දො චණ්ඩාලපුක්කුසො; ආරද්ධවීරියො පහිතත්තො, නිච්චං දළ්හපරක්කමො; පප්පොති පරමං සුද්ධිං, එවං ජානාහි බ්රාහ්මණා’’ති. “क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र, चंडाल किंवा कचरा उचलणारा असो; जर तो उद्योगी, दृढनिश्चयी आणि सदैव कठोर परिश्रम करणारा असेल, तर तो परम शुद्धीला प्राप्त करतो. हे ब्राह्मणा, असे तू जाण.” එවං වුත්තෙ, සුද්ධිකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භො ගොතම…පෙ… අඤ්ඤතරො ච පනායස්මා භාරද්වාජො අරහතං අහොසී’’ති. असे म्हटले असता, सुद्धिकभारद्वाज ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला, "अतिशय सुंदर, आदरणीय गोतम! ... आणि आयुष्यमान भारद्वाज अर्हतांपैकी एक झाले." 8. අග්ගිකසුත්තං ८. अग्गिक सुत्त 194. එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන අග්ගිකභාරද්වාජස්ස බ්රාහ්මණස්ස සප්පිනා පායසො සන්නිහිතො හොති – ‘‘අග්ගිං ජුහිස්සාමි, අග්ගිහුත්තං පරිචරිස්සාමී’’ති. १९४. एका वेळी भगवंत राजगृहातील वेळुवनातील कलंदकनिवाप येथे विहार करत होते. त्या वेळी अग्गिकभारद्वाज ब्राह्मणाने तुपासह खीर (पायस) तयार ठेवली होती, त्याने विचार केला होता की, "मी अग्नीमध्ये आहुती देईन, अग्निहोत्राची पूजा करीन." අථ ඛො භගවා පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය රාජගහං පිණ්ඩාය පාවිසි. රාජගහෙ සපදානං පිණ්ඩාය චරමානො යෙන අග්ගිකභාරද්වාජස්ස බ්රාහ්මණස්ස නිවෙසනං තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. අද්දසා ඛො අග්ගිකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො භගවන්තං පිණ්ඩාය ඨිතං. දිස්වාන භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – त्यानंतर भगवंत सकाळी चिवर परिधान करून, पात्र व चिवर घेऊन राजगृहात भिक्षेसाठी प्रविष्ट झाले. राजगृहात घरोघरी भिक्षेसाठी फिरत असताना भगवंत अग्गिकभारद्वाज ब्राह्मणाच्या घरापाशी आले आणि एका बाजूला उभे राहिले. अग्गिकभारद्वाज ब्राह्मणाने भगवंतांना भिक्षेसाठी उभे असलेले पाहिले. भगवंतांना पाहून त्याने गाथेने संबोधित केले – ‘‘තීහි විජ්ජාහි සම්පන්නො, ජාතිමා සුතවා බහූ; විජ්ජාචරණසම්පන්නො, සොමං භුඤ්ජෙය්ය පායස’’න්ති. “जो त्रिविद्येने (तीन वेदांनी) संपन्न आहे, उच्च कुलीन आहे, बहुश्रुत आहे, आणि जो विद्या व चरणाने संपन्न आहे, त्यानेच ही खीर (पायस) ग्रहण करावी.” ‘‘බහුම්පි පලපං ජප්පං, න ජච්චා හොති බ්රාහ්මණො; අන්තොකසම්බු සංකිලිට්ඨො, කුහනාපරිවාරිතො. “केवळ पुष्कळ बडबड (मंत्रजप) केल्याने कोणी जन्माने ब्राह्मण होत नाही; जो आतून कुजलेला (क्लेशयुक्त), मलीन आणि ढोंगीपणाने वेढलेला आहे.” ‘‘පුබ්බෙනිවාසං යො වෙදී, සග්ගාපායඤ්ච පස්සති; අථො ජාතික්ඛයං පත්තො, අභිඤ්ඤාවොසිතො මුනි. “ज्याला आपल्या पूर्वजन्मांचे ज्ञान आहे, जो स्वर्ग आणि नरक (अपाय) पाहतो, जो जन्माच्या क्षयाला (अर्हत पदाला) प्राप्त झाला आहे, असा अभिज्ञेने परिपूर्ण असलेला मुनी;” ‘‘එතාහි තීහි විජ්ජාහි, තෙවිජ්ජො හොති බ්රාහ්මණො; විජ්ජාචරණසම්පන්නො, සොමං භුඤ්ජෙය්ය පායස’’න්ති. “या तीन प्रकारच्या ज्ञानामुळेच मनुष्य 'त्रिविद्य' ब्राह्मण होतो. असा विद्या आणि चरणाने संपन्न असलेला मनुष्यच ही खीर (पायस) खाण्यास पात्र आहे.” ‘‘භුඤ්ජතු භවං ගොතමො. බ්රාහ්මණො භව’’න්ති. “आदरणीय गोतमांनी हे ग्रहण करावे. आपणच खरे ब्राह्मण आहात.” ‘‘ගාථාභිගීතං [Pg.169] මෙ අභොජනෙය්යං,සම්පස්සතං බ්රාහ්මණ නෙස ධම්මො; ගාථාභිගීතං පනුදන්ති බුද්ධා,ධම්මෙ සති බ්රාහ්මණ වුත්තිරෙසා. “गाथा म्हणून मिळवलेले अन्न माझ्यासाठी अभक्ष्य (खाण्यायोग्य नाही) आहे. हे ब्राह्मणा, सत्य पाहणाऱ्यांचा हा धर्म नाही. बुद्ध गाथा म्हणून मिळवलेल्या अन्नाचा त्याग करतात. हे ब्राह्मणा, धर्म अस्तित्वात असताना हीच बुद्धांची उपजीविका (नियम) आहे.” ‘‘අඤ්ඤෙන ච කෙවලිනං මහෙසිං,ඛීණාසවං කුක්කුච්චවූපසන්තං; අන්නෙන පානෙන උපට්ඨහස්සු,ඛෙත්තඤ්හි තං පුඤ්ඤපෙක්ඛස්ස හොතී’’ති. “ज्यांचे आस्रव नष्ट झाले आहेत, ज्यांची शंका-कुशंका शांत झाली आहे, अशा परिपूर्ण आणि महान ऋषींची इतर अन्न व पाण्याने सेवा कर; कारण पुण्य इच्छिणाऱ्यासाठी तेच उत्तम सुपीक शेत (पुण्यक्षेत्र) आहे.” එවං වුත්තෙ, අග්ගිකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භො ගොතම…පෙ… අඤ්ඤතරො ච පනායස්මා අග්ගිකභාරද්වාජො අරහතං අහොසී’’ති. असे म्हटले असता, अग्गिकभारद्वाज ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला, "अतिशय सुंदर, आदरणीय गोतम! ... आणि आयुष्यमान अग्गिकभारद्वाज अर्हतांपैकी एक झाले." 9. සුන්දරිකසුත්තං ९. सुन्दरिक सुत्त 195. එකං සමයං භගවා කොසලෙසු විහරති සුන්දරිකාය නදියා තීරෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන සුන්දරිකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො සුන්දරිකාය නදියා තීරෙ අග්ගිං ජුහති, අග්ගිහුත්තං පරිචරති. අථ ඛො සුන්දරිකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො අග්ගිං ජුහිත්වා අග්ගිහුත්තං පරිචරිත්වා උට්ඨායාසනා සමන්තා චතුද්දිසා අනුවිලොකෙසි – ‘‘කො නු ඛො ඉමං හබ්යසෙසං භුඤ්ජෙය්යා’’ති? අද්දසා ඛො සුන්දරිකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො භගවන්තං අඤ්ඤතරස්මිං රුක්ඛමූලෙ සසීසං පාරුතං නිසින්නං. දිස්වාන වාමෙන හත්ථෙන හබ්යසෙසං ගහෙත්වා දක්ඛිණෙන හත්ථෙන කමණ්ඩලුං ගහෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි. අථ ඛො භගවා සුන්දරිකභාරද්වාජස්ස බ්රාහ්මණස්ස පදසද්දෙන සීසං විවරි. අථ ඛො සුන්දරිකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො ‘මුණ්ඩො අයං භවං, මුණ්ඩකො අයං භව’න්ති තතොව පුන නිවත්තිතුකාමො අහොසි. අථ ඛො සුන්දරිකභාරද්වාජස්ස බ්රාහ්මණස්ස එතදහොසි – ‘මුණ්ඩාපි හි ඉධෙකච්චෙ බ්රාහ්මණා භවන්ති; යංනූනාහං තං උපසඞ්කමිත්වා ජාතිං පුච්ඡෙය්ය’න්ති. १९५. एका वेळी भगवंत कोसल देशात सुन्दरिका नदीच्या काठी विहार करत होते. त्या वेळी सुन्दरिकभारद्वाज ब्राह्मण सुन्दरिका नदीच्या काठी अग्नीमध्ये आहुती देत होता, अग्निहोत्राची पूजा करत होता. त्यानंतर सुन्दरिकभारद्वाज ब्राह्मणाने अग्नीमध्ये आहुती देऊन आणि अग्निहोत्राची पूजा करून, आपल्या आसनावरून उठून चारी दिशांना पाहिले की, "हा यज्ञाचा उरलेला भाग (हव्यशेष) कोण खाईल?" सुन्दरिकभारद्वाज ब्राह्मणाने भगवंतांना एका झाडाच्या मुळाशी डोक्यासह पांघरून घेऊन बसलेले पाहिले. त्यांना पाहून त्याने डाव्या हाताने यज्ञाचा उरलेला भाग आणि उजव्या हाताने कमंडलू घेतला आणि तो भगवंतांच्या दिशेने गेला. तेव्हा भगवंतांनी सुन्दरिकभारद्वाज ब्राह्मणाच्या पावलांच्या आवाजाने आपले डोके उघडे केले. तेव्हा सुन्दरिकभारद्वाज ब्राह्मणाने विचार केला, "हे गृहस्थ तर मुंडित (डोके कोरलेले) आहेत, हे तर मुंडक आहेत," आणि तो तेथून परत फिरू लागला. पण सुन्दरिकभारद्वाज ब्राह्मणाच्या मनात असा विचार आला की, "या जगात काही ब्राह्मण देखील मुंडित असतात; मी त्यांच्याजवळ जाऊन त्यांची जात का विचारू नये?" අථ ඛො සුන්දරිකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘කිංජච්චො භව’න්ති? त्यानंतर सुन्दरिकभारद्वाज ब्राह्मण भगवंतांच्या जवळ गेला; आणि जवळ जाऊन भगवंतांना म्हणाला, "आपली जात कोणती आहे?" ‘‘මා [Pg.170] ජාතිං පුච්ඡ චරණඤ්ච පුච්ඡ,කට්ඨා හවෙ ජායති ජාතවෙදො; නීචාකුලීනොපි මුනි ධිතිමා,ආජානීයො හොති හිරීනිසෙධො. “जात विचारू नकोस, तर आचरण विचार; अग्नी हा लाकडापासूनच उत्पन्न होतो. नीच कुळात जन्मलेला असला तरी मुनी हा दृढनिश्चयी, बुद्धिमान आणि लाजेने (पाप करण्याच्या भीतीने) स्वतःवर नियंत्रण ठेवणारा असतो.” ‘‘සච්චෙන දන්තො දමසා උපෙතො,වෙදන්තගූ වුසිතබ්රහ්මචරියො; යඤ්ඤොපනීතො තමුපව්හයෙථ,කාලෙන සො ජුහති දක්ඛිණෙය්යෙ’’ති. “जो सत्याने दमित आहे, इंद्रिय संयमाने युक्त आहे, वेदांताचा (ज्ञानाचा) पारगामी आहे, ज्याने ब्रह्मचर्य पूर्ण केले आहे; अशा यज्ञासाठी योग्य असलेल्या व्यक्तीला योग्य वेळी आमंत्रित करावे. तोच खऱ्या अर्थाने पूजनीय व्यक्तीला आहुती देतो.” ‘‘අද්ධා සුයිට්ඨං සුහුතං මම යිදං,යං තාදිසං වෙදගුමද්දසාමි; තුම්හාදිසානඤ්හි අදස්සනෙන,අඤ්ඤො ජනො භුඤ්ජති හබ්යසෙස’’න්ති. “नक्कीच माझा यज्ञ सुफळ झाला आणि माझी आहुती सार्थकी लागली, कारण मी आपल्यासारख्या ज्ञानवंताला पाहिले आहे. आपल्यासारख्यांचे दर्शन न झाल्यामुळेच इतर लोक यज्ञाचा उरलेला भाग खात होते.” ‘‘භුඤ්ජතු භවං ගොතමො. බ්රාහ්මණො භව’’න්ති. “आदरणीय गोतमांनी हे ग्रहण करावे. आपणच खरे ब्राह्मण आहात.” ‘‘ගාථාභිගීතං මෙ අභොජනෙය්යං,සම්පස්සතං බ්රාහ්මණ නෙස ධම්මො; ගාථාභිගීතං පනුදන්ති බුද්ධා,ධම්මෙ සති බ්රාහ්මණ වුත්තිරෙසා. “गाथा म्हणून मिळवलेले अन्न माझ्यासाठी अभक्ष्य (खाण्यायोग्य नाही) आहे. हे ब्राह्मणा, सत्य पाहणाऱ्यांचा हा धर्म नाही. बुद्ध गाथा म्हणून मिळवलेल्या अन्नाचा त्याग करतात. हे ब्राह्मणा, धर्म अस्तित्वात असताना हीच बुद्धांची उपजीविका (नियम) आहे.” ‘‘අඤ්ඤෙන ච කෙවලිනං මහෙසිං,ඛීණාසවං කුක්කුච්චවූපසන්තං; අන්නෙන පානෙන උපට්ඨහස්සු,ඛෙත්තඤ්හි තං පුඤ්ඤපෙක්ඛස්ස හොතී’’ති. “ज्यांचे आस्रव नष्ट झाले आहेत, ज्यांची शंका-कुशंका शांत झाली आहे, अशा परिपूर्ण आणि महान ऋषींची इतर अन्न व पाण्याने सेवा कर; कारण पुण्य इच्छिणाऱ्यासाठी तेच उत्तम सुपीक शेत (पुण्यक्षेत्र) आहे.” ‘‘අථ කස්ස චාහං, භො ගොතම, ඉමං හබ්යසෙසං දම්මී’’ති? ‘‘න ඛ්වාහං, බ්රාහ්මණ, පස්සාමි සදෙවකෙ ලොකෙ සමාරකෙ සබ්රහ්මකෙ සස්සමණබ්රාහ්මණියා පජාය සදෙවමනුස්සාය යස්සෙසො හබ්යසෙසො භුත්තො සම්මා පරිණාමං ගච්ඡෙය්ය අඤ්ඤත්ර, බ්රාහ්මණ, තථාගතස්ස වා තථාගතසාවකස්ස වා. තෙන හි ත්වං, බ්රාහ්මණ, තං හබ්යසෙසං අප්පහරිතෙ වා ඡඩ්ඩෙහි අප්පාණකෙ වා උදකෙ ඔපිලාපෙහී’’ති. “तर मग, हे गोतमा, मी हा यज्ञाचा उरलेला भाग कोणाला देऊ?” “हे ब्राह्मणा, देव, मार आणि ब्रह्मा यांच्यासह या जगात, श्रमण, ब्राह्मण, देव आणि मानवांसह या प्रजातीमध्ये, तथागत किंवा तथागतांच्या श्रावकाशिवाय मला असा कोणीही दिसत नाही, जो हा यज्ञाचा उरलेला भाग खाऊन योग्य प्रकारे पचवू शकेल. म्हणून, हे ब्राह्मणा, तू हा यज्ञाचा उरलेला भाग हिरवे गवत नसलेल्या ठिकाणी टाकून दे किंवा जीवजंतू नसलेल्या पाण्यात विसर्जित कर.” අථ ඛො සුන්දරිකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො තං හබ්යසෙසං අප්පාණකෙ උදකෙ ඔපිලාපෙසි. අථ ඛො සො හබ්යසෙසො උදකෙ පක්ඛිත්තො චිච්චිටායති [Pg.171] චිටිචිටායති සන්ධූපායති සම්පධූපායති. සෙය්යථාපි නාම ඵාලො දිවසංසන්තත්තො උදකෙ පක්ඛිත්තො චිච්චිටායති චිටිචිටායති සන්ධූපායති සම්පධූපායති; එවමෙව සො හබ්යසෙසො උදකෙ පක්ඛිත්තො චිච්චිටායති චිටිචිටායති සන්ධූපායති සම්පධූපායති. त्यानंतर सुन्दरीकभारद्वाज ब्राह्मणाने तो हव्यशेष (यज्ञाचा उरलेला भाग) जीवजंतू नसलेल्या पाण्यात विसर्जित केला. तेव्हा पाण्यात टाकलेला तो हव्यशेष सळसळ असा आवाज करू लागला, वाफाळू लागला आणि चोहोबाजूने धूर सोडू लागला. ज्याप्रमाणे दिवसभर तापलेला लोखंडाचा फाळ पाण्यात टाकला असता सळसळ असा आवाज करतो, वाफाळतो आणि चोहोबाजूने धूर सोडतो; त्याचप्रमाणे तो हव्यशेष पाण्यात टाकला असता सळसळ असा आवाज करू लागला, वाफाळू लागला आणि चोहोबाजूने धूर सोडू लागला. අථ ඛො සුන්දරිකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො සංවිග්ගො ලොමහට්ඨජාතො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතං ඛො සුන්දරිකභාරද්වාජං බ්රාහ්මණං භගවා ගාථාහි අජ්ඣභාසි – तेव्हा सुन्दरीकभारद्वाज ब्राह्मण भयभीत झाला आणि त्याचे अंगावर रोमांच उभे राहिले. तो भगवान जेथे होते तेथे गेला; आणि जवळ जाऊन एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभे राहिलेल्या सुन्दरीकभारद्वाज ब्राह्मणाला भगवंतांनी गाथांनी संबोधित केले – ‘‘මා බ්රාහ්මණ දාරු සමාදහානො,සුද්ධිං අමඤ්ඤි බහිද්ධා හි එතං; න හි තෙන සුද්ධිං කුසලා වදන්ති,යො බාහිරෙන පරිසුද්ධිමිච්ඡෙ. "हे ब्राह्मणा, लाकडे पेटवून (यज्ञ करून) शुद्धी मिळते असे मानू नकोस, कारण ही केवळ बाह्य गोष्ट आहे. जो बाह्य गोष्टींनी शुद्धीची इच्छा करतो, त्याला त्याद्वारे शुद्धी मिळते असे कुशल (ज्ञानी) लोक म्हणत नाहीत. ‘‘හිත්වා අහං බ්රාහ්මණ දාරුදාහංඅජ්ඣත්තමෙවුජ්ජලයාමි ජොතිං; නිච්චග්ගිනී නිච්චසමාහිතත්තො,අරහං අහං බ්රහ්මචරියං චරාමි. "हे ब्राह्मणा, लाकडाची आग पेटवणे सोडून मी केवळ अंतर्मनातच ज्ञानाची ज्योत प्रज्वलित करतो. माझी अग्नी निरंतर प्रज्वलित आहे, माझे चित्त सदैव समाहित (एकाग्र) आहे, मी अर्हत असून श्रेष्ठ ब्रह्मचर्य आचरण करतो. ‘‘මානො හි තෙ බ්රාහ්මණ ඛාරිභාරො,කොධො ධුමො භස්මනි මොසවජ්ජං; ජිව්හා සුජා හදයං ජොතිඨානං,අත්තා සුදන්තො පුරිසස්ස ජොති. "हे ब्राह्मणा, तुझा अहंकार (मान) हाच तुझा खांद्यावरील भार आहे, तुझा क्रोध हा धूर आहे आणि असत्य बोलणे ही राख आहे. जीभ ही यज्ञाची पळी (स्रुवा) आहे, हृदय हे अग्नीचे स्थान आहे आणि मनुष्याचे सुसंयमित मन (चित्त) हीच खरी ज्योत आहे. ‘‘ධම්මො රහදො බ්රාහ්මණ සීලතිත්ථො,අනාවිලො සබ්භි සතං පසත්ථො; යත්ථ හවෙ වෙදගුනො සිනාතා,අනල්ලගත්තාව තරන්ති පාරං. "हे ब्राह्मणा, धम्म हा एक जलाशय आहे आणि शील हा त्याचा घाट (तीर्थ) आहे. तो अत्यंत निर्मळ असून सत्पुरुषांनी सत्पुरुषांसाठी त्याची प्रशंसा केली आहे. जेथे वेदगू (ज्ञानी अर्हत) स्नान करतात आणि ओले न होताच पैलतीराला (निर्वाणाला) पार करतात. ‘‘සච්චං ධම්මො සංයමො බ්රහ්මචරියං,මජ්ඣෙ සිතා බ්රාහ්මණ බ්රහ්මපත්ති; ස තුජ්ජුභූතෙසු නමො කරොහි,තමහං නරං ධම්මසාරීති බ්රූමී’’ති. "सत्य, धम्म, संयम आणि ब्रह्मचर्य, हे मध्यम मार्गावर आधारित असून श्रेष्ठ अवस्था (ब्रह्मप्राप्ती) मिळवून देणारे आहेत. तू त्या सरळ मार्गाने जाणाऱ्या (ऋजू) सत्पुरुषांना नमस्कार कर. अशा मनुष्यालाच मी 'धम्मसारथी' (धम्माचे सार असणारा) असे म्हणतो." එවං [Pg.172] වුත්තෙ, සුන්දරිකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භො ගොතම…පෙ… අඤ්ඤතරො ච පනායස්මා භාරද්වාජො අරහතං අහොසී’’ති. असे म्हटले असता, सुन्दरीकभारद्वाज ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला – "अतिशय सुंदर, हे गौतम! ... आणि आयुष्यमान भारद्वाज अर्हतांपैकी एक झाले." 10. බහුධීතරසුත්තං १०. बहुधीतर सुत्त 196. එකං සමයං භගවා කොසලෙසු විහරති අඤ්ඤතරස්මිං වනසණ්ඩෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන අඤ්ඤතරස්ස භාරද්වාජගොත්තස්ස බ්රාහ්මණස්ස චතුද්දස බලීබද්දා නට්ඨා හොන්ති. අථ ඛො භාරද්වාජගොත්තො බ්රාහ්මණො තෙ බලීබද්දෙ ගවෙසන්තො යෙන සො වනසණ්ඩො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා අද්දස භගවන්තං තස්මිං වනසණ්ඩෙ නිසින්නං පල්ලඞ්කං ආභුජිත්වා උජුං කායං පණිධාය පරිමුඛං සතිං උපට්ඨපෙත්වා. දිස්වාන යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතො සන්තිකෙ ඉමා ගාථායො අභාසි – १९६. एकदा भगवान कोसल देशामध्ये एका जंगलात (वनखंडात) विहार करत होते. त्या वेळी भारद्वाज गोत्राच्या एका ब्राह्मणाचे चौदा बैल हरवले होते. तेव्हा तो भारद्वाजगोत्री ब्राह्मण त्या बैलांचा शोध घेत घेत त्या जंगलात आला. तेथे त्याने भगवंतांना मांडी घालून, शरीर ताठ ठेवून आणि समोर स्मृती प्रस्थापित करून (ध्यानस्थ) बसलेले पाहिले. त्यांना पाहून तो भगवंतांच्या जवळ गेला आणि जवळ जाऊन भगवंतांच्या समोर या गाथा म्हणाला – ‘‘න හි නූනිමස්ස සමණස්ස, බලීබද්දා චතුද්දස; අජ්ජසට්ඨිං න දිස්සන්ති, තෙනායං සමණො සුඛී. "नक्कीच या श्रमणाचे चौदा बैल हरवलेले नाहीत, जे आज सहा दिवसांपासून दिसत नाहीत; म्हणूनच हा श्रमण सुखी आहे. ‘‘න හි නූනිමස්ස සමණස්ස, තිලාඛෙත්තස්මි පාපකා; එකපණ්ණා දුපණ්ණා ච, තෙනායං සමණො සුඛී. "नक्कीच या श्रमणाच्या तिळाच्या शेतात केवळ एक किंवा दोन पाने उरलेली खराब पिके नाहीत; म्हणूनच हा श्रमण सुखी आहे. ‘‘න හි නූනිමස්ස සමණස්ස, තුච්ඡකොට්ඨස්මි මූසිකා; උස්සොළ්හිකාය නච්චන්ති, තෙනායං සමණො සුඛී. "नक्कीच या श्रमणाच्या रिकाम्या कोठारात उंदीर आनंदाने उड्या मारत नाचत नाहीत; म्हणूनच हा श्रमण सुखी आहे. ‘‘න හි නූනිමස්ස සමණස්ස, සන්ථාරො සත්තමාසිකො; උප්පාටකෙහි සඤ්ඡන්නො, තෙනායං සමණො සුඛී. "नक्कीच या श्रमणाची सात महिन्यांपासून न झटकलेली चटई (बिछाना) किड्या-मुंग्यांनी भरलेली नाही; म्हणूनच हा श्रमण सुखी आहे. ‘‘න හි නූනිමස්ස සමණස්ස, විධවා සත්ත ධීතරො; එකපුත්තා දුපුත්තා ච, තෙනායං සමණො සුඛී. "नक्कीच या श्रमणाला सात विधवा मुली नाहीत, ज्यांना एकेक किंवा दोन दोन मुले आहेत; म्हणूनच हा श्रमण सुखी आहे. ‘‘න හි නූනිමස්ස සමණස්ස, පිඞ්ගලා තිලකාහතා; සොත්තං පාදෙන බොධෙති, තෙනායං සමණො සුඛී. "नक्कीच या श्रमणाला पिंगट डोळ्यांची आणि अंगावर तीळ (व्रण) असलेली पत्नी नाही, जी झोपेत असताना त्याला लाथेने मारून जागी करते; म्हणूनच हा श्रमण सुखी आहे. ‘‘න හි නූනිමස්ස සමණස්ස, පච්චූසම්හි ඉණායිකා; දෙථ දෙථාති චොදෙන්ති, තෙනායං සමණො සුඛී’’ති. "नक्कीच या श्रमणाला पहाटेच्या वेळी सावकार 'द्या, आमचे पैसे द्या' म्हणून तगादा लावत नाहीत; म्हणूनच हा श्रमण सुखी आहे." ‘‘න [Pg.173] හි මය්හං බ්රාහ්මණ, බලීබද්දා චතුද්දස; අජ්ජසට්ඨිං න දිස්සන්ති, තෙනාහං බ්රාහ්මණා සුඛී. "हे ब्राह्मणा, माझे चौदा बैल हरवलेले नाहीत, जे आज सहा दिवसांपासून दिसत नाहीत; म्हणूनच, हे ब्राह्मणा, मी सुखी आहे. ‘‘න හි මය්හං බ්රාහ්මණ, තිලාඛෙත්තස්මි පාපකා; එකපණ්ණා දුපණ්ණා ච, තෙනාහං බ්රාහ්මණා සුඛී. "हे ब्राह्मणा, माझ्या तिळाच्या शेतात केवळ एक किंवा दोन पाने उरलेली खराब पिके नाहीत; म्हणूनच, हे ब्राह्मणा, मी सुखी आहे. ‘‘න හි මය්හං බ්රාහ්මණ, තුච්ඡකොට්ඨස්මි මූසිකා; උස්සොළ්හිකාය නච්චන්ති, තෙනාහං බ්රාහ්මණා සුඛී. "हे ब्राह्मणा, माझ्या रिकाम्या कोठारात उंदीर आनंदाने उड्या मारत नाचत नाहीत; म्हणूनच, हे ब्राह्मणा, मी सुखी आहे. ‘‘න හි මය්හං බ්රාහ්මණ, සන්ථාරො සත්තමාසිකො; උප්පාටකෙහි සඤ්ඡන්නො, තෙනාහං බ්රාහ්මණා සුඛී. "हे ब्राह्मणा, माझी सात महिन्यांपासून न झटकलेली चटई (बिछाना) किड्या-मुंग्यांनी भरलेली नाही; म्हणूनच, हे ब्राह्मणा, मी सुखी आहे. ‘‘න හි මය්හං බ්රාහ්මණ, විධවා සත්ත ධීතරො; එකපුත්තා දුපුත්තා ච, තෙනාහං බ්රාහ්මණා සුඛී. "हे ब्राह्मणा, माझ्या सात विधवा मुली नाहीत, ज्यांना एकेक किंवा दोन दोन मुले आहेत; म्हणूनच, हे ब्राह्मणा, मी सुखी आहे. ‘‘න හි මය්හං බ්රාහ්මණ, පිඞ්ගලා තිලකාහතා; සොත්තං පාදෙන බොධෙති, තෙනාහං බ්රාහ්මණා සුඛී. "हे ब्राह्मणा, माझी पिंगट डोळ्यांची आणि अंगावर तीळ (व्रण) असलेली पत्नी नाही, जी झोपेत असताना मला लाथेने मारून जागी करते; म्हणूनच, हे ब्राह्मणा, मी सुखी आहे. ‘‘න හි මය්හං බ්රාහ්මණ, පච්චූසම්හි ඉණායිකා; දෙථ දෙථාති චොදෙන්ති, තෙනාහං බ්රාහ්මණා සුඛී’’ති. "हे ब्राह्मणा, मला पहाटेच्या वेळी सावकार 'द्या, आमचे पैसे द्या' म्हणून तगादा लावत नाहीत; म्हणूनच, हे ब्राह्मणा, मी सुखी आहे." එවං වුත්තෙ, භාරද්වාජගොත්තො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භො ගොතම, අභික්කන්තං, භො ගොතම! සෙය්යථාපි, භො ගොතම, නික්කුජ්ජිතං වා උක්කුජ්ජෙය්ය, පටිච්ඡන්නං වා විවරෙය්ය, මූළ්හස්ස වා මග්ගං ආචික්ඛෙය්ය, අන්ධකාරෙ වා තෙලපජ්ජොතං ධාරෙය්ය – චක්ඛුමන්තො රූපානි දක්ඛන්තීති; එවමෙව භොතා ගොතමෙන අනෙකපරියායෙන ධම්මො පකාසිතො. එසාහං භවන්තං ගොතමං සරණං ගච්ඡාමි ධම්මඤ්ච භික්ඛුසඞ්ඝඤ්ච. ලභෙය්යාහං භොතො ගොතමස්ස සන්තිකෙ පබ්බජ්ජං, ලභෙය්යං උපසම්පද’’න්ති. असे म्हटले असता, भारद्वाजगोत्री ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला – "अतिशय सुंदर, हे गौतम! अतिशय सुंदर, हे गौतम! ज्याप्रमाणे एखाद्याने उपडे ठेवलेले भांडे उताणे करून ठेवावे, किंवा झाकलेले उघडून दाखवावे, किंवा वाट चुकलेल्याला वाट दाखवावी, किंवा अंधारात तेलाचा दिवा धरावा जेणेकरून डोळे असणाऱ्यांना रूपे दिसावीत; त्याचप्रमाणे आदरणीय गौतमांनी अनेक प्रकारे धम्म प्रकाशित केला आहे. मी आदरणीय गौतमांना, धम्माला आणि भिक्खू संघाला शरण जातो. मला आदरणीय गौतमांच्या सन्निध प्रवज्जा मिळावी आणि उपसंपदा मिळावी." අලත්ථ ඛො භාරද්වාජගොත්තො බ්රාහ්මණො භගවතො සන්තිකෙ පබ්බජ්ජං, අලත්ථ උපසම්පදං. අචිරූපසම්පන්නො පනායස්මා භාරද්වාජො එකො වූපකට්ඨො අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරන්තො නචිරස්සෙව – යස්සත්ථාය කුලපුත්තා සම්මදෙව අගාරස්මා අනගාරියං පබ්බජන්ති, තදනුත්තරං – බ්රහ්මචරියපරියොසානං දිට්ඨෙව ධම්මෙ සයං අභිඤ්ඤා සච්ඡිකත්වා උපසම්පජ්ජ විහාසි. ‘‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං [Pg.174] ඉත්ථත්තායා’’ති අබ්භඤ්ඤාසි. අඤ්ඤතරො ච පනායස්මා භාරද්වාජො අරහතං අහොසීති. त्या भारद्वाजगोत्री ब्राह्मणाला भगवंतांच्या सन्निध प्रवज्जा मिळाली आणि उपसंपदा मिळाली. उपसंपदा मिळाल्यानंतर लवकरच आयुष्यमान भारद्वाज एकटे, एकांतात, अप्रमत्त (जागरूक), उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करू लागले. ज्या ध्येयासाठी कुलपुत्र योग्य प्रकारे घरादाराचा त्याग करून अनगारिक (गृहहीन) प्रवज्जा घेतात, ते ब्रह्मचर्याचे सर्वश्रेष्ठ अंतिम ध्येय (अर्हतपद) त्यांनी याच जन्मात स्वतःच्या विशेष ज्ञानाने (अभिज्ञा) साक्षात करून प्राप्त केले. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले आहे, आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरलेले नाही,' असे त्यांनी जाणले. आणि आयुष्यमान भारद्वाज अर्हतांपैकी एक झाले. අරහන්තවග්ගො පඨමො. पहिला अर्हतवर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – ධනඤ්ජානී ච අක්කොසං, අසුරින්දං බිලඞ්ගිකං; අහිංසකං ජටා චෙව, සුද්ධිකඤ්චෙව අග්ගිකා; සුන්දරිකං බහුධීතරෙන ච තෙ දසාති. धनंजानी सुत्त, अक्कोस सुत्त, असुरिन्द सुत्त, बिलंगिक सुत्त, अहिंसक सुत्त, जटा सुत्त, सुद्धिक सुत्त, अग्गिक सुत्त, सुन्दरीक सुत्त आणि बहुधीतर सुत्त – अशी ही दहा सुत्ते आहेत. 2. උපාසකවග්ගො २. उपासकवर्ग 1. කසිභාරද්වාජසුත්තං १. कसिभारद्वाज सुत्त 197. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා මගධෙසු විහරති දක්ඛිණාගිරිස්මිං එකනාළායං බ්රාහ්මණගාමෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන කසිභාරද්වාජස්ස බ්රාහ්මණස්ස පඤ්චමත්තානි නඞ්ගලසතානි පයුත්තානි හොන්ති වප්පකාලෙ. අථ ඛො භගවා පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය යෙන කසිභාරද්වාජස්ස බ්රාහ්මණස්ස කම්මන්තො තෙනුපසඞ්කමි. १९७. मी असे ऐकले आहे – एका वेळी भगवान मगध देशातील दक्खिणागिरी येथील एकनाळा नावाच्या ब्राह्मण गावात विहार करत होते. त्या वेळी पेरणीच्या हंगामात कसिभारद्वाज ब्राह्मणाची सुमारे पाचशे नांगर बैलांना जुंपलेली होती. तेव्हा भगवान सकाळच्या वेळी चीवर नेसून, पात्र व चीवर घेऊन जेथे कसिभारद्वाज ब्राह्मणाचे शेतकाम चालू होते, तेथे गेले। තෙන ඛො පන සමයෙන කසිභාරද්වාජස්ස බ්රාහ්මණස්ස පරිවෙසනා වත්තති. අථ ඛො භගවා යෙන පරිවෙසනා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. අද්දසා ඛො කසිභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො භගවන්තං පිණ්ඩාය ඨිතං. දිස්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අහං ඛො, සමණ, කසාමි ච වපාමි ච, කසිත්වා ච වපිත්වා ච භුඤ්ජාමි. ත්වම්පි, සමණ, කසස්සු ච වපස්සු ච, කසිත්වා ච වපිත්වා ච භුඤ්ජස්සූ’’ති. ‘‘අහම්පි ඛො, බ්රාහ්මණ, කසාමි ච වපාමි ච, කසිත්වා ච වපිත්වා ච භුඤ්ජාමී’’ති. න ඛො මයං පස්සාම භොතො ගොතමස්ස යුගං වා නඞ්ගලං වා ඵාලං වා පාචනං වා බලීබද්දෙ වා, අථ ච පන භවං ගොතමො එවමාහ – ‘‘අහම්පි ඛො, බ්රාහ්මණ, කසාමි ච වපාමි ච, කසිත්වා ච වපිත්වා ච භුඤ්ජාමී’’ති[Pg.175]. අථ ඛො කසිභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – त्या वेळी कसिभारद्वाज ब्राह्मणाचे अन्नवाटप चालू होते. तेव्हा भगवान जेथे अन्नवाटप चालू होते तेथे गेले आणि एका बाजूला उभे राहिले. कसिभारद्वाज ब्राह्मणाने भगवंतांना भिक्षेसाठी उभे राहिलेले पाहिले. पाहून तो भगवंतांना म्हणाला – “हे श्रमणा, मी नांगरतो आणि पेरतो; आणि नांगरून व पेरून मगच खातो. हे श्रमणा, तूही नांगर आणि पेर; आणि नांगरून व पेरून मगच खा.” तेव्हा भगवान म्हणाले – “हे ब्राह्मणा, मीसुद्धा नांगरतो आणि पेरतो; आणि नांगरून व पेरून मगच खातो.” ब्राह्मण म्हणाला – “आम्हाला तर आदरणीय गोतमांचे जू, नांगर, फाळ, चाबूक किंवा बैल दिसत नाहीत; तरीही आदरणीय गोतम असे म्हणतात – ‘हे ब्राह्मणा, मीसुद्धा नांगरतो आणि पेरतो; आणि नांगरून व पेरून मगच खातो.’” तेव्हा कसिभारद्वाज ब्राह्मणाने भगवंतांना गाथेने विचारले – ‘‘කස්සකො පටිජානාසි, න ච පස්සාමි තෙ කසිං; කස්සකො පුච්ඡිතො බ්රූහි, කථං ජානෙමු තං කසි’’න්ති. “तुम्ही स्वतःला शेतकरी म्हणवता, पण मला तुमची शेती दिसत नाही. मी विचारतो आहे, हे शेतकऱ्या, सांगा, आम्ही तुमची ती शेती कशी समजावी?” ‘‘සද්ධා බීජං තපො වුට්ඨි, පඤ්ඤා මෙ යුගනඞ්ගලං; හිරී ඊසා මනො යොත්තං, සති මෙ ඵාලපාචනං. “श्रद्धा हे माझे बीज आहे, तप ही वृष्टी आहे, प्रज्ञा हे माझे जू आणि नांगर आहे; ह्री हे नांगराचा दांडा आहे, मन हे दोरखंड आहे आणि स्मृती हे माझे फाळ व चाबूक आहे. ‘‘කායගුත්තො වචීගුත්තො, ආහාරෙ උදරෙ යතො; සච්චං කරොමි නිද්දානං, සොරච්චං මෙ පමොචනං. “मी कायेने सुरक्षित आणि वाचेने सुरक्षित आहे, आहाराच्या बाबतीत उदरावर नियंत्रण ठेवणारा आहे; मी सत्याने तणांची काढणी करतो आणि सौजन्य हे माझे बंधनातून मुक्त होणे आहे. ‘‘වීරියං මෙ ධුරධොරය්හං, යොගක්ඛෙමාධිවාහනං; ගච්ඡති අනිවත්තන්තං, යත්ථ ගන්ත්වා න සොචති. “वीर्य हा माझा ओझे वाहणारा बैल आहे, जो मला योगक्षेमाकडे घेऊन जातो; तो न थांबता पुढे जातो, जेथे गेल्यावर माणूस शोक करत नाही. ‘‘එවමෙසා කසී කට්ඨා, සා හොති අමතප්ඵලා; එතං කසිං කසිත්වාන, සබ්බදුක්ඛා පමුච්චතී’’ති. “अशा प्रकारे ही शेती केली जाते, जिचे फळ अमृत असते; ही शेती केल्यावर माणूस सर्व दुःखांतून मुक्त होतो.” ‘‘භුඤ්ජතු භවං ගොතමො. කස්සකො භවං. යඤ්හි භවං ගොතමො අමතප්ඵලම්පි කසිං කසතී’’ති. “आदरणीय गोतमांनी भोजन करावे. आपण खरोखरच शेतकरी आहात, कारण आदरणीय गोतम अशी शेती करतात जिचे फळ अमृत आहे.” ‘‘ගාථාභිගීතං මෙ අභොජනෙය්යං,සම්පස්සතං බ්රාහ්මණ නෙස ධම්මො; ගාථාභිගීතං පනුදන්ති බුද්ධා,ධම්මෙ සති බ්රාහ්මණ වුත්තිරෙසා. “गाथा गाऊन मिळवलेले अन्न माझ्यासाठी अभोज्य आहे. हे ब्राह्मणा, सत्य पाहणाऱ्यांचा हा धर्म नाही. बुद्ध गाथा गाऊन मिळवलेल्या अन्नाचा त्याग करतात. हे ब्राह्मणा, जोपर्यंत सद्धर्म अस्तित्वात आहे, तोपर्यंत बुद्धांची हीच उपजीविका आहे. ‘‘අඤ්ඤෙන ච කෙවලිනං මහෙසිං,ඛීණාසවං කුක්කුච්චවූපසන්තං; අන්නෙන පානෙන උපට්ඨහස්සු,ඛෙත්තඤ්හි තං පුඤ්ඤපෙක්ඛස්ස හොතී’’ති. “तू इतर अन्नाने आणि पेयाने त्या परिपूर्ण, महर्षी, क्षीणास्रव आणि पश्चात्ताप शांत झालेल्या अर्हताची सेवा कर; कारण पुण्य इच्छिणाऱ्यासाठी तेच उत्तम क्षेत्र आहे.” එවං වුත්තෙ, කසිභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භො ගොතම…පෙ… අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. असे म्हटल्यावर, कसिभारद्वाज ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला – “अतिशय सुंदर, हे गोतमा! अतिशय सुंदर! ... आजपासून मला जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे.” 2. උදයසුත්තං २. उदयसुत्त 198. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො භගවා පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය යෙන උදයස්ස බ්රාහ්මණස්ස නිවෙසනං තෙනුපසඞ්කමි. අථ [Pg.176] ඛො උදයො බ්රාහ්මණො භගවතො පත්තං ඔදනෙන පූරෙසි. දුතියම්පි ඛො භගවා පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය යෙන උදයස්ස බ්රාහ්මණස්ස නිවෙසනං තෙනුපසඞ්කමි…පෙ… තතියම්පි ඛො උදයො බ්රාහ්මණො භගවතො පත්තං ඔදනෙන පූරෙත්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘පකට්ඨකොයං සමණො ගොතමො පුනප්පුනං ආගච්ඡතී’’ති. १९८. श्रावस्ती येथील प्रसंग. तेव्हा भगवान सकाळच्या वेळी चीवर नेसून, पात्र व चीवर घेऊन जेथे उदय ब्राह्मणाचे घर होते तेथे गेले. तेव्हा उदय ब्राह्मणाने भगवंतांचे पात्र भाताने भरले. दुसऱ्या दिवशीही भगवान सकाळच्या वेळी चीवर नेसून, पात्र व चीवर घेऊन जेथे उदय ब्राह्मणाचे घर होते तेथे गेले... तिसऱ्या दिवशीही उदय ब्राह्मणाने भगवंतांचे पात्र भाताने भरले आणि भगवंतांना म्हणाला – “हा चवीचा हावरा श्रमण गोतम वारंवार येतो.” ‘‘පුනප්පුනඤ්චෙව වපන්ති බීජං, පුනප්පුනං වස්සති දෙවරාජා; පුනප්පුනං ඛෙත්තං කසන්ති කස්සකා, පුනප්පුනං ධඤ්ඤමුපෙති රට්ඨං. “शेतकरी वारंवार बीज पेरतात, पर्जन्यराज वारंवार पाऊस पाडतो; शेतकरी वारंवार शेत नांगरतात, आणि धान्याची वारंवार राष्ट्रात आवक होते. ‘‘පුනප්පුනං යාචකා යාචයන්ති, පුනප්පුනං දානපතී දදන්ති; පුනප්පුනං දානපතී දදිත්වා, පුනප්පුනං සග්ගමුපෙන්ති ඨානං. “याचक वारंवार याचना करतात, दानशूर वारंवार दान देतात; दानशूर वारंवार दान देऊन वारंवार स्वर्गात स्थान मिळवतात. ‘‘පුනප්පුනං ඛීරනිකා දුහන්ති, පුනප්පුනං වච්ඡො උපෙති මාතරං; පුනප්පුනං කිලමති ඵන්දති ච, පුනප්පුනං ගබ්භමුපෙති මන්දො. “दूध काढणारे वारंवार दूध काढतात, वासरू वारंवार आईकडे जाते; अज्ञानी माणूस वारंवार थकून थरथर कापतो आणि वारंवार गर्भात प्रवेश करतो. ‘‘පුනප්පුනං ජායති මීයති ච, පුනප්පුනං සිවථිකං හරන්ති; මග්ගඤ්ච ලද්ධා අපුනබ්භවාය, න පුනප්පුනං ජායති භූරිපඤ්ඤො’’ති. “तो वारंवार जन्मतो आणि मरतो, लोक त्याला वारंवार स्मशानात घेऊन जातात; परंतु ज्याने पुनर्जन्म न होण्यासाठी मार्ग प्राप्त केला आहे, तो महाप्रज्ञ माणूस पुन्हा पुन्हा जन्माला येत नाही.” එවං වුත්තෙ, උදයො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භො ගොතම…පෙ… උපාසකං මං භවං ගොතමො ධාරෙතු අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. असे म्हटल्यावर, उदय ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला – “अतिशय सुंदर, हे गोतमा! ... आजपासून मला जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून आदरणीय गोतमांनी स्वीकारावे.” 3. දෙවහිතසුත්තං ३. devahitasuttaṃ 199. සාවත්ථිනිදානං. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා වාතෙහාබාධිකො හොති; ආයස්මා ච උපවාණො භගවතො උපට්ඨාකො හොති. අථ ඛො භගවා ආයස්මන්තං උපවාණං ආමන්තෙසි – ‘‘ඉඞ්ඝ මෙ ත්වං, උපවාණ, උණ්හොදකං ජානාහී’’ති. ‘‘එවං, භන්තෙ’’ති ඛො ආයස්මා උපවාණො භගවතො පටිස්සුත්වා නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය යෙන දෙවහිතස්ස බ්රාහ්මණස්ස නිවෙසනං තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා තුණ්හීභූතො එකමන්තං අට්ඨාසි. අද්දසා ඛො දෙවහිතො බ්රාහ්මණො ආයස්මන්තං උපවාණං තුණ්හීභූතං එකමන්තං ඨිතං. දිස්වාන ආයස්මන්තං උපවාණං ගාථාය අජ්ඣභාසි – १९९. श्रावस्ती येथील प्रसंग. त्या वेळी भगवान वातव्याधीने आजारी होते; आणि आयुष्यमान उपवाण भगवंतांचे परिचारक होते. तेव्हा भगवान आयुष्यमान उपवाणांना म्हणाले – “जा उपवाण, माझ्यासाठी गरम पाण्याची व्यवस्था कर.” आयुष्यमान उपवाणांनी “होय, भंते” असे भगवंतांना उत्तर दिले आणि चीवर नेसून, पात्र व चीवर घेऊन जेथे देवहित ब्राह्मणाचे घर होते तेथे गेले; तेथे जाऊन ते शांतपणे एका बाजूला उभे राहिले. देवहित ब्राह्मणाने आयुष्यमान उपवाणांना शांतपणे एका बाजूला उभे राहिलेले पाहिले. पाहून त्याने आयुष्यमान उपवाणांना गाथेने विचारले – ‘‘තුණ්හීභූතො [Pg.177] භවං තිට්ඨං, මුණ්ඩො සඞ්ඝාටිපාරුතො; කිං පත්ථයානො කිං එසං, කිං නු යාචිතුමාගතො’’ති. “शांतपणे उभे राहिलेले, मुंडण केलेले आणि संघात पांघरलेले आपण काय इच्छित आहात? काय शोधत आहात? येथे काय मागण्यासाठी आला आहात?” ‘‘අරහං සුගතො ලොකෙ, වාතෙහාබාධිකො මුනි; සචෙ උණ්හොදකං අත්ථි, මුනිනො දෙහි බ්රාහ්මණ. “जगातील अर्हत, सुगत, मुनी वातव्याधीने आजारी आहेत. हे ब्राह्मणा, जर गरम पाणी असेल, तर ते मुनींना दान कर. ‘‘පූජිතො පූජනෙය්යානං, සක්කරෙය්යාන සක්කතො; අපචිතො අපචෙය්යානං, තස්ස ඉච්ඡාමි හාතවෙ’’ති. “जे पूजनीयांकडून पूजले जातात, सत्कार करण्यायोग्य लोकांकडून सत्कृत केले जातात, आदरणीय लोकांकडून आदर पावले जातात; त्यांच्यासाठी मला हे गरम पाणी घेऊन जायचे आहे.” අථ ඛො දෙවහිතො බ්රාහ්මණො උණ්හොදකස්ස කාජං පුරිසෙන ගාහාපෙත්වා ඵාණිතස්ස ච පුටං ආයස්මතො උපවාණස්ස පාදාසි. අථ ඛො ආයස්මා උපවාණො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං උණ්හොදකෙන න්හාපෙත්වා උණ්හොදකෙන ඵාණිතං ආලොලෙත්වා භගවතො පාදාසි. අථ ඛො භගවතො ආබාධො පටිප්පස්සම්භි. तेव्हा देवहित ब्राह्मणाने एका माणसाकरवी गरम पाण्याची कावड उचलून दिली आणि गुळाची एक पुडी आयुष्यमान उपवाणांना दिली. त्यानंतर आयुष्यमान उपवाण जेथे भगवान होते तेथे गेले; तेथे जाऊन त्यांनी भगवंतांना गरम पाण्याने स्नान घातले आणि गरम पाण्यात गूळ विरघळवून तो भगवंतांना दिला. त्यानंतर भगवंतांचा आजार बरा झाला. අථ ඛො දෙවහිතො බ්රාහ්මණො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතා සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො දෙවහිතො බ්රාහ්මණො භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – त्यानंतर देवहित ब्राह्मण जेथे भगवान होते तेथे गेला; तेथे जाऊन त्याने भगवंतांसोबत कुशलमंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या देवहित ब्राह्मणाने भगवंतांना गाथेने विचारले – ‘‘කත්ථ දජ්ජා දෙය්යධම්මං, කත්ථ දින්නං මහප්ඵලං; කථඤ්හි යජමානස්ස, කථං ඉජ්ඣති දක්ඛිණා’’ති. "दान देण्यायोग्य वस्तू (देयधम्म) कोणाला द्यावी? कोणाला दिलेले दान महाफळ देणारे ठरते? यज्ञ करणाऱ्या (दान देणाऱ्या) व्यक्तीचे दान कसे यशस्वी होते आणि त्याची दक्षिणा कशी फलद्रूप होते?" ‘‘පුබ්බෙනිවාසං යො වෙදී, සග්ගාපායඤ්ච පස්සති; අථො ජාතික්ඛයං පත්තො, අභිඤ්ඤාවොසිතො මුනි. "जो आपल्या पूर्वजन्मांना (पुब्बेनिवास) जाणतो, जो स्वर्ग आणि अपाय (नरक/दुर्गती) पाहतो, तसेच जो जन्माच्या क्षयाला (अर्हतपदाला) प्राप्त झाला आहे, असा अभिज्ञा (उच्च ज्ञान) प्राप्त करून कृतकृत्य झालेला मुनी;" ‘‘එත්ථ දජ්ජා දෙය්යධම්මං, එත්ථ දින්නං මහප්ඵලං; එවඤ්හි යජමානස්ස, එවං ඉජ්ඣති දක්ඛිණා’’ති. "अशा (अर्हत) मुनीला दान देण्यायोग्य वस्तू द्यावी. येथे दिलेले दान महाफळ देणारे ठरते. अशा प्रकारे दान देणाऱ्याचे दान यशस्वी होते आणि त्याची दक्षिणा फलद्रूप होते." එවං වුත්තෙ, දෙවහිතො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං භො ගොතම…පෙ… උපාසකං මං භවං ගොතමො ධාරෙතු අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. असे म्हटले असता, देवहित ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला, "अतिशय सुंदर, हे गौतम! अतिशय सुंदर, हे गौतम! ... आजपासून मी जोपर्यंत जिवंत आहे तोपर्यंत शरण आलेला उपासक म्हणून आदरणीय गौतमांनी माझा स्वीकार करावा." 4. මහාසාලසුත්තං ४. महासाल सुत्त 200. සාවත්ථිනිදානං[Pg.178]. අථ ඛො අඤ්ඤතරො බ්රාහ්මණමහාසාලො ලූඛො ලූඛපාවුරණො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතා සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නං ඛො තං බ්රාහ්මණමහාසාලං භගවා එතදවොච – ‘‘කින්නු ත්වං, බ්රාහ්මණ, ලූඛො ලූඛපාවුරණො’’ති? ‘‘ඉධ මෙ, භො ගොතම, චත්තාරො පුත්තා. තෙ මං දාරෙහි සංපුච්ඡ ඝරා නික්ඛාමෙන්තී’’ති. ‘‘තෙන හි ත්වං, බ්රාහ්මණ, ඉමා ගාථායො පරියාපුණිත්වා සභායං මහාජනකායෙ සන්නිපතිතෙ පුත්තෙසු ච සන්නිසින්නෙසු භාසස්සු – २००. श्रावस्ती येथील घटना. तेव्हा एक वृद्ध, जीर्ण कपडे परिधान केलेला श्रीमंत (महासाल) ब्राह्मण भगवंतांकडे आला. जवळ येऊन त्याने भगवंतांशी कुशलक्षेम विचारले. आनंददायी व संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या त्या महासाल ब्राह्मणाला भगवान म्हणाले, "ब्राह्मणा, तू असा जीर्ण आणि फाटके-तुटके कपडे घातलेला का आहेस?" "हे गौतम, येथे माझे चार मुलगे आहेत. त्यांनी आपापल्या पत्नींच्या सांगण्यावरून मला घरातून हाकलून दिले आहे." "तसे असेल तर ब्राह्मणा, तू हे गाथा (श्लोक) पाठ कर आणि जेव्हा लोकसभेत मोठा जनसमुदाय एकत्र येईल आणि तुझे मुलगेही तेथे एकत्र बसलेले असतील, तेव्हा हे गाथा म्हण:" ‘‘යෙහි ජාතෙහි නන්දිස්සං, යෙසඤ්ච භවමිච්ඡිසං; තෙ මං දාරෙහි සංපුච්ඡ, සාව වාරෙන්ති සූකරං. "ज्या मुलांच्या जन्माने मला आनंद झाला होता आणि ज्यांच्या कल्याणाची मी नेहमी इच्छा केली, त्यांनीच आपल्या पत्नींशी सल्लामसलत करून मला घरातून हाकलून दिले आहे, जसे कुत्रे डुकराला भुंकून हाकलून लावतात." ‘‘අසන්තා කිර මං ජම්මා, තාත තාතාති භාසරෙ; රක්ඛසා පුත්තරූපෙන, තෙ ජහන්ති වයොගතං. "ते दुष्ट आणि नीच मुलगे मला 'बाबा, बाबा' म्हणत असत. पण ते मुलांच्या रूपातील राक्षस निघाले, ज्यांनी मी वृद्ध झाल्यावर मला सोडून दिले." ‘‘අස්සොව ජිණ්ණො නිබ්භොගො, ඛාදනා අපනීයති; බාලකානං පිතා ථෙරො, පරාගාරෙසු භික්ඛති. "ज्याप्रमाणे म्हातारा आणि निरुपयोगी झालेला घोडा खाण्यापिण्यापासून वंचित केला जातो, त्याचप्रमाणे त्या मूर्ख मुलांचा हा वृद्ध पिता आता इतरांच्या घरी भीक मागत फिरत आहे." ‘‘දණ්ඩොව කිර මෙ සෙය්යො, යඤ්චෙ පුත්තා අනස්සවා; චණ්ඩම්පි ගොණං වාරෙති, අථො චණ්ඩම්පි කුක්කුරං. "अशा आज्ञा न पाळणाऱ्या मुलांपेक्षा माझी ही काठीच माझ्यासाठी श्रेष्ठ आहे; कारण ही काठी पिसाळलेल्या बैलाला दूर ठेवते आणि हिंस्त्र कुत्र्यालाही पळवून लावते." ‘‘අන්ධකාරෙ පුරෙ හොති, ගම්භීරෙ ගාධමෙධති; දණ්ඩස්ස ආනුභාවෙන, ඛලිත්වා පතිතිට්ඨතී’’ති. "अंधारात ती माझ्या पुढे चालते (मार्ग दाखवते), खोल पाण्यात ती मला आधार देते. या काठीच्या प्रभावामुळे घसरलो तरी मी पुन्हा खंबीरपणे उभा राहू शकतो." අථ ඛො සො බ්රාහ්මණමහාසාලො භගවතො සන්තිකෙ ඉමා ගාථායො පරියාපුණිත්වා සභායං මහාජනකායෙ සන්නිපතිතෙ පුත්තෙසු ච සන්නිසින්නෙසු අභාසි – त्यानंतर त्या महासाल ब्राह्मणाने भगवंतांच्या सन्निध या गाथा पाठ केल्या आणि जेव्हा लोकसभेत मोठा जनसमुदाय एकत्र आला आणि त्याचे मुलगेही तेथे एकत्र बसले होते, तेव्हा त्याने त्या गाथा म्हटल्या – ‘‘යෙහි ජාතෙහි නන්දිස්සං, යෙසඤ්ච භවමිච්ඡිසං; තෙ මං දාරෙහි සංපුච්ඡ, සාව වාරෙන්ති සූකරං. "ज्या मुलांच्या जन्माने मला आनंद झाला होता आणि ज्यांच्या कल्याणाची मी नेहमी इच्छा केली, त्यांनीच आपल्या पत्नींशी सल्लामसलत करून मला घरातून हाकलून दिले आहे, जसे कुत्रे डुकराला भुंकून हाकलून लावतात." ‘‘අසන්තා කිර මං ජම්මා, තාත තාතාති භාසරෙ; රක්ඛසා පුත්තරූපෙන, තෙ ජහන්ති වයොගතං. "ते दुष्ट आणि नीच मुलगे मला 'बाबा, बाबा' म्हणत असत. पण ते मुलांच्या रूपातील राक्षस निघाले, ज्यांनी मी वृद्ध झाल्यावर मला सोडून दिले." ‘‘අස්සොව [Pg.179] ජිණ්ණො නිබ්භොගො, ඛාදනා අපනීයති; බාලකානං පිතා ථෙරො, පරාගාරෙසු භික්ඛති. "ज्याप्रमाणे म्हातारा आणि निरुपयोगी झालेला घोडा खाण्यापिण्यापासून वंचित केला जातो, त्याचप्रमाणे त्या मूर्ख मुलांचा हा वृद्ध पिता आता इतरांच्या घरी भीक मागत फिरत आहे." ‘‘දණ්ඩොව කිර මෙ සෙය්යො, යඤ්චෙ පුත්තා අනස්සවා; චණ්ඩම්පි ගොණං වාරෙති, අථො චණ්ඩම්පි කුක්කුරං. "अशा आज्ञा न पाळणाऱ्या मुलांपेक्षा माझी ही काठीच माझ्यासाठी श्रेष्ठ आहे; कारण ही काठी पिसाळलेल्या बैलाला दूर ठेवते आणि हिंस्त्र कुत्र्यालाही पळवून लावते." ‘‘අන්ධකාරෙ පුරෙ හොති, ගම්භීරෙ ගාධමෙධති; දණ්ඩස්ස ආනුභාවෙන, ඛලිත්වා පතිතිට්ඨතී’’ති. "अंधारात ती माझ्या पुढे चालते, खोल पाण्यात ती मला आधार देते. या काठीच्या प्रभावामुळे घसरलो तरी मी पुन्हा खंबीरपणे उभा राहू शकतो." අථ ඛො නං බ්රාහ්මණමහාසාලං පුත්තා ඝරං නෙත්වා න්හාපෙත්වා පච්චෙකං දුස්සයුගෙන අච්ඡාදෙසුං. අථ ඛො සො බ්රාහ්මණමහාසාලො එකං දුස්සයුගං ආදාය යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතා සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො බ්රාහ්මණමහාසාලො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘මයං, භො ගොතම, බ්රාහ්මණා නාම ආචරියස්ස ආචරියධනං පරියෙසාම. පටිග්ගණ්හතු මෙ භවං ගොතමො ආචරියධන’’න්ති. පටිග්ගහෙසි භගවා අනුකම්පං උපාදාය. අථ ඛො සො බ්රාහ්මණමහාසාලො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භො ගොතම…පෙ… උපාසකං මං භවං ගොතමො ධාරෙතු අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. तेव्हा त्या मुलांनी त्या महासाल ब्राह्मणाला घरी नेले, त्याला स्नान घातले आणि प्रत्येकाने त्याला वस्त्रजोडी दिली. त्यानंतर तो महासाल ब्राह्मण एक वस्त्रजोडी घेऊन भगवंतांकडे आला. जवळ येऊन त्याने भगवंतांशी कुशलक्षेम विचारले. आनंददायी व संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला तो महासाल ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला, "हे गौतम, आम्ही ब्राह्मण आपल्या गुरूसाठी गुरुदक्षिणा शोधत असतो. आदरणीय गौतमांनी माझ्याकडून ही गुरुदक्षिणा स्वीकारावी." भगवंतांनी अनुकंपा (दया) करून ती स्वीकारली. त्यानंतर तो महासाल ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला, "अतिशय सुंदर, हे गौतम! अतिशय सुंदर, हे गौतम! ... आजपासून मी जोपर्यंत जिवंत आहे तोपर्यंत शरण आलेला उपासक म्हणून आदरणीय गौतमांनी माझा स्वीकार करावा." 5. මානත්ථද්ධසුත්තං ५. मानत्थद्ध सुत्त 201. සාවත්ථිනිදානං. තෙන ඛො පන සමයෙන මානත්ථද්ධො නාම බ්රාහ්මණො සාවත්ථියං පටිවසති. සො නෙව මාතරං අභිවාදෙති, න පිතරං අභිවාදෙති, න ආචරියං අභිවාදෙති, න ජෙට්ඨභාතරං අභිවාදෙති. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා මහතියා පරිසාය පරිවුතො ධම්මං දෙසෙති. අථ ඛො මානත්ථද්ධස්ස බ්රාහ්මණස්ස එතදහොසි – ‘‘අයං ඛො සමණො ගොතමො මහතියා පරිසාය පරිවුතො ධම්මං දෙසෙති. යංනූනාහං යෙන සමණො ගොතමො තෙනුපසඞ්කමෙය්යං. සචෙ මං සමණො ගොතමො ආලපිස්සති, අහම්පි තං ආලපිස්සාමි. නො චෙ මං සමණො ගොතමො ආලපිස්සති, අහම්පි නාලපිස්සාමී’’ති. අථ ඛො මානත්ථද්ධො බ්රාහ්මණො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා තුණ්හීභූතො එකමන්තං අට්ඨාසි. අථ ඛො භගවා තං නාලපි. අථ ඛො මානත්ථද්ධො බ්රාහ්මණො – ‘නායං සමණො [Pg.180] ගොතමො කිඤ්චි ජානාතී’ති තතොව පුන නිවත්තිතුකාමො අහොසි. අථ ඛො භගවා මානත්ථද්ධස්ස බ්රාහ්මණස්ස චෙතසා චෙතොපරිවිතක්කමඤ්ඤාය මානත්ථද්ධං බ්රාහ්මණං ගාථාය අජ්ඣභාසි – २०१. श्रावस्ती येथील घटना. त्या काळी श्रावस्तीमध्ये 'मानत्थद्ध' (अहंकारी) नावाचा एक ब्राह्मण राहत होता. तो आपल्या आईला वंदन करत नसे, वडिलांना वंदन करत नसे, गुरूंना वंदन करत नसे आणि मोठ्या भावालाही वंदन करत नसे. त्या वेळी भगवान मोठ्या जनसमुदायाने वेढलेले असताना धम्मदेशना देत होते. तेव्हा मानत्थद्ध ब्राह्मणाच्या मनात असा विचार आला – "हे श्रमण गौतम मोठ्या जनसमुदायाने वेढलेले असताना धम्मदेशना देत आहेत. मी श्रमण गौतमांकडे जावे. जर श्रमण गौतम माझ्याशी बोलले, तर मीही त्यांच्याशी बोलेन. जर श्रमण गौतम माझ्याशी बोलले नाहीत, तर मीही त्यांच्याशी बोलणार नाही." त्यानंतर मानत्थद्ध ब्राह्मण भगवंतांकडे गेला आणि जवळ जाऊन शांतपणे एका बाजूला उभा राहिला. परंतु भगवंतांनी त्याच्याशी संभाषण केले नाही. तेव्हा मानत्थद्ध ब्राह्मणाने विचार केला – 'या श्रमण गौतमाला काहीच समजत नाही' आणि तो तेथूनच परत फिरू लागला. तेव्हा भगवंतांनी आपल्या चित्ताने मानत्थद्ध ब्राह्मणाच्या मनातील विचार जाणून त्याला गाथेने संबोधित केले – ‘‘න මානං බ්රාහ්මණ සාධු, අත්ථිකස්සීධ බ්රාහ්මණ; යෙන අත්ථෙන ආගච්ඡි, තමෙවමනුබ්රූහයෙ’’ති. "हे ब्राह्मणा, अहंकार बाळगणे कधीही चांगले नसते. स्वतःचे कल्याण इच्छिणाऱ्या माणसाने, ज्या हेतूने तो येथे आला आहे, त्याच हेतूची वृद्धी केली पाहिजे." අථ ඛො මානත්ථද්ධො බ්රාහ්මණො – ‘‘චිත්තං මෙ සමණො ගොතමො ජානාතී’’ති තත්ථෙව භගවතො පාදෙසු සිරසා නිපතිත්වා භගවතො පාදානි මුඛෙන ච පරිචුම්බති පාණීහි ච පරිසම්බාහති, නාමඤ්ච සාවෙති – ‘‘මානත්ථද්ධාහං, භො ගොතම, මානත්ථද්ධාහං, භො ගොතමා’’ති. අථ ඛො සා පරිසා අබ්භුතචිත්තජාතා අහොසි – ‘අච්ඡරියං වත භො, අබ්භුතං වත භො! අයඤ්හි මානත්ථද්ධො බ්රාහ්මණො නෙව මාතරං අභිවාදෙති, න පිතරං අභිවාදෙති, න ආචරියං අභිවාදෙති, න ජෙට්ඨභාතරං අභිවාදෙති; අථ ච පන සමණෙ ගොතමෙ එවරූපං පරමනිපච්චකාරං කරොතී’ති. අථ ඛො භගවා මානත්ථද්ධං බ්රාහ්මණං එතදවොච – ‘‘අලං, බ්රාහ්මණ, උට්ඨෙහි, සකෙ ආසනෙ නිසීද. යතො තෙ මයි චිත්තං පසන්න’’න්ති. අථ ඛො මානත්ථද්ධො බ්රාහ්මණො සකෙ ආසනෙ නිසීදිත්වා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – तेव्हा मानत्थद्ध ब्राह्मणाने विचार केला – "श्रमण गौतम माझ्या मनातील विचार जाणतात." त्याने लगेचच तेथे भगवंतांच्या चरणांवर डोके ठेवून साष्टांग नमस्कार केला. तो भगवंतांच्या चरणांचे मुखाने चुंबन घेऊ लागला, हातांनी त्यांचे पाय कुरवाळू लागला आणि आपले नाव सांगू लागला – "हे गौतम, मी मानत्थद्ध आहे! हे गौतम, मी मानत्थद्ध आहे!" तेव्हा तो जनसमुदाय अत्यंत आश्चर्यचकित झाला आणि लोक म्हणू लागले – "किती आश्चर्यकारक गोष्ट आहे! किती अद्भूत गोष्ट आहे! हा मानत्थद्ध ब्राह्मण आपल्या आईला वंदन करत नाही, वडिलांना वंदन करत नाही, गुरूंना वंदन करत नाही आणि मोठ्या भावालाही वंदन करत नाही; तरीही तो श्रमण गौतमांप्रती असा परम आदर व्यक्त करत आहे!" तेव्हा भगवान मानत्थद्ध ब्राह्मणाला म्हणाले, "बस, ब्राह्मणा! उठ आणि तुझ्या आसनावर बस, कारण तुझे चित्त माझ्यावर प्रसन्न झाले आहे." त्यानंतर मानत्थद्ध ब्राह्मण आपल्या आसनावर बसला आणि त्याने भगवंतांना गाथेने विचारले – ‘‘කෙසු න මානං කයිරාථ, කෙසු චස්ස සගාරවො; ක්යස්ස අපචිතා අස්සු, ක්යස්සු සාධු සුපූජිතා’’ති. "हे गौतम, कोणत्या व्यक्तींच्या बाबतीत माणसाने अभिमान बाळगू नये? कोणाचा आदर करावा? कोणाचा सन्मान करावा? आणि कोणाची चांगल्या प्रकारे पूजा करावी?" ‘‘මාතරි පිතරි චාපි, අථො ජෙට්ඨම්හි භාතරි; ආචරියෙ චතුත්ථම්හි,තෙසු න මානං කයිරාථ; තෙසු අස්ස සගාරවො,ත්යස්ස අපචිතා අස්සු; ත්යස්සු සාධු සුපූජිතා. "आई, वडील, तसेच मोठा भाऊ आणि चौथा म्हणजे आचार्य (शिक्षक) – यांच्या बाबतीत माणसाने अभिमान बाळगू नये. त्यांचा आदर करावा, त्यांचा सन्मान करावा आणि त्यांची चांगल्या प्रकारे पूजा करावी." ‘‘අරහන්තෙ සීතීභූතෙ, කතකිච්චෙ අනාසවෙ; නිහච්ච මානං අථද්ධො, තෙ නමස්සෙ අනුත්තරෙ’’ති. "जे अर्हत आहेत, शांत झालेले आहेत, ज्यांचे कर्तव्य पूर्ण झाले आहे, जे आसवमुक्त आहेत, अशा त्या सर्वश्रेष्ठ व्यक्तींना आपला अभिमान सोडून, नम्र होऊन वंदन करावे." එවං [Pg.181] වුත්තෙ, මානත්ථද්ධො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භො ගොතම…පෙ… උපාසකං මං භවං ගොතමො ධාරෙතු අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. असे म्हटले असता, मानत्थद्ध ब्राह्मणाने भगवंतांना असे म्हटले – "अतिशय सुंदर, हे गौतम! अतिशय सुंदर, हे गौतम! ... आजपासून मी जोपर्यंत जिवंत आहे तोपर्यंत शरण गेलेला उपासक म्हणून आपण मला स्वीकारावे." 6. පච්චනීකසුත්තං ६. "पच्चनीक सुत्त" 202. සාවත්ථිනිදානං. තෙන ඛො පන සමයෙන පච්චනීකසාතො නාම බ්රාහ්මණො සාවත්ථියං පටිවසති. අථ ඛො පච්චනීකසාතස්ස බ්රාහ්මණස්ස එතදහොසි – ‘‘යංනූනාහං යෙන සමණො ගොතමො තෙනුපසඞ්කමෙය්යං. යං යදෙව සමණො ගොතමො භාසිස්සති තං තදෙවස්සාහං පච්චනීකාස්ස’’න්ති. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා අබ්භොකාසෙ චඞ්කමති. අථ ඛො පච්චනීකසාතො බ්රාහ්මණො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං චඞ්කමන්තං එතදවොච – ‘භණ සමණධම්ම’න්ති. २०२. श्रावस्ती येथील घटना. त्या वेळी श्रावस्तीमध्ये 'पच्चनीकसात' नावाचा एक ब्राह्मण राहत होता. त्या वेळी त्या पच्चनीकसात ब्राह्मणाच्या मनात असा विचार आला – 'मी श्रमण गौतमांकडे जावे. श्रमण गौतम जे काही बोलतील, मी त्याच्या अगदी उलट (विरोध) बोलेन.' त्या वेळी भगवान उघड्या जागेत चंक्रमण (येरझऱ्या घालणे) करत होते. तेव्हा पच्चनीकसात ब्राह्मण भगवंतांकडे गेला आणि जवळ जाऊन चंक्रमण करणाऱ्या भगवंतांना म्हणाला – 'हे श्रमण, धर्माचा उपदेश करा.' ‘‘න පච්චනීකසාතෙන, සුවිජානං සුභාසිතං; උපක්කිලිට්ඨචිත්තෙන, සාරම්භබහුලෙන ච. "जो विरोधात आनंद मानतो, ज्याचे चित्त मलीन आहे आणि जो अत्यंत आक्रमक आहे, अशा व्यक्तीला सुभाषित (उत्तम प्रकारे सांगितलेला धर्म) समजणे सोपे नसते." ‘‘යො ච විනෙය්ය සාරම්භං, අප්පසාදඤ්ච චෙතසො; ආඝාතං පටිනිස්සජ්ජ, ස වෙ ජඤ්ඤා සුභාසිත’’න්ති. "परंतु जो कलहवृत्ती आणि मनातील अप्रसन्नता दूर करतो, आणि द्वेष सोडून देतो, तोच खरोखर सुभाषित समजू शकतो." එවං වුත්තෙ, පච්චනීකසාතො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භො ගොතම, අභික්කන්තං, භො ගොතම…පෙ… උපාසකං මං භවං ගොතමො ධාරෙතු අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. असे म्हटले असता, पच्चनीकसात ब्राह्मणाने भगवंतांना असे म्हटले – "अतिशय सुंदर, हे गौतम! अतिशय सुंदर, हे गौतम! ... आजपासून मी जोपर्यंत जिवंत आहे तोपर्यंत शरण गेलेला उपासक म्हणून आपण मला स्वीकारावे." 7. නවකම්මිකසුත්තං ७. "नवकम्मिक सुत्त" 203. එකං සමයං භගවා කොසලෙසු විහරති අඤ්ඤතරස්මිං වනසණ්ඩෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන නවකම්මිකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො තස්මිං වනසණ්ඩෙ කම්මන්තං කාරාපෙති. අද්දසා ඛො නවකම්මිකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො භගවන්තං අඤ්ඤතරස්මිං සාලරුක්ඛමූලෙ නිසින්නං පල්ලඞ්කං ආභුජිත්වා උජුං කායං පණිධාය පරිමුඛං සතිං උපට්ඨපෙත්වා. දිස්වානස්ස එතදහොසි – ‘‘අහං ඛො ඉමස්මිං වනසණ්ඩෙ කම්මන්තං කාරාපෙන්තො රමාමි. අයං සමණො ගොතමො කිං කාරාපෙන්තො රමතී’’ති? අථ [Pg.182] ඛො නවකම්මිකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි. උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – २०३. एक वेळ भगवान कोसल देशातील एका जंगलात विहार करत होते. त्या वेळी 'नवकम्मिक भारद्वाज' नावाचा ब्राह्मण त्या जंगलात लाकूडतोडीचे काम करून घेत होता. नवकम्मिक भारद्वाज ब्राह्मणाने भगवंतांना एका साल वृक्षाच्या मुळाशी मांडी घालून, शरीर सरळ ठेवून, समोर स्मृती प्रस्थापित करून बसलेले पाहिले. त्यांना पाहून त्याच्या मनात विचार आला – 'मी तर या जंगलात काम करून घेण्यात आनंद मानतो. पण हे श्रमण गौतम काय काम करून घेण्यात आनंद मानत आहेत?' नंतर नवकम्मिक भारद्वाज ब्राह्मण भगवंतांकडे गेला आणि जवळ जाऊन त्याने भगवंतांना गाथेने विचारले – ‘‘කෙ නු කම්මන්තා කරීයන්ති, භික්ඛු සාලවනෙ තව; යදෙකකො අරඤ්ඤස්මිං, රතිං වින්දති ගොතමො’’ති. "हे भिक्खू, या सालवनात तुमचे कोणते काम चालू आहे? ज्यामुळे तुम्ही, हे गौतम, या अरण्यात एकटेच आनंद घेत आहात?" ‘‘න මෙ වනස්මිං කරණීයමත්ථි,උච්ඡින්නමූලං මෙ වනං විසූකං; ස්වාහං වනෙ නිබ්බනථො විසල්ලො,එකො රමෙ අරතිං විප්පහායා’’ති. "हे ब्राह्मणा, माझे या जंगलात कोणतेही काम उरलेले नाही. माझे (क्लेशरूपी) जंगल मुळासकट उपटून टाकले गेले आहे आणि ते नष्ट झाले आहे. असा मी, जंगलात (क्लेशरूपी) अरण्यापासून मुक्त आणि शल्यविरहित होऊन, उदासीनतेचा त्याग करून एकटाच आनंद घेत आहे." එවං වුත්තෙ, නවකම්මිකභාරද්වාජො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භො ගොතම…පෙ… උපාසකං මං භවං ගොතමො ධාරෙතු අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. असे म्हटले असता, नवकम्मिक भारद्वाज ब्राह्मणाने भगवंतांना असे म्हटले – "अतिशय सुंदर, हे गौतम! अतिशय सुंदर, हे गौतम! ... आजपासून मी जोपर्यंत जिवंत आहे तोपर्यंत शरण गेलेला उपासक म्हणून आपण मला स्वीकारावे." 8. කට්ඨහාරසුත්තං ८. "कट्ठहार सुत्त" 204. එකං සමයං භගවා කොසලෙසු විහරති අඤ්ඤතරස්මිං වනසණ්ඩෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන අඤ්ඤතරස්ස භාරද්වාජගොත්තස්ස බ්රාහ්මණස්ස සම්බහුලා අන්තෙවාසිකා කට්ඨහාරකා මාණවකා යෙන වනසණ්ඩො තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා අද්දසංසු භගවන්තං තස්මිං වනසණ්ඩෙ නිසින්නං පල්ලඞ්කං ආභුජිත්වා උජුං කායං පණිධාය පරිමුඛං සතිං උපට්ඨපෙත්වා. දිස්වාන යෙන භාරද්වාජගොත්තො බ්රාහ්මණො තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භාරද්වාජගොත්තං බ්රාහ්මණං එතදවොචුං – ‘‘යග්ඝෙ, භවං ජානෙය්යාසි! අසුකස්මිං වනසණ්ඩෙ සමණො නිසින්නො පල්ලඞ්කං ආභුජිත්වා උජුං කායං පණිධාය පරිමුඛං සතිං උපට්ඨපෙත්වා’’. අථ ඛො භාරද්වාජගොත්තො බ්රාහ්මණො තෙහි මාණවකෙහි සද්ධිං යෙන සො වනසණ්ඩො තෙනුපසඞ්කමි. අද්දසා ඛො භගවන්තං තස්මිං වනසණ්ඩෙ නිසින්නං පල්ලඞ්කං ආභුජිත්වා උජුං කායං පණිධාය පරිමුඛං සතිං උපට්ඨපෙත්වා. දිස්වාන යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – २०४. एक वेळ भगवान कोसल देशातील एका जंगलात विहार करत होते. त्या वेळी भारद्वाज गोत्राच्या एका ब्राह्मणाचे अनेक तरुण शिष्य लाकडे गोळा करण्यासाठी त्या जंगलात गेले. तेथे गेल्यावर त्यांनी भगवंतांना त्या जंगलात मांडी घालून, शरीर सरळ ठेवून, समोर स्मृती प्रस्थापित करून बसलेले पाहिले. त्यांना पाहून ते भारद्वाज गोत्राच्या ब्राह्मणाकडे गेले आणि जवळ जाऊन त्याला म्हणाले – 'महाराज, आपल्याला माहीत असावे की, अमुक एका जंगलात एक श्रमण मांडी घालून, शरीर सरळ ठेवून, समोर स्मृती प्रस्थापित करून बसले आहेत.' तेव्हा भारद्वाज गोत्राचा तो ब्राह्मण त्या तरुण शिष्यांसह त्या जंगलात गेला. तेथे त्याने भगवंतांना मांडी घालून, शरीर सरळ ठेवून, समोर स्मृती प्रस्थापित करून बसलेले पाहिले. त्यांना पाहून तो भगवंतांकडे गेला आणि जवळ जाऊन त्याने भगवंतांना गाथेने विचारले – ‘‘ගම්භීරරූපෙ බහුභෙරවෙ වනෙ,සුඤ්ඤං අරඤ්ඤං විජනං විගාහිය; අනිඤ්ජමානෙන ඨිතෙන වග්ගුනා,සුචාරුරූපං වත භික්ඛු ඣායසි. "अतिशय खोल आणि अनेक भयावह गोष्टींनी भरलेल्या या निर्जन, मानवरहित जंगलात प्रवेश करून, हे भिक्खू, तुम्ही स्थिर, शांत आणि सुंदर शरीराने किती सुंदर ध्यान करत आहात!" ‘‘න [Pg.183] යත්ථ ගීතං නපි යත්ථ වාදිතං,එකො අරඤ්ඤෙ වනවස්සිතො මුනි; අච්ඡෙරරූපං පටිභාති මං ඉදං,යදෙකකො පීතිමනො වනෙ වසෙ. "जिथे कोणतेही गाणे नाही की वाद्य वाजवले जात नाही, अशा या अरण्यात एकटेच राहणारे मुनी! मला हे मोठे आश्चर्य वाटते की, तुम्ही प्रसन्न चित्ताने या जंगलात एकटेच राहत आहात." ‘‘මඤ්ඤාමහං ලොකාධිපතිසහබ්යතං,ආකඞ්ඛමානො තිදිවං අනුත්තරං; කස්මා භවං විජනමරඤ්ඤමස්සිතො,තපො ඉධ කුබ්බසි බ්රහ්මපත්තියා’’ති. "मला असे वाटते की, आपण सर्वश्रेष्ठ अशा स्वर्गलोकाची (ब्रह्मलोकाची) आणि जगाचा स्वामी असलेल्या ब्रह्माच्या सहवासाची इच्छा करत आहात. म्हणूनच आपण या निर्जन अरण्याचा आश्रय घेतला आहे आणि ब्रह्मलोकाच्या प्राप्तीसाठी येथे तपश्चर्या करत आहात?" ‘‘යා කාචි කඞ්ඛා අභිනන්දනා වා,අනෙකධාතූසු පුථූ සදාසිතා; අඤ්ඤාණමූලප්පභවා පජප්පිතා,සබ්බා මයා බ්යන්තිකතා සමූලිකා. "हे ब्राह्मणा, विविध विषयांवर नेहमी अवलंबून असणारी जी काही तृष्णा किंवा आसक्ती आहे, जी अज्ञानाच्या मुळापासून निर्माण झाली आहे, ती सर्व मी मुळासकट नष्ट केली आहे." ‘‘ස්වාහං අකඞ්ඛො අසිතො අනූපයො,සබ්බෙසු ධම්මෙසු විසුද්ධදස්සනො; පප්පුය්ය සම්බොධිමනුත්තරං සිවං,ඣායාමහං බ්රහ්ම රහො විසාරදො’’ති. "असा मी, तृष्णारहित, अनासक्त आणि बंधनांशिवाय, सर्व धर्मांच्या (सत्याच्या) बाबतीत शुद्ध दृष्टी असलेला झालो आहे. सर्वश्रेष्ठ आणि कल्याणकारी अशा संबोधीला प्राप्त करून, हे ब्राह्मणा, मी या निर्जन जंगलात निर्भयपणे ध्यान करत आहे." එවං වුත්තෙ, භාරද්වාජගොත්තො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භො ගොතම අභික්කන්තං, භො ගොතම…පෙ… අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. असे म्हटले असता, भारद्वाज गोत्राच्या ब्राह्मणाने भगवंतांना असे म्हटले – "अतिशय सुंदर, हे गौतम! अतिशय सुंदर, हे गौतम! ... आजपासून मी जोपर्यंत जिवंत आहे तोपर्यंत शरण गेलेला उपासक म्हणून आपण मला स्वीकारावे." 9. මාතුපොසකසුත්තං ९. "मातुपोसक सुत्त" 205. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො මාතුපොසකො බ්රාහ්මණො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතා සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො මාතුපොසකො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අහඤ්හි, භො ගොතම, ධම්මෙන භික්ඛං පරියෙසාමි, ධම්මෙන භික්ඛං පරියෙසිත්වා මාතාපිතරො පොසෙමි. කච්චාහං, භො ගොතම, එවංකාරී කිච්චකාරී හොමී’’ති? ‘‘තග්ඝ ත්වං, බ්රාහ්මණ, එවංකාරී කිච්චකාරී හොසි. යො ඛො, බ්රාහ්මණ, ධම්මෙන භික්ඛං පරියෙසති, ධම්මෙන භික්ඛං පරියෙසිත්වා මාතාපිතරො පොසෙති, බහුං සො පුඤ්ඤං පසවතී’’ති. २०५. श्रावस्ती येथील प्रसंग. तेव्हा मातुपोसक (आई-वडिलांचे पालनपोषण करणारा) नावाचा एक ब्राह्मण जेथे भगवान होते तेथे गेला; तिथे पोहोचून त्याने भगवंतांसोबत कुशलक्षेम विचारले. आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण आटोपून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला तो मातुपोसक ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला – “हे गौतम, मी धर्मानुसार (न्याय्य मार्गाने) भिक्षा मागतो आणि धर्मानुसार भिक्षा मागून माझ्या आई-वडिलांचे पालनपोषण करतो. हे गौतम, असे केल्याने मी माझे कर्तव्य योग्य प्रकारे पार पाडत आहे ना?” “नक्कीच, ब्राह्मणा! तू अशा प्रकारे वागून आपले कर्तव्य योग्य प्रकारे पार पाडत आहेस. हे ब्राह्मणा, जो कोणी धर्मानुसार भिक्षा मागतो आणि धर्मानुसार भिक्षा मागून आपल्या आई-वडिलांचे पालनपोषण करतो, तो विपुल पुण्य संपादन करतो.” ‘‘යො [Pg.184] මාතරං පිතරං වා, මච්චො ධම්මෙන පොසති; තාය නං පාරිචරියාය, මාතාපිතූසු පණ්ඩිතා; ඉධෙව නං පසංසන්ති, පෙච්ච සග්ගෙ පමොදතී’’ති. “जो मनुष्य आपल्या आई किंवा वडिलांचे धर्मानुसार पालनपोषण करतो, आई-वडिलांच्या त्या सेवेमुळे ज्ञानी लोक या जगातच त्याची प्रशंसा करतात, आणि मृत्यूनंतर तो स्वर्गात आनंदित होतो.” එවං වුත්තෙ, මාතුපොසකො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං භො ගොතම, අභික්කන්තං, භො ගොතම…පෙ… උපාසකං මං භවං ගොතමො ධාරෙතු අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. असे म्हटले असता, मातुपोसक ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला – “अतिशय सुंदर, हे गौतम! अतिशय सुंदर, हे गौतम! ... आजपासून मी आयुष्यभर शरण आलेला उपासक आहे, असे आपण मला मानावे.” 10. භික්ඛකසුත්තං १०. भिक्खक सुत्त 206. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො භික්ඛකො බ්රාහ්මණො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතා සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො භික්ඛකො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අහම්පි ඛො, භො ගොතම, භික්ඛකො, භවම්පි භික්ඛකො, ඉධ නො කිං නානාකරණ’’න්ති? २०६. श्रावस्ती येथील प्रसंग. तेव्हा एक भिक्खक (भिक्षा मागणारा) ब्राह्मण जेथे भगवान होते तेथे गेला; तिथे पोहोचून त्याने भगवंतांसोबत कुशलक्षेम विचारले. आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण आटोपून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला तो भिक्खक ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला – “हे गौतम, मीसुद्धा भिक्षा मागणारा आहे आणि आपणही भिक्षा मागणारे आहात. मग या भिक्षा मागण्याच्या बाबतीत आपल्या दोघांमध्ये काय फरक आहे?” ‘‘න තෙන භික්ඛකො හොති, යාවතා භික්ඛතෙ පරෙ; විස්සං ධම්මං සමාදාය, භික්ඛු හොති න තාවතා. “केवळ इतरांकडे भिक्षा मागितल्याने कोणी भिक्खू (किंवा भिक्खक) होत नाही; दुर्गंधीयुक्त (अकुशल) धर्माचे आचरण करून कोणी भिक्खू होऊ शकत नाही.” ‘‘යොධ පුඤ්ඤඤ්ච පාපඤ්ච, බාහිත්වා බ්රහ්මචරියං; සඞ්ඛාය ලොකෙ චරති, ස වෙ භික්ඛූති වුච්චතී’’ති. “परंतु जो या जगात पुण्य आणि पाप या दोन्हीच्या पलीकडे जाऊन, ब्रह्मचर्याचे पालन करतो, आणि विचारपूर्वक (ज्ञानाने) जगात वावरतो, त्यालाच खरोखर 'भिक्खू' म्हटले जाते.” එවං වුත්තෙ, භික්ඛකො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භො ගොතම, අභික්කන්තං, භො ගොතම…පෙ… උපාසකං මං භවං ගොතමො ධාරෙතු අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. असे म्हटले असता, तो भिक्खक ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला – “अतिशय सुंदर, हे गौतम! अतिशय सुंदर, हे गौतम! ... आजपासून मी आयुष्यभर शरण आलेला उपासक आहे, असे आपण मला मानावे.” 11. සඞ්ගාරවසුත්තං ११. संगारव सुत्त 207. සාවත්ථිනිදානං. තෙන ඛො පන සමයෙන සඞ්ගාරවො නාම බ්රාහ්මණො සාවත්ථියං පටිවසති උදකසුද්ධිකො, උදකෙන පරිසුද්ධිං පච්චෙති, සායං පාතං උදකොරොහනානුයොගමනුයුත්තො විහරති. අථ ඛො ආයස්මා ආනන්දො පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය සාවත්ථිං පිණ්ඩාය පාවිසි. සාවත්ථියං පිණ්ඩාය චරිත්වා පච්ඡාභත්තං පිණ්ඩපාතපටික්කන්තො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා ආනන්දො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘ඉධ, භන්තෙ, සඞ්ගාරවො නාම බ්රාහ්මණො සාවත්ථියං පටිවසති උදකසුද්ධිකො[Pg.185], උදකෙන සුද්ධිං පච්චෙති, සායං පාතං උදකොරොහනානුයොගමනුයුත්තො විහරති. සාධු, භන්තෙ, භගවා යෙන සඞ්ගාරවස්ස බ්රාහ්මණස්ස නිවෙසනං තෙනුපසඞ්කමතු අනුකම්පං උපාදායා’’ති. අධිවාසෙසි භගවා තුණ්හීභාවෙන. २०७. श्रावस्ती येथील प्रसंग. त्या वेळी संगारव नावाचा एक ब्राह्मण श्रावस्तीमध्ये राहत होता. तो 'जलशुद्धी' मानणारा होता, म्हणजेच पाण्याने शुद्धी होते यावर त्याचा विश्वास होता. तो रोज संध्याकाळी आणि सकाळी पाण्यात डुबकी मारण्याच्या (स्नान करण्याच्या) विधीमध्ये मग्न असे. तेव्हा आदरणीय आनंद सकाळी वस्त्रे परिधान करून, पात्र आणि चीवर घेऊन श्रावस्तीमध्ये भिक्षेसाठी गेले. श्रावस्तीमध्ये भिक्षाटन करून, भोजनोत्तर भिक्षेहून परत आल्यावर ते जेथे भगवान होते तेथे गेले; तिथे पोहोचून भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेले आदरणीय आनंद भगवंतांना म्हणाले – “भंते, येथे श्रावस्तीमध्ये संगारव नावाचा एक ब्राह्मण राहतो, जो जलशुद्धी मानणारा आहे. पाण्याचे स्नान केल्याने शुद्धी होते यावर त्याचा विश्वास आहे आणि तो रोज संध्याकाळी व सकाळी पाण्यात डुबकी मारण्याच्या विधीमध्ये मग्न असतो. भंते, भगवंतांनी अनुकंपा करून संगारव ब्राह्मणाच्या घरी जावे, ही विनंती.” भगवंतांनी मौन बाळगून संमती दिली. අථ ඛො භගවා පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය යෙන සඞ්ගාරවස්ස බ්රාහ්මණස්ස නිවෙසනං තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා පඤ්ඤත්තෙ ආසනෙ නිසීදි. අථ ඛො සඞ්ගාරවො බ්රාහ්මණො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතා සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නං ඛො සඞ්ගාරවං බ්රාහ්මණං භගවා එතදවොච – ‘‘සච්චං කිර ත්වං, බ්රාහ්මණ, උදකසුද්ධිකො, උදකෙන සුද්ධිං පච්චෙසි, සායං පාතං උදකොරොහනානුයොගමනුයුත්තො විහරසී’’ති? ‘‘එවං, භො ගොතම’’. ‘‘කිං පන ත්වං, බ්රාහ්මණ, අත්ථවසං සම්පස්සමානො උදකසුද්ධිකො, උදකසුද්ධිං පච්චෙසි, සායං පාතං උදකොරොහනානුයොගමනුයුත්තො විහරසී’’ති? ‘‘ඉධ මෙ, භො ගොතම, යං දිවා පාපකම්මං කතං හොති, තං සායං න්හානෙන පවාහෙමි, යං රත්තිං පාපකම්මං කතං හොති තං පාතං න්හානෙන පවාහෙමි. ඉමං ඛ්වාහං, භො ගොතම, අත්ථවසං සම්පස්සමානො උදකසුද්ධිකො, උදකෙන සුද්ධිං පච්චෙමි, සායං පාතං උදකොරොහනානුයොගමනුයුත්තො විහරාමී’’ති. त्यानंतर भगवान सकाळी वस्त्रे परिधान करून, पात्र आणि चीवर घेऊन जेथे संगारव ब्राह्मणाचे घर होते तेथे गेले; तिथे पोहोचून ते तयार केलेल्या आसनावर बसले. तेव्हा संगारव ब्राह्मण जेथे भगवान होते तेथे आला; तिथे पोहोचून त्याने भगवंतांसोबत कुशलक्षेम विचारले. आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण आटोपून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या संगारव ब्राह्मणाला भगवान म्हणाले – “ब्राह्मणा, हे खरे आहे का की तू जलशुद्धी मानणारा आहेस, पाण्याने शुद्धी होते यावर तुझा विश्वास आहे आणि तू रोज संध्याकाळी व सकाळी पाण्यात डुबकी मारण्याच्या विधीमध्ये मग्न असतोस?” “होय, हे गौतम.” “पण ब्राह्मणा, कोणता विशेष लाभ पाहून तू जलशुद्धी मानतोस, पाण्याने शुद्धी होते यावर विश्वास ठेवतोस आणि रोज संध्याकाळी व सकाळी पाण्यात डुबकी मारण्याच्या विधीमध्ये मग्न असतोस?” “हे गौतम, माझ्याकडून दिवसा जे काही पापकर्म घडते, ते मी संध्याकाळी स्नान करून वाहून लावतो (नष्ट करतो); आणि रात्री जे काही पापकर्म घडते, ते मी सकाळी स्नान करून वाहून लावतो. हे गौतम, हाच विशेष लाभ पाहून मी जलशुद्धी मानतो, पाण्याने शुद्धी होते यावर विश्वास ठेवतो आणि रोज संध्याकाळी व सकाळी पाण्यात डुबकी मारण्याच्या विधीमध्ये मग्न असतो.” ‘‘ධම්මො රහදො බ්රාහ්මණ සීලතිත්ථො,අනාවිලො සබ්භි සතං පසත්ථො; යත්ථ හවෙ වෙදගුනො සිනාතා,අනල්ලගත්තාව තරන්ති පාර’’න්ති. “हे ब्राह्मणा, (अष्टांगिक) धर्म हाच एक जलाशय आहे आणि शील हा त्याचा घाट (तीर्थ) आहे, जो अत्यंत निर्मळ आहे आणि सत्पुरुषांनी सत्पुरुषांसाठी त्याची प्रशंसा केली आहे. जिथे वेदपारंगत (ज्ञानी/अरहंत) स्नान करतात, आणि आपले शरीर ओले न करताच पैलतीराला (निर्वाणाला) पार करून जातात.” එවං වුත්තෙ, සඞ්ගාරවො බ්රාහ්මණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භො ගොතම, අභික්කන්තං, භො ගොතම…පෙ… උපාසකං මං භවං ගොතමො ධාරෙතු අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. असे म्हटले असता, संगारव ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला – “अतिशय सुंदर, हे गौतम! अतिशय सुंदर, हे गौतम! ... आजपासून मी आयुष्यभर शरण आलेला उपासक आहे, असे आपण मला मानावे.” 12. ඛොමදුස්සසුත්තං १२. खोमदुस्स सुत्त 208. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා සක්කෙසු විහරති ඛොමදුස්සං නාමං සක්යානං නිගමො. අථ ඛො භගවා පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා [Pg.186] පත්තචීවරමාදාය ඛොමදුස්සං නිගමං පිණ්ඩාය පාවිසි. තෙන ඛො පන සමයෙන ඛොමදුස්සකා බ්රාහ්මණගහපතිකා සභායං සන්නිපතිතා හොන්ති කෙනචිදෙව කරණීයෙන, දෙවො ච එකමෙකං ඵුසායති. අථ ඛො භගවා යෙන සා සභා තෙනුපසඞ්කමි. අද්දසංසු ඛොමදුස්සකා බ්රාහ්මණගහපතිකා භගවන්තං දූරතොව ආගච්ඡන්තං. දිස්වාන එතදවොචුං – ‘‘කෙ ච මුණ්ඩකා සමණකා, කෙ ච සභාධම්මං ජානිස්සන්තී’’ති? අථ ඛො භගවා ඛොමදුස්සකෙ බ්රාහ්මණගහපතිකෙ ගාථාය අජ්ඣභාසි – २०८. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान शाक्य देशात 'खोमदुस्स' नावाच्या शाक्यांच्या नगरात (वस्तीत) विहार करत होते. तेव्हा भगवान सकाळी वस्त्रे परिधान करून, पात्र आणि चीवर घेऊन खोमदुस्स नगरात भिक्षेसाठी शिरले. त्या वेळी खोमदुस्स येथील ब्राह्मण गृहपती काही कामासाठी सभेच्या ठिकाणी एकत्र आले होते आणि हलका पाऊस पडत होता (पावसाचे थेंब पडत होते). तेव्हा भगवान जेथे ती सभा होती तेथे गेले. खोमदुस्स येथील ब्राह्मण गृहपतींनी भगवंतांना दुरूनच येताना पाहिले. त्यांना पाहून ते म्हणाले – “हे मुंडक (डोके मुंडण केलेले) श्रमण कोण आहेत? आणि त्यांना सभेचे नियम (शिष्टाचार) काय माहीत असणार?” तेव्हा भगवंतांनी खोमदुस्स येथील ब्राह्मण गृहपतींना गाथेने संबोधित केले – ‘‘නෙසා සභා යත්ථ න සන්ති සන්තො,සන්තො න තෙ යෙ න වදන්ති ධම්මං; රාගඤ්ච දොසඤ්ච පහාය මොහං,ධම්මං වදන්තා ච භවන්ති සන්තො’’ති. “ती सभा नव्हे जिथे सत्पुरुष नसतात, आणि ते सत्पुरुष नव्हेत जे धर्माचे प्रतिपादन करत नाहीत. राग (आसक्ती), द्वेष आणि मोह यांचा त्याग करून, जे धर्माचे प्रतिपादन करतात, तेच खरे सत्पुरुष असतात.” එවං වුත්තෙ, ඛොමදුස්සකා බ්රාහ්මණගහපතිකා භගවන්තං එතදවොචුං – ‘‘අභික්කන්තං, භො ගොතම, අභික්කන්තං, භො ගොතම; සෙය්යථාපි, භො ගොතම, නික්කුජ්ජිතං වා උක්කුජ්ජෙය්ය, පටිච්ඡන්නං වා විවරෙය්ය, මූළ්හස්ස වා මග්ගං ආචික්ඛෙය්ය, අන්ධකාරෙ වා තෙලපජ්ජොතං ධාරෙය්ය – චක්ඛුමන්තො රූපානි දක්ඛන්තීති, එවමෙවං භොතා ගොතමෙන අනෙකපරියායෙන ධම්මො පකාසිතො. එතෙ මයං භවන්තං ගොතමං සරණං ගච්ඡාම ධම්මඤ්ච භික්ඛුසඞ්ඝඤ්ච. උපාසකෙ නො භවං ගොතමො ධාරෙතු අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතෙ සරණං ගතෙ’’ති. असे म्हटले असता, खोमदुस्स येथील ब्राह्मण आणि गृहपती भगवंतांना म्हणाले – “अतिशय सुंदर, हे गौतम! अतिशय सुंदर, हे गौतम! ज्याप्रमाणे, हे गौतम, उपडा केलेला घडा उताणा करावा, झाकलेले उघडे करावे, वाट चुकलेल्याला मार्ग दाखवावा किंवा अंधारात तेलाचा दिवा धरावा जेणेकरून डोळे असणाऱ्यांना रूपे दिसू शकतील; त्याचप्रमाणे आदरणीय गौतमांनी अनेक पर्यायांनी धम्म प्रकाशित केला आहे. आम्ही सर्व आदरणीय गौतमांना, धम्माला आणि भिक्खू संघाला शरण जातो. आदरणीय गौतमांनी आम्हाला आजपासून आयुष्यभर शरण आलेले उपासक म्हणून स्वीकारावे.” උපාසකවග්ගො දුතියො. दुसरा उपासकवर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – කසි උදයො දෙවහිතො, අඤ්ඤතරමහාසාලං; මානථද්ධං පච්චනීකං, නවකම්මිකකට්ඨහාරං; මාතුපොසකං භික්ඛකො, සඞ්ගාරවො ච ඛොමදුස්සෙන ද්වාදසාති. कसी, उदय, देवहित, अञ्ञतरमहासाल, मानत्थद्ध, पच्चनीक, नवकम्मिक, कट्ठहार, मातुपोसक, भिक्खक, संगारव आणि खोमदुस्स – हे बारा सुत्त आहेत. බ්රාහ්මණසංයුත්තං සමත්තං. ब्राह्मणसंयुत्त समाप्त झाले. 8. වඞ්ගීසසංයුත්තං ८. वंगीससंयुत्त 1. නික්ඛන්තසුත්තං १. निक्खन्त सुत्त (प्रव्रजित सुत्त) 209. එවං [Pg.187] මෙ සුතං – එකං සමයං ආයස්මා වඞ්ගීසො ආළවියං විහරති අග්ගාළවෙ චෙතියෙ ආයස්මතා නිග්රොධකප්පෙන උපජ්ඣායෙන සද්ධිං. තෙන ඛො පන සමයෙන ආයස්මා වඞ්ගීසො නවකො හොති අචිරපබ්බජිතො ඔහිය්යකො විහාරපාලො. අථ ඛො සම්බහුලා ඉත්ථියො සමලඞ්කරිත්වා යෙන අග්ගාළවකො ආරාමො තෙනුපසඞ්කමිංසු විහාරපෙක්ඛිකායො. අථ ඛො ආයස්මතො වඞ්ගීසස්ස තා ඉත්ථියො දිස්වා අනභිරති උප්පජ්ජති, රාගො චිත්තං අනුද්ධංසෙති. අථ ඛො ආයස්මතො වඞ්ගීසස්ස එතදහොසි – ‘‘අලාභා වත මෙ, න වත මෙ ලාභා; දුල්ලද්ධං වත මෙ, න වත මෙ සුලද්ධං; යස්ස මෙ අනභිරති උප්පන්නා, රාගො චිත්තං අනුද්ධංසෙති, තං කුතෙත්ථ ලබ්භා, යං මෙ පරො අනභිරතිං විනොදෙත්වා අභිරතිං උප්පාදෙය්ය. යංනූනාහං අත්තනාව අත්තනො අනභිරතිං විනොදෙත්වා අභිරතිං උප්පාදෙය්ය’’න්ති. අථ ඛො ආයස්මා වඞ්ගීසො අත්තනාව අත්තනො අනභිරතිං විනොදෙත්වා අභිරතිං උප්පාදෙත්වා තායං වෙලායං ඉමා ගාථායො අභාසි – २०९. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी आयुष्यमान वंगीस आळवी येथील अग्गाळव चेतियामध्ये आपले उपाध्याय आयुष्यमान निग्रोधकप्प यांच्यासोबत राहत होते. त्या वेळी आयुष्यमान वंगीस हे नवीनच प्रव्रजित झालेले नवशिके भिक्खू होते आणि विहाराचे रक्षक म्हणून मागे राहिले होते. तेव्हा अनेक स्त्रिया उत्तम प्रकारे शृंगार करून अग्गाळव आरामात विहार पाहण्याच्या इच्छेने आल्या. त्या स्त्रियांना पाहून आयुष्यमान वंगीस यांच्या मनात अरती (असमाधान) उत्पन्न झाली आणि रागाने त्यांच्या चित्ताला ग्रासले. तेव्हा आयुष्यमान वंगीस यांच्या मनात असा विचार आला – “हा माझा मोठा तोटा आहे, माझा काही लाभ नाही; मला हे वाईट रीतीने मिळाले आहे, चांगल्या रीतीने मिळाले नाही; कारण माझ्या मनात अरती उत्पन्न झाली आहे आणि रागाने माझ्या चित्ताला ग्रासले आहे. माझ्या मनातील ही अरती दूर करून माझ्या मनात रती उत्पन्न करील असा दुसरा कोण मला येथे मिळणार? मी स्वतःच स्वतःची अरती दूर करून रती का उत्पन्न करू नये?” त्यानंतर आयुष्यमान वंगीस यांनी स्वतःच स्वतःची अरती दूर करून रती उत्पन्न केली आणि त्या वेळी या गाथा म्हटल्या – ‘‘නික්ඛන්තං වත මං සන්තං, අගාරස්මානගාරියං; විතක්කා උපධාවන්ති, පගබ්භා කණ්හතො ඉමෙ. “घरातून बेघर होऊन प्रव्रजित झालेल्या आणि शांत असलेल्या माझ्याकडे, काळ्या मार (कपिले) कडून आलेले हे उद्धट काम-वितर्क धावून येत आहेत. ‘‘උග්ගපුත්තා මහිස්සාසා, සික්ඛිතා දළ්හධම්මිනො; සමන්තා පරිකිරෙය්යුං, සහස්සං අපලායිනං. “जरी उत्तम धनुर्विद्या शिकलेले, दृढ धनुष्य धारण करणारे आणि रणांगणातून न पळणारे एक हजार राजपुत्र मला चहूबाजूंनी वेढून उभे राहिले, ‘‘සචෙපි එතතො භිය්යො, ආගමිස්සන්ති ඉත්ථියො; නෙව මං බ්යාධයිස්සන්ති, ධම්මෙ සම්හි පතිට්ඨිතං. “किंवा याहूनही अधिक स्त्रिया जरी येथे आल्या, तरी त्या मला विचलित करू शकणार नाहीत, कारण मी माझ्या धम्मात दृढपणे प्रतिष्ठित आहे. ‘‘සක්ඛී හි මෙ සුතං එතං, බුද්ධස්සාදිච්චබන්ධුනො; නිබ්බානගමනං මග්ගං, තත්ථ මෙ නිරතො මනො. “मी स्वतः आदित्यबंधू बुद्धांच्या मुखातून निर्वाणाकडे नेणारा हा मार्ग ऐकला आहे; आणि त्याच मार्गात माझे चित्त रममाण झाले आहे. ‘‘එවඤ්චෙ මං විහරන්තං, පාපිම උපගච්ඡසි; තථා මච්චු කරිස්සාමි, න මෙ මග්ගම්පි දක්ඛසී’’ති. “हे पापी मारा! जर तू अशा प्रकारे विहार करणाऱ्या माझ्याकडे येशील, तर हे मृत्यू, मी असे करीन की तुला माझा मार्गही दिसणार नाही.” 2. අරතිසුත්තං २. अरती सुत्त (असमाधान सुत्त) 210. එකං [Pg.188] සමයං…පෙ… ආයස්මා වඞ්ගීසො ආළවියං විහරති අග්ගාළවෙ චෙතියෙ ආයස්මතා නිග්රොධකප්පෙන උපජ්ඣායෙන සද්ධිං. තෙන ඛො පන සමයෙන ආයස්මා නිග්රොධකප්පො පච්ඡාභත්තං පිණ්ඩපාතපටික්කන්තො විහාරං පවිසති, සායං වා නික්ඛමති අපරජ්ජු වා කාලෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන ආයස්මතො වඞ්ගීසස්ස අනභිරති උප්පන්නා හොති, රාගො චිත්තං අනුද්ධංසෙති. අථ ඛො ආයස්මතො වඞ්ගීසස්ස එතදහොසි – ‘‘අලාභා වත මෙ, න වත මෙ ලාභා; දුල්ලද්ධං වත මෙ, න වත මෙ සුලද්ධං; යස්ස මෙ අනභිරති උප්පන්නා, රාගො චිත්තං අනුද්ධංසෙති; තං කුතෙත්ථ ලබ්භා, යං මෙ පරො අනභිරතිං විනොදෙත්වා අභිරතිං උප්පාදෙය්ය. යංනූනාහං අත්තනාව අත්තනො අනභිරතිං විනොදෙත්වා අභිරතිං උප්පාදෙය්ය’’න්ති. අථ ඛො ආයස්මා වඞ්ගීසො අත්තනාව අත්තනො අනභිරතිං විනොදෙත්වා අභිරතිං උප්පාදෙත්වා තායං වෙලායං ඉමා ගාථායො අභාසි – २१०. एका वेळी... आयुष्यमान वंगीस आळवी येथील अग्गाळव चेतियामध्ये आपले उपाध्याय आयुष्यमान निग्रोधकप्प यांच्यासोबत राहत होते. त्या वेळी आयुष्यमान निग्रोधकप्प हे जेवणानंतर पिंडपातावरून परतल्यावर विहारात प्रवेश करत असत आणि संध्याकाळी किंवा दुसऱ्या दिवशी सकाळी बाहेर पडत असत. त्या वेळी आयुष्यमान वंगीस यांच्या मनात अरती उत्पन्न झाली होती आणि रागाने त्यांच्या चित्ताला ग्रासले होते. तेव्हा आयुष्यमान वंगीस यांच्या मनात असा विचार आला – “हा माझा मोठा तोटा आहे, माझा काही लाभ नाही; मला हे वाईट रीतीने मिळाले आहे, चांगल्या रीतीने मिळाले नाही; कारण माझ्या मनात अरती उत्पन्न झाली आहे आणि रागाने माझ्या चित्ताला ग्रासले आहे. माझ्या मनातील ही अरती दूर करून माझ्या मनात रती उत्पन्न करील असा दुसरा कोण मला येथे मिळणार? मी स्वतःच स्वतःची अरती दूर करून रती का उत्पन्न करू नये?” त्यानंतर आयुष्यमान वंगीस यांनी स्वतःच स्वतःची अरती दूर करून रती उत्पन्न केली आणि त्या वेळी या गाथा म्हटल्या – ‘‘අරතිඤ්ච රතිඤ්ච පහාය, සබ්බසො ගෙහසිතඤ්ච විතක්කං; වනථං න කරෙය්ය කුහිඤ්චි, නිබ්බනථො අරතො ස හි භික්ඛු. “जो अरती आणि रती यांचा त्याग करून, घराशी संबंधित सर्व वितर्कांचा पूर्णपणे त्याग करतो; जो कुठेही क्लेशांचे रान वाढू देत नाही, जो क्लेशरहित आणि आसक्तीरहित आहे, तोच खरा भिक्खू होय. ‘‘යමිධ පථවිඤ්ච වෙහාසං, රූපගතඤ්ච ජගතොගධං; කිඤ්චි පරිජීයති සබ්බමනිච්චං, එවං සමෙච්ච චරන්ති මුතත්තා. “या पृथ्वीवर किंवा आकाशात जे काही रूप आहे, किंवा जे काही या जगात समाविष्ट आहे, ते सर्व क्षय पावणारे आणि अनित्य आहे; असे पूर्णपणे जाणून विमुक्त चित्त असलेले मुनी विहरतात. ‘‘උපධීසු ජනා ගධිතාසෙ, දිට්ඨසුතෙ පටිඝෙ ච මුතෙ ච; එත්ථ විනොදය ඡන්දමනෙජො, යො එත්ථ න ලිම්පති තං මුනිමාහු. “लोक उपाधींमध्ये, पाहिलेल्या, ऐकलेल्या, वास घेतलेल्या, चखलेल्या आणि स्पर्श केलेल्या विषयांमध्ये गुंतलेले असतात. या विषयांवरील आपली तृष्णा दूर करून जो निष्कंप राहतो आणि जो यात लिप्त होत नाही, त्यालाच मुनी म्हणतात. ‘‘අථ සට්ඨිනිස්සිතා සවිතක්කා, පුථූ ජනතාය අධම්මා නිවිට්ඨා; න ච වග්ගගතස්ස කුහිඤ්චි, නො පන දුට්ඨුල්ලභාණී ස භික්ඛු. “तसेच, जे साठ दृष्टींवर अवलंबून आहेत, जे स्वतःच्या वितर्कांनी ग्रासलेले आहेत – असे अनेक लोक अधम्मामध्ये स्थिर आहेत. परंतु जो भिक्खू कोणत्याही क्लेशकारक गटात सामील होत नाही आणि जो अश्लील किंवा कठोर बोलत नाही, तोच खरा भिक्खू होय. ‘‘දබ්බො චිරරත්තසමාහිතො, අකුහකො නිපකො අපිහාලු; සන්තං පදං අජ්ඣගමා මුනි පටිච්ච, පරිනිබ්බුතො කඞ්ඛති කාල’’න්ති. “जो बुद्धिमान, दीर्घकाळापासून समाधीत स्थिर असलेला, ढोंग न करणारा, प्रज्ञावान आणि तृष्णारहित आहे; असा मुनी शांत पदाला प्राप्त करून, पूर्णपणे शांत होऊन आपल्या काळाची वाट पाहत असतो.” 3. පෙසලසුත්තං ३. पेसल सुत्त (शीलवान सुत्त) 211. එකං සමයං ආයස්මා වඞ්ගීසො ආළවියං විහරති අග්ගාළවෙ චෙතියෙ ආයස්මතා නිග්රොධකප්පෙන උපජ්ඣායෙන සද්ධිං. තෙන ඛො පන සමයෙන [Pg.189] ආයස්මා වඞ්ගීසො අත්තනො පටිභානෙන අඤ්ඤෙ පෙසලෙ භික්ඛූ අතිමඤ්ඤති. අථ ඛො ආයස්මතො වඞ්ගීසස්ස එතදහොසි – ‘‘අලාභා වත මෙ, න වත මෙ ලාභා; දුල්ලද්ධං වත මෙ, න වත මෙ සුලද්ධං; ය්වාහං අත්තනො පටිභානෙන අඤ්ඤෙ පෙසලෙ භික්ඛූ අතිමඤ්ඤාමී’’ති. අථ ඛො ආයස්මා වඞ්ගීසො අත්තනාව අත්තනො විප්පටිසාරං උප්පාදෙත්වා තායං වෙලායං ඉමා ගාථායො අභාසි – २११. एका वेळी आयुष्यमान वंगीस आळवी येथील अग्गाळव चेतियामध्ये आपले उपाध्याय आयुष्यमान निग्रोधकप्प यांच्यासोबत राहत होते. त्या वेळी आयुष्यमान वंगीस आपल्या बुद्धिमत्तेमुळे इतर शीलवान भिक्खूंचा अनादर करत असत. तेव्हा आयुष्यमान वंगीस यांच्या मनात असा विचार आला – “हा माझा मोठा तोटा आहे, माझा काही लाभ नाही; मला हे वाईट रीतीने मिळाले आहे, चांगल्या रीतीने मिळाले नाही; कारण मी माझ्या बुद्धिमत्तेमुळे इतर शीलवान भिक्खूंचा अनादर करतो.” त्यानंतर आयुष्यमान वंगीस यांनी स्वतःच स्वतःच्या मनात पश्चात्ताप उत्पन्न केला आणि त्या वेळी या गाथा म्हटल्या – ‘‘මානං පජහස්සු ගොතම, මානපථඤ්ච පජහස්සු; අසෙසං මානපථස්මිං, සමුච්ඡිතො විප්පටිසාරීහුවා චිරරත්තං. “हे गौतमा! तू मानाचा त्याग कर आणि मानाच्या मार्गाचाही पूर्णपणे त्याग कर. मानाच्या मार्गावर मोहित होऊन तू दीर्घकाळापासून पश्चात्ताप करत राहिला आहेस. ‘‘මක්ඛෙන මක්ඛිතා පජා, මානහතා නිරයං පපතන්ති; සොචන්ති ජනා චිරරත්තං, මානහතා නිරයං උපපන්නා. “गुण नाकारण्याच्या दोषाने माखलेले आणि मानाने ग्रस्त झालेले लोक नरकात पडतात. मानाने ग्रस्त होऊन नरकात उत्पन्न झालेले लोक दीर्घकाळापर्यंत शोक करतात. ‘‘න හි සොචති භික්ඛු කදාචි, මග්ගජිනො සම්මාපටිපන්නො; කිත්තිඤ්ච සුඛඤ්ච අනුභොති, ධම්මදසොති තමාහු පහිතත්තං. “परंतु मार्गाने क्लेशांवर विजय मिळवणारा आणि योग्य आचरण करणारा भिक्खू कधीही शोक करत नाही. तो कीर्ती आणि सुखाचा अनुभव घेतो. अशा दृढनिश्चयी पुरुषाला शहाणे लोक ‘धम्म पाहणारा’ म्हणतात. ‘‘තස්මා අඛිලොධ පධානවා, නීවරණානි පහාය විසුද්ධො; මානඤ්ච පහාය අසෙසං, විජ්ජායන්තකරො සමිතාවී’’ති. “म्हणून, या शासनात द्वेषरहित आणि उद्योगी होऊन, नीवरणांचा त्याग करून शुद्ध व्हावे. मानाचा पूर्णपणे त्याग करून, प्रज्ञेने क्लेशांचा अंत करावा आणि शांत व्हावे.” 4. ආනන්දසුත්තං ४. आनंद सुत्त 212. එකං සමයං ආයස්මා ආනන්දො සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. අථ ඛො ආයස්මා ආනන්දො පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය සාවත්ථිං පිණ්ඩාය පාවිසි ආයස්මතා වඞ්ගීසෙන පච්ඡාසමණෙන. තෙන ඛො පන සමයෙන ආයස්මතො වඞ්ගීසස්ස අනභිරති උප්පන්නා හොති, රාගො චිත්තං අනුද්ධංසෙති. අථ ඛො ආයස්මා වඞ්ගීසො ආයස්මන්තං ආනන්දං ගාථාය අජ්ඣභාසි – २१२. एका वेळी आयुष्यमान आनंद श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेव्हा आयुष्यमान आनंद सकाळच्या वेळी चीवर परिधान करून, पात्र व चीवर घेऊन, आयुष्यमान वंगीश यांना सोबत घेऊन श्रावस्तीमध्ये भिक्षेसाठी शिरले. त्या वेळी आयुष्यमान वंगीश यांच्या मनात (धम्माबद्दल) अरती (उदासीनता) उत्पन्न झाली होती आणि कामरागाने त्यांच्या चित्ताला ग्रासले होते. तेव्हा आयुष्यमान वंगीश यांनी आयुष्यमान आनंद यांना गाथेने संबोधित केले – ‘‘කාමරාගෙන ඩය්හාමි, චිත්තං මෙ පරිඩය්හති; සාධු නිබ්බාපනං බ්රූහි, අනුකම්පාය ගොතමා’’ති. “मी कामरागाने जळत आहे, माझे चित्त चहूबाजूंनी होरपळत आहे. हे गौतम! माझ्यावर अनुकंपा करून, कृपया हा दाह शांत करण्याचा (कामराग शांत करण्याचा) उपाय सांगा.” ‘‘සඤ්ඤාය විපරියෙසා, චිත්තං තෙ පරිඩය්හති; නිමිත්තං පරිවජ්ජෙහි, සුභං රාගූපසංහිතං. “संज्ञेच्या (समजुतीच्या) विपर्यासाने तुझे चित्त चहूबाजूंनी होरपळत आहे. कामरागाला उत्तेजित करणाऱ्या 'शुभ' (सुंदर) अशा निमित्ताचा (आभासाचा) त्याग कर. ‘‘සඞ්ඛාරෙ පරතො පස්ස, දුක්ඛතො මා ච අත්තතො; නිබ්බාපෙහි මහාරාගං, මා ඩය්හිත්ථො පුනප්පුනං. “संस्कारांकडे (सर्व घटकांकडे) परके (अनित्य) म्हणून आणि दुःख म्हणून बघ, आत्मा म्हणून बघू नकोस. या तीव्र कामरागाला शांत कर, पुन्हा पुन्हा स्वतःला होरपळू देऊ नकोस. ‘‘අසුභාය [Pg.190] චිත්තං භාවෙහි, එකග්ගං සුසමාහිතං; සති කායගතා ත්යත්ථු, නිබ්බිදාබහුලො භව. “अशुभाच्या (अपवित्रतेच्या) भावनेने चित्त विकसित कर, जे एकाग्र व सुसमाहित असेल. तुझी स्मृती कायागत (शरीरावर केंद्रित) असो आणि तू कामभोगांविषयी अत्यंत विरक्त हो. ‘‘අනිමිත්තඤ්ච භාවෙහි, මානානුසයමුජ්ජහ; තතො මානාභිසමයා, උපසන්තො චරිස්සසී’’ති. “निमित्तरहित (अनिमित्त) भावनेचा अभ्यास कर आणि मानाच्या (अहंकाराच्या) सुप्त प्रवृत्तीचा त्याग कर. त्यानंतर मानाचा पूर्णपणे नाश केल्याने तू शांत होऊन विहरेल.” 5. සුභාසිතසුත්තං ५. सुभाषित सुत्त 213. සාවත්ථිනිදානං. තත්ර ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘භික්ඛවො’’ති. ‘‘භදන්තෙ’’ති තෙ භික්ඛූ භගවතො පච්චස්සොසුං. භගවා එතදවොච – २१३. श्रावस्ती येथील प्रसंग. तिथे भगवंतांनी भिक्षूंना संबोधित केले – “भिक्षूंनो!” “भंते!” अशा शब्दांत त्या भिक्षूंनी भगवंतांना प्रतिसाद दिला. भगवंत म्हणाले – ‘‘චතූහි, භික්ඛවෙ, අඞ්ගෙහි සමන්නාගතා වාචා සුභාසිතා හොති, නො දුබ්භාසිතා; අනවජ්ජා ච අනනුවජ්ජා ච විඤ්ඤූනං. කතමෙහි චතූහි? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සුභාසිතංයෙව භාසති නො දුබ්භාසිතං, ධම්මංයෙව භාසති නො අධම්මං, පියංයෙව භාසති නො අප්පියං, සච්චංයෙව භාසති නො අලිකං. ඉමෙහි ඛො, භික්ඛවෙ, චතූහි අඞ්ගෙහි සමන්නාගතා වාචා සුභාසිතා හොති, නො දුබ්භාසිතා, අනවජ්ජා ච අනනුවජ්ජා ච විඤ්ඤූන’’න්ති. ඉදමවොච භගවා, ඉදං වත්වාන සුගතො අථාපරං එතදවොච සත්ථා – “भिक्षूंनो, चार अंगांनी (वैशिष्ट्यांनी) युक्त असलेली वाणी ही सुभाषित (चांगली बोललेली) असते, दुर्भाषित (वाईट बोललेली) नसते; ती निर्दोष असते आणि सुज्ञांकडून (पंडितांकडून) निंदेला पात्र ठरत नाही. कोणत्या चार अंगांनी? भिक्षूंनो, येथे भिक्षू केवळ सुभाषितच बोलतो, दुर्भाषित बोलत नाही; तो केवळ धम्माला धरूनच बोलतो, अधम्माला धरून बोलत नाही; तो केवळ प्रिय (मधुर) बोलतो, अप्रिय बोलत नाही; तो केवळ सत्यच बोलतो, असत्य बोलत नाही. भिक्षूंनो, या चार अंगांनी युक्त असलेली वाणी सुभाषित असते, दुर्भाषित नसते; ती निर्दोष असते आणि सुज्ञांकडून निंदेला पात्र ठरत नाही.” भगवंत असे म्हणाले. हे बोलून सुगतांनी, शास्त्यांनी पुढे हे सांगितले – ‘‘සුභාසිතං උත්තමමාහු සන්තො,ධම්මං භණෙ නාධම්මං තං දුතියං; පියං භණෙ නාප්පියං තං තතියං,සච්චං භණෙ නාලිකං තං චතුත්ථ’’න්ති. “सज्जन म्हणतात की सुभाषित बोलणे हे सर्वश्रेष्ठ आहे; धम्माला धरून बोलावे, अधम्माला धरून नाही, हे दुसरे; प्रिय बोलावे, अप्रिय नाही, हे तिसरे; आणि सत्य बोलावे, असत्य नाही, हे चौथे.” අථ ඛො ආයස්මා වඞ්ගීසො උට්ඨායාසනා එකංසං උත්තරාසඞ්ගං කරිත්වා යෙන භගවා තෙනඤ්ජලිං පණාමෙත්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘පටිභාති මං භගවා, පටිභාති මං සුගතා’’ති. ‘‘පටිභාතු තං වඞ්ගීසා’’ති භගවා අවොච. අථ ඛො ආයස්මා වඞ්ගීසො භගවන්තං සම්මුඛා සාරුප්පාහි ගාථාහි අභිත්ථවි – तेव्हा आयुष्यमान वंगीश आसनावरून उठले, आपले उत्तरासंग (वरचे वस्त्र) एका खांद्यावर केले आणि भगवंतांच्या दिशेने हात जोडून नमस्कार करत भगवंतांना म्हणाले – “हे भगवंत, मला काही सुचत आहे! हे सुगत, मला काही सुचत आहे!” भगवंत म्हणाले – “हे वंगीश, तुला जे सुचत आहे ते व्यक्त कर.” तेव्हा आयुष्यमान वंगीश यांनी भगवंतांच्या समोर त्यांच्या योग्य अशा गाथांनी त्यांची स्तुती केली – ‘‘තමෙව වාචං භාසෙය්ය, යායත්තානං න තාපයෙ; පරෙ ච න විහිංසෙය්ය, සා වෙ වාචා සුභාසිතා. “मनुष्याने अशीच वाणी बोलावी, जिच्यामुळे स्वतःला मनस्ताप होणार नाही आणि इतरांनाही इजा (पीडा) होणार नाही; तीच वाणी खरोखर सुभाषित होय. ‘‘පියවාචංව භාසෙය්ය, යා වාචා පටිනන්දිතා; යං අනාදාය පාපානි, පරෙසං භාසතෙ පියං. “मनुष्याने प्रिय वाणीच बोलावी, जी ऐकून आनंद होतो; इतरांचे दोष न काढता (पापयुक्त शब्द न वापरता) जे इतरांशी प्रिय बोलणे आहे, तेच बोलावे. ‘‘සච්චං [Pg.191] වෙ අමතා වාචා, එස ධම්මො සනන්තනො; සච්චෙ අත්ථෙ ච ධම්මෙ ච, ආහු සන්තො පතිට්ඨිතා. “सत्य हीच खरोखर अमृतवाणी आहे, हा सनातन नियम (धम्म) आहे. सज्जन लोक सत्यावर, कल्याणावर (अर्थावर) आणि धम्मावर प्रतिष्ठित असतात, असे म्हणतात. ‘‘යං බුද්ධො භාසතෙ වාචං, ඛෙමං නිබ්බානපත්තියා; දුක්ඛස්සන්තකිරියාය, සා වෙ වාචානමුත්තමා’’ති. “बुद्ध जी वाणी बोलतात, जी निर्वाण प्राप्तीसाठी आणि दुःखाचा अंत करण्यासाठी कल्याणकारी (क्षेम) आहे, तीच वाणी खरोखर सर्व वाणींमध्ये उत्तम आहे.” 6. සාරිපුත්තසුත්තං ६. सारिपुत्त सुत्त 214. එකං සමයං ආයස්මා සාරිපුත්තො සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන ආයස්මා සාරිපුත්තො භික්ඛූ ධම්මියා කථාය සන්දස්සෙති සමාදපෙති සමුත්තෙජෙති සම්පහංසෙති පොරියා වාචාය විස්සට්ඨාය අනෙලගලාය අත්ථස්ස විඤ්ඤාපනියා. තෙ ච භික්ඛූ අට්ඨිං කත්වා මනසි කත්වා සබ්බචෙතසා සමන්නාහරිත්වා ඔහිතසොතා ධම්මං සුණන්ති. අථ ඛො ආයස්මතො වඞ්ගීසස්ස එතදහොසි – ‘‘අයං ඛො ආයස්මා සාරිපුත්තො භික්ඛූ ධම්මියා කථාය සන්දස්සෙති සමාදපෙති සමුත්තෙජෙති සම්පහංසෙති පොරියා වාචාය විස්සට්ඨාය අනෙලගලාය අත්ථස්ස විඤ්ඤාපනියා. තෙ ච භික්ඛූ අට්ඨිං කත්වා මනසි කත්වා සබ්බචෙතසා සමන්නාහරිත්වා ඔහිතසොතා ධම්මං සුණන්ති. යංනූනාහං ආයස්මන්තං සාරිපුත්තං සම්මුඛා සාරුප්පාහි ගාථාහි අභිත්ථවෙය්ය’’න්ති. २१४. एका वेळी आयुष्यमान सारिपुत्त श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. त्या वेळी आयुष्यमान सारिपुत्त भिक्षूंना धम्मचर्चेद्वारे उपदेश करत होते, त्यांना धम्मात प्रवृत्त करत होते, त्यांना उत्साहित करत होते आणि आनंदित करत होते. त्यांचे बोलणे सुसंस्कृत, स्पष्ट, अस्खलित, दोषरहित आणि अर्थ समजण्यास सुलभ असे होते. आणि ते भिक्षू देखील आदरपूर्वक, मन लावून, संपूर्ण चित्त एकाग्र करून, कान देऊन धम्म ऐकत होते. तेव्हा आयुष्यमान वंगीश यांच्या मनात असा विचार आला – “हे आयुष्यमान सारिपुत्त भिक्षूंना धम्मचर्चेद्वारे उपदेश करत आहेत, प्रवृत्त करत आहेत, उत्साहित करत आहेत आणि आनंदित करत आहेत. त्यांचे बोलणे सुसंस्कृत, स्पष्ट, अस्खलित, दोषरहित आणि अर्थ समजण्यास सुलभ आहे. आणि ते भिक्षू देखील आदरपूर्वक, मन लावून, संपूर्ण चित्त एकाग्र करून, कान देऊन धम्म ऐकत आहेत. मग मी आयुष्यमान सारिपुत्त यांच्या समोर त्यांच्या योग्य अशा गाथांनी त्यांची स्तुती का करू नये?” අථ ඛො ආයස්මා වඞ්ගීසො උට්ඨායාසනා එකංසං උත්තරාසඞ්ගං කරිත්වා යෙනායස්මා සාරිපුත්තො තෙනඤ්ජලිං පණාමෙත්වා ආයස්මන්තං සාරිපුත්තං එතදවොච – ‘‘පටිභාති මං, ආවුසො සාරිපුත්ත, පටිභාති මං, ආවුසො සාරිපුත්තා’’ති. ‘‘පටිභාතු තං, ආවුසො වඞ්ගීසා’’ති. අථ ඛො ආයස්මා වඞ්ගීසො ආයස්මන්තං සාරිපුත්තං සම්මුඛා සාරුප්පාහි ගාථාහි අභිත්ථවි – तेव्हा आयुष्यमान वंगीश आसनावरून उठले, आपले उत्तरासंग एका खांद्यावर केले आणि आयुष्यमान सारिपुत्त यांच्या दिशेने हात जोडून नमस्कार करत आयुष्यमान सारिपुत्त यांना म्हणाले – “हे मित्र सारिपुत्त, मला काही सुचत आहे! हे मित्र सारिपुत्त, मला काही सुचत आहे!” “हे मित्र वंगीश, तुला जे सुचत आहे ते व्यक्त कर.” तेव्हा आयुष्यमान वंगीश यांनी आयुष्यमान सारिपुत्त यांच्या समोर त्यांच्या योग्य अशा गाथांनी त्यांची स्तुती केली – ‘‘ගම්භීරපඤ්ඤො මෙධාවී, මග්ගාමග්ගස්ස කොවිදො; සාරිපුත්තො මහාපඤ්ඤො, ධම්මං දෙසෙති භික්ඛුනං. “गंभीर प्रज्ञा असलेले, बुद्धिमान, मार्ग आणि अमार्ग जाणण्यात कुशल, महाप्रज्ञावान सारिपुत्त भिक्षूंना धम्माचा उपदेश करत आहेत. ‘‘සංඛිත්තෙනපි දෙසෙති, විත්ථාරෙනපි භාසති; සාළිකායිව නිග්ඝොසො, පටිභානං උදීරයි. “ते संक्षेपानेही उपदेश करतात आणि विस्तारानेही बोलतात; मैना पक्ष्यासारखा मधुर आवाज असलेले ते आपल्या प्रतिभेला (ज्ञानाला) प्रवाही करतात. ‘‘තස්ස [Pg.192] තං දෙසයන්තස්ස, සුණන්ති මධුරං ගිරං; සරෙන රජනීයෙන, සවනීයෙන වග්ගුනා; උදග්ගචිත්තා මුදිතා, සොතං ඔධෙන්ති භික්ඛවො’’ති. “ते उपदेश करत असताना, भिक्षू त्यांची मधुर वाणी ऐकतात; त्यांच्या त्या मनमोहक, ऐकण्यास सुखद आणि सुश्राव्य आवाजाने भिक्षू प्रसन्नचित्त व आनंदित होऊन कान देऊन ऐकतात.” 7. පවාරණාසුත්තං ७. पवारणा सुत्त 215. එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති පුබ්බාරාමෙ මිගාරමාතුපාසාදෙ මහතා භික්ඛුසඞ්ඝෙන සද්ධිං පඤ්චමත්තෙහි භික්ඛුසතෙහි සබ්බෙහෙව අරහන්තෙහි. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා තදහුපොසථෙ පන්නරසෙ පවාරණාය භික්ඛුසඞ්ඝපරිවුතො අබ්භොකාසෙ නිසින්නො හොති. අථ ඛො භගවා තුණ්හීභූතං භික්ඛුසඞ්ඝං අනුවිලොකෙත්වා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘හන්ද දානි, භික්ඛවෙ, පවාරෙමි වො. න ච මෙ කිඤ්චි ගරහථ කායිකං වා වාචසිකං වා’’ති. २१५. एका वेळी भगवंत श्रावस्तीमध्ये पूर्वाराम येथील मृगारमातेच्या प्रासादात (मिगारमातुपासाद) पाचशे भिक्षूंच्या मोठ्या भिक्षुसंघासोबत विहार करत होते, जे सर्वच्या सर्व अर्हत होते. त्या वेळी भगवंत पंधराव्या (पौर्णिमेच्या) उपोसथ दिवशी पवारेसाठी (पवारणा विधीसाठी) भिक्षुसंघाने वेढलेले असून उघड्या जागेवर बसले होते. तेव्हा भगवंतांनी शांत बसलेल्या भिक्षुसंघाकडे निरखून पाहिले आणि भिक्षूंना संबोधित केले – “भिक्षूंनो, आता मी तुम्हाला आमंत्रित (पवारणा) करतो. माझ्या शारीरिक किंवा वाचिक अशा कोणत्याही कृत्यात तुम्हाला काही दोष आढळतो का?” එවං වුත්තෙ, ආයස්මා සාරිපුත්තො උට්ඨායාසනා එකංසං උත්තරාසඞ්ගං කරිත්වා යෙන භගවා තෙනඤ්ජලිං පණාමෙත්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘න ඛො මයං, භන්තෙ, භගවතො කිඤ්චි ගරහාම කායිකං වා වාචසිකං වා. භගවා හි, භන්තෙ, අනුප්පන්නස්ස මග්ගස්ස උප්පාදෙතා, අසඤ්ජාතස්ස මග්ගස්ස සඤ්ජනෙතා, අනක්ඛාතස්ස මග්ගස්ස අක්ඛාතා, මග්ගඤ්ඤූ මග්ගවිදූ මග්ගකොවිදො. මග්ගානුගා ච, භන්තෙ, එතරහි සාවකා විහරන්ති පච්ඡා සමන්නාගතා; අහඤ්ච ඛො, භන්තෙ, භගවන්තං පවාරෙමි. න ච මෙ භගවා කිඤ්චි ගරහති කායිකං වා වාචසිකං වා’’ති. असे म्हटले असता, आयुष्यमान सारिपुत्त आपल्या आसनावरून उठले, एका खांद्यावर उत्तरासंग (उपरणे) परिधान करून, जेथे भगवान होते त्या दिशेने हात जोडून नमस्कार करत भगवंतांना असे म्हणाले – “भंते, आम्ही भगवंतांच्या कोणत्याही कायिक किंवा वाचिक कर्माची निंदा करत नाही. कारण, भंते, भगवान हे अनुत्पन्न मार्गाचे उत्पादक आहेत, न समजलेल्या मार्गाचे आकलन करून देणारे आहेत, न सांगितलेल्या मार्गाचे प्रख्यापक आहेत, ते मार्ग जाणणारे, मार्गविद् आणि मार्गकोविद आहेत. आणि भंते, आता त्यांचे श्रावक त्या मार्गाचे अनुसरण करत विहरत आहेत आणि नंतर त्यात प्रतिष्ठित झाले आहेत. आणि भंते, मी सुद्धा भगवंतांना निमंत्रित (पवारणा) करतो: भगवंतांना माझ्या कोणत्याही कायिक किंवा वाचिक कर्मामध्ये काही निंदनीय आढळले आहे का?” ‘‘න ඛ්වාහං තෙ, සාරිපුත්ත, කිඤ්චි ගරහාමි කායිකං වා වාචසිකං වා. පණ්ඩිතො ත්වං, සාරිපුත්ත, මහාපඤ්ඤො ත්වං, සාරිපුත්ත, පුථුපඤ්ඤො ත්වං, සාරිපුත්ත, හාසපඤ්ඤො ත්වං, සාරිපුත්ත, ජවනපඤ්ඤො ත්වං, සාරිපුත්ත, තික්ඛපඤ්ඤො ත්වං, සාරිපුත්ත, නිබ්බෙධිකපඤ්ඤො ත්වං, සාරිපුත්ත. සෙය්යථාපි, සාරිපුත්ත, රඤ්ඤො චක්කවත්තිස්ස ජෙට්ඨපුත්තො පිතරා පවත්තිතං චක්කං සම්මදෙව අනුප්පවත්තෙති; එවමෙව ඛො ත්වං, සාරිපුත්ත, මයා අනුත්තරං ධම්මචක්කං පවත්තිතං සම්මදෙව අනුප්පවත්තෙසී’’ති. “सारिपुत्ता, मी तुझ्या कोणत्याही कायिक किंवा वाचिक कर्माची निंदा करत नाही. सारिपुत्ता, तू पंडित आहेस; सारिपुत्ता, तू महाप्रज्ञ आहेस; सारिपुत्ता, तू पृथुप्रज्ञ आहेस; सारिपुत्ता, तू हासप्रज्ञ आहेस; सारिपुत्ता, तू जवनप्रज्ञ आहेस; सारिपुत्ता, तू तीक्ष्णप्रज्ञ आहेस; सारिपुत्ता, तू निर्वेधिकप्रज्ञ आहेस. सारिपुत्ता, ज्याप्रमाणे चक्रवर्ती राजाचा ज्येष्ठ पुत्र आपल्या पित्याने फिरवलेले चक्र योग्य प्रकारे अनुवर्तित करतो; त्याचप्रमाणे, सारिपुत्ता, तू माझ्याद्वारे प्रवर्तित केलेले हे अनुत्तर धम्मचक्र योग्य प्रकारे अनुवर्तित करतोस.” ‘‘නො චෙ කිර මෙ, භන්තෙ, භගවා කිඤ්චි ගරහති කායිකං වා වාචසිකං වා. ඉමෙසං පන, භන්තෙ, භගවා පඤ්චන්නං භික්ඛුසතානං න කිඤ්චි ගරහති කායිකං වා වාචසිකං වා’’ති. ‘‘ඉමෙසම්පි ඛ්වාහං, සාරිපුත්ත, පඤ්චන්නං භික්ඛුසතානං න [Pg.193] කිඤ්චි ගරහාමි කායිකං වා වාචසිකං වා. ඉමෙසඤ්හි, සාරිපුත්ත, පඤ්චන්නං භික්ඛුසතානං සට්ඨි භික්ඛූ තෙවිජ්ජා, සට්ඨි භික්ඛූ ඡළභිඤ්ඤා, සට්ඨි භික්ඛූ උභතොභාගවිමුත්තා, අථ ඉතරෙ පඤ්ඤාවිමුත්තා’’ති. “भंते, जर भगवंतांना माझ्या कोणत्याही कायिक किंवा वाचिक कर्मामध्ये काही निंदनीय आढळले नसेल, तर भंते, भगवान या पाचशे भिक्खूंच्या कोणत्याही कायिक किंवा वाचिक कर्माची निंदा करतात का?” “सारिपुत्ता, मी या पाचशे भिक्खूंच्याही कोणत्याही कायिक किंवा वाचिक कर्माची निंदा करत नाही. कारण, सारिपुत्ता, या पाचशे भिक्खूंपैकी साठ भिक्खू त्रिविद्य (तेविज्जा) आहेत, साठ भिक्खू षडभिज्ञ (सहा अभिज्ञा प्राप्त) आहेत, साठ भिक्खू उभतोभागविमुक्त आहेत, आणि उर्वरित प्रज्ञाविमुक्त आहेत.” අථ ඛො ආයස්මා වඞ්ගීසො උට්ඨායාසනා එකංසං උත්තරාසඞ්ගං කරිත්වා යෙන භගවා තෙනඤ්ජලිං පණාමෙත්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘පටිභාති මං භගවා, පටිභාති මං සුගතා’’ති. ‘‘පටිභාතු තං, වඞ්ගීසා’’ති භගවා අවොච. අථ ඛො ආයස්මා වඞ්ගීසො භගවන්තං සම්මුඛා සාරුප්පාහි ගාථාහි අභිත්ථවි – तेव्हा आयुष्यमान वंगीस आपल्या आसनावरून उठले, एका खांद्यावर उत्तरासंग परिधान करून, जेथे भगवान होते त्या दिशेने हात जोडून नमस्कार करत भगवंतांना असे म्हणाले – “भगवंत मला स्फुरत आहेत, सुगत मला स्फुरत आहेत!” भगवंतांनी म्हटले, “वंगीसा, तुला स्फुरो.” तेव्हा आयुष्यमान वंगीसांनी भगवंतांच्या समोर योग्य अशा गाथांनी त्यांची स्तुती केली – ‘‘අජ්ජ පන්නරසෙ විසුද්ධියා, භික්ඛූ පඤ්චසතා සමාගතා; සංයොජනබන්ධනච්ඡිදා, අනීඝා ඛීණපුනබ්භවා ඉසී. “आज पंधराव्या दिवशी (पौर्णिमेच्या उपोसथ दिवशी) शुद्धीसाठी पाचशे भिक्खू एकत्र आले आहेत; जे संयोजनांचे आणि बंधनांचे उच्छेदन करणारे, दुःखरहित, पुनर्जन्म नष्ट केलेले ऋषी आहेत. ‘‘චක්කවත්තී යථා රාජා, අමච්චපරිවාරිතො; සමන්තා අනුපරියෙති, සාගරන්තං මහිං ඉමං. “ज्याप्रमाणे चक्रवर्ती राजा, आपल्या अमात्यांनी वेढलेला असून, महासागरापर्यंत पसरलेल्या या संपूर्ण पृथ्वीभोवती फिरतो, ‘‘එවං විජිතසඞ්ගාමං, සත්ථවාහං අනුත්තරං; සාවකා පයිරුපාසන්ති, තෙවිජ්ජා මච්චුහායිනො. “त्याचप्रमाणे, संग्राम जिंकलेल्या, अनुत्तर सार्थवाह अशा भगवंतांची, त्रिविद्य आणि मृत्यूला जिंकणारे श्रावक सेवा करत आहेत. ‘‘සබ්බෙ භගවතො පුත්තා, පලාපෙත්ථ න විජ්ජති; තණ්හාසල්ලස්ස හන්තාරං, වන්දෙ ආදිච්චබන්ධුන’’න්ති. “हे सर्व भगवंतांचे पुत्र आहेत, यांच्यात कोणताही निरुपयोगी भुसा नाही. तृष्णा-शल्याचा नाश करणाऱ्या, आदित्यबंधू भगवंतांना मी वंदन करतो.” 8. පරොසහස්සසුත්තං ८. परोसहस्स सुत्त 216. එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ මහතා භික්ඛුසඞ්ඝෙන සද්ධිං අඩ්ඪතෙලසෙහි භික්ඛුසතෙහි. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා භික්ඛූ නිබ්බානපටිසංයුත්තාය ධම්මියා කථාය සන්දස්සෙති සමාදපෙති සමුත්තෙජෙති සම්පහංසෙති. තෙ ච භික්ඛූ අට්ඨිං කත්වා මනසි කත්වා සබ්බචෙතසා සමන්නාහරිත්වා ඔහිතසොතා ධම්මං සුණන්ති. අථ ඛො ආයස්මතො වඞ්ගීසස්ස එතදහොසි – ‘‘අයං ඛො භගවා භික්ඛූ නිබ්බානපටිසංයුත්තාය ධම්මියා කථාය සන්දස්සෙති සමාදපෙති සමුත්තෙජෙති සම්පහංසෙති. තෙ ච භික්ඛූ අට්ඨිං කත්වා මනසි කත්වා සබ්බචෙතසා සමන්නාහරිත්වා ඔහිතසොතා ධම්මං සුණන්ති. යංනූනාහං භගවන්තං සම්මුඛා සාරුප්පාහි ගාථාහි අභිත්ථවෙය්ය’’න්ති. २१६. एकदा भगवान श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात साडेबाराशे (१२५०) भिक्खूंच्या मोठ्या भिक्खू संघासह विहरत होते. त्या वेळी भगवान भिक्खूंना निर्वाणाशी संबंधित धम्मचर्चेने उपदेश करत होते, त्यांना धम्मात समाविष्ट करत होते, त्यांना उत्साहित करत होते आणि आनंदित करत होते. आणि ते भिक्खूही आदरपूर्वक, मन लावून, संपूर्ण चित्ताने एकाग्र होऊन, कान देऊन धम्म ऐकत होते. तेव्हा आयुष्यमान वंगीसांच्या मनात असा विचार आला – “हे भगवान भिक्खूंना निर्वाणाशी संबंधित धम्मचर्चेने उपदेश करत आहेत, त्यांना धम्मात समाविष्ट करत आहेत, त्यांना उत्साहित करत आहेत आणि आनंदित करत आहेत. आणि ते भिक्खूही आदरपूर्वक, मन लावून, संपूर्ण चित्ताने एकाग्र होऊन, कान देऊन धम्म ऐकत आहेत. मग मी भगवंतांच्या समोर योग्य अशा गाथांनी त्यांची स्तुती का करू नये?” අථ [Pg.194] ඛො ආයස්මා වඞ්ගීසො උට්ඨායාසනා එකංසං උත්තරාසඞ්ගං කරිත්වා යෙන භගවා තෙනඤ්ජලිං පණාමෙත්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘පටිභාති මං භගවා, පටිභාති මං සුගතා’’ති. ‘‘පටිභාතු තං, වඞ්ගීසා’’ති භගවා අවොච. අථ ඛො ආයස්මා වඞ්ගීසො භගවන්තං සම්මුඛා සාරුප්පාහි ගාථාහි අභිත්ථවි – तेव्हा आयुष्यमान वंगीस आपल्या आसनावरून उठले, एका खांद्यावर उत्तरासंग परिधान करून, जेथे भगवान होते त्या दिशेने हात जोडून नमस्कार करत भगवंतांना असे म्हणाले – “भगवंत मला स्फुरत आहेत, सुगत मला स्फुरत आहेत!” भगवंतांनी म्हटले, “वंगीसा, तुला स्फुरो.” तेव्हा आयुष्यमान वंगीसांनी भगवंतांच्या समोर योग्य अशा गाथांनी त्यांची स्तुती केली – ‘‘පරොසහස්සං භික්ඛූනං, සුගතං පයිරුපාසති; දෙසෙන්තං විරජං ධම්මං, නිබ්බානං අකුතොභයං. “एक हजाराहून अधिक भिक्खू सुगतांच्या सेवेत उपस्थित आहेत, जे निष्कलंक धम्माचा आणि निर्भय अशा निर्वाणाचा उपदेश करत आहेत. ‘‘සුණන්ති ධම්මං විමලං, සම්මාසම්බුද්ධදෙසිතං; සොභති වත සම්බුද්ධො, භික්ඛුසඞ්ඝපුරක්ඛතො. “ते सम्यक्संबुद्धांनी उपदेशिलेला विमल धम्म ऐकत आहेत. भिक्खू संघाच्या मध्यभागी सुशोभित असणारे सम्यक्संबुद्ध खरोखरच अत्यंत शोभून दिसत आहेत! ‘‘නාගනාමොසි භගවා, ඉසීනං ඉසිසත්තමො; මහාමෙඝොව හුත්වාන, සාවකෙ අභිවස්සති. “भगवंत, आपले नाव ‘नाग’ आहे, आपण ऋषींमधील सातवे ऋषी आहात. महामेघाप्रमाणे होऊन आपण आपल्या श्रावकांवर वर्षाव करत आहात. ‘‘දිවාවිහාරා නික්ඛම්ම, සත්ථුදස්සනකම්යතා ; සාවකො තෙ මහාවීර, පාදෙ වන්දති වඞ්ගීසො’’ති. “दिवसाच्या विहारातून बाहेर पडून, शास्त्यांच्या दर्शनाच्या इच्छेने, हे महावीरा, आपला श्रावक वंगीस आपल्या चरणांना वंदन करत आहे.” ‘‘කිං නු තෙ, වඞ්ගීස, ඉමා ගාථායො පුබ්බෙ පරිවිතක්කිතා, උදාහු ඨානසොව තං පටිභන්තී’’ති? ‘න ඛො මෙ, භන්තෙ, ඉමා ගාථායො පුබ්බෙ පරිවිතක්කිතා, අථ ඛො ඨානසොව මං පටිභන්තී’ති. ‘තෙන හි තං, වඞ්ගීස, භිය්යොසොමත්තාය පුබ්බෙ අපරිවිතක්කිතා ගාථායො පටිභන්තූ’ති. ‘එවං, භන්තෙ’ති ඛො ආයස්මා වඞ්ගීසො භගවතො පටිස්සුත්වා භිය්යොසොමත්තාය භගවන්තං පුබ්බෙ අපරිවිතක්කිතාහි ගාථාහි අභිත්ථවි – “वंगीसा, या गाथा तू आधीच रचून ठेवल्या होत्या की तुला त्या याच क्षणी स्फुरल्या आहेत?” ‘भंते, या गाथा मी आधी रचून ठेवल्या नव्हत्या, तर मला त्या याच क्षणी स्फुरल्या आहेत.’ ‘तसे असेल तर, वंगीसा, तुला आधी न रचलेल्या आणखीही गाथा अधिक प्रमाणात स्फुरोत.’ ‘होय, भंते,’ असे म्हणून आयुष्यमान वंगीसांनी भगवंतांच्या शब्दांचे स्वागत केले आणि आधी न रचलेल्या गाथांनी भगवंतांची अधिक प्रमाणात स्तुती केली – ‘‘උම්මග්ගපථං මාරස්ස අභිභුය්ය, චරති පභිජ්ජ ඛිලානි; තං පස්සථ බන්ධපමුඤ්චකරං, අසිතං භාගසො පවිභජං. “माराच्या कुमार्गावर विजय मिळवून, मनातील अडथळे मोडून टाकून जे विहरत आहेत; त्या बंधनातून मुक्त करणाऱ्या, अनासक्त आणि धम्माचे योग्य प्रकारे विभाजन करून उपदेश करणाऱ्या भगवंतांना पहा. ‘‘ඔඝස්ස නිත්ථරණත්ථං, අනෙකවිහිතං මග්ගං අක්ඛාසි; තස්මිඤ්චෙ අමතෙ අක්ඛාතෙ, ධම්මද්දසා ඨිතා අසංහීරා. “चार ओघांमधून पार होण्यासाठी त्यांनी अनेक प्रकारचा मार्ग सांगितला आहे; त्या अमृत मार्गाचा उपदेश केला असता, धम्म पाहणारे त्यात अचल आणि अविचल होऊन प्रतिष्ठित झाले आहेत. ‘‘පජ්ජොතකරො අතිවිජ්ඣ, සබ්බට්ඨිතීනං අතික්කමමද්දස; ඤත්වා ච සච්ඡිකත්වා ච, අග්ගං සො දෙසයි දසද්ධානං. “ज्ञानप्रकाश पसरवणाऱ्या भगवंतांनी सर्व प्रकारच्या दृष्टींच्या स्थानांना भेदून, संसारचक्राच्या पलीकडचे निर्वाण पाहिले; ते स्वतः जाणून आणि साक्षात्कृत करून, त्यांनी पाच जणांना त्या श्रेष्ठ धम्माचा उपदेश केला. ‘‘එවං [Pg.195] සුදෙසිතෙ ධම්මෙ,කො පමාදො විජානතං ධම්මං ; තස්මා හි තස්ස භගවතො සාසනෙ; අප්පමත්තො සදා නමස්සමනුසික්ඛෙ’’ති. “अशा प्रकारे धम्माचा उत्तम उपदेश केला असता, धम्म जाणणाऱ्यांना कोणता बरं प्रमाद असू शकतो? म्हणूनच, त्या भगवंतांच्या शासनात नेहमी अप्रमत्त राहून, वंदन करत धम्माचे आचरण करावे.” 9. කොණ්ඩඤ්ඤසුත්තං ९. कोंडण्य सुत्त 217. එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. අථ ඛො ආයස්මා අඤ්ඤාසිකොණ්ඩඤ්ඤො සුචිරස්සෙව යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතො පාදෙසු සිරසා නිපතිත්වා භගවතො පාදානි මුඛෙන ච පරිචුම්බති, පාණීහි ච පරිසම්බාහති, නාමඤ්ච සාවෙති – ‘‘කොණ්ඩඤ්ඤොහං, භගවා, කොණ්ඩඤ්ඤොහං, සුගතා’’ති. අථ ඛො ආයස්මතො වඞ්ගීසස්ස එතදහොසි – ‘‘අයං ඛො ආයස්මා අඤ්ඤාසිකොණ්ඩඤ්ඤො සුචිරස්සෙව යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතො පාදෙසු සිරසා නිපතිත්වා භගවතො පාදානි මුඛෙන ච පරිචුම්බති, පාණීහි ච පරිසම්බාහති, නාමඤ්ච සාවෙති – ‘කොණ්ඩඤ්ඤොහං, භගවා, කොණ්ඩඤ්ඤොහං, සුගතා’ති. යංනූනාහං ආයස්මන්තං අඤ්ඤාසිකොණ්ඩඤ්ඤං භගවතො සම්මුඛා සාරුප්පාහි ගාථාහි අභිත්ථවෙය්ය’’න්ති. २१७. एकदा भगवान राजगृह येथे वेळुवनातील कलंदकनिवाप येथे विहार करत होते. तेव्हा आयुष्यमान अज्ञासिकोंडण्य बऱ्याच दीर्घ काळानंतर जेथे भगवान होते तेथे आले; आल्यानंतर त्यांनी भगवंतांच्या चरणांवर आपले मस्तक टेकवून वंदन केले, भगवंतांच्या चरणांचे मुखाने चुंबन घेतले, हातांनी त्यांना कुरवाळले आणि आपले नाव सांगू लागले – “भगवंत, मी कोंडण्य आहे! सुगत, मी कोंडण्य आहे!” तेव्हा आयुष्यमान वंगिसांच्या मनात असा विचार आला – “हे आयुष्यमान अज्ञासिकोंडण्य बऱ्याच दीर्घ काळानंतर जेथे भगवान आहेत तेथे आले आहेत; आल्यानंतर त्यांनी भगवंतांच्या चरणांवर आपले मस्तक टेकवून वंदन केले, भगवंतांच्या चरणांचे मुखाने चुंबन घेतले, हातांनी त्यांना कुरवाळले आणि आपले नाव सांगू लागले – ‘भगवंत, मी कोंडण्य आहे! सुगत, मी कोंडण्य आहे!’ तर मग मी भगवंतांच्या समक्ष आयुष्यमान अज्ञासिकोंडण्यांची योग्य गाथांनी स्तुती करावी.” අථ ඛො ආයස්මා වඞ්ගීසො උට්ඨායාසනා එකංසං උත්තරාසඞ්ගං කරිත්වා යෙන භගවා තෙනඤ්ජලිං පණාමෙත්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘පටිභාති මං, භගවා, පටිභාති මං, සුගතා’’ති. ‘‘පටිභාතු තං, වඞ්ගීසා’’ති භගවා අවොච. අථ ඛො ආයස්මා වඞ්ගීසො ආයස්මන්තං අඤ්ඤාසිකොණ්ඩඤ්ඤං භගවතො සම්මුඛා සාරුප්පාහි ගාථාහි අභිත්ථවි – त्यानंतर आयुष्यमान वंगिस आपल्या आसनावरून उठले, एका खांद्यावर उत्तरासंग परिधान करून जेथे भगवान होते त्या दिशेने हात जोडून नमस्कार करत भगवंतांना म्हणाले – “भगवंत, मला स्फुरत आहे! सुगत, मला स्फुरत आहे!” भगवान म्हणाले – “वंगिस, तुला स्फुरू दे.” त्यानंतर आयुष्यमान वंगिसांनी भगवंतांच्या समक्ष आयुष्यमान अज्ञासिकोंडण्यांची योग्य गाथांनी स्तुती केली – ‘‘බුද්ධානුබුද්ධො සො ථෙරො, කොණ්ඩඤ්ඤො තිබ්බනික්කමො; ලාභී සුඛවිහාරානං, විවෙකානං අභිණ්හසො. “बुद्धांच्या मागोमाग सत्य जाणणारे, तीव्र प्रयत्नशील ते स्थवीर कोंडण्य आहेत; जे सुखविहारांचे आणि वारंवार एकांतवासाचे लाभ घेणारे आहेत. ‘‘යං සාවකෙන පත්තබ්බං, සත්ථුසාසනකාරිනා; සබ්බස්ස තං අනුප්පත්තං, අප්පමත්තස්ස සික්ඛතො. “शास्त्यांच्या शासनाचे पालन करणाऱ्या अप्रमत्तपणे साधना करणाऱ्या श्रावकाने जे काही प्राप्त करायचे असते, ते सर्व त्यांनी प्राप्त केले आहे. ‘‘මහානුභාවො තෙවිජ්ජො, චෙතොපරියායකොවිදො; කොණ්ඩඤ්ඤො බුද්ධදායාදො, පාදෙ වන්දති සත්ථුනො’’ති. “महानुभाव, त्रैविद्य, परचित्तज्ञानकुशल आणि बुद्धांचे खरे वारसदार असलेले कोंडण्य शास्त्यांच्या चरणांना वंदन करत आहेत.” 10. මොග්ගල්ලානසුත්තං १०. मोग्गल्लानसुत्त 218. එකං [Pg.196] සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති ඉසිගිලිපස්සෙ කාළසිලායං මහතා භික්ඛුසඞ්ඝෙන සද්ධිං පඤ්චමත්තෙහි භික්ඛුසතෙහි සබ්බෙහෙව අරහන්තෙහි. තෙසං සුදං ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො චෙතසා චිත්තං සමන්නෙසති විප්පමුත්තං නිරුපධිං. අථ ඛො ආයස්මතො වඞ්ගීසස්ස එතදහොසි – ‘‘අයං ඛො භගවා රාජගහෙ විහරති ඉසිගිලිපස්සෙ කාළසිලායං මහතා භික්ඛුසඞ්ඝෙන සද්ධිං පඤ්චමත්තෙහි භික්ඛුසතෙහි සබ්බෙහෙව අරහන්තෙහි. තෙසං සුදං ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො චෙතසා චිත්තං සමන්නෙසති විප්පමුත්තං නිරුපධිං. යංනූනාහං ආයස්මන්තං මහාමොග්ගල්ලානං භගවතො සම්මුඛා සාරුප්පාහි ගාථාහි අභිත්ථවෙය්ය’’න්ති. २१८. एकदा भगवान राजगृह येथे इसिगिली पर्वताच्या कुशीत काळशिला येथे पाचशे भिक्खूंच्या मोठ्या भिक्खूसंघासोबत विहार करत होते, जे सर्वच्या सर्व अर्हत होते. तेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान आपल्या चित्ताने त्यांच्या क्लेशमुक्त आणि उपाधिरहित चित्ताचे निरीक्षण करत होते. तेव्हा आयुष्यमान वंगिसांच्या मनात असा विचार आला – “हे भगवान राजगृह येथे इसिगिली पर्वताच्या कुशीत काळशिला येथे पाचशे भिक्खूंच्या मोठ्या भिक्खूसंघासोबत विहार करत आहेत, जे सर्वच्या सर्व अर्हत आहेत. तेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान आपल्या चित्ताने त्यांच्या क्लेशमुक्त आणि उपाधिरहित चित्ताचे निरीक्षण करत आहेत. तर मग मी भगवंतांच्या समक्ष आयुष्यमान महामोग्गल्लानांची योग्य गाथांनी स्तुती करावी.” අථ ඛො ආයස්මා වඞ්ගීසො උට්ඨායාසනා එකංසං උත්තරාසඞ්ගං කරිත්වා යෙන භගවා තෙනඤ්ජලිං පණාමෙත්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘පටිභාති මං, භගවා, පටිභාති මං, සුගතා’’ති. ‘‘පටිභාතු තං, වඞ්ගීසා’’ති භගවා අවොච. අථ ඛො ආයස්මා වඞ්ගීසො ආයස්මන්තං මහාමොග්ගල්ලානං භගවතො සම්මුඛා සාරුප්පාහි ගාථාහි අභිත්ථවි – त्यानंतर आयुष्यमान वंगिस आपल्या आसनावरून उठले, एका खांद्यावर उत्तरासंग परिधान करून जेथे भगवान होते त्या दिशेने हात जोडून नमस्कार करत भगवंतांना म्हणाले – “भगवंत, मला स्फुरत आहे! सुगत, मला स्फुरत आहे!” भगवान म्हणाले – “वंगिस, तुला स्फुरू दे.” त्यानंतर आयुष्यमान वंगिसांनी भगवंतांच्या समक्ष आयुष्यमान महामोग्गल्लानांची योग्य गाथांनी स्तुती केली – ‘‘නගස්ස පස්සෙ ආසීනං, මුනිං දුක්ඛස්ස පාරගුං; සාවකා පයිරුපාසන්ති, තෙවිජ්ජා මච්චුහායිනො. “पर्वताच्या कुशीत बसलेल्या, दुःखाच्या पार गेलेल्या मुनींची, मृत्यूवर विजय मिळवणारे त्रैविद्य श्रावक सेवा-उपासना करत आहेत. ‘‘තෙ චෙතසා අනුපරියෙති, මොග්ගල්ලානො මහිද්ධිකො; චිත්තං නෙසං සමන්නෙසං, විප්පමුත්තං නිරූපධිං. “महान ऋद्धीवान मोग्गल्लान आपल्या चित्ताने त्यांच्या चित्ताचे निरीक्षण करत आहेत आणि त्यांचे क्लेशमुक्त व उपाधिरहित चित्त जाणून घेत आहेत. ‘‘එවං සබ්බඞ්ගසම්පන්නං, මුනිං දුක්ඛස්ස පාරගුං; අනෙකාකාරසම්පන්නං, පයිරුපාසන්ති ගොතම’’න්ති. “अशा प्रकारे सर्व गुणांनी संपन्न, दुःखाच्या पार गेलेल्या, अनेक कल्याणकारी गुणांनी युक्त अशा गौतम मुनींची श्रावक सेवा-उपासना करत आहेत.” 11. ගග්ගරාසුත්තං ११. गग्गरासुत्त 219. එකං සමයං භගවා චම්පායං විහරති ගග්ගරාය පොක්ඛරණියා තීරෙ මහතා භික්ඛුසඞ්ඝෙන සද්ධිං පඤ්චමත්තෙහි භික්ඛුසතෙහි සත්තහි ච උපාසකසතෙහි සත්තහි ච උපාසිකාසතෙහි අනෙකෙහි ච දෙවතාසහස්සෙහි. ත්යාස්සුදං භගවා අතිරොචති වණ්ණෙන චෙව යසසා ච. අථ ඛො ආයස්මතො වඞ්ගීසස්ස එතදහොසි – ‘‘අයං ඛො [Pg.197] භගවා චම්පායං විහරති ගග්ගරාය පොක්ඛරණියා තීරෙ මහතා භික්ඛුසඞ්ඝෙන සද්ධිං පඤ්චමත්තෙහි භික්ඛුසතෙහි සත්තහි ච උපාසකසතෙහි සත්තහි ච උපාසිකාසතෙහි අනෙකෙහි ච දෙවතාසහස්සෙහි. ත්යාස්සුදං භගවා අතිරොචති වණ්ණෙන චෙව යසසා ච. යංනූනාහං භගවන්තං සම්මුඛා සාරුප්පාය ගාථාය අභිත්ථවෙය්ය’’න්ති. २१९. एकदा भगवान चंपा नगरीत गग्गरा पुष्करणीच्या तीरावर पाचशे भिक्खूंच्या मोठ्या भिक्खूसंघासोबत, सातशे उपासक, सातशे उपासिका आणि अनेक हजार देवतांसोबत विहार करत होते. तेथे भगवान आपल्या वर्णाने आणि यशाने अत्यंत शोभून दिसत होते. तेव्हा आयुष्यमान वंगिसांच्या मनात असा विचार आला – “हे भगवान चंपा नगरीत गग्गरा पुष्करणीच्या तीरावर पाचशे भिक्खूंच्या मोठ्या भिक्खूसंघासोबत, सातशे उपासक, सातशे उपासिका आणि अनेक हजार देवतांसोबत विहार करत आहेत. तेथे भगवान आपल्या वर्णाने आणि यशाने अत्यंत शोभून दिसत आहेत. तर मग मी भगवंतांच्या समक्ष योग्य गाथेने त्यांची स्तुती करावी.” අථ ඛො ආයස්මා වඞ්ගීසො උට්ඨායාසනා එකංසං උත්තරාසඞ්ගං කරිත්වා යෙන භගවා තෙනඤ්ජලිං පණාමෙත්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘පටිභාති මං, භගවා, පටිභාති මං, සුගතා’’ති. ‘‘පටිභාතු තං, වඞ්ගීසා’’ති භගවා අවොච. අථ ඛො ආයස්මා වඞ්ගීසො භගවන්තං සම්මුඛා සාරුප්පාය ගාථාය අභිත්ථවි – त्यानंतर आयुष्यमान वंगिस आपल्या आसनावरून उठले, एका खांद्यावर उत्तरासंग परिधान करून जेथे भगवान होते त्या दिशेने हात जोडून नमस्कार करत भगवंतांना म्हणाले – “भगवंत, मला स्फुरत आहे! सुगत, मला स्फुरत आहे!” भगवान म्हणाले – “वंगिस, तुला स्फुरू दे.” त्यानंतर आयुष्यमान वंगिसांनी भगवंतांच्या समक्ष योग्य गाथेने त्यांची स्तुती केली – ‘‘චන්දො යථා විගතවලාහකෙ නභෙ,විරොචති විගතමලොව භාණුමා; එවම්පි අඞ්ගීරස ත්වං මහාමුනි,අතිරොචසි යසසා සබ්බලොක’’න්ති. “ज्याप्रमाणे ढगविरहित आकाशात चंद्र शोभून दिसतो, किंवा मलरहित सूर्य प्रकाशतो; त्याचप्रमाणे हे अंगीरस! हे महामुनी! आपण आपल्या यशाने संपूर्ण लोकात अतिशय शोभून दिसत आहात.” 12. වඞ්ගීසසුත්තං १२. वंगिससुत्त 220. එකං සමයං ආයස්මා වඞ්ගීසො සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන ආයස්මා වඞ්ගීසො අචිරඅරහත්තප්පත්තො හුත්වා විමුත්තිසුඛං පටිසංවෙදී තායං වෙලායං ඉමා ගාථායො අභාසි – २२०. एकदा आयुष्यमान वंगिस श्रावस्ती येथील अनाथपिंडिकांच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. त्या वेळी आयुष्यमान वंगिस नुकतेच अर्हतपद प्राप्त करून विमुक्तीसुखाचा अनुभव घेत होते. त्या प्रसंगी त्यांनी या गाथा म्हटल्या – ‘‘කාවෙය්යමත්තා විචරිම්හ පුබ්බෙ, ගාමා ගාමං පුරා පුරං; අථද්දසාම සම්බුද්ධං, සද්ධා නො උපපජ්ජථ. “पूर्वी आम्ही काव्याच्या नशेत एका गावावरून दुसऱ्या गावावर, एका नगरावरून दुसऱ्या नगरावर फिरत असू. नंतर आम्ही सम्यक संबुद्धांना पाहिले आणि आमच्यात श्रद्धा उत्पन्न झाली. ‘‘සො මෙ ධම්මමදෙසෙසි, ඛන්ධායතනධාතුයො ; තස්සාහං ධම්මං සුත්වාන, පබ්බජිං අනගාරියං. “त्यांनी मला धम्माचा उपदेश केला – स्कंध, आयतन आणि धातूंचा. त्यांचा तो धम्म ऐकून मी गृहत्याग करून प्रव्रज्या घेतली. ‘‘බහුන්නං වත අත්ථාය, බොධිං අජ්ඣගමා මුනි; භික්ඛූනං භික්ඛුනීනඤ්ච, යෙ නියාමගතද්දසා. “नक्कीच, बहुजनांच्या कल्याणासाठी मुनींनी बोधी प्राप्त केली; त्या भिक्खू आणि भिक्खुणींसाठी, ज्यांनी नियत मार्गाचे दर्शन घेतले आहे. ‘‘ස්වාගතං [Pg.198] වත මෙ ආසි, මම බුද්ධස්ස සන්තිකෙ; තිස්සො විජ්ජා අනුප්පත්තා, කතං බුද්ධස්ස සාසනං. “बुद्धांच्या सानिध्यात माझे येणे खरोखरच सुस्वागत ठरले; मी तीन विद्या प्राप्त केल्या आहेत आणि बुद्धांचे शासन पूर्ण केले आहे. ‘‘පුබ්බෙනිවාසං ජානාමි, දිබ්බචක්ඛුං විසොධිතං; තෙවිජ්ජො ඉද්ධිපත්තොම්හි, චෙතොපරියායකොවිදො’’ති. “मी पूर्वजन्मांचे स्मरण जाणतो, माझे दिव्यचक्षू विशुद्ध झाले आहेत. मी त्रैविद्य आहे, ऋद्धी प्राप्त आहे आणि परचित्तज्ञानात कुशल आहे.” වඞ්ගීසසංයුත්තං සමත්තං. वंगिससंयुत्त समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका – නික්ඛන්තං අරති චෙව, පෙසලා අතිමඤ්ඤනා; ආනන්දෙන සුභාසිතා, සාරිපුත්තපවාරණා; පරොසහස්සං කොණ්ඩඤ්ඤො, මොග්ගල්ලානෙන ගග්ගරා; වඞ්ගීසෙන ද්වාදසාති. निक्खंत, अरती, पेसला, अतिमञ्ञना, आनन्द, सुभासित, सारिपुत्त, पवारणा, परोसहस्स, कोण्डञ्ञ, मोग्गल्लान, गग्गरा आणि वंगिस – अशा या बारा सुत्तांचा हा संग्रह आहे. 9. වනසංයුත්තං ९. वनसंयुत्त 1. විවෙකසුත්තං १. विवेकसुत्त 221. එවං [Pg.199] මෙ සුතං – එකං සමයං අඤ්ඤතරො භික්ඛු කොසලෙසු විහරති අඤ්ඤතරස්මිං වනසණ්ඩෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන සො භික්ඛු දිවාවිහාරගතො පාපකෙ අකුසලෙ විතක්කෙ විතක්කෙති ගෙහනිස්සිතෙ. අථ ඛො යා තස්මිං වනසණ්ඩෙ අධිවත්ථා දෙවතා තස්ස භික්ඛුනො අනුකම්පිකා අත්ථකාමා තං භික්ඛුං සංවෙජෙතුකාමා යෙන සො භික්ඛු තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා තං භික්ඛුං ගාථාහි අජ්ඣභාසි – २२१. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी एक भिक्खू कोसल देशातील एका वनखंडात (अरण्यात) विहार करत होते. त्या वेळी ते भिक्खू दिवसाच्या विहारासाठी गेले असता, घराशी (गृहस्थजीवनाशी) संबंधित असलेल्या पापकारक, अकुशल विचारांचे चिंतन करू लागले. तेव्हा त्या वनखंडात राहणाऱ्या एका देवतेने, त्या भिक्खूविषयी अनुकंपा व त्यांचे हित चिंतून, त्यांच्या मनात संवेग (तीव्र जाणीव) निर्माण करण्याच्या इच्छेने, ते भिक्खू जेथे होते तेथे ती आली. जवळ येऊन तिने त्या भिक्खूंना गाथांनी संबोधित केले – ‘‘විවෙකකාමොසි වනං පවිට්ඨො,අථ තෙ මනො නිච්ඡරතී බහිද්ධා; ජනො ජනස්මිං විනයස්සු ඡන්දං,තතො සුඛී හොහිසි වීතරාගො. “तुम्ही एकांताची (विवेकाची) इच्छा धरून वनात प्रवेश केला आहे, तरीही तुमचे मन बाहेर भटकत आहे. हे मानवा, इतर माणसांविषयीची आसक्ती (इच्छा) दूर करा; त्यामुळे तुम्ही रागरहित होऊन सुखी व्हाल. ‘‘අරතිං පජහාසි සතො, භවාසි සතං තං සාරයාමසෙ; පාතාලරජො හි දුත්තරො, මා තං කාමරජො අවාහරි. “तुम्ही उदासीनतेचा (अरतीचा) त्याग करा आणि जागरूक (स्मृतिमान) व्हा. जागरूक असलेल्या तुम्हाला आम्ही आठवण करून देत आहोत. पाताळातील धुळीप्रमाणे असलेला हा क्लेशरूपी मळ पार करणे कठीण आहे; कामवासनेच्या धुळीला स्वतःला वाहून नेऊ देऊ नका. ‘‘සකුණො යථා පංසුකුන්ථිතො, විධුනං පාතයති සිතං රජං; එවං භික්ඛු පධානවා සතිමා, විධුනං පාතයති සිතං රජ’’න්ති. “ज्याप्रमाणे धुळीने माखलेला पक्षी स्वतःला झटकून शरीराला चिकटलेली धूळ पाडून टाकतो, त्याचप्रमाणे उद्योगी आणि जागरूक भिक्खूने स्वतःला झटकून चिकटलेला क्लेशरूपी मळ पाडून टाकावा.” අථ ඛො සො භික්ඛු තාය දෙවතාය සංවෙජිතො සංවෙගමාපාදීති. तेव्हा त्या देवतेने संवेगित केलेले ते भिक्खू संवेगाला (तीव्र वैराग्याला) प्राप्त झाले. 2. උපට්ඨානසුත්තං २. उपठ्ठानसुत्त (जागृत करणारे सुत्त) 222. එකං සමයං අඤ්ඤතරො භික්ඛු කොසලෙසු විහරති අඤ්ඤතරස්මිං වනසණ්ඩෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන සො භික්ඛු දිවාවිහාරගතො සුපති. අථ ඛො යා තස්මිං වනසණ්ඩෙ අධිවත්ථා දෙවතා තස්ස භික්ඛුනො අනුකම්පිකා අත්ථකාමා තං භික්ඛුං සංවෙජෙතුකාමා යෙන සො භික්ඛු තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා තං භික්ඛුං ගාථාහි අජ්ඣභාසි – २२२. एका वेळी एक भिक्खू कोसल देशातील एका वनखंडात विहार करत होते. त्या वेळी ते भिक्खू दिवसाच्या विहारासाठी गेले असता झोपले. तेव्हा त्या वनखंडात राहणाऱ्या एका देवतेने, त्या भिक्खूविषयी अनुकंपा व त्यांचे हित चिंतून, त्यांच्या मनात संवेग निर्माण करण्याच्या इच्छेने, ते भिक्खू जेथे होते तेथे ती आली. जवळ येऊन तिने त्या भिक्खूंना गाथांनी संबोधित केले – ‘‘උට්ඨෙහි භික්ඛු කිං සෙසි, කො අත්ථො සුපිතෙන තෙ; ආතුරස්ස හි කා නිද්දා, සල්ලවිද්ධස්ස රුප්පතො. “उठा भिक्खू, का झोपला आहात? तुम्हाला झोपण्याने काय लाभ होणार? जो क्लेशांनी पीडित आहे आणि तृष्णारूपी बाणाने विंधला जाऊन तळमळत आहे, त्याला झोप कशी येऊ शकते? ‘‘යාය [Pg.200] සද්ධාය පබ්බජිතො, අගාරස්මානගාරියං; තමෙව සද්ධං බ්රූහෙහි, මා නිද්දාය වසං ගමී’’ති. “ज्या श्रद्धेने तुम्ही गृहत्याग करून अनगारिक (प्रव्रजित) झाला आहात, त्याच श्रद्धेची वृद्धी करा; आळस व झोपेच्या आहारी जाऊ नका.” ‘‘අනිච්චා අද්ධුවා කාමා, යෙසු මන්දොව මුච්ඡිතො; බද්ධෙසු මුත්තං අසිතං, කස්මා පබ්බජිතං තපෙ. “कामभोग हे अनित्य आणि अस्थिर आहेत, ज्यांच्यामध्ये केवळ मूर्ख मनुष्यच मोहित होतो. जो बंधनांतून मुक्त आणि अनासक्त आहे, अशा प्रव्रजिताला दिवसाची झोप का बरे संताप देऊ शकेल? ‘‘ඡන්දරාගස්ස විනයා, අවිජ්ජාසමතික්කමා; තං ඤාණං පරමොදානං, කස්මා පබ්බජිතං තපෙ. “कामरागाचा निरोध केल्यामुळे आणि अविद्येचे उल्लंघन केल्यामुळे, ज्यांचे ज्ञान अत्यंत शुद्ध झाले आहे, अशा प्रव्रजिताला दिवसाची झोप का बरे संताप देऊ शकेल? ‘‘ඡෙත්වා අවිජ්ජං විජ්ජාය, ආසවානං පරික්ඛයා; අසොකං අනුපායාසං, කස්මා පබ්බජිතං තපෙ. “विद्येने अविद्येचा छेद करून आणि आसवांचा क्षय करून जो शोकरहित व त्रासरहित झाला आहे, अशा प्रव्रजिताला दिवसाची झोप का बरे संताप देऊ शकेल? ‘‘ආරද්ධවීරියං පහිතත්තං, නිච්චං දළ්හපරක්කමං; නිබ්බානං අභිකඞ්ඛන්තං, කස්මා පබ්බජිතං තපෙ’’ති. “ज्यांनी वीर्य आरंभिले आहे, ज्यांचे चित्त निर्वाणाकडे प्रवृत्त आहे, जे सदैव दृढ पराक्रमी आहेत आणि निर्वाणाची आकांक्षा बाळगतात, अशा प्रव्रजिताला दिवसाची झोप का बरे संताप देऊ शकेल?” 3. කස්සපගොත්තසුත්තං ३. कस्सपगोत्तसुत्त 223. එකං සමයං ආයස්මා කස්සපගොත්තො කොසලෙසු විහරති අඤ්ඤතරස්මිං වනසණ්ඩෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන ආයස්මා කස්සපගොත්තො දිවාවිහාරගතො අඤ්ඤතරං ඡෙතං ඔවදති. අථ ඛො යා තස්මිං වනසණ්ඩෙ අධිවත්ථා දෙවතා ආයස්මන්තං කස්සපගොත්තං සංවෙජෙතුකාමා යෙනායස්මා කස්සපගොත්තො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං කස්සපගොත්තං ගාථාහි අජ්ඣභාසි – २२३. एका वेळी आयुष्यमान कस्सपगोत्त कोसल देशातील एका वनखंडात विहार करत होते. त्या वेळी आयुष्यमान कस्सपगोत्त दिवसाच्या विहारासाठी गेले असता एका पारध्याला (शिकारीला) उपदेश करत होते. तेव्हा त्या वनखंडात राहणाऱ्या देवतेने, आयुष्यमान कस्सपगोत्त यांच्या मनात संवेग निर्माण करण्याच्या इच्छेने, आयुष्यमान कस्सपगोत्त जेथे होते तेथे ती आली. जवळ येऊन तिने आयुष्यमान कस्सपगोत्त यांना गाथांनी संबोधित केले – ‘‘ගිරිදුග්ගචරං ඡෙතං, අප්පපඤ්ඤං අචෙතසං; අකාලෙ ඔවදං භික්ඛු, මන්දොව පටිභාති මං. “डोंगराळ दऱ्याखोऱ्यांत फिरणाऱ्या, अल्पबुद्धी आणि विवेक नसलेल्या पारध्याला अवेळी उपदेश करणारे हे भिक्खू मला एखाद्या अज्ञानी माणसासारखे वाटतात. ‘‘සුණාති න විජානාති, ආලොකෙති න පස්සති; ධම්මස්මිං භඤ්ඤමානස්මිං, අත්ථං බාලො න බුජ්ඣති. तो ऐकतो पण समजत नाही, पाहतो पण त्याला दिसत नाही; धम्माचा उपदेश केला जात असतानाही तो मूर्ख त्याचा अर्थ समजत नाही. ‘‘සචෙපි දස පජ්ජොතෙ, ධාරයිස්සසි කස්සප; නෙව දක්ඛති රූපානි, චක්ඛු හිස්ස න විජ්ජතී’’ති. हे कस्सप, जरी तुम्ही दहा दिवे पेटवून धरलेत, तरीही तो रूपे पाहू शकणार नाही, कारण त्याला पाहण्यासाठी (ज्ञानाचे) डोळेच नाहीत.” අථ ඛො ආයස්මා කස්සපගොත්තො තාය දෙවතාය සංවෙජිතො සංවෙගමාපාදීති. तेव्हा आयुष्यमान कस्सपगोत्त त्या देवतेने संवेगित केले असता संवेगाला प्राप्त झाले. 4. සම්බහුලසුත්තං ४. सम्बहुलसुत्त (अनेक भिक्खूंचे सुत्त) 224. එකං [Pg.201] සමයං සම්බහුලා භික්ඛූ කොසලෙසු විහරන්ති අඤ්ඤතරස්මිං වනසණ්ඩෙ. අථ ඛො තෙ භික්ඛූ වස්සංවුට්ඨා තෙමාසච්චයෙන චාරිකං පක්කමිංසු. අථ ඛො යා තස්මිං වනසණ්ඩෙ අධිවත්ථා දෙවතා තෙ භික්ඛූ අපස්සන්තී පරිදෙවමානා තායං වෙලායං ඉමං ගාථං අභාසි – २२४. एका वेळी अनेक भिक्खू कोसल देशातील एका वनखंडात विहार करत होते. वर्षावास पूर्ण झाल्यावर, तीन महिन्यांनंतर ते भिक्खू चारिकेसाठी (प्रवासासाठी) निघून गेले. तेव्हा त्या वनखंडात राहणाऱ्या देवतेने त्या भिक्खूंना न पाहून, विलाप करत त्या वेळी ही गाथा म्हटली – ‘‘අරති විය මෙජ්ජ ඛායති,බහුකෙ දිස්වාන විවිත්තෙ ආසනෙ; තෙ චිත්තකථා බහුස්සුතා,කොමෙ ගොතමසාවකා ගතා’’ති. “आज मला अनेक रिकामी व एकांत आसने पाहून उदासीनता वाटत आहे. ते सुंदर प्रवचन करणारे, बहुश्रुत असलेले गोतमांचे (बुद्धांचे) श्रावक कोठे गेले बरं?” එවං වුත්තෙ, අඤ්ඤතරා දෙවතා තං දෙවතං ගාථාය පච්චභාසි – असे म्हटले असता, दुसऱ्या एका देवतेने त्या देवतेला गाथेने प्रत्युत्तर दिले – ‘‘මාගධං ගතා කොසලං ගතා, එකච්චියා පන වජ්ජිභූමියා; මගා විය අසඞ්ගචාරිනො, අනිකෙතා විහරන්ති භික්ඛවො’’ති. “काही मगध देशात गेले आहेत, काही कोसल देशात गेले आहेत, तर काही वज्जींच्या भूमीवर गेले आहेत. जंगलातील हरिणांप्रमाणे आसक्तीशिवाय मुक्तपणे विहार करणारे ते भिक्खू कोणत्याही एका घराशिवाय (अनिकेत होऊन) सर्वत्र विहार करत आहेत.” 5. ආනන්දසුත්තං ५. आनन्दसुत्त 225. එකං සමයං ආයස්මා ආනන්දො කොසලෙසු විහරති අඤ්ඤතරස්මිං වනසණ්ඩෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන ආයස්මා ආනන්දො අතිවෙලං ගිහිසඤ්ඤත්තිබහුලො විහරති. අථ ඛො යා තස්මිං වනසණ්ඩෙ අධිවත්ථා දෙවතා ආයස්මතො ආනන්දස්ස අනුකම්පිකා අත්ථකාමා ආයස්මන්තං ආනන්දං සංවෙජෙතුකාමා යෙනායස්මා ආනන්දො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං ආනන්දං ගාථාය අජ්ඣභාසි – २२५. एका वेळी आयुष्यमान आनंद कोसल देशातील एका वनखंडात विहार करत होते. त्या वेळी आयुष्यमान आनंद गृहस्थांना उपदेश करण्यात अतिशय व्यस्त राहत असत. तेव्हा त्या वनखंडात राहणाऱ्या देवतेने, आयुष्यमान आनंद यांच्याविषयी अनुकंपा व त्यांचे हित चिंतून, त्यांच्या मनात संवेग निर्माण करण्याच्या इच्छेने, आयुष्यमान आनंद जेथे होते तेथे ती आली. जवळ येऊन तिने आयुष्यमान आनंद यांना गाथेने संबोधित केले – ‘‘රුක්ඛමූලගහනං පසක්කිය, නිබ්බානං හදයස්මිං ඔපිය; ඣා ගොතම මා පමාදො, කිං තෙ බිළිබිළිකා කරිස්සතී’’ති. “वृक्षाच्या मुळाशी असलेल्या घनदाट अरण्यात प्रवेश करून, निर्वाणाला हृदयात धारण करून ध्यान करा, हे गोतम (आनंद)! आळस करू नका. हा लोकांचा कोलाहल (लोकांशी निरर्थक संभाषण) तुमचे काय भले करणार?” අථ ඛො ආයස්මා ආනන්දො තාය දෙවතාය සංවෙජිතො සංවෙගමාපාදීති. तेव्हा आयुष्यमान आनंद त्या देवतेने संवेगित केले असता संवेगाला प्राप्त झाले. 6. අනුරුද්ධසුත්තං ६. अनुरुद्धसुत्त 226. එකං සමයං ආයස්මා අනුරුද්ධො කොසලෙසු විහරති අඤ්ඤතරස්මිං වනසණ්ඩෙ. අථ ඛො අඤ්ඤතරා තාවතිංසකායිකා දෙවතා ජාලිනී [Pg.202] නාම ආයස්මතො අනුරුද්ධස්ස පුරාණදුතියිකා යෙනායස්මා අනුරුද්ධො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං අනුරුද්ධං ගාථාය අජ්ඣභාසි – २२६. एका वेळी आयुष्यमान अनुरुद्ध कोसल देशातील एका वनखंडात विहार करत होते. तेव्हा तावतींस देवलोकातील जालिनी नावाची एक देवकन्या, जी पूर्वजन्मात आयुष्यमान अनुरुद्ध यांची पत्नी होती, आयुष्यमान अनुरुद्ध जेथे होते तेथे आली. जवळ येऊन तिने आयुष्यमान अनुरुद्ध यांना गाथेने संबोधित केले – ‘‘තත්ථ චිත්තං පණිධෙහි, යත්ථ තෙ වුසිතං පුරෙ; තාවතිංසෙසු දෙවෙසු, සබ්බකාමසමිද්ධිසු; පුරක්ඛතො පරිවුතො, දෙවකඤ්ඤාහි සොභසී’’ති. “तुमचे मन तेथे लावा, जेथे तुम्ही पूर्वी राहत होतात. सर्व कामभोगांनी समृद्ध अशा तावतींस देवलोकात देवकन्यांनी वेढलेले तुम्ही अत्यंत शोभून दिसत होतात.” ‘‘දුග්ගතා දෙවකඤ්ඤායො, සක්කායස්මිං පතිට්ඨිතා; තෙ චාපි දුග්ගතා සත්තා, දෙවකඤ්ඤාහි පත්ථිතා’’ති. “सत्कायदृष्टीत (अहंकारात) स्थिर असलेल्या देवकन्या दुर्गतीला प्राप्त झालेल्या आहेत; आणि ज्या देवकन्यांची इच्छा बाळगतात, ते प्राणी देखील दुर्गतीलाच प्राप्त होतात.” ‘‘න තෙ සුඛං පජානන්ති, යෙ න පස්සන්ති නන්දනං; ආවාසං නරදෙවානං, තිදසානං යසස්සින’’න්ති. “ज्यांनी यशस्वी अशा तावतींस देवपुत्रांचे निवासस्थान असलेले नंदनवन पाहिले नाही, त्यांना खऱ्या सुखाची माहितीच नाही.” ‘‘න ත්වං බාලෙ විජානාසි, යථා අරහතං වචො; අනිච්චා සබ්බසඞ්ඛාරා, උප්පාදවයධම්මිනො; උප්පජ්ජිත්වා නිරුජ්ඣන්ති, තෙසං වූපසමො සුඛො. “हे अज्ञानी देवकन्ये, अर्हतांचे वचन काय आहे हे तुला माहीत नाही. सर्व संस्कार (संखारा) अनित्य आहेत, उत्पन्न होणे आणि नष्ट होणे हाच त्यांचा स्वभाव आहे. उत्पन्न होऊन ते नष्ट होतात; त्यांचा उपशम (शांत होणे म्हणजेच निर्वाण) हेच खरे सुख आहे. ‘‘නත්ථි දානි පුනාවාසො, දෙවකායස්මි ජාලිනි; වික්ඛීණො ජාතිසංසාරො, නත්ථි දානි පුනබ්භවො’’ති. हे जालिनी, आता माझा देवलोकात पुन्हा निवास होणार नाही. माझा जन्म-संसार संपुष्टात आला आहे, आता मला पुनर्जन्म नाही.” 7. නාගදත්තසුත්තං ७. नागदत्तसुत्त 227. එකං සමයං ආයස්මා නාගදත්තො කොසලෙසු විහරති අඤ්ඤතරස්මිං වනසණ්ඩෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන ආයස්මා නාගදත්තො අතිකාලෙන ගාමං පවිසති, අතිදිවා පටික්කමති. අථ ඛො යා තස්මිං වනසණ්ඩෙ අධිවත්ථා දෙවතා ආයස්මතො නාගදත්තස්ස අනුකම්පිකා අත්ථකාමා ආයස්මන්තං නාගදත්තං සංවෙජෙතුකාමා යෙනායස්මා නාගදත්තො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං නාගදත්තං ගාථාහි අජ්ඣභාසි – २२७. एकदा आयुष्यमान नागदत्त कोसल देशातील एका वनखंडात (अरण्य भागात) विहार करत होते. त्या वेळी आयुष्यमान नागदत्त अतिशय सकाळीच गावात प्रवेश करत असत आणि भर दुपारी (खूप उशिरा) परत येत असत. तेव्हा त्या वनखंडात राहणाऱ्या एका देवतेने, जी आयुष्यमान नागदत्तांविषयी अनुकंपा बाळगणारी, त्यांचे हित इच्छिणारी होती आणि त्यांच्या मनात संवेग (वैराग्य/तीव्र जाणीव) निर्माण करू इच्छित होती, आयुष्यमान नागदत्त जेथे होते तेथे ती गेली. जवळ जाऊन तिने आयुष्यमान नागदत्तांना गाथांनी संबोधित केले – ‘‘කාලෙ පවිස නාගදත්ත, දිවා ච ආගන්ත්වා අතිවෙලචාරී; සංසට්ඨො ගහට්ඨෙහි, සමානසුඛදුක්ඛො. “हे नागदत्त! तू सकाळीच (गावात) प्रवेश करतोस आणि दुपारी परत येतोस, अशा प्रकारे तू अवेळी फिरणारा (अतिवेलचारी) झाला आहेस. गृहस्थांशी अतिशय संसृष्ट (एकत्र आलेला) राहून तू त्यांच्या सुख-दुःखात भागीदार होत आहेस. ‘‘භායාමි නාගදත්තං සුප්පගබ්භං, කුලෙසු විනිබද්ධං; මා හෙව මච්චුරඤ්ඤො බලවතො, අන්තකස්ස වසං උපෙසී’’ති. “कुलांमध्ये (घराण्यांमध्ये) आसक्त झालेल्या आणि अत्यंत प्रगल्भ (धिटाई करणाऱ्या) नागदत्ताविषयी मला भीती वाटते. बलवान आणि अंतक (सर्व संपवणाऱ्या) अशा मृत्यूराजाच्या वशात तू पडू नकोस.” අථ [Pg.203] ඛො ආයස්මා නාගදත්තො තාය දෙවතාය සංවෙජිතො සංවෙගමාපාදීති. त्यानंतर आयुष्यमान नागदत्त त्या देवतेने संवेजित (जागृत) केल्यामुळे संवेगाला (तीव्र वैराग्याला) प्राप्त झाले. 8. කුලඝරණීසුත්තං ८. कुलघरणी सुत्त (गृहस्वामिनी सूत्र) 228. එකං සමයං අඤ්ඤතරො භික්ඛු කොසලෙසු විහරති අඤ්ඤතරස්මිං වනසණ්ඩෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන සො භික්ඛු අඤ්ඤතරස්මිං කුලෙ අතිවෙලං අජ්ඣොගාළ්හප්පත්තො විහරති. අථ ඛො යා තස්මිං වනසණ්ඩෙ අධිවත්ථා දෙවතා තස්ස භික්ඛුනො අනුකම්පිකා අත්ථකාමා තං භික්ඛුං සංවෙජෙතුකාමා යා තස්මිං කුලෙ කුලඝරණී, තස්සා වණ්ණං අභිනිම්මිනිත්වා යෙන සො භික්ඛු තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා තං භික්ඛුං ගාථාය අජ්ඣභාසි – २२८. एकदा एक भिक्खू कोसल देशातील एका वनखंडात विहार करत होते. त्या वेळी ते भिक्खू एका विशिष्ट कुटुंबात अतिशय घनिष्ठ (आसक्त) होऊन राहत असत. तेव्हा त्या वनखंडात राहणाऱ्या एका देवतेने, जी त्या भिक्खूंविषयी अनुकंपा बाळगणारी, त्यांचे हित इच्छिणारी होती आणि त्यांच्या मनात संवेग निर्माण करू इच्छित होती, त्या कुटुंबातील गृहस्वामिनीचे रूप धारण केले आणि ते भिक्खू जेथे होते तेथे ती गेली. जवळ जाऊन तिने त्या भिक्खूंना गाथेने संबोधित केले – ‘‘නදීතීරෙසු සණ්ඨානෙ, සභාසු රථියාසු ච; ජනා සඞ්ගම්ම මන්තෙන්ති, මඤ්ච තඤ්ච කිමන්තර’’න්ති. “नदीकाठांवर, विश्रामगृहांमध्ये, सभांमध्ये आणि रस्त्यांवर लोक एकत्र येऊन माझ्याबद्दल आणि तुझ्याबद्दल कुजबुजतात (चर्चा करतात). आपल्या दोघांमध्ये असे काय आहे?” ‘‘බහූහි සද්දා පච්චූහා, ඛමිතබ්බා තපස්සිනා; න තෙන මඞ්කු හොතබ්බං, න හි තෙන කිලිස්සති. “तपस्वी पुरुषाने (साधकाने) लोकांच्या अनेक प्रतिकूल शब्दांचे (निंदेचे) सहनशीलतेने स्वागत केले पाहिजे. त्याने त्यामुळे खिन्न (उद्विग्न) होऊ नये, कारण केवळ दुसऱ्यांच्या बोलण्याने माणूस मलिन (दूषित) होत नाही. ‘‘යො ච සද්දපරිත්තාසී, වනෙ වාතමිගො යථා; ලහුචිත්තොති තං ආහු, නාස්ස සම්පජ්ජතෙ වත’’න්ති. “परंतु जो वनातील वातहरिणाप्रमाणे केवळ आवाजानेच भयभीत होतो, त्याला ज्ञानी लोक 'चंचल मनाचा' म्हणतात. त्याचे व्रत (साधना) कधीही यशस्वी होत नाही.” 9. වජ්ජිපුත්තසුත්තං ९. वज्जिपुत्ता सुत्त 229. එකං සමයං අඤ්ඤතරො වජ්ජිපුත්තකො භික්ඛු වෙසාලියං විහරති අඤ්ඤතරස්මිං වනසණ්ඩෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන වෙසාලියං වජ්ජිපුත්තකො සබ්බරත්තිචාරො හොති. අථ ඛො සො භික්ඛු වෙසාලියා තූරිය-තාළිත-වාදිත-නිග්ඝොසසද්දං සුත්වා පරිදෙවමානො තායං වෙලායං ඉමං ගාථං අභාසි – २२९. एकदा एक वज्जिपुत्र भिक्खू वेसाली येथील एका वनखंडात विहार करत होते. त्या वेळी वेसालीमध्ये वज्जिपुत्रांचा रात्रभर चालणारा उत्सव सुरू होता. तेव्हा वेसालीतून येणारा वाद्यांचा, ताशांचा आणि संगीताचा मोठा आवाज ऐकून ते भिक्खू विलाप करत त्या वेळी ही गाथा म्हणाले – ‘‘එකකා මයං අරඤ්ඤෙ විහරාම,අපවිද්ධංව වනස්මිං දාරුකං; එතාදිසිකාය රත්තියා,කො සු නාමම්හෙහි පාපියො’’ති. “आम्ही जंगलात टाकून दिलेल्या लाकडासारखे अरण्यवासात एकटेच राहत आहोत. अशा (उत्सवाच्या) रात्री आमच्यापेक्षा अधिक दुर्दैवी (हीन) दुसरा कोण असेल?” අථ ඛො යා තස්මිං වනසණ්ඩෙ අධිවත්ථා දෙවතා තස්ස භික්ඛුනො අනුකම්පිකා අත්ථකාමා තං භික්ඛුං සංවෙජෙතුකාමා යෙන සො භික්ඛු තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා තං භික්ඛුං ගාථාය අජ්ඣභාසි – तेव्हा त्या वनखंडात राहणाऱ्या एका देवतेने, जी त्या भिक्खूंविषयी अनुकंपा बाळगणारी, त्यांचे हित इच्छिणारी होती आणि त्यांच्या मनात संवेग निर्माण करू इच्छित होती, ते भिक्खू जेथे होते तेथे ती गेली. जवळ जाऊन तिने त्या भिक्खूंना गाथेने संबोधित केले – ‘‘එකකොව [Pg.204] ත්වං අරඤ්ඤෙ විහරසි, අපවිද්ධංව වනස්මිං දාරුකං; තස්ස තෙ බහුකා පිහයන්ති, නෙරයිකා විය සග්ගගාමින’’න්ති. “जरी तू जंगलात टाकून दिलेल्या लाकडासारखा अरण्यात एकटाच राहत असलास, तरी नरकातील जीव जसे स्वर्गात जाणाऱ्यांचा हेवा करतात, तसेच अनेक जण तुझा हेवा (आदरयुक्त मत्सर) करतात.” අථ ඛො සො භික්ඛු තාය දෙවතාය සංවෙජිතො සංවෙගමාපාදීති. त्यानंतर ते भिक्खू त्या देवतेने संवेजित केल्यामुळे संवेगाला प्राप्त झाले. 10. සජ්ඣායසුත්තං १०. सज्झाय सुत्त (पठण सूत्र) 230. එකං සමයං අඤ්ඤතරො භික්ඛු කොසලෙසු විහරති අඤ්ඤතරස්මිං වනසණ්ඩෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන සො භික්ඛු යං සුදං පුබ්බෙ අතිවෙලං සජ්ඣායබහුලො විහරති සො අපරෙන සමයෙන අප්පොස්සුක්කො තුණ්හීභූතො සඞ්කසායති. අථ ඛො යා තස්මිං වනසණ්ඩෙ අධිවත්ථා දෙවතා තස්ස භික්ඛුනො ධම්මං අසුණන්තී යෙන සො භික්ඛු තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා තං භික්ඛුං ගාථාය අජ්ඣභාසි – २३०. एकदा एक भिक्खू कोसल देशातील एका वनखंडात विहार करत होते. त्या वेळी ते भिक्खू पूर्वी खूप वेळ धम्माचे पठण (सज्झाय) करत असत, परंतु काही काळानंतर ते निरुत्साही होऊन मौन धारण करून राहू लागले. तेव्हा त्या वनखंडात राहणाऱ्या देवतेला त्या भिक्खूंचे धम्मपठण ऐकू न आल्यामुळे, ते भिक्खू जेथे होते तेथे ती गेली. जवळ जाऊन तिने त्या भिक्खूंना गाथेने संबोधित केले – ‘‘කස්මා තුවං ධම්මපදානි භික්ඛු, නාධීයසි භික්ඛූහි සංවසන්තො; සුත්වාන ධම්මං ලභතිප්පසාදං, දිට්ඨෙව ධම්මෙ ලභතිප්පසංස’’න්ති. “हे भिक्खू! इतर भिक्खूंसोबत राहत असताना तू धम्मपदांचे पठण का करत नाहीस? धम्म ऐकून माणसाला प्रसन्नता लाभते आणि याच जन्मात त्याला प्रशंसाही मिळते.” ‘‘අහු පුරෙ ධම්මපදෙසු ඡන්දො, යාව විරාගෙන සමාගමිම්හ; යතො විරාගෙන සමාගමිම්හ, යං කිඤ්චි දිට්ඨංව සුතං මුතං වා; අඤ්ඤාය නික්ඛෙපනමාහු සන්තො’’ති. “जोपर्यंत मला वैराग्य (अरिहंत पद) प्राप्त झाले नव्हते, तोपर्यंत माझी धम्मपदांच्या पठणात रुची होती. परंतु जेव्हापासून मला वैराग्य प्राप्त झाले आहे, तेव्हापासून जे काही पाहिले, ऐकले किंवा अनुभवले आहे, ते सर्व जाणून घेऊन त्याचा त्याग करणे (पठण थांबवणे) यालाच संत (ज्ञानी) योग्य मानतात.” 11. අකුසලවිතක්කසුත්තං ११. अकुसलवितक्क सुत्त (अकुशल विचार सूत्र) 231. එකං සමයං අඤ්ඤතරො භික්ඛු කොසලෙසු විහරති අඤ්ඤතරස්මිං වනසණ්ඩෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන සො භික්ඛු දිවාවිහාරගතො පාපකෙ අකුසලෙ විතක්කෙ විතක්කෙති, සෙය්යථිදං – කාමවිතක්කං, බ්යාපාදවිතක්කං, විහිංසාවිතක්කං. අථ ඛො යා තස්මිං වනසණ්ඩෙ අධිවත්ථා දෙවතා තස්ස භික්ඛුනො අනුකම්පිකා අත්ථකාමා තං භික්ඛුං සංවෙජෙතුකාමා යෙන සො භික්ඛු තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා තං භික්ඛුං ගාථාහි අජ්ඣභාසි – २३१. एकदा एक भिक्खू कोसल देशातील एका वनखंडात विहार करत होते. त्या वेळी ते भिक्खू दिवसाच्या विश्रांतीसाठी गेले असता त्यांच्या मनात पापी, अकुशल विचार येऊ लागले, जसे की – कामवितर्क (वासनायुक्त विचार), व्यापादवितर्क (द्वेषयुक्त विचार) आणि विहिंसावितर्क (हिंसेचे विचार). तेव्हा त्या वनखंडात राहणाऱ्या एका देवतेने, जी त्या भिक्खूंविषयी अनुकंपा बाळगणारी, त्यांचे हित इच्छिणारी होती आणि त्यांच्या मनात संवेग निर्माण करू इच्छित होती, ते भिक्खू जेथे होते तेथे ती गेली. जवळ जाऊन तिने त्या भिक्खूंना गाथांनी संबोधित केले – ‘‘අයොනිසො මනසිකාරා, සො විතක්කෙහි ඛජ්ජසි; අයොනිසො පටිනිස්සජ්ජ, යොනිසො අනුචින්තය. “अयोग्य मनसिकारामुळे (अयोनिसो मनसिकार) तू या विचारांनी ग्रासला गेला आहेस. अयोग्य मनसिकाराचा त्याग कर आणि योग्य प्रकारे (योनिसो मनसिकार) विचार कर. ‘‘සත්ථාරං [Pg.205] ධම්මමාරබ්භ, සඞ්ඝං සීලානි අත්තනො; අධිගච්ඡසි පාමොජ්ජං, පීතිසුඛමසංසයං; තතො පාමොජ්ජබහුලො, දුක්ඛස්සන්තං කරිස්සසී’’ති. “शास्ता (बुद्ध), धम्म, संघ आणि स्वतःच्या शीलांचे स्मरण करून तू नक्कीच प्रमोद (आनंद), प्रीती आणि सुख प्राप्त करशील. त्यानंतर अत्यंत आनंदित होऊन तू दुःखाचा अंत करशील.” අථ ඛො සො භික්ඛු තාය දෙවතාය සංවෙජිතො සංවෙගමාපාදීති. त्यानंतर ते भिक्खू त्या देवतेने संवेजित केल्यामुळे संवेगाला प्राप्त झाले. 12. මජ්ඣන්හිකසුත්තං १२. मज्झन्हिक सुत्त (मध्यान्ह सूत्र) 232. එකං සමයං අඤ්ඤතරො භික්ඛු කොසලෙසු විහරති අඤ්ඤතරස්මිං වනසණ්ඩෙ. අථ ඛො තස්මිං වනසණ්ඩෙ අධිවත්ථා දෙවතා යෙන සො භික්ඛු තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා තස්ස භික්ඛුනො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – २३२. एकदा एक भिक्खू कोसल देशातील एका वनखंडात विहार करत होते. तेव्हा त्या वनखंडात राहणारी देवता ते भिक्खू जेथे होते तेथे गेली. जवळ जाऊन तिने त्या भिक्खूंच्या समोर ही गाथा म्हटली – ‘‘ඨිතෙ මජ්ඣන්හිකෙ කාලෙ, සන්නිසීවෙසු පක්ඛිසු; සණතෙව බ්රහාරඤ්ඤං, තං භයං පටිභාති මං. “दुपारची वेळ झाली असता आणि पक्षी शांत बसले असता, हे मोठे अरण्य जणू काही गुंजत आहे (आवाज करत आहे). हे मला अत्यंत भयप्रद वाटते.” ‘‘ඨිතෙ මජ්ඣන්හිකෙ කාලෙ, සන්නිසීවෙසු පක්ඛිසු; සණතෙව බ්රහාරඤ්ඤං, සා රති පටිභාති ම’’න්ති. “दुपारची वेळ झाली असता आणि पक्षी शांत बसले असता, हे मोठे अरण्य जणू काही गुंजत आहे. हे मला अत्यंत आनंददायी (रमणीय) वाटते.” 13. පාකතින්ද්රියසුත්තං १३. पाकतइंद्रिय सुत्त (असंयत इंद्रिय सूत्र) 233. එකං සමයං සම්බහුලා භික්ඛූ කොසලෙසු විහරන්ති අඤ්ඤතරස්මිං වනසණ්ඩෙ උද්ධතා උන්නළා චපලා මුඛරා විකිණ්ණවාචා මුට්ඨස්සතිනො අසම්පජානා අසමාහිතා විබ්භන්තචිත්තා පාකතින්ද්රියා. අථ ඛො යා තස්මිං වනසණ්ඩෙ අධිවත්ථා දෙවතා තෙසං භික්ඛූනං අනුකම්පිකා අත්ථකාමා තෙ භික්ඛූ සංවෙජෙතුකාමා යෙන තෙ භික්ඛූ තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා තෙ භික්ඛූ ගාථාහි අජ්ඣභාසි – २३३. एकदा अनेक भिक्खू कोसल देशातील एका वनखंडात विहार करत होते. ते उद्धट, गर्विष्ठ, चंचल, वाचाळ, निरर्थक बोलणारे, विस्मरणशील (स्मृती नसलेले), असंप्रजन्य (भान नसलेले), एकाग्रता नसलेले, विचलित मनाचे आणि असंयत इंद्रियांचे (इंद्रियांवर ताबा नसलेले) झाले होते. तेव्हा त्या वनखंडात राहणाऱ्या एका देवतेने, जी त्या भिक्खूंविषयी अनुकंपा बाळगणारी, त्यांचे हित इच्छिणारी होती आणि त्यांच्या मनात संवेग निर्माण करू इच्छित होती, ते भिक्खू जेथे होते तेथे ती गेली. जवळ जाऊन तिने त्या भिक्खूंना गाथांनी संबोधित केले – ‘‘සුඛජීවිනො පුරෙ ආසුං, භික්ඛූ ගොතමසාවකා; අනිච්ඡා පිණ්ඩමෙසනා, අනිච්ඡා සයනාසනං; ලොකෙ අනිච්චතං ඤත්වා, දුක්ඛස්සන්තං අකංසු තෙ. “पूर्वीचे गोतम बुद्धांचे श्रावक भिक्खू सुखाने जीवन जगत असत. ते कोणत्याही तृष्णेविना भिक्षा शोधत असत आणि तृष्णेविनाच शय्यासन (राहण्याची जागा) स्वीकारत असत. जगातील अनित्यता जाणून त्यांनी दुःखाचा अंत केला. ‘‘දුප්පොසං කත්වා අත්තානං, ගාමෙ ගාමණිකා විය; භුත්වා භුත්වා නිපජ්ජන්ති, පරාගාරෙසු මුච්ඡිතා. “परंतु आता काही भिक्खू गावातील प्रमुखांप्रमाणे स्वतःचे पोषण करणे कठीण करून घेतात. ते पोटभर खाऊन इतरांच्या घरांमध्ये आसक्त होऊन झोपून राहतात.” ‘‘සඞ්ඝස්ස [Pg.206] අඤ්ජලිං කත්වා, ඉධෙකච්චෙ වදාමහං; අපවිද්ධා අනාථා තෙ, යථා පෙතා තථෙව තෙ. संघाला हात जोडून (अंजली करून), मी येथे काही (भिक्खूंबद्दल) बोलत आहे. जसे मृतदेह टाकून दिले जातात, तसेच ते टाकून दिलेले आणि अनाथ (आश्रयहीन) आहेत. ‘‘යෙ ඛො පමත්තා විහරන්ති, තෙ මෙ සන්ධාය භාසිතං; යෙ අප්පමත්තා විහරන්ති, නමො තෙසං කරොමහ’’න්ති. जे प्रमादी (बेसावध) होऊन जगतात, त्यांना उद्देशून मी हे बोललो आहे. जे अप्रमादी (जागरूक) होऊन जगतात, त्यांना मी वंदन करतो. අථ ඛො තෙ භික්ඛූ තාය දෙවතාය සංවෙජිතා සංවෙගමාපාදුන්ති. त्यानंतर, त्या देवतेने संवेगित केल्यामुळे त्या भिक्खूंना संवेग प्राप्त झाला. 14. ගන්ධත්ථෙනසුත්තං १४. गंधत्थेन सुत्त 234. එකං සමයං අඤ්ඤතරො භික්ඛු කොසලෙසු විහරති අඤ්ඤතරස්මිං වනසණ්ඩෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන සො භික්ඛු පච්ඡාභත්තං පිණ්ඩපාතපටික්කන්තො පොක්ඛරණිං ඔගාහෙත්වා පදුමං උපසිඞ්ඝති. අථ ඛො යා තස්මිං වනසණ්ඩෙ අධිවත්ථා දෙවතා තස්ස භික්ඛුනො අනුකම්පිකා අත්ථකාමා තං භික්ඛුං සංවෙජෙතුකාමා යෙන සො භික්ඛු තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා තං භික්ඛුං ගාථාය අජ්ඣභාසි – २३४. एकदा एक भिक्खू कोसल देशातील एका वनखंडात राहत होते. त्या वेळी ते भिक्खू दुपारच्या भोजनानंतर, पिंडपाताहून परतल्यावर एका तलावात उतरून कमळाचा सुगंध घेत होते. तेव्हा त्या वनखंडात राहणाऱ्या एका देवतेने, त्या भिक्खूंबद्दल अनुकंपा बाळगणाऱ्या आणि त्यांचे कल्याण इच्छिणाऱ्या, त्यांना संवेगित करण्याच्या इच्छेने, ते भिक्खू जेथे होते तेथे जाऊन गाथेने म्हटले – ‘‘යමෙතං වාරිජං පුප්ඵං, අදින්නං උපසිඞ්ඝසි; එකඞ්ගමෙතං ථෙය්යානං, ගන්ධත්ථෙනොසි මාරිසා’’ති. “हे जे पाण्यात उगवलेले कमळाचे फूल आहे, जे तुम्हाला दिलेले नाही, त्याचा तुम्ही सुगंध घेत आहात. चोरीच्या प्रकारांमधील हा एक प्रकार आहे; हे महाशया, तुम्ही सुगंधाचे चोर आहात।” ‘‘න හරාමි න භඤ්ජාමි, ආරා සිඞ්ඝාමි වාරිජං; අථ කෙන නු වණ්ණෙන, ගන්ධත්ථෙනොති වුච්චති. “मी हे कमळ घेऊन जात नाही, ना ते तोडत आहे, मी तर दुरूनच त्याचा सुगंध घेत आहे. मग कोणत्या कारणाने मला सुगंधाचा चोर म्हटले जात आहे? ‘‘ය්වායං භිසානි ඛනති, පුණ්ඩරීකානි භඤ්ජති; එවං ආකිණ්ණකම්මන්තො, කස්මා එසො න වුච්චතී’’ති. “जो मनुष्य कमळाचे कंद उकरून काढतो, पांढरी कमळे तोडतो, अशा हिंसक व अपवित्र कृत्य करणाऱ्याला चोर का म्हटले जात नाही?” ‘‘ආකිණ්ණලුද්දො පුරිසො, ධාතිචෙලංව මක්ඛිතො; තස්මිං මෙ වචනං නත්ථි, ත්වඤ්චාරහාමි වත්තවෙ. “जो मनुष्य अत्यंत क्रूर आणि पापी आहे, दाईच्या मळलेल्या वस्त्रासारखा मळलेला आहे, त्याच्याबद्दल मला काही बोलायचे नाही. परंतु मला तुम्हालाच बोलणे योग्य वाटते. ‘‘අනඞ්ගණස්ස පොසස්ස, නිච්චං සුචිගවෙසිනො; වාලග්ගමත්තං පාපස්ස, අබ්භාමත්තංව ඛායතී’’ති. “कारण जो निष्पाप (क्लेशरहित) आहे आणि नेहमी पवित्रतेच्या शोधात असतो, त्याला केसाच्या टोकाएवढे लहान पापही ढगाएवढे मोठे दिसते.” ‘‘අද්ධා මං යක්ඛ ජානාසි, අථො මෙ අනුකම්පසි; පුනපි යක්ඛ වජ්ජාසි, යදා පස්සසි එදිස’’න්ති. “हे यक्षा, खरोखरच तू मला ओळखतोस आणि माझ्यावर अनुकंपा करतोस. जेव्हा जेव्हा तू माझे असे कृत्य पाहशील, तेव्हा पुन्हा मला असेच सांगत जा.” ‘‘නෙව [Pg.207] තං උපජීවාම, නපි තෙ භතකාම්හසෙ; ත්වමෙව භික්ඛු ජානෙය්ය, යෙන ගච්ඡෙය්ය සුග්ගති’’න්ති. “आम्ही तुझ्यावर उपजीविका करत नाही, ना आम्ही तुझे नोकर आहोत. हे भिक्खू, तू स्वतःच जाण की कोणत्या कर्माने तू सुगतीला जाऊ शकशील.” අථ ඛො සො භික්ඛු තාය දෙවතාය සංවෙජිතො සංවෙගමාපාදීති. त्यानंतर, त्या देवतेने संवेगित केल्यामुळे त्या भिक्खूला संवेग प्राप्त झाला. වනසංයුත්තං සමත්තං. वनसंयुत्त समाप्त झाले. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – විවෙකං උපට්ඨානඤ්ච, කස්සපගොත්තෙන සම්බහුලා; ආනන්දො අනුරුද්ධො ච, නාගදත්තඤ්ච කුලඝරණී. विवेक सुत्त, उपट्ठाण सुत्त, कस्सपगोत्त सुत्त, संबहुला सुत्त, आनंद सुत्त, अनुरुद्ध सुत्त, नागदत्त सुत्त आणि कुलघरणी सुत्त. වජ්ජිපුත්තො ච වෙසාලී, සජ්ඣායෙන අයොනිසො; මජ්ඣන්හිකාලම්හි පාකතින්ද්රිය, පදුමපුප්ඵෙන චුද්දස භවෙති. वज्जिपुत्त सुत्त, वेसाली सुत्त, सज्झाय सुत्त, अयोनिसो सुत्त, मज्झन्हिकाल सुत्त, पाकतइंद्रिय सुत्त आणि पदुमपुप्फ सुत्त; अशी ही चौदा सुत्ते आहेत. 10. යක්ඛසංයුත්තං १०. यक्खसंयुत्त 1. ඉන්දකසුත්තං १. इन्दक सुत्त 235. එවං [Pg.208] මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති ඉන්දකූටෙ පබ්බතෙ, ඉන්දකස්ස යක්ඛස්ස භවනෙ. අථ ඛො ඉන්දකො යක්ඛො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – २३५. असे मी ऐकले आहे – एकदा भगवान बुद्ध राजगृह येथे इन्दकूट पर्वतावर, इन्दक यक्षाच्या भवनात राहत होते. तेव्हा इन्दक यक्ष जेथे भगवान होते तेथे आला आणि भगवंतांना गाथेने म्हणाला – ‘‘රූපං න ජීවන්ති වදන්ති බුද්ධා, කථං න්වයං වින්දතිමං සරීරං; කුතස්ස අට්ඨීයකපිණ්ඩමෙති, කථං න්වයං සජ්ජති ගබ්භරස්මි’’න්ති. “बुद्ध म्हणतात की रूप हा जीव (आत्मा) नाही, मग या जीवाला हे शरीर कसे मिळते? त्याला हा हाडांचा आणि मांसाचा गोळा कोठून मिळतो? आणि हा जीव मातेच्या गर्भात कसा अडकतो (उत्पन्न होतो)?” ‘‘පඨමං කලලං හොති, කලලා හොති අබ්බුදං; අබ්බුදා ජායතෙ පෙසි, පෙසි නිබ්බත්තතී ඝනො; ඝනා පසාඛා ජායන්ති, කෙසා ලොමා නඛාපි ච. “प्रथम 'कलल' (द्रवरूप) तयार होते, कललापासून 'अब्बुद' (बुडबुडा) तयार होतो, अब्बुदापासून 'पेसी' (मांसाचा तुकडा) जन्म घेतो, पेसीपासून 'घन' (मांसाचा घट्ट गोळा) निर्माण होतो. घनापासून पाच शाखा (हात, पाय व डोके) निर्माण होतात आणि त्यानंतर केस, रोम (अंगावरील केस) व नखे उत्पन्न होतात. ‘‘යඤ්චස්ස භුඤ්ජතී මාතා, අන්නං පානඤ්ච භොජනං; තෙන සො තත්ථ යාපෙති, මාතුකුච්ඡිගතො නරො’’ති. “आणि त्याची माता जे काही अन्न, पाणी व भोजन ग्रहण करते, त्याद्वारे मातेच्या गर्भातील तो जीव तेथे जगतो (पोषण मिळवतो).” 2. සක්කනාමසුත්තං २. सक्कनाम सुत्त 236. එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති ගිජ්ඣකූටෙ පබ්බතෙ. අථ ඛො සක්කනාමකො යක්ඛො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – २३६. एकदा भगवान बुद्ध राजगृह येथे गिज्झकूट (गृध्रकूट) पर्वतावर राहत होते. तेव्हा सक्क नावाचा यक्ष जेथे भगवान होते तेथे आला आणि भगवंतांना गाथेने म्हणाला – ‘‘සබ්බගන්ථප්පහීනස්ස, විප්පමුත්තස්ස තෙ සතො; සමණස්ස න තං සාධු, යදඤ්ඤමනුසාසසී’’ති. “सर्व ग्रंथांमधून (बंधनांमधून) मुक्त झालेल्या, पूर्णपणे विमुक्त आणि स्मृतिमान असलेल्या आपल्यासारख्या श्रमणाला इतरांना उपदेश करणे योग्य नाही.” ‘‘යෙන කෙනචි වණ්ණෙන, සංවාසො සක්ක ජායති; න තං අරහති සප්පඤ්ඤො, මනසා අනුකම්පිතුං. “हे सक्क, कोणत्याही कारणाने जेव्हा कोणाशी सहवास (संबंध) येतो, तेव्हा प्रज्ञावंताने मनात त्या व्यक्तीबद्दल (केवळ आसक्तीपोटी) अनुकंपा बाळगणे योग्य नाही. ‘‘මනසා චෙ පසන්නෙන, යදඤ්ඤමනුසාසති; න තෙන හොති සංයුත්තො, යානුකම්පා අනුද්දයා’’ති. “जर प्रसन्न (शुद्ध) मनाने कोणी दुसऱ्याला उपदेश करत असेल, तर तो त्या उपदेशामुळे बंधनात पडत नाही; कारण ती केवळ अनुकंपा आणि दया असते.” 3. සූචිලොමසුත්තං ३. सूचिलोम सुत्त 237. එකං සමයං භගවා ගයායං විහරති ටඞ්කිතමඤ්චෙ සූචිලොමස්ස යක්ඛස්ස භවනෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන ඛරො ච යක්ඛො සූචිලොමො [Pg.209] ච යක්ඛො භගවතො අවිදූරෙ අතික්කමන්ති. අථ ඛො ඛරො යක්ඛො සූචිලොමං යක්ඛං එතදවොච – ‘‘එසො සමණො’’ති! ‘‘නෙසො සමණො, සමණකො එසො’’. ‘‘යාව ජානාමි යදි වා සො සමණො යදි වා පන සො සමණකො’’ති. २३७. एकदा भगवान बुद्ध गया येथे सूचिलोम यक्षाच्या भवनातील एका पाषाणमंचावर (टंकितमंचावर) राहत होते. त्या वेळी खर यक्ष आणि सूचिलोम यक्ष भगवंतांच्या जवळून जात होते. तेव्हा खर यक्षाने सूचिलोम यक्षाला म्हटले – “हा श्रमण आहे!” (सूचिलोम म्हणाला) “हा श्रमण नाही, हा तर ढोंगी श्रमण (श्रमणक) आहे. तो श्रमण आहे की ढोंगी श्रमण आहे, हे मी तपासून पाहतो.” අථ ඛො සූචිලොමො යක්ඛො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතො කායං උපනාමෙසි. අථ ඛො භගවා කායං අපනාමෙසි. අථ ඛො සූචිලොමො යක්ඛො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘භායසි මං සමණා’’ති? ‘‘න ඛ්වාහං තං, ආවුසො, භායාමි; අපි ච තෙ සම්ඵස්සො පාපකො’’ති. ‘‘පඤ්හං තං, සමණ පුච්ඡිස්සාමි. සචෙ මෙ න බ්යාකරිස්සසි, චිත්තං වා තෙ ඛිපිස්සාමි, හදයං වා තෙ ඵාලෙස්සාමි, පාදෙසු වා ගහෙත්වා පාරගඞ්ගාය ඛිපිස්සාමී’’ති. ‘‘න ඛ්වාහං තං, ආවුසො, පස්සාමි සදෙවකෙ ලොකෙ සමාරකෙ සබ්රහ්මකෙ සස්සමණබ්රාහ්මණියා පජාය සදෙවමනුස්සාය, යො මෙ චිත්තං වා ඛිපෙය්ය හදයං වා ඵාලෙය්ය පාදෙසු වා ගහෙත්වා පාරගඞ්ගාය ඛිපෙය්ය; අපි ච ත්වං, ආවුසො, පුච්ඡ යදා කඞ්ඛසී’’ති. අථ ඛො සූචිලොමො යක්ඛො භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – ( ) त्यानंतर सूचिलोम यक्ष जेथे भगवान होते तेथे आला आणि त्याने भगवंतांच्या शरीराजवळ आपले शरीर नेले. तेव्हा भगवंतांनी आपले शरीर थोडे दूर केले. मग सूचिलोम यक्षाने भगवंतांना विचारले – “श्रमणा, तू मला घाबरतोस का?” (भगवान म्हणाले) “हे मित्रा, मी तुला मुळीच घाबरत नाही; परंतु तुझा स्पर्श अपवित्र (अप्रिय) आहे.” (यक्ष म्हणाला) “श्रमणा, मी तुला एक प्रश्न विचारणार आहे. जर तू मला उत्तर दिले नाहीस, तर मी तुझे चित्त विचलित करीन, किंवा तुझे हृदय फाडून टाकीन, किंवा तुझे पाय धरून तुला गंगेच्या पलीकडे फेकून देईन.” (भगवान म्हणाले) “हे मित्रा, देव, मार आणि ब्रह्मा यांच्यासह या जगात, श्रमण-ब्राह्मणांसह, देव आणि मनुष्यांच्या या प्रजातीमध्ये मला असा कोणीही दिसत नाही जो माझे चित्त विचलित करू शकेल, माझे हृदय फाडू शकेल किंवा माझे पाय धरून मला गंगेच्या पलीकडे फेकू शकेल. तरीही, हे मित्रा, तुला जे विचारायचे असेल ते विचार.” तेव्हा सूचिलोम यक्षाने भगवंतांना गाथेने विचारले – ‘‘රාගො ච දොසො ච කුතොනිදානා,අරතී රතී ලොමහංසො කුතොජා; කුතො සමුට්ඨාය මනොවිතක්කා,කුමාරකා ධඞ්කමිවොස්සජන්තී’’ති. “राग (आसक्ती) आणि द्वेष यांचे मूळ काय आहे? अरती (उदासीनता), रती (आनंद) आणि रोमांच (अंगावर काटा येणे) कोठून उत्पन्न होतात? मनातील कुविचार कोठून उद्भवतात, जे माणसाला तसे विचलित करतात जसे मुले कावळ्याला पकडून सोडून देतात?” ‘‘රාගො ච දොසො ච ඉතොනිදානා,අරතී රතී ලොමහංසො ඉතොජා; ඉතො සමුට්ඨාය මනොවිතක්කා,කුමාරකා ධඞ්කමිවොස්සජන්ති. “राग आणि द्वेष यांचे मूळ याच आत्मभावात (शरीरात) आहे; अरती, rati आणि रोमांच येथूनच उत्पन्न होतात. मनातील कुविचार येथूनच उद्भवतात, जे माणसाला तसे विचलित करतात जसे मुले कावळ्याला पकडून सोडून देतात. ‘‘ස්නෙහජා අත්තසම්භූතා, නිග්රොධස්සෙව ඛන්ධජා; පුථූ විසත්තා කාමෙසු, මාලුවාව විතතා වනෙ. हे विचार तृष्णेच्या स्नेहातून जन्मतात, स्वतःमधूनच उत्पन्न होतात, जसे वडाच्या झाडाच्या फांद्यांतून पारंब्या फुटतात. ते कामभोगांमध्ये अनेक प्रकारे गुंतलेले असतात, जसे जंगलात माळूवेची वेल झाडाला वेढून पसरते. ‘‘යෙ [Pg.210] නං පජානන්ති යතොනිදානං,තෙ නං විනොදෙන්ති සුණොහි යක්ඛ; තෙ දුත්තරං ඔඝමිමං තරන්ති,අතිණ්ණපුබ්බං අපුනබ්භවායා’’ති. हे यक्षा, ऐक! जे लोग या विचारांचे मूळ कारण जाणतात, ते त्यांचा नाश करतात. ते या कठीण अशा क्लेश-ओघाला (प्रवाहाला) पार करतात, जो पूर्वी कधीही पार केला गेला नव्हता, जेणेकरून त्यांचा पुनर्जन्म होत नाही.” 4. මණිභද්දසුත්තං ४. मणिभद्द सुत्त 238. එකං සමයං භගවා මගධෙසු විහරති මණිමාලිකෙ චෙතියෙ මණිභද්දස්ස යක්ඛස්ස භවනෙ. අථ ඛො මණිභද්දො යක්ඛො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – २३८. एकदा भगवान बुद्ध मगध देशात मणिमालिक चैत्यात, मणिभद्द यक्षाच्या भवनात राहत होते. तेव्हा मणिभद्द यक्ष जेथे भगवान होते तेथे आला आणि भगवंतांच्या समोर ही गाथा म्हणाला – ‘‘සතීමතො සදා භද්දං, සතිමා සුඛමෙධති; සතීමතො සුවෙ සෙය්යො, වෙරා ච පරිමුච්චතී’’ති. “स्मृतिमान (जागरूक) माणसाचे नेहमी कल्याण होते, स्मृतिमान माणूस सुख प्राप्त करतो. स्मृतिमान माणसाचा प्रत्येक दिवस अधिक चांगला होतो आणि तो वैरापासून (शत्रुत्वापासून) मुक्त होतो.” ‘‘සතීමතො සදා භද්දං, සතිමා සුඛමෙධති; සතීමතො සුවෙ සෙය්යො, වෙරා න පරිමුච්චති. “स्मृतिमान माणसाचे नेहमी कल्याण होते, स्मृतिमान माणूस सुख प्राप्त करतो. स्मृतिमान माणसाचा प्रत्येक दिवस अधिक चांगला होतो, परंतु तो केवळ एवढ्याने वैरापासून मुक्त होत नाही.” ‘‘යස්ස සබ්බමහොරත්තං, අහිංසාය රතො මනො; මෙත්තං සො සබ්බභූතෙසු, වෙරං තස්ස න කෙනචී’’ති. "ज्याचे मन रात्रंदिवस अहिंसेमध्ये रममाण असते, आणि जो सर्व प्राण्यांविषयी मैत्रीभाव बाळगतो, त्याचे कोणाशीही वैर नसते." 5. සානුසුත්තං ५. सानू सुत्त 239. එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන අඤ්ඤතරිස්සා උපාසිකාය සානු නාම පුත්තො යක්ඛෙන ගහිතො හොති. අථ ඛො සා උපාසිකා පරිදෙවමානා තායං වෙලායං ඉමා ගාථායො අභාසි – २३९. एक वेळ भगवान श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. त्या वेळी एका उपासिकेचा 'सानू' नावाचा मुलगा एका यक्षाने पकडला होता. तेव्हा ती उपासिका रडत-आक्रोश करत त्या वेळी या गाथा म्हणाली – ‘‘චාතුද්දසිං පඤ්චදසිං, යා ච පක්ඛස්ස අට්ඨමී; පාටිහාරියපක්ඛඤ්ච, අට්ඨඞ්ගසුසමාගතං. "जे लोक पक्षाच्या चौदाव्या, पंधराव्या आणि आठव्या दिवशी, तसेच प्रातिहारिय पक्षाच्या वेळी, आठ अंगांनी युक्त अशा... ‘‘උපොසථං උපවසන්ති, බ්රහ්මචරියං චරන්ති යෙ; න තෙහි යක්ඛා කීළන්ති, ඉති මෙ අරහතං සුතං; සා දානි අජ්ජ පස්සාමි, යක්ඛා කීළන්ති සානුනා’’ති. ...उपोसथाचे पालन करतात आणि ब्रह्मचर्य आचरतात, त्यांच्याशी यक्ष खेळत नाहीत (त्यांना त्रास देत नाहीत), असे मी अर्हतांकडून ऐकले आहे. परंतु आज मी स्वतः पाहत आहे की यक्ष सानूशी खेळत आहेत (त्याला त्रास देत आहेत)." ‘‘චාතුද්දසිං [Pg.211] පඤ්චදසිං, යා ච පක්ඛස්ස අට්ඨමී; පාටිහාරියපක්ඛඤ්ච, අට්ඨඞ්ගසුසමාගතං; උපොසථං උපවසන්ති, බ්රහ්මචරියං චරන්ති යෙ. "जे लोक पक्षाच्या चौदाव्या, पंधराव्या आणि आठव्या दिवशी, तसेच प्रातिहारिय पक्षाच्या वेळी, आठ अंगांनी युक्त अशा उपोसथाचे पालन करतात आणि ब्रह्मचर्य आचरतात, ‘‘න තෙහි යක්ඛා කීළන්ති, සාහු තෙ අරහතං සුතං; සානුං පබුද්ධං වජ්ජාසි, යක්ඛානං වචනං ඉදං; මාකාසි පාපකං කම්මං, ආවි වා යදි වා රහො. त्यांच्याशी यक्ष खेळत नाहीत (त्यांना त्रास देत नाहीत). अर्हतांकडून तू जे ऐकले आहेस ते अगदी योग्य आहे. सानू जेव्हा शुद्धीवर येईल, त्याला यक्षांचा हा संदेश सांग: 'उघडपणे असो वा गुप्तपणे, कोणतेही पापकृत्य करू नकोस. ‘‘සචෙ ච පාපකං කම්මං, කරිස්සසි කරොසි වා; න තෙ දුක්ඛා පමුත්යත්ථි, උප්පච්චාපි පලායතො’’ති. जर तू पापकृत्य केलेस किंवा आता करत असशील, तर आकाशात उडून पळून गेलास तरी तुझी दुःखातून सुटका होणार नाही.'" ‘‘මතං වා අම්ම රොදන්ති, යො වා ජීවං න දිස්සති; ජීවන්තං අම්ම පස්සන්තී, කස්මා මං අම්ම රොදසී’’ති. "आई, लोक एकतर मृत व्यक्तीसाठी रडतात किंवा जो जिवंत असूनही दिसत नाही त्याच्यासाठी रडतात. पण आई, मला जिवंत पाहत असतानाही तू माझ्यासाठी का रडत आहेस?" ‘‘මතං වා පුත්ත රොදන්ති, යො වා ජීවං න දිස්සති; යො ච කාමෙ චජිත්වාන, පුනරාගච්ඡතෙ ඉධ; තං වාපි පුත්ත රොදන්ති, පුන ජීවං මතො හි සො. "बाळा, लोक मृत व्यक्तीसाठी रडतात किंवा जो जिवंत असूनही दिसत नाही त्याच्यासाठी रडतात. परंतु जो कामभोगांचा त्याग करून पुन्हा या गृहस्थाश्रमात परत येतो, त्याच्यासाठीही लोक रडतात, कारण जिवंत असूनही तो मृतासमानच असतो. ‘‘කුක්කුළා උබ්භතො තාත, කුක්කුළං පතිතුමිච්ඡසි; නරකා උබ්භතො තාත, නරකං පතිතුමිච්ඡසි. हे प्रिय बाळा, धगधगत्या कोळशांमधून बाहेर काढलेला असतानाही तू पुन्हा धगधगत्या कोळशांमध्ये पडू इच्छितोस! नरकातून बाहेर काढलेला असतानाही तू पुन्हा नरकात पडू इच्छितोस! ‘‘අභිධාවථ භද්දන්තෙ, කස්ස උජ්ඣාපයාමසෙ; ආදිත්තා නීහතං භණ්ඩං, පුන ඩය්හිතුමිච්ඡසී’’ති. पुढे धाव, तुझे कल्याण असो! आम्ही आमचे दुःख कोणाकडे मांडणार? पेटलेल्या घरातून बाहेर काढलेले सामान तू पुन्हा जळण्यासाठी आत टाकू इच्छितोस!" 6. පියඞ්කරසුත්තං ६. प्रियंकर सुत्त 240. එකං සමයං ආයස්මා අනුරුද්ධො සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන ආයස්මා අනුරුද්ධො රත්තියා පච්චූසසමයං පච්චුට්ඨාය ධම්මපදානි භාසති. අථ ඛො පියඞ්කරමාතා යක්ඛිනී පුත්තකං එවං තොසෙසි – २४०. एक वेळ आयुष्यमान अनुरुद्ध श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. त्या वेळी आयुष्यमान अनुरुद्ध रात्रीच्या पहाटेच्या वेळी उठून धम्मपदांचे पठण करत होते. तेव्हा प्रियंकराची आई असलेल्या यक्षिणीने आपल्या लहान मुलाला अशा प्रकारे शांत केले – ‘‘මා සද්දං කරි පියඞ්කර, භික්ඛු ධම්මපදානි භාසති; අපි ච ධම්මපදං විජානිය, පටිපජ්ජෙම හිතාය නො සියා. "प्रियंकरा, आवाज करू नकोस. भिक्खू धम्मपदांचे पठण करत आहेत. धम्मपद समजून घेऊन जर आपण त्यानुसार आचरण केले, तर ते आपल्या कल्याणासाठी ठरेल. ‘‘පාණෙසු ච සංයමාමසෙ, සම්පජානමුසා න භණාමසෙ; සික්ඛෙම සුසීල්යමත්තනො, අපි මුච්චෙම පිසාචයොනියා’’ති. आपण प्राण्यांविषयी संयम बाळगू या, जाणूनबुजून असत्य बोलणार नाही. स्वतःच्या उत्तम शीलधर्माचे पालन करू या, जेणेकरून कदाचित आपली या पिशाच योनीतून सुटका होईल." 7. පුනබ්බසුසුත්තං ७. पुनब्बसू सुत्त 241. එකං [Pg.212] සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා භික්ඛූ නිබ්බානපටිසංයුත්තාය ධම්මියා කථාය සන්දස්සෙති සමාදපෙති සමුත්තෙජෙති සම්පහංසෙති. තෙ ච භික්ඛූ අට්ඨිං කත්වා මනසි කත්වා සබ්බචෙතසා සමන්නාහරිත්වා ඔහිතසොතා ධම්මං සුණන්ති. අථ ඛො පුනබ්බසුමාතා යක්ඛිනී පුත්තකෙ එවං තොසෙසි – २४१. एक वेळ भगवान श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. त्या वेळी भगवान भिक्खूंना निर्वाणाशी संबंधित धम्म उपदेश देऊन धम्माचे दर्शन घडवत होते, धम्मात प्रवृत्त करत होते, त्यांना उत्साहित व प्रफुल्लित करत होते. ते भिक्खू देखील आदरपूर्वक, मन लावून, संपूर्ण चित्त एकाग्र करून आणि कान देऊन धम्म ऐकत होते. त्या वेळी पुनब्बसूची आई असलेल्या यक्षिणीने आपल्या मुलांना अशा प्रकारे शांत केले – ‘‘තුණ්හී උත්තරිකෙ හොහි, තුණ්හී හොහි පුනබ්බසු; යාවාහං බුද්ධසෙට්ඨස්ස, ධම්මං සොස්සාමි සත්ථුනො. "उत्तरीके, शांत राहा; पुनब्बसू, तूही शांत राहा! जोपर्यंत मी देव आणि मनुष्यांचे शास्ते असलेल्या सर्वश्रेष्ठ बुद्धांचा धम्म ऐकत आहे, तोपर्यंत शांत राहा. ‘‘නිබ්බානං භගවා ආහ, සබ්බගන්ථප්පමොචනං; අතිවෙලා ච මෙ හොති, අස්මිං ධම්මෙ පියායනා. भगवान सर्व बंधनांतून मुक्त करणाऱ्या निर्वाणाविषयी सांगत आहेत. या धम्माविषयी माझ्या मनात अत्यंत तीव्र प्रेम निर्माण झाले आहे. ‘‘පියො ලොකෙ සකො පුත්තො, පියො ලොකෙ සකො පති; තතො පියතරා මය්හං, අස්ස ධම්මස්ස මග්ගනා. जगात स्वतःचा मुलगा प्रिय असतो, जगात स्वतःचा पती प्रिय असतो; परंतु माझ्यासाठी या धम्माचा शोध त्यांच्यापेक्षाही अधिक प्रिय आहे. ‘‘න හි පුත්තො පති වාපි, පියො දුක්ඛා පමොචයෙ; යථා සද්ධම්මස්සවනං, දුක්ඛා මොචෙති පාණිනං. कारण प्रिय असलेला मुलगा किंवा पती देखील दुःखातून मुक्त करू शकत नाही, ज्याप्रमाणे सद्धम्माचे श्रवण प्राण्यांना दुःखातून मुक्त करते. ‘‘ලොකෙ දුක්ඛපරෙතස්මිං, ජරාමරණසංයුතෙ; ජරාමරණමොක්ඛාය, යං ධම්මං අභිසම්බුධං; තං ධම්මං සොතුමිච්ඡාමි, තුණ්හී හොහි පුනබ්බසූ’’ති. दुःखाने ग्रासलेल्या आणि जरा-मरणाने जखडलेल्या या जगात, जरा-मरणापासून मुक्ती मिळवण्यासाठी ज्या धम्माचा बुद्धांनी साक्षात्कार केला आहे, तो धम्म ऐकण्याची माझी इच्छा आहे. म्हणून पुनब्बसू, तू शांत राहा!" ‘‘අම්මා න බ්යාහරිස්සාමි, තුණ්හීභූතායමුත්තරා; ධම්මමෙව නිසාමෙහි, සද්ධම්මස්සවනං සුඛං; සද්ධම්මස්ස අනඤ්ඤාය, අම්මා දුක්ඛං චරාමසෙ. "आई, मी बोलणार नाही, ही उत्तरा देखील शांत आहे. तू केवळ धम्मावरच लक्ष केंद्रित कर, कारण सद्धम्माचे श्रवण सुखकारक असते. आई, सद्धम्म न जाणल्यामुळेच आपण दुःखात भटकत राहिलो आहोत. ‘‘එස දෙවමනුස්සානං, සම්මූළ්හානං පභඞ්කරො; බුද්ධො අන්තිමසාරීරො, ධම්මං දෙසෙති චක්ඛුමා’’ති. संभ्रमित झालेल्या देव आणि मनुष्यांना प्रकाश देणारे, अंतिम शरीर धारण केलेले, प्रज्ञाचक्षू असलेले हे बुद्ध धम्माचा उपदेश करत आहेत." ‘‘සාධු ඛො පණ්ඩිතො නාම, පුත්තො ජාතො උරෙසයො; පුත්තො මෙ බුද්ධසෙට්ඨස්ස, ධම්මං සුද්ධං පියායති. "माझ्या उदरी जन्मलेला मुलगा खरोखरच बुद्धिमान झाला आहे, हे खूप चांगले झाले. माझा मुलगा सर्वश्रेष्ठ बुद्धांच्या शुद्ध धम्मावर प्रेम करतो. ‘‘පුනබ්බසු සුඛී හොහි, අජ්ජාහම්හි සමුග්ගතා; දිට්ඨානි අරියසච්චානි, උත්තරාපි සුණාතු මෙ’’ති. पुनब्बसू, तू सुखी हो! आज अखेर माझी सुटका झाली आहे. आपण आर्यसत्ये पाहिली आहेत. माझी मुलगी उत्तरा देखील माझे ऐको!" 8. සුදත්තසුත්තං ८. सुदत्त सुत्त 242. එකං [Pg.213] සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති සීතවනෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන අනාථපිණ්ඩිකො ගහපති රාජගහං අනුප්පත්තො හොති කෙනචිදෙව කරණීයෙන. අස්සොසි ඛො අනාථපිණ්ඩිකො ගහපති – ‘‘බුද්ධො කිර ලොකෙ උප්පන්නො’’ති. තාවදෙව ච පන භගවන්තං දස්සනාය උපසඞ්කමිතුකාමො හොති. අථස්ස අනාථපිණ්ඩිකස්ස ගහපතිස්ස එතදහොසි – ‘‘අකාලො ඛො අජ්ජ භගවන්තං දස්සනාය උපසඞ්කමිතුං. ස්වෙ දානාහං කාලෙන භගවන්තං දස්සනාය ගමිස්සාමී’’ති බුද්ධගතාය සතියා නිපජ්ජි. රත්තියා සුදං තික්ඛත්තුං වුට්ඨාසි පභාතන්ති මඤ්ඤමානො. අථ ඛො අනාථපිණ්ඩිකො ගහපති යෙන සිවථිකද්වාරං තෙනුපසඞ්කමි. අමනුස්සා ද්වාරං විවරිංසු. අථ ඛො අනාථපිණ්ඩිකස්ස ගහපතිස්ස නගරම්හා නික්ඛමන්තස්ස ආලොකො අන්තරධායි, අන්ධකාරො පාතුරහොසි, භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසො උදපාදි, තතොව පුන නිවත්තිතුකාමො අහොසි. අථ ඛො සිවකො යක්ඛො අන්තරහිතො සද්දමනුස්සාවෙසි – २४२. एक वेळ भगवान राजगृहातील शीतवनात विहार करत होते. त्या वेळी अनाथपिंडिक गृहपती काही कामानिमित्त राजगृहात आला होता. अनाथपिंडिक गृहपतीने ऐकले की, 'जगात बुद्धांचा उदय झाला आहे!' हे ऐकताच त्याला तात्काळ भगवंतांच्या दर्शनासाठी जाण्याची इच्छा झाली. परंतु अनाथपिंडिक गृहपतीच्या मनात विचार आला – 'आज भगवंतांच्या दर्शनासाठी जाण्याची ही योग्य वेळ नाही. उद्या सकाळी मी भगवंतांच्या दर्शनासाठी जाईन.' असे विचार करून तो बुद्धानुस्मृती करत झोपला. रात्रीच्या वेळी पहाट झाली असे समजून तो तीन वेळा उठला. त्यानंतर अनाथपिंडिक गृहपती स्मशानभूमीच्या दाराकडे गेला. अमनुष्यांनी दार उघडले. परंतु अनाथपिंडिक गृहपती शहराबाहेर पडत असतानाच प्रकाश नाहीसा झाला आणि अंधार पसरला. त्याच्या मनात भीती, थरकाप आणि अंगावर काटा उभा राहिला, आणि त्याला तेथूनच परत फिरावेसे वाटले. तेव्हा अदृश्य असलेल्या सीवक नावाच्या यक्षाने त्याला हा आवाज ऐकवला – ‘‘සතං හත්ථී සතං අස්සා, සතං අස්සතරීරථා; සතං කඤ්ඤාසහස්සානි, ආමුක්කමණිකුණ්ඩලා; එකස්ස පදවීතිහාරස්ස, කලං නාග්ඝන්ති සොළසිං. "एक लाख हत्ती, एक लाख घोडे, एक लाख खेचरांचे रथ आणि रत्नांचे कर्णभूषणे परिधान केलेल्या एक लाख कन्या – हे सर्व मिळून एका पावलाच्या सोळाव्या भागाच्या बरोबरीचे देखील नाहीत. ‘‘අභික්කම ගහපති, අභික්කම ගහපති; අභික්කමනං තෙ සෙය්යො, නො පටික්කමන’’න්ති. पुढे पाऊल टाक, गृहपती! पुढे पाऊल टाक, गृहपती! पुढे जाणे हेच तुझ्यासाठी श्रेयस्कर आहे, मागे फिरणे नव्हे." අථ ඛො අනාථපිණ්ඩිකස්ස ගහපතිස්ස අන්ධකාරො අන්තරධායි, ආලොකො පාතුරහොසි, යං අහොසි භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසො, සො පටිප්පස්සම්භි. දුතියම්පි ඛො අනාථපිණ්ඩිකස්ස ගහපතිස්ස ආලොකො අන්තරධායි, අන්ධකාරො පාතුරහොසි, භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසො උදපාදි, තතොව පුන නිවත්තිතුකාමො අහොසි. දුතියම්පි ඛො සිවකො යක්ඛො අන්තරහිතො සද්දමනුස්සාවෙසි – तेव्हा अनाथपिंडिक गृहपतीचा अंधार नाहीसा झाला आणि प्रकाश पसरला. त्याच्या मनात जी भीती, थरकाप आणि अंगावर काटा उभा राहिला होता, तो शांत झाला. दुसऱ्यांदा देखील अनाथपिंडिक गृहपतीचा प्रकाश नाहीसा झाला, अंधार पसरला, भीती, थरकाप आणि अंगावर काटा उभा राहिला, आणि त्याला तेथूनच परत फिरावेसे वाटले. दुसऱ्यांदा देखील अदृश्य असलेल्या सीवक यक्षाने त्याला हा आवाज ऐकवला – ‘‘සතං [Pg.214] හත්ථී සතං අස්සා…පෙ…කලං නාග්ඝන්ති සොළසිං. “शंभर हत्ती, शंभर घोडे... (इत्यादी) विहाराकडे जाणाऱ्या व्यक्तीच्या एका पावलाच्या प्रगतीच्या (पुण्याच्या) सोळाव्या भागाचीही बरोबरी करू शकत नाहीत.” ‘‘අභික්කම ගහපති, අභික්කම ගහපති; අභික්කමනං තෙ සෙය්යො, නො පටික්කමන’’න්ති. “पुढे जा, गृहपती! पुढे जा, गृहपती! पुढे जाणेच तुझ्यासाठी कल्याणकारक आहे, मागे फिरणे नव्हे.” අථ ඛො අනාථපිණ්ඩිකස්ස ගහපතිස්ස අන්ධකාරො අන්තරධායි, ආලොකො පාතුරහොසි, යං අහොසි භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසො, සො පටිප්පස්සම්භි. තතියම්පි ඛො අනාථපිණ්ඩිකස්ස ගහපතිස්ස ආලොකො අන්තරධායි, අන්ධකාරො පාතුරහොසි, භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසො උදපාදි, තතොව පුන නිවත්තිතුකාමො අහොසි. තතියම්පි ඛො සිවකො යක්ඛො අන්තරහිතො සද්දමනුස්සාවෙසි – तेव्हा अनाथपिंडिक गृहपतीचा अंधार नाहीसा झाला आणि प्रकाश प्रकट झाला. त्याचे जे काही भय, थरकाप आणि अंगावर शहारे येणे होते, ते शांत झाले. तिसऱ्यांदाही अनाथपिंडिक गृहपतीचा प्रकाश नाहीसा झाला आणि अंधार प्रकट झाला; भय, थरकाप आणि अंगावर शहारे येणे उत्पन्न झाले, आणि त्याला पुन्हा मागे फिरावेसे वाटले. तिसऱ्यांदाही अदृश्य असलेल्या सीवक यक्षाने हा आवाज ऐकवला – ‘‘සතං හත්ථී සතං අස්සා…පෙ…කලං නාග්ඝන්ති සොළසිං. “शंभर हत्ती, शंभर घोडे... (इत्यादी) विहाराकडे जाणाऱ्या व्यक्तीच्या एका पावलाच्या प्रगतीच्या (पुण्याच्या) सोळाव्या भागाचीही बरोबरी करू शकत नाहीत.” ‘‘අභික්කම ගහපති, අභික්කම ගහපති; අභික්කමනං තෙ සෙය්යො, නො පටික්කමන’’න්ති. “पुढे जा, गृहपती! पुढे जा, गृहपती! पुढे जाणेच तुझ्यासाठी कल्याणकारक आहे, मागे फिरणे नव्हे.” අථ ඛො අනාථපිණ්ඩිකස්ස ගහපතිස්ස අන්ධකාරො අන්තරධායි, ආලොකො පාතුරහොසි, යං අහොසි භයං ඡම්භිතත්තං ලොමහංසො, සො පටිප්පස්සම්භි. අථ ඛො අනාථපිණ්ඩිකො ගහපති යෙන සීතවනං යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි. तेव्हा अनाथपिंडिक गृहपतीचा अंधार नाहीसा झाला आणि प्रकाश प्रकट झाला. त्याचे जे काही भय, थरकाप आणि अंगावर शहारेणे होते, ते शांत झाले. त्यानंतर अनाथपिंडिक गृहपती जेथे शीतवन होते आणि जेथे भगवान होते, तेथे गेला. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා රත්තියා පච්චූසසමයං පච්චුට්ඨාය අබ්භොකාසෙ චඞ්කමති. අද්දසා ඛො භගවා අනාථපිණ්ඩිකං ගහපතිං දූරතොව ආගච්ඡන්තං. දිස්වාන චඞ්කමා ඔරොහිත්වා පඤ්ඤත්තෙ ආසනෙ නිසීදි. නිසජ්ජ ඛො භගවා අනාථපිණ්ඩිකං ගහපතිං එතදවොච – ‘‘එහි සුදත්තා’’ති. අථ ඛො අනාථපිණ්ඩිකො ගහපති, නාමෙන මං භගවා ආලපතීති, හට්ඨො උදග්ගො තත්ථෙව භගවතො පාදෙසු සිරසා නිපතිත්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කච්චි, භන්තෙ, භගවා සුඛමසයිත්ථා’’ති? त्या वेळी भगवान रात्रीच्या पहाटेच्या वेळी उठून खुल्या जागेत चंक्रमण करत होते. भगवंतांनी अनाथपिंडिक गृहपतीला दुरूनच येताना पाहिले. त्याला पाहून चंक्रमणावरून उतरून ते तयार केलेल्या आसनावर बसले. बसल्यावर भगवंतांनी अनाथपिंडिक गृहपतीला असे म्हटले – “ये, सुदत्त!” तेव्हा अनाथपिंडिक गृहपती, 'भगवंतांनी मला माझ्या नावाने हाक मारली' या विचाराने अत्यंत हर्षित व प्रफुल्लित झाला आणि त्याने तेथेच भगवंतांच्या चरणांवर डोके ठेवून वंदन केले आणि भगवंतांना विचारले – “भंते, भगवंतांनी सुखाने विश्रांती घेतली ना?” ‘‘සබ්බදා වෙ සුඛං සෙති, බ්රාහ්මණො පරිනිබ්බුතො; යො න ලිම්පති කාමෙසු, සීතිභූතො නිරූපධි. “जो कामवासनांमध्ये लिप्त होत नाही, जो शांत झाला आहे आणि उपाधिरहित (आसक्तीरहित) आहे, असा परिनिर्वाण पावलेला ब्राह्मण (श्रेष्ठ पुरुष) नेहमीच सुखाने निजतो.” ‘‘සබ්බා ආසත්තියො ඡෙත්වා, විනෙය්ය හදයෙ දරං; උපසන්තො සුඛං සෙති, සන්තිං පප්පුය්ය චෙතසා’’ති. “सर्व प्रकारच्या आसक्ती तोडून, हृदयातील संताप (चिंता) दूर करून, मनाने शांती प्राप्त केलेला शांत पुरुष सुखाने निजतो.” 9. පඨමසුක්කාසුත්තං ९. प्रथम सुक्का सुत्त 243. එකං [Pg.215] සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන සුක්කා භික්ඛුනී මහතියා පරිසාය පරිවුතා ධම්මං දෙසෙති. අථ ඛො සුක්කාය භික්ඛුනියා අභිප්පසන්නො යක්ඛො රාජගහෙ රථිකාය රථිකං සිඞ්ඝාටකෙන සිඞ්ඝාටකං උපසඞ්කමිත්වා තායං වෙලායං ඉමා ගාථායො අභාසි – २४३. एकदा भगवान राजगृह येथील वेळुवनातील कलंदकनिवाप येथे विहार करत होते. त्या वेळी सुक्का भिक्खुणी मोठ्या समुदायाने वेढलेली असताना धम्मदेशना करत होती. तेव्हा सुक्का भिक्खुणीवर अत्यंत प्रसन्न झालेल्या एका यक्षाने राजगृहातील एका रस्त्यावरून दुसऱ्या रस्त्यावर आणि एका चौकातून दुसऱ्या चौकात जाऊन त्या वेळी या गाथा म्हटल्या – ‘‘කිං මෙ කතා රාජගහෙ මනුස්සා, මධුපීතාව සෙයරෙ; යෙ සුක්කං න පයිරුපාසන්ති, දෙසෙන්තිං අමතං පදං. “राजगृहातील या लोकांना काय झाले आहे, जे मद्य प्यायल्यासारखे झोपून राहिले आहेत? जे अमृतपदाची (निर्वाणाची) देशना करणाऱ्या सुक्का भिक्खुणीची सेवा-उपासना करत नाहीत.” ‘‘තඤ්ච පන අප්පටිවානීයං, අසෙචනකමොජවං; පිවන්ති මඤ්ඤෙ සප්පඤ්ඤා, වලාහකමිව පන්ථගූ’’ති. “तृप्ती न होणाऱ्या आणि कोणत्याही भेसळीशिवाय अत्यंत ओजस्वी अशा त्या धम्माचे प्राशन सुज्ञ लोक तसे करतात, जसे प्रवासी ढगातून पडणाऱ्या पाण्याचे प्राशन करतात.” 10. දුතියසුක්කාසුත්තං १०. द्वितीय सुक्का सुत्त 244. එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන අඤ්ඤතරො උපාසකො සුක්කාය භික්ඛුනියා භොජනං අදාසි. අථ ඛො සුක්කාය භික්ඛුනියා අභිප්පසන්නො යක්ඛො රාජගහෙ රථිකාය රථිකං සිඞ්ඝාටකෙන සිඞ්ඝාටකං උපසඞ්කමිත්වා තායං වෙලායං ඉමං ගාථං අභාසි – २४४. एकदा भगवान राजगृह येथील वेळुवनातील कलंदकनिवाप येथे विहार करत होते. त्या वेळी एका उपासकाने सुक्का भिक्खुणीला भोजन दान दिले. तेव्हा सुक्का भिक्खुणीवर अत्यंत प्रसन्न झालेल्या एका यक्षाने राजगृहातील एका रस्त्यावरून दुसऱ्या रस्त्यावर आणि एका चौकातून दुसऱ्या चौकात जाऊन त्या वेळी ही गाथा म्हटली – ‘‘පුඤ්ඤං වත පසවි බහුං, සප්පඤ්ඤො වතායං උපාසකො; යො සුක්කාය අදාසි භොජනං, සබ්බගන්ථෙහි විප්පමුත්තියා’’ති. “या सुज्ञ उपासकाने खरोखरच मोठे पुण्य संचित केले आहे, ज्याने सर्व बंधनांतून मुक्त झालेल्या सुक्का भिक्खुणीला भोजन दान दिले आहे.” 11. චීරාසුත්තං ११. चीरा सुत्त 245. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන අඤ්ඤතරො උපාසකො චීරාය භික්ඛුනියා චීවරං අදාසි. අථ ඛො චීරාය භික්ඛුනියා අභිප්පසන්නො යක්ඛො රාජගහෙ රථිකාය රථිකං සිඞ්ඝාටකෙන සිඞ්ඝාටකං උපසඞ්කමිත්වා තායං වෙලායං ඉමං ගාථං අභාසි – २४५. मी असे ऐकले आहे – एकदा भगवान राजगृह येथील वेळुवनातील कलंदकनिवाप येथे विहार करत होते. त्या वेळी एका उपासकाने चीरा भिक्खुणीला चीवर दान दिले. तेव्हा चीरा भिक्खुणीवर अत्यंत प्रसन्न झालेल्या एका यक्षाने राजगृहातील एका रस्त्यावरून दुसऱ्या रस्त्यावर आणि एका चौकातून दुसऱ्या चौकात जाऊन त्या वेळी ही गाथा म्हटली – ‘‘පුඤ්ඤං [Pg.216] වත පසවි බහුං, සප්පඤ්ඤො වතායං උපාසකො; යො චීරාය අදාසි චීවරං, සබ්බයොගෙහි විප්පමුත්තියා’’ති. “या सुज्ञ उपासकाने खरोखरच मोठे पुण्य संचित केले आहे, ज्याने सर्व योगांतून (बंधनांतून) मुक्त झालेल्या चीरा भिक्खुणीला चीवर दान दिले आहे.” 12. ආළවකසුත්තං १२. आळवक सुत्त 246. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා ආළවියං විහරති ආළවකස්ස යක්ඛස්ස භවනෙ. අථ ඛො ආළවකො යක්ඛො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘නික්ඛම, සමණා’’ති. ‘‘සාධාවුසො’’ති භගවා නික්ඛමි. ‘‘පවිස, සමණා’’ති. ‘‘සාධාවුසො’’ති භගවා පාවිසි. දුතියම්පි ඛො ආළවකො යක්ඛො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘නික්ඛම, සමණා’’ති. ‘‘සාධාවුසො’’ති භගවා නික්ඛමි. ‘‘පවිස, සමණා’’ති. ‘‘සාධාවුසො’’ති භගවා පාවිසි. තතියම්පි ඛො ආළවකො යක්ඛො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘නික්ඛම, සමණා’’ති. ‘‘සාධාවුසො’’ති භගවා නික්ඛමි. ‘‘පවිස, සමණා’’ති. ‘‘සාධාවුසො’’ති භගවා පාවිසි. චතුත්ථම්පි ඛො ආළවකො යක්ඛො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘නික්ඛම, සමණා’’ති. ‘‘න ඛ්වාහං තං, ආවුසො, නික්ඛමිස්සාමි. යං තෙ කරණීයං තං කරොහී’’ති. ‘‘පඤ්හං තං, සමණ, පුච්ඡිස්සාමි. සචෙ මෙ න බ්යාකරිස්සසි, චිත්තං වා තෙ ඛිපිස්සාමි, හදයං වා තෙ ඵාලෙස්සාමි, පාදෙසු වා ගහෙත්වා පාරගඞ්ගාය ඛිපිස්සාමී’’ති. ‘‘න ඛ්වාහං තං, ආවුසො, පස්සාමි සදෙවකෙ ලොකෙ සමාරකෙ සබ්රහ්මකෙ සස්සමණබ්රාහ්මණියා පජාය සදෙවමනුස්සාය, යෙ මෙ චිත්තං වා ඛිපෙය්ය හදයං වා ඵාලෙය්ය, පාදෙසු වා ගහෙත්වා පාරගඞ්ගාය ඛිපෙය්ය. අපි ච ත්වං, ආවුසො, පුච්ඡ යදා කඞ්ඛසී’’ති. २४६. मी असे ऐकले आहे – एकदा भगवान आळवी नगरीत आळवक यक्षाच्या भवनात विहार करत होते. तेव्हा आळवक यक्ष जेथे भगवान होते तेथे आला; आणि भगवंतांना म्हणाला – “श्रमणा, बाहेर नीघ!” भगवंतांनी “ठीक आहे, आवुसो (मित्रा)” असे म्हणून बाहेर पाऊल टाकले. यक्ष म्हणाला, “श्रमणा, आत ये!” भगवंतांनी “ठीक आहे, आवुसो” असे म्हणून आत प्रवेश केला. दुसऱ्यांदाही आळवक यक्षाने भगवंतांना म्हटले – “श्रमणा, बाहेर नीघ!” भगवंतांनी “ठीक आहे, आवुसो” असे म्हणून बाहेर पाऊल टाकले. यक्ष म्हणाला, “श्रमणा, आत ये!” भगवंतांनी “ठीक आहे, आवुसो” असे म्हणून आत प्रवेश केला. तिसऱ्यांदाही आळवक यक्षाने भगवंतांना म्हटले – “श्रमणा, बाहेर नीघ!” भगवंतांनी “ठीक आहे, आवुसो” असे म्हणून बाहेर पाऊल टाकले. यक्ष म्हणाला, “श्रमणा, आत ये!” भगवंतांनी “ठीक आहे, आवुसो” असे म्हणून आत प्रवेश केला. चौथ्यांदाही आळवक यक्षाने भगवंतांना म्हटले – “श्रमणा, बाहेर नीघ!” भगवंतांनी उत्तर दिले, “आवुसो, मी आता बाहेर जाणार नाही. तुला जे काही करायचे असेल ते तू कर.” यक्ष म्हणाला, “श्रमणा, मी तुला एक प्रश्न विचारणार आहे. जर तू मला त्याचे उत्तर दिले नाहीस, तर मी तुझे चित्त विचलित करीन, किंवा तुझे हृदय विदीर्ण करीन, किंवा तुला पायाला धरून गंगेच्या पलीकडच्या तीरावर फेकून देईन.” भगवंतांनी उत्तर दिले, “आवुसो, देव, मार आणि ब्रह्मासह या जगात, श्रमण-ब्राह्मण, देव आणि मानवांसह या प्रजेमध्ये मला असा कोणीही दिसत नाही जो माझे चित्त विचलित करू शकेल, माझे हृदय विदीर्ण करू शकेल किंवा मला पायाला धरून गंगेच्या पलीकडे फेकू शकेल. तरीही, आवुसो, तुला जे विचारायचे असेल ते तू विचार.” ‘‘කිංසූධ විත්තං පුරිසස්ස සෙට්ඨං, කිංසු සුචිණ්ණං සුඛමාවහාති; කිංසු හවෙ සාදුතරං රසානං, කථංජීවිං ජීවිතමාහු සෙට්ඨ’’න්ති. “या जगात माणसाची सर्वात श्रेष्ठ संपत्ती कोणती? कशाचे चांगल्या प्रकारे आचरण केल्याने सुख मिळते? सर्व रसांमध्ये सर्वात मधुर रस कोणता? आणि कशा प्रकारे जगणाऱ्याचे जीवन सर्वात श्रेष्ठ म्हटले जाते?” ‘‘සද්ධීධ විත්තං පුරිස්ස සෙට්ඨං, ධම්මො සුචිණ්ණො සුඛමාවහාති; සච්චං හවෙ සාදුතරං රසානං, පඤ්ඤාජීවිං ජීවිතමාහු සෙට්ඨ’’න්ති. “या जगात श्रद्धा हीच माणसाची सर्वात श्रेष्ठ संपत्ती आहे; धम्माचे चांगल्या प्रकारे आचरण केल्याने सुख मिळते; सत्य हाच सर्व रसांमध्ये सर्वात मधुर रस आहे; आणि प्रज्ञेने जगणाऱ्याचे जीवन सर्वात श्रेष्ठ म्हटले जाते.” ‘‘කථංසු තරති ඔඝං, කථංසු තරති අණ්ණවං; කථංසු දුක්ඛමච්චෙති, කථංසු පරිසුජ්ඣතී’’ති. “माणूस ओघ (संसार-प्रवाह) कसा पार करतो? महासागर (भवसागर) कसा पार करतो? दुःखातून कसा मुक्त होतो? आणि तो कसा शुद्ध होतो?” ‘‘සද්ධාය [Pg.217] තරති ඔඝං, අප්පමාදෙන අණ්ණවං; වීරියෙන දුක්ඛමච්චෙති, පඤ්ඤාය පරිසුජ්ඣතී’’ති. “श्रद्धेने माणूस ओघ पार करतो; अप्रमादाने (जागरूकतेने) महासागर पार करतो; वीर्याने (प्रयत्नाने) दुःखातून मुक्त होतो; आणि प्रज्ञेने तो शुद्ध होतो.” ‘‘කථංසු ලභතෙ පඤ්ඤං, කථංසු වින්දතෙ ධනං; කථංසු කිත්තිං පප්පොති, කථං මිත්තානි ගන්ථති; අස්මා ලොකා පරං ලොකං, කථං පෙච්ච න සොචතී’’ති. "मनुष्य प्रज्ञा कशी प्राप्त करतो? धन कसे मिळवतो? कीर्ती कशी प्राप्त करतो? मित्रांना आपल्याशी कसे बांधून ठेवतो? आणि या लोकातून परलोकात गेल्यावर तो शोक का करत नाही?" ‘‘සද්දහානො අරහතං, ධම්මං නිබ්බානපත්තියා; සුස්සූසං ලභතෙ පඤ්ඤං, අප්පමත්තො විචක්ඛණො. "निर्वाण प्राप्तीसाठी अर्हतांच्या धम्मावर श्रद्धा ठेवून, ऐकण्याची इच्छा ठेवणारा (धम्म श्रवण करणारा), अप्रमत्त (जागरूक) आणि बुद्धिमान मनुष्य प्रज्ञा प्राप्त करतो." ‘‘පතිරූපකාරී ධුරවා, උට්ඨාතා වින්දතෙ ධනං; සච්චෙන කිත්තිං පප්පොති, දදං මිත්තානි ගන්ථති; අස්මා ලොකා පරං ලොකං, එවං පෙච්ච න සොචති. "योग्य ते करणारा, कर्तव्यदक्ष, उद्योगी आणि प्रयत्नशील मनुष्य धन मिळवतो. सत्याने तो कीर्ती प्राप्त करतो. दान दिल्याने तो मित्रांना जोडतो. अशा प्रकारे या लोकातून परलोकात गेल्यावर तो शोक करत नाही." ‘‘යස්සෙතෙ චතුරො ධම්මා, සද්ධස්ස ඝරමෙසිනො; සච්චං දම්මො ධිති චාගො, ස වෙ පෙච්ච න සොචති. "ज्या गृहस्थ जीवन जगणाऱ्या श्रद्धाळू मनुष्यामध्ये हे चार धर्म असतात— सत्य, दम (इंद्रियसंयम), धृती (धैर्य) आणि त्याग (उदारता)— तो परलोकात गेल्यावर खरोखरच शोक करत नाही." ‘‘ඉඞ්ඝ අඤ්ඤෙපි පුච්ඡස්සු, පුථූ සමණබ්රාහ්මණෙ; යදි සච්චා දම්මා චාගා, ඛන්ත්යා භිය්යොධ විජ්ජතී’’ති. "आता तू इतर अनेक श्रमण आणि ब्राह्मणांनाही विचारून बघ, की या जगात सत्य, दम, त्याग आणि क्षमा (सहनशीलता) यांपेक्षा श्रेष्ठ काही आढळते का." ‘‘කථං නු දානි පුච්ඡෙය්යං, පුථූ සමණබ්රාහ්මණෙ; යොහං අජ්ජ පජානාමි, යො අත්ථො සම්පරායිකො. "आता मी इतर अनेक श्रमण आणि ब्राह्मणांना कशासाठी विचारू? कारण आज मला परलोकातील कल्याणाचा (परलोकातील हिताचा) मार्ग समजला आहे." ‘‘අත්ථාය වත මෙ බුද්ධො, වාසායාළවිමාගමා ; යොහං අජ්ජ පජානාමි, යත්ථ දින්නං මහප්ඵලං. "खरोखर, बुद्ध माझ्या कल्याणासाठीच आळवी येथे राहण्यास आले. कोणाला दिलेले दान महाफलदायी ठरते, हे आज मला समजले आहे." ‘‘සො අහං විචරිස්සාමි, ගාමා ගාමං පුරා පුරං; නමස්සමානො සම්බුද්ධං, ධම්මස්ස ච සුධම්මත’’න්ති. "आता मी सम्यक्संबुद्धांना वंदन करत आणि धम्माच्या उत्तमतेची प्रशंसा करत एका गावाकडून दुसऱ्या गावाकडे, एका नगराकडून दुसऱ्या नगराकडे प्रवास करीन." යක්ඛසංයුත්තං සමත්තං. यक्षसंयुक्त समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – ඉන්දකො සක්ක සූචි ච, මණිභද්දො ච සානු ච; පියඞ්කර පුනබ්බසු සුදත්තො ච, ද්වෙ සුක්කා චීරආළවීති ද්වාදස. इंद्रक, सक्क, सूचि, मणिभद्र, सानू, पियंकर, पुनब्बसू, सुदत्त, दोन सुक्का, चीर आणि आळवी—असे हे बारा (सुत्त) आहेत. 11. සක්කසංයුත්තං ११. सक्कसंयुक्त 1. පඨමවග්ගො १. प्रथम वर्ग 1. සුවීරසුත්තං १. सुवीर सुत्त 247. එවං [Pg.218] මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. තත්ර ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘භික්ඛවො’’ති. ‘‘භදන්තෙ’’ති තෙ භික්ඛූ භගවතො පච්චස්සොසුං. භගවා එතදවොච – २४७. असे मी ऐकले आहे— एक वेळ भगवान श्रावस्ती येथील अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तिथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले— "भिक्खूंनो!" त्या भिक्खूंनी भगवंतांना प्रत्युत्तर दिले— "भदंत!" भगवान म्हणाले— ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, අසුරා දෙවෙ අභියංසු. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො සුවීරං දෙවපුත්තං ආමන්තෙසි – ‘එතෙ, තාත සුවීර, අසුරා දෙවෙ අභියන්ති. ගච්ඡ, තාත සුවීර, අසුරෙ පච්චුය්යාහී’ති. ‘එවං භද්දන්තවා’ති ඛො, භික්ඛවෙ, සුවීරො දෙවපුත්තො සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස පටිස්සුත්වා පමාදං ආපාදෙසි. දුතියම්පි ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො සුවීරං දෙවපුත්තං ආමන්තෙසි – ‘එතෙ, තාත සුවීර, අසුරා දෙවෙ අභියන්ති. ගච්ඡ, තාත සුවීර, අසුරෙ පච්චුය්යාහී’ති. ‘එවං භද්දන්තවා’ති ඛො, භික්ඛවෙ, සුවීරො දෙවපුත්තො සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස පටිස්සුත්වා දුතියම්පි පමාදං ආපාදෙසි. තතියම්පි ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො සුවීරං දෙවපුත්තං ආමන්තෙසි – ‘එතෙ, තාත සුවීර, අසුරා දෙවෙ අභියන්ති. ගච්ඡ, තාත සුවීර, අසුරෙ පච්චුය්යාහී’ති. ‘එවං භද්දන්තවා’ති ඛො, භික්ඛවෙ, සුවීරො දෙවපුත්තො සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස පටිස්සුත්වා තතියම්පි පමාදං ආපාදෙසි. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො සුවීරං දෙවපුත්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – "भिक्खूंनो, पूर्वी कधीतरी असुरांनी देवांवर चढाई केली होती. तेव्हा देवांचा राजा सक्क याने सुवीर देवपुत्राला बोलावले आणि म्हटले— 'प्रिय सुवीर, हे असुर देवांवर चालून येत आहेत. जा, प्रिय सुवीर, असुरांचा प्रतिकार करण्यासाठी पुढे जा.' भिक्खूंनो, सुवीर देवपुत्राने सक्क देवराजाला 'तसेच असो, महाराज' असे उत्तर दिले, पण तो प्रमत्त (निष्काळजी) झाला. भिक्खूंनो, दुसऱ्यांदाही सक्क देवराजाने सुवीर देवपुत्राला बोलावले... पण दुसऱ्यांदाही सुवीर देवपुत्र प्रमत्त झाला. भिक्खूंनो, तिसऱ्यांदाही सक्क देवराजाने सुवीर देवपुत्राला बोलावले... पण तिसऱ्यांदाही सुवीर देवपुत्र प्रमत्त झाला. तेव्हा, भिक्खूंनो, देवांचा राजा सक्क याने सुवीर देवपुत्राला गाथेने संबोधित केले—" ‘‘අනුට්ඨහං අවායාමං, සුඛං යත්රාධිගච්ඡති; සුවීර තත්ථ ගච්ඡාහි, මඤ්ච තත්ථෙව පාපයා’’ති. "जिथे प्रयत्न न करता आणि कष्ट न करता सुख प्राप्त होते, हे सुवीर, तू तिथे जा आणि मलाही तिथेच घेऊन चल." ‘‘අලස්වස්ස අනුට්ඨාතා, න ච කිච්චානි කාරයෙ; සබ්බකාමසමිද්ධස්ස, තං මෙ සක්ක වරං දිසා’’ති. "जो आळशी आहे, प्रयत्न करत नाही, कोणतीही कामे करत नाही, तरीही त्याच्या सर्व इच्छा पूर्ण होतात; हे सक्क, मला त्या श्रेष्ठ स्थानाचा मार्ग दाखवा." ‘‘යත්ථාලසො [Pg.219] අනුට්ඨාතා, අච්චන්තං සුඛමෙධති; සුවීර තත්ථ ගච්ඡාහි, මඤ්ච තත්ථෙව පාපයා’’ති. "जिथे आळशी आणि प्रयत्न न करणारा मनुष्य अत्यंत सुखाचा उपभोग घेतो, हे सुवीर, तू तिथे जा आणि मलाही तिथेच घेऊन चल." ‘‘අකම්මුනා දෙවසෙට්ඨ, සක්ක වින්දෙමු යං සුඛං; අසොකං අනුපායාසං, තං මෙ සක්ක වරං දිසා’’ති. "हे देवश्रेष्ठ सक्क, जिथे कोणतेही काम न करता आम्हाला सुख मिळू शकेल, जे शोकविरहित आणि त्रासविरहित असेल, हे सक्क, मला त्या श्रेष्ठ स्थानाचा मार्ग दाखवा." ‘‘සචෙ අත්ථි අකම්මෙන, කොචි ක්වචි න ජීවති; නිබ්බානස්ස හි සො මග්ගො, සුවීර තත්ථ ගච්ඡාහි; මඤ්ච තත්ථෙව පාපයා’’ති. "हे सुवीर, जर असे कोणतेही स्थान असेल जिथे काम न करता कोणीही जगू शकत नाही, तर तो खरोखर निर्वाणाचाच मार्ग आहे. हे सुवीर, तू तिथे जा आणि मलाही तिथेच घेऊन चल." ‘‘සො හි නාම, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො සකං පුඤ්ඤඵලං උපජීවමානො දෙවානං තාවතිංසානං ඉස්සරියාධිපච්චං රජ්ජං කාරෙන්තො උට්ඨානවීරියස්ස වණ්ණවාදී භවිස්සති. ඉධ ඛො තං, භික්ඛවෙ, සොභෙථ, යං තුම්හෙ එවං ස්වාක්ඛාතෙ ධම්මවිනයෙ පබ්බජිතා සමානා උට්ඨහෙය්යාථ ඝටෙය්යාථ වායමෙය්යාථ අප්පත්තස්ස පත්තියා අනධිගතස්ස අධිගමාය, අසච්ඡිකතස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති. "भिक्खूंनो, जो देवांचा राजा सक्क स्वतःच्या पुण्याच्या फळावर जगत असून, तावतिंस देवांवर आधिपत्य आणि राज्य करत असतानाही जर उद्योग आणि वीर्याची (प्रयत्नांची) प्रशंसा करतो; तर मग भिक्खूंनो, तुम्ही या सुविख्यात धम्म आणि विनयात प्रव्रजित झाले असताना, जे अद्याप प्राप्त झाले नाही ते प्राप्त करण्यासाठी, जे अद्याप साध्य झाले नाही ते साध्य करण्यासाठी आणि ज्याचा अद्याप साक्षात्कार झाला नाही त्याचा साक्षात्कार करण्यासाठी उद्योग करणे, प्रयत्न करणे आणि वीर्य गाजवणे कितीतरी पटीने अधिक योग्य ठरेल." 2. සුසීමසුත්තං २. सुसीम सुत्त 248. සාවත්ථියං. තත්ර ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘භික්ඛවො’’ති. ‘‘භදන්තෙ’’ති තෙ භික්ඛූ භගවතො පච්චස්සොසුං. භගවා එතදවොච – २४८. श्रावस्ती येथे. तिथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले— "भिक्खूंनो!" त्या भिक्खूंनी भगवंतांना प्रत्युत्तर दिले— "भदंत!" भगवान म्हणाले— ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, අසුරා දෙවෙ අභියංසු. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො සුසීමං දෙවපුත්තං ආමන්තෙසි – ‘එතෙ, තාත සුසීම, අසුරා දෙවෙ අභියන්ති. ගච්ඡ, තාත සුසීම, අසුරෙ පච්චුය්යාහී’ති. ‘එවං භද්දන්තවා’ති ඛො, භික්ඛවෙ, සුසීමො දෙවපුත්තො සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස පටිස්සුත්වා පමාදං ආපාදෙසි. දුතියම්පි ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො සුසීමං දෙවපුත්තං ආමන්තෙසි…පෙ… දුතියම්පි පමාදං ආපාදෙසි. තතියම්පි ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො සුසීමං දෙවපුත්තං ආමන්තෙසි…පෙ… තතියම්පි පමාදං ආපාදෙසි. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො සුසීමං දෙවපුත්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – "भिक्खूंनो, पूर्वी कधीतरी असुरांनी देवांवर चढाई केली होती. तेव्हा देवांचा राजा सक्क याने सुसीम देवपुत्राला बोलावले आणि म्हटले— 'प्रिय सुसीम, हे असुर देवांवर चालून येत आहेत. जा, प्रिय सुसीम, असुरांचा प्रतिकार करण्यासाठी पुढे जा.' भिक्खूंनो, सुसीम देवपुत्राने सक्क देवराजाला 'तसेच असो, महाराज' असे उत्तर दिले, पण तो प्रमत्त (निष्काळजी) झाला. दुसऱ्यांदाही सक्क देवराजाने सुसीम देवपुत्राला बोलावले... पण दुसऱ्यांदाही तो प्रमत्त झाला. तिसऱ्यांदाही सक्क देवराजाने सुसीम देवपुत्राला बोलावले... पण तिसऱ्यांदाही तो प्रमत्त झाला. तेव्हा, भिक्खूंनो, देवांचा राजा सक्क याने सुसीम देवपुत्राला गाथेने संबोधित केले—" ‘‘අනුට්ඨහං අවායාමං, සුඛං යත්රාධිගච්ඡති; සුසීම තත්ථ ගච්ඡාහි, මඤ්ච තත්ථෙව පාපයා’’ති. "जिथे प्रयत्न न करता आणि कष्ट न करता सुख प्राप्त होते, हे सुसीम, तू तिथे जा आणि मलाही तिथेच घेऊन चल." ‘‘අලස්වස්ස [Pg.220] අනුට්ඨාතා, න ච කිච්චානි කාරයෙ; සබ්බකාමසමිද්ධස්ස, තං මෙ සක්ක වරං දිසා’’ති. "जो आळशी आहे, प्रयत्न करत नाही, कोणतीही कामे करत नाही, तरीही त्याच्या सर्व इच्छा पूर्ण होतात; हे सक्क, मला त्या श्रेष्ठ स्थानाचा मार्ग दाखवा." ‘‘යත්ථාලසො අනුට්ඨාතා, අච්චන්තං සුඛමෙධති; සුසීම තත්ථ ගච්ඡාහි, මඤ්ච තත්ථෙව පාපයා’’ති. "जिथे आळशी आणि प्रयत्न न करणारा मनुष्य अत्यंत सुखाचा उपभोग घेतो, हे सुसीम, तू तिथे जा आणि मलाही तिथेच घेऊन चल." ‘‘අකම්මුනා දෙවසෙට්ඨ, සක්ක වින්දෙමු යං සුඛං; අසොකං අනුපායාසං, තං මෙ සක්ක වරං දිසා’’ති. "हे देवश्रेष्ठ सक्क, जिथे कोणतेही काम न करता आम्हाला सुख मिळू शकेल, जे शोकविरहित आणि त्रासविरहित असेल, हे सक्क, मला त्या श्रेष्ठ स्थानाचा मार्ग दाखवा." ‘‘සචෙ අත්ථි අකම්මෙන, කොචි ක්වචි න ජීවති; නිබ්බානස්ස හි සො මග්ගො, සුසීම තත්ථ ගච්ඡාහි; මඤ්ච තත්ථෙව පාපයා’’ති. "हे सुसीम, जर असे कोणतेही स्थान असेल जिथे काम न करता कोणीही जगू शकत नाही, तर तो खरोखर निर्वाणाचाच मार्ग आहे. हे सुसीम, तू तिथे जा आणि मलाही तिथेच घेऊन चल." ‘‘සො හි නාම, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො සකං පුඤ්ඤඵලං උපජීවමානො දෙවානං තාවතිංසානං ඉස්සරියාධිපච්චං රජ්ජං කාරෙන්තො උට්ඨානවීරියස්ස වණ්ණවාදී භවිස්සති. ඉධ ඛො තං, භික්ඛවෙ, සොභෙථ, යං තුම්හෙ එවං ස්වාක්ඛාතෙ ධම්මවිනයෙ පබ්බජිතා සමානා උට්ඨහෙය්යාථ ඝටෙය්යාථ වායමෙය්යාථ අප්පත්තස්ස පත්තියා, අනධිගතස්ස අධිගමාය, අසච්ඡිකතස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති. "भिक्खूहो, तो देवांचा राजा सक्क स्वतःच्या पुण्यफळावर उपजीविका करत, तावतिंस लोकातील देवांवर आधिपत्य व राज्य गाजवत असतानाही, उद्योगी व वीर्यवान (प्रयत्नशील) पुरुषाच्या गुणांची प्रशंसा करतो. भिक्खूहो, या उत्तम प्रकारे उपदेशिलेल्या धम्म-विनयामध्ये प्रव्रजित झाल्यावर तुम्ही जे वीर्य (प्रयत्न) कराल, ते तुम्हाला शोभून दिसेल. म्हणून जे प्राप्त झाले नाही ते प्राप्त करण्यासाठी, जे अधिगत नाही ते अधिगत करण्यासाठी, आणि ज्याचा साक्षात्कार झाला नाही त्याचा साक्षात्कार करण्यासाठी तुम्ही उद्योग करा, तत्पर व्हा आणि प्रयत्न करा." 3. ධජග්ගසුත්තං ३. ध्वजग्ग सुत्त 249. සාවත්ථියං. තත්ර ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘භික්ඛවො’’ති. ‘‘භදන්තෙ’’ති තෙ භික්ඛූ භගවතො පච්චස්සොසුං. භගවා එතදවොච – २४९. श्रावस्ती येथे. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – "भिक्खूहो!" "भदंत!" असे त्या भिक्खूंनी भगवंतांना उत्तर दिले. भगवंत म्हणाले – ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, දෙවාසුරසඞ්ගාමො සමුපබ්යූළ්හො අහොසි. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො දෙවෙ තාවතිංසෙ ආමන්තෙසි – "भिक्खूहो, पूर्वी एकदा देव आणि असुरांचे युद्ध पेटले होते. तेव्हा देवांचा राजा सक्क याने तावतिंस लोकातील देवांना संबोधित केले – ‘සචෙ, මාරිසා, දෙවානං සඞ්ගාමගතානං උප්පජ්ජෙය්ය භයං වා ඡම්භිතත්තං වා ලොමහංසො වා, මමෙව තස්මිං සමයෙ ධජග්ගං උල්ලොකෙය්යාථ. මමඤ්හි වො ධජග්ගං උල්ලොකයතං යං භවිස්සති භයං වා ඡම්භිතත්තං වා ලොමහංසො වා, සො පහීයිස්සති’. 'मित्रांनो, युद्धात गेलेल्या देवांच्या मनात जर कधी भय, थरकाप किंवा अंगावर काटा उभा राहणे (रोमहर्ष) उत्पन्न झाले, तर त्या वेळी तुम्ही माझ्याच ध्वजाच्या शिखराकडे पाहावे. कारण माझ्या ध्वजशिखराकडे पाहणाऱ्या तुमचे जे काही भय, थरकाप किंवा अंगावर काटा उभा राहणे असेल, ते नाहीसे होईल.' ‘නො චෙ මෙ ධජග්ගං උල්ලොකෙය්යාථ, අථ පජාපතිස්ස දෙවරාජස්ස ධජග්ගං උල්ලොකෙය්යාථ. පජාපතිස්ස හි වො දෙවරාජස්ස ධජග්ගං උල්ලොකයතං යං භවිස්සති භයං වා ඡම්භිතත්තං වා ලොමහංසො වා, සො පහීයිස්සති’. 'जर तुम्ही माझ्या ध्वजशिखराकडे पाहू शकला नाहीत, तर देवराज प्रजापतीच्या ध्वजशिखराकडे पाहावे. कारण देवराज प्रजापतीच्या ध्वजशिखराकडे पाहणाऱ्या तुमचे जे काही भय, थरकाप किंवा अंगावर काटा उभा राहणे असेल, ते नाहीसे होईल.' ‘නො [Pg.221] චෙ පජාපතිස්ස දෙවරාජස්ස ධජග්ගං උල්ලොකෙය්යාථ, අථ වරුණස්ස දෙවරාජස්ස ධජග්ගං උල්ලොකෙය්යාථ. වරුණස්ස හි වො දෙවරාජස්ස ධජග්ගං උල්ලොකයතං යං භවිස්සති භයං වා ඡම්භිතත්තං වා ලොමහංසො වා, සො පහීයිස්සති’. 'जर तुम्ही देवराज प्रजापतीच्या ध्वजशिखराकडे पाहू शकला नाहीत, तर देवराज वरुणाच्या ध्वजशिखराकडे पाहावे. कारण देवराज वरुणाच्या ध्वजशिखराकडे पाहणाऱ्या तुमचे जे काही भय, थरकाप किंवा अंगावर काटा उभा राहणे असेल, ते नाहीसे होईल.' ‘නො චෙ වරුණස්ස දෙවරාජස්ස ධජග්ගං උල්ලොකෙය්යාථ, අථ ඊසානස්ස දෙවරාජස්ස ධජග්ගං උල්ලොකෙය්යාථ. ඊසානස්ස හි වො දෙවරාජස්ස ධජග්ගං උල්ලොකයතං යං භවිස්සති භයං වා ඡම්භිතත්තං වා ලොමහංසො වා, සො පහීයිස්සතී’’’ති. 'जर तुम्ही देवराज वरुणाच्या ध्वजशिखराकडे पाहू शकला नाहीत, तर देवराज ईशानाच्या ध्वजशिखराकडे पाहावे. कारण देवराज ईशानाच्या ध्वजशिखराकडे पाहणाऱ्या तुमचे जे काही भय, थरकाप किंवा अंगावर काटा उभा राहणे असेल, ते नाहीसे होईल.'" ‘‘තං ඛො පන, භික්ඛවෙ, සක්කස්ස වා දෙවානමින්දස්ස ධජග්ගං උල්ලොකයතං, පජාපතිස්ස වා දෙවරාජස්ස ධජග්ගං උල්ලොකයතං, වරුණස්ස වා දෙවරාජස්ස ධජග්ගං උල්ලොකයතං, ඊසානස්ස වා දෙවරාජස්ස ධජග්ගං උල්ලොකයතං යං භවිස්සති භයං වා ඡම්භිතත්තං වා ලොමහංසො වා, සො පහීයෙථාපි නොපි පහීයෙථ. "परंतु भिक्खूहो, देवांचा राजा सक्क, देवराज प्रजापती, देवराज वरुण किंवा देवराज ईशान्य यांच्या ध्वजशिखराकडे पाहणाऱ्या देवांचे जे काही भय, थरकाप किंवा अंगावर काटा उभा राहणे असेल, ते कदाचित नाहीसे होईल किंवा नाहीसे होणारही नाही. ‘‘තං කිස්ස හෙතු? සක්කො හි, භික්ඛවෙ, දෙවානමින්දො අවීතරාගො අවීතදොසො අවීතමොහො භීරු ඡම්භී උත්රාසී පලායීති. "असे कशामुळे? कारण भिक्खूहो, देवांचा राजा सक्क हा अजूनही रागमुक्त, द्वेषमुक्त आणि मोहमुक्त झालेला नाही. तो स्वतः भीरू (भित्रा), थरथरणारा, घाबरणारा आणि पळून जाणारा आहे." ‘‘අහඤ්ච ඛො, භික්ඛවෙ, එවං වදාමි – ‘සචෙ තුම්හාකං, භික්ඛවෙ, අරඤ්ඤගතානං වා රුක්ඛමූලගතානං වා සුඤ්ඤාගාරගතානං වා උප්පජ්ජෙය්ය භයං වා ඡම්භිතත්තං වා ලොමහංසො වා, මමෙව තස්මිං සමයෙ අනුස්සරෙය්යාථ – ඉතිපි සො භගවා අරහං සම්මාසම්බුද්ධො විජ්ජාචරණසම්පන්නො සුගතො ලොකවිදූ අනුත්තරො පුරිසදම්මසාරථි සත්ථා දෙවමනුස්සානං බුද්ධො භගවා’ති. මමඤ්හි වො, භික්ඛවෙ, අනුස්සරතං යං භවිස්සති භයං වා ඡම්භිතත්තං වා ලොමහංසො වා, සො පහීයිස්සති. "परंतु भिक्खूहो, मी असे सांगतो – 'भिक्खूहो, जर तुम्ही अरण्यात, वृक्षाच्या मुळाशी किंवा शून्य घरात असताना तुमच्या मनात भय, थरकाप किंवा अंगावर काटा उभा राहणे उत्पन्न झाले, तर त्या वेळी तुम्ही माझेच स्मरण करावे – "ते भगवंत अर्हत, सम्यक्संबुद्ध, विद्याचरणसंपन्न, सुगत, लोकविदू, अनुत्तर पुरुषदम्यसारथी, देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध आणि भगवंत आहेत." कारण भिक्खूहो, माझे स्मरण करणाऱ्या तुमचे जे काही भय, थरकाप किंवा अंगावर काटा उभा राहणे असेल, ते निश्चितपणे नाहीसे होईल.' ‘‘නො චෙ මං අනුස්සරෙය්යාථ, අථ ධම්මං අනුස්සරෙය්යාථ – ‘ස්වාක්ඛාතො භගවතා ධම්මො සන්දිට්ඨිකො අකාලිකො එහිපස්සිකො ඔපනෙය්යිකො පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’ති. ධම්මඤ්හි වො, භික්ඛවෙ, අනුස්සරතං යං භවිස්සති භයං වා ඡම්භිතත්තං වා ලොමහංසො වා, සො පහීයිස්සති. "जर तुम्ही माझे स्मरण करू शकला नाहीत, तर धम्माचे स्मरण करावे – 'भगवंतांनी धम्माचा सुंदर प्रकारे उपदेश केला आहे, तो याच जन्मात प्रत्यक्ष फळ देणारा, तात्काळ फळ देणारा, "ये आणि स्वतः पाहा" असे सांगणारा, स्वतःच्या कल्याणासाठी आचरणात आणण्याजोगा आणि सुज्ञ माणसांनी आपापल्या परीने अनुभवण्याजोगा आहे.' कारण भिक्खूहो, धम्माचे स्मरण करणाऱ्या तुमचे जे काही भय, थरकाप किंवा अंगावर काटा उभा राहणे असेल, ते निश्चितपणे नाहीसे होईल. ‘‘නො චෙ ධම්මං අනුස්සරෙය්යාථ, අථ සඞ්ඝං අනුස්සරෙය්යාථ – ‘සුප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො උජුප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො [Pg.222] ඤායප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො සාමීචිප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො, යදිදං චත්තාරි පුරිසයුගානි අට්ඨ පුරිසපුග්ගලා එස භගවතො සාවකසඞ්ඝො, ආහුනෙය්යො පාහුනෙය්යො දක්ඛිණෙය්යො අඤ්ජලිකරණීයො අනුත්තරං පුඤ්ඤක්ඛෙත්තං ලොකස්සා’ති. සඞ්ඝඤ්හි වො, භික්ඛවෙ, අනුස්සරතං යං භවිස්සති භයං වා ඡම්භිතත්තං වා ලොමහංසො වා, සො පහීයිස්සති. "जर तुम्ही धम्माचे स्मरण करू शकला नाहीत, तर संघाचे स्मरण करावे – 'भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ ऋजुप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ न्यायप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ सामीचीप्रतिपन्न आहे. चार पुरुषयुग आणि आठ पुरुषपुद्गल असलेला हा भगवंतांचा श्रावकसंघ आहुनेय, पाहुनेय, दक्षिणेय, अंजलिकरणीय आणि जगातील सर्वश्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र आहे.' कारण भिक्खूहो, संघाचे स्मरण करणाऱ्या तुमचे जे काही भय, थरकाप किंवा अंगावर काटा उभा राहणे असेल, ते निश्चितपणे नाहीसे होईल. ‘‘තං කිස්ස හෙතු? තථාගතො හි, භික්ඛවෙ, අරහං සම්මාසම්බුද්ධො වීතරාගො වීතදොසො වීතමොහො අභීරු අච්ඡම්භී අනුත්රාසී අපලායී’’ති. ඉදමවොච භගවා. ඉදං වත්වාන සුගතො අථාපරං එතදවොච සත්ථා – "असे कशामुळे? कारण भिक्खूहो, तथागत अर्हत, सम्यक्संबुद्ध हे रागमुक्त, द्वेषमुक्त आणि मोहमुक्त आहेत. ते निर्भय, थरकाप न पावणारे, न घाबरणारे आणि पळून न जाणारे आहेत." भगवंतांनी असे सांगितले. हे बोलून सुगत शास्त्यांनी पुढे असे म्हटले – ‘‘අරඤ්ඤෙ රුක්ඛමූලෙ වා, සුඤ්ඤාගාරෙව භික්ඛවො; අනුස්සරෙථ සම්බුද්ධං, භයං තුම්හාක නො සියා. "अरण्यात, वृक्षाच्या मुळाशी किंवा शून्य घरात, हे भिक्खूहो! तुम्ही संबुद्धांचे स्मरण करा, तुम्हाला कोणतेही भय राहणार नाही. ‘‘නො චෙ බුද්ධං සරෙය්යාථ, ලොකජෙට්ඨං නරාසභං; අථ ධම්මං සරෙය්යාථ, නිය්යානිකං සුදෙසිතං. "जर तुम्ही जगातील श्रेष्ठ आणि नरश्रेष्ठ अशा बुद्धांचे स्मरण करू शकला नाहीत, तर संसारसागरातून मुक्त करणाऱ्या आणि उत्तम प्रकारे उपदेशिलेल्या धम्माचे स्मरण करा. ‘‘නො චෙ ධම්මං සරෙය්යාථ, නිය්යානිකං සුදෙසිතං; අථ සඞ්ඝං සරෙය්යාථ, පුඤ්ඤක්ඛෙත්තං අනුත්තරං. "जर तुम्ही संसारसागरातून मुक्त करणाऱ्या आणि उत्तम प्रकारे उपदेशिलेल्या धम्माचे स्मरण करू शकला नाहीत, तर सर्वश्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र असलेल्या संघाचे स्मरण करा. ‘‘එවං බුද්ධං සරන්තානං, ධම්මං සඞ්ඝඤ්ච භික්ඛවො; භයං වා ඡම්භිතත්තං වා, ලොමහංසො න හෙස්සතී’’ති. "अशा प्रकारे, हे भिक्खूहो! बुद्ध, धम्म आणि संघाचे स्मरण करणाऱ्यांना कोणतेही भय, थरकाप किंवा अंगावर काटा उभा राहणे होणार नाही." 4. වෙපචිත්තිසුත්තං ४. वेपचित्ति सुत्त 250. සාවත්ථිනිදානං. ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, දෙවාසුරසඞ්ගාමො සමුපබ්යූළ්හො අහොසි. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්ති අසුරින්දො අසුරෙ ආමන්තෙසි – ‘සචෙ, මාරිසා, දෙවානං අසුරසඞ්ගාමෙ සමුපබ්යූළ්හෙ අසුරා ජිනෙය්යුං දෙවා පරාජිනෙය්යුං, යෙන නං සක්කං දෙවානමින්දං කණ්ඨපඤ්චමෙහි බන්ධනෙහි බන්ධිත්වා මම සන්තිකෙ ආනෙය්යාථ අසුරපුර’න්ති. සක්කොපි ඛො, භික්ඛවෙ, දෙවානමින්දො දෙවෙ තාවතිංසෙ ආමන්තෙසි – ‘සචෙ, මාරිසා, දෙවානං අසුරසඞ්ගාමෙ සමුපබ්යූළ්හෙ දෙවා ජිනෙය්යුං අසුරා පරාජිනෙය්යුං, යෙන නං වෙපචිත්තිං අසුරින්දං කණ්ඨපඤ්චමෙහි බන්ධනෙහි බන්ධිත්වා මම සන්තිකෙ ආනෙය්යාථ සුධම්මසභ’’’න්ති. තස්මිං ඛො පන, භික්ඛවෙ, සඞ්ගාමෙ දෙවා ජිනිංසු[Pg.223], අසුරා පරාජිනිංසු. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, දෙවා තාවතිංසා වෙපචිත්තිං අසුරින්දං කණ්ඨපඤ්චමෙහි බන්ධනෙහි බන්ධිත්වා සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස සන්තිකෙ ආනෙසුං සුධම්මසභං. තත්ර සුදං, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්ති අසුරින්දො කණ්ඨපඤ්චමෙහි බන්ධනෙහි බද්ධො සක්කං දෙවානමින්දං සුධම්මසභං පවිසන්තඤ්ච නික්ඛමන්තඤ්ච අසබ්භාහි ඵරුසාහි වාචාහි අක්කොසති පරිභාසති. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, මාතලි සඞ්ගාහකො සක්කං දෙවානමින්දං ගාථාහි අජ්ඣභාසි – २५०. श्रावस्ती येथील निदान. "भिक्षूंनो, पूर्वी कधीतरी देव आणि असुरांमध्ये मोठे युद्ध पेटले होते. तेव्हा, भिक्षूंनो, वेपचित्ती असुरेंद्राने असुरांना संबोधित केले – 'मित्रांनो, जर देव आणि असुरांच्या या युद्धात असुरांचा विजय झाला आणि देवांचा पराभव झाला, तर देवांचा राजा शक्राला दोन हात, दोन पाय आणि गळा अशा पाच ठिकाणी बांधून (पंचबंधनाने बांधून) माझ्याकडे असुरपुरात घेऊन या.' भिक्षूंनो, देवांचा राजा शक्रानेही तावतिंस देवांना संबोधित केले – 'मित्रांनो, जर देव आणि असुरांच्या या युद्धात देवांचा विजय झाला आणि असुरांचा पराभव झाला, तर वेपचित्ती असुरेंद्राला दोन हात, दोन पाय आणि गळा अशा पाच ठिकाणी बांधून माझ्याकडे सुधम्मा देवसभेत घेऊन या.' भिक्षूंनो, त्या युद्धात देवांचा विजय झाला आणि असुरांचा पराभव झाला. त्यानंतर, भिक्षूंनो, तावतिंस देवांनी वेपचित्ती असुरेंद्राला दोन हात, दोन पाय आणि गळा अशा पाच ठिकाणी बांधून देवांचा राजा शक्राकडे सुधम्मा देवसभेत आणले. भिक्षूंनो, तिथे पाच ठिकाणी बांधलेला वेपचित्ती असुरेंद्र सुधम्मा देवसभेत प्रवेश करणाऱ्या आणि बाहेर पडणाऱ्या देवांचा राजा शक्राला अत्यंत असभ्य आणि कठोर शब्दांत शिवीगाळ व अपमान करू लागला. तेव्हा, भिक्षूंनो, मातली सारथीने देवांचा राजा शक्राला गाथेने संबोधित केले –" ‘‘භයා නු මඝවා සක්ක, දුබ්බල්යා නො තිතික්ඛසි; සුණන්තො ඵරුසං වාචං, සම්මුඛා වෙපචිත්තිනො’’ති. "हे मघवा शक्रा! वेपचित्तीच्या समोरून येणारे हे कठोर शब्द ऐकूनही तुम्ही जे सहन करत आहात, ते भीतीमुळे की दुर्बलतेमुळे?" ‘‘නාහං භයා න දුබ්බල්යා, ඛමාමි වෙපචිත්තිනො; කථඤ්හි මාදිසො විඤ්ඤූ, බාලෙන පටිසංයුජෙ’’ති. "मी भीतीमुळे किंवा दुर्बलतेमुळे वेपचित्तीचे शब्द सहन करत नाही. माझ्यासारख्या सुज्ञ माणसाने मूर्खाशी वाद का घालावा?" ‘‘භිය්යො බාලා පභිජ්ජෙය්යුං, නො චස්ස පටිසෙධකො; තස්මා භුසෙන දණ්ඩෙන, ධීරො බාලං නිසෙධයෙ’’ති. "जर मूर्खाला रोखणारे कोणी नसेल, तर तो अधिकच अनावर होईल. म्हणून सुज्ञ माणसाने कठोर शिक्षेने मूर्खाला आवरले पाहिजे." ‘‘එතදෙව අහං මඤ්ඤෙ, බාලස්ස පටිසෙධනං; පරං සඞ්කුපිතං ඤත්වා, යො සතො උපසම්මතී’’ති. "दुसरा संतप्त झाला आहे हे जाणून जो जागरूक राहून शांत राहतो, तीच मूर्खाला रोखण्याची खरी पद्धत आहे, असे मी मानतो." ‘‘එතදෙව තිතික්ඛාය, වජ්ජං පස්සාමි වාසව; යදා නං මඤ්ඤති බාලො, භයා ම්යායං තිතික්ඛති; අජ්ඣාරුහති දුම්මෙධො, ගොව භිය්යො පලායින’’න්ති. "हे वासव! सहनशीलतेमध्ये मला हाच एक दोष दिसतो; जेव्हा मूर्ख माणूस असा विचार करतो की, 'हा माझ्या भीतीने सहन करत आहे,' तेव्हा तो मंदबुद्धी माणूस पळणाऱ्या बैलावर इतर बैल धावून जातात तसा अधिकच अंगावर धावून येतो." ‘‘කාමං මඤ්ඤතු වා මා වා, භයා ම්යායං තිතික්ඛති; සදත්ථපරමා අත්ථා, ඛන්ත්යා භිය්යො න විජ්ජති. "तो असा विचार करो किंवा न करो की 'हा माझ्या भीतीने सहन करत आहे', स्वतःचे कल्याण हेच ज्यांचे परम ध्येय आहे त्यांच्यासाठी, सहनशीलतेपेक्षा श्रेष्ठ काहीही नाही." ‘‘යො හවෙ බලවා සන්තො, දුබ්බලස්ස තිතික්ඛති; තමාහු පරමං ඛන්තිං, නිච්චං ඛමති දුබ්බලො. "जो खरोखर बलवान असूनही दुर्बलाचे अपराध सहन करतो, त्यालाच संत श्रेष्ठ सहनशीलता म्हणतात; दुर्बलाला तर नेहमीच सहन करावे लागते." ‘‘අබලං තං බලං ආහු, යස්ස බාලබලං බලං; බලස්ස ධම්මගුත්තස්ස, පටිවත්තා න විජ්ජති. "ज्याचे बळ हे केवळ मूर्खपणाचे बळ आहे, त्या बळाला सुज्ञ लोक 'अ-बळ' (दुर्बलता) म्हणतात. जो धर्माने रक्षित असून बलवान आहे, त्याला विरोध करणारा कोणी नसतो." ‘‘තස්සෙව තෙන පාපියො, යො කුද්ධං පටිකුජ්ඣති; කුද්ධං අප්පටිකුජ්ඣන්තො, සඞ්ගාමං ජෙති දුජ්ජයං. "जो क्रोधाला क्रोधाने उत्तर देतो, तो स्वतःचेच अधिक नुकसान करतो. क्रोधाला क्रोधाने उत्तर न देणारा माणूस जिंकण्यास कठीण असलेले युद्ध जिंकतो." ‘‘උභින්නමත්ථං [Pg.224] චරති, අත්තනො ච පරස්ස ච; පරං සඞ්කුපිතං ඤත්වා, යො සතො උපසම්මති. "दुसरा संतप्त झाला आहे हे जाणून जो जागरूक राहून शांत राहतो, तो स्वतःचे आणि दुसऱ्याचे अशा दोघांचेही कल्याण साधत असतो." ‘‘උභින්නං තිකිච්ඡන්තානං, අත්තනො ච පරස්ස ච; ජනා මඤ්ඤන්ති බාලොති, යෙ ධම්මස්ස අකොවිදා’’ති. "स्वतःच्या आणि दुसऱ्याच्या अशा दोघांच्याही क्रोधावर उपचार करणाऱ्याला जे लोक मूर्ख समजतात, ते धर्माचे अज्ञानी असतात." ‘‘සො හි නාම, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො සකං පුඤ්ඤඵලං උපජීවමානො දෙවානං තාවතිංසානං ඉස්සරියාධිපච්චං රජ්ජං කාරෙන්තො ඛන්තිසොරච්චස්ස වණ්ණවාදී භවිස්සති. ඉධ ඛො තං, භික්ඛවෙ, සොභෙථ යං තුම්හෙ එවං ස්වාක්ඛාතෙ ධම්මවිනයෙ පබ්බජිතා සමානා ඛමා ච භවෙය්යාථ සොරතා චා’’ති. "भिक्षूंनो, तो देवांचा राजा शक्र स्वतःच्या पुण्याच्या फळावर उपजीविका करत असताना आणि तावतिंस देवांवर आधिपत्य व राज्य गाजवत असतानाही जर सहनशीलता आणि सौम्यतेची प्रशंसा करत असेल, तर भिक्षूंनो, तुम्ही या सुस्पष्टपणे सांगितलेल्या धम्म आणि विनयात प्रव्रजित झाले असताना, तुम्ही सहनशील आणि सौम्य असणे कितीतरी अधिक शोभून दिसेल!" 5. සුභාසිතජයසුත්තං ५. "सुभाषितजय सुत्त" 251. සාවත්ථිනිදානං. ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, දෙවාසුරසඞ්ගාමො සමුපබ්යූළ්හො අහොසි. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්ති අසුරින්දො සක්කං දෙවානමින්දං එතදවොච – ‘හොතු, දෙවානමින්ද, සුභාසිතෙන ජයො’ති. ‘හොතු, වෙපචිත්ති, සුභාසිතෙන ජයො’ති. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, දෙවා ච අසුරා ච පාරිසජ්ජෙ ඨපෙසුං – ‘ඉමෙ නො සුභාසිතදුබ්භාසිතං ආජානිස්සන්තී’ති. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්තිං අසුරින්දො සක්කං දෙවානමින්දං එතදවොච – ‘භණ, දෙවානමින්ද, ගාථ’න්ති. එවං වුත්තෙ, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො වෙපචිත්ති අසුරින්දං එතදවොච – ‘තුම්හෙ ඛ්වෙත්ථ, වෙපචිත්ති, පුබ්බදෙවා. භණ, වෙපචිත්ති, ගාථ’න්ති. එවං වුත්තෙ, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්ති අසුරින්දො ඉමං ගාථං අභාසි – २५१. "श्रावस्ती येथील निदान. "भिक्षूंनो, पूर्वी कधीतरी देव आणि असुरांमध्ये मोठे युद्ध पेटले होते. तेव्हा, भिक्षूंनो, वेपचित्ती असुरेंद्राने देवांचा राजा शक्राला म्हटले – 'हे देवाधिपती शक्र! सुभाषितातून (उत्तम वचनातून) विजय निश्चित होऊ दे.' शक्राने उत्तर दिले – 'हे वेपचित्ती, सुभाषितातूनच विजय निश्चित होऊ दे.' त्यानंतर, भिक्षूंनो, देव आणि असुरांनी आपापल्या सभासदांना मध्यस्थ म्हणून नेमले आणि विचार केला – 'हे सभासद आपल्यातील सुभाषित (चांगले बोलणे) आणि दुभाषित (वाईट बोलणे) पारखतील.' मग, भिक्षूंनो, वेपचित्ती असुरेंद्राने देवांचा राजा शक्राला म्हटले – 'हे देवाधिपती, गाथा म्हणा.' असे म्हटल्यावर, भिक्षूंनो, देवांचा राजा शक्राने वेपचित्ती असुरेंद्राला म्हटले – 'हे वेपचित्ती, तुम्हीच या देवलोकातील ज्येष्ठ देव आहात. म्हणून तुम्हीच आधी गाथा म्हणा.' असे म्हटल्यावर, भिक्षूंनो, वेपचित्ती असुरेंद्राने ही गाथा म्हटली –" ‘‘භිය්යො බාලා පභිජ්ජෙය්යුං, නො චස්ස පටිසෙධකො; තස්මා භුසෙන දණ්ඩෙන, ධීරො බාලං නිසෙධයෙ’’ති. "जर मूर्खाला रोखणारे कोणी नसेल, तर तो अधिकच अनावर होईल. म्हणून सुज्ञ माणसाने कठोर शिक्षेने मूर्खाला आवरले पाहिजे." ‘‘භාසිතාය ඛො පන, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්තිනා අසුරින්දෙන ගාථාය අසුරා අනුමොදිංසු, දෙවා තුණ්හී අහෙසුං. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්ති අසුරින්දො සක්කං දෙවානමින්දං එතදවොච – ‘භණ, දෙවානමින්ද, ගාථ’න්ති. එවං වුත්තෙ, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො ඉමං ගාථං අභාසි – "भिक्षूंनो, वेपचित्ती असुरेंद्राने गाथा म्हटल्यावर असुरांनी त्याचे कौतुक केले, पण देव शांत राहिले. त्यानंतर, भिक्षूंनो, वेपचित्ती असुरेंद्राने देवांचा राजा शक्राला म्हटले – 'हे देवाधिपती, गाथा म्हणा.' असे म्हटल्यावर, भिक्षूंनो, देवांचा राजा शक्राने ही गाथा म्हटली –" ‘‘එතදෙව අහං මඤ්ඤෙ, බාලස්ස පටිසෙධනං; පරං සඞ්කුපිතං ඤත්වා, යො සතො උපසම්මතී’’ති. "दुसरा संतप्त झाला आहे हे जाणून जो जागरूक राहून शांत राहतो, तीच मूर्खाला रोखण्याची खरी पद्धत आहे, असे मी मानतो." ‘‘භාසිතාය [Pg.225] ඛො පන, භික්ඛවෙ, සක්කෙන දෙවානමින්දෙන ගාථාය, දෙවා අනුමොදිංසු, අසුරා තුණ්හී අහෙසුං. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො වෙපචිත්තිං අසුරින්දං එතදවොච – ‘භණ, වෙපචිත්ති, ගාථ’න්ති. එවං වුත්තෙ, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්ති අසුරින්දො ඉමං ගාථං අභාසි – "भिक्षूंनो, देवांचा राजा शक्राने गाथा म्हटल्यावर देवांनी त्याचे कौतुक केले, पण असुर शांत राहिले. त्यानंतर, भिक्षूंनो, देवांचा राजा शक्राने वेपचित्ती असुरेंद्राला म्हटले – 'हे वेपचित्ती, गाथा म्हणा.' असे म्हटल्यावर, भिक्षूंनो, वेपचित्ती असुरेंद्राने ही गाथा म्हटली –" ‘‘එතදෙව තිතික්ඛාය, වජ්ජං පස්සාමි වාසව; යදා නං මඤ්ඤති බාලො, භයා ම්යායං තිතික්ඛති; අජ්ඣාරුහති දුම්මෙධො, ගොව භිය්යො පලායින’’න්ති. "हे वासव! सहनशीलतेमध्ये मला हाच एक दोष दिसतो; जेव्हा मूर्ख माणूस असा विचार करतो की, 'हा माझ्या भीतीने सहन करत आहे,' तेव्हा तो मंदबुद्धी माणूस पळणाऱ्या बैलावर इतर बैल धावून जातात तसा अधिकच अंगावर धावून येतो." ‘‘භාසිතාය ඛො පන, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්තිනා අසුරින්දෙන ගාථාය අසුරා අනුමොදිංසු, දෙවා තුණ්හී අහෙසුං. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්ති අසුරින්දො සක්කං දෙවානමින්දං එතදවොච – ‘භණ, දෙවානමින්ද, ගාථ’න්ති. එවං වුත්තෙ, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො ඉමා ගාථායො අභාසි – "भिक्षूंनो, वेपचित्ती असुरेंद्राने गाथा म्हटल्यावर असुरांनी त्याचे कौतुक केले, पण देव शांत राहिले. त्यानंतर, भिक्षूंनो, वेपचित्ती असुरेंद्राने देवांचा राजा शक्राला म्हटले – 'हे देवाधिपती, गाथा म्हणा.' असे म्हटल्यावर, भिक्षूंनो, देवांचा राजा शक्राने या गाथा म्हटल्या –" ‘‘කාමං මඤ්ඤතු වා මා වා, භයා ම්යායං තිතික්ඛති; සදත්ථපරමා අත්ථා, ඛන්ත්යා භිය්යො න විජ්ජති. "तो असा विचार करो किंवा न करो की 'हा माझ्या भीतीने सहन करत आहे', स्वतःचे कल्याण हेच ज्यांचे परम ध्येय आहे त्यांच्यासाठी, सहनशीलतेपेक्षा श्रेष्ठ काहीही नाही." ‘‘යො හවෙ බලවා සන්තො, දුබ්බලස්ස තිතික්ඛති; තමාහු පරමං ඛන්තිං, නිච්චං ඛමති දුබ්බලො. "जो खरोखर बलवान असूनही दुर्बलाचे अपराध सहन करतो, त्यालाच संत श्रेष्ठ सहनशीलता म्हणतात; दुर्बलाला तर नेहमीच सहन करावे लागते." ‘‘අබලං තං බලං ආහු, යස්ස බාලබලං බලං; බලස්ස ධම්මගුත්තස්ස, පටිවත්තා න විජ්ජති. "ज्याचे बळ हे केवळ मूर्खपणाचे बळ आहे, त्या बळाला सुज्ञ लोक 'अ-बळ' (दुर्बलता) म्हणतात. जो धर्माने रक्षित असून बलवान आहे, त्याला विरोध करणारा कोणी नसतो." ‘‘තස්සෙව තෙන පාපියො, යො කුද්ධං පටිකුජ්ඣති; කුද්ධං අප්පටිකුජ්ඣන්තො, සඞ්ගාමං ජෙති දුජ්ජයං. जो क्रोधी माणसावर उलट क्रोध करतो, तो स्वतःचेच अधिक नुकसान करतो. क्रोधाला क्रोधाने उत्तर न देणारा मनुष्य जिंकण्यास कठीण असा संग्राम जिंकतो. ‘‘උභින්නමත්ථං චරති, අත්තනො ච පරස්ස ච; පරං සඞ්කුපිතං ඤත්වා, යො සතො උපසම්මති. जो मनुष्य दुसऱ्याला क्रोधीत झालेले पाहून, जागरूक राहून शांत होतो, तो स्वतःच्या आणि दुसऱ्याच्या अशा दोघांच्याही कल्याणासाठी आचरण करतो. ‘‘උභින්නං තිකිච්ඡන්තානං, අත්තනො ච පරස්ස ච; ජනා මඤ්ඤන්ති බාලොති, යෙ ධම්මස්ස අකොවිදා’’ති. जे लोक धम्मामध्ये अकुशल आहेत, ते स्वतःचा आणि दुसऱ्याचा अशा दोघांचाही उपचार करणाऱ्याला मूर्ख समजतात. ‘‘භාසිතාසු ඛො පන, භික්ඛවෙ, සක්කෙන දෙවානමින්දෙන ගාථාසු, දෙවා අනුමොදිංසු, අසුරා තුණ්හී අහෙසුං. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, දෙවානඤ්ච අසුරානඤ්ච පාරිසජ්ජා එතදවොචුං – ‘භාසිතා ඛො වෙපචිත්තිනා අසුරින්දෙන ගාථායො. තා ච ඛො සදණ්ඩාවචරා සසත්ථාවචරා, ඉති භණ්ඩනං ඉති [Pg.226] විග්ගහො ඉති කලහො. භාසිතා ඛො සක්කෙන දෙවානමින්දෙන ගාථායො. තා ච ඛො අදණ්ඩාවචරා අසත්ථාවචරා, ඉති අභණ්ඩනං ඉති අවිග්ගහො ඉති අකලහො. සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස සුභාසිතෙන ජයො’ති. ඉති ඛො, භික්ඛවෙ සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස සුභාසිතෙන ජයො අහොසී’’ති. भिक्खूहो, जेव्हा देवांचा राजा सक्क याने या गाथा म्हटल्या, तेव्हा देवांनी त्याचे अनुमोदन केले, परंतु असुर शांत राहिले. त्यानंतर, भिक्खूहो, देव आणि असुरांच्या सभासदांनी असे म्हटले— 'असुरराज वेपचित्तीने म्हटलेल्या गाथा या दंडाशी आणि शस्त्राशी संबंधित आहेत; त्यामुळे भांडण, कलह आणि वाद निर्माण होतो. परंतु देवांचा राजा सक्क याने म्हटलेल्या गाथा या दंडविरहित आणि शस्त्रविरहित आहेत; त्यामुळे भांडण नाही, कलह नाही आणि वादही नाही. देवांचा राजा सक्क याने आपल्या सुभाषितातून विजय मिळवला आहे.' भिक्खूहो, अशा प्रकारे देवांचा राजा सक्क याचा सुभाषितातून विजय झाला. 6. කුලාවකසුත්තං ६. कुलावक सुत्त 252. සාවත්ථියං. ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, දෙවාසුරසඞ්ගාමො සමුපබ්යූළ්හො අහොසි. තස්මිං ඛො පන, භික්ඛවෙ, සඞ්ගාමෙ අසුරා ජිනිංසු, දෙවා පරාජිනිංසු. පරාජිතා ච ඛො, භික්ඛවෙ, දෙවා අපායංස්වෙව උත්තරෙනමුඛා, අභියංස්වෙව නෙ අසුරා. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො මාතලි සඞ්ගාහකං ගාථාය අජ්ඣභාසි – २५२. सावत्थी येथे. "भिक्खूहो, पूर्वी कधीतरी देव आणि असुरांमध्ये मोठे युद्ध पेटले होते. भिक्खूहो, त्या युद्धात असुरांचा विजय झाला आणि देवांचा पराभव झाला. पराभूत झालेले देव उत्तरेकडे तोंड करून पळून जाऊ लागले आणि असुर त्यांचा पाठलाग करू लागले. तेव्हा, भिक्खूहो, देवांचा राजा सक्क याने आपला सारथी मातली याला गाथेने संबोधित केले— ‘‘කුලාවකා මාතලි සිම්බලිස්මිං,ඊසාමුඛෙන පරිවජ්ජයස්සු; කාමං චජාම අසුරෙසු පාණං,මායිමෙ දිජා විකුලාවකා අහෙසු’’න්ති. ‘हे मातली, शाल्मलीच्या (काटेसावरीच्या) वनातील पक्ष्यांची घरटी रथाच्या दांड्याने वाचव. असुरांच्या हातून आमचे प्राण गेले तरी चालतील, पण हे पक्षी घरटे नसलेले (बेघर) होऊ नयेत.’ ‘‘‘එවං භද්දන්තවා’ති ඛො, භික්ඛවෙ, මාතලි සඞ්ගාහකො සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස පටිස්සුත්වා සහස්සයුත්තං ආජඤ්ඤරථං පච්චුදාවත්තෙසි. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, අසුරානං එතදහොසි – ‘පච්චුදාවත්තො ඛො දානි සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස සහස්සයුත්තො ආජඤ්ඤරථො. දුතියම්පි ඛො දෙවා අසුරෙහි සඞ්ගාමෙස්සන්තීති භීතා අසුරපුරමෙව පාවිසිංසු. ඉති ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස ධම්මෙන ජයො අහොසී’’’ති. ‘तसेच असो, महाराज!’ असे म्हणून सारथी मातलीने देवांचा राजा सक्क याच्या आज्ञेचे पालन केले आणि एक हजार घोड्यांचा तो दिव्य रथ मागे फिरवला. भिक्खूहो, जेव्हा रथ मागे फिरला, तेव्हा असुरांच्या मनात असा विचार आला— 'आता देवांचा राजा सक्क याचा एक हजार घोड्यांचा रथ मागे फिरला आहे. देव पुन्हा एकदा असुरांशी युद्ध करतील.' या भीतीने घाबरून ते असुरनगरीतच पळून गेले. भिक्खूहो, अशा प्रकारे देवांचा राजा सक्क याने धम्माच्या मार्गानेच विजय मिळवला. 7. නදුබ්භියසුත්තං ७. नदुब्भिय सुत्त 253. සාවත්ථියං. ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස රහොගතස්ස පටිසල්ලීනස්ස එවං චෙතසො පරිවිතක්කො උදපාදි – ‘යොපි මෙ අස්ස සුපච්චත්ථිකො තස්සපාහං න දුබ්භෙය්ය’න්ති. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්ති අසුරින්දො සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස චෙතසා චෙතොපරිවිතක්කමඤ්ඤාය යෙන සක්කො දෙවානමින්දො තෙනුපසඞ්කමි. අද්දසා [Pg.227] ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො වෙපචිත්තිං අසුරින්දං දූරතොව ආගච්ඡන්තං. දිස්වාන වෙපචිත්තිං අසුරින්දං එතදවොච – ‘තිට්ඨ, වෙපචිත්ති, ගහිතොසී’’’ති. २५३. सावत्थी येथे. "भिक्खूहो, पूर्वी कधीतरी देवांचा राजा सक्क एकांतात ध्यानस्थ बसला असताना त्याच्या मनात असा विचार आला— 'जरी कोणी माझा कट्टर शत्रू असला, तरी मी त्याच्याशी द्रोह करणार नाही.' भिक्खूहो, तेव्हा असुरराज वेपचित्तीने आपल्या मनाने देवांचा राजा सक्क याच्या मनातील हा विचार जाणून घेतला आणि तो सक्क याच्याकडे आला. भिक्खूहो, देवांचा राजा सक्क याने असुरराज वेपचित्तीला दुरूनच येताना पाहिले. त्याला पाहून तो म्हणाला— 'थांब, वेपचित्ती! तू पकडला गेला आहेस!' ‘‘යදෙව තෙ, මාරිස, පුබ්බෙ චිත්තං, තදෙව ත්වං මා පජහාසී’’ති. ‘हे प्रिय महोदया, तुमच्या मनात आधी जो विचार आला होता, त्याचा तुम्ही त्याग करू नका.’ ‘‘සපස්සු ච මෙ, වෙපචිත්ති, අදුබ්භායා’’ති. ‘हे वेपचित्ती, माझ्याशी द्रोह न करण्याची शपथ घे.’ ‘‘යං මුසා භණතො පාපං, යං පාපං අරියූපවාදිනො; මිත්තද්දුනො ච යං පාපං, යං පාපං අකතඤ්ඤුනො; තමෙව පාපං ඵුසතු, යො තෙ දුබ්භෙ සුජම්පතී’’ති. ‘असत्य बोलणाऱ्याला जे पाप मिळते, आर्यांची निंदा करणाऱ्याला जे पाप मिळते, मित्राचा द्रोह करणाऱ्याला जे पाप मिळते आणि कृतघ्न माणसाला जे पाप मिळते; हे सुजापती, जो तुमच्याशी द्रोह करेल, त्याला तेच पाप लाभो.’ 8. වෙරොචනඅසුරින්දසුත්තං ८. वेरोचन असुरिंद सुत्त 254. සාවත්ථියං ජෙතවනෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා දිවාවිහාරගතො හොති පටිසල්ලීනො. අථ ඛො සක්කො ච දෙවානමින්දො වෙරොචනො ච අසුරින්දො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා පච්චෙකං ද්වාරබාහං නිස්සාය අට්ඨංසු. අථ ඛො වෙරොචනො අසුරින්දො භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – २५४. सावत्थी येथील जेतवनात. त्या वेळी भगवान दिवसाच्या विहारासाठी एकांतात ध्यानस्थ बसले होते. तेव्हा देवांचा राजा सक्क आणि असुरराज वेरोचन भगवंतांकडे आले; जवळ येऊन ते दोघेही एकेका दाराच्या खांबाला टेकून उभे राहिले. त्यानंतर असुरराज वेरोचन याने भगवंतांच्या समोर ही गाथा म्हटली— ‘‘වායමෙථෙව පුරිසො, යාව අත්ථස්ස නිප්ඵදා; නිප්ඵන්නසොභනො අත්ථො, වෙරොචනවචො ඉද’’න්ති. ‘मनुष्याने जोपर्यंत ध्येय साध्य होत नाही, तोपर्यंत प्रयत्न करतच राहिले पाहिजे. साध्य झालेले ध्येयच शोभून दिसते; हे वेरोचनाचे वचन आहे.’ ‘‘වායමෙථෙව පුරිසො, යාව අත්ථස්ස නිප්ඵදා; නිප්ඵන්නසොභනො අත්ථො, ඛන්ත්යා භිය්යො න විජ්ජතී’’ති. ‘मनुष्याने जोपर्यंत ध्येय साध्य होत नाही, तोपर्यंत प्रयत्न करतच राहिले पाहिजे. साध्य झालेल्या ध्येयांमध्ये क्षमेपेक्षा श्रेष्ठ काहीही नाही; हे सक्काचे वचन आहे.’ ‘‘සබ්බෙ සත්තා අත්ථජාතා, තත්ථ තත්ථ යථාරහං; සංයොගපරමා ත්වෙව, සම්භොගා සබ්බපාණිනං; නිප්ඵන්නසොභනො අත්ථො, වෙරොචනවචො ඉද’’න්ති. ‘सर्व प्राणी आपापल्या गरजेनुसार वेगवेगळ्या ठिकाणी ध्येयाने प्रेरित असतात. परंतु सर्व प्राण्यांसाठी उपभोग्य वस्तूंचा संयोग हाच सर्वश्रेष्ठ उपभोग आहे. साध्य झालेले ध्येयच शोभून दिसते; हे वेरोचनाचे वचन आहे.’ ‘‘සබ්බෙ සත්තා අත්ථජාතා, තත්ථ තත්ථ යථාරහං; සංයොගපරමා ත්වෙව, සම්භොගා සබ්බපාණිනං; නිප්ඵන්නසොභනො අත්ථො, ඛන්ත්යා භිය්යො න විජ්ජතී’’ති. ‘सर्व प्राणी आपापल्या गरजेनुसार वेगवेगळ्या ठिकाणी ध्येयाने प्रेरित असतात. परंतु सर्व प्राण्यांसाठी उपभोग्य वस्तूंचा संयोग हाच सर्वश्रेष्ठ उपभोग आहे. साध्य झालेल्या ध्येयांमध्ये क्षमेपेक्षा श्रेष्ठ काहीही नाही; हे सक्काचे वचन आहे.’ 9. අරඤ්ඤායතනඉසිසුත්තං ९. अरण्यायतन इसि सुत्त 255. සාවත්ථියං[Pg.228]. ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, සම්බහුලා ඉසයො සීලවන්තො කල්යාණධම්මා අරඤ්ඤායතනෙ පණ්ණකුටීසු සම්මන්ති. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො ච දෙවානමින්දො වෙපචිත්ති ච අසුරින්දො යෙන තෙ ඉසයො සීලවන්තො කල්යාණධම්මා තෙනුපසඞ්කමිංසු. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්ති අසුරින්දො පටලියො උපාහනා ආරොහිත්වා ඛග්ගං ඔලග්ගෙත්වා ඡත්තෙන ධාරියමානෙන අග්ගද්වාරෙන අස්සමං පවිසිත්වා තෙ ඉසයො සීලවන්තෙ කල්යාණධම්මෙ අපබ්යාමතො කරිත්වා අතික්කමි. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො පටලියො උපාහනා ඔරොහිත්වා ඛග්ගං අඤ්ඤෙසං දත්වා ඡත්තං අපනාමෙත්වා ද්වාරෙනෙව අස්සමං පවිසිත්වා තෙ ඉසයො සීලවන්තෙ කල්යාණධම්මෙ අනුවාතං පඤ්ජලිකො නමස්සමානො අට්ඨාසි’’. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, තෙ ඉසයො සීලවන්තො කල්යාණධම්මා සක්කං දෙවානමින්දං ගාථාය අජ්ඣභාසිංසු – २५५. सावत्थी येथे. "भिक्खूहो, पूर्वी कधीतरी अनेक शीलवान आणि सदाचारी ऋषी अरण्यातील पर्णकुटींमध्ये शांतपणे राहत होते. भिक्खूहो, तेव्हा देवांचा राजा सक्क आणि असुरराज वेपचित्ती त्या शीलवान व सदाचारी ऋषींकडे गेले. भिक्खूहो, असुरराज वेपचित्तीने जाड तळ असलेले बूट घातले, तलवार लटकवली आणि डोक्यावर छत्र धरून मुख्य दाराने आश्रमात प्रवेश केला; आणि त्या शीलवान व सदाचारी ऋषींना न वाकता तो त्यांच्यावरून निघून गेला. परंतु, भिक्खूहो, देवांचा राजा सक्क याने आपले बूट काढले, आपली तलवार इतरांकडे सोपवली, आपले छत्र बंद केले आणि साध्या दाराने आश्रमात प्रवेश केला; आणि तो त्या शीलवान व सदाचारी ऋषींच्या समोर वाऱ्याच्या दिशेने हात जोडून, नमस्कार करत उभा राहिला. भिक्खूहो, तेव्हा त्या शीलवान व सदाचारी ऋषींनी देवांचा राजा सक्क याला गाथेने संबोधित केले—" ‘‘ගන්ධො ඉසීනං චිරදික්ඛිතානං,කායා චුතො ගච්ඡති මාලුතෙන; ඉතො පටික්කම්ම සහස්සනෙත්ත,ගන්ධො ඉසීනං අසුචි දෙවරාජා’’ති. ‘दीर्घकाळापासून व्रताचे पालन करणाऱ्या ऋषींच्या शरीरातून निघणारा गंध वाऱ्यासोबत पसरतो. हे सहस्रनेत्रा, येथून दूर हो; हे देवराज, ऋषींच्या शरीराचा हा गंध अशुद्ध आहे.’ ‘‘ගන්ධො ඉසීනං චිරදික්ඛිතානං,කායා චුතො ගච්ඡතු මාලුතෙන,සුචිත්රපුප්ඵං සිරස්මිංව මාලං; ගන්ධං එතං පටිකඞ්ඛාම භන්තෙ,න හෙත්ථ දෙවා පටිකූලසඤ්ඤිනො’’ති. ‘भंते, दीर्घकाळापासून व्रताचे पालन करणाऱ्या ऋषींच्या शरीरातून निघणारा गंध वाऱ्यासोबत पसरू द्या; डोक्यावर धारण केलेल्या सुंदर फुलांच्या माळेप्रमाणे आम्ही या गंधाची इच्छा करतो. कारण देव या शीलवंतांच्या गंधाला अपवित्र मानत नाहीत.’ 10. සමුද්දකසුත්තං १०. समुद्द्रक सुत्त 256. සාවත්ථියං. ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, සම්බහුලා ඉසයො සීලවන්තො කල්යාණධම්මා සමුද්දතීරෙ පණ්ණකුටීසු සම්මන්ති. තෙන ඛො පන සමයෙන දෙවාසුරසඞ්ගාමො සමුපබ්යූළ්හො අහොසි. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, තෙසං ඉසීනං සීලවන්තානං කල්යාණධම්මානං එතදහොසි – ‘ධම්මිකා ඛො දෙවා, අධම්මිකා අසුරා. සියාපි නො අසුරතො භයං. යංනූන මයං සම්බරං අසුරින්දං උපසඞ්කමිත්වා [Pg.229] අභයදක්ඛිණං යාචෙය්යාමා’’’ති. ‘‘අථ ඛො, භික්ඛවෙ, තෙ ඉසයො සීලවන්තො කල්යාණධම්මා – සෙය්යථාපි නාම බලවා පුරිසො සමිඤ්ජිතං වා බාහං පසාරෙය්ය, පසාරිතං වා බාහං සමිඤ්ජෙය්ය එවමෙව – සමුද්දතීරෙ පණ්ණකුටීසු අන්තරහිතා සම්බරස්ස අසුරින්දස්ස සම්මුඛෙ පාතුරහෙසුං. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, තෙ ඉසයො සීලවන්තො කල්යාණධම්මා සම්බරං අසුරින්දං ගාථාය අජ්ඣභාසිංසු – २५६. श्रावस्ती येथे. "भिक्खूहो, पूर्वीची गोष्ट आहे, शीलवान आणि कल्याणधर्मी असलेले अनेक ऋषी समुद्राच्या किनाऱ्यावर पर्णकुटीत शांतपणे राहत होते. त्या वेळी देव आणि असुरांचे युद्ध पेटले होते. तेव्हा, भिक्खूहो, त्या शीलवान आणि कल्याणधर्मी ऋषींच्या मनात असा विचार आला – 'देव हे धार्मिक आहेत आणि असुर हे अधार्मिक आहेत. आपल्याला असुरांपासून भय निर्माण होऊ शकते. मग आपण असुरराज संबराकडे जाऊन त्याच्याकडे अभयदानाची याचना का करू नये?' त्यानंतर, भिक्खूहो, ते शीलवान आणि कल्याणधर्मी ऋषी – ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य आपला दुमडलेला हात पसरतो किंवा पसरलेला हात दुमडतो, अगदी त्याचप्रमाणे – समुद्राच्या किनाऱ्यावरील पर्णकुटीतून अंतर्धान पावले आणि असुरराज संबराच्या समोर प्रकट झाले. त्यानंतर, भिक्खूहो, त्या शीलवान आणि कल्याणधर्मी ऋषींनी असुरराज संबराला गाथेने संबोधित केले –" ‘‘ඉසයො සම්බරං පත්තා, යාචන්ති අභයදක්ඛිණං; කාමංකරො හි තෙ දාතුං, භයස්ස අභයස්ස වා’’ති. "संबराकडे आलेले ऋषी अभयदानाची याचना करत आहेत. कारण तू त्यांना त्यांच्या इच्छेनुसार भय किंवा अभय देण्यास समर्थ आहेस." ‘‘ඉසීනං අභයං නත්ථි, දුට්ඨානං සක්කසෙවිනං; අභයං යාචමානානං, භයමෙව දදාමි වො’’ති. "सक्काची (इंद्राची) सेवा करणाऱ्या आणि आमच्याशी वैर ठेवणाऱ्या दुष्ट ऋषींना अभय नाही. अभयाची याचना करणाऱ्या तुम्हांला मी केवळ भयच देईन." ‘‘අභයං යාචමානානං, භයමෙව දදාසි නො; පටිග්ගණ්හාම තෙ එතං, අක්ඛයං හොතු තෙ භයං. "अभयाची याचना करणाऱ्या आम्हांला तू केवळ भयच देत आहेस. आम्ही तुझ्याकडून हे स्वीकारतो; तुझे हे भय अक्षय (कधीही न संपणारे) होवो!" ‘‘යාදිසං වපතෙ බීජං, තාදිසං හරතෙ ඵලං; කල්යාණකාරී කල්යාණං, පාපකාරී ච පාපකං; පවුත්තං තාත තෙ බීජං, ඵලං පච්චනුභොස්සසී’’ති. "माणूस जसे बीज पेरतो, तसेच फळ त्याला मिळते. कल्याणकारी कर्म करणाऱ्याला कल्याणकारी फळ मिळते आणि पाप कर्म करणाऱ्याला पापी फळ मिळते. हे वत्सा, तू जसे बीज पेरले आहेस, तसेच फळ तुला भोगावे लागेल." ‘‘අථ ඛො, භික්ඛවෙ, තෙ ඉසයො සීලවන්තො කල්යාණධම්මා සම්බරං අසුරින්දං අභිසපිත්වා – සෙය්යථාපි නාම බලවා පුරිසො සමිඤ්ජිතං වා බාහං පසාරෙය්ය, පසාරිතං වා බාහං සමිඤ්ජෙය්ය එවමෙව – සම්බරස්ස අසුරින්දස්ස සම්මුඛෙ අන්තරහිතා සමුද්දතීරෙ පණ්ණකුටීසු පාතුරහෙසුං. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සම්බරො අසුරින්දො තෙහි ඉසීහි සීලවන්තෙහි කල්යාණධම්මෙහි අභිසපිතො රත්තියා සුදං තික්ඛත්තුං උබ්බිජ්ජී’’ති. "त्यानंतर, भिक्खूहो, ते शीलवान आणि कल्याणधर्मी ऋषी असुरराज संबराला शाप देऊन – ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य आपला दुमडलेला हात पसरतो किंवा पसरलेला हात दुमडतो, अगदी त्याचप्रमाणे – असुरराज संबराच्या समोरून अंतर्धान पावले आणि समुद्राच्या किनाऱ्यावरील पर्णकुटीत प्रकट झाले. त्यानंतर, भिक्खूहो, त्या शीलवान आणि कल्याणधर्मी ऋषींनी शाप दिल्यामुळे असुरराज संबर रात्रीच्या वेळी तीनदा दचकून जागा झाला." පඨමො වග්ගො. पहिला वर्ग (वग्ग) समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – සුවීරං සුසීමඤ්චෙව, ධජග්ගං වෙපචිත්තිනො; සුභාසිතං ජයඤ්චෙව, කුලාවකං නදුබ්භියං; වෙරොචන අසුරින්දො, ඉසයො අරඤ්ඤකඤ්චෙව; ඉසයො ච සමුද්දකාති. सुवीर सुत्त, सुसीम सुत्त, ध्वजग्ग सुत्त, वेपचित्ती सुत्त, सुभाषितजय सुत्त, कुलावक सुत्त, नदुब्भिय सुत्त, वेरोचन असुरिंद सुत्त, इसयो अरञ्ञक सुत्त आणि इसयो समुद्द्रक सुत्त. 2. දුතියවග්ගො २. दुसरा वर्ग (वग्ग) 1. වතපදසුත්තං १. व्रतपद सुत्त (वतपदसुत्त) 257. සාවත්ථියං[Pg.230]. ‘‘සක්කස්ස, භික්ඛවෙ, දෙවානමින්දස්ස පුබ්බෙ මනුස්සභූතස්ස සත්ත වතපදානි සමත්තානි සමාදින්නානි අහෙසුං, යෙසං සමාදින්නත්තා සක්කො සක්කත්තං අජ්ඣගා. කතමානි සත්ත වතපදානි? යාවජීවං මාතාපෙත්තිභරො අස්සං, යාවජීවං කුලෙ ජෙට්ඨාපචායී අස්සං, යාවජීවං සණ්හවාචො අස්සං, යාවජීවං අපිසුණවාචො අස්සං, යාවජීවං විගතමලමච්ඡෙරෙන චෙතසා අගාරං අජ්ඣාවසෙය්යං මුත්තචාගො පයතපාණි වොස්සග්ගරතො යාචයොගො දානසංවිභාගරතො, යාවජීවං සච්චවාචො අස්සං, යාවජීවං අක්කොධනො අස්සං – සචෙපි මෙ කොධො උප්පජ්ජෙය්ය, ඛිප්පමෙව නං පටිවිනෙය්ය’’න්ති. ‘‘සක්කස්ස, භික්ඛවෙ, දෙවානමින්දස්ස පුබ්බෙ මනුස්සභූතස්ස ඉමානි සත්ත වතපදානි සමත්තානි සමාදින්නානි අහෙසුං, යෙසං සමාදින්නත්තා සක්කො සක්කත්තං අජ්ඣගා’’ති. २५७. श्रावस्ती येथे. "भिक्खूहो, देवांचा राजा सक्क (इंद्र) जेव्हा पूर्वजन्मी मनुष्य होता, तेव्हा त्याने सात व्रतांचे पूर्णपणे पालन केले होते, ज्यांच्या पालनामुळे सक्काला देवराजपद प्राप्त झाले. ती सात व्रते कोणती? (१) 'मी आयुष्यभर माझ्या माता-पित्यांचे संगोपन व सेवा करेन.' (२) 'मी आयुष्यभर कुळातील वडीलधाऱ्या व्यक्तींचा आदर-सन्मान करेन.' (३) 'मी आयुष्यभर मृदू आणि मधुर वाणी बोलेन.' (४) 'मी आयुष्यभर चहाडी करणार नाही.' (५) 'मी आयुष्यभर लोभ आणि मत्सराचा मळ नसलेल्या चित्ताने गृहस्थाश्रमात राहीन; मुक्तहस्ताने दान देणारा, दान देण्यासाठी सदैव हात स्वच्छ ठेवणारा, त्यागात आनंद मानणारा, याचना करणाऱ्यांच्या मागण्या पूर्ण करण्यास योग्य आणि दान व वाटणी करण्यात रमणारा होईन.' (६) 'मी आयुष्यभर सत्य बोलेन.' (७) 'मी आयुष्यभर क्रोधरहित राहीन – आणि जरी माझ्या मनात क्रोध उत्पन्न झाला, तरी मी तो त्वरित नष्ट करेन.' भिक्खूहो, देवांचा राजा सक्क जेव्हा पूर्वजन्मी मनुष्य होता, तेव्हा त्याने या सात व्रतांचे पूर्णपणे पालन केले होते, ज्यांच्या पालनामुळे सक्काला देवराजपद प्राप्त झाले." ‘‘මාතාපෙත්තිභරං ජන්තුං, කුලෙ ජෙට්ඨාපචායිනං; සණ්හං සඛිලසම්භාසං, පෙසුණෙය්යප්පහායිනං. "जो मनुष्य आपल्या माता-पित्यांचे संगोपन करतो, कुळातील वडीलधाऱ्यांचा आदर करतो, मृदू व प्रेमळ संभाषण करतो, चहाडी करण्याच्या सवयीचा त्याग करतो," ‘‘මච්ඡෙරවිනයෙ යුත්තං, සච්චං කොධාභිභුං නරං; තං වෙ දෙවා තාවතිංසා, ආහු සප්පුරිසො ඉතී’’ති. "मत्सर दूर करण्यात तत्पर असतो, सत्यवादी असतो आणि क्रोधावर विजय मिळवतो; त्यालाच खरोखर तावतिंस देव 'सत्पुरुष' (सज्जन) म्हणतात." 2. සක්කනාමසුත්තං २. सक्कनाम सुत्त (सक्कनामत सुत्त) 258. සාවත්ථියං ජෙතවනෙ. තත්ර ඛො භගවා භික්ඛූ එතදවොච – ‘‘සක්කො, භික්ඛවෙ, දෙවානමින්දො පුබ්බෙ මනුස්සභූතො සමානො මඝො නාම මාණවො අහොසි, තස්මා මඝවාති වුච්චති. २५८. श्रावस्ती येथील जेतवनात. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित करून म्हटले – "भिक्खूहो, देवांचा राजा सक्क जेव्हा पूर्वजन्मी मनुष्य होता, तेव्हा तो 'मघ' नावाचा तरुण होता; म्हणूनच त्याला 'मघवा' असे म्हटले जाते." ‘‘සක්කො, භික්ඛවෙ, දෙවානමින්දො පුබ්බෙ මනුස්සභූතො සමානො පුරෙ දානං අදාසි, තස්මා පුරින්දදොති වුච්චති. "भिक्खूहो, देवांचा राजा सक्क जेव्हा पूर्वजन्मी मनुष्य होता, तेव्हा त्याने नगरा-नगरांमध्ये दान दिले; म्हणूनच त्याला 'पुरिंदद' असे म्हटले जाते." ‘‘සක්කො, භික්ඛවෙ, දෙවානමින්දො පුබ්බෙ මනුස්සභූතො සමානො සක්කච්චං දානං අදාසි, තස්මා සක්කොති වුච්චති. "भिक्खूहो, देवांचा राजा सक्क जेव्हा पूर्वजन्मी मनुष्य होता, तेव्हा त्याने आदरपूर्वक दान दिले; म्हणूनच त्याला 'सक्क' असे म्हटले जाते." ‘‘සක්කො[Pg.231], භික්ඛවෙ, දෙවානමින්දො පුබ්බෙ මනුස්සභූතො සමානො ආවසථං අදාසි, තස්මා වාසවොති වුච්චති. "भिक्खूहो, देवांचा राजा सक्क जेव्हा पूर्वजन्मी मनुष्य होता, तेव्हा त्याने विश्रामगृह दान दिले; म्हणूनच त्याला 'वासव' असे म्हटले जाते." ‘‘සක්කො, භික්ඛවෙ, දෙවානමින්දො සහස්සම්පි අත්ථානං මුහුත්තෙන චින්තෙති, තස්මා සහස්සක්ඛොති වුච්චති. "भिक्खूहो, देवांचा राजा सक्क एका क्षणात हजारो गोष्टींचा विचार करू शकतो; म्हणूनच त्याला 'सहस्सक्ख' असे म्हटले जाते." ‘‘සක්කස්ස, භික්ඛවෙ, දෙවානමින්දස්ස සුජා නාම අසුරකඤ්ඤා පජාපති, තස්මා සුජම්පතීති වුච්චති. "भिक्खूहो, देवांचा राजा सक्क याची पत्नी 'सुजा' नावाची असुरकन्या होती; म्हणूनच त्याला 'सुजम्पति' असे म्हटले जाते." ‘‘සක්කො, භික්ඛවෙ, දෙවානමින්දො දෙවානං තාවතිංසානං ඉස්සරියාධිපච්චං රජ්ජං කාරෙති, තස්මා දෙවානමින්දොති වුච්චති. "भिक्खूहो, देवांचा राजा सक्क तावतिंस देवांवर आधिपत्य आणि राज्य करतो; म्हणूनच त्याला 'देवांनामिंद' असे म्हटले जाते." ‘‘සක්කස්ස, භික්ඛවෙ දෙවානමින්දස්ස පුබ්බෙ මනුස්සභූතස්ස සත්ත වතපදානි සමත්තානි සමාදින්නානි අහෙසුං, යෙසං සමාදින්නත්තා සක්කො සක්කත්තං අජ්ඣගා. කතමානි සත්ත වතපදානි? යාවජීවං මාතාපෙත්තිභරො අස්සං, යාවජීවං කුලෙ ජෙට්ඨාපචායී අස්සං, යාවජීවං සණ්හවාචො අස්සං, යාවජීවං අපිසුණවාචො අස්සං, යාවජීවං විගතමලමච්ඡෙරෙන චෙතසා අගාරං අජ්ඣාවසෙය්යං මුත්තචාගො පයතපාණි වොස්සග්ගරතො යාචයොගො දානසංවිභාගරතො, යාවජීවං සච්චවාචො අස්සං, යාවජීවං අක්කොධනො අස්සං – සචෙපි මෙ කොධො උප්පජ්ජෙය්ය, ඛිප්පමෙව නං පටිවිනෙය්ය’’න්ති. ‘‘සක්කස්ස, භික්ඛවෙ, දෙවානමින්දස්ස පුබ්බෙ මනුස්සභූතස්ස ඉමානි සත්ත වතපදානි සමත්තානි සමාදින්නානි අහෙසුං, යෙසං සමාදින්නත්තා සක්කො සක්කත්තං අජ්ඣගා’’ති. "भिक्खूहो, देवांचा राजा सक्क जेव्हा पूर्वजन्मी मनुष्य होता, तेव्हा त्याने सात व्रतांचे पूर्णपणे पालन केले होते, ज्यांच्या पालनामुळे सक्काला देवराजपद प्राप्त झाले. ती सात व्रते कोणती? (१) 'मी आयुष्यभर माझ्या माता-पित्यांचे संगोपन व सेवा करेन.' (२) 'मी आयुष्यभर कुळातील वडीलधाऱ्या व्यक्तींचा आदर-सन्मान करेन.' (३) 'मी आयुष्यभर मृदू आणि मधुर वाणी बोलेन.' (४) 'मी आयुष्यभर चहाडी करणार नाही.' (५) 'मी आयुष्यभर लोभ आणि मत्सराचा मळ नसलेल्या चित्ताने गृहस्थाश्रमात राहीन; मुक्तहस्ताने दान देणारा, दान देण्यासाठी सदैव हात स्वच्छ ठेवणारा, त्यागात आनंद मानणारा, याचना करणाऱ्यांच्या मागण्या पूर्ण करण्यास योग्य आणि दान व वाटणी करण्यात रमणारा होईन.' (६) 'मी आयुष्यभर सत्य बोलेन.' (७) 'मी आयुष्यभर क्रोधरहित राहीन – आणि जरी माझ्या मनात क्रोध उत्पन्न झाला, तरी मी तो त्वरित नष्ट करेन.' भिक्खूहो, देवांचा राजा सक्क जेव्हा पूर्वजन्मी मनुष्य होता, तेव्हा त्याने या सात व्रतांचे पूर्णपणे पालन केले होते, ज्यांच्या पालनामुळे सक्काला देवराजपद प्राप्त झाले." ‘‘මාතාපෙත්තිභරං ජන්තුං, කුලෙ ජෙට්ඨාපචායිනං; සණ්හං සඛිලසම්භාසං, පෙසුණෙය්යප්පහායිනං. "जो मनुष्य आपल्या माता-पित्यांचे संगोपन करतो, कुळातील वडीलधाऱ्यांचा आदर करतो, मृदू व प्रेमळ संभाषण करतो, चहाडी करण्याच्या सवयीचा त्याग करतो," ‘‘මච්ඡෙරවිනයෙ යුත්තං, සච්චං කොධාභිභුං නරං; තං වෙ දෙවා තාවතිංසා, ආහු සප්පුරිසො ඉතී’’ති. "मत्सर दूर करण्यात तत्पर असतो, सत्यवादी असतो आणि क्रोधावर विजय मिळवतो; त्यालाच खरोखर तावतिंस देव 'सत्पुरुष' (सज्जन) म्हणतात." 3. මහාලිසුත්තං ३. महालि सुत्त (महालिसुत्त) 259. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා වෙසාලියං විහරති මහාවනෙ කූටාගාරසාලායං. අථ ඛො මහාලි ලිච්ඡවී යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො මහාලි ලිච්ඡවී භගවන්තං එතදවොච – २५९. मी असे ऐकले आहे – एका वेळी भगवान वैशाली येथील महावनात कूटागारशाळेत विहार करत होते. तेव्हा महाली लिच्छवी जेथे भगवान होते तेथे आले; आल्यावर त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या महाली लिच्छवींनी भगवंतांना असे म्हटले – ‘‘දිට්ඨො ඛො[Pg.232], භන්තෙ, භගවතා සක්කො දෙවානමින්දො’’ති? “भन्ते, भगवंतांनी देवांचा राजा सक्क याला पाहिले आहे का?” ‘‘දිට්ඨො ඛො මෙ, මහාලි, සක්කො දෙවානමින්දො’’ති. “महाली, मी देवांचा राजा सक्क याला पाहिले आहे.” ‘‘සො හි නූන, භන්තෙ, සක්කපතිරූපකො භවිස්සති. දුද්දසො හි, භන්තෙ, සක්කො දෙවානමින්දො’’ති. “भन्ते, तो नक्कीच सक्कचा प्रतिरूप (बनावट सक्क) असावा. कारण भन्ते, देवांचा राजा सक्क हा पाहण्यास अत्यंत कठीण आहे.” ‘‘සක්කඤ්ච ඛ්වාහං, මහාලි, පජානාමි සක්කකරණෙ ච ධම්මෙ, යෙසං ධම්මානං සමාදින්නත්තා සක්කො සක්කත්තං අජ්ඣගා, තඤ්ච පජානාමි. “महाली, मी सक्कलाही ओळखतो आणि सक्क बनवणाऱ्या गुणांनाही (धम्मांनाही) जाणतो, ज्या धम्मांचे आचरण केल्यामुळे सक्काने सक्कपद प्राप्त केले, तेही मी जाणतो.” ‘‘සක්කො, මහාලි, දෙවානමින්දො පුබ්බෙ මනුස්සභූතො සමානො මඝො නාම මාණවො අහොසි, තස්මා මඝවාති වුච්චති. “महाली, देवांचा राजा सक्क पूर्वजन्मी मनुष्य असताना 'मघ' नावाचा तरुण होता, म्हणून त्याला 'मघवा' असे म्हणतात.” ‘‘සක්කො, මහාලි, දෙවානමින්දො පුබ්බෙ මනුස්සභූතො සමානො සක්කච්චං දානං අදාසි, තස්මා සක්කොති වුච්චති. “महाली, देवांचा राजा सक्क पूर्वजन्मी मनुष्य असताना आदरपूर्वक दान देत असे, म्हणून त्याला 'सक्क' असे म्हणतात.” ‘‘සක්කො, මහාලි, දෙවානමින්දො පුබ්බෙ මනුස්සභූතො සමානො පුරෙ දානං අදාසි, තස්මා පුරින්දදොති වුච්චති. “महाली, देवांचा राजा सक्क पूर्वजन्मी मनुष्य असताना सर्वांच्या आधी दान देत असे, म्हणून त्याला 'पुरिंदद' असे म्हणतात.” ‘‘සක්කො, මහාලි, දෙවානමින්දො පුබ්බෙ මනුස්සභූතො සමානො ආවසථං අදාසි, තස්මා වාසවොති වුච්චති. “महाली, देवांचा राजा सक्क पूर्वजन्मी मनुष्य असताना विश्रामगृहे दान करत असे, म्हणून त्याला 'वासव' असे म्हणतात.” ‘‘සක්කො, මහාලි, දෙවානමින්දො සහස්සම්පි අත්ථානං මුහුත්තෙන චින්තෙති, තස්මා සහස්සක්ඛොති වුච්චති. “महाली, देवांचा राजा सक्क एका क्षणात हजार गोष्टींचा विचार करू शकतो, म्हणून त्याला 'सहस्सक्ख' असे म्हणतात.” ‘‘සක්කස්ස, මහාලි, දෙවානමින්දස්ස සුජා නාම අසුරකඤ්ඤා පජාපති, තස්මා සුජම්පතීති වුච්චති. “महाली, देवांचा राजा सक्क याची पत्नी 'सुजा' नावाची असुरकन्या आहे, म्हणून त्याला 'सुजम्पती' असे म्हणतात.” ‘‘සක්කො, මහාලි, දෙවානමින්දො දෙවානං තාවතිංසානං ඉස්සරියාධිපච්චං රජ්ජං කාරෙති, තස්මා දෙවානමින්දොති වුච්චති. “महाली, देवांचा राजा सक्क हा तावतिंस लोकातील देवांवर आधिपत्य व राज्य करतो, म्हणून त्याला 'देवानामिन्द' असे म्हणतात.” ‘‘සක්කස්ස, මහාලි, දෙවානමින්දස්ස පුබ්බෙ මනුස්සභූතස්ස සත්ත වතපදානි සමත්තානි සමාදින්නානි අහෙසුං, යෙසං සමාදින්නත්තා සක්කො සක්කත්තං අජ්ඣගා. කතමානි සත්ත වතපදානි? යාවජීවං මාතාපෙත්තිභරො අස්සං, යාවජීවං කුලෙ ජෙට්ඨාපචායී අස්සං, යාවජීවං සණ්හවාචො අස්සං, යාවජීවං අපිසුණවාචො අස්සං, යාවජීවං විගතමලමච්ඡෙරෙන චෙතසා අගාරං අජ්ඣාවසෙය්යං මුත්තචාගො පයතපාණි වොස්සග්ගරතො යාචයොගො දානසංවිභාගරතො, යාවජීවං සච්චවාචො අස්සං, යාවජීවං අක්කොධනො අස්සං – සචෙපි මෙ කොධො උප්පජෙය්ය, ඛිප්පමෙව නං පටිවිනෙය්ය’’න්ති. ‘‘සක්කස්ස, මහාලි, දෙවානමින්දස්ස පුබ්බෙ මනුස්සභූතස්ස ඉමානි [Pg.233] සත්ත වතපදානි සමත්තානි සමාදින්නානි අහෙසුං, යෙසං සමාදින්නත්තා සක්කො සක්කත්තං අජ්ඣගා’’ති. “महाली, देवांचा राजा सक्क जेव्हा पूर्वजन्मी मनुष्य होता, तेव्हा त्याने सात व्रतपदे पूर्णपणे स्वीकारली होती, ज्यांच्या आचरणामुळे सक्काने सक्कपद प्राप्त केले. ती सात व्रतपदे कोणती? १. मी जन्मभर माता-पित्यांची सेवा करीन. २. मी जन्मभर कुळातील वडीलधाऱ्यांचा आदर करीन. ३. मी जन्मभर मृदू भाषक राहीन. ४. मी जन्मभर चहाडी करणार नाही. ५. मी जन्मभर लोभ आणि मत्सरापासून मुक्त मनाने घरात राहीन, मुक्तहस्ते दान देणारा, दान देण्यासाठी सदैव हात स्वच्छ ठेवणारा, त्यागात आनंद मानणारा, याचना करणाऱ्यांना साहाय्य करणारा आणि दानाचे वाटप करण्यात तत्पर राहीन. ६. मी जन्मभर सत्यवादी राहीन. ७. मी जन्मभर अक्रोधन राहीन – आणि जरी मला क्रोध आला, तरी मी तो त्वरित शांत करीन. महाली, देवांचा राजा सक्क जेव्हा पूर्वजन्मी मनुष्य होता, तेव्हा त्याने ही सात व्रतपदे पूर्णपणे स्वीकारली होती, ज्यांच्या आचरणामुळे सक्काने सक्कपद प्राप्त केले.” ‘‘මාතාපෙත්තිභරං ජන්තුං, කුලෙ ජෙට්ඨාපචායිනං; සණ්හං සඛිලසම්භාසං, පෙසුණෙය්යප්පහායිනං. “जो मनुष्य माता-पित्यांचे पालनपोषण करतो, कुळातील वडीलधाऱ्यांचा आदर करतो, मृदू व प्रेमळ संभाषण करतो, चहाडीचा त्याग करतो,” ‘‘මච්ඡෙරවිනයෙ යුත්තං, සච්චං කොධාභිභුං නරං; තං වෙ දෙවා තාවතිංසා, ආහු සප්පුරිසො ඉතී’’ති. “मत्सर दूर करण्यात तत्पर असतो, सत्य बोलतो आणि क्रोधावर विजय मिळवतो; त्यालाच तावतिंस लोकांतील देव खरोखर 'सत्पुरुष' म्हणतात.” 4. දලිද්දසුත්තං ४. दलिद्द सुत्त 260. එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. තත්ර ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘භික්ඛවො’’ති. ‘‘භදන්තෙ’’ති තෙ භික්ඛූ භගවතො පච්චස්සොසුං. භගවා එතදවොච – २६०. एका वेळी भगवान राजगृह येथील वेळुवनातील कलंदकनिवाप येथे विहार करत होते. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – “भिक्खूंनो!” “भन्ते!” असे त्या भिक्खूंनी भगवंतांना उत्तर दिले. भगवान म्हणाले – ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, අඤ්ඤතරො පුරිසො ඉමස්මිංයෙව රාජගහෙ මනුස්සදලිද්දො අහොසි මනුස්සකපණො මනුස්සවරාකො. සො තථාගතප්පවෙදිතෙ ධම්මවිනයෙ සද්ධං සමාදියි, සීලං සමාදියි, සුතං සමාදියි, චාගං සමාදියි, පඤ්ඤං සමාදියි. සො තථාගතප්පවෙදිතෙ ධම්මවිනයෙ සද්ධං සමාදියිත්වා සීලං සමාදියිත්වා සුතං සමාදියිත්වා චාගං සමාදියිත්වා පඤ්ඤං සමාදියිත්වා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජි දෙවානං තාවතිංසානං සහබ්යතං. සො අඤ්ඤෙ දෙවෙ අතිරොචති වණ්ණෙන චෙව යසසා ච. තත්ර සුදං, භික්ඛවෙ, දෙවා තාවතිංසා උජ්ඣායන්ති ඛිය්යන්ති විපාචෙන්ති – ‘අච්ඡරියං වත භො, අබ්භුතං වත භො! අයඤ්හි දෙවපුත්තො පුබ්බෙ මනුස්සභූතො සමානො මනුස්සදලිද්දො අහොසි මනුස්සකපණො මනුස්සවරාකො; සො කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපන්නො දෙවානං තාවතිංසානං සහබ්යතං. සො අඤ්ඤෙ දෙවෙ අතිරොචති වණ්ණෙන චෙව යසසා චා’’’ති. “भिक्खूंनो, पूर्वी याच राजगृहात एक मनुष्य अत्यंत दरिद्री, दीन आणि कनिष्ठ दर्जाचा होता. त्याने तथागतांनी उपदेशिलेल्या धम्म आणि विनयावर श्रद्धा ठेवली, शील ग्रहण केले, श्रुत मिळवले, त्याग अंगीकारला आणि प्रज्ञा संपादन केली. तथागतांनी उपदेशिलेल्या धम्म आणि विनयात श्रद्धा, शील, श्रुत, त्याग आणि प्रज्ञा ग्रहण केल्यामुळे, शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर तो सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात तावतिंस देवांच्या संगतीत जन्माला आला. तो इतर देवांपेक्षा वर्ण आणि यशाने अधिक शोभून दिसू लागला. भिक्खूंनो, त्यावर तावतिंस देव असंतुष्ट झाले, कुरकुर करू लागले आणि तक्रार करू लागले – ‘अहो आश्चर्य! अहो अद्भूत! हा देवपुत्र पूर्वी मनुष्य असताना अत्यंत दरिद्री, दीन आणि कनिष्ठ दर्जाचा होता; परंतु शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर तो सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात तावतिंस देवांच्या संगतीत जन्माला आला आहे. आणि तो इतर देवांपेक्षा वर्ण व यशाने अधिक शोभून दिसत आहे!’” ‘‘අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො දෙවෙ තාවතිංසෙ ආමන්තෙසි – ‘මා ඛො තුම්හෙ, මාරිසා, එතස්ස දෙවපුත්තස්ස උජ්ඣායිත්ථ. එසො ඛො, මාරිසා, දෙවපුත්තො පුබ්බෙ මනුස්සභූතො සමානො තථාගතප්පවෙදිතෙ [Pg.234] ධම්මවිනයෙ සද්ධං සමාදියි, සීලං සමාදියි, සුතං සමාදියි, චාගං සමාදියි, පඤ්ඤං සමාදියි. සො තථාගතප්පවෙදිතෙ ධම්මවිනයෙ සද්ධං සමාදියිත්වා සීලං සමාදියිත්වා සුතං සමාදියිත්වා චාගං සමාදියිත්වා පඤ්ඤං සමාදියිත්වා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපන්නො දෙවානං තාවතිංසානං සහබ්යතං. සො අඤ්ඤෙ දෙවෙ අතිරොචති වණ්ණෙන චෙව යසසා චා’’’ති. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො දෙවෙ තාවතිංසෙ අනුනයමානො තායං වෙලායං ඉමා ගාථායො අභාසි – “तेव्हा, भिक्खूंनो, देवांचा राजा सक्क याने तावतिंस देवांना संबोधित केले – ‘मित्रांनो, तुम्ही या देवपुत्रावर असंतुष्ट होऊ नका. मित्रांनो, हा देवपुत्र पूर्वी मनुष्य असताना, त्याने तथागतांनी उपदेशिलेल्या धम्म आणि विनयावर श्रद्धा ठेवली, शील ग्रहण केले, श्रुत मिळवले, त्याग अंगीकारला आणि प्रज्ञा संपादन केली. तथागतांनी उपदेशिलेल्या धम्म आणि विनयात श्रद्धा, शील, श्रुत, त्याग आणि प्रज्ञा ग्रहण केल्यामुळे, शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर तो सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात तावतिंस देवांच्या संगतीत जन्माला आला आहे. तो इतर देवांपेक्षा वर्ण आणि यशाने अधिक शोभून दिसत आहे.’ त्यानंतर, भिक्खूंनो, देवांचा राजा सक्क याने तावतिंस देवांना शांत करत त्या वेळी या गाथा म्हटल्या –” ‘‘යස්ස සද්ධා තථාගතෙ, අචලා සුප්පතිට්ඨිතා; සීලඤ්ච යස්ස කල්යාණං, අරියකන්තං පසංසිතං. “ज्याची तथागतांवर अढळ आणि सुप्रतिष्ठित श्रद्धा आहे; आणि ज्याचे शील कल्याणकारी, आर्यांना प्रिय व प्रशंसनीय आहे;” ‘‘සඞ්ඝෙ පසාදො යස්සත්ථි, උජුභූතඤ්ච දස්සනං; අදලිද්දොති තං ආහු, අමොඝං තස්ස ජීවිතං. “ज्याची संघावर निष्ठा आहे आणि ज्याची दृष्टी सरळ आहे; त्याला ज्ञानी लोक 'अदरिद्र' म्हणतात, त्याचे जीवन व्यर्थ जात नाही.” ‘‘තස්මා සද්ධඤ්ච සීලඤ්ච, පසාදං ධම්මදස්සනං; අනුයුඤ්ජෙථ මෙධාවී, සරං බුද්ධාන සාසන’’න්ති. “म्हणून, बुद्ध शासनाचे स्मरण करत, बुद्धिमान मनुष्याने श्रद्धा, शील, निष्ठा आणि धम्मदर्शनाचा वारंवार अभ्यास करावा.” 5. රාමණෙය්යකසුත්තං ५. रामणेय्यक सुत्त 261. සාවත්ථියං ජෙතවනෙ. අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතො ඛො සක්කො දෙවානමින්දො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කිං නු ඛො, භන්තෙ, භූමිරාමණෙය්යක’’න්ති? २६१. श्रावस्ती येथील जेतवनात. तेव्हा देवांचा राजा सक्क जेथे भगवान होते तेथे आला; आल्यावर त्याने भगवंतांना अभिवादन केले आणि एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेल्या देवांचा राजा सक्क याने भगवंतांना विचारले – “भन्ते, कोणती भूमी खरोखर रमणीय आहे?” ‘‘ආරාමචෙත්යා වනචෙත්යා, පොක්ඛරඤ්ඤො සුනිම්මිතා; මනුස්සරාමණෙය්යස්ස, කලං නාග්ඝන්ති සොළසිං. “सुंदर रीतीने बनवलेले आराम-चैत्य, वन-चैत्य आणि कमळांचे तलाव; हे सर्व मिळूनही रमणीय मनुष्याच्या सोळाव्या भागाच्या एका कलेचीही बरोबरी करू शकत नाहीत।” ‘‘ගාමෙ වා යදි වාරඤ්ඤෙ, නින්නෙ වා යදි වා ථලෙ; යත්ථ අරහන්තො විහරන්ති, තං භූමිරාමණෙය්යක’’න්ති. "गावात असो वा अरण्यात, दरीत असो वा मैदानावर; जिथे अर्हत निवास करतात, ती भूमी खरोखरच रमणीय आहे." 6. යජමානසුත්තං ६. यजमान सुत्त 262. එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති ගිජ්ඣකූටෙ පබ්බතෙ. අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං [Pg.235] අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතො ඛො සක්කො දෙවානමින්දො භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – २६२. एका वेळी भगवान राजगृह येथे गिज्झकूट पर्वतावर निवास करत होते. तेव्हा देवांचा राजा शक्र जेथे भगवान होते तेथे आला; जवळ येऊन भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेला देवांचा राजा शक्र भगवंतांना गाथेने म्हणाला – ‘‘යජමානානං මනුස්සානං, පුඤ්ඤපෙක්ඛාන පාණිනං; කරොතං ඔපධිකං පුඤ්ඤං, කත්ථ දින්නං මහප්ඵල’’න්ති. "यज्ञ (दान) करणाऱ्या मनुष्यांसाठी, पुण्याची इच्छा करणाऱ्या प्राण्यांसाठी, जे ऐहिक सुखाचे फळ देणारे पुण्यकर्म करतात, कोणाला दिलेले दान महाफळ देणारे ठरते?" ‘‘චත්තාරො ච පටිපන්නා, චත්තාරො ච ඵලෙ ඨිතා; එස සඞ්ඝො උජුභූතො, පඤ්ඤාසීලසමාහිතො. "चार (मार्गावर) चालणारे आणि चार फलावर अधिष्ठित असलेले; हा प्रज्ञा, शील आणि समाधीने युक्त असलेला सरळ मार्गी संघ आहे." ‘‘යජමානානං මනුස්සානං, පුඤ්ඤපෙක්ඛාන පාණිනං; කරොතං ඔපධිකං පුඤ්ඤං, සඞ්ඝෙ දින්නං මහප්ඵල’’න්ති. "यज्ञ (दान) करणाऱ्या मनुष्यांसाठी, पुण्याची इच्छा करणाऱ्या प्राण्यांसाठी, जे ऐहिक सुखाचे फळ देणारे पुण्यकर्म करतात, संघात दिलेले दान महाफळ देणारे ठरते." 7. බුද්ධවන්දනාසුත්තං ७. बुद्धवंदना सुत्त 263. සාවත්ථියං ජෙතවනෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන භගවා දිවාවිහාරගතො හොති පටිසල්ලීනො. අථ ඛො සක්කො ච දෙවානමින්දො බ්රහ්මා ච සහම්පති යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා පච්චෙකං ද්වාරබාහං නිස්සාය අට්ඨංසු. අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො භගවතො සන්තිකෙ ඉමං ගාථං අභාසි – २६३. श्रावस्ती येथील जेतवनात. त्या वेळी भगवान दिवसाच्या विहारासाठी एकांतात ध्यानस्थ बसले होते. तेव्हा देवांचा राजा शक्र आणि ब्रह्मा सहम्पती जेथे भगवान होते तेथे आले; जवळ येऊन ते दोघेही एकेका दाराच्या खांबाला टेकून उभे राहिले. तेव्हा देवांचा राजा शक्र भगवंतांच्या सन्निध ही गाथा म्हणाला – ‘‘උට්ඨෙහි වීර විජිතසඞ්ගාම,පන්නභාර අනණ විචර ලොකෙ; චිත්තඤ්ච තෙ සුවිමුත්තං,චන්දො යථා පන්නරසාය රත්ති’’න්ති. "उठा, हे वीर! संग्राम जिंकणाऱ्या, भार उतरवून ठेवलेल्या, ऋणमुक्त झालेल्या भगवंता, जगात संचार करा. पौर्णिमेच्या रात्रीच्या चंद्राप्रमाणे आपले चित्त पूर्णपणे विमुक्त झाले आहे." ‘‘න ඛො, දෙවානමින්ද, තථාගතා එවං වන්දිතබ්බා. එවඤ්ච ඛො, දෙවානමින්ද, තථාගතා වන්දිතබ්බා – "हे देवाधिपती शक्र, तथागतांची अशी वंदना करायची नसते. तर हे देवाधिपती शक्र, तथागतांची वंदना अशी केली पाहिजे –" ‘‘උට්ඨෙහි වීර විජිතසඞ්ගාම,සත්ථවාහ අනණ විචර ලොකෙ; දෙසස්සු භගවා ධම්මං,අඤ්ඤාතාරො භවිස්සන්තී’’ති. "उठा, हे वीर! संग्राम जिंकणाऱ्या, सार्थवाह (मार्गदर्शक), ऋणमुक्त झालेल्या भगवंता, जगात संचार करा. भगवान धम्माचा उपदेश करोत, धम्म समजून घेणारे लोक नक्कीच असतील." 8. ගහට්ඨවන්දනාසුත්තං ८. गृहस्थवंदना सुत्त 264. සාවත්ථියං. තත්ර…පෙ… එතදවොච – ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො මාතලිං සඞ්ගාහකං ආමන්තෙසි – ‘යොජෙහි, සම්ම මාතලි, සහස්සයුත්තං [Pg.236] ආජඤ්ඤරථං. උය්යානභූමිං ගච්ඡාම සුභූමිං දස්සනායා’ති. ‘එවං භද්දන්තවා’ති ඛො, භික්ඛවෙ, මාතලි සඞ්ගාහකො සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස පටිස්සුත්වා සහස්සයුත්තං ආජඤ්ඤරථං යොජෙත්වා සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස පටිවෙදෙසි – ‘යුත්තො ඛො තෙ, මාරිස, සහස්සයුත්තො ආජඤ්ඤරථො. යස්ස දානි කාලං මඤ්ඤසී’’’ති. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො වෙජයන්තපාසාදා ඔරොහන්තො අඤ්ජලිං කත්වා සුදං පුථුද්දිසා නමස්සති. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, මාතලි සඞ්ගාහකො සක්කං දෙවානමින්දං ගාථාය අජ්ඣභාසි – २६४. श्रावस्ती येथे. तेथे भगवंतांनी असे म्हटले – 'भिक्षूंनो, पूर्वी कधीतरी देवांचा राजा शक्र आपल्या मातली नावाच्या सारथ्याला म्हणाला – 'मित्रा मातली, हजार घोड्यांचा उत्कृष्ट रथ तयार कर. आपण सुंदर भूमी पाहण्यासाठी उद्यानात जाऊया.' भिक्षूंनो, 'तसेच असो, महाराज,' असे म्हणून मातली सारथ्याने देवांचा राजा शक्र याच्या आज्ञेचे पालन केले आणि हजार घोड्यांचा उत्कृष्ट रथ तयार करून देवांचा राजा शक्र याला कळवले – 'महाराज, आपला हजार घोड्यांचा उत्कृष्ट रथ तयार आहे. आता आपल्याला योग्य वाटेल त्या वेळी प्रस्थान करावे.' भिक्षूंनो, त्यानंतर देवांचा राजा शक्र वैजयंत प्रासादातून खाली उतरताना हात जोडून सर्व दिशांना नमस्कार करू लागला. तेव्हा भिक्षूंनो, मातली सारथ्याने देवांचा राजा शक्र याला गाथेने विचारले –' ‘‘තං නමස්සන්ති තෙවිජ්ජා, සබ්බෙ භුම්මා ච ඛත්තියා; චත්තාරො ච මහාරාජා, තිදසා ච යසස්සිනො; අථ කො නාම සො යක්ඛො, යං ත්වං සක්ක නමස්සසී’’ති. "तीन वेदांचे ज्ञाते (त्रैविद्य), पृथ्वीवरील सर्व क्षत्रिय राजे, चार महाराज (लोकपाल) आणि कीर्तिमान तायतिंस (तेहतीस) देव आपल्याला नमस्कार करतात; मग हे शक्र, आपण ज्या यक्षाला (पूजनीय सत्तेला) नमस्कार करत आहात, तो कोण आहे?" ‘‘මං නමස්සන්ති තෙවිජ්ජා, සබ්බෙ භුම්මා ච ඛත්තියා; චත්තාරො ච මහාරාජා, තිදසා ච යසස්සිනො. "तीन वेदांचे ज्ञाते, पृथ्वीवरील सर्व क्षत्रिय राजे, चार महाराज आणि कीर्तिमान तायतिंस देव मला नमस्कार करतात." ‘‘අහඤ්ච සීලසම්පන්නෙ, චිරරත්තසමාහිතෙ; සම්මාපබ්බජිතෙ වන්දෙ, බ්රහ්මචරියපරායනෙ. "परंतु मी शीलसंपन्न, दीर्घकाळ समाधीत लीन असलेल्या, योग्य प्रकारे प्रव्रजित झालेल्या आणि ब्रह्मचर्यपरायण असलेल्या संन्याशांना (भिक्षूंना) वंदन करतो." ‘‘යෙ ගහට්ඨා පුඤ්ඤකරා, සීලවන්තො උපාසකා; ධම්මෙන දාරං පොසෙන්ති, තෙ නමස්සාමි මාතලී’’ති. "हे मातली, जे गृहस्थ पुण्यकर्म करणारे, शीलवान उपासक आहेत आणि जे धर्मानुसार आपल्या कुटुंबाचे (पत्नी-मुलांचे) पालनपोषण करतात, त्यांना मी नमस्कार करतो." ‘‘සෙට්ඨා හි කිර ලොකස්මිං, යෙ ත්වං සක්ක නමස්සසි; අහම්පි තෙ නමස්සාමි, යෙ නමස්සසි වාසවා’’ති. "हे शक्र, आपण ज्यांना नमस्कार करता, ते खरोखरच या जगात सर्वश्रेष्ठ आहेत. हे वासव, आपण ज्यांना नमस्कार करता, त्यांना मीसुद्धा नमस्कार करतो." ‘‘ඉදං වත්වාන මඝවා, දෙවරාජා සුජම්පති; පුථුද්දිසා නමස්සිත්වා, පමුඛො රථමාරුහී’’ති. "असे बोलून सुजाताचा पती, देवांचा राजा मघवा (शक्र) सर्व दिशांना नमस्कार करून रथावर आरूढ झाला." 9. සත්ථාරවන්දනාසුත්තං ९. शास्तृवंदना सुत्त 265. සාවත්ථියං ජෙතවනෙ. ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො මාතලිං සඞ්ගාහකං ආමන්තෙසි – ‘යොජෙහි, සම්ම මාතලි, සහස්සයුත්තං ආජඤ්ඤරථං, උය්යානභූමිං ගච්ඡාම සුභූමිං දස්සනායා’ති. ‘එවං භද්දන්තවා’ති ඛො, භික්ඛවෙ, මාතලි සඞ්ගාහකො සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස පටිස්සුත්වා [Pg.237] සහස්සයුත්තං ආජඤ්ඤරථං යොජෙත්වා සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස පටිවෙදෙසි – ‘යුත්තො ඛො තෙ, මාරිස, සහස්සයුත්තො ආජඤ්ඤරථො. යස්ස දානි කාලං මඤ්ඤසී’’’ති. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො වෙජයන්තපාසාදා ඔරොහන්තො අඤ්ජලිං කත්වා සුදං භගවන්තං නමස්සති. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, මාතලි සඞ්ගාහකො සක්කං දෙවානමින්දං ගාථාය අජ්ඣභාසි – २६५. श्रावस्ती येथील जेतवनात. 'भिक्षूंनो, पूर्वी कधीतरी देवांचा राजा शक्र आपल्या मातली नावाच्या सारथ्याला म्हणाला – 'मित्रा मातली, हजार घोड्यांचा उत्कृष्ट रथ तयार कर. आपण सुंदर भूमी पाहण्यासाठी उद्यानात जाऊया.' भिक्षूंनो, 'तसेच असो, महाराज,' असे म्हणून मातली सारथ्याने देवांचा राजा शक्र याच्या आज्ञेचे पालन केले आणि हजार घोड्यांचा उत्कृष्ट रथ तयार करून देवांचा राजा शक्र याला कळवले – 'महाराज, आपला हजार घोड्यांचा उत्कृष्ट रथ तयार आहे. आता आपल्याला योग्य वाटेल त्या वेळी प्रस्थान करावे.' भिक्षूंनो, त्यानंतर देवांचा राजा शक्र वैजयंत प्रासादातून खाली उतरताना हात जोडून भगवंतांना नमस्कार करू लागला. तेव्हा भिक्षूंनो, मातली सारथ्याने देवांचा राजा शक्र याला गाथेने विचारले –' ‘‘යඤ්හි දෙවා මනුස්සා ච, තං නමස්සන්ති වාසව; අථ කො නාම සො යක්ඛො, යං ත්වං සක්ක නමස්සසී’’ති. "हे वासव, देव आणि मनुष्य ज्या आपल्याला नमस्कार करतात; मग हे शक्र, आपण ज्या यक्षाला नमस्कार करत आहात, तो कोण आहे?" ‘‘යො ඉධ සම්මාසම්බුද්ධො, අස්මිං ලොකෙ සදෙවකෙ; අනොමනාමං සත්ථාරං, තං නමස්සාමි මාතලි. "हे मातली, या देवलोकासहित असलेल्या जगात जे सम्यक्संबुद्ध आहेत, त्या सर्वश्रेष्ठ नावाच्या शास्त्याला (गुरूचा) मी नमस्कार करतो." ‘‘යෙසං රාගො ච දොසො ච, අවිජ්ජා ච විරාජිතා; ඛීණාසවා අරහන්තො, තෙ නමස්සාමි මාතලි. "हे मातली, ज्यांचे राग, द्वेष आणि अविद्या नष्ट झाली आहे, जे क्षीणासव (आस्रव नष्ट झालेले) अर्हत आहेत, त्यांना मी नमस्कार करतो." ‘‘යෙ රාගදොසවිනයා, අවිජ්ජාසමතික්කමා; සෙක්ඛා අපචයාරාමා, අප්පමත්තානුසික්ඛරෙ; තෙ නමස්සාමි මාතලී’’ති. "हे मातली, जे राग आणि द्वेषाचा नाश करण्यासाठी, अविद्येच्या पलीकडे जाण्यासाठी, संसाराचा क्षय करण्यात रममाण होऊन अप्रमादपूर्वक (जागृत राहून) साधना करत आहेत, त्या शैक्ष (साधकांना) मी नमस्कार करतो." ‘‘සෙට්ඨා හි කිර ලොකස්මිං, යෙ ත්වං සක්ක නමස්සසි; අහම්පි තෙ නමස්සාමි, යෙ නමස්සසි වාසවා’’ති. "हे शक्र, आपण ज्यांना नमस्कार करता, ते खरोखरच या जगात सर्वश्रेष्ठ आहेत. हे वासव, आपण ज्यांना नमस्कार करता, त्यांना मीसुद्धा नमस्कार करतो." ‘‘ඉදං වත්වාන මඝවා, දෙවරාජා සුජම්පති; භගවන්තං නමස්සිත්වා, පමුඛො රථමාරුහී’’ති. "असे बोलून सुजाताचा पती, देवांचा राजा मघवा (शक्र) भगवंतांना नमस्कार करून रथावर आरूढ झाला." 10. සඞ්ඝවන්දනාසුත්තං १०. संघवंदना सुत्त 266. සාවත්ථියං ජෙතවනෙ. තත්ර ඛො…පෙ… එතදවොච – ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො මාතලිං සඞ්ගාහකං ආමන්තෙසි – ‘යොජෙහි, සම්ම මාතලි, සහස්සයුත්තං ආජඤ්ඤරථං, උය්යානභූමිං ගච්ඡාම සුභූමිං දස්සනායා’ති. ‘එවං භද්දන්තවා’ති ඛො, භික්ඛවෙ, මාතලි සඞ්ගාහකො සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස පටිස්සුත්වා, සහස්සයුත්තං ආජඤ්ඤරථං යොජෙත්වා සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස පටිවෙදෙසි – ‘යුත්තො ඛො තෙ, මාරිස, සහස්සයුත්තො ආජඤ්ඤරථො, යස්ස දානි කාලං මඤ්ඤසී’’’ති. අථ ඛො, භික්ඛවෙ[Pg.238], සක්කො දෙවානමින්දො වෙජයන්තපාසාදා ඔරොහන්තො අඤ්ජලිං කත්වා සුදං භික්ඛුසඞ්ඝං නමස්සති. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, මාතලි සඞ්ගාහකො සක්කං දෙවානමින්දං ගාථාය අජ්ඣභාසි – २६६. श्रावस्ती येथील जेतवनात. तेथे भगवंतांनी असे म्हटले – 'भिक्षूंनो, पूर्वी कधीतरी देवांचा राजा शक्र आपल्या मातली नावाच्या सारथ्याला म्हणाला – 'मित्रा मातली, हजार घोड्यांचा उत्कृष्ट रथ तयार कर. आपण सुंदर भूमी पाहण्यासाठी उद्यानात जाऊया.' भिक्षूंनो, 'तसेच असो, महाराज,' असे म्हणून मातली सारथ्याने देवांचा राजा शक्र याच्या आज्ञेचे पालन केले आणि हजार घोड्यांचा उत्कृष्ट रथ तयार करून देवांचा राजा शक्र याला कळवले – 'महाराज, आपला हजार घोड्यांचा उत्कृष्ट रथ तयार आहे. आता आपल्याला योग्य वाटेल त्या वेळी प्रस्थान करावे.' भिक्षूंनो, त्यानंतर देवांचा राजा शक्र वैजयंत प्रासादातून खाली उतरताना हात जोडून भिक्षुसंघाला नमस्कार करू लागला. तेव्हा भिक्षूंनो, मातली सारथ्याने देवांचा राजा शक्र याला गाथेने विचारले –' ‘‘තඤ්හි එතෙ නමස්සෙය්යුං, පූතිදෙහසයා නරා; නිමුග්ගා කුණපම්හෙතෙ, ඛුප්පිපාසසමප්පිතා. "हे शक्र, जे मनुष्य दुर्गंधीयुक्त शरीरात राहतात, जे या मृतदेहासारख्या शरीरात बुडालेले आहेत आणि जे भूक व तहानेने व्याकुळ आहेत, त्यांनीच खरोखर आपल्याला नमस्कार केला पाहिजे." ‘‘කිං නු තෙසං පිහයසි, අනාගාරාන වාසව; ආචාරං ඉසිනං බ්රූහි, තං සුණොම වචො තවා’’ති. “हे वासवा (इंद्रा), गृहत्याग केलेल्या (अनागारिक) त्या ऋषींचा तू का हेवा करतोस? आम्हाला त्या ऋषींच्या आचरणाविषयी सांग; आम्ही तुझे ते वचन ऐकू इच्छितो.” ‘‘එතං තෙසං පිහයාමි, අනාගාරාන මාතලි; යම්හා ගාමා පක්කමන්ති, අනපෙක්ඛා වජන්ති තෙ. “हे मातली, गृहत्याग केलेल्या त्या अनागारिकांच्या या आचरणाचा मी हेवा करतो; ते ज्या गावांतून निघून जातात, तिथून कोणत्याही आसक्तीशिवाय (अनापेक्षितपणे) निघून जातात.” ‘‘න තෙසං කොට්ඨෙ ඔපෙන්ති, න කුම්භි න කළොපියං ; පරනිට්ඨිතමෙසානා, තෙන යාපෙන්ති සුබ්බතා. “ते धान्याची कोठारात साठवणूक करत नाहीत, घागरीत किंवा टोपलीतही काही साठवून ठेवत नाहीत. इतरांनी तयार केलेले (अन्न) शोधत, ते सुव्रती (उत्तम व्रत पाळणारे) त्यावरच आपली उपजीविका करतात.” ‘‘සුමන්තමන්තිනො ධීරා, තුණ්හීභූතා සමඤ්චරා; දෙවා විරුද්ධා අසුරෙහි, පුථු මච්චා ච මාතලි. “ते धीर (ज्ञानी) उत्तम विचार करणारे असतात, मौन बाळगून समतेने आचरण करतात. हे मातली, देव हे असुरांशी वैर बाळगतात आणि सामान्य मनुष्यही एकमेकांशी वैर बाळगतात.” ‘‘අවිරුද්ධා විරුද්ධෙසු, අත්තදණ්ඩෙසු නිබ්බුතා; සාදානෙසු අනාදානා, තෙ නමස්සාමි මාතලී’’ති. “वैर करणाऱ्यांमध्ये जे वैररहित असतात, हिंसक (दंडधारी) लोकांमध्ये जे शांत (निवृत) असतात, आणि आसक्ती बाळगणाऱ्यांमध्ये जे अनासक्त असतात; हे मातली, अशा ऋषींना मी वंदन करतो.” ‘‘සෙට්ඨා හි කිර ලොකස්මිං, යෙ ත්වං සක්ක නමස්සසි; අහම්පි තෙ නමස්සාමි, යෙ නමස්සසි වාසවා’’ති. “हे शक्रा, ज्यांना तुम्ही वंदन करता, ते खरोखरच या जगात सर्वश्रेष्ठ आहेत. हे वासवा, ज्यांना तुम्ही वंदन करता, त्यांना मीसुद्धा वंदन करतो.” ‘‘ඉදං වත්වාන මඝවා, දෙවරාජා සුජම්පති; භික්ඛුසඞ්ඝං නමස්සිත්වා, පමුඛො රථමාරුහී’’ති. “असे बोलून, सुजाचा पती, देवांचा राजा मघवा (इंद्र) भिक्षुसंघाला वंदन करून आपल्या रथात आरूढ झाला.” දුතියො වග්ගො. दुसरा वर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याचा सारांश (उद्दान) – දෙවා පන තයො වුත්තා, දලිද්දඤ්ච රාමණෙය්යකං; යජමානඤ්ච වන්දනා, තයො සක්කනමස්සනාති. तीन देव सांगितले आहेत, दरिद्री आणि रमणीय; यजमान आणि वंदना, आणि शक्राच्या वंदनेचे तीन सुत्त. 3. තතියවග්ගො ३. तिसरा वर्ग 1. ඡෙත්වාසුත්තං १. छेत्वा सुत्त (नाश करून) 267. සාවත්ථියං [Pg.239] ජෙතවනෙ. අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතො ඛො සක්කො දෙවානමින්දො භගවන්තං ගාථාය අජ්ඣභාසි – २६७. श्रावस्ती येथील जेतवनात. तेव्हा देवांचा राजा शक्र जेथे भगवान होते तेथे आला; आल्यावर भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेला देवांचा राजा शक्र भगवंतांना गाथेने म्हणाला – ‘‘කිංසු ඡෙත්වා සුඛං සෙති, කිංසු ඡෙත්වා න සොචති; කිස්සස්සු එකධම්මස්ස, වධං රොචෙසි ගොතමා’’ති. “कशाचा नाश करून मनुष्य सुखाने झोपतो? कशाचा नाश करून तो शोक करत नाही? हे गोतमा, कोणत्या एका गोष्टीचा नाश करण्यास आपण संमती देता?” ‘‘කොධං ඡෙත්වා සුඛං සෙති, කොධං ඡෙත්වා න සොචති; කොධස්ස විසමූලස්ස, මධුරග්ගස්ස වාසව; වධං අරියා පසංසන්ති, තඤ්හි ඡෙත්වා න සොචතී’’ති. “हे वासवा, क्रोधाचा नाश करून मनुष्य सुखाने झोपतो; क्रोधाचा नाश करून तो शोक करत नाही. ज्याचे मूळ विषारी आहे आणि टोक गोड आहे, अशा क्रोधाचा नाश करण्याची आर्य प्रशंसा करतात; कारण त्याचा नाश केल्यावर मनुष्य शोक करत नाही.” 2. දුබ්බණ්ණියසුත්තං २. दुब्बण्णिय सुत्त (कुरूप यक्षाविषयीचे सुत्त) 268. සාවත්ථියං ජෙතවනෙ. තත්ර ඛො…පෙ… එතදවොච – ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, අඤ්ඤතරො යක්ඛො දුබ්බණ්ණො ඔකොටිමකො සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස ආසනෙ නිසින්නො අහොසි. තත්ර සුදං, භික්ඛවෙ, දෙවා තාවතිංසා උජ්ඣායන්ති ඛිය්යන්ති විපාචෙන්ති – ‘අච්ඡරියං වත භො, අබ්භුතං වත, භො! අයං යක්ඛො දුබ්බණ්ණො ඔකොටිමකො සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස ආසනෙ නිසින්නො’’’ති! යථා යථා ඛො, භික්ඛවෙ, දෙවා තාවතිංසා උජ්ඣායන්ති ඛිය්යන්ති විපාචෙන්ති, තථා තථා සො යක්ඛො අභිරූපතරො චෙව හොති දස්සනීයතරො ච පාසාදිකතරො ච. २६८. श्रावस्ती येथील जेतवनात. तेथे भगवंतांनी हे सांगितले – “भिक्षूंनो, पूर्वी कधीतरी एक कुरूप आणि बुटका यक्ष देवांचा राजा शक्र याच्या आसनावर येऊन बसला. तेव्हा, भिक्षूंनो, तावतिंस लोकांतील देव संतापले, कुरकुर करू लागले आणि तक्रार करू लागले की, ‘अरे आश्चर्य आहे! हे तर अद्भूत आहे! हा कुरूप आणि बुटका यक्ष देवांचा राजा शक्र याच्या आसनावर बसला आहे!’ परंतु, भिक्षूंनो, जसेजसे तावतिंस देव संतापत होते, कुरकुर करत होते आणि तक्रार करत होते, तसतसा तो यक्ष अधिक देखणा, अधिक दर्शनीय आणि अधिक प्रसन्न वाटू लागला.” ‘‘අථ ඛො, භික්ඛවෙ, දෙවා තාවතිංසා යෙන සක්කො දෙවානමින්දො තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා සක්කං දෙවානමින්දං එතදවොචුං – ‘ඉධ තෙ, මාරිස, අඤ්ඤතරො යක්ඛො දුබ්බණ්ණො ඔකොටිමකො සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස ආසනෙ නිසින්නො. තත්ර සුදං, මාරිස, දෙවා තාවතිංසා උජ්ඣායන්ති ඛිය්යන්ති විපාචෙන්ති – අච්ඡරියං වත, භො, අබ්භුතං වත, භො! අයං යක්ඛො දුබ්බණ්ණො ඔකොටිමකො සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස ආසනෙ නිසින්නොති. යථා යථා ඛො, මාරිස, දෙවා උජ්ඣායන්ති ඛිය්යන්ති විපාචෙන්ති, තථා තථා සො යක්ඛො අභිරූපතරො චෙව හොති දස්සනීයතරො [Pg.240] ච පාසාදිකතරො චාති. සො හි නූන, මාරිස, කොධභක්ඛො යක්ඛො භවිස්සතී’’’ති. “त्यानंतर, भिक्षूंनो, तावतिंस देव देवांचा राजा शक्र याच्याकडे गेले आणि त्याला म्हणाले, ‘हे प्रिय महोदया, एक कुरूप आणि बुटका यक्ष आपल्या आसनावर बसला आहे. तिथे तावतिंस देव संतापत आहेत, कुरकुर करत आहेत आणि तक्रार करत आहेत की—आश्चर्य आहे! अद्भूत आहे! हा कुरूप आणि बुटका यक्ष देवांचा राजा शक्र याच्या आसनावर बसला आहे! परंतु, जसेजसे देव संतापत आहेत, कुरकुर करत आहेत आणि तक्रार करत आहेत, तसतसा तो यक्ष अधिक देखणा, अधिक दर्शनीय आणि अधिक प्रसन्न वाटू लागला आहे.’ (शक्र म्हणाला:) ‘हे देवांनो, तो नक्कीच क्रोधभक्षक (क्रोध खाणारा) यक्ष असावा.’” ‘‘අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො යෙන සො කොධභක්ඛො යක්ඛො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා එකංසං උත්තරාසඞ්ගං කරිත්වා දක්ඛිණජාණුමණ්ඩලං පථවියං නිහන්ත්වා යෙන සො කොධභක්ඛො යක්ඛො තෙනඤ්ජලිං පණාමෙත්වා තික්ඛත්තුං නාමං සාවෙති – ‘සක්කොහං මාරිස, දෙවානමින්දො, සක්කොහං, මාරිස, දෙවානමින්දො’ති. යථා යථා ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො නාමං සාවෙසි, තථා තථා සො යක්ඛො දුබ්බණ්ණතරො චෙව අහොසි ඔකොටිමකතරො ච. දුබ්බණ්ණතරො චෙව හුත්වා ඔකොටිමකතරො ච තත්ථෙවන්තරධායී’’ති. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො සකෙ ආසනෙ නිසීදිත්වා දෙවෙ තාවතිංසෙ අනුනයමානො තායං වෙලායං ඉමා ගාථායො අභාසි – “त्यानंतर, भिक्षूंनो, देवांचा राजा शक्र त्या क्रोधभक्षक यक्षाकडे गेला. जवळ जाऊन त्याने आपले उपरणे एका खांद्यावर घेतले, आपला उजवा गुडघा जमिनीवर टेकवला आणि त्या यक्षाच्या दिशेने हात जोडून तीन वेळा आपले नाव जाहीर केले: ‘हे महोदया, मी शक्र आहे, देवांचा राजा! हे महोदया, मी शक्र आहे, देवांचा राजा!’ जसेजसे शक्राने आपले नाव जाहीर केले, तसतसा तो यक्ष अधिक कुरूप आणि अधिक बुटका होत गेला आणि शेवटी तिथेच नाहीसा झाला. त्यानंतर, भिक्षूंनो, देवांचा राजा शक्र आपल्या आसनावर बसला आणि तावतिंस देवांना उपदेश करत त्याने त्या वेळी या गाथा म्हटल्या –” ‘‘න සූපහතචිත්තොම්හි, නාවත්තෙන සුවානයො; න වො චිරාහං කුජ්ඣාමි, කොධො මයි නාවතිට්ඨති. “माझे चित्त दूषित (क्रोधित) होत नाही, आणि क्रोधाच्या आवर्तात मी सहज वाहून जात नाही. मी दीर्घकाळ राग धरत नाही, आणि क्रोध माझ्यामध्ये टिकून राहत नाही.” ‘‘කුද්ධාහං න ඵරුසං බ්රූමි, න ච ධම්මානි කිත්තයෙ; සන්නිග්ගණ්හාමි අත්තානං, සම්පස්සං අත්ථමත්තනො’’ති. “रागावलेला असताना मी कठोर बोलत नाही, आणि अधर्माची (अकुशलाची) प्रशंसा करत नाही. स्वतःचे हित लक्षात घेऊन मी स्वतःवर पूर्ण नियंत्रण ठेवतो.” 3. සම්බරිමායාසුත්තං ३. संबरिमाया सुत्त (संबरीच्या मायेविषयीचे सुत्त) 269. සාවත්ථියං…පෙ… භගවා එතදවොච – ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්ති අසුරින්දො ආබාධිකො අහොසි දුක්ඛිතො බාළ්හගිලානො. අථ ඛො භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො යෙන වෙපචිත්ති අසුරින්දො තෙනුපසඞ්කමි ගිලානපුච්ඡකො. අද්දසා ඛො, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්ති අසුරින්දො සක්කං දෙවානමින්දං දූරතොව ආගච්ඡන්තං. දිස්වාන සක්කං දෙවානමින්දං එතදවොච – ‘තිකිච්ඡ මං දෙවානමින්දා’ති. ‘වාචෙහි මං, වෙපචිත්ති, සම්බරිමාය’න්ති. ‘න තාවාහං වාචෙමි, යාවාහං, මාරිස, අසුරෙ පටිපුච්ඡාමී’’’ති. ‘‘අථ ඛො, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්ති අසුරින්දො අසුරෙ පටිපුච්ඡි – ‘වාචෙමහං, මාරිසා, සක්කං දෙවානමින්දං සම්බරිමාය’න්ති? ‘මා ඛො ත්වං, මාරිස, වාචෙසි සක්කං දෙවානමින්දං සම්බරිමාය’’’න්ති. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්ති අසුරින්දො සක්කං දෙවානමින්දං ගාථාය අජ්ඣභාසි – २६९. श्रावस्ती येथे... भगवंतांनी हे सांगितले – “भिक्षूंनो, पूर्वी कधीतरी असुरांचा राजा वेपचित्ती आजारी, दुःखी आणि गंभीर आजाराने ग्रस्त होता. तेव्हा देवांचा राजा शक्र वेपचित्तीची विचारपूस करण्यासाठी त्याच्याकडे गेला. असुरांचा राजा वेपचित्ती याने देवांचा राजा शक्र याला दुरूनच येताना पाहिले. पाहून तो देवांच्या राजा शक्राला म्हणाला, ‘हे देवांच्या राजा, माझ्यावर उपचार करा.’ (शक्र म्हणाला:) ‘हे वेपचित्ती, मला संबरीची माया (जादू) शिकव.’ (वेपचित्ती म्हणाला:) ‘हे महोदया, जोपर्यंत मी इतर असुरांना विचारत नाही, तोपर्यंत मी ती शिकवणार नाही.’ त्यानंतर, भिक्षूंनो, असुरांचा राजा वेपचित्ती याने असुरांना विचारले, ‘हे असुरांनो, मी देवांचा राजा शक्र याला संबरीची माया शिकवू का?’ (असुर म्हणाले:) ‘हे महोदया, देवांचा राजा शक्र याला संबरीची माया शिकवू नका.’ त्यानंतर, भिक्षूंनो, असुरांचा राजा वेपचित्ती याने देवांचा राजा शक्र याला गाथेने म्हटले –” ‘‘මායාවී [Pg.241] මඝවා සක්ක, දෙවරාජ සුජම්පති; උපෙති නිරයං ඝොරං, සම්බරොව සතං සම’’න්ති. “हे सुजाचे पती, देवांचे राजे मघवा शक्र! मायावी (जादूगार) मनुष्य संबरीप्रमाणे शंभर वर्षांपर्यंत घोर नरकात जातो.” 4. අච්චයසුත්තං ४. अच्चय सुत्त (अपराधाविषयीचे सुत्त) 270. සාවත්ථියං…පෙ… ආරාමෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන ද්වෙ භික්ඛූ සම්පයොජෙසුං. තත්රෙකො භික්ඛු අච්චසරා. අථ ඛො සො භික්ඛු තස්ස භික්ඛුනො සන්තිකෙ අච්චයං අච්චයතො දෙසෙති; සො භික්ඛු නප්පටිග්ගණ්හාති. අථ ඛො සම්බහුලා භික්ඛූ යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදිංසු. එකමන්තං නිසින්නා ඛො තෙ භික්ඛූ භගවන්තං එතදවොචුං – ‘‘ඉධ, භන්තෙ, ද්වෙ භික්ඛූ සම්පයොජෙසුං, තත්රෙකො භික්ඛු අච්චසරා. අථ ඛො සො, භන්තෙ, භික්ඛු තස්ස භික්ඛුනො සන්තිකෙ අච්චයං අච්චයතො දෙසෙති, සො භික්ඛු නප්පටිග්ගණ්හාතී’’ති. २७०. श्रावस्ती येथे... आरामात. त्या वेळी दोन भिक्खूंमध्ये वाद झाला. त्यातील एका भिक्खूने दुसऱ्या भिक्खूचा अपराध केला (मर्यादा ओलांडली). तेव्हा त्या भिक्खूने त्या दुसऱ्या भिक्खूपाशी आपला अपराध अपराध म्हणून कबूल केला; परंतु त्या भिक्खूने तो स्वीकारला नाही (त्याला क्षमा केली नाही). तेव्हा अनेक भिक्खू भगवंतांकडे गेले; भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या त्या भिक्खूंनी भगवंतांना असे म्हटले – “भंते, येथे दोन भिक्खूंमध्ये वाद झाला. त्यातील एका भिक्खूने दुसऱ्याचा अपराध केला. भंते, तेव्हा त्या भिक्खूने त्या दुसऱ्या भिक्खूपाशी आपला अपराध अपराध म्हणून कबूल केला, पण त्या भिक्खूने तो स्वीकारला नाही.” ‘‘ද්වෙමෙ, භික්ඛවෙ, බාලා. යො ච අච්චයං අච්චයතො න පස්සති, යො ච අච්චයං දෙසෙන්තස්ස යථාධම්මං නප්පටිග්ගණ්හා’’ති – ඉමෙ ඛො, භික්ඛවෙ, ද්වෙ බාලා. ‘‘ද්වෙමෙ, භික්ඛවෙ, පණ්ඩිතා. යො ච අච්චයං අච්චයතො පස්සති, යො ච අච්චයං දෙසෙන්තස්ස යථාධම්මං පටිග්ගණ්හා’’ති – ඉමෙ ඛො, භික්ඛවෙ, ද්වෙ පණ්ඩිතා. “भिक्खूंनो, हे दोन मूर्ख आहेत. जो आपला अपराध अपराध म्हणून पाहत नाही, आणि जो दुसरा अपराध कबूल करत असताना धम्मानुसार त्याला क्षमा करत नाही – भिक्खूंनो, हे दोन मूर्ख आहेत. भिक्खूंनो, हे दोन पंडित (बुद्धिमान) आहेत. जो आपला अपराध अपराध म्हणून पाहतो, आणि जो दुसरा अपराध कबूल करत असताना धम्मानुसार त्याला क्षमा करतो – भिक्खूंनो, हे दोन पंडित आहेत.” ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො සුධම්මායං සභායං දෙවෙ තාවතිංසෙ අනුනයමානො තායං වෙලායං ඉමං ගාථං අභාසි – “भिक्खूंनो, पूर्वी कधीतरी देवांचा राजा शक्र याने सुधम्मा सभेत तावतिंस देवांना उपदेश करताना त्या वेळी ही गाथा म्हटली –” ‘‘කොධො වො වසමායාතු, මා ච මිත්තෙහි වො ජරා; අගරහියං මා ගරහිත්ථ, මා ච භාසිත්ථ පෙසුණං; අථ පාපජනං කොධො, පබ්බතොවාභිමද්දතී’’ති. “क्रोध तुमच्या नियंत्रणात येऊ द्या, मित्रांसोबत तुमचे नाते बिघडू देऊ नका. जो निंदेला पात्र नाही त्याची निंदा करू नका, आणि चहाडीचे शब्द बोलू नका. कारण क्रोध दुर्जन माणसाला तसाच चिरडून टाकतो, जसा एखादा पर्वत चिरडतो.” 5. අක්කොධසුත්තං ५. अक्कोध सुत्त 271. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. තත්ර ඛො භගවා භික්ඛූ…පෙ… භගවා එතදවොච – ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, සක්කො දෙවානමින්දො සුධම්මායං සභායං දෙවෙ තාවතිංසෙ අනුනයමානො තායං වෙලායං ඉමං ගාථං අභාසි – २७१. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान श्रावस्ती येथील अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना... भगवंतांनी असे म्हटले – “भिक्खूंनो, पूर्वी कधीतरी देवांचा राजा शक्र याने सुधम्मा सभेत तावतिंस देवांना उपदेश करताना त्या वेळी ही गाथा म्हटली –” ‘‘මා [Pg.242] වො කොධො අජ්ඣභවි, මා ච කුජ්ඣිත්ථ කුජ්ඣතං; අක්කොධො අවිහිංසා ච, අරියෙසු ච පටිපදා ; අථ පාපජනං කොධො, පබ්බතොවාභිමද්දතී’’ති. “क्रोध तुमच्यावर ताबा मिळवू देऊ नका, आणि रागवणाऱ्यांवर तुम्ही रागवू नका. अक्रोध (क्रोध न करणे) आणि अहिंसा हीच आर्यांची (सत्पुरुषांची) जीवनपद्धती आहे. कारण क्रोध दुर्जन माणसाला तसाच चिरडून टाकतो, जसा एखादा पर्वत चिरडतो.” තතියො වග්ගො. तिसरा वग्ग. තස්සුද්දානං – त्याचा सारांश (उद्दान) – ඡෙත්වා දුබ්බණ්ණියමායා, අච්චයෙන අකොධනො; දෙසිතං බුද්ධසෙට්ඨෙන, ඉදඤ්හි සක්කපඤ්චකන්ති. “छेत्वा, दुब्बण्णिय, माया, अच्चय आणि अकोधन; बुद्धश्रेष्ठांनी उपदेशिलेले हे शक्राचे पाच सुत्त आहेत.” සක්කසංයුත්තං සමත්තං. सक्कसंयुत्त समाप्त. සගාථාවග්ගො පඨමො. सगाथावग्ग पहिला समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याचा सारांश (उद्दान) – දෙවතා දෙවපුත්තො ච, රාජා මාරො ච භික්ඛුනී; බ්රහ්මා බ්රාහ්මණ වඞ්ගීසො, වනයක්ඛෙන වාසවොති. “देवता, देवपुत्त, राजा, मार, भिक्खुनी, ब्रह्मा, ब्राह्मण, वंगीस, वन, यक्ख आणि वासव (सक्क).” සගාථාවග්ගසංයුත්තපාළි නිට්ඨිතා. सगाथावग्गसंयुत्तपाळि समाप्त. | |||
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |