| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
1 นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धाला नमस्कार असो. มชฺฌิมนิกาเย मज्झिमनिकायामध्ये มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา मज्झिमपण्णासटीका ๑. คหปติวคฺโค १. गहपतिवग्ग ๑. กนฺทรกสุตฺตวณฺณนา १. कन्दरकसुत्तवण्णना ๑. อารามโปกฺขรณีอาทีสูติ [Pg.1] อารามโปกฺขรณีอุยฺยานเจติยฏฺฐานาทีสุ. อุสฺสนฺนาติ พหุลา. อโสกกณิการโกวิฬารกุมฺภีราชรุกฺเขหิ สมฺมิสฺสตาย ตํ จมฺปกวนํ นีลาทิปญฺจวณฺณกุสุมปฏิมณฺฑิตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ, น จมฺปกรุกฺขานํเยว นีลาทิปญฺจวณฺณกุสุมตายาติ วทนฺติ. ภควา กุสุมคนฺธสุคนฺเธ จมฺปกวเน วิหรตีติ อิมินา น มาปนกาเล เอว ตสฺมึ นคเร จมฺปกรุกฺขา อุสฺสนฺนา, อถ โข อปรภาเคปีติ ทสฺเสติ. ‘‘ปญฺจสตมตฺเตหิ อฑฺฒเตฬเสหี’’ติ เอวํ อทสฺสิตปริจฺเฉเทน. หตฺถิโน จาเรติ สิกฺขาเปตีติ หตฺถาจริโย หตฺถีนํ สิกฺขาปโก, ตสฺส ปุตฺโตติ อาห ‘‘หตฺถาจริยสฺส ปุตฺโต’’ติ. ตทา ภควา เตสํ ปสาทชนนตฺถํ อตฺตโน พุทฺธานุภาวํ อนิคุหิตฺวาว นิสินฺโนติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ฉพฺพณฺณานํ ฆนพุทฺธรสฺมีน’’นฺติอาทิมาห. ภควโต เจว คารเวนาติ ภควโต ครุภาเวน, ภควติ คารเวนาติ วา ปาโฐ. १. 'आरामपोक्खरणीआदीसु' (आराम-पुष्करणी इत्यादींमध्ये) म्हणजे आराम (बगीचे), पोक्खरणी (तलाव), उद्यान, चेतिय (चैत्य) स्थाने इत्यादींमध्ये. 'उस्सन्ना' म्हणजे भरपूर किंवा विपुल प्रमाणात. अशोक, कण्णिकार, कोविळार, कुंभी आणि राजवृक्ष यांच्या मिश्रणामुळे ते चंपकवन निळ्या इत्यादी पाच रंगांच्या फुलांनी सुशोभित झाले होते असे समजावे; केवळ चंपक वृक्षांनाच पाच रंगांची फुले आली होती असे नाही, असे म्हणतात. 'भगवान फुलांच्या सुवासाने सुवासित अशा चंपकवनात विहार करत होते' यावरून केवळ नगर स्थापनेच्या वेळीच त्या नगरात चंपक वृक्ष विपुल प्रमाणात होते असे नाही, तर नंतरच्या काळातही होते, हे दर्शविले जाते. 'पंचसतमत्तेहि अढतेलसेहि' अशा प्रकारे निश्चित मर्यादा न दाखवता. हत्तींना चालवणारा आणि शिकवणारा तो 'हत्थाचरियो' (हत्ती-प्रशिक्षक) होय, त्याचा मुलगा म्हणून 'हत्थाचरियस्स पुत्तो' (हत्ती-प्रशिक्षकाचा मुलगा) असे म्हटले आहे. त्यावेळी भगवंतांनी त्यांच्या मनात श्रद्धा निर्माण करण्यासाठी आपला बुद्ध-प्रभाव न लपवता ते बसले होते, हे दर्शवण्यासाठी 'छब्बण्णानां घनबुद्धरस्मीनं' इत्यादी म्हटले आहे. 'भगवतो चेव गारवेन' म्हणजे भगवंतांच्या आदरभावामुळे, किंवा 'भगवति गारवेन' (भगवंतांविषयीच्या आदरामुळे) असाही पाठ आहे. นิจฺจํ น โหตีติ อภิณฺหํ น โหติ, กทาจิเทว โหตีติ อตฺโถ. อภิณฺหนิจฺจตา หิ อิธ อธิปฺเปตา, น กูฏฏฺฐนิจฺจตา. โลเก กิญฺจิ วิมฺหยาวหํ ทิสฺวา หตฺถวิการมฺปิ กโรนฺติ, องฺคุลึ วา โผฏยนฺติ, ตํ สนฺธาย วุตฺตํ [Pg.2] ‘‘อจฺฉรํ ปหริตุํ ยุตฺต’’นฺติ. อภูตปุพฺพํ ภูตนฺติ อยํ นิรุตฺตินโย เยภุยฺเยน อุปาทาย รุฬฺหีวเสน วุตฺโตติ เวทิตพฺโพ. ตถา หิ ปาฬิยํ ‘‘เยปิ เต, โภ โคตม, อเหสุํ อตีตมทฺธาน’’นฺติอาทิ วุตฺตํ, กิญฺจิ อกตฺตพฺพมฺปิ กริยมานํ ทุกฺกรภาเวน วิมฺหยาวหํ โหติ, ตถา กิญฺจิ กตฺตพฺพํ, ปุริมํ ครหจฺฉริยํ, ปจฺฉิมํ ปสํสจฺฉริยํ, ตทุภยํ สุตฺตปทโส ทสฺเสตุํ ‘‘ตตฺถา’’ติอาทิ วุตฺตํ. 'निच्चं न होति' म्हणजे वारंवार होत नाही, तर कधीतरीच होते असा अर्थ आहे. कारण येथे 'अभिण्हनिच्चता' (सतत चालणारी नित्यता) अभिप्रेत आहे, 'कूटट्ठनिच्चता' (अपरिवर्तनीय नित्यता) नाही. जगात काहीतरी आश्चर्यकारक पाहून लोक हाताने हावभावही करतात किंवा चुटकी वाजवतात, त्याला अनुसरून 'अच्छरं पहरितुं युत्तं' (चुटकी वाजवण्यास योग्य) असे म्हटले आहे. 'अभूतपुब्बं भूतं' (जे पूर्वी कधी घडले नव्हते ते घडले) हा निरुक्ति-नियम प्रामुख्याने रूढीच्या आधारे वापरला गेला आहे असे समजावे. कारण पाळीमध्ये 'हे गोतम, जे भूतकाळात झाले...' इत्यादी म्हटले आहे. काही न करण्याजोगे कृत्य देखील केले जात असताना त्याच्या कठीणतेमुळे आश्चर्यकारक वाटते, तसेच काही करण्याजोगे कृत्य देखील. पहिले निंदनीय आश्चर्य आहे आणि दुसरे प्रशंसनीय आश्चर्य आहे. हे दोन्ही सुत्तातील पदांनुसार दर्शवण्यासाठी 'तत्थ' इत्यादी म्हटले आहे. สมฺมา ปฏิปาทิโตติ สมฺมาปฏิปทายํ ฐปิโต. เอสา ปฏิปทา ปรมาติ เอตปรมํ, ภาวนปุํสกนิทฺเทโสยํ ยถา ‘‘วิสมํ จนฺทิมสูริยา ปริวตฺตนฺตี’’ติ (อ. นิ. ๔.๗๐). อยญฺเหตฺถ อตฺโถ – ภควา ภิกฺขุสงฺโฆ ปฏิปทาย ตุมฺเหหิ ปฏิปาทิโต, อตีเตปิ กาเล พุทฺธา เอตปรมํเยว ภิกฺขุสงฺฆํ สมฺมา ปฏิปาเทสุํ, อนาคเตปิ กาเล เอตปรมํเยว ภิกฺขุสงฺฆํ สมฺมา ปฏิปาเทสฺสนฺตีติ ปริพฺพาชโก นยคฺคาเหน ทิฏฺเฐน อทิฏฺฐํ อนุมินนฺโต สพฺเพสมฺปิ พุทฺธานํ สาสเน สงฺฆสุปฺปฏิปตฺตึ มชฺเฌ ภินฺนสุวณฺณํ วิย สมสมํ กตฺวา ทสฺเสติ, เอวํ ทสฺเสนฺโต จ เตสํ สุธมฺมตญฺจ ตถา ทสฺเสติ เอวาติ เวทิตพฺโพ, พุทฺธสุพุทฺธตา ปน เนสํ สรูเปเนว ทสฺสิตาติ. น อิโต ภิยฺโยติ อิมินา ปาฬิยํ เอตปรมํเยวาติ อวธารเณน นิวตฺติตํ ทสฺเสติ สีลปทฏฺฐานตฺตา สมาธิสฺส, สมาธิปทฏฺฐานตฺตา จ ปญฺญาย สีเลปิ จ อภิสมาจาริกปุพฺพกตฺตา อาทิพฺรหฺมจริยกสฺส วุตฺตํ ‘‘อาภิสมาจาริกวตฺตํ อาทึ กตฺวา’’ติ. 'सम्मा पटिपादितो' म्हणजे सम्यक् प्रतिपदेमध्ये स्थापित केलेला. 'एसा पटिपदा परमा' म्हणजेच 'एतपरमं'. हा भाव-नपुंसकलिंगी निर्देश आहे, जसे की 'विसमं चंदिमसूरियां परिवत्तन्ति' (चंद्र आणि सूर्य विषम रीतीने फिरतात). येथे हा अर्थ आहे – 'हे भगवन्, भिक्खू संघ आपल्याद्वारे योग्य मार्गावर प्रवृत्त केला गेला आहे. भूतकाळातही बुद्धांनी भिक्खू संघाला याच सर्वश्रेष्ठ मार्गावर योग्य प्रकारे प्रवृत्त केले होते आणि भविष्यकाळातही बुद्ध भिक्खू संघाला याच सर्वश्रेष्ठ मार्गावर योग्य प्रकारे प्रवृत्त करतील.' अशा प्रकारे तो परिव्राजक अनुमानाच्या आधारे, पाहिलेल्या गोष्टीवरून न पाहिलेल्या गोष्टीचा अंदाज लावत, सर्व बुद्धांच्या शासनातील संघाच्या सुप्रतिपत्तीला मध्यभागी तोडलेल्या सोन्याप्रमाणे समान करून दाखवतो. आणि असे दर्शवताना तो त्यांच्या सद्धर्माची उत्तमता देखील तशाच प्रकारे दर्शवतो, असे समजावे. बुद्धांचे सुबुद्धत्व तर त्यांच्या स्वरूपावरूनच स्पष्ट होते. 'न इतो भिय्यो' या पाळीतील 'एतपरमंयेव' या अवधारणामुळे जे निवृत्त झाले आहे ते दर्शवले आहे. कारण शील हे समाधीचे जवळचे कारण आहे आणि समाधी ही प्रज्ञेचे जवळचे कारण आहे. तसेच शीलामध्ये देखील आभिसमाचारिक आचरण हे आदि-ब्रह्मचर्याचे पूर्वगामी असल्यामुळे 'आभिसमाचारिकवत्तं आदिं कत्वा' असे म्हटले आहे. ๒. ปุจฺฉานุสนฺธิอาทีสุ อนนฺโตคธตฺตา ‘‘ปาฏิเอกฺโก อนุสนฺธี’’ติ วตฺวา ตเมวตฺถํ ปากฏํ กาตุํ ‘‘ภควา กิรา’’ติอาทิ วุตฺตํ. อุปสนฺตการณนฺติ อุปสนฺตภาวการณํ. ตญฺหิ อริยานํเยว วิสโย, ตตฺถาปิ จ พุทฺธานํ เอว อนวเสสโต วิสโยติ อิมมตฺถํ พฺยติเรกโต อนฺวยโต จ ทสฺเสตุํ น หิ ตฺวนฺติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ ญาตตฺถจริยา กากชาตกาทิวเสน เวทิตพฺพา, โลกตฺถจริยา ตํตํปารมิปูรณวเสน, พุทฺธตฺถจริยา มหาโพธิชาตกาทิวเสน. อจฺฉริยํ โภ โคตมาติอาทินา กนฺทรเกน กตํ ปสาทปเวทนํ ทสฺเสติ. २. प्रश्न-अनुसंधि इत्यादींमध्ये समाविष्ट असल्यामुळे 'पाटिएक्को अनुसंधि' (एक स्वतंत्र संदर्भ) असे सांगून तोच अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी 'भगवा किरा' इत्यादी म्हटले आहे. 'उपसंतकारणं' म्हणजे उपशांत होण्याचे कारण. कारण तो केवळ आर्यांचाच विषय आहे, आणि त्यातही बुद्धांचाच तो पूर्णपणे विषय आहे, हा अर्थ व्यतिरेक आणि अन्वय पद्धतीने दर्शवण्यासाठी 'न हि त्वं' इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये 'ज्ञातत्थचरिया' काकजातक इत्यादींच्या आधारे समजावी, 'लोकतत्थचरिया' त्या त्या पारमिता पूर्ण करण्याच्या आधारे आणि 'बुद्धत्थचरिया' महाबोधिजातक इत्यादींच्या आधारे समजावी. 'अच्छरियं भो गोतम' इत्यादींद्वारे कन्दरकाने व्यक्त केलेली आपली श्रद्धा दर्शवली आहे. เยปิ เตติอาทินา เตน วุตฺตมตฺถํ ปจฺจนุภาสนฺเตน ภควตา สมฺปฏิจฺฉิตนฺติ จริตตฺตา อาห – ‘‘สนฺติ หิ กนฺทรกาติ อยมฺปิ ปาฏิเยกฺโก อนุสนฺธี’’ติ[Pg.3]. โย หิ กนฺทรเกน ภิกฺขุสงฺฆสฺส อุปสนฺตภาโว กิตฺติโต, ตํ วิภชิตฺวา ทสฺเสนฺโตปิ เตน อปุจฺฉิโตเยว อตฺตโน อชฺฌาสเยน ภควา ‘‘สนฺติ หี’’ติอาทินา เทสนํ อารภิ. เตนาห ‘‘ภควโต กิร เอตทโหสี’’ ติอาทิ. กปฺเปตฺวาติ อญฺญถา สนฺตเมว อตฺตานํ อญฺญถา วิธาย. ปกปฺเปตฺวาติ สนิทสฺสนวเสน คเหตฺวา. เตนาห ‘‘กุหกภาเวนา’’ติอาทิ. ปฏิปทํ ปูรยมานาติ กามํ อวิเสเสน เสกฺขา วุจฺจนฺติ, เต ปน อธิคตมคฺควเสน ‘‘ปูรยมานา’’ติ น วตฺตพฺพา กิจฺจสฺส นิฏฺฐิตตฺตา. มคฺโค หิ เอกจิตฺตกฺขณิโกติ อาห ‘‘อุปริมคฺคสฺส วิปสฺสนาย อุปสนฺตา’’ติ. อิโต มุตฺตาติ มคฺเคนาคตูปสมโต มุตฺตา. กลฺยาณปุถุชฺชเน สนฺธาย วทติ. เตนาห ‘‘จตูหิ สติปฏฺฐาเนหิ อุปสนฺตา’’ติ. 'येपि ते' इत्यादींद्वारे त्याने सांगितलेल्या गोष्टीचा पुनरुच्चार करत भगवंतांनी ती स्वीकारली आहे, म्हणून आचरणाच्या संदर्भात म्हटले आहे – 'सन्ति हि कन्दरक' हा देखील एक स्वतंत्र संदर्भ आहे. कारण कन्दरकाने भिक्खू संघाच्या ज्या उपशांत भावाची प्रशंसा केली होती, त्याचे वर्गीकरण करून दर्शवताना देखील, त्याने न विचारताच भगवंतांनी स्वतःच्या इच्छेने 'सन्ति हि' इत्यादींद्वारे देशनेला सुरुवात केली. म्हणूनच 'भगवतो किर एतदहोसि' इत्यादी म्हटले आहे. 'कप्पेत्वा' म्हणजे स्वतः जसे आहोत त्यापेक्षा वेगळे रूप धारण करून. 'पकप्पेत्वा' म्हणजे उदाहरणासह ग्रहण करून. म्हणूनच 'कुहकभावेन' इत्यादी म्हटले आहे. 'पटिपदं पूरयमाना' म्हणजे सामान्यतः 'सेक्ख' (शैक्ष) असे म्हटले जाते, परंतु त्यांनी मार्ग प्राप्त केला असल्यामुळे त्यांचे कर्तव्य पूर्ण झाले असल्याने त्यांना 'पूर्ण करणारे' असे म्हणता येत नाही. कारण मार्ग हा एका चित्तक्षणाचाच असतो, म्हणून 'उपरि मग्गस्स विपस्सनाय उपसंता' असे म्हटले आहे. 'इतो मुत्ता' म्हणजे मार्गाद्वारे प्राप्त झालेल्या उपशमापासून मुक्त. हे कल्याण-पृथग्जनांना उद्देशून म्हटले आहे. म्हणूनच 'चतूहि सतिपट्ठानेहि उपसंता' असे म्हटले आहे. สตตสีลาติ อวิจฺฉินฺนสีลา. สาติสโย หิ เอเตสํ สีลสฺส อขณฺฑาทิภาโว. สุปริสุทฺธสีลตาวเสน สนฺตตา วุตฺติ เอเตสนฺติ สนฺตตวุตฺติโนติ อาห ‘‘ตสฺเสว เววจน’’นฺติ. เอวํ สีลวุตฺติวเสน ‘‘สนฺตตวุตฺติโน’’ติ ปทสฺส อตฺถํ วตฺวา อิทานิ ชีวิตวุตฺติวเสน ทสฺเสนฺโต ‘‘สนฺตตชีวิกาวาติ อตฺโถ’’ติ อาห. สาสนสฺส ชีวิตวุตฺติ สีลสนฺนิสฺสิตา เอวาติ อาห ‘‘ตสฺมิ’’นฺติอาทิ. 'सततसीला' म्हणजे अखंड शील पाळणारे. कारण त्यांच्या शीलाचा अखंडत्व इत्यादी भाव अतिशय श्रेष्ठ दर्जाचा असतो. अत्यंत शुद्ध शीलामुळे ज्यांचे वर्तन निरंतर चालणारे असते ते 'संततवुत्तिनो' होत, म्हणून 'तस्सेव वेवचनं' असे म्हटले आहे. अशा प्रकारे शील-वर्तनाच्या दृष्टीने 'संततवुत्तिनो' या पदाचा अर्थ सांगून, आता जीवन जगण्याच्या दृष्टीने दर्शवताना 'संततजीविका' असा अर्थ आहे, असे म्हटले आहे. शासनाचे अस्तित्व शीलावरच अवलंबून असते, म्हणूनच 'तस्मिं' इत्यादी म्हटले आहे. นิปยติ วิโสเสติ ราคาทิสํกิเลสํ, ตโต วา อตฺตานํ นิปาตีติ นิปโก, ปญฺญวา. เตนาห ‘‘ปญฺญวนฺโต’’ติ. ปญฺญาย ฐตฺวา ชีวิกากปฺปนํ นาม พุทฺธปฏิกุฏฺฐมิจฺฉาชีวํ ปหาย สมฺมาชีเวน ชีวนนฺติ ตํ ทสฺเสนฺโต ‘‘ยถา เอกจฺโจ’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ยํ วตฺตพฺพํ, ตํ วิสุทฺธิมคฺเค (วิสุทฺธิ. ๑.๑๔) ตํสํวณฺณนายญฺจ (วิสุทฺธิ. มหาฏี. ๑.๑๔) วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ. รถวินีตปฏิปทาทโย เตสุ เตสุ สุตฺเตสุ วุตฺตนเยน เวทิตพฺพา. อิโต อญฺญตฺถ มหาโคปาลกสุตฺตาทีสุ (ม. นิ. ๑.๓๔๖ อาทโย) โลกุตฺตรสติปฏฺฐานา กถิตาติ อาห – ‘‘อิธ ปน โลกิยโลกุตฺตรมิสฺสกา สติปฏฺฐานา กถิตา’’ติ, สติปฏฺฐานสุตฺเตปิ (ที. นิ. ๒.๓๗๓-๓๗๔; ม. นิ. ๑.๑๐๖ อาทโย) โวมิสฺสกาว กถิตาติ. เอตฺตเกนาติ เอตฺตกาย เทสนาย. जो रागादी संक्लेशांना नष्ट करतो (सुकवतो) किंवा स्वतःला त्यात पडण्यापासून वाचवतो, तो 'निपक' (चतुर) म्हणजेच प्रज्ञावान होय. म्हणूनच 'प्रज्ञावंत' (paññavanto) असे म्हटले आहे. प्रज्ञेमध्ये प्रतिष्ठित होऊन, उपजीविका चालवणे म्हणजेच बुद्धांनी निषिद्ध मानलेल्या मिथ्या आजीविकेचा (micchājīva) त्याग करून सम्यक आजीविकेने (sammājīva) जगणे, हे दर्शवण्यासाठी 'जसे की कोणी एक' (yathā ekacco) इत्यादी म्हटले आहे. त्याबाबत जे काही सांगायचे आहे, ते विसुद्धिमग्ग (१.१४) आणि त्याच्या महाटीकेमध्ये (१.१४) सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावे. रथविनीत प्रतिपदा इत्यादी त्या त्या सूत्तांमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्याव्यात. या व्यतिरिक्त महागोपालक सूत्त इत्यादींमध्ये (म.नि. १.३४६ इ.) लोकोत्तर सतिपट्ठान सांगितले आहे, म्हणून म्हटले आहे – 'परंतु येथे लौकिक आणि लोकोत्तर मिश्रित सतिपट्ठान सांगितले आहे.' सतिपट्ठान सूत्तातही (दी.नि. २.३७३-३७४; म.नि. १.१०६ इ.) मिश्रितच सांगितले आहे. 'एवढ्यानेच' म्हणजे 'एवढ्या देशनेनेच'. ๓. การกภาวนฺติ [Pg.4] ปฏิปตฺติยํ ปฏิปชฺชนกภาวํ. มยมฺปิ นาม คิหี พหุกิจฺจา สมานา กาเลน กาลํ สติปฏฺฐาเนสุ สุปฺปติฏฺฐิตจิตฺตา วิหราม, กิมงฺคํ ปน วิเวกวาสิโนติ อตฺตโน การกภาวํ ปเวเทนฺโต เอวํ ภิกฺขุสงฺฆญฺจ อุกฺขิปติ. เตนาห ‘‘อยญฺเหตฺถ อธิปฺปาโย’’ติอาทิ. นานารมฺมเณสุ อปราปรํ อุปฺปชฺชมานานํ ราคาทิกิเลสานํ ฆนชฏิตสงฺขาตากาเรน ปวตฺติ กิเลสคหเนน คหนตา, เตนาห ‘‘อนฺโต ชฏา พหิ ชฏา, ชฏาย ชฏิตา ปชา’’ติ (สํ. นิ. ๑.๒๓, ๑๙๒). มนุสฺสานํ อชฺฌาสยคหเณน สาเฐยฺยมฺปีติ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘กสฏสาเฐยฺเยสุปิ เอเสว นโย’’ติ. ยถา สปฺปิมธุผาณิตาทีสุ กจวรภาโว, โส กสโฏติ วุจฺจติ, เอวํ สนฺตาเน อปริสุทฺโธ สํกิเลสภาโว กสฏนฺติ อาห ‘‘อปริสุทฺธฏฺเฐน กสฏตา’’ติ. อตฺตนิ อสนฺตคุณสมฺภาวนํ เกราฏิยฏฺโฐ. ชานาตีติ ‘‘อิทํ อหิตํ น เสวิตพฺพํ, อิทํ หิตํ เสวิตพฺพ’’นฺติ วิจาเรติ เทเสติ. วิจารณตฺโถปิ หิ โหติ ชานาติ-สทฺโท ยถา ‘‘อายสฺมา ชานาตี’’ติ. สพฺพาปิ…เป… อธิปฺเปตา ‘‘ปสุปาลกา’’ติอาทีสุ วิย. อิธ อนฺตร-สทฺโท ‘‘วิชฺชนฺตริกายา’’ติอาทีสุ (ม. นิ. ๒.๑๔๙) วิย ขณตฺโถติ อาห ‘‘ยตฺตเกน ขเณนา’’ติ. เตนาติ หตฺถินา. ตานีติ สาเฐยฺยาทีนิ. ३. 'कारकभाव' म्हणजे प्रतिपत्तीमध्ये (आचरणात) आचरण करण्याचा भाव. 'आम्ही गृहस्थ असूनही, अनेक कामे असताना वेळोवेळी सतिपट्ठानांमध्ये सुप्रतिष्ठित चित्त ठेवून विहरतो, मग विवेकशील (एकांतात राहणाऱ्या) भिक्खूंचे काय सांगावे!' अशा प्रकारे स्वतःचा कारकभाव प्रकट करत ते भिक्खू संघालाही प्रोत्साहित करतात. म्हणूनच 'येथे हाच अभिप्राय आहे' इत्यादी म्हटले आहे. विविध आलंबनांमध्ये वारंवार उत्पन्न होणाऱ्या रागादी क्लेशांची दाट गुंतागुंतीच्या स्वरूपातील प्रवृत्ती म्हणजेच क्लेश-गहनाने (क्लेशांच्या अरण्याने) वेढलेले असणे होय. म्हणूनच म्हटले आहे – 'आत जटा (गुंता), बाहेर जटा, जटेने ही प्रजा वेढलेली आहे' (सं.नि. १.२३, १९२). मनुष्यांच्या आशयाचे (मनाचा कल) ग्रहण करण्याने शठता (धूर्तपणा) देखील होते, हे दर्शवण्यासाठी म्हटले आहे – 'कपट आणि शठतेमध्येही हाच नियम लागू होतो'. ज्याप्रमाणे तूप, मध, गूळ इत्यादींमध्ये कचरा असतो, त्याला 'कसाट' (मळ/कचरा) म्हटले जाते, त्याचप्रमाणे चित्तसंततीमध्ये अपवित्र संक्लेश भाव असणे म्हणजे 'कसाट' होय, म्हणून म्हटले आहे – 'अपवित्रतेच्या अर्थाने कसाटता (मळकटपणा) आहे'. स्वतःमध्ये नसलेल्या गुणांची बतावणी करणे म्हणजे 'केराटिय' (ढोंग/कपट) होय. 'जाणतो' म्हणजे 'हे अहितकारक आहे, याचे सेवन करू नये; हे हितकारक आहे, याचे सेवन करावे' असा विचार करतो आणि उपदेश करतो. कारण 'जाणणे' या शब्दाचा अर्थ विचार करणे असाही होतो, जसे की 'आयुष्यमान जाणतात'. सर्वच...पे... 'पशूपालक' इत्यादींप्रमाणे अभिप्रेत आहेत. येथे 'अंतर' हा शब्द 'विज्जन्तरिका' (विजेचा चमकारा) इत्यादींप्रमाणे (म.नि. २.१४९) 'क्षण' या अर्थाने वापरला आहे, म्हणून म्हटले आहे – 'जितक्या क्षणात'. 'त्याच्याद्वारे' म्हणजे हत्तीद्वारे. 'ती' म्हणजे शठता इत्यादी. อตฺถโต กายจิตฺตุชุกตาปฏิปกฺขภูตาว โลภสหคตจิตฺตุปฺปาทสฺส ปวตฺติอาการวิเสสาติ ตานิ ปวตฺติอากาเรน ทสฺเสตุํ ‘‘ตตฺถา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ ยสฺสาติ ปาณภูตสฺส อสฺสสฺส วา หตฺถิโน วา. ฐสฺสามีติ ตตฺเถว สปฺปฏิภเย ฐาเน คนฺตฺวา ฐสฺสามีติ น โหติ. อิมสฺส สาเฐยฺยตาย ปากฏกรณํ วญฺจนาธิปฺปายภาวโต. ตถา หิ จตูสุ ฐาเนสุ ‘‘วญฺเจตฺวา’’ อิจฺเจว วุตฺตํ, นิคุหนฺโต ปน ตตฺเถว คนฺตฺวา ติฏฺเฐยฺย. เอส นโย เสเสสุปิ. ปฏิมคฺคํ อาโรหิตุกามสฺสาติ อาคตมคฺคเมว นิวตฺติตฺวา คนฺตุกามสฺส. เลณฺฑวิสฺสชฺชนาทีสุ กาลนฺตราเปกฺขาภาวํ ‘‘ตถา’’ติ อิมินา อุปสํหรติ. वास्तविक पाहता, काय आणि चित्ताच्या ऋजुतेच्या (सरळपणाच्या) विरोधी असणाऱ्या लोभयुक्त चित्तोत्पादाच्या प्रवृत्तीचे हे विशेष प्रकार आहेत, म्हणून त्यांना प्रवृत्तीच्या स्वरूपात दर्शवण्यासाठी 'तेथे' (tattha) इत्यादी म्हटले आहे. त्यात 'ज्या' म्हणजे प्राण्याचा, घोड्याचा किंवा हत्तीचा. 'मी उभा राहीन' म्हणजे त्याच भययुक्त ठिकाणी जाऊन 'मी उभा राहीन' असे नसते. याची शठता (धूर्तपणा) उघड होणे हे फसवणुकीच्या हेतूमुळे होते. तसेच चार ठिकाणी 'फसवून' असेच म्हटले आहे, परंतु लपवणारा तर तिथेच जाऊन उभा राहील. हाच नियम इतरांच्या बाबतीतही लागू होतो. 'उलट मार्गावर जाऊ इच्छिणाऱ्याचा' म्हणजे आलेल्या मार्गानेच परत जाऊ इच्छिणाऱ्याचा. लीद (मलमूत्र) विसर्जन इत्यादींमध्ये काळाच्या अंतराची अपेक्षा नसणे, हे 'तसेच' (tathā) या शब्दाने स्पष्ट केले आहे. อนฺโตชาตกาติ อตฺตโน ทาสิยา กุจฺฉิมฺหิ ชาตา. ธนกฺกีตาติ ธนํ ทตฺวา ทาสภาเวน คหิตา. กรมรานีตาติ ทาสภาเวน กรมรคฺคาหคหิตา. ทาสพฺยนฺติ ทาสภาวํ. เปสฺสาติ อทาสา เอว หุตฺวา เวยฺยาวจฺจกรา. อิมํ วิสฺสชฺเชตฺวาติ อิมํ อตฺตโน หตฺถคตํ วิสฺสชฺเชตฺวา. อิมํ [Pg.5] คณฺหนฺตาติ อิมํ ตสฺส หตฺถคตํ คณฺหนฺตา. สมฺมุขโต อญฺญถา ปรมฺมุขกาเล กายวาจาสมุทาจารทสฺสเนเนว จิตฺตสฺส เนสํ อญฺญถา ฐิตภาโว นิทฺทิฏฺโฐติ เวทิตพฺโพ. 'अंतोजाता' म्हणजे स्वतःच्या दासीच्या गर्भातून जन्मलेली. 'धनक्कीता' म्हणजे धन देऊन दासी म्हणून विकत घेतलेली. 'करमरानीता' म्हणजे युद्धात किंवा जबरदस्तीने पकडून दासी बनवलेली. 'दासव्य' म्हणजे दासभाव (गुलामगिरी). 'पेस्सा' म्हणजे दासी नसतानाही सेवाकार्य (वैय्यावच्च) करणारी. 'याचा त्याग करून' म्हणजे स्वतःच्या हातात असलेल्या गोष्टीचा त्याग करून. 'हे ग्रहण करणारे' म्हणजे त्याच्या हातात असलेले ग्रहण करणारे. प्रत्यक्ष समोर असताना एक प्रकारे आणि पाठीमागे दुसऱ्या प्रकारे वागणे, हे त्यांच्या काय आणि वाचेच्या व्यवहारावरूनच त्यांच्या चित्ताची विपरीत स्थिती दर्शवते, असे समजावे. ๔. อยมฺปิ ปาฏิเยกฺโก อนุสนฺธีติ เอตฺถาปิ อนนฺตเร วุตฺตนเยเนว อนุสนฺธิโยชนา เวทิตพฺพา. เตเนวาห ‘‘อยญฺหี’’ติอาทิ. จตุตฺโถ หิตปฏิปทํ ปฏิปนฺโนติ โยชนา. ปุคฺคลสีเสน ปุคฺคลปฏิปตฺตึ ทสฺเสนฺโต ‘‘ปุคฺคเล ปหายา’’ติ อาห. ปฏิปตฺติ หิ อิธ ปหาตพฺพา, น ปุคฺคลา. ยถา อสฺสทฺธาทิปุคฺคลปริวชฺชเนน สทฺธินฺทฺริยาทิภาวนา อิชฺฌนฺติ, เอวํ มิจฺฉาปฏิปนฺนปุคฺคลปริวชฺชเนน มิจฺฉาปฏิปทา วชฺชิตพฺพาติ อาห – ‘‘ปุริเม ตโย ปุคฺคเล ปหายา’’ติ. จตุตฺถปุคฺคลสฺสาติ อิมสฺมึ จตุกฺเก วุตฺตจตุตฺถปุคฺคลสฺส หิตปฏิปตฺติยํเยว ปฏิปาเทมิ ปวตฺเตมีติ ทสฺเสนฺโต. สนฺตาติ สมํ วินาสํ นิโรธํ ปตฺตาติ อยเมตฺถ อตฺโถติ อาห ‘‘นิรุทฺธา สนฺตาติ วุตฺตา’’ติ. ปุน สนฺตาติ ภาวนาวเสน กิเลสปริฬาหวิคมโต สนฺตาติ อยเมตฺถ อตฺโถติ อาห ‘‘นิพฺพุตา’’ติ. สนฺตาติ อาเนตฺวา โยชนา. สนฺโต หเวติ เอตฺถ สมภาวกเรน สาธุภาวสฺส วิเสสปจฺจยภูเตน ปณฺฑิจฺเจน สมนฺนาคตา อริยา ‘‘สนฺโต’’ติ วุตฺตาติ อาห – ‘‘สนฺโต หเว…เป… ปณฺฑิตา’’ติ. ४. हा देखील एक स्वतंत्र संदर्भ (अनुसंधी) आहे, येथेही पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच संदर्भाची जोडणी समजून घ्यावी. म्हणूनच 'हाच' इत्यादी म्हटले आहे. 'चौथा हितकारक प्रतिपदेचे आचरण करतो' अशी योजना आहे. पुद्गलाच्या (व्यक्तीच्या) माध्यमातून पुद्गलाची प्रतिपत्ती (आचरण) दर्शवताना 'पुद्गलांचा त्याग करून' असे म्हटले आहे. कारण येथे प्रतिपत्तीचा (चुकीच्या आचरणाचा) त्याग करायचा आहे, पुद्गलाचा (व्यक्तीचा) नाही. ज्याप्रमाणे अश्रद्ध इत्यादी पुद्गलांचा त्याग केल्याने श्रद्धा-इंद्रिय इत्यादींची भावना यशस्वी होते, त्याचप्रमाणे मिथ्या आचरण करणाऱ्या पुद्गलांचा त्याग केल्याने मिथ्या प्रतिपदेचा त्याग केला पाहिजे, म्हणून म्हटले आहे – 'पहिल्या तीन पुद्गलांचा त्याग करून'. चौथ्या पुद्गलाच्या म्हणजे या चतुष्कात सांगितलेल्या चौथ्या पुद्गलाला हितकारक प्रतिपदेमध्येच प्रवृत्त करतो, हे दर्शवण्यासाठी. 'शांत' म्हणजे शमन, विनाश किंवा निरोधाला प्राप्त झालेले, हा येथे अर्थ आहे, म्हणून म्हटले आहे – 'निरुद्ध झालेल्यांना शांत म्हटले आहे'. पुन्हा 'शांत' म्हणजे भावनेच्या प्रभावाने क्लेशांचा दाह नष्ट झाल्यामुळे शांत झालेले, हा येथे अर्थ आहे, म्हणून म्हटले आहे – 'निब्बुत्त' (निर्वाण प्राप्त). 'शांत' हा शब्द आणून योजना करावी. 'संतो हवे' (नक्कीच संत) येथे समभावामुळे आणि साधुभावाचे विशेष कारण असलेल्या पांडित्याने (ज्ञानाने) युक्त असलेल्या अरियांना 'संत' म्हटले आहे, म्हणून म्हटले आहे – 'संतो हवे...पे... पंडिता'. อาหิโต อหํมาโน เอตฺถาติ อตฺตา (อ. นิ. ฏี. ๒.๔.๑๙๘) อตฺตภาโว, อิธ ปน โย ปโร น โหติ, โส อตฺตา, ตํ อตฺตานํ. ปรนฺติ อตฺตโต อญฺญํ. ฉาตํ วุจฺจติ ตณฺหา ชิฆจฺฉาเหตุตาย. อนฺโต ตาปนกิเลสานนฺติ อตฺตโน สนฺตาเน อตฺตปริฬาหชนนสนฺตปฺปนกิเลสานํ. จิตฺตํ อาราเธตีติ จิตฺตํ ปสาเทติ, สมฺปหํเสตีติ อตฺโถ. ยสฺมา ปน ตถาภูโต จิตฺตํ สมฺปาเทนฺโต อชฺฌาสยํ คณฺหนฺโต นาม โหติ, ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘จิตฺตํ สมฺปาเทตี’’ติอาทิ. ज्यामध्ये 'अहंकार' (मी-पणा) स्थापित आहे तो 'अत्ता' (स्व) म्हणजेच अत्तभाव (आत्मभाव) होय. परंतु येथे जो 'पर' (दुसरा) नाही, तो 'अत्ता' (स्वतः) आहे, त्या स्वतःला. 'पर' म्हणजे स्वतःव्यतिरिक्त दुसरा. तृष्णा आणि भुकेच्या कारणामुळे त्याला 'छात' (भुकेलेला/तृष्णायुक्त) म्हटले जाते. 'अंतःतापन क्लेश' म्हणजे स्वतःच्या चित्तसंततीमध्ये स्वतःला संताप आणि दाह उत्पन्न करणारे क्लेश. 'चित्त आराधित करतो' म्हणजे चित्त प्रसन्न करतो, हर्षित करतो असा अर्थ आहे. परंतु ज्या अर्थी तशा प्रकारचा मनुष्य चित्त संपादन करतो म्हणजेच आशय (मनाचा कल) ग्रहण करतो, म्हणूनच 'चित्त संपादन करतो' इत्यादी म्हटले आहे. ๕. ทุกฺขํ ปฏิกฺกูลํ เชคุจฺฉํ เอตสฺสาติ ทุกฺขปฏิกฺกูโล ตํ ทุกฺขปฏิกฺกูลํ. วิเสสนวิเสสิตพฺพตา หิ กามจารา. อฏฺฐกถายํ ปน ทุกฺขสฺส วิเสสิตพฺพตํ สนฺธาย พาหิรตฺถสมาสํ อนาทิยิตฺวา ‘‘ทุกฺขสฺส ปฏิกฺกูล’’นฺติ อตฺโถ วุตฺโต. เยน หิ ภาเคน ปุริสสฺส ทุกฺขํ ปฏิกฺกูลํ, เตน ทุกฺขสฺส ปุริโสปีติ. เตนาห – ‘‘ปจฺจนีกสณฺฐิต’’นฺติ. ५. ज्याला दुःख प्रतिकूल आणि घृणास्पद वाटते, तो 'दुःखप्रतिकूल' होय, त्याला 'दुःखप्रतिकूल' म्हणतात. कारण विशेषण आणि विशेष्य भाव हा इच्छेनुसार असू शकतो. परंतु अट्ठकथेमध्ये दुःखाच्या विशेष्य भावाचा विचार करून, बाह्य अर्थाचा समास न घेता 'दुःखाला प्रतिकूल' असा अर्थ सांगितला आहे. कारण ज्या अंशाने मनुष्याला दुःख प्रतिकूल असते, त्याच अंशाने दुःखाला मनुष्यही प्रतिकूल असतो. म्हणूनच 'प्रतिकूल स्थितीत असलेले' असे म्हटले आहे. ๖. จตูหิ [Pg.6] การเณหีติ ธาตุกุสลตาทีหิ จตูหิ การเณหิ. กมฺมํ กโรตีติ โยคกมฺมํ กโรติ. ยสฺมา สมฺพุทฺธา ปเรสํ มคฺคผลาธิคมาย อุสฺสาหชาตา, ตตฺถ นิรนฺตรํ ยุตฺตปฺปยุตฺตา เอว โหนฺติ, เต ปฏิจฺจ เตสํ อนฺตราโย น โหติเยวาติ อาห ‘‘น ปน พุทฺเธ ปฏิจฺจา’’ติ. กิริยปริหานิยา เทสกสฺส ตสฺเสว วา ปุคฺคลสฺส ตชฺชปโยคาภาวโต. ‘‘เทสกสฺส วา’’ติ อิทํ สาวกานํ วเสน ทฏฺฐพฺพํ. มหตา อตฺเถนาติ เอตฺถ อตฺถ-สทฺโท อานิสํสปริยาโยติ อาห ‘‘ทฺวีหิ อานิสํเสหี’’ติ. ปสาทํ ปฏิลภติ ‘‘อรหนฺโต’’ติอาทินา สงฺฆสุปฺปฏิปตฺติยา สุตตฺตา. อภินโว นโย อุทปาทิ สนฺตตสีลตาทิวเสน อนตฺตนฺตปตาทิวเสน, โสปิ ตํ สุตฺวา ทาสาทีสุ สวิเสสํ ลชฺชี ทยาปนฺโน หิตานุกมฺปี หุตฺวา เสกฺขปฏิปทํ สีลํ สาเธนฺโต อนุกฺกเมน สติปฏฺฐานภาวนํ ปริพฺรูเหติ. เตนาห ภควา ‘‘มหตา อตฺเถน สํยุตฺโต’’ติ. ६. 'चार कारणांनी' म्हणजे धातुकुशलता इत्यादी चार कारणांनी. 'कर्म करतो' म्हणजे योगकर्म करतो. ज्याअर्थी सम्यक्संबुद्ध इतरांना मार्ग आणि फल प्राप्त करून देण्यासाठी उत्साही असतात, आणि त्यात निरंतर युक्त व प्रयुक्त (मग्न) असतात, त्यामुळे त्यांच्या आश्रयाने (त्यांच्यामुळे) त्यांच्यात कोणताही अंतराय (अडथळा) येतच नाही, म्हणून म्हटले आहे - "परंतु बुद्धांच्या आश्रयाने नाही". क्रियेच्या हानीमुळे, उपदेश करणाऱ्याच्या किंवा त्याच व्यक्तीच्या योग्य प्रयोगाच्या अभावामुळे. "किंवा उपदेश करणाऱ्याच्या" हे श्रावकांच्या संदर्भात समजले पाहिजे. 'महान अर्थाने' येथे 'अर्थ' शब्द हा 'आणिसंस' (फायदा/लाभ) या अर्थाने वापरला आहे, म्हणून म्हटले आहे - "दोन फायद्यांनी (आणिसंसांनी)". "ते अर्हत आहेत" इत्यादी प्रकारे संघाच्या सुप्रतिपत्तीबद्दल (चांगल्या आचरणाबद्दल) ऐकल्यामुळे तो प्रसन्नता (प्रसाद) प्राप्त करतो. निरंतर शील इत्यादींच्या प्रभावाने आणि स्वतःला त्रास न देण्याच्या (अनत्तंतपता) तत्त्वामुळे एक नवीन मार्ग (नय) उत्पन्न झाला. तोसुद्धा ते ऐकून दासांविषयी विशेषत्वाने लज्जा बाळगणारा (संकोच बाळगणारा), दयाळू आणि हिताची इच्छा करणारा बनून, शैक्षप्रतिपदेचे (शिखण्याच्या मार्गाचे) शील साध्य करत, अनुक्रमाने सतिपट्ठान भावनेची वृद्धी करतो. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे - "महान अर्थाने युक्त". ๘. ปเรสํ หนนฆาตนาทินา โรทาปนโต ลุทฺโท, ตถา วิฆาตกภาเวน กายจิตฺตานํ วิทารณโต ทารุโณ, วิรุทฺธวาทตาย กกฺขโฬ, พนฺธนาคาเร นิยุตฺโต พนฺธนาคาริโก. ८. इतरांना मारणे, इजा करणे इत्यादींद्वारे रडवल्यामुळे तो 'लुद्द' (क्रूर/पारधी) आहे, तसेच विघातक भावाने काय आणि चित्त विदीर्ण (छिन्नविच्छिन्न) केल्यामुळे 'दारुण' (भयानक) आहे, विरुद्ध बोलण्याच्या (वाद घालण्याच्या) स्वभावामुळे 'कक्खळ' (कठोर) आहे, आणि कारागृहात (तुरुंगात) नियुक्त असलेला तो 'बंधनागारिक' (तुरुंग रक्षक) आहे. ๙. ขตฺติยาภิเสเกนาติ ขตฺติยานํ กตฺตพฺพอภิเสเกน. สนฺถาคารนฺติ สนฺถารวเสน กตํ อคารํ ยญฺญาวาฏํ. สปฺปิเตเลนาติ สปฺปิมเยน เตเลน, ยมกสฺเนเหน หิ ตทา กายํ อพฺภญฺชติ. วจฺฉภาวํ ตริตฺวา ฐิโต วจฺฉตโร. ปริกฺเขปกรณตฺถายาติ วนมาลาหิ สทฺธึ ทพฺเภหิ เวทิยา ปริกฺเขปนตฺถาย. ยญฺญภูมิยนฺติ อวเสสยญฺญฏฺฐาเน. ยํ ปเนตฺถ อตฺถโต อวิภตฺตํ ตํ สุวิญฺเญยฺยเมว. ९. 'क्षत्रिय अभिषेकाने' म्हणजे क्षत्रियांसाठी करावयाच्या अभिषेकाने. 'संथागार' म्हणजे संथार (आसन/गवत पसरवणे) च्या उद्देशाने बनवलेले घर किंवा यज्ञमंडप. 'तूप आणि तेलाने' म्हणजे तुपाने युक्त तेलाने; कारण त्यावेळी यमकस्नेहाने (तूप आणि तेलाच्या मिश्रणाने) शरीराला मर्दन (अभ्यंग) केले जात असे. वासरू असण्याची अवस्था पार करून उभा असलेला तो 'वच्छतर' (तरुण बैल). 'वेढण्यासाठी' म्हणजे वनमालांसह दर्भाने (कुश गवताने) वेदीला वेढण्यासाठी. 'यज्ञभूमीत' म्हणजे उर्वरित यज्ञस्थानी. आणि येथे जे अर्थाच्या दृष्टीने स्पष्ट केलेले नाही, ते सहज समजण्यासारखेच आहे. กนฺทรกสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. कंदरक सुत्ताच्या वर्णनावरील लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๒. อฏฺฐกนาครสุตฺตวณฺณนา २. अट्ठकनागर सुत्ताचे वर्णन (अट्ठकनागरसुत्तवण्णना). ๑๗. อวิทูเรติ [Pg.7] อิมินา ปาฬิยํ ‘‘เวสาลิย’’นฺติ อิทํ สมีเป ภุมฺมวจนนฺติ ทสฺเสติ. สารปฺปตฺตกุลคณนายาติ (อ. นิ. ฏี. ๓.๑๑.๑๖) มหาสารมหปฺปตฺตกุลคณนาย. ทสเม ฐาเนติ อญฺเญ อญฺเญติ ทสคณนฏฺฐาเน. อฏฺฐกนคเร ชาโต ภโว อฏฺฐกนาคโร. กุกฺกุฏาราโมติ ปาฏลิปุตฺเต กุกฺกุฏาราโม, น โกสมฺพิยํ. १७. 'अविदूरे' (जवळच) या शब्दाने पाळी भाषेतील 'वेसालिया' (वैशालीमध्ये) हे सप्तमी विभक्तीचे रूप 'समीप' (जवळ) या अर्थाने आहे, असे दर्शवले आहे. 'सारप्पत्तकुलगणनाय' म्हणजे महान सार आणि मोठेपण प्राप्त झालेल्या कुळांच्या गणनेत. 'दहाव्या स्थानावर' म्हणजे इतरांच्या संदर्भात दहाव्या गणना स्थानावर. अट्ठक नगरात जन्मलेला किंवा राहणारा तो 'अट्ठकनागर'. 'कुक्कुटाराम' म्हणजे पाटलिपुत्रातील कुक्कुटाराम, कौशाम्बीतील नव्हे. ๑๘. ปกตตฺถนิทฺเทโส ต-สทฺโทติ ตสฺส ‘‘ภควตา’’ติอาทีหิ ปเทหิ สมานาธิกรณภาเวน วุตฺตสฺส เยน อภิสมฺพุทฺธภาเวน ภควา ปกโต อธิคโต สุปากโฏ จ, ตํ อภิสมฺพุทฺธภาวํ สทฺธึ อาคมนียปฏิปทาย อตฺถภาเวน ทสฺเสนฺโต ‘‘โย โส…เป… อภิสมฺพุทฺโธ’’ติ อาห. สติปิ ญาณทสฺสน-สทฺทานํ อิธ ปญฺญาเววจนภาเว เตน เตน วิเสเสน เตสํ วิสยวิเสเส ปวตฺติทสฺสนตฺถํ อสาธารณญาณวิเสสวเสน วิชฺชาตฺตยวเสน วิชฺชาอภิญฺญานาวรณญาณวเสน สพฺพญฺญุตญาณมํสจกฺขุวเสน ปฏิเวธเทสนาญาณวเสน จ ตทตฺถํ โยเชตฺวา ทสฺเสนฺโต ‘‘เตสํ เตส’’นฺติอาทิมาห. ตตฺถ อาสยานุสยํ ชานตา อาสยานุสยญาเณน สพฺพํ เญยฺยธมฺมํ ปสฺสตา สพฺพญฺญุตานาวรณญาเณหิ. ปุพฺเพนิวาสาทีหีติ ปุพฺเพนิวาสาสวกฺขยญาเณหิ. ปฏิเวธปญฺญายาติ อริยมคฺคปญฺญาย. เทสนาปญฺญาย ปสฺสตาติ เทเสตพฺพธมฺมานํ เทเสตพฺพปฺปการํ โพธเนยฺยปุคฺคลานญฺจ อาสยานุสยจริตาธิมุตฺติอาทิเภทํ ธมฺมเทสนาปญฺญาย ยาถาวโต ปสฺสตา. อรีนนฺติ กิเลสารีนํ, ปญฺจวิธมารานํ วา, สาสนสฺส วา ปจฺจตฺถิกานํ อญฺญติตฺถิยานํ เตสํ ปน หนนํ ปาฏิหาริเยหิ อภิภวนํ อปฺปฏิภานตากรณํ อชฺฌุเปกฺขนเมว วา, เกสิวินยสุตฺตญฺเจตฺถ นิทสฺสนํ. १८. 'त' (तो) हा शब्द प्रगट अर्थाचा निर्देश करणारा आहे. "भगवता" इत्यादी पदांशी समानाधिकरण भावाने सांगितलेल्या ज्या अभिसंबुद्धभावामुळे (पूर्ण ज्ञान प्राप्त झाल्यामुळे) भगवान प्रगट झाले, त्यांनी ते प्राप्त केले आणि ते सुप्रसिद्ध झाले, तो अभिसंबुद्धभाव आगमनीय प्रतिपदेसह (प्राप्तीच्या मार्गासह) अर्थरूपाने दर्शवताना "जो तो...पे... अभिसंबुद्ध" असे म्हटले आहे. जरी येथे 'ज्ञान' आणि 'दर्शन' हे शब्द प्रज्ञेचेच समानार्थी शब्द असले, तरी त्या त्या वैशिष्ट्यामुळे त्यांच्या विषय-विशेषातील प्रवृत्ती दर्शवण्यासाठी - असाधारण ज्ञानविशेषाच्या रूपाने, त्रिविद्यांच्या रूपाने, विद्या-अभिज्ञा-अनावरण ज्ञानाच्या रूपाने, सर्वज्ञताज्ञान आणि मांसचक्षूच्या रूपाने, तसेच प्रतिवेध (साक्षात्कार) व देशना ज्ञानाच्या रूपाने - त्यांचा अर्थ जुळवून दाखवताना "त्या त्या..." इत्यादी म्हटले आहे. त्यात, आशय आणि अनुशय जाणणाऱ्या 'आशयानुशय ज्ञानाने' आणि सर्व ज्ञेय धर्म पाहणाऱ्या 'सर्वज्ञता व अनावरण ज्ञानाने'. 'पुब्बेनिवास' इत्यादींनी म्हणजे पूर्वनिवासस्मृती आणि आसवक्खय (आस्रवक्षय) ज्ञानाने. 'प्रतिवेध प्रज्ञेने' म्हणजे आर्यमार्ग प्रज्ञेने. 'देशना प्रज्ञेने पाहणाऱ्या' म्हणजे उपदेश करावयाच्या धर्मांचे, उपदेशाच्या पद्धतींचे आणि बोध प्राप्त करण्यास योग्य असलेल्या व्यक्तींच्या आशय, अनुशय, चरित, अधिमुक्ती इत्यादी भेदांचे धम्मदेशना प्रज्ञेने यथार्थपणे दर्शन घेणाऱ्या. 'अरींचे' म्हणजे क्लेशरूप शत्रूंचे, किंवा पाच प्रकारच्या मारांचे, किंवा शासनाचे (धम्माचे) शत्रू असलेल्या अन्यतीर्थियांचे; त्यांचे हनन करणे म्हणजे प्रातिहार्यांनी (चमत्कारांनी) त्यांचा पराभव करणे, त्यांना निरुत्तर करणे किंवा केवळ उपेक्षा करणे होय, आणि येथे 'केसिविनय सुत्त' हे याचे उदाहरण आहे. ตถา ฐานาฏฺฐานาทิวิภาคํ ชานตา ยถากมฺมูปคสตฺเต ปสฺสตา, สวาสนานํ อาสวานํ ขีณตฺตา อรหตา, อภิญฺเญยฺยาทิเภเท ธมฺเม อภิญฺเญยฺยาทิโต อวิปรีตาวโพธโต สมฺมาสมฺพุทฺเธน. อถ วา ตีสุ กาเลสุ อปฺปฏิหตญาณตาย ชานตา, กายกมฺมาทิวเสน ติณฺณํ กมฺมานํ ญาณานุปริวตฺติโต นิสมฺมการิตาย ปสฺสตา, ทวาทีนํ อภาวสาธิกาย [Pg.8] ปหานสมฺปทาย อรหตา, ฉนฺทาทีนํ อหานิเหตุภูตาย อกฺขยปฏิภานสาธิกาย สพฺพญฺญุตาย สมฺมาสมฺพุทฺเธนาติ เอวํ ทสพลอฏฺฐารสอาเวณิกพุทฺธธมฺมวเสนปิ โยชนา กาตพฺพา. तसेच स्थान आणि अस्थान इत्यादींचे वर्गीकरण जाणणाऱ्या, कर्मानुसार गती प्राप्त करणाऱ्या प्राण्यांना पाहणाऱ्या, वासनेसह सर्व आस्रव नष्ट झाल्यामुळे 'अर्हत' असलेल्या, आणि अभिज्ञेय (जाणून घेण्यास योग्य) इत्यादी विविध धर्मांना त्यांच्या यथार्थ स्वरूपात जाणल्यामुळे 'सम्यक्संबुद्ध' असलेल्या. अथवा, तिन्ही काळांतील (भूत, वर्तमान, भविष्य) अप्रतिहत (अबाधित) ज्ञानाने जाणणाऱ्या, कायकर्म इत्यादींच्या रूपाने तिन्ही कर्मांचे ज्ञानाच्या अनुषंगाने विचारपूर्वक आचरण पाहणाऱ्या, क्रीडा इत्यादींच्या अभावाला सिद्ध करणाऱ्या प्रहाणसंपदेमुळे 'अर्हत' असलेल्या, आणि छंदादींच्या (धम्मछंदाच्या) हानीला कारणीभूत न होणाऱ्या अक्षय प्रतिभेला सिद्ध करणाऱ्या सर्वज्ञतेमुळे 'सम्यक्संबुद्ध' असलेल्या - अशा प्रकारे दशबल आणि अठरा आवेणिक बुद्धधर्मांच्या आधारे देखील योजना (अर्थ लावला) केली पाहिजे. ๑๙. อภิสงฺขตนฺติ อตฺตโน ปจฺจเยหิ อภิสมฺมุขภาเวน สเมจฺจ สมฺภูยฺย กตํ, สฺวสฺส กตภาโว อุปฺปาทเนน เวทิตพฺโพ, น อุปฺปนฺนสฺส ปฏิสงฺขรเณนาติ อาห ‘‘อุปฺปาทิต’’นฺติ. เต จสฺส ปจฺจยา เจตนาปธานาติ ทสฺเสตุํ ปาฬิยํ ‘‘อภิสงฺขตํ อภิสญฺเจตยิต’’นฺติ วุตฺตนฺติ ‘‘เจตยิตํ ปกปฺปิต’’นฺติ อตฺถมาห. อภิสงฺขตํ อภิสญฺเจตยิตนฺติ จ ฌานสฺส ปาตุภาวทสฺสนมุเขน วิทฺธํสนภาวํ อุลฺลิงฺเคติ ยญฺหิ อหุตฺวา สมฺภวติ, ตํ หุตฺวา ปฏิเวติ. เตนาห ปาฬิยํ ‘อภิสงฺขต’นฺติอาทิ. สมถวิปสฺสนาธมฺเม ฐิโตติ สมถธมฺเม ฐิตตฺตา สมาหิโต วิปสฺสนํ ปฏฺฐเปตฺวา อนิจฺจานุปสฺสนาทีหิ นิจฺจสญฺญาทโย ปชหนฺโต อนุกฺกเมน ตํ อนุโลมญาณํ ปาเปตา หุตฺวา วิปสฺสนาธมฺเม ฐิโต. สมถวิปสฺสนาสงฺขาเตสุ ธมฺเมสุ รญฺชนฏฺเฐน ราโค, นนฺทนฏฺเฐน นนฺทีติ. ตตฺถ สุขุมา อเปกฺขา วุตฺตา, ยา ‘‘นิกนฺตี’’ติ วุจฺจติ. १९. 'अभिसंखत' (संस्कारित/उत्पन्न केलेले) म्हणजे स्वतःच्या प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) संमुखतेने एकत्र येऊन निर्माण केलेले. त्याची निर्मिती ही उत्पत्तीने समजली पाहिजे, आधीच उत्पन्न झालेल्याच्या दुरुस्तीने (प्रतिसंस्करणाने) नव्हे, म्हणून म्हटले आहे - "उत्पादित" (उत्पन्न केलेले). आणि त्याची ती कारणे चेतनाप्रधान आहेत हे दर्शवण्यासाठी पाळीमध्ये "अभिसंखतं अभिसंचे तयितं" असे म्हटले आहे, ज्याचा अर्थ "चेतयितं पकप्पितं" (चेतनेने कल्पिलेले) असा सांगितला आहे. 'अभिसंखत' आणि 'अभिसंचे तयित' हे ध्यानाच्या प्रादुर्भावाच्या (प्रगटीकरणाच्या) माध्यमातून त्याच्या विनाशशील स्वभावाला दर्शवते; कारण जे आधी नसून नंतर उत्पन्न होते, ते उत्पन्न होऊन नष्ट होते. म्हणूनच पाळीमध्ये 'अभिसंखतं' इत्यादी म्हटले आहे. 'समथ-विपस्सना धर्मात स्थित' म्हणजे समथ धर्मात स्थित असल्यामुळे समाहित होऊन, विपस्सना प्रस्थापित करून, अनित्यानुपश्यना इत्यादींद्वारे नित्यसंज्ञा इत्यादींचा त्याग करत, अनुक्रमाने त्या अनुलोम ज्ञानाप्रत पोहोचणारा होऊन विपस्सना धर्मात स्थित असलेला. समथ आणि विपस्सना नावाच्या धर्मांमध्ये आसक्त होण्याच्या अर्थाने 'राग' आणि आनंदित होण्याच्या अर्थाने 'नंदी' (आनंद) असे म्हटले आहे. तेथे सूक्ष्म अपेक्षेला (आसक्तीला) सांगितले आहे, ज्याला "निकंती" (अभिलाषा/आसक्ती) असे म्हणतात. เอวํ สนฺเตติ เอวํ ยถารุตวเสน จ อิมสฺส สุตฺตปทสฺส อตฺเถ คเหตพฺเพ สติ. สมถวิปสฺสนาสุ ฉนฺทราโค กตฺตพฺโพติ อนาคามิผลํ นิพฺพตฺเตตฺวา ตทตฺถาย สมถวิปสฺสนาปิ อนิพฺพตฺเตตฺวา เกวลํ ตตฺถ ฉนฺทราโค กตฺตพฺโพ ภวิสฺสติ. กสฺมา? เตสุ สมถวิปสฺสนาสงฺขาเตสุ ธมฺเมสุ ฉนฺทราคมตฺเตน อนาคามินา ลทฺธพฺพสฺส อลทฺธานาคามิผเลน ลทฺธพฺพตฺตา ตถา สติ เตน อนาคามิผลมฺปิ ลทฺธพฺพเมว นาม โหติ. เตนาห – ‘‘อนาคามิผลํ ปฏิวิทฺธํ ภวิสฺสตี’’ติ. สภาวโต รสิตพฺพตฺตา อวิปรีโต อตฺโถ เอว อตฺถรโส. อญฺญาปิ กาจิ สุคติโยติ วินิปาติเก สนฺธายาห. อญฺญาปิ กาจิ ทุคฺคติโยติ อสุรกายมาห. असे असताना आणि या सूत्राच्या पदाचा अर्थ शब्दाच्या अर्थानुसार ग्रहण करायचा झाल्यास. 'समथ आणि विपश्यनेमध्ये छंदराग (इच्छा व आसक्ती) निर्माण करावा' म्हणजे अनागामी फल प्राप्त करून, त्याकरिता समथ आणि विपश्यना देखील उत्पन्न न करता केवळ तिथे छंदराग निर्माण करावा लागेल. का? कारण समथ आणि विपश्यना संज्ञक असलेल्या त्या धर्मांमध्ये केवळ छंदरागाच्या द्वारे अनागामी व्यक्तीने जे प्राप्त करायचे आहे, ते अनागामी फल प्राप्त न झालेल्या व्यक्तीने प्राप्त करायचे असल्यामुळे, तसे झाल्यास त्याने अनागामी फल देखील प्राप्त केलेच असे होते. म्हणूनच म्हटले आहे – 'अनागामी फल साक्षात केले जाईल'. स्वभावाने आस्वाद घेण्यायोग्य असल्यामुळे अविपरीत (यथार्थ) अर्थ म्हणजेच 'अत्थरस' (अर्थरस) होय. 'इतर कोणतीही सुगती' हे विनिपातिक (पतन पावणाऱ्या जीवांच्या) संदर्भात म्हटले आहे. 'इतर कोणतीही दुर्गती' हे असुरकायाला (असुर योनीला) उद्देशून म्हटले आहे. สมถธุรเมว ธุรํ สมถยานิกสฺส วเสน เทสนาย อาคตตฺตา. มหามาลุกฺโยวาเท ‘‘วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจาร’’นฺติ ปาทกชฺฌานํ กตฺวา ‘‘โส ยเทว ตตฺถ โหติ รูปคตํ เวทนาคต’’นฺติอาทินา วิปสฺสนํ วิตฺถาเรตฺวา ‘‘โส ตตฺถ ฐิโต อาสวานํ ขยํ [Pg.9] ปาปุณาตี’’ติ (ม. นิ. ๒.๑๓๓) อาคตตฺตา ‘‘มหามาลุกฺโยวาเท วิปสฺสนาว ธุร’’นฺติ อาห. มหาสติปฏฺฐานสุตฺเต (ที. นิ. ๒.๓๗๓ อาทโย; ม. นิ. ๑.๑๐๖ อาทโย) สพฺพตฺถกเมว ติกฺขตราย วิปสฺสนาย อาคตตฺตา วุตฺตํ ‘‘วิปสฺสนุตฺตรํ กถิต’’นฺติ. กายคตาสติสุตฺเต (ม. นิ. ๓.๑๕๓-๑๕๔) อานาปานชฺฌานาทิวเสน สวิเสสํ สมถวิปสฺสนาย อาคตตฺตา วุตฺตํ ‘‘สมถุตฺตรํ กถิต’’นฺติ. समथयानिकाच्या (समथ मार्गाने जाणाऱ्याच्या) दृष्टीने उपदेशात आल्यामुळे समथधुरा (समथ साधना) हीच मुख्य धुरा (कर्तव्य) आहे. महामालुक्योवाद सुत्तात 'अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, सवितर्क आणि सविचार...' असे पादक ध्यान (पायाभूत ध्यान) करून, 'तो तिथे जे काही रूपगत, वेदनागत आहे...' इत्यादींद्वारे विपश्यनेचा विस्तार करून, 'तो तिथे स्थित राहून आसवांच्या क्षयाला प्राप्त होतो' (म. नि. २.१३३) असे आल्यामुळे 'महामालुक्योवाद सुत्तात विपश्यनाच मुख्य धुरा आहे' असे म्हटले आहे. महासतिपट्ठान सुत्तात (दी. नि. २.३७३ इत्यादी; म. नि. १.१०६ इत्यादी) सर्व प्रकारे अत्यंत तीक्ष्ण विपश्यनेच्या संदर्भात आल्यामुळे 'विपश्यनोत्तर (विपश्यनेला प्राधान्य देणारे) सांगितले आहे' असे म्हटले आहे. कायगतासति सुत्तात (म. नि. ३.१५३-१५४) आनापान ध्यानादींच्या द्वारे विशेष रूपाने समथ आणि विपश्यनेच्या संदर्भात आल्यामुळे 'समथोत्तर (समथला प्राधान्य देणारे) सांगितले आहे' असे म्हटले आहे. อปฺปํ ยาจิเตน พหุํ เทนฺเตน อุฬารปุริเสน วิย เอกํ ธมฺมํ ปุจฺฉิเตน ‘‘อยมฺปิ เอกธมฺโม’’ติ กถิตตฺตา เอกาทสปิ ธมฺมา ปุจฺฉาวเสน เอกธมฺโม นาม ชาโต ปจฺเจกํ วากฺยปริสมาปนญาเยน. เอกวีสติ ปพฺพานิ เตหิ โพธิยมานาย ปฏิปทาย เอกรูปตฺตา ปฏิปทาวเสน เอกธมฺโม นาม ชาโตติ. อิธ อิมสฺมึ อฏฺฐกนาครสุตฺเต. เนวสญฺญานาสญฺญายตนธมฺมานํ สงฺขาราวเสสสุขุมภาวปฺปตฺตตาย ตตฺถ สาวกานํ ทุกฺกรนฺติ น จตุตฺถารุปฺปวเสเนตฺถ เทสนา อาคตาติ จตุนฺนํ พฺรหฺมวิหารานํ, เหฏฺฐิมานํ ติณฺณํ อารุปฺปานญฺจ วเสน เอกาทส. ปุจฺฉาวเสนาติ ‘‘อตฺถิ นุ โข, ภนฺเต อานนฺท, เตน…เป… สมฺมาสมฺพุทฺเธน เอกธมฺโม อกฺขาโต’’ติ (ม. นิ. ๒.๑๘) เอวํ ปวตฺตปุจฺฉาวเสน. อมตุปฺปตฺติยตฺเถนาติ อมตภาวสฺส อุปฺปตฺติเหตุตาย, สพฺพานิปิ กมฺมฏฺฐานานิ เอกรสมฺปิ อมตาธิคมปฏิปตฺติยาติ อตฺโถ, เอวเมตฺถ อคฺคผลภูมิ อนาคามิผลภูมีติ ทฺเวว ภูมิโย สรูปโต อาคตา, นานนฺตริยตาย ปน เหฏฺฐิมาปิ ทฺเว ภูมิโย อตฺถโต อาคตา เอวาติ ทฏฺฐพฺพา. ज्याप्रमाणे थोडी याचना केली असता पुष्कळ देणाऱ्या एखाद्या उदार पुरुषाने, एका धर्माविषयी विचारले असता 'हा देखील एक धर्म आहे' असे सांगितल्यामुळे, प्रत्येक वाक्याच्या समाप्तीच्या नियमाने (वाक्यपरिसमापनन्यायाने) अकराही धर्म विचारलेल्या प्रश्नाच्या अनुषंगाने 'एक धर्म' या नावाने प्रसिद्ध झाले. एकवीस पर्व (विभाग) असून, त्यांच्याद्वारे बोध प्राप्त करून देणाऱ्या प्रतिपदेच्या (साधनेच्या) एकरूपतेमुळे, प्रतिपदेच्या दृष्टीने 'एक धर्म' या नावाने प्रसिद्ध झाले. येथे या अठ्ठकनागर सुत्तात. नेवसञ्ञानासञ्ञायतन (नैवसंज्ञानासंज्ञायतन) धर्मांच्या संस्कारांच्या अवशिष्ट सूक्ष्म भावाला प्राप्त झाल्यामुळे तिथे श्रावकांसाठी ते कठीण आहे, म्हणून चौथ्या अरूप ध्यानाच्या संदर्भात येथे उपदेश आलेला नाही; म्हणून चार ब्रह्मविहार आणि खालच्या तीन अरूप ध्यानांच्या संदर्भात अकरा (धर्म) झाले. 'प्रश्नाच्या अनुषंगाने' म्हणजे 'भन्ते आनंद, त्या...पे... सम्यक्संबुद्धांनी असा एखादा एक धर्म सांगितला आहे का?' (म. नि. २.१८) अशा प्रकारे विचारलेल्या प्रश्नाच्या अनुषंगाने. 'अमतोत्पत्तीच्या अर्थाने' म्हणजे अमृतत्वाच्या (निर्वाणाच्या) उत्पत्तीचे कारण असल्यामुळे; सर्वच कर्मस्थान (साधना पद्धती) एकरस असून अमृत प्राप्तीची प्रतिपदा (साधना) आहेत, असा अर्थ आहे. अशा प्रकारे येथे अग्रफलभूमी (अर्हतफलभूमी) आणि अनागामीफलभूमी अशा दोनच भूमी प्रत्यक्षपणे आल्या आहेत, परंतु आनंतर्यतेमुळे (लगेचच प्राप्त होणाऱ्या क्रमाने) खालच्या दोन भूमी देखील अर्थतः आल्याच आहेत, असे समजावे. ๒๑. ปญฺจ สตานิ อคฺโฆ เอตสฺสาติ ปญฺจสตํ. เสสํ อุตฺตานเมว. २१. पाचशे (कार्षापण) ज्याचे मूल्य आहे ते 'पंचशत' (पाचशे मूल्य असलेले) होय. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. อฏฺฐกนาครสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. अठ्ठकनागर सुत्ताच्या वर्णनावरील लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๓. เสขสุตฺตวณฺณนา ३. सेखसुत्त वर्णना (सेखसुत्ताचे स्पष्टीकरण) ๒๒. สนฺถาคารนฺติ อตฺถานุสาสนาคารํ. เตนาห – ‘‘อุยฺโยคกาลาทีสู’’ติอาทิ. อาทิ-สทฺเทน มงฺคลมหาทีนํ สงฺคโห ทฏฺฐพฺโพ. สนฺถมฺภนฺตีติ วิสฺสมนฺติ, ปริสฺสมํ วิโนเทนฺตีติ อตฺโถ. สหาติ สนฺนิเวสวเสน [Pg.10] เอกชฺฌํ. สห อตฺถานุสาสนํ อคารนฺติ เอตสฺมึ อตฺเถ ตฺถ-การสฺส นฺถ-การํ กตฺวา สนฺถาคารนฺติ วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. สนฺถรนฺตีติ สมฺมนฺตนวเสน ติฏฺฐนฺติ. २२. 'संथागार' म्हणजे अर्थ आणि अनुशासनाचे गृह (सभागृह). म्हणूनच म्हटले आहे – 'प्रस्थानाच्या वेळी इत्यादी...' 'इत्यादी' (आदि) शब्दाने मंगलमहोत्सव इत्यादींचा संग्रह समजावा. 'संथम्भन्ति' म्हणजे विश्रांती घेतात, थकवा दूर करतात असा अर्थ आहे. 'सह' म्हणजे रचनेच्या (सन्निवेश) दृष्टीने एकत्र. 'सहा' (एकत्र) आणि 'अनुशासन' करण्याचे 'अगार' (गृह) या अर्थामध्ये 'त्थ' काराचा 'न्थ' कार करून 'संथागार' असे म्हटले आहे, असे समजावे. 'संथरन्ति' म्हणजे विचारविनिमय करण्यासाठी एकत्र जमतात (किंवा उभे राहतात). เตปิฏกํ พุทฺธวจนํ อาคตเมว ภวิสฺสตีติ พุทฺธวจนสฺส อาคมนสีเสน อริยผลธมฺมานมฺปิ อาคมนํ วุตฺตเมว, ติยามรตฺตึ ตตฺถ วสนฺตานํ ผลสมาปตฺติวฬญฺชนํ โหตีติ. ตสฺมิญฺจ ภิกฺขุสงฺเฆ กลฺยาณปุถุชฺชนา วิปสฺสนํ อุสฺสุกฺกาเปนฺตา โหนฺตีติ เจ? อริยมคฺคธมฺมานํ ตตฺถ อาคมนํ โหติเยว. 'त्रिपिटक बुद्धवचन आलेलेच असेल' या बुद्धवचनाच्या आगमनाच्या मुख्य उद्देशाने आर्यफलधर्मांचे देखील आगमन सांगितलेच आहे, कारण तीन प्रहरांच्या रात्री तिथे राहणाऱ्यांना फलसमापत्तीचा उपभोग घेता येतो. आणि जर त्या भिक्खू संघामध्ये कल्याण-पुथुज्जन (कल्याणकारी पृथग्जन) विपश्यनेसाठी उत्सुक असतील तर? तिथे आर्यमार्गधर्मांचे आगमन होतेच. อลฺลโคมเยนาติ อจฺเฉน อลฺลโคมยรเสน. โอปุญฺฉาเปตฺวาติ วิลิมฺปิตฺวา. จตุชฺชาติยคนฺเธหีติ ตครกุงฺกุมยวนปุปฺผตมาลปตฺตานิ ปิสิตฺวา กตคนฺเธหิ นานาวณฺเณติ นีลาทิวเสน นานาวณฺเณ, น ภิตฺติวิเสสวเสน. ภิตฺติวิเสสวเสน ปน นานาสณฺฐานรูปเมว. มหาปิฏฺฐิกโกชวเกติ หตฺถิปิฏฺฐีสุ อตฺถริตพฺพตาย มหาปิฏฺฐิกาติ ลทฺธสมญฺเญ โกชเวติ วทนฺติ. กุตฺตเก ปน สนฺธาเยตํ วุตฺตํ หตฺถตฺถรณา หตฺถิรูปวิจิตฺตา. อสฺสตฺถรกสีหตฺถรกาทโยปิ อสฺสสีหรูปาทิวิจิตฺตา เอว อตฺถรกา, จิตฺตตฺถรกํ นานารูเปหิ เจว นานาวิธมาลากมฺมาทีหิ จ วิจิตฺตํ อตฺถรกํ. 'अल्लगोमयेन' म्हणजे स्वच्छ ओल्या शेणाच्या रसाने. 'ओपुंछापेत्वा' म्हणजे सारवून (लेपन करून). 'चतुज्जातीयगंधेहि' म्हणजे तगर, कुंकुम, यवनपुष्प (केशर) आणि तमालपत्र वाटून तयार केलेल्या सुवासाने. 'नानावण्णे' म्हणजे निळ्या इत्यादी रंगांच्या द्वारे विविध रंगांचे, भिंतीच्या वैशिष्ट्यामुळे नव्हे. भिंतीच्या वैशिष्ट्यामुळे तर विविध आकारांचे रूपच असते. 'महापिट्ठिककोजविके' म्हणजे हत्तीच्या पाठीवर अंथरण्यासाठी योग्य असल्यामुळे 'महापिट्ठिका' असे नाव मिळालेल्या लोकरीच्या आसनाला (कोजवे) म्हणतात. 'कुत्तक' च्या संदर्भात हे म्हटले आहे की, हत्तीच्या आकाराने सुशोभित केलेले हत्तीचे आसन. 'अस्सत्थकर-सीहत्थरक' इत्यादी देखील घोडा, सिंह इत्यादींच्या आकाराने सुशोभित केलेली आसनेच आहेत. 'चित्तत्थकरं' म्हणजे विविध रूपांनी आणि विविध प्रकारच्या पुष्पमालांच्या नक्षीकामाने सुशोभित केलेले आसन. อุปธานนฺติ อปสฺสยนํ อุปทหิตฺวาติ อปสฺสยโยคฺคภาเวน ฐเปตฺวา คนฺเธหิ กตมาลา คนฺธทามํ, ตมาลปตฺตาทีหิ กตํ ปตฺตทามํ. อาทิ-สทฺเทน หิงฺคุลตกฺโกลชาติผลชาติปุปฺผาทีหิ กตทามํ สงฺคณฺหาติ. ปลฺลงฺกากาเรน กตปีฐํ ปลฺลงฺกปีฐํ, ตีสุ ปสฺเสสุ, เอกปสฺเส เอว วา สอุปสฺสยํ อปสฺสยปีฐํ, อนปสฺสยํ มุณฺฑปีฐํ โยชนาวฏฺเฏติ โยชนปริกฺเขเป. 'उपधानं' म्हणजे लोड (उशी/टेकण). 'उपदहित्वा' म्हणजे टेकण्यासाठी योग्य अशा प्रकारे ठेवून. सुगंधित द्रव्यांनी बनवलेली माळ म्हणजे 'गंधदाम' (गंधमाळ), तमालपत्रादींनी बनवलेली माळ म्हणजे 'पत्रदाम'. 'आदि' शब्दाने हिंगूळ, तक्कोल, जायफळ, जाईचे फूल इत्यादींनी बनवलेल्या माळांचा संग्रह होतो. पलंगाच्या आकाराचे बनवलेले पीठ (आसन) म्हणजे 'पल्लंकपीठ'. तीन बाजूंनी किंवा एका बाजूने टेकण्यासाठी आधार असलेले आसन म्हणजे 'अपस्सयपीठ'. 'अनपस्सयं' म्हणजे टेकण्यासाठी आधार नसलेले मुंडपीठ. 'योजनावट्टे' म्हणजे योजनेच्या परिघात (घेरामध्ये). สํวิธายาติ อนฺตรวาสกสฺส โกณปเทสญฺจ อิตรปเทสญฺจ สมํ กตฺวา วิธาย. เตนาห – ‘‘กตฺตริยา ปทุมํ กนฺตนฺโต วิยา’’ติ ติมณฺฑลํ ปฏิจฺฉาเทนฺโตติ เอตฺถ จ ยสฺมา พุทฺธานํ รูปสมฺปทา วิย อากปฺปสมฺปทาปิ ปรมุกฺกํสคตา, ตสฺมา ตทา ภควา เอวํ โสภตีติ ทสฺเสนฺโต ‘‘สุวณฺณปามงฺเคนา’’ติอาทิมาห, ตตฺถ อสเมน พุทฺธเวเสนาติอาทินา [Pg.11] ตทา ภควา พุทฺธานุภาวสฺส นิคุหเณ การณาภาวโต ตตฺถ สนฺนิปติตเทวมนุสฺสนาคยกฺขคนฺธพฺพาทีนํ ปสาทชนนตฺถํ อตฺตโน สภาวปกติกิริยาเยว กปิลวตฺถุํ ปาวิสีติ ทสฺเสติ. พุทฺธานํ กายปฺปภา นาม ปกติยา อสีติหตฺถมตฺตเมว ปเทสํ ผรตีติ อาห – ‘‘อสีติหตฺถฏฺฐานํ อคฺคเหสี’’ติ นีลปีตโลหิโตทาตมญฺชิฏฺฐปภสฺสรานํ วเสน ฉพฺพณฺณา พุทฺธรสฺมิโย. ‘संविधाय’ म्हणजे अंतरवासकाचा (अंतर्वस्त्राचा) कोपरा आणि इतर भाग समान करून, व्यवस्थित परिधान करून. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘कात्रीने कमळ कापल्याप्रमाणे’. ‘तिमंडल’ (गुडघे आणि नाभी) झाकताना, येथे जशी बुद्धांची रूपसंपदा श्रेष्ठ आहे, तशीच त्यांची आचारसंपदा (आकप्पसंपदा) देखील परम उत्कृष्टतेस पोहोचलेली आहे. म्हणून, त्यावेळी भगवान अशा प्रकारे शोभून दिसत होते हे दर्शविताना ‘सुवर्णपामंगाने’ इत्यादी म्हटले आहे. तेथे ‘अतुलनीय बुद्धवेषाने’ इत्यादीद्वारे, त्यावेळी भगवंतांना आपल्या बुद्धप्रभावाचा (बुद्धानुभावाचा) संकोच करण्याचे (लपवण्याचे) काही कारण नसल्यामुळे, तेथे जमलेल्या देव, मनुष्य, नाग, यक्ष, गंधर्व इत्यादींच्या मनात श्रद्धा (प्रसाद) निर्माण करण्यासाठी ते आपल्या स्वाभाविक आणि नैसर्गिक रूपानेच कपिलवस्तूमध्ये प्रविष्ट झाले, हे दर्शविले आहे. बुद्धांची कायप्रभा (शारीरिक प्रभा) नैसर्गिकरीत्या ऐंशी हात प्रमाणाच्या प्रदेशात पसरते, म्हणून म्हटले आहे— ‘ऐंशी हातांची जागा व्यापली’. निळा, पिवळा, तांबडा, पांढरा, मंजिष्ठ आणि प्रभास्वर अशा सहा रंगांच्या बुद्धरश्मी (बुद्धांचे किरण) पसरत होत्या. สพฺพปาลิผุลฺโลติ มูลโต ปฏฺฐาย ยาว อคฺคา ผุลฺโล วิกสิโต. ปฏิปาฏิยา ฐปิตานนฺติอาทิ ปริกปฺปูปมา. ยถา ตํ…เป… อลงฺกตํ อญฺโญ วิโรจติ, เอวํ วิโรจิตฺถ, สมตึสาย ปารมิตาหิ อภิสงฺขตตฺตา เอวํ วิโรจิตฺถาติ วุตฺตํ โหติ. ปญฺจวีสติยา นทีนนฺติ คงฺคาทีนํ จนฺทภาคาปริโยสานานํ ปญฺจวีสติยา มหานทีนํ. สมฺภิชฺชาติ สมฺเภทํ มิสฺสีภาวํ ปตฺวา มุขทฺวาเรติ สมุทฺทํ ปวิฏฺฐฏฺฐาเน. ‘सब्बपालिफुल्लो’ म्हणजे मुळापासून शेंड्यापर्यंत पूर्णपणे फुललेला, विकसित झालेला. ‘अनुक्रमे ठेवलेल्या’ इत्यादी ही कल्पित उपमा आहे. ज्याप्रमाणे ते... पे... अलंकृत केलेले इतर शोभून दिसते, त्याप्रमाणे ते शोभून दिसत होते; तीस पारमितांच्या अभिसंस्कृततेमुळे (पूर्णत्वामुळे) ते अशा प्रकारे शोभून दिसत होते, असे म्हटले आहे. ‘पंचवीस नद्यांच्या’ म्हणजे गंगा नदीपासून सुरू होऊन चंद्रभागा नदीपर्यंत संपणाऱ्या पंचवीस महानद्यांच्या. ‘संभिज्ज’ म्हणजे संगम किंवा मिश्रण पावून, ‘मुखद्वारी’ म्हणजे समुद्रात प्रवेश करण्याच्या ठिकाणी. เทวมนุสฺสนาคสุปณฺณคนฺธพฺพยกฺขาทีนํ อกฺขีนีติ เจตํ ปริกปฺปนวเสน วุตฺตํ. สหสฺเสนาติ ปทสหสฺเสน, ภาณวารปฺปมาเณน คนฺเถนาติ อตฺโถ. ‘देव, मनुष्य, नाग, सुपर्ण (गरुड), गंधर्व, यक्ष इत्यादींचे डोळे’ हे कल्पनेच्या आधारे म्हटले आहे. ‘सहस्राने’ म्हणजे हजार पदांनी, भाणवार प्रमाणाच्या ग्रंथाने, असा अर्थ आहे. กมฺปยนฺโต วสุนฺธรนฺติ อตฺตโน คุณวิเสเสหิ ปถวีกมฺปํ อุปฺปาเทนฺโต, เอวํภูโตปิ อเหฐยนฺโต ปาณานิ. สพฺพทกฺขิณตฺตา พุทฺธานํ ทกฺขิณํ ปฐมํ ปาทํ อุทฺธรนฺโต. สมํ สมฺผุสเต ภูมึ สุปฺปติฏฺฐิตปาทตาย. ยทิปิ ภูมึ สมํ ผุสติ, รชสานุปลิปฺปติ สุขุมตฺตา ฉวิยา. นินฺนฏฺฐานํ อุนฺนมตีติอาทิ พุทฺธานํ สุปฺปติฏฺฐิตปาทสงฺขาตสฺส มหาปุริสลกฺขณปฏิลาภสฺส นิสฺสนฺทผลํ. นาติทูเร อุทฺธรตีติ อติทูเร ฐเปตุํ น อุทฺธรติ. นจฺจาสนฺเน จ นิกฺขิปนฺติ อจฺจาสนฺเน จ ฐาเน อนิกฺขิปนฺโต นิยฺยาติ. หาสยนฺโต สเทวเก โลเก โตสยนฺโต. จตูหิ ปาเทหิ จรตีติ จตุจารี. ‘वसुंधरेला कंपित करत’ म्हणजे आपल्या विशेष गुणांनी पृथ्वीकंप उत्पन्न करत, असे असूनही प्राण्यांना पीडा न देता. सर्व प्रकारे दक्षिण (उजवा) मार्ग अनुसरणारे असल्यामुळे, बुद्धांचा उजवा पाय प्रथम उचलला जातो. सुप्रतिष्ठित पादत्वामुळे (पायांचे तळवे सपाट असल्यामुळे) ते जमिनीला समतोलपणे स्पर्श करतात. जरी ते जमिनीला समतोलपणे स्पर्श करत असले, तरी त्यांच्या त्वचेच्या सुकुमारतेमुळे (सूक्ष्मतेमुळे) ती धुळीने माखत नाही. ‘खोलगट जागा उंच होते’ इत्यादी बुद्धांच्या सुप्रतिष्ठित पाद नावाच्या महापुरुष लक्षणाच्या प्राप्तीचे स्वाभाविक फळ (निष्यंदफल) आहे. ‘फार लांब उचलत नाही’ म्हणजे खूप दूर ठेवण्यासाठी पाय उचलत नाही. ‘आणि फार जवळ ठेवत नाही’ म्हणजे अतिशय जवळच्या ठिकाणी पाय न ठेवता ते पुढे जातात. सदेवलोकाला (देवांसह संपूर्ण जगाला) हर्षित करत, संतुष्ट करत. चार चरणांनी चालणारे ते ‘चतुचारी’. พุทฺธานุภาวสฺส ปกาสนวเสน คตตฺตา วณฺณกาโล นาม กิเรส. สรีรวณฺเณ วา คุณวณฺเณ วา กถิยมาเน ทุกฺกถิตนฺติ น วตฺตพฺพํ. กสฺมา? อปริมาณวณฺณา หิ พุทฺธา ภควนฺโต, พุทฺธคุณสํวณฺณนา ชานนฺตสฺส ยถาธมฺมสํวณฺณนํเยว อนุปวิสตีติ. बुद्धप्रभावाच्या (बुद्धानुभावाच्या) प्रकटीकरणाच्या रूपाने गेल्यामुळे, याला खरोखर ‘वर्णकाल’ (स्तुतीची वेळ) म्हटले जाते. शरीराच्या वर्णाचे (सौंदर्याचे) किंवा गुणांच्या वर्णाचे (स्तुतीचे) वर्णन केले जात असताना, ते ‘वाईट रीतीने सांगितले गेले’ असे म्हणता येत नाही. का? कारण बुद्ध भगवंत हे अपरिमित गुणांचे स्वामी आहेत. बुद्धगुणांचे वर्णन जाणणाऱ्या व्यक्तीचे वर्णन हे यथाधम्म (धम्मानुसार) वर्णनातच समाविष्ट होते. ทุกูลจุมฺพฏเกนาติ [Pg.12] คนฺถิตฺวา คหิตทุกูลวตฺเถน, นาควิกฺกนฺตจรโณติ หตฺถินาคสทิสปทนิกฺเขโป. สตปุญฺญลกฺขโณติ อเนกสตปุญฺญนิมฺมิตมหาปุริสลกฺขโณ มณิเวโรจโน ยถาติ อติวิย วิโรจมาโน มณิ วิย เวโรจโน นาม เอโก มณิวิเสโสติ เกจิ มหาสาโลวาติ มหนฺโต สาลรุกฺโข วิย, โกวิฬาราทิมหารุกฺโข วิย วา ปทุโม โกกนโท ยถาติ โกกนทสงฺขาตํ มหาปทุมํ วิย, วิกสมานปทุมํ วิย วา. ‘दुकूलचुंबटकाने’ म्हणजे गुंडाळून धरलेल्या रेशमी (दुकूल) वस्त्राने. ‘नागविक्रांतचरण’ म्हणजे हत्तीप्रमाणे (नाग) पावले टाकणारे. ‘शतपुण्यलक्षण’ म्हणजे अनेक शेकडो पुण्यांनी निर्मित झालेल्या महापुरुष लक्षणांनी युक्त. ‘मणी वैरोचनाप्रमाणे’ म्हणजे अत्यंत देदीप्यमान मण्याप्रमाणे, किंवा काही जणांच्या मते ‘वैरोचन’ नावाचा एक विशिष्ट मणी. ‘महाशाल वृक्षाप्रमाणे’ म्हणजे मोठा शाल वृक्ष किंवा कोविळार (कांचन) इत्यादी महावृक्षाप्रमाणे. ‘कोकनद कमळाप्रमाणे’ म्हणजे कोकनद नावाच्या महाकमळाप्रमाणे किंवा उमलणाऱ्या कमळाप्रमाणे. อากาสคงฺคํ โอตาเรนฺโต วิยาติอาทิ ตสฺสา ปกิณฺณกกถาย อญฺเญสํ ทุกฺกรภาวทสฺสนญฺเจว สุณนฺตานํ อจฺจนฺตสุขาวหภาวทสฺสนญฺจ ปถวีชํ อากฑฺเฒนฺโต วิยาติ นาฬิยนฺตํ โยเชตฺวา มหาปถวิยา เหฏฺฐิมตเล ปปฺปฏโกชํ อุทฺธํมุขํ กตฺวา อากฑฺเฒนฺโต วิย โยชนิกนฺติ โยชนปฺปมาณํ มธุภณฺฑนฺติ มธุปฏลํ. ‘आकाशगंगा खाली उतरवल्याप्रमाणे’ इत्यादी त्या प्रकीर्ण कथेचे इतरांसाठी कठीण असणे आणि ऐकणाऱ्यांसाठी अत्यंत सुखकारक असणे दर्शवण्यासाठी आहे. ‘पृथ्वीचा रस वर खेचल्याप्रमाणे’ म्हणजे नळीचे यंत्र (नलिका यंत्र) जोडून महापृथ्वीच्या खालच्या थरातील भूमीचा रस (पर्पटक रस) वरच्या दिशेने खेचून घेण्याप्रमाणे. ‘योजनिक’ म्हणजे एक योजन प्रमाणाचे, ‘मधुभांड’ म्हणजे मधाचे पोळे. มหนฺตนฺติ อุฬารํ. สพฺพทานํ ทินฺนเมว โหตีติ สพฺพเมว ปจฺจยชาตํ อาวาสทายเกน ทินฺนเมว โหติ. ตถาหิ ทฺเว ตโย คาเม ปิณฺฑาย จริตฺวา กิญฺจิ อลทฺธา อาคตสฺสปิ ฉายูทกสมฺปนฺนํ อารามํ ปวิสิตฺวา นฺหายิตฺวา ปฏิสฺสเย มุหุตฺตํ นิปชฺชิตฺวา อุฏฺฐาย นิสินฺนสฺส กาเย พลํ อาหริตฺวา ปกฺขิตฺตํ วิย โหติ. พหิ วิจรนฺตสฺส จ กาเย วณฺณธาตุ วาตาตเปหิ กิลมติ, ปฏิสฺสยํ ปวิสิตฺวา ทฺวารํ ปิธาย มุหุตฺตํ นิสินฺนสฺส วิสภาคสนฺตติ วูปสมฺมติ, สภาคสนฺตติ ปติฏฺฐาติ, วณฺณธาตุ อาหริตฺวา ปกฺขิตฺตา วิย โหติ, พหิ วิจรนฺตสฺส จ ปาเท กณฺฏโก วิชฺฌติ, ขาณุ ปหรติ, สรีสปาทิปริสฺสโย เจว โจรภยญฺจ อุปฺปชฺชติ, ปฏิสฺสยํ ปวิสิตฺวา ทฺวารํ ปิธาย นิปนฺนสฺส ปน สพฺเพ ปริสฺสยา น โหนฺติ, อชฺฌยนฺตสฺส ธมฺมปีติสุขํ, กมฺมฏฺฐานํ มนสิกโรนฺตสฺส อุปสมสุขํ อุปฺปชฺชติ พหิทฺธา วิกฺเขปาภาวโต, พหิ วิจรนฺตสฺส จ กาเย เสทา มุจฺจนฺติ, อกฺขีนิ ผนฺทนฺติ, เสนาสนํ ปวิสนกฺขเณ มญฺจปีฐาทีนิ น ปญฺญายนฺติ, มุหุตฺตํ นิสินฺนสฺส ปน อกฺขิปสาโท อาหริตฺวา ปกฺขิตฺโต วิย โหติ, ทฺวารวาตปานมญฺจปีฐาทีนิ ปญฺญายนฺติ, เอตสฺมิมฺปิ จ อาวาเส วสนฺตํ ทิสฺวา มนุสฺสา จตูหิ ปจฺจเยหิ สกฺกจฺจํ อุปฏฺฐหนฺติ. เตน วุตฺตํ – ‘‘อาวาสทานสฺมึ ทินฺเน สพฺพํ ทานํ ทินฺนเมว โหตี’’ติ. ภูมฏฺฐก…เป… น สกฺกาติ อยมตฺโถ มหาสุทสฺสนวตฺถุนา (ที. นิ. ๒.๒๔๑ อาทโย) ทีเปตพฺโพ. ‘महान’ म्हणजे भव्य (उदार). ‘सर्व दान दिल्यासारखेच होते’ म्हणजे आवास (विहार) देणाऱ्याने सर्वच प्रत्यय (गरजांच्या वस्तू) दिल्यासारखेच होते. कारण, दोन-तीन गावांमध्ये पिंडपातासाठी (भिक्षेसाठी) फिरून काहीही न मिळता परत आलेल्या भिक्खूने देखील छाया आणि पाण्याने समृद्ध अशा आरामात (विहारात) प्रवेश करून, स्नान करून, आश्रयामध्ये क्षणभर विश्रांती घेऊन उठून बसल्यावर, त्याच्या शरीरात जणू नवीन बळ संचारल्यासारखे होते. बाहेर फिरणाऱ्याच्या शरीरातील वर्णधातू (तेज) वारा आणि उन्हामुळे थकतो; परंतु आश्रयात प्रवेश करून, दार बंद करून क्षणभर बसल्याने विजातीय संतती (अस्वस्थता) शांत होते, सजातीय संतती (स्वस्थता) प्रस्थापित होते आणि जणू वर्णधातू पुन्हा प्राप्त झाल्यासारखा होतो. बाहेर फिरणाऱ्याच्या पायात काटा टोचतो, खुंट लागतो, सरपटणाऱ्या प्राण्यांचा उपद्रव आणि चोरांचे भय निर्माण होते; परंतु आश्रयात प्रवेश करून, दार बंद करून निजलेल्याला मात्र हे सर्व उपद्रव नसतात. अध्ययन करणाऱ्याला धम्मप्रीतीचे सुख आणि कम्मट्ठानाचे (ध्यानाचे) मनन करणाऱ्याला उपशमसुख (शांतीचे सुख) प्राप्त होते, कारण बाहेर कोणतेही विक्षेप नसतात. बाहेर फिरणाऱ्याच्या शरीराला घाम सुटतो, डोळे थरथरतात, आणि सेनासनात (विहारात) प्रवेश करताना खाट, पाट इत्यादी वस्तू स्पष्ट दिसत नाहीत; परंतु क्षणभर बसल्यावर डोळ्यांची दृष्टी जणू पूर्ववत स्वच्छ होते आणि दार, खिडकी, खाट, पाट इत्यादी वस्तू स्पष्ट दिसू लागतात. आणि या आवासात राहणाऱ्याला पाहून लोक चार प्रत्ययांनी आदराने त्यांची सेवा करतात. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘आवासदान दिले असता सर्व दान दिल्यासारखेच होते’. ‘भूमट्ठक... पे... शक्य नाही’ हा अर्थ महासुदस्सन वत्थूद्वारे (दीघनिकाय २.२४१ इत्यादी) स्पष्ट केला पाहिजे. สีตนฺติ [Pg.13] (สารตฺถ. ฏี. จูฬวคฺค ๓.๒๙๕; สํ. นิ. ฏี. ๒.๔.๒๔๓) อชฺฌตฺตธาตุกฺโขภวเสน วา พหิทฺธอุตุวิปริณามวเสน วา อุปฺปชฺชนกสีตํ. อุณฺหนฺติ อคฺคิสนฺตาปํ. ตสฺส ปน ทวทาหาทีสุ สมฺภโว ทฏฺฐพฺโพ. ปฏิหนฺตีติ ปฏิพาหติ. ยถา ตทุภยวเสน กายจิตฺตานํ พาธนานิ น โหนฺติ, เอวํ กโรติ. สีตุณฺหพฺภาหเต หิ สรีเร วิกฺขิตฺตจิตฺโต ภิกฺขุ โยนิโส ปทหิตุํ น สกฺโกติ. วาฬมิคานีติ สีหพฺยคฺฆาทิวาฬมิเค. คุตฺตเสนาสนญฺหิ ปวิสิตฺวา ทฺวารํ ปิธาย นิสินฺนสฺส เต ปริสฺสยา น โหนฺติ. สรีสเปติ เย เกจิ สรนฺตา คจฺฉนฺเต ทีฆชาติเก. มกเสติ นิทสฺสนเมตํ, ฑํสาทีนํ เอเตเนว สงฺคโห ทฏฺฐพฺโพ. สิสิเรติ สีตกาลวเสน สตฺตาหวทฺทลิกาทิวเสน จ อุปฺปนฺเน สิสิรสมฺผสฺเส. วุฏฺฐิโยติ ยทา ตทา อุปฺปนฺนา วสฺสวุฏฺฐิโย ปฏิหนตีติ โยชนา. "शीतम्" (सारत्थ. टी. चूळवग्ग ३.२९५; सं. नि. टी. २.४.२४३) म्हणजे आध्यात्मिक धातूंच्या क्षोभामुळे किंवा बाह्य ऋतूंच्या परिवर्तनामुळे उत्पन्न होणारी थंडी. "उष्णम्" म्हणजे अग्नीचा संताप. त्याचा संभव वणवा इत्यादींमध्ये पाहावा. "प्रतिहन्ति" म्हणजे दूर करते. ज्यायोगे त्या दोन्हीमुळे काय आणि चित्त यांना बाधा होणार नाही, असे करते. कारण, शीत आणि उष्णाने पीडित शरीरामध्ये विक्षिप्त चित्त असलेला भिक्खू योग्य प्रकारे प्रयत्न करण्यास समर्थ होत नाही. "वाळमिगानि" म्हणजे सिंह, वाघ इत्यादी हिंस्र पशू. सुरक्षित शयनासनात प्रवेश करून, दार बंद करून बसलेल्याला ते उपद्रव होत नाहीत. "सरीसृप" म्हणजे जे काही सरपटणारे दीर्घ जातीचे प्राणी आहेत. "मकासे" हे केवळ उदाहरण आहे, डास इत्यादींचा यातच संग्रह पाहावा. "शिशिर" म्हणजे हिवाळ्यामुळे आणि सात दिवसांच्या ढगाळ वातावरणामुळे उत्पन्न होणारा शिशिर ऋतूचा स्पर्श. "वृष्टि" म्हणजे वेळोवेळी पडणारा पावसाचा वर्षाव दूर करतो, असा संबंध लावावा. วาตาตโป โฆโรติ รุกฺขคจฺฉาทีนํ อุมฺมูลภญฺชนวเสน ปวตฺติยา โฆโร สรชอรชาทิเภโท วาโต เจว คิมฺหปริฬาหสมเยสุ อุปฺปตฺติยา โฆโร สูริยาตโป จ. ปฏิหญฺญตีติ ปฏิพาหียติ. เลณตฺถนฺติ นานารมฺมณโต จิตฺตํ นิวตฺเตตฺวา ปฏิสลฺลานารามตฺถํ. สุขตฺถนฺติ วุตฺตปริสฺสยาภาเวน ผาสุวิหารตฺถํ. ฌายิตุนฺติ อฏฺฐตึสารมฺมเณสุ ยตฺถ กตฺถจิ จิตฺตํ อุปนิชฺฌายิตุํ. วิปสฺสิตุนฺติ อนิจฺจาทิโต สพฺพสงฺขาเร สมฺมสิตุํ. "घोर वात आणि आतप" म्हणजे झाडे, झुडपे इत्यादींना मुळासकट उपटून टाकणारा, धुळीने युक्त किंवा धुळीशिवाय असलेला भयंकर वारा आणि उन्हाळ्याच्या दाहक काळात उत्पन्न होणारे भयंकर ऊन. "प्रतिहन्यते" म्हणजे दूर केले जाते. "लेणार्थम्" म्हणजे नाना प्रकारच्या आलंबनांपासून चित्ताला निवृत्त करून एकांतात ध्यान करण्यासाठी. "सुखार्थम्" म्हणजे वर सांगितलेल्या उपद्रवांच्या अभावामुळे सुखाने विहार करण्यासाठी. "ध्यायितुम्" म्हणजे अडतीस आलंबनांपैकी कोणत्याही एका आलंबनावर चित्त एकाग्र करण्यासाठी. "विपश्यितुम्" म्हणजे अनित्य इत्यादी रूपाने सर्व संस्कारांचे परीक्षण करण्यासाठी. วิหาเรติ ปฏิสฺสเย. การเยติ การาเปยฺย. รมฺเมติ มโนรเม นิวาสสุเข. วาสเยตฺถ พหุสฺสุเตติ กาเรตฺวา ปน เอตฺถ วิหาเรสุ พหุสฺสุเต สีลวนฺเต กลฺยาณธมฺเม นิวาเสยฺย. เต นิวาเสนฺโต ปน เตสํ พหุสฺสุตานํ ยถา ปจฺจเยหิ กิลมโถ น โหติ, เอวํ อนฺนญฺจ ปานญฺจ วตฺถเสนาสนานิ จ ทเทยฺย อุชุภูเตสุ อชฺฌาสยสมฺปนฺเนสุ กมฺมผลานํ รตนตฺตยคุณานญฺจ สทฺทหเนน วิปฺปสนฺเนน เจตสา. "विहारे" म्हणजे आश्रयस्थानात. "कारये" म्हणजे बांधून घ्यावे. "रम्मे" म्हणजे मनमोहक, राहण्यास सुखकारक अशा. "वासयेत्थ बहुस्सुते" म्हणजे विहार बांधून घेऊन त्या विहारांमध्ये बहुश्रुत, शीलवान आणि कल्याणधर्मी भिक्खूंना निवास करवावा. त्यांना निवास करवाताना, त्या बहुश्रुत भिक्खूंना प्रत्ययांच्या अभावामुळे त्रास होणार नाही अशा प्रकारे अन्न, पान, वस्त्र आणि सेनासन द्यावे; हे दान सरळ मार्गी, उदात्त आशय असलेल्या, कर्मफलावर आणि रत्नत्रयाच्या गुणांवर श्रद्धा ठेवणाऱ्या प्रसन्न चित्ताने द्यावे. อิทานิ คหฏฺฐปพฺพชิตานํ อญฺญมญฺญูปการตํ ทสฺเสตุํ ‘‘เต ตสฺสา’’ติ คาถมาห. ตตฺถ เตติ พหุสฺสุตา ตสฺสาติ อุปาสกสฺส. ธมฺมํ เทเสนฺตีติ สกลวฏฺฏทุกฺขปนุทนํ ธมฺมํ เทเสนฺติ. ยํ โส ธมฺมํ อิธญฺญายาติ โส ปุคฺคโล ยํ สทฺธมฺมํ อิมสฺมึ สาสเน สมฺมาปฏิปชฺชเนน ชานิตฺวา อคฺคมคฺคาธิคเมน อนาสโว หุตฺวา ปรินิพฺพายติ. आता गृहस्थ आणि प्रव्रजित यांच्यातील परस्पर उपकाराला दर्शवण्यासाठी "ते तस्सा" ही गाथा म्हटली आहे. त्यात "ते" म्हणजे ते बहुश्रुत भिक्खू, "तस्सा" म्हणजे त्या उपासकाला. "धम्मं देसेन्ति" म्हणजे संपूर्ण संसारदुःखाचे निवारण करणाऱ्या धम्माचा उपदेश करतात. "यं सो धम्मं इधञ्ञाय" म्हणजे तो मनुष्य ज्या सद्धम्माला या शासनात सम्यक् प्रतिपत्तीने जाणून, अग्र मार्गाच्या प्राप्तीने अनास्रव होऊन परिनिर्वाण प्राप्त करतो. ปูชาสกฺการวเสเนว [Pg.14] ปฐมยาโม เขปิโต, ภควโต เทสนาย อปฺปาวเสโส มชฺฌิมยาโม คโตติ ปาฬิยํ ‘‘พหุเทว รตฺติ’’นฺติ วุตฺตนฺติ อาห ‘‘อติเรกตรํ ทิยฑฺฒยาม’’นฺติ. สนฺทสฺเสสีติ อานิสํสํ ทสฺเสสิ, อาวาสทานปฏิสํยุตฺตํ ธมฺมึ กถํ สุตฺวา ตโต ปรํ, ‘‘มหาราช, อิติปิ สีลํ, อิติปิ สมาธิ, อิติปิ ปญฺญา’’ติ สีลาทิคุเณ เตสํ สมฺมา ทสฺเสสิ, หตฺเถน คเหตฺวา วิย ปจฺจกฺขโต ปกาเสสิ. สมาทเปสีติ ‘‘เอวํ สีลํ สมาทาตพฺพํ, สีเล ปติฏฺฐิเตน เอวํ สมาธิ, เอวํ ปญฺญา ภาเวตพฺพา’’ติ ยถา เต สีลาทิคุเณ อาทิยนฺติ, ตถา คณฺหาเปสิ. สมุตฺเตเชสีติ ยถา สมาทินฺนํ สีลํ สุวิสุทฺธํ โหติ, สมถวิปสฺสนา จ ภาวิยมานา ยถา สุฏฺฐุ วิโสธิตา อุปริวิเสสาวหา โหนฺติ, เอวํ จิตฺตํ สมุตฺเตเชสิ นิสามนวเสน โวทาเปสิ. สมฺปหํเสสีติ ยถานุสิฏฺฐํ ฐิตสีลาทิคุเณหิ สมฺปติ ลทฺธคุณานิสํเสหิ เจว อุปริ ลทฺธพฺพผลวิเสเสหิ จ อุปริจิตฺตํ สมฺมา ปหํเสสิ, ลทฺธสฺสาสวเสน สุฏฺฐุ โตเสสิ. เอวเมเตสํ ปทานํ อตฺโถ เวทิตพฺโพ. पूजा आणि सत्कार करण्यातच रात्रीचा पहिला प्रहर व्यतीत झाला, आणि भगवंतांच्या देशनेसाठी रात्रीचा मध्यम प्रहर थोडाच शिलकी राहिला, म्हणून पाळीमध्ये "बहुदेव रत्तिं" असे म्हटले आहे, याविषयी सांगितले की "दीड प्रहरापेक्षा अधिक काळ". "संदस्सेसी" म्हणजे लाभ दाखवला; आवास-दानाशी संबंधित धम्मकथा ऐकल्यानंतर, "महाराज, असे शील आहे, असा समाधी आहे, अशी प्रज्ञा आहे" अशा प्रकारे शील इत्यादी गुण त्यांना चांगल्या प्रकारे दाखवले, जणू काही हाताने धरून प्रत्यक्षच प्रकट केले. "समादपेसी" म्हणजे "अशा प्रकारे शील ग्रहण करावे, शीलामध्ये प्रतिष्ठित होऊन अशा प्रकारे समाधी आणि अशा प्रकारे प्रज्ञा भावना करावी" ज्यायोगे त्यांनी शील इत्यादी गुण अंगीकारावे, तसे त्यांना ग्रहण करायला लावले. "समुत्तेजेसी" म्हणजे ग्रहण केलेले शील अत्यंत शुद्ध व्हावे, आणि भावना केली जाणारी समथ-विपस्सना चांगल्या प्रकारे विशुद्ध होऊन उत्तरोत्तर विशेष गुणांना प्राप्त करून देणारी व्हावी, अशा प्रकारे चित्ताला उत्तेजित केले, मनन करण्याच्या द्वारे निर्मळ केले. "संपहंसेसी" म्हणजे उपदेशानुसार स्थित असलेल्या शील इत्यादी गुणांमुळे सध्या प्राप्त झालेल्या गुणांच्या लाभाने आणि भविष्यात प्राप्त होणाऱ्या विशेष फलांमुळे चित्ताला चांगल्या प्रकारे हर्षित केले, आश्वासन मिळाल्यामुळे अत्यंत संतुष्ट केले. अशा प्रकारे या पदांचा अर्थ समजून घ्यावा. สมุทายวจโนปิ อสีติมหาเถร-สทฺโท ตเทกเทเสปิ นิรุฬฺโหติ อาห ‘‘อสีติมหาเถเรสุ วิชฺชมาเนสู’’ติ. อานนฺทตฺเถโรปิ หิ อนฺโตคโธ เอวาติ. สากิยมณฺฑเลติ สากิยราชสมูเห. समुदायवाचक असलेला देखील "अशीतिमहाथेर" हा शब्द त्याच्या एका भागासाठीही रूढ आहे, म्हणून म्हटले आहे - "अशीतिमहाथेरांमध्ये विद्यमान असताना". कारण आनंद थेर देखील त्यातच समाविष्ट आहेत. "साकियमण्डले" म्हणजे शाक्य राजांच्या समूहात. ปฏิปทาย นิยุตฺตตฺตา ปาฏิปโท. เตนาห – ‘‘ปฏิปนฺนโก’’ติ. สิกฺขนสีลตาทินา เสโข, โอธิโส สมิตปาปตาย สมโณ. เสโข ปาฏิปโท ปฏิปชฺชนปุคฺคลาธิฏฺฐาเนน ปฏิปทาเทสนํ นิยเมนฺโต ปฏิปทาย ปุคฺคลํ นิยเมติ นามาติ ‘‘ปฏิปทาย ปุคฺคลํ นิยเมตฺวา ทสฺเสตี’’ติ. เสขปฺปฏิปทา สาสเน มงฺคลปฏิปทา สมฺมเทว อเสวิตพฺพปริวชฺชเนน เสวิตพฺพสมาทาเนน อุกฺกํสวตฺถูสุ จ ภาวโต อเสขธมฺมปาริปูริยา อาวหตฺตา จ วฑฺฒมานกปฏิปทา. อกิลมนฺตาว สลฺลกฺเขสฺสนฺตีติ อิทํ ตทา เตสํ อเสขภูมิอธิคมาย อโยคฺยตาย วุตฺตํ. อกิลมนฺตาวาติ อิมินา ปฏิสมฺภิทาปฺปตฺตสฺสปิ อนธิคตมคฺคสญฺญาปนา ภาริยาติ ทสฺเสติ. โอสฏาติ อนุปฺปวิฏฺฐา. สกลํ วินยปิฏกํ กถิตเมว โหติ ตสฺส สีลกถาพาหุลฺลโต เสสทฺวเยปิ เอเสว นโย. ตีหิ ปิฏเกหีติ กรณตฺเถ กรณวจนํ. เตน ตํตํปิฏกานํ ตสฺสา ตสฺสา สิกฺขาย สาธกตมภาวํ ทสฺเสติ. प्रतिपदेमध्ये नियुक्त असल्यामुळे "पाटिपद". म्हणूनच म्हटले आहे - "प्रतिपन्नक". शिकण्याच्या शीलतेमुळे "सेख", आणि मर्यादित स्वरूपात पापांचे शमन केल्यामुळे "समण". सेख पाटिपद हा आचरण करणाऱ्या पुद्गलाच्या अधिष्ठानाने प्रतिपदा देशनेचा नियमन करत प्रतिपदेद्वारे पुद्गलाचे नियमन करतो, म्हणूनच "प्रतिपदेद्वारे पुद्गलाचे नियमन करून दाखवतो" असे म्हटले आहे. "सेखप्पटिपदा" ही शासनातील मंगल प्रतिपदा आहे, जी वर्ज्य गोष्टींचा योग्य प्रकारे त्याग करून, स्वीकारण्यायोग्य गोष्टींचे ग्रहण करून आणि श्रेष्ठ गोष्टींमध्ये भावना केल्यामुळे अशैक्षधर्माच्या परिपूर्तीला आणणारी असल्यामुळे वर्धमान प्रतिपदा आहे. "अक्किलमन्ता व सल्लक्खेस्सन्ति" हे तेव्हा त्यांच्या अशैक्षभूमीच्या प्राप्तीसाठी अयोग्यतेमुळे म्हटले आहे. "अक्किलमन्ता व" याने हे दर्शवले आहे की, प्रतिसंभिदा प्राप्त झालेल्याला देखील अप्राप्त मार्गाचे ज्ञान करून देणे कठीण आहे. "ओसटा" म्हणजे अनुप्रविष्ट. संपूर्ण विनयपिटक कथितच असते, कारण त्यात शीलकथेचे बाहुल्य असते; उर्वरित दोन पिटकांमध्येही हाच नियम समजावा. "तीहि पिटकेहि" हे करण अर्थात तृतीया विभक्तीचे रूप आहे. त्याद्वारे त्या त्या पिटकांचे त्या त्या शिक्षेसाठी अत्यंत साधक असणे दर्शवले आहे. ปิฏฺฐิวาโต [Pg.15] อุปฺปชฺชติ อุปาทินฺนกสรีรสฺส ตถารูปตฺตา สงฺขารานญฺจ อนิจฺจตาย ทุกฺขานุพนฺธตฺตา. อการณํ วา เอตนฺติ เยนาธิปฺปาเยน วุตฺตํ, ตเมว อธิปฺปายํ วิวริตุํ ‘‘ปโหตี’’ติอาทิ วุตฺตํ. จตูหิ อิริยาปเถหิ ปริภุญฺชิตุกาโม อโหสิ สกฺยราชูนํ อชฺฌาสยวเสน. ตถา หิ วกฺขติ ‘‘สตฺถาปิ ตเทว สนฺธาย ตตฺถ สงฺฆาฏึ ปญฺญเปตฺวา นิปชฺชีตี’’ติ. ยทิ เอวํ ‘‘ปิฏฺฐิ เม อาคิลายตี’’ติ อิทํ กถนฺติ อาห ‘‘อุปาทินฺนกสรีรญฺจ นามา’’ติอาทิ. उपादिन्नक शरीराच्या तशा स्वरूपामुळे आणि संस्कारांच्या अनित्यता व दुःखाच्या अनुबंधामुळे पाठीचा वात उत्पन्न होतो. किंवा हे अकारण नाही, ज्या अभिप्रायाने हे म्हटले आहे, तोच अभिप्राय स्पष्ट करण्यासाठी "पहोति" इत्यादी म्हटले आहे. शाक्य राजांच्या आशयानुसार चारही इरियापथांनी उपभोग घेण्याची त्यांची इच्छा होती. तसेच पुढे सांगतील - "शास्ता देखील त्याचाच संदर्भ घेऊन तेथे संघाटी अंथरून निजले". जर असे आहे, तर "माझी पाठ दुखत आहे" हे कसे? यावर म्हटले आहे - "उपादिन्नक शरीर नावाचे..." इत्यादी. ๒๓. ‘‘อิมินา ปาติโมกฺขสํวเรน…เป… สมฺปนฺโน’’ติอาทีสุ (วิภ. ๕๑๑) สมนฺนาคตตฺโถ สมฺปนฺน-สทฺโท, อิธ ปน ปาริปูริอตฺโถติ ทสฺเสตุํ ‘‘ปริปุณฺณสีโลติ อตฺโถ’’ติ วุตฺตํ. โย ปน สมฺปนฺนสีโลเยว, โส ปริปุณฺณสีโล. ปริสุทฺธญฺหิ สีลํ ‘‘ปริปุณฺณ’’นฺติ วุจฺจติ, น สพลํ กมฺมาสํ วา. สุนฺทรธมฺเมหีติ โสภนธมฺเมหิ. ยสฺมึ สนฺตาเน อุปฺปนฺนา ตสฺส โสภนภาวโต. เตหิ สปฺปุริสภาวสาธนโต สปฺปุริสานํ ธมฺเมหิ. २३. “या प्रातिमोक्षसंवरणाने...पे... संपन्न” इत्यादींमध्ये (विभंग ५११) 'संपन्न' या शब्दाचा अर्थ 'समन्वागत' (युक्त असलेला) असा आहे, परंतु येथे परिपूर्णतेचा अर्थ दर्शवण्यासाठी “परिपूर्णशील असा अर्थ आहे” असे म्हटले आहे. जो खरोखर संपन्नशील आहे, तोच परिपूर्णशील आहे. कारण परिशुद्ध शीलालाच “परिपूर्ण” म्हटले जाते, डागाळलेले (सबल) किंवा डाग असलेले (कम्मास) नाही. 'सुंदरधम्मेहि' म्हणजे शोभन (सुंदर) धर्मांनी. ज्या संतानामध्ये (चित्तसंततीमध्ये) ते उत्पन्न होतात, त्याला शोभन बनवत असल्यामुळे. त्यांच्याद्वारे सत्पुरुषभावाची सिद्धी होत असल्यामुळे ते सत्पुरुषांचे धर्म आहेत. ๒๔. อิมินา เอตฺตเกน ฐาเนนาติ ‘‘อิธ, มหานาม, อริยสาวโก’’ติ อารภิตฺวา ยาว ‘‘อกสิรลาภี’’ติ ปทํ อิมินา เอตฺตเกน อุทฺเทสปเทน มาติกํ ฐเปตฺวา. ปฏิปาฏิยาติ อุทฺเทสปฏิปาฏิยา. เอวมาหาติ ‘‘เอวํ กถญฺจ, มหานามา’’ติอาทินา อิทานิ วุจฺจมาเนน ทสฺสิตากาเรน อาห. २४. “या एवढ्या स्थानाने” म्हणजे “येथे, महानाम, आर्यश्रावक” येथपासून सुरू करून “अकसिरलाभी” (विनासायास प्राप्त करणारा) या पदापर्यंत या एवढ्या उद्देशपदाने मातृका (रूपरेषा) स्थापित करून. 'परिपार्टीने' म्हणजे उद्देशाच्या अनुक्रमाने. 'असे म्हणाले' म्हणजे “असे आणि कसे, महानाम!” इत्यादींद्वारे आता सांगण्यात येणाऱ्या दर्शविलेल्या पद्धतीने (भगवान) म्हणाले. ๒๕. หิรียตีติ ลชฺชียติ ปีฬียติ. ยสฺมา หิรี ปาปชิคุจฺฉนลกฺขณา, ตสฺมา ‘‘ชิคุจฺฉตีติ อตฺโถ’’ติ วุตฺตํ. โอตฺตปฺปตีติ อุตฺตปฺปติ. ปาปุตฺราสลกฺขณญฺหิ โอตฺตปฺปํ. ปคฺคหิตวีริโยติ สงฺโกจํ อนาปนฺนวีริโย. เตนาห ‘‘อโนสกฺกิตมานโส’’ติ. ปหานตฺถายาติ สมุจฺฉินฺทนตฺถาย. กุสลานํ ธมฺมานํ อุปสมฺปทา นาม อธิคโม เอวาติ อาห ‘‘ปฏิลาภตฺถายา’’ติ. สติเนปกฺเกนาติ สติยา เนปกฺเกน ติกฺขวิสทสูรภาเวน. อฏฺฐกถายํ ปน เนปกฺกํ นาม ปญฺญาติ อธิปฺปาเยน ‘‘สติยา จ นิปกภาเวน จา’’ติ อตฺโถ วุตฺโต, เอวํ สติ อญฺโญ นิทฺทิฏฺโฐ นาม โหติ. สติมาติ จ อิมินาว วิเสสา สติ คหิตา, ปรโต ‘‘จิรกตมฺปิ [Pg.16] จิรภาสิตมฺปิ สริตา อนุสฺสริตา’’ติ สติกิจฺจเมว นิทฺทิฏฺฐํ, น ปญฺญากิจฺจํ, ตสฺมา สติเนปกฺเกนาติ สติยา เนปกฺกภาเวนาติ สกฺกา วิญฺญาตุํ. เตเนว หิ ปจฺจยวิเสสวเสน อญฺญธมฺมนิรเปกฺโข สติยา พลวภาโว. ตถา หิ ญาณวิปฺปยุตฺตจิตฺเตนปิ อชฺฌยนสมฺมสนานิ สมฺภวนฺติ. २५. 'हिरीयती' (लज्जित होतो) म्हणजे लज्जा वाटणे, पीडित होणे. ज्याअर्थी 'हिरी' (लज्जा) चे लक्षण पापाची घृणा करणे हे आहे, म्हणून “घृणा करतो असा अर्थ आहे” असे म्हटले आहे. 'ओत्तप्पती' (भय वाटणे) म्हणजे भयभीत होणे. कारण पापाचे भय वाटणे हेच 'ओत्तप्प' (भय) चे लक्षण आहे. 'पग्गहितवीर्य' (प्रयत्नशील) म्हणजे संकोच न पावलेले वीर्य (प्रयत्न) असलेला. म्हणूनच “मागे न हटणारे मन असलेला” असे म्हटले आहे. 'प्रहाणासाठी' म्हणजे समूळ नष्ट करण्यासाठी (समुच्छेदासाठी). कुशल धर्मांची उपसंपदा म्हणजे त्यांची प्राप्तीच होय, म्हणून “प्रतिलाभासाठी (प्राप्तीसाठी)” असे म्हटले आहे. 'सतिनेपक्केन' म्हणजे स्मृतीच्या नैपक्याने (चातुर्याने), जे तीक्ष्ण, स्पष्ट आणि सक्षम असणे आहे. परंतु अट्ठकथेमध्ये 'नैपक्य' म्हणजे 'प्रज्ञा' या अभिप्रायाने “स्मृती आणि नैपुण्यभावाने” असा अर्थ सांगितला आहे; असे असल्यास दुसराच अर्थ निर्दिष्ट होतो. आणि 'सतिमा' (स्मृतिमान) या शब्दानेच विशेष स्मृती ग्रहण केली आहे, पुढे “फार पूर्वी केलेले आणि फार पूर्वी बोललेले स्मरण करणारा व पुन्हा पुन्हा स्मरण करणारा” असे स्मृतीचेच कार्य निर्दिष्ट केले आहे, प्रज्ञेचे कार्य नाही. म्हणून 'सतिनेपक्केन' म्हणजे स्मृतीच्या नैपुण्यभावाने, असे समजणे शक्य आहे. कारण त्याच प्रत्ययविशेषाच्या प्रभावाने इतर धर्मांची अपेक्षा न ठेवता स्मृतीचा बलवान भाव प्रकट होतो. कारण ज्ञानविप्रयुक्त चित्ताने देखील अध्ययन आणि मनन संभवते. เจติยงฺคณวตฺตาทีติ อาทิ-สทฺเทน โพธิยงฺคณวตฺตาทีนิ สงฺคณฺหาติ. อสีติมหาวตฺตปฏิปตฺติปูรณนฺติ เอตฺถ อสีติวตฺตปฏิปตฺติปูรณํ มหาวตฺตปฏิปตฺติปูรณนฺติ วตฺตปฏิปตฺติปูรณ-สทฺโท ปจฺเจกํ โยเชตพฺโพ. ตตฺถ มหาวตฺตานิ (วิภ. มูลฏี. ๔๐๖) นาม วตฺตขนฺธเก (จูฬว. ๓๕๖ อาทโย) วุตฺตานิ อาคนฺตุกวตฺตํ อาวาสิกํ คมิกํ อนุโมทนํ ภตฺตคฺคํ ปิณฺฑจาริกํ อารญฺญิกํ เสนาสนํ ชนฺตาฆรํ วจฺจกุฏิ อุปชฺฌายํ สทฺธิวิหาริกํ อาจริยํ อนฺเตวาสิกวตฺตนฺติ จุทฺทส. ตโต อญฺญานิ ปน กทาจิ ตชฺชนียกมฺมกตาทิกาเล ปาริวาสิกาทิกาเล จ จริตพฺพานิ อสีติ ขุทฺทกวตฺตานิ สพฺพาสุ อวตฺถาสุ น จริตพฺพานิ, ตสฺมา มหาวตฺเตสุ, อคฺคหิตานิ. ตตฺถ ‘‘ปาริวาสิกานํ ภิกฺขูนํ วตฺตํ ปญฺญเปสฺสามี’’ติ อารภิตฺวา ‘‘น อุปสมฺปาเทตพฺพํ…เป… น ฉมายํ จงฺกมนฺเต จงฺกเม จงฺกมิตพฺพ’’นฺติ (จูฬว. ๘๑) วุตฺตานิ ปกภตฺเต จริตพฺพวตฺตาวสานานิ ฉสฏฺฐิ, ตโต ปรํ ‘‘น, ภิกฺขเว, ปาริวาสิเกน ภิกฺขุนา ปาริวาสิกวุฑฺฒตเรน ภิกฺขุนา สทฺธึ มูลายปฏิกสฺสนารเหน มานตฺตารเหน มานตฺตจาริเกน อพฺภานารเหน ภิกฺขุนา สทฺธึ เอกจฺฉนฺเน อาวาเส วตฺตพฺพ’’นฺติอาทีนิ (จูฬว. ๘๒) ปกตตฺเต จริตพฺเพหิ อนญฺญตฺตา วิสุํ วิสุํ อคเณตฺวา ปาริวาสิกวุฑฺฒตราทีสุ ปุคฺคลนฺตเรสุ จริตพฺพตฺตา เตสํ วเสน สมฺปิณฺเฑตฺวา เอเกกํ กตฺวา คณิตพฺพานิ ปญฺจาติ เอกสตฺตติวตฺตานิ, อุกฺเขปนิยกมฺมกตวตฺเตสุ วตฺตปญฺญาปนวเสน วุตฺตํ – ‘‘น ปกตตฺตสฺส ภิกฺขุโน อภิวาทนํ ปจฺจุฏฺฐานํ…เป… นฺหาเน ปิฏฺฐิปริกมฺมํ สาทิตพฺพ’’นฺติ (จูฬว. ๕๑) อิทํ อภิวาทนาทีนํ อสาทิยนํ เอกํ, ‘‘น ปกตตฺโต ภิกฺขุ สีลวิปตฺติยา อนุทฺธํสิตพฺโพ’’ติอาทีนิ จ ทสาติ เอวเมตานิ ทฺวาสีติ. เอเตสฺเวว ปน กานิจิ ตชฺชนียกมฺมาทิวตฺตานิ กานิจิ ปาริวาสิกาทิวตฺตานีติ อคฺคหิตคฺคหเณน ทฺวาสีติ, เอวํ อปฺปกํ ปน อูนมธิกํ วา คณนุปคํ น โหตีติ อิธ ‘‘อสีติ’’จฺเจว วุตฺตํ. อญฺญตฺถ ปน อฏฺฐกถาปเทเส ‘‘ทฺวาสีติ ขนฺธกวตฺตานี’’ติ วุจฺจติ. 'चेतियंगण-वत्त' (चैत्य-अंगण-कर्तव्य) इत्यादींमधील 'आदि' शब्दाने 'बोधियंगण-वत्त' (बोधि-अंगण-कर्तव्य) इत्यादींचे ग्रहण होते. 'अशीतिमहावत्तप्रतिपत्तिपूरण' (ऐंशी महाकर्तव्यांच्या पालनाची पूर्तता) यामध्ये 'ऐंशी कर्तव्यांच्या पालनाची पूर्तता' आणि 'महाकर्तव्यांच्या पालनाची पूर्तता' अशा प्रकारे 'कर्तव्य-पालन-पूर्तता' (वत्तपटिपत्तिपूरण) हा शब्द प्रत्येकाशी जोडला पाहिजे. त्यामध्ये 'महाकर्तव्ये' (विभंग मूलटीका ४०६) म्हणजे 'वत्तखन्धक' (चुल्लवग्ग ३५६ इत्यादी) मध्ये सांगितलेली चौदा कर्तव्ये आहेत, ती म्हणजे: आगंतुक-वत्त, आवासिक-वत्त, gamik-वत्त, अनुमोदन-वत्त, भत्तग्ग-वत्त (भोजनशाळा कर्तव्य), पिंडचारिक-वत्त, आरण्यक-वत्त, सेनासन-वत्त, जंताघर-वत्त (स्नानगृह कर्तव्य), वच्चकुटी-वत्त (शौचालय कर्तव्य), उपाध्यायांचे कर्तव्य (उपज्झाय-वत्त), सद्धिविहारिक-वत्त (शिष्य कर्तव्य), आचार्यांचे कर्तव्य (आचरिय-वत्त) आणि अंतेवासिक-वत्त (अंतेवासी शिष्य कर्तव्य). त्याव्यतिरिक्त इतर कर्तव्ये जी कधीतरी 'तज्जनिय-कम्म' (तर्जनीयकर्म) इत्यादींच्या वेळी या 'पारिवासिक' (परिवर्त काळ) इत्यादींच्या वेळी पाळायची असतात, ती ऐंशी क्षुद्र (लहान) कर्तव्ये सर्व अवस्थांमध्ये पाळायची नसतात, म्हणून ती महाकर्तव्यांमध्ये समाविष्ट केलेली नाहीत. त्यामध्ये “पारिवासिक भिक्खूंचे कर्तव्य प्रज्ञप्त करीन” येथपासून सुरू करून “उपसंपदा देऊ नये...पे... जमिनीवर चंक्रमण करणाऱ्याच्या चंक्रमण मार्गावर चंक्रमण करू नये” (चुल्लवग्ग ८१) यापर्यंत सांगितलेली, सामान्य भिक्खूने पाळायच्या कर्तव्यांच्या शेवटी असलेली ६६ (सहासष्ट) कर्तव्ये आहेत. त्यानंतर “भिक्खूंनो, पारिवासिक भिक्खूने आपल्यापेक्षा ज्येष्ठ पारिवासिक भिक्खूसोबत, मूलाय-पटिकस्सन-अर्ह (मूळ दंडास पात्र), मानत्त-अर्ह (मानत्तास पात्र), मानत्त-चारी किंवा अब्भान-अर्ह (पुनःस्थापनेस पात्र) भिक्खूसोबत एकाच छताखाली राहू नये” इत्यादी (चुल्लवग्ग ८२) सामान्य भिक्खूने पाळायच्या कर्तव्यांपेक्षा वेगळी नसून, स्वतंत्रपणे न मोजता पारिवासिक ज्येष्ठ इत्यादी इतर व्यक्तींच्या संदर्भात पाळायची असल्यामुळे, त्यांच्या आधारे एकत्रित करून प्रत्येकी एक मानून मोजल्यास ५ होतात, अशा प्रकारे ७१ (एकोहत्तर) कर्तव्ये होतात. 'उक्खेपनीय-कम्म' (उत्क्षेपणीयकर्म) केलेल्यांच्या कर्तव्यांमध्ये कर्तव्य-प्रज्ञप्तीच्या संदर्भात म्हटले आहे - “सामान्य भिक्खूचे अभिवादन, प्रत्युत्थान (पच्चुट्ठान)...पे... स्नानाच्या वेळी पाठीची मालिश स्वीकारू नये” (चुल्लवग्ग ५१) हे अभिवादन इत्यादींचा स्वीकार न करण्याचे १, आणि “सामान्य भिक्खूने सील-विपत्तीचा आरोप करू नये” इत्यादी १०, अशा प्रकारे ही ८२ (ब्याऐंशी) होतात. यामध्येच काही तर्जनीयकर्मादी कर्तव्ये आणि काही पारिवासिकादी कर्तव्ये आहेत, अशा प्रकारे न घेतलेल्यांचे ग्रहण केल्याने ८२ होतात. अशा प्रकारे थोडे कमी किंवा जास्त असणे हे मोजणीत धरले जात नसल्यामुळे येथे “ऐंशी” असेच म्हटले आहे. परंतु इतर अट्ठकथांच्या भागांमध्ये “ब्याऐंशी खन्धक कर्तव्ये” असे म्हटले जाते. สกฺกจฺจํ [Pg.17] อุทฺทิสนํ สกฺกจฺจํ อุทฺทิสาปนนฺติ ปจฺเจกํ สกฺกจฺจํ-สทฺโท โยเชตพฺโพ. อุทฺทิสนํ อุทฺเทสคฺคหณํ. ธมฺโมสารณํ ธมฺมสฺส อุจฺจารณํ. ธมฺมเทสนา – 'सक्किच्चं उद्दिसनं सक्किच्चं उद्दिसापनं' (आदरपूर्वक उद्देश करणे, आदरपूर्वक उद्देश करवून घेणे) यामध्ये 'सक्किच्चं' (आदरपूर्वक) हा शब्द प्रत्येकाशी जोडला पाहिजे. 'उद्दिशन' म्हणजे उद्देश ग्रहण करणे (शिकणे). 'धम्मोसारण' म्हणजे धर्माचे उच्चारण (पठण) करणे. 'धम्मदेसना' (धर्मोपदेश) – ‘‘อาทิมฺหิ สีลํ เทเสยฺย, มชฺเฌ ฌานํ วิปสฺสนํ; ปริโยสาเน จ นิพฺพานํ, เอสา กถิกสณฺฐิตี’’ติ. (ที. นิ. อฏฺฐ. ๑.๑๙๐; สํ. นิ. อฏฺฐ. ๓.๔.๒๔๖) – “सुरुवातीला शीलाचा उपदेश करावा, मध्ये ध्यान आणि विपस्सना (विदर्शन) चा; आणि शेवटी निर्वाणाचा, हीच प्रवचनकाराची (कथिकाची) पद्धती आहे.” (दीघनिकाय अट्ठकथा १.१९०; संयुत्तनिकाय अट्ठकथा ३.४.२४६) – เอวํ กถิตลกฺขณา ธมฺมกถา. อุปคนฺตฺวา นิสินฺนสฺส ยสฺส กสฺสจิ คหฏฺฐสฺส ปพฺพชิตสฺส วา ตงฺขณานุรูปา ธมฺมี กถา อุปนิสินฺนกถา. ภตฺตานุโมทนกถา อนุโมทนิยา. สริตาติ เอตฺถ น เกวลํ จิรกตจิรภาสิตานํ สรณมนุสฺสรณมตฺตํ อธิปฺเปตํ, อถ โข ตถาปวตฺตรูปารูปธมฺมานํ ปริคฺคหมุเขน ปวตฺตวิปสฺสนาจาเร สติสมฺโพชฺฌงฺคสมุฏฺฐาปนนฺติ ทสฺเสตุํ ‘‘ตสฺมึ กาเยน จิรกเต’’ติอาทิ วุตฺตํ. สกิมฺปิ สรเณนาติ เอกวารํ สรเณน. ปุนปฺปุนํ สรเณนาติ อนุ อนุ สรเณน. สติสมฺโพชฺฌงฺคมฺปิ วิเวกนิสฺสิตํ วิราคนิสฺสิตํ นิโรธนิสฺสิตํ โวสคฺคปริณามิญฺจ กตฺวา สรนฺโต ตตฺถ ตตฺถ ชวนวาเร สรณชวนวาเร ปริตฺตชวนวเสน อนุสฺสริตาติ เวทิตพฺพา. अशा प्रकारे सांगितलेल्या लक्षणांची ती 'धम्मकथा' (धर्मकथा) होय. जवळ येऊन बसलेल्या कोणत्याही गृहस्थाला किंवा प्रव्रजिताला (भिक्खूला) त्या क्षणाला अनुरूप अशी केलेली धार्मिक चर्चा म्हणजे 'उपनिषण्णकथा' (जवळ बसून केलेली चर्चा) होय. भोजनानंतर अनुमोदनासाठी केलेली चर्चा म्हणजे 'अनुमोदनीया' (अनुमोदनकथा) होय. 'स्मरण केले' यामध्ये केवळ फार पूर्वी केलेल्या आणि फार पूर्वी बोललेल्या गोष्टींचे स्मरण किंवा अनुस्मरण करणे एवढाच अभिप्राय नाही, तर त्या प्रकारे प्रवृत्त झालेल्या रूप आणि अरूप धर्मांच्या परिग्रहाद्वारे (जाणून घेण्याद्वारे) प्रवृत्त होणाऱ्या विपस्सना-आचारात (विपस्सना साधनेत) 'सति-सम्बोज्झङ्ग' (स्मृति-संबोध्यंग) चे उत्थान करणे, हे दर्शवण्यासाठी “त्या शरीराने फार पूर्वी केलेल्या” इत्यादी म्हटले आहे. 'एकदा स्मरण केल्याने' म्हणजे एका वेळी स्मरण केल्याने. 'पुन्हा पुन्हा स्मरण केल्याने' म्हणजे वारंवार अनुस्मरण केल्याने. 'सति-सम्बोज्झङ्ग' ला देखील विवेक-निसित, विराग-निसित, निरोध-निसित आणि वोस्सग्ग-परिणामी (त्याग-परिणामी) करून, स्मरण करत असताना त्या त्या जवन-वारांमध्ये (चित्तवीथीच्या जवन क्षणांमध्ये), स्मरण-जवन-वारांमध्ये, परीत्त (मर्यादित) जवनाच्या वशाने 'अनुस्मरण केले' असे समजावे. คติอตฺถา ธาตุสทฺทา พุทฺธิอตฺถา โหนฺตีติ อาห – ‘‘อุทยญฺจ วยญฺจ ปฏิวิชฺฌิตุํ สมตฺถายา’’ติ. มิสฺสกนเยนายํ เทสนา อาคตาติ อาห – ‘‘วิกฺขมฺภนวเสน จ สมุจฺเฉทวเสน จา’’ติ. เตนาห ‘‘วิปสฺสนาปญฺญาย เจวา’’ติอาทิ. วิปสฺสนาปญฺญาย นิพฺเพธิกปริยายโต. สา จ โข ปเทสิกาติ นิปฺปเทสิกํ กตฺวา ทสฺเสตุํ ‘‘มคฺคปญฺญาย ปฏิลาภสํวตฺตนโต จา’’ติ วุตฺตํ. ทุกฺขกฺขยคามินิภาเวปิ เอเสว นโย. สมฺมาติ ยาถาวโต. อกุปฺปธมฺมตาย หิ มคฺคปญฺญา เขปิตเขปนาย น ปุน กิจฺจํ อตฺถีติ อุปาเยน ญาเยน ยา ปวตฺติ สา เอวาติ อาห – ‘‘เหตุนา นเยนา’’ติ. गत्यर्थक धातूंचे शब्द बुद्धीच्या (ज्ञानाच्या) अर्थाचे असतात, म्हणून म्हटले आहे - "उदय आणि व्यय (उत्पत्ती आणि विनाश) समजून घेण्यास समर्थ असणाऱ्या" (प्रज्ञेसाठी). ही देशना मिश्र पद्धतीने (मिश्र नयाने) आली आहे, म्हणून म्हटले आहे - "विक्षंभन (दडपून टाकणे) आणि समुच्छेद (समूळ नष्ट करणे) या दोन्ही मार्गांनी." म्हणूनच म्हटले आहे - "विपश्यना प्रज्ञेने सुद्धा" इत्यादी. विपश्यना प्रज्ञेच्या भेदक (निब्बेधिक) पर्यायाने. आणि ती (विपश्यना प्रज्ञा) प्रादेशिक (मर्यादित) आहे, म्हणून तिला निष्प्रादेशिक (अमर्यादित) करून दाखवण्यासाठी "मार्गप्रज्ञेच्या प्राप्तीला कारणीभूत ठरणारी" असे म्हटले आहे. दुःखक्षयगामी (दुःखाचा क्षय करणाऱ्या मार्गाकडे नेणारी) असण्याच्या बाबतीतही हाच नियम (नय) आहे. "सम्मा" (सम्यक) म्हणजे यथार्थपणे (जसे आहे तसे). कारण अकुप्पधम्मतेमुळे (अकंपित स्वभावामुळे) मार्गप्रज्ञा नष्ट करण्याजोग्या क्लेशांचा नाश करते, त्यानंतर पुन्हा काही कर्तव्य उरत नाही. अशा प्रकारे उपायाने आणि न्यायाने जी प्रवृत्ती होते, तीच ती आहे, म्हणून म्हटले आहे - "हेतूने आणि नयाने (पद्धतीने)". ๒๖. อธิกํ เจโต อภิเจโต, มหคฺคตจิตฺตํ, ตสฺส ปน อธิกตา กามจฺฉนฺทาทิปฏิปกฺขวิคเมน วิสิฏฺฐภาวปฺปตฺติ, ตนฺนิสฺสิตานิ อาภิเจตสิกานิ. เตนาห ‘‘อภิจิตฺตํ เสฏฺฐจิตฺตํ สิตาน’’นฺติ. ทิฏฺฐธมฺมสุขวิหารานนฺติ อิมสฺมึเยว อตฺตภาเว ผาสุวิหารภูตานํ. เตหิ [Pg.18] ปน สมงฺคิตกฺขเณ ยสฺมา วิเวกชํ ปีติสุขํ สมาธิชํ ปีติสุขํ อปีติชํ สติปาริสุทฺธิญาณสุขญฺจ ปฏิลภติ วินฺทติ, ตสฺมา อาห – ‘‘อปฺปิตปฺปิตกฺขเณ สุขปฏิลาภเหตูน’’นฺติ. อิจฺฉิติจฺฉิตกฺขเณ สมาปชฺชิตาติ อิมินา เตสุ ฌาเนสุ สมาปชฺชนวสีภาวมาห, ‘‘นิกามลาภี’’ติ ปน วจนโต อาวชฺชนาธิฏฺฐานา ปจฺจเวกฺขณวสิโย จ วุตฺตา เอวาติ เวทิตพฺพา. นิทุกฺขลาภีติ อิมินา เตสํ ฌานานํ สุขปฏิปทาขิปฺปาภิญฺญตํ ทสฺเสติ, วิปุลลาภีติ อิมินา ปคุณตํ ตปฺปมาณทสฺสิตภาวทีปนโต. เตนาห ‘‘ปคุณภาเวนา’’ติอาทิ. สมาปชฺชิตุํ สกฺโกติ สมาปชฺชนวสีภาวตาย สาธิตตฺตา. สมาธิปาริปนฺถิกธมฺเมติ วสีภาวสฺส ปจฺจนีกธมฺเม. ฌานาธิคมสฺส ปน ปจฺจนีกธมฺมา ปเคว วิกฺขมฺภิตา, อญฺญถา ฌานาธิคโม เอว น สิยา. อกิลมนฺโต วิกฺขมฺเภตุํ น สกฺโกตีติ กิจฺเฉน วิกฺขมฺเภติ วิโสเธติ, กามาทีนวปจฺจเวกฺขณาทีหิ กามจฺฉนฺทาทีนํ อญฺเญสํ สมาธิปาริปนฺถิกานํ ทูรสมุสฺสารณํ อิธ วิกฺขมฺภนํ วิโสธนนฺติ เวทิตพฺพํ. २६. अधिक चित्त म्हणजे 'अभिचेत' (अभिचित्त), जे महग्गत चित्त (महान झालेले चित्त) आहे. आणि त्याची 'अधिकता' म्हणजे कामच्छंद इत्यादी विरोधी धर्मांच्या दूर होण्याने विशिष्ट अवस्थेची प्राप्ती होणे होय; त्यावर आश्रित असणारे ते 'आभिचेतसिक' (चित्ताशी संबंधित) होय. म्हणूनच म्हटले आहे - "अभिचित्त म्हणजे आश्रित असणारे श्रेष्ठ चित्त." 'दिट्ठधम्मसुखविहारानां' (दृष्टधम्मसुखविहार करणाऱ्यांचे) म्हणजे याच आत्मभावात (याच जन्मात) सुखाने विहार करणाऱ्यांचे. त्यांच्याशी युक्त असण्याच्या क्षणी, ज्या अर्थी तो विवेकजन्य प्रीती-सुख, समाधिजन्य प्रीती-सुख, निष्प्रीती (प्रीतीरहित) स्मृती-परिशुद्धी-ज्ञान-सुख प्राप्त करतो आणि अनुभवतो, म्हणूनच म्हटले आहे - "अर्पणा (ध्यान) प्राप्त झालेल्या प्रत्येक क्षणी सुखप्राप्तीचे कारण असणाऱ्यांचे." "इच्छिलेल्या प्रत्येक क्षणी समापन्न होणारे" याने त्या ध्यानांमध्ये समापत्तीच्या (प्रवेश करण्याच्या) वशीभावाचा (प्रभुत्वाचा) निर्देश केला आहे. आणि "निकामलाभी" (सहज प्राप्त करणारे) या शब्दाने आवर्जन (चित्त एकाग्र करणे), अधिष्ठान आणि प्रत्यवेक्षण (पुनरावलोकन) या वशीभावांचेही वर्णन केले आहे, असे समजावे. 'निदुःखलाभी' (विनासायास प्राप्त करणारे) याने त्या ध्यानांची 'सुखप्रतिपदा-क्षिप्रअभिज्ञता' (सुखकर मार्ग आणि जलद ज्ञान) दर्शविली आहे. 'विपुललाभी' याने त्यांची निपुणता (अभ्यास) आणि त्याचे प्रमाण दर्शविले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - "निपुणतेमुळे (अभ्यासामुळे)" इत्यादी. समापत्तीच्या वशीभावाचे साधन केल्यामुळे तो समापन्न होण्यास समर्थ होतो. 'समाधीचे परिपंथिक (बाधक) धर्म' म्हणजे वशीभावाचे विरोधी धर्म. ध्यानप्राप्तीचे विरोधी धर्म तर आधीच विक्षंभित (दडपून टाकलेले) असतात, अन्यथा ध्यानप्राप्तीच झाली नसती. 'थकल्याशिवाय विक्षंभित करू शकत नाही' म्हणजे कष्टाने विक्षंभित करतो, विशुद्ध करतो. कामादींच्या दोषांचे प्रत्यवेक्षण (चिंतन) इत्यादींद्वारे कामच्छंद आणि इतर समाधीच्या बाधक धर्मांना दूर हाकलून देणे, यालाच येथे 'विक्षंभन' किंवा 'विशोधन' (शुद्ध करणे) असे समजावे. ๒๗. วิปสฺสนาหิตาย อุปรูปริวิเสสาวหตฺตา วฑฺฒมานาย ปุพฺพภาคสีลาทิปฏิปทาย. สา เอว ปุพฺพภาคปฏิปทา ยถาภาวิตตาย อวสฺสํ ภาวินํ วิเสสํ ปริคฺคหิตตฺตา อณฺฑํ วิยาติ อณฺฑํ, กิเลเสหิ อทูสิตตาย อปูติ อณฺฑํ เอตสฺสาติ อปุจฺจณฺโฑ, วิปสฺสนํ อุสฺสุกฺกาเปตฺวา ฐิตปุคฺคโล, ตสฺส ภาโว อปุจฺจณฺฑตา. วิปสฺสนาทิญาณปฺปเภทายาติ ปุพฺเพนิวาสญาณาทิญาณปเภทาย. ตตฺถาติ เจโตขิลสุตฺเต (ม. นิ. ๑.๑๘๕) ‘‘ส โข โส, ภิกฺขเว, เอวํ อุสฺโสฬฺหิปนฺนรสงฺคสมนฺนาคโต ภิกฺขุ ภพฺโพ อภินิพฺพิทายา’’ติ อาคตตฺตา อุสฺโสฬฺหิปนฺนรเสหิ องฺเคหิ สมนฺนาคตภาโวติ เอวํ ยํ โอปมฺมสํสนฺทนํ อาคตํ, ตํ โอปมฺมสํสนฺทนํ อิธ อิมสฺมึ เสขสุตฺเต โยเชตฺวา เวทิตพฺพนฺติ สมฺพนฺโธ. २७. विपश्यनेसाठी हितकारक असणाऱ्या आणि उत्तरोत्तर विशेष गुणांना आणणाऱ्या, वृद्धिंगत होणाऱ्या पूर्वभाग-शील इत्यादी प्रतिपदेने (आचरणाने). तीच पूर्वभाग-प्रतिपदा योग्य प्रकारे भावना केल्यामुळे (अभ्यासल्यामुळे) अवश्य होणाऱ्या विशेष गुणाला ग्रहण करणारी असल्यामुळे अंड्यासारखी (अंडं) आहे. क्लेशांनी दूषित न झाल्यामुळे जिचे अंडे कुजलेले नाही (अपूति अंडं), तो 'अपुच्चंड' (कुजलेले अंडे नसलेला) होय. विपश्यनेमध्ये उद्योगशील होऊन राहिलेला पुद्गल (व्यक्ती), त्याचा भाव म्हणजे 'अपुच्चंडता' (अकुथित-अंडता). 'विपश्यना इत्यादी ज्ञानाच्या प्रभेदासाठी' म्हणजे पूर्वनिवासज्ञान (पूर्वजन्मांचे स्मरण करणारे ज्ञान) इत्यादी ज्ञानाच्या प्रभेदासाठी. 'तेथे' म्हणजे चेतोखील सुत्तात (म. नि. १.१८५) "हे भिक्खूहो, तो पंधरा प्रकारच्या उद्योग-अंगांनी (उस्सोळ्हि-पन्नरस-अंग) युक्त असलेला भिक्खू अभिनिब्बिदेसाठी (भेदनासाठी/ज्ञानासाठी) योग्य ठरतो" असे आल्यामुळे, पंधरा प्रकारच्या उद्योग-अंगांनी युक्त असण्याचा भाव, अशा प्रकारे जी उपमेची तुलना आली आहे, ती उपमेची तुलना येथे या 'सेख सुत्तात' जोडून समजून घ्यावी, असा संबंध आहे. ๒๘. มหคฺคตาทิภาเวน เหฏฺฐิมานํ ฌานานํ อนุรูปมฺปิ อตฺตโน วิเสเสน เต อุตฺตริตฺวา อติกฺกมิตฺวาน ฐิตนฺติ อนุตฺตรํ, เตนาห – ‘‘ปฐมาทิชฺฌาเนหิ อสทิสํ อุตฺตม’’นฺติ. ทุติยาทีสุปิ อภินิพฺภิทาสุ. ปุพฺเพนิวาสญาณํ อุปฺปชฺชมานํ ยถา อตฺตโน วิสยปฏิจฺฉาทกํ กิเลสนฺธการํ วิธมนฺตเมว [Pg.19] อุปฺปชฺชติ, เอวํ อตฺตโน วิสเย กญฺจิ วิเสสํ กโรนฺตเมว อุปฺปชฺชตีติ อาห – ‘‘ปุพฺเพนิวาสญาเณน ปฐมํ ชายตี’’ติ, เสสญาณทฺวเยปิ เอเสว นโย. २८. महग्गत इत्यादी भावाने खालच्या ध्यानांच्या अनुरूप असूनही, स्वतःच्या वैशिष्ट्याने त्यांना ओलांडून आणि पार करून स्थित असणारे ते 'अनुत्तर' (सर्वश्रेष्ठ) होय. म्हणूनच म्हटले आहे - "प्रथम इत्यादी ध्यानांपेक्षा असमान आणि उत्तम." दुसऱ्या इत्यादी अभिनिब्भिदांमध्ये (भेदनांमध्ये/ज्ञानांमध्ये) सुद्धा. पूर्वनिवासज्ञान उत्पन्न होत असताना, जसे ते स्वतःच्या विषयाला झाकणाऱ्या क्लेशरूपी अंधकाराचा नाश करतच उत्पन्न होते, तसेच ते स्वतःच्या विषयात काहीतरी विशेष करतच उत्पन्न होते, म्हणून म्हटले आहे - "पूर्वनिवासज्ञानाने प्रथम उत्पन्न होते." उर्वरित दोन ज्ञानांच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. ๒๙. จรณสฺมินฺติ ปจฺจตฺเต ภุมฺมวจนนฺติ อาห ‘‘จรณํ นาม โหตีติ อตฺโถ’’ติ. เตนาติ กรณตฺเถ กรณวจนํ อคตปุพฺพทิสาคมเน เตสํ สาธกตมภาวโต. २९. 'चरणस्मिं' (चरणात) हे प्रत्यक्षात सप्तमी विभक्तीचे रूप आहे, म्हणून म्हटले आहे - "चरण नावाचे होते, असा अर्थ आहे." 'तेन' (त्याच्याद्वारे) हे करण अर्थातील तृतीया विभक्तीचे रूप आहे, कारण पूर्वी कधीही न गेलेल्या देशाकडे जाण्यात ते अत्यंत साधक (साधनभूत) ठरतात. อฏฺฐ ญาณานีติ อิธ อาคตานิ จ อนาคตานิ จ อมฺพฏฺฐสุตฺตาทีสุ (ที. นิ. ๑.๒๕๔ อาทโย) อาคตานิ คเหตฺวา วทติ. วินิวิชฺฌิตฺวาติ ปุพฺเพนิวาสปฏิจฺฉาทกาทิกิเลสตมํ ภินฺทิตฺวา ปทาเลตฺวา. "आठ ज्ञाने" म्हणजे येथे आलेली आणि न आलेली, जी अंबट्ठ सुत्त इत्यादींमध्ये (दी. नि. १.२५४ इत्यादी) आली आहेत, त्यांना गृहीत धरून सांगत आहे. 'विनिविज्झित्वा' (भेदून) म्हणजे पूर्वनिवासज्ञानाला झाकणाऱ्या क्लेशरूपी अंधकाराला भेदून आणि छिन्नविच्छिन्न करून. ๓๐. สนงฺกุมาเรนาติ สนนฺตนกุมาเรน. ตเทว หิ ตสฺส สนนฺตนกุมารตํ ทสฺเสตุํ ‘‘จิรกาลโต ปฏฺฐายา’’ติ วุตฺตํ. โส อตฺตภาโวติ เยน อตฺตภาเวน มนุสฺสปเถ ฌานํ นิพฺพตฺเตสิ, โส กุมารตฺตภาโว, ตสฺมา พฺรหฺมภูโตปิ ตาทิเสน กุมารตฺตภาเวน จรติ. ३०. 'सनंकुमारेन' म्हणजे सनंतनकुमाराने. त्याचे ते सनंतनकुमारत्व दर्शवण्यासाठीच "फार प्राचीन काळापासून" असे म्हटले आहे. 'तो आत्मभाव' म्हणजे ज्या आत्मभावाने (शरीराने) त्याने मनुष्यलोकात ध्यान उत्पन्न केले, तो कुमार-आत्मभाव होय. म्हणूनच ब्रह्मदेव झालेला असतानाही तो तशाच कुमार-आत्मभावाने वावरतो. ชนิตสฺมึ-สทฺโท เอว อิ-การสฺส เอ-การํ กตฺวา ‘‘ชเนตสฺมิ’’นฺติ วุตฺโต, ชนิตสฺมินฺติ จ ชนสฺมินฺติ อตฺโถ เวทิตพฺโพ. ชนิตสฺมินฺติ สามญฺญคฺคหเณปิ ยตฺถ จตุวณฺณสมญฺญา, ตตฺเถว มนุสฺสโลเก. ขตฺติโย เสฏฺโฐติ โลกสมญฺญาปิ มนุสฺสโลเกเยว, น เทวกาเย พฺรหฺมกาเย วาติ ทสฺเสตุํ ‘‘เย โคตฺตปฏิสาริโน’’ติ วุตฺตํ. ปฏิสรนฺตีติ ‘‘อหํ โคตโม, อหํ กสฺสโป’’ติ ปติ ปติ อตฺตโน โคตฺตํ อนุสรนฺติ ปฏิชานนฺติ วาติ อตฺโถ. 'जनितस्मिं' या शब्दातील 'इ' काराचा 'ए' कार करून 'जनेतस्मिं' असा शब्द प्रयोग केला आहे. आणि 'जनितस्मिं' म्हणजे 'जनात' (लोकांमध्ये), असा अर्थ समजावा. 'जनितस्मिं' असे सामान्य ग्रहण केले असले तरी, जेथे चार वर्णांची संज्ञा आहे, त्याच मनुष्यलोकात (हा अर्थ लागू होतो). "क्षत्रिय श्रेष्ठ आहे" ही लोकसंज्ञा देखील मनुष्यलोकातच आहे, देवलोकात किंवा ब्रह्मलोकात नाही, हे दर्शवण्यासाठी "जे गोत्राचे अनुसरण करतात" (ये गोत्तपटिसारिनो) असे म्हटले आहे. 'पटिसरन्ति' (अनुसरण करतात) म्हणजे "मी गौतम आहे, मी कस्सप (कश्यप) आहे" अशा प्रकारे आपापल्या गोत्राचे वारंवार स्मरण करतात किंवा प्रतिपादन करतात, असा अर्थ आहे. เอตฺตาวตาติ ‘‘สาธุ สาธุ อานนฺทา’’ติ เอตฺตเกน สาธุการทาเนน. ชินภาสิตํ นาม ชาตนฺติอาทิโต ปฏฺฐาย ยาว ปริโยสานา เถรภาสิตํ พุทฺธภาสิตเมว นาม ชาตํ. ‘‘กิมฺปนิทํ สุตฺตํ สตฺถุเทสนานุวิธานโต ชินภาสิตํ, อุทาหุ สาธุการทานมตฺเตนา’’ติ เอวรูปา โจทนา อิธ อโนกาสา เถรสฺส เทสนาย ภควโต เทสนานุวิธานเหตุกตฺตา สาธุการทานสฺสาติ. ยํ ปเนตฺถ อตฺถโต อวิภตฺตํ, ตํ สุวิญฺเญยฺยเมว. 'एत्तावता' (एवढ्याने) म्हणजे "साधू, साधू आनंदा!" एवढ्या साधुकार देण्याने. 'जिनभाषित (बुद्धवचन) झाले' म्हणजे आरंभापासून शेवटपर्यंत स्थविरांचे (थेरांचे) भाषण हे बुद्धभाषितच झाले. "पण हे सुत्त शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) देशनेच्या अनुसरणामुळे जिनभाषित झाले की केवळ साधुकार देण्याने?" अशा प्रकारच्या शंकेला येथे वाव नाही, कारण स्थविरांच्या देशनेला भगवंतांच्या देशनेचे अनुसरण असल्यामुळेच साधुकार दिला गेला आहे. आणि येथे ज्याचा अर्थ स्पष्ट केलेला नाही, तो सहज समजण्याजोगाच आहे. เสขสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. सेखसुत्त-वर्णनेची लीनत्थप्रकाशना (गूढार्थ स्पष्टीकरण) समाप्त झाली. ๔. โปตลิยสุตฺตวณฺณนา ४. पोतलियसुत्त-वर्णना (पोतलिय सुत्ताचे स्पष्टीकरण). ๓๑. องฺคา [Pg.20] นาม ชนปทิโน ราชกุมารา, เตสํ นิวาโส เอโกปิ ชนปโท รุฬฺหิวเสน องฺคาตฺเวว วุจฺจตีติ อาห ‘‘องฺคาเยว โส ชนปโท’’ติ. มหิยา ปนสฺส อุตฺตเรน ยา อาโปติ มหิยา นทิยา ยา อาโป ตสฺส ชนปทสฺส อุตฺตเรน โหนฺติ. ตาสํ อวิทูรตฺตา โส ชนปโท อุตฺตราโปติ วุจฺจติ. สา ปน มหี กตฺถจิ กตฺถจิ ภิชฺชิตฺวา คตาติ อาห ‘‘กตรมหิยา อุตฺตเรน ยา อาโป’’ติ. ตตฺถาติ ตสฺสา มหิยา อาคมนโต ปฏฺฐาย อยํ อาวิภาวกถา. ยสฺมา (อ. นิ. ฏี. ๓.๘.๑๙) โลกิยา ชมฺพุทีโป หิมวา ตตฺถ ปติฏฺฐิตสมุทฺททหปพฺพตนทิโยติ เอเตสุ ยํ ยํ น มนุสฺสโคจรํ, ตตฺถ สยํ สมฺมูฬฺหา อญฺเญปิ สมฺโมหยนฺติ, ตตฺถ ตตฺถ สมฺโมหวิธมนตฺถํ ‘‘อยํ กิร ชมฺพุทีโป’’ติอาทิมารทฺธํ. ทสสหสฺสโยชนปริมาโณ อายามโต จ วิตฺถารโต จาติ อธิปฺปาโย. เตนาห ‘‘ตตฺถา’’ติอาทิ. อุทเกน อชฺโฌตฺถโฏ ตทุปโภคิสตฺตานํ ปุญฺญกฺขเยน. ३१. अंग नावाचे जनपदाचे राजकुमार होते, त्यांचा निवास असलेला एक जनपद देखील रूढीने 'अंग' असाच म्हटला जातो, म्हणून 'अंगायवे सो जनपदो' (तो जनपद अंगच आहे) असे म्हटले आहे. 'मही' नदीच्या उत्तरेला जे पाणी आहे, ते त्या जनपदाच्या उत्तरेला आहे. त्याच्या जवळ असल्यामुळे तो जनपद 'उत्तराप' (उत्तर-आप) म्हटला जातो. ती मही नदी ठिकठिकाणी विभागून गेली आहे, म्हणून 'कतरमहिया उत्तरेन या आपो' (कोणत्या मही नदीच्या उत्तरेला जे पाणी आहे) असे म्हटले आहे. 'तथ' (तेथे) म्हणजे त्या मही नदीच्या उगमापासून घेऊन ही स्पष्टीकरण देणारी कथा आहे. कारण लौकिक लोक जंबुद्वीप, हिमवंत (हिमालय) आणि तेथे असलेले समुद्र, तलाव, पर्वत, नद्या यांपैकी जे जे मानवाच्या आवाक्याबाहेर आहे, त्याविषयी स्वतः संभ्रमित होऊन इतरांनाही संभ्रमित करतात. त्या त्या ठिकाणी असलेला संभ्रम दूर करण्यासाठी 'अयं किर जम्बुदीपो' (हा जंबुद्वीप आहे) इत्यादींचे वर्णन सुरू केले आहे. लांबी आणि रुंदीने दहा हजार योजन परिमाण असलेला, असा याचा अभिप्राय आहे. म्हणूनच 'तथ' इत्यादी म्हटले आहे. तेथील उपभोग घेणाऱ्या प्राण्यांच्या पुण्याच्या क्षयामुळे ते पाण्याने व्यापलेले आहे. สุนฺทรทสฺสนํ กูฏนฺติ สุทสฺสนกูฏํ, ยํ โลเก ‘‘เหมกูฏ’’นฺติ วุจฺจติ. มูลคนฺโธ กาฬานุสาริยาทิ. สารคนฺโธ จนฺทนาทิ. เผคฺคุคนฺโธ สลลาทิ. ตจคนฺโธ ลวงฺคาทิ. ปปฏิกคนฺโธ กพิตฺถาทิ. รสคนฺโธ สชฺชาทิ, ปตฺตคนฺโธ ตมาลหิริเวราทิ. ปุปฺผคนฺโธ นาคกุงฺกุมาทิ. ผลคนฺโธ ชาติผลาทิ. คนฺธคนฺโธ สพฺเพสํ คนฺธานํ คนฺโธ. ยสฺส หิ รุกฺขสฺส สพฺเพสมฺปิ มูลาทีนํ คนฺโธ อตฺถิ, โส อิธ คนฺโธ นาม. ตสฺส คนฺธสฺส คนฺโธ คนฺธคนฺโธ. สพฺพานิ ปุถุลโต ปญฺญาสโยชนานิ, อายามโต ปน อุพฺเพธโต วิย ทฺวิโยชนสตาเนวาติ วทนฺติ. सुंदर दर्शन देणारे शिखर म्हणजे 'सुदस्सनकूट' (सुदर्शन शिखर), ज्याला जगात 'हेमकूट' असे म्हटले जाते. मूळ-गंध (मुळांचा सुगंध) म्हणजे काळानुसारी (काळा अगरू) इत्यादी. सार-गंध (गाभ्याचा सुगंध) म्हणजे चंदनादी. फेग्गु-गंध (भुसभुशीत लाकडाचा सुगंध) म्हणजे सरल (देवदार) इत्यादी. तच-गंध (सालीचा सुगंध) म्हणजे लवंग इत्यादी. पपटिक-गंध (पापुद्र्याचा सुगंध) म्हणजे कवीठ इत्यादी. रस-गंध (डिंकाचा सुगंध) म्हणजे राळ (सर्ज) इत्यादी. पत्त-गंध (पानांचा सुगंध) म्हणजे तमालपत्र, वाळा इत्यादी. पुप्फ-गंध (फुलांचा सुगंध) म्हणजे नागकेशर, कुंकुम इत्यादी. फल-गंध (फळांचा सुगंध) म्हणजे जायफळ इत्यादी. गंध-गंध म्हणजे सर्व सुगंधांचा सुगंध. ज्या वृक्षाला मुळांपासून सर्वच भागांचा सुगंध असतो, त्याला येथे 'गंध' म्हटले आहे. त्या गंधाचा जो गंध तो 'गंधगंध' होय. हे सर्व रुंदीने पन्नास योजने आणि लांबी व उंचीने दोनशे योजने आहेत, असे म्हणतात. มโนหรสิลาตลานีติ โอตรณตฺถาย มนุญฺญโสปานสิลาตลานิ. สุปฏิยตฺตานีติ ตทุปโภคิสตฺตานํ สาธารณกมฺมานุภาเวน สุฏฺฐุ ปฏิยตฺตานิ สุปฺปวตฺติตานิ โหนฺติ. มจฺฉกจฺฉปาทโย อุทกํ มลินํ กโรนฺติ, ตทภาวโต ผลิกสทิสนิมฺมลุทกานิ. ติริยโต ทีฆํ อุคฺคตกูฏนฺติ ‘‘ติรจฺฉานปพฺพต’’นฺติ อาห. 'मनोहरशिलातल' म्हणजे खाली उतरण्यासाठी बनवलेले सुंदर पायऱ्यांचे शिलातल. 'सुपटियत्त' (सुसज्ज) म्हणजे तेथील उपभोग घेणाऱ्या प्राण्यांच्या सामायिक कर्माच्या प्रभावाने चांगल्या प्रकारे तयार केलेले व सुव्यवस्थित असलेले. मासे, कासव इत्यादी प्राणी पाणी दूषित करतात, त्यांच्या अभावामुळे स्फटिकासारखे निर्मळ पाणी असलेले. आडव्या दिशेने पसरलेले आणि उंच शिखरे असलेले, म्हणून त्याला 'तिरच्छानपब्बत' (आडवा पर्वत) असे म्हटले आहे. อาปณานิ [Pg.21] เอว โวหารสฺส มุขภูตานีติ อาห ‘‘อาปณมุขสหสฺสานี’’ติ. วิภตฺตานีติ ววตฺถิตานิ อญฺญมญฺญาสมฺภินฺนานิ. วสนฏฺฐานนฺติ อตฺตโน ยถาผาสุกํ วสิตพฺพฏฺฐานํ. อาสติ เอตฺถาติ อาสนํ, นิสีทิตพฺพฏฺฐานานิ. दुकानेच व्यापाराचे मुख्य केंद्र (मुख) असतात, म्हणून 'आपणमुखसहस्सानी' (हजारो बाजारपेठांची मुखे) असे म्हटले आहे. 'विभत्त' (विभक्त) म्हणजे सुव्यवस्थित आणि एकमेकांत न मिसळलेले. 'वसनट्ठान' (निवासस्थान) म्हणजे स्वतःच्या सोयीनुसार राहण्याचे ठिकाण. जेथे बसले जाते ते 'आसन' म्हणजे बसण्याची ठिकाणे. อสารุปฺปํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชนกสฺส ฉาทนโต ฉนฺนํ อนุจฺฉวิกํ, ตเทว อชฺฌาสยสมฺปตฺตึ ปติรูเปติ ปกาเสตีติ ปติรูปํ. เตนาห ‘‘นปฺปติรูป’’นฺติ. การณเววจนานีติ ญาปกการณเววจนานิ. ญาปกญฺหิ การณํ อธิปฺเปตํ. อตฺถํ อากโรติ ปกาเสตีติ อากาโร, ตเมว ลีนํ คุฬฺหํ อตฺถํ คเมตีติ ลิงฺคํ, โส เตน นิมียตีติ นิมิตฺตนฺติ วุจฺจติ. อิทานิ ตเมวตฺถํ วิวริตุํ ‘‘ทีฆทสวตฺถ…เป… นิมิตฺตาติ วุตฺตา’’ติ อาห. เตติ อาการาทโย. ตถา หิ ปน เมติอาทินา โปตลิโย คหปติ ‘‘ปริพฺพาชกนิยาเมน อหํ ชีวามิ, ตสฺมา คหปติ น โหมีติ วทติ. โอวทนฺโตติ อนุสาสนฺโต. อุปวทนฺโตติ ปริภาสนฺโต. अयोग्य गोष्टीच्या आश्रयाने उत्पन्न होणाऱ्या दोषांना झाकणारे असल्यामुळे 'छन्न' (झाकलेले) म्हणजे योग्य; आणि तेच मनाच्या शुद्धतेला (अध्याशय संपत्तीला) अनुरूप किंवा प्रकट करते म्हणून 'पतिरूप' (प्रतिरूप/अनुरूप). म्हणूनच 'नप्पतिरूपं' (अनुरूप नसलेले) असे म्हटले आहे. 'कारणवेवचन' (कारणाचे समानार्थी शब्द) म्हणजे ज्ञापक कारणाचे समानार्थी शब्द. कारण येथे ज्ञापक (बोध करून देणारे) कारण अभिप्रेत आहे. जो अर्थाला आकार देतो किंवा प्रकट करतो तो 'आकार' होय; जो त्याच लपलेल्या, गूढ अर्थाचा बोध करून देतो ते 'लिंग' होय; आणि ज्याच्याद्वारे तो निश्चित केला जातो ते 'निमित्त' म्हटले जाते. आता याच अर्थाचा खुलासा करण्यासाठी 'दीघदसवत्थ...पे... निमित्ताति वृत्ता' (लांब दशांचे वस्त्र... इत्यादी निमित्त म्हटले आहे) असे म्हटले आहे. 'ते' म्हणजे आकार इत्यादी. कारण 'मे' (माझ्या) इत्यादी शब्दांद्वारे पोतलीय गृहपती म्हणतात की, 'मी परिव्राजकाच्या नियमाने जगतो, म्हणून मी गृहपती नाही.' 'ओवदंतो' म्हणजे उपदेश करणारे (अनुशासन करणारे). 'उपवदंतो' म्हणजे दोष दाखवणारे (निंदा करणारे). ๓๒. เคธภูโต โลโภติ คิชฺฌนสภาโว โลโภ. อคิชฺฌนลกฺขโณ น โลโภ, อนินฺทาภูตํ อฆฏฺฏนนฺติ นินฺทาย ปฏิปกฺขภูตํ ปเรสํ อฆฏฺฏนํ. นินฺทาฆฏฺฏนาติ นินฺทาวเสน ปเรสํ ฆฏฺฏนา อกฺโกสนา. พฺยวหารโวหาโรปีติ กยวิกฺกยลกฺขโณ สพฺโยหาโรปิ ทานคฺคหณํ โวหาโร. ‘‘ทตฺโต ติสฺโส’’ ติอาทินา โวหรณํ ปญฺญาปนนฺติ ปญฺญตฺติ โวหาโร. ยถาธิปฺเปตสฺส อตฺถสฺส โวหรณํ กถนํ โพธนนฺติ วจนํ โวหาโร. ยาถาวโต อยาถาวโต จ โวหรติ เอเตนาติ โวหาโร, เจตนา. อยมิธาธิปฺเปโตติ อยํ เจตนาลกฺขโณ โวหาโร อิธ อิมสฺมึ อตฺเถ อธิปฺเปโต, โส จ โข สาวชฺโชว สมุจฺเฉทสฺส อิจฺฉิตตฺตา. อิทานิ จตุพฺพิธสฺสปิ โวหารสฺส อิธ สมฺภวํ ทสฺเสตุํ ‘‘ยสฺมา วา’’ติอาทิ วุตฺตํ. คิหีติ เจตนา นตฺถีติ อหํ คิหีติ เจตนาปวตฺติ นตฺถิ. คิหีติ วจนํ นตฺถีติ คิหีติ อตฺตโน ปเรสญฺจ วจนปฺปวตฺติ นตฺถิ. คิหีติ ปณฺณตฺติ นตฺถีติ คิหีติ สมญฺญา นตฺถิ. คิหีติ พฺยวหาโร นตฺถีติ สมุทาจาโร นตฺถิ. ३२. 'गेधभूतो लोभो' (आसक्तीयुक्त लोभ) म्हणजे हाव धरण्याच्या स्वभावाचा लोभ. हाव न धरण्याच्या लक्षणाचा तो 'न लोभ' (अलोभ) होय. 'अनिंदाभूतं अघट्टनं' म्हणजे निंदेच्या विरुद्ध असलेले, इतरांना न दुखावणारे. 'निंदाघट्टना' म्हणजे निंदेच्या भावनेने इतरांना दुखावणे किंवा शिवीगाळ करणे. 'व्यवहार-वोहार' म्हणजे खरेदी-विक्रीच्या लक्षणाचा व्यवहार आणि देणे-घेणे रूप व्यवहार. 'दत्त, तिस्स' इत्यादी नावांनी व्यवहार करणे किंवा प्रज्ञापित करणे म्हणजे 'पण्णत्ति वोहार' (प्रज्ञप्ती व्यवहार). अभिप्रेत असलेल्या अर्थाचे प्रतिपादन करणे, सांगणे किंवा बोध करून देणे म्हणजे 'वचन वोहार' (वचन व्यवहार). ज्याच्याद्वारे यथार्थ किंवा अयथार्थ व्यवहार केला जातो तो 'वोहार' म्हणजे चेतना होय. हा चेतना-लक्षण असलेला व्यवहार येथे या अर्थाने अभिप्रेत आहे, आणि तो समूळ नष्ट करण्याची इच्छा असल्यामुळे तो सावद्य (दोषयुक्त) आहे. आता चारही प्रकारच्या व्यवहारांचे येथे अस्तित्व दाखवण्यासाठी 'यस्मा वा' (किंवा ज्या कारणाने) इत्यादी म्हटले आहे. 'गृही' (गृहस्थ) अशी चेतना नाही म्हणजे 'मी गृहस्थ आहे' अशी चेतनेची प्रवृत्ती नाही. 'गृही' असे वचन नाही म्हणजे स्वतःसाठी किंवा इतरांसाठी 'गृही' अशा शब्दाचा प्रयोग नाही. 'गृही' अशी प्रज्ञप्ती नाही म्हणजे 'गृही' अशी संज्ञा (नाव) नाही. 'गृही' असा व्यवहार नाही म्हणजे तसा आचार-व्यवहार नाही. ๓๓. ปาณาติปาโตว สํโยชนํ. กสฺมา? พนฺธนภาเวน ปวตฺตนโต นิสฺสริตุํ อปฺปทานโต. ปาณาติปาตสฺส อตฺถิตาย โส ปุคฺคโล [Pg.22] ‘‘ปาณาติปาตี’’ติ วุจฺจตีติ อาห – ‘‘ปาณาติปาตสฺส…เป… โหตี’’ติ. ยญฺหิ ยสฺส อตฺถิ, เตน โส อปทิสฺสตีติ. พหุตายาติ อจกฺขุกาทิเภเทน พหุภาวโต. ปาณาติปาตสฺส ปฏิปกฺโข อปาณาติปาโต. โส ปน อตฺถโต กายทฺวาริโก สีลสํวโรติ อาห ‘‘กายิกสีลสํวเรนา’’ติ. อตฺตาปิ มํ อุปวเทยฺยาติอาทิ ปาณาติปาเต อาทีนวทสฺสนํ. อาทีนวทสฺสิโน หิ ตโต โอรมณํ. เทสนาวเสนาติ อญฺญตฺถ สุตฺเต อภิธมฺเม จ ทสสุ สํโยชเนสุ ปญฺจสุ นีวรเณสุ เทสนาวเสน อปริยาปนฺนมฺปิ สํโยชนนฺติปิ นีวรณนฺติปิ อิธ วุตฺตํ. กสฺมา? ตทตฺถสมฺภวโต. เตนาห – ‘‘วฏฺฏพนฺธนฏฺเฐน หิตปฺปฏิจฺฉาทนฏฺเฐน จา’’ติ, ปาณาติปาโต หิ อปาณาติปาตปจฺจยํ หิตํ ปฏิจฺฉาเทนฺโตว อุปฺปชฺชตีติ. เอโก อวิชฺชาสโวติ อิทํ สหชาตวเสน วุตฺตํ, อุปนิสฺสยวเสน ปน อิตเรสมฺปิ อาสวานํ ยถารหํ สมฺภโว เวทิตพฺโพ. ปาณาติปาตี หิ ปุคฺคโล ‘‘ตปฺปจฺจยํ อตฺถํ กริสฺสามี’’ติ กาเม ปตฺเถติ. ทิฏฺฐึ คณฺหาติ, ภววิเสสํ ปจฺจาสีสติ. ตตฺถ อุปฺปนฺนํ วิหนติ พาธตีติ วิฆาโต, ทุกฺขํ, ปริฬาหนํ อนตฺถุปฺปาทวเสน อุปตาปนํ ปริฬาโห, อยเมเตสํ วิเสโส. สพฺพตฺถาติ สพฺเพสุ วาเรสุ. อิมินา อุปาเยนาติ อติเทเสน ปน ปริคฺคหิโต อตฺโถ ปรโต อาคมิสฺสตีติ. ३३. प्राणातिपात (जीवहिंसा) हेच संयोजन (बंधन) आहे. का? कारण ते बंधनाच्या रूपाने प्रवृत्त होते आणि त्यातून सुटण्याची संधी देत नाही (निसरण न दिल्यामुळे). प्राणातिपाताच्या अस्तित्वामुळे तो पुद्गल (व्यक्ती) 'प्राणातिपाती' (जीवहिंसक) म्हटला जातो, म्हणून भगवान म्हणाले - 'प्राणातिपाताचा... पे... होतो'. कारण ज्याच्याकडे जे असते, त्यानेच तो ओळखला जातो. 'बहुताया' (बहुतेमुळे) म्हणजे डोळे नसलेले (अचक्षुक) इत्यादी भेदांमुळे अनेक प्रकारच्या असण्यामुळे. प्राणातिपाताचा प्रतिपक्ष (विरोधी) अप्राणातिपात (जीवहिंसेपासून विरत राहणे) आहे. आणि तो अर्थाच्या दृष्टीने कायद्वाराचा (शरीराचा) शीलसंवर आहे, म्हणून 'कायिक शीलसंवराने' असे म्हटले आहे. 'स्वतः (विवेक) देखील माझी निंदा करेल' इत्यादी प्राणातिपातातील आदीनवदर्शन (दोषदर्शन) आहे. कारण दोष पाहणाऱ्याचीच त्यापासून विरती (निवृत्ती) होते. 'देशनावशेन' (देशनेच्या वशाने) म्हणजे इतरत्र सूत्रात आणि अभिधम्मात दहा संयोजनांमध्ये आणि पाच नीवरणांमध्ये देशनेच्या वशाने जे अपरियापन्न (अंतर्भूत नसलेले) आहे, त्यालाही येथे 'संयोजन' आणि 'नीवरण' असे म्हटले आहे. का? कारण त्याचा तो अर्थ संभवतो म्हणून. म्हणूनच म्हटले आहे - 'संसारबंधनाच्या अर्थाने आणि हिताला झाकून टाकण्याच्या अर्थाने', कारण प्राणातिपात हा अप्राणातिपाताच्या प्रत्ययाने (कारणाने) होणाऱ्या हिताला झाकून टाकतच उत्पन्न होतो. 'एक अविद्यासव' हे सहजातभावाच्या वशाने म्हटले आहे, परंतु उपनिश्रयभावाच्या वशाने इतरही आसवांचा यथाशक्य संभव समजून घ्यावा. कारण प्राणातिपाती पुद्गल 'त्याच्या प्रत्ययाने (कारणाने) मी हित साधीन' असे म्हणून कामांची (भोगांची) इच्छा करतो. दृष्टी (चुकीचे मत) ग्रहण करतो, विशिष्ट भवाची आकांक्षा करतो. तेथे उत्पन्न होणाऱ्याला जे नष्ट करते, बाधा पोहोचवते ते 'विघात' (दुःख) आहे; अनर्थ उत्पन्न करण्याच्या वशाने होणारा संताप म्हणजे 'परिळाह' (दाह) आहे, हा या दोघांमधील भेद आहे. 'सब्बत्था' (सर्वत्र) म्हणजे सर्व वारांमध्ये (प्रसंगांमध्ये). 'या उपायाने' म्हणजे अतिदेशाने (अतिव्याप्तीने) ग्रहण केलेला अर्थ पुढे येईल. ๓๔-๔๐. อิมสฺมึ ปเทติ เอเตน สตฺตสุปิ วาเรสุ ตถา อาคตํ ปทํ สามญฺญโต คหิตํ. เตนาห ‘‘อิมินา’’ติอาทิ. โรสนํ กายิกํ วาจสิกญฺจาติ ตปฺปฏิปกฺโข อโรโสปิ ตถา ทุวิโธติ อาห ‘‘กายิกวาจสิกสํวเรนา’’ติ. ยถา อภิชฺฌา โลโภ, อนภิชฺฌา อโลโภ, เอวํ อโกธูปายาโส อพฺยาปาโท, สํวเร สุขนฺติ สํวโรติ ทฏฺฐพฺโพ, อนติโลโภ ปน สติสํวเร, อนติมาโน ญาณสํวเร สงฺคหํ คจฺฉตีติ ทฏฺฐพฺพํ. อิเมสุ ปน ปเทสุ เอวํ สพฺพวาเรสุ โยชนา กาตพฺพาติ สมฺพนฺโธ. ३४-४०. 'या पदात' याद्वारे साती वारांमध्ये (प्रसंगांमध्ये) तशा प्रकारे आलेले पद सामान्य रूपाने ग्रहण केले आहे. म्हणूनच 'याने' इत्यादी म्हटले आहे. रोषण (क्रोध/पीडा देणे) हे कायिक आणि वाचिक असते, आणि त्याचा प्रतिपक्ष असलेला 'अरोष' (अक्रोध) देखील तसाच द्विविध (दोन प्रकारचा) असतो, म्हणून 'कायिक-वाचिक संवराने' असे म्हटले आहे. ज्याप्रमाणे अभिध्या म्हणजे लोभ आणि अनभिध्या म्हणजे अलोभ, त्याचप्रमाणे अक्रोध आणि अनुपायस म्हणजे अव्यापाद होय. 'संवरात सुख' म्हणजे संवर असे समजावे. अतिलोभ न करणे हे सतीसंवरात (स्मृती संवरात) आणि अतिमान न करणे हे ज्ञानसंवरात समाविष्ट होते, असे समजावे. या पदांमध्ये अशा प्रकारे सर्व वारांमध्ये योजना करावी, हा संबंध आहे. เอวํ อาสวุปฺปตฺติ เวทิตพฺพาติ เอตฺถ วุตฺตสฺสปิ เอกชฺฌํ วุจฺจมานตฺตา ‘‘ปุน อยํ สงฺเขปวินิจฺฉโย’’ติ วุตฺตํ. อสมฺโมหตฺถํ อารมฺมณสฺส. ปุริเมสุ ตาว จตูสุ วาเรสุ วิรมิตุํ น สกฺโกมีติ วตฺตพฺพํ. ‘‘อตฺตาปิ มํ อุปวเทยฺยา’’ติ เอตสฺส ปทสฺส อตฺถวณฺณนายํ ‘‘น สกฺโกมี’’ติ, ‘‘อนุวิชฺชาปิ มํ วิญฺญู ครเหยฺยุ’’นฺติ เอตสฺส ปทสฺส อตฺถวณฺณนายํ ‘‘น สกฺโกตี’’ติ [Pg.23] วตฺตพฺพํ, อิมินา นเยน ปจฺฉิเมสุปิ จตูสุ ยถารหํ โยชนา เวทิตพฺพา. อติมาเน ภวาสวอวิชฺชาสวาติ วุตฺตํ มาเนน สห ทิฏฺฐิยา อนุปฺปชฺชนโต, อติมาโน ปน กามราเคนปิ อุปฺปชฺชเตวาติ ‘‘อติมาเน กามาสวอวิชฺชาสวา’’ติ วตฺตพฺพํ สิยา, สฺวายํ นโย วุตฺตนยตฺตา สุวิญฺเญยฺโยติ น ทสฺสิโต. ปาติโมกฺขสํวรสีลํ กถิตํ อาทิโต จตูหิ ฉฏฺเฐน วาติ ปญฺจหิ วาเรหิ, เสเสหิ ตีหิ ปาติโมกฺขสํวรสีเล ฐิตสฺส ภิกฺขุโน ปฏิสงฺขาปหานํ, สพฺเพหิปิ ปน ภิกฺขุภาเว ฐิตสฺส คิหิโวหารสมุจฺเฉโท กถิโต. ตตฺถ สพฺพตฺถ วตฺตํ ‘‘อิทญฺจิทญฺจ มยฺหํ กาตุํ นปฺปติรูป’’นฺติ ปฏิสงฺขานวเสน อกรณํ ปชหนญฺจ ปฏิสงฺขาปหานํ. 'अशा प्रकारे आसवांची उत्पत्ती समजावी' येथे जे सांगितले आहे तेच एकत्रितपणे सांगत असल्यामुळे 'पुन्हा हा संक्षेप-विनिर्णय आहे' असे म्हटले आहे. आलंबनाच्या (विषयाच्या) असंमोहासाठी (स्पष्टतेसाठी). पहिल्या चार वारांमध्ये (प्रसंगांमध्ये) 'मी विरत राहू शकत नाही' असे म्हणावे. 'स्वतः (विवेक) देखील माझी निंदा करेल' या पदाच्या अर्थवर्णनात 'मी शकत नाही' असे आणि 'तपासणी करून सुज्ञ लोक माझी निंदा करतील' या पदाच्या अर्थवर्णनात 'तो शकत नाही' असे म्हणावे. या न्यायाने नंतरच्या चार वारांमध्येही योग्यतेनुसार योजना समजावी. अतिमानात 'भवासव आणि अविद्यासव' असे म्हटले आहे, कारण मानासोबत दृष्टी उत्पन्न होत नाही. परंतु अतिमान हा कामरागाने देखील उत्पन्न होतोच, म्हणून 'अतिमानात कामासव आणि अविद्यासव' असे म्हणायला हवे होते; हा न्याय पूर्वी सांगितलेल्या न्यायानुसार सहज समजण्यासारखा असल्यामुळे दर्शविला नाही. सुरुवातीच्या चार आणि सहाव्या अशा पाच वारांद्वारे प्रातिमोक्षसंवरशील सांगितले आहे. उर्वरित तीन वारांद्वारे प्रातिमोक्षसंवरशीलात स्थित असलेल्या भिक्खूचे 'प्रतिसंख्या-प्रहाण' (विचारपूर्वक त्याग) सांगितले आहे. परंतु सर्वांद्वारे भिक्खूभावात स्थित असलेल्याच्या 'गृहस्थ-व्यवहाराचा समूच्छेद' (पूर्ण त्याग) सांगितला आहे. तेथे सर्वत्र 'हे आणि हे करणे माझ्यासाठी योग्य नाही' अशा विचारपूर्वक (प्रतिसंख्यान) न करणे आणि त्याग करणे म्हणजे 'प्रतिसंख्या-प्रहाण' होय. กามาทีนวกถาวณฺณนา कामांच्या आदीनवाच्या (दोषांच्या) कथेचे वर्णन. ๔๒. อุปสุมฺเภยฺยาติ เอตฺถ อุป-สทฺโท สมีปตฺโถ, สุมฺภนํ วิกฺเขปนํ. เตเนว ตเมนนฺติ ภุมฺมตฺเถ อุปโยควจนนฺติ อาห – ‘‘ตสฺส สมีเป ขิเปยฺยา’’ติ, ตสฺส กุกฺกุรสฺส สมีเป อฏฺฐิกงฺกลํ ขิเปยฺยาติ อตฺโถ. นิมฺมํสตฺตา กงฺกลนฺติ วุจฺจตีติ อิมินา วิคตมํสาย อฏฺฐิกงฺกลิกาย อุรฏฺฐิมฺหิ วา ปิฏฺฐิกณฺฏเก วา สีสฏฺฐิมฺหิ วา กงฺกล-สทฺโท นิรุฬฺโหติ ทสฺเสติ. สุนิกฺกนฺตนฺติ นิลฺลิขิตํ กตฺวาว นิพฺพิเสสํ ลิขิตํ. ४२. 'उपसुंभेय्य' येथे 'उप' हा शब्द समीप (जवळ) या अर्थी आहे, आणि 'सुंभन' म्हणजे फेकणे (विक्षेपण). म्हणूनच 'तमेतं' हे सप्तमीच्या अर्थी द्वितीयेचे वचन आहे, म्हणून म्हटले आहे - 'त्याच्या समीप फेकावे', म्हणजेच त्या कुत्र्याच्या जवळ हाडांचा सांगाडा फेकावा असा अर्थ आहे. मांस नसलेल्याला 'कंकाल' (सांगाडा) म्हटले जाते, याद्वारे मांस नसलेल्या अस्थींच्या सांगाड्यातील छातीचे हाड, पाठीचा कणा किंवा डोक्याचे हाड यांसाठी 'कंकाल' हा शब्द रूढ आहे, हे दर्शविले आहे. 'सुनिक्कन्तं' म्हणजे पूर्णपणे खरवडून काढलेले, कसलाही अंश न ठेवता खरवडलेले. เอกตฺตุปฏฺฐานสฺส อชฺฌุเปกฺขนวเสน ปวตฺติยา เอกตฺตา. เตนาห ‘‘จตุตฺถฌานุเปกฺขา’’ติ. ยสฺมา ปนสฺส อารมฺมณมฺปิ เอกสภาวเมว, ตสฺมา อาห ‘‘สา หี’’ติอาทิ. โลกามิสสงฺขาตาติ อปริญฺญาตวตฺถุนา โลเกน อามสิตพฺพโต, โลเก วา อามิโสติ สงฺขํ คตาย วเสน กามคุณานํ กามภาโว จ อามิสภาโว จ, โส เอว นิปฺปริยายโต อามิสนฺติ วตฺตพฺพตํ อรหติ. กามคุณามิสาติ กามคุเณ ฉนฺทราคา. คหณฏฺเฐน ภุสํ อาทานฏฺเฐน. एकत्वाच्या (एकाग्रतेच्या) उपस्थानाच्या उपेक्षाभावाच्या वशाने प्रवृत्त होत असल्यामुळे 'एकत्व' आहे. म्हणूनच 'चतुर्थ ध्यान उपेक्षा' असे म्हटले आहे. आणि ज्याअर्थी त्याचे आलंबन देखील एकस्वभावीच आहे, म्हणूनच 'तीच' इत्यादी म्हटले आहे. 'लोकामिषसंखाता' म्हणजे अपरिज्ञात (न समजलेल्या) वस्तू असणाऱ्या लोकांद्वारे स्पर्श केला जाण्यामुळे, किंवा लोकात 'आमिष' (भोग/प्रलोभन) अशी संज्ञा प्राप्त झाल्यामुळे कामगुणांचा कामभाव आणि आमिषभाव होय; तोच मुख्य अर्थाने 'आमिष' म्हणण्यास योग्य आहे. 'कामगुणामिष' म्हणजे कामगुणांमधील छंदराग (आसक्ती). ग्रहण करण्याच्या अर्थाने, अत्यंत दृढतेने ग्रहण करण्याच्या अर्थाने. ๔๓. ฑยนํ อากาเสน คมนนฺติ อาห ‘‘อุปฺปติตฺวา คจฺเฉยฺยา’’ติ. คิชฺฌาทีนํ วาสิผรสุ น โหตีติ อาห – ‘‘มุขตุณฺฑเกน ฑสนฺตา ตจฺเฉยฺยุ’’นฺติ. วิสฺสชฺเชยฺยุนฺติ เอตฺถ ‘‘วิสฺสชฺชน’’นฺติ อากฑฺฒนํ อธิปฺเปตํ อเนกตฺถตฺตา ธาตูนํ, อากฑฺฒนญฺจ อนุพนฺธิตฺวา ปาตนนฺติ อาห ‘‘มํสเปสึ นเขหิ กฑฺฒิตฺวา ปาเตยฺยุ’’นฺติ. ४३. 'डयन' म्हणजे आकाशातून जाणे, म्हणून 'उडून जावे' असे म्हटले आहे. गिधाड इत्यादींजवळ वासला (तासणी) किंवा कुऱ्हाड नसते, म्हणून म्हटले आहे - 'चोचीने चावून तासून टाकावे'. 'विस्सज्जेय्युं' येथे धातूंच्या अनेक अर्थांमुळे 'विसर्जन' म्हणजे ओढणे अभिप्रेत आहे, आणि ओढून मागे लागून पाडणे, म्हणून म्हटले आहे - 'मांसाचा तुकडा नखांनी ओढून पाडावा'. ๔๗. ปุริสสฺส [Pg.24] อาโรหนโยคฺยํ โปริเสยฺยํ. ४७. पुरुषाच्या (माणसाच्या) चढण्यास योग्य ते 'पोरिसेय्य' (पुरुष-प्रमाण). ๔๘. สมฺปนฺนํ สุนฺทรํ ผลมสฺสาติ สมฺปนฺนผลํ. ผลูปปนฺนนฺติ ผเลหิ อุเปตนฺติ อาห ‘‘พหุผล’’นฺติ. ४८. ज्याचे फळ संपन्न आणि सुंदर आहे ते 'संपन्नफल'. 'फलोपपन्न' म्हणजे फळांनी युक्त, म्हणून 'बहुफल' (पुष्कळ फळे असलेले) असे म्हटले आहे. ๕๐. สุวิทูรวิทูเรติ อริยสฺส วินเย โวหารสมุจฺเฉทโต สุฏฺฐุ วิทูรภูเต เอว วิทูเร อหํ ฐิโต. กสฺสจิ นาม อตฺถสฺสปิ อชานนโต น อาชานนฺตีติ อนาชานียาติ กตฺตุสาธนมสฺส ทสฺเสนฺโต อชานนเกติ อชานนฺตโภชนสีเสน เตสํ ทาตพฺพปจฺจเย วทติ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. ५०. 'सुविदूरविदूरे' म्हणजे आर्यांच्या विनयात व्यवहाराच्या समूच्छेदापासून (पूर्ण त्यागापासून) अत्यंत दूर असलेल्या दूरवरच मी स्थित आहे. कोणत्याही अर्थाला न जाणण्यामुळे जे जाणत नाहीत ते 'अनाजानीय' (अज्ञानी) आहेत, याचे कर्तृसाधन दर्शविताना 'न जाणणारे' असे म्हणून, न जाणणाऱ्यांच्या भोजनाच्या मुख्यतेने त्यांना देण्यायोग्य प्रत्ययांबद्दल (साधनांबद्दल) सांगत आहेत. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. โปตลิยสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. पोतलिय सुत्ताच्या वर्णनाची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ-प्रकाशिनी टीका) समाप्त झाली. ๕. ชีวกสุตฺตวณฺณนา ५. जीवक सुत्ताचे वर्णन. ๕๑. กุมาเรน ภโต โปสาปิโตติ กุมารภโต, กุมารภโต เอว โกมารภจฺโจ ยถา ‘‘ภิสกฺกเมว เภสชฺช’’นฺติ. ५१. कुमाराने (राजकुमाराने) ज्याचे भरणपोषण केले किंवा पोसले तो 'कुमारभत', आणि 'कुमारभत' म्हणजेच 'कोमारभच्च' (कौमारभृत्य), ज्याप्रमाणे 'भिषक' (वैद्य) म्हणजेच 'भेषज' (औषध) होय. อารภนฺตีติ เอตฺถ อารภ-สทฺโท กามํ กามายูหนยญฺญุฏฺฐาปนอาปตฺติอาปชฺชนวิญฺญาปนาทีสุปิ อาคโต, อิธ ปน หึสเน อิจฺฉิตพฺโพติ อาห – ‘‘อารภนฺตีติ ฆาเตนฺตี’’ติ. อุทฺทิสิตฺวา กตนฺติ (อ. นิ. ฏี. ๓.๘.๑๒; สารตฺถ. ฏี. มหาวคฺค ๓.๒๙๔) อตฺตานํ อุทฺทิสิตฺวา มารณวเสน กตํ นิพฺพตฺติตํ. ปฏิจฺจกมฺมนฺติ เอตฺถ กมฺม-สทฺโท กมฺมสาธโน อตีตกาลิโกติ อาห – ‘‘อตฺตานํ ปฏิจฺจ กต’’นฺติ. นิมิตฺตกมฺมสฺเสตํ อธิวจนํ ‘‘ปฏิจฺจ กมฺมํ ผุสตี’’ติอาทีสุ (ชา. ๑.๔.๗๕) วิย. นิมิตฺตกมฺมสฺสาติ นิมิตฺตภาเวน ลทฺธพฺพกมฺมสฺส, น กรณการาปนวเสน. ปฏิจฺจกมฺมํ เอตฺถ อตฺถีติ มํสํ ปฏิจฺจกมฺมํ ยถา ‘‘พุทฺธํ เอตสฺส อตฺถีติ พุทฺโธ’’ติ. เตสนฺติ นิคณฺฐานํ. อญฺเญปิ พฺราหฺมณาทโย ตํลทฺธิกา อตฺเถว. "आरभन्ति" (आरंभ करतात/मारतात) या संदर्भात 'आरभ' हा शब्द जरी काम-उत्पादन, आपत्ती ओढवून घेणे, विज्ञापना इत्यादी अर्थांनी आला असला, तरी येथे तो 'हिंसा करणे' या अर्थाने घेणे अपेक्षित आहे, म्हणून म्हटले आहे – "आरभन्ति म्हणजे मारतात (घात करतात)." "उद्दिस्सित्वा कतं" (उद्देशून केलेले) म्हणजे स्वतःला उद्देशून मारण्याच्या हेतूने केलेले किंवा तयार केलेले. "पटिच्चकम्मं" (प्रतीत्यकर्म) यामध्ये 'कम्म' (कर्म) हा शब्द कर्मसाधन आणि भूतकाळी आहे, म्हणून म्हटले आहे – "स्वतःला अनुसरून (किंवा उद्देशून) केलेले." "पटिच्च कम्मं फुसति" (प्रतीत्य कर्म स्पर्श करते/प्राप्त होते) इत्यादींप्रमाणे (जातक १.४.७५) हे 'निमित्तकर्मा'चेच पर्यायी नाव आहे. "निमित्तकर्माचे" म्हणजे निमित्तभावाने प्राप्त होणाऱ्या कर्माचे, स्वतः करण्याच्या किंवा करवून घेण्याच्या अर्थाने नाही. येथे ज्या मांसात 'प्रतीत्यकर्म' (उद्देशून केलेले कर्म) समाविष्ट आहे, त्याला 'प्रतीत्यकर्म' (पटिच्चकम्म) असे म्हणतात, जसे की "ज्याला बुद्धत्व प्राप्त झाले आहे तो बुद्ध". "त्यांचे" म्हणजे निगंठांचे (निर्ग्रंथांचे). इतरही ब्राह्मण इत्यादी त्या मताचे (त्याच विचारसरणीचे) आहेतच. การณนฺติ เอตฺถ ยุตฺติ อธิปฺเปตา, สา เอว จ ธมฺมโต อนเปตตฺตา ‘‘ธมฺโม’’ติ วุตฺตาติ อาห – ‘‘การณํ นาม ติโกฏิปริสุทฺธมจฺฉมํสปริโภโค’’ติ. อนุการณํ นาม มหาชนสฺส ตถา พฺยากรณํ ยุตฺติยา ธมฺมสฺส อนุรูปภาวโต มํสํ ปริภุญฺชิตพฺพนฺติ อนุญฺญาตํ ตเถว กถนนฺติ กตฺวา. ตนฺติ ‘‘ชานํ อุทฺทิสฺสกตํ มํสํ ปริภุญฺชตี’’ติ เอวํ วุตฺตํ ปริภุญฺชนํ เนว การณํ โหติ [Pg.25] สพฺเพน สพฺพํ อภาวโต สติ จ อยุตฺติยํ อธมฺโมติ กตฺวา. ตถา พฺยากรณนฺติ ‘‘ชานํ อุทฺทิสฺสกตํ มํสํ ปริภุญฺชตี’’ติ กถนํ ยุตฺติยา ธมฺมสฺส อนนุรูปภาวโต น อนุการณํ โหติ. ปเรหิ วุตฺตการเณน สการโณ หุตฺวาติ ปเร ติตฺถิยา ‘ชาน’นฺติอาทินา ธมฺมํ กเถนฺติ วทนฺติ, เตน การณภูเตน สการโณ หุตฺวา. เตหิ ตถา วตฺตพฺโพ เอว หุตฺวา ตุมฺหากํ วาโท วา อนุวาโท วา ‘‘มํสํ ปริภุญฺชิตพฺพ’’นฺติ ปวตฺตา ตุมฺหากํ กถา วา ปรโต ปเรหิ ตถา ปวตฺติตา ตสฺสา อนุกถา วา. วิญฺญูหิ ครหิตพฺพการณนฺติ ติตฺถิยา ตาว ติฏฺฐนฺตุ, ตโต อญฺเญหิ ปณฺฑิเตหิ ครหิตพฺพการณํ. โกจิ น อาคจฺฉตีติ ครหิตพฺพตํ น อาปชฺชตีติ อตฺโถ. อภิภวิตฺวา อาจิกฺขนฺตีติ อภิภุยฺย มทฺทิตฺวา กเถนฺติ, อภิภูเตน อกฺโกสนฺตีติ อตฺโถ. "कारण" या संदर्भात योग्य युक्ती (तर्क) अभिप्रेत आहे, आणि ती धर्मापासून विलग नसल्यामुळे तिला "धम्म" म्हटले आहे, म्हणून सांगितले आहे – "कारण म्हणजे त्रिकोटिपरिशुद्ध (तीन प्रकारे शुद्ध असलेल्या) मासे आणि मांसाचे सेवन करणे." "अनुकारण" म्हणजे बहुजनांना तशा प्रकारे स्पष्टीकरण देणे, जे युक्ती आणि धम्माला अनुरूप असल्यामुळे "मांसाचे सेवन करावे" या अनुमतीनुसारच बोलणे होय. "तो (भिक्षू) जाणूनबुजून स्वतःसाठी उद्देशून तयार केलेले मांस खातो" असे जे सेवन सांगितले आहे, ते मुळीच 'कारण' (योग्य युक्ती) असू शकत नाही, कारण ते सर्वथा अयोग्य आणि अधम्म आहे. तसेच, "जाणूनबुजून उद्देशून केलेले मांस खातो" असे स्पष्टीकरण देणे हे युक्ती आणि धम्माला अनुरूप नसल्यामुळे 'अनुकारण' होऊ शकत नाही. "इतरांनी सांगितलेल्या कारणाने सकारण होऊन" म्हणजे इतर तित्थिय (तीर्थंकर/परधर्मीय) 'जाणूनबुजून' इत्यादी शब्दांनी धम्माचे निरूपण करतात, त्या कारणाने सकारण होऊन. त्यांच्याद्वारे तसेच बोलले गेले पाहिजे, तुमचा वाद (मत) किंवा अनुवादाच्या रूपात "मांसाचे सेवन करावे" अशी तुमची चर्चा असो, किंवा इतरांनी नंतर तशीच चालवलेली तिची अनुकथा (अनुवाद) असो. "विज्ञांद्वारे (विद्वानांद्वारे) निंदनीय कारण" म्हणजे तित्थिय तर बाजूला राहोत, परंतु इतर विद्वानांद्वारे (पंडितांद्वारे) निंदा करण्यास योग्य असे कारण. "कोणीही येत नाही" याचा अर्थ निंदनीयतेला प्राप्त होत नाही असा आहे. "अभिभूत करून सांगतात" म्हणजे पराभूत करून, दडपून सांगतात; पराभूत झाल्यामुळे ते आक्रोश करतात असा अर्थ आहे. ๕๒. การเณหีติ ปริโภคจิตฺตสฺส อวิสุทฺธตาเหตูหิ. ภิกฺขู อุทฺทิสฺสกตํ ทิฏฺฐํ. ตาทิสมํสญฺหิ ปริโภคานารหตฺตา จิตฺตอวิสุทฺธิยา การณํ จิตฺตสํกิเลสาวหโต. อิทานิ ทิฏฺฐสุตปริสงฺกิตานิ สรูปโต ทสฺเสตุํ ‘‘ทิฏฺฐาทีสู’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ ตทุภยวิมุตฺตปริสงฺกิตนฺติ ‘‘ทิฏฺฐํ สุต’’นฺติ อิมํ อุภยํ อนิสฺสาย – ‘‘กึ นุ โข อิมํ ภิกฺขุํ อุทฺทิสฺส วธิตฺวา สมฺปาทิต’’นฺติ เกวลเมว ปริสงฺกิตํ. สพฺพสงฺคาหโกติ สพฺเพสํ ติณฺณํ ปริสงฺกิตานํ สงฺคณฺหนโก. ५२. "कारणांनी" म्हणजे उपभोग घेणाऱ्या चित्ताच्या अशुद्धतेच्या हेतूंनी. भिक्षूंना उद्देशून केलेले (प्राणी मारताना) पाहिले असणे. कारण तशा प्रकारचे मांस उपभोगण्यास अयोग्य असल्यामुळे चित्ताच्या अशुद्धतेचे कारण बनते आणि चित्ताला संक्लिष्ट (मलीन) करते. आता पाहिलेले (दिट्ठ), ऐकलेले (सुत) आणि शंका घेतलेले (परिसंकित) यांचे स्वरूप स्पष्ट करण्यासाठी "दिट्ठ आदींमध्ये" इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये "त्या दोन्हीहून मुक्त असलेली शंका" म्हणजे 'पाहिलेले' आणि 'ऐकलेले' या दोन्हीचा आधार न घेता – "काय बरे या भिक्षूला उद्देशून (प्राण्याला) मारून हे तयार केले असेल?" अशी केवळ शंका घेणे होय. "सर्वसंग्राहक" म्हणजे तिन्ही प्रकारच्या शंकांचा संग्रह करणारा. มงฺคลาทีนนฺติ อาทิ-สทฺเทน อาหุนปาหุนาทิกํ สงฺคณฺหาติ. นิพฺเพมติกา โหนฺตีติ สพฺเพน สพฺพํ ปริสงฺกิตาภาวมาห. อิตเรสนฺติ อชานนฺตานํ วฏฺฏติ, ชานโต เอเวตฺถ อาปตฺติ โหติ. เตเยวาติ เย อุทฺทิสฺส กตํ, เตเยว. "मंगळ इत्यादींच्या" यातील 'आदि' शब्दाने आहुन (यज्ञीय भोजन), पाहुन (पाहुणचार) इत्यादींचा संग्रह होतो. "निःशंक होतात" याद्वारे सर्व प्रकारे शंकेचा पूर्ण अभाव असणे सांगितले आहे. "इतरांना" म्हणजे न जाणणाऱ्यांना (ते मांस खाणे) कल्प्य (योग्य) आहे, केवळ जाणणाऱ्यालाच येथे आपत्ती (दोष) प्राप्त होते. "तेच" म्हणजे ज्यांना उद्देशून ते केले गेले आहे, तेच. อุทฺทิสฺสกตมํสปริโภคโต อกปฺปิยมํสปริโภคสฺส วิเสสํ ทสฺเสตุํ ‘‘อกปฺปิยมํสํ ปนา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ปุริมสฺมึ สจิตฺตกา อาปตฺติ, อิตรสฺมึ อจิตฺตกา. เตนาห – ‘‘อกปฺปิยมํสํ อชานิตฺวา ภุตฺตสฺสปิ อาปตฺติเยวา’’ติ. ปริโภคนฺติ ปริภุญฺชิตพฺพนฺติ วทามีติ อตฺโถ. उद्देशून केलेल्या मांसाच्या सेवनापेक्षा अकल्प्य (अयोग्य) मांसाच्या सेवनातील फरक दाखवण्यासाठी "अकल्प्य मांस तर" इत्यादी म्हटले आहे. पहिल्या बाबतीत (उद्देशून केलेल्या मांसात) सचित्तक (जाणूनबुजून केलेली) आपत्ती येते, तर दुसऱ्या बाबतीत अचित्तक (न जाणताही) आपत्ती येते. म्हणूनच म्हटले आहे – "अकल्प्य मांस न जाणता खाल्ले तरीही आपत्ती (दोष) येतेच." "परिभोग" म्हणजे सेवन करावे, असे मी सांगतो असा अर्थ आहे. ๕๓. ตาทิสสฺสาติ ติโกฏิปริสุทฺธสฺส มจฺฉมํสสฺส ปริโภเค. เมตฺตาวิหาริโนปีติ อปิ-สทฺเทน อเมตฺตาวิหาริโนปิ. เมตฺตาวิหาริโน ปริโภเค สิขาปฺปตฺตา อนวชฺชตาติ ทสฺเสตุํ ‘‘อิธ, ชีวก, ภิกฺขู’’ติอาทิ [Pg.26] วุตฺตํ. อนิยเมตฺวาติ อวิเสเสตฺวา สามญฺญโต. ยสฺมา ภควตา – ‘‘ยโต โข, วจฺฉ, ภิกฺขุโน ตณฺหา ปหีนา โหตี’’ติอาทินา มหาวจฺฉโคตฺตสุตฺเต (ม. นิ. ๒.๑๙๔) อตฺตา อนิยเมตฺวา วุตฺโต. ตถา หิ วจฺฉโคตฺโต – ‘‘ติฏฺฐตุ ภวํ โคตโม, อตฺถิ ปน โภโต โคตมสฺส เอกภิกฺขุปิ สาวโก อาสวานํ ขยา…เป… อุปสมฺปชฺช วิหรตี’’ติ อาห, ‘‘อิธ, ภารทฺวาช, ภิกฺขุ อญฺญตรํ คามํ วา นิคมํ วา อุปนิสฺสาย วิหรตี’’ติอาทินา จงฺกีสุตฺเต (ม. นิ. ๒.๔๓๐) อตฺตา อนิยเมตฺวา วุตฺโต. ตถา หิ ตตฺถ ปรโต – ‘‘ยํ โข ปน อยมายสฺมา ธมฺมํ เทเสติ, คมฺภีโร โส ธมฺโม ทุทฺทโส ทุรนุโพโธ สนฺโต ปณีโต อตกฺกาวจโร นิปุโณ ปณฺฑิตเวทนีโย, น โส ธมฺโม สุเทสนีโย ลุทฺเทนา’’ติอาทินา เทสนา อาคตา, ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘ภควตา หิ มหาวจฺฉโคตฺตสุตฺเต, จงฺกีสุตฺเต อิมสฺมึ สุตฺเตติ ตีสุ ฐาเนสุ อตฺตานํเยว สนฺธาย เทสนา กตา’’ติ. มํสูปเสจโนว อธิปฺเปโต มจฺฉมํสสหิตสฺส อาหารสฺส ปริโภคภาวโต มจฺฉมํสสฺส จ อิธ อธิปฺเปตตฺตา. ५३. "तशा प्रकारच्या" म्हणजे त्रिकोटिपरिशुद्ध मासे आणि मांसाच्या सेवनाबाबत. "मैत्रीविहारी देखील" यातील 'अपि' (देखील) शब्दाने मैत्रीविहार न करणाऱ्याचाही समावेश होतो. मैत्रीविहारी भिक्षूच्या सेवनामध्ये निर्दोषता शिखरावर पोहोचलेली असते, हे दर्शवण्यासाठी "येथे, जीवक, भिक्षू" इत्यादी म्हटले आहे. "अनियमित करून" म्हणजे विशेष न करता सामान्य रूपाने. कारण भगवंतांनी – "जेव्हा, वच्छ, भिक्षूची तृष्णा नष्ट होते" इत्यादींद्वारे महावच्छगोत्त सुत्तात (म. नि. २.१९४) स्वतःचा उल्लेख सामान्य रूपाने (अनियमित करून) केला आहे. तसेच वच्छगोत्त म्हणाला – "हे गौतम, हे राहू द्या, पण आपल्या गौतम गोत्राच्या श्रावकांमध्ये असा एकही भिक्षू आहे का, जो आसवांचा क्षय करून... विहरत आहे?" आणि "येथे, भारद्वाज, भिक्षू एखाद्या गावाचा किंवा नगराचा आश्रय घेऊन विहरतो" इत्यादींद्वारे चंकी सुत्तात (म. नि. २.४३०) स्वतःचा उल्लेख सामान्य रूपाने केला आहे. कारण तेथे पुढे – "हा आयुष्यमान जो धम्म उपदेशितो, तो धम्म गंभीर, दुर्दर्श (पाहण्यास कठीण), दुरनुबोध (समजण्यास कठीण), शांत, प्रणीत, अतर्कावचर (तर्काच्या पलीकडचा), निपुण आणि पंडितांनाच समजणारा आहे, तो धम्म लोभी माणसाला चांगल्या प्रकारे उपदेशित करता येत नाही" इत्यादी उपदेश आला आहे, म्हणूनच म्हटले आहे – "भगवंतांनी महावच्छगोत्त सुत्त, चंकी सुत्त आणि या सुत्तात अशा तीन ठिकाणी स्वतःलाच उद्देशून उपदेश केला आहे." येथे मांसाचे कालवण (मांसूपसेचन) च अभिप्रेत आहे, कारण मासे आणि मांसासह असलेल्या आहाराचे सेवन करणे आणि येथे मासे व मांसच अभिप्रेत असल्यामुळे. อคถิโต อปฺปฏิพทฺโธ. ตณฺหามุจฺฉนายาติ ตณฺหายนวเสน มุจฺฉาปตฺติยา. อนชฺโฌปนฺโน ตณฺหาย อภิภวิตฺวา น อชฺโฌตฺถโฏ, คิลิตฺวา ปรินิฏฺฐเปตฺวา น สณฺฐิโตติ อตฺโถ. เตนาห – ‘‘สพฺพํ อาลุมฺปิตฺวา’’ติอาทิ. อิธ อาทีนโว อาหารสฺส ปฏิกูลภาโวติ อาห ‘‘เอกรตฺติวาเสนา’’ติอาทิ. อยมตฺโถ อาหารปริโภโคติ อตฺถสํโยชนปริจฺเฉทิกา ‘‘ยาวเทว อิมสฺส กายสฺส ฐิติยา’’ติอาทินา (ที. นิ. ๓.๑๘๒; ม. นิ. ๑.๒๓; ๒.๒๔; ๓.๗๕; สํ. นิ. ๔.๑๒๐) ปวตฺตา อาหารปฏิพทฺธฉนฺทราคนิสฺสรณภูตา ปญฺญา อสฺส อตฺถีติ นิสฺสรณปญฺโญ. อิทมตฺถนฺติ เอตมตฺถาย. เอวํ สนฺเตติ ‘‘พฺรหฺมาติ จ เมตฺตาวิหาริโน สมญฺญา’’ติ อวตฺวา เย ธมฺมา เมตฺตาวิหารสฺส ปฏิปกฺขภูตา, ตตฺถ สาวเสสํ ปหาสิ พฺรหฺมา, อนวเสสํ ปหาสิ ภควาติ สเจ เต อิทํ สนฺธาย ภาสิตํ, เอวํ สนฺเต ตว อิทํ ยถาวุตฺตวจนํ อนุชานามิ, น เมตฺตาวิหาริตาสามญฺญมตฺตโตติ อตฺโถ. अनासक्त, अबद्ध (गुंतलेला नसलेला). 'तण्हामुच्छनाय' (तृष्णेच्या मोहाने) म्हणजे तृष्णेच्या वशतेमुळे मोहात पडणे. 'अनज्झोपन्नो' (अनासक्त) म्हणजे तृष्णेने पराभूत न होता तिच्या आहारी न जाणे, गिळून (आहार घेऊन) त्यातच मग्न न राहणे असा अर्थ आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - "सर्व घास घेऊन" इत्यादी. येथे आहाराचा दोष आणि त्याची प्रतिकूलता दर्शवण्यासाठी "एका रात्रीच्या वास्तव्याने" इत्यादी म्हटले आहे. हा अर्थ आहाराच्या उपभोगाशी संबंधित आहे. "केवळ या शरीराच्या स्थितीसाठी" इत्यादी सूत्रांद्वारे (दी. नि. ३.१८२; म. नि. १.२३; २.२४; ३.७५; सं. नि. ४.१२०) प्रवृत्त झालेली, आहाराशी संबंधित छंद-रागापासून (इच्छा-आसक्तीपासून) मुक्त करणारी प्रज्ञा ज्याच्याकडे आहे, तो 'निस्सरणपञ्ञो' (मुक्तीची प्रज्ञा असलेला) होय. 'इदमत्थं' म्हणजे या अर्थासाठी. असे असताना, "मैत्रीविहारी (मैत्रीभावाने राहणारा) व्यक्तीला 'ब्रह्मा' अशी संज्ञा आहे" असे न म्हणता, जे धर्म मैत्रीविहाराच्या विरोधी आहेत, त्यातील काही भागाचा त्याग ब्रह्माने केला, परंतु भगवंतांनी त्यांचा पूर्णपणे (निरवशेष) त्याग केला आहे, असे जर तुम्ही या संदर्भाने म्हटले असेल, तर मी तुमच्या या विधानाचा स्वीकार करतो, केवळ मैत्रीविहाराच्या सामान्य गुणधर्मामुळे नाही, असा अर्थ आहे. ๕๕. ‘‘ปาฏิเยกฺโก [Pg.27] อนุสนฺธี’’ติ วตฺวา วิสุํ อนุสนฺธิภาวํ ทสฺเสตุํ ‘‘อิมสฺมึ หี’’ติอาทิ วุตฺตํ. ทฺวารํ ถเกตีติ มจฺฉมํสปริโภคานุญฺญาย อญฺเญสํ วจนทฺวารํ ปิทหติ, โจทนาปถํ นิรุนฺธติ. กถํ สตฺตานุทฺทยํ ทสฺเสติ? สตฺตานุทฺทยมุเขน พาหิรกานํ มจฺฉมํสปริโภคปฏิกฺเขโป ตยิทํ มิจฺฉา, ติโกฏิปริสุทฺธสฺเสว มจฺฉมํสสฺส ปริโภโค ภควตา อนุญฺญาโต. ตถา หิ วุตฺตํ – ‘ตีหิ โข อหํ, ชีวก, ฐาเนหิ มํสํ ปริโภคนฺติ วทามี’ติอาทิ (ม. นิ. ๒.๕๒). วินเยปิ (ปารา. ๔๐๙; จูฬว. ๓๔๓) วุตฺตํ – ‘‘ติโกฏิปริสุทฺธํ, เทวทตฺต, มจฺฉมํสํ มยา อนุญฺญาต’’นฺติ. ติโกฏิปริสุทฺธญฺจ ภุญฺชนฺตานํ สตฺเตสุ อนุทฺทยา นิจฺจลา. ‘‘สตฺตานุทฺทยํ ทสฺเสตี’’ติ สงฺเขปโต วุตฺตมตฺถํ วิวรนฺโต ‘‘สเจ หี’’ติอาทิมาห. ५५. "स्वतंत्र संदर्भ (अनुसंधि)" असे सांगून, वेगळा संदर्भ दर्शवण्यासाठी "यामध्येच" इत्यादी म्हटले आहे. "द्वार बंद करतो" म्हणजे मासे आणि मांस खाण्याच्या परवानगीने इतरांच्या बोलण्याचे द्वार बंद करतो, आक्षेपाचा मार्ग रोखतो. प्राण्यांबद्दलची दया कशी दर्शवतो? प्राण्यांवरील दयेच्या निमित्ताने बाहेरील लोकांचा (इतर पंथीयांचा) मासे आणि मांस खाण्यास असलेला विरोध हा चुकीचा आहे, कारण भगवंतांनी केवळ 'तिकोटिपरिसुद्ध' (तीन प्रकारे शुद्ध असलेल्या) मासे आणि मांसाच्या उपभोगालाच अनुमती दिली आहे. कारण असे म्हटले आहे - "हे जीवक, मी तीन कारणांनी मांस उपभोगण्यास योग्य आहे असे सांगतो" इत्यादी (म. नि. २.५२). विनयपिटकातही (पारा. ४०९; चुळ्ळव. ३४३) म्हटले आहे - "हे देवदत्त, मी तीन प्रकारे शुद्ध (तिकोटिपरिसुद्ध) असलेले मासे आणि मांस खाण्यास अनुमती दिली आहे." आणि तीन प्रकारे शुद्ध असलेले अन्न ग्रहण करणाऱ्यांची प्राण्यांबद्दलची दया स्थिर (अविचल) असते. "प्राण्यांबद्दलची दया दर्शवतो" या संक्षेपाने सांगितलेल्या अर्थाचे स्पष्टीकरण करताना "जर खरोखर" इत्यादी म्हटले आहे. ปฐเมน การเณนาติ เทสนาวเสนปิ ปโยควเสนปิ ปฐเมน ปรูปฆาตเหตุนา. กฑฺฒิโต โส ปาโณ. คเลน ปเวเธนฺเตนาติ โยตฺตคเลน กรเณน อสยฺหมาเนน. พหุปุญฺญเมว โหติ อาสาทนาเปกฺขาย อภาวโต, หิตชฺฌาสยตฺตา วาติ อธิปฺปาโย. เอสาหํ, ภนฺเตติอาทิ กสฺมา วุตฺตํ, สรณคมนวเสเนว คหิตสรโณติ โจทนํ สนฺธายาห ‘‘อย’’นฺติอาทิ. โอคาหนฺโตติอาทิโต ปฏฺฐาย ยาว ปริโยสานา สุตฺตํ อนุสฺสรนฺโต อตฺถํ อุปธาเรนฺโต. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. "पहिल्या कारणाने" म्हणजे उपदेशाच्या दृष्टीने किंवा प्रयोगाच्या (कृतीच्या) दृष्टीने, दुसऱ्याला इजा पोहचवण्याच्या पहिल्या कारणाने. तो प्राणी ओढला गेला. "गळ्याने थरथरत असताना" म्हणजे दोरीने गळा आवळल्यामुळे असह्य वेदना होत असताना. आस्वाद घेण्याच्या इच्छेचा अभाव असल्यामुळे आणि कल्याणाची भावना असल्यामुळे मोठे पुण्यच मिळते, असा अभिप्राय आहे. "हे भंते, मी हा..." इत्यादी का म्हटले आहे? केवळ शरण गमनाच्या द्वारेच शरण घेतलेले आहे, या आक्षेपाचा संदर्भ घेऊन "हा" इत्यादी म्हटले आहे. "प्रवेश करत असताना" इत्यादीपासून सुरुवात करून शेवटपर्यंत सूत्राचे स्मरण करत आणि अर्थाचे चिंतन करत. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. ชีวกสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. जीवकसुत्ताच्या वर्णनावरील लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๖. อุปาลิสุตฺตวณฺณนา ६. उपालिसुत्त-वर्णना ๕๖. ปาวารํ ปารุปตีติ ปาวาริโก, อิทํ ตสฺส กุลสมุทาคตํ นามํ, โส ปน มหทฺธโน มหาโภโค นคเร เสฏฺฐิฏฺฐาเน ฐิโต. เตนาห ‘‘ทุสฺสปาวาริกเสฏฺฐิโน’’ติ. ทีฆตฺตา ทีฆตมตฺตา. โส กิร ปมาณโต อุปวจฺฉยโต ทิยฑฺฒรตนํ อติกฺกมฺม ฐิโต. เอวํลทฺธนาโมติ ‘‘ทีฆตปสฺสี’’ติ ลทฺธสมญฺโญ. พาหิรายตเนติ ติตฺถิยสมเย ปิณฺฑปาโตติ โวหาโร นตฺถิ, ตสฺมา สาสนโวหาเรน ‘‘ปิณฺฑปาตปฺปฏิกฺกนฺโต’’ติ วุตฺตนฺติ อธิปฺปาโย. ५६. "पावार (एक प्रकारचे वस्त्र) परिधान करतो म्हणून पावारिक", हे त्याचे कुळाकडून आलेले नाव आहे. तो अत्यंत श्रीमंत, महाभोगी आणि नगरात श्रेष्ठ (शेटजी) पदावर प्रतिष्ठित होता. म्हणूनच "दुस्सपावारिक श्रेष्ठि" (वस्त्र-पावारिक शेटजी) असे म्हटले आहे. "दीघत्ता" म्हणजे दीर्घ तपस्वी असणे. तो आकाराने आणि उंचीने दीड हातापेक्षा जास्त उंच होता असे म्हणतात. अशा प्रकारे नाव मिळालेला, म्हणजेच "दीघतपस्सी" (दीर्घतपस्वी) अशी संज्ञा मिळालेला. बाह्य संप्रदायांमध्ये (तीर्थिकांच्या काळात) 'पिंडपात' असा व्यवहार (शब्दप्रयोग) नाही, म्हणून बुद्ध शासनाच्या व्यवहाराने "पिंडपाताहून परतलेला" असे म्हटले आहे, असा अभिप्राय आहे. ทสฺเสตีติ [Pg.28] เทเสติ. ฐเปตีติ อญฺญมญฺญสงฺกรโต ววตฺถเปติ. กิริยายาติ กรเณน. ปวตฺติยาติ ปวตฺตเนน. ทณฺฑานิ ปญฺญเปตีติ เอตฺถ กสฺมา ภควตา อาทิโตว ตถา น ปุจฺฉิตนฺติ? ยสฺมา สา ตสฺมึ อตฺเถ สภาวนิรุตฺติ น โหติ, สาสเน โลเก สมยนฺตเรสุ จ ตาทิโส สมุทาจาโร นตฺถิ, เกวลํ ปน ตสฺเสว นิคณฺฐสฺสายํ โกฏฺฐาลกสทิโส สมุทาจาโรติ อิมมตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘กมฺมานิ ปญฺญเปติ’’ อิจฺเจวาห. อจิตฺตกนฺติ จิตฺตรหิตํ, จิตฺเตน อสมุฏฺฐาปิตนฺติ อตฺโถ. กถํ ปน ตทุภยสฺส จิตฺเตน วินา สมฺภโวติ โจทนํ สนฺธาย ตตฺถ นิทสฺสนมาห ‘‘ยถา กิรา’’ติอาทิ. ปฏิวิภตฺตานนฺติ อตฺถโต ภินฺนานํ. ปฏิวิสิฏฺฐานนฺติ วิเสสนปทวเสน สทฺทโตปิ ภินฺนานํ. วจนํ ปติฏฺฐเปตุกาโมติ ทีฆตปสฺสิโน ยถาวุตฺตวจนํ ปติฏฺฐเปตุกาโม. ตสฺมิญฺหิ ปติฏฺฐาปิเต เตนปฺปสงฺเคน อาคโต, อุปาลิ คหปติ ตสฺมึ ปเทเส ธมฺมํ ทิสฺวา สาสเน อภิปฺปสีทิสฺสติ. "दर्शवतो" म्हणजे उपदेश करतो. "प्रस्थापित करतो" म्हणजे एकमेकांशी संकर न करता निश्चित करतो. "क्रियेने" म्हणजे करण्याने. "प्रवृत्तीने" म्हणजे चालवण्याने. "दंडांची घोषणा करतो" येथे भगवंतांनी सुरुवातीलाच तसे का विचारले नाही? कारण त्या अर्थामध्ये ती स्वाभाविक व्याख्या होत नाही, बुद्ध शासनात, जगात आणि इतर संप्रदायांमध्ये तसा व्यवहार नाही, केवळ त्या निगंठाचाच (निर्ग्रंथाचाच) हा कोठडीसारखा व्यवहार आहे, हा अर्थ दर्शवण्यासाठी "कर्मांची घोषणा करतो" असेच म्हटले आहे. "अचित्तक" म्हणजे चित्तरहित, चित्ताने उत्पन्न न झालेले असा अर्थ आहे. परंतु त्या दोन्ही गोष्टी चित्ताशिवाय कशा शक्य आहेत, या आक्षेपाचा संदर्भ घेऊन तेथे उदाहरण देण्यासाठी "जसे की" इत्यादी म्हटले आहे. "विभक्त केलेल्या" म्हणजे अर्थाच्या दृष्टीने भिन्न असलेल्या. "विशिष्ट" म्हणजे विशेषण पदांच्या द्वारे शब्दाच्या दृष्टीनेही भिन्न असलेल्या. "वचन प्रस्थापित करण्याची इच्छा असलेला" म्हणजे दीघतपस्सीचे पूर्वोक्त वचन प्रस्थापित करण्याची इच्छा असलेला. कारण ते प्रस्थापित झाल्यावर, त्या निमित्ताने आलेले उपालि गृहपती त्या ठिकाणी धम्माचे दर्शन घेऊन बुद्ध शासनावर अत्यंत प्रसन्न होतील. กถา เอว อุปริ วาทาโรปนสฺส วตฺถุภาวโต กถาวตฺถุ. กถายํ ปติฏฺฐเปสีติ กถาวตฺถุสฺมึ, ตทตฺเถ วา ปติฏฺฐเปสิ. ยถา ตํ วาทาโรปนภเยน น อวชานาติ, เอวํ ตสฺสํ กถายํ, ตสฺมึ วา อตฺเถ ทีฆตปสฺสึ ยาวตติยํ วาเท ปติฏฺฐเปสิ. วาทนฺติ โทสํ. कथाच पुढे वादाचा आधार बनत असल्यामुळे तिला 'कथावस्तू' म्हटले आहे. "कथेत प्रस्थापित केले" म्हणजे कथावस्तूमध्ये किंवा त्याच्या अर्थामध्ये प्रस्थापित केले. वाद उभा राहण्याच्या भीतीने तो नकार देणार नाही, अशा प्रकारे त्या कथेत किंवा त्या अर्थामध्ये दीघतपस्सीला तीन वेळा वादात प्रस्थापित केले. "वाद" म्हणजे दोष. ๕๗. อิทานิ เจตนาสมฺปยุตฺตธมฺมมฺปิ คเหตฺวา กายกมฺมาทิวเสน สงฺคเหตฺวา ทสฺเสตุํ ‘‘อปิจา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ ติวิธํ กายทุจฺจริตํ กายกมฺมํ นามาติอาทิ ‘‘กมฺมสฺส กิริยายา’’ติ ปาฬิยํ อกุสลกมฺมสฺส อธิคตตฺตา วุตฺตํ, ปุพฺเพ ปน อฏฺฐกามาวจรกุสลเจตนาติอาทิ สาวชฺชํ อนวชฺชญฺจ สามญฺญโต เอกชฺฌํ กตฺวา ทสฺสิตํ. กสฺมา ปเนตฺถ เจตนา น คหิตาติ อาห ‘‘อิมสฺมึ สุตฺเต กมฺมํ ธุร’’นฺติ. กายกมฺมาทิเภทํ กมฺมเมว ธุรํ เชฏฺฐกํ ปุพฺพงฺคมํ, น เจตนามตฺตเมว. เอวมาคเตปีติ กมฺมานีติ เอวํ นาเมน อาคเตปิ เจตนา ธุรํ, ตตฺถ เจตนํ เชฏฺฐกํ ปุพฺพงฺคมํ กตฺวา วุตฺตนฺติ อธิปฺปาโย. กถํ ปน ตตฺถ กมฺมนฺติ วา กมฺมานีติ วา อาคเต เตสํ เจตนาย ธุรภาโวติ อาห ‘‘ยตฺถ กตฺถจิ…เป… ลภตี’’ติ. ตตฺถ ยตฺถ กตฺถจีติ ยสฺมึ กิสฺมิญฺจิ ทฺวาเร. สา วุตฺตาวาติ สา เจตนา วุตฺตาว, ยา กายสงฺขาราทิปริยาเยน (ยสฺส กสฺสจิ กมฺมสฺส กายทฺวาราทีสุ ปวตฺตาปนเจตนา) สมฺปยุตฺตธมฺมาปิ [Pg.29] ตทคฺเคน โลกิยาปิ โลกุตฺตราปิ กมฺมเมว, อภิชฺฌาทโย ปน เจตนาปกฺขิกาติ ทฏฺฐพฺพํ. ५७. आता चेतनासंप्रयुक्त धर्मांनाही घेऊन, कायकर्मादींच्या रूपाने संग्रह करून दाखवण्यासाठी "अपि च" (शिवाय) इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये त्रिविध कायदुश्चरित हे 'कायकर्म' आहे इत्यादी "कम्मस्स क्रियाय" (कर्माच्या क्रियेने) असे पाळीमध्ये अकुशल कर्माच्या प्राप्तीमुळे म्हटले आहे. परंतु पूर्वी आठ कामावचर कुशल चेतना इत्यादी सावद्य (दोषयुक्त) आणि अनवद्य (दोषरहित) यांना सामान्यतः एकत्रित करून दाखवले आहे. परंतु येथे चेतना का घेतली नाही? म्हणून म्हटले आहे - "या सुत्तात कर्म हेच मुख्य (धुर) आहे." कायकर्मादी भेदांचे कर्मच मुख्य, ज्येष्ठ आणि पूर्वंगम (अग्रगामी) आहे, केवळ चेतनाच नाही. "असे आले तरी" म्हणजे 'कर्मे' अशा नावाने आले तरी चेतनाच मुख्य आहे, तिथे चेतनेला ज्येष्ठ आणि पूर्वंगम करून सांगितले आहे असा अभिप्राय आहे. परंतु तिथे 'कर्म' किंवा 'कर्मे' असे आले असता, त्यांची चेतना कशी मुख्य होते? म्हणून म्हटले आहे - "जिथे कुठे...पे... लाभते." तिथे 'जिथे कुठे' म्हणजे कोणत्याही द्वारात. "ती सांगितलीच आहे" म्हणजे ती चेतना सांगितलीच आहे, जी कायसंस्कारादी पर्यायाने (ज्या कोणत्याही कर्माची कायद्वारादींमध्ये प्रवृत्त करणारी चेतना आहे) संप्रयुक्त धर्म देखील त्या अग्रभागाने लौकिक असो वा लोकोत्तर असो, कर्मच आहे; परंतु अभिध्या (लोभ) इत्यादी चेतनापक्षाचे आहेत असे समजावे. มหนฺตนฺติ กฏุกผลํ. น กิลมติ สปฺปาฏิหาริยตฺตา ปฏิญฺญาย. อิทานิ เตสํ สปฺปาฏิหาริยตํ ทสฺเสตุํ ‘‘ตถา หี’’ติอาทิ วุตฺตํ. ยทิ อกุสลํ ปตฺวา กายกมฺมํ วจีกมฺมํ มหนฺตนฺติ วทนฺโต น กิลมติ, อถ กสฺมา ภควา อิธ อกุสลํ มโนกมฺมํ มหาสาวชฺชํ กเถสีติ อาห ‘‘อิมสฺมึ ปน ฐาเน’’ติอาทิ. ยาวตติยํ ปติฏฺฐาปนมตฺเตน คตมคฺคํ ปฏิปชฺชนฺโต. เตนาห ‘‘กิญฺจิ อตฺถนิปฺผตฺตึ อปสฺสนฺโตปี’’ติ. "महंत" (मोठे) म्हणजे कटू फळ देणारे. प्रातिहार्ययुक्त (प्रभावशाली) प्रतिज्ञेमुळे तो थकत नाही. आता त्यांची प्रातिहार्यता दाखवण्यासाठी "तथा हि" (तसेच) इत्यादी म्हटले आहे. जर अकुशल प्राप्त झाल्यावर कायकर्म आणि वचीकर्म मोठे आहे असे म्हणताना तो थकत नाही, तर मग भगवंतांनी येथे अकुशल मनोकर्म महासावद्य (मोठे दोषयुक्त) का सांगितले? म्हणून म्हटले आहे - "या स्थानावर तर" इत्यादी. तिसऱ्यांदा प्रस्थापित करण्याच्या केवळ मार्गाने गेलेल्या मार्गावर चालणारा. म्हणूनच म्हटले आहे - "कोणतीही अर्थनिष्पत्ती (फळ) न पाहताही." ๕๘. นิวาสฏฺฐานภูโต พาลโก เอติสฺสา อตฺถีติ พาลกินี. สตฺถุปฏิญฺญาตตาย นิคณฺฐานํ มหาติ สมฺภาวิตตฺตา มหานิคณฺโฐ. ५८. जिचे निवासस्थान बालक आहे ती 'बालकिनी' होय. शास्त्यांनी (बुद्धांनी) प्रतिज्ञा केल्यामुळे निगंठांमध्ये महान अशी मान्यता असल्यामुळे 'महानिगंठ' होय. ๖๐. อาวฏฺเฏติ ปุริมาการโต นิวตฺเตติ อตฺตโน วเส วตฺเตติ เอตายาติ อาวฏฺฏนี, มายา. เตนาห ‘‘อาวฏฺเฏตฺวา คหณมาย’’นฺติ. สตฺถุปฏิญฺญานํ พุทฺธทสฺสเน จิตฺตเมว น อุปฺปชฺชติ, อยเมตฺถ ธมฺมตา. สเจ ปน โส ตํ ปฏิญฺญํ อปฺปหาย พุทฺธานํ สมฺมุขีภาวํ อุปคจฺเฉยฺย, สตฺตธา มุทฺธา ผเลยฺย, ตสฺมา ภควา ‘‘มา อยํ พาโล วินสฺสี’’ติอาทิโตว ยถา สมฺมุขีภาวํ น ลภติ, ตถา กโรติ. สฺวายมตฺโถ ปาถิกปุตฺตสมาคเมน ทีเปตพฺโพ. ทสฺสนสมฺปตฺตินิยามมาห ‘‘ตถาคตํ หี’’ติอาทิ. อาคมา นุ โข อิธ ตุมฺหากํ สนฺติกํ. ६०. जी पूर्व स्थितीपासून वळवते, स्वतःच्या वशमध्ये करते ती 'आवर्त्तनी' म्हणजे माया (जादू) होय. म्हणूनच म्हटले आहे - "आवर्त्तित करून (वळवून) ग्रहण करण्याची माया." शास्त्यांची प्रतिज्ञा करणाऱ्यांच्या मनात बुद्धदर्शनाची इच्छाच उत्पन्न होत नाही, हा येथील स्वभाव (धम्मता) आहे. परंतु जर त्याने ती प्रतिज्ञा न सोडता बुद्धांच्या संमुख जाण्याचा प्रयत्न केला, तर त्याचे मस्तक सात तुकड्यांत फुटेल; म्हणूनच भगवंतांनी "हा मूर्ख नष्ट होऊ नये" म्हणून सुरुवातीपासूनच तो संमुख येऊ शकणार नाही अशी व्यवस्था केली. हाच अर्थ पाथिकपुत्त समागमाने स्पष्ट केला पाहिजे. दर्शनसंपत्तीचा नियम सांगताना म्हटले आहे - "तथागतांनाच" इत्यादी. तुम्ही येथे त्यांच्या जवळ आलात काय? ๖๑. วจีสจฺเจ ปติฏฺฐหิตฺวาติ ยถาปฏิญฺญาตาย ปฏิญฺญาย ฐตฺวา. ६१. "वचीसच्चात (वाणीच्या सत्यात) प्रतिष्ठित होऊन" म्हणजे प्रतिज्ञा केल्याप्रमाणे प्रतिज्ञेवर ठाम राहून. ๖๒. สีโตทเก อมตา ปาณา ปานกาเล ปน มรนฺติ, เตปิ เตน สีโตทกปริโภเคน มาริตา โหนฺติ, ตสฺมา ตปสฺสินา นาม สพฺเพน สพฺพํ สีโตทกํ น ปริภุญฺชิตพฺพนฺติ เตสํ ลทฺธิ. ปากติกํ วา อุทกํ สตฺโตติ ปุราตนานํ นิคณฺฐานํ ลทฺธิ. เตนาห ‘‘สตฺตสญฺญาย สีโตทกํ ปฏิกฺขิปนฺตี’’ติ. เตสํ ตํ อธุนาตนนิคณฺฐานํ วาเทน วิรุชฺฌติ. เต หิ ปถวีอาทินวปทตฺถโต อญฺญเมว ชีวิตํ ปฏิชานนฺติ. จิตฺเตน สีโตทกํ ปาตุกาโม ปริภุญฺชิตุกาโม โหติ โรเค ฐตฺวาปิ สตฺตานํ จิตฺตสฺส ตถา น วิตตตา. เตนาห – ‘‘เตนสฺส มโนทณฺโฑ ตตฺเถว ภิชฺชตี’’ติ. เตนาติ สีโตทกํ ปาตุํ ปริภุญฺชิตุญฺจ อิจฺฉเนน. อสฺสาติ ยถาวุตฺตสฺส นิคณฺฐสฺส. ตตฺเถวาติ ตถาจิตฺตุปฺปาทเน เอว. ภิชฺชติ สํวรสฺส วิโกปิตตฺตา. ตถาภูโต โส นิคณฺโฐ สีโตทกํ [Pg.30] เจ ลเภยฺย, กติปยํ กาลํ ชีเวยฺย, อลาเภน ปน ปริสุสฺสมานกณฺโฐฏฺฐตาลุชิวฺหาอาทิโก สพฺพโส ปริทาหาภิภูโต มเรยฺย. เตนาห – ‘‘สีโตทกํ อลภมาโน กาลํ กเรยฺยา’’ติ. กสฺมา? ยสฺมา สีโตทกํ ปิวาย สนฺนิสฺสิตจิตฺตสฺส มรณํ โหติ, ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘มโนทณฺโฑ ปน ภินฺโนปิ จุติมฺปิ อากฑฺฒตี’’ติ. ยสฺมา ปน ตถาภูตจิตฺตสฺส นิคณฺฐสฺส มโนสตฺเตสุ นาม เทเวสุ อุปปตฺติ โหตีติ ติตฺถิยานํ ลทฺธิ, ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘มโนทณฺโฑ ปน ภินฺโนปิ ปฏิสนฺธิมฺปิ อากฑฺฒตี’’ติ. อิตีติ เอวํ ‘‘อิธาสฺส นิคณฺโฐ’’ติอาทิอากาเรน. นนฺติ อุปาลึ คหปตึ. มหนฺโตติ วทาเปสิ ‘‘มโนปฏิพทฺโธ กาลงฺกโรตี’’ติ วทนฺโตติ อธิปฺปาโย. ६२. शीतोदकात (थंड पाण्यात) न मारलेले प्राणी पिण्याच्या वेळी मरतात, ते देखील त्या शीतोदकाच्या उपभोगाने मारले जातात, म्हणून तपस्व्याने सर्व प्रकारे शीतोदकाचा उपभोग घेऊ नये, हे त्यांचे मत (लद्धि) आहे. किंवा नैसर्गिक पाणी हाच जीव आहे, हे प्राचीन निगंठांचे मत आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - "सत्त्वसंज्ञेने (जीव समजून) शीतोदकाचा त्याग करतात." त्यांचे हे मत आधुनिक निगंठांच्या वादाशी विरुद्ध आहे. कारण ते पृथ्वी इत्यादी नऊ पदार्थांपेक्षा वेगळाच जीव मानतात. मनाने शीतोदक पिण्याची, उपभोगण्याची इच्छा असते, आजारी असतानाही प्राण्यांच्या मनाचा तसा विस्तार होत नाही. म्हणूनच म्हटले आहे - "त्यामुळे त्याचा मनोदंड तिथेच भंग पावतो." 'त्यामुळे' म्हणजे शीतोदक पिण्याची आणि उपभोगण्याची इच्छा केल्यामुळे. 'त्याचा' म्हणजे वर सांगितलेल्या निगंठाचा. 'तिथेच' म्हणजे तशा चित्तोत्पादामध्येच. 'भंग पावतो' म्हणजे संवराचा नाश झाल्यामुळे. तसा झालेला तो निगंठ जर शीतोदक मिळवेल, तर काही काळ जगेल; परंतु न मिळाल्यामुळे कोरडा पडलेला कंठ, ओठ, टाळू, जीभ इत्यादी असलेला, सर्व प्रकारे परिदाहाने (दाहाने) ग्रस्त होऊन मरेल. म्हणूनच म्हटले आहे - "शीतोदक न मिळाल्यामुळे तो काळ करेल (मरेल)." का? कारण शीतोदक पिण्यावर आश्रित असलेल्या चित्ताचा मृत्यू होतो, म्हणूनच म्हटले आहे - "मनोदंड भंग पावला तरी च्युतीला (मृत्यूला) आकर्षित करतो." आणि ज्या अर्थी तशा चित्त असलेल्या निगंठाची 'मनोसत्त' नावाच्या देवांमध्ये उत्पत्ती होते, असे तीर्थिकांचे मत आहे, म्हणूनच म्हटले आहे - "मनोदंड भंग पावला तरी प्रतिसंधीला (पुनर्जन्माला) आकर्षित करतो." 'इति' म्हणजे अशा प्रकारे "येथे त्याचा निगंठ" इत्यादी रूपाने. 'त्याला' म्हणजे उपालि गृहपतीला. "मनाशी बद्ध होऊन काळ करतो" असे म्हणणाऱ्याला 'मोठा' असे वदवले, असा अभिप्राय आहे. อุปาสกสฺสาติ อุปาลิสฺส คหปติสฺส. มุจฺฉาวเสนาติอาทินา อนฺวยโต พฺยติเรกโต จ มโนทณฺฑสฺส มหนฺตตํ วิภาเวติ. จิตฺตสนฺตติปฺปวตฺติมตฺเตเนวาติ วินา กายทณฺเฑน วจีทณฺเฑน จ เกวลํ จิตฺตสนฺตติปฺปวตฺติมตฺเตน. ภิชฺชิตฺวาปีติ เอตฺถ ปิ-สทฺเทน อภิชฺชิตฺวาปิ. อนิยฺยานิกาติ อปฺปาฏิหีรา, อยุตฺตาติ อตฺโถ. สลฺลกฺเขสิ อุปาสโกติ วิภตฺตึ วิปริณาเมตฺวา โยชนา. ปญฺหปฏิภานานีติ ญาตุํ อิจฺฉิเต อตฺเถ อุปฺปชฺชนกปฏิภานานิ. "उपासकाचा" म्हणजे उपालि गृहपतीचा. "मूर्च्छेच्या वशाने" इत्यादीद्वारे अन्वय आणि व्यतिरेक या दोन्ही प्रकारे मनोदंडाचे मोठेपण स्पष्ट केले आहे. "केवळ चित्तसंततीच्या प्रवृत्तीनेच" म्हणजे कायदंड आणि वचीदंडाशिवाय केवळ चित्तसंततीच्या प्रवृत्तीनेच. "भंग पावूनही" येथे 'अपि' शब्दाने 'भंग न पावताही' असा अर्थ होतो. "अनिय्यानिक" म्हणजे अप्रातिहार्य, अयोग्य असा अर्थ आहे. "उपासकाने लक्ष दिले" अशी विभक्ती बदलून योजना करावी. "प्रश्नप्रतिभान" म्हणजे जाणून घेण्याची इच्छा असलेल्या अर्थामध्ये उत्पन्न होणारे प्रतिभान (स्फूर्ती). ‘‘มโนปฏิพทฺโธ กาลํ กโรตี’’ติ วทนฺเตน อตฺถโต มโนทณฺฑสฺส ตทุตฺตรภาโว ปฏิญฺญาโต โหตีติ อาห ‘‘อิทานิ มโนทณฺโฑ มหนฺโตติ อิทํ วจน’’นฺติ. ตถา เจว วุตฺตํ – ‘‘มโนทณฺโฑว พลวา มหนฺโตติ วทาเปสี’’ติ. "मनाशी बद्ध होऊन काळ करतो" असे म्हणणाऱ्याने अर्थतः मनोदंडाचे श्रेष्ठत्व मान्य केले आहे, म्हणूनच म्हटले आहे - "आता मनोदंड मोठा आहे हे वचन." तसेच म्हटले आहे - "मनोदंडच बलवान आणि मोठा आहे असे वदवले." ๖๓. ปาณาติปาตาทิโต ยมนํ ยาโม, จตุพฺพิโธ ยาโม จตุยาโม, จตุยามสงฺขาเตน สํวเรน สํวุโต จาตุยามสํวรสํวุโต. อฏฺฐกถายํ ปน ยาม-สทฺโท โกฏฺฐาสปริยาโยติ ‘‘อิมินา จตุโกฏฺฐาเสนา’’ติ วุตฺตํ. ปิยชาติกํ รูปาทิอารมฺมณํ ราควเสน พาเลหิ ภาวนียตฺตา ‘‘ภาวิต’’นฺติ วุจฺจตีติ อาห ‘‘ภาวิตนฺติ ปญฺจ กามคุณา’’ติ. ६३. प्राणातिपातादींपासून (हिंसेपासून) संयम राखणे म्हणजे 'याम' होय. चार प्रकारचा याम म्हणजे 'चतुर्याम' होय. चतुर्याम संज्ञेच्या संवराने संवृत असलेला तो 'चातुर्यामसंवरसंवृत' होय. परंतु अट्ठकथेमध्ये 'याम' शब्द हा भागाचा (कोठ्ठास) पर्याय आहे, म्हणून "या चार भागांनी" असे म्हटले आहे. प्रिय वाटणारे रूपादी आलंबन रागाच्या वशाने मूर्खांद्वारे भावना करण्यायोग्य असल्यामुळे त्याला "भावित" म्हटले जाते, म्हणूनच म्हटले आहे - "भावित म्हणजे पाच कामगुण." โย สพฺพํ ปาปํ อาสวญฺจ วาเรตีติ สพฺพวารี, ตสฺส นวสุ ปทตฺเถสุ สตฺตโม ปทตฺโถ, เตน สพฺพวารินา ปาปํ วาริตฺวา ฐิโตติ สพฺพวาริวาริโต[Pg.31]. เตนาห ‘‘สพฺเพน ปาปวารเณน วาริตปาโป’’ติ. ตโต เอว สพฺพสฺส วาริตพฺพสฺส อาสวสฺส ธุนนโต สพฺพวาริธุโต. วาริตพฺพสฺส นิวารณวเสน สพฺพวาริโน ผุโฏ ผุสิโตติ สพฺพวาริผุโฏ. สงฺฆาตนฺติ สหสา หนนํ, อสญฺเจตนิกวธนฺติ อตฺโถ. กตรสฺมึ โกฏฺฐาเสติ ตีสุ ทณฺฑโกฏฺฐาเสสุ กตรโกฏฺฐาเส. जो सर्व पाप आणि आसवांचे वारण (प्रतिबंध) करतो तो 'सब्बवारी' (सर्ववारी) होय. त्या नऊ पदार्थांपैकी हा सातवा पदार्थ आहे. त्या सर्ववारीने पापाचे वारण करून जो स्थित आहे तो 'सब्बवारिवारितो' (सर्ववारिवारित) होय. म्हणूनच म्हटले आहे - 'सर्व प्रकारच्या पापनिवारणाने ज्याचे पाप निवारित झाले आहे.' म्हणूनच, वारण करण्यास योग्य अशा सर्व आसवांचा नाश केल्यामुळे (धुतल्यामुळे) तो 'सब्बवारिधुतो' (सर्ववारिधुत) होय. वारण करण्याजोग्या पापांच्या निवारण रूपाने सर्ववारीने जो स्पर्शित झाला आहे तो 'सब्बवारिप्फुटो' (सर्ववारिस्पृष्ट) होय. 'संघात' म्हणजे अचानक मारणे, अजाणतेपणे केलेला वध असा अर्थ आहे. 'कतरस्मिं कोट्ठासे' म्हणजे तीन दण्डभागांपैकी कोणत्या भागात. ๖๔. ขลิยติ สมาทิยตีติ ขลํ, ราสีติ อาห – ‘‘เอกํ มํสขลนฺติ เอกํ มํสราสิ’’นฺติ. วิชฺชาธรอิทฺธิยา อิทฺธิมา. สา ปน อิทฺธิ ยสฺมา อานุภาวสมฺปนฺนสฺเสว อิชฺฌติ, น ยสฺส กสฺสจิ. ตสฺมา อาห ‘‘อานุภาวสมฺปนฺโน’’ติ. วิชฺชานุภาววเสเนว อานุภาวสมฺปนฺโน. จิตฺเต วสีภาวปฺปตฺโต อานุภาวาย เอว วิชฺชาย ปคุณภาวาปาทเนน. เอเตน วสีภาวํ โลกิยสมญฺญาวเสน ภควา อุปาลึ คหปตึ ปญฺญเปตุกาโม เอวมาห. โลกิกา หิ ‘‘ภาวนามยอิทฺธิยา อิทฺธิมา เจโตวสีภาวปฺปตฺโต ปรูปฆาตํ กโรตี’’ติ มญฺญนฺติ. ตถา หิ เต อิสโย ปเรสํ สํวณฺเณนฺติ, อิสีนํ อานุภาวํ กิตฺเตนฺติ. ยํ ปเนตฺถ วตฺตพฺพํ, ตํ ปรโต อาคมิสฺสตีติ. ६४. जे गोळा केले जाते किंवा एकत्र केले जाते ते 'खल' (रास) होय. म्हणून म्हटले आहे - 'एकं मंसखलं' म्हणजे एक मांसाचा ढीग. विद्याधर ऋद्धीने युक्त तो ऋद्धिमान होय. परंतु ती ऋद्धी केवळ प्रभावसंपन्न व्यक्तीलाच प्राप्त होते, इतर कोणालाही नाही. म्हणूनच म्हटले आहे - 'अनुभावसंपन्न' (प्रभावशाली). विद्येच्या प्रभावामुळेच तो प्रभावसंपन्न आहे. प्रभावासाठीच विद्येचा सराव करून चित्तावर वशित्व प्राप्त केलेला. या वशित्वाला लौकिक समजुतीनुसार स्पष्ट करू इच्छिणारे भगवान उपालि गृहपतीला असे म्हणाले. कारण लौकिक लोक असे मानतात की, 'भावनमय ऋद्धीने युक्त, चित्तावर वशित्व मिळवलेला ऋद्धिमान मनुष्य इतरांना हानी पोहोचवू शकतो.' तसेच ते ऋषी इतरांचे वर्णन करतात आणि ऋषींच्या प्रभावाचे कीर्तन करतात. याविषयी जे काही सांगायचे आहे, ते पुढे येईल. ๖๕. อรญฺญเมว หุตฺวาติ สพฺพโส อรญฺญเมว หุตฺวา. อรญฺญภาเวน อรญฺญํ ชาตํ, น นามมตฺเตน. อิสีนํ อตฺถายาติ อิสีนํ อาสาทนตฺถาย. ६५. 'अरण्यमेव हुत्वा' म्हणजे पूर्णपणे अरण्यच बनून. अरण्यभावामुळे ते अरण्य बनले, केवळ नावापुरते नाही. 'ऋषींच्या अर्थासाठी' म्हणजे ऋषींचा अपमान करण्यासाठी (किंवा त्यांना त्रास देण्यासाठी). โคธาวรีตีรโต นาติทูเร. อุสูยมาโนติ ‘‘น มํ เอส ชโน ปริวาเรตี’’ติ อุสูยํ กโรนฺโต. กิลิฏฺโฐ วตาติ ปงฺกทนฺตรชสิรตาทีหิ กิลิฏฺฐสรีโร. อนญฺชิตมณฺฑิโตติ อนญฺชิตกฺขิโก สพฺเพน, สพฺพํ อมณฺฑิโต จ. ตสฺมึ กาเล ‘‘กาลสฺเสว อกฺขีนํ อญฺชนํ มงฺคล’’นฺติ มนุสฺสานํ ลทฺธิ, ตสฺมา อนญฺชนํ วิสุํ คหิตํ. गोदावरी नदीच्या किनाऱ्यापासून फार दूर नाही. 'असूया करणारा' म्हणजे 'हे लोक माझ्याभोवती गोळा होत नाहीत' अशी असूया करणारा. 'खरोखर मलीन' म्हणजे चिखल, दातांवरील मळ, धूळ आणि डोक्यावरील जटा इत्यादींनी मलीन शरीर असलेला. 'अनांजित-अमंडित' म्हणजे डोळ्यांत काजळ न घातलेला आणि पूर्णपणे न सजलेला. त्या काळात 'सकाळीच डोळ्यांत काजळ घालणे हे मंगलकारक आहे' अशी लोकांची समजूत होती, म्हणूनच 'अनांजन' (काजळ न घालणे) हे वेगळे सांगितले आहे. ราชา ตสฺส วจนํ คเหตฺวาติ ‘‘เวเทสุ อีทิสํ อาคตํ ภวิสฺสตีติ เอวํ, ภนฺเต’’ติ ราชา ตสฺส ปุโรหิตสฺส วจนํ คเหตฺวา. อุสุมชาตหทโยติ อุตฺตตฺตหทโย. นาสิกานํ อปฺปโหนฺเต มุเขน อสฺสสนฺโต. 'राजाने त्याचे वचन स्वीकारून' म्हणजे 'वेदांमध्ये असेच आले असावे, हे भंते!' असे म्हणून राजाने त्या पुरोहिताचे वचन स्वीकारून. 'उष्ण हृदय झालेला' म्हणजे संतप्त हृदय झालेला. नाकाने श्वास घेणे अपुरे पडत असल्यामुळे तोंडाने श्वास घेणारा. วิชิตชเยหิ อาคนฺตฺวา นกฺขตฺตยุตฺตํ อาคเมนฺเตหิ นิสีทิตพฺพฏฺฐานํ ชยขนฺธาวารฏฺฐานํ. อุทกวุฏฺฐิปาตนาทิ ตสฺมึ ปาปกมฺเม อสมงฺคิภูตานมฺปิ สมนุญฺญตาย [Pg.32] อนฺโตกรณตฺถํ กตํ. กตภณฺฑวุฏฺฐีติ อาภรณวสฺสํ. มหาชโน สมนุญฺโญ ชาโตติ โยชนา. มาตุโปสกราโมติ มาตริ สมฺมาปฏิปนฺโน ราโม นาม เอโก ปุริโส. อสมงฺคิภูตานนฺติ อสมนุญฺญานํ. विजय मिळवून परत आल्यावर आणि शुभ नक्षत्राची वाट पाहत असताना बसण्याचे ठिकाण म्हणजे 'जयस्कंधावार स्थान' (विजयी छावणीचे ठिकाण) होय. पाऊस पाडणे इत्यादी गोष्टी त्या पापकर्मात सहभागी नसलेल्यांनाही संमती देण्यासाठी (किंवा त्यांच्या अंतःकरणात अनुकूलता निर्माण करण्यासाठी) केल्या गेल्या. 'कतभण्डवुट्ठी' म्हणजे आभूषणांचा वर्षाव. 'महाजन सहमत झाले' अशी योजना आहे. 'मातृपोषक राम' म्हणजे आईची योग्य प्रकारे सेवा करणारा राम नावाचा एक माणूस. 'असमंगीभूतांना' म्हणजे जे सहमत नव्हते त्यांना. อวกิริยาติ อสุสฺสูสตํ ปฏิจฺจ. ผุลิงฺคานีติ อคฺคิกณานิ. ปตนฺติ กาเยติ กาเย อิโต จิโต นิปตนฺติ. เอเต กิร นิรยํ วิวริตฺวา มหาชนสฺส ทสฺเสนฺติ. 'अवकिरिय' म्हणजे ऐकण्याची अनिच्छा (अनादर) असल्यामुळे. 'फुलिंग' म्हणजे अग्नीच्या ठिणग्या. 'शरीरावर पडतात' म्हणजे शरीरावर इकडेतिकडे पडतात. हे नक्कीच नरक उघडून लोकांना दाखवतात. ยถาผาสุกฏฺฐานนฺติ มยํ กญฺจิปิ เทสํ อุทฺทิสฺส น คจฺฉาม, ยตฺถ ปน วสนฺตสฺส ปพฺพชิตสฺส ผาสุ โหติ, ตํ ยถาผาสุกฏฺฐานํ คจฺฉามาติ อธิปฺปาโย. สงฺฆาติ สํหตา. คณาติ ตํตํเสณิภาเวน คณิตพฺพตาย คณา. คณีภูตาติ เอกชฺฌาสยา หุตฺวา ราสิภูตา. อทินฺนาทานนฺติอาทีสุปิ นิรเย ปจฺจิตฺวา มนุสฺสโลกํ อาคตสฺส วิปากาวเสเสนาติ อาเนตฺวา โยเชตพฺพํ. 'यथाफासुकस्थान' (अनुकूल स्थान) म्हणजे 'आम्ही कोणत्याही विशिष्ट देशाच्या उद्देशाने जात नाही, तर जेथे राहणे प्रव्रजितासाठी अनुकूल असते, त्या अनुकूल स्थानी आम्ही जातो' असा अभिप्राय आहे. 'संघ' म्हणजे एकत्रित झालेले. 'गण' म्हणजे त्या त्या श्रेणीच्या रूपाने मोजले जाण्यामुळे त्यांना गण म्हणतात. 'गणीभूत' म्हणजे एकाच विचाराचे होऊन एकत्र आलेले. 'अदिन्नादान' (चोरी) इत्यादींच्या बाबतीतही, नरकात यातना भोगून मनुष्यलोकात आलेल्या व्यक्तीच्या कर्माच्या अवशिष्ट विपाकामुळे, असे जोडून अर्थ लावावा. ปคฺคณฺหิสฺสามีติ สมฺภาวนํ อุปฺปาเทสฺสามิ. เนสํ กตฺตพฺพนฺติ จินฺเตสีติ โยชนา. กึ จินฺเตสิ? อาฆาตํ อุปฺปาเทตฺวา อนตฺถกรณูปายํ. เตนาห ‘‘โส ธมฺมกถาปริโยสาเน’’ติอาทิ. นาคพลปิจฺฉิลฺลาทีนนฺติ นาคพลสาสปองฺโกลเตลกณิการนิยฺยาสาทีนํ จิกฺขลฺลานํ. วิเหฐยึสุ นิรยาทิกถาหิ ฆฏฺเฏนฺตา. ฉทฺวารารมฺมเณติ จกฺขาทีนํ ฉนฺนํ ทฺวารานํ อารมฺมณภูเต รูปาทิวิสเย. 'मी सन्मान करीन' म्हणजे आदर निर्माण करीन. 'त्यांच्यासाठी काय करावे असा विचार केला' असा संबंध आहे. काय विचार केला? द्वेष निर्माण करून अनर्थ करण्याचा उपाय. म्हणूनच म्हटले आहे - 'तो धम्मकथेच्या शेवटी' इत्यादी. 'नागबल-पिच्छिल' इत्यादी म्हणजे नागबला, मोहरी, अंकोल तेल, कण्हेर वृक्षाचा चीक इत्यादींचा चिखल. नरक इत्यादींच्या कथांनी आघात करून त्यांनी त्रास दिला. 'सहा द्वारांचे आलंबन' म्हणजे चक्षु इत्यादी सहा द्वारांचे आलंबन असणारे रूप इत्यादी विषय. นว วุฏฺฐิโยติ อุทกวุฏฺฐิ สุมนปุปฺผวุฏฺฐิ มาสกวุฏฺฐิ กหาปณวุฏฺฐิ อาภรณวุฏฺฐิ อาวุธวุฏฺฐิ องฺคารวุฏฺฐิ ปาสาณวุฏฺฐิ วาลิกาวุฏฺฐีติ อิมา นว วุฏฺฐิโย. อวญฺจยีติ สกฺการํ กโรนฺโต วิย หุตฺวา อสกฺการํ กโรนฺโต อนตฺถจรเณน วญฺจยิ. อทูสเกติ อนปราเธ. 'नऊ वर्षाव' म्हणजे पाण्याचा वर्षाव, जाईच्या फुलांचा वर्षाव, माषक नाण्यांचा वर्षाव, कहापण नाण्यांचा वर्षाव, आभूषणांचा वर्षाव, शस्त्रांचा वर्षाव, कोळशांचा वर्षाव, दगडांचा वर्षाव आणि वाळूचा वर्षाव - हे नऊ वर्षाव होत. 'फसवले' म्हणजे सत्कार करत असल्यासारखे दाखवून प्रत्यक्षात असत्कार करत अनर्थ करून फसवले. 'अदूषक' म्हणजे निरपराध व्यक्तीला. ‘‘ทิฏฺฐมงฺคลิกา พฺราหฺมณกญฺญา’’ติ ชาตกฏฺฐกถาทีสุ (ชา. อฏฺฐ. ๔.๑๕.มาตงฺคชาตกวณฺณนา) อาคตํ, อิธ ปน ‘‘เสฏฺฐิธีตา’’ติ. วาเรยฺยตฺถายาติ อาวาหตฺถาย, อสฺสาติ เปสิตปุคฺคลสฺส. ตาทิเสน นีจกุลสํวตฺตนิเยน กมฺมุนา ลทฺโธกาเสน จณฺฑาลโยนิยํ นิพฺพตฺโต. जातक अट्ठकथा इत्यादींमध्ये (मातंग जातक वर्णनात) 'दिट्ठमंगलिक ही ब्राह्मणकन्या' असे आले आहे, परंतु येथे 'श्रेष्ठीची मुलगी' असे म्हटले आहे. 'विवाहासाठी' म्हणजे लग्नासाठी, 'त्याच्या' म्हणजे पाठवलेल्या व्यक्तीच्या. अशा नीच कुळात जन्म देणाऱ्या कर्माला संधी मिळाल्यामुळे तो चांडाळ योनीत जन्मला. จมฺมเคเหติ [Pg.33] จมฺเมน ฉาทิเต เคเห. มาตงฺโคตฺเววสฺส นามํ อโหสิ ชาติสมุทาคตํ. ตนฺติ ฆณฺฏํ. วาเทนฺโต ตาลเนน สทฺทํ กโรนฺโต. มหาปถํ ปฏิปชฺชิ ทิฏฺฐมงฺคลิกาย เคหทฺวารสมีเปน. 'चर्मगृहात' म्हणजे चामड्याने झाकलेल्या घरात. जातीवरून त्याचे नाव 'मातंग' असेच पडले होते. 'ती' म्हणजे घंटा. 'वाजवत' म्हणजे वाजवून आवाज करत. तो दिट्ठमंगलिकेच्या घराच्या दराजवळून जाणाऱ्या महामार्गावर आला. ตสฺสา เวยฺยาวจฺจกรา เจว อุปฏฺฐากมนุสฺสา ปฏิพทฺธา จ สุราโสณฺฑาทโย ชาณุกปฺปราทีหิ สุโกฏฺฏิตํ โกฏฺฏิตภาเวน มุจฺฉํ อาปนฺนตฺตา มโตติ สญฺญาย ฉฑฺเฑสุํ. तिच्या सेवकांनी, परिचारकांनी आणि तिच्याशी संबंधित असलेल्या मद्यपी इत्यादींनी त्याला गुडघे आणि कोपर इत्यादींनी इतके बेदम मारले की तो बेशुद्ध पडला, आणि तो मेला आहे असे समजून त्यांनी त्याला तिथेच सोडून दिले. อถ โพธิสตฺโต อายุอวเสสสฺส อตฺถิตาย มนฺทมนฺเท วาเต วายนฺเต จิเรน สญฺญํ ปฏิลภติ. เตนาห ‘‘มหาปุริโส’’ติอาทิ. เคหงฺคเณติ เคหสฺส มหาทฺวารโต พหิ วิวฏงฺคเณ. ปติโตติ ปาตํ กตฺวา อิจฺฉิตตฺถนิปฺผตฺตึ อนฺตรํ กตฺวา อนุปฺปเวเสน นิปนฺโน. ทิฏฺฐมงฺคลิกายาติ ทิฏฺฐมงฺคลิกาการเณน. नंतर बोधिसत्त्वांचे आयुष्य शिल्लक असल्यामुळे, मंद मंद वारा वाहत असताना बऱ्याच वेळाने त्यांना शुद्ध आली. म्हणूनच म्हटले आहे - 'महापुरुष' इत्यादी. 'घराच्या अंगणात' म्हणजे घराच्या मुख्य दरवाजाबाहेर असलेल्या खुल्या अंगणात. 'पडला' म्हणजे स्वतःला पाडून, इच्छित कार्य पूर्ण होईपर्यंत मध्ये न थांबता तिथेच पडून राहिला. 'दिट्ठमंगलिकेसाठी' म्हणजे दिट्ठमंगलिकेच्या कारणास्तव. ยสนฺติ วิภวํ กิตฺติสทฺทญฺจ. จนฺทนฺติ จนฺทมณฺฑลํ, จนฺทวิมานนฺติ อตฺโถ. อุจฺฉิฏฺฐเคเหติ ปเรหิ ปริภุตฺตเคเห. มณฺฑเปติ นครมชฺเฌ มหามณฺฑเป. 'यश' म्हणजे वैभव आणि कीर्ती. 'चंद्र' म्हणजे चंद्रमंडळ, चंद्रविमान असा अर्थ आहे. 'उच्छिष्ट घरात' म्हणजे इतरांनी वापरलेल्या घरात. 'मंडपात' म्हणजे नगराच्या मध्यभागी असलेल्या मोठ्या मंडपात. ขีรมณิมูลนฺติ ขีรมูลํ, ปาเทสุ พทฺธมณิมูลญฺจ. ยาวตา วาจุคฺคตา ปริยตฺตีติ ยตฺตโก มนุสฺสวจีทฺวารโต อุคฺคโต นิกฺขนฺโต ปวตฺโต, ยํกิญฺจิ วจีมยนฺติ อตฺโถ. อากาสงฺคเณติ วิวฏงฺคเณ. 'क्षीरमणीमूल' म्हणजे दुधाचे मूल्य आणि पायात बांधलेल्या मण्यांचे मूल्य. 'जितकी वाणीतून निघालेली परियत्ती' म्हणजे मानवी वाणीच्या द्वारातून जे काही बाहेर पडले, प्रकट झाले किंवा प्रवृत्त झाले, जे काही वाचेने युक्त आहे असा अर्थ आहे. 'आकाश अंगणात' म्हणजे खुल्या अंगणात. ทุมฺมวาสีติ ธูโม ธูสโร, อนญฺชิตามณฺฑิโตติ อธิปฺปาโย. โอตลฺลโกติ นิหีนชฺฌาสโย, อปฺปานุภาโวติ อตฺโถ. ปฏิมุญฺจ กณฺเฐติ ยาว คลวาฏกา ปารุปิตฺวา. โก เร ตุวนฺติ อเร โก นาม ตฺวํ. ‘दुम्मवासी’ म्हणजे धुरकट किंवा मळकट वस्त्र नेसलेला, ज्याने डोळ्यात काजळ घातलेले नाही किंवा स्वतःला सजवलेले नाही असा अभिप्राय आहे. ‘ओतल्लको’ म्हणजे हीन मनोवृत्तीचा, अल्प प्रभाव असलेला असा अर्थ आहे. ‘पटिमुञ्च कण्ठे’ म्हणजे गळ्यापर्यंत पांघरून घेऊन. ‘को रे तुवं’ म्हणजे अरे, तू कोण आहेस? ปกตนฺติ ปฏิยตฺตํ นานปฺปการโต อภิสงฺขตํ. อุตฺติฏฺฐปิณฺฑนฺติ อนฺตรฆรํ อุปคมฺม ฐตฺวา ลทฺธพฺพปิณฺฑํ, ภิกฺขาหารนฺติ อตฺโถ. ลภตนฺติ ลจฺฉตุ. สปาโกติ มหาสตฺโต ชาติวเสน ยถาภูตํ อตฺตานํ อาวิกโรติ. ‘पकतं’ म्हणजे विविध प्रकारे तयार केलेले किंवा बनवलेले. ‘उत्तिट्ठपिण्डं’ म्हणजे घराघरांमध्ये जाऊन, उभे राहून मिळवलेले अन्न (पिंड), भिक्षा-अन्न असा अर्थ आहे. ‘लभतं’ म्हणजे प्राप्त होऊ दे. ‘सपाको’ म्हणजे महासत्त्व (बोधिसत्त्व) आपल्या जातीच्या दृष्टीने स्वतःला जसे आहे तसे प्रकट करतात. อตฺถตฺถิตํ สทฺทหโตติ สมฺปรายิกสฺส อตฺถสฺส อตฺถิภาวํ สทฺทหนฺตสฺส. อเปหีติ อปคจฺฉ. เอตฺโตติ อิมสฺมา ฐานา. ชมฺมาติ ลามก. ‘अत्थत्थितं सद्दहतो’ म्हणजे परलोकातील कल्याणाच्या अस्तित्वावर श्रद्धा ठेवणाऱ्याचा. ‘अपेहि’ म्हणजे दूर हो (निघून जा). ‘एत्तो’ म्हणजे या ठिकाणाहून. ‘जम्मा’ म्हणजे नीच किंवा तुच्छ. อนูปเขตฺเตติ [Pg.34] อชงฺคเล อุทกสมฺปนฺเน เขตฺเต ผลวิเสสํ ปจฺจาสีสนฺตา. เอตาย สทฺธาย ททาหิ ทานนฺติ นินฺนํ ถลญฺจ ปูเรนฺโต เมโฆ วิย คุณวนฺเต นิคฺคุเณ จ ทานํ เทหิ, เอวํ เทนฺโต จ อปฺเปว อาราธเย ทกฺขิเณยฺเยติ. ทกฺขิเณยฺเยติ สีลาทิคุณสมนฺนาคเต. ‘अनूपखेत्ते’ म्हणजे जंगल नसलेल्या, पाण्याने समृद्ध असलेल्या शेतात विशेष फळाची आशा ठेवणारे. ‘एताय सद्धाय ददाहि दानं’ म्हणजे सखल आणि उंच जमीन भरून काढणाऱ्या मेघाप्रमाणे गुणवान आणि गुणहीन दोघांनाही दान दे, आणि अशा प्रकारे दान देत असताना कदाचित तू दान स्वीकारण्यास योग्य असलेल्यांना संतुष्ट करशील. ‘दक्खिणेय्ये’ म्हणजे शील इत्यादी गुणांनी युक्त असलेल्यांना. ตานีติ เต พฺราหฺมณา. เวณุปทเรนาติ เวฬุวิลีเวน. ‘तानि’ म्हणजे ते ब्राह्मण. ‘वेणुपदरेण’ म्हणजे बांबूच्या तुकड्याने. คิรึ นเขน ขณสีติ ปพฺพตํ อตฺตโน นเขน ขณนฺโต วิย อโหสิ. อโยติ กาลโลหํ. ปทหสีติ อภิภวสิ, อตฺตโน สรีเรน อภิภวนฺโต วิย อโหสิ. ‘गिरिं नखेन खणसि’ म्हणजे स्वतःच्या नखांनी पर्वत खणल्यासारखे झाले. ‘अयो’ म्हणजे लोखंड. ‘पदहसि’ म्हणजे तू पराभूत करतोस, स्वतःच्या शरीराने दडपून टाकल्यासारखे झाले. อาเวธิตนฺติ จลิตํ วิปริวตฺเตตฺวา ฐิตํ. ปิฏฺฐิโตติ ปิฏฺฐิปสฺเสน. พาหุํ ปสาเรติ อกมฺมเนยฺยนฺติ อกมฺมกฺขมํ พาหุทฺวยํ ถทฺธํ สุกฺขทณฺฑกํ วิย เกวลํ ปสาเรติ, น สมิญฺเชติ, เสตานิ อกฺขีนิ ปริวตฺตเนน กณฺหมณฺฑลสฺส อทิสฺสนโต. ‘आवेधितं’ म्हणजे थरथरलेले, उलटून राहिलेले. ‘पिट्ठितो’ म्हणजे पाठीमागून. ‘बाहुं पसारेति अकम्मनेय्यं’ म्हणजे काम करण्यास असमर्थ असलेले दोन्ही हात ताठ होऊन सुकलेल्या लाकडासारखे केवळ पसरलेले राहतात, ते हलत नाहीत; डोळे फिरल्यामुळे काळी बाहुली न दिसता डोळे पांढरे पडतात. ชีวิตนฺติ ชีวนํ. ‘जीवितं’ म्हणजे जीवन. เวหายสนฺติ อากาเส. ปถทฺธุโนติ ปถภูตทฺธุโน วิย. ‘वेहायसं’ म्हणजे आकाशात. ‘पथद्धुनो’ म्हणजे मार्गावरील प्रवाशाप्रमाणे. สญฺญมฺปิ น กโรตีติ ‘‘อิเม กุลปฺปสุตา’’ติ สญฺญามตฺตมฺปิ น กโรติ. ทนฺตกฏฺฐกุจฺฉิฏฺฐกนฺติ ขาทิตทนฺตกฏฺฐตฺตา วุตฺตํ. เอตสฺเสว อุปริ ปติสฺสติ อปฺปทุฏฺฐปโทสภาวโต, มหาสตฺตสฺส ตทา อุกฺกํสคตเขตฺตภาวโต. อิทฺธิวิสโย นาม อจินฺเตยฺโย, ตสฺมา กถํ สูริยสฺส อุคฺคนฺตุํ นาทาสีติ น จินฺเตตพฺพํ. อรุณุคฺคํ น ปญฺญายตีติ ตสฺมึ ปเทเส อรุณปภา น ปญฺญายติ, อนฺธกาโร เอว โหติ. ‘सञ्ञम्पि न करोति’ म्हणजे ‘हे उच्च कुळातील आहेत’ अशी साधी जाणीवही ठेवत नाही. ‘दन्तकट्ठकुच्छिट्ठकं’ म्हणजे दात घासण्याची काडी चावल्यामुळे असे म्हटले आहे. ‘याच्यावरच कोसळेल’ कारण निर्दोष व्यक्तीवर द्वेष केल्यामुळे आणि त्यावेळी महासत्त्व हे सर्वोच्च पुण्यक्षेत्र होते. ऋद्धीचा विषय हा अचिंत्य आहे, म्हणून ‘सूर्याला उगवू का दिले नाही’ असा विचार करू नये. ‘अरुणुग्गं न पञ्ञायति’ म्हणजे त्या प्रदेशात अरुणाचा प्रकाश दिसत नाही, केवळ अंधारच असतो. ยกฺขาวฏฺโฏ นุ โข อยํ กาลวิปริยาโย. มหาปญฺญนฺติ มหนฺตานํ ปญฺญานํ อธิฏฺฐานภูตํ. ชนปทสฺส มุขํ ปสฺสถาติ อิมสฺส ชนปทวาสิโน ชนสฺส อุปทฺทเวน มงฺกุภูตํ มุขํ ปสฺสถ. हा यक्षाचा प्रभाव आहे की काळाचा विपर्यास? ‘महापञ्ञं’ म्हणजे महान प्रज्ञेचे अधिष्ठान केलेले. ‘जनपदस्स मुखं पस्सथ’ म्हणजे या जनपदातील रहिवाशांचे संकटाने व्याकुळ झालेले चेहरे पहा. เอตสฺส กถา เอตสฺเสว อุปริ ปติสฺสตีติ ยาหิ เตน ปารมิตาปริภาวนสมิทฺธาหิ นานาสมาปตฺติวิหารปริปูริตาหิ สีลทิฏฺฐิสมฺปทาหิ สุสงฺขตสนฺตาเน มหากรุณาธิวาเส มหาสตฺเต อริยูปวาทกมฺมอภิสปสงฺขาตา ผรุสวาจา ปวตฺติตา, สา อภิสปิ ตสฺส เขตฺตวิเสสภาวโต ตสฺส จ อชฺฌาสยผรุสตาย ทิฏฺฐธมฺมเวทนิยกมฺมํ หุตฺวา [Pg.35] สเจ โส มหาสตฺตํ น ขมาเปติ, สตฺตเม ทิวเส วิปจฺจนสภาวํ ชาตํ, ขมาปิเต ปน มหาสตฺเต ปโยคสมฺปตฺติ ปฏิพาหิตตฺตา อวิปากธมฺมตํ อาปชฺชติ อโหสิกมฺมภาวโต. อยญฺหิ อริยูปวาทปาปสฺส ทิฏฺฐธมฺมเวทนิยสฺส ธมฺมตา, เตน วุตฺตํ ‘เอตสฺส กถา เอตสฺเสว อุปริ ปติสฺสตี’ติอาทิ. มหาสตฺโต ปน ตํ ตสฺส อุปริ ปติตุํ น อทาสิ, อุปาเยน โมเจสิ. เตน วุตฺตํ จริยาปิฏเก (จริยา. ๒.๖๔) – ‘त्याचे बोलणे त्याच्यावरच कोसळेल’ म्हणजे ज्या महासत्त्वांचे अंतःकरण पारमितांच्या भावनेने समृद्ध आहे, जे विविध समापत्तींच्या विहाराने परिपूर्ण आहेत, जे शील आणि दृष्टीच्या संपदेने सुसंस्कृत आहेत आणि जे महाकरुणेचे निवासस्थान आहेत, अशा महासत्त्वांवर त्याने आर्य-निंदा आणि शापयुक्त कठोर वचन उच्चारले आहे. तो शाप त्या महासत्त्वांच्या विशेष पुण्यक्षेत्रत्वामुळे आणि त्याच्या स्वतःच्या कठोर मनोवृत्तीमुळे ‘दृष्टधर्मवेदनीय कर्म’ (याच जन्मात फळ देणारे कर्म) बनून, जर त्याने महासत्त्वांची क्षमा मागितली नाही, तर सातव्या दिवशी त्याचे फळ मिळणे स्वाभाविक होते. परंतु महासत्त्वांची क्षमा मागितल्यास, प्रयोगाच्या समृद्धीमुळे ते कर्म निष्फळ ठरते आणि ‘अहोसिकर्म’ बनते. कारण आर्य-निंदेच्या पापाचे याच जन्मात फळ मिळणे हाच नियम आहे, म्हणूनच ‘त्याचे बोलणे त्याच्यावरच कोसळेल’ इत्यादी म्हटले आहे. परंतु महासत्त्वांनी ते त्याच्यावर कोसळू दिले नाही, तर उपायाने त्याची सुटका केली. म्हणूनच चरियापिटकात म्हटले आहे – ‘‘ยํ โส ตทา มํ อภิสปิ, กุปิโต ทุฏฺฐมานโส; ตสฺเสว มตฺถเก นิปติ, โยเคน ตํ ปโมจยิ’’นฺติ. ‘तेव्हा क्रुद्ध आणि दुष्ट मनाचा होऊन त्याने मला जो शाप दिला, तो त्याच्याच डोक्यावर कोसळला असता, परंतु मी उपायाने त्याची सुटका केली.’ ยญฺหิ ตตฺถ สตฺตเม ทิวเส โพธิสตฺเตน สูริยุคฺคมนนิวารณํ กตํ, อยเมตฺถ โยโคติ อธิปฺเปโต. โยเคน หิ อุพฺพฬฺหา สราชิกา ปริสา นครวาสิโน เนคมา เจว ชานปทา จ โพธิสตฺตสฺส สนฺติกํ ตาปสํ อาเนตฺวา ขมาเปสุํ. โส จ โพธิสตฺตสฺส คุเณ ชานิตฺวา ตสฺมึ จิตฺตํ ปสาเทสิ. ยํ ปนสฺส มตฺถเก มตฺติกาปิณฺฑสฺส ฐปนํ, ตสฺส จ สตฺตธา ผาลนํ กตํ, ตํ มนุสฺสานํ จิตฺตานุรกฺขณตฺถํ. อญฺญถา หิ – ‘‘อิเม ปพฺพชิตา สมานา จิตฺตสฺส วเส วตฺตนฺติ, น ปน จิตฺตํ อตฺตโน วเส วตฺตาเปนฺตี’’ติ มหาสตฺตมฺปิ เตน สทิสํ กตฺวา คณฺเหยฺยุํ, ตทสฺส เตสํ ทีฆรตฺตํ อหิตาย ทุกฺขายาติ. เตนาห ‘‘อถสฺสา’’ติอาทิ. कारण तिथे सातव्या दिवशी बोधिसत्त्वांनी जे सूर्योदय रोखण्याचे काम केले, तोच येथे ‘उपाय’ (योग) म्हणून अभिप्रेत आहे. कारण त्या उपायाने व्याकुळ झालेल्या राजासहित सर्व परिषदेने, नगरवासीयांनी, व्यापारी आणि जनपदातील लोकांनी त्या तापसाला बोधिसत्त्वांच्या जवळ आणून त्यांची क्षमा मागितली. आणि त्यानेही बोधिसत्त्वांचे गुण जाणून त्यांच्यावर आपले चित्त प्रसन्न केले. परंतु त्याच्या डोक्यावर मातीचा गोळा ठेवणे आणि त्याचे सात तुकडे करणे जे केले गेले, ते लोकांच्या चित्ताचे रक्षण करण्यासाठी होते. अन्यथा – ‘हे प्रव्रजित असूनही चित्ताच्या आहारी जातात, स्वतःच्या चित्ताला आपल्या ताब्यात ठेवत नाहीत’ असे म्हणून लोकांनी महासत्त्वांनाही त्याच्यासारखेच मानले असते, आणि ते त्यांच्या दीर्घकालीन अहितासाठी व दुःखासाठी ठरले असते. म्हणूनच ‘अथस्स’ इत्यादी म्हटले आहे. โลหกูฏวสฺสนฺติ อยคุฬวสฺสํ. ตทา หิ รตนมตฺตานิ ทิยฑฺฒรตนมตฺตานิปิ ติขิณํสานิ อยคุฬมณฺฑลานิ อิโต จิโต จ นิปตนฺตา มนุสฺสานํ สรีรานิ ขณฺฑขณฺฑกานิ อกํสุ. กลลวสฺสนฺติ ตนุกกทฺทมปฏลกทฺทมํ. อุปหจฺจาติ อาฆาเฏตฺวา. ตเทว มชฺฌารญฺญํ. ‘लोहकूटवस्सं’ म्हणजे लोखंडी गोळ्यांचा पाऊस. कारण त्यावेळी एक हात किंवा दीड हात आकाराचे, तीक्ष्ण कडा असलेले लोखंडी गोळे इकडेतिकडे पडत असताना त्यांनी लोकांच्या शरीराचे तुकडे तुकडे केले. ‘कललवस्सं’ म्हणजे पातळ चिखलाचा पाऊस. ‘उपहच्च’ म्हणजे आघात करून. ‘तदेव मज्झारञ्ञं’ म्हणजे तेच मध्य-अरण्य होय. ๖๗. อนุวิจฺจการนฺติ อนุวิจฺจกรณํ. การเณหิ ทฺวีหิ อนิยฺยานิกสาสเน ฐิตานํ อตฺตโน สาวกตฺตํ อุปคเต ปคฺคหนิคฺคหานิ ทสฺเสตุํ ‘‘กสฺมา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ६७. ‘अनुविच्चकारं’ म्हणजे विचारपूर्वक तपासणी करणे. दोन कारणांमुळे, अनिर्याणिक शासनात (जे मुक्ती देणारे नाही अशा शिकवणुकीत) राहिलेल्यांच्या आणि आपल्याकडे श्रावकत्व प्राप्त झालेल्यांच्या प्रग्रह (प्रोत्साहन) आणि निग्रह (दमन) दाखवण्यासाठी ‘कस्मा’ इत्यादी म्हटले आहे. ๖๙. อนุปุพฺพึ กถนฺติ (ที. นิ. ฏี. ๒.๗๕-๗๖; อ. นิ. ฏี. ๓.๘.๑๒) อนุปุพฺพิยา อนุปุพฺพํ กเถตพฺพกถํ, กา ปน สา? ทานาทิกถา. ทานกถา ตาว ปจุรชเนสุปิ ปวตฺติยา สพฺพสาธารณตฺตา สุกรตฺตา สีเล ปติฏฺฐานสฺส อุปายภาวโต จ อาทิโตว กถิตา[Pg.36]. ปริจฺจาคสีโล หิ ปุคฺคโล ปริคฺคหวตฺถูสุ นิสฺสงฺคภาวโต สุเขเนว สีลานิ สมาทิยติ, ตตฺถ จ สุปฺปติฏฺฐิโต โหติ. สีเลน ทายกปฏิคฺคหณวิสุทฺธิโต ปรานุคฺคหํ วตฺวา ปรปีฬานิวตฺติวจนโต, กิริยธมฺมํ วตฺวา อกิริยธมฺมวจนโต, โภคยสสมฺปตฺติเหตุํ วตฺวา ภวสมฺปตฺติเหตุวจนโต จ ทานกถานนฺตรํ สีลกถา กถิตา. ตญฺจ สีลํ วฏฺฏนิสฺสิตํ, อยํ ภวสมฺปตฺติ ตสฺส ผลนฺติ ทสฺสนตฺถํ, อิเมหิ จ ทานสีลมเยหิ ปณีตจริยเภทภินฺเนหิ ปุญฺญกิริยวตฺถูหิ เอตา จาตุมหาราชิกาทีสุ ปณีตตราทิเภทภินฺนา อปริเมยฺยา โภคภวสมฺปตฺติโยติ ทสฺสนตฺถํ ตทนนฺตรํ สคฺคกถา. สฺวายํ สคฺโค ราคาทีหิ อุปกฺกิลิฏฺโฐ สพฺพทา อนุปกฺกิลิฏฺโฐ อริยมคฺโคติ ทสฺสนตฺถํ สคฺคานนฺตรํ มคฺโค, มคฺคญฺจ กเถนฺเตน ตทธิคมูปายสนฺทสฺสนตฺถํ สคฺคปริยาปนฺนาปิ ปเคว อิตเร สพฺเพปิ กามา นาม พหฺวาทีนวา อนิจฺจา อทฺธุวา วิปริณามธมฺมาติ กามานํ อาทีนโว. หีนา คมฺมา โปถุชฺชนิกา อนริยา อนตฺถสญฺหิตาติ เตสํ โอกาโร ลามกภาโว, สพฺเพปิ ภวา กิเลสานํ วตฺถุภูตาติ ตตฺถ สํกิเลโส. สพฺพโส กิเลสวิปฺปมุตฺตํ นิพฺพานนฺติ เนกฺขมฺเม อานิสํโส จ กเถตพฺโพติ อยมตฺโถ มคฺคนฺตีติ เอตฺถ อิติ-สทฺเทน ทสฺสิโตติ เวทิตพฺพํ. ६९. अनुपुब्बीकथा म्हणजे (दी. नि. टी. २.७५-७६; अ. नि. टी. ३.८.१२) अनुक्रमाने सांगण्याची कथा. ती कोणती आहे? दान इत्यादी कथा (दानादीकथा). दानकथा ही सामान्य लोकांमध्येही प्रचलित असल्यामुळे, सर्वांसाठी सामायिक व सुलभ असल्यामुळे आणि शीलामध्ये प्रतिष्ठित होण्याचा तो एक उपाय असल्यामुळे सर्वप्रथम सांगितली जाते. कारण त्यागशील व्यक्ती परिग्रह वस्तूंविषयी (मालमत्तेविषयी) अनासक्त असल्यामुळे सहजतेने शीलांचे ग्रहण (समादान) करते आणि त्यात चांगल्या प्रकारे प्रतिष्ठित होते. शीलाद्वारे दाता आणि प्रतिग्रहीता (स्वीकारणारा) यांच्या शुद्धीमुळे इतरांवर अनुग्रह करण्याविषयी सांगून, दुसऱ्यांना पीडा न देण्याविषयी सांगून, क्रियाधर्माविषयी सांगून अक्रियाधर्माचा निषेध केल्यामुळे, आणि भोग व यश संपत्तीच्या कारणाविषयी सांगून भवसंपत्तीच्या कारणाविषयी सांगितल्यामुळे दानकथेनंतर शीलकथा सांगितली जाते. आणि ते शील संसारावर (वट्टावर) आश्रित आहे, ही भवसंपत्ती त्याचेच फळ आहे हे दर्शवण्यासाठी, आणि या दान व शीलमय अशा श्रेष्ठ आचरणाने युक्त पुण्यक्रियावस्तूंमुळे चातुर्महाराजिकादी देवलोकांमध्ये श्रेष्ठ अशा अपरिमित भोग व भवसंपत्ती प्राप्त होते हे दर्शवण्यासाठी त्यानंतर स्वर्गकथा (सग्गकथा) सांगितली जाते. तो स्वर्ग राग इत्यादी क्लेशांनी मलीन (उपक्किलिट्ठ) आहे, तर आर्यमार्ग हा नेहमीच अमलीन (अनुपक्किलिट्ठ) आहे हे दर्शवण्यासाठी स्वर्गकथेनंतर मार्गाची (मग्ग) चर्चा केली जाते. आणि मार्गाचे वर्णन करताना, तो प्राप्त करण्याचा उपाय दर्शवण्यासाठी, स्वर्गात समाविष्ट असलेल्या आणि इतर सर्वच कामांचे (इच्छांचे) अनेक दोष असलेले, अनित्य, अध्रुव आणि परिवर्तनशील असणे म्हणजेच 'कामांचे दुष्परिणाम' (कामादीनव) सांगितले जातात. ते (कामभोग) हीन, ग्राम्य, पृथग्जनांचे (सामान्य लोकांचे), अनार्य आणि अनर्थकारक आहेत, हा त्यांचा 'ओकार' म्हणजे तुच्छ भाव आहे; आणि सर्वच भव हे क्लेशांचे अधिष्ठान असल्यामुळे तिथे संक्लेश (मलीनता) आहे. सर्व प्रकारे क्लेशांपासून मुक्त असणे म्हणजेच निर्वाण होय, अशा प्रकारे नैष्क्रम्याचे (नेक्खम्म) फायदे (आनिसंस) सांगितले पाहिजेत. हा अर्थ 'मग्गं' (मार्ग) या शब्दातील 'इति' शब्दाने दर्शवला आहे, असे समजावे. สุขานํ นิทานนฺติ ทิฏฺฐธมฺมิกานํ สมฺปรายิกานํ นิพฺพานสญฺหิตานญฺจาติ สพฺเพสมฺปิ สุขานํ การณํ. ยญฺหิ กิญฺจิ โลเก โภคสุขํ นาม, ตํ สพฺพํ ทานนิทานนฺติ ปากโฏ อยมตฺโถ. ยํ ปน ฌานวิปสฺสนามคฺคผลนิพฺพานปฏิสํยุตฺตํ สุขํ, ตสฺสปิ ทานํ อุปนิสฺสยปจฺจโย โหติเยว. สมฺปตฺตีนํ มูลนฺติ ยา อิมา โลเก ปเทสรชฺชสิริสฺสริยสตฺตรตนสมุชฺชลจกฺกวตฺติสมฺปทาติ เอวํปเภทา มานุสิกา สมฺปตฺติโย, ยา จ จาตุมหาราชาทิคตา ทิพฺพา สมฺปตฺติโย, ยา วา ปนญฺญาปิ สมฺปตฺติโย, ตาสํ สพฺพาสํ อิทํ มูลการณํ. โภคานนฺติ ภุญฺชิตพฺพฏฺเฐน ‘‘โภโค’’นฺติ ลทฺธนามานํ มนาปิยรูปาทีนํ, ตนฺนิสฺสยานํ วา อุปโภคสุขานํ, ปติฏฺฐา นิจฺจลาธิฏฺฐานตาย. วิสมคตสฺสาติ พฺยสนปฺปตฺตสฺส. ตาณนฺติ รกฺขา ตโต ปริปาลนโต. เลณนฺติ พฺยสเนหิ ปริปาติยมานสฺส โอลียนปเทโส. คตีติ คนฺตพฺพฏฺฐานํ. ปรายณนฺติ ปฏิสรณํ. อวสฺสโยติ วินิปติตุํ อเทนฺโต นิสฺสโย. อารมฺมณนฺติ โอลุพฺภารมฺมณํ. 'सुखांचे निदान (कारण)' म्हणजे ऐहिक (दिट्ठधम्मिक), पारलौकिक (साम्परायिक) आणि निर्वाणाशी संबंधित असलेल्या सर्वच सुखांचे कारण होय. कारण या जगात जे काही भोगसुख म्हणून ओळखले जाते, ते सर्व दानामुळेच मिळते, हा अर्थ स्पष्ट आहे. परंतु, जे ध्यान, वियश्यना, मार्ग, फल आणि निर्वाण यांच्याशी संबंधित सुख आहे, त्यासाठी देखील दान हे उपनिश्रय प्रत्यय (उपनिस्सयपच्चय) ठरतेच. 'संपत्तीचे मूळ' म्हणजे या जगात प्रादेशिक राज्य, ऐश्वर्य, सात रत्नांनी देदीप्यमान चक्रवर्ती संपत्ती इत्यादी प्रकारच्या मानवी संपत्ती, आणि चातुर्महाराजिकादी देवलोकांमधील दिव्य संपत्ती, किंवा इतर ज्या काही संपत्ती आहेत, त्या सर्वांचे हे मूळ कारण आहे. 'भोगांचे' म्हणजे उपभोग घेण्याच्या अर्थाने 'भोग' असे नाव मिळालेल्या प्रिय रूप इत्यादींचे, किंवा त्यावर आधारित उपभोग सुखांचे, स्थिर अधिष्ठान असल्यामुळे ते 'प्रतिष्ठा' (पतिट्ठा) आहे. 'विषमगतस्य' म्हणजे संकटात (व्यसनात) सापडलेल्याचे. 'त्राण' (ताण) म्हणजे रक्षण, त्या संकटापासून वाचवणे. 'लेण' (लयन/आश्रय) म्हणजे संकटांनी गांजलेल्या व्यक्तीचे आश्रयस्थान. 'गती' म्हणजे जाण्याचे स्थान (गंतव्य स्थान). 'परायण' म्हणजे परम आश्रय (प्रतिशरण). 'अवश्रय' (अवस्सय) म्हणजे अधःपतन होऊ न देणारा आधार. 'आलंबन' (आरम्मण) म्हणजे धरून ठेवण्याचा आधार. รตนมยสีหาสนสทิสนฺติ [Pg.37] สพฺพรตนมยสตฺตงฺคมหาสีหาสนสทิสํ, มหคฺฆํ หุตฺวา สพฺพโส วินิปติตุํ อปฺปทานโต. มหาปถวิสทิสํ คตคตฏฺฐาเน ปติฏฺฐาสมฺภวโต. ยถา ทุพฺพลสฺส ปุริสสฺส อาลมฺพนรชฺชุ อุตฺติฏฺฐโต ติฏฺฐโต จ อุปตฺถมฺโภ, เอวํ ทานํ สตฺตานํ สมฺปตฺติภเว อุปปตฺติยา ฐิติยา จ ปจฺจโย โหตีติ อาห ‘‘อาลมฺพนฏฺเฐน อาลมฺพนรชฺชุสทิส’’นฺติ. ทุกฺขนิตฺถรณฏฺเฐนาติ ทุคฺคติทุกฺขนิตฺถรณฏฺเฐน. สมสฺสาสนฏฺเฐนาติ โลภมจฺฉริยาทิปฏิสตฺตุปทฺทวโต สมฺมเทว อสฺสาสนฏฺเฐน. ภยปริตฺตาณฏฺเฐนาติ ทาลิทฺทิยภยโต ปริปาลนฏฺเฐน. มจฺเฉรมลาทีหีติ มจฺเฉรโลภโทสอิสฺสามิจฺฉาทิฏฺฐิวิจิกิจฺฉาทิ จิตฺตมเลหิ. อนุปลิตฺตฏฺเฐนาติ อนุปกฺกิลิฏฺฐตาย. เตสนฺติ มจฺเฉรมลาทีนํ. เอเตสํ เอว ทุราสทฏฺเฐน. อสนฺตาสนฏฺเฐนาติ อสนฺตาสเหตุภาเวน. โย หิ ทายโก ทานปติ, โส สมฺปติปิ น กุโตจิ สนฺตสติ, ปเคว อายตึ. พลวนฺตฏฺเฐนาติ มหาพลวตาย. ทายโก หิ ทานปติ สมฺปติ ปกฺขพเลน พลวา โหติ, อายตึ ปน กายพลาทีหิ. อภิมงฺคลสมฺมตฏฺเฐนาติ ‘‘วุฑฺฒิการณ’’นฺติ อภิสมฺมตภาเวน. วิปตฺติโต สมฺปตฺติยา นยนํ เขมนฺตภูมิสมฺปาปนํ. 'रत्नमय सिंहासनासारखे' म्हणजे सर्व रत्नांनी बनलेल्या सात अंगांच्या महासिंहासनासारखे, जे अत्यंत मौल्यवान असल्यामुळे कोणत्याही प्रकारे अधःपतन होऊ देत नाही. ते 'महापृथ्वीसारखे' आहे, कारण व्यक्ती जिथे जिथे जाईल तिथे तिथे त्याला आधार (प्रतिष्ठा) मिळणे शक्य होते. ज्याप्रमाणे एखाद्या दुर्बळ माणसाला उठताना आणि उभे राहताना धरून ठेवण्याची दोरी (आलंबनरज्जू) आधार ठरते, त्याचप्रमाणे दान हे प्राण्यांना संपत्तीच्या भवात उत्पन्न होण्यासाठी आणि तिथे टिकून राहण्यासाठी प्रत्यय (कारण) ठरते, म्हणूनच त्याला 'आलंबन देण्याच्या अर्थाने आलंबनरज्जू सारखे' म्हटले आहे. 'दुःख पार करण्याच्या अर्थाने' म्हणजे दुर्गतीच्या दुःखातून पार पाडण्याच्या अर्थाने. 'आश्वासन देण्याच्या अर्थाने' म्हणजे लोभ, मत्सर इत्यादी शत्रूंच्या उपद्रवापासून चांगल्या प्रकारे दिलासा (आश्वासन) देण्याच्या अर्थाने. 'भयापासून रक्षण करण्याच्या अर्थाने' म्हणजे दारिद्र्याच्या भयापासून रक्षण करण्याच्या अर्थाने. 'मत्सर मल इत्यादींनी' म्हणजे मत्सर, लोभ, द्वेष, ईर्ष्या, मिथ्यादृष्टी, विचिकित्सा (शंका) इत्यादी चित्ताच्या मलांनी (अशुद्धींनी). 'अलिप्त राहण्याच्या अर्थाने' म्हणजे मलीन न होण्याच्या अर्थाने. 'त्यांपैकी' म्हणजे मत्सर इत्यादी मलांच्या. यांच्याच द्वारे पराभूत न होण्याच्या (दुरासद) अर्थाने. 'भयभीत न होण्याच्या अर्थाने' म्हणजे निर्भयतेचे कारण असल्यामुळे. कारण जो दाता, दानपती असतो, तो वर्तमानातही कशालाही घाबरत नाही, मग भविष्याची काय गोष्ट! 'बलवान असण्याच्या अर्थाने' म्हणजे महाबलशाली असण्याच्या अर्थाने. कारण दानपती दाता वर्तमानात मित्र/पक्ष बळामुळे बलवान असतो, आणि भविष्यात कायिक बळ इत्यादींमुळे. 'अभिमांगल्य संमत असण्याच्या अर्थाने' म्हणजे 'वृद्धीचे कारण' म्हणून मान्य असल्यामुळे. विपत्तीतून संपत्तीकडे नेणे म्हणजेच क्षेमभूमीला (सुरक्षित स्थानाला) पोहोचवणे होय. อิทานิ มหาโพธิจริยภาเวนปิ ทานคุณํ ทสฺเสตุํ ทานํ นาเมตนฺติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ อตฺตานํ นิยฺยาเทนฺเตนาติ เอเตน ทานผลํ สมฺมเทว ปสฺสนฺตา มหาปุริสา อตฺตโน ชีวิตมฺปิ ปริจฺจชนฺติ, ตสฺมา โก นาม วิญฺญุชาติโก พาหิเร วตฺถุมฺหิ สงฺคํ กเรยฺยาติ โอวาทํ เทติ. อิทานิ ยา โลกิยา โลกุตฺตรา จ อุกฺกํสคตา สมฺปตฺติโย, ตา สพฺพา ทานโตเยว ปวตฺตนฺตีติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ทานญฺหี’’ติอาทิมาห. ตตฺถ สกฺกมารพฺรหฺมสมฺปตฺติโย อตฺตหิตาย เอว, จกฺกวตฺติสมฺปตฺติ ปน อตฺตหิตาย จ ปรหิตาย จาติ ทสฺเสตุํ สา ตาสํ ปรโต วุตฺตา. เอตา โลกิยา, อิมา ปน โลกุตฺตราติ ทสฺเสตุํ ‘‘สาวกปารมีญาณ’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. ตาสุปิ อุกฺกฏฺฐุกฺกฏฺฐตรุกฺกฏฺฐตมเมว ทสฺเสตุํ กเมน ญาณตฺตยํ วุตฺตํ. เตสํ ปน ทานสฺส ปจฺจยภาโว เหฏฺฐา วุตฺโตเยว. เอเตเนว ตสฺส พฺรหฺมสมฺปตฺติยาปิ ปจฺจยภาโว ทีปิโตติ เวทิตพฺโพ. आता महाबोधीच्या चर्याभावाने देखील दानाचा गुण दर्शवण्यासाठी 'दानं नामेतं' (दान म्हणजे हे) इत्यादी म्हटले आहे. त्यात 'स्वतःला समर्पित करताना' या विधानाने हे दर्शवले आहे की, दानाचे फळ चांगल्या प्रकारे पाहणारे महापुरुष स्वतःच्या प्राणांचाही त्याग करतात, म्हणून कोणता सुज्ञ माणूस बाह्य वस्तूंमध्ये आसक्ती ठेवील? असा उपदेश दिला आहे. आता ज्या लौकिक आणि लोकोत्तर अशा उत्कृष्ट संपत्ती आहेत, त्या सर्व दानामुळेच प्राप्त होतात हे दर्शवण्यासाठी 'दानं हि' (दानच खरोखर) इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये शक्र (इंद्र), मार आणि ब्रह्मा यांची संपत्ती केवळ स्वतःच्या हितासाठीच असते, परंतु चक्रवर्ती संपत्ती ही स्वतःच्या आणि इतरांच्याही हितासाठी असते, हे दर्शवण्यासाठी ती त्यांच्या नंतर सांगितली आहे. या लौकिक आहेत, आणि या लोकोत्तर आहेत हे दर्शवण्यासाठी 'श्रावकपारमीज्ञान' (सावकपारमीञाण) इत्यादी म्हटले आहे. त्यांच्यामध्येही उत्कृष्ट, उत्कृष्टतर आणि उत्कृष्टतम अवस्था दर्शवण्यासाठी अनुक्रमाने तीन ज्ञानांचा (ज्ञानत्रय) उल्लेख केला आहे. त्यांच्यासाठी दानाचा प्रत्ययभाव (कारणभाव) खाली सांगितलाच आहे. यावरूनच ब्रह्मसंपत्तीसाठी देखील दानाचा प्रत्ययभाव स्पष्ट होतो, असे समजावे. ทานญฺจ นาม หิตชฺฌาสเยน, ปูชาวเสน วา อตฺตโน สนฺตกสฺส ปเรสํ ปริจฺจชนํ, ตสฺมา ทายโก ปุริสปุคฺคโล ปเรสํ สนฺตกํ หริสฺสตีติ [Pg.38] อฏฺฐานเมตนฺติ อาห – ‘‘ทานํ ททนฺโต สีลํ สมาทาตุํ สกฺโกตี’’ติ. สีลาลงฺการสทิโส อลงฺกาโร นตฺถิ โสภาวิเสสาวหตฺตา สีลสฺส. สีลปุปฺผสทิสํ ปุปฺผํ นตฺถีติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย. สีลคนฺธสทิโส คนฺโธ นตฺถีติ เอตฺถ ‘‘จนฺทนํ ตครํ วาปี’’ติอาทิกา (ธ. ป. ๕๕; มิ. ป. ๔.๑.๑) คาถา – ‘‘คนฺโธ อิสีนํ จิรทิกฺขิตานํ, กายา จุโต คจฺฉติ มาลุเตนา’’ติอาทิกา (ชา. ๒.๑๗.๕๕) ชาตกคาถาโย จ อาหริตฺวา วตฺตพฺพา, สีลญฺหิ สตฺตานํ อาภรณญฺเจว อลงฺกาโร จ คนฺธวิเลปนญฺจ ทสฺสนียภาวาวหญฺจ. เตนาห ‘‘สีลาลงฺกาเรน หี’’ติอาทิ. दान म्हणजे कल्याणाच्या इच्छेने (हितभावनेने) किंवा पूज्यभावाने आपल्या मालकीच्या वस्तूचा इतरांसाठी त्याग करणे. म्हणूनच, दान देणारा पुरुष (व्यक्ती) इतरांची वस्तू हिरावून घेईल, हे अशक्य आहे - असे म्हटले आहे: "दान देणारा मनुष्य शील ग्रहण करण्यास (समादान करण्यास) समर्थ होतो." शीलासारखा दुसरा कोणताही अलंकार नाही, कारण शील हे विशेष शोभा प्राप्त करून देणारे आहे. "शीलरूपी पुष्पासारखे दुसरे पुष्प नाही" यातही हाच नियम लागू होतो. "शीलगंधासारखा दुसरा कोणताही गंध नाही" या संदर्भात "चन्दनं तगरं वापि..." (धम्मपद ५५; मिलिन्दपञ्ह ४.१.१) ही गाथा आणि "चिरदीक्षित ऋषींचा गंध त्यांच्या शरीरातून निघून वाऱ्यासोबत वाहतो..." (जातक २.१७.५५) इत्यादी जातकगाथा उद्धृत करून स्पष्ट केले पाहिजे. कारण शील हे प्राण्यांचे आभूषण, अलंकार, सुगंधी विलेपन आणि त्यांना दर्शनीय (सौंदर्यवान) बनवणारे आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - "शीलरूपी अलंकारानेच..." इत्यादी. อยํ สคฺโค ลพฺภตีติ อิทํ มชฺฌิเมหิ ฉนฺทาทีหิ สมาทานสีลํ สนฺธายาห. เตนาห สกฺโก เทวราชา – "हा स्वर्ग प्राप्त होतो" हे मध्यम श्रेणीच्या छंदादींनी (इच्छा इत्यादींनी) युक्त असलेल्या समादान शीलाला (शील पालनाला) उद्देशून म्हटले आहे. म्हणूनच देवराज शक्राने म्हटले आहे - ‘‘หีเนน พฺรหฺมจริเยน, ขตฺติเย อุปปชฺชติ; มชฺฌิเมน จ เทวตฺตํ, อุตฺตเมน วิสุชฺฌตี’’ติ. (ชา. ๑.๘.๗๕; ๒.๒๒.๔๒๙; ที. นิ. ฏี. ๒.๗๕-๗๖); "हीन (कनिष्ठ दर्जाच्या) ब्रह्मचर्याने मनुष्य क्षत्रिय कुळात जन्म घेतो; मध्यम दर्जाच्या ब्रह्मचर्याने देवत्व (स्वर्ग) प्राप्त होते आणि उत्तम दर्जाच्या ब्रह्मचर्याने मनुष्य विशुद्ध (मुक्त) होतो." อิฏฺโฐติ สุโข. กนฺโตติ กมนีโย. มนาโปติ มนวฑฺฒนโก. ตํ ปน ตสฺส อิฏฺฐาทิภาวํ ทสฺเสตุํ ‘‘นิจฺจเมตฺถ กีฬา’’ติอาทิ วุตฺตํ. 'इष्ट' म्हणजे सुखकारक. 'कांत' म्हणजे कमनीय (प्रिय/आकर्षक). 'मनाप' म्हणजे मनाला आनंद देणारा (मन वाढवणारा). आणि त्याचा तो इष्ट इत्यादी भाव दर्शवण्यासाठी "येथे निरंतर क्रीडा..." इत्यादी म्हटले आहे. โทโสติ อนิจฺจตาทินา อปฺปสฺสาทาทินา จ ทูสิตภาโว, ยโต เต วิญฺญูนํ จิตฺตํ นาราเธนฺติ. อถ วา อาทีนํ วาติ ปวตฺเตตีติ อาทีนโว, ปรมกปณตา. ตถา จ กามา ยถาภูตํ ปจฺจเวกฺขนฺตานํ ปจฺจุปติฏฺฐนฺติ. ลามกภาโวติ อเสฏฺเฐหิ เสวิตพฺโพ, เสฏฺเฐหิ น เสวิตพฺโพ นิหีนภาโว. สํกิลิสฺสนนฺติ วิพาธกตา อุปตาปตา จ. 'दोष' म्हणजे अनित्यता इत्यादींमुळे आणि अल्प आस्वाद (अल्प समाधान) इत्यादींमुळे दूषित झालेली अवस्था, ज्यामुळे ते सुज्ञ लोकांच्या चित्ताला संतुष्ट करत नाहीत. अथवा 'आदीन' (दुःख/दीनता) कडे घेऊन जातो तो 'आदीनव' (दोष/धोका) होय, म्हणजेच अत्यंत दयनीय अवस्था. आणि अशा प्रकारे, जे लोक यथार्थपणे (यथाभूत) विचार करतात, त्यांच्यासमोर कामभोग याच स्वरूपात प्रकट होतात. 'लामकभाव' (तुच्छता) म्हणजे जे श्रेष्ठ नसलेल्या लोकांद्वारे सेवन करण्यायोग्य आहे आणि श्रेष्ठांद्वारे सेवन न करण्यायोग्य असा नीच भाव होय. 'संक्लेश' (मळकट होणे/क्लेशकारक असणे) म्हणजे पीडादायकता आणि संतापदायकता होय. เนกฺขมฺเม อานิสํสนฺติ เอตฺถ ยตฺตกา กาเมสุ อาทีนวา, ตปฺปฏิปกฺขโต ตตฺตกา เนกฺขมฺเม อานิสํสา. อปิจ – ‘‘เนกฺขมฺมํ นาเมตํ อสมฺพาธํ อสํกิลิฏฺฐํ นิกฺขนฺตํ กาเมหิ, นิกฺขนฺตํ กามสญฺญาย, นิกฺขนฺตํ กามวิตกฺเกหิ, นิกฺขนฺตํ กามปริฬาเหหิ, นิกฺขนฺตํ พฺยาปาทสญฺญายา’’ติอาทินา (สารตฺถ. ฏี. มหาวคฺค ๓.๒๖; ที. นิ. ฏี. ๒.๗๕-๗๖) นเยน เนกฺขมฺเม อานิสํเส ปกาเสสิ, ปพฺพชฺชาย ฌานาทีสุ จ คุเณ วิภาเวสิ วณฺเณสิ. กลฺลจิตฺตนฺติ เหฏฺฐา ปวตฺติตเทสนาย อสฺสทฺธิยาทีนํ จิตฺตโทสานํ วิคตตฺตา อุปริเทสนาย ภาชนภาวูปคมเนน กมฺมกฺขมจิตฺตํ. อฏฺฐกถายํ ปน ยสฺมา อสฺสทฺธิยาทโย จิตฺตสฺส โรคภูตา[Pg.39], ตทา เต วิคตา, ตสฺมา อาห ‘‘อโรคจิตฺต’’นฺติ. ทิฏฺฐิมานาทิกิเลสวิคเมน มุทุจิตฺตํ. กามจฺฉนฺทาทิวิคเมน วินีวรณจิตฺตํ. สมฺมาปฏิปตฺติยํ อุฬารปีติปาโมชฺชโยเคน อุทคฺคจิตฺตํ. ตตฺถ สทฺธาสมฺปตฺติยา ปสนฺนจิตฺตํ. ยทา ภควา อญฺญาสีติ สมฺพนฺโธ. อถ วา กลฺลจิตฺตนฺติ กามจฺฉนฺทวิคเมน อโรคจิตฺตํ. มุทุจิตฺตนฺติ พฺยาปาทวิคเมน เมตฺตาวเสน อกถินจิตฺตํ. วินีวรณจิตฺตนฺติ อุทฺธจฺจกุกฺกุจฺจวิคเมน วิกฺเขปสฺส วิคตตฺตา เตน อปิหิตจิตฺตํ. อุทคฺคจิตฺตนฺติ ถินมิทฺธวิคเมน สมฺปคฺคหิตวเสน อลีนจิตฺตํ. ปสนฺนจิตฺตนฺติ วิจิกิจฺฉาวิคเมน สมฺมาปฏิปตฺติยํ อธิมุตฺตจิตฺตนฺติ เอวเมตฺถ เสสปทานํ อตฺโถ เวทิตพฺโพ. "नेक्खम्माचे (निष्क्रमणाचे/त्यागाचे) फायदे" या संदर्भात, कामभोगांमध्ये जेवढे दोष (आदीनव) आहेत, त्याच्या अगदी उलट तेवढेच फायदे नेक्खम्मामध्ये आहेत. शिवाय - "नेक्खम्म म्हणजे अडथळामुक्त, क्लेशरहित, कामभोगांपासून मुक्त, कामसंज्ञेपासून मुक्त, कामवितर्कांपासून मुक्त, कामपरिदाहापासून मुक्त आणि व्यापादसंज्ञेपासून मुक्त असणे होय" इत्यादी पद्धतीने त्यांनी नेक्खम्माचे फायदे प्रकट केले, आणि प्रव्रज्या तसेच ध्यान इत्यादींच्या गुणांचे विश्लेषण व वर्णन केले. 'कल्लचित्त' (कर्मक्षम चित्त) म्हणजे पूर्वी दिलेल्या देशनेमुळे अश्रद्धा इत्यादी चित्तातील दोष दूर झाल्यामुळे, पुढील देशनेसाठी पात्र बनलेले कर्मक्षम चित्त होय. परंतु अट्ठकथेमध्ये, ज्याअर्थी अश्रद्धा इत्यादी चित्ताचे रोग आहेत आणि ते तेव्हा दूर झाले होते, म्हणून त्याला "अरोगचित्त" (निरोगी चित्त) म्हटले आहे. दृष्टी (मिथ्यादृष्टी) आणि मान (अहंकार) इत्यादी क्लेश दूर झाल्यामुळे ते 'मृदुचित्त' (कोमल चित्त) झाले. कामच्छंद इत्यादी नीवरण दूर झाल्यामुळे ते 'विनिवरणचित्त' (नीवरणमुक्त चित्त) झाले. सम्यक प्रतिपत्तीमध्ये (योग्य आचरणात) उदार प्रीती आणि प्रामोद्याच्या योगाने ते 'उदग्गचित्त' (प्रफुल्लित चित्त) झाले. त्यामध्ये श्रद्धासंपत्तीमुळे ते 'प्रसन्नचित्त' झाले. "जेव्हा भगवंतांनी जाणले" असा याचा संबंध आहे. अथवा, 'कल्लचित्त' म्हणजे कामच्छंद दूर झाल्यामुळे झालेले निरोगी चित्त. 'मृदुचित्त' म्हणजे व्यापाद (द्वेष) दूर झाल्यामुळे आणि मैत्रीभावामुळे कठोर नसलेले चित्त. 'विनिवरणचित्त' म्हणजे औद्धत्य-कुकुच्च (अस्वस्थता आणि पश्चात्ताप) दूर झाल्यामुळे आणि विक्षेप नष्ट झाल्यामुळे आवरणरहित झालेले चित्त. 'उदग्गचित्त' म्हणजे थिन-मिद्ध (आळस आणि सुस्ती) दूर झाल्यामुळे आणि चित्त एकाग्र झाल्यामुळे अलीन (सक्रिय/जागृत) चित्त. 'प्रसन्नचित्त' म्हणजे विचिकित्सा (शंका) दूर झाल्यामुळे सम्यक प्रतिपत्तीमध्ये अधिमुक्त (समर्पित) झालेले चित्त - अशा प्रकारे येथे उर्वरित पदांचा अर्थ समजून घ्यावा. เสยฺยถาปีติอาทินา อุปมาวเสน อุปาลิสฺส สํกิเลสปฺปหานํ อริยมคฺคนิปฺผาทนญฺจ ทสฺเสติ. อปคตกาฬกนฺติ วิคตกาฬกํ. สมฺมเทวาติ สุฏฺฐุ เอว. รชนนฺติ นีลปีตาทิรงฺคชาตํ. ปฏิคฺคณฺเหยฺยาติ คณฺเหยฺย ปภสฺสรํ ภเวยฺย. ตสฺมึเยว อาสเนติ ติสฺสํ เอว นิสชฺชายํ. เอเตนสฺส ลหุวิปสฺสกตา ติกฺขปญฺญตา สุขปฏิปทาขิปฺปาภิญฺญตา จ ทสฺสิตา โหติ. วิรชนฺติ อปายคมนียราครชาทีนํ วิคเมน วิรชํ. อนวเสสทิฏฺฐิวิจิกิจฺฉามลาปคเมน วีตมลํ. ติณฺณํ มคฺคานนฺติ เหฏฺฐิมานํ ติณฺณํ มคฺคานํ. ตสฺส อุปฺปตฺติอาการทสฺสนนฺติ กสฺมา วุตฺตํ? นนุ มคฺคญาณํ อสงฺขตธมฺมารมฺมณนฺติ โจทนํ สนฺธายาห ‘‘ตํ หี’’ติอาทิ. ตตฺถ ปฏิวิชฺฌนฺตนฺติ อสมฺโมหปฏิเวธวเสน ปฏิวิชฺฌนฺตํ. เตนาห ‘‘กิจฺจวเสนา’’ติ. "ज्याप्रमाणे..." इत्यादी उपमेच्या द्वारे उपालीच्या संक्लेशांचा (मळाचा) नाश आणि आर्यमार्गाची प्राप्ती दर्शवली आहे. 'अपगतकाळक' म्हणजे काळे डाग दूर झालेले. 'सम्मदैव' म्हणजे चांगल्या प्रकारेच. 'रजन' म्हणजे निळा, पिवळा इत्यादी विविध रंग. 'प्रतिगृह्णीयात' (रंग ग्रहण करणे) म्हणजे रंग स्वीकारणे किंवा प्रभास्वर (तेजस्वी) होणे. 'त्याच आसनावर' म्हणजे त्याच बैठकीवर. यावरून त्याची शीघ्र विपश्यना करण्याची क्षमता, तीक्ष्ण प्रज्ञा, सुखकारक प्रतिपदा आणि क्षिप्र अभिज्ञा (शीघ्र ज्ञानप्राप्ती) दर्शवली जाते. 'विरज' म्हणजे अपायकारक (नरक इत्यादी गतीला नेणाऱ्या) राग (आसक्ती) रूपी धूळ इत्यादी दूर झाल्यामुळे विरज (धुळीरहित) झालेले. 'वीतमल' म्हणजे दृष्टी (मिथ्यादृष्टी) आणि विचिकित्सा (शंका) रूपी मळ पूर्णपणे नष्ट झाल्यामुळे मळरहित झालेले. 'तीन मार्गांचे' म्हणजे खालच्या तीन (आर्य) मार्गांचे. "त्याच्या उत्पत्तीचा प्रकार दर्शवणे" असे का म्हटले आहे? "मार्गज्ञान हे असंस्कृत धर्माचे आलंबन करणारे असते" या आक्षेपाला उद्देशून "ते खरोखरच..." इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये 'प्रतिवेध करणे' म्हणजे संमोहरहित प्रतिवेधाच्या (यथार्थ ज्ञानाच्या) द्वारे प्रतिवेध करणे होय. म्हणूनच म्हटले आहे - "कार्याच्या वशाने..." ตตฺริทํ อุปมาสํสนฺทนํ – วตฺถํ วิย จิตฺตํ, วตฺถสฺส อาคนฺตุกมเลหิ กิลิฏฺฐภาโว วิย จิตฺตสฺส ราคาทิมเลหิ สํกิลิฏฺฐภาโว, โธวนสิลา วิย อนุปุพฺพีกถา, อุทกํ วิย สทฺธา, อุทเก เตเมตฺวา อูสโคมยฉาริกาภเรหิ กาฬกปเทเส สมฺมทฺทิตฺวา วตฺถสฺส โธวนปโยโค วิย สทฺธาสิเนเหน เตเมตฺวา สติสมาธิปญฺญาหิ โทเส สิถิเล กตฺวา สุตาทิวิธินา จิตฺตสฺส โสธเน วีริยารมฺโภ. เตน ปโยเคน วตฺเถ กาฬกาปคโม วิย วีริยารมฺเภน กิเลสวิกฺขมฺภนํ, รงฺคชาตํ วิย อริยมคฺโค, เตน สุทฺธสฺส วตฺถสฺส ปภสฺสรภาโว วิย วิกฺขมฺภิตกิเลสสฺส จิตฺตสฺส มคฺเคน ปริโยทปนนฺติ. येथे उपमेची तुलना अशी आहे - वस्त्राप्रमाणे चित्त आहे, वस्त्राचा बाहेरील मळामुळे मलीन होणारा स्वभाव हा चित्ताचा राग इत्यादी मळांमुळे मलीन होणाऱ्या स्वभावासारखा आहे, कपडे धुण्याच्या शिळेप्रमाणे अनुपूर्वी कथा (क्रमिक उपदेश) आहे, पाण्याप्रमाणे श्रद्धा आहे, पाण्यात भिजवून, खारट माती, शेण आणि राख यांच्या मिश्रणाने काळ्या डागांच्या जागी घासून वस्त्र धुण्याचा जो प्रयत्न केला जातो, त्याप्रमाणे श्रद्धारूपी स्नेहाने भिजवून, स्मृती, समाधी आणि प्रज्ञेच्या द्वारे दोषांना शिथिल करून, श्रवण इत्यादी विधींनी चित्त शुद्ध करण्यासाठी केलेला वीर्यारंभ (प्रयत्न) आहे. त्या प्रयत्नाने वस्त्रावरील काळे डाग दूर होण्याप्रमाणे, वीर्यारंभाने क्लेशांचे दमन (विष्कंभन) करणे आहे, रंगाप्रमाणे आर्यमार्ग आहे, आणि त्या रंगाने शुद्ध वस्त्राला प्राप्त होणाऱ्या प्रभास्वरतेप्रमाणे (चमकदारपणाप्रमाणे), क्लेश दमित झालेल्या चित्ताचे मार्गाच्या द्वारे अत्यंत शुद्ध (परियोदपन) होणे आहे. ทิฏฺฐธมฺโมติ วตฺวา ทสฺสนํ นาม ญาณทสฺสนโต อญฺญมฺปิ อตฺถีติ ตนฺนิวตฺตนตฺถํ ‘‘ปตฺตธมฺโม’’ติ วุตฺตํ. ปตฺติ จ ญาณสมฺปตฺติโต อญฺญาปิ วิชฺชตีติ [Pg.40] ตโต วิเสสนตฺถํ ‘‘วิทิตธมฺโม’’ติ วุตฺตํ. สา ปเนสา วิทิตธมฺมตา ธมฺเมสุ เอกเทสนาปิ โหตีติ นิปฺปเทสโต วิทิตภาวํ ทสฺเสตุํ ‘‘ปริโยคาฬฺหธมฺโม’’ติ วุตฺตํ. เตนสฺส สจฺจาภิสมฺโพธํเยว ทีเปติ. มคฺคญาณญฺหิ เอกาภิสมยวเสน ปริญฺญาทิกิจฺจํ สาเธนฺตํ นิปฺปเทเสน จตุสจฺจธมฺมํ สมนฺตโต โอคาหนฺตํ นาม โหติ. เตนาห – ‘‘ทิฏฺโฐ อริยสจฺจธมฺโม เอเตนาติ ทิฏฺฐธมฺโม’’ติ. ติณฺณา วิจิกิจฺฉาติ สปฺปฏิภยกนฺตารสทิสา โสฬสวตฺถุกา อฏฺฐวตฺถุกา จ ติณฺณา วิจิกิจฺฉา ติณฺณวิจิกิจฺฉา. วิคตกถํกโถติ ปวตฺติอาทีสุ ‘‘เอวํ นุ โข, กึ นุ โข’’ติ เอวํ ปวตฺติกา วิคตา สมุจฺฉินฺนา กถํกถา. สารชฺชกรานํ ปาปธมฺมานํ ปหีนตฺตา ตปฺปฏิปกฺเขสุ สีลาทิคุเณสุ สุปฺปติฏฺฐิตตฺตา เวสารชฺชํ วิสารทภาวํ เวยฺยตฺติยํ ปตฺโต. อตฺตนา เอว ปจฺจกฺขโต ทิฏฺฐตฺตา น ตสฺส ปโร ปจฺเจตพฺโพ อตฺถีติ อปรปฺปจฺจโย. दृष्टधम्म (दिट्ठधम्मो) असे म्हटल्यानंतर, 'दर्शन' नावाचे ज्ञानदर्शनापेक्षा इतरही काही असू शकते, त्याचे निवारण करण्यासाठी 'पत्तधम्म' (पत्तधम्मो - ज्याने धम्म प्राप्त केला आहे) असे म्हटले आहे. प्राप्ती ही ज्ञानसंपत्तीपेक्षा इतरही असू शकते, म्हणून त्यापासून वेगळे दर्शवण्यासाठी 'विदितधम्म' (विदितधम्मो - ज्याला धम्म ज्ञात झाला आहे) असे म्हटले आहे. ती ही विदितधम्मता धम्माच्या केवळ एका भागापुरतीच असू शकते, म्हणून संपूर्णपणे ज्ञात असण्याची अवस्था दर्शवण्यासाठी 'परियोगाळ्हधम्म' (परियोगाळ्हधम्मो - ज्याने धम्माचा सखोल वेध घेतला आहे) असे म्हटले आहे. याद्वारे त्याचा सत्याचा साक्षात्कार (सच्चाभिसंबोध) च दर्शविला जातो. कारण मार्गज्ञान हे एकाच अभिसमयाच्या द्वारे परिज्ञा इत्यादी कार्ये साध्य करत, संपूर्णपणे चार आर्यसत्यांच्या धम्माचा सर्व बाजूंनी वेध घेणारे (अवगाहन करणारे) असते. म्हणूनच म्हटले आहे – 'ज्याद्वारे आर्यसत्यधम्म पाहिला गेला आहे, तो दृष्टधम्म होय.' 'तिण्णविचिकिच्छो' (ज्याने शंका ओलांडल्या आहेत) म्हणजे भययुक्त वाळवंटासारख्या सोळा प्रकारच्या आणि आठ प्रकारच्या शंका ज्याने ओलांडल्या आहेत, तो 'तिण्णविचिकिच्छो'. 'विगतकथंकथो' (ज्याची शंका-कुशंका नष्ट झाली आहे) म्हणजे प्रवृत्ती इत्यादींमध्ये 'असे आहे का, काय बरे आहे?' अशा प्रकारे चालणारी शंका-कुशंका ज्याची निघून गेली आहे, समूळ नष्ट झाली आहे, तो. भय निर्माण करणाऱ्या पापधम्मांचा प्रहाण केल्यामुळे आणि त्यांच्या विरोधी अशा शील इत्यादी गुणांमध्ये उत्तम प्रकारे प्रतिष्ठित झाल्यामुळे जो वैशारद्य (निर्भयता), विशारद भाव किंवा नैपुण्य प्राप्त झाला आहे, तो. स्वतःच प्रत्यक्ष पाहिले असल्यामुळे त्याला दुसऱ्या कोणावर अवलंबून राहण्याची गरज नसते, म्हणून तो 'अपरप्रत्यय' (अपरप्पच्चयो - दुसऱ्यावर अवलंबून नसलेला) होय. ๗๑. ปณฺฑิโตติ ปญฺญวา. ७१. पंडित म्हणजे प्रज्ञावान होय. ๗๒. เตน หิ สมฺมาติ โทวาริเกน สทฺธึ สลฺลปติเยว, ‘‘เอตฺเถวา’’ติ เตน วุตฺตวจนํ สุตฺวาปิ ตสฺส อตฺถํ อสลฺลกฺเขนฺโต. กสฺมา? ปริเทวตาย. เตนาห ‘‘พลวโสเกน อภิภูโต’’ติ. ७२. त्यामुळेच 'मित्रा' असे म्हणत तो द्वारपालाशी बोलतोच, 'येथेच' असे त्याने म्हटलेले वचन ऐकूनही त्याचा अर्थ लक्षात न घेता. कशामुळे? विलापामुळे. म्हणूनच म्हटले आहे – 'तीव्र शोकाने ग्रासलेला' (अभिभूत झालेला). ๗๓. เตเนวาติ เยน อุตฺตราสงฺเคน อาสนํ สมฺมชฺชติ, เตเนว อุทเร ปริกฺขิปนฺโต ‘‘มาหํ สตฺถารํ มม สรีเรน ผุสิ’’นฺติ อนฺตรํ กโรนฺโต อุตฺตราสงฺเคน ตํ อุทเร ปริกฺขิปนฺโต ปริคฺคเหตฺวา. ‘‘ทตฺตปญฺญตฺต’’นฺติอาทีสุ (ที. นิ. ๑.๑๗๑) วิย ทตฺต-สทฺโท เอตฺถ พาลปริยาโยติ อาห ‘‘ชโฬสิ ชาโต’’ติ. อุปฏฺฐากสฺส อญฺญถาภาเวนาติ ปุพฺเพ อตฺตโน อุปฏฺฐากสฺส อิทานิ อนุปฏฺฐากภาเวน. ७३. त्याच्यानेच म्हणजे ज्या उत्तरासंगाने (वरच्या वस्त्राने) तो आसन स्वच्छ करतो, त्यानेच पोटाला वेढत 'मी माझ्या शरीराने शास्त्याला (बुद्धांना) स्पर्श करू नये' असे अंतर ठेवत, उत्तरासंगाने पोटाला वेढून धरून. 'दत्तपञ्ञत्तं' इत्यादींमध्ये (दी. नि. १.१७१) 'दत्त' शब्द जसा येथे मूर्खाचा पर्याय आहे, म्हणून म्हटले आहे – 'तू मूर्ख जन्माला आला आहेस' (जळोसी जातो). उपस्थायकाच्या (सेवकाच्या) बदललेल्या भावामुळे म्हणजे पूर्वी स्वतःचा उपस्थायक असलेला आता अनुपस्थायक (सेवक नसलेला) झाल्यामुळे. ๗๕. อวิญฺญาณกํ ทารุสาขาทิมยํ. พหลพหลํ ปีตาวเลปนํ รงฺคชาตนฺติ อติวิย พหลํ ปีตวณฺณมญฺชิฏฺฐอาทิอวเลปนรชนํ. ฆฏฺเฏตฺวา อุปฺปาทิตจฺฉวึ, ยา รงฺคํ ปิวติ. นิลฺโลมตนฺติ ปุนปฺปุนํ อนุลิมฺปเนน. ขณฺฑขณฺฑิตนฺติ ขณฺฑขณฺฑิตภาวํ. รงฺคกฺขโม รชนิโย. เตนาห ‘‘ราคมตฺตํ ชเนตี’’ติ. อนุโยคนฺติ โจทนํ. วีมํสนฺติ วิจารณํ. ถุเส โกฏฺเฏตฺวา ตณฺฑุลปริเยสนํ [Pg.41] วิย กทลิยํ สารปริเยสนํ วิย จ นิคณฺฐวาเท สารวีมํสนํ. ตโต เอว จ ตํ วีมํสนฺโต ริตฺตโก ตุจฺฉโกว โหตีติ. สพฺพมฺปิ พุทฺธวจนํ จตุสจฺจวินิมุตฺตํ นตฺถิ, ตญฺจ วีมํสิยมานํ วิญฺญูนํ ปีติโสมนสฺสเมว ชเนติ, อตปฺปกญฺจ อเสจนาภาเวนาติ อาห ‘‘จตุสจฺจกถา หี’’ติอาทิ. ยถา ยถาติ ยทิ ขนฺธมุเขน ยทิ ธาตายตนาทีสุ อญฺญตรมุเขน พุทฺธวจนํ โอคาหิสฺสติ, ตถา ตถา คมฺภีรญาณานํเยว โคจรภาวโต คมฺภีรเมว โหติ. โย เจตฺถ ปณฺฑิโต นิปุโณ กตปรปฺปวาโท ปณิธาย สพฺพถาเมน โจทนํ อารมฺภติ ตสฺส โจทนา เกสคฺคมตฺตมฺปิ จาเลตุํ น สกฺโกติ. ปุน สุจิรมฺปิ กาลํ วิจาเรนฺเตสุปิ วิมทฺทกฺขมโต, เอวํ ตถาคตวาโท สฺวาขฺยาตภาวโตติ อาห ‘‘อนุโยคกฺขโม วิมชฺชนกฺขโม จา’’ติ. ७५. अविज्ञाणक (चेतनाविरहित) म्हणजे लाकूड, फांद्या इत्यादींनी बनलेले. 'दाट पिवळा लेप लावलेला रंग' म्हणजे अत्यंत दाट पिवळ्या रंगाचा, मंजिष्ठा इत्यादींचा लेप किंवा रंग. घासून निर्माण केलेली त्वचा, जी रंग शोषून घेते. 'रोमविरहित' (निल्लोमतं) म्हणजे वारंवार लेप लावल्यामुळे. 'खंडित-खंडित' म्हणजे तुकडे-तुकडे होण्याची अवस्था. 'रंगक्षम' म्हणजे रंगविण्यास योग्य. म्हणूनच म्हटले आहे – 'राग (आसक्ती/रंग) उत्पन्न करतो'. 'अनुयोग' म्हणजे चोदना (आक्षेप घेणे). 'मीमांसा' म्हणजे विचारणा (तपासणी). भुसा कुटून तांदूळ शोधण्यासारखे आणि केळीच्या खांबामध्ये सार (गाभा) शोधण्यासारखे निग्रंथांच्या वादामध्ये साराची मीमांसा करणे होय. आणि म्हणूनच त्याची मीमांसा करणारा रिकामी आणि तुच्छच ठरतो. सर्वच बुद्धवचन चार आर्यसत्यांशिवाय दुसरे काही नाही, आणि त्याची मीमांसा केली असता ते विद्वानांना प्रीती आणि सोमनस्यच (आनंद) उत्पन्न करते, आणि अतृप्त न करणारे असल्यामुळे ते अतृप्तता निर्माण करत नाही, म्हणूनच म्हटले आहे – 'चार आर्यसत्यांची कथा ही' इत्यादी. ज्या ज्या प्रकारे, मग ते स्कंधांच्या माध्यमातून असो किंवा धातू, आयतन इत्यादींपैकी कोणत्याही माध्यमातून असो, जर बुद्धवचनाचा वेध घेतला (अवगाहन केले), तर त्या त्या प्रकारे ते गंभीर ज्ञान असणाऱ्यांचाच विषय असल्यामुळे गंभीरच असते. आणि जो कोणी येथे पंडित, निपुण, परवादाचा अभ्यास केलेला, पूर्ण शक्तीनिशी आक्षेप घेण्यास सुरुवात करतो, त्याचा आक्षेप केसाच्या टोकाएवढाही धक्का देऊ शकत नाही. पुन्हा दीर्घकाळ विचार केला तरीही ते विमर्दन सहन करणारे (परीक्षेला उतरणारे) असल्यामुळे, अशा प्रकारे तथागतांचा वाद हा स्वाख्यात (उत्तम प्रकारे सांगितलेला) असल्यामुळे म्हटले आहे – 'तो अनुयोगक्षम (आक्षेपांना तोंड देणारा) आणि विमर्जनक्षम (परीक्षेला उतरणारा) आहे'. ๗๖. วิสยปริญฺญาเณน ทหติ ปฏิปกฺเข โสเธตีติ ธีโร, สฺวายมสฺส ธีรภาโว สพฺพโส สมฺโมหวิทฺธํสนตายาติ อาห – ‘‘ยา ปญฺญา…เป… เตน สมนฺนาคตสฺสา’’ติ. ปภินฺนขีลสฺสาติ สมุจฺฉินฺนสพฺพเจโตขีลสฺส, กิเลสมจฺจุมารวิชเยเนว อภิสงฺขารขนฺธมารา ชิตาว โหนฺตีติ เตสํ ทฺวินฺนํ อิธ อคฺคหณํ. อีฆ-สทฺโท ทุกฺขปริยาโยติ อาห ‘‘นิทฺทุกฺขสฺสา’’ติ. ตตฺถ สอุปาทิเสสนิพฺพานปฺปตฺติยา กิเลเสน นิทฺทุกฺขตา, อนุปาทิเสสนิพฺพานปฺปตฺติยา วิปากทุกฺเขน นิทฺทุกฺขตา. รชฺชนทุสฺสนมุยฺหนาทิวเสน วิวิธํ อีสนโต วีสํ, วีสเมว เวสํ, ราคาทีติ อาห – ‘‘เวสนฺตรสฺสาติ ราคาทิวีสํ ตริตฺวา วิตริตฺวา ฐิตสฺสา’’ติ. ७६. विषयाच्या परिज्ञानाने (पूर्ण ज्ञानाने) जो प्रतिपक्षाला (विरोधी दोषांना) नष्ट करतो आणि शुद्ध करतो, तो 'धीर' होय. त्याचा हा धीरभाव सर्व प्रकारे संमोह (अज्ञान) नष्ट करण्यामुळे आहे, म्हणून म्हटले आहे – 'जी प्रज्ञा...पे... त्याने युक्त असलेल्याचा'. 'पभिन्नखील' (ज्याचे अडथळे नष्ट झाले आहेत) म्हणजे ज्याचे सर्व चेतोखील (मनाचे अडथळे) समूळ नष्ट झाले आहेत. क्लेशमार आणि मृत्युमार यांच्यावरील विजयानेच अभिसंस्कारमार आणि स्कंधमार हे जिंकलेच जातात, म्हणून त्या दोघांचे येथे ग्रहण केलेले नाही. 'ईघ' शब्द हा दुःखाचा पर्याय आहे, म्हणून म्हटले आहे – 'निद्दुक्खस्स' (दुःखरहित असलेल्याचा). त्यामध्ये स-उपादिशेष निर्वाण प्राप्तीमुळे क्लेशांपासून दुःखरहितता होते, आणि अनुपपादिशेष निर्वाण प्राप्तीमुळे विपाक दुःखापासून दुःखरहितता होते. आसक्ती, द्वेष, मोह इत्यादींच्या द्वारे विविध प्रकारे पीडा देणारे जे विष आहे, तेच विषम रूप म्हणजे राग इत्यादी होय, म्हणून म्हटले आहे – 'वेसंतरस्स' म्हणजे राग इत्यादी विष पार करून, ओलांडून राहिलेल्याचा. ตุสิตสฺสาติ กรุณายนวเสน ตุสิยา อิตสฺส สํวตฺตสฺส. เอวํ สติ ‘‘มุทิตสฺสา’’ติ อิทํ ปุนรุตฺตเมว โหติ. มนุชสฺสาติ ปฐมาย ชาติยา ภควา มนุสฺสชาติโย หุตฺวา วุตฺตานํ วกฺขมานานญฺจ วเสน สเทวกํ อภิภวิตฺวา ฐิโต อจฺฉริโย ภควาติ ทสฺเสติ. สเทวกํ โลกํ สํสารโต นิพฺพานสุขํ นรติ เนติ ปาเปตีติ นโร, นายโกติ อตฺโถ, ตสฺส นรสฺส, เตนาห ‘‘ปุนรุตฺต’’นฺติ. ‘‘มนุชสฺสา’’ติ วตฺวา ‘‘นรสฺสา’’ติ ปุนรุตฺตํ ปทํ. อตฺถวเสน อญฺญถา วุจฺจมาเน เอเกกคาถาย ทสคุณา นปฺปโหนฺติ, น ปูเรนฺตีติ อตฺโถ. 'तुसितस्स' म्हणजे करुणेच्या भावनेने संतुष्ट झालेल्याचा. असे असताना 'मुदितस्स' हे पुनरुक्तच (पुन्हा म्हटलेले) होते. 'मनुजस्स' (मनुष्याचा) म्हणजे पहिल्या जन्मात भगवान मनुष्यजातीचे होऊन, सांगितलेल्या आणि सांगण्यात येणाऱ्या गोष्टींच्या द्वारे देवलोकासह सर्व जगाला पराभूत करून राहिलेले आश्चर्यकारक भगवान आहेत, हे दर्शवितात. देवलोकासह सर्व जगाला संसारातून निर्वाणसुखाकडे जो नेतो, तो 'नर' म्हणजे नायक असा अर्थ आहे, त्या नराचा. म्हणूनच म्हटले आहे – 'पुनरुक्त'. 'मनुजस्स' असे म्हणून 'नरस्स' म्हणणे हा पुनरुक्त शब्द आहे. अर्थाच्या दृष्टीने जर वेगळ्या प्रकारे सांगितले गेले, तर प्रत्येक गाथेमध्ये दहा गुण पुरेसे होत नाहीत, म्हणजेच पूर्ण होत नाहीत, असा अर्थ आहे. วิเนตีติ วินโย, วินโย เอว เวเนยิโกติ อาห ‘‘สตฺตานํ วินายกสฺสา’’ติ. วิญฺญูนํ รุจึ ราติ, อีเรตีติ วา รุจิโร, สฺวายมสฺส รุจิรภาโว [Pg.42] กุสลตายาติ อาห ‘‘สุจิธมฺมสฺสา’’ติ. ปภาสกสฺสาติ ญาณาโลเกน ปภสฺสรภาวกรสฺส. นิสฺสงฺคสฺสาติ อฏฺฐสุปิ ปริสาสุ, สเทเว วา สพฺพสฺมึ โลเก อคฺคณฺหาปนปริจฺจาเคน นิสฺสฏสฺส. คมฺภีรคุณสฺสาติ ปเรสํ ญาเณน อปฺปติฏฺฐภาวา คมฺภีรคุณสฺส. เตนาห ภควา – ‘‘อตฺถิ, ภิกฺขเว, อญฺเญว ธมฺมา คมฺภีรา’’ติอาทิ (ที. นิ. ๑.๒๘). อริยาย วา ตุณฺหีภาเวน โมนปฺปตฺตสฺส. ธมฺเม ฐิตสฺสาติ ธมฺมกาเย สุปฺปติฏฺฐิตสฺส. สํวุตตฺตสฺสาติ อรกฺขิยกายสมาจาราทิตาย สํวุตสภาวสฺส. जो विनय करतो (मार्गदर्शन करतो) तो विनय, विनय म्हणजेच वेनेयिक (विनीत करणारा), म्हणूनच म्हटले आहे – 'प्राण्यांचे विनायक' (प्राण्यांना सन्मार्गावर नेणारे). विद्वानांच्या आवडीला जो वाढवतो किंवा प्रेरित करतो तो 'रुचिर' होय. त्याचा हा रुचिरभाव त्याच्या कुशलतेमुळे आहे, म्हणूनच म्हटले आहे – 'शुचिधम्म' (पवित्र धम्म असलेल्याचा). 'प्रभासक' (प्रकाशक) म्हणजे ज्ञानरूपी प्रकाशाने देदीप्यमान (प्रभास्वर) करणारा. 'निःसंग' म्हणजे आठही परिषदांमध्ये, किंवा देवलोकासह संपूर्ण जगात आसक्तीचा त्याग करून मुक्त झालेला. 'गंभीरगुण' म्हणजे इतरांच्या ज्ञानाने ज्याचा थांग लागत नाही अशा गंभीर गुणांनी युक्त असलेला. म्हणूनच भगवान म्हणाले – 'भिक्खूहो, इतरही काही गंभीर धम्म आहेत' इत्यादी (दी. नि. १.२८). किंवा आर्य मौनाच्या (तुष्णीभाव) द्वारे मुनिभाव (मौनत्व) प्राप्त झालेला. 'धम्मामध्ये प्रतिष्ठित' म्हणजे धम्मकायामध्ये उत्तम प्रकारे प्रतिष्ठित असलेला. 'संवृत चित्त असलेला' (संवर राखणारा) म्हणजे रक्षण न कराव्या लागणाऱ्या कायिक आचरणादींमुळे संवृत स्वभावाचा असलेला. อาคุํ น กโรตีติอาทีหิ จตูหิ การเณหิ, ปนฺตเสนาสนสฺสาติ วิวิตฺตเสนาสนสฺส. ปฏิมนฺตนปญฺญายาติ สพฺพปรปฺปวาทานํ วิปราวตฺตมนฺตนปญฺญาย. โมนํ วุจฺจติ ญาณํ สพฺพโต กิเลสานํ นิธุนนโต. ‘आगुं न करोति’ (पाप करत नाही) इत्यादी चार कारणांमुळे, ‘पन्तसेनासनस्स’ म्हणजे विविक्त (एकांत) सेनासनाचा. ‘पटिमन्तनपञ्ञाय’ म्हणजे सर्व परवादांचे (इतर सिद्धांतांचे) खंडन करणाऱ्या विचार-प्रज्ञेने. सर्व क्लेशांचे निर्मूलन केल्यामुळे ज्ञानाला ‘मोन’ (मौन/मुनिभाव) म्हटले जाते। อิสิสตฺตมสฺสาติ สพฺพอิสีสุ เชฏฺฐสฺส สาธุตมสฺส. เสฏฺฐปฺปตฺตสฺสาติ เสฏฺฐํ อุตฺตมํ สมฺมาสมฺโพธึ ปตฺตสฺส. อกฺขราทีนีติ อกฺขรปทพฺยญฺชนาการ-นิรุตฺตินิทฺเทส-สํกาสนปกาสน-วิวรณ-วิภชนุตฺตานีกรณานีติ พฺยญฺชนตฺถปทานิ. สโมธาเนตฺวา วิเนยฺยชฺฌาสยานุรูปํ ปกาสนโต กถนโต ปทกสฺส. ปุริ-สทฺโท ‘‘ปุพฺเพ’’ติ อิมินา สมานตฺโถติ อาห – ‘‘ปุรินฺททสฺสาติ สพฺพปฐมํ ธมฺมทานทายกสฺสา’’ติ. ภควา อสยฺหํ สหิตุํ สมตฺโถติ อาห ‘‘สมตฺถสฺสา’’ติ. เตนาห – ‘‘ตถาคตํ พุทฺธมสยฺหสาหิน’’นฺติ (อิติวุ. ๓๘). เต ปตฺตสฺสาติ เต คุเณ อนวเสสโต ปตฺตสฺส. วิตฺถาเรตฺวา สํกิเลสโวทานธมฺมํ พฺยากโรตีติ พฺยากรโณ, พฺยากรโณ เอว เวยฺยากรโณ. ตนฺติปทนฺติ ตนฺตึ อาโรเปตฺวา ฐปิตํ ปทํ. ‘इसिसत्तमस्स’ म्हणजे सर्व ऋषींमध्ये (इर्षींमध्ये) ज्येष्ठ आणि अत्यंत साधू (श्रेष्ठ). ‘सेट्ठप्पत्तस्स’ म्हणजे श्रेष्ठ, उत्तम अशा सम्यक्संबोधीला प्राप्त झालेल्या. ‘अक्खरादीनि’ म्हणजे अक्षर, पद, व्यंजन, आकार, निरुक्ति, निर्देश, संकासन (स्पष्टीकरण), प्रकाशन, विवरण, विभाजन आणि उत्तानीकरण (स्पष्ट करणे) हे व्यंजनाचे अर्थ सांगणारे शब्द आहेत. विनेय (उपदेश देण्यास योग्य) लोकांच्या आशयाला अनुरूप अशा प्रकारे एकत्रित करून प्रकाशित केल्यामुळे, सांगण्यामुळे ‘पदक’ (मार्गदर्शक) म्हटले आहे. ‘पुरि’ हा शब्द ‘पुब्बे’ (पूर्वी) या अर्थाशी समान आहे, म्हणून म्हटले आहे – ‘पुरिन्ददस्स’ म्हणजे सर्वात आधी धम्मदान देणाऱ्याचा. भगवान असह्य गोष्टी सहन करण्यास समर्थ आहेत, म्हणून ‘समत्थस्स’ (समर्थाचा) असे म्हटले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘तथागतं बुद्धमसह्यसाहिनं’ (असह्य गोष्टी सहन करणाऱ्या तथागत बुद्धाला) (इतिवृत्तक ३८). ‘ते पत्तस्स’ म्हणजे त्या गुणांना पूर्णपणे प्राप्त झालेल्याचा. संक्लेश (मळकटपणा) आणि वोदान (शुद्धी) च्या धम्माचे सविस्तर व्याकरण (स्पष्टीकरण) करतो तो ‘ब्याकरणो’ (व्याकरणकर्ता), आणि ‘ब्याकरणो’ म्हणजेच ‘वेय्याकरणो’ होय. ‘तन्तिपदं’ म्हणजे तन्तीवर (परंपरेवर/सूत्रावर) ठेवून स्थापित केलेले पद। ตณฺหาพนฺธเนน สพฺเพน วา กิเลสพนฺธเนน อพทฺธสฺส. มหาปญฺญายาติ มหานุภาวาย ปญฺญาย, มหาวิสยาย วา ปญฺญาย. สพฺพา หิ ภควโต ปญฺญา มหานุภาวา, ยถาสกํ วิสเย มหาวิสยา จ เอกาทิวเสน อนวเสสโต มหาวิสยา นาม สพฺพญฺญุตาว. อานุภาวทสฺสนฏฺเฐนาติ อจฺฉริยาจินฺเตยฺยาปริเมยฺยสฺส อตฺตโน อานุภาวสฺส โลกสฺส ทสฺสนฏฺเฐน. ยกฺขสฺสาติ วา โลเกน ปูชนียสฺส[Pg.43]. อยํ อุปาสโก ขุชฺชุตฺตรา วิย อุปาสิกา เสขปฏิสมฺภิทาปฺปตฺโตติ อาห ‘‘โสตาปตฺติมคฺเคเนว ปฏิสมฺภิทา อาคตา’’ติ. กิเลสปฺปหานวณฺณํ กเถนฺโตติ กิเลสปฺปหานํ วิสยํ นิมิตฺตํ กตฺวา วณฺณํ กเถนฺโต. तृष्णाबंधनाने किंवा सर्व क्लेशबंधनाने न बांधलेल्याचा. ‘महापञ्ञाय’ म्हणजे महानुभाव (महान सामर्थ्यशाली) प्रज्ञेने, किंवा महाविषय (विस्तृत क्षेत्र) असलेल्या प्रज्ञेने. कारण भगवंतांची सर्व प्रज्ञा महानुभाव आहे, आणि आपापल्या विषयात ती महाविषय आहे, तसेच एकादीच्या क्रमाने पूर्णपणे महाविषय असणारी प्रज्ञा म्हणजेच ‘सब्बञ्ञुता’ (सर्वज्ञता) होय. ‘आनुभावदस्सनट्ठेन’ म्हणजे जगाला स्वतःचा आश्चर्यकारक, अचिंत्य आणि अपरिमेय प्रभाव दाखवण्याच्या अर्थाने. ‘यक्खस्स’ म्हणजे जगाद्वारे पूजनीय असलेल्याचा. हा उपासक खुज्जुत्तरा उपासिकेप्रमाणे शैक्ष-प्रतिसंभिदा प्राप्त आहे, म्हणून म्हटले आहे – ‘सोतापत्तिमार्गानेच प्रतिसंभिदा प्राप्त झाली’. ‘किलेसप्पहानवण्णं कथेन्तो’ म्हणजे क्लेशांच्या प्रहाणाला (नष्ट करण्याला) विषय किंवा निमित्त बनवून त्याची प्रशंसा करणारा। ๗๗. สมฺปิณฺฑิตาติ สนฺนิจิตา, คนฺถิตาติ อตฺโถ. อิเม สตฺตาติ ยํ ยเทว ปริพฺภมนฺตา สตฺตา. อตฺตโนว จินฺตยนฺตีติ อวีตตณฺหตาย สกํเยว ปโยชนํ จินฺเตนฺติ. ตถา หิ มเต ญาตเก อนุโสจนฺตาปิ เตหิ สาเธตพฺพสฺส อตฺตโน ปโยชนสฺเสว วเสน อนุโสจนฺติ. อุณฺหํ อโหสีติ พลวตา จิตฺตสฺส สนฺตาเปน สนฺตตฺตํ อพฺภนฺตรํ หทยฏฺฐานํ ขทิรงฺคารสนฺตาปิตํ วิย อุณฺหํ อโหสิ. เตนาห ‘‘โลหิตํ วิลียิตฺถา’’ติ. ปตฺตมตฺตนฺติ เอกปตฺตปูรมตฺตํ. อภิสมยสาธิกาย จตุสจฺจเทสนาย สงฺเขเปเนว เทสิตตฺตา อาห – ‘อุคฺฆฏิตญฺญุปุคฺคลสฺส วเสน ธมฺมเทสนา ปรินิฏฺฐิตา’’ติ. ७७. ‘सम्पिण्डिता’ म्हणजे संचित केलेली, गुंफलेली असा अर्थ आहे. ‘इमे सत्ता’ म्हणजे जे जे संसरण करणारे प्राणी आहेत. ‘अत्तनोव चिन्तयन्ति’ म्हणजे तृष्णा नष्ट न झाल्यामुळे ते स्वतःच्याच प्रयोजनाचा (हिताचा) विचार करतात. कारण मृत नातेवाईकांसाठी शोक करतानाही, त्यांच्याद्वारे साध्य होणाऱ्या स्वतःच्याच प्रयोजनासाठी ते शोक करतात. ‘उण्हं अहोसि’ म्हणजे चित्ताच्या तीव्र संतापामुळे तापलेले आतील हृदयस्थान खैराच्या कोळशाने तापवल्यासारखे उष्ण झाले. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘लोहितं विलीयित्थ’ (रक्त वितळले). ‘पत्तमतं’ म्हणजे एक पात्र भरून. अभिसमय (सत्यप्राप्ती) साधून देणाऱ्या चतुरार्यसत्य देशनेचे अत्यंत संक्षेपाने उपदेशन केल्यामुळे म्हटले आहे – ‘उग्घटितञ्ञू (शीघ्र बुद्धीच्या) पुद्गलाच्या अनुषंगाने धम्मदेशना पूर्ण झाली’। อุปาลิสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. उपालिसुत्त वर्णनाची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली। ๗. กุกฺกุรวติกสุตฺตวณฺณนา ७. कुक्कुरवतिकसुत्त वर्णन (कुक्कुरवतिक सुत्ताची टीका) ๗๘. โกลิเยสูติ พหุวจนวเสนายํ ปาฬิ อาคตา. เอวํนามเก ชนปเทติ อตฺถวจนํ กสฺมา วุตฺตนฺติ อาห ‘‘โส หี’’ติอาทิ. น นิยมิโตติ ‘‘อสุกมฺหิ นาม วิหาเร’’ติ น นิยเมตฺวา วุตฺโต. เสนาสเนเยวาติ อาวาเสเยว, น รุกฺขมูลาทิเก. เวสกิริยา ฆาสคฺคหณาทินา สมาทาตพฺพฏฺเฐน โควตํ, ตสฺมึ นิยุตฺโต โควติโก. เตนาห ‘‘สมาทินฺนโควโต’’ติ. ยํ สนฺธายาหุ เวทเวทิโน – ‘‘คจฺฉํ ภกฺเขติ, ติฏฺฐํ มุตฺเตติ, อุปาหา อุทกํ ธูเปติ, ติณานิ ฉินฺทตี’’ติอาทิ. อยํ อเจโลติ อเจลกปพฺพชฺชาวเสน อเจโล, ปุริโม ปน โควติโก กุกฺกุรวติโกติ เอตฺถ วุตฺตนยานุสาเรน อตฺโถ วตฺตพฺโพ. ปลิกุณฺฐิตฺวาติ อุโภ หตฺเถ อุโภ ปาเท จ สมิญฺชิตฺวา. ‘‘อุกฺกุฏิโก หุตฺวา’’ติปิ วทนฺติ. คมนํ นิปฺผชฺชนํ คตีติ อาห – ‘‘กา [Pg.44] คตีติ กา นิปฺผตฺตี’’ติ. นิปฺผตฺติปริโยสานา หิ วิปากธมฺมปฺปวตฺติ. กตูปจิตกมฺมวเสน อภิสมฺปเรติ เอตฺถาติ อภิสมฺปราโย, ปรโลโก. ตตฺถสฺส จ นิปฺผตฺตึ ปุจฺฉตีติ อาห – ‘‘อภิสมฺปรายมฺหิ กตฺถ นิพฺพตฺตี’’ติ. กุกฺกุรวตสมาทานนฺติ กุกฺกุรภาวสมาทานํ, ‘‘อชฺช ปฏฺฐาย อหํ กุกฺกุโร’’ติ กุกฺกุรภาวาธิฏฺฐานํ. ७८. ‘कोलियेसु’ हे बहुवचनाच्या रूपाने पाळीमध्ये आले आहे. ‘या नावाच्या जनपदात’ असा अर्थ का सांगितला आहे? म्हणून ‘सो ही’ इत्यादी म्हटले आहे. ‘न नियमितो’ म्हणजे ‘अमुक एका विहारात’ असे मर्यादित करून सांगितले नाही. ‘सेनासनेयेव’ म्हणजे आवासातच (निवासस्थानातच), वृक्षमूल इत्यादी ठिकाणी नाही. वेश, क्रिया, चारा खाणे इत्यादी ग्रहण करण्याच्या रूपाने समादान (स्वीकार) करण्याच्या अर्थाने ‘गोवत’ (गो-व्रत) म्हटले आहे, आणि त्यात जो नियुक्त आहे तो ‘गोवतिक’ होय. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘समादिन्नगोवतो’ (ज्याने गो-व्रत स्वीकारले आहे). ज्याला उद्देशून वेदवेत्ते म्हणतात – ‘चालताना खातो, उभे राहून मूत्रविसर्जन करतो, पाणी आणतो, गवत कापतो’ इत्यादी. ‘अयं अचेलो’ म्हणजे अचेलक (नग्न) प्रव्रज्येच्या कारणाने नग्न असलेला; परंतु पूर्वीचा ‘गोवतिक’ आणि ‘कुक्कुरवतिक’ यांचा अर्थ येथे सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा. ‘पलिकुण्ठित्वा’ म्हणजे दोन्ही हात आणि दोन्ही पाय आकुंचित करून (वळवून). ‘उक्कुटिको हुत्वा’ (उकिडवे बसून) असेही म्हणतात. गमन किंवा निष्पत्ती म्हणजे ‘गती’, म्हणून म्हटले आहे – ‘का गती म्हणजे काय निष्पत्ती (परिणाम)’. कारण विपाक-धम्माची प्रवृत्ती निष्पत्तीमध्येच समाप्त होते. केलेल्या आणि साठवलेल्या कर्माच्या प्रभावाने जिथे मनुष्य गमन करतो तो ‘अभिसम्परायो’ म्हणजे परलोक होय. आणि तिथे त्याच्या उत्पत्तीविषयी विचारताना म्हटले आहे – ‘अभिसम्परायम्हि कत्थ निब्बत्ती’ (परलोकात कुठे जन्म होईल?). ‘कुक्कुरवतसमादानं’ म्हणजे कुत्र्याच्या भावाचे समादान (स्वीकार), ‘आजपासून मी कुत्रा आहे’ असा कुत्र्याच्या भावाचा दृढ निश्चय करणे। ๗๙. ปริปุณฺณนฺติ ยตฺตกา กุกฺกุรวิการา, เตหิ ปริปุณฺณํ. เตนาห ‘‘อนูน’’นฺติ. อพฺโพกิณฺณนฺติ เตหิ อโวมิสฺสํ. กุกฺกุราจารนฺติ กุกฺกุรานํ คมนากาโรติอาทิอาจาเรน กุกฺกุรภาวาธิฏฺฐานจิตฺตมาห. ตถา ตถา อากปฺเปตพฺพโต อากปฺโป, ปวตฺติอากาโร. โส ปเนตฺถ คมนาทิโกติ อาห ‘‘กุกฺกุรานํ คมนากาโร’’ติอาทิ. อาจาเรนาติ กุกฺกุรสีลาจาเรน. วตสมาทาเนนาติ กุกฺกุรวตาธิฏฺฐาเนน. กุกฺกุรจริยาทิเยว ทุกฺกรตปจรณํ. เตน คติวิปริเยสากาเรน ปวตฺตา ลทฺธิ. อสฺส กุกฺกุรวติกสฺส อญฺญา คติ นตฺถีติ อิตรคตึ ปฏิกฺขิปติ, อิตราสํ ปน สมฺภโว เอว นตฺถีติ. นิปชฺชมานนฺติ วตสีลาทีนํ สํโคปนวเสน สิชฺฌมานํ. ยถา สกมฺมกธาตุสทฺทา อตฺถวิเสสวเสน อกมฺมกา โหนฺติ ‘‘วิพุทฺโธ ปุริโส วิพุทฺโธ กมลสณฺโฑ’’ติ, เอวํ อตฺถวิเสสวเสน อกมฺมกาปิ สกมฺมกา โหนฺตีติ ทสฺเสนฺโต ‘‘น ปริเทวามิ น อนุตฺถุนามี’’ติอาทิมาห. อนุตฺถุนสทฺโท จ สกมฺมกวเสน ปยุชฺชติ ‘‘ปุราณานิ อนุตฺถุน’’นฺติอาทีสุ. อยญฺเจตฺถ ปโยโคติ อิมินา คาถายญฺจ อนุตฺถุนนโรทนํ อธิปฺเปตนฺติ ทสฺเสติ. ७९. ‘परिपुण्णं’ म्हणजे जितके कुत्र्याचे विकार (चेष्टा) आहेत, त्यांनी परिपूर्ण. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘अनूनं’ (उणे नसलेले). ‘अब्बोकिण्णं’ म्हणजे त्यांच्याशी अमिश्रित. ‘कुक्कुराचारं’ म्हणजे कुत्र्यांच्या चालण्याच्या पद्धती इत्यादी आचरणाने कुत्र्याच्या भावाचा निश्चय करणारे चित्त. तशा तशा प्रकारे वागण्यामुळे ‘आकप्प’ म्हणजे प्रवृत्तीचा प्रकार (वेश/चेष्टा). तो येथे चालणे इत्यादी आहे, म्हणून म्हटले आहे – ‘कुत्र्यांच्या चालण्याची पद्धत’ इत्यादी. ‘आचारेन’ म्हणजे कुत्र्याच्या शीलाचरणाने. ‘वतसमादानेन’ म्हणजे कुत्र्याच्या व्रताच्या दृढ निश्चयाने. कुत्र्यासारखे आचरण करणे हेच कठीण तपश्चर्या करणे होय. त्या गतीच्या विपरीततेच्या रूपाने प्रवृत्त झालेली ही ‘लद्धि’ (दृष्टी/मत) आहे. ‘या कुक्कुरवतिक (श्वानव्रती) माणसाला दुसरी गती नाही’ याने इतर गतीचा निषेध केला आहे, कारण इतरांचा संभवच नाही. ‘निपज्जमानं’ म्हणजे व्रत-शील इत्यादींचे रक्षण केल्यामुळे सिद्ध होणारे. ज्याप्रमाणे सकर्मक धातूचे शब्द अर्थविशेषाच्या कारणाने अकर्मक होतात, जसे ‘विबुद्धो पुरिसो’ (जागा झालेला पुरुष), ‘विबुद्धो कमलसण्डो’ (उमललेला कमळांचा समूह), त्याचप्रमाणे अकर्मक शब्दही अर्थविशेषाच्या कारणाने सकर्मक होतात, हे दर्शवण्यासाठी ‘न परिदेवामि न अनुत्थुनामि’ इत्यादी म्हटले आहे. आणि ‘अनुत्थुन’ हा शब्द ‘पुराणानि अनुत्थुनन्ति’ इत्यादींमध्ये सकर्मक रूपाने वापरला जातो. आणि हाच येथे प्रयोग आहे, या गाथेमध्ये ‘अनुत्थुनन’ म्हणजे रडणे/शोक करणे अभिप्रेत आहे हे दर्शवले आहे। ๘๐. วุตฺตนเยเนวาติ อิมินา โควตนฺติ โควตสมาทานํ. โคสีลนฺติ ควาจารํ. โคจิตฺตนฺติ ‘‘อชฺช ปฏฺฐาย โคหิ กาตพฺพํ กริสฺสามี’’ติ อุปฺปนฺนจิตฺตนฺติ อิมมตฺถํ อติทิสติ. คฺวากปฺเป ปน วตฺตพฺพํ อวสิฏฺฐํ ‘‘กุกฺกุรากปฺเป วุตฺตสทิสเมวา’’ติ อิมินาว อติทิฏฺฐํ, วิสิฏฺฐญฺจ ยถา ปน ตตฺถาติอาทินา วุตฺตเมว. ยํ ปเนตฺถ วตฺตพฺพํ, ตํ กุกฺกุรวตาทีสุ วุตฺตนยเมว. ८०. ‘वृत्त नयेनेव’ (सांगितलेल्या पद्धतीनेच) याने ‘गोवतं’ म्हणजे गो-व्रताचे समादान. ‘गोसीलं’ म्हणजे गाईचे आचरण. ‘गोचित्तं’ म्हणजे ‘आजपासून गाईंनी करण्यासारखे कर्म मी करीन’ असे उत्पन्न झालेले चित्त, हा अर्थ अतिदिशित (लागू) केला आहे. गो-आकल्पाविषयी (गाईच्या वेशाविषयी) जे सांगायचे उरले आहे, ते ‘कुक्कुर-आकल्पात सांगितल्याप्रमाणेच आहे’ यानेच अतिदिशित केले आहे, आणि विशेष गोष्ट ‘यथा पन तत्थ’ इत्यादींमध्ये सांगितल्याप्रमाणेच आहे. येथे जे काही सांगायचे आहे, ते कुक्कुर-व्रत इत्यादींमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच आहे। ๘๑. เอกจฺจกมฺมกิริยาวเสนาติ เอกจฺจสฺส อกุสลกมฺมสฺส กุสลกมฺมสฺส กรณปฺปสงฺเคน. อิเมสนฺติ โควติกกุกฺกุรวติกานํ. กิริยาติ โควตภาวนาทิวเสน ปวตฺตา กิริยา. ปากฏา ภวิสฺสตีติ ‘‘อิมสฺมึ กมฺมจตุกฺเก อิทํ นาม กมฺมํ ภชตี’’ติ ปากฏา ภวิสฺสติ. ८१. ‘एकच्चकम्मकिरियावसेनाति’ (काही कर्माच्या क्रियेच्या वशाने) म्हणजे काही अकुशल कर्माच्या किंवा कुशल कर्माच्या करण्याच्या प्रसंगाने. ‘इमेसन्ति’ (यांच्या) म्हणजे गोव्रती (गाईचे व्रत पाळणारे) आणि कुक्कुरव्रती (कुत्र्याचे व्रत पाळणारे) यांच्या. ‘किरियाति’ (क्रिया) म्हणजे गोव्रत-भावना इत्यादींच्या द्वारे प्रवृत्त झालेली क्रिया. ‘पाकटा भविस्सतीति’ (स्पष्ट होईल) म्हणजे 'या कर्म-चतुष्कात हे अमुक कर्म विभागले जाते' अशा प्रकारे स्पष्ट होईल. กาฬกนฺติ [Pg.45] (อ. นิ. ฏี. ๒.๔.๒๓๒) มลีนํ, จิตฺตสฺส อปภสฺสรภาวกรณนฺติ อตฺโถ. ตํ ปเนตฺถ กมฺมปถสมฺปตฺตเมว อธิปฺเปตนฺติ อาห ‘‘ทสอกุสลกมฺมปถ’’นฺติ. กณฺหนฺติ กณฺหาภิชาติเหตุโต วา กณฺหํ. เตนาห ‘‘กณฺหวิปาก’’นฺติ. อปายูปปตฺติ มนุสฺเสสุ จ โทภคฺคิยํ กณฺหวิปาโก, ยถา ตมภาโว วุตฺโต, เอกตฺตนิทฺเทเสน ปน ‘‘อปาเย นิพฺพตฺตนโต’’ติ วุตฺตํ, นิพฺพตฺตาปนโตติ อตฺโถ. สุกฺกนฺติ โอทาตํ, จิตฺตสฺส ปภสฺสรภาวกรณนฺติ อตฺโถ, สุกฺกาภิชาติเหตุโต วา สุกฺกํ. เตนาห ‘‘สุกฺกวิปาก’’นฺติ. สคฺคูปปตฺติ มนุสฺสโลเก โสภคฺคิยญฺจ สุกฺกวิปาโก, ยถา จ โชติภาโว วุตฺโต, เอกตฺตนิทฺเทเสน ปน ‘‘สคฺเค นิพฺพตฺตนโต’’ติ วุตฺตํ, นิพฺพตฺตาปนโตติ อตฺโถ, โวมิสฺสกกมฺมนฺติ กาเลน กณฺหํ, กาเลน สุกฺกนฺติ เอวํ มิสฺสกวเสน กตกมฺมํ. ‘‘สุขทุกฺขวิปาก’’นฺติ วตฺวา สุขทุกฺขานํ ปวตฺติอาการํ ทสฺเสตุํ ‘‘มิสฺสกกมฺมญฺหี’’ติอาทิ วุตฺตํ. กมฺมสฺส กณฺหสุกฺกสมญฺญา กณฺหสุกฺกาภิชาติเหตุตายาติ, อปจฺจยคามิตาย ตทุภยวินิมุตฺตสฺส กมฺมกฺขยกรกมฺมสฺส อิธ สุกฺกปริยาโยปิ น อิจฺฉิโตติ อาห – ‘‘อุภย…เป… อสุกฺกนฺติ วุตฺต’’นฺติ. ตตฺถ อุภยวิปากสฺสาติ ยถาธิคตสฺส วิปากสฺส. สมฺปตฺติภวปริยาปนฺโน หิ วิปาโก อิธ ‘‘สุกฺกวิปาโก’’ติ อธิปฺเปโต, น อจฺจนฺตปริสุทฺโธ. ‘काळकं’ (अं. नि. टी. २.४.२३२) म्हणजे मलीन, चित्ताला अप्रभास्वर (तेजहीन) बनवणारे असा अर्थ आहे. येथे ते कर्मपथ-संपत्तीलाच अभिप्रेत धरून ‘दहा अकुशल कर्मपथ’ असे म्हटले आहे. ‘कण्हं’ (कृष्ण/काळे) म्हणजे कृष्ण-अभिजातीच्या हेतूने किंवा काळे. म्हणूनच ‘कण्हविपाकं’ (कृष्ण विपाक) असे म्हटले आहे. अपायलोकात उत्पन्न होणे आणि मनुष्यांमध्ये दुर्भाग्य असणे हा कृष्ण विपाक आहे, जसे की अंधकारमय भाव सांगितला आहे. परंतु एकवचनी निर्देशाने ‘अपायलोकात उत्पन्न झाल्यामुळे’ असे म्हटले आहे, म्हणजेच उत्पन्न करवणारे असा अर्थ आहे. ‘सुक्कं’ (शुक्ल/पांढरे) म्हणजे स्वच्छ/उज्ज्वल, चित्ताला प्रभास्वर (तेजस्वी) बनवणारे असा अर्थ आहे, किंवा शुक्ल-अभिजातीच्या हेतूने शुक्ल. म्हणूनच ‘सुक्कविपाकं’ (शुक्ल विपाक) असे म्हटले आहे. स्वर्गलोकात उत्पन्न होणे आणि मनुष्यलोकात सौभाग्य असणे हा शुक्ल विपाक आहे, जसे की ज्योतिभाव (प्रकाशमय भाव) सांगितला आहे. परंतु एकवचनी निर्देशाने ‘स्वर्गात उत्पन्न झाल्यामुळे’ असे म्हटले आहे, म्हणजेच उत्पन्न करवणारे असा अर्थ आहे. ‘वोमिस्सककम्मं’ (मिश्रित कर्म) म्हणजे कधी काळे (कृष्ण) तर कधी पांढरे (शुक्ल) अशा मिश्रित रूपाने केलेले कर्म. ‘सुखदुःखविपाकं’ असे सांगून सुख-दुःखाच्या प्रवृत्तीचा प्रकार दर्शवण्यासाठी ‘मिस्सककम्मञ्हि’ (मिश्रित कर्मच) इत्यादी म्हटले आहे. कर्माची कृष्ण-शुक्ल ही संज्ञा कृष्ण-शुक्ल अभिजातीच्या हेतूमुळे आहे. अप्राप्तगामी (निर्वाणगामी) असल्यामुळे त्या दोन्हीपासून मुक्त असलेल्या, कर्माचा क्षय करणाऱ्या कर्मासाठी येथे ‘शुक्ल’ हा पर्याय देखील इच्छित नाही, म्हणूनच म्हटले आहे – ‘उभय...पे... अशुक्ल असे म्हटले आहे’. त्यात ‘उभयविपाकस्स’ म्हणजे यथाप्राप्त विपाकाचा. कारण संपत्ती-भवात समाविष्ट असलेला विपाक येथे ‘शुक्ल विपाक’ म्हणून अभिप्रेत आहे, अत्यंत परिशुद्ध नव्हे. สทุกฺขนฺติ อตฺตนา อุปฺปาเทตพฺเพน ทุกฺเขน สทุกฺขํ, ทุกฺขสํวตฺตนิกนฺติ อตฺโถ. ‘‘อิมสฺมึ สุตฺเต เจตนา ธุรํ, อุปาลิสุตฺเต (ม. นิ. ๒.๕๖) กมฺม’’นฺติ เหฏฺฐา วุตฺตมฺปิ อตฺถํ อิธ สาธยติ วิชานนตฺถํ. อภิสงฺขริตฺวาติ อายูหิตฺวา. ตํ ปน ปจฺจยสมวายสิทฺธิโต สํกฑฺฒนํ ปิณฺฑนํ วิย โหตีติ อาห – ‘‘สงฺกฑฺฒิตฺวา, ปิณฺฑํ กตฺวาติ อตฺโถ’’ติ, สทุกฺขํ โลกนฺติ อปายโลกมาห. วิปากผสฺสาติ ผสฺสสีเสน ตตฺถ วิปากปวตฺตมาห. ภูตกมฺมโตติ นิพฺพตฺตกมฺมโต อตฺตนา กตูปจิตกมฺมโต. ยถาภูตนฺติ ยาทิสํ. กมฺมสภาควเสนาติ กมฺมสริกฺขกวเสน. อุปปตฺติ โหตีติ อปทาทิเภทา อุปปตฺติ. กมฺเมน วิย วุตฺตาติ ยํ กโรติ, เตน อุปปชฺชตีติ เอกกมฺเมเนว ชายมานา วิย วุตฺตา อปทาทิเภทา. อุปปตฺติ จ นาม วิปาเกน โหติ วิปาเก สมฺภวนฺเต เอกํเสน เต อุปปตฺติวิเสสา สมฺภวนฺติ. ยทิ เอวํ กสฺมา ‘‘เตน อุปปชฺชตี’’ติ อุปปตฺติกมฺมเหตุกา วุตฺตาติ อาห ‘‘ยสฺมา ปนา’’ติอาทิ. เยน กมฺมวิปาเกน นิพฺพตฺโตติ [Pg.46] เยน กมฺมวิปาเกน วิปจฺจมาเนน อยํ สตฺโต นิพฺพตฺโตติ วุจฺจติ. ตํกมฺมวิปากผสฺสาติ ตสฺส ตสฺส กมฺมสฺส วิปากภูตา ผสฺสา. กมฺเมน ทาตพฺพํ ทายํ ตพฺพิปากํ อาทิยนฺตีติ กมฺมทายาทา, ผสฺสา. กมฺมสฺส ทายชฺชตา กมฺมผลสฺส ทายชฺชํ, ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘กมฺมทายชฺชา’’ติ. เตนาห ‘‘กมฺมเมว เนสํ ทายชฺชํ สนฺตก’’นฺติ. ‘सदुक्खं’ (दुःखासहित) म्हणजे स्वतः उत्पन्न करावयाच्या दुःखाने युक्त, दुःखाला कारणीभूत असणारे असा अर्थ आहे. ‘या सूत्तात चेतना मुख्य आहे, उपालिसूत्तात (म. नि. २.५६) कर्म मुख्य आहे’ हा खाली सांगितलेला अर्थ देखील येथे समजण्यासाठी सिद्ध करतो. ‘अभिसङ्खरित्वा’ म्हणजे संचित करून. परंतु ते प्रत्यय-समवायाच्या (कारणांच्या एकत्र याण्याच्या) सिद्धीमुळे ओढून आणण्यासारखे किंवा गोळा करण्यासारखे होते, म्हणून म्हटले आहे – ‘ओढून आणून, गोळा करून असा अर्थ आहे’. ‘सदुक्खं लोकं’ म्हणजे अपायलोक असे म्हटले आहे. ‘विपाकफस्सा’ (विपाक-स्पर्श) म्हणजे स्पर्शाच्या मुख्यतेने तेथे विपाकाची प्रवृत्ती सांगितली आहे. ‘भूतकम्मतो’ म्हणजे उत्पन्न झालेल्या कर्मापासून, स्वतः केलेल्या व संचित केलेल्या कर्मापासून. ‘यथाभूतं’ म्हणजे जसे. ‘कम्मसभागवसेनाति’ म्हणजे कर्माच्या समानतेच्या वशाने (कर्माच्या सारखेपणाने). ‘उपपत्ति होतीति’ म्हणजे अपद (पाय नसलेले प्राणी) इत्यादी भेदांनी युक्त उत्पत्ती. ‘कम्मेन विय वृत्ता’ म्हणजे जे करतो, त्याने उत्पन्न होतो, अशा प्रकारे एका कर्मानेच उत्पन्न होत असल्यासारखे अपद इत्यादी भेद सांगितले आहेत. आणि उत्पत्ती ही विपाकामुळे होते, विपाक संभवत असताना निश्चितपणे ते उत्पत्तीचे विशेष संभवतात. जर असे आहे, तर ‘त्याने उत्पन्न होतो’ अशी उत्पत्ती कर्म-हेतुक का सांगितली आहे? म्हणून म्हटले आहे – ‘परंतु ज्या कारणाने...’ इत्यादी. ‘येन कम्मविपाकेन निब्बत्तो’ म्हणजे ज्या कर्मविपाकाच्या विपाचित (परिपक्व) होण्याने हा प्राणी उत्पन्न झाला असे म्हटले जाते. ‘तंकम्मविपाकफस्सा’ म्हणजे त्या त्या कर्माचे विपाक असणारे स्पर्श. कर्माने देण्यायोग्य दाय (वारसा) म्हणजेच त्याचा विपाक ग्रहण करतात म्हणून ‘कम्मदायादा’ (कर्माचे वारसदार) म्हणजे स्पर्श. कर्माची दायज्जता (वारसाहक्क) म्हणजे कर्मफळाचा वारसा, म्हणूनच ‘कम्मदायज्जा’ असे म्हटले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘कर्मच त्यांचा वारसा आणि स्वतःची संपत्ती आहे’. ติสฺโส จ เหฏฺฐิมชฺฌานเจตนาติ อิทํ อพฺยาพชฺฌเวทนํ เวทิยนเอกนฺตสุขุปฺปตฺติยา เหตุภาวสาธนํ. ยทิ เอวํ ยถาวุตฺตา ฌานเจตนา ตาว โหตุ เอกนฺตสุขุปฺปตฺติเหตุภาวโต. กามาวจรา กินฺตีติ กามาวจรา ปน กุสลเจตนา ตํสภาวาภาวโต กินฺติ เกน ปกาเรน อพฺยาพชฺฌมโนสงฺขาโร นาม ชาโตติ โจเทติ, อิตโร ปน น สพฺพา กามาวจรกุสลเจตนา ตถา คหิตา, อถ โข เอกจฺจา ฌานเจตนานุกูลาติ ทสฺเสนฺโต ‘‘กสิณสชฺชนกาเล กสิณาเสวนกาเล ลพฺภนฺตี’’ติ อาห. ตตฺถ กสิณาเสวนเจตนา คเหตพฺพา, สา อุปจารชฺฌานสฺส สาธิกา. เตน กามาวจรเจตนา ปฐมชฺฌานเจตนาย ฆฏิตาติ กสิณสชฺชนเจตนาปิ กทาจิ ตาทิสา โหตีติ คหิตา. ปริกมฺมาทิวเสน หิ ปวตฺตา ภาวนามยา กามาวจรกุสลเจตนา ปฐมชฺฌานสฺส อาสนฺนตาย วุตฺตา. จตุตฺถชฺฌานเจตนา ตติยชฺฌานเจตนาย ฆฏิตาติ อิทํ เอกตฺตกายเอกตฺตสญฺญีสตฺตาวาสวตาย ตํสริกฺขกา อุเปกฺขาปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ สุขสริกฺขตา, เอวํ สนฺตสภาวตา ญาณสหิตตา จ. เกจิ ปน จตุตฺถชฺฌานเจตนานุคุณาติ นิทสฺเสนฺตา กสิณสชฺชนกาเล กสิณชฺฌานกาเล กสิณาเสวนกาเล ลพฺภตีติ ตติยชฺฌานเจตนาย อาสนฺนฆฏิตตา วุตฺตาติ วทนฺติ, ตํ เตสํ มติมตฺตํ, วุตฺตนเยเนว ตาสํ ฆฏิตตา เวทิตพฺพา. อุภยมิสฺสกวเสนาติ อุภเยสํ กุสลากุสลสงฺขารานํ สุขทุกฺขานญฺจ มิสฺสกภาววเสน. เวมานิกเปตานนฺติ อิทํ พาหุลฺลโต วุตฺตํ, อิตเรสมฺปิ วินิปาติกานํ กาเลน ทุกฺขํ โหติเยว. ‘तिस्सो च हेट्ठिमज्झानचेतनाति’ (आणि खालच्या तीन ध्यान-चेतना) हे अव्याबाध्य (दुःखरहित) वेदनेचा अनुभव घेणाऱ्या एकांत सुखाच्या उत्पत्तीचे हेतू असणे सिद्ध करते. जर असे आहे, तर पूर्वोक्त ध्यान-चेतना एकांत सुखाच्या उत्पत्तीचे हेतू असण्यामुळे तशी असो. ‘कामावचरा किन्तीति’ म्हणजे कामावचर कुशल चेतना तर तशा स्वभावाची नसल्यामुळे कशा प्रकारे ‘अव्याबाध्य मनःसंस्कार’ नावाने उत्पन्न झाली, अशी शंका उपस्थित करतो. दुसरा (टीकाकार) मात्र सर्व कामावचर कुशल चेतना तशा प्रकारे घेतलेल्या नाहीत, तर काही ध्यान-चेतनेला अनुकूल आहेत असे दर्शवत ‘कसिण-सज्जन काळी (कसिण तयार करताना) आणि कसिण-सेवन काळी प्राप्त होतात’ असे म्हणतो. तेथे कसिण-सेवन चेतना घेतली पाहिजे, ती उपचार-ध्यानाची साधक आहे. त्यामुळे कामावचर चेतना प्रथम ध्यान-चेतनेशी जोडलेली आहे, म्हणून कसिण-सज्जन चेतना देखील कधीकधी तशीच असते, असे घेतले आहे. कारण परिकर्म इत्यादींच्या वशाने प्रवृत्त झालेली भावनामय कामावचर कुशल चेतना प्रथम ध्यानाच्या निकट असल्यामुळे तसे म्हटले आहे. ‘चतुत्थज्झानचेतना ततियज्झानचेतनाय घटिताति’ (चौथ्या ध्यानाची चेतना तिसऱ्या ध्यानाच्या चेतनेशी जोडलेली आहे) हे एकत्व-काय आणि एकत्व-संज्ञी सत्त्वावासाप्रमाणे तिच्यासारखी असणारी उपेक्षा देखील अशा स्थानांमध्ये सुखासारखी असते, तसेच शांत स्वभाव असणारी आणि ज्ञानयुक्त असणारी असते. परंतु काही लोक चौथ्या ध्यान-चेतनेला अनुकूल असे दर्शवत ‘कसिण-सज्जन काळी, कसिण-ध्यान काळी आणि कसिण-सेवन काळी प्राप्त होते’ म्हणून तिसऱ्या ध्यान-चेतनेशी निकटची जोडणी सांगितली आहे असे म्हणतात, ते केवळ त्यांचे मत आहे. सांगितलेल्या पद्धतीनेच त्यांची जोडणी समजली पाहिजे. ‘उभयमिस्सकवसेनाति’ म्हणजे दोन्ही कुशल-अकुशल संस्कारांच्या आणि सुख-दुःखांच्या मिश्रित भावाच्या वशाने. ‘वेमानिकपेतानं’ (वैमानिक प्रेतांच्या) हे बहुतांश करून म्हटले आहे, इतर विनिपातिक (नरकवासी) जीवांना देखील काळाच्या ओघात दुःख होतेच. ตสฺส ปหานายาติ ตสฺส ยถาวุตฺตสฺส กมฺมสฺส อนุปฺปตฺติธมฺมตาปาทนาย. ยา เจตนาติ ยา อปจยคามินิเจตนา. กมฺมํ ปตฺวาติ สุขกมฺมนฺติ วุจฺจมาเน มคฺคเจตนาย อญฺโญ ปณฺฑรตโร ธมฺโม นาม นตฺถิ [Pg.47] อจฺจนฺตปาริสุทฺธิภาวโต. อกณฺหา อสุกฺกาติ อาคตาติ เอตฺถ สุกฺกภาวปฏิกฺเขปการณํ เหฏฺฐา วุตฺตนยเมว. เตนาห ‘‘อิทํ ปน กมฺมจตุกฺกํ ปตฺวา’’ติอาทิ. ‘तस्स पहानायाति’ (त्याच्या प्रहाणासाठी) म्हणजे त्या पूर्वोक्त कर्माच्या अनुत्पत्ती-धर्माला (पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्थितीला) प्राप्त करून देण्यासाठी. ‘या चेतनाति’ म्हणजे जी अपचयगामी (कर्मक्षय करणारी) चेतना आहे. ‘कम्मं पत्वाति’ म्हणजे ‘सुखकर्म’ असे म्हटले जात असताना मार्ग-चेतनेपेक्षा दुसरा कोणताही अधिक उज्ज्वल (शुद्ध) धर्म नाही, कारण ती अत्यंत परिशुद्ध असते. ‘अकण्हा असुक्का’ (न काळे, न पांढरे) असे आले आहे, येथे शुक्लभावाचा निषेध करण्याचे कारण खाली सांगितलेल्या पद्धतीनेच आहे. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘परंतु या कर्म-चतुष्काला प्राप्त करून...’ इत्यादी. ๘๒. อนิยฺยานิกปกฺเขติ อเจฬกปพฺพชฺชาย กุกฺกุรวเต จ. โยเคติ ญายธมฺมปฏิปตฺติยนฺติ อตฺโถ. โยเนนาติ โย ติตฺถิยปริวาโส เตน ภควตา ปญฺญตฺโต. ยํ ติตฺถิยปริวาสํ สมาทิยิตฺวาติ อยเมตฺถ โยชนา. ฆํสิตฺวา สุวณฺณํ วิย นิฆํโสปฺปเล. โกฏฺเฏตฺวา หตฺเถน วิย กุลาลภาชนํ. ८२. ‘अनिय्यानिकपक्खे’ (अनिर्याणिक पक्ष) म्हणजे अचेलक प्रव्रज्या (नग्न दीक्षा) आणि कुक्कुरव्रत (कुत्र्यासारखे वर्तन करण्याचे व्रत) यामध्ये. ‘योगे’ म्हणजे न्याय्य धम्माचे आचरण (योग्य धम्मप्रतिपत्ती) असा अर्थ आहे. ‘योनेन’ म्हणजे जो तित्थिय-परिवास (इतर पंथियांचा निवासकाळ) भगवंतांनी प्रज्ञप्त केला आहे. ‘जो तित्थिय-परिवास स्वीकारून’ हा येथे संबंध आहे. ‘निघंसोप्पले’ म्हणजे सोन्याला घासून पाहिल्याप्रमाणे. ‘कोट्टित्वा’ म्हणजे कुंभाराच्या भांड्याला हाताने ठोकून पाहिल्याप्रमाणे। วูปกฏฺโฐติ วิวิตฺโต เอกีภูโต. เปสิตตฺโตติ นิพฺพานํ ปติ เปสิตตฺโต. กามํ ตทนุตฺตรํ พฺรหฺมจริยปริโยสานํ…เป… วิหาสีติ อิมินาว อรหตฺตนิกูเฏน เทสนา นิฏฺฐาปิตา โหติ, อายสฺมโต ปน เสนิยสฺส ปฏิปตฺติกิตฺตนปรเมตํ อุชุกํ อาปนฺนอรหตฺตภาวทีปนํ, ยทิทํ ‘‘อญฺญตโร โข ปนา’’ติอาทิวจนนฺติ อาห ‘‘อรหตฺตนิกูเฏเนวา’’ติ. อรหตฺตาธิคโมเยว ตสฺส เตสํ อพฺภนฺตรตา. เสสํ สพฺพํ สุวิญฺเญยฺยเมว. ‘वूपकट्ठो’ म्हणजे विविक्त (एकांतात गेलेला) किंवा एकीभूत (एकटा झालेला). ‘पेसितत्तो’ म्हणजे निर्वाणाकडे चित्त लावलेला (चित्त प्रेषित केलेला). ‘कामं तदनुत्तरं ब्रह्मचरियपरियोसानं...पे... विहासी’ (निश्चितच त्या अनुत्तर ब्रह्मचर्याच्या समाप्तीला... विहरते झाले) या अर्हत्त्वाच्या शिखरानेच देशना समाप्त होते. परंतु आयुष्यमान सेनिय यांच्या प्रतिपत्तीचे (आचरणाचे) कौतुक करणारे आणि थेट प्राप्त झालेल्या अर्हत्त्वभावाला दर्शवणारे हे ‘अञ्ञतरो kho पना’ (निश्चितच इतर कोणीतरी...) इत्यादी वचन आहे, म्हणून ‘अरहत्तनिकूटेनेव’ (अर्हत्त्वाच्या शिखरानेच) असे म्हटले आहे. अर्हत्त्व प्राप्ती हीच त्यांची त्यांच्यामधील आंतरिकता आहे. उर्वरित सर्व सहज समजण्यासारखेच आहे। กุกฺกุรวติกสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. कुक्कुरवतिक सुत्ताच्या वर्णनातील गूढार्थाचे प्रकटीकरण (लीनत्थप्पकासना) समाप्त झाले। ๘. อภยราชกุมารสุตฺตวณฺณนา ८. अभयराजकुमार सुत्ताचे वर्णन। ๘๓. ชาติยา อสมาโน นิหีนาจริโย ปรทตฺตูปชีวิกาย มาตุยา กุจฺฉิยํ ชาโต ปาทสิกปุตฺโต. นินฺทาวเสน วทติ เอเตนาติ วาโท อคุโณติ อาห – ‘‘วาทํ อาโรเปหีติ โทสํ อาโรเปหี’’ติ. นิพฺพตฺตวเสน นิรยํ อรหติ, นิรยสํวตฺตนิเยน วา กมฺเมน นิรเย นิยุตฺโต เนรยิโก. อาปายิโกติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย. อวีจิมฺหิ อุปฺปชฺชิตฺวา ตตฺถ อายุกปฺปสญฺญิตํ อนฺตรกปฺปํ ติฏฺฐตีติ กปฺปฏฺโฐ. นิรยูปปตฺติปริหรณวเสน ติกิจฺฉิตุํ สกฺกุเณยฺโยติ เตกิจฺโฉ, น เตกิจฺโฉ อเตกิจฺโฉ. ทฺเว อนฺเต โมเจตฺวาติ ผรุสํ วา อปฺปิยํ วา กปฺเปยฺยาติ ทฺเว โกฏฺฐาเส มุญฺจิตฺวา [Pg.48] เต อนามสิตฺวา ปุจฺฉิตํ อตฺถํ ตโต พหิ กโรนฺโต อุคฺคิลติ นาม. ตํ ปน เอวํ กาตุํ น สกฺโกตีติ อาห – ‘‘อุคฺคิลิตุํ พหิ นีหริตุํ น สกฺขิตี’’ติ. เอวเมวายํ ปุจฺฉา น คเหตพฺพา, อยเมตฺถ โทโสติ ตํ อปุจฺฉํ กโรนฺโต อปนยนฺโต โอคิลติ นาม, ตถา ปน อสกฺโกนฺโต ปติฏฺฐาเปนฺโต น โอคิลติ นาม, ภควา ปน ตมตฺถํ โอกาสมฺปิ อกโรนฺโต อุภยถาปิ อสกฺขีติ เวทิตพฺโพ. กถํ? ภควา หิ ‘‘น ขฺเวตฺถ ราชกุมาร เอกํเสนา’’ติ วทนฺโต นิคณฺฐสฺส อธิปฺปายํ วิปริวตฺเตติ, อุโภ อนฺเต โมเจตฺวา ปญฺหํ วิสฺสชฺเชสิ, เอวํ ตาว อุคฺคิลิตุํ อสกฺขิ. ‘‘น ตตฺร ราชกุมาร เอกํเสนา’’ติ วทนฺโต เอว จ ‘‘นายํ ปุจฺฉา เอวํ อวิภาเคน ปุจฺฉิตพฺพา, วิภชิตฺวา ปน ปุจฺฉิตพฺพา’’ติ ปุจฺฉาย โทสํ ทีเปนฺโต ตํ หาเรนฺโต โอคิลิตุมฺปิ สกฺขตีติ. ८३. जातीने असमान, हीन आचरणाचा, दुसऱ्याने दिलेल्या दानावर जगणाऱ्या मातेच्या उदरातून जन्मलेला तो दासीपुत्र (पादशिखपुत्र) होय. निंदेच्या हेतूने याद्वारे बोलतो म्हणून वाद म्हणजे अवगुण; म्हणून म्हटले आहे – ‘वाद लादणे म्हणजे दोष लादणे’. उत्पत्तीच्या कारणाने नरकास पात्र असलेला, किंवा नरकगामी कर्मामुळे नरकात पडलेला तो ‘नेरयिक’ (नरकवासी) होय. ‘आपायिको’ (अपायगामी) यामध्येही हाच नियम आहे. अवीची नरकात उत्पन्न होऊन तेथे आयुष्यकल्प नावाच्या अंतरकल्पापर्यंत राहतो तो ‘कप्पट्ठो’ (कल्पस्थ) होय. नरकातील उत्पत्ती टाळण्याच्या दृष्टीने ज्याचा उपचार केला जाऊ शकतो तो ‘तेकिच्छो’ (उपचारयोग्य), आणि ज्याचा उपचार होऊ शकत नाही तो ‘अतेकिच्छो’ (उपचार-अयोग्य) होय. ‘दोन्ही टोके सोडून’ म्हणजे कठोर किंवा अप्रिय अशा दोन भागांना सोडून, त्यांना स्पर्श न करता विचारलेल्या अर्थाला त्यातून बाहेर काढणे याला ‘उग्गिलति’ (ओकणे/बाहेर काढणे) म्हणतात. परंतु तो तसे करण्यास असमर्थ आहे, म्हणून म्हटले आहे – ‘ओकून बाहेर काढण्यास समर्थ होणार नाही’. त्याचप्रमाणे हा प्रश्न स्वीकारण्याजोगा नाही, हा यात दोष आहे, असे सांगून तो प्रश्न निरर्थक ठरवून दूर करणे याला ‘ओगिलति’ (गिळणे) म्हणतात. परंतु तसे करण्यास असमर्थ राहून त्याला प्रस्थापित करणे याला ‘न ओगिलति’ (न गिळणे) म्हणतात. भगवंतांनी मात्र त्या चुकीच्या अर्थाला कोणतीही संधी न देता दोन्ही प्रकारे समर्थपणे उत्तर दिले, असे समजावे. कसे? कारण भगवंतांनी ‘हे राजकुमारा, येथे एकांताने (निश्चितपणे) असे नाही’ असे सांगून निगंठाचा (निर्ग्रंथाचा) अभिप्राय बदलून टाकला, दोन्ही टोके सोडून प्रश्नाचे विसर्जन केले, अशा प्रकारे ते ओकून बाहेर काढण्यास समर्थ झाले. ‘हे राजकुमारा, तेथे एकांताने असे नाही’ असे म्हणत असतानाच ‘हा प्रश्न अशा प्रकारे अविभाजितपणे विचारला जाऊ नये, तर विभाजित करून विचारला पाहिजे’ असे सांगून प्रश्नातील दोष दाखवून दिला आणि तो नष्ट करत ते गिळण्यासही समर्थ झाले। อุฏฺฐาตุํ น สกฺขิสฺสติ จิตฺตสฺส อญฺญถา ปวตฺติยา. อภโย ทฺเว มคฺเค กตปริจโย เฉโก นิปุโณ วาทสีโล จ หุตฺวา วิจรติ. เตนาห – ‘‘โส วาทชฺฌาสยตาย ตสฺส วจนํ สมฺปฏิจฺฉนฺโต ‘เอวํ, ภนฺเต’ติ อาหา’’ติ. चित्ताच्या विचलित अवस्थेमुळे तो उठण्यास समर्थ होणार नाही. अभय हा दोन्ही मार्गांचा परिचय असलेला, चतुर, niपुण आणि वादप्रिय होऊन वावरत असे. म्हणून म्हटले आहे – ‘तो वादाच्या इच्छेने त्याचे वचन स्वीकारत ‘तसेच आहे, भंते’ असे म्हणाला’। ๘๕. เอวรูปนฺติ ยา ปเรสํ อปฺปิยา อมนาปา ทุรุตฺตวาจา, เอวรูปา วาจา, น ปน ผรุสวาจา. ผรุสวาจาย หิ เสตุฆาโต ตถาคตานํ. เจตนาผรุสตาย หิ ผรุสวาจา อิจฺฉิตา, น ปเรสํ อปฺปิยตามตฺเตน. นฏฺฐา นิคณฺฐา โอคิลิกาทิสมฺมตสฺส ปญฺหสฺส เอกวจเนน วิทฺธํสิตตฺตา. ८५. ‘एवरूपं’ (अशा प्रकारची) म्हणजे जी इतरांना अप्रिय, नावडती आणि वाईट रीतीने बोललेली वाणी आहे, अशा प्रकारची वाणी; परंतु ती कठोर वाणी (परुसवाचा) नव्हे. कारण तथागतांनी कठोर वाणीचा पूर्णपणे नाश (सेतुघात) केला आहे. चेतनेच्या कठोरतेमुळेच कठोर वाणी मानली जाते, केवळ इतरांना अप्रिय वाटल्याने नव्हे. गिळणे इत्यादी मानल्या गेलेल्या प्रश्नाचा एकाच वचनाने विध्वंस केल्यामुळे निगंठ (निर्ग्रंथ) पराभूत झाले। ๘๖. ทารกสฺส องฺเก นิสีทนสฺส การณํ ทสฺเสตุํ ‘‘เลสวาทิโน’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ เลสวาทิโนติ ฉลวาทิโน, วาทมคฺเค วา อปริปุณฺณตาย เลสมตฺเตเนว วาทสีลา. โอสฏสงฺคาโมติ อเนกวารํ ปรวาทมทฺทนวเสน โอติณฺณวาทสงฺคาโม. วิชฺฌิตฺวาติ นเขน วิชฺฌิตฺวา. อิมเมวาติ ยฺวายํ ทารโก อตฺตโน วาทภงฺคปริหรณตฺถํ อิมินา องฺเก นิสีทาปิโต, อิมเมว อสฺส ทารกํ อุปมํ นิสฺสยํ กตฺวา วาทํ ภินฺทิสฺสามิ. ‘‘อสฺส วาทํ อปฺปฏิตตาย อุปมาย ภญฺชิสฺสามี’’ติ จินฺเตตฺวา. ८६. बालकाला मांडीवर बसवण्याचे कारण दाखवण्यासाठी ‘लेसवादिनो’ इत्यादी म्हटले आहे. तेथे ‘लेसवादिनो’ म्हणजे छलवादी (कुतर्क करणारे), किंवा वादाच्या मार्गात अपूर्णतेमुळे केवळ लेशानेच (निमित्तानेच) वाद घालणारे. ‘ओसटसंग्रामो’ म्हणजे अनेक वेळा दुसऱ्यांच्या वादाचे मर्दन केल्यामुळे वाद-संग्रामात उतरलेला. ‘विज्झित्वा’ म्हणजे नखाने टोचून. ‘इममेव’ म्हणजे जो हा बालक स्वतःचा वादभंग टाळण्यासाठी याने मांडीवर बसवला आहे, याच बालकाला उपमेचा आधार बनवून मी त्याचा वाद मोडून काढीन. ‘याचा वाद मी अशा उपमेने मोडीन जिचे खंडन करता येणार नाही’ असा विचार करून। อปเนยฺยํ [Pg.49] อสฺส อหนฺติ อสฺส ทารกสฺส มุขโต อหํ ตํ อปเนยฺยํ. อภูตตฺโถว อภูตํ อุตฺตรปทโลเปนาติ อาห ‘‘อภูตนฺติ อภูตตฺถ’’นฺติ. อตจฺฉนฺติ ตสฺเสว เววจนนฺติ อาห ‘‘อตจฺฉนฺติ น ตจฺฉ’’นฺติ. อภูตนฺติ วา อสนฺตํ อวิชฺชมานํ. อตจฺฉนฺติ อตถาการํ. อนตฺถสํหิตนฺติ ทิฏฺฐธมฺมิเกน, สมฺปรายิเกน วา อนตฺเถน สํหิตํ, อนตฺเถ วา สํหิตํ, น อตฺโถติ วา อนตฺโถ, อตฺถสฺส ปฏิปกฺโข สภาโว, เตน สํหิตนฺติ อนตฺถสํหิตํ, ปิสุณวาจํ สมฺผปฺปลาปญฺจาติ อตฺโถ. เอวเมตฺถ จตุพฺพิธสฺสปิ วจีทุจฺจริตสฺส คหิตตา ทฏฺฐพฺพา. ‘अपनैय्यं अस्स अहं’ म्हणजे त्या बालकाच्या मुखातून मी ते काढून टाकीन. उत्तरपदाचा लोप झाल्यामुळे अभूतार्थ हाच ‘अभूत’ आहे, म्हणून म्हटले आहे – ‘अभूत म्हणजे अभूतार्थ (असत्य)’. ‘अतच्छं’ हा त्याचाच समानार्थी शब्द आहे, म्हणून म्हटले आहे – ‘अतच्छं म्हणजे जे तथ्य नाही’. किंवा ‘अभूत’ म्हणजे जे असत (अस्तित्वात नसलेले) किंवा अविद्यमान आहे. ‘अतच्छं’ म्हणजे जे अतथाकार (तथ्य नसलेले) आहे. ‘अनत्थसंहितं’ म्हणजे ऐहिक किंवा पारलौकिक अनर्थाने युक्त असलेले, किंवा अनर्थात जोडलेले; अथवा जो अर्थ नाही तो अनर्थ, अर्थाचा विरोधी स्वभाव, त्याने युक्त असलेले ते ‘अनत्थसंहितं’ (अनर्थकारक) होय; याचा अर्थ चुगली (पिसुणवाचा) आणि निरर्थक बडबड (सम्फप्पलाप) असा आहे. अशा प्रकारे येथे चारही प्रकारच्या वाचेच्या दुश्चरित्रांचे ग्रहण केले आहे असे समजावे। ทุปฺปยุตฺโตติ ทุปฺปฏิปนฺโน. น ตํ ตถาคโต ภาสติ อภูตตาทิโทสทุฏฺฐตฺตา. ตมฺปิ ตถาคโต น ภาสติ ภูตตฺเถปิ อนตฺถสํหิตตาทิโทสทุฏฺฐตฺตา. ‘दुप्पयुत्तो’ म्हणजे चुकीच्या मार्गाने गेलेला (दुष्प्रतिपन्न). तथागत ते बोलत नाहीत, कारण ते असत्यता इत्यादी दोषांनी दूषित असते. तथागत ते देखील बोलत नाहीत, जे सत्य असूनही अनर्थकारक असणे इत्यादी दोषांनी दूषित असते। ฐานํ การณํ เอติสฺสา อตฺถีติ ฐานิยา ก-การสฺส ย-การํ กตฺวา, น ฐานิยาติ อฏฺฐานิยา, นิกฺการณา อยุตฺติยุตฺตา, สา เอว กถาติ อฏฺฐานิยกถา. อตฺตปจฺจกฺขกถํ กเถมาติ อตฺตนา เอว ปจฺจกฺขํ กตฺวา ปวตฺติยมานํ ฉลกถํ กเถม. जिला स्थान म्हणजे कारण आहे ती ‘ठाणिया’ (स्थानीया) – येथे ‘क’ काराचा ‘य’ कार करून; जी स्थानीया नाही ती ‘अट्ठाणिया’ (अस्थानीया), निष्कारण, अयुक्तियुक्त; तीच कथा म्हणजे ‘अट्ठाणियकथा’ (अस्थानकथा) होय. ‘अत्तपच्चक्खकथं कथेमा’ म्हणजे स्वतःच प्रत्यक्ष करून प्रवृत्त होणारी छलकथा (युक्तिवाद) आम्ही सांगतो। คามิกมหลฺลโก ‘‘อิเม มํ วญฺเจตุกามา, อหเมว ทานิ อิเม วญฺเจสฺสามี’’ติ จินฺเตตฺวา ‘‘เอวํ ภวิสฺสตี’’ติอาทิมาห. ‘‘น มยํ ทาสา’’ติปิ วตฺตุํ นาสกฺขึสุ ปุพฺเพ ตถากติกาย กตตฺตา. गावातील वृद्ध माणसाने ‘हे मला फसवू इच्छितात, आता मीच यांना फसवतो’ असा विचार करून ‘असे होईल’ इत्यादी म्हटले. पूर्वी तसा करार केल्यामुळे ‘आम्ही दास नाही’ असे म्हणण्यासही ते समर्थ झाले नाहीत। ตติยํ ตติยเมวาติ ทฺวีสุปิ ปกฺเขสุ ตติยํ ตติยเมว วาจํ. ภาสิตพฺพกาลํ อนติกฺกมิตฺวาติ ยสฺส ยทา ยถา ภาสิตพฺพํ, ตสฺส ตทา ตเถว จ ภาสนโต ภาสิตพฺพํ การณํ ภาสิตพฺพกาลญฺจ อนติกฺกมิตฺวาว ภาสติ. ‘ततियं ततियमेव’ म्हणजे दोन्ही पक्षांमध्ये तिसरी-तिसरीच वाणी. ‘बोलण्याची वेळ न ओलांडता’ म्हणजे ज्याला जेव्हा जसे बोलायचे आहे, त्याला तेव्हा तसेच बोलल्यामुळे, बोलण्याचे कारण आणि बोलण्याची वेळ न ओलांडताच बोलतात। ๘๗. ฐานุปฺปตฺติกญาเณนาติ ฐาเน เอว อุปฺปชฺชนกญาเณน. ตสฺมึ ตสฺมึ การเณ ตสฺส ตํ ตํ อวตฺถาย อุปฺปชฺชนกญาเณน, ธมฺมานํ ยถาสภาวโต อวพุชฺฌนสภาโวติ ธมฺมสภาโว. ธมฺเม สภาวธมฺเม อนวเสเส วา ยาถาวโต อุปธาเรตีติ ธมฺมธาตุ, สพฺพญฺญุตา. เตนาห ‘‘สพฺพญฺญุตญฺญาณสฺเสตํ อธิวจน’’นฺติ. สุปฺปฏิวิทฺธนฺติ สพฺพํ เญยฺยธมฺมํ สุฏฺฐุ ปฏิวิชฺฌนวเสน, สุฏฺฐุ ปฏิวิทฺธนฺติ อตฺโถ. เตนาห ‘‘หตฺถคตํ ภควโต’’ติ. เนยฺยปุคฺคลวเสน ปรินิฏฺฐิตาติ กถาปริวิภาเคน อยเมว [Pg.50] เทสนา จตฺตาริ อริยสจฺจานิ ทสฺเสนฺโต อรหตฺตํ ปจฺจกฺขาสีติ. ८७. ठाणुप्पत्तिकञाणेन (स्थान-उत्पत्ति-ज्ञानाने) म्हणजे योग्य प्रसंगीच उत्पन्न होणारे ज्ञान. त्या त्या कारणात, त्याच्या त्या त्या अवस्थेत उत्पन्न होणारे ज्ञान. धर्मांच्या यथास्वभावाने (यथार्थ स्वरूपाने) आकलन होण्याचा स्वभाव म्हणजे 'धम्मस्वभाव' होय. धर्मांना, स्वभावधर्मांना किंवा संपूर्णपणे यथार्थपणे धारण करतो म्हणून 'धम्मधातू' म्हणजेच 'सब्बञ्ञुता' (सर्वज्ञता) होय. म्हणूनच म्हटले आहे— 'हे सब्बञ्ञुता-ज्ञानाचेच अधिवाचन (पर्यायवाची नाव) आहे.' 'सुप्पटिविद्धं' (सुप्रतिविद्ध) म्हणजे सर्व ज्ञेय धर्मांचे चांगल्या प्रकारे प्रतिवेध (आकलन) करण्याच्या दृष्टीने, 'चांगल्या प्रकारे प्रतिवेध केलेले' असा अर्थ आहे. म्हणूनच म्हटले आहे— 'भगवंतांच्या हस्तगत झालेले.' नेय्यपुग्गल (बोधप्राप्त होण्यास योग्य व्यक्ती) च्या दृष्टीने समाप्त झालेली हीच देशना, कथेच्या विभागाने चार आर्यसत्ये दर्शवीत अर्हत्त्व प्रगट करते. อภยราชกุมารสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. अभयराजकुमारसुत्तवण्णनेची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๙. พหุเวทนิยสุตฺตวณฺณนา ९. बहुवेदनीयसुत्तवण्णना (बहुवेदनीय सुत्ताची व्याख्या) ๘๘. ปญฺจกงฺโคติ วฑฺฒกีกิจฺจสาธเน วาสิอาทิปญฺจกํ องฺคํ สํธนํ เอตสฺมินฺติ ปญฺจกงฺโค. ถมฺภาทิวตฺถูนํ ถปนฏฺเฐน ถปติ. ปณฺฑิตอุทายิตฺเถโร, น กาฬุทายี เถโร. ८८. 'पञ्चकङ्ग' (पंचकांग) म्हणजे सुताराच्या कामाचे साधन असलेल्या वासला (तासणी) इत्यादी पाच अंगांचे (साधनांचे) संधान (एकत्रीकरण) ज्याच्यापाशी आहे तो 'पञ्चकङ्ग' होय. खांब इत्यादी वस्तूंच्या स्थापनेच्या (उभारणीच्या) अर्थाने 'थपति' (स्थपती/सुतार) म्हटले जाते. (येथे) पंडित उदायी थेर अभिप्रेत आहेत, काळुदायी थेर नव्हेत. ๘๙. ปริยายติ อตฺตโน ผลํ วตฺเตตีติ ปริยาโย, การณํ. เวทนาสนฺนิสฺสิโต จ กายิกเจตสิกภาโว การณํ. เตนาห – ‘‘กายิกเจตสิกวเสน ทฺเว เวทิตพฺพา’’ติ. ตตฺถ ปสาทกายสนฺนิสฺสิตา กายิกา, เจโตสนฺนิสฺสิตา เจตสิกา. สุขาทิวเสน ติสฺโสติ เอตฺถ สุขนทุกฺขนุเปกฺขนานิ สุขาทิเวทนาย การณํ. ตานิ หิ ปวตฺตินิมิตฺตานิ กตฺวา ตตฺถ สุขาทิสทฺทปฺปวตฺติ, อิมินา นเยน เสเสสุปิ ยถารหํ การณํ นิทฺธาเรตฺวา วตฺตพฺพํ. อุปวิจารวเสนาติ อารมฺมณํ อุเปจฺจ สวิเสสปวตฺติวเสน. ยสฺมิญฺหิ อารมฺมเณ โสมนสฺสเวทนา ปวตฺตติ, อารมฺมณตาย ตํ อุปคนฺตฺวา อิตรเวทนาหิ วิสิฏฺฐตาย สวิเสสํ ตตฺถ ปวตฺติ. เตนาห ‘‘โสมนสฺสฏฺฐานิยํ รูปํ อุปวิจรตี’’ติ. เอส นโย เสสเวทนาสุ เคหสฺสิตานีติ เคหนิสฺสิตานิ. ८९. 'परियाय' (पर्याय) म्हणजे जो स्वतःचे फळ घडवून आणतो, म्हणजेच कारण होय. वेदनेवर आश्रित असलेला कायिक व चैतसिक भाव हे कारण आहे. म्हणूनच म्हटले आहे – 'कायिक आणि चैतसिक रूपाने दोन वेदना जाणाव्यात.' त्यामध्ये प्रसादकायावर (इंद्रिय शरीरावर) आश्रित असलेली कायिक वेदना आणि चित्तावर आश्रित असलेली चैतसिक वेदना होय. 'सुख इत्यादींच्या रूपाने तीन' यामध्ये सुख, दुःख आणि उपेक्षा हे सुख इत्यादी वेदनांचे कारण आहेत. कारण त्यांना प्रवृत्तीचे निमित्त करून तेथे सुख इत्यादी शब्दांची प्रवृत्ती होते; याच पद्धतीने इतर वेदनांमध्येही योग्यतेनुसार कारण निश्चित करून सांगितले पाहिजे. 'उपविचारवशात' म्हणजे आलंबनाजवळ जाऊन विशेष रूपाने प्रवृत्त होण्याच्या वशात. कारण ज्या आलंबनामध्ये सोमनस्य (सौमनस्य) वेदना प्रवृत्त होते, आलंबन रूपाने त्याच्याजवळ जाऊन इतर वेदनांपेक्षा विशिष्टतेने तेथे तिची विशेष प्रवृत्ती होते. म्हणूनच म्हटले आहे – 'सौमनस्य निर्माण करणाऱ्या रूपाचा उपविचार करतो.' हाच नियम इतर वेदनांच्या बाबतीतही समजावा. 'गेहस्सितानि' म्हणजे घराशी संबंधित (गृहस्थ जीवनावर आश्रित) असणारे. ๙๐. ปริยาเยนาติ ‘‘อิทเมตฺถ ทุกฺขสฺมินฺติ วทามี’’ติ วุตฺตฏฺฐานํ สนฺธาย วทติ. ตํ ทสฺเสนฺโตติ กามญฺเจตฺถ สุตฺเต – ‘‘ทฺเวปานนฺท, เวทนา วุตฺตา’’ติ ทฺเว อาทึ กตฺวา เวทนา ทสฺสิตา, เอกาปิ ปน ทสฺสิตา เอวาติ ทสฺเสนฺโต. อุปตฺถมฺเภตุนฺติ เอกาปิ เวทนา วุตฺตา มยา ปริยาเยน, เอวํ สติ ทฺเวปิ วตฺตพฺพาติ เอวํ ตสฺส วาทํ อุปตฺถมฺเภตุํ. กถํ ปน เอกา เวทนา วุตฺตาติ? ยํ กิญฺจิ เวทยิตํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา, อิทเมตฺถ ทุกฺขสฺมินฺติ วทามีติ. ยํ ปเนตฺถ วตฺตพฺพํ, ตํ อิติวุตฺตกวณฺณนายํ (อิติวุ. อฏฺฐ. ๕๒ อาทโย) ปรมตฺถทีปนิยํ วุตฺตนเยน เวทิตพฺพํ. ९०. 'पर्यायाने' म्हणजे 'या संदर्भात मी याला दुःख म्हणतो' असे जे म्हटले आहे, त्या स्थानाचा संदर्भ घेऊन बोलतात. ते दर्शविताना – जरी या सुत्तात 'हे आनंदा, दोन वेदना सांगितल्या आहेत' असे म्हणून दोन इत्यादी वेदना दर्शविल्या आहेत, तरी एक वेदना देखील दर्शविलीच आहे, हे दर्शविताना. 'समर्थन करण्यासाठी' म्हणजे माझ्याद्वारे पर्यायाने एक वेदना देखील सांगितली गेली आहे, असे असताना दोन वेदना देखील सांगितल्या पाहिजेत, अशा प्रकारे त्याच्या मताचे समर्थन करण्यासाठी. पण एक वेदना कशी सांगितली आहे? 'जे काही अनुभवले जाते, मग ते सुख असो, दुःख असो वा अदुःख-असुख (उपेक्षा) असो, या संदर्भात मी याला दुःख म्हणतो.' याविषयी जे काही सांगायचे आहे, ते इतिवृत्तक-वण्णनेमध्ये (इतिवृत्तक अट्ठकथा ५२ इत्यादी) 'परमत्थदीपनी' मध्ये सांगितलेल्या पद्धतीने जाणावे. กถํ [Pg.51] ปเนตฺถ รูปาวจรจตุตฺเถ อรูเปสุ สญฺญาเวทยิตนิโรเธ สุขํ อุทฺธตนฺติ อาห ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทิ. สนฺตฏฺเฐนาติ ปฏิปกฺขธมฺมานํ วูปสนฺตภาเวน. ปณีตฏฺเฐนาติ ภาวนาวิเสสวิสิฏฺเฐน อตปฺปกภาเวเนว เสฏฺฐภาเวน จ, ปจฺจยวิเสเสน ปธานภาวํ นีตนฺติปิ ปณีตํ. เวทยิตสุขํ นาม เวทนาภูตํ สุขนฺติ กตฺวา. อเวทยิตสุขํ นาม ยาวตา นิทฺทุกฺขตา, ตาวตา สุขนฺติ วุจฺจตีติ.อถ วา นิโรโธ สุฏฺฐุ ขาทติ ขนติ กายิกเจตสิกาพาธนฺติ วตฺตพฺพตํ อรหติ สตฺตาหมฺปิ ตตฺถ ทุกฺขสฺส นิรุชฺฌนโต. เตนาห ‘‘นิทฺทุกฺขภาวสงฺขาเตน สุขฏฺเฐนา’’ติ. परंतु येथे रूपावचर चौथ्या ध्यानात, अरूप ध्यानांमध्ये आणि संज्ञा-वेदयित-निरोधामध्ये सुख कसे उद्धृत (सांगितले) केले आहे? यावर 'येथे आणि...' इत्यादी म्हटले आहे. 'शांत अर्थाने' म्हणजे विरोधी धर्मांच्या शांत होण्याच्या भावाने. 'प्रणीत अर्थाने' म्हणजे विशेष भावनेने विशिष्ट अशा अतप्तभावाने (त्रास न देणाऱ्या भावाने) आणि श्रेष्ठ भावाने; तसेच विशेष प्रत्ययाने (कारणाने) प्रधान भावाला प्राप्त झालेले देखील 'प्रणीत' होय. वेदयित-सुख म्हणजे वेदना-रूप असलेले सुख होय. अवेदयित-सुख म्हणजे जितकी दुःखहीनता आहे, तितके सुख म्हटले जाते. अथवा निरोध हा कायिक आणि चैतसिक बाधांना चांगल्या प्रकारे नष्ट करतो (खणून काढतो), असे म्हणण्यास योग्य आहे; कारण सात दिवस देखील तेथे दुःखाचा निरोध होतो. म्हणूनच म्हटले आहे – 'दुःखहीनतेच्या भावाने युक्त अशा सुख-अर्थाने.' ๙๑. ยสฺมึ ยสฺมึ ภเว, จิตฺตุปฺปาเท, อวตฺถาย วา นิทฺทุกฺขภาโว, ทุกฺขสฺส ปฏิปกฺขตา อนุปลพฺภเนน ทุกฺขวิวิตฺตํ, ตํ สุขสฺมึเยว ปญฺญเปติ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. ९१. ज्या ज्या भवात, चित्तोत्पादात किंवा अवस्थेत दुःखहीनता असते, दुःखाचा अभाव असल्यामुळे जे दुःखापासून विलग (मुक्त) असते, त्याला सुखातच प्रज्ञप्त केले जाते (सुखच म्हटले जाते). उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. พหุเวทนียสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. बहुवेदनीयसुत्तवण्णनेची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๑๐. อปณฺณกสุตฺตวณฺณนา १०. अपण्णकसुत्तवण्णना (अपण्णक सुत्ताची व्याख्या) ๙๓. นานาวิธาติ นานาวิธทิฏฺฐิกา สมณพฺราหฺมณาติ ปพฺพชฺชามตฺเตน สมณา, ชาติมตฺเตน พฺราหฺมณา จ. ทสฺสนนฺติ ทิฏฺฐิ. คหิตนฺติ อภินิวิสฺส คหิตํ. อิติ เต อตฺตโน ทสฺสนํ คเหตุกามา ปุจฺฉนฺติ. วินา ทสฺสเนน โลโก น นิยฺยาตีติ วิโมกฺขภาวนาย เอเกน ทสฺสเนน วินา โลโก สํสารทุกฺขโต น นิคจฺฉติ. เอกทิฏฺฐิยมฺปิ ปติฏฺฐาตุํ นาสกฺขึสุ สทฺธาการาภาวโต. ตถา หิ เต อิมาย เทสนาย สรเณสุ ปติฏฺฐหึสุ. ยสฺมา อวิปรีเต สทฺเธยฺยวตฺถุสฺมึ อุปฺปนฺนสทฺธา ‘‘อาการวตี’’ติ อธิปฺเปตา, ตสฺมา โย โลเก อวิปรีตธมฺมเทสนา, อยเมเวสาติ ปวตฺตา มคฺคสาธนคตาย สทฺธาย การณภาวโต ตนฺนิสฺสยา สทฺธา, สา อาการวตีติ วุตฺตา. อวตฺถุสฺมิญฺหิ สทฺธา อยุตฺตการณตาย น อาการวตี. อาการวตีติ เอตฺถ วตี-สทฺโท น เกวลํ อตฺถิตามตฺตทีปโก, อถ โข อติสยตฺถทีปโก ปาสํสตฺถทีปโก วา ทฏฺฐพฺโพ. เตน อาการวตีติ สทฺเธยฺยวตฺถุวเสน อติสยการณวตีติ วา ปาสํสการณวตีติ วา [Pg.52] อยเมตฺถ อตฺโถ. อปณฺณโกติ เอตฺถ ยถา กญฺจิ อตฺถํ สาเธตุํ อารทฺธสฺส ปโยโค วิรทฺโธ, ตตฺถ อการโก วิย โหติ ปุนปิ อารภิตพฺพตาย. อวิรทฺโธ ปน อตฺถสฺส สาธนโต อปณฺณโก, เอวํ อยมฺปิ ธมฺโม อภิภวิตฺวา ปวตฺตนโต เอกํสโต ‘‘อปณฺณโก’’ติ วุตฺโต. เตนาห ‘‘อวิรทฺโธ อทฺเวชฺฌคามี เอกํสคาหิโก’’ติ. ९३. 'नानाविधा' म्हणजे नाना प्रकारच्या दृष्टी (विचारसरणी) असणारे. 'समणब्राह्मणा' म्हणजे केवळ प्रव्रज्येमुळे श्रमण आणि केवळ जन्मामुळे ब्राह्मण असणारे. 'दस्सन' (दर्शन) म्हणजे दृष्टी (मत/विचार). 'गहितं' (गृहीत) म्हणजे अभिनिवेशाने (हट्टाने) स्वीकारलेले. अशा प्रकारे ते स्वतःची दृष्टी (मत) स्वीकारण्याच्या इच्छेने विचारतात. 'दर्शनाशिवाय लोक मुक्त होत नाही' म्हणजे विमोक्ष-भावनेच्या एका दर्शनाशिवाय (सम्यक् दृष्टीशिवाय) लोक संसारदुःखातून बाहेर पडत नाही. श्रद्धेच्या आकाराचा (कारणाचा) अभाव असल्यामुळे ते एका दृष्टीवरही प्रतिष्ठित होऊ शकले नाहीत. म्हणूनच ते या देशनेद्वारे शरणांमध्ये (त्रिसरणात) प्रतिष्ठित झाले. कारण अविपरीत (यथार्थ) अशा श्रद्धा ठेवण्यास योग्य वस्तूवर उत्पन्न झालेली श्रद्धा 'आकारवती' (सकारण) मानली जाते; म्हणून जगात जी अविपरीत धम्मदेशना आहे, ती हीच आहे, अशा प्रकारे प्रवृत्त झालेल्या मार्ग-साधनेतील श्रद्धेचे कारण असल्यामुळे, तिच्यावर आश्रित असलेली श्रद्धा 'आकारवती' म्हटली गेली आहे. कारण अयोग्य वस्तूवर ठेवलेली श्रद्धा अयोग्य कारणामुळे 'आकारवती' (सकारण) नसते. 'आकारवती' यामध्ये 'वती' हा शब्द केवळ अस्तित्त्व दर्शवणारा नाही, तर तो अतिशय-अर्थ (उत्कृष्टता) दर्शवणारा किंवा प्रशंसनीय-अर्थ दर्शवणारा समजला पाहिजे. त्यामुळे 'आकारवती' म्हणजे श्रद्धा ठेवण्यास योग्य वस्तूच्या दृष्टीने 'अतिशय कारण असणारी' किंवा 'प्रशंसनीय कारण असणारी' असा येथे अर्थ आहे. 'अपण्णक' (असंदिग्ध/निश्चित) म्हणजे येथे जसे एखादा अर्थ (ध्येय) साध्य करण्यासाठी सुरू केलेला प्रयत्न जर अयशस्वी झाला, तर तो न केल्यासारखाच होतो, कारण तो पुन्हा सुरू करावा लागतो. परंतु जो अयशस्वी न होता अर्थ साध्य करतो तो 'अपण्णक' होय; त्याचप्रमाणे हा धम्म देखील (सर्व संकटांवर) मात करून प्रवृत्त होत असल्यामुळे एकांताने (निश्चितपणे) 'अपण्णक' म्हटला गेला आहे. म्हणूनच म्हटले आहे – 'अयशस्वी न होणारा, दुटप्पी नसणारा (अद्वैधगामी) आणि एकांताने (निश्चितपणे) ग्रहण करण्यास योग्य.' ๙๔. ตพฺพิปจฺจนีกภูตาติ ตสฺสา มิจฺฉาทิฏฺฐิยา ปจฺจนีกภูตา. ९४. 'तब्बिप्पचनीकभूता' (त्याच्या विपरीत असलेली) म्हणजे त्या मिथ्यादृष्टीच्या विपरीत (विरोधी) असलेली. ๙๕. เนสนฺติ กุสลานํ ธมฺมานํ. อกุสลโต นิกฺขนฺตภาเวติ อสํกิลิฏฺฐภาเว. อานิสํโสติ สุทฺธวิปากตา. วิสุทฺธิปกฺโขติ วิสุทฺธิภาโว ปริโยทาตตา. อภูตธมฺมสฺส ทิฏฺฐิภาวสฺส สญฺญาปนา อาจิกฺขนา อภูตธมฺมสญฺญาปนา. สาวชฺเชสุ ปรมวชฺเช มิจฺฉาทสฺสเน ปคฺคหณนฺติ กุโต สุสีลฺยสฺส ปคฺคโหติ อาห – ‘‘มิจฺฉาทสฺสนํ คณฺหนฺตสฺเสว สุสีลฺยํ ปหีนํ โหตี’’ติ. มิจฺฉาทิฏฺฐิอาทโยติ เอตฺถ มิจฺฉาสงฺกปฺโป ปรโลกาภาวจินฺตา, มิจฺฉาวาจา ปรโลกาภาววาทภูโต มุสาวาโท, อริยานํ ปจฺจนีกตาทโย. อปราปรํ อุปฺปชฺชนวเสนาติ ปุนปฺปุนํ จิตฺเต อุปฺปชฺชนวเสน. ปาปกา อกุสลา ธมฺมาติ ปจฺจเวกฺขณสญฺญาปนาทิกาเล อุปฺปชฺชนกา ตถาปวตฺตา อกุสลขนฺธา. ९५. कुशल धर्मांचे अस्तित्व नसते. अकुशलातून बाहेर पडणे म्हणजे अक्लिष्ट (असंक्लिष्ट) अवस्था. 'आनिसंस' (फायदा/लाभ) म्हणजे शुद्ध विपाक (परिणाम). 'विशुद्धिपक्ष' म्हणजे विशुद्ध भाव, अत्यंत निर्मळता (परियोदातता). अभूत धर्माच्या (असत्य गोष्टीच्या) दृष्टीभावाची समजूत घालणे, सांगणे म्हणजे 'अभूतधम्मसञ्ञापना' (असत्य धर्माची समजूत घालणे). सदोष गोष्टींमध्ये परम दोष असलेल्या मिथ्यादृष्टीचे ग्रहण करणे, मग सुशीलाचे ग्रहण कोठून होणार? म्हणून म्हटले आहे – 'मिथ्यादृष्टी ग्रहण करणाऱ्याचेच सुशीलता नष्ट होते.' येथे 'मिथ्यादृष्टी इत्यादी' मध्ये मिथ्या संकल्प म्हणजे परलोकाच्या अभावाचा विचार, मिथ्या वाचा म्हणजे परलोकाचा अभाव सांगणारे असत्य बोलणे (मुसावाद), आणि आर्यांचा विरोध इत्यादींचा समावेश होतो. वारंवार उत्पन्न होण्याच्या दृष्टीने म्हणजे चित्तात पुन्हा पुन्हा उत्पन्न होण्याच्या दृष्टीने. पापक अकुशल धर्म म्हणजे प्रत्यवेक्षण (पुनरावलोकन) आणि समजूत घालण्याच्या वेळी उत्पन्न होणारे आणि तशा प्रकारे प्रवृत्त होणारे अकुशल स्कंध. กลิคฺคโหติ อนตฺถปริคฺคโห. โส ปน ยสฺมา ทิฏฺเฐว ธมฺเม อภิสมฺปรายญฺจ ปราชโย โหตีติ อาห ‘‘ปราชยคฺคาโห’’ติ. ทุสฺสมตฺโตติ เอตฺถ ทุ-สทฺโท ‘‘สมาทินฺโน’’ติ เอตฺถาปิ อาเนตฺวา โยเชตพฺโพติ อาห ‘‘ทุปฺปรามฏฺโฐ’’ติ. ยถา ทุปฺปรามฏฺโฐ โหติ, เอวํ สมาทินฺโน ทุสฺสมตฺโต ทุสมาทินฺโน วุตฺโต. สกวาทเมว ผริตฺวาติ อตฺตโน นตฺถิกวาทเมว ‘‘อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’’นฺติ (ม. นิ. ๒.๑๘๗; ๓.๒๗-๒๘) อวธาเรนฺโต อญฺญสฺส โอกาสอทานวเสน ผริตฺวา. เตนาห ‘‘อธิมุจฺจิตฺวา’’ติ. ‘‘สมฺพุทฺโธ’’ติอาทิ อธิมุจฺจนาการทสฺสนํ. ริญฺจตีติ วิเวเจติ อปเนติ. เตนาห ‘‘วชฺเชตี’’ติ. 'कलिग्गह' (पराभव किंवा वाईट पकड) म्हणजे अनर्थाचे ग्रहण. परंतु, ज्या अर्थी या जन्मात (दृष्टधर्मात) आणि परलोकात पराभव होतो, म्हणून त्याला 'पराजयग्गाह' (पराजयाचे ग्रहण) म्हटले आहे. येथे 'दुस्समत्त' मधील 'दु' हा शब्द 'समादिन्न' येथेही आणून जोडला पाहिजे, म्हणून 'दुप्परामट्ठ' (चुकीच्या पद्धतीने स्पर्श केलेला/पकडलेला) असे म्हटले आहे. ज्याप्रमाणे चुकीच्या पद्धतीने स्पर्श केलेला असतो, त्याचप्रमाणे ग्रहण केलेला 'दुस्समत्त' हा 'दुसमादिन्न' (चुकीच्या पद्धतीने स्वीकारलेला) म्हटला आहे. आपल्याच वादाचा प्रसार करून म्हणजे स्वतःच्या नास्तिकवादाचाच 'हेच सत्य आहे, इतर सर्व व्यर्थ आहे' असा निश्चय करून, दुसऱ्याला वाव न देता त्याचा प्रसार करून. म्हणून 'अधिमुच्चित्वा' (दृढ निश्चय करून/अधिमुक्त होऊन) असे म्हटले आहे. 'सम्बुद्ध' इत्यादी हे अधिमुक्तीचा (दृढ विश्वासाचा) प्रकार दर्शवणारे आहे. 'रिञ्चति' म्हणजे वेगळे करतो, दूर करतो. म्हणून 'वज्जेति' (वर्ज्य करतो) असे म्हटले आहे. ๙๖. กฏคฺคโหติ กตํ สพฺพโส สิทฺธิเมว กตฺวา คหณํ. โส ปน ชยลาโภ โหตีติ วุตฺตํ ‘‘ชยคฺคาโห’’ติ. สุคฺคหิโตติ สุฏฺฐุกรณวเสน คหิโต. สุปรามฏฺโฐติ สุฏฺฐุ ปราปรํ อาเสวนวเสน อามฏฺโฐ[Pg.53]. อุภเยนปิ ตสฺส กมฺมสฺส กตูปจิตภาวํ ทสฺเสติ, โสตฺถิภาวาวหตฺตญฺจ สคฺคุปปตฺติสํวตฺตนโต ปาปสภาวปหานโต จ. ९६. 'कटग्गह' (विजयी पकड) म्हणजे सर्व प्रकारे सिद्ध करूनच ग्रहण करणे. तो विजयाचा लाभ देणारा असतो, म्हणून त्याला 'जयग्गाह' (विजयाचे ग्रहण) म्हटले आहे. 'सुग्गहीत' म्हणजे चांगल्या प्रकारे केल्यामुळे ग्रहण केलेला. 'सुपरामट्ठ' म्हणजे वारंवार चांगल्या प्रकारे आचरण (सेवन) केल्यामुळे स्पर्श केलेला (अनुभवलेला). या दोन्ही शब्दांद्वारे त्या कर्माची केलेली आणि संचित केलेली अवस्था दर्शविली जाते, तसेच स्वर्गात उत्पन्न होण्यास कारणीभूत ठरल्यामुळे आणि पापस्वभावाचा त्याग केल्यामुळे कल्याणकारी असणे दर्शविले जाते. ๙๗. สหตฺถา กโรนฺตสฺสาติ (ที. นิ. ฏี. ๑.๑๖๖; สํ. นิ. ฏี. ๒.๓.๒๑๑) สหตฺเถเนว กโรนฺตสฺส. นิสฺสคฺคิยถาวราทโยปิ อิธ สหตฺถกรเณเนว สงฺคหิตา. ปจนํ ทหนํ วิพาธนนฺติ อาห ‘‘ทณฺเฑน ปีเฬนฺตสฺสา’’ติ. โสกํ สยํ กโรนฺตสฺสาติ ปรสฺส โสกการณํ สยํ กโรนฺตสฺส, โสกํ วา อุปฺปาเทนฺตสฺส. ปเรหิ อตฺตโน วจนกเรหิ. สยมฺปิ ผนฺทโตติ ปรสฺส วิพาธนปโยเคน สยมฺปิ ผนฺทโต. อติปาตยโตติ ปทํ สุทฺธกตฺตุอตฺเถ เหตุกตฺตุอตฺเถ จ วตฺตตีติ อาห ‘‘หนนฺตสฺสปิ หนาเปนฺตสฺสาปี’’ติ. ९७. 'स्वतःच्या हाताने करणाऱ्याचे' म्हणजे स्वतःच्या हातानेच करणाऱ्याचे. 'निस्सग्गिय' (त्याग करण्यायोग्य), 'थावर' (स्थावर) इत्यादींचाही येथे स्वतःच्या हाताने करण्यामध्येच समावेश होतो. शिजवणे, जाळणे, पीडा देणे या अर्थाने 'दंडाने पीडित करणाऱ्याचे' असे म्हटले आहे. 'स्वतः शोक करणाऱ्याचे' म्हणजे दुसऱ्याच्या शोकाचे कारण स्वतः बनणाऱ्याचे किंवा शोक उत्पन्न करणाऱ्याचे. स्वतःच्या शब्दांचे पालन करणाऱ्या दुसऱ्या लोकांद्वारे. 'स्वतःही थरथरणाऱ्याचे' म्हणजे दुसऱ्याला पीडा देण्याच्या प्रयोगाने स्वतःही थरथरणाऱ्याचे. 'अतिपातयतो' (प्राणघात करणाऱ्याचे) हा शब्द स्वतः मारणे आणि दुसऱ्याकडून मारवून घेणे या दोन्ही अर्थांत वापरला जातो, म्हणून 'मारणाऱ्याचे आणि मारवून घेणाऱ्याचेही' असे म्हटले आहे. ฆรสฺส ภิตฺติ อนฺโต พหิ จ สนฺธิตา หุตฺวา ฐิตา ฆรสนฺธิ. กิญฺจิปิ อเสเสตฺวา นิรวเสสเมว โลโปติ นิลฺโลโป. เอกาคาเร นิยุตฺโต วิโลโป เอกาคาริโก. ปริโต สพฺพโส ปนฺเถ หนนํ ปริปนฺโถ. ปาปํ น กรียติ ปุพฺเพ อสโต อุปฺปาเทตุํ อสกฺกุเณยฺยตฺตา, ตสฺมา นตฺถิ ปาปํ. ยทิ เอวํ กถํ สตฺตา ปาปํ ปฏิปชฺชนฺตีติ อาห – ‘‘สตฺตา ปน กโรมาติ เอวํสญฺญิโน โหนฺตี’’ติ. เอวํ กิรสฺส โหติ ‘‘อิเมสญฺหิ สตฺตานํ หึสาทิกิริยา น อตฺตานํ ผุสติ ตสฺส นิจฺจตาย นิพฺพิการตฺตา, สรีรํ ปน อเจตนํ กฏฺฐกลิงฺครูปมํ, ตสฺมึ วิโกปิเตปิ น กิญฺจิ ปาป’’นฺติ. ขุรเนมินาติ นิสิตขุรมยเนมินา. คงฺคาย ทกฺขิณทิสา อปฺปติรูปเทโส, อุตฺตรทิสา ปติรูปเทโสติ อธิปฺปาเยน ‘‘ทกฺขิณญฺเจ’’ติอาทิ วุตฺตนฺติ ‘‘ทกฺขิณตีเร มนุสฺสา กกฺขฬา’’ติอาทิมาห. घराची भिंत आतून आणि बाहेरून जोडलेली असणे म्हणजे 'घरसंधि'. काहीही शिल्लक न ठेवता पूर्णपणे लुटणे म्हणजे 'निल्लोप' (पूर्ण लूट). एकाच घरात नियुक्त केलेली लूट म्हणजे 'एकागारिक'. चहूबाजूंनी रस्त्यावर मारणे म्हणजे 'परिपंथ' (दरोडा). पूर्वी अस्तित्वात नसलेले पाप उत्पन्न करणे शक्य नसल्यामुळे पाप केले जात नाही, म्हणून पाप अस्तित्वात नाही. जर असे आहे, तर प्राणी पापात कसे प्रवृत्त होतात? म्हणून म्हटले आहे – 'परंतु प्राणी आपण पाप करत आहोत अशा संज्ञेचे (विचाराचे) असतात.' असे खरोखर त्याला वाटते – 'या प्राण्यांची हिंसा इत्यादी क्रिया स्वतःला स्पर्श करत नाहीत, कारण आत्मा नित्य आणि निर्विकार आहे; शरीर तर अचेतन असून लाकूड आणि मातीच्या ढेकळासारखे आहे, त्यामुळे त्याला छिन्नविछिन्न केले तरी काही पाप लागत नाही.' 'खुरनेमिना' म्हणजे तीक्ष्ण खुरासारखी धार असलेल्या चाकाच्या कडेने. गंगेची दक्षिण दिशा हा अयोग्य देश आहे आणि उत्तर दिशा हा योग्य देश आहे, या अभिप्रायाने 'दक्षिण किनाऱ्यावरील लोक क्रूर असतात' इत्यादी म्हटले आहे. มหายาคนฺติ มหาวิชิตยญฺญสทิสํ มหายาคํ. สีลสํยเมนาติ กายิกวาจสิกสํวเรน. สจฺจวจเนนาติ สจฺจวาจาย. ตสฺส วิสุํ วจนํ โลเก ครุตรปุญฺญสมฺมตภาวโต. ยถา หิ ปาปธมฺเมสุ มุสาวาโท ครุ, เอวํ ปุญฺญธมฺเมสุ สจฺจวาจา. เตนาห ภควา – ‘‘เอกํ ธมฺมมตีตสฺสา’’ติอาทิ (ธ. ป. ๑๗๖). วุตฺตนเยเนวาติ กณฺหปกฺเข วุตฺตนเยน. ตตฺถ หิ – ‘‘นตฺถิ ปาปํ, นตฺถิ ปาปสฺส อาคโม’’ติ อาคตํ, อิธ ‘‘อตฺถิ ปุญฺญํ, อตฺถิ ปุญฺญสฺส อาคโม’’ติ อาคตํ, อยเมว วิเสโส. เสสํ วุตฺตสทิสเมวาติ [Pg.54] ‘‘เตสเมตํ ปาฏิกงฺข’’นฺติ เอวมาทึ สนฺธาย วทติ, ตํ เหฏฺฐา ปุริมวารสทิสํ. 'महायज्ञ' म्हणजे महाविजित यज्ञासारखा महायज्ञ. 'शीलसंयमाने' म्हणजे कायिक आणि वाचिक संवराने. 'सत्यवचनाने' म्हणजे सत्य बोलण्याने. जगात त्याचे वेगळे वचन अत्यंत श्रेष्ठ पुण्य मानले गेले आहे. ज्याप्रमाणे पापधर्मांमध्ये असत्य बोलणे (मुसावाद) हा मोठा दोष आहे, त्याचप्रमाणे पुण्यधर्मांमध्ये सत्य बोलणे हे श्रेष्ठ आहे. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे – 'एकं धम्ममतीतस्स' (ज्याने एका धर्माचे उल्लंघन केले आहे...) इत्यादी. 'सांगितलेल्या पद्धतीनेच' म्हणजे कृष्णपक्षामध्ये (पापपक्षात) सांगितलेल्या पद्धतीनेच. कारण तेथे 'पाप नाही, पापाचा आगम (परिणाम) नाही' असे आले आहे, तर येथे 'पुण्य आहे, पुण्याचा आगम (परिणाम) आहे' असे आले आहे, हाच विशेष फरक आहे. 'बाकी सर्व सांगितल्याप्रमाणेच आहे' हे 'त्यांना याची अपेक्षा करावी' इत्यादी संदर्भाने म्हटले आहे, ते खालील पूर्व वाराप्रमाणेच (मागील संदर्भाप्रमाणेच) आहे. ๑๐๐. อุภเยนาติ เหตุปจฺจยปฏิเสธวจเนน. สํกิเลสปจฺจยนฺติ สํสาเร ปริพฺภมเนน กิลินฺนสฺส มลินภาวสฺส การณํ. วุตฺตวิปริยาเยน วิสุทฺธิปจฺจยนฺติ สทฺทตฺโถ เวทิตพฺโพ. พลนฺติอาทีสุ สตฺตานํ สํกิเลสาวหํ โวทานาวหญฺจ อุสฺสาหสงฺขาตํ พลํ วา, สูรวีรภาวสงฺขาตํ วีริยํ วา, ปุริเสน กตฺตพฺโพ ปุริสถาโม วา, โส เอว ปรํ ปรํ ฐานํ อกฺกมนปฺปตฺติยา ปุริสปรกฺกโม วา นตฺถิ น อุปลพฺภติ. १००. 'दोन्हींद्वारे' म्हणजे हेतू आणि प्रत्यय (कारण) यांच्या निषेध वचनाद्वारे. 'संक्लेशप्रत्यय' म्हणजे संसारात भटकल्यामुळे मलिन होण्याचे कारण. याच्या उलट अर्थाने 'विशुद्धिप्रत्यय' (निर्मळतेचे कारण) असा शब्दार्थ समजला पाहिजे. 'बल' इत्यादींमध्ये प्राण्यांना संक्लेश (मलिनता) आणि वोदान (निर्मळता) देणारे उत्साह नावाचे बल किंवा शूर-वीर भाव नावाचे वीर्य, किंवा मनुष्याने करण्यायोग्य मनुष्यबळ (पुरिसथाम), किंवा एका स्थानावरून दुसऱ्या स्थानावर जाण्यासाठी असणारा पुरुष पराक्रम (पुरिसपरक्कम) अस्तित्वात नाही, तो आढळत नाही. สตฺวโยคโต, รูปาทีสุ สตฺตวิสตฺตตาย จ สตฺตา. ปาณนโต อสฺสาสปสฺสาสวเสน ปวตฺติยา ปาณา. เต ปน โส เอกินฺทฺริยาทิวเสน วิภชิตฺวา วทตีติ อาห ‘‘เอกินฺทฺริโย’’ติอาทิ. อณฺฑโกสาทีสุ ภวนโต ภูตาติ วุจฺจนฺตีติ อาห ‘‘อณฺฑโกส…เป… วทนฺตี’’ติ. ชีวนโต ปาณํ ธาเรนฺโต วิย วฑฺฒนโต ชีวาติ เอวํ สตฺตปาณภูตชีเวสุ สทฺทตฺโถ เวทิตพฺโพ. นตฺถิ เอเตสํ สํกิเลสวิสุทฺธีสุ วโสติ อวสา. นตฺถิ เนสํ พลํ วีริยญฺจาติ อพลา อวีริยา. นิยตตาติ อจฺเฉชฺชสุตฺตาวุตาเภชฺชมณิ วิย นิยตปวตฺตนตาย คติชาติพนฺธปชหวเสน นิยาโม. ตตฺถ ตตฺถ คมนนฺติ ฉนฺนํ อภิชาตีนํ ตาสุ ตาสุ คตีสุ อุปคมนํ สมวาเยน สมาคโม. สภาโวเยวาติ ยถา กณฺฏกสฺส ติกฺขตา, กพิฏฺฐผลานํ ปริมณฺฑลตา, มิคปกฺขีนํ วิจิตฺตาการตา, เอวํ สพฺพสฺสปิ โลกสฺส เหตุปจฺจเยน วินา ตถา ตถา ปริณาโม, อยํ สภาโวเยว อกิตฺติโมเยว. เตนาห ‘‘เยน หี’’ติอาทิ. सत्त्वयोगामुळे (आसक्तीमुळे) आणि रूप इत्यादींमध्ये अत्यंत आसक्त असल्यामुळे त्यांना 'सत्त्व' (सत्त) म्हणतात. श्वासोच्छ्वासाच्या क्रियेने प्रवृत्त होत असल्यामुळे त्यांना 'प्राण' (पाण) म्हणतात. त्यांना तो (मक्खलि गोसाल) एक-इंद्रिय इत्यादींच्या आधारे विभागून सांगतो, म्हणून 'एकिन्द्रिय' इत्यादी म्हटले आहे. अंडकोश इत्यादींमधून उत्पन्न होत असल्यामुळे त्यांना 'भूत' म्हटले जाते, म्हणून 'अंडकोश...पे... म्हणतात' असे म्हटले आहे. जगण्यामुळे, प्राणांचे धारण केल्याप्रमाणे वाढण्यामुळे त्यांना 'जीव' म्हणतात; अशा प्रकारे सत्त्व, प्राण, भूत आणि जीव या शब्दांचा अर्थ समजून घ्यावा. संक्लेश (मळकटपणा) आणि विशुद्धी (पवित्रता) यावर यांचे काही नियंत्रण नाही, म्हणून ते 'अवश' (विवश) आहेत. त्यांच्याकडे बल आणि वीर्य (ऊर्जा) नाही, म्हणून ते 'अबल' आणि 'अवीर्य' आहेत. 'नियतता' म्हणजे न तुटणाऱ्या दोऱ्यात ओवलेल्या अभेद्य मण्याप्रमाणे निश्चितपणे चालणाऱ्या गती, जात, बंध आणि सुटका यानुसार असणारा नियम (नियती). 'तित्थे तित्थे गमनं' (तिथे तिथे जाणे) म्हणजे सहा अभिजातींचे त्या त्या गतींमध्ये पोहोचणे, समूहाने एकत्र येणे. 'स्वभावच' (सभावोyeव) म्हणजे जसे काट्यांचे तीक्ष्ण असणे, कवट फळांचे गोल असणे, पशू-पक्ष्यांचे विविध प्रकारचे असणे; अशा प्रकारे संपूर्ण जगाचा हेतू आणि प्रत्यय (कारण आणि परिस्थिती) यांशिवाय तसा तसा परिणाम होणे, हा केवळ स्वभावच आहे, अकृत्रिमच आहे. म्हणूनच 'येन हि' (ज्याद्वारे) इत्यादी म्हटले आहे. สกุเณ หนตีติ สากุณิโก, ตถา สูกริโก. ลุทฺโทติ อญฺโญปิ โย โกจิ มาควิโก เนสาโท. ปาปกมฺมปสุตตาย กณฺหาภิชาติ นาม. ภิกฺขูติ สากิยา ภิกฺขู, มจฺฉมํสขาทนโต นีลาภิชาตีติ วทนฺติ. ญายลทฺเธปิ ปจฺจเย ภุญฺชมานา อาชีวกสมยสฺส วิโลมคาหิตาย ‘‘ปจฺจเยสุ กณฺฏเก ปกฺขิปิตฺวา ขาทนฺตี’’ติ วทนฺติ. เอเก ปพฺพชิตา, เย สวิเสสํ อตฺตกิลมถานุโยคมนุยุตฺตา. ตถา [Pg.55] หิ เต กณฺฏเก วตฺเตนฺตา วิย โหนฺตีติ กณฺฏกวุตฺติกาติ วุตฺตา. ฐตฺวา ภุญฺชนทานปฏิกฺเขปาทิวตสมาโยเคน ปณฺฑรตรา. อเจลกสาวกาติ อาชีวกสาวเก วทติ. เต กิร อาชีวกลทฺธิยา วิสุทฺธจิตฺตตาย นิคณฺเฐหิปิ ปณฺฑรตรา. นนฺทาทโย หิ ตถารูปาย ปฏิปตฺติยา ปตฺตพฺพา, ตสฺมา นนฺทาทโย นิคณฺเฐหิ อาชีวกสาวเกหิ จ ปณฺฑรตราติ วุตฺตา ‘‘สุกฺกาภิชาตี’’ติ. पक्ष्यांना मारतो तो 'साकुणिक' (पारधी), तसेच डुकरांना मारणारा 'सूकरिक'. 'लुद्द' (शिकारी) म्हणजे इतर कोणताही शिकारी किंवा निषाद. पापकर्मात मग्न असल्यामुळे त्यांना 'कण्हाभिजाती' (कृष्ण-अभिजाती) म्हणतात. 'भिक्खू' म्हणजे शाक्यपुत्रीय भिक्खू; मासे आणि मांस खात असल्यामुळे (आजीविकांच्या मते) त्यांना 'नीलाभिजाती' (निळी जात) म्हणतात. न्याय्य मार्गाने मिळालेले प्रत्यय (भोजन इत्यादी) भोगत असतानाही, आजीवक पंथाच्या विपरीत विचारसरणीमुळे ते म्हणतात की, 'ते प्रत्ययांमध्ये काटे टाकून खातात'. काही प्रव्रजित, जे विशेषतः आत्मक्लेश अनुयोगात (स्वतःला त्रास देण्याच्या साधनेत) मग्न असतात, ते काट्यांवर लोळल्यासारखे राहत असल्यामुळे त्यांना 'कंटकवृत्तिक' (काट्यांचे व्रत पाळणारे) म्हटले आहे. उभे राहून भोजन करणे, दान नाकारणे इत्यादी व्रतांच्या पालनामुळे ते अधिक पांढरे (शुद्ध) असतात. 'अचेलकसावक' म्हणजे आजीवक श्रावकांना (शिष्यांना) म्हणतात. ते आजीवक सिद्धांतानुसार चित्ताच्या शुद्धतेमुळे निग्रंथांपेक्षाही अधिक पांढरे (शुद्ध) असतात. नंदा इत्यादींना अशा प्रकारच्या प्रतिपदेने (साधनेने) प्राप्त करायचे असते, म्हणून नंदा इत्यादींना निग्रंथांपेक्षा आणि आजीवक श्रावकांपेक्षा अधिक पांढरे (शुद्ध) म्हटले आहे, जी 'सुक्काभिजाती' (शुक्ल-अभिजाती) आहे. อยเมเตสํ ลทฺธีติ สากุณิกาทิภาวูปคมเนน กณฺหาภิชาติอาทีสุ ทุกฺขํ สุขญฺจ ปฏิสํเวเทนฺตา อนุกฺกเมน มหากปฺปานํ จุลฺลาสีติสหสฺสานิ เขเปตฺวา อาชีวกภาวูปคมเนน ปรมสุกฺกาภิชาติยํ ฐตฺวา สํสารโต สุชฺฌนฺตีติ อยํ เตสํ นิยติ อาชีวกานํ ลทฺธิ. 'ही त्यांची लब्धी (मत/सिद्धांत) आहे' - पारधी इत्यादी अवस्था प्राप्त करून कृष्ण-अभिजाती इत्यादींमध्ये दुःख आणि सुख अनुभवत, अनुक्रमाने चौऱ्याऐंशी हजार (८४,०००) महाकल्प घालवून, आजीवक अवस्था प्राप्त करून परम शुक्ल-अभिजातीमध्ये स्थित होऊन संसारातून शुद्ध (मुक्त) होतात; ही त्यांची नियती म्हणजेच आजीविकांचे मत (लब्धी) आहे. ‘‘นตฺถิ ทินฺน’’นฺติ วทนฺโต นตฺถิโก ทานสฺส ผลํ ปฏิกฺขิปตีติ อาห – ‘‘นตฺถิกทิฏฺฐิ วิปากํ ปฏิพาหตี’’ติ. ตถา เจว เหฏฺฐา สํวณฺณิตํ ‘‘นตฺถิกทิฏฺฐิ หิ นตฺถิตมาหา’’ติ. อเหตุกทิฏฺฐิ อุภยนฺติ กมฺมํ วิปากญฺจ อุภยํ. โส หิ ‘‘อเหตู อปจฺจยา สตฺตา สํกิลิสฺสนฺติ วิสุชฺฌนฺตี’’ติ วทนฺโต กมฺมสฺส วิย วิปากสฺสปิ สํกิเลสวิสุทฺธีนํ ปจฺจยตฺตาภาววจนโต ตทุภยํ ปฏิพาหติ นาม. วิปาโก ปฏิพาหิโต โหติ อสติ กมฺเม วิปากาภาวโต. กมฺมํ ปฏิพาหิตํ โหติ อสติ วิปาเก กมฺมสฺส นิรตฺถกภาวาปตฺติโต. อตฺถโตติ สรูเปน. อุภยปฏิพาหกาติ วิสุํ วิสุํ ตํตํทิฏฺฐิตา วุตฺตาปิ สพฺเพ เต นตฺถิกาทโย นตฺถิกทิฏฺฐิอาทิวเสน ปจฺเจกํ ติวิธทิฏฺฐิกา เอว อุภยปฏิพาหกตฺตา. ‘‘อุภยปฏิพาหกา’’ติ หิ เหตุวจนํ. อเหตุกวาทา จาติอาทิ ปฏิญฺญาวจนํ. โย หิ วิปากปฏิพาหเนน นตฺถิกทิฏฺฐิโก, โส อตฺถโต กมฺมปฏิพาหเนน อกิริยทิฏฺฐิโก, อุภยปฏิพาหเนน อเหตุกทิฏฺฐิโก จ โหติ. เสสทฺวเยปิ เอเสว นโย. 'दिलेले काही नाही' (नत्थि दिन्नं) असे म्हणणारा नास्तिक दानाच्या फळाचा निषेध करतो, म्हणून म्हटले आहे – 'नास्तिकदृष्टी विपाकाचा (फळाचा) निषेध करते.' तसेच खाली वर्णन केल्याप्रमाणे 'नास्तिकदृष्टी ही नास्तित्त्व (काहीही अस्तित्त्वात नाही असे) सांगते.' अहेतुकदृष्टी दोन्हीचा – म्हणजे कर्म आणि विपाक (फळ) या दोन्हीचा निषेध करते. कारण, 'हेतूशिवाय आणि प्रत्ययाशिवाय (कारणाशिवाय) प्राणी संक्लिष्ट (मळकट) होतात आणि शुद्ध होतात' असे म्हणणारा, कर्माप्रमाणेच विपाकाचाही संक्लेश आणि विशुद्धीचे कारण नसणे असे सांगत असल्यामुळे, तो त्या दोन्हीचा निषेध करतो. कर्म नसताना विपाक नसतो, म्हणून विपाकाचा निषेध होतो. विपाक नसताना कर्माचे निरर्थकत्व प्राप्त होते, म्हणून कर्माचा निषेध होतो. 'अर्थतः' म्हणजे प्रत्यक्ष स्वरूपात. 'दोन्हींचा निषेध करणारे' – जरी वेगवेगळ्या दृष्टी स्वतंत्रपणे सांगितल्या असल्या, तरी ते सर्व नास्तिक इत्यादी लोक नास्तिकदृष्टी इत्यादींच्या आधारे वैयक्तिकरित्या त्रिविध दृष्टी असणारेच आहेत, कारण ते दोन्हींचा निषेध करणारे आहेत. 'दोन्हींचा निषेध करणारे' हे हेतूचे वचन (कारण) आहे. 'अहेतुकवादी च' (आणि अहेतुकवादी) इत्यादी प्रतिज्ञेचे वचन आहे. जो विपाकाचा निषेध केल्यामुळे नास्तिकदृष्टी असणारा आहे, तो अर्थतः कर्माचा निषेध केल्यामुळे अक्रियदृष्टी असणारा आणि दोन्हींचा निषेध केल्यामुळे अहेतुकदृष्टी असणारा ठरतो. उर्वरित दोन्हींच्या बाबतीतही हाच नियम लागू होतो. สชฺฌายนฺตีติ ตํ ทิฏฺฐิทีปกํ คนฺถํ อุคฺคเหตฺวา ปฐนฺติ. วีมํสนฺตีติ ตสฺส อตฺถํ วิจาเรนฺติ. เตสนฺติอาทิ วีมํสนาการทสฺสนํ. ตสฺมึ อารมฺมเณติ ยถาปริกปฺปิตกมฺมผลาภาวทีปเก ‘‘นตฺถิ ทินฺน’’นฺติอาทินยปฺปวตฺตาย ลทฺธิยา อารมฺมเณ. มิจฺฉาสติ สนฺติฏฺฐตีติ ‘‘นตฺถิ ทินฺน’’นฺติอาทิวเสน [Pg.56] อนุสฺสวูปลทฺเธ อตฺเถ ตทาการปริวิตกฺกเนหิ สวิคฺคเห วิย สรูปโต จิตฺตสฺส ปจฺจุปฏฺฐิเต จิรกาลปริจเยน ‘‘เอวเมต’’นฺติ นิชฺฌานกฺขมภาวูปคมเนน นิชฺฌานกฺขนฺติยา ตถา คหิเต ปุนปฺปุนํ ตเถว อาเสวนฺตสฺส พหุลีกโรนฺตสฺส มิจฺฉาวิตกฺเกน สมาทิยมานา มิจฺฉาวายามุปตฺถมฺภิตา อตํสภาวํ ‘‘ตํสภาว’’นฺติ คณฺหนฺตี มิจฺฉาสตีติ ลทฺธนามา ตํลทฺธิสหคตา ตณฺหา สนฺติฏฺฐติ. จิตฺตํ เอกคฺคํ โหตีติ ยถาวุตฺตวิตกฺกาทิปจฺจยลาเภน ตสฺมึ อารมฺมเณ อวฏฺฐิตตาย อเนกคฺคํ ปหาย เอกคฺคํ อปฺปิตํ วิย โหติ. มิจฺฉาสมาธิปิ หิ ปจฺจยวิเสเสหิ ลทฺธภาวนาพเลหิ กทาจิ สมาธานปติรูปกิจฺจกโร โหติเยว วาลวิชฺฌนาทีสุ วิยาติ ทฏฺฐพฺพํ. ชวนานิ ชวนฺตีติ อเนกกฺขตฺตุํ เตนากาเรน ปุพฺพภาคิเยสุ ชวนวาเรสุ ปวตฺเตสุ สพฺพปจฺฉิเม ชวนวาเร สตฺต ชวนานิ ชวนฺติ. ปฐมชวเน ปน สเตกิจฺฉา โหนฺติ, ตถา ทุติยาทีสูติ ธมฺมสภาวทสฺสนเมตํ, น ปน ตสฺมึ ขเณ เตสํ สเตกิจฺฉภาวาปาทนํ เกนจิ สกฺกา กาตุํ. 'सज्झायन्ति' (स्वाध्याय करतात) म्हणजे त्या दृष्टीचे प्रतिपादन करणाऱ्या ग्रंथाचे ग्रहण करून पठण करतात. 'वीमंसन्ति' (मीमांसा करतात) म्हणजे त्याचा अर्थ विचारतात. 'तेसं' (त्यांचे) इत्यादी मीमांसेचा प्रकार दर्शवणारे आहे. 'तस्मिं आरम्मणे' (त्या आलंबनात) म्हणजे कल्पिलेल्या कर्मफलाचा अभाव दर्शवणाऱ्या 'दिलेले काही नाही' इत्यादी पद्धतीने प्रवृत्त झालेल्या सिद्धांताच्या आलंबनात. 'मिच्छासति संतिट्ठति' (मिथ्या स्मृती प्रस्थापित होते) म्हणजे 'दिलेले काही नाही' इत्यादी प्रकारे परंपरेने प्राप्त झालेल्या अर्थावर, त्या आकाराच्या विचारांमुळे शरीरासह प्रत्यक्ष स्वरूपात चित्त उपस्थित झाल्यावर, दीर्घकाळाच्या परिचयाने 'हे असेच आहे' अशा प्रकारे विचारपूर्वक स्वीकारण्याच्या अवस्थेला (निज्झानक्खंति) प्राप्त होऊन, वारंवार तसेच आचरण करणाऱ्या आणि त्याचा सराव करणाऱ्या व्यक्तीच्या मनात मिथ्या वितर्काने युक्त, मिथ्या व्यायामाने (प्रयत्नाने) समर्थित, जे त्याचे स्वरूप नाही त्याला 'तेच त्याचे स्वरूप आहे' असे ग्रहण करणारी, 'मिथ्या स्मृती' हे नाव मिळालेली आणि त्या सिद्धांताशी संबंधित असणारी तृष्णा प्रस्थापित होते. 'चित्तं एकग्गं होति' (चित्त एकाग्र होते) म्हणजे वर सांगितलेल्या वितर्क इत्यादी प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) प्राप्तीमुळे त्या आलंबनावर स्थिर झाल्याने, अनेकता (विक्षेप) सोडून एकाग्र, जणू समाधीत लीन झाल्यासारखे होते. कारण मिथ्या समाधी देखील विशिष्ट प्रत्ययांच्या आणि प्राप्त झालेल्या भावनेच्या बलाने कधीकधी समाधीसारखेच कार्य करणारी ठरते, जसे की केसाचा वेध घेण्यामध्ये (धनुर्विद्येत) इत्यादी; असे समजले पाहिजे. 'जवनानि जवन्ति' (जवन धावतात) म्हणजे अनेक वेळा त्या प्रकारे पूर्वभागातील जवन-वारांमध्ये (प्रक्रियांमध्ये) प्रवृत्त झाल्यावर, सर्वात शेवटच्या जवन-वारात सात जवने धावतात. पहिल्या जवनात ते 'सतेकिच्छ' (उपचारयोग्य/सुधारण्यायोग्य) असतात, तसेच दुसऱ्या इत्यादींमध्येही; हे केवळ धम्माच्या स्वभावाचे दर्शन आहे, परंतु त्या क्षणी त्यांना सुधारण्यायोग्य बनवणे कोणालाही शक्य नाही. ตตฺถาติ เตสุ ตีสุ มิจฺฉาทสฺสเนสุ. โกจิ เอกํ ทสฺสนํ โอกฺกมตีติ ยสฺส เอกสฺมึเยว อภินิเวโส อาเสวนา จ ปวตฺตา, โส เอกํเยว ทสฺสนํ โอกฺกมติ. ยสฺส ปน ทฺวีสุ, ตีสุปิ วา อภินิเวสนา ปวตฺตา, โส ทฺเว ตีณิ โอกฺกมติ. เอเตน ยา ปุพฺเพ อุภยปฏิพาหนตามุเขน วุตฺตา อตฺถสิทฺธา สพฺพทิฏฺฐิกตา, สา ปุพฺพภาคิยา. ยา ปน มิจฺฉตฺตนิยาโมกฺกนฺติ ภูตา, สา ยถาสกํ ปจฺจยสมุทาคมสิทฺธิโต ภินฺนารมฺมณานํ วิย วิเสสาธิคมานํ อญฺญมญฺญํ เอกชฺฌํ อนุปฺปตฺติยา อสํกิณฺณา เอวาติ ทสฺเสติ. เอกสฺมึ โอกฺกนฺเตปีติอาทินา ติสฺสนฺนมฺปิ ทิฏฺฐีนํ สมานพลตํ สมานผลตญฺจ ทสฺเสติ, ตสฺมา ติสฺโสปิ เจตา เอกสฺส อุปฺปนฺนา อญฺญมญฺญํ อพฺโพกิณฺณา เอว, เอกาย วิปาเก ทินฺเน อิตรา อนุพลปฺปทายิกา โหนฺติ. วฏฺฏขาณุ นามาติ อิทํ วจนํ เนยฺยตฺถํ, น นีตตฺถนฺติ ตํ วิวริตฺวา ทสฺเสตุํ กึ ปเนสาติอาทิ วุตฺตํ, อกุสลํ นาเมตํ อพลํ ทุพฺพลํ, น กุสลํ วิย มหาพลนฺติ อาห – ‘‘เอกสฺมึเยว อตฺตภาเว นิยโต’’ติ. อญฺญถา สมฺมตฺตนิยาโม วิย มิจฺฉตฺตนิยาโมปิ อจฺจนฺติโก สิยา. ยทิ เอวํ วฏฺฏขาณุกโชตนา กถนฺติ อาห ‘‘อาเสวนวเสน ปนา’’ติอาทิ, ตสฺมา ยถา ‘‘สกึ นิมุคฺโค [Pg.57] นิมุคฺโคว โหตี’’ติ (อ. นิ. ๗.๑๕) วุตฺตํ, เอวํ วฏฺฏขาณุกโชตนา. ยาทิเส หิ ปจฺจเย ปฏิจฺจ อยํ ตํตํทสฺสนํ โอกฺกนฺโต ปุน กทาจิ ตปฺปฏิปกฺเข ปจฺจเย ปฏิจฺจ ตโต สีสุกฺขิปนมสฺส น โหตีติ น วตฺตพฺพํ. เตน วุตฺตํ ‘‘เยภุยฺเยนา’’ติ. “तत्य” (तेथे) म्हणजे त्या तीन मिथ्या दृष्टींमध्ये. “कोणी एका दृष्टीमध्ये प्रवेश करतो” म्हणजे ज्याचा एकाच दृष्टीमध्ये अभिनिवेश (दृढ निश्चय) आणि आसेवना (पुनःपुन्हा अभ्यास) प्रवृत्त झाली आहे, तो एकाच दृष्टीमध्ये प्रवेश करतो. परंतु ज्याचा दोन किंवा तिन्ही दृष्टींमध्ये अभिनिवेश प्रवृत्त झाला आहे, तो दोन किंवा तिन्ही दृष्टींमध्ये प्रवेश करतो. याद्वारे, जी पूर्वी दोन्हीच्या प्रतिषेधाच्या मुखाने सांगितलेली, अर्थसिद्ध अशी ‘सर्वदृष्टिकता’ आहे, ती पूर्वभागीय आहे. परंतु जी ‘मिथ्यात्व-नियाम’ कडे जाणारी झाली आहे, ती आपापल्या प्रत्यय-समुदायाच्या सिद्धीमुळे, भिन्न आलंबन असणाऱ्या विशेष अधिगमांप्रमाणे, एकमेकांत एकत्र न मिसळता (असंकीर्ण) प्राप्त होते, असे दर्शविते. “एकामध्ये प्रवेश केला तरी” इत्यादींद्वारे तिन्ही दृष्टींचे समान बल आणि समान फल दर्शविले आहे. म्हणून या तिन्ही दृष्टी एकाच व्यक्तीमध्ये उत्पन्न झाल्या तरी त्या एकमेकांत न मिसळणाऱ्या असतात; एका दृष्टीने विपाक (फळ) दिला असता, इतर दृष्टी तिला अनुबल (अतिरिक्त बळ) देणाऱ्या ठरतात. “वट्टखाणू” (संसाररूपी खुंट) हे वचन नेय्यार्थ (अप्रत्यक्ष अर्थ असणारे) आहे, नीतार्थ (स्पष्ट अर्थ असणारे) नाही, हे स्पष्ट करण्यासाठी “किं पनेसा” (पण हे काय आहे) इत्यादी म्हटले आहे. अकुशल हे अबल आणि दुर्बल असते, कुशलासारखे महाबली नसते, म्हणून म्हटले आहे - “एकाच आत्मभावात नियत असते.” अन्यथा, सम्यक्त्व-नियामाप्रमाणे मिथ्यात्व-नियाम देखील अत्यंतिक झाला असता. जर असे आहे, तर ‘वट्टखाणुक’ चे प्रकटीकरण कसे होते? म्हणून म्हटले आहे - “आसेवनाच्या वशाने तर...” इत्यादी. म्हणून ज्याप्रमाणे “एकदा बुडालेला बुडालेलाच राहतो” (अं. नि. ७.१५) असे म्हटले आहे, त्याप्रमाणे ‘वट्टखाणुक’ चे प्रकटीकरण समजावे. कारण ज्या प्रत्ययाला (कारणाला) अनुसरून हा त्या-त्या दृष्टीमध्ये प्रवेश करतो, पुन्हा कधीतरी त्याच्या प्रतिपक्ष (विरोधी) प्रत्ययाला अनुसरून त्याचे डोके वर काढणे होणारच नाही, असे म्हणता येत नाही. म्हणूनच “येभुय्येन” (बहुतांश करून) असे म्हटले आहे। ตสฺมาติ ยสฺมา เอวํ สํสารขาณุภาวสฺสปิ ปจฺจโย อกลฺยาณชโน, ตสฺมา. ภูติกาโมติ ทิฏฺฐธมฺมิกสมฺปรายิกปรมตฺถานํ วเสน อตฺตโน คุเณหิ วฑฺฒิกาโม. ยํ ปเนตฺถ เกจิ วทนฺติ ‘‘ยถา จิรกาลภาวนาย ปริปากูปคมลทฺธพลตฺตา อุปนิสฺสยกุสลา อกุสเล สพฺพโส สมุจฺฉินฺทนฺติ, เอวํ อกุสลธมฺมา ตโตปิ จิรกาลภาวนาสมฺภวโต ลทฺธพลา หุตฺวา กทาจิ กุสลธมฺเมปิ สมุจฺฉินฺทนฺติ. เอวญฺจ กตฺวา ทฬฺหมิจฺฉาภินิเวสสฺส มิจฺฉาทิฏฺฐิกสฺส วฏฺฏขาณุกภาวโชตนาปิ สมตฺถิตา โหตี’’ติ ยถา ตํ ‘‘วสฺสภญฺญานํ ทิฏฺฐี’’ติ, ตํ น, มิจฺฉตฺตนิยตธมฺมานํ จิรกาลภาวนามตฺเตน น ปฏิปกฺขสฺส ปชหนสมตฺถตา, อถ โข ธมฺมตาสิทฺเธน ปจฺจยวิเสสาหิตสามตฺถิเยน อตฺตโน ปหายกสภาเวน ปหายกภาโว ภาวนากุสลานํเยว วุตฺโต, อกุสลานํเยว จ ปหาตพฺพภาโว ‘‘ทสฺสเนน ปหาตพฺพา’’ติอาทินา นเยน, อกุสลานํเยว ทุพฺพลภาโว ‘‘อพลานํ พลียนฺตี’’ติอาทินา (สุ. นิ. ๗๗๖; มหานิ. ๕) (ยุตฺตินาปิ นามโต วา อธิคมนิโย อาโลโก อาโลกภาวโต พาหิรารเณกา วิย น เจตฺถ ปฏิญฺญตฺเต ภาเวสตา โสตุโน อาสํกิตพฺพา วิเสสวสฺส สาเธตพฺพโต สามญฺญสฺส จ โสตุภาเวน อธิปฺเปตตฺตา เวท-สทฺทสฺส โลโป ทีเป สภาเว สาธเน ยถา ตํ สทฺทยภาวสฺส นาปิ วิสุทฺธกอนุมานาทิวิโรธสมฺภาวโต. น หิ สกฺกา อนฺตราโลกสฺส พาหิราโลกสฺส วิย รูปกายํ อุปาทาย รูปตา จกฺขุวิญฺเญยฺยตฺตาทิเก ปติฏฺฐาเปตุํ สกฺกาติ วุตฺตํ, นนุปิ อนฺตราโลโก อวิคฺคหตฺตา เวทนา วิยาติ สทฺเธว ญาณาโลกสฺส อวิชฺชนฺธการา วิย วิธมนิยภาเว สพฺเพสมฺปิ กุสลธมฺมานํ เกนจิปิ อกุสลธมฺเมน สมุจฺฉินฺทนิยตา สิทฺธาว โหติ). วฏฺฏขาณุกโจทนาย ยํ วตฺตพฺพํ, ตํ เหฏฺฐา วุตฺตเมวาติ ติฏฺฐเตสา พาลชนวิกตฺถนา. “तस्मा” (म्हणून) म्हणजे ज्या अर्थी अशा प्रकारे संसार-खुंट होण्यास देखील अकल्याण मित्र हाच प्रत्यय (कारण) आहे, म्हणून. “भूतिकामो” (कल्याण इच्छिणारा) म्हणजे ऐहिक, पारलौकिक आणि परमार्थ यांच्या वशाने स्वतःच्या गुणांनी वृद्धी इच्छिणारा. येथे काही लोक जे म्हणतात की - “ज्याप्रमाणे दीर्घकाळ भावनेने परिपक्वता प्राप्त झाल्यामुळे मिळालेल्या बलामुळे उपनिश्रय-कुशल हे अकुशलाचा सर्वतोपरी समूळ उच्छेद करतात, त्याचप्रमाणे अकुशल धर्म देखील त्याहूनही दीर्घकाळ भावनेच्या संभवामुळे बलवान होऊन कधीतरी कुशल धर्माचाही समूळ उच्छेद करतात. आणि असे मानल्याने दृढ मिथ्या अभिनिवेश असणाऱ्या मिथ्यादृष्टी व्यक्तीचा ‘वट्टखाणुकभाव’ (संसार-खुंट भाव) स्पष्ट करणे देखील समर्थित होते” - जशी ती “वस्सभज्ञांची दृष्टी” आहे, ते योग्य नाही. कारण मिथ्यात्व-नियत धर्मांना केवळ दीर्घकाळ भावनेने प्रतिपक्षाचा (विरोधी धर्माचा) त्याग करण्याचे सामर्थ्य प्राप्त होत नाही. तर उलट, धम्मता-सिद्ध (नैसर्गिक नियमाने सिद्ध) अशा प्रत्यय-विशेषाने प्राप्त झालेल्या सामर्थ्यामुळे, स्वतःच्या प्रहाण करण्याच्या स्वभावामुळे प्रहाणकत्व हे केवळ भावना-कुशलांचेच सांगितले आहे, आणि अकुशलांचा केवळ प्रहातव्यभाव “दर्शनाने प्रहातव्य” इत्यादी पद्धतीने सांगितला आहे. तसेच अकुशलांचा दुर्बलभाव “अबल असणाऱ्यांचे बलवान होतात” इत्यादींद्वारे सांगितला आहे. (युक्तीने किंवा नावाने देखील प्राप्त होणारा प्रकाश हा प्रकाशरूप असल्यामुळे बाह्य प्रकाशाप्रमाणेच असतो... ज्ञानाचा प्रकाश हा अविद्यारूपी अंधकाराचा नाश करणारा असल्यामुळे, कोणत्याही अकुशल धर्माद्वारे सर्व कुशल धर्मांचा समूळ उच्छेद केला जाणे अशक्य आहे हे सिद्धच होते). ‘वट्टखाणुक’ च्या आक्षेपाबाबत जे सांगायचे आहे, ते आधीच सांगितले आहे, त्यामुळे ही बालजनांची फुशारकी येथेच राहू द्या। ๑๐๓. ฌานจิตฺตมยาติ [Pg.58] รูปาวจรชฺฌานจิตฺเตน นิพฺพตฺตา. ตถา หิ เตสํ วิเสเสน ฌานมนสา นิพฺพตฺตตฺตา ‘‘มโนมยา’’ติ วุตฺตา, อวิเสเสน ปน อภิสงฺขารมนสา สพฺเพปิ สตฺตา มโนมยา เอว. สญฺญามยาติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย. เตนาห ‘‘อรูปชฺฌานสญฺญายา’’ติ. อยนฺติ รูปิตาภาวปฏิปชฺชนกปุคฺคโล. อปฺปฏิลทฺธชฺฌาโนติ อนธิคตรูปชฺฌาโน. ตสฺสปีติ ตกฺกิโนปิ. รูปชฺฌาเน กงฺขา นตฺถิ อนุสฺสววเสน ลทฺธวินิจฺฉยตฺตา. १०३. “झानचित्तमया” (ध्यानचित्तमय) म्हणजे रूपावचर ध्यानचित्ताने उत्पन्न झालेले. कारण, विशेषतः ध्यान-मनाने उत्पन्न झाल्यामुळे त्यांना “मनोमय” असे म्हटले आहे; परंतु सामान्यतः अभिसंस्कार-मनाने सर्वच प्राणी मनोमय असतात. “सञ्ञामया” (संज्ञामय) यामध्ये देखील हाच नियम आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - “अरूपध्यान-संज्ञेमुळे”. “अयं” (हा) म्हणजे रूपीभावाचा अभाव प्राप्त करणारा पुद्गल. “अप्पटिलद्धज्झानो” (ध्यान न मिळालेला) म्हणजे रूपावचर ध्यान प्राप्त न झालेला. “तस्सपि” (त्याचाही) म्हणजे तर्काचा आश्रय घेणाऱ्याचाही. रूपावचर ध्यानाविषयी शंका नसते, कारण अनुश्रवाच्या वशाने त्याने निर्णय प्राप्त केलेला असतो। ๑๐๔. สาราคายาติ สราคภาวาย. สนฺติเกติ สมีเป, น ถามคตา ทิฏฺฐินาติทูรตฺตา สราคา, น สมฺปยุตฺตตฺตา. สา หิ น ถามคตา วฏฺฏปริยาปนฺเนสุ ธมฺเมสุ รชฺชตีติ วิญฺญายตีติ อาห – ‘‘ราควเสน วฏฺเฏ รชฺชนสฺสา’’ติ. สพฺเพปิ สํโยชนา ตณฺหาวเสเนว สมฺภวนฺตีติ อาห – ‘‘ตณฺหาวเสน สํโยชนตฺถายา’’ติ. อารุปฺเป ปนสฺส กงฺขา นตฺถีติ อนุสฺสววเสน ลทฺธนิจฺฉยํ สนฺธาย วุตฺตํ. กามํ ทุคฺคติทุกฺขานํ เอกนฺตสํวตฺตเนน นตฺถิกทิฏฺฐิอาทีนํ อปณฺณกตา ปากฏา เอว, นิปฺปริยาเยน ปน อนวชฺชสฺส อตฺถสฺส เอกนฺตสาธกํ อปณฺณกนฺติ กตฺวา โจทนา, สาวชฺชสฺสปิ อตฺถสฺส สาธเน เอกํสิกภาวํ คเหตฺวา ปริหาโร. เตนาห ‘‘คหณวเสนา’’ติอาทิ. เตน รุฬฺหีวเสน ‘‘นตฺถิ ทินฺน’’นฺติอาทีนิ อปณฺณกงฺคานิ ชาตานีติ ทสฺเสติ. १०४. “सारागाय” (सरागतेसाठी) म्हणजे सराग भावासाठी. “सन्तिके” (जवळ) म्हणजे समीप, जी दृष्टी दृढ झालेली नाही तिच्यापासून फार दूर नसल्यामुळे ती सराग असते, संप्रयुक्त असल्यामुळे नाही. कारण ती दृढ न झालेली दृष्टी संसार-पर्यापन्न धर्मांमध्ये आसक्त होते, असे जाणले जाते, म्हणून म्हटले आहे - “रागाच्या वशाने संसारात आसक्त होण्यासाठी.” सर्वच संयोजने केवळ तण्हा (तृष्णा) च्या वशानेच संभवतात, म्हणून म्हटले आहे - “तृष्णेच्या वशाने संयोजनाच्या स्थितीसाठी.” अरूपलोकाविषयी त्याला शंका नसते, हे अनुश्रवाच्या वशाने प्राप्त झालेल्या निश्चयाला अनुसरून म्हटले आहे. जरी दुर्गती आणि दुःखांना निश्चितपणे प्राप्त करून देणाऱ्या नास्तिकदृष्टी इत्यादींची ‘अपण्णकता’ (निश्चितता) स्पष्टच आहे, तरीही निष्पर्यायाने (थेटपणे) अनवद्य (दोषरहित) अर्थाचे एकांततः साधक असणे म्हणजे ‘अपण्णक’ (अकाट्य) होय, असे मानून आक्षेप घेतला आहे; आणि सावद्य (दोषयुक्त) अर्थाच्या साधनात देखील एकांतिक भाव स्वीकारून परिहार दिला आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - “ग्रहण करण्याच्या वशाने” इत्यादी. यावरून रूढीच्या वशाने “दिलेले अस्तित्वात नाही” इत्यादी अपण्णक-अंगे झाली आहेत, असे दर्शविते। ๑๐๕. เหฏฺฐา ตโย ปุคฺคลาว โหนฺตีติ อตฺตนฺตโป ปรนฺตโปติ อิมสฺมึ จตุกฺเก เหฏฺฐา ตโย ปุคฺคลา โหนฺติ. ยถาวุตฺตา ปญฺจปิ ปุคฺคลา ทุปฺปฏิปนฺนาว, ตโต อตฺถิกวาทาทโย ปญฺจปุคฺคลา สมฺมาปฏิปนฺนตาย อิมสฺมึ จตุกฺเก เอโก จตุตฺถปุคฺคโลว โหติ. เอตมตฺถํ ทสฺเสตุนฺติ อิธ เหฏฺฐา วุตฺตปุคฺคลปญฺจกทฺวยํ อิมสฺมึ จตุกฺเก เอว สงฺคหํ คจฺฉตีติ วิภาเคน ทุปฺปฏิปตฺติสุปฺปฏิปตฺติโย ทสฺเสตุํ ภควา อิมํ เทสนํ อารภีติ. ยํ ปเนตฺถ อตฺถโต อวิภตฺตํ, ตํ สุวิญฺเญยฺยเมว. १०५. “खालील तीन पुद्गलच असतात” म्हणजे ‘अत्तंतपो’ (स्वतःला ताप देणारा), ‘परंतपो’ (दुसऱ्याला ताप देणारा) या चतुष्कामध्ये खालील तीन पुद्गल असतात. वर सांगितलेले पाचही पुद्गल दुष्प्रतिपन्न आहेत; त्यानंतर अस्तिकवादी इत्यादी पाच पुद्गल सम्यक्-प्रतिपन्न असल्यामुळे या चतुष्कामध्ये एक चौथा पुद्गलच होतो. हा अर्थ दर्शविण्यासाठी - येथे खाली सांगितलेले दोन पुद्गल-पंचक या चतुष्कामध्येच समाविष्ट होतात, अशा विभागाने दुष्प्रतिपत्ती आणि सुप्रतिपत्ती दर्शविण्यासाठी भगवंतांनी हा उपदेश सुरू केला. येथे जे अर्थाच्या दृष्टीने अविभक्त आहे, ते सहज समजण्यासारखेच आहे। อปณฺณกสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. अपण्णकसुत्त-वर्णनेची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ-प्रकाशिनी टीका) समाप्त झाली। นิฏฺฐิตา จ คหปติวคฺควณฺณนา. आणि गृहपती-वर्ग-वर्णना समाप्त झाली. ๒. ภิกฺขุวคฺโค २. भिक्खू वर्ग ๑. อมฺพลฏฺฐิกราหุโลวาทสุตฺตวณฺณนา १. अंबलट्ठिक-राहुलोवाद सुत्त-वर्णना ๑๐๗. อมฺพลฏฺฐิกายนฺติ [Pg.59] เอตฺถ อมฺพลฏฺฐิกา วุจฺจติ สุชาโต ตรุณมฺพรุกฺโข, ตสฺส ปน อวิทูเร กโต ปาสาโท อิธ ‘‘อมฺพลฏฺฐิกา’’ติ อธิปฺเปโต. เตนาห ‘‘เวฬุวนวิหารสฺสา’’ติอาทิ. ปธานฆรสงฺเขเปติ ภาวนาเคหปฺปกาเร โยคีนํ เคเหติ อตฺโถ. ติขิโณว โหติ, น ตสฺส ติขิณภาโว เกนจิ กาตพฺโพ สภาวสิทฺธตฺตา. เอวเมว อตฺตโน วิมุตฺติปริปาจนกมฺมุนา ติกฺขวิสทภาวปฺปตฺติยา อยมฺปิ อายสฺมา…เป… ตตฺถ วิหาสิ. ปกติปญฺญตฺตเมวาติ ปกติยา ปญฺญตฺตํ พุทฺธานํ อุปคมนโต ปุเรตรเมว จาริตฺตวเสน ปญฺญตฺตํ. १०७. अंबलट्ठिकायं यामध्ये 'अंबलट्ठिका' म्हणजे चांगला वाढलेला तरुण आंब्याचे झाड (तरुण-आम्ब-वृक्ष) असे म्हटले जाते. परंतु, येथे त्याच्या जवळच बांधलेला महाल (प्रासाद) 'अंबलट्ठिका' या शब्दाने अभिप्रेत आहे. म्हणूनच 'वेळुवनविहाराच्या...' इत्यादी म्हटले आहे. 'पधानघरसंखेपे' (प्रधानघर संक्षेपात) म्हणजे ध्यानगृहाच्या प्रकारात, योग्यांचे घर असा अर्थ आहे. तो तीक्ष्णच असतो, त्याचा तीक्ष्णपणा कोणाकडून केला जात नाही, कारण तो स्वभावसिद्ध असतो. याचप्रमाणे स्वतःच्या विमुक्तीला परिपक्व करणाऱ्या कर्माने तीक्ष्ण व स्पष्ट भाव प्राप्त झाल्यामुळे हे आयुष्यमान (आयुष्मान)... पे... तेथे राहत होते. 'पकतिपञ्ञत्तमेव' (प्रकृतिप्रज्ञप्तच) म्हणजे प्रकृतीने (स्वभावाने) प्रज्ञप्त केलेले, बुद्धांच्या आगमनापूर्वीच परंपरेने (चारित्र्यवशात) प्रज्ञप्त केलेले होय. ๑๐๘. อุทกํ อเนน ธียติ, ฐปียติ วา เอตฺถาติ อุทกาธานํ. อุทกฏฺฐานนฺติ จ ขุทฺทกภาชนํ. ‘‘โอวาททานตฺถํ อามนฺเตสี’’ติ วตฺวา ตํ ปนสฺส โอวาททานํ น อิเธว, อถ โข พหูสุ ฐาเนสุ พหุกฺขตฺตุํ ปวตฺติตนฺติ ตานิ ตานิ สงฺเขปโต ทสฺเสตฺวา อิธ สํวณฺณนตฺถํ ‘‘ภควตา หี’’ติอาทิ วุตฺตํ. १०८. याच्याद्वारे पाणी धारण केले जाते किंवा यात ठेवले जाते, म्हणून ते 'उदकाधान' (पाण्याचे भांडे) होय. 'उदकट्ठान' म्हणजे लहान भांडे. 'उपदेश देण्यासाठी आमंत्रित केले' असे सांगून, तो उपदेश केवळ येथेच दिला गेला नाही, तर अनेक ठिकाणी अनेक वेळा दिला गेला होता, हे संक्षेपाने दाखवून येथे वर्णना करण्यासाठी 'भगवंतांनीच...' इत्यादी म्हटले आहे. ตตฺถ สพฺพพุทฺเธหิ อวิชหิตนฺติ อิมินา สพฺเพสํ พุทฺธานํ สาสเน กุมารปญฺหา นาม โหตีติ ทสฺเสติ. เอเกกโต ปฏฺฐาย ยาว ทสกา ปวตฺตา ทส ปุจฺฉา เอตสฺสาติ ทสปุจฺฉํ, เอเกกโต ปฏฺฐาย ยาว ทสกา เอกุตฺตรวเสน ปวตฺตํ วิสฺสชฺชนตฺถาย ปญฺจปณฺณสวิสฺสชฺชนํ สามเณรปญฺหนฺติ สมฺพนฺโธ. ยํ ปเนตฺถ วตฺตพฺพํ, ตํ ปรมตฺถโชติกายํ ขุทฺทกฏฺฐกถายํ (ขุ. ปา. อฏฺฐ. ๔.กุมารปญฺหวณฺณนา) วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ. อนาทีนวทสฺสิตาย อภิณฺหํ มุสา สมุทาจรณโต ‘‘ปิยมุสาวาทา’’ติ วุตฺตํ, อุทกาวเสสฉฑฺฑนอุทกาธานนิกุชฺชนอุกฺกุชฺชนทสฺสนสญฺญิตา จตสฺโส อุทกาธานูปมาโย สพฺพสฺส ยุทฺธกมฺมสฺส อกรณกรณวเสน ทสฺสิตา ทฺเว หตฺถิอุปมาโย. तेथे 'सर्व बुद्धांनी न सोडलेले' यावरून सर्व बुद्धांच्या शासनात 'कुमारप्रश्न' (कुमारपञ्हा) नावाचे प्रश्न असतात, हे दर्शविले आहे. एकापासून सुरू करून दहापर्यंत चालणारे दहा प्रश्न यात आहेत म्हणून ते 'दशपृच्छ' (दशपुच्छ) होय. एकापासून सुरू करून दहापर्यंत एकोत्तरी पद्धतीने चालणाऱ्या उत्तरांसाठी पंचावन्न उत्तरे असणारा 'सामणेरप्रश्न' (सामणेरपञ्हा) असा संबंध आहे. येथे जे काही सांगायचे आहे, ते 'परमत्थजोतिका' नावाच्या खुद्दकपाठ-अट्ठकथेतील (कुमारपञ्हवर्णना) सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावे. दुष्परिणाम (आदीनव) न दिसल्यामुळे वारंवार असत्य बोलण्याला 'प्रिय-मृषावादी' (पियमुसावादा - खोटे बोलण्याची आवड असणारा) म्हटले आहे. पाण्याचे उरलेले पाणी फेकून देणे, पाण्याचे भांडे उपडे करणे आणि उताणे करणे या दर्शनाने युक्त अशा चार 'उदकाधान-उपमा' (पाण्याच्या भांड्याच्या उपमा) आहेत, आणि संपूर्ण युद्धकर्माच्या करण्या-न करण्याच्या संदर्भात दोन 'हत्ती-उपमा' दर्शविल्या आहेत. ตตฺถ ราหุลสุตฺตนฺติ สุตฺตนิปาเต อาคตํ ราหุลสุตฺตํ (สุ. นิ. ๓๓๗ อาทโย). อภิณฺโหวาทวเสน วุตฺตนฺติ อิมินา อนฺตรนฺตรา ตํ สุตฺตํ กเถตฺวา ภควา เถรํ โอวทตีติ ทสฺเสติ. อิทญฺจ ปนาติ อิทํ ยถาวุตฺตํ ภควโต ตํตํกาลานุรูปํ อตฺตโน โอวาททานํ สนฺธาย. พีชนฺติ อณฺฑํ. ปสฺสสิ นูติ [Pg.60] นุ-สทฺโท อนุชานเน, นนุ ปสฺสสีติ อตฺโถ. สจฺจธมฺมํ ลงฺฆิตฺวา ฐิตสฺส กิญฺจิปิ อกตฺตพฺพํ นาม ปาปํ นตฺถีติ อาห – ‘‘สมฺปชานมุสาวาเท สํวรรหิตสฺส โอปมฺมทสฺสนตฺถํ วุตฺตา’’ติ. ตถา หิ – तेथे 'राहुलसुत्त' म्हणजे सुत्तनिपातात आलेले राहुलसुत्त (सु. नि. ३३७ इत्यादी) होय. 'वारंवार उपदेश करण्याच्या उद्देशाने म्हटले आहे' यावरून भगवंत वेळोवेळी ते सुत्त सांगून थेरांना उपदेश करत असत, हे दर्शविले आहे. 'आणि हे' म्हणजे भगवंतांनी त्या त्या काळानुरूप स्वतः दिलेला हा पूर्वोक्त उपदेश होय. 'बीज' म्हणजे अंडे. 'पस्ससि नु' (तू पाहतोस का?) मधील 'नु' हा शब्द अनुमती दर्शवणारा आहे, म्हणजेच 'तू पाहत नाहीस का?' असा अर्थ आहे. सत्यधर्माचे उल्लंघन करून राहिलेल्या व्यक्तीसाठी कोणतेही न करण्यासारखे पाप उरत नाही, हे सांगताना म्हटले आहे – 'जाणूनबुजून खोटे बोलण्यात संयम नसलेल्या व्यक्तीला उपमा दाखवण्यासाठी हे म्हटले आहे.' कारण की – ‘‘เอกํ ธมฺมมตีตสฺส, มุสาวาทิสฺส ชนฺตุโน; วิติณฺณปรโลกสฺส, นตฺถิ ปาปมการิย’’นฺติ. (ธ. ป. ๑๗๖); 'ज्या मनुष्याने एका धर्माचे (सत्याचे) उल्लंघन केले आहे, जो असत्य बोलणारा आहे आणि ज्याने परलोकाचा त्याग केला आहे, त्याच्यासाठी कोणतेही पाप अकरणीय (न करण्यासारखे) नाही.' (धम्मपद १७६); อุรุฬฺหวาติ อุรุฬฺโห หุตฺวา อุสฺสิโต. โส ปน ทมวเสน อภิรุยฺห วฑฺฒิโต อาโรหนโยคฺโย จ โหตีติ อาห ‘‘อภิวฑฺฒิโต อาโรหสมฺปนฺโน’’ติ. อาคตาคเตติ อตฺตโน โยคฺยปเทสํ อาคตาคเต. ปฏิเสนาย ผลกโกฏฺฐกมุณฺฑปาการาทโยติ ปฏิเสนาย อตฺตโน อารกฺขตฺถาย ฐปิเต ผลกโกฏฺฐเก เจว อุทฺธจฺฉทปาการาทิเก จ. เอตํ ปเทสนฺติ เอตํ ปรเสนาปเทสํ. เอตฺตเกนาติ โอโลกนมตฺเตน. ตสฺส โอโลกนาการทสฺสเนเนว. สตมฺปิ สหสฺสมฺปิ เสนานีกํ ทฺเวธา ภิชฺชติ, ตีรปาติกํ มทฺทิตํ หุตฺวา ปทาตา หุตฺวา ทฺเวธา หุตฺวา ปลายนฺติ. กณฺเณหิ ปหริตฺวาติ ปเคว สรานํ อาคมนสทฺทํ อุปธาเรตฺวา ยถา เวโค น โหติ, เอวํ สมุฏฺฐาเปตฺวา เตหิ ปหริตฺวา ปาตนํ. ปฏิหตฺถิปฏิอสฺสาติอาทินา ปจฺเจกํ ปติ-สทฺโท โยเชตพฺโพติ. ทีฆาสิลฏฺฐิยาติ ทีฆลตาย อสิลฏฺฐิยา. 'उरुळ्ह' म्हणजे वाढलेला आणि उंच झालेला. तो दमनाच्या (प्रशिक्षणाच्या) मार्गाने स्वार होऊन वाढवलेला आणि स्वार होण्यास योग्य झालेला असतो, म्हणून 'अभिवर्धित आणि आरोहणसंपन्न' (अभिवाढितो आरोहसंपन्नो) असे म्हटले आहे. 'आगतागत' म्हणजे स्वतःच्या योग्य ठिकाणी आलेले. 'प्रतिसेनेच्या फलककोठक-मुंडप्राकारादी' म्हणजे शत्रूच्या सैन्याने स्वतःच्या रक्षणासाठी उभारलेले लाकडी बुरूज आणि उंच छताचे तट इत्यादी. 'हा प्रदेश' म्हणजे शत्रूच्या सैन्याचा हा प्रदेश. 'एवढ्यानेच' म्हणजे केवळ पाहण्यानेच; त्याच्या पाहण्याच्या पद्धतीवरूनच. शंभर किंवा हजार सैनिकांचे सैन्य दोन भागात विभागले जाते, नदीच्या काठाप्रमाणे चिरडले जाऊन, पायदळ बनून, दोन भाग होऊन पळून जाते. 'कानांनी प्रहार करून' म्हणजे आधीच बाणांच्या येण्याचा आवाज ओळखून, वेग अनावर होणार नाही अशा प्रकारे कान वर करून, त्यांच्याद्वारे प्रहार करून पाडणे. 'प्रतिहत्ती, प्रतिघोडा' इत्यादींमध्ये प्रत्येक शब्दाला 'प्रति' हा शब्द जोडला पाहिजे. 'दीर्घ असियष्टीने' म्हणजे लांब व लवचिक तलवाररूपी काठीने. กรเณติ กมฺมกรเณ. มญฺญติ หตฺถาโรโห. อยมุคฺครนฺติ ตาทิเส กาเล คหิตมุคฺครํ. โอโลเกตฺวาติ ญาณจกฺขุนา ทิสฺวา, อภิณฺหํ สมฺปชญฺญํ อุปฏฺฐเปตฺวาติ อตฺโถ. 'करणे' म्हणजे कर्म करण्यात. हत्तीवर स्वार असलेला विचार करतो. 'हा मुद्गल' (गदा) म्हणजे अशा वेळी हातात घेतलेली गदा. 'पाहून' म्हणजे ज्ञानचक्षूने पाहून, सतत संप्रजन्य (जागरूकता) प्रस्थापित करून असा अर्थ आहे. ๑๐๙. สสกฺกนฺติ ปสฺสิตุํ ยุตฺตํ กตฺวา อุสฺสาหํ ชเนตฺวา น กรณียํ, ตาทิสํ นิยมโต อกตฺตพฺพํ โหตีติ อาห ‘‘เอกํเสเนว น กาตพฺพ’’นฺติ. ปฏิสํหเรยฺยาสีติ กรณโต สงฺโกจํ อาปชฺเชยฺยาสิ. ยถาภูโต อสนฺโต นิวตฺโต อกโรนฺโต นาม โหตีติ อาห ‘‘นิวตฺเตยฺยาสิ มา กเรยฺยาสี’’ติ. อนุปเทยฺยาสีติ อนุพลปฺปทายี ภเวยฺยาสิ. เตนาห ‘‘อุปตฺถมฺเภยฺยาสี’’ติ. ตํ ปน อนุพลปฺปทานํ อุปตฺถมฺภนํ ปุนปฺปุนํ กรณเมวาติ อาห ‘‘ปุนปฺปุนํ กเรยฺยาสี’’ติ[Pg.61]. สิกฺขมาโนติ ตํเยว อธิสีลสิกฺขํ ตนฺนิสฺสยญฺจ สิกฺขาทฺวยํ สิกฺขนฺโต สมฺปาเทนฺโต. १०९. 'ससक्कं' (सशक्य/प्रयत्नपूर्वक) म्हणजे पाहण्यास योग्य करून, उत्साह निर्माण करून जे करू नये, तसे निश्चितपणे अकरणीय असते, म्हणून 'निश्चितपणे करू नये' (एकंसेनेव न कातब्बं) असे म्हटले आहे. 'पटिसंहरेय्यासि' (मागे घ्यावे) म्हणजे ते करण्यापासून स्वतःला मागे घ्यावे (संकोच करावा). जसे आहे तसे नसताना, निवृत्त झालेला, न करणारा असा होतो, म्हणून 'निवृत्त व्हावे, करू नये' असे म्हटले आहे. 'अनुपदेय्यासि' म्हणजे पाठबळ देणारा व्हावे. म्हणूनच 'उपस्तंभन करावे' (मदत करावी) असे म्हटले आहे. ते पाठबळ देणे किंवा उपस्तंभन करणे म्हणजे वारंवार करणेच होय, म्हणून 'वारंवार करावे' असे म्हटले आहे. 'सिक्खमानो' (शिकावे/अभ्यास करावा) म्हणजे त्या अधिशील-शिक्षेचा आणि त्यावर आधारित दोन शिक्षांचा अभ्यास करून त्या पूर्ण करणे होय. ๑๑๑. กิตฺตเก ปน ฐาเนติ กิตฺตเก ฐาเน ปวตฺตานิ. อวิทูเร เอว ปวตฺตานีติ ทสฺเสนฺโต ‘‘เอกสฺมึ ปุเรภตฺเตเยว โสเธตพฺพานี’’ติ อาห. เอวญฺหิ ตานิ สุโสธิตานิ โหนฺติ สุปริสุทฺธานิ. ปเรสํ อปฺปิยํ ครุํ คารยฺหํ, ยถาวุตฺตฏฺฐานโต ปน อญฺญํ วา กมฺมฏฺฐานมนสิกาเรเนว กายกมฺมาทีนิ ปริโสธิตานิ โหนฺตีติ น คหิตํ. ปฏิฆํ วาติ เอตฺถ วา-สทฺเทน อสมเปกฺขเณ โมหสฺส สงฺคโห ทฏฺฐพฺโพ. १११. 'किती ठिकाणी?' म्हणजे किती ठिकाणी घडलेले. ते जवळच घडलेले आहे हे दर्शवण्यासाठी 'एकाच भोजनपूर्व काळात (पूर्वाह्नात) ते शुद्ध केले पाहिजेत' असे म्हटले आहे. कारण अशा प्रकारे ते सुशोधित आणि अत्यंत शुद्ध होतात. इतरांना अप्रिय, जड आणि निंदनीय असणारे, परंतु पूर्वोक्त स्थानापेक्षा वेगळे, केवळ कम्मट्ठान-मनसिकारानेच (कर्मस्थान-मनस्कारानेच) कायकर्म इत्यादी शुद्ध होतात, म्हणून ते घेतले नाही. 'प्रतिघ (द्वेष) किंवा...' यामध्ये 'किंवा' (वा) या शब्दाने विचार न करण्यातील मोहाचा समावेश समजला पाहिजे. ๑๑๒. วุตฺตนเยน กายกมฺมาทิปริโสธนํ นาม อิเธว, น อิโต พหิทฺธาติ อาห ‘‘พุทฺธา…เป… สาวกา วา’’ติ. เต หิ อตฺถโต สมณพฺราหฺมณา วาติ. ตสฺมาติ ยสฺมา สพฺพพุทฺธปจฺเจกพุทฺธสาวเกหิ อารุฬฺหมคฺโค, ราหุล, มยา ตุยฺหํ อาจิกฺขิโต, ตสฺมา. เตน อนุสิกฺขนฺเตน ตยา เอวํ สิกฺขิตพฺพนฺติ โอวาทํ อทาสิ. เสสํ วุตฺตนยตฺตา สุวิญฺเญยฺยเมว. ११२. सांगितलेल्या पद्धतीने कायकर्म इत्यादींची शुद्धी केवळ येथेच होते, याबाहेर नाही, म्हणून 'बुद्ध... पे... किंवा श्रावक' असे म्हटले आहे. कारण तेच अर्थाने खरे श्रमण-ब्राह्मण आहेत. 'त्यामुळे' म्हणजे: हे राहुला, ज्याअर्थी सर्व बुद्ध, प्रत्येकबुद्ध आणि श्रावकांनी आचरलेला मार्ग मी तुला दाखवला आहे, त्याअर्थी. 'त्याचे अनुकरण करणाऱ्या तू अशा प्रकारे शिकले पाहिजे' असा उपदेश त्यांनी दिला. उर्वरित भाग पूर्वोक्त पद्धतीचा असल्यामुळे सहज समजण्यासारखाच आहे. อมฺพลฏฺฐิกราหุโลวาทสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา अंबलट्ठिक-राहुलोवाद सुत्त-वर्णनेच्या लीनार्थप्रकाशिनी (गूढार्थ स्पष्टीकरण) สมตฺตา. समाप्त. ๒. มหาราหุโลวาทสุตฺตวณฺณนา २. महाराजहुलोवाद सुत्त-वर्णना (महाराहुलोवाद सुत्ताची अट्ठकथा) ๑๑๓. อิริยาปถานุพนฺธเนนาติ อิริยาปถคมนานุพนฺธเนน, น ปฏิปตฺติคมนานุพนฺธเนน. อญฺญเมว หิ พุทฺธานํ ปฏิปตฺติคมนํ อญฺญํ สาวกานํ. วิลาสิตคมเนนาติ – ‘‘ทูเร ปาทํ น อุทฺธรติ, น อจฺจาสนฺเน ปาทํ นิกฺขิปติ, นาติสีฆํ คจฺฉติ นาติสณิก’’นฺติอาทินา (สํ. นิ. อฏฺฐ. ๓.๔.๒๔๓; อุทา. อฏฺฐ. ๗๖; สารตฺถ. ฏี. มหาวคฺค ๓.๒๘๕) วุตฺเตน สภาวสีเลน พุทฺธานํ จาตุริยคมเนน. ตเทว หิ สนฺธาย ‘‘ปเท ปทํ นิกฺขิปนฺโต’’ติ วุตฺตํ. ปทานุปทิโกติ ราหุลตฺเถรสฺสปิ ลกฺขณปาริปูริยา ตาทิสเมว คมนนฺติ ยตฺตกํ ปเทสํ อนฺตรํ อทตฺวา ภควโต ปิฏฺฐิโต คนฺตุํ อารทฺโธ, สพฺพตฺถ ตเมว คมนปทานุปทํ คจฺฉตีติ ปทานุปทิโก. ११३. "इरियापथानुबंधननेन" (इरियापथाच्या अनुसरणाने) म्हणजे शारीरिक हालचालींच्या (इरियापथ) गमनाचे अनुसरण करणे, प्रतिपत्तीच्या (साधनेच्या) गमनाचे अनुसरण करणे नव्हे. कारण बुद्धांचे प्रतिपत्तीगमन वेगळे असते आणि श्रावकांचे वेगळे असते. "विलासितगमनेन" (मनोहर चालण्याने) म्हणजे— "पाऊल फार लांब उचलत नाहीत, फार जवळ ठेवत नाहीत, फार वेगाने चालत नाहीत, फार हळू चालत नाहीत" इत्यादी प्रकारे (सं. नि. अट्ठ. ३.४.२४३; उदा. अट्ठ. ७६; सारत्थ. टी. महावग्ग ३.२८५) म्हटल्याप्रमाणे बुद्धांच्या स्वाभाविक आणि चतुर चालण्याने होय. त्यालाच उद्देशून "पावलावर पाऊल ठेवत" (पदे पदं निक्खिपंतो) असे म्हटले आहे. "पदानुपदिको" (पावलावर पाऊल ठेवून चालणारा) म्हणजे राहुल थेरांच्या बाबतीतही लक्षणांच्या परिपूर्णतेमुळे तशीच चाल होती; त्यांनी भगवंतांच्या मागे चालताना थोडेही अंतर न ठेवता चालण्यास सुरुवात केली आणि सर्व ठिकाणी त्यांच्या पावलावर पाऊल ठेवूनच ते चालत राहिले, म्हणून त्यांना "पदानुपदिक" म्हटले आहे। วณฺณนาภูมิ [Pg.62] จายํ ตตฺถ ภควนฺตํ เถรญฺจ อเนกรูปาหิ อุปมาหิ วณฺเณนฺโต ‘‘ตตฺถ ภควา’’ติอาทิมาห. นิกฺขนฺตคชโปตโก วิย วิโรจิตฺถาติ ปทํ อาเนตฺวา โยชนา. เอวํ ตํ เกสรสีโห วิยาติอาทีสุปิ อาเนตฺวา โยเชตพฺพํ. ตารกราชา นาม จนฺโท. ทฺวินฺนํ จนฺทมณฺฑลานนฺติอาทิ ปริกปฺปวจนํ, พุทฺธาเวณิกสนฺตกํ วิย พุทฺธานํ อากปฺปโสภา อโหสิ, อโห สิรีสมฺปตฺตีติ โยชนา. आणि ही स्तुतीची भूमी (वर्णनभूमी) आहे, जिथे भगवंत आणि थेर यांचे अनेक प्रकारच्या उपमांनी वर्णन करताना "तेथे भगवंत" इत्यादी म्हटले आहे. "बाहेर पडलेल्या हत्तीच्या पिल्लाप्रमाणे शोभून दिसले" (निक्खंतगजपोतको विय विरोचित्थ) हे पद आणून संबंध जोडला पाहिजे. याचप्रमाणे "केसरसिंहाप्रमाणे" (केसरसीहो विय) इत्यादींमध्येही पद आणून संबंध जोडला पाहिजे. "तारकराज" म्हणजे चंद्र होय. "दोन चंद्रमंडळांचे" इत्यादी काल्पनिक वचन (परिकल्पवचन) आहे. बुद्धांचे शारीरिक सौंदर्य हे बुद्धांच्याच असाधारण गुणांसारखे (बुद्धावेणिक) होते, "अहाहा! काय ही श्रीसंपत्ती (वैभव)!" असा संबंध जोडला पाहिजे। อาทิยมานาติ คณฺหนฺติ. ‘‘ปจฺฉา ชานิสฺสามา’’ติ น อชฺชุเปกฺขิตพฺโพ. อิทํ น กตฺตพฺพนฺติ วุตฺเตติ อิทํ ปาณอติปาตนํ น กตฺตพฺพนฺติ วุตฺเต อิทํ ทณฺเฑน วา เลฑฺฑุนา วา วิเหฐนํ น กตฺตพฺพํ, อิทํ ปาณินา ทณฺฑกทานญฺจ อนฺตมโส กุชฺฌิตฺวา โอโลกนมตฺตมฺปิ น กตฺตพฺพเมวาติ นยสเตนปิ นยสหสฺเสนปิ ปฏิวิชฺฌติ, ตถา อิธ ตาว สมฺมชฺชนํ กตฺตพฺพนฺติ วุตฺเตปิ ตตฺถ ปริภณฺฑกรณํ วิหารงฺคณสมฺมชฺชนํ กจวรฉฑฺฑนํ วาลิกาสมกิรณนฺติ เอวมาทินา นยสเตน นยสหสฺเสน ปฏิวิชฺฌติ. เตนาห – ‘‘อิทํ กตฺตพฺพนฺติ วุตฺเตปิ เอเสว นโย’’ติ. ปริภาสนฺติ ตชฺชนํ. ลภามีติ ปจฺจาสีสติ. "आदियमाना" म्हणजे ग्रहण करतात (स्वीकारतात). "नंतर जाणून घेऊ" असे म्हणून दुर्लक्ष करू नये. "हे करू नये" असे म्हटले असता, म्हणजे "हा प्राणातिपात (जीवहिंसा) करू नये" असे म्हटले असता, "काठीने किंवा ढेकळाने पीडा देऊ नये, हाताने किंवा काठीने प्रहार करू नये आणि अगदी रागाने पाहणेसुद्धा करू नये" अशा प्रकारे शेकडो आणि हजारो मार्गांनी तो समजून घेतो. तसेच, "येथे झाडलोट करावी" असे म्हटले असता, "तेथे सारवणे (परिभंडकरण), विहाराच्या अंगणाची झाडलोट करणे, कचरा टाकणे, वाळू पसरवणे" इत्यादी शेकडो आणि हजारो मार्गांनी तो समजून घेतो. म्हणूनच म्हटले आहे— "हे करावे असे म्हटले तरी हाच नियम लागू होतो." "परिभास" म्हणजे ताकीद देणे (धमकावणे). "मिळवतो" म्हणजे आशा करतो (अपेक्षा करतो)। สพฺพเมตนฺติ สพฺพํ เอตํ มยิ ลพฺภมานํ สิกฺขากามตํ. อภิญฺญายาติ ชานิตฺวา. สหาโยติ รฏฺฐปาลตฺเถรํ สนฺธายาห. โส หิ ภควตา สทฺธาปพฺพชิตภาเว เอตทคฺเค ฐปิโต. ธมฺมารกฺโขติ สตฺถุ สทฺธมฺมรตนานุปาลโก ธมฺมภณฺฑาคาริโก. เปตฺติโยติ จูฬปิตา. สพฺพํ เม ชินสาสนนฺติ สพฺพมฺปิ พุทฺธสาสนํ มยฺหเมว. "सब्बमेतं" (हे सर्व) म्हणजे माझ्यात आढळणारी ही सर्व शिक्षणाची आवड (सिक्खाकामता). "अभिञ्ञाय" म्हणजे जाणून घेऊन. "सहाया" (मित्र/सहकारी) हे राष्ट्रपाल थेरांना उद्देशून म्हटले आहे. कारण भगवंतांनी त्यांना श्रद्धेने प्रव्रजित झालेल्यांमध्ये अग्रस्थानी (एतदग्ग) प्रस्थापित केले होते. "धम्मारक्खो" (धम्मरक्षक) म्हणजे शास्त्यांच्या सद्धम्मरूपी रत्नाचे रक्षण करणारे धम्मभांडारिक (धम्मभांडागारिक). "पेत्तियो" म्हणजे चुलता (वडिलांचे लहान भाऊ). "सब्बं मे जिनसासनं" (सर्व जिनशासन माझेच आहे) म्हणजे संपूर्ण बुद्धशासन माझेच आहे। ฉนฺทราคํ ญตฺวาติ ฉนฺทราคํ มม จิตฺเต อุปฺปนฺนํ ญตฺวา. อญฺญตรสฺมึ รุกฺขมูเลติ วิหารปริยนฺเต อญฺญตรสฺมึ รุกฺขมูลฏฺฐาเน อนุจฺฉวิเก. "छंदरागं ञत्वा" (छंदराग जाणून) म्हणजे माझ्या चित्तात उत्पन्न झालेला छंदराग (इच्छा व आसक्ती) जाणून घेऊन. "अञ्ञतरस्मिं रुक्खमूले" (एका झाडाच्या मुळाशी) म्हणजे विहाराच्या सीमेवरील एका योग्य अशा झाडाच्या मुळाशी असलेल्या ठिकाणी। ตทาติ อคฺคสาวเกหิ ปสาทาปนกาเล. อญฺญกมฺมฏฺฐานานิ จงฺกมนอิริยาปเถปิ ปิฏฺฐิปสารณกาเลปิ สมิชฺฌนฺติ, น เอวมิทนฺติ อาห – ‘‘อิทมสฺส เอติสฺสา นิสชฺชาย กมฺมฏฺฐานํ อนุจฺฉวิก’’นฺติ. อานาปานสฺสตินฺติ อานาปานสฺสติกมฺมฏฺฐานํ. "तदा" (तेव्हा) म्हणजे अग्रश्रावकांद्वारे प्रसन्न (संतुष्ट) करण्याच्या वेळी. इतर कर्मस्थान (ध्यानविषय) चंक्रमण करण्याच्या इरियापथात किंवा पाठ ताणण्याच्या वेळीही यशस्वी होतात, पण हे तसे नाही; म्हणून म्हटले आहे— "हे कर्मस्थान त्याच्या या बसण्याच्या आसनासाठी योग्य आहे." "आनापानस्सति" म्हणजे आनापानस्मृती कर्मस्थान (श्वासावर लक्ष केंद्रित करण्याचे ध्यान)। สมสีสี โหตีติ สเจ สมสีสี หุตฺวา น ปรินิพฺพายติ. ปจฺเจกโพธึ สจฺฉิกโรติ โน เจ ปจฺเจกโพธึ สจฺฉิกโรติ. ขิปฺปาภิญฺโญติ ขิปฺปํ ลหุํเยว ปตฺตพฺพฉฬภิญฺโญ. "समसीसी होती" (समशीर्षी होतो) म्हणजे जर तो समशीर्षी होऊन परिनिर्वाण पावत नसेल. "पच्चेकबोधं सच्छिकरोति" (प्रत्येकबोधीचा साक्षात्कार करतो), जर तो प्रत्येकबोधीचा साक्षात्कार करत नसेल. "खिप्पाभिञ्ञो" (शीघ्र अभिज्ञा प्राप्त करणारा) म्हणजे जो लवकर आणि सहजपणे सहा अभिज्ञा (षडभिज्ञा) प्राप्त करू शकतो। ปริปุณฺณาติ [Pg.63] โสฬสสุ อากาเรสุ กสฺสจิปิ อตาปเนน สพฺพโส ปุณฺณา. สุภาวิตาติ สมถภาวนาย วิปสฺสนาภาวนาย จ อนุปุพฺพสมฺปาทเนน สุภาวิตา. คณนาวิธานานุปุพฺพิยา อาเสวิตตฺตา อนุปุพฺพํ ปริจิตา. "परिपुण्णा" (परिपूर्ण) म्हणजे सोळा प्रकारांपैकी कशाचीही उणीव न राहता सर्व प्रकारे पूर्ण. "सुभाविता" (सुभावित/चांगल्या प्रकारे प्रगत केलेली) म्हणजे शमथभावना आणि विपश्यनाभावना यांच्या अनुक्रमे संपादनाने चांगल्या प्रकारे प्रगत केलेली. मोजण्याच्या (गणना) पद्धतीच्या अनुक्रमाने वारंवार सराव केल्यामुळे क्रमाने परिचित झालेली। โอมานํ วาติ อวชานนํ อุญฺญาตนฺติ เอวํวิธํ มานํ วา. อติมานํ วาติ ‘‘กึ อิเมหิ, มเมว อานุภาเวน ชีวิสฺสามี’’ติ เอวํ อติมานํ วา กุโต ชเนสฺสตีติ. "ओमानं वा" (हीनमान किंवा न्यूनगंड) म्हणजे स्वतःला कमी लेखणे किंवा अशा प्रकारचा मान (अभिमान). "अतिमानं वा" (अतिमान किंवा अहंकार) म्हणजे "यांच्याशी काय देणेघेणे, मी माझ्याच प्रभावाने जगणार" अशा प्रकारचा अतिमान तो कसा बरं उत्पन्न करेल? ๑๑๔. วิสงฺขริตฺวาติ วิสํยุตฺเต กตฺวา, ยถา สงฺคากาเรน คหณํ น คจฺฉติ, เอวํ วินิภุญฺชิตฺวาติ อตฺโถ. มหาภูตานิ ตาว วิตฺถาเรตุ, สมฺมสนูปคตฺตา, อสมฺมสนูปคํ อากาสธาตุํ อถ กสฺมา วิตฺถาเรสีติ อาห ‘‘อุปาทารูปทสฺสนตฺถ’’นฺติ. อาโปธาตุ สุขุมรูปํ. อิตราสุ โอฬาริกสุขุมตาปิ ลพฺภตีติ อาห ‘‘อุปาทารูปทสฺสนตฺถ’’นฺติ. เหฏฺฐา จตฺตาริ มหาภูตาเนว กถิตานิ, น อุปาทารูปนฺติ ตสฺส ปเนตฺถ ลกฺขณหารนเยน อากาสทสฺสเนน ทสฺสิตตา เวทิตพฺพา. เตนาห ‘‘อิมินา มุเขน ตํ ทสฺเสตุ’’นฺติ. น เกวลํ อุปาทารูปคฺคหณทสฺสนตฺถเมว อากาสธาตุ วิตฺถาริตา, อถ โข ปริคฺคหสุขตายปีติ ทสฺเสนฺโต ‘‘อปิจา’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ปริจฺฉินฺทิตพฺพสฺส รูปสฺส นิรวเสสปริยาทานตฺถํ ‘‘อชฺฌตฺติเกนา’’ติ วิเสสนมาห. อากาเสนาติ อากาสธาตุยา คหิตาย. ปริจฺฉินฺนรูปนฺติ ตาย ปริจฺฉินฺทิตกลาปคตมฺปิ ปากฏํ โหติ วิภูตํ หุตฺวา อุปฏฺฐาติ. ११४. "विसंखरित्वा" (विसंस्कारित करून) म्हणजे विलग करून, जेणेकरून ते समूहाच्या रूपाने ग्रहण केले जाणार नाही; अशा प्रकारे 'विभक्त करून' (विनिभुंजित्वा) असा याचा अर्थ आहे. महाभूतांचे तर सविस्तर वर्णन करावे कारण ते संमर्शनयोग्य (परीक्षणयोग्य) आहेत, परंतु जे संमर्शनयोग्य नाही अशा आकाशधातूचे सविस्तर वर्णन कशासाठी केले? यावर ते म्हणतात— "उपादारूपाचे दर्शन घडवण्यासाठी" (उपादारूपदस्सनत्थं). आपधातू (जलतत्त्व) हे सूक्ष्म रूप आहे. इतरांमध्ये स्थूलत्व आणि सूक्ष्मत्व दोन्ही आढळतात, म्हणून म्हटले आहे— "उपादारूपाचे दर्शन घडवण्यासाठी". खाली केवळ चार महाभूतांचेच वर्णन केले आहे, उपादारूपाचे नाही; परंतु येथे लक्षणहार पद्धतीने (लक्खणहारनय) आकाशाच्या दर्शनाद्वारे त्याचे दर्शन घडवले आहे, असे समजावे. म्हणूनच म्हटले आहे— "या मार्गाने ते दर्शवण्यासाठी". केवळ उपादारूपाचे ग्रहण दर्शवण्यासाठीच आकाशधातूचे सविस्तर वर्णन केलेले नाही, तर ग्रहणाच्या सुलभतेसाठीही केले आहे, हे दर्शवताना "शिवाय" (अपि च) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे परिच्छिन्न (मर्यादित) करावयाच्या रूपाच्या संपूर्ण आकलनासाठी "अध्यात्मिक" (अज्झत्तिकेन) हे विशेषण वापरले आहे. "आकाशेन" म्हणजे आकाशधातू ग्रहण केल्याने. "परिच्छिन्नरूप" म्हणजे तिच्याद्वारे मर्यादित केलेल्या कलापांमध्ये (समूहांमध्ये) गेलेले रूपही स्पष्ट होते आणि प्रकट होऊन समोर येते। อิทานิ วุตฺตเมวตฺถํ สุขคฺคหณตฺถํ คาถาย ทสฺเสติ. ตสฺสาติ อุปาทายรูปสฺส. เอวํ อาวิภาวตฺถนฺติ เอวํ ปริจฺฉินฺนตาย อากาสสฺส วเสน วิภูตภาวตฺถํ. ตนฺติ อากาสธาตุํ. आता हाच सांगितलेला अर्थ सहज समजण्यासाठी गाथेद्वारे दर्शवतात. "तस्स" (त्याचे) म्हणजे उपादाय रूपाचे (उपादारूपाचे). "एवं आविभावत्थं" (अशा प्रकारे प्रकट करण्यासाठी) म्हणजे अशा प्रकारे मर्यादित केलेल्या आकाशाच्या माध्यमातून स्पष्ट होण्यासाठी. "तं" म्हणजे आकाशधातूला। ๑๑๘. อากาสภาวํ คตนฺติ จตูหิ มหาภูเตหิ อสมฺผุฏฺฐานํ เตสํ ปริจฺเฉทกภาเวน อากาสนฺติ คเหตพฺพตํ คตํ, อากาสเมว วา อากาสคตํ ยถา ‘‘ทิฏฺฐิคตํ (ธ. ส. ๓๘๑; มหานิ. ๑๒), อตฺถงฺคต’’นฺติ (อ. นิ. อฏฺฐ. ๑.๑.๑๓๐) จ. อาทินฺนนฺติ อิมนฺติ ตณฺหาทิฏฺฐีหิ อาทินฺนํ. เตนาห ‘‘คหิตํ ปรามฏฺฐ’’นฺติ. อญฺญตฺถ กมฺมชํ ‘‘อุปาทินฺน’’นฺติ วุจฺจติ, น ตถา อิธาติ อาห ‘‘สรีรฏฺฐกนฺติ อตฺโถ’’ติ. ปถวีธาตุอาทีสุ [Pg.64] วุตฺตนเยเนวาติ มหาหตฺถิปโทปเม (ม. นิ. ๑.๓๐๐ อาทโย) วุตฺตนยทสฺสนํ สนฺธาย วทติ. ११८. "आकाशभावं गतं" (आकाशभावाला प्राप्त झालेले) म्हणजे चार महाभूतांनी स्पर्श न केलेले, त्यांच्या मर्यादा ठरवण्याच्या स्वरूपात 'आकाश' म्हणून ग्रहण करण्यायोग्य झालेले; किंवा 'आकाशगत' म्हणजे आकाशच, जसे "दिट्ठिगतं" (दृष्टिगत) आणि "अत्थंगतं" (अस्तंगत) यामध्ये आहे. "आदिन्नं" (ग्रहण केलेले) म्हणजे तृष्णा आणि दृष्टी (तण्हा-दिट्ठि) यांनी ग्रहण केलेले. म्हणूनच म्हटले आहे— "गृहीत, परास्पर्श केलेले" (गहितं परामट्ठं). इतर ठिकाणी कर्मज (कर्मापासून उत्पन्न झालेल्या) गोष्टीला "उपादिन्न" म्हटले जाते, परंतु येथे तसे नाही; म्हणून म्हटले आहे— "शरीराशी संबंधित (शरीरस्थ) असा अर्थ आहे." "पठवीधातु आदींमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच" हे महाहत्थिपदोपम सुत्तात (म. नि. १.३०० इ.) सांगितलेल्या पद्धतीचा संदर्भ देऊन म्हटले आहे। ๑๑๙. ตาทิภาโว นาม นิฏฺฐิตกิจฺจสฺส โหติ, อยญฺจ วิปสฺสนํ อนุยุญฺชติ, อถ กิมตฺถํ ตาทิภาวตา วุตฺตาติ? ปถวีสมตาทิลกฺขณาจิกฺขณาหิ วิปสฺสนาย สุขปฺปวตฺติอตฺถํ. เตนาห ‘‘อิฏฺฐานิฏฺเฐสู’’ติอาทิ. คเหตฺวาติ กุสลปฺปวตฺติยา โอกาสทานวเสน ปริคฺคเหตฺวา. น ปติฏฺฐิโตติ น นิสฺสิโต น ลคฺโค. ११९. तादिभाव (तथाभाव) हा कृतकृत्य (ज्याचे कर्तव्य पूर्ण झाले आहे अशा) व्यक्तीचा असतो, आणि हा (साधक) विपश्यनेचा अभ्यास करत आहे, तर मग येथे तादिभाव कशासाठी सांगितला आहे? पृथ्वीसमता इत्यादी लक्षणांच्या निर्देशाने विपश्यनेची सुखद प्रवृत्ती व्हावी म्हणून (तो सांगितला आहे). म्हणूनच “इष्ट आणि अनिष्ट गोष्टींमध्ये” इत्यादी म्हटले आहे. ‘गहेत्वा’ (ग्रहण करून) म्हणजे कुशल प्रवृत्तीला वाव देण्याच्या हेतूने स्वीकार करून. ‘न पतिट्ठितो’ (प्रतिष्ठित न झालेला) म्हणजे आश्रित न झालेला, आसक्त न झालेला। ๑๒๐. พฺรหฺมวิหารภาวนา อสุภภาวนา อานาปานสฺสติภาวนา จ อุปจารํ วา อปฺปนํ วา ปาเปนฺโต วิปสฺสนาย ปาทกภาวาย อนิจฺจาทิสญฺญาย วิปสฺสนาภาเวน อุสฺสกฺกิตฺวา มคฺคปฏิปาฏิยา อรหตฺตาธิคมาย โหตีติ ‘‘เมตฺตาทิภาวนาย ปน โหตี’’ติ วุตฺตํ. ยตฺถ กตฺถจิ สตฺเตสุ สงฺขาเรสุ จ ปฏิหญฺญนกิเลโสติ อาฆาตภาวเมว วทติ ญายภาวโต อญฺเญสมฺปิ. อสฺมิมาโนติ รูปาทิเก ปจฺเจกํ เอกชฺฌํ คเหตฺวา ‘‘อยมหมสฺมี’’ติ เอวํ ปวตฺตมาโน. १२०. ब्रह्मविहारभावना, अशुभभावना आणि आनापानस्मृतिभावना ही उपचार किंवा अप्पणा (अर्पणा समाधी) प्रत पोहोचवून, विपश्यनेचा पाया बनण्यासाठी, अनित्यता इत्यादी संज्ञेच्या द्वारे विपश्यना भावनेने प्रगती करून, मार्ग-परंपरेने अर्हतपद प्राप्त करून देणारी ठरते, म्हणून “मैत्री इत्यादी भावनेने होते” असे म्हटले आहे. “कोणत्याही प्राण्यांवर आणि संस्कारांवर आघात करणारा क्लेश” म्हणजे न्यायाने (नियमाने) इतरांच्या बाबतीतही आघातभाव (द्वेषभाव) च सांगतो. ‘अस्मिमान’ (अहंकार) म्हणजे रूप इत्यादींना स्वतंत्रपणे किंवा एकत्रितपणे ग्रहण करून “हा मी आहे” अशा प्रकारे प्रवृत्त होणारा (मान) होय। ๑๒๑. อิทํ กมฺมฏฺฐานนฺติ เอตฺถ คณนาทิวเสน อาเสวิยมานา อสฺสาสปสฺสาสา โยคกมฺมสฺส ปติฏฺฐานตาย กมฺมฏฺฐานํ. ตตฺถ ปน ตถาปวตฺโต มนสิกาโร ภาวนา. เอตฺถ จ ตสฺเสว เถรสฺส ภควตา พหูนํ กมฺมฏฺฐานานํ เทสิตตฺตา จริตํ อนาทิยิตฺวา กมฺมฏฺฐานานิ สพฺเพสํ ปุคฺคลานํ สปฺปายานีติ อยมตฺโถ สิทฺโธ, อติสปฺปายวเสน ปน กมฺมฏฺฐาเนสุ วิภาคกถา กถิตาติ เวทิตพฺพา. १२१. “हे कर्मस्थान” यामध्ये गणना इत्यादी पद्धतीने अभ्यासले जाणारे श्वास-प्रश्वास हे योगकर्माचे अधिष्ठान असल्यामुळे ‘कर्मस्थान’ आहे. आणि तेथे त्या प्रकारे प्रवृत्त झालेला मनसिकार म्हणजे ‘भावना’ होय. आणि येथे, भगवान बुद्धांनी त्या थेरांना अनेक कर्मस्थानांचा उपदेश केल्यामुळे, (व्यक्तीच्या) चरित्राचा विचार न करता कर्मस्थाने सर्व व्यक्तींसाठी अनुकूल असतात, हा अर्थ सिद्ध होतो; परंतु अत्यंत अनुकूलतेच्या दृष्टीने कर्मस्थानांचे वर्गीकरण सांगितले आहे, असे समजावे। มหาราหุโลวาทสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. महारहुलोवादसुत्त-वर्णनेची लीनत्थप्पकासना समाप्त झाली। ๓. จูฬมาลุกฺยสุตฺตวณฺณนา ३. चूळमालुक्यसुत्त-वर्णना ๑๒๒. เอวํ ฐปิตานีติ ‘‘สสฺสโต โลโก’’ติอาทินยปฺปวตฺตานิ ทิฏฺฐิคตานิ อนิยฺยานิกตาย น พฺยากาตพฺพานิ น กเถตพฺพานิ, เอวํ ฐปนียปกฺเข ฐปิตานิ เจว นิยฺยานิกสาสเน ฉฑฺฑนียตาย ปฏิกฺขิตฺตานิ จ, อปิเจตฺถ อตฺถโต ปฏิกฺเขโป เอว พฺยากาตพฺพโต. ยถา เอโก [Pg.65] กมฺมกิเลสวเสน อิตฺถตฺตํ อาคโต, ตถา อปโรปิ อปโรปีติ สตฺโต ตถาคโต วุจฺจตีติ อาห – ‘‘ตถาคโตติ สตฺโต’’ติ. ตํ อพฺยากรณํ มยฺหํ น รุจฺจตีติ ยทิ สสฺสโต โลโก, สสฺสโต โลโกติ, อสสฺสโต โลโก, อสสฺสโต โลโกติ ชานามาติ พฺยากาตพฺพเมว, ยํ ปน อุภยถา อพฺยากรณํ, ตํ เม จิตฺตํ น อาราเธติ อชานนเหตุกตฺตา อพฺยากรณสฺส. เตนาห – ‘‘อชานโต โข ปน อปสฺสโต เอตเทว อุชุกํ, ยทิทํ น ชานามิ น ปสฺสามี’’ติ. สสฺสโตติอาทีสุ สสฺสโตติ สพฺพกาลิโก, นิจฺโจ ธุโว อวิปริณามธมฺโมติ อตฺโถ. โส หิ ทิฏฺฐิคติเกหิ โลกียนฺติ เอตฺถ ปุญฺญปาปตพฺพิปากา, สยํ วา ตพฺพิปากากราทิภาเวน อวิยุตฺเตหิ โลกียตีติ โลโกติ อธิปฺเปโต. เอเตน จตฺตาโรปิ สสฺสตวาทา ทสฺสิตา โหนฺติ. อสสฺสโตติ น สสฺสโต, อนิจฺโจ อทฺธุโว เภทนธมฺโมติ อตฺโถ, อสสฺสโตติ จ สสฺสตภาวปฏิกฺเขเปน อุจฺเฉโท ทีปิโตติ สตฺตปิ อุจฺเฉทวาทา ทสฺสิตา โหนฺติ. อนฺตวาติ ปริวฏุโม ปริจฺฉินฺนปริมาโณ, อสพฺพคโตติ อตฺโถ. เตน ‘‘สรีรปริมาโณ, องฺคุฏฺฐปริมาโณ, ยวปริมาโณ ปรมาณุปริมาโณ อตฺตา’’ติ (อุทา. อฏฺฐ. ๕๔; ที. นิ. ฏี. ๑.๗๖-๗๗) เอวมาทิวาทา ทสฺสิตา โหนฺติ. १२२. “अशा प्रकारे बाजूला ठेवलेले” म्हणजे “लोक शाश्वत आहे” इत्यादी पद्धतीने प्रवृत्त झालेली दृष्टी (मते) ही मोक्ष देणारी नसल्यामुळे करण्याचे स्पष्टीकरण करू नये व ती सांगू नयेत. अशा प्रकारे बाजूला ठेवण्याच्या पक्षात ठेवलेली आणि मोक्ष देणाऱ्या शासनात त्याज्य असल्यामुळे नाकारलेली आहेत. शिवाय, येथे अर्थाच्या दृष्टीने नकार देणे हेच स्पष्टीकरण करण्यासारखे आहे. ज्याप्रमाणे एक प्राणी कर्म आणि क्लेशांच्या प्रभावाने या मनुष्यलोकात येतो, त्याचप्रमाणे दुसरा आणि तिसराही येतो, म्हणून प्राण्याला ‘तथागत’ म्हटले जाते, म्हणूनच म्हटले आहे – “तथागत म्हणजे प्राणी”. “ते अव्याकरण (स्पष्टीकरण न देणे) मला आवडत नाही” म्हणजे जर लोक शाश्वत असेल तर “लोक शाश्वत आहे” असे, आणि जर लोक अशाश्वत असेल तर “लोक अशाश्वत आहे” असे मला माहित आहे, असे स्पष्टीकरण दिलेच पाहिजे. परंतु जे दोन्ही प्रकारे अव्याकृत (अनुत्तरित) ठेवले आहे, ते माझ्या मनाला पटत नाही, कारण अव्याकरणाचे कारण अज्ञान आहे. म्हणूनच म्हटले आहे – “न जाणणाऱ्या आणि न पाहणाऱ्यासाठी हेच सरळ आहे की, मी जाणत नाही, मी पाहत नाही.” ‘शाश्वत’ इत्यादी शब्दांमध्ये ‘शाश्वत’ म्हणजे सर्वकालिक, नित्य, ध्रुव आणि अपरिणामी (बदल न होणारा) असा अर्थ आहे. कारण तो (लोक) चुकीची दृष्टी बाळगणाऱ्यांकडून पाहिला जातो, येथे पुण्य-पाप आणि त्यांचे विपाक, किंवा स्वतः त्यांच्या विपाकाचे कर्ते इत्यादी रूपाने जे अविभक्त आहेत, त्यांच्याद्वारे जो पाहिला जातो तो ‘लोक’ असा अभिप्रेत आहे. याद्वारे चारही शाश्वतवाद दर्शविले गेले आहेत. ‘अशाश्वत’ म्हणजे शाश्वत नसलेला, अनित्य, अध्रुव आणि नाशवंत असा अर्थ आहे. आणि ‘अशाश्वत’ या शब्दाने शाश्वतभावाचा निषेध करून उच्छेद (विनाश) दर्शविला आहे, याद्वारे सातही उच्छेदवाद दर्शविले गेले आहेत. ‘अंतवान’ (मर्यादित) म्हणजे परिमित, मर्यादित परिमाण असलेला, सर्वव्यापी नसलेला असा अर्थ आहे. याद्वारे “आत्मा हा शरीराच्या आकाराचा, अंगठ्याच्या आकाराचा, यवाच्या आकाराचा किंवा परमाणूच्या आकाराचा आहे” इत्यादी वाद दर्शविले गेले आहेत। ตถาคโต ปรํ มรณาติ ตถาคโต ชีโว อตฺตา มรณโต อิมสฺส กายสฺส เภทโต ปรํ อุทฺธํ โหติ อตฺถิ สํวิชฺชตีติ อตฺโถ. เอเตน สสฺสตภาวมุเขน โสฬส สญฺญีวาทา, อฏฺฐ อสญฺญีวาทา, อฏฺฐ จ เนวสญฺญีนาสญฺญีวาทา ทสฺสิตา โหนฺติ. น โหตีติ นตฺถิ น อุปลพฺภติ. เอเตน อุจฺเฉทวาโท ทสฺสิโต โหติ. อปิจ โหติ จ น จ โหตีติ อตฺถิ นตฺถิ จาติ. เอเตน เอกจฺจสสฺสตวาโท ทสฺสิโต. เนว โหติ น น โหตีติ ปน อิมินา อมราวิกฺเขปวาโท ทสฺสิโตติ เวทิตพฺพํ. ภควตา ปน อนิยฺยานิกตฺตา อนตฺถสํหิตานิ อิมานิ ทสฺสนานีติ ตานิ น พฺยากตานิ, ตํ อพฺยากรณํ สนฺธายาห อยํ เถโร ‘‘ตํ เม น รุจฺจตี’’ติ. สิกฺขํ ปฏิกฺขิปิตฺวา ยถาสมาทินฺนสิกฺขํ ปหาย. “मृत्यूनंतर तथागत असतात” म्हणजे तथागत, जीव किंवा आत्मा हा मृत्यूच्या नंतर, या शरीराच्या भेदानंतर (नाशानंतर) पुढे अस्तित्वात असतो, असा अर्थ आहे. याद्वारे शाश्वतभावाच्या रूपाने सोळा संज्ञीवाद, आठ असंज्ञीवाद आणि आठ नैवसंज्ञी-नासंज्ञीवाद दर्शविले गेले आहेत. “नसतात” म्हणजे नसतात, उपलब्ध होत नाहीत. याद्वारे उच्छेदवाद दर्शविला गेला आहे. तसेच, “असतात आणि नसतातही” म्हणजे आहेत आणि नाहीतही. याद्वारे एकच्चशाश्वतवाद (आंशिक शाश्वतवाद) दर्शविला गेला आहे. “नसतात आणि न नसतातही” याद्वारे अमराविक्षेपवाद दर्शविला गेला आहे, असे समजावे. परंतु भगवंतांनी ही मते मोक्ष न देणारी आणि अनर्थकारक असल्यामुळे त्यांचे स्पष्टीकरण केले नाही, त्या अव्याकरणाचा संदर्भ घेऊन या थेरांनी “ते मला आवडत नाही” असे म्हटले आहे. “शिक्षेचा त्याग करून” म्हणजे स्वीकारलेल्या शिक्षेचा (शील-नियमांचा) त्याग करून। ๑๒๕. ตฺวํ [Pg.66] เนว ยาจโกติ อหํ ภนฺเต ภควติ พฺรหฺมจริยํ จริสฺสามีติอาทินา. น ยาจิตโกติ ตฺวํ มาลุกฺยปุตฺต มยิ พฺรหฺมจริยํ จราติอาทินา. १२५. “तू याचक नव्हतास” म्हणजे “भंते, मी भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळीन” इत्यादी प्रकारे (तू याचना केली नव्हतीस). “आणि मी याचना केली नव्हती” म्हणजे “हे मालुक्यपुत्ता, तू माझ्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळ” इत्यादी प्रकारे (मी याचना केली नव्हती). ๑๒๖. ปรเสนาย ฐิเตน ปุริเสน. พหลเลปเนนาติ พหลวิเลปเนน. มหาสุปิยาทิ สพฺโพ มุทุหิทโก เวณุวิเสโส สณฺโห. มรุวาติ มกจิ. ขีรปณฺณิโนติ ขีรปณฺณิยา, ยสฺสา ฉินฺทนมตฺเต ปณฺเณ ขีรํ ปคฺฆรติ. คจฺฉนฺติ คจฺฉโต ชาตํ สยํชาตคุมฺพโต คหิตนฺติ อธิปฺปาโย. สิถิลหนุ นาม ทตฺตา กณฺโณ ปตงฺโค. เอตาย ทิฏฺฐิยา สติ น โหตีติ ‘‘สสฺสโต โลโก’’ติ เอตาย ทิฏฺฐิยา สติ มคฺคพฺรหฺมจริยวาโส น โหติ, ตํ ปหาย เอว ปตฺตพฺพโต. १२६. “शत्रूच्या सैन्यात उभ्या असलेल्या माणसाने.” ‘बहललेपनेन’ म्हणजे दाट लेप लावलेल्या. महासुपिय इत्यादी सर्व मऊ गाठींचे, बांबूचे मऊ प्रकार आहेत. ‘मरुवा’ म्हणजे मकची. ‘खीरपण्णि’ म्हणजे क्षीरपर्णी वनस्पती, जिचे पान तोडल्याबरोबर दूध वाहू लागते. ‘गच्छ’ म्हणजे झुडूप, स्वतः उगवलेल्या झुडुपातून घेतलेले असा अभिप्राय आहे. ‘सिथिलहनु’ म्हणजे सैल जबडा असलेला, दत्तो, कर्ण किंवा पतंग. “ही दृष्टी असताना होत नाही” म्हणजे “लोक शाश्वत आहे” ही दृष्टी असताना मार्ग-ब्रह्मचर्यवास शक्य होत नाही, कारण तिचा त्याग करूनच तो प्राप्त केला जाऊ शकतो। ๑๒๗. อตฺเถว ชาตีติอาทินา เอตา ทิฏฺฐิโย ปจฺเจกมฺปิ สํสารปริพฺรูหนา กฏสิวฑฺฒนา นิพฺพานวิพนฺธนาติ ทสฺเสติ. १२७. “जन्म तर आहेच” इत्यादी वाक्यांद्वारे, या दृष्टी (मते) स्वतंत्रपणे देखील संसाराची वृद्धी करणाऱ्या, स्मशानाची वाढ करणाऱ्या आणि निर्वाणात अडथळा आणणाऱ्या आहेत, असे दर्शविले आहे। ๑๒๘. ตสฺมาติหาติ อิทํ อฏฺฐาเน อุทฺธฏํ, ฐาเนเยว ปน ‘‘วุตฺตปฏิปกฺขนเยน เวทิตพฺพ’’นฺติ อิมสฺส ปรโต กตฺวา สํวณฺเณตพฺพํ. อตฺตโน ผเลน อรณียโต อนุคนฺตพฺพโต การณมฺปิ ‘‘อตฺโถ’’ติ วุจฺจตีติ อาห ‘‘การณนิสฺสิต’’นฺติ. เตนาห ‘‘พฺรหฺมจริยสฺส อาทิมตฺตมฺปี’’ติ. ปุพฺพปทฏฺฐานนฺติ ปฐมารมฺโภ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. १२८. “तस्मातिह” (म्हणूनच) हे अयोग्य ठिकाणी उद्धृत केले आहे, योग्य ठिकाणीच “सांगितलेल्या प्रतिपक्षाच्या नियमाने समजावे” याच्या पुढे ठेवून त्याचे वर्णन केले पाहिजे. स्वतःच्या फलाने प्राप्त करण्यायोग्य आणि अनुसरण्यायोग्य असल्यामुळे कारणाला देखील ‘अर्थ’ म्हटले जाते, म्हणून “कारणावर आश्रित” असे म्हटले आहे. म्हणूनच “ब्रह्मचर्याची सुरुवात देखील” असे म्हटले आहे. ‘पुब्बपदट्ठान’ म्हणजे पहिली सुरुवात (प्रारंभ). उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे। จูฬมาลุกฺยสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. चूळमालुक्यसुत्त-वर्णनेची लीनत्थप्पकासना समाप्त झाली। ๔. มหามาลุกฺยสุตฺตวณฺณนา ४. महामालुक्यसुत्त-वर्णना ๑๒๙. โอรํ วุจฺจติ กามธาตุ, ตตฺถ ปวตฺติยา สํวตฺตนโต โอรํ ภชนฺตีติ โอรมฺภาคิยานิ, เหฏฺฐิมมคฺควชฺฌตาย โอรมฺภาเค เหฏฺฐาโกฏฺฐาเส ภชนฺตีติ โอรมฺภาคิยานิ ก-การสฺส ย-การํ กตฺวา. เตนาห ‘‘เหฏฺฐาโกฏฺฐาสิกานี’’ติอาทิ. กมฺมุนา หิ วฏฺเฏน จ ทุกฺขํ สํโยเชนฺตีติ สํโยชนานิ, โอรมฺภาคิยสญฺญิตานิ สํโยชนานิ ยสฺส อปฺปหีนานิ, ตสฺเสว วฏฺฏทุกฺขํ. ยสฺส ปน ตานิ ปหีนานิ, ตสฺส ตํ นตฺถีติ. อปฺปหีนตาย อนุเสตีติ อริยมคฺเคน อสมุจฺฉินฺนตาย การณลาเภ [Pg.67] สติ อุปฺปชฺชติ, อปฺปหีนภาเวน อนุเสติ. อนุสยมาโน สํโยชนํ นาม โหตีติ อนุสยตฺตํ ผริตฺวา ปวตฺตมาโน ปาปธมฺโม ยถาวุตฺเตนตฺเถน สํโยชนํ นาม โหติ. เอเตน ยทิ ปน อนุสยโต สํโยชนํ ปวตฺตํ, ตถาปิ เย เต กามราคาทโย ‘‘อนุสยา’’ติ วุจฺจนฺติ, เตเยว พนฺธนฏฺเฐน สํโยชนานีติ ทสฺเสติ. १२९. ओरं (खालचा भाग) म्हणजे कामधातू म्हटले जाते. तेथे प्रवृत्तीच्या अस्तित्वामुळे जे खालच्या भागाचे सेवन करतात, त्यांना 'ओरंभागिय' (खालच्या भागाशी संबंधित) म्हणतात. खालच्या मार्गाने नष्ट होण्याजोगे असल्यामुळे, खालच्या भागात किंवा खालच्या कोठ्ठासात (भागात) जे राहतात, त्यांना 'क' काराचा 'य' कार करून 'ओरंभागिय' असे म्हटले जाते. म्हणूनच "हेट्ठाकोट्ठासिकानि" (खालच्या भागाशी संबंधित) इत्यादी म्हटले आहे. कारण जे कर्माने आणि संसारचक्राने (वट्ट) दुःखाशी जोडतात, त्यांना 'संयोजने' म्हणतात. ज्याचे 'ओरंभागिय' संज्ञक (खालच्या भागातील) संयोजने नष्ट झालेली नाहीत, त्यालाच संसारचक्राचे दुःख (वट्टदुःख) प्राप्त होते. परंतु ज्याचे ते नष्ट झाले आहे, त्याला ते दुःख नसते. 'नष्ट न झाल्यामुळे अनुसयन करते' (appahīnatāya anusetīti) म्हणजे आर्यमार्गाने समूळ नष्ट न झाल्यामुळे, कारण प्राप्त झाल्यावर जे उत्पन्न होते, ते नष्ट न झाल्याच्या अवस्थेत सुप्त राहते (अनुसयन करते). 'अनुसयमान असताना संयोजन बनते' (Anusayamāno saṃyojanaṃ nāma hotīti) म्हणजे सुप्त अवस्थेत पसरून प्रवृत्त होणारा पापदम्म (पापधर्म) वर सांगितलेल्या अर्थाने 'संयोजन' या नावाने ओळखला जातो. याद्वारे, जरी अनुसयापासून संयोजन प्रवृत्त झाले असले, तरीही जे कामराग इत्यादी 'अनुसय' म्हटले जातात, तेच बंधनाच्या अर्थाने 'संयोजने' आहेत, असे दर्शविले आहे. เอวํ สนฺเตปีติ ยเทว โอรมฺภาคิยสํโยชนํ ภควตา ปุจฺฉิตํ, ตเทว เถเรนปิ วิสฺสชฺชิตํ, ตถาปิ อยํ ลทฺธิ สนฺนิสฺสยา. ตตฺถ โทสาโรปนาติ ทสฺเสตุํ ‘‘ตสฺส วาเท’’ติอาทิ วุตฺตํ. สมุทาจารกฺขเณเยวาติ ปวตฺติกฺขเณ เอว. น หิ สพฺเพ วตฺตมานา กิเลสา สํโยชนตฺถํ ผรนฺตีติ อธิปฺปาโย. เตนาติ เตน การเณน, ตถาลทฺธิกตฺตาติ อตฺโถ. จินฺเตสิ ‘‘ธมฺมํ เทเสสฺสามี’’ติ โยชนา. อตฺตโน ธมฺมตาเยวาติ อชฺฌตฺตาสเยเนว. วิสํวาทิตาติ สตฺถุ จิตฺตสฺส อนาราธเนน วิเวจิตา. เอวมกาสิ เอวํ ธมฺมํ เทสาเปสิ. "असे असतानाही" (Evaṃ santepī) म्हणजे भगवंतांनी जे ओरंभागिय संयोजन विचारले होते, स्थविरांनी (थेरांनी) देखील त्याचेच उत्तर दिले, तरीही हा सिद्धांत (लद्धि) चुकीच्या समजुतीवर आधारित आहे. त्यात दोषारोप दाखवण्यासाठी "तस्स वादे" (त्याच्या वादात) इत्यादी म्हटले आहे. "समुदाचारक्षणीच" (Samudācārakkhaṇeyeva) म्हणजे प्रवृत्तीच्या क्षणीच. कारण सर्व वर्तमान क्लेश संयोजनाच्या अर्थाने पसरत नाहीत, असा अभिप्राय आहे. "तेन" (त्यामुळे) म्हणजे त्या कारणाने, तसा सिद्धांत असल्यामुळे, असा अर्थ आहे. "विचार केला की 'मी धम्म उपदेश करीन'" (dhammaṃ desessāmī) असा संबंध आहे. "स्वतःच्या धम्मतेनेच" (Attano dhammatāyeva) म्हणजे स्वतःच्या आंतरिक आशयानेच (अध्यात्म आशयानेच). "विसंवादित" (Visaṃvāditā) म्हणजे शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) चित्ताला संतुष्ट न केल्यामुळे वेगळे केलेले. "असे केले" (Evamakāsi) म्हणजे अशा प्रकारे धम्माचा उपदेश करवला. ๑๓๐. สกฺกายทิฏฺฐิปริยุฏฺฐิเตนาติ ปริยุฏฺฐานสมตฺถสกฺกายทิฏฺฐิเกน. ตถาภูตญฺจ จิตฺตํ ตาย ทิฏฺฐิยา วิคยฺหิตํ อชฺโฌตฺถฏญฺจ นาม โหตีติ อาห ‘‘คหิเตน อภิภูเตนา’’ติ. ทิฏฺฐินิสฺสรณํ นาม ทสฺสนมคฺโค เตน สมุจฺฉินฺทิตพฺพโต, โส ปน นิพฺพานํ อาคมฺม ตํ สมุจฺฉินฺทติ, ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘ทิฏฺฐินิสฺสรณํ นิพฺพาน’’นฺติ. อวิโนทิตา อนีหฏาติ ปททฺวเยนปิ สมุจฺเฉทวเสน อปฺปหีนตฺตํเยว วทติ. อญฺญํ สํโยชนํ อญฺโญ อนุสโยติ วทนฺติ, สหภาโว นาม อญฺเญน โหติ. น หิ ตเทว เตน สหาติ วุจฺจตีติ เตสํ อธิปฺปาโย. อญฺเญนาติ อตฺถโต อญฺเญน. อวตฺถามตฺตโต ยทิปิ อวยววินิมุตฺโต สมุทาโย นตฺถิ, อวยโว ปน สมุทาโย น โหตีติ โส สมุทายโต อญฺโญ เอวาติ สกฺกา วตฺตุนฺติ ยถาวุตฺตสฺส ปริหารสฺส อปฺปาฏิหีรกตํ อาสงฺกิตฺวา ปกฺขนฺตรํ อาสลฺลิตํ ‘‘อถาปิ สิยา’’ติอาทินา. ปกฺขนฺตเรหิ ปริหารา โหนฺตีติ ยถาวุตฺตญาเยนปิ อญฺโญ ปุริโส อถาปิ สิยา, อยํ ปเนตฺถ อญฺโญ โทโสติ อาห ‘‘ยทิ ตเทวา’’ติอาทิ. อถาปิ สิยา ตุยฺหํ ยทิ ปริวิตกฺโก อีทิโส ยทิ ตเทว สํโยชนนฺติอาทิ. อิมมตฺถํ สนฺธายาติ ปรมตฺถโต โส เอว [Pg.68] กิเลโส สํโยชนมนุสโย จ, พนฺธนตฺถอปฺปหีนตฺถานํ ปน อตฺเถว เภโทติ อิมมตฺถํ สนฺธาย. १३०. "सक्कायदिट्ठिपरियुट्ठितेन" (सत्कायदृष्टीने वेढलेला) म्हणजे वेढण्यास समर्थ असलेल्या सत्कायदृष्टीने युक्त असलेला. आणि तशा प्रकारच्या दृष्टीने ग्रासलेले आणि दडपलेले चित्त असते, म्हणून "गहितेन अभिभूतेन" (गृहीत धरलेल्या आणि पराभूत झालेल्या) असे म्हटले आहे. "दिट्ठिनिस्सरण" (दृष्टीपासून सुटका) म्हणजे दर्शनमार्ग, कारण त्याच्याद्वारे ती समूळ नष्ट केली जाते. तो दर्शनमार्ग निर्वाणाचा आश्रय घेऊन तिला समूळ नष्ट करतो, म्हणून "दिट्ठिनिस्सरणं निब्बानं" (दृष्टीपासून सुटका म्हणजे निर्वाण) असे म्हटले आहे. "अविनोदिता अनीहटा" (दूर न केलेले, बाहेर न काढलेले) या दोन्ही पदांद्वारे समूच्छेद (समूळ नाश) न झाल्यामुळे नष्ट न झालेली अवस्थाच सांगितली आहे. "संयोजन वेगळे आणि अनुसय वेगळा" असे ते म्हणतात, कारण सहभाव (एकत्र असणे) हा दुसऱ्यासोबतच होतो. तीच गोष्ट स्वतःसोबत असू शकत नाही, असा त्यांचा अभिप्राय आहे. "दुसऱ्याने" म्हणजे अर्थाच्या दृष्टीने दुसऱ्याने. जरी अवयवांशिवाय कोणताही समुदाय नसतो, तरीही अवयव हा स्वतः समुदाय नसतो, म्हणून तो समुदायापेक्षा वेगळाच आहे असे म्हणता येते. अशा प्रकारे सांगितलेल्या समाधानाचा अपरिहार्यपणा लक्षात घेऊन "अथापि सिया" (असेही असू शकते) इत्यादींद्वारे दुसरा पक्ष मांडला आहे. दुसऱ्या पक्षांद्वारे समाधान होते, म्हणून वर सांगितलेल्या न्यायाने दुसरा पुरुष असू शकतो, आणि यात हा दुसरा दोष आहे, हे दर्शवण्यासाठी "यदि तदेव" (जर तेच असेल तर) इत्यादी म्हटले आहे. "अथापि सिया" म्हणजे जर तुमचा असा विचार असेल की जर तेच संयोजन असेल इत्यादी. "या अर्थाला उद्देशून" (Imamatthaṃ sandhāya) म्हणजे परमार्थतः तोच क्लेश 'संयोजन' आणि 'अनुसय' आहे, परंतु बंधनाचा अर्थ आणि नष्ट न होण्याचा अर्थ यांमध्ये भेद आहेच, या अर्थाला उद्देशून हे म्हटले आहे. ๑๓๒. ตจจฺเฉโท วิย สมาปตฺติ กิเลสานํ สมาปตฺติวิกฺขมฺภนสฺส สารจฺเฉทสฺส อนุสยสฺส ทูรภาวโต. เผคฺคุจฺเฉโท วิย วิปสฺสนา ตสฺส อาสนฺนภาวโต. เอวรูปา ปุคฺคลาติ อภาวิตสทฺธาทิพลตาย ทุพฺพลนามกายา ปุคฺคลา, เยสํ สกฺกายนิโรธาย…เป… นาธิมุจฺจติ. เอวํ ทฏฺฐพฺพาติ ยถา โส ทุพฺพลโก ปุริโส, เอวํ ทฏฺฐพฺโพ โส ปุริโส คงฺคาปารํ วิย สกฺกายปารํ คนฺตุํ อสมตฺถตฺตา. วุตฺตวิปริยาเยน สุกฺกปกฺขสฺส อตฺโถ เวทิตพฺโพ. १३२. त्वचा कापण्याप्रमाणे समापत्ती (ध्यानप्राप्ती) असते, कारण समापत्तीद्वारे क्लेशांचे दमन होते आणि साराचा छेद करणाऱ्या अनुसयापासून ती दूर असते. गाभा (फेग्गु) कापण्याप्रमाणे विपश्यना असते, कारण ती त्याच्या (अनुसयाच्या) जवळ असते. "अशा प्रकारचे पुद्गल" (Evarūpā puggalā) म्हणजे श्रद्धा इत्यादी बलांची भावना न केल्यामुळे दुर्बल नामकाय असलेले पुद्गल, ज्यांचे चित्त सत्कायनिरोधासाठी...पे... अधिमुक्त (प्रवृत्त) होत नाही. "अशा प्रकारे पाहावे" (Evaṃ daṭṭhabbā) म्हणजे जसा तो दुर्बल मनुष्य असतो, तसाच तो मनुष्य पाहावा, कारण तो गंगा पार करण्याप्रमाणे सत्काय-पार (सत्कायदृष्टीच्या पलीकडे) जाण्यास असमर्थ असतो. सांगितलेल्याच्या उलट अर्थाने शुक्लपक्षाचा (चांगल्या बाजूचा) अर्थ समजून घ्यावा. ๑๓๓. อุปธิวิเวเกนาติ อิมินา อุปธิวิเวกาติ กรเณ นิสฺสกฺกนนฺติ ทสฺเสติ, อุปธิวิเวกาติ วา เหตุมฺหิ นิสฺสกฺกวจนสฺส อุปธิวิเวเกนาติ เหตุมฺหิ กรณวจเนน ปญฺจกามคุณวิเวโก กถิโต. กามคุณาปิ หิ อุปธียติ เอตฺถ ทุกฺขนฺติ อุปธีติ วุจฺจนฺตีติ. ถินมิทฺธปจฺจยา กายวิชมฺภิตาทิเภทํ กายาลสิยํ. ตตฺถาติ อนฺโตสมาปตฺติยํ สมาปตฺติอพฺภนฺตเร ชาตํ. ตํ ปน สมาปตฺติปริยาปนฺนมฺปิ อปริยาปนฺนมฺปีติ ตทุภยํ ทสฺเสตุํ ‘‘อนฺโตสมาปตฺติกฺขเณเยวา’’ติอาทิ วุตฺตํ. รูปาทโย ธมฺเมติ รูปเวทนาทิเก ปญฺจกฺขนฺธธมฺเม. น นิจฺจโตติ อิมินา นิจฺจปฏิกฺเขปโต เตสํ อนิจฺจตมาห. ตโต เอว อุทยวยนฺตโต วิปริณามโต ตาวกาลิกโต จ เต อนิจฺจาติ โชติตํ โหติ. ยญฺหิ นิจฺจํ น โหติ, ตํ อุทยพฺพยปริจฺฉินฺนํ ชราย มรเณน จาติ ทฺเวธา วิปริณตํ อิตฺตรขณเมว จ โหติ. น สุขโตติ อิมินา สุขปฏิกฺเขปโต เตสํ ทุกฺขตมาห, อโต เอว อภิณฺหํ ปฏิปีฬนโต ทุกฺขวตฺถุโต จ เต ทุกฺขาติ โชติตํ โหติ. อุทยพฺพยวนฺตตาย หิ เต อภิณฺหํ ปฏิปีฬนโต นิรนฺตรทุกฺขตาย ทุกฺขสฺเสว จ อธิฏฺฐานภูตาติ. ปจฺจยยาปนียตาย โรคมูลตาย จ โรคโต. ทุกฺขตาสูลโยคิตาย กิเลสาสุจิปคฺฆรณโต อุปฺปาทชราภงฺเคหิ อุทฺธุมาตปกฺกภิชฺชนโต จ คณฺฑโต. ปีฬาชนนโต อนฺโตตุทนโต ทุนฺนีหรณโต จ อวทฺธิอาวหโต อฆวตฺถุโต จ อเสรีภาวโต อาพาธปทฏฺฐานตาย จ อาพาธโต. อวสวตฺตนโต อวิเธยฺยตาย ปรโต[Pg.69]. พฺยาธิชรามรเณหิ ปลุชฺชนียตาย ปโลกโต. สามีนิวาสีการกเวทกอธิฏฺฐายกวิรหโต สุญฺญโต. อตฺตปฏิกฺเขปฏฺเฐน อนตฺตโต, รูปาทิธมฺมาปิ น เอตฺถ อตฺตา โหนฺตีติ อนตฺตา, เอวํ อยมฺปิ น อตฺตา โหตีติ อนตฺตา. เตน อพฺยาปารโต นิรีหโต ตุจฺฉโต อนตฺตาติ ทีปิตํ โหติ. ลกฺขณตฺตยเมว อวโพธตฺถํ เอกาทสหิ ปเทหิ วิภชิตฺวา คหิตนฺติ ทสฺเสตุํ ‘‘ตตฺถา’’ติอาทิ วุตฺตํ. १३३. "उपाधिविवेकाने" (Upadhivivekena) याद्वारे 'उपाधिविवेक' हा करणात (तृतीया विभक्तीत) अपादान (निसक्कन) दर्शवतो. किंवा 'उपाधिविवेक' हा हेतूमध्ये अपादान वचनाचा 'उपाधिविवेकाने' या हेतूमध्ये करण वचनाद्वारे पाच कामगुणांचा विवेक (अलिप्तता) सांगितला आहे. कारण कामगुणांमध्ये दुःख ठेवले जाते (उत्पन्न होते), म्हणून त्यांना 'उपाधी' म्हटले जाते. "थीनमिद्ध" (स्त्यान-मिद्ध) च्या प्रत्ययाने (कारणाने) जांभई देणे इत्यादी प्रकारचा शरीराचा आळस (कायाळस) होतो. "तेथे" (Tatthā) म्हणजे अंतःसमापत्तीमध्ये, समापत्तीच्या अभ्यंतरात (आत) उत्पन्न झालेले. ते समापत्तीमध्ये समाविष्ट असलेले किंवा समाविष्ट नसलेले, हे दोन्ही दर्शवण्यासाठी "अंतःसमापत्तीच्या क्षणीच" (antosamāpattikkhaṇeyeva) इत्यादी म्हटले आहे. "रूपादी धम्म" (Rūpādayo dhamme) म्हणजे रूप, वेदना इत्यादी पंचस्कंध धम्म. "नित्य नाही" (Na niccato) याद्वारे नित्याचा निषेध करून त्यांचे अनित्यत्व सांगितले आहे. म्हणूनच, उत्पत्ती आणि विनाश (उदय-व्यय) असल्यामुळे, परिणाम पावणारे असल्यामुळे आणि तात्कालिक असल्यामुळे ते 'अनित्य' आहेत, हे स्पष्ट होते. कारण जे नित्य नसते, ते उत्पत्ती आणि विनाशाने मर्यादित असते, आणि जरा व मरणाने दोन प्रकारे परिणाम पावणारे व क्षणभंगुर असते. "सुख नाही" (Na sukhato) याद्वारे सुखाचा निषेध करून त्यांचे दुःखत्व सांगितले आहे. म्हणूनच, सतत पीडित करण्यामुळे आणि दुःखाचे कारण असल्यामुळे ते 'दुःख' आहेत, हे स्पष्ट होते. कारण उत्पत्ती आणि विनाश असणारे असल्यामुळे, सतत पीडित करण्यामुळे ते निरंतर दुःखदायक आणि दुःखाचेच अधिष्ठान आहेत. प्रत्ययांवर (कारणांवर) अवलंबून असल्यामुळे आणि रोगाचे मूळ असल्यामुळे ते 'रोग' (रोगतो) आहेत. दुःखरुपी शूलाशी (भाला) जोडलेले असल्यामुळे, क्लेशरुपी अशुद्धी वाहून नेणारे असल्यामुळे, आणि उत्पत्ती, जरा व भंगाने फुगून फुटणारे असल्यामुळे ते 'गंड' (फोडा - gaṇḍato) आहेत. पीडा उत्पन्न करणारे असल्यामुळे, आतून टोचणारे असल्यामुळे, बाहेर काढण्यास कठीण असल्यामुळे, अनर्थ घडवून आणणारे असल्यामुळे, पापाचे स्थान असल्यामुळे, पराधीन असल्यामुळे आणि व्याधीचे कारण असल्यामुळे ते 'आबाध' (आजार - ābādhato) आहेत. वश न होणारे असल्यामुळे आणि आज्ञेत न राहणारे असल्यामुळे ते 'पर' (परतो) आहेत. व्याधी, जरा आणि मरणाने नष्ट होणारे असल्यामुळे ते 'पलोक' (नाशवंत - palokato) आहेत. स्वामी, रहिवासी, कर्ता, भोक्ता आणि अधिष्ठाता यांच्या अभावामुळे ते 'शून्य' (suññato) आहेत. आत्म्याचा निषेध करण्याच्या अर्थाने ते 'अनात्म' (anattato) आहेत. रूप इत्यादी धम्म येथे आत्मा नाहीत, म्हणून ते 'अनात्म' आहेत; अशा प्रकारे हा देखील आत्मा नाही, म्हणून 'अनात्म' आहे. याद्वारे ते व्यापाररहित (अक्रिय), इच्छारहित, तुच्छ आणि अनात्म आहेत, हे दर्शविले आहे. तीन लक्षणांचेच (अनित्य, दुःख, अनात्म) आकलन होण्यासाठी अकरा पदांमध्ये विभागून ग्रहण केले आहे, हे दर्शवण्यासाठी "तथ" (तेथे) इत्यादी म्हटले आहे. อนฺโตสมาปตฺติยนฺติ สมาปตฺตีนํ สหชาตตาย สมาปตฺตีนํ อพฺภนฺตเร. จิตฺตํ ปฏิสํหรตีติ ตปฺปฏิพทฺธฉนฺทราคาทิอุปกฺกิเลสวิกฺขมฺภเนน วิปสฺสนาจิตฺตํ ปฏิสํหรติ. เตนาห ‘‘โมเจตี’’ติ. สวนวเสนาติ ‘‘สพฺพสงฺขารสมโถ’’ติอาทินา สวนวเสน. ถุติวเสนาติ ตเถว โถมนาวเสน คุณโต สํกิตฺตนวเสน. ปริยตฺติวเสนาติ ตสฺส ธมฺมสฺส ปริยาปุณนวเสน. ปญฺญตฺติวเสนาติ ตทตฺถสฺส ปญฺญาปนวเสน. อารมฺมณกรณวเสเนว อุปสํหรติ มคฺคจิตฺตํ. เอตํ สนฺตนฺติอาทิ ปน อวธารณนิวตฺติตตฺถทสฺสนํ. ยถา วิปสฺสนา ‘‘เอตํ สนฺตํ เอตํ ปณีต’’นฺติอาทินา อสงฺขตาย ธาตุยา จิตฺตํ อุปสํหรติ, เอวํ มคฺโค นิพฺพานํ สจฺฉิกิริยาภิสมยวเสน อภิสเมนฺโต ตตฺถ ลพฺภมาเน สพฺเพ วิเสเส อสมฺโมหโต ปฏิวิชานนฺโต ตตฺถ จิตฺตํ อุปสํหรติ. เตนาห ‘‘อิมินา ปน อากาเรนา’’ติอาทิ. โส ตตฺถ ฐิโตติ โส อทนฺธวิปสฺสโน โยคี ตตฺถ ตาย อนิจฺจาทิลกฺขณตฺตยารมฺมณาย วิปสฺสนาย ฐิโต. สพฺพโสติ ตสฺส มคฺคสฺส อธิคมาย นิพฺพตฺติตสมถวิปสฺสนาสุ. อสกฺโกนฺโต อนาคามี โหตีติ เหฏฺฐิมมคฺควหาสุ เอว สมถวิปสฺสนาสุ ฉนฺทราคํ ปหาย อคฺคมคฺควหาสุ ตาสุ นิกนฺตึ ปริยาทาตุํ อสกฺโกนฺโต อนาคามิตายเมว สณฺฐาติ. 'Antosamāpattiyanti' म्हणजे समापत्तींच्या सहजाततेमुळे समापत्तींच्या अभ्यंतरात (आत). 'Cittaṃ paṭisaṃharati' म्हणजे त्याच्याशी संबंधित छंद-राग इत्यादी उपक्किलेसांच्या (उपकलेशांच्या) विक्खंभनाने (दडपून टाकण्याने) विपस्सनाचित्त मागे घेतो. म्हणूनच 'moceti' (मुक्त करतो) असे म्हटले आहे. 'Savanavasena' म्हणजे 'सब्बसंखारसमथो' (सर्व संस्कारांचा शम) इत्यादी ऐकण्याच्या (श्रवण करण्याच्या) द्वारे. 'Thutivasena' म्हणजे त्याचप्रमाणे स्तुतीद्वारे, गुणांच्या संकीर्तनाद्वारे. 'Pariyattivasena' म्हणजे त्या धम्माच्या परियापुणन (अध्ययन) द्वारे. 'Paññattivasena' म्हणजे त्याच्या अर्थाच्या प्रज्ञापनाद्वारे (स्पष्टीकरणाद्वारे). आलंबन करण्याच्या द्वारेच मग्गचित्त (मार्गचित्त) उपसंहार करते. 'Etaṃ santaṃ' (हे शांत आहे) इत्यादी वाक्ये अवधारण (निश्चय) आणि निवृत्तीचा अर्थ दर्शवणारी आहेत. ज्याप्रमाणे विपस्सना 'एतं सन्तं एतं पणीतं' इत्यादींद्वारे असंखत धातूमध्ये चित्त उपसंहार करते, त्याचप्रमाणे मग्ग (मार्ग) हा निब्बानाचा (निर्वाणाचा) साक्षात्काराच्या अभिसमयाने अभिसमय करत असताना, तेथे प्राप्त होणाऱ्या सर्व विशेषांना संमोहाशिवाय (असंमोहाने) जाणत, तेथे चित्त उपसंहार करतो. म्हणूनच 'iminā pana ākārena' (परंतु या आकाराने/पद्धतीने) इत्यादी म्हटले आहे. 'So tattha ṭhito' म्हणजे तो अदंधविपस्सक (शीघ्रविपस्सक) योगी तेथे त्या अनित्यता इत्यादी तीन लक्षणांच्या आलंबन असणाऱ्या विपस्सनेमध्ये स्थित असतो. 'Sabbaso' म्हणजे त्या मार्गाच्या अधिगमासाठी (प्राप्तीसाठी) उत्पन्न झालेल्या समथ आणि विपस्सनेमध्ये. 'Asakkonto anāgāmī hoti' म्हणजे खालच्या मार्गाचे वहन करणाऱ्या समथ-विपस्सनेमध्येच छंद-राग सोडून, उच्च मार्गाचे वहन करणाऱ्या त्या समथ-विपस्सनेमध्ये निकंती (आसक्ती) नष्ट करण्यास असमर्थ ठरल्यामुळे अनागामी अवस्थेतच स्थिर होतो. สมติกฺกนฺตตฺตาติ สมถวเสน วิปสฺสนาวเสน จาติ สพฺพถาปิ รูปสฺส อติกฺกนฺตตฺตา. เตนาห ‘‘อยญฺหี’’ติอาทิ. อเนนาติ โยคินา. ตํ อติกฺกมฺมาติ อิทํ โย วา ปฐมํ ปญฺจโวการภวปริยาปนฺเน ธมฺเม สมฺมเทว สมฺมสิตฺวา เต วิวชฺเชตฺวา ตโต อรูปสมาปตฺตึ สมาปชฺชิตฺวา อรูปธมฺเม สมฺมสติ, ตํ สนฺธาย วุตฺตํ. เตนาห ‘‘อิทานิ อรูปํ สมฺมสตี’’ติ. 'Samatikkantattā' म्हणजे समथ आणि विपस्सनेच्या द्वारे सर्व प्रकारे रूपाचे अतिक्रमण केल्यामुळे. म्हणूनच 'ayañhi' (हा खरोखर) इत्यादी म्हटले आहे. 'Anena' म्हणजे योग्याने. 'Taṃ atikkamma' (त्याचे अतिक्रमण करून) हे जे कोणी प्रथम पंचवोकारभवात (पाच स्कंध असलेल्या अस्तित्वात) समाविष्ट असलेल्या धम्मांचे चांगल्या प्रकारे परीक्षण (संमसन) करून, त्यांचा त्याग करून, त्यानंतर अरूपसमापत्ती प्राप्त करून अरूपधम्मांचे परीक्षण करतो, त्याला उद्देशून म्हटले आहे. म्हणूनच 'idāni arūpaṃ sammasati' (आता अरूपाचे परीक्षण करतो) असे म्हटले आहे. สมถวเสน [Pg.70] คจฺฉโตติ สมถปฺปธานํ ปุพฺพภาคปฏิปทํ อนุยุญฺชนฺตสฺส. จิตฺเตกคฺคตา ธุรํ โหตีติ ตสฺส วิปสฺสนาภาวนาย ตถา ปุพฺเพ ปวตฺตตฺตา วุฏฺฐานคามินิวิปสฺสนา สมาธิปฺปธานา โหติ, มคฺเคปิ จิตฺเตกคฺคตา ธุรํ โหติ, สมาธินฺทฺริยํ ปุพฺพงฺคมํ พลวํ โหติ. โส เจโตวิมุตฺโต นามาติ โส อริโย เจโตวิมุตฺโต นาม โหติ. วิปสฺสนาวเสน คจฺฉโตติ ‘‘สมถวเสน คจฺฉโต’’ติ เอตฺถ วุตฺตนยานุสาเรน อตฺโถ เวทิตพฺโพ. อยญฺจ ปุคฺคลวิภาโค สุตฺตนฺตนเยน อิธาภิหิโต ปริยาโย นาม, อภิธมฺมนเยน ปรโต กีฏาคิริสุตฺตวณฺณนายํ ทสฺสยิสฺสาม. อยํ สภาวธมฺโมเยวาติ ปุพฺพภาคปฏิปทา สมถปฺปธานา เจ สมาธิ ธุรํ, วิปสฺสนาปธานา เจ ปญฺญา ธุรนฺติ อยํ ธมฺมสภาโวเยว, เอตฺถ กิญฺจิ น อาสงฺกิตพฺพํ. 'Samathavasena gacchato' म्हणजे समथ-प्रधान पूर्वभाग-प्रतिपदेचे (प्रारंभिक मार्गाचे) आचरण करणाऱ्याचे. 'Cittekaggatā dhuraṃ hoti' म्हणजे त्याच्या विपस्सनाभावनेमध्ये पूर्वी तशा प्रकारे प्रवृत्त झाल्यामुळे, वुट्ठानगामिनी विपस्सना समाधी-प्रधान असते, मार्गामध्येही चित्ताची एकाग्रता मुख्य (धुरंधर) असते, समाधींद्रिय हे पुरोगामी आणि बलवान असते. 'So cetovimutto nāma' म्हणजे तो अरिय (आर्य) 'चेतोविमुक्त' या नावाचा होतो. 'Vipassanāvasena gacchato' याचा अर्थ 'samathavasena gacchato' यामध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनुसार समजून घ्यावा. आणि हा पुग्गल-विभाग (पुद्गल-विभाग) सुत्तंत-पद्धतीने येथे सांगितलेला पर्याय आहे, अभिधम्म-पद्धतीने पुढे कीटागिरिसुत्त-वर्णनेमध्ये आम्ही तो दाखवू. 'Ayaṃ sabhāvadhammoyeva' म्हणजे जर पूर्वभाग-प्रतिपदा समथ-प्रधान असेल तर समाधी मुख्य असते, आणि जर विपस्सना-प्रधान असेल तर पञ्ञा (प्रज्ञा) मुख्य असते, हा धम्माचा स्वभावच आहे, यात कोणतीही शंका घेण्याचे कारण नाही. อินฺทฺริยปโรปริยตฺตํ อินฺทฺริยเวมตฺตตา. เตนาห ‘‘อินฺทฺริยนานตฺตํ วทามี’’ติ. อินฺทฺริยนานตฺตตา การณนฺติ อิทํ ทสฺเสติ – อนิจฺจาทิวเสน วิปสฺสนาภินิเวโส วิย สมถวเสน วิปสฺสนาวเสน จ ยํ ปุพฺพภาคคมนํ, ตํ อปฺปมาณํ ตํ วุฏฺฐานคามินิวิปสฺสนํ, ยสฺส สมาธิ ธุรํ ปุพฺพงฺคมํ พลวํ โหติ, โส อริโย เจโตวิมุตฺติ นาม โหติ. ยสฺส ปญฺญา ธุรํ ปุพฺพงฺคมํ พลวํ โหติ โส อริโย ปญฺญาวิมุตฺโต นาม โหติ. อิทานิ ตมตฺถํ พุทฺธิวิสิฏฺเฐน นิทสฺสเนน ทสฺเสนฺโต ‘‘ทฺเว อคฺคสาวกา’’ติอาทิมาห, ตํ สุวิญฺเญยฺยเมว. 'Indriyaparopariyattaṃ' म्हणजे इंद्रियांची भिन्नता (इंद्रियवेमत्तता). म्हणूनच 'indriyanānattaṃ vadāmi' (मी इंद्रियांची विविधता सांगतो) असे म्हटले आहे. इंद्रियांची विविधता हे कारण आहे, हे दर्शवण्यासाठी - अनित्यता इत्यादींच्या द्वारे विपस्सनेचा अभिनिवेश (प्रवेश) ज्याप्रमाणे होतो, त्याचप्रमाणे समथ आणि विपस्सनेच्या द्वारे जे पूर्वभाग-गमन (प्रारंभिक प्रगती) होते, ते अमर्याद असते, ती वुट्ठानगामिनी विपस्सना असते. ज्याची समाधी मुख्य, पुरोगामी आणि बलवान असते, तो अरिय 'चेतोविमुक्त' होतो. ज्याची पञ्ञा (प्रज्ञा) मुख्य, पुरोगामी आणि बलवान असते, तो अरिय 'पञ्ञाविमुक्त' होतो. आता हाच अर्थ बुद्धीने श्रेष्ठ अशा उदाहरणाने दर्शवण्यासाठी 'dve aggasāvakā' (दोन अग्रश्रावक) इत्यादी म्हटले आहे, ते सहज समजण्यासारखेच आहे. มหามาลุกฺยสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. महामालुक्यसुत्त-वर्णनेची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ-प्रकाशिनी टीका) समाप्त झाली. ๕. ภทฺทาลิสุตฺตวณฺณนา ५. भद्दारिसुत्त-वर्णना ๑๓๔. อสิยตีติ อสนํ, ภุญฺชนํ โภชนํ, อสนสฺส โภชนํ อสนโภชนํ, อาหารปริโภโค, เอกสฺมึ กาเล อสนโภชนํ เอกาสนโภชนํ. โส ปน กาโล สพฺพพุทฺธานํ สพฺพปจฺเจกพุทฺธานํ อาจิณฺณสมาจิณฺณวเสน ปุพฺพณฺโห เอว อิธาธิปฺเปโตติ อาห ‘‘เอกสฺมึ ปุเรภตฺเต อสนโภชน’’นฺติ. วิปฺปฏิสารกุกฺกุจฺจนฺติ ‘‘อยุตฺตํ วต มยา กตํ, โย อตฺตโน สรีรปกตึ อชานนฺโต เอกาสนโภชนํ ภุญฺชิ, เยน เม อิทํ สรีรํ กิสํ ชาตํ พฺรหฺมจริยานุคฺคโห นาโหสี’’ติ เอวํ [Pg.71] วิปฺปฏิสารกุกฺกุจฺจํ ภเวยฺย. เอตํ สนฺธาย สตฺถา อาห, น ภทฺทาลิเมว ตาทิสํ กิริยํ อนุชานนฺโต. อิตรถาติ ยทิ เอกํเยว ภตฺตํ ทฺวิธา กตฺวา ตโต เอกสฺส ภาคสฺส ภุญฺชนํ เอกเทสภุญฺชนํ อธิปฺเปตํ. โก สกฺโกตีติ โก เอวํ ยาเปตุํ สกฺโกติ. อตีตชาติปริจโยปิ นาม อิเมสํ สตฺตานํเยว อนุพนฺธตีติ อาห ‘‘อตีเต’’ติอาทิ. วิรวนฺตสฺเสวาติ อนาทเร สามิวจนํ. ตํ มทฺทิตฺวาติ ‘‘อยํ สิกฺขา สพฺเพสมฺปิ พุทฺธานํ สาสเน อาจิณฺณํ, อยญฺจ ภิกฺขุ อิมํ สิกฺขเตวา’’ติ วตฺวา ตํ ภทฺทาลึ ตสฺส วา อนุสฺสาหปเวทนํ อภิภวิตฺวา. ภิกฺขาจารคมนตฺถํ น วิตกฺกมาฬกํ อคมาสิ, วิหารจาริกํ จรนฺโต ตสฺส วสนฏฺฐานํ ภควา คจฺฉติ. १३४. 'Asiyati' म्हणजे खाणे (असन), जेवणे म्हणजे भोजन, असनाचे भोजन म्हणजे असनभोजन, म्हणजेच आहाराचा उपभोग. एकाच वेळी असनभोजन करणे म्हणजे एकासनभोजन होय. तो काळ सर्व बुद्धांच्या आणि सर्व प्रत्येकबुद्धांच्या आचरलेल्या परंपरेनुसार दुपारपूर्वीचाच येथे अभिप्रेत आहे, म्हणून 'ekasmiṃ purebhatte asanabhojanaṃ' (दुपारच्या जेवणापूर्वी एकाच वेळी भोजन करणे) असे म्हटले आहे. 'Vippaṭisārakukkuccaṃ' (पश्चात्ताप आणि अस्वस्थता) म्हणजे 'मी खरोखर अयोग्य केले, ज्याने स्वतःच्या शरीराची प्रकृती न जाणता एकासनभोजन केले, ज्यामुळे माझे हे शरीर कृश झाले आणि ब्रह्मचर्याला साहाय्य झाले नाही,' अशा प्रकारचा पश्चात्ताप आणि अस्वस्थता निर्माण होऊ शकते. हे लक्षात घेऊन शास्त्यांनी (भगवंतांनी) असे म्हटले आहे, भद्दारिच्या तशा कृतीला अनुमती देण्यासाठी नाही. 'Itarathā' म्हणजे जर एकाच भोजनाचे दोन भाग करून त्यातील एका भागाचे भोजन करणे (एकदेशभोजन) अभिप्रेत असेल तर. 'Ko sakkoti' म्हणजे कोण अशा प्रकारे जीवन जगू शकतो? 'अतीत जन्माचा परिचय देखील या प्राण्यांच्या पाठीशी राहतोच,' हे दर्शवण्यासाठी 'atīte' (अतीते) इत्यादी म्हटले आहे. 'Viravantasseva' (ओरडत असतानाच) हे अनादराचे षष्ठी विभक्तीचे रूप आहे. 'Taṃ madditvā' (त्याला दडपून/पराभूत करून) म्हणजे 'ही शिक्षा (नियम) सर्वच बुद्धांच्या शासनात आचरली गेली आहे, आणि हा भिक्खू हे शिकेलच,' असे म्हणून त्या भद्दारिला किंवा त्याच्या निरुत्साहाच्या निवेदनाला पराभूत करून. भिक्षाटनासाठी जाण्याकरिता ते वितक्कमाळकामध्ये (विचार करण्याच्या ठिकाणी) गेले नाहीत, तर विहारात फिरत असताना भगवंत त्याच्या निवासस्थानी जातात. ๑๓๕. ทูสยนฺติ ครหนฺติ เอเตนาติ โทโส, อปราโธ, โส เอว กุจฺฉิตภาเวน โทสโก. ครหาย ปวตฺติฏฺฐานโต โอกาโส. เตนาห – ‘‘เอตํ โอกาสํ เอตํ อปราธ’’นฺติ. ทุกฺกรตรนฺติ ปติการวเสน อติสเยน ทุกฺกรํ. อปราโธ หิ น ขมาเปนฺตํ ยถาปจฺจยํ วิตฺถาริโต หุตฺวา ทุปฺปติกาโร โหติ. เตนาห ‘‘วสฺสญฺหี’’ติอาทิ. १३५. ज्याद्वारे दूषित करतात किंवा निंदा करतात तो 'दोष' किंवा 'अपराध' होय, तोच निंद्य भाव असल्यामुळे 'दोषक' आहे. निंदेच्या प्रवृत्तीचे स्थान असल्यामुळे तो 'ओकास' (अवकाश/संधी) आहे. म्हणूनच 'etaṃ okāsaṃ etaṃ aparādhaṃ' (हा अवकाश, हा अपराध) असे म्हटले आहे. 'Dukkarataraṃ' म्हणजे निवारण करण्याच्या दृष्टीने अत्यंत कठीण. कारण क्षमा न मागितल्यास अपराध हा कारणांनुसार विस्तारत जातो आणि त्याचे निवारण करणे कठीण होते. म्हणूनच 'vassañhi' (वर्षभर खरोखर) इत्यादी म्हटले आहे. อลคฺคิตฺวาติ อิมมฺปิ นาม อปนีตํ อกาสีติ เอวํ อวิเนตฺวา, ตํ ตํ ตสฺส หิตปฏิปตฺตึ นิวารณํ กตฺวาติ อตฺโถ. ญายปฏิปตฺตึ อติจฺจ เอติ ปวตฺตตีติ อจฺจโย, อปราโธ, ปุริเสน มทฺทิตฺวา ปวตฺติโต อปราโธ อตฺถโต ปุริสํ อติจฺจ อภิภวิตฺวา ปวตฺโต นาม โหติ. เตนาห ‘‘อจฺจโย มํ, ภนฺเต, อจฺจคมา’’ติ. อวเสสปจฺจยานํ สมาคเม เอติ ผลํ เอตสฺมา อุปฺปชฺชติ ปวตฺตติ จาติ สมโย, เหตุ ยถา ‘‘สมุทาโย’’ติ อาห ‘‘เอกํ การณ’’นฺติ. ยํ ปเนตฺถ ภทฺทาลิตฺเถรสฺส อปริปูรการิตาย ภิกฺขุอาทีนํ ชานนํ, ตมฺปิ การณํ กตฺวา ‘‘อหํ โข, ภนฺเต, น อุสฺสหามี’’ติอาทินา วตฺตพฺพนฺติ ทสฺเสติ. ‘अलग्गित्व’ म्हणजे ‘याने हे देखील दूर केले’ अशा प्रकारे विनय (शिस्त) न लावता, त्याच्या त्या हितकारक प्रतिपत्तीला (आचरणाला) अडथळा निर्माण करून, असा अर्थ आहे. न्याय्य प्रतिपत्तीचे (योग्य मार्गाचे) उल्लंघन करून जे घडते किंवा चालते, तो ‘अच्चय’ (अपराध/अतिचार) होय. माणसाने उल्लंघन करून केलेला अपराध हा अर्थतः माणसाचे उल्लंघन करून, त्याला पराभूत करून प्रवृत्त झालेला असतो. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘भन्ते, माझ्याकडून अपराध (अतिचार) झाला आहे.’ उर्वरित प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) एकत्र येण्याने जे फळ मिळते, ज्याच्यापासून ते उत्पन्न होते आणि प्रवृत्त होते, तो ‘समय’ (प्रसंग/हेतू) होय, जसे ‘समुदाय’ या अर्थाने ‘एक कारण’ असे म्हटले आहे. आणि येथे भद्दारि थेरांच्या अपूर्ण आचरणामुळे भिक्खू इत्यादींना जे समजले, त्यालाही कारण बनवून ‘भन्ते, मी खरोखर समर्थ (उत्साही) नाही’ इत्यादी प्रकारे बोलले पाहिजे, हे दर्शविते। ๑๓๖. เอกจิตฺตกฺขณิกาติ ปฐมมคฺคจิตฺตกฺขเณน เอกจิตฺตกฺขณิกา. เอวํ อาณาเปตุํ น ยุตฺตนฺติ สงฺกมตฺถาย อาณาเปตุํ น ยุตฺตํ ปโยชนาภาวโต. อนาจิณฺณญฺเจตํ พุทฺธานํ, ยทิทํ ปทสา อกฺกมนํ. ตถา หิ – १३६. ‘एकचित्तक्खणिका’ म्हणजे प्रथम मार्गचित्ताच्या क्षणाने एकचित्तक्षणिक असणे. ‘अशी आज्ञा देणे योग्य नाही’ म्हणजे पूल ओलांडण्यासाठी आज्ञा देणे योग्य नाही, कारण त्याचे काही प्रयोजन नाही. आणि बुद्धांचे हे आचरण नाही, जे पायाने पाऊल ठेवणे (तुडवणे) आहे. कारण की— ‘‘อกฺกมิตฺวาน มํ พุทฺโธ, สห สิสฺเสหิ คจฺฉตุ; มา นํ กลลํ อกฺกมิตฺถ, หิตาย เม ภวิสฺสตี’’ติ. (พุ. วํ. ๒.๕๓); “बुद्ध आपल्या शिष्यांसह माझ्यावर पाऊल ठेवून जावोत; त्यांनी चिखलावर पाऊल ठेवू नये, हे माझ्या हिताचे होईल.” (बुद्धवंश २.५३); สุเมธปณฺฑิเตน [Pg.72] ปจฺจาสีสิตํ น กตํ. ยถาห – सुमेध पंडिताने अशी अपेक्षा केली नव्हती. जसे म्हटले आहे— ‘‘ทีปงฺกโร โลกวิทู, อาหุตีนํ ปฏิคฺคโห; อุสฺสีสเก มํ ฐตฺวาน, อิทํ วจนมพฺรวี’’ติ. (พุ. วํ. ๒.๖๐); “लोकविदू, आहुती ग्रहण करणारे दीपंकर बुद्ध, माझ्या डोक्यापाशी उभे राहून हे वचन बोलले—” (बुद्धवंश २.६०); ภควตา อาณตฺเต สติ เตสมฺปิ เอวํ กาตุํ น ยุตฺตนฺติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย. เอเตสํ ปฏิพาหิตุํ ยุตฺตนฺติ อิทํ อฏฺฐานปริกปฺปนวเสเนว วุตฺตํ. น หิ พุทฺธานํ กาตุํ อารทฺธํ นาม กิจฺจํ เกหิจิ ปฏิพาหิตุํ ยุตฺตํ นาม อตฺถิ ปฏิพาหิตุํเยว อกรณโต. สมฺมตฺตนิยามสฺส อโนกฺกนฺตตฺตา วุตฺตํ ‘‘พาหิรโก’’ติ. भगवंतांनी आज्ञा दिली असता त्यांनीही असे करणे योग्य नाही, येथेही हाच नियम आहे. ‘त्यांना रोखणे योग्य आहे’ हे केवळ अयोग्य कल्पनेच्या वशने म्हटले आहे. कारण बुद्धांनी सुरू केलेले कार्य कोणालाही रोखणे योग्य नाही, कारण ते रोखणे अशक्यच आहे. सम्यक्त्व-नियामामध्ये (योग्य नियमात) प्रवेश न केल्यामुळे ‘बाहिरको’ (बाह्य) असे म्हटले आहे। ๑๓๗. น กมฺมฏฺฐานํ อลฺลียตีติ จิตฺตํ กมฺมฏฺฐานํ น โอตรติ. १३७. ‘कर्मस्थान लागत नाही’ म्हणजे चित्त कर्मस्थानात उतरत नाही। ๑๔๐. ปุนปฺปุนํ กาเรนฺตีติ ทณฺฑกมฺมปณามนาทิการณํ ปุนปฺปุนํ กาเรนฺติ. สมฺมาวตฺตมฺหิ น วตฺตตีติ ตสฺสา ตสฺสา อาปตฺติยา วุฏฺฐานตฺถํ ภควตา ปญฺญตฺตสมฺมาวตฺตมฺหิ น วตฺตติ. อนุโลมวตฺเต น วตฺตตีติ เยน เยน วตฺเตน สงฺโฆ อนุโลมิโก โหติ, ตสฺมึ ตสฺมึ อนุโลมวตฺเต น วตฺตติ วิโลมเมว คณฺหาติ, ปฏิโลเมน โหติ. นิตฺถารณกวตฺตมฺหีติ เยน วตฺเตน สงฺโฆ อนุโลมิโก โหติ, สาปตฺติกภาวโต นิตฺถิณฺโณ โหติ, ตมฺหิ นิตฺถารณวตฺตสฺมึ น วตฺตติ. เตนาห ‘‘อาปตฺตี’’ติอาทิ. ทุพฺพจกรเณติ ทุพฺพจสฺส ภิกฺขุโน กรเณ. १४०. ‘पुन्हा पुन्हा करवून घेतात’ म्हणजे दंडकर्म, निष्कासन इत्यादी कारणे पुन्हा पुन्हा करवून घेतात. ‘सम्यक् वर्तनात वागत नाही’ म्हणजे त्या त्या आपत्तीतून बाहेर पडण्यासाठी भगवंतांनी प्रज्ञप्त केलेल्या सम्यक् वर्तनात तो वागत नाही. ‘अनुकूल वर्तनात वागत नाही’ म्हणजे ज्या ज्या वर्तनाने संघ अनुकूल होतो, त्या त्या अनुकूल वर्तनात तो वागत नाही, तर उलटच वागतो, प्रतिकूल होतो. ‘निस्तारण वर्तनात’ म्हणजे ज्या वर्तनाने संघ अनुकूल होतो आणि आपत्तीच्या अवस्थेतून मुक्त होतो, त्या निस्तारण वर्तनात तो वागत नाही. म्हणूनच ‘आपत्ती’ इत्यादी म्हटले आहे. ‘दुब्बचकरणे’ म्हणजे दुर्वचनी (हट्टी) भिक्खूच्या बाबतीत करणे। ๑๔๔. ยาเปตีติ วตฺตติ, สาสเน ติฏฺฐตีติ อตฺโถ. อภิญฺญาปตฺตาติ ‘‘อสุโก อสุโก จ เถโร สีลวา กลฺยาณธมฺโม พหุสฺสุโต’’ติอาทินา อภิญฺญาตภาวํ ปตฺตา อธิคตอภิญฺญาตา. १४४. ‘यापेति’ म्हणजे वागतो, शासनात टिकून राहतो, असा अर्थ आहे. ‘अभिञ्ञापत्ता’ (प्रसिद्धीस पावलेले) म्हणजे ‘अमुक अमुक थेर शीलवान, कल्याणधर्मी आणि बहुश्रुत आहेत’ इत्यादी प्रकारे प्रसिद्धीस पावलेले, ज्यांनी प्रसिद्धी प्राप्त केली आहे। ๑๔๕. สตฺเตสุ หายมาเนสูติ กิเลสพหุลตาย ปฏิปชฺชนกสตฺเตสุ ปริหายนฺเตสุ ปฏิปเถสุ ชายมาเนสุ. อนฺตรธายติ นาม ตทาธารตาย. ทิฏฺฐธมฺมิกา ปรูปวาทาทโย. สมฺปรายิกา อปายทุกฺขวิเสสา. อาสวนฺติ เตน เตน ปจฺจเยน ปวตฺตนฺตีติ อาสวา. เนสนฺติ ปรูปวาทาทิอาสวานํ. เตติ วีติกฺกมธมฺมา. १४५. ‘प्राणी क्षीण होत असताना’ म्हणजे क्लेशांच्या बाहुल्यामुळे आचरण करणारे प्राणी क्षीण होत असताना आणि प्रतिपत्तीचे मार्ग नष्ट होत असताना. त्याच्या आधाराने (सद्धम्म) अंतर्धान पावतो. ‘दिट्ठधम्मिका’ (या जन्मातील) म्हणजे इतरांचे अपवाद (निंदा) इत्यादी. ‘साम्परायिका’ (परलोकातील) म्हणजे अपायातील दुःखविशेष. ‘आसवन्ति’ म्हणजे त्या त्या कारणाने जे प्रवृत्त होतात, ते ‘आसव’ (आस्रव) होत. ‘नेसं’ म्हणजे इतरांच्या निंदेमुळे होणाऱ्या आसवांचे. ‘ते’ म्हणजे उल्लंघनाचे धर्म (अतिचार धर्म)। อกาลํ ทสฺเสตฺวาติ สิกฺขาปทปญฺญตฺติยา อกาลํ ทสฺเสตฺวา. อุปฺปตฺตินฺติ อาสวฏฺฐานิยานํ ธมฺมานมุปฺปตฺตึ. สิกฺขาปทปญฺญตฺติยา กาลํ, ตาว [Pg.73] เสนาสนานิ ปโหนฺติ, เตน อาวาสมจฺฉริยาทิเหตุนา สาสเน เอกจฺเจ อาสวฏฺฐานิยา ธมฺมา น อุปฺปชฺชนฺติ. อิมินา นเยนาติ อิมินา ปน เหตุนา ปทโสธมฺมสิกฺขาปทานํ สงฺคโห ทฏฺฐพฺโพ. ‘अकाळाला दर्शवून’ म्हणजे शिक्षापद प्रज्ञप्तीचा (नियम बनवण्याचा) अयोग्य काळ दर्शवून. ‘उत्पत्ती’ म्हणजे आसवस्थानीय (आस्रव उत्पन्न करणाऱ्या) धर्मांची उत्पत्ती. शिक्षापद प्रज्ञप्तीचा काळ, तोपर्यंत सेनासने पुरेशी असतात, त्यामुळे आवास-मात्सर्य (निवासस्थानाचा लोभ) इत्यादी कारणांमुळे शासनात काही आसवस्थानीय धर्म उत्पन्न होत नाहीत. ‘या नयाने’ म्हणजे या हेतूने पदसो-धम्म-शिक्षापदांचा संग्रह समजला पाहिजे। ยสนฺติ กิตฺติสทฺทํ ปริวารญฺจ. สาคตตฺเถรสฺส นาคทมนกิตฺติยสาทิวเสน สุราปานสงฺขาโต อาสวฏฺฐานิโย ธมฺโม อุปฺปชฺชิ. ‘यश’ म्हणजे कीर्ती आणि परिवार. स्वागत थेरांच्या नागदमन, कीर्ती, यश इत्यादींमुळे सुरापान नावाचा आसवस्थानीय धर्म उत्पन्न झाला। รเสน รสํ สํสนฺเทตฺวาติ อุปาทินฺนกผสฺสรเสน อนุปาทินฺนกผสฺสรสํ สํสนฺเทตฺวา. ‘रसाने रस मिळवून’ म्हणजे उपादिन्नक (सजीव शरीराच्या) स्पर्शरसाशी अनुपादिन्नक (निर्जीव वस्तूच्या) स्पर्शरसाचा मेळ घालून। ๑๔๖. น โข, ภทฺทาลิ, เอเสว เหตุ, อถ โข อญฺญมฺปิ อตฺถีติ ทสฺเสนฺโต ภควา ‘‘อปิจา’’ติอาทิมาห. เตน ธมฺมสฺส สกฺกจฺจสวเน เถรํ นิโยเชติ. १४६. “हे भद्दारि, केवळ हाच हेतू नाही, तर दुसराही हेतू आहे” हे दर्शविताना भगवंतांनी ‘अपि च’ (शिवाय) इत्यादी म्हटले. त्याद्वारे ते थेरांना धम्माचे आदरपूर्वक श्रवण करण्यासाठी प्रवृत्त करतात। ๑๔๗. วิเสวนาจารนฺติ อทนฺตกิริยํ. ปรินิพฺพายตีติ วูปสมฺมติ. ตตฺถ อทนฺตกิริยํ ปหาย ทนฺโต โหติ. ยุคสฺสาติ รถธุรสฺส. १४७. ‘विसेवनाचार’ म्हणजे अदंतक्रिया (असंयत वर्तन). ‘परिनिब्बायति’ म्हणजे शांत होतो (उपशमित होतो). तेथे अदंतक्रिया सोडून तो दमित (संयत) होतो. ‘युगस्स’ म्हणजे रथाच्या धुरेचे (जूचे)। อนุกฺกเมติ อนุรูปปริคเม. ตทวตฺถานุรูปํ ปาทานํ อุกฺขิปเน นิกฺขิปเน จ. เตนาห ‘‘จตฺตาโร ปาเท’’ติอาทิ. รชฺชุพนฺธนวิธาเนนาติ ปาทโต ภูมิยา โมจนวิธาเนน. เอวํ กรณตฺถนฺติ ยถา อสฺเส นิสินฺนสฺเสว ภูมึ คเหตุํ สกฺกา, เอวํ จตฺตาโร ปาเท ตถา กตฺวา อตฺตโน นิจฺจลภาวกรณตฺถํ. มณฺฑเลติ มณฺฑลธาวิกายํ. ปถวีกมเนติ ปถวึ ผุฏฺฐมตฺเตน คมเน. เตนาห ‘‘อคฺคคฺคขุเรหี’’ติ. โอกฺกนฺตกรณสฺมินฺติ โอกฺกนฺเตตฺวา ปรเสนาสมฺมทฺทน โอกฺกนฺตกรเณ. เอกสฺมึ ฐาเนติ จตูสุ ปาเทสุ ยตฺถ กตฺถจิ เอกสฺมึ ฐาเน คมนํ โจเทนฺตีติ อตฺโถ, โส ปเนตฺถ สีฆตโร อธิปฺเปโต. ทวตฺเตติ มริยาทาโกปเนหิ นานปฺปโยชเน, ปรเสนาย ปวตฺตมหานาทปหรเณหิ อตฺโถ. เตนาห ‘‘ยุทฺธกาลสฺมิ’’นฺติอาทิ. ‘अनुक्कमे’ म्हणजे अनुरूप गतीने चालणे. त्या त्या अवस्थेनुसार पाय उचलणे आणि ठेवणे. म्हणूनच ‘चार पाय’ इत्यादी म्हटले आहे. ‘रज्जुबंधनविधानाने’ म्हणजे पायाला जमिनीवरून सोडवण्याच्या विधानाने. ‘असे करण्यासाठी’ म्हणजे जसे घोड्यावर बसलेल्या अवस्थेतच जमीन पकडता येऊ शकते, तसे चार पाय करून स्वतःला निश्चल (स्थिर) करण्यासाठी. ‘मंडले’ म्हणजे वर्तुळाकार धावण्यात. ‘पथवीकमने’ म्हणजे जमिनीला केवळ स्पर्श करत चालण्यात. म्हणूनच ‘खुरांच्या टोकांनी’ असे म्हटले आहे. ‘ओक्कंतकरणस्मिं’ म्हणजे शत्रूच्या सैन्यावर चाल करून जाऊन त्यांना चिरडण्याच्या क्रियेत. ‘एका ठिकाणी’ म्हणजे चार पायांपैकी कोणत्याही एका ठिकाणी जाण्यास प्रवृत्त करणे असा अर्थ आहे, येथे अधिक वेगवान गती अभिप्रेत आहे. ‘दवत्ते’ म्हणजे मर्यादांचे उल्लंघन करून विविध प्रयोजनांसाठी, शत्रूच्या सैन्यातून निघणाऱ्या मोठ्या आवाजाला नष्ट करण्याच्या अर्थाने. म्हणूनच ‘युद्धकाळात’ इत्यादी म्हटले आहे। รญฺญา ชานิตพฺพคุเณติ ยถา ราชา อสฺสสฺส คุเณ ชานาติ, เอวํ เตน ชานิตพฺพคุณการณํ กาเรติ. อสฺสราชวํเสติ ทุสฺสหํ ทุกฺขํ ปตฺวาปิ ยถา อยํ ราชวํสานุรูปกิริยํ น ชหิสฺสติ, เอวํ สิกฺขาปเน. สิกฺขาปนเมว หิ สนฺธาย สพฺพตฺถ ‘‘การณํ กาเรตี’’ติ วุตฺตํ ตสฺส กรณการาปนปริยายตฺตา. ‘राजाला समजण्याजोगे गुण’ म्हणजे जसे राजा घोड्याचे गुण जाणतो, तसे त्याला समजण्याजोग्या गुणांचे प्रशिक्षण करवून घेतो. ‘अश्वराजवंशात’ म्हणजे असह्य दुःख प्राप्त झाले तरी हा घोडा राजवंशाला अनुरूप असलेली क्रिया सोडणार नाही, अशा प्रकारे प्रशिक्षण देण्यात. प्रशिक्षणाचाच संदर्भ घेऊन सर्वत्र ‘कारण करवून घेतो’ असे म्हटले आहे, कारण ते कार्य करवून घेण्याचा एक पर्याय आहे। ยถา [Pg.74] อุตฺตมชโว โหตีติ ชวทสฺสนฏฺฐาเน ยถา หโย อุตฺตมชวํ น หาเปสิ, เอวํ สิกฺขาเปติ. อุตฺตมหยภาเว, ยถา อุตฺตมหโย โหตีติ กมฺมกรณกาเล อตฺตโน อุตฺตมสภาวํ อนิคุหิตฺวา อวชฺเชตฺวา ยถา อตฺถสิทฺธิ โหติ, เอวํ ปรมชเวน สิกฺขาเปติ. ยถา กิริยา วินา ทพฺพมฺปิ วินา กิริยํ น ภวติ, เอวํ ทฏฺฐพฺพนฺติ ทสฺเสตุํ ‘‘ตตฺถ ปกติยา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘ज्यामुळे तो उत्तम वेगाचा होतो’ म्हणजे वेग दाखवण्याच्या ठिकाणी जसा घोडा आपला उत्तम वेग सोडत नाही, तसे त्याला प्रशिक्षण देतो. उत्तम घोड्याच्या भावात, ‘ज्यामुळे तो उत्तम घोडा होतो’ म्हणजे काम करण्याच्या वेळी आपला उत्तम स्वभाव न लपवता, त्याचे चिंतन करून जशी कार्यसिद्धी होते, तसे परम वेगाने प्रशिक्षण देतो. जसे क्रियेशिवाय द्रव्य आणि द्रव्याशिवाय क्रिया होत नाही, असे समजले पाहिजे, हे दर्शवण्यासाठी ‘तेथे प्रकृतीने’ इत्यादी म्हटले आहे। ตตฺราติ ตสฺมึ ปกติยา อุตฺตมหยสฺเสว อุตฺตมหยการณารหตฺตา อุตฺตมชวปฏิปชฺชเน. มาสขาทกโฆฏกานนฺติ มาสํ ขาทิตฺวา ยถา ตถา วิคุณขลุงฺคกานํ. วลญฺชกทณฺฑนฺติ รญฺญา คเหตพฺพสุวณฺณทณฺฑํ. ธาตุปตฺถทฺโธติ อตฺตนาว สมุปฺปาทิตธาตุยา อุปตฺถมฺภิโต หุตฺวา. ‘तत्र’ म्हणजे त्यामध्ये, स्वभावाने उत्तम घोड्याप्रमाणे उत्तम घोड्याच्या योग्यतेमुळे उत्तम वेगाची प्राप्ती करण्यामध्ये. ‘मासखादकघोटकानं’ म्हणजे उडीद खाऊन जसे तसे वागणाऱ्या दुर्गुणी घोड्यांचे. ‘वलञ्जकदण्डं’ म्हणजे राजाने धारण करण्याचा सोन्याचा दंड. ‘धातुपत्थद्धो’ म्हणजे स्वतःच उत्पन्न केलेल्या धातूने (शारीरिक घटकाने) आधारलेला होऊन. อุตฺตเม สาขลฺเยติ ปรมสขิลภาเว สขิลวาจาย เอว ทเมตพฺพตาย. เตนาห ‘‘มุทุวาจาย หี’’ติอาทิ. ‘उत्तमे साखल्ये’ म्हणजे परम मधुरतेमध्ये (मैत्रीभावात), केवळ मधुर वाणीनेच दमन करण्यायोग्य असल्यामुळे. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘मृदू वाणीनेच’ इत्यादी. อรหตฺตผลสมฺมาทิฏฺฐิยาติ ผลสมาปตฺติกาเล ปวตฺตสมฺมาญาณํ. สมฺมาญาณํ ปุพฺเพ วุตฺตสมฺมาทิฏฺฐิเยวาติ ปน อิทํ ผลสมฺมาทิฏฺฐิภาวสามญฺเญน วุตฺตํ. เกจิ ปน ‘‘ปจฺจเวกฺขณญาณ’’นฺติ วทนฺติ, ตํ น ยุชฺชติ ‘‘อเสกฺเขนา’’ติ วิเสสิตตฺตา. ตมฺปิ อเสกฺขญาณนฺติ เจ? เอวมฺปิ นิปฺปริยาย เสกฺขคฺคหเณ ปริยายเสกฺขคฺคหณํ น ยุตฺตเมว, กิจฺจเภเทน วา วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. เอกา เอว หิ สา ปญฺญา นิพฺพานสฺส ปจฺจกฺขกิริยาย สมฺมาทสฺสนกิจฺจํ อุปาทาย ‘‘สมฺมาทิฏฺฐี’’ติ วุตฺตา, สมฺมาชานนกิจฺจํ อุปาทาย ‘‘สมฺมาญาณ’’นฺติ. อญฺญาตาวินฺทฺริยวเสน วา สมฺมาทิฏฺฐิ, ปญฺญินฺทฺริยวเสน สมฺมาญาณนฺติ เอวเมตฺถ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. มคฺคผลาวหาย เทสนาย สงฺเขปโตว อาคตตฺตา วุตฺตํ ‘‘อุคฺฆฏิตญฺญุปุคฺคลสฺส วเสนา’’ติ. ‘अरहत्तफलसम्मादिट्ठि’ म्हणजे फलसमापत्तीच्या वेळी प्रवृत्त झालेले सम्यक् ज्ञान. पूर्वी सांगितलेली सम्यक् दृष्टीच सम्यक् ज्ञान आहे, हे फल-सम्यक् दृष्टीच्या सामान्य भावाने म्हटले आहे. काही जण याला ‘पच्चवेक्खणञाण’ (प्रत्यवेक्षण ज्ञान) म्हणतात, ते योग्य नाही; कारण ‘असेक्ख’ (अशैक्ष) असे विशेषण दिले आहे. जर तेही अशैक्ष ज्ञान आहे असे म्हटले, तरीही मुख्य अर्थाने शैक्षाचे ग्रहण असताना लाक्षणिक अर्थाने शैक्षाचे ग्रहण करणे योग्य नाही, किंवा कार्याच्या भेदाने म्हटले आहे असे समजावे. कारण ती एकच प्रज्ञा निर्वाणाच्या साक्षात्कारासाठी सम्यक् दर्शनाचे कार्य घेऊन ‘सम्मादिट्ठि’ (सम्यक् दृष्टी) म्हटली जाते, आणि सम्यक् जाणण्याचे कार्य घेऊन ‘सम्माञाण’ (सम्यक् ज्ञान) म्हटली जाते. किंवा ‘अञ्ञाताविन्द्रिय’ च्या दृष्टीने सम्यक् दृष्टी, आणि ‘पञ्ञिन्द्रिय’ च्या दृष्टीने सम्यक् ज्ञान, असा येथे अर्थ समजावा. मार्ग आणि फल देणाऱ्या देशनेमध्ये संक्षेपानेच आल्यामुळे ‘उग्घटितञ्ञूपुग्गल’ (तीव्र बुद्धीच्या व्यक्तीच्या) दृष्टीने असे म्हटले आहे. ภทฺทาลิสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. भद्दालिसुत्तवर्णनेची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๖. ลฏุกิโกปมสุตฺตวณฺณนา ६. लतुकिकोपमसुत्तवर्णना (लतुकिकोपम सुत्ताची व्याख्या). ๑๔๘. มหาอุทายิตฺเถโรติ กาฬุทายิลาฬุทายิตฺเถเรหิ อญฺโญ มหาเทหตาย มหาอุทายีติ สาสเน ปญฺญาโต เถโร. อปหริ อปหรติ อปหริสฺสตีติ อปหตฺตา. เตกาลิโก หิ อยํ [Pg.75] สทฺโท. อุปหตฺตาติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย. อปหารโกติ อปเนตา. อุปหารโกติ อุปเนตา. १४८. ‘महाउदायी थेर’ म्हणजे काळुदायी आणि लाळुदायी थेरांपेक्षा वेगळे, विशाल शरीरामुळे ‘महाउदायी’ म्हणून बुद्ध शासनात प्रसिद्ध असलेले थेर होत. ज्याने हरण केले, जो हरण करतो, जो हरण करेल, तो ‘अपहत्ता’ (अपहर्ता). हा शब्द त्रैकालिक आहे. ‘उपहत्ता’ (उपहर्ता) यामध्येही हाच नियम आहे. ‘अपहारक’ म्हणजे दूर करणारा. ‘उपहारक’ म्हणजे जवळ आणणारा. ๑๔๙. ยนฺติ ภุมฺมตฺเถ ปจฺจตฺตวจนํ, เตน จ อนนฺตรนิทฺทิฏฺฐสมโย ปจฺจามฏฺโฐติ อาห ‘‘ยสฺมึ สมเย’’ติ. น ภควนฺตํ ปฏิจฺจาติ น ภควนฺตํ อารมฺมณํ กตฺวา. १४९. ‘यं’ हे सप्तमीच्या अर्थात प्रथमा विभक्तीचे रूप आहे, आणि त्याने लगेचच निर्दिष्ट केलेल्या वेळेचा निर्देश केला आहे, म्हणून म्हटले आहे— ‘ज्या वेळी’ (यस्मिं समये). ‘न भगवन्तं पटिच्च’ म्हणजे भगवंतांना आलंबन न बनवता. กมฺมนิปฺผนฺนตฺถนฺติ อตฺตนา อายาจิยมานกมฺมสิทฺธิอตฺถํ. ภวตีติ ภู, น ภูติ อภู, ภยวเสน ปน สา อิตฺถี ‘‘อภุ’’นฺติ อาห. อาตุ มาตูติ เอตฺถ ยถา – ‘कम्मनिप्फन्नत्थं’ म्हणजे स्वतः प्रार्थना केलेल्या कार्याच्या सिद्धीसाठी. ‘भवति’ म्हणजे ‘भू’ (होणे), ‘न भू’ म्हणजे ‘अभू’ (न होणे), परंतु भीतीने त्या स्त्रीने ‘अभू’ असे म्हटले. ‘आतु मातू’ यामध्ये जसे— ‘‘องฺคา องฺคา สมฺภวสิ, หทยา อธิชายเส; อตฺตา เอว ปุตฺต นามาสิ, ส ชีว สรโทสต’’นฺติ. – “तू प्रत्येक अवयवातून उत्पन्न झाला आहेस, हृदयातून जन्मला आहेस; हे पुत्रा, तू माझा आत्माच आहेस, तू शंभर वर्षे जग.” อาทีสุ ปุตฺโต ‘‘อตฺตา’’ติ วุจฺจติ กุลวเสน สนฺตาเน ปวตฺตนโต. เอวํ ปิตาปิ ‘‘ปุตฺตสฺส อตฺตา’’ติ วุจฺจติ. ยสฺมา ‘‘ภิกฺขุสฺส อตฺตา มาตา’’ติ วตฺถุกามา ภยวเสน ‘‘อาตุ มาตู’’ติ อาห. เตนาห ‘‘อาตูติ ปิตา’’ติอาทิ. इत्यादींमध्ये पुत्राला ‘आत्मा’ म्हटले जाते, कारण कुळाच्या परंपरेने वंश चालू राहतो. याचप्रमाणे पित्यालाही ‘पुत्राचा आत्मा’ म्हटले जाते. ज्या अर्थी ‘भिक्खूचा आत्मा माता आहे’, त्या अर्थी कामवासनेने युक्त असलेल्या स्त्रीने भीतीने ‘आतु मातू’ असे म्हटले. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘आतू म्हणजे पिता’ इत्यादी. ๑๕๐. เอวเมวนฺติ อิทํ ครหตฺถโชตนนิปาตปทนฺติ วุตฺตํ ‘‘ครหนฺโต อาหา’’ติ. ตถา หิ นํ วาจกสทฺเทเนว ทสฺเสนฺโต ‘‘อิเธกจฺเจ โมฆปุริสา’’ติ อาห. อาหํสูติ เตสํ ตถา วจนสฺส อวิจฺเฉเทน ปวตฺติทีปนนฺติ อาห ‘‘วทนฺตี’’ติ. กึ ปนิมสฺส อปฺปมตฺตกสฺสาติ ปหาตพฺพวตฺถุํ อวมญฺญมาเนหิ วุตฺตํ. เตนาห ‘‘กึ ปนา’’ติ. เหตุมฺหิ โชเตตพฺเพ เจตํ สามิวจนํ ยถา ‘‘อนุสฺสวสฺส เหตุ, อชฺเฌนสฺส เหตู’’ติ. เตนาห ‘‘อปฺปมตฺตกสฺส เหตู’’ติ. นนุ อปสฺสนฺเตน วิย อสุณนฺเตน วิย ภวิตพฺพนฺติ? สตฺถารา นาม อปฺปมตฺตเกสุ โทเสสุ อปสฺสนฺเตน วิย จ อสุณนฺเตน วิย จ ภวิตพฺพนฺติ เตสํ อธิปฺปาเยน วิวรณํ. เตสุ จาติ สิกฺขากาเมสุ จ. อปฺปจฺจยํ อุปฏฺฐาเปนฺตีติ อาเนตฺวา สมฺพนฺธิตพฺพนฺติ ทสฺเสติ. เตสนฺติ เย ‘‘โมฆปุริสา’’ติ วุตฺตา ปุคฺคลา, เตสํ. คเล พทฺธํ มหากฏฺฐนฺติ คเล โอลมฺเพตฺวา พทฺธํ รุกฺขทณฺฑมาห. ปูติลตายาติ คโลจิยา. ปาราชิกวตฺถุ วิย ทุปฺปชหํ โหตีติ ฉนฺทกปฺปหานวเสน ตํ ปชหิตุํ น สกฺโกติ. १५०. ‘एवमेव’ हे निंदा दर्शवणारे निपात पद आहे, म्हणून म्हटले आहे— ‘निंदा करत म्हणाले’. कारण त्यांना वाचक शब्दानेच दाखवताना ‘येथे काही मोघपुरुष (मूर्ख लोक)’ असे म्हटले आहे. ‘आहंसु’ म्हणजे त्यांच्या त्या बोलण्याचा अखंड प्रवाह दर्शवण्यासाठी म्हटले आहे— ‘म्हणतात’ (वदन्ति). ‘या अल्पशा गोष्टीचे काय?’ हे सोडण्यायोग्य वस्तूचा अनादर करणाऱ्यांनी म्हटले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘काय पण...’ (किं पना). हेतू दर्शवायचा असताना ही षष्ठी विभक्ती आहे, जसे ‘अनुश्रवाच्या हेतूने, अध्ययनाच्या हेतूने’. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘अल्पशा गोष्टीच्या हेतूने’ (अप्पमत्तकस्स हेतू). ‘काय, न पाहिल्यासारखे आणि न ऐकल्यासारखे राहिले पाहिजे ना?’ शास्त्यांनी (बुद्धांनी) लहान दोषांकडे न पाहिल्यासारखे आणि न ऐकल्यासारखे राहिले पाहिजे, या त्यांच्या अभिप्रायाचे हे स्पष्टीकरण आहे. ‘तेसु च’ म्हणजे शिक्षणाची इच्छा असणाऱ्यांमध्ये. ‘अप्पच्चयं उपट्ठापेन्ति’ म्हणजे आणून जोडले पाहिजे हे दर्शवते. ‘तेसं’ म्हणजे ज्यांना ‘मोघपुरुष’ म्हटले आहे त्या व्यक्तींचे. ‘गले बद्धं महाकट्ठं’ म्हणजे गळ्यात लटकवून बांधलेला मोठा लाकडाचा ओंडका. ‘पूतिलताया’ म्हणजे गुळवेलीने. पाराजिकाच्या वस्तू (गुन्ह्या) प्रमाणे ते सोडणे कठीण होते, कारण इच्छेचा त्याग न केल्यामुळे ते त्याचा त्याग करू शकत नाहीत. ๑๕๑. อนุสฺสุกฺกาติ [Pg.76] ตสฺส ปหาตพฺพสฺส ปหาเน อุสฺสุกฺกรหิตา. อปจฺจาสีสนปกฺเขติ ตาย ปรทตฺตวุตฺติตาย กสฺสจิ ปจฺจยสฺส กุโตจิ อปจฺจาสีสกปกฺเข ฐิตา หุตฺวา สุปฺปชหํ โหติ, น ตสฺส ปหาเน ภาริยํ อตฺถิ. १५१. ‘अनुस्सुक्का’ म्हणजे त्या त्याग करण्यायोग्य गोष्टीचा त्याग करण्याविषयी उत्सुकता नसलेले (प्रयत्नहीन). ‘अपच्चaसीसनपक्खे’ म्हणजे दुसऱ्याने दिलेल्यावर उपजीविका करत असल्यामुळे, कोणत्याही प्रत्ययाची (साधनाची) कोठूनही अपेक्षा न ठेवण्याच्या पक्षात राहून ते सहज सोडता येण्यासारखे असते, त्याचा त्याग करणे कठीण नसते. ๑๕๒. ทลิทฺโท ทุคฺคโต. อสฺสโกติ อสาปเตยฺโย. เคหยฏฺฐิโยติ เคหฉทนสฺส อาธารา, ตา อุชุกํ ติริยํ ฐเปตพฺพทณฺฑา. สมนฺตโต ภิตฺติปาเทสุ ฐเปตพฺพทณฺฑา มณฺฑลา. กากาติทายินฺติ อิโต จิโต กาเกหิ อติปาตวเสน อุฑฺเฑตพฺพํ. เตนาห ‘‘ยตฺถ กิญฺจิเทวา’’ติอาทิ. สูรกากาติ กากานํ อุฑฺเฑปนาการมาห. นปรมรูปนฺติ หีนรูปํ. วิลีวมญฺจโกติ ตาลเวตฺตกาทีหิ วีตมญฺจโก. สา ปนสฺส สนฺตานานํ ฉินฺนภินฺนตาย โอลุคฺควิลุคฺคตา, ตถา สติ สา วิสมรูปา โหตีติ อาห ‘‘โอณตา’’ติอาทิ. โส ปุคฺคโล ลูขโภชี โหตีติ อาห ‘‘ธญฺญํ นาม กุทฺรูสโก’’ติ. สมกาลํ วปิตพฺพตาย สมวาปกํ, ยถาอุตุ วปิตพฺพพีชํ. ชายิกาติ กุจฺฉิตา ภริยา, สพฺพตฺถ ครหายํ ก-สทฺโท. โส วตาหํ ปพฺพเชยฺยนฺติ โสหํ เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา ปพฺพเชยฺยํ, โยหํ ปุริโส นาม อสฺสํ วตาติ ปพฺพชฺชาวเสน อตฺตโน ปุริสํ โพเธยฺย. ตํสภาเว ฐิตสฺส โพธา น ตุ ทุกฺกรา, สา ขโฏปิกา. สา กุมฺภี. เมณฺฑกเสฏฺฐิโน อฑฺฒเตฬสานิ โกฏฺฐาคารสตานิ วิย. १५२. ‘दरिद्री’ म्हणजे दुर्गतीला गेलेला. ‘अस्सको’ म्हणजे संपत्ती नसलेला. ‘गेहयट्ठियो’ म्हणजे घराच्या छपराचे आधार, ते सरळ किंवा आडवे ठेवलेले लाकूड. भिंतीच्या पायाभोवती सर्व बाजूंनी ठेवलेले लाकूड म्हणजे ‘मण्डल’. ‘काकातिदायिं’ म्हणजे इकडे तिकडे कावळ्यांनी उडून जाण्यासारखे. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘जिथे काहीही...’ इत्यादी. ‘सूरकाका’ म्हणजे कावळ्यांच्या उडण्याची पद्धत सांगितली आहे. ‘नपरमरूपं’ म्हणजे हीन रूप (कुरूप). ‘विलीवमञ्चको’ म्हणजे ताड किंवा वेताने विणलेली खाट. परंतु ती दोऱ्या तुटल्यामुळे मोडकळीस आलेली असते, तसे असल्यामुळे ती विषम आकाराची होते, म्हणून म्हटले आहे— ‘वाकलेली’ इत्यादी. तो मनुष्य निकृष्ट अन्न खाणारा असतो, म्हणून म्हटले आहे— ‘धान्य म्हणजे कोद्रू’ (कुद्रूसको). एकाच वेळी पेरणी करण्यायोग्य असल्यामुळे ‘समवापक’, ऋतूनुसार पेरण्याचे बी. ‘जायिका’ म्हणजे निंदनीय पत्नी, सर्वत्र निंदेच्या अर्थात ‘क’ प्रत्यय लागतो. ‘तो मी खरोखर प्रव्रजित व्हावे’ म्हणजे तो मी केस आणि दाढी काढून प्रव्रजित व्हावे, जो मी खरोखर पुरुष आहे, असे प्रव्रज्येच्या माध्यमातून स्वतःच्या पुरुषत्वाची जाणीव करून देईल. त्या स्वभावात राहिलेल्याला जाणीव होणे कठीण नाही, ती ‘खटोपिका’ (लहान खाट). ती ‘कुंभी’ (मातीचे भांडे). मेंडक श्रेष्ठीच्या साडेबाराशे कोठारांप्रमाणे. ๑๕๓. สุวณฺณนิกฺขสตานนฺติ อเนเกสํ สุวณฺณนิกฺขสตานํ. จโยติ สนฺตาเนหิ นิจโย อวีจิ นิจฺจปฺปพนฺธนิจโย. เตนาห ‘‘สนฺตานโต กตสนฺนิจโย’’ติ. १५३. ‘सुवण्णनिक्खसतानं’ म्हणजे अनेक शेकडो सोन्याच्या निष्कांचे (नाण्यांचे). ‘चयो’ म्हणजे परंपरेने झालेला संग्रह, अखंड आणि निरंतर चालणारा संग्रह. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘परंपरेने केलेला संग्रह’ (सन्तानतो कतसन्निचयो). ๑๕๔. เหฏฺฐา กิญฺจาปิ อปฺปชหนกา ปฐมํ ทสฺสิตา, ปชหนกา ปธานา, เตสญฺจ วเสเนตฺถ ปุคฺคลจตุกฺกํ ทสฺสิตํ. เต ตญฺเจว ปชหนฺตีติ ปชหนกา ปฐมํ คหิตา. ราสิวเสนาติ ‘‘อิธุทายิ เอกจฺโจ ปุคฺคโล’’ติอาทินา จตุกฺเก อาคตวิภาคํ อนามสิตฺวา ‘‘เต เต’’ติ ปจุรวเสน วุตฺตํ. เตนาห ‘‘น ปาฏิเยกฺกํ วิภตฺตา’’ติ. อวิภาเคน คหิตวตฺถูสุ วิภาคโต คหณํ โลกสิทฺธเมตนฺติ ทสฺเสตุํ ‘‘ยถา นามา’’ติอาทิ [Pg.77] วุตฺตํ. ปชหนกปุคฺคลาติ ‘‘เต ตญฺเจว ปชหนฺตี’’ติ เอวํ ปชหนกปุคฺคลา เอว. १५४. जरी खाली (पूर्वी) न सोडणारे (अप्पजहनक) प्रथम दर्शविले आहेत, तरी सोडणारे (पजहनक) हे प्रधान आहेत, आणि त्यांच्याच प्रभावाने येथे चार व्यक्तींचा समूह (पुग्गलचतुक्क) दर्शविला आहे. 'ते त्यालाच सोडतात' म्हणून सोडणारे (पजहनक) प्रथम घेतले आहेत. 'राशिवशाने' म्हणजे "येथे, उदायी, एखादी व्यक्ती" इत्यादी चार प्रकारांत आलेल्या विभागाचा उल्लेख न करता, "ते ते" अशा सामान्य (प्रचुर) रूपाने म्हटले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - "स्वतंत्रपणे विभागलेले नाहीत" (न पाटियेक्कं विभत्ता). अविभाजितपणे घेतलेल्या गोष्टींमध्ये विभागाद्वारे ग्रहण करणे हे लोकसिद्ध आहे, हे दर्शविण्यासाठी "जसे की" (यथा नामा) इत्यादी म्हटले आहे. 'पजहनकपुग्गल' (सोडणारे व्यक्ती) म्हणजे "ते त्यालाच सोडतात" अशा प्रकारे सोडणारे व्यक्तीच होत. อุปธิอนุธาวนกาติ อุปธีสุ อนุอนุธาวนกา อุปธิโย อารพฺภ ปวตฺตนกา. วิตกฺกาเยวาติ กามสงฺกปฺปาทิวิตกฺกาเยว. อินฺทฺริยนานตฺตตาติ วิมุตฺติปริปาจกานํ อินฺทฺริยานํ ปโรปริยตฺตํ. ตสฺส หิ วเสเนว เต จตฺตาโร ปุคฺคลา ชาตา. อคฺคมคฺคตฺถาย วิปสฺสนํ อุสฺสุกฺกาเปตฺวา ยาว น ตํ มคฺเคน สมุคฺฆาเตนฺติ, ตาว นปฺปชหนฺติ นาม. อิติ เหฏฺฐิมา ตโยปิ อริยา อปฺปหีนสฺส กิเลสสฺส วเสน ‘‘นปฺปชหนฺตี’’ติ วุตฺตา, ปเคว ปุถุชฺชนา. วุตฺตนเยน ปน วิปสฺสนํ มคฺเคน ฆเฏนฺตา เต จตฺตาโร ชนา อคฺคมคฺคกฺขเณ ปชหนฺติ นาม. เต เอว ตตฺถ สีฆการิโน ขิปฺปํ ปชหนฺติ นาม, เตนาห ‘‘ตตฺถา’’ติอาทิ. 'उपाधिअनुधावनक' म्हणजे उपाधींच्या मागे धावणारे, उपाधींना अनुसरून प्रवृत्त होणारे. 'वितर्कच' (वितक्कायेव) म्हणजे कामसंकल्प इत्यादी वितर्कच. 'इंद्रियनानात्तता' (इंद्रियांची भिन्नता) म्हणजे विमुक्ती परिपक्व करणाऱ्या इंद्रियांची उच्च-नीचता (परोपरियत्त). कारण त्याच्याच प्रभावाने ते चार व्यक्ती निर्माण होतात. अग्रमार्गाच्या (अर्हत्-मार्गाच्या) प्राप्तीसाठी विपश्यनेला उद्युक्त करून जोपर्यंत ते मार्गाने त्याचा (क्लेशांचा) समूळ नाश करत नाहीत, तोपर्यंत ते 'सोडत नाहीत' असे म्हटले जाते. अशा प्रकारे, खालील तिन्ही आर्य (श्रोतापन्न, सकदागामी, अनागामी) नष्ट न झालेल्या क्लेशांच्या वशाने "सोडत नाहीत" असे म्हटले आहे, मग पृथग्जनांविषयी (पुथुज्जन) काय सांगावे! सांगितलेल्या पद्धतीने विपश्यनेला मार्गाशी जोडणारे ते चार लोक अग्रमार्ग-क्षणी (अर्हत्-मार्ग क्षणी) खरोखरच सोडतात. तेच तेथे शीघ्र कार्य करणारे असून त्वरित सोडतात, म्हणूनच "तेथे" (तत्थ) इत्यादी म्हटले आहे. สํเวคํ กตฺวา อคฺคึ อกฺกนฺตปุริโส วิย. มคฺเคนาติ อนุกฺกมาคเตน อคฺคมคฺเคน. มหาหตฺถิปโทปเมติ มหาหตฺถิปโทปมสุตฺเต (ม. นิ. ๑.๓๐๐ อาทโย). ตตฺถ หิ ‘‘ตสฺส ธาตารมฺมณเมว จิตฺตํ ปกฺขนฺทติ ปสีทติ สนฺติฏฺฐติ อธิมุจฺจตี’’ติ (ม. นิ. ๑.๓๐๒) เอตฺถ อติติกฺขนาติติกฺข-นาติมนฺทอติมนฺท-ปุคฺคลวเสน อฏฺฐกถายํ (ม. นิ. อฏฺฐ. ๒.๓๐๒) ตโย วารา อุทฺธฏา, ตตฺถ มชฺฌิมวเสเนว ปญฺโห กถิโต. อินฺทฺริยภาวเนติ อินฺทฺริยภาวนาสุตฺเต, ตตฺถาปิ มชฺฌิมนเยเนว ปญฺโห กถิโต. เตนาห ‘‘อิเมสู’’ติอาทิ. संवेग उत्पन्न करून अग्नीवर पाय ठेवलेल्या माणसाप्रमाणे. 'मार्गाने' (मग्गेन) म्हणजे अनुक्रमाने प्राप्त झालेल्या अग्रमार्गाने (अर्हत्-मार्गाने). 'महाहत्थिपदोपम' मध्ये म्हणजे महाहत्थिपदोपम सुत्तात (मज्झिम निकाय १.३०० इत्यादी). कारण तेथे "त्याचे चित्त धातूच्या आलंबनाकडेच झेपावते, प्रसन्न होते, स्थिर होते आणि अधिमुक्त होते" (मज्झिम निकाय १.३०२) येथे अति-तीक्ष्ण, अति-तीक्ष्ण नसलेले, अति-मंद आणि अति-मंद नसलेल्या व्यक्तींच्या वशाने अट्ठकथेत तीन वेळा (वार) उद्धृत केले आहे, तेथे मध्यम मार्गानेच (मध्यम वशानेच) प्रश्न विचारला आहे. 'इंद्रियभावना' मध्ये म्हणजे इंद्रियभावना सुत्तात, तेथेही मध्यम पद्धतीनेच प्रश्न विचारला आहे. म्हणूनच "यांमध्ये" (इमेसू) इत्यादी म्हटले आहे. ตนฺติ ‘‘อุปธี’’ติ วุตฺตํ ขนฺธปญฺจกํ. ทุกฺขสฺส มูลนฺติ สพฺพสฺสปิ วฏฺฏทุกฺขสฺส การณํ. นิคฺคหโณติ นิรุปาทาโน. เตนาห ‘‘นิตฺตณฺโห’’ติ. 'ते' (तं) म्हणजे 'उपाधी' असे म्हटलेले पंचस्कंध (खन्धपञ्चक). 'दुःखाचे मूळ' (दुक्खस्स मूलं) म्हणजे सर्वच संसार-दुःखाचे (वट्टदुक्ख) कारण. 'निग्गहणो' म्हणजे उपादानरहित (निरुपादानो). म्हणूनच "तृष्णारहित" (नित्तण्हो) असे म्हटले आहे. ๑๕๕. เย ปชหนฺตีติ ‘‘เต ตญฺเจว ปชหนฺตี’’ติ เอวํ วุตฺตปุคฺคลา. เต อิเม นาม เอตฺตเก กิเลเส ปชหนฺตีติ เย เต ปุถุชฺชนา ลาภิโน จ ปญฺจ กามคุเณ เอตฺตเก ตํตํฌานาทิวตฺถุเก จ ตํตํมคฺควชฺฌตาย ปริจฺฉินฺนตฺตา เอตฺตเก กิเลเส ปชหนฺติ. เย นปฺปชหนฺตีติ เอตฺถ วุตฺตนยานุสาเรน อตฺโถ เวทิตพฺโพ. อสุจิสุขํ กายาสุจิสนฺนิสฺสิตตฺตา. อนริเยหีติ อปริสุทฺเธหิ. ปฏิลาภโต ภายิตพฺพํ กิเลสทุกฺขคติกตฺตา. วิปากโต ภายิตพฺพํ อปายทุกฺขคติกตฺตา. คณโตปิ กิเลสโตปิ วิวิตฺตสุขนฺติ คณสงฺคณิกโต จ กิเลสสงฺคณิกโต [Pg.78] จ วิวิตฺตสุขํ. ราคาทิวูปสมตฺถายาติ ราคาทิวูปสมาวหํ สุขํ. น ภายิตพฺพํ สมฺปติ อายติญฺจ เอกนฺตหิตภาวโต. १५५. 'जे सोडतात' (ये पजहन्ति) म्हणजे "ते त्यालाच सोडतात" असे म्हटलेले व्यक्ती. 'ते या नावाचे एवढे क्लेश सोडतात' म्हणजे जे पृथग्जन आणि (ध्यान) लाभ घेणारे आहेत, ते पाच कामगुणांना, एवढ्या त्या त्या ध्यान इत्यादींच्या विषयांना आणि त्या त्या मार्गाने नष्ट होणारे असल्यामुळे मर्यादित (परिच्छिन्न) झालेल्या एवढ्या क्लेशांना सोडतात. 'जे सोडत नाहीत' (ये नप्पजहन्ति) याचा अर्थ येथे सांगितलेल्या पद्धतीने समजून घ्यावा. 'अशुची सुख' (असुचिसुखं) म्हणजे शरीराच्या अशुद्धतेवर आश्रित असल्यामुळे. 'अनार्यांद्वारे' (अनारियेहि) म्हणजे अपवित्र (अपरिसुद्ध) लोकांद्वारे. प्राप्तीपासून घाबरले पाहिजे, कारण ते क्लेश आणि दुःखाच्या गतीचे (परिणामाचे) असते. विपाकापासून (परिणामापासून) घाबरले पाहिजे, कारण ते अपाय (दुर्गती) आणि दुःखाच्या गतीचे असते. समूहापासून आणि क्लेशांपासून विविक्त (अलिप्त) सुख म्हणजे जनसमुदायाच्या संसर्गापासून (गणसंगणिका) आणि क्लेशांच्या संसर्गापासून (किलेससंगणिका) अलिप्त असलेले सुख. 'रागादींच्या उपशमासाठी' (रागादिवूपसमत्थाय) म्हणजे राग इत्यादींचा उपशम घडवून आणणारे सुख. घाबरण्याचे कारण नाही, कारण ते वर्तमानकाळात आणि भविष्यकाळात अत्यंत हितकारक असते. ๑๕๖. อิญฺชิตสฺมินฺติ ปจฺจตฺเต ภุมฺมวจนนฺติ อาห ‘‘อิญฺชน’’นฺติอาทิ. อิญฺชติ เตนาติ อิญฺชิตํ, ตสฺส ตสฺส ฌานสฺส โขภกรํ โอฬาริกํ ฌานงฺคํ. จตุตฺถชฺฌานํ อนิญฺชนํ สนฺนิสินฺนาภาวโต. ตถา หิ วุตฺตํ ‘‘ฐิเต อาเนญฺชปฺปตฺเต’’ติ (ที. นิ. ๑.๒๔๔-๒๔๕; ม. นิ. ๑.๓๘๔-๓๘๖; ปารา. ๑๒-๑๓). १५६. 'इंजितस्मिं' (कंपनात/चलनात) हे वैयक्तिक अर्थातील सप्तमी विभक्तीचे रूप आहे, म्हणून "इंजनं" (कंपन/चलन) इत्यादी म्हटले आहे. ज्याच्याद्वारे कंपन होते ते 'इंजित' (कंपित) होय, जे त्या त्या ध्यानात खळबळ माजवणारे ओळारिक (स्थूल) ध्यानांग असते. चौथे ध्यान (चतुत्थज्झान) हे अकंपित (अनिंजन) असते, कारण त्यात (स्थूल ध्यानांगांचे) अस्तित्व नसते (सन्निसिन्नाभावतो). कारण तसेच म्हटले आहे - "स्थिर आणि अकंपित अवस्थेला प्राप्त झालेल्या" (ठिते आनेञ्जपत्ते). อลํ-สทฺโท ยุตฺตตฺโถปิ โหติ – ‘‘อลเมว นิพฺพินฺทิตุํ, อลํ วิมุจฺจิตุ’’นฺติอาทีสุ (ที. นิ. ๒.๒๗๒; สํ. นิ. ๒.๑๒๔, ๑๒๘, ๑๓๔, ๑๔๓), ตสฺมา อนลํ อนุสงฺคํ กาตุํ อยุตฺตนฺติ อตฺโถ. เตนาห ‘‘อกตฺตพฺพอาลยนฺติ วทามี’’ติ. สนฺนิฏฺฐานนฺติ สมฺมาปฏิปตฺติยํ อลํ เอตฺตาวตาติ อุสฺสาหปฏิปฺปสฺสมฺภนวเสน สนฺนิฏฺฐานํ น กาตพฺพนฺติ โยชนา. อุทฺธมฺภาคิยสญฺญิตํ อณุํ วา โอรมฺภาคิยสญฺญิตํ ถูลํ วา, รูปราโคติ เอวรูปํ อณุํ วา กามาสโว ปฏิฆนฺติ เอวรูปํ ถูลํ วา, มุทุนา ปวตฺติอาการวิเสเสน อปฺปสาวชฺชํ, กมฺมพนฺธนฏฺเฐน วา อปฺปสาวชฺชํ, ตพฺพิปริยายโต มหาสาวชฺชํ เวทิตพฺพํ. นาติติกฺขปญฺญสฺส วเสน เทสนาย ปวตฺตตฺตา ‘‘เนยฺยปุคฺคลสฺส วเสนา’’ติ วุตฺตํ. สพฺพโส หิ ปริยาทินฺนนิกนฺติกสฺส อริยปุคฺคลสฺส วเสน สญฺญาเวทยิตนิโรธสฺส อาคตตฺตา ‘‘อรหตฺตนิกูเฏเนว นิฏฺฐาปิตา’’ติ วุตฺตํ. ยํ ปเนตฺถ อตฺถโต น วิภตฺตํ, ตํ สุวิญฺเญยฺยเมว. 'अलं' हा शब्द योग्य या अर्थी देखील वापरला जातो - "कंटाळणे (निर्वेद प्राप्त करणे) योग्यच आहे, विमुक्त होणे योग्यच आहे" इत्यादींमध्ये, म्हणून 'अनलं' म्हणजे आसक्ती (अनुषंग) करणे अयोग्य आहे, असा अर्थ आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - "मी याला न करण्यासारखी आसक्ती (अकत्तब्बआलयं) म्हणतो". 'सन्निट्ठान' (निश्चय) म्हणजे सम्यक प्रतिपत्तीमध्ये (योग्य आचरणात) "एवढेच पुरेसे आहे" अशा प्रकारे उत्साहाच्या शिथिलतेमुळे निश्चय करू नये, अशी योजना आहे. उद्धंभागिय (उच्च स्तरावरील बंधने) संज्ञेचे सूक्ष्म किंवा ओरंभागिय (निम्न स्तरावरील बंधने) संज्ञेचे स्थूल; रूपराग यांसारखे सूक्ष्म किंवा कामासव व प्रतिघ यांसारखे स्थूल; मृदू प्रवृत्तीच्या विशेष आकारामुळे अल्पदोषयुक्त (अप्पसावज्ज) किंवा कर्मबंधनाच्या अर्थाने अल्पदोषयुक्त, आणि याच्या उलट महादोषयुक्त (महासावज्ज) समजावे. अति-तीक्ष्ण प्रज्ञा नसलेल्या व्यक्तीच्या वशाने देशना प्रवृत्त झाल्यामुळे "नेय्य व्यक्तीच्या (नेय्यपुग्गल) वशाने" असे म्हटले आहे. कारण सर्व प्रकारे तृष्णा नष्ट झालेल्या आर्य व्यक्तीच्या वशाने संज्ञावेदयितनिरोधाचे वर्णन आल्यामुळे "अर्हत्त्वाच्या शिखरानेच (अर्हत्तनिकूटेनेव) समाप्त केले आहे" असे म्हटले आहे. आणि येथे ज्याचा अर्थ स्पष्ट केलेला नाही, तो सहज समजण्यासारखाच आहे. ลฏุกิโกปมสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. लटुकिकोपम सुत्ताच्या वर्णनातील गूढार्थाचे प्रकटीकरण (लीनत्थप्पकासना) समाप्त झाले. ๗. จาตุมสุตฺตวณฺณนา ७. चातुम सुत्ताचे वर्णन (चातुमसुत्तवण्णना). ๑๕๗. ยถาอุปนิสฺสเยนาติ โย โย อุปนิสฺสโย ยถาอุปนิสฺสโย, เตน ยถาอุปนิสฺสเยน สมฺมาปโยเคน. ปติฏฺฐหิสฺสนฺติ สาสเน ปติฏฺฐํ ปฏิลภิสฺสนฺติ. วสนฏฺฐานานีติ วสฺสคฺคาทิวเสน วสนฏฺฐานานิ. สณฺฐาปยมานาติ สุวิภตฺตภาเวน ฐเปนฺตา. १५७. 'यथाउपनिस्सयेन' म्हणजे जो जो उपनिषय (उपनिसय - प्रबळ कारण/आश्रय) तो तो यथाउपनिषय, त्या यथाउपनिषयाने म्हणजेच सम्यक प्रयोगाने (सम्मापयोगेन). 'प्रतिष्ठित होतील' (पतिट्ठहिस्सन्ति) म्हणजे शासनात (बुद्ध शासनात) प्रतिष्ठा प्राप्त करतील. 'वसणट्ठानानि' (राहण्याची ठिकाणे) म्हणजे वर्षावास इत्यादींच्या संख्येनुसार राहण्याची ठिकाणे. 'संठापयमाना' म्हणजे चांगल्या प्रकारे विभागून ठेवणारे. อวินิพฺโภคสทฺทนฺติ วินิภุญฺชิตฺวา คเหตุํ อสกฺกุเณยฺยสทฺทํ. วจีโฆโสปิ หิ พหูหิ เอกจฺจํ ปวตฺติโต ฐานโต จ ทูรตโร เกวลํ มหานิคฺโฆโส [Pg.79] เอว หุตฺวา โสตปถมาคจฺฉติ. มจฺฉวิโลเปติ มจฺเฉ วิลุมฺปิตฺวา วิย คหเณ, มจฺฉานํ วา นยเน. 'अविनिब्भोगसद्दं' (अविभक्त आवाज) म्हणजे वेगळा करून ग्रहण न करता यावा असा आवाज. कारण अनेक लोकांद्वारे एकत्र केलेला वाणीचा आवाज (वचीघोस) देखील दूरच्या ठिकाणाहून केवळ एक मोठा कोलाहल (महानिग्घोस) बनूनच कानावर पडतो. 'मच्छविलोपे' म्हणजे माशांना लुटल्याप्रमाणे पकडणे, किंवा माशांना वाहून नेणे. ๑๕๘. ววสฺสคฺคตฺเถติ นิจฺฉยตฺเถ, อิทํ ตาว อมฺเหหิ วุจฺจมานวจนํ เอกนฺตโสตพฺพํ, ปจฺฉา ตุมฺเหหิ กาตพฺพํ กโรถาติ อธิปฺปาโย. วจนปริหาโรติ เตหิ สกฺยราชูหิ วุตฺตวจนสฺส ปริหาโร. เลสกปฺปนฺติ กปฺปิยเลสํ. ธุรวหาติ ธุรวาหิโน, โธรยฺหาติ อตฺโถ. ปาทมูลนฺติ อุปจารํ วทติ. วิคจฺฉิสฺสตีติ หายิสฺสติ. ปฏิปฺผริโตติ น ภควโต สมฺมุขาว, สกฺยราชูนํ ปุรโตปิ วิปฺผริโตว โหติ. १५८. 'ववस्सग्गत्थे' म्हणजे निश्चयाच्या अर्थाने; "आमच्याद्वारे बोलले जाणारे हे वचन आधी नक्कीच ऐकले पाहिजे, नंतर तुम्ही जे करायचे आहे ते करा" असा अभिप्राय आहे. 'वचनपरिहारो' म्हणजे त्या शाक्य राजांद्वारे बोललेल्या वचनाचे उत्तर (परिहार). 'लेसकप्पं' म्हणजे कल्पित कारण (कप्पियलेस). 'धुरवहा' म्हणजे धुरा वाहणारे (धुरवाहिनो), म्हणजेच भार वाहणारे बैल (धोरय्हा) असा अर्थ आहे. 'पादमूलं' म्हणजे सेवा (उपचार) असे म्हणतात. 'विगच्छिस्सति' म्हणजे नष्ट होईल (ऱ्हास पावेल). 'पटिप्फरितो' म्हणजे केवळ भगवंतांच्या समोरच नव्हे, तर शाक्य राजांच्या समोर देखील पसरलेला (विप्फरित) असतो. ๑๕๙. อภินนฺทตูติ อภิมุโข หุตฺวา ปโมทตุ. อภิวทตูติ อภิรูปวเสน วทตุ. ปสาทญฺญถตฺตนฺติ อปฺปสาทสฺส วิปริณาโม หีนายาวตฺตนสงฺขาตํ ปริวตฺตนํ, เตนาห ‘‘วิพฺภมนฺตานํ. วิปริณามญฺญถตฺต’’นฺติ. การณูปจาเรน สสฺเสสุ พีชปริยาโยติ อาห ‘‘พีชานํ ตรุณานนฺติ ตรุณสสฺสาน’’นฺติ. ตรุณภาเวเนว ตสฺส ภาวิโน ผลสฺส อภาเวน วิปริณาโม. १५९. ‘अभिनन्दतु’ म्हणजे अभिमुख होऊन आनंदित होणे. ‘अभिवदतु’ म्हणजे अभिरूपतेने (सौंदर्याने किंवा योग्यतेने) बोलणे. ‘पसादञ्ञथत्तं’ (प्रसन्नतेचा अन्यथाभाव) म्हणजे अप्रसन्नतेचा विपरिणाम (बदल), जो हीन अवस्थेकडे परत जाण्याच्या स्वरूपातील परिवर्तन आहे; म्हणूनच म्हटले आहे— ‘विभ्रम करणाऱ्यांचा (मार्गभ्रष्ट होणाऱ्यांचा) विपरिणाम आणि अन्यथाभाव’. कारणाच्या उपचाराने पिकांमध्ये बीजाचा पर्याय वापरला आहे, म्हणून म्हटले आहे— ‘तरुण बीजांचे’ म्हणजे ‘तरुण पिकांचे’. तरुण अवस्थेमुळेच त्या भावी फळाच्या अभावाने होणारा तो विपरिणाम आहे. ๑๖๐. กตฺตพฺพสฺส สรเสเนว กรณํ จิตฺตรุจิยํ, น ตถา ปรสฺส อุสฺสาทเนนาติ อาห – ‘‘ปกฺโกสิยมานานํ คมนํ นาม น ผาสุก’’นฺติ. มยมฺปิ ภควา วิย ทิฏฺฐธมฺมสุขวิหาเรเนว วิหริสฺสามาติ ทีเปติ ปกติยา วิเวกชฺฌาสยภาวโต วิรทฺโธ อาคตสฺส ภารสฺส อวหนโตเยว. เตนาห ‘‘อตฺตโน ภารภาวํ น อญฺญาสี’’ติ. १६०. कर्तव्य हे स्वतःच्या आवडीने करणे चित्ताला रुचणारे असते, दुसऱ्याच्या दबावाने किंवा प्रोत्साहनाने तसे होत नाही; म्हणूनच म्हटले आहे— ‘बोलावले जात असताना जाणे हे सुखकर नसते.’ ‘आम्हीही भगवंतांप्रमाणे दृष्टधम्मसुखविहारानेच विहार करू’ असे तो दर्शवतो, कारण तो स्वभावाने विवेकशील (एकांतप्रिय) आशयाचा असल्यामुळे, आलेल्या भाराचे वहन न करण्याच्या विरुद्ध आहे. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘त्याने स्वतःचा भारभाव (स्वतःवरील ओझे) जाणला नाही’. ๑๖๑. กสฺมา อารภีติ? สปฺปายโต. ปญฺจสตา หิ ภิกฺขู อภินวา, ตสฺมา เตสํ โอวาททานตฺถํ ภควา อิมํ เทสนํ อารภีติ. १६१. कशासाठी आरंभ केला? अनुकूल (सप्पाय) असल्यामुळे. कारण पाचशे भिक्खू नवीन होते, म्हणून त्यांना उपदेश (ओवाद) देण्यासाठी भगवंतांनी या देशनेचा आरंभ केला. ๑๖๒. โกธุปายาสสฺสาติ เอตฺถ กุชฺฌนฏฺเฐน โกโธ, สฺเวว จิตฺตสฺส กายสฺส จ อติปฺปมทฺทนมถนุปฺปาทเนหิ ทฬฺหํ อายาสฏฺเฐน อุปายาโส. อเนกวารํ ปวตฺติตฺวา อตฺตนา สมเวตํ สตฺตํ อชฺโฌตฺถริตฺวา สีสํ อุกฺขิปิตุํ อทตฺวา อนยพฺยสนปาปเนน โกธุปายาสสฺส อูมิสทิสตา ทฏฺฐพฺพา. เตนาห ‘‘โกธุปายาเส’’ติอาทิ. १६२. ‘कोधुपायास’ (क्रोध आणि उपायास) यामध्ये— येथे क्रुद्ध होण्याच्या अर्थाने ‘कोध’ (क्रोध) आहे, आणि तोच चित्त व शरीराचे अत्यंत मर्दन आणि मंथन उत्पन्न करून दृढ आयास (त्रास) देण्याच्या अर्थाने ‘उपायास’ आहे. अनेक वेळा प्रवृत्त होऊन, स्वतःशी जोडलेल्या प्राण्याला दडपून टाकून, त्याला डोके वर काढू न देता, विनाशात आणि संकटात पाडत असल्यामुळे, क्रोध-उपायासाची लाटेसारखी (ऊमि-सदृश) अवस्था समजली पाहिजे. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘क्रोध आणि उपायास’ इत्यादी. ๑๖๓. โอทริกตฺเตน ขาทิโตติ โอทริกภาเวน อามิสเคเธน มิจฺฉาชีเวน ชีวิกากปฺปเนน นาสิตสีลาทิคุณตาย ขาทิตธมฺมสรีโร. १६३. ‘ओदरिकतेने (खादाडपणाने) खाल्लेला’ म्हणजे खादाडपणामुळे, आमिषाच्या लोभाने, मिथ्या उपजीविकेने (मिच्छा-आजीव) जीवन जगल्यामुळे, जिचे शील इत्यादी गुण नष्ट झाले आहेत असे ‘खाल्लेले धम्मशरीर’ असलेला. ๑๖๔. ปญฺจกามคุณาวฏฺเฏ [Pg.80] นิมุชฺชิตฺวาติ เอตฺถ กามราคาภิภูเต สตฺเต อิโต จ เอตฺโต, เอตฺโต จ อิโตติ เอวํ มนาปิยรูปาทิวิสยสงฺขาเต อาวฏฺเฏ อตฺตานํ สํสาเรตฺวา ยถา ตโต พหิภูเต เนกฺขมฺเม จิตฺตมฺปิ น อุปฺปาเทติ, เอวํ อาวฏฺเฏตฺวา พฺยสนาปาทเนน กามคุณานํ อาวฏฺฏสทิสตา ทฏฺฐพฺพา. เตนาห ‘‘ยถา หี’’ติอาทิ. १६४. ‘पाच कामगुणांच्या भोवऱ्यात बुडून’ यामध्ये— येथे कामरागाने ग्रस्त झालेल्या प्राण्यांना इकडून तिकडे आणि तिकडून इकडे अशा प्रकारे मनाला आवडणाऱ्या रूप इत्यादी विषयांच्या स्वरूपातील भोवऱ्यात स्वतःला संसारात फिरवून, ज्याप्रमाणे त्याबाहेर असलेल्या नैष्क्रम्यात (नेक्खम्म) चित्तही उत्पन्न होऊ देत नाही, अशा प्रकारे फिरवून संकटात पाडत असल्यामुळे कामगुणांची भोवऱ्यासारखी (आवट्ट-सदृश) अवस्था समजली पाहिजे. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘ज्याप्रमाणे’ इत्यादी. ๑๖๕. ราคานุทฺธํสิเตนาติ ราเคน อนุทฺธํสิเตน. จณฺฑมจฺฉํ อาคมฺมาติ สุสุกาทิจณฺฑมจฺฉํ อาคมฺม. มาตุคามํ อาคมฺมาติ มาตุคาโม หิ โยนิโสมนสิการรหิตํ อธีรปุริสํ อิตฺถิกุตฺตภูเตหิ อตฺตโน หาวภาววิลาเสหิ อภิภุยฺย คเหตฺวา ธีรชาติยมฺปิ อตฺตโน รูปาทีหิ ปโลภนวเสน อนวเสสํ อตฺตโน อุปการธมฺเม สีลาทิเก สมฺปาเทตุํ อสมตฺถํ กโรนฺโต อนยพฺยสนํ ปาเปติ. เตนาห – ‘‘มาตุคามํ อาคมฺม อุปฺปนฺนกามราโค วิพฺภมตี’’ติ. १६५. ‘रागाने उद्ध्वस्त झालेल्या’ म्हणजे रागाने नष्ट झालेल्या. ‘क्रूर माशाचा आश्रय घेऊन’ म्हणजे सुसर इत्यादी क्रूर माशांचा आश्रय घेऊन. ‘मातृग्रामाचा (स्त्रीचा) आश्रय घेऊन’ म्हणजे— कारण स्त्री ही योनिसोमनसिकार नसलेल्या अधीर पुरुषाला स्त्रीच्या हावभाव आणि विलासांनी पराभूत करून आपल्या ताब्यात घेते, आणि धैर्यवान पुरुषालाही आपल्या रूप इत्यादींच्या प्रलोभनाने पूर्णपणे स्वतःचे उपकारक धर्म असलेल्या शील इत्यादींचे संपादन करण्यास असमर्थ बनवून विनाशात आणि संकटात पाडते. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘मातृग्रामाचा (स्त्रीचा) आश्रय घेऊन उत्पन्न झालेल्या कामरागामुळे तो मार्गभ्रष्ट होतो’. ภยํ นาม ยตฺถ ภายิตพฺพวตฺถุ, ตตฺถ โอตรนฺตสฺเสว โหติ, น อโนตรนฺตสฺส, ตํ โอตริตฺวา ภยํ วิโนเทตฺวา ตตฺถ กิจฺจํ สาเธตพฺพํ, อิตรถา จตฺถสิทฺธิ น โหตีติ อิมมตฺถํ อุปโมปมิตพฺพสรูปวเสน ทสฺเสตุํ ‘‘ยถา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ อุทกํ นิสฺสาย อานิสํโส ปิปาสวินยนํ สรีรสุทฺธิ ปริฬาหูปสโม กายอุตุคฺคาหาปนนฺติ เอวมาทิ. สาสนํ นิสฺสาย อานิสํโส ปน สงฺเขปโต วฏฺฏทุกฺขูปสโม, วิตฺถารโต ปน สีลานิสํสาทิวเสน อเนกวิโธ, โส วิสุทฺธิมคฺเค (วิสุทฺธิ. ๑.๙) วุตฺตนเยน เวทิตพฺโพ. วุตฺตปฺปกาโร อานิสํโส โหติ ตานิ ภยานิ อภิภุยฺย ปวตฺตสฺสาติ อธิปฺปาโย. อิมานิ อภายิตฺวาติ อิมานิ โกธูปายาสาทิภยานิ อภิภุยฺย ปวตฺติตฺวา อภายิตฺวา. โกธูปายาสาทโย หิ ภายติ เอตสฺมาติ ภยนฺติ วุตฺตา. เถโรติ มหาธมฺมรกฺขิตตฺเถโร. กามํ ปหานาภิสมยกาโล เอว สจฺฉิกิริยาภิสมโย, สมฺมาทิฏฺฐิยา ปน สํกิเลสโวทานธมฺเมสุ กิจฺจํ อสํกิณฺณํ กตฺวา ทสฺเสตุํ สมานกาลิกมฺปิ อสมานกาลิกํ วิย วุตฺตํ ‘‘ตณฺหาโสตํ ฉินฺทิตฺวา นิพฺพานปารํ ทฏฺฐุํ น สกฺโกตี’’ติ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. भय हे जेथे भीतीचे कारण असते, तेथे उतरणाऱ्यालाच (प्रवेश करणाऱ्यालाच) वाटते, न उतरणाऱ्याला नाही. त्यात उतरून, भीती दूर करून, तेथे आपले कार्य साध्य केले पाहिजे, अन्यथा ध्येयप्राप्ती होत नाही; हा अर्थ उपमा आणि उपमेय यांच्या स्वरूपात दर्शवण्यासाठी ‘ज्याप्रमाणे’ इत्यादी म्हटले आहे. तेथे पाण्याचा आश्रय घेतल्याने मिळणारे फायदे (आनिसंस) म्हणजे तहान शमवणे, शरीर शुद्ध करणे, दाह शांत करणे, शरीराचा थकवा दूर करणे इत्यादी आहेत. बुद्ध शासनाचा आश्रय घेतल्याने मिळणारा फायदा संक्षेपाने संसारदुःखाचा उपशम हा आहे, आणि विस्ताराने शील-आनिसंस इत्यादींच्या रूपाने अनेक प्रकारचा आहे; तो विसुद्धिमग्गात (१.९) सांगितलेल्या पद्धतीने समजून घ्यावा. सांगितलेल्या प्रकारचा फायदा त्या भयांवर मात करून प्रवृत्त होणाऱ्यालाच मिळतो, असा अभिप्राय आहे. ‘यांना न भिता’ म्हणजे या क्रोध-उपायास इत्यादी भयांवर मात करून प्रवृत्त होऊन, न भिता. कारण क्रोध-उपायास इत्यादींमुळे माणूस भितो, म्हणून त्यांना ‘भय’ म्हटले आहे. ‘थेर’ म्हणजे महाधम्मरक्खित थेर. जरी प्रहाण-अभिसमय हाच साक्षात्कार-अभिसमय असला, तरी सम्यक् दृष्टीने संक्लेश आणि वोदान (शुद्धी) धर्मांमधील कार्य स्पष्ट करण्यासाठी, एकाच वेळी घडणाऱ्या गोष्टींना वेगवेगळ्या वेळी घडणाऱ्या गोष्टींप्रमाणे म्हटले आहे— ‘तृष्णेचा प्रवाह (तण्हा-सोत) तोडल्याशिवाय निब्बानाचा पलीकडचा तीर पाहता येत नाही.’ उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. จาตุมสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. चातुम सुत्ताच्या वर्णनाची लीनत्थप्पकासना (गूढ अर्थाचे प्रकटीकरण) समाप्त झाली. ๘. นฬกปานสุตฺตวณฺณนา ८. नळकपान सुत्ताचे वर्णन. ๑๖๖. ยตฺถ [Pg.81] โพธิสตฺตปมุโข วานโร นฬเกน ปานียํ ปิวิ, สา โปกฺขรณี, ตสฺสามนฺโต ภูมิปฺปเทโส, ตตฺถ นิวิฏฺฐคาโม จ ‘‘นฬกปาน’’นฺเตว ปญฺญายิตฺถ, อิธ ปน คาโม อธิปฺเปโตติ อาห ‘‘นฬกปาเนติ เอวํนามเก คาเม’’ติ. อิทานิ ตมตฺถํ อาคมนโต ปฏฺฐาย ทสฺเสตุํ ‘‘ปุพฺเพ กิรา’’ติ อารทฺธํ. ปญฺญวาติ อิติกตฺตพฺพตาย ปญฺญาย ปญฺญวา. १६६. जेथे बोधिसत्त्वांच्या नेतृत्वाखालील वानरांनी नळाने (वेळूच्या नळीने) पाणी प्यायले, ती पोखरण (तलाव) होती, आणि तिच्या जवळील भूमीचा प्रदेश व तेथे वसलेले गाव ‘नळकपान’ याच नावाने ओळखले जात होते; परंतु येथे गाव अभिप्रेत आहे, म्हणून म्हटले आहे— ‘नळकपान नावाच्या गावात’. आता तो अर्थ सुरुवातीपासून दर्शवण्यासाठी ‘पूर्वी म्हणे’ असे सुरू केले आहे. ‘प्रज्ञावान’ म्हणजे काय करावे हे जाणणाऱ्या प्रज्ञेने युक्त असलेला. ถูลทีฆพหุลภาเวน มหตีหิ ทาฐิกาหิ สมนฺนาคตตฺตา มหาทาฐิโก. ‘‘อุทกรกฺขโส อห’’นฺติ วตฺวา วานรานํ กญฺจิ อมุญฺจิตฺวา ‘‘สพฺเพ ตุมฺเห มม หตฺถคตา’’ติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ตุมฺเห ปน สพฺเพ ขาทิสฺสามี’’ติ อาห. ธมิ…เป… ปิวึสูติ โพธิสตฺเตน คหิตนโฬ อนวเสโส อพฺภนฺตเร สพฺพสนฺธีนํ นิพฺพาเธน เอกจฺฉิทฺโท อโหสิ. เนว มํ ตฺวํ วธิสฺสสีติ อุทกรกฺขส ตฺวํ วธิตุกาโมปิ มม ปุริสถาเมน น วธิสฺสสิ. जाड, लांब आणि दाट अशा मोठ्या सुळ्यांनी युक्त असल्यामुळे तो ‘महादाढिक’ (मोठ्या सुळ्यांचा) होता. ‘मी जलराक्षस आहे’ असे म्हणून, वानरांपैकी कोणालाही न सोडता, ‘तुम्ही सर्व माझ्या हातात सापडला आहात’ हे दाखवत तो म्हणाला— ‘मी तुम्हा सर्वांना खाऊन टाकीन.’ ‘फुंकर मारली... पे... प्यायले’ म्हणजे बोधिसत्त्वांनी घेतलेला वेळूचा नळ आतून सर्व सांधे अडथळ्याशिवाय निघून पूर्णपणे एक सलग छिद्र असलेला झाला. ‘तू मला मारू शकणार नाहीस’ म्हणजे हे जलराक्षसा, तू मला मारण्याची इच्छा बाळगत असलास तरी माझ्या पराक्रमामुळे तू मला मारू शकणार नाहीस. เอวํ ปน วตฺวา มหาสตฺโต ‘‘อยํ ปาโป เอตฺถ ปานียํ ปิวนฺเต อญฺเญปิ สตฺเต มา พาธยิตฺถา’’ติ กรุณายมาโน ‘‘เอตฺถ ชายนฺตา นฬา สพฺเพ อปพฺพพนฺธา เอกจฺฉิทฺทาว โหนฺตู’’ติ อธิฏฺฐาย คโต. เตนาห ‘‘ตโต ปฏฺฐายา’’ติอาทิ. असे बोलून महासत्त्वांनी (बोधिसत्त्वांनी) ‘हा पापी येथे पाणी पिणाऱ्या इतर प्राण्यांना त्रास देऊ नये’ अशी करुणा बाळगून, ‘येथे उगवणारे सर्व वेळू सांधे नसलेले आणि एक सलग छिद्र असलेलेच होवोत’ असा संकल्प (अधिष्ठान) करून ते निघून गेले. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘तेव्हापासून’ इत्यादी. ๑๖๗. อนุรุทฺธปฺปมุขา ภิกฺขู ภควตา ‘‘กจฺจิ ตุมฺเห อนุรุทฺธา’’ติ ปุจฺฉิตาติ เถโร ‘‘ตคฺฆ มยํ, ภนฺเต’’ติ อาห. १६७. भगवंतांनी अनुरुद्धांच्या नेतृत्वाखालील भिक्खूंना ‘हे अनुरुद्ध, तुम्ही...’ असे विचारले असता, थेरांनी ‘नक्कीच, भंते!’ असे म्हटले. สเจ ปพฺพชติ, ชีวิตํ ลภิสฺสติ, โน อญฺญถาติ รญฺญา ปพฺพชฺชาย อภินีตาติ ราชาภินีตา. โจราภินีตาติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย. โจรานํ มูลํ ฉินฺทนฺโต ‘‘กณฺฏกโสธนํ กริสฺสามี’’ติ. อาชีวิกายาติ อาชีเวน ชีวิตวุตฺติยา. อิเมสุ ปน อนุรุทฺธตฺเถราทีสุ. ‘जर तो प्रव्रजित झाला, तर त्याला जीवन मिळेल, अन्यथा नाही’ अशा प्रकारे राजाने प्रव्रज्येसाठी आणलेले ते ‘राजाभिनीत’ होय. ‘चोराभिनीत’ यामध्येही हाच नियम आहे. चोरांचे मूळ उपटून टाकताना ‘मी कंटकशोधन (काटे दूर) करीन’ असे. ‘आजीविकेसाठी’ म्हणजे उपजीविकेने जीवन जगण्यासाठी. परंतु या अनुरुद्ध थेर इत्यादींमध्ये. วิเวกนฺติ ปุพฺพกาลิกกิริยปฺปธานํ ‘‘อพฺยาปชฺชํ อุเปต’’นฺติอาทีสุ วิยาติ อาห – ‘‘วิวิจฺจา’’ติ, วิวิจฺจิตฺวา วิวิตฺโต หุตฺวา วินา หุตฺวาติ อตฺโถ. ปพฺพชิตกิจฺจนฺติ ปพฺพชิตสฺส สารุปฺปกิจฺจํ. สมณกิจฺจนฺติ สมณภาวกรณกิจฺจํ. ยทคฺเคน หิ ปพฺพชิตกิจฺจํ กาตุํ น สกฺโกติ ตทคฺเคน สมณภาวกรมฺปิ กิจฺจํ กาตุํ น สกฺโกติ. เตนาห ‘‘โส เยวา’’ติอาทิ. "विवेक" म्हणजे पूर्वकालिक क्रियाप्रधान, जसे "अव्यापज्जं उपेतं" (व्यापादविरहित होणे) इत्यादींमध्ये म्हटले आहे, म्हणून म्हटले आहे - "विविच्च" (विविक्त होऊन), म्हणजे विविक्त होऊन, अलिप्त होऊन, विरहित होऊन असा अर्थ आहे. "पब्बजितकिच्चं" (प्रव्रजिताचे कर्तव्य) म्हणजे प्रव्रजिताला योग्य असे कर्तव्य. "समणकिच्चं" (श्रमणाचे कर्तव्य) म्हणजे श्रमणभाव निर्माण करणारे कर्तव्य. कारण ज्या प्रमाणात तो प्रव्रजिताचे कर्तव्य करण्यास असमर्थ असतो, त्याच प्रमाणात तो श्रमणभाव निर्माण करणारे कर्तव्यही करण्यास असमर्थ असतो. म्हणूनच "सो येव" (तोच) इत्यादी म्हटले आहे. ๑๖๘. อปฺปฏิสนฺธิเก [Pg.82] ตาว พฺยากโรนฺโต ปวตฺตีสุ ฐานํ อตีโตติ กตฺวา อุปปตฺตีสุ พฺยากโรติ นาม ตตฺถ ปฏิสนฺธิยา อภาวกิตฺตนโต. มหนฺตตุฏฺฐิโนติ วิปุลปโมทา. १६८. प्रथम अप्रतिसंधी (पुनर्जन्म नसलेल्या) व्यक्तीविषयी स्पष्ट करताना, प्रवृत्तींमधील स्थान ओलांडून गेल्यामुळे, उत्पत्तींविषयी स्पष्ट करतो, कारण तिथे प्रतिसंधीचा (पुनर्जन्माचा) अभाव सांगितला आहे. "महन्ततुट्ठिनो" म्हणजे विपुल प्रमोद (मोठा आनंद). ๑๖๙. อิมสฺสาติ ‘‘อสฺสา’’ติ ปทสฺส อตฺถวจนํ. อิมสฺส ฐิตสฺส อายสฺมโต สามํ ทิฏฺโฐ วา โหติ อนุสฺสวสุโต วาติ โยชนา. สมาธิปกฺขิกา ธมฺมา ธมฺมาติ อธิปฺเปตา, สมาธิ ปน เอวํวิหารีติ เอตฺถ วิหารสทฺเทน คหิโต. เอวํวิมุตฺตาติ เอตฺถ ปน วิมุตฺติสทฺเทน ผลวิมุตฺติ คหิตา. จรโตปีติ สมถวิปสฺสนาจาเรน จรโตปิ วิหรนฺตสฺสปิ. อุปาสกอุปาสิกาฐาเนสุ ลพฺภมานมฺปิ อรหตฺตํ อปฺปกภาวโต ปาฬิยํ อนุทฺธฏนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. १६९. "इमस्स" (याचे) हे "अस्स" या पदाच्या अर्थाचे स्पष्टीकरण आहे. या स्थित असलेल्या आयुष्यमानांनी स्वतः पाहिलेले असते किंवा परंपरेने ऐकलेले असते, अशी योजना आहे. "धम्मा" (धम्म) या शब्दाने समाधीच्या बाजूचे धम्म अभिप्रेत आहेत, तर "एवंविहारी" (अशा प्रकारे विहार करणारे) यामध्ये विहार शब्दाने समाधी ग्रहण केली आहे. "एवंविमुत्ता" (अशा प्रकारे विमुक्त) यामध्ये विमुक्ती शब्दाने फलविमुक्ती ग्रहण केली आहे. "चरतोपि" म्हणजे समथ आणि विपश्यनेच्या आचरणाने चालणाऱ्या किंवा विहार करणाऱ्याचेही. उपासक आणि उपासिकांच्या भूमिकेत प्राप्त होणारे अर्हत्त्व हे अल्प प्रमाणात असल्यामुळे पाळीमध्ये उद्धृत केलेले नाही, असे समजावे. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. นฬกปานสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. नळकपानसुत्तवर्णनेची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๙. โคลิยานิสุตฺตวณฺณนา ९. गोलियानिसुत्तवर्णना (गोलियानिसुत्ताची टीका). ๑๗๓. ปทสมาจาโรติ ตํตํปจฺจยเภททสฺสนาย วิคตตฺตา ปกาเรหิ ทลิทฺทสมาจาโร สิถิลสมาจาโรติ อตฺโถ. ยสฺมา ปน ตาทิโส สมาจาโร ถิโร ทฬฺโห นาม น โหติ, ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘ทุพฺพลสมาจาโร’’ติ. ‘‘สาขสมาจาโร’’ติ วา ปาโฐ, ตตฺถ ตตฺถ ลคฺคนฏฺเฐน สาขาสทิสสีโลติ อตฺโถ. เตนาห ‘‘โอฬาริกาจาโร’’ติ. ปจฺจเยสุ สาเปกฺโขติ ปจฺจเยสุ สาเปกฺขตาย เอว หิสฺส โอฬาริกาจารตา เวทิตพฺพา. ครุนา กิสฺมิญฺจิ วุตฺเต คารววเสน ปติสฺสวนํ ปติสฺโส, ปติสฺสวจนภูตํ ตํสภาคญฺจ ยํ กิญฺจิ คารวนฺติ อตฺโถ. สห ปติสฺเสนาติ สปฺปติสฺเสน, สปฺปติสฺสเวน โอวาทสมฺปฏิจฺฉเนน. ปติสฺสียตีติ วา ปติสฺโส, ครุกาตพฺโพ, เตน สห ปติสฺเสนาติ สพฺพํ ปุพฺเพ วิย. เตนาห ‘‘สเชฏฺฐเกนา’’ติ. เสริวิหาโร นาม อตฺตปฺปธานวาโส. เตนาห ‘‘นิรงฺกุสวิหาเรนา’’ติ. १७३. "पदसमाचारो" म्हणजे त्या त्या प्रत्ययांच्या भेदांचे दर्शन नष्ट झाल्यामुळे विविध प्रकारे दरिद्री आचार किंवा शिथिल आचार असा अर्थ आहे. परंतु ज्याअर्थी तसा आचार स्थिर व दृढ नसतो, म्हणून "दुब्बलसमाचारो" (दुर्बल आचार असलेला) असे म्हटले आहे. "साखासमाचारो" (शाखा-आचार) असाही पाठ आहे, तिथे तिथे अडकून राहण्याच्या अर्थाने शाखेसारखे शील असलेला असा अर्थ आहे. म्हणूनच "ओळारिकाचारो" (स्थूल आचार असलेला) असे म्हटले आहे. "पच्चयेसु सापेक्खो" (प्रत्ययांवर अवलंबून असलेला) कारण प्रत्ययांवरील सापेक्षतेमुळेच त्याचा स्थूल आचार समजून घ्यावा. गुरूंनी काही सांगितले असता आदरापोटी दिलेला होकार म्हणजे "पतिस्सो" (प्रतिश्रव), प्रतिवचन स्वरूप असलेला आणि त्यासारखाच असणारा कोणताही आदर असा अर्थ आहे. "सह पतिस्सेन" म्हणजे सप्रतिश्रव, आदराने उपदेश स्वीकारणारा. किंवा ज्याचा आदर केला पाहिजे तो "पतिस्सो", त्याच्यासह असणारा तो "सपतिस्सो", हे सर्व पूर्वीप्रमाणेच आहे. म्हणूनच "सजेट्ठकेन" (ज्येष्ठासह) असे म्हटले आहे. "सेरिविहारो" म्हणजे स्वतःच्या इच्छेनुसार राहणे (स्वैर विहार). म्हणूनच "निरङ्कुसविहारेन" (निरंकुश विहाराने) असे म्हटले आहे. อนุปขชฺชาติ อนุปกฑฺฒิตฺวา. ครุฏฺฐานิยานํ อนฺตรํ อนาปุจฺฉา อนุปวิสิตฺวาติ อิมมตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘ตตฺถ โย’’ติอาทิ วุตฺตํ. "अनुपखज्ज" म्हणजे ओढून घेऊन (किंवा घुसून). आदरणीय व्यक्तींच्या मध्ये न विचारता प्रवेश करून, हा अर्थ दर्शवण्यासाठी "तत्थ यो" (तिथे जो) इत्यादी म्हटले आहे. อาภิสมาจาริกนฺติ [Pg.83] อภิสมาจาเร ภวํ. กึ ปน ตนฺติ อาห ‘‘วตฺตปฏิปตฺติมตฺตมฺปี’’ติ. นาติกาลสฺเสว สงฺฆสฺส ปุรโต ปวิสิตพฺพํ, น ปจฺฉา ปฏิกฺกมิตพฺพนฺติ อธิปฺปาเยน อติกาเล จ คามปฺปเวโส อติทิวา ปฏิกฺกมนญฺจ นิวาริตํ, ตํ ทสฺเสตุํ ‘‘น อติปาโต’’ติอาทิ วุตฺตํ. อุทฺธจฺจปกติโกติ วิพฺภนฺตจิตฺโต. อวจาปลฺเยนาติ ทฬฺหวาตาปหตปลฺลวสทิเสน โลลภาเวน. "आभिसमाचारिकं" म्हणजे अभिसमाचारात (उत्कृष्ट आचारात) असणारे. ते काय आहे? म्हणून म्हटले आहे - "वत्तपटिपत्तिमत्तम्पि" (केवळ व्रत आणि प्रतिपत्ती देखील). फार लवकर संघाच्या पुढे प्रवेश करू नये आणि फार उशिरा परत येऊ नये, या उद्देशाने फार लवकर गावात प्रवेश करणे आणि फार उशिरा परतणे निषिद्ध केले आहे, हे दर्शवण्यासाठी "न अतिपातो" इत्यादी म्हटले आहे. "उद्धच्चपकतिको" म्हणजे विचलित चित्त असलेला (उद्धत स्वभावाचा). "अवचापल्येन" म्हणजे जोरदार वाऱ्याने हलणाऱ्या पानासारख्या चंचलतेचा अभाव. ปญฺญวตาติ อิมินา ภิกฺขุสารุปฺเปสุ อิติกตฺตพฺเพสุ อุปายปญฺญา อธิปฺเปตา, น สุตมยปญฺญา. อภิธมฺเม อภิวินเย โยโคติ อิมินา ภาวนาปญฺญาอุตฺตริมนุสฺสธมฺเม โยโค ปกาสิโต. โยโคติ จ ปริจโย อุคฺคณฺหวเสน. "पञ्ञवता" (प्रज्ञावानाने) याद्वारे भिक्षूंना योग्य अशा कर्तव्यांमधील उपाय-प्रज्ञा अभिप्रेत आहे, श्रुतमयी प्रज्ञा नव्हे. "अभिधम्मे अभिविनये योगो" (अभिधम्म आणि अभिविनयातील योग) याद्वारे भावनाप्रज्ञा आणि उत्तरिमनुष्यधम्मातील योग प्रकट केला आहे. आणि "योगो" म्हणजे शिकण्याच्या दृष्टीने असलेला परिचय (अभ्यास). อารุปฺปาติ อิมินา จตสฺโสปิ อรูปสมาปตฺติโย คหิตา, ตา ปน จตูหิ รูปสมาปตฺตีหิ วินา น สมฺปชฺชนฺตีติ อาห – ‘‘อารุปฺปาติ เอตฺตาวตา อฏฺฐปิ สมาปตฺติโย วุตฺตา โหนฺตี’’ติ. กสิเณติ ทสวิเธ กสิเณ. เอกํ ปริกมฺมกมฺมฏฺฐานนฺติ ยํ กิญฺจิ เอกภาวนา ปริกมฺมทีปนํ ขนฺธกมฺมฏฺฐานํ. เตนาห ‘‘ปคุณํ กตฺวา’’ติ. กสิณปริกมฺมํ ปน ตคฺคหเณเนว คหิตํ โหติ, โลกิยา อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา เหฏฺฐา คหิตาติ อาห ‘‘อุตฺตริมนุสฺสธมฺเมติ อิมินา สพฺเพปิ โลกุตฺตรธมฺเม ทสฺเสตี’’ติ. เนยฺยปุคฺคลสฺส วเสนาติ ชานิตฺวา วิตฺถาเรตฺวา ญาตพฺพปุคฺคลสฺส วเสนาติ. "आरुप्पा" (आरूप्य) याद्वारे चारही अरूप समापत्ती ग्रहण केल्या आहेत, परंतु त्या चार रूप समापत्तींशिवाय प्राप्त होत नाहीत, म्हणून म्हटले आहे - "आरुप्पा या शब्दाने आठही समापत्ती सांगितल्या आहेत". "कसिणे" म्हणजे दहा प्रकारच्या कसिणांमध्ये. "एकं परिकम्मकम्मट्ठानं" म्हणजे कोणतेही एक भावना-परिकर्म दर्शवणारे स्कंध-कर्मस्थान. म्हणूनच "पगुणं कत्वा" (प्रवीण करून) असे म्हटले आहे. कसिण-परिकर्म तर त्याच्या ग्रहणानेच ग्रहण केले जाते, लौकिक उत्तरिमनुष्यधम्म खाली ग्रहण केले आहेत, म्हणून म्हटले आहे - "उत्तरिमनुष्यधम्मे या शब्दाने सर्व लोकोत्तर धम्म दर्शवले आहेत". "नेय्यपुग्गलस्स वसेन" म्हणजे जाणून घेऊन, विस्तार करून समजून घेणाऱ्या पुद्गलाच्या (व्यक्तीच्या) अधीन राहून. โคลิยานิสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. गोलियानिसुत्तवर्णनेची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๑๐. กีฏาคิริสุตฺตวณฺณนา १०. कीटागिरिसुत्तवर्णना (कीटागिरिसुत्ताची टीका). ๑๗๔. ปญฺจ อานิสํเสติ อปฺปาพาธตาทิเก ปญฺจ คุเณ. ตตฺถ อกฺขิโรคกุจฺฉิโรคาทีนํ อภาโว อปฺปาพาธตา. สรีเร เตสํ กุปฺปนทุกฺขสฺส อภาโว อปฺปาตงฺกํ. สรีรสฺส อุฏฺฐานสุขตา ลหุฏฺฐานํ. พลํ นาม กายพลํ. ผาสุวิหาโร อิริยาปถสุขตา. อนุปกฺขนฺทานีติ ทุจฺจชนวเสน สตฺตานํ อนุปวิฏฺฐานิ. สญฺชานิสฺสถาติ เอตฺถ อิติ-สทฺโท อาทิอตฺโถ, ตสฺมา อิติ เอวํ อานิสํสนฺติ อตฺโถ. १७४. "पञ्च आनिसंसे" (पाच शिफारसी/फायदे) म्हणजे अल्प-आबाधता (कमी आजारपण) इत्यादी पाच गुण. त्यामध्ये डोळ्यांचे आजार, पोटाचे आजार इत्यादींचा अभाव म्हणजे "अल्प-आबाधता". शरीरात त्यांच्या कोपामुळे होणाऱ्या दुःखाचा अभाव म्हणजे "अल्प-आतंक". शरीराची उठण्या-बसण्याची सुलभता म्हणजे "लघूत्थान". "बलं" म्हणजे कायिक बल (शारीरिक शक्ती). "फासुविहारो" म्हणजे ईर्यापथातील सुख (सहज विहार). "अनुपक्खन्दानी" म्हणजे वाईट लोकांमुळे प्राण्यांमध्ये प्रवेश केलेले. "सञ्जानिस्सथ" यामध्ये 'इति' हा शब्द आदि-अर्थी आहे, म्हणून 'इति' म्हणजे अशा प्रकारे फायदे, असा अर्थ आहे. ๑๗๕. อาวาเส นิยุตฺตาติ อาวาสิกา ตสฺส อนติวตฺตนโต. เตนาห ‘‘นิพทฺธวาสิโน’’ติ, นิยตวาสิโนติ อตฺโถ. ตนฺนิพนฺธาติ [Pg.84] นิพนฺธํ วุจฺจติ พฺยาปาโร, ตตฺถ พนฺธา ปสุตา อุสฺสุกาติ ตนฺนิพนฺธา. กถํ เต ตตฺถ นิพนฺธาติ อาห ‘‘อกตํ เสนาสน’’นฺติอาทิ. อุปฺปชฺชนเกน กาเลน ปตฺตพฺพํ กาลิกํ โส ปน กาโล อนาคโต เอว โหตีติ อาห ‘‘อนาคเต กาเล ปตฺตพฺพ’’นฺติ. १७५. "आवासे नियुत्ता" (आवासात नियुक्त असलेले) म्हणजे आवासी, त्याचे उल्लंघन न करण्यामुळे. म्हणूनच "निबद्धवासिनो" (नियमित राहणारे) असे म्हटले आहे, म्हणजे नियत रहिवासी असा अर्थ आहे. "तन्निबन्धा" म्हणजे 'निबंध' म्हणजे व्यापार (काम), त्यात जे बांधलेले, मग्न, उत्सुक असतात ते 'तन्निबंध'. ते तिथे कसे बांधलेले असतात? म्हणून म्हटले आहे - "अकतं सेनासनं" (न बनवलेले शयन-आसन) इत्यादी. उत्पन्न होणाऱ्या काळाने प्राप्त होणारे ते 'कालिक', आणि तो काळ अनागत (भविष्यकाळ) च असतो, म्हणून म्हटले आहे - "अनागत काळात प्राप्त होणारे". ๑๗๘. เอตฺตกา เวทนา เสวิตพฺพาติ อฏฺฐารสปิ เนกฺขมฺมนิสฺสิตา เวทนา เสวิตพฺพา, เคหสฺสิตา น เสวิตฺพฺพา. १७८. "एत्तका वेदना सेवितब्बा" (एवढ्या वेदनांचे सेवन करावे) म्हणजे अठराही नैष्क्रम्य-आश्रित वेदनांचे सेवन करावे, गृह-आश्रित वेदनांचे सेवन करू नये. ๑๘๑. ตํ กตํ โสฬสวิธสฺสปิ กิจฺจสฺส นิฏฺฐิตตฺตา. อนุโลมิกานีติ อุตุสุขภาเวน อนุรูปานิ. เตนาห ‘‘กมฺมฏฺฐานสปฺปายานี’’ติ. สมานํ กุรุมานาติ โอมตฺตตํ อธิมตฺตตญฺจ ปหาย สมกิจฺจตํ สมฺปาเทนฺตา. १८१. "तं कतं" (ते केले) कारण सोळा प्रकारची कर्तव्ये पूर्ण झाली आहेत. "अनुलोमिकानि" म्हणजे ऋतूच्या सुखाच्या दृष्टीने अनुकूल असणारे. म्हणूनच "कम्मट्ठानसप्पायानि" (कर्मस्थानाला अनुकूल असणारे) असे म्हटले आहे. "समानं कुरुमाना" म्हणजे हीनता आणि अतिरेक सोडून समान कर्तव्य पार पाडणारे. ๑๘๒. เต ทฺเว โหนฺตีติ เต อาทิโต วุตฺตา ทฺเว. १८२. "ते द्वे होन्ति" म्हणजे सुरुवातीला सांगितलेले ते दोन होत. อุภโต (อ. นิ. ฏี. ๓.๗.๑๔) อุภยถา อุโภหิ ภาเคหิ วิมุตฺโตติ อุภโตภาควิมุตฺโต เอกเทสสรูเปกเสสนเยน. ตถา หิ วุตฺตํ อภิธมฺมฏฺฐกถายํ (ปุ. ป. อฏฺฐ. ๒๔) ‘‘ทฺวีหิ ภาเคหิ ทฺเว วาเร วิมุตฺโตติ อุภโตภาควิมุตฺโต’’ติ. ตตฺถ เกจิ ตาว เถรา – ‘‘สมาปตฺติยา วิกฺขมฺภนวิโมกฺเขน, มคฺเคน สมุจฺเฉทวิโมกฺเขน วิมุตฺโตติ อุภโตภาควิมุตฺโต’’ติ วทนฺติ. อญฺเญ เถรา – ‘‘อยํ อุภโตภาควิมุตฺโต รูปโต มุจฺจิตฺวา นามํ นิสฺสาย ฐิโต ปุน ตโต มุจฺจนโต นามนิสฺสิตโก’’ติ วตฺวา ตสฺส จ สาธกํ – उभतो (अं. नि. टी. ३.७.१४) म्हणजे दोन्ही प्रकारे किंवा दोन्ही भागांनी विमुक्त झालेला तो 'उभतोभागविमुक्त' होय, हा एकदेश-सरूप-एकशेष नियम आहे. तसेच अभिधम्म-अट्ठकथेत (पुग्गलपञ्ञत्ति-अट्ठकथा २४) म्हटले आहे – "दोन भागांनी आणि दोन वेळा विमुक्त झालेला तो 'उभतोभागविमुक्त' होय." त्याविषयी काही थेर (स्थवीर) असे म्हणतात की – "समापत्तीच्या विष्कंभन-विमोक्षाने आणि मार्गाच्या समुच्छेद-विमोक्षाने विमुक्त झालेला तो 'उभतोभागविमुक्त' होय." इतर थेर म्हणतात – "हा उभतोभागविमुक्त रूपापासून मुक्त होऊन नामाचा आश्रय घेऊन स्थित असतो आणि पुन्हा त्यातूनही मुक्त होत असल्यामुळे तो 'नामाश्रित' (नामनिस्सितक) आहे." असे सांगून त्याचे प्रमाण म्हणून – ‘‘อจฺจิ ยถา วาตเวเคน ขิตฺตา, (อุปสิวาติ ภควา,)อตฺถํ ปเลติ น อุเปติ สงฺขํ; เอวํ มุนิ นามกายา วิมุตฺโต,อตฺถํ ปเลติ น อุเปติ สงฺข’’นฺติ. (สุ. นิ. ๑๐๘๐; จูฬนิ. อุปสีวมาณวปุจฺฉา ๑๑; อุปสีวมาณวปุจฺฉานิทฺเทส ๔๓) – "ज्याप्रमाणे वाऱ्याच्या वेगाने विझलेली ज्योत, (हे उपसीव, भगवान म्हणाले,) अस्त पावते आणि तिची गणना करता येत नाही; त्याचप्रमाणे मुनी नामकायापासून विमुक्त होऊन अस्त पावतात आणि त्यांची गणना करता येत नाही." (सुत्तनिपात १०८०; चुळ्ळनिद्देस, उपसीवमाणवपुच्छा ११; उपसीवमाणवपुच्छानिद्देस ४३) – อิมํ สุตฺตปทํ วตฺวา ‘‘นามกายโต จ รูปกายโต จ สุวิมุตฺตตฺตา อุภโตภาควิมุตฺโต’’ติ วทนฺติ. สุตฺเต หิ อากิญฺจญฺญายตนลาภิโน อุปสิวพฺราหฺมณสฺส ภควตา นามกายา วิมุตฺโตติ อุภโตภาควิมุตฺโตติ อกฺขาโตติ. อปเร ปน ‘‘สมาปตฺติยา วิกฺขมฺภนวิโมกฺเขน [Pg.85] เอกวารํ วิมุตฺโต, มคฺเคน สมุจฺเฉทวิโมกฺเขน เอกวารํ วิมุตฺโตติ เอวํ อุภโตภาควิมุตฺโต’’ติ วทนฺติ. เอตฺถ ปฐมวาเท ทฺวีหิ ภาเคหิ วิมุตฺโตติ อุภโตภาควิมุตฺโต. ทุติยวาเท อุภโตภาคโต วิมุตฺโตติ อุภโตภาควิมุตฺโต. ตติยวาเท ปน ทฺวีหิ ภาเคหิ ทฺเว วาเร วิมุตฺโตติ อยเมเตสํ วิเสโส. กิเลเสหิ วิมุตฺโต กิเลสา วา วิกฺขมฺภนสมุจฺเฉเทหิ กายทฺวยโต วิมุตฺตา อสฺสาติ อยมตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. เตนาห ‘‘ทฺวีหิ ภาเคหี’’ติอาทิ. हे सुत्तपद उद्धृत करून ते म्हणतात की, "नामकाय आणि रूपकाय या दोन्हीपासून चांगल्या प्रकारे विमुक्त झाल्यामुळे तो 'उभतोभागविमुक्त' होय." कारण सुत्तात आकिंचन्यायतन प्राप्त करणाऱ्या उपसीव ब्राह्मणाला भगवंतांनी "नामकायापासून विमुक्त" म्हणजेच "उभतोभागविमुक्त" असे म्हटले आहे. परंतु इतर काही जण म्हणतात की, "समापत्तीच्या विष्कंभन-विमोक्षाने एकदा विमुक्त झालेला आणि मार्गाच्या समुच्छेद-विमोक्षाने एकदा विमुक्त झालेला, अशा प्रकारे तो 'उभतोभागविमुक्त' होय." येथे पहिल्या मतात 'दोन भागांनी विमुक्त' तो उभतोभागविमुक्त होय. दुसऱ्या मतात 'दोन्ही भागांतून विमुक्त' तो उभतोभागविमुक्त होय. तिसऱ्या मतात 'दोन भागांनी दोन वेळा विमुक्त' तो उभतोभागविमुक्त होय, हा या मतांमधील फरक आहे. क्लेशांपासून विमुक्त झालेला किंवा विष्कंभन व समुच्छेद यांच्याद्वारे दोन्ही कायांपासून क्लेश विमुक्त झाले आहेत, असा याचा अर्थ समजला पाहिजे. म्हणूनच "दोन भागांनी" इत्यादी म्हटले आहे. โสติ อุภโตภาควิมุตฺโต. กามญฺเจตฺถ รูปาวจรจตุตฺถชฺฌานมฺปิ อรูปาวจรชฺฌานํ วิย ทุวงฺคิกํ อาเนญฺชปฺปตฺตนฺติ วุจฺจติ. ตํ ปน ปทฏฺฐานํ กตฺวา อรหตฺตํ ปตฺโต อุภโตภาควิมุตฺโต นาม น โหติ รูปกายโต อวิมุตฺตตฺตา. ตญฺหิ กิเลสกายโตว วิมุตฺตํ, น รูปกายโต, ตสฺมา ตโต วุฏฺฐาย อรหตฺตํ ปตฺโต อุภโตภาควิมุตฺโต น โหตีติ อาห – ‘‘จตุนฺนํ อรูป…เป… ปญฺจวิโธ โหตี’’ติ. ‘‘รูปี รูปานิ ปสฺสตี’’ติอาทิเก นิโรธสมาปตฺติอนฺเต อฏฺฐ วิโมกฺเข วตฺวา – ‘‘ยโต จ โข, อานนฺท, ภิกฺขุ อิเม อฏฺฐ วิโมกฺเข กาเยน ผุสิตฺวา วิหรติ, ปญฺญาย จสฺส ทิสฺวา อาสวา ปริกฺขีณา โหนฺติ, อยํ วุจฺจติ, อานนฺท, ภิกฺขุ อุภโตภาควิมุตฺโต’’ติ ยทิปิ มหานิทาเน (ที. นิ. ๒.๑๒๙-๑๓๐) วุตฺตํ, ตํ ปน อุภโตภาควิมุตฺตเสฏฺฐวเสน วุตฺตนฺติ อิธ สพฺพอุภโตภาควิมุตฺตสงฺคหณตฺถํ ‘‘ปญฺจวิโธ โหตี’’ติ วตฺวา ‘‘ปาฬิ ปเนตฺถ…เป… อภิธมฺเม อฏฺฐวิโมกฺขลาภิโน วเสน อาคตา’’ติ อาห. อิธาปิ หิ กีฏาคิริสุตฺเต ‘‘อิธ, ภิกฺขเว, เอกจฺโจ ปุคฺคโล…เป… อุภโตภาควิมุตฺโต’’ติ อรูปสมาปตฺติวเสน จตฺตาโร อุภโตภาควิมุตฺตา, เสฏฺโฐ จ วุตฺโต วุตฺตลกฺขณูปปตฺติโต. ยถาวุตฺเตสุ หิ ปญฺจสุ ปุริมา จตฺตาโร นิโรธํ น สมาปชฺชนฺตีติ ปริยาเยน อุภโตภาควิมุตฺตา นาม. อฏฺฐสมาปตฺติลาภี อนาคามี ตํ สมาปชฺชิตฺวา ตโต วุฏฺฐาย วิปสฺสนํ วฑฺเฒตฺวา อรหตฺตํ ปตฺโตติ นิปฺปริยาเยน อุภโตภาควิมุตฺตเสฏฺโฐ นาม. 'तो' म्हणजे उभतोभागविमुक्त. जरी येथे रूपावचर चौथे ध्यान देखील अरूपावचर ध्यानाप्रमाणे दोन अंगांचे आणि 'आनेञ्जपत्त' (अकंपित अवस्थेला प्राप्त) म्हटले जाते, तरी त्याला आधार बनवून अर्हतपद प्राप्त केलेला साधक रूपकायापासून विमुक्त न झाल्यामुळे 'उभतोभागविमुक्त' ठरत नाही. कारण तो केवळ क्लेशकायापासून विमुक्त झालेला असतो, रूपकायापासून नाही; म्हणून त्यातून उठून अर्हतपद प्राप्त केलेला साधक उभतोभागविमुक्त होत नाही, असे सांगण्यासाठी म्हटले आहे – "चार अरूप... पे... पाच प्रकारचा असतो." "रूपी रूपांना पाहतो" इत्यादी निरोधसमापत्तीपर्यंतच्या आठ विमोक्षांना सांगून – "हे आनंदा, जेव्हा भिक्खू या आठ विमोक्षांना कायेने स्पर्श करून विहरतो आणि प्रज्ञेने पाहून त्याचे आसव नष्ट होतात, तेव्हा हे आनंदा, त्या भिक्खूला 'उभतोभागविमुक्त' म्हटले जाते," असे जरी महानिदान सुत्तात (दी. नि. २.१२९-१३०) म्हटले असले, तरी ते श्रेष्ठ उभतोभागविमुक्ताच्या संदर्भात म्हटले आहे. येथे सर्व प्रकारच्या उभतोभागविमुक्तांचा संग्रह करण्यासाठी "पाच प्रकारचा असतो" असे सांगून, "येथे पाळी... पे... अभिधम्मात आठ विमोक्ष प्राप्त करणाऱ्यांच्या संदर्भात आले आहे" असे म्हटले आहे. कारण येथे कीटागिरि सुत्तात देखील "येथे, भिक्खूंनो, एखादा पुद्गल... पे... उभतोभागविमुक्त" असे म्हणून अरूपसमापत्तीच्या आधारे चार उभतोभागविमुक्त आणि सांगितलेल्या लक्षणांच्या प्राप्तीमुळे श्रेष्ठ देखील सांगितला आहे. कारण सांगितलेल्या पाच प्रकारांपैकी पहिले चार निरोधसमापत्तीला प्राप्त होत नाहीत, म्हणून त्यांना पर्यायाने उभतोभागविमुक्त म्हटले जाते. तर आठ समापत्ती प्राप्त करणारा अनागामी त्या समापत्तीला प्राप्त होऊन, त्यातून उठून विपश्यना वाढवून अर्हतपद प्राप्त करतो, त्याला निष्पर्यायाने श्रेष्ठ उभतोभागविमुक्त म्हटले जाते. กตโม จ ปุคฺคโลติอาทีสุ กตโมติ ปุจฺฉาวจนํ, ปุคฺคโลติ อสาธารณโต ปุจฺฉิตพฺพวจนํ. อิธาติ อิมสฺมึ สาสเน. เอกจฺโจติ เอโก[Pg.86]. อฏฺฐ วิโมกฺเข กาเยน ผุสิตฺวา วิหรตีติ อฏฺฐ สมาปตฺติโย สหชาตนามกาเยน ปฏิลภิตฺวา วิหรติ. ปญฺญาย จสฺส ทิสฺวา อาสวา ปริกฺขีณา โหนฺตีติ วิปสฺสนาปญฺญาย สงฺขารคตํ, มคฺคปญฺญาย จตฺตาริ สจฺจานิ ปสฺสิตฺวา จตฺตาโรปิ อาสวา ปริกฺขีณา โหนฺตีติ เอวมตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. "कोणता पुद्गल?" इत्यादी वाक्यांमध्ये "कोणता?" हा प्रश्नार्थक शब्द आहे, "पुद्गल" हा विशिष्ट रूपाने विचारला जाणारा शब्द आहे. "येथे" म्हणजे या शासनात (बुद्धशासनात). "एखादा" म्हणजे एक. "आठ विमोक्षांना कायेने स्पर्श करून विहरतो" म्हणजे आठ समापत्तींना सहजात नामकायाने प्राप्त करून विहरतो. "आणि प्रज्ञेने पाहून त्याचे आसव नष्ट होतात" म्हणजे विपश्यना प्रज्ञेने संस्कारांचे स्वरूप पाहून आणि मार्गप्रज्ञेने चार आर्यसत्यांना पाहून चारही आसव नष्ट होतात, असा याचा अर्थ समजला पाहिजे. ปญฺญาวิมุตฺโตติ วิเสสโต ปญฺญาย เอว วิมุตฺโต, น ตสฺสา ปติฏฺฐานภูเตน อฏฺฐวิโมกฺขสงฺขาเตน สาติสเยน สมาธินาติ ปญฺญาวิมุตฺโต. โย อริโย อนธิคตอฏฺฐวิโมกฺเขน สพฺพโส อาสเวหิ วิมุตฺโต, ตสฺเสตํ อธิวจนํ. อธิคเตปิ หิ รูปชฺฌานวิโมกฺเข น โส สาติสยสมาธินิสฺสิโตติ น ตสฺส วเสน อุภโตภาควิมุตฺโต โหตีติ วุตฺโตวายมตฺโถ. อรูปชฺฌาเนสุ ปน เอกสฺมิมฺปิ สติ อุภโตภาควิมุตฺโตเยว นาม โหติ. เตน หิ อฏฺฐวิโมกฺเขกเทเสน ตํนามทานสมตฺเถน อฏฺฐวิโมกฺขลาภีตฺเวว วุจฺจติ. สมุทาเย หิ ปวตฺโต โวหาโร อวยเวปิ ทิสฺสติ ยถา ‘‘สตฺติสโย’’ติ. ปาฬีติ อภิธมฺมปาฬิ. เอตฺถาติ เอติสฺสํ ปญฺญาวิมุตฺติกถายํ. อฏฺฐวิโมกฺขปฏิกฺเขปวเสเนวาติ อวธารเณน อิธาปิ ปฏิกฺเขปวเสเนว อาคตภาวํ ทสฺเสติ. เตนาห ‘‘กาเยน ผุสิตฺวา วิหรตี’’ติ. "प्रज्ञाविमुक्त" म्हणजे विशेषतः प्रज्ञेनेच विमुक्त झालेला, तिच्या (प्रज्ञेच्या) अधिष्ठानभूत असलेल्या आणि आठ विमोक्ष नावाच्या अतिशय श्रेष्ठ समाधीने विमुक्त न झालेला तो 'प्रज्ञाविमुक्त' होय. ज्या आर्य श्रावकाने आठ विमोक्ष प्राप्त न करताच सर्व प्रकारे आसवांतून मुक्ती मिळवली आहे, त्याचे हे नाव (अधिवचन) आहे. कारण रूपावचर ध्यानाचा विमोक्ष प्राप्त केलेला असला तरी, तो अतिशय श्रेष्ठ समाधीवर आश्रित नसतो, म्हणून त्या आधारे तो उभतोभागविमुक्त होत नाही, हा अर्थ आधीच सांगितला आहे. परंतु अरूपावचर ध्यानांपैकी एक जरी ध्यान प्राप्त असेल, तरी तो उभतोभागविमुक्तच ठरतो. म्हणूनच, आठ विमोक्षांच्या एका अंशाने देखील ते नाव देण्यास समर्थ असल्यामुळे त्याला 'आठ विमोक्ष प्राप्त करणारा' असेच म्हटले जाते. कारण संपूर्ण समूहासाठी वापरला जाणारा व्यवहार त्याच्या एका भागासाठी देखील वापरला जातो, जसे की "सत्तिसयो" (शंभर शस्त्रे असलेला). "पाळी" म्हणजे अभिधम्मपाळी. "येथे" म्हणजे या प्रज्ञाविमुक्ताच्या कथेत. "आठ विमोक्षांच्या निषेधाच्या रूपानेच" या निश्चयाने येथे देखील निषेधाच्या रूपानेच हा विषय आला असल्याचे दर्शविते. म्हणूनच "कायेने स्पर्श करून विहरतो" असे म्हटले आहे. ผุฏฺฐนฺตํ สจฺฉิกโรตีติ ผุฏฺฐานํ อนฺโต ผุฏฺฐนฺโต, ผุฏฺฐานํ อรูปชฺฌานานํ อนนฺตโร กาโลติ อธิปฺปาโย. อจฺจนฺตสํโยเค เจตํ อุปโยควจนํ, ผุฏฺฐานนฺตรกาลเมว สจฺฉิกโรติ สจฺฉิกาตพฺโพปาเยนาติ วุตฺตํ โหติ. ภาวนปุํสกํ วา เอตํ ‘‘เอกมนฺตํ นิสีที’’ติอาทีสุ (ปารา. ๒) วิย. โย หิ อรูปชฺฌาเนน รูปกายโต นามกาเยกเทสโต จ วิกฺขมฺภนวิโมกฺเขน วิมุตฺโต, เตน นิโรธสงฺขาโต วิโมกฺโข อาโลจิโต ปกาสิโต วิย โหติ, น ปน กาเยน สจฺฉิกโต, นิโรธํ ปน อารมฺมณํ กตฺวา เอกจฺเจสุ อาสเวสุ เขปิเตสุ เตน โส สจฺฉิกโต โหติ, ตสฺมา โส สจฺฉิกาตพฺพํ นิโรธํ ยถาอาโลจิตํ นามกาเยน สจฺฉิกโรตีติ ‘‘กายสกฺขี’’ติ วุจฺจติ, น ตุ ‘‘วิมุตฺโต’’ติ เอกจฺจานํ อาสวานํ อปริกฺขีณตฺตา. เตนาห [Pg.87] – ‘‘ฌานผสฺสํ ปฐมํ ผุสติ, ปจฺฉา นิโรธํ นิพฺพานํ สจฺฉิกโรตี’’ติ. อยํ จตุนฺนํ อรูปสมาปตฺตีนํ เอเกกโต วุฏฺฐาย สงฺขาเร สมฺมสิตฺวา กายสกฺขิภาวํ ปตฺตานํ จตุนฺนํ, นิโรธา วุฏฺฐาย อคฺคมคฺคปฺปตฺตอนาคามิโน จ วเสน อุภโตภาควิมุตฺโต วิย ปญฺจวิโธ นาม โหติ. เตน วุตฺตํ อภิธมฺมฏีกายํ ‘‘กายสกฺขิมฺหิปิ เอเสว นโย’’ติ. स्पर्श केलेल्याच्या शेवटी साक्षात करतो म्हणजे स्पर्शाचा अंत तो 'फुठ्ठंत' (phuṭṭhanto), म्हणजेच अरूपध्यानांच्या स्पर्शाचा लगेचच नंतरचा काळ असा अभिप्राय आहे. आणि हे अत्यंतसंयोगात द्वितीया विभक्तीचे रूप आहे, स्पर्शाच्या लगेचच नंतरच्या काळातच साक्षात करण्याच्या उपायाने साक्षात करतो, असे म्हटले आहे. किंवा हे 'एकमन्तं निसीदि' (एका बाजूला बसले) इत्यादींप्रमाणे भावे नपुंसकलिंगी रूप आहे. जो खरोखर अरूपध्यानाने रूपकायापासून आणि नामकायाच्या एका भागापासून विक्खंभनविमोक्षाद्वारे (विक्षेपण मुक्तीद्वारे) विमुक्त झाला आहे, त्याने निरोध नावाचा विमोक्ष जणू काही पाहिला आहे, प्रकाशित केला आहे, परंतु कायेने (शरीराने) साक्षात केलेला नाही. परंतु निरोधाला आलंबन करून काही आसवांचा क्षय केला असता त्याने तो साक्षात केलेला असतो. म्हणून तो साक्षात करण्यायोग्य निरोधाला जसा पाहिला आहे तसा नामकायेने साक्षात करतो, म्हणून त्याला 'कायसाक्षी' (कायासक्खी) म्हटले जाते, परंतु काही आसवांचा पूर्ण क्षय न झाल्यामुळे 'विमुक्त' असे म्हटले जात नाही. म्हणूनच त्यांनी म्हटले आहे – 'प्रथम ध्यानस्पर्शाचा स्पर्श करतो, नंतर निरोध निर्वाणाचा साक्षात करतो.' हा चार अरूपसमापत्तींपैकी एकेकातून उठून संस्कारांचे संमर्शन करून कायसाक्षी भाव प्राप्त झालेल्या चार आणि निरोधातून उठून अग्रमागाला प्राप्त झालेल्या अनागामीच्या रूपाने 'उभतोभागविमुक्त' प्रमाणे पाच प्रकारचा होतो. म्हणूनच अभिधम्मटीकेमध्ये म्हटले आहे – 'कायसाक्षीच्या बाबतीतही हाच नियम आहे.' ทิฏฺฐนฺตํ ปตฺโตติ ทสฺสนสงฺขาตสฺส โสตาปตฺติมคฺคญาณสฺส อนนฺตรํ ปตฺโตติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ทิฏฺฐตฺตา ปตฺโต’’ติปิ ปาโฐ. เอเตน จตุสจฺจทสฺสนสงฺขาตาย ทิฏฺฐิยา นิโรธสฺส ปตฺตตํ ทีเปติ. เตนาห ‘‘ทุกฺขา สงฺขารา, สุโข นิโรโธติ ญาตํ โหตี’’ติ. ตตฺถ ปญฺญายาติ มคฺคปญฺญาย. ปฐมผลฏฺฐโต ยาว อคฺคมคฺคฏฺฐา, ตาว ทิฏฺฐิปฺปตฺโต. เตนาห ‘‘โสปิ กายสกฺขิ วิย ฉพฺพิโธ โหตี’’ติ. ยถา ปน ปญฺญาวิมุตฺโต ปญฺจวิโธ วุตฺโต, เอวํ อยมฺปิ สุกฺขวิปสฺสโก, จตูหิ รูปชฺฌาเนหิ วุฏฺฐาย ทิฏฺฐิปฺปตฺตภาวปฺปตฺตา จตฺตาโร จาติ ปญฺจวิโธ โหตีติ เวทิตพฺโพ. สทฺธาวิมุตฺเตปิ เอเสว นโย. อิทํ ทุกฺขนฺติ เอตฺตกํ ทุกฺขํ, น อิโต อุทฺธํ ทุกฺขนฺติ. ยถาภูตํ ปชานาตีติ ฐเปตฺวา ตณฺหํ อุปาทานกฺขนฺธปญฺจกํ ทุกฺขสจฺจนฺติ ยาถาวโต ปชานาติ. ยสฺมา ปน ตณฺหา ทุกฺขํ ชเนติ นิพฺพตฺเตติ, ตโต ตํ ทุกฺขํ สมุเทติ, ตสฺมา นํ ‘‘อยํ ทุกฺขสมุทโย’’ติ ยถาภูตํ ปชานาติ ยสฺมา ปน อิทํ ทุกฺขํ สมุทโย จ นิพฺพานํ ปตฺวา นิรุชฺฌติ อปฺปวตฺตึ คจฺฉติ, ตสฺมา ‘‘อยํ ทุกฺขนิโรโธ’’ติ ยถาภูตํ ปชานาติ. อริโย ปน อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค ตํ ทุกฺขนิโรธํ คจฺฉติ, เตน ‘‘อยํ ทุกฺขนิโรธคามินิปฏิปทา’’ติ ยถาภูตํ ปชานาติ. เอตฺตาวตา นานกฺขเณ สจฺจววตฺถานํ ทสฺสิตํ. อิทานิ ตํ เอกกฺขเณ ทสฺเสตุํ ‘‘ตถาคตปฺปเวทิตา’’ติอาทิ วุตฺตํ, ตสฺสตฺโถ อาคมิสฺสติ. दृष्टीच्या शेवटी प्राप्त झालेला म्हणजे दर्शन नावाच्या स्रोतापत्ती-मार्गज्ञानाच्या लगेचच नंतर प्राप्त झालेला, असे म्हटले आहे. 'दिट्ठत्ता पत्तो' (दृष्टीमुळे प्राप्त झालेला) असाही पाठ आहे. याद्वारे चार आर्यसत्यांच्या दर्शनावर आधारित दृष्टीने निरोधाची प्राप्ती स्पष्ट होते. म्हणूनच त्यांनी म्हटले आहे – 'संस्कार दुःखकारक आहेत, निरोध सुखरूप आहे, हे ज्ञात होते.' तेथे 'प्रज्ञेने' म्हणजे मार्गप्रज्ञेने. पहिल्या फलस्थ व्यक्तीपासून ते अग्र मार्गस्थ व्यक्तीपर्यंत तो 'दृष्टीप्राप्त' असतो. म्हणूनच त्यांनी म्हटले आहे – 'तोसुद्धा कायसाक्षीप्रमाणे सहा प्रकारचा असतो.' परंतु ज्याप्रमाणे प्रज्ञाविमुक्त पाच प्रकारचा सांगितला आहे, त्याचप्रमाणे हासुद्धा शुष्कविपश्यक (सुक्खविपस्सक) आणि चार रूपध्यानांतून उठून दृष्टीप्राप्त भाव प्राप्त झालेले चार, अशा प्रकारे पाच प्रकारचा असतो, असे जाणावे. श्रद्धाविमुक्ताच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. 'हे दुःख आहे' म्हणजे एवढेच दुःख आहे, यापलीकडे दुःख नाही. 'यथाभूत जाणतो' म्हणजे तृष्णेला सोडून पाच उपादानस्कंध हेच दुःखसत्य आहे, असे यथार्थपणे जाणतो. परंतु ज्या अर्थी तृष्णा दुःखाला जन्म देते, उत्पन्न करते, त्यापासून ते दुःख उद्भवते, म्हणून त्याला 'हा दुःखसमुदय आहे' असे यथाभूत जाणतो. परंतु ज्या अर्थी हे दुःख आणि समुदय निर्वाणाला प्राप्त करून निरुद्ध होते, अप्रवृत्तीला प्राप्त होते, म्हणून त्याला 'हा दुःखनिरोध आहे' असे यथाभूत जाणतो. आणि आर्य अष्टांगिक मार्ग त्या दुःखनिरोधाकडे घेऊन जातो, म्हणून त्याला 'ही दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदा आहे' असे यथाभूत जाणतो. एवढ्याने वेगवेगळ्या क्षणांतील सत्याचे निर्धारण दाखवले आहे. आता ते एकाच क्षणात दाखवण्यासाठी 'तथागतप्पवेदिता' (तथागतांनी प्रवेदिलेली) इत्यादी म्हटले आहे, त्याचा अर्थ पुढे येईल. สทฺธาย วิมุตฺโตติ เอเตน สพฺพถา อวิมุตฺตสฺสปิ สทฺธามตฺเตน วิมุตฺตภาโว ทีปิโต โหติ. สทฺธาวิมุตฺโตติ วา สทฺธาย อธิมุตฺโตติ อตฺโถ. วุตฺตนเยเนวาติ ‘‘โสตาปตฺติผล’’นฺติอาทินา วุตฺตนเยน. สทฺทหนฺตสฺสาติ ‘‘เอกํสโต อยํ ปฏิปทา กิเลสกฺขยํ อาวหติ สมฺมาสมฺพุทฺเธน ภาสิตตฺตา’’ติ เอวํ สทฺทหนฺตสฺส. ยสฺมา ปนสฺส อนิจฺจานุปสฺสนาทีหิ [Pg.88] นิจฺจสญฺญาปหานวเสน ภาวนาย ปุพฺเพนาปรํ วิเสสํ ปสฺสโต ตตฺถ ตตฺถ ปจฺจกฺขตาปิ อตฺถิ, ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘สทฺทหนฺตสฺส วิยา’’ติ. เสสปททฺวยํ ตสฺเสว เววจนํ. เอตฺถ จ ปุพฺพภาคมคฺคภาวนาติ วจเนน อาคมนียปฏิปทานานตฺเตน สทฺธาวิมุตฺตทิฏฺฐิปฺปตฺตานํ ปญฺญานานตฺตํ โหตีติ ทสฺสิตํ. อภิธมฺมฏฺฐกถายมฺปิ (ปุ. ป. อฏฺฐ. ๒๘) ‘‘เนสํ กิเลสปฺปหาเน นานตฺตํ นตฺถิ, ปญฺญาย นานตฺตํ อตฺถิเยวา’’ติ วตฺวา – ‘‘อาคมนียนานตฺเตเนว สทฺธาวิมุตฺโต ทิฏฺฐิปฺปตฺตํ น ปาปุณาตีติ สนฺนิฏฺฐานํ กต’’นฺติ วุตฺตํ. श्रद्धेने विमुक्त याद्वारे सर्व प्रकारे विमुक्त नसलेल्याचाही केवळ श्रद्धेमुळे विमुक्त भाव स्पष्ट होतो. किंवा 'श्रद्धाविमुक्त' म्हणजे श्रद्धेने अधिमुक्त (समर्पित) झालेला असा अर्थ आहे. 'सांगितलेल्या पद्धतीनेच' म्हणजे 'स्रोतापत्ती फल' इत्यादींनी सांगितलेल्या पद्धतीने. 'श्रद्धा ठेवणाऱ्याचा' म्हणजे 'सम्यक्संबुद्धांनी उपदेशिल्यामुळे ही प्रतिपदा निश्चितपणे क्लेशक्षय घडवून आणते' अशी श्रद्धा ठेवणाऱ्याचा. परंतु अनित्यानुपश्यना इत्यादींद्वारे नित्यसंज्ञेचा प्रहाण करण्याच्या स्वरूपातील भावनेने पूर्व आणि उत्तर विशेष पाहणाऱ्याला त्या त्या ठिकाणी प्रत्यक्षताही असते, म्हणून 'श्रद्धा ठेवणाऱ्याप्रमाणे' असे म्हटले आहे. उर्वरित दोन पदे त्याचेच समानार्थी शब्द आहेत. आणि येथे 'पूर्वभाग मार्गभावना' या शब्दाने आगमनीय प्रतिपदेच्या भिन्नतेमुळे श्रद्धाविमुक्त आणि दृष्टीप्राप्त यांच्या प्रज्ञेमध्ये भिन्नता असते, हे दाखवले आहे. अभिधम्म-अट्ठकथेमध्येही 'त्यांच्या क्लेशप्रहाणामध्ये भिन्नता नाही, प्रज्ञेमध्ये भिन्नता आहेच' असे सांगून – 'आगमनीय भिन्नतेमुळेच श्रद्धाविमुक्त दृष्टीप्राप्त अवस्थेला पोहोचत नाही, असा निष्कर्ष काढला आहे' असे म्हटले आहे. ปญฺญาสงฺขาตํ ธมฺมํ อธิมตฺตตาย ปุพฺพงฺคมํ หุตฺวา ปวตฺตํ อนุสฺสรตีติ ธมฺมานุสารี. เตนาห ‘‘ธมฺโม’’ติอาทิ. สทฺธํ อนุสฺสรติ สทฺธาปุพฺพงฺคมํ มคฺคํ ภาเวตีติ อิมมตฺถํ ‘‘เอเสว นโย’’ติ อติทิสติ. ปญฺญํ วาเหตีติ ปญฺญาวาหี, ปญฺญํ สาติสยํ ปวตฺเตตีติ อตฺโถ. เตนาห ‘‘ปญฺญาปุพฺพงฺคมํ อริยมคฺคํ ภาเวตี’’ติ. สทฺธาวาหินฺติ เอตฺถ วุตฺตนเยน อตฺโถ เวทิตพฺโพ. อุภโตภาควิมุตฺตาทิกถาติ อุภโตภาควิมุตฺตาทีสุ อาคมนโต ปฏฺฐาย วตฺตพฺพกถา. เอเตสนฺติ ยถาวุตฺตานํ อุภโตภาควิมุตฺตาทีนํ. อิธาติ อิมสฺมึ กีฏาคิริสุตฺเต. นนุ จ อฏฺฐสมาปตฺติลาภิวเสน อุภโตภาควิมุตฺโต กายสกฺขีอาทโย จ อภิธมฺเม อาคตา, กถมิธ อรูปชฺฌานลาภีวเสเนว อุทฺธฏาติ โจทนํ สนฺธายาห ‘‘ยสฺมา’’ติอาทิ. प्रज्ञा नावाच्या धर्माला अधिक तीव्रतेने पुरोगामी करून प्रवृत्त झालेल्याचे अनुसरण करतो तो 'धर्मानुसारी' (धम्मानुसारी). म्हणूनच त्यांनी म्हटले आहे – 'धम्म' इत्यादी. श्रद्धेचे अनुसरण करतो, श्रद्धा पुरोगामी असलेल्या मार्गाची भावना करतो, या अर्थासाठी 'हाच नियम आहे' असा अतिदेश केला आहे. प्रज्ञेला वाहून नेतो तो 'प्रज्ञावाही', प्रज्ञेला अतिशय उत्कृष्टपणे प्रवृत्त करतो असा अर्थ आहे. म्हणूनच त्यांनी म्हटले आहे – 'प्रज्ञा पुरोगामी असलेल्या आर्यमार्गाची भावना करतो.' 'श्रद्धावाही' या शब्दाचा अर्थ येथे सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. 'उभतोभागविमुक्त' इत्यादींची कथा म्हणजे उभतोभागविमुक्त इत्यादींच्या बाबतीत आगमनापासून सांगण्यायोग्य कथा. 'यांच्या' म्हणजे वर सांगितलेल्या उभतोभागविमुक्त इत्यादींच्या. 'येथे' म्हणजे या कीटागिरिसुत्तात. 'पण अष्टसमापत्तींच्या प्राप्तीमुळे उभतोभागविमुक्त आणि कायसाक्षी इत्यादी अभिधम्मात आले आहेत, मग येथे केवळ अरूपध्यान प्राप्त करण्याच्या दृष्टीनेच का उद्धृत केले आहेत?' या शंकेचे निरसन करण्यासाठी 'ज्या अर्थी' इत्यादी म्हटले आहे। ผุสิตฺวา ปตฺวา. ปญฺญาย จสฺส ทิสฺวา อาสวา ปริกฺขีณา โหนฺตีติ น อาสวา ปญฺญาย ปสฺสียนฺติ, ทสฺสนการณา ปญฺญาย ปริกฺขีณา ‘‘ทิสฺวา ปญฺญาย ปริกฺขีณา’’ติ วุตฺตา. ทสฺสนายตฺตปริกฺขยตฺตา เอว หิ ทสฺสนํ อาสวานํ ขยสฺส ปุริมกิริยา โหตีติ. ตถาคเตน ปเวทิตาติ โพธิมณฺเฑ นิสีทิตฺวา ตถาคเตน ปฏิวิทฺธา วิทิตา ปจฺฉา ปเรสํ ปากฏีกตา. ‘‘จตุสจฺจธมฺมา’’ติ วตฺวา ตทนฺโตคธตฺตา สีลาทีนํ ‘‘อิมสฺมึ ฐาเน สีลํ กถิต’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. อตฺเถนาติ อวิปฺปฏิสาราทิปโยชเนน ตสฺมึ ตสฺมึ ปีติอาทิเกน อตฺเถน. การเณนาติ สปฺปุริสูปนิสฺสยาทินา การเณน ตสฺมึ ตสฺมึ สมาธิอาทิปทฏฺฐานตาย สีลาทิ [Pg.89] การเณ. จิณฺณจริตตฺตาติ สทฺธาจิณฺณภาเวน สมฺโพธาวหภาเว. ตตฺถ ตตฺถ วิจริตา วิเสเสน จริตา, เตสุ เตน ปญฺญา สุฏฺฐุ จราปิตาติ อตฺโถ. ปติฏฺฐิตา โหติ มคฺเคน อาคตตฺตา. มตฺตาย ปริตฺตปฺปมาเณน. โอโลกนํ ขมนฺติ, ปญฺญาย คเหตพฺพตํ อุเปนฺติ. फुसित्वा म्हणजे प्राप्त करून. 'पञ्ञाय चस्स दिस्वा आसवा परिक्खीणा होन्ति' (प्रज्ञेने पाहून त्याचे आसव क्षीण होतात) याचा अर्थ असा नाही की आसव प्रज्ञेने पाहिले जातात, तर प्रज्ञेने पाहिल्यामुळे (दर्शनामुळे) ते क्षीण होतात, म्हणून 'पाहून प्रज्ञेने क्षीण झाले' असे म्हटले आहे. कारण दर्शन (पाहणे) यावरच क्षय अवलंबून असल्याने, दर्शन हे आसवांच्या क्षयाची पूर्वक्रिया ठरते. 'तथागतेन पवेदिता' (तथागतांनी प्रवेदित केलेले) म्हणजे बोधिमंडळावर बसून तथागतांनी साक्षात्कृत केलेले, जाणलेले आणि नंतर इतरांना प्रकट केलेले. 'चतुसच्चधम्मा' (चार आर्यसत्य धर्म) असे म्हणून, त्यात शील इत्यादींचा अंतर्भाव होत असल्यामुळे 'या ठिकाणी शील सांगितले आहे' इत्यादी म्हटले आहे. 'अत्थेन' (अर्थाने) म्हणजे पश्चात्ताप न होणे (अविप्पटिसार) इत्यादी प्रयोजनाने, त्या त्या ठिकाणी प्रीती इत्यादी अर्थाने. 'कारणेन' (कारणाने) म्हणजे सत्पुरुष-संश्रय (सत्पुरुषांचा आश्रय) इत्यादी कारणाने, त्या त्या ठिकाणी समाधी इत्यादींचे पदस्थान (कारण) म्हणून शील इत्यादी कारणांमध्ये. 'चिण्णचरितत्ता' म्हणजे श्रद्धेने आचरण केल्यामुळे संबोधीला प्राप्त करून देणाऱ्या अवस्थेत. त्या त्या ठिकाणी विचरलेले, विशेष रूपाने आचरण केलेले, त्यांमध्ये त्याने प्रज्ञा चांगल्या प्रकारे चालविली आहे असा अर्थ आहे. 'पतिट्ठिता होति' (प्रतिष्ठित होते) म्हणजे मार्गाने आल्यामुळे. 'मत्ताय' म्हणजे अल्प प्रमाणात. 'ओलोकनं खमन्ति' (अवलोकन सहन करतात) म्हणजे प्रज्ञेने ग्रहण करण्यायोग्य होतात. ตโยติ กายสกฺขิทิฏฺฐิปฺปตฺตสทฺธาวิมุตฺตา. ยถาฐิโตว ปาฬิอตฺโถ, น ตตฺถ กิญฺจิ นิทฺธาเรตฺวา วตฺตพฺพํ อตฺถีติ สุตฺตนฺตปริยาเยน อวุตฺตํ วทติ. ตสฺส มคฺคสฺสาติ โสตาปตฺติมคฺคสฺส ยํ กาตพฺพํ, ตสฺส อธิคตตฺตา. อุปริ ปน ติณฺณํ มคฺคานํ อตฺถาย เสวมานา อนุโลมเสนาสนํ, ภชมานา กลฺยาณมิตฺเต, สมนฺนานยมานา อินฺทฺริยานิ อนุปุพฺเพน ภาวนามคฺคปฺปฏิปาฏิยา อรหตฺตํ ปาปุณิสฺสนฺติ มคฺคสฺส อเนกจิตฺตกฺขณิกตายาติ อยเมตฺถ สุตฺตปเทเส ปาฬิยา อตฺโถ. 'तयो' (तीन) म्हणजे कायसाक्षी, दृष्टि प्राप्त आणि श्रद्धाविमुक्त. पाळीचा (पाळि) अर्थ जसा आहे तसाच आहे, त्यात काही वेगळे स्पष्ट करून सांगण्यासारखे नाही, म्हणून सूत्राच्या पद्धतीने जे सांगितले नाही ते सांगतात. 'तस्स मग्गस्स' (त्या मार्गाचे) म्हणजे सोतापत्तिमार्गाचे (स्रोतापत्ती मार्गाचे) जे कर्तव्य आहे, ते प्राप्त केल्यामुळे. परंतु, वरच्या तीन मार्गांच्या प्राप्तीसाठी अनुकूल शयनासनाचा (अनुलोगसेनासन) सेवा करत, कल्याणमित्रांची संगत करत, इंद्रियांना अनुकूल करत, अनुक्रमाने भावनामार्गाच्या परंपरेने अर्हत्त्व प्राप्त करतील, कारण मार्ग हा अनेक चित्तक्षणांचा बनलेला असतो - हा येथे सूत्रभागातील पाळीचा अर्थ आहे. อิมเมว ปาฬึ คเหตฺวาติ ‘‘กตโม จ ปุคฺคโล สทฺธานุสารี’’ติ มคฺคฏฺเฐ ปุคฺคเล วตฺวา ‘‘อิมสฺส โข อหํ, ภิกฺขเว’’ติอาทินา เตสํ วเสน อนุโลมเสนาสนเสวนาทีนํ วุตฺตตฺตา อิมเมว ยถาวุตฺตํ ปาฬิปเทสํ คเหตฺวา ‘‘โลกุตฺตรธมฺโม พหุจิตฺตกฺขณิโก’’ติ วทติ. โส วตฺตพฺโพติ โส วิตณฺฑวาที เอวํ วตฺตพฺโพ. ยทิ มคฺคฏฺฐปุคฺคเล วตฺวา อนุโลมิกเสนาสนเสวนาทิ ปาฬิยํ วุตฺตนฺติ มคฺคสมงฺคิโน เอว หุตฺวา เต ตถา ปฏิปชฺชนฺติ, เอวํ สนฺเต เสนาสนปฏิสํยุตฺตรูปาทิวิปสฺสนคฺคหณสฺมึ ตว มเตน มคฺคสมงฺคิโน เอว อาปชฺเชยฺยุํ, น เจตํ เอวํ โหติ, ตสฺมา สุตฺตํ เม ลทฺธนฺติ ยํ กิญฺจิ มา กเถหีติ วาเรตพฺโพ. เตนาห ‘‘ยทิ อญฺเญน จิตฺเตนา’’ติอาทิ. ตตฺถ เอวํ สนฺเตติ นานาจิตฺเตเนว เสนาสนปฏิเสวนาทิเก สติ. ตตฺถ ปาฬิยํ ยทิ โลกุตฺตรธมฺมสมงฺคิโน เอว ปญฺจวิญฺญาณสมงฺคิกาเลปิ โลกุตฺตรสมงฺคิตํ สเจ สมฺปฏิจฺฉสิ, สตฺถารา สทฺธึ ปฏิวิรุชฺฌสิ สุตฺตวิโรธทีปนโต. เตนาห ‘‘สตฺถารา หี’’ติอาทิ. ธมฺมวิจารณา นาม ตุยฺหํ อวิสโย, ตสฺมา ยาคุํ ปิวาหีติ อุยฺโยเชตพฺโพ. 'इममेव पाळिं गहेत्वा' (हीच पाळी घेऊन) म्हणजे 'कतम च पुग्गलो सद्धानुसारी' (श्रद्धानुसार चालणारा पुद्गल कोणता?) असे मार्गस्थ पुद्गलांविषयी सांगून, 'इमस्स खो अहं, भिक्खवे' (याचे खरोखर मी, भिक्षूंनो) इत्यादींद्वारे त्यांच्या संदर्भात अनुकूल शयनासनाचा उपभोग इत्यादी सांगितल्यामुळे, हाच पूर्वोक्त पाळीचा भाग घेऊन 'लोकोत्तर धर्म हा अनेक चित्तक्षणांचा असतो' असे तो म्हणतो. 'सो वत्तब्बो' (त्याला असे म्हणावे) म्हणजे त्या वितंडवाद्याला असे म्हणावे - जर मार्गस्थ पुद्गलांविषयी सांगून अनुकूल शयनासनाचा उपभोग इत्यादी पाळीमध्ये सांगितले आहे, तर ते मार्गयुक्त (मग्गसमङ्गी) होऊनच तसे आचरण करतात; जर असे असेल, तर शयनासनाशी संबंधित रूप इत्यादींच्या विपश्यना ग्रहणात तुझ्या मते ते मार्गयुक्तच होतील, पण असे होत नाही. म्हणून 'मला सूत्र मिळाले आहे' असे म्हणून काहीही बोलू नकोस, असे त्याला रोखावे. म्हणूनच म्हटले आहे - 'यदि अञ्ञेन चित्तेन' (जर दुसऱ्या चित्ताने) इत्यादी. 'तत्थ एवं सन्ते' म्हणजे नाना चित्तांनीच शयनासनाचा उपभोग इत्यादी होत असताना. तेथे पाळीमध्ये जर लोकोत्तरधर्माने युक्त असलेलेच पंचविज्ञानयुक्त काळीही लोकोत्तरयुक्तता स्वीकारतात असे तू मानत असशील, तर तू शास्त्यांशी (बुद्धांशी) विरोध करत आहेस, कारण हे सूत्राच्या विरुद्ध जाणारे आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - 'satthārā hī' (शास्त्यांशीच) इत्यादी. 'धर्माची चिकित्सा करणे हा तुझा विषय नाही, म्हणून तू पेज (कांजी) पी' असे म्हणून त्याला घालवून द्यावे. ๑๘๓. อาทิเกเนวาติ ปฐเมเนว. อนุปุพฺพสิกฺขาติ อนุปุพฺเพเนว ปวตฺตสิกฺขาย. เตนาห ‘‘กรณตฺเถ ปจฺจตฺตวจน’’นฺติ. สทฺธา ชาตา เอตสฺสาติ สทฺธาชาโต, อคฺยาหิตาติปกฺเขเปน ชาต-สทฺทสฺส ปจฺฉาวจนํ[Pg.90]. เอวเมตนฺติ อธิมุจฺจนํ โอกปฺปนิยสทฺธา. สนฺติเก นิสีทติ อุปฏฺฐานวเสน. สาธุกํ กตฺวา ธาเรตีติ ยถาสุตํ ธมฺมํ วาจุคฺคตกรณวเสน ตํ ปคุณํ กตฺวา สารวเสน ธาเรติ. ฉนฺโท ชายตีติ ธมฺเมสุ นิชฺฌานกฺขเมสุ อิเม ธมฺเม ภาวนาปญฺญาย ปจฺจกฺขโต อุสฺสามีติ กตฺตุกมฺยตากุสลจฺฉนฺโท ชายติ. อุสฺสหตีติ ฉนฺโท อุปฺปาทมตฺเต อฏฺฐตฺวา ตโต ภาวนารมฺภวเสน อุสฺสหติ. ตุลยติติ สมฺมสนวเสน สงฺขาเร. ตีรณวิปสฺสนาย ตุลยนฺโตติ ตีรณปริญฺญาย ชานิตฺวา อุปริ ปหานปริญฺญาย วเสน ปริตุลยนฺโต ปฏิชานนฺโต. มคฺคปธานํ ปทหตีติ มคฺคลกฺขณํ ปธานิกํ มคฺคํ ปทหติ. เปสิตจิตฺโตติ นิพฺพานํ ปติ เปสิตจิตฺโต. นามกาเยนาติ มคฺคปฺปฏิปาฏิยา ตํตํมคฺคสมฺปยุตฺตนามกาเยน. น ปน กิญฺจิ อาหาติ ทูรตาย สมานํ น กิญฺจิ วจนํ ภควา อาห เต ทฬฺหตรํ นิคฺคณฺหิตุํ. १८३. 'आदिकेनेव' म्हणजे पहिल्यापासूनच. 'अनुपुब्बसिक्खा' (अनुक्रमिक शिक्षण) म्हणजे अनुक्रमानेच चालणाऱ्या शिक्षणाने. म्हणूनच म्हटले आहे - 'करण अर्थात प्रथमा विभक्ती आहे'. 'सद्धा जाता एतस्स' (ज्याला श्रद्धा उत्पन्न झाली आहे) तो 'सद्धाजातो' (श्रद्धाजात). 'एवमेतं' (असे हे) म्हणजे अधिमुक्ती (दृढ विश्वास), श्रद्धा बसणे. 'सन्तिके निसीदति' (जवळ बसतो) म्हणजे सेवेच्या उद्देशाने. 'साधुकं कत्वा धारेति' (चांगल्या प्रकारे धारण करतो) म्हणजे ऐकलेला धर्म मुखोद्गत करून, त्याचा सराव करून, तो सार रूपाने मनात धारण करतो. 'छन्दो जायति' (इच्छा उत्पन्न होते) म्हणजे मनन करण्यास योग्य असलेल्या धर्मांविषयी 'हे धर्म मी भावनाप्रज्ञेने प्रत्यक्ष अनुभवणार' अशी काहीतरी करण्याची कुशल इच्छा (कत्तुकम्यताकुसलच्छन्द) उत्पन्न होते. 'उस्सहति' (उत्साह दाखवतो) म्हणजे केवळ इच्छा उत्पन्न होण्यावरच न थांबता, त्यानंतर भावनेच्या आरंभाने उत्साह दाखवतो. 'तुलयति' म्हणजे संस्करणांचे (संस्कारांचे) मनन करून तोलणे. 'तीरणविपस्सनाय तुलयन्तो' म्हणजे तीरणपरिज्ञेने (निर्णय परिज्ञेने) जाणून, पुढे प्रहाणपरिज्ञेच्या (त्याग परिज्ञेच्या) आधारे तुलना करत, प्रतिज्ञा करत. 'मग्गपधानं पदहति' म्हणजे मार्गलक्षण असलेल्या प्रधान मार्गासाठी प्रयत्न करतो. 'पेसितचित्तो' म्हणजे निर्वाणाकडे चित्त पाठविलेला. 'नामकायाने' म्हणजे मार्गाच्या अनुक्रमाने त्या त्या मार्गाशी संप्रयुक्त असलेल्या नामकायाने. 'न पन किञ्चि आहा' म्हणजे दूर असल्यामुळे भगवंतांनी त्यांना अधिक दृढतेने निग्रहित करण्यासाठी काहीही वचन म्हटले नाही. ๑๘๔. ปเณน โวหาเรน พฺยากรณํ ปณวิยา, ปณวิยา อภาเวน โอปณวิยา, น อุเปตีติ น ยุชฺชติ. ตนฺติ อิทํ อิธ อธิปฺเปตํ ปโณ ปณวิยํ ทสฺเสตุํ. ตยิทํ สพฺพํ ภควา ‘‘มยํ โข, อาวุโส, สายญฺเจว ภุญฺชามา’’ติ อสฺสชิปุนพฺพสุเกหิ วุตฺตํ สิกฺขาย อวตฺตนภาวทีปนวจนํ สนฺธาย วทติ. १८४. 'पण' म्हणजे व्यवहाराने स्पष्ट करणे ते 'पणविया', आणि 'पणविया' च्या अभावाने 'ओपणविया' (व्यवहारबाह्य), 'न उपेति' म्हणजे जुळत नाही. 'तं' म्हणजे येथे अभिप्रेत असलेले 'पण' आणि 'पणविय' दाखवण्यासाठी आहे. हे सर्व भगवान 'आम्ही तर, आवुसो, संध्याकाळीच जेवतो' असे अस्सजि आणि पुनब्बसु यांनी शिक्षेचे (सिक्खेचे) पालन न करण्याचे दर्शविणारे जे वचन म्हटले होते, त्याला संधान करून (उद्देशून) म्हणतात. อุกฺขิปิตฺวาติ สีเสน คเหตฺวา วิย สมาทาย. อนุธมฺโมติ อนุรูโป สภาโว, สาวกภาวสฺส อนุจฺฉวิกา ปฏิปตฺติ. โรหนียนฺติ วิรุฬฺหิภาวํ. สินิยฺหติ เอตฺถ, เอเตน วาติ สิเนโห, การณํ. ตํ เอตฺถ อตฺถีติ สิเนหวนฺตํ, ปาทกนฺติ อตฺโถ. ตโจ เอกํ องฺคนฺติ ตโจ วีรปกฺขภาเว เอกมงฺคํ. ปธานํ อนุยุญฺชนฺตสฺส หิ ตเจ ปลุชฺชมาเนปิ ตํนิมิตฺตํ อโวสานํ อนาปชฺชนกสฺเสว วีริยสฺส เอกํ องฺคํ เอกํ การณํ. เอวํ เสเสสุ วตฺตพฺพํ. เตนาห – ‘‘อรหตฺตํ อปฺปตฺวา น วุฏฺฐหิสฺสามีติ เอวํ ปฏิปชฺชตี’’ติ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. 'उक्खिपित्वा' (उचलून) म्हणजे डोक्यावर घेतल्याप्रमाणे स्वीकारून. 'अनुधम्मो' म्हणजे अनुरूप स्वभाव, श्रावकभावाला योग्य अशी प्रतिपत्ती (आचरण). 'रोहनीयं' म्हणजे वृद्धीला प्राप्त होणे. 'सिनिय्हति एत्थ, एतेन वा' (यात स्नेह निर्माण होतो किंवा याने) म्हणून 'सिनेहो' (स्नेह) म्हणजे कारण. ते येथे आहे म्हणून 'सिनेहवन्तं' (स्नेहयुक्त), म्हणजे पादक (पायाभूत) असा अर्थ आहे. 'तचो एकं अङ्गं' (त्वचा हे एक अंग आहे) म्हणजे वीर्यपक्षाच्या बाबतीत त्वचा हे एक अंग आहे. कारण प्रधान प्रयत्न करणाऱ्याची त्वचा जरी नष्ट झाली, तरी त्या निमित्ताने खचून न जाता वीर्य टिकवून ठेवण्याचे ते एक अंग, एक कारण आहे. इतर अंगांच्या बाबतीतही असेच समजावे. म्हणूनच म्हटले आहे - 'अर्हत्त्व प्राप्त केल्याशिवाय मी उठणार नाही, अशा प्रकारे तो प्रतिपन्न होतो (प्रयत्न करतो)'. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. กีฏาคิริสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. कीटागिरिसुत्तवर्णनेची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. นิฏฺฐิตา จ ภิกฺขุวคฺควณฺณนา. आणि भिक्खुवग्गवर्णना (भिक्षुवर्ग वर्णन) समाप्त झाली. ๓. ปริพฺพาชกวคฺโค ३. परिव्राजकवर्ग (परिब्बाजकवग्गो) ๑. เตวิชฺชวจฺฉสุตฺตวณฺณนา १. तेविज्जवच्छसुत्तवर्णना ๑๘๕. ตตฺถาติ [Pg.91] เอกปุณฺฑรีกสญฺญิเต ปริพฺพาชการาเม. อนาคตปุพฺโพ โลกิยสมุทาหารวเสน ‘‘จิรสฺสํ โข, ภนฺเต’’ติอาทินา วุจฺจติ, อยํ ปเนตฺถ อาคตปุพฺพตํ อุปาทาย ตถา วุตฺโต. ภควา หิ เกสญฺจิ วิมุตฺติชนนตฺถํ, เกสญฺจิ อินฺทฺริยปริปากตฺถํ, เกสญฺจิ วิเสสาธิคมตฺถํ กทาจิ ติตฺถิยารามํ อุปคจฺฉติ. อนนุญฺญาย ฐตฺวาติ อนนุชานิตพฺเพ ฐตฺวา. อนุชานิตพฺพํ สิยา อนญฺญาตสฺส เญยฺยสฺส อภาวโต. ยาวตกญฺหิ เญยฺยํ, ตาวตกํ ภควโต ญาณํ, ยาวตกญฺจ ภควโต ญาณํ ตาวตกํ เญยฺยํ. เตเนวาห – ‘‘น ตสฺส อทิฏฺฐมิธตฺถิ กิญฺจิ, อโถ อวิญฺญาตมชานิตพฺพ’’นฺติอาทิ (มหานิ. ๑๕๖; จูฬนิ. โธตกมาณวปุจฺฉานิทฺเทส ๓๒; ปฏิ. ม. ๑.๑๒๑). สพฺพญฺญุตญฺญาเณน หิ ภควา อาวชฺเชตฺวา ปชานาติ. วุตฺตญฺเหตํ ‘‘อาวชฺชนปฏิพทฺธํ พุทฺธสฺส ภควโต ญาณ’’นฺติ (มิ. ป. ๔.๑.๒). ยทิ เอวํ ‘‘จรํ สมาหิโต นาโค, ติฏฺฐํ นาโค สมาหิโต’’ติ (อ. นิ. ๖.๔๓) อิทํ สุตฺตปทํ กถนฺติ? วิกฺเขปาภาวทีปนปทเมตํ, น อนาวชฺชเนนปิ ญาณานํ ปวตฺติปริทีปนํ. ยํ ปเนตฺถ วตฺตพฺพํ, ตํ เหฏฺฐา วิตฺถารโต วุตฺตเมว. १८५. तेथे (तत्थ) म्हणजे 'एकपुंडरीक' नावाच्या परिव्राजक आरामात. जो पूर्वी कधीही आला नव्हता, त्याला लौकिक व्यवहाराच्या दृष्टीने "बऱ्याच दिवसांनी, भन्ते!" इत्यादी प्रकारे म्हटले जाते; परंतु येथे पूर्वी आलेल्याचा संदर्भ घेऊन तसे म्हटले आहे. कारण, भगवान कधी काही लोकांच्या विमुक्तीच्या उत्पत्तीसाठी, काहींच्या इंद्रियांच्या परिपाकासाठी, तर काहींच्या विशेष अधिगमनासाठी अन्यतीर्थियांच्या आरामात जात असत. 'अनुमती न घेता उभे राहून' म्हणजे अनुमती देण्यास अयोग्य अशा ठिकाणी उभे राहून. अनुमती देण्यासारखे काही नसावे, कारण अज्ञात राहण्यासारखे कोणतेही ज्ञेय (जाणून घेण्याजोगे) शिल्लक राहिलेले नाही. कारण जेवढे काही ज्ञेय आहे, तेवढे भगवंतांचे ज्ञान आहे; आणि जेवढे भगवंतांचे ज्ञान आहे, तेवढेच ज्ञेय आहे. म्हणूनच म्हटले आहे – "त्यांच्यासाठी या जगात काहीही न पाहिलेले नाही, तसेच काहीही न समजलेले किंवा न जाणलेले नाही" इत्यादी. कारण भगवान आपल्या सर्वज्ञता-ज्ञानाने आवर्जन करून जाणतात. म्हणूनच हे म्हटले आहे – "बुद्ध भगवंतांचे ज्ञान हे आवर्जनावर अवलंबून असते." जर असे असेल, तर "चालतानाही तो श्रेष्ठ पुरुष (नाग) समाहित असतो, उभा असतानाही तो श्रेष्ठ पुरुष समाहित असतो" हे सुत्तपद कसे काय जुळते? हे पद विक्षेपाचा अभाव दर्शवणारे आहे, आवर्जन न करताही ज्ञानाची प्रवृत्ती दर्शवणारे नाही. याविषयी जे काही सांगायचे आहे, ते खाली सविस्तरपणे सांगितले गेले आहे. ๑๘๖. ยาวเทวาติ อิทํ ยถารุจิ ปวตฺติ วิย อปราปรุปฺปตฺติปิ อิจฺฉิตพฺพาติ ตทภาวํ ทสฺเสนฺโต อาห – ‘‘สกึ ขีณานํ อาสวานํ ปุน เขเปตพฺพาภาวา’’ติ. ปจฺจุปฺปนฺนชานนคุณนฺติ อิทํ ทิพฺพจกฺขุญาณสฺส ปริภณฺฑญาณํ อนาคตํสญาณํ อนาทิยิตฺวา วุตฺตํ, ตสฺส ปน วเสน อนาคตํสญาณคุณํ ทสฺเสตีติ วตฺตพฺพํ สิยา. १८६. 'यावदेव' (जितके आवश्यक आहे तितकेच) हे जसे इच्छेनुसार प्रवृत्ती दर्शवते, तसेच वारंवार होणारी उत्पत्तीही इच्छित असावी, म्हणून त्याचा अभाव दर्शवताना म्हटले आहे – "एकदा आसव नष्ट झाल्यावर पुन्हा ते नष्ट करण्याची आवश्यकता नसते." 'वर्तमानकाळ जाणण्याचा गुण' हे दिव्यचक्षु-ज्ञानाचे साहाय्यक ज्ञान असलेल्या अनागत-ज्ञान (भविष्यकाळाचे ज्ञान) विचारात न घेता म्हटले आहे; परंतु त्याच्या आधारे अनागत-ज्ञानाचा गुण दर्शवला जातो, असे म्हटले पाहिजे. คิหิปริกฺขาเรสูติ วตฺถาภรณาทิธนธญฺญาทิคิหิปริกฺขาเรสุ. คิหิลิงฺคํ ปน อปฺปมาณํ, ตสฺมา คิหิพนฺธนํ ฉินฺทิตฺวา ทุกฺขสฺสนฺตกรา โหนฺติเยว. สติ ปน ทุกฺขสฺสนฺตกิริยาย คิหิลิงฺเค เต น ติฏฺฐนฺติเยวาติ ทสฺเสนฺโต ‘‘เยปี’’ติอาทิมาห. สุกฺขาเปตฺวา สมุจฺฉินฺทิตฺวา. อรหตฺตํ ปตฺตทิวเสเยว ปพฺพชนํ วา ปรินิพฺพานํ วาติ อยํ นโย น สพฺพสาธารโณติ อาห ‘‘ภูมเทวตา ปน ติฏฺฐนฺตี’’ติ. ตตฺถ การณวจนํ [Pg.92] ‘‘นิลียโนกาสสฺส อตฺถิตายา’’ติ. อรญฺญปพฺพตาทิปวิเวกฏฺฐานํ นิลียโนกาโส. เสสกามภเวติ กามโลเก. ลฬิตชนสฺสาติ อาภรณาลงฺการนจฺจคีตาทิวเสน วิลาสยุตฺตชนสฺส. 'गृहस्थोपयोगी वस्तूंमध्ये' म्हणजे वस्त्र, अलंकार, धन, धान्य इत्यादी गृहस्थांच्या उपभोग्य वस्तूंमध्ये. गृहस्थवेष हा काही अडथळा नाही, म्हणून गृहस्थाचे बंधन तोडून ते दुःखाचा अंत करणारे बनतातच. परंतु दुःखाचा अंत झाल्यावर ते गृहस्थवेषात राहत नाहीत, हे दर्शवण्यासाठी "जे कोणी" इत्यादी म्हटले आहे. 'सुकवून' म्हणजे समूळ नष्ट करून. अर्हत्त्व प्राप्त झालेल्या दिवशीच प्रव्रज्या घेणे किंवा परिनिर्वाण प्राप्त करणे, हा नियम सर्वांना सारखा लागू होत नाही, हे दर्शवण्यासाठी म्हटले आहे – "परंतु भूमदेवता राहतात." तेथे राहण्याचे कारण सांगितले आहे – "लपण्यासाठी (एकांतात राहण्यासाठी) जागा उपलब्ध असल्यामुळे." अरण्य, पर्वत इत्यादी एकांताची ठिकाणे म्हणजेच लपण्याची जागा होय. 'उर्वरित कामभवात' म्हणजे कामलोकात. 'ललित जनांचे' म्हणजे अलंकार, दागदागिने, नृत्य, गीत इत्यादींनी विलासी जीवन जगणाऱ्या लोकांचे. โสปีติ ‘‘โส อญฺญตฺร เอเกนา’’ติ วุตฺโต โสปิ. กรโต น กรียติ ปาปนฺติ เอวํ น กิริยํ ปฏิพาหติ. ยทิ อตฺตานํเยว คเหตฺวา กเถติ, อถ กสฺมา มหาสตฺโต ตทา อาชีวกปพฺพชฺชํ อุปคจฺฉีติ อาห ‘‘ตทา กิรา’’ติอาทิ. ตสฺสปีติ น เกวลํ อญฺเญสํ เอว ปาสณฺฑานํ, ตสฺสปิ. วีริยํ น หาเปสีติ ตโปชิคุจฺฉวาทํ สมาทิยิตฺวา ฐิโต วิราคตฺถาย ตํ สมาทิณฺณวตฺตํ น ปริจฺจชิ, สตฺถุสาสนํ น ฉฑฺเฑสิ. เตนาห – ‘‘กิริยวาที หุตฺวา สคฺเค นิพฺพตฺตตี’’ติ. 'तोसुद्धा' म्हणजे "तो एकाशिवाय इतर" असे म्हटलेला तोसुद्धा. "करणाऱ्याकडून पाप घडत नाही" अशा प्रकारे तो अक्रियावादाचे समर्थन करतो. जर तो स्वतःचाच संदर्भ घेऊन बोलत असेल, तर महासत्त्वाने त्यावेळी आजीवक पंथाची प्रव्रज्या का स्वीकारली? यावर म्हटले आहे – "त्यावेळी असे ऐकिवात आहे की..." इत्यादी. 'त्याच्यासुद्धा' म्हणजे केवळ इतर पाखंड्यांच्याच नव्हे, तर त्याच्यासुद्धा. 'वीर्य सोडले नाही' म्हणजे तपो-जुगुप्सावादाचा स्वीकार करून राहिलेल्याने वैराग्यासाठी स्वीकारलेले ते व्रत सोडले नाही, शास्त्यांच्या शासनाचा त्याग केला नाही. म्हणूनच म्हटले आहे – "क्रियावादी होऊन स्वर्गात उत्पन्न होतो." เตวิชฺชวจฺฉสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. तेविज्जवच्छसुत्तवर्णनेची लीनत्थप्पकासना समाप्त झाली. ๒. อคฺคิวจฺฉสุตฺตวณฺณนา २. अग्गिवच्छसुत्तवर्णना. ๑๘๗. โลกสฺส สสฺสตตาปวตฺติปฏิกฺเขปวเสน ปวตฺโต วาโท อุจฺเฉทวาโท เอว โหตีติ สสฺสตคฺคาหาภาเว อุจฺเฉทคฺคาหภาวโต ปุน ปริพฺพาชเกน ‘‘อสสฺสโต โลโก’’ติ วทนฺเตน อุจฺเฉทคฺคาโห ปุจฺฉิโต, ภควตาปิ โส เอว ปฏิกฺขิตฺโตติ อาห ‘‘ทุติเย นาหํ อุจฺเฉททิฏฺฐิโก’’ติ. อนฺตานนฺติกาทิวเสนาติ เอตฺถ อนฺตานนฺติกคฺคหเณน อนฺตวา โลโก อนนฺตวา โลโกติ อิมํ วาททฺวยมาห. อาทิ-สทฺเทน ‘‘ตํ ชีวํ ตํ สรีร’’นฺติอาทิวาทจตุกฺกํ สงฺคณฺหาติ, อิตรํ ปน ทฺวยํ สรูเปเนว คหิตนฺติ. ปฏิกฺเขโป เวทิตพฺโพติ ‘‘ตติเย นาหํ อนฺตวาทิฏฺฐิโก, จตุตฺเถ นาหํ อนนฺตวาทิฏฺฐิโก’’ติ เอวมาทินา ปฏิกฺเขโป เวทิตพฺโพ. ‘‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ อยมฺปิ สสฺสตวาโท, โส จ โข อปรนฺตกปฺปิกวเสน, ‘‘สสฺสโต โลโก’’ติ ปน ปุพฺพนฺตกปฺปิกวเสนาติ อยเมเตสํ วิเสโส. ‘‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา’’ติ อยมฺปิ อุจฺเฉทวาโท, โส จ โข สตฺตวเสน, ‘‘อสสฺสโต โลโก’’ติ ปน สตฺตสงฺขารวเสนาติ วทนฺติ. १८७. जगाच्या शाश्वततेच्या प्रवृत्तीचा निषेध केल्याने निर्माण होणारा वाद हा उच्छेदवादच असतो; म्हणून शाश्वत-ग्रहाच्या अभावी उच्छेद-ग्रह निर्माण होत असल्याने, पुन्हा परिव्राजकाने "जग अशाश्वत आहे" असे म्हणत उच्छेदवादाविषयी विचारले. भगवंतांनीही त्याचाच निषेध केला, म्हणून म्हटले आहे – "दुसऱ्या प्रश्नात मी उच्छेददृष्टीचा नाही." 'अंतान्तिक इत्यादींच्या आधारे' येथे 'अंतान्तिक' या शब्दाने "जग मर्यादित आहे" आणि "जग अमर्यादित आहे" या दोन वादांचा उल्लेख केला आहे. 'आदि' शब्दाने "तोच जीव आणि तेच शरीर" इत्यादी चार वादांचा समावेश होतो, तर इतर दोन वाद त्यांच्या मूळ रूपातच घेतले आहेत. निषेध समजून घ्यावा म्हणजे – "तिसऱ्या प्रश्नात मी अंतवादी दृष्टीचा नाही, चौथ्या प्रश्नात मी अनंतवादी दृष्टीचा नाही" इत्यादी प्रकारे निषेध समजून घ्यावा. "मृत्य्यूनंतर तथागत असतात" हा देखील शाश्वतवादच आहे, परंतु तो अपरान्त-कल्पनेच्या आधारे आहे; तर "जग शाश्वत आहे" हा पूर्वान्त-कल्पनेच्या आधारे आहे, हा या दोन्हींमधील फरक आहे. "मृत्य्यूनंतर तथागत नसतात" हा देखील उच्छेदवादच आहे, परंतु तो सत्त्वाच्या दृष्टीने आहे; तर "जग अशाश्वत आहे" हा सत्त्व-संस्कारांच्या दृष्टीने आहे, असे म्हणतात. ๑๘๙. สปฺปติภยํ [Pg.93] อุปฺปชฺชนโต สห ทุกฺเขนาติ สทุกฺขํ. เตนาห ‘‘กิเลสทุกฺเขนา’’ติอาทิ. เตสํเยวาติ กิเลสทุกฺขวิปากทุกฺขานํเยว. สอุปฆาตกนฺติ สพาธํ. สอุปายาสนฺติ สปริสฺสมํ สอุปตาปํ สปีฬํ. สปริฬาหนฺติ สทรถํ. १८९. भय निर्माण होत असल्यामुळे दुःखासह असणे म्हणजे 'सदुःख'. म्हणूनच म्हटले आहे – "क्लेश-दुःखाने" इत्यादी. 'त्यांच्याच' म्हणजे क्लेश-दुःख आणि विपाक-दुःख यांच्याच. 'सउपघातक' म्हणजे बाधायुक्त. 'सउपायास' म्हणजे परिश्रमासह, संतापासह आणि पीडेसह. 'सपरिळाह' म्हणजे त्रासासह. กิญฺจิ ทิฏฺฐิคตนฺติ อิมา ตาว อฏฺฐ ทิฏฺฐิโย มา โหนฺตุ, อตฺถิ ปน, โภ โคตม, ยํ กิญฺจิ ทิฏฺฐิคตํ คหิตํ. น หิ ตาย ทิฏฺฐิยา วินา กญฺจิ สมยํ ปวตฺเตตุํ ยุชฺชตีติ อธิปฺปาเยน ปุจฺฉติ. อปวิทฺธนฺติ สมุจฺเฉทปฺปหานวเสน ฉฑฺฑิตํ. ปญฺญาย ทิฏฺฐนฺติ วิปสฺสนาปญฺญาสหิตาย มคฺคปญฺญาย ภควตา ปฏิวิทฺธํ. ยตฺถ อุปฺปชฺชนฺติ, ตํ สตฺตํ มเถนฺติ สมฺมทฺทนฺตีติ มถิตาติ อาห ‘‘มถิตานนฺติ เตสํเยว เววจน’’นฺติ. กญฺจิ ธมฺมนฺติ รูปธมฺมํ อรูปธมฺมํ วา. อนุปาทิยิตฺวาติ อคฺคเหตฺวา. 'काही दृष्टीगत' म्हणजे – हे गौतम! या आठ दृष्टी तर नसोत, पण अशी कोणतीही दृष्टी आहे का जी आपण स्वीकारली आहे? कारण कोणत्याही दृष्टीशिवाय कोणताही सिद्धांत चालवणे योग्य नाही, या अभिप्रायाने तो विचारतो. 'अपविद्ध' म्हणजे समूळ नष्ट करून सोडून दिलेले. 'प्रज्ञेने पाहिले' म्हणजे विपश्यना-प्रज्ञेसह मार्गप्रज्ञेने भगवंतांनी साक्षात केले. जेथे उत्पन्न होतात, त्या प्राण्याला जे घुसळतात किंवा चिरडतात, ते 'मथित' होत; म्हणूनच म्हटले आहे – "मथितांचे हे त्यांचेच समानार्थी शब्द आहेत." 'कोणताही धर्म' म्हणजे रूपधर्म किंवा अरूपधर्म. 'अनुपादान करून' म्हणजे ग्रहण न करता. ๑๙๐. น อุเปตีติ สงฺขํ น คจฺฉตีติ อตฺโถติ อาห ‘‘น ยุชฺชตี’’ติ. อนุชานิตพฺพํ สิยา อนุปาทาวิมุตฺตสฺส กญฺจิปิ อุปฺปตฺติยา อภาวโต. ‘‘เอวํ วิมุตฺตจิตฺโต น อุปปชฺชตี’’ติ กามญฺเจตํ สภาวปเวทนํ ปรินิพฺพานํ, เอเก ปน อุจฺเฉทวาทิโน ‘‘มยมฺปิ ‘สตฺโต อายตึ น อุปปชฺชตี’ติ วทาม, สมโณ โคตโมปิ ตถา วทตี’’ติ อุจฺเฉทภาเวเยว ปติฏฺฐหิสฺสนฺติ, ตสฺมา ภควา ‘‘น อุปปชฺชตีติ โข วจฺฉ น อุเปตี’’ติ อาห. ‘‘อุปปชฺชตี’’ติ ปน วุตฺเต สสฺสตเมว คณฺเหยฺยาติ โยชนา. เสสทฺวเยปิ เอเสว นโย. อปฺปติฏฺโฐติ อุจฺเฉทวาทาทิวเสน ปติฏฺฐารหิโต. อนาลมฺโพติ เตสํเยว วาทานํ โอลมฺพารมฺมณสฺส อภาเวน อนาลมฺโพ. สุขปเวสนฏฺฐานนฺติ เตสญฺเญว วาทานํ สุขปเวสโนกาสํ มา ลภตูติ. อนนุญฺญาย ฐตฺวาติ ‘‘น อุปปชฺชตี’’ติอาทินา อนุชานิตพฺพาย ปฏิญฺญาย ฐานเหตุ. อนุญฺญมฺปีติ อนุชานิตพฺพมฺปิ ทุติยปญฺหํ ปฏิกฺขิปิ. ปริยตฺโต ปน ธมฺโม อตฺถโต ปจฺจยากาโร เอวาติ อาห ‘‘ธมฺโมติ ปจฺจยาการธมฺโม’’ติ. อญฺญตฺถ ปโยเคนาติ อิมมฺหา นิยฺยานิกสาสนา อญฺญสฺมึ มิจฺฉาสมเย ปวตฺตปฺปโยเคน, อนิยฺยานิกํ วิวิธํ มิจฺฉาปฏิปตฺตึ ปฏิปชฺชนฺเตนาติ อตฺโถ. ‘‘อญฺญวาทิยเกนา’’ติปิ ปาโฐ, ปจฺจยาการโต อญฺญาการทีปกอาจริยวาทํ ปคฺคยฺห ติฏฺฐนฺเตนาติ อตฺโถ. १९०. 'न उपेति' (जवळ जात नाही) म्हणजे संज्ञेला (संख्येला/ओळखायला) प्राप्त होत नाही, हा अर्थ सांगताना 'योग्य नाही' (न युज्जति) असे म्हटले आहे. उपादानरहित विमुक्त झालेल्या (अनुपादाविमुक्त) व्यक्तीचा कोणताही पुनर्जन्म (उत्पत्ती) होत नसल्यामुळे, ते मान्य करण्यासारखे असावे. 'अशा प्रकारे विमुक्तचित्त असलेला उत्पन्न होत नाही' हे जरी परिनिर्वाणाचे स्वभाव-प्रकटीकरण असले, तरी काही उच्छेदवादी 'आम्हीसुद्धा सत्त्व भविष्यात उत्पन्न होत नाही असेच म्हणतो आणि श्रमण गौतमसुद्धा तसेच म्हणतात' असे म्हणून उच्छेदवादातच प्रतिष्ठित होतील. म्हणूनच भगवंतांनी 'हे वच्छ! उत्पन्न होतो असे म्हणणे योग्य नाही' असे म्हटले. जर 'उत्पन्न होतो' असे म्हटले असते, तर ते शाश्वतवादच ग्रहण करतील, अशी योजना आहे. उर्वरित दोन प्रश्नांच्या बाबतीतही हाच नियम लागू होतो. 'अप्पतिट्ठो' (अप्रतिष्ठित) म्हणजे उच्छेदवाद इत्यादींच्या प्रभावामुळे प्रतिष्ठारहित असणे. 'अनालंबो' (अनालंबन) म्हणजे त्याच वादांना धरून ठेवण्यासाठी कोणतेही आलंबन (आधार) नसल्यामुळे अनालंब असणे. 'सुखपवेसनट्ठानं' (सहज प्रवेश करण्याचे स्थान) म्हणजे त्याच वादांना सहज प्रवेश करण्याची संधी मिळू नये म्हणून. 'अननुञ्ञाय ठत्वा' (अमान्यतेवर ठाम राहून) म्हणजे 'उत्पन्न होत नाही' इत्यादींद्वारे मान्य करण्याजोग्या प्रतिज्ञेच्या स्थानामुळे. 'अनुञ्ञम्पि' (मान्य करण्याजोग्यालाही) म्हणजे मान्य करण्याजोग्या दुसऱ्या प्रश्नालाही नकार दिला. परंतु, पर्य्याप्त धर्म हा अर्थाच्या दृष्टीने प्रत्ययाकार (प्रतीत्यसमुत्पाद) च आहे, म्हणून 'धम्मो म्हणजे प्रत्ययाकार धर्म' असे म्हटले आहे. 'अञ्ञत्थ पयोगेन' (इतरत्र प्रयोगाने) म्हणजे या नैर्याणिक (मुक्ती देणाऱ्या) शासनाऐवजी दुसऱ्या मिथ्या सिद्धांतात प्रवृत्त होण्याने, म्हणजेच अनैर्याणिक अशा विविध मिथ्या प्रतिपत्तींचे (चुकीच्या मार्गांचे) आचरण करण्याने, असा अर्थ आहे. 'अञ्ञवादियकेन' असाही पाठ आहे, ज्याचा अर्थ प्रत्ययाकारापेक्षा वेगळा आकार दर्शवणाऱ्या आचार्यवादाचा स्वीकार करून त्यातच स्थित राहणे, असा आहे. ๑๙๑. อปฺปจฺจโยติ [Pg.94] อนุปาทาโน, นิรินฺธโนติ อตฺโถ. १९१. 'अप्पच्चयो' (प्रत्ययरहित) म्हणजे अनुपादान (उपादानरहित), म्हणजेच निरंधन (इंधनरहित) असा अर्थ आहे. ๑๙๒. เยน รูเปนาติ เยน ภูตุปาทาทิเภเทน รูปธมฺเมน. ตํ รูปํ ตปฺปฏิพทฺธสํโยชนปฺปหาเนน ขีณาสว-ตถาคตสฺส ปหีนํ อนุปฺปตฺติธมฺมตํ อาปนฺนํ. เตน วุตฺตํ ปาฬิยํ ‘‘อนุปฺปาทธมฺม’’นฺติอาทิ. อญฺเญสํ ชานนาย อภาวคุณตาย คุณคมฺภีโร. ‘‘เอตฺตกา คุณา’’ติ ปมาณํ คณฺหิตุํ น สกฺกุเณยฺโย. ‘‘อีทิสา เอตสฺส คุณา’’ติ ปริโยคาหิตุํ อสกฺกุเณยฺยตาย ทุปฺปริโยคาฬฺโหติ. ทุชฺชาโนติ อคาธตาย คมฺภีโร ‘‘เอตฺตกานิ อุทกฬฺหกสตานี’’ติอาทินา ปเมตุํ น สกฺกาติ อปฺปเมยฺโย, ตโต เอว ทุชฺชาโน. เอวเมวานฺติ ยถา มหาสมุทฺโท คมฺภีโร อปฺปเมยฺโย ทุชฺชาโน, เอวเมว ขีณาสโวปิ คุณวเสน, ตสฺมา อยํ รูปาทึ คเหตฺวา รูปีติอาทิโวหาโร ภเวยฺย, ปรินิพฺพุตสฺส ปน ตทภาวา ตถา ปญฺญาเปตุํ น สกฺกา, ตโต ตํ อารพฺภ อุปปชฺชตีติอาทิ น ยุชฺเชยฺย. ยถา ปน วิชฺชมาโน เอว ชาตเวโท พฺยตฺเตน ปุริเสน นียมาโน ปุรตฺถิมาทิทิสํ คโตติ วุจฺเจยฺย, น นิพฺพุโต, เอวํ ขีณาสโวปีติ ทสฺเสนฺโต ‘‘เอวเมวา’’ติอาทิมาห. १९२. 'येन रूपेन' (ज्या रूपाने) म्हणजे महाभूत आणि उपादाय रूप इत्यादी भेदांनी युक्त असलेल्या रूपधर्माने. ते रूप, त्याच्याशी संबंधित संयोजनांचा (बंधनांचा) प्रहाण (नाश) केल्यामुळे, क्षीणासव तथागतांचे प्रहीण (नष्ट) झाले आहे आणि ते पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या धर्माला (अनुत्पत्तिधर्मता) प्राप्त झाले आहे. म्हणूनच पाळीमध्ये 'अनुत्पादधम्मं' (उत्पन्न न होणारा धर्म) इत्यादी म्हटले आहे. इतरांना समजण्यासारखे नसलेल्या गुणांमुळे तो 'गुणगंभीर' आहे. 'एवढे गुण आहेत' असे त्याचे प्रमाण मोजता येत नाही. 'याचे गुण अशा प्रकारचे आहेत' असे पूर्णपणे जाणून घेणे अशक्य असल्यामुळे तो 'दुप्पवियोगाळ्हो' (दुष्प्रवेश्य/खोलवर समजण्यास कठीण) आहे. 'दुज्जानो' (जाणण्यास कठीण) म्हणजे अगाधतेमुळे गंभीर असलेला, 'यात शेकडो उदकाळ्हक (पाण्याचे माप) पाणी आहे' इत्यादी प्रकारे मोजता येत नसल्यामुळे तो 'अप्पमेय्यो' (अप्रमेय/अथांग) आहे, आणि म्हणूनच तो दुर्ज्ञेय (जाणण्यास कठीण) आहे. 'एवमेव' (अशाच प्रकारे) म्हणजे ज्याप्रमाणे महासागर गंभीर, अप्रमेय आणि दुर्ज्ञेय आहे, त्याचप्रमाणे क्षीणासव (अर्हत) देखील गुणांच्या दृष्टीने तसाच आहे. म्हणून, या रूप इत्यादींना ग्रहण करून 'हा रूपवान आहे' इत्यादी व्यवहार होऊ शकतो, परंतु परिनिर्वाण पावलेल्या व्यक्तीच्या बाबतीत त्याचा अभाव असल्यामुळे तसे प्रज्ञापित (स्पष्ट) करता येत नाही; त्यामुळे त्याला उद्देशून 'तो उत्पन्न होतो' इत्यादी म्हणणे योग्य ठरणार नाही. परंतु, ज्याप्रमाणे अस्तित्वात असलेलाच अग्नी एखाद्या चतुर माणसाने विझवला असता, तो पूर्व इत्यादी दिशेला गेला असे म्हटले जात नाही, तर तो शांत (विझलेला) झाला असे म्हटले जाते, त्याचप्रमाणे क्षीणासवाच्या बाबतीतही आहे, हे दर्शवण्यासाठी 'एवमेव' (अशाच प्रकारे) इत्यादी म्हटले आहे. อนิจฺจตาติ เอตฺถ อนิจฺจตาคหณํ อสารนิทสฺสนํ. เตน ยถา โส สาลรุกฺโข สาขาปลาสาทิอสาราปคเมน สุทฺโธ สาเร ปติฏฺฐิโต, เอวมยํ ธมฺมวินโย สาสวสงฺขาตอสารวิคเมน โลกุตฺตรธมฺมสาเร ปติฏฺฐิโตติ ทสฺเสติ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. 'अनित्यता' यामध्ये अनित्यतेचे ग्रहण हे असारतेचे (निःसारतेचे) निदर्शन आहे. त्याद्वारे, ज्याप्रमाणे तो सालवृक्ष फांद्या, पाने इत्यादी असार भाग निघून गेल्यामुळे शुद्ध होऊन केवळ सारभागात (गाभ्यात) प्रतिष्ठित होतो, त्याचप्रमाणे हा धम्मविनय देखील सासव (आसवांनी युक्त) अशा असार भागाच्या विगमाने (नष्ट होण्याने) लोकोत्तर धम्मसारात प्रतिष्ठित झाला आहे, हे दर्शवले आहे. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. อคฺคิวจฺฉสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. अग्निवच्छसुत्ताच्या वर्णनावरील लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ-प्रकाशिनी टीका) समाप्त झाली. ๓. มหาวจฺฉสุตฺตวณฺณนา ३. महावच्छसुत्त-वर्णना (महावच्छसुत्ताची टीका) ๑๙๓. สห กถา เอตสฺส อตฺถีติ สหกถี, ‘‘มยํ ปุจฺฉาวเสน ตุมฺเห วิสฺสชฺชนวเสนา’’ติ เอวํ สหปวตฺตกโถติ อตฺโถ. เอตสฺเสว กถิตานิ, ตตฺถ ปฐเม วิชฺชาตฺตยํ เทสิตํ, ทุติเย อคฺคินา ทสฺสิตนฺติ เตวิชฺชวจฺฉสุตฺตํ อคฺคิวจฺฉสุตฺตนฺติ นามํ วิเสเสตฺวา วุตฺตํ. สีฆํ ลทฺธึ น วิสฺสชฺเชนฺติ, ยสฺมา สงฺขารานํ นิยโตยํ วินาโส อนญฺญสมุปฺปาโท, เหตุสมุปฺปนฺนาปิ น จิเรน นิชฺฌานํ ขมนฺติ, น ลหุํ. เตนาห ‘‘วสาเตล [Pg.95] …เป… สุชฺฌนฺตี’’ติ. ปจฺฉิมคมนํ ญาณสฺส ปริปากํ คตตฺตา. ยฏฺฐึ อาลมฺพิตฺวา อุทกํ ตริตุํ โอตรนฺโต ปุริโส ‘‘ยฏฺฐึ โอตริตฺวา อุทเก ปตมาโน’’ติ วุตฺโต. กมฺมปถวเสน วิตฺถารเทสนนฺติ สํขิตฺตเทสนํ อุปาทาย วุตฺตํ. เตนาห ‘‘มูลวเสน เจตฺถา’’ติอาทิ. วิตฺถารสทิสาติ กมฺมปถวเสน อิธ เทสิตเทสนาว มูลวเสน เทสิตเทสนํ อุปาทาย วิตฺถารสทิสา. วิตฺถารเทสนา นาม นตฺถีติ น เกวลํ อยเมว, อถ โข สพฺพาปิ พุทฺธานํ นิปฺปริยาเยน อุชุเกน นิรวเสสโต วิตฺถารเทสนา นาม นตฺถิ เทสนาญาณสฺส มหาวิสยตาย กรณสมฺปตฺติยา จ ตชฺชาย มหานุภาวตฺตา สพฺพญฺญุตญฺญาณสฺส. สพฺพญฺญุตญฺญาณสมงฺคิตาย หิ อวเสสปฏิสมฺภิทานุภาวิตาย อปริมิตกาลสมฺภตญาณสมฺภารสมุทาคตาย กทาจิปิ ปริกฺขยานรหาย อนญฺญสาธารณาย ปฏิภานปฏิสมฺภิทาย ปหูตชิวฺหาทิตทนุรูปรูปกายสมฺปตฺติสมฺปทาย วิตฺถาริยมานา ภควโต เทสนา กถํ ปริมิตา ปริจฺฉินฺนา ภเวยฺย, มหาการุณิกตาย ปน ภควา เวเนยฺยชฺฌาสยานุรูปํ ตตฺถ ตตฺถ ปริมิตํ ปริจฺฉินฺนํ กตฺวา นิฏฺฐเปติ. อยญฺจ อตฺโถ มหาสีหนาทสุตฺเตน (ม. นิ. ๑.๑๔๖ อาทโย) ทีเปตพฺโพ. สพฺพํ สํขิตฺตเมว อตฺตชฺฌาสยวเสน อกเถตฺวา โพธเนยฺยปุคฺคลชฺฌาสยวเสน เทสนาย นิฏฺฐาปิตตฺตา. น เจตฺถ ธมฺมสาสนวิโรโธ ปริยายํ อนิสฺสาย ยถาธมฺมํ ธมฺมานํ โพธิตตฺตา สพฺพลหุตฺตา จาติ. १९३. ज्याच्याशी संवाद (सहकथा) होतो तो 'सहकथी' होय. 'आम्ही प्रश्नांच्या माध्यमातून आणि तुम्ही उत्तरांच्या माध्यमातून' अशा प्रकारे एकत्र चालणारा संवाद, असा याचा अर्थ आहे. त्यालाच हे सांगितले गेले आहे. त्यापैकी पहिल्या सुत्तात त्रिविद्या (विज्जात्तय) उपदेशिली आहे आणि दुसऱ्या सुत्तात अग्नीच्या उदाहरणाने दर्शविले आहे, म्हणून त्यांना अनुक्रमे 'तेविज्जवच्छसुत्त' आणि 'अग्निवच्छसुत्त' अशी विशेष नावे दिली आहेत. ते आपली मते (लद्धि) लवकर सोडत नाहीत, कारण संस्कारांचा हा विनाश निश्चित आहे आणि तो इतर कशानेही उत्पन्न होत नाही; हेतूने उत्पन्न झालेले संस्कार देखील लवकर चिंतनास पात्र ठरत नाहीत, सहजपणे नाही. म्हणूनच 'वसातेल (चरबीचे तेल) ...पे... शुद्ध होतात' असे म्हटले आहे. 'पच्छिमगमनं' (शेवटी जाणे) म्हणजे ज्ञानाचा परिपाक झाल्यामुळे होय. काठीचा आधार घेऊन पाणी पार करण्यासाठी उतरणाऱ्या माणसाला 'काठी घेऊन पाण्यात उतरणारा' असे म्हटले आहे. 'कर्मपथाच्या दृष्टीने सविस्तर उपदेश' हे संक्षिप्त उपदेशाला अनुसरून म्हटले आहे. म्हणूनच 'येथे मूळ कारणाच्या दृष्टीने देखील' इत्यादी म्हटले आहे. 'विस्तारसदृश' म्हणजे येथे कर्मपथाच्या दृष्टीने दिलेला उपदेश हा मूळ कारणाच्या दृष्टीने दिलेल्या उपदेशाला अनुसरून विस्तारासारखाच आहे. 'सविस्तर उपदेश नावाचा काही नाही' म्हणजे केवळ हाच नाही, तर बुद्धांचा कोणताही उपदेश पूर्णपणे, थेट आणि निरवशेष असा सविस्तर उपदेश नसतो; कारण उपदेश-ज्ञानाचा विषय अत्यंत विशाल आहे आणि सर्वज्ञता-ज्ञानाच्या प्रभावामुळे त्याची साधनसंपत्ती महान आहे. कारण, सर्वज्ञता-ज्ञानाने युक्त असल्यामुळे, उर्वरित प्रतिसंभिदांच्या (ज्ञानविशेषांच्या) प्रभावामुळे, अपरिमित काळापासून संचित केलेल्या ज्ञानसंभारातून प्राप्त झालेल्या, कधीही क्षय न होणाऱ्या, इतरांपेक्षा वेगळ्या अशा प्रतिभान-प्रतिसंभिदेमुळे आणि विशाल जिव्हा (जीभ) इत्यादींना अनुरूप अशा रूपकायाच्या समृद्धीमुळे भगवंतांचा विस्तारत जाणारा उपदेश मर्यादित किंवा परिच्छिन्न कसा असू शकेल? परंतु, महाकारुणिक असल्यामुळे भगवान विनेय (उपदेश देण्यास योग्य) लोकांच्या आशयानुसार (पात्रतेनुसार) तिथे तिथे मर्यादित आणि परिच्छिन्न करून उपदेश समाप्त करतात. आणि हा अर्थ 'महासिहनादसुत्ता'द्वारे (म. नि. १.१४६ इत्यादी) स्पष्ट केला पाहिजे. सर्व काही संक्षिप्तच आहे, कारण ते स्वतःच्या इच्छेनुसार न सांगता बोध प्राप्त करणाऱ्या पुद्गलाच्या (व्यक्तीच्या) आशयानुसार उपदेश संपवला गेला आहे. आणि यात धम्मशासनाचा कोणताही विरोध नाही, कारण कोणत्याही पर्यायाचा (पद्धतीचा) आश्रय न घेता यथाधम्म धर्माचा बोध करून दिला आहे आणि तो अत्यंत सुलभ आहे. ๑๙๔. สตฺต ธมฺมา กามาวจรา สมฺปตฺตสมาทานวิรตีนํ อิธาธิปฺเปตตฺตา. १९४. येथे संपत्त-विरती आणि समादान-विरती अभिप्रेत असल्यामुळे सात धर्म कामावचर आहेत. อนิยเมตฺวาติ ‘‘สมฺมาสมฺพุทฺโธ, สาวโก’’ติ วา นิยมํ วิเสเสน อกตฺวา. อตฺตานเมว…เป… เวทิตพฺพํ, ตถา หิ ปริพฺพาชโก ‘‘ติฏฺฐตุ ภวํ โคตโม’’ติ อาห. 'अनियमेत्वा' (नियम न करता) म्हणजे 'सम्यक्संबुद्ध किंवा श्रावक' असा विशेष नियम न करता. स्वतःलाच...पे... जाणून घ्यावे, कारण तो परिव्राजक 'आपण (भवंत) गौतम थांबा' असे म्हणाला. ๑๙๕. สตฺถาว อรหา โหติ ปฏิปตฺติยา ปาริปูริภาวโต. ตสฺมึ พฺยากเตติ ตสฺมึ ‘‘เอกภิกฺขุปิ สาวโก’’ติอาทินา สุฏฺฐุ ปญฺเห กถิเต. १९५. प्रतिपत्तीच्या (आचरणाच्या) परिपूर्णतेमुळे शास्ताच अर्हत असतात. 'तस्मिं ब्याकते' (त्याचे स्पष्टीकरण केल्यावर) म्हणजे 'एक भिक्खू देखील श्रावक आहे' इत्यादी प्रकारे प्रश्नाचे उत्तम प्रकारे स्पष्टीकरण केल्यावर. ๑๙๖. สมฺปาทโกติ ปฏิปตฺติสมฺปาทโก. १९६. 'संपादको' (संपादन करणारा) म्हणजे प्रतिपत्तीचे (आचरणाचे) संपादन करणारा. ๑๙๗. เสขาย [Pg.96] วิชฺชายาติ เสขลกฺขณปฺปตฺตาย มคฺคปญฺญาย สาติสยํ กตฺวา กรณวเสน วุตฺตา, ผลปญฺญา ปน ตาย ปตฺตพฺพตฺตา กมฺมภาเวน วุตฺตา. เตนาห ‘‘เหฏฺฐิมผลตฺตยํ ปตฺตพฺพ’’นฺติ. อิมํ ปเนตฺถ อวิปรีตมตฺถํ ปาฬิโต เอว วิญฺญายมานํ อปฺปฏิวิชฺฌนโต วิตณฺฑวาที ‘‘ยาวตกํ เสเขน ปตฺตพฺพํ, อนุปฺปตฺตํ ตํ มยา’’ติ วจนเลสํ คเหตฺวา ‘‘อรหตฺตมคฺโคปิ อเนน ปตฺโตเยวา’’ติ วทติ. เอวนฺติ อิทานิ วุจฺจมานาย คาถาย. १९७. ‘सेखाय विज्जाय’ (शैक्ष विद्येने) म्हणजे शैक्ष-लक्षण प्राप्त झालेल्या मार्गप्रज्ञेच्या (मग्गपञ्ञा) माध्यमातून अतिशय उत्कृष्ट करून करण (साधन) रूपाने म्हटले आहे. परंतु फलप्रज्ञा (फलपञ्ञा) तिच्याद्वारे प्राप्त करण्यायोग्य असल्यामुळे कर्म रूपाने म्हटली आहे. म्हणूनच म्हटले आहे – 'खालील तीन फळे प्राप्त करण्यायोग्य आहेत'. पाळीमधूनच (पाळितो) समजणारा हा अचूक अर्थ न समजल्यामुळे, वितंडवादी 'शैक्षाने जे काही प्राप्त करायचे आहे, ते मी प्राप्त केले आहे' या शब्दांचा आधार घेऊन 'याने अर्हत्त्वमार्ग देखील प्राप्त केलाच आहे' असे म्हणतो. 'एवम्' (अशा प्रकारे) हे आता म्हटल्या जाणाऱ्या गाथेसाठी आहे. กิเลสานิ ปหาย ปญฺจาติ ปญฺโจรมฺภาคิยสํโยชนสงฺขาเต สํกิเลเส ปหาย ปชหิตฺวา, ปหานเหตุ วา. ปริปุณฺณเสโขติ สพฺพโส วฑฺฒิตเสขธมฺโม. อปริหานธมฺโมติ อปริหานสภาโว. น หิ ยสฺส ผาติคเตหิ สีลาทิธมฺเมหิ ปริหานิ อตฺถิ, สมาธิมฺหิ ปริปูรการิตาย เจโตวสิปฺปตฺโต. เตนาห ‘‘สมาหิตินฺทฺริโย’’ติ. อปริหานธมฺมตฺตาว ฐิตตฺโต. ‘किलेसानि पहाय पञ्च’ (पाच क्लेशांचा त्याग करून) म्हणजे पाच ओराम्भागिय-संयोजन (खालची पाच बंधने) नावाच्या संक्लेशांचा त्याग करून, किंवा त्यागाच्या हेतूने. ‘परिपुण्णसेखो’ (परिपूर्ण शैक्ष) म्हणजे सर्व प्रकारे वाढलेले शैक्षधर्म असलेला. ‘अपरिहानधम्मो’ म्हणजे जिचा ऱ्हास होत नाही असा स्वभाव असलेला. कारण, ज्याचा वृद्धिंगत झालेल्या शीलादी धर्मांपासून ऱ्हास होत नाही, तो समाधीमध्ये परिपूर्णता आणल्यामुळे चेतोवशी (मनावर नियंत्रण) प्राप्त झालेला असतो. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘समाहितिन्द्रियो’ (समाहित इंद्रिये असलेला). अपरिहानधर्मी (ऱ्हास न होणारा स्वभाव) असल्यामुळेच तो ‘ठितत्तो’ (स्थिरचित्त) आहे. อนาคามินา หิ อเสขภาวาวหา ธมฺมา ปริปูเรตพฺพา, น เสขภาวาวหาติ โส เอกนฺตปริปุณฺเณ เสโข วุตฺโต. เอตํ น พุทฺธวจนนฺติ ‘‘มคฺโค พหุจิตฺตกฺขณิโก’’ติ เอตํ วจนํ น พุทฺธวจนํ อนนฺตเรกนฺตวิปากทานโต, พหุกฺขตฺตุํ ปวตฺตเน ปโยชนาภาวโต จ โลกุตฺตรกุสลสฺส, ‘‘สมาธิมานนฺตริกญฺญมาหุ (ขุ. ปา. ๖.๕; สุ. นิ. ๒๒๘), น ปารํ ทิคุณํ ยนฺตี’’ติ (สุ. นิ. ๗๑๙) เอวมาทีนิ สุตฺตปทานิ เอตสฺสตฺถสาธกานิ. โอรมฺภาคิยสํโยชนปฺปหาเนน เสกฺขธมฺมปริปูริภาวสฺส วุตฺตตาย อตฺโถ ตว วจเนน วิรุชฺฌตีติ. อสฺส อายสฺมโต วจฺฉสฺส. कारण अनागामीने अशैक्ष-भाव (असेखभाव) आणणारे धर्म परिपूर्ण करायचे असतात, शैक्ष-भाव आणणारे नाही; म्हणून त्याला एकांततः परिपूर्ण असलेला शैक्ष (sekha) म्हटले आहे. ‘हे बुद्धवचन नाही’ म्हणजे ‘मार्ग अनेक चित्तक्षणांचा असतो’ हे विधान बुद्धवचन नाही, कारण लोकोत्तर कुशल (लोकुत्तरकुसल) हे तात्काळ आणि निश्चित विपाक देणारे असते, आणि ते अनेक वेळा प्रवृत्त होण्यात काही प्रयोजन नसते. ‘समाधिमानन्तरिकञ्ञमाहु’ (त्या समाधीला आनंतरीक म्हणतात) आणि ‘न पारं दिगुणं यन्ति’ (ते दुसऱ्यांदा पलीकडच्या तीरावर जात नाहीत) इत्यादी सुत्तपदे या अर्थाचे साधक (सिद्ध करणारे) आहेत. ओराम्भागिय-संयोजनांच्या प्रहाणाने (त्यागाने) शैक्षधर्माची परिपूर्णता होते असे म्हटल्यामुळे, हा अर्थ तुमच्या वचनाशी विसंगत ठरतो. ‘अस्स’ म्हणजे त्या आयुष्यमान वच्छाचे. ๑๙๘. อภิญฺญา วา การณนฺติ ยญฺหิ ตํ ตตฺร ตตฺร สกฺขิภพฺพตาสงฺขาตํ อิทฺธิวิธปจฺจนุภวนาทิ, ตสฺส อภิญฺญา การณํ. อถ อิทฺธิวิธปจฺจนุภวนาทิ อภิญฺญา, เอวํ สติ อภิญฺญาปาทกชฺฌานํ การณํ. อวสาเน ฉฏฺฐาภิญฺญาย ปน อรหตฺตํ. เอตฺถ จ ยสฺมา ปฐมสุตฺเต อาสวกฺขโย อธิปฺเปโต, อาสวา ขีณา เอว, น ปุน เขเปตพฺพา, ตสฺมา ตตฺถ ‘‘ยาวเทวา’’ติ น วุตฺตํ. อิธ ผลสมาปตฺติ อธิปฺเปตา, สา จ ปุนปฺปุนํ สมาปชฺชียติ, ตสฺมา ‘‘ยาวเทวา’’ติ วุตฺตํ. ตโต เอว หิ ‘‘อรหตฺตํ วา การณ’’นฺติ วุตฺตํ. ตญฺหิ ‘‘กุทาสฺสุ นามาหํ ตทายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหริสฺสามิ, [Pg.97] ยทริยา เอตรหิ อุปสมฺปชฺช วิหรนฺตี’’ติ (ม. นิ. ๑.๔๖๕; ๓.๓๐๗) อนุตฺตเรสุ วิโมกฺเขสุ ปิหํ อุปฏฺฐเปตฺวา อภิญฺญา นิพฺพตฺเตนฺตสฺส การณํ, ตยิทํ สพฺพสาธารณํ น โหตีติ สาธารณวเสน นํ ทสฺเสนฺโต ‘‘อรหตฺตสฺส วิปสฺสนา วา’’ติ อาห. १९८. ‘अभिञ्ञा वा कारणं’ (किंवा अभिज्ञा हे कारण आहे) कारण जे तिथे तिथे साक्षात्काराची योग्यता म्हणून ओळखले जाणारे ऋद्धिविधींचे (ऋद्धि-शक्तींचे) अनुभव घेणे इत्यादी आहे, त्याचे कारण अभिज्ञा (अभिञ्ञा) आहे. जर ऋद्धिविधींचे अनुभव घेणे इत्यादी हीच अभिज्ञा असेल, तर अशा वेळी अभिज्ञा-पादक ध्यान (अभिज्ञा उत्पन्न करणारे ध्यान) हे कारण आहे. शेवटी, सहाव्या अभिज्ञेने अर्हत्त्व प्राप्त होते. आणि येथे, पहिल्या सुत्तात आसवांचा क्षय (आसवक्खय) अभिप्रेत असल्यामुळे, आणि आसव क्षीणच झालेले असल्यामुळे, ते पुन्हा नष्ट करायचे नसतात, म्हणून तिथे ‘यावदेव’ (केवळ यासाठीच) असे म्हटले नाही. येथे फलसमापत्ती अभिप्रेत आहे, आणि ती वारंवार प्राप्त केली जाते, म्हणून ‘यावदेव’ असे म्हटले आहे. म्हणूनच ‘अर्हत्त्व किंवा कारण’ असे म्हटले आहे. कारण ‘कधी बरं मी त्या आयतनात (अवस्थेत) उपसंपन्न होऊन (प्रवेश करून) विहरेन, ज्यामध्ये आर्य सध्या उपसंपन्न होऊन विहरत आहेत?’ अशा प्रकारे अनुत्तर विमोक्षांविषयी (विमुक्तींविषयी) इच्छा निर्माण करून अभिज्ञा उत्पन्न करणाऱ्यासाठी ते कारण आहे. हे सर्वांसाठी साधारण (समान) नसते, म्हणून साधारण रूपाने ते दर्शवताना ‘अर्हत्त्वाची विपश्यना (विपस्सना) किंवा’ असे म्हटले आहे. ๒๐๐. ปริจรนฺติ นาม วิปฺปกตพฺรหฺมจริยวาสตฺตา. ปริจิณฺโณ โหติ สาวเกน นาม สตฺถุ ธมฺเม กตฺตพฺพา ปริจริยา สมฺมเทว นิฏฺฐาปิตตฺตา. เตนาห ‘‘อิติ…เป… เถโร เอวมาหา’’ติ. เตสํ คุณานนฺติ เตสํ อเสกฺขคุณานํ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. २००. ‘परिचरन्ति’ (सेवा करतात) असे म्हटले आहे कारण त्यांचा ब्रह्मचर्यवास अपूर्ण (अपूर्ण राहिलेला) असतो. श्रावकाद्वारे शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) धम्मामध्ये करायची सेवा योग्य प्रकारे पूर्ण केली गेल्यामुळे शास्ते ‘परिचिण्णो’ (सेविलेले) होतात. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘इति... पे... थेरो एवमाहा’ (अशा प्रकारे... पे... स्थविरांनी असे म्हटले). ‘तेसं गुणानं’ (त्या गुणांचे) म्हणजे त्या अशैक्ष गुणांचे (असेक्खगुणांचे). उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. มหาวจฺฉสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. महावच्छसुत्त-वर्णनेची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ-प्रकाशिनी टीका) समाप्त झाली. ๔. ทีฆนขสุตฺตวณฺณนา ४. दीघनखसुत्त-वर्णना (दीघनखसुत्ताची व्याख्या) ๒๐๑. ขนนํ ขตํ, สูกรสฺส ขตํ เอตฺถ อตฺถีติ สูกรขตา, สูกรสฺส วา อิมสฺมึ พุทฺธุปฺปาเท ปฐมํ ขตํ อุปาทาย สูกรขตา, ตาย. เอวํนามเกติ เอวํ อิตฺถิลิงฺควเสน ลทฺธนามเก. ปํสุโธเตติ โธตปํสุเก. โอตริตฺวา อภิรุหิตพฺพนฺติ ปกติภูมิโต อเนเกหิ โสปานผลเกหิ โอตริตฺวา ปุน เลณทฺวารํ กติปเยหิ อภิรุหิตพฺพํ. २०१. ‘खनन’ म्हणजे खणणे (खत). डुकराने खणलेले (खत) येथे आहे म्हणून ‘सूकरखता’ (डुकराने खणलेली गुहा), किंवा या बुद्धोत्पादामध्ये (बुद्धांच्या काळात) डुकराने प्रथम खणल्याचा संदर्भ घेऊन ‘सूकरखता’; तिच्याद्वारे. ‘एवंनामके’ म्हणजे स्त्रीलिंगी रूपाने असे नाव मिळालेली. ‘पंसुधोते’ म्हणजे जिची धूळ धुतली गेली आहे अशी. ‘उतरून चढावे लागते’ म्हणजे नैसर्गिक जमिनीवरून अनेक पायऱ्यावरून खाली उतरून पुन्हा गुहेच्या दारापाशी काही पायऱ्या चढाव्या लागतात. ฐิตโกวาติ มาตุลสฺส ฐิตตฺตา ตตฺถ สคารวสปติสฺสวเสน ฐิตโกว. กิญฺจาปิ สพฺพ-สทฺโท อวิเสสโต อนวเสสปริยาทายโก, วตฺถุอธิปฺปายานุโรธี ปน สทฺทปฺปโยโคติ ตมตฺถํ สนฺธาย ปริพฺพาชโก ‘‘สพฺพํ เม นกฺขมตี’’ติ อาห. ยา โลเก มนุสฺสอุปปตฺติโยติอาทิกา อุปปตฺติโย, ตา อนตฺถสมุทาคตา ตตฺถ ตตฺเถว สตฺตานํ อุจฺฉิชฺชนโต, ตสฺมา สมยวาทีหิ วุจฺจมานา สพฺพา อายตึ อุปฺปชฺชนอุปปตฺติ น โหติ. ชลพุพฺพุฬกา วิย หิ อิเม สตฺตา ตตฺถ ตตฺถ สมเย อุปฺปชฺชิตฺวา ภิชฺชนฺติ, เตสํ ตตฺถ ปฏิสนฺธิ นตฺถีติ อสฺส อธิปฺปาโย. เตนาห ‘‘ปฏิสนฺธิโย’’ติอาทิ. อสฺส อธิปฺปายํ มุญฺจิตฺวาติ เยนาธิปฺปาเยน ปริพฺพาชโก ‘‘สพฺพํ เม นกฺขมตี’’ติ อาห, ตํ ตสฺส อธิปฺปายํ ชานนฺโตปิ อชานนฺโต วิย หุตฺวา ตสฺส อกฺขเร ตาว โทสํ ทสฺเสนฺโตติ [Pg.98] ปเทสสพฺพํ สนฺธาย เตน วุตฺตํ, สพฺพสพฺพวิสยํ กตฺวา ตตฺถ โทสํ คณฺหนฺโต. ยถา โลเก เกนจิ ‘‘สพฺพํ วุตฺตํ, ตํ มุสา’’ติ วุตฺเต ตสฺส วจนสฺส สพฺพนฺโตคธตฺตา มุสาภาโว อาปชฺเชยฺย, เอวํ อิมสฺสปิ ‘‘สพฺพํ เม นกฺขมตี’’ติ วทโต ตถา ปวตฺตา ทิฏฺฐิปิ นกฺขมตีติ อตฺถโต อาปนฺนเมว โหติ. เตนาห ภควา – ‘‘เอสาปิ เต ทิฏฺฐิ นกฺขมตี’’ติ. ยถา ปน เกนจิ ‘‘สพฺพํ วุตฺตํ มุสา’’ติ วุตฺเต อธิปฺปายานุโรธินี สทฺทปฺปวตฺติ, ตสฺส วจนํ มุญฺจิตฺวา ตทญฺเญสเมว มุสาภาโว ญายาคโต, เอวมิธาปิ ‘‘สพฺพํ เม นกฺขมตี’’ติ วจนโต ยสฺสา ทิฏฺฐิยา วเสน ‘‘สพฺพํ เม นกฺขมตี’’ติ เตน วุตฺตํ, ตํ ทิฏฺฐึ มุญฺจิตฺวา ตทญฺญเมว ยถาธิปฺเปตํ สพฺพํ นกฺขมตีติ อยมตฺโถ ญายาคโต, ภควา ปน วาทีวโร สุขุมาย อาณิยา ถูลํ อาณึ นีหรนฺโต วิย อุปาเยน ตสฺส ทิฏฺฐิคตํ นีหริตุํ ตสฺส อธิปฺปาเยน อวตฺวา สทฺทวเสน ตาว ลพฺภมานํ โทสํ ทสฺเสนฺโต ‘‘ยาปิ โข เต’’ติอาทิมาห. เตน วุตฺตํ – ‘‘อสฺส อธิปฺปายํ มุญฺจิตฺวา อกฺขเร ตาว โทสํ ทสฺเสนฺโต’’ติ. ‘ठितकोवा’ (उभाच असलेला) म्हणजे त्याचे मामा उभे असल्यामुळे तिथे आदर आणि सन्मानापोटी तो उभाच राहिला. जरी ‘सब्ब’ (सर्व) हा शब्द सामान्यतः काहीही शिल्लक न ठेवता सर्वसमावेशक असला, तरी शब्दाचा प्रयोग विषयाच्या अभिप्रायानुसार होतो; हाच अर्थ मनात ठेवून परिव्राजकाने ‘मला काहीही मान्य नाही’ (सब्बं मे नक्खमति - मला सर्व अमान्य आहे) असे म्हटले. जगात मानवी उत्पत्ती (पुनर्जन्म) इत्यादी ज्या उत्पत्ती आहेत, त्या अनर्थाला कारणीभूत आहेत कारण तिथे तिथेच प्राण्यांचा उच्छेद (नाश) होतो; म्हणून संप्रदायवाद्यांनी सांगितलेली कोणतीही भविष्यातील उत्पत्ती (पुनर्जन्म) होत नाही. कारण पाण्याचे बुडबुडे जसे तिथे तिथे योग्य वेळी उत्पन्न होऊन फुटतात, तसेच हे प्राणी देखील तिथे तिथे उत्पन्न होऊन नष्ट होतात, त्यांचा तिथे पुनर्जन्म (पटिसन्धि) होत नाही – असा त्याचा अभिप्राय होता. म्हणूनच ‘पटिसन्धियो’ (पुनर्जन्म) इत्यादी म्हटले आहे. ‘त्याचा अभिप्राय सोडून’ म्हणजे ज्या अभिप्रायाने परिव्राजकाने ‘मला काहीही मान्य नाही’ असे म्हटले, तो त्याचा अभिप्राय माहीत असूनही न माहीत असल्यासारखे करून, आधी त्याच्या शब्दांमधील दोष दाखवण्यासाठी, त्याने म्हटलेल्या अंशतः ‘सर्व’ या शब्दाचा संदर्भ घेऊन, त्याला पूर्णपणे सर्वव्यापी करून त्यात दोष काढला. ज्याप्रमाणे जगात कोणी ‘सर्व बोलणे खोटे आहे’ असे म्हटले असता, त्याचे स्वतःचे बोलणेही ‘सर्व’ मध्ये समाविष्ट असल्यामुळे त्याचे खोटेपणा सिद्ध होईल; त्याचप्रमाणे ‘मला काहीही मान्य नाही’ असे म्हणणाऱ्या या व्यक्तीचे देखील, अशा प्रकारे प्रवृत्त झालेले मत (दृष्टी) त्याला मान्य नाही, हे अर्थावरून सिद्धच होते. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले – ‘तुझे हे मत देखील तुला मान्य नाही का?’ परंतु ज्याप्रमाणे कोणी ‘सर्व बोलणे खोटे आहे’ असे म्हटले असता, शब्दाचा प्रयोग अभिप्रायानुसार होतो आणि त्याचे स्वतःचे बोलणे सोडून इतरांचेच बोलणे खोटे आहे हे न्यायाने सिद्ध होते; त्याचप्रमाणे येथेही ‘मला काहीही मान्य नाही’ या वचनावरून, ज्या मताच्या प्रभावाने त्याने ‘मला काहीही मान्य नाही’ असे म्हटले, ते मत सोडून इतर सर्व काही अभिप्रेत असल्याप्रमाणे मान्य नाही, हा अर्थ न्यायाने सिद्ध होतो. परंतु वादविवादात श्रेष्ठ असलेल्या भगवंतांनी, एखाद्या बारीक खिळ्याने मोठा खिळा उपटून काढावा त्याप्रमाणे, उपायाने त्याचे ते मत (दिट्ठिगत) दूर करण्यासाठी, त्याच्या अभिप्रायानुसार न बोलता, शब्दांच्या आधारे मिळणारा दोष दाखवत ‘यापि खो ते’ (तुझे जे हे मत आहे) इत्यादी म्हटले. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘त्याचा अभिप्राय सोडून आधी शब्दांमधील दोष दाखवताना’. ปริพฺพาชโก ปน ยํ สนฺธาย ‘‘สพฺพํ เม นกฺขมตี’’ติ มยา วุตฺตํ, ‘‘อยํ โส’’ติ ยถาวุตฺตโทสปริหรณตฺถํ ตสฺมึ อตฺเถ วุจฺจมาเน เอส โทโส สพฺโพ น โหติ, เอวมฺปิ สมโณ โคตโม มม วาเท โทสเมว อาโรเปยฺยาติ อตฺตโน อชฺฌาสยํ นิคุหิตฺวา ยถาวุตฺตโทสํ ปริหริตุกาโม ‘‘เอสา เม’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ตมฺปสฺส ตาทิสเมวาติ ยํ ‘‘สพฺพํ เม นกฺขมตี’’ติ คหิตํ วตฺถุ, ตมฺปิ ตาทิสเมว ภเวยฺยาติ. อยญฺจ สพฺพนฺโตคธทิฏฺฐิ มยฺหมฺปิ ทิฏฺฐิวตฺถุ, ตํ เม ขเมยฺยวาติ. ยสฺมา ปน ‘‘เอสาปิ ทิฏฺฐิ ตุยฺหํ นกฺขมตี’’ติ ยาปิ ทิฏฺฐิ วุตฺตา ภวตา โคตเมน, สาปิ มยฺหํ นกฺขมติ, ตสฺมา สพฺพํ เม นกฺขมเตวาติ ปริพฺพาชกสฺส อธิปฺปาโย. เตนาห – ‘‘ตํ ปริหรามีติ สญฺญาย วทตี’’ติ. ตถา จ วกฺขติ ‘‘ตสฺมาปิ อุจฺเฉททิฏฺฐิ มยฺหํ นกฺขมตี’’ติ. ‘‘เอสา เม ทิฏฺฐี’’ติ ยา ฐิติภูตา ทิฏฺฐิ, ตาย ‘‘สพฺพํ เม นกฺขมตี’’ติ ปเนตฺถ สพฺพคฺคหเณน คหิตตฺตา อาห – ‘‘อตฺถโต ปนสฺส เอสา ทิฏฺฐิ น เม ขมตีติ อาปชฺชตี’’ติ. อยํ โทโสติ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘ยสฺส ปนา’’ติอาทิ. เอสาติ ทิฏฺฐิ. รุจิตนฺติ ทิฏฺฐิทสฺสเนน อภินิวิสิตฺวา โรเจตฺวา คหิตํ. เตน หิ ทิฏฺฐิอกฺขเมน อรุจิเตน ภวิตพฺพนฺติ สติ ทิฏฺฐิยา อกฺขมภาเว ตโต ตาย คหิตาย ขเมยฺย รุจฺเจยฺย ยถา, เอวํ สพฺพสฺส อกฺขมภาเวติ [Pg.99] อปรภาเค สพฺพํ ขมติ รุจฺจตีติ อาปชฺชติ. น ปเนส ตํ สมฺปฏิจฺฉตีติ เอส ‘‘สพฺพํ เม นกฺขมตี’’ติ เอวํ วทนฺโต อุจฺเฉทวาที ตํ วุตฺตนเยน สพฺพสฺส ขมนํ รุจฺจนํ น สมฺปฏิจฺฉติ. ญาเยน วุตฺตมตฺถํ กถํ น สมฺปฏิจฺฉตีติ อาห ‘‘เกวลํ ตสฺสาปิ อุจฺเฉททิฏฺฐิยา อุจฺเฉทเมว คณฺหาตี’’ติ. สพฺเพสญฺหิ ธมฺมานํ อายตึ อุปฺปาทํ อรุจฺจิตฺวา ตํ สนฺธาย อยํ ‘‘สพฺพํ เม นกฺขมตี’’ติ วทติ, อุจฺเฉททิฏฺฐิเกสุ จ อุจฺฉินฺเนสุ กุโต อุจฺเฉททิฏฺฐิสภาโวติ. परिव्राजकाने मात्र ज्याला उद्देशून "मला सर्व काही मान्य नाही" असे माझ्याकडून म्हटले गेले, "ते हेच आहे" अशा प्रकारे आधी सांगितलेल्या दोषाचे निवारण करण्यासाठी त्या अर्थाचे प्रतिपादन केले जात असताना हा सर्व दोष राहत नाही, तरीही श्रमण गौतम माझ्या वादात दोषच लावतील, असा स्वतःचा हेतू लपवून आणि आधी सांगितलेल्या दोषाचे निवारण करण्याची इच्छा धरून "हे माझे..." इत्यादी म्हटले. तेथे "त्याचे ते देखील तसेच होईल" म्हणजे जे "मला सर्व काही मान्य नाही" असे गृहीत धरलेले तत्त्व आहे, ते देखील तसेच होईल. आणि ही सर्वसमावेशक दृष्टी माझ्यासाठीही दृष्टीचा विषय आहे, ती मला मान्य असावी का? परंतु, "ही दृष्टी देखील तुला मान्य नाही" अशी जी दृष्टी भगवान गौतमांनी सांगितली आहे, ती देखील मला मान्य नाही, म्हणून "मला सर्व काही अमान्यच आहे" असा परिव्राजकाचा अभिप्राय आहे. म्हणूनच म्हटले आहे – "त्याचे निवारण करतो या समजुतीने तो बोलतो". आणि पुढे असेही म्हणेल "म्हणूनच उच्छेददृष्टी देखील मला मान्य नाही". "ही माझी दृष्टी आहे" अशी जी प्रस्थापित दृष्टी आहे, तिच्याद्वारे "मला सर्व काही मान्य नाही" येथे "सर्व" या शब्दाच्या ग्रहणाने ती गृहीत धरली गेल्यामुळे म्हटले आहे – "अर्थातच त्याची ही दृष्टी मला मान्य नाही असे निष्पन्न होते". "हा दोष आहे" हे दर्शवताना म्हटले आहे "ज्याला मात्र..." इत्यादी. "ही" म्हणजे दृष्टी. "रुचलेले" म्हणजे दृष्टीच्या दर्शनाने अभिनिवेश करून, आवडून स्वीकारलेले. म्हणून दृष्टीच्या अमान्यतेने ते अरुचिकर असले पाहिजे, असे असताना दृष्टीच्या अमान्यतेमध्ये, त्यानंतर तिच्याद्वारे स्वीकारलेल्या गोष्टी जशा मान्य व्हाव्यात, रुचाव्यात, तसेच सर्वांच्या अमान्यतेमध्ये नंतरच्या काळात "सर्व काही मान्य होते, रुचते" असे निष्पन्न होते. "परंतु तो त्याचा स्वीकार करत नाही" म्हणजे हा "मला सर्व काही मान्य नाही" असे बोलणारा उच्छेदवादी आधी सांगितलेल्या पद्धतीने सर्वांचे मान्य होणे किंवा रुचणे स्वीकारत नाही. न्यायाने सांगितलेला अर्थ तो कसा स्वीकारत नाही? हे सांगताना म्हटले आहे – "केवळ त्या उच्छेददृष्टीचा देखील तो उच्छेदच स्वीकारतो". कारण सर्व धर्मांच्या भविष्यातील उत्पत्तीला नापसंत करून, त्याला उद्देशून हा "मला सर्व काही मान्य नाही" असे म्हणतो, आणि उच्छेदवाद्यांमध्ये सर्व नष्ट झाल्यावर उच्छेददृष्टीचा स्वभाव कोठून असणार? เตนาติ เตน การเณน, ยสฺมา อิเธกจฺเจ สตฺตา อีทิสํ ทิฏฺฐึ ปคฺคยฺห ติฏฺฐนฺติ, ตสฺมาติ วุตฺตํ โหติ. ปชหนเกน วา จิตฺเตน เอกชฺฌํ คเหตฺวา ปชหนเกหิ อปฺปชหนเก นิทฺธาเรตุํ ภควา ‘‘อโต…เป… พหุตรา’’ติ อโวจาติ อาห – ‘‘ปชหนเกสุ นิสฺสกฺก’’นฺติ ยถา ‘‘ปญฺจสีเลหิ ปภาวนา ปญฺญวนฺตตรา’’ติ. ‘‘พหู’’ติ วตฺวา น เกวลํ พหู, อถ โข อติวิย พหูติ ทสฺเสนฺโต ‘‘พหุตรา’’ติ อาห. ‘‘พหู หี’’ติ นยิทํ นิสฺสกฺกวจนํ, อถ โข ปจฺจตฺตวจนํ. กถํ หิ-สทฺโทติ อาห ‘‘หิ-กาโร นิปาตมตฺต’’นฺติ. อนิสฺสกฺกวจนํ ตาว ตสฺส ปชหนกานํ พหุภาวโต เตปิ ปรโต ‘‘พหุตรา’’ติ วุจฺจียนฺติ. มูลทสฺสนนฺติ เย ตาทิสํ ทสฺสนํ ปฐมํ อุปาทิยนฺติ, ตชฺชาติกเมว ปจฺฉา คหิตทสฺสนํ. วิชาติยญฺหิ ปฐมํ คหิตทสฺสนํ อปฺปหาย วิชาติยสฺส คหณํ น สมฺภวติ วิรุทฺธสฺส อภินิเวสสฺส สห อนวฏฺฐานโต. อวิรุทฺธํ ปน มูลทสฺสนํ อวิสฺสชฺชิตฺวา วิสยาทิเภทภินฺนํ อปรทสฺสนํ คเหตุํ ลพฺภติ. เตนาห ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทิ. "तेन" म्हणजे त्या कारणाने, ज्या अर्थी येथे काही प्राणी अशा दृष्टीचा स्वीकार करून राहतात, म्हणून असे म्हटले आहे. किंवा त्याग करणाऱ्या चित्ताने एकत्र ग्रहण करून, त्याग करणाऱ्यांमधून त्याग न करणाऱ्यांना वेगळे करण्यासाठी भगवंतांनी "यापेक्षा...पे... अधिक आहेत" असे म्हटले, म्हणून सांगितले आहे – "त्याग करणाऱ्यांमध्ये अपादान (निसर्ग)" जसे "पंचशीलांपेक्षा प्रज्ञेची भावना अधिक प्रज्ञावान आहे". "अनेक" असे म्हणून केवळ अनेकच नाही, तर अत्यंत अनेक आहेत हे दर्शवण्यासाठी "अधिक" असे म्हटले आहे. "बहू हि" हे अपादान वचन (निसर्गवचन) नाही, तर ते प्रथमा विभक्तीचे वचन आहे. "हि" हा शब्द कसा आहे? तर सांगितले आहे – "हि-कार हा केवळ निपात आहे". अपादान नसलेले वचन तर त्याच्या त्याग करणाऱ्यांच्या बहुसंख्येमुळे ते देखील पुढे "अधिक" असे म्हटले जातात. "मूळ दर्शन" म्हणजे जे तशा दर्शनाचा प्रथम स्वीकार करतात, त्याच जातीचे नंतर स्वीकारलेले दर्शन असते. कारण विजातीय असे प्रथम स्वीकारलेले दर्शन न सोडता दुसऱ्या विजातीय दर्शनाचा स्वीकार करणे शक्य नाही, कारण विरुद्ध अभिनिवेशांचे एकत्र राहणे शक्य नसते. परंतु अविरुद्ध असलेले मूळ दर्शन न सोडता, विषयादी भेदांनी भिन्न असलेले दुसरे दर्शन स्वीकारता येते. म्हणूनच म्हटले आहे "आणि येथे..." इत्यादी. ตตฺถ กิญฺจาปิ เอกจฺจสสฺสตวาโท สสฺสตุจฺเฉทาภินิเวสานํ วเสน ยถากฺกมํ สสฺสตุจฺเฉทคฺคาหนชาติโก, อุจฺเฉทคฺคาเหน ปน สสฺสตาภินิเวสสฺส ตํคาเหน จ อสสฺสตาภินิเวสสฺส วิรุชฺฌนโต อุภยตฺถปิ ‘‘เอกจฺจสสฺสตํ วา คเหตุํ น สกฺกา’’ติ วุตฺตํ, ตถา ‘‘สสฺสตํ วา อุจฺเฉทํ วา น สกฺกา คเหตุ’’นฺติ จ. มูลสสฺสตญฺหิ ปฐมํ คหิตํ. อายตเนสุปิ โยเชตพฺพนฺติ ปฐมํ จกฺขายตนํ สสฺสตนฺติ คเหตฺวา อปรภาเค น เกวลํ จกฺขายตนเมว สสฺสตํ, โสตายตนมฺปิ สสฺสตํ, ฆานายตนาทิปิ สสฺสตนฺติ คณฺหาตีติอาทินา โยเชตพฺพํ. อายตเนสุปีติ ปิ-สทฺเทน ธาตูนํ อินฺทฺริยานมฺปิ คาโห ทฏฺฐพฺโพ. อิทํ สนฺธายาติ [Pg.100] ‘‘มูเล สสฺสต’’นฺติอาทินา วุตฺตปฐมคฺคาหสฺส สมานชาติยํ อปรคฺคาหํ สนฺธาย. तेथे जरी काही अंशी शाश्वतवाद हा शाश्वत आणि उच्छेद यांच्या अभिनिवेशाच्या प्रभावाने अनुक्रमे शाश्वत व उच्छेद ग्रहण करणाऱ्या स्वभावाचा असला, तरी उच्छेद ग्रहणाने शाश्वत अभिनिवेशाचा आणि त्याच्या ग्रहणाने अशाश्वत अभिनिवेशाचा विरोध होत असल्यामुळे दोन्ही ठिकाणी "एकदेशीय शाश्वत देखील ग्रहण करणे शक्य नाही" असे म्हटले आहे, तसेच "शाश्वत किंवा उच्छेद ग्रहण करणे शक्य नाही" असेही म्हटले आहे. कारण मूळ शाश्वत हे प्रथम ग्रहण केले जाते. "आयतनांमध्येही योजना करावी" म्हणजे प्रथम चक्षुआयतन शाश्वत आहे असे मानून, नंतरच्या काळात केवळ चक्षुआयतनच शाश्वत नाही, तर श्रोत्रआयतनही शाश्वत आहे, घ्राणायतन इत्यादी देखील शाश्वत आहेत, असे ग्रहण करतो, अशा प्रकारे योजना करावी. "आयतनांमध्येही" यातील "अपि" (ही) शब्दाने धातू आणि इंद्रियांचे ग्रहण देखील समजावे. "याला उद्देशून" म्हणजे "मुळात शाश्वत" इत्यादी प्रकारे सांगितलेल्या पहिल्या ग्रहणाच्या समान जातीच्या दुसऱ्या ग्रहणाला उद्देशून. ทุติยวาเร ปฐมวาเร วุตฺตสทิสํ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ. ตตฺถ อาทีนวํ ทิสฺวาติ ‘‘ยทิ รูปํ สสฺสตํ สิยา, นยิทํ อาพาธาย สํวตฺเตยฺย. ยสฺมา จ โข อิทํ รูปํ อสสฺสตํ, ตสฺมา อภิณฺหปฏิปีฬนฏฺเฐน อุทยวยวนฺตตาย รูปํ อนิจฺจํ สงฺขตํ ปฏิจฺจสมุปฺปนฺนํ, สสฺสตาภินิเวโส มิจฺฉา’’ติอาทินา ตตฺถ สสฺสตวาเท อาทีนวํ โทสํ ทิสฺวา. โอฬาริกนฺติ ตสฺมา ปฏิปีฬนฏฺเฐน อยาถาวคฺคาหตาย รูปํ น สณฺหํ โอฬาริกเมว. เวทนาทีนมฺปิ อนิจฺจาทิภาวทสฺสนํ รูปเวทนาอาทีนํ สมานโยคกฺขมตฺตา. วิสฺสชฺเชตีติ ปชหติ. दुसऱ्या वेळी, पहिल्या वेळी सांगितल्याप्रमाणेच आणि सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावे. तेथे "आदीनव (दोष) पाहून" म्हणजे "जर रूप शाश्वत असते, तर ते पीडेला कारणीभूत ठरले नसते. आणि ज्या अर्थी हे रूप अशाश्वत आहे, त्या अर्थी वारंवार पीडित होण्याच्या अर्थाने आणि उत्पत्ती-विनाशयुक्त असल्यामुळे रूप हे अनित्य, संस्कृत (संस्कारित) आणि प्रतीत्यसमुत्पन्न आहे, शाश्वत अभिनिवेश हा मिथ्या आहे" इत्यादी प्रकारे त्या शाश्वतवादातील आदीनव म्हणजे दोष पाहून. "ओळारिक" (स्थूल) म्हणजे म्हणून पीडित होण्याच्या अर्थाने आणि अयथार्थ ग्रहणामुळे रूप हे सूक्ष्म नसून स्थूलच आहे. वेदना इत्यादींचे देखील अनित्यत्व इत्यादी पाहणे हे रूप, वेदना इत्यादींच्या समान योगक्षेमतेमुळे (समान स्वभावामुळे) आहे. "विसर्जन करतो" म्हणजे त्याग करतो. ติสฺโส ลทฺธิโยติ สสฺสตุจฺเฉทเอกจฺจสสฺสตทิฏฺฐิโย. ยสฺมา สสฺสตทิฏฺฐิกา วฏฺเฏ รชฺชนสฺส อาสนฺนา. ตถา หิ เต โอลียนฺตีติ วุจฺจนฺติ, ภวาภวทิฏฺฐีนํ วเสน อิเมสํ สตฺตานํ สํสารโต สีสุกฺขิปนํ นตฺถีติ เอตาว ติสฺโส วิเสสโต คเหตพฺพา. "तीन मते (लद्धी)" म्हणजे शाश्वत, उच्छेद आणि एकदेशीय शाश्वत दृष्टी. कारण शाश्वतदृष्टी असणारे संसारात (भवचक्रात) आसक्त होण्याच्या जवळ असतात. म्हणूनच त्यांना "लीन होतात" असे म्हटले जाते, भव आणि विभव दृष्टीच्या प्रभावाने या प्राण्यांचे संसारातून डोके वर काढणे (मुक्त होणे) शक्य नाही, म्हणून या तीन दृष्टी विशेष रूपाने ग्रहण कराव्यात. อิธโลกํ ปรโลกญฺจ อตฺถีติ ชานาตีติ เอตฺตาวตา สสฺสตทสฺสนสฺส อปฺปสาวชฺชตาการณมาห, วฏฺฏํ อสฺสาเทติ, อภินนฺทตีติ อิมินา ทนฺธวิราคตาย. เตนาห ‘‘ตสฺมา’’ติอาทิ. อิธโลกํ ปรโลกญฺจ อตฺถีติ ชานาตีติ อิมินา ตาสุ ตาสุ คตีสุ สตฺตานํ สํสรณํ ปฏิกฺขิปตีติ ทสฺเสติ, สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ อตฺถีติ ชานาตีติ อิมินา กมฺมผลํ. กุสลํ น กโรตีติ อิมินา กมฺมํ, อกุสลํ กโรนฺโต น ภายตีติ อิมินา ปุญฺญาปุญฺญานิ สภาวโต ชายนฺตีติ ทสฺเสติ. วฏฺฏํ อสฺสาเทติ อภินนฺทติ ตนฺนินฺนภาวโต. สีฆํ ลทฺธึ ชหิตุํ น สกฺโกติ วฏฺฏุปจฺเฉทสฺส อรุจฺจนโต. อุจฺเฉทวาที หิ ตสฺมึ ภเว อุจฺเฉทํ มญฺญติ. ตโต ปรํ อิธโลกํ ปรโลกญฺจ อตฺถีติ ชานาติ สุกตทุกฺกฏานํ ผลํ อตฺถีติ ชานาติ กมฺมผลวาทีภาวโต. เยภุยฺเยน หิ อุจฺเฉทวาที สภาวนิยติยทิจฺฉาภินิเวเสสุ อญฺญตฺราภินิเวโส โหติ. สีฆํ ทสฺสนํ ปชหติ วฏฺฏาภิรติยา อภาวโต. ปารมิโย ปูเรตุํ สกฺโกนฺโต ปจฺเจกพุทฺโธ หุตฺวา, โลกโวหารมตฺเตเนว โส สมฺมาสมฺพุทฺโธ หุตฺวา ปรินิพฺพายตีติ โยชนา. อสกฺโกนฺโตติ พุทฺโธ โหตุํ อสกฺโกนฺโต. อภินีหารํ [Pg.101] กตฺวา อคฺคสาวกาทิภาวสฺส อภินีหารํ สมฺปาเทตฺวา. สาวโก หุตฺวาติ อคฺคสาวโก มหาสาวโก หุตฺวา, ตตฺถาปิ เตวิชฺโช ฉฬภิญฺโญ ปฏิสมฺภิทาปฺปตฺโต วา สุกฺขวิปสฺสโก เอว วา พุทฺธสาวโก หุตฺวา ปรินิพฺพายติ. สพฺพมิทํ อุจฺเฉทวาทิโน กลฺยาณมิตฺตนิสฺสเยน สมฺมตฺตนิยาโมกฺกมเน ขิปฺปวิราคตาทสฺสนตฺถํ อาคตํ. เตนาห ‘‘ตสฺมา’’ติอาทิ. "इहलोक आणि परलोक अस्तित्वात आहे हे जाणतो" याद्वारे शाश्वत दृष्टीच्या (sassatadassana) अल्प दोषाचे कारण सांगितले आहे. "संसाराचा आस्वाद घेतो, त्यात रममाण होतो" याद्वारे मंद वैराग्य (dandhavirāgatā) दर्शविले आहे. म्हणूनच "तस्मा" (म्हणून) इत्यादी म्हटले आहे. "इहलोक आणि परलोक अस्तित्वात आहे हे जाणतो" याद्वारे विविध गतींमध्ये प्राण्यांचे संसरण नाकारले जात नाही हे दर्शविले आहे. "सुकृत आणि दुष्कृत कर्मांचे फळ असते हे जाणतो" याद्वारे कर्मफळ दर्शविले आहे. "कुशल कर्म करत नाही" याद्वारे कर्म, आणि "अकुशल कर्म करताना भीत नाही" याद्वारे पुण्य-अपुण्य स्वभावतःच उत्पन्न होतात हे दर्शविले आहे. संसारात आसक्ती असल्यामुळे तो संसाराचा आस्वाद घेतो आणि त्यात रममाण होतो. संसाराचा उच्छेद (नाश) आवडत नसल्यामुळे तो आपली चुकीची धारणा (लद्धि) लवकर सोडू शकत नाही. कारण उच्छेदवादी त्या अस्तित्वातच उच्छेद मानतो. त्यानंतर, कर्मफलवादी असल्यामुळे तो "इहलोक आणि परलोक अस्तित्वात आहे हे जाणतो, सुकृत आणि दुष्कृत कर्मांचे फळ असते हे जाणतो". बहुतांश उच्छेदवादी स्वभाववाद, नियतिवाद किंवा यदृच्छावाद यांपैकी एखाद्या अभिनिवेशात (दृढ धारणेत) अडकलेले असतात. संसारात आसक्ती नसल्यामुळे तो आपली दृष्टी लवकर सोडून देतो. पारमिता पूर्ण करण्यास समर्थ असलेला प्रत्येकबुद्ध होऊन, केवळ लोकव्यवहारानुसार तो सम्यक्संबुद्ध होऊन परिनिर्वाण प्राप्त करतो, अशी योजना आहे. "असमर्थ असलेला" म्हणजे बुद्ध होण्यास असमर्थ असलेला. "अभिनिहार करून" म्हणजे अग्रश्रावक इत्यादी पदाचा अभिनिहार (संकल्प) पूर्ण करून. "श्रावक होऊन" म्हणजे अग्रश्रावक किंवा महाश्रावक होऊन, आणि तिथेही त्रिविद्य, षळभिज्ञ, प्रतिसंभिदाप्राप्त किंवा केवळ शुष्कविपश्यक बुद्धश्रावक होऊन परिनिर्वाण प्राप्त करतो. हे सर्व उच्छेदवादी व्यक्तीला कल्याणमित्राच्या आश्रयाने सम्यक्त्व-नियामामध्ये प्रवेश करताना शीघ्र वैराग्य प्राप्त होते हे दर्शविण्यासाठी आले आहे. म्हणूनच "तस्मा" इत्यादी म्हटले आहे. ๒๐๒. กญฺชิเยเนวาติ อารนาเฬน. กญฺชิยสทิเสน อุจฺเฉททสฺสเนน. ปูริโตติ ปริปุณฺณชฺฌาสโย. โสติ ปริพฺพาชโก. อปฺปหายาติ อภินฺทิตฺวา. วิคฺคโหติ กลโห อิทเมว สจฺจํ, โมฆมญฺญนฺติ อญฺญมญฺญํ วิรุทฺธคฺคาโหติ กตฺวา. วิวาทนฺติ วิรุทฺธวาทํ. วิฆาตนฺติ วิโรธเหตุกํ จิตฺตวิฆาตํ. วิเหสนฺติ วิคฺคหวิวาทนิมิตฺตํ กายิกํ เจตสิกญฺจ กิลมถํ. อาทีนวํ ทิสฺวาติ เอตาสํ ทิฏฺฐีนํ เอวรูโป อาทีนโว, อนิยฺยานิกภาวตาย ปน สมฺปติ อายติญฺจ มหาทีนโวติ เอวํ อาทีนวํ ทิสฺวา. २०२. "कांजिणेच" (Kañjiyeneva) म्हणजे आंबट कांजीने. कांजीसारख्या उच्छेद दृष्टीने. "पूरितो" म्हणजे परिपूर्ण आशय असलेला. "सो" म्हणजे तो परिव्राजक. "अप्पहाय" म्हणजे न भंग करता. "विग्गहो" म्हणजे कलह, "हेच सत्य आहे, इतर सर्व व्यर्थ आहे" अशा प्रकारे परस्परांच्या विरुद्ध ग्रहण करणे. "विवाद" म्हणजे विरुद्ध वाद. "विघात" म्हणजे विरोधामुळे निर्माण होणारा चित्ताचा विघात (त्रास). "विहेसा" म्हणजे कलह आणि वादामुळे होणारा शारीरिक व मानसिक थकवा (क्लेश). "आदीनवं दिस्वा" म्हणजे या दृष्टींचा असा दोष पाहून, आणि मोक्ष न देणाऱ्या (अनिय्यानिक) स्वरूपामुळे वर्तमान व भविष्यात मोठा दोष आहे, असा दोष पाहून. ๒๐๕. ‘‘เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา’’ติอาทินา (ม. นิ. ๑.๒๔๑; สํ. นิ. ๓.๘) กายํ อนฺเวตีติ กายนฺวโย, โสเยว, ตสฺส วา สมูโห กายนฺวยตา, กายปฏิพทฺโธ กิเลโส. เตนาห ‘‘กายํ…เป… อตฺโถ’’ติ. २०५. "हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे" इत्यादींद्वारे (म. नि. १.२४१; सं. नि. ३.८) जो कायाचे अनुकरण करतो तो 'कायान्वय' होय. तोच किंवा त्याचा समूह म्हणजे 'कायान्वयता' होय, जो कायाशी बद्ध असलेला क्लेश आहे. म्हणूनच "कायं...पे... अत्तो" (काया...पे... अर्थ) असे म्हटले आहे. อสมฺมิสฺสภาวนฺติ อสงฺกรโต ววตฺถิตภาวํ. เตน ตาสํ ยถาสกํ ปจฺจยานํ อุปฺปชฺชิตฺวา วิคมํ ทสฺเสติ. เอวญฺหิ ตาสํ กทาจิปิ สงฺกโร นตฺถิ. เตนาห ‘‘ตตฺรายํ สงฺเขปตฺโถ’’ติอาทิ. สรูปํ อคฺคเหตฺวา ‘‘อญฺญา เวทนา’’ติ อนิยเมน วุตฺตตฺตา ตเมว วิคมํ ทสฺเสนฺโต ‘‘อนุปฺปนฺนาว โหนฺติ อนฺตรหิตา วา’’ติ อาห. สรูปโต นิยเมตฺวา วุจฺจมาเน กาจิ อนุปฺปนฺนา วา โหติ, กาจิ อนฺตรหิตา วาติ. จุณฺณวิจุณฺณภาวทสฺสนตฺถนฺติ ขเณ ขเณ ภิชฺชมานภาวทสฺสนตฺถํ. "असंमिसभावं" (असंमिश्र भाव) म्हणजे संकर न होता निश्चित झालेली अवस्था. याद्वारे त्या त्या वेदना आपापल्या प्रत्ययांमुळे उत्पन्न होऊन नष्ट होतात हे दर्शविले आहे. कारण अशा प्रकारे त्यांचा कधीही संकर (मिश्रण) होत नाही. म्हणूनच "तत्रायं संखेपत्थो" (तेथे हा संक्षेपार्थ आहे) इत्यादी म्हटले आहे. विशिष्ट स्वरूप न घेता "दुसरी वेदना" असे अनियंत्रितपणे म्हटल्यामुळे, तोच नाश दर्शविताना "अनुत्पन्नच असतात किंवा अंतर्हित होतात" असे म्हटले आहे. विशिष्ट रूपाने निश्चित करून सांगताना, एखादी अनुत्पन्न असते किंवा एखादी अंतर्हित होते. "चुण्णविचुण्णभावदस्सनत्थं" (चूर्ण-वि चूर्ण भाव दर्शविण्यासाठी) म्हणजे क्षणाक्षणाला भंग पावणारी अवस्था दर्शविण्यासाठी. น เกนจิ สํวทตีติ เกนจิ ปุคฺคเลน สทฺธึ ทิฏฺฐิราควเสน สํกิลิฏฺฐจิตฺโต น วทติ. เตนาห ‘‘สสฺสตํ คเหตฺวา’’ติอาทิ. น วิวทตีติ วิรุทฺธภาโว หุตฺวา น วิวทติ. ปริวตฺเตตฺวาติ อุจฺเฉทํ คเหตฺวา เอกจฺจสสฺสตํ คเหตฺวา เอวํ วุตฺตนเยน ตโยปิ วาทา ปริวตฺเตตฺวา โยเชตพฺพา[Pg.102]. เตน โวหรตีติ เตน โลกโวหาเรน โลกสมญฺญํ อนติธาวนฺโต สตฺโต ปุริโส ปุคฺคโลติอาทินา โวหรติ, น ปน อิโต พาหิรกา วิย อภินิวิสติ. เตนาห ‘‘อปรามสนฺโต’’ติ. กญฺจิ ธมฺมนฺติ รูปาทีสุ เอกํ ธมฺมมฺปิ. ปรามาสคฺคาเหน อคฺคณฺหนฺโตติ ‘‘นิจฺจ’’นฺติอาทินา, ‘‘เอตํ มมา’’ติอาทินา จ ธมฺมสภาวํ อติกฺกมิตฺวา ปรโต อามสิตฺวา คหเณน อคฺคณฺหนฺโต. "न केनचि संवदति" (कोणाशीही वाद घालत नाही) म्हणजे कोणत्याही पुद्गलासोबत दृष्टीरागाच्या प्रभावाने संक्लिष्ट चित्त होऊन बोलत नाही. म्हणूनच "शाश्वत ग्रहण करून" इत्यादी म्हटले आहे. "न विवदति" म्हणजे विरोधी भाव ठेवून वाद घालत नाही. "परिवत्तेत्वा" (परिवर्तित करून) म्हणजे उच्छेद ग्रहण करून, एकदेशीय शाश्वत ग्रहण करून, अशा प्रकारे सांगितलेल्या पद्धतीने तिन्ही वादांचे परिवर्तन करून योजना करावी. "तेन वोहरति" (त्याने व्यवहार करतो) म्हणजे त्या लोकव्यवहाराने, लोकसंज्ञेचे उल्लंघन न करता "सत्त्व, पुरुष, पुद्गल" इत्यादी शब्दांनी व्यवहार करतो, परंतु बाह्य पंथीयांप्रमाणे त्यात अभिनिवेश (आसक्ती) ठेवत नाही. म्हणूनच "अपरामसंतो" (स्पर्श न करता/आसक्ती न ठेवता) असे म्हटले आहे. "कंचि धम्मं" (कोणताही धर्म) म्हणजे रूपादी धर्मांपैकी एकाही धर्माला. "परामसग्गाहेन अग्गण्हंतो" (परामर्श-ग्रहणाने ग्रहण न करता) म्हणजे "नित्य" इत्यादी किंवा "हे माझे आहे" इत्यादी प्रकारे धर्माच्या स्वभावाचे उल्लंघन करून, पलीकडे जाऊन आसक्तीने ग्रहण न करता. กตาวีติ กตกิจฺโจ. โส วเทยฺยาติ ขีณาสโว ภิกฺขุ อหงฺการมมงฺกาเรสุ สพฺพโส สมุจฺฉินฺเนสุปิ อหํ วทามีติ วเทยฺย. ตตฺถ อหนฺติ นิยกชฺฌตฺตสนฺตาเน. มมนฺติ ตสฺส สนฺตกภูเต วตฺถุสฺมึ โลกนิรุฬฺเห. สมญฺญนฺติ ตตฺถ สุกุสลตาย โลเก สมญฺญา กุสโล วิทิตฺวา. โวหารมตฺเตนาติ เกวลํ ปจฺเจกพุทฺโธ หุตฺวา มหาโพธิปารมิโย ปูเรตุํ อสกฺโกนฺโต สาวโก หุตฺวา เทสโวหารมตฺเตน น อปฺปหีนตณฺโห วิย อนฺธปุถุชฺชโน อภินิเวสนวเสน. "कतावी" (कृतावी) म्हणजे कृतकृत्य (ज्याने आपले कर्तव्य पूर्ण केले आहे). "सो वदेय्य" (तो बोलेल) म्हणजे क्षीणास्रव भिक्खू, अहंकार आणि मकार पूर्णपणे नष्ट झाले असतानाही, "मी बोलतो" असे बोलेल. तिथे "मी" म्हणजे स्वतःच्या आंतरिक संतानामध्ये. "माझे" म्हणजे त्याच्या मालकीच्या वस्तूंमध्ये, जे लोकव्यवहारात रूढ आहे. "समञ्ञं" (संज्ञा/नाव) म्हणजे त्या लोकव्यवहारात अत्यंत कुशल असल्यामुळे, लोकांमधील संज्ञा कुशलतेने जाणून. "वोहारमत्तेन" (केवळ व्यवहाराने) म्हणजे केवळ प्रत्येकबुद्ध होऊन महाबोधी पारमिता पूर्ण करण्यास असमर्थ असलेला श्रावक होऊन, केवळ उपदेशाच्या व्यवहाराने, तृष्णा नष्ट न झालेल्या अंध पृथग्जनाप्रमाणे अभिनिवेश (आसक्ती) ठेवून नव्हे. ๒๐๖. สสฺสตาทีสูติ สสฺสตาภินิเวสาทีสุ. เตสํ เตสํ ธมฺมานนฺติ นิทฺธารเณ สามิวจนํ. สสฺสตํ อภิญฺญายาติ สสฺสตทิฏฺฐึ สมุทยโต อตฺถงฺคมโต อสฺสาทโต นิสฺสรณโต อภิวิสิฏฺฐาย ปญฺญาย ปฏิวิชฺฌิตฺวา. ปหานนฺติ อจฺจนฺตปฺปหานํ สมุจฺเฉทํ. รูปสฺส ปหานนฺติ รูปสฺส ตปฺปฏิพทฺธสญฺโญชนปฺปหาเนน ปหานํ. อนุปฺปาทนิโรเธน นิรุทฺเธหิ อาสเวหิ อคฺคเหตฺวาว จิตฺตํ วิมุจฺจิ. ‘‘อาสเวหิ จิตฺตํ วิมุจฺจี’’ติ เอตฺถ กิญฺจิปิ อคฺคเหตฺวา อเสเสตฺวา. โสฬส ปญฺญาติ มหาปญฺญาทิกา โสฬส ปญฺญา. จตุรงฺคสมนฺนาคโตติ ปุณฺณอุโปสถทิวสตา, เกนจิ อนามนฺติตเมว อเนกสตานํเยว อเนกสหสฺสานํ วา ภิกฺขูนํ สนฺนิปติตตา, สพฺเพสํ เอหิภิกฺขุภาเวน อุปสมฺปนฺนตา, ฉฬภิญฺญตา จาติ. เตนาห ‘‘ตตฺริมานิ องฺคานี’’ติอาทิ. ยํ ปเนตฺถ อตฺถโต อวิภตฺตํ, ตํ สุวิญฺเญยฺยเมว. २०६. "शाश्वतादींमध्ये" म्हणजे शाश्वत अभिनिवेश इत्यादींमध्ये. "त्या त्या धर्मांचे" हे निर्धारण अर्थातील षष्ठी विभक्तीचे रूप आहे. "शाश्वत जाणून" म्हणजे शाश्वत दृष्टीला तिच्या उत्पत्ती, अस्त, आस्वाद आणि निस्सरण यांद्वारे अतिविशिष्ट प्रज्ञेने जाणून (प्रतिवेध करून). "प्रहाण" म्हणजे अत्यंत प्रहाण (पूर्णपणे नष्ट करणे), समूळ उच्छेद. "रूपाचे प्रहाण" म्हणजे रूपाशी बद्ध असलेल्या संयोजनांच्या प्रहाणाने प्रहाण होय. अनुत्पाद निरोधाने निरुद्ध झालेल्या आस्रवांपासून काहीही ग्रहण न करताच चित्त विमुक्त झाले. "आस्रवांपासून चित्त विमुक्त झाले" यामध्ये काहीही ग्रहण न करता, पूर्णपणे विमुक्त झाले. "सोळा प्रज्ञा" म्हणजे महाप्रज्ञा इत्यादी सोळा प्रज्ञा. "चतुरंगसमन्नागतो" (चार अंगांनी युक्त) म्हणजे पौर्णिमेचा उपोसथ दिवस असणे, कोणाचेही आमंत्रण नसताना शेकडो किंवा हजारो भिक्खूंचे एकत्रित येणे, सर्वांचे 'एहिभिक्खू' भावाने उपसंपन्न असणे, आणि षळभिज्ञ असणे. म्हणूनच "तत्रिमानि अङ्गानि" (तेथे ही अंगे आहेत) इत्यादी म्हटले आहे. येथे जे अर्थाच्या दृष्टीने स्पष्ट केलेले नाही, ते सहज समजण्यासारखेच आहे. ทีฆนขสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. "दीर्घनख सुत्ताच्या वर्णनावरील लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशनी टीका) समाप्त झाली." ๕. มาคณฺฑิยสุตฺตวณฺณนา ५. "मागंडिय सुत्ताचे वर्णन (अट्ठकथा)." ๒๐๗. ทฺเว [Pg.103] มาคณฺฑิยาติ ทฺเว มาคณฺฑิยนามกา. เทวคพฺภสทิสนฺติ เทวานํ วสนโอวรกสทิสํ. เอตํ วุตฺตนฺติ ‘‘ภารทฺวาชโคตฺตสฺส พฺราหฺมณสฺส อคฺยาคาเร ติณสนฺถารเก’’ติ เอตํ วุตฺตํ. น เกวลํ ตํ ทิวสเมวาติ ยํ ทิวสํ มาคณฺฑิโย ปริพฺพาชโก ติณสนฺถารกํ ปญฺญตฺตํ, น เกวลํ ตํ ทิวสเมว ภควา เยนญฺญตโร วนสณฺโฑ, เตนุปสงฺกมีติ โยชนา. คามูปจาเรติ คามสมีเป. สญฺญาณํ กตฺวาติ สญฺญาณํ กตฺวา วิย. น หิ ภควโต ตสฺส สญฺญาณกรเณ ปโยชนํ อตฺถิ. २०७. "दोन मागंडिय" म्हणजे मागंडिय नावाचे दोन व्यक्ती. "देवगर्भासारखे" म्हणजे देवांच्या राहण्याच्या खोलीसारखे (गर्भगृहासारखे). "हे म्हटले आहे" म्हणजे "भारद्वाजगोत्रीय ब्राह्मणाच्या अग्नीशाळेत तृणसंस्तरावर (गवताच्या बिछान्यावर)" हे म्हटले आहे. "केवळ त्याच दिवशी नाही" म्हणजे ज्या दिवशी मागंडिय परिव्राजकासाठी तृणसंस्तर पसरवला गेला होता, केवळ त्याच दिवशी नाही तर भगवान ज्या बाजूला दुसरा एखादा वनखंड होता, त्या बाजूला गेले, अशी योजना करावी. "गामोपचारात" म्हणजे गावाच्या जवळ. "खूण करून" म्हणजे जणू काही खूण करून. कारण भगवंतांना ती खूण करण्याचे काही प्रयोजन नव्हते. สมณเสยฺยานุรูปนฺติ สมณสฺส อนุจฺฉวิกา เสยฺยา. ปาสํสตฺโถ หิ อยํ รูป-สทฺโท. เตนาห ‘‘อิมํ ติณสนฺถารก’’นฺติอาทิ. อนากิณฺโณติ วิลุฬิโต อฆฏฺฏิโต. หตฺถปาทสีเสหิ ตตฺถ ตตฺถ ปหเฏน น จลิโต อภินฺโน, อจลิตตฺตา เอว อภินฺนํ อตฺถรณํ. ปริจฺฉินฺทิตฺวา ปญฺญตฺโต วิยาติ อยํ เฉเกน จิตฺตกาเรน จินฺเตตฺวา ตุลิกาย ปริจฺฉินฺนเลขาย ปริจฺฉินฺทิตฺวา ลิขิตา จิตฺตกตเสยฺยา วิย. ภูนํ วุจฺจติ วฑฺฒิตํ, ตํ หนฺตีติ ภูนหุโน. เตนาห ‘‘หตวฑฺฒิโน’’ติ. ตํ ปนายํ จกฺขาทีสุ สํวรวิธานํ วฑฺฒิหนนํ มญฺญติ. เตนาห ‘‘มริยาทการกสฺสา’’ติ. พฺรูเหตพฺพนฺติ อุฬารวิสยูปหาเรน วฑฺเฒตพฺพํ ปีเณตพฺพํ. ตํ ปน อนนุภูตานุภวเนน โหตีติ อาห ‘‘อทิฏฺฐํ ทกฺขิตพฺพ’’นฺติ. อนุภูตํ ปน อปณีตํ โหตีติ วุตฺตํ ‘‘ทิฏฺฐํ สมติกฺกมิตพฺพ’’นฺติ. เสสวาเรสุปิ เอเสว นโย. ปรมทิฏฺฐธมฺมนิพฺพานวาที กิเรส ปริพฺพาชโก, ตสฺมา เอวํ ฉสุ ทฺวาเรสุ วฑฺฒึ ปญฺญเปติ. ยสฺมา ยํ ฉนฺนมฺปิ จกฺขาทีนํ ยถาสกํ วิสยคฺคหณํ ปฏิกฺขิปนฺโต โลกสฺส อวฑฺฒิตํ วินาสเมว ปญฺญเปติ, ตสฺมา โส สยมฺปิ วฑฺฒิหโต หตวฑฺฒิโต. "समणसेय्यानुरूपं" (श्रमणशय्यानुरूप) म्हणजे श्रमणाला अनुरूप अशी शय्या (बिछाना). हा 'रूप' शब्द प्रशंसार्थक आहे. म्हणूनच "इमं तिणसन्थारकं" (हा तृणसंथारा/गवताचा बिछाना) इत्यादी म्हटले आहे. "अनाकिण्णो" (अनाकीर्ण) म्हणजे विस्कळीत न झालेला, न विस्कटलेला. हात, पाय आणि डोके यांनी इकडेतिकडे मारल्यामुळे न हललेला, अभिन्न (अखंड); न हलल्यामुळेच तो 'अभिन्न अंथरूण' आहे. "परिच्छिन्दित्वा पञ्ञत्तो विय" (मर्यादित करून अंथरल्यासारखा) म्हणजे एखाद्या चतुर चित्रकाराने विचार करून, कुंचल्याने मर्यादित रेषा आखून रेखाटलेल्या चित्रमय शय्येसारखा. "भून" म्हणजे वाढ (वृद्धी), त्याचा नाश करतो तो "भूनहुनो" (वृद्धीचा नाश करणारा). म्हणूनच "हतवड्ढिनो" (वृद्धीचा नाश करणारा) असे म्हटले आहे. तो (मागंदिय) डोळे इत्यादी इंद्रियांच्या संवर-विधानाला (संयम ठेवण्याला) वृद्धीचा नाश मानतो. म्हणूनच "मरियादकारकस्स" (मर्यादा घालणाऱ्याचा) असे म्हटले आहे. "ब्रूहेतब्बं" (वाढवले पाहिजे) म्हणजे उदार विषयांच्या उपभोगाने वाढवले पाहिजे, तृप्त केले पाहिजे. ते न अनुभवलेल्या गोष्टींचा अनुभव घेतल्याने होते, म्हणून "अदिट्ठं दक्खितब्बं" (न पाहिलेले पाहिले पाहिजे) असे म्हटले आहे. अनुभवलेले मात्र निकृष्ट असते, म्हणून "दिट्ठं समतिक्कमितब्बं" (पाहिलेल्याचे उल्लंघन केले पाहिजे) असे म्हटले आहे. उर्वरित प्रसंगांमध्येही हाच नियम आहे. हा परिव्राजक 'परम-दृष्टधम्म-निर्वाणवादी' (याच जन्मात परम निर्वाण मानणारा) आहे, म्हणूनच तो अशा प्रकारे सहा द्वारांमध्ये (इंद्रियांमध्ये) वृद्धी प्रस्थापित करतो. ज्या अर्थी तो डोळे इत्यादी सहा इंद्रियांच्या आपापल्या विषयांच्या ग्रहणाचा निषेध करत लोकांच्या अवृद्धीची (ऱ्हासाची) आणि विनाशाचीच घोषणा करतो, त्या अर्थी तो स्वतःच वृद्धी नष्ट झालेला, 'हतवृद्धी' आहे. สํกิเลสโต อารกตฺตา อริโย นิยฺยานิกธมฺมภาวโต ญาโย ธมฺโม. วชฺชเลสสฺสปิ อภาวโต กุสโล. เตนาห ‘‘ปริสุทฺเธ การณธมฺเม อนวชฺเช’’ติ. อุคฺคตสฺสาติ อุจฺจกุลีนตาทินา อุฬารสฺส. มุเข อารกฺขํ ฐเปตฺวาติ มุเขน สํยโต หุตฺวา. อมฺพชมฺพูอาทีนิ คเหตฺวา วิย อปูรยมาโนติ อมฺพชมฺพูอาทีนิ อญฺญมญฺญวิสทิสานิ วิย ปูรณกถานเยน ยํ กิญฺจิ อกเถตฺวา. เตนาห ‘‘มยา กถิตนิยาเมนา’’ติ. संक्लेशापासून (मनाच्या मलीनतेपासून) दूर असल्यामुळे तो 'अरिथ' (आर्य) आहे; मोक्षाकडे नेणारा धर्म असल्यामुळे तो 'न्याय धर्म' आहे. दोषाचा लवलेशही नसल्यामुळे तो 'कुशल' आहे. म्हणूनच "परिसुद्धे कारणधम्मे अनवज्जे" (परिशुद्ध, दोषरहित कारणधर्मामध्ये) असे म्हटले आहे. "उग्गतस्स" (उच्च पदावर पोहोचलेल्याच्या) म्हणजे उच्च कुलीनता इत्यादींमुळे श्रेष्ठ असलेल्याच्या. "मुखे आरक्खं ठपेत्वा" (मुखावर रक्षक ठेवून) म्हणजे मुखाने संयमित होऊन. "अम्बजम्बूआदीनि गहेत्वा विय अपूरयमानो" (आंबे, जांभळे इत्यादी घेऊन न भरता) म्हणजे आंबे, जांभळे इत्यादी एकमेकांशी विसंगत गोष्टींप्रमाणे, केवळ भर घालण्याच्या कथेच्या पद्धतीने काहीही न बोलता. म्हणूनच "मया कथितनियामेन" (मी सांगितलेल्या पद्धतीने) असे म्हटले आहे. ๒๐๘. ผลสมาปตฺติยา [Pg.104] วุฏฺฐิโตติ ทิวาวิหารโต วุฏฺฐิโตติ อตฺโถ. ทิวาวิหาโรปิ หิ ‘‘ปฏิสลฺลาน’’นฺติ วุจฺจติ ‘‘รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาที’’ติอาทีสุ (ปารา. ๑๘). ภควา หิ ผลสมาปตฺติโต วุฏฺฐานุตฺตรกาลํ เตสํ กถาสลฺลาปํ สุตฺวา ทิวาวิหารโต วุฏฺฐาย ตตฺถ คโต. สํเวโค นาม สโหตฺตปฺปญาณํ, ตํ นิพฺพินฺทนวเสนปิ โหติ, สํเวคนิสฺสิตํ สนฺธายาห ‘‘ปีติสํเวเคน สํวิคฺโค’’ติ. โส ปน ยสฺมา ปุริมาวตฺถาย จลนํ โหติ จิตฺตสฺส, ตสฺมา อาห ‘‘จลิโต กมฺปิโต’’ติ. ติขิณโสเตน ปุริเสนาติ ภควนฺตํ สนฺธายาห. २०८. "फलसमापत्तिया वुट्ठितो" (फलसमापत्तीतून उठलेले) म्हणजे 'दिवाविहारातून' (दुपारच्या विश्रांतीतून/ध्यानातून) उठलेले, असा अर्थ आहे. कारण दिवाविहारालाही "पटिसल्लानं" (एकांतवास) म्हटले जाते, जसे की "रहोगतस्स पटिसल्लीनस्स एवं चेतसो परिवितक्को उदपादि" (एकांतात ध्यानस्थ असलेल्याच्या मनात असा विचार उत्पन्न झाला) इत्यादींमध्ये (पाराजिक १८). भगवान फलसमापत्तीतून उठल्यानंतरच्या काळात त्यांचे संभाषण ऐकून, दिवाविहारातून उठून तिथे गेले. "संवेग" म्हणजे ओत्तप्प (पापाची भीती) युक्त ज्ञान; ते निर्वेदाच्या (वैराग्याच्या) प्रभावानेही होते. संवेगावर आधारित असलेल्या संदर्भात "पीतिसंवेगेन संविग्गो" (प्रीती आणि संवेगाने संविग्न झालेले) असे म्हटले आहे. त्या संवेगामुळे चित्त पूर्वस्थितीपासून विचलित होते, म्हणूनच "चलितो कम्पितो" (चलित झालेले, कंपित झालेले) असे म्हटले आहे. "तिखिणसोतेन पुरिसेन" (तीक्ष्ण प्रवाह असलेल्या पुरुषाने) हे भगवंतांना उद्देशून म्हटले आहे. ๒๐๙. ธมฺมเทสนํ อารภิ ยถา วิเนยฺยทมนกุสโล วสนฏฺฐานฏฺเฐนาติ อิทํ อารมิตพฺพภาวสฺส ภาวลกฺขณวจนํ. อารมติ เอตฺถาติ อาราโม, รูปํ อาราโม เอตสฺสาติ รูปารามํ, ตโต เอว ตนฺนินฺนภาเวน รูเป รตนฺติ รูปรตํ, เตน สมฺโม ทุปฺปตฺติยา รูเปน สมฺมุทิตนฺติ รูปสมฺมุทิตํ, ตเทตํ ตทภิหตชวนกิจฺจํ ตตฺถ อาโรเปตฺวา วุตฺตํ. ทนฺตนฺติอาทีสุปิ เอเสว นโย. ทนฺตํ ทมิตํ. นิพฺพิเสวนนฺติ วิคตวิสุกายิกํ. คุตฺตนฺติ สติยา คุตฺตํ. รกฺขิตนฺติ ตสฺเสว เววจนํ. สํวุตนฺติ อปนีตํ ปเวสนิวารเณน. เตนาห ‘‘ปิหิต’’นฺติ. २०९. विनेय (शिष्य) लोकांचे दमन करण्यात कुशल असलेल्या भगवंतांनी राहण्याच्या स्थानाच्या अर्थाने धम्मदेशना सुरू केली - हे रममाण होण्याच्या भावाचे लक्षण सांगणारे वचन आहे. जिथे रममाण होतात तो "आरामो" (आराम/क्रीडास्थान) होय. रूप हेच ज्याचे क्रीडास्थान आहे ते "रूपारामं" (रूपाराम) होय. त्याच कारणाने, त्याकडे झुकलेले असल्यामुळे जे रूपात रमतात ते "रूपरतं" (रूपरत) होय. त्यामुळे मोहाच्या प्राप्तीने जे रूपाने हर्षित होते ते "रूपसम्मुदितं" (रूपसंमुदित) होय. हे सर्व त्या (रूपाने) आहत झालेल्या जवन-कार्याला (चित्ताच्या वेगाला) तिथे आरोपित करून सांगितले आहे. "दन्तं" (दंत/दमित) इत्यादी शब्दांमध्येही हाच नियम आहे. दंत म्हणजे दमित केलेले (संयमित केलेले). "निब्बिसेवनं" (निर्विषेवन) म्हणजे विदूषकत्व किंवा चंचलतेने विरहित असलेले. "गुत्तं" (गुप्त) म्हणजे स्मृतीद्वारे (सतीद्वारे) रक्षिलेले. "रक्खितं" (रक्षित) हा त्याचाच समानार्थी शब्द आहे. "संवुतं" (संवृत) म्हणजे (विषयांच्या) प्रवेशाला रोखून दूर केलेले. म्हणूनच "पिहितं" (बंद केलेले/झाकलेले) असे म्हटले आहे. ๒๑๐. อุปฺปชฺชนปริฬาหนฺติ อุปฺปชฺชนกิเลสปริฬาหํ. กึ วจนํ วตฺตพฺพํ อสฺสาติ รูปารมฺมณํ อนุภวิตฺวา สมุทยาทิปหานํ ปริคฺคณฺหิตฺวา ปรินิพฺพินฺทิตฺวา วิรชฺชิตฺวา โย วิมุตฺโต, ตตฺถ กึ วุทฺธิหตปริยาโย อวสฺสํ ลภติ น ลภตีติ ปุจฺฉติ. ปริพฺพาชโก ตาทิเส สารพทฺธวิมุตฺติเก วุทฺธิหโตติ น วเทยฺยาติ อาห ‘‘น กิญฺจิ, โภ, โคตมา’’ติ. २१०. "उप्पज्जनपरिळाहं" (उत्पन्न होणारा परिदाह) म्हणजे उत्पन्न होणारा क्लेश-परिदाह (संताप). "किं वचनं वत्तब्बं अस्स" (त्याला काय म्हणावे?) म्हणजे रूपाचे आलंबन अनुभवून, समुदय इत्यादींचा त्याग स्वीकारून, विरक्त होऊन आणि मुक्त होऊन जो विमुक्त झाला आहे, त्याला 'वृद्धी नष्ट झालेला' (हतवृद्धी) हा पर्याय नक्कीच लागू पडतो की नाही, असे विचारले आहे. परिव्राजक अशा सारभूत बंधनांतून विमुक्त झालेल्या व्यक्तीला 'वृद्धी नष्ट झालेला' असे म्हणणार नाही, म्हणूनच "न किञ्चि, भो, गोतमा" (काहीही नाही, हे गौतम!) असे म्हटले आहे. ๒๑๑. เตติ ตยา, อยเมว วา ปาโฐ. วสฺสํ วาโส วสฺสํ อุตฺตรปทโลเปน, วสฺสิตุํ อรหตีติ วสฺสิโก, วสฺสกาเล นิวาสานุจฺฉวิโกติ อตฺโถ. २११. "ते" म्हणजे तुझ्याद्वारे, किंवा हाच पाठ आहे. 'वस्सं' (वर्षा) म्हणजे निवास; उत्तरपदाचा लोप करून 'वस्सं' झाले आहे. राहण्यास योग्य तो "वस्सिका" (वर्षिक/पावसाळी), म्हणजे पावसाळ्यात राहण्यास योग्य असा अर्थ आहे. นาติอุจฺโจ โหติ นาตินีโจติ คิมฺหิโก วิย อุจฺโจ, เหมนฺติโก วิย นีโจ น โหติ, อถ โข ตทุภยเวมชฺฌลกฺขณตาย นาติอุจฺโจ โหติ นาตินีโจ. นาติตนูนีติ [Pg.105] เหมนฺติกสฺส วิย น ขุทฺทกานิ. นาติพหูนีติ คิมฺหิกสฺส วิย น อติพหูนิ. มิสฺสกาเนวาติ เหมนฺติกคิมฺหิเกสุ วุตฺตลกฺขณโวมิสฺสกานิ. อุณฺหปเวสนตฺถายาติ นิยูเหสุ ปุเรภตฺตํ ปจฺฉาภตฺตญฺจ ปติตสูริโยภาสวเสน อุณฺหสฺส อพฺภนฺตรปเวสนตฺถาย. ภิตฺตินิยูหานิ นีหรียนฺตีติ ทกฺขิณปสฺเส ภิตฺตีสุ นิยูหานิ นีหริตฺวา กรียนฺติ. วิปุลชาลานีติ ปุถุลฉิทฺทานิ. อุทกยนฺตานีติ อุทกวาหกยนฺตานิ. "na-ati-ucco hoti na-ati-nīco" (फार उंच नाही आणि फार सखल नाही) म्हणजे उन्हाळ्यातील घरासारखे उंच नाही आणि हिवाळ्यातील घरासारखे सखल नाही; तर त्या दोन्हीच्या मध्यवर्ती लक्षणामुळे ते फार उंचही नसते आणि फार सखलही नसते. "नातितनूनि" (फार लहान नाहीत) म्हणजे हिवाळ्यातील घरासारखी लहान नसतात. "नातिबहूनि" (फार जास्त नाहीत) म्हणजे उन्हाळ्यातील घरासारखी अतिशय जास्त नसतात. "मिस्सकानेव" (मिश्रच) म्हणजे हिवाळा आणि उन्हाळ्यातील घरांच्या सांगितलेल्या लक्षणांचे मिश्रण असलेले. "उण्हपवेसनत्थाय" (उष्णता आत येण्यासाठी) म्हणजे सज्जांमध्ये (झरोक्यांमध्ये) दुपारपूर्वी आणि दुपारनंतर पडणाऱ्या सूर्याच्या प्रकाशामुळे उष्णता आत येण्यासाठी. "भित्तिनियूहानि नीहरीयन्ति" (भिंतींचे सज्जे बाहेर काढले जातात) म्हणजे दक्षिण बाजूच्या भिंतींमध्ये सज्जे बाहेर काढून तयार केले जातात. "विपुलजालानि" (मोठ्या जाळ्या) म्हणजे मोठी छिद्रे असलेले झरोके. "उदकयन्तानि" (जलशक्तीची यंत्रे) म्हणजे पाणी वाहून नेणारी यंत्रे. นีลุปฺปลคจฺฉเก กตฺวาติ วิกสิเตหิ นีลุปฺปเลหิ คจฺฉเก นฬินิเก กตฺวา. คนฺธกลลนฺติ คนฺธมิสฺสกกทฺทมํ. ยมกภิตฺตีติ ยุคฬภิตฺติ, ตสฺสา อนฺตเร นาฬิ, ยโต อุทกํ อภิรุหติ. โลหนาฬินฺติ โลหมยยนฺตนาฬึ. ชาลนฺติ ตมฺพโลหมยํ ชาลํ. เหฏฺฐา ยนฺตํ ปริวตฺเตนฺตีติ เหฏฺฐาภาเค อุทกยนฺตํ คเมนฺติ. อุทกผุสิเต เตเมนฺเต วิวณฺณตา มาโหสีติ นีลปฏํ นิวาเสติ. ทิวากาเลติ ทิวสเวลาย. อชฺฌตฺตํ วูปสนฺตจิตฺโต วิหรามีติ เอเตน อตฺตโน ผลสมาปตฺติวิหาโร ภควตา ทสฺสิโตติ อาห – ‘‘ตาย รติยา รมมาโนติ อิทํ จตุตฺถชฺฌานิกผลสมาปตฺติรตึ สนฺธาย วุตฺต’’นฺติ. "नीलुप्पलगच्छके कत्वा" (निळ्या कमळांचे गुच्छ करून) म्हणजे उमललेल्या निळ्या कमळांचे गुच्छ किंवा नलिका करून. "गन्धकललं" (गंधकलल) म्हणजे सुगंधी द्रव्यांनी मिश्रित केलेला चिखल (लेप). "यमकभित्ति" (यमकभिंत) म्हणजे दुहेरी भिंत, जिच्या आत नळी असते, ज्यातून पाणी वर चढते. "लोहनाळिं" (लोहनाळी) म्हणजे लोखंडाची यंत्राची नळी. "जालं" (जाळी) म्हणजे तांब्याची किंवा लोखंडाची जाळी. "हेट्ठा यन्तं परिवर्तेंति" (खाली यंत्र फिरवतात) म्हणजे खालच्या भागात जल-यंत्र चालवतात. "उदकफुसिते तेमेन्ते विवण्णता माहोसि" (पाण्याच्या थेंबांनी भिजल्यामुळे विवर्णता/रंग खराब होऊ नये म्हणून) निळा पडदा लावतात. "दिवाकाले" (दिवसाच्या वेळी) म्हणजे दिवसाच्या वेळेत. "अज्झत्तं वूपसन्तचित्तो विहरामि" (अध्यात्मिकदृष्ट्या शांत चित्त होऊन विहरतो) याद्वारे भगवंतांनी स्वतःचा फलसमापत्तीचा विहार दर्शवला आहे, म्हणूनच म्हटले आहे - "ताय रतिया रममानो" (त्या रतीमध्ये रममाण होऊन) हे चौथ्या ध्यानाच्या फलसमापत्तीच्या रतीला (आनंदाला) उद्देशून म्हटले आहे. ๒๑๒. มหา จ เนสํ ปปญฺโจติ เนสํ ราชูนํ มหาปปญฺโจ ราชิทฺธิวเสน สพฺพทา สมฺปตฺติวิสโย จ, อนุภวิตุํ น ลภนฺตีติ อธิปฺปาโย. มนฺเต คเวสนฺตา วิจรนฺติ, น โภคสุขํ. คณนา นาม อจฺฉินฺนคณนา, น วิคณคณนา น ปณคณนา. อาวฏฺโฏติ ยถาธิคเต ทิพฺเพ กาเม ปหาย กามเหตุ อาวฏฺโฏ นิวตฺโต ปริวตฺติโต ภเวยฺย. เอวํ มานุสกา กามาติ ยถา โกจิ กุสคฺเคน อุทกํ คเหตฺวา มหาสมุทฺเท อุทกํ มิเนยฺย. ตตฺถ มหาสมุทฺเท อุทกเมว มหนฺตํ วิปุลํ ปณีตญฺจ, เอวํ ทิพฺพานํ กามานํ สมีเป อุปนิธาย มานุสกา กามา อปฺปมตฺตกา โอรมตฺตกา นิหีนา, ทิพฺพาว กามา มหนฺตา วิปุลา อุฬารา ปณีตา. สมธิคยฺหาติ สมฺมา อธิคมนวเสน นิคฺคยฺห ทิพฺพมฺปิ สุขํ หีนํ กตฺวา ติฏฺฐติ. २१२. ‘महा च नेसं प्रपञ्चो’ (त्यांचा मोठा प्रपंच) म्हणजे त्या राजांचा मोठा प्रपंच, जो राजवैभवामुळे नेहमीच संपत्तीचा विषय असतो, परंतु ते त्याचा उपभोग घेऊ शकत नाहीत, असा अभिप्राय आहे. ते मंत्र शोधत फिरतात, भोगांचे सुख नाही. ‘गणना’ म्हणजे अखंड गणना, विस्कळीत गणना किंवा पैशांची गणना नव्हे. ‘आवट्टो’ (आवर्त/परिवर्तन) म्हणजे जसे प्राप्त झालेल्या दिव्य कामांचा (भोगांचा) त्याग करून, कामाच्या (भोगाच्या) हेतूने आवर्तित, निवृत्त किंवा परिवर्तित व्हावे. ‘एवं मानुसका कामा’ (असे मानवी काम/भोग) म्हणजे जसे एखाद्याने कुशाच्या (गवताच्या) टोकाने पाणी घेऊन महासागरातील पाण्याचे मोजमाप करावे. तेथे महासागरातील पाणीच मोठे, विपुल आणि प्रणीत (उत्कृष्ट) असते; त्याचप्रमाणे दिव्य कामांच्या (भोगांच्या) तुलनेत मानवी काम (भोग) हे अत्यंत अल्प, कनिष्ठ आणि हीन आहेत, तर दिव्य काम (भोग) हेच मोठे, विपुल, उदार आणि प्रणीत आहेत. ‘समधिगय्ह’ म्हणजे सम्यक अधिगमनाच्या (प्राप्तीच्या) प्रभावाने दिव्य सुखालाही हीन करून (त्याच्या पलीकडे) राहणे. ๒๑๓. อาโรคฺยเหตุกํ สุขํ อสฺส อตฺถีติ สุขี, ตํ ปนสฺส โรควิคมโตวาติ อาห ‘‘ปฐมํ ทุกฺขิโต ปจฺฉา สุขิโต’’ติ. เสรี นาม อตฺตาธีนวุตฺตีติ อาห ‘‘เสรี เอกโก ภเวยฺยา’’ติ. อตฺตโน วโส [Pg.106] สยํวโส, โส เอตสฺส อตฺถีติ สยํวสี. องฺคารกปลฺลํ วิย กามวตฺถุปริฬาหเหตุโต. ตจฺเฉตฺวาติ ฆฏฺเฏตฺวา, กณฺฑูยิตฺวาติ อตฺโถ. २१३. ज्याला आरोग्यामुळे मिळणारे सुख लाभले आहे तो ‘सुखी’ होय, आणि ते त्याला रोगाचे निवारण झाल्यामुळे मिळते, म्हणूनच म्हटले आहे— ‘प्रथम दुःखित, नंतर सुखी’. ‘सेरी’ (स्वेच्छेने वागणारा) म्हणजे स्वतःच्या अधीन राहून जगणारा, म्हणूनच म्हटले आहे— ‘सेरी एकटाच असावा’. स्वतःचे नियंत्रण म्हणजे स्वयंवश, जो स्वतःच्या नियंत्रणात असतो तो ‘स्वयं वशी’ होय. कामवस्तूंच्या (भोगांच्या) परिदाहाच्या (दाहाच्या) कारणाने ते निखाऱ्यांच्या भांड्यासारखे (अङ्गारकपात्र) असते. ‘तच्छेत्वा’ म्हणजे घासून किंवा खाजवून, असा अर्थ आहे. ๒๑๔. เยน กาโย มธุรกชาโต โหติ, ตํ กิร กุฏฺฐํ ฉวึ วินาเสติ, จมฺมํ ฉิทฺทชาตํ วิย โหติ. เตเนวาห ‘‘อุปหตกายปฺปสาโท’’ติ. ปจฺจลตฺถาติ ปฏิลภิ. อวิชฺชาภิภูตตาย วิโรธิปจฺจยสมาโยเคน ปญฺญินฺทฺริยสฺส อุปหตตฺตา. อายตึ ทุกฺขผลตาย เอตรหิ จ กิเลสทุกฺขพหุลตาย กามานํ ทุกฺขสมฺผสฺสตา, ตทุภยสํยุตฺเตสุ เตสุ จ ตํ อสลฺลกฺขิตฺวา เอกนฺตสุขาภินิเวโส วิปรีตสญฺญาย, น เกวลาย สุขเวทนาย สุขาติ ปวตฺตสญฺญี. २१४. ज्यामुळे शरीर मधुर (खाज सुटणारे) बनते, तो कुष्ठरोग त्वचेचा नाश करतो आणि त्वचा छिद्रे पडल्यासारखी होते. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘उपहतकायप्रसाद’ (शरीराची संवेदनशीलता नष्ट झालेला). ‘पच्चलत्था’ म्हणजे प्राप्त केले. अविद्याभिभूत (अज्ञानाने ग्रासलेले) असल्यामुळे आणि विरोधी प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) संयोगामुळे प्रज्ञेंद्रियाचा नाश झाल्याने असे होते. भविष्यात दुःखद फल देणारे असल्यामुळे आणि वर्तमानात क्लेश-दुःखाची बहुलता असल्यामुळे कामांचा (भोगांचा) स्पर्श हा दुःखदच असतो. या दोन्ही गोष्टींनी युक्त असलेल्या त्या भोगांमध्ये, त्या दुःखाचे भान न ठेवता, विपरीत संज्ञेमुळे (भ्रमित समजुतीमुळे) केवळ सुखाचाच अभिनिवेश (आग्रह) धरला जातो; केवळ सुखद वेदनेमुळेच ‘हे सुख आहे’ अशी संज्ञा (समजूत) प्रवृत्त होते असे नाही. ๒๑๕. ตานีติ กุฏฺฐสรีเร วณมุขานิ. อสุจีนีติ อสุภานิ. ทุคฺคนฺธานีติ วิสฺสคนฺธานิ. ปูตีนีติ กุณปภูตานิ. อิทานีติ เอตรหิ. นเขหิ วิปฺปตจฺฉนอคฺคิปริตาปเนหิ อตินิปฺปีฬนกาเล ปาณกา…เป… ปคฺฆรนฺติ, เตน เวทนา ตนุกา โหติ. เอวนฺติ วุตฺตนเยน เวทนาย ตนุกภาวโต. २१५. ‘तानि’ म्हणजे कुष्ठरोगी शरीरावरील जखमांची तोंडे. ‘असुचीनि’ म्हणजे अशुद्ध/अशुभ. ‘दुग्गन्धानि’ म्हणजे दुर्गंधीयुक्त (कुजलेला वास असणारे). ‘पूतीनि’ म्हणजे सडलेले (शवासारखे). ‘इदानि’ म्हणजे आता (या वेळी). नखांनी ओरबाडताना आणि अग्नीने शेकताना, अतिशय दाबल्याच्या वेळी जंतू... इत्यादी पाझरतात, त्यामुळे वेदना कमी होते. ‘एवं’ म्हणजे सांगितलेल्या पद्धतीने वेदना कमी झाल्यामुळे. อาโรคฺยภาเว ธนลาภาทิลาภุปฺปตฺติโต, อสติ จ อาโรคฺเย ลาภสฺส นิรตฺถกภาวโต, ทิฏฺฐธมฺมิกาทิสพฺพสมฺปตฺตีนํ ลาภสฺส นิมิตฺตภาวโต จ อาโรคฺยปรมา ลาภา. นิพฺพาเน สุขุปฺปตฺติโต, อสติ จ นิพฺพานาธิคเม ตาทิสสฺส สุขสฺส อนุปลพฺภนโต, สพฺพสงฺขตวิวิตฺตตฺตา จ สพฺพโส จ สํสารทุกฺขาภาวโต, อธิคเต จ ตสฺมึ สกลวฏฺฏทุกฺขาภาวโต จ นิพฺพานํ ปรมํ สุขํ. ปุพฺพภาคมคฺคานนฺติ กายานุปสฺสนาทิเภทภินฺนานํ อริยมคฺคสฺส ปุพฺพภาคิยานํ มคฺคานํ. เตสญฺจ อมตคามิตา นาม ตนฺนินฺนตาวเสเนว สจฺฉิกิริยาวเสนาติ อาห ‘‘ปุพฺพภาคคมเนเนว อมตคามิน’’นฺติ. อฏฺฐงฺคิโก อริยมคฺโค เขโม สพฺพปริสฺสยสมุคฺฆาตเนน อนุปทฺทุตตฺตา, ตํสมงฺคีนํ สพฺพโส อนุปทฺทุตตฺตา ตํสมงฺคีนํ สพฺพโส อนุปทฺทวเหตุโต จ. ลทฺธิวเสน คหิตาติ สสฺสตวาทาทีหิ เกวลํ เตสํ ลทฺธิวเสน ตถา คหิตา. เขมอมตคามินนฺติ อิมินา หิ ‘‘เขมํอมตคามิน’’นฺติ วิภตฺติอโลเปน นิทฺเทโส, อตฺโถ ปน วิภตฺติโลเปน ทฏฺฐพฺโพติ ทสฺเสติ. आरोग्य असल्यावरच धनलाभादी लाभांची प्राप्ती होते, आणि आरोग्य नसताना लाभांचे निरर्थकत्व असते, तसेच ऐहिक (दृष्टधार्मिक) इत्यादी सर्व संपत्तीच्या लाभाचे ते कारण असल्याने ‘आरोग्य हा परम लाभ’ आहे. निर्वाणामध्ये सुखाची उत्पत्ती होत असल्याने, आणि निर्वाण प्राप्त न झाल्यास तशा सुखाची अनुपलब्धता असल्याने, तसेच सर्व संस्कृत (संस्कारित) गोष्टींपासून अलिप्त असल्यामुळे आणि सर्व प्रकारे संसारदुःखाचा अभाव असल्याने, आणि ते प्राप्त झाल्यावर संपूर्ण संसारचक्र (वर्त) दुःखाचा अभाव होत असल्याने ‘निर्वाण हे परम सुख’ आहे. ‘पुब्बभागमग्गानं’ म्हणजे कायानुपश्यना इत्यादी भेदांनी युक्त असलेल्या आर्यमार्गाच्या पूर्वभागीय मार्गांचे. आणि त्यांची ‘अमृतगामिता’ म्हणजे त्याकडे झुकलेले असणे आणि साक्षात्काराच्या प्रभावानेच होय, म्हणूनच म्हटले आहे— ‘पूर्वभागाच्या गमनानेच अमृतगामी’. अष्टांगिक आर्यमार्ग हा ‘क्षेम’ (सुरक्षित) आहे कारण सर्व उपद्रवांचे समूळ उच्चाटन केल्यामुळे तो उपद्रवरहित आहे, आणि त्या मार्गाने चालणाऱ्यांना सर्व प्रकारे उपद्रव न होण्याचे ते कारण आहे. ‘लद्धिवसेन गहिता’ म्हणजे शाश्वतवाद इत्यादींच्या केवळ त्यांच्या मतांच्या (सिद्धांतांच्या) प्रभावाने तसे ग्रहण केले गेले आहे. ‘खेमअमतगामिनं’ याने ‘खेमंअमतगामिनं’ अशा विभक्तीचा लोप न करता निर्देश केला आहे, परंतु अर्थ मात्र विभक्तीच्या लोपानेच समजून घ्यावा, असे दर्शविले आहे. ๒๑๖. อโนมชฺชตีติ [Pg.107] อนุ อนุ โอมชฺชติ. อปราปรํ หตฺถํ เหฏฺฐา โอตาเรนฺโต มชฺชติ. २१६. ‘अनोमज्जति’ म्हणजे वारंवार खाली बुडणे. पुन्हा पुन्हा हात खाली नेत बुडणे. ๒๑๗. เฉกนฺติ ฆนภาเวน วีตํ. ฆนมฏฺฐภาเวน สุนฺทรํ โหตีติ อาห ‘‘สมฺปนฺน’’นฺติ. สาธูหิ ปรมปฺปิจฺฉสนฺตุฏฺเฐหิ ลาโต คหิโตติ สาหุฬิ. สงฺการโจฬกํ นิจฺจกาฬกํ. २१७. ‘छेकं’ म्हणजे दाट विणलेले. दाट आणि गुळगुळीत असल्यामुळे ते सुंदर असते, म्हणूनच ‘सम्पन्नं’ (समृद्ध/उत्कृष्ट) असे म्हटले आहे. परम अल्पेच्छ आणि संतुष्ट अशा साधूंनी घेतलेले (स्वीकारलेले) वस्त्र म्हणजे ‘साहुळि’. कचऱ्यातील चिंध्यांचे वस्त्र जे नेहमीच काळे (मळलेले) असते. ๒๑๘. ตตฺถ ตตฺถ รุชนฏฺเฐน วิพาธนฏฺเฐน โรโคว ภูโต. วิปสฺสนาญาเณนปิ สิขาปฺปตฺเตน อาโรคฺยํ เอกเทเสน ปสฺสติ, นิพฺพานญฺจ วฏฺฏปฏิปกฺขโตติ อาห ‘‘วิปสฺสนาญาณญฺเจวา’’ติ. २१८. त्या त्या ठिकाणी वेदना देण्याच्या आणि बाधा पोहचवण्याच्या अर्थाने ते रोगासारखेच झाले आहे. शिखरेला (सर्वोच्चतेला) पोहोचलेल्या विपश्यना ज्ञानाने देखील आरोग्याला एका अंशाने पाहतो, आणि संसारचक्राच्या (वर्त) विरोधी असल्याने निर्वाणाला पाहतो, म्हणूनच ‘विपस्सनाञाणञ्चेव’ (विपश्यना ज्ञानच) असे म्हटले आहे. ๒๑๙. อนฺตราติ ปฐมุปฺปตฺติ ชรามรณานํ เวมชฺเฌ. อุปหโตติ ปิตฺตเสมฺหาทิโทเสหิ ทูสิตภาเวน กถิโต. ปิตฺตาทิโทเส ปน เภสชฺชเสวนาย นิวตฺเตนฺโต อุปหตํ ปฏิปากติกํ กโรนฺโต จกฺขูนิ อุปฺปาเทติ นาม. วินฏฺฐานีติ อนุปฺปตฺติธมฺมตํ อาปนฺนานิ. २१९. ‘अन्तरा’ म्हणजे प्रथम उत्पत्ती आणि जरामरण यांच्या मध्यभागी. ‘उपहतो’ म्हणजे पित्त, कफ इत्यादी दोषांमुळे दूषित झालेला असे म्हटले आहे. औषधोपचाराने पित्त इत्यादी दोषांचे निवारण करून, नष्ट झालेल्या डोळ्यांना पूर्ववत निरोगी करणे म्हणजेच ‘डोळे उत्पन्न करणे’ होय. ‘विनट्ठानि’ म्हणजे पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या धर्माला प्राप्त झालेले. ๒๒๐. ปุพฺเพ วุตฺเต สาหุฬิยจีเร. วฏฺเฏ อนุคตจิตฺเตนาติ อนมตคฺเค สํสารวฏฺเฏ อนาทีนวทสฺสิตาย อนุคามิจิตฺเตน. २२०. पूर्वी सांगितलेल्या ‘साहुळि’ चीवरामध्ये. ‘वट्टे अनुगतचित्तेन’ म्हणजे अनादी-अनंत संसारचक्रात (संसारवर्तात) दोष न पाहिल्यामुळे त्यामागे धावणाऱ्या चित्ताने. ๒๒๑. ธมฺมสฺสาติ นิพฺพานสฺส. อนุธมฺมนฺติ อนุรูปํ นิยฺยานธมฺมํ. เตนาห ‘‘อนุจฺฉวิกํ ปฏิปท’’นฺติ. ปญฺจกฺขนฺเธติ ปญฺจุปาทานกฺขนฺเธ ทสฺเสติ. ‘‘ทีฆรตฺตํ วต, โภ’’ติอาทินา ปาฬิยํ วิวฏฺฏํ ทสฺสิตํ. เตนาห ‘‘อุปาทานนิโรธาติ วิวฏฺฏํ ทสฺเสนฺโต’’ติ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. २२१. ‘धम्मस्स’ म्हणजे निर्वाणाचा. ‘अनुधम्मं’ म्हणजे त्याच्या अनुरूप असलेला मोक्षगामी धर्म (निय्यानधम्म). म्हणूनच म्हटले आहे— ‘अनुरूप प्रतिपदा’ (योग्य आचरण). ‘पञ्चक्खन्धे’ याने पाच उपादानस्कंध दर्शविले आहेत. ‘दीघरत्तं वत, भो’ (खरोखर दीर्घकाळ, हे महाशय!) इत्यादींद्वारे पाळीमध्ये विवर्त (संसारमुक्ती) दर्शविली आहे. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘उपादाननिरोधाने विवर्त (मुक्ती) दर्शविताना’. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. มาคณฺฑิยสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. मागंडिय सुत्ताच्या वर्णनावरील लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๖. สนฺทกสุตฺตวณฺณนา ६. संदक सुत्ताचे वर्णन ๒๒๓. เทเวน วสฺเสน กโต โสพฺโภ เทวกตโสพฺโภ. เตนาห ‘‘วสฺโส…เป… รหโท’’ติ. คุหาติ ปํสุคุหา ปาสาณคุหา มิสฺสกคุหาติ ติสฺโส คุหา. ตตฺถ ปํสุคุหา อุทกมุตฺตฏฺฐาเน อโหสิ นินฺนฏฺฐานํ ปน อุทเกน อชฺโฌตฺถตํ. อุมงฺคํ กตฺวาติ เหฏฺฐา สุทุคฺคํ กตฺวา. อนมตคฺคิยํ [Pg.108] ปจฺจเวกฺขิตฺวาติ ‘‘น โข โส สตฺตาวาโส สุลภรูโป, โย อิมินา ทีเฆน อทฺธุนา อนาวุฏฺฐปุพฺโพ’’ติอาทินา (ม. นิ. ๑.๑๖๐) อิทญฺจ ตฬากํ มยา วุตฺถปุพฺพํ ภวิสฺสติ, ตมฺปิ ฐานํ โส จ อตฺตภาโว อปญฺญตฺติกภาวํ คโตติ เอวํ อนมตคฺคิยํ ปจฺจเวกฺขิตฺวา ตาทิสํ ฐานํ คนฺตุํ วฏฺฏติ. อิมินา นเยน สมุทฺทปพฺพตทสฺสนาทีสุปิ ปจฺจเวกฺขณาวิธิ เวทิตพฺโพ. २२३. पावसाच्या पाण्याने तयार झालेला खड्डा म्हणजे ‘देवकतसोब्भो’ (देवकृत खड्डा). म्हणूनच म्हटले आहे— ‘पाऊस... इत्यादी जलाशय’. ‘गुहा’ म्हणजे मातीची गुहा, दगडाची गुहा आणि मिश्र गुहा अशा तीन गुहा आहेत. त्यापैकी मातीची गुहा पाणी नसलेल्या ठिकाणी होती, परंतु सखल भाग पाण्याने व्यापलेला होता. ‘उमङ्गं कत्वा’ म्हणजे खाली कठीण मार्ग (सुरंग) करून. ‘अनमतग्गियं पच्चवेक्खित्वा’ म्हणजे ‘तो सत्त्वावास (प्राण्यांचे निवासस्थान) सहज मिळण्यासारखा नाही, जो या दीर्घ काळात पूर्वी कधी अनुभवला नसेल’ इत्यादींद्वारे (म. नि. १.१६०) आणि ‘हे तळे देखील मी पूर्वी अनुभवले असेल, ते स्थान आणि तो आत्मभाव (अस्तित्व) आता अप्रकट झाला आहे’ अशा प्रकारे अनादी संसाराचे (अनमतग्गिय) प्रत्यवेक्षण करून तशा ठिकाणी जाणे योग्य आहे. या पद्धतीने समुद्र, पर्वत इत्यादी पाहताना देखील प्रत्यवेक्षणाची (चिंतनाची) पद्धत समजून घ्यावी. อุจฺจํ นทมานายาติ อุจฺจํ กตฺวา สทฺทํ กโรนฺติยา กามสฺสาทภวสฺสาทาทิวตฺถุนฺติ ‘‘อยญฺจ อยญฺจ กาโม อิฏฺโฐ กนฺโต มนาโป, อสุโก ภโว อิฏฺโฐ กนฺโต มนาโป, เอวมยํ โลโก ปิเยหิ ปิยตโร’’ติ เอวํ กามสฺสาทภวสฺสาทโลกสฺสาทาทิสงฺขาตํ วตฺถุํ. ทุคฺคติโต สํสารโต จ นิยฺยาติ เอเตนาติ นิยฺยานํ, สคฺคมคฺโค โมกฺขมคฺโค จ, ตํ นิยฺยานํ อรหติ, นิยฺยาเน วา นิยุตฺตาติ นิยฺยานิกา, นิยฺยานํ วา ผลํ เอติสฺสา อตฺถีติ นิยฺยานิกา, วจีทุจฺจริตาทิสํกิเลสโต นิยฺยาตีติ วา นิยฺยานียา, อี-การสฺส รสฺสตฺตํ ย-การสฺส จ ก-การํ กตฺวา นิยฺยานิกา, เจตนาย สทฺธึ สมฺผปฺปลาปา เวรมณิ. ตปฺปฏิปกฺขโต อนิยฺยานิกา, ตสฺสา ภาโว อนิยฺยานิกตฺตํ, ตสฺมา อนิยฺยานิกตฺตา. ติรจฺฉานภูตาติ ติโรกรณภูตา. เคหสฺสิตกถาติ กามปฏิสํยุตฺตกถา. กมฺมฏฺฐานภาเวติ อนิจฺจตาปฏิสํยุตฺตจตุสจฺจกมฺมฏฺฐานภาเว. สห อตฺเถนาติ สาตฺถกํ, หิตปฏิสํยุตฺตนฺติ อตฺโถ. วิสิขาติ ฆรสนฺนิเวโส, วิสิขาคหเณน จ ตนฺนิวาสิโน คหิตา ‘‘คาโม อาคโต’’ติอาทีสุ (สารตฺถ. ฏี. ๑.อาจริยปรมฺปรกถาวณฺณนา) วิย. เตเนวาห ‘‘สูรา สมตฺถา’’ติ ‘‘สทฺธา ปสนฺนา’’ติ จ. กุมฺภฏฺฐานปฺปเทเสน กุมฺภทาสิโย วุตฺตาติ อาห ‘‘กุมฺภทาสิกถา วา’’ติ. 'उच्चं नदमानाया' म्हणजे उच्च आवाज करून (मोठ्याने ओरडत). काम-आस्वाद, भव-आस्वाद इत्यादींची वस्तू म्हणजे 'हा आणि हा काम (इच्छा/भोग) इष्ट, कांत (प्रिय), मनाजोगा आहे; अमुक भव इष्ट, कांत, मनाजोगा आहे, अशा प्रकारे हा लोक प्रिय गोष्टींमुळे अधिक प्रिय आहे' - अशा प्रकारे काम-आस्वाद, भव-आस्वाद, लोक-आस्वाद इत्यादी म्हणून ओळखली जाणारी वस्तू. ज्याच्याद्वारे दुर्गतीतून आणि संसारातून बाहेर पडता येते ते 'निय्यान' (मुक्तीचा मार्ग) होय, जो स्वर्गमार्ग आणि मोक्षमार्ग आहे. त्या निय्यानास (मुक्तीस) जी योग्य आहे, किंवा निय्यानात (मुक्तीच्या मार्गात) जी प्रवृत्त आहे ती 'निय्यानिका' (मुक्ती देणारी) होय. किंवा जिचे फळ निय्यान (मुक्ती) आहे ती 'निय्यानिका'. किंवा जी वाचेच्या दुश्चरित्रादी संक्लेशांमधून (मळांमधून) बाहेर काढते ती 'निय्यानीया' होय. 'ई' काराचा ऱ्हस्व करून आणि 'य' काराचा 'क' कार करून 'निय्यानिका' असा शब्द बनतो, जो चेतनेसह संफप्पलापापासून (व्यर्थ बडबडीपासून) विरती (विरमणे) दर्शवतो. त्याच्या विरुद्ध असणारी ती 'अनिय्यानिका' (मुक्ती न देणारी), तिचा भाव म्हणजे 'अनिय्यानिकत्व', म्हणून 'अनिय्यानिकत्वामुळे'. 'तिरच्छानभूता' म्हणजे आडकाठी आणणारी (आवरण घालणारी). 'गेहस्सितकथा' (घराशी संबंधित कथा) म्हणजे कामाशी (इंद्रियभोगांशी) संबंधित कथा. 'कम्मट्ठानाचे अस्तित्व' म्हणजे अनित्यतेशी संबंधित चतुःसत्य कम्मट्ठानाचे (कर्मस्थानाचे) अस्तित्व. 'अर्थासह' म्हणजे 'सार्थक', हिताशी संबंधित असा अर्थ आहे. 'विसिखा' म्हणजे घरांची वस्ती (गल्ली/रस्ता), आणि 'विसिखा' या शब्दाच्या ग्रहणाने तेथील रहिवासी अभिप्रेत आहेत, जसे 'गाव आला' इत्यादींमध्ये (सारत्थदीपनी टीका १, आचार्यपरंपराकथावर्णन) म्हटले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे: 'शूर, समर्थ' आणि 'श्रद्धाळू, प्रसन्न'. कुंभस्थान (पाण्याच्या घागरी ठेवण्याची जागा) या निर्देशाने कुंभदासी (पाणी भरणार्या दासी) म्हटल्या आहेत, म्हणून म्हटले आहे 'किंवा कुंभदासीकथा'. ๒๒๘. โวหาโร วิย เตสํ ตถา โวหารมตฺตํ คเหตฺวา วุตฺตํ ‘‘พฺรหฺมจริยวาเส’’ติ. อกตาติ สเมน, วิสเมน วา เกนจิ เหตุนา น กตา น วิหิตา. กตวิโธ กรณวิธิ นตฺถิ เอเตสนฺติ อกฏวิธา. ปททฺวเยนปิ โลเก เกนจิ เหตุปจฺจเยน เนสํ อนิพฺพตฺตตํ ทสฺเสติ. อิทฺธิยาปิ น นิมฺมิตาติ กสฺสจิ อิทฺธิมโต เจโตวสิปฺปตฺตสฺส เทวสฺส, อิสฺสราทิโน วา อิทฺธิยาปิ น นิมฺมิตา. อนิมฺมาตาติ กสฺสจิ อนิมฺมาปิตา. รูปาทิชนกภาวนฺติ รูปสทฺทาทีนํ ปจฺจยภาวํ, รูปาทโยปิ ปถวิยาทีหิ [Pg.109] อปฺปฏิพทฺธวุตฺติกาติ ตสฺส อธิปฺปาโย. ยถา ปพฺพตกูฏํ เกนจิ อนิพฺพตฺติตํ กสฺสจิ จ อนิพฺพตฺตนกํ, เอวเมเตปีติ อาห ‘‘ปพฺพตกูฏา วิย ฐิตาติ กูฏฏฺฐา’’ติ. ยมิทํ พีชโต องฺกุราทิ ชายตีติ วุจฺจติ, ตํ วิชฺชมานเมว ตโต นิกฺขมติ นาวิชฺชมานํ, อญฺญถา อญฺญโตปิ อญฺญสฺส อุปลทฺธิ สิยาติ อธิปฺปาโย. เอวํ ฐิตาติ เอวํ นิพฺพิการา ฐิตา. อุภเยนปีติ อตฺถทฺวเยนปีติ วทนฺติ. ‘‘กูฏฏฺฐา เอสิกฏฺฐายิฏฺฐิตา’’ติ ปททฺวเยนปิ. เตสํ สตฺตนฺนํ กายานํ. ฐิตตฺตาติ นิพฺพิการาภาเวน ฐิตตฺตา. น จลนฺตีติ วิการํ นาปชฺชนฺติ. วิการาภาวโต หิ เตสํ สตฺตนฺนํ กายานํ เอสิกฏฺฐายิฏฺฐิตตา. อนิญฺชนญฺจ อตฺถโต ปกติยา อวฏฺฐานเมวาติ ทสฺเสตุํ ‘‘น วิปริณาเมนฺตี’’ติ วุตฺตํ. ตถา อวิปริณามธมฺมตฺตา เอว เต อญฺญมญฺญํ น พฺยาพาเธนฺติ. สติ หิ วิการํ อาปาเทตพฺพตาย พฺยาพาธกตาปิ สิยา, ตถา อนุคฺคเหตพฺพตาย อนุคฺคาหกตาติ ตทภาวํ ทสฺเสตุํ ปาฬิยํ ‘‘นาล’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. २२८. त्यांच्या व्यवहाराप्रमाणे, केवळ व्यवहार म्हणून घेऊन 'ब्रह्मचर्यवासात' असे म्हटले आहे. 'अकता' (न केलेली) म्हणजे सम किंवा विषम अशा कोणत्याही कारणाने न केलेली, न निर्माण केलेली. ज्यांच्यामध्ये निर्मितीची कोणतीही क्रिया किंवा पद्धत नाही ते 'अकटविधा' (अकृत-विधा). या दोन्ही पदांद्वारे जगात कोणत्याही हेतू-प्रत्ययाने (कारणाने) त्यांची अनुत्पत्ती (उत्पन्न न होणे) दर्शविली आहे. 'ऋद्धीनेही न निर्मिलेली' म्हणजे कोणत्याही ऋद्धिवान, चित्तावर ताबा मिळवलेल्या देवाच्या किंवा ईश्वरादींच्या ऋद्धीनेही न निर्मिलेली. 'अनिम्माता' म्हणजे कोणाकडूनही न निर्माण करविलेली. 'रूपादींचा जनकभाव' म्हणजे रूप, शब्द इत्यादींचा प्रत्ययभाव (कारणभाव); रूप इत्यादी देखील पृथ्वी इत्यादींवर अवलंबून नसलेले आहेत, असा त्याचा अभिप्राय आहे. ज्याप्रमाणे पर्वताचे शिखर कोणाकडूनही उत्पन्न केलेले नसते आणि कोणासाठीही उत्पन्न होणारे नसते, त्याचप्रमाणे हे देखील आहेत, म्हणून म्हटले आहे: 'पर्वतशिखराप्रमाणे स्थिर आहेत म्हणून कूटट्ठा (कूटस्थ)'. 'बीजापासून अंकुर इत्यादी उत्पन्न होतात' असे जे म्हटले जाते, ते आधीच अस्तित्वात असलेलेच त्यातून बाहेर पडते, जे अस्तित्वात नाही ते नाही; अन्यथा कोणत्याही गोष्टीपासून कोणत्याही गोष्टीची प्राप्ती झाली असती, असा अभिप्राय आहे. 'अशा प्रकारे स्थित' म्हणजे अशा प्रकारे निर्विकारपणे स्थित. 'दोन्हींनीही' म्हणजे दोन्ही अर्थांनीही, असे म्हणतात. 'कूटट्ठा एसिकट्ठाायिट्ठिता' (कूटस्थ आणि इंद्रखिळासारखे स्थिर) या दोन्ही पदांद्वारेही. त्या सात कायांचे (समूहांचे). 'स्थित असल्यामुळे' म्हणजे निर्विकार भावाने स्थित असल्यामुळे. 'हलत नाहीत' म्हणजे त्यांच्यात कोणताही विकार (बदल) होत नाही. कारण विकाराच्या अभावामुळेच त्या सात कायांची इंद्रखिळासारखी स्थिरता असते. आणि 'अकंपता' म्हणजे अर्थतः स्वभावाने स्थिर राहणेच होय, हे दर्शवण्यासाठी 'त्यांचे परिवर्तन होत नाही' असे म्हटले आहे. तसेच, अपरिवर्तनशील स्वभावाचे असल्यामुळेच ते एकमेकांना बाधा (पीडा) पोहचवत नाहीत. कारण जर विकार उत्पन्न करण्याची शक्यता असती, तर बाधकताही असती; तसेच जर उपकार करण्याची शक्यता असती, तर उपकारकताही असती; म्हणून त्यांचा अभाव दर्शवण्यासाठी पाळीमध्ये 'नालं' (समर्थ नाही) इत्यादी म्हटले आहे. ปถวี เอว กาเยกเทสตฺตา ปถวีกาโย. หนฺตุํ วา ฆาเตตุํ วา สมตฺโถ นาม นตฺถิ ชีวสตฺตมานํ กายานํ นิจฺจตาย นิพฺพิการภาวโต, เอเตเนว เนสมหนฺตพฺพตา อฆาเตตพฺพตา อตฺถโต วุตฺตาเยวาติ ทฏฺฐพฺพา. ตถา หิ วุตฺตํ ‘‘สตฺตนฺนํตฺเวว กายาน’’นฺติอาทิ. โสตุํ วา สาเวตุํ วา สมตฺโถ นาม นตฺถีติ ปจฺเจกํ เนสํ สวเนสุ อสมตฺถตฺตา ตเทกเทสาทีสุปิ อสมตฺถตํ ทีเปติ. ยทิ โกจิ หนฺตา นตฺถิ, กถํ สตฺถปฺปหาโรติ อาห ‘‘ยถา มุคฺคราสิอาทีสู’’ติอาทิ. เกวลํ สญฺญามตฺตเมว โหติ, หนนฆาตนาทิ ปน ปรมตฺถโต นตฺเถว กายานํ อวิโกปนียภาวโตติ อธิปฺปาโย. เกวลํ ตกฺกมตฺเตน นิรตฺถกํ ทิฏฺฐึ ทีเปตีติ เอเตน ยสฺมา ตกฺกิกา นิรงฺกุสตาย ปริกปฺปนสฺส ยํ กิญฺจิ อตฺตนา ปริกปฺปิตํ สารโต มญฺญมานา ตเถว อภินิวิสฺส ตกฺกทิฏฺฐิคฺคาหํ คณฺหนฺติ, ตสฺมา น เตสํ ทิฏฺฐิวตฺถุสฺมึ วิญฺญูหิ วิจารณา กตฺตพฺพาติ ทสฺเสติ. เกจีติ สารสมาสาจริยา. ปญฺจินฺทฺริยวเสนาติ ปญฺจรูปินฺทฺริยวเสน. กมฺมนฺติ ลทฺธิ กมฺมภาเวน สุปากฏตฺตา. อวงฺกกถาตารณาทิกา ทฺวาสฏฺฐิ ปฏิปทา. เอกสฺมึ กปฺเปติ เอกสฺมึ มหากปฺเป. पृथ्वी हाच कायेचा (समूहाचा) एक भाग असल्यामुळे ती 'पृथ्वीकाय' होय. मारण्यास किंवा मारविण्यास कोणीही समर्थ नाही, कारण जीव आणि सत्त्व मानल्या जाणार्या कायांच्या नित्यतेमुळे आणि निर्विकारत्वामुळे; यावरूनच त्यांचे न मारले जाणे आणि न मारविणे अर्थतः सांगितलेच आहे, असे समजावे. कारण तसेच म्हटले आहे: 'सात कायांच्याच...' इत्यादी. ऐकण्यास किंवा ऐकविण्यास कोणीही समर्थ नाही, कारण त्यांच्यापैकी प्रत्येकाचे ऐकण्यामध्ये असमर्थत्व असल्यामुळे त्यांच्या एका भागादींमध्येही असमर्थता दर्शविली जाते. जर कोणी मारणारा नाही, तर शस्त्राचा प्रहार कसा होतो? यावर म्हटले आहे: 'जसे मुगाच्या राशीत इत्यादी...' केवळ संज्ञामात्र (भास) होते, परंतु मारणे-मारविणे इत्यादी परमार्थतः नाहीच, कारण कायांचा अविकोपनीय स्वभाव (अपरिवर्तनीयता) आहे, असा अभिप्राय आहे. केवळ तर्काच्या जोरावर निरर्थक दृष्टी (मत) दर्शवितात; यावरून, ज्याअर्थी तार्किक लोक निरंकुश कल्पनेने स्वतः कल्पिलेल्या कोणत्याही गोष्टीला सारभूत मानून त्यातच अभिनिवेश (आग्रह) धरतात आणि तार्किक दृष्टीचा स्वीकार करतात, त्याअर्थी सुज्ञांनी त्यांच्या दृष्टीच्या विषयावर विचार करू नये, हे दर्शविले आहे. 'केची' (काही) म्हणजे सारसमासाचे आचार्य. 'पाच इंद्रियांच्या वशाने' म्हणजे पाच रूपी इंद्रियांच्या वशाने. 'कर्म' म्हणजे मत, जे कर्मभावाने सुस्पष्ट असल्यामुळे. अवंककथा (सरळ कथा), तारण इत्यादी बासष्ट प्रतिपदा (मार्ग). 'एका कल्पामध्ये' म्हणजे एका महाकल्पामध्ये. ปุริสภูมิโยติ [Pg.110] ปธานปุคฺคเลน นิทฺเทโส, อิตฺถีนมฺเปตา ภูมิโย อิจฺฉนฺเตว. ภิกฺขุ จ ปนฺนโกติอาทิ เตสํ ปาฬิเยว. ตตฺถ ปนฺนโกติ ภิกฺขาย วิจรณโกติ วทนฺติ, เตสํ วา ปฏิปตฺตึ ปฏิปนฺนโก. ชิโนติ ชิณฺโณ, ชราวเสน นิหีนธาตุโกติ วทนฺติ, อตฺตโน วา ปฏิปตฺติยา ปฏิปกฺขํ ชินิตฺวา ฐิโต. โส กิร ตถาภูโต กสฺสจิปิ ธมฺมํ น กเถติ, เตนาห ‘‘น กิญฺจิ อาหา’’ติ. อลาภินฺติ ‘‘โส น กุมฺภิมุขา ปฏิคฺคณฺหตี’’ติอาทินา (ที. นิ. ๑.๓๙๔) นเยน วุตฺตอลาภเหตุสมาโยเคน อลาภึ. ตโต เอว ชิฆจฺฉาทุพฺพลปเรตตาย สยนปรายณํ สมณํ ปนฺนภูมีติ วทติ. 'पुरिसभूमियो' (पुरुषभूमी) हा प्रधान पुद्गलाच्या (व्यक्तीच्या) आधारे केलेला निर्देश आहे, स्त्रियांसाठीही या भूमी इच्छिलेल्याच आहेत. 'भिक्खू च पन्नको' (भिक्खू आणि पन्नक) इत्यादी त्यांची पाळीच (मूळ पाठ) आहे. तेथे 'पन्नक' म्हणजे भिक्षेसाठी फिरणारा असे म्हणतात, किंवा त्यांच्या प्रतिपदेचे (आचरणाचे) पालन करणारा. 'जिन' म्हणजे जीर्ण, जरेमुळे (वृद्धत्वामुळे) क्षीण धातू असलेला असे म्हणतात, किंवा स्वतःच्या प्रतिपदेने (साधनेने) प्रतिपक्षाला (शत्रूला/विकारांना) जिंकून राहिलेला. तो खरोखर तसा झालेला कोणालाही धम्म सांगत नाही, म्हणूनच म्हटले आहे: 'काहीही बोलला नाही'. 'अलाभी' (काहीही न मिळवणारा) म्हणजे 'तो घागरीच्या तोंडातून स्वीकारत नाही' इत्यादी (दीघनिकाय १.३९४) पद्धतीने सांगितलेल्या अलाभाच्या कारणांच्या संयोगाने अलाभी असलेला. म्हणूनच, भुकेने आणि दुर्बलतेने ग्रस्त होऊन शयनपरायण (झोपून राहिलेल्या) श्रमणाला 'पन्नभूमी' असे म्हणतात. อาชีววุตฺติสตานีติ สตฺตานํ อาชีวภูตานิ ชีวิกาวุตฺติสตานิ. ปสุคฺคหเณน เอฬกชาติ คหิตา, มิคคฺคหเณน รุรุควยาทิสพฺพมิคชาติ. พหู เทวาติ จาตุมหาราชิกาทิพฺรหฺมกายิกาทิวเสน เนสํ อนฺตรเภทวเสน พหู เทวา. ตตฺถ จาตุมหาราชิกานํ เอกจฺโจ อนฺตรเภโท ‘‘มหาสมยสุตฺเตน’’ (ที. นิ. ๒.๓๓๑ อาทโย) ทีเปตพฺโพ. มานุสาปิ อนนฺตาติ ทีปเทสกุลวํสาชีวาทิวิภาควเสน มานุสาปิ อนนฺตเภทา. ปิสาจา เอว เปสาจา, เต อปรเปตาทโย มหนฺตา เวทิตพฺพา. 'आजीववृत्तिशतानि' म्हणजे प्राण्यांच्या उपजीविकेची शेकडो साधने (जीविकावृत्ती). 'पशू' या शब्दाच्या ग्रहणाने मेंढ्यांची जात घेतली आहे, 'मृग' या शब्दाच्या ग्रहणाने रुरु, गवय इत्यादी सर्व मृगजाती (हरणांच्या जाती) घेतल्या आहेत. 'बहू देवा' (अनेक देव) म्हणजे चातुर्महाराजिक, ब्रह्मकायिक इत्यादींच्या अंतर्गत भेदांमुळे अनेक देव. तेथे चातुर्महाराजिकांचा काही अंतर्गत भेद 'महासमय सुत्ताद्वारे' (दीघनिकाय २.३३१ इत्यादी) स्पष्ट केला पाहिजे. 'मानुसापि अनंता' (मानवही अनंत आहेत) म्हणजे द्वीप, देश, कुल, वंश, आजीविका इत्यादींच्या विभागांमुळे मानवांचेही अनंत भेद आहेत. पिशाच हेच 'पेसाच' होत, ते इतर प्रेत इत्यादी मोठे (योनीचे) समजावेत. ฉทฺทนฺตทหมนฺทากินิโย กุฬีรมุจลินฺทนาเมน วทติ. คณฺฐิกาติ ปพฺพคณฺฐิกา. ปณฺฑิโตปิ…เป… อุทฺธํ น คจฺฉติ, กสฺมา? สตฺตานํ สํสรณกาลสฺส นิยตภาวโต. छद्दन्तदह (छद्दन्त सरोवर) आणि मंदाकिनी यांना 'कुळीर' व 'मुचलिंद' या नावाने म्हणतात. 'गंठिका' म्हणजे पर्वताची गाठ (पर्वतग्रंथी). पंडित सुद्धा... पे... वर जात नाही, कशामुळे? प्राण्यांच्या संसरणकाळाच्या (संसारात भटकण्याच्या काळाच्या) नियतभावामुळे (निश्चिततेमुळे). อปริปกฺกํ สํสรณนิมิตฺตํ สีลาทินา ปริปาเจติ นาม สีฆํเยว วิสุทฺธิปฺปตฺติยา. ปริปกฺกํ ผุสฺส ผุสฺส ปตฺวา ปตฺวา ปริปกฺกภาวาปาทเนน พฺยนฺตึ กโรติ นาม. สุตฺตคุเฬติ สุตฺตวฏฺฏิยํ. นิพฺเพฐิยมานเมว ปเลตีติ อุปมาย สตฺตานํ สํสาโร อนุกฺกเมน ขียเตว, น ตสฺส วทฺธีติ ทสฺเสติ ปริจฺฉินฺนรูปตฺตา. अपरिपक्व अशा संसरणनिमित्ताला (संसाराच्या कारणाला) शीलादींच्या द्वारे शीघ्रच विशुद्धी प्राप्त करण्यासाठी परिपक्व करतो. परिपक्व झालेल्याला स्पर्श करून करून, प्राप्त करून करून, परिपक्व भावाला प्राप्त करून देण्याद्वारे नष्ट करतो. 'सुत्तगुळ' म्हणजे सुताची गुंडी (सुत्तवट्टियं). 'उकलत असतानाच ती संपून जाते' या उपमेने प्राण्यांचा संसार अनुक्रमाने क्षीणच होत जातो, त्याची वृद्धी होत नाही, हे त्याच्या परिच्छिन्न रूपामुळे (मर्यादित स्वरूपामुळे) दर्शविले आहे. ๒๒๙. นิยติวาเท ปกฺขิปนฺโตติ สพฺพญฺญุตํ ปฏิชานิตฺวาปิ ปเทสญฺญุตาย อสมฺปายมาโน ตตฺถ อตฺตโน อญฺญาณกิริยํ ปริหริตุํ อสกฺโกนฺโต จ ‘‘เอวเมสา นิยตี’’ติ นิยติวาเท ปกฺขิปนฺโต. २२९. 'नियतीवादात ढकलणारा' म्हणजे सर्वज्ञतेची प्रतिज्ञा करूनही, प्रादेशिक ज्ञानाने (अल्प ज्ञानाने) अपूर्ण राहिल्यामुळे आणि तेथे स्वतःच्या अज्ञानाची क्रिया लपविण्यास असमर्थ ठरल्यामुळे, 'अशीच ही नियती आहे' असे सांगून नियतीवादात ढकलणारा होय. ๒๓๐. ธมฺมกถาย [Pg.111] อปสฺสยภูโต อนุสฺสโว เอตสฺส อตฺถีติ อนุสฺสวี, เตเนวสฺส อปสฺสยวาทํ ทสฺเสตุํ ‘‘อนุสฺสวนิสฺสิโต’’ติ อาห. สวนํ สจฺจโตติ ยํ กิญฺจิ อนุสฺสวํ, ตํ สวนํ สจฺจนฺติ คเหตฺวา ฐิโต. ปิฏกสมฺปทายาติ คนฺถสมฺปาทเนน, ตาทิสํ คนฺถํ ปคุณํ วาจุคฺคตํ กตฺวา ตํ นิสฺสาย ธมฺมํ กเถติ. เตนาห ‘‘วคฺคปณฺณาสกายา’’ติอาทิ. २३०. धम्मकथेसाठी आधारभूत असणारी श्रुती (अनुस्सव) ज्याच्याकडे आहे तो 'अनुस्सवी' (श्रुतीवर अवलंबून असणारा) होय. म्हणूनच त्याचा आधारवाद दर्शविण्यासाठी 'अनुस्सव-निश्रित' (श्रुतीवर आश्रित) असे म्हटले आहे. 'ऐकलेले सत्य मानून' म्हणजे जे काही ऐकले आहे (अनुस्सव), ते ऐकलेलेच सत्य आहे असे गृहीत धरून राहिलेला. 'पिटक-संपदेने' म्हणजे ग्रंथांच्या संपादनाने; तशा ग्रंथाचा सराव करून, तो मुखोद्गत करून, त्याचा आश्रय घेऊन धम्म उपदेश करतो. म्हणूनच 'वग्गपण्णासक' इत्यादी म्हटले आहे. ๒๓๒. มนฺทปญฺโญติ ปริตฺตปญฺโญ. โมมูโหติ สมฺมุยฺหโก. ‘‘เอวนฺติปิ เม โน’’ติอาทินา วิวิโธ นานปฺปกาโร เขโป วาจาย ปรวาทานํ ขีปนํ วาจาวิกฺเขโป, ตํ วาจาวิกฺเขปํ, น มรติ น ปจฺฉิชฺชติ ยถาวุตฺโต วาทวิกฺเขโป เอตายาติ อมรา, ตตฺถ ปวตฺตา ทิฏฺฐิ อมราวิกฺเขโป, ตํ อมราวิกฺเขปํ. อปริยนฺตวิกฺเขปนฺติ ‘‘เอวมฺปิ เม โน’’ติอาทินา ปุจฺฉิตสฺส อปริโยสาปนวเสน วิกฺเขปํ. อิโต จิโต จ สนฺธาวติ เอกสฺมึ สภาเว อนวฏฺฐานโต. คาหํ น อุปคจฺฉตีติ มิจฺฉาคาหตาย อุตฺตรวิธานาย ปุริมปกฺขํ ฐเปตฺวา คาหํ น อุปคจฺฉติ. อมราสทิสาย อมราย วิกฺเขโปติ อมราวิกฺเขโป. २३२. 'मंदपण्ञो' म्हणजे अल्प बुद्धीचा. 'मोमूहो' म्हणजे अत्यंत संभ्रमित असलेला. 'माझ्या मते असेही नाही' इत्यादी प्रकारे विविध प्रकारचा वाणीचा विक्षेप, परवाद्यांच्या मतांचे खंडन करणे म्हणजे 'वाचाविक्षेप' होय, त्या वाचाविक्षेपाला; जो पूर्वोक्त वादविक्षेप मरत नाही किंवा खंडित होत नाही ती 'अमरा' (अमर) होय, आणि त्यात प्रवृत्त झालेली दृष्टी म्हणजे 'अमराविक्षेप' होय, त्या अमराविक्षेपाला. 'अपरियंतविक्षेप' म्हणजे 'माझ्या मते असेही नाही' इत्यादी प्रकारे विचारलेल्या प्रश्नाचा शेवट न करण्याच्या स्वरूपातील विक्षेप होय. एकाच स्वभावात स्थिर न राहिल्यामुळे तो इकडेतिकडे धावतो. 'ग्रहणाला प्राप्त होत नाही' म्हणजे मिथ्या ग्रहामुळे (चुकीच्या धारणेमुळे) पुढील उत्तरासाठी पूर्वपक्षाला ठेवून तो कोणत्याही एका मताचा स्वीकार करत नाही. अमर माशासारख्या चंचल असणाऱ्या विक्षेपाला 'अमराविक्षेप' म्हणतात. อิทํ กุสลนฺติ เอตฺถ อิติ-สทฺโท ปการตฺโถ, อิมินา ปกาเรนาติ อตฺโถ. อมราวิกฺเขปิโก ยถา กุสเล, เอวํ อญฺญสฺมึ ยํ กิญฺจิ เกนจิ ปุจฺฉิตํ อตฺถํ อตฺตโน อรุจฺจนตาย ‘‘เอวนฺติปิ เม โน’’ติอาทินา ตตฺถ ตตฺถ วิกฺเขปญฺเญว อาปชฺชติ, ตสฺมา ‘‘เอวนฺติปิ เม โน’’ติอาทิ ตตฺถ ตตฺถ ปุจฺฉิตาการปฏิเสธนวเสน วิกฺขิปนาการทสฺสนํ. นนุ เจตฺถ วิกฺเขปวาทิโน วิกฺเขปปกฺขสฺส อนนุชานนํ วิกฺเขปปกฺเข อวฏฺฐานํ ยุตฺตนฺติ? น, ตตฺถาปิ ตสฺส สมฺมูฬฺหสฺส ปฏิกฺเขปวเสเนว วิกฺเขปวาทสฺส ปวตฺตนโต. เตน วุตฺตํ ‘‘โน’’ติ. ตถา หิ สญฺจโย เพลฏฺฐปุตฺโต รญฺญา อชาตสตฺตุนา สนฺทิฏฺฐิกํ สามญฺญผลํ ปุฏฺโฐ ปรโลกตฺติกาทีนํ ปฏิเสธนมุเขน วิกฺเขปํ พฺยากาสิ. 'हे कुशल आहे' यामध्ये 'इति' हा शब्द प्रकार दर्शवणारा आहे, 'या प्रकारे' असा याचा अर्थ आहे. अमराविक्षेपवादी ज्याप्रमाणे कुशलाच्या बाबतीत, त्याचप्रमाणे इतर कोणत्याही विषयावर विचारलेल्या प्रश्नावर स्वतःच्या नापसंतीमुळे 'माझ्या मते असेही नाही' इत्यादी प्रकारे ठिकठिकाणी विक्षेपच (टाळाटाळ) करतो. म्हणून 'माझ्या मते असेही नाही' इत्यादी ठिकठिकाणी विचारलेल्या प्रश्नांच्या आकाराचा निषेध करण्याच्या स्वरूपात विक्षेपाचा प्रकार दर्शविला आहे. पण मग येथे विक्षेपवाद्याने विक्षेपपक्षाचा स्वीकार न करणे आणि विक्षेपपक्षातच स्थिर राहणे योग्य नाही का? नाही, कारण तेथेही त्या संभ्रमित व्यक्तीचा निषेध करण्याच्या स्वरूपातच विक्षेपवाद प्रवृत्त होतो. म्हणूनच 'नाही' (नो) असे म्हटले आहे. तसेच, संजय बेलट्ठिपुत्त याला राजा अजातशत्रूने प्रत्यक्ष दिसणाऱ्या श्रमणफळाविषयी विचारले असता, त्याने परलोक इत्यादींच्या निषेधाद्वारे विक्षेप (टाळाटाळ) व्यक्त केला होता. เอตฺถาห – ‘‘นนุ จายํ สพฺโพปิ อมราวิกฺเขปิโก กุสลาทโย ธมฺเม ปรโลกตฺติกาทีนิ จ ยถาภูตํ อนวพุชฺฌมาโน ตตฺถ ตตฺถ ปญฺหํ ปุฏฺโฐ สมาโน ปุจฺฉาย วิกฺเขปมตฺตํ อาปชฺชติ, ตสฺส กถํ ทิฏฺฐิคตภาโว. น หิ อวตฺตุกามสฺส วิย ปุจฺฉิตมตฺถํ อชานนฺตสฺส วิกฺเขปกรณมตฺเตน [Pg.112] ตสฺส ทิฏฺฐิคติกตา ยุตฺตา’’ติ? วุจฺจเต – น เหว โข ปุจฺฉาย วิกฺเขปกรณมตฺเตน ตสฺส ทิฏฺฐิคติกตา, อถ โข มิจฺฉาภินิเวสวเสน. สสฺสตาภินิเวเสน มิจฺฉาภินิวิฏฺโฐเยว หิ ปุคฺคโล มนฺทพุทฺธิตาย กุสลาทิธมฺเม ปรโลกตฺติกาทีนิ จ ยาถาวโต อปฺปฏิปชฺชมาโน อตฺตนา อวิญฺญาตสฺส อตฺถสฺส ปรํ วิญฺญาเปตุํ อสกฺกุเณยฺยตาย มุสาวาทภเยน จ วิกฺเขปํ อาปชฺชตีติ. อถ วา ปุญฺญปาปานํ ตพฺพิปากานญฺจ อนวโพเธน อสทฺทหเนน จ ตพฺพิสยาย ปุจฺฉาย วิกฺเขปกรณํเยว สุนฺทรนฺติ ขนฺตึ รุจึ อุปฺปาเทตฺวา อภินิวิสนฺตสฺส อุปฺปนฺนา วิสุํเยว สา เอกา ทิฏฺฐิ สตฺตภงฺคทิฏฺฐิ วิยาติ ทฏฺฐพฺพา, อินฺทฺริยพทฺธโต จ ตติยฏฺฐานภาเว ทสฺสิโต. येथे विचारले आहे – 'हा सर्वच अमराविक्षेपवादी कुशल इत्यादी धर्म आणि परलोक इत्यादी गोष्टी यथार्थपणे न जाणता, ठिकठिकाणी प्रश्न विचारला असता केवळ प्रश्नाची टाळाटाळ (विक्षेप) करतो, तर त्याचा दृष्टीगतभाव (चुकीचा दृष्टिकोन असणे) कसा असू शकतो? कारण ज्याला बोलायचे नाही अशा व्यक्तीप्रमाणे, विचारलेला अर्थ न समजल्यामुळे केवळ विक्षेप (टाळाटाळ) केल्याने त्याला दृष्टीगतिक (चुकीच्या दृष्टिकोनाचा धारक) मानणे योग्य नाही.' यावर उत्तर दिले जाते – केवळ प्रश्नाची टाळाटाळ केल्यानेच तो दृष्टीगतिक होत नाही, तर मिथ्या अभिनिवेशामुळे (चुकीच्या आग्रहामुळे) होतो. शाश्वत अभिनिवेशाने मिथ्या अभिनिविष्ट झालेलाच मनुष्य मंदबुद्धीमुळे कुशल इत्यादी धर्म आणि परलोक इत्यादी गोष्टी यथार्थपणे प्राप्त न करू शकल्याने, स्वतःला माहीत नसलेला अर्थ दुसऱ्याला समजावून सांगण्यास असमर्थ असल्यामुळे आणि असत्य बोलण्याच्या (मुसावादाच्या) भयाने विक्षेप (टाळाटाळ) करतो. किंवा पुण्य-पाप आणि त्यांच्या विपाकांचे (परिणामांचे) ज्ञान नसल्यामुळे व त्यावर श्रद्धा नसल्यामुळे, त्याविषयीच्या प्रश्नावर विक्षेप करणेच योग्य आहे, अशी आवड व संमती निर्माण करून अभिनिवेश करणाऱ्या व्यक्तीमध्ये उत्पन्न झालेली ती एक स्वतंत्र दृष्टी 'सप्तभंगी दृष्टी' प्रमाणे मानली पाहिजे, आणि इंद्रियबद्धतेमुळे ती तिसऱ्या स्थानावर दर्शविली आहे. ๒๓๔. สนฺนิธิการกํ กาเมติ เอตฺถ อนินฺทฺริยพทฺธานิ อธิปฺเปตานีติ ติลตณฺฑุลาทิคฺคหณํ, ตสฺส โลกสฺส อปฺปสาทปริหารตฺถํ กทาจิ ตณฺฑุลนาฬิอาทิสงฺคหณกรณํ สนฺธาย วุตฺตํ ‘‘ติลตณฺฑุลาทโย ปญฺญายนฺตี’’ติ. २३४. 'साठवणूक करण्याची इच्छा करतो' यामध्ये इंद्रियबद्ध नसलेल्या (अचेतन) गोष्टी अभिप्रेत आहेत, जसे की तीळ, तांदूळ इत्यादींचे ग्रहण करणे. लोकांमध्ये अप्रसन्नता टाळण्यासाठी कधीतरी तांदळाची नाळी (माप) इत्यादींचा संग्रह करणे याला संधान करून 'तीळ, तांदूळ इत्यादी दिसून येतात' असे म्हटले आहे. ๒๓๖. อาชีวกา มตา นามาติ อิเม อาชีวกา สพฺพโส สมฺมาปฏิปตฺติรหิตา มิจฺฉา เอว จ ปฏิปชฺชมานา อธิสีลสงฺขาตสฺส สีลชีวิตสฺส อภาเวน มตา นาม. ปุตฺตมตาติ มตปุตฺตา. สมเณ โคตเม พฺรหฺมจริยวาโส อตฺถีติ สมณํ เอว โคตมํ ปริสุทฺโธ สุปริปุณฺโณ ตกฺกรสฺส สมฺมา ทุกฺขกฺขยาวโห พฺรหฺมจริยวาโส อตฺถิ. เอเตเนตฺถ ธมฺมสุธมฺมตาทิทีปเนน พุทฺธสุพุทฺธตญฺจ ทีเปติ, อญฺญตฺถ นตฺถีติ อิมินา พาหิรเกสุ ตสฺส อภาวํ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. २३६. 'आजीवक मृतप्राय आहेत' म्हणजे हे आजीवक सर्व प्रकारे सम्यक प्रतिपत्तीने (योग्य आचरणाने) रहित असून केवळ मिथ्या आचरण करत असल्यामुळे, अधिशील नावाच्या शीलमय जीवनाच्या अभावामुळे मृतप्रायच आहेत. 'पुत्तमता' म्हणजे मृत पुत्र. 'श्रमण गोतमांच्या ठिकाणी ब्रह्मचर्यवास आहे' म्हणजे श्रमण गोतमांच्या ठिकाणीच अत्यंत शुद्ध, परिपूर्ण आणि दुःखाचा सम्यक क्षय करणारा ब्रह्मचर्यवास आहे. याद्वारे येथे धम्माची सुधम्मता इत्यादी प्रकाशित करून बुद्धांची सुबुद्धता प्रकाशित केली आहे, 'इतरत्र नाही' याने बाह्य पंथांमध्ये त्याचा अभाव दर्शविला आहे. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. สนฺทกสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. संदकसुत्ताच्या वर्णनाची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๗. มหาสกุลุทายิสุตฺตวณฺณนา ७. महासकुलुदायिसुत्त-वर्णन ๒๓๗. อภิญฺญาตาติ เอทิโส เอทิโส จาติ อภิลกฺขณวเสน ญาตา. อปฺปสทฺทสฺส วินีโต, อปฺปสทฺทตาย มนฺทภาณิตาย วินีโตติ จ อปฺปสทฺทวินีโตติ วุจฺจมาเน อญฺเญน วินีตภาโว ทีปิโต โหติ, ภควา ปน สยมฺภุญาเณน สยเมว วินีโต. ตสฺมา ปาฬิยํ ‘‘อปฺปสทฺทวินีโต’’ติ น วุตฺตํ. เตนาห ‘‘น หิ ภควา อญฺเญน วินีโต’’ติ. २३७. 'अभिज्ञाता' (प्रसिद्ध) म्हणजे अशा अशा लक्षणांच्या द्वारे ओळखले गेलेले. 'अल्प शब्दाने विनीत' किंवा अल्प शब्द असण्याने व मंद बोलण्याने विनीत असण्याला 'अप्पसद्दविनीतो' (अल्पशब्दविनीत) असे म्हटले असता, दुसऱ्या कोणाकडून विनीत केले गेल्याचा भाव दर्शविला जातो; परंतु भगवान तर स्वयंभू ज्ञानाने स्वतःच विनीत झालेले आहेत. म्हणूनच पाळीमध्ये 'अप्पसद्दविनीतो' असे म्हटले नाही. म्हणूनच म्हटले आहे – 'भगवान दुसऱ्या कोणाकडून विनीत झालेले नाहीत'. ๒๓๘. หิยฺโยทิวสํ [Pg.113] อุปาทาย ตโต อาสนฺนานิ กติปยานิ ทิวสานิ ปุริมานิ นาม โหนฺติ, ปุริมานีติ จ ปุพฺพกานิ, อตีตานีติ อตฺโถ. ตโต ปรนฺติ ยถา วุตฺตอตีตทิวสโต อนนฺตรํ ปรํ ปุริมตรํ อติสเยน ปุริมตฺตา. อิติ อิเมสุ ทฺวีสุ ปวตฺติโต ยถากฺกมํ ปุริมปุริมตรภาโว, เอวํ สนฺเตปิ ยเทตฺถ ‘‘ปุริมตร’’นฺติ วุตฺตํ, ตโต ปภุติ ยํ ยํ โอรํ, ตํ ตํ ปรํ, ยํ ยํ ปรํ, ตํ ตํ ‘‘ปุริมตร’’นฺติ วุตฺตํ โหติ. กุตูหลยุตฺตา สาลา กุตูหลสาลา ยถา ‘‘อาชญฺญรโถ’’ติ. อิเม ทสฺสนาทโย. २३८. कालच्या दिवसापासून सुरुवात करून त्याजवळचे काही दिवस "पुरिम" (पूर्वीचे) म्हटले जातात, आणि "पुरिम" म्हणजे "पुब्बक" (पूर्वीचे), म्हणजेच "अतीत" (भूतकाळ) असा अर्थ आहे. "ततो परं" (त्यानंतर) म्हणजे वर सांगितलेल्या भूतकाळातील दिवसाच्या लगेचच नंतरचे, जे अत्यंत पूर्वीचे असल्यामुळे "पुरिमतर" (अधिक पूर्वीचे) आहे. अशा प्रकारे या दोन्हीमध्ये अनुक्रमाने पूर्वीचे आणि अधिक पूर्वीचे असण्याची स्थिती निर्माण होते, असे असले तरी येथे जे "पुरिमतर" म्हटले आहे, तेव्हापासून जे जे जवळचे आहे ते "पर" (नंतरचे) आणि जे जे दूरचे आहे ते "पुरिमतर" म्हटले जाते. कुतूहलाने (जिज्ञासेने) युक्त असलेली शाळा म्हणजे "कुतूहलशाला" (चर्चागृह), जसे की "आजञ्ञरथो" (उत्कृष्ट रथ). हे दर्शन इत्यादी आहेत. อยถาภูตคุเณหีติ อยถาภูตํ มิจฺฉาทีปิตอตฺถมตฺเตเนว อุคฺโฆสิตคุเณหิ สมุคฺคโต โฆสิโต. ตรนฺติ อติกฺกมนฺติ เอเตนาติ ติตฺถํ, อคฺคมคฺโค. ทิฏฺฐิคติกมคฺโค ปน อยถาภูโตปิ เตสํ ตถา วิตรณํ อุปาทาย ติตฺถนฺติ โวหรียตีติ ตํ กโรนฺตา ติตฺถกรา. โอสรตีติ ปวิสติ. "अयथाभूतगुणेहि" म्हणजे जे वास्तविक गुण नाहीत, केवळ मिथ्या रीतीने प्रकट केलेल्या अर्थाच्या आधारे घोषित केलेल्या गुणांनी युक्त. ज्याच्याद्वारे पार करतात (तरन्ति) किंवा ओलांडतात (अतिक्कमन्ति) ते "तित्थ" (तीर्थ/मार्ग), म्हणजेच अग्र मार्ग (अग्गमग्गो). परंतु, दृष्टीगतांचा (चुकीच्या मतांचा) मार्ग हा अयथार्थ असूनही, त्यांच्याद्वारे पार करण्याच्या अर्थाने त्याला "तित्थ" असे म्हटले जाते, आणि ते निर्माण करणारे "तित्थकर" (तीर्थंकर/पंथसंस्थापक) होत. "ओसरति" म्हणजे प्रवेश करतो. ๒๓๙. สหิตนฺติ ปุพฺพาปราวิรุทฺธํ. น กิญฺจิ ชาตนฺติ ปฏิญฺญาโทสเหตุโทสอุทาหรณโทสทุฏฺฐโทสตาย น กิญฺจิ ชาตํ. เตนาห ‘‘อาโรปิโต เต วาโท’’ติ. วทนฺติ เตน ปริภาสนฺตีติ วาโท โทโส. สภาวกฺโกเสนาติ สภาวโต ปวตฺตโกฏฺฐาเสน. २३९. "सहितं" म्हणजे पूर्व आणि अपूर्व (सुरुवातीपासून शेवटपर्यंत) सुसंगत असलेले (परस्परविरोधी नसलेले). "न किञ्चि जातं" म्हणजे प्रतिज्ञादोष, हेतुदोष, उदाहरणदोष किंवा दुष्टदोष यांमुळे काहीही निष्पन्न झाले नाही. म्हणूनच म्हटले आहे— "आरोपितो ते वादो" (तुझा वाद खोडून काढला आहे). ज्याच्याद्वारे बोलतात किंवा निंदा करतात तो "वाद" म्हणजे दोष होय. "सभावक्कोसेन" म्हणजे स्वभावाने प्रवृत्त झालेल्या भागाद्वारे. ๒๔๐. ปีเฬยฺยาติ มธุภณฺเฑน สห ภาชเน ปีเฬตฺวา ทเทยฺย. สพฺรหฺมจารีหิ สมฺปโยเชตฺวาติ สหธมฺมิเกหิ วิเหฐนปโยคํ กตฺวา, เตนาห ‘‘วิวาทํ กตฺวา’’ติ. २४०. "पीळेय्य" म्हणजे मधाच्या भांड्यासह पात्रात पिळून द्यावे. "सब्रह्मचारीहि सम्पयोजेत्वा" म्हणजे सहधार्मिकांसोबत छळ करण्याचा प्रयत्न करून, म्हणूनच म्हटले आहे— "विवादं कत्वा" (विवाद करून). ๒๔๑. อิตรีตเรนาติ ปณีตโต อิตเรน. เตนาห ‘‘ลามกลามเกนา’’ติ. २४१. "इतरीतरेन" म्हणजे उत्तम गोष्टीपेक्षा इतर गोष्टीने. म्हणूनच म्हटले आहे— "लामकलामकेन" (अतिशय निकृष्ट गोष्टीने). ๒๔๒. ภตฺตโกสเกนาติ โกสกภตฺเตน, ขุทฺทกสราวภตฺตเกนาติ อตฺโถ. เพลุวมตฺตภตฺตาหาราติ พิลฺลปมาณภตฺตโภชนา. โอฏฺฐวฏฺฏิยาติ มุขวฏฺฏิยา. สพฺพากาเรเนวาติ สพฺพปฺปกาเรเนว. อนปฺปาหาโรติ น วตฺตพฺโพ กทาจิ อปฺปาหาโรติ กตฺวา. ตตฺถ อติวิย อญฺเญหิ อวิสยฺหํ อปฺปาหารตํ ภควโต ทสฺเสตุํ ‘‘ปธานภูมิย’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. มยาติ นิสฺสกฺกวจนํ. วิเสสตราติ เตน ธมฺเมน วิเสสวนฺตตรา. २४२. "भत्तकोसकेन" म्हणजे लहान वाटीतील भाताने, म्हणजेच लहान द्रोणातील भाताने असा अर्थ आहे. "बेलुवमत्तभत्ताहारा" म्हणजे बेलाच्या फळाच्या आकाराचे भाताचे भोजन करणारे. "ओट्ठवट्टिया" म्हणजे ओठांच्या कडेने. "सब्बाकारेनेव" म्हणजे सर्व प्रकारेच. "अनप्पाहारो" म्हणजे "अल्प आहार घेणारे" असे कधीही म्हणू नये. तेथे, इतरांना सहन न होणारा भगवंतांचा अत्यंत अल्प आहार दर्शवण्यासाठी "पधानभूमियं" (प्रधानभूमीत) इत्यादी म्हटले आहे. "मया" हा अपादान (पंचमी) विभक्तीचा शब्द आहे. "विसेसतरा" म्हणजे त्या धम्मामुळे अधिक वैशिष्ट्यपूर्ण होय. วตสมาทานวเสเนว [Pg.114] ปํสุกูลํ ธาเรนฺตีติ ปํสุกูลิกาติ อาห – ‘‘สมาทินฺนปํสุกูลิกงฺคา’’ติ, สทฺทตฺโถ ปน ‘‘วิสุทฺธิมคฺเค’’ (วิสุทฺธิ. ๑.๒๔) วุตฺตนเยน เวทิตพฺโพ. ปิณฺฑปาติกา สปทานจาริโนติอาทีสุปิ เอเสว นโย. ตตฺถ ตตฺถ สตฺเถน ฉินฺทิตตฺตา สตฺถลูขานิ. ยํ ยํ สปฺปายํ, ตสฺเสว คหณํ อุจฺจินนฺติ อาห ‘‘อุจฺจินิตฺวา…เป… ถิรฏฺฐานเมว คเหตฺวา’’ติ. อลาพุโลมสานีติ อลาพุโลมานิ วิย สุขุมตรานิ จีวรสุตฺตํสูนิ เอเตสํ สนฺตีติ อลาพุโลมสานิ. ปาติตสาณปํสุกูลนฺติ กเฬวเรน สทฺธึ ฉฑฺฑิตสาณมยํ ปํสุกูลํ, ยํ ตุมฺพมตฺเต ปุฬเว โอธุนิตฺวา สตฺถา คณฺหิ. व्रत धारण करण्याच्या हेतूनेच जे पांसुकूल (स्मशानातील किंवा कचऱ्यातील कापड) परिधान करतात ते "पांसुकूलिक" होत, म्हणूनच म्हटले आहे— "समादिन्नपंसुकूलिकङ्गा" (पांसुकूलिक अंग स्वीकारलेले). याचा शब्दशः अर्थ "विसुद्धिमग्ग" मध्ये सांगितलेल्या पद्धतीने समजून घ्यावा. "पिण्डपातिक" (भिक्षापात्र धारण करणारे), "सपदानचारिनो" (सलग घरांतून भिक्षा मागणारे) इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम लागू होतो. ठिकठिकाणी शस्त्राने (सुरीने) कापल्यामुळे जे खडबडीत झाले आहे ते "सत्थलूखानि". जे जे अनुकूल आहे, त्याचेच ग्रहण करणे म्हणजे निवडणे, म्हणूनच म्हटले आहे— "निवडून...पे... केवळ मजबूत भागच घेऊन". "अलाबुलोमानि" म्हणजे भोपळ्याच्या केसांसारखे अत्यंत सूक्ष्म चिवर-तंतू ज्यांचे आहेत ते "अलाबुलोमसानि". "पातितसाणपंसुकूलं" म्हणजे प्रेतासोबत टाकून दिलेले तागाचे पांसुकूल वस्त्र, जे शास्त्यांनी (बुद्धांनी) भांड्याच्या आकाराचे किडे झटकून स्वीकारले होते. ‘‘ยถาปิ ภมโร ปุปฺผ’’นฺติอาทินา (ธ. ป. ๔๙) วุตฺตํ มธุกรภิกฺขาจารวตํ ‘‘ปิณฺฑิยาโลปโภชนํ นิสฺสาย ปพฺพชฺชา’’ติ (มหาว. ๗๓, ๑๒๘) วจนโต ภิกฺขูนํ ปกติภูตํ วตนฺติ วุตฺตํ ‘‘อุญฺฉาสเก วเต รตา’’ติ. วต-สทฺโท เจตฺถ ปกติวตสงฺขาตํ สกวตํ วทติ. เตนาห ‘‘อุญฺฉาจริยสงฺขาเต ภิกฺขูนํ ปกติวเต’’ติ. อุจฺจนีจฆรทฺวารฏฺฐายิโนติ มหนฺตขุทฺทกเคหานํ พหิทฺวารโกฏฺฐกฏฺฐายิโน. กพรมิสฺสกํ ภตฺตํ สํหริตฺวาติ กณาชกมิสฺสกํ ภตฺตํ สมฺปิณฺฑิตฺวา. อุมฺมารโต ปฏฺฐายาติ ฆรุมฺมารโต ปฏฺฐาย. "यथापि भमरो पुप्फं" (ज्याप्रमाणे भ्रमर फुलाला इजा न करता...) इत्यादी गाथेमध्ये (धम्मपद ४९) सांगितलेले मधुकराप्रमाणे भिक्षा मागण्याचे व्रत, "पिण्डियालोपभोजनं निस्साय पब्बज्जा" (भिक्षेच्या अन्नावर अवलंबून प्रव्रज्या असते) या वचनानुसार भिक्खूंचे नैसर्गिक व्रत आहे, म्हणूनच "उञ्छासके वते रता" (कण गोळा करण्याच्या व्रतात रममाण असणारे) असे म्हटले आहे. येथे "वत" (व्रत) हा शब्द नैसर्गिक व्रत मानल्या गेलेल्या स्वतःच्या व्रताला दर्शवतो. म्हणूनच म्हटले आहे— "उञ्छाचरियसंखाते भिक्खूनं पकतिवते" (भिक्खूंच्या कण गोळा करण्याच्या नैसर्गिक व्रतामध्ये). "उच्चनीचघरद्वारट्ठायिनो" म्हणजे मोठ्या आणि लहान घरांच्या बाहेरील दारापाशी उभे राहणारे. "कबरमिस्सकं भत्तं संहरित्वा" म्हणजे कण्या आणि कोंडा मिश्रित भात एकत्र करून. "उम्मारतो पट्ठाय" म्हणजे घराच्या उंबरठ्यापासून सुरुवात करून. จีวรานุคฺคหตฺถนฺติ จีวรานุรกฺขณตฺถํ. เอตฺถ จ ยสฺมา พุทฺธา นาม สเทวเก โลเก อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ, สา จสฺส ปุญฺญกฺเขตฺตตา ปรมุกฺกํสคตา, ตสฺมา สตฺตานํ ตาทิสํ อุปการํ อาจิกฺขิตฺวา เต จ อนุคฺคณฺหนฺตา คหปติจีวรํ สาทิยนฺติ, จตุปจฺจยสนฺโตเส ปน เน ปรมุกฺกํสคตา เอวาติ ทฏฺฐพฺพํ. "चीवरानुग्गहत्थं" म्हणजे चीवराचे रक्षण करण्यासाठी. आणि येथे, ज्याअर्थी बुद्ध हे देवलोकासह या जगात "अनुत्तर पुञ्ञक्खेत्त" (सर्वश्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र) आहेत, आणि त्यांचे हे पुण्यक्षेत्र असणे परम श्रेष्ठतेला पोहोचलेले आहे, म्हणून प्राण्यांना तशा प्रकारचा उपकार सांगून आणि त्यांच्यावर अनुग्रह करत ते गृहपतींनी दिलेले चीवर (गृहपतिचीवर) स्वीकारतात; परंतु चार प्रत्ययांच्या (गरजांच्या) संतोषाच्या बाबतीत ते परम श्रेष्ठतेला पोहोचलेलेच आहेत, असे समजावे. ๒๔๔. สปฺปจฺจยนฺติ สเหตุกํ สการณํ หุตฺวา ธมฺมํ เทเสตีติ อยเมตฺถ อตฺโถ. โจทโก ปน อธิปฺปายํ อชานนฺโต ‘‘กึ ปนา’’ติอาทิมาห. อิตโร ‘‘โน น เทเสตี’’ติอาทินา อธิปฺปายํ วิวรติ. นิทานนฺติ เจตฺถ ญาปกํ อุปฺปตฺติการณํ อธิปฺเปตํ, ตญฺจ ตสฺส ตสฺส อนุปฺปตฺติยุตฺตสฺส อตฺถสฺส ปฏิปกฺขหรณโต ‘‘สปฺปาฏิหาริย’’นฺติ วุจฺจตีติ อาห ‘‘ปุริมสฺเสเวตํ เววจน’’นฺติ. ราคาทีนํ วา ปฏิหรณํ ปฏิหาริยํ, ตเทว ปาฏิหาริยํ, สห ปาฏิหาริเยนาติ สปฺปาฏิหาริยํ. ราคาทิปฏิเสธวเสเนว หิ สตฺถา ธมฺมํ เทเสติ. २४४. "सप्पच्चयं" म्हणजे हेतूसह आणि कारणासह धम्माचा उपदेश करतात, असा येथे अर्थ आहे. परंतु शंका विचारणारा (चोदक) अभिप्राय न समजल्यामुळे "तर मग काय?" इत्यादी विचारतो. दुसरा "नाही, ते उपदेश करत नाहीत असे नाही" इत्यादींद्वारे अभिप्राय स्पष्ट करतो. येथे "निदान" म्हणजे उत्पत्तीचे कारण किंवा ज्ञापक अभिप्रेत आहे, आणि ते त्या त्या योग्य अर्थाच्या विरोधी गोष्टींचे निवारण करत असल्यामुळे त्याला "सप्पाटिहारियं" (प्रातिहार्ययुक्त/चमत्कारयुक्त) म्हटले जाते, म्हणूनच सांगितले आहे— "हे पूर्वीच्या शब्दाचेच समानार्थी रूप आहे". याशिवाय, राग (आसक्ती) इत्यादींचे निवारण करणे म्हणजे "पातिहारिय", आणि तेच पातिहार्य होय; पातिहार्यासह असणे म्हणजे "सप्पाटिहारिय". कारण शास्ते (बुद्ध) राग इत्यादींच्या प्रतिषेधाच्या (निवारणाच्या) हेतूनेच धम्माचा उपदेश करतात. ๒๔๕. ตสฺส [Pg.115] ตสฺส ปญฺหสฺสาติ ยํ ยํ ปญฺหํ ปโร อภิสงฺขริตฺวา ภควนฺตํ อุปสงฺกมิตฺวา ปุจฺฉติ, ตสฺส ตสฺส ปญฺหสฺส. อุปริ อาคมนวาทปถนฺติ วิสฺสชฺชเน กเต ตโต อุปริ อาคจฺฉนกํ วาทมคฺคํ. วิเสเสตฺวา วทนฺโตติ วตฺตติ, ‘‘โภ โคตม, วตฺตุมรหตี’’ติ อตฺตโน วาทเภทนตฺถํ อาหตํ การณํ อตฺตโน มารณตฺถํ อาวุธํ นิทสฺเสนฺโต วิย วิเสเสตฺวา วทนฺโต ปหารเกน วจเนน. อนฺตรนฺตเรติ มยา วุจฺจมานกถาปพนฺธสฺส อนฺตรนฺตเร. ทเทยฺย วเทยฺย. เอวรูเปสุ ฐาเนสูติ ปรวาทีหิ สทฺธึ วาทปฏิวาทฏฺฐาเนสุ. เต นิคฺคเหตุํ มยา เทสิตํ สุตฺตปทํ อาเนตฺวา มมเยว อนุสาสนึ โอวาทํ ปจฺจาสีสนฺติ. २४५. "तस्स तस्स पञ्हस्स" म्हणजे जो जो प्रश्न दुसरा माणूस तयार करून भगवंतांकडे येऊन विचारतो, त्या त्या प्रश्नाचा. "उपरि आगमनवादपथं" म्हणजे उत्तर दिल्यानंतर त्यावर येणारा वादाचा मार्ग. "विसेसित्वा वदन्तो" म्हणजे वैशिष्ट्यपूर्ण रीतीने बोलणारा, जसे की स्वतःच्या नाशासाठी शस्त्र दाखवावे, तसे स्वतःचा वाद खोडण्यासाठी आणलेले कारण दाखवत, "हे गोतम, आपण बोलण्यास योग्य आहात" असे आघातात्मक शब्दांनी वैशिष्ट्यपूर्ण रीतीने बोलणारा. "अन्तरन्तरे" म्हणजे माझ्याद्वारे बोलल्या जाणाऱ्या कथाप्रवाहाच्या मध्येच. "ददेय्य" म्हणजे द्यावे किंवा बोलावे. "एवरूपेsu ठानेसु" म्हणजे परवाद्यांसोबतच्या अशा वाद-प्रतिवादाच्या प्रसंगी. त्यांचा निग्रह (पराभव) करण्यासाठी माझ्याद्वारे उपदेशिलेले सुत्तपद आणून ते माझ्याच अनुशासनाची (उपदेशाची) आणि ओवादाची (सल्ल्याची) अपेक्षा करतात. ๒๔๖. สมฺปาเทมีติ มโนรถํ สมฺปาเทมิ. ปริปูเรมีติ อชฺฌาสยํ ปริปูเรมิ. อธิสีเลติ อธิเก อุตฺตมสีเล. สาวกสีลโต จ ปจฺเจกพุทฺธสีลโต จ พุทฺธานํ สีลํ อธิกํ อุกฺกฏฺฐํ ปรมุกฺกํสโต อนญฺญสาธารณภาวโต. เตนาห ‘‘พุทฺธสีลํ นาม กถิต’’นฺติ. ฐานุปฺปตฺติกปญฺญาติ ตตฺถ ตตฺถ ฐานโส อุปฺปนฺนปญฺญา. เตนาห ‘‘ตตฺถา’’ติอาทิ. อวเสสา ปญฺญาติ อิธ ปาฬิยํ อาคตา อนาคตา จ ยถาวุตฺตญาณทฺวยวินิมุตฺตา ปญฺญา. २४६. "सम्पादेमि" म्हणजे मनोरथ पूर्ण करतो. "परिपूरेमि" म्हणजे आशय (इच्छा) पूर्ण करतो. "अधिसीले" म्हणजे अधिक असलेल्या उत्तम शीलामध्ये. सावकशीलापेक्षा (श्रावकशीलापेक्षा) आणि पच्चेकबुद्धशीलापेक्षा (प्रत्येकबुद्धशीलापेक्षा) बुद्धांचे शील हे त्यांच्या परम श्रेष्ठतेमुळे आणि अनन्यसाधारणत्वामुळे अधिक उत्कृष्ट आहे. म्हणूनच म्हटले आहे— "बुद्धशील असे सांगितले आहे". "ठाणुप्पत्तिकपञ्ञा" म्हणजे त्या त्या प्रसंगी निर्माण झालेली प्रज्ञा. म्हणूनच म्हटले आहे— "तेथे" इत्यादी. "अवसेसा पञ्ञा" म्हणजे येथे पाळिमध्ये आलेली आणि न आलेली, वर सांगितलेल्या दोन प्रकारच्या ज्ञानांशिवाय उरलेली प्रज्ञा. ๒๔๗. วิเสสาธิคมานนฺติ สติปฏฺฐานาทีนํ อธิคนฺธพฺพวิเสสานํ. อภิญฺญา นาม ฉ อภิญฺญา, ตาสุ อุกฺกฏฺฐนิทฺเทเสน ฉฬภิญฺญารหโตว อคฺคมคฺคปญฺญา อิธ อภิญฺญาติ อธิปฺเปตา, ตสฺส โวสานํ ปริโยสานํ ปารมี ปรมุกฺกํสาติ อวกํสาติ จ อคฺคผลํ วุจฺจตีติ อาห ‘‘อภิญฺญา…เป… อรหตฺตํ ปตฺตา’’ติ. २४७. "विशेषअधिगम" म्हणजे सतिपट्ठान (स्मृतिप्रस्थान) इत्यादी प्राप्त करण्यायोग्य विशेष अधिगम (प्राप्ती) होय. "अभिञ्ञा" म्हणजे सहा अभिज्ञा; त्यांमध्ये उत्कृष्ट निर्देशानुसार षडभिज्ञांना (सहा अभिज्ञांना) पात्र असणाऱ्याचीच अग्र मार्ग प्रज्ञा (अग्गमग्गपञ्ञा) येथे 'अभिञ्ञा' म्हणून अभिप्रेत आहे. त्याचा अंत, समाप्ती, पारमिता, परम उत्कर्ष आणि अवकर्ष (न्यूनता नसणे) याला अग्रफल (अर्हत्त्व) म्हटले जाते, म्हणून "अभिञ्ञा...पे... अरहत्तं पत्ता" (अभिज्ञा... अर्हत्त्व प्राप्त झाले) असे म्हटले आहे. อุปายปธาเนติ อริยผลาธิคมนสฺส อุปายภูเต ปธาเน. ‘‘อนุปฺปนฺนปาปกานุปฺปาทาทิอตฺถา’’ติ คหิตา ตเถว โหนฺติ, ตํ อตฺถํ สาเธนฺติเยวาติ เอตสฺส อตฺถสฺส ทีปโก สมฺมา-สทฺโทติ ยถาอธิปฺเปตตฺถสฺส อนุปฺปนฺนปาปกานุปฺปาทาทิโน อุปายภูเต, ปธานอุปายภูเตติ อตฺโถ. สมฺมา-สทฺทสฺส วา โยนิโส อตฺถทีปกตํ สนฺธาย ‘‘โยนิโส ปธาเน’’ติ วุตฺตํ. ฉนฺทํ ชเนตีติ กตฺตุกมฺยตากุสลจฺฉนฺทํ อุปฺปาเทติ ปวตฺเตติ วา. วายมตีติ ปโยคปรกฺกมํ กโรติ. วีริยํ อารภตีติ กายิกเจตสิกวีริยํ กโรติ. จิตฺตํ อุกฺขิปตีติ [Pg.116] เตเนว สหชาตวีริเยน โกสชฺชปกฺขโต จิตฺตํ อุกฺขิปติ. ปทหตีติ สมฺมปฺปธานภูตํ วีริยํ ปวตฺเตติ. ปฏิปาฏิยา ปเนตานิ จตฺตาริ ปทานิ อาเสวนาภาวนาพหุลีกมฺมสาตจฺจกิริยาหิ โยเชตพฺพานิ. ‘‘ปทหตี’’ติ วา อิมินา อาเสวนาทีหิ สทฺธึ สิขาปตฺตํ อุสฺโสฬฺหิวีริยํ โยเชตพฺพํ. วฑฺฒิยา ปริปูรณตฺถนฺติ ยาวตา ภาวนาปาริปูริยา ปริปูรณตฺถํ. ยา ฐิตีติ ยา กุสลานํ ธมฺมานํ ปฏิปกฺขวิคเมน อวฏฺฐิติ. โส อสมฺโมโสติ โส อวินาโส. ยํ เวปุลฺลนฺติ โย สพฺพโส วิปุลภาโว มหนฺตตา. ภาวนาปาริปูรีติ ภาวนาย ปริปูริตา. อตฺโถติปิ เวทิตพฺพํ ปุริมปจฺฉิมปทานํ สมานตฺถภาวโต. "उपायपधान" म्हणजे आर्यफलाच्या प्राप्तीसाठी उपायभूत असलेल्या प्रयत्नात (प्रधानात). "अनुत्पन्न पापक अकुशल धर्मांचा अनुत्पाद इत्यादी अर्थाने" जे ग्रहण केले आहे ते तसेच असते, त्या अर्थाला साध्य करणारेच असते; या अर्थाचा प्रकाशक 'सम्मा' (सम्यक्) हा शब्द आहे, म्हणजेच अभिप्रेत असलेल्या अनुत्पन्न पापक अकुशल धर्मांच्या अनुत्पादादींचा उपायभूत, प्रधान उपायभूत असा अर्थ आहे. किंवा 'सम्मा' शब्दाचा 'योनिसो' (योग्य प्रकारे/मनःपूर्वक) अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी "योनिसो पधाने" (योग्य प्रकारे प्रयत्न करणे) असे म्हटले आहे. "छन्दं जनेति" (इच्छा उत्पन्न करतो) म्हणजे काहीतरी करण्याची इच्छा असलेला कुशल छंद उत्पन्न करतो किंवा प्रवृत्त करतो. "वायमति" (प्रयत्न करतो) म्हणजे प्रयोगात्मक पराक्रम करतो. "वीरियं आरभति" (वीर्य आरंभ करतो) म्हणजे कायिक आणि चैतसिक वीर्य (उत्साह/प्रयत्न) करतो. "चित्तं उक्खिपति" (चित्त वर उचलतो) म्हणजे त्याच सहजात वीर्याने आळसाच्या बाजूने झुकलेल्या चित्ताला वर उचलतो. "पदहति" (प्रयत्न करतो) म्हणजे सम्यक्प्रधानभूत वीर्य प्रवृत्त करतो. अनुक्रमाने ही चार पदे आसेवन (पुनःपुन्हा करणे), भावना, बहुलीकर्म (वारंवार सराव) आणि सातत्यपूर्ण क्रियेने जोडली पाहिजेत. किंवा "पदहति" या पदाने आसेवनादींसह शिखरेला पोहोचलेले अत्यंत उत्साही वीर्य जोडले पाहिजे. "वृद्धीच्या परिपूर्णतेसाठी" म्हणजे भावनेच्या परिपूर्णतेने परिपूर्ण होण्यासाठी. "जी स्थिती" म्हणजे कुशल धर्मांची विरोधी घटकांच्या विगमाने (नष्ट होण्याने) होणारी स्थिती (स्थैर्य). "तो असंमोष" म्हणजे त्याचा अविनाश (नाश न होणे). "जे वैपुल्य" म्हणजे जो सर्व प्रकारे विपुल भाव, मोठेपणा होय. "भावनापारिपूरी" म्हणजे भावनेची परिपूर्णता. पूर्व आणि उत्तर पदांच्या समान अर्थामुळे हा अर्थ समजून घ्यावा. ปุพฺพภาคปฏิปทา กถิตาตํตํวิเสสาธิคมสฺส ปฏิปทาวิภาวนาย อารทฺธตฺตา. อกุสลานํ ธมฺมานํ อนุปฺปชฺชเนน อนตฺถาวหตา นาม นตฺถีติ วุตฺตํ – ‘‘อุปฺปชฺชมานา’’ติ วจนํ อุปฺปนฺนานํ ราสนฺตรภาเวน คหิตตฺตา. ตถา กุสลานํ ธมฺมานํ อุปฺปชฺชเนนาติ วุตฺตํ – อนุปฺปชฺชมานาติ วจนํ อุปฺปนฺนานํ ราสนฺตรภาเวน คหิตตฺตา. นิรุชฺฌมานาติ ปฏิปกฺขสมาโยเคน วินสฺสมานา, น ขณนิโรธวเสน นิรุชฺฌมานา. त्या त्या विशेष अधिगमाच्या प्रतिपदेचे (मार्गाचे) स्पष्टीकरण करण्यासाठी पूर्वभाग प्रतिपदा सांगितली गेली आहे. अकुशल धर्मांच्या अनुत्पादामुळे अनर्थ निर्माण होत नाही, म्हणून "उत्पन्न होणारे" असे म्हटले आहे – कारण उत्पन्न झालेल्या धर्मांचे दुसऱ्या राशीच्या रूपात ग्रहण केले जाते. तसेच कुशल धर्मांच्या उत्पादाने (उत्पत्तीने) असे म्हटले आहे – "अनुत्पन्न होणारे" हे वचन उत्पन्न झालेल्या धर्मांचे दुसऱ्या राशीच्या रूपात ग्रहण केल्यामुळे आहे. "निरुद्ध्यमान" (नष्ट होणारे) म्हणजे विरोधी घटकांच्या संयोगाने नष्ट होणारे, क्षणिक निरोधाच्या वशाने निरुद्ध होणारे नव्हे. โลภาทโย เวทิตพฺพา, เย อารทฺธวิปสฺสกานํ อุปฺปชฺชนารหา. สกึ อุปฺปชฺชิตฺวาติ สภาวกถนมตฺตเมตํ. เอกวารเมว หิ มคฺโค อุปฺปชฺชติ. นิรุชฺฌมาโนติ สรเสเนว นิรุชฺฌมาโน. น หิ ตสฺส ปฏิปกฺขสมาโยโค นาม อตฺถิ. ผลสฺสาติ อนนฺตรกาเลว อุปฺปชฺชนกผลสฺส. ปจฺจยํ ทตฺวาว นิรุชฺฌตีติ อิมินา มคฺโค สมฺปติ อายติญฺจ เอกนฺเตเนว อตฺถาวโหติ ทสฺเสติ. ปุริมสฺมิมฺปีติ ‘‘อนุปฺปนฺนา เม กุสลา ธมฺมา อนุปฺปชฺชมานา อนตฺถาย สํวตฺเตยฺยุ’’นฺติ เอตสฺมึ ตติยวาเรปิ. ‘‘สมถวิปสฺสนา คเหตพฺพา’’ติ วุตฺตํ อฏฺฐกถายํ, ตํ ปน มคฺคสฺส อนุปฺปนฺนตาย สพฺภาวโต, อนุปฺปชฺชมาเน จ ตสฺมึ วฏฺฏานตฺถสพฺภาวโตติ มคฺคสฺสปิ สาธารณภาวโต น ยุตฺตนฺติ ปฏิกฺขิปติ. ยทิ สมถวิปสฺสนานมฺปิ อนุปฺปตฺติ อนตฺถาวหา, มคฺคสฺส อนุปฺปตฺติยา วตฺตพฺพํ นตฺถีติ. लोभ इत्यादी समजून घ्यावेत, जे आरब्धविपस्सक (विपश्यना सुरू केलेल्या) साधकांना उत्पन्न होण्यास योग्य आहेत. "एकदाच उत्पन्न होऊन" हे केवळ स्वभावाचे कथन आहे. कारण मार्ग एकदाच उत्पन्न होतो. "निरुद्ध्यमान" म्हणजे स्वतःच्या रसानेच (स्वभावानेच) निरुद्ध होणारा. कारण त्याचा विरोधी घटकांशी संयोग नसतो. "फलाचा" म्हणजे लगेचच नंतरच्या काळात उत्पन्न होणाऱ्या फलाचा. "प्रत्यय (कारण) देऊनच निरुद्ध होतो" याने मार्ग वर्तमानकाळात आणि भविष्यकाळात निश्चितपणे कल्याणकारी (अर्थवह) ठरतो हे दर्शविले आहे. "पूर्वीच्या मध्येही" म्हणजे "माझे अनुत्पन्न कुशल धर्म उत्पन्न न होता अनर्थासाठी कारणीभूत ठरतील" या तिसऱ्या वेळीही. अट्ठकथेत (अट्टकथेत) "समथ आणि विपस्सना ग्रहण करावी" असे म्हटले आहे, परंतु मार्गाच्या अनुत्पन्नतेच्या अस्तित्वामुळे आणि तो उत्पन्न न झाल्यास संसाररूपी अनर्थाचे अस्तित्व असल्यामुळे, मार्गाच्याही साधारणत्वामुळे ते योग्य नाही म्हणून नाकारले आहे. जर समथ आणि विपस्सना यांची अनुत्पत्ती देखील अनर्थकारक असेल, तर मार्गाच्या अनुत्पत्तीबद्दल काय सांगावे! มหนฺตํ[Pg.117], คารวํ โหติ, ตสฺมา ‘‘สงฺฆคารเวน ยถารุจิ วนฺทิตุํ น ลภามี’’ติ สงฺเฆน สห น นิกฺขมิ. เอตฺตกํ ธาตูนํ นิธานํ นาม อญฺญตฺร นตฺถิ, มหาธาตุนิธานโต หิ นีหริตฺวา กติปยา ธาตุโย ตตฺถ ตตฺถ เจติเย อุปนีตา, อิธ ปน รามคามถูเป วินฏฺเฐ นาคภวนํ ปวิฏฺฐา โทณมตฺตา ธาตุโย อุปนีตา. อติมนฺทานิ โนติ นนุ อติวิย มนฺทานิ. मोठा आदर असतो, म्हणून "संघाच्या आदरामुळे मला माझ्या आवडीनुसार वंदन करायला मिळत नाही" असे विचार करून ते संघासोबत बाहेर पडले नाहीत. एवढा मोठा धातूंचा साठा (निधान) इतर कोठेही नाही, कारण महाधातू निधानातून काढून काही धातू वेगवेगळ्या चैत्यांमध्ये नेल्या गेल्या होत्या, परंतु येथे रामगाम थूपाचा (रामग्राम स्तूपाचा) नाश झाल्यावर नागभवनात प्रवेश केलेल्या द्रोणभर (दोणमत्त) धातू आणल्या गेल्या. "अतिमंदानी नो" म्हणजे काय त्या अत्यंत मंद नाहीत का? สํวิชฺชิตฺวาติ ‘‘กถญฺหิ นาม มาทิโส อีทิสํ อนตฺถํ ปาปุณิสฺสตี’’ติ สํเวคํ ชเนตฺวา. อีทิสํ นาม มาทิสํ อารพฺภ วตฺตพฺพนฺติ กึ วทตีติ ตํ วจนํ อนาทิยนฺโต. "संविज्जित्वा" म्हणजे "माझ्यासारख्याला असा अनर्थ कसा काय प्राप्त होईल?" असा संवेग उत्पन्न करून. "माझ्यासारख्याच्या बाबतीत असे बोलले जावे, हे काय बोलत आहे?" असे म्हणून त्या शब्दांकडे दुर्लक्ष करत. สนฺตสมาปตฺติโต อญฺญํ สนฺถมฺภนการณํ พลวํ นตฺถีติ ตโต ปริหีโน สมฺมาปฏิปตฺติยํ ปติฏฺฐา กถํ ภวิสฺสตีติ อาห ‘‘สนฺตาย…เป… น สกฺโกตี’’ติ. น หิ มหารชฺชุยา ฉินฺนาย สุตฺตตนฺตู สนฺถมฺเภตุํ สกฺโกนฺตีติ. สมเถ ทสฺเสตฺวา เตน สมานคติกา อิมสฺมึ วิสเย วิปสฺสนาปีติ อิมินา อธิปฺปาเยนาห ‘‘เอวํ อุปฺปนฺนา สมถวิปสฺสนา…เป… สํวตฺตนฺตี’’ติ. शांत समापत्तीपेक्षा (शांत ध्यानावस्थेपेक्षा) दुसरे कोणतेही बलवान आधार देणारे कारण नाही, म्हणून त्यापासून भ्रष्ट झालेला मनुष्य सम्यक् प्रतिपदेमध्ये कसा प्रतिष्ठित होईल? म्हणून "संताय...पे... न सक्कोति" (शांत... शकत नाही) असे म्हटले आहे. कारण मोठी दोरी तुटल्यावर सुताचे धागे आधार देऊ शकत नाहीत. समथ दर्शवून, या विषयात विपस्सना देखील त्याच गतीची (स्वभावाची) आहे, या अभिप्रायाने "एवं उप्पन्ना samathavipassanā...pe... saṃvattantī" (अशा प्रकारे उत्पन्न झालेली समथ आणि विपस्सना... कारणीभूत ठरतात) असे म्हटले आहे. กาสาวนฺติ กาสาววตฺถํ. กจฺฉํ ปีเฬตฺวา นิวตฺถนฺติ ปจฺฉิมํ โอวฏฺฏิกํ ปีเฬนฺโต วิย ทฬฺหํ กตฺวา นิวตฺถํ อทฺทสํสูติ โยชนา. "कासाव" म्हणजे काषाय वस्त्र (भगवे वस्त्र). "कच्छं पीळेत्वा निवत्थं" म्हणजे मागचा कासोटा घट्ट बांधल्याप्रमाणे घट्ट करून परिधान केलेले पाहिले, असा संबंध (योजना) आहे. วุตฺตนเยนาติ (อ. นิ. ฏี. ๑.๑.๓๙๔) ‘‘กามา นาเมเต อนิจฺจา ทุกฺขา วิปริณามธมฺมา’’ติอาทินา วตฺถุกามกิเลสกาเมสุ อาทีนวทสฺสนปุพฺพกเนกฺขมฺมปฏิปตฺติยา ฉนฺทราคํ วิกฺขมฺภยโต สมุจฺฉินฺทนฺตสฺส จ ‘‘อนุปฺปนฺโน จ กามาสโว น อุปฺปชฺชตี’’ติอาทินา เหฏฺฐา สพฺพาสวสุตฺตวณฺณนาทีสุ (ม. นิ. ๑.๑๕ อาทโย; ม. นิ. อฏฺฐ. ๑.๑๕ อาทโย) วุตฺตนเยน. อารมฺมณรสํ อนุภวิตฺวา นิรุทฺธวิปาโกติ ตทารมฺมณมาห. อนุภวิตฺวา ภวิตฺวา จ วิคตํ ภูตวิคตํ. อนุภูตภูตา หิ ภูตตาสามญฺเญน ภูต-สทฺเทน วุตฺตา. สามญฺญเมว หิ อุปสคฺเคน วิเสสียตีติ. อนุภูตสทฺโท จ กมฺมวจนิจฺฉาย อภาวโต อนุภวกวาจโก ทฏฺฐพฺโพ. วิปาโก อารมฺมเณ อุปฺปชฺชิตฺวา นิรุทฺโธ ภุตฺวาวิคโตติ วตฺตพฺพตํ อรหติ, [Pg.118] วิกปฺปคาหวเสน ราคาทีหิ ตพฺพิปกฺเขหิ จ อกุสลํ กุสลญฺจ กมฺมํ อารมฺมณรสํ อนุภวิตฺวา วิคตนฺติ วตฺตพฺพตํ อรหติ. ยถาวุตฺโต ปน วิปาโก เกวลํ อารมฺมณรสานุภวนวเสเนว ปวตฺตตีติ อนุภวิตฺวา วิคตตฺตา นิปฺปริยาเยเนว วุตฺโต, ตสฺส จ ตถา วุตฺตตฺตา กมฺมํ ภวิตฺวา วิคตปริยาเยน, ยํ ‘‘อุปฺปนฺนานํ อกุสลานํ ธมฺมานํ ปหานาย, อุปฺปนฺนานํ กุสลานํ ธมฺมานํ ฐิติยา’’ติ เอตฺถ ‘‘อุปฺปนฺน’’นฺติ คเหตฺวา ตํสทิสานํ ปหานํ, วุทฺธิ จ วุตฺตา. วิปจฺจิตุํ โอกาสกรณวเสน อุปฺปติตํ อตีตกมฺมญฺจ ตโต อุปฺปชฺชิตุํ อารทฺโธ อนาคโต วิปาโก จ ‘‘โอกาสกตุปฺปนฺโน’’ติ วุตฺโต. ยํ อุปฺปนฺนสทฺเทน วินาปิ วิญฺญายมานํ อุปฺปนฺนํ สนฺธาย ‘‘นาหํ, ภิกฺขเว, สญฺเจตนิกาน’’นฺติอาทิ (อ. นิ. ๑๐.๒๑๗, ๒๑๙) วุตฺตํ. "वृत्त नयेन" (अं. नि. टी. १.१.३९४) म्हणजे "काम हे खरोखर अनित्य, दुःख आणि विपरिणामधर्मी आहेत" इत्यादी प्रकारे वस्तुकॉम (भौतिक काम) आणि क्लेशकाम (मानसिक काम) यांमधील दोषदर्शनापूर्वक नैष्क्रम्य-प्रतिपत्तीने (निक्खम्मपटिपत्ति) छंदरागाचा (इच्छा आणि आसक्ती) विक्षेपण (दाबून टाकणे) आणि समूच्छेदन (पूर्णपणे नष्ट) करणाऱ्यासाठी "अनुत्पन्न काम-आसव उत्पन्न होत नाही" इत्यादी प्रकारे खालील 'सब्बासव सुत्त' (सर्व-आसव सुत्त) च्या वर्णनादींमध्ये (म. नि. १.१५ इत्यादी; म. नि. अट्ठ. १.१५ इत्यादी) सांगितलेल्या पद्धतीने. आलंबनाचा (आरम्मण) रस अनुभवून निरुद्ध झालेला विपाक म्हणजे 'तदारम्मण' (त्या आलंबनाचा विपाक) असे म्हटले आहे. अनुभवून आणि होऊन जे निघून गेले आहे ते 'भूतविगत' (झालेले व गेलेले) होय. कारण अनुभवलेले आणि झालेले हे 'भूत' या सामान्य शब्दाने म्हटले जाते. सामान्य अर्थालाच उपसर्गाने विशेष बनवले जाते. आणि 'अनुभूत' हा शब्द कर्मवाच्य इच्छेच्या अभावामुळे अनुभवणाऱ्याचा वाचक मानला पाहिजे. विपाक आलंबनामध्ये उत्पन्न होऊन निरुद्ध झाला, होऊन निघून गेला, असे म्हणण्यास योग्य आहे; विकल्पग्रहणामुळे (विकप्पगाह) राग इत्यादींनी आणि त्यांच्या विपक्षांनी (विरोधी धर्मांनी) अकुशल आणि कुशल कर्म आलंबनाचा रस अनुभवून निघून गेले, असे म्हणण्यास योग्य आहे. परंतु, वर सांगितलेला विपाक केवळ आलंबन-रसाच्या अनुभवाच्या वशानेच प्रवृत्त होतो, म्हणून 'अनुभवून निघून गेलेला' अशा निप्परियाय (थेट/मुख्य) रूपानेच सांगितला आहे. आणि त्याचे तसे कथन केल्यामुळे कर्म 'होऊन निघून गेले' या पर्यायाने (गौण रूपाने) सांगितले आहे, जे "उत्पन्न झालेल्या अकुशल धर्मांच्या प्रहाणासाठी, उत्पन्न झालेल्या कुशल धर्मांच्या स्थितीसाठी" येथे 'उत्पन्न' असे ग्रहण करून त्यांच्यासारख्यांचे प्रहाण (त्याग) आणि वृद्धी सांगितली आहे. विपाकासाठी (फळ देण्यासाठी) संधी देण्याच्या वशाने उदित झालेले अतीत (भूतकाळातील) कर्म आणि त्यापासून उत्पन्न होण्यास आरंभ झालेला अनागत (भविष्यातील) विपाक यांना 'ओकासकtuप्पन्न' (संधी मिळून उत्पन्न झालेले) म्हटले आहे. जे 'उत्पन्न' या शब्दाशिवाय देखील समजले जाणारे 'उत्पन्न' लक्षात घेऊन "भिक्खूहो, मी संचेतनिक (सचेतन कर्मांचे)..." इत्यादी (अं. नि. १०.२१७, २१९) भगवान म्हणाले आहेत. เตสูติ วิปสฺสนาย ภูมิภูเตสุ ขนฺเธสุ. อนุสยิตกิเลสาติ อนุสยวเสน ปวตฺตา อปฺปหีนา มคฺเคน ปหาตพฺพา กิเลสา อธิปฺเปตา. เตนาห ‘‘อตีตา…เป… น วตฺตพฺพา’’ติ. เตสญฺหิ อมฺพรุกฺโขปมาย วตฺตมานาทิตา น วตฺตพฺพา มคฺเคน ปหาตพฺพานํ ตาทิสสฺส วิภาคสฺส อนุปฺปชฺชนโต. อปฺปหีนาว โหนฺตีติ อิมินา อปฺปหีนฏฺเฐน อนุสยฏฺโฐติ ทสฺเสติ. อิทํ ภูมิลทฺธุปฺปนฺนํ นามาติ อิทํ เตสุ ขนฺเธสุ อุปฺปตฺติรหกิเลสชาตํ ตาย เอว อุปฺปตฺติรหตาย ภูมิลทฺธุปฺปนฺนํ นาม, เตภูมกภูมิลทฺธา นาม โหตีติ อตฺโถ. ตาสุ ตาสุ ภูมีสูติ มนุสฺสเทวาทิอตฺตภาวสงฺขาเตสุ อุปาทานกฺขนฺเธสุ. ตสฺมึ ตสฺมึ สนฺตาเน อนุปฺปตฺติอนาปาทิตตาย อสมุคฺฆาติตา. เอตฺถ จ ลทฺธภูมิกํ ภูมิลทฺธนฺติ วุตฺตํ อคฺคิอาหิโต วิย. "त्यांच्यामध्ये" (तेसू) म्हणजे विपश्यनेची भूमी असलेल्या स्कंधांमध्ये (खंध). "अनुशयित क्लेश" (अनुसयितकिलेसा) म्हणजे अनुशय रूपाने प्रवृत्त असलेले, प्रहीण न झालेले (नष्ट न झालेले) आणि मार्गाने (मग्ग) प्रहाण करण्यास योग्य असलेले क्लेश अभिप्रेत आहेत. म्हणूनच म्हटले आहे - "अतीत... पे... असे म्हणू नये." कारण आंब्याच्या झाडाच्या उपमेप्रमाणे, मार्गाने प्रहाण करण्यास योग्य असलेल्या क्लेशांचे वर्तमानकाळ इत्यादी असणे सांगता येत नाही, कारण तशा प्रकारचा विभाग उत्पन्न होत नाही. "प्रहीण न झालेलेच असतात" याने 'प्रहीण न असण्याच्या' अर्थाने 'अनुशय' अर्थ दर्शवला आहे. "हे भूमिलद्धुप्पन्न (भूमी प्राप्त करून उत्पन्न झालेले) आहे" म्हणजे हे त्या स्कंधांमध्ये उत्पन्न होण्यास योग्य असलेले क्लेशसमूह, त्याच उत्पत्तीच्या योग्यतेमुळे 'भूमिलद्धुप्पन्न' नावाचे, म्हणजेच तेभूमिक (तीन भूमींमधील) भूमी प्राप्त केलेले असते, असा अर्थ आहे. "त्या त्या भूमींमध्ये" म्हणजे मनुष्य, देव इत्यादी आत्मभाव संज्ञक उपादानस्कंधांमध्ये. त्या त्या संतानामध्ये (प्रवाहामध्ये) अनुत्पत्ती न मिळवल्यामुळे जे समूच्छिन्न (पूर्णपणे नष्ट) झालेले नाहीत. आणि येथे 'लद्धभूमिक' (भूमी प्राप्त केलेले) यालाच 'भूमिलद्ध' असे म्हटले आहे, जसे की अग्नी प्रज्वलित केला जातो. โอกาสกตุปฺปนฺน-สทฺเทปิ จ โอกาโส กโต เอเตนาติ โอกาโส กโต เอตสฺสาติ จ อตฺถทฺวเยปิ กต-สทฺทสฺส ปรนิปาโต ทฏฺฐพฺโพ. อาหตขีรรุกฺโข วิย นิมิตฺตคฺคาหวเสน อธิคฺคหิตํ อารมฺมณํ, อนาหตขีรรุกฺโข วิย อวิกฺขมฺภิตตาย อนฺโตคธกิเลสํ อารมฺมณํ. นิมิตฺตคฺคาหกาวิกฺขมฺภิตกิเลสา วา ปุคฺคลา อาหตานาหตขีรรุกฺขสทิสา. ปุริมนเยเนวาติ อวิกฺขมฺภิตุปฺปนฺเน วิย ‘‘อิมสฺมึ นาม ฐาเน นุปฺปชฺชิสฺสนฺตีติ น วตฺตพฺพา. กสฺมา? อสมุคฺฆาติตตฺตา’’ติ โยเชตฺวา วิตฺถาเรตพฺพํ. "ओकासकतुप्पन्न" (संधी मिळून उत्पन्न झालेले) या शब्दात देखील "याने संधी दिली" आणि "याला संधी दिली गेली" या दोन्ही अर्थांमध्ये 'कत' शब्दाचा परनिपात (नंतर येथे) समजला पाहिजे. ज्याप्रमाणे कापलेले दुधाचे झाड (ज्यातून दूध वाहते) त्याप्रमाणे निमित्तग्रहणाच्या वशाने ग्रहण केलेले आलंबन असते; आणि न कापलेल्या दुधाच्या झाडाप्रमाणे विक्षेपण न झाल्यामुळे अंतर्भूत क्लेशांचे आलंबन असते. किंवा निमित्त ग्रहण करणारे आणि विक्षेपण न झालेले क्लेश असलेले पुद्गल (व्यक्ती) हे कापलेल्या आणि न कापलेल्या दुधाच्या झाडासारखे असतात. "पूर्वीच्याच पद्धतीने" म्हणजे विक्षेपण न झालेल्या उत्पन्नाप्रमाणे "या ठिकाणी उत्पन्न होणार नाहीत, असे म्हणू नये. का? कारण ते समूच्छिन्न (पूर्णपणे नष्ट) झालेले नाहीत" असे जोडून विस्तार केला पाहिजे. วุตฺตํ ปฏิสมฺภิทามคฺเค. ตตฺถ จ มคฺเคน ปหีนกิเลสานเมว ติธา นวตฺตพฺพตํ อปากฏํ สุปากฏํ กาตุํ อชาตผลรุกฺโข อุปมาภาเวน อาคโต[Pg.119]. อตีตาทีนํ อปฺปหีนตา ทสฺสนตฺถมฺปิ ‘‘ชาตผลรุกฺเขน ทีเปตพฺพ’’นฺติ วุตฺตํ. ตตฺถ ยถา อจฺฉินฺเน รุกฺเข นิพฺพตฺตารหานิ ผลานิ ฉินฺเน อนุปฺปชฺชมานานิ น กทาจิ สสภาวานิ อเหสุํ โหนฺติ ภวิสฺสนฺติ จาติ ตานิ อตีตาทิภาเวน น วตฺตพฺพานิ, เอวํ มคฺเคน ปหีนกิเลสา จ ทฏฺฐพฺพา. ยถา เฉเท อสติ ผลานิ อุปฺปชฺชิสฺสนฺติ, สติ จ นุปฺปชฺชิสฺสนฺตีติ เฉทสฺส สาตฺถกตา, เอวํ มคฺคภาวนาย จ สาตฺถกตา โยเชตพฺพา. 'पटिसंभिदामग्ग' (प्रतिसंभिदामार्ग) मध्ये म्हटले आहे. आणि तेथे मार्गाने प्रहीण झालेल्या क्लेशांचेच तीन प्रकारे 'न सांगता येणे' जे अप्रकट होते ते स्पष्ट करण्यासाठी 'फळ न आलेले झाड' उपमेच्या रूपाने आले आहे. अतीत इत्यादींची अप्रहीणता (नष्ट न होणे) दर्शवण्यासाठी देखील "फळ आलेल्या झाडाने स्पष्ट करावे" असे म्हटले आहे. तेथे ज्याप्रमाणे न कापलेल्या झाडावर उत्पन्न होण्यास योग्य असलेली फळे, झाड कापल्यावर उत्पन्न न होणारी, कधीही स्वभावाने नव्हती, नाहीत आणि असणार नाहीत, म्हणून ती अतीत इत्यादी भावाने सांगता येत नाहीत; त्याचप्रमाणे मार्गाने प्रहीण झालेले क्लेश समजले पाहिजेत. ज्याप्रमाणे छेद (कापणे) नसताना फळे उत्पन्न होतील, आणि छेद असताना उत्पन्न होणार नाहीत, ही छेदाची सार्थकता आहे; त्याचप्रमाणे मार्गभावनेची सार्थकता जोडली पाहिजे. เตปิ ปชหติเยว กิเลสปฺปหาเนเนว เตสมฺปิ อนุปฺปตฺติธมฺมตาปาทนโต. อภิสงฺขารวิญฺญาณสฺสาติ ปฏิสนฺธิวิญฺญาณสฺส. อุปาทินฺนอนุปาทินฺนโตติ อุปาทินฺนขนฺธโต เจว กิเลสโต จ. อุปปตฺติวเสน วุฏฺฐานํ ทสฺเสตุมาห – ‘‘ภววเสน ปนา’’ติอาทิ. เย โสตาปนฺนสฺส สตฺต ภวา อปฺปหีนา, ตโต ปญฺจ ฐเปตฺวา อิตเร ทฺเว ‘‘สุคติภเวกเทสา’’ติ อธิปฺเปตา. สุคติกามภวโตติ สุคติภเวกเทสภูตกามภวโต. อรหตฺตมคฺโค รูปารูปภวโต วุฏฺฐาติ อุทฺธมฺภาคิยสํโยชนสมุคฺฆาตภาวโต. ยทิ อรหตฺตมคฺโค เอว อริยมคฺโค สิยา, โส เอว สพฺพกิเลเส ปชเหยฺย, สพฺพภเวหิปิ วุฏฺฐเหยฺย. ยสฺมา ปน โอธิโสว กิเลสา ปหียนฺติ, ตสฺมา เหฏฺฐิมเหฏฺฐิมมคฺเคหิ ปหีนาวเสเส กิเลเส โส ปชหติ, อิติ อิมํ สามตฺถิยํ สนฺธาย ‘‘สพฺพภเวหิ วุฏฺฐาติเยวาติปิ วทนฺตี’’ติ วุตฺตํ. ตถา หิ โส เอว ‘‘วชิรูปโม’’ติ วุตฺโต. ते देखील क्लेशांच्या प्रहाणानेच त्यांचा त्याग करतात, कारण त्यांच्यातही अनुत्पत्ती-धर्मता आणली जाते. "अभिसंस्कार विज्ञानाचे" (अभिसङ्खारविञ्ञाणस्स) म्हणजे प्रतिसंधी विज्ञानाचे (पटिसन्धिविञ्ञाण). "उपादिन्न आणि अनुपादिन्न यांपासून" म्हणजे उपादिन्न स्कंधापासून आणि क्लेशांपासून. उत्पत्तीच्या वशाने उठणे (बाहेर पडणे) दर्शवण्यासाठी म्हटले आहे - "भव वशाने तर..." इत्यादी. सोतापन्नाचे (श्रोतआपन्न) जे सात भव प्रहीण झालेले नाहीत, त्यातील पाच सोडून इतर दोन "सुगती भवाचा एक भाग" म्हणून अभिप्रेत आहेत. "सुगती कामभवापासून" म्हणजे सुगती भवाचा एक भाग असलेल्या कामभवापासून. अर्हत्-मार्ग (अरहत्तमग्गो) हा रूप आणि अरूप भवापासून मुक्त होतो (बाहेर पडतो), कारण तो उद्धंभागिय (वरच्या भागातील) संयोजनांचा समूच्छेद करतो. जर केवळ अर्हत्-मार्गच आर्यमार्ग असता, तर त्यानेच सर्व क्लेशांचा प्रहाण केला असता आणि सर्व भवांपासून तो मुक्त झाला असता. परंतु, ज्याअर्थी क्लेश मर्यादित रूपानेच प्रहीण होतात, त्याअर्थी तो खालच्या खालच्या मार्गांनी प्रहीण होऊन उरलेल्या क्लेशांचा प्रहाण करतो. म्हणून हे सामर्थ्य लक्षात घेऊन "सर्व भवांपासून मुक्त होतोच असेही म्हणतात" असे म्हटले आहे. म्हणूनच त्याला "वज्रोपम" (वजिरूपमो) म्हटले आहे. โหตุ ตาว วุตฺตนเยน อนุปฺปนฺนานํ อกุสลานํ อนุปฺปาทาย, อุปฺปนฺนานํ อุปฺปนฺนสทิสานํ ปหานาย อนุปฺปตฺติธมฺมตาปาทนาย มคฺคภาวนา, อถ มคฺคกฺขเณ กถํ อนุปฺปนฺนานํ กุสลานํ อุปฺปาทาย อุปฺปนฺนานญฺจ ฐิติยา ภาวนา โหติ เอกจิตฺตกฺขณิกตฺตา ตสฺสาติ โจเทติ, อิตโร ‘‘มคฺคปฺปวตฺติยาเยวา’’ติ ปริหารมาห. มคฺโค หิ กามญฺเจกจิตฺตกฺขณิโก, ตถารูโป ปนสฺส ปวตฺติวิเสโส, ยํ อนุปฺปนฺนา กุสลา ธมฺมา สาติสยํ อุปฺปชฺชนฺติ, อุปฺปนฺนา จ สวิเสสํ ปาริปูรึ ปาปุณนฺติ. เตนาห ‘‘มคฺโค หี’’ติอาทิ. กิญฺจาปิ อริยมคฺโค วตฺตมานกฺขเณ อนุปฺปนฺโน นาม น โหติ, อนุปฺปนฺนปุพฺพตํ อุปาทาย อุปจารวเสน ตถา วุจฺจตีติ ทสฺเสตุํ ‘‘อนาคตปุพฺพํ หี’’ติอาทิ วุตฺตํ. อยเมวาติ อยํ มคฺคสฺส ยถาปจฺจยปวตฺติ [Pg.120] เอว ฐิติ นามาติ, มคฺคสมงฺคี ปุคฺคโล มคฺคมฺปิ ภาเวนฺโต เอว ตสฺส ฐิติยา ภาเวตีติ วตฺตุํ วฏฺฏติ. सांगितलेल्या पद्धतीने अनुत्पन्न अकुशलांच्या अनुत्पादासाठी, उत्पन्न झालेल्या आणि उत्पन्न होणाऱ्यांसारख्यांच्या प्रहाणासाठी (नष्ट करण्यासाठी) आणि पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्थितीच्या प्राप्तीसाठी मार्गभावना असो. परंतु, मार्गक्षणी (मार्गाच्या क्षणी) अनुत्पन्न कुशलांच्या उत्पादासाठी आणि उत्पन्न झालेल्यांच्या स्थितीसाठी भावना कशी होते, कारण तो (मार्ग) एकाच चित्तक्षणाचा असतो? असा आक्षेप घेतला जातो. दुसरा 'मार्गप्रवृत्तीनेच' असे उत्तर देतो. कारण मार्ग जरी एकाच चित्तक्षणाचा असला, तरी त्याची प्रवृत्तीविशेष (कार्यपद्धती) अशी असते की, ज्यामुळे अनुत्पन्न कुशल धर्म अतिशय उत्कृष्टपणे उत्पन्न होतात आणि उत्पन्न झालेले विशेष परिपूर्णतेला प्राप्त होतात. म्हणूनच 'मग्गो हि' (कारण मार्ग...) इत्यादी म्हटले आहे. जरी आर्यमार्ग वर्तमान क्षणी अनुत्पन्न नसतो, तरी पूर्वी कधीही उत्पन्न न झाल्यामुळे उपचाराने (लाक्षणिक अर्थाने) तसे म्हटले जाते, हे दर्शवण्यासाठी 'अनागतपुब्बं हि' (पूर्वी न आलेला...) इत्यादी म्हटले आहे. 'अयमेव' (हाच) म्हणजे मार्गाची ही प्रत्ययानुसार (कारणांनुसार) प्रवृत्ती म्हणजेच 'स्थिति' होय. मार्गयुक्त (मग्gसमङ्गी) पुद्गल मार्गाची भावना करत असतानाच त्याच्या स्थितीसाठी भावना करतो, असे म्हणणे योग्य आहे. อุปสมมานํ คจฺฉตีติ วิกฺขมฺภนวเสน สมุจฺเฉทวเสน กิเลเส อุปสเมนฺตํ วตฺตติ. ปุพฺพภาคินฺทฺริยานิ เอว วา อธิปฺเปตานิ. เตเนวาห ‘‘กิเลสูปสมตฺถํ วา คจฺฉตี’’ติ. 'उपसममानं गच्छति' (उपशमनाला प्राप्त होतो) म्हणजे विक्खंभन (दडपून टाकणे) आणि समुच्छेद (समूळ नष्ट करणे) यांद्वारे क्लेशांचे उपशमन करत प्रवृत्त होतो. किंवा पूर्वभागातील इंद्रियेच अभिप्रेत आहेत. म्हणूनच 'किलेसुपसमत्थं वा गच्छति' (किंवा क्लेशांच्या उपशमनासाठी जातो) असे म्हटले आहे. ๒๔๘. อธิมุจฺจนฏฺเฐนาติ (ที. นิ. ฏี. ๒.๑๒๙; อ. นิ. ฏี. ๓.๘.๖๖) อธิกํ สวิเสสํ มุจฺจนฏฺเฐน, เตนาห ‘‘สุฏฺฐุ มุจฺจนฏฺโฐ’’ติ. เอเตน สติปิ สพฺพสฺสปิ รูปาวจรชฺฌานสฺส วิกฺขมฺภนวเสน ปฏิปกฺขโต วิมุตฺตภาเว เยน ภาวนาวิเสเสน ตํ ฌานํ สาติสยํ ปฏิปกฺขโต วิมุจฺจิตฺวา ปวตฺตติ, โส ภาวนาวิเสโส ทีปิโต. ภวติ หิ สมานชาติยุตฺโตปิ ภาวนาวิเสเสน ปวตฺติอาการวิเสโส. ยถา ตํ สทฺธาวิมุตฺตโต ทิฏฺฐิปฺปตฺตสฺส, ตถา ปจฺจนีกธมฺเมหิ สุฏฺฐุ วิมุตฺตตาย เอว อนิคฺคหิตภาเวน นิราสงฺกตาย อภิรติวเสน สุฏฺฐุ อธิมุจฺจนฏฺเฐนปิ วิโมกฺโข. เตนาห ‘‘อารมฺมเณ จา’’ติอาทิ. อยํ ปนตฺโถติ อยํ อธิมุจฺจนตฺโถ ปจฺฉิมวิโมกฺเข นิโรเธ นตฺถิ. เกวโล วิมุตฺตตฺโถ เอว ตตฺถ ลพฺภติ, ตํ สยเมว ปรโต วกฺขติ. २४८. 'अधिमुच्चनट्ठेन' (अधिमुक्तीच्या अर्थाने) म्हणजे अधिक विशेष रूपाने मुक्त होण्याच्या अर्थाने, म्हणूनच 'सुट्ठु मुच्चनट्ठो' (चांगल्या प्रकारे मुक्त होण्याचा अर्थ) असे म्हटले आहे. याद्वारे, जरी सर्व रूपावचर ध्यानांचा विक्खंभन (दडपून टाकणे) द्वारे प्रतिपक्षापासून (विरोधी धर्मांपासून) विमुक्त भाव असला, तरी ज्या भावनाविशेषाने ते ध्यान प्रतिपक्षापासून अतिशय उत्कृष्टपणे विमुक्त होऊन प्रवृत्त होते, तो भावनाविशेष दर्शविला आहे. कारण समान जातीचा असूनही भावनाविशेषामुळे प्रवृत्तीच्या आकारात (पद्धतीत) विशेष फरक पडतो. ज्याप्रमाणे श्रद्धाविमुक्तापेक्षा दृष्टीप्राप्ताचा (फरक असतो), त्याचप्रमाणे विरोधी धर्मांपासून चांगल्या प्रकारे विमुक्त झाल्यामुळेच, अनिगृहीत (दडपले न गेलेले) असल्यामुळे, नि:शंकतेमुळे आणि अभिरतीमुळे (आनंदामुळे) चांगल्या प्रकारे अधिमुक्तीच्या अर्थाने देखील विमोक्ष होतो. म्हणूनच 'आरम्मणे च' (आणि आलंबनात...) इत्यादी म्हटले आहे. 'अयं पनत्तो' (हा अर्थ तर) म्हणजे हा अधिमुक्तीचा अर्थ अंतिम विमोक्षात म्हणजेच निरोधात नाही. तेथे केवळ विमुक्तीचाच अर्थ प्राप्त होतो, हे ते स्वतः पुढे सांगतील. รูปีติ เยนายํ สสนฺตติปริยาปนฺเนน รูเปน สมนฺนาคโต, ตํ ยสฺส ฌานสฺส เหตุภาเวน วิสิฏฺฐํ รูปํ โหติ. เยน วิสิฏฺเฐน รูเปน ‘‘รูปี’’ติ วุจฺเจยฺย รูปี-สทฺทสฺส อติสยตฺถทีปนโต, ตเทว สสนฺตติปริยาปนฺนรูปนิมิตฺตํ ฌานมิว ปรมตฺถโต รูปีภาวสาธกนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. เตนาห ‘‘อชฺฌตฺต’’นฺติอาทิ. รูปชฺฌานํ รูปํ อุตฺตรปทโลเปน. รูปานีติ ปเนตฺถ ปุริมปทโลโป ทฏฺฐพฺโพ. เตน วุตฺตํ ‘‘นีลกสิณาทีนิ รูปานี’’ติ. 'रूपी' म्हणजे ज्या स्वतःच्या संततीमध्ये (प्रवाहात) समाविष्ट असलेल्या रूपाने तो युक्त आहे, ते रूप ज्या ध्यानाचे कारण असल्यामुळे विशिष्ट रूप असते. ज्या विशिष्ट रूपामुळे 'रूपी' असे म्हटले जावे, कारण 'रूपी' हा शब्द अतिशयार्थ (विशेष अर्थ) दर्शवतो, तेच स्वतःच्या संततीमध्ये समाविष्ट असलेले रूपनिमित्त ध्यानाप्रमाणे परमार्थतः रूपीभावाचे साधक आहे असे समजावे. म्हणूनच 'अज्झत्तं' (अध्यात्म...) इत्यादी म्हटले आहे. उत्तरपदलोप होऊन 'रूपध्यान' हेच 'रूप' आहे. येथे 'रूपाणि' यामध्ये पूर्वपदलोप समजावा. म्हणूनच 'नीलकसिणादीनि रूपाणि' (नील कसिण इत्यादी रूपे) असे म्हटले आहे. อนฺโตอปฺปนายํ สุภนฺติ อาโภโค นตฺถีติ อิมินา ปุพฺพาโภควเสน อธิมุตฺติ สิยาติ ทสฺเสติ. เอวญฺเหตฺถ ตถาวตฺตพฺพตาปตฺติโจทนา อนวกาสา โหติ. ยสฺมา สุวิสุทฺเธสุ นีลาทีสุ วณฺณกสิเณสุ ตตฺถ กตาธิการานํ อภิรติวเสน สุฏฺฐุ อธิมุตฺติ สิยา, ตสฺมา อฏฺฐกถายํ ตถา ตติโย วิโมกฺโข สํวณฺณิโต. ยสฺมา ปน เมตฺตาทิวเสน ปวตฺตมานา ภาวนา สตฺเต อปฺปฏิกูลโต ทหติ, [Pg.121] เต สุภโต อธิมุจฺจิตฺวาว ปวตฺตติ, ตสฺมา ปฏิสมฺภิทามคฺเค (ปฏิ. ม. ๑.๒๑๒) พฺรหฺมวิหารภาวนา ‘‘สุภวิโมกฺโข’’ติ วุตฺตา, ตยิทํ อุภยมฺปิ เตน เตน ปริยาเยน วุตฺตตฺตา น วิรุชฺฌตีติ ทฏฺฐพฺพํ. 'अंतोअप्पनायं सुभन्ति आभोगो नत्थि' (अर्पणेच्या आत 'शुभ' असा विचार/आभोग नाही) याद्वारे पूर्व आभोगाच्या (विचाराच्या) प्रभावाने अधिमुक्ती असू शकते, हे दर्शविले आहे. अशा प्रकारे येथे 'तसे म्हणणे प्राप्त होते' हा आक्षेप निरवकाश (अयोग्य) ठरतो. ज्याअर्थी अत्यंत विशुद्ध अशा नील इत्यादी वर्णकसिणांमध्ये, ज्यांनी तेथे अधिकार (अभ्यास) केला आहे त्यांच्या अभिरतीमुळे (आनंदामुळे) चांगल्या प्रकारे अधिमुक्ती असू शकते, म्हणूनच अट्ठकथेत (अट्टकथेत) तिसऱ्या विमोक्षाचे तसे वर्णन केले आहे. परंतु, ज्याअर्थी मैत्री इत्यादींच्या प्रभावाने प्रवृत्त होणारी भावना प्राण्यांना अप्रातिकूल्य (अनुकूल) मानून, त्यांना शुभ मानूनच अधिमुक्त होऊन प्रवृत्त होते, म्हणूनच पटिसंभिदामग्गात (प्रतिसंभिदामार्गात) ब्रह्मविहार भावनेला 'शुभविमोक्ष' म्हटले आहे. हे दोन्हीही वेगवेगळ्या पर्यायांनी (दृष्टिकोनांनी) सांगितले असल्यामुळे परस्परांशी विरुद्ध नाहीत, असे समजावे. สพฺพโสติ อนวเสสโต. น หิ จตุนฺนํ อรูปกฺขนฺธานํ เอกเทโสปิ ตตฺถ อวสิฏฺโฐติ. วิสฺสฏฺฐตฺตาติ ยถาปริจฺฉินฺเน กาเล นิโรธิตตฺตา. อุตฺตโม วิโมกฺโข นาม อริเยเหว สมาปชฺชิตพฺพโต, อริยผลปริโยสานตฺตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม นิพฺพานปฺปตฺติภาวโต จ. 'सब्बसो' (सर्वथा) म्हणजे पूर्णपणे, काहीही शिल्लक न ठेवता. कारण चार अरूपस्कंधांचा एक भागही तेथे शिल्लक राहत नाही. 'विस्सट्ठत्ता' (मुक्त झाल्यामुळे) म्हणजे निश्चित केलेल्या काळात निरोध झाल्यामुळे. 'उत्तम विमोक्ष' म्हणजे केवळ आर्यांद्वारेच समापन्न (प्राप्त) होण्याजोगा असल्यामुळे, आर्यफलात त्याची समाप्ती होत असल्यामुळे आणि याच जन्मात (दिट्ठेव धम्मे) निर्वाणप्राप्तीचे स्वरूप असल्यामुळे होय. ๒๔๙. อภิภวตีติ อภิภุ (ที. นิ. ฏี. ๒.๑๗๓; อ. นิ. ฏี. ๓.๖.๖๑-๖๕) ปริกมฺมํ, ญาณํ วา. อภิภุ อายตนํ เอตสฺสาติ อภิภายตนํ, ฌานํ. อภิภวิตพฺพํ วา อารมฺมณสงฺขาตํ อายตนํ เอตสฺสาติ อภิภายตนํ, ฌานํ. อารมฺมณาภิภวนโต อภิภุ จ ตํ อายตนญฺจ โยคิโน สุขวิเสสานํ อธิฏฺฐานภาวโต มนายตนธมฺมายตนภาวโต จาติปิ สสมฺปยุตฺตํ ฌานํ อภิภายตนํ. เตนาห ‘‘อภิภวนการณานี’’ติอาทิ. ตานีติ อภิภายตนสญฺญิตานิ ฌานานิ. สมาปตฺติโต วุฏฺฐิตสฺส อาโภโค ปุพฺพภาคภาวนาวเสน ฌานกฺขเณ ปวตฺตํ อภิภวนาการํ คเหตฺวา ปวตฺโตติ ทฏฺฐพฺโพ. ปริกมฺมวเสน อชฺฌตฺตํ รูปสญฺญี, น อปฺปนาวเสน. น หิ ปฏิภาคนิมิตฺตารมฺมณา อปฺปนา อชฺฌตฺตวิสยา สมฺภวติ. ตํ ปน อชฺฌตฺต ปริกมฺมวเสน ลทฺธํ กสิณนิมิตฺตํ อสุวิสุทฺธเมว โหติ, น พหิทฺธา ปริกมฺมวเสน ลทฺธํ วิย วิสุทฺธํ. २४९. 'अभिभवति' (पराभूत करतो) म्हणून 'अभिभू' म्हणजे परिकर्म किंवा ज्ञान होय. 'अभिभू' (पराभूत करणारे) आयतन (स्थान) आहे ज्याचे, ते 'अभिभायतन' म्हणजे ध्यान होय. किंवा पराभूत करण्याजोगे आलंबन संज्ञक आयतन आहे ज्याचे, ते 'अभिभायतन' म्हणजे ध्यान होय. आलंबनाचा पराभव करत असल्यामुळे ते 'अभिभू' आहे आणि योगी पुरुषाच्या सुखविशेषांचे अधिष्ठान असल्यामुळे तसेच मनायतन व धम्मायतन (धर्मायतन) स्वरूप असल्यामुळे ते आयतन देखील आहे, म्हणून संप्रयुक्त (युक्त) ध्यान हे 'अभिभायतन' आहे. म्हणूनच 'अभिभवनकारणानि' (पराभवाची कारणे...) इत्यादी म्हटले आहे. 'तानि' (ती) म्हणजे अभिभायतन संज्ञक ध्याने होत. समापत्तीमधून उठलेल्या व्यक्तीचा आभोग (विचार) पूर्वभाग-भावनेच्या प्रभावाने ध्यानक्षणी प्रवृत्त झालेल्या पराभव करण्याच्या पद्धतीला ग्रहण करून प्रवृत्त होतो, असे समजावे. परिकर्माच्या प्रभावाने अध्यात्म (स्वतःच्या आत) रूपसंज्ञी असतो, अर्पणेच्या (अप्पना) प्रभावाने नाही. कारण प्रतिभागनिमित्त आलंबन असलेली अर्पणा अध्यात्मविषयक असू शकत नाही. परंतु, ते अध्यात्म परिकर्माच्या प्रभावाने प्राप्त झालेले कसिणनिमित्त अत्यंत विशुद्ध नसते, ज्याप्रमाणे बाह्य परिकर्माच्या प्रभावाने प्राप्त झालेले विशुद्ध असते, तसे ते नसते. ปริตฺตานีติ ยถาลทฺธานิ สุปฺปสราวมตฺตานิ. เตนาห ‘‘อวฑฺฒิตานี’’ติ. ปริตฺตวเสเนวาติ วณฺณวเสน อาโภเค วิชฺชมาเนปิ ปริตฺตวเสเนว อิทมภิภายตนํ วุตฺตํ. ปริตฺตตา เหตฺถ อภิภวนสฺส การณํ. วณฺณาโภเค สติปิ อสติปิ อภิภายตนภาวนา นาม ติกฺขปญฺญสฺเสว สมฺภวติ, น อิตรสฺสาติ ‘‘ญาณุตฺตริโก ปุคฺคโล’’ติ. อภิภวิตฺวา สมาปชฺชตีติ เอตฺถ อภิภวนํ สมาปชฺชนญฺจ อุปจารชฺฌานาธิคมสมนนฺตรเมว อปฺปนาฌานุปฺปาทนนฺติ อาห ‘‘สห นิมิตฺตุปฺปาเทเนเวตฺถ อปฺปนํ ปาเปตี’’ติ. สห นิมิตฺตุปฺปาเทนาติ จ อปฺปนาปริวาสาภาวสฺส ลกฺขณวจนเมตํ. โย ‘‘ขิปฺปาภิญฺโญ’’ติ วุจฺจติ[Pg.122], ตโตปิ ญาณุตฺตรสฺเสว อภิภายตนภาวนา. เอตฺถาติ เอตสฺมึ นิมิตฺเต. อปฺปนํ ปาเปตีติ ภาวนา อปฺปนํ เนติ. 'परित्तानि' (मर्यादित/लहान) म्हणजे जसे प्राप्त झाले आहे तसे, लहान मातीच्या पात्राच्या आकाराचे. म्हणूनच 'अवड्ढितानि' (न वाढवलेले) असे म्हटले आहे. 'परित्तवसेनेव' (मर्यादित रूपानेच) म्हणजे वर्णाच्या (रंगाच्या) रूपाने आभोग (विचार) विद्यमान असतानाही मर्यादित रूपानेच हे अभिभायतन सांगितले आहे. कारण येथे मर्यादित असणे हेच पराभवाचे कारण आहे. वर्णाचा आभोग असताना किंवा नसतानाही अभिभायतन भावना ही तीक्ष्ण प्रज्ञा (बुद्धी) असलेल्या व्यक्तीलाच शक्य होते, इतरांना नाही, म्हणूनच 'ञाणुत्तरिको पुग्गलो' (ज्ञानोत्तरिक पुद्गल) असे म्हटले आहे. 'अभिभवित्वा समापज्जति' (पराभूत करून समापन्न होतो) येथे पराभव करणे आणि समापन्न होणे म्हणजे उपचार ध्यानाच्या प्राप्तीनंतर लगेचच अर्पणा ध्यानाचा उत्पाद होय, म्हणून 'सह निमित्तुप्पादेनेवेत्थ अप्पनं पापेति' (येथे निमित्ताच्या उत्पादासोबतच अर्पणेला प्राप्त करून देतो) असे म्हटले आहे. 'सह निमित्तुप्पादेन' (निमित्ताच्या उत्पादासोबत) हे अर्पणा-परिवासाच्या (अर्पणेच्या विलंबाच्या) अभावाचे लक्षण सांगणारे वचन आहे. ज्याला 'खिप्पाभिञ्ञो' (क्षिप्र-अभिज्ञ - जलद ज्ञान मिळवणारा) म्हटले जाते, त्यापेक्षाही ज्ञानोत्तरिक (श्रेष्ठ ज्ञान असलेल्या) व्यक्तीलाच अभिभायतन भावना प्राप्त होते. 'एत्थ' (येथे) म्हणजे या निमित्तामध्ये. 'अप्पनं पापेति' (अर्पणेला प्राप्त करून देतो) म्हणजे भावना अर्पणेला नेते. เอตฺถ จ เกจิ ‘‘อุปฺปนฺเน อุปจารชฺฌาเน ตํ อารพฺภ เย เหฏฺฐิมนฺเตน ทฺเว ตโย ชวนวารา ปวตฺตนฺติ, เต อุปจารชฺฌาน ปกฺขิกา เอว, ตทนนฺตรญฺจ ภวงฺคปริวาเสน อุปจาราเสวนาย จ วินา อปฺปนา โหติ, สห นิมิตฺตุปฺปาเทเนว อปฺปนํ ปาเปตี’’ติ วทนฺติ, ตํ เตสํ มติมตฺตํ. น หิ ปาริวาสิกปริกมฺเมน อปฺปนาวาโร อิจฺฉิโต, นาปิ มหคฺคตปฺปมาณชฺฌาเนสุ วิย อุปจารชฺฌาเน เอกนฺตโต ปจฺจเวกฺขณา อิจฺฉิตพฺพา, ตสฺมา อุปจารชฺฌานาธิคมโต ปรํ กติปยภวงฺคจิตฺตาวสาเน อปฺปนํ ปาปุณนฺโต ‘‘สห นิมิตฺตุปฺปาเทเนเวตฺถ อปฺปนํ ปาเปตี’’ติ วุตฺโต. ‘‘สห นิมิตฺตุปฺปาเทนา’’ติ จ อธิปฺปายิกมิทํ วจนํ, น นีตตฺถํ, อธิปฺปาโย วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. येथे काही लोक म्हणतात की, 'उपचारध्यान उत्पन्न झाल्यावर, त्याला आरंभ करून जे कमीत कमी दोन किंवा तीन जवनवार प्रवृत्त होतात, ते उपचारध्यानाच्या पक्षाचेच असतात; आणि त्यानंतर भवांगप्रवाहाने आणि उपचाराच्या आसेवनाशिवाय अर्पणा होते, निमित्त उत्पन्न होण्यासोबतच अर्पणा प्राप्त होते.' हे त्यांचे केवळ मत आहे. कारण पारिवासिक परिकर्माने अर्पणावार इच्छित नाही, आणि महग्गत व अप्रमाण ध्यानांप्रमाणे उपचारध्यानात निश्चितपणे प्रत्यवेक्षण इच्छिले जाऊ नये. म्हणून, उपचारध्यानाच्या प्राप्तीनंतर काही भवांगचित्तांच्या समाप्तीनंतर अर्पणा प्राप्त करणाऱ्याच्या बाबतीत 'निमित्त उत्पन्न होण्यासोबतच येथे अर्पणा प्राप्त होते' असे म्हटले आहे. आणि 'निमित्त उत्पन्न होण्यासोबतच' हे वचन अभिप्राययुक्त आहे, नीतार्थ नाही; याचा अभिप्राय सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा। น อนฺโตสมาปตฺติยํ ตทา ตถารูปสฺส อาโภคสฺส อสมฺภวโต, สมาปตฺติโต วุฏฺฐิตสฺส อาโภโค ปุพฺพภาคภาวนาวเสน ฌานกฺขเณ ปวตฺตํ อภิภวนาการํ คเหตฺวา ปวตฺโตติ ทฏฺฐพฺพํ. อภิธมฺมฏฺฐกถายํ (ธ. ส. อฏฺฐ. ๒๐๔) ปน ‘‘อิมินา ปนสฺส ปุพฺพภาโค กถิโต’’ติ วุตฺตํ. อนฺโตสมาปตฺติยํ ตถา อาโภคาภาเว กสฺมา ‘‘ฌานสญฺญายปี’’ติ วุตฺตนฺติ อาห ‘‘อภิภว…เป… อตฺถี’’ติ. समापत्तीच्या आत (अंतःसमापत्तीत) तशा प्रकारचा आभोग (मनोयोग) संभवत नसल्यामुळे, समापत्तीतून उठलेल्या व्यक्तीचा आभोग पूर्वभाग-भावनेच्या वशाने ध्यानक्षणी प्रवृत्त झालेल्या अभिभवन-आकाराला ग्रहण करून प्रवृत्त होतो, असे समजावे. अभिधम्म-अट्ठकथेत (ध. सं. अ. २०४) मात्र 'याने याचा पूर्वभाग सांगितला आहे' असे म्हटले आहे. अंतःसमापत्तीत तशा आभोगाचा अभाव असताना 'ध्यानसंज्ञेमध्येही' असे का म्हटले आहे? म्हणून 'अभिभव...पे... अत्थि' (अभिभवन... इत्यादी आहे) असे म्हटले आहे। วฑฺฒิตปฺปมาณานีติ วิปุลปฺปมาณานีติ อตฺโถ, น เอกงฺคุลทฺวงฺคุลาทิวเสน วฑฺฒิตปฺปมาณานีติ ตถา วฑฺฒนสฺเสเวตฺถ อสมฺภวโต. เตนาห ‘‘มหนฺตานี’’ติ. 'वर्धितप्रमाण' म्हणजे 'विपुल प्रमाण' असा अर्थ आहे, एक बोट, दोन बोटे इत्यादींच्या प्रमाणात वाढवलेले प्रमाण नाही, कारण तशा प्रकारे वाढवणे येथे असंभव आहे. म्हणूनच 'महान' (मोठे) असे म्हटले आहे। รูเป สญฺญา รูปสญฺญา, สา อสฺส อตฺถีติ รูปสญฺญี, น รูปสญฺญี อรูปสญฺญี. สญฺญาสีเสน ฌานํ วทติ. รูปสญฺญาย อนุปฺปาทนเมเวตฺถ อลาภิตา. พหิทฺธาว อุปฺปนฺนนฺติ พหิทฺธาวตฺถุสฺมึเยว อุปฺปนฺนํ. อภิธมฺเม ปน ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ ปริตฺตานิ สุวณฺณทุพฺพณฺณานิ, อปฺปมาณานิ สุวณฺณทุพฺพณฺณานี’’ติ เอวํ จตุนฺนํ อภิภายตนานํ อาคตตฺตา อภิธมฺมฏฺฐกถายํ (ธ. ส. อฏฺฐ. ๒๐๔) ‘‘กสฺมา ปน ยถา สุตฺตนฺเต – ‘อชฺฌตฺตํ รูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ ปริตฺตานี’ติอาทิ วุตฺตํ, เอวํ อวตฺวา อิธ จตูสุปิ อภิภายตเนสุ อชฺฌตฺตํ [Pg.123] อรูปสญฺญิตาว วุตฺตา’’ติ โจทนํ กตฺวา ‘‘อชฺฌตฺตรูปานํ อนภิภวนียโต’’ติ การณํ วตฺวา ‘‘ตตฺถ วา หิ อิธ วา พหิทฺธารูปาเนว อภิภวิตพฺพานิ, ตสฺมา ตานิ นิยมโต วตฺตพฺพานีติ ตตฺราปิ อิธาปิ วุตฺตานิ. ‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี’ติ อิทํ ปน สตฺถุ เทสนาวิลาสมตฺตเมวา’’ติ วุตฺตํ. रूपाविषयीची संज्ञा म्हणजे 'रूपसंज्ञा', ती ज्याच्याकडे आहे तो 'रूपसंज्ञी'; जो रूपसंज्ञी नाही तो 'अरूपसंज्ञी'. संज्ञेच्या मुख्यतेने ध्यानाला सांगितले आहे. रूपसंज्ञेचे उत्पन्न न होणे म्हणजेच येथे 'अलाभिता' (न मिळणे) आहे. 'बाह्यतःच उत्पन्न झाले' म्हणजे बाह्य वस्तूमध्येच उत्पन्न झाले. अभिधम्मात मात्र 'अध्यात्मतः अरूपसंज्ञी बाहेर सुवर्ण आणि दुर्वर्ण अशा मर्यादित रूपांना पाहतो, सुवर्ण आणि दुर्वर्ण अशा अमर्याद रूपांना पाहतो' अशा प्रकारे चार अभिभायतनांचे वर्णन आले असल्यामुळे, अभिधम्म-अट्ठकथेत (ध. सं. अ. २०४) अशी शंका उपस्थित केली आहे की, 'ज्याप्रमाणे सुत्तंतात - अध्यात्मतः रूपसंज्ञी असलेला एक जण बाहेर मर्यादित रूपांना पाहतो - इत्यादी म्हटले आहे, तसे न सांगता येथे चारही अभिभायतनांमध्ये अध्यात्मतः अरूपसंज्ञिताच का सांगितली आहे?' आणि त्याचे कारण 'अध्यात्म रूपांचे अभिभवन (पराभव) न करता येण्याजोगे असल्यामुळे' असे देऊन पुढे म्हटले आहे की, 'तेथे किंवा येथे बाह्य रूपांवरच विजय मिळवायचा (अभिभवन करायचे) असतो, म्हणून ती नियमाने सांगणे आवश्यक आहे, म्हणूनच तेथेही आणि येथेही ती सांगितली आहेत. 'अध्यात्मतः अरूपसंज्ञी' हे मात्र शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) देशनेचा केवळ एक विलास (शैली) आहे।' เอตฺถ จ วณฺณาโภครหิตานิ สหิตานิ จ สพฺพานิ ‘‘ปริตฺตานิ สุวณฺณทุพฺพณฺณานี’’ติ วุตฺตานิ, ตถา ‘‘อปฺปมาณานี’’ติ ทฏฺฐพฺพานิ. อตฺถิ หิ เอโส ปริยาโย ‘‘ปริตฺตานิ อภิภุยฺย ตานิ เจ กทาจิ วณฺณวเสน อาภุชิตานิ โหนฺติ สุวณฺณทุพฺพณฺณานิ อภิภุยฺยา’’ติ. ปริยายกถา หิ สุตฺตนฺตเทสนาติ. อภิธมฺเม ปน นิปฺปริยายเทสนตฺตา วณฺณาโภครหิตานิ วิสุํ วุตฺตานิ, ตถา สหิตานิ. อตฺถิ หิ อุภยตฺถ อภิภวนปริยาโยติ ‘‘อชฺฌตฺตํ รูปสญฺญี’’ติอาทินา ปฐมทุติยอภิภายตเนสุ ปฐมวิโมกฺโข, ตติยจตุตฺถาภิภายตเนสุ ทุติยวิโมกฺโข, วณฺณาภิภายตเนสุ ตติยวิโมกฺโข จ อภิภวนปฺปวตฺติโต สงฺคหิโต, อภิธมฺเม ปน นิปฺปริยายเทสนตฺตา วิโมกฺขาภิภายตนานิ อสงฺกรโต ทสฺเสตุํ วิโมกฺเข วชฺเชตฺวา อภิภายตนานิ กถิตานิ, สพฺพานิ จ วิโมกฺขกิจฺจานิ ฌานานิ วิโมกฺขเทสนายํ วุตฺตานิ. ตเทตํ ‘‘อชฺฌตฺตํ รูปสญฺญี’’ติ อาคตสฺส อภิภายตนทฺวยสฺส อภิธมฺเม อภิภายตเนสุ อวจนโต ‘‘รูปี รูปานิ ปสฺสตี’’ติอาทีนญฺจ สพฺพวิโมกฺขกิจฺจสาธารณวจนภาวโต ววตฺถานํ กตนฺติ วิญฺญายติ. आणि येथे वर्णाचा आभोग नसलेली आणि आभोग असलेली सर्व रूपे 'मर्यादित, सुवर्ण व दुर्वर्ण' अशी सांगितली आहेत, तसेच ती 'अमर्याद' आहेत असे समजावे. कारण हा एक पर्याय (प्रकार) आहे की, 'मर्यादित रूपांवर विजय मिळवून, जर ती कधी वर्णाचा वशाने आभोगित (मनोयोगयुक्त) होतात, तर सुवर्ण व दुर्वर्ण रूपांवर विजय मिळवून.' सुत्तंत-देशना ही पर्याय-कथा (पर्यायी उपदेश) आहे. परंतु अभिधम्मात निष्पर्याय-देशना (थेट उपदेश) असल्यामुळे, वर्णाचा आभोग नसलेली रूपे स्वतंत्रपणे सांगितली आहेत, आणि तशीच आभोग असलेलीही. कारण दोन्ही ठिकाणी अभिभवनाचा पर्याय आहे, म्हणून 'अध्यात्मतः रूपसंज्ञी' इत्यादींद्वारे पहिल्या व दुसऱ्या अभिभायतनांमध्ये पहिला विमोक्ष, तिसऱ्या व चौथ्या अभिभायतनांमध्ये दुसरा विमोक्ष, आणि वर्ण-अभिभायतनांमध्ये तिसरा विमोक्ष अभिभवनाच्या प्रवृत्तीमुळे समाविष्ट केला आहे. परंतु अभिधम्मात निष्पर्याय-देशना असल्यामुळे, विमोक्ष आणि अभिभायतने संकर न करता (स्पष्टपणे) दाखवण्यासाठी विमोक्ष वगळून केवळ अभिभायतने सांगितली आहेत, आणि विमोक्षाचे कार्य करणारी सर्व ध्याने विमोक्ष-देशनेमध्ये सांगितली आहेत. म्हणूनच, 'अध्यात्मतः रूपसंज्ञी' या स्वरूपात आलेल्या दोन अभिभायतनांचे अभिधम्मातील अभिभायतनांमध्ये वर्णन न केल्यामुळे आणि 'रूपी रूपांना पाहतो' इत्यादी वचने सर्व विमोक्ष-कार्यांसाठी साधारण वचन असल्यामुळे, त्यांची व्यवस्था केली गेली आहे असे समजते। ‘‘อชฺฌตฺตรูปานํ อนภิภวนียโต’’ติ อิทํ อภิธมฺเม กตฺถจิปิ ‘‘อชฺฌตฺตํ รูปานิ ปสฺสตี’’ติ อวตฺวา สพฺพตฺถ ยํ วุตฺตํ ‘‘พหิทฺธารูปานิ ปสฺสตี’’ติ, ตสฺส การณวจนํ. เตน ยํ อญฺญเหตุกํ, ตํ เตน เหตุนา วุตฺตํ, ยํ ปน เทสนาวิลาสเหตุกํ อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญิตาย เอว อภิธมฺเม วจนํ, น ตสฺส อญฺญํ การณํ มคฺคิตพฺพนฺติ ทสฺเสติ. อชฺฌตฺตรูปานํ อนภิภวนียตา จ เตสํ พหิทฺธารูปานํ วิย อวิภูตตฺตา, เทสนาวิลาโส จ ยถาวุตฺตววตฺถานวเสน เวทิตพฺโพ, เวเนยฺยชฺฌาสยวเสน วิชฺชมานปริยายกถนภาวโต. ‘‘สุวณฺณทุพฺพณฺณานี’’ติ เอเตเนว สิทฺธตฺตา นีลาทิอภิภายตนานิ น วตฺตพฺพานีติ เจ? น, นีลาทีสุ [Pg.124] กตาธิการานํ นีลาทิภาวสฺเสว อภิภวนการณตฺตา. น หิ เตสํ ปริสุทฺธาปริสุทฺธวณฺณานํ ปริตฺตตา ตทปฺปมาณตา วา อภิภวนการณํ, อถ โข นีลาทิภาโว เอวาติ. เอเตสุ จ ปริตฺตาทิกสิณรูเปสุ ยํ จริตสฺส อิมานิ อภิภายตนานิ อิชฺฌนฺติ, ตํ ทสฺเสตุํ ‘‘อิเมสุ ปนา’’ติอาทิ วุตฺตํ. 'अध्यात्म रूपांचे अभिभवन न करता येण्याजोगे असल्यामुळे' हे विधान अभिधम्मात कोठेही 'अध्यात्मतः रूपांना पाहतो' असे न म्हणता सर्वत्र जे 'बाह्य रूपांना पाहतो' असे म्हटले आहे, त्याचे कारण सांगणारे वचन आहे. त्याद्वारे, जे इतर कारणांमुळे आहे, ते त्या कारणाने सांगितले आहे; परंतु जे देशना-विलासाच्या (उपदेशाच्या शैलीच्या) कारणामुळे अध्यात्मतः अरूपसंज्ञितेचेच अभिधम्मात कथन आहे, त्याचे दुसरे कोणतेही कारण शोधू नये, असे दर्शविले आहे. अध्यात्म रूपांचे अभिभवन न करता येणे हे त्यांच्या बाह्य रूपांप्रमाणे स्पष्ट (प्रकट) नसण्यामुळे आहे, आणि देशना-विलास हा सांगितलेल्या व्यवस्थेनुसार समजून घ्यावा, कारण विनेय (शिष्य) लोकांच्या आशयानुसार पर्यायी कथनाचा भाव विद्यमान असतो. जर असे म्हटले की, 'सुवर्ण व दुर्वर्ण' यानेच सिद्ध होत असल्यामुळे नील (निळे) इत्यादी अभिभायतने सांगण्याची गरज नाही? तर तसे नाही, कारण नील इत्यादींमध्ये ज्यांनी अधिकार (अभ्यास) केला आहे, त्यांच्यासाठी नील इत्यादी भावच अभिभवनाचे कारण आहे. कारण त्या शुद्ध-अशुद्ध वर्णांचे मर्यादित असणे किंवा अमर्यादित असणे हे अभिभवनाचे कारण नाही, तर नील इत्यादी भावच कारण आहे. आणि या मर्यादित इत्यादी कसिण-रूपांमध्ये ज्या चरिताच्या (स्वभावाच्या) व्यक्तीला ही अभिभायतने सिद्ध होतात, ते दर्शवण्यासाठी 'परंतु यांमध्ये...' इत्यादी म्हटले आहे। สพฺพสงฺคาหิกวเสนาติ สกลนีลวณฺณนีลนิทสฺสนนีลนิภาสานํ สาธารณวเสน. วณฺณวเสนาติ สภาววณฺณวเสน. นิทสฺสนวเสนาติ ปสฺสิตพฺพตาวเสน. โอภาสวเสนาติ สปฺปภาสตาย อวภาสนวเสน. อุมาปุปฺผนฺติ อตสิปุปฺผํ. นีลเมว โหติ วณฺณสงฺกราภาวโต. พาราณสิยํ ภวนฺติ พาราณสิยํ สมุฏฺฐิตํ. 'सर्वसंग्राहक वशाने' म्हणजे सर्व नीलवर्ण, नीलनिदर्शन आणि नीलनिर्भास यांच्या साधारण वशाने. 'वर्णाच्या वशाने' म्हणजे स्वभाव-वर्णाच्या वशाने. 'निदर्शनाच्या वशाने' म्हणजे पाहण्यायोग्य असण्याच्या वशाने. 'अवभासाच्या वशाने' म्हणजे प्रभायुक्त (तेजस्वी) असल्याने प्रकाशमान होण्याच्या वशाने. 'उमापुष्प' म्हणजे अळशीचे फूल (अतसीपुष्प). वर्णाचा संकर (मिश्रण) नसल्यामुळे ते केवळ निळेच असते. 'वाराणसीमध्ये होतात' म्हणजे वाराणसीमध्ये उत्पन्न झालेले। เต ธมฺเมติ เต สติปฏฺฐานาทิธมฺเม เจว อฏฺฐวิโมกฺขธมฺเม จ. จิณฺณวสีภาวาเยว ตตฺถ อภิวิสิฏฺฐาย ปญฺญาย ปริโยสานุตฺตรํ สตํ คตา อภิญฺญาโวสานปารมิปฺปตฺตา. 'ते धर्म' म्हणजे ते सतीपट्ठान (स्मृतिप्रस्थान) इत्यादी धर्म आणि आठ विमोक्ष धर्म. तेथे आचरलेल्या वशीभावामुळेच (नियंत्रणामुळेच) अतिविशिष्ट प्रज्ञेने अंतिम श्रेष्ठ ज्ञानाला प्राप्त झालेले, अभिज्ञांच्या समाप्तीची पारमिता (पूर्णता) प्राप्त झालेले आहेत। ๒๕๐. สกลฏฺเฐนาติ (ที. นิ. ฏี. ๓.๓๔๖; อ. นิ. ฏี. ๓.๑๐.๒๕) สกลภาเวน, อสุภนิมิตฺตาทีสุ วิย เอกเทเส อฏฺฐตฺวา อนวเสสโต คเหตพฺพฏฺเฐนาติ อตฺโถ. ยถา เขตฺตํ สสฺสานํ อุปฺปตฺติฏฺฐานํ วฑฺฒิฏฺฐานญฺจ, เอวเมว ตํตํสมฺปยุตฺตธมฺมานนฺติ อาห ‘‘เขตฺตฏฺเฐนา’’ติ. ปริจฺฉินฺทิตฺวาติ อิทํ อุทฺธํ อโธ ติริยนฺติ โยเชตพฺพํ. ปริจฺฉินฺทิตฺวา เอว หิ สพฺพตฺถ กสิณํ วฑฺเฒตพฺพํ. เตน เตน การเณนาติ อุปริอาทีสุ เตน เตน กสิเณน. ยถา กินฺติ อาห – ‘‘อาโลกมิว รูปทสฺสนกาโม’’ติ, ยถา ทิพฺพจกฺขุนา อุทฺธํ เจ รูปํ ทฏฺฐุกาโม, อุทฺธํ อาโลกํ ปสาเรติ, อโธ เจ, อโธ, สมนฺตโต เจ รูปํ ทฏฺฐุกาโม, สมนฺตโต อาโลกํ ปสาเรติ, เอวํ สพฺพกสิณนฺติ อตฺโถ. เอกสฺสาติ ปถวีกสิณาทีสุ เอเกกสฺส. อญฺญภาวานุปคมนตฺถนฺติ อญฺญกสิณภาวานุปคมนทีปนตฺถํ, อญฺญสฺส วา กสิณภาวานุปคมนทีปนตฺถํ. น หิ อญฺเญน ปสาริตกสิณํ ตโต อญฺเญน ปสาริตกสิณภาวํ อุปคจฺฉติ, เอวมฺปิ เนสํ อญฺญกสิณสมฺเภทาภาโว เวทิตพฺโพ. น อญฺญํ ปถวีอาทิ. น หิ อุทเกน ฐิตฏฺฐาเน สสมฺภารปถวี อตฺถิ. อญฺญกสิณสมฺเภโทติ อาโปกสิณาทินา สงฺกโร[Pg.125]. สพฺพตฺถาติ สพฺเพสุ เสสกสิเณสุ. เอกเทเส อฏฺฐตฺวา อนวเสสผรณํ ปมาณสฺส อคฺคหณโต อปฺปมาณํ. เตเนว หิ เนสํ กสิณสมญฺญา. ตถา หิ ‘‘ตญฺหี’’ติอาทิมาห. ตตฺถ เจตสา ผรนฺโตติ ภาวนาจิตฺเตน อารมฺมณํ กโรนฺโต. ภาวนาจิตฺตญฺหิ กสิณํ ปริตฺตํ วา วิปุลํ วา สกลเมว มนสิ กโรติ. २५०. सकलट्ठेन (दी. नि. टी. ३.३४६; अ. नि. टी. ३.१०.२५) म्हणजे सकलभावाने (पूर्ण रूपाने), जसे अशुभनिमित्त इत्यादींमध्ये एका भागात न राहता संपूर्णपणे ग्रहण करण्याच्या अर्थाने, असा अर्थ आहे. ज्याप्रमाणे शेत हे पिकांच्या उत्पत्तीचे आणि वाढीचे स्थान असते, त्याचप्रमाणे त्या त्या संप्रयुक्त धर्मांचे (स्थान असते), म्हणून "खेत्तट्ठेन" (क्षेत्राच्या अर्थाने) असे म्हटले आहे. "परिच्छिन्दित्वा" (मर्यादित करून) हे वर, खाली आणि तिरके या अर्थाशी जोडले पाहिजे. कारण मर्यादित करूनच सर्वत्र कसिण वाढवले पाहिजे. "तेन तेन कारणेन" म्हणजे वर इत्यादींमध्ये त्या त्या कसिणाने. "कशा प्रकारे" हे सांगण्यासाठी म्हटले आहे - "आलोकमिव रूपदस्सनकामो" (ज्याप्रमाणे रूप पाहण्याची इच्छा असणारा प्रकाशाचा विस्तार करतो), ज्याप्रमाणे दिव्यचक्षूने जर वरचे रूप पाहण्याची इच्छा असेल तर वर प्रकाश पसरवतो, जर खाली असेल तर खाली, आणि जर चहूबाजूंनी रूप पाहण्याची इच्छा असेल तर चहूबाजूंनी प्रकाश पसरवतो, त्याचप्रमाणे सर्व कसिणांच्या बाबतीत समजावे, असा अर्थ आहे. "एकस्स" म्हणजे पठवीकसिण इत्यादींपैकी एकेकाचे. "अञ्ञभावानुपगमनत्थं" म्हणजे इतर कसिणभावाला प्राप्त न होणे दर्शवण्यासाठी, किंवा दुसऱ्याच्या कसिणभावाला प्राप्त न होणे दर्शवण्यासाठी. कारण एकाने पसरवलेले कसिण दुसऱ्याने पसरवलेल्या कसिणभावाला प्राप्त होत नाही, अशा प्रकारे त्यांचा इतर कसिणांशी संभेद (मिसळणे) न होणे समजले पाहिजे. "न अञ्ञं" म्हणजे पठवी इत्यादी इतर नाही. कारण पाण्याने व्यापलेल्या ठिकाणी ससंभार पठवी (माती) नसते. "अञ्ञकसिणसम्भेदो" म्हणजे आपोकसिण इत्यादींशी संकर (मिसळणे). "सब्बत्थ" म्हणजे इतर सर्व कसिणांमध्ये. एका भागात न राहता संपूर्णपणे पसरणे, प्रमाणाचे ग्रहण न केल्यामुळे "अप्पमाण" (अप्रमाण/अमर्याद) आहे. म्हणूनच त्यांना "कसिण" ही संज्ञा आहे. म्हणूनच "तञ्हि" इत्यादी म्हटले आहे. तेथे "चेतसा फरन्तो" म्हणजे भावनाचित्ताने आलंबन (आरम्मण) करत. कारण भावनाचित्त कसिणाला लहान किंवा मोठे, संपूर्णपणे मनात धारण करते. กสิณุคฺฆาฏิมากาเส ปวตฺตํ วิญฺญาณํ ผรณอปฺปมาณวเสน ‘‘วิญฺญาณกสิณ’’นฺติ วุตฺตํ. ตถา หิ ตํ ‘‘วิญฺญาณ’’นฺติ วุจฺจติ. กสิณวเสนาติ อุคฺฆาฏิตกสิณวเสน กสิณุคฺฆาฏิมากาเส อุทฺธํอโธติริยตา เวทิตพฺพา. ยตฺตกญฺหิ ฐานํ กสิณํ ปสาริตํ, ตตฺตกํ อากาสภาวนาวเสน อากาสํ โหตีติ. เอวํ ยตฺตกํ ฐานํ อากาสํ หุตฺวา อุปฏฺฐิตํ, ตตฺตกํ อากาสเมว หุตฺวา วิญฺญาณสฺส ปวตฺตนโต อาคมนวเสน วิญฺญาณกสิเณปิ อุทฺธํอโธติริยตา วุตฺตาติ ‘‘กสิณุคฺฆาฏิมากาสวเสน ตตฺถ ปวตฺตวิญฺญาเณ อุทฺธํอโธติริยตา เวทิตพฺพา’’ติ อาห. कसिण काढून घेतलेल्या आकाशात (कसिणुग्घाटिमाकास) प्रवृत्त झालेल्या विज्ञानाला, पसरण्याच्या आणि अमर्यादतेच्या दृष्टीने "विञ्ञाणकसिण" (विज्ञानकसिण) असे म्हटले आहे. कारण त्याला "विज्ञाण" (विज्ञान) असे म्हटले जाते. "कसिणवसेन" म्हणजे काढून घेतलेल्या कसिणाच्या प्रभावाने कसिण काढून घेतलेल्या आकाशात वर, खाली आणि तिरके असणे समजले पाहिजे. कारण जितक्या जागेत कसिण पसरवले जाते, तितकी जागा आकाशभावनेच्या प्रभावाने आकाश बनते. अशा प्रकारे जितकी जागा आकाश बनून उपस्थित होते, तितकी जागा आकाशच बनून विज्ञानाच्या प्रवृत्तीमुळे (प्रवाहामुळे) विज्ञानकसिणामध्येही वर, खाली आणि तिरके असणे सांगितले आहे, म्हणून "कसिण काढून घेतलेल्या आकाशाच्या प्रभावाने तेथे प्रवृत्त झालेल्या विज्ञानात वर, खाली आणि तिरके असणे समजले पाहिजे" असे म्हटले आहे. ๒๕๒. วุตฺโตเยว วมฺมิกสุตฺเต. นิสฺสิตญฺจ ฉวตฺถุนิสฺสิตตฺตา วิปสฺสนาญาณสฺส. ปฏิพทฺธญฺจ เตน วินา อปฺปวตฺตนโต กายสญฺญิตานํ รูปธมฺมานํ อารมฺมณกรณโต จ. สุฏฺฐุ ภาติ โอภาสตีติ วา สุโภ. กุรุวินฺทชาติอาทิชาติวิเสโสปิ มณิ อากรปาริสุทฺธิมูลโก เอวาติ อาห ‘‘สุปริสุทฺธอากรสมุฏฺฐิโต’’ติ. โทสนีหรณวเสน ปริกมฺมนิปฺผตฺตีติ อาห ‘‘สุฏฺฐุ กตปริกมฺโม อปนีตปาสาณสกฺขโร’’ติ. โธวนเวธนาทีหีติ จตูสุ ปาสาเณสุ โธวเนน เจว กาฬกาทิอปหรณตฺถาย สุตฺเตน อาวุนนตฺถาย จ วิชฺฌเนน. ตาปสณฺหกรณาทีนํ สงฺคโห อาทิ-สทฺเทน. วณฺณสมฺปตฺตินฺติ สุตฺตสฺส วณฺณสมฺปตฺตึ. २५२. वम्मिकसुत्तात (वाळवीच्या टेकडीच्या सूत्तात) हे सांगितलेच आहे. आणि विपश्यनाज्ञानाचे (विपस्सनाञाण) सहा वस्तूंवर (चवत्थु) आश्रित असल्यामुळे ते "निस्सित" (आश्रित) आहे. आणि त्याशिवाय प्रवृत्त न होण्यामुळे आणि "कायसंज्ञित" रूपधर्मांना आलंबन बनवण्यामुळे ते "पटिबद्ध" (प्रतिबद्ध/जोडलेले) आहे. जे चांगल्या प्रकारे चमकते किंवा प्रकाशित होते ते "सुभ" (शुभ/सुंदर) होय. कुरुविंद इत्यादी जातींचा विशेष मणी देखील खाणीच्या शुद्धतेवरच आधारित असतो, म्हणून "सुपरिसुद्धआकरसमुट्ठितो" (अतिशय शुद्ध खाणीतून उत्पन्न झालेला) असे म्हटले आहे. दोष दूर करण्याच्या दृष्टीने परिकर्म (संस्कार) पूर्ण होते, म्हणून "सुट्ठु कतपरिकम्मो अपनीतपासाणसक्खरो" (चांगल्या प्रकारे संस्कार केलेला, दगड आणि खडे दूर केलेला) असे म्हटले आहे. "धोवनवेधनादीही" म्हणजे चार दगडांवर धुण्याने आणि काळे डाग इत्यादी दूर करण्यासाठी व दोऱ्यात ओवण्यासाठी छिद्र पाडण्याने. "आदि" शब्दाने तापवणे, गुळगुळीत करणे इत्यादींचा संग्रह होतो. "वण्णसम्पत्तिं" म्हणजे दोऱ्याची वर्णसंपत्ती (रंग आणि गुणवत्ता). มณิ วิย กรชกาโย ปจฺจเวกฺขิตพฺพโต. อาวุตสุตฺตํ วิย วิปสฺสนาญาณํ อนุปวิสิตฺวา ฐิตตฺตา. จกฺขุมา ปุริโส วิย วิปสฺสนาลาภี ภิกฺขุ สมฺมเทว ตสฺส ทสฺสนโต. ตทารมฺมณานนฺติ รูปธมฺมารมฺมณานํ. ผสฺสปญฺจมกจิตฺตเจตสิกคฺคหเณน คหิตธมฺมาปิ วิปสฺสนาจิตฺตุปฺปาทปริยาปนฺนา เอวาติ เวทิตพฺพํ. เอวญฺหิ เตสํ วิปสฺสนาญาณคติกตฺตา ‘‘อาวุตสุตฺตํ วิย วิปสฺสนาญาณ’’นฺติ วจนํ อวิโรธิตํ โหติ. मण्याप्रमाणे हा भौतिक शरीर (करजकाय) प्रत्यवेक्षण (निरीक्षण) करण्याजोगा असल्यामुळे आहे. ओवलेल्या दोऱ्याप्रमाणे विपश्यनाज्ञान (विपस्सनाञाण) त्यात प्रवेश करून राहिलेले असल्यामुळे आहे. डोळस माणसाप्रमाणे विपश्यना प्राप्त भिक्खू त्याचे योग्य प्रकारे दर्शन करत असल्यामुळे (दस्सतो) आहे. "तदारम्मणानं" म्हणजे रूपधर्मांचे आलंबन असणाऱ्यांचे. स्पर्श-पंचमक (फस्सपञ्चमक) चित्त आणि चैतसिकांच्या ग्रहणाने ग्रहण केलेले धर्म देखील विपश्यना-चित्तोत्पादामध्ये समाविष्ट आहेत, असे समजले पाहिजे. कारण अशा प्रकारे त्यांचे विपश्यनाज्ञानाच्या गतीचे (स्वभावाचे) असल्यामुळे "ओवलेल्या दोऱ्याप्रमाणे विपश्यनाज्ञान" हे वचन सुसंगत (अविरोधी) ठरते. ญาณสฺสาติ [Pg.126] ปจฺจเวกฺขณญาณสฺส. ยทิ เอวํ ญาณสฺส วเสน วตฺตพฺพํ, น ปุคฺคลสฺสาติ อาห ‘‘ตสฺส ปนา’’ติอาทิ. มคฺคสฺส อนนฺตรํ, ตสฺมา โลกิยาภิญฺญานํ ปรโต ฉฏฺฐาภิญฺญาย ปุรโต วตฺตพฺพํ วิปสฺสนาญาณํ. เอวํ สนฺเตปีติ ยทิปายํ ญาณานุปุพฺพฏฺฐิติ, เอวํ สนฺเตปิ เอตสฺส อนฺตรา วาโร นตฺถีติ ปญฺจสุ โลกิยาภิญฺญาสุ กถิตาสุ อากงฺเขยฺยสุตฺตาทีสุ (ม. นิ. ๑.๖๔ อาทโย) วิย ฉฏฺฐาภิญฺญา กเถตพฺพาติ เอตสฺส อนภิญฺญาลกฺขณสฺส วิปสฺสนาญาณสฺส ตาสํ อนฺตรา วาโร น โหติ, ตสฺมา ตตฺถ อวสราภาวโต อิเธว รูปาวจรจตุตฺถชฺฌานานนฺตรเมว ทสฺสิตํ วิปสฺสนาญาณํ. ยสฺมา จาติ จ-สทฺโท สมุจฺจยตฺโถ. เตน น เกวลํ ตเทว, อถ โข อิทมฺปิ การณํ วิปสฺสนาญาณสฺส อิเธว ทสฺสเนติ อิมมตฺถํ ทีเปติ. ทิพฺเพน จกฺขุนา เภรวรูปํ ปสฺสโตติ เอตฺถ อิทฺธิวิธญาเณน เภรวํ รูปํ นิมฺมินิตฺวา จกฺขุนา ปสฺสโตติ วตฺตพฺพํ, เอวมฺปิ อภิญฺญาลาภิโน อปริญฺญาณวตฺถุกสฺส ภยสนฺตาโส อุปฺปชฺชติ อุจฺจวาลิกวาสีมหานาคตฺเถรสฺส วิย. อิธาปีติ อิมสฺมึ วิปสฺสนาญาเณปิ, น สติปฏฺฐานาทีสุ เอวาติ อธิปฺปาโย. "ञाणस्स" म्हणजे प्रत्यवेक्षणज्ञानाचे (पच्चवेक्खणञाण). जर असे असेल तर ज्ञानाच्या दृष्टीने सांगितले पाहिजे, पुद्गलाच्या (व्यक्तीच्या) दृष्टीने नाही, म्हणून "तस्स पना" (परंतु त्याचे) इत्यादी म्हटले आहे. मार्गाच्या (मग्ग) लगेच नंतर, म्हणून लौकिक अभिज्ञांच्या पलीकडे आणि सहाव्या अभिज्ञेच्या आधी विपश्यनाज्ञान सांगितले पाहिजे. "एवं सन्तेपि" (असे असूनही) म्हणजे जरी हा ज्ञानाचा अनुक्रम असला, तरी असे असूनही याच्या मध्ये कोणताही वाव नाही, म्हणून पाच लौकिक अभिज्ञा सांगितल्या गेल्यावर "आकंखेय्यसुत्त" इत्यादींमध्ये (म. नि. १.६४ इत्यादी) ज्याप्रमाणे सहावी अभिज्ञा सांगितली पाहिजे, त्याप्रमाणे या अभिज्ञा-लक्षण नसलेल्या विपश्यनाज्ञानाचा त्यांच्या मध्ये वाव होत नाही. म्हणून तेथे संधी नसल्यामुळे येथेच रूपावचर चतुर्थ ध्यानानंतर लगेच विपश्यनाज्ञान दाखवले आहे. "यस्मा च" मधील "च" शब्द हा समुच्चयार्थक आहे. त्याने केवळ तेच नाही, तर हे देखील विपश्यनाज्ञान येथेच दाखवण्याचे कारण आहे, हा अर्थ स्पष्ट होतो. "दिव्यचक्षूने भयानक रूप पाहणाऱ्याच्या" बाबतीत येथे ऋद्धिविधज्ञानाने (इद्धिविधञाण) भयानक रूप निर्माण करून चक्षूने पाहतो असे म्हटले पाहिजे. असे असूनही, ज्या गोष्टीचे पूर्ण ज्ञान झालेले नाही अशा अभिज्ञाप्राप्त व्यक्तीला देखील उच्चवालिकवासी महानाग थेरांप्रमाणे भय आणि संत्रास उत्पन्न होतो. "इधापि" म्हणजे या विपश्यनाज्ञानात देखील, केवळ सतिपट्ठान (स्मृतिप्रस्थान) इत्यादींमध्येच नाही, असा अभिप्राय आहे. ๒๕๓. มโนมยิทฺธิยํ จิณฺณวสิตาย อภิญฺญา โวสานปารมิปฺปตฺตตา เวทิตพฺพาติ โยชนา. มเนน นิพฺพตฺตนฺติ อภิญฺญามเนน นิพฺพตฺติตํ. ตํ สทิสภาวทสฺสนตฺถเมวาติ สณฺฐานโตปิ วณฺณโตปิ อวยววิเสสโตปิ สทิสภาวทสฺสนตฺถเมว. สชาติยํ ฐิโต, น นาคิทฺธิยา อญฺญชาติรูโป. สุปริกมฺมกตมตฺติกาทโย วิย อิทฺธิวิธญาณํ วิกุพฺพนกิริยาย นิสฺสยภาวโต. २५३. मनोमय ऋद्धीमध्ये (मनोमयिद्धि) वशित्व प्राप्त केल्यामुळे अभिज्ञेची परिपूर्णता (वोसानपारमिप्पत्तता) प्राप्त झाली आहे, असे समजले पाहिजे, अशी योजना आहे. "मनेन निब्बत्तं" म्हणजे अभिज्ञा-मनाने निर्माण केलेले. "ते सादृश्य दाखवण्यासाठीच आहे" म्हणजे आकाराने, वर्णाने आणि अवयवांच्या वैशिष्ट्याने देखील सादृश्य दाखवण्यासाठीच आहे. आपल्याच जातीत राहिलेला, नागऋद्धीप्रमाणे इतर जातीच्या रूपाचा नाही. चांगल्या प्रकारे संस्कार केलेली माती इत्यादींप्रमाणे ऋद्धिविधज्ञान हे विकुब्बन-क्रियेचे (रूपांतरण क्रियेचे) आश्रयस्थान असल्यामुळे आहे. ๒๕๕. อปฺปกสิเรเนวาติ อกิจฺเฉเนว. २५५. "अप्पकसिरेनेव" म्हणजे कोणत्याही कष्टाशिवाय (सहजपणेच). ๒๕๖. มนฺโท อุตฺตานเสยฺยกทารโกปิ ‘‘ทหโร’’ติ วุจฺจตีติ ตโต วิเสสนตฺถํ ‘‘ยุวา’’ติ วุตฺตํ. ยุวาปิ โกจิ อนิจฺฉนโต อมณฺฑนสีโล โหตีติ ตโต วิเสสนตฺถํ ‘‘มณฺฑนกชาติโก’’ติ วุตฺตํ. เตน วุตฺตํ ‘‘ยุวาปี’’ติอาทิ. กาฬติลปฺปมาณา พินฺทโว กาฬติลกานิ. นาติกมฺมาสติลปฺปมาณา พินฺทโว ติลกานิ. วงฺกํ นาม ปิยงฺคํ. โยพฺพนปีฬกาทโย มุขทูสิปีฬกา. มุขคโต โทโส มุขโทโส, ลกฺขณวจนญฺเจตํ มุเข อโทสสฺสปิ ปากฏภาวสฺส อธิปฺเปตตฺตา[Pg.127]. ยถา วา มุเข โทโส, เอวํ มุเข อโทโสปิ มุขโทโส สรโลเปน, มุขโทโส จ มุขโทโส จ มุขโทโสติ เอกเสสนเยนเปตฺถ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. เอวญฺหิ ปเรสํ โสฬสวิธํ จิตฺตํ ปากฏํ โหตีติ วจนํ สมตฺถิตํ โหติ. २५६. मन्द (अजाण) पाठीवर निजणाऱ्या बालकालाही 'दहर' (लहान) म्हटले जाते, म्हणून त्याहून वेगळेपण दर्शवण्यासाठी 'युवा' असे म्हटले आहे. तरुण असूनही कोणी इच्छेअभावी अलंकार न घालणारा (अमण्डनशील) असू शकतो, म्हणून त्याहून वेगळेपण दर्शवण्यासाठी 'मण्डनकजातिक' (अलंकारप्रिय स्वभावाचा) असे म्हटले आहे. म्हणूनच 'युवापि' (तरुण असूनही) इत्यादी म्हटले आहे. काळ्या तिळाच्या आकाराचे ठिपके म्हणजे 'काळतिलक' (काळे तीळ). फारसे न पसरलेले तिळाच्या आकाराचे ठिपके म्हणजे 'तिलक'. 'वङ्क' म्हणजे प्रियंगू (एक वनस्पती). तारुण्यपिटिका इत्यादी म्हणजे 'मुखदूषिपिटिका' (चेहऱ्यावरील मुरुम). चेहऱ्यावरील दोष म्हणजे 'मुखदोष', आणि हे लक्षणात्मक वचन आहे कारण चेहऱ्यावर दोष नसतानाही स्पष्टता अभिप्रेत आहे. किंवा जसा चेहऱ्यावर दोष असतो, त्याचप्रमाणे चेहऱ्यावर दोष नसणे देखील स्वराच्या लोपाने 'मुखदोष' होते, आणि 'मुखदोष' व 'मुखदोष' मिळून 'मुखदोष' असा एकशेष पद्धतीने येथे अर्थ समजला पाहिजे. अशा प्रकारे इतरांचे सोळा प्रकारचे चित्त प्रकट होते, हे वचन सिद्ध होते. ๒๕๙. ปฏิปทาวเสนาติ ยถารหํ สมถวิปสฺสนามคฺคปฏิปทาวเสน. อฏฺฐสุ โกฏฺฐาเสสูติ สติปฏฺฐานาทีสุ โพธิปกฺขิยธมฺมโกฏฺฐาเสสุ, วิโมกฺขโกฏฺฐาเสสุ วาติ อิเมสุ อฏฺฐสุ โกฏฺฐาเสสุ. เสเสสูติ วุตฺตาวเสเสสุ อภิภายตนโกฏฺฐาสาทีสุ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. २५९. 'प्रतिपदेच्या वशाने' म्हणजे योग्यतेनुसार समथ-विपश्यना-मार्ग-प्रतिपदेच्या वशाने. 'आठ कोठ्ठासांमध्ये' (भागांमध्ये) म्हणजे सतिपट्ठान (स्मृतिप्रस्थान) इत्यादी बोधिपक्खिय धम्मांच्या भागांमध्ये किंवा विमोक्षाच्या भागांमध्ये, या आठ भागांमध्ये. 'उर्वरितांमध्ये' म्हणजे सांगितलेल्या उर्वरित अभिभायतन (अभिभ्वायतन) इत्यादी भागांमध्ये. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. มหาสกุลุทายิสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. महासकुलुदायिसुत्त-वर्णनाची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ-प्रकाशिनी टीका) समाप्त झाली. ๘. สมณมุณฺฑิกาปุตฺตสุตฺตวณฺณนา ८. समणमुण्डिकापुत्तसुत्त-वर्णना (टीका) ๒๖๐. อุคฺคหิตุนฺติ สิกฺขิตุํ. อุคฺคาเหตุนฺติ สิกฺขาเปตุํ, ปาฐโต อตฺตนา ยถาอุคฺคหิตมตฺถํ ตพฺพิภาวนตฺถาย อุจฺจารณวเสน ปเรสํ คาเหตุนฺติ อตฺโถ. สมยนฺติ ทิฏฺฐึ. สา หิ สํโยชนภาวโต สเมติ สมฺพนฺธา เอติ ปวตฺตติ, ทฬฺหคฺคหณภาวโต วา สํยุตฺตา อยนฺติ ปวตฺตนฺติ สตฺตา ยถาภินิเวสํ เอเตนาติ สมโยติ วุจฺจติ. ทิฏฺฐิสํโยชเนน หิ สตฺตา อติวิย พชฺฌนฺตีติ. สูริยสฺส อุคฺคมนโต อตฺถงฺคมา อยํ เอตฺตโก กาโล รตฺตนฺธการวิธมนโต ทิวา นาม, ตสฺส ปน มชฺฌิมปหารสญฺญิโต กาโล สมุชฺชลิตปภาเตชทหนภาเวน ทิวา นาม. เตนาห ‘‘ทิวสสฺสปิ ทิวาภูเต’’ติ. ปฏิสํหริตฺวาติ นิวตฺเตตฺวา. เอวํ จิตฺตสฺส ปฏิสํหรณํ นาม โคจรกฺเขตฺเต ฐปนนฺติ อาห ‘‘ฌานรติเสวนวเสน เอกีภาวํ คโต’’ติ. เอเตน กายวิเวกปุพฺพกํ จิตฺตวิเวกมาห. สีลาทิคุณวิเสสโยคโต มนสา สมฺภาวนียา, เต ปน ยสฺมา อตฺตโน สีลาทิคุเณหิ วิญฺญูนํ มนาปา โหนฺติ (กิเลสอนิคฺคหสฺส ปญฺจปสาทายตฺตตฺตา,) ตสฺมา อาห ‘‘มนวฑฺฒนกาน’’นฺติอาทิ. ตตฺถ อุนฺนมตีติ อุทคฺคํ โหติ. วฑฺฒตีติ สทฺธาวเสน วฑฺฒติ. เตนาห ภควา – ‘‘อนุสฺสรณมฺปหํ, ภิกฺขเว, เตสํ ภิกฺขูนํ พหูปการํ วทามี’’ติ (อิติวุ. ๑๐๔; สํ. นิ. ๕.๑๘๔). २६०. 'उग्गहितुं' म्हणजे शिकण्यासाठी. 'उग्गाहेतुं' म्हणजे शिकवण्यासाठी, पाठावरून स्वतः ग्रहण केलेला अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी उच्चारणाद्वारे इतरांना ग्रहण करून देणे असा अर्थ आहे. 'समय' म्हणजे दृष्टी. कारण ती संयोजनभावामुळे एकत्र येते, संबंधातून येते, प्रवृत्त होते, किंवा दृढ ग्रहणामुळे संयुक्त होऊन प्राणी यानुसार अभिनिवेश करतात, म्हणून याला 'समय' म्हटले जाते. कारण दृष्टी-संयोजनाने प्राणी अत्यंत बद्ध होतात. सूर्याच्या उगवण्यापासून मावळण्यापर्यंतचा हा एवढा काळ रात्रीचा अंधार नष्ट केल्यामुळे 'दिवा' (दिवस) नावाचा आहे, आणि त्याचा मध्यम प्रहराचा काळ प्रज्वलित प्रभा, तेज आणि दाहकतेमुळे 'दिवा' नावाचा आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - 'दिवसाच्याही भर दिवसा'. 'पटिसंहरित्वा' म्हणजे मागे फिरवून. अशा प्रकारे चित्ताचे मागे फिरवणे म्हणजे गोचरक्षेत्रात स्थापित करणे, म्हणून म्हटले आहे - 'ध्यानरतीच्या सेवनाने एकाग्रतेला प्राप्त झालेला'. याद्वारे कायविवेकपूर्वक चित्तविवेक सांगितला आहे. शील इत्यादी गुणविशेषांच्या योगाने मनाने आदरणीय असणारे, आणि ते आपल्या शील इत्यादी गुणांमुळे विद्वानांना प्रिय वाटतात (कारण क्लेशांचा निग्रह हा पाच प्रकारच्या प्रसादावर अवलंबून असतो), म्हणून म्हटले आहे - 'मनवड्ढनकानं' (मनाला आनंद देणाऱ्यांविषयी) इत्यादी. त्यात 'उन्नमति' म्हणजे उदित होते (उत्साही होते). 'वड्ढति' म्हणजे श्रद्धेच्या वशाने वाढते. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे - 'भिक्खूहो, मी त्या भिक्खूंचे अनुस्मरण देखील बहुउपकारी म्हणतो' (इतिवृत्तक १०४; संयुत्त निकाय ५.१८४). ๒๖๑. ปญฺญเปมีติ [Pg.128] ปชานนภาเวน ญาเปมิ ตถา ววตฺถเปมิ. เตนาห ‘‘ทสฺเสมิ ฐเปมี’’ติ. ปริปุณฺณกุสลนฺติ สพฺพโส ปุณฺณกุสลธมฺมํ, อุตฺตมกุสลนฺติ อุตฺตมภาวํ เสฏฺฐภาวํ ปตฺตกุสลธมฺมํ. อโยชฺฌนฺติ วาทยุทฺเธน อโยธนียํ, วาทยุทฺธํ โหตุ, เตน ปราชโย น โหตีติ ทสฺเสติ, เตนาห ‘‘วาทยุทฺเธนา’’ติอาทิ. สํวรปฺปหานนฺติ ปญฺจสุ สํวเรสุ เยน เกนจิ สํวเรน สํวรลกฺขณํ ปหานํ. ปฏิเสวนปฺปหานํ วาติ วา-สทฺเทน ปริวชฺชนปฺปหานาทึ สงฺคณฺหาติ. เสสปเทสูติ ‘‘น ภาสตี’’ติอาทีสุ ปเทสุ. เอเสว นโยติ อิมินา ‘‘อภาสนมตฺตเมว วทตี’’ติ เอวมาทึ อติทิสติ. २६१. 'पञ्ञपेमि' (प्रज्ञापित करतो) म्हणजे प्रजाननभावाने (जाणून घेऊन) ज्ञापित करतो, तसेच प्रस्थापित करतो. म्हणूनच म्हटले आहे - 'दाखवतो, स्थापित करतो'. 'परिपुण्णकुसलं' म्हणजे सर्वतोपरी पूर्ण कुशल धर्म, 'उत्तमकुसलं' म्हणजे उत्तम अवस्था, श्रेष्ठ अवस्था प्राप्त झालेला कुशल धर्म. 'अयोझं' म्हणजे वादविवादाच्या युद्धाने पराभूत न करता येण्याजोगा; वादविवाद होऊ दे, त्याने पराजय होत नाही हे दर्शवतो, म्हणूनच म्हटले आहे - 'वादविवादाच्या युद्धाने' इत्यादी. 'संवरप्पहानं' म्हणजे पाच संवरांपैकी कोणत्याही संवराने संवरलक्षण प्रहाण (त्याग). किंवा 'पटिसेवनप्पहाणं' (प्रतिसेवन प्रहाण) - येथे 'वा' (किंवा) शब्दाने परिवर्जन प्रहाण इत्यादींचा संग्रह होतो. 'उर्वरित पदांमध्ये' म्हणजे 'बोलत नाही' इत्यादी पदांमध्ये. 'हाच नियम आहे' याद्वारे 'केवळ न बोलणेच सांगतो' इत्यादी अतिदेश (लागू) केला आहे. นาภินนฺทีติ น สมฺปฏิจฺฉิ. สาสเน ติณฺณํ ทุจฺจริตานํ มิจฺฉาชีวสฺส วิวชฺชนํ วณฺณียติ, อยญฺจ เอวํ กเถติ, ตสฺมา สาสนสฺส อนุโลมํ วิย วทติ, วทนฺโต จ สมฺมาสมฺพุทฺเธ ธมฺเม จสฺส อปฺปสาทํ น ทสฺเสติ, ตสฺมา ปสนฺนการมฺปิ วทตีติ มญฺญมาโน ตสฺส วาทํ น ปฏิเสเธติ. 'नाभिनन्दि' म्हणजे स्वीकार केला नाही. शासनात (बुद्धांच्या शिकवणीत) तीन दुश्चरित्रांचा आणि मिथ्या आजीविकेचा त्याग करण्याचे वर्णन केले आहे, आणि हा देखील असेच सांगत आहे, म्हणून तो शासनाला अनुकूल असल्यासारखे बोलतो. आणि बोलताना तो सम्यक्संबुद्ध व त्यांच्या धर्माविषयी अप्रसन्नता दर्शवत नाही, म्हणून तो प्रसन्नतेने बोलत आहे असे मानून भगवंत त्याच्या मताचा निषेध करत नाहीत. ๒๖๒. ยถา ตสฺส วจนํ, เอวํ สนฺเตติ ยถา ตสฺส ปริพฺพาชกสฺส วจนํ, เอวํ สมณภาเว สนฺเต ลพฺภมาเน. มยํ ปน เอวํ น วทามาติ เอเตน สมณภาโว นาม เอวํ น โหตีติ ทสฺเสติ. โย หิ ธมฺโม ยาทิโส, ตเถว ตํ พุทฺธา ทีเปนฺติ. วิเสสญาณํ น โหตีติ กายวิเสสวิสยญาณํ ตสฺส ตทา นตฺถิ, ยโต ปรกาเย อุปกฺกมํ กเรยฺยาติ ทสฺเสติ, ตสฺส ปน ตตฺถ วิเสสญาณมฺปิ นตฺเถวาติ. ยสฺมา กายปฏิพทฺธํ กายกมฺมํ, ตสฺมา ตํ นิวตฺเตนฺโต อาห ‘‘อญฺญตฺร ผนฺทิตมตฺตา’’ติ. กิเลสสหคตจิตฺเตเนวาติ ทุกฺขสมฺผสฺสสฺส อสหนนิมิตฺเตน โทมนสฺสสหคตจิตฺเตเนว. ทุติยวาเรปิ เอเสว นโย. ชิฆจฺฉาปิปาสทุกฺขสฺส อสหนนิมิตฺเตน โทมนสฺเสเนว. วิกูชิตมตฺตาติ เอตฺถ วิรูปํ กูชิตํ วิกูชิตํ ปุพฺเพนิวาสสนฺนิสฺสยํ อุปยํ, ตํ ปเนตฺถ โรทนหสนสมุฏฺฐาปกจิตฺตสหคตนฺติ โทสสหคตํ โลภสหคตญฺจาติ ทฏฺฐพฺพํ. จิตฺตนฺติ กุสลจิตฺตํ. อกุสลจิตฺตํ ปน อตีตารมฺมณํ ปวตฺตตีติ วตฺตพฺพเมว นตฺถิ. สริตฺวาติ ยาว น สติสณฺฐาปนา ธมฺมา อุปฺปชฺชนฺติ, ตาว สุปินนฺเต อนุภูตํ วิย ทุกฺขํ สริตฺวา โรทนฺติ. หสนฺตีติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย. อยญฺจ นโย เย ลทฺธสุขารมฺมณา หุตฺวา คหิตปฏิสนฺธิกา มาตุกุจฺฉิโตปิ สุเขเนว นิกฺขมนฺติ, เตสํ วเสน วุตฺโตติ ทฏฺฐพฺโพ. ปายนฺติยาติ อตฺตโน ชนปทเทสรูเปน [Pg.129] ปายนฺติยา. อยมฺปีติ อาชีโวปิ มาตุ อญฺญวิหิตกาเล จ โลกสฺสาทวเสน กิเลสสหคตจิตฺเตเนว โหติ. २६२. 'जसे त्याचे वचन आहे, तसे असताना' म्हणजे जसे त्या परिव्राजकाचे वचन आहे, तसे श्रमणभाव असताना प्राप्त होते. 'आम्ही मात्र असे म्हणत नाही' याद्वारे श्रमणभाव असा नसतो हे दर्शवले आहे. कारण जो धर्म जसा आहे, तसाच बुद्ध ते प्रकाशित करतात. 'विशेष ज्ञान नसते' म्हणजे शरीराच्या विशेष विषयाचे ज्ञान त्याला तेव्हा नसते, ज्यायोगे तो दुसऱ्याच्या शरीरावर काही उपक्रम (क्रिया) करू शकेल हे दर्शवले आहे, आणि त्याला तेथे विशेष ज्ञान देखील नसतेच. ज्याअर्थी कायकर्म हे शरीराशी बद्ध असते, म्हणून त्याला रोखताना म्हटले आहे - 'केवळ थरथरण्याव्यतिरिक्त'. 'क्लेशसहगत चित्तानेच' म्हणजे दुःखद स्पर्शाच्या असह्यतेमुळे उद्भवलेल्या दौर्मनस्ययुक्त चित्तानेच. दुसऱ्या वेळीही हाच नियम आहे. भूक आणि तहानेच्या दुःखाच्या असह्यतेमुळे उद्भवलेल्या दौर्मनस्यानेच. 'विकूजितमत्ता' येथे विकृत कूजन (रडणे/ओरडणे) म्हणजे 'विकूजित' होय, जे पूर्वजन्माच्या संस्कारांवर आधारित उपाय आहे; आणि ते येथे रडणे व हसणे उत्पन्न करणाऱ्या चित्ताशी सहगत असल्याने द्वेषसहगत आणि लोभसहगत आहे असे समजले पाहिजे. 'चित्त' म्हणजे कुशल चित्त. अकुशल चित्त तर भूतकाळातील आलंबनावर प्रवृत्त होते, हे सांगण्याची गरजच नाही. 'स्मरण करून' म्हणजे जोपर्यंत स्मृती प्रस्थापित करणारे धर्म उत्पन्न होत नाहीत, तोपर्यंत स्वप्नात अनुभवलेल्या दुःखासारखे स्मरण करून ते रडतात. 'हसतात' येथेही हाच नियम आहे. आणि हा नियम ज्यांना सुखाचे आलंबन मिळाले आहे आणि ज्यांनी प्रतिसंधी घेतली आहे, जे मातेच्या उदरातून सुखानेच बाहेर पडतात, त्यांच्या संदर्भात सांगितला आहे असे समजले पाहिजे. 'पाजताना' म्हणजे आपल्या प्रादेशिक भाषेनुसार पाजताना. 'हा देखील' म्हणजे आजीविका देखील मातेच्या इतर कामात व्यस्त असताना आणि लोकांच्या आस्वादाच्या वशाने क्लेशसहगत चित्तानेच होते. ๒๖๓. สมธิคยฺหาติ สมฺมา อธิคตภาเวน คเหตฺวา อภิภวิตฺวา วิเสเสตฺวา วิสิฏฺโฐ หุตฺวา. ขีณาสวํ สนฺธายาติ พฺยติเรกวเสน ขีณาสวํ สนฺธาย. อยญฺเหตฺถ อตฺโถ – ขีณาสวมฺปิ โสตาปนฺนกุสลํ ปญฺญเปติ เสกฺขภูมิยํ ฐิตตฺตา. เสสปเทสุปิ เอเสว นโย. २६३. 'समधिगय्ह' म्हणजे सम्यक रीतीने अधिगत (प्राप्त) करून, ग्रहण करून, अभिभूत करून, विशेष करून विशिष्ट होऊन. 'खीणासवाला (क्षीणासवाला) उद्देशून' म्हणजे व्यतिरेक वशाने क्षीणासवाला उद्देशून. येथे हा अर्थ आहे - क्षीणासवाचा देखील स्रोतापन्नाचे कुशल प्रज्ञापित करतो, कारण तो शैक्षभूमीत (सेक्खभूमित) स्थित असतो. उर्वरित पदांमध्येही हाच नियम आहे. ตีณิ ปทานิ นิสฺสายาติ น กาเยน ปาปกํ กมฺมํ กโรติ, น ปาปกํ วาจํ ภาสติ, น ปาปกํ อาชีวํ อาชีวตีติ อิมานิ ตีณิ ปทานิ นิสฺสาย กุสลสีลมูลกา จ อกุสลสีลมูลกา จาติ ทฺเว ปฐมจตุกฺกา ฐปิตา. เอกํ ปทํ นิสฺสายาติ น ปาปกํ สงฺกปฺปํ สงฺกปฺเปตีติ อิมํ เอกปทํ นิสฺสาย กุสลสงฺกปฺปมูลกา อกุสลสงฺกปฺปมูลกา จาติ อิเม ทฺเว ปจฺฉิมจตุกฺกา ฐปิตา. ‘तीन पदांचा आश्रय घेऊन’ म्हणजे शरीराने पाप कर्म करत नाही, वाणीने पापयुक्त बोलत नाही, पापयुक्त उपजीविका करत नाही; या तीन पदांचा आश्रय घेऊन कुशलशीलमूलक आणि अकुशलशीलमूलक असे पहिले दोन चतुष्क स्थापित केले आहेत. ‘एका पदाचा आश्रय घेऊन’ म्हणजे पापयुक्त संकल्प करत नाही; या एका पदाचा आश्रय घेऊन कुशलसंकल्पमूलक आणि अकुशलसंकल्पमूलक असे हे दोन नंतरचे चतुष्क स्थापित केले आहेत. ๒๖๔. วิจิกิจฺฉุทฺธจฺจสหคตจิตฺตทฺวยมฺปิ วฏฺฏติ พลวตา โมเหน สมนฺนาคตตฺตา. ตถา หิ ตานิ ‘‘โมมูหจิตฺตานี’’ติ วุจฺจนฺติ. २६४. विचिकित्सा (शंका) आणि उद्धच्च (चंचलता) यांनी युक्त असलेले दोन्ही चित्त देखील बलवान मोहाने युक्त असल्यामुळे प्रवृत्त होतात. म्हणूनच त्यांना ‘मोमुहचित्त’ (अतिशय मूढ चित्त) असे म्हटले जाते. กุหินฺติ กึนิมิตฺตํ. กตรํฐานํ ปาปุณิตฺวาติ กึ การณํ อาคมฺม. เอตฺเถเตติ เอตฺถาติ กายวจีมโนสุจริตภาวนาสาชีวนิปฺผตฺติยํ. สา ปน เหฏฺฐิมโกฏิยา โสตาปตฺติผเลน ทีเปตพฺพาติ อาห ‘‘โสตาปตฺติผเล ภุมฺม’’นฺติ. ยสฺมา อาชีวฏฺฐมกํ อวสิฏฺฐญฺจ สีลํ ปาติโมกฺขสํวรสีลสฺส จ ปาริสุทฺธิปาติโมกฺขาธิคเมน โสตาปตฺติผลปฺปตฺติยา สิทฺโธ โหตีติ อาห – ‘‘ปาติโมกฺข…เป… นิรุชฺฌตี’’ติ. ‘‘สุขสีโล ทุกฺขสีโล’’ติอาทีสุ วิย ปกติอตฺถสีลสทฺทํ คเหตฺวา วุตฺตํ ‘‘อกุสลสีล’’นฺติอาทิ. ‘कुहिं’ (कोठे) म्हणजे कोणत्या निमित्ताने. ‘कोणत्या स्थानाला प्राप्त करून’ म्हणजे कोणत्या कारणाचा आश्रय घेऊन. ‘येथे’ म्हणजे काय, वाचा आणि मनाच्या सुचरिताच्या भावनेने आजीविकेच्या (उपजीविकेच्या) निष्पत्तीमध्ये. ती (निष्पत्ती) कनिष्ठ पातळीवर स्रोतापत्ती-फलाने दर्शविली पाहिजे, म्हणून ‘स्रोतापत्ती-फलामध्ये सप्तमी विभक्ती’ असे म्हटले आहे. कारण आजीव-अष्टमक आणि उर्वरित शील हे पातिमोक्ख-संवर-शीलाच्या आणि परिशुद्ध-पातिमोक्खाच्या प्राप्तीने स्रोतापत्ती-फल प्राप्तीसाठी सिद्ध होते, म्हणून ‘पातिमोक्ख...पे... निरुद्ध होते’ असे म्हटले आहे. ‘सुखशील, दुःखशील’ इत्यादींप्रमाणे मूळ अर्थातील ‘शील’ शब्द घेऊन ‘अकुशल शील’ इत्यादी म्हटले आहे. ๒๖๕. กามาวจรกุสลจิตฺตเมว วุตฺตํ สมฺปตฺตสมาทานวิรติปุพฺพกสฺส สีลสฺส อธิปฺเปตตฺตา. เตนาห – ‘‘เอเตน หิ กุสลสีลํ สมุฏฺฐาตี’’ติ. २६५. कामावचर कुशल चित्तच सांगितले आहे, कारण संपत्त-विरती आणि समादान-विरती पूर्वगामी असलेल्या शीलाचा येथे अभिप्रेत अर्थ आहे. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘यानेच कुशल शील उत्पन्न होते’. สีลวาติ เอตฺถ วา-สทฺโท ปาสํสตฺโถว เวทิตพฺโพติ อาห ‘‘สีลสมฺปนฺโน โหตี’’ติ. โย สีลมตฺเต ปติฏฺฐิโต, น สมาธิปญฺญาสุ, โส [Pg.130] สีลมยธมฺมปูริตตาย สีลมโย. เตนาห ‘‘อลเมตฺตาวตา’’ติอาทิ. ยตฺถาติ ยสฺสํ เจโตวิมุตฺติยํ ปญฺญาวิมุตฺติยญฺจ. ตทุภยญฺจ ยสฺมา อรหตฺตผเล สงฺคหิตํ, ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘อรหตฺตผเล ภุมฺม’’นฺติ. อเสสํ นิรุชฺฌติ สุขวิปากภาวสฺส สพฺพโส ปฏิปฺปสฺสมฺภนโต. ‘शीलवान’ यामध्ये ‘वा’ (वन्त्) हा शब्द प्रशंसेच्या अर्थानेच समजला पाहिजे, म्हणून ‘शीलसंपन्न होतो’ असे म्हटले आहे. जो केवळ शीलामध्ये प्रतिष्ठित आहे, समाधी आणि प्रज्ञेमध्ये नाही, तो शीलमय धर्माने परिपूर्ण असल्यामुळे ‘शीलमय’ आहे. म्हणूनच ‘एवढ्यानेच पुरेसे आहे’ इत्यादी म्हटले आहे. ‘जिथे’ म्हणजे ज्या चेतोविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्तीमध्ये. आणि ते दोन्ही ज्याअर्थी अर्हत्त्वफलामध्ये समाविष्ट आहेत, म्हणून ‘अर्हत्त्वफलामध्ये सप्तमी विभक्ती’ असे म्हटले आहे. सुखविपाकभावाचा पूर्णपणे उपशम झाल्यामुळे ते पूर्णपणे निरुद्ध होते. ๒๖๖. กามปฏิสํยุตฺตา สญฺญา กามสญฺญา. เสเสสุปิ เอเสว นโย. อิตรา ทฺเวติ พฺยาปาทวิหึสาสญฺญา. २६६. कामाशी संबंधित असलेली संज्ञा म्हणजे ‘कामसंज्ञा’. उरलेल्यांमध्येही हाच नियम लावावा. ‘इतर दोन’ म्हणजे व्यापादसंज्ञा आणि विहिंसासंज्ञा. อนาคามิผลปฐมชฺฌานนฺติ อนาคามิผลสหคตํ ปฐมชฺฌานํ. เอตฺถาติ ยถาวุตฺเต ปฐมชฺฌาเน. เอตฺถ จ อุชุวิปจฺจนีเกน ปฏิปกฺขปฺปหานํ สาติสยนฺติ ปฐมชฺฌานคฺคหณํ. เตนาห ‘‘อปริเสสา นิรุชฺฌนฺตี’’ติ. เนกฺขมฺมสญฺญานํ กามาวจรจิตฺตสหคตตา ตสฺส สีลสฺส สมุฏฺฐานตา จ สมฺปยุตฺตนเยน เวทิตพฺพา. ‘अनागामी-फल-प्रथमध्यान’ म्हणजे अनागामी-फलाने युक्त असलेले प्रथम ध्यान. ‘येथे’ म्हणजे वर सांगितलेल्या प्रथम ध्यानामध्ये. आणि येथे थेट विरोधी असलेल्या प्रतिपक्षाचा त्याग अतिशय श्रेष्ठ आहे, म्हणून प्रथम ध्यानाचा स्वीकार केला आहे. म्हणूनच ‘निरवशेष निरुद्ध होतात’ असे म्हटले आहे. नैष्क्रम्य-संज्ञांची कामावचर-चित्त-सहगतता आणि त्या शीलाची उत्पत्ती संप्रयुक्त नियमाने समजून घ्यावी. ๒๖๗. กุสลสงฺกปฺปนิโรธทุติยชฺฌานิกอรหตฺตผลอกุสลสงฺกปฺปนิโรธ- ปฐมชฺฌานิกอนาคามิผลคฺคหเณน สมโณ ทสฺสิโต. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. २६७. कुशल संकल्पाचा निरोध करणाऱ्या द्वितीय ध्यानाशी संबंधित अर्हत्त्वफल आणि अकुशल संकल्पाचा निरोध करणाऱ्या प्रथम ध्यानाशी संबंधित अनागामीफलाच्या ग्रहणाने श्रमण दर्शविला आहे. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. สมณมุณฺฑิกาปุตฺตสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. समणमुंडिकापुत्त सुत्ताच्या वर्णनातील लीनत्थप्पकासना (गूढ अर्थाचे प्रकटीकरण) समाप्त झाली. ๙. จูฬสกุลุทายิสุตฺตวณฺณนา ९. चूळसकुलुदायि सुत्त वर्णन ๒๗๑. ปญฺโหติ ญาตุํ อิจฺฉิโต อตฺโถ, ตเทว ธมฺมเทสนาย นิมิตฺตภาวโต การณํ. อุปฏฺฐาตูติ ญาณสฺส โคจรภาวํ อุปคจฺฉตุ. เยน การเณนาติ เยน ตุยฺหํ อุปฏฺฐิเตน การเณน ธมฺมเทสนา อุปฏฺฐเหยฺย, ตํ ปน ปริพฺพาชกสฺส อชฺฌาสยวเสน ตถา วุตฺตํ. เตนาห ‘‘เอเตน หิ…เป… ทีเปตี’’ติ. เอกงฺคณานีติ ปิธานาภาเวน เอกงฺคณสทิสานิ. เตนาห ‘‘ปากฏานี’’ติ. २७१. ‘प्रश्न’ म्हणजे जाणून घेण्याची इच्छा असलेला अर्थ, तोच धम्मदेशनेच्या निमित्तभावाचे कारण आहे. ‘उपस्थित होवो’ म्हणजे ज्ञानाच्या गोचरभावाला (विषयाला) प्राप्त होवो. ‘ज्या कारणाने’ म्हणजे तुझ्या उपस्थित असलेल्या ज्या कारणाने धम्मदेशना उपस्थित होईल, ते परिव्राजकाच्या आशयानुसार तसे म्हटले आहे. म्हणूनच ‘यानेच...पे... स्पष्ट करतो’ असे म्हटले आहे. ‘एकंगण’ म्हणजे आवरण नसल्यामुळे एकाच अंगणासारखे. म्हणूनच ‘प्रकट आहेत’ असे म्हटले आहे. ชานนฺโตติ อตฺตโน ตถาภาวํ สยํ ชานนฺโต. สกฺกจฺจํ สุสฺสูสตีติ ‘‘ตถาภูตํเยว มํ ตถา อโวจา’’ติ สาทรํ สุสฺสูสติ. ตสฺมาติ ทิพฺพจกฺขุลาภิโน อนาคตํสญาณลาภโต. เอวมาหาติ ‘‘โย [Pg.131] โข, อุทายิ, ทิพฺเพน จกฺขุนา’’ติ อารภิตฺวา ‘‘โส วา มํ อปรนฺตํ อารพฺภ ปญฺหํ ปุจฺเฉยฺยา’’ติ เอวํ อโวจ. ‘जाणणारा’ म्हणजे स्वतःची तशी स्थिती स्वतः जाणणारा. ‘आदरपूर्वक ऐकण्याची इच्छा करतो’ म्हणजे ‘माझ्याविषयी जसे आहे तसेच त्यांनी मला सांगितले’ अशा आदराने ऐकण्याची इच्छा करतो. ‘त्यामुळे’ म्हणजे दिव्यचक्षू प्राप्त करणाऱ्याला अनागत-ज्ञान (भविष्याचे ज्ञान) प्राप्त झाल्यामुळे. ‘असे म्हणाले’ म्हणजे ‘हे उदायी, जो दिव्यचक्षूने...’ येथपासून सुरुवात करून ‘तो मला अपरान्ताविषयी (भविष्याविषयी) प्रश्न विचारू शकेल’ असे म्हणाले. อิตรนฺติ อวสิฏฺฐํ อิมสฺมึ ฐาเน วตฺตพฺพํ. วุตฺตนยเมวาติ ‘‘โย หิ ลาภี’’ติอาทินา วุตฺตนยเมว. อตีเตติ ปุพฺเพนิวาสานุสฺสติญาณสฺส วิสยภูเต อตฺเถ. อนาคเตติ อนาคตํสญาณสฺส วิสยภูเต อนาคเต อตฺเถ. ‘इतर’ म्हणजे या ठिकाणी सांगण्यासारखे उरलेले. ‘सांगितलेल्या पद्धतीनेच’ म्हणजे ‘जो खरोखर प्राप्त करणारा आहे’ इत्यादी सांगितलेल्या पद्धतीनेच. ‘अतीतामध्ये’ म्हणजे पूर्वनिवासानुस्मृती ज्ञानाचा विषय असलेल्या भूतकाळातील गोष्टींमध्ये. ‘अनागतामध्ये’ म्हणजे अनागत-ज्ञानाचा विषय असलेल्या भविष्यातील गोष्टींमध्ये. ปํสุปเทเส นิพฺพตฺตนโต ปํสุสโมกิณฺณสรีรตาย ปํสุปิสาจกํ. เอกํ มูลํ คเหตฺวาติ ทีฆโส เหฏฺฐิมนฺเตน จตุรงฺคุลํ, อุปริมนฺเตน วิทตฺถิกํ รุกฺขคจฺฉลตาทีสุ ยสฺส กสฺสจิ เอกํ มูลํ คเหตฺวา อญฺญชาติกานํ อทิสฺสมานกาโย โหติ. อยํ กิร เนสํ ชาติสิทฺธา ธมฺมตา. ตตฺราติ ตสฺส มูลวเสน อทิสฺสมานกตาย. น ทิสฺสติ ญาเณน น ปสฺสติ. धूळ किंवा मातीच्या प्रदेशात उत्पन्न झाल्यामुळे आणि शरीर धुळीने माखलेले असल्यामुळे त्याला ‘पांसुपिशाचक’ म्हणतात. ‘एक मूळ धरून’ म्हणजे लांबीने कमीत कमी चार बोटे आणि जास्तीत जास्त एक वीत असलेल्या वृक्ष, झुडूप, वेल इत्यादींचे कोणतेही एक मूळ धरून इतर जातीच्या लोकांना त्याचे शरीर अदृश्य होते. ही खरोखर त्यांची जन्मजात लाभलेली निसर्गसिद्धता आहे. ‘तेथे’ म्हणजे त्या मुळाच्या प्रभावाने अदृश्य झाल्यामुळे दिसत नाही, ज्ञानाने पाहत नाही. ๒๗๒. น จ อตฺถํ ทีเปยฺยาติ อธิปฺเปตมตฺถํ สา วาจา สรูปโต น จ ทีเปยฺย, เกวลํ วาจามตฺตเมวาติ อธิปฺปาโย. ปฏิหริตพฺพฏฺเฐน ปรสนฺตาเน เนตพฺพฏฺเฐน ปฏิหาริย-สทฺททฺวาเรน วิญฺญาตพฺโพ ภาวตฺโถ, โสว ปาฏิหีรโก นิรุตฺตินเยน, นตฺถิ เอตสฺส ปาฏิหีรกนฺติ อปฺปาฏิหีรกตํ, ต-สทฺเทน ปทํ วฑฺเฒตฺวา ตถา วุตฺตํ, อนิยฺยานํ. เตนาห ‘‘นิรตฺถกํ สมฺปชฺชตี’’ติ. สุภกิณฺหเทวโลเก ขนฺธา วิย โชเตตีติ อิมินา – ‘‘ทิพฺโพ รูปี มโนมโย สพฺพงฺคปจฺจงฺคี อหีนินฺทฺริโย อตฺตา’’ติ อิมมตฺถํ ทสฺเสติ. २७२. ‘आणि अर्थ स्पष्ट करत नाही’ म्हणजे ती वाणी अभिप्रेत अर्थाला प्रत्यक्षपणे स्पष्ट करत नाही, केवळ शब्दमात्रच राहते, असा अभिप्राय आहे. दूर करण्याच्या अर्थाने किंवा दुसऱ्याच्या मनात नेण्याच्या अर्थाने ‘पाटीहारिय’ (प्रातिहार्य) या शब्दाद्वारे समजून घेण्याचा जो भावार्थ आहे, तोच निरुक्तीच्या नियमाने ‘पाटीहीरक’ आहे. ज्याला हे प्रातिहार्य नाही ते ‘अप्पाटीहीरकतं’ (अप्रातिहार्यत्व) होय, ‘त’ शब्दाने पद वाढवून तसे म्हटले आहे, जे मोक्षाकडे नेणारे नाही. म्हणूनच ‘निरर्थक ठरते’ असे म्हटले आहे. ‘शुभकिण्ह देवलोकातील स्कंधांप्रमाणे चमकतो’ याने – ‘दिव्य, रूपी, मनोमय, सर्व अवयवांनी युक्त, इंद्रिये उणी नसलेला आत्मा’ हा अर्थ दर्शविला आहे. ๒๗๓. สอุปสคฺคปทสฺส อตฺโถ อุปสคฺเคน วินาปิ วิญฺญายตีติ อาห ‘‘วิทฺเธติ อุพฺพิทฺเธ’’ติ. สา จสฺส อุพฺพิทฺธตา อุปกฺกิเลสวิคเมน สุจิภาเวน อุปฏฺฐานนฺติ อาห ‘‘เมฆวิคเมน ทูรีภูเต’’ติ. อินฺทนีลมณิ วิย ทิพฺพติ โชเตตีติ เทโว, อากาโส. ‘‘อฑฺฒรตฺตสมเย’’ติ วตฺตพฺเพ ภุมฺมตฺเถ วิหิตวจนานํ อจฺจนฺตสํโยคาภาวา อุปโยควจนํ เวทิตพฺพํ. ปุณฺณมาสิยญฺหิ คคนมชฺฌสฺส ปุรโต วา ปจฺฉโต วา อนฺเต ฐิเต อฑฺฒรตฺเต สมโย ภินฺโน นาม โหติ, มชฺเฌ เอว ปน ฐิโต อภินฺโน นาม. เตนาห ‘‘อภินฺเน อฑฺฒรตฺตสมเย’’ติ. २७३. उपसर्गासह असलेल्या पदाचा अर्थ उपसर्गाशिवाय देखील समजतो, म्हणून ‘विद्ध’ म्हणजे ‘उब्बिद्ध’ (उंच उठलेले) असे म्हटले आहे. आणि त्याची ती उब्बिद्धता उपक्किलेशांच्या (मळाच्या) नाशाने शुद्ध स्वरूपात उपस्थित होणे आहे, म्हणून ‘मेघ दूर झाल्यामुळे’ असे म्हटले आहे. इंद्रनील मण्याप्रमाणे जो चमकतो तो ‘देव’ म्हणजे आकाश. ‘मध्यरात्रीच्या वेळी’ असे म्हणताना सप्तमी विभक्तीच्या अर्थात विहित केलेल्या वचनांचा अत्यंत संयोग नसल्यामुळे द्वितीया विभक्ती समजली पाहिजे. कारण पौर्णिमेला आकाशाच्या मध्यभागाच्या पुढे किंवा मागे शेवटी मध्यरात्र असताना वेळ भिन्न असते, परंतु मध्यभागीच असताना ती अभिन्न असते. म्हणूनच ‘अभिन्न मध्यरात्रीच्या वेळी’ असे म्हटले आहे. เย อนุโภนฺตีติ เย เทวา จนฺทิมสูริยานํ อาภา อนุโภนฺติ วินิภุญฺชนฺติ วฬญฺชนฺติ จ เตหิ เทเวหิ พหู เจว พหุตรา จ จนฺทิมสูริยานํ อาภา [Pg.132] อนนุโภนฺโต. เตนาห – ‘‘อตฺตโน สรีโรภาเสเนว อาโลกํ ผริตฺวา วิหรนฺตี’’ติ. "ये अनुभोन्तीति" (जे अनुभवतात) म्हणजे जे देव चंद्र आणि सूर्याच्या प्रकाशाचा अनुभव घेतात, उपभोग घेतात आणि वापर करतात, त्या देवांपेक्षा चंद्र आणि सूर्याच्या प्रकाशाचा अनुभव न घेणारे देव पुष्कळ आणि अत्यंत अधिक आहेत. म्हणूनच म्हटले आहे – "आपल्या शरीराच्या प्रकाशानेच प्रकाश पसरवून विहरतात." ๒๗๔. ปุจฺฉามูฬฺโห ปน ชาโต ‘‘อยํ ปรโม วณฺโณ’’ติ คหิตปทสฺส วิธมเนน. อเจลกปาฬินฺติ ‘‘อเจลโก โหติ มุตฺตาจาโร’’ติอาทินยปฺปวตฺตํ (ที. นิ. ๑.๓๙๔) อเจลกปฏิปตฺติทีปกคนฺถํ, คนฺถสีเสเนว เตน ปกาสิตวาทานิ วทติ. สุราเมรยปานมนุยุตฺตปุคฺคลสฺส สุราปานโต วิรติ ตสฺส กายํ จิตฺตญฺจ ตาเปนฺตี สํวตฺตตีติ สุราปานวิรติ (ตโป, โสเยว คุโณ. เตนาห ‘‘สุราปานวิรตีติ อตฺโถ’’ติ). २७४. परंतु "हा परम वर्ण आहे" या ग्रहण केलेल्या पदाचे खंडन केल्यामुळे तो विचारण्यात गोंधळलेला (मूढ) झाला. 'अचेलकपाळि' म्हणजे "अचेलक (नग्न) असतो, मुक्त आचार असलेला असतो" इत्यादी पद्धतीने प्रवृत्त झालेला (दी. नि. १.३९४) अचेलक-प्रतिपत्ती (नग्न तपस्वींच्या आचरणाचा) प्रकाशक ग्रंथ होय; त्या ग्रंथाच्या शीर्षकाद्वारेच तो त्यात प्रकाशित केलेल्या सिद्धांतांचे प्रतिपादन करतो. सुरा आणि मेरय (मद्य) पिण्यात मग्न असलेल्या व्यक्तीची मद्यपानापासूनची विरती (निवृत्ती) त्याच्या शरीराला आणि चित्ताला ताप देणारी ठरते, म्हणून मद्यपानापासूनची विरती हेच 'तप' आहे, तोच गुण आहे. म्हणूनच म्हटले आहे – "मद्यपानापासून विरती असा अर्थ आहे." ๒๗๕. เอกนฺตํ อจฺจนฺตเมว สุขํ อสฺสาติ เอกนฺตสุขํ. ปญฺจสุ ธมฺเมสูติ ‘‘ปาณาติปาตา ปฏิวิรตี’’ติอาทีสุ ปญฺจสุ สีลาจารธมฺเมสุ. น ชานึสูติ สมฺโมเสน อนุปฏฺฐหนฺติ ตทตฺถํ น พุชฺฌนฺติ. พุทฺธุปฺปาเทน กิร วิหตเตชานิ มหานุภาวานิ มนฺตปทานิ วิย พาหิรกานํ โยคาวจรคนฺเถน สทฺธึ โยคาวจรปฏิปทา นสฺสติ. อุคฺคณฺหึสูติ ‘‘ปญฺจ ปุพฺพภาคธมฺเม’’ติอาทิวจนมตฺตํ อุคฺคณฺหึสุ. ตติยชฺฌานโตติ การโณปจาเรน ผลํ วทติ, ผลภูตโต ตติยชฺฌานโต. २७५. ज्याला एकांततः (पूर्णपणे) आणि अत्यंत सुखच असते, ते 'एकांतसुख' होय. 'पाच धर्मांमध्ये' म्हणजे "पाणातिपातापासून (हिंसेपासून) विरती" इत्यादी पाच शीलाचार रूपी धर्मांमध्ये. 'नाही जाणले' म्हणजे संमोहामुळे (स्मृती भ्रंशामुळे) उपस्थित न राहिल्याने त्याचा अर्थ समजला नाही. बुद्धांच्या उत्पत्तीमुळे जसे बाह्य (इतर) पंथीयांचे महान प्रभावी मंत्रपद नष्टतेज होतात, त्याचप्रमाणे त्यांच्या योगाचार ग्रंथासह योगाचार प्रतिपदा (साधना मार्ग) नष्ट होते. 'ग्रहण केले' म्हणजे "पाच पूर्वभाग धर्म" इत्यादी केवळ शब्दांचे ग्रहण केले. 'ततियज्झानापासून' (तिसऱ्या ध्यानापासून) म्हणजे कारणाच्या उपचाराने फळ सांगितले आहे, फळ स्वरूप असलेल्या ततियज्झानापासून. ๒๗๖. เอกนฺตสุขสฺส โลกสฺส ปฏิลาเภน ปตฺติยา ตตฺถ นิพฺพตฺติ ปฏิลาภสจฺฉิกิริยา. เอกนฺตสุเข โลเก อนภินิพฺพตฺติตฺวา เอว อิทฺธิยา ตตฺถ คนฺตฺวา ตสฺส สตฺตโลกสฺส ภาชนโลกสฺส จ ปจฺจกฺขโต ทสฺสนํ ปจฺจกฺขสจฺฉิกิริยา. เตนาห ‘‘ตตฺถา’’ติอาทิ. २७६. एकांतसुखमय लोकाच्या प्राप्तीने आणि तिथे उत्पन्न होण्याने जी प्राप्ती होते, ती 'प्रतिलाभ-साक्षात्क्रिया' (प्राप्तीचा साक्षात्कार) होय. एकांतसुखमय लोकात उत्पन्न न होताच, ऋद्धीने (अलौकिक शक्तीने) तिथे जाऊन त्या सत्त्वलोकाचे आणि भाजनलोकाचे (भौतिक विश्वाचे) प्रत्यक्ष दर्शन घेणे, ही 'प्रत्यक्ष-साक्षात्क्रिया' होय. म्हणूनच "तिथे" इत्यादी म्हटले आहे. ๒๗๗. อุทญฺจนิโกติ อุทญฺจโน. วิญฺฌุปพฺพตปสฺเส คามานํ อนิวิฏฺฐตฺตา ตึสโยชนมตฺตํ ฐานํ อฏวี นาม, ตตฺถ เสนาสนํ, ตสฺมึ อฏวิเสนาสเน ปธานกมฺมิกานํ ภิกฺขูนํ พหูนํ ตตฺถ นิวาเสน เอกํ ปธานฆรํ อโหสิ. २७७. 'उदञ्चनिको' म्हणजे उदञ्चन (पाणी काढण्याचे भांडे किंवा विहीर). विंझु पर्वताच्या कुशीत गावांची वस्ती नसल्यामुळे सुमारे तीस योजन अंतराचा प्रदेश 'अटवी' (अरण्य) नावाचा होता, तिथे सेनासन (निवासस्थान) होते. त्या अरण्य-सेनासनात ध्यानसाधना करणाऱ्या अनेक भिक्खूंच्या वास्तव्यामुळे एक 'प्रधानघर' (ध्यानगृह) होते. จูฬสกุลุทายิสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. चूळसकुलुदायि-सुत्त वर्णनाची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๑๐. เวขนสสุตฺตวณฺณนา १०. वेखनस-सुत्त वर्णन (टीका) ๒๘๐. สห [Pg.133] วตฺถุกาเมน กิเลสกาโม ครุ ครุกาตพฺโพ เอตสฺสาติ กามครุ. เตสฺเวว กาเมสุ นินฺนโปณปพฺภารชฺฌาสโยติ กามาธิมุตฺโต. ปพฺพชฺชาปฐมชฺฌานาทิกํ เนกฺขมฺมํ ครุ ครุกาตพฺพํ เอตสฺสาติ เนกฺขมฺมครุ. ตตฺถ นินฺนโปณปพฺภารชฺฌาสโย เนกฺขมฺมาธิมุตฺโต สฺวายมตฺโถ ยถา เอกจฺเจ คหฏฺเฐ ลพฺภติ, เอวํ เอกจฺเจ อนคาเรปีติ อาห ‘‘ปพฺพชิโตปี’’ติอาทิ. อยํ ปน เวขนโส ปริพฺพาชโก. โส หิ เวขนสตาปสปพฺพชฺชํ อุปคนฺตฺวา เวขนเสน อิมินา ทิฏฺฐิมาทาย สมาทิยิตฺวา ฐิตตฺตา ‘‘เวขนโส’’ติ วุจฺจติ. ยถา โลโก สยํ เอกาทสหิ อคฺคีหิ อาทิตฺโตปิ สมาโน ปจฺจกฺขโต อนุภวิยมานํ สาลากิกํ อคฺคิสนฺตาปํ วิย อนาทิกาลานุคตสมฺมากวจรสนฺตาปํ อาทิตฺตตาย น สลฺลกฺเขติ, สมฺมาสมฺพุทฺเธน ปน มหากรุณาสมุสฺสาหิตมานเสน ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อาทิตฺต’’นฺติ อาทิตฺตปริยาเย (สํ. นิ. ๔.๒๘; มหาว. ๕๔) เทสิยมาเน สลฺลกฺเขติ, เอวํ อยมฺปิ อนาทิกาลปริภาวิตํ อตฺตอชฺฌาสเย อวฏฺฐิตํ กามาธิมุตฺตํ สรเสน อนุปธาเรนฺโต สตฺถารา – ‘‘ปญฺจ โข อิเม, กจฺจาน, กามคุณา’’ติอาทินา กามคุเณสุ กามสุเข ภาสิยมาเน ‘‘กามาธิมุตฺตํ วต ปพฺพชิตสฺส จิตฺต’’นฺติ อุปธาเรสฺสตีติ อาห – ‘‘อิมาย กถาย กถิยมานาย อตฺตโน กามาธิมุตฺตตํ สลฺลกฺเขสฺสตี’’ติ. กามคฺคสุขนฺติ กาเมตพฺพวตฺถูหิ อคฺคภูตํ สุขํ. สพฺเพ หิ เตภูมกธมฺมา กามนียฏฺเฐน กามา, เต ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชนสุขโต นิพฺพานสุขเมว อคฺคภูตํ สุขํ. ยถาห – ‘‘ยาวตา, ภิกฺขเว, ธมฺมา สงฺขตา วา อสงฺขตา วา, วิราโค เตสํ อคฺคมกฺขายตี’’ติ (อิติวุ. ๙๐; อ. นิ. ๔.๓๔) – ‘‘นิพฺพานํ ปรมํ สุข’’นฺติ (ม. นิ. ๒.๒๑๕, ๒๑๗; ธ. ป. ๒๐๓) จ. เตน วุตฺตํ ‘‘นิพฺพานํ อธิปฺเปต’’นฺติ. २८०. वस्तुकमासह (वस्तुकॉम) किलेसकाम ज्याच्यासाठी गुरू (महत्त्वाचा) किंवा आदरणीय आहे, तो 'कामगुरू' होय. त्या कामांमध्येच ज्याचा कल, प्रवृत्ती आणि कललेला आशय असतो, तो 'कामाधिमुक्त' (कामासक्त) होय. प्रव्रज्या, प्रथम ध्यान इत्यादी नेक्खम्म (कामत्याग) ज्याच्यासाठी गुरू किंवा आदरणीय आहे, तो 'नेक्खम्मगुरू' होय. तिथे ज्याचा कल, प्रवृत्ती आणि कललेला आशय नेक्खम्माकडे असतो, तो 'नेक्खम्माधिमुक्त' होय. हा अर्थ जसा काही गृहस्थांच्या बाबतीत आढळतो, तसाच काही अनगारिकांच्या (प्रव्रजितांच्या) बाबतीतही आढळतो, म्हणूनच "प्रव्रजित असूनही" इत्यादी म्हटले आहे. हा वेखनस तर परिव्राजक आहे. तो वेखनस तापस प्रव्रज्येचा स्वीकार करून, या वेखनसाच्या दृष्टीचे ग्रहण करून आणि ती स्वीकारून राहिल्यामुळे त्याला "वेखनस" म्हटले जाते. ज्याप्रमाणे हा लोक स्वतः अकरा अग्नींनी पेटलेला असूनही, प्रत्यक्ष अनुभवल्या जाणाऱ्या शलाकेच्या (लोखंडी सळईच्या) अग्नीच्या संतापाप्रमाणे, अनादी काळापासून चालत आलेल्या सम्यक आचरणाच्या संतापाला पेटलेला म्हणून लक्षात घेत नाही; परंतु महाकारुण्याने प्रेरित चित्त असलेल्या सम्यक संबुद्धांनी "भिक्खूंनो, सर्व काही पेटलेले आहे" अशा प्रकारे 'आदित्तपरियाय सुत्तात' (सं. नि. ४.२८; महाव. ५४) उपदेश केला असता तो लक्षात घेतो; त्याचप्रमाणे हा देखील अनादी काळापासून जोपासलेल्या, स्वतःच्या आशयात स्थिर असलेल्या कामासक्तीचा स्वतःच्या स्वभावाने विचार न करता, शास्त्यांनी (बुद्धांनी) – "कच्चान, हे पाच कामगुण आहेत" इत्यादी प्रकारे कामगुणांमधील कामसुखाचा उपदेश केला असता, "प्रव्रजिताचे चित्त खरोखरच कामासक्त आहे" असा विचार करेल, म्हणूनच म्हटले आहे – "हा उपदेश केला जात असताना तो स्वतःची कामासक्ती लक्षात घेईल." 'कामग्गसुख' म्हणजे काम्य (इच्छित) वस्तूंमध्ये जे अग्रभूत (सर्वश्रेष्ठ) सुख आहे ते. कारण तिन्ही भूमींमधील सर्व धर्म कामनीय (इच्छिण्यायोग्य) असल्यामुळे 'काम' आहेत, त्यांच्यावर अवलंबून उत्पन्न होणाऱ्या सुखापेक्षा 'निब्बानसुख' (निर्वाणसुख) हेच सर्वश्रेष्ठ सुख आहे. जसे म्हटले आहे – "भिक्खूंनो, जेवढे काही संस्कृत (संस्कारित) किंवा असंस्कृत धर्म आहेत, त्या सर्वांमध्ये विराग (वैराग्य) हा सर्वश्रेष्ठ सांगितला आहे" (इतिवृ. ९०; अं. नि. ४.३४) आणि "निब्बान हे परम सुख आहे" (म. नि. २.२१५, २१७; ध. प. २०३). म्हणूनच म्हटले आहे – "निब्बान अभिप्रेत आहे." ๒๘๑. ปุพฺเพนิวาสญาณลาภิโน ปุพฺพนฺตํ อารพฺภ วุจฺจมานกถา อนุจฺฉวิกา ตทตฺถสฺส ปจฺจกฺขภาวโต, ตทภาวโต เวขนสสฺส อนนุจฺฉวิกาติ อาห ‘‘ยสฺมา…เป… นตฺถี’’ติ. อนาคตกถาย…เป… นตฺถีติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย. อารกฺขตฺถายาติ เทวตาหิ มนฺตปเทหิ สห ฐิตา [Pg.134] ตตฺถ อารกฺขตฺถาย. อวิชฺชายาติ อิทํ ลกฺขณวจนํ, ตํมูลกตฺตา วา สพฺพกิเลสธมฺมานํ อวิชฺชาว คหิตา. ชานนํ ปหีนกิเลสปจฺจเวกฺขณญาเณน. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. २८१. पुब्बेनिवास-ज्ञान (पूर्वजन्मांचे ज्ञान) प्राप्त झालेल्या व्यक्तीसाठी पूर्वान्ताला (भूतकाळाला) अनुसरून सांगितलेली कथा योग्य असते, कारण त्याचा अर्थ प्रत्यक्ष असतो; परंतु त्याच्या अभावामुळे वेखनसासाठी ती अयोग्य आहे, म्हणूनच म्हटले आहे – "ज्या अर्थी...पे... नाही." अनागत कथेच्या (भविष्यासंबंधीच्या कथेच्या) बाबतीतही हाच नियम लागू होतो. 'आरक्षणार्थ' (रक्षणासाठी) म्हणजे देवता मंत्रपदांसह तिथे रक्षणासाठी उपस्थित होत्या. 'अविद्येमुळे' हे लक्षण सांगणारे वचन आहे, किंवा सर्व क्लेशधर्मांचे मूळ असल्यामुळे 'अविद्या'च ग्रहण केली आहे. 'जाणणे' म्हणजे नष्ट झालेल्या क्लेशांच्या प्रत्यवेक्षण ज्ञानाने (पुनरावलोकनाने) जाणणे. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. เวขนสสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. वेखनस-सुत्त वर्णनाची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. นิฏฺฐิตา จ ปริพฺพาชกวคฺควณฺณนา. आणि परिव्राजक-वर्ग वर्णन (टीका) समाप्त झाले. ๔. ราชวคฺโค ४. राजवग्ग (राजवर्ग) ๑. ฆฏิการสุตฺตวณฺณนา १. घतिकार-सुत्त वर्णन (टीका) ๒๘๒. จริยนฺติ [Pg.135] โพธิจริยํ, โพธิสมฺภารสมฺภรณวเสน ปวตฺติตํ โพธิสตฺตปฏิปตฺตินฺติ อตฺโถ. สุการณนฺติ โพธิปริปาจนสฺส เอกนฺติกํ สุนฺทรํ การณํ, กสฺสปสฺส ภควโต ปยิรุปาสนาทึ สนฺธาย วทติ. ตญฺหิ เตน สทฺธึ มยา อิธ กตนฺติ วตฺตพฺพตํ ลภติ. มนฺทหสิตนฺติ อีสกํ หสิตํ. กุหํ กุหนฺติ หาส-สทฺทสฺส อนุกรณเมตํ. หฏฺฐปหฏฺฐาการมตฺตนฺติ หฏฺฐปหฏฺฐมตฺตํ. ยถา คหิตสงฺเกตา ‘‘ปหฏฺโฐ ภควา’’ติ สญฺชานนฺติ, เอวํ อาการทสฺสนมตฺตํ. २८२. 'चर्या' म्हणजे बोधिचर्या, बोधिसंभार (ज्ञानाचे संचित) गोळा करण्याच्या हेतूने प्रवृत्त झालेली बोधिसत्त्वाची प्रतिपदा (साधना) असा अर्थ आहे. 'सुकारण' म्हणजे बोधी परिपक्व करण्याचे एकांतिक सुंदर कारण; हे कस्सप भगवंतांच्या सेवेला (उपासनेला) उद्देशून म्हटले आहे. कारण "ते त्यांच्यासोबत मी इथे केले" असे म्हणण्यास ते पात्र ठरते. 'मंदहसित' म्हणजे थोडेसे हसणे. 'कुहं कुहं' हे हसण्याच्या आवाजाचे अनुकरण आहे. 'हट्टपहट्ट-आकारमात्र' म्हणजे केवळ अत्यंत हर्षित झाल्याचा भाव. ज्याप्रमाणे संकेत समजणारे लोक "भगवंत हर्षित झाले आहेत" असे ओळखतात, तसे केवळ भावाचे दर्शन होय. อิทานิ อิมินา ปสงฺเคน ตาสํ สมุฏฺฐานํ วิภาคโต ทสฺเสตุํ ‘‘หสิตญฺจ นาเมต’’นฺติอาทิ อารทฺธํ. ตตฺถ อชฺฌุเปกฺขนวเสนปิ หาโส น สมฺภวติ, ปเคว โทมนสฺสวเสนาติ อาห ‘‘เตรสหิ โสมนสฺสสหคตจิตฺเตหี’’ติ. นนุ จ เกจิ โกธวเสนปิ หสนฺตีติ? น, เตสมฺปิ ยํ ตํ โกธวตฺถุ, ตสฺส มยํ ทานิ ยถากามการิตํ อาปชฺชิสฺสามาติ ทุวิญฺเญยฺยนฺตเรน โสมนสฺสจิตฺเตเนว หาสสฺส อุปฺปชฺชนโต. เตสูติ ปญฺจสุ โสมนสฺสสหคตจิตฺเตสุ. พลวารมฺมเณติ อุฬารอารมฺมเณ ยมกมหาปาฏิหาริยสทิเส. ทุพฺพลารมฺมเณติ อนุฬาเร อารมฺมเณ. อิมสฺมึ ปน ฐาเน…เป… อุปฺปาเทสีติ อิทํ โปราณฏฺฐกถายํ ตถา อาคตตฺตา วุตฺตํ. น อเหตุกโสมนสฺสสหคตจิตฺเตน ภควโต สิตํ โหตีติ ทสฺสนตฺถํ. आता या प्रसंगाने त्यांचे (चित्तांचे) समुत्थान विभागशः दाखवण्यासाठी 'हसितञ्च नामेतं' (हसित म्हणजे हे) इत्यादी सुरू केले आहे. तेथे उपेक्षाभावामुळे (अज्झुपेक्खनवसेन) देखील हास्य संभवत नाही, मग डोमनस्स (दौर्मनस्य) मुळे तर दूरच, म्हणून म्हटले आहे - 'तेरसahi सोमनस्ससहगतचित्तेहि' (तेरा सोमनस्स-सहगत चित्तांद्वारे). पण काही लोक क्रोधाच्या भरातही हसतात की नाही? नाही, त्यांच्या बाबतीतही जे क्रोधाचे कारण असते, 'आता आम्ही यावर इच्छेनुसार कृती करू' अशा कठीणपणे समजणाऱ्या सोमनस्स-चित्तानेच (सौमनस्य चित्तानेच) हास्य उत्पन्न होते. 'तेसू' म्हणजे पाच सोमनस्स-सहगत चित्तांमध्ये. 'बलवारम्मणे' म्हणजे यमक-महाप्रातिहार्यासारख्या भव्य आलंबनामध्ये (उळारआरम्मणे). 'दुब्बलारम्मणे' म्हणजे सामान्य आलंबनामध्ये. या ठिकाणी...पे... 'उप्पादेसि' (उत्पन्न केले) हे जुन्या अट्ठकथेत (पोरानट्ठकथायं) तसे आल्यामुळे म्हटले आहे. भगवंतांचे स्मित अहेतुक-सोमनस्स-सहगत चित्ताने होत नाही, हे दर्शवण्यासाठी हे म्हटले आहे. อภิธมฺมฏีกายํ (ธ. ส. มูลฏี. ๕๖๘) ปน ‘‘อตีตํสาทีสุ อปฺปฏิหตํ ญาณํ วตฺวา ‘อิเมหิ ตีหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคตสฺส พุทฺธสฺส ภควโต สพฺพํ กายกมฺมํ ญาณปุพฺพงฺคมํ ญาณานุปริวตฺต’นฺติอาทิวจนโต (มหานิ. ๖๙, ๑๕๖; จูฬนิ. มาฆราชมาณวปุจฺฉานิทฺเทส ๘๕; ปฏิ. ม. ๓.๕; เนตฺติ. ๑๕; ที. นิ. อฏฺฐ. ๓.๓๐๕; วิภ. มูลฏี. สุตฺตนฺตภาชนียวณฺณนา; ที. นิ. ฏี. ๓.๑๔๑, ๓๐๕) ‘ภควโต อิทํ จิตฺตํ อุปฺปชฺชตี’ติ วุตฺตวจนํ วิจาเรตพฺพ’’นฺติ วุตฺตํ. ตตฺถ อิมินา หสิตุปฺปาทจิตฺเตน ปวตฺติยมานมฺปิ ภควโต สิตกรณํ ปุพฺเพนิวาส-อนาคตํส-สพฺพญฺญุตญฺญาณานํ อนุวตฺตกตฺตา ญาณานุปริวตฺติเยวาติ, เอวํ ปน ญาณานุปริวตฺติภาเว สติ น โกจิ ปาฬิอฏฺฐกถานํ วิโรโธ. ตถา หิ อภิธมฺมฏฺฐกถายํ (ธ. ส. อฏฺฐ. ๕๖๘) ‘‘เตสํ [Pg.136] ญาณานํ จิณฺณปริยนฺเต อิทํ จิตฺตํ อุปฺปชฺชตี’’ติ วุตฺตํ. อวสฺสญฺจ เอตํ เอวํ อิจฺฉิตพฺพํ, อญฺญถา อาวชฺชนสฺสปิ ภควโต ปวตฺติ ตถารูเป กาเล น สํยุชฺเชยฺย, ตสฺสปิ หิ วิญฺญตฺติสมุฏฺฐาปกภาวสฺส อิจฺฉิตตฺตา, ตถา หิ วุตฺตํ – ‘‘เอวญฺจ กตฺวา มโนทฺวาราวชฺชนสฺสปิ วิญฺญตฺติสมุฏฺฐาปกตฺตํ อุปปนฺนํ โหตี’’ติ, น จ วิญฺญตฺติสมุฏฺฐาปกตฺเต ตํสมุฏฺฐิตาย วิญฺญตฺติยา กายกมฺมาทิภาวํ อาปชฺชนภาโว วิพนฺธตีติ ตเมว สนฺธาย วทติ. เตนาห ‘‘เอวํ อปฺปมตฺตกมฺปี’’ติ. สเตริตา วิชฺชุลตา นาม สเตรตาวิชฺชุลตา. สา หิ อิตรวิชฺชุลตา วิย ขณฏฺฐิติกา สีฆนิโรธา จ น โหติ, อปิจ โข ทนฺธนิโรธา, ตญฺจ สพฺพกาลํ จตุทีปิกมหาเมฆโตว นิจฺฉรติ เตนาห ‘‘จาตุทฺทีปิกมหาเมฆมุขโต’’ติ. อยํ กิร ตาสํ รสฺมิวฏฺฏีนํ ธมฺมตา, ยทิทํ ติกฺขตฺตุํ สิรวรํ ปทกฺขิณํ กตฺวา ทาฐคฺเคสุเยว อนฺตรธานํ. अभिधम्मटीकेमध्ये (ध. स. मूलटी. ५६८) मात्र 'अतीतांश इत्यादींमध्ये अप्रतिहत ज्ञान सांगून "या तीन धम्मांनी युक्त असलेल्या बुद्ध भगवंतांचे सर्व कायकर्म ज्ञानाने पूर्वंगम आणि ज्ञानाचे अनुपरिवर्तन करणारे असते" इत्यादी वचनांमुळे (महानि. ६९, १५६; चूळनि. माघराजमाणवपुच्छानिद्देस ८५; पटि. म. ३.५; नेत्ति. १५; दी. नि. अट्ठ. ३.३०५; विभ. मूलटी. सुत्तन्तभापनीयवण्णना; दी. नि. टी. ३.१४१, ३०५) "भगवंतांचे हे चित्त उत्पन्न होते" असे म्हटलेले वचन विचार करण्याजोगे आहे' असे म्हटले आहे. तेथे या हसितुप्पादचित्ताने (हास्योत्पादक चित्ताने) प्रवृत्त होणारे भगवंतांचे स्मित करणे देखील पुब्बेनिवास (पूर्वनिवास), अनागतंस (अनागत) आणि सब्बञ्ञुतञ्ञाण (सर्वज्ञता ज्ञान) यांचे अनुवर्तन करणारे असल्यामुळे ज्ञानानुपरिवर्तीच आहे. अशा प्रकारे ज्ञानानुपरिवर्ती भाव असताना पाळि-अट्ठकथांमध्ये कोणताही विरोध राहत नाही. कारण अभिधम्म-अट्ठकथेत (ध. स. अट्ठ. ५६८) 'त्या ज्ञानांच्या आचरणाच्या शेवटी हे चित्त उत्पन्न होते' असे म्हटले आहे. आणि हे निश्चितपणे असेच मानले पाहिजे, अन्यथा आवज्जन (आवर्जन) करणाऱ्या भगवंतांची प्रवृत्ती अशा वेळी जुळणार नाही, कारण त्याचेही विञ्ञत्तिसमुट्ठापकत्व (विज्ञप्ति-समुत्थापकत्व) मान्य केले गेले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - 'एवं अप्पमत्तकम्पि' (अशा प्रकारे थोडेसेही). 'सतेरिता विज्जुलाता' म्हणजे सतेरता-विद्युल्लता (विजेचा चमकारा). ती इतर विजेसारखी क्षणिक आणि लवकर नष्ट होणारी नसते, तर हळूहळू नष्ट होणारी असते, आणि ती नेहमी चारही द्वीपांवरील महामेघातूनच निघते, म्हणूनच म्हटले आहे - 'चातुद्दी पिकमहामेघमुखतो' (चारही द्वीपांवरील महामेघाच्या मुखातून). त्या रश्मींच्या समूहाचा हा स्वभावच आहे की, त्यांनी तीन वेळा श्रेष्ठ मस्तकाला प्रदक्षिणा घालून दाढांच्या टोकांवरच अंतर्धान पावावे. ๒๘๓. ยทิปิ จตฺตาริ อสงฺขฺเยยฺยานิ กปฺปานํ สตสหสฺสญฺจ ปญฺญาปารมิตา ปริภาวิตา, ตถาปิ อิทานิ ตํ พุทฺธนฺตรํ ตสฺสา ปฏิปาเทตพฺพตฺตา วุตฺตํ ‘‘อปริปกฺกญาณตฺตา’’ติ. กามญฺจสฺส ญาณาย อิทานิปิ ปฏิปาเทตพฺพตา อตฺถิ, เอวํ สนฺเตปิ นนุ สมฺมาสมฺพุทฺเธสุ ปสาเทน สมฺภาวนาย ภวิตพฺพํ ตถา จิรกาลํ ปริภาวิตตฺตา, กถํ ตตฺถ หีฬนาติ อาห ‘‘พฺราหฺมณกุเล’’ติอาทิ. จิรกาลปริจิตาปิ หิ คุณภาวนา อปฺปเกนปิ อกลฺยาณมิตฺตสํสคฺเคน วิปริวตฺตติ อญฺญถตฺตํ คจฺฉติ. เตน มหาสตฺโตปิ ชาติสิทฺธายํ ลทฺธิยํ ฐตฺวา ชาติสิทฺเธน มาเนน เอวมาห – ‘‘กึ ปน เตน มุณฺฑเกน สมณเกน ทิฏฺเฐนา’’ติ. ตถา หิ วุตฺตํ อฏฺฐกถายํ – २८३. जरी चार असंख्येय आणि एक लाख कल्पपर्यंत प्रज्ञापारमिता परिभावित (अभ्यासिली) केली होती, तरीही आता त्या बुद्धकाळात तिला प्राप्त करून द्यायचे असल्यामुळे 'अपरिपक्कञाणत्ता' (अपरिपक्व ज्ञान असल्यामुळे) असे म्हटले आहे. जरी त्यांच्या ज्ञानासाठी आताही ती प्राप्त करून देण्याची आवश्यकता आहे, तरीही सम्यक्संबुद्धांच्या प्रति आदराने आणि श्रद्धेने युक्त असायला हवे होते, कारण दीर्घकाळपर्यंत तिचा अभ्यास केला गेला होता, मग तेथे निंदा कशी झाली? म्हणून 'ब्राह्मणकुले' (ब्राह्मण कुळात) इत्यादी म्हटले आहे. कारण दीर्घकाळ अभ्यासलेली गुणांची भावना देखील थोड्याशा अकल्याणमित्राच्या (अकल्याणकारी मित्राच्या) संगतीने बदलते आणि अन्यथा होते (नष्ट होते). त्यामुळे महासत्त (महासत्त्व - बोधिसत्त्व) देखील जन्माधारित मतावर ठाम राहून आणि जन्माधारित अभिमानाने असे म्हणाले - 'त्या मुंडक (बोडक्या) श्रमणाला पाहून काय होणार?' म्हणूनच अट्ठकथेत म्हटले आहे - ‘‘ตสฺมา อกลฺยาณชนํ, อาสีวิสมิโวรคํ,อารกา ปริวชฺเชยฺย, ภูติกาโม วิจกฺขโณ’’ติ. (ที. นิ. อฏฺฐ. ๑.๑๗๐-๑๗๒); "म्हणून, कल्याणाची इच्छा करणाऱ्या चतुर माणसाने अकल्याणकारी (दुर्जन) माणसाला, विषारी सर्पाप्रमाणे दूरूनच टाळावे." (दी. नि. अट्ठ. १.१७०-१७२); นฺหานจุณฺเณน สุตฺเตน กตา โสตฺติ, กุรุวินฺทคุฬิกา, สา เอว สินายนฺติ กายํ วิโสเธนฺติ เอตายาติ สินานํ. เตนาห – ‘‘โสตฺติ สินานนฺติ สินานตฺถาย กตโสตฺติ’’นฺติ. स्नानचूर्णाने (न्हाणचुण्णेन) आणि सुताने बनवलेली सोंटी (घासणी), कुरुविंदगुटिका, जिच्याद्वारे स्नान करतात आणि शरीराची शुद्धी करतात, ती म्हणजे 'सिनानं' (स्नान). म्हणूनच म्हटले आहे - 'सोत्ति सिनानन्ति सिनानत्थाय कतसोत्तिं' (स्नानासाठी बनवलेली सोंटी म्हणजे स्नान). ๒๘๔. อริยปริหาเรนาติ อริยานํ ปริหาเรน, อนาคามีนํ นฺหานกาเล อตฺตโน กายสฺส ปริหารนิยาเมนาติ อตฺโถ. อตฺตโน [Pg.137] ญาณสมฺปตฺติยา วิภวสมฺปตฺติยา ปสนฺนการํ กาตุํ สกฺขิสฺสติ. เอตทตฺถนฺติ ‘‘อหิตนิวารณํ, หิเต นิโยชนํ พฺยสเน ปริวชฺชน’’นฺติ ยทิทํ, เอตทตฺถํ มิตฺตา นาม โหนฺติ. เกจิ ‘‘ยาเวตฺถ อหุปี’’ติ ปฐนฺติ, เตสํ ยาว เอตฺถ เกสคฺคคหณํ ตาว อยํ นิพนฺโธ อหุปีติ อตฺโถ. २८४. 'अरियपरिहारेन' म्हणजे आर्यांच्या परिहाराने (आचरणाने), अनागामींच्या स्नानसमयी स्वतःच्या शरीराच्या परिहाराच्या (काळजी घेण्याच्या) नियमाने, असा अर्थ आहे. स्वतःच्या ज्ञानसंपत्तीने आणि विभवसंपत्तीने प्रसन्न करण्याचे कारण बनू शकेल. 'एतदत्थं' (यासाठी) म्हणजे 'अहिताचे निवारण करणे, हितामध्ये लावणे, संकटात साथ न सोडणे' हे जे आहे, याचसाठी मित्र असतात. काही लोक 'यावेत्थ अहुपि' असे वाचतात, त्यांच्या मते जोपर्यंत येथे केसांचे पकडणे होते, तोपर्यंत हा संबंध होता, असा अर्थ आहे. ๒๘๕. สติปฏิลาภตฺถายาติ โพธิยา มหาภินีหารํ กตฺวา โพธิสมฺภารปฏิปทาย ปูรณภาเว สติยา ปฏิลาภตฺถาย. อิทานิ ตสฺส สตุปฺปาทนียกถาย ปวตฺติตาการํ สงฺเขเปเนว ทสฺเสตุํ ‘‘ตสฺส หี’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ น ลามกฏฺฐานํ โอติณฺณสตฺโตติ อิมินา มหาสตฺตสฺส ปณีตาธิมุตฺตตํ ทสฺเสตฺวา เอวํ ปณีตาธิมุตฺติกสฺส ปมาทกิริยา น ยุตฺตาติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ตาทิสสฺส นาม ปมาทวิหาโร น ยุตฺโต’’ติ อาห. ตทา โพธิสตฺตสฺส เนกฺขมฺมชฺฌาสโย เตลปฺปทีโป วิย วิเสสโต นิพฺพตฺติ, ตํ ทิสฺวา ภควา ตทนุรูปํ ธมฺมกถํ กโรนฺโต ‘‘ตาทิสสฺส…เป… กเถสี’’ติ. ปรสมุทฺทวาสี เถรา อญฺญถา วทนฺติ. อฏฺฐกถายํ ปน นายํ พุทฺธานํ ภาโร, ยทิทํ ปูริตปารมีนํ โพธิสตฺตานํ ตถา ธมฺมเทสนา เตสํ มหาภินีหารสมนนฺตรมฺปิ โพธิสมฺภารสฺส สยมฺภุญาเณเนว ปฏิวิทิตตฺตา. ตสฺมา โพธิสตฺตภาวปเวทนเมว ตสฺส ภควา อกาสีติ ทสฺเสตุํ ‘‘สติปฏิลาภตฺถายา’’ติอาทิ วุตฺตํ. สติปฏิลาภตฺถายาติ สมฺมาปฏิปตฺติยา อุชฺชลเน ปากฏกรสติปฏิลาภาย. २८५. 'सतिपटिलाभत्थाय' (स्मृतीच्या पुनर्प्राप्तीसाठी) म्हणजे बोधीसाठी महाअभिनिहार (महान संकल्प) करून बोधिसंभार-प्रतिपदेच्या पूर्ततेमध्ये स्मृतीच्या पुनर्प्राप्तीसाठी. आता त्याच्यामध्ये स्मृती उत्पन्न करणाऱ्या कथेच्या प्रवृत्तीचा प्रकार संक्षेपाने दाखवण्यासाठी 'तस्स हि' (त्याच्यासाठीच) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'हलक्या (हीन) स्थानावर न उतरलेला सत्त्व' याद्वारे महासत्त्वाचा प्रणीत-अधिमुक्त भाव (उच्च ध्येयाप्रती समर्पण) दाखवून, अशा प्रणीत-अधिमुक्त व्यक्तीला प्रमाद (आळस/दुर्लक्ष) करणे योग्य नाही हे दर्शवताना 'तादिसस्स नाम पमादविहारो न युत्तो' (अशा व्यक्तीला प्रमादविहार करणे योग्य नाही) असे म्हटले आहे. तेव्हा बोधिसत्त्वाचा नैष्क्रम्य-अध्याशय (नेक्खम्मज्झासयो - संन्यासाची भावना) तेलाच्या दिव्याप्रमाणे विशेष रूपाने प्रज्वलित झाला, ते पाहून भगवंतांनी त्याला अनुरूप धम्मकथा सांगताना 'तादिसस्स...पे... कथेसि' (अशा प्रकारे... सांगितले) असे म्हटले. परसमुद्रवासी थेर वेगळे सांगतात. परंतु अट्ठकथेत हा बुद्धांचा भार (कर्तव्य) नाही, कारण पारमिता पूर्ण केलेल्या बोधिसत्त्वांना तशी धम्मदेशना देणे, त्यांच्या महाअभिनिहारानंतर लगेचच बोधिसंभाराचे स्वयंभू ज्ञानानेच आकलन होत असल्यामुळे आवश्यक नसते. म्हणून भगवंतांनी त्यांना केवळ बोधिसत्त्वभावाची जाणीव करून दिली, हे दर्शवण्यासाठी 'सतिपटिलाभत्थाय' इत्यादी म्हटले आहे. 'सतिपटिलाभत्थाय' म्हणजे सम्यक् प्रतिपत्तीच्या प्रज्वलनाने स्पष्ट रसयुक्त स्मृतीच्या पुनर्प्राप्तीसाठी. ๒๘๖. ญาณญฺหิ กิเลสธมฺมวิทาลนปทาลเนหิ สิงฺคํ วิยาติ สิงฺคํ. ตญฺหิ ปฏิปตฺติยา อุปตฺถมฺภิตํ อุสฺสิตํ นาม โหติ, ตทภาเว ปติตํ นาม. เกจิ ปน วีริยํ สิงฺคนฺติ วทนฺติ. ตสฺมึ สมฺมปฺปธานวเสน ปวตฺเต พาหิรปพฺพชฺชํ อุปคตาปิ มหาสตฺตา วิสุทฺธาสยา อปฺปิจฺฉตาทิคุณสมงฺคิโน ยถารหํ คนฺถธุรํ วาสธุรญฺจ ปริพฺรูหยนฺตา วิหรนฺติ, ปเคว พุทฺธสาสเน อปฺปิจฺฉตาทีหีติ อาห ‘‘จตุปาริสุทฺธิสีเล ปนา’’ติอาทิ. วิปสฺสนํ พฺรูเหนฺตา สิขาปฺปตฺตวิปสฺสนา โหนฺตีติ วุตฺตํ – ‘‘ยาว อนุโลมญาณํ อาหจฺจ ติฏฺฐนฺตี’’ติ, อนุโลมญาณโต โอรเมว วิปสฺสนํ ฐเปนฺตีติ อตฺโถ. มคฺคผลตฺถํ วายามํ น กโรนฺติ ปญฺญาปารมิตาย สพฺพญฺญุตญฺญาณคพฺภสฺส อปริปุณฺณตฺตา อปริปกฺกตฺตา จ. २८६. ज्ञान हे क्लेशधर्मांचे विदारण आणि प्रदारण (नष्ट) करत असल्यामुळे शिंगासारखे (उन्नत/तीक्ष्ण) असते, म्हणून त्याला 'शिंग' म्हणतात. ते प्रतिपत्तीने (साधनेने) उपस्तंभित (पुष्ट) झाले की 'उन्नत' (वर उचललेले) म्हटले जाते, आणि त्याच्या अभावी ते 'पतित' (खाली पडलेले) म्हटले जाते. काही लोक तर वीर्याला (उत्साहाला) 'शिंग' म्हणतात. त्या सम्यक्प्रधानाच्या (सम्यक् व्यायामाच्या) प्रभावाने प्रवृत्त झालेले, बाह्य प्रव्रज्येला प्राप्त झालेले देखील विशुद्ध आशय असलेले महासत्त्व, अल्पेच्छता इत्यादी गुणांनी युक्त होऊन यथाशक्य ग्रंथधुर आणि वासधुर (विपश्यनाधुर) वाढवत विहार करतात; मग बुद्धशासनात अल्पेच्छता इत्यादी गुणांनी युक्त असणाऱ्यांबद्दल काय सांगावे! म्हणूनच 'चतुपारिसुद्धिसीले पना' (चतुष्पारिशुद्धिशीलात तर) इत्यादी म्हटले आहे. विपश्यनेची वृद्धी करताना ते शिखाप्राप्त (सर्वोच्च) विपश्यनायुक्त होतात, हे दर्शवण्यासाठी 'याव अनुलोमञाणं आहच्च तिट्ठन्ती' (अनुलोम ज्ञानापर्यंत पोहोचून थांबतात) असे म्हटले आहे; याचा अर्थ अनुलोम ज्ञानाच्या अलीकडेच विपश्यना स्थापित करतात. प्रज्ञापारमितेच्या आणि सर्वज्ञता-ज्ञानगर्भाच्या अपरिपूर्णतेमुळे व अपरिपक्वतेमुळे ते मार्गफलासाठी प्रयत्न करत नाहीत. ๒๘๗. เถเรหีติ [Pg.138] วุทฺธตเรหิ. นิวาเส สตีติ ยสฺมึ ฐาเน ปพฺพชิโต, ตตฺเถว นิวาเส. วปฺปกาลโตติ สสฺสานํ วปฺปกาลโต. ปุพฺเพ วิย ตโต ปรํ ติขิเณน สูริยสนฺตาเปน ปโยชนํ นตฺถีติ วุตฺตํ – ‘‘วปฺปกาเล วิตานํ วิย อุปริ วตฺถกิลญฺชํ พนฺธิตฺวา’’ติ. ปุฏเกติ กลาเป. २८७. 'थेरेही' म्हणजे वयोवृद्ध थेरांद्वारे. 'निवासे सती' म्हणजे ज्या ठिकाणी प्रव्रजित झाले, त्याच ठिकाणी निवास असताना. 'वप्पकालतो' म्हणजे पिकांच्या पेरणीच्या काळापासून. पूर्वीप्रमाणे त्यानंतर तीव्र सूर्यप्रकाशाची (उन्हाची) आवश्यकता नसते, म्हणून 'वप्पकाले वितानं विय उपरि वत्थकिलञ्जं बन्धित्वा' (पेरणीच्या काळात चांदव्याप्रमाणे वर कापडी चटई बांधून) असे म्हटले आहे. 'पुटके' म्हणजे पेंढ्यांच्या जुडीत (किंवा गठ्ठ्यात). ๒๘๘. ปจฺจยสามคฺคิเหตุกตฺตา ธมฺมปฺปตฺติยา ปเทสโต ปริญฺญาวตฺถุกาปิ อริยา อุปฏฺฐิเต จิตฺตวิฆาตปจฺจเย ยเทตํ นาติสาวชฺชํ, ตเทวํ คณฺหนฺตีติ อยเมตฺถ ธมฺมตาติ อาห – ‘‘อลาภํ อารพฺภ จิตฺตญฺญถตฺต’’นฺติอาทิ. โสติ กิกี กาสิราชา. พฺราหฺมณภตฺโตติ พฺราหฺมเณสุ ภตฺโต. เทเวติ พฺราหฺมเณ สนฺธายาห. ภูมิเทวาติ เตสํ สมญฺญา, ตทา พฺราหฺมณครุโก โลโก. ตทา หิ กสฺสโปปิ ภควา พฺราหฺมณกุเล นิพฺพตฺติ. ธีตุ อวณฺณํ วตฺวาติ, ‘‘มหาราช, ตว ธีตา พฺราหฺมณสมยํ ปหาย มุณฺฑปาสณฺฑิกสมยํ คณฺหี’’ติอาทินา ราชปุตฺติยา อคุณํ วตฺวา. วรํ คณฺหึสุ ญาตกา. รชฺชํ นิยฺยาเตสิ ‘‘มา เม วจนํ มุสา อโหสิ, อฏฺฐเม ทิวเส นิคฺคณฺหิสฺสามี’’ติ. २८८. प्रत्यय-सामग्रीच्या (कारणांच्या अनुकूलतेच्या) हेतूने धर्मप्राप्ती होत असल्यामुळे, प्रदेशतः (अंशतः) परिज्ञावस्तू असणारे आर्य देखील चित्ताच्या विघाताचे (विक्षेपाचे) कारण उपस्थित झाल्यावर, जे फारसे दोषयुक्त नसते, तसेच ग्रहण करतात, ही येथील धर्मता (नियम) आहे, हे दर्शवण्यासाठी 'अलाभं आरब्भ चित्तञ्ञथत्तं' (अलाभाला अनुसरून चित्ताची अन्यथावृत्ती) इत्यादी म्हटले आहे. 'सो' म्हणजे तो काशिराज किकी. 'ब्राह्मणभत्तो' म्हणजे ब्राह्मणांवर भक्ती असणारा. 'देवे' हे ब्राह्मणांना उद्देशून म्हटले आहे. 'भूमिदेवा' ही त्यांची संज्ञा आहे, कारण त्या काळी लोक ब्राह्मणांना पूज्य मानत असत. त्या काळी भगवान कश्यप देखील ब्राह्मणकुळात उत्पन्न झाले होते. 'धीतु अवण्णं वत्वा' म्हणजे 'महाराज, तुमच्या कन्येने ब्राह्मण संप्रदाय सोडून मुंडित पाखंडी संप्रदाय स्वीकारला आहे' इत्यादी प्रकारे राजकुमारीची निंदा करून. नातेवाईकांनी वर (वरदान) मागितले. 'माझे वचन खोटे ठरू नये, मी आठव्या दिवशी निग्रह करीन' असे म्हणून त्यांनी राज्य सोपवले. ปาวนอสฺมนยนวเสน สมฺมา ปาวีกตตฺตา ปริสุทฺธตณฺฑุลานิ. ปาฬิยํ ตณฺฑุลปฏิภสฺตานีติ ตณฺฑุลขณฺฑานิ. มุคฺคปฏิภสฺตกฬายปฏิภสฺเตสุปิ เอเสว นโย. पावन (पाखडणे) आणि अश्म-नयन (खडे काढणे) यांद्वारे चांगल्या प्रकारे स्वच्छ केल्यामुळे ते 'परिशुद्ध तांदूळ' होत. पाळीमध्ये 'तण्डुलपटiभस्तानि' म्हणजे तांदळाचे तुकडे (कण). मूग आणि मटार (कळाय) यांच्या तुकड्यांच्या बाबतीतही हाच नियम लागू होतो. ๒๘๙. โก นุ โขติ ภุมฺมตฺเถ ปจฺจตฺตวจนนฺติ อาห – ‘‘กุหึ นุ โข’’ติ ปาริปูรึ โยชียนฺติ พฺยญฺชนโภชนานิ เอตฺถาติ ปริโยโค, ตโต ปริโยคา. เตนาห ‘‘สูปภาชนโต’’ติ. สญฺญํ ทตฺวาติ วุตฺตํ สพฺพํ อาจิกฺขิตฺวา ตุมฺหากํ อตฺถาย สมฺปาเทตฺวา นิกฺขิตฺโต อุปฏฺฐาโกติ ภควโต อาโรเจถาติ สญฺญํ ทตฺวา. อติวิสฺสตฺโถติ อติวิย วิสฺสตฺโถ. ปญฺจวณฺณาติ ขุทฺทิกาทิวเสน ปญฺจปฺปการา. २८९. 'को नु खो' हे सप्तमीच्या अर्थात प्रथमेचे वचन आहे, म्हणून 'कुहिं नु खो' (कुठे बरे) असे म्हटले आहे. ज्या पात्रात व्यंजने आणि भोजन पूर्णपणे वाढले जाते ते 'परियोग', म्हणून 'परियोगा' म्हटले आहे. म्हणूनच 'सूपभाजनतो' (वरण-भाजीच्या पात्रातून) असे म्हटले आहे. 'सञ्ञं दत्वा' (संकेत देऊन) म्हणजे सर्व काही सांगून, 'तुमच्यासाठी हे मिळवून ठेवले आहे, उपस्थायकाने (सेवकाने) ठेवले आहे' असे भगवंतांना सांगावे, असा संकेत देऊन. 'अतिविस्सत्थो' म्हणजे अत्यंत विश्वासू. 'पञ्चवण्णा' म्हणजे लहान इत्यादी भेदांमुळे पाच प्रकारचे. ๒๙๐. กินฺติ นิสฺสกฺเก ปจฺจตฺตวจนํ, กสฺมาติ อตฺโถ? ธมฺมิโกติ อิมินา อาคมนสุทฺธึ ทสฺเสติ[Pg.139]. ภิกฺขูนํ ปตฺเต ภตฺตสทิโสติ อิมินา อุปาสเกน สตฺถุ ปริจฺจตฺตภาวํ ตตฺถ สตฺถุโน จ อปริสงฺกตํ ทสฺเสติ. สิกฺขาปทเวลา นาม นตฺถีติ ธมฺมสฺสามิภาวโต สิกฺขาปทมริยาทา นาม นตฺถิ ปณฺณตฺติวชฺเช, ปกติวชฺเช ปน เสตุฆาโต เอว. २९०. 'किन्ति' हे अपादान अर्थातील प्रथमेचे वचन आहे, 'कशासाठी' असा याचा अर्थ आहे. 'धम्मिको' याने आगमनाची शुद्धता (न्याय्य मार्ग) दर्शवली आहे. 'भिक्खूनां पत्ते भत्तसदिसो' (भिक्षूंच्या पात्रातील भातासारखा) याने उपासकाद्वारे शास्त्यांसाठी (बुद्धांसाठी) केलेला त्याग आणि त्याविषयी शास्त्यांची निःशंकता दर्शवली आहे. 'सिक्खापदवेला नाम नत्थि' म्हणजे धर्मस्वामी (धर्माचे मालक) असल्यामुळे प्रज्ञप्ति-वर्जात (नियमबद्ध दोषांमध्ये) शिक्षापदाची मर्यादा नसते; परंतु प्रकृती-वर्जात (नैसर्गिक दोषांमध्ये) मात्र मर्यादा भंग करणे हा सेतूचा (नियमाचा) नाशच आहे. ๒๙๑. ฉทนฏฺฐาเน ยทากาสํ, ตเทว ตสฺส เคหสฺส ฉทนนฺติ อากาสจฺฉทนํ. ปกติยา อุตุผรณเมวาติ ฉาทิเต ยาทิสํ อุตุ, ฉทเน อุตฺติณภาเวปิ ตมฺหิ เคเห ตาทิสเมว อุตุผรณํ อโหสิ. เตสํเยวาติ เตสํ ฆฏิการสฺส มาตาปิตูนํ เอว. २९१. छपराच्या जागी जे आकाश आहे, तेच त्या घराचे छप्पर आहे, म्हणून त्याला 'आकाशच्छदन' (उघडे छप्पर) म्हणतात. 'पकतिया उतुफरणमेवा' म्हणजे घर छप्परयुक्त असताना जसे ऋतूचे (हवामानाचे) सुखद वातावरण होते, छप्पर नसतानाही त्या घरात तसेच ऋतूचे सुखद वातावरण राहिले. 'तेसंयेवा' म्हणजे त्या घटिकाराच्या मातापित्यांचेच. ๒๙๒. ‘‘จตสฺโส มุฏฺฐิโย เอโก กุฑุโว, จตฺตาโร กุฑุวา เอโก ปตฺโถ, จตฺตาโร ปตฺถา เอโก อาฬฺหโก, จตฺตาโร อาฬฺหกา เอกํ โทณํ, จตฺตาริ โทณานิ เอกา มานิกา, จตสฺโส มานิกา เอกา ขารี, วีสติ ขาริกา เอโก วาโหติ ตเทว เอกสกฏ’’นฺติ สุตฺตนิปาตฏฺฐกถาทีสุ (สุ. นิ. อฏฺฐ. ๒.๖๖๒) วุตฺตํ, อิธ ปน ‘‘ทฺเว สกฏานิ เอโก วาโห’’ติ วุตฺตํ. เตลผาณิตาทินฺติ อาทิ-สทฺเทน สปฺปิอาทึ มริจาทิกฏุกภณฺฑญฺจ สงฺคณฺหาติ. นาหํ รญฺญา ทิฏฺฐปุพฺโพ, กุโต ปริปฺผสฺโสติ อธิปฺปาโย. นจฺจิตฺวาติ นจฺจํ ทตฺวา. २९२. 'चार मुठी म्हणजे एक कुडुव, चार कुडुव म्हणजे एक प्रस्थ, चार प्रस्थ म्हणजे एक आढक, चार आढक म्हणजे एक द्रोण, चार द्रोण म्हणजे एक मानिका, चार मानिका म्हणजे एक खारी, वीस खारी म्हणजे एक वाह आणि तोच एक गाडा होय' असे सुत्तनिपात-अट्ठकथा इत्यादींमध्ये (सु. नि. अट्ठ. २.६६२) म्हटले आहे, परंतु येथे 'दोन गाडे म्हणजे एक वाह' असे म्हटले आहे. 'तेलफाणितादिं' यातील 'आदि' शब्दाने तूप इत्यादी आणि मिरी इत्यादी तिखट/कटू पदार्थांचा संग्रह होतो. 'मी राजाला पूर्वी कधी पाहिले नाही, मग स्पर्श कुठून होणार?' असा अभिप्राय आहे. 'नच्चित्वा' म्हणजे नृत्य करून. ฆฏิการสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. घटिकारसुत्त-वर्णनेची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ-प्रकाशिनी टीका) समाप्त झाली. ๒. รฏฺฐปาลสุตฺตวณฺณนา २. रट्ठपालसुत्त-वर्णना (रट्ठपालसुत्ताची टीका) ๒๙๓. ถูลเมว ถุลฺลํ, ถุลฺลา วิปุลา มหนฺตา โกฏฺฐา ชาตา อิมสฺสาติ ถุลฺลโกฏฺฐิกนฺติ โอทนปูปปหูตวเสน ลทฺธนาโม นิคโม. อฏฺฐกถายํ ปน ถุลฺลโกฏฺฐนฺติ อตฺโถ วุตฺโต. เตน ปาฬิยํ อิก-สทฺเทน ปทวฑฺฒนํ กตนฺติ ทสฺเสติ. २९३. स्थूल म्हणजेच 'थुल्ल'. ज्याचे कोठार (धान्य साठवण्याची जागा) थुल्ल म्हणजे विस्तीर्ण व मोठे आहे, त्याला 'थुल्लकोट्ठिक' म्हणतात. भात आणि पोळ्यांच्या मुबलकतेमुळे हे नाव मिळालेला हा एक निगम (नगर) आहे. अट्ठकथेमध्ये मात्र 'थुल्लकोट्ठं' असा अर्थ सांगितला आहे. यावरून पाळीमध्ये 'इक' प्रत्ययाने शब्दाचा विस्तार केला आहे, हे दर्शवले जाते. ๒๙๔. รฏฺฐปาโลติ อิทํ ตสฺส กุลปุตฺตสฺส นามํ. ปเวณิวเสน อาคตกุลวํสานุคตนฺติ สมุทาคมโต ปฏฺฐาย ทสฺเสตุํ ‘‘กสฺมา รฏฺฐปาโล’’ติอาทิ วุตฺตํ. สนฺธาเรตุนฺติ วินาสนโต ปุพฺเพ ยาทิสํ, ตเถว สมฺมเทว ธาเรตุํ สมตฺโถ. สทฺธาติ กมฺมผลสทฺธาย สมฺปนฺนา. สามเณรํ ทิสฺวาติ สิกฺขากามตาย เอตทคฺเค ฐปิยมานํ ทิสฺวา. २९४. 'रट्ठपाल' हे त्या कुलपुत्राचे नाव आहे. परंपरेने चालत आलेल्या कुलवंशाचे अनुकरण करणारे आहे, हे उत्पत्तीपासून दाखवण्यासाठी 'कस्मा रट्ठपालो' (रट्ठपाल का?) इत्यादी म्हटले आहे. 'सन्धारेतुं' म्हणजे विनाशापूर्वी जसे होते, तसेच चांगल्या प्रकारे धारण करण्यास समर्थ असणे. 'सद्धा' म्हणजे कर्मफलाच्या श्रद्धेने युक्त असणे. 'सामणेरं दिस्वा' म्हणजे शिक्षणाची इच्छा असल्यामुळे त्यांना अग्रस्थानी स्थापित केलेले पाहून. สห [Pg.140] รญฺญาติ สราชิกํ, รญฺญา สทฺธึ ราชปริสํ. จาตุวณฺณนฺติ พฺราหฺมณาทิจตุวณฺณสมุทายํ. โปเสตุนฺติ วทฺเธตุํ ทานาทีหิ สงฺคหวตฺถูหิ สงฺคณฺหิตุํ. ยํ กุลํ. ปโหสฺสตีติ สกฺขิสฺสติ. 'सह रञ्ञा' म्हणजे राजासहित, राजासोबत राजपरिषद. 'चातुवण्णं' म्हणजे ब्राह्मणादी चार वर्णांचा समुदाय. 'पोसेतुं' म्हणजे वाढवण्यासाठी, दानादी संग्रहवस्तूंद्वारे संग्रह करण्यासाठी. 'यं कुलं' म्हणजे जे कूळ. 'पहोस्सती' म्हणजे समर्थ होईल. เตน เตน เม อุปปริกฺขโตติ ‘‘กามา นาเมเต อนิจฺจา ทุกฺขา วิปริณามธมฺมา, อฏฺฐิกงฺกลูปมา’’ติ (ม. นิ. ๑.๒๓๔; ปาจิ. ๔๑๗; มหานิ. ๓, ๖) จ อาทินา เยน เยน อากาเรน กาเมสุ อาทีนวํ โอการํ สํกิเลสํ, ตพฺพิปริยายโต เนกฺขมฺเม อานิสํสํ คุณํ ปกาเสนฺตํ ภควตา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานามิ, เตน เตน ปกาเรน อุปปริกฺขโต วีมํสนฺตสฺส มยฺหํ เอวํ โหติ เอวํ อุปฏฺฐาติ. สิกฺขตฺตยพฺรหฺมจริยนฺติ อธิสีลาทิสิกฺขตฺตยสงฺคหํ เสฏฺฐจริยํ. อขณฺฑาทิภาวาปาทเนน อขณฺฑํ ลกฺขณวจนญฺเหตํ. กญฺจิปิ สิกฺเขกเทสํ อเสเสตฺวา เอกนฺเตเนว ปริปูเรตพฺพตาย เอกนฺตปริปุณฺณํ. จิตฺตุปฺปาทมตฺตมฺปิ สํกิเลสมลํ อนุปฺปาเทตฺวา อจฺจนฺตเมว วิสุทฺธํ กตฺวา ปริหริตพฺพตาย เอกนฺตปริสุทฺธํ. ตโต เอว สงฺขํ วิย ลิขิตนฺติ สงฺขลิขิตํ. เตนาห ‘‘ลิขิตสงฺขสทิส’’นฺติ. ทาฐิกาปิ มสฺสุคฺคหเณเนว คเหตฺวา ‘‘มสฺสุ’’ตฺเวว วุตฺตํ, อุตฺตราธรมสฺสุนฺติ อตฺโถ. กสาเยน รตฺตานิ กาสายานิ. อนนุญฺญาตํ ปุตฺตํ น ปพฺพาเชติ ‘‘มาตาปิตูนํ โลกิยมหาชนสฺส จิตฺตญฺญถตฺตํ มา โหตู’’ติ. ตถา หิ สุทฺโธทนมหาราชสฺส ตถา วโร ทินฺโน. त्या त्या प्रकारे मी परीक्षण करतो की, 'काम (भोग) हे अनित्य, दुःखद आणि विपरिणामधर्मी आहेत, ते अस्थिपंजरासारखे आहेत' इत्यादींद्वारे ज्या ज्या प्रकारे भगवंतांनी कामांमधील (भोगांमधील) आदीनव (दोष), हीनता आणि संक्लेश प्रकट केला आहे, आणि त्याच्या उलट नेक्खम्माचे (नैष्क्रम्याचे) आनिसंस (फायदे) व गुण प्रकट करत धम्माचा उपदेश केला आहे, तो मी जाणतो. त्या त्या प्रकारे परीक्षण व विचार करणाऱ्या मला असे वाटते, असे जाणवते. 'सिक्खत्तयब्रह्मचरियं' म्हणजे अधिशील इत्यादी त्रिशिक्षांचा संग्रह असलेले श्रेष्ठ आचरण. अखंड इत्यादी भाव प्राप्त करून देणारे असल्यामुळे 'अखंड' हे लक्षणात्मक वचन आहे. शिक्षेचा कोणताही भाग शिल्लक न ठेवता पूर्णपणे परिपूर्ण करायचे असल्यामुळे 'एकान्तपरिपूर्ण'. चित्तामध्ये थोडाही संक्लेशाचा मळ उत्पन्न न होऊ देता अत्यंत विशुद्ध करून आचरण करायचे असल्यामुळे 'एकान्तपरिशुद्ध'. म्हणूनच शंखासारखे घासून स्वच्छ केलेले म्हणून 'संखलिखित'. म्हणूनच म्हटले आहे 'लिखितशंखसदृश'. दाढीचाही मिशीमध्येच समावेश करून केवळ 'मस्सु' (मिशी) असे म्हटले आहे, ज्याचा अर्थ वरची व खालची मिशी असा आहे. कषाय रंगाने रंगवलेले ते 'काषाय' (वस्त्र). 'माता-पिता आणि लौकिक महाजनांच्या मनात विपरित भाव निर्माण होऊ नये' म्हणून परवानगी न घेतलेल्या पुत्राला प्रवज्जा दिली जात नाही. कारण शुद्धोधन महाराजांना तसा वर दिला गेला होता. ๒๙๕. ปิยายิตพฺพโต ปิโยติ อาห ‘‘ปีติชนโก’’ติ. มนสฺส อปฺปายนโต มนาโปติ อาห ‘‘มนวฑฺฒนโก’’ติ. สุเขธิโต ตรุณทารกกาเล. ตโต ปรญฺจ สปฺปิขีราทิสาทุรสมนุญฺญโภชนาทิอาหารสมฺปตฺติยา สุขปริภโต. อถ วา ทฬฺหภตฺติกธาติชนาทิปริชนสมฺปตฺติยา เจว ปริจฺฉทสมฺปตฺติยา จ อุฬารปณีตสุขปจฺจยูปหาเรหิ จ สุเขธิโต, อกิจฺเฉเนว ทุกฺขปฺปจฺจยวิโนทเนน สุขปริภโต. อชฺฌตฺติกงฺคสมฺปตฺติยา วา สุเขธิโต, พาหิรงฺคสมฺปตฺติยา สุขปริภโต. กสฺสจีติ อุปโยคตฺเถ สามิวจนํ, กิญฺจีติ วุตฺตํ โหติ, อยเมว วา ปาโฐ. ตถา หิ ‘‘อปฺปมตฺตกมฺปิ กลภาคํ ทุกฺขสฺส น ชานาสี’’ติ อตฺโถ วุตฺโต. เอวํ สนฺเตติ นนุ มยํ รฏฺฐปาล มรณาทีสุ เกนจิ อุปาเยน อปฺปตีกาเรน มรเณนปิ ตยา อกามกาปิ [Pg.141] วินา ภวิสฺสาม, เอวํ สติ. เยนาติ เยน การเณน. กึ ปนาติ เอตฺถ กินฺติ การณตฺเถ ปจฺจตฺตวจนนฺติ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘เกน ปน การเณนา’’ติ. २९५. प्रिय वाटण्याजोगे असल्यामुळे 'प्रिय' म्हणजे 'प्रीती निर्माण करणारा' असे म्हटले आहे. मनाला तृप्त करणारे असल्यामुळे 'मनाप' (मनपसंत) म्हणजे 'मन वाढवणारा' (मनाला आनंद देणारा) असे म्हटले आहे. 'सुखेधितो' म्हणजे लहान वयात सुखात वाढलेला. आणि त्यानंतर तूप, दूध इत्यादी स्वादिष्ट व अनुकूल भोजन इत्यादी आहारसंपत्तीने सुखाचा उपभोग घेतलेला. अथवा दृढभक्त (एकनिष्ठ) दाई इत्यादी परिजनांच्या संपत्तीने आणि परिच्छद (साधनसामग्री) संपत्तीने तसेच उदार व प्रणीत (उत्कृष्ट) सुखकारक उपकरणांच्या उपहारांनी सुखेधित (सुखात वाढलेला), आणि विनासायास दुःखाच्या कारणांचे निवारण करून सुखाचा उपभोग घेतलेला. किंवा आंतरिक अंगांच्या संपत्तीने सुखेधित आणि बाह्य अंगांच्या संपत्तीने सुखाचा उपभोग घेतलेला. 'कस्सचि' हे द्वितीयेच्या अर्थात षष्ठीचे वचन आहे, ज्याचा अर्थ 'किंचि' (काहीही) असा होतो, किंवा हाच पाठ आहे. म्हणूनच 'दुःखाचा अगदी लहानसा भागही तुला माहीत नाही' असा अर्थ सांगितला आहे. 'एवं सन्ते' म्हणजे 'हे राष्ट्रपाला! आपण मरणादी कोणत्याही उपायाने, ज्याचा प्रतिकार करता येत नाही अशा मरणाने देखील, तुझी इच्छा नसतानाही तुझ्यापासून विभक्त होऊ, असे असताना'. 'येन' म्हणजे ज्या कारणाने. 'किं पन' यामध्ये 'किं' हे कारणाच्या अर्थात प्रथमेचे वचन आहे हे दर्शवताना म्हटले आहे 'पण कोणत्या कारणाने?'. ๒๙๖. ปริจาเรหีติ ปริโต ตตฺถ ตตฺถ ยถาสกํ วิสเยสุ จาเรหิ. เตนาห ‘‘อิโต จิโต จ อุปเนหี’’ติ. ปริจาเรหีติ วา สุขูปกรเณหิ อตฺตานํ ปริจาเรหิ, อตฺตโน ปริจรณํ กาเรหิ. ตถาภูโต จ ยสฺมา ลฬนฺโต กีฬนฺโต นาม โหติ, ตสฺมา ‘‘ลฬา’’ติอาทิ วุตฺตํ. นิจฺจทานํ ทานํ นาม, อุโปสถทิวสาทีสุ ทาตพฺพํ อติเรกทานํ ปทานํ นาม. ปเวณีรกฺขณวเสน วา ทียมานํ ทานํ นาม, อตฺตนาว ปฏฺฐเปตฺวา ทียมานํ ปทานํ นาม. ปจุรชนสาธารณํ วา นาติอุฬารํ ทานํ นาม, อนญฺญสาธารณํ อติอุฬารํ ปทานํ นาม. อุทฺทสฺเสตพฺพาติ อุทฺธํ ทสฺเสตพฺพา. กุโต อุทฺธํ เต ทสฺเสตพฺพา? ปพฺพชิตโต อุทฺธํ อตฺตานํ มาตาปิตโร ทสฺเสตพฺพา, เตนาห ‘‘ยถา’’ติอาทิ. २९६. 'परिचारेहि' म्हणजे चहूकडे तिथे तिथे आपापल्या विषयांमध्ये विहार कर. म्हणूनच म्हटले आहे 'इकडे तिकडे घेऊन जा'. किंवा 'परिचारेहि' म्हणजे सुखाच्या उपकरणांनी स्वतःचे मनोरंजन कर, स्वतःची सेवा करून घे. आणि तशा स्थितीत असलेला मनुष्य खेळणारा व विलास करणारा असतो, म्हणून 'लळा' (लाड करणे/विलास करणे) इत्यादी म्हटले आहे. नित्य दिले जाणारे दान म्हणजे 'दान', आणि उपोसथ इत्यादी दिवशी दिले जाणारे अतिरिक्त दान म्हणजे 'प्रदान'. किंवा परंपरेचे रक्षण करण्यासाठी दिले जाणारे दान म्हणजे 'दान', आणि स्वतःहून सुरू करून दिले जाणारे दान म्हणजे 'प्रदान'. किंवा सामान्य लोकांसाठी असलेले फार मोठे नसलेले दान म्हणजे 'दान', आणि इतरांसाठी नसलेले अत्यंत मोठे दान म्हणजे 'प्रदान'. 'उद्दस्सेतब्बा' म्हणजे वर दाखवावे. कुठून वर ते दाखवावे? प्रवज्जित झाल्यानंतर माता-पित्यांनी स्वतःला दाखवावे, म्हणूनच 'यथा' इत्यादी म्हटले आहे. ๒๙๙. พลํ คเหตฺวาติ เอตฺถ พลคฺคหณํ นาม กายพลสฺส อุปฺปาทนเมวาติ อาห ‘‘กายพลํ ชเนตฺวา’’ติ. เอวํ วิหรนฺโตติ ยถา ปาฬิยํ วุตฺตํ เอวํ เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต วิหรนฺโต. ตสฺมาติ ยสฺมา เนยฺโย, น อุคฺฆฏิตญฺญู, น จ วิปญฺจิตญฺญู, ตสฺมา. จิเรน ปพฺพชิโต ทฺวาทสเม วสฺเส อรหตฺตํ ปาปุณิ. ยํ ปน วุตฺตํ ปาฬิยํ ‘‘น จิรสฺเสวา’’ติ, ตํ สฏฺฐิ วสฺสานิ ตโต อธิกมฺปิ วิปสฺสนาปริวาสํ วสนฺเต อุปาทาย วุตฺตํ. २९९. 'बलं गहेत्वा' (बळ घेऊन) यामध्ये बळ ग्रहण करणे म्हणजे शारीरिक बळ उत्पन्न करणेच होय, म्हणून म्हटले आहे 'शारीरिक बळ उत्पन्न करून'. 'एवं विहरन्तो' म्हणजे पाळीमध्ये (पालिपाठात) सांगितल्याप्रमाणे अशा प्रकारे एकटा, एकांतात राहणारा, अप्रमत्त होऊन विहार करणारा. 'तस्मा' म्हणजे कारण तो नेय्य (मार्गदर्शनाने जाणणारा) होता, उग्घटितञ्ञू (थोडक्यात सांगताच जाणणारा) किंवा विपञ्चितञ्ञू (सविस्तर सांगण्याने जाणणारा) नव्हता, म्हणून. दीर्घकाळानंतर, प्रवज्जित झाल्याच्या बाराव्या वर्षी त्यांनी अरहंतपद प्राप्त केले. पाळीमध्ये जे 'न चिरस्सेव' (लवकरच) असे म्हटले आहे, ते साठ वर्षे किंवा त्याहून अधिक काळ विपश्यना-वासात राहणाऱ्यांच्या तुलनेत म्हटले आहे. สตฺตทฺวารโกฏฺฐกสฺสาติ สตฺตคพฺภนฺตรทฺวารโกฏฺฐกสีเสน คพฺภนฺตรานิ วทติ. ปหราเปตีติ วโยวุฑฺฒานุรูปํ กปฺปาปนาทินา อลงฺการาเปติ. อนฺโตชาตตาย ญาติสทิสี ทาสี ญาติทาสี. ปูติภาเวเนว ลกฺขิตพฺโพ โทโส วา อภิโทโส, โสว อาภิโทสิโก, อภิโทสํ วา ปจฺจูสกาลํ คโต ปตฺโต อติกฺกนฺโตติ อาภิโทสิโก. เตนาห ‘‘เอกรตฺตาติกฺกนฺตสฺสา’’ติอาทิ. อปริโภคารโห ปูติภูตภาเวน. อริยโวหาเรนาติ อริยสมุทาจาเรน. อริยา หิ มาตุคามํ ภคินิวาเทน สมุทาจรนฺติ. นิสฺสฏฺฐปริคฺคหนฺติ ปริจฺจตฺตาลยํ. วตฺตุํ วฏฺฏตีติ นิรเปกฺขภาวโต วุตฺตํ, อิธ ปน วิเสสโต อปริโภคารหตฺตาว วตฺถุโน. นิมียติ สญฺญายตีติ นิมิตฺตํ, ตถาสลฺลกฺขิโต อากาโรติ อาห ‘‘อาการํ อคฺคเหสี’’ติ. 'सत्तद्वारकोट्ठकस्स' म्हणजे सात गर्भगृहांच्या (खोल्यांच्या) आतील प्रवेशद्वारांच्या मुख्यतेने गर्भगृहांचे वर्णन करतो. 'पहरापेति' म्हणजे वयाच्या वाढीनुसार केस कापणे इत्यादींनी सुशोभित करतो. घरातच जन्मलेली असल्यामुळे नातेवाईकासारखी असलेली दासी म्हणजे 'ज्ञातिदासी' (नातेवाईक दासी). दुर्गंधीमुळेच ओळखता येणारा दोष किंवा अतिदोष, तोच 'आभिदोसिक' (शिळे अन्न), किंवा रात्रीचा काळ निघून गेल्यानंतर सकाळी प्राप्त झालेले ते 'आभिदोसिक'. म्हणूनच म्हटले आहे 'एक रात्र उलटून गेलेले' इत्यादी. दुर्गंधीयुक्त झाल्यामुळे उपभोगास अयोग्य. 'अरियवोhारेन' म्हणजे आर्य व्यवहाराने (आर्य शिष्टाचाराने). कारण आर्य लोक स्त्रियांना 'भगिनी' (बहीण) या शब्दाने संबोधित करतात. 'निस्सट्ठपरिग्गहं' म्हणजे जिचा आसक्तीचा त्याग केला आहे अशी. 'वत्तुं वट्टति' (बोलणे योग्य आहे) हे निरपेक्ष भावाने म्हटले आहे, परंतु येथे विशेषतः वस्तूच्या उपभोगास अयोग्यतेमुळे म्हटले आहे. ज्याच्यावरून ओळखले जाते किंवा जाणले जाते ते 'निमित्त', त्यावरून लक्षात आलेला आकार म्हणून म्हटले आहे 'आकार ग्रहण केला'. ๓๐๐. ฆรํ [Pg.142] ปวิสิตฺวาติ เคหสามินิยา นิสีทิตพฺพฏฺฐานภูตํ อนฺโตเคหํ ปวิสิตฺวา. อาลปเนติ ทาสิชนสฺส อาลปเน. พหิ นิกฺขมนฺตาติ ยถาวุตฺตอนฺโตเคหโต พหิ นิกฺขมนฺติโย. ฆเรสุ สาลา โหนฺตีติ ฆเรสุ เอกมนฺเต โภชนสาลา โหนฺติ ปาการปริกฺขิตฺตา สุสํวิหิตทฺวารพนฺธา สุสมฺมฏฺฐวาลิกงฺคณา. ३००. 'घरं पविसित्वा' (घरात प्रवेश करून) म्हणजे घराच्या मालकिणीच्या बसण्याचे ठिकाण असलेल्या अंतर्गृहात (घराच्या आतल्या भागात) प्रवेश करून. 'आलपने' म्हणजे दासींच्या संभाषणात. 'बहि निक्खमन्ता' म्हणजे वर सांगितलेल्या अंतर्गृहातून बाहेर पडणाऱ्या. 'घरेसु साला होन्ति' म्हणजे घरांमध्ये एका बाजूला भोजनशाळा असतात, ज्या भिंतींनी वेढलेल्या, चांगल्या प्रकारे बंद होणारे दरवाजे असलेल्या आणि वाळू पसरून स्वच्छ केलेल्या अंगणाने युक्त असतात. อโนกปฺปนํ อสทฺทหนํ. อมริสนํ อสหนํ. อนาคตวจนํ อนาคตสทฺทปฺปโยโค, อตฺโถ ปน วตฺตมานกาลิโกว. เตนาห ‘‘ปจฺจกฺขมฺปี’’ติ. อริยิทฺธิยนฺติ ‘‘ปฏิกูเล อปฏิกูลสญฺญี วิหรตี’’ติ (อ. นิ. ๕.๑๔๔) เอวํ วุตฺตอริยิทฺธิยํ. 'अनोकप्पनं' म्हणजे अविश्वास (श्रद्धा नसणे). 'अमरिसनं' म्हणजे असहनशीलता (सहन न करणे). 'अनागतवचनं' म्हणजे भविष्यकाळातील शब्दाचा प्रयोग, परंतु अर्थ वर्तमानकालीनच आहे. म्हणूनच म्हटले आहे 'प्रत्यक्ष देखील'. 'अरियिद्धियं' म्हणजे 'प्रतिकूल गोष्टींमध्ये अनुकूलतेची भावना ठेवून विहार करतो' (अं. नि. ५.१४४) अशा प्रकारे सांगितलेली आर्य ऋद्धी. ปูติกุมฺมาโส ฉฑฺฑนียธมฺโม ตสฺส เคหโต ลทฺโธปิ น ทาตพฺพยุตฺตโก ทาสิชเนน ทินฺโนติ อาห ‘‘เทยฺยธมฺมวเสน เนว ทานํ อลตฺถมฺหา’’ติ. ‘‘อิเมหิ มุณฺฑเกหี’’ติอาทินา นิตฺถุนนวจเนน ปจฺจกฺขานํ อตฺถโต ลทฺธเมว, ตสฺส ปน อุชุกผาสุสมาจารวเสน อลทฺธตฺตา วุตฺตํ ‘‘น ปจฺจกฺขาน’’นฺติ. เตนาห – ‘‘ปฏิสนฺถารวเสน ปจฺจกฺขานมฺปิ น อลตฺถมฺหา’’ติ. ‘‘เนว ทาน’’นฺติอาทิ ปจฺจาสีสาย อกฺขนฺติยา จ วุตฺตํ วิย ปจุรชโน มญฺเญยฺยาติ ตนฺนิวตฺตนตฺถํ อธิปฺปายมสฺส วิวริตุํ ‘‘กสฺมา ปนา’’ติอาทิ วุตฺตํ. สุตฺติกาปฏิจฺฉนฺนนฺติ สิปฺปิกาฉทาหิ ฉนฺนํ. कुजलेला किंवा सडलेला भात (पूतिकुम्मासो) जो फेकून देण्याच्या योग्यतेचा होता, तो त्याच्या घरातून मिळाला असला तरी दासीने तो दिल्यामुळे तो देण्यास योग्य नव्हता, म्हणून म्हटले आहे - 'देय्यधम्म (दान देण्यायोग्य वस्तू) या नात्याने आम्हाला कोणतेही दान मिळाले नाही.' 'या मुंडकांमुळे (मुंडकेही)...' इत्यादी निंदाव्यंजक शब्दांद्वारे नकार प्रत्यक्षपणे मिळालाच होता, परंतु त्याच्या सरळ आणि सुलभ आचरणामुळे तो न मिळाल्यासारखाच असल्याने 'नकार नाही' (na paccakkhānaṃ) असे म्हटले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - 'आदरातिथ्याच्या स्वरूपात आम्हाला नकारही मिळाला नाही.' 'दान मिळालेच नाही' इत्यादी वाक्ये अपेक्षेने आणि असहिष्णुतेने बोलली गेली आहेत असे सामान्य लोकांना वाटू नये, म्हणून त्यांचा अभिप्राय स्पष्ट करण्यासाठी 'पण का बरं?' (kasmā pana) इत्यादी म्हटले आहे. 'सुत्तिकापटिच्छन्नं' (suttikāpaṭicchannaṃ) म्हणजे शिंपल्यांच्या कवचाने झाकलेले (सिप्पिकाछदाहि छन्नं). อุกฺกฏฺฐเอกาสนิกตายาติ อิทํ ภูตกถนมตฺตํ เถรสฺส ตถาภาวทีปนโต. มุทุกสฺสปิ หิ เอกาสนิกสฺส ยาย นิสชฺชาย กิญฺจิมตฺตํ โภชนํ ภุตฺตํ, วตฺตสีเสนปิ ตโต วุฏฺฐิตสฺส ปุน ภุญฺชิตุํ น วฏฺฏติ. เตนาห ติปิฏกจูฬาภยตฺเถโร ‘‘อาสนํ วา รกฺเขยฺย โภชนํ วา’’ติ. อุกฺกฏฺฐสปทานจาริโกติ ปุรโต ปจฺฉโต จ อาหฏภิกฺขมฺปิ อคฺคเหตฺวา พหิทฺวาเร ฐตฺวา ปตฺตวิสฺสชฺชนเมว กโรติ. เอเตเนว เถรสฺส อุกฺกฏฺฐปิณฺฑปาติกภาโว ทีปิโต. เตนาห – ‘‘สฺวาตนาย ภิกฺขํ นาม นาธิวาเสตี’’ติ. อถ กสฺมา อธิวาเสสีติ อาห ‘‘มาตุ อนุคฺคเหนา’’ติอาทิ. ปณฺฑิตา หิ มาตาปิตูนํ อาจริยุปชฺฌายานํ วา กาตพฺพํ อนุคฺคหํ อชฺฌุเปกฺขิตฺวา ธุตงฺคสุทฺธิกา น ภวนฺติ. 'उक्कट्ट-एकासनिकता' (ukkaṭṭhaekāsanikatā - अत्यंत कठोरपणे एकाच आसनावर बसून भोजन करणे) हे स्थविरांच्या (थेरांच्या) त्या स्थितीचे दर्शन घडवण्यासाठी केवळ सत्यकथन आहे. कारण सौम्य प्रकारच्या एकासनिक भिक्खूनेही ज्या आसनावर बसून थोडे जरी भोजन केले असेल, तर नियमानुसार तिथून उठल्यानंतर त्याला पुन्हा भोजन करणे योग्य नाही. म्हणूनच तिपिटक चुळ्ळाभय स्थविरांनी म्हटले आहे - 'आसनाचे रक्षण करावे किंवा भोजनाचे.' 'उक्कट्टसपदानचारिक' (ukkaṭṭhasapadānacāriko - कठोरपणे क्रमाने भिक्षाटन करणारा) म्हणजे पुढे किंवा मागे आणलेली भिक्षा न स्वीकारता, घराबाहेर उभे राहून केवळ आपले पात्र पुढे करतो. यावरूनच स्थविरांचे कठोर पिंडपातिक (भिक्षा मागण्याचे व्रत) असणे स्पष्ट होते. म्हणूनच म्हटले आहे - 'ते दुसऱ्या दिवशीच्या भोजनाचे आमंत्रण स्वीकारत नाहीत.' मग त्यांनी आमंत्रण का स्वीकारले? तर 'मातेवरील अनुग्रहासाठी' इत्यादी म्हटले आहे. कारण ज्ञानी लोक माता-पिता किंवा आचार्य-उपाध्याय यांच्यावर करावयाच्या अनुग्रहाकडे दुर्लक्ष करून केवळ धुतंग-शुद्धीचे (धुतांग पालनाचे) आचरण करत नाहीत. ๓๐๑. ปยุตฺตนฺติ วทฺธิวเสน ปโยชิตํ, ตทฺธิตโลปํ กตฺวา วุตฺตนฺติ เวทิตพฺพํ ยถา อญฺญตฺถาปิ ‘‘ปิตามหํ ธนํ ลทฺธา, สุขํ ชีวติ สญฺจโย’’ติ[Pg.143]. เชฏฺฐกิตฺถิโยติ ปธานิตฺถิโย. อิโตติ อิมสฺมึ กุเล อนุภวิตพฺพวิภวสมฺปตฺติโต. อญฺญโตติ อิมสฺส ทินฺนตฺตา อญฺญสฺมึ กุเล อนุภวิตพฺพสมฺปตฺติโต. ३०१. 'पयुत्तं' (payuttaṃ) म्हणजे व्याजाच्या (वाढीच्या) उद्देशाने लावलेले; तद्धित प्रत्ययाचा लोप करून हे सांगितले आहे असे समजावे, जसे की इतर ठिकाणीही म्हटले आहे - 'आजोबांचे धन मिळवून संचय करणारा सुखाने जगतो.' 'जेठ्ठकित्थियो' (jeṭṭhakitthiyo) म्हणजे मुख्य स्त्रिया (प्रधान स्त्रिया). 'इतो' (ito) म्हणजे या कुळात उपभोगायला मिळणाऱ्या वैभव-संपत्तीतून. 'अञ्ञतो' (aññato) म्हणजे दुसऱ्या कुळात दिले गेल्यामुळे त्या दुसऱ्या कुळात उपभोगायला मिळणाऱ्या संपत्तीतून. ๓๐๒. จิตฺตวิจิตฺตนฺติ กปฺปนาย เจว อรหรูเปน อลงฺการาทินา จ จิตฺติตญฺเจว วิจิตฺติตญฺจ. วณกายนฺติ วณภูตํ กายํ. สมนฺตโต อุสฺสิตนฺติ เหฏฺฐิมกายวเสน เหฏฺฐา อุปริ จ สนฺนิสฺสิตํ. นิจฺจาตุรนฺติ อภิณฺหปฺปฏิปีฬิตํ, สทา ทุกฺขิตํ วา. พหุสงฺกปฺปนฺติ ราควตฺถุภาเวน อภิชเนหิ หาวภาววิลาสวเสน, อามิสวเสน จ โสณสิงฺคาลาทีหิ พหูหิ สงฺกปฺเปตพฺพํ. ฐิตีติ อวฏฺฐานํ อวิปริณาโม นตฺถิ. เตนาห – ‘‘ภิชฺชนธมฺมตาว นิยตา’’ติ, ปริสฺสวภาวาปตฺติ เจว วินาสปตฺติ จ เอกนฺติกาติ อตฺโถ. ३०२. 'चित्तविचित्तं' (cittavicittaṃ) म्हणजे कल्पनेने तसेच सुंदर रूप, अलंकार इत्यादींनी सुशोभित आणि नानाविध रंगांनी सजवलेले. 'वणकायं' (vaṇakāyaṃ) म्हणजे जखमांनी भरलेले शरीर. 'समंततो उस्सितं' (samantato ussitṃ) म्हणजे खालच्या शरीराच्या आधाराने खाली आणि वर सर्व बाजूंनी आधारलेले (उभे केलेले). 'निच्चातुरं' (niccāturaṃ) म्हणजे सतत पीडित किंवा नेहमी दुःखी असणारे. 'बहुसंकप्पं' (bahusaṅkappaṃ) म्हणजे रागाचा (वासनेचा) विषय असल्यामुळे लोकांद्वारे हावभाव व विलासाने, आणि मांसाच्या (आमिषाच्या) लोभाने कुत्रे-कोल्हे इत्यादी अनेक प्राण्यांद्वारे इच्छा (संकल्प) केले जाणारे. 'ठिती' (ṭhiti) म्हणजे स्थिरता किंवा अपरिवर्तनीयता नाही. म्हणूनच म्हटले आहे - 'नष्ट होणे हाच याचा निश्चित स्वभाव आहे' (bhijjanadhammatāva niyatā), म्हणजेच सडणे आणि विनाश पावणे हे अगदी निश्चित आहे असा अर्थ आहे. จิตฺตกตมฺปีติ คนฺธาทีหิ จิตฺตกตมฺปิ. รูปนฺติ สรีรํ. 'चित्तकतमपि' (cittakatampi) म्हणजे सुगंधी द्रव्ये इत्यादींनी सुशोभित केलेले. 'रूपं' (rūpaṃ) म्हणजे शरीर (शरीरं). อลตฺตกกตาติ ปิณฺฑิอลตฺตเกน สุวณฺณกตา. เตนาห ‘‘อลตฺตเกน รญฺชิตา’’ติ. จุณฺณกมกฺขิตนฺติ โทสนีหรเณหิ ตาปทหนาทีหิ กตาภิสงฺขารมุขํ โคโรจนาทีหิ โอภาสนกจุณฺเณหิ มกฺขิตํ, เตนาห ‘‘สาสปกกฺเกนา’’ติอาทิ. 'अलत्तककता' (alattakakatā) म्हणजे लाखेच्या रंगाने (पिंडी-अलक्तकाने) सुंदर किंवा सुवर्णमय केलेली. म्हणूनच म्हटले आहे - 'लाखेच्या रंगाने रंगवलेली'. 'चुण्णकमक्खितं' (cuṇṇakamakkhitaṃ) म्हणजे डाग घालवणे, उष्णता व जळजळ दूर करणे इत्यादी उपचारांनी तयार केलेल्या चेहऱ्यावर गोरोचन इत्यादी चमकवणाऱ्या चूर्णांनी (पावडरीने) माखलेले; म्हणूनच 'मोहरीच्या लेपाने' (sāsapakakkena) इत्यादी म्हटले आहे. รโสทเกนาติ สรลนิยฺยาสรสมิสฺเสน อุทเกน. อาวตฺตนปริวตฺเต กตฺวาติ อาวตฺตนปริวตฺตนวเสน นเต กตฺวา. อฏฺฐปทกรจนายาติ ภิตฺติกูฏทฺธจนฺทาทิวิภาคาย อฏฺฐปทกรจนาย. 'रसोदकेन' (rasodakena) म्हणजे देवदार वृक्षाच्या रसाने (डिंकाने) मिश्रित पाण्याने. 'आवत्तनपरिवत्ते कत्वा' (āvattanaparivatte katvā) म्हणजे फिरवून आणि वळवून कुरळे किंवा वाकलेले करून. 'अट्ठपदकरचनाय' (aṭṭhapadakaracanāya) म्हणजे भिंती, शिखरे, अर्धचंद्र इत्यादींच्या विभाजनासाठी अष्टपद (बुद्धिबळाच्या पटासारख्या) रचनेने. วิรวมาเนติ ‘‘อยํ ปลายติ, คณฺห คณฺหา’’ติ วิรวมาเน. หิรญฺญสุวณฺณโอโรเธติ วตฺตพฺพํ. 'विरवमाने' (viravamāne) म्हणजे 'हा पळून जात आहे, पकडा, पकडा!' असा आरडाओरडा करत असताना. 'हिरञ्ञसुवण्णओरोधे' (hiraññasuvaṇṇaorodhe) असे म्हटले पाहिजे. ๓๐๓. อุสฺสิตาย อุสฺสิตายาติ กุลวิภวพาหุสจฺจปญฺญาสมฺปตฺติยา อุคฺคตาย อุคฺคตาย. อภิลกฺขิโต อุฬารภาเวน. ३०३. 'उस्सिताय उस्सिताय' (ussitāya ussitāya) म्हणजे कुळ, वैभव, बहुश्रुतता आणि प्रज्ञा यांच्या संपत्तीने उन्नत झालेल्या (श्रेष्ठ झालेल्या). 'अभिलक्खितो' (abhilakkhito) म्हणजे उदारभावाने (उदात्ततेने) चिन्हांकित किंवा वैशिष्ट्यपूर्ण झालेला. ๓๐๔. ปริชุญฺญานีติ ปริหานานิ. เย พฺยาธินา อภิภูตา สตฺตา ชิณฺณกปฺปา วโยหานิสตฺตา วิย โหนฺติ, ตโต นิวตฺเตนฺโต ‘‘ชราชิณฺโณ’’ติ อาห. วโยวุฑฺโฒ, น สีลาทิวุฑฺโฒ. มหตฺตํ ลาติ คณฺหาตีติ มหลฺลโก, ชาติยา มหลฺลโก, น วิภวาทินาติ ชาติมหลฺลโก[Pg.144]. ทฺวตฺติราชปริวตฺตสงฺขาตํ อทฺธานํ กาลํ คโต วีติวตฺโตติ อทฺธคโต. ตถา จ ปฐมวยํ มชฺฌิมวยญฺจ อตีโต โหตีติ อาห ‘‘อทฺธานํ อติกฺกนฺโต’’ติ. ชิณฺณาทิปเทหิ ปฐมวยมชฺฌิมวยสฺส โพธิตตฺตา อนุปฺปตฺตตาวิสิฏฺโฐ วย-สทฺโท โอสานวยวิสโยติ อาห ‘‘ปจฺฉิมวยํ อนุปฺปตฺโต’’ติ. ३०४. 'परिजुञ्ञानि' (parijuññāni) म्हणजे हानी किंवा ऱ्हास. जे प्राणी रोगाने ग्रस्त होऊन जणू जीर्ण झाल्यासारखे होतात, त्यांच्यापासून वेगळे दर्शवण्यासाठी 'जराजीर्ण' (jarājiṇṇo - वृद्धत्वामुळे जीर्ण झालेला) असे म्हटले आहे. 'वयोवुड्ढो' (vayovuḍḍho) म्हणजे वयाने वृद्ध झालेला, शील इत्यादींनी वृद्ध झालेला नव्हे. जो मोठेपण प्राप्त करतो (महतं लाति) तो 'महल्लक' (mahallako) होय; तो जन्माने (वयाने) वृद्ध असतो, वैभवाने नव्हे, म्हणून त्याला 'जातिमहल्लक' (jātimahallako) म्हटले आहे. दोन किंवा तीन राजांच्या कारकिर्दीच्या काळाएवढा मोठा मार्ग (काळ) पार करून गेलेला तो 'अद्धगतो' (addhagato) होय. अशा प्रकारे, ज्याने पहिले वय (तारुण्य) आणि मध्यम वय पार केले आहे, त्याला 'मार्ग पार केलेला' (addhānaṃ atikkanto) असे म्हटले आहे. 'जीर्ण' इत्यादी शब्दांनी पहिल्या आणि मध्यम वयाचा बोध होत असल्यामुळे, 'वय' हा शब्द अंतिम वयाच्या संदर्भात वापरला आहे, म्हणून 'अंतिम वयात (वृद्धावस्थेत) पोहोचलेला' (pacchimavayaṃ anuppatto) असे म्हटले आहे. ‘‘อปฺปิจฺโฉ, อปฺปฑํสมกสวาตาตปสรีสปสมฺผสฺโส’’ติ (อ. นิ. ๑๐.๑๑) เอวมาทีสุ วิย อปฺป-สทฺโท อภาวตฺโถติ อธิปฺปาเยนาห ‘‘อปฺปาพาโธติ อโรโค, อปฺปาตงฺโกติ นิทฺทุกฺโข’’ติ. อปฺปตฺโถ วา อิธ, ตตฺถาปิ อปฺป-สทฺโท ทฏฺฐพฺโพ. เอวญฺหิ ‘‘โย หิ, คหปติ, อิมํ ปูติกายํ ปริหรนฺโต มุหุตฺตมฺปิ อาโรคฺยํ ปฏิชาเนยฺย กิมญฺญตฺร พาลฺยา’’ติ (สํ. นิ. ๓.๑) สุตฺตปทํ สมตฺถิตํ โหติ. วิปจฺจนํ วิปาโก, โส เอว เวปาโก. สโม เวปาโก เอติสฺสา อตฺถีติ สมเวปากินี, ตาย. เตเนว สมเวปากินิภาเวน สพฺพมฺปิ สมฺมเทว คณฺหาติ ธาเรตีติ คหณี. คหณิสมฺปตฺติยา หิ ยถาภุตฺตอาหาโร สมฺมเทว ชีรนฺโต สรีเร ติฏฺฐติ, โน อญฺญถา ภุตฺตภุตฺโต อาหาโร ชีรติ คหณิยา ติกฺขภาเวน. ตเถว ติฏฺฐตีติ ภุตฺตากาเรเนว ติฏฺฐติ คหณิยา มนฺทภาวโต. ภตฺตจฺฉนฺโท อุปฺปชฺชเตว ภุตฺตอาหารสฺส สมฺมา ปริณามํ คตตฺตา. เตเนวาติ สมเวปากินิภาเวเนว. ปตฺตานํ โภคานํ ปริกฺขิยมานํ น สหสา เอกชฺฌํเยว ปริกฺขยํ คจฺฉนฺติ, อถ โข อนุกฺกเมน, ตถา ญาตโยปีติ อาห ‘‘อนุปุพฺเพนา’’ติ. ฉาตกภยาทินาติ อาทิ-สทฺเทน พฺยาธิภยาทึ สงฺคณฺหาติ. 'अप्पिच्छो, अप्पडंसमकसवातातपसरीसपसम्फस्सो' (अंगुत्तर निकाय १०.११) इत्यादींमध्ये 'अप्प' (अल्प) हा शब्द 'अभाव' (नसणे) या अर्थाने वापरला आहे, याच अभिप्रायाने म्हटले आहे - 'अप्पाबाधो' (appābādho) म्हणजे निरोगी (अरोगो), 'अप्पातंको' (appātaṅko) म्हणजे दुःखमुक्त (निद्दुक्खो). किंवा येथे 'अप्प' चा अर्थ 'अल्प' असाही घ्यावा. अशा प्रकारे, 'हे गृहपती, या सडणाऱ्या शरीराला सांभाळत असताना जो कोणी क्षणभरही आरोग्याचा दावा करतो, तो मूर्खपणाशिवाय काय असू शकतो?' (संयुत्त निकाय ३.१) हे सुत्तवचन सुसंगत ठरते. 'विपच्चन' म्हणजे पचन (विपाको), तोच 'वेपाको' होय. जिचे पचन सम प्रमाणात होते ती 'समवेपाकिनी' (samavepākinī) होय, तिच्याद्वारे. त्याच समवेपाकिनी स्थितीमुळे जे सर्व काही चांगल्या प्रकारे ग्रहण करते आणि धारण करते, ती 'गहणी' (gahaṇī - जठराग्नी) होय. कारण जठराग्नीच्या उत्तम स्थितीमुळे (गहणिसंपत्तीमुळे) खाल्लेले अन्न चांगल्या प्रकारे पचून शरीरात राहते; जठराग्नीच्या अति-तीव्रतेमुळे (तिक्खभावेन) खाल्लेले अन्न लगेच जळून जात नाही (किंवा पचत नाही). 'तथैव तिट्ठति' म्हणजे जठराग्नीच्या मंदतेमुळे (मंदभावतो) ते खाल्लेल्या स्वरूपातच राहते. खाल्लेल्या अन्नाचे योग्य प्रकारे रूपांतर (पचन) झाल्यामुळे अन्नाची इच्छा (भत्तच्छंदो) निर्माण होतेच. 'तेनेव' म्हणजे त्याच समवेपाकिनी स्थितीमुळेच. प्राप्त झालेल्या भोगांचा (संपत्तीचा) क्षय होत असताना, ते अचानक एकाच वेळी नष्ट होत नाहीत, तर हळूहळू नष्ट होतात; नातेवाईकांच्या बाबतीतही तसेच होते, म्हणून 'अनुक्रमाने' (anupubbenā) असे म्हटले आहे. 'छातकभयादिना' (chātakabhayādinā) मधील 'आदि' शब्दाने दुष्काळाचे भय, रोगाचे भय इत्यादींचा समावेश होतो. ๓๐๕. อุทฺเทสสีเสน นิทฺเทโส คหิโตติ อาห ‘‘ธมฺมนิทฺเทสา อุทฺทิฏฺฐา’’ติ. ยสฺมา วา เย ธมฺมา อุทฺทิสิตพฺพฏฺเฐน ‘‘อุทฺเทสา’’ติ วุจฺจนฺติ. เตว ธมฺมา นิทฺทิสิตพฺพฏฺเฐน นิทฺเทสาติ ‘‘ธมฺมนิทฺเทสา อุทฺทิฏฺฐา’’ติ อตฺโถ วุตฺโต. อถ วา เย ธมฺมา อนิจฺจตาทิวิภาวนวเสน อุทฺธํ อุทฺธํ เทเสสฺสนฺติ, เต ธมฺมา ตเถว นิสฺเสสโต เทเสสฺสนฺตีติ เอวํ อุทฺเทสนิทฺเทสปทานํ อนตฺถนฺตรตา เวทิตพฺพา. ตตฺถาติ ชรามรณสนฺติเก. อทฺธุโวติ นิทฺธุโว น ถิโร, อนิจฺโจติ อตฺโถ. เตนาห ‘‘ธุวฏฺฐานวิรหิโต’’ติ, อชาตาภูตาสงฺขตธุวภาวการณวิวิตฺโตติ อตฺโถ. อุปนียฺยตีติ วา [Pg.145] ชรามรเณน โลโก สมฺมา นียติ, ตสฺมา อทฺธุโวติ เอวเมตฺถ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. ตายิตุนฺติ ชาติอาทิพฺยสนโต รกฺขิตุํ สมตฺเถน อิสฺสเรน อตฺตนา วิรหิโตติ. ‘‘อิมํ โลกํ อิโต วฏฺฏทุกฺขโต โมเจสฺสามิ, ชราพฺยาธิมรณานํ ตํ อธิภวิตุํ น ทสฺสามี’’ติ เอวํ อภิสรตีติ อภิสฺสรณํ, โลกสฺส สุขสฺส ทาตา หิตสฺส วิธาตา โกจิ อิสฺสโร, ตทภาวโต อาห ‘‘อนภิสฺสโรติ อสรโณ’’ติ. นิสฺสโก มมายิตพฺพวตฺถุอภาวโต, เตนาห ‘‘สกภณฺฑวิรหิโต’’ติอาทิ. ตณฺหาย วเส ชาโต ตณฺหาย วิชิโตติ กตฺวา ‘‘ตณฺหาย ทาโส’’ติ วุตฺตํ. ३०५. उद्देशाच्या (संक्षिप्त विधानाच्या) शीर्षकाखाली निर्देश (सविस्तर स्पष्टीकरण) ग्रहण केला आहे, म्हणून म्हटले आहे - 'धम्मनिर्देश उद्दिष्ट (सांगितले) आहेत'. किंवा ज्या अर्थी जे धम्म उद्देश करण्याच्या (सांगण्याच्या) अर्थाने 'उद्देश' म्हटले जातात, तेच धम्म निर्देश करण्याच्या (स्पष्ट करण्याच्या) अर्थाने निर्देश आहेत, म्हणून 'धम्मनिर्देश उद्दिष्ट आहेत' असा अर्थ सांगितला आहे. अथवा जे धम्म अनित्यता इत्यादींचे स्पष्टीकरण करण्याच्या उद्देशाने पुढे पुढे देशित केले जातील, तेच धम्म त्याच प्रकारे पूर्णपणे देशित केले जातील, अशा प्रकारे 'उद्देश' आणि 'निर्देश' या पदांमध्ये कोणताही भिन्न अर्थ नाही, असे जाणावे. 'तथ' म्हणजे जरा आणि मरणाच्या समीप. 'अद्धुवो' म्हणजे अस्थिर, स्थिर नसलेला, अनित्य असा अर्थ आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - 'ध्रुव स्थानाने विरहित', म्हणजेच अजात, अभूत, असंस्कृत अशा ध्रुवभावाच्या कारणाने विरहित असा अर्थ आहे. किंवा 'उपनिय्यति' म्हणजे जरा आणि मरणाद्वारे लोक पूर्णपणे नेला जातो, म्हणून तो 'अद्धुवो' (अध्रुव) आहे, असा येथे अर्थ पाहावा. 'तायितुं' म्हणजे जन्म इत्यादी संकटांपासून रक्षण करण्यास समर्थ अशा ईश्वराने (स्वामीने) किंवा स्वतःने विरहित असणे. 'मी या लोकाला या संसारदुःखातून मुक्त करीन, जरा, व्याधी आणि मरणाला त्यावर मात करू देणार नाही' अशा प्रकारे जो धावून येतो तो 'अभिसरण' (रक्षक) होय, म्हणजेच लोकाला सुख देणारा आणि हिताचे विधान करणारा कोणी ईश्वर; त्याच्या अभावामुळे म्हटले आहे - 'अनभिसरो' म्हणजे 'अशरण' (ज्याला कोणी रक्षक नाही). 'निस्सको' म्हणजे 'माझे' म्हणण्यासारख्या वस्तूचा अभाव असल्यामुळे, म्हणूनच म्हटले आहे - 'स्वतःच्या मालकीच्या वस्तूने विरहित' इत्यादी. तृष्णेच्या वश झालेला, तृष्णेने पराभूत झालेला असल्यामुळे 'तृष्णेचा दास' असे म्हटले आहे. ๓๐๖. หตฺถิวิสยตฺตา หตฺถิสนฺนิสฺสิตตฺตา วา หตฺถิสิปฺปํ ‘‘หตฺถี’’ติ คหิตนฺติ อาห – ‘‘หตฺถิสฺมินฺติ หตฺถิสิปฺเป’’ติ, เสสปเทสุปิ เอเสว นโย. สาติสยํ อูรุพลํ เอตสฺส อตฺถีติ อูรุพลีติ อาห – ‘‘อูรุพลสมฺปนฺโน’’ติ, ตเมวตฺถํ ปากฏํ กตฺวา ทสฺเสตุํ ‘‘ยสฺส หี’’ติอาทิ วุตฺตํ. อภินฺนํ ปรเสนํ ภินฺทโต ภินฺนํ สกเสนํ สนฺธารยโต อุปตฺถมฺภยโต. พาหุพลีติ เอตฺถาปิ ‘‘ยสฺส หิ ผลกญฺจ อาวุธญฺจ คเหตฺวา’’ติอาทินา อตฺโถ วตฺตพฺโพ, อิธ ปน ปรหตฺถคตํ รชฺชํ อาหริตุํ พาหุพลนฺติ โยชนา. ยถา หิ ‘‘อูรุพลี’’ติ เอตฺถาปิ พาหุพลํ อนามสิตฺวา อตฺโถ, เอวํ ‘‘พาหุพลี’’ติ เอตฺถ อูรุพลํ อนามสิตฺวา อตฺโถ เวทิตพฺโพ, อาหิโต อหํมาโน เอตฺถาติ อตฺตา, อตฺตภาโว. อลํ สมตฺโถ อตฺตา เอตสฺสาติ อลมตฺโถติ อาห ‘‘สมตฺถอตฺตภาโว’’ติ. ३०६. हत्तीशी संबंधित असल्यामुळे किंवा हत्तीवर आश्रित असल्यामुळे हत्तीच्या कौशल्याला (हस्तिविद्या) 'हत्ती' असे ग्रहण केले आहे, म्हणून म्हटले आहे - 'हत्तीमध्ये म्हणजे हस्तिविद्येमध्ये', इतर पदांमध्येही हाच नियम आहे. ज्याच्याकडे अतिशय जंघाबल (पायांचे बळ) आहे तो 'ऊरुबली', म्हणून म्हटले आहे - 'ऊरुबलसंपन्न' (जंघाबलाने युक्त). तोच अर्थ स्पष्ट करून दाखवण्यासाठी 'ज्याला खरोखर' इत्यादी म्हटले आहे. शत्रूच्या अभेद्य सैन्याला भेदणारा, आणि स्वतःच्या छिन्नभिन्न झालेल्या सैन्याला एकत्र आणणारा व आधार देणारा. 'बाहुबली' यामध्येही 'ज्याने खरोखर ढाल आणि शस्त्र हाती घेऊन' इत्यादी प्रकारे अर्थ सांगावा, परंतु येथे दुसऱ्याच्या हाती गेलेले राज्य परत मिळवण्यासाठी 'बाहुबल' अशी योजना आहे. ज्याप्रमाणे 'ऊरुबली' यामध्ये बाहुबलाचा उल्लेख न करता अर्थ होतो, त्याचप्रमाणे 'बाहुबली' यामध्ये ऊरुबलाचा उल्लेख न करता अर्थ समजून घ्यावा. ज्यामध्ये 'अहंकार' (मी-पणा) स्थापित आहे तो 'अत्ता' म्हणजे आत्मभाव (शरीर). जो स्वतः समर्थ आहे तो 'अलमत्थो', म्हणून म्हटले आहे - 'समर्थ आत्मभाव'. ปริโยธายาติ วา ปริโต อารกฺขํ โอทหิตฺวา. ‘‘สํวิชฺชนฺเต โข, โภ รฏฺฐปาล, อิมสฺมึ ราชกุเล หตฺถิกายาปิ…เป… วตฺติสฺสนฺตี’’ติ อิทมฺปิ โส ราชา อุปริ ธมฺมุทฺเทสสฺส การณํ อาหรนฺโต อาห. 'परियोधाय' म्हणजे चहूबाजूंनी रक्षण (पहरा) ठेवून. 'हे राष्ट्रपाल, या राजकुलात हत्तींचे दलही विद्यमान आहेत...पे... चालतील' हे देखील तो राजा पुढे धम्मुद्देशाचे (धम्म उपदेशाचे) कारण सांगताना म्हणाला. วุตฺตสฺเสว อนุ ปจฺฉา คายนวเสน กถนํ อนุคีติ. ตา ปน คาถา ธมฺมุทฺเทสานํ เทสนานุปุพฺพึ อนาทิยิตฺวาปิ ยถารหํ สงฺคณฺหนวเสน อนุคีตาติ อาห ‘‘จตุนฺนํ ธมฺมุทฺเทสานํ อนุคีติ’’นฺติ. सांगितलेल्या गोष्टीचेच नंतर किंवा मागाहून गायन करून सांगणे म्हणजे 'अनुगीती' होय. परंतु त्या गाथा धम्मुद्देशांच्या देशनेच्या अनुक्रमाचा विचार न करताही योग्यतेनुसार संग्रह करण्याच्या उद्देशाने गायिल्या गेल्या आहेत, म्हणून म्हटले आहे - 'चार धम्मुद्देशांची अनुगीती'. ๓๐๗. เอกนฺติ เอกชาติยํ. วตฺถุกามกิเลสกามา วิสยเภเทน ภินฺทิตฺวา ตถา วุตฺตาติ ทฏฺฐพฺโพ. ३०७. 'एकं' म्हणजे एकाच जातीचे. वस्तुकाम आणि क्लेशकाम हे विषयाच्या भेदाने भिन्न करून तसे सांगितले आहेत, असे पाहावे. สาครนฺเตนาติ [Pg.146] สาครปริยนฺเตน. 'सागरन्तेन' म्हणजे सागराच्या मर्यादेपर्यंत (समुद्रकिनाऱ्यापर्यंत). อโห วตาติ โสจเน นิปาโต, ‘‘อโห วต ปาปํ กตํ มยา’’ติอาทีสุ วิย. อมราติอาทีสุ อาหูติ กเถนฺติ. มตํ อุทฺทิสฺส ‘‘อมฺห’’นฺติ วตฺตพฺเพ โสกวเสน ‘‘อมร’’นฺติ วุจฺจติ. 'अहो वत' हा शोकाचा निपात (अव्यय) आहे, जसे 'अहो वत, माझ्याकडून पाप झाले' इत्यादींमध्ये. 'अमरा' इत्यादींमध्ये 'आहू' म्हणजे म्हणतात. मृत व्यक्तीला उद्देशून 'आम्ही' असे म्हणायचे असताना शोकामुळे 'अमर' असे म्हटले जाते. โวสานนฺติ นิฏฺฐํ, ปริโยสานนฺติ อตฺโถ. สาวาติ ปญฺญา เอว. ธนโตติ สพฺพธนโต. อุตฺตมตรา เสฏฺฐา, เตเนวาห ‘‘ปญฺญาชีวึ ชีวิตมาหุ เสฏฺฐ’’นฺติ (สํ. นิ. ๑.๒๔๖; สุ. นิ. ๑๘๔). 'वोसानं' म्हणजे निष्ठा (समाप्ती), पर्यवसान असा अर्थ आहे. 'सा' म्हणजे प्रज्ञाच. 'धनतो' म्हणजे सर्व धनांपेक्षा. 'उत्तमतर' म्हणजे श्रेष्ठ, म्हणूनच म्हटले आहे - 'प्रज्ञेने जगणे हेच श्रेष्ठ जीवन आहे असे म्हणतात'. เตสุ ปาปํ กโรนฺเตสุ สตฺเตสุ, นิทฺธารเณ เจตํ ภุมฺมวจนํ. ปรมฺปรายาติ อตฺตภาวปรมฺปราย. สํสารํ อาปชฺชิตฺวาติ ภวาทีสุ สํสารสฺส อาปชฺชนเหตุํ อาปชฺชนฺโต ปรโลกํ อุเปติ, ปรโลกํ อุเปนฺโตว พหุวิธทุกฺขสงฺขาตํ คพฺภญฺจ อุเปติ. ตาทิสสฺสาติ ตถารูปสฺส คพฺภวาสทุกฺขาทีนํ อธิฏฺฐานภูตสฺส อปฺปปญฺญสฺส อญฺโญ อปฺปปญฺโญ จ อภิสทฺทหนฺโต หิตสุขาวหนฺติ ปตฺติยายนฺโต. त्या पाप करणाऱ्या प्राण्यांमध्ये, हे निर्धारण अर्थातील सप्तमीचे वचन आहे. 'परंपराय' म्हणजे आत्मभावाच्या (अस्तित्वाच्या) परंपरेने. 'संसाराला प्राप्त होऊन' म्हणजे भवांमध्ये संसाराच्या प्राप्तीचे कारण प्राप्त करून परलोकात जातो, परलोकात जातानाच अनेक प्रकारच्या दुःखांनी युक्त अशा गर्भात प्रवेश करतो. 'तादृशाचा' म्हणजे तशा प्रकारच्या गर्भवासाच्या दुःखादींचे अधिष्ठान असलेल्या अल्पप्रज्ञा (अल्प बुद्धी) असलेल्या व्यक्तीवर दुसरा अल्पप्रज्ञ विश्वास ठेवणारा, हे हित आणि सुख देणारे आहे असा विश्वास ठेवणारा. ‘‘ปาปธมฺโม’’ติ วุตฺตตฺตา ตาทิสสฺส ปรโลโก นาม ทุคฺคติ เอวาติ อาห ‘‘ปรมฺหิ อปายโลเก’’ติ. 'पापधर्मी' असे म्हटल्यामुळे तशा व्यक्तीचा परलोक म्हणजे दुर्गतीच होय, म्हणून म्हटले आहे - 'परलोकातील अपायलोकात (नरकात)'. วิวิธรูเปนาติ รูปสทฺทาทิวเสน ตตฺถปิ ปณีตตราทิวเสน พหุวิธรูเปน. 'विविध रूपाने' म्हणजे रूप, शब्द इत्यादींच्या द्वारे आणि त्यातही अधिक उत्तम इत्यादींच्या द्वारे अनेक प्रकारच्या रूपाने. สามญฺญเมวาติ สมณภาโว เอว เสยฺโย. เอตฺถ จ อาทิโต ทฺวีหิ คาถาหิ จตุตฺโถ ธมฺมุทฺเทโส อนุคีโต. จตุตฺถคาถาย ตติโย. ปญฺจมคาถาย ทุติโย. ฉฏฺฐคาถาย ทุติยตติยา. สตฺตมคาถาย ปฐโม ธมฺมุทฺเทโส อนุคีโต, อฏฺฐมาทีหิ ปวตฺตินิวตฺตีสุ กาเมสุ เนกฺขมฺเม จ ยถารหํ อาทีนวานิสํสํ วิภาเวตฺวา อตฺตโน ปพฺพชฺชการณํ ปรมโต ทสฺเสนฺโต ยถาวุตฺตธมฺมุทฺเทสํ นิคเมติ, เตน วุตฺตํ ‘‘ตา ปน คาถา ธมฺมุทฺเทสานํ เทสนานุปุพฺพึ อนาทิยิตฺวาปิ ยถารหํ สงฺคณฺหนวเสน อนุคีตา’’ติ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. 'सामञ्ञमेव' म्हणजे श्रमणभावच श्रेष्ठ आहे. आणि येथे सुरुवातीच्या दोन गाथांद्वारे चौथ्या धम्मुद्देशाची अनुगीती केली आहे. चौथ्या गाथेने तिसऱ्याची. पाचव्या गाथेने दुसऱ्याची. सहाव्या गाथेने दुसऱ्या व तिसऱ्याची. सातव्या गाथेने पहिल्या धम्मुद्देशाची अनुगीती केली आहे. आठव्या इत्यादी गाथांद्वारे प्रवृत्ती आणि निवृत्तीमध्ये, कामांमध्ये (भोगांमध्ये) आणि नैष्क्रम्यामध्ये (संन्यासात) योग्यतेनुसार दोष आणि लाभ स्पष्ट करून, स्वतःच्या प्रव्रज्येचे (दीक्षेचे) कारण उत्कृष्टपणे दाखवून, वर सांगितलेल्या धम्मुद्देशाचा उपसंहार करतो. म्हणूनच म्हटले आहे - 'परंतु त्या गाथा धम्मुद्देशांच्या देशनेच्या अनुक्रमाचा विचार न करताही योग्यतेनुसार संग्रह करण्याच्या उद्देशाने गायिल्या गेल्या आहेत'. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. รฏฺฐปาลสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. राष्ट्रपालसुत्तवर्णनेतील लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๓. มฆเทวสุตฺตวณฺณนา ३. मघदेवसुत्तवर्णना ๓๐๘. ปุพฺเพ [Pg.147] มฆเทโว นาม ราชาติ อตีตกาเล อิมสฺมึเยว กปฺเป อเนกวสฺสสหสฺสายุเกสุ มนุสฺเสสุ ปฏิปาฏิยา อุปฺปนฺนานํ จตุราสีติสหสฺสานํ จกฺกวตฺติราชูนํ อาทิปุริโส มฆเทโวติ เอวํนาโม ราชา. ३०८. 'पूर्वी मघदेव नावाचा राजा होता' म्हणजे भूतकाळात याच कल्पामध्ये, अनेक हजार वर्षांचे आयुष्य असलेल्या मनुष्यांमध्ये अनुक्रमाने उत्पन्न झालेल्या चौऱ्याऐंशी हजार चक्रवर्ती राजांचा मूळ पुरुष 'मघदेव' नावाचा राजा होता. ธมฺโมติ ราชธมฺโมติ โลกิกา วทนฺติ. มหาโพธินิธานปารมิตาสงฺขาโต ปน ธมฺโม อตฺถีติ ธมฺมิโก. ธมฺเมนาติ ญาเยน. ตทา พฺรหฺมวิหาราทิภาวนาธมฺมสฺส รญฺโญ อนธิคตตฺตา ตสฺสปิ วา อนภิชฺฌาทีหิ สมานโยคกฺขมตฺตา วุตฺตํ ‘‘ทสกุสลกมฺมปเถ ฐิโต’’ติ. ธมฺมนฺติ ธมฺมโต อนเปตํ. ตถา หิ จ โส ปกฺขปาตาภาวโต ‘‘สโม’’ติ วุจฺจตีติ อาห ‘‘สมํ จรตี’’ติ. ปกตินิยาเมเนวาติ ปเวณิยา อาคตนิยาเมเนว. ยสฺมา นิคมชนปเทสุ เยภุยฺเยน คหปตีนํ สงฺคโห, ตสฺมา อฏฺฐกถายํ ‘‘คหปติกาน’’นฺตฺเวว วุตฺตํ. ปาฬิยํ ปน อญฺญเมว นาครจาริตฺตํ, อญฺญํ เนคมชนปทจาริตฺตนฺติ เต วิสุํ คหิตา ‘‘เนคเมสุ เจว ชนปเทสุ จา’’ติ. ปจฺจุคฺคมนนิคฺคมนวเสน อุโปสถสฺส ปฏิหรณํ ปาฏิหาริโย, โส เอว ปาฏิหาริโก, ปกฺโข. อิเม ทิวสาติ อิเม จตฺตาโร ทิวสา. लौकिक लोक 'धम्मो' (धम्म) म्हणजे 'राजधम्म' असे म्हणतात. परंतु महाबोधीच्या निधानाचा (साठ्याचा) पारमितासंज्ञक जो धम्म आहे, तो ज्याच्याकडे आहे तो 'धम्मिको' (धार्मिक) होय. 'धम्मेन' म्हणजे न्यायाने. त्या वेळी ब्रह्मविहारादी भावनाधम्माची राजाला प्राप्ती न झाल्यामुळे किंवा त्याच्या अनभिध्या (अलोभ) इत्यादींशी समान योगक्षेम असल्यामुळे 'दशकुशलकर्मपथात स्थित असलेला' असे म्हटले आहे. 'धम्मं' म्हणजे धम्मापासून विचलित न झालेला. कारण तो पक्षपात नसल्यामुळे 'सम' (समान) म्हटला जातो, म्हणून 'समं चरति' (समतेने आचरण करतो) असे म्हटले आहे. 'पकतितियामेनेव' (प्रकृती नियमानेच) म्हणजे परंपरेने चालत आलेल्या नियमानेच. ज्याअर्थी निगम आणि जनपदांमध्ये बहुतांश गृहपतींचा संग्रह (समावेश) होतो, म्हणून अट्ठकथेत 'गहपतिकानं' (गृहपतींचा) असेच म्हटले आहे. परंतु पाळीमध्ये नगराची प्रथा वेगळी आणि निगम-जनपदांची प्रथा वेगळी असल्यामुळे, त्यांना स्वतंत्रपणे 'नेगमेसु चेव जनपदेसु चा' (निगमांमध्ये आणि जनपदांमध्ये सुद्धा) असे घेतले आहे. उपोसथाचे स्वागत व विसर्जन करण्याच्या दृष्टीने त्याचे पालन करणे म्हणजे 'पाटिहारियो' (प्रातिहार्य), तोच 'पाटिहारिको' (प्रातिहारिक) पक्ष होय. 'इमे दिवसा' म्हणजे हे चार दिवस. ๓๐๙. เทโวติ มจฺจุ อภิภวนฏฺเฐน. ยถา หิ เทโว ปกติสตฺเต อภิภวติ, เอวํ มจฺจุ สตฺเต อภิภวติ. ‘‘อหํ อสุกํ มทฺทิตุํ อาคมิสฺสามิ, ตฺวํ ตสฺส เกเส คเหตฺวา มา วิสฺสชฺเชหี’’ติ มจฺจุเทวสฺส อาณากรา ทูตา วิยาติ ทูตาติ วุจฺจนฺติ. อลงฺกตปฏิยตฺตายาติ อิทํ อตฺตโน ทิพฺพานุภาวํ อาวิกตฺวา ฐิตายาติ ทสฺเสตุํ วุตฺตํ. เทวตาพฺยากรณสทิสเมว โหติ น จิเรเนว มรณสมฺภวโต. วิสุทฺธิเทวานนฺติ ขีณาสวพฺรหฺมานํ. เต หิ จริมภเว โพธิสตฺตานํ ชิณฺณาทิเก ทสฺเสนฺติ. ३०९. अभिभूत (पराभूत) करण्याच्या अर्थाने मृत्यूला 'देवो' (देव) म्हटले आहे. कारण ज्याप्रमाणे देव सामान्य प्राण्यांना पराभूत करतो, त्याचप्रमाणे मृत्यू प्राण्यांना पराभूत करतो. 'मी अमुक एकाला चिरडण्यासाठी येईन, तू त्याचे केस पकडून ठेव, सोडू नकोस' असे सांगणारे मृत्यूरूपी देवाचे आज्ञाधारक दूत असल्यासारखे वाटतात, म्हणून त्यांना 'दूता' (दूत) म्हटले आहे. 'अलंक्तपटियत्ताय' (अलंकृत व सुसज्ज) हे तिने स्वतःचा दिव्य प्रभाव प्रकट करून उभे राहिल्याचे दर्शवण्यासाठी म्हटले आहे. लवकरच मृत्यू संभवत असल्यामुळे हे देवतेच्या भाकितासारखेच असते. 'विसुद्धिदेवानं' (विशुद्ध देवांचे) म्हणजे क्षीणासव (अर्हत) ब्रह्मांचे. कारण ते अंतिम जन्मामध्ये बोधिसत्त्वांना वृद्धत्व इत्यादी (निमित्त) दाखवतात. ทุขิตญฺจ พฺยาธิตนฺติ พฺยาธิภาเวน สญฺชาตทุกฺขนฺติ อตฺโถ. อนฺติมภวิกโพธิสตฺตานํ วิสุทฺธิเทเวหิ อุปฏฺฐาปิตภาวํ อุปาทาย ตทญฺเญสํ เตหิ อนุปฏฺฐาปิตานมฺปิ ปณฺฑิตานํ ตถา โวหริตพฺพตา ปริยายสิทฺธาติ อาห ‘‘อิมินา ปริยาเยนา’’ติ. 'दुखितञ्च ब्याधितं' (दुःखी आणि व्याधीग्रस्त) म्हणजे व्याधीमुळे (आजाराने) उत्पन्न झालेले दुःख असा अर्थ आहे. अंतिम जन्मातील बोधिसत्त्वांना विशुद्ध देवांनी (ते निमित्त) उपस्थित केले होते, हे लक्षात घेऊन, त्यांच्याव्यतिरिक्त इतरांना ज्यांच्यासमोर देवांनी ते उपस्थित केले नाही अशा विद्वानांनाही तसा व्यवहार करणे पर्यायाने सिद्ध होते, म्हणून 'इमिना परियायेन' (या पर्यायाने) असे म्हटले आहे. ทิสมฺปตีติ [Pg.148] วิภตฺติอโลเปน นิทฺเทโส, ทิสาสีเสน เทสา วุตฺตาติ เทสานํ อธิปติราชาติ อตฺโถ. อุตฺตมงฺเค สิรสิ รุหนฺตีติ อุตฺตมงฺครุหา, เกสา. เต ปเนตฺถ ยสฺมา ปลิตตฺตา อวิเสสโต สพฺพปจฺฉิมวยสนฺทสฺสกา โหนฺติ, ตสฺมา ‘‘วโยหรา’’ติ วุตฺตา. 'दिसम्पती' (दिशांचा स्वामी) हा विभक्तीचा लोप करून केलेला निर्देश आहे. दिशांच्या मुख्यत्वामुळे देश अभिप्रेत आहेत, म्हणून देशांचा अधिपती राजा असा अर्थ आहे. उत्तमांगावर म्हणजेच डोक्यावर उगवतात म्हणून 'उत्तमाङ्गरुहा' म्हणजे केस. ते येथे पिकल्यामुळे (पांढरे झाल्यामुळे) सामान्यतः अंतिम वयाचे (वृद्धत्वाचे) दर्शक असतात, म्हणून त्यांना 'वयोहरा' (वय हरण करणारे) म्हटले आहे. ปุริสยุโค ยสฺมา ตสฺมึ วํเส สญฺชาตปุริสฏฺฐิติยา ปริจฺฉินฺโน, ตสฺมา อาห ‘‘วํสสมฺภเว ปุริเส’’ติ. ราชเคหโต อาหฏภิกฺขาย ยาเปนฺโตติ อิมินา กุมารกปพฺพชฺชาย อุปคตภาวํ ทสฺเสติ. 'पुरिसयुगो' (पुरुषयुग) हे त्या वंशात जन्मलेल्या पुरुषांच्या स्थितीने मर्यादित असल्यामुळे 'वंससम्भवे पुरिसे' (वंशात उत्पन्न झालेले पुरुष) असे म्हटले आहे. राजवाड्यातून आणलेल्या भिक्षेवर उपजीविका करणारा, यावरून कुमारवयातच प्रव्रज्या (दीक्षा) घेतल्याची स्थिती दर्शवली आहे. ปริหริยมาโนวาติ อญฺเญน อญฺเญน ปริหริยมาโน วิย เวลาย เวลาย เตน มหตา ปริชเนน อุปฏฺฐิยมาโน กุมารกีฬํ กีฬีติ อตฺโถ. เกจิ ปน ‘‘ปริหริยมาโน เอวา’’ติ อวธารณวเสน อตฺถํ วทนฺติ, ตถา สติ จตุราสีติวสฺสสหสฺสานิ ถญฺญปายี ตรุณทารโก อโหสีติ อาปชฺชตีติ ตทยุตฺตํ. กุมารกาลํ วตฺวา ตทนนฺตรํ โอปรชฺชวจนโต วิรุทฺธญฺเจตํ. (ปญฺจมงฺคลวจเนน อุนฺนงฺคลมงฺคลอุกฺกนฺตนมงฺคลกมฺมหายมงฺคลทุสฺสมงฺคลานิ สมุปคตานิ เอว อเหสุนฺติ ทฏฺฐพฺพํ). 'परिहरियमानो वा' (सांभाळला जात असताना) म्हणजे इतरांकडून सांभाळला जात असल्याप्रमाणे वेळोवेळी त्या मोठ्या परिजनांद्वारे (सेवकांद्वारे) सेवा केली जात असताना त्याने बाललीला केल्या, असा अर्थ आहे. परंतु काही लोग 'परिहरियमानो एव' (सांभाळला जात असतानाच) असा निश्चित अर्थ सांगतात; तसे असल्यास तो चौऱ्याऐंशी हजार वर्षे स्तनपान करणारा लहान बालक होता असा प्रसंग येईल, जे अयोग्य आहे. कुमारकाळाचा उल्लेख करून त्यानंतर उपराजपदाचा (युवराजपदाचा) उल्लेख केल्यामुळे हे विरुद्ध ठरते. (पंचमंगल वचनाने उन्नंगलमंगल, उक्कंतनमंगल, कम्महायमंगल आणि दुस्समंगल हे प्राप्त झाले होते असे समजावे). ๓๑๑. สวํสวเสน อาคตา ปุตฺตนตฺตุอาทโย ปุตฺตา จ ปปุตฺตา จ เอติสฺสาติ ปุตฺตปปุตฺตกา ปรมฺปรา. นิหตนฺติ นิหิตํ ฐปิตํ, ปวตฺติตนฺติ อตฺโถ. นิหตนฺติ วา สตตํ ปติฏฺฐิตภาเวน วฬญฺชิตนฺติ อตฺโถ. เตนาห ‘‘กลฺยาณวตฺต’’นฺติ. อติเรกตรา ทฺเว คุณาติ มหาสตฺตสฺส มฆเทวกาลโต อติเรกตรา ทฺเว คุณา อิตรราชูหิ ปน อติเรกตรา อเนกสตสหสฺสปฺปเภทา เอว คุณา อเหสุนฺติ. ३११. आपल्या वंशाच्या परंपरेने आलेले मुलगे, नातू इत्यादी मुलगे आणि नातू ज्या परंपरेत आहेत, ती 'पुत्तपपुत्तका' (पुत्र-पौत्रांची) परंपरा होय. 'निहतं' म्हणजे ठेवलेले, प्रस्थापित केलेले, म्हणजेच प्रवृत्त केलेले असा अर्थ आहे. किंवा 'निहतं' म्हणजे सतत प्रस्थापित राहिल्यामुळे आचरणात आणलेले असा अर्थ आहे. म्हणूनच 'कल्याणवत्तं' (कल्याणकारी व्रत) असे म्हटले आहे. 'अतिरेकतरा द्वे गुणा' (अधिक असलेले दोन गुण) म्हणजे महासत्त्वाचे मघादेवाच्या काळापासून अधिक असलेले दोन गुण; परंतु इतर राजांपेक्षा अधिक असलेले अनेक शतसहस्र प्रकारचे गुण होते. ๓๑๒. เตตฺตึส สหปุญฺญการิโน เอตฺถ นิพฺพตฺตาติ ตํสหจริตฏฺฐานํ เตตฺตึสํ, ตเทว ตาวตึสํ, ตํนิวาโส เอเตสนฺติ ตาวตึสา. นิวาสภาโว จ เตสํ ตตฺถ นิพฺพตฺตนปุพฺพโกติ อาห – ‘‘เทวานํ ตาวตึสานนฺติ ตาวตึสภวเน นิพฺพตฺตเทวาน’’นฺติ. รญฺโญติ นิมิมหาราชสฺส. โอวาเท ฐตฺวาติ ‘‘สีลํ อรกฺขนฺโต มม สนฺติกํ มา อาคจฺฉตู’’ติ นิคฺคณฺหนวเสนปิ, ‘‘เอกนฺตโต มม วิชิเต วสนฺเตน สีลํ รกฺขิตพฺพ’’นฺติ เอวํ ปวตฺติตโอวาทวเสนปิ โอวาเท ฐตฺวา. ३१२. तेहतीस सहपुण्यकर्ते (एकत्र पुण्यकर्म करणारे) येथे उत्पन्न झाले म्हणून त्या सहचारी स्थानाला 'तेहतीस' म्हणतात, तेच 'तावतंस' (त्रायस्त्रिंश) होय, आणि त्यांचा निवास येथे आहे म्हणून ते 'तावतंसा' (तावतींस देव) होत. त्यांचा निवास तेथे उत्पन्न होण्यावर आधारित आहे, म्हणून म्हटले आहे – 'देवामं तावतिंसानं' म्हणजे तावतींस भवनात उत्पन्न झालेल्या देवांचे. 'रञ्ञो' म्हणजे निमि महाराजांचे. 'ओवादे ठत्वा' (उपदेशात राहून) म्हणजे 'शीलाचे रक्षण न करणारा माझ्या जवळ येऊ नये' अशा निग्रहाने (शासनाने) किंवा 'माझ्या राज्यात राहणाऱ्याने निश्चितपणे शीलाचे रक्षण केले पाहिजे' अशा प्रकारे दिलेल्या उपदेशाचे पालन करून. อถ [Pg.149] นนฺติ มหาชุติกํ มหาวิปฺผารํ มหานุภาวํ นิมิราชานํ. ‘‘สกฺโกหมสฺมิ เทวินฺโท, ตว สนฺติกมาคโต’’ติ อตฺตโน สกฺกภาวํ ปเวเทตฺวา ‘‘กงฺขํ เต ปฏิวิโนเทสฺสามี’’ติ อาห. เตนาห ‘‘สพฺพภูตานมิสฺสรา’’ติอาทิ. त्यानंतर त्यांना म्हणजेच महातेजस्वी, महाप्रभावी आणि महानुभाव निमि राजाला. 'मी देवांचा राजा शक्र आहे, तुझ्याकडे आलो आहे' असे स्वतःचे शक्रत्व प्रकट करून 'मी तुझी शंका दूर करीन' असे ते म्हणाले. म्हणूनच 'सब्बभूतानमिस्सरा' (सर्व प्राण्यांचे ईश्वर) इत्यादी म्हटले आहे. สีลํ อุปาทาย โอมกตาย ‘‘กิ’’นฺติ หีเฬนฺโต วทติ. คุณวิสิฏฺฐตายาติ ลาภยสาทีนญฺเจว ปิยมนาปตาทีนญฺจ อาสวกฺขยปริโยสานานํ นิมิตฺตภาเวน อุตฺตมคุณตาย. ตทา สกฺโก อนุรุทฺธตฺเถโร, โส อตฺตโน ปุริมชาติยํ ปจฺจกฺขสิทฺธํว ทานโต สีลํ มหนฺตํ วิภาเวนฺโต ‘‘อหญฺหี’’ติอาทิมาห. ตตฺถ อตฺตนา วสิยมานํ กามาวจรเทวโลกํ สนฺธาย ‘‘เปตฺติวิสยโต’’ติ วุตฺตํ. ตสฺส หิ กปฺปสตสหสฺสํ วิวฏฺฏชฺฌาสยสฺส ปูริตปารมิสฺส เทวโลโก เปตโลโก วิย อุปฏฺฐาสิ. เตเนวาห ‘‘อจฺฉราคณสงฺฆุฏฺฐํ, ปิสาจคณเสวิต’’นฺติ (สํ. นิ. ๑.๔๖). शीलाच्या तुलनेत (दानाची) कनिष्ठता दर्शवण्यासाठी 'किं' (काय?) असे तुच्छतेने ते म्हणतात. 'गुणविसिट्ठताया' (गुणांच्या विशिष्टतेमुळे) म्हणजे लाभ, यश इत्यादी आणि प्रिय व मनपसंत गोष्टी इत्यादी, ज्यांचा शेवट आसवांच्या क्षयात (आसवांचा नाश होण्यात) होतो, त्यांचे निमित्त असल्यामुळे उत्तम गुणवत्तेमुळे. त्या वेळी शक्र हे अनुरुद्ध थेर होते, त्यांनी आपल्या पूर्वजन्मात प्रत्यक्ष सिद्ध झालेल्या दानापेक्षा शीलाचे मोठेपण स्पष्ट करताना 'अहं हि' (मी खरोखर) इत्यादी म्हटले. तेथे स्वतः राहत असलेल्या कामावचर देवलोकाचा संदर्भ देऊन 'पेत्तिविसयतो' (प्रेतलोकापेक्षा) असे म्हटले आहे. कारण ज्यांनी शंभर हजार कल्प संसारातून मुक्त होण्याचा संकल्प केला होता आणि पारमिता पूर्ण केल्या होत्या, त्यांना देवलोक हा प्रेतलोकासारखाच भासला. म्हणूनच म्हटले आहे – 'अप्सरांच्या समूहाने नादित असलेला, पिशाच समूहाने सेवित असलेला' (संयुत्त निकाय १.४६). ขตฺติเยติ ขตฺติยชาติยํ. วิสุชฺฌตีติ พฺรหฺมโลกูปปตฺตึ สนฺธาย วทติ กามสํกิเลสวิสุชฺฌนโต. กายาติ จ พฺรหฺมกายมาห. 'खत्तिये' म्हणजे क्षत्रिय जातीमध्ये. 'विसुज्झति' (विशुद्ध होतो) हे काम-संक्लेशांच्या (कामवासनेच्या मलिनातेच्या) विशुद्धीमुळे ब्रह्मलोकात उत्पन्न होण्याच्या संदर्भात म्हटले आहे. 'काया' म्हणजे ब्रह्मकाय (ब्रह्मलोक) असे म्हटले आहे. อิมสฺส มม อทิฏฺฐปุพฺพรูปํ ทิสฺวา ‘‘อหุเทว ภย’’นฺติ จินฺเตตฺวา อาห ‘‘อวิกมฺปมาโน’’ติ. ภายนฺโต หิ จิตฺตสฺส อญฺญถตฺเตน กายสฺส จ ฉมฺภิตตฺเตน วิกมฺปติ นาม. เตนาห ‘‘อภายมาโน’’ติ. สุขํ กเถตุํ โหตีติ ปุญฺญผลํ กเถตุํ สุขํ โหติ. 'माझे हे पूर्वी कधीही न पाहिलेले रूप पाहून याला नक्कीच भीती वाटली असेल' असा विचार करून ते 'अविकम्पमानो' (कंपित न होता) असे म्हणाले. कारण भीती वाटणारा माणूस चित्ताच्या विकृतीमुळे आणि शरीराच्या थरथराटामुळे कंपित होतो. म्हणूनच 'अभायमानो' (भयभीत न होता) असे म्हटले आहे. 'सुखं कथेतुं होति' म्हणजे पुण्याचे फळ सांगणे सोपे जाते. ๓๑๓. มนํ อาคมฺม ยุตฺตาเยว โหนฺตีติ มาตลิสฺส สกฺกสฺเสว จิตฺตํ ชานิตฺวา ยุตฺตา วิย โหนฺติ, รเถ ยุตฺตอาชานียกิจฺจํ กโรนฺติ เทวปุตฺตา. เอวํ ตาทิเส กาเล ตถา ปฏิปชฺชนฺติ, ยถา เอราวโณ เทวปุตฺโต หตฺถิกิจฺจํ. นทฺธิโต ปฏฺฐายาติ รถปญฺชรปริยนฺเตน อกฺขสฺส สมฺพนฺธฏฺฐานํ นทฺธี, ตโต ปฏฺฐาย. อกฺโข พชฺฌติ เอตฺถาติ อกฺขพทฺโธ, อกฺเขน รถสฺส พทฺธฏฺฐานํ. ยถา เทวโลกโต ยาว จนฺทมณฺฑลสฺส คมนวีถิ, ตาว อตฺตโน อานุภาเวน เหฏฺฐามุขเมว รถํ เปเสสิ, เอวํ จนฺทมณฺฑลสฺส คมนวีถิโต ยาว รญฺโญ ปาสาโท, ตาว ตเถว เปเสสิ. ทฺเว มคฺเค ทสฺเสตฺวาติ ปโตทลฏฺฐิยา อากาสํ วิลิขนฺโต วิย อตฺตโน อานุภาเวน นิรยคามี เทวโลกคามี จาติ ทฺเว มคฺเค [Pg.150] ทสฺเสตฺวา. กตเมนาติอาทิ เทสนามตฺตํ, ยถา เตน รเถน คจฺฉนฺตสฺส นิรโย เทวโลโก จ ปากฏา โหนฺติ, ตถา กรณํ อธิปฺเปตํ. ३१३. "मनाचे आकलन करून जोडलेलेच असतात" (मणं आगम्म युत्तायेव होन्तीति) म्हणजे मातलीच्या आणि शक्राच्याच चित्ताला जाणून जोडल्यासारखे होतात, रथाला जोडलेल्या आजानीय (उत्कृष्ट) अश्वांचे कार्य देवपुत्र करतात. अशा वेळी ते तशा प्रकारे वागतात, ज्याप्रमाणे ऐरावण देवपुत्र हत्तीचे कार्य करतो. "नद्धीपासून" (नद्धितो पट्ठाय) म्हणजे रथाच्या सांगाड्याच्या टोकापर्यंत आसाचा (अक्षाचा) जो जोडण्याचा भाग आहे ती 'नद्धी' होय, तिथपासून. "येथे आस बांधला जातो" म्हणून तो 'अक्षबद्ध' (अक्खबद्धो), आसाने रथाचा बांधलेला भाग. ज्याप्रमाणे देवलोकापासून चंद्रमंडळाच्या गमनमार्गापर्यंत आपल्या प्रभावाने रथाला खाली तोंड करूनच पाठवले, त्याचप्रमाणे चंद्रमंडळाच्या गमनमार्गापासून राजाच्या प्रासादापर्यंत तसेच पाठवले. "दोन मार्ग दाखवून" (द्वे मग्गे दस्सेत्वा) म्हणजे चाबकाच्या काठीने आकाशात रेषा ओढल्यासारखे आपल्या प्रभावाने नरकात जाणारा आणि देवलोकात जाणारा असे दोन मार्ग दाखवून. "कोणत्या मार्गाने" (कतमेन) इत्यादी केवळ उपदेश आहे, ज्याप्रमाणे त्या रथाने जाणाऱ्याला नरक आणि देवलोक स्पष्ट दिसतात, तसे करणे अभिप्रेत आहे. วุตฺตการณเมว สนฺธายาห มหาสตฺโต ‘‘อุภเยเนว มํ มาตลิ เนหี’’ติ. ทุคฺคนฺติ ทุคฺคมํ. เวตฺตรณินฺติ เอวํนามกํ นิรยํ. กุถิตนฺติ ปกฺกุถิตํ นิปกฺกเตลสทิสชาลํ. ขารสํยุตฺตนฺติ ขาโรทกสทิสํ. सांगितलेल्या कारणाचाच संदर्भ घेऊन महासत्त्व म्हणाले, "हे मातली, मला दोन्ही मार्गांनी घेऊन चल" (उभयेनेव मं मातलि नेहीति). "दुग्गं" म्हणजे दुर्गम (जाण्यास कठीण). "वेत्तरणी" म्हणजे या नावाचा नरक. "कुथितं" म्हणजे उकळलेले, कढत तेलासारख्या ज्वाळा असलेले. "खारसंयुत्तं" म्हणजे खारे पाणी (क्षारयुक्त पाणी) असलेल्या पाण्यासारखे. รถํ นิวตฺเตตฺวาติ นิรยาภิมุขโต นิวตฺเตตฺวา. พีรณีเทวธีตายาติ ‘‘พีรณี’’ติ เอวํนามิกาย อจฺฉราย. โสณทินฺนเทวปุตฺตสฺสาติ ‘‘โสณทินฺโน’’ติ เอวํนามกสฺส เทวปุตฺตสฺส. คณเทวปุตฺตานนฺติ คณวเสน ปุญฺญํ กตฺวา คณวเสเนว นิพฺพตฺตเทวปุตฺตานํ. "रथ फिरवून" (रथं निवत्तेत्वा) म्हणजे नरकाभिमुखतेपासून मागे फिरवून. "बीरणी देवकन्येच्या" (बीरणीदेवधीताया) म्हणजे 'बीरणी' नावाच्या अप्सरेच्या. "सोणदिन्न देवपुत्राच्या" (सोणदिन्नदेवपुत्तस्स) म्हणजे 'सोणदिन्न' नावाच्या देवपुत्राच्या. "गणदेवपुत्रांच्या" (गणदेवपुत्तानं) म्हणजे समूहाने पुण्य करून समूहानेच उत्पन्न झालेल्या देवपुत्रांच्या. ปตฺตกาเลติ อุปกฏฺฐาย เวลาย. อติถินฺติ ปจฺเจกสมฺพุทฺธํ. กสฺสปสฺส ภควโต สาสเน เอกํ ขีณาสวตฺเถรนฺติปิ วทนฺติ. มาตาว ปุตฺตํ สกิมาภินนฺทีติ ยถา ปวาสโต อาคตํ ปุตฺตํ มาตา สกึ เอกวารํ อาคตกาเล อภินนฺทติ, ตถา นิจฺจกาเล อภินนฺทิ สกฺกจฺจํ ปริวิสิ. สํยมา สํวิภาคาติ สีลสํยมา สํวิภาคสีลา. ชาตเกติ นิมิชาตเก. "योग्य वेळी" (पत्तकाले) म्हणजे जवळ आलेल्या वेळी. "अतिथीला" (अतिथिं) म्हणजे प्रत्येकबुद्धाला. काही जण 'कश्यप भगवंतांच्या शासनातील एका क्षीणास्रव (अर्हत) स्थविराला' असेही म्हणतात. "आई जशी पुत्राचे एकदाच स्वागत करते" (माता व पुत्तं सकिमाभिनन्दी) म्हणजे ज्याप्रमाणे प्रवासाहून आलेल्या पुत्राचे आई एकदाच तो आल्याच्या वेळी स्वागत करते, त्याप्रमाणे नेहमीच स्वागत केले व आदराने सेवा केली. "संयम व संविभाग" (संयमा संविभागा) म्हणजे शीलसंयम आणि दान देण्याचे शील असणारे. "जातकात" म्हणजे निमिजातकात. จิตฺตกูฏนฺติ เทวนครสฺส ทกฺขิณทิสาย ทฺวารโกฏฺฐกํ. สกฺโก จิตฺตํ สนฺธาเรตุํ อสกฺโกนฺโตติ มหาสตฺเต ปวตฺตํ เทวตานํ สกฺการสมฺมานํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนํ อตฺตโน อุสูยจิตฺตํ พหิ อนาวิกตฺวา อพฺภนฺตเรเยว จ นํ ฐเปตุํ อสกฺโกนฺโต. อญฺเญสํ ปุญฺเญน วสาหีติ สกฺกสฺส มหาสตฺตํ โรเสตุกามตาย อาราธนํ นิทสฺเสติ. ปุราณสกฺโก ทีฆายุโก, ตํ อุปาทาย ชราชิณฺณํ วิย กตฺวา ‘‘ชรสกฺโก’’ติ วุตฺตํ. "चित्तकूट" (चित्तकूटं) म्हणजे देवनगराच्या दक्षिण देशाचे गोपूर (द्वारकोठक). "शक्र आपले चित्त आवरू न शकल्यामुळे" (सक्को चित्तं सन्धारेतुं असक्कोन्तो) म्हणजे महासत्त्वाच्या बाबतीत देवांनी केलेल्या आदर-सत्काराला पाहून उत्पन्न झालेली आपली ईर्ष्या बाहेर प्रकट न करता आतल्या आत दाबून ठेवण्यास असमर्थ झाल्यामुळे. "इतरांच्या पुण्याच्या बळावर राहा" (अञ्ञेसं पुञ्ञेन वसाही) हे शक्राची महासत्त्वाला क्रुद्ध करण्याची इच्छा दर्शवणारे आवाहन आहे. जुना शक्र दीर्घायुषी असतो, त्याला अनुसरून जणू काही तो जराजर्जर झाला आहे असे दर्शवण्यासाठी "जराशक्र" (जरासक्को) असे म्हटले आहे. ๓๑๕. เสสํ สพฺพนฺติ ปพฺพชฺชุปคมนา เสสํ อตฺตโน วํเส โปราณราชูนํ ราชจาริตฺตํ. ปากติกนฺติ ปุน สภาวตฺตเมว คโต อโหสิ, อปพฺพชิตภาววจเนเนวสฺส พฺรหฺมวิหารภาวนาทีนํ ปพฺพชฺชาคุณานํ อภาโว ทีปิโต โหติ. ३१५. "इतर सर्व" (सेसं सब्बं) म्हणजे प्रव्रज्या घेण्याव्यतिरिक्त आपल्या वंशातील प्राचीन राजांचे राजचरित्र. "प्राकृतिक" (पाकतितं) म्हणजे पुन्हा आपल्या मूळ स्वभावालाच प्राप्त झाला होता, प्रव्रज्या न घेण्याच्या विधानानेच त्याच्या ब्रह्मविहारभावना इत्यादी प्रव्रज्येच्या गुणांचा अभाव दर्शवला जातो. ๓๑๖. วีริยํ อกโรนฺโต สมุจฺฉินฺทติ, น ตาว สมุจฺฉินฺนํ, กลฺยาณมิตฺตสํสคฺคาทิปจฺจยสมวาเย สติ สีลวตํ กลฺยาณวตฺตํ ปวตฺเตตุํ สกฺโกติ[Pg.151]. ทุสฺสีเลน สมุจฺฉินฺนํ นาม โหติ ตสฺส ตตฺถ นิราสภาเวน ปฏิปตฺติยา เอว อสมฺภวโต. สตฺต เสขา ปวตฺเตนฺติ กลฺยาณวตฺตสฺส อปรินิฏฺฐิตกิจฺจตฺตา. ขีณาสเวน ปวตฺติตํ นาม ปรินิฏฺฐิตกิจฺจตฺตา. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. ३१६. "वीर्य (प्रयत्न) न करणारा उच्छेद करतो", परंतु तोपर्यंत उच्छेद झालेला नसतो; कल्याणमित्रांची संगत इत्यादी प्रत्ययांचा (कारणांचा) संयोग झाल्यावर शीलवानांचे कल्याणकारी व्रत चालू ठेवणे शक्य होते. दुःशीलाने (शीलाचा) उच्छेद केलेला असतो, कारण त्याच्यामध्ये त्याविषयीची निराशा असल्यामुळे आचरणाची शक्यताच नसते. सात शैक्ष (सेख) कल्याणकारी व्रत चालू ठेवतात, कारण त्यांचे कार्य अद्याप पूर्ण झालेले नसते. क्षीणास्रवाने (अर्हताने) ते चालू ठेवले असे म्हटले जाते, कारण त्याचे कार्य पूर्ण झालेले असते. उर्वरित सर्व सहज समजण्यासारखेच आहे. มฆเทวสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. "मखादेवसुत्तवर्णनेची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थप्रकाशिनी टीका) समाप्त झाली." ๔. มธุรสุตฺตวณฺณนา ४. "मधुरसुत्तवर्णना" ๓๑๗. มธุรายนฺติ อุตฺตรมธุรายํ. คุนฺทาวเนติ กาฬสิปฺปลิวเน. อติมุตฺตกวเนติ จ วทนฺติ. จตูสุ วณฺเณสุ พฺราหฺมโณว เสฏฺโฐ วณฺโณ. ปณฺฑโรติ ปริสุทฺโธ. กาฬโกติ อปริสุทฺโธ. ชาติโคตฺตาทิปญฺญาปนฏฺฐาเนสูติ ชาติโคตฺตาทิวเสน สุทฺธจินฺตายํ พฺราหฺมณา เอว สุทฺธชาติกา, น อิตเรติ อธิปฺปาโย. สํสารโต วา สุทฺธจินฺตายํ พฺราหฺมณาว สุชฺฌนฺติ เวทวิหิตสฺส สุทฺธวิธิโน อญฺเญสํ อวิสยตฺตาติ อธิปฺปาโย. ตํ ปเนตํ เตสํ วิรุชฺฌติ ขตฺติยเวสฺสานมฺปิ มนฺตชฺเฌนสฺส อนุญฺญาตตฺตา, มนฺตชฺเฌนวิธินา จ สํสารสุทฺธิยาภาวโต. ปุตฺตา นาม อโนรสาปิ โหนฺติ, น ตถา อิเมติ อาห ‘‘โอรสา’’ติ. อุเร สํวฑฺฒิตปุตฺโตปิ ‘‘โอรส’’นฺติ วุจฺจติ. อิเม ปน มุขโต นิคฺคโต หุตฺวา อุเร สํวฑฺฒาติ ทสฺเสตุํ ‘‘โอรสา มุขโต ชาตา’’ติ วุตฺตํ. ตโต เอว พฺรหฺมโต ชาตาติ พฺรหฺมชา, พฺรหฺมสมฺภูตาปิ ‘‘พฺรหฺมชา’’ติ วุจฺจนฺติ, น ตถา อิเม. อิเม ปน ปจฺจกฺขโต พฺรหฺมุนา นิมฺมิตาติ พฺรหฺมนิมฺมิตา, ตโต เอว พฺรหฺมโต ลทฺธพฺพวิชฺชาทิทายชฺชทายาทาติ พฺรหฺมทายาทาติ สพฺพเมตํ พฺราหฺมณานํ กตฺถนาปลาปสทิสํ วิญฺญูนํ อปฺปมาณํ อวิมทฺทกฺขมํ วาจาวตฺถุมตฺตํ พฺรหฺมกุตฺตสฺเสว อภาวโต. ยํ ปเนตฺถ วตฺตพฺพํ, ตํ วิสุทฺธิมคฺควณฺณนายํ วุตฺตเมว. เตนาห ‘‘โฆโสเยวา’’ติอาทิ. โวหารมตฺตเมเวตนฺติ เอตํ ‘‘พฺราหฺมโณว เสฏฺโฐ วณฺโณ’’ติอาทิ วจนมตฺตเมว, น ตสฺส อตฺโถ เตหิ อธิปฺเปตปฺปกาโร อตฺถิ. ३१७. "मथुरेत" (मधुरायं) म्हणजे उत्तर मथुरेत. "गुंदावनात" (गुन्दावने) म्हणजे काळशिशवीच्या वनात (काळसिप्पलीवनात). याला 'अतिमुक्तकवन' असेही म्हणतात. "चार वर्णांमध्ये ब्राह्मणच श्रेष्ठ वर्ण आहे." "पांढरा" (पण्डरो) म्हणजे परिशुद्ध. "काळा" (काळको) म्हणजे अपरिशुद्ध. "जाती, गोत्र इत्यादींच्या प्रज्ञेच्या बाबतीत" (जातिगोत्तादिपञ्ञापनट्ठानेसू) म्हणजे जाती, गोत्र इत्यादींच्या आधारे शुद्धतेचा विचार केला असता ब्राह्मणच शुद्ध जातीचे आहेत, इतर नाहीत, असा अभिप्राय आहे. किंवा संसारातून शुद्धतेचा विचार केला असता ब्राह्मणच शुद्ध होतात, कारण वेदांमध्ये विहित केलेली शुद्धीची पद्धत इतरांच्या आवाक्याबाहेरची आहे, असा अभिप्राय आहे. परंतु हे त्यांचे म्हणणे त्यांच्याशीच विसंगत ठरते, कारण क्षत्रिय आणि वैश्यांनाही मंत्रांचे अध्ययन करण्याची अनुमती आहे, आणि मंत्रांच्या अध्ययनाच्या विधीने संसारातून शुद्धी होत नाही. पुत्र हे औरस नसलेले (दत्तक इत्यादी) देखील असतात, परंतु हे तसे नाहीत, म्हणून "औरस" (ओरसा) असे म्हटले आहे. छातीवर वाढवलेल्या पुत्रालाही 'औरस' म्हटले जाते. परंतु हे मुखातून निघून छातीवर वाढले आहेत हे दर्शवण्यासाठी "मुखातून जन्मलेले औरस पुत्र" (ओरसा मुखतो जाता) असे म्हटले आहे. म्हणूनच ब्रह्मदेवापासून जन्मलेले म्हणून 'ब्रह्मज', ब्रह्मदेवापासून उत्पन्न झालेल्यांनाही 'ब्रह्मज' म्हटले जाते, परंतु हे तसे नाहीत. हे प्रत्यक्ष ब्रह्मदेवाने निर्माण केलेले आहेत म्हणून 'ब्रह्मनिर्मित', म्हणूनच ब्रह्मदेवाकडून मिळणाऱ्या विद्या इत्यादी दायादाचे (वारशाचे) वाटेकरी म्हणून 'ब्रह्मदायाद' आहेत; हे सर्व ब्राह्मणांच्या फुशारकी मारण्याच्या बडबडीसारखे आहे, जो विद्वानांसाठी अप्रमाण, विचार न टिकणारे आणि केवळ शब्दांचे अवडंबर आहे, कारण ब्रह्मदेवाचे अस्तित्त्वच नाही. याविषयी जे काही सांगायचे आहे, ते विसुद्धिमग्गवर्णनेत (विशुद्धिमार्ग अट्ठकथेत) सांगितलेच आहे. म्हणूनच "हा केवळ घोषच आहे" (घोसोयेवा) इत्यादी म्हटले आहे. "हा केवळ व्यवहारच आहे" (वोहारमत्तमेवेतं) म्हणजे "ब्राह्मणच श्रेष्ठ वर्ण आहे" इत्यादी केवळ बोलणेच आहे, त्याचा अर्थ त्यांनी अभिप्रेत केलेल्या प्रकारे खरा नाही. ๓๑๘. สมิชฺเฌยฺยาติ ทิฏฺฐิทีปนวเสน อตฺตโน อชฺฌาสโย นิปฺผชฺเชยฺย. เตนาห ‘‘มโนรโถ ปูเรยฺยา’’ติ. ขตฺติโยปีติ ปรขตฺติโยปิ[Pg.152]. อสฺสาติ สมิทฺธธนาทึ ปตฺตสฺส. เตนาห – ‘‘อิสฺสริยสมฺปตฺตสฺสา’’ติ เนสนฺติ เอเตสํ จตุนฺนํ วณฺณานํ เอตฺถ ปุพฺพุฏฺฐายิภาวาทินา อิตเรหิ อุปจริตพฺพตาย น กิญฺจิ นานากรณนฺติ โยชนา. ३१८. "समृद्ध व्हावी" (समिज्झेय्या) म्हणजे दृष्टीच्या प्रकटीकरणाद्वारे आपली इच्छा पूर्ण व्हावी. म्हणूनच "मनोरथ पूर्ण व्हावा" (मनोरथो पूरेय्या) असे म्हटले आहे. "क्षत्रिय देखील" (खत्तियोपि) म्हणजे दुसरा क्षत्रिय देखील. "त्याचा" (अस्सा) म्हणजे समृद्ध धन इत्यादी प्राप्त झालेल्याचा. म्हणूनच "ऐश्वर्यसंपत्ती प्राप्त झालेल्याचा" (इस्सरियसम्पत्तस्सा) असे म्हटले आहे. "यांचा" (नेसं) म्हणजे या चार वर्णांमध्ये येथे आधी उठणे इत्यादींद्वारे इतरांकडून सेवा करून घेण्याच्या बाबतीत कोणताही फरक नाही, असा संबंध जोडला पाहिजे. ๓๒๒. อหํ จีวราทีหิ อุปฏฺฐาโก, ตุมฺหากํ อิจฺฉิตจฺฉิตกฺขเณ วเทยฺยาถ เยนตฺโถติ โยชนา. โจราทิอุปทฺทวนิเสธเนน รกฺขาคุตฺติ, ทานาทินิมิตฺตอุปทฺทวนิเสธเนน อาวรณคุตฺติ. ปจฺจุปฺปนฺนานตฺถนิเสธเนน วา รกฺขาคุตฺติ, อาคามิอนตฺถนิเสธเนน อาวรณคุตฺติ. เอตฺถ จ ขตฺติยาทีสุ โย โย อิสฺสโร, ตสฺส อิตเรน อนุวตฺเตตพฺพภาเว, กุสลากุสลกรเณน เนสํ วเสน ลทฺธพฺพอภิสมฺปราเย, ปพฺพชิเตหิ ลทฺธพฺพสามีจิกิริยาย จ อณุมตฺโตปิ วิเสโส นตฺถิ, ตสฺมา โส วิเสสาภาโว ปาฬิยํ ตตฺถ ตตฺถ วาเร ‘‘เอวํ สนฺเต’’ติอาทินา วิภาวิโต. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. ३२२. मी चीवरादींनी (चीवर इत्यादींद्वारे) उपस्थापक (सेवा करणारा) आहे, तुम्हाला ज्या क्षणी ज्याची इच्छा असेल, त्या क्षणी तुम्ही सांगावे की कशाची गरज आहे, असा याचा अर्थ (योजना) आहे. चोर इत्यादींच्या उपद्रवाचे निवारण करून रक्षण करणे म्हणजे 'रक्षागुत्ती' (रक्षण-गुप्ती) होय, आणि दानादींच्या निमित्ताने होणाऱ्या उपद्रवाचे निवारण करून रक्षण करणे म्हणजे 'आवरणगुत्ती' (आवरण-गुप्ती) होय. किंवा वर्तमानकाळातील अनर्थाचे निवारण करणे म्हणजे 'रक्षागुत्ती' आणि भविष्यकाळातील अनर्थाचे निवारण करणे म्हणजे 'आवरणगुत्ती' होय. आणि येथे क्षत्रिय इत्यादींमध्ये जो जो ईश्वर (शासक/अधिकारी) आहे, त्याचे इतरांनी अनुकरण करण्याच्या बाबतीत, कुशल आणि अकुशल कर्मे केल्याने त्यांच्या अधीन राहून मिळणाऱ्या परलोकातील गतीच्या बाबतीत, आणि प्रव्रजितांकडून (भिक्खूंकडून) मिळणाऱ्या आदरयुक्त वर्तनाच्या (सामीचीकिरिया) बाबतीत अणुमात्रही फरक नाही. म्हणूनच, तो फरकाचा अभाव पाळीमध्ये जागोजागी 'असे असताना' (एवं सन्ते) इत्यादी शब्दांनी स्पष्ट केला आहे. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. มธุรสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. मधुरसुत्तवण्णनेची (मधुर सूत्राच्या वर्णनाची) लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๕. โพธิราชกุมารสุตฺตวณฺณนา ५. बोधिरराजकुमारसुत्तवण्णना (बोधिरराजकुमार सूत्राचे वर्णन) ๓๒๔. โอโลกนกปทุมนฺติ ลีลาอรวินฺทํ. ตสฺมาติ โกกนทสณฺฐานตฺตา โกกนโทติ สงฺขํ ลภิ. ३२४. 'ओलोकनकपदुमं' (अवलोकन-कमळ) म्हणजे क्रीडा-कमळ (लीला-कमळ). म्हणूनच, कोकनदाच्या (तांबड्या कमळाच्या) आकाराचे असल्यामुळे त्याला 'कोकनद' हे नाव मिळाले. ๓๒๕. ยาว ปจฺฉิม…เป… ผลกํ วุตฺตํ ตสฺส สพฺพปจฺฉา สนฺถตตฺตา. อุปริมผลคตญฺหิ โสปานมตฺถกํ. โอโลกนตฺถํเยวาติ น เกวลํ ภควโต อาคมนญฺเญว โอโลกนตฺถํ, อถ โข อตฺตโน ปตฺถนาย สนฺถราปิตาย เจลปฏิกาย อกฺกมนสฺสปิ. ३२५. 'याव पच्छिम...पे... फलकं' असे म्हटले आहे, कारण ते सर्वात शेवटी पसरलेले (आच्छादलेले) फळके होते. वरच्या फळक्यावर पायऱ्यांचा वरचा भाग असतो. 'ओलोकनत्थंयेव' (केवळ पाहण्यासाठीच) म्हणजे केवळ भगवंतांचे आगमन पाहण्यासाठीच नव्हे, तर आपल्या प्रार्थनेनुसार पसरवलेल्या कापडी वस्त्रावर (चेलपटिका) त्यांनी पाऊल ठेवावे (आक्रमण करावे) यासाठी सुद्धा. สกุณโปตเกติ กาทมฺพฏิฏฺฏิภปุตฺตเก. อญฺโญว ภเวยฺยาติ ตสฺมึ อตฺตภาเว มาตุคามโต อญฺโญ อิทานิ ภริยาภูโต มาตุคาโม ภเวยฺย. ปุตฺตํ ลเภยฺยาติ อตฺตโน กมฺมวเสน ปุตฺตํ, โน ตสฺส. อุโภหีติ อิเมหิ เอว อุโภหิ. อิเมหิ การเณหีติ ตสฺส ราชกุมารสฺส พุทฺธํ ปฏิจฺจ มิจฺฉาคหณํ, ติตฺถิยานํ อุชฺฌายนํ, อนาคเต มนุสฺสานํ ภิกฺขูนํ อุทฺทิสฺส วิปฺปฏิสาโรติ อิเมหิ ตีหิ การเณหิ. ปญฺญตฺตนฺติ สนฺถตํ เจลปฏิกํ. มงฺคลํ อิจฺฉนฺตีติ มงฺคลิกา. 'सकुणपोतके' म्हणजे कादंब (हंस) किंवा टिटवीची पिल्ले. 'अञ्ञोव भवेय्य' (दुसरीच असावी) म्हणजे त्या आत्मभावात (जन्मात) पूर्वीच्या स्त्रीपेक्षा वेगळी, आता पत्नी झालेली दुसरी स्त्री असावी. 'पुत्तं लभेय्य' (पुत्र प्राप्त व्हावा) म्हणजे स्वतःच्या कर्माच्या प्रभावाने पुत्र मिळावा, तिच्या कर्माने नव्हे. 'उभोही' म्हणजे या दोन्ही कारणांनी. 'इमेही कारणेही' (या कारणांमुळे) म्हणजे त्या राजकुमाराचे बुद्धांविषयीचे चुकीचे मत (मिथ्याग्रह), तीर्थिक लोकांचे आक्षेप घेणे, आणि भविष्यात माणसांचा भिक्खूंना उद्देशून पश्चात्ताप होणे, या तीन कारणांमुळे. 'पञ्ञत्तं' म्हणजे पसरवलेले कापडी वस्त्र (चेलपटिका). 'मङ्गलं इच्छन्ती' (मंगलाची इच्छा करणारे) म्हणजे माङ्गलिक. ๓๒๖. ตติยํ [Pg.153] การณนฺติ อิมินา ภิกฺขูสุ วิปฺปฏิสารานุปฺปาทนมาห. ยํ กิญฺจิ ปริภุญฺชน-สุขํ กามสุขลฺลิกานุโยโคติ อธิปฺปาเยน กามสุขลฺลิกานุโยคสญฺญี หุตฺวา…เป… มญฺญมาโน เอวมาห. ३२६. 'ततियं कारणं' (तिसरे कारण) याद्वारे भिक्खूंमध्ये पश्चात्ताप उत्पन्न न होणे सांगितले आहे. 'जे काही उपभोगण्याचे सुख आहे, ते कामसुखल्लिकानुयोग (इंद्रियसुखाचा उपभोग घेणे) आहे' अशा अभिप्रायाने, कामसुखल्लिकानुयोगाची संज्ञा असलेला होऊन...पे... असे मानत त्याने असे म्हटले. ๓๒๗. อถ นํ ภควา ตโต มิจฺฉาภินิเวสโต วิเวเจตุกาโม ‘‘โส โข อห’’นฺติอาทินา อตฺตโน ทุกฺกรจริยํ ทสฺเสตุํ อารภิ. มหาสจฺจเก(ม. นิ. ๑.๓๖๔ อาทโย) วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ ‘‘โส โข อห’’นฺติอาทิปาฐสฺส ตตฺถ อาคตนิยาเมเนว อาคตตฺตา. ปาสราสิสุตฺเต (ม. นิ. ๑.๒๗๒ อาทโย) วุตฺตนเยนาติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย. ३२७. त्यानंतर भगवंतांनी त्याला त्या चुकीच्या समजुतीपासून (मिथ्याभिनिवेशापासून) दूर करण्याची इच्छा धरून 'सो खो अहं' (तो मी खरोखर) इत्यादी शब्दांनी स्वतःची दुष्करचर्या दाखवण्यास सुरुवात केली. महासच्चक सुत्तात (म. नि. १.३६४ इत्यादी) सांगितलेल्या पद्धतीनेच हे समजून घ्यावे, कारण 'सो खो अहं' इत्यादी पाठ तेथे ज्या नियमाने आला आहे, त्याच नियमाने येथेही आला आहे. पासरासि सुत्तात (म. नि. १.२७२ इत्यादी) सांगितलेल्या पद्धतीने, येथेही हाच नियम लागू होतो. ๓๔๓. องฺกุสํ คณฺหนฺติ เอเตน ตสฺส คหเณ เฉโก โหตีติ องฺกุสคหณสิปฺปํ. เมฆอุตุนฺติ เมฆํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนสีตอุตุํ. ปพฺพตอุตุนฺติ ปพฺพตํ ปฏิจฺจ อุณฺหอุตุํ. อุภยวเสน จ ตสฺส ตถา สีตุณฺหอุตุโต เอโน อาคโตติ ต-การสฺส ท-การํ กตฺวา อุเทโนติ นามํ อกาสิ. ३४३. 'अङ्कुसं गण्हन्ति' (अंकुश धरतात) याद्वारे तो अंकुश धरण्यात कुशल होतो, म्हणून त्याला 'अंकुशग्रहण शिल्प' (अंकुश धरण्याची कला) म्हणतात. 'मेघउतुं' म्हणजे मेघांच्या (ढगांच्या) संबंधाने निर्माण झालेला शीत ऋतू (थंड हवामान). 'पब्बतउतुं' म्हणजे पर्वताच्या संबंधाने निर्माण झालेला उष्ण ऋतू (गरम हवामान). आणि या दोन्ही कारणांमुळे, अशा प्रकारे शीत व उष्ण ऋतूंमधून तो (बाळ) बाहेर आला, म्हणून 'त' काराचा 'द' कार करून 'उदेन' असे नाव ठेवले. ตาปโส โอคาฬฺหญาณวเสน รญฺโญ มตภาวํ ญตฺวา. อาทิโต ปฏฺฐายาติ โกสมฺพินคเร ปรนฺตปรญฺโญ อคฺคมเหสิภาวโต ปฏฺฐาย. ปุพฺเพติ สีลวนฺตกาเล. หตฺถิคนฺถนฺติ หตฺถีนํ อตฺตโน วเส วตฺตาปนสตฺถํ. เตเนวสฺส ตํ สิกฺขาเปติ, กิจฺจญฺจ อิชฺฌติ. तापसाने आपल्या सखोल ज्ञानाच्या (अवगाढ ज्ञानाच्या) बळावर राजाच्या मृत्यूची बातमी जाणून घेतली. 'आदितो पट्ठाय' (सुरुवातीपासून) म्हणजे कोसंबी नगरात परंतप राजाची अग्रमहिषी (मुख्य राणी) असण्यापासून सुरुवात करून. 'पुब्बे' म्हणजे शीलवान असतानाच्या काळात. 'हत्थिगन्थं' म्हणजे हत्तींना स्वतःच्या वशमध्ये करण्याचे शास्त्र (हस्ति-विद्या ग्रंथ). म्हणूनच तो त्याला ती विद्या शिकवतो आणि त्याचे कार्य यशस्वी होते. ๓๔๔. ปทหนภาโวติ ภาวนานุโยโค. ปธาเน วา นิยุตฺโต ปธานิโย, ปธานิยสฺส ภิกฺขุโน, ตสฺเสว ปธานิยภาวสฺส องฺคานิ การณานิ ปธานิยงฺคานิ. สทฺธา เอตสฺส อตฺถีติ สทฺโธ. กิญฺจาปิ ปจฺเจกโพธิสตฺตานมฺปิ อภินีหารโต ปฏฺฐาย อาคตา อาคมนสทฺธา เอว, มหาโพธิสตฺตานํ ปน สทฺธา ครุตราติ สา เอว คหิตา. อจลภาเวน โอกปฺปนํ ‘‘สมฺมาสมฺพุทฺโธ ภควา, สฺวาขฺยาโต ธมฺโม, สุปฺปฏิปนฺโน สงฺโฆ’’ติ เกนจิ อกมฺปิยภาเวน รตนตฺตยคุเณ โอคาหิตฺวา กปฺปนํ. ปสาทุปฺปตฺติ รตนตฺตเย ปสีทนเมว. โพธินฺติ จตุมคฺคญาณนฺติ วุตฺตํ ตํนิมิตฺตตฺตา สพฺพญฺญุตญฺญาณสฺส, โพธีติ วา สมฺมาสมฺโพธิ. สพฺพญฺญุตญฺญาณปทฏฺฐานญฺหิ มคฺคญาณํ, มคฺคญาณปทฏฺฐานญฺจ สพฺพญฺญุตญฺญาณํ ‘‘สมฺมาสมฺโพธี’’ติ วุจฺจติ. นิจฺฉิตสุพุทฺธตาย ธมฺมสฺส สุธมฺมตา สงฺฆสฺส สุปฺปฏิปตฺติ วินิจฺฉิตา เอว [Pg.154] โหตีติ อาห ‘‘เทสนาสีสเมว เจต’’นฺติอาทิ. ตสฺส ปธานํ วีริยํ อิชฺฌติ รตนตฺตยสทฺธาย ‘‘อิมาย ปฏิปทาย ชรามรณโต มุจฺจิสฺสามี’’ติ ปธานานุโยเค อวํมุขสมฺภวโต. ३४४. 'पदहनभावो' म्हणजे भावनेचा अभ्यास (भावनानुयोग). किंवा जो प्रधानात (प्रयत्नात) नियुक्त आहे तो 'प्रधानिय' (प्रयत्नशील), अशा प्रधानिय भिक्खूचे, आणि त्याच प्रधानियभावाची जी अंगे (कारणे) आहेत ती 'प्रधानियंगे' (प्रयत्नाची अंगे) होत. ज्याच्याजवळ श्रद्धा आहे तो 'सद्धो' (श्रद्धावान). जरी प्रत्येकबोधिसत्त्वांची सुद्धा त्यांच्या संकल्पापासून (अभिनीहारापासून) चालत आलेली श्रद्धा ही 'आगमनश्रद्धा'च असते, तरी महाबोधिसत्त्वांची श्रद्धा अधिक श्रेष्ठ (गुरूतर) असते, म्हणून तीच येथे घेतली आहे. अचल भावाने दृढ विश्वास ठेवणे म्हणजे 'सम्मासम्बुद्धो भगवा, स्वाक्खातो धम्मो, suppatīpanno saṅgho' (भगवंत सम्यक्संबुद्ध आहेत, धम्म सुविख्यात/सुस्पष्ट आहे, संघ सुप्रतिपन्न आहे) अशा प्रकारे कोणाकडूनही कंपित न होणाऱ्या भावाने रत्नत्रयाच्या गुणांमध्ये अवगाहन करून निश्चय करणे होय. 'प्रसादोत्पत्ती' म्हणजे रत्नत्रयावर प्रसन्न होणे (श्रद्धा बसणे) होय. 'बोधि' म्हणजे चार मार्गांचे ज्ञान (चतुर्मार्गज्ञान) असे म्हटले आहे, कारण ते सर्वज्ञता-ज्ञानाचे निमित्त आहे, किंवा बोधि म्हणजे सम्यक्संबोधि होय. सर्वज्ञता-ज्ञानाचे अधिष्ठान (पदस्थान) हे मार्गज्ञान आहे, आणि मार्गज्ञानाचे अधिष्ठान हे सर्वज्ञता-ज्ञान आहे, ज्याला 'सम्यक्संबोधि' म्हटले जाते. धम्माचे सुधम्मत्व आणि संघाची सुप्रतिपत्ती ही निश्चितपणे जाणलेली असते, म्हणूनच 'देसनासीसमेव चेतं' (हे देशनेचे मुख्य अंगच आहे) इत्यादी म्हटले आहे. रत्नत्रयावरील श्रद्धेमुळे 'या प्रतिपदेने (मार्गाने) मी जरामरणातून मुक्त होईन' अशा प्रकारे प्रयत्नात (प्रधानुयोगात) तत्परता निर्माण होत असल्यामुळे, त्याचा प्रधान (प्रयत्न) आणि वीर्य (उत्साह) यशस्वी होतो. อปฺปาพาโธติอาทิ เหฏฺฐา วุตฺตเมว. อคุณํ ปกาเสตา อายตึ สํวรํ อาปชฺชิตา สมฺมาปฏิปตฺติยา วิโสธนตฺถํ. อุทยญฺจ อตฺถญฺจ คนฺตุนฺติ ‘‘อวิชฺชาสมุทยา’’ติอาทินา ปญฺจนฺนํ อุปาทานกฺขนฺธานํ อุทยญฺจ วยญฺจ ชานิตุํ. เตนาห ‘‘เอเตนา’’ติอาทิ. ปริสุทฺธาย อุปกฺกิเลสวินิมุตฺตาย. นิพฺพิชฺฌิตุนฺติ ตทงฺควเสน ปชหิตุํ สมุจฺเฉทปฺปหานสฺส ปจฺจโย ภวิตุํ. ยํ ทุกฺขํ ขียตีติ กิเลเสสุ อปฺปหีเนสุ เตน ตทุปนิสฺสยกมฺมํ ปฏิจฺจ ยํ ทุกฺขํ อุปฺปชฺเชยฺย, ตํ สนฺธาย วุตฺตํ. 'अप्पाबाधो' (अल्प-व्याधी असलेला) इत्यादी खाली आधीच सांगितले आहे. स्वतःचे दोष (अवगुण) प्रकट करून, भविष्यात संयम धारण करून, सम्यक् प्रतिपत्तीने (योग्य आचरणाने) स्वतःला शुद्ध करण्यासाठी. 'उदय आणि अस्त जाणून घेण्यासाठी' म्हणजे 'avijjāsamudayā' इत्यादींद्वारे पाच उपादानस्कंधांचा उदय आणि व्यय (अस्त) जाणून घेण्यासाठी. म्हणूनच 'एतेन' इत्यादी म्हटले आहे. 'परिशुद्धाय' म्हणजे उपक्किलेसांपासून (उपक्लेशांपासून) मुक्त झालेल्या. 'निब्बिज्झितुं' म्हणजे तदंग रूपाने त्याग करण्यासाठी, समुच्छेद-प्रहाणाचा (क्लेश पूर्णपणे नष्ट करण्याचा) प्रत्यय (कारण) होण्यासाठी. 'जे दुःख क्षीण होते' म्हणजे क्लेश नष्ट न झाल्यामुळे, त्यासंबंधीच्या कर्माच्या अधीन राहून जे दुःख उत्पन्न होऊ शकते, त्याला उद्देशून हे म्हटले आहे. ๓๔๕. เสสทิวเสติ สตฺตทิวสโต ปฏฺฐาย ยาว ทฺเว รตฺตินฺทิวา. ३४५. 'सेसदिवसे' (उर्वरित दिवसांत) म्हणजे सातव्या दिवसापासून सुरू करून दोन अहोरात्र (दिवस-रात्र) पर्यंत. ๓๔๖. กุจฺฉิสนฺนิสฺสิโต คพฺโภ นิสฺสยโวหาเรน ‘‘กุจฺฉี’’ติ วุจฺจติ, โส เอติสฺสา อตฺถีติ กุจฺฉิมตี. เตนาห ‘‘อาปนฺนสตฺตา’’ติ. อารกฺโข ปนสฺส ปจฺจุปฏฺฐิโต โหตีติ มาตรา คหิตสรณํ คพฺภวุฏฺฐิตสฺส ตสฺส สรณคมนํ ปเวทยิตสฺส กุสลํ สรณํ นาม, มาตุ กตรกฺโข ปุตฺตสฺสปิ ปจฺจุปฏฺฐิโตติ. มหลฺลกกาเลติ วจนตฺถํ ชานนกาเล. สาเรนฺตีติ ยถาทิฏฺฐํ ยถาพลํ รตนตฺตยคุณปติฏฺฐาปนวเสน อสฺส สาเรนฺติ. สลฺลกฺเขตฺวาติ วุตฺตมตฺถํ อุปธาเรตฺวา. สรณํ คหิตํ นาม โหติ รตนตฺตยสฺส สรณภาวสลฺลกฺขณปุพฺพกตนฺนินฺนจิตฺตภาวโตว. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. ३४६. कुशीत (गर्भाशयात) आश्रित असलेला गर्भ हा उपचाराने (निश्चय व्यवहाराने) 'कुच्छी' (कुशी) असे म्हटले जाते, आणि तो जिच्याजवळ आहे ती 'कुच्छिमती' (गर्भवती) होय. म्हणूनच 'आपन्नसत्त्ता' (गर्भवती) असे म्हटले आहे. 'आरक्खो पनस्स पच्चुपट्ठितो होति' (त्याचे रक्षण उपस्थित असते) म्हणजे मातेने घेतलेले शरण, गर्भातून बाहेर आलेल्या आणि शरण गेल्याचे जाहीर करणाऱ्या त्या बालकाचे कुशल शरण होय; मातेने केलेले रक्षण पुत्रासाठी देखील उपस्थित असते. 'महल्लककाले' म्हणजे शब्दांचा अर्थ समजण्याच्या वयात. 'सारेन्ति' (स्मरण करून देतात) म्हणजे जसे पाहिले आहे आणि जसे सामर्थ्य आहे त्यानुसार रत्नत्रयाच्या गुणांची प्रतिष्ठापना करून त्याला स्मरण करून देतात. 'सल्लक्खेत्वा' म्हणजे सांगितलेला अर्थ मनात धरून (लक्षात घेऊन). रत्नत्रयाचे शरण जाणे हे रत्नत्रयाच्या शरणभावाचे नीट आकलन करून, त्याकडेच चित्त वळवल्यानेच खऱ्या अर्थाने होते. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. โพธิราชกุมารสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. बोधिरराजकुमारसुत्तवण्णनेची (बोधिरराजकुमार सूत्राच्या वर्णनाची) लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๖. องฺคุลิมาลสุตฺตวณฺณนา ६. अङ्गुलिमालसुत्तवण्णना (अंगुलिमाल सूत्राचे वर्णन) ๓๔๗. องฺคุลีนํ มาลํ ธาเรตีติ อิมินา อนฺวตฺถา ตสฺส สมญฺญาติ ทสฺเสติ. ตตฺราติ ตสฺมึ อาจริยวจเนน องฺคุลิมาลสฺส ธารเณ. กรีสสหสฺสเขตฺเต เอกสาลิสีสํ วิย อปญฺญายมานสกกิจฺโจ โหตีติ อธิปฺปาโย. ตกฺกสีลํ เปสยึสุ ‘‘ตาทิสสฺส อาจริยสฺส สนฺติเก [Pg.155] สิปฺปุคฺคหสมฺมาปโยเคน ทิฏฺฐธมฺมิเก สมฺปรายิเก จ อตฺเถ ชานนฺโต ภาริยํ น กเรยฺยา’’ติ. พาหิรกา อเหสุํ อหึสกสฺส วตฺตสมฺปตฺติยา อาจริยสฺส จิตฺตสภาวโต นิพฺพตฺตนติภาเวน. สิเนเหเนว วทนฺเตติ สิเนเหน วิย วทนฺเต. ३४७. "तो बोटांची माळ धारण करतो" यावरून त्याचे हे नाव सार्थ आहे, असे दर्शविते. 'तत्र' (तेथे) म्हणजे आचार्यांच्या सांगण्यावरून अंगुलीमाळ (बोटांची माळ) धारण करण्याच्या बाबतीत. हजार करीस क्षेत्रात एका साळीच्या लोंबीप्रमाणे स्वतःचे कर्तव्य न समजणारा होतो, असा अभिप्राय आहे. त्यांनी त्याला तक्षशिलेला पाठवले की, "अशा आचार्यांच्या जवळ विद्याग्रहणाच्या योग्य अभ्यासाने इहलोकातील आणि परलोकातील हित जाणणारा मनुष्य कठीण काम करणार नाही." अहिंसकाच्या सदाचाराच्या समृद्धीमुळे आणि आचार्यांच्या चित्ताच्या स्वभावातून निर्माण झालेल्या अतिशय आदरामुळे ते (इतर विद्यार्थी) परके झाले. 'स्नेहानेच बोलतात' म्हणजे जणू स्नेहाने बोलत असल्यासारखे. คณนมฺปิ น อุคฺคณฺหาตีติ คณนวิธิมฺปิ น สลฺลกฺเขติ. ตตฺถ การณมาห ‘‘ปกติยา’’ติอาทินา. ฐปิตฏฺฐาเนติ รุกฺขคจฺฉนฺตราทิเก ฐปิตฏฺฐาเน สกุนฺตสิงฺคาลานํ วเสน องฺคุลิโย วินสฺสนฺติ. ภคฺคโวติ โกสลรญฺโญ ปุโรหิตํ โคตฺเตน วทติ. โจโร อวิสฺสาสนีโย สาหสิกภาวโต. ปุราณสนฺถตา สาขา อวิสฺสาสนียา วิจฺฉิกาทีนํ ปเวสนโยคฺยตฺตา. ราชา อวิสฺสาสนีโย อิสฺสริยมเทน ธนโลเภน จ กทาจิ ชีวิเต สงฺกาภาวโต. อิตฺถี อวิสฺสาสนียา โลลสีลจิตฺตภาวโต. อนุทฺธรณีโย ภวิสฺสติ สํสารปงฺกโต. 'गणना देखील शिकत नाही' म्हणजे गणनेच्या पद्धतीकडेही लक्ष देत नाही. त्याचे कारण 'स्वभावाने' इत्यादी शब्दांनी सांगितले आहे. 'ठेवलेल्या ठिकाणी' म्हणजे झाडे, झुडपे इत्यादींच्या दरम्यान ठेवलेल्या ठिकाणी पक्षी आणि कोल्हे यांच्यामुळे बोटे नष्ट होतात. 'भग्गव' या गोत्राने कोसल राजाच्या पुरोहिताला संबोधले आहे. चोर त्याच्या क्रूर स्वभावामुळे अविश्वासू असतो. जुन्या पानांनी झाकलेली फांदी विंचू इत्यादींच्या प्रवेशासाठी योग्य असल्याने अविश्वासू असते. राजा ऐश्वर्याच्या मदाने आणि धनाच्या लोभाने कधीकधी प्राणावर बेतू शकत असल्याने अविश्वासू असतो. स्त्री तिच्या चंचल स्वभाव आणि चित्तामुळे अविश्वासू असते. तो संसाररूपी चिखलातून बाहेर काढता येण्याजोगा नसेल. ๓๔๘. สงฺกริตฺวาติ ‘‘มยํ เอกชฺฌํ สนฺนิปติตฺวา โจรํ มาเรตฺวา วา ปลาเปตฺวา คมิสฺสามา’’ติ สงฺกรํ กตฺวา. อิทฺธาภิสงฺขารนฺติ อภิสงฺขรณํ อธิฏฺฐานํ. อภิสงฺขาสีติ อธิฏฺฐหิ. สํหริตฺวาติ สํขิปิตฺวา. โอรภาเคติ โจรสฺส โอรภาเค. ३४८. 'एकत्र येऊन' म्हणजे "आम्ही एकत्र जमून चोराला मारून किंवा पळवून लावून जाऊ" असा निश्चय करून. 'ऋद्धि-अभिसंस्कार' म्हणजे ऋद्धिबलाचा संकल्प किंवा अधिष्ठान. 'अभिसंस्कार केला' म्हणजे अधिष्ठान केले. 'संहार करून' म्हणजे संकुचित करून. 'ओरभागात' म्हणजे चोराच्या अलीकडच्या भागात. ๓๔๙. ทณฺโฑติ ปหรณหตฺถจฺเฉทนาทิโก ทณฺฑนสงฺขาโต ทณฺโฑ. ปวตฺตยิตพฺโพติ อาเนตพฺโพ. อปเนตฺวาติ อตฺตโน สนฺตานโต สมุจฺเฉทวเสน ปหาย. ปฏิสงฺขายาติ ปฏิสงฺขาเนน. อวิหึสายาติ กรุณาย. สารณียธมฺเมสูติ ฉสุปิ สารณียธมฺเมสุ, ฐิโต อฏฺฐิตานํ ปาปธมฺมานํ โพธิมูเล เอว สมุจฺฉินฺนตฺตา. ยถา อตีเต อปริมิตํ กาลํ สนฺธาวิตํ, เอวํ อิมาย ปฏิปตฺติยา อนาคเตปิ สนฺธาวิสฺสตีติ ทสฺเสนฺโต ‘‘อิทานี’’ติอาทิมาห. ३४९. 'दंड' म्हणजे मारहाण करणे, हात तोडणे इत्यादी शिक्षात्मक दंड. 'प्रवृत्त करावा' म्हणजे आणावा. 'दूर करून' म्हणजे स्वतःच्या चित्तसंततीतून समूळ नष्ट करून सोडून देणे. 'प्रतिसंख्यान करून' म्हणजे विचारपूर्वक चिंतनाने. 'अहिंसेने' म्हणजे करुणेने. 'सारणीय धर्मांमध्ये' म्हणजे सहाही सारणीय धर्मांमध्ये स्थित असलेला, कारण बोधिवृक्षाच्या मुळाशीच अस्थित पापधर्मांचा समूळ नाश झाला होता. ज्याप्रमाणे भूतकाळात अमर्याद काळ भटकलो, त्याचप्रमाणे या आचरणाने भविष्यकाळातही भटकावे लागेल, हे दर्शविताना "आता" इत्यादी म्हटले आहे. อิตฺเววาติ อิติ เอว, อิติ-สทฺโท นิทสฺสนตฺโถ. เตนาห ‘‘เอวํ วตฺวา เยวา’’ติ. อกิรีติ อากิริ, ปญฺจปิ อาวุธานิ วิกิริ. เตน วุตฺตํ ‘‘ขิปิ ฉฑฺเฑสี’’ติ. 'इत्येव' म्हणजे 'इति एव' (अशा प्रकारेच), येथे 'इति' शब्द उदाहरणादाखल आहे. म्हणूनच "असे बोलूनच" असे म्हटले आहे. 'अकिरि' म्हणजे विखुरले, पाचही शस्त्रे फेकून दिली. म्हणूनच "फेकले, टाकून दिले" असे म्हटले आहे. ๓๕๐. เอตฺโตวาติ อโต เอว อาคตมคฺเคเนว สาวตฺถึ คตา. อธิวาเสสฺสตีติ ‘‘โจรํ ปฏิเสเธตุํ คมิสฺสามี’’ติ วุตฺเต ตุณฺหี ภวิสฺสติ[Pg.156]. ทารุณกมฺเมน อุปฺปนฺนนามนฺติ ‘‘องฺคุลิมาโล’’ติ อิมํ นามํ สนฺธาย วทติ. ३५०. 'इथूनच' म्हणजे येथूनच, आलेल्या मार्गानेच श्रावस्तीला गेले. 'स्वीकार करतील' म्हणजे "चोराला रोखण्यासाठी मी जाईन" असे म्हटल्यावर ते मौन धारण करतील. क्रूर कर्मामुळे मिळालेले नाव म्हणजे "अंगुलीमाळ" या नावाचा संदर्भ देऊन बोलत आहेत. ๓๕๑. หตฺถี อรญฺญหตฺถี โหนฺติ มนุสฺสานํ ตตฺถ คนฺตุํ อสกฺกุเณยฺยตฺตา, เอวํ อสฺสาปิ. กูฏสหสฺสานํ ภิชฺชนการณํ โหติ เถรสฺส อาคมนภเยน ฆเฏ ฉฑฺเฑตฺวา ปลายเนน. คพฺภมูฬฺหายาติ พฺยากุลคพฺภาย. ปพฺพชฺชาพเลนาติ วุตฺตํ, สตฺถุ เทสนานุภาเวนาติ ปน วตฺตพฺพํ. โส หิ ตสฺสาปิ การณนฺติ. อริยา นาม ชาติ ปพฺพชฺชา อริยภาวตฺถาย ชาตีติ กตฺวา. ३५१. हत्ती हे जंगली हत्ती असतात कारण माणसांना तेथे जाणे अशक्य असते, तसेच घोड्यांच्या बाबतीतही आहे. हजारो घागरी फुटण्याचे कारण म्हणजे स्थविरांच्या येण्याच्या भीतीने घागरी टाकून पळून जाणे हे होते. 'गर्भमूळ्हा' म्हणजे जिचा गर्भ व्याकुळ झाला आहे अशी स्त्री. 'प्रव्रज्येच्या बलाने' असे म्हटले आहे, परंतु 'शास्त्यांच्या देशनेच्या प्रभावाने' असे म्हटले पाहिजे. कारण तेच तिच्यासाठी देखील कारण आहे. 'आर्य जात' म्हणजे प्रव्रज्या, जी आर्यत्वाच्या प्राप्तीसाठी जन्म आहे. มหาปริตฺตํ นาเมตนฺติ มหานุภาวํ ปริตฺตํ นาเมตํ. ตถา หิ นํ เถโร สพฺพภาเวน อริยาย ชาโต สจฺจาธิฏฺฐาเนน อกาสิ. เตนาห ‘‘สจฺจกิริยกตฏฺฐาเน’’ติ. คพฺภมูฬฺหนฺติ มูฬฺหคพฺภํ. คพฺโภ หิ ปริปกฺโก สมฺปชฺชมาโน วิชายนกาเล กมฺมชวาเตหิ สญฺจาเลตฺวา ปริวตฺติโต อุทฺธํปาโท อโธสีโส หุตฺวา โยนิมุขาภิมุโข โหติ, เอวํ โส กสฺสจิ อลคฺโค โสตฺถินา พหิ นิกฺขมติ, วิปชฺชมาโน ปน วิปริวตฺตนวเสน โยนิมคฺคํ ปิทหิตฺวา ติริยํ นิปชฺชติ, ตถา ยสฺสา โยนิมคฺโค ปิทหติ, สา ตตฺถ กมฺมชวาเตหิ อปราปรํ ปริวตฺตมานา พฺยากุลา มูฬฺหคพฺภาติ วุจฺจติ, ตํ สนฺธาย วุตฺตํ ‘‘คพฺภมูฬฺห’’นฺติ. 'महापरित्त' म्हणजे हे महान प्रभाव असलेले परित्त आहे. कारण स्थविरांनी पूर्णपणे आर्य जन्माच्या सत्य-अधिष्ठानाने ते केले. म्हणूनच "सत्यक्रिया केलेल्या ठिकाणी" असे म्हटले आहे. 'गर्भमूळ्ह' म्हणजे अडकलेला गर्भ. कारण गर्भ पूर्ण वाढलेला असताना प्रसूतीच्या वेळी कर्मज वायूने हलवला जाऊन, फिरून पाय वर आणि डोके खाली होऊन योनीमार्गाकडे वळतो, अशा प्रकारे तो कोठेही न अडकता सुखरूप बाहेर पडतो. परंतु अडथळा आल्यास, उलट फिरल्यामुळे योनीमार्ग बंद करून आडवा पडतो. अशा प्रकारे जिचा योनीमार्ग बंद होतो, ती तेथे कर्मज वायूने इकडेतिकडे फिरवली जाऊन व्याकुळ होते, तिला 'मूळ्हगर्भा' म्हटले जाते, त्यालाच उद्देशून 'गर्भमूळ्ह' असे म्हटले आहे. สจฺจกิริยา นาม พุทฺธาสยํ อตฺตโน สีลํ ปจฺจเวกฺขิตฺวา กตา, ตสฺมา สจฺจกิริยา เวชฺชกมฺมํ น โหตีติ ทฏฺฐพฺพํ. เถรสฺสปิ จาติอาทินา อุปสงฺกมิตพฺพการณํ วทติ. อิเม ทฺเว เหตู ปฏิจฺจ ภควา เถรํ สจฺจกิริยํ กาเรสิ. ชาตินฺติ มูลชาตึ. सत्यक्रिया ही बुद्धांच्या आशयानुसार स्वतःच्या शीलाचे प्रत्यवेक्षण करून केली जाते, म्हणून सत्यक्रिया हा वैद्यकीय उपचार नव्हे, असे समजले पाहिजे. 'स्थविरांचे देखील' इत्यादी शब्दांनी जवळ जाण्याचे कारण सांगितले आहे. या दोन कारणांवरून भगवंतांनी स्थविरांकडून सत्यक्रिया करवून घेतली. 'जाती' म्हणजे मूळ जन्म. ๓๕๒. ปริยาทาย อาหจฺจ ภินฺเนน สีเสน. สภาคทิฏฺฐธมฺมเวทนียกมฺมนฺติ นิรเย นิพฺพตฺตนสกกมฺมสภาคภูตํ ทิฏฺฐธมฺมเวทนียกมฺมํ. สภาคตา จ สมานวตฺถุกตา สมานารมฺมณตาเอกวีถิปริยาปนฺนตาทิวเสน สพฺพถา สริกฺขตา, สทิสมฺปิ จ นาม ตเทวาหรียติ ยถา ‘‘ตสฺเสว กมฺมสฺส วิปาโก’’ติ จ ‘‘สา เอว ติตฺติรี ตาเนว โอสธานี’’ติ จ. อิทานิ ตเมว สภาคตํ ทสฺเสตุํ ‘‘กมฺมํ หี’’ติอาทิ อารทฺธํ. กริยมานเมวาติ ปจฺจยสมวาเยน ปฏิปาฏิยา นิพฺพตฺติยมานเมว. ตโย โกฏฺฐาเส ปูเรติ, ทิฏฺฐธมฺมเวทนียอปราปริยายเวทนียอุปปชฺชเวทนียสงฺขาเต ตโย ภาเค ปูเรติ, เตสํ ติณฺณํ ภาคานํ วเสน ปวตฺตติ. ३५२. पूर्णपणे संपवून, आघात करून फुटलेल्या डोक्याने. 'सभाग-दृष्टधर्मवेदनीय कर्म' म्हणजे नरकात उत्पन्न होणाऱ्या स्वतःच्या कर्माच्या समान असणारे दृष्टधर्मवेदनीय कर्म. आणि सभागता म्हणजे समान वस्तू असणे, समान आलंबन असणे, एकाच वीथीमध्ये समाविष्ट असणे इत्यादींमुळे सर्व प्रकारे सारखे असणे. आणि सारखे असणे म्हणजेच तेच आणले जाते, जसे की "त्याच कर्माचा हा विपाक आहे" आणि "तीच तित्तिरी आणि तीच औषधे आहेत". आता तीच सभागता दर्शवण्यासाठी "कर्मच" इत्यादी सुरू केले आहे. 'केले जात असतानाच' म्हणजे प्रत्ययांच्या संयोगाने क्रमाने उत्पन्न केले जात असतानाच. तीन भाग पूर्ण करते, म्हणजे दृष्टधर्मवेदनीय, उपपद्यवेदनीय आणि अपरापर्यातवेदनीय नावाचे तीन भाग पूर्ण करते, त्या तीन भागांच्या स्वरूपात ते प्रवृत्त होते. ทิฏฺฐธมฺโม [Pg.157] วุจฺจติ ปจฺจกฺขภูโต ปจฺจุปฺปนฺโน อตฺตภาโว, ตตฺถ เวทิตพฺพผลํ กมฺมํ ทิฏฺฐธมฺมเวทนียํ. ปจฺจุปฺปนฺนภวโต อนนฺตรํ เวทิตพฺพผลํ กมฺมํ อุปปชฺชเวทนียํ. ทิฏฺฐธมฺมานนฺตรภวโต อญฺญสฺมึ อตฺตภาวปริยาเย อตฺตภาวปริวตฺเต เวทิตพฺพผลํ กมฺมํ อปราปริยายเวทนียํ. ปฏิปกฺเขหิ อนภิภูตตาย, ปจฺจยวิเสเสน ปฏิลทฺธวิเสสตาย จ พลวภาวปฺปตฺตา ตาทิสสฺส ปุพฺพาภิสงฺขารสฺส วเสน สาติสยา หุตฺวา ปวตฺตา ปฐมชวนเจตนา ตสฺมึเยว อตฺตภาเว ผลทายินี ทิฏฺฐธมฺมเวทนียา นาม. สา หิ วุตฺตากาเรน พลวติ ชวนสนฺตาเน คุณวิเสสยุตฺเตสุ อุปการานุปการวสปฺปวตฺติยา อาเสวนาลาเภน อปฺปวิปากตาย จ อิตรทฺวยํ วิย ปวตฺตสนฺตานุปรมาเปกฺขํ โอกาสลาภาเปกฺขญฺจ กมฺมํ น โหตีติ อิเธว ปุปฺผมตฺตํ วิย ปวตฺติวิปากมตฺตํ ผลํ เทติ. दिट्ठधम्म म्हणजे प्रत्यक्ष असलेला, वर्तमानकालीन आत्मभाव (अस्तित्व) होय. त्यात ज्या कर्माचे फळ अनुभवायचे असते, त्याला 'दिट्ठधम्मवेदनीय' कर्म म्हणतात. वर्तमान भवानंतर (जन्मानंतर) लगेचच ज्या कर्माचे फळ अनुभवायचे असते, त्याला 'उपपज्जवेदनीय' कर्म म्हणतात. दिट्ठधम्माच्या (वर्तमान जन्माच्या) पुढील जन्माव्यतिरिक्त इतर कोणत्याही आत्मभावाच्या (जन्माच्या) पर्यायात किंवा चक्रात ज्या कर्माचे फळ अनुभवायचे असते, त्याला 'अपरापरियवेदनीय' कर्म म्हणतात. प्रतिपक्षांकडून (विरोधकांकडून) पराभूत न झाल्यामुळे आणि विशिष्ट प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) साहाय्याने विशेष सामर्थ्य प्राप्त झाल्यामुळे बलवान बनलेल्या, अशा प्रकारच्या पूर्व-अभिसंस्काराच्या प्रभावाने अत्यंत प्रबळ होऊन प्रवृत्त झालेली प्रथम जवनचेतना त्याच आत्मभावात (जन्मात) फळ देणारी ठरते, तिला 'दिट्ठधम्मवेदनीय' म्हणतात. कारण ती, सांगितलेल्या पद्धतीने बलवान अशा जवन-प्रवाहामध्ये, विशेष गुणांनी युक्त असलेल्यांच्या बाबतीत उपकार किंवा अपकाराच्या स्वरूपात प्रवृत्त झाल्यामुळे, आसेवन (पुनरावृत्ती) न मिळाल्याने आणि अल्प विपाक असल्यामुळे, इतर दोन कर्मांप्रमाणे प्रवृत्तीच्या प्रवाहाच्या समाप्तीची किंवा संधीची वाट पाहणारे कर्म बनत नाही; तर याच जन्मात, केवळ फुलाप्रमाणे, प्रवृत्तीच्या विपाकापुरतेच फळ देते. ตถา อสกฺโกนฺตนฺติ กมฺมสฺส ผลทานํ นาม อุปธิปโยคาทิปจฺจยนฺตรสมวาเยเนว โหตีติ ตทภาวโต ตสฺมึเยว อตฺตภาเว วิปากํ ทาตุํ อสกฺโกนฺตํ. อโหสิกมฺมนฺติ กมฺมํเยว อโหสิ, น ตสฺส วิปาโก อโหสิ, อตฺถิ ภวิสฺสติ วาติ เอวํ วตฺตพฺพํ กมฺมํ. อตฺถสาธิกาติ ทานาทิปาณาติปาตาทิอตฺถสฺส นิปฺผาทิกา. กา ปน สาติ อาห ‘‘สตฺตมชวนเจตนา’’ติ. สา หิ สนฺนิฏฺฐาปกเจตนา วุตฺตนเยน ปฏิลทฺธวิเสสา ปุริมชวนเจตนาหิ ลทฺธาเสวนา จ สมานา อนนฺตเร อตฺตภาเว วิปากทายินี อุปปชฺชเวทนียกมฺมํ นาม. เตนาห ‘‘อนนฺตเร อตฺตภาเว วิปากํ เทตี’’ติ. สติ สํสารปฺปวตฺติยาติ อิมินา อสติ สํสารปฺปวตฺติยา อโหสิกมฺมปกฺเข ติฏฺฐติ วิปจฺจโนกาสสฺส อภาวโตติ. तसेच, 'अशक्य असणारे' म्हणजे कर्माचे फळ देणे हे उपाधी, प्रयोग इत्यादी इतर प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) संयोगानेच होत असल्यामुळे, त्यांच्या अभावी त्याच आत्मभावात (जन्मात) विपाक (फळ) देण्यास असमर्थ असणारे होय. 'अहोसिकर्म' म्हणजे जे केवळ कर्मच राहिले, ज्याचा विपाक झाला नाही, नाही आणि होणारही नाही, असे म्हटले जाणारे कर्म होय. 'अर्थसाधिका' म्हणजे दान इत्यादी किंवा प्राणातिपात (हिंसा) इत्यादी अर्थाची (कार्याची) निष्पादिका होय. 'ती कोणती?' यावर म्हणतात - 'सातवी जवनचेतना'. कारण ती निर्णय घेणारी चेतना, सांगितलेल्या पद्धतीने विशेष सामर्थ्य प्राप्त करून आणि पूर्व जवनचेतनांच्या आसेवनाने (पुनरावृत्तीने) युक्त होऊन, लगेचच पुढील आत्मभावात विपाक देणारी ठरते, तिला 'उपपज्जवेदनीय कर्म' म्हणतात. म्हणूनच म्हटले आहे - 'लगेचच पुढील आत्मभावात विपाक देते.' 'संसार प्रवृत्ती असताना' या विधानाने हे दर्शवले आहे की, संसार प्रवृत्ती नसताना, विपाकाची (फळ देण्याची) संधी नसल्यामुळे ते कर्म 'अहोसिकर्म' च्या श्रेणीत जाते. สมุคฺฆาฏิตานิ วิปจฺจโนกาสสฺส อนุปฺปตฺติธมฺมตาปาทเนน. ทิฏฺฐธมฺมเวทนียํ อตฺถิ วิปาการหาภาวสฺส อนิพฺพตฺติตตฺตา วิปจฺจโนกาสสฺส อนุปจฺฉินฺนตฺตา. กตูปจิตญฺหิ กมฺมํ สติ วิปจฺจโนกาเส ยาว น ผลํ เทติ, ตาว อตฺเถว นาม วิปาการหภาวโต. ‘‘ยสฺส โข’’ติ อิทํ อนิยมาการวจนํ ภควตา กมฺมสริกฺขตาวเสน สาธารณโต วุตฺตนฺติ อาห ‘‘ยาทิสสฺส โข’’ติ. विपाकाची (फळ देण्याची) संधी न मिळण्याच्या स्थितीला प्राप्त करून दिल्यामुळे ते 'समूळ नष्ट केलेले' असते. विपाकाची योग्यता नष्ट न झाल्यामुळे आणि विपाकाची संधी खंडित न झाल्यामुळे 'दिट्ठधम्मवेदनीय' कर्म अस्तित्वात असते. कारण केलेले आणि संचित केलेले कर्म, विपाकाची संधी असताना जोपर्यंत फळ देत नाही, तोपर्यंत विपाकाच्या योग्यतेमुळे ते अस्तित्वातच असते. 'ज्या कोणाचे' हे अनिश्चित स्वरूपाचे वचन भगवंतांनी कर्माच्या समानतेच्या आधारे सामान्यपणे म्हटले आहे, म्हणून 'ज्या प्रकारच्या' असे म्हटले आहे. ปมาทกิเลสวิมุตฺโตติ ปมาทเหตุเกหิ สพฺเพหิ กิเลเสหิ วิมุตฺโต. 'प्रमादकिलेसविमुत्तो' (प्रमाद-क्लेश-विमुक्त) म्हणजे प्रमादामुळे (बेसावधपणामुळे) उत्पन्न होणाऱ्या सर्व क्लेशांपासून मुक्त झालेला. ปาปสฺส [Pg.158] ปิธานํ นาม อวิปากธมฺมตาปาทนนฺติ อาห ‘‘อปฺปฏิสนฺธิกํ กรียตี’’ติ. พุทฺธสาสเนติ สิกฺขาตฺตยสงฺคเห พุทฺธสฺส ภควโต สาสเน. ยุตฺตปฺปยุตฺโต วิหรตีติ อกตฺตพฺพสฺส อกรณวเสน, กตฺตพฺพสฺส จ ปริปูรณวเสน ปวตฺตติ. पापाचे पिधान (झाकणे) म्हणजे त्याला विपाक न देण्याच्या स्थितीला नेणे, म्हणूनच म्हटले आहे - 'ते अपूर्वसंधिक (पुनर्जन्म न देणारे) केले जाते.' 'बुद्धशासनात' म्हणजे त्रिशिक्षांचा (शील, समाधी, प्रज्ञा) संग्रह असलेल्या बुद्ध भगवंतांच्या शासनात होय. 'युक्तप्रयुक्त होऊन विहरतो' म्हणजे जे करू नये ते न करण्याद्वारे आणि जे करावे ते पूर्ण करण्याद्वारे प्रवृत्त राहतो. ทิสฺสนฺติ กุชฺฌนฺตีติ ทิสา, ปฏิปกฺขาติ อาห ‘‘สปตฺตา’’ติ. ตปฺปสํสปการนฺติ เมตฺตานิสํสกิตฺตนาการํ. กาเลนาติ อาเมฑิตโลเปน นิทฺเทโสติ อาห ‘‘ขเณ ขเณ’’ติ. อนุกโรนฺตูติ เยสํ กลฺยาณมิตฺตานํ สนฺติเก สุณนฺติ, ยถาสุตํ ธมฺมํ เตสํ อนุกโรนฺตุ ทิฏฺฐานุคติกรณํ อาปชฺชนฺตุ, อตฺตโน เวริปุคฺคลานมฺปิ ภควโต สนฺติเก ธมฺมสฺสวนํ สมฺมาปฏิปตฺติญฺจ ปจฺจาสีสติ. जे द्वेष करतात किंवा रागवतात ते 'दिशा' (शत्रू), म्हणजेच प्रतिपक्ष; म्हणूनच 'सपत्ता' (शत्रू) असे म्हटले आहे. 'तप्पसंसपकारं' म्हणजे मैत्रीच्या (मेत्ता) आनिशंसाचे (फायद्यांचे) कीर्तन करण्याचा प्रकार होय. 'कालेन' (वेळेवर) हा द्विरुक्तीचा लोप करून केलेला निर्देश आहे, म्हणूनच 'क्षणाक्षणाला' असे म्हटले आहे. 'अनुकरण करोत' म्हणजे ज्या कल्याणमित्रांच्या सन्निध ते ऐकतात, ऐकलेल्या धम्मानुसार त्यांचे अनुकरण करोत, त्यांच्या आचरणाचे अनुकरण करोत; येथे स्वतःच्या वैरी व्यक्तींनीही भगवंतांच्या सन्निध धम्मश्रवण करावे आणि सम्यक प्रतिपत्ती (योग्य आचरण) करावी, अशी आशा व्यक्त केली आहे. ตสนฺติ คตึ ปตฺถยนฺตีติ ตสา ภวนฺตราทีสุ สํสรณภาวโต. เตนาห ‘‘ตสา วุจฺจนฺติ สตณฺหา’’ติ. जे भयभीत होतात किंवा गतीची (पुढील जन्माची) इच्छा करतात ते 'तस' (त्रस/चलायमान प्राणी) होत, कारण ते वेगवेगळ्या भवांमध्ये संसार करत राहतात. म्हणूनच म्हटले आहे - 'तृष्णेने युक्त असलेल्यांना तस म्हटले जाते.' เนตพฺพฏฺฐานํ อุทกํ นยนฺตีติ เนตฺติกา. พนฺธิตฺวาติ ทฬฺหํ พนฺธิตฺวา. เตลกญฺชิเกนาติ เตลมิสฺสิเตน กญฺชิเกน. पाणी वाहून नेण्याच्या ठिकाणी जे पाणी नेतात, त्यांना 'नेत्तिक' (कालवे काढणारे) म्हणतात. 'बांधीत' म्हणजे घट्ट बांधून. 'तेलकांजिकेन' म्हणजे तेलाने मिश्रित केलेल्या कांजीने. ยาทิโสว อนิฏฺเฐ, ตาทิโสว อิฏฺเฐติ อิฏฺฐานิฏฺเฐ นิพฺพิกาเรน ตาที. เยสํ ปน กามามิสาทีนํ วนฺตตฺตา ราคาทีนํ จตฺตตฺตา กาโมฆาทีนํ ติณฺณตฺตา ตาทิภาโว ภเวยฺย, เตสํ ภควตา สพฺพโส วนฺตา จตฺตา ติณฺณา, ตสฺมา ภควา วนฺตาวีติ ตาที, จตฺตาวีติ ตาที, ติณฺณาวีติ ตาที, เยหิ อนญฺญสาธารเณหิ สีลาทิคุเณหิ สมนฺนาคตตฺตา ภควา ตาทิภาเวน อุกฺกํสปารมิปฺปตฺโต ตํนิทฺเทโส, เตหิ คุเณหิ ยาถาวโต นิทฺทิสิตพฺพโตปิ ตาที. ยถา ยนฺตรชฺชุยา ยนฺตํ นียติ, เอวํ ยาย ตณฺหาย ภโว นียติ, สา ‘‘ภวเนตฺติ ภวรชฺชู’’ติ วุตฺตา. เตนาห ‘‘ตาย หี’’ติอาทิ, กมฺมานิ กุสลาทีนิ วิปจฺจยนฺติ อปจฺจยนฺติ เอตายาติ กมฺมวิปาโก. อปจฺจยภาโว นาม อริยมคฺคเจตนายาติ อาห ‘‘มคฺคเจตนายา’’ติ. ยาว น กิเลสา ปหียนฺติ, ตาว อิเม สตฺตา สอิณา เอว อเสริวิหารภาวโตติ อาห ‘‘อณโณ นิกฺกิเลโส ชาโต’’ติ. जसा अनिष्ट गोष्टींमध्ये, तसाच इष्ट गोष्टींमध्ये निर्विकार राहणारा तो 'तादी' (समता बाळगणारा) होय. ज्या काम-आमिष इत्यादींचा ओकारी करून त्याग केल्यामुळे, राग इत्यादींचा त्याग केल्यामुळे आणि काम-ओघ इत्यादी पार केल्यामुळे 'तादी-भाव' (समताभाव) प्राप्त होतो; त्या सर्वांचा भगवंतांनी पूर्णपणे त्याग केला आहे, सोडले आहे आणि ते पार केले आहे. म्हणूनच भगवान 'वंतावी' (त्याग करणारे) म्हणून 'तादी' आहेत, 'चत्तावी' (सोडून देणारे) म्हणून 'तादी' आहेत, 'तिण्णावी' (पार झालेले) म्हणून 'तादी' आहेत. ज्या असाधारण शील इत्यादी गुणांनी युक्त असल्यामुळे भगवान तादी-भावाने उत्कृष्ट पारमितेला प्राप्त झाले आहेत, तो त्यांचा निर्देश आहे; त्या गुणांमुळे यथार्थपणे निर्देश करण्यायोग्य असल्यामुळेही ते 'तादी' आहेत. ज्याप्रमाणे यंत्राच्या दोरीने यंत्र ओढले जाते, त्याचप्रमाणे ज्या तृष्णेने भव (जन्म) ओढला जातो, तिला 'भवनेट्टी' (भवाची दोरी) म्हटले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - 'तिच्याद्वारेच' इत्यादी; जिच्याद्वारे कुशल इत्यादी कर्मे विपाकाला (फळाला) प्राप्त होतात किंवा अपक्व राहतात, तो 'कर्मविपाक' होय. अपक्व भाव (विपाक न देण्याची स्थिती) म्हणजे आर्यमार्ग चेतनेमुळे होय, म्हणूनच 'मार्गचेतनेमुळे' असे म्हटले आहे. जोपर्यंत क्लेश नष्ट होत नाहीत, तोपर्यंत हे प्राणी पराधीनतेमुळे ऋणीच असतात; म्हणूनच 'निष्क्लेश झालेला मनुष्य अनृण (ऋणमुक्त) होतो' असे म्हटले आहे. เถยฺยปริโภโค (วิสุทฺธิ. ฏี. ๑.๙๑) นาม สามิปริโภคาภาวโต. ภควตาปิ หิ อตฺตโน สาสเน สีลวโต ปจฺจยา อนุญฺญาตา, น ทุสฺสีลสฺส, ทายกานํ [Pg.159] สีลวโตเยว ปริจฺจาโค, น ทุสฺสีลสฺส อตฺตโน การานํ มหปฺผลภาวสฺส ปจฺจาสีสนโต. อิติ สตฺถารา อนนุญฺญาตตฺตา ทายเกหิ จ อปริจฺจตฺตตฺตา ‘‘ทุสฺสีลสฺส ปริโภโค เถยฺยปริโภโค นามา’’ติ วุตฺตํ. อิณวเสน ปริโภโค อิณปริโภโค. ปฏิคฺคาหกโต ทกฺขิณาวิสุทฺธิยา อภาวโต อิณํ คเหตฺวา ปริโภโค วิยาติ อตฺโถ. ยสฺมา เสกฺขา ภควโต โอรสปุตฺตา, ตสฺมา เต ปิตุสนฺตกานํ ปจฺจยานํ ทายาทา หุตฺวา เต ปจฺจเย ปริภุญฺชนฺตีติ เตสํ ปริโภโค ทายชฺชปริโภโค นาม. กึ ปน เต ภควโต ปจฺจเย ปริภุญฺชนฺติ, อุทาหุ คิหีหิ ทินฺนนฺติ? คิหีหิ ทินฺนาปิ เต ภควตา อนุญฺญาตตฺตา ภควโต สนฺตกา โหนฺติ อนนุญฺญาเตสุ สพฺเพน สพฺพํ ปริโภคาภาวโต อนุญฺญาเตสุเยว ปริโภคสมฺภวโต. ธมฺมทายาทสุตฺตญฺเจตฺถ (ม. นิ. ๑.๒๙ อาทโย) สาธกํ. 'थेय्यपरिभोग' (चोरीचा उपभोग) म्हणजे स्वामीच्या मालकीच्या उपभोगाचा अभाव असल्यामुळे होणारा उपभोग होय. कारण भगवंतांनी देखील आपल्या शासनात शीलवानालाच प्रत्ययांचा (साधनांचा) उपभोग घेण्याची अनुमती दिली आहे, दुःशीलाला नाही; आणि दान देणारे देखील आपल्या दानाचे महाफळ मिळावे या आशेने शीलवानालाच दान देतात, दुःशीलाला नाही. अशा प्रकारे, शास्त्यांनी (बुद्धांनी) अनुमती न दिल्यामुळे आणि दात्यांनी (त्याच्यासाठी) त्याग न केल्यामुळे, 'दुःशीलाचा उपभोग हा थेय्यपरिभोग (चोरीचा उपभोग) होय' असे म्हटले आहे. ऋणाच्या स्वरूपातील उपभोग म्हणजे 'इणपरिभोग' (ऋणोपभोग) होय. प्रतिग्राहकाच्या (स्वीकार करणाऱ्याच्या) बाजूने दक्षिणा-विशुद्धीचा अभाव असल्यामुळे, कर्ज घेऊन उपभोग घेण्यासारखा हा उपभोग आहे, असा याचा अर्थ आहे. ज्याअर्थी शैक्ष (सेक्ख) हे भगवंतांचे औरस पुत्र आहेत, त्याअर्थी ते पित्याच्या मालकीच्या प्रत्ययांचे (साधनांचे) दायाद (वारसदार) होऊन त्या प्रत्ययांचा उपभोग घेतात; म्हणून त्यांच्या उपभोगाला 'दायज्जपरिभोग' (वारसा हक्काचा उपभोग) म्हणतात. पण मग ते भगवंतांच्या प्रत्ययांचा उपभोग घेतात की गृहस्थांनी दिलेल्या प्रत्ययांचा? गृहस्थांनी दिलेले असले तरी, भगवंतांनी अनुमती दिल्यामुळे ते भगवंतांच्याच मालकीचे होतात; कारण अनुमती नसलेल्या गोष्टींचा पूर्णपणे उपभोग घेता येत नाही, तर केवळ अनुमती असलेल्या गोष्टींचाच उपभोग घेणे शक्य असते. आणि या बाबतीत 'धम्मदयादसुत्त' हे प्रमाण आहे. อวีตราคานํ ตณฺหาปรวสตาย ปจฺจยปริโภเค สามิภาโว นตฺถิ, ตทภาเวน วีตราคานํ ตตฺถ สามิภาโว ยถารุจิ ปริโภคสมฺภวโต. ตถา หิ เต ปฏิกูลมฺปิ อปฺปฏิกูลากาเรน, อปฺปฏิกูลมฺปิ ปฏิกูลากาเรน ตทุภยํ วิวชฺเชตฺวา อุเปกฺขากาเรน จ ปจฺจเย ปริภุญฺชนฺติ, ทายกานญฺจ มโนรถํ ปริปูเรนฺติ. เสสเมตฺถ ยํ วตฺตพฺพํ, ตํ วิสุทฺธิมคฺเค, ตํสํวณฺณนาสุ จ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ. กิเลสอิณานํ อภาวํ สนฺธาย ‘‘อณโณ’’ติ วุตฺตํ, น ปจฺจเวกฺขิตปริโภคมตฺตํ. เตนาห อายสฺมา จ พากุโล – ‘‘สตฺตาหเมว โข อหํ, อาวุโส, สรโณ รฏฺฐปิณฺฑํ ภุญฺชิ’’นฺติ (ม. นิ. ๓.๒๑๑). रागमुक्त न झालेल्यांना (अवीतरागांना) तृष्णेच्या परवशतेमुळे प्रत्ययांच्या (चीवर, पिंडपात इत्यादींच्या) उपभोगामध्ये स्वामित्व नसते. त्याच्या अभावामुळे (तृष्णेच्या अभावामुळे) वीतरागांचे (रागमुक्तांचे) तेथे स्वामित्व असते, कारण ते इच्छेनुसार उपभोग घेऊ शकतात. कारण ते प्रतिकूल गोष्टींचाही अप्रतिकूल भावनेने, अप्रतिकूल गोष्टींचाही प्रतिकूल भावनेने, किंवा दोन्ही वर्ज्य करून उपेक्षाभावाने प्रत्ययांचा उपभोग घेतात, आणि दान देणाऱ्यांची इच्छा पूर्ण करतात. याविषयी जे काही उरलेले सांगायचे आहे, ते 'विशुद्धिमग्ग' आणि त्याच्या टीकांमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावे. क्लेशांच्या ऋणाचा अभाव लक्षात घेऊन 'अनृण' (ऋणमुक्त) असे म्हटले आहे, केवळ प्रत्यवेक्षित उपभोगामुळे नव्हे. म्हणूनच आयुष्यमान बाकुल यांनी म्हटले आहे - 'मित्रांनो, मी केवळ सात दिवसच ऋणी राहून राष्ट्राचा पिंडपात ग्रहण केला.' วตฺถุกามกิเลสกาเมหิ ตณฺหาย ปวตฺติอาการํ ปฏิจฺจ อตฺถิ รมณโวหาโรติ อาห – ‘‘ทุวิเธสุปิ กาเมสุ ตณฺหารติสนฺถว’’นฺติ. มนฺติตนฺติ กถิตํ. อุปฺปนฺเนหิ สตฺถุปฏิญฺเญหิ. สํวิภตฺตาติ กุสลาทิวเสน ขนฺธาทีหิ อากาเรหิ วิภตฺตา. สุนฺทรํ อาคมนนฺติ สฺวาคตํ. ตโต เอว น กุจฺฉิตํ อาคตํ. โสฬสวิธกิจฺจสฺส ปริโยสิตตฺตา อาห ‘‘ตํ สพฺพํ มยา กต’’นฺติ. มคฺคปญฺญายเมว ตติยวิชฺชาสมญฺญาติ อาห – ‘‘ตีหิ วิชฺชาหิ นวหิ จ โลกุตฺตรธมฺเมหี’’ติ. वस्तुकॉम आणि क्लेशकाम यांच्याद्वारे तृष्णेच्या प्रवृत्तीच्या प्रकाराला अनुसरून 'रमण' (रममाण होणे) असा व्यवहार होतो, म्हणून म्हटले आहे - 'दोन्ही प्रकारच्या कामांमध्ये तृष्णेची रती आणि संस्तव (परिचय) आहे.' 'मंतितं' म्हणजे कथित (सांगितलेले). स्वतःला शास्ता मानणाऱ्या उत्पन्न झालेल्या लोकांद्वारे. 'संविभत्ता' म्हणजे कुशल इत्यादींच्या रूपाने स्कंध इत्यादी प्रकारांनी विभागलेले. 'सुंदर आगमन' म्हणजे स्वागत. म्हणूनच ते निंदनीय पद्धतीने आलेले नाही. सोळा प्रकारच्या कृत्यांची समाप्ती झाल्यामुळे म्हटले आहे - 'ते सर्व माझ्याकडून केले गेले आहे.' मार्गप्रज्ञेलाच 'तिसरी विद्या' असे नाव असल्यामुळे म्हटले आहे - 'तीन विद्यांनी आणि नऊ लोकोत्तर धर्मांनी.' องฺคุลิมาลสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. अंगुलिमालसुत्तवर्णनेची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๗. ปิยชาติกสุตฺตวณฺณนา ७. पियजातिकसुत्तवर्णना ๓๕๓. ปกตินิยาเมนาติ [Pg.160] ยถา โสกุปฺปตฺติโต ปุพฺเพ อิติ กตฺตพฺเพสุ อสมฺโมหวเสน จิตฺตํ ปกฺขนฺทติ, ตานิ จสฺส อุปฏฺฐหนฺติ, น เอวํ โสกสฺส จิตฺตสงฺโกจสภาวโต. เตน วุตฺตํ ‘‘ปกตินิยาเมน ปน น ปฏิภนฺตี’’ติ. เกจิ ปน ‘‘สามนฺตา กติปเย น กุฏุมฺพํ สนฺธาเรติ. เตนาห ‘น สพฺเพน สพฺพํ ปฏิภนฺตี’ติ’’ วทนฺติ. เอตฺถาติ ทุติยปเท. อเนกตฺถตฺตา ธาตูนํ ‘‘น ปฏิภาตี’’ติ ปทสฺส ‘‘น รุจฺจตี’’ติ อตฺถมาห. น ปฏิภาตีติ วา ภุญฺชิตุกามตาจิตฺตํ น อุปฏฺฐิตนฺติ อตฺโถ. ปติฏฺฐิโตกาสนฺติ อินฺทฺริยาวิฏฺฐฏฺฐานํ วทติ. ปิยายิตพฺพโต ปิโย ชาติ อุปฺปตฺติฏฺฐานํ เอเตสนฺติ ปิยชาติกา. ปิโย ปภุติ เอเตสนฺติ ปิยปฺปภุติกาติ วตฺตพฺเพ, อุ-การสฺส ว-การํ, ต-การสฺส จ โลปํ กตฺวา ‘‘ปิยปฺปภาวิกา’’ติ วุตฺตํ. เตนาห ‘‘ปิยโต ปภวนฺตี’’ติ. ३५३. 'प्रकृतितया' (नैसर्गिक नियमाने) म्हणजे जसे शोक उत्पन्न होण्यापूर्वी कर्तव्य कर्मांमध्ये संमोह नसल्यामुळे चित्त प्रवृत्त होते आणि ती कर्तव्ये त्याच्यासमोर उपस्थित होतात, तसे शोकामुळे चित्ताचा संकोच होण्याच्या स्वभावामुळे होत नाही. म्हणूनच म्हटले आहे - 'परंतु नैसर्गिक नियमाने ते सुचत नाहीत.' परंतु काही लोक म्हणतात - 'जवळचे काही लोक कुटुंबाचा सांभाळ करत नाहीत. म्हणूनच म्हटले आहे - सर्व प्रकारे सर्व काही सुचत नाही.' 'येथे' म्हणजे दुसऱ्या पदात. धातूंचे अनेक अर्थ असल्यामुळे 'न प्रतिभाति' (सुचत नाही) या शब्दाचा 'आवडत नाही' असा अर्थ सांगितला आहे. किंवा 'न प्रतिभाति' म्हणजे जेवण्याची इच्छा असणारे चित्त उत्पन्न झाले नाही, असा अर्थ आहे. 'प्रतिष्ठित स्थान' म्हणजे इंद्रियांनी व्यापलेले स्थान असे म्हणतात. प्रिय वाटण्यामुळे जे प्रिय आहे, आणि 'जाती' म्हणजे ज्यांचे उत्पत्तीचे स्थान आहे, ते 'पियजातिका' (प्रिय गोष्टींपासून उत्पन्न होणारे) होत. 'प्रिय' ज्यांचे मूळ (प्रभव) आहे त्यांना 'पियप्पभुतिका' असे म्हणायला हवे होते, परंतु 'उ' काराचा 'व' कार आणि 'त' काराचा लोप करून 'पियप्पभाविका' (प्रिय गोष्टींपासून उद्भवणारे) असे म्हटले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - 'प्रियापासून उत्पन्न होतात.' ๓๕๕. ปร-สทฺเทน สมานตฺถํ อชฺฌตฺติกภาวนิเสธนตฺถํ ‘‘ปิเร’’ติ ปทนฺติ อาห ‘‘อมฺหากํ ปเร’’ติ. ปิเรติ วา ‘‘ปรโต’’ติ อิมินา สมานตฺถํ นิปาตปทนฺติ อาห ‘‘จร ปิเรติ ปรโต คจฺฉา’’ติ. ३५५. 'पर' या शब्दाशी समान अर्थ असणारे आणि आध्यात्मिक भावाचा निषेध करण्यासाठी 'पिरे' हे पद आहे, म्हणून म्हटले आहे - 'आमचे परके (इतर).' किंवा 'पिरे' हे 'परतो' (दूर) याच्याशी समान अर्थ असणारे निपात पद आहे, म्हणून म्हटले आहे - 'चर पिरे म्हणजे दूर जा.' ๓๕๖. ทฺวิธา เฉตฺวาติ เอตฺถ ยทิ อิตฺถี ตสฺส ปุริสสฺส ปิยา, กถํ ทฺวิธา ฉินฺทตีติ อาห ‘‘ยทิ หี’’ติอาทิ. ३५६. 'दोन तुकडे करून' यामध्ये जर ती स्त्री त्या पुरुषाची प्रिय असेल, तर तो तिचे दोन तुकडे कसा करतो? यावर 'जर खरोखरच...' इत्यादी म्हटले आहे. ๓๕๗. กถํ กเถยฺยนฺติ ยถา ภควา เอตสฺส พฺราหฺมณสฺส กเถสิ, โส จ เม กเถสิ, ตถา จาหํ กเถยฺยํ. มรณวเสน วิปริณาโม อตฺตภาวสฺส ปริวตฺตตฺตา. ปลายิตฺวา คมนวเสน อญฺญถาภาโว มิตฺตสนฺถวสฺส สมาคมสฺส จ อญฺญถาภูตตฺตา. ३५७. 'कसे सांगावे' म्हणजे जसे भगवंतांनी या ब्राह्मणाला सांगितले, आणि त्याने मला सांगितले, तसेच मी सांगावे. मृत्यूमुळे होणारा विपरिणाम (बदल) हा आत्मभावाच्या (शरीराच्या) परिवर्तनामुळे होतो. पळून जाण्यामुळे होणारा अन्यथाभाव हा मित्रांच्या परिचयाचा आणि भेटीचा अन्यथाभाव झाल्यामुळे होतो. ฉฑฺฑิตภาเวนาติ ปริวตฺติตภาเวน. หตฺถคมนวเสน อญฺญถาภาโว ปุพฺเพ สวเส วตฺติตานํ อิทานิ วเส อวตฺตนภาเวน. 'टाकून दिलेल्या भावाने' म्हणजे परिवर्तित (बदललेल्या) भावाने. दुसऱ्याच्या हातात जाण्यामुळे होणारा अन्यथाभाव म्हणजे जे पूर्वी स्वतःच्या ताब्यात होते, ते आता स्वतःच्या ताब्यात न राहिल्यामुळे होणारा बदल. อาจเมหีติ อาจมนํ มุขวิกฺขาลนํ กาเรหิ. ยสฺมา มุขํ วิกฺขาเลนฺตา หิ หตฺถปาเท โธวิตฺวา วิกฺขาเลนฺติ, ตสฺมา ‘‘อาจมิตฺวา’’ติ วตฺวา ปจฺฉาปิ ตสฺส อตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘มุขํ วิกฺขาเลตฺวา’’ติ อาห. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. 'आचमेहि' म्हणजे आचमन कर (तोंड धुवून घे). कारण तोंड धुताना लोक हात-पाय धुवून मग तोंड धुतात, म्हणून 'आचमन करून' असे म्हटल्यानंतर त्याचा अर्थ स्पष्ट करताना 'तोंड धुवून' असे म्हटले आहे. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. ปิยชาติกสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. पियजातिकसुत्तवर्णनेची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๘. พาหิติกสุตฺตวณฺณนา ८. बाहितिकसुत्तवर्णना ๓๕๙. สาวชฺชตาย [Pg.161] อุปารมฺภํ อรหตีติ โอปารมฺโภ. เตนาห ‘‘โทสํ อาโรปนารโห’’ติ. พาลา อุปารมฺภวตฺถุมญฺญํ อมูลกมฺปิ นํ อาโรเปนฺตา อุคฺโฆเสนฺติ, ตสฺมา เต อนามสิตฺวา ‘‘วิญฺญูหี’’ติ อิทํ ปทํ คเหตฺวา ปญฺเหน ญาตุํ อิจฺฉิเตน อตฺเถน อุปารมฺภาทีนํ อุปริ อุตฺตรํ ปริปูเรตุํ นาสกฺขิมฺหา. ตํ การณนฺติ ตํ อุปฺปตฺติการณํ. ยทิ หิ มยา ‘‘วิญฺญูหี’’ติ ปทํ ปกฺขิปิตฺวา วุตฺตํ ภเวยฺย, ปญฺหา เม ปริปุณฺณา ภเวยฺย, น ปน วุตฺตา. อิทานิ ปน ตํ การณํ อุตฺตรํ อายสฺมตา อานนฺเทน ‘‘วิญฺญูหี’’ติ เอวํ วทนฺเตน ปริปูริตํ. ३५९. सदोषत्वामुळे जो उपालंभास (निंदेस) पात्र आहे तो 'ओपालंभo' (उपालंभपात्र). म्हणूनच म्हटले आहे - 'दोषारोपणास पात्र.' मूर्ख लोक उपालंभाच्या इतर गोष्टींवर अमूलक (निराधार) आरोप करूनही ओरडतात, म्हणून त्यांचा उल्लेख न करता 'विज्ञ लोकांद्वारे' (सुजाण लोकांद्वारे) हे पद घेऊन, प्रश्नाद्वारे जाणून घेण्याची इच्छा असलेल्या अर्थाने उपालंभ इत्यादींच्या पलीकडे उत्तर पूर्ण करण्यास आम्ही असमर्थ ठरलो. 'ते कारण' म्हणजे ते उत्पत्तीचे कारण. जर मी 'विज्ञ लोकांद्वारे' हे पद जोडून सांगितले असते, तर माझा प्रश्न परिपूर्ण झाला असता, परंतु तसे सांगितले गेले नाही. परंतु आता ते कारण आणि उत्तर आयुष्यमान आनंदांनी 'विज्ञ लोकांद्वारे' असे म्हणून पूर्ण केले आहे. ๓๖๐. โกสลฺลปฏิปกฺขโต อโกสลฺลํ วุจฺจติ อวิชฺชา, ตํสมุฏฺฐานโต อโกสลฺลสมฺภูโต. อวชฺชํ วุจฺจติ ครหิตพฺพํ, สห อวชฺเชหีติ สาวชฺโช, คารยฺโห. ราคาทิโทเสหิ สโทโส. เตหิ เอว สพฺยาพชฺโฌ, ตโต เอว สมฺปติ อายติญฺจ สทุกฺโข. สพฺยาพชฺฌาทิโก นิสฺสนฺทวิปาโก. ३६०. कौशल्याच्या (कुशलतेच्या) विरोधी असल्यामुळे अकुशलतेला 'अविद्या' म्हटले जाते, आणि तिच्यापासून उत्पन्न झाल्यामुळे तो 'अकौशलसंभूत' (अकुशलतेतून उत्पन्न झालेला) होय. 'अवज्ज' म्हणजे निंदनीय, आणि दोषांसह असणारा तो 'सावज्ज' (सदोष), म्हणजेच निंदनीय होय. राग इत्यादी दोषांमुळे तो सदोष असतो. त्यांच्यामुळेच तो पीडादायक असतो, आणि म्हणूनच तो वर्तमानात आणि भविष्यात दुःखदायक असतो. पीडादायक इत्यादी हा त्याचा निस्यंदविपाक (परिणाम) आहे. ตถา อตฺโถ วุตฺโต ภเวยฺยาติ ปุจฺฉาสภาเคนปิ อตฺโถ วุตฺโต ภเวยฺย, ปุจฺฉนฺตสฺส ปน น ตาว จิตฺตาราธนํ. เตนาห – ‘‘เอวํ พฺยากรณํ ปน น ภาริย’’นฺติ, ครุกรณํ น โหติ วิสารชฺชํ น สิยาติ อธิปฺปาโย. เตนาห – ‘‘อปฺปหีนอกุสโลปิ หิ ปหานํ วณฺเณยฺยา’’ติ. เอวรูโป ปน ยถาการี ตถาวาที น โหติ, น เอวํ ภควาติ อาห ‘‘ภควา’’ติอาทิ. เอวํ พฺยากาสีติ ‘‘สพฺพากุสลธมฺมปหีโน โข, มหาราช, ตถาคโต’’ติ เอวํ พฺยากาสิ. สุกฺกปกฺเขปิ เอเสว นโยติ อิมินา ‘‘สพฺเพสํเยว กุสลานํ ธมฺมานํ อุปสมฺปทํ วณฺเณตี’’ติ วุตฺเต ยถา ปุจฺฉา, ตถา อตฺโถ วุตฺโต ภเวยฺย, เอวํ พฺยากรณํ ปน น ภาริยํ, อสมฺปาทิตกุสลธมฺโมปิ อุปสมฺปทํ วณฺเณยฺย. ภควา ปน สมฺมเทว สมฺปาทิตกุสลตฺตา ยถาการี ตถาวาทีติ ทสฺเสตุํ ‘‘เอวํ พฺยากาสี’’ติ อิมมตฺถํ ทสฺเสติ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. 'तसा अर्थ सांगितला गेला असता' म्हणजे प्रश्नाच्या अनुरूपही अर्थ सांगितला गेला असता, परंतु विचारणाऱ्याचे चित्त अजून प्रसन्न झाले नसते. म्हणूनच म्हटले आहे - 'परंतु असे व्याकरण (स्पष्टीकरण) कठीण नाही', याचा अभिप्राय असा की ते कठीण काम नाही आणि त्यात विशेष नैपुण्य लागत नाही. म्हणूनच म्हटले आहे - 'कारण ज्याने अकुशल नष्ट केले नाही, तो देखील अकुशलाच्या प्रहाणाची (नष्ट करण्याची) प्रशंसा करू शकतो.' परंतु असा मनुष्य 'यथाकारी तथावादी' (जसे करतो तसे बोलणारा) नसतो, भगवंत तसे नाहीत, हे दर्शवण्यासाठी 'भगवंत...' इत्यादी म्हटले आहे. 'असे स्पष्ट केले' म्हणजे 'महाराज, तथागतांनी सर्व अकुशल धर्मांचे प्रहाण केले आहे' असे स्पष्ट केले. 'शुक्लपक्षातही (चांगल्या बाजूनेही) हाच नियम आहे' याने 'सर्व कुशल धर्मांच्या उपसंपदेची (प्राप्तीची) प्रशंसा करतात' असे म्हटले असता जसा प्रश्न आहे, तसा अर्थ स्पष्ट होईल, परंतु असे स्पष्टीकरण कठीण नाही, कारण ज्याने कुशल धर्म प्राप्त केले नाहीत तो देखील उपसंपदेची प्रशंसा करू शकतो. परंतु भगवंतांनी कुशल धर्म चांगल्या प्रकारे प्राप्त केले असल्यामुळे ते 'यथाकारी तथावादी' आहेत, हे दर्शवण्यासाठी 'असे स्पष्ट केले' हा अर्थ दर्शवला आहे. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. พาหิติกสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. बाहितिकसुत्तवर्णनेची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๙. ธมฺมเจติยสุตฺตวณฺณนา ९. धम्मचेतियसुत्तवर्णना ๓๖๔. เมทวณฺณา [Pg.162] อุฬุปวณฺณา จ ตตฺถ ตตฺถ ปาสาณา อุสฺสนฺนา อเหสุนฺติ เมทาฬุปนฺติ คามสฺส สมญฺญา ชาตา. อุฬุปวณฺณาติ จนฺทสมานวณฺณตาย เมทปาสาณา วุตฺตาติ เกจิ. อฏฺฐกถายํ ปน ‘‘เมทวณฺณา ปาสาณา กิเรตฺถ อุสฺสนฺนา อเหสุ’’นฺติ อิทํ วุตฺตํ. อสฺสาติ เสนาปติสฺส. กถาสมุฏฺฐาปนตฺถนฺติ มลฺลิกาย โสกวิโนทนธมฺมกถาสมุฏฺฐาปนตฺถํ. ३६४. तिथे तिथे मेदाच्या (चरबीच्या) रंगाचे आणि उळुपाच्या (लव्हाळ्याच्या किंवा चंद्राच्या) रंगाचे दगड विपुल प्रमाणात होते, म्हणून त्या गावाला 'मेदाळुप' असे नाव पडले. काही जणांच्या मते, चंद्रासारख्या रंगाचे असल्यामुळे मेद-पाषाणांना 'उळुपवण्ण' असे म्हटले आहे. परंतु अट्ठकथेत असे म्हटले आहे की, 'येथे मेदाच्या रंगाचे दगड विपुल प्रमाणात होते.' 'अस्स' म्हणजे सेनापतीच्या. 'कथासमुट्ठापनत्थं' म्हणजे मल्लिकेचा शोक दूर करण्यासाठी धम्मकथा सुरू करण्याच्या हेतूने. รญฺญาติ ปเสนทีโกสลรญฺญา. มหจฺจาติ มหติยา. ปทวิปลฺลาเสน เจตํ วุตฺตํ. ปสาทมรหนฺตีติ ปาสาทิกานิ. เตนาห ‘‘สห รญฺชนกานี’’ติ. ยานิ ปน ปาสาทิกานิ, ตานิ ปสฺสิตุํ ยุตฺตานิ. ปาสาทิกานีติ วา สทฺทหนสหิตานิ. เตนาห ‘‘ปสาทชนกานี’’ติ. ‘‘อปฺปาพาธ’’นฺติ อาทีสุ วิย อปฺปสทฺโท อภาวตฺโถติ อาห ‘‘นิสฺสทฺทานี’’ติ. อนิยมตฺถวาจี ย-สทฺโท อนิยมาการวาจโกปิ โหตีติ ‘‘ยตฺถา’’ติ ปทสฺส ‘‘ยาทิเสสู’’ติอาทิมาห. ตถา หิ องฺคุลิมาลสุตฺเต (ม. นิ. อฏฺฐ. ๒.๓๔๗ อาทโย) ‘‘ยสฺส โข’’ติ ปทสฺส ‘‘ยาทิสสฺส โข’’ติ อตฺโถ วุตฺโต. 'रञ्ञा' म्हणजे राजा पसेनदी कोसल याच्याकडून. 'महच्चा' म्हणजे मोठ्या. हे पदविपल्लासाने (पदांच्या विपर्यासाने) म्हटले आहे. जे प्रसन्नतेस पात्र आहेत, ते 'पासादिक' (प्रसन्नतादायक) होत. म्हणूनच म्हटले आहे— 'सह रञ्जनकानि' (रंजन करणाऱ्यांसहित). जी प्रसन्नतादायक आहेत, ती पाहण्यास योग्य आहेत. किंवा 'पासादिक' म्हणजे श्रद्धायुक्त. म्हणूनच म्हटले आहे— 'पसादजनकानी' (प्रसन्नता उत्पन्न करणारी). 'अप्पाबाध' इत्यादी शब्दांप्रमाणे येथे 'अप्प' हा शब्द अभावाच्या अर्थाने आहे, म्हणून 'निसद्दानि' (निःशब्द/शांत) असे म्हटले आहे. अनिश्चित अर्थ दर्शवणारा 'य' हा शब्द अनिश्चित प्रकार दर्शवणाराही असतो, म्हणून 'यत्थ' या पदाचा अर्थ 'यादिसेसु' (ज्या प्रकारच्या) इत्यादी असा केला आहे. तसेच अंगुलिमाल सुत्तात 'यस्स खो' या पदाचा अर्थ 'यादिसस्स खो' (ज्या प्रकारच्या) असा सांगितला आहे. ๓๖๖. ปฏิจฺฉทนฺติ ปฏิจฺฉาทกํ. ราชกกุธภณฺฑานีติ ราชภณฺฑภูตานิ. รหายตีติ รโห กโรติ, มํ อชฺเฌสตีติ อตฺโถ. ३६६. 'पटिच्छदं' म्हणजे झाकणारे. 'राजककुधभण्डानि' म्हणजे राजचिन्हे असलेली उपकरणे. 'रहायति' म्हणजे एकांत करतो, किंवा 'मला विनंती करतो' असा याचा अर्थ आहे. ๓๖๗. ยถาสภาวโต เญยฺยํ ธาเรติ อวธาเรตีติ ธมฺโม, ญาณนฺติ อาห ‘‘ปจฺจกฺขญาณสงฺขาตสฺส ธมฺมสฺสา’’ติ. อนุนโยติ อนุคจฺฉนโก. ทิฏฺเฐน หิ อทิฏฺฐสฺส อนุมานํ. เตนาห ‘‘อนุมานํ อนุพุทฺธี’’ติ. อาปาณโกฏิกนฺติ ยาว ปาณโกฏิ, ตาว ชีวิตปริโยสานํ. เอตนฺติ ธมฺมนฺวยสงฺขาตํ อนุมานํ. เอวนฺติ ‘‘อิธ ปนาห’’นฺติ วุตฺตปฺปกาเรน. ३६७. जे ज्ञेय गोष्टीला तिच्या वास्तविक स्वभावाने धारण करते किंवा निश्चित करते तो 'धम्म' (ज्ञान) होय, म्हणूनच 'पच्चक्खञाणसङ्खातस्स धम्मस्स' (प्रत्यक्ष ज्ञान नावाचा धम्म) असे म्हटले आहे. 'अनुणयो' म्हणजे अनुकरण करणारे (मागोमाग जाणारे). कारण पाहिलेल्या गोष्टीवरून न पाहिलेल्या गोष्टीचे अनुमान केले जाते. म्हणूनच म्हटले आहे— 'अनुमान हे अनुबुद्धी (मागून होणारे ज्ञान) आहे.' 'आपाणकोटि' म्हणजे प्राणांच्या अंतापर्यंत, म्हणजेच जीवनाच्या समाप्तीपर्यंत. 'एतं' म्हणजे धम्मान्वय नावाचे अनुमान. 'एवं' म्हणजे 'येथे पुन्हा म्हटले आहे' या सांगितलेल्या प्रकारे. ๓๖๙. จกฺขุํ อพนฺธนฺเต วิยาติ อปาสาทิกตาย ปสฺสนฺตานํ จกฺขุํ อตฺตนิ อพนฺธนฺเต วิย. กุลสนฺตานานุพนฺโธ โรโค กุลโรโค. อุฬารนฺติ สานุภาวํ. โย หิ อานุภาวสมฺปนฺโน, ตํ ‘‘มเหสกฺข’’นฺติ วทนฺติ. อรหตฺตํ คณฺหนฺโตติ อุกฺกฏฺฐนิทฺเทโสยํ, เหฏฺฐิมผลานิ คณฺหนฺโตปิ. ३६९. 'चक्खुं अबन्धन्ते विय' (डोळे खिळवून न ठेवल्यासारखे) म्हणजे अप्रसन्नतेमुळे पाहणाऱ्यांचे डोळे स्वतःकडे आकर्षित न केल्यासारखे. कुळपरंपरेने चालत आलेला रोग म्हणजे 'कुलरोग' होय. 'उळारं' म्हणजे प्रभावयुक्त. कारण जो प्रभावसंपन्न असतो, त्याला 'महेसक्ख' (महानुभाव) म्हणतात. 'अरहत्तं गण्हन्तो' (अर्हतपद प्राप्त करणारा) हा उत्कृष्ट निर्देश आहे, यात खालची फळे प्राप्त करणाऱ्यांचाही समावेश होतो. ๓๗๓. ชีวิกา [Pg.163] ชีวิตวุตฺติ. ३७३. 'जीविका' म्हणजे उपजीविका (जीवितवृत्ती). ๓๗๔. ธมฺมํ เจเตติ สํเวเทติ เอเตหีติ ธมฺมเจติยานิ, ธมฺมสฺส ปูชาวจนานิ. นนุ เจตานิ พุทฺธสงฺฆคุณทีปนานิปิ สนฺติ? กถํ ‘‘ธมฺมเจติยานีติ ธมฺมสฺส จิตฺตีการวจนานี’’ติ วุตฺตนฺติ อาห ‘‘ตีสุ หี’’ติอาทิ. ตตฺถ ยสฺมา พุทฺธรตนมูลกานิ เสสรตนานิ ตสฺส วเสน ลทฺธพฺพโต. โกสลรญฺญา เจตฺถ พุทฺธคารเวน ธมฺมสงฺฆคารวํ ปเวทิตํ, ตสฺมา ‘‘ภควติ จิตฺตีกาเร กเต ธมฺโมปิ กโตว โหตี’’ติ วุตฺตํ. ยสฺมา จ รตนตฺตยปสาทปุพฺพิกา สาสเน สมฺมาปฏิปตฺติ, ตสฺมา วุตฺตํ – ‘‘อาทิพฺรหฺมจริยกานีติ มคฺคพฺรหฺมจริยสฺส อาทิภูตานี’’ติ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. ३७४. ज्यांच्याद्वारे धम्माचे चिंतन केले जाते किंवा धम्माचा अनुभव घेतला जातो, ती 'धम्मचेतियानि' (धम्मचैत्ये) म्हणजे धम्माच्या आदराची वचने होत. पण ही वचने बुद्ध आणि संघाचे गुणही प्रकाशित करणारी नाहीत का? मग 'धम्मचेतियानि म्हणजे धम्माच्या आदराची वचने' असे कसे म्हटले? यावर 'तीसु हि' (कारण तिन्हींमध्ये) इत्यादी म्हटले आहे. त्यात, कारण बुद्धरत्न हे मूळ आहे आणि इतर रत्ने त्याच्या आधारेच प्राप्त होतात. कोसल राजाने येथे बुद्धांवरील आदराद्वारे धम्म आणि संघावरील आदर व्यक्त केला आहे, म्हणूनच 'भगवंतांचा आदर केला असता धम्माचाही आदर केला जातोच' असे म्हटले आहे. आणि त्रिरत्नावरील श्रद्धेने युक्त अशीच शासनातील सम्यक प्रतिपत्ती (आचरण) असते, म्हणूनच म्हटले आहे— 'आदिब्रह्मचरियकानि' म्हणजे मार्ग-ब्रह्मचर्याची मूळ कारणे. उर्वरित भाग समजण्यास सोपाच आहे. ธมฺมเจติยสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. धम्मचेतियसुत्त-वर्णनाची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकटीकरण) समाप्त झाली. ๑๐. กณฺณกตฺถลสุตฺตวณฺณนา १०. कण्णकत्थलसुत्त-वर्णन ๓๗๕. อนนฺตรสุตฺเต วุตฺตกรณีเยเนวาติ ‘‘ปาสาเท วา นาฏเกสุ วา จิตฺตสฺสาทํ อลภมาโน ตตฺถ ตตฺถ วิจริตุํ อารทฺโธ’’ติ วุตฺตกรณีเยน. อปฺปทุฏฺฐปโทสีนญฺหิ เอวํ โหตีติ. ३७५. 'अनन्तरसुत्ते वृत्तकरणीयेनेव' (लगेचच आधीच्या सुत्तात सांगितलेल्या कारणानेच) म्हणजे 'महालात किंवा नाटकांमध्ये मनाला आनंद न मिळाल्यामुळे तो तिथे तिथे फिरू लागला' या सांगितलेल्या कारणाने. कारण ज्यांच्या मनात थोडाही द्वेष नसतो, त्यांच्या बाबतीत असे घडते. ๓๗๖. ปุจฺฉิโตติ ‘‘อญฺญํ ทูตํ นาลตฺถุ’’นฺติ ปุจฺฉิโต. โสติ ราชา. ตาสํ วนฺทนา สเจ อุตฺตรกาลํ, อตฺตโน อาคมนการณํ กเถสฺสติ. ३७६. 'पुच्छितो' (विचारले असता) म्हणजे 'तुम्हाला दुसरा कोणताही दूत मिळाला नाही का?' असे विचारले असता. 'सो' म्हणजे राजा. त्यांचे वंदन जर नंतरच्या काळात असेल, तर तो स्वतःच्या येण्याचे कारण सांगेल. ๓๗๘. เอกาวชฺชเนนาติ เอกวีถิชวเนน. เตน เอกจิตฺตํ ตาว ติฏฺฐตุ, เอกจิตฺตวีถิยาปิ สพฺพํ ชานิตุํ น สกฺกาติ ทสฺเสติ. ‘‘อิทํ นาม อตีตํ ชานิสฺสามี’’ติ อนิยเมตฺวา อาวชฺชโต ยํ กิญฺจิ อตีตํ ชานาติ, นิยมิเต ปน นิยมิตเมวาติ อาห – ‘‘เอเกน หิ…เป… เอกเทสเมว ชานาตี’’ติ. เตน จิตฺเตนาติ ‘‘อตีตํ สพฺพํ ชานิสฺสามี’’ติ เอวํ ปวตฺตจิตฺเตน. อิตเรสูติ อนาคตปจฺจุปฺปนฺเนสุ. การณชาติกนฺติ ยุตฺติสภาวํ, ยุตฺติยา ยุตฺตนฺติ อตฺโถ. สมฺปรายคุณนฺติ สมฺปราเย กตกมฺมสฺส วิเสสํ. ३७८. 'एकावज्जनेन' म्हणजे एकाच वीथि-जवन चित्ताने. यावरून हे दर्शवले आहे की, एका चित्ताची गोष्ट तर दूरच राहो, एका चित्तवीथीनेही सर्व काही जाणून घेणे शक्य नाही. 'मी अमुक एक भूतकाळ जाणीन' असे निश्चित न करता विचार केला असता, तो कोणताही भूतकाळ जाणतो; परंतु निश्चित केले असता निश्चित केलेलाच भाग जाणतो, म्हणूनच म्हटले आहे— 'एकाच... पे... एकाच भागाला जाणतो.' 'तेन चित्तेन' म्हणजे 'मी सर्व भूतकाळ जाणीन' अशा प्रकारे प्रवृत्त झालेल्या चित्ताने. 'इतरेसु' म्हणजे अनागत (भविष्यकाळ) आणि पच्चुप्पन्न (वर्तमानकाळ) यांमध्ये. 'कारणजातिकं' म्हणजे युक्तिसंगत स्वभाव, युक्तीने युक्त असा याचा अर्थ आहे. 'सम्परायगुणं' म्हणजे परलोकात केलेल्या कर्माचे विशेष फळ. ๓๗๙. โลกุตฺตรมิสฺสกานิ กถิตานิ โพธิราชกุมารสุตฺเต วิย โลกิยา เจว โลกุตฺตรา จ. ยถาลาภวเสน เจตฺถ ปธานิยงฺคานํ [Pg.164] โลกุตฺตรคฺคหณํ เวทิตพฺพํ. ปจฺเจกํ เอว เนสญฺจ ปธานิยงฺคตา ทฏฺฐพฺพา ยถา ‘‘อฏฺฐวิโมกฺขา สนฺทิสฺสนฺติ โลกุตฺตรมิสฺสกา’’ติ. โลกุตฺตราเนวาติ เจตฺถ ยํ วตฺตพฺพํ, ตํ ปรโต อาวิ ภวิสฺสติ. ปธานนานตฺตนฺติ ปทหนนานตฺตํ, ภาวนานุโยควิเสสนฺติ อตฺโถ. สงฺขาเร ปริมทฺทิตฺวา ปฏิปกฺขธมฺเม เอกเทสโต ปชหิตฺวา ฐิตสฺส ภาวนานุโยโค สพฺเพน สพฺพํ อปริมทฺทิตสงฺขารสฺส อปฺปหีนปฏิปกฺขสฺส ภาวนานุโยคโต สุขุโม วิสโทว โหติ, สจฺจาภิสมเยน สนฺตานสฺส อาหิตวิเสสตฺตาติ อาห – ‘‘อญฺญาทิสเมว หิ ปุถุชฺชนสฺส ปธานํ, อญฺญาทิสํ โสตาปนฺนสฺสา’’ติอาทิ. อยญฺจ วิเสโส น เกวลํ อนริยอริยปุคฺคลโต เอว, อถ โข อริเยสุปิ เสกฺขาทิวิเสสโตปิ ลพฺภติ อภิสงฺขารวิเสสโต อภินีหารโต จ อิชฺฌนโตติ ทสฺเสนฺโต ‘‘อญฺญาทิสํ สกทาคามิโน’’ติอาทิมาห. น ปาปุณาตีติ ยสฺมา ปุถุชฺชโน สพฺพถาว ปธานํ ปทหนฺโต โสตาปตฺติมคฺคํ อธิคจฺฉติ, โสตาปนฺโน จ สกทาคามิมคฺคนฺติ เหฏฺฐิมํ อุปริมโต โอฬาริกํ, อุปริมญฺจ อิตรโต สุขุมํ เตน ปหาตุํ อสกฺกุเณยฺยสฺส ปชหนโต, อิติ อธิคนฺตพฺพวิเสเสน จ อธิคมปฏิปทาย สณฺหสุขุมตา ติกฺขวิสทตา จ วิญฺญายตีติ อาห – ‘‘ปุถุชฺชนสฺส ปธานํ โสตาปนฺนสฺส ปธานํ น ปาปุณาตี’’ติอาทิ. ३७९. बोधराजकुमार सुत्ताप्रमाणे येथे लौकिक आणि लोकोत्तर अशा दोन्ही गोष्टींचे मिश्रण करून (लोकुत्तरमिस्सकानि) सांगितले आहे. आणि येथे जसा लाभ होईल त्याप्रमाणे प्रधानियंगांचे (प्रयत्नांच्या अंगांचे) लोकोत्तर ग्रहण समजावे. आणि त्यांची प्रत्येक प्रधानियंगता स्वतंत्रपणे पाहिली पाहिजे, जसे की 'आठ विमोक्ष हे लोकोत्तर मिश्रित दिसतात.' 'लोकोत्तरच' याविषयी जे काही सांगायचे आहे, ते पुढे स्पष्ट होईल. 'पधाननाणत्तं' (प्रयत्नांचा भेद) म्हणजे प्रयत्नाचा भेद, म्हणजेच भावनानुयोगाचा (भावनेच्या अभ्यासाचा) विशेष असा अर्थ आहे. संस्कारांचे दमन करून आणि विरोधी धर्मांचा काही अंशी त्याग करून राहिलेल्या व्यक्तीचा भावनानुयोग हा, ज्याने संस्कारांचे अजिबात दमन केलेले नाही आणि विरोधी धर्मांचा त्याग केलेला नाही अशा व्यक्तीच्या भावनानुयोगापेक्षा सूक्ष्म आणि स्पष्ट असतो; कारण सच्च-अभिसमयाने (सत्य साक्षात्काराने) त्याच्या चित्तसंततीमध्ये विशेष गुण निर्माण झालेला असतो. म्हणूनच म्हटले आहे— 'कारण पुथुज्जनाचा (सामान्य माणसाचा) प्रयत्न वेगळाच असतो आणि सोतापन्नाचा प्रयत्न वेगळाच असतो' इत्यादी. आणि हा भेद केवळ अनार्य आणि आर्य पुद्गलांमध्येच (व्यक्तींमध्येच) नाही, तर आर्यांमध्येही सेक्ख (शैक्य) इत्यादींच्या भेदावरून, अभिसंस्काराच्या विशेषावरून आणि अभिनिहाराच्या (निश्चयाच्या) सिद्धीवरून प्राप्त होतो, हे दर्शवण्यासाठी 'सकदागामीचा प्रयत्न वेगळाच असतो' इत्यादी म्हटले आहे. 'प्राप्त होत नाही' (न पापुणाति) कारण पुथुज्जन सर्व प्रकारे प्रयत्न करून सोतापत्तिमार्ग प्राप्त करतो, आणि सोतापन्न हा सकदागामिमार्ग प्राप्त करतो. अशा प्रकारे खालचा मार्ग वरच्या मार्गापेक्षा स्थूल असतो आणि वरचा मार्ग खालच्या मार्गापेक्षा सूक्ष्म असतो, कारण ज्याचा त्याग करणे पूर्वी अशक्य होते त्याचा त्याग केला जातो. अशा प्रकारे प्राप्त करावयाच्या विशेषावरून आणि प्राप्तीच्या प्रतिपदेवरून (मार्गावरून) तिची सूक्ष्मता आणि तीक्ष्ण-स्पष्टता समजून येते, म्हणूनच म्हटले आहे— 'पुथुज्जनाचा प्रयत्न सोतापन्नाच्या प्रयत्नापर्यंत पोहोचू शकत नाही' इत्यादी. อกูฏกรณนฺติ อวญฺจนกิริยํ. อนวจฺฉินฺทนนฺติ อติยานํ. อวิญฺฉนํ น อากฑฺฒนํ, นิยุตฺตตํ วินิเวเฐตฺวา สมนฺตา วิปริวตฺติตฺวา สมธาราย ฉฑฺฑนํ วา. ตสฺส การณํ ตํการณํ, ตํ การณนฺติ วา ตํ กิริยํ ตํ อธิการํ. ทนฺเตหิ คนฺตพฺพภูมินฺติ ทนฺเตหิ ปตฺตพฺพฏฺฐานํ, ปตฺตพฺพวตฺถุํ วา. จตฺตาโรปิ อสฺสทฺธา นาม อุปริมอุปริมสทฺธาย อภาวโต. เยน หิ ยํ อปฺปตฺตํ, ตสฺส ตํ นตฺถิ. อริยสาวกสฺส…เป… นตฺถิ ปฐมมคฺเคเนว มายาสาเฐยฺยานํ ปหาตพฺพตฺตา. เตเนวาติ สมฺมเทว วิรุทฺธปกฺขานํ สทฺธาทีนํ อิธาธิปฺเปตตฺตา. ยทิ เอวํ กถํ มิสฺสกกถาติ อาห ‘‘อสฺสขฬุงฺกสุตฺตนฺเต ปนา’’ติอาทิ. จตฺตาโรว โหนฺติ ปุถุชฺชนาทิวเสน. 'अकूटकरण' म्हणजे कपट न करण्याची क्रिया (फसवणूक न करणे). 'अनवच्छिंदन' म्हणजे उल्लंघन करणे (पुढे जाणे). 'अविंच्छन' म्हणजे ओढणे नव्हे, तर जोडलेल्या गोष्टीला सोडवून, सर्व बाजूंनी फिरवून, समतोल ठेवून टाकून देणे होय. त्याचे कारण म्हणजे 'तत्कारण', किंवा 'तत्कारण' म्हणजे ती क्रिया किंवा तो अधिकार. 'दंतेहि गंतब्बभूमिं' म्हणजे दंत (वश केलेल्या/प्रशिक्षित) प्राण्यांनी जाण्याचे स्थान किंवा प्राप्त करण्याचे ठिकाण होय. चारही जण 'अश्रद्ध' आहेत कारण त्यांच्यात उत्तरोत्तर (वरच्या पातळीवरील) श्रद्धेचा अभाव आहे. कारण ज्याने जे प्राप्त केले नाही, त्याच्याकडे ते नसते. आर्यश्रावकाला...पे... नसते, कारण पहिल्या मार्गानेच (सोतापत्ती मार्गानेच) माया आणि शाठ्य (कपट) यांचा प्रहाण (नाश) होतो. 'त्यामुळेच' म्हणजे विरोधी पक्षातील श्रद्धा इत्यादींचा येथे योग्य प्रकारे अभिप्रेत असल्यामुळे. जर असे असेल तर मिश्र कथा कशी? म्हणून "अस्सखळुंकसुत्तंतात तर..." इत्यादी म्हटले आहे. पृथग्जन इत्यादींच्या भेदाने चारच असतात. โอปมฺมสํสนฺทเน อทนฺตหตฺถิอาทโย วิยาติอาทินา กณฺหปกฺเข, ยถา ปน ทนฺตหตฺถิอาทโยติอาทินา สุกฺกปกฺเข จ สาธารณโต เอกชฺฌํ [Pg.165] กตฺวา วุตฺตํ, อสาธารณโต ภินฺทิตฺวา ทสฺเสตุํ ‘‘อิทํ วุตฺตํ โหตี’’ติอาทิ วุตฺตํ. उपमेच्या तुलनेत 'अदंत (अप्रशिक्षित) हत्ती इत्यादींप्रमाणे' इत्यादी शब्दांनी कृष्णपक्षात (अकुशल पक्षात), आणि 'जसे प्रशिक्षित हत्ती इत्यादी' इत्यादी शब्दांनी शुक्लपक्षात (कुशल पक्षात) सामान्यपणे एकत्र करून सांगितले आहे. तेच असाधारणपणे (विशेष रूपाने) विभागून दाखवण्यासाठी "याचा अर्थ असा आहे..." इत्यादी म्हटले आहे. ๓๘๐. สมฺมปฺปธานา นิพฺพิสิฏฺฐวีริยา. เตนาห – ‘‘น กิญฺจิ นานากรณํ วทามิ, ยทิทํ วิมุตฺติยา วิมุตฺติ’’นฺติ. น หิ สุกฺขวิปสฺสกเตวิชฺชฉฬภิญฺญานํ วิมุตฺติยา นานากรณํ อตฺถิ. เตน วุตฺตํ ‘‘ยํ เอกสฺสา’’ติอาทิ. กึ ตฺวํ น ชานาสีติ สมฺพนฺโธ. อาคจฺฉนฺตีติ อุปฺปชฺชนวเสน อาคจฺฉนฺติ. นาคจฺฉนฺตีติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย. อิทํ ปุจฺฉนฺโตติ อิทํ ปุจฺฉามีติ ทสฺเสนฺโต. อปฺปหีนเจตสิกทุกฺขา อนธิคตอนาคามิตา. เตนาห ‘‘อุปปตฺติวเสน อาคนฺตาโร’’ติ. สมุจฺฉินฺนทุกฺขาติ สมุคฺฆาฏิตเจตสิกทุกฺขา. ३८०. 'सम्माप्पधान' (सम्यक्प्रधान) म्हणजे विशेष वीर्य (प्रयत्न) असणारे. म्हणूनच म्हटले आहे – "मी विमुक्तीच्या बाबतीत कोणताही फरक सांगत नाही, जी ही विमुक्ती आहे." कारण शुष्कविपश्यक, त्रिविद्य आणि षडभिज्ञ यांच्या विमुक्तीमध्ये कोणताही फरक नसतो. म्हणूनच "जे एकाचे..." इत्यादी म्हटले आहे. "तुला माहीत नाही का?" असा संबंध आहे. 'येतात' म्हणजे उत्पत्तीच्या रूपाने येतात. 'येत नाहीत' यामध्येही हाच नियम आहे. 'हे विचारणारा' म्हणजे "मी हे विचारत आहे" असे दर्शवणारा. ज्यांचे मानसिक दुःख नष्ट झालेले नाही आणि ज्यांनी अनागामी अवस्था प्राप्त केलेली नाही. म्हणूनच "उत्पत्तीच्या (पुनर्जन्माच्या) रूपाने येणारे" असे म्हटले आहे. 'समुच्छिन्नदुःख' म्हणजे ज्यांचे मानसिक दुःख समूळ नष्ट झाले आहे ते. ๓๘๑. ตมฺหา ฐานาติ ตโต ยถาธิคตอิสฺสริยฏฺฐานโต. ปุน ตมฺหา ฐานาติ ตโต ทุคฺคตา. สมฺปนฺนกามคุณนฺติ อุฬารกามคุณสมนฺนาคตํ. ३८१. 'त्या स्थानावरून' म्हणजे त्या प्राप्त केलेल्या ऐश्वर्ययुक्त स्थानावरून. 'पुन्हा त्या स्थानावरून' म्हणजे त्या दुर्गतीमधून. 'संपन्नकामगुण' म्हणजे उत्कृष्ट कामगुणांनी युक्त असलेले. ตตฺถาติ กามเทวโลเก. ฐานภาวโตติ อรหตฺตญฺเจ อธิคตํ, ตาวเทว ปรินิพฺพานโต. อุปริเทเว จาติ อุปรูปริ ภูมิวาเส เทเว จ, จกฺขุวิญฺญาณทสฺสเนนปิ ทสฺสนาย นปฺปโหนฺตีติ โยชนา. 'तेथे' म्हणजे कामदेवलोकात. 'स्थानभावामुळे' म्हणजे जर अर्हत्त्व प्राप्त झाले, तर लगेचच परिनिर्वाण होत असल्यामुळे. 'आणि वरच्या देवांमध्ये' म्हणजे वरच्या वरच्या भूमीवर राहणाऱ्या देवांमध्ये देखील, चक्षुविज्ञानाच्या दर्शनानेही पाहण्यास ते समर्थ नसतात, अशी योजना करावी. ๓๘๒. วุตฺตนเยเนวาติ เทวปุจฺฉาย วุตฺเตเนว นเยน. สา กิร กถาติ ‘‘นตฺถิ โส สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา, โย สกิเทว สพฺพํ เนยฺย’’นฺติ กถา. เตติ วิฏฏูภสญฺชยา. อิมสฺมึเยว ฐาเนติ อิมสฺมึ มิคทาเยเยว. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. ३८२. 'सांगितलेल्या पद्धतीनेच' म्हणजे देवाच्या प्रश्नामध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच. 'ती कथा' म्हणजे "असा कोणताही श्रमण किंवा ब्राह्मण नाही, जो एकाच वेळी सर्व ज्ञेय गोष्टी जाणू शकेल" ही कथा होय. 'ते' म्हणजे विडूडभ आणि संजय. 'याच ठिकाणी' म्हणजे याच मृगदावात (हरिणांच्या वनात). उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. กณฺณกตฺถลสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. कण्णकत्थलसुत्तवर्णनेची लीनात्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. นิฏฺฐิตา จ ราชวคฺควณฺณนา. आणि राजवग्गवर्णना (राजवर्गाची अट्ठकथा) समाप्त झाली. ๕. พฺราหฺมณวคฺโค ५. ब्राह्मणवग्गो (ब्राह्मणवर्ग) ๑. พฺรหฺมายุสุตฺตวณฺณนา १. ब्रह्मायुसुत्तवर्णना (ब्रह्मायुसुत्ताची अट्ठकथा) ๓๘๓. ‘‘มหาสตฺโต [Pg.166] มหิทฺธิโก มหานุภาโว’’ติอาทีสุ (มหาว. ๓๘) อุฬารตา วิสโย, ‘‘มหาชนกาโย สนฺนิปตี’’ติอาทีสุ สมฺพหุลภาววิสโย, อิธ ปน ตทุภยมฺปิสฺส อตฺโถติ ‘‘มหตาติ คุณมหตฺเตนปิ มหตา’’ติอาทิ วุตฺตํ. อปฺปิจฺฉตาทีติ อาทิ-สทฺเทน สนฺตุฏฺฐิสลฺเลขปวิเวกอสํสคฺควีริยารมฺภาทีนํ สงฺคโห. ทิฏฺฐิสีลสามญฺญสงฺฆาตสงฺขาเตนาติ เอตฺถ ‘‘นิยโต สมฺโพธิปรายโณ’’ (สํ. นิ. ๒.๔๑; ๓.๙๙๘, ๑๐๐๔) – ‘‘อฏฺฐานเมตํ, ภิกฺขเว, อนวกาโส, ยํ ทิฏฺฐิสมฺปนฺโน ปุคฺคโล สญฺจิจฺจ ปาณํ ชีวิตา โวโรเปยฺยาติ เนตํ ฐานํ วิชฺชตี’’ติอาทิวจนโต ทิฏฺฐิสีลานํ นิยตสภาวตฺตา โสตาปนฺนาปิ อญฺญมญฺญํ ทิฏฺฐิสีลสามญฺเญน สํหตา, ปเคว สกทาคามิอาทโย. ‘‘ตถารูปาย ทิฏฺฐิยา ทิฏฺฐิสามญฺญคโต วิหรติ (ที. นิ. ๓.๓๒๔, ๓๕๖; ม. นิ. ๑.๔๙๒; ๓.๕๔; อ. นิ. ๖.๑๑; ปริ. ๒๗๔) ตถารูเปหิ สีเลหิ สีลสามญฺญคโต วิหรตี’’ติ (ที. นิ. ๓.๓๒๔; ม. นิ. ๑.๔๙๒; ๓.๕๔; อ. นิ. ๖.๑๒; ปริ. ๒๗๔) วจนโต ปุถุชฺชนานมฺปิ ทิฏฺฐิสีลสามญฺเญน สํหตภาโว ลพฺภติเยว. ३८३. "महासत्त्व, महर्द्धिक, महानुभाव" इत्यादींमध्ये (महाव. ३८) श्रेष्ठता हा विषय आहे, "महाजनसमुदाय गोळा झाला" इत्यादींमध्ये विपुलता (संख्याधिक्य) हा विषय आहे, परंतु येथे त्याचे दोन्ही अर्थ असल्यामुळे "महान म्हणजे गुणांच्या मोठेपणानेही महान" इत्यादी म्हटले आहे. 'अल्पेच्छता इत्यादी' यातील 'इत्यादी' शब्दाने संतुष्टी (संतोष), सल्लेख (घासून पुसून शुद्ध करणे), प्रविवेक (एकांतवास), असंसर्ग (अलिप्तता), वीर्यारंभ (प्रयत्नशीलता) इत्यादींचा संग्रह होतो. 'दृष्टी आणि शील यांच्या समानतेच्या समूहाने' यामध्ये "नियत, संबोधीकडे जाणारा" – "हे भिक्खूहो, हे अशक्य आहे, असा कोणताही प्रसंग नाही की दृष्टीसंपन्न (सोतापन्न) व्यक्तीने जाणूनबुजून प्राण्याचा जीव घ्यावा, हे स्थान शक्य नाही" इत्यादी वचनांवरून दृष्टी आणि शील यांच्या नियत स्वभावामुळे सोतापन्न देखील एकमेकांशी दृष्टी आणि शील यांच्या समानतेने जोडलेले असतात, मग सकदागामी इत्यादींबद्दल काय सांगावे! "तशा प्रकारच्या दृष्टीने दृष्टीच्या समानतेत राहतो, तशा प्रकारच्या शीलाने शीलाच्या समानतेत राहतो" या वचनावरून पृथग्जनांमध्येही दृष्टी आणि शील यांच्या समानतेने जोडले जाणे प्राप्त होतेच. โอฏฺฐปหตกรณวเสน อตฺถวิภาควเสน. สนิฆณฺฑุเกฏุภานนฺติ เอตฺถ นิฆณฺฑูติ วจนียวาจกภาเวน อตฺถํ สทฺทญฺจ ขณฺฑติ วิภชฺช ทสฺเสตีติ นิขณฺฑุ. โส เอว อิธ ข-การสฺส ฆ-การํ กตฺวา ‘‘นิฆณฺฑู’’ติ วุตฺโต. กิฏติ คเมติ กิริยาทิวิภาคํ, ตํ วา อนวเสสปริยาทานโต คเมนฺโต ปูเรตีติ เกฏุภํ. เววจนปฺปกาสกนฺติ ปริยายสทฺททีปกํ, เอเกกสฺส อตฺถสฺส อเนกปริยายวจนวิภาวกนฺติ อตฺโถ. นิทสฺสนมตฺตญฺเจตํ อเนเกสมฺปิ อตฺถานํ เอกสทฺทวจนียตาวิภาวนวเสนปิ ตสฺส คนฺถสฺส ปวตฺตตฺตา. วจีเภทาทิลกฺขณา กิริยา กปฺปียติ เอเตนาติ กิริยากปฺโป, โส ปน วณฺณปทสมฺพนฺธปทตฺถวิภาคโต พหุวิกปฺโปติ อาห ‘‘กิริยากปฺปวิกปฺโป’’ติ. อิทญฺจ มูลกิริยากปฺปคนฺถํ สนฺธาย วุตฺตํ. โส หิ สตสหสฺสปริมาโณ นลจริยาทิปกรณํ. ฐานกรณาทิวิภาคโต [Pg.167] นิพฺพจนวิภาคโต จ อกฺขรา ปเภทียนฺติ เอเตหีติ อกฺขรปฺปเภทา, สิกฺขานิรุตฺติโย. เอเตสนฺติ เวทานํ. เต เอว เวเท ปทโส กายตีติ ปทโก. ตํ ตํ สทฺทํ ตทตฺถญฺจ พฺยากโรติ พฺยาจิกฺขติ เอเตนาติ พฺยากรณํ, สทฺทสตฺถํ. อายตึ หิตํ เตน โลโก น ยตติ น อีหตีติ โลกายตํ. ตญฺหิ คนฺถํ นิสฺสาย สตฺตา ปุญฺญกิริยาย จิตฺตมฺปิ น อุปฺปาเทนฺติ. วยตีติ วโย, น วโย อวโย, น อวโย อนวโย, อาทิมชฺฌปริโยสาเนสุ กตฺถจิ อปริกิลนฺโต อวิตฺถายนฺโต เต คนฺเถ สนฺธาเรติ ปูเรตีติ อตฺโถ. ทฺเว ปฏิเสธา ปกตึ คเมนฺตีติ ทสฺเสนฺโต ‘‘อวโย น โหตี’’ติ วตฺวา ตตฺถ อวยํ ทสฺเสตุํ ‘‘อวโย…เป… น สกฺโกตี’’ติ วุตฺตํ. ओठ हलवण्याच्या क्रियेने आणि अर्थाच्या विभागाने. 'सनिघंडुकेटुभं' यामध्ये 'निघंडु' म्हणजे वाच्य-वाचक भावाने अर्थ आणि शब्द यांचे खंडन करून (विभागून) दाखवणारा तो 'निखंडु'. येथे 'ख' काराचा 'घ' कार करून त्याला 'निघंडु' म्हटले आहे. जो क्रिया इत्यादींच्या विभागाला प्राप्त करून देतो किंवा संपूर्णपणे ग्रहण करून पूर्ण करतो, तो 'केटुभ'. 'वेवचनप्पकासकं' म्हणजे पर्यायी शब्दांचा प्रकाशक, म्हणजेच एकाच अर्थाचे अनेक पर्यायी शब्द स्पष्ट करणारा, असा अर्थ आहे. हे केवळ एक उदाहरण आहे, कारण अनेक अर्थांना एकाच शब्दाने व्यक्त करण्याच्या स्पष्टीकरणानेही तो ग्रंथ प्रवृत्त होतो. ज्याच्याद्वारे वाणीचे भेद इत्यादी लक्षणे असलेली क्रिया कल्पिली जाते, तो 'क्रियाकल्प' होय. तो वर्ण, पद, संबंध आणि पदार्थांच्या विभागाने अनेक प्रकारचा (बहुविकल्प) असल्यामुळे "क्रियाकल्पविकल्प" असे म्हटले आहे. आणि हे मूळ क्रियाकल्प ग्रंथाला अनुसरून म्हटले आहे. तो ग्रंथ एक लाख परिमाणाचा असून नळचर्या इत्यादींचे प्रकरण आहे. स्थान, करण इत्यादींच्या विभागाने आणि निरुक्तीच्या विभागाने ज्यांच्याद्वारे अक्षरांचे प्रभेद (विभाग) केले जातात, ते 'अक्षरप्रभेद' म्हणजे शिक्षा आणि निरुक्त होय. 'यांचे' म्हणजे वेदांचे. वेदांचेच पदांच्या रूपाने गायन करतो तो 'पदक'. त्या त्या शब्दाचे आणि त्याच्या अर्थाचे जे व्याकरण (स्पष्टीकरण) करते, ते 'व्याकरण' म्हणजे शब्दशास्त्र होय. भविष्यातील हितासाठी ज्याच्याद्वारे लोक प्रयत्न करत नाहीत किंवा इच्छा करत नाहीत, ते 'लोकायत' (चार्वाक शास्त्र) होय. कारण त्या ग्रंथाचा आश्रय घेऊन प्राणी पुण्यकर्मासाठी चित्त देखील उत्पन्न करत नाहीत. जो खर्च होतो तो 'वय', जो खर्च होत नाही तो 'अवय', जो अवय नाही तो 'अनवय' (अक्षय), म्हणजे आदि, मध्य आणि शेवटी कुठेही न थकता, न अडखळता त्या ग्रंथांना धारण करतो, पूर्ण करतो, असा अर्थ आहे. दोन नकार मूळ अर्थाकडे नेतात हे दर्शवण्यासाठी "अवय होत नाही" असे सांगून, तेथे अवय दाखवण्यासाठी "अवय...पे... शकत नाही" असे म्हटले आहे. ๓๘๔. ครูติ ภาริยํ อตฺตานํ ตโต โมเจตฺวา คมนํ ทุกฺกรํ โหติ. อนตฺโถปิ อุปฺปชฺชติ นินฺทาพฺยาโรสอุปารมฺภาทิ. อพฺภุคฺคโตติ เอตฺถ อภิสทฺทโยเคน อิตฺถมฺภูตาขฺยานตฺเถ อุปโยควจนํ. ३८४. 'गुरू' (जड/कठीण) म्हणजे स्वतःला त्यातून सोडवून जाणे कठीण असते. निंदा, क्रोध, उपालंभ (दोषारोप) इत्यादी अनर्थही उत्पन्न होतात. 'अब्भुग्गतो' (प्रसिद्ध झालेला) यामध्ये 'अभि' शब्दाच्या योगाने 'इत्थंभूताख्यान' (अशा प्रकारची स्थिती सांगणे) या अर्थी द्वितीया विभक्तीचा (उपयोगवचनाचा) वापर झाला आहे. ลกฺขณานีติ ลกฺขณทีปนานิ มนฺตปทานิ. อนฺตรธายนฺตีติ น เกวลํ ลกฺขณมนฺตานิเยว, อญฺญานิปิ พฺราหฺมณานํ ญาณพลาภาเวน อนุกฺกเมน อนฺตรธายนฺติ. ตถา หิ วทนฺติ ‘‘เอกสตํ อทฺธริยํ ทิปญฺญาสมตฺตโต สามา’’ติอาทิ. ปณิธิมหโต สมาทานมหโตติอาทินา ปจฺเจกํ มห-สทฺโท โยเชตพฺโพ. ปณิธิมหนฺตตาทิ จสฺส พุทฺธวํสจริยาปิฏกวณฺณนาทิวเสเนว เวทิตพฺโพ. นิฏฺฐาติ นิปฺผตฺติโย. ชาติสามญฺญโตติ ลกฺขณชาติยา ลกฺขณภาเวน สมานภาวโต. ยถา หิ พุทฺธานํ ลกฺขณานิ สุวิสุทฺธานิ สุปริพฺยตฺตานิ ปริปุณฺณานิ จ โหนฺติ, น เอวํ จกฺกวตฺตีนํ. เตนาห ‘‘น เตเหว พุทฺโธ โหตี’’ติ. ‘लक्षणे’ म्हणजे लक्षणांचे स्पष्टीकरण करणारे मंत्रपद. ‘अंतर्धान पावतात’ म्हणजे केवळ लक्षण-मंत्रच नव्हे, तर ब्राह्मणांच्या ज्ञानबलाच्या अभावामुळे इतरही (मंत्र) अनुक्रमाने अंतर्धान पावतात. तसेच ते म्हणतात, “एकशे एक अध्वर्यु, बावन्न साम” इत्यादी. ‘प्रणिधिमहतः’ (महान संकल्पाने), ‘समादानमहतः’ (महान समादानाने) इत्यादींमध्ये प्रत्येक ठिकाणी ‘मह’ (महान) हा शब्द जोडला पाहिजे. आणि त्याची प्रणिधि-महानता (संकल्पाची महानता) इत्यादी बुद्धवंश आणि चरियापिटक यांच्या वर्णनानुसारच समजून घेतली पाहिजे. ‘निष्ठा’ म्हणजे निष्पत्ती (पूर्णता). ‘जातिसामान्यतः’ म्हणजे लक्षण-जातीच्या लक्षणभावाच्या समानतेमुळे. कारण ज्याप्रमाणे बुद्धांची लक्षणे अत्यंत विशुद्ध, अत्यंत स्पष्ट आणि परिपूर्ण असतात, तशी चक्रवर्तींची नसतात. म्हणूनच म्हटले आहे, “केवळ त्या (लक्षणां)मुळेच कोणी बुद्ध होत नाही.” อภิรูปตา ทีฆายุกตา, อปฺปาตงฺกตา พฺราหฺมณาทีนํ ปิยมนาปตาติ จตูหิ อจฺฉริยธมฺเมหิ. ทานํ ปิยวจนํ อตฺถจริยา สมานตฺตตาติ อิเมหิ จตูหิ สงฺคหวตฺถูหิ. รญฺชนโตติ ปีติชนนโต. จกฺกํ จกฺกรตนํ วตฺเตติ ปวตฺเตตีติ จกฺกวตฺตี, สมฺปตฺติจกฺเกหิ สยํ วตฺเตติ, เตหิ จ ปรํ สตฺตนิกายํ วตฺเตติ ปวตฺเตตีติ จกฺกวตฺตี, ปรหิตาวโห อิริยาปถจกฺกานํ วตฺโต วตฺตนํ เอตสฺส อตฺถีติ จกฺกวตฺตี, อปฺปฏิหตํ วา [Pg.168] อาณาสงฺขาตํ จกฺกํ วตฺเตตีติ จกฺกวตี, อปฺปฏิหตํ วา อาณาสงฺขาตํ จกฺกํ วตฺเตตีติ จกฺกวตฺตี, ขตฺติยมณฺฑลาทิสญฺญิตํ จกฺกํ สมูหํ อตฺตโน วเส วตฺเตตีติ จกฺกวตฺตี. ธมฺมํ จรตีติ ธมฺมิโก. ธมฺมโต อนเปตตฺตา ธมฺโม รญฺชนตฺเถน ราชาติ ธมฺมราชา. โกปาทีติ อาทิ-สทฺเทน กามโลภมานมทาทิเก สงฺคณฺหาติ. วิชิตาวีติ วิชิตวา. เกนจิ อกมฺปิยฏฺเฐน ชนปทตฺถาวริยปฺปตฺโต. ทฬฺหภตฺติภาวโต วา ชนปโท ถาวริยํ ปตฺโต เอตฺถาติ ชนปทตฺถาวริยปฺปตฺโต. จิตฺตีกตภาวาทินาปิ (ขุ. ปา. อฏฺฐ. ๖.๓; ที. นิ. อฏฺฐ. ๒.๓๓; สํ. นิ. อฏฺฐ. ๓.๕.๒๒๓; สุ. นิ. อฏฺฐ. ๑.๒๒๖; มหานิ. อฏฺฐ. ๕๐) จกฺกสฺส รตนฏฺโฐ เวทิตพฺโพ. เอส นโย เสเสสุปิ. รตินิมิตฺตตาย วา จิตฺตีกตาทิภาวสฺส รติชนนฏฺเฐน เอกสงฺคหตาย วิสุํ อคฺคหณํ. अभिरूपता (सौंदर्य), दीर्घायुष्य, निरोगीपणा आणि ब्राह्मण इत्यादींना प्रिय व मनपसंत असणे, या चार आश्चर्यकारक गुणांमुळे. दान, प्रियवचन, अर्थचर्या आणि समानार्थता या चार संघहवस्तूंद्वारे (संग्रहवस्तूंद्वारे). ‘रंजन करणे’ म्हणजे प्रीती (आनंद) निर्माण करणे. चक्र म्हणजे चक्ररत्न फिरवतो (प्रवर्तित करतो) म्हणून तो ‘चक्रवर्ती’ होय; संपत्तीच्या चक्रांनी स्वतः चालतो आणि त्यांच्याद्वारे इतर प्राणीसमुदायाला चालवतो (प्रवर्तित करतो) म्हणून तो ‘चक्रवर्ती’ होय; परहित साधणाऱ्या इरियापथ-चक्रांचे (चार्यापथांचे) वर्तन ज्याच्याकडे आहे तो ‘चक्रवर्ती’ होय; किंवा जो अप्रतिहत अशा आज्ञारूपी चक्राला चालवतो तो ‘चक्रवर्ती’ होय; क्षत्रिय मंडळादी संज्ञित चक्राला (समूहाला) आपल्या वशात चालवतो तो ‘चक्रवर्ती’ होय. धर्माचे आचरण करतो म्हणून तो ‘धार्मिक’ होय. धर्मापासून विचलित न झाल्यामुळे तो ‘धम्म’ आहे आणि रंजनाचा (प्रजेला आनंद देण्याचा) अर्थ असल्यामुळे तो ‘राजा’ आहे, म्हणून तो ‘धम्मराजा’ होय. ‘क्रोधादी’ मधील ‘आदी’ शब्दाने काम, लोभ, मान, मद इत्यादींचा संग्रह होतो. ‘विजितावी’ म्हणजे ज्याने विजय मिळवला आहे असा. कोणाकडूनही कंपित न होण्याच्या अर्थाने ‘जनपद-स्थैर्य प्राप्त झालेला’. किंवा दृढ भक्तीभावामुळे ज्याच्या राज्यात जनपद (लोक) स्थिरतेला प्राप्त झाले आहेत, तो ‘जनपद-स्थैर्य प्राप्त झालेला’ होय. आदरणीय भाव इत्यादींमुळे देखील चक्राचा ‘रत्न’ हा अर्थ समजून घ्यावा. हाच नियम इतरांच्या बाबतीतही लागू होतो. किंवा रतीचे (आनंदाचे) कारण असल्यामुळे, आदरणीय भाव इत्यादींच्या रती-जनक (आनंददायी) अर्थाने एकाच संग्रहात समाविष्ट असल्याने त्याचे स्वतंत्रपणे ग्रहण केलेले नाही. อิเมหิ ปน รตเนหิ ราชา จกฺกวตฺตี ยํ ยมตฺถํ ปจฺจนุโภติ, ตํ ตํ ทสฺเสตุํ ‘‘อิเมสุ ปนา’’ติอาทิ วุตฺตํ. อชิตํ ชินาติ มเหสกฺขตาสํวตฺตนิยกมฺมนิสฺสนฺทภาวโต. วิชิเต ยถาสุขํ อนุวิจรติ หตฺถิรตนํ อสฺสรตนญฺจ อภิรุหิตฺวา เตสํ อานุภาเวน อนฺโตปาตราเสเยว สกลํ ปถวึ อนุสํยายิตฺวา ราชธานิยํ ปจฺจาคมนโต. ปริณายกรตเนน วิชิตมนุรกฺขติ เตน ตตฺถ ตตฺถ กตฺตพฺพกิจฺจสฺส สํวิธานโต. เสเสหีติ มณิรตนอิตฺถิรตนคหปติรตเนหิ. ตตฺถ มณิรตเนน โยชนปฺปมาเณ เทเส อนฺธการํ วิธมิตฺวา อาโลกทสฺสนาทินา สุขมนุภวติ, อิตฺถิรตเนน อติกฺกนฺตมานุสรูปสมฺปตฺติทสฺสนาทิวเสน, คหปติรตเนน อิจฺฉิติจฺฉิตมณิกนกรชตาทิธนปฺปฏิลาภวเสน. อุสฺสาหสตฺติโยโค เยน เกนจิ อปฺปฏิหตาณาจกฺกภาวสิทฺธิโต. หตฺถิอสฺสรตนาทีนํ มหานุภาวตฺตา โกสสมฺปตฺติยาปิ ปภาวสมฺปตฺติสิทฺธิโต ‘‘หตฺถิ…เป… โยโค’’ติ วุตฺตํ. โกโส หิ นาม สติ อุสฺสาหสมฺปตฺติยํ (อุคฺคเตชสฺส สุกุมารปรกฺกมสฺส ปสนฺนมุขสฺส สมฺมุเข ปาปุณาติ). ปจฺฉิเมนาติ ปริณายกรตเนน. ตญฺหิ สพฺพราชกิจฺเจสุ กุสลํ อวิรชฺฌนปโยคํ. เตนาห ‘‘มนฺตสตฺติโยโค’’ติ. ติวิธสตฺติโยคผลํ ปริปุณฺณํ โหตีติ สมฺพนฺโธ. เสเสหีติ เสเสหิ ปญฺจหิ รตเนหิ. อโทสกุสลมูลชนิตกมฺมานุภาเวนาติ อโทสสงฺขาเตน กุสลมูเลน สหชาตาทิปจฺจยวเสน อุปฺปาทิตกมฺมสฺส [Pg.169] อานุภาเวน สมฺปชฺชนฺติ โสมฺมตรรตนชาติกตฺตา. มชฺฌิมานิ มณิอิตฺถิคหปติรตนานิ. อโลภ…เป… กมฺมานุภาเวน สมฺปชฺชนฺติ อุฬารธนสฺส อุฬารธนปฏิลาภการณสฺส จ ปริจฺจาคสมฺปทาเหตุกตฺตา. ปจฺฉิมนฺติ ปริณายกรตนํ. ตญฺหิ อโมห…เป… กมฺมานุภาเวน สมฺปชฺชติ มหาปญฺเญเนว จกฺกวตฺติราชกิจฺจสฺส ปริเณตพฺพตฺตา. पण या रत्नांद्वारे चक्रवर्ती राजा ज्या ज्या गोष्टींचा अनुभव घेतो, ते ते दर्शवण्यासाठी “यांमध्ये तर” इत्यादी म्हटले आहे. ‘अजिताला जिंकतो’ कारण ते महान प्रभाव निर्माण करणाऱ्या कर्माच्या विपाकामुळे (निस्यंदभावामुळे) होते. हत्तीरत्न आणि अश्वरत्नावर आरूढ होऊन, त्यांच्या प्रभावाने सकाळच्या न्याहारीच्या आधीच संपूर्ण पृथ्वीची प्रदक्षिणा करून राजधानीत परत येत असल्यामुळे, तो विजित प्रदेशात यथासुख संचार करतो. परिणायकरत्नाद्वारे (सेनापतीरत्नाद्वारे) तो विजित प्रदेशाचे रक्षण करतो, कारण त्याच्याद्वारे तिथे तिथे कर्तव्यकर्माचे नियोजन केले जाते. ‘इतरांद्वारे’ म्हणजे मणिरत्न, स्त्रीरत्न आणि गृहपतीरत्नाद्वारे. त्यामध्ये, मणिरत्नाद्वारे एक योजन प्रमाणाच्या प्रदेशातील अंधार नष्ट करून प्रकाश दाखवणे इत्यादींद्वारे सुखाचा अनुभव घेतो, स्त्रीरत्नाद्वारे मानवी रूपाच्या पलीकडचे सौंदर्य पाहणे इत्यादींद्वारे, आणि गृहपतीरत्नाद्वारे इच्छित मणी, सुवर्ण, चांदी इत्यादी धन प्राप्त करण्याद्वारे. ‘उत्साहशक्तीचा योग’ कारण कोणाकडूनही खंडित न होणाऱ्या आज्ञाचक्राची सिद्धी होते. हत्ती, अश्व इत्यादी रत्नांच्या महान प्रभावामुळे आणि कोशसंपत्तीमुळे देखील प्रभावशक्तीची सिद्धी होत असल्यामुळे “हत्ती...पे... योग” असे म्हटले आहे. कारण उत्साहसंपत्ती असताना कोश (खजिना) स्वतःच प्राप्त होतो (उग्र तेज असलेल्या, सुकुमार पराक्रम असलेल्या आणि प्रसन्न मुख असलेल्या व्यक्तीच्या समोर तो प्राप्त होतो). ‘शेवटच्याद्वारे’ म्हणजे परिणायकरत्नाद्वारे. कारण ते सर्व राजकार्यांमध्ये कुशल आणि अचूक योजना करणारे असते. म्हणूनच म्हटले आहे, “मंत्रशक्तीचा योग”. त्रिविध शक्तीच्या योगाचे फळ परिपूर्ण होते, असा संबंध आहे. ‘इतरांद्वारे’ म्हणजे उर्वरित पाच रत्नांद्वारे. ‘अद्वेष कुशलमुळापासून उत्पन्न झालेल्या कर्माच्या प्रभावाने’ म्हणजे अद्वेष नावाच्या कुशलमुळासह सहजात इत्यादी प्रत्ययांच्या वशाने उत्पन्न झालेल्या कर्माच्या प्रभावाने ती सौम्यतर रत्नजाती प्राप्त होतात. मध्यम रत्ने म्हणजे मणिरत्न, स्त्रीरत्न आणि गृहपतीरत्न होत. ती अलोभ...पे... कर्माच्या प्रभावाने प्राप्त होतात, कारण ती उदार धनाचा आणि उदार धनप्राप्तीच्या कारणाचा त्याग करण्याच्या संपदेमुळे (हेतूमुळे) मिळतात. शेवटचे म्हणजे परिणायकरत्न होय. कारण ते अमोह...पे... कर्माच्या प्रभावाने प्राप्त होते, कारण महाप्रज्ञेनेच चक्रवर्तीच्या राजकार्याचे संचालन केले जाऊ शकते. สรณโต ปฏิปกฺขวิธมนโต สูรา. เตนาห ‘‘อภีรุกชาติกา’’ติ. อสุเร วิชินิตฺวา ฐิตตฺตา วีโร, สกฺโก เทวานมินฺโท, ตสฺส องฺคํ เทวปุตฺโต เสนงฺคภาวโตติ วุตฺตํ ‘‘วีรงฺครูปาติ เทวปุตฺตสทิสกายา’’ติ. สภาโวติ สภาวภูโต อตฺโถ. วีรการณนฺติ วีรภาวการณํ. วีริยมยสรีรา วิยาติ สวิคฺคหวีริยสทิสา สวิคฺคหญฺเจ วีริยํ สิยา, ตํสทิสาติ อตฺโถ. นนุ รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส ปฏิเสนา นาม นตฺถิ, ยมสฺส ปุตฺตา ปมทฺเทยฺยุํ, อถ กสฺมา ‘‘ปรเสนปมทฺทนา’’ติ วุตฺตนฺติ โจทนํ สนฺธายาห ‘‘สเจ’’ติอาทิ. เตน ปรเสนา โหตุ วา มา วา, เต ปน เอวํ มหานุภาวาติ ทสฺเสติ. ธมฺเมนาติ กตูปจิเตน อตฺตโน ปุญฺญธมฺเมน. เตน หิ สญฺโจทิตา ปถวิยํ สพฺพราชาโน ปจฺจุคฺคนฺตฺวา ‘‘สฺวาคตํ เต มหาราชา’’ติอาทึ วตฺวา อตฺตโน รชฺชํ รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส นิยฺยาเทนฺติ. เตน วุตฺตํ ‘‘โส อิมํ…เป… อชฺฌาวสตี’’ติ. อฏฺฐกถายํ ปน ตสฺส ยถาวุตฺตธมฺมสฺส จิรตรํ วิปจฺจิตุํ ปจฺจยภูตํ จกฺกวตฺติวตฺตสมุทาคตํ ปโยคสมฺปตฺติสงฺขาตํ ธมฺมํ ทสฺเสตุํ ‘‘ปาโณ น หนฺตพฺโพติอาทินา ปญฺจสีลธมฺเมนา’’ติ วุตฺตํ. เอวญฺหิ ‘‘อทณฺเฑน อสตฺเถนา’’ติ อิทํ วจนํ สุฏฺฐุตรํ สมตฺถิตํ โหติ, ยสฺมา ราคาทโย ปาปธมฺมา อุปฺปชฺชมานา สตฺตสนฺตานํ ฉาเทตฺวา ปริโยนนฺธิตฺวา ติฏฺฐนฺติ, กุสลปวตฺตึ นิวาเรนฺติ, ตสฺมา เต ‘‘ฉทนา, ฉทา’’ติ จ วุตฺตา. शरण गेल्यामुळे आणि प्रतिपक्षाचा (शत्रूचा) नाश केल्यामुळे ते शूर आहेत. म्हणूनच म्हटले आहे - "अभिरुकजातिका" (भयमुक्त स्वभावाचे). असुरांवर विजय मिळवून राहिल्यामुळे वीर असलेला देवांचा राजा शक्र (इंद्र), त्याचा अंगभूत असलेला देवपुत्र हा सैन्याचा भाग असल्यामुळे "वीरंगरूपा म्हणजे देवपुत्रासारखे शरीर असलेले" असे म्हटले आहे. 'स्वभाव' म्हणजे स्वभावभूत अर्थ. 'वीरकारण' म्हणजे वीरत्वाचे कारण. 'वीर्यमय शरीरासारखे' म्हणजे मूर्तिमंत वीर्यासारखे; जर वीर्याला शरीर असते, तर त्यासारखे, असा अर्थ आहे. शंका अशी आहे की, चक्रवर्ती राजाला कोणतीही विरोधी सेना (शत्रू सेना) नसते, जिचे त्याचे पुत्र दमन करतील, मग "परसैन्याचे दमन करणारे" असे का म्हटले आहे? या शंकेचे निरसन करण्यासाठी "सचे" (जर) इत्यादी म्हटले आहे. याद्वारे परसेना असो वा नसो, ते अशा प्रकारे महान प्रभावशाली आहेत हे दर्शविले आहे. 'धम्माने' म्हणजे स्वतः संपादन केलेल्या पुण्यधर्माने. कारण त्याने प्रेरित होऊन पृथ्वीवरील सर्व राजे सामोरे जाऊन "आपले स्वागत असो, महाराज!" इत्यादी म्हणून आपले राज्य चक्रवर्ती राजाला सोपवून देतात. म्हणूनच म्हटले आहे - "तो या... पे... पृथ्वीवर राज्य करतो." परंतु अट्ठकथेमध्ये, त्या पूर्वोक्त धर्माचे दीर्घकाळ विपाकात (फळात) रूपांतर होण्यासाठी कारणीभूत असलेल्या, चक्रवर्तीच्या कर्तव्याने प्राप्त झालेल्या आणि प्रयोगसंपत्ती म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या धर्माला दर्शविण्यासाठी "प्राणाची हिंसा करू नये इत्यादी पंचशील धर्माने" असे म्हटले आहे. अशा प्रकारे "दंडाशिवाय आणि शस्त्राशिवाय" हे वचन चांगल्या प्रकारे समर्थित होते. कारण राग इत्यादी पापी धर्म उत्पन्न होऊन प्राण्यांच्या संतानाला (चित्तप्रवाहाला) झाकून आणि वेढून राहतात, कुशल प्रवृत्तीला रोखतात, म्हणून त्यांना "छदन" (आवरण) किंवा "छद" असे म्हटले आहे. วิวฏฺเฏตฺวา ปริวตฺเตตฺวา. ปูชารหตา วุตฺตา ‘‘อรหตีติ อรห’’นฺติ. ตสฺสาติ ปูชารหตาย. ยสฺมา สมฺมาสมฺพุทฺโธ, ตสฺมา อรหนฺติ. พุทฺธตฺตเหตุภูตา วิวฏฺฏจฺฉทตา วุตฺตา สวาสนสพฺพกิเลสปฺปหานปุพฺพกตฺตา พุทฺธภาวสิทฺธิยา. อรหํ วฏฺฏาภาเวนาติ ผเลน เหตุอนุมานทสฺสนํ. สมฺมาสมฺพุทฺโธ ฉทนาภาเวนาติ เหตุนา ผลานุมานทสฺสนํ. เหตุทฺวยํ วุตฺตํ ‘‘วิวฏฺโฏ วิจฺฉโท จา’’ติ. ทุติยเวสารชฺเชนาติ ‘‘ขีณาสวสฺส เต ปฏิชานโต’’ติอาทินา (ม. นิ. ๑.๑๕๐) อาคเตน เวสารชฺเชน. ปุริมสิทฺธีติ [Pg.170] ปุริมสฺส ปทสฺส อตฺถสิทฺธิ. ปฐเมนาติ ‘‘สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส เต ปฏิชานโต’’ติอาทินา (ม. นิ. ๑.๑๕๐) อาคเตน เวสารชฺเชน. ทุติยสิทฺธีติ พุทฺธตฺตสิทฺธิ. ตติยจตุตฺเถหีติ ‘‘เย โข ปน เต อนฺตรายิกา ธมฺมา’’ติอาทินา (ม. นิ. ๑.๑๕๐), ‘‘ยสฺส โข ปน เต อตฺถายา’’ติอาทินา (ม. นิ. ๑.๑๕๐) จ อาคเตหิ ตติยจตุตฺเถหิ เวสารชฺเชหิ. ตติยสิทฺธีติ วิวฏฺฏจฺฉทนตา สิทฺธิ. ยาถาวโต อนฺตรายิกนิยฺยานิกธมฺมาปเทเสน หิ สตฺถุ วิวฏฺฏจฺฉทภาโว โลเก ปากโฏ อโหสิ. ปุริมํ ธมฺมจกฺขุนฺติ ปุริมปทํ ภควโต ธมฺมจกฺขุํ สาเธติ กิเลสารีนํ สํสารจกฺกสฺส จ อรานํ หตภาวทีปนโต. ทุติยํ ปทํ พุทฺธจกฺขุํ สาเธติ สมฺมาสมฺพุทฺธสฺเสว ตํ สมฺภวโต. ตติยํ ปทํ สมนฺตจกฺขุํ สาเธติ สวาสนสพฺพกิเลสปฺปหานทีปนโต. ‘‘สมฺมาสมฺพุทฺโธ’’ติ หิ วตฺวา ‘‘วิวฏฺฏจฺฉโท’’ติ วจนํ พุทฺธภาวาวหเมว สพฺพกิเลสปฺปหานํ วิภาเวตีติ. สูรภาวนฺติ ลกฺขณวิภาวเนน วิสทญาณตํ. "विवट्टेतवा" म्हणजे फिरवून किंवा उलटवून. पूजेची योग्यता सांगताना "जो पूजेस पात्र आहे तो अरहंत" असे म्हटले आहे. 'तस्स' म्हणजे त्या पूजेच्या योग्यतेमुळे. कारण ते सम्यक्संबुद्ध आहेत, म्हणून ते अरहंत आहेत. बुद्धत्वाचे कारण असलेली 'विवट्टच्छदता' (आवरण दूर करणे) ही वासनेसह सर्व क्लेशांचा नाश करण्यापूर्वी बुद्धभाव सिद्ध करण्यासाठी सांगितली आहे. 'संसारचक्राचा (वट्टाचा) अभाव असल्यामुळे अरहंत' हे फळावरून हेतूचे अनुमान दर्शविणे आहे. 'आवरणाचा (छदनाचा) अभाव असल्यामुळे सम्यक्संबुद्ध' हे हेतूवरून फळाचे अनुमान दर्शविणे आहे. "विवट्ट (संसारचक्रापासून मुक्त) आणि विच्छद (आवरणरहित)" हे दोन हेतू सांगितले आहेत. 'दुसऱ्या वैशारद्याने' म्हणजे "स्वतःला क्षीणासव (आस्रवमुक्त) म्हणवून घेणाऱ्या तुमच्या..." इत्यादी (म. नि. १.१५०) सूत्रात आलेल्या वैशारद्याने (निर्भयतेने). 'पूर्वसिद्धी' म्हणजे पहिल्या पदाच्या अर्थाची सिद्धी. 'पहिल्याने' म्हणजे "स्वतःला सम्यक्संबुद्ध म्हणवून घेणाऱ्या तुमच्या..." इत्यादी (म. नि. १.१५०) सूत्रात आलेल्या वैशारद्याने. 'दुसरी सिद्धी' म्हणजे बुद्धत्वाची सिद्धी. 'तिसऱ्या आणि चौथ्याने' म्हणजे "जे अंतरायिक (अडथळा आणणारे) धर्म आहेत..." इत्यादी (म. नि. १.१५०) आणि "ज्या अर्थासाठी (कल्याणासाठी)..." इत्यादी (म. नि. १.१५०) सूत्रात आलेल्या तिसऱ्या व चौथ्या वैशारद्याने. 'तिसरी सिद्धी' म्हणजे विवट्टच्छदनतेची (आवरण दूर करण्याची) सिद्धी. कारण अंतरायिक आणि नैर्याणिक (मुक्ती देणाऱ्या) धर्मांच्या यथार्थ उपदेशामुळे शास्त्यांचा (बुद्धांचा) 'विवट्टच्छद' (आवरणरहित) भाव जगात प्रकट झाला. 'पहिले धम्मचक्षू' म्हणजे पहिले पद भगवंतांच्या धम्मचक्षूची सिद्धी करते, कारण ते क्लेशरूपी शत्रूंचा आणि संसारचक्राच्या आऱ्यांचा नाश झाल्याचे दर्शविते. दुसरे पद 'बुद्धचक्षू' सिद्ध करते, कारण ते केवळ सम्यक्संबुद्धांमध्येच संभवते. तिसरे पद 'समंतचक्षू' (सर्वज्ञता चक्षू) सिद्ध करते, कारण ते वासनेसह सर्व क्लेशांचा नाश झाल्याचे दर्शविते. कारण "सम्यक्संबुद्ध" असे म्हणून "विवट्टच्छद" असे म्हणणे हे बुद्धत्व प्राप्त करून देणाऱ्या सर्व क्लेशांच्या प्रहाणालाच (नाशालाच) स्पष्ट करते. 'शूरभाव' म्हणजे लक्षणांच्या विश्लेषणाने प्राप्त झालेले स्पष्ट ज्ञान. ๓๘๕. คเวสีติ (ที. นิ. ฏี. ๑.๒๘๗) ญาเณน ปริเยสนํ อกาสิ. สมานยีติ ญาเณน สงฺกเลนฺโต สมานํ อานยิ สมาหริ. น สกฺโกติ สํกุจิเต อิริยาปเถ เยภุยฺเยน เตสํ ทุพฺพิภาวนโต. กงฺขตีติ ปทสฺส อากงฺขตีติ อยมตฺโถติ อาห – ‘‘อโห วต ปสฺเสยฺยนฺติ ปตฺถนํ อุปฺปาเทตี’’ติ. กิจฺฉตีติ กิลมติ. ‘‘กงฺขตี’’ติ ปทสฺส ปุพฺเพ อาสีสนตฺถตํ วตฺวา อิทานิ ตสฺส สํสยตฺถตฺตเมว วิกปฺปนฺตรวเสน ทสฺเสนฺโต ‘‘กงฺขาย วา ทุพฺพลา วิมติ วุตฺตา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตีหิ ธมฺเมหิ ติปฺปกาเรหิ สํสยธมฺเมหิ. กาลุสฺสิยภาโวติ อปฺปสนฺนตาย เหตุภูโต อาวิลภาโว. ยสฺมา ภควโต โกโสหิตํ สพฺพพุทฺธาเวณิกํ วตฺถคุยฺหํ สุวิสุทฺธกญฺจนมณฺฑลสนฺนิกาสํ อตฺตโน สณฺฐานสนฺนิเวสสุนฺทรตาย อาชาเนยฺยคนฺธหตฺถิโน วรงฺคจารุภาวํ วิกสมานตปนิยารวินฺทสมุชฺชลเกสราวตฺตวิลาสํ สญฺฌาปภานุรญฺชิตชลวนนฺตราภิลกฺขิต-สมฺปุณฺณจนฺทมณฺฑลโสภญฺจ อตฺตโน สิริยา อภิภุยฺย วิราชติ, ยํ พาหิรพฺภนฺตรมเลหิ อนุปกฺกิลิฏฺฐตาย จิรกาลํ สุปริจิตพฺรหฺมจริยาธิการตาย สุสณฺฐิตสณฺฐานสมฺปตฺติยา จ โกปีนมฺปิ สนฺตํ อโกปีนเมว, ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘ภควโต หี’’ติอาทิ. ปหูตภาวนฺติ [Pg.171] ปุถุลภาวํ. เอตฺเถว หิ ตสฺส สํสโย, ตนุมุทุสุกุมารตาทีสุ ปนสฺส คุเณสุ ตสฺส วิจารณา เอว นาโหสิ. ३८५. "गवेसी" (दी. नि. टी. १.२८७) म्हणजे ज्ञानाने शोध घेतला. "समानयी" म्हणजे ज्ञानाने संकलन करत समान आणले, गोळा केले. संकुचित ईर्यापथात (शारीरिक हालचालींमध्ये) बहुतांश वेळा त्यांचे स्पष्ट आकलन करणे शक्य नसते. 'कंखति' या पदाचा अर्थ 'आकांक्षा करतो' असा आहे, हे सांगताना म्हटले आहे - "अहो! मी ते पाहावे, अशी इच्छा उत्पन्न करतो." 'किच्छति' म्हणजे थकतो किंवा कष्ट पावतो. 'कंखति' या पदाचा आधी इच्छेच्या अर्थाने उल्लेख करून, आता पर्यायी अर्थाने त्याचा संशयाचा अर्थ दर्शविताना "कांक्षेमुळे किंवा दुर्बल संशयामुळे म्हटले आहे" इत्यादी म्हटले आहे. 'तीन धर्मांनी' म्हणजे तीन प्रकारच्या संशयास्पद धर्मांनी. 'कालुष्यभाव' म्हणजे अप्रसन्नतेचे कारण असलेला गढूळपणा (मळभ). कारण भगवंतांचे कोशगत (कोशात लपलेले) आणि सर्व बुद्धांचे असाधारण लक्षण असलेले गुह्यांग हे अत्यंत शुद्ध सुवर्णमंडलासारखे असून, आपल्या सुंदर रचनेमुळे आणि आकृतीमुळे ते श्रेष्ठ गंधहत्तीच्या सुंदर सोंडेच्या सौंदर्याला, उमललेल्या सुवर्णकमळाच्या प्रज्वलित परागकणांच्या विलासाला आणि संध्याकाळच्या प्रकाशाने उजळलेल्या जलाशयाच्या वनामध्ये दिसणाऱ्या पूर्णचंद्रमंडळाच्या शोभेला आपल्या सौंदर्याने मागे टाकून शोभून दिसते; जे बाह्य व अंतर्गत मलाने मलाने मलिन न झाल्यामुळे, दीर्घकाळ उत्तम प्रकारे आचरलेल्या ब्रह्मचर्याच्या प्रभावामुळे आणि सुव्यवस्थित शरीरसंपत्तीमुळे लज्जास्पद असूनही लज्जास्पद वाटत नाही, म्हणूनच "भगवंतांचे..." इत्यादी म्हटले आहे. 'पहूतभाव' म्हणजे विशालता किंवा रुंदी. कारण याच बाबतीत त्याला संशय होता, परंतु त्यांच्या पातळ, मऊ आणि सुकुमार इत्यादी गुणांबद्दल त्याला कोणतीही शंका नव्हती. หิริกรโณกาสนฺติ หิริยิตพฺพฏฺฐานํ. ฉายนฺติ ปฏิพิมฺพํ. กีทิสนฺติ อาห ‘‘อิทฺธิยา’’ติอาทิ. ฉายารูปนฺติ ภควโต ปฏิพิมฺพรูปํ. ตญฺจ โข พุทฺธสนฺตานโต วินิมุตฺตํ รูปกมตฺตํ ภควโต สรีรวณฺณสณฺฐานาวยวํ อิทฺธิมยํ พิมฺพกมตฺตํ, ตํ ปน ทสฺเสนฺโต ภควา ยถา อตฺตโน พุทฺธรูปํ น ทิสฺสติ, ตถา กตฺวา ทสฺเสติ. นีหริตฺวาติ ผริตฺวา. "हिरिकरणोकास" म्हणजे लज्जा उत्पन्न होण्याचे स्थान. "छाया" म्हणजे प्रतिबिंब. ते कसे आहे? हे सांगताना "ऋद्धीने" इत्यादी म्हटले आहे. "छायारूप" म्हणजे भगवंतांचे प्रतिबिंबित रूप. आणि ते बुद्धसंतानापासून (बुद्धांच्या प्रत्यक्ष शरीरापासून) वेगळे असलेले केवळ एक रूपमात्र असून, भगवंतांच्या शरीराचा वर्ण, आकार आणि अवयव यांनी युक्त असलेले ऋद्धीमय प्रतिबिंब मात्र आहे; ते दाखवताना भगवंत स्वतःचे बुद्धरूप दिसणार नाही अशा प्रकारे करून दाखवतात. "नीहरित्वा" म्हणजे पसरवून किंवा बाहेर काढून. กณฺณโสตานํ อุปจิตตนุตมฺพโลมตาย โธตรชตปนาฬิกาสทิสตา วุตฺตา. มุขปริยนฺเตติ เกสนฺเต. कान आणि नाक यांच्या छिद्रांची त्वचा मऊ, पातळ आणि तांबूस केसांनी युक्त असल्यामुळे त्यांची तुलना धुतलेल्या चांदीच्या नळीशी केली आहे. "मुखपरियंत" म्हणजे केसांच्या टोकापाशी (कपाळाच्या सीमेवर). กิริยากรณนฺติ กิริยาย กายิกสฺส วาจสิกสฺส ปฏิปตฺติ. ตตฺถาติ เตสุ กิจฺเจสุ. ธมฺมกถิกานํ วตฺตํ ทสฺเสตุํ พีชนิคฺคหณํ กตํ. น หิ อญฺญถา สพฺพสฺสปิ โลกสฺส อลงฺการภูตํ ปรมุกฺกํสคตํ สิกฺขาสํยมานํ พุทฺธานํ มุขจนฺทมณฺฑลํ ปฏิจฺฉาเทตพฺพํ โหติ. "क्रियाकरण" म्हणजे क्रियेचे, म्हणजेच कायिक आणि वाचिक आचरण. "तथ" (तेथे) म्हणजे त्या कर्तव्यांमध्ये. धम्मकथिकांचे (धर्माचा उपदेश करणाऱ्यांचे) कर्तव्य दर्शविण्यासाठी पंखा हातात धरण्याचे सांगितले आहे. कारण अन्यथा, सर्व जगाचे अलंकार स्वरूप असलेले, परम उत्कर्षाला पोहोचलेले आणि शिक्षा व संयमाने युक्त असलेले बुद्धांचे मुखचंद्रमंडल झाकण्याची काहीच आवश्यकता नसते. ปตฺถริตวิตานโอลมฺพิตคนฺธทามกุสุมทามเก คนฺธมณฺฑลมาเฬ. ปุพฺพภาเคน ปริจฺฉินฺทิตฺวาติ ‘‘เอตฺตกํ เวลํ สมาปตฺติยา วีตินาเมสฺสามี’’ติ เอวํ ปวตฺเตน ปุพฺพภาเคน กาลํ ปริจฺฉินฺทิตฺวา. ปจฺจยทายเกสุ อนุโรธวเสน ปริสํ อุสฺสาเทนฺโต วา ปคฺคณฺหนฺโต, อทายเกสุ วิโรธวเสน ปริสํ อปสาเทนฺโต วา. पसरविलेल्या चांदव्यावर टांगलेल्या सुगंधी माळा आणि फुलांच्या माळा असलेल्या गंधमंडळमाळात (सुगंधी मंडपात). 'पुब्बभागेन परिच्छिन्दित्वा' (पूर्वभागाने परिच्छिन्न करून) म्हणजे 'मी एवढा वेळ समापत्तीमध्ये घालवीन' अशा प्रकारे पूर्वभागाने काळ मर्यादित करून. प्रत्ययदायकांवर (दान देणाऱ्यांवर) अनुग्रह करण्याच्या हेतूने परिषदेला (समुदायाला) उत्साहित किंवा प्रवृत्त करणे, आणि दान न देणाऱ्यांबद्दलच्या विरोधामुळे परिषदेला परावृत्त किंवा नापसंत करणे. โยคกฺเขมํ อนฺตรายาภาวํ. สภาวคุเณเนวาติ ยถาวุตฺตคุเณเนว. โภโต โคตมสฺส คุณํ สวิคฺคหํ จกฺกวาฬํ อติสมฺพาธํ วิตฺถาเรน สนฺธาเรตุํ อปฺปโหนฺตโต. ภวคฺคํ อตินีจํ อุปรูปริ สนฺธาเรตุํ อปฺปโหนฺตโต. योगक्खेम म्हणजे अंतरायाचा (अडथळ्यांचा) अभाव. 'सभावगुणेनेव' (स्वभावगुणानेच) म्हणजे आधी सांगितलेल्या गुणानेच. पूजनीय गोतमांच्या (भगवान बुद्धांच्या) सगुण (मूर्तिमंत) गुणाला अत्यंत संकुचित असलेले चक्रवाळ (ब्रह्मांड) विस्ताराने धारण करण्यास असमर्थ असल्यामुळे. भवाग्र (अस्तित्वाचे सर्वोच्च शिखर) अत्यंत खाली असल्यामुळे वरच्यावर धारण करण्यास असमर्थ असल्यामुळे. ๓๘๖. ฐานคมนาทีสุ (ที. นิ. ฏี. ๒.๓๕) ภูมิยํ สุฏฺฐุ สมํปติฏฺฐิตา ปาทา เอตสฺสาติ สุปฺปติฏฺฐิตปาโท. ตํ ปน ภควโต สุปฺปติฏฺฐิตปาทตํ พฺยติเรกมุเขน วิภาเวตุํ ‘‘ยถา หี’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ อคฺคตลนฺติ อคฺคปาทตลํ. ปณฺหีติ ปณฺหิตลํ. ปสฺสนฺติ ปาทตลสฺส ทฺวีสุ ปสฺเสสุ เอเกกํ, อุภยเมว วา ปริยนฺตํ ปสฺสํ. สุวณฺณปาทุกตลํ วิย อุชุกํ นิกฺขิปิยมานํ. เอกปฺปหาเรเนวาติ เอกกฺขเณเยว. สกลํ ปาทตลํ ภูมึ ผุสติ นิกฺขิปเน. เอกปฺปหาเรเนว สกลํ ปาทตลํ ภูมิโต อุฏฺฐหตีติ โยชนา. ३८६. उभे राहणे, चालणे इत्यादींमध्ये (दी. नि. टी. २.३५) ज्यांचे पाय जमिनीवर चांगल्या प्रकारे आणि समतोलपणे टेकतात, ते 'सुप्पतिट्ठितपादो' (सुप्रतिष्ठित पाद) होत. भगवंतांच्या त्या सुप्रतिष्ठित पादत्वाला व्यतिरेक पद्धतीने स्पष्ट करण्यासाठी 'यथा ही' इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये 'अग्गतल' म्हणजे पायाच्या तळव्याचा अग्रभाग (पुढचा भाग). 'पण्हि' म्हणजे टाच. 'पस्स' म्हणजे पायाच्या तळव्याच्या दोन्ही बाजूंपैकी प्रत्येक बाजू किंवा दोन्ही बाजूंच्या कडा. सोन्याच्या पादुकेच्या तळव्याप्रमाणे सरळ टेकवले जाणारे. 'एकप्पहारेनेव' म्हणजे एकाच क्षणी. पाय टेकवताना संपूर्ण पाऊल जमिनीला स्पर्श करते. एकाच क्षणी संपूर्ण पाऊल जमिनीवरून वर उठते, अशी योजना आहे. ตตฺราติ [Pg.172] ตาย สุปฺปติฏฺฐิตปาทตาย อนุปุพฺพนินฺนาว อจฺฉริยพฺภุตํ อิทํ วุจฺจมานํ นิสฺสนฺทผลํ. วุตฺตเมวตฺถํ สตฺถุ ติทิวคมเนน สุปากฏํ กาตุํ ‘‘ตถา หี’’ติอาทึ วตฺวา ‘‘น หี’’ติอาทินา ตํ สมตฺเถติ. เตน ปฐมลกฺขณโตปิ ทุติยลกฺขณํ มหานุภาวนฺติ ทสฺเสติ. ตถา หิ วกฺขติ ‘‘อนฺตมโส จกฺกวตฺติรญฺโญ ปริสํ อุปาทาย สพฺโพปิ จกฺกลกฺขณสฺเสว ปริวาโร’’ติ. ยุคนฺธรปพฺพตสฺส ตาวตึสภวนสฺส จ ปกติปทนิกฺเขปฏฺฐานุปสงฺกมเน เนว พุทฺธานํ, น เทวตานํ อานุภาโว, อถ โข พุทฺธานํ ลกฺขณานุภาโวติ อิมมตฺถํ นิทสฺสิตํ. สีลเตเชน…เป… ทสนฺนํ ปารมีนํ อานุภาเวนาติ อิทมฺปิ ลกฺขณนิพฺพตฺตกมฺมวิเสสกิตฺตนเมวาติ ทฏฺฐพฺพํ. สพฺพาวนฺเตหีติ สพฺพปเทสวนฺเตหิ. तिथे 'तत्र' म्हणजे त्या सुप्रतिष्ठित पादत्वामुळे अनुक्रमाने उतार असणारे हे आश्चर्यकारक व अद्भुत असे सांगितले जाणारे निस्यंदफल (स्वाभाविक फळ) आहे. शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) त्रिदिव (तावतींस स्वर्गात) गमनाने हाच अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी 'tathā hī' (तथा ही) इत्यादी सांगून 'na hī' (न ही) इत्यादींनी त्याचे समर्थन केले आहे. याद्वारे पहिल्या लक्षणापेक्षा दुसरे लक्षण अधिक महानुभाव (प्रभावशाली) आहे हे दर्शविले आहे. कारण ते पुढे सांगतील - 'अगदी चक्रवर्ती राजाच्या परिषदेपर्यंत सर्व काही चक्रलक्षणाचाच परिवार आहे.' युगंधर पर्वत आणि तावतींस भवनाच्या नैसर्गिक पाऊल ठेवण्याच्या स्थानांवर जाण्यात बुद्धांचा किंवा देवतांचा प्रभाव नसून, बुद्धांच्या लक्षणांचाच प्रभाव आहे, हा अर्थ येथे दर्शविला आहे. 'शीलतेजाने...पे... दहा पारमितांच्या प्रभावाने' हे देखील लक्षणांना उत्पन्न करणाऱ्या विशिष्ट कर्मांचे कीर्तनच आहे असे समजावे. 'सब्बावंतेहि' म्हणजे सर्व प्रदेशांनी युक्त. นาภิปริจฺฉินฺนาติ นาภิยํ ปริจฺฉินฺนา ปริจฺเฉทวเสน ฐิตา. นาภิมุขปริกฺเขปปฏฺโฏติ ปกติจกฺกสฺส อกฺขพฺภาหตปริหรณตฺถํ นาภิมุเข ฐเปตพฺพปริกฺเขปปฏฺโฏ. เนมิมณิกาติ เนมิยํ อาวฬิภาเวน ฐิตมณิกาเลขา. 'नाभिपरिच्छिन्ना' म्हणजे नाभीमध्ये (चाकाच्या मध्यभागात) परिच्छिन्न (मर्यादित) होऊन परिच्छेदाच्या रूपाने राहिलेली. 'नाभिमुखपरिक्खेपपट्टो' म्हणजे सामान्य चाकाच्या आसाला होणारा धक्का टाळण्यासाठी नाभीच्या तोंडावर ठेवण्याचा वेढणारा पट्टा. 'नेमिमणिका' म्हणजे नेमीवर (चाकाच्या धावेवर) ओळीने असलेल्या मण्यांसारख्या रेषा. สมฺพหุลวาโรติ พหุวิธเลขงฺควิภาวนวาโร. สตฺตีติ อาวุธสตฺติ. สิริวจฺโฉติ สิริมุขํ. นนฺทีติ ทกฺขิณาวฏฺฏํ. โสวตฺติโกติ โสวตฺติองฺโก. วฏํสโกติ อาเวฬํ. วฑฺฒมานกนฺติ ปุริสหาริ ปุริสงฺคํ. โมรหตฺถโกติ โมรปิญฺฉกลาโป, โมรปิญฺฉ ปริสิพฺพิโต วา พีชนิวิเสโส. วาลพีชนีติ จามริวาลํ. สิทฺธตฺถาทิ ปุณฺณฆฏปุณฺณปาติโย. ‘‘จกฺกวาโฬ’’ติ วตฺวา ตสฺส ปธานาวยเว ทสฺเสตุํ ‘‘หิมวา สิเนรุ…เป… สหสฺสานี’’ติ วุตฺตํ. 'संबहुलवारो' म्हणजे अनेक प्रकारच्या रेषाकृतींचे स्पष्टीकरण करणारा विभाग. 'सत्ती' म्हणजे शक्ती नावाचे शस्त्र. 'सिरिवच्छो' म्हणजे श्रीवत्स (मंगळचिन्ह). 'नंदी' म्हणजे उजवीकडे वळलेला शंख (दक्षिणावर्त). 'सोवत्तिको' म्हणजे स्वस्तिक चिन्ह. 'वतंसको' म्हणजे मुकुट किंवा फुलांचा हार. 'वड्ढमानकं' म्हणजे पुरुषाला शोभणारे आभूषण किंवा वर्धमानक चिन्ह. 'मोरहत्थको' म्हणजे मोराच्या पिसांचा झुबका किंवा मोराच्या पिसांनी शिवलेला विशिष्ट पंखा. 'वालबीजनी' म्हणजे चवरी. मोहरी इत्यादी आणि पूर्णघट (पाण्याने भरलेला घडा) व पूर्णपात्र. 'चक्रवाळ' असे म्हणून त्याचे मुख्य अवयव दर्शविण्यासाठी 'हिमवा, सिनेरु...पे... सहस्र' इत्यादी म्हटले आहे. อายตปณฺหีติ อิทํ อญฺเญสํ ปณฺหิโต ทีฆตํ สนฺธาย วุตฺตํ, น ปน อติทีฆตนฺติ อาห ‘‘ปริปุณฺณปณฺหี’’ติ. ยถา ปน ปณฺหิลกฺขณํ ปริปุณฺณํ นาม โหติ, ตํ พฺยติเรกมุเขน ทสฺเสตุํ ‘‘ยถา หี’’ติอาทิ วุตฺตํ. อารคฺเคนาติ มณฺฑลาย สิขาย. วฏฺเฏตฺวาติ ยถา สุวฏฺฏํ โหติ, เอวํ วฏฺเฏตฺวา. รตฺตกมฺพลเคณฺฑุกสทิสาติ รตฺตกมฺพลมยเคณฺฑุกสทิสา. 'आयतपण्हि' (लांब टाच) हे इतरांच्या टाचेच्या तुलनेत लांब असण्याच्या संदर्भाने म्हटले आहे, परंतु ती अतिशय लांब आहे असे नाही, म्हणून 'परिपुण्णपण्हि' (पूर्ण विकसित टाच) असे म्हटले आहे. टाचेचे लक्षण कशा प्रकारे परिपूर्ण असते, हे व्यतिरेक पद्धतीने दर्शविण्यासाठी 'यथा ही' इत्यादी म्हटले आहे. 'आरग्गेन' म्हणजे गोलाकार टोकाने. 'वट्टेत्वा' म्हणजे जसे सुबक गोल होईल तसे गोल करून. 'रत्तकम्बलगेण्डुकसदिसा' म्हणजे लाल लोकरीच्या चेंडूसारखी. มกฺกฏสฺเสวาติ วานรสฺส วิย. ทีฆภาเวน สมตํ สนฺธาเยตํ วุตฺตํ. นิยฺยาสเตเลนาติ ฉทิกนิยฺยาสาทินิยฺยาสสมฺมิสฺเสน เตเลน. 'मक्कटस्सेव' म्हणजे माकडाप्रमाणे. लांबीच्या समानतेच्या संदर्भाने हे म्हटले आहे. 'निय्यासतैलेन' म्हणजे छताच्या डिंकासारख्या डिंकाने मिश्रित केलेल्या तेलाने. ตลุนาติ [Pg.173] สุกุมารา. 'तलुना' म्हणजे सुकुमार (मऊ/कोमल). จมฺเมนาติ องฺคุลนฺตรเวฐิตจมฺเมน. ปฏิพทฺธองฺคุลนฺตโรติ เอกโต สมฺพทฺธองฺคุลนฺตโร. เอกปฺปมาณาติ ทีฆโต สมานปฺปมาณา. ยวลกฺขณนฺติ อพฺภนฺตรโต องฺคุลิปพฺเพฐิตํ ยวลกฺขณํ. ปฏิวิชฺฌิตฺวาติ ตํตํปพฺพานํ สมานเทสตาย องฺคุลีนํ ปสาริตกาเล อญฺญมญฺญํ วิชฺฌิตานิ วิย ผุสิตฺวา ติฏฺฐนฺติ. 'चम्मेन' म्हणजे बोटांच्या मधील भागाला वेढणाऱ्या त्वचेने. 'पटिबद्धअङ्गुलन्तरो' म्हणजे बोटांमधील भाग एकत्र जोडलेला असणे (जालयुक्त बोटे). 'एकप्पमाणा' म्हणजे लांबीने समान आकाराची. 'यवलक्खण' म्हणजे बोटांच्या सांध्यांच्या आत वेढलेले यवाचे (सातूचे) चिन्ह. 'पटिविज्झित्वा' म्हणजे त्या त्या सांध्यांच्या समान स्थानामुळे बोटे पसरली असता ती एकमेकांना वेधल्यासारखी स्पर्श करून राहतात. สงฺขา วุจฺจนฺติ โคปฺผกา, อุทฺธํ สงฺขา เอเตสนฺติ อุสฺสงฺขา, ปาทา. ปิฏฺฐิปาเทติ ปิฏฺฐิปาทสมีเป. สุเขน ปาทา ปริวตฺตนฺติ ปาทนามนาทีสุ, เตเนว คจฺฉนฺตานํ เตสํ เหฏฺฐา ปาทตลานิ ทิสฺสนฺติ. เตนาติ โคปฺผกานํ ปิฏฺฐิปาทโต อุทฺธํ ปติฏฺฐิตตฺตา. จตุรงฺคุลมตฺตญฺหิ ตานิ อุทฺธํ อาโรหิตฺวา ปติฏฺฐหนฺติ, นิคุฬฺหานิ จ โหนฺติ, น อญฺเญสํ วิย ปญฺญายมานานิ. สติปิ เทสนฺตรปฺปวตฺติยํ นิจฺจโลติ ทสฺสนตฺถํ นาภิคฺคหณํ. घोट्यांना 'संखा' म्हणतात, ज्यांचे घोटे वर असतात ते 'उस्संखा' (उन्नत घोटे असलेले) पाय होत. 'पिट्ठिपादे' म्हणजे पायाच्या पाठीच्या (वरच्या भागाच्या) जवळ. पाय वाकवणे इत्यादींमध्ये पाय सहजपणे फिरतात, म्हणूनच चालताना त्यांच्या पायांचे तळवे खालून दिसतात. 'तेन' म्हणजे घोटे पायाच्या पाठीवरून वरच्या बाजूला स्थित असल्यामुळे. कारण ते सुमारे चार बोटे वर चढून स्थित असतात आणि ते गुप्त (न दिसणारे) असतात, इतरांप्रमाणे स्पष्ट दिसत नाहीत. दुसऱ्या ठिकाणी गमन होत असतानाही ते निश्चल असते, हे दर्शविण्यासाठी नाभीचा उल्लेख केला आहे. ยสฺมา เอณีมิคสฺส สมนฺตโต เอกสทิสมํสา อนุกฺกเมน อุทฺธํ ถูลา ชงฺฆา โหนฺติ, ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘เอณีมิคสทิสชงฺฆา’’ติ. ปริปุณฺณชงฺโฆติ สมนฺตโต มํสูปจเยน ปริปุณฺณชงฺโฆ. เตนาห ‘‘น เอกโต’’ติอาทิ. ज्याअर्थी एणी मृगाचे (काळविटाचे) पाय चहूबाजूंनी समान मांस असलेले आणि अनुक्रमाने वरच्या बाजूला स्थूल (पुष्ट) असतात, म्हणून 'एणीमिगसदिसजङ्घा' (काळविटासारख्या जंघा/पिंडऱ्या असलेले) असे म्हटले आहे. 'परिपुण्णजङ्घो' म्हणजे चहूबाजूंनी मांसाच्या उपचयाने (वाढीने) परिपूर्ण पिंडऱ्या असलेले. म्हणूनच 'न एकतो' (एका बाजूने नाही) इत्यादी म्हटले आहे. เอเตนาติ ‘‘อโนนมนฺโต’’ติอาทิวจเนน, ชาณุผาสุภาวทีปเนนาติ อตฺโถ. อวเสสชนาติ อิมินา ลกฺขเณน รหิตา ชนา. ขุชฺชา วา โหนฺติ เหฏฺฐิมกายโต อุปริมกายสฺส รสฺสตาย. วามนา วา อุปริมกายโต เหฏฺฐิมกายสฺส รสฺสตาย. เอเตน ฐเปตฺวา สมฺมาสมฺพุทฺธํ จกฺกวตฺตินญฺจ อิตเร สตฺตา ขุชฺชา วามนา จาติ ทสฺเสติ. 'एतेन' म्हणजे 'अनो नमन्तो' (न वाकता) इत्यादी वचनाने, गुडघ्यांपर्यंत सहज हात पोहोचणे स्पष्ट करणे हा याचा अर्थ आहे. 'अवसेसजना' म्हणजे या लक्षणाने रहित असलेले इतर लोक. खालच्या शरीराच्या तुलनेत वरचे शरीर लहान असल्यामुळे ते एकतर कुबडे (खुज्ज) असतात. किंवा वरच्या शरीराच्या तुलनेत खालचे शरीर लहान असल्यामुळे ते बुटके (वामन) असतात. याद्वारे सम्यक्संबुद्ध आणि चक्रवर्ती राजा यांना वगळता इतर सर्व प्राणी कुबडे किंवा बुटके असतात, हे दर्शविले आहे. โอหิตนฺติ สโมหิตํ อนฺโตคธํ. ตถาภูตํ ปน ตํ เตน ฉนฺนํ โหตีติ อาห ‘‘ปฏิจฺฉนฺน’’นฺติ. 'ओहितं' म्हणजे समाहित (आत सामावलेले/अंतर्गत). तशा प्रकारे असलेले ते त्याने झाकलेले असते, म्हणून 'पटिच्छन्नं' (झाकलेले/कोशगत) असे म्हटले आहे. สุวณฺณวณฺโณติ สุวณฺณวณฺณวณฺโณติ อยเมตฺถ อตฺโถติ อาห ‘‘ชาติหิงฺคุลเกนา’’ติอาทิ. สฺวายมตฺโถ อาวุตฺติญาเยน จ เวทิตพฺโพ. สรีรปริยาโย อิธ วณฺณสทฺโทติ อธิปฺปาเยน ปฐมวิกปฺปํ วตฺวา ตถารูปาย ปน รุฬฺหิยา อภาวํ มนสิ กตฺวา วณฺณธาตุปริยายเมว วณฺณสทฺทํ คเหตฺวา ทุติยวิกปฺโป วุตฺโต. 'सुवण्णवण्णो' (सुवर्णवर्ण) म्हणजे सोन्यासारखा वर्ण असलेला, हा येथे अर्थ आहे, म्हणून 'जातिहिङ्गुलकेन' (शुद्ध हिंगुळाने) इत्यादी म्हटले आहे. हाच अर्थ आवृत्तीच्या नियमाने (पुनरावृत्तीने) देखील समजून घ्यावा. येथे 'वण्ण' शब्द शरीराचा वाचक आहे, या अभिप्रायाने पहिला पर्याय सांगून, परंतु तशा प्रकारच्या रूढीचा अभाव मनात ठेवून, 'वण्ण' शब्द वर्णधातूचा (रंगाचा) वाचक मानून दुसरा पर्याय सांगितला आहे. รโชติ [Pg.174] สุขุมรโช. ชลฺลนฺติ มลีนภาวาวโห เรณุสญฺจโย. เตนาห ‘‘มลํ วา’’ติ. ยทิ วิวฏฺฏติ, กถํ นฺหานาทีติ อาห ‘‘หตฺถโธวนา’’ติอาทิ. रजो म्हणजे सूक्ष्म धूळ. जल्ल म्हणजे मलीनता आणणारा धुळीचा संचय. म्हणूनच 'मळ किंवा' (मलं वा) असे म्हटले आहे. जर तो दूर होतो, तर स्नान इत्यादी कसे होते? यासाठी 'हात धुणे' (हत्थधोवन) इत्यादी म्हटले आहे. อาวฏฺฏปริโยสาเนติ ปทกฺขิณาวฏฺฏาย อนฺเต. 'आवट्टपरियोसाने' (आवर्त-पर्यवसाने) म्हणजे प्रदक्षिणा-आवर्तनाच्या शेवटी. พฺรหฺมุโน สรีรํ ปุรโต วา ปจฺฉโต วา อโนนมิตฺวา อุชุกเมว อุคฺคตนฺติ อาห ‘‘พฺรหฺมา วิย อุชุคตฺโต’’ติ. ปสฺสวงฺกาติ ทกฺขิณปสฺเสน วา วามปสฺเสน วา วงฺกา. ब्रह्मदेवाचे शरीर पुढे किंवा मागे न वाकता सरळच वर गेलेले असते, म्हणून 'ब्रह्माप्रमाणे सरळ शरीर असलेले' (ब्रह्मा विय उजुगत्तो) असे म्हटले आहे. 'पस्सवंका' (पार्श्ववक्र) म्हणजे उजव्या बाजूने किंवा डाव्या बाजूने वक्र (वाकलेले). หตฺถปิฏฺฐิอาทิวเสน สตฺต อุสฺสทา เอตสฺสาติ สตฺตุสฺสโท. हाताची पाठ इत्यादींच्या आधारे ज्यांचे सात अवयव उन्नत (भरलेले) आहेत, ते 'सत्tuस्सदो' (सप्त-उत्सद - सात ठिकाणी भरलेले) होत. สีหสฺส ปุพฺพทฺธํ สีหปุพฺพทฺธํ, ปริปุณฺณาวยวตาย สีหปุพฺพทฺธํ วิย สกโล กาโย อสฺสาติ สีหปุพฺพทฺธกาโย. สีหสฺเสวาติ สีหสฺส วิย. สณฺฐนฺตีติ สณฺฐหนฺติ. นานาจิตฺเตนาติ วิวิธจิตฺเตน. ปุญฺญจิตฺเตนาติ ปารมิตาปุญฺญจิตฺตรูเปน. จิตฺติโตติ สญฺชาตจิตฺตภาโว. सिंहाचा पूर्वार्ध (पुढचा भाग) म्हणजे 'सिंहपुब्बद्ध'. अवयवांच्या परिपूर्णतेमुळे ज्यांचे संपूर्ण शरीर सिंहाच्या पूर्वार्धासारखे आहे, ते 'सिंहपुब्बद्धकायो' (सिंह-पूर्वार्ध-काय) होत. 'सीहस्सेव' म्हणजे सिंहाप्रमाणेच. 'सण्ठन्ति' म्हणजे स्थिर होतात/स्थित असतात. 'नानाचित्तेन' म्हणजे विविध चित्ताने. 'पुञ्ञचित्तेन' म्हणजे पारमिता-पुण्यचित्त रूपाने. 'चित्तितो' म्हणजे उत्पन्न झालेली चित्तवृत्ती. ทฺวินฺนํ โกฏฺฏานมนฺตรนฺติ ทฺวินฺนํ ปิฏฺฐิพาหานํ เวมชฺฌํ, ปิฏฺฐิมชฺฌสฺส อุปริภาโค. จิตํ ปริปุณฺณนฺติ อนินฺนภาเวน จิตํ, ทฺวีหิ โกฏฺเฏหิ สมตลตาย ปริปุณฺณํ. อุคฺคมฺมาติ อุคฺคนฺตฺวา. 'द्विन्नं कोट्टानमन्तरं' (दोन खांद्यांमधील अंतर) म्हणजे दोन्ही पाठीच्या बाजूंच्या मधील भाग, पाठीच्या मध्यभागाचा वरील भाग. 'चितं परिपुण्णं' म्हणजे खोलगट नसून भरलेला, दोन्ही बाजूंच्या समतलतेमुळे परिपूर्ण असलेला. 'उग्गम्मा' म्हणजे वर येऊन (उद्गमित होऊन). นิคฺโรธปริมณฺฑโล วิย ปริมณฺฑโล นิคฺโรธปริมณฺฑโล เอกสฺส ปริมณฺฑลสทฺทสฺส โลปํ กตฺวา. น หิ สพฺโพ นิคฺโรโธ มณฺฑโล. เตนาห ‘‘สมกฺขนฺธสาโข นิคฺโรโธ’’ติ. ปริมณฺฑลสทฺทสนฺนิธาเนน วา ปริมณฺฑโลว นิคฺโรโธ คยฺหตีติ ปริมณฺฑลสทฺทสฺส โลเปน วินาปิ อยมตฺโถ ลพฺภตีติ อาห ‘‘นิคฺโรโธ วิย ปริมณฺฑโล’’ติ. ยาวตกฺวสฺสาติ โอ-การสฺส ว-การาเทสํ กตฺวา วุตฺตํ. वटवृक्षाच्या (निग्रोध) परिमंडळाप्रमाणे परिमंडळ असणे म्हणजे 'निग्रोधपरिमंडल', येथे एका 'परिमंडल' शब्दाचा लोप करून हा शब्द बनला आहे. कारण सर्वच वटवृक्ष गोल (परिमंडल) नसतात. म्हणूनच 'समान खोड आणि फांद्या असलेला वटवृक्ष' असे म्हटले आहे. किंवा 'परिमंडल' शब्दाच्या सान्निध्यामुळे परिमंडळ असलेलाच वटवृक्ष घेतला जातो, म्हणून 'परिमंडल' शब्दाच्या लोपाशिवायही हाच अर्थ प्राप्त होतो, म्हणूनच 'वटवृक्षाप्रमाणे परिमंडळ' असे म्हटले आहे. 'यावतक्वस्स' हे 'ओ' काराचा 'व' कार आदेश करून म्हटले आहे. สมวฏฺฏิตกฺขนฺโธติ สมํ สุวฏฺฏิตกฺขนฺโธ. โกญฺจา วิย ทีฆคลา, พกา วิย วงฺกคลา, วราหา วิย ปุถุลคลาติ โยชนา. สุวณฺณาลิงฺคสทิโสติ สุวณฺณมยขุทฺทกมุทิงฺคสทิโส. 'समवट्टितक्खन्धो' म्हणजे समान रीतीने सुवर्तुळाकार (सुबक) मान असलेले. क्रौंच पक्षाप्रमाणे लांब मान, बगळ्याप्रमाणे वक्र मान, डुकराप्रमाणे जाड मान अशी योजना आहे. 'सुवण्णालिङ्गसदिसो' म्हणजे सुवर्णमयी लहान मृदंगासारखा. รสคฺคสคฺคีติ มธุราทิเภทํ รสํ คสนฺติ อนฺโต ปเวสนฺตีติ รสคฺคสา, รสคฺคสานํ อคฺคา รสคฺคสคฺคา, ตา เอตสฺส สนฺตีติ รสคฺคสคฺคี. เตนาติ โอชาย อผรเณน, หีนธาตุกตฺตา เต พหฺวาพาธา โหนฺติ. 'रसग्गसग्गी' म्हणजे जे मधुर इत्यादी विविध रसांचे ग्रहण करतात, त्यांना आत प्रवेश देतात ते 'रसग्गसा' (रसवाहिन्या) होत; रसवाहिन्यांमध्ये ज्या श्रेष्ठ आहेत त्या 'रसग्गसग्गा' होत, आणि ज्यांच्याकडे त्या आहेत ते 'रसग्गसग्गी' (उत्कृष्ट रसवाहिन्या असलेले) होत. 'तेन' म्हणजे ओजाच्या (रसाच्या) प्रसाराने; हीन धातूचे (दुर्बळ प्रकृतीचे) असल्यामुळे ते बहुतांश आजारी असतात. ‘‘หนู’’ติ [Pg.175] สนฺนิสฺสยทนฺตาธารสฺส สมญฺญา, ตํ ภควโต สีหหนุสทิสํ, ตสฺมา ภควา สีหหนุ. ตตฺถ ยสฺมา พุทฺธานํ รูปกายสฺส ธมฺมกายสฺส จ อุปมา นาม นิหีนุปมาว, นตฺถิ สมานุปมา, กุโต อธิกูปมา, ตสฺมา อยมฺปิ นิหีนุปมาติ ทสฺเสตุํ ‘‘ตตฺถา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ติภาควเสน มณฺฑลตาย ทฺวาทสิยํ ปกฺขสฺส จนฺทสทิสานิ. 'हनु' हे दातांच्या आधाराचे (जबड्याचे) नाव आहे, ते भगवंतांचे सिंहाच्या जबड्यासारखे आहे, म्हणून भगवंतांना 'सिंहहनु' (सिंहासारखा जबडा असलेले) म्हटले आहे. तेथे, ज्याअर्थी बुद्धांच्या रूपकायाची आणि धम्मकायाची उपमा ही केवळ कनिष्ठ उपमाच (निहीन उपमा) असते, समान उपमा नसते, मग अधिक उपमा कुठून असणार? म्हणून ही देखील कनिष्ठ उपमाच आहे हे दर्शवण्यासाठी 'तथ्य' इत्यादी म्हटले आहे. तीन भागांच्या आधारे गोलाकार असल्यामुळे ते द्वादशीच्या चंद्रासारखे आहेत. ทนฺตานํ อุจฺจนีจตา อพฺภนฺตรพาหิรปสฺสวเสนปิ เวทิตพฺพา, น อคฺควเสเนว. เตนาห ‘‘อยปฏฺฏฉินฺนสงฺขปฏลํ วิยา’’ติ. อยปฏฺฏนฺติ จ กกจํ อธิปฺเปตํ. วิสมาติ วิสมสณฺฐานา. दातांचा उंच-सखलपणा हा आतील आणि बाहेरील बाजूनेही समजून घेतला पाहिजे, केवळ टोकांवरूनच नव्हे. म्हणूनच 'लोखंडी पट्टीने कापलेल्या शंखाच्या तुकड्याप्रमाणे' असे म्हटले आहे. 'अयपट्ट' म्हणजे करवत अभिप्रेत आहे. 'विसमा' म्हणजे विषम आकाराचे. วิจฺฉินฺทิตฺวา วิจฺฉินฺทิตฺวา ปวตฺตสรตาย ฉินฺนสฺสราปิ. อเนกาการตาย ภินฺนสฺสราปิ. กากสฺส วิย อมนุญฺญสรตาย กากสฺสราปิ. อปลิพุทฺธตฺตาติ อนุปทฺทุตวตฺถุกตฺตา. วตฺถุนฺติ จ อกฺขรุปฺปตฺติฏฺฐานมาห. อฏฺฐงฺคสมนฺนาคโตติ เอตฺถ อฏฺฐงฺคานิ ปรโต อาคมิสฺสนฺติ. มญฺชุโฆโสติ มธุรสฺสโร. तुटून-तुटून निघणाऱ्या स्वरामुळे 'छिन्नस्वरा' देखील. अनेक प्रकारांमुळे 'भिन्नस्वरा' देखील. कावळ्यासारख्या अप्रिय स्वरामुळे 'काकस्वरा' देखील. 'अपलिबुद्धत्ता' म्हणजे उपद्रवरहित स्थान असणे. 'वत्थु' (वस्तू/स्थान) म्हणजे अक्षरांच्या उत्पत्तीचे स्थान म्हटले आहे. 'अट्ठङ्गसमन्नागतो' (अष्टांगयुक्त) यातील आठ अंगे पुढे येतील. 'मञ्जुघोषो' म्हणजे मधुर स्वर असलेले. กรวีกสทฺโท เยสํ สตฺตานํ โสตปถํ อุปคจฺฉติ, เต อตฺตโน สรสมฺปตฺติยา ปกตึ ชหาเปตฺวา อวเส กโรนฺโต อตฺตโน วเส วตฺเตติ, เอวํ มธุโรติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ตตฺริท’’นฺติอาทิมาห. ตํ ปีตินฺติ ตํ พุทฺธคตํ ปีตึ. เตเนว นีหาเรน ปุนปฺปุนํ ปวตฺตนฺตํ อวิชหิตฺวา วิกฺขมฺภิตกิเลสา เถรานํ สนฺติเก ลทฺธธมฺมสฺสวนสปฺปายา อุปนิสฺสยสมฺปตฺติยา ปริปกฺกญาณตาย ‘‘สตฺตหิ…เป… ปติฏฺฐาสี’’ติ. สตฺตสตมตฺเตน โอโรธชเนน สทฺธึ ปทสาว เถรานํ สนฺติกํ อุปคตตฺตา ‘‘สตฺตหิ ชงฺฆาสเตหิ สทฺธิ’’นฺติ วุตฺตํ. करवीक पक्षाचा आवाज ज्या प्राण्यांच्या कानावर पडतो, त्यांना तो आपल्या स्वराच्या समृद्धीने त्यांची मूळ प्रकृती विसरायला लावून, विवश करून स्वतःच्या वशमध्ये करतो, तो इतका मधुर असतो हे दर्शवण्यासाठी 'तत्रिदं' इत्यादी म्हटले आहे. 'तं पीतिं' म्हणजे त्या बुद्धविषयक प्रीतीला. त्याच पद्धतीने वारंवार प्रवृत्त होणाऱ्या प्रीतीला न सोडता, क्लेशांचे दमन केलेले, थेरांच्या सन्निध योग्य धम्मश्रवण प्राप्त केलेले, उपनिश्रय संपत्तीमुळे परिपक्व ज्ञान झालेले असल्यामुळे 'सात... पे... प्रतिष्ठित झाले' असे म्हटले आहे. सातशेच्या सुमारास अंतःपुरातील स्त्रियांसह पायीच थेरांच्या सन्निध गेल्यामुळे 'सातशे जंघांसह (पायांसह) एकत्र' असे म्हटले आहे. อภินีลเนตฺโตติ อธิกนีลเนตฺโต. อธิกนีลตา จ สาติสยํ นีลภาเวน เวทิตพฺพา, น เนตฺเต นีลวณฺณสฺเสว อธิกภาวโตติ อาห ‘‘น สกลนีลเนตฺโตวา’’ติอาทิ. ปีตโลหิตวณฺณา เสตมณฺฑลคตราชิวเสน, นีลเสตกาฬวณฺณา ปน ตํตํมณฺฑลวเสเนว เวทิตพฺพา. 'अभिनीलनेत्तो' म्हणजे अत्यंत निळे डोळे असलेले. आणि अत्यंत निळेपणा हा अतिशय निळ्या रंगाने समजून घ्यावा, डोळ्यात केवळ निळ्या रंगाच्याच अधिकतेमुळे नव्हे, म्हणूनच 'न सकलनीलनेत्तोवा' (पूर्णपणे निळे डोळे नसलेले) इत्यादी म्हटले आहे. पिवळा आणि लाल रंग हा पांढऱ्या मंडळातील रेषांमुळे, तर निळा, पांढरा आणि काळा रंग हा त्या त्या मंडळाच्या आधारे समजून घ्यावा. จกฺขุภณฺฑนฺติ อกฺขิทลนฺติ เกจิ, อกฺขิทลปตฺตนฺติ อญฺเญ. อกฺขิทเลหิ ปน สทฺธึ อกฺขิพิมฺพนฺติ เวทิตพฺพํ. เอวญฺหิ วินิคฺคตคมฺภีรโชตนาปิ ยุตฺตา โหติ. 'चक्खुभण्डं' म्हणजे काही जण पापणी म्हणतात, तर इतर पापणीचे टोक म्हणतात. परंतु पापण्यांसह डोळ्यांचे बिंब असे समजले पाहिजे. कारण अशा प्रकारे बाहेर पडणारा सखोल प्रकाशही योग्य ठरतो. อุณฺณาสทฺโท [Pg.176] โลเก อวิเสสโต โลมปริยาโย, อิธ ปน โลมวิเสสวาจโกติ อาห ‘‘อุณฺณโลม’’นฺติ. นลาฏมชฺฌชาตาติ นลาฏมชฺฌคตา. โอทาตตาย อุปมา, น มุทุตาย. รชตปุพฺพุฬกาติ รชตมยตารกา. लोकात 'उण्णा' (ऊर्ण) हा शब्द सामान्यतः केसांचा (लोम) पर्याय आहे, परंतु येथे तो एका विशिष्ट केसाचा वाचक आहे, म्हणून 'उण्णलोमं' (ऊर्णा-लोम) असे म्हटले आहे. 'नलाटमज्झजाता' म्हणजे कपाळाच्या मध्यभागी असलेली. ही उपमा पांढरेपणासाठी (शुभ्रतेसाठी) आहे, मऊपणासाठी नाही. 'रजतपुब्बुळका' म्हणजे चांदीचे बुडबुडे (चांदीचे तारे). ทฺเว อตฺถวเส ปฏิจฺจ วุตฺตนฺติ ยสฺมา พุทฺธา จกฺกวตฺติโน จ ปริปุณฺณนลาฏตาย ปริปุณฺณสีสพิมฺพตาย จ ‘‘อุณฺหีสสีสา’’ติ วุจฺจนฺติ, ตสฺมา เต ทฺเว อตฺถวเส ปฏิจฺจ ‘‘อุณฺหีสสีโส’’ติ อิทํ วุตฺตํ. อิทานิ ตํ อตฺถทฺวยํ ภควติ สุปฺปติฏฺฐิตนฺติ ทสฺเสตุํ ‘‘ตถาคตสฺสหี’’ติอาทิ วุตฺตํ. สณฺหตมตาย สุวณฺณวณฺณตาย จ รญฺโญ พทฺธอุณฺหีสปฏฺโฏ วิย วิโรจติ. กปฺปสีสาติ ทฺวิธาภูตสีสา. ผลสีสาติ ผลสทิสสีสา. อฏฺฐิสีสาติ มํสสฺส อภาวโต ตโจปริโยนทฺธอฏฺฐิมตฺตสีสา. ตุมฺพสีสาติ ลาพุสทิสสีสา. ปพฺภารสีสาติ ปิฏฺฐิภาเคน โอลมฺพมานสีสา. ปุริมนเยนาติ ปริปุณฺณนลาฏตาปกฺเขน. อุณฺหีสเวฐิตสีโส วิยาติ อุณฺหีสปฏฺเฏน เวฐิตสีสปเทโส วิย. อุณฺหีสํ วิยาติ เฉเกน สิปฺปินา วิรจิตอุณฺหีสมณฺฑลํ วิย. दोन अर्थांच्या आधारे म्हटले आहे - ज्याअर्थी बुद्ध आणि चक्रवर्ती राजे हे परिपूर्ण कपाळ आणि परिपूर्ण शिरोबिंब असल्यामुळे 'उण्हिससीसा' (उष्णीष-शीर्ष) म्हटले जातात, म्हणून त्या दोन अर्थांच्या आधारे 'उण्हिससीसो' असे म्हटले आहे. आता ते दोन अर्थ भगवंतांच्या ठिकाणी चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित आहेत हे दर्शवण्यासाठी 'तथागतस्स ही' इत्यादी म्हटले आहे. सुकुमारतेमुळे आणि सुवर्णवर्णामुळे ते राजाने बांधलेल्या उष्णीष-पट्ट्याप्रमाणे (मुकुटाप्रमाणे) शोभून दिसते. 'कप्पसीसा' म्हणजे दोन भाग झालेले डोके. 'फलसीसा' म्हणजे फळासारखे डोके. 'अट्ठिसीसा' म्हणजे मांसाच्या अभावामुळे केवळ त्वचेने झाकलेले हाडांचे डोके. 'तुम्बसीसा' म्हणजे भोपळ्यासारखे डोके. 'पब्भारसीसा' म्हणजे पाठीमागच्या बाजूला झुकलेले डोके. 'पुरिमनयेen' म्हणजे पूर्वीच्या पद्धतीने (परिपूर्ण कपाळाच्या बाजूने). 'उण्हिसवेठितसीसो विय' म्हणजे उष्णीष-पट्ट्याने वेढलेल्या डोक्याच्या भागासारखे. 'उण्हिसं विय' म्हणजे कुशल कारागिराने तयार केलेल्या उष्णीष-मंडळासारखे. กมฺมนฺติ เยน เยน กมฺเมน ยํ ยํ ลกฺขณํ นิพฺพตฺตํ, ตํ ตํ กมฺมํ. กมฺมสริกฺขกนฺติ ตสฺส ตสฺส ลกฺขณสฺส ตํกมฺมานุรูปตา. ลกฺขณนฺติ ตสฺส มหาปุริสลกฺขณสฺส อวิปรีตสภาโว. ลกฺขณานิสํสนฺติ ตํ ลกฺขณปฏิลาเภน ลทฺธพฺพคุโณ. อิมานิ กมฺมาทีนีติ อิมานิ อนนฺตรํ วุตฺตานิ กมฺมกมฺมสริกฺขกาทีนิ ทสฺเสตฺวา ตํ สรูปโต วิภาเวตฺวา กเถตพฺพานิ สํวณฺณเกน. "कम्म" (कर्म) म्हणजे ज्या ज्या कर्माने जे जे लक्षण उत्पन्न झाले आहे, ते ते कर्म होय. "कम्मसरिक्खक" (कर्माची अनुरूपता) म्हणजे त्या त्या लक्षणाची त्या कर्माशी असलेली अनुरूपता होय. "लक्खण" (लक्षण) म्हणजे त्या महापुरुष लक्षणाचा अविपरीत (यथार्थ) स्वभाव होय. "लक्खणानिसंस" (लक्षणाचे लाभ/फळ) म्हणजे ते लक्षण प्राप्त झाल्यामुळे मिळणारा गुण (फायदा) होय. "इमानि कम्मादीनि" (ही कर्मादी) म्हणजे ही नंतर सांगितलेली कर्म, कम्मसरिक्खक इत्यादी दर्शवून, त्याचे स्वरूप स्पष्ट करून भाष्यकाराने (संवरणकेन) सांगावे. รตนวิจิตฺตสุวณฺณโตรณํ ตสฺมึ กาเล มนุสฺสโลเก นตฺถีติ วุตฺตํ ‘‘เทวนคเร’’ติ. สพฺพโส สุปุปฺผิตสาลรุกฺโข อสาธารณโสโภ มนุสฺสูปจาเร น ลพฺภตีติ อาห ‘‘เสลนฺตรมฺหี’’ติ. กิริยาจารนฺติ กายิกวาจสิกกิริยาปวตฺตึ. त्या काळी मनुष्यलोकात रत्नांनी सुशोभित सोन्याचे तोरण नव्हते, म्हणून "देवनगरे" (देवलोकात/देवांच्या नगरात) असे म्हटले आहे. सर्व बाजूंनी बहरलेला, असाधारण सौंदर्याचा साल वृक्ष मानवी वस्तीत आढळत नाही, म्हणून "सेलन्तरम्हि" (पर्वतांच्या दरम्यान) असे म्हटले आहे. "किरियाचार" (क्रियाचार) म्हणजे कायिक (शारीरिक) आणि वाचिक (वाणीच्या) क्रियांची प्रवृत्ती होय. ๓๘๗. สตตปาฏิหาริยนฺติ สตตํ จริมภเว สพฺพกาลํ ลกฺขณนิพฺพตฺตกกมฺมานุภาวเหตุกํ พุทฺธาเวณิกํ ปาฏิหาริยํ. พุทฺธานํ อติทูเร ปาทํ นิกฺขิปิตุกามานมฺปิ นาติทูเร เอว นิกฺขิปนํ โหตีติ ‘‘น อติทูเร ฐเปสฺสามีติ [Pg.177] อุทฺธรตี’’ติ วุตฺตํ. ปกติสญฺจรณวเสเนตํ วุตฺตํ, ตาทิเสน ปาเทน อเนกโยชเน ฐเปสฺสามีติ อุทฺธรณมฺปิ โหติเยว. อติทูรํ หีติอาทิ ปมาณาติกฺกเม โทสทสฺสนํ. เอวํ สตีติ เอวํ ทกฺขิณปาทวามปาทานํ ยถาธิปฺเปตปติฏฺฐิตฏฺฐาเน สติ. ปทวิจฺเฉโทติ ปทวารวิจฺเฉโท. ยาทิสํ ปสาเรนฺโต วามปาทสฺส อุทฺธรณํ ปติฏฺฐานญฺจ, ทกฺขิณปาทสฺส ตาทิสเมว, อิติ เนสํ อุทฺธรณปติฏฺฐานานํ สมานโต อญฺญมญฺญภาเวน อนูนานธิกตาย วุตฺตํ ‘‘ทกฺขิณปาทกิจฺจํ วามปาเทน นิยมิตํ, วามปาทกิจฺจํ ทกฺขิณปาเทน นิยมิต’’นฺติ. ३८७. "सततपाटिहारिय" (सतत प्रातिहार्य) म्हणजे अंतिम जन्मात (चरिमभवे) सर्वकाळ लक्षणांना उत्पन्न करणाऱ्या कर्माच्या प्रभावामुळे होणारे बुद्ध-अवेणिक (बुद्धांचे असाधारण) प्रातिहार्य होय. बुद्धांची पावले अतिशय दूर टाकण्याची इच्छा असली तरी ती अतिशय दूर पडत नाहीत, म्हणून "मी अतिशय दूर ठेवणार नाही, असे विचार करून पाऊल उचलतात" असे म्हटले आहे. हे नैसर्गिक चालण्याच्या संदर्भात म्हटले आहे, अशा पावलाने अनेक योजने दूर पाऊल ठेवण्यासाठी उचलणे देखील होतेच. "अतिदूरं हि" इत्यादीद्वारे प्रमाणाचे उल्लंघन करण्यातील दोष दाखवला आहे. "एवं सति" म्हणजे अशा प्रकारे उजव्या आणि डाव्या पायांचे इच्छित स्थानी प्रस्थापन होत असताना. "पदविच्छेद" म्हणजे पावलांच्या अंतराचा विभाग होय. डावा पाय पुढे पसरताना जसे पाऊल उचलणे आणि ठेवणे होते, उजव्या पायाचेही तसेच होते; अशा प्रकारे त्यांच्या पाऊल उचलण्याच्या आणि ठेवण्याच्या समानतेमुळे, कमी किंवा जास्त न होता, "उजव्या पायाचे कार्य डाव्या पायाने नियमित केले जाते आणि डाव्या पायाचे कार्य उजव्या पायाने नियमित केले जाते" असे म्हटले आहे. ทิวาติ อุปกฏฺฐาย เวลาย. วิหารภตฺตตฺถายาติ วิหาเร ยถาวุทฺธํ คเหตพฺพภตฺตตฺถาย. ปจฺฉโต อาคจฺฉนฺโตติ ปกติคมเนน ปจฺฉโต อาคจฺฉนฺโต. โอกาสํ น ลภตีติ ปทนิกฺเขปฏฺฐานํ น ลภติ. อูรุปริยาโย อิธ สตฺถิ-สทฺโทติ อาห ‘‘น อูรุํ อุนฺนาเมตี’’ติ. ทณฺฑงฺกุสํ วุจฺจติ ทีฆทณฺโฑ องฺกุโส, เตน รุกฺขสาขํ ฉินฺทโต ปุริสสฺส ยถา ปจฺฉาภาเคน ปาทานํ โอสกฺกนํ โหติ, เอวํ ภควโต ปาทา น โอสกฺกนฺตีติ อาห ‘‘รุกฺขสาขาเฉทน…เป… โอสกฺกาเปตี’’ติ. โอพทฺธานาพทฺธฏฺฐาเนหิ ปาทํ โกฏฺเฏนฺโต วิยาติ อาพทฺธฏฺฐาเนน อนาพทฺธฏฺฐาเนน จ ปาทขณฺฑํ โกฏฺเฏตฺวา ถทฺธํ กโรนฺโต วิย. น อิโต จิโต จ จาเลตีติ อปราปรํ น จาเลติ. อุสฺสงฺขปาทตาย สุเขเนว ปาทานํ ปริวตฺตนโต นาภิโต ปฏฺฐาย อุปริมกาโย น อิญฺชตีติ เหฏฺฐิมกาโยว อิญฺชติ. เตนาห ‘‘อุปริม…เป… นิจฺจโล โหตี’’ติ. น ชานาติ อนิญฺชนโต. กายพเลนาติ คมนปโยคสงฺขาเตน กายคเตน วิเสสพเลน. ชวคมนเหตุภูเตน วา กายพเลน. เตนาห ‘‘พาหา ขิปนฺโต’’ติอาทิ. ชเวน คจฺฉนฺโต หิ พาหา ขิปติ, สรีรโต เสทา มุจฺจนฺติ. นาคาปโลกิตวเสนาติ นาคสฺส อปโลกนมิว สกลกาเยเนว ปริวตฺเตตฺวา อปโลกนวเสน. "दिवा" म्हणजे जवळ आलेल्या वेळी (दुपारच्या वेळी). "विहारभत्तत्थाय" म्हणजे विहारात ज्येष्ठतेनुसार अन्न (भोजन) ग्रहण करण्यासाठी. "पच्छतो आगच्छन्तो" म्हणजे सामान्य गतीने मागे येणारा. "ओकासं न लभति" म्हणजे पाऊल ठेवण्यासाठी जागा मिळत नाही. येथे 'सत्थि' हा शब्द मांडीचा (ऊरु) वाचक आहे, म्हणून "मांडी वर उचलत नाही" (न ऊरुं उन्नामेति) असे म्हटले आहे. "दण्डङ्कुस" म्हणजे लांब दांड्याचा अंकुश; त्याने झाडाची फांदी तोडणाऱ्या माणसाचे पाय जसे पाठीमागे घसरतात, तसे भगवंतांचे पाय पाठीमागे घसरत नाहीत, म्हणून "झाडाची फांदी तोडणे... पे... घसरवणे" असे म्हटले आहे. "ओबद्धानबद्धट्ठानेहि पादं कोट्टन्तो विय" म्हणजे बद्ध आणि अबद्ध भागांनी पायाचा तुकडा ठोकून तो कडक (ताठ) केल्यासारखे. "न इतो चितो च चालेति" म्हणजे इकडेतिकडे हलवत नाही. पायाचे घोटे उंच असल्यामुळे (उस्सङ्खपादता) पाय सहजपणे वळतात, त्यामुळे नाभीपासून वरचे शरीर हलत नाही, केवळ खालचे शरीरच हलते. म्हणूनच म्हटले आहे "वरचे... पे... निश्चल असते". न हलल्यामुळे समजत नाही. "कायबलेन" म्हणजे चालण्याच्या प्रयत्नाने युक्त असलेल्या शरीराच्या विशेष बलाने, किंवा वेगाने चालण्यास कारणीभूत असलेल्या शारीरिक बलाने. म्हणूनच "हात झटकत" इत्यादी म्हटले आहे. कारण वेगाने जाणारा माणूस हात झटकतो आणि शरीरातून घाम निघतो. "नागापलोकितवसेन" म्हणजे हत्तीप्रमाणे (नागाप्रमाणे) संपूर्ण शरीर फिरवून पाहण्याच्या पद्धतीने. อนาวรณญาณสฺสาติ อนาวรณญาณพเลน ทสฺสนสฺส. อนาวรณวาโร ปน กาเย ปติฏฺฐิตรูปทสฺสนมฺปิ อนาวรณเมวาติ ทสฺสนตฺถํ วุตฺโต. อินฺทขีลโต ปฏฺฐายาติ นครทฺวาเร อินฺทขีลโต ปฏฺฐาย. ปกติอิริยาปเถเนวาติ [Pg.178] โอนมนาทึ อกตฺวา อุชุกคมนาทินา เอว. ยทิ เอวํ โกฏฺฐกทฺวารเคหปฺปเวเส กถนฺติ อาห ‘‘ทลิทฺทมนุสฺสาน’’นฺติอาทิ. ปริวตฺเตนฺเตนาติ นิปชฺชนตฺถํ กายํ ปริวตฺเตนฺเตน. "अनावरणञाणस्स" म्हणजे अनावरण ज्ञानाच्या (अनावृत ज्ञानाच्या) बलाने होणारे दर्शन. "अनावरणवार" (अनावृत विभाग) हा शरीरावर असलेल्या रूपाचे दर्शन देखील अनावृतच आहे, हे दर्शवण्यासाठी सांगितला आहे. "इन्दखीलतो पट्ठाय" म्हणजे नगरद्वारातील इंद्रखिलापासून (इंद्रस्तंभापासून) सुरू करून. "पकतिइरियापथेनेव" म्हणजे वाकणे इत्यादी न करता, सरळ चालणे इत्यादी नैसर्गिक ईर्यापथानेच (शारीरिक स्थितीनेच). जर असे असेल, तर वेशीच्या दारातून किंवा घरात प्रवेश करताना कसे होते? म्हणून "गरीब लोकांच्या..." इत्यादी म्हटले आहे. "परिवत्तेन्तेन" म्हणजे झोपण्यासाठी शरीर फिरवणाऱ्याने. หตฺเถหิ คเหตฺวาติ อุโภหิ หตฺเถหิ อุโภสุ กฏิปฺปเทเสสุ ปริคฺคเหตฺวา. ปตติ นิสีทนฏฺฐาเน นิปชฺชนวเสน ปตติ. โอริมํ องฺคํ นิสฺสาย นิสินฺโนติ ปลฺลงฺกมาภุชิตฺวา อุกฺกุฏิกนิสชฺชาย อุปริมกายํ เหฏฺฐิมกาเย ปติฏฺฐเปนฺโตเยว ภารีกรณวเสน โอริมงฺคํ นิสฺสาย นิสินฺโน. ฆํสนฺโตติ อานิสทเทเสน อาสนฏฺฐานํ ฆํสนฺโต. ปาริมงฺคนฺติ สตฺถิภาคสมฺมทฺทํ อานิสทปเทสํ. ตเถวาติ ฆํสนฺโต เอว. โอลมฺพกํ ธาเรนฺโต วิยาติ โอลมฺพกสุตฺตํ โอตาเรนฺโต วิย. เตน อุชุกเมว นิสีทนมาห. สรีรสฺส ครุกภาวเหตูนํ ทูรโต สมุปายิตภาเวน สลฺลหุกภาวโต ตูลปิจุํ ฐเปนฺโต วิย. "हत्थेहि गहेत्वा" म्हणजे दोन्ही हातांनी कंबरेच्या दोन्ही बाजूंना पकडून. "पतति" म्हणजे बसण्याच्या ठिकाणी झोपण्याच्या उद्देशाने पडणे (शरीर टेकवणे). "ओरिमं अङ्गं निस्साय निसिन्नो" म्हणजे मांडी घालून (पल्लङ्क) किंवा उकिडवे बसून, वरचे शरीर खालच्या शरीरावर प्रस्थापित करत, भार देण्याच्या उद्देशाने खालच्या अंगाचा (ओरिमङ्ग) आश्रय घेऊन बसलेला. "घंसन्तो" म्हणजे नितंबाच्या भागाने (आनिसददेसेन) आसनाच्या जागेला घासणारा. "पारिमङ्गं" म्हणजे मांडीच्या भागाला दाबणारा नितंबाचा प्रदेश. "तथेव" म्हणजे त्याचप्रमाणे घासणारा. "ओलम्बकं धारेन्तो विय" म्हणजे ओळंबा (ओळंब्याची दोरी) खाली सोडल्याप्रमाणे. याद्वारे सरळ बसणे सांगितले आहे. शरीराच्या जडपणाचे हेतू दूर झाल्यामुळे अत्यंत हलकेपणा आल्याने, जणू कापसाचा गोळा (तुलपिचु) ठेवल्याप्रमाणे. อปฺเปสกฺขานํ มหานุภาวเคหปฺปเวเส สิยา ฉมฺภิตตฺตํ, จิตฺตกฺโขโภ, ทรถวเสน นานปฺปการกปฺปนํ, ภยวเสน ตณฺหาวเสน ปริตสฺสนํ, ตํ สพฺพํ ภควโต นตฺถีติ ทสฺเสตุํ ปาฬิยํ ‘‘น ฉมฺภตี’’ติอาทิ (ม. นิ. ๒.๓๘๗) วุตฺตนฺติ อาห ‘‘น ฉมฺภตี’’ติอาทิ. अल्प प्रभाव असलेल्या लोकांचा (अप्पेसक्खानं) जेव्हा महानुभाव (मोठ्या प्रभावाच्या) घरात प्रवेश होतो, तेव्हा त्यांच्यात थरकाप (चम्भितत्त), चित्ताचा क्षोभ, त्रासामुळे विविध प्रकारच्या कल्पना, आणि भयामुळे किंवा तृष्णेमुळे व्याकुळता निर्माण होऊ शकते; हे सर्व भगवंतांच्या ठिकाणी नसते, हे दर्शवण्यासाठी पाळीमध्ये "न चम्भति" (तो थरथरत नाही) इत्यादी (म. नि. २.३८७) म्हटले आहे, म्हणून "न चम्भति" इत्यादी म्हटले आहे. อุทกํ ทียติ เอเตนาติ อุทกทานํ, ภิงฺการาทิ อุทกภาชนํ. พทฺธํ กตฺวาติ หตฺถคตมตฺติกํ วิย อตฺตโน วเส อวตฺตนฺตํ กตฺวา. ปริวตฺเตตฺวาติ กุชฺชิตฺวา. วิฉฑฺฑยมาโน อุทกสฺส วิกฺขิปนวเสน ฉฑฺฑยมาโน. "उदकं दीयति एतेन" (ज्याने पाणी दिले जाते) म्हणजे उदकदान, म्हणजेच झारी (भिङ्कार) इत्यादी पाण्याचे भांडे. "बद्धं कत्वा" (बद्ध करून) म्हणजे हातात घेतलेल्या मातीप्रमाणे स्वतःच्या नियंत्रणात न राहणारे करून. "परिवत्तेत्वा" म्हणजे पालथे करून (कुज्जित्वा). "विछड्ढयमानो" म्हणजे पाणी विखरून टाकण्याच्या उद्देशाने टाकणारा. ตถา น คณฺหาติ, พฺยญฺชนมตฺตาย เอว คณฺหนฺโต. ภตฺตํ วา อมนาปนฺติ อาเนตฺวา โยชนา. พฺยญฺชเนน อาโลปอตินามนํ, อาโลเปน พฺยญฺชนอตินามนนฺติ อิเมสุ ปน ทฺวีสุ ปฐมเมว อสารุปฺปตาย อนิฏฺฐํ วชฺเชตพฺพนฺติ ปาฬิยํ ปฏิกฺขิตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. สพฺพตฺเถวาติ สพฺพสฺมึ อาหริตพฺพวตฺถุสฺมึ สุปณีตภาเวน รโส ปากโฏ โหติ ญาเณน ปริญฺญาตตฺตา. รสเคโธ ปน นตฺถิ เสตุฆาตตฺตา. तशा प्रकारे ग्रहण करत नाहीत, केवळ व्यंजनाच्या (भाजी/चटणी इत्यादी) योग्य प्रमाणातच ग्रहण करतात. "किंवा नापसंत अन्न" (भत्तं वा अमनापं) असे आणून जोडणे करावे. "व्यंजनाने घासाचे उल्लंघन करणे" आणि "घासाने व्यंजनाचे उल्लंघन करणे" या दोन्हीपैकी पहिलेच अयोग्य असल्यामुळे अनिष्ट मानून वर्ज्य करावे, हे पाळीमध्ये नाकारले आहे असे समजावे. "सब्बत्थेव" (सर्वत्रच) म्हणजे ग्रहण करावयाच्या सर्वच वस्तूंमध्ये उत्तम प्रकारे रस (चव) प्रकट होतो, कारण तो ज्ञानाने पूर्णपणे जाणलेला असतो. परंतु, सेतूचा (तृष्णेच्या पुलाचा) नाश झाल्यामुळे रसाची आसक्ती (रसगेध) मात्र नसते. อสฺสาติ ‘‘เนว ทวายา’’ติอาทิปทสฺส. วุตฺตเมตนฺติ ‘‘วิสุทฺธิมคฺเค วินิจฺฉโย อาคโต’’ติ สพฺพาสวสุตฺเต (ม. นิ. ๑.๒๓) สํวณฺณยนฺเตน วุตฺตเมตํ, ตสฺมา [Pg.179] น เอตฺถ ตํ วตฺตพฺพนฺติ อธิปฺปาโย, ตสฺมา โย ตสฺมึ ตสฺมึ วินิจฺฉเย วิเสสวาโท อิจฺฉิตพฺโพ. โส ปรมตฺถมญฺชูสาย วิสุทฺธิมคฺควณฺณนาย วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. ปตฺตสฺส คหณฏฺฐานนฺติ หตฺเถน ปตฺตสฺส คหณปเทสํ. วินิวตฺติตฺวาติ ปตฺเต สพฺพํ อามิสคตํ สทฺธึ ภตฺเตน วินิวตฺติตฺวา คจฺฉติ. ปมาณาติกฺกนฺตนฺติ เกลายนวเสน อติกฺกนฺตปมาณํ อารกฺขํ ฐเปติ. จีวรโภคนฺตรนฺติ จีวรปฏลนฺตรํ. อุทเรน อกฺกมิตฺวาติ อุทเรเนว สนฺนิรุมฺภิตฺวา. ‘अस्सा’ (आस्वाद) हा ‘नेव दवाय’ (मजेसाठी नाही) इत्यादी पदाचा अर्थ आहे. ‘हे म्हटले आहे’ म्हणजे ‘विशुद्धिमार्गात निर्णय आला आहे’ असे सब्बासव सुत्ताच्या (म. नि. १.२३) वर्णनात म्हटले आहे, म्हणून येथे ते सांगण्याची गरज नाही असा अभिप्राय आहे. म्हणून त्या त्या निर्णयामध्ये जो विशेष वाद (स्पष्टीकरण) अपेक्षित आहे, तो ‘परमत्थमंजूषा’ नावाच्या विशुद्धिमार्ग-टीकेमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा. ‘पत्तस्स गहणट्ठाणं’ (पात्राचे ग्रहणस्थान) म्हणजे हाताने पात्र पकडण्याची जागा. ‘विनिवत्तित्वा’ (बाजूला करून) म्हणजे पात्रातील सर्व आमिष (अन्न) भातासह बाजूला करून जातो. ‘पमाणातिक्कन्तं’ (प्रमाणाबाहेर) म्हणजे आसक्तीपोटी प्रमाणाचे उल्लंघन करून रक्षण करतो. ‘चीवरभोगन्तरं’ म्हणजे चीवराच्या थरांच्या दरम्यान. ‘उदरेन अक्कमित्वा’ (पोटाने दाबून) म्हणजे पोटानेच दाबून धरून। อปฺปตฺตกาลํ อภิมุขํ นาเมติ อุปนาเมตีติ อตินาเมติ, ปตฺตกาลํ อติกฺกาเมนฺโต นาเมติ อปเนตีติ อตินาเมติ. อุภยมฺปิ เอกชฺฌํ คเหตฺวา ปาฬิยํ ‘‘น จ อนุโมทนสฺส กาลมตินาเมตี’’ติ วุตฺตนฺติ ทสฺเสนฺโต ‘‘โย หี’’ติอาทิมาห. जो वेळ आलेली नाही (अप्राप्त काळ) ती समोर आणतो किंवा जवळ आणतो, त्याला ‘अतिनामेति’ म्हणतात; किंवा प्राप्त झालेली वेळ ओलांडून पुढे नेतो किंवा दूर करतो, त्याला ‘अतिनामेति’ म्हणतात. या दोन्ही अर्थांना एकत्र घेऊन पाळीमध्ये ‘आणि अनुमोदनाची वेळ घालवत नाही’ (न च अनुमोदनस्स कालमतिनामेति) असे म्हटले आहे, हे दर्शवण्यासाठी ‘यो हि’ (जो खरोखर) इत्यादी म्हटले आहे। เวคคมเนน ปฏิสํมุญฺจิตฺวา ธาวิตฺวา คจฺฉติ. อจฺจุกฺกฏฺฐนฺติ อติวิย อุทฺธํ กตฺวา กฑฺฒิตปารุตํ. เตนาห ‘‘โย หิ ยาว หนุกฏฺฐิโต…เป… โหตี’’ติ. อจฺโจกฺกฏฺฐนฺติ อติวิย เหฏฺฐา กตฺวา กฑฺฒิตปารุตํ. เตนาห ‘‘ยาว โคปฺผกา โอตาเรตฺวา’’ติ. อุภโต อุกฺขิปิตฺวาติ ทกฺขิณโต วามโตติ อุโภสุ ปสฺเสสุ อุตฺตราสงฺคํ อุกฺขิปิตฺวา. ถนนฺติ ทกฺขิณถนํ. वेगाने जाण्याने (कपडे) सावरून धावत जातो. ‘अच्चुक्कट्ठं’ (अत्यंत वर ओढलेले) म्हणजे अत्यंत वर करून ओढून पांघरलेले. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘जो हनुवटीच्या हाडापर्यंत... पे... असतो.’ ‘अच्चोक्कट्ठं’ (अत्यंत खाली ओढलेले) म्हणजे अत्यंत खाली करून ओढून पांघरलेले. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘घोट्यापर्यंत खाली उतरवून.’ ‘उभतो उक्खिपित्वा’ (दोन्ही बाजूंनी वर करून) म्हणजे उजवीकडून आणि डावीकडून अशा दोन्ही बाजूंनी उत्तरासंग (वरचे वस्त्र) वर करून. ‘थणं’ (स्तन) म्हणजे उजवा स्तन। วิสฺสฏฺโฐติ วิมุตฺโต. เตนาห ‘‘วิสฺสฏฺฐตฺตาเยว เจส วิญฺเญยฺโย’’ติ. ยสฺมา อมุตฺตวาทิโน วจนํ อวิสฺสฏฺฐตาย น สินิยฺหติ, น เอวํ มุตฺตวาทิโนติ อาห ‘‘สินิทฺโธ’’ติ. วิญฺเญยฺโยติ สุปริพฺยตฺตตาย อกฺขรโต จ พฺยญฺชนโต จ วิญฺญาตุํ สกฺกุเณยฺโย. เตนาห ‘‘ปากโฏ’’ติ. วิญฺญาปนิโยติ วิชานิตพฺโพ. พฺยญฺชนวเสเนว เจตฺถ วิญฺเญยฺยตา เวทิตพฺพา โฆสสฺส อธิปฺเปตตฺตา. มธุโรติ ปิโย เปมนีโย อปลิพุทฺโธ. สวนมรหติ, สวนสฺส โสตสฺส หิโตติ วา สวนีโย. สมฺปิณฺฑิโตติ สหิโต. ภควโต หิ สทฺโท อุปฺปตฺติฏฺฐานกตาสญฺจิตตฺตา สหิตากาเรเนว อาปาถมาคจฺฉติ, น อโยสลากาย ปหฏกํสถาลํ วิย วิปฺปกิณฺโณ. เตนาห ‘‘อวิสารี’’ติ. คมฺภีโรติ ยถา คมฺภีรวตฺถุปริจฺฉินฺทเนน ญาณสฺส คมฺภีรสมญฺญา, เอวํ คมฺภีรฏฺฐานสมฺภวโต สทฺทสฺส คมฺภีรสมญฺญาติ อาห ‘‘คมฺภีโรติ คมฺภีรสมุฏฺฐิโต’’ติ[Pg.180]. นินฺนาทวาติ สวิเสสํ นินฺนาทวา. สฺวายํ วิเสโส คมฺภีรภาวสิทฺโธติ อาห ‘‘คมฺภีรตฺตาเยว เจส นินฺนาที’’ติ. เอวเมตฺถ จตฺตาริ องฺคานิ จตุรงฺคนิปฺผาทีนิ เวทิตพฺพานิ. อการณา มา นสฺสีติ พุทฺธานุภาเวน วิย สรสฺส ปริสปริยนฺตตา วุตฺตา, ธมฺมตาวเสเนว ปน สา เวทิตพฺพา ตสฺส มูลการณสฺส ตถา อวฏฺฐิตตฺตา. ‘विस्सट्ठो’ (स्पष्ट/मुक्त) म्हणजे मुक्त. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘मुक्त (स्पष्ट) असल्यामुळेच तो समजण्याजोगा (विज्ञेय) आहे.’ कारण जो मुक्तपणे बोलत नाही (अमुक्तवादी) त्याचे वचन अस्पष्टतेमुळे मधुर (स्निग्ध) वाटत नाही, परंतु मुक्तपणे बोलणाऱ्याचे (मुक्तवादी) तसे नसते, म्हणून ‘स्निग्धो’ (मधुर) असे म्हटले आहे. ‘विज्ञेय’ म्हणजे अत्यंत स्पष्टतेमुळे अक्षरावरून आणि व्यंजनावरून समजून घेण्यास योग्य. म्हणूनच ‘पाकटो’ (स्पष्ट) असे म्हटले आहे. ‘विज्ञापनीय’ म्हणजे जाणून घेण्याजोगा. येथे व्यंजनाच्या आधारेच विज्ञेयता समजून घ्यावी, कारण येथे आवाजाचा (घोष) अभिप्राय आहे. ‘मधुर’ म्हणजे प्रिय, प्रेमळ आणि अडथळारहित. जो ऐकण्यास योग्य आहे, किंवा ऐकण्यास (कानाला) हितकारक आहे, तो ‘सवनीय’ (श्रवणीय) होय. ‘सम्पिण्डितो’ म्हणजे एकत्रित. कारण भगवंतांचा आवाज हा उत्पत्तीच्या स्थानावरून संचित झाल्यामुळे एकत्रित स्वरूपातच कानावर पडतो, लोखंडी सळईने ठोकलेल्या काशाच्या थाळीसारखा विखुरलेला नसतो. म्हणूनच ‘अविसारी’ (न विखुरणारा) असे म्हटले आहे. ‘गंभीर’ म्हणजे ज्याप्रमाणे गंभीर विषयाचे आकलन केल्याने ज्ञानाला ‘गंभीर’ ही संज्ञा मिळते, त्याचप्रमाणे गंभीर स्थानातून उत्पन्न होत असल्यामुळे आवाजाला ‘गंभीर’ ही संज्ञा मिळते, म्हणून ‘गंभीर म्हणजे गंभीर स्थानातून उत्पन्न झालेला’ असे म्हटले आहे. ‘निन्नादवा’ म्हणजे विशेष घुमणारा. हा विशेष गुण गंभीरतेमुळेच सिद्ध होतो, म्हणून ‘गंभीरतेमुळेच तो घुमणारा आहे’ असे म्हटले आहे. अशा प्रकारे येथे चार अंगे चार अंगांना निष्पन्न करणारे समजून घ्यावेत. ‘विनाकारण नष्ट होऊ नये’ याद्वारे बुद्धानुभावाप्रमाणेच आवाजाची परिषदेच्या मर्यादेपर्यंत पोहोचण्याची क्षमता सांगितली आहे, परंतु ती केवळ धम्मतेमुळेच (नैसर्गिक नियमामुळेच) समजून घ्यावी, कारण त्याचे मूळ कारण तसेच स्थित आहे। ปจฺโจสกฺกิตฺวาติ ปฏินิวตฺติตฺวา. สมุสฺสิตกญฺจนปพฺพตํ วิย อุปริ อินฺทนีลรตนวิตตสิขํ วิชฺชุลฺลตาภูสิตํ. มหาปถวีอาทโย สตฺถุคุณปฏิภาคตาย นิทสฺสนํ, เกวลํ มหนฺตตามตฺตํ อุปาทาย นิทสฺสิตา. ‘पच्चोसक्कित्वा’ (मागे सरकून) म्हणजे मागे फिरून. जणू काही वर इंद्रनील रत्नांचे शिखर पसरलेला आणि विजेच्या लतेने सुशोभित असलेला उंच सोन्याचा पर्वतच. महापृथ्वी इत्यादी शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) गुणांच्या तुलनेसाठी उदाहरणे आहेत, ती केवळ त्यांच्या विशालतेचा आधार घेऊन दर्शविली आहेत। ๓๙๐. อปฺปฏิสํวิทิโตติ อนาโรจิโต. อาคมนวเสน เจตฺถ ปฏิสํเวทิตนฺติ อาห ‘‘อวิญฺญาตอาคมโน’’ติ. อุคฺคตภาวนฺติ กุลโภควิชฺชาทีหิ อุฬารภาวํ. อนุทฺทยสมฺปนฺนาติ การุณิกา. ३९०. ‘अप्पटिसंविदितो’ म्हणजे न कळवलेला (असूचित). येथे येण्याच्या संदर्भात कळवले गेले आहे, म्हणून ‘अविज्ञात आगमन असलेला’ (ज्याचे येणे माहीत नव्हते असा) असे म्हटले आहे. ‘उग्गतभावं’ (उच्च दर्जा) म्हणजे कूळ, संपत्ती, विद्या इत्यादींमुळे प्राप्त झालेली थोरवी. ‘अनुद्दयसम्पन्ना’ म्हणजे कारुणिक (दयेने युक्त)। ๓๙๑. สหสาว โอกาสกรเณน อุจฺจกุลีนตา ทีปิตา โหตีติ อาห ‘‘เวเคน อุฏฺฐาย ทฺวิธา ภิชฺชิตฺวา’’ติอาทิ. ३९१. अचानक जागा करून देण्याने उच्च कुलीनता स्पष्ट होते, हे दर्शवण्यासाठी ‘वेगाने उठून, दोन भागात विभागून’ इत्यादी म्हटले आहे। นาริสมานนามนฺติ อิตฺถิอตฺถโชตกนามํ. เตนาห ‘‘อิตฺถิลิงฺค’’นฺติ. อวฺหาตพฺพาติ กเถตพฺพา. ‘नारीसमाननामं’ म्हणजे स्त्रीवाचक अर्थ प्रकट करणारे नाव. म्हणूनच ‘स्त्रीलिंग’ असे म्हटले आहे. ‘अव्हातब्बा’ म्हणजे सांगण्यास योग्य (किंवा संबोधण्यास योग्य)। ๓๙๔. เอกนีหาเรเนว อฏฺฐ ปญฺเห พฺยากโรนฺโต. ‘‘ปุพฺเพนิวาสํ…เป… ปวุจฺจตี’’ติ อิมินา ปุพฺเพนิวาสสฺส วิทิตการณํ วุตฺตนฺติ อาห ‘‘ตสฺส ปุพฺเพนิวาโส ปากโฏ’’ติ. ทิพฺพจกฺขุญาณํ กถิตํ ตสฺส ปริภณฺฑญาณภาวโต ยถากมฺมูปคญาณสฺส. ‘‘ชาติกฺขยํ ปตฺโต, อภิญฺญา โวสิโต’’ติ จ วุตฺตตฺตา มุนีติ อเสกฺขมุนิ อิธาธิปฺเปโตติ อาห ‘‘อรหตฺตญาณโมเนยฺเยน สมนฺนาคโต’’ติ. ३९४. एकाच पद्धतीने आठ प्रश्नांचे उत्तर देताना. ‘पुब्बेनिवासं (पूर्वजन्म)... पे... म्हटले जाते’ याद्वारे पूर्वजन्माच्या ज्ञानाचे कारण सांगितले आहे, म्हणून ‘त्याचा पूर्वजन्म प्रकट आहे’ असे म्हटले आहे. दिव्यचक्षू ज्ञानाविषयी सांगितले आहे, कारण ते यथाकम्मूपग ज्ञानाचे (कर्मानुसार गती जाणण्याच्या ज्ञानाचे) पूरक ज्ञान आहे. ‘जातीचा (जन्माचा) क्षय प्राप्त झालेला, अभिज्ञेने परिपूर्ण’ असे म्हटल्यामुळे, येथे ‘मुनी’ शब्दाने ‘असेक्ख मुनी’ (अर्हत मुनी) अभिप्रेत आहे, म्हणून ‘अर्हत्त्व-ज्ञानरूपी मुनिभावाने युक्त असलेला’ असे म्हटले आहे। กิเลสราเคหิ กิเลสวิวณฺณตาหิ. ชาติกฺขยปฺปตฺตตฺตา ‘‘อโถ ชาติกฺขยํ ปตฺโต’’ติ วุตฺตตฺตา. อภิชานิตฺวาติ อภิวิสิฏฺฐตาย อคฺคมคฺคปญฺญาย ญตฺวา. อิทานิ ปฏิสมฺภิทายํ อาคตนเยน ปริญฺญาปหานภาวนาสจฺฉิกิริยาสมาปตฺตีนํ ปารคมเนน ปารคูติ อยเมตฺถ อตฺโถติ ทสฺเสตุํ ‘‘ปารคูติ วา’’ติอาทิ วุตฺตํ. อภิญฺเญยฺยธมฺมานํ ชานนวเสน อภิญฺญาปารคู. ตาทิโสติ ยาทิโส ‘‘ปารคู สพฺพธมฺมาน’’นฺติ ปททฺวเยน [Pg.181] วุตฺโต, ตาทิโส. ฉหิ อากาเรหีติ ปชานนาทีหิ ยถาวุตฺเตหิ ฉหิ อากาเรหิ. क्लेशरूपी रागांमुळे किंवा क्लेशरूपी मलिनतेमुळे. जन्माचा क्षय प्राप्त झाल्यामुळे ‘आणि जन्माचा क्षय प्राप्त झालेला’ असे म्हटले आहे. ‘अभिज्ञानित्वा’ (विशेष रूपाने जाणून) म्हणजे अतिविशिष्ट अशा अग्र मार्गज्ञानाने (अर्हत् मार्गज्ञानाने) जाणून. आता प्रतिसंभिदामध्ये आलेल्या पद्धतीने परिज्ञा (पूर्ण ज्ञान), प्रहाण (त्याग), भावना (विकास) आणि साक्षात्काराच्या समापत्तींच्या पार जाण्याने ‘पारगू’ (पार गेलेला) हा येथे अर्थ आहे, हे दर्शवण्यासाठी ‘पारगू किंवा’ इत्यादी म्हटले आहे. अभिज्ञेय (जाणून घेण्यास योग्य) धर्मांना जाणण्याच्या दृष्टीने ‘अभिज्ञा-पारगू’ (अभिज्ञेमध्ये पारंगत). ‘तादिसो’ (तसा) म्हणजे जसा ‘सर्व धर्मांच्या पार गेलेला’ या दोन पदांनी सांगितला आहे, तसा. ‘सहा आकारांनी’ म्हणजे प्रजानन (विशेष रूपाने जाणणे) इत्यादी वर सांगितलेल्या सहा प्रकारांनी। กามญฺเจตฺถ ทฺเว เอว ปุจฺฉาคาถา ทฺเว จ วิสฺสชฺชนาคาถา, ปุจฺฉาปฏิปาฏิยา ปน อสงฺกรโต จ วิสฺสชฺชนํ ปวตฺตติ, ตํ นิทฺธาเรตุํ กึ ปนาติอาทิ วุตฺตํ. เวเทหิ คตตฺตาติ เวเทหิ มคฺคญาเณหิ ปารงฺคตตฺตา. ปุพฺเพนิวาสนฺติอาทีหิ วิชฺชานํ อตฺถิตาย โพธิตตฺตา. ปาปธมฺมานนฺติ ฉตฺตึสปาปธมฺมานํ โสตฺถานํ มคฺคํ ปาปเนน นิสฺเสสโต โสธิตตฺตา. जरी येथे दोनच प्रश्नगाथा आणि दोनच उत्तरगाथा आहेत, तरीही प्रश्नांच्या अनुक्रमानुसार कोणताही गोंधळ न होता उत्तर दिले जाते, हे स्पष्ट करण्यासाठी ‘परंतु काय...’ इत्यादी म्हटले आहे. ‘वेदेहि गतत्ता’ (वेदांद्वारे गेलेला) म्हणजे वेदांद्वारे म्हणजेच मार्गज्ञानांद्वारे पार गेलेला असल्यामुळे. पूर्वजन्म इत्यादी विद्यांच्या अस्तित्वामुळे बुद्धत्व प्राप्त झाल्यामुळे. ‘पापधम्मां’ म्हणजे छत्तीस पापधर्मांच्या स्रोतांना मार्गाच्या प्राप्तीने पूर्णपणे शुद्ध केल्यामुळे। ๓๙๕. ธมฺโม นาม อรหตฺตมคฺโค กุสลธมฺเมสุ อุกฺกํสปารมิปฺปตฺติยา อุกฺกฏฺฐนิทฺเทเสน. ตสฺส อนุรูปธมฺมภาวโต อนุธมฺโม นาม เหฏฺฐิมมคฺคผลธมฺมา. โย สตฺถุ สนฺติเก ธมฺมํ สุตฺวา ยถานุสิฏฺฐํ น ปฏิปชฺชติ, โส ตถาคตํ ธมฺมาธิกรณํ วิเหเฐติ นาม. โย ปน ปฏิปชฺชนฺโต จ ทนฺธาภิญฺญตาย กมฺมฏฺฐานโสธนตฺถํ อนฺตรนฺตรา ภควนฺตํ อุปสงฺกมิตฺวา อเนกวารํ กถาเปติ, โส เอตฺตาวตา ธมฺมาธิกรณํ ตถาคตํ วิเหเฐตีติ น วตฺตพฺโพ. น หิ ภควโต ธมฺมเทสนาย ปริสฺสโม อตฺถิ, อยญฺจ อตฺโถ มหาสุทสฺสนสุตฺตาทีหิ (ที. นิ. ๒.๒๔๑ อาทโย) ทีเปตพฺโพ, ตสฺมา – ‘‘สจฺจธมฺมสฺส อนุธมฺม’’นฺติ วตฺตพฺเพ วุตฺตเมว พฺยติเรกมุเขน วิภาเวตุํ ‘‘น จ มํ ธมฺมาธิกรณํ วิเหเสสี’’ติ วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. ตตฺถ ปรินิพฺพายีติ ปรกาเล เจตฺถ ปรินิพฺพานมฺปิ สงฺคยฺหติ, ตํ ปน อิมสฺมึ คหิตเมว โหตีติ อาห ‘‘เทสนาย อรหตฺเตเนว กูฏํ คหิต’’นฺติ. ३९५. ‘धम्म’ म्हणजे कुशल धम्मांमध्ये उत्कृष्ट पारमिता प्राप्तीसाठी उत्कृष्ट निर्देश असलेला अर्हत् मार्ग होय. त्याच्या अनुरूप धम्मभावामुळे ‘अनुधम्म’ म्हणजे कनिष्ठ मार्ग आणि फल धम्म होत. जो शास्त्यांच्या सन्निध धम्म ऐकून, उपदेशिल्याप्रमाणे आचरण करत नाही, तो तथागतांना धम्माच्या बाबतीत त्रास देतो असे म्हटले जाते. परंतु जो आचरण करत असताना, मंद प्रज्ञेमुळे (दंधाभिज्ञतेमुळे) कम्मट्ठानाचे शुद्धीकरण करण्यासाठी वेळोवेळी भगवंतांकडे जाऊन अनेक वेळा चर्चा करतो, त्याला एवढ्यावरून ‘धम्माच्या बाबतीत तथागतांना त्रास देणारा’ असे म्हणता येणार नाही. कारण भगवंतांना धम्मदेशना देण्याचा कोणताही थकवा नसतो, आणि हा अर्थ महासुदस्सन सुत्त इत्यादींद्वारे (दी. नि. २.२४१ इत्यादी) स्पष्ट केला पाहिजे. म्हणून – ‘सच्चधम्माचा अनुधम्म’ असे म्हणायचे असताना, व्यतिरेक पद्धतीने स्पष्ट करण्यासाठी ‘आणि तू मला धम्माच्या बाबतीत त्रास दिला नाहीस’ असे म्हटले आहे, असे समजले पाहिजे. तेथे ‘परिनिब्बायी’ म्हणजे नंतरच्या काळातील परिनिर्वाण देखील यात समाविष्ट होते, परंतु ते यात आधीच गृहीत धरले गेले आहे, म्हणून म्हटले आहे की ‘देशनेमध्ये अर्हत्त्वानेच शिखर गाठले आहे’. พฺรหฺมายุสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. ब्रह्मायुसुत्तवर्णनेची लीनत्थप्पकासना समाप्त झाली. ๒. เสลสุตฺตวณฺณนา २. सेलसुuttवर्णना ๓๙๖. เกณิโยติ ตสฺส นามํ, ปุพฺเพ เกณิยา ชีวิกากปฺปนโตติ วทนฺติ. ชฏิโลติ ชฏาธโร. พฺราหฺมณชาติกตฺตา โกฏิสารตาย จ พฺราหฺมณมหาสาโล. ปโยเชตฺวา นิสฺสโย หุตฺวา วสติ, รตฺตึ กามสมฺปตฺตึ อนุภวตีติ วา โยชนา. สุสงฺขตนฺติ สปฺปิมธุสกฺกราทีหิ เจว มริจสิงฺคีเวราทีหิ จ สุฏฺฐุ อภิสงฺขตํ. ३९६. ‘केणिय’ हे त्याचे नाव आहे, पूर्वी केणिया (नाव) चालवून उपजीविका करत असल्यामुळे असे म्हणतात. ‘जटिल’ म्हणजे जटा धारण करणारा. ब्राह्मण जातीचा असल्यामुळे आणि कोट्यवधींची संपत्ती असल्यामुळे तो ‘ब्राह्मणमहासाल’ होता. व्यवसाय करून, आश्रित होऊन राहतो, किंवा रात्री कामसुखाचा उपभोग घेतो, असा याचा अर्थ लावला जातो. ‘सुसंखत’ म्हणजे तूप, मध, साखर इत्यादींनी तसेच मिरी, आले इत्यादींनी चांगल्या प्रकारे तयार केलेले. ปฏิกฺเขปปสนฺนตายาติ [Pg.182] อโหวตายํ อปฺปิจฺโฉ, โย นิมนฺติยมาโนปิ น สาทิยตีติ อุปนิมนฺติยมานสฺส ปฏิกฺเขเป ติตฺถิยานํ ปสนฺนภาวโตติ. ตํ กถํ? วิรุทฺธเมตนฺติ ‘‘อการณเมต’’นฺติ ปฏิกฺขิปติ. ‘पटिक्खेपपसन्नताय’ (नकारामुळे प्रसन्न होणे) म्हणजे ‘अहाहा! हा किती अल्पेच्छ आहे, जो निमंत्रण दिले जात असतानाही स्वीकारत नाही’ अशा प्रकारे निमंत्रित केलेल्या व्यक्तीच्या नकारावर तीर्थिकांचा प्रसन्न भाव असणे. ते कसे? ‘हे विरुद्ध आहे’ म्हणजेच ‘हे अकारण आहे’ असे म्हणून तो नकार देतो. ๓๙๘. กปฺปสหสฺเสหิปิ…เป… อโหสีติ อิทํ นานุสฺสวสิทฺธํ อนุมานคฺคหณํ สนฺธายาห. ปเทติ อุตฺตรปทโลเปน นิทฺเทโสติ อาห ‘‘ปทปฺปมาเณ’’ติ. ปชฺชติ นิกฺขิปติ เอตฺถาติ วา ปทํ ปกติยา ปาทนิกฺขิปฏฺฐานํ, ตสฺมึ ปเท. กีฬาปสุตตาทินา ปมาทํ อาปชฺชติ. โพธิสตฺตจาริกนฺติ ทุกฺกรจริยํ สนฺธาย วทติ. ३९८. ‘कल्पसहस्रांनी सुद्धा...पे... झाले’ हे केवळ ऐकीव माहितीवर आधारित नसून अनुमानाने ग्रहण केलेले आहे, हे लक्षात घेऊन म्हटले आहे. ‘पद’ म्हणजे उत्तरपदाचा लोप करून केलेला निर्देश आहे, म्हणून ‘पदप्रमाण’ असे म्हटले आहे. किंवा ज्या ठिकाणी पाऊल टाकले जाते ते ‘पद’ म्हणजे स्वाभाविकपणे पाऊल ठेवण्याची जागा, त्या पदावर. कीळामध्ये (क्रीडेमध्ये) मग्न असणे इत्यादींमुळे प्रमादाला प्राप्त होतो. ‘बोधिसत्तचारिका’ म्हणजे दुष्करचर्येला उद्देशून म्हटले आहे. ๓๙๙. ปริปุณฺณตายาติ อนูนตาย. อหีนงฺคตายาติ อเวกลฺลภาวโต. โรจตีติ รุจิ, เทหปฺปภา, โสภณา รุจิ เอตสฺสาติ สุรุจิ. อาโรหสมฺปตฺติ กายสฺส ปมาณยุตฺตอุจฺจตา. ปริณาหสมฺปตฺติ กิสถูลภาววชฺชิตปริณาหตา. สณฺฐานสมฺปตฺติ อวยวานํ สุสณฺฐิตตา. จารุทสฺสโนติ ปิยทสฺสโน เตนาห ‘‘สุจิรมฺปี’’ติอาทิ. สุวณฺณสทิสวณฺโณติ ชาติหิงฺคุลเกน มทฺทิตฺวา สิลานิฆํเสเนว ปริกมฺมํ กตฺวา ฐปิตฆนสุวณฺณรูปวณฺโณ. มหาปุริสภาวํ พฺยญฺเชนฺติ ปกาเสนฺตีติ พฺยญฺชนานิ, มหาปุริสลกฺขณานีติ อาห ‘‘ปฐมํ วุตฺตพฺยญฺชนาเนวา’’ติ. ३९९. ‘परिपुण्णताय’ म्हणजे उणेपणा नसणे. ‘अहीनङ्गताय’ म्हणजे अवयवांमध्ये वैकल्य नसणे. जी चमकते ती ‘रुची’ म्हणजे शरीराची प्रभा, ज्याची रुची शोभिवंत आहे तो ‘सुरुची’. ‘आरोहसंपत्ती’ म्हणजे शरीराची प्रमाणबद्ध उंची. ‘परिणahसंपत्ती’ म्हणजे बारीक किंवा स्थूलपणा नसलेली सुडौलता. ‘संठानसंपत्ती’ म्हणजे अवयवांची सुसंस्थितता. ‘चारुदस्सनो’ म्हणजे प्रियदर्शन, म्हणूनच ‘सुचिरम्पि’ (दीर्घकाळपर्यंत) इत्यादी म्हटले आहे. ‘सुवर्णसदृशवर्ण’ म्हणजे अस्सल हिंगुळाने घासून आणि दगडावर घासून पॉलिश करून ठेवलेल्या शुद्ध सोन्याच्या मूर्तीसारखा वर्ण. जे महापुरुषभाव प्रकट करतात ती ‘व्यंजने’ म्हणजे महापुरुष लक्षणे होत, म्हणूनच ‘प्रथम सांगितलेली व्यंजनेच’ असे म्हटले आहे. ปุพฺเพ วุตฺตนฺติ ‘‘สุรุจี’’ติ ปุพฺเพ วุตฺตํ, ‘‘อาทิจฺโจว วิโรจสี’’ติ ปุน วุตฺตํ. ‘‘จารุทสฺสโน สุวณฺณวณฺโณสี’’ติ ปุพฺเพ วุตฺตํ, ‘‘กลฺยาณทสฺสโน ภิกฺขุ กญฺจนาภตฺตโจ’’ติ ปุน วุตฺตนฺติ อิมมตฺถํ สนฺธายาห ‘‘อุตฺตรคาถายปิ เอเสว นโย’’ติ. สาติสยํ อุตฺตมวณฺเณ วณฺเณตฺวา อุตฺตมวณฺณิโนติ ปเทน สนฺตํ ปกาเสตีติ อาห ‘‘อุตฺตมวณฺณสมฺปนฺนสฺสา’’ติ. อุตฺตมสารถีติ เสฏฺฐปุริสสารถิ. ตตฺถ ตตฺถ ชมฺพุวนสณฺฑมณฺฑิตตาย ชมฺพุทีโป ‘‘ชมฺพุสณฺโฑ’’ติ วุจฺจติ. อิสฺสริยนฺติ จกฺกวตฺติสฺสริยํ. ‘पूर्वी सांगितले’ म्हणजे पूर्वी ‘सुरुची’ असे म्हटले होते, आणि पुन्हा ‘सूर्यासारखा तळपतोस’ असे म्हटले आहे. ‘चारुदर्शन आणि सुवर्णवर्णी आहेस’ असे पूर्वी म्हटले होते, आणि पुन्हा ‘कल्याणदर्शन भिक्खू, कांचनासारखी त्वचा असलेला’ असे म्हटले आहे, या अर्थाला उद्देशून ‘पुढील गाथेतही हाच नियम आहे’ असे म्हटले आहे. अतिशय उत्कृष्ट वर्णाचे वर्णन करून ‘उत्तमवर्णी’ या पदाने शांत भाव प्रकट करतो, म्हणून ‘उत्तमवर्णाने संपन्न असलेल्याचा’ असे म्हटले आहे. ‘उत्तमसारथी’ म्हणजे श्रेष्ठ पुरुषांचा सारथी. ठिकठिकाणी जंबूवनांनी सुशोभित असल्यामुळे जंबुद्वीपाला ‘जंबुसंड’ असे म्हटले जाते. ‘इस्सरीय’ म्हणजे चक्रवर्तीचे ऐश्वर्य. ชาติขตฺติยาติ ชาติมนฺโต ขตฺติยา. ราชาภิราชาติ เอตฺถ อภิ-สทฺโท ปูชตฺโถติ อาห ‘‘ราชูนํ ปูชนีโย’’ติ. ‘जातिखत्तिय’ म्हणजे उच्च कुळातील क्षत्रिय. ‘राजाधिराज’ यामध्ये ‘अभि’ हा शब्द पूजार्थ आहे, म्हणून ‘राजांना पूजनीय असलेला’ असे म्हटले आहे. อปฺปมาณาติ อปริมาณา โลกธาตุโย. ‘‘ยาวตา ปน อากงฺเขยฺยา’’ติ (อ. นิ. ๓.๘๑) หิ วุตฺตํ. ธมฺมราชา อนุตฺตโรติ เอตฺถ วุตฺตอนุตฺตรภาวํ ‘‘ยาวตา [Pg.183] หี’’ติอาทินา ปากฏตรํ กตฺวา ธมฺมราชภาวํ วิภาเวตุํ ‘‘สฺวาห’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. ธมฺเมนาติ ปฏิเวธธมฺเมน. เตนาห ‘‘อนุตฺตเรเนวา’’ติ. อนุตฺตเรนาติ วิสิฏฺเฐน อุตฺตเมน. อิมสฺมึ ปกฺเข ธมฺเมนาติ ปฏิปตฺติธมฺเมนาติปิ สงฺคยฺหติ. ปริยตฺติธมฺเมนาติ เทสนาธมฺเมน อาณาจกฺกํ ปวตฺเตมีติ โยชนา. เทสนาญาณปฏิเวธญาณวิภาคํ ธมฺมจกฺกเมว วา. อปฺปฏิวตฺติยนฺติ ปฏิวตฺติตุํ อสกฺกุเณยฺยํ. ‘अप्पमाण’ म्हणजे अमर्याद लोकधातू. कारण ‘जितकी इच्छा करावी’ (अं. नि. ३.८१) असे म्हटले आहे. ‘धम्मराजा अनुत्तर’ यामध्ये सांगितलेला अनुत्तरभाव ‘जितके काही...’ इत्यादींद्वारे अधिक स्पष्ट करून धम्मराजभाव दर्शवण्यासाठी ‘मी तो...’ इत्यादी म्हटले आहे. ‘धम्माने’ म्हणजे प्रतिवेध धम्माने. म्हणूनच ‘अनुत्तरानेच’ असे म्हटले आहे. ‘अनुत्तराने’ म्हणजे विशिष्ट अशा उत्तमाने. या पक्षात ‘धम्माने’ म्हणजे प्रतिपत्ती धम्माने देखील समाविष्ट होते. ‘परियत्ती धम्माने’ म्हणजे देशना धम्माने आज्ञाचक्र प्रवर्तित करतो, असा संबंध आहे. किंवा देशनाज्ञान आणि प्रतिवेधज्ञान विभाग असलेले धम्मचक्रच होय. ‘अप्पटिवत्तिय’ म्हणजे मागे न फिरवता येण्याजोगे. ตถาคเตน ชาโตติ ตถาคเตน เหตุนา อริยาย ชาติยา ชาโต. เหตุอตฺเถ กรณวจนํ. อนุชาโตติ จ วุตฺเต อนุ-สทฺทสฺส วเสน ตถาคตนฺติ จ อุปโยควจนเมว โหติ, โส จ อนุ-สทฺโท เหตุอตฺถโชตโกติ อาห ‘‘ตถาคตํ เหตุํ อนุชาโต’’ติ. อวญฺญาตพฺพภาเวน ชาโตติ อวชาโต ทุปฺปฏิปนฺนตฺตา. เตนาห ‘‘ทุสฺสีโล’’ติ. ตถา หิ วุตฺตํ โกกาลิกํ อารพฺภ ‘‘ปุริสนฺตกลิ อวชาโต’’ติ. ปุตฺโต นาม น โหติ ตสฺส โอวาทานุสาสนิยํ อฏฺฐิตตฺตา. เอวมาหาติ ‘‘อนุชาโต ตถาคต’’นฺติ เอวมาห. ‘तथागताने जन्मलेला’ म्हणजे तथागतांच्या हेतूने आर्य जातीमध्ये जन्मलेला. येथे हेतू अर्थामध्ये तृतीया विभक्ती आहे. आणि ‘अनुजात’ असे म्हटले असता ‘अनु’ या शब्दाच्या प्रभावाने ‘तथागताला’ अशी द्वितीया विभक्ती होते, आणि तो ‘अनु’ शब्द हेतू अर्थाचा द्योतक आहे, म्हणूनच ‘तथागत हेतूला अनुसरून जन्मलेला’ असे म्हटले आहे. अवमानना करण्यायोग्य भावाने जन्मलेला तो ‘अवजात’, कारण तो चुकीच्या मार्गाने चालणारा असतो. म्हणूनच ‘दुःशील’ असे म्हटले आहे. कारण कोकालिकला उद्देशून म्हटले आहे की, ‘पुरुषांमधील नीच, अवजात’. तो त्यांच्या उपदेशावर आणि अनुशासनावर स्थिर न राहिल्यामुळे खऱ्या अर्थाने पुत्र नसतो. ‘असे म्हटले’ म्हणजे ‘तथागतांच्या अनुजात’ असे म्हटले आहे. วิชฺชาติ มคฺควิชฺชา. อุกฺกฏฺฐนิทฺเทเสน วิมุตฺตีติ ผลวิมุตฺติ. นนุ จ มคฺโค ภาเวตพฺเพน คหิโตติ? สจฺจํ คหิโต, สพฺเพ จ ปน สตฺต ธมฺมา อภิญฺเญยฺยาติ วิชฺชาย อภิญฺเญยฺยภาโว วุตฺโต. อิมินา วา นเยน สพฺเพสมฺปิ อภิญฺเญยฺยภาโว วุตฺโต เอวาติ เวทิตพฺโพ. ผเลน วินา เหตุภาวสฺเสว อภาวโต เหตุวจเนน ผลสิทฺธิ, นิโรธสฺส จ สมฺปาปเนน มคฺคสฺส เหตุภาโว. ทุกฺขสฺส นิพฺพตฺตเนน ตณฺหาย สมุทยภาโวติ อิมมตฺถํ สงฺคหิตเมว อตฺถโต อาปนฺนตฺตา. ยุตฺตเหตุนาติ ยุตฺติยุตฺเตน เหตุนา พุทฺธภาวํ สาเธติ สจฺจวินิมุตฺตสฺส พุชฺฌิตพฺพสฺส อภาวโต สจฺจสมฺโพธเนเนว จ ตสฺส อนวเสสโต พุทฺธตฺตา. อตฺถวจนญฺเจตํ, ปโยควจนานิ ปน – พฺราหฺมณ, อหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ สพฺพถา อวิปรีตธมฺมเทสโน, สมฺมาสมฺพุทฺธตฺตา สพฺพตฺถ อวิปรีตมาจิกฺขติ ยถาหํ สพฺพมคฺคเทสโกติ. กึ ปน ภควา สยเมว อตฺตโน สมฺมาสมฺพุทฺธภาวํ อาโรเจตีติ? มหากรุณาย อญฺเญสํ มหาวิสยโต. ตตฺถ ‘‘เอโกมฺหิ สมฺมาสมฺพุทฺโธ, สพฺพาภิภู สพฺพวิทูหมสฺมี’’ติอาทีนิ (มหาว. ๑๑; ม. นิ. ๑.๒๘๕; ๒.๓๔๑; กถา. ๔๐๕) สุตฺตปทานิ อิทเมว จ สุตฺตปทํ เอตสฺส อตฺถสฺส สาธกํ. विज्जा म्हणजे मार्गविद्या (मार्गाचे ज्ञान). उत्कृष्ट निर्देशाने 'विमुत्ती' (विमुक्ती) म्हणजे फलविमुक्ती होय. पण मार्ग हा भावित (विकसित) करण्याच्या अर्थाने घेतला गेला आहे ना? सत्य आहे, घेतला गेला आहे. परंतु सर्व सत्त्व आणि धम्म हे 'अभिज्ञेय' (विशेष रूपाने जाणण्यायोग्य) असल्यामुळे विद्येचा अभिज्ञेयभाव सांगितला आहे. किंवा या न्यायाने सर्वांचाच अभिज्ञेयभाव सांगितला आहे असे जाणावे. फळाशिवाय हेतूभावाचाच अभाव असल्यामुळे, हेतूच्या कथनाने फलाची सिद्धी होते; आणि निरोधाची प्राप्ती करून देण्यामुळे मार्गाचा हेतूभाव सिद्ध होतो. दुःखाच्या उत्पत्तीमुळे तृष्णेचा समुदायभाव (समुदय सत्य) होतो, हा अर्थ अर्थतः प्राप्त होत असल्यामुळे संग्रहितच आहे. 'युक्तहेतूने' म्हणजे युक्तिसंगत हेतूने बुद्धभाव सिद्ध होतो; कारण सत्य विरहित असे काही जाणण्यासारखे नसल्यामुळे, सत्याच्या संबोधानेच त्यांचा पूर्णपणे बुद्धभाव सिद्ध होतो. आणि हे अर्थवचन आहे. प्रयोगवचने तर अशी आहेत - "हे ब्राह्मणा, मी सम्यक्संबुद्ध आहे, सर्वथा अविपरीत (यथार्थ) धम्मदेशना देणारा आहे. सम्यक्संबुद्ध असल्यामुळे सर्वत्र अविपरीत (यथार्थ) उपदेश करतो, जसे की मी सर्व मार्गांचा उपदेशक आहे." पण भगवान स्वतःच स्वतःचा सम्यक्संबुद्धभाव का घोषित करतात? महाकरुणेमुळे आणि इतरांच्या महाविषयासाठी (कल्याणासाठी). तेथे "मी एकटाच सम्यक्संबुद्ध आहे, सर्वविजेता आणि सर्वज्ञ आहे" इत्यादी सुत्तपदे आणि हेच सुत्तपद या अर्थाचे साधक (सिद्ध करणारे) आहे. สลฺลกนฺตโนติ [Pg.184] สลฺลานํ สมุจฺฉินฺนตฺตา. โรคสฺสาติ กิเลสโรคสฺส. ตสฺมาติ อปุนปวตฺติปาทเนน ติกิจฺฉนโต. พฺรหฺมํ วา เสฏฺฐํ สมฺมาสมฺโพธึ ปตฺโตติ พฺรหฺมภูโต. เอวํ อาคตายาติ อิมินา – 'सल्लकंतनो' (शल्यकर्ता/शल्यचिकित्सक) म्हणजे शल्यांचे (बाणांचे) समूळ उच्चाटन केल्यामुळे. 'रोगाचा' म्हणजे क्लेशरूपी रोगाचा. 'त्यामुळे' म्हणजे पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या पद्धतीने चिकित्सा केल्यामुळे. ब्रह्म किंवा श्रेष्ठ सम्यक्संबोधीला प्राप्त झाल्यामुळे 'ब्रह्मभूत' (झालेले). अशा प्रकारे आलेल्या याने - ‘‘กามา เต ปฐมา เสนา, ทุติยา อรติ วุจฺจติ; ตติยา ขุปฺปิปาสา เต, จตุตฺถี ตณฺหา ปวุจฺจติ. "काम (इच्छा/वासना) ही तुझी पहिली सेना आहे, दुसरी 'अरती' (असमाधान/नापसंती) म्हटली जाते; तिसरी 'खुप्पिपासा' (भूक आणि तहान) तुझी सेना आहे, चौथी 'तण्हा' (तृष्णा) म्हटली जाते. ถินมิทฺธํ เตปญฺจมํ ถินมิทฺธํ เต, ฉฏฺฐา ภีรู ปวุจฺจติ; สตฺตมี วิจิกิจฺฉา เต, มกฺโข ถมฺโภ เต อฏฺฐโม. पाचवी तुझी सेना 'थीनमिद्ध' (आळस आणि सुस्ती) आहे, सहावी 'भीरू' (भय/भीती) म्हटली जाते; सातवी तुझी 'विचिकिच्छा' (शंका/संदेह) आहे, आठवी 'मक्ख' (गुणनाश/कृतघ्नता) आणि 'थंभ' (स्तब्धता/हट्ट) आहे. ลาโภ สิโลโก สกฺกาโร, มิจฺฉาลทฺโธ จ โย ยโส; โย จตฺตานํ สมุกฺกํเส, ปเร จ อวชานติ; เอสา นมุจิ เต เสนา, กณฺหสฺสาภิปฺปหารินี’’ติ. (สุ. นิ. ๔๓๘-๔๔๑); लाभ, श्लोक (कीर्ती), सत्कार आणि मिथ्या मार्गाने मिळवलेले जे यश; जो स्वतःची प्रशंसा करतो आणि इतरांना तुच्छ लेखतो; हे नमुची (मार)! ही तुझी सेना आहे, जी काळ्या (माराची) प्रहार करणारी सेना आहे." เอวํ วุตฺตํ นววิธํ เสนํ สงฺคยฺหติ. วเส วตฺเตตฺวาติ สมุจฺฉินฺทเนน อนุปฺปาทตาปาทเนน วเส วตฺเตตฺวา. กุโตจิ อภโย นิพฺภโย. अशा प्रकारे सांगितलेल्या नऊ प्रकारच्या सेनेचा संग्रह होतो. 'वश करून' म्हणजे समूळ नष्ट करून आणि पुन्हा उत्पन्न न होऊ देऊन वश करून. 'कुठूनही अभय' म्हणजे निर्भय. สยเมว ทฏฺฐพฺพนฺติ เยน เยน อธิคโต, เตน เตน ปรสทฺธาย คนฺตพฺพํ หิตฺวา อสมฺโมหโต ปจฺจเวกฺขณาญาเณเนว สามํ ทฏฺฐพฺพํ. เตนาห ‘‘ปจฺจกฺข’’นฺติ. ปสฏฺฐา ทิฏฺฐิ สนฺทิฏฺฐิ. ยถา รเถน ชยตีติ รถิโก, เอวํ อิทํ มคฺคพฺรหฺมจริยํ สนฺทิฏฺฐิยา ชยตีติ สนฺทิฏฺฐิกํ. อถ วา ทิฏฺฐนฺติ ทสฺสนํ วุจฺจติ, ทิฏฺฐเมว สนฺทิฏฺฐํ, สนฺทสฺสนนฺติ อตฺโถ. สนฺทิฏฺฐํ อรหตีติ สนฺทิฏฺฐิโก ยถา วตฺถยุคํ อรหตีติ วตฺถยุคิโก. สนฺทิฏฺฐิกํ ผลทานํ สนฺธาย นาสฺส กาโลติ อกาลํ, อกาลเมว อกาลิกํ, น กาลนฺตรํ เขเปตฺวา ผลํ เทติ, อตฺตโน ปน ปวตฺติสมนนฺตรเมว ผลํ เทตีติ อตฺโถ. อถ วา อตฺตโน ผลปฺปทาเน ปกฏฺโฐ กาโล ปตฺโต อสฺสาติ กาลิโก, โลกิโย กุสลธมฺโม, อิทํ ปน สมนนฺตรผลตฺตา น กาลิกํ. 'स्वतःच पाहावे' म्हणजे ज्याने ज्याने (हा मार्ग) प्राप्त केला आहे, त्याने त्याने दुसऱ्याच्या श्रद्धेवर जाणे सोडून देऊन, संमोहरहित होऊन प्रत्यावेक्षण ज्ञानानेच स्वतः पाहावे. म्हणूनच म्हटले आहे - 'प्रत्यक्ष'. प्रशंसनीय दृष्टी म्हणजे 'संदिट्ठी' (संदृष्टी). ज्याप्रमाणे रथाने जिंकणारा तो 'रथी' (रथिक), त्याचप्रमाणे हे मार्ग-ब्रह्मचर्य संदृष्टीने जिंकते म्हणून ते 'संदिट्ठिक' (संदृष्टिक/ऐहिक किंवा प्रत्यक्ष फळ देणारे) आहे. अथवा 'दिट्ठ' (दृष्ट) म्हणजे दर्शन म्हटले जाते, दृष्ट तेच संदृष्ट, संदर्शन असा अर्थ आहे. जे संदृष्टाला (दर्शनाला) पात्र आहे ते 'संदिट्ठिक', ज्याप्रमाणे वस्त्रयुगाला पात्र असणारे ते 'वस्त्रयुगिक' होय. संदृष्टिक फलदानाच्या संदर्भात, ज्याला काळ लागत नाही तो 'अकाल', अकाल म्हणजेच 'अकालिक' (तात्काळ फळ देणारे). याचा अर्थ असा की, ते इतर काळाचा अपव्यय न करता फळ देते, तर स्वतःच्या प्रवृत्तीनंतर लगेचच फळ देते. अथवा स्वतःचे फळ देण्यामध्ये ज्याला विशिष्ट काळ प्राप्त होतो तो 'कालिक' म्हणजे लौकिक कुशल धर्म होय; परंतु हे (मार्ग-ब्रह्मचर्य) लगेचच फळ देणारे असल्यामुळे 'अकालिक' आहे. ๔๐๐. ‘‘มหายญฺญํ ปวตฺตยี’’ติอาทีสุ เกวลํ ทานธมฺมาทีสุ ยญฺญปริยายสมฺภวโต ‘‘พฺราหฺมณานํ ยญฺญาภาวโต’’ติ วุตฺตํ. พฺราหฺมณา หิ ‘‘อคฺคิมุขา เทวา’’ติ อคฺคิชุหนปุพฺพกํ ยญฺญํ วิทหนฺติ. เตนาห ‘‘อคฺคิชุหนปฺปธานาติ อตฺโถ’’ติ ‘‘ภูรฺภุว? สฺว?’’ อิติ สาวิตฺตี ปุพฺพกตฺตา มุขํ ปุพฺพงฺคมํ[Pg.185]. ‘‘มุขมิว มุข’’นฺติอาทีสุ วิย อิธาปิ ปธานปริยาโย มุขสทฺโทติ ทสฺเสนฺโต ‘‘มนุสฺสานํ เสฏฺฐโต ราชา ‘มุข’นฺติ วุตฺโต’’ติ อาห. อาธารโตติ โอคาหนฺตีนํ นทีนํ อาธารภาวโต ปฏิสรณโต คนฺตพฺพฏฺฐานภาวโต. สญฺญาณโตติ จนฺทโยควเสน อชฺช อสุกนกฺขตฺตนฺติ ปญฺญายนโต. อาโลกกรณโตติ นกฺขตฺตานิ อภิภวิตฺวา อาโลกกรณโต. โสมฺมภาวโตติ สีตหิมวาสีตวาตูปกฺขรภาวโต. ตปนฺตานนฺติ ทีปสิขา อคฺคิชาลา อสนิวิจกฺกนฺติ เอวมาทีนํ วิชฺชลนฺตานํ. อายมุขํ อคฺคทกฺขิเณยฺยภาเวน. ४००. "महायज्ञ प्रवृत्त केला" इत्यादींमध्ये केवळ दानधर्मादींमध्ये यज्ञाचा पर्याय संभवत असल्यामुळे "ब्राह्मणांच्या यज्ञाचा अभाव असल्यामुळे" असे म्हटले आहे. कारण ब्राह्मण "अग्निमुख देव आहेत" असे मानून अग्नीमध्ये आहुती देण्यापूर्वक यज्ञ करतात. म्हणूनच म्हटले आहे - "अग्नीमध्ये आहुती देणे हेच प्रधान आहे असा अर्थ आहे." "भूर्भुवः स्वः" या सावित्री (गायत्री) मंत्राच्या पूर्वगामीपणामुळे मुख (मुख्य) हे अग्रगामी आहे. "मुखासारखे मुख" इत्यादींप्रमाणे येथेही 'मुख' हा शब्द प्रधान या अर्थाने वापरला आहे, हे दर्शवताना "मनुष्यांमध्ये श्रेष्ठ असल्यामुळे राजाला 'मुख' म्हटले आहे" असे म्हटले आहे. 'आधाराने' म्हणजे प्रवेश करणाऱ्या नद्यांचा आधार असल्यामुळे, आश्रय असल्यामुळे आणि जाण्याचे स्थान असल्यामुळे. 'संज्ञानाने' (चिन्हाने) म्हणजे चंद्राच्या योगामुळे आज अमुक नक्षत्र आहे असे समजून येत असल्यामुळे. 'प्रकाश करण्याने' म्हणजे नक्षत्रांना मागे टाकून प्रकाश करत असल्यामुळे. 'सौम्यभावाने' म्हणजे थंड बर्फ आणि थंड वाऱ्याच्या उपकरणाच्या भावामुळे. 'तपणाऱ्यांमध्ये' (तेजस्वी असणाऱ्यांमध्ये) म्हणजे दिव्याची शिखा, अग्नीची ज्वाला, वज्रचक्र इत्यादी चमकणाऱ्यांमध्ये. 'आयमुख' (प्राप्तीचे द्वार) म्हणजे अग्र-दक्षिणेय (सर्वश्रेष्ठ दान स्वीकारण्यास पात्र) भावाने. ทิพฺพจกฺขุ ธมฺมจกฺขุ ปญฺญาจกฺขุ พุทฺธจกฺขุ สมนฺตจกฺขูติ อิเมหิ ปญฺจหิ จกฺขูหิ. เต สรณสฺสาติ เต สรณสฺส จ, เต สรณภาวมูลกตฺตา อิตรทฺวยสฺส จ, ยถาวุตฺต เต-ปเทน วุตฺตตฺถโต ปรสฺส จาติ อตฺโถ. อิทํ วุตฺตํ โหติ – ‘‘เต ตุยฺหํ, อิตรสฺส จ สรณสฺส อโห อานุภาโว’’ติ. อาวุตฺติวเสน วา เต สรณสฺสาติ เอตฺถ อตฺโถ วิภาเวตพฺโพ – ตุยฺหํ สรณภูตสฺส จ อิตรสรณสฺส จ อานุภาโวติ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. दिव्यचक्षू, धम्मचक्षू, प्रज्ञाचक्षू, बुद्धचक्षू आणि समंतचक्षू या पाच चक्षूंद्वारे. 'ते सरणस्स' (तुझ्या शरणाचे) म्हणजे तुझे आणि शरणभावाच्या मूळ कारणाने इतर दोन्हींचेही, जसे की 'ते' या पदाने सांगितलेल्या अर्थावरून दुसऱ्याचेही, असा अर्थ आहे. हे असे म्हटले आहे - "तुझ्या आणि इतर शरणाचा काय हा प्रभाव!" किंवा आवृत्तीच्या वशाने 'ते सरणस्स' याचा अर्थ असा स्पष्ट करावा - तुझ्या शरण झालेल्याचा आणि इतर शरणाचा प्रभाव. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. เสลสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. सेलसुत्तवर्णनेची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๓. อสฺสลายนสุตฺตวณฺณนา ३. अस्सलायनसुत्तवर्णना (अस्सलायन सुत्ताची टीका). ๔๐๑. อญฺญมญฺญวิสิฏฺฐตฺตา วิสทิสํ รชฺชํ วิรชฺชํ, วิรชฺชโต อาคตา, ตตฺถ ชาตาติ วา เวรชฺชกา, เอวํ ชาตา โข ปน เต, ยสฺมา วตฺถาภรณาทิวิภาเคน นานปฺปการา โหนฺติ, ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘นานาเวรชฺชกาน’’นฺติ. อฏฺฐกถายํ ปน เวรชฺชสฺเสว วเสน นานปฺปการตา วุตฺตา. ยญฺญุปาสนาทินาติ ยญฺญานุภวนมนฺตชฺเฌนทกฺขิณปริเยสนาทินา. จตุวณฺณสาธารณนฺติ ขตฺติยาทีนํ จตุนฺนํ วณฺณานํ สาธารณํ สํสารสุทฺธิปาปตสฺสนํ. นฺหานสุทฺธิยาติ ติตฺถสมุทฺทขาเตสุ มนฺตชปฺปนปุพฺพกํ สายํตติยอุทโกโรหนาทินฺหานสุทฺธิยา. ภาวนาสุทฺธิยาติ ปรมโชติภูตาย ปุริสภาวนาสงฺขาตาย สุทฺธิยา. วาปิตสิโรติ โอโรปิตเกโส. ตเมว หิ สิโร วาปิตนฺติ วุจฺจติ. ४०१. एकमेकांपासून विशिष्ट (भिन्न) असल्यामुळे विसदृश राज्य म्हणजे 'विराज्य' (वेरज्ज), विराज्यातून आलेले किंवा तेथे जन्मलेले ते 'वेरज्जक' (वैराज्यक) होत. अशा प्रकारे जन्मलेले ते, ज्या अर्थी वस्त्र-अलंकार इत्यादींच्या विभागाने नाना प्रकारचे असतात, म्हणून "नानावेरज्जकांचे" (विविध देशांतील लोकांचे) असे म्हटले आहे. परंतु अट्ठकथेमध्ये (अठ्ठकथा) वैराज्याच्याच (वेरज्ज) कारणाने नानाप्रकारता सांगितली आहे. 'यज्ञोपासना इत्यादींनी' म्हणजे यज्ञाचा अनुभव घेणे, मंत्रांचे अध्ययन करणे, दक्षिणा शोधणे इत्यादींनी. 'चारही वर्णांना साधारण' म्हणजे क्षत्रिय इत्यादी चारही वर्णांना साधारण असणारे संसारशुद्धीचे आणि पापाचे दर्शन. 'स्नानशुद्धीने' म्हणजे तीर्थ, समुद्र आणि तलावांमध्ये मंत्रजप करण्यापूर्वक संध्याकाळी तिसऱ्यांदा पाण्यात उतरणे इत्यादी स्नानशुद्धीने. 'भावनाशुद्धीने' म्हणजे परमज्योती स्वरूप असलेल्या पुरुषभावनेने युक्त अशा शुद्धीने. 'वापितशिर' म्हणजे मुंडण केलेले डोके. त्यालाच 'शिर वापित' (मुंडित मस्तक) असे म्हटले जाते. สภาววาทีติ [Pg.186] ยถาภูตวาที. ปพฺพชนฺตาติ พฺราหฺมณปพฺพชฺชํ อุปคจฺฉนฺตา, ตสฺมา พฺราหฺมณานํ ปพฺพชฺชาวิธานํ สิกฺขนฺเตน โภตา ‘‘พฺราหฺมณาว สุชฺฌนฺติ, โน อพฺราหฺมณา’’ติ อยํ วิธิ สเหตุโก สอุปาทาโน สกฺกจฺจํ อุคฺคหิโต, ตสฺมา ตุยฺหํ ปราชโย นตฺถิ…เป… เอวมาหํสุ. ‘स्वभाववादी’ म्हणजे यथाभूतवादी (यथार्थ बोलणारे). ‘पब्बजन्त’ (प्रव्रजित होणारे) म्हणजे ब्राह्मणांच्या प्रव्रज्येला प्राप्त होणारे; म्हणून ब्राह्मणांच्या प्रव्रज्या-विधीचे शिक्षण घेणाऱ्या आपल्याद्वारे 'ब्राह्मणच शुद्ध होतात, अब्राह्मण नाही' हा विधी सहेतुक आणि सोपादान (आसक्तीसह) काळजीपूर्वक ग्रहण केला गेला आहे, म्हणून तुमचा पराजय नाही... इत्यादी त्यांनी म्हटले. ๔๐๒. ลทฺธิภินฺทนตฺถนฺติ ‘‘พฺราหฺมณาว พฺรหฺมุโน ปุตฺตา โอรสา มุขโต ชาตา พฺรหฺมชา’’ติ เอวํ ปวตฺตลทฺธิยา วินิเวฐนตฺถํ. ปุตฺตปฏิลาภตฺถายาติ ‘‘เอวํ มยํ เปตฺติกํ อิณธารํ โสเธยฺยามา’’ติ ลทฺธิยํ ฐตฺวา ปุตฺตปฏิลาภตฺถาย. อยญฺเหตฺถ อธมฺมิกานํ พฺราหฺมณานํ อชฺฌาสโย. เนสนฺติ พฺราหฺมณานํ. สจฺจวจนํ สิยาติ ‘‘พฺรหฺมุโน ปุตฺตา’’ติอาทิวจนํ สจฺจํ ยทิ สิยา พฺราหฺมณีนํ…เป… ภเวยฺย, น เจตํ อตฺถิ. มหาพฺรหฺมุโน มุขโต ชาโตติ วาทจฺเฉทกวาโท มุขโตชาตจฺเฉกวาโท. อสฺสลายโนวิญฺญู ชาติโก ‘‘นิรกฺเขปํ สมเณน โคตเมน วุตฺต’’นฺติ ชานนฺโตปิ สหคตานํ พฺราหฺมณานํ จิตฺตานุรกฺขณตฺถํ ‘‘กิญฺจาปิ ภวํ โคตโม’’ติอาทิมาห. ४०२. ‘लद्धिभिन्दनत्थं’ (चुकीचे मत खंडित करण्यासाठी) म्हणजे 'ब्राह्मणच ब्रह्माचे औरस पुत्र आहेत, मुखातून जन्मलेले आहेत, ब्रह्मज आहेत' अशा प्रकारे प्रवृत्त झालेल्या मताचे निवारण करण्यासाठी. ‘पुत्तपटिलाभत्थाय’ (पुत्रप्राप्तीसाठी) म्हणजे 'अशा प्रकारे आम्ही पितृऋण फेडू' या मतावर ठाम राहून पुत्रप्राप्तीसाठी. हा येथे अधार्मिक ब्राह्मणांचा हेतू आहे. ‘नेसं’ म्हणजे ब्राह्मणांचे. ‘सच्चवचनं सिया’ म्हणजे 'ब्रह्माचे पुत्र' इत्यादी वचन जर ब्राह्मणींच्या बाबतीत सत्य असते... तर तसे झाले असते, पण तसे नाही. 'महाब्रह्माच्या मुखातून जन्मलेला' हा वाद खोडून काढणारा वाद म्हणजे 'मुखतोजातच्छेदकवाद' होय. सुज्ञ स्वभावाचा अस्सलायन 'श्रमण गोतमांनी निरपवाद (अकाट्य) सांगितले आहे' हे जाणत असूनही, सोबत आलेल्या ब्राह्मणांच्या मनाचे रक्षण करण्यासाठी 'जरी पूज्य गोतम...' इत्यादी म्हणाला. ๔๐๓. อิทานิ พฺราหฺมโณว เสฏฺโฐ วณฺโณติ วาทํ ภินฺทิตุํ ‘‘สุตํ เต โยนกกมฺโพเชสู’’ติอาทิ อารทฺธํ. ยทิ พฺราหฺมโณว เสฏฺโฐ วณฺโณ, สพฺพตฺถ พฺราหฺมโณว เสฏฺโฐ ภเวยฺย, อถ กสฺมา โยนกกมฺโพชาทิชนปเทสุ พฺราหฺมณานํ เสฏฺฐภาโว นตฺถิ? เอวญฺหิ ตตฺถ วณฺณา, ตสฺมา ‘‘พฺราหฺมโณว เสฏฺโฐ’’ติ ลทฺธิมตฺตเมตํ. เตสุ หิ ชนปเทสุ ชนา เอกชฺฌํ สนฺนิปติตฺวา สมฺมนฺตยิตฺวา กติกํ อกํสุ, ทาสํ สามิกํ กตฺวา อิตเร สพฺเพ ตํ ปูเชตฺวา ตสฺส วเส วตฺตนฺติ, โย เตสํ อยฺโย โหติ อิตเร สพฺเพ ตสฺส ทาสา โหนฺติ, เต กติปยสํวจฺฉราติกฺกเมน ตสฺส กิญฺจิ โทสํ ทิสฺวา ตํ ตโต ฐานโต อปเนตฺวา อญฺญํ ฐเปนฺติ, อิติ โส อยฺโย หุตฺวา ทาโส โหติ, อิตโร ทาโส หุตฺวา อยฺโย โหติ, เอวํ ตาว เกจิ ‘‘อยฺโย หุตฺวา ทาโส โหติ, ทาโส หุตฺวา อยฺโย โหตี’’ติ เอตฺถ อตฺถํ วทนฺติ. อฏฺฐกถายํ ปน ปุริมวเสเนว ตมตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘พฺราหฺมโณ สภริโย’’ติอาทิ วุตฺตํ. วยปฺปตฺเต ปุตฺเต อสตีติ อิทํ วกฺขมานสฺส ทารกสฺส ทายชฺชสามิกภาวสฺส ตาว ทสฺสนํ. มาติโต สุทฺโธติ เอตฺถ [Pg.187] โย มาติโต สุทฺธตฺตา อยฺโย, ปิติโต อสุทฺธตฺตา ทาโส โหติ, โส เอว ปิติโต อสุทฺธตฺตา ทาโส หุตฺวา มาติโต อยฺโย โหตีติ ชาตึ สมฺเภเทติ. โสว สพฺเพน สพฺพํ โหตีติ น สกฺกา วตฺตุนฺติ อปเร. โก ถาโมติ มหนฺเต โลกสนฺนิวาเส อนมตคฺเค อตีเต กาเล อิตฺถีนํ วา จิตฺเต อนวฏฺฐิเต ทาสา ทาสา เอว โหนฺติ, อยฺยา อยฺยา เอว โหนฺตีติ เอตฺถ โก เอกนฺติโก สเหตุโก อวสฺสโย, ตสฺส สาธโก สิทฺธนฺโต, กึ นิทสฺสนนฺติ อตฺโถ. ४०३. आता 'ब्राह्मणच श्रेष्ठ वर्ण आहे' हा वाद खोडून काढण्यासाठी 'तुम्ही योनक आणि कंबोज देशांबद्दल ऐकले आहे का' इत्यादी सुरू केले. जर ब्राह्मणच श्रेष्ठ वर्ण असता, तर सर्व ठिकाणी ब्राह्मणच श्रेष्ठ ठरला असता, मग योनक, कंबोज इत्यादी जनपदांमध्ये ब्राह्मणांचे श्रेष्ठत्व का नाही? कारण तेथे असे वर्ण आहेत, म्हणून 'ब्राह्मणच श्रेष्ठ आहे' हे केवळ एक मत आहे. कारण त्या जनपदांमध्ये लोक एकत्र येऊन, विचारविनिमय करून करार करतात, दासाला स्वामी बनवून इतर सर्वजण त्याचा आदर करतात आणि त्याच्या नियंत्रणात राहतात; जो त्यांचा आर्य (स्वामी) असतो, इतर सर्व त्याचे दास होतात. ते काही वर्षे उलटून गेल्यावर त्याचा काही दोष पाहून त्याला त्या पदावरून दूर करतात आणि दुसऱ्याला स्थापित करतात, अशा प्रकारे तो आर्य असूनही दास बनतो आणि दुसरा दास असूनही आर्य बनतो. अशा प्रकारे काहीजण 'आर्य असून दास बनतो, दास असून आर्य बनतो' याचा अर्थ सांगतात. परंतु अट्ठकथेत पूर्वीच्याच वशानुसार तो अर्थ दर्शवण्यासाठी 'ब्राह्मण पत्नीसह' इत्यादी म्हटले आहे. 'पुत्र वयात आलेला नसताना' हे पुढे बोलल्या जाणाऱ्या बालकाच्या वारसाहक्काच्या मालकी हक्काचे दर्शन घडवण्यासाठी आहे. 'मातेकडून शुद्ध' यामध्ये जो मातेकडून शुद्ध असल्यामुळे आर्य आणि पित्याकडून अशुद्ध असल्यामुळे दास असतो, तोच पित्याकडून अशुद्ध असल्यामुळे दास होऊन मातेकडून आर्य होतो, अशा प्रकारे जातीचे संमिश्रण होते. 'तोच सर्वतोपरी सर्व काही होतो' असे म्हणता येत नाही, असे इतर म्हणतात. 'काय बळ आहे?' म्हणजे या विशाल लोकसंसारात, अनादी भूतकाळात किंवा स्त्रियांचे चित्त अस्थिर असताना, दास हे दासच राहतात आणि आर्य हे आर्यच राहतात, याविषयी कोणता एकांतिक (निश्चित), सहेतुक आधार आहे, त्याचा साधक सिद्धांत कोणता, त्याचे उदाहरण काय, असा अर्थ आहे. ๔๐๔. สุกฺกจฺเฉทกวาโท นามาติ ‘‘พฺราหฺมโณว สุกฺโก วณฺโณ’’ติ เอวํ วุตฺโต สุกฺกจฺเฉทกวาโร นาม. ४०४. ‘सुक्कच्छेदकवाद’ (शुक्लच्छेदकवाद) म्हणजे 'ब्राह्मणच शुक्ल (शुद्ध) वर्ण आहे' अशा प्रकारे सांगितलेला शुक्लच्छेदकवार होय. ๔๐๘. สพฺพสฺมึ อคฺคิกิจฺจํ กโรนฺเตติ เอเตน ยถา ยโต กุโตจิ นิสฺสยโต อุปฺปนฺโน อคฺคิอุปาทานสมฺปนฺโน อคฺคิกิจฺจํ กโรติ, เอวํ ยสฺมึ กสฺมิญฺจิ ทาสกุเล ชาโต อุปนิสฺสยสมฺปนฺโน สมฺมาปฏิปชฺชมาโน สํสารโต สุชฺฌติ เอวาติ ทสฺเสติ. ४०८. ‘सब्बस्मिं अग्गिकिच्चं करोन्ते’ (सर्व ठिकाणी अग्नीचे कार्य करतो) याद्वारे ज्याप्रमाणे कोणत्याही आश्रयाने उत्पन्न झालेला अग्नी, इंधनाने (उपादानाने) युक्त होऊन अग्नीचे कार्य करतो, त्याचप्रमाणे कोणत्याही दासकुलात जन्मलेला मनुष्य, उपनिषयसंपन्न (सहाय्यक गुणांनी युक्त) होऊन योग्य प्रकारे आचरण करत संसारातून शुद्ध (मुक्त) होतोच, हे दर्शवले आहे. ๔๐๙. ปาทสิกวณฺโณติ อนฺตราฬวณฺโณ. เอเตสนฺติ ขตฺติยกุมาเรน พฺราหฺมณกญฺญาย อุปฺปนฺนปุตฺโต, พฺราหฺมณกุมาเรน ขตฺติยกญฺญาย อุปฺปนฺนปุตฺโตติ เอเตสํ ทฺวินฺนํ มาณวกานํ. มตกภตฺเตติ มเต อุทฺทิสฺส กตภตฺเต. ถาลิปาเกติ กตมงฺคลภตฺเต. ४०९. ‘पादसिकवर्ण’ म्हणजे अंतराळवर्ण (मिश्र वर्ण). ‘एतेसं’ म्हणजे क्षत्रिय कुमारापासून ब्राह्मण कन्येच्या पोटी जन्मलेला पुत्र आणि ब्राह्मण कुमारापासून क्षत्रिय कन्येच्या पोटी जन्मलेला पुत्र, या दोन्ही माणवकांचा (तरुणांचा). ‘मतकभत्त’ म्हणजे मृताला उद्देशून केलेले भोजन (श्राद्ध भोजन). ‘थालीपाक’ म्हणजे मंगल प्रसंगी केलेले भोजन. ๔๑๐. ตุมฺเหติ ชาติสามญฺญโต มาณวํ พฺราหฺมเณหิ สทฺธึ เอกชฺฌํ สงฺคณฺหนฺโต อาห. โก นุ โขติ อวํสิโร อิสิวาโท, เตสํ พฺราหฺมณีสีนํ อสามตฺถิยทสฺสเนน ชาติยา อปฺปมาณตํ วิภาเวตุํ คามทารกเวเสน อุปคจฺฉิ. เตน วุตฺตํ ‘‘คามณฺฑลรูโป วิยา’’ติ. โกณฺฑทมโกติ อทนฺตทมโก. ४१०. ‘तुम्हे’ (तुम्ही) असे जातीच्या समानतेमुळे माणवकाला ब्राह्मणांसह एकत्र गृहीत धरून म्हटले आहे. 'को नु खो' (कोण बरे) हा अधोमुख ऋषींचा वाद, त्या ब्राह्मण ऋषींची असमर्थता दाखवून जातीचे निरर्थकत्व स्पष्ट करण्यासाठी गावातील मुलाच्या वेषात आला. म्हणूनच 'गावातील मुलाच्या रूपासारखा' असे म्हटले आहे. ‘कोण्डदमक’ म्हणजे अदम्य प्राण्याला वश करणारा. ๔๑๑. ชเนตีติ ชนิกา ชเนตฺติ. ชนโก ปิตาติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย. คนฺธพฺพปญฺหนฺติ คนฺธพฺพสฺส มาตุกุจฺฉิยํ อุปฺปชฺชนกสตฺตสฺส ขตฺติยภาวาทิปุจฺฉํ. ทพฺพิคหณสิปฺปมฺปิ เอกา วิชฺชา เวทิตพฺพา. ตตฺถ กิร กุสโล ยํ กิญฺจิ อาหารูปคปณฺณปุปฺผผลพีชํ อนฺตมโส เอลาลุกมฺปิ คเหตฺวา เภสชฺเชหิ โยเชตฺวา ปจนฺโต สปฺปิมธุผาณิเตหิ สมานรสํ กตฺวา สมฺปาเทตุํ [Pg.188] สกฺโกติ, ปุณฺโณปิ ตาทิโส, เตน ญาตํ ตฺวํ ทพฺพิคหณสิปฺปมตฺตมฺปิ น ชานาสีติ สมฺพนฺโธ. สทฺโธติ กมฺมผลสทฺธาย สทฺโธ, โปถุชฺชนิเกเนว รตนตฺตยปสาเทน ปสนฺโน. เตเนวาห – ‘‘อุปาสกํ มํ ภวํ…เป… สรณํ คต’’นฺติ. ४११. ‘जनेती’ म्हणजे जन्म देणारी माता. 'जनको पिता' (जन्म देणारा पिता) यामध्येही हाच नियम आहे. ‘गन्धब्बपञ्हं’ म्हणजे गंधर्वाचा (मातेच्या गर्भात उत्पन्न होणाऱ्या जीवाचा) क्षत्रियत्व इत्यादीविषयीचा प्रश्न. ‘दब्बिगहणसिप्प’ (पळी धरण्याची कला) ही देखील एक विद्या समजली पाहिजे. त्यामध्ये कुशल असलेला मनुष्य कोणतेही खाण्यायोग्य पान, फूल, फळ, बी, अगदी काकडी देखील घेऊन, औषधांशी जोडून शिजवताना, तूप, मध आणि गुळाच्या रसासारखा समान चवीचा पदार्थ तयार करू शकतो; पुण्ण देखील तसाच होता, त्यावरून 'तुम्हाला पळी धरण्याची कला देखील माहीत नाही' असा संबंध जोडला जातो. ‘सद्धो’ (श्रद्धाळू) म्हणजे कर्मफलावरील श्रद्धेने युक्त असलेला, सामान्य माणसाच्या त्रिरत्नावरील प्रसन्नतेने प्रसन्न झालेला. म्हणूनच म्हटले आहे – 'पूज्यांनी मला उपासक म्हणून... शरण आलेला मानावे.' อสฺสลายนสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. अस्सलायनसुत्तवर्णनेची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๔. โฆฏมุขสุตฺตวณฺณนา ४. घोटमुखसुत्तवर्णना (घोटमुख सुत्ताची व्याख्या) ๔๑๒. เขมิยา นาม รญฺโญ เทวิยา โรปิตตฺตา ตํ อมฺพวนํ เขมิยมฺพวนนฺติ วุจฺจตีติ วทนฺติ. ธมฺมิโกติ ธมฺมยุตฺโต สพฺพโสว อธมฺมํ ปหาย ธมฺเม ฐิโต. ปริพฺพชติ ปพฺพชติ เอเตนาติ ปริพฺพโช, ฆราวาสโต นิกฺขมนปุพฺพกํ ลิงฺคคฺคหณวเสน สีลสมาทานํ. เอตฺถาติ เอตสฺมึ ปริพฺพเช. สภาโวติ ตํ ปริพฺพาชนิยํ, เตหิ เตหิ ปริพฺพาชเกหิ อนุฏฺฐาตพฺโพ ปฏิปตฺติธมฺมสงฺขาโต สภาโว. ธมฺโมว ปมาณนฺติ เอเตน มยํ อหิริมนา จิตฺตสฺส ยถาอุปฏฺฐิตํ กเถม, ตสฺมา ตํ อปฺปมาณํ, โย ปเนตฺถ อวิตโถ ธมฺโม, ตเทว ปมาณํ. อธิคตปฏิปตฺติสงฺขาโต สภาโว อตฺถิ, ตสฺส ตุมฺเหหิ ตุมฺเหหิ พหุนา นานาสนฺทสฺสนาทิ กมฺเมน อิธ ภวิตพฺพํ, พหุเทเวตฺถ วตฺตพฺพนฺติ อธิปฺปาโย. ४१२. खेमिया नावाच्या राजाच्या राणीने लावल्यामुळे त्या आम्रवनाला 'खेमियम्बवन' (खेमिय आम्रवन) म्हटले जाते, असे म्हणतात. ‘धम्मिको’ म्हणजे धर्मयुक्त, सर्वतोपरी अधर्माचा त्याग करून धर्मात स्थित असलेला. 'परिव्वजति pब्बजति एतेनाति परिव्वजो' (ज्याद्वारे गृहत्याग करून प्रव्रजित होतात तो परिव्राजक) म्हणजे गृहस्थाश्रमातून बाहेर पडून चिन्हांचे ग्रहण करण्याद्वारे शील ग्रहण करणे. ‘एत्थाति’ म्हणजे या परिव्रज्येत. ‘सभावो’ म्हणजे तो परिव्राजकाचा धर्म, त्या त्या परिव्राजकांद्वारे आचरणीय असलेला, प्रतिपत्ती (आचरण) धर्माने युक्त स्वभाव. ‘धम्मोव पमाणं’ (धर्मच प्रमाण आहे) याद्वारे आम्ही निर्लज्जपणे चित्तात जसे येईल तसे बोलतो, म्हणून ते अप्रमाण आहे, परंतु जो येथे यथार्थ धर्म आहे, तोच प्रमाण आहे. प्राप्त केलेल्या प्रतिपत्तीने युक्त स्वभाव आहे, त्यासाठी तुमच्याद्वारे विविध उपदेश इत्यादींच्या कार्याने येथे उपस्थित राहिले पाहिजे, येथे पुष्कळ काही बोलले पाहिजे, असा अभिप्राय आहे. ๔๑๔. สารตฺตรตฺตาติ สารชฺชนวเสน รตฺตา, พหุลราควเสน อภิรตฺตาติ อตฺโถ. อตฺตนา ญาเปตพฺพมตฺถํ อนุคฺคหาเปติ โพเธตีติ อนุคฺคโห, ญาปิตการณํ, สห อนุคฺคเหนาติ สานุคฺคหา. เตนาห ‘‘สการณา’’ติ. กึ ปน ตํ การณํ? อิมสฺสาธิปฺปาโย ‘‘นตฺถิ ธมฺมิโก ปริพฺพโช’’ติ มยา วุตฺโต, อทฺธา ปนายสฺมา อุเทโน ยาถาวโต ธมฺมิกํ ปริพฺพชํ เม อาจิกฺขตีติ. เตนาห ‘‘วุตฺตญฺเหต’’นฺติอาทิ. ४१४. "सारत्तरत्ता" (अतिशय आसक्त) म्हणजे आसक्तीच्या वशतेमुळे आसक्त झालेले, तीव्र रागाच्या (वासनेच्या) वशतेमुळे अत्यंत आसक्त झालेले, असा अर्थ आहे. स्वतः समजून घेण्याजोगा अर्थ जो अनुग्रहित करतो, बोध करून देतो, तो 'अनुग्रह' म्हणजे समजून दिलेले कारण होय; अनुग्रहासहित असणे म्हणजे 'सानुग्रहा' (अनुग्रहासहित). म्हणूनच म्हटले आहे - "सकारणा" (कारणासहित). पण ते कारण कोणते? "धार्मिक परिव्राजक नाही" हा माझा अभिप्राय मी व्यक्त केला आहे, परंतु आयुष्यमान उदेन मला खरोखरच योग्य अशा धार्मिक परिव्राजकाविषयी सांगत आहेत. म्हणूनच "वृत्तञ्हेतम्" (हे सांगितले गेले आहे) इत्यादी म्हटले आहे. ๔๒๑. สพฺพมิทํ ถาวรชงฺคมํ ปุริสกตํ, ตสฺมา ยํ กิญฺจิ กตฺวา อตฺตา โปเสตพฺโพ รกฺขิตพฺโพติ โลกายตนิสฺสิโต นีติมคฺโค โฆฏมุขกนฺโต, ตสฺมา อาห ‘‘เอตสฺส กิร ชานนสิปฺเป’’ติอาทิ. สคฺเค [Pg.189] นิพฺพตฺโต นาม นตฺถิ อกตฺตพฺพเมว กรณโต. เทวโลกปริยาปนฺนธนํ มนุสฺสานํ อุปกปฺปปุญฺญาภาวโต ปุพฺเพ อตฺตนา นิหิตธนํ ‘‘อสุเก จา’’ติ อาจิกฺขิตฺวา คโต. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. ४२१. "हे सर्व स्थावर आणि जंगम (सजीव-निर्जीव) मनुष्यानेच निर्माण केले आहे, म्हणून काहीही करून स्वतःचे पोषण व रक्षण केले पाहिजे" हा लोकायत दर्शनावर आधारित नीति मार्ग घोटमुखाला प्रिय होता, म्हणूनच म्हटले आहे - "याच्या ज्ञानशिल्पात (विद्येत) नक्कीच..." इत्यादी. न करण्याजोगे कर्म केल्यामुळे स्वर्गात उत्पन्न होणे शक्य नाही. देवलोकातील संपत्ती मनुष्यांच्या उपकारक पुण्याच्या अभावामुळे प्राप्त होत नाही, म्हणून पूर्वी स्वतः पुरून ठेवलेले धन "अमुक ठिकाणी आहे" असे सांगून तो निघून गेला. उर्वरित भाग सहज समजण्याजोगा आहे. โฆฏมุขสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. घोटमुखसुत्त वर्णनाची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๕. จงฺกีสุตฺตวณฺณนา ५. चङ्कीसुत्त वर्णन (चङ्कीसुत्ताची अट्ठकथा) ๔๒๒. ตสฺมินฺติ สาลวเน. อุตฺตเรน โอปาสาทนฺติ โอปาสาทคามสฺส อุตฺตรทิสายํ. อุตฺตเรนาติ เอน-สทฺทโยเคน หิ โอปาสาทนฺติ อุปโยควจนํ. อชฺฌาวสตีติ เอตฺถ อธิ-อา-สทฺทานํ อนตฺถนฺตรตํ หทเย กตฺวา อาห ‘‘วสตี’’ติ. อิทานิ เตสํ อตฺถวิเสสภาวิตํ ทสฺเสนฺโต ‘‘อภิภวิตฺวา วา อาวสตี’’ติอาทิมาห. เอตฺถาติ โอปาสาทปเท. สตฺตุสฺสทนฺติอาทีสุ ปน กถนฺติ อาห – ‘‘ตสฺส อนุปฺปโยคตฺตาว เสสปเทสู’’ติ. อุป-อนุ-อธิ-อิติ-เอวํ-ปุพฺพเก วสนกิริยยาฏฺฐาเน อุปโยควจนเมว ปาปุณาตีติ สทฺทวิทู อิจฺฉนฺตีติ อาห ‘‘ลกฺขณํ สทฺทสตฺถโต ปริเยสิตพฺพ’’นฺติ. ตถา หิ วุตฺตํ ‘‘อุปสคฺควเสน ปเนตฺถ ภุมฺมตฺเถ อุปโยควจนํ เวทิตพฺพ’’นฺติ. อุสฺสทตา นาเมตฺถ พหุลตาติ ตํ พหุลตํ ทสฺเสตุํ ‘‘พหุชน’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. อาวชฺชิตฺวาติ ปริกฺขิปิตฺวา. ४२२. "त्यामध्ये" म्हणजे त्या सालवनात (सालाच्या जंगलात). "उत्तरेण ओपासादं" म्हणजे ओपासाद गावाच्या उत्तर दिशेला. 'उत्तरेण' या 'एन' प्रत्ययाने युक्त शब्दाच्या योगाने 'ओपासादं' यामध्ये द्वितीया विभक्ती (उपयोगवचन) झाली आहे. 'अज्झावसति' (अध्यावसति) यामध्ये 'अधि' आणि 'आ' या उपसर्गांच्या अर्थाचा अभेद् मनात ठेवून "वसति" (राहतात) असे म्हटले आहे. आता त्यांचा विशेष अर्थ दर्शवताना "अभिभूत करून किंवा जिंकून राहतात" इत्यादी म्हटले आहे. "येथे" म्हणजे ओपासाद या पदात. "सत्तुस्सदं" (प्राण्यांनी गजबजलेले) इत्यादींमध्ये कसे? तर म्हणतात - "त्याच्या अनुप्रयोगामुळेच उर्वरित पदांमध्ये". 'उप', 'अनु', 'अधि' इत्यादी उपसर्ग आधी असलेल्या 'वस्' (राहणे) या क्रियापदाच्या स्थानी द्वितीया विभक्तीच (उपयोगवचन) होते, असे व्याकरणकार मानतात, म्हणूनच म्हटले आहे - "लक्षण (नियम) व्याकरणशास्त्रातून शोधले पाहिजे". तसेच म्हटले आहे - "उपसर्गाच्या प्रभावामुळे येथे सप्तमीच्या अर्थात द्वितीया विभक्ती समजावी". 'उस्सदता' म्हणजे येथे विपुलता (प्रचुरता) होय, ती विपुलता दर्शवण्यासाठी "बहुजन" (अनेक लोक) इत्यादी म्हटले आहे. "आवज्जित्वा" म्हणजे वेढून किंवा घेरून. รญฺญา วิย ภุญฺชิตพฺพนฺติ วา ราชโภคฺคํ. รญฺโญ ทายภูตนฺติ กุลปรมฺปราย โภคฺคภาเวน รญฺญา ลทฺธทายภูตํ. เตนาห ‘‘ทายชฺชนฺติ อตฺโถ’’ติ. ราชนีหาเรน ปริภุญฺชิตพฺพโต อุทฺธํ ปริโภคลาภสฺส เสฏฺฐเทยฺยตา นาม นตฺถีติ อาห – ‘‘ฉตฺตํ อุสฺสาเปตฺวา ราชสงฺเขเปน ปริภุญฺชิตพฺพ’’นฺติ. ติตฺถปพฺพตาทีสูติ นทีติตฺถปพฺพตปาทคามทฺวารอฏวีมุขาทีสุ. นิสฺสฏฺฐปริจฺจตฺตนฺติ มุตฺตจาควเสน ปริจฺจตฺตํ กตฺวา. เอเตสํ พฺราหฺมณคหปติกานํ. "राजाप्रमाणे उपभोग घेण्याजोगे" म्हणून 'राजभोग्य'. "राजाचा दायभाग (वारसा)" म्हणजे कुलपरंपरेने उपभोग घेण्याच्या रूपाने राजाला मिळालेला दायभाग. म्हणूनच म्हटले आहे - "दायज्जं (वारसा) असा अर्थ आहे". राजाच्या पद्धतीने उपभोग घेण्यापेक्षा श्रेष्ठ असा उपभोग लाभ दुसरा कोणताही नसल्यामुळे म्हटले आहे - "छत्र उभारून राजाप्रमाणे संक्षेपाने उपभोग घेण्याजोगे". "तीर्थ-पर्वत इत्यादींमध्ये" म्हणजे नदीचे घाट, पर्वताच्या पायथ्याशी, गावाचे दरवाजे, अरण्याचे प्रवेशद्वार इत्यादी ठिकाणी. "निस्सट्ठपरिच्चत्तं" म्हणजे मुक्तहस्ते त्याग केल्याप्रमाणे दान केलेले. "या ब्राह्मण आणि गृहपतींचे". ๔๒๓. ติ สนฺนิปติตา. โย โกจิ วิญฺญูนํ อิจฺฉิโต ปญฺโห, ตสฺส ปุจฺฉิตสฺส ยาถาวโต กถนสมตฺโถ ปุจฺฉิตปญฺหพฺยากรณสมตฺโถ.กุลาปเทสาทินา มหตี มตฺตา เอตสฺสาติ มหามตฺโต. ४२३. "असे एकत्र आलेले". विद्वानांना अपेक्षित असलेला कोणताही प्रश्न विचारला असता, त्याचे यथायोग्य उत्तर देण्यास समर्थ असणारा म्हणजे 'विचारलेल्या प्रश्नाचे व्याकरण (स्पष्टीकरण) करण्यास समर्थ'. कुळाचा उल्लेख इत्यादींमुळे ज्याची प्रतिष्ठा मोठी आहे, तो 'महामात्र' (मोठा अधिकारी किंवा प्रतिष्ठित व्यक्ती). ๔๒๔. เตติ [Pg.190] ‘‘นานาเวรชฺชกา’’ติ วุตฺตพฺราหฺมณา. ‘‘อุภโต สุชาโต’’ติ (ที. นิ. ฏี. ๑.๓๐๓; อ. นิ. ฏี. ๓.๕.๑๓๔) เอตฺตเก วุตฺเต เยหิ เกหิจิ ทฺวีหิ ภาเคหิ สุชาตตา วิญฺญาเยยฺย, สุชาตสทฺโท จ ‘‘สุชาโต จารุทสฺสโน’’ติอาทีสุ (ม. นิ. ๒.๓๙๙; สุ. นิ. ๕๕๓; เถรคา. ๘๑๘) อาโรหปริณาหสมฺปตฺติปริยาโยติ ชาติวเสเนว สุชาตตํ วิภาเวตุํ ‘‘มาติโต จ ปิติโต จา’’ติ วุตฺตํ. อโนรสปุตฺตวเสนปิ โลเก มาตุปิตุสมญฺญา ทิสฺสติ, อิธ ปนสฺส โอรสปุตฺตวเสเนว อิจฺฉียตีติ ทสฺเสตุํ ‘‘สํสุทฺธคหณีโก’’ติ วุตฺตํ. ปิตา จ มาตา จ ปิตโร, ปิตูนํ ปิตโร ปิตามหา, เตสํ ยุโค ปิตามหยุโค, ตสฺมา ยาว สตฺตมา ปิตามหยุคาติ เอวเมตฺถ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. ยุคสทฺโท เจตฺถ เอกเสสนเยน ทฏฺฐพฺโพ ‘‘ยุโค จ ยุโค จ ยุคา’’ติ. เอวญฺหิ ตตฺถ ตตฺถ ทฺวินฺนํ คหิตเมว โหติ. เตนาห – ‘‘ตโต อุทฺธํ สพฺเพปิ ปุพฺพปุริสา ปิตามหคฺคหเณเนว คหิตา’’ติ. ปุริสคฺคหณญฺเจตฺถ อุกฺกฏฺฐนิทฺเทสวเสน กตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. เอวญฺหิ ‘‘มาติโต’’ติ ปาฬิวจนํ สมตฺถิตํ โหติ. อกฺขิตฺโตติ อปฺปตฺตเขโป. อนวกฺขิตฺโตติ สทฺธถาลิปากาทีสุ น อวกฺขิตฺโต. ชาติวาเทนาติ เหตุมฺหิ กรณวจนนฺติ ทสฺเสตุํ ‘‘เกน การเณนา’’ติอาทิ วุตฺตํ. เอตฺถ จ อุภโต…เป… ปิตามหยุคาติ เอเตน พฺราหฺมณสฺส โยนิโทสาภาโว ทสฺสิโต สํสุทฺธคหณิกภาวกิตฺตนโต. อกฺขิตฺโตติ อิมินา กิริยาปราธาภาโว. กิริยาปราเธน หิ สตฺตา เขปํ ปาปุณนฺติ. อนุปกุฏฺโฐติ อิมินา อยุตฺตสํสคฺคาภาโว. อยุตฺตสํสคฺคมฺปิ หิ ปฏิจฺจ สตฺตา อกฺโกสํ ลภนฺติ. ४२४. "ते" म्हणजे "नानावेरज्जका" (विविध देशांतील) असे म्हटलेले ब्राह्मण. "दोन्ही बाजूंनी सुजात (उत्कृष्ट जन्माचा)" एवढेच म्हटले असता, कोणत्याही दोन भागांनी सुजात असणे समजले जाऊ शकते, आणि 'सुजात' हा शब्द "सुजातो चारुदस्सनो" (सुजात आणि दर्शनीय) इत्यादींमध्ये शरीरसौष्ठवाच्या समृद्धीचा वाचक आहे, म्हणून केवळ जन्माच्या आधारेच सुजातत्व स्पष्ट करण्यासाठी "मातेच्या बाजूने आणि पित्याच्या बाजूने" असे म्हटले आहे. जगात दत्तक पुत्राच्या बाबतीतही माता-पित्यांचे नाव दिसते, परंतु येथे औरस पुत्राच्या अर्थानेच अपेक्षित आहे हे दर्शवण्यासाठी "संसुद्धगहणीको" (शुद्ध गर्भाशयाचा/वशंाचा) असे म्हटले आहे. माता आणि पिता म्हणजे 'पितर', पित्यांचे पिता म्हणजे 'पितामह' (आजोबा), त्यांची पिढी म्हणजे 'पितामहयुग', म्हणून "सातव्या पितामह पिढीपर्यंत" असा येथे अर्थ समजला पाहिजे. येथे 'युग' हा शब्द एकशेष समासाच्या नियमाने "युग आणि युग म्हणजे युगे" असा समजला पाहिजे. अशा प्रकारे प्रत्येक ठिकाणी दोघांचे ग्रहण होतेच. म्हणूनच म्हटले आहे - "त्याच्या पलीकडे सर्वच पूर्वज 'पितामह' या शब्दानेच ग्रहण केले जातात". आणि येथे 'पुरुष' शब्दाचे ग्रहण उत्कृष्ट निर्देशानुसार केले आहे असे समजले पाहिजे. अशा प्रकारे "मातितो" (मातेच्या बाजूने) या पालि वचनाचे समर्थन होते. "अक्खित्तो" म्हणजे ज्याच्यावर आक्षेप घेतला गेला नाही. "अनवक्खित्तो" म्हणजे श्राद्ध-थालीपाकादी (यज्ञीय अन्नादी) कार्यात बहिष्कृत न केलेला. "जातिवादेन" (जातीच्या वादाने) यामध्ये हेतू अर्थी तृतीया विभक्ती आहे हे दर्शवण्यासाठी "कोणत्या कारणाने" इत्यादी म्हटले आहे. आणि येथे "दोन्ही बाजूंनी... सातव्या पितामह पिढीपर्यंत" याने ब्राह्मणाचा योनिदोष (जन्मदोष) नसणे दर्शवले आहे, कारण त्याच्या शुद्ध वंशाचे वर्णन केले आहे. "अक्खित्तो" याने क्रियाविषयक अपराधाचा अभाव दर्शवला आहे. कारण क्रियाविषयक अपराधामुळेच प्राणी आक्षेप किंवा निंदेला पात्र ठरतात. "अनुपकुट्ठो" याने अयोग्य संसर्गाचा अभाव दर्शवला आहे. कारण अयोग्य संसर्गामुळेही प्राणी निंदेला पात्र ठरतात. อิสฺสโรติ อธิปเตยฺยสํวตฺตนิยกมฺมผเลน อีสนสีโล. สา ปนสฺส อิสฺสรตา วิภวสมฺปตฺติปจฺจยา ปากฏา ชาตาติ อฑฺฒตาปริยายภาเวน วทนฺโต ‘‘อฑฺโฒติ อิสฺสโร’’ติ อาห. มหนฺตํ ธนมสฺส ภูมิคตญฺเจว เวหาสฏฺฐญฺจาติ มหทฺธโน. ตสฺสาติ ตสฺส ตสฺส. วทนฺติ ‘‘อนฺวยโต พฺยติเรกโต จ อนุปสงฺกมนการณํ กิตฺเตมา’’ติ. "ईश्वर" म्हणजे अधिपत्य प्राप्त करून देणाऱ्या कर्माच्या फळामुळे शासन करण्याचा स्वभाव असलेला. त्याचे ते ईश्वरत्व (प्रभुत्व) वैभव आणि संपत्तीच्या कारणाने प्रकट झाले आहे, म्हणून समृद्धतेचा पर्याय दर्शवताना "अड्ढो (समृद्ध) म्हणजे ईश्वर" असे म्हटले आहे. ज्याचे भूमीगत (जमिनीत पुरलेले) आणि आकाशात (वर) असलेले धन मोठे आहे, तो 'महद्धन' (महाधनी). "त्याचे" म्हणजे त्या त्या व्यक्तीचे. "अन्वय आणि व्यतिरेक या दोन्ही पद्धतींनी जवळ न जाण्याचे कारण आम्ही सांगतो" असे म्हणतात. อธิกรูโปติ วิสิฏฺฐรูโป อุตฺตมสรีโร. ทสฺสนํ อรหตีติ ทสฺสนีโย. เตนาห ‘‘ทสฺสนโยคฺโค’’ติ. ปสาทํ อาวหตีติ ปาสาทิโก. เตนาห ‘‘จิตฺตปสาทชนนโต’’ติ. วณฺณสฺสาติ วณฺณธาตุยา[Pg.191]. สรีรนฺติ สนฺนิเวสวิสิฏฺโฐ กรจรณคีวาสีสาทิ อวยวสมุทาโย, โส จ สณฺฐานมุเขน คยฺหตีติ ‘‘ปรมาย วณฺณโปกฺขรตายาติ ปรมาย…เป… สมฺปตฺติยา จา’’ติ วุตฺตํ. สพฺพวณฺเณสุ สุวณฺณวณฺโณว อุตฺตโมติ วุตฺตํ ‘‘เสฏฺเฐน สุวณฺณวณฺเณน สมนฺนาคโต’’ติ. ตถา หิ พุทฺธา จกฺกวตฺติโน จ สุวณฺณวณฺณาว โหนฺติ. พฺรหฺมวจฺฉสีติ อุตฺตมสรีราโภ สุวณฺณาโภติ อตฺโถ. อิมเมว หิ อตฺถํ สนฺธายาห ‘‘มหาพฺรหฺมุโน สรีรสทิเสน สรีเรน สมนฺนาคโต’’ติ. น พฺรหฺมุชุคตฺตตํ. อขุทฺทาวกาโส ทสฺสนายาติ อาโรหปริณาหสมฺปตฺติยา อวยวปาริปูริยา จ ทสฺสนาย โอกาโส น ขุทฺทโก. เตนาห ‘‘สพฺพาเนวา’’ติอาทิ. अधिरूप म्हणजे विशिष्ट रूप असलेले, उत्तम शरीर असलेले. दर्शनास पात्र म्हणून 'दर्शनीय'. म्हणूनच म्हटले आहे 'दर्शनयोग्य'. प्रसन्नता निर्माण करणारे म्हणून 'प्रासादिक'. म्हणूनच म्हटले आहे 'चित्तप्रसाद निर्माण करणारे'. 'वर्णाचा' म्हणजे वर्णधातूचा. 'शरीर' म्हणजे हात, पाय, मान, डोके इत्यादी अवयवांचा विशिष्ट रचनेचा समूह, आणि तो आकृतीच्या स्वरूपात घेतला जातो म्हणून 'परम वर्णपोक्खरता' म्हणजे 'परम... पे... संपत्तीने' असे म्हटले आहे. सर्व वर्णांमध्ये सुवर्णवर्णच उत्तम आहे, म्हणून 'श्रेष्ठ सुवर्णवर्णाने युक्त' असे म्हटले आहे. कारण बुद्ध आणि चक्रवर्ती हे सुवर्णवर्णाचेच असतात. 'ब्रह्मवच्चसी' म्हणजे उत्तम शरीराची आभा असलेले, सुवर्ण आभा असलेले असा अर्थ आहे. याच अर्थाचा संदर्भ घेऊन म्हटले आहे 'महाब्रह्माच्या शरीरासारख्या शरीराने युक्त'. ब्रह्मासारखे सरळ शरीर नव्हे. 'दर्शनासाठी लहान नसलेला वाव' म्हणजे उंची आणि रुंदीच्या समृद्धीने आणि अवयवांच्या परिपूर्णतेने दर्शनासाठी असलेला वाव लहान नाही. म्हणूनच 'सर्वच' इत्यादी म्हटले आहे. ยมนิยมลกฺขณํ สีลมสฺส อตฺถีติ สีลวา, ตํ ปนสฺส รตฺตญฺญุตาย วุทฺธํ วฑฺฒิตํ สีลํ อสฺส อตฺถีติ วุทฺธสีลี, เตน จ สพฺพทา สมาโยคโต วุฑฺฒสีเลน สมนฺนาคโต. ปญฺจสีลมตฺตเมว สนฺธาย วทนฺติ ตโต ปรํ สีลสฺส ตตฺถ อภาวโต เตสญฺจ อชานนโต. यम-नियमांचे लक्षण असलेले शील ज्याच्याकडे आहे तो 'शीलवान'. आणि त्याचे ते शील बहुश्रुततेमुळे (रत्तञ्ञुता) वाढलेले, वृद्धिंगत झालेले शील ज्याच्याकडे आहे तो 'वृद्धशिली', आणि त्याच्याशी नेहमी जोडलेले असल्यामुळे तो 'वृद्धशीलाने युक्त' आहे. केवळ पंचशीलाचाच संदर्भ घेऊन ते बोलतात, कारण त्यानंतरच्या शीलाचा तिथे अभाव असतो आणि त्यांना त्याचे ज्ञान नसते. ฐานกรณสมฺปตฺติยา สิกฺขาสมฺปตฺติยา จ กตฺถจิปิ อนูนตาย ปริมณฺฑลปทานิ พฺยญฺชนานิ อกฺขรานิ เอติสฺสาติ ปริมณฺฑลปทพฺยญฺชนา. อถ วา ปชฺชติ อตฺโถ เอเตนาติ ปทํ, นามาทิ, ยถาธิปฺเปตมตฺถํ พฺยญฺเชตีติ พฺยญฺชนํ วากฺยํ, เตสํ ปริปุณฺณตาย ปริมณฺฑลปทพฺยญฺชนา. อตฺถญาปนสาธนตาย วาจาว กรณนฺติ วากฺกรณํ, อุทาหรณโฆโส. คุณปริปุณฺณภาเวน ตสฺส พฺราหฺมณสฺส, เตน วา ภาสิตพฺพอตฺถสฺส. ปูเร ปุณฺณภาเว. ปูเรติ จ ปุริมสฺมึ อตฺเถ อาธาเร ภุมฺมํ, ทุติยสฺมึ วิสเย. สุขุมาลตฺตเนนาติ อิมินา ตสฺสา วาจาย มุทุสณฺหภาวมาห. อปลิพุทฺธาย ปิตฺตเสมฺหาทีหิ. สนฺทิฏฺฐํ สพฺพํ ทสฺเสตฺวา วิย เอกเทสกถนํ. วิลมฺพิตํ สณิกํ จิรายิตฺวา กถนํ. ‘‘สนฺทิทฺธวิลมฺพิตาที’’ติ วา ปาโฐ. ตตฺถ สนฺทิทฺธํ สนฺเทหชนกํ. อาทิ-สทฺเทน ขลิตานุกฑฺฒิตาทึ สงฺคณฺหาติ. อาทิมชฺฌปริโยสานํ ปากฏํ กตฺวาติ อิมินา จสฺส วาจาย อตฺถปาริปูรึ วทนฺติ. उच्चारस्थान आणि प्रयत्नांच्या समृद्धीने तसेच शिक्षेच्या (प्रशिक्षणाच्या) समृद्धीने कुठेही उणीव नसल्यामुळे जिची पदे, व्यंजने आणि अक्षरे परिमंडळ (पूर्ण व गोल) आहेत ती 'परिमंडलपदव्यंजना' होय. अथवा ज्याच्याद्वारे अर्थ प्राप्त होतो ते 'पद' म्हणजे नाम इत्यादी, आणि अभिप्रेत अर्थ जो प्रकट करतो ते 'व्यंजन' म्हणजे वाक्य, त्यांच्या परिपूर्णतेमुळे 'परिमंडलपदव्यंजना' म्हटले आहे. अर्थ समजवून देण्याचे साधन असल्यामुळे वाणी हेच करण (साधन) आहे म्हणून 'वाक्करण' म्हणजे उच्चारणाचा घोष. गुणांच्या परिपूर्णतेमुळे त्या ब्राह्मणाचा, किंवा त्याने बोलण्याच्या अर्थाचा. 'पुरे' म्हणजे पूर्ण भावात. 'पुरे' हे पहिल्या अर्थात आधारात सप्तमी विभक्ती आहे, दुसऱ्या अर्थात विषयात आहे. 'सुकुमारतेने' याने त्या वाणीचा मृदू आणि मऊ भाव सांगितला आहे. पित्त, कफ इत्यादींनी अडथळा न आलेली. 'संदिट्ठ' म्हणजे सर्व दाखविल्यासारखे एका भागाचे कथन करणे. 'विलंबित' म्हणजे हळूहळू, उशिरा बोलणे. 'संदिद्धविलंबितादी' असाही पाठ आहे. तिथे 'संदिद्ध' म्हणजे संशय निर्माण करणारे. 'आदि' शब्दाने स्खलित (चुकणे), ओढून-ताणून बोलणे इत्यादींचा संग्रह होतो. 'आदी, मध्य आणि अंत स्पष्ट करून' याने त्याच्या वाणीची अर्थपरिपूर्णता सांगतात. ๔๒๕. สทิสาติ เอกเทเสน สทิสา. น หิ พุทฺธานํ คุเณหิ สพฺพถา สทิสา เกจิปิ คุณา อญฺเญสุ ลพฺภนฺติ. อิตเรติ อตฺตโน คุเณหิ อสทิสคุเณ. อิทนฺติ อิทํ อตฺถชาตํ. โคปทกนฺติ คาวิยา ปเท ฐิตอุทกํ. กุลปริยาเยนาติ กุลานุกฺกเมน. ४२५. समान म्हणजे एका अंशाने समान. कारण बुद्धांच्या गुणांशी सर्व प्रकारे समान असणारे कोणतेही गुण इतरांमध्ये आढळत नाहीत. 'इतर' म्हणजे स्वतःच्या गुणांशी असमान गुण असलेले. 'हे' म्हणजे हा अर्थसमूह. 'गोपदक' म्हणजे गाईच्या पाऊलखुणेत (खुरपणात) साचलेले पाणी. 'कुलपर्यायाने' म्हणजे कुळाच्या अनुक्रमाने. ตตฺถาติ [Pg.192] มญฺจเก. สีหเสยฺยํ กปฺเปสีติ ยถา ราหุ อสุรินฺโท อายามโต วิตฺถารโต อุพฺเพธโต จ ภควโต รูปกายสฺส ปริจฺเฉทํ คเหตุํ น สกฺโกติ, ตถารูปํ อิทฺธาภิสงฺขารํ อภิสงฺขโรนฺโต สีหเสยฺยํ กปฺเปสิ. तिथे म्हणजे मंचावर (शय्येवर). 'सिंहशय्या घेतली' म्हणजे ज्याप्रमाणे राहू असुरेंद्र लांबी, रुंदी आणि उंचीने भगवंतांच्या रूपकायाची मर्यादा मोजू शकत नाही, तशा प्रकारचा ऋद्धी-अभिसंस्कार करत त्यांनी सिंहशय्या घेतली. ปริสุทฺธฏฺเฐน อริยนฺติ อาห ‘‘อริยํ อุตฺตมํ ปริสุทฺธ’’นฺติ. อนวชฺชฏฺเฐน กุสลํ, น สุขวิปากฏฺเฐน. กตฺถจิ จตุราสีติ ปาณสหสฺสานิ กตฺถจิ อปริมาณาปิ เทวมนุสฺสา ยสฺมา จตุวีสติยา ฐาเนสุ อสงฺขฺเยยฺยา อปริเมยฺยา มคฺคผลามตํ ปิวนฺติ. โกฏิสตสหสฺสาทิปริมาเณนปิ พหู เอว. ตสฺมา อนุตฺตราจารสิกฺขาปนวเสเนว ภควา พหูนํ อาจริโย. เตติ กามราคโต อญฺเญ ภควตา ปหีนกิเลเส. परिशुद्ध अर्थाने 'अरीय' (आर्य) आहे म्हणून म्हटले आहे 'आर्य, उत्तम, परिशुद्ध'. निर्दोष अर्थाने 'कुशल', सुखविपाक अर्थाने नव्हे. काही ठिकाणी चौऱ्याऐंशी हजार प्राणी, तर काही ठिकाणी अमर्याद देव आणि मनुष्य, ज्या अर्थी चोवीस स्थानांवर असंख्य आणि अपरिमेय मार्गफल रूपी अमृताचे प्राशन करतात. कोटि-शत-सहस्र (अब्जावधी) इत्यादी परिमाणाने देखील ते पुष्कळच आहेत. म्हणूनच, सर्वोत्तम आचरण शिकवण्याच्या दृष्टीनेच भगवान बहुतांचे आचार्य आहेत. 'ते' म्हणजे कामरागाव्यतिरिक्त भगवंतांनी नष्ट केलेले इतर क्लेश. อปาปปุเรกฺขาโรติ อปาเปหิ ปุรกฺขรียติ, น วา ปาปํ ปุรโต กโรตีติปิ อปาปปุเรกฺขาโรติ อิมมตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘อปาเป นว โลกุตฺตรธมฺเม’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ อปาเปติ ปาปปปฏิปกฺเข ปาปรหิเต จ. พฺรหฺมนิ ภวา, พฺรหฺมุโน วา หิตา ครุกรณาทินา, พฺรหฺมานํ วา มคฺคํ ชานาตีติ พฺรหฺมญฺญา, ตสฺสา พฺรหฺมญฺญาย ปชาย. अपाय नसलेल्यांनी (पुण्यवानांनी) ज्यांना पुढे केले आहे तो 'अपापपुरेक्खारो', किंवा जो पापाला पुढे करत नाही तो 'अपापपुरेक्खारो' हा अर्थ दाखवण्यासाठी 'अपाप म्हणजे नऊ लोकोत्तर धर्म' इत्यादी म्हटले आहे. तिथे 'अपाप' म्हणजे पापाचे विरोधी आणि पापरहित. ब्रह्मामध्ये उत्पन्न झालेली, किंवा आदर-सत्कार इत्यादींद्वारे ब्रह्मासाठी हितकारक असलेली, किंवा ब्रह्माचा मार्ग जाणणारी ती 'ब्रह्मण्या', त्या ब्रह्मण्या प्रजेची. ติโรรฏฺฐา ติโรชนปทาติ เอตฺถ รชฺชํ รฏฺฐํ ราชนฺติ ราชาโน เอเตนาติ กตฺวา. ตเทกเทสภูตา ปเทสา ปน ชนปโท ชนา ปชฺชนฺติ เอตฺถ สุขชีวิกํ ปาปุณนฺตีติ กตฺวา. ปุจฺฉาย โทสํ สลฺลกฺเขตฺวาติ สมฺพนฺโธ. ภควา วิสฺสชฺเชติ เตสํ อุปนิสฺสยสมฺปตฺตึ จินฺเตตฺวาติ อธิปฺปาโย. นวกาติ อาคนฺตุกภาเวน อมฺหากํ อภินวา. परराष्ट्रातून, परजनपदातून, इथे राज्य म्हणजे राष्ट्र, ज्याच्याद्वारे राजे राज्य करतात ते. त्याचाच एक भाग असलेले प्रदेश म्हणजे 'जनपद', जिथे लोक सुखकारक जीवन प्राप्त करतात ते. 'प्रश्नातील दोष लक्षात घेऊन' हा संबंध आहे. भगवान त्यांच्या उपनिषय-संपत्तीचा (अध्यात्मिक पात्रतेचा) विचार करून उत्तर देतात, असा अभिप्राय आहे. 'नवक' म्हणजे आगंतुक (पाहुणे) म्हणून आमच्यासाठी नवीन असलेले. ๔๒๖. โอปาเตติ นิปฺปาเตตีติ อตฺโถ. ตถาภูโต จ ตตฺถ เปสิตา โหตีติ วุตฺตํ ‘‘ปเวเสตี’’ติ. สํปุรกฺขโรนฺตีติ สกฺกจฺจํ ปุพฺพงฺคมํ กโรนฺติ. เตนาห ‘‘ปุรโต กตฺวา วิจรนฺตี’’ติ. ४२६. खाली पाडतो, पाडून टाकतो असा अर्थ आहे. आणि तशा प्रकारे तिथे पाठवला जातो म्हणून 'प्रवेश करतो' असे म्हटले आहे. 'सं पुरक्खरोंती' म्हणजे आदराने पुढे करतात. म्हणूनच म्हटले आहे 'पुढे करून फिरतात'. ๔๒๗. สุทฺเท พหิ กตฺวา รโห สาสิตพฺพฏฺเฐน มนฺตา เอว ตํตํอตฺถปฏิปตฺติเหตุตาย ปทนฺติ มนฺตปทํ เวทํ. เตนาห ‘‘เวโท’’ติ. เอวํ กิราติ ปรมฺปรภาเวน อาภตนฺติ อาจริยปรมฺปราย อาภตํ. ปาวจนสงฺขาตสมฺปตฺติยาติ [Pg.193] ปมุขวจนมฺหิ อุทตฺตาทิสมฺปตฺติยา. สาวิตฺติอาทีหิ ฉนฺทพนฺเธหิ วคฺคพนฺเธหิ จาติ คายตฺตีอาทีหิ อชฺฌายานุวากาทีหิ ฉนฺทพนฺเธหิ จ วคฺคพนฺเธหิ จ. สมฺปาเทตฺวาติ ปทสมฺปตฺตึ อหาเปตฺวา. ปวตฺตาโรติ วา ปาวจนวเสน วตฺตาโร. สชฺฌายิตนฺติ คายนวเสน สชฺฌายิตํ, ตํ ปน ปเทเนว อิจฺฉิตนฺติ อาห ‘‘ปทสมฺปตฺติวเสนา’’ติ. อญฺเญสํ วุตฺตนฺติ ปาวจนวเสน อญฺเญสํ วุตฺตํ. ราสิกตนฺติ อิรุเวทยชุเวทสามเวทาทิวเสน, ตตฺถาปิ ปจฺเจกํ มนฺตพฺรหฺมาทิวเสน อชฺฌายานุวากาทิวเสน ราสิกตํ. ทิพฺเพน จกฺขุนา โอโลเกตฺวาติ ทิพฺพจกฺขุปริภณฺเฑน ยถากมฺมูปคญาเณน สตฺตานํ กมฺมสฺสกตํ, ปจฺจกฺขโต ทสฺสนฏฺเฐน ทิพฺพจกฺขุสทิเสน ปุพฺเพนิวาสญาเณน อตีตกปฺเป พฺราหฺมณานํ มนฺตชฺเฌนวิธิญฺจ โอโลเกตฺวา. ปาวจเนน สห สํสนฺเทตฺวาติ กสฺสปสมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ยํ วจนํ วฏฺฏสนฺนิสฺสิตํ, เตน สห อวิรุทฺธํ กตฺวา. น หิ เตสํ วิวฏฺฏสนฺนิสฺสิโต อตฺโถ ปจฺจกฺโข โหติ. อปราปเรติ อฏฺฐกาทีหิ อปราปเร, ปจฺฉิมา โอกฺกากราชกาลาทีสุ อุปฺปนฺนา. ปกฺขิปิตฺวาติ อฏฺฐกาทีหิ คนฺถิตมนฺตปเทสุ กิเลสสนฺนิสฺสิตปทานํ ตตฺถ ตตฺถ ปเท ปกฺขิปนํ กตฺวา. วิรุทฺเธ อกํสูติ พฺราหฺมณธมฺมิกสุตฺตาทีสุ (ขุ. นิ. พฺราหฺมณธมฺมิกสุตฺตํ) อาคตนเยเนว สํกิเลสิกตฺถทีปนโต ปจฺจนีกภูเต อกํสุ. ४२७. शुद्धांना बाहेर ठेवून एकांतात शिकवण्याच्या अर्थाने 'मंत' (मंत्र) आणि त्या त्या अर्थाच्या प्राप्तीचे कारण असल्यामुळे 'पद' म्हणजे 'मंतपद' (मंत्रपद) म्हणजेच वेद होय. म्हणूनच म्हटले आहे - 'वेदो' (वेद). 'एवं किरा' (असे म्हणतात) म्हणजे परंपरेने आणलेले, आचार्य परंपरेने चालत आलेले. 'पावचनसंखातसंपत्तिया' म्हणजे प्रमुख वचनातील उदात्त इत्यादी संपत्तीने. 'सावित्तीआदीहि छंदबंधेहि वग्गबंधेहि च' म्हणजे गायत्री इत्यादी छंदोबद्ध आणि अध्याय-अनुवाक इत्यादी वर्गबंधांनी. 'संपादेत्वा' म्हणजे पदांची संपत्ती न गमावता. 'पवत्तारो' म्हणजे प्रवचन रूपाने सांगणारे. 'सज्झायितं' म्हणजे गायन रूपाने सज्झाय (सराव) केलेले, परंतु ते पदांच्या द्वारेच इच्छित असल्यामुळे म्हटले आहे - 'पदसंपत्तीच्या वशाने'. 'अञ्ञेसं वृत्तं' म्हणजे प्रवचनाच्या वशाने इतरांना सांगितलेले. 'रासिकतं' म्हणजे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद इत्यादींच्या रूपाने, आणि त्यातही प्रत्येक मंत्र, ब्राह्मण इत्यादींच्या रूपाने, अध्याय, अनुवाक इत्यादींच्या रूपाने संकलित (राशीकृत) केलेले. 'दिब्बेन चक्खुना ओलोकेत्वा' (दिव्य चक्षूने पाहून) म्हणजे दिव्यचक्षूच्या साहाय्याने, यथाकर्मोपगज्ञानाने प्राण्यांचे कर्मस्वगतत्व, प्रत्यक्ष दर्शनाच्या अर्थाने दिव्यचक्षूसमान असलेल्या पूर्वेनिवासज्ञानाने (पुब्बेनिवासञाण) भूतकाळातील कल्पामध्ये ब्राह्मणांच्या मंत्रपठणाची पद्धत पाहून. 'पावचनेन सह संसंदेत्वा' म्हणजे कश्यप सम्यक्संबुद्धांचे जे वचन संसार-आश्रित (वट्टसन्निसित) आहे, त्याच्याशी सुसंगत करून. कारण त्यांचा विवर्त-आश्रित (विवट्टसन्निसित) अर्थ प्रत्यक्ष नसतो. 'अपरापरे' म्हणजे अष्टक इत्यादींपेक्षा नंतरचे, जे नंतरच्या ओक्काक राजाच्या काळादिकांमध्ये उत्पन्न झाले. 'पक्खिपित्वा' म्हणजे अष्टक इत्यादींनी रचलेल्या मंत्रपदांमध्ये क्लेश-आश्रित पदांचे तिथे तिथे पदांमध्ये प्रक्षिप्त (समाविष्ट) करून. 'विरुद्धे अकंसु' म्हणजे 'ब्राह्मणधम्मिक सुत्ता'त (खुद्दकनिकाय, ब्राह्मणधम्मिकसुत्त) आलेल्या पद्धतीनेच संक्लेशिक (मलीन) अर्थाचे प्रकाशन केल्यामुळे ते विरोधी बनवले. ๔๒๘. ปฏิปาฏิยา ฆฏิตาติ ปฏิปาฏิยา สมฺพทฺธา. ปรมฺปรสํสตฺตาติ อาทานิยาย ยฏฺฐิยา สํสตฺตา. เตนาห ‘‘ยฏฺฐิคฺคาหเกน จกฺขุมตา’’ติ. ปุริมสฺสาติ มณฺฑลากาเรน ฐิตาย อนฺธเวณิยา สพฺพปุริมสฺส หตฺเถน สพฺพปจฺฉิมสฺส กจฺฉํ คณฺหาเปตฺวา. ทิวสมฺปีติ อเนกทิวสมฺปิ. จกฺขุสฺส อนาคตภวํ ญตฺวา ยถาอกฺกนฺตฏฺฐาเนเยว อนุปติตฺวา อกฺกมนํว สลฺลกฺเขตฺวา ‘‘กหํ จกฺขุมา กหํ มคฺโค’’ติ ปริเวทิตฺวา. ४२८. 'पटीपाटिया घटिता' (अनुक्रमाने जोडलेले) म्हणजे अनुक्रमाने संबद्ध असलेले. 'परंपरासंसत्ता' म्हणजे धरून ठेवण्याच्या काठीशी जोडलेले. म्हणूनच म्हटले आहे - 'काठी धरणाऱ्या डोळस माणसाने'. 'पुरिमस्स' (पहिल्याच्या) म्हणजे वर्तुळाकार उभ्या असलेल्या अंधांच्या रांगेत सर्वात पहिल्याच्या हाताने सर्वात शेवटच्याची कंबर पकडवून. 'दिवसम्पि' म्हणजे अनेक दिवससुद्धा. डोळस माणसाचे न येणे जाणून, ज्या ठिकाणी पाऊल ठेवले आहे त्याच ठिकाणी पाऊल ठेवून चालण्यासारखे लक्षात घेऊन 'डोळस माणूस कुठे आहे, मार्ग कुठे आहे?' असा विलाप करून. ปาฬิอาคเตสุ ทฺวีสูติ สทฺธา อนุสฺสโวติ อิเมสุ ทฺวีสุ. เอวรูเปติ ยถา สทฺธานุสฺสวา, เอวรูเป เอว ปจฺจกฺขคาหิโนติ อตฺโถ. ตโยติ รุจิอาการปริวิตกฺกทิฏฺฐินิชฺฌานกฺขนฺติโย. ภูตวิปากาติ ภูตตฺถนิฏฺฐายกา อธิปฺเปตตฺถสาธกา, วุตฺตวิปริยาเยน อภูตตฺถวิปากา เวทิตพฺพา[Pg.194]. เอตฺถาติ เอเตสุ สทฺธายิตาทิวตฺถูสุ. เอกํเสเนว นิฏฺฐํ คนฺตุํ นาลํ อเนกนฺติกตฺตา สทฺธาทิคฺคาหสฺส. อุปริ ปุจฺฉาย มคฺคํ วิวริตฺวา ฐเปสิ สจฺจานุรกฺขาย ญาตุกามตาย อุปฺปาทิตตฺตา. ปสฺสติ หิ ภควา – มยา ‘‘สจฺจมนุรกฺขตา…เป… นิฏฺฐํ คนฺตุ’’นฺติ วุตฺเต สจฺจานุรกฺขณํ ญาตุกาโม มาณโว ‘‘กิตฺตาวตา’’ติอาทินา ปุจฺฉิสฺสติ, ตสฺส ตํ วิสฺสชฺเชตฺวา สจฺจานุโพเธ ปุจฺฉาย อวสรํ ทตฺวา ตสฺส อุปนิสฺสเย อุปการธมฺเม กเถสฺสามีติ. เตน วุตฺตํ – ‘‘อุปริ ปุจฺฉาย มคฺคํ วิวริตฺวา ฐเปสี’’ติ. 'पाळिआगतेसु द्वीसु' (पाळीमध्ये आलेल्या दोन्हींमध्ये) म्हणजे श्रद्धा आणि अनुश्रव (ऐकीव माहिती) या दोन्हींमध्ये. 'एवरूपे' म्हणजे जसे श्रद्धा आणि अनुश्रव आहेत, अशाच प्रकारच्या प्रत्यक्ष ग्रहण करणाऱ्यांच्या बाबतीत असा अर्थ आहे. 'तयो' (तीन) म्हणजे रुची, आकारपरिवितर्क (तर्क) आणि दृष्टीनिज्झानक्खंती (दृष्टीचे चिंतन करून स्वीकारणे). 'भूतविपाका' म्हणजे सत्य अर्थाचा निश्चय करणारे, अपेक्षित अर्थ साध्य करणारे; याच्या उलट 'अभूतविपाक' (असत्य अर्थाचा निश्चय करणारे) समजावे. 'एत्थ' (येथे) म्हणजे या श्रद्धा इत्यादी विषयांमध्ये. श्रद्धा इत्यादींचे ग्रहण अनैकांतिक (अनिश्चित) असल्यामुळे केवळ एकाच बाजूने निष्कर्षाप्रत पोहोचणे योग्य नाही. पुढे प्रश्नाचा मार्ग मोकळा करून ठेवला, कारण सत्य रक्षणाची इच्छा आणि जाणून घेण्याची इच्छा निर्माण झाली होती. कारण भगवान पाहतात की - माझ्याद्वारे 'सत्याचे रक्षण करणाऱ्याने...पे... निष्कर्षाप्रत पोहोचावे' असे म्हटले असता, सत्य रक्षण जाणून घेण्याची इच्छा असलेला तरुण (माणव) 'किती प्रमाणात' इत्यादी प्रश्न विचारेल, त्याचे उत्तर देऊन त्याला सत्याच्या अनुबोधाविषयी प्रश्न विचारण्याची संधी देऊन, त्याच्या उपनिषयाला (कल्याणाला) उपकारक असणारे धर्म मी सांगेन. म्हणूनच म्हटले आहे - 'पुढे प्रश्नाचा मार्ग मोकळा करून ठेवला'. ๔๓๐. อตฺตานญฺเญว สนฺธาย วทติ, ยโต วุตฺตํ ปาฬิยํ – ‘‘ยํ โข ปนายมายสฺมา ธมฺมํ เทเสติ, คมฺภีโร โส ธมฺโม ทุทฺทโส ทุรนุโพโธ’’ติอาทิ. ลุพฺภนฺตีติ โลภนียา ยถา ‘‘อปายคมนียา’’ติ อาห ‘‘โลภนีเยสุ ธมฺเมสูติ โลภธมฺเมสู’’ติ. ยถา วา รูปาทิธมฺมา โลภนียา, เอวํ โลโภติ อาห ‘‘โลภนีเยสุ ธมฺเมสูติ โลภธมฺเมสู’’ติ. เตเนวาห – ‘‘ยํ โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชติ, เอตฺถ นิวิสมานา นิวิสตี’’ติ (ที. นิ. ๒.๔๐๐; ม. นิ. ๑.๑๓๓; วิภ. ๒๐๓). เอเส นโย เสสปททฺวเยปิ. ४३०. स्वतःलाच उद्देशून बोलतात, म्हणूनच पाळीमध्ये म्हटले आहे - 'हा आयुष्यमान जो धर्म देशना करतो, तो धर्म गंभीर आहे, दुर्दर्श (पाहण्यास कठीण) आहे, दुरनुबोध (समजण्यास कठीण) आहे' इत्यादी. 'लुब्भन्ति' (लोभ पावतात) म्हणजे लोभनीय, जसे 'अपायगमनीया' (अपायकारक मार्गाने जाणारे) म्हटले आहे, तसेच 'लोभनीय धम्मांविषयी म्हणजे लोभधर्मांविषयी' असे म्हटले आहे. किंवा जसे रूप इत्यादी धर्म लोभनीय आहेत, तसेच लोभ आहे, म्हणून म्हटले आहे - 'लोभनीय धम्मांविषयी म्हणजे लोभधर्मांविषयी'. म्हणूनच म्हटले आहे - 'जगात जे काही प्रियरूप आणि सातरूप (सुखद रूप) आहे, तिथेच ही तृष्णा उत्पन्न होताना उत्पन्न होते, तिथेच ती स्थिर होताना स्थिर होते'. हाच नियम उर्वरित दोन पदांच्या बाबतीतही लागू होतो. ๔๓๒. นิเวเสตีติ ฐเปติ ปฏฺฐเปติ. ปยิรุปาสตีติ อุปฏฺฐานวเสน อุปคนฺตฺวา นิสีทติ. สุยฺยติ เอเตนาติ โสตนฺติ อาห ‘‘ปสาทโสต’’นฺติ. ตญฺหิ สวนาย โอทหิตพฺพนฺติ. ธาเรติ สนฺธาเรติ ตตฺเถว มนํ ฐเปติ. อตฺถโตติ ยถาวุตฺตสฺส ธมฺมสฺส อตฺถโต. การณโตติ ยุตฺติโต เหตุทาหรเณหิ อุปปตฺติโต. โอโลกนนฺติ เอวเมตนฺติ ยถาสภาวโต ปญฺญาจกฺขุนา ทฏฺฐพฺพตํ ขมนฺติ, ตญฺจ มหนฺตสฺส มณิโน ปชฺชลนฺตสฺส วิย อาวิกตฺวา อตฺถสฺส จิตฺเต อุปฏฺฐานนฺติ อาห ‘‘อิธา’’ติอาทิ. กตฺตุกมฺยตาฉนฺโทติ กตฺตุกามตาสงฺขาโต กุสลจฺฉนฺโท. วายมตีติอาทิโต จตุนฺนมฺปิ วีริยานํ วเสน วายามํ ปรกฺกมํ กโรติ. มคฺคปธานํ ปทหตีติ มคฺคาวหํ มคฺคปริยาปนฺนญฺจ สมฺมปฺปธานํ ปทหติ, ปทหนวเสน ตํ ปริปูเรติ. ปรมสจฺจนฺติ อโมฆธมฺมตฺตา ปรมตฺถสจฺจํ. สหชาตนามกาเยนาติ มคฺคปญฺญาสหชาตนามกาเยน. ตเทวาติ ตเทว ปรมสจฺจํ นิพฺพานํ. เตเนวาห – ‘‘สจฺฉิกิริยาภิสมเยน วิภูตํ ปากฏํ กโรนฺโต ปสฺสตี’’ติ. ४३२. 'निवेसेति' (प्रस्थापित करतो) म्हणजे ठेवतो, प्रस्थापित करतो. 'पयिरुपासति' (सेवा करतो/जवळ बसतो) म्हणजे उपस्थानाच्या (सेवेच्या) भावनेने जवळ जाऊन बसतो. 'सुय्यति एतेnaति सोतं' (ज्याद्वारे ऐकले जाते ते कान) म्हणून म्हटले आहे - 'प्रसादसोत' (श्रवणेंद्रिय). कारण ते ऐकण्यासाठी एकाग्र केले पाहिजे. 'धारेति' म्हणजे धारण करतो, तिथेच मन स्थिर करतो. 'अत्थतो' म्हणजे यथावक्त धर्माच्या अर्थावरून. 'कारणतो' म्हणजे युक्तीने, हेतू आणि उदाहरणांच्या उपपत्तीने. 'ओलोकनं' (अवलोकन) म्हणजे 'हे असेच आहे' असे यथास्वभावाने प्रज्ञाचक्षूने पाहण्यास योग्य असणे, आणि ते एखाद्या मोठ्या प्रज्वलित मण्याप्रमाणे स्पष्ट करून अर्थाचे चित्तात प्रकटीकरण होणे, म्हणून म्हटले आहे - 'इध' (येथे) इत्यादी. 'कत्तुकम्यताछंदो' म्हणजे काहीतरी करण्याची इच्छा असलेला कुशल छंद (कुशल इच्छा). 'वायमति' (प्रयत्न करतो) इत्यादीद्वारे चारही वीर्यांच्या (प्रयत्नांच्या) वशाने व्यायाम (प्रयत्न) आणि पराक्रम करतो. 'मग्गपधानं पदहति' म्हणजे मार्गाला वाहून नेणारे आणि मार्गात समाविष्ट असणारे सम्यक्प्रधान (सम्मापधान) आचरतो, आचरणाच्या वशाने ते परिपूर्ण करतो. 'परमसच्चं' (परम सत्य) म्हणजे अमोघ धर्म असल्यामुळे परमार्थ सत्य. 'सहजातनामकायेन' म्हणजे मार्गप्रज्ञेसोबत उत्पन्न झालेल्या नामकायाने. 'तदेव' म्हणजे तेच परम सत्य निर्वाण (निब्बान) होय. म्हणूनच म्हटले आहे - 'साक्षात्काराच्या अभिसमयाने स्पष्ट आणि प्रकट करत पाहतो'. ๔๓๓-๔. มคฺคานุโพโธติ [Pg.195] มคฺคปฏิปาฏิยา โพโธ พุชฺฌนํ, เยสํ กิเลสานํ สมุจฺฉินฺทนวเสน มคฺคปฺปฏิเวโธ, เตสํ ปฏิปสฺสมฺภนวเสน ปวตฺตมานํ สามญฺญผลํ, มคฺเคน ปฏิวิทฺธานิ สจฺจานิ, ปรมตฺถสจฺจเมว วา อนุรูปพุชฺฌนนฺติ อธิปฺปาโย. ‘‘สจฺจานุปฺปตฺตีติ ผลสจฺฉิกิริยา’’ติ วุตฺตํ. เอวญฺหิ สติ เหฏฺฐา วุตฺตา สทฺธาปฏิลาภาทโย ทฺวาทส ธมฺมา สจฺจานุปฺปตฺติยา อุปการา โหนฺติ, ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘เตสํเยวาติ เหฏฺฐา วุตฺตานํ ทฺวาทสนฺน’’นฺติ. นายํ ‘‘เตสํเยวา’’ติ ปทสฺส อตฺโถ. สติปิ กุสลวิปากาทิภาเวน นานตฺเต วตฺถารมฺมณภูมิกิจฺจาทิวเสน ปน สทิสาติ อุปายโตว มคฺคธมฺมา อาเสวิตา พหุลีกตา ผลภูตาติ วตฺตพฺพตํ อรหตีติ ตํสทิเส ตพฺโพหารํ กตฺวา ‘‘เตสํ มคฺคสมฺปยุตฺตธมฺมาน’’นฺติ วุตฺตํ. เอวญฺหิ อาเสวนาคหณํ สมตฺถิตํ, น อญฺญถา. น หิ เอกจิตฺตกฺขณิกานํ มคฺคธมฺมานํ อาเสวนา, พหุลีกมฺมํ วา อตฺถีติ. ตุลนาติ วิปสฺสนา. สา หิ วุฏฺฐานคามินิภูตา มคฺคปฺปธานสฺส พหุการา ตสฺส อภาเว มคฺคปฺปธานสฺเสว อภาวโต, เอวํ อุสฺสาโห ตุลนาย ฉนฺโท อุสฺสาหสฺส พหุกาโรติอาทินา เหฏฺฐิมสฺส อุปริมูปการตํ สุวิญฺเญยฺยเมวาติ อาห – ‘‘อิมินา นเยน สพฺพปเทสุ อตฺโถ เวทิตพฺโพ’’ติ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. ४३३-४. 'मग्गानुबोध' (मार्गाचा अनुबोध) म्हणजे मार्गाच्या अनुक्रमाने होणारा बोध किंवा ज्ञान. ज्या क्लेशांच्या समूच्छेदनाद्वारे (पूर्ण नाशाद्वारे) मार्ग-प्रतिवेध (मार्गाचा साक्षात्कार) होतो, त्यांच्या प्रतिप्रस्रब्धीमुळे (शांत होण्यामुळे) प्रवृत्त होणारे 'सामञ्ञफल' (श्रामण्यफळ), मार्गाने प्रतिवेध केलेले (जाणलेले) सत्य किंवा परमार्थ सत्याचाच अनुरूप बोध, असा याचा अभिप्राय आहे. 'सच्चानुप्पत्ती' (सत्याची प्राप्ती) म्हणजे फल-साक्षात्कारी' असे म्हटले आहे. असे असताना, खाली सांगितलेले श्रद्धा-लाभ इत्यादी बारा धर्म सत्याच्या प्राप्तीसाठी उपकारक ठरतात, म्हणूनच 'तेसंयेव' म्हणजे 'खाली सांगितलेल्या बारा धर्मांचेच' असे म्हटले आहे. 'तेसंयेव' या पदाचा हाच अर्थ नाही. कुशल-विपाक इत्यादी भावांच्या विविधतेमुळे भेद असला तरी, वस्तू, आलंबन, भूमी, कृत्य इत्यादींच्या दृष्टीने ते समान असल्याने, उपायानेच मार्गधर्मांचे सेवन व बहुलीकरण केले असता ते फलभूत होण्यास योग्य ठरतात. म्हणून त्यांच्याशी समान असलेल्या त्या व्यवहाराला अनुसरून 'त्या मार्गसंप्रयुक्त धर्मांचे' असे म्हटले आहे. अशा प्रकारे आसेवनाचे (पुन्हा पुन्हा सराव करण्याचे) ग्रहण समर्थित होते, अन्यथा नाही. कारण एका चित्तक्षणापुरते मर्यादित असलेल्या मार्गधर्मांचे आसेवन किंवा बहुलीकरण असू शकत नाही. 'तुलना' म्हणजे विपश्यना होय. ती वुठ्ठानगामिनी (उत्थानगामिनी) बनून मार्गप्रधानासाठी अत्यंत उपकारक ठरते, तिच्या अभावी मार्गप्रधानाचाच अभाव होतो. अशा प्रकारे उत्साह हा तुलनेसाठी आणि छंद हा उत्साहासाठी उपकारक ठरतो, इत्यादी प्रकारे खालच्या पायरीचा वरच्या पायरीसाठी असलेला उपकार सहज समजण्यासारखा आहे, म्हणूनच म्हटले आहे – 'या पद्धतीने सर्व पदांचा अर्थ समजून घ्यावा.' उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. จงฺกีสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. चङ्कीसुत्तवण्णनेची (चङ्की सूत्राच्या भाष्याची) लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๖. เอสุการีสุตฺตวณฺณนา ६. एसुकारीसुत्तवण्णना (एसुकारी सूत्राचे भाष्य) ๔๓๗. โกฏฺฐาสนฺติ มํสภาคํ. ลคฺคาเปยฺยุนฺติ นฺหารุนา วา วาเกน วา พนฺธิตฺวา ปุริสสฺส หตฺเถ วา วสนเคเห วา โอลมฺพนวเสน พนฺเธยฺยุํ. สตฺถธมฺมนฺติ สตฺถิเกสุ สตฺถวาเหน ปเณตพฺพํ อาณาธมฺมํ. ตสฺส นิกฺขมนตฺถนฺติ ตํ มูลํ สตฺถิเกหิ นิตฺถรณตฺถํ. ปาปํ อสฺสาติ ปริจรนฺตสฺส ปาริจริยาย อหิตํว อสฺส. เตนาห ‘‘น เสยฺโย’’ติ. อุจฺจกุลีนาทโย ทุติยวาราทีหิ วุจฺจนฺติ, อิธ อุปธิวิปตฺติสมฺปตฺติโย ปาปิยาทิปเทหิ วุตฺตาติ อธิปฺปาโย. เตนาห – ‘‘ปาปิโยติ ปาปโก ลามโก อตฺตภาโว อสฺสา’’ติ. เสยฺยํโสติ หิตโกฏฺฐาโส, หิตสภาโวติ อตฺโถ. อุจฺจกุลีนตาติ กรณตฺเถ ปจฺจตฺตวจนนฺติ อาห ‘‘อุจฺจากุลีนตฺเตนา’’ติ. ‘‘วณฺโณ น ขีเยถ ตถาคตสฺสา’’ติอาทีสุ [Pg.196] (ที. นิ. อฏฺฐ. ๑.๓๐๕; ๓.๑๔๑; ม. นิ. อฏฺฐ. ๒.๔๒๕; อุทา. ๕๓; อป. อฏฺฐ. ๒.๗.๒๐; พุ. วํ. อฏฺฐ. ๔.๔; จริยา. อฏฺฐ. ๑.นิทานกถา; ๒.ปกิณฺณกกถา; ที. นิ. ฏี. ๑.คนฺถารมฺภกถาวณฺณนา; สํ. นิ. ฏี. ๑.๒.๑; อ. นิ. ฏี. ๑.๑.๑; วชิร. ฏี. คนฺถารมฺภกถาวณฺณนา; สารตฺถ. ฏี. ๑.คนฺถารมฺภกถาวณฺณนา; เนตฺติ. ฏี. คนฺถารมฺภกถาวณฺณนา; ม. นิ. ฏี. ๑.๑) วิย วณฺณสทฺโท อิธ ปสํสาปริยาโยติ อาห ‘‘เวสฺโสปิ หิ อุฬารวณฺโณ โหตี’’ติ. ४३७. 'कोठ्ठासं' म्हणजे मांसाचा भाग. 'लग्गापेय्युं' म्हणजे शिरेने (स्नायूने) किंवा वल्कलाने बांधून माणसाच्या हातात किंवा राहत्या घरात लटकवून बांधावे. 'सत्थधम्मं' म्हणजे सार्थवाहकांद्वारे (व्यापाऱ्यांच्या प्रमुखांद्वारे) सार्थांमध्ये (व्यापारी समूहांमध्ये) लागू केला जाणारा आज्ञा-नियम (कायदा). 'तस्स निक्खमणत्थं' म्हणजे त्या सार्थांकडून त्या मूळ भांडवलाची सुटका करण्यासाठी. 'पापं अस्स' म्हणजे सेवा करणाऱ्याच्या सेवेमुळे त्याचे अहितच व्हावे. म्हणूनच म्हटले आहे – 'ना सेय्यो' (श्रेयस्कर नाही). उच्चकुलीन इत्यादी दुसऱ्या वेळी इत्यादींनी सांगितले जातात, येथे उपाधी-विपत्ती आणि उपाधी-संपत्ती 'पापिय' (पापी) इत्यादी पदांनी सांगितल्या आहेत, असा अभिप्राय आहे. म्हणूनच म्हटले आहे – 'पापियो' म्हणजे त्याचा पापी, निकृष्ट आत्मभाव (शरीर) असावा. 'सेय्यंसो' म्हणजे हिताचा भाग, हितकारक स्वभाव असा अर्थ आहे. उच्चकुलीनता हे करण अर्थातील प्रथमा विभक्तीचे वचन आहे, म्हणून 'उच्चाकुलीनत्तेन' (उच्चकुलीनतेमुळे) असे म्हटले आहे. 'तथागतांचा वर्ण (कीर्ती) नष्ट होऊ नये' इत्यादी वाक्यांप्रमाणे येथे 'वण्ण' (वर्ण) हा शब्द प्रशंसेचा समानार्थी आहे, म्हणूनच म्हटले आहे – 'वैश्य देखील उदार वर्णाचा (कीर्तीचा) असतो.' ๔๔๐. ‘‘นิรโว ปทสทฺโท โสฬารโคตฺตสฺส อกิณฺณมตฺติกาปตฺโต ติฏฺเฐยฺย อสงฺคจารี’’ติ วุตฺตตฺตา ภิกฺขา จริตพฺพาว, อยํ เตสํ กุลธมฺโมติ อธิปฺปาโย. หริตฺวาติ อปเนตฺวา. สตฺตชีโว สตฺตวาณิชโก. โคเปติ รกฺขตีติ โคโป, อารกฺขาธิกาเร นิยุตฺโต. อสนฺติ ลูนนฺติ เตนาติ อสิตํ, ลวิตฺตํ. วิวิธํ ภารํ อาภญฺชนฺติ โอลมฺพนฺติ เอตฺถาติ พฺยาภงฺคี, กาชํ. ४४०. 'सोळा गोत्रांच्या (कुलांच्या) भिक्षूचा पाऊल वाजता कामा नये, त्याने मातीने माखलेले पात्र घेऊन आसक्तीरहित होऊन फिरावे' असे म्हटल्यामुळे भिक्षा मागणेच योग्य आहे, हा त्यांचा कुलधर्म आहे असा अभिप्राय आहे. 'हरित्वा' म्हणजे दूर करून (बाजूला करून). 'सत्तजीवो' म्हणजे प्राण्यांचा व्यापारी. 'गोपेति रक्खतीति गोपो' म्हणजे जो रक्षण करतो तो गोप (राखणदार), जो रक्षणाच्या कामात नियुक्त आहे. 'असन्ति लूनन्ति तेनाति असितं' म्हणजे ज्याने कापले जाते ते असित (विळा/दातेरी विळा). 'विविधं भारं आभञ्जन्ति ओलम्बन्ति एत्थाति ब्याभङ्गी' म्हणजे ज्यावर विविध प्रकारचे ओझे लटकवले जाते ती व्याभंगी (कावड). ๔๔๑. อนุสฺสรโตติ อนุสฺสรณเหตุ กุลวํสานุสฺสรณกฺขเณ ขตฺติโยติอาทินา สงฺขฺยํ คจฺฉติ. เตนาห ‘‘โปราเณ…เป… อนุสฺสริยมาเน’’ติ. อุจฺจนีจตฺตชานนตฺถญฺจ กุลววตฺถานํ กตํ โหตีติ ขตฺติยาทิกุลกมฺมุนา เตสํ จตุนฺนํ วณฺณานํ สนฺธนํ ชีวิกํ ปญฺญเปนฺติ พฺราหฺมณา, ตถาคโต ปน โลกุตฺตรธมฺมเมว ปุริสสฺส สนฺธนํ ปญฺญเปติ เตน สตฺตสฺส โลกคฺคภาวสิทฺธิโต. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. ४४१. 'अनुस्सरतो' म्हणजे अनुस्मरण करण्याच्या हेतूने, कुलवंशाच्या अनुस्मरण क्षणी 'क्षत्रिय' इत्यादी नावाने तो गणला जातो. म्हणूनच म्हटले आहे – 'पोराणे...पे... अनुस्सरियमाने' (प्राचीन...पे... अनुस्मरण केले जात असताना). उच्च-नीच भाव जाणण्यासाठी कुलाची व्यवस्था केली जाते, म्हणून क्षत्रिय इत्यादी कुलांच्या कर्माद्वारे त्या चार वर्णांचे संधान (उपजीविका) ब्राह्मण प्रस्थापित करतात. परंतु, तथागत मात्र लोकोत्तर धर्मालाच मनुष्याचे संधान (खरे धन/उपजीविका) म्हणून प्रस्थापित करतात, कारण त्यामुळे प्राण्याला जगातील सर्वश्रेष्ठ पदाची सिद्धी (प्राप्ती) होते. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. เอสุการีสุตฺตวณฺณนา ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. एसुकारीसुत्तवण्णनेची (एसुकारी सूत्राच्या भाष्याची) लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๗. ธนญฺชานิสุตฺตวณฺณนา ७. धनञ्जानिसुत्तवण्णना (धनञ्जानि सूत्राचे भाष्य) ๔๔๕. ราชคหํ ปริกฺขิปิตฺวา ฐิตปพฺพตสฺสาติ ปณฺฑวปพฺพตํ สนฺธายาห. ราชคหนครสฺส ทกฺขิณทิสาภาเค ปพฺพตสฺส สมีเป ฐิโต ชนปโท ทกฺขิณาคิริ. ตณฺฑุลปุฏกานํ ปาลิ เอตฺถาติ ตณฺฑุลปาลิ. ตสฺส [Pg.197] กิร ทฺวารสมีเป ตณฺฑุลวาณิชา ตณฺฑุลปสิพฺพเก วิวริตฺวา ปฏิปาฏิยา ฐเปตฺวา นิสีทนฺติ, เตนสฺส ‘‘ตณฺฑุลปาลิทฺวาร’’นฺติ สมญฺญา อโหสิ. สพฺพเมว สสฺสํ คณฺหาตีติ ทลิทฺทกสฺสกานํ ทิวสปริพฺพยมตฺตเมว วิสฺสชฺเชตฺวา สพฺพเมว อายโต นิปฺผนฺนํ ธญฺญํ คณฺหาติ. มนฺทสสฺสานีติ มนฺทนิปฺผตฺติกานิ สสฺสานิ. ४४५. 'राजगृहाला वेढून असलेल्या पर्वताच्या' म्हणजे पाण्डव पर्वताला उद्देशून म्हटले आहे. राजगृहनगराच्या दक्षिण देशात पर्वताच्या जवळ असलेला प्रदेश म्हणजे दक्षिणागिरी होय. तांदळाच्या पोत्यांची रांग (पाळ) जेथे असते ती 'तण्डुलपालि'. असे म्हणतात की, त्याच्या दाराजवळ तांदळाचे व्यापारी तांदळाची पोती उघडून एका ओळीत ठेवून बसत असत, म्हणूनच त्याला 'तण्डुलपालिद्वार' अशी संज्ञा मिळाली. 'सब्बमेव सस्सं गण्हाती' म्हणजे गरीब शेतकऱ्यांच्या केवळ दैनंदिन खर्चापुरतेच सोडून, उत्पन्नातून मिळालेले सर्वच धान्य तो घेऊन घेतो. 'मन्दसस्सानी' म्हणजे कमी पिकलेली (अल्प उत्पादन झालेली) पिके. ๔๔๖. อิมินา นเยนาติ ทาสกมฺมกรสฺส นิวาสนภตฺตเวตฺตนานุปฺปทาเนน มงฺคลทิวเสสุ ธนวตฺถาลงฺการานุปฺปทานาทินา จ โปเสตพฺโพ. มิตฺตามจฺจานํ ปิยวจนอตฺถจริยาสมานตฺตตาทิ มิตฺตามจฺจกรณียํ กตฺตพฺพํ, ตถา ญาติสาโลหิตานํ. ตตฺถ อาวาหวิวาหสมฺพทฺเธน ‘‘อมฺหากํ อิเม’’ติ ญายนฺตีติ ญาตี, มาตาปิตาทิสมฺพทฺธตาย สมานโลหิตาติ สาโลหิตา. สมฺมา ททนฺเตสุปิ อสชฺชนโต นตฺถิ เอเตสํ ติถีติ อติถิ, เตสํ อตฺตนา สมานปริโภควเสน อติถิกรณียํ กาตพฺพํ, อติถิพลีติ อตฺโถ. ญาตกภูตปุพฺพา เปตฺติวิสยํ อุปคตา ปุพฺพเปตา, ทกฺขิเณยฺเยสุ กาเลน กาลํ ทานํ ทตฺวา เตสํ อุทฺทิสนํ ปุพฺพเปตกรณียํ, เปตพลีติ อตฺโถ. คนฺธปุปฺผวิเลปนชาลาภตฺเตหิ กาเลน กาลํ เทวตานํ ปูชา เทวตากรณียํ, เทวตาพลีติ อตฺโถ, ราชกิจฺจกรณํ อุปฏฺฐานํ ราชกรณียํ. อยมฺปิ กาโยติ อตฺตโน กายํ สนฺธาย วทติ. อิมมตฺถํ สนฺธายาห ‘‘อิมินา นเยน อตฺโถ เวทิตพฺโพ’’ติ. ४४६. 'इमिना नयेन' म्हणजे दास आणि कर्मकरांना (नोकर-चाकरांना) निवास, अन्न आणि वेतन देऊन तसेच मंगल प्रसंगी धन, वस्त्र, अलंकार इत्यादी देऊन त्यांचे पोषण केले पाहिजे. मित्र आणि अमात्यांशी प्रिय बोलणे, अर्थचर्या (कल्याण करणे), समानशीलता इत्यादी मित्र-अमात्य कर्तव्ये केली पाहिजेत, त्याचप्रमाणे ज्ञाती आणि सालोहितांचे (नातेवाईक आणि रक्तसंबंधीयांचे) कर्तव्य केले पाहिजे. तेथे, विवाहसंबंधाने 'हे आमचे आहेत' असे जे ओळखले जातात ते 'ज्ञाती' (नातेवाईक) आणि माता-पित्यांच्या संबंधामुळे जे समान रक्ताचे आहेत ते 'सालोहित' (रक्तसंबंधी) होत. योग्य प्रकारे दान देणाऱ्यांकडेही तिथी न ठरवता येत असल्याने त्यांना 'अतिथी' म्हणतात, त्यांच्यासाठी स्वतःच्या समान उपभोगाच्या भावनेने अतिथी-कर्तव्य केले पाहिजे, म्हणजेच अतिथीबली होय. पूर्वी नातेवाईक असलेले आणि आता प्रेतलोकात गेलेले ते 'पुब्बपेत' (पूर्वप्रेत) होत, पूजनीय व्यक्तींना वेळोवेळी दान देऊन ते त्यांना समर्पित करणे हे पूर्वप्रेत-कर्तव्य होय, म्हणजेच प्रेतबली होय. गंध, पुष्प, विलेपन आणि दीप-नैवेद्याने वेळोवेळी देवतांची पूजा करणे हे देवता-कर्तव्य होय, म्हणजेच देवतावली (देवताबली) होय. राजाच्या कामात उपस्थित राहून सेवा करणे हे राजकर्तव्य होय. 'अयम्पि कायो' (हा शरीर देखील) असे स्वतःच्या शरीराला उद्देशून म्हटले आहे. याच अर्थाला उद्देशून म्हटले आहे – 'या पद्धतीने अर्थ समजून घ्यावा.' ๔๔๗. ปญฺจ ทุสฺสีลฺยกมฺมานีติ นิจฺจสีลปฏิปกฺขธมฺมา. ทส อกุสลกมฺมปถธมฺมา ทส ทุสฺสีลฺยกมฺมานิ. อธมฺมจารี เอว วิสมจารี กายวิสมาทิจรณโตติ วิสมจารีปทสฺส อตฺโถ วิสุํ น วุตฺโต. ४४७. पाच दुःशील कर्मे म्हणजे नित्यशीलाच्या विरुद्ध असलेले धर्म (नियम) होत. दहा अकुशल कर्मपथ धर्म हेच दहा दुःशील कर्मे होत. अधर्मचारी हाच विषमचारी होय, कारण तो कायिक (शारीरिक) विषम आचरण करतो, म्हणूनच 'विषमचारी' या शब्दाचा अर्थ वेगळा सांगितलेला नाही. ๔๔๘-๔๕๓. โอสรนฺติ อปสกฺกนฺติ, ขียนฺตีติ อตฺโถ. เตนาห ‘‘ปริหายนฺตี’’ติ. อภิสรนฺตีติ อภิวฑฺฒนวเสน ปวตฺตนฺติ. เตนาห ‘‘วฑฺฒนฺตี’’ติ. ตตฺราติ พฺรหฺมโลเก. อสฺสาติ พฺรหฺมโลเก อุปฺปนฺนสฺส ธนญฺชานิสฺส. ตโต ปฏฺฐายาติ ยทา ภควตา ‘‘เอโส, ภิกฺขเว, สาริปุตฺโต’’ติอาทิ วุตฺตํ, ตโต ปฏฺฐาย. จตุสจฺจวินิมุตฺตนฺติ นิทฺธาเรตฺวา วิภชิตฺวา วุจฺจมาเนหิ สจฺเจหิ วิมุตฺตํ. อตฺถโต ปน ตโต ปุพฺเพปิ สจฺจวิมุตฺตํ กถํ น กเถสิเยว สจฺจวิมุตฺตสฺส นิยฺยานสฺส อภาวโต. ४४८-४५३. 'ओसरन्ति' म्हणजे मागे हटतात, क्षीण होतात असा अर्थ आहे. म्हणूनच 'परिहायन्ति' (ऱ्हास पावतात) असे म्हटले आहे. 'अभिसरन्ति' म्हणजे अभिवृद्धीच्या (वाढण्याच्या) रूपाने प्रवृत्त होतात. म्हणूनच 'वड्ढन्ति' (वाढतात) असे म्हटले आहे. 'तत्र' म्हणजे ब्रह्मलोकात. 'अस्स' म्हणजे ब्रह्मलोकात उत्पन्न झालेल्या धनंजानीचे. 'ततो पट्ठाय' म्हणजे जेव्हा भगवंतांनी 'भिक्खूहो, हा सारिपुत्त आहे' इत्यादी म्हटले, तेव्हापासून. 'चतुसच्चविनिमुत्तं' म्हणजे निश्चित करून, विभागून सांगितल्या जाणाऱ्या (चार) सत्यांपासून मुक्त. अर्थाच्या दृष्टीने तर त्यापूर्वीही सत्यमुक्त (सत्याहून वेगळे) का सांगितले नाही? कारण सत्यमुक्तामध्ये नैर्याणिकत्व (मुक्तीकडे नेणारा मार्ग) नसते. ธนญฺชานิสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. धनंजानिसुत्तवर्णनेची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๘. วาเสฏฺฐสุตฺตวณฺณนา ८. वासेठ्ठसुत्तवर्णना (वासेठ्ठ सुत्ताची टीका) ๔๕๔. ชาตึ [Pg.198] โสเธตุกามา โหนฺตีติ สหวาสีนํ พฺราหฺมณานํ กิริยา ปราเธน วา อสารุปฺปตฺเตน วา ชาติยา อุปกฺกิเลสํ อาสงฺกาย ตํ โสเธตุกามา โหนฺติ. มนฺเต โสเธตุกามา โหนฺตีติ มนฺตวจเน อาจริยมติโจทนาย อญฺเญน วากฺเยน เกนจิ การเณน สํสเย อุปฺปนฺเน ตํ โสเธตุกามา โหนฺติ. อนฺตราติ เวมชฺเฌ, อญฺญตฺเถวา อนฺตราสทฺโทติ ตสฺส อญฺญา กถาติ วจนํ อวคนฺตพฺพํ. ขนฺตีเมตฺตานุทฺทยาทิคุณสมฺปนฺโน เอว ‘‘สีลวาติ คุณวา’’ติอาห. เตหิ สีลสฺส วิสฺสชฺชนกาเลปิ ‘‘สีลวา’’ติ วุจฺจติ. สมฺปนฺนสีลตฺตา วา เตหิ สมนฺนาคโต เอว โหตีติ อาห ‘‘สีลวาติ คุณวา’’ติ. อาจารสมฺปนฺโนติ สาธุ อาจารวตฺโต. ४५४. 'जातिं सोधेतुकामा होन्ति' (जात शुद्ध करण्याची इच्छा असणारे असतात) म्हणजे सोबत राहणाऱ्या ब्राह्मणांच्या क्रियेच्या अपराधाने किंवा अयोग्यतेने जातीच्या उपक्लेशाची (दोषाची) शंका आल्यामुळे ते ती शुद्ध करू इच्छितात. 'मन्ते सोधेतुकामा होन्ति' (मंत्र शुद्ध करण्याची इच्छा असणारे असतात) म्हणजे मंत्रवचनात आचार्यांच्या मताच्या प्रेरणेने किंवा इतर कोणत्याही वाक्यामुळे काही कारणाने संशय उत्पन्न झाल्यावर ते ते शुद्ध करू इच्छितात. 'अन्तरा' म्हणजे मध्ये (मध्यभारी), इतर ठिकाणी 'अन्तरा' हा शब्द 'त्याची दुसरी कथा' या अर्थाने समजला पाहिजे. क्षमा, मैत्री, अनुकंपा इत्यादी गुणांनी संपन्न असलेल्यालाच 'शीलवान आणि गुणवान' असे म्हटले आहे. त्यांच्याद्वारे शीलाचा त्याग करण्याच्या वेळीही 'शीलवान' असे म्हटले जाते. किंवा संपन्न शील असल्यामुळे तो त्यांच्याशी युक्तच असतो, म्हणून 'शीलवान आणि गुणवान' असे म्हटले आहे. 'आचारसंपन्न' म्हणजे चांगल्या आचरणाने युक्त असलेला. ๔๕๕. สิกฺขิตาติ เตวิชฺชานํ สิกฺขิตา ตุมฺเห, น ทานิ ตุมฺเหหิ กิญฺจิ กตฺตพฺพํ อตฺถีติ อตฺโถ. ปฏิญฺญาตาติ ปฏิชานิตฺวา ฐิตา. ४५५. 'सिक्खिता' म्हणजे तुम्ही त्रैविद्यांचे (तेविज्जांचे) शिक्षण घेतलेले आहे, आता तुम्हाला काहीही करणे बाकी राहिलेले नाही असा अर्थ आहे. 'पटिञ्ञाता' म्हणजे प्रतिज्ञा करून (मान्य करून) राहिलेले. เวทตฺตยสงฺขาตา ติสฺโส วิชฺชา อชฺฌยนฺตีติ เตวิชฺชา. เตนาห ‘‘ติเวทาน’’นฺติ. ตโย เวเท อณนฺติ อชฺฌยนฺตีติ พฺราหฺมณา, เตสํ. ยํ เอกํ ปทมฺปิ อกฺขาตํ, ตํ อตฺถโต พฺยญฺชนโต จ เกวลิโน อธิยิโน อปฺปปโยเคน. นิฏฺฐาคตมฺหาติ นิปฺผตฺตึ คตา อมฺหา เตวิชฺชาย สกสมยสฺส กถเน. तीन वेद नावाच्या three विद्यांचे जे अध्ययन करतात ते 'तेविज्जा' (त्रैविद्य) होत. म्हणूनच 'तिवेदानं' असे म्हटले आहे. जे तीन वेदांचे पठण करतात, अध्ययन करतात ते ब्राह्मण होत, त्यांचे. जे एक पद देखील सांगितले आहे, ते अर्थाच्या दृष्टीने आणि व्यंजनाच्या (शब्दाच्या) दृष्टीने संपूर्णपणे अध्ययन करणाऱ्याच्या अल्प प्रयत्नानेच (समजते). 'निट्ठागतम्हा' म्हणजे आम्ही आमच्या सिद्धांताच्या कथनात त्रैविद्येमध्ये निष्पत्तीला (पूर्णतेला) प्राप्त झालो आहोत. มโนกมฺมโต หิ วตฺตสมฺปทาติการณูปจาเรนายมตฺโถ วุตฺโตติ อาห – ‘‘เตน สมนฺนาคโต หิ อาจารสมฺปนฺโน โหตี’’ติ. मनोकर्मामुळेच व्रतसंपत्ती इत्यादी कारणांच्या उपचाराने हा अर्थ सांगितला आहे, म्हणूनच म्हटले आहे – 'त्याच्याशी युक्त असलेलाच आचारसंपन्न असतो'. ขยาตีตนฺติ วฑฺฒิปกฺเข ฐิตนฺติ อตฺโถ. สุกฺกปกฺขปาฏิปทโต ปฏฺฐาย หิ จนฺโท วฑฺฒตีติ วุจฺจติ, น ขียตีติ. วนฺทมานา ชนา นมกฺการํ กโรนฺติ. 'खयातीतं' म्हणजे वृद्धीच्या पक्षात (शुक्ल पक्षात) असलेला असा अर्थ आहे. कारण शुक्ल पक्षाच्या प्रतिपदेपासून चंद्र वाढतो असे म्हटले जाते, क्षीण होतो असे नाही. वंदन करणारे लोक नमस्कार करतात. อตฺถทสฺสเนนาติ วิวรเณน ทสฺสนปริณายกฏฺเฐน โลกสฺส จกฺขุ หุตฺวา สมุปฺปนฺนํ. 'अत्थदस्सनेन' म्हणजे विवरणाने, दर्शनाच्या मार्गदर्शकत्वाच्या अर्थाने जगाचा डोळा (चक्षू) होऊन उत्पन्न झालेले. ๔๕๖. ติฏฺฐตุ ตาว พฺราหฺมณจินฺตาติ – ‘‘กึ ชาติยา พฺราหฺมโณ โหติ อุทาหุ ภวติ กมฺมุนา’’ติ อยํ พฺราหฺมณวิจาโร ตาว ติฏฺฐตุ[Pg.199]. ชาติทสฺสนตฺถํ ติณรุกฺขกีฏปฏงฺคโต ปฏฺฐาย โลเก ชาติวิภงฺคํ วิตฺถารโต กเถสฺสามีติ เตสํ จิตฺตสมฺปหํสนตฺถํ เทเสตพฺพมตฺถํ ปฏิชานาติ. ตตฺถ อญฺญมญฺญา หิ ชาติโยติ อิทํ การณวจนํ, ยสฺมา อิมา ชาติโย นาม อญฺญมญฺญํ วิสิฏฺฐา, ตสฺมา ชาติวิภงฺคํ พฺยากริสฺสามีติ. ४५६. 'तिट्ठतु तावं ब्राह्मणचिन्ता' म्हणजे – 'माणूस जन्माने ब्राह्मण होतो की कर्माने होतो?' हा ब्राह्मणाविषयीचा विचार तूर्तास बाजूला राहू द्या. जाती दाखवण्यासाठी गवत, वृक्ष, कीटक, पतंग इत्यादींपासून सुरुवात करून जगातील जातींचे वर्गीकरण (जातिविभंग) विस्ताराने सांगेन, अशा प्रकारे त्यांच्या चित्ताला आनंदित करण्यासाठी उपदेश करावयाच्या विषयाची प्रतिज्ञा करतात. त्यामध्ये 'अञ्ञमञ्ञा हि जातियो' (कारण जाती एकमेकांपासून भिन्न आहेत) हे कारणाचे वचन आहे; ज्याअर्थी या जाती एकमेकांपासून विशिष्ट (भिन्न) आहेत, म्हणूनच मी जातींचे वर्गीकरण स्पष्ट करीन. ยสฺมา อิธ อุปาทินฺนกชาติ พฺยากาตพฺพภาเวน อาคตา, ตสฺสา ปน นิทสฺสนภาเวน อิตรา, ตสฺมา ‘‘ชาติวิภงฺคํ ปาณาน’’นฺติ ปาฬิยํ วุตฺตํ. เตสํ เตสํ ปาณานํ ชาติโยติ อตฺโถ. เอวนฺติ นิทสฺสนํ กเถตฺวา นิทสฺสิตพฺเพ กถิยมาเน. ตสฺสาติ วาเสฏฺฐสฺส. กามํ ‘‘เตสํ โวหํ พฺยกฺขิสฺส’’นฺติ อุโภปิ มาณเว นิสฺสาย เทสนา อาคตา, ตถาปิ ตตฺถ ตตฺถ ‘‘เอวํ, วาเสฏฺฐ, ชานาหี’’ติอาทินา วาเสฏฺฐเมว อาลปนฺโต ภควา ตเมว อิมินา นิยาเมน ปมุขํ อกาสิ. เตน วุตฺตํ ‘‘ตสฺสาติ วาเสฏฺฐสฺสา’’ติ. ชาติเภโท ชาติวิเสโส, ชาติยา เภโท ปากโฏ ภวิสฺสติ นิทสฺสเนน วิภูตภาวํ อาปาทิเตน ปฏิญฺญาตสฺส อตฺถสฺส วิภูตภาวาปตฺติโต. อาม น วฏฺฏตีติ กมฺมนานตาย เอว อุปาทินฺนนานตาย ปฏิกฺเขปปทเมตํ, น พีชนานตาย อนุปาทินฺนนานตาย ปฏิกฺเขปปทนฺติ ทสฺเสตุํ ‘‘กมฺมํ หี’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตสฺสตฺโถ – ตํตํโยนิขิปนมตฺตํ กมฺมสฺส สามตฺถิยํ, ตํตํโยนินิยตา ปน เย วณฺณวิเสสา, เต ตํตํโยนิสิทฺธิยาว สิทฺธา โหนฺตีติ ตํ ปน โยนิขิปนกมฺมํ ตํตํโยนิวิสิฏฺฐ-วิเสสาภิภูตาย ปโยคนิปฺผตฺติยา, อสํมุจฺฉิตาย เอว วา ปจฺจยภูตาย ภวปตฺถนาย อภิสงฺขตเมวาติ วิญฺญาตพฺพปจฺจยวิเสเสน วินา ผลวิเสสาภาวโต เอตํ สมีหิตกมฺมํ ปตฺถนาทีหิ จ ภินฺนสตฺติตํ วิสิฏฺฐสามตฺถิยํ วา อาปชฺชิตฺวา จกฺขุนฺทฺริยาทิวิสิฏฺฐผลนิพฺพตฺตกํ ชายติ, เอวํ โยนิขิปนตํโยนินิยตวิเสสาวหตา โหตีติ. เถเรน หิ พีชนานตา วิย กมฺมนานตาปิ อุปาทินฺนกนานตาย สิยา นุ โข ปจฺจโยติ โจทนํ ปฏิกฺขิปิตฺวา ปจฺจยวิเสสวิสิฏฺฐา กมฺมนานตา ปน ปจฺจโยติ นิจฺฉิตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. ज्याअर्थी येथे उपादिन्नक (उपादानयुक्त) जात स्पष्ट करण्याच्या भावाने आली आहे, आणि दुसरी जात तिच्या उदाहरणाच्या रूपाने आली आहे, म्हणूनच पाळीमध्ये 'जातिविभङ्गं पाळानं' असे म्हटले आहे. त्या त्या प्राण्यांच्या जाती असा याचा अर्थ आहे. 'एवं' असे उदाहरण देऊन, उदाहरण देण्यायोग्य गोष्टीचे कथन केले जात असताना. 'तस्स' म्हणजे वासेठ्ठचे. जरी 'तेसं वोहं ब्याक्खिस्सं' (त्यांचे मी वर्गीकरण करीन) असे म्हणून दोन्ही माणवकांना (तरुणांना) उद्देशून हा उपदेश आला असला, तरीही ठिकठिकाणी 'एवं, वासेठ्ठ, जानाहि' (असे, वासेठ्ठ, समज) इत्यादी प्रकारे वासेठ्ठलाच संबोधित करून भगवंतांनी त्यालाच या नियमाने प्रमुख केले. म्हणूनच 'तस्स म्हणजे वासेठ्ठचे' असे म्हटले आहे. 'जातिभेद' म्हणजे जातीचा विशेष; उदाहरणाद्वारे स्पष्टता आणल्याने प्रतिज्ञा केलेल्या अर्थाची स्पष्टता होत असल्यामुळे जातीचा भेद स्पष्ट होईल. 'आम न वट्टति' (होय, हे योग्य नाही) हे कर्माच्या विविधतेमुळेच उपादिन्नक विविधतेचे निषेध करणारे पद आहे, बीजाच्या विविधतेमुळे अनुपादिन्नक विविधतेचे निषेध करणारे पद नाही, हे दर्शवण्यासाठी 'कम्मं हि' (कर्मच) इत्यादी म्हटले आहे. त्याचा अर्थ असा – त्या त्या योनीमध्ये टाकणे एवढेच कर्माचे सामर्थ्य आहे, परंतु त्या त्या योनीशी नियत (निश्चित) असलेले जे वर्णविशेष आहेत, ते त्या त्या योनीच्या सिद्धीनेच सिद्ध होतात; आणि ते योनीमध्ये टाकणारे कर्म त्या त्या योनीच्या विशिष्ट विशेषाने अभिभूत झालेल्या प्रयोगाच्या निष्पत्तीने, किंवा अमूर्च्छित अशाच प्रत्ययभूत (कारणभूत) भवप्रार्थनेने अभिसंस्कृत (संस्कारित) केलेलेच असते, कारण विशिष्ट कारणाशिवाय विशिष्ट फळ मिळत नाही. म्हणून हे इच्छित कर्म प्रार्थना इत्यादींनी भिन्न शक्ती किंवा विशिष्ट सामर्थ्य प्राप्त करून चक्षुरिंद्रिय इत्यादी विशिष्ट फळांना उत्पन्न करणारे होते, अशा प्रकारे योनीमध्ये टाकणे हे त्या त्या योनीशी नियत असलेल्या विशेषाला प्राप्त करून देणारे होते. स्थविरांनी (थेरांनी) बीजाच्या विविधतेप्रमाणे कर्माची विविधता देखील उपादिन्नक विविधतेचे कारण असू शकते काय, या शंकेचे खंडन करून, कारणविशेषाने विशिष्ट असलेली कर्माची विविधताच कारण आहे, असे निश्चित केले आहे, हे समजून घ्यावे. นานาวณฺณาติ นานปฺปการวณฺณา. ตาลนาฬิเกราทีนํ โลเก อภิญฺญาตติณชาติภาวโต วิเสเสน คยฺหติ อภิญฺญาตโสตนเยน. ชาติยา พฺราหฺมโณวาติ อฏฺฐานปยุตฺโต เอว-สทฺโท, ชาติยาว [Pg.200] พฺราหฺมโณ ภเวยฺยาติ โยชนา. น จ คยฺหตีติ ติณรุกฺขาทีสุ วิย พฺราหฺมเณสุ ชาตินิยตสฺส ลิงฺคสฺส อนุปลพฺภนโต, ปิวนภุญฺชนกถนหสนาทิกิริยาย พฺราหฺมณภาเวน เอกนฺติกลิงฺคนิยตาย มนฺตชฺเฌนาทึ วินา อนุปลพฺภนโต จ. วจีเภเทเนวาติ อาหจฺจวจเนเนว. 'नानावण्णा' म्हणजे नाना प्रकारच्या वर्णांचे (रंगांचे किंवा आकारांचे). ताड, नारळ इत्यादींचा जगात प्रसिद्ध तृणजाती (गवताच्या जाती) म्हणून समावेश होत असल्यामुळे, प्रसिद्ध परंपरेनुसार त्यांचा विशेष रूपाने स्वीकार केला जातो. 'जातिया ब्राह्मणो व' यामध्ये 'एव' (व) हा शब्द अयोग्य ठिकाणी वापरला आहे, 'जन्मानेच ब्राह्मण असावा' अशी त्याची योजना आहे. 'न च गय्हति' (आणि ग्रहण केले जात नाही) कारण गवत, वृक्ष इत्यादींप्रमाणे ब्राह्मणांमध्ये जातीने निश्चित केलेले कोणतेही चिन्ह आढळत नाही; आणि पिणे, खाणे, बोलणे, हसणे इत्यादी क्रियांद्वारे ब्राह्मणाचे अस्तित्व दर्शवणारे कोणतेही एकांतिक चिन्ह मंत्राध्ययनाशिवाय आढळत नाही. 'वचीभेदेनेव' म्हणजे केवळ बोलण्यानेच (शब्दानेच). กีเฏ ปฏงฺเคติอาทีสุ ชาตินานตา ลพฺภติ อญฺญมญฺญลิงฺควิสิฏฺฐตาทสฺสนา. กุนฺถา กีฏกา, ขชฺชขาทกา กิปิลฺลิกา. อุปฺปติตฺวาติ อุฑฺเฑตฺวา อุฑฺเฑตฺวา. ปฏภาวํ คจฺฉนฺตีติ วา ปฏงฺคา, น ขุทฺทกปาณกา กีฏา นาม. เตสมฺปิ กีฏกานํ. कीटक, पतंग इत्यादींमध्ये एकमेकांच्या लिंगविशिष्टतेच्या (चिन्हांच्या) दर्शनामुळे जातींची विविधता आढळते. कुंथ (बारीक कीटक), कीटक, खज्जखादक (काजवे) आणि किपिल्लिक (मुंग्या). 'उप्पतित्वा' म्हणजे उडून-उडून. किंवा जे पटभाव (पसरट रूप) प्राप्त करतात ते 'पतंग' होत, केवळ लहान प्राणी असणारे कीटक नव्हे. त्या कीटकांची सुद्धा। กาฬกาทโยติ กลนฺทกาทโย. 'काळकादयो' म्हणजे कलंदक (खारूताई) इत्यादी। อุทรํเยว เนสํ ปาทา อุทเรเนว สมฺปชฺชนโต. त्यांचे पोट हेच त्यांचे पाय असतात, कारण ते पोटाच्या साहाय्यानेच गमन करतात। สญฺญาปุพฺพโก วิธิ อนิจฺโจติ ทสฺเสนฺโต ‘‘อุทเก’’ติ อาห ยถา ‘‘วีรสฺส ภาโว วีริย’’นฺติ. संज्ञेवर आधारित नियम अनित्य आहे हे दर्शवताना 'उदके' (पाण्यात) असे म्हटले आहे, जसे 'वीराचा भाव म्हणजे वीरिय' असे म्हटले जाते। ปตฺตสมุทาเย ปกฺขสทฺโทติ ‘‘ปตฺเตหิ ยนฺตี’’ติ วุตฺตํ. น หิ อวยวพฺยติเรเกน สมุทาโย อตฺถิ. पंखांच्या समूहासाठी 'पक्ख' हा शब्द वापरला आहे, म्हणून 'पंखांनी जातात' असे म्हटले आहे. कारण अवयवांशिवाय कोणताही समुदाय अस्तित्वात नसतो। สงฺเขเปน วุตฺโต ‘‘ชาติวเสน นานา’’ติอาทินา. เอตฺถ ปทตฺเถ ทุพฺพิญฺเญยฺยํ นตฺถีติ สมฺพนฺธมตฺตํ ทสฺเสตุํ ‘‘ตตฺรายํ โยชนา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘น หิ พฺราหฺมณานํ เอทิสํ สีสํ โหติ, ขตฺติยานํ เอทิสนฺติ นิยโม อตฺถิ ยถา หตฺถิอสฺสมิคาทีน’’นฺติ อิทเมว วากฺยํ สพฺพตฺถ เนตพฺพํ. ตํ สํงฺขิปิตฺวา ทสฺเสนฺโต ‘‘อิมินา นเยน สพฺพํ โยเชตพฺพ’’นฺติ อาห. 'जातीच्या आधारे नाना' इत्यादींद्वारे संक्षेपाने सांगितले आहे. येथे शब्दांच्या अर्थामध्ये काहीही दुर्बोध नाही, केवळ संबंध दर्शवण्यासाठी 'तत्रायं योजना' इत्यादी म्हटले आहे. 'जसे हत्ती, घोडे, मृग इत्यादींमध्ये असते, तसा ब्राह्मणांचे डोके असे असते आणि क्षत्रियांचे डोके तसे असते, असा कोणताही नियम नाही' हेच वाक्य सर्वत्र लागू केले पाहिजे. ते संक्षेपाने दर्शवताना 'या पद्धतीने सर्व योजना करावी' असे म्हटले आहे। ตสฺสาติ ยถาวุตฺตนิคมนวจนสฺส อยํ โยชนา อิทานิ วุจฺจมานา โยชนา เวทิตพฺพา. 'तस्स' म्हणजे वर सांगितलेल्या निष्कर्षवचनाची ही योजना, आता सांगितली जाणारी योजना समजून घ्यावी। ๔๕๗. โวการนฺติ โวกรณํ, เยน วิสิฏฺฐตาย น โวกรียติ ชาติเภโทติ อตฺโถ. เตนาห ‘‘นานตฺต’’นฺติ. ४५७. 'वोकार' म्हणजे वोकरण (भेद करणे), ज्या विशिष्टतेमुळे जातीचा भेद स्पष्ट केला जात नाही, असा अर्थ आहे. म्हणूनच 'नानत्तं' (विविधता) असे म्हटले आहे। โครกฺขาทิอุปชีวเนน อาชีววิปนฺโน, หึสาทินา สีลวิปนฺโน, นิกฺขิตฺตวตฺตตาทินา อาจารวิปนฺโนติ. สามญฺญโชตนา วิเสเส นิวิฏฺฐา โหตีติ อาห ‘‘โครกฺขนฺติ เขตฺตรกฺข’’นฺติ. ‘‘โคติ หิ ปถวิยา นาม’’นฺติ. เตหิ เตหิ อุปาเยหิ สิกฺขิตพฺพฏฺเฐน สิปฺปํ, ตตฺถ โกสลฺลํ. ปเรสํ [Pg.201] อีสนฏฺเฐน หึสนฏฺเฐน อิสฺโส, โส อสฺส อตฺถีติ อิสฺโส โยธาชีวิโก, อิสฺสสฺส กมฺมํ ปหรณํ, อุสุํ สตฺติญฺจ นิสฺสาย ปวตฺตา ชีวิกา อิสฺสตฺตํ. เตนาห ‘‘อาวุธชีวิก’’นฺติ. ยํ นิสฺสาย อสฺส ชีวิกา, ตเทว ทสฺเสตุํ ‘‘อุสุญฺจ สตฺติญฺจา’’ติ วุตฺตํ. गोरक्षण इत्यादी उपजीविकेमुळे आजीविका भ्रष्ट झालेला (आजीवविपन्न), हिंसेमुळे शील भ्रष्ट झालेला (शीलविपन्न), आणि कर्तव्ये सोडून दिल्यामुळे आचार भ्रष्ट झालेला (आचारविपन्न) असा अर्थ आहे. सामान्य अर्थाचे प्रकटीकरण विशेष अर्थामध्ये स्थिर होते, हे दर्शवण्यासाठी 'गोरक्खं म्हणजे शेताचे रक्षण' असे म्हटले आहे. कारण 'गो' हे पृथ्वीचे नाव आहे. त्या त्या उपायांनी शिकण्यायोग्य असल्यामुळे ते 'सिप्प' (शिल्प/कला) आहे आणि त्यात कौशल्य असणे. इतरांवर सत्ता गाजवण्याच्या किंवा हिंसेच्या अर्थाने 'इस्सो' (योद्धा), तो ज्याच्याकडे आहे तो 'इस्सो' म्हणजे योद्धा, योद्ध्याचे काम प्रहार करणे आहे, बाण आणि भाला यांवर अवलंबून असणारी उपजीविका म्हणजे 'इस्सत्तं' (शस्त्रविद्या). म्हणूनच 'आवुधजीविकं' (शस्त्रावर जगणारा) असे म्हटले आहे. ज्याच्यावर त्याची उपजीविका अवलंबून आहे, तेच दर्शवण्यासाठी 'बाण आणि भाला' असे म्हटले आहे। พฺรหฺมํ วุจฺจติ เวโท, ตํ อณติ ชานาตีติ พฺราหฺมโณ, ชานนญฺจ โปราเณหิ พฺราหฺมเณหิ วิหิตนิยาเมน พฺราหฺมเณหิ กโตปสเมน อนุฏฺฐานตเปน ยถา ‘‘อาชีวสีลาจารวิปนฺโน นตฺถี’’ติ พฺราหฺมณธมฺมิเกหิ โลกิยปณฺฑิเตหิ จ สมฺปฏิจฺฉิโต, ตถา ปฏิปชฺชนเมวาติ อาห ‘‘เอวํ พฺราหฺมณสมเยน…เป… สาเธตฺวา’’ติ. เอวํ สนฺเตติ เอวํ อาชีวสีลาจารวิปนฺนสฺส อพฺราหฺมณภาเว สติ น ชาติยา พฺราหฺมโณ โหติ, คุเณหิ ปน อาชีวสีลาจารสมฺปตฺติสงฺขาเตหิ พฺราหฺมโณ โหติ, ตสฺมา คุณานํเยว พฺราหฺมณภาวกรณโต จตุวณฺณวิภาเค ยตฺถ กตฺถจิ กุเล ชาโต โย สีลาทิคุณสมฺปนฺนตาย คุณวา, โส วุตฺตลกฺขเณน นิปฺปริยายโต พาหิตปาปตาย พฺราหฺมโณติ อยเมตฺถ พฺราหฺมณภาเว ญาโยติ, เอวํ ญายํ อตฺถโต อาปนฺนํ กตฺวา. นนฺติ ตเมว ยถาวุตฺตํ ญายํ. โย พฺราหฺมณสฺส สํวณฺณิตายาติ มาตุยา อุภโตสุชาตตาทิกุลวณฺเณน สํวณฺณิตาย ปสตฺถาย ยถารูปาย พฺราหฺมณสฺส มาตา ภวิตุํ ยุตฺตา, ตถารูปาย มาตริสมฺภูโต. เอเตน จตุนฺนํ โยนีนํ ยตฺถ กตฺถจิ วิเสสนิฏฺฐา กตา. เตนาห ‘‘ตตฺราปิ วิเสเสนา’’ติ. เอวํ สามญฺญโต วิเสสนิฏฺฐาวเสน ‘‘โยนิชํ มตฺติสมฺภว’’นฺติ ปทสฺส อตฺถํ วตฺวา อิทานิ สามญฺญโชตนํ อนาทิยิตฺวา วิเสสโชตนาวเสเนว อตฺถํ วตฺตุํ ‘‘ยาจาย’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. ปริสุทฺธอุปฺปตฺติมคฺคสงฺขาตา โยนิ วุตฺตาติ อนุปกฺกุฏฺฐภาเวน ปริสุทฺธอุปฺปตฺติมคฺคสงฺขาตา ยา จายํ โยนิ วุตฺตาติ สมฺพนฺโธ. ตโตปิ ชาตสมฺภูตตฺตาติ ตโต โยนิโต ชาตตฺตา มาตาเปตฺติสมฺปตฺติโต สมฺภูตตฺตา. 'ब्रह्म' म्हणजे वेद म्हटले जाते, त्याला जो जाणतो तो ब्राह्मण होय. आणि हे जाणणे प्राचीन ब्राह्मणांनी विहित केलेल्या नियमांनुसार, ब्राह्मणांनी केलेल्या उपशम (शांती) आणि अनुष्ठान-तपाने, जसे 'आजीविका, शील आणि आचार यांपासून भ्रष्ट झालेला कोणीही नाही' असे ब्राह्मणधर्मीय आणि लौकिक पंडितांनी स्वीकारले आहे, तसेच आचरण करणे होय, म्हणून 'अशा प्रकारे ब्राह्मण संकेतानुसार...पे... सिद्ध करून' असे म्हटले आहे. असे असताना, अशा प्रकारे आजीविका, शील आणि आचार भ्रष्ट झालेल्या व्यक्तीचा अब्राह्मणभाव सिद्ध होत असताना, कोणीही जन्माने ब्राह्मण होत नाही, तर आजीविका, शील आणि आचारसंपत्तीने युक्त अशा गुणांमुळेच ब्राह्मण होतो. म्हणून गुणांमुळेच ब्राह्मणत्व प्राप्त होत असल्यामुळे, चार वर्णांच्या विभागात कोणत्याही कुळात जन्मलेला, जो शील इत्यादी गुणांनी संपन्न असल्यामुळे गुणवान आहे, तो सांगितलेल्या लक्षणानुसार निश्चितपणे पापांचा त्याग केल्यामुळे (बाहितपापत्वामुळे) 'ब्राह्मण' आहे, हाच येथे ब्राह्मणत्वाचा नियम आहे, अशा प्रकारे या नियमाला अर्थाच्या दृष्टीने प्रस्थापित करून. 'नं' म्हणजे त्याच वर सांगितलेल्या नियमाला. 'जो ब्राह्मणाच्या संवर्णित' म्हणजे आईच्या दोन्ही बाजूंच्या सुजाततेमुळे आणि कुळ-वर्णाने प्रशंसित असलेल्या, ज्या रूपाने ब्राह्मणाची आई होण्यास योग्य आहे, अशा रूपाच्या मातेपासून जन्मलेला. याद्वारे चार योनींपैकी कोणत्याही एका विशिष्ट योनीचा निश्चय केला आहे. म्हणूनच 'तेथेही विशेष रूपाने' असे म्हटले आहे. अशा प्रकारे सामान्य रूपाने विशेष निश्चयाच्या आधारे 'योनिजं मत्तिसंभवं' (योनीतून जन्मलेला आणि मातेपासून उत्पन्न झालेला) या पदाचा अर्थ सांगून, आता सामान्य प्रकटीकरणाचा स्वीकार न करता, केवळ विशेष प्रकटीकरणाच्या आधारे अर्थ सांगण्यासाठी 'याचायं' इत्यादी म्हटले आहे. 'परिशुद्ध उत्पत्तिमार्ग' अशी जी योनी सांगितली आहे, दोषरहित असल्यामुळे परिशुद्ध उत्पत्तिमार्ग म्हणून जी ही योनी सांगितली आहे, असा संबंध आहे. 'ततोपि जातसंभूतत्ता' म्हणजे त्या योनीतून जन्मल्यामुळे आणि माता-पित्यांच्या शुद्धतेमुळे उत्पन्न झाल्यामुळे। วิสิฏฺฐตฺตาติ สมุทายภูตา มนุสฺสา ราคาทินา วิสิฏฺฐตฺตา. ราคาทินา สห กิญฺจเนนาติ สกิญฺจโน. ตเถว ราคาทิสงฺขาเตน ปลิโพธนฏฺเฐน สห ปลิโพเธนาติ สปลิโพโธ. สพฺพคหณปฏินิสฺสคฺเคนาติ อุปาทานสงฺขาตสฺส สพฺพสฺส คหณสฺส ปฏินิสฺสชฺชเนน. ยสฺมา พาหิตปาโป อตฺตโน สนฺตานโต พหิกตปาโป, ตสฺมา ตมหํ พฺรูมิ พฺราหฺมณนฺติ [Pg.202] อตฺโถ วตฺตพฺโพ. เอวรูโป เอติสฺสา กถาย อุปเทโส นานปฺปการโต วิภตฺโต, ตสฺมา ตตฺถ ตตฺถ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. 'विसीठत्ता' (विशिष्ट असल्यामुळे) म्हणजे समूहरूप असलेले मनुष्य राग (आसक्ती) इत्यादींनी युक्त असल्यामुळे. राग इत्यादी रूपी 'किंचन' (आसक्ती) यांसह असल्यामुळे तो 'सकिंचन' होय. तसेच राग इत्यादी म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या अडथळ्यांच्या (पलिबोध) अर्थाने अडथळ्यांसह असणारा तो 'सपलिबोध' होय. 'सब्बगहणपटिनिस्सग्गेन' म्हणजे उपादान म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या सर्व प्रकारच्या ग्रहणाचा (आसक्तीचा) त्याग केल्यामुळे. ज्या अर्थी तो बाहितपाप आहे, आपल्या चित्तप्रवाहातून ज्याने पापांना बाहेर काढले आहे, त्या अर्थी 'त्याला मी ब्राह्मण म्हणतो' असा अर्थ समजला पाहिजे. अशा प्रकारचा या कथेचा उपदेश विविध प्रकारे विभागलेला आहे, म्हणून तो त्या त्या ठिकाणी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा। ๔๕๘. คหิตทณฺเฑสูติ ปเรสํ ทณฺเฑน วิเหฐนํ อนิธาย อาทินฺนทณฺเฑสุ. ४५८. 'गहितदंडेषु' (ज्यांनी दंड धारण केला आहे त्यांच्यामध्ये) म्हणजे इतरांना दंडाने पीडा देण्याचा विचार न सोडता, ज्यांनी दंड हाती घेतला आहे त्यांच्यामध्ये। ๔๕๙. กิญฺจิ คหณนฺติ ตณฺหาคาหาทีสุ กิญฺจิ คาหํ. ४५९. 'किंचि गहणं' म्हणजे तृष्णा-ग्रहण इत्यादींपैकी कोणतेही ग्रहण। เยน กามภเวน มานุสเกหิ ปญฺจหิ กามคุเณหิ ยุญฺชติ, ตํ มานุสกํ โยคํ. ‘‘มานุสกํ โยค’’นฺติ เอตฺถ จ เอกเทสํ คเหตฺวา วุตฺตํ, เอส นโย ‘‘ทิพฺพโยค’’นฺติ เอตฺถาปิ. สพฺพโยควิสํยุตฺตนฺติ ปททฺวเยน วุตฺเตหิ สพฺพกิเลสโยเคหิ วิปฺปยุตฺตํ. ज्या कामभवामुळे मानवी पाच कामगुणांशी जोडला जातो, तो 'मानुसक योग' (मानवी बंध) होय. 'मानुसक योग' यामध्ये एका अंशाचा स्वीकार करून सांगितले आहे, हाच नियम 'दिब्बयोग' (दिव्य बंध) यामध्येही लागू होतो. 'सब्बयोगविसंयुत्तं' म्हणजे दोन्ही पदांद्वारे सांगितलेल्या सर्व क्लेश-योगांपासून (बंधनांपासून) विमुक्त असलेला। รตินฺติ อภิรตึ อาสตฺตึ. กุสลภาวนายาติ กายภาวนาทิ กุสลธมฺมภาวนาย อุกฺกณฺฐิตํ. วีริยวนฺตนฺติ วีริยสพฺภาเวน วีรํ นิทฺทิสติ, วีรภาโว หิ วีริยนฺติ. 'रतिं' म्हणजे अभिरती किंवा आसक्ती. 'कुसलभावनाय' म्हणजे कायभावना इत्यादी कुशलधम्म-भावनेमध्ये उत्कंठित असलेला. 'वीरियवन्तं' म्हणजे वीरियाच्या (प्रयत्नाच्या) अस्तित्वामुळे वीराला निर्देशित करतो, कारण वीरभाव म्हणजेच वीरिय होय। สุนฺทรํ ฐานนฺติ นิพฺพานํ. สุนฺทราย ปฏิปตฺติยา อริยปฏิปตฺติยา. 'सुंदरं ठाणं' (सुंदर स्थान) म्हणजे निब्बान. 'सुंदर प्रतिपत्तीने' म्हणजे आर्य प्रतिपत्तीने (आर्य आचरणाने)। นิพฺพตฺตินฺติ ปริโยสานํ. อตีเตติ อตีตโกฏฺฐาเส. กิญฺจนการโกติ ปลิโพธเหตุภูโต. 'निब्बत्तिं' म्हणजे परियोसान (शेवट). 'अतीते' म्हणजे अतीत कोठ्ठासात (भूतकाळात). 'किंचनकारको' म्हणजे पलिबोध (अडथळा) निर्माण करण्यास कारणीभूत असलेला। อเสกฺเข สีลกฺขนฺธาทิเก มหนฺเต คุเณ. ปญฺจนฺนํ มารานํ วิชิตตฺตา วิชิตวิชยํ. असेक्ख (अशैक्ष) शीलस्कंध इत्यादी महान गुणांमध्ये. पाच मारांवर विजय मिळवल्यामुळे 'विजितविजय' (ज्याने विजय मिळवला आहे असा)। ๔๖๐. อิทํ อชานนฺตาติ ‘‘ชาติยา พฺราหฺมโณ’’ติ อิทํ โลกสมญฺญามตฺตนฺติ อชานนฺตา. เย พฺราหฺมเณสุ นามโคตฺตํ นาม ตติยํ ทิฏฺฐาภินิเวสํ ชเนนฺติ, สาว เนสํ ทิฏฺฐิ. กตํ อภิสงฺขตนฺติ ปริกปฺปนวเสเนว กตํ ฐปิตํ ตทุปจิตํ, น เหตุปจฺจยสมาโยเคน. สมุจฺจาติ สมฺมุติยา. กา ปน สา สมฺมุตีติ อาห ‘‘สมญฺญายา’’ติ, โลกสมญฺญาเตนาติ อตฺโถ. สมฺมา ปน ปรมตฺถโต อชานนฺตานํ นามโคตฺตํ เอวํ กปฺเปตีติ อาห ‘‘โน เจ’’ติอาทิ. ตํ ปน อสนฺตมฺปิ ปรมตฺถโต สนฺตตาเยว อภินิวิสนฺติ, เตสมยํ โทโสติ ทสฺเสตุํ ‘‘เอวํ ปกปฺปิต’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. เตนาห ภควา – ‘‘ชนปทนิรุตฺตึ นาภินิเวเสยฺยา’’ติ [Pg.203] (ม. นิ. ๓.๓๓๑). อชานนฺตา โนติ เอตฺถ โน-สทฺโท อวธารณตฺโถ – ‘‘น โน สมํ อตฺถิ ตถาคเตนา’’ติอาทีสุ (ขุ. ปา. ๖.๓) วิยาติ อาห ‘‘อชานนฺตาว เอวํ วทนฺตี’’ติ. ४६०. "हे न जाणणारे" म्हणजे "जन्माने ब्राह्मण" हे केवळ लोकसंकेत (लोकसमज्ञा) आहे, हे न जाणणारे. जे ब्राह्मणांमध्ये नाम आणि गोत्र या तिसऱ्या दृष्टी-अभिनिवेशाला (दृष्टीच्या आग्रहाला) उत्पन्न करतात, तीच त्यांची दृष्टी होय. "कृत अभिसंस्कृत" म्हणजे केवळ कल्पनेच्या वश होऊन केलेले, स्थापित केलेले, साठवलेले, हेतू आणि प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) संयोगाने नव्हे. "समुच्चा" म्हणजे संमतीने (संकेताने). ती संमती कोणती? म्हणून "समज्ञेने" (samaññāyā) असे म्हटले आहे, लोकसंकेताने असा अर्थ आहे. परंतु जे परमार्थतः योग्य प्रकारे जाणत नाहीत, ते नाम आणि गोत्र अशी कल्पना करतात, म्हणून "नो चे" इत्यादी म्हटले आहे. ते परमार्थतः असत्य (अस्तित्वात नसलेले) असूनही सत्य म्हणूनच त्यात अभिनिवेश (आग्रह) धरतात, हा त्यांचा दोष आहे हे दर्शवण्यासाठी "अशा प्रकारे कल्पिलेले" (evaṃ pakappitaṃ) इत्यादी म्हटले आहे. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे - "जनपद-निरुक्तीचा (प्रादेशिक भाषेचा) अभिनिवेश धरू नये" (म. नि. ३.३३१). "अजानन्ता नो" येथे 'नो' हा शब्द अवधारणार्थक (निश्चयार्थक) आहे - जसे "न नो समं अत्थि तथागतेन" (खु. पा. ६.३) इत्यादींमध्ये आहे, म्हणून "न जाणणारेच असे म्हणतात" असे म्हटले आहे। นิปฺปริยายนฺติ ภาวนปุํสกนิทฺเทโส, นิปฺปริยาเยน อุชุกเมวาติ อตฺโถ, น ปุพฺเพ วิย ‘‘โย หิ โกจี’’ติ ปริยายวเสน. ‘‘น ชจฺจา’’ติ คาถาย ปุพฺพทฺเธน ชาติวาทํ ปฏิกฺขิปนฺโต ปจฺฉิมทฺเธน กมฺมวาทํ ปติฏฺฐเปนฺโต. ตตฺถาติ ติสฺสํ คาถายํ. อุปฑฺฒคาถาย วิตฺถารณตฺถนฺติ อุปฑฺฒคาถาย อตฺถํ วิตฺถาเรตุํ ‘‘กสฺสโก กมฺมุนา’’ติ วุตฺตํ. ตตฺถ ปุริมาย จตูหิ ปาเทหิ, ปจฺฉิเม ทฺวีหิ ทฺวินฺนมฺปิ สาธารณโต อตฺโถ วิตฺถาริโต. ตตฺถ กสิกมฺมาทีติ อาทิ-สทฺเทน สิปฺปกมฺมวาณิชาทิ สงฺคโห. "निष्पर्याय" हा भाव-नपुंसकलिंगी निर्देश आहे, निष्पर्यायाने (थेट) सरळच असा अर्थ आहे, पूर्वीप्रमाणे "जो कोणी" अशा पर्यायाच्या वश होऊन नव्हे. "न जच्चा" (जन्माने नव्हे) या गाथेच्या पूर्वार्धाने जातिवादाचा निषेध करत आणि उत्तरार्धाने कर्मवादाची स्थापना करत. "तेथे" म्हणजे त्या गाथेत. "अर्ध्या गाथेच्या विस्तारासाठी" म्हणजे अर्ध्या गाथेचा अर्थ सविस्तर सांगण्यासाठी "शेतकरी कर्माने होतो" असे म्हटले आहे. तेथे पहिल्या चार चरणांनी आणि नंतरच्या दोन चरणांनी, दोघांचाही सामान्य अर्थ सविस्तर स्पष्ट केला आहे. तेथे "कृषिकर्म इत्यादी" मधील 'इत्यादी' शब्दाने शिल्पकाम (कलाकौशल्य), व्यापार इत्यादींचा संग्रह होतो। ปฏิจฺจสมุปฺปาทปธานวจนวิญฺเญยฺโย ปจฺจโย ปฏิจฺจสมุปฺปาทสทฺทสฺส อตฺโถ ปจฺจยุปฺปนฺนาเปกฺขาย โหตีติ อาห – ‘‘อิมินา ปจฺจเยน เอตํ โหตี’’ติ. ยํ ปเนตฺถ วตฺตพฺพํ, ตํ วิสุทฺธิมคฺเค (วิสุทฺธิ. ๒.๕๗๐) ตํสํวณฺณนายญฺจ (วิสุทฺธิ. มหาฏี. ๒.๕๗๐) วุตฺตนเยน เวทิตพฺพํ. สมฺมานาวมานารหกุเลติ สมฺมานารเห ขตฺติยาทิกุเล, อวมานารเห จณฺฑาลาทิกุเล กมฺมวเสน อุปปตฺติ โหติ กมฺมสฺส วิปจฺจมาโนกาสกรตาย วินา ตาทิสาย อุจฺจนีจกุลนิพฺพตฺติยา อภาวโต. อฑฺฒทลิทฺทตาทิ อญฺญาปิ หีนปณีตตา. प्रतीत्यसमुत्पाद-प्रधान वचनाने समजण्याजोगा प्रत्यय (कारण) हा 'प्रतीत्यसमुत्पाद' शब्दाचा अर्थ प्रत्ययोत्पन्नाच्या (कार्यांच्या) अपेक्षेने होतो, म्हणून "या प्रत्ययाने (कारणाने) हे होते" असे म्हटले आहे. याविषयी जे काही सांगायचे आहे, ते विसुद्धिमग्ग (विसुद्धि. २.५७०) आणि त्याच्या टीकेमध्ये (विसुद्धि. महाटी. २.५७०) सांगितलेल्या पद्धतीने जाणावे. "सन्मान आणि अवमान मिळण्यास पात्र कुळात" म्हणजे सन्मानास पात्र असलेल्या क्षत्रिय इत्यादी कुळात आणि अवमानास पात्र असलेल्या चंडाल इत्यादी कुळात कर्माच्या वश होऊन उत्पत्ती होते; कारण कर्माच्या विपाकाच्या (फळाच्या) अवकाशाशिवाय अशा प्रकारच्या उच्च-नीच कुळातील उत्पत्ती शक्य नाही. श्रीमंती, गरिबी इत्यादी इतरही हीन आणि प्रणीत (उत्कृष्ट) अवस्था (कर्मामुळेच होतात). กมฺมุนาติ เจตฺถ ยถา โลกปชาสตฺตสทฺเทหิ เอโก เอวตฺโถ วุตฺโต, เอวํ เสสสทฺเทหิปิ, อธิปฺปายวิเสโส ปน ตตฺถ อตฺถีติ ทสฺเสตุํ ‘‘ปุริมปเทน เจตฺถา’’ติอาทิ วุตฺตํ. นายํ โลโก พฺรหฺมนิมฺมิโต กมฺเมน อุปฺปชฺชนโต. น หิ สนฺนิหิตการณานํ ผลานํ อญฺเญน อุปฺปตฺติทิฏฺฐิ ยุชฺชติ. เตนาห ‘‘ทิฏฺฐิยา ปฏิเสโธ เวทิตพฺโพ’’ติ. ยํ ปเนตฺถ วตฺตพฺพํ ตํ วิสุทฺธิมคฺคสํวณฺณนาทีสุวุตฺตนเยน เวทิตพฺพํ. ตถา โลกสฺส ปฐมุปฺปตฺติ น พฺรหฺมุนาติ ‘‘กมฺมุนา หิ ตาสุ ตาสู’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตติเยน ‘‘อยํ โลโก อาทิโต ปภุติ ปภวกมฺมุนา วตฺตตี’’ติ วุตฺตมตฺถํ นิคเมติ.วุตฺตสฺเสวตฺถสฺส สูจนญฺหิ นิคมนํ. ตํ ปน นิยมตฺถํ โหตีติ อาห ‘‘กมฺเมเนว พทฺธา หุตฺวา ปวตฺตนฺติ, น อญฺญถา’’ติ[Pg.204]. จตุตฺเถน ปเทน. ยายโตติ คจฺฉโต. นิพฺพตฺตโตติ นิพฺพตฺตนฺตสฺส. ปวตฺตโตติ ปวตฺตนฺตสฺส. "कर्मामुळे" यामध्ये जसे 'लोक', 'प्रजा' आणि 'सत्त्व' या शब्दांनी एकच अर्थ सांगितला आहे, तसेच उर्वरित शब्दांनीही; परंतु तेथे विशिष्ट अभिप्राय आहे हे दर्शवण्यासाठी "येथे पहिल्या पदाने" इत्यादी म्हटले आहे. हा लोक ब्रह्मदेवाने निर्माण केलेला नाही, कारण तो कर्माने उत्पन्न होतो. प्रत्यक्ष कारणांमुळे उत्पन्न होणाऱ्या फळांची उत्पत्ती दुसऱ्या कोणाकडून झाली आहे, अशी दृष्टी (मत) योग्य ठरत नाही. म्हणूनच "दृष्टीचा प्रतिषेध (निषेध) जाणावा" असे म्हटले आहे. याविषयी जे काही सांगायचे आहे, ते विसुद्धिमग्ग-अट्ठकथा इत्यादींमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीने जाणावे. तसेच जगाची पहिली उत्पत्ती ब्रह्मदेवामुळे झालेली नाही, म्हणून "कर्मामुळेच त्या त्या (गतींमध्ये)" इत्यादी म्हटले आहे. तिसऱ्या पदाने "हा लोक सुरुवातीपासूनच उत्पत्तीच्या कर्माने चालतो" या सांगितलेल्या अर्थाचा उपसंहार (निगमन) केला आहे. सांगितलेल्याच अर्थाचे सूचन करणे म्हणजेच निगमन होय. परंतु ते नियमाच्या अर्थाने आहे, म्हणून "कर्मामुळेच बद्ध होऊन प्रवृत्त होतात, अन्यथा नाही" असे म्हटले आहे. चौथ्या पदाने. "यायतो" म्हणजे जाणाऱ्याचे. "निब्बत्ततो" म्हणजे उत्पन्न होणाऱ्याचे. "पवत्ततो" म्हणजे प्रवृत्त होणाऱ्याचे। ธุตธมฺมา วิเสสโต ตณฺหาย สนฺตตฺตวเสน วตฺตนฺตีติ อาห ‘‘ตเปนาติ ธุตงฺคตเปนา’’ติ. เมถุนวิรติ วิเสสโต พฺราหฺมณานํ พฺรหฺมจริยนฺติ สา อิธ พฺรหฺมจริเยนาติ อธิปฺเปตาติ อาห ‘‘พฺรหฺมจริเยนาติ เมถุนวิรติยา’’ติ. เอเตนาติ อิมินา ‘‘ตเปนา’’ติอาทีหิ จตูหิ ปเทหิ วุตฺเตน. เสฏฺเฐนาติ อุตฺตเมน. สํกิเลสวิสุทฺธิยา ปริสุทฺเธน. พฺรหฺมนฺติ พฺรหฺมภาวํ เสฏฺฐภาวํ. โส ปเนตฺถ อตฺถโต พฺราหฺมณภาโวติ อาห ‘‘พฺราหฺมณภาวํ อาวหตี’’ติ. धुतधर्म विशेषतः तृष्णेच्या संतापाचा नाश करण्याच्या अर्थाने प्रवृत्त होतात, म्हणून "तपाने म्हणजे धुतांग-तपाने" असे म्हटले आहे. मैथुनापासून विरती हे विशेषतः ब्राह्मणांचे ब्रह्मचर्य आहे, ते येथे 'ब्रह्मचर्याने' या शब्दाने अभिप्रेत आहे, म्हणून "ब्रह्मचर्याने म्हणजे मैथुन-विरतीने" असे म्हटले आहे. "याने" म्हणजे या "तपाने" इत्यादी चार पदांनी सांगितलेल्याने. "श्रेष्ठ" म्हणजे उत्तमाने. संक्लेश-विशुद्धीने अत्यंत शुद्ध अशा. "ब्रह्म" म्हणजे ब्रह्मभाव, श्रेष्ठभाव. तो येथे अर्थाच्या दृष्टीने ब्राह्मणभाव आहे, म्हणून "ब्राह्मणभाव प्राप्त करून देतो" असे म्हटले आहे। พฺรหฺมา จ สกฺโก จาติ สกฺกครุกานํ สกฺโก สกฺเกนปิ ครุกาตพฺพโต, พฺรหฺมครุกานํ พฺรหฺมา พฺรหฺมุนาปิ ครุกาตพฺพโต. วิชานตนฺติ ปรมตฺถพฺราหฺมณสฺส วิเสสํ ชานนฺตานํ วิญฺญูนํ. อวิญฺญุโน หิ อปฺปมาณํ. เตนาห – ‘‘ปณฺฑิตาน’’นฺติ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. "ब्रह्मा आणि शक्र" म्हणजे शक्राला पूज्य मानणाऱ्यांसाठी शक्र, जो शक्रानेही आदर करण्याजोगा आहे; ब्रह्माला पूज्य मानणाऱ्यांसाठी ब्रह्मा, जो ब्रह्मदेवानेही आदर करण्याजोगा आहे. "जाणणाऱ्यांचे" म्हणजे परमार्थ-ब्राह्मणाचे वैशिष्ट्य जाणणाऱ्या विद्वानांचे. कारण अज्ञानांचे मत प्रमाण मानले जात नाही. म्हणूनच "पंडितांचे" असे म्हटले आहे. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे। วาเสฏฺฐสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. वासेठ्ठसुत्त-वर्णनेची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ-प्रकाशिनी टीका) समाप्त झाली। ๙. สุภสุตฺตวณฺณนา ९. सुभसुत्त-वर्णना (सुभसुत्ताची अट्ठकथा/टीका) ๔๖๒. ตุทิสญฺญาโต คาโม นิคโม เอตสฺสาติ โตเทยฺโย, ตสฺส อตฺตโช โตเทยฺยปุตฺโตติ อาห ‘‘ตุทิคามา’’ติอาทิ. อาราธโกติ สํราธโก. ธมฺมนิสนฺติ ยสฺมา สมฺปาทเนน ปริปูรเณน อิจฺฉิตา, ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘สมฺปาทโก ปริปูรโก’’ติ. ญายติ นิจฺฉเยน คเมติ นิพฺพานํ, ตํ วา ญายติ ปฏิวิชฺฌียติ เอเตนาติ ญาโย, ตโต เอตสฺส สมฺปาทกเหตุภาวโต ญาโย ธมฺโม อริยมคฺโค ตํ ญายํ ธมฺมํ. เตนาห ‘‘การณธมฺม’’นฺติ. อนวชฺชนฺติ อวชฺชปฏิปกฺขํ. ४६२. "तुदी" नावाचे गाव किंवा निगम ज्याचे आहे तो तोदेय्य, त्याचा पुत्र तोदेय्यपुत्त, म्हणून "तुदी गावापासून" इत्यादी म्हटले आहे. "आराधक" म्हणजे संतुष्ट करणारा (किंवा साध्य करणारा). "धम्मनिस्सं" कारण संपादन केल्याने, परिपूर्ण केल्याने इच्छित प्राप्त होते, म्हणून "संपादक, परिपूरक" असे म्हटले आहे. "न्याय" म्हणजे ज्याच्याद्वारे निश्चितपणे निर्वाण प्राप्त केले जाते, किंवा ज्याच्याद्वारे ते जाणले जाते, साक्षात्कृत केले जाते तो 'न्याय' होय; आणि तो प्राप्त करून देण्याचे कारण असल्याने 'न्याय धर्म' म्हणजे आर्य अष्टांगिक मार्ग, त्या न्याय धर्माला. म्हणूनच "कारण-धर्म" असे म्हटले आहे. "अनवद्य" म्हणजे दोषांच्या विरुद्ध असलेला (दोषरहित). ๔๖๓. วฏฺฏจารกโต นิยฺยาตีติ นิยฺยานิกํ อีการสฺส รสฺสตฺตํ ย-การสฺส จ ก-การํ กตฺวา. นิยฺยาเน วา นิยุตฺตํ, นิยฺยานํ สีลนฺติ วา นิยฺยานิกํ, ตปฺปฏิปกฺขโต อนิยฺยานิกํ. สา ปน อตฺถโต อกุสลกิริยาติ อาห ‘‘อกุสลปฏิปท’’นฺติ. ४६३. संसारचक्रापासून बाहेर काढतो म्हणून "नैय्यानिक" (मुक्ती देणारा), येथे 'ई' काराचा र्हस्व करून आणि 'य' काराचा 'क' कार करून हा शब्द बनला आहे. किंवा जे मुक्तीमध्ये नियुक्त आहे, किंवा ज्याचा स्वभाव मुक्ती देणे हा आहे ते 'नैय्यानिक' होय; त्याच्या विरुद्ध असलेले ते 'अनैय्यानिक' होय. परंतु ते अर्थाच्या दृष्टीने अकुशल कर्म आहे, म्हणून "अकुशल प्रतिपदा" (अकुशल मार्ग) असे म्हटले आहे। พหุภาววาจโก [Pg.205] อิธ มหาสทฺโท ‘‘มหาชโน’’ติอาทีสุวิยาติ อาห ‘‘มหนฺเตหิ พหูหี’’ติ. อตฺโถติ ปโยชนํ. มหนฺตานีติ พหุลานิ. กิจฺจานีติ กาตพฺพานิ. อธิกรณานีติ อธิการชีวิการูปานิ. ฆราวาสกมฺมเมว ปญฺจพลิกรณทสอตฺถฏฺฐานภาวโต โลกยาตฺราย จ สมฺปวตฺติฏฺฐานภาวโต ชีวิตวุตฺติยา วา เหตุภาวโต ฆราวาสกมฺมฏฺฐานํ. येथे 'महा' हा शब्द "महाजन" इत्यादी शब्दांप्रमाणे बहुत्वाचा वाचक आहे, म्हणून "मोठ्या, पुष्कळ" असे म्हटले आहे. "अत्थ" म्हणजे प्रयोजन. "महान" म्हणजे पुष्कळ. "किच्चानि" म्हणजे करावयाची कर्तव्ये. "अधिकरणानि" म्हणजे अधिकार आणि उपजीविकेची साधने. गृहस्थाश्रमाचे काम हेच पंचबली करणे, दहा प्रकारच्या अर्थांचे स्थान असणे, लोकव्यवहार चालण्याचे स्थान असणे किंवा उपजीविकेचे कारण असणे यामुळे "गृहस्थाश्रम-कर्मस्थान" आहे। ‘‘อปฺปเกนปิ เมธาวี, ปาภเตน วิจกฺขโณ; สมุฏฺฐาเปติ อตฺตานํ, อณุํ อคฺคึว สนฺธม’’นฺติ. (ชา. ๑.๑.๔); "बुद्धिमान आणि चतुर मनुष्य थोड्याशा भांडवलानेही स्वतःला वर आणतो, जसे एखादा मनुष्य लहानशा अग्नीला फुंकून मोठा करतो." (जा. १.१.४); คาถาย วุตฺตนเยน จูฬนฺเตวาสิกสฺส วิย. गाथेत सांगितलेल्या पद्धतीने, चूल-अंतेवासिकाप्रमाणे (लहान शिष्याप्रमाणे). ๔๖๔. อโยนิโส ปวตฺติตํ วาณิชฺชกมฺมํ วิย อปายภูตํ กสิกมฺมํ นิทสฺสนภาเว ฐเปตฺวา อโยนิโสมนสิกรณวเสน ปวตฺตํ ฆราวาสกิจฺจํ สนฺธายาห – ‘‘ยถา กสิ…เป… เอวํ ฆราวาสกมฺมฏฺฐานมฺปี’’ติ. พฺราหฺมณภตฺโต อโหสีติ โส กิร พหู พฺราหฺมเณ ธนํ ทตฺวา ยญฺญํ กาเรสิ. อุปรีติ ‘‘อุปริ อุปฏฺฐาตีติ วเทหี’’ติ พฺราหฺมเณหิ อตฺตโน สมเยน อาจิกฺขาปิโตปิ ยถา อุปฏฺฐิตเมว กเถตฺวา กาลํ กตฺวา นิรเย นิพฺพตฺโต, อถ พฺราหฺมณา – ‘‘อิมินา อมฺหากํ ยญฺเญ โทโส ทินฺโน’’ติ กุชฺฌิตฺวา ตสฺส กเฬวรํ สุสานํ เนตุํ นาทํสุ. อถสฺส ญาตเกหิ สหสฺเส ทินฺเน ตํ สหสฺสํ คเหตฺวา เคหโต นีหริตุํ อทํสุ. กสฺสปสมฺมาสมฺพุทฺธกาเล ฉตฺตึส อิตฺถิโย ‘‘เอกา วตฺถํ อทาสิ, เอกา คนฺธํ, เอกา สุมนมาล’’นฺติอาทินา ตํ ตํ ทานมยํ ปุญฺญํ กตฺวา อายุปริโยสาเน ตาวตึสภวเน สกฺกสฺส เทวรญฺโญ ปริจาริกา หุตฺวา นิพฺพตฺตึสุ สหสฺสอจฺฉราปริวาริกา, สกฺกสฺส เทวรญฺโญ เวชยนฺตรถํ เปเสตฺวา ปกฺโกสาปิเตน คุตฺติลาจริยภูเตน มหาโพธิสตฺเตน ปุจฺฉิตา ตํ ตํ อตฺตนา กตํ ปุญฺญํ พฺยากรึสุ. ตํ สนฺธาย วุตฺตํ ‘‘สกลาย คุตฺติลวิมานกถาย ทีเปตพฺพ’’นฺติ. วณิชฺชกมฺมฏฺฐานํ วิปชฺชมานนฺติ เอตฺถ ตสฺส วิปชฺชมานากาโร เหฏฺฐา วุตฺโต. เอวํ ปพฺพชฺชกมฺมฏฺฐานมฺปิ วิปชฺชมานํ อปฺปผลํ โหตีติ อาเนตฺวา สมฺพนฺโธ. สีเลสุ อปริปูรการิโนติอาทิ ตสฺส วิปชฺชนาการทสฺสนํ. ฌานาทิสุขนฺติ เอตฺถ อาทิ-สทฺเทน อภิญฺญาวิปสฺสนาทิสุขสฺส วิย สพฺรหฺมจารีหิ สทฺธึ สีลสมฺปทาทิสุขสฺส [Pg.206] สงฺคโห ทฏฺฐพฺโพ. อรหตฺตมฺปิ ปาปุณาติ ปเคว เสกฺขปุถุชฺชนสมฺปตฺติโยติ อธิปฺปาโย. ४६४. अयोनिशो (अयोग्य रीतीने) चालवलेल्या व्यापार-धंद्याप्रमाणे अपायकारक ठरलेल्या शेतीच्या कामाचे उदाहरण देऊन, अयोनिशोमनसिकारामुळे (अयोग्य विचारसरणीमुळे) चालणाऱ्या गृहस्थाश्रमाच्या कर्तव्याचा संदर्भ देऊन म्हटले आहे – “जशी शेती...पे... तसेच गृहस्थाश्रमाचे कर्मस्थान देखील.” 'ब्राह्मणभक्त होता' म्हणजे त्याने अनेक ब्राह्मणांना धन देऊन यज्ञ करवला होता. 'वर' म्हणजे “वर उपस्थित आहे असे सांग” असे ब्राह्मणांनी आपल्या सिद्धांतानुसार शिकवले असूनही, त्याने जसे घडले तसेच सांगितले आणि मृत्यूनंतर तो नरकात उत्पन्न झाला. तेव्हा ब्राह्मणांनी – “याने आमच्या यज्ञात दोष दाखवला” असा राग धरून त्याचे प्रेत स्मशानात नेण्यास दिले नाही. त्यानंतर त्याच्या नातेवाईकांनी एक हजार (कार्षापण) दिले असता, ते हजार घेऊन त्यांनी प्रेत घरातून बाहेर काढू दिले. कश्यप सम्यक्संबुद्धांच्या काळात छत्तीस स्त्रियांनी “एकीने वस्त्र दिले, एकीने गंध, एकीने फुलांची माळ” इत्यादी प्रकारे आपापले दानमय पुण्य करून, आयुष्य संपल्यावर तावतिंस भवनात देवराज शक्राच्या परिचारिका म्हणून जन्म घेतला, ज्यांच्यासोबत हजार अप्सरांचा परिवार होता. देवराज शक्राने वैजयंत रथ पाठवून बोलावून घेतलेल्या गुत्तिल आचार्य रूपी महाबोधिसत्त्वांनी विचारले असता, त्यांनी स्वतः केलेले ते ते पुण्य स्पष्ट करून सांगितले. त्याचा संदर्भ देऊन म्हटले आहे – “संपूर्ण गुत्तिलविमान कथेने हे स्पष्ट करावे.” 'व्यापार रूपी कर्मस्थान बिघडत असताना' येथे त्याच्या बिघडण्याचा प्रकार खाली सांगितला आहे. अशा प्रकारे प्रव्रज्या रूपी कर्मस्थान देखील बिघडल्यास अल्पफळ देणारे होते, असा संबंध जोडावा. 'शीलांचे परिपूर्ण पालन न करणारे' इत्यादी त्याच्या बिघडण्याचा प्रकार दर्शवणे आहे. 'ध्यानादी सुख' येथे 'आदि' शब्दाने अभिज्ञा, विपश्यना इत्यादी सुखांप्रमाणेच सब्रह्मचाऱ्यांसोबतच्या शीलसंपदा इत्यादी सुखाचा संग्रह समजला पाहिजे. 'अर्हत्त्व देखील प्राप्त करतो, मग शैक्ष आणि पृथग्जन संपत्तीबद्दल काय सांगावे!' असा अभिप्राय आहे. จาคสีเสนาติ ปธานภูเตน จาเคน ทาเนน ตํ อวสฺสยํ กตฺวา. เอตฺถ เต น โกจิ อผาสุกภาโวติ. อุชุกํ กตฺวา อวิรุทฺธํ กตฺวา, สมฺปโยเชตฺวาติ อตฺโถ. ตปจริยนฺติ อคฺคิปริจรณํ, ตปจริยญฺจ พฺรหฺมจริยคฺคหณา ทุฏฺฐุลฺลภาวโต. 'त्यागाच्या मुख्यतेने' म्हणजे प्रधान असलेल्या त्यागाने (दानाने) त्याला आश्रय करून. 'येथे तुला कोणताही त्रास (असुविधा) नाही.' 'सरळ करून, अविरुद्ध करून, युक्त करून' असा अर्थ आहे. 'तपचर्या' म्हणजे अग्नीची सेवा करणे, आणि ब्रह्मचर्य ग्रहण केल्यामुळे दुष्टभावापासून (अशुद्धतेपासून) दूर राहणे हीच तपचर्या होय. ๔๖๖. อชานนภาวนฺติ อสพฺพญฺญุภาวํ. ภควโต ปน สพฺพญฺญุภาโว สเทวเก โลเก ชลตเล ปกฺขิตฺตเตลํ วิย ปตฺถริตฺวา ฐิโต, น เม อิทํ ปติรูปํ, ตโต ปริวตฺติสฺสามีติ ‘‘พฺราหฺมโณ, โภ, โคตมา’’ติอาทิมาห. ปจฺจาหริตุํ ปฏิปกฺเขน อปหริตุํ. เสตโปกฺขรสทิโสติ ปุณฺฑรีกปตฺตสทิสวณฺโณ. สุวฏฺฏิตาติ วฏฺฏภาวยุตฺตฏฺฐาเน สุวฏฺฏา. นามกํเยวาติ นามมตฺตเมว วจนมตฺตเมว. ตถาภูตานํ ภาวสฺสปิ อภาเวน นิหีนํ นาม โหติ, นาม-สทฺโท นิหีนปริยาโย. เตนาห – ‘‘ลามกํเยวา’’ติ. ४६६. 'न जाणणे' म्हणजे सर्वज्ञ नसणे (असर्वज्ञभाव). भगवंतांचा सर्वज्ञभाव तर सदेव लोकामध्ये पाण्याच्या पृष्ठभागावर पसरलेल्या तेलासारखा पसरून राहिलेला आहे. “हे माझ्यासाठी योग्य नाही, मी यापासून मागे फिरेन” असा विचार करून त्याने “हे गौतम, ब्राह्मण...” इत्यादी म्हटले. 'परत घेण्यासाठी' म्हणजे विरोधी पक्षाने दूर करण्यासाठी. 'पांढऱ्या कमळासारखा' म्हणजे पांढऱ्या कमळाच्या पानाच्या रंगासारखा. 'सुवर्तित' म्हणजे गोलाकार असलेल्या ठिकाणी चांगल्या प्रकारे गोल असलेली. 'केवळ नावच' म्हणजे केवळ नाव मात्र, केवळ वचन मात्र. तशा प्रकारच्या अस्तित्वाचा देखील अभाव असल्यामुळे ते 'हीन' (तुच्छ) ठरते, 'नाम' हा शब्द हीन अर्थाचा वाचक आहे. म्हणूनच म्हटले आहे – “केवळ तुच्छच”. ๔๖๗. กตมา วาจา เตสํ เสยฺโยติ เตสํ จงฺกิยาทีนํ พฺราหฺมณมหาสาลานํ วุจฺจมานวิภาคาสุ วาจาสุ กตมา วาจา เสยฺโยติ. ‘‘เสยฺยา’’ติ ลิงฺควิปลฺลาเสน วุตฺตํ. สมฺมุติยาติ อวิลงฺฆิตสาธุมริยาทาย โลกสมฺมุติยา. เตนาห ‘‘โลกโวหาเรนา’’ติ. มนฺตาติ มนฺตาสงฺขาตาย ปญฺญาย มนฺเตตฺวา ชานิตฺวา. เตนาห ‘‘ตุลยิตฺวา’’ติ. อตฺถสํหิตนฺติ เหตุสญฺหิตํ. ตํ ปน เอกํสโต ยุตฺติยุตฺตํ โหตีติ อาห – ‘‘การณนิสฺสิต’’นฺติ. อาวุโตติอาทีสุ อาทิโต อภิมุขํ ญาณคติยา วิพนฺธเนน อาวุโต, อาวริเยน วิเสสโต ญาณคติยา นิพนฺธเนน นิวุโต, เอวํ โอผุโฏ ปลิคุณฺฐิโต. ปริโยนทฺโธติ สมนฺตโต โอนทฺโธ ฉาทิโต. เตนาห ‘‘ปลิเวฐิโต’’ติ. ४६७. 'त्यांच्यापैकी कोणती वाणी श्रेष्ठ आहे' म्हणजे त्या चंकी इत्यादी ब्राह्मण महासालांच्या सांगितल्या जाणाऱ्या वेगवेगळ्या वाणींमध्ये कोणती वाणी श्रेष्ठ आहे. 'सेय्या' (श्रेयस) हे लिंगविपर्यासाने (लिंगबदलाने) म्हटले आहे. 'संमतीने' म्हणजे जिचे उल्लंघन केले जात नाही अशा चांगल्या मर्यादेने युक्त लोकसंमतीने. म्हणूनच म्हटले आहे – “लोकव्यवहाराने”. 'मंता' म्हणजे मंता नावाच्या प्रज्ञेने विचार करून, जाणून घेऊन. म्हणूनच म्हटले आहे – “तुलना करून (तोलून मापून)”. 'अर्थसंहित' म्हणजे हेतूने युक्त. ते निश्चितपणे युक्तिसंगत असते, म्हणून म्हटले आहे – “कारणावर आधारित”. 'आवृत्त' इत्यादींमध्ये – सुरुवातीला समोरून ज्ञानमार्गाला अडथळा आल्यामुळे 'आवृत्त' (झाकलेला), आवरणाने विशेषतः ज्ञानमार्गाला बांधल्यामुळे 'निवृत्त' (अडवलेला), अशा प्रकारे आच्छादित, वेढलेला. 'परियोनद्ध' म्हणजे सर्व बाजूंनी वेढलेला, झाकलेला. म्हणूनच म्हटले आहे – “गुंडाळलेला”. ๔๖๘. สเจ เอตํ การณมตฺถีติ ‘‘นิสฺสฏฺฐติณกฏฺฐุปาทาโน อคฺคิ ชลตี’’ติ เอตํ การณํ สเจ อตฺถิ ยทิ สิยา, โส อปโร ติณกฏฺฐุปาทาโน อคฺคิ ยทิ ภเวยฺย. สโทโส สาทีนโว สปริกฺกิเลโส. ปริสุทฺโธติ อุปกฺกิเลสาภาเวน สพฺพโส สุทฺโธ. ชาติ อาทีนํ อภาเวนาติ ชาติปจฺจยานํ กมฺมกิเลสานํ นิคฺคเมน. ४६८. 'जर हे कारण असेल तर' म्हणजे “गवत आणि लाकूड या इंधनाशिवाय अग्नी जळतो” हे कारण जर असेल, जर तसे घडले, तर तो दुसरा गवत आणि लाकूड या इंधनावर जळणारा अग्नी जर असेल. सदोष, उपद्रवकारक (आदीनवाने युक्त), क्लेशाने युक्त. 'परिशुद्ध' म्हणजे उपक्लेश नसल्यामुळे सर्व प्रकारे शुद्ध. 'जाती इत्यादींच्या अभावामुळे' म्हणजे जातीचे प्रत्यय (कारण) असलेल्या कर्म-क्लेशांच्या नाशाने. ๔๖๙. น [Pg.207] นิจฺจลา ติฏฺฐนฺตีติ ตตฺถ ปกฺขิปิตพฺพสฺส ลพฺภมานตฺตา ยถาปญฺญตฺตํ หุตฺวา นิจฺจลา อกมฺปิยา น ติฏฺฐนฺติ. ตํ โทสํ ตํ อูนตาโทสํ. ४६९. 'निश्चल राहत नाहीत' म्हणजे तिथे टाकण्यासारख्या गोष्टी उपलब्ध असल्यामुळे, जसे प्रज्ञप्त (नियमबद्ध) केले आहे तसे होऊन ते निश्चल, अकंपित राहत नाहीत. 'तो दोष' म्हणजे ती उणीव किंवा कमतरतेचा दोष. อญฺญสฺมึ อสตีติ อตฺถภญฺชกมุสาวาเท อสติ. โส หิ อตฺตโน สนฺตกสฺส อทาตุกามตาทิวเสน ปวตฺตสฺส อกมฺมปถปฺปตฺตสฺส มุสาวาทภาวสฺส วิปรีโต อญฺโญ อิธ อธิปฺเปโต. ตถา หิ อิตโร เยภุยฺเยน วฬญฺชิตพฺพโต โวหริตพฺพโต วฬญฺชกมุสาวาโทติ อาห. น กทาจิ มุสาวาทีติ ทฺเว กถา น กเถนฺติ. พาหิรกานํ อนวชฺชตปสมฺมตายปิ นิสฺสิโตติ วตฺตุํ อาห ‘‘สีลวา ตปนิสฺสิตโก โหติ’’ติ. วิวฏมุขา มนฺตชฺเฌนมณฺฑิตา สพฺพโส สชฺฌายา โหนฺติ, น อิตเรติ อาห ‘‘ปพฺพชิตา นิจฺจํ สชฺฌายนฺตี’’ติ. 'दुसरे नसताना' म्हणजे अर्थाचा नाश करणाऱ्या असत्य भाषणाचा (मुसावादाचा) अभाव असताना. कारण, स्वतःच्या मालकीची वस्तू देण्याची इच्छा नसणे इत्यादींमुळे निर्माण होणाऱ्या आणि अकर्मपथाला प्राप्त झालेल्या असत्य भाषणाच्या विरुद्ध असलेला दुसरा प्रकार येथे अभिप्रेत आहे. कारण, दुसरा प्रकार बहुतांश वेळा व्यवहारात आणला जात असल्यामुळे, त्याला 'व्यवहारिक असत्य भाषण' (वळंजकमुसावाद) असे म्हटले आहे. 'कधीही असत्य न बोलणारे' म्हणजे ते दोन प्रकारची विधाने (दुटप्पी बोलणे) करत नाहीत. बाह्य पंथीयांच्या निर्दोष मानल्या गेलेल्या तपावर देखील ते अवलंबून असतात, हे सांगण्यासाठी म्हटले आहे – “शीलवान तपावर अवलंबून असतो.” उघड्या मुखाने, मंत्रांच्या अध्ययनाने सुशोभित होऊन ते सर्व प्रकारे सज्झाय (सज्झायन/पठण) करतात, इतर लोक तसे करत नाहीत, म्हणून म्हटले आहे – “प्रव्रजित नेहमी सज्झायन करतात.” ๔๗๐. จิรํ นิกฺขนฺโตติ นิคฺคโต หุตฺวา จิรกาเล. น สพฺพโส ปจฺจกฺขา โหนฺติ สติสมฺโมหโต มคฺคานญฺจ อญฺญถา กรณโต. จิรายิตตฺตนฺติ ‘‘อยํ มคฺโค’’ติ กถนสฺส จิรายนํ. วิตฺถายิตตฺตนฺติ อสปฺปฏิภานํ. ตํ ปน สอุปมาห ทสฺเสตุํ ‘‘ยถา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ४७०. 'दीर्घकाळ बाहेर पडलेला' म्हणजे बाहेर पडून बराच काळ झालेला. स्मृतीच्या संमोहामुळे (विस्मरणाने) आणि मार्गांचे स्वरूप बदलल्यामुळे ते सर्व प्रकारे प्रत्यक्ष राहत नाहीत. 'उशीर होणे' म्हणजे “हा मार्ग आहे” असे सांगण्यास वेळ लागणे. 'विस्तार होणे' म्हणजे तात्काळ सुचू न शकणे (अप्रतिभान). ते स्पष्ट करण्यासाठी उपमेसह “जसे...” इत्यादी म्हटले आहे. พลสมฺปนฺโนติ กายพเลน สมนฺนาคโต. ปมาณกตํ กมฺมํ นาม ปมาณกรานํ ราคาทิกิเลสานํ อวิกฺขมฺภิตตฺตา ‘‘ปมาณกตํ กมฺมํ นาม กามาวจร’’นฺติ อาห, เตสํ ปน วิกฺขมฺภิตตฺตา วุตฺตํ ‘‘อปฺปมาณกตํ กมฺมํ นาม รูปารูปาวจร’’นฺติ. ตตฺถาปิ วิเสสโต อปฺปมญฺญาภาวนา สมฺภวตีติ อาห ‘‘เตสุปี’’ติอาทิ. นิรีหกตฺตา ยถา อปฺปมาณสมญฺญา ลพฺภติ, ตํ ทสฺเสตุํ ‘‘ปมาณํ…เป… วุจฺจตี’’ติ อาห. น โอหียติ น ติฏฺฐตีติ กตูปจิตมฺปิ กามาวจรกมฺมํ ยถาธิคเต มหคฺคตชฺฌาเน อปริหีเน ตํ อภิภวิตฺวา อาสีเทตฺวา ปสฺเส โอหียกํ กตฺวา ปฏิสนฺธึ ทาตุํ สมตฺถภาเวน น ติฏฺฐติ. ลคฺคิตุนฺติ อาวริตุํ. ฐาตุนฺติ ปติฏฺฐาตุํ. ผริตฺวาติ ปฏิปฺผริตฺวา. ปริยาทิยิตฺวาติ ตสฺส สามตฺถิยํ เขเปตฺวา. กมฺมสฺส ปริยาทิยนํ นาม วิปากุปฺปาทพนฺธนเมวาติ อาห – ‘‘ตสฺส วิปากํ ปฏิพาหิตฺวา’’ติ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. ‘बलसंपन्न’ म्हणजे कायिक बलाने (शारीरिक शक्तीने) युक्त असलेला. ‘प्रमाणकृत कर्म’ म्हणजे राग इत्यादी क्लेशांचे दमन न झाल्यामुळे ‘प्रमाणकृत कर्म हे कामावचर कर्म आहे’ असे म्हटले आहे. परंतु, त्यांचे दमन झाल्यामुळे ‘अप्रमाणकृत कर्म हे रूप-अरूपावचर कर्म आहे’ असे म्हटले आहे. तेथेही विशेषतः अप्रमाण (अपमञ्ञा) भावना संभवते, म्हणून ‘तेसुपि’ (त्यांच्यामध्येही) इत्यादी म्हटले आहे. निष्क्रीयतेमुळे जशी ‘अप्रमाण’ ही संज्ञा प्राप्त होते, ते दर्शवण्यासाठी ‘प्रमाण...पे... म्हटले जाते’ असे म्हटले आहे. ‘न ओहीयति न तिट्ठति’ (मागे पडत नाही, टिकत नाही) म्हणजे केलेले आणि साठवलेले कामावचर कर्मसुद्धा, प्राप्त झालेल्या महग्गत ध्यानाचा ऱ्हास न झाल्यास, त्याला पराभूत करून, जवळ येऊन, बाजूला सारून (मागे टाकून) प्रतिसंधी देण्यास समर्थ म्हणून टिकून राहत नाही. ‘लग्गितुं’ म्हणजे अडथळा आणणे (आवरण करणे). ‘ठातुं’ म्हणजे प्रतिष्ठित होणे. ‘फरित्वा’ म्हणजे पसरवून (प्रति-पसरवून). ‘परियादियित्वा’ म्हणजे त्याचे सामर्थ्य संपवून (क्षीण करून). कर्माचे परियादियन (संपवणे) म्हणजे विपाकाच्या उत्पत्तीचे बंधनच होय, म्हणून ‘त्याचा विपाक रोखून’ असे म्हटले आहे. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. สุภสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. सुभसुत्तवर्णनेची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. ๑๐. สงฺคารวสุตฺตวณฺณนา १०. संगारवसुत्तवर्णना (संगारव सुत्ताची व्याख्या). ๔๗๓. อภิปฺปสนฺนาติ [Pg.208] อภิสเมจฺจ ปสนฺนา. เตนาห – ‘‘อเวจฺจปฺปสาทวเสน ปสนฺนา’’ติ. พฺราหฺมณี วิคตมลมจฺเฉรตาย ‘‘ตุยฺหํ เทยฺยธมฺมํ รุจฺจนกฏฺฐาเน เทหี’’ติ อาห. มคฺเคเนว หิสฺสา มจฺฉริยสฺส ปหีนตฺตา พุทฺธปกฺขพฺราหฺมณปกฺขวเสน อุภโตปกฺขิกา. ४७३. ‘अभिप्पसन्ना’ म्हणजे पूर्णपणे समजून घेऊन प्रसन्न झालेली. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘अवेच्चप्पसाद (अढळ श्रद्धा) च्या कारणाने प्रसन्न झालेली’. ब्राह्मणीने मळ आणि मत्सर दूर झाल्यामुळे “तुला देयधर्म (दान) ज्या ठिकाणी आवडेल तिथे दे” असे म्हटले. कारण मार्गाच्या (आर्यमार्गाच्या) प्रभावानेच तिचा मत्सर नष्ट झाला होता, म्हणून ती बुद्धपक्ष आणि ब्राह्मणपक्ष अशा दोन्ही पक्षांची (उभयपक्षी) झाली होती. กึสูติ กินฺติ ปุจฺฉาวจนํ. เฉตฺวา อนาทิยิตฺวา วินาเสตฺวา. สุขํ เสตีติ จิตฺตสนฺตาปาภาเวน สุเขน สุปติ. น โสจตีติ ตโต เอว โสกํ นาม วินาเสติ. โกธนฺติ กุชฺฌนลกฺขณํ โกธํ. เฉตฺวา สมุจฺฉินฺทิตฺวา. สุขํ เสตีติ โกธปริฬาเหน อปริฑยฺหมานตฺตา สุขํ สุปติ. โกธวินาเสน วินฏฺฐโทมนสฺสตฺตา น โสจติ. วิสมูลสฺสาติ ทุกฺขวิปากสฺส. มธุรคฺคสฺสาติ อกฺโกสกสฺส ปจฺจกฺโกสเนน, ปหารกสฺส ปฏิปฺปหรเณน ยํ สุขํ อุปฺปชฺชติ, ตํ สนฺธาเยว ‘‘มธุรคฺโค’’ติ วุตฺโต. อิมสฺมิญฺหิ ฐาเน ปริโยสานํ ‘‘อคฺค’’นฺติ วุตฺตํ. อริยาติ พุทฺธาทโย อริยา. ‘किंसू’ म्हणजे ‘काय’ असा प्रश्नार्थक शब्द. ‘छेत्वा’ म्हणजे स्वीकार न करता, नष्ट करून. ‘सुखं सेति’ म्हणजे चित्ताच्या संतापाचा अभाव असल्यामुळे सुखाने झोपतो. ‘न सोचति’ म्हणजे त्याच कारणाने शोकाचा नाश करतो. ‘कोधं’ म्हणजे क्रोधाचे लक्षण असलेल्या क्रोधाला. ‘छेत्वा’ म्हणजे समूळ नष्ट करून. ‘सुखं सेति’ म्हणजे क्रोधाच्या परिदाहाने (दाहाने) जळत नसल्यामुळे सुखाने झोपतो. क्रोधाच्या नाशाने दौर्मनस्य (दुःख) नष्ट झाल्यामुळे शोक करत नाही. ‘विसमूलस्स’ म्हणजे दुःखद विपाक असलेल्या. ‘मधुरग्गस्स’ म्हणजे शिवीगाळ करणाऱ्याला उलट शिवीगाळ केल्याने, किंवा मारणाऱ्याला उलट मारल्याने जे सुख उत्पन्न होते, त्याला संदर्भात ठेवूनच ‘मधुरग्ग’ (मधुर टोक असलेले) असे म्हटले आहे. कारण या ठिकाणी ‘अग्ग’ हा शब्द समाप्ती (शेवट) या अर्थाने वापरला आहे. ‘अरिय’ म्हणजे बुद्ध इत्यादी आर्य. ปญฺหํ กเถสีติ พฺราหฺมโณ กิร จินฺเตสิ – ‘‘สมโณ โคตโม โลกปูชิโต, น สกฺกา ยํ วา ตํ วา วตฺวา สนฺตชฺเชตุํ, เอกํ สณฺหปญฺหํ ปุจฺฉิสฺสามี’’ติ. โส เอกํ ปุจฺฉาคาถํ อภิสงฺขริตฺวา ‘‘สเจ อสุกสฺส นาม วธํ โรเจมีติ วกฺขติ, เย ตุยฺหํ น รุจฺจนฺติ, เต มาเรตุกาโมสิ, โลกวธาย อุปฺปนฺโน กึ ตุยฺหํ สมณภาเวนาติ นิคฺคเหสฺสามิ. สเจ น กสฺสจิ วธํ โรเจมีติ วกฺขติ, อถ นํ ตฺวํ ราคาทีนมฺปิ วธํ น อิจฺฉสิ, ตสฺมา สมโณ หุตฺวา อาหิณฺฑสีติ นิคฺคณฺหิสฺสามีติ อิมํ อุภโตโกฏิกํ ปญฺหํ ปุฏฺโฐ สมโณ โคตโม เนว คิลิตุํ น อุคฺคิลิตุํ สกฺขิสฺสตี’’ติ เอวํ จินฺเตตฺวา อิมํ ปยฺหํ ปุจฺฉิ. ตสฺส ภควา อชฺฌาสยานุรูปํ กเถสิ. โส ปญฺหพฺยากรเณน อาราธิตจิตฺโต ปพฺพชฺชํ ยาจิ. สตฺถา ตํ ปพฺพาเชสิ, โส ปพฺพชฺชากิจฺจํ มตฺถกํ ปาเปสิ. เตน วุตฺตํ ‘‘ปพฺพชิตฺวา อรหตฺตํ ปตฺโต’’ติ. ‘प्रश्न विचारला’ म्हणजे ब्राह्मणाने असा विचार केला की – “श्रमण गौतम हे लोकपूजित आहेत, त्यांना काहीही बोलून घाबरवणे शक्य नाही, म्हणून मी त्यांना एक सूक्ष्म प्रश्न विचारतो.” त्याने एक प्रश्नरूप गाथा तयार केली आणि विचार केला – “जर ते म्हणतील की ‘मी अमुक एकाच्या वधाला संमती देतो’, तर मी त्यांना निरुत्तर करेन की ‘जे तुला आवडत नाहीत, त्यांना मारण्याची तुझी इच्छा आहे, मग जगाचा नाश करण्यासाठी उत्पन्न झालेल्या तुझ्या श्रमणत्वाचा काय उपयोग?’ जर ते म्हणतील की ‘मी कोणाच्याही वधाला संमती देत नाही’, तर मी त्यांना निरुत्तर करेन की ‘मग तू राग इत्यादींच्या वधाचीही (नाशाचीही) इच्छा करत नाहीस, तर मग श्रमण होऊन का फिरत आहेस?’ असा हा दोन्ही बाजूंनी कोंडीत पकडणारा प्रश्न विचारल्यावर श्रमण गौतम तो ना गिळू शकतील ना ओकू शकतील.” असा विचार करून त्याने हा प्रश्न विचारला. भगवंतांनी त्याच्या आशयाला अनुरूप असे उत्तर दिले. त्या प्रश्नाच्या उत्तराने प्रसन्न चित्त होऊन त्याने प्रव्रज्येची (दीक्षेची) याचना केली. शास्त्यांनी (बुद्धांनी) त्याला प्रव्रजित केले, आणि त्याने प्रव्रज्येचे कार्य पूर्णत्वास नेले. म्हणूनच म्हटले आहे – “प्रव्रजित होऊन अर्हत्त्व प्राप्त केले.” อวภูตาติ อโธภูตา. อโธภาโว สตฺตานํ อวฑฺฒิ อวมงฺคลนฺติ อาห – ‘‘อวฑฺฒิภูตา อวมงฺคลภูตาเยวา’’ติ. ปริภูตาติ ปริภวปฺปตฺตา. วิชฺชมานานนฺติ ปาฬิยํ อนาทเร สามิวจนนฺติ ตทตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘วิชฺชมาเนสู’’ติอาห. ปกฏฺฐํ, ปวฑฺฒํ วา ญาณนฺติ ปญฺญาณนฺติ ภควโต ญาณํ วิเสเสตฺวา วุตฺตํ. ‘अवभूता’ म्हणजे अधोभूत (खाली गेलेले/पतित झालेले). प्राण्यांची अधोगती ही त्यांची अवनती आणि अमंगलता आहे, म्हणून म्हटले आहे – ‘अवनती झालेले आणि अमंगल झालेलेच’. ‘परिभूता’ म्हणजे पराभवाला प्राप्त झालेले. ‘विज्जमानानं’ हे पाळीमध्ये अनादर अर्थातील षष्ठी विभक्तीचे रूप आहे, त्याचा अर्थ दर्शवताना ‘विज्जमानेसु’ (विद्यमान असताना) असे म्हटले आहे. ‘प्रकृष्ट किंवा प्रवर्धित ज्ञान’ म्हणजे ‘प्रज्ञान’ (पञ्ञाणं), हे भगवंतांच्या ज्ञानाचे विशेषत्व दर्शवण्यासाठी म्हटले आहे. ๔๗๔. อภิชานิตฺวาติ [Pg.209] อภิวิสิฏฺเฐน ญาเณน ชานิตฺวา. โวสิตโวสานาติ กตกรณียตาย สพฺพโส ปริโสสิตนิฏฺฐา. ปารมิสงฺขาตนฺติ ปรมุกฺกํสภาวโต ปารมีติ สงฺขาตํ. เตนาห ‘‘สพฺพธมฺมานํ ปารภูต’’นฺติ. พฺรหฺมจริยสฺสาติ สาสนพฺรหฺมจริยสฺส อาทิภูตํ. เตนาห ‘‘อุปฺปาทกา ชนกา’’ติ. ‘‘อิทเมวํ ภวิสฺสติ อิทเมว’’นฺติ ตกฺกนํ ตกฺโก, โส เอตสฺส อตฺถีติ ตกฺกี. ยสฺมา โส ตํ ตํ วตฺถุํ ตถา ตถา ตกฺกิตฺวา คณฺหติ, ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘ตกฺกคาหี’’ติ. วีมํสนสีโล วีมํสี ปจฺจกฺขภูตมตฺถํ วีมํสนภูตาย ปญฺญาย เกวลํ วีมํสนโต. เตนาห ‘‘ปญฺญาจารํ จราเปตฺวา เอวํวาที’’ติ. ยถาวุตฺตตกฺกีวีมํสีภาเวน ตกฺกปริยาหตํ วีมํสานุจริตํ สยํปฏิภานํ เอวเมตนฺติ วตฺวา. ४७४. ‘अभिज्ञानित्वा’ म्हणजे अतिविशिष्ट ज्ञानाने जाणून घेऊन. ‘वोसितवोसाना’ म्हणजे कर्तव्य पूर्ण केल्यामुळे सर्व प्रकारे परिशोधित झालेली निष्ठा (समाप्ती). ‘पारमीसंखातं’ म्हणजे परम उत्कृष्टतेमुळे ‘पारमी’ (पारमिता) म्हणून ओळखले जाणारे. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘सर्व धर्मांच्या पार गेलेले’. ‘ब्रह्मचर्यस्स’ म्हणजे शासन-ब्रह्मचर्याचे आदिभूत (मूळ). म्हणूनच म्हटले आहे – ‘उत्पादक, जनक’. “हे असेच होईल, हे असेच आहे” असा तर्क करणे म्हणजे ‘तर्क’ होय, आणि जो असा तर्क करतो तो ‘तक्की’ (तर्कवादी). ज्याअर्थी तो त्या त्या गोष्टीचा तशा तशा प्रकारे तर्क करून स्वीकार करतो, म्हणून त्याला ‘तक्कगाही’ (तर्क स्वीकारणारा) म्हटले आहे. विचार करण्याची सवय असलेला तो ‘वीमंसी’ (मीमांसक), जो प्रत्यक्ष असलेल्या गोष्टीचा मीमांसारूप प्रज्ञेने केवळ विचार करतो. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘प्रज्ञेचा वापर करून असे बोलणारा’. वर सांगितल्याप्रमाणे तर्क आणि मीमांसा करण्याच्या स्वभावामुळे, तर्काने सिद्ध झालेल्या आणि मीमांसेचे अनुसरण करणाऱ्या स्वतःच्या प्रतिभेने “हे असेच आहे” असे बोलून. ๔๘๕. อฏฺฐิตปธานวตนฺติ อญฺญตฺถ กิสฺมิญฺจิ ปุคฺคเล อฏฺฐิตปธานวตํ อนญฺญสาธารณํ โภโต โคตมสฺส ปธานํ อโหสิ. สปฺปุริสปธานวตํ อโหสิ สปฺปุริสปธานวตาธิคตานํ เอตาทิสานํ อรหตํ อจฺฉริยปุคฺคลานํเยว อาเวณิกปธานวตํ อโหสิ. อชานนฺโตว ปกาเสตีติ อยํ ปุจฺฉิตมตฺถํ สยํ ปจฺจกฺขโต อชานนฺโต เอว เกวลํ สทฺทํ อุปฺปาเทตฺวาว ปกาเสสีติ สญฺญาย อาห. อชานนภาเว สนฺเตติ อิเม อธิเทวาติ ปจฺจกฺขโต ชานเน อสติ. ปณฺฑิเตน มนุสฺเสนาติ โลกโวหารกุสเลน มนุสฺเสน, ตฺวํ ปน โลกโวหาเรปิ อกุสโล. วจนตฺถญฺหิ อชานนฺโต ยํ กิญฺจิ วทติ. อุจฺเจน สมฺมตนฺติ อุจฺจํ สุปากฏํ สพฺพโส ตรุณทารเกหิปิ สมฺมตํ. ญาตเมตํ ยทิทํ อตฺถิ เทวาติ. เตนาห ‘‘สุสุทารกาปี’’ติอาทิ. เทวาติ อุปปตฺติเทวา. อธิเทวา นาม สมฺมุติเทเวหิ อธิกเทวาติ กตฺวา, ตทญฺเญ จ มนุสฺเส อธิกภาเว กิเมว วตฺตพฺพํ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. ४८५. ‘अट्ठितपधानवतं’ म्हणजे इतर कोणत्याही पुद्गलामध्ये (व्यक्तीमध्ये) न आढळणारे, पूज्य गौतमांचे असाधारण असे प्रधान व्रत (तपश्चर्या) होते. ‘सप्पुरिसपधानवतं’ म्हणजे सत्पुरुषांच्या प्रधान व्रताने प्राप्त झालेल्या अशा अर्हतांचे, आश्चर्यकारक व्यक्तींचेच हे आवेणिक (असाधारण/वैयक्तिक) प्रधान व्रत होते. ‘अजाणंतोव पकासेति’ म्हणजे हा विचारलेल्या गोष्टीला स्वतः प्रत्यक्षपणे न जाणताच केवळ शब्द उच्चारून प्रकट करतो, अशा समजुतीने म्हटले आहे. ‘अजाणनभावे संते’ म्हणजे ‘हे अधिदेव आहेत’ असे प्रत्यक्ष ज्ञान नसताना. ‘पंडितेन मनुस्सेन’ म्हणजे लोकव्यवहारात कुशल असलेल्या मनुष्याने; परंतु तू तर लोकव्यवहारातही अकुशल आहेस. कारण शब्दाचा अर्थ न जाणता तो काहीही बोलतो. ‘उच्चेन सम्मतं’ म्हणजे उच्च, अत्यंत सुप्रसिद्ध, अगदी लहान मुलांनीही मान्य केलेले. ‘देव आहेत हे ज्ञात आहे’ या अर्थाने. म्हणूनच ‘लहान मुलेसुद्धा’ इत्यादी म्हटले आहे. ‘देवा’ म्हणजे उपपत्ती-देव. ‘अधिदेवा’ म्हणजे संमुती-देवांपेक्षा श्रेष्ठ देव असे मानून, मग इतर मनुष्यांपेक्षा त्यांच्या श्रेष्ठतेबद्दल काय सांगावे! उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. ปปญฺจสูทนิยา มชฺฌิมนิกายฏฺฐกถาย पपंचसूदनी या मज्झिमनिकाय-अट्ठकथेतील สงฺคารวสุตฺตวณฺณนาย ลีนตฺถปฺปกาสนา สมตฺตา. संगारवसुत्तवर्णनेची लीनत्थप्पकासना (गूढार्थ प्रकाशिका टीका) समाप्त झाली. นิฏฺฐิตา จ พฺราหฺมณวคฺควณฺณนา. आणि ब्राह्मणवग्गवर्णना (ब्राह्मण वर्गाची व्याख्या) समाप्त झाली. มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา สมตฺตา. मज्झिमपण्णास-टीका समाप्त झाली. | |||
| မြန်မာ | |||
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| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
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| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |