| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| Français | |||
| Canon Pali | Commentaires | Sous-commentaires | Autres |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| Deutsch | |||
| Pali-Kanon | Kommentare | Subkommentare | Sonstige |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
နမော တဿ ဘဂဝတော အရဟတော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ उन भगवान्, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध को नमस्कार। မဇ္ဈိမနိကာယေ मज्झिमनिकाय में। မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသဋီကာ मज्झिमपण्णास-टीका। ၁. ဂဟပတိဝဂ္ဂေါ १. गहपतिवग्ग (गृहपति वर्ग)। ၁. ကန္ဒရကသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. कन्दरकसुत्त-वण्णना (कन्दरक सूत्र की व्याख्या)। ၁. အာရာမပေါက္ခရဏီအာဒီသူတိ [Pg.1] အာရာမပေါက္ခရဏီဥယျာနစေတိယဋ္ဌာနာဒီသု. ဥဿန္နာတိ ဗဟုလာ. အသောကကဏိကာရကောဝိဠာရကုမ္ဘီရာဇရုက္ခေဟိ သမ္မိဿတာယ တံ စမ္ပကဝနံ နီလာဒိပဉ္စဝဏ္ဏကုသုမပဋိမဏ္ဍိတန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ, န စမ္ပကရုက္ခာနံယေဝ နီလာဒိပဉ္စဝဏ္ဏကုသုမတာယာတိ ဝဒန္တိ. ဘဂဝါ ကုသုမဂန္ဓသုဂန္ဓေ စမ္ပကဝနေ ဝိဟရတီတိ ဣမိနာ န မာပနကာလေ ဧဝ တသ္မိံ နဂရေ စမ္ပကရုက္ခာ ဥဿန္နာ, အထ ခေါ အပရဘာဂေပီတိ ဒဿေတိ. ‘‘ပဉ္စသတမတ္တေဟိ အဍ္ဎတေဠသေဟီ’’တိ ဧဝံ အဒဿိတပရိစ္ဆေဒေန. ဟတ္ထိနော စာရေတိ သိက္ခာပေတီတိ ဟတ္ထာစရိယော ဟတ္ထီနံ သိက္ခာပကော, တဿ ပုတ္တောတိ အာဟ ‘‘ဟတ္ထာစရိယဿ ပုတ္တော’’တိ. တဒါ ဘဂဝါ တေသံ ပသာဒဇနနတ္ထံ အတ္တနော ဗုဒ္ဓါနုဘာဝံ အနိဂုဟိတွာဝ နိသိန္နောတိ ဒဿေန္တော ‘‘ဆဗ္ဗဏ္ဏာနံ ဃနဗုဒ္ဓရသ္မီန’’န္တိအာဒိမာဟ. ဘဂဝတော စေဝ ဂါရဝေနာတိ ဘဂဝတော ဂရုဘာဝေန, ဘဂဝတိ ဂါရဝေနာတိ ဝါ ပါဌော. १. “आरामपोक्खरणीआदीसु” का अर्थ है—आराम (उपवन), पोक्खरणी (पुष्करिणी), उद्यान, चैत्य स्थान आदि में। “उस्सन्ना” का अर्थ है—बहुत अधिक। अशोक, कणिकार, कोविळार, कुम्भी और राजवृक्षों के साथ मिश्रित होने के कारण वह चम्पकवन नीले आदि पाँच वर्णों के पुष्पों से सुसज्जित था, ऐसा समझना चाहिए; वे कहते हैं कि केवल चम्पक वृक्षों में ही नीले आदि पाँच वर्णों के पुष्प नहीं थे। “भगवान् पुष्पों की सुगन्ध से सुवासित चम्पकवन में विहार करते हैं”—इससे यह दर्शाते हैं कि न केवल उस नगर के निर्माण काल में ही वहाँ चम्पक वृक्ष प्रचुर मात्रा में थे, बल्कि बाद के समय में भी थे। “पञ्चसतमत्तेहि अढतेळसेहि” (लगभग पाँच सौ, साढ़े बारह सौ)—इस प्रकार बिना किसी निश्चित सीमा के दिखाया गया है। जो हाथियों को चराता है अर्थात् शिक्षा देता है, वह ‘हत्थाचरियो’ (हस्त्याचार्य) है, हाथियों का शिक्षक; उसका पुत्र ‘हत्थाचरियस्स पुत्तो’ (हस्त्याचार्य का पुत्र) कहलाता है। उस समय भगवान् उनके मन में श्रद्धा उत्पन्न करने के लिए अपने बुद्ध-प्रभाव को बिना छिपाए ही बैठे थे, यह दर्शाते हुए “छब्बण्णानं घनबुद्धरस्मीनं” (छह वर्णों वाली सघन बुद्ध-रश्मियों) आदि कहा गया है। “भगवतो चेव गारवेना” का अर्थ है—भगवान् के गौरव (गरुभाव) के कारण, अथवा “भगवति गारवेना” (भगवान् के प्रति गौरव/श्रद्धा के कारण) ऐसा पाठ है। နိစ္စံ န ဟောတီတိ အဘိဏှံ န ဟောတိ, ကဒါစိဒေဝ ဟောတီတိ အတ္ထော. အဘိဏှနိစ္စတာ ဟိ ဣဓ အဓိပ္ပေတာ, န ကူဋဋ္ဌနိစ္စတာ. လောကေ ကိဉ္စိ ဝိမှယာဝဟံ ဒိသွာ ဟတ္ထဝိကာရမ္ပိ ကရောန္တိ, အင်္ဂုလိံ ဝါ ဖောဋယန္တိ, တံ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ [Pg.2] ‘‘အစ္ဆရံ ပဟရိတုံ ယုတ္တ’’န္တိ. အဘူတပုဗ္ဗံ ဘူတန္တိ အယံ နိရုတ္တိနယော ယေဘုယျေန ဥပါဒါယ ရုဠှီဝသေန ဝုတ္တောတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. တထာ ဟိ ပါဠိယံ ‘‘ယေပိ တေ, ဘော ဂေါတမ, အဟေသုံ အတီတမဒ္ဓါန’’န္တိအာဒိ ဝုတ္တံ, ကိဉ္စိ အကတ္တဗ္ဗမ္ပိ ကရိယမာနံ ဒုက္ကရဘာဝေန ဝိမှယာဝဟံ ဟောတိ, တထာ ကိဉ္စိ ကတ္တဗ္ဗံ, ပုရိမံ ဂရဟစ္ဆရိယံ, ပစ္ဆိမံ ပသံသစ္ဆရိယံ, တဒုဘယံ သုတ္တပဒသော ဒဿေတုံ ‘‘တတ္ထာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. “निच्चं न होती” का अर्थ है—निरन्तर नहीं होता, कभी-कभी ही होता है। यहाँ ‘अभिण्हनिच्चता’ (निरन्तरता) अभिप्रेत है, न कि ‘कूटट्ठनिच्चता’ (शाश्वत नित्यता)। लोक में कुछ आश्चर्यजनक देखकर लोग हाथों से विकार (चेष्टा) भी करते हैं, या उँगली चटकाते हैं, उसी के सन्दर्भ में “अच्छरं पहरितुं युत्तं” (चुटकी बजाने योग्य) कहा गया है। “अभूतपुब्बं भूतं” (जो पहले नहीं हुआ था, वह हुआ)—यह निरुक्ति-नय (व्युत्पत्ति) प्रायः रूढ़ि के आधार पर कहा गया समझना चाहिए। जैसा कि पालि में “येपि ते, भो गोतम, अहेसुं अतीतमद्धानं” (हे गौतम! जो अतीत काल में हुए) आदि कहा गया है। कुछ न करने योग्य कार्य भी किए जाने पर अपनी दुष्करता के कारण आश्चर्यजनक होते हैं, वैसे ही कुछ करने योग्य कार्य भी। पहला ‘गर्हा-आश्चर्य’ (निन्दनीय आश्चर्य) है और दूसरा ‘प्रशंसा-आश्चर्य’ (प्रशंसनीय आश्चर्य); उन दोनों को सुत्त के पदों के अनुसार दर्शाने के लिए “तत्थ” आदि कहा गया है। သမ္မာ ပဋိပါဒိတောတိ သမ္မာပဋိပဒါယံ ဌပိတော. ဧသာ ပဋိပဒါ ပရမာတိ ဧတပရမံ, ဘာဝနပုံသကနိဒ္ဒေသောယံ ယထာ ‘‘ဝိသမံ စန္ဒိမသူရိယာ ပရိဝတ္တန္တီ’’တိ (အ. နိ. ၄.၇၀). အယဉှေတ္ထ အတ္ထော – ဘဂဝါ ဘိက္ခုသံဃော ပဋိပဒါယ တုမှေဟိ ပဋိပါဒိတော, အတီတေပိ ကာလေ ဗုဒ္ဓါ ဧတပရမံယေဝ ဘိက္ခုသံဃံ သမ္မာ ပဋိပါဒေသုံ, အနာဂတေပိ ကာလေ ဧတပရမံယေဝ ဘိက္ခုသံဃံ သမ္မာ ပဋိပါဒေဿန္တီတိ ပရိဗ္ဗာဇကော နယဂ္ဂါဟေန ဒိဋ္ဌေန အဒိဋ္ဌံ အနုမိနန္တော သဗ္ဗေသမ္ပိ ဗုဒ္ဓါနံ သာသနေ သံဃသုပ္ပဋိပတ္တိံ မဇ္ဈေ ဘိန္နသုဝဏ္ဏံ ဝိယ သမသမံ ကတွာ ဒဿေတိ, ဧဝံ ဒဿေန္တော စ တေသံ သုဓမ္မတဉ္စ တထာ ဒဿေတိ ဧဝါတိ ဝေဒိတဗ္ဗော, ဗုဒ္ဓသုဗုဒ္ဓတာ ပန နေသံ သရူပေနေဝ ဒဿိတာတိ. န ဣတော ဘိယျောတိ ဣမိနာ ပါဠိယံ ဧတပရမံယေဝါတိ အဝဓာရဏေန နိဝတ္တိတံ ဒဿေတိ သီလပဒဋ္ဌာနတ္တာ သမာဓိဿ, သမာဓိပဒဋ္ဌာနတ္တာ စ ပညာယ သီလေပိ စ အဘိသမာစာရိကပုဗ္ဗကတ္တာ အာဒိဗြဟ္မစရိယကဿ ဝုတ္တံ ‘‘အာဘိသမာစာရိကဝတ္တံ အာဒိံ ကတွာ’’တိ. “सम्मा पटिपादितो” का अर्थ है—सम्यक् प्रतिपदा (सही मार्ग) में स्थापित किया गया। “एसा पटिपदा परमा” का अर्थ है—यह प्रतिपदा परम है; यह ‘भावनपुंसक’ निर्देश है, जैसे “विसमं चन्दिमसूरिया परिवत्तन्ति” (अं. नि. 4.70)। यहाँ यह अर्थ है—भगवान्! भिक्षु संघ आपके द्वारा प्रतिपदा में स्थापित किया गया है; अतीत काल में भी बुद्धों ने भिक्षु संघ को इसी परम प्रतिपदा में सम्यक् रूप से स्थापित किया था, और भविष्य में भी इसी परम प्रतिपदा में सम्यक् रूप से स्थापित करेंगे। इस प्रकार वह परिव्राजक देखे हुए के आधार पर अनदेखे का अनुमान लगाते हुए सभी बुद्धों के शासन में संघ की सुप्रतिपत्ति (अच्छे आचरण) को बीच में टूटे हुए स्वर्ण के समान एक जैसा करके दिखाता है। ऐसा दिखाते हुए वह उनकी ‘सुधम्मता’ (उत्तम धर्मता) को भी उसी प्रकार दर्शाता है, ऐसा समझना चाहिए; जबकि उनकी ‘बुद्ध-सुबुद्धता’ (बुद्धत्व) को उनके स्वरूप से ही दर्शाया गया है। “न इतो भिय्यो” (इससे अधिक नहीं)—इसके द्वारा पालि में “एतपरमंयेव” (यही परम है) इस अवधारण (निश्चय) से जो निवृत्त (व्यावृत्त) है उसे दर्शाता है। चूँकि शील समाधि का पदट्ठान (निकट कारण) है और समाधि प्रज्ञा का, तथा शील में भी ‘आभिसमाचारिक’ (आचरण सम्बन्धी) शील ‘आदिब्रह्मचर्य’ (मुख्य शील) से पहले होता है, इसलिए “आभिसमाचारिकवत्तं आदिं कत्वा” (आभिसमाचारिक व्रत को आदि/प्रारम्भ मानकर) कहा गया है। ၂. ပုစ္ဆာနုသန္ဓိအာဒီသု အနန္တောဂဓတ္တာ ‘‘ပါဋိဧက္ကော အနုသန္ဓီ’’တိ ဝတွာ တမေဝတ္ထံ ပါကဋံ ကာတုံ ‘‘ဘဂဝါ ကိရာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. ဥပသန္တကာရဏန္တိ ဥပသန္တဘာဝကာရဏံ. တဉှိ အရိယာနံယေဝ ဝိသယော, တတ္ထာပိ စ ဗုဒ္ဓါနံ ဧဝ အနဝသေသတော ဝိသယောတိ ဣမမတ္ထံ ဗျတိရေကတော အနွယတော စ ဒဿေတုံ န ဟိ တွန္တိအာဒိ ဝုတ္တံ. တတ္ထ ဉာတတ္ထစရိယာ ကာကဇာတကာဒိဝသေန ဝေဒိတဗ္ဗာ, လောကတ္ထစရိယာ တံတံပါရမိပူရဏဝသေန, ဗုဒ္ဓတ္ထစရိယာ မဟာဗောဓိဇာတကာဒိဝသေန. အစ္ဆရိယံ ဘော ဂေါတမာတိအာဒိနာ ကန္ဒရကေန ကတံ ပသာဒပဝေဒနံ ဒဿေတိ. २. “पुच्छानुसन्धि” (प्रश्न-अनुसन्धि) आदि में अन्तर्निहित न होने के कारण “पाटिएक्को अनुसन्धी” (पृथक अनुसन्धि) कहकर उसी अर्थ को स्पष्ट करने के लिए “भगवा किरा” आदि कहा गया है। “उपसन्तकारणन्ति” का अर्थ है—उपशान्त होने का कारण। वह (उपशम) आर्यों का ही विषय है, और उसमें भी बुद्धों का ही पूर्णतः विषय है—इस अर्थ को व्यतिरेक (नकारात्मक) और अन्वय (सकारात्मक) रूप से दर्शाने के लिए “न हि त्वं” आदि कहा गया है। वहाँ ‘ज्ञातत्थचरिया’ (ज्ञातियों/सम्बन्धियों के हित के लिए चर्या) को काक-जातक आदि के माध्यम से समझना चाहिए, ‘लोकत्थचरिया’ (लोक-हित के लिए चर्या) को उन-उन पारमिताओं की पूर्ति के माध्यम से, और ‘बुद्धत्थचरिया’ (बुद्धत्व के लिए चर्या) को महाबोधि-जातक आदि के माध्यम से। “अच्छरियं भो गोतमा” आदि के द्वारा कन्दरक द्वारा की गई श्रद्धा की अभिव्यक्ति को दर्शाया गया है। ယေပိ တေတိအာဒိနာ တေန ဝုတ္တမတ္ထံ ပစ္စနုဘာသန္တေန ဘဂဝတာ သမ္ပဋိစ္ဆိတန္တိ စရိတတ္တာ အာဟ – ‘‘သန္တိ ဟိ ကန္ဒရကာတိ အယမ္ပိ ပါဋိယေက္ကော အနုသန္ဓီ’’တိ[Pg.3]. ယော ဟိ ကန္ဒရကေန ဘိက္ခုသံဃဿ ဥပသန္တဘာဝေါ ကိတ္တိတော, တံ ဝိဘဇိတွာ ဒဿေန္တောပိ တေန အပုစ္ဆိတောယေဝ အတ္တနော အဇ္ဈာသယေန ဘဂဝါ ‘‘သန္တိ ဟီ’’တိအာဒိနာ ဒေသနံ အာရဘိ. တေနာဟ ‘‘ဘဂဝတော ကိရ ဧတဒဟောသီ’’ တိအာဒိ. ကပ္ပေတွာတိ အညထာ သန္တမေဝ အတ္တာနံ အညထာ ဝိဓာယ. ပကပ္ပေတွာတိ သနိဒဿနဝသေန ဂဟေတွာ. တေနာဟ ‘‘ကုဟကဘာဝေနာ’’တိအာဒိ. ပဋိပဒံ ပူရယမာနာတိ ကာမံ အဝိသေသေန သေက္ခာ ဝုစ္စန္တိ, တေ ပန အဓိဂတမဂ္ဂဝသေန ‘‘ပူရယမာနာ’’တိ န ဝတ္တဗ္ဗာ ကိစ္စဿ နိဋ္ဌိတတ္တာ. မဂ္ဂေါ ဟိ ဧကစိတ္တက္ခဏိကောတိ အာဟ ‘‘ဥပရိမဂ္ဂဿ ဝိပဿနာယ ဥပသန္တာ’’တိ. ဣတော မုတ္တာတိ မဂ္ဂေနာဂတူပသမတော မုတ္တာ. ကလျာဏပုထုဇ္ဇနေ သန္ဓာယ ဝဒတိ. တေနာဟ ‘‘စတူဟိ သတိပဋ္ဌာနေဟိ ဥပသန္တာ’’တိ. “येपि ते” आदि के द्वारा उसके (कन्दरक के) कहे हुए अर्थ को दोहराते हुए भगवान् ने उसे स्वीकार किया, इस व्यवहार के कारण कहा गया है—“सन्ति हि कन्दरका” यह भी एक पृथक अनुसन्धि है। कन्दरक द्वारा भिक्षु संघ की जिस उपशान्त अवस्था की प्रशंसा की गई थी, उसे विभाजित करके (विस्तार से) दर्शाते हुए, कन्दरक द्वारा बिना पूछे ही भगवान् ने अपने आशय से “सन्ति ही” आदि के द्वारा देशना आरम्भ की। इसीलिए कहा गया—“भगवतो किर एतदहोसी” आदि। “कप्पेत्वा” का अर्थ है—अपने आप को, जो कि अन्यथा (किसी और रूप में) है, उसे किसी और रूप में बनाकर। “पकप्पेत्वा” का अर्थ है—निदर्शन (उदाहरण) के रूप में ग्रहण करके। इसीलिए “कुहकभावेना” (कपटपूर्ण व्यवहार से) आदि कहा गया है। “पटिपदं पूरयमाना” (प्रतिपदा को पूर्ण करते हुए)—यद्यपि सामान्य रूप से ‘सेक्ख’ (शिक्षार्थी) कहे जाते हैं, किन्तु प्राप्त किए जा चुके मार्ग के सन्दर्भ में उन्हें “पूर्ण करने वाले” नहीं कहा जाना चाहिए क्योंकि कार्य समाप्त हो चुका है। चूँकि मार्ग एक चित्त-क्षण वाला होता है, इसलिए कहा गया—“उपरिमग्गस्स विपस्सनाय उपसन्ता” (ऊपरी मार्ग की विपश्यना से उपशान्त)। “इतो मुत्ता” का अर्थ है—मार्ग से प्राप्त उपशम से मुक्त (रहित)। यह ‘कल्याण-पृथग्जनों’ के सन्दर्भ में कहा गया है। इसीलिए “चतूहि सतिपट्ठानेहि उपसन्ता” (चार स्मृति-प्रस्थानों से उपशान्त) कहा गया है। သတတသီလာတိ အဝိစ္ဆိန္နသီလာ. သာတိသယော ဟိ ဧတေသံ သီလဿ အခဏ္ဍာဒိဘာဝေါ. သုပရိသုဒ္ဓသီလတာဝသေန သန္တတာ ဝုတ္တိ ဧတေသန္တိ သန္တတဝုတ္တိနောတိ အာဟ ‘‘တဿေဝ ဝေဝစန’’န္တိ. ဧဝံ သီလဝုတ္တိဝသေန ‘‘သန္တတဝုတ္တိနော’’တိ ပဒဿ အတ္ထံ ဝတွာ ဣဒါနိ ဇီဝိတဝုတ္တိဝသေန ဒဿေန္တော ‘‘သန္တတဇီဝိကာဝါတိ အတ္ထော’’တိ အာဟ. သာသနဿ ဇီဝိတဝုတ္တိ သီလသန္နိဿိတာ ဧဝါတိ အာဟ ‘‘တသ္မိ’’န္တိအာဒိ. सततशीला (Satatasīlā) का अर्थ है अविच्छिन्न शील (निरंतर शील)। इनके शील का अखण्ड आदि होना अतिशय (उत्कृष्ट) है। सुविशुद्ध शील होने के कारण इनकी वृत्ति (आचरण) सतत है, इसलिए इन्हें 'सततवृत्ति' (santatavuttino) कहा गया है; इसीलिए कहा गया है कि 'यह उसी का पर्यायवाची है'। इस प्रकार शील-वृत्ति के अनुसार 'सततवृत्ति' पद का अर्थ बताकर, अब जीविका-वृत्ति के अनुसार दर्शाते हुए कहते हैं— 'सततजीविका वाले, यह अर्थ है'। शासन में जीविका-वृत्ति शील पर ही आश्रित है, इसीलिए 'तस्मिं' आदि कहा गया है। နိပယတိ ဝိသောသေတိ ရာဂါဒိသံကိလေသံ, တတော ဝါ အတ္တာနံ နိပါတီတိ နိပကော, ပညဝါ. တေနာဟ ‘‘ပညဝန္တော’’တိ. ပညာယ ဌတွာ ဇီဝိကာကပ္ပနံ နာမ ဗုဒ္ဓပဋိကုဋ္ဌမိစ္ဆာဇီဝံ ပဟာယ သမ္မာဇီဝေန ဇီဝနန္တိ တံ ဒဿေန္တော ‘‘ယထာ ဧကစ္စော’’တိအာဒိမာဟ. တတ္ထ ယံ ဝတ္တဗ္ဗံ, တံ ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂေ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၁.၁၄) တံသံဝဏ္ဏနာယဉ္စ (ဝိသုဒ္ဓိ. မဟာဋီ. ၁.၁၄) ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ရထဝိနီတပဋိပဒါဒယော တေသု တေသု သုတ္တေသု ဝုတ္တနယေန ဝေဒိတဗ္ဗာ. ဣတော အညတ္ထ မဟာဂေါပါလကသုတ္တာဒီသု (မ. နိ. ၁.၃၄၆ အာဒယော) လောကုတ္တရသတိပဋ္ဌာနာ ကထိတာတိ အာဟ – ‘‘ဣဓ ပန လောကိယလောကုတ္တရမိဿကာ သတိပဋ္ဌာနာ ကထိတာ’’တိ, သတိပဋ္ဌာနသုတ္တေပိ (ဒီ. နိ. ၂.၃၇၃-၃၇၄; မ. နိ. ၁.၁၀၆ အာဒယော) ဝေါမိဿကာဝ ကထိတာတိ. ဧတ္တကေနာတိ ဧတ္တကာယ ဒေသနာယ. जो राग आदि संक्लेशों को सुखा देता है (नष्ट कर देता है), अथवा उनसे अपनी रक्षा करता है, वह 'निपक' (निपुण) है, अर्थात् प्रज्ञावान। इसीलिए कहा गया है— 'प्रज्ञावान'। प्रज्ञा में स्थित होकर जीविका चलाना अर्थात् बुद्ध द्वारा निन्दित मिथ्या-आजीव को त्यागकर सम्यक्-आजीव से जीना है, इसे दर्शाते हुए 'यथा एकच्चो' (जैसे कोई एक) आदि कहा गया है। वहाँ जो कुछ कहना है, वह विशुद्धिमार्ग और उसकी टीका में बताए गए तरीके से ही जानना चाहिए। रथविनीत-प्रतिपदा आदि को उन-उन सूत्रों में बताए गए तरीके से जानना चाहिए। इससे अन्यत्र महागोपालक सूत्र आदि में लोकोत्तर सतिपट्ठान कहे गए हैं, इसीलिए कहा— 'यहाँ तो लौकिक और लोकोत्तर मिश्रित सतिपट्ठान कहे गए हैं', सतिपट्ठान सुत्त में भी मिश्रित ही कहे गए हैं। 'एत्तकेन' का अर्थ है— इतनी देशना से। ၃. ကာရကဘာဝန္တိ [Pg.4] ပဋိပတ္တိယံ ပဋိပဇ္ဇနကဘာဝံ. မယမ္ပိ နာမ ဂိဟီ ဗဟုကိစ္စာ သမာနာ ကာလေန ကာလံ သတိပဋ္ဌာနေသု သုပ္ပတိဋ္ဌိတစိတ္တာ ဝိဟရာမ, ကိမင်္ဂံ ပန ဝိဝေကဝါသိနောတိ အတ္တနော ကာရကဘာဝံ ပဝေဒေန္တော ဧဝံ ဘိက္ခုသံဃဉ္စ ဥက္ခိပတိ. တေနာဟ ‘‘အယဉှေတ္ထ အဓိပ္ပာယော’’တိအာဒိ. နာနာရမ္မဏေသု အပရာပရံ ဥပ္ပဇ္ဇမာနာနံ ရာဂါဒိကိလေသာနံ ဃနဇဋိတသင်္ခါတာကာရေန ပဝတ္တိ ကိလေသဂဟနေန ဂဟနတာ, တေနာဟ ‘‘အန္တော ဇဋာ ဗဟိ ဇဋာ, ဇဋာယ ဇဋိတာ ပဇာ’’တိ (သံ. နိ. ၁.၂၃, ၁၉၂). မနုဿာနံ အဇ္ဈာသယဂဟဏေန သာဌေယျမ္ပီတိ ဒဿေန္တော အာဟ ‘‘ကသဋသာဌေယျေသုပိ ဧသေဝ နယော’’တိ. ယထာ သပ္ပိမဓုဖာဏိတာဒီသု ကစဝရဘာဝေါ, သော ကသဋောတိ ဝုစ္စတိ, ဧဝံ သန္တာနေ အပရိသုဒ္ဓေါ သံကိလေသဘာဝေါ ကသဋန္တိ အာဟ ‘‘အပရိသုဒ္ဓဋ္ဌေန ကသဋတာ’’တိ. အတ္တနိ အသန္တဂုဏသမ္ဘာဝနံ ကေရာဋိယဋ္ဌော. ဇာနာတီတိ ‘‘ဣဒံ အဟိတံ န သေဝိတဗ္ဗံ, ဣဒံ ဟိတံ သေဝိတဗ္ဗ’’န္တိ ဝိစာရေတိ ဒေသေတိ. ဝိစာရဏတ္ထောပိ ဟိ ဟောတိ ဇာနာတိ-သဒ္ဒေါ ယထာ ‘‘အာယသ္မာ ဇာနာတီ’’တိ. သဗ္ဗာပိ…ပေ… အဓိပ္ပေတာ ‘‘ပသုပါလကာ’’တိအာဒီသု ဝိယ. ဣဓ အန္တရ-သဒ္ဒေါ ‘‘ဝိဇ္ဇန္တရိကာယာ’’တိအာဒီသု (မ. နိ. ၂.၁၄၉) ဝိယ ခဏတ္ထောတိ အာဟ ‘‘ယတ္တကေန ခဏေနာ’’တိ. တေနာတိ ဟတ္ထိနာ. တာနီတိ သာဌေယျာဒီနိ. ३. 'कारकभाव' का अर्थ है प्रतिपत्ति (अभ्यास) में प्रतिपन्न होने की अवस्था। 'हम गृहस्थ भी बहुत कार्यों वाले होते हुए समय-समय पर स्मृतिप्रस्थानों (सतिपट्ठानों) में सुप्रतिष्ठित चित्त होकर विहार करते हैं, तो फिर विवेक (एकान्त) में रहने वालों का क्या कहना'— इस प्रकार अपने कारकभाव को बताते हुए वह भिक्षु संघ की प्रशंसा करता है। इसीलिए कहा गया है— 'यहाँ यह अभिप्राय है' आदि। विभिन्न आलम्बनों में बार-बार उत्पन्न होने वाले राग आदि क्लेशों की घनी उलझन के रूप में प्रवृत्ति ही 'क्लेश-गहन' (क्लेशों की सघनता) है, इसीलिए कहा गया है— 'अन्दर उलझन है, बाहर उलझन है, प्रजा उलझनों से उलझी हुई है'। मनुष्यों के आशय को ग्रहण करने से 'शाठ्य' (धूर्तता) भी होती है, यह दर्शाते हुए कहा— 'कषट और शाठ्य में भी यही नियम है'। जैसे घी, मधु, फाणित (गुड़ का रस) आदि में जो कचरा होता है, उसे 'कषट' कहा जाता है, वैसे ही सन्तान (चित्त-परम्परा) में अपरिशुद्ध संक्लेश भाव 'कषट' है, इसीलिए कहा— 'अशुद्ध होने के अर्थ में कषटता है'। अपने भीतर अविद्यमान गुणों की संभावना करना 'कैराट्य' (धूर्तता) का अर्थ है। 'जानता है' का अर्थ है— 'यह अहितकर है, इसका सेवन नहीं करना चाहिए; यह हितकर है, इसका सेवन करना चाहिए'— ऐसा विचार करता है और उपदेश देता है। 'जानना' शब्द विचार करने के अर्थ में भी होता है, जैसे 'आयुष्मान् जानते हैं'। 'पशुपालक' आदि के समान सभी...पे... अभिप्रेत हैं। यहाँ 'अन्तर' शब्द 'विज्जन्तरिकाय' आदि के समान 'क्षण' के अर्थ में है, इसीलिए कहा— 'जितने क्षण में'। 'तेन' का अर्थ है— उस हाथी के द्वारा। 'तानि' का अर्थ है— वे शाठ्य आदि। အတ္ထတော ကာယစိတ္တုဇုကတာပဋိပက္ခဘူတာဝ လောဘသဟဂတစိတ္တုပ္ပာဒဿ ပဝတ္တိအာကာရဝိသေသာတိ တာနိ ပဝတ္တိအာကာရေန ဒဿေတုံ ‘‘တတ္ထာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. တတ္ထ ယဿာတိ ပါဏဘူတဿ အဿဿ ဝါ ဟတ္ထိနော ဝါ. ဌဿာမီတိ တတ္ထေဝ သပ္ပဋိဘယေ ဌာနေ ဂန္တွာ ဌဿာမီတိ န ဟောတိ. ဣမဿ သာဌေယျတာယ ပါကဋကရဏံ ဝဉ္စနာဓိပ္ပာယဘာဝတော. တထာ ဟိ စတူသု ဌာနေသု ‘‘ဝဉ္စေတွာ’’ ဣစ္စေဝ ဝုတ္တံ, နိဂုဟန္တော ပန တတ္ထေဝ ဂန္တွာ တိဋ္ဌေယျ. ဧသ နယော သေသေသုပိ. ပဋိမဂ္ဂံ အာရောဟိတုကာမဿာတိ အာဂတမဂ္ဂမေဝ နိဝတ္တိတွာ ဂန္တုကာမဿ. လေဏ္ဍဝိဿဇ္ဇနာဒီသု ကာလန္တရာပေက္ခာဘာဝံ ‘‘တထာ’’တိ ဣမိနာ ဥပသံဟရတိ. अर्थतः काया और चित्त की ऋजुता (सीधेपन) के प्रतिपक्ष भूत लोभ-सहगत चित्त-उत्पाद के प्रवृत्ति-आकार के विशेष होने के कारण, उन्हें प्रवृत्ति-आकार के रूप में दर्शाने के लिए 'तत्य' आदि कहा गया है। वहाँ 'यस्स' का अर्थ है— जिस प्राणी का, चाहे वह घोड़ा हो या हाथी। 'ठस्सामि' (खड़ा रहूँगा) का अर्थ यह नहीं है कि वह उसी भययुक्त स्थान पर जाकर खड़ा रहेगा। इसकी शठता (धूर्तता) का प्रकटीकरण वंचना (धोखा देने) के अभिप्राय से होने के कारण है। क्योंकि चार स्थानों पर 'वंचना करके' (वञ्चेत्वा) ही कहा गया है, किन्तु छिपाने वाला तो वहीं जाकर खड़ा हो जाएगा। यही नियम शेष में भी है। 'पटिमग्गं आरोहितुकामिस्स' का अर्थ है— आए हुए मार्ग पर ही लौटकर जाने की इच्छा रखने वाले का। लीद (गोबर) त्यागने आदि में समय के अन्तराल की अपेक्षा न होने को 'तथा' शब्द से उपसंहारित किया गया है। အန္တောဇာတကာတိ အတ္တနော ဒါသိယာ ကုစ္ဆိမှိ ဇာတာ. ဓနက္ကီတာတိ ဓနံ ဒတွာ ဒါသဘာဝေန ဂဟိတာ. ကရမရာနီတာတိ ဒါသဘာဝေန ကရမရဂ္ဂါဟဂဟိတာ. ဒါသဗျန္တိ ဒါသဘာဝံ. ပေဿာတိ အဒါသာ ဧဝ ဟုတွာ ဝေယျာဝစ္စကရာ. ဣမံ ဝိဿဇ္ဇေတွာတိ ဣမံ အတ္တနော ဟတ္ထဂတံ ဝိဿဇ္ဇေတွာ. ဣမံ [Pg.5] ဂဏှန္တာတိ ဣမံ တဿ ဟတ္ထဂတံ ဂဏှန္တာ. သမ္မုခတော အညထာ ပရမ္မုခကာလေ ကာယဝါစာသမုဒါစာရဒဿနေနေဝ စိတ္တဿ နေသံ အညထာ ဌိတဘာဝေါ နိဒ္ဒိဋ္ဌောတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. 'अन्तोजातका' का अर्थ है— अपनी दासी की कोख से उत्पन्न। 'धनक्कीता' का अर्थ है— धन देकर दास-भाव में ग्रहण की गई। 'करमरानीता' का अर्थ है— युद्ध आदि में बंदी बनाकर दास-भाव में लाई गई। 'दासव्यं' का अर्थ है— दास-भाव (गुलामी)। 'पेस्सा' का अर्थ है— जो दास नहीं हैं, किन्तु सेवा-कार्य (वैयावृत्य) करने वाले हैं। 'इमं विस्सज्जेत्वा' का अर्थ है— अपने हाथ में आए हुए इसे छोड़कर। 'इमं गण्हन्ता' का अर्थ है— उसके हाथ में आए हुए इसे ग्रहण करते हुए। सामने होने पर एक तरह का और पीठ पीछे (परोक्ष में) दूसरे तरह का काया और वाणी का व्यवहार देखने से ही उनके चित्त की अन्यथा (विपरीत) स्थिति निर्दिष्ट है, ऐसा समझना चाहिए। ၄. အယမ္ပိ ပါဋိယေက္ကော အနုသန္ဓီတိ ဧတ္ထာပိ အနန္တရေ ဝုတ္တနယေနေဝ အနုသန္ဓိယောဇနာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. တေနေဝါဟ ‘‘အယဉှီ’’တိအာဒိ. စတုတ္ထော ဟိတပဋိပဒံ ပဋိပန္နောတိ ယောဇနာ. ပုဂ္ဂလသီသေန ပုဂ္ဂလပဋိပတ္တိံ ဒဿေန္တော ‘‘ပုဂ္ဂလေ ပဟာယာ’’တိ အာဟ. ပဋိပတ္တိ ဟိ ဣဓ ပဟာတဗ္ဗာ, န ပုဂ္ဂလာ. ယထာ အဿဒ္ဓါဒိပုဂ္ဂလပရိဝဇ္ဇနေန သဒ္ဓိန္ဒြိယာဒိဘာဝနာ ဣဇ္ဈန္တိ, ဧဝံ မိစ္ဆာပဋိပန္နပုဂ္ဂလပရိဝဇ္ဇနေန မိစ္ဆာပဋိပဒါ ဝဇ္ဇိတဗ္ဗာတိ အာဟ – ‘‘ပုရိမေ တယော ပုဂ္ဂလေ ပဟာယာ’’တိ. စတုတ္ထပုဂ္ဂလဿာတိ ဣမသ္မိံ စတုက္ကေ ဝုတ္တစတုတ္ထပုဂ္ဂလဿ ဟိတပဋိပတ္တိယံယေဝ ပဋိပါဒေမိ ပဝတ္တေမီတိ ဒဿေန္တော. သန္တာတိ သမံ ဝိနာသံ နိရောဓံ ပတ္တာတိ အယမေတ္ထ အတ္ထောတိ အာဟ ‘‘နိရုဒ္ဓါ သန္တာတိ ဝုတ္တာ’’တိ. ပုန သန္တာတိ ဘာဝနာဝသေန ကိလေသပရိဠာဟဝိဂမတော သန္တာတိ အယမေတ္ထ အတ္ထောတိ အာဟ ‘‘နိဗ္ဗုတာ’’တိ. သန္တာတိ အာနေတွာ ယောဇနာ. သန္တော ဟဝေတိ ဧတ္ထ သမဘာဝကရေန သာဓုဘာဝဿ ဝိသေသပစ္စယဘူတေန ပဏ္ဍိစ္စေန သမန္နာဂတာ အရိယာ ‘‘သန္တော’’တိ ဝုတ္တာတိ အာဟ – ‘‘သန္တော ဟဝေ…ပေ… ပဏ္ဍိတာ’’တိ. ४. यह भी एक पृथक अनुसन्धि है - यहाँ भी पूर्वोक्त विधि से ही अनुसन्धि का योजन समझना चाहिए। इसीलिए 'अयञ्हि' आदि कहा गया है। चौथा (व्यक्ति) हित-प्रतिपदा (कल्याणकारी मार्ग) पर चलने वाला है, यह अर्थ है। पुद्गल के माध्यम से पुद्गल की प्रतिपत्ति (आचरण) को दिखाते हुए 'पुद्गलों को छोड़कर' कहा। यहाँ प्रतिपत्ति ही छोड़ने योग्य है, पुद्गल नहीं। जैसे अश्रद्धा आदि पुद्गलों के वर्जन से श्रद्धा इन्द्रिय आदि की भावना सिद्ध होती है, वैसे ही मिथ्या प्रतिपन्न पुद्गलों के वर्जन से मिथ्या प्रतिपदा का त्याग करना चाहिए - यह 'पहले तीन पुद्गलों को छोड़कर' से कहा गया है। 'चौथे पुद्गल का' - इस चतुष्क में कहे गए चौथे पुद्गल को हित-प्रतिपत्ति में ही प्रवृत्त करता हूँ, यह दिखाते हुए। 'शान्त' का अर्थ है - जो विनाश या निरोध को प्राप्त हो गए हैं, यह यहाँ अर्थ है, इसीलिए 'निरुद्ध ही शान्त कहे गए हैं' कहा। पुनः 'शान्त' का अर्थ है - भावना के वश से क्लेशों के परिदाह (जलन) के दूर हो जाने से शान्त, यह यहाँ अर्थ है, इसीलिए 'निर्वृत' (बुझे हुए) कहा। 'शान्त' शब्द को लाकर जोड़ना चाहिए। 'सन्तो हवे' यहाँ समभाव के कारण साधुभाव के विशेष प्रत्ययभूत पाण्डित्य से युक्त आर्यों को 'शान्त' कहा गया है - इसीलिए 'सन्तो हवे...पे... पण्डिता' कहा। အာဟိတော အဟံမာနော ဧတ္ထာတိ အတ္တာ (အ. နိ. ဋီ. ၂.၄.၁၉၈) အတ္တဘာဝေါ, ဣဓ ပန ယော ပရော န ဟောတိ, သော အတ္တာ, တံ အတ္တာနံ. ပရန္တိ အတ္တတော အညံ. ဆာတံ ဝုစ္စတိ တဏှာ ဇိဃစ္ဆာဟေတုတာယ. အန္တော တာပနကိလေသာနန္တိ အတ္တနော သန္တာနေ အတ္တပရိဠာဟဇနနသန္တပ္ပနကိလေသာနံ. စိတ္တံ အာရာဓေတီတိ စိတ္တံ ပသာဒေတိ, သမ္ပဟံသေတီတိ အတ္ထော. ယသ္မာ ပန တထာဘူတော စိတ္တံ သမ္ပာဒေန္တော အဇ္ဈာသယံ ဂဏှန္တော နာမ ဟောတိ, တသ္မာ ဝုတ္တံ ‘‘စိတ္တံ သမ္ပာဒေတီ’’တိအာဒိ. जिसमें 'अहंकार' (मैं-पन) स्थापित है, वह 'अत्ता' (आत्मा/स्वयं) है, अर्थात् आत्मभाव। यहाँ जो 'पर' (दूसरा) नहीं है, वह 'अत्ता' है, उस अपने आपको। 'पर' का अर्थ है - अपने से भिन्न। 'छात' (भूखा) तृष्णा को कहा जाता है क्योंकि वह भूख का हेतु है। 'अन्तः तापन क्लेशों का' अर्थात् अपनी सन्तान (प्रवाह) में आत्म-परिदाह उत्पन्न करने वाले और सन्तप्त करने वाले क्लेशों का। 'चित्त को आराधित करता है' अर्थात् चित्त को प्रसन्न करता है, सम्प्रहर्षित करता है - यह अर्थ है। चूँकि वैसा होकर चित्त को सम्पादित करने वाला 'अध्याशय' (आशय) को ग्रहण करने वाला होता है, इसलिए 'चित्तं सम्पादेति' आदि कहा गया है। ၅. ဒုက္ခံ ပဋိက္ကူလံ ဇေဂုစ္ဆံ ဧတဿာတိ ဒုက္ခပဋိက္ကူလော တံ ဒုက္ခပဋိက္ကူလံ. ဝိသေသနဝိသေသိတဗ္ဗတာ ဟိ ကာမစာရာ. အဋ္ဌကထာယံ ပန ဒုက္ခဿ ဝိသေသိတဗ္ဗတံ သန္ဓာယ ဗာဟိရတ္ထသမာသံ အနာဒိယိတွာ ‘‘ဒုက္ခဿ ပဋိက္ကူလ’’န္တိ အတ္ထော ဝုတ္တော. ယေန ဟိ ဘာဂေန ပုရိသဿ ဒုက္ခံ ပဋိက္ကူလံ, တေန ဒုက္ခဿ ပုရိသောပီတိ. တေနာဟ – ‘‘ပစ္စနီကသဏ္ဌိတ’’န္တိ. ५. दुःख जिसके लिए प्रतिकूल और जुगुप्सित (घृणित) है, वह 'दुःखप्रतिकूल' है। विशेषण और विशेष्य का भाव इच्छानुसार होता है। किन्तु अट्ठकथा में दुःख की विशेष्यता को ध्यान में रखकर बाह्य-अर्थ-समास को न अपनाकर 'दुःख का प्रतिकूल' यह अर्थ कहा गया है। जिस भाग से पुरुष के लिए दुःख प्रतिकूल है, उसी से दुःख के लिए पुरुष भी (प्रतिकूल) है। इसीलिए 'पच्चनीकसण्ठितं' (विपरीत स्थित) कहा। ၆. စတူဟိ [Pg.6] ကာရဏေဟီတိ ဓာတုကုသလတာဒီဟိ စတူဟိ ကာရဏေဟိ. ကမ္မံ ကရောတီတိ ယောဂကမ္မံ ကရောတိ. ယသ္မာ သမ္ဗုဒ္ဓါ ပရေသံ မဂ္ဂဖလာဓိဂမာယ ဥဿာဟဇာတာ, တတ္ထ နိရန္တရံ ယုတ္တပ္ပယုတ္တာ ဧဝ ဟောန္တိ, တေ ပဋိစ္စ တေသံ အန္တရာယော န ဟောတိယေဝါတိ အာဟ ‘‘န ပန ဗုဒ္ဓေ ပဋိစ္စာ’’တိ. ကိရိယပရိဟာနိယာ ဒေသကဿ တဿေဝ ဝါ ပုဂ္ဂလဿ တဇ္ဇပယောဂါဘာဝတော. ‘‘ဒေသကဿ ဝါ’’တိ ဣဒံ သာဝကာနံ ဝသေန ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. မဟတာ အတ္ထေနာတိ ဧတ္ထ အတ္ထ-သဒ္ဒေါ အာနိသံသပရိယာယောတိ အာဟ ‘‘ဒွီဟိ အာနိသံသေဟီ’’တိ. ပသာဒံ ပဋိလဘတိ ‘‘အရဟန္တော’’တိအာဒိနာ သံဃသုပ္ပဋိပတ္တိယာ သုတတ္တာ. အဘိနဝေါ နယော ဥဒပါဒိ သန္တတသီလတာဒိဝသေန အနတ္တန္တပတာဒိဝသေန, သောပိ တံ သုတွာ ဒါသာဒီသု သဝိသေသံ လဇ္ဇီ ဒယာပန္နော ဟိတာနုကမ္ပီ ဟုတွာ သေက္ခပဋိပဒံ သီလံ သာဓေန္တော အနုက္ကမေန သတိပဋ္ဌာနဘာဝနံ ပရိဗြူဟေတိ. တေနာဟ ဘဂဝါ ‘‘မဟတာ အတ္ထေန သံယုတ္တော’’တိ. ६. 'चार कारणों से' अर्थात् धातु-कुशलता आदि चार कारणों से। 'कर्म करता है' अर्थात् योग-कर्म करता है। चूँकि बुद्ध दूसरों के मार्ग-फल की प्राप्ति के लिए उत्साहयुक्त होते हैं, वहाँ वे निरन्तर संलग्न और प्रयुक्त ही होते हैं, उनके कारण उनमें (दूसरों में) अन्तराय (बाधा) नहीं ही होता है, इसीलिए 'बुद्ध के कारण नहीं' कहा। क्रिया की हानि से, उपदेशक के या उस पुद्गल के तज्जन्य प्रयोग के अभाव के कारण। 'उपदेशक के' - यह श्रावकों के वश से देखना चाहिए। 'महतत्त्व (महान अर्थ) से' - यहाँ 'अत्थ' शब्द आनृशंस (लाभ) का पर्यायवाची है, इसीलिए 'दो आनृशंसों से' कहा। 'प्रसाद प्राप्त करता है' - 'अरहन्त' आदि के द्वारा संघ की सुप्रतिपत्ति (अच्छे आचरण) के सुनने से। सन्तत-शीलता आदि के वश से और अनत्तन्तप (स्वयं को न तपाने) आदि के वश से एक नया नय (विधि) उत्पन्न हुआ, वह भी उसे सुनकर दासों आदि के प्रति विशेष रूप से लज्जावान, दयावान और हित-अनुकम्पी होकर शैक्ष-प्रतिपदा रूपी शील को सिद्ध करता हुआ क्रमशः स्मृतिप्रस्थान-भावना को बढ़ाता है। इसीलिए भगवान ने 'महान अर्थ से संयुक्त' कहा। ၈. ပရေသံ ဟနနဃာတနာဒိနာ ရောဒါပနတော လုဒ္ဒေါ, တထာ ဝိဃာတကဘာဝေန ကာယစိတ္တာနံ ဝိဒါရဏတော ဒါရုဏော, ဝိရုဒ္ဓဝါဒတာယ ကက္ခဠော, ဗန္ဓနာဂါရေ နိယုတ္တော ဗန္ဓနာဂါရိကော. ८. दूसरों के हनन-घातन आदि के द्वारा रुलाने के कारण 'लुब्धक' (क्रूर), वैसे ही विघातक होने से काय और चित्त के विदारण (फाड़ने) के कारण 'दारुण', विरुद्ध बात करने के कारण 'कक्खल' (कठोर), और कारागार में नियुक्त होने के कारण 'बन्धनागारिक' (जेलर) है। ၉. ခတ္တိယာဘိသေကေနာတိ ခတ္တိယာနံ ကတ္တဗ္ဗအဘိသေကေန. သန္ထာဂါရန္တိ သန္ထာရဝသေန ကတံ အဂါရံ ယညာဝါဋံ. သပ္ပိတေလေနာတိ သပ္ပိမယေန တေလေန, ယမကသ္နေဟေန ဟိ တဒါ ကာယံ အဗ္ဘဉ္ဇတိ. ဝစ္ဆဘာဝံ တရိတွာ ဌိတော ဝစ္ဆတရော. ပရိက္ခေပကရဏတ္ထာယာတိ ဝနမာလာဟိ သဒ္ဓိံ ဒဗ္ဘေဟိ ဝေဒိယာ ပရိက္ခေပနတ္ထာယ. ယညဘူမိယန္တိ အဝသေသယညဋ္ဌာနေ. ယံ ပနေတ္ထ အတ္ထတော အဝိဘတ္တံ တံ သုဝိညေယျမေဝ. ९. 'क्षत्रिय-अभिषेक से' अर्थात् क्षत्रियों के लिए किए जाने वाले अभिषेक से। 'सन्थागार' अर्थात् संस्तार (बिछाने) के वश से बनाया गया घर या यज्ञ-शाला। 'सर्पि-तेल से' अर्थात् घी रूपी तेल से, क्योंकि उस समय यमक-स्नेह (दो प्रकार के स्नेह) से शरीर का अभ्यंजन (मालिश) करते हैं। बछड़े की अवस्था को पार कर खड़ा हुआ 'वच्छतरो' (जवान बैल) है। 'परिक्षेप करने के लिए' अर्थात् वन-मालाओं के साथ दभों (कुशों) से वेदी को घेरने के लिए। 'यज्ञ-भूमि में' अर्थात् शेष यज्ञ-स्थान में। जो यहाँ अर्थतः अविभक्त (अस्पष्ट) है, वह सुविज्ञेय ही है। ကန္ဒရကသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. कन्दरक-सुत्त की वर्णना के लीनत्थ-प्रकाशिनी (गूढ़ार्थ-प्रकाशिनी टीका) समाप्त हुई। ၂. အဋ္ဌကနာဂရသုတ္တဝဏ္ဏနာ २. अट्ठकनागर-सुत्त की वर्णना। ၁၇. အဝိဒူရေတိ [Pg.7] ဣမိနာ ပါဠိယံ ‘‘ဝေသာလိယ’’န္တိ ဣဒံ သမီပေ ဘုမ္မဝစနန္တိ ဒဿေတိ. သာရပ္ပတ္တကုလဂဏနာယာတိ (အ. နိ. ဋီ. ၃.၁၁.၁၆) မဟာသာရမဟပ္ပတ္တကုလဂဏနာယ. ဒသမေ ဌာနေတိ အညေ အညေတိ ဒသဂဏနဋ္ဌာနေ. အဋ္ဌကနဂရေ ဇာတော ဘဝေါ အဋ္ဌကနာဂရော. ကုက္ကုဋာရာမောတိ ပါဋလိပုတ္တေ ကုက္ကုဋာရာမော, န ကောသမ္ဗိယံ. १७. 'अविदूरे' (पास में) इससे पालि में 'वेसालिया' (वैशाली में) इस पद को समीप-अर्थ में सप्तमी विभक्ति वाला दिखाया है। 'सारप्राप्त कुल गणना से' अर्थात् महान सार को प्राप्त कुलों की गणना से। 'दसवें स्थान पर' अर्थात् अन्य-अन्य दस गणना के स्थानों में। अट्ठक नगर में उत्पन्न हुआ 'अट्ठकनागर' है। 'कुक्कुटाराम' पाटलिपुत्र में है, कोसम्बी में नहीं। ၁၈. ပကတတ္ထနိဒ္ဒေသော တ-သဒ္ဒေါတိ တဿ ‘‘ဘဂဝတာ’’တိအာဒီဟိ ပဒေဟိ သမာနာဓိကရဏဘာဝေန ဝုတ္တဿ ယေန အဘိသမ္ဗုဒ္ဓဘာဝေန ဘဂဝါ ပကတော အဓိဂတော သုပါကဋော စ, တံ အဘိသမ္ဗုဒ္ဓဘာဝံ သဒ္ဓိံ အာဂမနီယပဋိပဒါယ အတ္ထဘာဝေန ဒဿေန္တော ‘‘ယော သော…ပေ… အဘိသမ္ဗုဒ္ဓေါ’’တိ အာဟ. သတိပိ ဉာဏဒဿန-သဒ္ဒါနံ ဣဓ ပညာဝေဝစနဘာဝေ တေန တေန ဝိသေသေန တေသံ ဝိသယဝိသေသေ ပဝတ္တိဒဿနတ္ထံ အသာဓာရဏဉာဏဝိသေသဝသေန ဝိဇ္ဇာတ္တယဝသေန ဝိဇ္ဇာအဘိညာနာဝရဏဉာဏဝသေန သဗ္ဗညုတဉာဏမံသစက္ခုဝသေန ပဋိဝေဓဒေသနာဉာဏဝသေန စ တဒတ္ထံ ယောဇေတွာ ဒဿေန္တော ‘‘တေသံ တေသ’’န္တိအာဒိမာဟ. တတ္ထ အာသယာနုသယံ ဇာနတာ အာသယာနုသယဉာဏေန သဗ္ဗံ ဉေယျဓမ္မံ ပဿတာ သဗ္ဗညုတာနာဝရဏဉာဏေဟိ. ပုဗ္ဗေနိဝါသာဒီဟီတိ ပုဗ္ဗေနိဝါသာသဝက္ခယဉာဏေဟိ. ပဋိဝေဓပညာယာတိ အရိယမဂ္ဂပညာယ. ဒေသနာပညာယ ပဿတာတိ ဒေသေတဗ္ဗဓမ္မာနံ ဒေသေတဗ္ဗပ္ပကာရံ ဗောဓနေယျပုဂ္ဂလာနဉ္စ အာသယာနုသယစရိတာဓိမုတ္တိအာဒိဘေဒံ ဓမ္မဒေသနာပညာယ ယာထာဝတော ပဿတာ. အရီနန္တိ ကိလေသာရီနံ, ပဉ္စဝိဓမာရာနံ ဝါ, သာသနဿ ဝါ ပစ္စတ္ထိကာနံ အညတိတ္ထိယာနံ တေသံ ပန ဟနနံ ပါဋိဟာရိယေဟိ အဘိဘဝနံ အပ္ပဋိဘာနတာကရဏံ အဇ္ဈုပေက္ခနမေဝ ဝါ, ကေသိဝိနယသုတ္တဉ္စေတ္ထ နိဒဿနံ. १८. 'प्रकटार्थ निर्देश' में 'त' शब्द का अर्थ है—'भगवा' आदि पदों के साथ समानाधिकरण भाव से कहे गए जिस अभिसम्बुद्ध भाव के कारण भगवान प्रकट, अधिगत और सुविख्यात हुए, उस अभिसम्बुद्ध भाव को आगमनीय प्रतिपदा के अर्थ के साथ दिखाते हुए "जो वह... पे... अभिसम्बुद्ध है" ऐसा कहा। यद्यपि यहाँ 'ज्ञान' और 'दर्शन' शब्द प्रज्ञा के पर्यायवाची हैं, फिर भी उन-उन विशेषताओं के द्वारा उनके विषय-विशेष में प्रवृत्ति दिखाने के लिए असाधारण ज्ञान-विशेष के वश से, त्रिविद्या के वश से, विद्या-अभिज्ञा-अनावरण ज्ञान के वश से, सर्वज्ञता ज्ञान और मांस-चक्षु के वश से, तथा प्रतिवेध और देशना ज्ञान के वश से उस अर्थ को जोड़कर दिखाते हुए "उन-उन का" आदि कहा। वहाँ 'आशयानुशय' को जानने वाले के द्वारा 'आशयानुशय ज्ञान' से, 'सब ज्ञेय धर्मों' को देखने वाले के द्वारा 'सर्वज्ञता और अनावरण ज्ञान' से। 'पुब्बेनिवास' आदि के द्वारा अर्थात् 'पुब्बेनिवास' और 'आसवक्खय' (आस्रवक्षय) ज्ञानों से। 'प्रतिवेध प्रज्ञा' से अर्थात् 'आर्यमार्ग प्रज्ञा' से। 'देशना प्रज्ञा' से देखते हुए अर्थात् देशना करने योग्य धर्मों के देशना प्रकार को और बोध प्राप्त करने योग्य पुद्गलों के आशय, अनुशय, चरित, अधिमुक्ति आदि के भेद को धर्मदेशना प्रज्ञा से यथार्थ रूप में देखते हुए। 'अरि' (शत्रु) अर्थात् क्लेश रूपी शत्रुओं का, अथवा पाँच प्रकार के मारों का, अथवा शासन के प्रतिपक्षी अन्य तीर्थिकों का; उनका हनन करना, प्रातिहार्यों से उन्हें अभिभूत करना, उन्हें निरुत्तर करना अथवा उनकी उपेक्षा करना ही है, और यहाँ 'केसिविनय सुत्त' उदाहरण है। တထာ ဌာနာဋ္ဌာနာဒိဝိဘာဂံ ဇာနတာ ယထာကမ္မူပဂသတ္တေ ပဿတာ, သဝါသနာနံ အာသဝါနံ ခီဏတ္တာ အရဟတာ, အဘိညေယျာဒိဘေဒေ ဓမ္မေ အဘိညေယျာဒိတော အဝိပရီတာဝဗောဓတော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေန. အထ ဝါ တီသု ကာလေသု အပ္ပဋိဟတဉာဏတာယ ဇာနတာ, ကာယကမ္မာဒိဝသေန တိဏ္ဏံ ကမ္မာနံ ဉာဏာနုပရိဝတ္တိတော နိသမ္မကာရိတာယ ပဿတာ, ဒဝါဒီနံ အဘာဝသာဓိကာယ [Pg.8] ပဟာနသမ္ပဒါယ အရဟတာ, ဆန္ဒာဒီနံ အဟာနိဟေတုဘူတာယ အက္ခယပဋိဘာနသာဓိကာယ သဗ္ဗညုတာယ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေနာတိ ဧဝံ ဒသဗလအဋ္ဌာရသအာဝေဏိကဗုဒ္ဓဓမ္မဝသေနပိ ယောဇနာ ကာတဗ္ဗာ. उसी प्रकार स्थान-अस्थान आदि के विभाग को जानने वाले के द्वारा, यथाकर्मोपग सत्त्वों को देखने वाले के द्वारा, वासना सहित आस्रवों के क्षीण होने से 'अर्हत्' के द्वारा, अभिज्ञेय आदि भेदों वाले धर्मों को अभिज्ञेय आदि के रूप में विपरीत रहित बोध होने से 'सम्यक्सम्बुद्ध' के द्वारा। अथवा, तीनों कालों में अप्रतिहत ज्ञान होने के कारण जानने वाले के द्वारा, कायकर्म आदि के वश से तीनों कर्मों के ज्ञान के अनुवर्ती होने से विचारपूर्वक कार्य करने के कारण देखने वाले के द्वारा, क्रीड़ा (दव) आदि के अभाव को सिद्ध करने वाली प्रहाण-सम्पदा के कारण 'अर्हत्' के द्वारा, छन्द आदि की अहानि (कमी न होना) के हेतुभूत अक्षय प्रतिभा को सिद्ध करने वाली सर्वज्ञता के कारण 'सम्यक्सम्बुद्ध' के द्वारा—इस प्रकार दस बल और अठारह आवेणिक बुद्ध धर्मों के वश से भी योजना करनी चाहिए। ၁၉. အဘိသင်္ခတန္တိ အတ္တနော ပစ္စယေဟိ အဘိသမ္မုခဘာဝေန သမေစ္စ သမ္ဘူယျ ကတံ, သွဿ ကတဘာဝေါ ဥပ္ပာဒနေန ဝေဒိတဗ္ဗော, န ဥပ္ပန္နဿ ပဋိသင်္ခရဏေနာတိ အာဟ ‘‘ဥပ္ပာဒိတ’’န္တိ. တေ စဿ ပစ္စယာ စေတနာပဓာနာတိ ဒဿေတုံ ပါဠိယံ ‘‘အဘိသင်္ခတံ အဘိသဉ္စေတယိတ’’န္တိ ဝုတ္တန္တိ ‘‘စေတယိတံ ပကပ္ပိတ’’န္တိ အတ္ထမာဟ. အဘိသင်္ခတံ အဘိသဉ္စေတယိတန္တိ စ ဈာနဿ ပါတုဘာဝဒဿနမုခေန ဝိဒ္ဓံသနဘာဝံ ဥလ္လိင်္ဂေတိ ယဉှိ အဟုတွာ သမ္ဘဝတိ, တံ ဟုတွာ ပဋိဝေတိ. တေနာဟ ပါဠိယံ ‘အဘိသင်္ခတ’န္တိအာဒိ. သမထဝိပဿနာဓမ္မေ ဌိတောတိ သမထဓမ္မေ ဌိတတ္တာ သမာဟိတော ဝိပဿနံ ပဋ္ဌပေတွာ အနိစ္စာနုပဿနာဒီဟိ နိစ္စသညာဒယော ပဇဟန္တော အနုက္ကမေန တံ အနုလောမဉာဏံ ပါပေတာ ဟုတွာ ဝိပဿနာဓမ္မေ ဌိတော. သမထဝိပဿနာသင်္ခါတေသု ဓမ္မေသု ရဉ္ဇနဋ္ဌေန ရာဂေါ, နန္ဒနဋ္ဌေန နန္ဒီတိ. တတ္ထ သုခုမာ အပေက္ခာ ဝုတ္တာ, ယာ ‘‘နိကန္တီ’’တိ ဝုစ္စတိ. १९. 'अभिसंखत' (अभिसंस्कृत) का अर्थ है—अपने प्रत्ययों के द्वारा सम्मुख भाव से मिलकर और उत्पन्न होकर किया गया; उसका किया हुआ होना 'उत्पादन' से समझना चाहिए, न कि उत्पन्न हुए के 'प्रतिसंस्कार' (मरम्मत) से, इसीलिए "उत्पादित" कहा। और वे उसके प्रत्यय 'चेतना' प्रधान हैं, यह दिखाने के लिए पालि में "अभिसंखतं अभिसञ्चेतयितं" कहा गया है, जिसका अर्थ "चेतयित (सोचा हुआ) और प्रकल्पित" कहा है। 'अभिसंखत' और 'अभिसञ्चेतयित' ध्यान के प्रादुर्भाव को दिखाने के माध्यम से उसके विनाशशील स्वभाव को सूचित करता है; क्योंकि जो पहले न होकर उत्पन्न होता है, वह होकर नष्ट हो जाता है। इसीलिए पालि में 'अभिसंखत' आदि कहा गया है। 'शमथ-विपश्यना धर्मों में स्थित' का अर्थ है—शमथ धर्म में स्थित होने के कारण समाहित होकर, विपश्यना को आरम्भ कर अनित्यानुपश्यना आदि के द्वारा नित्य-संज्ञा आदि का त्याग करते हुए, अनुक्रम से उस अनुलोम ज्ञान को प्राप्त कराने वाला होकर विपश्यना धर्म में स्थित। शमथ और विपश्यना संज्ञक धर्मों में रञ्जन (रंगने) के अर्थ में 'राग' है, और नन्दन (आनन्द लेने) के अर्थ में 'नन्दी' है। वहाँ सूक्ष्म अपेक्षा (इच्छा) कही गई है, जिसे "निकन्ति" (आसक्ति) कहा जाता है। ဧဝံ သန္တေတိ ဧဝံ ယထာရုတဝသေန စ ဣမဿ သုတ္တပဒဿ အတ္ထေ ဂဟေတဗ္ဗေ သတိ. သမထဝိပဿနာသု ဆန္ဒရာဂေါ ကတ္တဗ္ဗောတိ အနာဂါမိဖလံ နိဗ္ဗတ္တေတွာ တဒတ္ထာယ သမထဝိပဿနာပိ အနိဗ္ဗတ္တေတွာ ကေဝလံ တတ္ထ ဆန္ဒရာဂေါ ကတ္တဗ္ဗော ဘဝိဿတိ. ကသ္မာ? တေသု သမထဝိပဿနာသင်္ခါတေသု ဓမ္မေသု ဆန္ဒရာဂမတ္တေန အနာဂါမိနာ လဒ္ဓဗ္ဗဿ အလဒ္ဓါနာဂါမိဖလေန လဒ္ဓဗ္ဗတ္တာ တထာ သတိ တေန အနာဂါမိဖလမ္ပိ လဒ္ဓဗ္ဗမေဝ နာမ ဟောတိ. တေနာဟ – ‘‘အနာဂါမိဖလံ ပဋိဝိဒ္ဓံ ဘဝိဿတီ’’တိ. သဘာဝတော ရသိတဗ္ဗတ္တာ အဝိပရီတော အတ္ထော ဧဝ အတ္ထရသော. အညာပိ ကာစိ သုဂတိယောတိ ဝိနိပါတိကေ သန္ဓာယာဟ. အညာပိ ကာစိ ဒုဂ္ဂတိယောတိ အသုရကာယမာဟ. 'ऐसा होने पर' अर्थात् इस प्रकार शब्द के यथाश्रुत अर्थ के अनुसार इस सुत्त-पद का अर्थ ग्रहण करने पर। 'शमथ-विपश्यना में छन्द-राग करना चाहिए'—इसका अर्थ होगा कि अनागामी फल को उत्पन्न कर, उसके लिए शमथ-विपश्यना को भी उत्पन्न न कर केवल वहाँ छन्द-राग करना होगा। क्यों? उन शमथ-विपश्यना संज्ञक धर्मों में केवल छन्द-राग मात्र से, अनागामी द्वारा प्राप्त किए जाने वाले (फल) को, जिसने अनागामी फल प्राप्त नहीं किया है उसके द्वारा प्राप्त कर लिए जाने के कारण, वैसा होने पर उसके द्वारा अनागामी फल भी प्राप्त ही हो जाता है। इसीलिए कहा—"अनागामी फल प्रतिविद्ध (साक्षात्कृत) होगा।" स्वभाव से आस्वादन योग्य होने के कारण विपरीत रहित अर्थ ही 'अर्थ-रस' है। "अन्य भी कोई सुगतियाँ" यह विनिपातिकों (देवों के एक भेद) के सन्दर्भ में कहा है। "अन्य भी कोई दुर्गतियाँ" यह असुर-निकाय के लिए कहा है। သမထဓုရမေဝ ဓုရံ သမထယာနိကဿ ဝသေန ဒေသနာယ အာဂတတ္တာ. မဟာမာလုကျောဝါဒေ ‘‘ဝိဝိစ္စ အကုသလေဟိ ဓမ္မေဟိ သဝိတက္ကံ သဝိစာရ’’န္တိ ပါဒကဇ္ဈာနံ ကတွာ ‘‘သော ယဒေဝ တတ္ထ ဟောတိ ရူပဂတံ ဝေဒနာဂတ’’န္တိအာဒိနာ ဝိပဿနံ ဝိတ္ထာရေတွာ ‘‘သော တတ္ထ ဌိတော အာသဝါနံ ခယံ [Pg.9] ပါပုဏာတီ’’တိ (မ. နိ. ၂.၁၃၃) အာဂတတ္တာ ‘‘မဟာမာလုကျောဝါဒေ ဝိပဿနာဝ ဓုရ’’န္တိ အာဟ. မဟာသတိပဋ္ဌာနသုတ္တေ (ဒီ. နိ. ၂.၃၇၃ အာဒယော; မ. နိ. ၁.၁၀၆ အာဒယော) သဗ္ဗတ္ထကမေဝ တိက္ခတရာယ ဝိပဿနာယ အာဂတတ္တာ ဝုတ္တံ ‘‘ဝိပဿနုတ္တရံ ကထိတ’’န္တိ. ကာယဂတာသတိသုတ္တေ (မ. နိ. ၃.၁၅၃-၁၅၄) အာနာပါနဇ္ဈာနာဒိဝသေန သဝိသေသံ သမထဝိပဿနာယ အာဂတတ္တာ ဝုတ္တံ ‘‘သမထုတ္တရံ ကထိတ’’န္တိ. शमथयानिक के वश से देशना में आने के कारण 'शमथ-धुर' ही धुर (मुख्य) है। महामालुक्योवाद सुत्त में "अकुशल धर्मों से विविक्त होकर सवितर्क-सविचार..." इस प्रकार पादक-ध्यान कर "वह वहाँ जो भी रूपगत, वेदनागत है..." आदि के द्वारा विपश्यना का विस्तार कर "वह वहाँ स्थित होकर आस्रवों के क्षय को प्राप्त करता है" ऐसा आने के कारण "महामालुक्योवाद में विपश्यना ही धुर है" ऐसा कहा। महासतिपट्ठान सुत्त में सर्वत्र ही तीक्ष्णतर विपश्यना के आने के कारण "विपश्यना-प्रधान कहा गया है" ऐसा कहा गया है। कायगतासति सुत्त में आनापान-ध्यान आदि के वश से सविशेष शमथ-विपश्यना के आने के कारण "शमथ-प्रधान कहा गया है" ऐसा कहा गया है। အပ္ပံ ယာစိတေန ဗဟုံ ဒေန္တေန ဥဠာရပုရိသေန ဝိယ ဧကံ ဓမ္မံ ပုစ္ဆိတေန ‘‘အယမ္ပိ ဧကဓမ္မော’’တိ ကထိတတ္တာ ဧကာဒသပိ ဓမ္မာ ပုစ္ဆာဝသေန ဧကဓမ္မော နာမ ဇာတော ပစ္စေကံ ဝါကျပရိသမာပနဉာယေန. ဧကဝီသတိ ပဗ္ဗာနိ တေဟိ ဗောဓိယမာနာယ ပဋိပဒါယ ဧကရူပတ္တာ ပဋိပဒါဝသေန ဧကဓမ္မော နာမ ဇာတောတိ. ဣဓ ဣမသ္မိံ အဋ္ဌကနာဂရသုတ္တေ. နေဝသညာနာသညာယတနဓမ္မာနံ သင်္ခါရာဝသေသသုခုမဘာဝပ္ပတ္တတာယ တတ္ထ သာဝကာနံ ဒုက္ကရန္တိ န စတုတ္ထာရုပ္ပဝသေနေတ္ထ ဒေသနာ အာဂတာတိ စတုန္နံ ဗြဟ္မဝိဟာရာနံ, ဟေဋ္ဌိမာနံ တိဏ္ဏံ အာရုပ္ပာနဉ္စ ဝသေန ဧကာဒသ. ပုစ္ဆာဝသေနာတိ ‘‘အတ္ထိ နု ခေါ, ဘန္တေ အာနန္ဒ, တေန…ပေ… သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေန ဧကဓမ္မော အက္ခာတော’’တိ (မ. နိ. ၂.၁၈) ဧဝံ ပဝတ္တပုစ္ဆာဝသေန. အမတုပ္ပတ္တိယတ္ထေနာတိ အမတဘာဝဿ ဥပ္ပတ္တိဟေတုတာယ, သဗ္ဗာနိပိ ကမ္မဋ္ဌာနာနိ ဧကရသမ္ပိ အမတာဓိဂမပဋိပတ္တိယာတိ အတ္ထော, ဧဝမေတ္ထ အဂ္ဂဖလဘူမိ အနာဂါမိဖလဘူမီတိ ဒွေဝ ဘူမိယော သရူပတော အာဂတာ, နာနန္တရိယတာယ ပန ဟေဋ္ဌိမာပိ ဒွေ ဘူမိယော အတ္ထတော အာဂတာ ဧဝါတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. अल्प याचना करने पर बहुत देने वाले उदार पुरुष की तरह, एक धर्म पूछे जाने पर 'यह भी एक धर्म है' ऐसा कहे जाने के कारण, ग्यारह धर्म भी प्रश्न के वश से 'एक धर्म' कहलाते हैं, प्रत्येक वाक्य की समाप्ति के न्याय से। इक्कीस पर्वों (भागों) के द्वारा बोध कराए जाने वाले प्रतिपदा (मार्ग) की एकरूपता के कारण, प्रतिपदा के वश से 'एक धर्म' नाम पड़ा है। यहाँ इस अट्टकनागर सुत्त में। नेवसञ्ञानासञ्ञायतन धर्मों के संस्कार-अवशेष सूक्ष्म भाव को प्राप्त होने के कारण वहाँ श्रावकों के लिए (विपश्यना करना) कठिन है, इसलिए यहाँ चौथे आरुप्प के वश से देशना नहीं आई है; चार ब्रह्मविहारों और नीचे के तीन आरुप्पों के वश से ग्यारह (धर्म) हैं। 'प्रश्न के वश से' का अर्थ है— 'भन्ते आनन्द, क्या उस... पे... सम्यक्सम्बुद्ध द्वारा एक धर्म कहा गया है' (म. नि. 2.18) इस प्रकार प्रवृत्त प्रश्न के वश से। 'अमतुप्पत्तियत्थेन' का अर्थ है— अमृत भाव की उत्पत्ति के हेतु होने से; सभी कर्मस्थान एकरस वाले अमृत की प्राप्ति की प्रतिपत्ति (अभ्यास) ही हैं, यह अर्थ है। इस प्रकार यहाँ अग्रफल भूमि (अर्हत्त्व) और अनागामिफल भूमि— ये दो ही भूमियाँ साक्षात् रूप से आई हैं, किन्तु अनन्तरता (निकटता) के कारण नीचे की दो भूमियाँ भी अर्थतः आई ही हैं, ऐसा समझना चाहिए। ၂၁. ပဉ္စ သတာနိ အဂ္ဃော ဧတဿာတိ ပဉ္စသတံ. သေသံ ဥတ္တာနမေဝ. २१. पाँच सौ जिसका मूल्य है, वह 'पञ्चसत' है। शेष स्पष्ट ही है। အဋ္ဌကနာဂရသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. अट्टकनागर सुत्त की व्याख्या की लीनत्थप्पकासना (गूढ़ार्थ प्रकाशिनी टीका) समाप्त हुई। ၃. သေခသုတ္တဝဏ္ဏနာ ३. सेख सुत्त की व्याख्या। ၂၂. သန္ထာဂါရန္တိ အတ္ထာနုသာသနာဂါရံ. တေနာဟ – ‘‘ဥယျောဂကာလာဒီသူ’’တိအာဒိ. အာဒိ-သဒ္ဒေန မင်္ဂလမဟာဒီနံ သင်္ဂဟော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. သန္ထမ္ဘန္တီတိ ဝိဿမန္တိ, ပရိဿမံ ဝိနောဒေန္တီတိ အတ္ထော. သဟာတိ သန္နိဝေသဝသေန [Pg.10] ဧကဇ္ဈံ. သဟ အတ္ထာနုသာသနံ အဂါရန္တိ ဧတသ္မိံ အတ္ထေ တ္ထ-ကာရဿ န္ထ-ကာရံ ကတွာ သန္ထာဂါရန္တိ ဝုတ္တန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. သန္ထရန္တီတိ သမ္မန္တနဝသေန တိဋ္ဌန္တိ. २२. 'सन्थागार' का अर्थ है अर्थ-अनुशासन (परामर्श/शिक्षा) का घर। इसीलिए कहा— 'उद्योग काल आदि में' इत्यादि। 'आदि' शब्द से मंगल-महा आदि का संग्रह समझना चाहिए। 'सन्थम्भन्ति' का अर्थ है विश्राम करते हैं, थकान दूर करते हैं। 'सह' का अर्थ है सन्निवेश (बनावट) के वश से एक साथ। 'सह' और 'अत्थानुसासन' का 'अगार' (घर)— इस अर्थ में 'थ' कार को 'न्थ' कार करके 'सन्थागार' कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। 'सन्थरन्ति' का अर्थ है मंत्रणा (परामर्श) के वश से स्थित होते हैं। တေပိဋကံ ဗုဒ္ဓဝစနံ အာဂတမေဝ ဘဝိဿတီတိ ဗုဒ္ဓဝစနဿ အာဂမနသီသေန အရိယဖလဓမ္မာနမ္ပိ အာဂမနံ ဝုတ္တမေဝ, တိယာမရတ္တိံ တတ္ထ ဝသန္တာနံ ဖလသမာပတ္တိဝဠဉ္ဇနံ ဟောတီတိ. တသ္မိဉ္စ ဘိက္ခုသံဃေ ကလျာဏပုထုဇ္ဇနာ ဝိပဿနံ ဥဿုက္ကာပေန္တာ ဟောန္တီတိ စေ? အရိယမဂ္ဂဓမ္မာနံ တတ္ထ အာဂမနံ ဟောတိယေဝ. त्रिपिटक बुद्धवचन आया ही होगा— इस बुद्धवचन के आगमन के मुख्य रूप से आर्यफल धर्मों का भी आगमन कहा ही गया है, (क्योंकि) तीनों याम (प्रहर) रात में वहाँ निवास करने वालों को फल-समापत्ति का सेवन होता है। और यदि उस भिक्षु संघ में कल्याण-पृथग्जन विपश्यना में उत्साह कर रहे हों तो? वहाँ आर्यमार्ग धर्मों का आगमन होता ही है। အလ္လဂေါမယေနာတိ အစ္ဆေန အလ္လဂေါမယရသေန. ဩပုဉ္ဆာပေတွာတိ ဝိလိမ္ပိတွာ. စတုဇ္ဇာတိယဂန္ဓေဟီတိ တဂရကုင်္ကုမယဝနပုပ္ဖတမာလပတ္တာနိ ပိသိတွာ ကတဂန္ဓေဟိ နာနာဝဏ္ဏေတိ နီလာဒိဝသေန နာနာဝဏ္ဏေ, န ဘိတ္တိဝိသေသဝသေန. ဘိတ္တိဝိသေသဝသေန ပန နာနာသဏ္ဌာနရူပမေဝ. မဟာပိဋ္ဌိကကောဇဝကေတိ ဟတ္ထိပိဋ္ဌီသု အတ္ထရိတဗ္ဗတာယ မဟာပိဋ္ဌိကာတိ လဒ္ဓသမညေ ကောဇဝေတိ ဝဒန္တိ. ကုတ္တကေ ပန သန္ဓာယေတံ ဝုတ္တံ ဟတ္ထတ္ထရဏာ ဟတ္ထိရူပဝိစိတ္တာ. အဿတ္ထရကသီဟတ္ထရကာဒယောပိ အဿသီဟရူပါဒိဝိစိတ္တာ ဧဝ အတ္ထရကာ, စိတ္တတ္ထရကံ နာနာရူပေဟိ စေဝ နာနာဝိဓမာလာကမ္မာဒီဟိ စ ဝိစိတ္တံ အတ္ထရကံ. 'अल्लगोमय' का अर्थ है स्वच्छ ताजे गोबर के रस से। 'ओपुञ्छापेत्वा' का अर्थ है लीपकर। 'चतुज्जातिगन्ध' का अर्थ है तगर, कुंकुम, यवनपुष्प और तमालपत्र को पीसकर बनाए गए गंधों से। 'नानावण्णे' का अर्थ है नीले आदि के वश से विभिन्न रंगों वाले, न कि भित्ति (दीवार) के विशेष वश से। भित्ति विशेष के वश से तो विभिन्न आकृतियों वाले रूप ही होते हैं। 'महापिट्ठिककोजवक' का अर्थ है हाथियों की पीठ पर बिछाने योग्य होने के कारण 'महापिट्ठिक' नाम वाले ऊनी वस्त्र (कोजवक)। 'कुत्तक' के विषय में यह कहा गया है कि वे हाथ के बिछौने (कालीन) हैं जो हाथी के चित्रों से विचित्र (सुसज्जित) हैं। 'अस्सत्थकर-सीहत्थकर' आदि भी घोड़े और सिंह आदि के रूपों से विचित्र बिछौने ही हैं। 'चित्तत्थकर' विभिन्न रूपों और विभिन्न प्रकार के माला-कर्म आदि से विचित्र बिछौना है। ဥပဓာနန္တိ အပဿယနံ ဥပဒဟိတွာတိ အပဿယယောဂ္ဂဘာဝေန ဌပေတွာ ဂန္ဓေဟိ ကတမာလာ ဂန္ဓဒါမံ, တမာလပတ္တာဒီဟိ ကတံ ပတ္တဒါမံ. အာဒိ-သဒ္ဒေန ဟိင်္ဂုလတက္ကောလဇာတိဖလဇာတိပုပ္ဖာဒီဟိ ကတဒါမံ သင်္ဂဏှာတိ. ပလ္လင်္ကာကာရေန ကတပီဌံ ပလ္လင်္ကပီဌံ, တီသု ပဿေသု, ဧကပဿေ ဧဝ ဝါ သဥပဿယံ အပဿယပီဌံ, အနပဿယံ မုဏ္ဍပီဌံ ယောဇနာဝဋ္ဋေတိ ယောဇနပရိက္ခေပေ. 'उपधान' का अर्थ है तकिया (मसनद), 'उपदहित्वा' का अर्थ है सहारा लेने योग्य भाव से रखकर। गंधों से बनी माला 'गन्धदाम' है, तमालपत्र आदि से बनी 'पत्तदाम' है। 'आदि' शब्द से हिंगुल, तक्कोल, जातिफल, जातिपुष्प आदि से बनी मालाओं का ग्रहण होता है। पलंग के आकार में बनी पीठ (चौकी) 'पल्लङ्कपीठ' है। तीन तरफ से या एक तरफ से सहारे (पीठ टिकाने) वाली 'अपस्सयपीठ' है। बिना सहारे वाली 'मुण्डपीठ' है। 'योजनवट्टे' का अर्थ है एक योजन के घेरे में। သံဝိဓာယာတိ အန္တရဝါသကဿ ကောဏပဒေသဉ္စ ဣတရပဒေသဉ္စ သမံ ကတွာ ဝိဓာယ. တေနာဟ – ‘‘ကတ္တရိယာ ပဒုမံ ကန္တန္တော ဝိယာ’’တိ တိမဏ္ဍလံ ပဋိစ္ဆာဒေန္တောတိ ဧတ္ထ စ ယသ္မာ ဗုဒ္ဓါနံ ရူပသမ္ပဒါ ဝိယ အာကပ္ပသမ္ပဒါပိ ပရမုက္ကံသဂတာ, တသ္မာ တဒါ ဘဂဝါ ဧဝံ သောဘတီတိ ဒဿေန္တော ‘‘သုဝဏ္ဏပါမင်္ဂေနာ’’တိအာဒိမာဟ, တတ္ထ အသမေန ဗုဒ္ဓဝေသေနာတိအာဒိနာ [Pg.11] တဒါ ဘဂဝါ ဗုဒ္ဓါနုဘာဝဿ နိဂုဟဏေ ကာရဏာဘာဝတော တတ္ထ သန္နိပတိတဒေဝမနုဿနာဂယက္ခဂန္ဓဗ္ဗာဒီနံ ပသာဒဇနနတ္ထံ အတ္တနော သဘာဝပကတိကိရိယာယေဝ ကပိလဝတ္ထုံ ပါဝိသီတိ ဒဿေတိ. ဗုဒ္ဓါနံ ကာယပ္ပဘာ နာမ ပကတိယာ အသီတိဟတ္ထမတ္တမေဝ ပဒေသံ ဖရတီတိ အာဟ – ‘‘အသီတိဟတ္ထဋ္ဌာနံ အဂ္ဂဟေသီ’’တိ နီလပီတလောဟိတောဒါတမဉ္ဇိဋ္ဌပဘဿရာနံ ဝသေန ဆဗ္ဗဏ္ဏာ ဗုဒ္ဓရသ္မိယော. 'संविधाय' का अर्थ है अन्तर्वासक (नीचे के वस्त्र) के कोनों और अन्य भागों को समान करके व्यवस्थित कर। इसीलिए कहा— 'कैंची से कमल काटते हुए के समान' तीन मण्डलों को ढंकते हुए। यहाँ जैसे बुद्धों की रूप-सम्पदा परम उत्कर्ष को प्राप्त है, वैसे ही उनकी आकल्प-सम्पदा (वेशभूषा की गरिमा) भी है, इसलिए उस समय भगवान् ऐसे सुशोभित होते हैं, यह दिखाते हुए 'सुवण्णपामङ्गेन' आदि कहा। वहाँ 'असम बुद्धवेश' आदि के द्वारा यह दर्शाया गया है कि उस समय भगवान् के बुद्ध-प्रभाव को छिपाने का कोई कारण न होने से, वहाँ एकत्रित देव, मनुष्य, नाग, यक्ष, गन्धर्व आदि में प्रसाद (श्रद्धा) उत्पन्न करने के लिए अपनी स्वाभाविक प्रकृति-क्रिया से ही कपिलवस्तु में प्रविष्ट हुए। बुद्धों की काय-प्रभा स्वभाव से ही अस्सी हाथ के क्षेत्र में फैलती है, इसलिए कहा— 'अस्सी हाथ के स्थान को घेर लिया'। नील, पीत, लोहित, ओदात (सफेद), मञ्जिष्ठ और प्रभास्वर के वश से बुद्ध की रश्मियाँ छह रंगों की होती हैं। သဗ္ဗပါလိဖုလ္လောတိ မူလတော ပဋ္ဌာယ ယာဝ အဂ္ဂါ ဖုလ္လော ဝိကသိတော. ပဋိပါဋိယာ ဌပိတာနန္တိအာဒိ ပရိကပ္ပူပမာ. ယထာ တံ…ပေ… အလင်္ကတံ အညော ဝိရောစတိ, ဧဝံ ဝိရောစိတ္ထ, သမတိံသာယ ပါရမိတာဟိ အဘိသင်္ခတတ္တာ ဧဝံ ဝိရောစိတ္ထာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ပဉ္စဝီသတိယာ နဒီနန္တိ ဂင်္ဂါဒီနံ စန္ဒဘာဂါပရိယောသာနာနံ ပဉ္စဝီသတိယာ မဟာနဒီနံ. သမ္ဘိဇ္ဇာတိ သမ္ဘေဒံ မိဿီဘာဝံ ပတွာ မုခဒွါရေတိ သမုဒ္ဒံ ပဝိဋ္ဌဋ္ဌာနေ. 'सब्बपालिपुल्लो' का अर्थ है जड़ से लेकर फुनगी (शिखर) तक खिला हुआ, विकसित। 'प्रतिपाटी (क्रम) से रखे हुए' आदि परिकल्पित उपमा है। 'जैसे वह... पे... अलंकृत अन्य सुशोभित होता है, वैसे ही सुशोभित हुए', तीस पारमिताओं द्वारा अभिसंस्कृत होने के कारण इस प्रकार सुशोभित हुए— यह कहा गया है। 'पच्चीस नदियों' का अर्थ है गंगा आदि से लेकर चन्दभागा तक की पच्चीस महानदियाँ। 'सम्भिज्ज' का अर्थ है संगम (मिश्रण) को प्राप्त होकर, 'मुखद्वारे' का अर्थ है समुद्र में प्रवेश करने के स्थान पर। ဒေဝမနုဿနာဂသုပဏ္ဏဂန္ဓဗ္ဗယက္ခာဒီနံ အက္ခီနီတိ စေတံ ပရိကပ္ပနဝသေန ဝုတ္တံ. သဟဿေနာတိ ပဒသဟဿေန, ဘာဏဝါရပ္ပမာဏေန ဂန္ထေနာတိ အတ္ထော. देव, मनुष्य, नाग, सुपर्ण, गन्धर्व, यक्ष आदि की आँखें— यह परिकल्पना के वश से कहा गया है। 'सहस्सेन' का अर्थ है हजार पदों से, अर्थात् भाणवार के परिमाण वाले ग्रन्थ से। ကမ္ပယန္တော ဝသုန္ဓရန္တိ အတ္တနော ဂုဏဝိသေသေဟိ ပထဝီကမ္ပံ ဥပ္ပာဒေန္တော, ဧဝံဘူတောပိ အဟေဌယန္တော ပါဏာနိ. သဗ္ဗဒက္ခိဏတ္တာ ဗုဒ္ဓါနံ ဒက္ခိဏံ ပဌမံ ပါဒံ ဥဒ္ဓရန္တော. သမံ သမ္ဖုသတေ ဘူမိံ သုပ္ပတိဋ္ဌိတပါဒတာယ. ယဒိပိ ဘူမိံ သမံ ဖုသတိ, ရဇသာနုပလိပ္ပတိ သုခုမတ္တာ ဆဝိယာ. နိန္နဋ္ဌာနံ ဥန္နမတီတိအာဒိ ဗုဒ္ဓါနံ သုပ္ပတိဋ္ဌိတပါဒသင်္ခါတဿ မဟာပုရိသလက္ခဏပဋိလာဘဿ နိဿန္ဒဖလံ. နာတိဒူရေ ဥဒ္ဓရတီတိ အတိဒူရေ ဌပေတုံ န ဥဒ္ဓရတိ. နစ္စာသန္နေ စ နိက္ခိပန္တိ အစ္စာသန္နေ စ ဌာနေ အနိက္ခိပန္တော နိယျာတိ. ဟာသယန္တော သဒေဝကေ လောကေ တောသယန္တော. စတူဟိ ပါဒေဟိ စရတီတိ စတုစာရီ. 'कंपयन्तो वसुन्धरं' का अर्थ है अपने विशेष गुणों से पृथ्वी में कंपन उत्पन्न करते हुए, ऐसा होते हुए भी प्राणियों को कष्ट न पहुँचाते हुए। सभी बुद्धों के दक्षिण (दाहिने) होने के कारण, वे पहले दाहिना पैर उठाते हैं। 'समं सम्फुसते भूमिं' का अर्थ है सुप्रतिष्ठित चरणों के कारण भूमि को समान रूप से स्पर्श करते हैं। यद्यपि वे भूमि को समान रूप से स्पर्श करते हैं, फिर भी त्वचा की सूक्ष्मता के कारण वे धूल से लिप्त नहीं होते। 'निम्न स्थान ऊँचा हो जाता है' आदि बुद्धों के सुप्रतिष्ठित पाद नामक महापुरुष लक्षण की प्राप्ति का स्वाभाविक फल (निस्यन्द फल) है। 'नातिदूरे उद्धरति' का अर्थ है कि वे बहुत दूर रखने के लिए पैर नहीं उठाते। 'नच्चासन्ने च निक्खिपन्ति' का अर्थ है कि वे बहुत पास के स्थान पर पैर न रखते हुए चलते हैं। देवलोक सहित संसार को हर्षित और संतुष्ट करते हुए। 'चार पैरों (चरणों) से चलते हैं' का अर्थ है चतुचारी। ဗုဒ္ဓါနုဘာဝဿ ပကာသနဝသေန ဂတတ္တာ ဝဏ္ဏကာလော နာမ ကိရေသ. သရီရဝဏ္ဏေ ဝါ ဂုဏဝဏ္ဏေ ဝါ ကထိယမာနေ ဒုက္ကထိတန္တိ န ဝတ္တဗ္ဗံ. ကသ္မာ? အပရိမာဏဝဏ္ဏာ ဟိ ဗုဒ္ဓါ ဘဂဝန္တော, ဗုဒ္ဓဂုဏသံဝဏ္ဏနာ ဇာနန္တဿ ယထာဓမ္မသံဝဏ္ဏနံယေဝ အနုပဝိသတီတိ. बुद्ध के अनुभाव (प्रभाव) के प्रकाशन के कारण होने से, यह वास्तव में 'वर्ण-काल' (प्रशंसा का समय) कहलाता है। शरीर के वर्ण (रूप) या गुणों के वर्ण (प्रशंसा) के विषय में कहे जाने पर यह नहीं कहना चाहिए कि 'बुरा कहा गया' है। क्यों? क्योंकि भगवान बुद्ध अपरिमित वर्ण (गुणों) वाले हैं, और बुद्ध के गुणों की प्रशंसा जानने वाले के लिए यह यथार्थ धर्म-प्रशंसा में ही प्रवेश करती है। ဒုကူလစုမ္ဗဋကေနာတိ [Pg.12] ဂန္ထိတွာ ဂဟိတဒုကူလဝတ္ထေန, နာဂဝိက္ကန္တစရဏောတိ ဟတ္ထိနာဂသဒိသပဒနိက္ခေပေါ. သတပုညလက္ခဏောတိ အနေကသတပုညနိမ္မိတမဟာပုရိသလက္ခဏော မဏိဝေရောစနော ယထာတိ အတိဝိယ ဝိရောစမာနော မဏိ ဝိယ ဝေရောစနော နာမ ဧကော မဏိဝိသေသောတိ ကေစိ မဟာသာလောဝါတိ မဟန္တော သာလရုက္ခော ဝိယ, ကောဝိဠာရာဒိမဟာရုက္ခော ဝိယ ဝါ ပဒုမော ကောကနဒေါ ယထာတိ ကောကနဒသင်္ခါတံ မဟာပဒုမံ ဝိယ, ဝိကသမာနပဒုမံ ဝိယ ဝါ. 'दुकूलचुम्बटकेन' का अर्थ है गाँठ बाँधकर पकड़े हुए दुकूल (रेशमी) वस्त्र से। 'नागविक्रान्तचरण' का अर्थ है हाथी (नाग) के समान चरणों का विन्यास। 'शतपुण्यलक्षण' का अर्थ है अनेक सौ पुण्यों से निर्मित महापुरुष लक्षण। 'मणि वैरोचन के समान' का अर्थ है अत्यधिक चमकने वाली मणि के समान, कुछ के अनुसार 'वैरोचन' नामक एक विशेष मणि। 'महाशाल के समान' का अर्थ है विशाल साल वृक्ष के समान, या कोविळार आदि विशाल वृक्ष के समान। 'पदुम कोकनद के समान' का अर्थ है कोकनद नामक महाकमल के समान, या खिलते हुए कमल के समान। အာကာသဂင်္ဂံ ဩတာရေန္တော ဝိယာတိအာဒိ တဿာ ပကိဏ္ဏကကထာယ အညေသံ ဒုက္ကရဘာဝဒဿနဉ္စေဝ သုဏန္တာနံ အစ္စန္တသုခါဝဟဘာဝဒဿနဉ္စ ပထဝီဇံ အာကဍ္ဎေန္တော ဝိယာတိ နာဠိယန္တံ ယောဇေတွာ မဟာပထဝိယာ ဟေဋ္ဌိမတလေ ပပ္ပဋကောဇံ ဥဒ္ဓံမုခံ ကတွာ အာကဍ္ဎေန္တော ဝိယ ယောဇနိကန္တိ ယောဇနပ္ပမာဏံ မဓုဘဏ္ဍန္တိ မဓုပဋလံ. 'आकाशगंगा को उतारने के समान' आदि उस प्रकीर्णक कथा के माध्यम से दूसरों के लिए इसकी दुष्करता को दिखाने के लिए और सुनने वालों के लिए अत्यंत सुखद होने को दिखाने के लिए है। 'पृथ्वी के रस (ओज) को खींचने के समान' का अर्थ है नाली-यंत्र (पाइप) लगाकर महापृथ्वी के निचले तल से पृथ्वी के सार (पर्पटक-ओज) को ऊपर की ओर मुख करके खींचने के समान। 'योजनिक' का अर्थ है एक योजन के परिमाण वाला। 'मधुभाण्ड' का अर्थ है मधु का छत्ता (मधु-पटल)। မဟန္တန္တိ ဥဠာရံ. သဗ္ဗဒါနံ ဒိန္နမေဝ ဟောတီတိ သဗ္ဗမေဝ ပစ္စယဇာတံ အာဝါသဒါယကေန ဒိန္နမေဝ ဟောတိ. တထာဟိ ဒွေ တယော ဂါမေ ပိဏ္ဍာယ စရိတွာ ကိဉ္စိ အလဒ္ဓါ အာဂတဿပိ ဆာယူဒကသမ္ပန္နံ အာရာမံ ပဝိသိတွာ နှာယိတွာ ပဋိဿယေ မုဟုတ္တံ နိပဇ္ဇိတွာ ဥဋ္ဌာယ နိသိန္နဿ ကာယေ ဗလံ အာဟရိတွာ ပက္ခိတ္တံ ဝိယ ဟောတိ. ဗဟိ ဝိစရန္တဿ စ ကာယေ ဝဏ္ဏဓာတု ဝါတာတပေဟိ ကိလမတိ, ပဋိဿယံ ပဝိသိတွာ ဒွါရံ ပိဓာယ မုဟုတ္တံ နိသိန္နဿ ဝိသဘာဂသန္တတိ ဝူပသမ္မတိ, သဘာဂသန္တတိ ပတိဋ္ဌာတိ, ဝဏ္ဏဓာတု အာဟရိတွာ ပက္ခိတ္တာ ဝိယ ဟောတိ, ဗဟိ ဝိစရန္တဿ စ ပါဒေ ကဏ္ဋကော ဝိဇ္ဈတိ, ခါဏု ပဟရတိ, သရီသပါဒိပရိဿယော စေဝ စောရဘယဉ္စ ဥပ္ပဇ္ဇတိ, ပဋိဿယံ ပဝိသိတွာ ဒွါရံ ပိဓာယ နိပန္နဿ ပန သဗ္ဗေ ပရိဿယာ န ဟောန္တိ, အဇ္ဈယန္တဿ ဓမ္မပီတိသုခံ, ကမ္မဋ္ဌာနံ မနသိကရောန္တဿ ဥပသမသုခံ ဥပ္ပဇ္ဇတိ ဗဟိဒ္ဓါ ဝိက္ခေပါဘာဝတော, ဗဟိ ဝိစရန္တဿ စ ကာယေ သေဒါ မုစ္စန္တိ, အက္ခီနိ ဖန္ဒန္တိ, သေနာသနံ ပဝိသနက္ခဏေ မဉ္စပီဌာဒီနိ န ပညာယန္တိ, မုဟုတ္တံ နိသိန္နဿ ပန အက္ခိပသာဒေါ အာဟရိတွာ ပက္ခိတ္တော ဝိယ ဟောတိ, ဒွါရဝါတပါနမဉ္စပီဌာဒီနိ ပညာယန္တိ, ဧတသ္မိမ္ပိ စ အာဝါသေ ဝသန္တံ ဒိသွာ မနုဿာ စတူဟိ ပစ္စယေဟိ သက္ကစ္စံ ဥပဋ္ဌဟန္တိ. တေန ဝုတ္တံ – ‘‘အာဝါသဒါနသ္မိံ ဒိန္နေ သဗ္ဗံ ဒါနံ ဒိန္နမေဝ ဟောတီ’’တိ. ဘူမဋ္ဌက…ပေ… န သက္ကာတိ အယမတ္ထော မဟာသုဒဿနဝတ္ထုနာ (ဒီ. နိ. ၂.၂၄၁ အာဒယော) ဒီပေတဗ္ဗော. 'महन्त' का अर्थ है उदार (विशाल)। 'सब दान दिया हुआ ही होता है' का अर्थ है कि आवास देने वाले के द्वारा सभी प्रत्यय (सामग्रियाँ) दिए हुए ही होते हैं। क्योंकि, दो-तीन गाँवों में भिक्षा के लिए भ्रमण कर कुछ भी न पाकर लौटे हुए व्यक्ति के लिए भी, छाया और जल से संपन्न आराम (विहार) में प्रवेश कर, स्नान कर, आश्रय में मुहूर्त भर लेटकर, उठकर बैठने पर शरीर में बल मानो लाकर डाल दिया गया हो, ऐसा होता है। बाहर घूमने वाले के शरीर की वर्ण-धातु (कांति) हवा और धूप से थक जाती है, आश्रय में प्रवेश कर द्वार बंद कर मुहूर्त भर बैठने पर विषम संतति शांत हो जाती है, सम संतति प्रतिष्ठित होती है, और वर्ण-धातु मानो लाकर डाल दी गई हो, ऐसी हो जाती है। बाहर घूमने वाले के पैर में काँटा चुभता है, ठूँठ से चोट लगती है, सरीसृप आदि का भय और चोर का भय उत्पन्न होता है; परंतु आश्रय में प्रवेश कर द्वार बंद कर लेटने वाले को ये सभी भय नहीं होते। अध्ययन करने वाले को धर्म-प्रीति का सुख और कर्मस्थान का मनन करने वाले को बाहरी विक्षेप न होने के कारण उपशम-सुख प्राप्त होता है। बाहर घूमने वाले के शरीर से पसीना निकलता है, आँखें फड़कती हैं, सेनासन (आवास) में प्रवेश करते समय मंच-पीठ (पलंग-पीढ़ा) आदि दिखाई नहीं देते; परंतु मुहूर्त भर बैठने पर आँखों की प्रसन्नता मानो लाकर डाल दी गई हो, ऐसी हो जाती है, और द्वार, खिड़की, मंच-पीठ आदि दिखाई देने लगते हैं। इस आवास में रहते हुए देखकर मनुष्य चार प्रत्ययों से आदरपूर्वक सेवा करते हैं। इसीलिए कहा गया है— "आवास दान देने पर सब दान दिया हुआ ही होता है।" 'भूमट्ठक... पे... न सक्का' इस अर्थ को महासुदस्सन-वस्तु (दीघ निकाय 2.241 आदि) के माध्यम से स्पष्ट किया जाना चाहिए। သီတန္တိ [Pg.13] (သာရတ္ထ. ဋီ. စူဠဝဂ္ဂ ၃.၂၉၅; သံ. နိ. ဋီ. ၂.၄.၂၄၃) အဇ္ဈတ္တဓာတုက္ခောဘဝသေန ဝါ ဗဟိဒ္ဓဥတုဝိပရိဏာမဝသေန ဝါ ဥပ္ပဇ္ဇနကသီတံ. ဥဏှန္တိ အဂ္ဂိသန္တာပံ. တဿ ပန ဒဝဒါဟာဒီသု သမ္ဘဝေါ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ပဋိဟန္တီတိ ပဋိဗာဟတိ. ယထာ တဒုဘယဝသေန ကာယစိတ္တာနံ ဗာဓနာနိ န ဟောန္တိ, ဧဝံ ကရောတိ. သီတုဏှဗ္ဘာဟတေ ဟိ သရီရေ ဝိက္ခိတ္တစိတ္တော ဘိက္ခု ယောနိသော ပဒဟိတုံ န သက္ကောတိ. ဝါဠမိဂါနီတိ သီဟဗျဂ္ဃာဒိဝါဠမိဂေ. ဂုတ္တသေနာသနဉှိ ပဝိသိတွာ ဒွါရံ ပိဓာယ နိသိန္နဿ တေ ပရိဿယာ န ဟောန္တိ. သရီသပေတိ ယေ ကေစိ သရန္တာ ဂစ္ဆန္တေ ဒီဃဇာတိကေ. မကသေတိ နိဒဿနမေတံ, ဍံသာဒီနံ ဧတေနေဝ သင်္ဂဟော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. သိသိရေတိ သီတကာလဝသေန သတ္တာဟဝဒ္ဒလိကာဒိဝသေန စ ဥပ္ပန္နေ သိသိရသမ္ဖဿေ. ဝုဋ္ဌိယောတိ ယဒါ တဒါ ဥပ္ပန္နာ ဝဿဝုဋ္ဌိယော ပဋိဟနတီတိ ယောဇနာ. 'शीत' का अर्थ है आंतरिक धातुओं के क्षोभ के कारण या बाहरी ऋतु-परिवर्तन के कारण उत्पन्न होने वाली ठंड। 'उष्ण' का अर्थ है अग्नि का संताप; इसे दावानल आदि के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। 'प्रतिहन्ति' का अर्थ है रोकता है। जिससे उन दोनों के कारण काय और चित्त को बाधा न हो, वैसा करता है। क्योंकि शीत और उष्ण से पीड़ित शरीर वाले विक्षिप्त चित्त वाला भिक्षु योनिशः (सही ढंग से) प्रयत्न नहीं कर सकता। 'व्यालमृग' का अर्थ है सिंह, व्याघ्र आदि हिंसक पशु। सुरक्षित सेनासन (आवास) में प्रवेश कर द्वार बंद कर बैठने वाले को वे भय नहीं होते। 'सरीसृप' का अर्थ है जो भी रेंगकर चलने वाले दीर्घ-जाति के जीव हैं। 'मक्षिका' एक उदाहरण है, डाँस (मच्छर) आदि का संग्रह इसी में समझना चाहिए। 'शिशिर' का अर्थ है शीतकाल के कारण और सात दिनों की वर्षा (वद्दलिका) आदि के कारण उत्पन्न शिशिर-स्पर्श। 'वृष्टि' का अर्थ है जब-तब होने वाली वर्षा की बौछारें; उन्हें रोकता है—यह अर्थ है। ဝါတာတပေါ ဃောရောတိ ရုက္ခဂစ္ဆာဒီနံ ဥမ္မူလဘဉ္ဇနဝသေန ပဝတ္တိယာ ဃောရော သရဇအရဇာဒိဘေဒေါ ဝါတော စေဝ ဂိမှပရိဠာဟသမယေသု ဥပ္ပတ္တိယာ ဃောရော သူရိယာတပေါ စ. ပဋိဟညတီတိ ပဋိဗာဟီယတိ. လေဏတ္ထန္တိ နာနာရမ္မဏတော စိတ္တံ နိဝတ္တေတွာ ပဋိသလ္လာနာရာမတ္ထံ. သုခတ္ထန္တိ ဝုတ္တပရိဿယာဘာဝေန ဖာသုဝိဟာရတ္ထံ. ဈာယိတုန္တိ အဋ္ဌတိံသာရမ္မဏေသု ယတ္ထ ကတ္ထစိ စိတ္တံ ဥပနိဇ္ဈာယိတုံ. ဝိပဿိတုန္တိ အနိစ္စာဒိတော သဗ္ဗသင်္ခါရေ သမ္မသိတုံ. 'घोर वातातप' का अर्थ है वृक्षों और झाड़ियों को जड़ से उखाड़ने और तोड़ने वाली प्रचंड धूल भरी या बिना धूल वाली हवा, और ग्रीष्म काल के संताप के समय उत्पन्न होने वाली सूर्य की प्रचंड धूप। 'प्रतिहन्यते' का अर्थ है रोका जाता है। 'लेणार्थ' (लयन के लिए) का अर्थ है चित्त को नाना आलम्बनों से हटाकर प्रतिसंलयन (एकान्त वास) में रमने के लिए। 'सुखार्थ' का अर्थ है उक्त बाधाओं के अभाव में सुखपूर्वक विहार के लिए। 'ध्यान करने के लिए' का अर्थ है अड़तीस आलम्बनों में से किसी भी एक पर चित्त को एकाग्र करने के लिए। 'विपश्यना के लिए' का अर्थ है अनित्यता आदि के दृष्टिकोण से सभी संस्कारों का सम्मर्शन (परीक्षण) करने के लिए। ဝိဟာရေတိ ပဋိဿယေ. ကာရယေတိ ကာရာပေယျ. ရမ္မေတိ မနောရမေ နိဝါသသုခေ. ဝါသယေတ္ထ ဗဟုဿုတေတိ ကာရေတွာ ပန ဧတ္ထ ဝိဟာရေသု ဗဟုဿုတေ သီလဝန္တေ ကလျာဏဓမ္မေ နိဝါသေယျ. တေ နိဝါသေန္တော ပန တေသံ ဗဟုဿုတာနံ ယထာ ပစ္စယေဟိ ကိလမထော န ဟောတိ, ဧဝံ အန္နဉ္စ ပါနဉ္စ ဝတ္ထသေနာသနာနိ စ ဒဒေယျ ဥဇုဘူတေသု အဇ္ဈာသယသမ္ပန္နေသု ကမ္မဖလာနံ ရတနတ္တယဂုဏာနဉ္စ သဒ္ဒဟနေန ဝိပ္ပသန္နေန စေတသာ. आश्रय में निवास कराता है। निर्माण कराता है या निर्माण करवाना चाहिए। रमणीय और सुखद निवास में रमाता है। 'यहाँ बहुश्रुत निवास करें'—ऐसा कहकर विहारों का निर्माण करवाकर वहाँ बहुश्रुत, शीलवान और कल्याणधर्मी भिक्षुओं को निवास कराए। उन्हें निवास कराते हुए, उन बहुश्रुत भिक्षुओं को जिस प्रकार प्रत्ययों (आवश्यकताओं) के कारण कष्ट न हो, वैसे ही ऋजु स्वभाव वाले, उत्तम आशय से संपन्न, कर्मफल और रत्नत्रय के गुणों में श्रद्धा रखने वाले प्रसन्न चित्त से अन्न, पान, वस्त्र और शयनासन प्रदान करे। ဣဒါနိ ဂဟဋ္ဌပဗ္ဗဇိတာနံ အညမညူပကာရတံ ဒဿေတုံ ‘‘တေ တဿာ’’တိ ဂါထမာဟ. တတ္ထ တေတိ ဗဟုဿုတာ တဿာတိ ဥပါသကဿ. ဓမ္မံ ဒေသေန္တီတိ သကလဝဋ္ဋဒုက္ခပနုဒနံ ဓမ္မံ ဒေသေန္တိ. ယံ သော ဓမ္မံ ဣဓညာယာတိ သော ပုဂ္ဂလော ယံ သဒ္ဓမ္မံ ဣမသ္မိံ သာသနေ သမ္မာပဋိပဇ္ဇနေန ဇာနိတွာ အဂ္ဂမဂ္ဂါဓိဂမေန အနာသဝေါ ဟုတွာ ပရိနိဗ္ဗာယတိ. अब गृहस्थों और प्रव्रजितों की परस्पर उपकारिता दिखाने के लिए 'ते तस्स' (वे उसके) यह गाथा कही। वहाँ 'ते' का अर्थ बहुश्रुत (भिक्षु) है और 'तस्स' का अर्थ उस उपासक का है। 'धम्मं देसेन्ति' का अर्थ है कि वे समस्त संसार-दुःख को दूर करने वाले धर्म का उपदेश देते हैं। 'यं सो धम्मं इधञ्ञाय' का अर्थ है कि वह व्यक्ति जिस सद्धर्म को इस शासन में सम्यक् प्रतिपत्ति (आचरण) के द्वारा जानकर और अग्र मार्ग (अर्हत् मार्ग) की प्राप्ति से अनास्रव होकर परिनिर्वाण प्राप्त करता है। ပူဇာသက္ကာရဝသေနေဝ [Pg.14] ပဌမယာမော ခေပိတော, ဘဂဝတော ဒေသနာယ အပ္ပာဝသေသော မဇ္ဈိမယာမော ဂတောတိ ပါဠိယံ ‘‘ဗဟုဒေဝ ရတ္တိ’’န္တိ ဝုတ္တန္တိ အာဟ ‘‘အတိရေကတရံ ဒိယဍ္ဎယာမ’’န္တိ. သန္ဒဿေသီတိ အာနိသံသံ ဒဿေသိ, အာဝါသဒါနပဋိသံယုတ္တံ ဓမ္မိံ ကထံ သုတွာ တတော ပရံ, ‘‘မဟာရာဇ, ဣတိပိ သီလံ, ဣတိပိ သမာဓိ, ဣတိပိ ပညာ’’တိ သီလာဒိဂုဏေ တေသံ သမ္မာ ဒဿေသိ, ဟတ္ထေန ဂဟေတွာ ဝိယ ပစ္စက္ခတော ပကာသေသိ. သမာဒပေသီတိ ‘‘ဧဝံ သီလံ သမာဒါတဗ္ဗံ, သီလေ ပတိဋ္ဌိတေန ဧဝံ သမာဓိ, ဧဝံ ပညာ ဘာဝေတဗ္ဗာ’’တိ ယထာ တေ သီလာဒိဂုဏေ အာဒိယန္တိ, တထာ ဂဏှာပေသိ. သမုတ္တေဇေသီတိ ယထာ သမာဒိန္နံ သီလံ သုဝိသုဒ္ဓံ ဟောတိ, သမထဝိပဿနာ စ ဘာဝိယမာနာ ယထာ သုဋ္ဌု ဝိသောဓိတာ ဥပရိဝိသေသာဝဟာ ဟောန္တိ, ဧဝံ စိတ္တံ သမုတ္တေဇေသိ နိသာမနဝသေန ဝေါဒါပေသိ. သမ္ပဟံသေသီတိ ယထာနုသိဋ္ဌံ ဌိတသီလာဒိဂုဏေဟိ သမ္ပတိ လဒ္ဓဂုဏာနိသံသေဟိ စေဝ ဥပရိ လဒ္ဓဗ္ဗဖလဝိသေသေဟိ စ ဥပရိစိတ္တံ သမ္မာ ပဟံသေသိ, လဒ္ဓဿာသဝသေန သုဋ္ဌု တောသေသိ. ဧဝမေတေသံ ပဒါနံ အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. पूजा और सत्कार के कारण ही प्रथम याम बीत गया, और भगवान् की देशना के कारण मध्यम याम का थोड़ा ही भाग शेष बचा था, इसलिए पालि में 'बहुदे व रत्तिं' (बहुत रात) कहा गया है, जिसका अर्थ है 'डेढ़ पहर से कुछ अधिक'। 'संदस्सेसी' का अर्थ है कि उन्होंने अनुशंसा (लाभ) दिखाई; आवास दान से संबंधित धार्मिक कथा सुनकर उसके बाद, 'महाराज, ऐसा शील है, ऐसी समाधि है, ऐसी प्रज्ञा है'—इस प्रकार उनके शील आदि गुणों को सम्यक् रूप से दिखाया, जैसे हाथ से पकड़कर प्रत्यक्ष रूप से प्रकट किया हो। 'समादपेसी' का अर्थ है—'इस प्रकार शील ग्रहण करना चाहिए, शील में प्रतिष्ठित होकर इस प्रकार समाधि और इस प्रकार प्रज्ञा की भावना करनी चाहिए'—जिस प्रकार वे शील आदि गुणों को ग्रहण करें, वैसा उन्हें ग्रहण कराया। 'समुत्तेजेसी' का अर्थ है—जिस प्रकार ग्रहण किया हुआ शील सुविशुद्ध होता है, और भावना की जाने वाली शमथ-विपश्यना जिस प्रकार भली-भाँति शोधित होकर उत्तर-विशेष (उच्च अवस्था) को प्राप्त कराने वाली होती है, इस प्रकार चित्त को उत्साहित किया और श्रवण के माध्यम से निर्मल किया। 'संपहंसेसी' का अर्थ है—जिस प्रकार उपदेश दिया गया है, वैसे स्थित शील आदि गुणों से, अभी प्राप्त गुणों के लाभ से और भविष्य में प्राप्त होने वाले फल-विशेषों से चित्त को सम्यक् रूप से प्रहर्षित किया, आश्वासन प्राप्त होने के कारण भली-भाँति संतुष्ट किया। इन पदों का अर्थ इस प्रकार समझना चाहिए। သမုဒါယဝစနောပိ အသီတိမဟာထေရ-သဒ္ဒေါ တဒေကဒေသေပိ နိရုဠှောတိ အာဟ ‘‘အသီတိမဟာထေရေသု ဝိဇ္ဇမာနေသူ’’တိ. အာနန္ဒတ္ထေရောပိ ဟိ အန္တောဂဓော ဧဝါတိ. သာကိယမဏ္ဍလေတိ သာကိယရာဇသမူဟေ. समुदायवाचक होने पर भी 'अस्सी महास्थविर' शब्द उसके एक अंश के लिए भी रूढ़ है, इसलिए कहा—'अस्सी महास्थविरों के विद्यमान होने पर'। क्योंकि आनंद स्थविर भी उन्हीं के अंतर्गत हैं। 'साकियमण्डले' का अर्थ है शाक्य राजाओं के समूह में। ပဋိပဒါယ နိယုတ္တတ္တာ ပါဋိပဒေါ. တေနာဟ – ‘‘ပဋိပန္နကော’’တိ. သိက္ခနသီလတာဒိနာ သေခေါ, ဩဓိသော သမိတပါပတာယ သမဏော. သေခေါ ပါဋိပဒေါ ပဋိပဇ္ဇနပုဂ္ဂလာဓိဋ္ဌာနေန ပဋိပဒါဒေသနံ နိယမေန္တော ပဋိပဒါယ ပုဂ္ဂလံ နိယမေတိ နာမာတိ ‘‘ပဋိပဒါယ ပုဂ္ဂလံ နိယမေတွာ ဒဿေတီ’’တိ. သေခပ္ပဋိပဒါ သာသနေ မင်္ဂလပဋိပဒါ သမ္မဒေဝ အသေဝိတဗ္ဗပရိဝဇ္ဇနေန သေဝိတဗ္ဗသမာဒါနေန ဥက္ကံသဝတ္ထူသု စ ဘာဝတော အသေခဓမ္မပါရိပူရိယာ အာဝဟတ္တာ စ ဝဍ္ဎမာနကပဋိပဒါ. အကိလမန္တာဝ သလ္လက္ခေဿန္တီတိ ဣဒံ တဒါ တေသံ အသေခဘူမိအဓိဂမာယ အယောဂျတာယ ဝုတ္တံ. အကိလမန္တာဝါတိ ဣမိနာ ပဋိသမ္ဘိဒါပ္ပတ္တဿပိ အနဓိဂတမဂ္ဂသညာပနာ ဘာရိယာတိ ဒဿေတိ. ဩသဋာတိ အနုပ္ပဝိဋ္ဌာ. သကလံ ဝိနယပိဋကံ ကထိတမေဝ ဟောတိ တဿ သီလကထာဗာဟုလ္လတော သေသဒွယေပိ ဧသေဝ နယော. တီဟိ ပိဋကေဟီတိ ကရဏတ္ထေ ကရဏဝစနံ. တေန တံတံပိဋကာနံ တဿာ တဿာ သိက္ခာယ သာဓကတမဘာဝံ ဒဿေတိ. प्रतिपदा (मार्ग) में नियुक्त होने के कारण 'पातिपद' है। इसीलिए कहा—'प्रतिपन्नक'। सीखने के स्वभाव आदि के कारण 'शैक्ष' है, और सीमित रूप से पापों को शांत करने के कारण 'श्रमण' है। शैक्ष प्रतिपन्नक व्यक्ति के आधार पर प्रतिपदा की देशना को निश्चित करते हुए वह प्रतिपदा के द्वारा पुद्गल (व्यक्ति) को निश्चित करता है, इसलिए कहा—'प्रतिपदा के द्वारा पुद्गल को निश्चित करके दिखाता है'। शासन में शैक्ष-प्रतिपदा एक मंगलकारी प्रतिपदा है, क्योंकि यह सम्यक् रूप से सेवन न करने योग्य (अकुशल) के वर्जन से, सेवन करने योग्य (कुशल) के ग्रहण से और उत्कृष्ट वस्तुओं की भावना से अशैक्ष धर्म की परिपूर्णता को लाने वाली और निरंतर बढ़ने वाली प्रतिपदा है। 'बिना थके ही ध्यान देंगे'—यह उस समय उनकी अशैक्ष भूमि की प्राप्ति के लिए अयोग्यता के कारण कहा गया है। 'बिना थके ही'—इससे यह दर्शाया गया है कि प्रतिसंविदा प्राप्त व्यक्ति के लिए भी अप्राप्त मार्ग का बोध कराना कठिन कार्य है। 'ओसटा' का अर्थ है प्रविष्ट हुए। शील-कथा की बहुलता के कारण संपूर्ण विनयपिटक ही कहा गया है, शेष दो (पिटकों) में भी यही न्याय (तर्क) है। 'तीनों पिटकों के द्वारा'—यहाँ करण अर्थ में करण विभक्ति है। उससे उन-उन पिटकों की उस-उस शिक्षा के प्रति साधकतम (सर्वश्रेष्ठ साधन) होने का भाव प्रदर्शित होता है। ပိဋ္ဌိဝါတော [Pg.15] ဥပ္ပဇ္ဇတိ ဥပါဒိန္နကသရီရဿ တထာရူပတ္တာ သင်္ခါရာနဉ္စ အနိစ္စတာယ ဒုက္ခာနုဗန္ဓတ္တာ. အကာရဏံ ဝါ ဧတန္တိ ယေနာဓိပ္ပာယေန ဝုတ္တံ, တမေဝ အဓိပ္ပာယံ ဝိဝရိတုံ ‘‘ပဟောတီ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. စတူဟိ ဣရိယာပထေဟိ ပရိဘုဉ္ဇိတုကာမော အဟောသိ သကျရာဇူနံ အဇ္ဈာသယဝသေန. တထာ ဟိ ဝက္ခတိ ‘‘သတ္ထာပိ တဒေဝ သန္ဓာယ တတ္ထ သံဃာဋိံ ပညပေတွာ နိပဇ္ဇီတီ’’တိ. ယဒိ ဧဝံ ‘‘ပိဋ္ဌိ မေ အာဂိလာယတီ’’တိ ဣဒံ ကထန္တိ အာဟ ‘‘ဥပါဒိန္နကသရီရဉ္စ နာမာ’’တိအာဒိ. उपादिन्नक शरीर (कर्म-जनित शरीर) के वैसा होने के कारण और संस्कारों की अनित्यता के कारण दुःख से अनुबद्ध होने से पीठ का दर्द (वात) उत्पन्न होता है। अथवा यह अकारण है—जिस अभिप्राय से यह कहा गया है, उसी अभिप्राय को स्पष्ट करने के लिए 'पहोती' आदि कहा गया है। शाक्य राजाओं के आशय के अनुसार वे चारों ईर्यापथों से (धर्म का) उपभोग करना चाहते थे। जैसा कि आगे कहेंगे—'शास्ता ने भी उसी को ध्यान में रखकर वहाँ संघाटी बिछाकर शयन किया'। यदि ऐसा है, तो 'मेरी पीठ दुख रही है'—यह कैसे कहा? इसके उत्तर में 'उपादिन्नक शरीर' आदि कहा गया है। ၂၃. ‘‘ဣမိနာ ပါတိမောက္ခသံဝရေန…ပေ… သမ္ပန္နော’’တိအာဒီသု (ဝိဘ. ၅၁၁) သမန္နာဂတတ္ထော သမ္ပန္န-သဒ္ဒေါ, ဣဓ ပန ပါရိပူရိအတ္ထောတိ ဒဿေတုံ ‘‘ပရိပုဏ္ဏသီလောတိ အတ္ထော’’တိ ဝုတ္တံ. ယော ပန သမ္ပန္နသီလောယေဝ, သော ပရိပုဏ္ဏသီလော. ပရိသုဒ္ဓဉှိ သီလံ ‘‘ပရိပုဏ္ဏ’’န္တိ ဝုစ္စတိ, န သဗလံ ကမ္မာသံ ဝါ. သုန္ဒရဓမ္မေဟီတိ သောဘနဓမ္မေဟိ. ယသ္မိံ သန္တာနေ ဥပ္ပန္နာ တဿ သောဘနဘာဝတော. တေဟိ သပ္ပုရိသဘာဝသာဓနတော သပ္ပုရိသာနံ ဓမ္မေဟိ. २३. ‘इस पातिमोक्ष संवर से...पे... संपन्न’ आदि में 'संपन्न' शब्द 'युक्त' होने के अर्थ में है, किंतु यहाँ परिपूर्णता के अर्थ में है, यह दिखाने के लिए 'परिपूर्ण शील वाला अर्थ है' ऐसा कहा गया है। जो संपन्न शील वाला ही है, वही परिपूर्ण शील वाला है। क्योंकि परिशुद्ध शील को ही 'परिपूर्ण' कहा जाता है, न कि चितकबरा (सबला) या दागदार (कम्मास)। 'सुंदर धर्मों से' का अर्थ है शोभन धर्मों से। जिस संतान (चित्त-संतति) में वे उत्पन्न होते हैं, उसकी शोभा बढ़ाने के कारण वे शोभन हैं। उनके द्वारा सत्पुरुष भाव की सिद्धि होने के कारण वे सत्पुरुषों के धर्म हैं। ၂၄. ဣမိနာ ဧတ္တကေန ဌာနေနာတိ ‘‘ဣဓ, မဟာနာမ, အရိယသာဝကော’’တိ အာရဘိတွာ ယာဝ ‘‘အကသိရလာဘီ’’တိ ပဒံ ဣမိနာ ဧတ္တကေန ဥဒ္ဒေသပဒေန မာတိကံ ဌပေတွာ. ပဋိပါဋိယာတိ ဥဒ္ဒေသပဋိပါဋိယာ. ဧဝမာဟာတိ ‘‘ဧဝံ ကထဉ္စ, မဟာနာမာ’’တိအာဒိနာ ဣဒါနိ ဝုစ္စမာနေန ဒဿိတာကာရေန အာဟ. २४. ‘इस इतने स्थान से’ का अर्थ है—'यहाँ, महानाम, आर्यश्रावक' से आरंभ करके 'बिना कठिनाई के प्राप्त करने वाला' पद तक, इतने उद्देश पदों के द्वारा मातृका (विषय-सूची) स्थापित करके। 'क्रम से' का अर्थ है उद्देश के क्रम से। 'इस प्रकार कहा' का अर्थ है—'और कैसे, महानाम' आदि के द्वारा अब कहे जाने वाले प्रकार से कहा। ၂၅. ဟိရီယတီတိ လဇ္ဇီယတိ ပီဠီယတိ. ယသ္မာ ဟိရီ ပါပဇိဂုစ္ဆနလက္ခဏာ, တသ္မာ ‘‘ဇိဂုစ္ဆတီတိ အတ္ထော’’တိ ဝုတ္တံ. ဩတ္တပ္ပတီတိ ဥတ္တပ္ပတိ. ပါပုတြာသလက္ခဏဉှိ ဩတ္တပ္ပံ. ပဂ္ဂဟိတဝီရိယောတိ သင်္ကောစံ အနာပန္နဝီရိယော. တေနာဟ ‘‘အနောသက္ကိတမာနသော’’တိ. ပဟာနတ္ထာယာတိ သမုစ္ဆိန္ဒနတ္ထာယ. ကုသလာနံ ဓမ္မာနံ ဥပသမ္ပဒါ နာမ အဓိဂမော ဧဝါတိ အာဟ ‘‘ပဋိလာဘတ္ထာယာ’’တိ. သတိနေပက္ကေနာတိ သတိယာ နေပက္ကေန တိက္ခဝိသဒသူရဘာဝေန. အဋ္ဌကထာယံ ပန နေပက္ကံ နာမ ပညာတိ အဓိပ္ပာယေန ‘‘သတိယာ စ နိပကဘာဝေန စာ’’တိ အတ္ထော ဝုတ္တော, ဧဝံ သတိ အညော နိဒ္ဒိဋ္ဌော နာမ ဟောတိ. သတိမာတိ စ ဣမိနာဝ ဝိသေသာ သတိ ဂဟိတာ, ပရတော ‘‘စိရကတမ္ပိ [Pg.16] စိရဘာသိတမ္ပိ သရိတာ အနုဿရိတာ’’တိ သတိကိစ္စမေဝ နိဒ္ဒိဋ္ဌံ, န ပညာကိစ္စံ, တသ္မာ သတိနေပက္ကေနာတိ သတိယာ နေပက္ကဘာဝေနာတိ သက္ကာ ဝိညာတုံ. တေနေဝ ဟိ ပစ္စယဝိသေသဝသေန အညဓမ္မနိရပေက္ခော သတိယာ ဗလဝဘာဝေါ. တထာ ဟိ ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တစိတ္တေနပိ အဇ္ဈယနသမ္မသနာနိ သမ္ဘဝန္တိ. २५. ‘हिरीयतीति’ (लज्जित होता है) का अर्थ है लज्जित होना, पीड़ित होना। चूँकि ‘ह्री’ (लज्जा) पाप से घृणा करने के लक्षण वाली है, इसलिए कहा गया है कि ‘घृणा करता है’ यही अर्थ है। ‘ओत्तप्पतीति’ (भयभीत होता है) का अर्थ है उद्विग्न होना। पाप से त्रास (भय) का लक्षण ही ‘ओत्तप्प’ (अपत्राप्य) है। ‘पग्गहितवीरियो’ (प्रगृहीत वीर्य) का अर्थ है संकोच को प्राप्त न हुआ वीर्य। इसीलिए कहा गया है ‘अनवसादी मन वाला’ (अनवसन्न मानस)। ‘पहाणत्थाया’ (प्रहाण के लिए) का अर्थ है समूच्छेद (विनाश) के लिए। कुशल धर्मों की ‘उपसम्पदा’ का अर्थ अधिगम (प्राप्ति) ही है, इसलिए कहा गया है ‘प्रतिलाभ के लिए’। ‘सतिनेपक्केन’ (स्मृति-नैपुल्य से) का अर्थ है स्मृति की निपुणता, तीक्ष्णता, स्पष्टता और शूरता से। अट्ठकथा में तो ‘नैपुल्य’ का अर्थ ‘प्रज्ञा’ है, इस अभिप्राय से ‘स्मृति और निपुणता के भाव से’ यह अर्थ कहा गया है, ऐसा होने पर दूसरा (प्रज्ञा) निर्दिष्ट होता है। ‘सतिमा’ (स्मृतिमान) इस शब्द से ही विशेष स्मृति ग्रहण की गई है, आगे ‘चिरकृत और चिरभाषित को भी स्मरण करने वाला, अनुस्मरण करने वाला’ इस प्रकार स्मृति का ही कार्य निर्दिष्ट है, प्रज्ञा का कार्य नहीं, इसलिए ‘सतिनेपक्केन’ का अर्थ ‘स्मृति की निपुणता के भाव से’ ऐसा समझा जा सकता है। उसी प्रत्यय विशेष के कारण अन्य धर्मों की अपेक्षा न रखने वाला स्मृति का बलवान भाव होता है। क्योंकि ज्ञान-विप्रयुक्त चित्त से भी अध्ययन और सम्मर्शन (चिन्तन) सम्भव होते हैं। စေတိယင်္ဂဏဝတ္တာဒီတိ အာဒိ-သဒ္ဒေန ဗောဓိယင်္ဂဏဝတ္တာဒီနိ သင်္ဂဏှာတိ. အသီတိမဟာဝတ္တပဋိပတ္တိပူရဏန္တိ ဧတ္ထ အသီတိဝတ္တပဋိပတ္တိပူရဏံ မဟာဝတ္တပဋိပတ္တိပူရဏန္တိ ဝတ္တပဋိပတ္တိပူရဏ-သဒ္ဒေါ ပစ္စေကံ ယောဇေတဗ္ဗော. တတ္ထ မဟာဝတ္တာနိ (ဝိဘ. မူလဋီ. ၄၀၆) နာမ ဝတ္တခန္ဓကေ (စူဠဝ. ၃၅၆ အာဒယော) ဝုတ္တာနိ အာဂန္တုကဝတ္တံ အာဝါသိကံ ဂမိကံ အနုမောဒနံ ဘတ္တဂ္ဂံ ပိဏ္ဍစာရိကံ အာရညိကံ သေနာသနံ ဇန္တာဃရံ ဝစ္စကုဋိ ဥပဇ္ဈာယံ သဒ္ဓိဝိဟာရိကံ အာစရိယံ အန္တေဝါသိကဝတ္တန္တိ စုဒ္ဒသ. တတော အညာနိ ပန ကဒါစိ တဇ္ဇနီယကမ္မကတာဒိကာလေ ပါရိဝါသိကာဒိကာလေ စ စရိတဗ္ဗာနိ အသီတိ ခုဒ္ဒကဝတ္တာနိ သဗ္ဗာသု အဝတ္ထာသု န စရိတဗ္ဗာနိ, တသ္မာ မဟာဝတ္တေသု, အဂ္ဂဟိတာနိ. တတ္ထ ‘‘ပါရိဝါသိကာနံ ဘိက္ခူနံ ဝတ္တံ ပညပေဿာမီ’’တိ အာရဘိတွာ ‘‘န ဥပသမ္ပာဒေတဗ္ဗံ…ပေ… န ဆမာယံ စင်္ကမန္တေ စင်္ကမေ စင်္ကမိတဗ္ဗ’’န္တိ (စူဠဝ. ၈၁) ဝုတ္တာနိ ပကဘတ္တေ စရိတဗ္ဗဝတ္တာဝသာနာနိ ဆသဋ္ဌိ, တတော ပရံ ‘‘န, ဘိက္ခဝေ, ပါရိဝါသိကေန ဘိက္ခုနာ ပါရိဝါသိကဝုဍ္ဎတရေန ဘိက္ခုနာ သဒ္ဓိံ မူလာယပဋိကဿနာရဟေန မာနတ္တာရဟေန မာနတ္တစာရိကေန အဗ္ဘာနာရဟေန ဘိက္ခုနာ သဒ္ဓိံ ဧကစ္ဆန္နေ အာဝါသေ ဝတ္တဗ္ဗ’’န္တိအာဒီနိ (စူဠဝ. ၈၂) ပကတတ္တေ စရိတဗ္ဗေဟိ အနညတ္တာ ဝိသုံ ဝိသုံ အဂဏေတွာ ပါရိဝါသိကဝုဍ္ဎတရာဒီသု ပုဂ္ဂလန္တရေသု စရိတဗ္ဗတ္တာ တေသံ ဝသေန သမ္ပိဏ္ဍေတွာ ဧကေကံ ကတွာ ဂဏိတဗ္ဗာနိ ပဉ္စာတိ ဧကသတ္တတိဝတ္တာနိ, ဥက္ခေပနိယကမ္မကတဝတ္တေသု ဝတ္တပညာပနဝသေန ဝုတ္တံ – ‘‘န ပကတတ္တဿ ဘိက္ခုနော အဘိဝါဒနံ ပစ္စုဋ္ဌာနံ…ပေ… နှာနေ ပိဋ္ဌိပရိကမ္မံ သာဒိတဗ္ဗ’’န္တိ (စူဠဝ. ၅၁) ဣဒံ အဘိဝါဒနာဒီနံ အသာဒိယနံ ဧကံ, ‘‘န ပကတတ္တော ဘိက္ခု သီလဝိပတ္တိယာ အနုဒ္ဓံသိတဗ္ဗော’’တိအာဒီနိ စ ဒသာတိ ဧဝမေတာနိ ဒွါသီတိ. ဧတေသွေဝ ပန ကာနိစိ တဇ္ဇနီယကမ္မာဒိဝတ္တာနိ ကာနိစိ ပါရိဝါသိကာဒိဝတ္တာနီတိ အဂ္ဂဟိတဂ္ဂဟဏေန ဒွါသီတိ, ဧဝံ အပ္ပကံ ပန ဦနမဓိကံ ဝါ ဂဏနုပဂံ န ဟောတီတိ ဣဓ ‘‘အသီတိ’’စ္စေဝ ဝုတ္တံ. အညတ္ထ ပန အဋ္ဌကထာပဒေသေ ‘‘ဒွါသီတိ ခန္ဓကဝတ္တာနီ’’တိ ဝုစ္စတိ. ‘चेतियङ्गणवत्तादी’ (चैत्य-प्राङ्गण के व्रत आदि) में ‘आदि’ शब्द से बोधि-प्राङ्गण के व्रत आदि का संग्रह होता है। ‘असीतिमहावत्तपटिपत्तिपूरणं’ (अस्सी महाव्रत प्रतिपत्ति का पूर्ण करना) यहाँ ‘असीतिवत्तपटिपत्तिपूरणं’ और ‘महावत्तपटिपत्तिपूरणं’ इस प्रकार ‘वत्तपटिपत्तिपूरण’ शब्द को प्रत्येक के साथ जोड़ना चाहिए। वहाँ महाव्रत (वत्तखन्धक में कहे गए) आगन्तुक व्रत, आवासिक, गमिक, अनुमोदन, भक्तग्ग (भोजनशाला), पिण्डचारिक, आरण्यक, सेनासन, जन्ताघर (स्नानागार), वच्चकुटी (शौचालय), उपाध्याय, सद्धिविहारिक, आचार्य और अन्तेवासिक व्रत - ये चौदह हैं। उनसे अन्य, जो कभी तर्जनीय कर्म आदि के समय और पारिवासिक आदि के समय पालन किए जाने चाहिए, वे अस्सी क्षुद्रक व्रत हैं जो सभी अवस्थाओं में पालन नहीं किए जाते, इसलिए उन्हें महाव्रतों में ग्रहण नहीं किया गया है। वहाँ ‘पारिवासिक भिक्षुओं के व्रत प्रज्ञप्त करूँगा’ यहाँ से आरम्भ कर ‘उपसम्पदा नहीं देनी चाहिए... भूमि पर चंक्रमण करते हुए चंक्रमण नहीं करना चाहिए’ इस प्रकार कहे गए सामान्य भिक्षु द्वारा पालन किए जाने वाले व्रतों के अन्त तक छियासठ (66) हैं, उसके बाद ‘भिक्षुओं, पारिवासिक भिक्षु को पारिवासिक वृद्धतर भिक्षु के साथ, मूलायपटिकस्सन के योग्य, मानत्त के योग्य, मानत्तचारी, अब्भान के योग्य भिक्षु के साथ एक ही छत के नीचे नहीं रहना चाहिए’ इत्यादि, जो सामान्य भिक्षु द्वारा पालन किए जाने वाले व्रतों से भिन्न नहीं हैं, उन्हें अलग-अलग न गिनकर पारिवासिक वृद्धतर आदि अन्य पुद्गलों में पालन किए जाने के कारण उनके वश से सम्मिलित कर एक-एक करके गिनने पर पाँच होते हैं - इस प्रकार इकहत्तर (71) व्रत होते हैं। उत्क्षेपणीय कर्म किए गए व्रतों में व्रत प्रज्ञप्ति के वश से कहा गया है - ‘सामान्य भिक्षु का अभिवादन, प्रत्युत्थान... स्नान में पीठ की मालिश स्वीकार नहीं करनी चाहिए’ यह अभिवादन आदि को स्वीकार न करना एक है, ‘सामान्य भिक्षु को शील-विपत्ति से आरोपित नहीं करना चाहिए’ इत्यादि दस हैं - इस प्रकार ये बयासी (82) हैं। इन्हीं में से कुछ तर्जनीय कर्म आदि के व्रत हैं और कुछ पारिवासिक आदि के व्रत हैं, इस प्रकार न ग्रहण किए गए को ग्रहण करने से बयासी होते हैं, इस प्रकार थोड़ा कम या अधिक गणना में नहीं आता, इसलिए यहाँ ‘अस्सी’ ही कहा गया है। अन्यत्र अट्ठकथा के प्रदेश में ‘बयासी खन्धक व्रत’ कहा जाता है। သက္ကစ္စံ [Pg.17] ဥဒ္ဒိသနံ သက္ကစ္စံ ဥဒ္ဒိသာပနန္တိ ပစ္စေကံ သက္ကစ္စံ-သဒ္ဒေါ ယောဇေတဗ္ဗော. ဥဒ္ဒိသနံ ဥဒ္ဒေသဂ္ဂဟဏံ. ဓမ္မောသာရဏံ ဓမ္မဿ ဥစ္စာရဏံ. ဓမ္မဒေသနာ – ‘सक्कच्चं उद्दिसनं’ (सत्कारपूर्वक उद्देश) और ‘सक्कच्चं उद्दिसापनं’ (सत्कारपूर्वक उद्देश कराना) में ‘सक्कच्चं’ शब्द को प्रत्येक के साथ जोड़ना चाहिए। ‘उद्दिसनं’ का अर्थ है उद्देश ग्रहण करना। ‘धम्मोसारणं’ का अर्थ है धर्म का उच्चारण करना। धर्मदेशना — ‘‘အာဒိမှိ သီလံ ဒေသေယျ, မဇ္ဈေ ဈာနံ ဝိပဿနံ; ပရိယောသာနေ စ နိဗ္ဗာနံ, ဧသာ ကထိကသဏ္ဌိတီ’’တိ. (ဒီ. နိ. အဋ္ဌ. ၁.၁၉၀; သံ. နိ. အဋ္ဌ. ၃.၄.၂၄၆) – “आदि में शील की देशना करनी चाहिए, मध्य में ध्यान और विपश्यना की; और अन्त में निर्वाण की, यही उपदेशक की स्थिति (पद्धति) है।” ဧဝံ ကထိတလက္ခဏာ ဓမ္မကထာ. ဥပဂန္တွာ နိသိန္နဿ ယဿ ကဿစိ ဂဟဋ္ဌဿ ပဗ္ဗဇိတဿ ဝါ တင်္ခဏာနုရူပါ ဓမ္မီ ကထာ ဥပနိသိန္နကထာ. ဘတ္တာနုမောဒနကထာ အနုမောဒနိယာ. သရိတာတိ ဧတ္ထ န ကေဝလံ စိရကတစိရဘာသိတာနံ သရဏမနုဿရဏမတ္တံ အဓိပ္ပေတံ, အထ ခေါ တထာပဝတ္တရူပါရူပဓမ္မာနံ ပရိဂ္ဂဟမုခေန ပဝတ္တဝိပဿနာစာရေ သတိသမ္ဗောဇ္ဈင်္ဂသမုဋ္ဌာပနန္တိ ဒဿေတုံ ‘‘တသ္မိံ ကာယေန စိရကတေ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. သကိမ္ပိ သရဏေနာတိ ဧကဝါရံ သရဏေန. ပုနပ္ပုနံ သရဏေနာတိ အနု အနု သရဏေန. သတိသမ္ဗောဇ္ဈင်္ဂမ္ပိ ဝိဝေကနိဿိတံ ဝိရာဂနိဿိတံ နိရောဓနိဿိတံ ဝေါသဂ္ဂပရိဏာမိဉ္စ ကတွာ သရန္တော တတ္ထ တတ္ထ ဇဝနဝါရေ သရဏဇဝနဝါရေ ပရိတ္တဇဝနဝသေန အနုဿရိတာတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. इस प्रकार के लक्षणों वाली धर्मकथा है। पास आकर बैठे हुए जिस किसी गृहस्थ या प्रव्रजित के लिए उस क्षण के अनुरूप धार्मिक कथा ‘उपनिषण्णकथा’ है। भोजन के बाद अनुमोदन की कथा ‘अनुमोदनीया’ है। ‘सरिता’ (स्मरण किया) यहाँ न केवल चिरकाल पहले किए गए और चिरकाल पहले कहे गए का स्मरण और अनुस्मरण मात्र अभिप्रेत है, बल्कि उस प्रकार प्रवृत्त रूप-अरूप धर्मों के परिग्रह के मुख से प्रवृत्त विपश्यना-आचार में स्मृति-सम्बोध्यङ्ग को समुत्थित करना है, यह दिखाने के लिए ‘उस काया द्वारा चिरकाल पहले किए गए’ इत्यादि कहा गया है। ‘सकिम्पि सरणेन’ का अर्थ है एक बार स्मरण करने से। ‘पुनप्पुनं सरणेन’ का अर्थ है बार-बार स्मरण करने से। स्मृति-सम्बोध्यङ्ग को भी विवेक-निश्रित, विराग-निश्रित, निरोध-निश्रित और व्युत्सर्ग-परिणामी बनाकर स्मरण करते हुए, उन-उन जवन-वारों में, स्मरण-जवन-वारों में परीत्त-जवन के वश से ‘अनुस्मरण किया’ ऐसा जानना चाहिए। ဂတိအတ္ထာ ဓာတုသဒ္ဒါ ဗုဒ္ဓိအတ္ထာ ဟောန္တီတိ အာဟ – ‘‘ဥဒယဉ္စ ဝယဉ္စ ပဋိဝိဇ္ဈိတုံ သမတ္ထာယာ’’တိ. မိဿကနယေနာယံ ဒေသနာ အာဂတာတိ အာဟ – ‘‘ဝိက္ခမ္ဘနဝသေန စ သမုစ္ဆေဒဝသေန စာ’’တိ. တေနာဟ ‘‘ဝိပဿနာပညာယ စေဝါ’’တိအာဒိ. ဝိပဿနာပညာယ နိဗ္ဗေဓိကပရိယာယတော. သာ စ ခေါ ပဒေသိကာတိ နိပ္ပဒေသိကံ ကတွာ ဒဿေတုံ ‘‘မဂ္ဂပညာယ ပဋိလာဘသံဝတ္တနတော စာ’’တိ ဝုတ္တံ. ဒုက္ခက္ခယဂါမိနိဘာဝေပိ ဧသေဝ နယော. သမ္မာတိ ယာထာဝတော. အကုပ္ပဓမ္မတာယ ဟိ မဂ္ဂပညာ ခေပိတခေပနာယ န ပုန ကိစ္စံ အတ္ထီတိ ဥပါယေန ဉာယေန ယာ ပဝတ္တိ သာ ဧဝါတိ အာဟ – ‘‘ဟေတုနာ နယေနာ’’တိ. "गति" अर्थ वाली धातुएँ "बुद्धि" अर्थ वाली होती हैं, इसलिए कहा गया है - "उदय और व्यय का प्रतिवेध करने में समर्थ"। यह देशना मिश्रित नय से आई है, इसलिए कहा गया है - "विष्कम्भन के वश से और समुच्छेद के वश से"। इसीलिए कहा गया है "विपश्यना प्रज्ञा से ही" आदि। विपश्यना प्रज्ञा के द्वारा भेदन (निब्बेधिक) के पर्याय से। वह (विपश्यना) प्रादेशिक (सीमित) है, उसे निष्प्रादेशिक (पूर्ण) करके दिखाने के लिए "मार्ग प्रज्ञा की प्राप्ति में संवर्तन होने से" कहा गया है। दुःख के क्षय तक ले जाने वाले भाव में भी यही नय है। "सम्मा" (सम्यक्) अर्थात् यथार्थ रूप से। अकुप्पधम्मता (अक्षोभ्यता) के कारण मार्ग प्रज्ञा द्वारा क्षय किए जाने योग्य (क्लेशों) के क्षय हो जाने पर पुनः कोई कृत्य शेष नहीं रहता, अतः उपाय और न्याय से जो प्रवृत्ति है, वही वह है, इसलिए कहा गया है - "हेतु और नय से"। ၂၆. အဓိကံ စေတော အဘိစေတော, မဟဂ္ဂတစိတ္တံ, တဿ ပန အဓိကတာ ကာမစ္ဆန္ဒာဒိပဋိပက္ခဝိဂမေန ဝိသိဋ္ဌဘာဝပ္ပတ္တိ, တန္နိဿိတာနိ အာဘိစေတသိကာနိ. တေနာဟ ‘‘အဘိစိတ္တံ သေဋ္ဌစိတ္တံ သိတာန’’န္တိ. ဒိဋ္ဌဓမ္မသုခဝိဟာရာနန္တိ ဣမသ္မိံယေဝ အတ္တဘာဝေ ဖာသုဝိဟာရဘူတာနံ. တေဟိ [Pg.18] ပန သမင်္ဂိတက္ခဏေ ယသ္မာ ဝိဝေကဇံ ပီတိသုခံ သမာဓိဇံ ပီတိသုခံ အပီတိဇံ သတိပါရိသုဒ္ဓိဉာဏသုခဉ္စ ပဋိလဘတိ ဝိန္ဒတိ, တသ္မာ အာဟ – ‘‘အပ္ပိတပ္ပိတက္ခဏေ သုခပဋိလာဘဟေတူန’’န္တိ. ဣစ္ဆိတိစ္ဆိတက္ခဏေ သမာပဇ္ဇိတာတိ ဣမိနာ တေသု ဈာနေသု သမာပဇ္ဇနဝသီဘာဝမာဟ, ‘‘နိကာမလာဘီ’’တိ ပန ဝစနတော အာဝဇ္ဇနာဓိဋ္ဌာနာ ပစ္စဝေက္ခဏဝသိယော စ ဝုတ္တာ ဧဝါတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. နိဒုက္ခလာဘီတိ ဣမိနာ တေသံ ဈာနာနံ သုခပဋိပဒါခိပ္ပာဘိညတံ ဒဿေတိ, ဝိပုလလာဘီတိ ဣမိနာ ပဂုဏတံ တပ္ပမာဏဒဿိတဘာဝဒီပနတော. တေနာဟ ‘‘ပဂုဏဘာဝေနာ’’တိအာဒိ. သမာပဇ္ဇိတုံ သက္ကောတိ သမာပဇ္ဇနဝသီဘာဝတာယ သာဓိတတ္တာ. သမာဓိပါရိပန္ထိကဓမ္မေတိ ဝသီဘာဝဿ ပစ္စနီကဓမ္မေ. ဈာနာဓိဂမဿ ပန ပစ္စနီကဓမ္မာ ပဂေဝ ဝိက္ခမ္ဘိတာ, အညထာ ဈာနာဓိဂမော ဧဝ န သိယာ. အကိလမန္တော ဝိက္ခမ္ဘေတုံ န သက္ကောတီတိ ကိစ္ဆေန ဝိက္ခမ္ဘေတိ ဝိသောဓေတိ, ကာမာဒီနဝပစ္စဝေက္ခဏာဒီဟိ ကာမစ္ဆန္ဒာဒီနံ အညေသံ သမာဓိပါရိပန္ထိကာနံ ဒူရသမုဿာရဏံ ဣဓ ဝိက္ခမ္ဘနံ ဝိသောဓနန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. २६. अधिक चित्त 'अभिचित्त' है, जो महग्गत चित्त है। उसकी अधिकता कामच्छन्द आदि प्रतिपक्षों के दूर होने से विशिष्ट भाव की प्राप्ति है, उससे संबंधित 'आभिचेतसिक' हैं। इसीलिए कहा गया है "अभिचित्त श्रेष्ठ चित्त के आश्रितों को"। "दृष्टधर्म सुखविहारों का" अर्थात् इसी आत्मभाव (जीवन) में सुखपूर्वक विहार रूप। उनके समांगी (युक्त) होने के क्षण में क्योंकि वह विवेकज प्रीति-सुख, समाधिज प्रीति-सुख, अप्रीतिज (प्रीति रहित) और स्मृति-पारिशुद्धि-ज्ञान-सुख प्राप्त करता है, अनुभव करता है, इसलिए कहा गया है - "अर्पित-अर्पित (समाहित) क्षण में सुख प्राप्ति के हेतुओं का"। "इच्छित-इच्छित क्षण में समापन्न होने वाला" इससे उन ध्यानों में समापत्ति की वशीभूतता (निपुणता) कही गई है। "निकामलाभी" (इच्छानुसार प्राप्त करने वाला) इस वचन से आवर्जन, अधिष्ठान और प्रत्यवेक्षण वशिताएँ भी कही गई हैं, ऐसा समझना चाहिए। "निदुक्खलाभी" (बिना दुःख के प्राप्त करने वाला) इससे उन ध्यानों की सुख-प्रतिपदा और क्षिप्राभिज्ञा को दिखाता है। "विपुललाभी" इससे प्रगुणता (अभ्यास की कुशलता) को उसके प्रमाण को दिखाने के कारण। इसीलिए कहा गया है "प्रगुण भाव से" आदि। समापन्न होने में समर्थ है क्योंकि समापत्ति-वशीभूतता सिद्ध हो चुकी है। "समाधि के परिपन्थी (बाधक) धर्मों" अर्थात् वशीभूतता के विरोधी धर्मों को। ध्यान की प्राप्ति के विरोधी धर्म तो पहले ही विष्कम्भित (दबा दिए गए) होते हैं, अन्यथा ध्यान की प्राप्ति ही नहीं होती। "बिना थके विष्कम्भित करने में समर्थ नहीं होता" अर्थात् कठिनाई से विष्कम्भित करता है, शुद्ध करता है। काम के दोषों के प्रत्यवेक्षण आदि के द्वारा कामच्छन्द आदि अन्य समाधि-बाधक धर्मों को दूर हटाना यहाँ 'विष्कम्भन' और 'विशोधन' समझना चाहिए। ၂၇. ဝိပဿနာဟိတာယ ဥပရူပရိဝိသေသာဝဟတ္တာ ဝဍ္ဎမာနာယ ပုဗ္ဗဘာဂသီလာဒိပဋိပဒါယ. သာ ဧဝ ပုဗ္ဗဘာဂပဋိပဒါ ယထာဘာဝိတတာယ အဝဿံ ဘာဝိနံ ဝိသေသံ ပရိဂ္ဂဟိတတ္တာ အဏ္ဍံ ဝိယာတိ အဏ္ဍံ, ကိလေသေဟိ အဒူသိတတာယ အပူတိ အဏ္ဍံ ဧတဿာတိ အပုစ္စဏ္ဍော, ဝိပဿနံ ဥဿုက္ကာပေတွာ ဌိတပုဂ္ဂလော, တဿ ဘာဝေါ အပုစ္စဏ္ဍတာ. ဝိပဿနာဒိဉာဏပ္ပဘေဒါယာတိ ပုဗ္ဗေနိဝါသဉာဏာဒိဉာဏပဘေဒါယ. တတ္ထာတိ စေတောခိလသုတ္တေ (မ. နိ. ၁.၁၈၅) ‘‘သ ခေါ သော, ဘိက္ခဝေ, ဧဝံ ဥဿောဠှိပန္နရသင်္ဂသမန္နာဂတော ဘိက္ခု ဘဗ္ဗော အဘိနိဗ္ဗိဒါယာ’’တိ အာဂတတ္တာ ဥဿောဠှိပန္နရသေဟိ အင်္ဂေဟိ သမန္နာဂတဘာဝေါတိ ဧဝံ ယံ ဩပမ္မသံသန္ဒနံ အာဂတံ, တံ ဩပမ္မသံသန္ဒနံ ဣဓ ဣမသ္မိံ သေခသုတ္တေ ယောဇေတွာ ဝေဒိတဗ္ဗန္တိ သမ္ဗန္ဓော. २७. विपश्यना के हित के लिए ऊपर-ऊपर के विशेष गुणों को लाने वाली बढ़ती हुई पूर्वभाग शील आदि प्रतिपदा के द्वारा। वही पूर्वभाग प्रतिपदा यथा-भावित होने के कारण अवश्य होने वाले विशेष को ग्रहण करने से 'अण्डे' के समान 'अण्डा' है। क्लेशों के द्वारा दूषित न होने के कारण 'अपुति अण्डा' (न सड़ा हुआ अण्डा) जिसका है, वह 'अपुच्चण्ड' है, जो विपश्यना में उद्योगी होकर स्थित पुद्गल है, उसका भाव 'अपुच्चण्डता' है। "विपश्यना आदि ज्ञान के प्रभेद के लिए" अर्थात् पूर्वनिवासज्ञान आदि ज्ञान के प्रभेद के लिए। वहाँ चेतोखिल सुत्त में "हे भिक्षुओं, वह इस प्रकार पन्द्रह उत्साह-अंगों से समन्वित भिक्षु अभिनिब्बिदा (भेदन) के लिए भव्य (योग्य) है" ऐसा आने से पन्द्रह उत्साह-अंगों से समन्वित होने का भाव - इस प्रकार जो उपमा का मिलान आया है, उस उपमा के मिलान को यहाँ इस शेख सुत्त में जोड़कर समझना चाहिए, यह सम्बन्ध है। ၂၈. မဟဂ္ဂတာဒိဘာဝေန ဟေဋ္ဌိမာနံ ဈာနာနံ အနုရူပမ္ပိ အတ္တနော ဝိသေသေန တေ ဥတ္တရိတွာ အတိက္ကမိတွာန ဌိတန္တိ အနုတ္တရံ, တေနာဟ – ‘‘ပဌမာဒိဇ္ဈာနေဟိ အသဒိသံ ဥတ္တမ’’န္တိ. ဒုတိယာဒီသုပိ အဘိနိဗ္ဘိဒါသု. ပုဗ္ဗေနိဝါသဉာဏံ ဥပ္ပဇ္ဇမာနံ ယထာ အတ္တနော ဝိသယပဋိစ္ဆာဒကံ ကိလေသန္ဓကာရံ ဝိဓမန္တမေဝ [Pg.19] ဥပ္ပဇ္ဇတိ, ဧဝံ အတ္တနော ဝိသယေ ကဉ္စိ ဝိသေသံ ကရောန္တမေဝ ဥပ္ပဇ္ဇတီတိ အာဟ – ‘‘ပုဗ္ဗေနိဝါသဉာဏေန ပဌမံ ဇာယတီ’’တိ, သေသဉာဏဒွယေပိ ဧသေဝ နယော. २८. महग्गत आदि भाव से नीचे के ध्यानों के अनुरूप होने पर भी अपने विशेष से उन्हें पार कर, लाँघ कर स्थित होने के कारण 'अनुत्तर' है, इसीलिए कहा गया है - "प्रथम आदि ध्यानों के असमान उत्तम"। द्वितीय आदि अभिनिब्बिदाओं (भेदन ज्ञानों) में भी। पूर्वनिवासज्ञान उत्पन्न होते हुए जैसे अपने विषय को ढकने वाले क्लेश रूपी अन्धकार को नष्ट करते हुए ही उत्पन्न होता है, वैसे ही अपने विषय में कोई विशेष कार्य करते हुए ही उत्पन्न होता है, इसलिए कहा गया है - "पूर्वनिवासज्ञान से पहले उत्पन्न होता है", शेष दो ज्ञानों में भी यही नय है। ၂၉. စရဏသ္မိန္တိ ပစ္စတ္တေ ဘုမ္မဝစနန္တိ အာဟ ‘‘စရဏံ နာမ ဟောတီတိ အတ္ထော’’တိ. တေနာတိ ကရဏတ္ထေ ကရဏဝစနံ အဂတပုဗ္ဗဒိသာဂမနေ တေသံ သာဓကတမဘာဝတော. २९. "चरणस्मिं" (चरण में) यह 'पच्चत्त' (प्रत्यगात्मा/स्वयं) में सप्तमी विभक्ति है, इसलिए कहा - "चरण नाम होता है, यह अर्थ है"। "तेन" (उसके द्वारा) यहाँ करण अर्थ में तृतीया विभक्ति है, क्योंकि पहले न गई हुई दिशाओं में जाने के लिए वे श्रेष्ठ साधन हैं। အဋ္ဌ ဉာဏာနီတိ ဣဓ အာဂတာနိ စ အနာဂတာနိ စ အမ္ဗဋ္ဌသုတ္တာဒီသု (ဒီ. နိ. ၁.၂၅၄ အာဒယော) အာဂတာနိ ဂဟေတွာ ဝဒတိ. ဝိနိဝိဇ္ဈိတွာတိ ပုဗ္ဗေနိဝါသပဋိစ္ဆာဒကာဒိကိလေသတမံ ဘိန္ဒိတွာ ပဒါလေတွာ. "आठ ज्ञान" यहाँ आए हुए और जो यहाँ नहीं आए हैं, उन्हें अम्बट्ठ सुत्त आदि से लेकर कहता है। "विनिविद्ध करके" अर्थात् पूर्वनिवास को ढकने वाले आदि क्लेश रूपी अन्धकार को तोड़कर, फाड़कर। ၃၀. သနင်္ကုမာရေနာတိ သနန္တနကုမာရေန. တဒေဝ ဟိ တဿ သနန္တနကုမာရတံ ဒဿေတုံ ‘‘စိရကာလတော ပဋ္ဌာယာ’’တိ ဝုတ္တံ. သော အတ္တဘာဝေါတိ ယေန အတ္တဘာဝေန မနုဿပထေ ဈာနံ နိဗ္ဗတ္တေသိ, သော ကုမာရတ္တဘာဝေါ, တသ္မာ ဗြဟ္မဘူတောပိ တာဒိသေန ကုမာရတ္တဘာဝေန စရတိ. ३०. "सनत्कुमार के द्वारा" अर्थात् सनन्तन कुमार के द्वारा। वही उसकी सनन्तन कुमारता दिखाने के लिए "चिरकाल से लेकर" कहा गया है। "वह आत्मभाव" जिससे मनुष्य लोक में ध्यान उत्पन्न किया, वह कुमार-आत्मभाव है, इसलिए ब्रह्मभूत होने पर भी वैसे कुमार-आत्मभाव से विचरण करता है। ဇနိတသ္မိံ-သဒ္ဒေါ ဧဝ ဣ-ကာရဿ ဧ-ကာရံ ကတွာ ‘‘ဇနေတသ္မိ’’န္တိ ဝုတ္တော, ဇနိတသ္မိန္တိ စ ဇနသ္မိန္တိ အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. ဇနိတသ္မိန္တိ သာမညဂ္ဂဟဏေပိ ယတ္ထ စတုဝဏ္ဏသမညာ, တတ္ထေဝ မနုဿလောကေ. ခတ္တိယော သေဋ္ဌောတိ လောကသမညာပိ မနုဿလောကေယေဝ, န ဒေဝကာယေ ဗြဟ္မကာယေ ဝါတိ ဒဿေတုံ ‘‘ယေ ဂေါတ္တပဋိသာရိနော’’တိ ဝုတ္တံ. ပဋိသရန္တီတိ ‘‘အဟံ ဂေါတမော, အဟံ ကဿပေါ’’တိ ပတိ ပတိ အတ္တနော ဂေါတ္တံ အနုသရန္တိ ပဋိဇာနန္တိ ဝါတိ အတ္ထော. "जनितस्मिं" शब्द में ही 'इ' कार को 'ए' कार करके "जनेतस्मिं" कहा गया है, और "जनितस्मिं" का अर्थ "जन (लोग) में" समझना चाहिए। "जनितस्मिं" ऐसा सामान्य रूप से ग्रहण करने पर भी जहाँ चार वर्णों की संज्ञा है, उसी मनुष्य लोक में। "क्षत्रिय श्रेष्ठ है" यह लोक-संज्ञा भी मनुष्य लोक में ही है, देव-निकाय या ब्रह्म-निकाय में नहीं, यह दिखाने के लिए "जो गोत्र का अनुसरण करने वाले हैं" कहा गया है। "अनुसरण करते हैं" अर्थात् "मैं गौतम हूँ, मैं काश्यप हूँ" इस प्रकार अपने-अपने गोत्र का बार-बार अनुसरण करते हैं या प्रतिज्ञा (दावा) करते हैं, यह अर्थ है। ဧတ္တာဝတာတိ ‘‘သာဓု သာဓု အာနန္ဒာ’’တိ ဧတ္တကေန သာဓုကာရဒါနေန. ဇိနဘာသိတံ နာမ ဇာတန္တိအာဒိတော ပဋ္ဌာယ ယာဝ ပရိယောသာနာ ထေရဘာသိတံ ဗုဒ္ဓဘာသိတမေဝ နာမ ဇာတံ. ‘‘ကိမ္ပနိဒံ သုတ္တံ သတ္ထုဒေသနာနုဝိဓာနတော ဇိနဘာသိတံ, ဥဒါဟု သာဓုကာရဒါနမတ္တေနာ’’တိ ဧဝရူပါ စောဒနာ ဣဓ အနောကာသာ ထေရဿ ဒေသနာယ ဘဂဝတော ဒေသနာနုဝိဓာနဟေတုကတ္တာ သာဓုကာရဒါနဿာတိ. ယံ ပနေတ္ထ အတ္ထတော အဝိဘတ္တံ, တံ သုဝိညေယျမေဝ. "इतने मात्र से" (एत्तावता) का अर्थ है "साधु साधु आनन्द" - इतने साधुकार देने से। "जिन-भाषित हो गया" का अर्थ है कि आदि से लेकर अंत तक स्थविर-भाषित (थेर-भाषित) बुद्ध-भाषित ही हो गया। "क्या यह सूत्र शास्ता की देशना के अनुरूप होने के कारण जिन-भाषित है, अथवा केवल साधुकार देने मात्र से?" - इस प्रकार का आक्षेप यहाँ निराधार है, क्योंकि स्थविर की देशना भगवान की देशना के अनुरूप होने के कारण ही साधुकार दिया गया है। यहाँ जो अर्थ से अविभक्त (अस्पष्ट) है, वह सुविज्ञेय (आसानी से समझने योग्य) ही है। သေခသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. शेख-सुत्त की वर्णना (व्याख्या) की लीनत्थप्पकासना (गूढ़ार्थ प्रकाशिनी टीका) समाप्त हुई। ၄. ပေါတလိယသုတ္တဝဏ္ဏနာ ४. पोतलिय-सुत्त की वर्णना (व्याख्या) ၃၁. အင်္ဂါ [Pg.20] နာမ ဇနပဒိနော ရာဇကုမာရာ, တေသံ နိဝါသော ဧကောပိ ဇနပဒေါ ရုဠှိဝသေန အင်္ဂါတွေဝ ဝုစ္စတီတိ အာဟ ‘‘အင်္ဂါယေဝ သော ဇနပဒေါ’’တိ. မဟိယာ ပနဿ ဥတ္တရေန ယာ အာပေါတိ မဟိယာ နဒိယာ ယာ အာပေါ တဿ ဇနပဒဿ ဥတ္တရေန ဟောန္တိ. တာသံ အဝိဒူရတ္တာ သော ဇနပဒေါ ဥတ္တရာပေါတိ ဝုစ္စတိ. သာ ပန မဟီ ကတ္ထစိ ကတ္ထစိ ဘိဇ္ဇိတွာ ဂတာတိ အာဟ ‘‘ကတရမဟိယာ ဥတ္တရေန ယာ အာပေါ’’တိ. တတ္ထာတိ တဿာ မဟိယာ အာဂမနတော ပဋ္ဌာယ အယံ အာဝိဘာဝကထာ. ယသ္မာ (အ. နိ. ဋီ. ၃.၈.၁၉) လောကိယာ ဇမ္ဗုဒီပေါ ဟိမဝါ တတ္ထ ပတိဋ္ဌိတသမုဒ္ဒဒဟပဗ္ဗတနဒိယောတိ ဧတေသု ယံ ယံ န မနုဿဂေါစရံ, တတ္ထ သယံ သမ္မူဠှာ အညေပိ သမ္မောဟယန္တိ, တတ္ထ တတ္ထ သမ္မောဟဝိဓမနတ္ထံ ‘‘အယံ ကိရ ဇမ္ဗုဒီပေါ’’တိအာဒိမာရဒ္ဓံ. ဒသသဟဿယောဇနပရိမာဏော အာယာမတော စ ဝိတ္ထာရတော စာတိ အဓိပ္ပာယော. တေနာဟ ‘‘တတ္ထာ’’တိအာဒိ. ဥဒကေန အဇ္ဈောတ္ထဋော တဒုပဘောဂိသတ္တာနံ ပုညက္ခယေန. ३१. 'अंग' नाम के जनपद के राजकुमार हैं, उनका निवास स्थान एक जनपद होने पर भी रूढ़ि के कारण 'अंग' ही कहा जाता है, इसीलिए कहा गया है - "वह जनपद अंग ही है"। "मही के उत्तर में जो जल है" का अर्थ है कि मही नदी का जो जल उस जनपद के उत्तर में है। उनके समीप होने के कारण वह जनपद 'उत्तराप' कहलाता है। वह मही नदी कहीं-कहीं विभाजित होकर बहती है, इसीलिए कहा गया है - "किस मही के उत्तर में जो जल है?"। "वहाँ" (तत्थ) का अर्थ है उस मही के उद्गम से लेकर यह स्पष्टीकरण कथा है। क्योंकि लौकिक जन जम्बुद्वीप, हिमवान और वहाँ स्थित समुद्र, दह (झील), पर्वत और नदियों के विषय में, जो-जो मनुष्यों की पहुँच से बाहर हैं, स्वयं भ्रमित होते हैं और दूसरों को भी भ्रमित करते हैं, उन-उन स्थानों पर भ्रम को दूर करने के लिए "यह जम्बुद्वीप है" आदि आरम्भ किया गया है। इसका अभिप्राय लंबाई और चौड़ाई में दस हजार योजन के परिमाण से है। इसीलिए "वहाँ" आदि कहा गया है। उन (वहाँ रहने वाले) प्राणियों के पुण्य के क्षय होने से वह जल से आच्छादित हो गया। သုန္ဒရဒဿနံ ကူဋန္တိ သုဒဿနကူဋံ, ယံ လောကေ ‘‘ဟေမကူဋ’’န္တိ ဝုစ္စတိ. မူလဂန္ဓော ကာဠာနုသာရိယာဒိ. သာရဂန္ဓော စန္ဒနာဒိ. ဖေဂ္ဂုဂန္ဓော သလလာဒိ. တစဂန္ဓော လဝင်္ဂါဒိ. ပပဋိကဂန္ဓော ကဗိတ္ထာဒိ. ရသဂန္ဓော သဇ္ဇာဒိ, ပတ္တဂန္ဓော တမာလဟိရိဝေရာဒိ. ပုပ္ဖဂန္ဓော နာဂကုင်္ကုမာဒိ. ဖလဂန္ဓော ဇာတိဖလာဒိ. ဂန္ဓဂန္ဓော သဗ္ဗေသံ ဂန္ဓာနံ ဂန္ဓော. ယဿ ဟိ ရုက္ခဿ သဗ္ဗေသမ္ပိ မူလာဒီနံ ဂန္ဓော အတ္ထိ, သော ဣဓ ဂန္ဓော နာမ. တဿ ဂန္ဓဿ ဂန္ဓော ဂန္ဓဂန္ဓော. သဗ္ဗာနိ ပုထုလတော ပညာသယောဇနာနိ, အာယာမတော ပန ဥဗ္ဗေဓတော ဝိယ ဒွိယောဇနသတာနေဝါတိ ဝဒန္တိ. "सुन्दर दर्शन वाला शिखर" सुदर्शन-कूट है, जिसे लोक में "हेमकूट" कहा जाता है। मूल-गंध (जड़ की सुगंध) कालागुरु आदि है। सार-गंध (सार भाग की सुगंध) चन्दन आदि है। फेग्गु-गंध (कच्ची लकड़ी की सुगंध) सरल (चीड़) आदि है। त्वचा-गंध (छाल की सुगंध) लौंग आदि है। पपटिका-गंध (पपड़ी की सुगंध) कपित्थ (कैथ) आदि है। रस-गंध (गोंद/रस की सुगंध) राल (सज्ज) आदि है। पत्र-गंध (पत्तों की सुगंध) तमाल, हीबेर (सुगंधबाला) आदि है। पुष्प-गंध नागकेसर, कुंकुम आदि है। फल-गंध जायफल आदि है। गंध-गंध सभी सुगंधों की सुगंध है। जिस वृक्ष में जड़ आदि सभी भागों की सुगंध होती है, उसे यहाँ 'गंध' कहा गया है। उस गंध की जो सुगंध है, वह 'गंध-गंध' है। वे सभी चौड़ाई में पचास योजन और लंबाई तथा ऊँचाई में दो सौ योजन के हैं, ऐसा कहते हैं। မနောဟရသိလာတလာနီတိ ဩတရဏတ္ထာယ မနုညသောပါနသိလာတလာနိ. သုပဋိယတ္တာနီတိ တဒုပဘောဂိသတ္တာနံ သာဓာရဏကမ္မာနုဘာဝေန သုဋ္ဌု ပဋိယတ္တာနိ သုပ္ပဝတ္တိတာနိ ဟောန္တိ. မစ္ဆကစ္ဆပါဒယော ဥဒကံ မလိနံ ကရောန္တိ, တဒဘာဝတော ဖလိကသဒိသနိမ္မလုဒကာနိ. တိရိယတော ဒီဃံ ဥဂ္ဂတကူဋန္တိ ‘‘တိရစ္ဆာနပဗ္ဗတ’’န္တိ အာဟ. "मनोहर शिलातल" का अर्थ है उतरने के लिए सुंदर सीढ़ीनुमा शिलातल। "सुसज्जित" (सुपटियत्तानि) का अर्थ है वहाँ उपभोग करने वाले प्राणियों के साधारण कर्मों के प्रभाव से भली-भाँति सज्जित और सुव्यवस्थित होते हैं। मछली, कछुए आदि जल को गंदा करते हैं, उनके अभाव के कारण स्फटिक के समान निर्मल जल वाले हैं। "तिरछा लंबा उठा हुआ शिखर" होने के कारण इसे "तिरच्छान पर्वत" कहा गया है। အာပဏာနိ [Pg.21] ဧဝ ဝေါဟာရဿ မုခဘူတာနီတိ အာဟ ‘‘အာပဏမုခသဟဿာနီ’’တိ. ဝိဘတ္တာနီတိ ဝဝတ္ထိတာနိ အညမညာသမ္ဘိန္နာနိ. ဝသနဋ္ဌာနန္တိ အတ္တနော ယထာဖာသုကံ ဝသိတဗ္ဗဋ္ဌာနံ. အာသတိ ဧတ္ထာတိ အာသနံ, နိသီဒိတဗ္ဗဋ္ဌာနာနိ. "दुकानें ही व्यापार का मुख्य द्वार हैं", इसीलिए "हजारों दुकान-मुख" कहा गया है। "विभक्त" का अर्थ है व्यवस्थित और एक-दूसरे से असम्बद्ध। "निवास स्थान" का अर्थ है अपनी सुविधानुसार रहने का स्थान। "जहाँ बैठते हैं" वह आसन है, अर्थात् बैठने के स्थान। အသာရုပ္ပံ ပဋိစ္စ ဥပ္ပဇ္ဇနကဿ ဆာဒနတော ဆန္နံ အနုစ္ဆဝိကံ, တဒေဝ အဇ္ဈာသယသမ္ပတ္တိံ ပတိရူပေတိ ပကာသေတီတိ ပတိရူပံ. တေနာဟ ‘‘နပ္ပတိရူပ’’န္တိ. ကာရဏဝေဝစနာနီတိ ဉာပကကာရဏဝေဝစနာနိ. ဉာပကဉှိ ကာရဏံ အဓိပ္ပေတံ. အတ္ထံ အာကရောတိ ပကာသေတီတိ အာကာရော, တမေဝ လီနံ ဂုဠှံ အတ္ထံ ဂမေတီတိ လိင်္ဂံ, သော တေန နိမီယတီတိ နိမိတ္တန္တိ ဝုစ္စတိ. ဣဒါနိ တမေဝတ္ထံ ဝိဝရိတုံ ‘‘ဒီဃဒသဝတ္ထ…ပေ… နိမိတ္တာတိ ဝုတ္တာ’’တိ အာဟ. တေတိ အာကာရာဒယော. တထာ ဟိ ပန မေတိအာဒိနာ ပေါတလိယော ဂဟပတိ ‘‘ပရိဗ္ဗာဇကနိယာမေန အဟံ ဇီဝါမိ, တသ္မာ ဂဟပတိ န ဟောမီတိ ဝဒတိ. ဩဝဒန္တောတိ အနုသာသန္တော. ဥပဝဒန္တောတိ ပရိဘာသန္တော. अयोग्यता के कारण उत्पन्न होने वाले (दोष) को ढकने के कारण 'छन्न' (प्रच्छन्न) अनुपयुक्त है, वही आशय की शुद्धि को 'प्रतिरूपित' (प्रकट) करता है, इसलिए 'प्रतिरूप' है। इसीलिए कहा गया है - "प्रतिरूप नहीं है"। "कारण के पर्यायवाची" का अर्थ है ज्ञापक कारण के पर्यायवाची। यहाँ ज्ञापक कारण ही अभिप्रेत है। जो अर्थ को 'आकरोति' (प्रकट) करता है वह 'आकार' है, वही जो लीन और गूढ़ अर्थ को 'गमेति' (बोध कराता) है वह 'लिंग' है, और जिससे वह मापा जाता है उसे 'निमित्त' कहा जाता है। अब उसी अर्थ को स्पष्ट करने के लिए "दीर्घदश वस्त्र... पे... निमित्त कहे गए हैं" कहा गया है। 'वे' का अर्थ आकार आदि है। जैसा कि "मेरे द्वारा" आदि शब्दों से पोतलिय गृहपति कहता है - "मैं परिव्राजक की रीति से जीता हूँ, इसलिए मैं गृहपति नहीं हूँ"। "ओवदन्तो" का अर्थ है उपदेश देते हुए। "उपवदन्तो" का अर्थ है निंदा करते हुए। ၃၂. ဂေဓဘူတော လောဘောတိ ဂိဇ္ဈနသဘာဝေါ လောဘော. အဂိဇ္ဈနလက္ခဏော န လောဘော, အနိန္ဒာဘူတံ အဃဋ္ဋနန္တိ နိန္ဒာယ ပဋိပက္ခဘူတံ ပရေသံ အဃဋ္ဋနံ. နိန္ဒာဃဋ္ဋနာတိ နိန္ဒာဝသေန ပရေသံ ဃဋ္ဋနာ အက္ကောသနာ. ဗျဝဟာရဝေါဟာရောပီတိ ကယဝိက္ကယလက္ခဏော သဗျောဟာရောပိ ဒါနဂ္ဂဟဏံ ဝေါဟာရော. ‘‘ဒတ္တော တိဿော’’ တိအာဒိနာ ဝေါဟရဏံ ပညာပနန္တိ ပညတ္တိ ဝေါဟာရော. ယထာဓိပ္ပေတဿ အတ္ထဿ ဝေါဟရဏံ ကထနံ ဗောဓနန္တိ ဝစနံ ဝေါဟာရော. ယာထာဝတော အယာထာဝတော စ ဝေါဟရတိ ဧတေနာတိ ဝေါဟာရော, စေတနာ. အယမိဓာဓိပ္ပေတောတိ အယံ စေတနာလက္ခဏော ဝေါဟာရော ဣဓ ဣမသ္မိံ အတ္ထေ အဓိပ္ပေတော, သော စ ခေါ သာဝဇ္ဇောဝ သမုစ္ဆေဒဿ ဣစ္ဆိတတ္တာ. ဣဒါနိ စတုဗ္ဗိဓဿပိ ဝေါဟာရဿ ဣဓ သမ္ဘဝံ ဒဿေတုံ ‘‘ယသ္မာ ဝါ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. ဂိဟီတိ စေတနာ နတ္ထီတိ အဟံ ဂိဟီတိ စေတနာပဝတ္တိ နတ္ထိ. ဂိဟီတိ ဝစနံ နတ္ထီတိ ဂိဟီတိ အတ္တနော ပရေသဉ္စ ဝစနပ္ပဝတ္တိ နတ္ထိ. ဂိဟီတိ ပဏ္ဏတ္တိ နတ္ထီတိ ဂိဟီတိ သမညာ နတ္ထိ. ဂိဟီတိ ဗျဝဟာရော နတ္ထီတိ သမုဒါစာရော နတ္ထိ. ३२. "गृद्ध-भूत लोभ" का अर्थ है आसक्त होने के स्वभाव वाला लोभ। "न लोभ" का लक्षण अनासक्ति है। "अनिंदा-भूत अघट्टन" का अर्थ है निंदा के विपरीत दूसरों को ठेस न पहुँचाना। "निंदा-घट्टना" का अर्थ है निंदा के द्वारा दूसरों को प्रताड़ित करना या गाली देना। "व्यवहार-वोहार" (व्यापारिक व्यवहार) का अर्थ है क्रय-विक्रय रूपी व्यवहार और दान-ग्रहण रूपी व्यवहार। "दत्त, तिस्स" आदि के द्वारा व्यवहार करना या प्रज्ञप्त करना 'प्रज्ञप्ति व्यवहार' है। अभिप्रेत अर्थ का व्यवहार करना, कहना या बोध कराना 'वचन व्यवहार' है। जिसके द्वारा यथार्थ या अयथार्थ का व्यवहार किया जाता है, वह 'व्यवहार' (वोहार) चेतना है। "यह यहाँ अभिप्रेत है" का अर्थ है कि यह चेतना-लक्षण वाला व्यवहार यहाँ इस अर्थ में अभिप्रेत है, और वह सावद्य (दोषयुक्त) ही है क्योंकि उसके उच्छेद की इच्छा की गई है। अब चारों प्रकार के व्यवहारों की यहाँ संभावना दिखाने के लिए "अथवा जिससे" आदि कहा गया है। "गृहस्थ है ऐसी चेतना नहीं है" का अर्थ है कि 'मैं गृहस्थ हूँ' ऐसी चेतना की प्रवृत्ति नहीं है। "गृहस्थ है ऐसा वचन नहीं है" का अर्थ है कि 'गृहस्थ' ऐसा अपने या दूसरों के लिए वचन की प्रवृत्ति नहीं है। "गृहस्थ है ऐसी प्रज्ञप्ति नहीं है" का अर्थ है कि 'गृहस्थ' ऐसी संज्ञा नहीं है। "गृहस्थ है ऐसा व्यवहार नहीं है" का अर्थ है कि वैसा आचरण नहीं है। ၃၃. ပါဏာတိပါတောဝ သံယောဇနံ. ကသ္မာ? ဗန္ဓနဘာဝေန ပဝတ္တနတော နိဿရိတုံ အပ္ပဒါနတော. ပါဏာတိပါတဿ အတ္ထိတာယ သော ပုဂ္ဂလော [Pg.22] ‘‘ပါဏာတိပါတီ’’တိ ဝုစ္စတီတိ အာဟ – ‘‘ပါဏာတိပါတဿ…ပေ… ဟောတီ’’တိ. ယဉှိ ယဿ အတ္ထိ, တေန သော အပဒိဿတီတိ. ဗဟုတာယာတိ အစက္ခုကာဒိဘေဒေန ဗဟုဘာဝတော. ပါဏာတိပါတဿ ပဋိပက္ခော အပါဏာတိပါတော. သော ပန အတ္ထတော ကာယဒွါရိကော သီလသံဝရောတိ အာဟ ‘‘ကာယိကသီလသံဝရေနာ’’တိ. အတ္တာပိ မံ ဥပဝဒေယျာတိအာဒိ ပါဏာတိပါတေ အာဒီနဝဒဿနံ. အာဒီနဝဒဿိနော ဟိ တတော ဩရမဏံ. ဒေသနာဝသေနာတိ အညတ္ထ သုတ္တေ အဘိဓမ္မေ စ ဒသသု သံယောဇနေသု ပဉ္စသု နီဝရဏေသု ဒေသနာဝသေန အပရိယာပန္နမ္ပိ သံယောဇနန္တိပိ နီဝရဏန္တိပိ ဣဓ ဝုတ္တံ. ကသ္မာ? တဒတ္ထသမ္ဘဝတော. တေနာဟ – ‘‘ဝဋ္ဋဗန္ဓနဋ္ဌေန ဟိတပ္ပဋိစ္ဆာဒနဋ္ဌေန စာ’’တိ, ပါဏာတိပါတော ဟိ အပါဏာတိပါတပစ္စယံ ဟိတံ ပဋိစ္ဆာဒေန္တောဝ ဥပ္ပဇ္ဇတီတိ. ဧကော အဝိဇ္ဇာသဝေါတိ ဣဒံ သဟဇာတဝသေန ဝုတ္တံ, ဥပနိဿယဝသေန ပန ဣတရေသမ္ပိ အာသဝါနံ ယထာရဟံ သမ္ဘဝေါ ဝေဒိတဗ္ဗော. ပါဏာတိပါတီ ဟိ ပုဂ္ဂလော ‘‘တပ္ပစ္စယံ အတ္ထံ ကရိဿာမီ’’တိ ကာမေ ပတ္ထေတိ. ဒိဋ္ဌိံ ဂဏှာတိ, ဘဝဝိသေသံ ပစ္စာသီသတိ. တတ္ထ ဥပ္ပန္နံ ဝိဟနတိ ဗာဓတီတိ ဝိဃာတော, ဒုက္ခံ, ပရိဠာဟနံ အနတ္ထုပ္ပာဒဝသေန ဥပတာပနံ ပရိဠာဟော, အယမေတေသံ ဝိသေသော. သဗ္ဗတ္ထာတိ သဗ္ဗေသု ဝါရေသု. ဣမိနာ ဥပါယေနာတိ အတိဒေသေန ပန ပရိဂ္ဂဟိတော အတ္ထော ပရတော အာဂမိဿတီတိ. ३३. प्राणातिपात ही संयोजन है। क्यों? बंधन के रूप में प्रवृत्त होने और (संसार से) निकलने का अवसर न देने के कारण। प्राणातिपात के होने से वह पुद्गल 'प्राणातिपाती' कहा जाता है - ऐसा कहा गया है - 'प्राणातिपात का... पे... होता है'। जिसके पास जो होता है, वह उसी से निर्दिष्ट किया जाता है। 'बहुताया' का अर्थ है चक्षुहीनता आदि के भेद से बहुत होने के कारण। प्राणातिपात का प्रतिपक्ष अप्राणातिपात है। वह वास्तव में काय-द्वार का शील-संवर है, इसलिए कहा - 'कायिक शील-संवर के द्वारा'। 'स्वयं भी मेरी निंदा करेगा' आदि प्राणातिपात में दोष-दर्शन है। दोष देखने वाले ही उससे विरत होते हैं। 'देशना के वश से' का अर्थ है कि अन्यत्र सूत्रों और अभिधर्म में दस संयोजनों और पाँच नीवरणों में देशना के वश से जो अपरियापन्न (अशामिल) है, उसे भी यहाँ संयोजन और नीवरण कहा गया है। क्यों? उसके अर्थ की संभावना होने के कारण। इसीलिए कहा - 'वट-बंधन के अर्थ में और हित को ढकने के अर्थ में', क्योंकि प्राणातिपात अप्राणातिपात-प्रत्यय रूपी हित को ढकते हुए ही उत्पन्न होता है। 'एक अविद्यासव' यह सहजात के वश से कहा गया है, उपनिश्रय के वश से अन्य आस्रवों की भी यथासंभव उत्पत्ति समझनी चाहिए। प्राणातिपाती पुद्गल 'उसके प्रत्यय से अर्थ सिद्ध करूँगा' इस प्रकार काम की इच्छा करता है। दृष्टि ग्रहण करता है, भव-विशेष की आशा करता है। वहाँ उत्पन्न (दुःख) को नष्ट करता है, बाधा पहुँचाता है, इसलिए 'विघात' है; दुःख है; अनर्थ की उत्पत्ति के कारण तपाने वाला 'परिलाह' (दाह) है, यह इनमें विशेष है। 'सर्वत्र' का अर्थ है सभी वारों (अवसरों) में। 'इस उपाय से' का अर्थ है अतिदेश (विस्तार) के द्वारा गृहीत अर्थ आगे आएगा। ၃၄-၄၀. ဣမသ္မိံ ပဒေတိ ဧတေန သတ္တသုပိ ဝါရေသု တထာ အာဂတံ ပဒံ သာမညတော ဂဟိတံ. တေနာဟ ‘‘ဣမိနာ’’တိအာဒိ. ရောသနံ ကာယိကံ ဝါစသိကဉ္စာတိ တပ္ပဋိပက္ခော အရောသောပိ တထာ ဒုဝိဓောတိ အာဟ ‘‘ကာယိကဝါစသိကသံဝရေနာ’’တိ. ယထာ အဘိဇ္ဈာ လောဘော, အနဘိဇ္ဈာ အလောဘော, ဧဝံ အကောဓူပါယာသော အဗျာပါဒေါ, သံဝရေ သုခန္တိ သံဝရောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော, အနတိလောဘော ပန သတိသံဝရေ, အနတိမာနော ဉာဏသံဝရေ သင်္ဂဟံ ဂစ္ဆတီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ဣမေသု ပန ပဒေသု ဧဝံ သဗ္ဗဝါရေသု ယောဇနာ ကာတဗ္ဗာတိ သမ္ဗန္ဓော. ३४-४०. 'इस पद में' इसके द्वारा सातों वारों में उसी प्रकार आए हुए पद को सामान्य रूप से ग्रहण किया गया है। इसीलिए कहा 'इससे' आदि। 'रोषण' (क्रोध) कायिक और वाचसिक है, उसका प्रतिपक्ष 'अरोषण' भी उसी प्रकार दो प्रकार का है, इसलिए कहा 'कायिक और वाचसिक संवर के द्वारा'। जैसे अभिध्या लोभ है, अनभिध्या अलोभ है, वैसे ही अक्रोध और अनूपायास अव्यापाद हैं; संवर में सुख है, इसलिए 'संवर' समझना चाहिए; 'अनतिलोभ' स्मृति-संवर में और 'अनतिमान' ज्ञान-संवर में संगृहीत होता है, ऐसा समझना चाहिए। इन पदों में इस प्रकार सभी वारों में योजना करनी चाहिए - यह संबंध है। ဧဝံ အာသဝုပ္ပတ္တိ ဝေဒိတဗ္ဗာတိ ဧတ္ထ ဝုတ္တဿပိ ဧကဇ္ဈံ ဝုစ္စမာနတ္တာ ‘‘ပုန အယံ သင်္ခေပဝိနိစ္ဆယော’’တိ ဝုတ္တံ. အသမ္မောဟတ္ထံ အာရမ္မဏဿ. ပုရိမေသု တာဝ စတူသု ဝါရေသု ဝိရမိတုံ န သက္ကောမီတိ ဝတ္တဗ္ဗံ. ‘‘အတ္တာပိ မံ ဥပဝဒေယျာ’’တိ ဧတဿ ပဒဿ အတ္ထဝဏ္ဏနာယံ ‘‘န သက္ကောမီ’’တိ, ‘‘အနုဝိဇ္ဇာပိ မံ ဝိညူ ဂရဟေယျု’’န္တိ ဧတဿ ပဒဿ အတ္ထဝဏ္ဏနာယံ ‘‘န သက္ကောတီ’’တိ [Pg.23] ဝတ္တဗ္ဗံ, ဣမိနာ နယေန ပစ္ဆိမေသုပိ စတူသု ယထာရဟံ ယောဇနာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. အတိမာနေ ဘဝါသဝအဝိဇ္ဇာသဝါတိ ဝုတ္တံ မာနေန သဟ ဒိဋ္ဌိယာ အနုပ္ပဇ္ဇနတော, အတိမာနော ပန ကာမရာဂေနပိ ဥပ္ပဇ္ဇတေဝါတိ ‘‘အတိမာနေ ကာမာသဝအဝိဇ္ဇာသဝါ’’တိ ဝတ္တဗ္ဗံ သိယာ, သွာယံ နယော ဝုတ္တနယတ္တာ သုဝိညေယျောတိ န ဒဿိတော. ပါတိမောက္ခသံဝရသီလံ ကထိတံ အာဒိတော စတူဟိ ဆဋ္ဌေန ဝါတိ ပဉ္စဟိ ဝါရေဟိ, သေသေဟိ တီဟိ ပါတိမောက္ခသံဝရသီလေ ဌိတဿ ဘိက္ခုနော ပဋိသင်္ခါပဟာနံ, သဗ္ဗေဟိပိ ပန ဘိက္ခုဘာဝေ ဌိတဿ ဂိဟိဝေါဟာရသမုစ္ဆေဒေါ ကထိတော. တတ္ထ သဗ္ဗတ္ထ ဝတ္တံ ‘‘ဣဒဉ္စိဒဉ္စ မယှံ ကာတုံ နပ္ပတိရူပ’’န္တိ ပဋိသင်္ခါနဝသေန အကရဏံ ပဇဟနဉ္စ ပဋိသင်္ခါပဟာနံ. 'इस प्रकार आस्रवों की उत्पत्ति समझनी चाहिए' यहाँ जो कहा गया है उसे एक साथ कहे जाने के कारण 'पुनः यह संक्षेप-विनिश्चय है' ऐसा कहा गया है। आलम्बन के असंमोह (मोह-रहित होने) के लिए। पहले के चार वारों में 'मैं विरत होने में समर्थ नहीं हूँ' ऐसा कहना चाहिए। 'स्वयं भी मेरी निंदा करेगा' इस पद की अर्थ-व्याख्या में 'समर्थ नहीं हूँ', 'विज्ञ जन भी मेरी निंदा करेंगे' इस पद की अर्थ-व्याख्या में 'समर्थ नहीं है' ऐसा कहना चाहिए; इस नय (विधि) से बाद के चार वारों में भी यथायोग्य योजना समझनी चाहिए। 'अतिमान' में भवास्रव और अविद्यास्रव कहे गए हैं क्योंकि मान के साथ दृष्टि उत्पन्न नहीं होती, किंतु अतिमान कामराग के साथ भी उत्पन्न होता ही है, इसलिए 'अतिमान में कामास्रव और अविद्यास्रव' कहना चाहिए, वह यह नय (विधि) पहले कहे जाने के कारण सुविज्ञ है, इसलिए नहीं दिखाया गया। पातिमोक्ख-संवर शील आदि के चार या छठे अथवा पाँच वारों से कहा गया है, शेष तीन वारों से पातिमोक्ख-संवर शील में स्थित भिक्षु के 'प्रतिसंख्यान-प्रहाण' (सोच-समझकर त्यागना) को कहा गया है, किंतु सभी के द्वारा भिक्षु-भाव में स्थित (व्यक्ति) के गृहस्थ-व्यवहार के उच्छेद को कहा गया है। वहाँ सर्वत्र 'यह और यह मेरे लिए करना उचित नहीं है' इस प्रकार प्रतिसंख्यान (विचार) के वश से न करना और त्यागना 'प्रतिसंख्यान-प्रहाण' है। ကာမာဒီနဝကထာဝဏ္ဏနာ कामादीनव-कथा-वर्णना (काम-भोगों के दोषों के वर्णन की व्याख्या) ၄၂. ဥပသုမ္ဘေယျာတိ ဧတ္ထ ဥပ-သဒ္ဒေါ သမီပတ္ထော, သုမ္ဘနံ ဝိက္ခေပနံ. တေနေဝ တမေနန္တိ ဘုမ္မတ္ထေ ဥပယောဂဝစနန္တိ အာဟ – ‘‘တဿ သမီပေ ခိပေယျာ’’တိ, တဿ ကုက္ကုရဿ သမီပေ အဋ္ဌိကင်္ကလံ ခိပေယျာတိ အတ္ထော. နိမ္မံသတ္တာ ကင်္ကလန္တိ ဝုစ္စတီတိ ဣမိနာ ဝိဂတမံသာယ အဋ္ဌိကင်္ကလိကာယ ဥရဋ္ဌိမှိ ဝါ ပိဋ္ဌိကဏ္ဋကေ ဝါ သီသဋ္ဌိမှိ ဝါ ကင်္ကလ-သဒ္ဒေါ နိရုဠှောတိ ဒဿေတိ. သုနိက္ကန္တန္တိ နိလ္လိခိတံ ကတွာဝ နိဗ္ဗိသေသံ လိခိတံ. ४२. 'उपसुम्भेय्य' यहाँ 'उप' शब्द समीप के अर्थ में है, 'सुम्भन' का अर्थ विक्षेपण (फेंकना) है। इसीलिए 'तमेनं' (उसको) यहाँ द्वितीया विभक्ति सप्तमी के अर्थ में है, इसलिए कहा - 'उसके समीप फेंके', उस कुत्ते के समीप अस्थि-पंजर फेंके - यह अर्थ है। मांस-रहित होने के कारण 'कंकाल' कहा जाता है - इसके द्वारा मांस-रहित अस्थि-पंजर के वक्ष-अस्थि या रीढ़ की हड्डी या सिर की हड्डी में 'कंकाल' शब्द रूढ़ है, यह दिखाया गया है। 'सुनिक्कन्तं' का अर्थ है अच्छी तरह खुरच कर बिना कुछ छोड़े साफ किया हुआ। ဧကတ္တုပဋ္ဌာနဿ အဇ္ဈုပေက္ခနဝသေန ပဝတ္တိယာ ဧကတ္တာ. တေနာဟ ‘‘စတုတ္ထဈာနုပေက္ခာ’’တိ. ယသ္မာ ပနဿ အာရမ္မဏမ္ပိ ဧကသဘာဝမေဝ, တသ္မာ အာဟ ‘‘သာ ဟီ’’တိအာဒိ. လောကာမိသသင်္ခါတာတိ အပရိညာတဝတ္ထုနာ လောကေန အာမသိတဗ္ဗတော, လောကေ ဝါ အာမိသောတိ သင်္ခံ ဂတာယ ဝသေန ကာမဂုဏာနံ ကာမဘာဝေါ စ အာမိသဘာဝေါ စ, သော ဧဝ နိပ္ပရိယာယတော အာမိသန္တိ ဝတ္တဗ္ဗတံ အရဟတိ. ကာမဂုဏာမိသာတိ ကာမဂုဏေ ဆန္ဒရာဂါ. ဂဟဏဋ္ဌေန ဘုသံ အာဒါနဋ္ဌေန. एकत्व-उपस्थान (एकाग्रता) की उपेक्षा के वश से प्रवृत्त होने के कारण 'एकत्व' है। इसीलिए कहा 'चतुर्थ ध्यान की उपेक्षा'। क्योंकि इसका आलम्बन भी एक ही स्वभाव वाला है, इसलिए कहा 'वह ही' आदि। 'लोकामिस' (लोक-आमिष) कहे जाने का कारण यह है कि अपरिज्ञात वस्तु वाले लोक के द्वारा इसका आस्वादन किया जाता है, अथवा लोक में जो आमिष (भोग) के रूप में प्रसिद्ध है, उसके वश से काम-गुणों का काम-भाव और आमिष-भाव ही मुख्य रूप से 'आमिष' कहे जाने के योग्य है। 'कामगुण-आमिष' का अर्थ है काम-गुणों में छंद-राग। 'ग्रहण' के अर्थ में 'भृश' (अत्यधिक) और 'आदान' (पकड़ने) के अर्थ में। ၄၃. ဍယနံ အာကာသေန ဂမနန္တိ အာဟ ‘‘ဥပ္ပတိတွာ ဂစ္ဆေယျာ’’တိ. ဂိဇ္ဈာဒီနံ ဝါသိဖရသု န ဟောတီတိ အာဟ – ‘‘မုခတုဏ္ဍကေန ဍသန္တာ တစ္ဆေယျု’’န္တိ. ဝိဿဇ္ဇေယျုန္တိ ဧတ္ထ ‘‘ဝိဿဇ္ဇန’’န္တိ အာကဍ္ဎနံ အဓိပ္ပေတံ အနေကတ္ထတ္တာ ဓာတူနံ, အာကဍ္ဎနဉ္စ အနုဗန္ဓိတွာ ပါတနန္တိ အာဟ ‘‘မံသပေသိံ နခေဟိ ကဍ္ဎိတွာ ပါတေယျု’’န္တိ. ४३. 'डयन' का अर्थ आकाश में गमन है, इसलिए कहा 'उड़कर जाए'। गीध आदि के पास बसूला या कुल्हाड़ी नहीं होती, इसलिए कहा - 'चोंच से काटते हुए छीलें'। 'विस्सज्जेय्युं' यहाँ 'विस्सज्जन' का अर्थ खींचना (आकर्षण) अभिप्रेत है क्योंकि धातुओं के अनेक अर्थ होते हैं, और खींचकर पीछे पड़कर गिराना, इसलिए कहा 'मांस-पेशी को नखों से खींचकर गिरा दें'। ၄၇. ပုရိသဿ [Pg.24] အာရောဟနယောဂျံ ပေါရိသေယျံ. ४७. मनुष्य के चढ़ने योग्य 'पौरिषेय' है। ၄၈. သမ္ပန္နံ သုန္ဒရံ ဖလမဿာတိ သမ္ပန္နဖလံ. ဖလူပပန္နန္တိ ဖလေဟိ ဥပေတန္တိ အာဟ ‘‘ဗဟုဖလ’’န္တိ. ४८. जिसके फल संपन्न और सुंदर हों, वह 'संपन्नफल' है। 'फलोपपन्न' का अर्थ फलों से युक्त है, इसलिए कहा 'बहुफल' (बहुत फलों वाला)। ၅၀. သုဝိဒူရဝိဒူရေတိ အရိယဿ ဝိနယေ ဝေါဟာရသမုစ္ဆေဒတော သုဋ္ဌု ဝိဒူရဘူတေ ဧဝ ဝိဒူရေ အဟံ ဌိတော. ကဿစိ နာမ အတ္ထဿပိ အဇာနနတော န အာဇာနန္တီတိ အနာဇာနီယာတိ ကတ္တုသာဓနမဿ ဒဿေန္တော အဇာနနကေတိ အဇာနန္တဘောဇနသီသေန တေသံ ဒါတဗ္ဗပစ္စယေ ဝဒတိ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. ५०. "सुविदूरविदूरे" का अर्थ है कि आर्य के विनय में व्यवहार के उच्छेद (समाप्ति) से जो अत्यंत दूर हो गया है, उसी दूर में मैं स्थित हूँ। किसी भी अर्थ को न जानने के कारण 'नहीं जानते' इस अर्थ में 'अनाजानीय'—यह इसका कर्तृ-साधन दिखाते हुए 'अजाननके' (न जानने वाले) पद से, न जानने वालों के भोजन के संदर्भ में उन्हें दिए जाने वाले प्रत्ययों (आवश्यकताओं) के बारे में कहते हैं। शेष सुविज्ञेय (आसानी से समझने योग्य) ही है। ပေါတလိယသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. पोतलिय सुत्त की वर्णना (व्याख्या) की लीनत्थप्पकासना (गूढ़ार्थ प्रकाशिनी टीका) समाप्त हुई। ၅. ဇီဝကသုတ္တဝဏ္ဏနာ ५. जीवक सुत्त की वर्णना (व्याख्या)। ၅၁. ကုမာရေန ဘတော ပေါသာပိတောတိ ကုမာရဘတော, ကုမာရဘတော ဧဝ ကောမာရဘစ္စော ယထာ ‘‘ဘိသက္ကမေဝ ဘေသဇ္ဇ’’န္တိ. ५१. कुमार द्वारा भरण-पोषण (पालित) किया गया, इसलिए 'कुमारभत' है; 'कुमारभत' ही 'कोमारभच्च' है, जैसे 'भिसक्क' (वैद्य) ही 'भेसज्ज' (भेषज/औषधि) है। အာရဘန္တီတိ ဧတ္ထ အာရဘ-သဒ္ဒေါ ကာမံ ကာမာယူဟနယညုဋ္ဌာပနအာပတ္တိအာပဇ္ဇနဝိညာပနာဒီသုပိ အာဂတော, ဣဓ ပန ဟိံသနေ ဣစ္ဆိတဗ္ဗောတိ အာဟ – ‘‘အာရဘန္တီတိ ဃာတေန္တီ’’တိ. ဥဒ္ဒိသိတွာ ကတန္တိ (အ. နိ. ဋီ. ၃.၈.၁၂; သာရတ္ထ. ဋီ. မဟာဝဂ္ဂ ၃.၂၉၄) အတ္တာနံ ဥဒ္ဒိသိတွာ မာရဏဝသေန ကတံ နိဗ္ဗတ္တိတံ. ပဋိစ္စကမ္မန္တိ ဧတ္ထ ကမ္မ-သဒ္ဒေါ ကမ္မသာဓနော အတီတကာလိကောတိ အာဟ – ‘‘အတ္တာနံ ပဋိစ္စ ကတ’’န္တိ. နိမိတ္တကမ္မဿေတံ အဓိဝစနံ ‘‘ပဋိစ္စ ကမ္မံ ဖုသတီ’’တိအာဒီသု (ဇာ. ၁.၄.၇၅) ဝိယ. နိမိတ္တကမ္မဿာတိ နိမိတ္တဘာဝေန လဒ္ဓဗ္ဗကမ္မဿ, န ကရဏကာရာပနဝသေန. ပဋိစ္စကမ္မံ ဧတ္ထ အတ္ထီတိ မံသံ ပဋိစ္စကမ္မံ ယထာ ‘‘ဗုဒ္ဓံ ဧတဿ အတ္ထီတိ ဗုဒ္ဓေါ’’တိ. တေသန္တိ နိဂဏ္ဌာနံ. အညေပိ ဗြာဟ္မဏာဒယော တံလဒ္ဓိကာ အတ္ထေဝ. 'आरभन्ति' यहाँ 'आरभ' शब्द यद्यपि कामना, कर्मों के संचय, यज्ञ के उत्थान, आपत्ति की प्राप्ति, विज्ञापना आदि अर्थों में भी आता है, किन्तु यहाँ हिंसा के अर्थ में अभीष्ट है, इसलिए कहा— 'आरभन्ति' अर्थात् 'मारते हैं'। 'उद्दिसित्वा कतं' का अर्थ है—अपने को उद्देश्य करके (लक्ष्य बनाकर) मारने के द्वारा किया गया या निष्पन्न किया गया। 'पटिच्चकम्मं' यहाँ 'कम्म' शब्द कर्म-साधन और अतीतकालिक है, इसलिए कहा— 'अपने प्रति (अपने कारण) किया गया'। यह 'निमित्तकम्म' का पर्यायवाची है, जैसे 'पटिच्च कम्मं फुसति' आदि में। 'निमित्तकम्मस्स' का अर्थ है—निमित्त भाव से प्राप्त होने योग्य कर्म का, न कि करने या कराने के वश से। 'पटिच्चकम्म' यहाँ है, इसलिए वह मांस 'पटिच्चकम्म' है, जैसे 'बुद्ध (ज्ञान) इसके पास है, इसलिए वह बुद्ध है'। 'तेसं' अर्थात् उन निग्रन्थों का। अन्य ब्राह्मण आदि भी उस मत वाले हैं ही। ကာရဏန္တိ ဧတ္ထ ယုတ္တိ အဓိပ္ပေတာ, သာ ဧဝ စ ဓမ္မတော အနပေတတ္တာ ‘‘ဓမ္မော’’တိ ဝုတ္တာတိ အာဟ – ‘‘ကာရဏံ နာမ တိကောဋိပရိသုဒ္ဓမစ္ဆမံသပရိဘောဂေါ’’တိ. အနုကာရဏံ နာမ မဟာဇနဿ တထာ ဗျာကရဏံ ယုတ္တိယာ ဓမ္မဿ အနုရူပဘာဝတော မံသံ ပရိဘုဉ္ဇိတဗ္ဗန္တိ အနုညာတံ တထေဝ ကထနန္တိ ကတွာ. တန္တိ ‘‘ဇာနံ ဥဒ္ဒိဿကတံ မံသံ ပရိဘုဉ္ဇတီ’’တိ ဧဝံ ဝုတ္တံ ပရိဘုဉ္ဇနံ နေဝ ကာရဏံ ဟောတိ [Pg.25] သဗ္ဗေန သဗ္ဗံ အဘာဝတော သတိ စ အယုတ္တိယံ အဓမ္မောတိ ကတွာ. တထာ ဗျာကရဏန္တိ ‘‘ဇာနံ ဥဒ္ဒိဿကတံ မံသံ ပရိဘုဉ္ဇတီ’’တိ ကထနံ ယုတ္တိယာ ဓမ္မဿ အနနုရူပဘာဝတော န အနုကာရဏံ ဟောတိ. ပရေဟိ ဝုတ္တကာရဏေန သကာရဏော ဟုတွာတိ ပရေ တိတ္ထိယာ ‘ဇာန’န္တိအာဒိနာ ဓမ္မံ ကထေန္တိ ဝဒန္တိ, တေန ကာရဏဘူတေန သကာရဏော ဟုတွာ. တေဟိ တထာ ဝတ္တဗ္ဗော ဧဝ ဟုတွာ တုမှာကံ ဝါဒေါ ဝါ အနုဝါဒေါ ဝါ ‘‘မံသံ ပရိဘုဉ္ဇိတဗ္ဗ’’န္တိ ပဝတ္တာ တုမှာကံ ကထာ ဝါ ပရတော ပရေဟိ တထာ ပဝတ္တိတာ တဿာ အနုကထာ ဝါ. ဝိညူဟိ ဂရဟိတဗ္ဗကာရဏန္တိ တိတ္ထိယာ တာဝ တိဋ္ဌန္တု, တတော အညေဟိ ပဏ္ဍိတေဟိ ဂရဟိတဗ္ဗကာရဏံ. ကောစိ န အာဂစ္ဆတီတိ ဂရဟိတဗ္ဗတံ န အာပဇ္ဇတီတိ အတ္ထော. အဘိဘဝိတွာ အာစိက္ခန္တီတိ အဘိဘုယျ မဒ္ဒိတွာ ကထေန္တိ, အဘိဘူတေန အက္ကောသန္တီတိ အတ္ထော. 'कारण' यहाँ युक्ति अभिप्रेत है, और वह धर्म से अलग न होने के कारण 'धम्म' कही गई है, इसलिए कहा— 'कारण नाम त्रिकोटि-परिशुद्ध मछली और मांस का परिभोग है'। 'अनुकारण' का अर्थ है—महाजनों को वैसा ही बताना, युक्ति और धर्म के अनुरूप होने से 'मांस का परिभोग करना चाहिए'—ऐसी अनुज्ञा के अनुसार ही कहना। 'तं' अर्थात् 'जानते हुए उद्देश्य करके बनाए गए मांस का परिभोग करता है'—इस प्रकार कहा गया परिभोग कभी कारण नहीं होता, क्योंकि वह सर्वथा अभाव रूप है और अयुक्तिसंगत होने पर अधर्म है। 'तथा व्याकारण' अर्थात् 'जानते हुए उद्देश्य करके बनाए गए मांस का परिभोग करता है'—यह कथन युक्ति और धर्म के अनुरूप न होने से 'अनुकारण' नहीं है। 'दूसरों द्वारा कहे गए कारण से सकारण होकर' अर्थात् दूसरे तीर्थिक 'जानते हुए' आदि के द्वारा धर्म कहते हैं, उस कारणभूत वचन से सकारण होकर। उनके द्वारा वैसा ही कहे जाने योग्य होकर आपका 'वाद' या 'अनुवाद' अथवा 'मांस का परिभोग करना चाहिए'—इस प्रकार चली आपकी कथा, या बाद में दूसरों द्वारा वैसी ही चलाई गई उसकी 'अनुकथा'। 'विज्ञों द्वारा निन्दनीय कारण' अर्थात् तीर्थिक तो दूर रहें, उनके अतिरिक्त अन्य पण्डितों द्वारा निन्दनीय कारण। 'कोई नहीं आता' का अर्थ है—निन्दनीयता को प्राप्त नहीं होता। 'अभिभूत करके कहते हैं' का अर्थ है—अभिभूत कर, कुचल कर कहते हैं; अभिभूत व्यक्ति द्वारा आक्रोश (गाली) देना इसका अर्थ है। ၅၂. ကာရဏေဟီတိ ပရိဘောဂစိတ္တဿ အဝိသုဒ္ဓတာဟေတူဟိ. ဘိက္ခူ ဥဒ္ဒိဿကတံ ဒိဋ္ဌံ. တာဒိသမံသဉှိ ပရိဘောဂါနာရဟတ္တာ စိတ္တအဝိသုဒ္ဓိယာ ကာရဏံ စိတ္တသံကိလေသာဝဟတော. ဣဒါနိ ဒိဋ္ဌသုတပရိသင်္ကိတာနိ သရူပတော ဒဿေတုံ ‘‘ဒိဋ္ဌာဒီသူ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. တတ္ထ တဒုဘယဝိမုတ္တပရိသင်္ကိတန္တိ ‘‘ဒိဋ္ဌံ သုတ’’န္တိ ဣမံ ဥဘယံ အနိဿာယ – ‘‘ကိံ နု ခေါ ဣမံ ဘိက္ခုံ ဥဒ္ဒိဿ ဝဓိတွာ သမ္ပာဒိတ’’န္တိ ကေဝလမေဝ ပရိသင်္ကိတံ. သဗ္ဗသင်္ဂါဟကောတိ သဗ္ဗေသံ တိဏ္ဏံ ပရိသင်္ကိတာနံ သင်္ဂဏှနကော. ५२. 'कारणों से' अर्थात् परिभोग-चित्त की अविशुद्धि के हेतुओं से। भिक्षुओं को उद्देश्य करके बनाया गया 'देखा' गया। वैसा मांस परिभोग के अयोग्य होने से चित्त की अविशुद्धि का कारण है, क्योंकि वह चित्त के संक्लेश (मैल) को लाने वाला है। अब 'दृष्ट, श्रुत और परिशंकित' को उनके स्वरूप में दिखाने के लिए 'दिट्ठादीसु' आदि कहा गया है। वहाँ 'तदुभयविमुक्त-परिशंकित' का अर्थ है—'देखा' और 'सुना' इन दोनों का सहारा लिए बिना—'क्या यह इस भिक्षु को उद्देश्य करके मारकर तैयार किया गया है?'—इस प्रकार केवल आशंका करना। 'सबका संग्रह करने वाला' अर्थात् सभी तीनों प्रकार की आशंकाओं का संग्रह करने वाला। မင်္ဂလာဒီနန္တိ အာဒိ-သဒ္ဒေန အာဟုနပါဟုနာဒိကံ သင်္ဂဏှာတိ. နိဗ္ဗေမတိကာ ဟောန္တီတိ သဗ္ဗေန သဗ္ဗံ ပရိသင်္ကိတာဘာဝမာဟ. ဣတရေသန္တိ အဇာနန္တာနံ ဝဋ္ဋတိ, ဇာနတော ဧဝေတ္ထ အာပတ္တိ ဟောတိ. တေယေဝါတိ ယေ ဥဒ္ဒိဿ ကတံ, တေယေဝ. 'मंगलादीनं' यहाँ 'आदि' शब्द से आहुन-पाहुन (अतिथि सत्कार) आदि का संग्रह होता है। 'निब्बेमतिका होन्ति' का अर्थ है—पूरी तरह से आशंका का अभाव होना। 'इतरेसं' अर्थात् न जानने वालों के लिए कल्प्य (उचित) है, जानने वाले को ही यहाँ आपत्ति होती है। 'तेयेव' अर्थात् जिन्हें उद्देश्य करके बनाया गया है, वे ही। ဥဒ္ဒိဿကတမံသပရိဘောဂတော အကပ္ပိယမံသပရိဘောဂဿ ဝိသေသံ ဒဿေတုံ ‘‘အကပ္ပိယမံသံ ပနာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. ပုရိမသ္မိံ သစိတ္တကာ အာပတ္တိ, ဣတရသ္မိံ အစိတ္တကာ. တေနာဟ – ‘‘အကပ္ပိယမံသံ အဇာနိတွာ ဘုတ္တဿပိ အာပတ္တိယေဝါ’’တိ. ပရိဘောဂန္တိ ပရိဘုဉ္ဇိတဗ္ဗန္တိ ဝဒါမီတိ အတ္ထော. उद्देश्य करके बनाए गए मांस के परिभोग से अकल्प्य (अखाद्य) मांस के परिभोग का विशेष अंतर दिखाने के लिए 'अकप्पियमांसं पना' आदि कहा गया है। पहले (उद्देश्यकृत) में सचित्तक (जानबूझकर की गई) आपत्ति है, दूसरे में अचित्तक (बिना जाने भी होने वाली) आपत्ति है। इसीलिए कहा— 'अकल्प्य मांस को बिना जाने खाने वाले को भी आपत्ति ही होती है'। 'परिभोगं' का अर्थ है—परिभोग करना चाहिए, ऐसा मैं कहता हूँ। ၅၃. တာဒိသဿာတိ တိကောဋိပရိသုဒ္ဓဿ မစ္ဆမံသဿ ပရိဘောဂေ. မေတ္တာဝိဟာရိနောပီတိ အပိ-သဒ္ဒေန အမေတ္တာဝိဟာရိနောပိ. မေတ္တာဝိဟာရိနော ပရိဘောဂေ သိခါပ္ပတ္တာ အနဝဇ္ဇတာတိ ဒဿေတုံ ‘‘ဣဓ, ဇီဝက, ဘိက္ခူ’’တိအာဒိ [Pg.26] ဝုတ္တံ. အနိယမေတွာတိ အဝိသေသေတွာ သာမညတော. ယသ္မာ ဘဂဝတာ – ‘‘ယတော ခေါ, ဝစ္ဆ, ဘိက္ခုနော တဏှာ ပဟီနာ ဟောတီ’’တိအာဒိနာ မဟာဝစ္ဆဂေါတ္တသုတ္တေ (မ. နိ. ၂.၁၉၄) အတ္တာ အနိယမေတွာ ဝုတ္တော. တထာ ဟိ ဝစ္ဆဂေါတ္တော – ‘‘တိဋ္ဌတု ဘဝံ ဂေါတမော, အတ္ထိ ပန ဘောတော ဂေါတမဿ ဧကဘိက္ခုပိ သာဝကော အာသဝါနံ ခယာ…ပေ… ဥပသမ္ပဇ္ဇ ဝိဟရတီ’’တိ အာဟ, ‘‘ဣဓ, ဘာရဒွါဇ, ဘိက္ခု အညတရံ ဂါမံ ဝါ နိဂမံ ဝါ ဥပနိဿာယ ဝိဟရတီ’’တိအာဒိနာ စင်္ကီသုတ္တေ (မ. နိ. ၂.၄၃၀) အတ္တာ အနိယမေတွာ ဝုတ္တော. တထာ ဟိ တတ္ထ ပရတော – ‘‘ယံ ခေါ ပန အယမာယသ္မာ ဓမ္မံ ဒေသေတိ, ဂမ္ဘီရော သော ဓမ္မော ဒုဒ္ဒသော ဒုရနုဗောဓော သန္တော ပဏီတော အတက္ကာဝစရော နိပုဏော ပဏ္ဍိတဝေဒနီယော, န သော ဓမ္မော သုဒေသနီယော လုဒ္ဒေနာ’’တိအာဒိနာ ဒေသနာ အာဂတာ, တသ္မာ ဝုတ္တံ ‘‘ဘဂဝတာ ဟိ မဟာဝစ္ဆဂေါတ္တသုတ္တေ, စင်္ကီသုတ္တေ ဣမသ္မိံ သုတ္တေတိ တီသု ဌာနေသု အတ္တာနံယေဝ သန္ဓာယ ဒေသနာ ကတာ’’တိ. မံသူပသေစနောဝ အဓိပ္ပေတော မစ္ဆမံသသဟိတဿ အာဟာရဿ ပရိဘောဂဘာဝတော မစ္ဆမံသဿ စ ဣဓ အဓိပ္ပေတတ္တာ. ५३. ‘तादिसस्स’ (उस प्रकार के) का अर्थ है तीन कोटियों से शुद्ध मछली और मांस के उपभोग में। ‘मेत्ताविहारिनोपि’ (मैत्री विहार करने वाले का भी) में ‘अपि’ शब्द से जो मैत्री विहार नहीं करते हैं, उनका भी ग्रहण होता है। मैत्री विहार करने वाले के उपभोग में निर्दोषता की पराकाष्ठा दिखाने के लिए ‘इध, जीवक, भिक्खू’ (यहाँ, जीवक, भिक्षु) आदि कहा गया है। ‘अनियमेत्वा’ का अर्थ है बिना विशेष किए, सामान्य रूप से। क्योंकि भगवान ने महावच्छगोत्त सुत्त (म.नि. २.१९४) में ‘यतो खो, वच्छ, भिक्खुनो तण्हा पहीना होति’ (जब, वच्छ, भिक्षु की तृष्णा क्षीण हो जाती है) आदि के द्वारा स्वयं को बिना नियम के (सामान्य रूप से) कहा है। जैसा कि वच्छगोत्त ने कहा— ‘भवन्त गोतम रहने दें, क्या भवन्त गोतम का एक भी भिक्षु श्रावक है जो आस्रवों के क्षय से... उपसम्पन्न होकर विहार करता है?’ इसी प्रकार चङ्की सुत्त (म.नि. २.४३०) में ‘इध, भारद्वाज, भिक्खु अञ्ञतरं गामं वा निगमं वा उपनिस्साय विहरति’ (यहाँ, भारद्वाज, भिक्षु किसी गाँव या कस्बे के आश्रय में विहार करता है) आदि के द्वारा स्वयं को बिना नियम के कहा गया है। क्योंकि वहाँ आगे— ‘यह आयुष्मान जो धर्म उपदेशित करते हैं, वह धर्म गम्भीर है, दुर्दर्श है, दुरनुबोध है, शान्त है, प्रणीत है, अतर्कावचर है, निपुण है, पण्डितवेदनीय है, वह धर्म लुब्ध (क्रूर) व्यक्ति द्वारा अच्छी तरह उपदेशित नहीं किया जा सकता’ आदि के द्वारा देशना आई है, इसलिए कहा गया है कि ‘भगवान ने महावच्छगोत्त सुत्त, चङ्की सुत्त और इस सुत्त—इन तीन स्थानों पर स्वयं को ही लक्ष्य करके देशना की है’। यहाँ मांस का बघार (मांसूपसेचन) ही अभिप्रेत है, क्योंकि मछली और मांस सहित आहार का उपभोग होता है और यहाँ मछली और मांस ही अभिप्रेत है। အဂထိတော အပ္ပဋိဗဒ္ဓေါ. တဏှာမုစ္ဆနာယာတိ တဏှာယနဝသေန မုစ္ဆာပတ္တိယာ. အနဇ္ဈောပန္နော တဏှာယ အဘိဘဝိတွာ န အဇ္ဈောတ္ထဋော, ဂိလိတွာ ပရိနိဋ္ဌပေတွာ န သဏ္ဌိတောတိ အတ္ထော. တေနာဟ – ‘‘သဗ္ဗံ အာလုမ္ပိတွာ’’တိအာဒိ. ဣဓ အာဒီနဝေါ အာဟာရဿ ပဋိကူလဘာဝေါတိ အာဟ ‘‘ဧကရတ္တိဝါသေနာ’’တိအာဒိ. အယမတ္ထော အာဟာရပရိဘောဂေါတိ အတ္ထသံယောဇနပရိစ္ဆေဒိကာ ‘‘ယာဝဒေဝ ဣမဿ ကာယဿ ဌိတိယာ’’တိအာဒိနာ (ဒီ. နိ. ၃.၁၈၂; မ. နိ. ၁.၂၃; ၂.၂၄; ၃.၇၅; သံ. နိ. ၄.၁၂၀) ပဝတ္တာ အာဟာရပဋိဗဒ္ဓဆန္ဒရာဂနိဿရဏဘူတာ ပညာ အဿ အတ္ထီတိ နိဿရဏပညော. ဣဒမတ္ထန္တိ ဧတမတ္ထာယ. ဧဝံ သန္တေတိ ‘‘ဗြဟ္မာတိ စ မေတ္တာဝိဟာရိနော သမညာ’’တိ အဝတွာ ယေ ဓမ္မာ မေတ္တာဝိဟာရဿ ပဋိပက္ခဘူတာ, တတ္ထ သာဝသေသံ ပဟာသိ ဗြဟ္မာ, အနဝသေသံ ပဟာသိ ဘဂဝါတိ သစေ တေ ဣဒံ သန္ဓာယ ဘာသိတံ, ဧဝံ သန္တေ တဝ ဣဒံ ယထာဝုတ္တဝစနံ အနုဇာနာမိ, န မေတ္တာဝိဟာရိတာသာမညမတ္တတောတိ အတ္ထော. ‘अगथितो’ का अर्थ है आसक्त न होना (अप्रतिबद्ध)। ‘तण्हामुच्छनाया’ का अर्थ है तृष्णा के वश में होकर मूर्च्छा को प्राप्त होना। ‘अनज्झोपन्नो’ का अर्थ है तृष्णा द्वारा अभिभूत होकर दबा हुआ नहीं, निगलकर और समाप्त करके स्थित नहीं, यह अर्थ है। इसीलिए कहा गया— ‘सब्बं आलुम्पित्वा’ (सब कुछ ग्रास बनाकर) आदि। यहाँ आहार की प्रतिकूलता ही दोष है, इसलिए ‘एकरत्तिवासेन’ (एक रात के निवास से) आदि कहा गया है। यह अर्थ आहार-परिभोग है, इस प्रकार अर्थ-संयोजन को परिच्छेदित करने वाली ‘यावदेव इमस्स कायस्स ठितिया’ (केवल इस शरीर की स्थिति के लिए) आदि के द्वारा प्रवृत्त, आहार से सम्बद्ध छन्द-राग के निस्सरण रूप प्रज्ञा जिसकी है, वह ‘निस्सरणपञ्ञो’ (निस्सरण-प्रज्ञ) है। ‘इदमत्थं’ का अर्थ है इस प्रयोजन के लिए। ‘एवं सन्ते’ का अर्थ है— ‘ब्रह्मा और मैत्री-विहार करने वाले की संज्ञा’ ऐसा न कहकर, जो धर्म मैत्री-विहार के प्रतिपक्ष हैं, उनमें ब्रह्मा ने अवशेष के साथ प्रहाण किया और भगवान ने निरवशेष प्रहाण किया, यदि तुमने इसे लक्ष्य करके कहा है, तो ऐसी स्थिति में मैं तुम्हारे इस यथोक्त वचन को स्वीकार करता हूँ, न कि केवल मैत्री-विहार की सामान्यता मात्र से, यह अर्थ है। ၅၅. ‘‘ပါဋိယေက္ကော [Pg.27] အနုသန္ဓီ’’တိ ဝတွာ ဝိသုံ အနုသန္ဓိဘာဝံ ဒဿေတုံ ‘‘ဣမသ္မိံ ဟီ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. ဒွါရံ ထကေတီတိ မစ္ဆမံသပရိဘောဂါနုညာယ အညေသံ ဝစနဒွါရံ ပိဒဟတိ, စောဒနာပထံ နိရုန္ဓတိ. ကထံ သတ္တာနုဒ္ဒယံ ဒဿေတိ? သတ္တာနုဒ္ဒယမုခေန ဗာဟိရကာနံ မစ္ဆမံသပရိဘောဂပဋိက္ခေပေါ တယိဒံ မိစ္ဆာ, တိကောဋိပရိသုဒ္ဓဿေဝ မစ္ဆမံသဿ ပရိဘောဂေါ ဘဂဝတာ အနုညာတော. တထာ ဟိ ဝုတ္တံ – ‘တီဟိ ခေါ အဟံ, ဇီဝက, ဌာနေဟိ မံသံ ပရိဘောဂန္တိ ဝဒါမီ’တိအာဒိ (မ. နိ. ၂.၅၂). ဝိနယေပိ (ပါရာ. ၄၀၉; စူဠဝ. ၃၄၃) ဝုတ္တံ – ‘‘တိကောဋိပရိသုဒ္ဓံ, ဒေဝဒတ္တ, မစ္ဆမံသံ မယာ အနုညာတ’’န္တိ. တိကောဋိပရိသုဒ္ဓဉ္စ ဘုဉ္ဇန္တာနံ သတ္တေသု အနုဒ္ဒယာ နိစ္စလာ. ‘‘သတ္တာနုဒ္ဒယံ ဒဿေတီ’’တိ သင်္ခေပတော ဝုတ္တမတ္ထံ ဝိဝရန္တော ‘‘သစေ ဟီ’’တိအာဒိမာဟ. ५५. ‘पाटियेक्को अनुसन्धी’ (पृथक अनुसन्धि) कहकर अलग अनुसन्धि भाव दिखाने के लिए ‘इमस्मिं ही’ आदि कहा गया है। ‘द्वारं थकेति’ का अर्थ है मछली और मांस के उपभोग की अनुमति देकर दूसरों के वचन-द्वार को बंद करता है, दोषारोपण के मार्ग को रोकता है। प्राणियों के प्रति दया कैसे दिखाता है? प्राणियों के प्रति दया के बहाने बाह्य लोगों द्वारा मछली और मांस के उपभोग का निषेध करना मिथ्या है, भगवान द्वारा केवल तीन कोटियों से शुद्ध मछली और मांस के उपभोग की अनुमति दी गई है। जैसा कि कहा गया है— ‘जीवक, मैं तीन कारणों से मांस को उपभोग योग्य कहता हूँ’ आदि (म.नि. २.५२)। विनय में भी कहा गया है— ‘देवदत्त, मेरे द्वारा तीन कोटियों से शुद्ध मछली और मांस की अनुमति दी गई है’। और तीन कोटियों से शुद्ध (मांस) खाने वालों की प्राणियों के प्रति दया निश्चल रहती है। ‘सत्तानद्दुयं दस्सेति’ (प्राणियों के प्रति दया दिखाता है) इस संक्षेप में कहे गए अर्थ का विवरण देते हुए ‘सचे ही’ आदि कहा गया है। ပဌမေန ကာရဏေနာတိ ဒေသနာဝသေနပိ ပယောဂဝသေနပိ ပဌမေန ပရူပဃာတဟေတုနာ. ကဍ္ဎိတော သော ပါဏော. ဂလေန ပဝေဓေန္တေနာတိ ယောတ္တဂလေန ကရဏေန အသယှမာနေန. ဗဟုပုညမေဝ ဟောတိ အာသာဒနာပေက္ခာယ အဘာဝတော, ဟိတဇ္ဈာသယတ္တာ ဝါတိ အဓိပ္ပာယော. ဧသာဟံ, ဘန္တေတိအာဒိ ကသ္မာ ဝုတ္တံ, သရဏဂမနဝသေနေဝ ဂဟိတသရဏောတိ စောဒနံ သန္ဓာယာဟ ‘‘အယ’’န္တိအာဒိ. ဩဂါဟန္တောတိအာဒိတော ပဋ္ဌာယ ယာဝ ပရိယောသာနာ သုတ္တံ အနုဿရန္တော အတ္ထံ ဥပဓာရေန္တော. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. ‘पठमेन कारणेन’ (पहले कारण से) का अर्थ है देशना के वश से भी और प्रयोग के वश से भी, दूसरों को घात पहुँचाने के पहले कारण से। वह प्राणी खींचा गया। ‘गलेन पवेधेन्तेन’ का अर्थ है गले के फंदे (जोत) के कारण असह्य वेदना से कांपते हुए। आस्वादन की अपेक्षा के अभाव के कारण और हित की भावना होने के कारण बहुत पुण्य ही होता है, यह अभिप्राय है। ‘एसाहं, भन्ते’ आदि क्यों कहा गया? शरण गमन के द्वारा ही शरण ग्रहण किया है, इस आक्षेप को लक्ष्य करके ‘अयं’ आदि कहा गया है। ‘ओगाहन्तो’ आदि से लेकर समाप्ति तक सुत्त का स्मरण करते हुए अर्थ का अवधारण करते हुए। शेष सुविज्ञेय (आसानी से समझने योग्य) ही है। ဇီဝကသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. जीवक सुत्त की व्याख्या में लीनत्थप्पकासना (गूढ़ अर्थ का प्रकाशन) समाप्त हुई। ၆. ဥပါလိသုတ္တဝဏ္ဏနာ ६. उपालि सुत्त की व्याख्या ၅၆. ပါဝါရံ ပါရုပတီတိ ပါဝါရိကော, ဣဒံ တဿ ကုလသမုဒါဂတံ နာမံ, သော ပန မဟဒ္ဓနော မဟာဘောဂေါ နဂရေ သေဋ္ဌိဋ္ဌာနေ ဌိတော. တေနာဟ ‘‘ဒုဿပါဝါရိကသေဋ္ဌိနော’’တိ. ဒီဃတ္တာ ဒီဃတမတ္တာ. သော ကိရ ပမာဏတော ဥပဝစ္ဆယတော ဒိယဍ္ဎရတနံ အတိက္ကမ္မ ဌိတော. ဧဝံလဒ္ဓနာမောတိ ‘‘ဒီဃတပဿီ’’တိ လဒ္ဓသမညော. ဗာဟိရာယတနေတိ တိတ္ထိယသမယေ ပိဏ္ဍပါတောတိ ဝေါဟာရော နတ္ထိ, တသ္မာ သာသနဝေါဟာရေန ‘‘ပိဏ္ဍပါတပ္ပဋိက္ကန္တော’’တိ ဝုတ္တန္တိ အဓိပ္ပာယော. ५६. ‘पावारं पारुपति’ (प्रावार ओढ़ता है) इसलिए ‘पावारिको’ (प्रावारिक), यह उसका कुल-परम्परा से आया नाम है, वह महाधनी और महाभोगी था और नगर में श्रेष्ठी के पद पर स्थित था। इसीलिए ‘दुस्सपावारिकसेट्ठिनो’ (वस्त्र-प्रावारिक श्रेष्ठी का) कहा गया है। ‘दीघत्ता’ का अर्थ है बहुत लम्बा होने के कारण। वह प्रमाण में ऊँचाई में डेढ़ रत्न (हाथ) से अधिक ऊँचा था। इस प्रकार नाम प्राप्त करने वाला ‘दीघतपस्सी’ (दीर्घ तपस्वी) नाम से प्रसिद्ध हुआ। ‘बाहिरायतने’ (बाह्य आयतन में) अर्थात् तीर्थिकों के समय में ‘पिण्डपात’ शब्द का व्यवहार नहीं था, इसलिए शासन (बुद्ध शासन) के व्यवहार के अनुसार ‘पिण्डपातप्पटिक्कन्तो’ (पिण्डपात से लौटा हुआ) कहा गया है, यह अभिप्राय है। ဒဿေတီတိ [Pg.28] ဒေသေတိ. ဌပေတီတိ အညမညသင်္ကရတော ဝဝတ္ထပေတိ. ကိရိယာယာတိ ကရဏေန. ပဝတ္တိယာတိ ပဝတ္တနေန. ဒဏ္ဍာနိ ပညပေတီတိ ဧတ္ထ ကသ္မာ ဘဂဝတာ အာဒိတောဝ တထာ န ပုစ္ဆိတန္တိ? ယသ္မာ သာ တသ္မိံ အတ္ထေ သဘာဝနိရုတ္တိ န ဟောတိ, သာသနေ လောကေ သမယန္တရေသု စ တာဒိသော သမုဒါစာရော နတ္ထိ, ကေဝလံ ပန တဿေဝ နိဂဏ္ဌဿာယံ ကောဋ္ဌာလကသဒိသော သမုဒါစာရောတိ ဣမမတ္ထံ ဒဿေတုံ ‘‘ကမ္မာနိ ပညပေတိ’’ ဣစ္စေဝါဟ. အစိတ္တကန္တိ စိတ္တရဟိတံ, စိတ္တေန အသမုဋ္ဌာပိတန္တိ အတ္ထော. ကထံ ပန တဒုဘယဿ စိတ္တေန ဝိနာ သမ္ဘဝေါတိ စောဒနံ သန္ဓာယ တတ္ထ နိဒဿနမာဟ ‘‘ယထာ ကိရာ’’တိအာဒိ. ပဋိဝိဘတ္တာနန္တိ အတ္ထတော ဘိန္နာနံ. ပဋိဝိသိဋ္ဌာနန္တိ ဝိသေသနပဒဝသေန သဒ္ဒတောပိ ဘိန္နာနံ. ဝစနံ ပတိဋ္ဌပေတုကာမောတိ ဒီဃတပဿိနော ယထာဝုတ္တဝစနံ ပတိဋ္ဌပေတုကာမော. တသ္မိဉှိ ပတိဋ္ဌာပိတေ တေနပ္ပသင်္ဂေန အာဂတော, ဥပါလိ ဂဟပတိ တသ္မိံ ပဒေသေ ဓမ္မံ ဒိသွာ သာသနေ အဘိပ္ပသီဒိဿတိ. 'दस्सेति' (दिखाता है) का अर्थ है 'देसेति' (उपदेश देता है)। 'ठपेति' (स्थापित करता है) का अर्थ है एक-दूसरे के मिश्रण से अलग करके व्यवस्थित करना। 'किरियाय' का अर्थ है 'करण' (करने) से। 'पवत्तिया' का अर्थ है 'प्रवर्तन' (प्रवृत्त करने) से। 'दण्डानि पञ्ञापेति' (दण्डों को प्रज्ञप्त करता है) - यहाँ भगवान ने शुरू से ही वैसा क्यों नहीं पूछा? क्योंकि उस अर्थ में वह स्वाभाविक निरुक्ति (परिभाषा) नहीं है, शासन में, लोक में और अन्य मतों में वैसा व्यवहार नहीं है, केवल उस निगण्ठ का ही यह कोठालक (अनाज के कोठार) जैसा व्यवहार है - इस अर्थ को दिखाने के लिए 'कम्मानि पञ्ञापेति' (कर्मों को प्रज्ञप्त करता है) ऐसा ही कहा। 'अचित्तकं' का अर्थ है चित्त-रहित, चित्त से उत्पन्न न किया गया। उन दोनों का चित्त के बिना संभव कैसे है - इस आक्षेप को ध्यान में रखकर वहाँ उदाहरण कहते हैं 'यथा किरा' इत्यादि। 'पटिविभत्तानं' का अर्थ है अर्थ से भिन्न। 'पटिविसिट्ठानं' का अर्थ है विशेषण पदों के कारण शब्द से भी भिन्न। 'वचनं पतिट्ठापेतुकामो' का अर्थ है दीघतपस्वी के यथोक्त वचन को स्थापित करने की इच्छा रखने वाला। उसके स्थापित हो जाने पर, उस प्रसंग से आए हुए उपालि गृहपति उस स्थान पर धर्म को देखकर शासन में अत्यधिक प्रसन्न होंगे। ကထာ ဧဝ ဥပရိ ဝါဒါရောပနဿ ဝတ္ထုဘာဝတော ကထာဝတ္ထု. ကထာယံ ပတိဋ္ဌပေသီတိ ကထာဝတ္ထုသ္မိံ, တဒတ္ထေ ဝါ ပတိဋ္ဌပေသိ. ယထာ တံ ဝါဒါရောပနဘယေန န အဝဇာနာတိ, ဧဝံ တဿံ ကထာယံ, တသ္မိံ ဝါ အတ္ထေ ဒီဃတပဿိံ ယာဝတတိယံ ဝါဒေ ပတိဋ္ဌပေသိ. ဝါဒန္တိ ဒေါသံ. कथा ही आगे वाद (आरोप) का आधार होने के कारण 'कथावस्तु' है। 'कथायं पतिट्ठापेसि' का अर्थ है कथावस्तु में, या उस अर्थ में स्थापित किया। जैसे वह वाद-आरोपण के भय से इनकार न करे, इस प्रकार उस कथा में, या उस अर्थ में दीघतपस्वी को तीन बार तक वाद में स्थापित किया। 'वादं' का अर्थ है दोष। ၅၇. ဣဒါနိ စေတနာသမ္ပယုတ္တဓမ္မမ္ပိ ဂဟေတွာ ကာယကမ္မာဒိဝသေန သင်္ဂဟေတွာ ဒဿေတုံ ‘‘အပိစာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. တတ္ထ တိဝိဓံ ကာယဒုစ္စရိတံ ကာယကမ္မံ နာမာတိအာဒိ ‘‘ကမ္မဿ ကိရိယာယာ’’တိ ပါဠိယံ အကုသလကမ္မဿ အဓိဂတတ္တာ ဝုတ္တံ, ပုဗ္ဗေ ပန အဋ္ဌကာမာဝစရကုသလစေတနာတိအာဒိ သာဝဇ္ဇံ အနဝဇ္ဇဉ္စ သာမညတော ဧကဇ္ဈံ ကတွာ ဒဿိတံ. ကသ္မာ ပနေတ္ထ စေတနာ န ဂဟိတာတိ အာဟ ‘‘ဣမသ္မိံ သုတ္တေ ကမ္မံ ဓုရ’’န္တိ. ကာယကမ္မာဒိဘေဒံ ကမ္မမေဝ ဓုရံ ဇေဋ္ဌကံ ပုဗ္ဗင်္ဂမံ, န စေတနာမတ္တမေဝ. ဧဝမာဂတေပီတိ ကမ္မာနီတိ ဧဝံ နာမေန အာဂတေပိ စေတနာ ဓုရံ, တတ္ထ စေတနံ ဇေဋ္ဌကံ ပုဗ္ဗင်္ဂမံ ကတွာ ဝုတ္တန္တိ အဓိပ္ပာယော. ကထံ ပန တတ္ထ ကမ္မန္တိ ဝါ ကမ္မာနီတိ ဝါ အာဂတေ တေသံ စေတနာယ ဓုရဘာဝေါတိ အာဟ ‘‘ယတ္ထ ကတ္ထစိ…ပေ… လဘတီ’’တိ. တတ္ထ ယတ္ထ ကတ္ထစီတိ ယသ္မိံ ကိသ္မိဉ္စိ ဒွါရေ. သာ ဝုတ္တာဝါတိ သာ စေတနာ ဝုတ္တာဝ, ယာ ကာယသင်္ခါရာဒိပရိယာယေန (ယဿ ကဿစိ ကမ္မဿ ကာယဒွါရာဒီသု ပဝတ္တာပနစေတနာ) သမ္ပယုတ္တဓမ္မာပိ [Pg.29] တဒဂ္ဂေန လောကိယာပိ လောကုတ္တရာပိ ကမ္မမေဝ, အဘိဇ္ဈာဒယော ပန စေတနာပက္ခိကာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ५७. अब चेतना-संप्रयुक्त धर्मों को भी लेकर कायकर्म आदि के रूप में संग्रह करके दिखाने के लिए 'अपि च' इत्यादि कहा गया है। वहाँ 'तीन प्रकार का काय-दुश्चरित कायकर्म है' इत्यादि 'कम्मस्स किरियाय' इस पालि में अकुशल कर्म के प्राप्त होने के कारण कहा गया है, किन्तु पहले 'आठ कामावचर कुशल चेतनाएँ' इत्यादि सावद्य (दोषपूर्ण) और अनवद्य (दोषरहित) को सामान्य रूप से एक साथ करके दिखाया गया है। यहाँ चेतना क्यों नहीं ग्रहण की गई? तो कहा - 'इस सूत्र में कर्म मुख्य (धुर) है'। कायकर्म आदि के भेद वाला कर्म ही मुख्य, ज्येष्ठ और पूर्वगामी है, न कि केवल चेतना मात्र। 'एवमागतेपि' का अर्थ है 'कर्म' इस नाम से आने पर भी चेतना मुख्य है, वहाँ चेतना को ज्येष्ठ और पूर्वगामी बनाकर कहा गया है - यह अभिप्राय है। किन्तु वहाँ 'कर्म' या 'कर्मों' के आने पर उनमें चेतना की मुख्यता कैसे है? तो कहा - 'जहाँ कहीं भी... पे... प्राप्त होता है'। वहाँ 'जहाँ कहीं भी' का अर्थ है जिस किसी द्वार में। 'वह कही ही गई है' का अर्थ है वह चेतना कही ही गई है, जो काय-संस्कार आदि के पर्याय से (जिस किसी कर्म की काय-द्वार आदि में प्रवृत्त करने वाली चेतना है) संप्रयुक्त धर्म भी उसकी प्रधानता से लौकिक भी और लोकोत्तर भी कर्म ही हैं, किन्तु अभिध्या आदि चेतना के पक्ष के हैं - ऐसा समझना चाहिए। မဟန္တန္တိ ကဋုကဖလံ. န ကိလမတိ သပ္ပာဋိဟာရိယတ္တာ ပဋိညာယ. ဣဒါနိ တေသံ သပ္ပာဋိဟာရိယတံ ဒဿေတုံ ‘‘တထာ ဟီ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. ယဒိ အကုသလံ ပတွာ ကာယကမ္မံ ဝစီကမ္မံ မဟန္တန္တိ ဝဒန္တော န ကိလမတိ, အထ ကသ္မာ ဘဂဝါ ဣဓ အကုသလံ မနောကမ္မံ မဟာသာဝဇ္ဇံ ကထေသီတိ အာဟ ‘‘ဣမသ္မိံ ပန ဌာနေ’’တိအာဒိ. ယာဝတတိယံ ပတိဋ္ဌာပနမတ္တေန ဂတမဂ္ဂံ ပဋိပဇ္ဇန္တော. တေနာဟ ‘‘ကိဉ္စိ အတ္ထနိပ္ဖတ္တိံ အပဿန္တောပီ’’တိ. 'महन्तं' का अर्थ है कड़वे फल वाला। प्रतिज्ञा के सप्रातिहार्य (प्रभावशाली) होने के कारण वह थकता नहीं है। अब उनकी सप्रातिहार्यता दिखाने के लिए 'तथा हि' इत्यादि कहा गया है। यदि अकुशल को प्राप्त कर कायकर्म और वचीकर्म को 'महान' कहते हुए वह थकता नहीं है, तो फिर भगवान ने यहाँ अकुशल मनोकर्म को 'महासावद्य' (बड़ा दोषपूर्ण) क्यों कहा? तो कहा - 'इस स्थान पर' इत्यादि। तीन बार तक स्थापित करने मात्र से गए हुए मार्ग पर चलने वाला। इसीलिए कहा - 'किसी अर्थ की निष्पत्ति न देखते हुए भी'। ၅၈. နိဝါသဋ္ဌာနဘူတော ဗာလကော ဧတိဿာ အတ္ထီတိ ဗာလကိနီ. သတ္ထုပဋိညာတတာယ နိဂဏ္ဌာနံ မဟာတိ သမ္ဘာဝိတတ္တာ မဟာနိဂဏ္ဌော. ५८. निवास स्थान रूप बालक (गाँव) जिसका है, वह 'बालकिनी' है। शास्ता के रूप में प्रतिज्ञात होने के कारण निगण्ठों में 'महान' के रूप में सम्मानित होने के कारण 'महा-निगण्ठ' है। ၆၀. အာဝဋ္ဋေတိ ပုရိမာကာရတော နိဝတ္တေတိ အတ္တနော ဝသေ ဝတ္တေတိ ဧတာယာတိ အာဝဋ္ဋနီ, မာယာ. တေနာဟ ‘‘အာဝဋ္ဋေတွာ ဂဟဏမာယ’’န္တိ. သတ္ထုပဋိညာနံ ဗုဒ္ဓဒဿနေ စိတ္တမေဝ န ဥပ္ပဇ္ဇတိ, အယမေတ္ထ ဓမ္မတာ. သစေ ပန သော တံ ပဋိညံ အပ္ပဟာယ ဗုဒ္ဓါနံ သမ္မုခီဘာဝံ ဥပဂစ္ဆေယျ, သတ္တဓာ မုဒ္ဓါ ဖလေယျ, တသ္မာ ဘဂဝါ ‘‘မာ အယံ ဗာလော ဝိနဿီ’’တိအာဒိတောဝ ယထာ သမ္မုခီဘာဝံ န လဘတိ, တထာ ကရောတိ. သွာယမတ္ထော ပါထိကပုတ္တသမာဂမေန ဒီပေတဗ္ဗော. ဒဿနသမ္ပတ္တိနိယာမမာဟ ‘‘တထာဂတံ ဟီ’’တိအာဒိ. အာဂမာ နု ခေါ ဣဓ တုမှာကံ သန္တိကံ. ६०. 'आवट्ठेति' (घुमाता है) - पहले के आकार से हटाता है, इसके द्वारा अपने वश में करता है, इसलिए 'आवट्ठनी' (आवर्तिनी) माया है। इसीलिए कहा - 'घुमाकर पकड़ने की माया'। शास्ता होने की प्रतिज्ञा करने वालों का बुद्ध के दर्शन में चित्त ही उत्पन्न नहीं होता, यह यहाँ की धर्मता (नियम) है। यदि वह उस प्रतिज्ञा को छोड़े बिना बुद्धों के सम्मुख आता, तो उसका सिर सात टुकड़ों में फट जाता, इसलिए भगवान 'यह मूर्ख नष्ट न हो जाए' - इस कारण शुरू से ही ऐसा करते हैं कि वह सम्मुख न आ सके। यह अर्थ पाथिकपुत्त के समागम से स्पष्ट किया जाना चाहिए। दर्शन-संपत्ति के नियम को कहते हैं 'तथागतं हि' इत्यादि। क्या वह यहाँ तुम्हारे पास आया? ၆၁. ဝစီသစ္စေ ပတိဋ္ဌဟိတွာတိ ယထာပဋိညာတာယ ပဋိညာယ ဌတွာ. ६१. 'वचीसच्चे पतिट्ठाहित्वा' का अर्थ है जैसी प्रतिज्ञा की थी, उस प्रतिज्ञा पर टिके रहकर। ၆၂. သီတောဒကေ အမတာ ပါဏာ ပါနကာလေ ပန မရန္တိ, တေပိ တေန သီတောဒကပရိဘောဂေန မာရိတာ ဟောန္တိ, တသ္မာ တပဿိနာ နာမ သဗ္ဗေန သဗ္ဗံ သီတောဒကံ န ပရိဘုဉ္ဇိတဗ္ဗန္တိ တေသံ လဒ္ဓိ. ပါကတိကံ ဝါ ဥဒကံ သတ္တောတိ ပုရာတနာနံ နိဂဏ္ဌာနံ လဒ္ဓိ. တေနာဟ ‘‘သတ္တသညာယ သီတောဒကံ ပဋိက္ခိပန္တီ’’တိ. တေသံ တံ အဓုနာတနနိဂဏ္ဌာနံ ဝါဒေန ဝိရုဇ္ဈတိ. တေ ဟိ ပထဝီအာဒိနဝပဒတ္ထတော အညမေဝ ဇီဝိတံ ပဋိဇာနန္တိ. စိတ္တေန သီတောဒကံ ပါတုကာမော ပရိဘုဉ္ဇိတုကာမော ဟောတိ ရောဂေ ဌတွာပိ သတ္တာနံ စိတ္တဿ တထာ န ဝိတတတာ. တေနာဟ – ‘‘တေနဿ မနောဒဏ္ဍော တတ္ထေဝ ဘိဇ္ဇတီ’’တိ. တေနာတိ သီတောဒကံ ပါတုံ ပရိဘုဉ္ဇိတုဉ္စ ဣစ္ဆနေန. အဿာတိ ယထာဝုတ္တဿ နိဂဏ္ဌဿ. တတ္ထေဝါတိ တထာစိတ္တုပ္ပာဒနေ ဧဝ. ဘိဇ္ဇတိ သံဝရဿ ဝိကောပိတတ္တာ. တထာဘူတော သော နိဂဏ္ဌော သီတောဒကံ [Pg.30] စေ လဘေယျ, ကတိပယံ ကာလံ ဇီဝေယျ, အလာဘေန ပန ပရိသုဿမာနကဏ္ဌောဋ္ဌတာလုဇိဝှာအာဒိကော သဗ္ဗသော ပရိဒါဟာဘိဘူတော မရေယျ. တေနာဟ – ‘‘သီတောဒကံ အလဘမာနော ကာလံ ကရေယျာ’’တိ. ကသ္မာ? ယသ္မာ သီတောဒကံ ပိဝါယ သန္နိဿိတစိတ္တဿ မရဏံ ဟောတိ, တသ္မာ ဝုတ္တံ ‘‘မနောဒဏ္ဍော ပန ဘိန္နောပိ စုတိမ္ပိ အာကဍ္ဎတီ’’တိ. ယသ္မာ ပန တထာဘူတစိတ္တဿ နိဂဏ္ဌဿ မနောသတ္တေသု နာမ ဒေဝေသု ဥပပတ္တိ ဟောတီတိ တိတ္ထိယာနံ လဒ္ဓိ, တသ္မာ ဝုတ္တံ ‘‘မနောဒဏ္ဍော ပန ဘိန္နောပိ ပဋိသန္ဓိမ္ပိ အာကဍ္ဎတီ’’တိ. ဣတီတိ ဧဝံ ‘‘ဣဓာဿ နိဂဏ္ဌော’’တိအာဒိအာကာရေန. နန္တိ ဥပါလိံ ဂဟပတိံ. မဟန္တောတိ ဝဒါပေသိ ‘‘မနောပဋိဗဒ္ဓေါ ကာလင်္ကရောတီ’’တိ ဝဒန္တောတိ အဓိပ္ပာယော. ६२. शीतोदक (ठंडे जल) में सूक्ष्म प्राणी होते हैं, जो पीने के समय मर जाते हैं, वे भी उस शीतोदक के उपभोग से मारे जाते हैं, इसलिए तपस्वी को पूरी तरह से शीतोदक का उपभोग नहीं करना चाहिए - यह उनकी (निगंठों की) मान्यता है। 'प्राकृतिक जल ही सत्त्व (प्राणी) है' - यह पुराने निगंठों की मान्यता है। इसीलिए कहा गया है - 'सत्त्व की संज्ञा से शीतोदक का प्रतिषेध करते हैं'। उनकी वह (मान्यता) आधुनिक निगंठों के वाद से विरुद्ध है। वे पृथ्वी आदि नौ पदार्थों से भिन्न ही जीव को स्वीकार करते हैं। चित्त से शीतोदक पीने का इच्छुक, उपभोग करने का इच्छुक होता है, रोग में स्थित होने पर भी सत्त्वों के चित्त की वैसी विस्तीर्णता नहीं होती। इसीलिए कहा - 'उसका मनदण्ड वहीं टूट जाता है'। 'तेन' अर्थात् शीतोदक पीने और उपभोग करने की इच्छा से। 'अस्स' अर्थात् पूर्वोक्त निगंठ का। 'तत्थेव' अर्थात् वैसे चित्त के उत्पन्न होने पर ही। 'भिज्जति' अर्थात् संवर के विचलित होने से। वैसा हुआ वह निगंठ यदि शीतोदक प्राप्त करे, तो कुछ समय तक जीवित रहे, किन्तु अप्राप्ति से सूखते हुए कण्ठ, ओष्ठ, तालु, जिह्वा आदि वाला होकर, पूरी तरह से परिदाह (जलन) से अभिभूत होकर मर जाए। इसीलिए कहा - 'शीतोदक न प्राप्त करते हुए काल (मृत्यु) को प्राप्त हो'। क्यों? क्योंकि शीतोदक पीने में संलग्न चित्त वाले की मृत्यु होती है, इसीलिए कहा गया - 'मनदण्ड टूटने पर भी च्युति (मृत्यु) को खींच लाता है'। क्योंकि वैसे चित्त वाले निगंठों की 'मनोसत्त' नामक देवों में उत्पत्ति होती है - यह तीर्थंकरों की मान्यता है, इसीलिए कहा गया - 'मनदण्ड टूटने पर भी प्रतिसन्धि (पुनर्जन्म) को खींच लाता है'। 'इति' इस प्रकार 'यहाँ इसका निगंठ' इत्यादि के रूप में। 'न' अर्थात् गृहपति उपालि को। 'महन्तो' (महान) - ऐसा कहलवाया, 'मन से प्रतिबद्ध होकर काल करता है' - ऐसा कहते हुए, यह अभिप्राय है। ဥပါသကဿာတိ ဥပါလိဿ ဂဟပတိဿ. မုစ္ဆာဝသေနာတိအာဒိနာ အနွယတော ဗျတိရေကတော စ မနောဒဏ္ဍဿ မဟန္တတံ ဝိဘာဝေတိ. စိတ္တသန္တတိပ္ပဝတ္တိမတ္တေနေဝါတိ ဝိနာ ကာယဒဏ္ဍေန ဝစီဒဏ္ဍေန စ ကေဝလံ စိတ္တသန္တတိပ္ပဝတ္တိမတ္တေန. ဘိဇ္ဇိတွာပီတိ ဧတ္ထ ပိ-သဒ္ဒေန အဘိဇ္ဇိတွာပိ. အနိယျာနိကာတိ အပ္ပာဋိဟီရာ, အယုတ္တာတိ အတ္ထော. သလ္လက္ခေသိ ဥပါသကောတိ ဝိဘတ္တိံ ဝိပရိဏာမေတွာ ယောဇနာ. ပဉှပဋိဘာနာနီတိ ဉာတုံ ဣစ္ဆိတေ အတ္ထေ ဥပ္ပဇ္ဇနကပဋိဘာနာနိ. उपासक का अर्थात् गृहपति उपालि का। 'मूर्च्छा के वश से' इत्यादि के द्वारा अन्वय और व्यतिरेक से मनदण्ड की महत्ता को स्पष्ट करते हैं। 'केवल चित्त-सन्तति की प्रवृत्ति मात्र से ही' अर्थात् कायदण्ड और वचीदण्ड के बिना केवल चित्त-सन्तति की प्रवृत्ति मात्र से। 'भिज्जित्वापि' यहाँ 'पि' शब्द से 'न टूटने पर भी'। 'अनिय्यानिका' अर्थात् निष्फल, अयुक्त - यह अर्थ है। 'उपासक ने लक्ष्य किया' - यहाँ विभक्ति को बदलकर योजना करनी चाहिए। 'पञ्हपटिभानानि' अर्थात् जानने की इच्छा वाले अर्थ में उत्पन्न होने वाली प्रतिभाएँ। ‘‘မနောပဋိဗဒ္ဓေါ ကာလံ ကရောတီ’’တိ ဝဒန္တေန အတ္ထတော မနောဒဏ္ဍဿ တဒုတ္တရဘာဝေါ ပဋိညာတော ဟောတီတိ အာဟ ‘‘ဣဒါနိ မနောဒဏ္ဍော မဟန္တောတိ ဣဒံ ဝစန’’န္တိ. တထာ စေဝ ဝုတ္တံ – ‘‘မနောဒဏ္ဍောဝ ဗလဝါ မဟန္တောတိ ဝဒါပေသီ’’တိ. 'मन से प्रतिबद्ध होकर काल करता है' - ऐसा कहने वाले के द्वारा अर्थतः मनदण्ड की श्रेष्ठता स्वीकार कर ली जाती है, इसीलिए कहा - 'अब मनदण्ड महान है, यह वचन'। वैसा ही कहा गया है - 'मनदण्ड ही बलवान और महान है - ऐसा कहलवाया'। ၆၃. ပါဏာတိပါတာဒိတော ယမနံ ယာမော, စတုဗ္ဗိဓော ယာမော စတုယာမော, စတုယာမသင်္ခါတေန သံဝရေန သံဝုတော စာတုယာမသံဝရသံဝုတော. အဋ္ဌကထာယံ ပန ယာမ-သဒ္ဒေါ ကောဋ္ဌာသပရိယာယောတိ ‘‘ဣမိနာ စတုကောဋ္ဌာသေနာ’’တိ ဝုတ္တံ. ပိယဇာတိကံ ရူပါဒိအာရမ္မဏံ ရာဂဝသေန ဗာလေဟိ ဘာဝနီယတ္တာ ‘‘ဘာဝိတ’’န္တိ ဝုစ္စတီတိ အာဟ ‘‘ဘာဝိတန္တိ ပဉ္စ ကာမဂုဏာ’’တိ. ६३. प्राणातिपात आदि से संयम 'याम' है, चार प्रकार का याम 'चतुर्याम' है, चतुर्याम संज्ञक संवर से जो संवृत है वह 'चातुर्यामसंवरसंवृत' है। अट्ठकथा में तो 'याम' शब्द कोष्ठक (भाग) का पर्यायवाची है, इसलिए 'इस चार भागों वाले से' ऐसा कहा गया है। प्रिय लगने वाले रूपादि आरम्भण (विषय) राग के वश से बालकों (अज्ञानियों) द्वारा भावित (बढ़ाए) जाने योग्य होने के कारण 'भावित' कहे जाते हैं, इसीलिए कहा - 'भावित अर्थात् पाँच कामगुण'। ယော သဗ္ဗံ ပါပံ အာသဝဉ္စ ဝါရေတီတိ သဗ္ဗဝါရီ, တဿ နဝသု ပဒတ္ထေသု သတ္တမော ပဒတ္ထော, တေန သဗ္ဗဝါရိနာ ပါပံ ဝါရိတွာ ဌိတောတိ သဗ္ဗဝါရိဝါရိတော[Pg.31]. တေနာဟ ‘‘သဗ္ဗေန ပါပဝါရဏေန ဝါရိတပါပေါ’’တိ. တတော ဧဝ သဗ္ဗဿ ဝါရိတဗ္ဗဿ အာသဝဿ ဓုနနတော သဗ္ဗဝါရိဓုတော. ဝါရိတဗ္ဗဿ နိဝါရဏဝသေန သဗ္ဗဝါရိနော ဖုဋော ဖုသိတောတိ သဗ္ဗဝါရိဖုဋော. သံဃာတန္တိ သဟသာ ဟနနံ, အသဉ္စေတနိကဝဓန္တိ အတ္ထော. ကတရသ္မိံ ကောဋ္ဌာသေတိ တီသု ဒဏ္ဍကောဋ္ဌာသေသု ကတရကောဋ္ဌာသေ. जो सभी पापों और आस्रवों को रोकता है वह 'सब्बवारी' है, उसके नौ पदार्थों में सातवाँ पदार्थ है, उस 'सब्बवारी' के द्वारा पाप को रोककर स्थित होने वाला 'सब्बवारिवारित' है। इसीलिए कहा - 'सभी पाप-निवारणों से निवारित पाप वाला'। उसी से, सभी निवारण योग्य आस्रवों को झाड़ देने (धूनन) के कारण 'सब्बवारिधुत' है। निवारण करने के वश से सभी निवारणों (वारि) से व्याप्त या स्पृष्ट होने के कारण 'सब्बवारिप्फुट' है। 'संघात' अर्थात् अचानक मारना, अनजाने में वध करना - यह अर्थ है। 'किस कोष्ठक (भाग) में' अर्थात् तीन दण्ड-कोष्ठकों में से किस कोष्ठक में। ၆၄. ခလိယတိ သမာဒိယတီတိ ခလံ, ရာသီတိ အာဟ – ‘‘ဧကံ မံသခလန္တိ ဧကံ မံသရာသိ’’န္တိ. ဝိဇ္ဇာဓရဣဒ္ဓိယာ ဣဒ္ဓိမာ. သာ ပန ဣဒ္ဓိ ယသ္မာ အာနုဘာဝသမ္ပန္နဿေဝ ဣဇ္ဈတိ, န ယဿ ကဿစိ. တသ္မာ အာဟ ‘‘အာနုဘာဝသမ္ပန္နော’’တိ. ဝိဇ္ဇာနုဘာဝဝသေနေဝ အာနုဘာဝသမ္ပန္နော. စိတ္တေ ဝသီဘာဝပ္ပတ္တော အာနုဘာဝါယ ဧဝ ဝိဇ္ဇာယ ပဂုဏဘာဝါပါဒနေန. ဧတေန ဝသီဘာဝံ လောကိယသမညာဝသေန ဘဂဝါ ဥပါလိံ ဂဟပတိံ ပညပေတုကာမော ဧဝမာဟ. လောကိကာ ဟိ ‘‘ဘာဝနာမယဣဒ္ဓိယာ ဣဒ္ဓိမာ စေတောဝသီဘာဝပ္ပတ္တော ပရူပဃာတံ ကရောတီ’’တိ မညန္တိ. တထာ ဟိ တေ ဣသယော ပရေသံ သံဝဏ္ဏေန္တိ, ဣသီနံ အာနုဘာဝံ ကိတ္တေန္တိ. ယံ ပနေတ္ထ ဝတ္တဗ္ဗံ, တံ ပရတော အာဂမိဿတီတိ. ६४. जो संचित होता है या इकट्ठा होता है वह 'खल' है, राशि है, इसीलिए कहा - 'एक मांस-खल' अर्थात् 'एक मांस की राशि'। विद्याधर की ऋद्धि से ऋद्धिमान। वह ऋद्धि क्योंकि प्रभाव-सम्पन्न व्यक्ति को ही सिद्ध होती है, हर किसी को नहीं। इसीलिए कहा 'प्रभाव-सम्पन्न'। विद्या के प्रभाव के वश से ही प्रभाव-सम्पन्न। चित्त में वशीभाव प्राप्त, प्रभाव के लिए ही विद्या के अभ्यास की पूर्णता प्राप्त करने से। इसके द्वारा भगवान लौकिक संज्ञा के वश से गृहपति उपालि को प्रज्ञापित करना चाहते हुए ऐसा बोले। क्योंकि लौकिक लोग मानते हैं कि 'भावना-मयी ऋद्धि से ऋद्धिमान, चित्त के वशीभाव को प्राप्त व्यक्ति दूसरों का घात करता है'। वैसे ही वे ऋषि दूसरों की प्रशंसा करते हैं, ऋषियों के प्रभाव का कीर्तन करते हैं। यहाँ जो कहना चाहिए, वह आगे आएगा। ၆၅. အရညမေဝ ဟုတွာတိ သဗ္ဗသော အရညမေဝ ဟုတွာ. အရညဘာဝေန အရညံ ဇာတံ, န နာမမတ္တေန. ဣသီနံ အတ္ထာယာတိ ဣသီနံ အာသာဒနတ္ထာယ. ६५. 'अरण्य ही होकर' अर्थात् पूरी तरह से अरण्य (जंगल) बनकर। अरण्य भाव के कारण अरण्य उत्पन्न हुआ, न कि केवल नाम मात्र से। 'ऋषियों के लिए' अर्थात् ऋषियों को सताने के लिए। ဂေါဓာဝရီတီရတော နာတိဒူရေ. ဥသူယမာနောတိ ‘‘န မံ ဧသ ဇနော ပရိဝါရေတီ’’တိ ဥသူယံ ကရောန္တော. ကိလိဋ္ဌော ဝတာတိ ပင်္ကဒန္တရဇသိရတာဒီဟိ ကိလိဋ္ဌသရီရော. အနဉ္ဇိတမဏ္ဍိတောတိ အနဉ္ဇိတက္ခိကော သဗ္ဗေန, သဗ္ဗံ အမဏ္ဍိတော စ. တသ္မိံ ကာလေ ‘‘ကာလဿေဝ အက္ခီနံ အဉ္ဇနံ မင်္ဂလ’’န္တိ မနုဿာနံ လဒ္ဓိ, တသ္မာ အနဉ္ဇနံ ဝိသုံ ဂဟိတံ. गोदावरी के तट से बहुत दूर नहीं। 'ईर्ष्या करते हुए' कि 'यह लोग मेरे चारों ओर नहीं हैं' - ऐसी ईर्ष्या करते हुए। 'कितना मलिन है' अर्थात् कीचड़, दाँतों के मैल, धूल, पसीना आदि से मलिन शरीर वाला। 'अञ्जन और मण्डन से रहित' अर्थात् पूरी तरह से आँखों में अञ्जन (काजल) न लगाया हुआ और पूरी तरह से असज्जित। उस समय मनुष्यों की यह मान्यता थी कि 'प्रातःकाल आँखों में अञ्जन लगाना मंगलकारी है', इसलिए 'अनञ्जन' को अलग से ग्रहण किया गया है। ရာဇာ တဿ ဝစနံ ဂဟေတွာတိ ‘‘ဝေဒေသု ဤဒိသံ အာဂတံ ဘဝိဿတီတိ ဧဝံ, ဘန္တေ’’တိ ရာဇာ တဿ ပုရောဟိတဿ ဝစနံ ဂဟေတွာ. ဥသုမဇာတဟဒယောတိ ဥတ္တတ္တဟဒယော. နာသိကာနံ အပ္ပဟောန္တေ မုခေန အဿသန္တော. राजा ने उसके वचन को स्वीकार कर - 'वेदों में ऐसा आया होगा, भन्ते' - इस प्रकार राजा ने उस पुरोहित के वचन को स्वीकार किया। 'उष्मजात-हृदय' अर्थात् तप्त हृदय वाला। नासिका के पर्याप्त न होने पर मुख से श्वास लेता हुआ। ဝိဇိတဇယေဟိ အာဂန္တွာ နက္ခတ္တယုတ္တံ အာဂမေန္တေဟိ နိသီဒိတဗ္ဗဋ္ဌာနံ ဇယခန္ဓာဝါရဋ္ဌာနံ. ဥဒကဝုဋ္ဌိပါတနာဒိ တသ္မိံ ပါပကမ္မေ အသမင်္ဂိဘူတာနမ္ပိ သမနုညတာယ [Pg.32] အန္တောကရဏတ္ထံ ကတံ. ကတဘဏ္ဍဝုဋ္ဌီတိ အာဘရဏဝဿံ. မဟာဇနော သမနုညော ဇာတောတိ ယောဇနာ. မာတုပေါသကရာမောတိ မာတရိ သမ္မာပဋိပန္နော ရာမော နာမ ဧကော ပုရိသော. အသမင်္ဂိဘူတာနန္တိ အသမနုညာနံ. विजितजयों (विजेताओं) द्वारा आकर नक्षत्र-योग की प्रतीक्षा करते हुए बैठने का स्थान 'जयस्कन्धावार' (विजय शिविर) का स्थान है। जल-वृष्टि का गिरना आदि उस पापकर्म में सम्मिलित न होने वालों की भी सहमति के कारण उन्हें भीतर करने के लिए किया गया। 'कतभण्डवुट्ठी' का अर्थ है आभूषणों की वर्षा। 'महाजनो समनुञ्ञो जातो' (जनसमूह सहमत हो गया) यह अन्वय है। 'मातुपोसकारामो' का अर्थ है माता की सम्यक् सेवा करने वाला राम नामक एक पुरुष। 'असमङ्गीभूतानं' का अर्थ है जो सहमत नहीं थे। အဝကိရိယာတိ အသုဿူသတံ ပဋိစ္စ. ဖုလိင်္ဂါနီတိ အဂ္ဂိကဏာနိ. ပတန္တိ ကာယေတိ ကာယေ ဣတော စိတော နိပတန္တိ. ဧတေ ကိရ နိရယံ ဝိဝရိတွာ မဟာဇနဿ ဒဿေန္တိ. 'अवकिरिया' का अर्थ है सुनने की अनिच्छा (अशुश्रूषा) के कारण। 'फुलिङ्गानि' का अर्थ है अग्नि के कण (चिनगारियाँ)। 'पतन्ति काये' का अर्थ है शरीर पर यहाँ-वहाँ गिरते हैं। वे (चिनगारियाँ) मानो नरक को खोलकर महाजन को दिखाते हैं। ယထာဖာသုကဋ္ဌာနန္တိ မယံ ကဉ္စိပိ ဒေသံ ဥဒ္ဒိဿ န ဂစ္ဆာမ, ယတ္ထ ပန ဝသန္တဿ ပဗ္ဗဇိတဿ ဖာသု ဟောတိ, တံ ယထာဖာသုကဋ္ဌာနံ ဂစ္ဆာမာတိ အဓိပ္ပာယော. သံဃာတိ သံဟတာ. ဂဏာတိ တံတံသေဏိဘာဝေန ဂဏိတဗ္ဗတာယ ဂဏာ. ဂဏီဘူတာတိ ဧကဇ္ဈာသယာ ဟုတွာ ရာသိဘူတာ. အဒိန္နာဒါနန္တိအာဒီသုပိ နိရယေ ပစ္စိတွာ မနုဿလောကံ အာဂတဿ ဝိပါကာဝသေသေနာတိ အာနေတွာ ယောဇေတဗ္ဗံ. 'यथाफासुकट्ठानं' (यथासुख स्थान) का अर्थ है कि हम किसी विशेष देश के उद्देश्य से नहीं जाते हैं, बल्कि जहाँ रहने वाले प्रव्रजित के लिए सुख (अनुकूलता) हो, उस यथासुख स्थान पर जाते हैं, यह अभिप्राय है। 'सङ्घा' का अर्थ है संहत (जुड़े हुए)। 'गणा' का अर्थ है उन-उन श्रेणियों के रूप में गिने जाने के कारण गण। 'गणीभूता' का अर्थ है एक ही आशय वाले होकर समूहबद्ध हुए। 'अदिन्नादानं' (अदत्तादान) आदि में भी नरक में पककर मनुष्य लोक में आए हुए व्यक्ति के 'विपाक के अवशेष' के साथ जोड़कर अन्वय करना चाहिए। ပဂ္ဂဏှိဿာမီတိ သမ္ဘာဝနံ ဥပ္ပာဒေဿာမိ. နေသံ ကတ္တဗ္ဗန္တိ စိန္တေသီတိ ယောဇနာ. ကိံ စိန္တေသိ? အာဃာတံ ဥပ္ပာဒေတွာ အနတ္ထကရဏူပါယံ. တေနာဟ ‘‘သော ဓမ္မကထာပရိယောသာနေ’’တိအာဒိ. နာဂဗလပိစ္ဆိလ္လာဒီနန္တိ နာဂဗလသာသပအင်္ကောလတေလကဏိကာရနိယျာသာဒီနံ စိက္ခလ္လာနံ. ဝိဟေဌယိံသု နိရယာဒိကထာဟိ ဃဋ္ဋေန္တာ. ဆဒွါရာရမ္မဏေတိ စက္ခာဒီနံ ဆန္နံ ဒွါရာနံ အာရမ္မဏဘူတေ ရူပါဒိဝိသယေ. 'पग्गण्हिस्सामि' का अर्थ है सम्मान (संभावना) उत्पन्न करूँगा। 'उनके लिए करना चाहिए' ऐसा सोचा, यह अन्वय है। क्या सोचा? आघात (क्रोध) उत्पन्न करके अनर्थ करने का उपाय। इसीलिए कहा 'सो धम्मकथापरियोसाने' (वह धर्मकथा की समाप्ति पर) आदि। 'नागबलपिच्छिल्लादीनं' का अर्थ है नागबल, सरसों, अंकोल का तेल, कणिकार का निर्यास (गोंद) आदि की कीचड़। 'विहेठयिंसु' का अर्थ है नरक आदि की कथाओं से चोट पहुँचाते हुए। 'छद्वारारम्मणे' का अर्थ है चक्षु आदि छह द्वारों के आलम्बनभूत रूप आदि विषयों में। နဝ ဝုဋ္ဌိယောတိ ဥဒကဝုဋ္ဌိ သုမနပုပ္ဖဝုဋ္ဌိ မာသကဝုဋ္ဌိ ကဟာပဏဝုဋ္ဌိ အာဘရဏဝုဋ္ဌိ အာဝုဓဝုဋ္ဌိ အင်္ဂါရဝုဋ္ဌိ ပါသာဏဝုဋ္ဌိ ဝါလိကာဝုဋ္ဌီတိ ဣမာ နဝ ဝုဋ္ဌိယော. အဝဉ္စယီတိ သက္ကာရံ ကရောန္တော ဝိယ ဟုတွာ အသက္ကာရံ ကရောန္တော အနတ္ထစရဏေန ဝဉ္စယိ. အဒူသကေတိ အနပရာဓေ. नौ वर्षाएँ हैं—जल की वर्षा, सुमन (चमेली) के फूलों की वर्षा, माषक (सिक्कों) की वर्षा, कार्षापण की वर्षा, आभूषणों की वर्षा, आयुधों (शस्त्रों) की वर्षा, अंगारों की वर्षा, पत्थरों की वर्षा और बालू की वर्षा—ये नौ वर्षाएँ हैं। 'अवञ्चयी' का अर्थ है सत्कार करते हुए के समान होकर असत्कार करते हुए अनर्थ के आचरण से ठगा। 'अदूसके' का अर्थ है निरपराध में। ‘‘ဒိဋ္ဌမင်္ဂလိကာ ဗြာဟ္မဏကညာ’’တိ ဇာတကဋ္ဌကထာဒီသု (ဇာ. အဋ္ဌ. ၄.၁၅.မာတင်္ဂဇာတကဝဏ္ဏနာ) အာဂတံ, ဣဓ ပန ‘‘သေဋ္ဌိဓီတာ’’တိ. ဝါရေယျတ္ထာယာတိ အာဝါဟတ္ထာယ, အဿာတိ ပေသိတပုဂ္ဂလဿ. တာဒိသေန နီစကုလသံဝတ္တနိယေန ကမ္မုနာ လဒ္ဓေါကာသေန စဏ္ဍာလယောနိယံ နိဗ္ဗတ္တော. 'दिट्ठमङ्गलिका ब्राह्मणकन्या' ऐसा जातक अट्ठकथा आदि (जातक अट्ठकथा 4.15, मातङ्ग जातक वर्णन) में आया है, किन्तु यहाँ 'श्रेष्ठि-पुत्री' (सेट्ठिधीता) कहा गया है। 'वारेय्यत्थाय' का अर्थ है विवाह के लिए, 'अस्स' का अर्थ है भेजे गए पुरुष के लिए। उस प्रकार के नीच कुल में ले जाने वाले कर्म और प्राप्त अवसर के कारण वह चाण्डाल योनि में उत्पन्न हुआ। စမ္မဂေဟေတိ [Pg.33] စမ္မေန ဆာဒိတေ ဂေဟေ. မာတင်္ဂေါတွေဝဿ နာမံ အဟောသိ ဇာတိသမုဒါဂတံ. တန္တိ ဃဏ္ဋံ. ဝါဒေန္တော တာလနေန သဒ္ဒံ ကရောန္တော. မဟာပထံ ပဋိပဇ္ဇိ ဒိဋ္ဌမင်္ဂလိကာယ ဂေဟဒွါရသမီပေန. 'चम्मगेहे' का अर्थ है चमड़े से ढके हुए घर में। जाति से प्राप्त उसका नाम 'मातङ्ग' ही था। 'तं' का अर्थ है उस घण्टा को। 'वादन्तो' का अर्थ है बजाते हुए, प्रहार से शब्द करते हुए। वह दिट्ठमङ्गलिका के घर के द्वार के समीप से महापथ (मुख्य मार्ग) पर चल पड़ा। တဿာ ဝေယျာဝစ္စကရာ စေဝ ဥပဋ္ဌာကမနုဿာ ပဋိဗဒ္ဓါ စ သုရာသောဏ္ဍာဒယော ဇာဏုကပ္ပရာဒီဟိ သုကောဋ္ဋိတံ ကောဋ္ဋိတဘာဝေန မုစ္ဆံ အာပန္နတ္တာ မတောတိ သညာယ ဆဍ္ဍေသုံ. उसके (दिट्ठमङ्गलिका के) सेवा करने वाले और परिचारक मनुष्य तथा उससे सम्बद्ध सुरा-व्यसनी (शराबी) आदि ने घुटनों और कोहनियों आदि से अच्छी तरह पीटे जाने के कारण मूर्छित होने से 'वह मर गया' ऐसी संज्ञा (समझ) से उसे फेंक दिया। အထ ဗောဓိသတ္တော အာယုအဝသေသဿ အတ္ထိတာယ မန္ဒမန္ဒေ ဝါတေ ဝါယန္တေ စိရေန သညံ ပဋိလဘတိ. တေနာဟ ‘‘မဟာပုရိသော’’တိအာဒိ. ဂေဟင်္ဂဏေတိ ဂေဟဿ မဟာဒွါရတော ဗဟိ ဝိဝဋင်္ဂဏေ. ပတိတောတိ ပါတံ ကတွာ ဣစ္ဆိတတ္ထနိပ္ဖတ္တိံ အန္တရံ ကတွာ အနုပ္ပဝေသေန နိပန္နော. ဒိဋ္ဌမင်္ဂလိကာယာတိ ဒိဋ္ဌမင်္ဂလိကာကာရဏေန. तब बोधिसत्व, आयु शेष होने के कारण, मन्द-मन्द हवा चलने पर देर से संज्ञा (चेतना) प्राप्त करते हैं। इसीलिए कहा 'महापुरिसो' आदि। 'गेहङ्गण' का अर्थ है घर के मुख्य द्वार के बाहर खुले आँगन में। 'पतितो' का अर्थ है गिरकर, इच्छित अर्थ की सिद्धि में बाधा डालकर, प्रवेश करके लेटा हुआ। 'दिट्ठमङ्गलिकाय' का अर्थ है दिट्ठमङ्गलिका के कारण। ယသန္တိ ဝိဘဝံ ကိတ္တိသဒ္ဒဉ္စ. စန္ဒန္တိ စန္ဒမဏ္ဍလံ, စန္ဒဝိမာနန္တိ အတ္ထော. ဥစ္ဆိဋ္ဌဂေဟေတိ ပရေဟိ ပရိဘုတ္တဂေဟေ. မဏ္ဍပေတိ နဂရမဇ္ဈေ မဟာမဏ္ဍပေ. 'यसं' का अर्थ है वैभव और कीर्ति-शब्द। 'चन्दं' का अर्थ है चन्द्रमण्डल, 'चन्द्रविमान' यह अर्थ है। 'उच्छिट्ठगेहे' का अर्थ है दूसरों द्वारा उपभोग किए गए घर में। 'मण्डपे' का अर्थ है नगर के मध्य में बड़े मण्डप में। ခီရမဏိမူလန္တိ ခီရမူလံ, ပါဒေသု ဗဒ္ဓမဏိမူလဉ္စ. ယာဝတာ ဝါစုဂ္ဂတာ ပရိယတ္တီတိ ယတ္တကော မနုဿဝစီဒွါရတော ဥဂ္ဂတော နိက္ခန္တော ပဝတ္တော, ယံကိဉ္စိ ဝစီမယန္တိ အတ္ထော. အာကာသင်္ဂဏေတိ ဝိဝဋင်္ဂဏေ. 'खीरमणिमूलं' का अर्थ है दूध का मूल्य और पैरों में बँधे मणियों का मूल्य। 'यावता वाचुग्गता परियत्ति' का अर्थ है जितना मनुष्य के वाक्-द्वार से निकला, प्रवृत्त हुआ, जो कुछ भी वाणीमय है, यह अर्थ है। 'आकासङ्गण' का अर्थ है खुले आँगन में। ဒုမ္မဝါသီတိ ဓူမော ဓူသရော, အနဉ္ဇိတာမဏ္ဍိတောတိ အဓိပ္ပာယော. ဩတလ္လကောတိ နိဟီနဇ္ဈာသယော, အပ္ပာနုဘာဝေါတိ အတ္ထော. ပဋိမုဉ္စ ကဏ္ဌေတိ ယာဝ ဂလဝါဋကာ ပါရုပိတွာ. ကော ရေ တုဝန္တိ အရေ ကော နာမ တွံ. 'दुम्मवासी' का अर्थ है धूमिल, धूसर; बिना अंजन और बिना श्रृंगार के, यह अभिप्राय है। 'ओतल्लको' का अर्थ है हीन आशय वाला, अल्प प्रभाव वाला, यह अर्थ है। 'पटिमुञ्च कण्ठे' का अर्थ है गले तक ओढ़कर। 'को रे तुवं' का अर्थ है अरे, तू कौन है? ပကတန္တိ ပဋိယတ္တံ နာနပ္ပကာရတော အဘိသင်္ခတံ. ဥတ္တိဋ္ဌပိဏ္ဍန္တိ အန္တရဃရံ ဥပဂမ္မ ဌတွာ လဒ္ဓဗ္ဗပိဏ္ဍံ, ဘိက္ခာဟာရန္တိ အတ္ထော. လဘတန္တိ လစ္ဆတု. သပါကောတိ မဟာသတ္တော ဇာတိဝသေန ယထာဘူတံ အတ္တာနံ အာဝိကရောတိ. 'पकतं' का अर्थ है तैयार किया हुआ, अनेक प्रकार से संस्कारित। 'उत्तिट्ठपिण्डं' का अर्थ है घर के भीतर जाकर खड़े होकर प्राप्त होने योग्य पिण्ड, भिक्षा-आहार, यह अर्थ है। 'लभतं' का अर्थ है प्राप्त करे। 'सपाको' (श्वपाक) का अर्थ है कि महासत्व जाति के अनुसार यथार्थ रूप में स्वयं को प्रकट करते हैं। အတ္ထတ္ထိတံ သဒ္ဒဟတောတိ သမ္ပရာယိကဿ အတ္ထဿ အတ္ထိဘာဝံ သဒ္ဒဟန္တဿ. အပေဟီတိ အပဂစ္ဆ. ဧတ္တောတိ ဣမသ္မာ ဌာနာ. ဇမ္မာတိ လာမက. 'अत्थत्थितं सद्दहतो' का अर्थ है पारलौकिक अर्थ (हित) के अस्तित्व पर श्रद्धा रखने वाले का। 'अपेहि' का अर्थ है दूर हो जा। 'एत्तो' का अर्थ है इस स्थान से। 'जम्मा' का अर्थ है नीच (अधम)। အနူပခေတ္တေတိ [Pg.34] အဇင်္ဂလေ ဥဒကသမ္ပန္နေ ခေတ္တေ ဖလဝိသေသံ ပစ္စာသီသန္တာ. ဧတာယ သဒ္ဓါယ ဒဒါဟိ ဒါနန္တိ နိန္နံ ထလဉ္စ ပူရေန္တော မေဃော ဝိယ ဂုဏဝန္တေ နိဂ္ဂုဏေ စ ဒါနံ ဒေဟိ, ဧဝံ ဒေန္တော စ အပ္ပေဝ အာရာဓယေ ဒက္ခိဏေယျေတိ. ဒက္ခိဏေယျေတိ သီလာဒိဂုဏသမန္နာဂတေ. 'अनूपखेत्ते' का अर्थ है जो जांगल (मरुभूमि) नहीं है, ऐसे जल-सम्पन्न खेत में विशेष फल की आशा करते हुए। 'एताय सद्धाय ददाहि दानं' का अर्थ है निम्न और उच्च भूमि को भरते हुए मेघ के समान गुणवान और निर्गुण दोनों को दान दे, और इस प्रकार देते हुए 'अप्पेव आराधये दक्खिणेय्ये' (शायद दक्षिणीय को प्रसन्न कर सको)। 'दक्खिणेय्ये' का अर्थ है शील आदि गुणों से युक्त व्यक्ति में। တာနီတိ တေ ဗြာဟ္မဏာ. ဝေဏုပဒရေနာတိ ဝေဠုဝိလီဝေန. 'तानि' का अर्थ है वे ब्राह्मण। 'वेणुपदरेन' का अर्थ है बाँस की खपच्ची से। ဂိရိံ နခေန ခဏသီတိ ပဗ္ဗတံ အတ္တနော နခေန ခဏန္တော ဝိယ အဟောသိ. အယောတိ ကာလလောဟံ. ပဒဟသီတိ အဘိဘဝသိ, အတ္တနော သရီရေန အဘိဘဝန္တော ဝိယ အဟောသိ. 'गिरिं नखेन खणसि' का अर्थ है पर्वत को अपने नाखून से खोदने वाले के समान हुआ। 'अयो' का अर्थ है काला लोहा। 'पदहसि' का अर्थ है अभिभूत करते हो, अपने शरीर से अभिभूत करने वाले के समान हुआ। အာဝေဓိတန္တိ စလိတံ ဝိပရိဝတ္တေတွာ ဌိတံ. ပိဋ္ဌိတောတိ ပိဋ္ဌိပဿေန. ဗာဟုံ ပသာရေတိ အကမ္မနေယျန္တိ အကမ္မက္ခမံ ဗာဟုဒွယံ ထဒ္ဓံ သုက္ခဒဏ္ဍကံ ဝိယ ကေဝလံ ပသာရေတိ, န သမိဉ္ဇေတိ, သေတာနိ အက္ခီနိ ပရိဝတ္တနေန ကဏှမဏ္ဍလဿ အဒိဿနတော. 'आवेधितं' का अर्थ है कम्पित, उलटकर स्थित। 'पिट्ठितो' का अर्थ है पीछे की ओर से। 'बाहुं पसारेति अकम्मनेय्यं' का अर्थ है अकर्मण्य (काम न करने योग्य) दोनों भुजाओं को स्तब्ध सूखी लकड़ी की तरह केवल फैलाता है, सिकोड़ता नहीं है; 'सेतानि अक्खीनि' (सफेद आँखें) का अर्थ है पुतलियों के घूमने से काले मण्डल का न दिखना। ဇီဝိတန္တိ ဇီဝနံ. 'जीवितं' का अर्थ है जीवन। ဝေဟာယသန္တိ အာကာသေ. ပထဒ္ဓုနောတိ ပထဘူတဒ္ဓုနော ဝိယ. वेहायस (Vehāyasa) का अर्थ आकाश में है। पथद्धुनो (Pathaddhuno) का अर्थ पथ पर चलने वाले यात्री के समान है। သညမ္ပိ န ကရောတီတိ ‘‘ဣမေ ကုလပ္ပသုတာ’’တိ သညာမတ္တမ္ပိ န ကရောတိ. ဒန္တကဋ္ဌကုစ္ဆိဋ္ဌကန္တိ ခါဒိတဒန္တကဋ္ဌတ္တာ ဝုတ္တံ. ဧတဿေဝ ဥပရိ ပတိဿတိ အပ္ပဒုဋ္ဌပဒေါသဘာဝတော, မဟာသတ္တဿ တဒါ ဥက္ကံသဂတခေတ္တဘာဝတော. ဣဒ္ဓိဝိသယော နာမ အစိန္တေယျော, တသ္မာ ကထံ သူရိယဿ ဥဂ္ဂန္တုံ နာဒါသီတိ န စိန္တေတဗ္ဗံ. အရုဏုဂ္ဂံ န ပညာယတီတိ တသ္မိံ ပဒေသေ အရုဏပဘာ န ပညာယတိ, အန္ဓကာရော ဧဝ ဟောတိ. ‘संज्ञा भी नहीं करता’ का अर्थ है कि ‘ये कुलीन हैं’ ऐसी मात्र संज्ञा भी नहीं करता। ‘दन्तकट्ठकुच्छिट्ठक’ (Dantakaṭṭhakucchiṭṭhaka) उसे कहा गया है जिसने दातून चबा ली है। यह उसी के ऊपर गिरेगा क्योंकि वह (महासत्व) द्वेषरहित है और उस समय महासत्व का क्षेत्र (पुण्यक्षेत्र) अपनी पराकाष्ठा पर था। ऋद्धि का विषय अचिन्त्य है, इसलिए यह नहीं सोचना चाहिए कि सूर्य को उदय होने से कैसे रोक दिया। ‘अरुणोदय नहीं दिखाई देता’ का अर्थ है कि उस प्रदेश में अरुण की प्रभा नहीं दिखाई देती, केवल अन्धकार ही रहता है। ယက္ခာဝဋ္ဋော နု ခေါ အယံ ကာလဝိပရိယာယော. မဟာပညန္တိ မဟန္တာနံ ပညာနံ အဓိဋ္ဌာနဘူတံ. ဇနပဒဿ မုခံ ပဿထာတိ ဣမဿ ဇနပဒဝါသိနော ဇနဿ ဥပဒ္ဒဝေန မင်္ကုဘူတံ မုခံ ပဿထ. क्या यह यक्षों का भँवर है या समय का विपर्यय (उलटफेर) है? ‘महाप्रज्ञ’ का अर्थ है महान प्रज्ञाओं का अधिष्ठान (आधार)। ‘जनपद का मुख देखो’ का अर्थ है इस जनपद के निवासियों का उपद्रव के कारण म्लान (उदास) हुआ मुख देखो। ဧတဿ ကထာ ဧတဿေဝ ဥပရိ ပတိဿတီတိ ယာဟိ တေန ပါရမိတာပရိဘာဝနသမိဒ္ဓါဟိ နာနာသမာပတ္တိဝိဟာရပရိပူရိတာဟိ သီလဒိဋ္ဌိသမ္ပဒါဟိ သုသင်္ခတသန္တာနေ မဟာကရုဏာဓိဝါသေ မဟာသတ္တေ အရိယူပဝါဒကမ္မအဘိသပသင်္ခါတာ ဖရုသဝါစာ ပဝတ္တိတာ, သာ အဘိသပိ တဿ ခေတ္တဝိသေသဘာဝတော တဿ စ အဇ္ဈာသယဖရုသတာယ ဒိဋ္ဌဓမ္မဝေဒနိယကမ္မံ ဟုတွာ [Pg.35] သစေ သော မဟာသတ္တံ န ခမာပေတိ, သတ္တမေ ဒိဝသေ ဝိပစ္စနသဘာဝံ ဇာတံ, ခမာပိတေ ပန မဟာသတ္တေ ပယောဂသမ္ပတ္တိ ပဋိဗာဟိတတ္တာ အဝိပါကဓမ္မတံ အာပဇ္ဇတိ အဟောသိကမ္မဘာဝတော. အယဉှိ အရိယူပဝါဒပါပဿ ဒိဋ္ဌဓမ္မဝေဒနိယဿ ဓမ္မတာ, တေန ဝုတ္တံ ‘ဧတဿ ကထာ ဧတဿေဝ ဥပရိ ပတိဿတီ’တိအာဒိ. မဟာသတ္တော ပန တံ တဿ ဥပရိ ပတိတုံ န အဒါသိ, ဥပါယေန မောစေသိ. တေန ဝုတ္တံ စရိယာပိဋကေ (စရိယာ. ၂.၆၄) – ‘उसकी बात उसी के ऊपर गिरेगी’ का अर्थ है कि पारमिताओं की भावना से समृद्ध, नाना समापत्तियों के विहार से परिपूर्ण, शील और दृष्टि की सम्पदा से सुसंस्कृत सन्तान वाले तथा महाकरुणा के निवास स्थान महासत्व के प्रति जो आर्यों के उपवाद (निन्दा) रूपी शाप वाली कठोर वाणी प्रयुक्त की गई थी, वह शाप उस (महासत्व) के विशेष पुण्यक्षेत्र होने के कारण और उस (निन्दक) के आशय की कठोरता के कारण ‘दृष्टधर्मवेदनीय कर्म’ (इसी जन्म में फल देने वाला कर्म) बनकर, यदि वह महासत्व से क्षमा नहीं माँगता, तो सातवें दिन विपाक देने के स्वभाव वाला हो जाता। परन्तु महासत्व से क्षमा माँग लेने पर, प्रयोग-सम्पत्ति के रुक जाने से, ‘अहोसि-कम्म’ (निष्फल कर्म) होने के कारण वह विपाक न देने वाला हो जाता है। आर्यों की निन्दा रूपी पाप के दृष्टधर्मवेदनीय होने की यही धर्मता (नियम) है, इसीलिए कहा गया है— ‘उसकी बात उसी के ऊपर गिरेगी’ आदि। किन्तु महासत्व ने उसे उसके ऊपर गिरने नहीं दिया, उपाय से उसे मुक्त कर दिया। इसीलिए चरियापिटक में कहा गया है— ‘‘ယံ သော တဒါ မံ အဘိသပိ, ကုပိတော ဒုဋ္ဌမာနသော; တဿေဝ မတ္ထကေ နိပတိ, ယောဂေန တံ ပမောစယိ’’န္တိ. ‘उस समय क्रोधित और दुष्ट मन वाले उसने मुझे जो शाप दिया था, वह उसी के मस्तक पर गिरा; मैंने उपाय (योग) से उसे मुक्त किया’। ယဉှိ တတ္ထ သတ္တမေ ဒိဝသေ ဗောဓိသတ္တေန သူရိယုဂ္ဂမနနိဝါရဏံ ကတံ, အယမေတ္ထ ယောဂေါတိ အဓိပ္ပေတော. ယောဂေန ဟိ ဥဗ္ဗဠှာ သရာဇိကာ ပရိသာ နဂရဝါသိနော နေဂမာ စေဝ ဇာနပဒါ စ ဗောဓိသတ္တဿ သန္တိကံ တာပသံ အာနေတွာ ခမာပေသုံ. သော စ ဗောဓိသတ္တဿ ဂုဏေ ဇာနိတွာ တသ္မိံ စိတ္တံ ပသာဒေသိ. ယံ ပနဿ မတ္ထကေ မတ္တိကာပိဏ္ဍဿ ဌပနံ, တဿ စ သတ္တဓာ ဖာလနံ ကတံ, တံ မနုဿာနံ စိတ္တာနုရက္ခဏတ္ထံ. အညထာ ဟိ – ‘‘ဣမေ ပဗ္ဗဇိတာ သမာနာ စိတ္တဿ ဝသေ ဝတ္တန္တိ, န ပန စိတ္တံ အတ္တနော ဝသေ ဝတ္တာပေန္တီ’’တိ မဟာသတ္တမ္ပိ တေန သဒိသံ ကတွာ ဂဏှေယျုံ, တဒဿ တေသံ ဒီဃရတ္တံ အဟိတာယ ဒုက္ခာယာတိ. တေနာဟ ‘‘အထဿာ’’တိအာဒိ. वहाँ सातवें दिन बोधिसत्व द्वारा जो सूर्योदय का निवारण किया गया, यहाँ ‘योग’ (उपाय) से यही अभिप्राय है। उस उपाय से व्याकुल होकर राजा सहित परिषद, नगरवासी, नैगम (व्यापारी) और जनपदवासी उस तापस को बोधिसत्व के पास ले आए और क्षमा याचना करवाई। उसने भी बोधिसत्व के गुणों को जानकर उनके प्रति चित्त प्रसन्न किया। उसके मस्तक पर जो मिट्टी का पिण्ड रखा गया और उसके सात टुकड़े किए गए, वह मनुष्यों के चित्त की रक्षा के लिए था। अन्यथा वे सोचते— ‘ये प्रव्रजित होकर भी चित्त के वश में रहते हैं, चित्त को अपने वश में नहीं रखते’, और वे महासत्व को भी उसी के समान समझ लेते, जो उनके लिए दीर्घकाल तक अहित और दुःख का कारण होता। इसीलिए ‘अथस्स’ आदि कहा गया है। လောဟကူဋဝဿန္တိ အယဂုဠဝဿံ. တဒါ ဟိ ရတနမတ္တာနိ ဒိယဍ္ဎရတနမတ္တာနိပိ တိခိဏံသာနိ အယဂုဠမဏ္ဍလာနိ ဣတော စိတော စ နိပတန္တာ မနုဿာနံ သရီရာနိ ခဏ္ဍခဏ္ဍကာနိ အကံသု. ကလလဝဿန္တိ တနုကကဒ္ဒမပဋလကဒ္ဒမံ. ဥပဟစ္စာတိ အာဃာဋေတွာ. တဒေဝ မဇ္ဈာရညံ. ‘लोहकूट-वर्ष’ का अर्थ है लोहे के गोलों की वर्षा। उस समय एक रत्न (हाथ) और डेढ़ रत्न के परिमाण वाले तीक्ष्ण धार वाले लोहे के गोलों के मण्डल इधर-उधर गिरते हुए मनुष्यों के शरीरों को टुकड़े-टुकड़े कर रहे थे। ‘कलल-वर्ष’ का अर्थ है पतले कीचड़ और कीचड़ की परतों की वर्षा। ‘उपहच्च’ का अर्थ है आघात पहुँचाकर। वही मध्य अरण्य है। ၆၇. အနုဝိစ္စကာရန္တိ အနုဝိစ္စကရဏံ. ကာရဏေဟိ ဒွီဟိ အနိယျာနိကသာသနေ ဌိတာနံ အတ္တနော သာဝကတ္တံ ဥပဂတေ ပဂ္ဂဟနိဂ္ဂဟာနိ ဒဿေတုံ ‘‘ကသ္မာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. ६७. ‘अनुविच्चकार’ का अर्थ है छानबीन या जाँच-परख कर कार्य करना। दो कारणों से, अनिर्याणिक शासन (मुक्ति न देने वाले मत) में स्थित अपने श्रावकत्व को प्राप्त हुए लोगों के प्रति प्रग्रह (प्रोत्साहन) और निग्रह (दमन) दिखाने के लिए ‘कस्मा’ (क्यों) आदि कहा गया है। ၆၉. အနုပုဗ္ဗိံ ကထန္တိ (ဒီ. နိ. ဋီ. ၂.၇၅-၇၆; အ. နိ. ဋီ. ၃.၈.၁၂) အနုပုဗ္ဗိယာ အနုပုဗ္ဗံ ကထေတဗ္ဗကထံ, ကာ ပန သာ? ဒါနာဒိကထာ. ဒါနကထာ တာဝ ပစုရဇနေသုပိ ပဝတ္တိယာ သဗ္ဗသာဓာရဏတ္တာ သုကရတ္တာ သီလေ ပတိဋ္ဌာနဿ ဥပါယဘာဝတော စ အာဒိတောဝ ကထိတာ[Pg.36]. ပရိစ္စာဂသီလော ဟိ ပုဂ္ဂလော ပရိဂ္ဂဟဝတ္ထူသု နိဿင်္ဂဘာဝတော သုခေနေဝ သီလာနိ သမာဒိယတိ, တတ္ထ စ သုပ္ပတိဋ္ဌိတော ဟောတိ. သီလေန ဒါယကပဋိဂ္ဂဟဏဝိသုဒ္ဓိတော ပရာနုဂ္ဂဟံ ဝတွာ ပရပီဠာနိဝတ္တိဝစနတော, ကိရိယဓမ္မံ ဝတွာ အကိရိယဓမ္မဝစနတော, ဘောဂယသသမ္ပတ္တိဟေတုံ ဝတွာ ဘဝသမ္ပတ္တိဟေတုဝစနတော စ ဒါနကထာနန္တရံ သီလကထာ ကထိတာ. တဉ္စ သီလံ ဝဋ္ဋနိဿိတံ, အယံ ဘဝသမ္ပတ္တိ တဿ ဖလန္တိ ဒဿနတ္ထံ, ဣမေဟိ စ ဒါနသီလမယေဟိ ပဏီတစရိယဘေဒဘိန္နေဟိ ပုညကိရိယဝတ္ထူဟိ ဧတာ စာတုမဟာရာဇိကာဒီသု ပဏီတတရာဒိဘေဒဘိန္နာ အပရိမေယျာ ဘောဂဘဝသမ္ပတ္တိယောတိ ဒဿနတ္ထံ တဒနန္တရံ သဂ္ဂကထာ. သွာယံ သဂ္ဂေါ ရာဂါဒီဟိ ဥပက္ကိလိဋ္ဌော သဗ္ဗဒါ အနုပက္ကိလိဋ္ဌော အရိယမဂ္ဂေါတိ ဒဿနတ္ထံ သဂ္ဂါနန္တရံ မဂ္ဂေါ, မဂ္ဂဉ္စ ကထေန္တေန တဒဓိဂမူပါယသန္ဒဿနတ္ထံ သဂ္ဂပရိယာပန္နာပိ ပဂေဝ ဣတရေ သဗ္ဗေပိ ကာမာ နာမ ဗဟွာဒီနဝါ အနိစ္စာ အဒ္ဓုဝါ ဝိပရိဏာမဓမ္မာတိ ကာမာနံ အာဒီနဝေါ. ဟီနာ ဂမ္မာ ပေါထုဇ္ဇနိကာ အနရိယာ အနတ္ထသဉှိတာတိ တေသံ ဩကာရော လာမကဘာဝေါ, သဗ္ဗေပိ ဘဝါ ကိလေသာနံ ဝတ္ထုဘူတာတိ တတ္ထ သံကိလေသော. သဗ္ဗသော ကိလေသဝိပ္ပမုတ္တံ နိဗ္ဗာနန္တိ နေက္ခမ္မေ အာနိသံသော စ ကထေတဗ္ဗောတိ အယမတ္ထော မဂ္ဂန္တီတိ ဧတ္ထ ဣတိ-သဒ္ဒေန ဒဿိတောတိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ६९. ‘आनुपूर्वी कथा’ का अर्थ है क्रमवार कही जाने वाली कथा। वह क्या है? दान आदि की कथा। दान-कथा सामान्य जनों में भी प्रचलित होने के कारण, सबके लिए साधारण होने के कारण, सुगम होने के कारण और शील में प्रतिष्ठित होने का उपाय होने के कारण सबसे पहले कही गई है। क्योंकि त्यागशील व्यक्ति परिग्रह की वस्तुओं में आसक्ति न होने के कारण सुखपूर्वक शीलों को ग्रहण करता है और उनमें भली-भाँति प्रतिष्ठित होता है। शील के द्वारा दाता और प्रतिग्राहक की शुद्धि से पर-अनुग्रह (दूसरों पर कृपा) बताकर और दूसरों को पीड़ा देने की निवृत्ति का वचन कहकर, क्रिया-धर्म बताकर अक्रिया-धर्म का निषेध कर, तथा भोग और यश की सम्पत्ति का हेतु बताकर भव-सम्पत्ति का हेतु बताने के लिए दान-कथा के बाद शील-कथा कही गई है। वह शील संसार (वट्ठ) के आश्रित है और यह भव-सम्पत्ति उसका फल है—यह दिखाने के लिए, तथा इन दान और शीलमय उत्तम चर्याओं के भेदों से युक्त पुण्य-क्रिया-वस्तुओं से चातुर्महाराजिक आदि देवलोकों में ये श्रेष्ठतर भेदों वाली अपरिमेय भोग और भव की सम्पत्तियाँ प्राप्त होती हैं—यह दिखाने के लिए उसके बाद स्वर्ग-कथा कही गई है। वह स्वर्ग राग आदि से क्लिष्ट है और आर्यमार्ग सर्वदा अक्लिष्ट है—यह दिखाने के लिए स्वर्ग के बाद मार्ग की कथा है। मार्ग का कथन करते हुए उसकी प्राप्ति के उपाय को दिखाने के लिए, स्वर्ग के अन्तर्गत आने वाले और उससे इतर भी सभी काम (भोग) बहुत दोषों वाले, अनित्य, अध्रुव और विपरिणामधर्मी हैं—यह ‘कामों का आदिनव’ (दोष) है। वे हीन, ग्राम्य, पृथग्जनोचित, अनार्य और अनर्थकारी हैं—यह उनका ‘ओकार’ (तुच्छता) है। सभी भव क्लेशों के आधार हैं—यह उनमें ‘संक्लेश’ है। सर्वथा क्लेशों से विमुक्त निर्वाण है—यह ‘नैष्क्रम्य’ (त्याग) में ‘नृशंस’ (लाभ) कहा जाना चाहिए। यह अर्थ ‘मग्गन्ति’ यहाँ ‘इति’ शब्द से दिखाया गया है, ऐसा समझना चाहिए। သုခါနံ နိဒါနန္တိ ဒိဋ္ဌဓမ္မိကာနံ သမ္ပရာယိကာနံ နိဗ္ဗာနသဉှိတာနဉ္စာတိ သဗ္ဗေသမ္ပိ သုခါနံ ကာရဏံ. ယဉှိ ကိဉ္စိ လောကေ ဘောဂသုခံ နာမ, တံ သဗ္ဗံ ဒါနနိဒါနန္တိ ပါကဋော အယမတ္ထော. ယံ ပန ဈာနဝိပဿနာမဂ္ဂဖလနိဗ္ဗာနပဋိသံယုတ္တံ သုခံ, တဿပိ ဒါနံ ဥပနိဿယပစ္စယော ဟောတိယေဝ. သမ္ပတ္တီနံ မူလန္တိ ယာ ဣမာ လောကေ ပဒေသရဇ္ဇသိရိဿရိယသတ္တရတနသမုဇ္ဇလစက္ကဝတ္တိသမ္ပဒါတိ ဧဝံပဘေဒါ မာနုသိကာ သမ္ပတ္တိယော, ယာ စ စာတုမဟာရာဇာဒိဂတာ ဒိဗ္ဗာ သမ္ပတ္တိယော, ယာ ဝါ ပနညာပိ သမ္ပတ္တိယော, တာသံ သဗ္ဗာသံ ဣဒံ မူလကာရဏံ. ဘောဂါနန္တိ ဘုဉ္ဇိတဗ္ဗဋ္ဌေန ‘‘ဘောဂေါ’’န္တိ လဒ္ဓနာမာနံ မနာပိယရူပါဒီနံ, တန္နိဿယာနံ ဝါ ဥပဘောဂသုခါနံ, ပတိဋ္ဌာ နိစ္စလာဓိဋ္ဌာနတာယ. ဝိသမဂတဿာတိ ဗျသနပ္ပတ္တဿ. တာဏန္တိ ရက္ခာ တတော ပရိပါလနတော. လေဏန္တိ ဗျသနေဟိ ပရိပါတိယမာနဿ ဩလီယနပဒေသော. ဂတီတိ ဂန္တဗ္ဗဋ္ဌာနံ. ပရာယဏန္တိ ပဋိသရဏံ. အဝဿယောတိ ဝိနိပတိတုံ အဒေန္တော နိဿယော. အာရမ္မဏန္တိ ဩလုဗ္ဘာရမ္မဏံ. "सुखों का निदान" का अर्थ है—दृष्टधार्मिक (वर्तमान), साम्परायिक (परलोक) और निर्वाण से संबंधित सभी सुखों का कारण। लोक में जो कुछ भी 'भोग-सुख' कहलाता है, वह सब दान से उत्पन्न होता है, यह अर्थ स्पष्ट है। जो ध्यान, विपश्यना, मार्ग, फल और निर्वाण से संबंधित सुख है, उसके लिए भी दान उपनिश्रय-प्रत्यय (प्रबल कारण) ही होता है। "सम्पत्तियों का मूल" का अर्थ है—इस लोक में प्रादेशिक राज्य की लक्ष्मी, ऐश्वर्य और सात रत्नों से देदीप्यमान चक्रवर्ती सम्पदा जैसी विभिन्न मानवीय सम्पत्तियाँ, और चातुर्महाराजिक आदि देवलोकों की दिव्य सम्पत्तियाँ, अथवा जो अन्य भी सम्पत्तियाँ हैं, उन सबका यह मूल कारण है। "भोगों का" का अर्थ है—उपभोग किए जाने के अर्थ में 'भोग' नाम प्राप्त मनभावन रूप आदि का, अथवा उन पर आश्रित उपभोग-सुखों का, स्थिरता के कारण "प्रतिष्ठा" (आधार) है। "विषमगतस्य" का अर्थ है—विपत्ति में पड़े हुए व्यक्ति का। "त्राण" का अर्थ है—उससे रक्षा करना। "लेण" (लयन) का अर्थ है—विपत्तियों से पीड़ित व्यक्ति के छिपने का स्थान। "गति" का अर्थ है—जाने योग्य स्थान। "परायण" का अर्थ है—शरण। "अवश्रय" का अर्थ है—नीचे गिरने न देने वाला सहारा। "आलम्बन" का अर्थ है—पकड़ने योग्य सहारा। ရတနမယသီဟာသနသဒိသန္တိ [Pg.37] သဗ္ဗရတနမယသတ္တင်္ဂမဟာသီဟာသနသဒိသံ, မဟဂ္ဃံ ဟုတွာ သဗ္ဗသော ဝိနိပတိတုံ အပ္ပဒါနတော. မဟာပထဝိသဒိသံ ဂတဂတဋ္ဌာနေ ပတိဋ္ဌာသမ္ဘဝတော. ယထာ ဒုဗ္ဗလဿ ပုရိသဿ အာလမ္ဗနရဇ္ဇု ဥတ္တိဋ္ဌတော တိဋ္ဌတော စ ဥပတ္ထမ္ဘော, ဧဝံ ဒါနံ သတ္တာနံ သမ္ပတ္တိဘဝေ ဥပပတ္တိယာ ဌိတိယာ စ ပစ္စယော ဟောတီတိ အာဟ ‘‘အာလမ္ဗနဋ္ဌေန အာလမ္ဗနရဇ္ဇုသဒိသ’’န္တိ. ဒုက္ခနိတ္ထရဏဋ္ဌေနာတိ ဒုဂ္ဂတိဒုက္ခနိတ္ထရဏဋ္ဌေန. သမဿာသနဋ္ဌေနာတိ လောဘမစ္ဆရိယာဒိပဋိသတ္တုပဒ္ဒဝတော သမ္မဒေဝ အဿာသနဋ္ဌေန. ဘယပရိတ္တာဏဋ္ဌေနာတိ ဒါလိဒ္ဒိယဘယတော ပရိပါလနဋ္ဌေန. မစ္ဆေရမလာဒီဟီတိ မစ္ဆေရလောဘဒေါသဣဿာမိစ္ဆာဒိဋ္ဌိဝိစိကိစ္ဆာဒိ စိတ္တမလေဟိ. အနုပလိတ္တဋ္ဌေနာတိ အနုပက္ကိလိဋ္ဌတာယ. တေသန္တိ မစ္ဆေရမလာဒီနံ. ဧတေသံ ဧဝ ဒုရာသဒဋ္ဌေန. အသန္တာသနဋ္ဌေနာတိ အသန္တာသဟေတုဘာဝေန. ယော ဟိ ဒါယကော ဒါနပတိ, သော သမ္ပတိပိ န ကုတောစိ သန္တသတိ, ပဂေဝ အာယတိံ. ဗလဝန္တဋ္ဌေနာတိ မဟာဗလဝတာယ. ဒါယကော ဟိ ဒါနပတိ သမ္ပတိ ပက္ခဗလေန ဗလဝါ ဟောတိ, အာယတိံ ပန ကာယဗလာဒီဟိ. အဘိမင်္ဂလသမ္မတဋ္ဌေနာတိ ‘‘ဝုဍ္ဎိကာရဏ’’န္တိ အဘိသမ္မတဘာဝေန. ဝိပတ္တိတော သမ္ပတ္တိယာ နယနံ ခေမန္တဘူမိသမ္ပာပနံ. "रत्नमय सिंहासन के समान" का अर्थ है—सभी रत्नों से बने सात अंगों वाले महान सिंहासन के समान, क्योंकि यह बहुमूल्य होने के कारण पूरी तरह से पतन होने से रोकता है। "महापृथ्वी के समान" क्योंकि जहाँ-जहाँ भी जाएँ, वहाँ आधार की संभावना होती है। जैसे किसी दुर्बल व्यक्ति के लिए उठते और खड़े होते समय सहारा देने वाली रस्सी आलम्बन होती है, वैसे ही दान सत्त्वों के लिए सम्पत्तिशाली भव में उत्पत्ति और स्थिति का प्रत्यय (कारण) होता है, इसलिए कहा गया—"आलम्बन के अर्थ में आलम्बन-रज्जु के समान"। "दुःख से पार उतारने के अर्थ में" अर्थात् दुर्गति के दुःख से पार उतारने के अर्थ में। "आश्वासन के अर्थ में" अर्थात् लोभ, मत्सर आदि शत्रुओं के उपद्रव से भली-भाँति आश्वस्त करने के अर्थ में। "भय से रक्षा के अर्थ में" अर्थात् दरिद्रता के भय से रक्षा करने के अर्थ में। "मत्सर (कंजूसी) रूपी मल आदि से" अर्थात् मत्सर, लोभ, द्वेष, ईर्ष्या, मिथ्यादृष्टि और विचिकित्सा आदि चित्त के मलों से। "अनुलिप्त होने के अर्थ में" अर्थात् अपवित्र न होने के कारण। "उनका" अर्थात् मत्सर रूपी मल आदि का। "इन्हीं के लिए दुर्धर्ष होने के अर्थ में"। "असंतासन (निर्भयता) के अर्थ में" अर्थात् निर्भयता का कारण होने से। जो दायक दानपति होता है, वह वर्तमान में भी किसी से नहीं डरता, भविष्य की तो बात ही क्या। "बलवान होने के अर्थ में" अर्थात् महान बलशाली होने के कारण। दायक दानपति वर्तमान में पक्ष-बल से बलवान होता है और भविष्य में काय-बल आदि से। "अभिमांगल्य सम्मत होने के अर्थ में" अर्थात् "वृद्धि का कारण" के रूप में मान्य होने के कारण। विपत्ति से सम्पत्ति की ओर ले जाना ही क्षेम-भूमि (सुरक्षित स्थान) तक पहुँचाना है। ဣဒါနိ မဟာဗောဓိစရိယဘာဝေနပိ ဒါနဂုဏံ ဒဿေတုံ ဒါနံ နာမေတန္တိအာဒိ ဝုတ္တံ. တတ္ထ အတ္တာနံ နိယျာဒေန္တေနာတိ ဧတေန ဒါနဖလံ သမ္မဒေဝ ပဿန္တာ မဟာပုရိသာ အတ္တနော ဇီဝိတမ္ပိ ပရိစ္စဇန္တိ, တသ္မာ ကော နာမ ဝိညုဇာတိကော ဗာဟိရေ ဝတ္ထုမှိ သင်္ဂံ ကရေယျာတိ ဩဝါဒံ ဒေတိ. ဣဒါနိ ယာ လောကိယာ လောကုတ္တရာ စ ဥက္ကံသဂတာ သမ္ပတ္တိယော, တာ သဗ္ဗာ ဒါနတောယေဝ ပဝတ္တန္တီတိ ဒဿေန္တော ‘‘ဒါနဉှီ’’တိအာဒိမာဟ. တတ္ထ သက္ကမာရဗြဟ္မသမ္ပတ္တိယော အတ္တဟိတာယ ဧဝ, စက္ကဝတ္တိသမ္ပတ္တိ ပန အတ္တဟိတာယ စ ပရဟိတာယ စာတိ ဒဿေတုံ သာ တာသံ ပရတော ဝုတ္တာ. ဧတာ လောကိယာ, ဣမာ ပန လောကုတ္တရာတိ ဒဿေတုံ ‘‘သာဝကပါရမီဉာဏ’’န္တိအာဒိ ဝုတ္တံ. တာသုပိ ဥက္ကဋ္ဌုက္ကဋ္ဌတရုက္ကဋ္ဌတမမေဝ ဒဿေတုံ ကမေန ဉာဏတ္တယံ ဝုတ္တံ. တေသံ ပန ဒါနဿ ပစ္စယဘာဝေါ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တောယေဝ. ဧတေနေဝ တဿ ဗြဟ္မသမ္ပတ္တိယာပိ ပစ္စယဘာဝေါ ဒီပိတောတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. अब महाबोधिचर्या के रूप में भी दान के गुण को दिखाने के लिए "दानं नामेतं" आदि कहा गया है। वहाँ "अपने आप को समर्पित करते हुए" इसके द्वारा दान के फल को भली-भाँति देखते हुए महापुरुष अपने जीवन का भी परित्याग कर देते हैं, इसलिए कौन बुद्धिमान व्यक्ति बाहरी वस्तुओं में आसक्ति करेगा—यह उपदेश देते हैं। अब जो लौकिक और लोकोत्तर उत्कृष्ट सम्पत्तियाँ हैं, वे सभी दान से ही प्रवृत्त होती हैं, यह दिखाने के लिए "दानं हि" आदि कहा। वहाँ शक्र, मार और ब्रह्मा की सम्पत्तियाँ केवल आत्म-हित के लिए ही हैं, किन्तु चक्रवर्ती सम्पदा आत्म-हित और पर-हित दोनों के लिए है, यह दिखाने के लिए उसे उनके बाद कहा गया है। ये लौकिक हैं और ये लोकोत्तर हैं, यह दिखाने के लिए "श्रावक-पारमी ज्ञान" आदि कहा गया है। उनमें भी उत्कृष्ट, उत्कृष्टतर और उत्कृष्टतम को ही दिखाने के लिए क्रमशः तीन ज्ञानों को कहा गया है। उनके लिए दान का प्रत्यय-भाव पहले ही कहा जा चुका है। इसी से उसकी ब्रह्म-सम्पत्ति के लिए भी प्रत्यय-भाव को समझना चाहिए। ဒါနဉ္စ နာမ ဟိတဇ္ဈာသယေန, ပူဇာဝသေန ဝါ အတ္တနော သန္တကဿ ပရေသံ ပရိစ္စဇနံ, တသ္မာ ဒါယကော ပုရိသပုဂ္ဂလော ပရေသံ သန္တကံ ဟရိဿတီတိ [Pg.38] အဋ္ဌာနမေတန္တိ အာဟ – ‘‘ဒါနံ ဒဒန္တော သီလံ သမာဒါတုံ သက္ကောတီ’’တိ. သီလာလင်္ကာရသဒိသော အလင်္ကာရော နတ္ထိ သောဘာဝိသေသာဝဟတ္တာ သီလဿ. သီလပုပ္ဖသဒိသံ ပုပ္ဖံ နတ္ထီတိ ဧတ္ထာပိ ဧသေဝ နယော. သီလဂန္ဓသဒိသော ဂန္ဓော နတ္ထီတိ ဧတ္ထ ‘‘စန္ဒနံ တဂရံ ဝါပီ’’တိအာဒိကာ (ဓ. ပ. ၅၅; မိ. ပ. ၄.၁.၁) ဂါထာ – ‘‘ဂန္ဓော ဣသီနံ စိရဒိက္ခိတာနံ, ကာယာ စုတော ဂစ္ဆတိ မာလုတေနာ’’တိအာဒိကာ (ဇာ. ၂.၁၇.၅၅) ဇာတကဂါထာယော စ အာဟရိတွာ ဝတ္တဗ္ဗာ, သီလဉှိ သတ္တာနံ အာဘရဏဉ္စေဝ အလင်္ကာရော စ ဂန္ဓဝိလေပနဉ္စ ဒဿနီယဘာဝါဝဟဉ္စ. တေနာဟ ‘‘သီလာလင်္ကာရေန ဟီ’’တိအာဒိ. दान का अर्थ है—हित की भावना से अथवा पूजा के भाव से अपनी वस्तु का दूसरों के लिए परित्याग करना, इसलिए दायक पुरुष दूसरों की वस्तु को हरण करेगा, यह असंभव है—यही कहा गया है कि "दान देते हुए वह शील को ग्रहण करने में समर्थ होता है"। शील रूपी अलंकार के समान कोई अलंकार नहीं है, क्योंकि शील विशेष शोभा लाने वाला है। शील रूपी पुष्प के समान कोई पुष्प नहीं है—यहाँ भी यही तर्क है। शील रूपी गंध के समान कोई गंध नहीं है—यहाँ "चन्दनं तगरं वापि" आदि गाथा और "चिर दीक्षित ऋषियों की गंध शरीर से निकलकर वायु के साथ जाती है" आदि जातक गाथाएँ उद्धृत कर कहनी चाहिए। शील ही सत्त्वों का आभूषण, अलंकार, गंध-विलेपन और दर्शनीयता लाने वाला है। इसीलिए कहा गया—"शील रूपी अलंकार से ही" आदि। အယံ သဂ္ဂေါ လဗ္ဘတီတိ ဣဒံ မဇ္ဈိမေဟိ ဆန္ဒာဒီဟိ သမာဒါနသီလံ သန္ဓာယာဟ. တေနာဟ သက္ကော ဒေဝရာဇာ – "यह स्वर्ग प्राप्त होता है"—यह मध्यम छन्द (इच्छा) आदि के साथ समादान किए गए (ग्रहण किए गए) शील के संदर्भ में कहा गया है। इसीलिए देवराज शक्र ने कहा है— ‘‘ဟီနေန ဗြဟ္မစရိယေန, ခတ္တိယေ ဥပပဇ္ဇတိ; မဇ္ဈိမေန စ ဒေဝတ္တံ, ဥတ္တမေန ဝိသုဇ္ဈတီ’’တိ. (ဇာ. ၁.၈.၇၅; ၂.၂၂.၄၂၉; ဒီ. နိ. ဋီ. ၂.၇၅-၇၆); "निम्न ब्रह्मचर्य से क्षत्रिय कुल में जन्म होता है; मध्यम से देवत्व प्राप्त होता है, और उत्तम से मनुष्य विशुद्ध हो जाता है।" ဣဋ္ဌောတိ သုခေါ. ကန္တောတိ ကမနီယော. မနာပေါတိ မနဝဍ္ဎနကော. တံ ပန တဿ ဣဋ္ဌာဒိဘာဝံ ဒဿေတုံ ‘‘နိစ္စမေတ္ထ ကီဠာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. "इष्ट" का अर्थ है सुखद। "कान्त" का अर्थ है कमनीय (चाहने योग्य)। "मनाप" का अर्थ है मन को बढ़ाने वाला (प्रिय)। उसके उस इष्ट आदि भाव को दिखाने के लिए "यहाँ नित्य क्रीड़ा" आदि कहा गया है। ဒေါသောတိ အနိစ္စတာဒိနာ အပ္ပဿာဒါဒိနာ စ ဒူသိတဘာဝေါ, ယတော တေ ဝိညူနံ စိတ္တံ နာရာဓေန္တိ. အထ ဝါ အာဒီနံ ဝါတိ ပဝတ္တေတီတိ အာဒီနဝေါ, ပရမကပဏတာ. တထာ စ ကာမာ ယထာဘူတံ ပစ္စဝေက္ခန္တာနံ ပစ္စုပတိဋ္ဌန္တိ. လာမကဘာဝေါတိ အသေဋ္ဌေဟိ သေဝိတဗ္ဗော, သေဋ္ဌေဟိ န သေဝိတဗ္ဗော နိဟီနဘာဝေါ. သံကိလိဿနန္တိ ဝိဗာဓကတာ ဥပတာပတာ စ. 'दोष' का अर्थ है अनित्यता और अल्प-आस्वाद आदि के कारण दूषित होना, जिससे वे विद्वानों के चित्त को प्रसन्न नहीं करते। अथवा, 'आदीन' (विनाश) की ओर ले जाने वाला 'आदीनव' है, जो परम दीनता (कष्ट) है। तथा काम-भोगों का यथार्थ रूप से प्रत्यवेक्षण करने वालों के सामने वे इसी रूप में उपस्थित होते हैं। 'लामकभाव' (नीचता) का अर्थ है जो श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा सेवन करने योग्य नहीं है, बल्कि अश्रेष्ठों द्वारा सेवनीय है, यह हीन अवस्था है। 'संक्लिष्टता' का अर्थ है बाधा पहुँचाने वाला और संतापकारी होना। နေက္ခမ္မေ အာနိသံသန္တိ ဧတ္ထ ယတ္တကာ ကာမေသု အာဒီနဝါ, တပ္ပဋိပက္ခတော တတ္တကာ နေက္ခမ္မေ အာနိသံသာ. အပိစ – ‘‘နေက္ခမ္မံ နာမေတံ အသမ္ဗာဓံ အသံကိလိဋ္ဌံ နိက္ခန္တံ ကာမေဟိ, နိက္ခန္တံ ကာမသညာယ, နိက္ခန္တံ ကာမဝိတက္ကေဟိ, နိက္ခန္တံ ကာမပရိဠာဟေဟိ, နိက္ခန္တံ ဗျာပါဒသညာယာ’’တိအာဒိနာ (သာရတ္ထ. ဋီ. မဟာဝဂ္ဂ ၃.၂၆; ဒီ. နိ. ဋီ. ၂.၇၅-၇၆) နယေန နေက္ခမ္မေ အာနိသံသေ ပကာသေသိ, ပဗ္ဗဇ္ဇာယ ဈာနာဒီသု စ ဂုဏေ ဝိဘာဝေသိ ဝဏ္ဏေသိ. ကလ္လစိတ္တန္တိ ဟေဋ္ဌာ ပဝတ္တိတဒေသနာယ အဿဒ္ဓိယာဒီနံ စိတ္တဒေါသာနံ ဝိဂတတ္တာ ဥပရိဒေသနာယ ဘာဇနဘာဝူပဂမနေန ကမ္မက္ခမစိတ္တံ. အဋ္ဌကထာယံ ပန ယသ္မာ အဿဒ္ဓိယာဒယော စိတ္တဿ ရောဂဘူတာ[Pg.39], တဒါ တေ ဝိဂတာ, တသ္မာ အာဟ ‘‘အရောဂစိတ္တ’’န္တိ. ဒိဋ္ဌိမာနာဒိကိလေသဝိဂမေန မုဒုစိတ္တံ. ကာမစ္ဆန္ဒာဒိဝိဂမေန ဝိနီဝရဏစိတ္တံ. သမ္မာပဋိပတ္တိယံ ဥဠာရပီတိပါမောဇ္ဇယောဂေန ဥဒဂ္ဂစိတ္တံ. တတ္ထ သဒ္ဓါသမ္ပတ္တိယာ ပသန္နစိတ္တံ. ယဒါ ဘဂဝါ အညာသီတိ သမ္ဗန္ဓော. အထ ဝါ ကလ္လစိတ္တန္တိ ကာမစ္ဆန္ဒဝိဂမေန အရောဂစိတ္တံ. မုဒုစိတ္တန္တိ ဗျာပါဒဝိဂမေန မေတ္တာဝသေန အကထိနစိတ္တံ. ဝိနီဝရဏစိတ္တန္တိ ဥဒ္ဓစ္စကုက္ကုစ္စဝိဂမေန ဝိက္ခေပဿ ဝိဂတတ္တာ တေန အပိဟိတစိတ္တံ. ဥဒဂ္ဂစိတ္တန္တိ ထိနမိဒ္ဓဝိဂမေန သမ္ပဂ္ဂဟိတဝသေန အလီနစိတ္တံ. ပသန္နစိတ္တန္တိ ဝိစိကိစ္ဆာဝိဂမေန သမ္မာပဋိပတ္တိယံ အဓိမုတ္တစိတ္တန္တိ ဧဝမေတ္ထ သေသပဒါနံ အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. 'नैष्क्रम्य के आनृशंस' (लाभ) के विषय में: काम-भोगों में जितने दोष (आदीनव) हैं, उसके विपरीत नैष्क्रम्य में उतने ही लाभ हैं। इसके अतिरिक्त— 'यह नैष्क्रम्य संबाध-रहित, असंक्लिष्ट, काम-भोगों से निकला हुआ, काम-संज्ञा से निकला हुआ, काम-वितर्कों से निकला हुआ, काम-परिदाहों से निकला हुआ और व्यापाद-संज्ञा से निकला हुआ है'—इस प्रकार नैष्क्रम्य के लाभों को प्रकाशित किया, प्रव्रज्या और ध्यान आदि के गुणों का विस्तार से वर्णन किया। 'कल्लचित्त' (स्वस्थ चित्त) का अर्थ है—पूर्व में दी गई देशना से अश्रद्धा आदि चित्त-दोषों के दूर हो जाने के कारण, आगामी देशना के लिए पात्र बनने योग्य कर्मण्य चित्त। अट्ठकथा में कहा गया है कि चूँकि अश्रद्धा आदि चित्त के रोग हैं, और वे उस समय दूर हो गए थे, इसलिए इसे 'अरोग चित्त' कहा गया है। दृष्टि और मान आदि क्लेशों के दूर होने से 'मृदु चित्त'। काम-छन्द आदि के दूर होने से 'विनीवरण चित्त'। सम्यक् प्रतिपत्ति में उदार प्रीति और प्रमोद के योग से 'उदग्र चित्त'। उसमें श्रद्धा की सम्पत्ति से 'प्रसन्न चित्त'। 'जब भगवान ने जाना'—यह सम्बन्ध है। अथवा, 'कल्लचित्त' का अर्थ काम-छन्द के दूर होने से अरोग चित्त है। 'मृदुचित्त' का अर्थ व्यापाद के दूर होने से मैत्री के कारण अ-कठोर चित्त है। 'विनीवरणचित्त' का अर्थ औद्धत्य-कुकृत्य के दूर होने से विक्षेप के अभाव के कारण अनावरण चित्त है। 'उदग्रचित्त' का अर्थ स्त्यान-मृद्ध के दूर होने से प्रग्रह के कारण अ-लीन चित्त है। 'प्रसन्नचित्त' का अर्थ विचिकित्सा के दूर होने से सम्यक् प्रतिपत्ति में अधिमुक्त चित्त है—इस प्रकार यहाँ शेष पदों का अर्थ समझना चाहिए। သေယျထာပီတိအာဒိနာ ဥပမာဝသေန ဥပါလိဿ သံကိလေသပ္ပဟာနံ အရိယမဂ္ဂနိပ္ဖာဒနဉ္စ ဒဿေတိ. အပဂတကာဠကန္တိ ဝိဂတကာဠကံ. သမ္မဒေဝါတိ သုဋ္ဌု ဧဝ. ရဇနန္တိ နီလပီတာဒိရင်္ဂဇာတံ. ပဋိဂ္ဂဏှေယျာတိ ဂဏှေယျ ပဘဿရံ ဘဝေယျ. တသ္မိံယေဝ အာသနေတိ တိဿံ ဧဝ နိသဇ္ဇာယံ. ဧတေနဿ လဟုဝိပဿကတာ တိက္ခပညတာ သုခပဋိပဒါခိပ္ပာဘိညတာ စ ဒဿိတာ ဟောတိ. ဝိရဇန္တိ အပါယဂမနီယရာဂရဇာဒီနံ ဝိဂမေန ဝိရဇံ. အနဝသေသဒိဋ္ဌိဝိစိကိစ္ဆာမလာပဂမေန ဝီတမလံ. တိဏ္ဏံ မဂ္ဂါနန္တိ ဟေဋ္ဌိမာနံ တိဏ္ဏံ မဂ္ဂါနံ. တဿ ဥပ္ပတ္တိအာကာရဒဿနန္တိ ကသ္မာ ဝုတ္တံ? နနု မဂ္ဂဉာဏံ အသင်္ခတဓမ္မာရမ္မဏန္တိ စောဒနံ သန္ဓာယာဟ ‘‘တံ ဟီ’’တိအာဒိ. တတ္ထ ပဋိဝိဇ္ဈန္တန္တိ အသမ္မောဟပဋိဝေဓဝသေန ပဋိဝိဇ္ဈန္တံ. တေနာဟ ‘‘ကိစ္စဝသေနာ’’တိ. 'जैसे कि' आदि उपमा के माध्यम से उपालि के संक्लेशों के प्रहाण और आर्यमार्ग की निष्पत्ति को दिखाया गया है। 'अपगतकालकम्' का अर्थ है—काले धब्बों से रहित। 'सम्मदेव' का अर्थ है—भली-भाँति। 'रजनम्' का अर्थ है—नील-पीत आदि रंग। 'प्रतिगृह्णीयात्' का अर्थ है—ग्रहण कर ले, प्रभास्वर हो जाए। 'उसी आसन पर'—इससे उसकी लघु-विपश्यना, तीक्ष्ण प्रज्ञा और सुख-प्रतिपदा-क्षिपाभिज्ञा प्रदर्शित होती है। 'विरज' का अर्थ है—अपायगामी राग-रज आदि के दूर होने से रज-रहित। 'वीतमल' का अर्थ है—अविशेष दृष्टि और विचिकित्सा रूपी मल के दूर होने से निर्मल। 'तीन मार्गों का'—अर्थात् नीचे के तीन मार्गों का। उसके उत्पत्ति के प्रकार को दिखाने के लिए ऐसा क्यों कहा गया? क्या मार्ग-ज्ञान असंस्कृत धर्म को आलम्बन बनाने वाला नहीं है? इस शंका के समाधान में 'तं ही' आदि कहा गया है। वहाँ 'प्रतिवेध करते हुए' का अर्थ है—असंमोह-प्रतिवेध के वश से भेदन करना। इसीलिए कहा गया—'कृत्य के वश से'। တတြိဒံ ဥပမာသံသန္ဒနံ – ဝတ္ထံ ဝိယ စိတ္တံ, ဝတ္ထဿ အာဂန္တုကမလေဟိ ကိလိဋ္ဌဘာဝေါ ဝိယ စိတ္တဿ ရာဂါဒိမလေဟိ သံကိလိဋ္ဌဘာဝေါ, ဓောဝနသိလာ ဝိယ အနုပုဗ္ဗီကထာ, ဥဒကံ ဝိယ သဒ္ဓါ, ဥဒကေ တေမေတွာ ဦသဂေါမယဆာရိကာဘရေဟိ ကာဠကပဒေသေ သမ္မဒ္ဒိတွာ ဝတ္ထဿ ဓောဝနပယောဂေါ ဝိယ သဒ္ဓါသိနေဟေန တေမေတွာ သတိသမာဓိပညာဟိ ဒေါသေ သိထိလေ ကတွာ သုတာဒိဝိဓိနာ စိတ္တဿ သောဓနေ ဝီရိယာရမ္ဘော. တေန ပယောဂေန ဝတ္ထေ ကာဠကာပဂမော ဝိယ ဝီရိယာရမ္ဘေန ကိလေသဝိက္ခမ္ဘနံ, ရင်္ဂဇာတံ ဝိယ အရိယမဂ္ဂေါ, တေန သုဒ္ဓဿ ဝတ္ထဿ ပဘဿရဘာဝေါ ဝိယ ဝိက္ခမ္ဘိတကိလေသဿ စိတ္တဿ မဂ္ဂေန ပရိယောဒပနန္တိ. यहाँ उपमा का मिलान इस प्रकार है—वस्त्र के समान चित्त है; वस्त्र के आगन्तुक मैल से मलिन होने के समान चित्त का राग आदि मलों से संक्लिष्ट होना है; धोने के पत्थर के समान आनुपूर्वी-कथा है; जल के समान श्रद्धा है; जल में भिगोकर ऊसर, गोमय और भस्म के लेप से काले स्थानों को मलकर वस्त्र धोने के प्रयोग के समान, श्रद्धा रूपी स्नेह से भिगोकर स्मृति, समाधि और प्रज्ञा द्वारा दोषों को शिथिल कर श्रुति आदि विधि से चित्त के शोधन में वीर्य का आरम्भ है। उस प्रयोग से वस्त्र के काले धब्बों के दूर होने के समान वीर्य-आरम्भ से क्लेशों का विष्कम्भन है; रंग के समान आर्यमार्ग है; और उस रंग से शुद्ध वस्त्र के प्रभास्वर होने के समान विष्कम्भित-क्लेश वाले चित्त का मार्ग द्वारा परिशोधन है। ဒိဋ္ဌဓမ္မောတိ ဝတွာ ဒဿနံ နာမ ဉာဏဒဿနတော အညမ္ပိ အတ္ထီတိ တန္နိဝတ္တနတ္ထံ ‘‘ပတ္တဓမ္မော’’တိ ဝုတ္တံ. ပတ္တိ စ ဉာဏသမ္ပတ္တိတော အညာပိ ဝိဇ္ဇတီတိ [Pg.40] တတော ဝိသေသနတ္ထံ ‘‘ဝိဒိတဓမ္မော’’တိ ဝုတ္တံ. သာ ပနေသာ ဝိဒိတဓမ္မတာ ဓမ္မေသု ဧကဒေသနာပိ ဟောတီတိ နိပ္ပဒေသတော ဝိဒိတဘာဝံ ဒဿေတုံ ‘‘ပရိယောဂါဠှဓမ္မော’’တိ ဝုတ္တံ. တေနဿ သစ္စာဘိသမ္ဗောဓံယေဝ ဒီပေတိ. မဂ္ဂဉာဏဉှိ ဧကာဘိသမယဝသေန ပရိညာဒိကိစ္စံ သာဓေန္တံ နိပ္ပဒေသေန စတုသစ္စဓမ္မံ သမန္တတော ဩဂါဟန္တံ နာမ ဟောတိ. တေနာဟ – ‘‘ဒိဋ္ဌော အရိယသစ္စဓမ္မော ဧတေနာတိ ဒိဋ္ဌဓမ္မော’’တိ. တိဏ္ဏာ ဝိစိကိစ္ဆာတိ သပ္ပဋိဘယကန္တာရသဒိသာ သောဠသဝတ္ထုကာ အဋ္ဌဝတ္ထုကာ စ တိဏ္ဏာ ဝိစိကိစ္ဆာ တိဏ္ဏဝိစိကိစ္ဆာ. ဝိဂတကထံကထောတိ ပဝတ္တိအာဒီသု ‘‘ဧဝံ နု ခေါ, ကိံ နု ခေါ’’တိ ဧဝံ ပဝတ္တိကာ ဝိဂတာ သမုစ္ဆိန္နာ ကထံကထာ. သာရဇ္ဇကရာနံ ပါပဓမ္မာနံ ပဟီနတ္တာ တပ္ပဋိပက္ခေသု သီလာဒိဂုဏေသု သုပ္ပတိဋ္ဌိတတ္တာ ဝေသာရဇ္ဇံ ဝိသာရဒဘာဝံ ဝေယျတ္တိယံ ပတ္တော. အတ္တနာ ဧဝ ပစ္စက္ခတော ဒိဋ္ဌတ္တာ န တဿ ပရော ပစ္စေတဗ္ဗော အတ္ထီတိ အပရပ္ပစ္စယော. 'दृष्टधर्मा' कहकर, चूँकि दर्शन ज्ञान-दर्शन के अतिरिक्त अन्य भी होता है, उसके निवारण के लिए 'पत्तधर्मा' कहा गया है। प्राप्ति ज्ञान-सम्पत्ति के अतिरिक्त अन्य भी होती है, अतः उसकी विशेषता बताने के लिए 'विदितधर्मा' कहा गया है। वह विदितधर्मता धर्मों के एक अंश में भी हो सकती है, अतः पूर्ण रूप से विदित होने को दर्शाने के लिए 'परियोगाळ्हधर्मा' कहा गया है। इससे उसके सत्याभिसमय को ही सूचित किया गया है। मार्ग-ज्ञान ही एक-अभिसमय के वश से परिज्ञा आदि कृत्यों को सिद्ध करते हुए, पूर्ण रूप से चारों आर्य सत्यों में सम्यक् प्रकार से अवगाहन करने वाला होता है। इसीलिए कहा गया— 'जिसके द्वारा आर्य सत्य रूपी धर्म देख लिया गया है, वह दृष्टधर्मा है।' 'तिण्ण-विचिकित्स' का अर्थ है—भययुक्त कान्तार के समान सोलह वस्तुओं और आठ वस्तुओं वाली शंकाओं को पार कर लेना। 'विगत-कथंकथी' का अर्थ है—उत्पत्ति आदि के विषय में 'यह क्या है, कैसे है' इस प्रकार होने वाली कथंकथा का दूर हो जाना, समूच्छेद हो जाना। 'सारज्ज' उत्पन्न करने वाले पाप धर्मों के प्रहाण होने से और उनके प्रतिपक्ष शील आदि गुणों में सुप्रतिष्ठित होने से 'वैशारद्य' को प्राप्त। स्वयं प्रत्यक्ष देखने के कारण उसे दूसरे पर विश्वास करने की आवश्यकता नहीं है, इसलिए 'अपरप्रत्यय' है। ၇၁. ပဏ္ဍိတောတိ ပညဝါ. ७१. 'पण्डित' का अर्थ है प्रज्ञावान। ၇၂. တေန ဟိ သမ္မာတိ ဒေါဝါရိကေန သဒ္ဓိံ သလ္လပတိယေဝ, ‘‘ဧတ္ထေဝါ’’တိ တေန ဝုတ္တဝစနံ သုတွာပိ တဿ အတ္ထံ အသလ္လက္ခေန္တော. ကသ္မာ? ပရိဒေဝတာယ. တေနာဟ ‘‘ဗလဝသောကေန အဘိဘူတော’’တိ. ७२. इसलिए, हे सौम्य! वह द्वारपाल के साथ बातचीत ही कर रहा है, 'यहीं है' - उसके द्वारा कहे गए इन वचनों को सुनकर भी उसके अर्थ पर ध्यान नहीं दे रहा है। किसलिए? विलाप (शोक) के कारण। इसीलिए कहा गया है - 'प्रबल शोक से अभिभूत'। ၇၃. တေနေဝါတိ ယေန ဥတ္တရာသင်္ဂေန အာသနံ သမ္မဇ္ဇတိ, တေနေဝ ဥဒရေ ပရိက္ခိပန္တော ‘‘မာဟံ သတ္ထာရံ မမ သရီရေန ဖုသိ’’န္တိ အန္တရံ ကရောန္တော ဥတ္တရာသင်္ဂေန တံ ဥဒရေ ပရိက္ခိပန္တော ပရိဂ္ဂဟေတွာ. ‘‘ဒတ္တပညတ္တ’’န္တိအာဒီသု (ဒီ. နိ. ၁.၁၇၁) ဝိယ ဒတ္တ-သဒ္ဒေါ ဧတ္ထ ဗာလပရိယာယောတိ အာဟ ‘‘ဇဠောသိ ဇာတော’’တိ. ဥပဋ္ဌာကဿ အညထာဘာဝေနာတိ ပုဗ္ဗေ အတ္တနော ဥပဋ္ဌာကဿ ဣဒါနိ အနုပဋ္ဌာကဘာဝေန. ७३. 'उसी से' का अर्थ है - जिस उत्तरासंग (ऊपरी वस्त्र) से वह आसन को झाड़ता है, उसी को पेट के चारों ओर लपेटते हुए, 'मैं अपने शरीर से शास्ता का स्पर्श न करूँ' - ऐसा बीच में अंतर (व्यवधान) करते हुए, उत्तरासंग से उसे पेट पर लपेटकर ग्रहण करके। 'दत्तपञ्ञत्त' आदि (दी. नि. 1.171) के समान यहाँ 'दत्त' शब्द मूर्ख का पर्यायवाची है, इसलिए कहा - 'तू मूर्ख पैदा हुआ है'। 'उपस्थापक के अन्यथा भाव से' का अर्थ है - पहले जो अपना उपस्थापक (सेवक) था, अब उसके अनुपस्थापक होने के कारण। ၇၅. အဝိညာဏကံ ဒါရုသာခါဒိမယံ. ဗဟလဗဟလံ ပီတာဝလေပနံ ရင်္ဂဇာတန္တိ အတိဝိယ ဗဟလံ ပီတဝဏ္ဏမဉ္ဇိဋ္ဌအာဒိအဝလေပနရဇနံ. ဃဋ္ဋေတွာ ဥပ္ပာဒိတစ္ဆဝိံ, ယာ ရင်္ဂံ ပိဝတိ. နိလ္လောမတန္တိ ပုနပ္ပုနံ အနုလိမ္ပနေန. ခဏ္ဍခဏ္ဍိတန္တိ ခဏ္ဍခဏ္ဍိတဘာဝံ. ရင်္ဂက္ခမော ရဇနိယော. တေနာဟ ‘‘ရာဂမတ္တံ ဇနေတီ’’တိ. အနုယောဂန္တိ စောဒနံ. ဝီမံသန္တိ ဝိစာရဏံ. ထုသေ ကောဋ္ဋေတွာ တဏ္ဍုလပရိယေသနံ [Pg.41] ဝိယ ကဒလိယံ သာရပရိယေသနံ ဝိယ စ နိဂဏ္ဌဝါဒေ သာရဝီမံသနံ. တတော ဧဝ စ တံ ဝီမံသန္တော ရိတ္တကော တုစ္ဆကောဝ ဟောတီတိ. သဗ္ဗမ္ပိ ဗုဒ္ဓဝစနံ စတုသစ္စဝိနိမုတ္တံ နတ္ထိ, တဉ္စ ဝီမံသိယမာနံ ဝိညူနံ ပီတိသောမနဿမေဝ ဇနေတိ, အတပ္ပကဉ္စ အသေစနာဘာဝေနာတိ အာဟ ‘‘စတုသစ္စကထာ ဟီ’’တိအာဒိ. ယထာ ယထာတိ ယဒိ ခန္ဓမုခေန ယဒိ ဓာတာယတနာဒီသု အညတရမုခေန ဗုဒ္ဓဝစနံ ဩဂါဟိဿတိ, တထာ တထာ ဂမ္ဘီရဉာဏာနံယေဝ ဂေါစရဘာဝတော ဂမ္ဘီရမေဝ ဟောတိ. ယော စေတ္ထ ပဏ္ဍိတော နိပုဏော ကတပရပ္ပဝါဒေါ ပဏိဓာယ သဗ္ဗထာမေန စောဒနံ အာရမ္ဘတိ တဿ စောဒနာ ကေသဂ္ဂမတ္တမ္ပိ စာလေတုံ န သက္ကောတိ. ပုန သုစိရမ္ပိ ကာလံ ဝိစာရေန္တေသုပိ ဝိမဒ္ဒက္ခမတော, ဧဝံ တထာဂတဝါဒေါ သွာချာတဘာဝတောတိ အာဟ ‘‘အနုယောဂက္ခမော ဝိမဇ္ဇနက္ခမော စာ’’တိ. ७५. 'अविज्ञाणक' का अर्थ है काष्ठ (लकड़ी) की शाखा आदि से बना हुआ। 'बहलबहलं पीतावलेपनं रङ्गजातं' का अर्थ है - अत्यंत गाढ़ा पीले रंग का मजीठ आदि का लेप और रंग। रगड़कर उत्पन्न की गई चमक, जो रंग को सोख लेती है। 'निल्लोमतं' का अर्थ है - बार-बार लेपन करने से। 'खण्डखण्डितं' का अर्थ है - टुकड़े-टुकड़े होने की अवस्था। 'रङ्गक्खमो' का अर्थ है - रंगने योग्य। इसीलिए कहा - 'राग मात्र उत्पन्न करता है'। 'अनुयोग' का अर्थ है - प्रेरणा (चोदना)। 'वीमंसा' का अर्थ है - विचार करना। जैसे भूसे को कूटकर चावल खोजना या केले के तने में सार खोजना, वैसे ही निर्ग्रन्थों के वाद में सार की खोज करना है। और इसी कारण उसकी परीक्षा करने वाला रिक्त और तुच्छ ही होता है। समस्त बुद्धवचन चतुरार्य सत्य से मुक्त नहीं है, और बुद्धिमानों द्वारा विचार किए जाने पर वह प्रीति और सौमनस्य ही उत्पन्न करता है, और अतृप्तिकर न होने के कारण (असेचनाक भाव से) कहा गया है - 'चतुरार्य सत्य की कथा ही' इत्यादि। 'यथा यथा' का अर्थ है - यदि स्कन्ध के माध्यम से या धातु-आयतन आदि में से किसी अन्य माध्यम से बुद्धवचन में अवगाहन करेगा, तो वैसे-वैसे वह गंभीर ज्ञान वालों का ही विषय होने के कारण गंभीर ही होता है। जो यहाँ पण्डित, निपुण और पर-प्रवादों (दूसरे मतों) का ज्ञाता है, वह यदि संकल्प करके पूरी शक्ति से आक्षेप (चोदना) आरम्भ करता है, तो उसका आक्षेप बाल के अग्र भाग मात्र को भी विचलित नहीं कर सकता। पुनः बहुत समय तक विचार करने पर भी विमर्दन (परीक्षा) को सहने योग्य होने के कारण, इस प्रकार तथागत का वाद सुख्यात होने से कहा गया है - 'अनुयोगक्षम और विमर्जनक्षम है'। ၇၆. ဝိသယပရိညာဏေန ဒဟတိ ပဋိပက္ခေ သောဓေတီတိ ဓီရော, သွာယမဿ ဓီရဘာဝေါ သဗ္ဗသော သမ္မောဟဝိဒ္ဓံသနတာယာတိ အာဟ – ‘‘ယာ ပညာ…ပေ… တေန သမန္နာဂတဿာ’’တိ. ပဘိန္နခီလဿာတိ သမုစ္ဆိန္နသဗ္ဗစေတောခီလဿ, ကိလေသမစ္စုမာရဝိဇယေနေဝ အဘိသင်္ခါရခန္ဓမာရာ ဇိတာဝ ဟောန္တီတိ တေသံ ဒွိန္နံ ဣဓ အဂ္ဂဟဏံ. ဤဃ-သဒ္ဒေါ ဒုက္ခပရိယာယောတိ အာဟ ‘‘နိဒ္ဒုက္ခဿာ’’တိ. တတ္ထ သဥပါဒိသေသနိဗ္ဗာနပ္ပတ္တိယာ ကိလေသေန နိဒ္ဒုက္ခတာ, အနုပါဒိသေသနိဗ္ဗာနပ္ပတ္တိယာ ဝိပါကဒုက္ခေန နိဒ္ဒုက္ခတာ. ရဇ္ဇနဒုဿနမုယှနာဒိဝသေန ဝိဝိဓံ ဤသနတော ဝီသံ, ဝီသမေဝ ဝေသံ, ရာဂါဒီတိ အာဟ – ‘‘ဝေသန္တရဿာတိ ရာဂါဒိဝီသံ တရိတွာ ဝိတရိတွာ ဌိတဿာ’’တိ. ७६. विषय के परिज्ञान से (अविद्या आदि) प्रतिपक्षों को जलाता है या शुद्ध करता है, इसलिए वह 'धीर' है; उसका यह धीर-भाव पूर्णतः सम्मोह के विध्वंस होने के कारण है, इसलिए कहा - 'जो प्रज्ञा... पे... उससे युक्त का'। 'पभिन्नखीलस्स' का अर्थ है - जिसके सभी चित्त-कील (मानसिक अवरोध) समूल नष्ट हो गए हैं; क्लेश-मृत्यु और मार पर विजय प्राप्त करने से ही अभिसंस्कार और स्कन्ध-मार जीत लिए जाते हैं, इसलिए यहाँ उन दोनों का ग्रहण नहीं किया गया है। 'ईघ' शब्द दुःख का पर्यायवाची है, इसलिए कहा - 'निद्दुक्खस्स' (दुःख रहित)। वहाँ स-उपादिशेष निर्वाण की प्राप्ति से क्लेशों से दुःख-रहितता होती है, और अनुपादिशेष निर्वाण की प्राप्ति से विपाक-दुःख से दुःख-रहितता होती है। रंजित होने, दूषित होने और मोहित होने आदि के कारण विविध प्रकार से गमन करने (ईसन) से 'वीस' (विषम), और विषम ही 'वेस' है, जो राग आदि हैं - इसलिए कहा 'वेसन्तरस्स' अर्थात् राग आदि रूपी विष (विषम) को तैरकर और पार करके स्थित रहने वाले का। တုသိတဿာတိ ကရုဏာယနဝသေန တုသိယာ ဣတဿ သံဝတ္တဿ. ဧဝံ သတိ ‘‘မုဒိတဿာ’’တိ ဣဒံ ပုနရုတ္တမေဝ ဟောတိ. မနုဇဿာတိ ပဌမာယ ဇာတိယာ ဘဂဝါ မနုဿဇာတိယော ဟုတွာ ဝုတ္တာနံ ဝက္ခမာနာနဉ္စ ဝသေန သဒေဝကံ အဘိဘဝိတွာ ဌိတော အစ္ဆရိယော ဘဂဝါတိ ဒဿေတိ. သဒေဝကံ လောကံ သံသာရတော နိဗ္ဗာနသုခံ နရတိ နေတိ ပါပေတီတိ နရော, နာယကောတိ အတ္ထော, တဿ နရဿ, တေနာဟ ‘‘ပုနရုတ္တ’’န္တိ. ‘‘မနုဇဿာ’’တိ ဝတွာ ‘‘နရဿာ’’တိ ပုနရုတ္တံ ပဒံ. အတ္ထဝသေန အညထာ ဝုစ္စမာနေ ဧကေကဂါထာယ ဒသဂုဏာ နပ္ပဟောန္တိ, န ပူရေန္တီတိ အတ္ထော. 'तुसितस्स' का अर्थ है - करुणा के कारण संतुष्ट होकर प्रवृत्त हुए का। ऐसा होने पर 'मुदितस्स' यह पुनरुक्ति ही होती है। 'मनुजस्स' का अर्थ है - प्रथम जाति में भगवान मनुष्य जाति के होकर, कहे गए और कहे जाने वाले वचनों के वश से देवों सहित लोक को अभिभूत कर स्थित आश्चर्यमय भगवान हैं - यह दर्शाता है। देवों सहित लोक को संसार से निर्वाण सुख की ओर ले जाता है (नरति), प्राप्त कराता है, इसलिए वह 'नर' है, अर्थात् नायक है; उस नर का, इसीलिए कहा 'पुनरुक्त'। 'मनुजस्स' कहकर 'नरस्स' कहना पुनरुक्त पद है। अर्थ के वश से अन्यथा कहे जाने पर प्रत्येक गाथा में दस गुण पर्याप्त नहीं होते, अर्थात् पूर्ण नहीं होते। ဝိနေတီတိ ဝိနယော, ဝိနယော ဧဝ ဝေနေယိကောတိ အာဟ ‘‘သတ္တာနံ ဝိနာယကဿာ’’တိ. ဝိညူနံ ရုစိံ ရာတိ, ဤရေတီတိ ဝါ ရုစိရော, သွာယမဿ ရုစိရဘာဝေါ [Pg.42] ကုသလတာယာတိ အာဟ ‘‘သုစိဓမ္မဿာ’’တိ. ပဘာသကဿာတိ ဉာဏာလောကေန ပဘဿရဘာဝကရဿ. နိဿင်္ဂဿာတိ အဋ္ဌသုပိ ပရိသာသု, သဒေဝေ ဝါ သဗ္ဗသ္မိံ လောကေ အဂ္ဂဏှာပနပရိစ္စာဂေန နိဿဋဿ. ဂမ္ဘီရဂုဏဿာတိ ပရေသံ ဉာဏေန အပ္ပတိဋ္ဌဘာဝါ ဂမ္ဘီရဂုဏဿ. တေနာဟ ဘဂဝါ – ‘‘အတ္ထိ, ဘိက္ခဝေ, အညေဝ ဓမ္မာ ဂမ္ဘီရာ’’တိအာဒိ (ဒီ. နိ. ၁.၂၈). အရိယာယ ဝါ တုဏှီဘာဝေန မောနပ္ပတ္တဿ. ဓမ္မေ ဌိတဿာတိ ဓမ္မကာယေ သုပ္ပတိဋ္ဌိတဿ. သံဝုတတ္တဿာတိ အရက္ခိယကာယသမာစာရာဒိတာယ သံဝုတသဘာဝဿ. विनीत करता है इसलिए 'विनय' है, विनय ही 'वेनेयिक' है, इसलिए कहा - 'सत्त्वों के विनायक का'। विद्वानों की रुचि को ग्रहण करता है या प्रेरित करता है, इसलिए 'रुचिर' है; उसका यह रुचिर-भाव कुशलता के कारण है, इसलिए कहा - 'शुचिधर्म वाले का'। 'पभासकस्स' का अर्थ है - ज्ञान के आलोक से प्रभास्वर भाव उत्पन्न करने वाले का। 'निस्सङ्गस्स' का अर्थ है - आठों परिषदों में, अथवा देवों सहित समस्त लोक में, आसक्ति के त्याग द्वारा मुक्त हुए का। 'गम्भीरगुणस्स' का अर्थ है - दूसरों के ज्ञान द्वारा थाह न पाने योग्य होने से गंभीर गुण वाले का। इसीलिए भगवान ने कहा - 'भिक्षुओं! अन्य भी धर्म हैं जो गंभीर हैं' इत्यादि (दी. नि. 1.28)। अथवा आर्य मौन के द्वारा 'मौन' (मुनि भाव) को प्राप्त हुए का। 'धम्मे ठितस्स' का अर्थ है - धर्मकाय में सुप्रतिष्ठित का। 'संवुतत्तस्स' का अर्थ है - अरक्षणीय काय-समाचार आदि के कारण संयमित स्वभाव वाले का। အာဂုံ န ကရောတီတိအာဒီဟိ စတူဟိ ကာရဏေဟိ, ပန္တသေနာသနဿာတိ ဝိဝိတ္တသေနာသနဿ. ပဋိမန္တနပညာယာတိ သဗ္ဗပရပ္ပဝါဒါနံ ဝိပရာဝတ္တမန္တနပညာယ. မောနံ ဝုစ္စတိ ဉာဏံ သဗ္ဗတော ကိလေသာနံ နိဓုနနတော. 'पाप (आगु) नहीं करता' इत्यादि चार कारणों से, 'पन्तसेनासनस्स' का अर्थ है - विविक्त (एकान्त) सेनासन वाले का। 'पटिमन्तनपञ्ञाय' का अर्थ है - सभी पर-प्रवादों (विपक्षी मतों) को उलट देने वाली मन्त्रणा-प्रज्ञा से। सभी ओर से क्लेशों को झाड़ देने (नष्ट करने) के कारण ज्ञान को 'मौन' कहा जाता है। ဣသိသတ္တမဿာတိ သဗ္ဗဣသီသု ဇေဋ္ဌဿ သာဓုတမဿ. သေဋ္ဌပ္ပတ္တဿာတိ သေဋ္ဌံ ဥတ္တမံ သမ္မာသမ္ဗောဓိံ ပတ္တဿ. အက္ခရာဒီနီတိ အက္ခရပဒဗျဉ္ဇနာကာရ-နိရုတ္တိနိဒ္ဒေသ-သံကာသနပကာသန-ဝိဝရဏ-ဝိဘဇနုတ္တာနီကရဏာနီတိ ဗျဉ္ဇနတ္ထပဒါနိ. သမောဓာနေတွာ ဝိနေယျဇ္ဈာသယာနုရူပံ ပကာသနတော ကထနတော ပဒကဿ. ပုရိ-သဒ္ဒေါ ‘‘ပုဗ္ဗေ’’တိ ဣမိနာ သမာနတ္ထောတိ အာဟ – ‘‘ပုရိန္ဒဒဿာတိ သဗ္ဗပဌမံ ဓမ္မဒါနဒါယကဿာ’’တိ. ဘဂဝါ အသယှံ သဟိတုံ သမတ္ထောတိ အာဟ ‘‘သမတ္ထဿာ’’တိ. တေနာဟ – ‘‘တထာဂတံ ဗုဒ္ဓမသယှသာဟိန’’န္တိ (ဣတိဝု. ၃၈). တေ ပတ္တဿာတိ တေ ဂုဏေ အနဝသေသတော ပတ္တဿ. ဝိတ္ထာရေတွာ သံကိလေသဝေါဒါနဓမ္မံ ဗျာကရောတီတိ ဗျာကရဏော, ဗျာကရဏော ဧဝ ဝေယျာကရဏော. တန္တိပဒန္တိ တန္တိံ အာရောပေတွာ ဌပိတံ ပဒံ. "इसिसत्तमस्स" का अर्थ है सभी ऋषियों में ज्येष्ठ और श्रेष्ठ। "सेट्ठप्पत्तस्स" का अर्थ है श्रेष्ठ, उत्तम सम्यक्संबोधि को प्राप्त। "अक्खरादीनि" का अर्थ है अक्षर, पद, व्यंजन, आकार, निरुक्ति, निर्देश, संकासन, प्रकाशन, विवरण, विभाजन और उत्तानीकरण—ये व्यंजन और अर्थ के पद हैं। विनेय जनों के आशय के अनुरूप प्रकाशन और कथन के कारण "पदक" कहा गया है। "पुरि" शब्द "पुब्बे" (पहले) के समान अर्थ वाला है, इसलिए कहा गया है—"पुरिन्ददस्स" अर्थात् सबसे पहले धर्मदान देने वाले का। भगवान असह्य को सहने में समर्थ हैं, इसलिए कहा गया है "समत्थस्स"। इसीलिए कहा गया है—"तथागतं बुद्धमसह्यसाहिनं" (इतिवृत्तक ३८)। "ते पत्तस्स" का अर्थ है उन गुणों को पूर्णतः प्राप्त। विस्तार से संक्लेश और व्यवदान धर्म की व्याख्या करने वाला "ब्याकरण" है, और "ब्याकरण" ही "वेय्याकरण" है। "तन्तिपदं" का अर्थ है तन्ति (परंपरा/सूत्र) में आरूढ़ कर स्थापित किया गया पद। တဏှာဗန္ဓနေန သဗ္ဗေန ဝါ ကိလေသဗန္ဓနေန အဗဒ္ဓဿ. မဟာပညာယာတိ မဟာနုဘာဝါယ ပညာယ, မဟာဝိသယာယ ဝါ ပညာယ. သဗ္ဗာ ဟိ ဘဂဝတော ပညာ မဟာနုဘာဝါ, ယထာသကံ ဝိသယေ မဟာဝိသယာ စ ဧကာဒိဝသေန အနဝသေသတော မဟာဝိသယာ နာမ သဗ္ဗညုတာဝ. အာနုဘာဝဒဿနဋ္ဌေနာတိ အစ္ဆရိယာစိန္တေယျာပရိမေယျဿ အတ္တနော အာနုဘာဝဿ လောကဿ ဒဿနဋ္ဌေန. ယက္ခဿာတိ ဝါ လောကေန ပူဇနီယဿ[Pg.43]. အယံ ဥပါသကော ခုဇ္ဇုတ္တရာ ဝိယ ဥပါသိကာ သေခပဋိသမ္ဘိဒါပ္ပတ္တောတိ အာဟ ‘‘သောတာပတ္တိမဂ္ဂေနေဝ ပဋိသမ္ဘိဒါ အာဂတာ’’တိ. ကိလေသပ္ပဟာနဝဏ္ဏံ ကထေန္တောတိ ကိလေသပ္ပဟာနံ ဝိသယံ နိမိတ္တံ ကတွာ ဝဏ္ဏံ ကထေန္တော. तृष्णा के बंधन से अथवा सभी क्लेशों के बंधन से जो मुक्त (अबद्ध) है। "महापञ्ञाय" का अर्थ है महानुभाव प्रज्ञा से, अथवा महाविषय वाली प्रज्ञा से। भगवान की सभी प्रज्ञा महानुभाव होती है, अपने-अपने विषय में महाविषय वाली होती है, और एक आदि के भेद से पूर्णतः महाविषय वाली प्रज्ञा ही "सर्वज्ञता" है। "आनुभावदस्सनट्ठेन" का अर्थ है आश्चर्यजनक, अचिन्त्य और अपरिमेय अपने अनुभाव को लोक को दिखाने के अर्थ में। "यक्खस्स" का अर्थ है लोक द्वारा पूजनीय। यह उपासक खुज्जुत्तरा उपासिका की तरह शैक्ष-प्रतिसंविदा को प्राप्त है, इसलिए कहा गया है—"स्रोतापत्ति मार्ग से ही प्रतिसंविदा प्राप्त हुई है"। "किलेसप्पहाणवण्णं कथन्तो" का अर्थ है क्लेशों के प्रहाण को विषय और निमित्त बनाकर उसकी प्रशंसा करना। ၇၇. သမ္ပိဏ္ဍိတာတိ သန္နိစိတာ, ဂန္ထိတာတိ အတ္ထော. ဣမေ သတ္တာတိ ယံ ယဒေဝ ပရိဗ္ဘမန္တာ သတ္တာ. အတ္တနောဝ စိန္တယန္တီတိ အဝီတတဏှတာယ သကံယေဝ ပယောဇနံ စိန္တေန္တိ. တထာ ဟိ မတေ ဉာတကေ အနုသောစန္တာပိ တေဟိ သာဓေတဗ္ဗဿ အတ္တနော ပယောဇနဿေဝ ဝသေန အနုသောစန္တိ. ဥဏှံ အဟောသီတိ ဗလဝတာ စိတ္တဿ သန္တာပေန သန္တတ္တံ အဗ္ဘန္တရံ ဟဒယဋ္ဌာနံ ခဒိရင်္ဂါရသန္တာပိတံ ဝိယ ဥဏှံ အဟောသိ. တေနာဟ ‘‘လောဟိတံ ဝိလီယိတ္ထာ’’တိ. ပတ္တမတ္တန္တိ ဧကပတ္တပူရမတ္တံ. အဘိသမယသာဓိကာယ စတုသစ္စဒေသနာယ သင်္ခေပေနေဝ ဒေသိတတ္တာ အာဟ – ‘ဥဂ္ဃဋိတညုပုဂ္ဂလဿ ဝသေန ဓမ္မဒေသနာ ပရိနိဋ္ဌိတာ’’တိ. ७७. "सम्पिण्डिता" का अर्थ है संचित, अर्थात् ग्रथित। "इमे सत्ता" का अर्थ है जो-जो प्राणी संसार में भटक रहे हैं। "अत्तनोव चिन्तयन्ति" का अर्थ है तृष्णा के क्षय न होने के कारण वे अपने ही प्रयोजन के बारे में सोचते हैं। जैसे कि मृत संबंधियों के लिए शोक करते हुए भी वे उनके द्वारा सिद्ध होने वाले अपने ही प्रयोजन के कारण शोक करते हैं। "उण्हं अहोसि" का अर्थ है चित्त के प्रबल संताप से हृदय का भीतरी स्थान खदिर के अंगारों से तप्त होने के समान गर्म हो गया। इसीलिए कहा गया है—"लोहितं विलीयित्था" (रक्त पिघल गया)। "पत्तमतं" का अर्थ है एक पात्र भर मात्र। अभिसमय सिद्ध करने वाली चतुःसत्य देशना के संक्षेप में उपदिष्ट होने के कारण कहा गया है—"उग्घटितञ्ञू (शीघ्र समझने वाले) पुद्गल के अनुसार धर्मदेशना समाप्त हुई"। ဥပါလိသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. उपालि सुत्त की वर्णना के लीनार्थ (गूढ़ अर्थ) का प्रकाशन समाप्त हुआ। ၇. ကုက္ကုရဝတိကသုတ္တဝဏ္ဏနာ ७. कुक्कुरवतिक सुत्त की वर्णना ၇၈. ကောလိယေသူတိ ဗဟုဝစနဝသေနာယံ ပါဠိ အာဂတာ. ဧဝံနာမကေ ဇနပဒေတိ အတ္ထဝစနံ ကသ္မာ ဝုတ္တန္တိ အာဟ ‘‘သော ဟီ’’တိအာဒိ. န နိယမိတောတိ ‘‘အသုကမှိ နာမ ဝိဟာရေ’’တိ န နိယမေတွာ ဝုတ္တော. သေနာသနေယေဝါတိ အာဝါသေယေဝ, န ရုက္ခမူလာဒိကေ. ဝေသကိရိယာ ဃာသဂ္ဂဟဏာဒိနာ သမာဒါတဗ္ဗဋ္ဌေန ဂေါဝတံ, တသ္မိံ နိယုတ္တော ဂေါဝတိကော. တေနာဟ ‘‘သမာဒိန္နဂေါဝတော’’တိ. ယံ သန္ဓာယာဟု ဝေဒဝေဒိနော – ‘‘ဂစ္ဆံ ဘက္ခေတိ, တိဋ္ဌံ မုတ္တေတိ, ဥပါဟာ ဥဒကံ ဓူပေတိ, တိဏာနိ ဆိန္ဒတီ’’တိအာဒိ. အယံ အစေလောတိ အစေလကပဗ္ဗဇ္ဇာဝသေန အစေလော, ပုရိမော ပန ဂေါဝတိကော ကုက္ကုရဝတိကောတိ ဧတ္ထ ဝုတ္တနယာနုသာရေန အတ္ထော ဝတ္တဗ္ဗော. ပလိကုဏ္ဌိတွာတိ ဥဘော ဟတ္ထေ ဥဘော ပါဒေ စ သမိဉ္ဇိတွာ. ‘‘ဥက္ကုဋိကော ဟုတွာ’’တိပိ ဝဒန္တိ. ဂမနံ နိပ္ဖဇ္ဇနံ ဂတီတိ အာဟ – ‘‘ကာ [Pg.44] ဂတီတိ ကာ နိပ္ဖတ္တီ’’တိ. နိပ္ဖတ္တိပရိယောသာနာ ဟိ ဝိပါကဓမ္မပ္ပဝတ္တိ. ကတူပစိတကမ္မဝသေန အဘိသမ္ပရေတိ ဧတ္ထာတိ အဘိသမ္ပရာယော, ပရလောကော. တတ္ထဿ စ နိပ္ဖတ္တိံ ပုစ္ဆတီတိ အာဟ – ‘‘အဘိသမ္ပရာယမှိ ကတ္ထ နိဗ္ဗတ္တီ’’တိ. ကုက္ကုရဝတသမာဒါနန္တိ ကုက္ကုရဘာဝသမာဒါနံ, ‘‘အဇ္ဇ ပဋ္ဌာယ အဟံ ကုက္ကုရော’’တိ ကုက္ကုရဘာဝါဓိဋ္ဌာနံ. ७८. "कोलियेसु" यह पालि बहुवचन के रूप में आई है। इस नाम के जनपद में, ऐसा अर्थ किसलिए कहा गया है, इसके लिए "सो ही" आदि कहा गया है। "अमुक विहार में" ऐसा नियम न करके कहा गया है। "सेनासनेयेव" का अर्थ है आवास में ही, न कि वृक्षमूल आदि में। घास ग्रहण करने आदि की क्रिया के कारण समादान करने योग्य होने से "गोवत" (गाय का व्रत), और उसमें नियुक्त व्यक्ति "गोवतिक" है। इसीलिए कहा गया है "समादिन्नगोवतो"। जिसके विषय में वेदवेत्ता कहते हैं—"चलते हुए खाना, खड़े होकर मूत्र त्याग करना, जल छिड़कना, घास काटना" आदि। यह "अचेलो" अचेलक प्रव्रज्या के कारण अचेल (नग्न) है, पूर्व के गोवतिक और कुक्कुरवतिक के विषय में यहाँ बताए गए नियम के अनुसार अर्थ कहना चाहिए। "पलिकुण्ठित्वा" का अर्थ है दोनों हाथों और दोनों पैरों को सिकोड़कर। "उक्कुटिक (उकड़ू) होकर" भी कहते हैं। "का गती" का अर्थ है क्या निष्पत्ति (परिणाम) होगी। निष्पत्ति की समाप्ति ही विपाक धर्म की प्रवृत्ति है। "कतूपचितकम्मवसेन" (किए गए और संचित कर्मों के वश से) जहाँ पुनर्जन्म होता है, वह "अभिसम्पराय" अर्थात् परलोक है। वहाँ उसकी निष्पत्ति के बारे में पूछता है, इसलिए कहा गया है—"अभिसम्परायम्हि कत्थ निब्बत्ती" (परलोक में कहाँ जन्म होगा)। "कुक्कुरवतसमादानं" का अर्थ है कुक्कुर-भाव का समादान, "आज से मैं कुत्ता हूँ" ऐसा कुक्कुर-भाव का अधिष्ठान। ၇၉. ပရိပုဏ္ဏန္တိ ယတ္တကာ ကုက္ကုရဝိကာရာ, တေဟိ ပရိပုဏ္ဏံ. တေနာဟ ‘‘အနူန’’န္တိ. အဗ္ဗောကိဏ္ဏန္တိ တေဟိ အဝေါမိဿံ. ကုက္ကုရာစာရန္တိ ကုက္ကုရာနံ ဂမနာကာရောတိအာဒိအာစာရေန ကုက္ကုရဘာဝါဓိဋ္ဌာနစိတ္တမာဟ. တထာ တထာ အာကပ္ပေတဗ္ဗတော အာကပ္ပော, ပဝတ္တိအာကာရော. သော ပနေတ္ထ ဂမနာဒိကောတိ အာဟ ‘‘ကုက္ကုရာနံ ဂမနာကာရော’’တိအာဒိ. အာစာရေနာတိ ကုက္ကုရသီလာစာရေန. ဝတသမာဒါနေနာတိ ကုက္ကုရဝတာဓိဋ္ဌာနေန. ကုက္ကုရစရိယာဒိယေဝ ဒုက္ကရတပစရဏံ. တေန ဂတိဝိပရိယေသာကာရေန ပဝတ္တာ လဒ္ဓိ. အဿ ကုက္ကုရဝတိကဿ အညာ ဂတိ နတ္ထီတိ ဣတရဂတိံ ပဋိက္ခိပတိ, ဣတရာသံ ပန သမ္ဘဝေါ ဧဝ နတ္ထီတိ. နိပဇ္ဇမာနန္တိ ဝတသီလာဒီနံ သံဂေါပနဝသေန သိဇ္ဈမာနံ. ယထာ သကမ္မကဓာတုသဒ္ဒါ အတ္ထဝိသေသဝသေန အကမ္မကာ ဟောန္တိ ‘‘ဝိဗုဒ္ဓေါ ပုရိသော ဝိဗုဒ္ဓေါ ကမလသဏ္ဍော’’တိ, ဧဝံ အတ္ထဝိသေသဝသေန အကမ္မကာပိ သကမ္မကာ ဟောန္တီတိ ဒဿေန္တော ‘‘န ပရိဒေဝါမိ န အနုတ္ထုနာမီ’’တိအာဒိမာဟ. အနုတ္ထုနသဒ္ဒေါ စ သကမ္မကဝသေန ပယုဇ္ဇတိ ‘‘ပုရာဏာနိ အနုတ္ထုန’’န္တိအာဒီသု. အယဉ္စေတ္ထ ပယောဂေါတိ ဣမိနာ ဂါထာယဉ္စ အနုတ္ထုနနရောဒနံ အဓိပ္ပေတန္တိ ဒဿေတိ. ७९. "परिपुण्णं" का अर्थ है जितने भी कुक्कुर-विकार (कुत्ते की चेष्टाएँ) हैं, उनसे परिपूर्ण। इसीलिए कहा गया है "अनूनं" (बिना किसी कमी के)। "अब्बोकिण्णं" का अर्थ है उनसे अमिश्रित। "कुक्कुराचारं" का अर्थ है कुत्तों के चलने के प्रकार आदि आचरण से कुक्कुर-भाव के अधिष्ठान वाला चित्त। वैसे-वैसे आकल्प (वेष/चेष्टा) करने के कारण "आकप्पो" अर्थात् प्रवृत्ति का प्रकार। वह यहाँ चलना आदि है, इसलिए कहा गया है "कुक्कुराणं गमनाकारो" आदि। "आचारेन" का अर्थ है कुक्कुर-शील और आचरण से। "वतसमादानेन" का अर्थ है कुक्कुर-व्रत के अधिष्ठान से। कुक्कुर-चर्या आदि ही दुष्कर तप का आचरण है। उस गति के विपरीत आकार में प्रवृत्त होने वाली "लब्धि" (दृष्टि) है। इस कुक्कुरवतिक की अन्य कोई गति नहीं है, इस प्रकार दूसरी गति का निषेध करता है, क्योंकि अन्य गतियों की संभावना ही नहीं है। "निपज्जमानं" का अर्थ है व्रत और शील आदि के संरक्षण से सिद्ध होता हुआ। जैसे 'अकर्मक' धातु के शब्द अर्थ विशेष के कारण 'सकर्मक' हो जाते हैं, जैसे "विबुद्धो पुरिसो" (जागा हुआ पुरुष) और "विबुद्धो कमलसण्डो" (खिला हुआ कमल समूह), वैसे ही अर्थ विशेष के कारण अकर्मक भी सकर्मक हो जाते हैं, यह दिखाते हुए "न परिदेवामि न अनुत्थुनामि" आदि कहा। "अनुत्थुन" शब्द सकर्मक रूप में प्रयुक्त होता है, जैसे "पुराणानि अनुत्थुनं" (पुरानी बातों का स्मरण करते हुए) आदि में। और यहाँ यह प्रयोग इस गाथा में "अनुत्थुनन" (विलाप) और रोने के अर्थ में अभिप्रेत है, यह दर्शाता है। ၈၀. ဝုတ္တနယေနေဝါတိ ဣမိနာ ဂေါဝတန္တိ ဂေါဝတသမာဒါနံ. ဂေါသီလန္တိ ဂဝါစာရံ. ဂေါစိတ္တန္တိ ‘‘အဇ္ဇ ပဋ္ဌာယ ဂေါဟိ ကာတဗ္ဗံ ကရိဿာမီ’’တိ ဥပ္ပန္နစိတ္တန္တိ ဣမမတ္ထံ အတိဒိသတိ. ဂွာကပ္ပေ ပန ဝတ္တဗ္ဗံ အဝသိဋ္ဌံ ‘‘ကုက္ကုရာကပ္ပေ ဝုတ္တသဒိသမေဝါ’’တိ ဣမိနာဝ အတိဒိဋ္ဌံ, ဝိသိဋ္ဌဉ္စ ယထာ ပန တတ္ထာတိအာဒိနာ ဝုတ္တမေဝ. ယံ ပနေတ္ထ ဝတ္တဗ္ဗံ, တံ ကုက္ကုရဝတာဒီသု ဝုတ္တနယမေဝ. ८०. "वत्त नयेनेवाति" (कहे गए तरीके से ही) इसके द्वारा 'गोवत' का अर्थ गो-व्रत का समादान है। 'गोसील' का अर्थ गाय जैसा आचरण है। 'गोचित्त' का अर्थ "आज से मैं वही करूँगा जो गायें करती हैं" - इस प्रकार उत्पन्न चित्त है, इस अर्थ का अतिदेश (विस्तार) करता है। गो-कल्प (गाय के आचरण) के विषय में जो शेष कहना है, वह "कुक्कुर-कल्प में कहे गए के समान ही है" - इसी से अतिदिष्ट है, और जो विशिष्ट है वह "यथा पन तत्थ" आदि के द्वारा कहा ही गया है। यहाँ जो कुछ भी कहना शेष है, वह कुक्कुर-व्रत आदि में कहे गए तरीके के समान ही है। ၈၁. ဧကစ္စကမ္မကိရိယာဝသေနာတိ ဧကစ္စဿ အကုသလကမ္မဿ ကုသလကမ္မဿ ကရဏပ္ပသင်္ဂေန. ဣမေသန္တိ ဂေါဝတိကကုက္ကုရဝတိကာနံ. ကိရိယာတိ ဂေါဝတဘာဝနာဒိဝသေန ပဝတ္တာ ကိရိယာ. ပါကဋာ ဘဝိဿတီတိ ‘‘ဣမသ္မိံ ကမ္မစတုက္ကေ ဣဒံ နာမ ကမ္မံ ဘဇတီ’’တိ ပါကဋာ ဘဝိဿတိ. ८१. "एकच्चकम्मकिरियावसेनाति" का अर्थ है - किसी अकुशल कर्म या कुशल कर्म को करने के प्रसंग से। "इमेसं" का अर्थ है - गो-व्रतिकों और कुक्कुर-व्रतिकों का। "किरिया" का अर्थ है - गो-व्रत की भावना आदि के वश में प्रवृत्त क्रिया। "पाकता भविस्सती" का अर्थ है - "इस कर्म-चतुष्क (चार प्रकार के कर्मों) में यह अमुक कर्म आता है" - यह स्पष्ट हो जाएगा। ကာဠကန္တိ [Pg.45] (အ. နိ. ဋီ. ၂.၄.၂၃၂) မလီနံ, စိတ္တဿ အပဘဿရဘာဝကရဏန္တိ အတ္ထော. တံ ပနေတ္ထ ကမ္မပထသမ္ပတ္တမေဝ အဓိပ္ပေတန္တိ အာဟ ‘‘ဒသအကုသလကမ္မပထ’’န္တိ. ကဏှန္တိ ကဏှာဘိဇာတိဟေတုတော ဝါ ကဏှံ. တေနာဟ ‘‘ကဏှဝိပါက’’န္တိ. အပါယူပပတ္တိ မနုဿေသု စ ဒေါဘဂ္ဂိယံ ကဏှဝိပါကော, ယထာ တမဘာဝေါ ဝုတ္တော, ဧကတ္တနိဒ္ဒေသေန ပန ‘‘အပါယေ နိဗ္ဗတ္တနတော’’တိ ဝုတ္တံ, နိဗ္ဗတ္တာပနတောတိ အတ္ထော. သုက္ကန္တိ ဩဒါတံ, စိတ္တဿ ပဘဿရဘာဝကရဏန္တိ အတ္ထော, သုက္ကာဘိဇာတိဟေတုတော ဝါ သုက္ကံ. တေနာဟ ‘‘သုက္ကဝိပါက’’န္တိ. သဂ္ဂူပပတ္တိ မနုဿလောကေ သောဘဂ္ဂိယဉ္စ သုက္ကဝိပါကော, ယထာ စ ဇောတိဘာဝေါ ဝုတ္တော, ဧကတ္တနိဒ္ဒေသေန ပန ‘‘သဂ္ဂေ နိဗ္ဗတ္တနတော’’တိ ဝုတ္တံ, နိဗ္ဗတ္တာပနတောတိ အတ္ထော, ဝေါမိဿကကမ္မန္တိ ကာလေန ကဏှံ, ကာလေန သုက္ကန္တိ ဧဝံ မိဿကဝသေန ကတကမ္မံ. ‘‘သုခဒုက္ခဝိပါက’’န္တိ ဝတွာ သုခဒုက္ခာနံ ပဝတ္တိအာကာရံ ဒဿေတုံ ‘‘မိဿကကမ္မဉှီ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. ကမ္မဿ ကဏှသုက္ကသမညာ ကဏှသုက္ကာဘိဇာတိဟေတုတာယာတိ, အပစ္စယဂါမိတာယ တဒုဘယဝိနိမုတ္တဿ ကမ္မက္ခယကရကမ္မဿ ဣဓ သုက္ကပရိယာယောပိ န ဣစ္ဆိတောတိ အာဟ – ‘‘ဥဘယ…ပေ… အသုက္ကန္တိ ဝုတ္တ’’န္တိ. တတ္ထ ဥဘယဝိပါကဿာတိ ယထာဓိဂတဿ ဝိပါကဿ. သမ္ပတ္တိဘဝပရိယာပန္နော ဟိ ဝိပါကော ဣဓ ‘‘သုက္ကဝိပါကော’’တိ အဓိပ္ပေတော, န အစ္စန္တပရိသုဒ္ဓေါ. "कालकं" का अर्थ है मलिन, जो चित्त को प्रभास्वर (चमकदार) न रहने दे। यहाँ वह कर्मपथ की पूर्णता के अर्थ में ही अभिप्रेत है, इसलिए "दस अकुशल कर्मपथ" कहा गया है। "कण्हं" (कृष्ण/काला) का अर्थ है कृष्ण-अभिजाति (काली उत्पत्ति) के कारण काला। इसीलिए "कण्हविपाकं" (कृष्ण विपाक) कहा गया है। अपायों (दुर्गति) में जन्म लेना और मनुष्यों में दुर्भाग्य होना 'कृष्ण विपाक' है, जैसा कि 'तमोभाव' (अंधकारमय अवस्था) कहा गया है; किन्तु एकत्व के निर्देश से "अपाय में उत्पन्न होने के कारण" कहा गया है, जिसका अर्थ है उत्पन्न कराने वाला। "सुक्कं" (शुक्ल/सफेद) का अर्थ है उज्ज्वल, जो चित्त को प्रभास्वर बनाने वाला है, अथवा शुक्ल-अभिजाति के कारण शुक्ल है। इसीलिए "सुक्कविपाकं" (शुक्ल विपाक) कहा गया है। स्वर्ग में जन्म लेना और मनुष्य लोक में सौभाग्य प्राप्त करना 'शुक्ल विपाक' है, जैसा कि 'ज्योतिभाव' (प्रकाशमय अवस्था) कहा गया है; किन्तु एकत्व के निर्देश से "स्वर्ग में उत्पन्न होने के कारण" कहा गया है, जिसका अर्थ है उत्पन्न कराने वाला। "वोमिस्सककम्मं" (मिश्रित कर्म) का अर्थ है - कभी काला, कभी सफेद - इस प्रकार मिश्रित रूप से किया गया कर्म। "सुखदुक्खविपाकं" कहकर सुख-दुःख की प्रवृत्ति के आकार को दिखाने के लिए "मिस्सककम्मञ्हि" आदि कहा गया है। कर्म की कृष्ण-शुक्ल संज्ञा कृष्ण-शुक्ल अभिजाति के कारण होने से, और अप्पच्चयगामिता (प्रत्यय रहित अवस्था) की ओर ले जाने वाले, उन दोनों से मुक्त, कर्म-क्षय करने वाले कर्म के लिए यहाँ 'शुक्ल' शब्द का प्रयोग भी इष्ट नहीं है, इसलिए कहा गया है - "उभय...पे... असुक्कं वुत्तं" (दोनों... अशुक्ल कहा गया है)। वहाँ "उभयविपाकस्स" का अर्थ है यथा-प्राप्त विपाक का। यहाँ 'सम्पत्ति-भव' (ऐश्वर्यपूर्ण भव) के अंतर्गत आने वाला विपाक ही 'शुक्ल विपाक' के रूप में अभिप्रेत है, न कि अत्यंत परिशुद्ध। သဒုက္ခန္တိ အတ္တနာ ဥပ္ပာဒေတဗ္ဗေန ဒုက္ခေန သဒုက္ခံ, ဒုက္ခသံဝတ္တနိကန္တိ အတ္ထော. ‘‘ဣမသ္မိံ သုတ္တေ စေတနာ ဓုရံ, ဥပါလိသုတ္တေ (မ. နိ. ၂.၅၆) ကမ္မ’’န္တိ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တမ္ပိ အတ္ထံ ဣဓ သာဓယတိ ဝိဇာနနတ္ထံ. အဘိသင်္ခရိတွာတိ အာယူဟိတွာ. တံ ပန ပစ္စယသမဝါယသိဒ္ဓိတော သံကဍ္ဎနံ ပိဏ္ဍနံ ဝိယ ဟောတီတိ အာဟ – ‘‘သင်္ကဍ္ဎိတွာ, ပိဏ္ဍံ ကတွာတိ အတ္ထော’’တိ, သဒုက္ခံ လောကန္တိ အပါယလောကမာဟ. ဝိပါကဖဿာတိ ဖဿသီသေန တတ္ထ ဝိပါကပဝတ္တမာဟ. ဘူတကမ္မတောတိ နိဗ္ဗတ္တကမ္မတော အတ္တနာ ကတူပစိတကမ္မတော. ယထာဘူတန္တိ ယာဒိသံ. ကမ္မသဘာဂဝသေနာတိ ကမ္မသရိက္ခကဝသေန. ဥပပတ္တိ ဟောတီတိ အပဒါဒိဘေဒါ ဥပပတ္တိ. ကမ္မေန ဝိယ ဝုတ္တာတိ ယံ ကရောတိ, တေန ဥပပဇ္ဇတီတိ ဧကကမ္မေနေဝ ဇာယမာနာ ဝိယ ဝုတ္တာ အပဒါဒိဘေဒါ. ဥပပတ္တိ စ နာမ ဝိပါကေန ဟောတိ ဝိပါကေ သမ္ဘဝန္တေ ဧကံသေန တေ ဥပပတ္တိဝိသေသာ သမ္ဘဝန္တိ. ယဒိ ဧဝံ ကသ္မာ ‘‘တေန ဥပပဇ္ဇတီ’’တိ ဥပပတ္တိကမ္မဟေတုကာ ဝုတ္တာတိ အာဟ ‘‘ယသ္မာ ပနာ’’တိအာဒိ. ယေန ကမ္မဝိပါကေန နိဗ္ဗတ္တောတိ [Pg.46] ယေန ကမ္မဝိပါကေန ဝိပစ္စမာနေန အယံ သတ္တော နိဗ္ဗတ္တောတိ ဝုစ္စတိ. တံကမ္မဝိပါကဖဿာတိ တဿ တဿ ကမ္မဿ ဝိပါကဘူတာ ဖဿာ. ကမ္မေန ဒါတဗ္ဗံ ဒါယံ တဗ္ဗိပါကံ အာဒိယန္တီတိ ကမ္မဒါယာဒါ, ဖဿာ. ကမ္မဿ ဒါယဇ္ဇတာ ကမ္မဖလဿ ဒါယဇ္ဇံ, တသ္မာ ဝုတ္တံ ‘‘ကမ္မဒါယဇ္ဇာ’’တိ. တေနာဟ ‘‘ကမ္မမေဝ နေသံ ဒါယဇ္ဇံ သန္တက’’န္တိ. "सदुक्खं" का अर्थ है - अपने द्वारा उत्पन्न किए जाने वाले दुःख के साथ, अर्थात् दुःख की ओर ले जाने वाला। "इस सूत्र में चेतना प्रधान है, उपालि-सूत्र में कर्म" - यह पहले कही गई बात यहाँ समझने के लिए सिद्ध की गई है। "अभिसङ्खरित्वा" का अर्थ है - संचित करके। वह प्रत्ययों के समूह से सिद्ध होने के कारण खींचने या इकट्ठा करने के समान होता है, इसलिए कहा गया है - "सङ्कड्ढित्वा, पिण्डं कत्वाति अत्थो" (खींचकर, पिण्ड बनाकर)। "सदुक्खं लोकं" से अपाय लोक (दुर्गति) कहा गया है। "विपाकफस्सा" के द्वारा स्पर्श को मुख्य मानकर वहाँ विपाक की प्रवृत्ति को कहा गया है। "भूतकम्मतो" का अर्थ है - उत्पन्न कर्म से, अपने द्वारा किए गए और संचित कर्म से। "यथाभूतं" का अर्थ है - जैसा। "कम्मसभागवसेना" का अर्थ है - कर्म की समानता के वश से। "उपपत्ति होति" का अर्थ है - अपाद (बिना पैर वाले) आदि के भेद से उत्पत्ति। "कम्मेन विय वुत्ता" का अर्थ है - जो करता है, उसी से उत्पन्न होता है - इस प्रकार एक ही कर्म से उत्पन्न होने के समान अपाद आदि भेद कहे गए हैं। उत्पत्ति वास्तव में विपाक से होती है; विपाक के होने पर निश्चित रूप से वे विशिष्ट उत्पत्तियाँ होती हैं। यदि ऐसा है, तो "तेन उपपज्जति" (उससे उत्पन्न होता है) - इस प्रकार उत्पत्ति को कर्म-हेतुक क्यों कहा गया? इसके उत्तर में "यस्मा पना" आदि कहा गया है। "येन कम्मविपाकेन निब्बत्तो" का अर्थ है - जिस कर्म-विपाक के पकने से यह सत्त्व उत्पन्न हुआ कहा जाता है। "तंकम्मविपाकफस्सा" का अर्थ है - उस-उस कर्म के विपाक-स्वरूप स्पर्श। कर्म द्वारा दिए जाने वाले दाय (विरासत) अर्थात् उस विपाक को ग्रहण करते हैं, इसलिए वे "कम्मदायादा" (कर्म के उत्तराधिकारी) हैं, जो कि स्पर्श हैं। कर्म की उत्तराधिकारिता ही कर्म-फल का उत्तराधिकार है, इसलिए "कम्मदायाज्जा" कहा गया है। इसीलिए कहा गया है - "कर्म ही उनका उत्तराधिकार (अपनी संपत्ति) है।" တိဿော စ ဟေဋ္ဌိမဇ္ဈာနစေတနာတိ ဣဒံ အဗျာဗဇ္ဈဝေဒနံ ဝေဒိယနဧကန္တသုခုပ္ပတ္တိယာ ဟေတုဘာဝသာဓနံ. ယဒိ ဧဝံ ယထာဝုတ္တာ ဈာနစေတနာ တာဝ ဟောတု ဧကန္တသုခုပ္ပတ္တိဟေတုဘာဝတော. ကာမာဝစရာ ကိန္တီတိ ကာမာဝစရာ ပန ကုသလစေတနာ တံသဘာဝါဘာဝတော ကိန္တိ ကေန ပကာရေန အဗျာဗဇ္ဈမနောသင်္ခါရော နာမ ဇာတောတိ စောဒေတိ, ဣတရော ပန န သဗ္ဗာ ကာမာဝစရကုသလစေတနာ တထာ ဂဟိတာ, အထ ခေါ ဧကစ္စာ ဈာနစေတနာနုကူလာတိ ဒဿေန္တော ‘‘ကသိဏသဇ္ဇနကာလေ ကသိဏာသေဝနကာလေ လဗ္ဘန္တီ’’တိ အာဟ. တတ္ထ ကသိဏာသေဝနစေတနာ ဂဟေတဗ္ဗာ, သာ ဥပစာရဇ္ဈာနဿ သာဓိကာ. တေန ကာမာဝစရစေတနာ ပဌမဇ္ဈာနစေတနာယ ဃဋိတာတိ ကသိဏသဇ္ဇနစေတနာပိ ကဒါစိ တာဒိသာ ဟောတီတိ ဂဟိတာ. ပရိကမ္မာဒိဝသေန ဟိ ပဝတ္တာ ဘာဝနာမယာ ကာမာဝစရကုသလစေတနာ ပဌမဇ္ဈာနဿ အာသန္နတာယ ဝုတ္တာ. စတုတ္ထဇ္ဈာနစေတနာ တတိယဇ္ဈာနစေတနာယ ဃဋိတာတိ ဣဒံ ဧကတ္တကာယဧကတ္တသညီသတ္တာဝါသဝတာယ တံသရိက္ခကာ ဥပေက္ခာပိ ဤဒိသေသု ဌာနေသု သုခသရိက္ခတာ, ဧဝံ သန္တသဘာဝတာ ဉာဏသဟိတတာ စ. ကေစိ ပန စတုတ္ထဇ္ဈာနစေတနာနုဂုဏာတိ နိဒဿေန္တာ ကသိဏသဇ္ဇနကာလေ ကသိဏဇ္ဈာနကာလေ ကသိဏာသေဝနကာလေ လဗ္ဘတီတိ တတိယဇ္ဈာနစေတနာယ အာသန္နဃဋိတတာ ဝုတ္တာတိ ဝဒန္တိ, တံ တေသံ မတိမတ္တံ, ဝုတ္တနယေနေဝ တာသံ ဃဋိတတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ဥဘယမိဿကဝသေနာတိ ဥဘယေသံ ကုသလာကုသလသင်္ခါရာနံ သုခဒုက္ခာနဉ္စ မိဿကဘာဝဝသေန. ဝေမာနိကပေတာနန္တိ ဣဒံ ဗာဟုလ္လတော ဝုတ္တံ, ဣတရေသမ္ပိ ဝိနိပါတိကာနံ ကာလေန ဒုက္ခံ ဟောတိယေဝ. तीन नीचे के ध्यान की चेतनाएँ - यह पीड़ा-रहित वेदना का अनुभव करने और एकांत सुख की उत्पत्ति के लिए हेतु-भाव का साधन है। यदि ऐसा है, तो यथाकथित ध्यान-चेतनाएँ एकांत सुख की उत्पत्ति का हेतु होने के कारण वैसी ही हों। कामावचर चेतनाएँ कैसी हैं? कामावचर कुशल चेतनाएँ उस स्वभाव के अभाव के कारण किस प्रकार 'अव्याबाझ मनोसंस्कार' नाम से उत्पन्न होती हैं - ऐसा आक्षेप करता है। दूसरा (टीकाकार) कहता है कि सभी कामावचर कुशल चेतनाएँ उस प्रकार नहीं ली गई हैं, बल्कि कुछ ध्यान-चेतनाओं के अनुकूल होती हैं, यह दिखाने के लिए 'कसिण-सज्जन-काल और कसिण-सेवन-काल में प्राप्त होती हैं' ऐसा कहा। वहाँ कसिण-सेवन की चेतना ग्रहण करनी चाहिए, वह उपचार-ध्यान की साधिका है। उससे कामावचर चेतना प्रथम ध्यान की चेतना से जुड़ी होती है, इसलिए कसिण-सज्जन की चेतना भी कभी वैसी होती है, ऐसा ग्रहण किया गया है। परिकर्म आदि के वश से प्रवृत्त भावनामय कामावचर कुशल चेतना प्रथम ध्यान के समीप होने के कारण कही गई है। चतुर्थ ध्यान की चेतना तृतीय ध्यान की चेतना से जुड़ी है - यह एकत्व-काय और एकत्व-संज्ञी सत्त्वावास होने के कारण उसके समान उपेक्षा भी ऐसे स्थानों में सुख के समान होती है, इस प्रकार शान्त स्वभाव वाली और ज्ञान-सहित होती है। कुछ लोग चतुर्थ ध्यान की चेतना के अनुकूल होने का निदर्शन करते हुए कहते हैं कि कसिण-सज्जन-काल, कसिण-ध्यान-काल और कसिण-सेवन-काल में प्राप्त होने के कारण तृतीय ध्यान की चेतना की निकटता कही गई है, वह उनका केवल मत है; बताए गए तरीके से ही उनकी संबद्धता जाननी चाहिए। 'दोनों के मिश्रण के वश से' - दोनों कुशल-अकुशल संस्कारों और सुख-दुखों के मिश्रित होने के कारण। 'वैमानिक प्रेतों का' - यह बहुलता से कहा गया है, अन्य विनिपातिकों को भी समय-समय पर दुख होता ही है। တဿ ပဟာနာယာတိ တဿ ယထာဝုတ္တဿ ကမ္မဿ အနုပ္ပတ္တိဓမ္မတာပါဒနာယ. ယာ စေတနာတိ ယာ အပစယဂါမိနိစေတနာ. ကမ္မံ ပတွာတိ သုခကမ္မန္တိ ဝုစ္စမာနေ မဂ္ဂစေတနာယ အညော ပဏ္ဍရတရော ဓမ္မော နာမ နတ္ထိ [Pg.47] အစ္စန္တပါရိသုဒ္ဓိဘာဝတော. အကဏှာ အသုက္ကာတိ အာဂတာတိ ဧတ္ထ သုက္ကဘာဝပဋိက္ခေပကာရဏံ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တနယမေဝ. တေနာဟ ‘‘ဣဒံ ပန ကမ္မစတုက္ကံ ပတွာ’’တိအာဒိ. उसके प्रहाण के लिए - उस यथाकथित कर्म की अप्राप्ति की धर्मता को सिद्ध करने के लिए। जो चेतना - जो अपचयगामिनी (निर्वाणगामिनी) चेतना है। कर्म को प्राप्त कर - 'सुख-कर्म' कहे जाने पर मार्ग-चेतना से बढ़कर अन्य कोई अधिक उज्ज्वल धर्म नहीं है, क्योंकि वह अत्यंत परिशुद्ध है। न काला न सफेद - यहाँ सफेद भाव के प्रतिषेध का कारण वही है जो नीचे बताया गया है। इसीलिए कहा - 'इस कर्म-चतुष्क को प्राप्त कर' आदि। ၈၂. အနိယျာနိကပက္ခေတိ အစေဠကပဗ္ဗဇ္ဇာယ ကုက္ကုရဝတေ စ. ယောဂေတိ ဉာယဓမ္မပဋိပတ္တိယန္တိ အတ္ထော. ယောနေနာတိ ယော တိတ္ထိယပရိဝါသော တေန ဘဂဝတာ ပညတ္တော. ယံ တိတ္ထိယပရိဝါသံ သမာဒိယိတွာတိ အယမေတ္ထ ယောဇနာ. ဃံသိတွာ သုဝဏ္ဏံ ဝိယ နိဃံသောပ္ပလေ. ကောဋ္ဋေတွာ ဟတ္ထေန ဝိယ ကုလာလဘာဇနံ. ८२. अनिर्याणिक पक्ष में - अचेलक प्रव्रज्या और कुक्कुर-व्रत में। योग में - न्याय-धर्म की प्रतिपत्ति में, यह अर्थ है। योनि से - जो तीर्थिकों का परिवास है, वह भगवान द्वारा प्रज्ञप्त किया गया है। जिस तीर्थिक-परिवास को समादान कर - यहाँ यह योजना है। घिसकर - सोने के समान, जैसे पत्थर पर घिसना। कूटकर - हाथ से जैसे कुम्हार के बर्तन को। ဝူပကဋ္ဌောတိ ဝိဝိတ္တော ဧကီဘူတော. ပေသိတတ္တောတိ နိဗ္ဗာနံ ပတိ ပေသိတတ္တော. ကာမံ တဒနုတ္တရံ ဗြဟ္မစရိယပရိယောသာနံ…ပေ… ဝိဟာသီတိ ဣမိနာဝ အရဟတ္တနိကူဋေန ဒေသနာ နိဋ္ဌာပိတာ ဟောတိ, အာယသ္မတော ပန သေနိယဿ ပဋိပတ္တိကိတ္တနပရမေတံ ဥဇုကံ အာပန္နအရဟတ္တဘာဝဒီပနံ, ယဒိဒံ ‘‘အညတရော ခေါ ပနာ’’တိအာဒိဝစနန္တိ အာဟ ‘‘အရဟတ္တနိကူဋေနေဝါ’’တိ. အရဟတ္တာဓိဂမောယေဝ တဿ တေသံ အဗ္ဘန္တရတာ. သေသံ သဗ္ဗံ သုဝိညေယျမေဝ. वूपकट्ठो - विविक्त, अकेला हुआ। पेसितत्तो - निर्वाण के प्रति समर्पित आत्मा वाला। 'कामं तदनुत्तरं ब्रह्मचरियपरियोसानं...पे... विहासि' - इसके द्वारा अर्हत्व की पराकाष्ठा के साथ देशना समाप्त होती है। आयुष्मान सेनिय की प्रतिपत्ति की प्रशंसा के लिए यह सीधे प्राप्त अर्हत्व भाव का द्योतन है, जो 'अञ्ञतरो खो पना' आदि वचनों से कहा गया है - 'अर्हत्व की पराकाष्ठा से ही'। अर्हत्व की प्राप्ति ही उसका उनके भीतर होना है। शेष सब सुविज्ञेय ही है। ကုက္ကုရဝတိကသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. कुक्कुरवतिक सुत्त की व्याख्या में लीनत्थप्पकासनी समाप्त हुई। ၈. အဘယရာဇကုမာရသုတ္တဝဏ္ဏနာ ८. अभयराजकुमार सुत्त की व्याख्या। ၈၃. ဇာတိယာ အသမာနော နိဟီနာစရိယော ပရဒတ္တူပဇီဝိကာယ မာတုယာ ကုစ္ဆိယံ ဇာတော ပါဒသိကပုတ္တော. နိန္ဒာဝသေန ဝဒတိ ဧတေနာတိ ဝါဒေါ အဂုဏောတိ အာဟ – ‘‘ဝါဒံ အာရောပေဟီတိ ဒေါသံ အာရောပေဟီ’’တိ. နိဗ္ဗတ္တဝသေန နိရယံ အရဟတိ, နိရယသံဝတ္တနိယေန ဝါ ကမ္မေန နိရယေ နိယုတ္တော နေရယိကော. အာပါယိကောတိ ဧတ္ထာပိ ဧသေဝ နယော. အဝီစိမှိ ဥပ္ပဇ္ဇိတွာ တတ္ထ အာယုကပ္ပသညိတံ အန္တရကပ္ပံ တိဋ္ဌတီတိ ကပ္ပဋ္ဌော. နိရယူပပတ္တိပရိဟရဏဝသေန တိကိစ္ဆိတုံ သက္ကုဏေယျောတိ တေကိစ္ဆော, န တေကိစ္ဆော အတေကိစ္ဆော. ဒွေ အန္တေ မောစေတွာတိ ဖရုသံ ဝါ အပ္ပိယံ ဝါ ကပ္ပေယျာတိ ဒွေ ကောဋ္ဌာသေ မုဉ္စိတွာ [Pg.48] တေ အနာမသိတွာ ပုစ္ဆိတံ အတ္ထံ တတော ဗဟိ ကရောန္တော ဥဂ္ဂိလတိ နာမ. တံ ပန ဧဝံ ကာတုံ န သက္ကောတီတိ အာဟ – ‘‘ဥဂ္ဂိလိတုံ ဗဟိ နီဟရိတုံ န သက္ခိတီ’’တိ. ဧဝမေဝါယံ ပုစ္ဆာ န ဂဟေတဗ္ဗာ, အယမေတ္ထ ဒေါသောတိ တံ အပုစ္ဆံ ကရောန္တော အပနယန္တော ဩဂိလတိ နာမ, တထာ ပန အသက္ကောန္တော ပတိဋ္ဌာပေန္တော န ဩဂိလတိ နာမ, ဘဂဝါ ပန တမတ္ထံ ဩကာသမ္ပိ အကရောန္တော ဥဘယထာပိ အသက္ခီတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. ကထံ? ဘဂဝါ ဟိ ‘‘န ခွေတ္ထ ရာဇကုမာရ ဧကံသေနာ’’တိ ဝဒန္တော နိဂဏ္ဌဿ အဓိပ္ပာယံ ဝိပရိဝတ္တေတိ, ဥဘော အန္တေ မောစေတွာ ပဉှံ ဝိဿဇ္ဇေသိ, ဧဝံ တာဝ ဥဂ္ဂိလိတုံ အသက္ခိ. ‘‘န တတြ ရာဇကုမာရ ဧကံသေနာ’’တိ ဝဒန္တော ဧဝ စ ‘‘နာယံ ပုစ္ဆာ ဧဝံ အဝိဘာဂေန ပုစ္ဆိတဗ္ဗာ, ဝိဘဇိတွာ ပန ပုစ္ဆိတဗ္ဗာ’’တိ ပုစ္ဆာယ ဒေါသံ ဒီပေန္တော တံ ဟာရေန္တော ဩဂိလိတုမ္ပိ သက္ခတီတိ. ८३. जाति से असमान - हीन आचरण वाला, दूसरों के दिए हुए पर जीवित रहने वाली माता की कोख से उत्पन्न, वेश्या का पुत्र। निंदा के वश से इससे बोलता है, इसलिए 'वाद' अवगुण है, अतः कहा - 'वाद आरोपित करो यानी दोष आरोपित करो'। उत्पत्ति के वश से नरक के योग्य है, या नरक ले जाने वाले कर्म से नरक में नियुक्त है, वह नैरयिक है। आपायिक में भी यही नियम है। अवीचि में उत्पन्न होकर वहाँ आयु-कल्प नामक अंतर-कल्प तक रहता है, इसलिए कल्पस्थ है। नरक में उत्पत्ति के परिहार के वश से जिसकी चिकित्सा की जा सके, वह चिकित्स्य है; जिसकी न की जा सके, वह अचिकित्स्य है। 'दो छोरों को छोड़कर' - कठोर या अप्रिय बात कहे, इन दो भागों को छोड़कर, उन्हें छुए बिना पूछे गए अर्थ को उससे बाहर करना 'उग्गिलति' (उगलना) कहलाता है। वह वैसा करने में समर्थ नहीं है, इसलिए कहा - 'उगलने (बाहर निकालने) में समर्थ नहीं होगा'। इसी प्रकार यह प्रश्न ग्रहण करने योग्य नहीं है, इसमें यह दोष है - ऐसा कहकर उस प्रश्न को हटा देना 'ओगिलति' (निगलना) कहलाता है; वैसा करने में असमर्थ होकर उसे स्थापित करना 'न ओगिलति' कहलाता है। भगवान ने उस अर्थ के लिए अवसर भी न देते हुए दोनों प्रकार से समर्थ हुए, ऐसा समझना चाहिए। कैसे? भगवान 'राजकुमार! यहाँ एकांततः ऐसा नहीं है' कहते हुए निगण्ठ के अभिप्राय को उलट देते हैं, दोनों छोरों को छोड़कर प्रश्न का उत्तर दिया, इस प्रकार उगलने में समर्थ हुए। 'राजकुमार! वहाँ एकांततः ऐसा नहीं है' ऐसा कहते हुए ही 'यह प्रश्न इस प्रकार बिना विभाग के नहीं पूछा जाना चाहिए, बल्कि विभक्त करके पूछा जाना चाहिए' - इस प्रकार प्रश्न के दोष को दिखाते हुए उसे हटाते हुए निगलने में भी समर्थ होते हैं। ဥဋ္ဌာတုံ န သက္ခိဿတိ စိတ္တဿ အညထာ ပဝတ္တိယာ. အဘယော ဒွေ မဂ္ဂေ ကတပရိစယော ဆေကော နိပုဏော ဝါဒသီလော စ ဟုတွာ ဝိစရတိ. တေနာဟ – ‘‘သော ဝါဒဇ္ဈာသယတာယ တဿ ဝစနံ သမ္ပဋိစ္ဆန္တော ‘ဧဝံ, ဘန္တေ’တိ အာဟာ’’တိ. चित्त की अन्य प्रकार से प्रवृत्ति होने के कारण उठने में समर्थ नहीं होगा। अभय दो मार्गों में अभ्यस्त, चतुर, निपुण और वाद-शील होकर विचरता है। इसीलिए कहा - 'वह वाद के आशय वाला होने के कारण उनके वचन को स्वीकार करते हुए एवं भन्ते बोला'। ၈၅. ဧဝရူပန္တိ ယာ ပရေသံ အပ္ပိယာ အမနာပါ ဒုရုတ္တဝါစာ, ဧဝရူပါ ဝါစာ, န ပန ဖရုသဝါစာ. ဖရုသဝါစာယ ဟိ သေတုဃာတော တထာဂတာနံ. စေတနာဖရုသတာယ ဟိ ဖရုသဝါစာ ဣစ္ဆိတာ, န ပရေသံ အပ္ပိယတာမတ္တေန. နဋ္ဌာ နိဂဏ္ဌာ ဩဂိလိကာဒိသမ္မတဿ ပဉှဿ ဧကဝစနေန ဝိဒ္ဓံသိတတ္တာ. ८५. "एवरूपं" का अर्थ है - जो दूसरों के लिए अप्रिय, अमनोहर और कटु वचन हों, ऐसी वाणी; किन्तु यह 'परुष वचन' (कठोर वाणी) नहीं है। क्योंकि तथागतों के लिए परुष वचन का सेतु-घात (पूर्ण विनाश) हो चुका है। परुष वचन चेतना की कठोरता से माना जाता है, न कि केवल दूसरों को अप्रिय लगने मात्र से। निगण्ठ नष्ट हो गए (हार गए), क्योंकि ओगिलिक आदि द्वारा सम्मत प्रश्न एक ही वचन से ध्वस्त हो गया। ၈၆. ဒါရကဿ အင်္ကေ နိသီဒနဿ ကာရဏံ ဒဿေတုံ ‘‘လေသဝါဒိနော’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. တတ္ထ လေသဝါဒိနောတိ ဆလဝါဒိနော, ဝါဒမဂ္ဂေ ဝါ အပရိပုဏ္ဏတာယ လေသမတ္တေနေဝ ဝါဒသီလာ. ဩသဋသင်္ဂါမောတိ အနေကဝါရံ ပရဝါဒမဒ္ဒနဝသေန ဩတိဏ္ဏဝါဒသင်္ဂါမော. ဝိဇ္ဈိတွာတိ နခေန ဝိဇ္ဈိတွာ. ဣမမေဝါတိ ယွာယံ ဒါရကော အတ္တနော ဝါဒဘင်္ဂပရိဟရဏတ္ထံ ဣမိနာ အင်္ကေ နိသီဒါပိတော, ဣမမေဝ အဿ ဒါရကံ ဥပမံ နိဿယံ ကတွာ ဝါဒံ ဘိန္ဒိဿာမိ. ‘‘အဿ ဝါဒံ အပ္ပဋိတတာယ ဥပမာယ ဘဉ္ဇိဿာမီ’’တိ စိန္တေတွာ. ८६. बालक के गोद में बैठने का कारण दिखाने के लिए "लेसवादिनो" आदि कहा गया है। वहाँ "लेसवादिनो" का अर्थ है - छलवादी, जो वाद-मार्ग में अपूर्णता के कारण केवल लेश (बहाने) मात्र से विवाद करने के स्वभाव वाले हैं। "ओसटसङ्गामो" का अर्थ है - अनेक बार दूसरों के वाद का मर्दन करने के कारण वाद-संग्राम में उतरा हुआ। "विज्झित्वा" का अर्थ है - नाखून से छेदकर। "इममेवा" का अर्थ है - जिस बालक को इसने अपने वाद-भंग के परिहार (बचाव) के लिए गोद में बिठाया है, इसी बालक को उपमा का आधार बनाकर मैं इसके वाद को खंडित करूँगा। "इसकी निर्विवाद उपमा से इसके वाद को भंग करूँगा" - ऐसा सोचकर। အပနေယျံ [Pg.49] အဿ အဟန္တိ အဿ ဒါရကဿ မုခတော အဟံ တံ အပနေယျံ. အဘူတတ္ထောဝ အဘူတံ ဥတ္တရပဒလောပေနာတိ အာဟ ‘‘အဘူတန္တိ အဘူတတ္ထ’’န္တိ. အတစ္ဆန္တိ တဿေဝ ဝေဝစနန္တိ အာဟ ‘‘အတစ္ဆန္တိ န တစ္ဆ’’န္တိ. အဘူတန္တိ ဝါ အသန္တံ အဝိဇ္ဇမာနံ. အတစ္ဆန္တိ အတထာကာရံ. အနတ္ထသံဟိတန္တိ ဒိဋ္ဌဓမ္မိကေန, သမ္ပရာယိကေန ဝါ အနတ္ထေန သံဟိတံ, အနတ္ထေ ဝါ သံဟိတံ, န အတ္ထောတိ ဝါ အနတ္ထော, အတ္ထဿ ပဋိပက္ခော သဘာဝေါ, တေန သံဟိတန္တိ အနတ္ထသံဟိတံ, ပိသုဏဝါစံ သမ္ဖပ္ပလာပဉ္စာတိ အတ္ထော. ဧဝမေတ္ထ စတုဗ္ဗိဓဿပိ ဝစီဒုစ္စရိတဿ ဂဟိတတာ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. मैं उसे निकाल दूँ - उस बालक के मुख से मैं उसे निकाल दूँ। 'अभूतत्थोव' (असत्य अर्थ ही) - उत्तरपद के लोप से 'अभूत' कहा गया है, इसलिए कहा - 'अभूत का अर्थ अभूतत्थ (असत्य अर्थ) है'। 'अतच्छं' उसी का पर्यायवाची है, इसलिए कहा - 'अतच्छं का अर्थ न तच्छं (जो सत्य नहीं है) है'। अथवा 'अभूतं' का अर्थ असत्य, अविद्यमान है। 'अतच्छं' का अर्थ अतथाकार (जो वैसा नहीं है) है। 'अनत्थसंहितं' का अर्थ दृष्टधार्मिक (इस लोक के) या साम्परायिक (परलोक के) अनर्थ से युक्त, अथवा अनर्थ में लगा हुआ, अथवा 'न अत्थो' (जो अर्थ/हित नहीं है) वह अनर्थ है, जो अर्थ का प्रतिपक्ष स्वभाव है, उससे युक्त 'अनत्थसंहितं' है; इसका अर्थ है पिशुनवाचा (चुगली) और सम्फप्पलाप (व्यर्थ प्रलाप)। इस प्रकार यहाँ चारों प्रकार के वचो-दुश्चरितों का ग्रहण समझना चाहिए। ဒုပ္ပယုတ္တောတိ ဒုပ္ပဋိပန္နော. န တံ တထာဂတော ဘာသတိ အဘူတတာဒိဒေါသဒုဋ္ဌတ္တာ. တမ္ပိ တထာဂတော န ဘာသတိ ဘူတတ္ထေပိ အနတ္ထသံဟိတတာဒိဒေါသဒုဋ္ဌတ္တာ. 'दुप्पयुत्तो' का अर्थ है 'दुष्प्रतिपन्न' (गलत तरीके से प्रयुक्त)। तथागत उसे नहीं कहते क्योंकि वह असत्यता आदि दोषों से दूषित है। उसे भी तथागत नहीं कहते क्योंकि सत्य होने पर भी वह अनर्थ-संहिता (अहितकर) आदि दोषों से दूषित है। ဌာနံ ကာရဏံ ဧတိဿာ အတ္ထီတိ ဌာနိယာ က-ကာရဿ ယ-ကာရံ ကတွာ, န ဌာနိယာတိ အဋ္ဌာနိယာ, နိက္ကာရဏာ အယုတ္တိယုတ္တာ, သာ ဧဝ ကထာတိ အဋ္ဌာနိယကထာ. အတ္တပစ္စက္ခကထံ ကထေမာတိ အတ္တနာ ဧဝ ပစ္စက္ခံ ကတွာ ပဝတ္တိယမာနံ ဆလကထံ ကထေမ. 'स्थान' (कारण) जिसमें है, वह 'ठानीया' (स्थानीया) है - यहाँ 'क' कार के स्थान पर 'य' कार करके; जो 'ठानीया' नहीं है वह 'अठानीया' (अस्थानीया) है, अर्थात् निष्कारण, अयुक्त। वही कथा 'अठानीया कथा' है। 'अत्तपच्चक्खकथं कथेमा' का अर्थ है - स्वयं प्रत्यक्ष करके प्रवर्तित की जाने वाली छलकथा (धूर्ततापूर्ण कथा) कहते हैं। ဂါမိကမဟလ္လကော ‘‘ဣမေ မံ ဝဉ္စေတုကာမာ, အဟမေဝ ဒါနိ ဣမေ ဝဉ္စေဿာမီ’’တိ စိန္တေတွာ ‘‘ဧဝံ ဘဝိဿတီ’’တိအာဒိမာဟ. ‘‘န မယံ ဒါသာ’’တိပိ ဝတ္တုံ နာသက္ခိံသု ပုဗ္ဗေ တထာကတိကာယ ကတတ္တာ. ग्राम-वृद्ध ने यह सोचकर कि 'ये मुझे ठगना चाहते हैं, अब मैं ही इन्हें ठगूँगा', 'ऐसा होगा' आदि कहा। 'हम दास नहीं हैं' - ऐसा भी वे नहीं कह सके क्योंकि पहले वैसी प्रतिज्ञा (समझौता) की गई थी। တတိယံ တတိယမေဝါတိ ဒွီသုပိ ပက္ခေသု တတိယံ တတိယမေဝ ဝါစံ. ဘာသိတဗ္ဗကာလံ အနတိက္ကမိတွာတိ ယဿ ယဒါ ယထာ ဘာသိတဗ္ဗံ, တဿ တဒါ တထေဝ စ ဘာသနတော ဘာသိတဗ္ဗံ ကာရဏံ ဘာသိတဗ္ဗကာလဉ္စ အနတိက္ကမိတွာဝ ဘာသတိ. 'ततियं ततियमेवा' का अर्थ है - दोनों पक्षों में तीसरी-तीसरी ही वाणी। 'भासितब्बकालं अनतिक्कमित्वा' का अर्थ है - जिसे, जब, जैसा कहना चाहिए, उसे तब, वैसा ही कहने के कारण, कहने योग्य कारण और कहने योग्य काल का उल्लंघन न करते हुए ही कहते हैं। ၈၇. ဌာနုပ္ပတ္တိကဉာဏေနာတိ ဌာနေ ဧဝ ဥပ္ပဇ္ဇနကဉာဏေန. တသ္မိံ တသ္မိံ ကာရဏေ တဿ တံ တံ အဝတ္ထာယ ဥပ္ပဇ္ဇနကဉာဏေန, ဓမ္မာနံ ယထာသဘာဝတော အဝဗုဇ္ဈနသဘာဝေါတိ ဓမ္မသဘာဝေါ. ဓမ္မေ သဘာဝဓမ္မေ အနဝသေသေ ဝါ ယာထာဝတော ဥပဓာရေတီတိ ဓမ္မဓာတု, သဗ္ဗညုတာ. တေနာဟ ‘‘သဗ္ဗညုတညာဏဿေတံ အဓိဝစန’’န္တိ. သုပ္ပဋိဝိဒ္ဓန္တိ သဗ္ဗံ ဉေယျဓမ္မံ သုဋ္ဌု ပဋိဝိဇ္ဈနဝသေန, သုဋ္ဌု ပဋိဝိဒ္ဓန္တိ အတ္ထော. တေနာဟ ‘‘ဟတ္ထဂတံ ဘဂဝတော’’တိ. နေယျပုဂ္ဂလဝသေန ပရိနိဋ္ဌိတာတိ ကထာပရိဝိဘာဂေန အယမေဝ [Pg.50] ဒေသနာ စတ္တာရိ အရိယသစ္စာနိ ဒဿေန္တော အရဟတ္တံ ပစ္စက္ခာသီတိ. ८७. 'ठानुप्पत्तिकञाणेन' का अर्थ है - स्थान (अवसर) पर ही उत्पन्न होने वाले ज्ञान से। उस-उस कारण में, उसकी उस-उस अवस्था में उत्पन्न होने वाले ज्ञान से। धर्मों को उनके यथास्वभाव से समझने का स्वभाव 'धम्मसभाव' (धर्म-स्वभाव) है। धर्मों में, स्वभाव-धर्मों में अथवा नि:शेष (सम्पूर्ण) रूप से यथार्थत: विचार करता है, इसलिए 'धम्मधातु' है, जो सर्वज्ञता है। इसीलिए कहा - 'यह सर्वज्ञता-ज्ञान का ही पर्यायवाची है'। 'सुप्पटिविद्धं' का अर्थ है - सभी ज्ञेय धर्मों को भली-भांति बेधने (जानने) के कारण, भली-भांति प्रतिवेध किया गया। इसीलिए कहा - 'भगवान के हाथ में आया हुआ'। 'नेय्यपुग्गलवसेन' (विनीत जनों के वश से) परिनिष्ठित हुई यह देशना कथा-विभाजन के द्वारा चार आर्य सत्यों को दिखाते हुए अर्हत्त्व का साक्षात्कार कराती है। အဘယရာဇကုမာရသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. अभयराजकुमार सुत्त की व्याख्या में लीनत्थप्पकासना (गूढ़ार्थ प्रकाशिनी टीका) समाप्त हुई। ၉. ဗဟုဝေဒနိယသုတ္တဝဏ္ဏနာ ९. बहुवेदनीय सुत्त की व्याख्या। ၈၈. ပဉ္စကင်္ဂေါတိ ဝဍ္ဎကီကိစ္စသာဓနေ ဝါသိအာဒိပဉ္စကံ အင်္ဂံ သံဓနံ ဧတသ္မိန္တိ ပဉ္စကင်္ဂေါ. ထမ္ဘာဒိဝတ္ထူနံ ထပနဋ္ဌေန ထပတိ. ပဏ္ဍိတဥဒါယိတ္ထေရော, န ကာဠုဒါယီ ထေရော. ८८. 'पञ्चकङ्गो' का अर्थ है - बढ़ई के कार्य को सिद्ध करने में बसूला आदि पाँच अंगों (उपकरणों) का समूह जिसमें है, वह 'पञ्चकङ्ग' है। खम्भे आदि वस्तुओं को स्थापित करने के कारण 'थपति' (स्थपति/बढ़ई) कहलाता है। यहाँ पण्डित उदायी स्थविर हैं, न कि कालुदायी स्थविर। ၈၉. ပရိယာယတိ အတ္တနော ဖလံ ဝတ္တေတီတိ ပရိယာယော, ကာရဏံ. ဝေဒနာသန္နိဿိတော စ ကာယိကစေတသိကဘာဝေါ ကာရဏံ. တေနာဟ – ‘‘ကာယိကစေတသိကဝသေန ဒွေ ဝေဒိတဗ္ဗာ’’တိ. တတ္ထ ပသာဒကာယသန္နိဿိတာ ကာယိကာ, စေတောသန္နိဿိတာ စေတသိကာ. သုခါဒိဝသေန တိဿောတိ ဧတ္ထ သုခနဒုက္ခနုပေက္ခနာနိ သုခါဒိဝေဒနာယ ကာရဏံ. တာနိ ဟိ ပဝတ္တိနိမိတ္တာနိ ကတွာ တတ္ထ သုခါဒိသဒ္ဒပ္ပဝတ္တိ, ဣမိနာ နယေန သေသေသုပိ ယထာရဟံ ကာရဏံ နိဒ္ဓါရေတွာ ဝတ္တဗ္ဗံ. ဥပဝိစာရဝသေနာတိ အာရမ္မဏံ ဥပေစ္စ သဝိသေသပဝတ္တိဝသေန. ယသ္မိဉှိ အာရမ္မဏေ သောမနဿဝေဒနာ ပဝတ္တတိ, အာရမ္မဏတာယ တံ ဥပဂန္တွာ ဣတရဝေဒနာဟိ ဝိသိဋ္ဌတာယ သဝိသေသံ တတ္ထ ပဝတ္တိ. တေနာဟ ‘‘သောမနဿဋ္ဌာနိယံ ရူပံ ဥပဝိစရတီ’’တိ. ဧသ နယော သေသဝေဒနာသု ဂေဟဿိတာနီတိ ဂေဟနိဿိတာနိ. ८९. 'परियाय' का अर्थ है - जो अपने फल को प्रवृत्त करता है, अर्थात् कारण। वेदना पर आश्रित कायिक और चैतसिक भाव ही कारण है। इसीलिए कहा - 'कायिक और चैतसिक के भेद से दो (वेदनाएँ) जाननी चाहिए'। उनमें प्रसाद-काय (इन्द्रिय-काय) पर आश्रित कायिक हैं, और चित्त पर आश्रित चैतसिक हैं। 'सुखादिवसेन तिस्सो' (सुख आदि के भेद से तीन) - यहाँ सुखद, दु:खद और उपेक्षात्मक अनुभव सुख आदि वेदनाओं के कारण हैं। उन्हें ही प्रवृत्ति का निमित्त बनाकर वहाँ सुख आदि शब्दों की प्रवृत्ति होती है; इस नय (विधि) से शेष में भी यथायोग्य कारण का निर्धारण करके कहना चाहिए। 'उपविचारवसेन' का अर्थ है - आलम्बन के पास जाकर विशेष रूप से प्रवृत्त होने के कारण। जिस आलम्बन में सौमनस्य वेदना प्रवृत्त होती है, आलम्बन होने के कारण उसके पास जाकर अन्य वेदनाओं से विशिष्ट होने के कारण वहाँ विशेष रूप से प्रवृत्ति होती है। इसीलिए कहा - 'सौमनस्य के स्थानभूत रूप का उपविचार (अनुसरण) करता है'। यही नय शेष वेदनाओं में भी है। 'गेहस्सितानि' का अर्थ है - गृह-आश्रित। ၉၀. ပရိယာယေနာတိ ‘‘ဣဒမေတ္ထ ဒုက္ခသ္မိန္တိ ဝဒါမီ’’တိ ဝုတ္တဋ္ဌာနံ သန္ဓာယ ဝဒတိ. တံ ဒဿေန္တောတိ ကာမဉ္စေတ္ထ သုတ္တေ – ‘‘ဒွေပါနန္ဒ, ဝေဒနာ ဝုတ္တာ’’တိ ဒွေ အာဒိံ ကတွာ ဝေဒနာ ဒဿိတာ, ဧကာပိ ပန ဒဿိတာ ဧဝါတိ ဒဿေန္တော. ဥပတ္ထမ္ဘေတုန္တိ ဧကာပိ ဝေဒနာ ဝုတ္တာ မယာ ပရိယာယေန, ဧဝံ သတိ ဒွေပိ ဝတ္တဗ္ဗာတိ ဧဝံ တဿ ဝါဒံ ဥပတ္ထမ္ဘေတုံ. ကထံ ပန ဧကာ ဝေဒနာ ဝုတ္တာတိ? ယံ ကိဉ္စိ ဝေဒယိတံ သုခံ ဝါ ဒုက္ခံ ဝါ အဒုက္ခမသုခံ ဝါ, ဣဒမေတ္ထ ဒုက္ခသ္မိန္တိ ဝဒါမီတိ. ယံ ပနေတ္ထ ဝတ္တဗ္ဗံ, တံ ဣတိဝုတ္တကဝဏ္ဏနာယံ (ဣတိဝု. အဋ္ဌ. ၅၂ အာဒယော) ပရမတ္ထဒီပနိယံ ဝုတ္တနယေန ဝေဒိတဗ္ဗံ. ९०. "पर्यायेन" का अर्थ है "यहाँ मैं इसे दुःख कहता हूँ" - इस संदर्भ में कहा गया है। उसे दिखाते हुए - यद्यपि इस सूत्र में "हे आनंद, दो वेदनाएँ कही गई हैं" आदि के द्वारा दो आदि वेदनाएँ दिखाई गई हैं, फिर भी एक भी दिखाई गई है। "समर्थन करने के लिए" का अर्थ है कि मेरे द्वारा पर्याय से एक वेदना भी कही गई है, ऐसा होने पर दो भी कहनी चाहिए - इस प्रकार उसके वाद का समर्थन करने के लिए। "एक वेदना कैसे कही गई है?" जो कुछ भी वेदित (अनुभव) है - चाहे सुख हो, दुःख हो या अदुःख-असुख हो, उसे मैं यहाँ दुःख कहता हूँ। यहाँ जो कुछ भी कहना शेष है, वह इतिवृत्तक-वर्णना (इतिवृत्तक अट्ठकथा) और परमत्थदीपनी में बताए गए तरीके से समझना चाहिए। ကထံ [Pg.51] ပနေတ္ထ ရူပါဝစရစတုတ္ထေ အရူပေသု သညာဝေဒယိတနိရောဓေ သုခံ ဥဒ္ဓတန္တိ အာဟ ‘‘ဧတ္ထ စာ’’တိအာဒိ. သန္တဋ္ဌေနာတိ ပဋိပက္ခဓမ္မာနံ ဝူပသန္တဘာဝေန. ပဏီတဋ္ဌေနာတိ ဘာဝနာဝိသေသဝိသိဋ္ဌေန အတပ္ပကဘာဝေနေဝ သေဋ္ဌဘာဝေန စ, ပစ္စယဝိသေသေန ပဓာနဘာဝံ နီတန္တိပိ ပဏီတံ. ဝေဒယိတသုခံ နာမ ဝေဒနာဘူတံ သုခန္တိ ကတွာ. အဝေဒယိတသုခံ နာမ ယာဝတာ နိဒ္ဒုက္ခတာ, တာဝတာ သုခန္တိ ဝုစ္စတီတိ.အထ ဝါ နိရောဓော သုဋ္ဌု ခါဒတိ ခနတိ ကာယိကစေတသိကာဗာဓန္တိ ဝတ္တဗ္ဗတံ အရဟတိ သတ္တာဟမ္ပိ တတ္ထ ဒုက္ခဿ နိရုဇ္ဈနတော. တေနာဟ ‘‘နိဒ္ဒုက္ခဘာဝသင်္ခါတေန သုခဋ္ဌေနာ’’တိ. यहाँ रूपावचर चतुर्थ (ध्यान) और अरूपों में संज्ञा-वेदयित-निरोध में सुख कैसे कहा गया है? इसके उत्तर में "यहाँ च" आदि कहा गया है। "शान्त अर्थ में" का अर्थ है प्रतिपक्ष धर्मों के शान्त होने के कारण। "प्रणीत अर्थ में" का अर्थ है विशेष भावना से विशिष्ट होने के कारण, अतृप्त न करने वाले भाव से और श्रेष्ठ भाव से; प्रत्यय विशेष के कारण प्रधानता को प्राप्त होने से भी प्रणीत है। "वेदयित सुख" का अर्थ है वेदना-स्वरूप सुख। "अवेदयित सुख" का अर्थ है जहाँ तक दुःख का अभाव है, वहाँ तक सुख कहा जाता है। अथवा, निरोध (निरोध-समापत्ति) शारीरिक और मानसिक बाधाओं को अच्छी तरह नष्ट कर देता है, इसलिए वह सुख कहलाने योग्य है, क्योंकि वहाँ सात दिनों तक दुःख का निरोध रहता है। इसीलिए कहा गया है - "दुःख के अभाव रूप सुख के अर्थ में"। ၉၁. ယသ္မိံ ယသ္မိံ ဘဝေ, စိတ္တုပ္ပာဒေ, အဝတ္ထာယ ဝါ နိဒ္ဒုက္ခဘာဝေါ, ဒုက္ခဿ ပဋိပက္ခတာ အနုပလဗ္ဘနေန ဒုက္ခဝိဝိတ္တံ, တံ သုခသ္မိံယေဝ ပညပေတိ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. ९१. जिस-जिस भव में, चित्त के उत्पाद में, या अवस्था में दुःख का अभाव है, दुःख की प्रतिपक्षता के कारण दुःख से रहित है, उसे सुख में ही प्रज्ञप्त (स्थापित) किया जाता है। शेष सुविज्ञेय (आसानी से समझने योग्य) ही है। ဗဟုဝေဒနီယသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. बहुवेदनीय सुत्त की वर्णना में लीनत्थप्पकासना (गूढ़ अर्थ का प्रकाशन) समाप्त हुई। ၁၀. အပဏ္ဏကသုတ္တဝဏ္ဏနာ १०. अपण्णक सुत्त की वर्णना। ၉၃. နာနာဝိဓာတိ နာနာဝိဓဒိဋ္ဌိကာ သမဏဗြာဟ္မဏာတိ ပဗ္ဗဇ္ဇာမတ္တေန သမဏာ, ဇာတိမတ္တေန ဗြာဟ္မဏာ စ. ဒဿနန္တိ ဒိဋ္ဌိ. ဂဟိတန္တိ အဘိနိဝိဿ ဂဟိတံ. ဣတိ တေ အတ္တနော ဒဿနံ ဂဟေတုကာမာ ပုစ္ဆန္တိ. ဝိနာ ဒဿနေန လောကော န နိယျာတီတိ ဝိမောက္ခဘာဝနာယ ဧကေန ဒဿနေန ဝိနာ လောကော သံသာရဒုက္ခတော န နိဂစ္ဆတိ. ဧကဒိဋ္ဌိယမ္ပိ ပတိဋ္ဌာတုံ နာသက္ခိံသု သဒ္ဓါကာရာဘာဝတော. တထာ ဟိ တေ ဣမာယ ဒေသနာယ သရဏေသု ပတိဋ္ဌဟိံသု. ယသ္မာ အဝိပရီတေ သဒ္ဓေယျဝတ္ထုသ္မိံ ဥပ္ပန္နသဒ္ဓါ ‘‘အာကာရဝတီ’’တိ အဓိပ္ပေတာ, တသ္မာ ယော လောကေ အဝိပရီတဓမ္မဒေသနာ, အယမေဝေသာတိ ပဝတ္တာ မဂ္ဂသာဓနဂတာယ သဒ္ဓါယ ကာရဏဘာဝတော တန္နိဿယာ သဒ္ဓါ, သာ အာကာရဝတီတိ ဝုတ္တာ. အဝတ္ထုသ္မိဉှိ သဒ္ဓါ အယုတ္တကာရဏတာယ န အာကာရဝတီ. အာကာရဝတီတိ ဧတ္ထ ဝတီ-သဒ္ဒေါ န ကေဝလံ အတ္ထိတာမတ္တဒီပကော, အထ ခေါ အတိသယတ္ထဒီပကော ပါသံသတ္ထဒီပကော ဝါ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. တေန အာကာရဝတီတိ သဒ္ဓေယျဝတ္ထုဝသေန အတိသယကာရဏဝတီတိ ဝါ ပါသံသကာရဏဝတီတိ ဝါ [Pg.52] အယမေတ္ထ အတ္ထော. အပဏ္ဏကောတိ ဧတ္ထ ယထာ ကဉ္စိ အတ္ထံ သာဓေတုံ အာရဒ္ဓဿ ပယောဂေါ ဝိရဒ္ဓေါ, တတ္ထ အကာရကော ဝိယ ဟောတိ ပုနပိ အာရဘိတဗ္ဗတာယ. အဝိရဒ္ဓေါ ပန အတ္ထဿ သာဓနတော အပဏ္ဏကော, ဧဝံ အယမ္ပိ ဓမ္မော အဘိဘဝိတွာ ပဝတ္တနတော ဧကံသတော ‘‘အပဏ္ဏကော’’တိ ဝုတ္တော. တေနာဟ ‘‘အဝိရဒ္ဓေါ အဒွေဇ္ဈဂါမီ ဧကံသဂါဟိကော’’တိ. ९३. "नानाविधा" का अर्थ है नाना प्रकार की दृष्टि वाले श्रमण और ब्राह्मण; प्रव्रज्या मात्र से श्रमण और जाति मात्र से ब्राह्मण। "दर्शन" का अर्थ है दृष्टि। "गृहीत" का अर्थ है अभिनिवेश (आग्रह) के साथ ग्रहण किया हुआ। इस प्रकार वे अपनी दृष्टि को ग्रहण करने की इच्छा से पूछते हैं। "दर्शन के बिना लोक मुक्त नहीं होता" का अर्थ है विमोक्ष-भावना के एक दर्शन के बिना लोक संसार के दुःख से बाहर नहीं निकलता। एक दृष्टि में भी वे प्रतिष्ठित नहीं हो सके क्योंकि उनमें श्रद्धा के आकार का अभाव था। तथापि, वे इस देशना के द्वारा शरणों में प्रतिष्ठित हुए। चूँकि विपरीत न होने वाले श्रद्धेय वस्तु में उत्पन्न श्रद्धा "आकारवती" (सकारण) अभिप्रेत है, इसलिए जो लोक में अविपरीत धर्म-देशना है, "यही वह है" - इस प्रकार प्रवृत्त मार्ग-साधन में स्थित श्रद्धा के कारण होने से, उस पर आश्रित श्रद्धा "आकारवती" कही गई है। क्योंकि अ-वस्तु (असत्य वस्तु) में श्रद्धा अयुक्त कारण होने से आकारवती नहीं होती। "आकारवती" में यहाँ "वती" शब्द न केवल अस्तित्व मात्र को दर्शाता है, बल्कि अतिशय अर्थ या प्रशंसा के अर्थ को भी दर्शाता है। इसलिए "आकारवती" का अर्थ है श्रद्धेय वस्तु के कारण अतिशय कारण वाली या प्रशंसनीय कारण वाली। "अपण्णक" के विषय में - जैसे किसी अर्थ को सिद्ध करने के लिए आरम्भ किया गया प्रयोग यदि विफल हो जाए, तो वह न करने वाले के समान होता है क्योंकि उसे फिर से आरम्भ करना पड़ता है। किन्तु जो विफल न हो, अर्थ की सिद्धि करने के कारण "अपण्णक" है; इसी प्रकार यह धर्म भी (विपक्ष को) अभिभूत करके प्रवृत्त होने से निश्चित रूप से "अपण्णक" कहा गया है। इसीलिए कहा गया है - "अविरूद्ध (विफल न होने वाला), दुविधा रहित और एकांशग्राही (निश्चित रूप से ग्रहण करने योग्य)"। ၉၄. တဗ္ဗိပစ္စနီကဘူတာတိ တဿာ မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိယာ ပစ္စနီကဘူတာ. ९४. "तद्विपक्षभूत" का अर्थ है उस मिथ्या दृष्टि के प्रतिकूल (विरोधी) होना। ၉၅. နေသန္တိ ကုသလာနံ ဓမ္မာနံ. အကုသလတော နိက္ခန္တဘာဝေတိ အသံကိလိဋ္ဌဘာဝေ. အာနိသံသောတိ သုဒ္ဓဝိပါကတာ. ဝိသုဒ္ဓိပက္ခောတိ ဝိသုဒ္ဓိဘာဝေါ ပရိယောဒါတတာ. အဘူတဓမ္မဿ ဒိဋ္ဌိဘာဝဿ သညာပနာ အာစိက္ခနာ အဘူတဓမ္မသညာပနာ. သာဝဇ္ဇေသု ပရမဝဇ္ဇေ မိစ္ဆာဒဿနေ ပဂ္ဂဟဏန္တိ ကုတော သုသီလျဿ ပဂ္ဂဟောတိ အာဟ – ‘‘မိစ္ဆာဒဿနံ ဂဏှန္တဿေဝ သုသီလျံ ပဟီနံ ဟောတီ’’တိ. မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိအာဒယောတိ ဧတ္ထ မိစ္ဆာသင်္ကပ္ပော ပရလောကာဘာဝစိန္တာ, မိစ္ဆာဝါစာ ပရလောကာဘာဝဝါဒဘူတော မုသာဝါဒေါ, အရိယာနံ ပစ္စနီကတာဒယော. အပရာပရံ ဥပ္ပဇ္ဇနဝသေနာတိ ပုနပ္ပုနံ စိတ္တေ ဥပ္ပဇ္ဇနဝသေန. ပါပကာ အကုသလာ ဓမ္မာတိ ပစ္စဝေက္ခဏသညာပနာဒိကာလေ ဥပ္ပဇ္ဇနကာ တထာပဝတ္တာ အကုသလခန္ဓာ. ९५. "इनका" का अर्थ है कुशल धर्मों का। "अकुशल से निकलने के भाव में" का अर्थ है असंक्लिष्ट (अमलिन) भाव में। "आशंस" का अर्थ है शुद्ध विपाक होना। "विशुद्धिपक्ष" का अर्थ है विशुद्धि भाव या निर्मलता। "अभूत धर्म" (असत्य) रूपी दृष्टि भाव को समझाना या बताना "अभूतधर्म-संज्ञापन" है। सावद्य (दोषयुक्त) कार्यों में परम दोष रूप मिथ्या दर्शन को ग्रहण करना - "सुशीलता का प्रग्रह (उन्नति) कहाँ से होगा?" इसके उत्तर में कहा - "मिथ्या दर्शन को ग्रहण करने वाले की सुशीलता नष्ट हो जाती है"। "मिथ्या दृष्टि आदि" में मिथ्या संकल्प का अर्थ है परलोक के अभाव का चिंतन, मिथ्या वाचा का अर्थ है परलोक के अभाव का कथन रूपी मृषावाद, और आर्यों की प्रतिकूलता आदि। "बार-बार उत्पन्न होने के वश से" का अर्थ है चित्त में पुनः-पुनः उत्पन्न होने के कारण। "पापमय अकुशल धर्म" का अर्थ है प्रत्यवेक्षण और संज्ञापन आदि के समय उत्पन्न होने वाले उस प्रकार प्रवृत्त अकुशल स्कंध। ကလိဂ္ဂဟောတိ အနတ္ထပရိဂ္ဂဟော. သော ပန ယသ္မာ ဒိဋ္ဌေဝ ဓမ္မေ အဘိသမ္ပရာယဉ္စ ပရာဇယော ဟောတီတိ အာဟ ‘‘ပရာဇယဂ္ဂါဟော’’တိ. ဒုဿမတ္တောတိ ဧတ္ထ ဒု-သဒ္ဒေါ ‘‘သမာဒိန္နော’’တိ ဧတ္ထာပိ အာနေတွာ ယောဇေတဗ္ဗောတိ အာဟ ‘‘ဒုပ္ပရာမဋ္ဌော’’တိ. ယထာ ဒုပ္ပရာမဋ္ဌော ဟောတိ, ဧဝံ သမာဒိန္နော ဒုဿမတ္တော ဒုသမာဒိန္နော ဝုတ္တော. သကဝါဒမေဝ ဖရိတွာတိ အတ္တနော နတ္ထိကဝါဒမေဝ ‘‘ဣဒမေဝ သစ္စံ မောဃမည’’န္တိ (မ. နိ. ၂.၁၈၇; ၃.၂၇-၂၈) အဝဓာရေန္တော အညဿ ဩကာသအဒါနဝသေန ဖရိတွာ. တေနာဟ ‘‘အဓိမုစ္စိတွာ’’တိ. ‘‘သမ္ဗုဒ္ဓေါ’’တိအာဒိ အဓိမုစ္စနာကာရဒဿနံ. ရိဉ္စတီတိ ဝိဝေစေတိ အပနေတိ. တေနာဟ ‘‘ဝဇ္ဇေတီ’’တိ. "कलिग्रह" का अर्थ है अनर्थ का परिग्रह। चूँकि वह इसी जन्म में और परलोक में भी पराजय का कारण होता है, इसलिए कहा गया है - "पराजय का ग्रहण"। "दुस्समत्तो" में "दु" शब्द को "समादिन्नो" के साथ भी जोड़कर समझना चाहिए, इसलिए कहा गया है - "दुष्परामृष्ट" (गलत तरीके से पकड़ा हुआ)। जैसे दुष्परामृष्ट होता है, वैसे ही "दुस्समत्तो" का अर्थ "दुःसमादत्त" (गलत तरीके से ग्रहण किया हुआ) कहा गया है। "अपने वाद को ही फैलाकर" का अर्थ है अपने नास्तिकवाद को ही "यही सत्य है, अन्य सब व्यर्थ है" - इस प्रकार निर्धारित करते हुए, दूसरे के लिए स्थान न छोड़ते हुए व्याप्त करना। इसीलिए कहा गया है - "अधिमुक्त होकर" (दृढ़ निश्चय करके)। "सम्बुद्ध" आदि अधिमुक्ति के प्रकार को दिखाने के लिए है। "रिञ्चति" का अर्थ है अलग करना या हटाना। इसीलिए कहा गया है - "वर्जित करता है"। ၉၆. ကဋဂ္ဂဟောတိ ကတံ သဗ္ဗသော သိဒ္ဓိမေဝ ကတွာ ဂဟဏံ. သော ပန ဇယလာဘော ဟောတီတိ ဝုတ္တံ ‘‘ဇယဂ္ဂါဟော’’တိ. သုဂ္ဂဟိတောတိ သုဋ္ဌုကရဏဝသေန ဂဟိတော. သုပရာမဋ္ဌောတိ သုဋ္ဌု ပရာပရံ အာသေဝနဝသေန အာမဋ္ဌော[Pg.53]. ဥဘယေနပိ တဿ ကမ္မဿ ကတူပစိတဘာဝံ ဒဿေတိ, သောတ္ထိဘာဝါဝဟတ္တဉ္စ သဂ္ဂုပပတ္တိသံဝတ္တနတော ပါပသဘာဝပဟာနတော စ. ९६. कटग्गहो (विजयी दाँव) का अर्थ है सब प्रकार से सिद्धि प्राप्त कर ग्रहण करना। वह विजय का लाभ होता है, इसलिए उसे 'जयग्गाहो' (विजय का ग्रहण) कहा गया है। सुग्गहितो का अर्थ है भली-भाँति करने के कारण ग्रहण किया गया। सुपरामट्ठो का अर्थ है भली-भाँति बार-बार सेवन (अभ्यास) करने के कारण स्पर्श किया गया। इन दोनों (पदों) से उस कर्म के किए जाने और संचित होने के भाव को दर्शाता है, और स्वर्ग में उत्पत्ति की ओर ले जाने तथा पाप स्वभाव के प्रहाण (त्याग) से कल्याणकारी अवस्था को लाने वाला होने को भी दर्शाता है। ၉၇. သဟတ္ထာ ကရောန္တဿာတိ (ဒီ. နိ. ဋီ. ၁.၁၆၆; သံ. နိ. ဋီ. ၂.၃.၂၁၁) သဟတ္ထေနေဝ ကရောန္တဿ. နိဿဂ္ဂိယထာဝရာဒယောပိ ဣဓ သဟတ္ထကရဏေနေဝ သင်္ဂဟိတာ. ပစနံ ဒဟနံ ဝိဗာဓနန္တိ အာဟ ‘‘ဒဏ္ဍေန ပီဠေန္တဿာ’’တိ. သောကံ သယံ ကရောန္တဿာတိ ပရဿ သောကကာရဏံ သယံ ကရောန္တဿ, သောကံ ဝါ ဥပ္ပာဒေန္တဿ. ပရေဟိ အတ္တနော ဝစနကရေဟိ. သယမ္ပိ ဖန္ဒတောတိ ပရဿ ဝိဗာဓနပယောဂေန သယမ္ပိ ဖန္ဒတော. အတိပါတယတောတိ ပဒံ သုဒ္ဓကတ္တုအတ္ထေ ဟေတုကတ္တုအတ္ထေ စ ဝတ္တတီတိ အာဟ ‘‘ဟနန္တဿပိ ဟနာပေန္တဿာပီ’’တိ. ९७. 'सहत्था करन्तस्स' (स्वयं हाथ से करते हुए का) का अर्थ है अपने ही हाथ से करते हुए का। निसग्गिय (त्याज्य), स्थावर आदि भी यहाँ स्वयं हाथ से करने के अंतर्गत ही संगृहीत हैं। पकाना, जलाना और बाधा पहुँचाना—इनके लिए कहा गया है 'दण्ड से पीड़ित करते हुए का'। 'सोकं सयं करन्तस्स' का अर्थ है दूसरे के शोक का कारण स्वयं बनते हुए का, अथवा शोक उत्पन्न करते हुए का। अपने वचनों का पालन करने वाले दूसरों के द्वारा। 'सयम्पि फन्दतो' का अर्थ है दूसरे को पीड़ित करने के प्रयोग से स्वयं भी कांपते हुए। 'अतिपातयतो' पद करने और करवाने—दोनों अर्थों में प्रयुक्त होता है, इसलिए कहा गया है 'मारते हुए का भी और मरवाते हुए का भी'। ဃရဿ ဘိတ္တိ အန္တော ဗဟိ စ သန္ဓိတာ ဟုတွာ ဌိတာ ဃရသန္ဓိ. ကိဉ္စိပိ အသေသေတွာ နိရဝသေသမေဝ လောပေါတိ နိလ္လောပေါ. ဧကာဂါရေ နိယုတ္တော ဝိလောပေါ ဧကာဂါရိကော. ပရိတော သဗ္ဗသော ပန္ထေ ဟနနံ ပရိပန္ထော. ပါပံ န ကရီယတိ ပုဗ္ဗေ အသတော ဥပ္ပာဒေတုံ အသက္ကုဏေယျတ္တာ, တသ္မာ နတ္ထိ ပါပံ. ယဒိ ဧဝံ ကထံ သတ္တာ ပါပံ ပဋိပဇ္ဇန္တီတိ အာဟ – ‘‘သတ္တာ ပန ကရောမာတိ ဧဝံသညိနော ဟောန္တီ’’တိ. ဧဝံ ကိရဿ ဟောတိ ‘‘ဣမေသဉှိ သတ္တာနံ ဟိံသာဒိကိရိယာ န အတ္တာနံ ဖုသတိ တဿ နိစ္စတာယ နိဗ္ဗိကာရတ္တာ, သရီရံ ပန အစေတနံ ကဋ္ဌကလိင်္ဂရူပမံ, တသ္မိံ ဝိကောပိတေပိ န ကိဉ္စိ ပါပ’’န္တိ. ခုရနေမိနာတိ နိသိတခုရမယနေမိနာ. ဂင်္ဂါယ ဒက္ခိဏဒိသာ အပ္ပတိရူပဒေသော, ဥတ္တရဒိသာ ပတိရူပဒေသောတိ အဓိပ္ပာယေန ‘‘ဒက္ခိဏဉ္စေ’’တိအာဒိ ဝုတ္တန္တိ ‘‘ဒက္ခိဏတီရေ မနုဿာ ကက္ခဠာ’’တိအာဒိမာဟ. घर की दीवार जो भीतर और बाहर से जुड़ी हुई खड़ी है, वह 'घरसन्धि' (सेंध) है। कुछ भी शेष न छोड़कर पूर्णतः लूट लेना 'निल्लोपो' है। एक ही घर में की गई लूट 'एकागारिको' है। चारों ओर से मार्ग में मारना 'परिपन्थो' (राहजनी) है। पाप नहीं किया जाता क्योंकि जो पहले विद्यमान नहीं था उसे उत्पन्न करना असंभव है, इसलिए पाप नहीं है। यदि ऐसा है तो प्राणी पाप में कैसे प्रवृत्त होते हैं? इसके लिए कहा गया है— 'प्राणी तो हम कर रहे हैं, ऐसी संज्ञा (धारणा) वाले होते हैं'। उसके लिए ऐसा (विचार) होता है कि 'इन प्राणियों की हिंसा आदि की क्रिया आत्मा को स्पर्श नहीं करती क्योंकि वह नित्य और निर्विकार है, और शरीर तो काष्ठ के लट्ठे के समान अचेतन है, उसके विक्षुब्ध होने पर भी कोई पाप नहीं होता'। 'खुरनेमिना' का अर्थ है तीक्ष्ण छुरे वाली नेमि (पहिये का घेरा) से। गंगा की दक्षिण दिशा अनुपयुक्त प्रदेश है और उत्तर दिशा उपयुक्त प्रदेश है—इस अभिप्राय से 'दक्खिणञ्चे' आदि कहा गया है, जैसे 'दक्षिण तट पर मनुष्य कठोर होते हैं' आदि। မဟာယာဂန္တိ မဟာဝိဇိတယညသဒိသံ မဟာယာဂံ. သီလသံယမေနာတိ ကာယိကဝါစသိကသံဝရေန. သစ္စဝစနေနာတိ သစ္စဝါစာယ. တဿ ဝိသုံ ဝစနံ လောကေ ဂရုတရပုညသမ္မတဘာဝတော. ယထာ ဟိ ပါပဓမ္မေသု မုသာဝါဒေါ ဂရု, ဧဝံ ပုညဓမ္မေသု သစ္စဝါစာ. တေနာဟ ဘဂဝါ – ‘‘ဧကံ ဓမ္မမတီတဿာ’’တိအာဒိ (ဓ. ပ. ၁၇၆). ဝုတ္တနယေနေဝါတိ ကဏှပက္ခေ ဝုတ္တနယေန. တတ္ထ ဟိ – ‘‘နတ္ထိ ပါပံ, နတ္ထိ ပါပဿ အာဂမော’’တိ အာဂတံ, ဣဓ ‘‘အတ္ထိ ပုညံ, အတ္ထိ ပုညဿ အာဂမော’’တိ အာဂတံ, အယမေဝ ဝိသေသော. သေသံ ဝုတ္တသဒိသမေဝါတိ [Pg.54] ‘‘တေသမေတံ ပါဋိကင်္ခ’’န္တိ ဧဝမာဒိံ သန္ဓာယ ဝဒတိ, တံ ဟေဋ္ဌာ ပုရိမဝါရသဒိသံ. 'महायज्ञ' का अर्थ है महाविजित यज्ञ के समान महान यज्ञ। 'शीलसंयम' का अर्थ है कायिक और वाचिक संवर (संयम) से। 'सत्यवचन' का अर्थ है सत्य वाणी से। लोक में उसे महान पुण्य माने जाने के कारण उसका अलग से उल्लेख है। जैसे पाप कर्मों में मृषावाद (झूठ) भारी है, वैसे ही पुण्य कर्मों में सत्य वाणी। इसीलिए भगवान ने कहा है— 'एकं धम्ममतीतस्स' (जिसने एक धर्म का उल्लंघन किया है) आदि। 'उक्त रीति से ही' का अर्थ है कृष्ण पक्ष (पाप पक्ष) में कही गई रीति से। वहाँ 'पाप नहीं है, पाप का आगमन नहीं है' ऐसा आया है, यहाँ 'पुण्य है, पुण्य का आगमन है' ऐसा आया है, यही विशेष अंतर है। शेष पूर्वोक्त के समान ही है— यह 'तेसमेतं पाटिकङ्खं' (उन्हें इसकी आशा करनी चाहिए) आदि के संदर्भ में कहा गया है, वह नीचे पिछले प्रकरण के समान ही है। ၁၀၀. ဥဘယေနာတိ ဟေတုပစ္စယပဋိသေဓဝစနေန. သံကိလေသပစ္စယန္တိ သံသာရေ ပရိဗ္ဘမနေန ကိလိန္နဿ မလိနဘာဝဿ ကာရဏံ. ဝုတ္တဝိပရိယာယေန ဝိသုဒ္ဓိပစ္စယန္တိ သဒ္ဒတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. ဗလန္တိအာဒီသု သတ္တာနံ သံကိလေသာဝဟံ ဝေါဒါနာဝဟဉ္စ ဥဿာဟသင်္ခါတံ ဗလံ ဝါ, သူရဝီရဘာဝသင်္ခါတံ ဝီရိယံ ဝါ, ပုရိသေန ကတ္တဗ္ဗော ပုရိသထာမော ဝါ, သော ဧဝ ပရံ ပရံ ဌာနံ အက္ကမနပ္ပတ္တိယာ ပုရိသပရက္ကမော ဝါ နတ္ထိ န ဥပလဗ္ဘတိ. १००. 'दोनों से' का अर्थ है हेतु और प्रत्यय के निषेध वचन से। 'संक्लेश प्रत्यय' का अर्थ है संसार में परिभ्रमण करने से क्लिन्न (भीगे हुए) के मलिन होने का कारण। इसके विपरीत 'विशुद्धि प्रत्यय' का शब्दार्थ समझना चाहिए। 'बल' आदि के विषय में— प्राणियों के संक्लेश और विशुद्धि को लाने वाला उत्साह नामक 'बल', अथवा शूरवीरता नामक 'वीर्य', अथवा पुरुष द्वारा किया जाने वाला 'पुरुष-थाम' (मानवीय शक्ति), अथवा वही उत्तरोत्तर स्थान प्राप्त करने के लिए 'पुरुष-पराक्रम'— (इनमें से कुछ भी) नहीं है, उपलब्ध नहीं होता है। သတွယောဂတော, ရူပါဒီသု သတ္တဝိသတ္တတာယ စ သတ္တာ. ပါဏနတော အဿာသပဿာသဝသေန ပဝတ္တိယာ ပါဏာ. တေ ပန သော ဧကိန္ဒြိယာဒိဝသေန ဝိဘဇိတွာ ဝဒတီတိ အာဟ ‘‘ဧကိန္ဒြိယော’’တိအာဒိ. အဏ္ဍကောသာဒီသု ဘဝနတော ဘူတာတိ ဝုစ္စန္တီတိ အာဟ ‘‘အဏ္ဍကောသ…ပေ… ဝဒန္တီ’’တိ. ဇီဝနတော ပါဏံ ဓာရေန္တော ဝိယ ဝဍ္ဎနတော ဇီဝါတိ ဧဝံ သတ္တပါဏဘူတဇီဝေသု သဒ္ဒတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. နတ္ထိ ဧတေသံ သံကိလေသဝိသုဒ္ဓီသု ဝသောတိ အဝသာ. နတ္ထိ နေသံ ဗလံ ဝီရိယဉ္စာတိ အဗလာ အဝီရိယာ. နိယတတာတိ အစ္ဆေဇ္ဇသုတ္တာဝုတာဘေဇ္ဇမဏိ ဝိယ နိယတပဝတ္တနတာယ ဂတိဇာတိဗန္ဓပဇဟဝသေန နိယာမော. တတ္ထ တတ္ထ ဂမနန္တိ ဆန္နံ အဘိဇာတီနံ တာသု တာသု ဂတီသု ဥပဂမနံ သမဝါယေန သမာဂမော. သဘာဝေါယေဝါတိ ယထာ ကဏ္ဋကဿ တိက္ခတာ, ကဗိဋ္ဌဖလာနံ ပရိမဏ္ဍလတာ, မိဂပက္ခီနံ ဝိစိတ္တာကာရတာ, ဧဝံ သဗ္ဗဿပိ လောကဿ ဟေတုပစ္စယေန ဝိနာ တထာ တထာ ပရိဏာမော, အယံ သဘာဝေါယေဝ အကိတ္တိမောယေဝ. တေနာဟ ‘‘ယေန ဟီ’’တိအာဒိ. आसक्ति (सत्व) के योग से और रूप आदि में आसक्त होने के कारण 'सत्त' (प्राणी) कहलाते हैं। श्वास-प्रश्वास के रूप में प्रवृत्त होने के कारण 'पाण' (प्राण) कहलाते हैं। वह उन्हें एक-इन्द्रिय आदि के भेद से विभाजित कर कहता है, इसलिए 'एकिन्द्रिय' आदि कहा गया है। अण्डकोश आदि में उत्पन्न होने के कारण 'भूत' कहे जाते हैं, इसलिए 'अण्डकोस...पे... वदन्ति' कहा गया है। जीवन के कारण प्राण धारण करने के समान बढ़ने के कारण 'जीव' कहलाते हैं— इस प्रकार सत्त, पाण, भूत और जीव का शब्दार्थ समझना चाहिए। संक्लेश और विशुद्धि में इनका कोई वश नहीं है, इसलिए 'अवसा' (विवश) हैं। इनमें बल और वीर्य नहीं है, इसलिए 'अबला' और 'अवीरिया' हैं। 'नियतता' का अर्थ है न टूटने वाले सूत्र में पिरोए गए न फूटने वाले मणि के समान नियत रूप से प्रवर्तन होने के कारण गति, जाति और बन्धन के त्याग के वश से नियम (निश्चितता)। 'वहाँ-वहाँ जाना' का अर्थ है छह अभिजातियों (श्रेणियों) का उन-उन गतियों में पहुँचना और समवाय से मिलन। 'स्वभाव ही है'— जैसे कांटे की तीक्ष्णता, कैथ के फलों की गोलाई, मृग और पक्षियों की विचित्रता, वैसे ही समस्त लोक का हेतु और प्रत्यय के बिना उस-उस रूप में परिणाम होना, यह स्वभाव ही है, अकृत्रिम ही है। इसीलिए 'येन हि' आदि कहा गया है। သကုဏေ ဟနတီတိ သာကုဏိကော, တထာ သူကရိကော. လုဒ္ဒေါတိ အညောပိ ယော ကောစိ မာဂဝိကော နေသာဒေါ. ပါပကမ္မပသုတတာယ ကဏှာဘိဇာတိ နာမ. ဘိက္ခူတိ သာကိယာ ဘိက္ခူ, မစ္ဆမံသခါဒနတော နီလာဘိဇာတီတိ ဝဒန္တိ. ဉာယလဒ္ဓေပိ ပစ္စယေ ဘုဉ္ဇမာနာ အာဇီဝကသမယဿ ဝိလောမဂါဟိတာယ ‘‘ပစ္စယေသု ကဏ္ဋကေ ပက္ခိပိတွာ ခါဒန္တီ’’တိ ဝဒန္တိ. ဧကေ ပဗ္ဗဇိတာ, ယေ သဝိသေသံ အတ္တကိလမထာနုယောဂမနုယုတ္တာ. တထာ [Pg.55] ဟိ တေ ကဏ္ဋကေ ဝတ္တေန္တာ ဝိယ ဟောန္တီတိ ကဏ္ဋကဝုတ္တိကာတိ ဝုတ္တာ. ဌတွာ ဘုဉ္ဇနဒါနပဋိက္ခေပါဒိဝတသမာယောဂေန ပဏ္ဍရတရာ. အစေလကသာဝကာတိ အာဇီဝကသာဝကေ ဝဒတိ. တေ ကိရ အာဇီဝကလဒ္ဓိယာ ဝိသုဒ္ဓစိတ္တတာယ နိဂဏ္ဌေဟိပိ ပဏ္ဍရတရာ. နန္ဒာဒယော ဟိ တထာရူပါယ ပဋိပတ္တိယာ ပတ္တဗ္ဗာ, တသ္မာ နန္ဒာဒယော နိဂဏ္ဌေဟိ အာဇီဝကသာဝကေဟိ စ ပဏ္ဍရတရာတိ ဝုတ္တာ ‘‘သုက္ကာဘိဇာတီ’’တိ. पक्षियों को मारने वाला 'साकुणिक' (बहेलिया) है, वैसे ही 'सूकरिक' (सूअर मारने वाला)। 'लुद्दो' (व्याध) कोई अन्य भी मृगया करने वाला निषाद है। पाप कर्मों में लगे होने के कारण वे 'कण्हाभिजाति' (कृष्ण अभिजाति/काली जाति) कहलाते हैं। 'भिक्खू' का अर्थ है शाक्यपुत्रीय भिक्षु; मछली और मांस खाने के कारण (आजीवक) उन्हें 'नीलाभिजाति' कहते हैं। न्यायपूर्वक प्राप्त प्रत्ययों (भोग की वस्तुओं) का उपभोग करने पर भी, आजीवक मत के विपरीत होने के कारण वे कहते हैं कि 'ये प्रत्ययों में काँटे डालकर खाते हैं'। 'एके पब्बजिता' - वे कुछ प्रव्रजित जो विशेष रूप से आत्म-क्लेश के अभ्यास में लगे हैं। क्योंकि वे काँटों पर लोटने वालों के समान होते हैं, इसलिए उन्हें 'कण्टकवृत्तिक' कहा गया है। खड़े होकर भोजन करने और दान के निषेध आदि व्रतों के पालन से वे 'पण्डरतर' (अत्यधिक श्वेत) हैं। 'अचेलकसावका' से तात्पर्य आजीवक श्रावकों से है। वे आजीवक मत के अनुसार चित्त की शुद्धि के कारण निग्रन्थों से भी अधिक श्वेत हैं। नन्द आदि वैसी प्रतिपत्ति (साधना) से प्राप्त होने योग्य हैं, इसलिए नन्द आदि को निग्रन्थों और आजीवक श्रावकों से भी अधिक श्वेत होने के कारण 'सुक्काभिजाति' (शुक्ल अभिजाति) कहा गया है। အယမေတေသံ လဒ္ဓီတိ သာကုဏိကာဒိဘာဝူပဂမနေန ကဏှာဘိဇာတိအာဒီသု ဒုက္ခံ သုခဉ္စ ပဋိသံဝေဒေန္တာ အနုက္ကမေန မဟာကပ္ပာနံ စုလ္လာသီတိသဟဿာနိ ခေပေတွာ အာဇီဝကဘာဝူပဂမနေန ပရမသုက္ကာဘိဇာတိယံ ဌတွာ သံသာရတော သုဇ္ဈန္တီတိ အယံ တေသံ နိယတိ အာဇီဝကာနံ လဒ္ဓိ. 'यह उनका मत है' - साकुणिक आदि भाव को प्राप्त होकर कृष्ण अभिजाति आदि में दु:ख और सुख का अनुभव करते हुए, क्रम से चौरासी हजार महाकल्पों को व्यतीत कर, आजीवक भाव को प्राप्त होकर परम शुक्ल अभिजाति में स्थित होकर संसार से शुद्ध (मुक्त) होते हैं - यह उन आजीवकों की 'नियति' (सिद्धांत) है। ‘‘နတ္ထိ ဒိန္န’’န္တိ ဝဒန္တော နတ္ထိကော ဒါနဿ ဖလံ ပဋိက္ခိပတီတိ အာဟ – ‘‘နတ္ထိကဒိဋ္ဌိ ဝိပါကံ ပဋိဗာဟတီ’’တိ. တထာ စေဝ ဟေဋ္ဌာ သံဝဏ္ဏိတံ ‘‘နတ္ထိကဒိဋ္ဌိ ဟိ နတ္ထိတမာဟာ’’တိ. အဟေတုကဒိဋ္ဌိ ဥဘယန္တိ ကမ္မံ ဝိပါကဉ္စ ဥဘယံ. သော ဟိ ‘‘အဟေတူ အပစ္စယာ သတ္တာ သံကိလိဿန္တိ ဝိသုဇ္ဈန္တီ’’တိ ဝဒန္တော ကမ္မဿ ဝိယ ဝိပါကဿပိ သံကိလေသဝိသုဒ္ဓီနံ ပစ္စယတ္တာဘာဝဝစနတော တဒုဘယံ ပဋိဗာဟတိ နာမ. ဝိပါကော ပဋိဗာဟိတော ဟောတိ အသတိ ကမ္မေ ဝိပါကာဘာဝတော. ကမ္မံ ပဋိဗာဟိတံ ဟောတိ အသတိ ဝိပါကေ ကမ္မဿ နိရတ္ထကဘာဝါပတ္တိတော. အတ္ထတောတိ သရူပေန. ဥဘယပဋိဗာဟကာတိ ဝိသုံ ဝိသုံ တံတံဒိဋ္ဌိတာ ဝုတ္တာပိ သဗ္ဗေ တေ နတ္ထိကာဒယော နတ္ထိကဒိဋ္ဌိအာဒိဝသေန ပစ္စေကံ တိဝိဓဒိဋ္ဌိကာ ဧဝ ဥဘယပဋိဗာဟကတ္တာ. ‘‘ဥဘယပဋိဗာဟကာ’’တိ ဟိ ဟေတုဝစနံ. အဟေတုကဝါဒါ စာတိအာဒိ ပဋိညာဝစနံ. ယော ဟိ ဝိပါကပဋိဗာဟနေန နတ္ထိကဒိဋ္ဌိကော, သော အတ္ထတော ကမ္မပဋိဗာဟနေန အကိရိယဒိဋ္ဌိကော, ဥဘယပဋိဗာဟနေန အဟေတုကဒိဋ္ဌိကော စ ဟောတိ. သေသဒွယေပိ ဧသေဝ နယော. ''दान का कोई फल नहीं है'' ऐसा कहने वाला नास्तिक दान के फल का निषेध करता है - ऐसा कहा गया है - ''नास्तिक दृष्टि विपाक (फल) का प्रतिषेध करती है।'' उसी प्रकार नीचे वर्णन किया गया है कि ''नास्तिक दृष्टि वास्तव में नास्तिकता (अभाव) को कहती है।'' अहेतुक दृष्टि दोनों का - कर्म और विपाक दोनों का (निषेध करती है)। क्योंकि वह ''बिना हेतु और बिना प्रत्यय के प्राणी संक्लिष्ट (अशुद्ध) होते हैं और शुद्ध होते हैं'' ऐसा कहते हुए, कर्म के समान ही विपाक के लिए भी संक्लेश और विशुद्धि के प्रत्यय (कारण) के अभाव का कथन करने के कारण, उन दोनों का प्रतिषेध करता है। कर्म के न होने पर विपाक का अभाव होने से विपाक प्रतिषेधित हो जाता है। विपाक के न होने पर कर्म के निरर्थक हो जाने से कर्म प्रतिषेधित हो जाता है। 'अर्थतः' का अर्थ है स्वरूप से। 'दोनों का प्रतिषेध करने वाले' - यद्यपि अलग-अलग उन-उन दृष्टियों के रूप में कहे गए हैं, फिर भी वे सभी नास्तिक आदि, नास्तिक दृष्टि आदि के वश से प्रत्येक तीन प्रकार की दृष्टि वाले ही हैं, क्योंकि वे दोनों का प्रतिषेध करने वाले हैं। ''दोनों का प्रतिषेध करने वाले'' यह हेतु-वचन है। ''अहेतुकवादी च'' आदि प्रतिज्ञा-वचन है। जो विपाक के प्रतिषेध से नास्तिक दृष्टि वाला है, वह अर्थतः कर्म के प्रतिषेध से अक्रिया दृष्टि वाला और दोनों के प्रतिषेध से अहेतुक दृष्टि वाला होता है। शेष दो में भी यही नियम है। သဇ္ဈာယန္တီတိ တံ ဒိဋ္ဌိဒီပကံ ဂန္ထံ ဥဂ္ဂဟေတွာ ပဌန္တိ. ဝီမံသန္တီတိ တဿ အတ္ထံ ဝိစာရေန္တိ. တေသန္တိအာဒိ ဝီမံသနာကာရဒဿနံ. တသ္မိံ အာရမ္မဏေတိ ယထာပရိကပ္ပိတကမ္မဖလာဘာဝဒီပကေ ‘‘နတ္ထိ ဒိန္န’’န္တိအာဒိနယပ္ပဝတ္တာယ လဒ္ဓိယာ အာရမ္မဏေ. မိစ္ဆာသတိ သန္တိဋ္ဌတီတိ ‘‘နတ္ထိ ဒိန္န’’န္တိအာဒိဝသေန [Pg.56] အနုဿဝူပလဒ္ဓေ အတ္ထေ တဒါကာရပရိဝိတက္ကနေဟိ သဝိဂ္ဂဟေ ဝိယ သရူပတော စိတ္တဿ ပစ္စုပဋ္ဌိတေ စိရကာလပရိစယေန ‘‘ဧဝမေတ’’န္တိ နိဇ္ဈာနက္ခမဘာဝူပဂမနေန နိဇ္ဈာနက္ခန္တိယာ တထာ ဂဟိတေ ပုနပ္ပုနံ တထေဝ အာသေဝန္တဿ ဗဟုလီကရောန္တဿ မိစ္ဆာဝိတက္ကေန သမာဒိယမာနာ မိစ္ဆာဝါယာမုပတ္ထမ္ဘိတာ အတံသဘာဝံ ‘‘တံသဘာဝ’’န္တိ ဂဏှန္တီ မိစ္ဆာသတီတိ လဒ္ဓနာမာ တံလဒ္ဓိသဟဂတာ တဏှာ သန္တိဋ္ဌတိ. စိတ္တံ ဧကဂ္ဂံ ဟောတီတိ ယထာဝုတ္တဝိတက္ကာဒိပစ္စယလာဘေန တသ္မိံ အာရမ္မဏေ အဝဋ္ဌိတတာယ အနေကဂ္ဂံ ပဟာယ ဧကဂ္ဂံ အပ္ပိတံ ဝိယ ဟောတိ. မိစ္ဆာသမာဓိပိ ဟိ ပစ္စယဝိသေသေဟိ လဒ္ဓဘာဝနာဗလေဟိ ကဒါစိ သမာဓာနပတိရူပကိစ္စကရော ဟောတိယေဝ ဝါလဝိဇ္ဈနာဒီသု ဝိယာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ဇဝနာနိ ဇဝန္တီတိ အနေကက္ခတ္တုံ တေနာကာရေန ပုဗ္ဗဘာဂိယေသု ဇဝနဝါရေသု ပဝတ္တေသု သဗ္ဗပစ္ဆိမေ ဇဝနဝါရေ သတ္တ ဇဝနာနိ ဇဝန္တိ. ပဌမဇဝနေ ပန သတေကိစ္ဆာ ဟောန္တိ, တထာ ဒုတိယာဒီသူတိ ဓမ္မသဘာဝဒဿနမေတံ, န ပန တသ္မိံ ခဏေ တေသံ သတေကိစ္ဆဘာဝါပါဒနံ ကေနစိ သက္ကာ ကာတုံ. 'सज्झायन्ति' (स्वाध्याय करते हैं) का अर्थ है उस दृष्टि को प्रकाशित करने वाले ग्रन्थ को सीखकर पढ़ते हैं। 'वीमंसन्ति' (मीमांसा करते हैं) का अर्थ है उसके अर्थ का विचार करते हैं। 'तेसं' आदि मीमांसा के आकार का प्रदर्शन है। 'उस आलम्बन में' का अर्थ है यथा-परिकल्पित कर्म-फल के अभाव को प्रकाशित करने वाले ''दान (दिया हुआ) कुछ नहीं है'' आदि नय से प्रवृत्त लब्धि (सिद्धांत) के आलम्बन में। 'मिथ्या स्मृति प्रतिष्ठित होती है' का अर्थ है ''दान कुछ नहीं है'' आदि के वश से अनुश्रुति (परम्परा) से प्राप्त अर्थ में, उन-उन आकारों के वितर्कों द्वारा विग्रह (शरीर) के समान स्वरूप से चित्त के उपस्थित होने पर, चिरकाल के परिचय से ''यह ऐसा ही है'' इस प्रकार निध्यान-क्षमता (गहन विचार की स्वीकृति) को प्राप्त होने से, निध्यान-क्षान्ति द्वारा वैसा ग्रहण किए जाने पर, बार-बार उसी प्रकार सेवन करने वाले और बहुलीकरण करने वाले व्यक्ति की, मिथ्या वितर्क से समाहित और मिथ्या व्यायाम से उपस्तम्भित (सहारा प्राप्त), जो अतद्-स्वभाव (जो वैसा नहीं है) को ''तद्-स्वभाव'' (वैसा ही है) के रूप में ग्रहण करती है, वह 'मिथ्या स्मृति' नाम प्राप्त उस लब्धि (सिद्धांत) के साथ रहने वाली तृष्णा प्रतिष्ठित होती है। 'चित्त एकाग्र होता है' का अर्थ है यथाकथित वितर्क आदि प्रत्ययों के लाभ से उस आलम्बन में अवस्थित होने के कारण, अनेकाग्रता को छोड़कर एकाग्र, अर्पित (समाहित) के समान होता है। मिथ्या समाधि भी प्रत्यय-विशेषों और प्राप्त भावना-बल से कभी-कभी समाधान (एकाग्रता) के प्रतिरूप कार्य करने वाली होती ही है, जैसे बाल-वेधन (निशानेबाजी) आदि में; ऐसा समझना चाहिए। 'जवन जवन करते हैं' का अर्थ है अनेक बार उस आकार से पूर्वभागीय जवन-वारों के प्रवृत्त होने पर, सबसे अंत के जवन-वार में सात जवन जवन करते हैं। प्रथम जवन में वे 'सप्रतिकार' (चिकित्सा योग्य) होते हैं, वैसे ही द्वितीय आदि में भी - यह धर्म-स्वभाव का दर्शन है, किन्तु उस क्षण में उन्हें सप्रतिकार बनाना किसी के द्वारा संभव नहीं है। တတ္ထာတိ တေသု တီသု မိစ္ဆာဒဿနေသု. ကောစိ ဧကံ ဒဿနံ ဩက္ကမတီတိ ယဿ ဧကသ္မိံယေဝ အဘိနိဝေသော အာသေဝနာ စ ပဝတ္တာ, သော ဧကံယေဝ ဒဿနံ ဩက္ကမတိ. ယဿ ပန ဒွီသု, တီသုပိ ဝါ အဘိနိဝေသနာ ပဝတ္တာ, သော ဒွေ တီဏိ ဩက္ကမတိ. ဧတေန ယာ ပုဗ္ဗေ ဥဘယပဋိဗာဟနတာမုခေန ဝုတ္တာ အတ္ထသိဒ္ဓါ သဗ္ဗဒိဋ္ဌိကတာ, သာ ပုဗ္ဗဘာဂိယာ. ယာ ပန မိစ္ဆတ္တနိယာမောက္ကန္တိ ဘူတာ, သာ ယထာသကံ ပစ္စယသမုဒါဂမသိဒ္ဓိတော ဘိန္နာရမ္မဏာနံ ဝိယ ဝိသေသာဓိဂမာနံ အညမညံ ဧကဇ္ဈံ အနုပ္ပတ္တိယာ အသံကိဏ္ဏာ ဧဝါတိ ဒဿေတိ. ဧကသ္မိံ ဩက္ကန္တေပီတိအာဒိနာ တိဿန္နမ္ပိ ဒိဋ္ဌီနံ သမာနဗလတံ သမာနဖလတဉ္စ ဒဿေတိ, တသ္မာ တိဿောပိ စေတာ ဧကဿ ဥပ္ပန္နာ အညမညံ အဗ္ဗောကိဏ္ဏာ ဧဝ, ဧကာယ ဝိပါကေ ဒိန္နေ ဣတရာ အနုဗလပ္ပဒါယိကာ ဟောန္တိ. ဝဋ္ဋခါဏု နာမာတိ ဣဒံ ဝစနံ နေယျတ္ထံ, န နီတတ္ထန္တိ တံ ဝိဝရိတွာ ဒဿေတုံ ကိံ ပနေသာတိအာဒိ ဝုတ္တံ, အကုသလံ နာမေတံ အဗလံ ဒုဗ္ဗလံ, န ကုသလံ ဝိယ မဟာဗလန္တိ အာဟ – ‘‘ဧကသ္မိံယေဝ အတ္တဘာဝေ နိယတော’’တိ. အညထာ သမ္မတ္တနိယာမော ဝိယ မိစ္ဆတ္တနိယာမောပိ အစ္စန္တိကော သိယာ. ယဒိ ဧဝံ ဝဋ္ဋခါဏုကဇောတနာ ကထန္တိ အာဟ ‘‘အာသေဝနဝသေန ပနာ’’တိအာဒိ, တသ္မာ ယထာ ‘‘သကိံ နိမုဂ္ဂေါ [Pg.57] နိမုဂ္ဂေါဝ ဟောတီ’’တိ (အ. နိ. ၇.၁၅) ဝုတ္တံ, ဧဝံ ဝဋ္ဋခါဏုကဇောတနာ. ယာဒိသေ ဟိ ပစ္စယေ ပဋိစ္စ အယံ တံတံဒဿနံ ဩက္ကန္တော ပုန ကဒါစိ တပ္ပဋိပက္ခေ ပစ္စယေ ပဋိစ္စ တတော သီသုက္ခိပနမဿ န ဟောတီတိ န ဝတ္တဗ္ဗံ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘ယေဘုယျေနာ’’တိ. वहाँ (तत्य) का अर्थ है उन तीन मिथ्या दृष्टियों में। 'कोई एक दृष्टि में प्रवेश करता है' का अर्थ है कि जिसकी केवल एक में ही अभिनिवेश (आग्रह) और आसेवना (अभ्यास) प्रवृत्त हुई है, वह एक ही दृष्टि में प्रवेश करता है। लेकिन जिसकी दो या तीनों में अभिनिवेश प्रवृत्त हुआ है, वह दो या तीनों में प्रवेश करता है। इससे जो पहले दोनों के निषेध के माध्यम से अर्थ-सिद्धि के रूप में 'सब दृष्टियों वाली' कही गई थी, वह पूर्वभागीय है। जो 'मिथ्यात्व-नियाम' में प्रवेश के रूप में हुई है, वह अपने-अपने प्रत्ययों के समुदाय से सिद्ध होने के कारण, भिन्न आलम्बनों वाले विशेष अधिगमों की तरह, एक-दूसरे के साथ एक स्थान पर प्राप्त होने पर भी असंकीर्ण (अमिश्रित) ही है, ऐसा दर्शाया गया है। 'एक में प्रवेश करने पर भी' इत्यादि के द्वारा तीनों दृष्टियों की समान बलवत्ता और समान फलवत्ता को दर्शाया गया है, इसलिए ये तीनों ही एक व्यक्ति में उत्पन्न होने पर एक-दूसरे से अमिश्रित ही रहती हैं; एक के विपाक देने पर दूसरी सहायक बल प्रदान करने वाली होती हैं। 'वट्टखाणु' (संसार का ठूँठ) नाम का यह वचन नेय्यार्थ (व्याख्या योग्य) है, नीतार्थ (निश्चित अर्थ वाला) नहीं, इसे स्पष्ट करने के लिए 'किं पनेस' इत्यादि कहा गया है। अकुशल निर्बल और दुर्बल होता है, कुशल की तरह महाबली नहीं, इसलिए कहा गया है— 'एक ही आत्मभाव में नियत है'। अन्यथा, सम्यक्त्व-नियाम की तरह मिथ्यात्व-नियाम भी आत्यन्तिक (अनन्त) हो जाता। यदि ऐसा है, तो 'वट्टखाणु' का प्रकाशन कैसे? इसके उत्तर में 'आसेवना के वश से तो' इत्यादि कहा गया है। इसलिए जैसे 'एक बार डूबा हुआ डूबा ही रहता है' (अं. नि. 7.15) कहा गया है, वैसे ही 'वट्टखाणु' का प्रकाशन है। क्योंकि जिन प्रत्ययों के कारण यह उस-उस दृष्टि में प्रविष्ट हुआ है, पुनः कभी उनके प्रतिपक्ष प्रत्ययों के कारण वहाँ से उसका सिर उठाना (निकलना) नहीं होगा, ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसीलिए 'येभुय्येन' (प्रायः) कहा गया है। တသ္မာတိ ယသ္မာ ဧဝံ သံသာရခါဏုဘာဝဿပိ ပစ္စယော အကလျာဏဇနော, တသ္မာ. ဘူတိကာမောတိ ဒိဋ္ဌဓမ္မိကသမ္ပရာယိကပရမတ္ထာနံ ဝသေန အတ္တနော ဂုဏေဟိ ဝဍ္ဎိကာမော. ယံ ပနေတ္ထ ကေစိ ဝဒန္တိ ‘‘ယထာ စိရကာလဘာဝနာယ ပရိပါကူပဂမလဒ္ဓဗလတ္တာ ဥပနိဿယကုသလာ အကုသလေ သဗ္ဗသော သမုစ္ဆိန္ဒန္တိ, ဧဝံ အကုသလဓမ္မာ တတောပိ စိရကာလဘာဝနာသမ္ဘဝတော လဒ္ဓဗလာ ဟုတွာ ကဒါစိ ကုသလဓမ္မေပိ သမုစ္ဆိန္ဒန္တိ. ဧဝဉ္စ ကတွာ ဒဠှမိစ္ဆာဘိနိဝေသဿ မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိကဿ ဝဋ္ဋခါဏုကဘာဝဇောတနာပိ သမတ္ထိတာ ဟောတီ’’တိ ယထာ တံ ‘‘ဝဿဘညာနံ ဒိဋ္ဌီ’’တိ, တံ န, မိစ္ဆတ္တနိယတဓမ္မာနံ စိရကာလဘာဝနာမတ္တေန န ပဋိပက္ခဿ ပဇဟနသမတ္ထတာ, အထ ခေါ ဓမ္မတာသိဒ္ဓေန ပစ္စယဝိသေသာဟိတသာမတ္ထိယေန အတ္တနော ပဟာယကသဘာဝေန ပဟာယကဘာဝေါ ဘာဝနာကုသလာနံယေဝ ဝုတ္တော, အကုသလာနံယေဝ စ ပဟာတဗ္ဗဘာဝေါ ‘‘ဒဿနေန ပဟာတဗ္ဗာ’’တိအာဒိနာ နယေန, အကုသလာနံယေဝ ဒုဗ္ဗလဘာဝေါ ‘‘အဗလာနံ ဗလီယန္တီ’’တိအာဒိနာ (သု. နိ. ၇၇၆; မဟာနိ. ၅) (ယုတ္တိနာပိ နာမတော ဝါ အဓိဂမနိယော အာလောကော အာလောကဘာဝတော ဗာဟိရာရဏေကာ ဝိယ န စေတ္ထ ပဋိညတ္တေ ဘာဝေသတာ သောတုနော အာသံကိတဗ္ဗာ ဝိသေသဝဿ သာဓေတဗ္ဗတော သာမညဿ စ သောတုဘာဝေန အဓိပ္ပေတတ္တာ ဝေဒ-သဒ္ဒဿ လောပေါ ဒီပေ သဘာဝေ သာဓနေ ယထာ တံ သဒ္ဒယဘာဝဿ နာပိ ဝိသုဒ္ဓကအနုမာနာဒိဝိရောဓသမ္ဘာဝတော. န ဟိ သက္ကာ အန္တရာလောကဿ ဗာဟိရာလောကဿ ဝိယ ရူပကာယံ ဥပါဒါယ ရူပတာ စက္ခုဝိညေယျတ္တာဒိကေ ပတိဋ္ဌာပေတုံ သက္ကာတိ ဝုတ္တံ, နနုပိ အန္တရာလောကော အဝိဂ္ဂဟတ္တာ ဝေဒနာ ဝိယာတိ သဒ္ဓေဝ ဉာဏာလောကဿ အဝိဇ္ဇန္ဓကာရာ ဝိယ ဝိဓမနိယဘာဝေ သဗ္ဗေသမ္ပိ ကုသလဓမ္မာနံ ကေနစိပိ အကုသလဓမ္မေန သမုစ္ဆိန္ဒနိယတာ သိဒ္ဓါဝ ဟောတိ). ဝဋ္ဋခါဏုကစောဒနာယ ယံ ဝတ္တဗ္ဗံ, တံ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တမေဝါတိ တိဋ္ဌတေသာ ဗာလဇနဝိကတ္ထနာ. इसलिए (तस्मा) का अर्थ है—चूँकि इस प्रकार संसार-स्थाणु (ठूँठ) होने का भी प्रत्यय (कारण) अकल्याण-मित्र है, इसलिए। 'भूतिकामो' का अर्थ है—दृष्टधार्मिक, साम्परायिक और पारमार्थिक लाभों के वश से अपने गुणों की वृद्धि चाहने वाला। यहाँ जो कुछ लोग कहते हैं— 'जैसे चिरकाल की भावना से परिपाक को प्राप्त होने के कारण प्राप्त बल वाले उपनिश्रय-कुशल धर्म अकुशल धर्मों का पूर्णतः उच्छेद कर देते हैं, वैसे ही अकुशल धर्म भी उससे भी अधिक चिरकाल की भावना के सम्भव होने से प्राप्त बल वाले होकर कभी कुशल धर्मों का भी उच्छेद कर देते हैं। और ऐसा मानकर दृढ़ मिथ्या अभिनिवेश वाले मिथ्यादृष्टि के लिए 'वट्टखाणु' (संसार का ठूँठ) भाव का प्रकाशन भी समर्थित हो जाता है'—जैसा कि वह 'वस्सभञ्ञों की दृष्टि' है, वह सही नहीं है। मिथ्यात्व-नियत धर्मों में केवल चिरकाल की भावना मात्र से प्रतिपक्ष (कुशल) के त्याग की सामर्थ्य नहीं होती। बल्कि धर्मता से सिद्ध, विशेष प्रत्ययों द्वारा आहित सामर्थ्य वाले अपने प्रहाणक (त्यागने वाले) स्वभाव के कारण प्रहाणक-भाव केवल भावना-कुशल धर्मों का ही कहा गया है, और अकुशल धर्मों का केवल प्रहातव्य-भाव (त्यागे जाने योग्य) 'दर्शन से प्रहातव्य' इत्यादि नय से कहा गया है। अकुशल धर्मों की दुर्बलता 'अबल बलवानों पर...' (सु. नि. 776) इत्यादि के द्वारा सिद्ध है। (युक्ति से भी या नाम से भी अधिगम योग्य आलोक, आलोक-भाव होने के कारण बाहरी अनेक दीपों की तरह यहाँ प्रतिज्ञात भावों में श्रोता को आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि विशेष का सिद्ध किया जाना अभीष्ट है और सामान्य का श्रोता-भाव से अभिप्रेत होने के कारण 'वेद' शब्द का लोप होने पर, दीप में स्वभाव और साधन के रूप में जैसे वह शब्द-भाव का है, वैसे ही विशुद्ध अनुमान आदि के विरोध की सम्भावना नहीं है। क्योंकि बाहरी आलोक की तरह आंतरिक आलोक के लिए रूप-काय का आश्रय लेकर रूपता, चक्षु-विज्ञेयता आदि को प्रतिष्ठित करना सम्भव नहीं है, ऐसा कहा गया है। क्या आंतरिक आलोक निराकार होने के कारण वेदना की तरह नहीं है? इस प्रकार ज्ञान-आलोक के अविद्या-अन्धकार की तरह विध्वंसनीय होने पर, सभी कुशल धर्मों का किसी भी अकुशल धर्म द्वारा उच्छेद किया जाना सिद्ध ही होता है)। 'वट्टखाणु' के आक्षेप के विषय में जो कहना चाहिए, वह पहले ही कहा जा चुका है, अतः यह बाल-जनों का प्रलाप यहीं रहने दें। ၁၀၃. ဈာနစိတ္တမယာတိ [Pg.58] ရူပါဝစရဇ္ဈာနစိတ္တေန နိဗ္ဗတ္တာ. တထာ ဟိ တေသံ ဝိသေသေန ဈာနမနသာ နိဗ္ဗတ္တတ္တာ ‘‘မနောမယာ’’တိ ဝုတ္တာ, အဝိသေသေန ပန အဘိသင်္ခါရမနသာ သဗ္ဗေပိ သတ္တာ မနောမယာ ဧဝ. သညာမယာတိ ဧတ္ထာပိ ဧသေဝ နယော. တေနာဟ ‘‘အရူပဇ္ဈာနသညာယာ’’တိ. အယန္တိ ရူပိတာဘာဝပဋိပဇ္ဇနကပုဂ္ဂလော. အပ္ပဋိလဒ္ဓဇ္ဈာနောတိ အနဓိဂတရူပဇ္ဈာနော. တဿပီတိ တက္ကိနောပိ. ရူပဇ္ဈာနေ ကင်္ခါ နတ္ထိ အနုဿဝဝသေန လဒ္ဓဝိနိစ္ဆယတ္တာ. १०३. 'झानचित्तमया' का अर्थ है—रूपावचर ध्यान-चित्त से उत्पन्न। क्योंकि वे विशेष रूप से ध्यान-मन से उत्पन्न होते हैं, इसलिए उन्हें 'मनोमय' कहा गया है; किन्तु सामान्य रूप से अभिसंस्कार-मन से सभी प्राणी मनोमय ही हैं। 'सञ्ञामया' में भी यही न्याय (तर्क) है। इसीलिए कहा गया है— 'अरूप-ध्यान की संज्ञा से'। 'अयं' का अर्थ है—रूप के अभाव को प्राप्त करने वाला पुद्गल। 'अप्पटिलद्धज्झानो' का अर्थ है—जिसने रूपावचर ध्यान प्राप्त नहीं किया है। 'तस्सपि' का अर्थ है—तार्किक का भी। रूपावचर ध्यान में शंका नहीं है क्योंकि अनुश्रव (परम्परा) के वश से निश्चय प्राप्त कर लिया गया है। ၁၀၄. သာရာဂါယာတိ သရာဂဘာဝါယ. သန္တိကေတိ သမီပေ, န ထာမဂတာ ဒိဋ္ဌိနာတိဒူရတ္တာ သရာဂါ, န သမ္ပယုတ္တတ္တာ. သာ ဟိ န ထာမဂတာ ဝဋ္ဋပရိယာပန္နေသု ဓမ္မေသု ရဇ္ဇတီတိ ဝိညာယတီတိ အာဟ – ‘‘ရာဂဝသေန ဝဋ္ဋေ ရဇ္ဇနဿာ’’တိ. သဗ္ဗေပိ သံယောဇနာ တဏှာဝသေနေဝ သမ္ဘဝန္တီတိ အာဟ – ‘‘တဏှာဝသေန သံယောဇနတ္ထာယာ’’တိ. အာရုပ္ပေ ပနဿ ကင်္ခါ နတ္ထီတိ အနုဿဝဝသေန လဒ္ဓနိစ္ဆယံ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ. ကာမံ ဒုဂ္ဂတိဒုက္ခာနံ ဧကန္တသံဝတ္တနေန နတ္ထိကဒိဋ္ဌိအာဒီနံ အပဏ္ဏကတာ ပါကဋာ ဧဝ, နိပ္ပရိယာယေန ပန အနဝဇ္ဇဿ အတ္ထဿ ဧကန္တသာဓကံ အပဏ္ဏကန္တိ ကတွာ စောဒနာ, သာဝဇ္ဇဿပိ အတ္ထဿ သာဓနေ ဧကံသိကဘာဝံ ဂဟေတွာ ပရိဟာရော. တေနာဟ ‘‘ဂဟဏဝသေနာ’’တိအာဒိ. တေန ရုဠှီဝသေန ‘‘နတ္ထိ ဒိန္န’’န္တိအာဒီနိ အပဏ္ဏကင်္ဂါနိ ဇာတာနီတိ ဒဿေတိ. १०४. 'सारागाय' का अर्थ है सराग भाव (राग युक्त होने) के लिए। 'सन्तिके' का अर्थ है समीप में, दृष्टि के बहुत दूर न होने के कारण सराग (राग युक्त) है, न कि सम्प्रयुक्त होने के कारण, क्योंकि वह (तृष्णा) दृढ़ नहीं हुई है। क्योंकि वह दृढ़ न हुई (तृष्णा) संसार-पर्यापन्न (संसार के अंतर्गत) धर्मों में आसक्त होती है, ऐसा जाना जाता है, इसलिए कहा - ''राग के वश से संसार में आसक्त होने के लिए।'' सभी संयोजन तृष्णा के वश से ही उत्पन्न होते हैं, इसलिए कहा - ''तृष्णा के वश से संयोजन के लिए।'' 'अरूप (लोकों) में उसे शंका नहीं है' यह अनुश्रुति (परम्परा) के वश से प्राप्त निश्चय के सन्दर्भ में कहा गया है। यद्यपि दुर्गति के दुखों की ओर निश्चित रूप से ले जाने के कारण नास्तिक दृष्टि आदि की 'अपण्णकता' (निश्चितता) प्रकट ही है, किन्तु निष्पर्याय (मुख्य) रूप से अनवद्य (निर्दोष) अर्थ को एकांततः सिद्ध करने वाला 'अपण्णक' है, ऐसा मानकर आक्षेप (चोदना) किया गया है, और सावद्य (दोषपूर्ण) अर्थ की सिद्धि में भी एकांतिक भाव को ग्रहण कर परिहार (समाधान) किया गया है। इसीलिए कहा ''ग्रहण के वश से'' आदि। इससे यह दर्शाता है कि रूढ़ि के वश से ''दान कुछ नहीं है'' आदि 'अपण्णक' के अंग बन गए हैं। ၁၀၅. ဟေဋ္ဌာ တယော ပုဂ္ဂလာဝ ဟောန္တီတိ အတ္တန္တပေါ ပရန္တပေါတိ ဣမသ္မိံ စတုက္ကေ ဟေဋ္ဌာ တယော ပုဂ္ဂလာ ဟောန္တိ. ယထာဝုတ္တာ ပဉ္စပိ ပုဂ္ဂလာ ဒုပ္ပဋိပန္နာဝ, တတော အတ္ထိကဝါဒါဒယော ပဉ္စပုဂ္ဂလာ သမ္မာပဋိပန္နတာယ ဣမသ္မိံ စတုက္ကေ ဧကော စတုတ္ထပုဂ္ဂလောဝ ဟောတိ. ဧတမတ္ထံ ဒဿေတုန္တိ ဣဓ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တပုဂ္ဂလပဉ္စကဒွယံ ဣမသ္မိံ စတုက္ကေ ဧဝ သင်္ဂဟံ ဂစ္ဆတီတိ ဝိဘာဂေန ဒုပ္ပဋိပတ္တိသုပ္ပဋိပတ္တိယော ဒဿေတုံ ဘဂဝါ ဣမံ ဒေသနံ အာရဘီတိ. ယံ ပနေတ္ထ အတ္ထတော အဝိဘတ္တံ, တံ သုဝိညေယျမေဝ. १०५. 'नीचे तीन पुद्गल ही होते हैं' - 'अत्तन्तपो' (स्वयं को तपाने वाला), 'परन्तपो' (दूसरों को तपाने वाला) - इस चतुष्क में नीचे के तीन पुद्गल होते हैं। यथाकथित पाँचों पुद्गल दुष्प्रतिपन्न (गलत मार्ग पर चलने वाले) ही हैं, उसके बाद आस्तिकवादी आदि पाँच पुद्गल सम्यक्-प्रतिपन्न होने के कारण इस चतुष्क में एक चौथे पुद्गल ही होते हैं। इस अर्थ को दिखाने के लिए - यहाँ नीचे कहे गए दो पाँच-पुद्गल समूह इसी चतुष्क में ही संगृहीत होते हैं - इस प्रकार विभाग द्वारा दुष्प्रतिपत्ति और सुप्रतिपत्ति को दिखाने के लिए भगवान ने यह देशना आरम्भ की। यहाँ जो अर्थ से अविभक्त (अस्पष्ट) है, वह सुविज्ञेय (आसानी से समझने योग्य) ही है। အပဏ္ဏကသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. अपण्णक सुत्त की वर्णना में लीनार्थ-प्रकाशिनी (टीका) समाप्त हुई। နိဋ္ဌိတာ စ ဂဟပတိဝဂ္ဂဝဏ္ဏနာ. और गृहपति-वग्ग की वर्णना समाप्त हुई। ၂. ဘိက္ခုဝဂ္ဂေါ २. भिक्खु-वग्ग (भिक्षु वर्ग) ၁. အမ္ဗလဋ္ဌိကရာဟုလောဝါဒသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. अम्बलट्ठिक-राहुलोवाद सुत्त की वर्णना ၁၀၇. အမ္ဗလဋ္ဌိကာယန္တိ [Pg.59] ဧတ္ထ အမ္ဗလဋ္ဌိကာ ဝုစ္စတိ သုဇာတော တရုဏမ္ဗရုက္ခော, တဿ ပန အဝိဒူရေ ကတော ပါသာဒေါ ဣဓ ‘‘အမ္ဗလဋ္ဌိကာ’’တိ အဓိပ္ပေတော. တေနာဟ ‘‘ဝေဠုဝနဝိဟာရဿာ’’တိအာဒိ. ပဓာနဃရသင်္ခေပေတိ ဘာဝနာဂေဟပ္ပကာရေ ယောဂီနံ ဂေဟေတိ အတ္ထော. တိခိဏောဝ ဟောတိ, န တဿ တိခိဏဘာဝေါ ကေနစိ ကာတဗ္ဗော သဘာဝသိဒ္ဓတ္တာ. ဧဝမေဝ အတ္တနော ဝိမုတ္တိပရိပါစနကမ္မုနာ တိက္ခဝိသဒဘာဝပ္ပတ္တိယာ အယမ္ပိ အာယသ္မာ…ပေ… တတ္ထ ဝိဟာသိ. ပကတိပညတ္တမေဝါတိ ပကတိယာ ပညတ္တံ ဗုဒ္ဓါနံ ဥပဂမနတော ပုရေတရမေဝ စာရိတ္တဝသေန ပညတ္တံ. १०७. 'अम्बलट्ठिका' में यहाँ अम्बलट्ठिका एक सुंदर तरुण आम के वृक्ष को कहा जाता है, किन्तु उसके पास ही बना हुआ प्रासाद (महल/भवन) यहाँ 'अम्बलट्ठिका' के रूप में अभिप्रेत है। इसीलिए कहा ''वेणुवन विहार का'' आदि। 'प्रधानघर-संक्षेप' का अर्थ है भावना-गृह के प्रकार में, योगियों के घर में। वह तीक्ष्ण ही होता है, उसकी तीक्ष्णता किसी के द्वारा की जाने वाली नहीं है क्योंकि वह स्वभाव-सिद्ध है। इसी प्रकार अपने विमुक्ति-परिपक्व करने वाले कर्म द्वारा तीक्ष्ण और विशद भाव की प्राप्ति से यह आयुष्मान भी... पे... वहाँ विहार करते थे। 'प्रकृति-प्रज्ञप्त' ही - प्रकृति से प्रज्ञप्त, बुद्धों के आगमन से पहले ही चारित्र के वश से प्रज्ञप्त। ၁၀၈. ဥဒကံ အနေန ဓီယတိ, ဌပီယတိ ဝါ ဧတ္ထာတိ ဥဒကာဓာနံ. ဥဒကဋ္ဌာနန္တိ စ ခုဒ္ဒကဘာဇနံ. ‘‘ဩဝါဒဒါနတ္ထံ အာမန္တေသီ’’တိ ဝတွာ တံ ပနဿ ဩဝါဒဒါနံ န ဣဓေဝ, အထ ခေါ ဗဟူသု ဌာနေသု ဗဟုက္ခတ္တုံ ပဝတ္တိတန္တိ တာနိ တာနိ သင်္ခေပတော ဒဿေတွာ ဣဓ သံဝဏ္ဏနတ္ထံ ‘‘ဘဂဝတာ ဟီ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. १०८. जिसमें जल धारण किया जाता है या रखा जाता है, वह 'उदकाधान' (जलपात्र) है। 'उदकस्थान' का अर्थ छोटा बर्तन है। 'उपदेश देने के लिए आमंत्रित किया' ऐसा कहकर, वह उनका उपदेश केवल यहीं नहीं, बल्कि बहुत से स्थानों पर अनेक बार प्रवृत्त हुआ है, उन-उन (उपदेशों) को संक्षेप में दिखाकर यहाँ व्याख्या के लिए 'भगवता ही' आदि कहा गया है। တတ္ထ သဗ္ဗဗုဒ္ဓေဟိ အဝိဇဟိတန္တိ ဣမိနာ သဗ္ဗေသံ ဗုဒ္ဓါနံ သာသနေ ကုမာရပဉှာ နာမ ဟောတီတိ ဒဿေတိ. ဧကေကတော ပဋ္ဌာယ ယာဝ ဒသကာ ပဝတ္တာ ဒသ ပုစ္ဆာ ဧတဿာတိ ဒသပုစ္ဆံ, ဧကေကတော ပဋ္ဌာယ ယာဝ ဒသကာ ဧကုတ္တရဝသေန ပဝတ္တံ ဝိဿဇ္ဇနတ္ထာယ ပဉ္စပဏ္ဏသဝိဿဇ္ဇနံ သာမဏေရပဉှန္တိ သမ္ဗန္ဓော. ယံ ပနေတ္ထ ဝတ္တဗ္ဗံ, တံ ပရမတ္ထဇောတိကာယံ ခုဒ္ဒကဋ္ဌကထာယံ (ခု. ပါ. အဋ္ဌ. ၄.ကုမာရပဉှဝဏ္ဏနာ) ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗံ. အနာဒီနဝဒဿိတာယ အဘိဏှံ မုသာ သမုဒါစရဏတော ‘‘ပိယမုသာဝါဒါ’’တိ ဝုတ္တံ, ဥဒကာဝသေသဆဍ္ဍနဥဒကာဓာနနိကုဇ္ဇနဥက္ကုဇ္ဇနဒဿနသညိတာ စတဿော ဥဒကာဓာနူပမာယော သဗ္ဗဿ ယုဒ္ဓကမ္မဿ အကရဏကရဏဝသေန ဒဿိတာ ဒွေ ဟတ္ထိဥပမာယော. वहाँ 'सभी बुद्धों द्वारा नहीं छोड़ा गया' इससे यह दिखाते हैं कि सभी बुद्धों के शासन में 'कुमार-प्रश्न' नामक (परम्परा) होती है। एक से लेकर दस तक प्रवृत्त दस प्रश्न इसके हैं, इसलिए 'दश-प्रश्न' है; एक से लेकर दस तक एकोत्तर क्रम से प्रवृत्त, उत्तर देने के लिए पचपन उत्तरों वाले 'सामणेर-प्रश्न' के साथ संबंध है। यहाँ जो कुछ कहना है, उसे 'परमत्थजोतिका' नामक खुद्दकपाठ-अट्ठकथा (कुमारप्रश्न-वर्णना) में कहे गए तरीके से ही जानना चाहिए। दोष न देखने के कारण बार-बार झूठ बोलने से 'प्रिय-मृषावादी' कहा गया है; जल के अवशेष को फेंकना, जलपात्र को औंधा करना और सीधा करना दिखाने वाली चार जलपात्र-उपमाएँ हैं, और सभी युद्ध-कर्मों को करने या न करने के वश से दो हाथी-उपमाएँ दिखाई गई हैं। တတ္ထ ရာဟုလသုတ္တန္တိ သုတ္တနိပါတေ အာဂတံ ရာဟုလသုတ္တံ (သု. နိ. ၃၃၇ အာဒယော). အဘိဏှောဝါဒဝသေန ဝုတ္တန္တိ ဣမိနာ အန္တရန္တရာ တံ သုတ္တံ ကထေတွာ ဘဂဝါ ထေရံ ဩဝဒတီတိ ဒဿေတိ. ဣဒဉ္စ ပနာတိ ဣဒံ ယထာဝုတ္တံ ဘဂဝတော တံတံကာလာနုရူပံ အတ္တနော ဩဝါဒဒါနံ သန္ဓာယ. ဗီဇန္တိ အဏ္ဍံ. ပဿသိ နူတိ [Pg.60] နု-သဒ္ဒေါ အနုဇာနနေ, နနု ပဿသီတိ အတ္ထော. သစ္စဓမ္မံ လင်္ဃိတွာ ဌိတဿ ကိဉ္စိပိ အကတ္တဗ္ဗံ နာမ ပါပံ နတ္ထီတိ အာဟ – ‘‘သမ္ပဇာနမုသာဝါဒေ သံဝရရဟိတဿ ဩပမ္မဒဿနတ္ထံ ဝုတ္တာ’’တိ. တထာ ဟိ – वहाँ 'राहुलसुत्त' का अर्थ सुत्तनिपात में आया हुआ राहुलसुत्त है। 'निरन्तर उपदेश के वश से कहा गया' इससे यह दिखाते हैं कि भगवान बीच-बीच में उस सुत्त को कहकर स्थविर (राहुल) को उपदेश देते हैं। 'और यह' का अर्थ भगवान के उस-उस समय के अनुरूप अपने उपदेश देने के संदर्भ में है। 'बीज' का अर्थ अण्ड (सार) है। 'क्या देखते हो' (पस्ससि नु) में 'नु' शब्द अनुमति (पूछने) के अर्थ में है, 'क्या तुम नहीं देखते हो' यह अर्थ है। सत्य-धर्म का उल्लंघन करके स्थित व्यक्ति के लिए कोई भी न करने योग्य पाप नहीं है, इसलिए कहा - 'जानबूझकर झूठ बोलने में संयम-रहित व्यक्ति के लिए उपमा दिखाने के लिए कहा गया है'। क्योंकि वैसा ही है - ‘‘ဧကံ ဓမ္မမတီတဿ, မုသာဝါဒိဿ ဇန္တုနော; ဝိတိဏ္ဏပရလောကဿ, နတ္ထိ ပါပမကာရိယ’’န္တိ. (ဓ. ပ. ၁၇၆); “एक धर्म (सत्य) का उल्लंघन करने वाले, झूठ बोलने वाले और परलोक की परवाह न करने वाले मनुष्य के लिए कोई भी पाप अकरणीय (न करने योग्य) नहीं है।” ဥရုဠှဝါတိ ဥရုဠှော ဟုတွာ ဥဿိတော. သော ပန ဒမဝသေန အဘိရုယှ ဝဍ္ဎိတော အာရောဟနယောဂျော စ ဟောတီတိ အာဟ ‘‘အဘိဝဍ္ဎိတော အာရောဟသမ္ပန္နော’’တိ. အာဂတာဂတေတိ အတ္တနော ယောဂျပဒေသံ အာဂတာဂတေ. ပဋိသေနာယ ဖလကကောဋ္ဌကမုဏ္ဍပါကာရာဒယောတိ ပဋိသေနာယ အတ္တနော အာရက္ခတ္ထာယ ဌပိတေ ဖလကကောဋ္ဌကေ စေဝ ဥဒ္ဓစ္ဆဒပါကာရာဒိကေ စ. ဧတံ ပဒေသန္တိ ဧတံ ပရသေနာပဒေသံ. ဧတ္တကေနာတိ ဩလောကနမတ္တေန. တဿ ဩလောကနာကာရဒဿနေနေဝ. သတမ္ပိ သဟဿမ္ပိ သေနာနီကံ ဒွေဓာ ဘိဇ္ဇတိ, တီရပါတိကံ မဒ္ဒိတံ ဟုတွာ ပဒါတာ ဟုတွာ ဒွေဓာ ဟုတွာ ပလာယန္တိ. ကဏ္ဏေဟိ ပဟရိတွာတိ ပဂေဝ သရာနံ အာဂမနသဒ္ဒံ ဥပဓာရေတွာ ယထာ ဝေဂေါ န ဟောတိ, ဧဝံ သမုဋ္ဌာပေတွာ တေဟိ ပဟရိတွာ ပါတနံ. ပဋိဟတ္ထိပဋိအဿာတိအာဒိနာ ပစ္စေကံ ပတိ-သဒ္ဒေါ ယောဇေတဗ္ဗောတိ. ဒီဃာသိလဋ္ဌိယာတိ ဒီဃလတာယ အသိလဋ္ဌိယာ. "उरुळ्हा" का अर्थ है उरुळ्ह (आरूढ़) होकर उन्नत होना। वह दमन के कारण आरूढ़ होकर बढ़ा हुआ और आरोहण के योग्य होता है, इसलिए कहा "अभिवड्ढितो आरोहसम्पन्नो" (भली-भाँति बढ़ा हुआ और आरोहण से संपन्न)। "आगतागते" का अर्थ है अपने योग्य प्रदेश में आने-जाने पर। "पटिसेनाय फलककोट्ठकमुण्डपाकारादयो" का अर्थ है प्रतिसेना (शत्रु सेना) से अपनी रक्षा के लिए स्थापित किए गए लकड़ी के कोष्ठक (बुर्ज) और मुण्ड-प्राकार (बिना मुँडेर की दीवार) आदि। "एतं पदेसं" का अर्थ है उस शत्रु सेना के प्रदेश को। "एत्तकेन" का अर्थ है केवल देखने मात्र से, उसके देखने के आकार के प्रदर्शन मात्र से। सौ या हजार सैनिकों वाली सेना भी दो भागों में विभक्त हो जाती है, तट के गिरने के समान कुचली हुई होकर, पैदल होकर, दो भागों में बँटकर भाग जाती है। "कण्णेहि पहरित्वा" का अर्थ है पहले ही बाणों के आने के शब्द को सुनकर, जिससे वेग न हो, इस प्रकार उठाकर उनसे प्रहार करके गिराना। "पटिहत्थिपटिअस्स" आदि में प्रत्येक के साथ 'पटि' शब्द जोड़ना चाहिए। "दीघासिलट्ठिया" का अर्थ है लंबी तलवार रूपी लता से। ကရဏေတိ ကမ္မကရဏေ. မညတိ ဟတ္ထာရောဟော. အယမုဂ္ဂရန္တိ တာဒိသေ ကာလေ ဂဟိတမုဂ္ဂရံ. ဩလောကေတွာတိ ဉာဏစက္ခုနာ ဒိသွာ, အဘိဏှံ သမ္ပဇညံ ဥပဋ္ဌပေတွာတိ အတ္ထော. "करणे" का अर्थ है कर्म करने में। हाथी का सवार मानता है। "अयमुग्गरं" का अर्थ है उस समय ग्रहण किए हुए मुग्दर (गदा) को। "ओलोकेत्वा" का अर्थ है ज्ञान-चक्षु से देखकर, अर्थात् निरंतर सम्प्रजन्य को उपस्थित करके। ၁၀၉. သသက္ကန္တိ ပဿိတုံ ယုတ္တံ ကတွာ ဥဿာဟံ ဇနေတွာ န ကရဏီယံ, တာဒိသံ နိယမတော အကတ္တဗ္ဗံ ဟောတီတိ အာဟ ‘‘ဧကံသေနေဝ န ကာတဗ္ဗ’’န္တိ. ပဋိသံဟရေယျာသီတိ ကရဏတော သင်္ကောစံ အာပဇ္ဇေယျာသိ. ယထာဘူတော အသန္တော နိဝတ္တော အကရောန္တော နာမ ဟောတီတိ အာဟ ‘‘နိဝတ္တေယျာသိ မာ ကရေယျာသီ’’တိ. အနုပဒေယျာသီတိ အနုဗလပ္ပဒါယီ ဘဝေယျာသိ. တေနာဟ ‘‘ဥပတ္ထမ္ဘေယျာသီ’’တိ. တံ ပန အနုဗလပ္ပဒါနံ ဥပတ္ထမ္ဘနံ ပုနပ္ပုနံ ကရဏမေဝါတိ အာဟ ‘‘ပုနပ္ပုနံ ကရေယျာသီ’’တိ[Pg.61]. သိက္ခမာနောတိ တံယေဝ အဓိသီလသိက္ခံ တန္နိဿယဉ္စ သိက္ခာဒွယံ သိက္ခန္တော သမ္ပာဒေန္တော. १०९. "ससक्कं" का अर्थ है देखने योग्य बनाकर, उत्साह उत्पन्न करके जो नहीं करना चाहिए, वैसा नियमतः न करने योग्य होता है, इसलिए कहा "एकंसेनेव न कातब्बं" (निश्चित रूप से नहीं करना चाहिए)। "पटिसंहरेय्यासि" का अर्थ है करने से संकोच करना चाहिए। यथार्थ में जो असत् (बुरा) है, उससे निवृत्त होना ही 'न करना' कहलाता है, इसलिए कहा "निवत्तेय्यासि मा करेय्यासि" (निवृत्त हो जाओ, मत करो)। "अनुपदेय्यासि" का अर्थ है अनुबल (सहायता) प्रदान करने वाला होना चाहिए। इसीलिए कहा "उपत्थम्भेय्यासि" (सहारा देना चाहिए)। वह अनुबल प्रदान करना या सहारा देना बार-बार करना ही है, इसलिए कहा "पुनप्पुनं करेय्यासि" (बार-बार करना चाहिए)। "सिक्खमानो" का अर्थ है उसी अधिशील-शिक्षा और उसके आश्रित, इन दो शिक्षाओं को सीखते हुए, सिद्ध करते हुए। ၁၁၁. ကိတ္တကေ ပန ဌာနေတိ ကိတ္တကေ ဌာနေ ပဝတ္တာနိ. အဝိဒူရေ ဧဝ ပဝတ္တာနီတိ ဒဿေန္တော ‘‘ဧကသ္မိံ ပုရေဘတ္တေယေဝ သောဓေတဗ္ဗာနီ’’တိ အာဟ. ဧဝဉှိ တာနိ သုသောဓိတာနိ ဟောန္တိ သုပရိသုဒ္ဓါနိ. ပရေသံ အပ္ပိယံ ဂရုံ ဂါရယှံ, ယထာဝုတ္တဋ္ဌာနတော ပန အညံ ဝါ ကမ္မဋ္ဌာနမနသိကာရေနေဝ ကာယကမ္မာဒီနိ ပရိသောဓိတာနိ ဟောန္တီတိ န ဂဟိတံ. ပဋိဃံ ဝါတိ ဧတ္ထ ဝါ-သဒ္ဒေန အသမပေက္ခဏေ မောဟဿ သင်္ဂဟော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. १११. "कित्तके पन ठाने" का अर्थ है कितने स्थानों में प्रवृत्त। "अविदूरे एव पवत्तानी" (निकट ही प्रवृत्त) यह दिखाते हुए कहा "एकस्मिं पुरेभत्तेयेव सोधेतब्बानि" (एक ही भोजन के पूर्व ही शुद्ध कर लेने चाहिए)। इस प्रकार वे भली-भाँति शोधित और सुविशुद्ध होते हैं। दूसरों के लिए अप्रिय, भारी और निंदनीय, किन्तु कहे गए स्थान से अन्य किसी कम्मट्ठान (कर्मस्थान) के मनसिकार से ही काय-कर्म आदि परिशोधित होते हैं, इसलिए इसे ग्रहण नहीं किया गया। "पटिघं वा" यहाँ 'वा' शब्द से उपेक्षा न करने पर मोह का संग्रह समझना चाहिए। ၁၁၂. ဝုတ္တနယေန ကာယကမ္မာဒိပရိသောဓနံ နာမ ဣဓေဝ, န ဣတော ဗဟိဒ္ဓါတိ အာဟ ‘‘ဗုဒ္ဓါ…ပေ… သာဝကာ ဝါ’’တိ. တေ ဟိ အတ္ထတော သမဏဗြာဟ္မဏာ ဝါတိ. တသ္မာတိ ယသ္မာ သဗ္ဗဗုဒ္ဓပစ္စေကဗုဒ္ဓသာဝကေဟိ အာရုဠှမဂ္ဂေါ, ရာဟုလ, မယာ တုယှံ အာစိက္ခိတော, တသ္မာ. တေန အနုသိက္ခန္တေန တယာ ဧဝံ သိက္ခိတဗ္ဗန္တိ ဩဝါဒံ အဒါသိ. သေသံ ဝုတ္တနယတ္တာ သုဝိညေယျမေဝ. ११२. कहे गए नियम से काय-कर्म आदि का परिशोधन यहीं (बुद्ध शासन में) है, इससे बाहर नहीं, इसलिए कहा "बुद्धा...पे... सावका वा"। वे ही वास्तव में श्रमण-ब्राह्मण हैं। "तस्मा" का अर्थ है क्योंकि सभी बुद्धों, प्रत्येक बुद्धों और श्रावकों द्वारा आरूढ़ (चला गया) मार्ग, हे राहुल, मैंने तुम्हें बताया है, इसलिए। उस अनुशिक्षा को ग्रहण करते हुए तुम्हें इस प्रकार सीखना चाहिए, यह उपदेश दिया। शेष अर्थ कहे गए नियम के अनुसार सुविज्ञेय ही है। အမ္ဗလဋ္ဌိကရာဟုလောဝါဒသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ अम्बलट्ठिकराहुलोवादसुत्त की व्याख्या की लीनत्थप्पकासना (गूढ़ अर्थ का प्रकाशन)। သမတ္တာ. समाप्त। ၂. မဟာရာဟုလောဝါဒသုတ္တဝဏ္ဏနာ २. महाराजहुलोवादसुत्त की व्याख्या। ၁၁၃. ဣရိယာပထာနုဗန္ဓနေနာတိ ဣရိယာပထဂမနာနုဗန္ဓနေန, န ပဋိပတ္တိဂမနာနုဗန္ဓနေန. အညမေဝ ဟိ ဗုဒ္ဓါနံ ပဋိပတ္တိဂမနံ အညံ သာဝကာနံ. ဝိလာသိတဂမနေနာတိ – ‘‘ဒူရေ ပါဒံ န ဥဒ္ဓရတိ, န အစ္စာသန္နေ ပါဒံ နိက္ခိပတိ, နာတိသီဃံ ဂစ္ဆတိ နာတိသဏိက’’န္တိအာဒိနာ (သံ. နိ. အဋ္ဌ. ၃.၄.၂၄၃; ဥဒါ. အဋ္ဌ. ၇၆; သာရတ္ထ. ဋီ. မဟာဝဂ္ဂ ၃.၂၈၅) ဝုတ္တေန သဘာဝသီလေန ဗုဒ္ဓါနံ စာတုရိယဂမနေန. တဒေဝ ဟိ သန္ဓာယ ‘‘ပဒေ ပဒံ နိက္ခိပန္တော’’တိ ဝုတ္တံ. ပဒါနုပဒိကောတိ ရာဟုလတ္ထေရဿပိ လက္ခဏပါရိပူရိယာ တာဒိသမေဝ ဂမနန္တိ ယတ္တကံ ပဒေသံ အန္တရံ အဒတွာ ဘဂဝတော ပိဋ္ဌိတော ဂန္တုံ အာရဒ္ဓေါ, သဗ္ဗတ္ထ တမေဝ ဂမနပဒါနုပဒံ ဂစ္ဆတီတိ ပဒါနုပဒိကော. ११३. "इरियापथानुबन्धनेन" का अर्थ है ईर्यापथ (चलने की मुद्रा) के गमन का अनुसरण करने से, न कि प्रतिपत्ति (साधना) के गमन का अनुसरण करने से। बुद्धों का प्रतिपत्ति-गमन अलग होता है और श्रावकों का अलग। "विलासितगमनेन" का अर्थ है— "पैर को बहुत दूर नहीं उठाता, न ही बहुत पास रखता है, न बहुत तेज चलता है, न बहुत धीरे" आदि प्रकार से कहे गए स्वाभाविक शील वाले बुद्धों के चतुर (सुन्दर) गमन से। उसी के संदर्भ में "पदे पदं निक्खिपन्तो" (पद-पद पर पैर रखते हुए) कहा गया है। "पदानुपदिको" का अर्थ है राहुल थेर का भी लक्षणों की परिपूर्णता के कारण वैसा ही गमन था, इसलिए जितना स्थान (अन्तर) न देकर वे भगवान के पीछे चलने लगे, सर्वत्र उसी गमन का पद-पद पर अनुसरण करते हैं, इसलिए 'पदानुपदिक' हैं। ဝဏ္ဏနာဘူမိ [Pg.62] စာယံ တတ္ထ ဘဂဝန္တံ ထေရဉ္စ အနေကရူပါဟိ ဥပမာဟိ ဝဏ္ဏေန္တော ‘‘တတ္ထ ဘဂဝါ’’တိအာဒိမာဟ. နိက္ခန္တဂဇပေါတကော ဝိယ ဝိရောစိတ္ထာတိ ပဒံ အာနေတွာ ယောဇနာ. ဧဝံ တံ ကေသရသီဟော ဝိယာတိအာဒီသုပိ အာနေတွာ ယောဇေတဗ္ဗံ. တာရကရာဇာ နာမ စန္ဒော. ဒွိန္နံ စန္ဒမဏ္ဍလာနန္တိအာဒိ ပရိကပ္ပဝစနံ, ဗုဒ္ဓါဝေဏိကသန္တကံ ဝိယ ဗုဒ္ဓါနံ အာကပ္ပသောဘာ အဟောသိ, အဟော သိရီသမ္ပတ္တီတိ ယောဇနာ. यह व्याख्या की भूमि है, वहाँ भगवान और स्थविर की अनेक प्रकार की उपमाओं से प्रशंसा करते हुए "तत्थ भगवा" आदि कहा। "निक्खन्तगजपोतको विय विरोचित्थ" (बाहर निकले हुए हाथी के बच्चे के समान सुशोभित हुए) इस पद को लाकर योजना करनी चाहिए। इसी प्रकार "तं केसरसीहो विय" (वह केसरिया सिंह के समान) आदि में भी लाकर जोड़ना चाहिए। "तारकराज" नाम चन्द्रमा का है। "द्विन्नं चन्दमण्डलानं" (दो चन्द्रमण्डलों का) आदि परिकल्पनात्मक वचन है, बुद्धों के असाधारण गुण के समान बुद्धों की चेष्टा की शोभा थी, अहो! श्री-सम्पत्ति (शोभा की पूर्णता), ऐसी योजना है। အာဒိယမာနာတိ ဂဏှန္တိ. ‘‘ပစ္ဆာ ဇာနိဿာမာ’’တိ န အဇ္ဇုပေက္ခိတဗ္ဗော. ဣဒံ န ကတ္တဗ္ဗန္တိ ဝုတ္တေတိ ဣဒံ ပါဏအတိပါတနံ န ကတ္တဗ္ဗန္တိ ဝုတ္တေ ဣဒံ ဒဏ္ဍေန ဝါ လေဍ္ဍုနာ ဝါ ဝိဟေဌနံ န ကတ္တဗ္ဗံ, ဣဒံ ပါဏိနာ ဒဏ္ဍကဒါနဉ္စ အန္တမသော ကုဇ္ဈိတွာ ဩလောကနမတ္တမ္ပိ န ကတ္တဗ္ဗမေဝါတိ နယသတေနပိ နယသဟဿေနပိ ပဋိဝိဇ္ဈတိ, တထာ ဣဓ တာဝ သမ္မဇ္ဇနံ ကတ္တဗ္ဗန္တိ ဝုတ္တေပိ တတ္ထ ပရိဘဏ္ဍကရဏံ ဝိဟာရင်္ဂဏသမ္မဇ္ဇနံ ကစဝရဆဍ္ဍနံ ဝါလိကာသမကိရဏန္တိ ဧဝမာဒိနာ နယသတေန နယသဟဿေန ပဋိဝိဇ္ဈတိ. တေနာဟ – ‘‘ဣဒံ ကတ္တဗ္ဗန္တိ ဝုတ္တေပိ ဧသေဝ နယော’’တိ. ပရိဘာသန္တိ တဇ္ဇနံ. လဘာမီတိ ပစ္စာသီသတိ. "आदियमाना" का अर्थ है ग्रहण करते हैं। "बाद में जान लेंगे" ऐसा कहकर उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। "इदं न कातब्बं" (यह नहीं करना चाहिए) ऐसा कहने पर, यह प्राणातिपात नहीं करना चाहिए, यह डंडे या ढेले से प्रताड़ित नहीं करना चाहिए, यह हाथ से डंडा देना और यहाँ तक कि क्रोधित होकर देखना मात्र भी नहीं करना चाहिए—इस प्रकार सौ और हजार नयों (तरीकों) से प्रतिवेध (बोध) करता है। उसी प्रकार, "यहाँ सम्मार्जन (सफाई) करना चाहिए" ऐसा कहने पर भी, वहाँ परिभाण्ड-करण (लिपाई-पुताई), विहार के आँगन की सफाई, कचरा फेंकना, बालू को बराबर फैलाना आदि सौ और हजार नयों से प्रतिवेध करता है। इसीलिए कहा— "इदं कातब्बन्ति वुत्तेपि एसेव नयो" (यह करना चाहिए, ऐसा कहने पर भी यही नियम है)। "परिभासं" का अर्थ है तर्जना (डाँटना)। "लभासि" का अर्थ है प्रत्याशा (आशा) करता है। သဗ္ဗမေတန္တိ သဗ္ဗံ ဧတံ မယိ လဗ္ဘမာနံ သိက္ခာကာမတံ. အဘိညာယာတိ ဇာနိတွာ. သဟာယောတိ ရဋ္ဌပါလတ္ထေရံ သန္ဓာယာဟ. သော ဟိ ဘဂဝတာ သဒ္ဓါပဗ္ဗဇိတဘာဝေ ဧတဒဂ္ဂေ ဌပိတော. ဓမ္မာရက္ခောတိ သတ္ထု သဒ္ဓမ္မရတနာနုပါလကော ဓမ္မဘဏ္ဍာဂါရိကော. ပေတ္တိယောတိ စူဠပိတာ. သဗ္ဗံ မေ ဇိနသာသနန္တိ သဗ္ဗမ္ပိ ဗုဒ္ဓသာသနံ မယှမေဝ. "सब्बमेतन्ति" (सब यह) का अर्थ है मुझमें प्राप्त होने वाली शिक्षा की कामना। "अभिञ्ञायाति" का अर्थ है जानकर। "सहायो" यह रट्ठपाल थेर के संदर्भ में कहा गया है। क्योंकि उन्हें भगवान ने श्रद्धापूर्वक प्रव्रजित होने वालों में अग्र स्थान पर रखा है। "धम्मारक्खो" का अर्थ है शास्ता के सद्धर्म-रत्न का रक्षक, धर्म-भाण्डागारिक। "पेत्तियो" का अर्थ है छोटा चाचा (चुलपिता)। "सब्बं मे जिनसासनन्ति" का अर्थ है सारा बुद्ध-शासन मेरा ही है। ဆန္ဒရာဂံ ဉတွာတိ ဆန္ဒရာဂံ မမ စိတ္တေ ဥပ္ပန္နံ ဉတွာ. အညတရသ္မိံ ရုက္ခမူလေတိ ဝိဟာရပရိယန္တေ အညတရသ္မိံ ရုက္ခမူလဋ္ဌာနေ အနုစ္ဆဝိကေ. "छन्दरागं ञत्वाति" का अर्थ है मेरे चित्त में उत्पन्न छन्द-राग को जानकर। "अञ्ञतरस्मिं रुक्खमूलेति" का अर्थ है विहार के अंत में किसी उपयुक्त वृक्ष के मूल स्थान पर। တဒါတိ အဂ္ဂသာဝကေဟိ ပသာဒါပနကာလေ. အညကမ္မဋ္ဌာနာနိ စင်္ကမနဣရိယာပထေပိ ပိဋ္ဌိပသာရဏကာလေပိ သမိဇ္ဈန္တိ, န ဧဝမိဒန္တိ အာဟ – ‘‘ဣဒမဿ ဧတိဿာ နိသဇ္ဇာယ ကမ္မဋ္ဌာနံ အနုစ္ဆဝိက’’န္တိ. အာနာပါနဿတိန္တိ အာနာပါနဿတိကမ္မဋ္ဌာနံ. "तदाति" का अर्थ है अग्रश्रावकों द्वारा प्रसन्न किए जाने के समय। अन्य कर्मस्थान चंक्रमण की ईर्यापथ में भी और पीठ फैलाने (विश्राम) के समय भी सिद्ध होते हैं, किंतु यह ऐसा नहीं है, इसलिए कहा - "यह इसके इस बैठने के लिए उपयुक्त कर्मस्थान है"। "आनापानस्सतिन्ति" का अर्थ है आनापानस्मृति कर्मस्थान। သမသီသီ ဟောတီတိ သစေ သမသီသီ ဟုတွာ န ပရိနိဗ္ဗာယတိ. ပစ္စေကဗောဓိံ သစ္ဆိကရောတိ နော စေ ပစ္စေကဗောဓိံ သစ္ဆိကရောတိ. ခိပ္ပာဘိညောတိ ခိပ္ပံ လဟုံယေဝ ပတ္တဗ္ဗဆဠဘိညော. "समसीसी होतीति" का अर्थ है यदि समशीर्षी होकर परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करता है। "पच्चेकबोधिं सच्छिकरोति" (प्रत्येकबोधि का साक्षात्कार करता है), यदि प्रत्येकबोधि का साक्षात्कार नहीं करता है। "खिप्पाभिञ्ञो" का अर्थ है शीघ्र ही, जल्दी ही छह अभिज्ञाओं को प्राप्त करने वाला। ပရိပုဏ္ဏာတိ [Pg.63] သောဠသသု အာကာရေသု ကဿစိပိ အတာပနေန သဗ္ဗသော ပုဏ္ဏာ. သုဘာဝိတာတိ သမထဘာဝနာယ ဝိပဿနာဘာဝနာယ စ အနုပုဗ္ဗသမ္ပာဒနေန သုဘာဝိတာ. ဂဏနာဝိဓာနာနုပုဗ္ဗိယာ အာသေဝိတတ္တာ အနုပုဗ္ဗံ ပရိစိတာ. "परिपुण्णाति" का अर्थ है सोलह आकारों में किसी के भी द्वारा संतप्त न होने से पूरी तरह पूर्ण। "सुभाविताति" का अर्थ है शमथ-भावना और विपश्यना-भावना के अनुक्रमिक संपादन से भली-भांति भावित। गणना-विधि के अनुक्रम से सेवन किए जाने के कारण अनुक्रम से परिचित। ဩမာနံ ဝါတိ အဝဇာနနံ ဥညာတန္တိ ဧဝံဝိဓံ မာနံ ဝါ. အတိမာနံ ဝါတိ ‘‘ကိံ ဣမေဟိ, မမေဝ အာနုဘာဝေန ဇီဝိဿာမီ’’တိ ဧဝံ အတိမာနံ ဝါ ကုတော ဇနေဿတီတိ. "ओमानं वाति" का अर्थ है अवमानना या तिरस्कार, इस प्रकार का मान। "अतिमानं वाति" का अर्थ है "इनसे क्या, मैं अपने ही प्रभाव से जीऊँगा" - इस प्रकार का अतिमान कहाँ से उत्पन्न करेगा? ၁၁၄. ဝိသင်္ခရိတွာတိ ဝိသံယုတ္တေ ကတွာ, ယထာ သင်္ဂါကာရေန ဂဟဏံ န ဂစ္ဆတိ, ဧဝံ ဝိနိဘုဉ္ဇိတွာတိ အတ္ထော. မဟာဘူတာနိ တာဝ ဝိတ္ထာရေတု, သမ္မသနူပဂတ္တာ, အသမ္မသနူပဂံ အာကာသဓာတုံ အထ ကသ္မာ ဝိတ္ထာရေသီတိ အာဟ ‘‘ဥပါဒါရူပဒဿနတ္ထ’’န္တိ. အာပေါဓာတု သုခုမရူပံ. ဣတရာသု ဩဠာရိကသုခုမတာပိ လဗ္ဘတီတိ အာဟ ‘‘ဥပါဒါရူပဒဿနတ္ထ’’န္တိ. ဟေဋ္ဌာ စတ္တာရိ မဟာဘူတာနေဝ ကထိတာနိ, န ဥပါဒါရူပန္တိ တဿ ပနေတ္ထ လက္ခဏဟာရနယေန အာကာသဒဿနေန ဒဿိတတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. တေနာဟ ‘‘ဣမိနာ မုခေန တံ ဒဿေတု’’န္တိ. န ကေဝလံ ဥပါဒါရူပဂ္ဂဟဏဒဿနတ္ထမေဝ အာကာသဓာတု ဝိတ္ထာရိတာ, အထ ခေါ ပရိဂ္ဂဟသုခတာယပီတိ ဒဿေန္တော ‘‘အပိစာ’’တိအာဒိမာဟ. တတ္ထ ပရိစ္ဆိန္ဒိတဗ္ဗဿ ရူပဿ နိရဝသေသပရိယာဒါနတ္ထံ ‘‘အဇ္ဈတ္တိကေနာ’’တိ ဝိသေသနမာဟ. အာကာသေနာတိ အာကာသဓာတုယာ ဂဟိတာယ. ပရိစ္ဆိန္နရူပန္တိ တာယ ပရိစ္ဆိန္ဒိတကလာပဂတမ္ပိ ပါကဋံ ဟောတိ ဝိဘူတံ ဟုတွာ ဥပဋ္ဌာတိ. ११४. "विसङ्खरित्वाति" का अर्थ है विसंयुक्त करके, जिससे संघात (समूह) के रूप में ग्रहण न हो, इस प्रकार अलग-अलग करके। महाभूतों का विस्तार करने के बाद, जो सम्मर्शन (परीक्षा) के योग्य हैं, फिर असममर्शन के योग्य आकाशधातु का विस्तार क्यों किया? इसके लिए कहा - "उपादा-रूप के दर्शन के लिए"। आपोधातु सूक्ष्म रूप है। अन्यों में औदारिक और सूक्ष्मता भी प्राप्त होती है, इसलिए कहा - "उपादा-रूप के दर्शन के लिए"। नीचे केवल चार महाभूत ही कहे गए हैं, उपादा-रूप नहीं, तो यहाँ लक्षणहार-नय से आकाश के दर्शन द्वारा उसे दिखाया गया समझना चाहिए। इसीलिए कहा - "इस मुख (द्वार) से उसे दिखाने के लिए"। न केवल उपादा-रूप के ग्रहण और दर्शन के लिए आकाशधातु का विस्तार किया गया है, बल्कि परिग्रह की सुगमता के लिए भी, यह दिखाते हुए "अपि च" आदि कहा। वहाँ परिच्छेद किए जाने वाले रूप के पूर्णतः अंत के लिए "अज्झत्तिकेन" (आध्यात्मिक) यह विशेषण कहा। "आकासेनाति" का अर्थ है आकाशधातु के ग्रहण से। "परिच्छिन्नरूपन्ति" का अर्थ है उसके द्वारा परिच्छेद किए गए कलापों के अंतर्गत भी स्पष्ट होता है, प्रकट होकर उपस्थित होता है। ဣဒါနိ ဝုတ္တမေဝတ္ထံ သုခဂ္ဂဟဏတ္ထံ ဂါထာယ ဒဿေတိ. တဿာတိ ဥပါဒါယရူပဿ. ဧဝံ အာဝိဘာဝတ္ထန္တိ ဧဝံ ပရိစ္ဆိန္နတာယ အာကာသဿ ဝသေန ဝိဘူတဘာဝတ္ထံ. တန္တိ အာကာသဓာတုံ. अब कहे गए अर्थ को ही सुखपूर्वक ग्रहण करने के लिए गाथा द्वारा दिखाते हैं। "तस्साति" का अर्थ है उपादा-रूप का। "एवं आविभावत्थन्ति" का अर्थ है इस प्रकार परिच्छिन्नता के कारण आकाश के वश से प्रकट होने के लिए। "तन्ति" का अर्थ है उस आकाशधातु को। ၁၁၈. အာကာသဘာဝံ ဂတန္တိ စတူဟိ မဟာဘူတေဟိ အသမ္ဖုဋ္ဌာနံ တေသံ ပရိစ္ဆေဒကဘာဝေန အာကာသန္တိ ဂဟေတဗ္ဗတံ ဂတံ, အာကာသမေဝ ဝါ အာကာသဂတံ ယထာ ‘‘ဒိဋ္ဌိဂတံ (ဓ. သ. ၃၈၁; မဟာနိ. ၁၂), အတ္ထင်္ဂတ’’န္တိ (အ. နိ. အဋ္ဌ. ၁.၁.၁၃၀) စ. အာဒိန္နန္တိ ဣမန္တိ တဏှာဒိဋ္ဌီဟိ အာဒိန္နံ. တေနာဟ ‘‘ဂဟိတံ ပရာမဋ္ဌ’’န္တိ. အညတ္ထ ကမ္မဇံ ‘‘ဥပါဒိန္န’’န္တိ ဝုစ္စတိ, န တထာ ဣဓာတိ အာဟ ‘‘သရီရဋ္ဌကန္တိ အတ္ထော’’တိ. ပထဝီဓာတုအာဒီသု [Pg.64] ဝုတ္တနယေနေဝါတိ မဟာဟတ္ထိပဒေါပမေ (မ. နိ. ၁.၃၀၀ အာဒယော) ဝုတ္တနယဒဿနံ သန္ဓာယ ဝဒတိ. ११८. "आकासभा्वं गतन्ति" का अर्थ है चार महाभूतों द्वारा अस्पृष्ट, उनके परिच्छेदक भाव से 'आकाश' के रूप में ग्रहण करने योग्य स्थिति को प्राप्त, अथवा आकाश ही आकाशगत है, जैसे "दिट्ठिगतं" और "अत्थङ्गतं"। "आदिन्नन्ति" का अर्थ है इसे तृष्णा और दृष्टि द्वारा ग्रहण किया गया। इसीलिए कहा - "गृहीत और परामृष्ट"। अन्यत्र कर्मज को "उपादिन्न" कहा जाता है, यहाँ वैसा नहीं है, इसलिए कहा - "शरीर में स्थित, यह अर्थ है"। पृथ्वीधातु आदि में कहे गए नय के समान ही, यह महाहत्थिपदोपम सुत्त में कहे गए नय के संदर्भ में कहा गया है। ၁၁၉. တာဒိဘာဝေါ နာမ နိဋ္ဌိတကိစ္စဿ ဟောတိ, အယဉ္စ ဝိပဿနံ အနုယုဉ္ဇတိ, အထ ကိမတ္ထံ တာဒိဘာဝတာ ဝုတ္တာတိ? ပထဝီသမတာဒိလက္ခဏာစိက္ခဏာဟိ ဝိပဿနာယ သုခပ္ပဝတ္တိအတ္ထံ. တေနာဟ ‘‘ဣဋ္ဌာနိဋ္ဌေသူ’’တိအာဒိ. ဂဟေတွာတိ ကုသလပ္ပဝတ္တိယာ ဩကာသဒါနဝသေန ပရိဂ္ဂဟေတွာ. န ပတိဋ္ဌိတောတိ န နိဿိတော န လဂ္ဂေါ. ११९. "तादिभाव" उसका होता है जिसका कृत्य पूर्ण हो चुका हो, और यह (राहुल) विपश्यना में लगा हुआ है, तो फिर तादिभाव क्यों कहा गया? पृथ्वी के समान होने आदि के लक्षणों के निर्देश से विपश्यना की सुखपूर्वक प्रवृत्ति के लिए। इसीलिए "इष्ट और अनिष्ट में" आदि कहा। "गहेत्वाति" का अर्थ है कुशल की प्रवृत्ति के लिए अवसर देने के वश से ग्रहण करके। "न पतिट्ठितो" का अर्थ है आश्रित नहीं, आसक्त नहीं। ၁၂၀. ဗြဟ္မဝိဟာရဘာဝနာ အသုဘဘာဝနာ အာနာပါနဿတိဘာဝနာ စ ဥပစာရံ ဝါ အပ္ပနံ ဝါ ပါပေန္တော ဝိပဿနာယ ပါဒကဘာဝါယ အနိစ္စာဒိသညာယ ဝိပဿနာဘာဝေန ဥဿက္ကိတွာ မဂ္ဂပဋိပါဋိယာ အရဟတ္တာဓိဂမာယ ဟောတီတိ ‘‘မေတ္တာဒိဘာဝနာယ ပန ဟောတီ’’တိ ဝုတ္တံ. ယတ္ထ ကတ္ထစိ သတ္တေသု သင်္ခါရေသု စ ပဋိဟညနကိလေသောတိ အာဃာတဘာဝမေဝ ဝဒတိ ဉာယဘာဝတော အညေသမ္ပိ. အသ္မိမာနောတိ ရူပါဒိကေ ပစ္စေကံ ဧကဇ္ဈံ ဂဟေတွာ ‘‘အယမဟမသ္မီ’’တိ ဧဝံ ပဝတ္တမာနော. १२०. ब्रह्मविहार-भावना, अशुभ-भावना और आनापानस्मृति-भावना उपचार या अर्पणा तक पहुँचाते हुए, विपश्यना के आधारभूत होने के लिए, अनित्य आदि संज्ञा के साथ विपश्यना-भाव से आगे बढ़कर मार्ग-क्रम से अर्हत्व की प्राप्ति के लिए होती है, इसलिए "मैत्री आदि की भावना से होता है" ऐसा कहा गया है। जहाँ कहीं भी सत्त्वों और संस्कारों में प्रतिघात करने वाला क्लेश है, वह आघात-भाव को ही कहता है, न्याय-भाव से अन्यों को भी। "अस्मिमानो" का अर्थ है रूप आदि को प्रत्येक रूप में या सामूहिक रूप में ग्रहण करके "यह मैं हूँ" इस प्रकार प्रवृत्त होना। ၁၂၁. ဣဒံ ကမ္မဋ္ဌာနန္တိ ဧတ္ထ ဂဏနာဒိဝသေန အာသေဝိယမာနာ အဿာသပဿာသာ ယောဂကမ္မဿ ပတိဋ္ဌာနတာယ ကမ္မဋ္ဌာနံ. တတ္ထ ပန တထာပဝတ္တော မနသိကာရော ဘာဝနာ. ဧတ္ထ စ တဿေဝ ထေရဿ ဘဂဝတာ ဗဟူနံ ကမ္မဋ္ဌာနာနံ ဒေသိတတ္တာ စရိတံ အနာဒိယိတွာ ကမ္မဋ္ဌာနာနိ သဗ္ဗေသံ ပုဂ္ဂလာနံ သပ္ပာယာနီတိ အယမတ္ထော သိဒ္ဓေါ, အတိသပ္ပာယဝသေန ပန ကမ္မဋ္ဌာနေသု ဝိဘာဂကထာ ကထိတာတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. १२१. "इदं कम्मट्ठानन्ति" यहाँ गणना आदि के वश से सेवन किए जाने वाले आश्वास-प्रश्वास योग-कर्म की प्रतिष्ठा होने के कारण कर्मस्थान हैं। वहाँ उस प्रकार प्रवृत्त मनसिकार 'भावना' है। और यहाँ उसी थेर को भगवान द्वारा बहुत से कर्मस्थानों का उपदेश दिए जाने से, चरित (स्वभाव) का विचार न करते हुए कर्मस्थान सभी पुद्गलों के लिए उपयुक्त हैं, यह अर्थ सिद्ध होता है, किंतु अति-उपयुक्तता के वश से कर्मस्थानों में विभाग-कथा कही गई है, ऐसा समझना चाहिए। မဟာရာဟုလောဝါဒသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. महाराजहुलोवाद सुत्त की वर्णना की लीनत्थप्पकासना (टीका) समाप्त हुई। ၃. စူဠမာလုကျသုတ္တဝဏ္ဏနာ ३. चूलमालुक्य सुत्त की वर्णना। ၁၂၂. ဧဝံ ဌပိတာနီတိ ‘‘သဿတော လောကော’’တိအာဒိနယပ္ပဝတ္တာနိ ဒိဋ္ဌိဂတာနိ အနိယျာနိကတာယ န ဗျာကာတဗ္ဗာနိ န ကထေတဗ္ဗာနိ, ဧဝံ ဌပနီယပက္ခေ ဌပိတာနိ စေဝ နိယျာနိကသာသနေ ဆဍ္ဍနီယတာယ ပဋိက္ခိတ္တာနိ စ, အပိစေတ္ထ အတ္ထတော ပဋိက္ခေပေါ ဧဝ ဗျာကာတဗ္ဗတော. ယထာ ဧကော [Pg.65] ကမ္မကိလေသဝသေန ဣတ္ထတ္တံ အာဂတော, တထာ အပရောပိ အပရောပီတိ သတ္တော တထာဂတော ဝုစ္စတီတိ အာဟ – ‘‘တထာဂတောတိ သတ္တော’’တိ. တံ အဗျာကရဏံ မယှံ န ရုစ္စတီတိ ယဒိ သဿတော လောကော, သဿတော လောကောတိ, အသဿတော လောကော, အသဿတော လောကောတိ ဇာနာမာတိ ဗျာကာတဗ္ဗမေဝ, ယံ ပန ဥဘယထာ အဗျာကရဏံ, တံ မေ စိတ္တံ န အာရာဓေတိ အဇာနနဟေတုကတ္တာ အဗျာကရဏဿ. တေနာဟ – ‘‘အဇာနတော ခေါ ပန အပဿတော ဧတဒေဝ ဥဇုကံ, ယဒိဒံ န ဇာနာမိ န ပဿာမီ’’တိ. သဿတောတိအာဒီသု သဿတောတိ သဗ္ဗကာလိကော, နိစ္စော ဓုဝေါ အဝိပရိဏာမဓမ္မောတိ အတ္ထော. သော ဟိ ဒိဋ္ဌိဂတိကေဟိ လောကီယန္တိ ဧတ္ထ ပုညပါပတဗ္ဗိပါကာ, သယံ ဝါ တဗ္ဗိပါကာကရာဒိဘာဝေန အဝိယုတ္တေဟိ လောကီယတီတိ လောကောတိ အဓိပ္ပေတော. ဧတေန စတ္တာရောပိ သဿတဝါဒါ ဒဿိတာ ဟောန္တိ. အသဿတောတိ န သဿတော, အနိစ္စော အဒ္ဓုဝေါ ဘေဒနဓမ္မောတိ အတ္ထော, အသဿတောတိ စ သဿတဘာဝပဋိက္ခေပေန ဥစ္ဆေဒေါ ဒီပိတောတိ သတ္တပိ ဥစ္ဆေဒဝါဒါ ဒဿိတာ ဟောန္တိ. အန္တဝါတိ ပရိဝဋုမော ပရိစ္ဆိန္နပရိမာဏော, အသဗ္ဗဂတောတိ အတ္ထော. တေန ‘‘သရီရပရိမာဏော, အင်္ဂုဋ္ဌပရိမာဏော, ယဝပရိမာဏော ပရမာဏုပရိမာဏော အတ္တာ’’တိ (ဥဒါ. အဋ္ဌ. ၅၄; ဒီ. နိ. ဋီ. ၁.၇၆-၇၇) ဧဝမာဒိဝါဒါ ဒဿိတာ ဟောန္တိ. १२२. इस प्रकार रखे गए (स्थापित) का अर्थ है - 'लोक शाश्वत है' आदि नय से प्रवृत्त दृष्टिगत (विचार), जो मोक्षदायक न होने के कारण अव्याकृत (व्याख्या न करने योग्य) और न कहने योग्य हैं; इस प्रकार स्थापनीय पक्ष में रखे गए हैं और मोक्षदायक शासन में त्यागने योग्य होने के कारण प्रतिषिद्ध हैं, और यहाँ अर्थतः प्रतिषेध ही व्याख्या करने योग्य होने से है। जैसे एक कर्म-क्लेश के वश से इस भाव (मनुष्यत्व) को प्राप्त हुआ, वैसे ही दूसरा और फिर दूसरा, इस प्रकार 'सत्व' को 'तथागत' कहा जाता है, इसीलिए कहा - 'तथागत यानी सत्व'। 'वह अव्याकरण (उत्तर न देना) मुझे पसंद नहीं है' - यदि लोक शाश्वत है, तो 'लोक शाश्वत है', यदि लोक अशाश्वत है, तो 'लोक अशाश्वत है' ऐसा मैं जानता हूँ, तो वह व्याख्या करने योग्य ही है; किन्तु जो दोनों प्रकार से अव्याकृत है, वह अज्ञान के कारण अव्याकरण होने से मेरे चित्त को प्रसन्न नहीं करता। इसीलिए कहा - 'न जानने वाले और न देखने वाले के लिए यही सीधा (सरल) है कि मैं नहीं जानता, मैं नहीं देखता'। 'शाश्वत' आदि में 'शाश्वत' का अर्थ है - सर्वकालिक, नित्य, ध्रुव और अपरिणामधर्मी। वह दृष्टिगतों (मिथ्यादृष्टि वालों) द्वारा 'लोक्यते' (देखा/अनुभव किया जाता है) इसमें पुण्य-पाप और उनके विपाक, अथवा स्वयं उनके विपाक के कर्ता आदि भाव से वियुक्त न होने वालों द्वारा 'लोक्यते' इति 'लोक' अभिप्रेत है। इससे चारों शाश्वतवाद दिखाए गए हैं। 'अशाश्वत' का अर्थ है - जो शाश्वत नहीं है, अनित्य, अध्रुव और भेदनधर्मी; और 'अशाश्वत' से शाश्वत भाव के प्रतिषेध द्वारा उच्छेद (विनाश) सूचित किया गया है, जिससे सातों उच्छेदवाद दिखाए गए हैं। 'अन्तवान' का अर्थ है - परिबद्ध या परिच्छिन्न परिमाण वाला, जो सर्वगत (व्यापक) नहीं है। उससे 'शरीर के परिमाण वाला, अंगूठे के परिमाण वाला, जौ के परिमाण वाला, परमाणु के परिमाण वाला आत्मा है' - इस प्रकार के वाद दिखाए गए हैं। တထာဂတော ပရံ မရဏာတိ တထာဂတော ဇီဝေါ အတ္တာ မရဏတော ဣမဿ ကာယဿ ဘေဒတော ပရံ ဥဒ္ဓံ ဟောတိ အတ္ထိ သံဝိဇ္ဇတီတိ အတ္ထော. ဧတေန သဿတဘာဝမုခေန သောဠသ သညီဝါဒါ, အဋ္ဌ အသညီဝါဒါ, အဋ္ဌ စ နေဝသညီနာသညီဝါဒါ ဒဿိတာ ဟောန္တိ. န ဟောတီတိ နတ္ထိ န ဥပလဗ္ဘတိ. ဧတေန ဥစ္ဆေဒဝါဒေါ ဒဿိတော ဟောတိ. အပိစ ဟောတိ စ န စ ဟောတီတိ အတ္ထိ နတ္ထိ စာတိ. ဧတေန ဧကစ္စသဿတဝါဒေါ ဒဿိတော. နေဝ ဟောတိ န န ဟောတီတိ ပန ဣမိနာ အမရာဝိက္ခေပဝါဒေါ ဒဿိတောတိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ဘဂဝတာ ပန အနိယျာနိကတ္တာ အနတ္ထသံဟိတာနိ ဣမာနိ ဒဿနာနီတိ တာနိ န ဗျာကတာနိ, တံ အဗျာကရဏံ သန္ဓာယာဟ အယံ ထေရော ‘‘တံ မေ န ရုစ္စတီ’’တိ. သိက္ခံ ပဋိက္ခိပိတွာ ယထာသမာဒိန္နသိက္ခံ ပဟာယ. 'तथागत मृत्यु के बाद' का अर्थ है - तथागत यानी जीव या आत्मा, इस शरीर के भेद (मृत्यु) के बाद ऊपर (परलोक में) होता है, है, विद्यमान है। इससे शाश्वत-भाव के मुख से सोलह संज्ञीवाद, आठ असंज्ञीवाद और आठ नैवसंज्ञी-नासंज्ञीवाद दिखाए गए हैं। 'नहीं होता है' का अर्थ है - नहीं है, उपलब्ध नहीं होता। इससे उच्छेदवाद दिखाया गया है। और 'होता भी है और नहीं भी होता है' का अर्थ है - है भी और नहीं भी। इससे एकच्च-शाश्वतवाद (आंशिक शाश्वतवाद) दिखाया गया है। 'न होता है न नहीं होता है' इससे 'अमराविक्खेपवाद' (अनिश्चिततावाद) दिखाया गया है, ऐसा जानना चाहिए। भगवान द्वारा मोक्षदायक न होने और अनर्थकारी होने के कारण ये दर्शन व्याकृत (व्याख्यायित) नहीं किए गए, उस अव्याकरण के संदर्भ में इस स्थविर ने कहा - 'वह मुझे पसंद नहीं है'। 'शिक्षा को त्यागकर' का अर्थ है - यथा-स्वीकृत शिक्षा को छोड़कर। ၁၂၅. တွံ [Pg.66] နေဝ ယာစကောတိ အဟံ ဘန္တေ ဘဂဝတိ ဗြဟ္မစရိယံ စရိဿာမီတိအာဒိနာ. န ယာစိတကောတိ တွံ မာလုကျပုတ္တ မယိ ဗြဟ္မစရိယံ စရာတိအာဒိနာ. १२५. 'तुम न तो याचक थे' - 'भन्ते! मैं भगवान के पास ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा' आदि के द्वारा। 'न ही याचित थे' - 'मालुक्यपुत्र! तुम मेरे पास ब्रह्मचर्य का पालन करो' आदि के द्वारा। ၁၂၆. ပရသေနာယ ဌိတေန ပုရိသေန. ဗဟလလေပနေနာတိ ဗဟလဝိလေပနေန. မဟာသုပိယာဒိ သဗ္ဗော မုဒုဟိဒကော ဝေဏုဝိသေသော သဏှော. မရုဝါတိ မကစိ. ခီရပဏ္ဏိနောတိ ခီရပဏ္ဏိယာ, ယဿာ ဆိန္ဒနမတ္တေ ပဏ္ဏေ ခီရံ ပဂ္ဃရတိ. ဂစ္ဆန္တိ ဂစ္ဆတော ဇာတံ သယံဇာတဂုမ္ဗတော ဂဟိတန္တိ အဓိပ္ပာယော. သိထိလဟနု နာမ ဒတ္တာ ကဏ္ဏော ပတင်္ဂေါ. ဧတာယ ဒိဋ္ဌိယာ သတိ န ဟောတီတိ ‘‘သဿတော လောကော’’တိ ဧတာယ ဒိဋ္ဌိယာ သတိ မဂ္ဂဗြဟ္မစရိယဝါသော န ဟောတိ, တံ ပဟာယ ဧဝ ပတ္တဗ္ဗတော. १२६. शत्रु सेना में स्थित पुरुष द्वारा। 'बहललेपनेन' का अर्थ है गाढ़े लेप से। महासुपिय आदि सभी कोमल हृदय वाले बाँस के विशेष प्रकार चिकने होते हैं। 'मरुवा' का अर्थ है मकचि (एक प्रकार का रेशा)। 'खीरपण्णिनो' का अर्थ है क्षीरपर्णी (दूध वाले पत्ते), जिसके पत्ते को काटते ही दूध बहने लगता है। 'गच्छन्ति' का अभिप्राय है चलते हुए उत्पन्न हुए स्वयंजात झाड़ी से लिया गया। 'सिथिलहनु' नाम का दत्त्ता, कर्ण और पतंग है। 'इस दृष्टि के होने पर नहीं होता' का अर्थ है कि 'लोक शाश्वत है' इस दृष्टि के होने पर मार्ग-ब्रह्मचर्य का वास नहीं होता, उसे त्याग कर ही इसे प्राप्त किया जा सकता है। ၁၂၇. အတ္ထေဝ ဇာတီတိအာဒိနာ ဧတာ ဒိဋ္ဌိယော ပစ္စေကမ္ပိ သံသာရပရိဗြူဟနာ ကဋသိဝဍ္ဎနာ နိဗ္ဗာနဝိဗန္ဓနာတိ ဒဿေတိ. १२७. 'यहीं जाति है' आदि के द्वारा यह दिखाया गया है कि ये दृष्टियाँ व्यक्तिगत रूप से भी संसार को बढ़ाने वाली, श्मशान को बढ़ाने वाली और निर्वाण में बाधा डालने वाली हैं। ၁၂၈. တသ္မာတိဟာတိ ဣဒံ အဋ္ဌာနေ ဥဒ္ဓဋံ, ဌာနေယေဝ ပန ‘‘ဝုတ္တပဋိပက္ခနယေန ဝေဒိတဗ္ဗ’’န္တိ ဣမဿ ပရတော ကတွာ သံဝဏ္ဏေတဗ္ဗံ. အတ္တနော ဖလေန အရဏီယတော အနုဂန္တဗ္ဗတော ကာရဏမ္ပိ ‘‘အတ္ထော’’တိ ဝုစ္စတီတိ အာဟ ‘‘ကာရဏနိဿိတ’’န္တိ. တေနာဟ ‘‘ဗြဟ္မစရိယဿ အာဒိမတ္တမ္ပီ’’တိ. ပုဗ္ဗပဒဋ္ဌာနန္တိ ပဌမာရမ္ဘော. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. १२८. 'तस्मातिह' (इसलिए यहाँ) यह अनुचित स्थान पर उद्धृत है, उचित स्थान पर ही 'कहे गए प्रतिपक्ष के नियम से जानना चाहिए' इसके बाद रखकर व्याख्या करनी चाहिए। अपने फल के द्वारा प्राप्त करने योग्य होने के कारण, कारण को भी 'अर्थ' कहा जाता है, इसलिए कहा 'कारण पर आश्रित'। इसीलिए कहा 'ब्रह्मचर्य का आदि मात्र भी'। 'पुब्बपदट्ठानं' का अर्थ है प्रथम आरम्भ। शेष सुविज्ञेय (आसानी से समझने योग्य) ही है। စူဠမာလုကျသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. चूलमालुक्यसुत्त की वर्णना (व्याख्या) का लीनत्थप्पकासना (गूढ़ अर्थ का प्रकाशन) समाप्त हुआ। ၄. မဟာမာလုကျသုတ္တဝဏ္ဏနာ ४. महामालुक्यसुत्त की वर्णना (व्याख्या)। ၁၂၉. ဩရံ ဝုစ္စတိ ကာမဓာတု, တတ္ထ ပဝတ္တိယာ သံဝတ္တနတော ဩရံ ဘဇန္တီတိ ဩရမ္ဘာဂိယာနိ, ဟေဋ္ဌိမမဂ္ဂဝဇ္ဈတာယ ဩရမ္ဘာဂေ ဟေဋ္ဌာကောဋ္ဌာသေ ဘဇန္တီတိ ဩရမ္ဘာဂိယာနိ က-ကာရဿ ယ-ကာရံ ကတွာ. တေနာဟ ‘‘ဟေဋ္ဌာကောဋ္ဌာသိကာနီ’’တိအာဒိ. ကမ္မုနာ ဟိ ဝဋ္ဋေန စ ဒုက္ခံ သံယောဇေန္တီတိ သံယောဇနာနိ, ဩရမ္ဘာဂိယသညိတာနိ သံယောဇနာနိ ယဿ အပ္ပဟီနာနိ, တဿေဝ ဝဋ္ဋဒုက္ခံ. ယဿ ပန တာနိ ပဟီနာနိ, တဿ တံ နတ္ထီတိ. အပ္ပဟီနတာယ အနုသေတီတိ အရိယမဂ္ဂေန အသမုစ္ဆိန္နတာယ ကာရဏလာဘေ [Pg.67] သတိ ဥပ္ပဇ္ဇတိ, အပ္ပဟီနဘာဝေန အနုသေတိ. အနုသယမာနော သံယောဇနံ နာမ ဟောတီတိ အနုသယတ္တံ ဖရိတွာ ပဝတ္တမာနော ပါပဓမ္မော ယထာဝုတ္တေနတ္ထေန သံယောဇနံ နာမ ဟောတိ. ဧတေန ယဒိ ပန အနုသယတော သံယောဇနံ ပဝတ္တံ, တထာပိ ယေ တေ ကာမရာဂါဒယော ‘‘အနုသယာ’’တိ ဝုစ္စန္တိ, တေယေဝ ဗန္ဓနဋ္ဌေန သံယောဇနာနီတိ ဒဿေတိ. १२९. 'ओर' (निकट/नीचे) कामधातु को कहा जाता है, वहाँ प्रवृत्ति के संवर्तन (होने) से जो 'ओर' का सेवन करते हैं वे 'ओरंभागिय' हैं; निचले मार्ग द्वारा वध (विनाश) के योग्य होने के कारण निचले भाग (अधोभाग) में रहने वाले 'ओरंभागिय' कहलाते हैं, यहाँ 'क' कार को 'य' कार करके। इसीलिए कहा 'निचले हिस्से वाले' आदि। कर्म और वट्ट (संसार चक्र) के द्वारा जो दुःख से जोड़ते हैं वे 'संयोजन' हैं; जिसके 'ओरंभागिय' नाम के संयोजन नष्ट नहीं हुए हैं, उसी के लिए संसार का दुःख है। जिसके वे नष्ट हो गए हैं, उसके लिए वह नहीं है। 'नष्ट न होने के कारण अनुशयित रहता है' का अर्थ है कि आर्यमार्ग द्वारा समूल नष्ट न होने के कारण, कारण मिलने पर उत्पन्न होता है, नष्ट न होने के भाव से अनुशयित रहता है। 'अनुशयित होता हुआ संयोजन कहलाता है' का अर्थ है कि अनुशय भाव में व्याप्त होकर प्रवृत्त होने वाला पाप-धर्म पूर्वोक्त अर्थ में संयोजन कहलाता है। इससे यह दिखाया गया है कि यदि अनुशय से संयोजन प्रवृत्त होता है, तो भी जो कामराग आदि 'अनुशय' कहे जाते हैं, वे ही बंधन के अर्थ में 'संयोजन' हैं। ဧဝံ သန္တေပီတိ ယဒေဝ ဩရမ္ဘာဂိယသံယောဇနံ ဘဂဝတာ ပုစ္ဆိတံ, တဒေဝ ထေရေနပိ ဝိဿဇ္ဇိတံ, တထာပိ အယံ လဒ္ဓိ သန္နိဿယာ. တတ္ထ ဒေါသာရောပနာတိ ဒဿေတုံ ‘‘တဿ ဝါဒေ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. သမုဒါစာရက္ခဏေယေဝါတိ ပဝတ္တိက္ခဏေ ဧဝ. န ဟိ သဗ္ဗေ ဝတ္တမာနာ ကိလေသာ သံယောဇနတ္ထံ ဖရန္တီတိ အဓိပ္ပာယော. တေနာတိ တေန ကာရဏေန, တထာလဒ္ဓိကတ္တာတိ အတ္ထော. စိန္တေသိ ‘‘ဓမ္မံ ဒေသေဿာမီ’’တိ ယောဇနာ. အတ္တနော ဓမ္မတာယေဝါတိ အဇ္ဈတ္တာသယေနေဝ. ဝိသံဝါဒိတာတိ သတ္ထု စိတ္တဿ အနာရာဓနေန ဝိဝေစိတာ. ဧဝမကာသိ ဧဝံ ဓမ္မံ ဒေသာပေသိ. ऐसा होने पर भी, भगवान ने जो ओरम्भागीय संयोजन पूछा था, स्थविर ने भी वही उत्तर दिया, फिर भी यह मत (लब्धि) आश्रययुक्त है। वहाँ दोषारोपण दिखाने के लिए 'तस्स वादे' (उसके वाद में) आदि कहा गया है। 'समुदाचारक्खणेयेव' का अर्थ है प्रवृत्ति के क्षण में ही। अभिप्राय यह है कि सभी वर्तमान क्लेश संयोजन के अर्थ में व्याप्त नहीं होते। 'तेन' का अर्थ है उस कारण से, अर्थात् वैसी लब्धि (मत) वाला होने के कारण। 'चिन्तेसि धम्मं देसेस्सामी' (सोचा कि धर्म उपदेश दूँगा) यह योजना है। 'अत्तनो धम्मतायेव' का अर्थ है अपने आंतरिक आशय से ही। 'विसंवादिता' का अर्थ है शास्ता के चित्त को प्रसन्न न करने के कारण पृथक किया गया। 'एवमकासि' का अर्थ है इस प्रकार धर्म का उपदेश करवाया। ၁၃၀. သက္ကာယဒိဋ္ဌိပရိယုဋ္ဌိတေနာတိ ပရိယုဋ္ဌာနသမတ္ထသက္ကာယဒိဋ္ဌိကေန. တထာဘူတဉ္စ စိတ္တံ တာယ ဒိဋ္ဌိယာ ဝိဂယှိတံ အဇ္ဈောတ္ထဋဉ္စ နာမ ဟောတီတိ အာဟ ‘‘ဂဟိတေန အဘိဘူတေနာ’’တိ. ဒိဋ္ဌိနိဿရဏံ နာမ ဒဿနမဂ္ဂေါ တေန သမုစ္ဆိန္ဒိတဗ္ဗတော, သော ပန နိဗ္ဗာနံ အာဂမ္မ တံ သမုစ္ဆိန္ဒတိ, တသ္မာ ဝုတ္တံ ‘‘ဒိဋ္ဌိနိဿရဏံ နိဗ္ဗာန’’န္တိ. အဝိနောဒိတာ အနီဟဋာတိ ပဒဒွယေနပိ သမုစ္ဆေဒဝသေန အပ္ပဟီနတ္တံယေဝ ဝဒတိ. အညံ သံယောဇနံ အညော အနုသယောတိ ဝဒန္တိ, သဟဘာဝေါ နာမ အညေန ဟောတိ. န ဟိ တဒေဝ တေန သဟာတိ ဝုစ္စတီတိ တေသံ အဓိပ္ပာယော. အညေနာတိ အတ္ထတော အညေန. အဝတ္ထာမတ္တတော ယဒိပိ အဝယဝဝိနိမုတ္တော သမုဒါယော နတ္ထိ, အဝယဝေါ ပန သမုဒါယော န ဟောတီတိ သော သမုဒါယတော အညော ဧဝါတိ သက္ကာ ဝတ္တုန္တိ ယထာဝုတ္တဿ ပရိဟာရဿ အပ္ပာဋိဟီရကတံ အာသင်္ကိတွာ ပက္ခန္တရံ အာသလ္လိတံ ‘‘အထာပိ သိယာ’’တိအာဒိနာ. ပက္ခန္တရေဟိ ပရိဟာရာ ဟောန္တီတိ ယထာဝုတ္တဉာယေနပိ အညော ပုရိသော အထာပိ သိယာ, အယံ ပနေတ္ထ အညော ဒေါသောတိ အာဟ ‘‘ယဒိ တဒေဝါ’’တိအာဒိ. အထာပိ သိယာ တုယှံ ယဒိ ပရိဝိတက္ကော ဤဒိသော ယဒိ တဒေဝ သံယောဇနန္တိအာဒိ. ဣမမတ္ထံ သန္ဓာယာတိ ပရမတ္ထတော သော ဧဝ [Pg.68] ကိလေသော သံယောဇနမနုသယော စ, ဗန္ဓနတ္ထအပ္ပဟီနတ္ထာနံ ပန အတ္ထေဝ ဘေဒေါတိ ဣမမတ္ထံ သန္ဓာယ. १३०. 'सक्कायदिट्ठिपरियुट्ठितेन' का अर्थ है पर्य्युत्थान में समर्थ सत्कायदृष्टि वाला। और वैसा चित्त उस दृष्टि से गृहीत और अभिभूत होता है, इसलिए 'गहितेन अभिभूतेन' कहा गया है। 'दिट्ठिनिस्सरण' दर्शनमार्ग है क्योंकि उसके द्वारा इसका समूच्छेद किया जाना चाहिए, और वह निर्वाण का आलम्बन लेकर उसका समूच्छेद करता है, इसलिए 'दिट्ठिनिस्सरणं निब्बानं' कहा गया है। 'अविनोदिता अनीहटा' इन दोनों पदों से समूच्छेद के अभाव में अप्रहीणता (न छूटना) ही कही गई है। वे कहते हैं कि संयोजन अन्य है और अनुशय अन्य है, क्योंकि 'सहभाव' (साथ होना) किसी अन्य के साथ ही होता है। उनका अभिप्राय है कि वही उसके साथ है, ऐसा नहीं कहा जाता। 'अञ्ञेन' का अर्थ है अर्थतः अन्य से। यद्यपि अवस्था मात्र से अवयवों से मुक्त कोई समुदाय नहीं है, फिर भी अवयव समुदाय नहीं होता, इसलिए वह समुदाय से अन्य ही है, ऐसा कहा जा सकता है—इस प्रकार पूर्वोक्त परिहार की अपर्याप्तता की आशंका करके 'अथापि सिया' आदि के द्वारा दूसरा पक्ष प्रस्तुत किया गया है। दूसरे पक्षों से परिहार होते हैं, इसलिए पूर्वोक्त न्याय से 'अन्य पुरुष भी हो सकता है', यहाँ यह दूसरा दोष है, ऐसा 'यदि तदेव' आदि के द्वारा कहा गया है। 'अथापि सिया' का अर्थ है यदि तुम्हारा ऐसा वितर्क हो कि 'यदि वही संयोजन है' आदि। 'इममत्थं सन्धाय' का अर्थ है कि परमार्थतः वही क्लेश संयोजन और अनुशय है, किन्तु बन्धन के अर्थ और अप्रहीण (न नष्ट होने) के अर्थ में भेद है—इस अर्थ को सन्धान (लक्ष्य) करके। ၁၃၂. တစစ္ဆေဒေါ ဝိယ သမာပတ္တိ ကိလေသာနံ သမာပတ္တိဝိက္ခမ္ဘနဿ သာရစ္ဆေဒဿ အနုသယဿ ဒူရဘာဝတော. ဖေဂ္ဂုစ္ဆေဒေါ ဝိယ ဝိပဿနာ တဿ အာသန္နဘာဝတော. ဧဝရူပါ ပုဂ္ဂလာတိ အဘာဝိတသဒ္ဓါဒိဗလတာယ ဒုဗ္ဗလနာမကာယာ ပုဂ္ဂလာ, ယေသံ သက္ကာယနိရောဓာယ…ပေ… နာဓိမုစ္စတိ. ဧဝံ ဒဋ္ဌဗ္ဗာတိ ယထာ သော ဒုဗ္ဗလကော ပုရိသော, ဧဝံ ဒဋ္ဌဗ္ဗော သော ပုရိသော ဂင်္ဂါပါရံ ဝိယ သက္ကာယပါရံ ဂန္တုံ အသမတ္ထတ္တာ. ဝုတ္တဝိပရိယာယေန သုက္ကပက္ခဿ အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. १३२. समापत्ति त्वचा के छेदन के समान है, क्योंकि क्लेशों का समापत्ति द्वारा विष्खम्भन (दबाना) सार (अनुशय) के छेदन से दूर है। विपश्यना फेग्गु (अन्तःकाष्ठ के बाहरी भाग) के छेदन के समान है, क्योंकि वह उसके (अनुशय के छेदन के) समीप है। 'एवरूपा पुग्गला' का अर्थ है श्रद्धा आदि बलों के विकसित न होने के कारण दुर्बल नाम-काय वाले पुद्गल, जिनका सत्काय-निरोध के लिए... पे... अधिमुक्ति (निश्चय) नहीं होता। 'एवं दट्ठब्बा' का अर्थ है जैसे वह दुर्बल पुरुष है, वैसे ही उस पुरुष को देखा जाना चाहिए, क्योंकि वह गंगा के पार जाने के समान सत्काय के पार जाने में असमर्थ है। उक्त के विपरीत शुक्ल पक्ष का अर्थ समझना चाहिए। ၁၃၃. ဥပဓိဝိဝေကေနာတိ ဣမိနာ ဥပဓိဝိဝေကာတိ ကရဏေ နိဿက္ကနန္တိ ဒဿေတိ, ဥပဓိဝိဝေကာတိ ဝါ ဟေတုမှိ နိဿက္ကဝစနဿ ဥပဓိဝိဝေကေနာတိ ဟေတုမှိ ကရဏဝစနေန ပဉ္စကာမဂုဏဝိဝေကော ကထိတော. ကာမဂုဏာပိ ဟိ ဥပဓီယတိ ဧတ္ထ ဒုက္ခန္တိ ဥပဓီတိ ဝုစ္စန္တီတိ. ထိနမိဒ္ဓပစ္စယာ ကာယဝိဇမ္ဘိတာဒိဘေဒံ ကာယာလသိယံ. တတ္ထာတိ အန္တောသမာပတ္တိယံ သမာပတ္တိအဗ္ဘန္တရေ ဇာတံ. တံ ပန သမာပတ္တိပရိယာပန္နမ္ပိ အပရိယာပန္နမ္ပီတိ တဒုဘယံ ဒဿေတုံ ‘‘အန္တောသမာပတ္တိက္ခဏေယေဝါ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. ရူပါဒယော ဓမ္မေတိ ရူပဝေဒနာဒိကေ ပဉ္စက္ခန္ဓဓမ္မေ. န နိစ္စတောတိ ဣမိနာ နိစ္စပဋိက္ခေပတော တေသံ အနိစ္စတမာဟ. တတော ဧဝ ဥဒယဝယန္တတော ဝိပရိဏာမတော တာဝကာလိကတော စ တေ အနိစ္စာတိ ဇောတိတံ ဟောတိ. ယဉှိ နိစ္စံ န ဟောတိ, တံ ဥဒယဗ္ဗယပရိစ္ဆိန္နံ ဇရာယ မရဏေန စာတိ ဒွေဓာ ဝိပရိဏတံ ဣတ္တရခဏမေဝ စ ဟောတိ. န သုခတောတိ ဣမိနာ သုခပဋိက္ခေပတော တေသံ ဒုက္ခတမာဟ, အတော ဧဝ အဘိဏှံ ပဋိပီဠနတော ဒုက္ခဝတ္ထုတော စ တေ ဒုက္ခာတိ ဇောတိတံ ဟောတိ. ဥဒယဗ္ဗယဝန္တတာယ ဟိ တေ အဘိဏှံ ပဋိပီဠနတော နိရန္တရဒုက္ခတာယ ဒုက္ခဿေဝ စ အဓိဋ္ဌာနဘူတာတိ. ပစ္စယယာပနီယတာယ ရောဂမူလတာယ စ ရောဂတော. ဒုက္ခတာသူလယောဂိတာယ ကိလေသာသုစိပဂ္ဃရဏတော ဥပ္ပာဒဇရာဘင်္ဂေဟိ ဥဒ္ဓုမာတပက္ကဘိဇ္ဇနတော စ ဂဏ္ဍတော. ပီဠာဇနနတော အန္တောတုဒနတော ဒုန္နီဟရဏတော စ အဝဒ္ဓိအာဝဟတော အဃဝတ္ထုတော စ အသေရီဘာဝတော အာဗာဓပဒဋ္ဌာနတာယ စ အာဗာဓတော. အဝသဝတ္တနတော အဝိဓေယျတာယ ပရတော[Pg.69]. ဗျာဓိဇရာမရဏေဟိ ပလုဇ္ဇနီယတာယ ပလောကတော. သာမီနိဝါသီကာရကဝေဒကအဓိဋ္ဌာယကဝိရဟတော သုညတော. အတ္တပဋိက္ခေပဋ္ဌေန အနတ္တတော, ရူပါဒိဓမ္မာပိ န ဧတ္ထ အတ္တာ ဟောန္တီတိ အနတ္တာ, ဧဝံ အယမ္ပိ န အတ္တာ ဟောတီတိ အနတ္တာ. တေန အဗျာပါရတော နိရီဟတော တုစ္ဆတော အနတ္တာတိ ဒီပိတံ ဟောတိ. လက္ခဏတ္တယမေဝ အဝဗောဓတ္ထံ ဧကာဒသဟိ ပဒေဟိ ဝိဘဇိတွာ ဂဟိတန္တိ ဒဿေတုံ ‘‘တတ္ထာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. १३३. 'उपधिविवेकेन' इसके द्वारा 'उपधिविवेक' से करण अर्थ में अपादान (निसक्कन) दिखाता है, अथवा 'उपधिविवेक' हेतु अर्थ में अपादान वचन के स्थान पर 'उपधिविवेकेन' हेतु अर्थ में करण वचन के द्वारा पाँच कामगुणों के विवेक को कहा गया है। क्योंकि कामगुणों में भी दुःख उपहित (रखा) होता है, इसलिए उन्हें 'उपधि' कहा जाता है। स्त्यान-मिद्ध के प्रत्यय से होने वाली अंगड़ाई आदि के भेद वाली कायिक आलस्य। 'तत्थ' का अर्थ है अन्तःसमापत्ति में, समापत्ति के भीतर उत्पन्न। वह समापत्ति-पर्य्यापन्न भी है और अपर्य्यापन्न भी—इन दोनों को दिखाने के लिए 'अन्तोसमापत्तिक्खणेयेव' आदि कहा गया है। 'रूपादयो धम्मे' का अर्थ है रूप-वेदना आदि पाँच स्कन्ध धर्म। 'न निच्चतो' इसके द्वारा नित्य का प्रतिषेध होने से उनकी अनित्यता कही गई है। उसी से उदय-व्यय वाला होने से, विपरिणामी होने से और तात्कालिक होने से वे अनित्य हैं, यह प्रकाशित होता है। जो नित्य नहीं होता, वह उदय-व्यय से परिच्छिन्न, जरा और मरण के द्वारा दो प्रकार से विपरिणत और क्षणभंगुर ही होता है। 'न सुखतो' इसके द्वारा सुख का प्रतिषेध होने से उनकी दुःखता कही गई है, इसीलिए निरन्तर पीड़ित होने से और दुःख की वस्तु होने से वे दुःख हैं, यह प्रकाशित होता है। उदय-व्यय युक्त होने के कारण वे निरन्तर पीड़ित होने से निरन्तर दुःख स्वरूप और दुःख के ही अधिष्ठान हैं। प्रत्ययों द्वारा यापनीय (निर्वाह योग्य) होने से और रोग का मूल होने से 'रोग' के रूप में। दुःखता रूपी शूल से युक्त होने से, क्लेश रूपी अशुचि के बहने से और उत्पाद-जरा-भंग द्वारा फूलने, पकने और फूटने के कारण 'गण्ड' (फोड़े) के रूप में। पीड़ा उत्पन्न करने से, भीतर चुभने से, कठिनता से निकलने के कारण, अनर्थकारी होने से, पाप की वस्तु होने से, परवश होने से और व्याधि का पदस्थान होने से 'आबाध' के रूप में। वश में न रहने से और आज्ञाकारी न होने से 'पर' (पराये) के रूप में। व्याधि, जरा और मरण से विनष्ट होने योग्य होने के कारण 'पलोक' (विनाशशील) के रूप में। स्वामी, निवासी, कर्ता, भोक्ता और अधिष्ठाता से रहित होने के कारण 'शून्य' के रूप में। आत्मा के प्रतिषेध के अर्थ में 'अनात्मा' के रूप में; रूप आदि धर्म भी यहाँ आत्मा नहीं हैं, इसलिए अनात्मा हैं, इसी प्रकार यह भी आत्मा नहीं है, इसलिए अनात्मा है। इससे व्यापार-रहित, चेष्टा-रहित और तुच्छ होने के कारण 'अनात्मा' प्रकाशित होता है। तीन लक्षणों को ही बोध के लिए ग्यारह पदों में विभाजित करके ग्रहण किया गया है, यह दिखाने के लिए 'तत्थ' आदि कहा गया है। အန္တောသမာပတ္တိယန္တိ သမာပတ္တီနံ သဟဇာတတာယ သမာပတ္တီနံ အဗ္ဘန္တရေ. စိတ္တံ ပဋိသံဟရတီတိ တပ္ပဋိဗဒ္ဓဆန္ဒရာဂါဒိဥပက္ကိလေသဝိက္ခမ္ဘနေန ဝိပဿနာစိတ္တံ ပဋိသံဟရတိ. တေနာဟ ‘‘မောစေတီ’’တိ. သဝနဝသေနာတိ ‘‘သဗ္ဗသင်္ခါရသမထော’’တိအာဒိနာ သဝနဝသေန. ထုတိဝသေနာတိ တထေဝ ထောမနာဝသေန ဂုဏတော သံကိတ္တနဝသေန. ပရိယတ္တိဝသေနာတိ တဿ ဓမ္မဿ ပရိယာပုဏနဝသေန. ပညတ္တိဝသေနာတိ တဒတ္ထဿ ပညာပနဝသေန. အာရမ္မဏကရဏဝသေနေဝ ဥပသံဟရတိ မဂ္ဂစိတ္တံ. ဧတံ သန္တန္တိအာဒိ ပန အဝဓာရဏနိဝတ္တိတတ္ထဒဿနံ. ယထာ ဝိပဿနာ ‘‘ဧတံ သန္တံ ဧတံ ပဏီတ’’န္တိအာဒိနာ အသင်္ခတာယ ဓာတုယာ စိတ္တံ ဥပသံဟရတိ, ဧဝံ မဂ္ဂေါ နိဗ္ဗာနံ သစ္ဆိကိရိယာဘိသမယဝသေန အဘိသမေန္တော တတ္ထ လဗ္ဘမာနေ သဗ္ဗေ ဝိသေသေ အသမ္မောဟတော ပဋိဝိဇာနန္တော တတ္ထ စိတ္တံ ဥပသံဟရတိ. တေနာဟ ‘‘ဣမိနာ ပန အာကာရေနာ’’တိအာဒိ. သော တတ္ထ ဌိတောတိ သော အဒန္ဓဝိပဿနော ယောဂီ တတ္ထ တာယ အနိစ္စာဒိလက္ခဏတ္တယာရမ္မဏာယ ဝိပဿနာယ ဌိတော. သဗ္ဗသောတိ တဿ မဂ္ဂဿ အဓိဂမာယ နိဗ္ဗတ္တိတသမထဝိပဿနာသု. အသက္ကောန္တော အနာဂါမီ ဟောတီတိ ဟေဋ္ဌိမမဂ္ဂဝဟာသု ဧဝ သမထဝိပဿနာသု ဆန္ဒရာဂံ ပဟာယ အဂ္ဂမဂ္ဂဝဟာသု တာသု နိကန္တိံ ပရိယာဒါတုံ အသက္ကောန္တော အနာဂါမိတာယမေဝ သဏ္ဌာတိ. अन्तोसमापत्तियन्ति (समापत्ति के भीतर) - समापत्तियों के साथ उत्पन्न होने के कारण समापत्तियों के भीतर। 'चित्तं पटिसंहरति' (चित्त को समेटता है) - उससे संबंधित छन्द-राग आदि उपक्लेशों के विक्षेपण (दबाने) द्वारा विपश्यना-चित्त को समेटता है। इसीलिए कहा गया है - 'मोचेति' (मुक्त करता है)। 'सवनवसेन' (श्रवण के वश से) - 'सब्बसंखारसमथो' (सभी संस्कारों का शमन) आदि के श्रवण के वश से। 'थुतिवसेन' (स्तुति के वश से) - उसी प्रकार प्रशंसा के वश से, गुणों के संकीर्तन के वश से। 'परियत्तिवसेन' (पर्यप्ति के वश से) - उस धर्म के अध्ययन (सीखने) के वश से। 'पञ्ञत्तिवसेन' (प्रज्ञप्ति के वश से) - उसके अर्थ के प्रज्ञापन (बताने) के वश से। आलम्बन बनाने के वश से ही मार्ग-चित्त को उपसंहृत करता है। 'एतं सन्तं' (यह शान्त है) आदि तो अवधारण (निश्चय) और निवृत्ति के अर्थ का दर्शन है। जैसे विपश्यना 'एतं सन्तं एतं पणीतं' आदि के द्वारा असंस्कृत धातु (निर्वाण) में चित्त को उपसंहृत करती है, वैसे ही मार्ग निर्वाण का साक्षात्कार रूपी अभिसमय के द्वारा साक्षात्कार करते हुए, वहाँ प्राप्त होने वाले सभी विशेषों को मोह-रहित होकर जानते हुए, वहाँ चित्त को उपसंहृत करता है। इसीलिए कहा गया है - 'इमिना पन आकारेना' (इस प्रकार से) आदि। 'सो तत्थ ठितो' (वह वहाँ स्थित) - वह अ-मन्द-विपश्यना वाला योगी वहाँ उस अनित्य आदि तीन लक्षणों के आलम्बन वाली विपश्यना में स्थित है। 'सब्बसो' (सब प्रकार से) - उस मार्ग की प्राप्ति के लिए उत्पन्न हुई शमथ और विपश्यनाओं में। 'असक्कोन्तो अनागामी होति' (असमर्थ होता हुआ अनागामी होता है) - निचले मार्गों के प्रवाह में ही शमथ और विपश्यनाओं में छन्द-राग को त्यागकर, उच्च मार्ग के प्रवाह में उनमें आसक्ति को समाप्त करने में असमर्थ होता हुआ अनागामी अवस्था में ही स्थित हो जाता है। သမတိက္ကန္တတ္တာတိ သမထဝသေန ဝိပဿနာဝသေန စာတိ သဗ္ဗထာပိ ရူပဿ အတိက္ကန္တတ္တာ. တေနာဟ ‘‘အယဉှီ’’တိအာဒိ. အနေနာတိ ယောဂိနာ. တံ အတိက္ကမ္မာတိ ဣဒံ ယော ဝါ ပဌမံ ပဉ္စဝေါကာရဘဝပရိယာပန္နေ ဓမ္မေ သမ္မဒေဝ သမ္မသိတွာ တေ ဝိဝဇ္ဇေတွာ တတော အရူပသမာပတ္တိံ သမာပဇ္ဇိတွာ အရူပဓမ္မေ သမ္မသတိ, တံ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ. တေနာဟ ‘‘ဣဒါနိ အရူပံ သမ္မသတီ’’တိ. समतिक्कन्तत्ता (भली-भाँति पार कर लेने के कारण) - शमथ के वश से और विपश्यना के वश से, सब प्रकार से रूप का अतिक्रमण कर लेने के कारण। इसीलिए कहा गया है - 'अयञ्हि' आदि। 'अनेन' - योगी के द्वारा। 'तं अतिक्कम्म' (उसका अतिक्रमण कर) - यह उसके विषय में कहा गया है जो पहले पंचवोकार भव (पाँच स्कन्धों वाले लोक) में सम्मिलित धर्मों का भली-भाँति सम्मर्शन (परीक्षण) कर, उन्हें त्यागकर, उसके बाद अरूप-समापत्ति को प्राप्त कर अरूप धर्मों का सम्मर्शन करता है। इसीलिए कहा गया है - 'इदानि अरूपं सम्मसति' (अब अरूप का सम्मर्शन करता है)। သမထဝသေန [Pg.70] ဂစ္ဆတောတိ သမထပ္ပဓာနံ ပုဗ္ဗဘာဂပဋိပဒံ အနုယုဉ္ဇန္တဿ. စိတ္တေကဂ္ဂတာ ဓုရံ ဟောတီတိ တဿ ဝိပဿနာဘာဝနာယ တထာ ပုဗ္ဗေ ပဝတ္တတ္တာ ဝုဋ္ဌာနဂါမိနိဝိပဿနာ သမာဓိပ္ပဓာနာ ဟောတိ, မဂ္ဂေပိ စိတ္တေကဂ္ဂတာ ဓုရံ ဟောတိ, သမာဓိန္ဒြိယံ ပုဗ္ဗင်္ဂမံ ဗလဝံ ဟောတိ. သော စေတောဝိမုတ္တော နာမာတိ သော အရိယော စေတောဝိမုတ္တော နာမ ဟောတိ. ဝိပဿနာဝသေန ဂစ္ဆတောတိ ‘‘သမထဝသေန ဂစ္ဆတော’’တိ ဧတ္ထ ဝုတ္တနယာနုသာရေန အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. အယဉ္စ ပုဂ္ဂလဝိဘာဂေါ သုတ္တန္တနယေန ဣဓာဘိဟိတော ပရိယာယော နာမ, အဘိဓမ္မနယေန ပရတော ကီဋာဂိရိသုတ္တဝဏ္ဏနာယံ ဒဿယိဿာမ. အယံ သဘာဝဓမ္မောယေဝါတိ ပုဗ္ဗဘာဂပဋိပဒါ သမထပ္ပဓာနာ စေ သမာဓိ ဓုရံ, ဝိပဿနာပဓာနာ စေ ပညာ ဓုရန္တိ အယံ ဓမ္မသဘာဝေါယေဝ, ဧတ္ထ ကိဉ္စိ န အာသင်္ကိတဗ္ဗံ. 'समथवसेन गच्छतो' (शमथ के वश से जाने वाले का) - शमथ-प्रधान पूर्वभाग-प्रतिपदा (प्रारम्भिक मार्ग) का अभ्यास करने वाले का। 'चित्तेकग्गता धुरं होति' (चित्त की एकाग्रता मुख्य होती है) - उसकी विपश्यना भावना में पहले वैसा होने के कारण, व्युत्थानगामिनी विपश्यना समाधि-प्रधान होती है, मार्ग में भी चित्त की एकाग्रता मुख्य होती है, समाधि-इन्द्रिय अग्रणी और बलवान होती है। 'सो चेतोविमुत्तो नामा' - वह आर्य 'चेतोविमुक्त' कहलाता है। 'विपस्सनावसेन गच्छतो' (विपश्यना के वश से जाने वाले का) - इसका अर्थ 'समथवसेन गच्छतो' में बताए गए तरीके के अनुसार समझना चाहिए। और यह पुद्गल-विभाजन यहाँ सूत्रान्त पद्धति से कहा गया एक पर्याय (व्याख्या) है, अभिधर्म पद्धति से आगे कीटागिरि-सुत्त की व्याख्या में दिखाएंगे। 'अयं सभाधम्मोयेवा' (यह स्वभाव-धर्म ही है) - यदि पूर्वभाग-प्रतिपदा शमथ-प्रधान है तो समाधि मुख्य है, यदि विपश्यना-प्रधान है तो प्रज्ञा मुख्य है - यह धर्म का स्वभाव ही है, इसमें कोई शंका नहीं करनी चाहिए। ဣန္ဒြိယပရောပရိယတ္တံ ဣန္ဒြိယဝေမတ္တတာ. တေနာဟ ‘‘ဣန္ဒြိယနာနတ္တံ ဝဒါမီ’’တိ. ဣန္ဒြိယနာနတ္တတာ ကာရဏန္တိ ဣဒံ ဒဿေတိ – အနိစ္စာဒိဝသေန ဝိပဿနာဘိနိဝေသော ဝိယ သမထဝသေန ဝိပဿနာဝသေန စ ယံ ပုဗ္ဗဘာဂဂမနံ, တံ အပ္ပမာဏံ တံ ဝုဋ္ဌာနဂါမိနိဝိပဿနံ, ယဿ သမာဓိ ဓုရံ ပုဗ္ဗင်္ဂမံ ဗလဝံ ဟောတိ, သော အရိယော စေတောဝိမုတ္တိ နာမ ဟောတိ. ယဿ ပညာ ဓုရံ ပုဗ္ဗင်္ဂမံ ဗလဝံ ဟောတိ သော အရိယော ပညာဝိမုတ္တော နာမ ဟောတိ. ဣဒါနိ တမတ္ထံ ဗုဒ္ဓိဝိသိဋ္ဌေန နိဒဿနေန ဒဿေန္တော ‘‘ဒွေ အဂ္ဂသာဝကာ’’တိအာဒိမာဟ, တံ သုဝိညေယျမေဝ. इन्द्रियपरोपरियत्तं (इन्द्रियों की उच्चता और नीचता) - इन्द्रियों की भिन्नता। इसीलिए कहा गया है - 'इन्द्रियनानत्तं वदामि' (मैं इन्द्रियों की विविधता कहता हूँ)। 'इन्द्रियनानत्तता कारणं' (इन्द्रियों की विविधता कारण है) - यह दिखाता है कि अनित्य आदि के वश से विपश्यना में अभिनिवेश (प्रवेश) की तरह, शमथ के वश से और विपश्यना के वश से जो पूर्वभाग का गमन है, वह अप्रमाण है, वह व्युत्थानगामिनी विपश्यना है; जिसकी समाधि मुख्य, अग्रणी और बलवान होती है, वह आर्य 'चेतोविमुक्ति' (चेतोविमुक्त) कहलाता है। जिसकी प्रज्ञा मुख्य, अग्रणी और बलवान होती है, वह आर्य 'प्रज्ञाविमुक्त' कहलाता है। अब उस अर्थ को बुद्धि-विशिष्ट उदाहरण से दिखाते हुए 'द्वे अग्गसावका' (दो अग्रश्रावक) आदि कहा गया है, वह सुविज्ञेय (आसानी से समझने योग्य) ही है। မဟာမာလုကျသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. महामालुक्य-सुत्त की व्याख्या में लीनत्थप्पकासना (गूढ़ अर्थ का प्रकाशन) समाप्त हुई। ၅. ဘဒ္ဒါလိသုတ္တဝဏ္ဏနာ ५. भद्दालि-सुत्त की व्याख्या। ၁၃၄. အသိယတီတိ အသနံ, ဘုဉ္ဇနံ ဘောဇနံ, အသနဿ ဘောဇနံ အသနဘောဇနံ, အာဟာရပရိဘောဂေါ, ဧကသ္မိံ ကာလေ အသနဘောဇနံ ဧကာသနဘောဇနံ. သော ပန ကာလော သဗ္ဗဗုဒ္ဓါနံ သဗ္ဗပစ္စေကဗုဒ္ဓါနံ အာစိဏ္ဏသမာစိဏ္ဏဝသေန ပုဗ္ဗဏှော ဧဝ ဣဓာဓိပ္ပေတောတိ အာဟ ‘‘ဧကသ္မိံ ပုရေဘတ္တေ အသနဘောဇန’’န္တိ. ဝိပ္ပဋိသာရကုက္ကုစ္စန္တိ ‘‘အယုတ္တံ ဝတ မယာ ကတံ, ယော အတ္တနော သရီရပကတိံ အဇာနန္တော ဧကာသနဘောဇနံ ဘုဉ္ဇိ, ယေန မေ ဣဒံ သရီရံ ကိသံ ဇာတံ ဗြဟ္မစရိယာနုဂ္ဂဟော နာဟောသီ’’တိ ဧဝံ [Pg.71] ဝိပ္ပဋိသာရကုက္ကုစ္စံ ဘဝေယျ. ဧတံ သန္ဓာယ သတ္ထာ အာဟ, န ဘဒ္ဒါလိမေဝ တာဒိသံ ကိရိယံ အနုဇာနန္တော. ဣတရထာတိ ယဒိ ဧကံယေဝ ဘတ္တံ ဒွိဓာ ကတွာ တတော ဧကဿ ဘာဂဿ ဘုဉ္ဇနံ ဧကဒေသဘုဉ္ဇနံ အဓိပ္ပေတံ. ကော သက္ကောတီတိ ကော ဧဝံ ယာပေတုံ သက္ကောတိ. အတီတဇာတိပရိစယောပိ နာမ ဣမေသံ သတ္တာနံယေဝ အနုဗန္ဓတီတိ အာဟ ‘‘အတီတေ’’တိအာဒိ. ဝိရဝန္တဿေဝါတိ အနာဒရေ သာမိဝစနံ. တံ မဒ္ဒိတွာတိ ‘‘အယံ သိက္ခာ သဗ္ဗေသမ္ပိ ဗုဒ္ဓါနံ သာသနေ အာစိဏ္ဏံ, အယဉ္စ ဘိက္ခု ဣမံ သိက္ခတေဝါ’’တိ ဝတွာ တံ ဘဒ္ဒါလိံ တဿ ဝါ အနုဿာဟပဝေဒနံ အဘိဘဝိတွာ. ဘိက္ခာစာရဂမနတ္ထံ န ဝိတက္ကမာဠကံ အဂမာသိ, ဝိဟာရစာရိကံ စရန္တော တဿ ဝသနဋ္ဌာနံ ဘဂဝါ ဂစ္ဆတိ. १३४. 'असियति' (खाया जाता है) इति 'असनं', भोजन करना 'भोजनं', असन का भोजन 'असनभोजनं' अर्थात् आहार का उपभोग; एक समय में असन-भोजन करना 'एकासनभोजनं' है। वह समय सभी बुद्धों और सभी प्रत्येकबुद्धों के आचरण के अनुसार पूर्वाह्न (दोपहर से पहले) ही यहाँ अभिप्रेत है, इसीलिए कहा गया है - 'एकस्मिं पुरेभत्ते असनभोजनं' (दोपहर के भोजन से पहले एक बार भोजन)। 'विप्पटिसारकुक्कुच्चं' (पश्चाताप और संशय) - 'निश्चित ही मैंने अनुचित किया, जिसने अपने शरीर की प्रकृति को न जानते हुए एकासन-भोजन किया, जिससे मेरा यह शरीर दुर्बल हो गया और ब्रह्मचर्य में सहायता नहीं मिली' - इस प्रकार पश्चाताप और संशय हो सकता है। इसे ध्यान में रखकर शास्ता ने कहा, न कि भद्दालि को ही वैसी क्रिया की अनुमति देते हुए। 'इतरथा' (अन्यथा) - यदि एक ही भोजन को दो भागों में बाँटकर उसमें से एक भाग का भोजन करना 'एकदेश-भोजन' अभिप्रेत होता। 'को सक्कोति' (कौन समर्थ है) - कौन इस प्रकार जीवन यापन करने में समर्थ है? 'अतीतजातिपरिचयोपि' (पिछली जातियों का परिचय भी) इन सत्त्वों का पीछा करता है, इसीलिए कहा गया है - 'अतीते' आदि। 'विरवन्तस्सेव' (चिल्लाते हुए का ही) - यह अनादर के अर्थ में षष्ठी विभक्ति है। 'तं मद्दित्वा' (उसे दबाकर) - 'यह शिक्षा सभी बुद्धों के शासन में आचरित है, और यह भिक्षु इसे सीखेगा ही' - ऐसा कहकर उस भद्दालि को या उसके उत्साहहीनता के निवेदन को अभिभूत (दबा) कर। भिक्षाटन के लिए जाने हेतु वह वितर्क-मण्डप में नहीं गए, विहार-चारिका करते हुए भगवान उसके निवास स्थान पर जाते हैं। ၁၃၅. ဒူသယန္တိ ဂရဟန္တိ ဧတေနာတိ ဒေါသော, အပရာဓော, သော ဧဝ ကုစ္ဆိတဘာဝေန ဒေါသကော. ဂရဟာယ ပဝတ္တိဋ္ဌာနတော ဩကာသော. တေနာဟ – ‘‘ဧတံ ဩကာသံ ဧတံ အပရာဓ’’န္တိ. ဒုက္ကရတရန္တိ ပတိကာရဝသေန အတိသယေန ဒုက္ကရံ. အပရာဓော ဟိ န ခမာပေန္တံ ယထာပစ္စယံ ဝိတ္ထာရိတော ဟုတွာ ဒုပ္ပတိကာရော ဟောတိ. တေနာဟ ‘‘ဝဿဉှီ’’တိအာဒိ. १३५. "दोष" (दोस) वह है जिसके द्वारा दूषित करते हैं या निंदा करते हैं, अर्थात् अपराध; वही कुत्सित भाव के कारण "दोषक" है। निंदा की प्रवृत्ति के स्थान के कारण "अवकाश" (अवसर) है। इसीलिए कहा गया है - "यह अवकाश, यह अपराध"। "दुष्करतर" का अर्थ है प्रतिकार (सुधार) की दृष्टि से अत्यंत कठिन। क्योंकि अपराध क्षमा न माँगने वाले के लिए प्रत्यय (कारणों) के अनुसार विस्तृत होकर कठिनता से सुधारा जाने वाला हो जाता है। इसीलिए "वस्सञ्हि" (वर्ष ही) आदि कहा गया है। အလဂ္ဂိတွာတိ ဣမမ္ပိ နာမ အပနီတံ အကာသီတိ ဧဝံ အဝိနေတွာ, တံ တံ တဿ ဟိတပဋိပတ္တိံ နိဝါရဏံ ကတွာတိ အတ္ထော. ဉာယပဋိပတ္တိံ အတိစ္စ ဧတိ ပဝတ္တတီတိ အစ္စယော, အပရာဓော, ပုရိသေန မဒ္ဒိတွာ ပဝတ္တိတော အပရာဓော အတ္ထတော ပုရိသံ အတိစ္စ အဘိဘဝိတွာ ပဝတ္တော နာမ ဟောတိ. တေနာဟ ‘‘အစ္စယော မံ, ဘန္တေ, အစ္စဂမာ’’တိ. အဝသေသပစ္စယာနံ သမာဂမေ ဧတိ ဖလံ ဧတသ္မာ ဥပ္ပဇ္ဇတိ ပဝတ္တတိ စာတိ သမယော, ဟေတု ယထာ ‘‘သမုဒါယော’’တိ အာဟ ‘‘ဧကံ ကာရဏ’’န္တိ. ယံ ပနေတ္ထ ဘဒ္ဒါလိတ္ထေရဿ အပရိပူရကာရိတာယ ဘိက္ခုအာဒီနံ ဇာနနံ, တမ္ပိ ကာရဏံ ကတွာ ‘‘အဟံ ခေါ, ဘန္တေ, န ဥဿဟာမီ’’တိအာဒိနာ ဝတ္တဗ္ဗန္တိ ဒဿေတိ. "अलग्गित्व" (बिना चिपके) का अर्थ है - "इसने यह अनुचित कार्य किया" इस प्रकार (मन में) न रखकर, उसके उस-उस हितकारी आचरण में बाधा न डालकर। न्यायपूर्ण आचरण का उल्लंघन कर जो प्रवृत्त होता है वह "अच्चय" (अपराध) है; मनुष्य द्वारा कुचलकर (जानबूझकर) किया गया अपराध वास्तव में मनुष्य का उल्लंघन कर, उसे अभिभूत कर प्रवृत्त होता है। इसीलिए कहा गया है - "भन्ते! अपराध ने मुझे अभिभूत कर लिया"। शेष प्रत्ययों के समागम में जिससे फल प्राप्त होता है, उत्पन्न होता है और प्रवृत्त होता है, वह "समय" (हेतु) है, जैसे "समुदय" के लिए कहा गया है - "एक कारण"। यहाँ भद्दालि स्थविर की अपरिपूर्णकारिता के कारण भिक्षुओं आदि का जो जानना है, उसे भी कारण बनाकर "भन्ते! मैं समर्थ नहीं हूँ" आदि कहना चाहिए, यह दर्शाया गया है। ၁၃၆. ဧကစိတ္တက္ခဏိကာတိ ပဌမမဂ္ဂစိတ္တက္ခဏေန ဧကစိတ္တက္ခဏိကာ. ဧဝံ အာဏာပေတုံ န ယုတ္တန္တိ သင်္ကမတ္ထာယ အာဏာပေတုံ န ယုတ္တံ ပယောဇနာဘာဝတော. အနာစိဏ္ဏဉ္စေတံ ဗုဒ္ဓါနံ, ယဒိဒံ ပဒသာ အက္ကမနံ. တထာ ဟိ – १३६. "एकचित्तक्षणिका" का अर्थ है प्रथम मार्ग-चित्त के क्षण के साथ एक चित्त-क्षण वाली। "इस प्रकार आज्ञा देना उचित नहीं है" का अर्थ है पार करने के लिए आज्ञा देना प्रयोजन के अभाव के कारण उचित नहीं है। और बुद्धों का यह आचरण नहीं रहा है, जो कि पैरों से कुचलना है। जैसा कि - ‘‘အက္ကမိတွာန မံ ဗုဒ္ဓေါ, သဟ သိဿေဟိ ဂစ္ဆတု; မာ နံ ကလလံ အက္ကမိတ္ထ, ဟိတာယ မေ ဘဝိဿတီ’’တိ. (ဗု. ဝံ. ၂.၅၃); "बुद्ध मुझ पर पैर रखकर शिष्यों के साथ जाएँ; वे कीचड़ पर पैर न रखें, यह मेरे हित के लिए होगा।" (बुद्धवंश २.५३) သုမေဓပဏ္ဍိတေန [Pg.72] ပစ္စာသီသိတံ န ကတံ. ယထာဟ – सुमेध पंडित द्वारा ऐसी प्रत्याशा नहीं की गई थी। जैसा कि कहा गया है - ‘‘ဒီပင်္ကရော လောကဝိဒူ, အာဟုတီနံ ပဋိဂ္ဂဟော; ဥဿီသကေ မံ ဌတွာန, ဣဒံ ဝစနမဗြဝီ’’တိ. (ဗု. ဝံ. ၂.၆၀); "लोकविद् और आहुतियों के प्रतिग्राहक दीपंकर बुद्ध ने मेरे सिरहाने खड़े होकर यह वचन कहा।" (बुद्धवंश २.६०) ဘဂဝတာ အာဏတ္တေ သတိ တေသမ္ပိ ဧဝံ ကာတုံ န ယုတ္တန္တိ ဧတ္ထာပိ ဧသေဝ နယော. ဧတေသံ ပဋိဗာဟိတုံ ယုတ္တန္တိ ဣဒံ အဋ္ဌာနပရိကပ္ပနဝသေနေဝ ဝုတ္တံ. န ဟိ ဗုဒ္ဓါနံ ကာတုံ အာရဒ္ဓံ နာမ ကိစ္စံ ကေဟိစိ ပဋိဗာဟိတုံ ယုတ္တံ နာမ အတ္ထိ ပဋိဗာဟိတုံယေဝ အကရဏတော. သမ္မတ္တနိယာမဿ အနောက္ကန္တတ္တာ ဝုတ္တံ ‘‘ဗာဟိရကော’’တိ. "भगवान द्वारा आज्ञा दिए जाने पर उनके लिए भी ऐसा करना उचित नहीं है" - यहाँ भी यही नियम है। "इनका निवारण करना उचित है" - यह केवल असंभव की कल्पना के वश में कहा गया है। क्योंकि बुद्धों द्वारा आरम्भ किया गया कोई भी कार्य किसी के द्वारा निवारण करने योग्य नहीं होता, क्योंकि उसका निवारण किया ही नहीं जा सकता। सम्यक्त्व-नियम में प्रवेश न करने के कारण "बाहिरक" (बाहरी) कहा गया है। ၁၃၇. န ကမ္မဋ္ဌာနံ အလ္လီယတီတိ စိတ္တံ ကမ္မဋ္ဌာနံ န ဩတရတိ. १३७. "कर्मस्थान में नहीं लगता" का अर्थ है कि चित्त कर्मस्थान में प्रवेश नहीं करता। ၁၄၀. ပုနပ္ပုနံ ကာရေန္တီတိ ဒဏ္ဍကမ္မပဏာမနာဒိကာရဏံ ပုနပ္ပုနံ ကာရေန္တိ. သမ္မာဝတ္တမှိ န ဝတ္တတီတိ တဿာ တဿာ အာပတ္တိယာ ဝုဋ္ဌာနတ္ထံ ဘဂဝတာ ပညတ္တသမ္မာဝတ္တမှိ န ဝတ္တတိ. အနုလောမဝတ္တေ န ဝတ္တတီတိ ယေန ယေန ဝတ္တေန သံဃော အနုလောမိကော ဟောတိ, တသ္မိံ တသ္မိံ အနုလောမဝတ္တေ န ဝတ္တတိ ဝိလောမမေဝ ဂဏှာတိ, ပဋိလောမေန ဟောတိ. နိတ္ထာရဏကဝတ္တမှီတိ ယေန ဝတ္တေန သံဃော အနုလောမိကော ဟောတိ, သာပတ္တိကဘာဝတော နိတ္ထိဏ္ဏော ဟောတိ, တမှိ နိတ္ထာရဏဝတ္တသ္မိံ န ဝတ္တတိ. တေနာဟ ‘‘အာပတ္တီ’’တိအာဒိ. ဒုဗ္ဗစကရဏေတိ ဒုဗ္ဗစဿ ဘိက္ခုနော ကရဏေ. १४०. "बार-बार कराते हैं" का अर्थ है दण्डकर्म, निष्कासन आदि कारण बार-बार कराते हैं। "सम्यक् वृत्त में नहीं वर्तता" का अर्थ है उस-उस आपत्ति से निकलने के लिए भगवान द्वारा प्रज्ञप्त सम्यक् वृत्त में नहीं वर्तता। "अनुलोम वृत्त में नहीं वर्तता" का अर्थ है जिस-जिस वृत्त से संघ अनुकूल होता है, उस-उस अनुलोम वृत्त में नहीं वर्तता, बल्कि विपरीत ही ग्रहण करता है, प्रतिकूल होता है। "निस्तारणक वृत्त में" का अर्थ है जिस वृत्त से संघ अनुकूल होता है और आपत्ति की अवस्था से निस्तार प्राप्त होता है, उस निस्तारणक वृत्त में नहीं वर्तता। इसीलिए "आपत्ति" आदि कहा गया है। "दुर्वचकरण" का अर्थ है दुर्वच भिक्षु के विषय में। ၁၄၄. ယာပေတီတိ ဝတ္တတိ, သာသနေ တိဋ္ဌတီတိ အတ္ထော. အဘိညာပတ္တာတိ ‘‘အသုကော အသုကော စ ထေရော သီလဝါ ကလျာဏဓမ္မော ဗဟုဿုတော’’တိအာဒိနာ အဘိညာတဘာဝံ ပတ္တာ အဓိဂတအဘိညာတာ. १४४. "यापेति" का अर्थ है वर्तता है, शासन में स्थित रहता है। "अभिज्ञाप्राप्त" का अर्थ है "अमुक-अमुक स्थविर शीलवान, कल्याणधर्मी और बहुश्रुत हैं" आदि के द्वारा विख्यात भाव को प्राप्त, जिन्होंने ख्याति प्राप्त कर ली है। ၁၄၅. သတ္တေသု ဟာယမာနေသူတိ ကိလေသဗဟုလတာယ ပဋိပဇ္ဇနကသတ္တေသု ပရိဟာယန္တေသု ပဋိပထေသု ဇာယမာနေသု. အန္တရဓာယတိ နာမ တဒါဓာရတာယ. ဒိဋ္ဌဓမ္မိကာ ပရူပဝါဒါဒယော. သမ္ပရာယိကာ အပါယဒုက္ခဝိသေသာ. အာသဝန္တိ တေန တေန ပစ္စယေန ပဝတ္တန္တီတိ အာသဝါ. နေသန္တိ ပရူပဝါဒါဒိအာသဝါနံ. တေတိ ဝီတိက္ကမဓမ္မာ. १४५. "सत्त्वों के क्षीण होने पर" का अर्थ है क्लेशों की बहुलता के कारण साधना करने वाले सत्त्वों के कम होने पर और गलत मार्गों के उत्पन्न होने पर। उनके आधार होने के कारण सद्धर्म अंतर्धान हो जाता है। "दृष्टधार्मिक" का अर्थ है दूसरों द्वारा निंदा आदि। "साम्परायिक" का अर्थ है दुर्गति के विशेष दुःख। "आसव" वे हैं जो उस-उस कारण से प्रवृत्त होते हैं। "नेसं" का अर्थ है उन पर-अपवाद आदि आस्रवों का। "ते" का अर्थ है वे उल्लंघन के धर्म। အကာလံ ဒဿေတွာတိ သိက္ခာပဒပညတ္တိယာ အကာလံ ဒဿေတွာ. ဥပ္ပတ္တိန္တိ အာသဝဋ္ဌာနိယာနံ ဓမ္မာနမုပ္ပတ္တိံ. သိက္ခာပဒပညတ္တိယာ ကာလံ, တာဝ [Pg.73] သေနာသနာနိ ပဟောန္တိ, တေန အာဝါသမစ္ဆရိယာဒိဟေတုနာ သာသနေ ဧကစ္စေ အာသဝဋ္ဌာနိယာ ဓမ္မာ န ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ. ဣမိနာ နယေနာတိ ဣမိနာ ပန ဟေတုနာ ပဒသောဓမ္မသိက္ခာပဒါနံ သင်္ဂဟော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. "अकाल को दिखाकर" का अर्थ है शिक्षापद की प्रज्ञप्ति के लिए अनुचित समय को दिखाकर। "उत्पत्ति" का अर्थ है आस्रव-स्थानीय धर्मों की उत्पत्ति। शिक्षापद की प्रज्ञप्ति का समय तब तक नहीं आता, जब तक सेनासन पर्याप्त होते हैं, उस आवास-मात्सर्य आदि के कारण शासन में कुछ आस्रव-स्थानीय धर्म उत्पन्न नहीं होते। "इस विधि से" का अर्थ है इस हेतु से पदसो-धम्म शिक्षापदों का संग्रह देखना चाहिए। ယသန္တိ ကိတ္တိသဒ္ဒံ ပရိဝါရဉ္စ. သာဂတတ္ထေရဿ နာဂဒမနကိတ္တိယသာဒိဝသေန သုရာပါနသင်္ခါတော အာသဝဋ္ဌာနိယော ဓမ္မော ဥပ္ပဇ္ဇိ. "यश" का अर्थ है कीर्ति और परिवार। स्वागत स्थविर के नाग-दमन की कीर्ति और यश आदि के कारण सुरापान नामक आस्रव-स्थानीय धर्म उत्पन्न हुआ। ရသေန ရသံ သံသန္ဒေတွာတိ ဥပါဒိန္နကဖဿရသေန အနုပါဒိန္နကဖဿရသံ သံသန္ဒေတွာ. "रस से रस का मिलान कर" का अर्थ है सजीव स्पर्श-रस के साथ निर्जीव स्पर्श-रस का मिलान कर। ၁၄၆. န ခေါ, ဘဒ္ဒါလိ, ဧသေဝ ဟေတု, အထ ခေါ အညမ္ပိ အတ္ထီတိ ဒဿေန္တော ဘဂဝါ ‘‘အပိစာ’’တိအာဒိမာဟ. တေန ဓမ္မဿ သက္ကစ္စသဝနေ ထေရံ နိယောဇေတိ. १४६. "हे भद्दालि! केवल यही हेतु नहीं है, बल्कि अन्य भी है" - यह दर्शाते हुए भगवान ने "अपि च" आदि कहा। इसके द्वारा वे स्थविर को धर्म के सत्कारपूर्वक श्रवण में नियोजित करते हैं। ၁၄၇. ဝိသေဝနာစာရန္တိ အဒန္တကိရိယံ. ပရိနိဗ္ဗာယတီတိ ဝူပသမ္မတိ. တတ္ထ အဒန္တကိရိယံ ပဟာယ ဒန္တော ဟောတိ. ယုဂဿာတိ ရထဓုရဿ. १४७. "विसेवनाचार" का अर्थ है अदमित व्यवहार। "परिनिर्वाण प्राप्त करता है" का अर्थ है शांत होता है। वहाँ अदमित व्यवहार को त्यागकर संयमित होता है। "युगस्य" का अर्थ है रथ की धुरी का। အနုက္ကမေတိ အနုရူပပရိဂမေ. တဒဝတ္ထာနုရူပံ ပါဒါနံ ဥက္ခိပနေ နိက္ခိပနေ စ. တေနာဟ ‘‘စတ္တာရော ပါဒေ’’တိအာဒိ. ရဇ္ဇုဗန္ဓနဝိဓာနေနာတိ ပါဒတော ဘူမိယာ မောစနဝိဓာနေန. ဧဝံ ကရဏတ္ထန္တိ ယထာ အဿေ နိသိန္နဿေဝ ဘူမိံ ဂဟေတုံ သက္ကာ, ဧဝံ စတ္တာရော ပါဒေ တထာ ကတွာ အတ္တနော နိစ္စလဘာဝကရဏတ္ထံ. မဏ္ဍလေတိ မဏ္ဍလဓာဝိကာယံ. ပထဝီကမနေတိ ပထဝိံ ဖုဋ္ဌမတ္တေန ဂမနေ. တေနာဟ ‘‘အဂ္ဂဂ္ဂခုရေဟီ’’တိ. ဩက္ကန္တကရဏသ္မိန္တိ ဩက္ကန္တေတွာ ပရသေနာသမ္မဒ္ဒန ဩက္ကန္တကရဏေ. ဧကသ္မိံ ဌာနေတိ စတူသု ပါဒေသု ယတ္ထ ကတ္ထစိ ဧကသ္မိံ ဌာနေ ဂမနံ စောဒေန္တီတိ အတ္ထော, သော ပနေတ္ထ သီဃတရော အဓိပ္ပေတော. ဒဝတ္တေတိ မရိယာဒါကောပနေဟိ နာနပ္ပယောဇနေ, ပရသေနာယ ပဝတ္တမဟာနာဒပဟရဏေဟိ အတ္ထော. တေနာဟ ‘‘ယုဒ္ဓကာလသ္မိ’’န္တိအာဒိ. 'अनुक्कमे' का अर्थ है अनुरूप परिगम (क्रमशः चलना) में। उस अवस्था के अनुरूप पैरों को उठाने और रखने में। इसीलिए कहा 'चारों पैरों को' आदि। 'रज्जुबंधन विधान से' का अर्थ है पैरों को भूमि से मुक्त करने के विधान से। 'इस प्रकार करने के लिए' का अर्थ है जैसे घोड़े पर बैठे हुए ही भूमि को पकड़ा जा सके, वैसे ही चारों पैरों को वैसा करके अपने आप को निश्चल बनाने के लिए। 'मण्डल' में का अर्थ है मण्डल-धाविका (गोलाकार दौड़) में। 'पृथ्वी पर चलने' में का अर्थ है पृथ्वी को मात्र स्पर्श करते हुए चलने में। इसीलिए कहा 'खुरों के अग्र भाग से'। 'ओक्कन्तकरण' में का अर्थ है आक्रमण करके शत्रु सेना को कुचलने के कार्य में। 'एक स्थान पर' का अर्थ है चारों पैरों में से कहीं भी एक स्थान पर चलने की प्रेरणा देते हैं, यहाँ वह अधिक तीव्र गति अभिप्रेत है। 'दवत्ते' का अर्थ है मर्यादा के उल्लंघन आदि विभिन्न प्रयोजनों में, शत्रु सेना में होने वाले महान नाद (शोर) को दूर करने के अर्थ में। इसीलिए कहा 'युद्ध काल में' आदि। ရညာ ဇာနိတဗ္ဗဂုဏေတိ ယထာ ရာဇာ အဿဿ ဂုဏေ ဇာနာတိ, ဧဝံ တေန ဇာနိတဗ္ဗဂုဏကာရဏံ ကာရေတိ. အဿရာဇဝံသေတိ ဒုဿဟံ ဒုက္ခံ ပတွာပိ ယထာ အယံ ရာဇဝံသာနုရူပကိရိယံ န ဇဟိဿတိ, ဧဝံ သိက္ခာပနေ. သိက္ခာပနမေဝ ဟိ သန္ဓာယ သဗ္ဗတ္ထ ‘‘ကာရဏံ ကာရေတီ’’တိ ဝုတ္တံ တဿ ကရဏကာရာပနပရိယာယတ္တာ. 'राजा द्वारा जानने योग्य गुणों में' का अर्थ है जैसे राजा घोड़े के गुणों को जानता है, वैसे ही उसके द्वारा जानने योग्य गुणों का अभ्यास कराता है। 'अश्वराजवंश' में का अर्थ है कि असह्य दुःख पाकर भी जैसे यह राजवंश के अनुरूप क्रिया को नहीं छोड़ेगा, ऐसा सिखाने में। सिखाने को ही लक्ष्य करके सर्वत्र 'कारण कराता है' (अभ्यास कराता है) कहा गया है, क्योंकि यह कार्य कराने का ही एक पर्याय है। ယထာ [Pg.74] ဥတ္တမဇဝေါ ဟောတီတိ ဇဝဒဿနဋ္ဌာနေ ယထာ ဟယော ဥတ္တမဇဝံ န ဟာပေသိ, ဧဝံ သိက္ခာပေတိ. ဥတ္တမဟယဘာဝေ, ယထာ ဥတ္တမဟယော ဟောတီတိ ကမ္မကရဏကာလေ အတ္တနော ဥတ္တမသဘာဝံ အနိဂုဟိတွာ အဝဇ္ဇေတွာ ယထာ အတ္ထသိဒ္ဓိ ဟောတိ, ဧဝံ ပရမဇဝေန သိက္ခာပေတိ. ယထာ ကိရိယာ ဝိနာ ဒဗ္ဗမ္ပိ ဝိနာ ကိရိယံ န ဘဝတိ, ဧဝံ ဒဋ္ဌဗ္ဗန္တိ ဒဿေတုံ ‘‘တတ္ထ ပကတိယာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. 'जैसे उत्तम वेग वाला होता है' का अर्थ है वेग प्रदर्शन के स्थान पर जैसे घोड़ा उत्तम वेग को न छोड़े, वैसा सिखाता है। 'उत्तम अश्व भाव में', जैसे उत्तम घोड़ा होता है, वैसे ही कार्य करने के समय अपने उत्तम स्वभाव को न छिपाकर और उसे लगाकर जैसे अर्थ की सिद्धि होती है, वैसे परम वेग के साथ सिखाता है। जैसे क्रिया के बिना द्रव्य और द्रव्य के बिना क्रिया नहीं होती, ऐसा देखना चाहिए, यह दिखाने के लिए 'वहाँ प्रकृति से' आदि कहा गया है। တတြာတိ တသ္မိံ ပကတိယာ ဥတ္တမဟယဿေဝ ဥတ္တမဟယကာရဏာရဟတ္တာ ဥတ္တမဇဝပဋိပဇ္ဇနေ. မာသခါဒကဃောဋကာနန္တိ မာသံ ခါဒိတွာ ယထာ တထာ ဝိဂုဏခလုင်္ဂကာနံ. ဝလဉ္ဇကဒဏ္ဍန္တိ ရညာ ဂဟေတဗ္ဗသုဝဏ္ဏဒဏ္ဍံ. ဓာတုပတ္ထဒ္ဓေါတိ အတ္တနာဝ သမုပ္ပာဒိတဓာတုယာ ဥပတ္ထမ္ဘိတော ဟုတွာ. 'वहाँ' का अर्थ है उस स्वभाव से उत्तम घोड़े के ही उत्तम अश्व के अभ्यास के योग्य होने के कारण उत्तम वेग को प्राप्त करने में। 'मासखादक घोड़ों' का अर्थ है उड़द खाकर जैसे-तैसे रहने वाले दुर्गुणों वाले घोड़ों का। 'वलञ्जक दण्ड' का अर्थ है राजा द्वारा ग्रहण करने योग्य स्वर्ण-दण्ड। 'धातुपत्थद्धो' का अर्थ है स्वयं द्वारा ही उत्पन्न धातु (शक्ति) से सहारा पाया हुआ होकर। ဥတ္တမေ သာခလျေတိ ပရမသခိလဘာဝေ သခိလဝါစာယ ဧဝ ဒမေတဗ္ဗတာယ. တေနာဟ ‘‘မုဒုဝါစာယ ဟီ’’တိအာဒိ. 'उत्तम साखल्य' (कोमलता) में का अर्थ है परम मित्रता के भाव में, क्योंकि उसे मधुर वाणी से ही दमित (शिक्षित) किया जाना चाहिए। इसीलिए कहा 'कोमल वाणी से ही' आदि। အရဟတ္တဖလသမ္မာဒိဋ္ဌိယာတိ ဖလသမာပတ္တိကာလေ ပဝတ္တသမ္မာဉာဏံ. သမ္မာဉာဏံ ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တသမ္မာဒိဋ္ဌိယေဝါတိ ပန ဣဒံ ဖလသမ္မာဒိဋ္ဌိဘာဝသာမညေန ဝုတ္တံ. ကေစိ ပန ‘‘ပစ္စဝေက္ခဏဉာဏ’’န္တိ ဝဒန္တိ, တံ န ယုဇ္ဇတိ ‘‘အသေက္ခေနာ’’တိ ဝိသေသိတတ္တာ. တမ္ပိ အသေက္ခဉာဏန္တိ စေ? ဧဝမ္ပိ နိပ္ပရိယာယ သေက္ခဂ္ဂဟဏေ ပရိယာယသေက္ခဂ္ဂဟဏံ န ယုတ္တမေဝ, ကိစ္စဘေဒေန ဝါ ဝုတ္တန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ဧကာ ဧဝ ဟိ သာ ပညာ နိဗ္ဗာနဿ ပစ္စက္ခကိရိယာယ သမ္မာဒဿနကိစ္စံ ဥပါဒါယ ‘‘သမ္မာဒိဋ္ဌီ’’တိ ဝုတ္တာ, သမ္မာဇာနနကိစ္စံ ဥပါဒါယ ‘‘သမ္မာဉာဏ’’န္တိ. အညာတာဝိန္ဒြိယဝသေန ဝါ သမ္မာဒိဋ္ဌိ, ပညိန္ဒြိယဝသေန သမ္မာဉာဏန္တိ ဧဝမေတ္ထ အတ္ထော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. မဂ္ဂဖလာဝဟာယ ဒေသနာယ သင်္ခေပတောဝ အာဂတတ္တာ ဝုတ္တံ ‘‘ဥဂ္ဃဋိတညုပုဂ္ဂလဿ ဝသေနာ’’တိ. ‘अर्हत्फल-सम्यग्दृष्टि’ का अर्थ है फल-समापत्ति के समय प्रवृत्त सम्यग्ज्ञान। ‘सम्यग्ज्ञान पहले कही गई सम्यग्दृष्टि ही है’ - यह फल-सम्यग्दृष्टि के सामान्य भाव से कहा गया है। कुछ लोग इसे ‘प्रत्यवेक्षण ज्ञान’ कहते हैं, लेकिन वह ‘अशैक्ष्य’ विशेषण होने के कारण उचित नहीं है। यदि कहें कि वह भी अशैक्ष्य ज्ञान है? तो भी मुख्य रूप से शैक्ष्य के ग्रहण में गौण रूप से शैक्ष्य का ग्रहण उचित नहीं है, अथवा इसे कार्य-भेद से कहा गया समझना चाहिए। वही एक प्रज्ञा निर्वाण के साक्षात्कार के कार्य की अपेक्षा से ‘सम्यग्दृष्टि’ कही गई है, और सम्यक् जानने के कार्य की अपेक्षा से ‘सम्यग्ज्ञान’ कही गई है। अथवा ‘अज्ञातविन्द्रिय’ के वश से सम्यग्दृष्टि और ‘प्रज्ञेन्द्रिय’ के वश से सम्यग्ज्ञान - इस प्रकार यहाँ अर्थ समझना चाहिए। मार्ग और फल को लाने वाली देशना में संक्षेप में आने के कारण ‘उग्घटितञ्ञू पुग्गल’ (तीक्ष्ण बुद्धि वाले व्यक्ति) के वश से कहा गया है। ဘဒ္ဒါလိသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. भद्दालि-सुत्त की व्याख्या में लीनत्थप्पकासना (गूढ़ अर्थ का प्रकाशन) समाप्त हुई। ၆. လဋုကိကောပမသုတ္တဝဏ္ဏနာ ६. लटुकिकोपम-सुत्त की व्याख्या ၁၄၈. မဟာဥဒါယိတ္ထေရောတိ ကာဠုဒါယိလာဠုဒါယိတ္ထေရေဟိ အညော မဟာဒေဟတာယ မဟာဥဒါယီတိ သာသနေ ပညာတော ထေရော. အပဟရိ အပဟရတိ အပဟရိဿတီတိ အပဟတ္တာ. တေကာလိကော ဟိ အယံ [Pg.75] သဒ္ဒေါ. ဥပဟတ္တာတိ ဧတ္ထာပိ ဧသေဝ နယော. အပဟာရကောတိ အပနေတာ. ဥပဟာရကောတိ ဥပနေတာ. १४८. ‘महाउदायी थेर’ का अर्थ है कालुदायी और लालुदायी थेरों से भिन्न, विशाल शरीर होने के कारण शासन में ‘महाउदायी’ नाम से प्रसिद्ध थेर। ‘अपहरि’, ‘अपहरति’, ‘अपहरिस्सति’ - इन अर्थों में ‘अपहत्ता’ (अपहरण करने वाला) शब्द है। यह शब्द तीनों कालों के लिए है। ‘उपहत्ता’ में भी यही नियम है। ‘अपहारक’ का अर्थ है हटाने वाला। ‘उपहारक’ का अर्थ है पास लाने वाला। ၁၄၉. ယန္တိ ဘုမ္မတ္ထေ ပစ္စတ္တဝစနံ, တေန စ အနန္တရနိဒ္ဒိဋ္ဌသမယော ပစ္စာမဋ္ဌောတိ အာဟ ‘‘ယသ္မိံ သမယေ’’တိ. န ဘဂဝန္တံ ပဋိစ္စာတိ န ဘဂဝန္တံ အာရမ္မဏံ ကတွာ. १४९. ‘यं’ (यद्) यह सप्तमी के अर्थ में प्रथमा विभक्ति है, उससे ठीक पहले निर्दिष्ट समय का परामर्श किया गया है, इसलिए कहा - ‘जिस समय में’। ‘न भगवन्तं पटिच्च’ का अर्थ है भगवान को आलम्बन न बनाकर। ကမ္မနိပ္ဖန္နတ္ထန္တိ အတ္တနာ အာယာစိယမာနကမ္မသိဒ္ဓိအတ္ထံ. ဘဝတီတိ ဘူ, န ဘူတိ အဘူ, ဘယဝသေန ပန သာ ဣတ္ထီ ‘‘အဘု’’န္တိ အာဟ. အာတု မာတူတိ ဧတ္ထ ယထာ – ‘कम्मनिप्फन्नत्थं’ का अर्थ है अपने द्वारा प्रार्थना किए गए कर्म की सिद्धि के लिए। ‘भवति’ इति ‘भू’ (होना), ‘न भू’ इति ‘अभू’ (नहीं होना), लेकिन भय के कारण उस स्त्री ने ‘अभू’ कहा। ‘आतु मातू’ यहाँ जैसे - ‘‘အင်္ဂါ အင်္ဂါ သမ္ဘဝသိ, ဟဒယာ အဓိဇာယသေ; အတ္တာ ဧဝ ပုတ္တ နာမာသိ, သ ဇီဝ သရဒေါသတ’’န္တိ. – “तुम अंग-अंग से उत्पन्न होते हो, हृदय से जन्म लेते हो; हे पुत्र! तुम स्वयं ही ‘आत्मा’ (स्वयं) हो, तुम सौ वर्षों तक जीवित रहो।” အာဒီသု ပုတ္တော ‘‘အတ္တာ’’တိ ဝုစ္စတိ ကုလဝသေန သန္တာနေ ပဝတ္တနတော. ဧဝံ ပိတာပိ ‘‘ပုတ္တဿ အတ္တာ’’တိ ဝုစ္စတိ. ယသ္မာ ‘‘ဘိက္ခုဿ အတ္တာ မာတာ’’တိ ဝတ္ထုကာမာ ဘယဝသေန ‘‘အာတု မာတူ’’တိ အာဟ. တေနာဟ ‘‘အာတူတိ ပိတာ’’တိအာဒိ. आदि में पुत्र को ‘आत्मा’ कहा जाता है क्योंकि वह कुल के वंश की संतान के रूप में प्रवृत्त होता है। इसी प्रकार पिता को भी ‘पुत्र की आत्मा’ कहा जाता है। चूँकि ‘भिक्षु की आत्मा माता है’, इसलिए काम-भोग की इच्छुक उस स्त्री ने भय के कारण ‘आतु मातू’ कहा। इसीलिए कहा ‘आतू’ का अर्थ पिता है इत्यादि। ၁၅၀. ဧဝမေဝန္တိ ဣဒံ ဂရဟတ္ထဇောတနနိပါတပဒန္တိ ဝုတ္တံ ‘‘ဂရဟန္တော အာဟာ’’တိ. တထာ ဟိ နံ ဝါစကသဒ္ဒေနေဝ ဒဿေန္တော ‘‘ဣဓေကစ္စေ မောဃပုရိသာ’’တိ အာဟ. အာဟံသူတိ တေသံ တထာ ဝစနဿ အဝိစ္ဆေဒေန ပဝတ္တိဒီပနန္တိ အာဟ ‘‘ဝဒန္တီ’’တိ. ကိံ ပနိမဿ အပ္ပမတ္တကဿာတိ ပဟာတဗ္ဗဝတ္ထုံ အဝမညမာနေဟိ ဝုတ္တံ. တေနာဟ ‘‘ကိံ ပနာ’’တိ. ဟေတုမှိ ဇောတေတဗ္ဗေ စေတံ သာမိဝစနံ ယထာ ‘‘အနုဿဝဿ ဟေတု, အဇ္ဈေနဿ ဟေတူ’’တိ. တေနာဟ ‘‘အပ္ပမတ္တကဿ ဟေတူ’’တိ. နနု အပဿန္တေန ဝိယ အသုဏန္တေန ဝိယ ဘဝိတဗ္ဗန္တိ? သတ္ထာရာ နာမ အပ္ပမတ္တကေသု ဒေါသေသု အပဿန္တေန ဝိယ စ အသုဏန္တေန ဝိယ စ ဘဝိတဗ္ဗန္တိ တေသံ အဓိပ္ပာယေန ဝိဝရဏံ. တေသု စာတိ သိက္ခာကာမေသု စ. အပ္ပစ္စယံ ဥပဋ္ဌာပေန္တီတိ အာနေတွာ သမ္ဗန္ဓိတဗ္ဗန္တိ ဒဿေတိ. တေသန္တိ ယေ ‘‘မောဃပုရိသာ’’တိ ဝုတ္တာ ပုဂ္ဂလာ, တေသံ. ဂလေ ဗဒ္ဓံ မဟာကဋ္ဌန္တိ ဂလေ ဩလမ္ဗေတွာ ဗဒ္ဓံ ရုက္ခဒဏ္ဍမာဟ. ပူတိလတာယာတိ ဂလောစိယာ. ပါရာဇိကဝတ္ထု ဝိယ ဒုပ္ပဇဟံ ဟောတီတိ ဆန္ဒကပ္ပဟာနဝသေန တံ ပဇဟိတုံ န သက္ကောတိ. १५०. ‘एवमेवं’ यह निंदा के अर्थ को प्रकट करने वाला निपात पद है, इसलिए कहा ‘निंदा करते हुए कहा’। क्योंकि उसे वाचक शब्द से ही दिखाते हुए ‘यहाँ कुछ मोघपुरुष’ कहा। ‘आहंसु’ (कहा) उनके उस वचन के निरंतर बने रहने को दर्शाने के लिए ‘वदन्ति’ (कहते हैं) कहा। ‘इस अल्पमात्र (तुच्छ) वस्तु का क्या प्रयोजन’ - यह त्यागने योग्य वस्तु का अनादर करने वालों द्वारा कहा गया है। इसीलिए कहा ‘किं पना’ (क्या फिर)। हेतु प्रकट करने के लिए यह षष्ठी विभक्ति है जैसे ‘अनुस्सवस्स हेतु’ (श्रुति के हेतु), ‘अज्झेनस्स हेतु’ (अध्ययन के हेतु)। इसीलिए कहा ‘अप्पमत्तकस्स हेतु’ (अल्पमात्र के कारण)। क्या न देखते हुए के समान और न सुनते हुए के समान होना चाहिए? शास्ता को अल्पमात्र दोषों में न देखते हुए के समान और न सुनते हुए के समान होना चाहिए - यह उनके अभिप्राय की व्याख्या है। ‘तेसु च’ का अर्थ है शिक्षा के इच्छुक व्यक्तियों में। ‘अप्पच्चयं उपट्ठापेन्ति’ का अर्थ है लाकर संबंध जोड़ते हैं। ‘तेसं’ का अर्थ है जो ‘मोघपुरुष’ कहे गए व्यक्ति हैं, उनका। ‘गले बद्धं महाकट्ठं’ का अर्थ है गले में लटकाकर बाँधा गया बड़ा काष्ठ (लकड़ी का डंडा)। ‘पूतिलताय’ का अर्थ है गिलोय की लता से। पाराजिक वस्तु के समान जिसे छोड़ना कठिन हो जाता है - वह छंद (इच्छा) के त्याग न होने के कारण उसे छोड़ने में समर्थ नहीं होता। ၁၅၁. အနုဿုက္ကာတိ [Pg.76] တဿ ပဟာတဗ္ဗဿ ပဟာနေ ဥဿုက္ကရဟိတာ. အပစ္စာသီသနပက္ခေတိ တာယ ပရဒတ္တဝုတ္တိတာယ ကဿစိ ပစ္စယဿ ကုတောစိ အပစ္စာသီသကပက္ခေ ဌိတာ ဟုတွာ သုပ္ပဇဟံ ဟောတိ, န တဿ ပဟာနေ ဘာရိယံ အတ္ထိ. १५१. ‘अनुस्सुक्का’ का अर्थ है उस त्यागने योग्य वस्तु के त्याग में उत्साह रहित। ‘अपच्चासीसनपक्खे’ का अर्थ है उस दूसरों द्वारा दी गई आजीविका के कारण किसी भी प्रत्यय (साधन) की कहीं से भी आशा न रखने वाले पक्ष में स्थित होने के कारण वह सुखपूर्वक त्यागने योग्य होता है, उसके त्याग में कोई कठिनाई नहीं होती। ၁၅၂. ဒလိဒ္ဒေါ ဒုဂ္ဂတော. အဿကောတိ အသာပတေယျော. ဂေဟယဋ္ဌိယောတိ ဂေဟဆဒနဿ အာဓာရာ, တာ ဥဇုကံ တိရိယံ ဌပေတဗ္ဗဒဏ္ဍာ. သမန္တတော ဘိတ္တိပါဒေသု ဌပေတဗ္ဗဒဏ္ဍာ မဏ္ဍလာ. ကာကာတိဒါယိန္တိ ဣတော စိတော ကာကေဟိ အတိပါတဝသေန ဥဍ္ဍေတဗ္ဗံ. တေနာဟ ‘‘ယတ္ထ ကိဉ္စိဒေဝါ’’တိအာဒိ. သူရကာကာတိ ကာကာနံ ဥဍ္ဍေပနာကာရမာဟ. နပရမရူပန္တိ ဟီနရူပံ. ဝိလီဝမဉ္စကောတိ တာလဝေတ္တကာဒီဟိ ဝီတမဉ္စကော. သာ ပနဿ သန္တာနာနံ ဆိန္နဘိန္နတာယ ဩလုဂ္ဂဝိလုဂ္ဂတာ, တထာ သတိ သာ ဝိသမရူပါ ဟောတီတိ အာဟ ‘‘ဩဏတာ’’တိအာဒိ. သော ပုဂ္ဂလော လူခဘောဇီ ဟောတီတိ အာဟ ‘‘ဓညံ နာမ ကုဒြူသကော’’တိ. သမကာလံ ဝပိတဗ္ဗတာယ သမဝါပကံ, ယထာဥတု ဝပိတဗ္ဗဗီဇံ. ဇာယိကာတိ ကုစ္ဆိတာ ဘရိယာ, သဗ္ဗတ္ထ ဂရဟာယံ က-သဒ္ဒေါ. သော ဝတာဟံ ပဗ္ဗဇေယျန္တိ သောဟံ ကေသမဿုံ ဩဟာရေတွာ ပဗ္ဗဇေယျံ, ယောဟံ ပုရိသော နာမ အဿံ ဝတာတိ ပဗ္ဗဇ္ဇာဝသေန အတ္တနော ပုရိသံ ဗောဓေယျ. တံသဘာဝေ ဌိတဿ ဗောဓာ န တု ဒုက္ကရာ, သာ ခဋောပိကာ. သာ ကုမ္ဘီ. မေဏ္ဍကသေဋ္ဌိနော အဍ္ဎတေဠသာနိ ကောဋ္ဌာဂါရသတာနိ ဝိယ. १५२. ‘दरिद्र’ का अर्थ है दुर्गत। ‘अस्सको’ का अर्थ है धनहीन। ‘गेहयट्ठियो’ का अर्थ है घर की छत के आधार, वे सीधे और तिरछे रखे जाने वाले डंडे। दीवार के चारों ओर रखे जाने वाले डंडे ‘मण्डल’ हैं। ‘काकातिदायि’ का अर्थ है यहाँ-वहाँ कौओं के उड़ने के कारण। इसीलिए कहा ‘जत्थ किञ्चिदेवा’ इत्यादि। ‘सूरकाका’ कौओं के उड़ने के प्रकार को कहता है। ‘नपरमरूपं’ का अर्थ है हीन रूप। ‘विलीवमञ्चको’ का अर्थ है ताड़ के पत्तों आदि से बुनी हुई खाट। वह उसके रेशों के टूटने-फूटने के कारण झुकी हुई और टेढ़ी-मेढ़ी होती है, इसलिए कहा ‘ओणता’ (झुकी हुई) इत्यादि। वह व्यक्ति रूखा भोजन करने वाला होता है, इसलिए कहा ‘धान्य का नाम कुद्रूसक (कोदो) है’। एक ही समय में बोए जाने के कारण ‘समवापक’, जैसे ऋतु के अनुसार बोया जाने वाला बीज। ‘जायिका’ का अर्थ है कुत्सित (बुरी) भार्या, यहाँ ‘क’ शब्द निंदा के अर्थ में है। ‘सो वताहं पब्बजेय्यं’ का अर्थ है वह मैं केश और दाढ़ी मुँडाकर प्रव्रजित हो जाऊँ, जो मैं पुरुष कहलाने योग्य होऊँ - इस प्रकार प्रव्रज्या के माध्यम से अपने पुरुषत्व को जगाए। उस स्वभाव में स्थित व्यक्ति के लिए बोध कठिन नहीं है, वह ‘खटोपिका’ है। वह ‘कुम्भी’ (घड़ा) है। मेण्डक श्रेष्ठी के साढ़े बारह सौ कोष्ठागारों (अन्न भंडारों) के समान। ၁၅၃. သုဝဏ္ဏနိက္ခသတာနန္တိ အနေကေသံ သုဝဏ္ဏနိက္ခသတာနံ. စယောတိ သန္တာနေဟိ နိစယော အဝီစိ နိစ္စပ္ပဗန္ဓနိစယော. တေနာဟ ‘‘သန္တာနတော ကတသန္နိစယော’’တိ. १५३. ‘सुवण्णनिक्खसतानं’ का अर्थ है अनेक सौ स्वर्ण-मुद्राओं का। ‘चयो’ का अर्थ है संततियों (परंपराओं) का समूह, निरंतर और अटूट प्रबंध का समूह। इसीलिए कहा ‘संतान (परंपरा) से किया गया संचय’। ၁၅၄. ဟေဋ္ဌာ ကိဉ္စာပိ အပ္ပဇဟနကာ ပဌမံ ဒဿိတာ, ပဇဟနကာ ပဓာနာ, တေသဉ္စ ဝသေနေတ္ထ ပုဂ္ဂလစတုက္ကံ ဒဿိတံ. တေ တဉ္စေဝ ပဇဟန္တီတိ ပဇဟနကာ ပဌမံ ဂဟိတာ. ရာသိဝသေနာတိ ‘‘ဣဓုဒါယိ ဧကစ္စော ပုဂ္ဂလော’’တိအာဒိနာ စတုက္ကေ အာဂတဝိဘာဂံ အနာမသိတွာ ‘‘တေ တေ’’တိ ပစုရဝသေန ဝုတ္တံ. တေနာဟ ‘‘န ပါဋိယေက္ကံ ဝိဘတ္တာ’’တိ. အဝိဘာဂေန ဂဟိတဝတ္ထူသု ဝိဘာဂတော ဂဟဏံ လောကသိဒ္ဓမေတန္တိ ဒဿေတုံ ‘‘ယထာ နာမာ’’တိအာဒိ [Pg.77] ဝုတ္တံ. ပဇဟနကပုဂ္ဂလာတိ ‘‘တေ တဉ္စေဝ ပဇဟန္တီ’’တိ ဧဝံ ပဇဟနကပုဂ္ဂလာ ဧဝ. १५४. नीचे यद्यपि पहले न त्यागने वालों (अप्पजहनका) को दिखाया गया है, फिर भी त्यागने वाले (पजहनका) प्रधान हैं, और उन्हीं के वश में यहाँ चार प्रकार के पुद्गलों को दिखाया गया है। वे उसे ही त्यागते हैं, इसलिए 'पजहनका' पहले ग्रहण किए गए हैं। 'रासिवसेन' का अर्थ है—'इधुदायी एकच्चो पुग्गलो' इत्यादि के द्वारा चतुष्क में आए विभाग का उल्लेख न करके 'वे-वे' इस प्रकार बहुलता से कहा गया है। इसीलिए कहा गया है—'अलग-अलग विभक्त नहीं हैं'। अविभाजित रूप से ग्रहण की गई वस्तुओं में विभागपूर्वक ग्रहण लोकसिद्ध है, यह दिखाने के लिए 'यथा नामा' इत्यादि कहा गया है। 'पजहनकपुग्गला' का अर्थ है—'वे उसे ही त्यागते हैं' इस प्रकार वे त्यागने वाले पुद्गल ही हैं। ဥပဓိအနုဓာဝနကာတိ ဥပဓီသု အနုအနုဓာဝနကာ ဥပဓိယော အာရဗ္ဘ ပဝတ္တနကာ. ဝိတက္ကာယေဝါတိ ကာမသင်္ကပ္ပာဒိဝိတက္ကာယေဝ. ဣန္ဒြိယနာနတ္တတာတိ ဝိမုတ္တိပရိပါစကာနံ ဣန္ဒြိယာနံ ပရောပရိယတ္တံ. တဿ ဟိ ဝသေနေဝ တေ စတ္တာရော ပုဂ္ဂလာ ဇာတာ. အဂ္ဂမဂ္ဂတ္ထာယ ဝိပဿနံ ဥဿုက္ကာပေတွာ ယာဝ န တံ မဂ္ဂေန သမုဂ္ဃာတေန္တိ, တာဝ နပ္ပဇဟန္တိ နာမ. ဣတိ ဟေဋ္ဌိမာ တယောပိ အရိယာ အပ္ပဟီနဿ ကိလေသဿ ဝသေန ‘‘နပ္ပဇဟန္တီ’’တိ ဝုတ္တာ, ပဂေဝ ပုထုဇ္ဇနာ. ဝုတ္တနယေန ပန ဝိပဿနံ မဂ္ဂေန ဃဋေန္တာ တေ စတ္တာရော ဇနာ အဂ္ဂမဂ္ဂက္ခဏေ ပဇဟန္တိ နာမ. တေ ဧဝ တတ္ထ သီဃကာရိနော ခိပ္ပံ ပဇဟန္တိ နာမ, တေနာဟ ‘‘တတ္ထာ’’တိအာဒိ. 'उपधिअनुधावनका' का अर्थ है—उपधियों (आसक्तियों) के पीछे-पीछे दौड़ने वाले, उपधियों को लेकर प्रवृत्त होने वाले। 'वितक्कायेवा' का अर्थ है—काम-संकल्प आदि वितर्क ही। 'इन्द्रियनानत्तता' का अर्थ है—विमुक्ति को परिपक्व करने वाली इन्द्रियों की श्रेष्ठता और हीनता (परोपरियत्तं)। उसके ही वश में वे चार पुद्गल उत्पन्न हुए हैं। अग्र मार्ग (अर्हत् मार्ग) के लिए विपश्यना को उत्साहित कर जब तक वे उस मार्ग से क्लेशों का समून्मूलन नहीं कर देते, तब तक वे 'नहीं त्यागते' कहलाते हैं। इस प्रकार नीचे के तीनों आर्य भी प्रहीण न हुए क्लेशों के कारण 'नहीं त्यागते' कहे गए हैं, पृथग्जनों की तो बात ही क्या है। किन्तु उक्त विधि से विपश्यना को मार्ग के साथ जोड़ते हुए वे चार जन अग्र मार्ग के क्षण में 'त्यागते' कहलाते हैं। वे ही वहाँ शीघ्र कार्य करने वाले होने के कारण 'शीघ्र त्यागते' कहलाते हैं, इसीलिए 'तत्या' इत्यादि कहा गया है। သံဝေဂံ ကတွာ အဂ္ဂိံ အက္ကန္တပုရိသော ဝိယ. မဂ္ဂေနာတိ အနုက္ကမာဂတေန အဂ္ဂမဂ္ဂေန. မဟာဟတ္ထိပဒေါပမေတိ မဟာဟတ္ထိပဒေါပမသုတ္တေ (မ. နိ. ၁.၃၀၀ အာဒယော). တတ္ထ ဟိ ‘‘တဿ ဓာတာရမ္မဏမေဝ စိတ္တံ ပက္ခန္ဒတိ ပသီဒတိ သန္တိဋ္ဌတိ အဓိမုစ္စတီ’’တိ (မ. နိ. ၁.၃၀၂) ဧတ္ထ အတိတိက္ခနာတိတိက္ခ-နာတိမန္ဒအတိမန္ဒ-ပုဂ္ဂလဝသေန အဋ္ဌကထာယံ (မ. နိ. အဋ္ဌ. ၂.၃၀၂) တယော ဝါရာ ဥဒ္ဓဋာ, တတ္ထ မဇ္ဈိမဝသေနေဝ ပဉှော ကထိတော. ဣန္ဒြိယဘာဝနေတိ ဣန္ဒြိယဘာဝနာသုတ္တေ, တတ္ထာပိ မဇ္ဈိမနယေနေဝ ပဉှော ကထိတော. တေနာဟ ‘‘ဣမေသူ’’တိအာဒိ. संवेग प्राप्त कर आग पर पैर रखने वाले पुरुष के समान। 'मग्गेना' का अर्थ है—अनुक्रम से प्राप्त अग्र मार्ग से। 'महाहत्थिपदोपमे' का अर्थ है—महाहत्थिपदोपम सुत्त में। वहाँ 'उसका चित्त धातु-आरम्बन में ही कूदता है, प्रसन्न होता है, स्थित होता है, अधिमुक्त होता है'—यहाँ अति-तीक्ष्ण, अनति-तीक्ष्ण, अनति-मन्द और अति-मन्द पुद्गलों के वश में अट्ठकथा में तीन वार (अवसर) उद्धृत किए गए हैं, वहाँ मध्यम के वश में ही प्रश्न कहा गया है। 'इन्द्रियभावना' का अर्थ है—इन्द्रियभावना सुत्त में, वहाँ भी मध्यम नय से ही प्रश्न कहा गया है। इसीलिए 'इमेसू' इत्यादि कहा गया है। တန္တိ ‘‘ဥပဓီ’’တိ ဝုတ္တံ ခန္ဓပဉ္စကံ. ဒုက္ခဿ မူလန္တိ သဗ္ဗဿပိ ဝဋ္ဋဒုက္ခဿ ကာရဏံ. နိဂ္ဂဟဏောတိ နိရုပါဒါနော. တေနာဟ ‘‘နိတ္တဏှော’’တိ. 'तं' का अर्थ है—'उपधि' कहा गया पंचस्कन्ध। 'दुक्खस्स मूलं' का अर्थ है—सम्पूर्ण वट्ट-दुःख (संसार दुःख) का कारण। 'निग्गहणो' का अर्थ है—उपादान रहित। इसीलिए 'नित्तण्हो' (तृष्णा रहित) कहा गया है। ၁၅၅. ယေ ပဇဟန္တီတိ ‘‘တေ တဉ္စေဝ ပဇဟန္တီ’’တိ ဧဝံ ဝုတ္တပုဂ္ဂလာ. တေ ဣမေ နာမ ဧတ္တကေ ကိလေသေ ပဇဟန္တီတိ ယေ တေ ပုထုဇ္ဇနာ လာဘိနော စ ပဉ္စ ကာမဂုဏေ ဧတ္တကေ တံတံဈာနာဒိဝတ္ထုကေ စ တံတံမဂ္ဂဝဇ္ဈတာယ ပရိစ္ဆိန္နတ္တာ ဧတ္တကေ ကိလေသေ ပဇဟန္တိ. ယေ နပ္ပဇဟန္တီတိ ဧတ္ထ ဝုတ္တနယာနုသာရေန အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. အသုစိသုခံ ကာယာသုစိသန္နိဿိတတ္တာ. အနရိယေဟီတိ အပရိသုဒ္ဓေဟိ. ပဋိလာဘတော ဘာယိတဗ္ဗံ ကိလေသဒုက္ခဂတိကတ္တာ. ဝိပါကတော ဘာယိတဗ္ဗံ အပါယဒုက္ခဂတိကတ္တာ. ဂဏတောပိ ကိလေသတောပိ ဝိဝိတ္တသုခန္တိ ဂဏသင်္ဂဏိကတော စ ကိလေသသင်္ဂဏိကတော [Pg.78] စ ဝိဝိတ္တသုခံ. ရာဂါဒိဝူပသမတ္ထာယာတိ ရာဂါဒိဝူပသမာဝဟံ သုခံ. န ဘာယိတဗ္ဗံ သမ္ပတိ အာယတိဉ္စ ဧကန္တဟိတဘာဝတော. १५५. ‘जो त्यागते हैं’ (ये पजहन्ति) का अर्थ है—वे व्यक्ति जिनके बारे में कहा गया है कि ‘वे उसे ही त्यागते हैं’। वे इन नाम वाले इतने क्लेशों को त्यागते हैं—जो पृथग्जन हैं और पाँच कामगुणों के प्राप्तकर्ता हैं, वे उन-उन ध्यानादि वस्तुओं के आधार पर और उन-उन मार्गों द्वारा प्रहाण के लिए परिच्छिन्न होने के कारण इतने क्लेशों को त्यागते हैं। ‘जो नहीं त्यागते हैं’ (ये नप्पजहन्ति) का अर्थ यहाँ बताए गए तरीके के अनुसार समझना चाहिए। ‘अशुचि सुख’ शरीर की अशुचिता पर आश्रित होने के कारण है। ‘अनार्यों द्वारा’ (अनारियेहि) का अर्थ है अपवित्रों द्वारा। ‘प्रतिलाभ से डरना चाहिए’ क्योंकि यह क्लेश और दुःख की गति वाला है। ‘विपाक से डरना चाहिए’ क्योंकि यह अपाय (दुर्गति) और दुःख की गति वाला है। ‘गण से भी और क्लेश से भी विविक्त सुख’ का अर्थ है समूह की संगति (गणसङ्गणिका) और क्लेशों की संगति से रहित सुख। ‘राग आदि के उपशम के लिए’ का अर्थ है राग आदि के उपशम को लाने वाला सुख। ‘नहीं डरना चाहिए’ क्योंकि यह वर्तमान और भविष्य में एकांततः हितकारी है। ၁၅၆. ဣဉ္ဇိတသ္မိန္တိ ပစ္စတ္တေ ဘုမ္မဝစနန္တိ အာဟ ‘‘ဣဉ္ဇန’’န္တိအာဒိ. ဣဉ္ဇတိ တေနာတိ ဣဉ္ဇိတံ, တဿ တဿ ဈာနဿ ခေါဘကရံ ဩဠာရိကံ ဈာနင်္ဂံ. စတုတ္ထဇ္ဈာနံ အနိဉ္ဇနံ သန္နိသိန္နာဘာဝတော. တထာ ဟိ ဝုတ္တံ ‘‘ဌိတေ အာနေဉ္ဇပ္ပတ္တေ’’တိ (ဒီ. နိ. ၁.၂၄၄-၂၄၅; မ. နိ. ၁.၃၈၄-၃၈၆; ပါရာ. ၁၂-၁၃). १५६. ‘इञ्जितस्मिं’ (कम्पन में) यह सप्तमी विभक्ति का एकवचन है, इसलिए कहा गया है—‘इञ्जनं’ (कम्पन) आदि। जिससे कम्पित होता है वह ‘इञ्जित’ है, जो उस-उस ध्यान में क्षोभ उत्पन्न करने वाला स्थूल ध्यानाङ्ग है। चतुर्थ ध्यान ‘अनेञ्ज’ (अकम्प्य) है क्योंकि उसमें क्षोभक अंगों का अभाव होता है। जैसा कि कहा गया है—‘स्थित और अनेञ्जता को प्राप्त होने पर’। အလံ-သဒ္ဒေါ ယုတ္တတ္ထောပိ ဟောတိ – ‘‘အလမေဝ နိဗ္ဗိန္ဒိတုံ, အလံ ဝိမုစ္စိတု’’န္တိအာဒီသု (ဒီ. နိ. ၂.၂၇၂; သံ. နိ. ၂.၁၂၄, ၁၂၈, ၁၃၄, ၁၄၃), တသ္မာ အနလံ အနုသင်္ဂံ ကာတုံ အယုတ္တန္တိ အတ္ထော. တေနာဟ ‘‘အကတ္တဗ္ဗအာလယန္တိ ဝဒါမီ’’တိ. သန္နိဋ္ဌာနန္တိ သမ္မာပဋိပတ္တိယံ အလံ ဧတ္တာဝတာတိ ဥဿာဟပဋိပ္ပဿမ္ဘနဝသေန သန္နိဋ္ဌာနံ န ကာတဗ္ဗန္တိ ယောဇနာ. ဥဒ္ဓမ္ဘာဂိယသညိတံ အဏုံ ဝါ ဩရမ္ဘာဂိယသညိတံ ထူလံ ဝါ, ရူပရာဂေါတိ ဧဝရူပံ အဏုံ ဝါ ကာမာသဝေါ ပဋိဃန္တိ ဧဝရူပံ ထူလံ ဝါ, မုဒုနာ ပဝတ္တိအာကာရဝိသေသေန အပ္ပသာဝဇ္ဇံ, ကမ္မဗန္ဓနဋ္ဌေန ဝါ အပ္ပသာဝဇ္ဇံ, တဗ္ဗိပရိယာယတော မဟာသာဝဇ္ဇံ ဝေဒိတဗ္ဗံ. နာတိတိက္ခပညဿ ဝသေန ဒေသနာယ ပဝတ္တတ္တာ ‘‘နေယျပုဂ္ဂလဿ ဝသေနာ’’တိ ဝုတ္တံ. သဗ္ဗသော ဟိ ပရိယာဒိန္နနိကန္တိကဿ အရိယပုဂ္ဂလဿ ဝသေန သညာဝေဒယိတနိရောဓဿ အာဂတတ္တာ ‘‘အရဟတ္တနိကူဋေနေဝ နိဋ္ဌာပိတာ’’တိ ဝုတ္တံ. ယံ ပနေတ္ထ အတ္ထတော န ဝိဘတ္တံ, တံ သုဝိညေယျမေဝ. ‘अलं’ शब्द ‘युक्त’ (उचित) के अर्थ में भी होता है—जैसे ‘निर्वेद के लिए पर्याप्त (अलं) है, विमुक्ति के लिए पर्याप्त है’ आदि में। इसलिए ‘अनलम्’ का अर्थ है आसक्ति करना अयुक्त है। इसीलिए कहा गया है—‘मैं इसे न करने योग्य आश्रय कहता हूँ’। ‘सन्निट्ठानं’ (निश्चय) का अर्थ है—सम्यक् प्रतिपत्ति में ‘इतना ही पर्याप्त है’ इस प्रकार उत्साह को शिथिल करने वाला निश्चय नहीं करना चाहिए, ऐसा योजन है। ऊर्ध्वभागीय संज्ञक सूक्ष्म या अधोभागीय संज्ञक स्थूल, रूपराग जैसा सूक्ष्म या कामासव और प्रतिघ जैसा स्थूल; कोमल प्रवृत्ति के विशेष आकार के कारण अल्प-सावद्य (कम दोषपूर्ण) है, अथवा कर्म-बन्धन के अर्थ में अल्प-सावद्य है, इसके विपरीत को महा-सावद्य समझना चाहिए। प्रज्ञा के बहुत तीक्ष्ण न होने के कारण देशना प्रवृत्त होने से ‘नेय्य पुद्गल के वश से’ कहा गया है। क्योंकि पूरी तरह से तृष्णा रहित आर्य पुद्गल के वश से संज्ञा-वेदयित-निरोध के आने के कारण ‘अर्हत्त्व के शिखर द्वारा ही समाप्त किया गया’ ऐसा कहा गया है। जो यहाँ अर्थ से विभक्त नहीं है, वह सुविज्ञेय ही है। လဋုကိကောပမသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. लतुकिकोपम सुत्त की व्याख्या में लीनार्थ प्रकाशना समाप्त हुई। ၇. စာတုမသုတ္တဝဏ္ဏနာ ७. चातुम सुत्त की व्याख्या ၁၅၇. ယထာဥပနိဿယေနာတိ ယော ယော ဥပနိဿယော ယထာဥပနိဿယော, တေန ယထာဥပနိဿယေန သမ္မာပယောဂေန. ပတိဋ္ဌဟိဿန္တိ သာသနေ ပတိဋ္ဌံ ပဋိလဘိဿန္တိ. ဝသနဋ္ဌာနာနီတိ ဝဿဂ္ဂါဒိဝသေန ဝသနဋ္ဌာနာနိ. သဏ္ဌာပယမာနာတိ သုဝိဘတ္တဘာဝေန ဌပေန္တာ. १५७. ‘यथाउपनिस्सयेन’ का अर्थ है—जो-जो उपनिषय (आधार) है वह यथा-उपनिषय है, उस यथा-उपनिषय रूपी सम्यक् प्रयोग से। ‘प्रतिष्ठित होंगे’ का अर्थ है शासन में प्रतिष्ठा प्राप्त करेंगे। ‘निवास स्थान’ का अर्थ है वर्षावास आदि के अनुसार रहने के स्थान। ‘संस्थापित करते हुए’ का अर्थ है सुविभक्त भाव से स्थापित करते हुए। အဝိနိဗ္ဘောဂသဒ္ဒန္တိ ဝိနိဘုဉ္ဇိတွာ ဂဟေတုံ အသက္ကုဏေယျသဒ္ဒံ. ဝစီဃောသောပိ ဟိ ဗဟူဟိ ဧကစ္စံ ပဝတ္တိတော ဌာနတော စ ဒူရတရော ကေဝလံ မဟာနိဂ္ဃောသော [Pg.79] ဧဝ ဟုတွာ သောတပထမာဂစ္ဆတိ. မစ္ဆဝိလောပေတိ မစ္ဆေ ဝိလုမ္ပိတွာ ဝိယ ဂဟဏေ, မစ္ဆာနံ ဝါ နယနေ. ‘अविनिब्भोगसद्दं’ का अर्थ है—वह शब्द जिसे अलग-अलग करके ग्रहण करना असंभव हो। क्योंकि बहुतों द्वारा एक साथ किया गया वाणी का घोष स्थान से बहुत दूर होने पर केवल एक महान कोलाहल बनकर ही कान के मार्ग में आता है। ‘मच्छविलोपे’ का अर्थ है मछलियों को लूटने के समान पकड़ने में, या मछलियों को ले जाने में। ၁၅၈. ဝဝဿဂ္ဂတ္ထေတိ နိစ္ဆယတ္ထေ, ဣဒံ တာဝ အမှေဟိ ဝုစ္စမာနဝစနံ ဧကန္တသောတဗ္ဗံ, ပစ္ဆာ တုမှေဟိ ကာတဗ္ဗံ ကရောထာတိ အဓိပ္ပာယော. ဝစနပရိဟာရောတိ တေဟိ သကျရာဇူဟိ ဝုတ္တဝစနဿ ပရိဟာရော. လေသကပ္ပန္တိ ကပ္ပိယလေသံ. ဓုရဝဟာတိ ဓုရဝါဟိနော, ဓောရယှာတိ အတ္ထော. ပါဒမူလန္တိ ဥပစာရံ ဝဒတိ. ဝိဂစ္ဆိဿတီတိ ဟာယိဿတိ. ပဋိပ္ဖရိတောတိ န ဘဂဝတော သမ္မုခါဝ, သကျရာဇူနံ ပုရတောပိ ဝိပ္ဖရိတောဝ ဟောတိ. १५८. ‘ववस्सग्गत्ये’ का अर्थ है निश्चय के अर्थ में; अभिप्राय यह है कि—पहले हमारे द्वारा कहे जा रहे इस वचन को एकाग्र होकर सुनना चाहिए, बाद में तुम्हें जो करना है वह करो। ‘वचनपरिहारो’ का अर्थ है उन शाक्य राजाओं द्वारा कहे गए वचन का उत्तर। ‘लेसकप्पं’ का अर्थ है कल्पनीय बहाना (लेश)। ‘धुरवहा’ का अर्थ है धुरी ढोने वाले, अर्थात् बोझ ढोने वाले पशु। ‘पादममूलं’ का अर्थ है समीपवर्ती स्थान। ‘विगच्छिस्सति’ का अर्थ है नष्ट हो जाएगा। ‘प्रतिप्फरित’ का अर्थ है केवल भगवान के सम्मुख ही नहीं, शाक्य राजाओं के सामने भी व्याप्त होता है। ၁၅၉. အဘိနန္ဒတူတိ အဘိမုခေါ ဟုတွာ ပမောဒတု. အဘိဝဒတူတိ အဘိရူပဝသေန ဝဒတု. ပသာဒညထတ္တန္တိ အပ္ပသာဒဿ ဝိပရိဏာမော ဟီနာယာဝတ္တနသင်္ခါတံ ပရိဝတ္တနံ, တေနာဟ ‘‘ဝိဗ္ဘမန္တာနံ. ဝိပရိဏာမညထတ္တ’’န္တိ. ကာရဏူပစာရေန သဿေသု ဗီဇပရိယာယောတိ အာဟ ‘‘ဗီဇာနံ တရုဏာနန္တိ တရုဏသဿာန’’န္တိ. တရုဏဘာဝေနေဝ တဿ ဘာဝိနော ဖလဿ အဘာဝေန ဝိပရိဏာမော. १५९. ‘अभिनन्दतु’ का अर्थ है—सम्मुख होकर प्रसन्न हो। ‘अभिवदतु’ का अर्थ है—सुन्दर रूप से बोले। ‘प्रसाद-अन्यथात्व’ का अर्थ है—प्रसन्नता का विकार, जो हीन अवस्था में लौटने रूपी परिवर्तन है, इसीलिए कहा गया है—‘विभ्रमित होने वालों का, विकार और अन्यथात्व’। कारण के उपचार से फसलों में बीज का पर्याय होने के कारण कहा गया है—‘तरुण बीजों का’ अर्थात् ‘तरुण फसलों का’। तरुण अवस्था में ही उस भविष्य के फल के अभाव के कारण वह विकार (विपरिणाम) है। ၁၆၀. ကတ္တဗ္ဗဿ သရသေနေဝ ကရဏံ စိတ္တရုစိယံ, န တထာ ပရဿ ဥဿာဒနေနာတိ အာဟ – ‘‘ပက္ကောသိယမာနာနံ ဂမနံ နာမ န ဖာသုက’’န္တိ. မယမ္ပိ ဘဂဝါ ဝိယ ဒိဋ္ဌဓမ္မသုခဝိဟာရေနေဝ ဝိဟရိဿာမာတိ ဒီပေတိ ပကတိယာ ဝိဝေကဇ္ဈာသယဘာဝတော ဝိရဒ္ဓေါ အာဂတဿ ဘာရဿ အဝဟနတောယေဝ. တေနာဟ ‘‘အတ္တနော ဘာရဘာဝံ န အညာသီ’’တိ. १६०. कर्तव्य को अपनी रुचि से ही करना चित्त की प्रसन्नता है, दूसरे के उकसाने से वैसा नहीं होता, इसीलिए कहा गया है—‘बुलाए जाने पर जाना सुखद नहीं होता’। ‘हम भी भगवान की तरह दृष्टधर्म-सुख-विहार में ही विहार करेंगे’—यह दर्शाता है कि स्वभाव से विवेक (एकान्त) की इच्छा होने के कारण, आए हुए भार को न ढोने से ही वह विमुख हुआ। इसीलिए कहा गया है—‘उसने अपने भार-भाव को नहीं जाना’। ၁၆၁. ကသ္မာ အာရဘီတိ? သပ္ပာယတော. ပဉ္စသတာ ဟိ ဘိက္ခူ အဘိနဝါ, တသ္မာ တေသံ ဩဝါဒဒါနတ္ထံ ဘဂဝါ ဣမံ ဒေသနံ အာရဘီတိ. १६१. किसलिए आरम्भ किया? अनुकूलता के कारण। क्योंकि पाँच सौ भिक्षु नए थे, इसलिए उन्हें उपदेश देने के लिए भगवान ने इस देशना को आरम्भ किया। ၁၆၂. ကောဓုပါယာသဿာတိ ဧတ္ထ ကုဇ္ဈနဋ္ဌေန ကောဓော, သွေဝ စိတ္တဿ ကာယဿ စ အတိပ္ပမဒ္ဒနမထနုပ္ပာဒနေဟိ ဒဠှံ အာယာသဋ္ဌေန ဥပါယာသော. အနေကဝါရံ ပဝတ္တိတွာ အတ္တနာ သမဝေတံ သတ္တံ အဇ္ဈောတ္ထရိတွာ သီသံ ဥက္ခိပိတုံ အဒတွာ အနယဗျသနပါပနေန ကောဓုပါယာသဿ ဦမိသဒိသတာ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. တေနာဟ ‘‘ကောဓုပါယာသေ’’တိအာဒိ. १६२. ‘क्रोधोपायस’ में क्रोध का अर्थ है क्रुद्ध होना, और वही चित्त और शरीर के अत्यधिक मर्दन और मन्थन उत्पन्न करने के कारण दृढ़ आयास (कष्ट) के अर्थ में ‘उपायस’ है। अनेक बार प्रवृत्त होकर, अपने साथ जुड़े हुए प्राणी को दबाकर, सिर उठाने का अवसर न देकर और अनय-व्यसन (विपत्ति) में पहुँचाने के कारण क्रोधोपायस की लहर (ऊर्मि) के साथ समानता देखनी चाहिए। इसीलिए कहा गया है—‘क्रोधोपायस’ आदि। ၁၆၃. ဩဒရိကတ္တေန ခါဒိတောတိ ဩဒရိကဘာဝေန အာမိသဂေဓေန မိစ္ဆာဇီဝေန ဇီဝိကာကပ္ပနေန နာသိတသီလာဒိဂုဏတာယ ခါဒိတဓမ္မသရီရော. १६३. ‘औदरिकत्व से खाया गया’ का अर्थ है—पेटू होने के कारण, आमिष (भोग) के लोभ से, मिथ्या आजीविका द्वारा जीवन यापन करने से, शील आदि गुणों के नष्ट हो जाने के कारण जिसका धर्म-शरीर खा लिया गया है। ၁၆၄. ပဉ္စကာမဂုဏာဝဋ္ဋေ [Pg.80] နိမုဇ္ဇိတွာတိ ဧတ္ထ ကာမရာဂါဘိဘူတေ သတ္တေ ဣတော စ ဧတ္တော, ဧတ္တော စ ဣတောတိ ဧဝံ မနာပိယရူပါဒိဝိသယသင်္ခါတေ အာဝဋ္ဋေ အတ္တာနံ သံသာရေတွာ ယထာ တတော ဗဟိဘူတေ နေက္ခမ္မေ စိတ္တမ္ပိ န ဥပ္ပာဒေတိ, ဧဝံ အာဝဋ္ဋေတွာ ဗျသနာပါဒနေန ကာမဂုဏာနံ အာဝဋ္ဋသဒိသတာ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. တေနာဟ ‘‘ယထာ ဟီ’’တိအာဒိ. १६४. 'पञ्चकामगुणवट्टे निमुज्जित्वा' (पाँच कामगुणों के भँवर में डूबकर)—यहाँ काम-राग से अभिभूत सत्त्वों को इधर-उधर, उधर-इधर इस प्रकार मनाप (प्रिय) रूपादि विषयों संज्ञक भँवर में स्वयं को घुमाकर, जैसे उससे बाहर स्थित नैष्क्रम्य (संन्यास) में चित्त भी उत्पन्न नहीं करता, इस प्रकार घुमाकर व्यसन (विनाश) को प्राप्त कराने के कारण कामगुणों की भँवर के साथ समानता देखनी चाहिए। इसीलिए 'यथा ही' इत्यादि कहा गया है। ၁၆၅. ရာဂါနုဒ္ဓံသိတေနာတိ ရာဂေန အနုဒ္ဓံသိတေန. စဏ္ဍမစ္ဆံ အာဂမ္မာတိ သုသုကာဒိစဏ္ဍမစ္ဆံ အာဂမ္မ. မာတုဂါမံ အာဂမ္မာတိ မာတုဂါမော ဟိ ယောနိသောမနသိကာရရဟိတံ အဓီရပုရိသံ ဣတ္ထိကုတ္တဘူတေဟိ အတ္တနော ဟာဝဘာဝဝိလာသေဟိ အဘိဘုယျ ဂဟေတွာ ဓီရဇာတိယမ္ပိ အတ္တနော ရူပါဒီဟိ ပလောဘနဝသေန အနဝသေသံ အတ္တနော ဥပကာရဓမ္မေ သီလာဒိကေ သမ္ပာဒေတုံ အသမတ္ထံ ကရောန္တော အနယဗျသနံ ပါပေတိ. တေနာဟ – ‘‘မာတုဂါမံ အာဂမ္မ ဥပ္ပန္နကာမရာဂေါ ဝိဗ္ဘမတီ’’တိ. १६५. 'रागाणुद्धंसितेना' का अर्थ है—राग के द्वारा नष्ट किए गए (अभिभूत) के द्वारा। 'चण्डमच्छं आगम्मा' का अर्थ है—मगरमच्छ आदि हिंसक मछलियों के कारण। 'मातुगामं आगम्मा' का अर्थ है—स्त्रियाँ ही योनिसो मनसिकार (उचित मनन) से रहित अधीर पुरुष को स्त्रियों के हाव-भाव और विलासों से अभिभूत कर पकड़ लेती हैं, और धैर्यवान जाति के पुरुष को भी अपने रूप आदि के द्वारा प्रलोभन देने के कारण, उसके शील आदि उपकारी धर्मों को पूर्ण करने में असमर्थ बनाती हुई विनाश (व्यसन) को प्राप्त कराती हैं। इसीलिए कहा गया है—'स्त्री के कारण उत्पन्न काम-राग वाला पुरुष विभ्रमित (भ्रष्ट) हो जाता है'। ဘယံ နာမ ယတ္ထ ဘာယိတဗ္ဗဝတ္ထု, တတ္ထ ဩတရန္တဿေဝ ဟောတိ, န အနောတရန္တဿ, တံ ဩတရိတွာ ဘယံ ဝိနောဒေတွာ တတ္ထ ကိစ္စံ သာဓေတဗ္ဗံ, ဣတရထာ စတ္ထသိဒ္ဓိ န ဟောတီတိ ဣမမတ္ထံ ဥပမောပမိတဗ္ဗသရူပဝသေန ဒဿေတုံ ‘‘ယထာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. တတ္ထ ဥဒကံ နိဿာယ အာနိသံသော ပိပါသဝိနယနံ သရီရသုဒ္ဓိ ပရိဠာဟူပသမော ကာယဥတုဂ္ဂါဟာပနန္တိ ဧဝမာဒိ. သာသနံ နိဿာယ အာနိသံသော ပန သင်္ခေပတော ဝဋ္ဋဒုက္ခူပသမော, ဝိတ္ထာရတော ပန သီလာနိသံသာဒိဝသေန အနေကဝိဓော, သော ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂေ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၁.၉) ဝုတ္တနယေန ဝေဒိတဗ္ဗော. ဝုတ္တပ္ပကာရော အာနိသံသော ဟောတိ တာနိ ဘယာနိ အဘိဘုယျ ပဝတ္တဿာတိ အဓိပ္ပာယော. ဣမာနိ အဘာယိတွာတိ ဣမာနိ ကောဓူပါယာသာဒိဘယာနိ အဘိဘုယျ ပဝတ္တိတွာ အဘာယိတွာ. ကောဓူပါယာသာဒယော ဟိ ဘာယတိ ဧတသ္မာတိ ဘယန္တိ ဝုတ္တာ. ထေရောတိ မဟာဓမ္မရက္ခိတတ္ထေရော. ကာမံ ပဟာနာဘိသမယကာလော ဧဝ သစ္ဆိကိရိယာဘိသမယော, သမ္မာဒိဋ္ဌိယာ ပန သံကိလေသဝေါဒါနဓမ္မေသု ကိစ္စံ အသံကိဏ္ဏံ ကတွာ ဒဿေတုံ သမာနကာလိကမ္ပိ အသမာနကာလိကံ ဝိယ ဝုတ္တံ ‘‘တဏှာသောတံ ဆိန္ဒိတွာ နိဗ္ဗာနပါရံ ဒဋ္ဌုံ န သက္ကောတီ’’တိ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. 'भय' नाम की वस्तु वहाँ होती है जहाँ डरने योग्य वस्तु हो, उसमें प्रवेश करने वाले को ही भय होता है, न प्रवेश करने वाले को नहीं; उसमें प्रवेश कर भय को दूर कर वहाँ कार्य सिद्ध करना चाहिए, अन्यथा अर्थ की सिद्धि नहीं होती—इस अर्थ को उपमा और उपमेय के स्वरूप से दिखाने के लिए 'यथा' इत्यादि कहा गया है। वहाँ जल के आश्रय से लाभ है—प्यास बुझना, शरीर की शुद्धि, जलन का उपशम, शरीर की गर्मी दूर करना इत्यादि। शासन (बुद्ध-शासन) के आश्रय से लाभ संक्षेप में वट्ट-दुःख (संसार दुःख) का उपशम है, और विस्तार से शील के लाभ आदि के रूप में अनेक प्रकार का है, उसे विशुद्धिमार्ग में कहे गए नय के अनुसार समझना चाहिए। उक्त प्रकार का लाभ उन भयों को अभिभूत कर प्रवृत्त होने वाले को होता है—यह अभिप्राय है। 'इमानि अभयित्वा' का अर्थ है—इन क्रोध और उपायास (हताशा) आदि भयों को अभिभूत कर, प्रवृत्त होकर, न डरकर। क्रोध और उपायास आदि से डरा जाता है, इसलिए इन्हें 'भय' कहा गया है। 'थेरो' का अर्थ है—महाधम्मरक्खित थेर। काम-प्रहाण अभिसमय का काल ही साक्षात्कृत (सच्चिकिरिया) अभिसमय का काल है, किन्तु सम्यक्-दृष्टि के द्वारा संक्लेश और व्यवदान (शुद्धि) धर्मों में कार्यों को असंकीर्ण (स्पष्ट) करके दिखाने के लिए, समान काल होने पर भी असमान काल के समान कहा गया है—'तृष्णा के स्रोत को काटकर निर्वाण के पार देखने में समर्थ नहीं होता'। शेष सुविज्ञेय ही है। စာတုမသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. चातुम सुत्त की व्याख्या में लीनत्थप्पकासनी (गूढ़ अर्थ का प्रकाशन) समाप्त हुई। ၈. နဠကပါနသုတ္တဝဏ္ဏနာ ८. नळकपान सुत्त की व्याख्या। ၁၆၆. ယတ္ထ [Pg.81] ဗောဓိသတ္တပမုခေါ ဝါနရော နဠကေန ပါနီယံ ပိဝိ, သာ ပေါက္ခရဏီ, တဿာမန္တော ဘူမိပ္ပဒေသော, တတ္ထ နိဝိဋ္ဌဂါမော စ ‘‘နဠကပါန’’န္တေဝ ပညာယိတ္ထ, ဣဓ ပန ဂါမော အဓိပ္ပေတောတိ အာဟ ‘‘နဠကပါနေတိ ဧဝံနာမကေ ဂါမေ’’တိ. ဣဒါနိ တမတ္ထံ အာဂမနတော ပဋ္ဌာယ ဒဿေတုံ ‘‘ပုဗ္ဗေ ကိရာ’’တိ အာရဒ္ဓံ. ပညဝါတိ ဣတိကတ္တဗ္ဗတာယ ပညာယ ပညဝါ. १६६. जहाँ बोधिसत्त्व प्रमुख वानर ने नळ (नरकुल) से पानी पिया, वह पुष्करिणी (पोखरा) है, उसके समीप का भूमि प्रदेश और वहाँ बसा हुआ गाँव 'नळकपान' के नाम से ही जाना गया, यहाँ गाँव अभिप्रेत है, इसलिए कहा—'नळकपान नामक गाँव में'। अब उस अर्थ को आरम्भ से दिखाने के लिए 'पुब्बे किरा' (सुना है पहले) आरम्भ किया गया। 'पञ्ञवा' का अर्थ है—'क्या करना चाहिए' इस बुद्धि (इतिकत्तब्यता पञ्ञा) के कारण प्रज्ञावान। ထူလဒီဃဗဟုလဘာဝေန မဟတီဟိ ဒါဌိကာဟိ သမန္နာဂတတ္တာ မဟာဒါဌိကော. ‘‘ဥဒကရက္ခသော အဟ’’န္တိ ဝတွာ ဝါနရာနံ ကဉ္စိ အမုဉ္စိတွာ ‘‘သဗ္ဗေ တုမှေ မမ ဟတ္ထဂတာ’’တိ ဒဿေန္တော ‘‘တုမှေ ပန သဗ္ဗေ ခါဒိဿာမီ’’တိ အာဟ. ဓမိ…ပေ… ပိဝိံသူတိ ဗောဓိသတ္တေန ဂဟိတနဠော အနဝသေသော အဗ္ဘန္တရေ သဗ္ဗသန္ဓီနံ နိဗ္ဗာဓေန ဧကစ္ဆိဒ္ဒေါ အဟောသိ. နေဝ မံ တွံ ဝဓိဿသီတိ ဥဒကရက္ခသ တွံ ဝဓိတုကာမောပိ မမ ပုရိသထာမေန န ဝဓိဿသိ. स्थूल, लंबे और घने होने के कारण विशाल दाढ़ों से युक्त होने से वह 'महादाठिक' है। 'मैं जल-राक्षस हूँ' ऐसा कहकर बंदरों में से किसी को भी न छोड़ते हुए, 'तुम सब मेरे वश में आ गए हो' यह दिखाते हुए उसने कहा, 'मैं तुम सबको खा जाऊँगा'। 'धमि...पे... पिविंसु' (फूँका... पिया) - बोधिसत्व द्वारा पकड़ी गई वह नली बिना किसी अवशेष के भीतर से सभी जोड़ों के निर्बाध होने के कारण एक छिद्र वाली (खोखली) हो गई। 'तुम मुझे नहीं मार सकोगे' - हे जल-राक्षस! तुम मुझे मारने की इच्छा रखते हुए भी मेरे पुरुषार्थ के कारण नहीं मार सकोगे। ဧဝံ ပန ဝတွာ မဟာသတ္တော ‘‘အယံ ပါပေါ ဧတ္ထ ပါနီယံ ပိဝန္တေ အညေပိ သတ္တေ မာ ဗာဓယိတ္ထာ’’တိ ကရုဏာယမာနော ‘‘ဧတ္ထ ဇာယန္တာ နဠာ သဗ္ဗေ အပဗ္ဗဗန္ဓာ ဧကစ္ဆိဒ္ဒါဝ ဟောန္တူ’’တိ အဓိဋ္ဌာယ ဂတော. တေနာဟ ‘‘တတော ပဋ္ဌာယာ’’တိအာဒိ. ऐसा कहकर महासत्व ने 'यह पापी यहाँ पानी पीने वाले अन्य प्राणियों को भी कष्ट न दे' इस प्रकार करुणा करते हुए, 'यहाँ उगने वाले सभी नली (सरकंडे) गांठों से रहित और एक छिद्र वाले ही हों' ऐसा अधिष्ठान करके चले गए। इसीलिए 'ततो पट्ठाय' आदि कहा गया है। ၁၆၇. အနုရုဒ္ဓပ္ပမုခါ ဘိက္ခူ ဘဂဝတာ ‘‘ကစ္စိ တုမှေ အနုရုဒ္ဓါ’’တိ ပုစ္ဆိတာတိ ထေရော ‘‘တဂ္ဃ မယံ, ဘန္တေ’’တိ အာဟ. १६७. अनुरुद्ध आदि प्रमुख भिक्षुओं से भगवान द्वारा 'अनुरुद्ध! क्या तुम (कुशल) हो?' इस प्रकार पूछे जाने पर स्थविर ने कहा - 'निश्चित ही, भन्ते!' သစေ ပဗ္ဗဇတိ, ဇီဝိတံ လဘိဿတိ, နော အညထာတိ ရညာ ပဗ္ဗဇ္ဇာယ အဘိနီတာတိ ရာဇာဘိနီတာ. စောရာဘိနီတာတိ ဧတ္ထာပိ ဧသေဝ နယော. စောရာနံ မူလံ ဆိန္ဒန္တော ‘‘ကဏ္ဋကသောဓနံ ကရိဿာမီ’’တိ. အာဇီဝိကာယာတိ အာဇီဝေန ဇီဝိတဝုတ္တိယာ. ဣမေသု ပန အနုရုဒ္ဓတ္ထေရာဒီသု. यदि वह प्रव्रजित होता है, तो जीवन प्राप्त करेगा, अन्यथा नहीं - इस प्रकार राजा द्वारा प्रव्रज्या के लिए लाए गए 'राजाभिनीत' कहलाते हैं। 'चोराभिनीत' के विषय में भी यही न्याय है। चोरों की जड़ काटते हुए 'मैं कांटों का शोधन (अपराधियों का दमन) करूँगा'। 'आजीविकाय' का अर्थ है आजीविका के लिए, जीवन निर्वाह के लिए। इन अनुरुद्ध स्थविर आदि के विषय में। ဝိဝေကန္တိ ပုဗ္ဗကာလိကကိရိယပ္ပဓာနံ ‘‘အဗျာပဇ္ဇံ ဥပေတ’’န္တိအာဒီသု ဝိယာတိ အာဟ – ‘‘ဝိဝိစ္စာ’’တိ, ဝိဝိစ္စိတွာ ဝိဝိတ္တော ဟုတွာ ဝိနာ ဟုတွာတိ အတ္ထော. ပဗ္ဗဇိတကိစ္စန္တိ ပဗ္ဗဇိတဿ သာရုပ္ပကိစ္စံ. သမဏကိစ္စန္တိ သမဏဘာဝကရဏကိစ္စံ. ယဒဂ္ဂေန ဟိ ပဗ္ဗဇိတကိစ္စံ ကာတုံ န သက္ကောတိ တဒဂ္ဂေန သမဏဘာဝကရမ္ပိ ကိစ္စံ ကာတုံ န သက္ကောတိ. တေနာဟ ‘‘သော ယေဝါ’’တိအာဒိ. 'विवेक' शब्द पूर्वकालिक क्रिया की प्रधानता वाला है, जैसा कि 'अव्यापज्जं उपेतं' आदि में है, इसलिए कहा - 'विविच्चा' (विविक्त होकर), विविक्त होकर या अलग होकर, बिना (संग के) होकर - यह अर्थ है। 'पब्बजितकिच्चं' का अर्थ है प्रव्रजित के योग्य कार्य। 'समणकिच्चं' का अर्थ है श्रमण भाव को बनाने वाला कार्य। क्योंकि जिस सीमा तक वह प्रव्रजित के कर्तव्य को करने में समर्थ नहीं होता, उस सीमा तक वह श्रमण भाव उत्पन्न करने वाले कार्य को भी करने में समर्थ नहीं होता। इसीलिए 'सो येवा' आदि कहा गया है। ၁၆၈. အပ္ပဋိသန္ဓိကေ [Pg.82] တာဝ ဗျာကရောန္တော ပဝတ္တီသု ဌာနံ အတီတောတိ ကတွာ ဥပပတ္တီသု ဗျာကရောတိ နာမ တတ္ထ ပဋိသန္ဓိယာ အဘာဝကိတ္တနတော. မဟန္တတုဋ္ဌိနောတိ ဝိပုလပမောဒါ. १६८. पुनर्जन्म रहित (अप्रतिसंधिक) के विषय में व्याख्या करते हुए, प्रवृत्तियों में स्थान से अतीत होने के कारण, उपपत्तियों (उत्पत्तियों) के विषय में व्याख्या करते हैं, क्योंकि वहाँ प्रतिसंधि (पुनर्जन्म) के अभाव का कथन है। 'महन्ततुट्ठिनो' का अर्थ है विपुल प्रमोद वाले। ၁၆၉. ဣမဿာတိ ‘‘အဿာ’’တိ ပဒဿ အတ္ထဝစနံ. ဣမဿ ဌိတဿ အာယသ္မတော သာမံ ဒိဋ္ဌော ဝါ ဟောတိ အနုဿဝသုတော ဝါတိ ယောဇနာ. သမာဓိပက္ခိကာ ဓမ္မာ ဓမ္မာတိ အဓိပ္ပေတာ, သမာဓိ ပန ဧဝံဝိဟာရီတိ ဧတ္ထ ဝိဟာရသဒ္ဒေန ဂဟိတော. ဧဝံဝိမုတ္တာတိ ဧတ္ထ ပန ဝိမုတ္တိသဒ္ဒေန ဖလဝိမုတ္တိ ဂဟိတာ. စရတောပီတိ သမထဝိပဿနာစာရေန စရတောပိ ဝိဟရန္တဿပိ. ဥပါသကဥပါသိကာဌာနေသု လဗ္ဘမာနမ္ပိ အရဟတ္တံ အပ္ပကဘာဝတော ပါဠိယံ အနုဒ္ဓဋန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. १६९. 'इमस्स' यह 'अस्स' पद का अर्थ-कथन है। 'इस स्थित आयुष्मान द्वारा स्वयं देखा गया है या सुना गया है' - ऐसा अन्वय है। 'धम्मा धम्मा' से समाधि के पक्ष वाले धर्म अभिप्रेत हैं, और समाधि यहाँ 'विहार' शब्द से ग्रहण की गई है। 'एवंविमुत्ता' यहाँ 'विमुत्ति' शब्द से फल-विमुक्ति ग्रहण की गई है। 'चरतोपि' का अर्थ है शमथ-विपश्यना के आचरण से चलते हुए या विहार करते हुए भी। उपासक-उपासिकाओं की अवस्था में प्राप्त होने वाला अर्हत्व भी अल्प होने के कारण पालि में उद्धृत नहीं किया गया है, ऐसा समझना चाहिए। शेष सुविज्ञेय ही है। နဠကပါနသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. नलकपान सुत्त की व्याख्या में लीनत्थप्पकासना समाप्त हुई। ၉. ဂေါလိယာနိသုတ္တဝဏ္ဏနာ ९. गोलियानि सुत्त की व्याख्या। ၁၇၃. ပဒသမာစာရောတိ တံတံပစ္စယဘေဒဒဿနာယ ဝိဂတတ္တာ ပကာရေဟိ ဒလိဒ္ဒသမာစာရော သိထိလသမာစာရောတိ အတ္ထော. ယသ္မာ ပန တာဒိသော သမာစာရော ထိရော ဒဠှော နာမ န ဟောတိ, တသ္မာ ဝုတ္တံ ‘‘ဒုဗ္ဗလသမာစာရော’’တိ. ‘‘သာခသမာစာရော’’တိ ဝါ ပါဌော, တတ္ထ တတ္ထ လဂ္ဂနဋ္ဌေန သာခါသဒိသသီလောတိ အတ္ထော. တေနာဟ ‘‘ဩဠာရိကာစာရော’’တိ. ပစ္စယေသု သာပေက္ခောတိ ပစ္စယေသု သာပေက္ခတာယ ဧဝ ဟိဿ ဩဠာရိကာစာရတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ဂရုနာ ကိသ္မိဉ္စိ ဝုတ္တေ ဂါရဝဝသေန ပတိဿဝနံ ပတိဿော, ပတိဿဝစနဘူတံ တံသဘာဂဉ္စ ယံ ကိဉ္စိ ဂါရဝန္တိ အတ္ထော. သဟ ပတိဿေနာတိ သပ္ပတိဿေန, သပ္ပတိဿဝေန ဩဝါဒသမ္ပဋိစ္ဆနေန. ပတိဿီယတီတိ ဝါ ပတိဿော, ဂရုကာတဗ္ဗော, တေန သဟ ပတိဿေနာတိ သဗ္ဗံ ပုဗ္ဗေ ဝိယ. တေနာဟ ‘‘သဇေဋ္ဌကေနာ’’တိ. သေရိဝိဟာရော နာမ အတ္တပ္ပဓာနဝါသော. တေနာဟ ‘‘နိရင်္ကုသဝိဟာရေနာ’’တိ. १७३. 'पदसमाचारो' का अर्थ है उन-उन प्रत्ययों के भेद दिखाने के लिए प्रवृत्त होने के कारण विभिन्न प्रकार से हीन आचरण या शिथिल आचरण। क्योंकि वैसा आचरण स्थिर या दृढ़ नहीं होता, इसलिए 'दुर्बल समाचार' कहा गया है। 'शाखा समाचार' ऐसा भी पाठ है, वहाँ-वहाँ आसक्त होने के कारण शाखा के समान शील वाला - यह अर्थ है। इसीलिए 'ओळारिकाचारो' (स्थूल आचरण) कहा गया है। प्रत्ययों में सापेक्ष होने के कारण ही उसका स्थूल आचरण जानना चाहिए। गुरु द्वारा कुछ कहे जाने पर गौरववश प्रतिश्रवण (स्वीकार करना) 'प्रतिस्स' है, प्रतिवचन रूप और उसके समान जो कुछ भी गौरव है - यह अर्थ है। 'सह पतिस्सेन' का अर्थ है गौरव के साथ, उपदेश को स्वीकार करने के साथ। अथवा 'प्रतिस्सीयति' इति 'प्रतिस्सो' अर्थात् जो गौरव के योग्य हो, उसके साथ - यह सब पहले की तरह ही है। इसीलिए 'सजेट्ठकेन' आदि कहा गया है। 'सेरिविहार' का अर्थ है अपनी प्रधानता से रहना। इसीलिए 'निरंकुश विहार' कहा गया है। အနုပခဇ္ဇာတိ အနုပကဍ္ဎိတွာ. ဂရုဋ္ဌာနိယာနံ အန္တရံ အနာပုစ္ဆာ အနုပဝိသိတွာတိ ဣမမတ္ထံ ဒဿေတုံ ‘‘တတ္ထ ယော’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. 'अनुपखज्ज' का अर्थ है पीछे से धक्का देकर। गुरुस्थानीय व्यक्तियों के बीच बिना पूछे प्रवेश करके - इस अर्थ को दिखाने के लिए 'तत्थ यो' आदि कहा गया है। အာဘိသမာစာရိကန္တိ [Pg.83] အဘိသမာစာရေ ဘဝံ. ကိံ ပန တန္တိ အာဟ ‘‘ဝတ္တပဋိပတ္တိမတ္တမ္ပီ’’တိ. နာတိကာလဿေဝ သံဃဿ ပုရတော ပဝိသိတဗ္ဗံ, န ပစ္ဆာ ပဋိက္ကမိတဗ္ဗန္တိ အဓိပ္ပာယေန အတိကာလေ စ ဂါမပ္ပဝေသော အတိဒိဝါ ပဋိက္ကမနဉ္စ နိဝါရိတံ, တံ ဒဿေတုံ ‘‘န အတိပါတော’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. ဥဒ္ဓစ္စပကတိကောတိ ဝိဗ္ဘန္တစိတ္တော. အဝစာပလျေနာတိ ဒဠှဝါတာပဟတပလ္လဝသဒိသေန လောလဘာဝေန. 'आभिसमाचारिकं' का अर्थ है उत्तम आचरण में होने वाला। वह क्या है? तो कहा - 'व्रत-प्रतिपत्ति मात्र भी'। संघ के सामने बहुत जल्दी प्रवेश नहीं करना चाहिए और बहुत देर से वापस नहीं आना चाहिए - इस अभिप्राय से बहुत जल्दी गाँव में प्रवेश और बहुत देर से लौटना निषिद्ध किया गया है, उसे दिखाने के लिए 'न अतिपातो' आदि कहा गया है। 'उद्धच्चपकतिको' का अर्थ है विक्षिप्त चित्त वाला। 'अवचापल्येन' का अर्थ है तेज हवा से हिलते हुए पत्तों के समान चंचलता के अभाव से। ပညဝတာတိ ဣမိနာ ဘိက္ခုသာရုပ္ပေသု ဣတိကတ္တဗ္ဗေသု ဥပါယပညာ အဓိပ္ပေတာ, န သုတမယပညာ. အဘိဓမ္မေ အဘိဝိနယေ ယောဂေါတိ ဣမိနာ ဘာဝနာပညာဥတ္တရိမနုဿဓမ္မေ ယောဂေါ ပကာသိတော. ယောဂေါတိ စ ပရိစယော ဥဂ္ဂဏှဝသေန. 'प्रज्ञावान' इससे भिक्षु के योग्य कर्तव्यों में 'उपाय-प्रज्ञा' अभिप्रेत है, न कि श्रुतमयी प्रज्ञा। 'अभिधम्मे अभिविनये योगो' इससे भावना-प्रज्ञा और उत्तर-मनुष्य धर्म में योग (अभ्यास) प्रकाशित किया गया है। 'योग' का अर्थ सीखने के माध्यम से परिचय भी है। အာရုပ္ပာတိ ဣမိနာ စတဿောပိ အရူပသမာပတ္တိယော ဂဟိတာ, တာ ပန စတူဟိ ရူပသမာပတ္တီဟိ ဝိနာ န သမ္ပဇ္ဇန္တီတိ အာဟ – ‘‘အာရုပ္ပာတိ ဧတ္တာဝတာ အဋ္ဌပိ သမာပတ္တိယော ဝုတ္တာ ဟောန္တီ’’တိ. ကသိဏေတိ ဒသဝိဓေ ကသိဏေ. ဧကံ ပရိကမ္မကမ္မဋ္ဌာနန္တိ ယံ ကိဉ္စိ ဧကဘာဝနာ ပရိကမ္မဒီပနံ ခန္ဓကမ္မဋ္ဌာနံ. တေနာဟ ‘‘ပဂုဏံ ကတွာ’’တိ. ကသိဏပရိကမ္မံ ပန တဂ္ဂဟဏေနေဝ ဂဟိတံ ဟောတိ, လောကိယာ ဥတ္တရိမနုဿဓမ္မာ ဟေဋ္ဌာ ဂဟိတာတိ အာဟ ‘‘ဥတ္တရိမနုဿဓမ္မေတိ ဣမိနာ သဗ္ဗေပိ လောကုတ္တရဓမ္မေ ဒဿေတီ’’တိ. နေယျပုဂ္ဂလဿ ဝသေနာတိ ဇာနိတွာ ဝိတ္ထာရေတွာ ဉာတဗ္ဗပုဂ္ဂလဿ ဝသေနာတိ. 'आरुप्प' इससे चारों अरूप समापत्तियाँ ग्रहण की गई हैं, वे चारों रूप समापत्तियों के बिना सिद्ध नहीं होतीं, इसलिए कहा - 'आरुप्प कहने से यहाँ आठों समापत्तियाँ कह दी गई होती हैं।' 'कसिणे' का अर्थ है दस प्रकार के कसिण में। 'एकं परिकम्मकम्मट्ठानं' का अर्थ है कोई एक भावना के परिकर्म को दिखाने वाला कर्मस्थान। इसीलिए 'प्रवीण करके' कहा गया है। कसिण-परिकर्म तो उसके ग्रहण से ही ग्रहण हो जाता है, लौकिक उत्तर-मनुष्य धर्म नीचे ग्रहण किए गए हैं, इसलिए कहा - 'उत्तर-मनुष्य धर्म इससे सभी लोकोत्तर धर्मों को दिखाता है।' 'नेय्यपुग्गलस्स वसेन' का अर्थ है जानकर और विस्तार करके जानने योग्य पुद्गल के वश से। ဂေါလိယာနိသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. गोलियानिसुत्त-वर्णना की लीनत्थप्पकासना (गूढ़ार्थ-प्रकाशिनी) समाप्त हुई। ၁၀. ကီဋာဂိရိသုတ္တဝဏ္ဏနာ १०. कीटागिरिसुत्त-वर्णना। ၁၇၄. ပဉ္စ အာနိသံသေတိ အပ္ပာဗာဓတာဒိကေ ပဉ္စ ဂုဏေ. တတ္ထ အက္ခိရောဂကုစ္ဆိရောဂါဒီနံ အဘာဝေါ အပ္ပာဗာဓတာ. သရီရေ တေသံ ကုပ္ပနဒုက္ခဿ အဘာဝေါ အပ္ပာတင်္ကံ. သရီရဿ ဥဋ္ဌာနသုခတာ လဟုဋ္ဌာနံ. ဗလံ နာမ ကာယဗလံ. ဖာသုဝိဟာရော ဣရိယာပထသုခတာ. အနုပက္ခန္ဒာနီတိ ဒုစ္စဇနဝသေန သတ္တာနံ အနုပဝိဋ္ဌာနိ. သဉ္ဇာနိဿထာတိ ဧတ္ထ ဣတိ-သဒ္ဒေါ အာဒိအတ္ထော, တသ္မာ ဣတိ ဧဝံ အာနိသံသန္တိ အတ္ထော. १७४. 'पाँच आनिसंस' (लाभ) का अर्थ है अल्प-आबाधता (स्वस्थता) आदि पाँच गुण। वहाँ आँख के रोग, पेट के रोग आदि का अभाव 'अल्प-आबाधता' है। शरीर में उनके कुपित होने के दुःख का अभाव 'अल्प-आतंक' (रोग-रहित होना) है। शरीर के उठने-बैठने में सुख 'लहुट्ठान' (लघु-उत्थान) है। 'बल' का अर्थ है कायिक बल। 'फासुविहार' का अर्थ है ईर्यापथ (चलने-फिरने) में सुख। 'अनुपक्खन्दानि' का अर्थ है दुष्ट जनों के कारण सत्त्वों में प्रविष्ट होना। 'सञ्जानिस्सथ' यहाँ 'इति' शब्द आदि के अर्थ में है, इसलिए 'इति' इस प्रकार आनिसंस (लाभ) की प्रशंसा करते हैं, यह अर्थ है। ၁၇၅. အာဝါသေ နိယုတ္တာတိ အာဝါသိကာ တဿ အနတိဝတ္တနတော. တေနာဟ ‘‘နိဗဒ္ဓဝါသိနော’’တိ, နိယတဝါသိနောတိ အတ္ထော. တန္နိဗန္ဓာတိ [Pg.84] နိဗန္ဓံ ဝုစ္စတိ ဗျာပါရော, တတ္ထ ဗန္ဓာ ပသုတာ ဥဿုကာတိ တန္နိဗန္ဓာ. ကထံ တေ တတ္ထ နိဗန္ဓာတိ အာဟ ‘‘အကတံ သေနာသန’’န္တိအာဒိ. ဥပ္ပဇ္ဇနကေန ကာလေန ပတ္တဗ္ဗံ ကာလိကံ သော ပန ကာလော အနာဂတော ဧဝ ဟောတီတိ အာဟ ‘‘အနာဂတေ ကာလေ ပတ္တဗ္ဗ’’န္တိ. १७५. 'आवास में नियुक्त' का अर्थ है 'आवासिक' (निवासी), क्योंकि वे उसका उल्लंघन नहीं करते। इसीलिए कहा गया है 'निबद्धवासी', जिसका अर्थ है 'नियतवासी' (निश्चित रूप से रहने वाले)। 'तन्निबन्धा' - 'निबन्ध' व्यापार (कार्य) को कहा जाता है, उसमें जो बँधे हुए, लगे हुए या उत्सुक हैं, वे 'तन्निबन्धा' हैं। वे वहाँ कैसे निबद्ध (बँधे) हैं? इसके लिए 'अकृत सेनासन' (न बना हुआ आवास) आदि कहा गया है। उत्पन्न होने वाले काल में प्राप्त होने योग्य 'कालिक' है, और वह काल भविष्य ही होता है, इसलिए कहा 'भविष्य काल में प्राप्त होने योग्य' । ၁၇၈. ဧတ္တကာ ဝေဒနာ သေဝိတဗ္ဗာတိ အဋ္ဌာရသပိ နေက္ခမ္မနိဿိတာ ဝေဒနာ သေဝိတဗ္ဗာ, ဂေဟဿိတာ န သေဝိတ္ဗ္ဗာ. १७८. 'इतनी वेदनाओं का सेवन करना चाहिए' का अर्थ है कि अठारह नैष्क्रम्य-निश्रित (वैराग्य-आधारित) वेदनाओं का सेवन करना चाहिए, गृह-निश्रित (सांसारिक) वेदनाओं का नहीं। ၁၈၁. တံ ကတံ သောဠသဝိဓဿပိ ကိစ္စဿ နိဋ္ဌိတတ္တာ. အနုလောမိကာနီတိ ဥတုသုခဘာဝေန အနုရူပါနိ. တေနာဟ ‘‘ကမ္မဋ္ဌာနသပ္ပာယာနီ’’တိ. သမာနံ ကုရုမာနာတိ ဩမတ္တတံ အဓိမတ္တတဉ္စ ပဟာယ သမကိစ္စတံ သမ္ပာဒေန္တာ. १८१. 'वह किया गया' सोलह प्रकार के कृत्यों की समाप्ति के कारण। 'अनुलौमिक' का अर्थ है ऋतु-सुख के भाव से अनुरूप। इसीलिए कहा 'कर्मस्थान-सप्पाय' (साधना के अनुकूल)। 'समानं कुरुमाना' का अर्थ है हीनता और अधिकता को त्यागकर समान कार्यक्षमता को सिद्ध करना। ၁၈၂. တေ ဒွေ ဟောန္တီတိ တေ အာဒိတော ဝုတ္တာ ဒွေ. १८२. 'वे दो होते हैं' का अर्थ है वे आदि में कहे गए दो। ဥဘတော (အ. နိ. ဋီ. ၃.၇.၁၄) ဥဘယထာ ဥဘောဟိ ဘာဂေဟိ ဝိမုတ္တောတိ ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တော ဧကဒေသသရူပေကသေသနယေန. တထာ ဟိ ဝုတ္တံ အဘိဓမ္မဋ္ဌကထာယံ (ပု. ပ. အဋ္ဌ. ၂၄) ‘‘ဒွီဟိ ဘာဂေဟိ ဒွေ ဝါရေ ဝိမုတ္တောတိ ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တော’’တိ. တတ္ထ ကေစိ တာဝ ထေရာ – ‘‘သမာပတ္တိယာ ဝိက္ခမ္ဘနဝိမောက္ခေန, မဂ္ဂေန သမုစ္ဆေဒဝိမောက္ခေန ဝိမုတ္တောတိ ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တော’’တိ ဝဒန္တိ. အညေ ထေရာ – ‘‘အယံ ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တော ရူပတော မုစ္စိတွာ နာမံ နိဿာယ ဌိတော ပုန တတော မုစ္စနတော နာမနိဿိတကော’’တိ ဝတွာ တဿ စ သာဓကံ – 'उभतो' (दोनों ओर से) का अर्थ है दोनों प्रकार से, दोनों भागों से विमुक्त 'उभतोभागविमुक्त' है, एकदेश-सरूप-एकशेष न्याय से। जैसा कि अभिधम्म-अट्ठकथा में कहा गया है— "दो भागों से, दो बार विमुक्त 'उभतोभागविमुक्त' है।" वहाँ कुछ स्थविर कहते हैं— "समापत्ति के विष्खम्भन-विमोक्ष से और मार्ग के समुच्छेद-विमोक्ष से विमुक्त 'उभतोभागविमुक्त' है।" अन्य स्थविर कहते हैं— "यह उभतोभागविमुक्त रूप से मुक्त होकर नाम के आश्रित स्थित है, पुनः उससे मुक्त होने के कारण नाम-निश्रित है," और इसके प्रमाण स्वरूप— ‘‘အစ္စိ ယထာ ဝါတဝေဂေန ခိတ္တာ, (ဥပသိဝါတိ ဘဂဝါ,)အတ္ထံ ပလေတိ န ဥပေတိ သင်္ခံ; ဧဝံ မုနိ နာမကာယာ ဝိမုတ္တော,အတ္ထံ ပလေတိ န ဥပေတိ သင်္ခ’’န္တိ. (သု. နိ. ၁၀၈၀; စူဠနိ. ဥပသီဝမာဏဝပုစ္ဆာ ၁၁; ဥပသီဝမာဏဝပုစ္ဆာနိဒ္ဒေသ ၄၃) – "जैसे वायु के वेग से बुझाई गई लौ (हे उपसीव! भगवान् ने कहा) अस्त हो जाती है और संज्ञा (नाम) को प्राप्त नहीं होती; वैसे ही मुनि नाम-काय से विमुक्त होकर अस्त हो जाते हैं और संज्ञा को प्राप्त नहीं होते।" ဣမံ သုတ္တပဒံ ဝတွာ ‘‘နာမကာယတော စ ရူပကာယတော စ သုဝိမုတ္တတ္တာ ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တော’’တိ ဝဒန္တိ. သုတ္တေ ဟိ အာကိဉ္စညာယတနလာဘိနော ဥပသိဝဗြာဟ္မဏဿ ဘဂဝတာ နာမကာယာ ဝိမုတ္တောတိ ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တောတိ အက္ခာတောတိ. အပရေ ပန ‘‘သမာပတ္တိယာ ဝိက္ခမ္ဘနဝိမောက္ခေန [Pg.85] ဧကဝါရံ ဝိမုတ္တော, မဂ္ဂေန သမုစ္ဆေဒဝိမောက္ခေန ဧကဝါရံ ဝိမုတ္တောတိ ဧဝံ ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တော’’တိ ဝဒန္တိ. ဧတ္ထ ပဌမဝါဒေ ဒွီဟိ ဘာဂေဟိ ဝိမုတ္တောတိ ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တော. ဒုတိယဝါဒေ ဥဘတောဘာဂတော ဝိမုတ္တောတိ ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တော. တတိယဝါဒေ ပန ဒွီဟိ ဘာဂေဟိ ဒွေ ဝါရေ ဝိမုတ္တောတိ အယမေတေသံ ဝိသေသော. ကိလေသေဟိ ဝိမုတ္တော ကိလေသာ ဝါ ဝိက္ခမ္ဘနသမုစ္ဆေဒေဟိ ကာယဒွယတော ဝိမုတ္တာ အဿာတိ အယမတ္ထော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. တေနာဟ ‘‘ဒွီဟိ ဘာဂေဟီ’’တိအာဒိ. इस सुत्त-पद को कहकर वे कहते हैं कि "नाम-काय और रूप-काय से सुविमुक्त होने के कारण 'उभतोभागविमुक्त' है।" सुत्त में आकिञ्चन्यायतन के लाभ प्राप्त उपसीव ब्राह्मण को भगवान् ने 'नाम-काय से विमुक्त' होने के कारण 'उभतोभागविमुक्त' कहा है। अन्य लोग कहते हैं— "समापत्ति के विष्खम्भन-विमोक्ष से एक बार विमुक्त और मार्ग के समुच्छेद-विमोक्ष से एक बार विमुक्त, इस प्रकार 'उभतोभागविमुक्त' है।" यहाँ प्रथम वाद में 'दो भागों से विमुक्त' उभतोभागविमुक्त है। द्वितीय वाद में 'दोनों भागों से विमुक्त' उभतोभागविमुक्त है। तृतीय वाद में 'दो भागों से दो बार विमुक्त'—यह इनका विशेष (अन्तर) है। क्लेशों से विमुक्त, अथवा विष्खम्भन और समुच्छेद द्वारा दोनों कायों से क्लेश विमुक्त हो गए हों, यह अर्थ समझना चाहिए। इसीलिए कहा 'दो भागों से' आदि। သောတိ ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တော. ကာမဉ္စေတ္ထ ရူပါဝစရစတုတ္ထဇ္ဈာနမ္ပိ အရူပါဝစရဇ္ဈာနံ ဝိယ ဒုဝင်္ဂိကံ အာနေဉ္ဇပ္ပတ္တန္တိ ဝုစ္စတိ. တံ ပန ပဒဋ္ဌာနံ ကတွာ အရဟတ္တံ ပတ္တော ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တော နာမ န ဟောတိ ရူပကာယတော အဝိမုတ္တတ္တာ. တဉှိ ကိလေသကာယတောဝ ဝိမုတ္တံ, န ရူပကာယတော, တသ္မာ တတော ဝုဋ္ဌာယ အရဟတ္တံ ပတ္တော ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တော န ဟောတီတိ အာဟ – ‘‘စတုန္နံ အရူပ…ပေ… ပဉ္စဝိဓော ဟောတီ’’တိ. ‘‘ရူပီ ရူပါနိ ပဿတီ’’တိအာဒိကေ နိရောဓသမာပတ္တိအန္တေ အဋ္ဌ ဝိမောက္ခေ ဝတွာ – ‘‘ယတော စ ခေါ, အာနန္ဒ, ဘိက္ခု ဣမေ အဋ္ဌ ဝိမောက္ခေ ကာယေန ဖုသိတွာ ဝိဟရတိ, ပညာယ စဿ ဒိသွာ အာသဝါ ပရိက္ခီဏာ ဟောန္တိ, အယံ ဝုစ္စတိ, အာနန္ဒ, ဘိက္ခု ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တော’’တိ ယဒိပိ မဟာနိဒါနေ (ဒီ. နိ. ၂.၁၂၉-၁၃၀) ဝုတ္တံ, တံ ပန ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တသေဋ္ဌဝသေန ဝုတ္တန္တိ ဣဓ သဗ္ဗဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တသင်္ဂဟဏတ္ထံ ‘‘ပဉ္စဝိဓော ဟောတီ’’တိ ဝတွာ ‘‘ပါဠိ ပနေတ္ထ…ပေ… အဘိဓမ္မေ အဋ္ဌဝိမောက္ခလာဘိနော ဝသေန အာဂတာ’’တိ အာဟ. ဣဓာပိ ဟိ ကီဋာဂိရိသုတ္တေ ‘‘ဣဓ, ဘိက္ခဝေ, ဧကစ္စော ပုဂ္ဂလော…ပေ… ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တော’’တိ အရူပသမာပတ္တိဝသေန စတ္တာရော ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တာ, သေဋ္ဌော စ ဝုတ္တော ဝုတ္တလက္ခဏူပပတ္တိတော. ယထာဝုတ္တေသု ဟိ ပဉ္စသု ပုရိမာ စတ္တာရော နိရောဓံ န သမာပဇ္ဇန္တီတိ ပရိယာယေန ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တာ နာမ. အဋ္ဌသမာပတ္တိလာဘီ အနာဂါမီ တံ သမာပဇ္ဇိတွာ တတော ဝုဋ္ဌာယ ဝိပဿနံ ဝဍ္ဎေတွာ အရဟတ္တံ ပတ္တောတိ နိပ္ပရိယာယေန ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တသေဋ္ဌော နာမ. 'वह' उभतोभागविमुक्त है। यद्यपि यहाँ रूपावचर चतुर्थ ध्यान को भी अरूपावचर ध्यान की तरह द्वि-अङ्गिक और 'आनेञ्जप्पत्त' (अचल अवस्था को प्राप्त) कहा जाता है, किन्तु उसे पदस्थान (आधार) बनाकर अर्हत्त्व प्राप्त करने वाला 'उभतोभागविमुक्त' नहीं कहलाता, क्योंकि वह रूप-काय से विमुक्त नहीं है। वह केवल क्लेश-काय से विमुक्त है, रूप-काय से नहीं; इसलिए उससे व्युत्थान कर अर्हत्त्व प्राप्त करने वाला उभतोभागविमुक्त नहीं होता, इसीलिए कहा— "चार अरूप... पे... पाँच प्रकार का होता है।" यद्यपि महानिदान सुत्त में कहा गया है— "आनन्द! जब भिक्षु इन आठ विमोक्षों को काय से स्पर्श कर विहार करता है, और प्रज्ञा से देखकर उसके आस्रव क्षीण हो जाते हैं, तो आनन्द! वह भिक्षु उभतोभागविमुक्त कहलाता है," वह श्रेष्ठ उभतोभागविमुक्त के अभिप्राय से कहा गया है। यहाँ सभी उभतोभागविमुक्तों के संग्रह के लिए "पाँच प्रकार का होता है" कहकर "यहाँ पालि... पे... अभिधम्म में आठ विमोक्षों के लाभियों के वश से आया है" ऐसा कहा। यहाँ कीटागिरि सुत्त में भी "यहाँ, भिक्षुओं! एक पुद्गल... पे... उभतोभागविमुक्त" इस प्रकार अरूप-समापत्तियों के वश से चार उभतोभागविमुक्त और श्रेष्ठ (पाँचवाँ) उक्त लक्षणों की प्राप्ति के कारण कहा गया है। उक्त पाँचों में से पहले चार निरोध-समापत्ति को प्राप्त नहीं करते, इसलिए वे पर्याय (गौण रूप) से उभतोभागविमुक्त कहलाते हैं। आठ समापत्तियों का लाभी अनागामी, उसे (निरोध को) प्राप्त कर, उससे व्युत्थान कर, विपश्यना बढ़ाकर अर्हत्त्व प्राप्त करने वाला 'निप्परियाय' (मुख्य रूप) से श्रेष्ठ उभतोभागविमुक्त कहलाता है। ကတမော စ ပုဂ္ဂလောတိအာဒီသု ကတမောတိ ပုစ္ဆာဝစနံ, ပုဂ္ဂလောတိ အသာဓာရဏတော ပုစ္ဆိတဗ္ဗဝစနံ. ဣဓာတိ ဣမသ္မိံ သာသနေ. ဧကစ္စောတိ ဧကော[Pg.86]. အဋ္ဌ ဝိမောက္ခေ ကာယေန ဖုသိတွာ ဝိဟရတီတိ အဋ္ဌ သမာပတ္တိယော သဟဇာတနာမကာယေန ပဋိလဘိတွာ ဝိဟရတိ. ပညာယ စဿ ဒိသွာ အာသဝါ ပရိက္ခီဏာ ဟောန္တီတိ ဝိပဿနာပညာယ သင်္ခါရဂတံ, မဂ္ဂပညာယ စတ္တာရိ သစ္စာနိ ပဿိတွာ စတ္တာရောပိ အာသဝါ ပရိက္ခီဏာ ဟောန္တီတိ ဧဝမတ္ထော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. "कौन सा पुद्गल" आदि में 'कौन सा' (कतमो) प्रश्नवाचक शब्द है, 'पुद्गल' असाधारण रूप से पूछा जाने वाला शब्द है। 'यहाँ' (इध) का अर्थ है इस शासन में। 'एक' (एकच्चो) का अर्थ है कोई एक। 'आठ विमोक्षों को काया से स्पर्श कर विहार करता है' का अर्थ है आठ समापत्तियों को सहजात नाम-काया से प्राप्त कर विहार करता है। 'प्रज्ञा से देखकर उसके आस्रव क्षीण हो जाते हैं' का अर्थ है विपश्यना प्रज्ञा से संस्कारों को और मार्ग प्रज्ञा से चार सत्यों को देखकर चारों ही आस्रव क्षीण हो जाते हैं - ऐसा अर्थ समझना चाहिए। ပညာဝိမုတ္တောတိ ဝိသေသတော ပညာယ ဧဝ ဝိမုတ္တော, န တဿာ ပတိဋ္ဌာနဘူတေန အဋ္ဌဝိမောက္ခသင်္ခါတေန သာတိသယေန သမာဓိနာတိ ပညာဝိမုတ္တော. ယော အရိယော အနဓိဂတအဋ္ဌဝိမောက္ခေန သဗ္ဗသော အာသဝေဟိ ဝိမုတ္တော, တဿေတံ အဓိဝစနံ. အဓိဂတေပိ ဟိ ရူပဇ္ဈာနဝိမောက္ခေ န သော သာတိသယသမာဓိနိဿိတောတိ န တဿ ဝသေန ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တော ဟောတီတိ ဝုတ္တောဝါယမတ္ထော. အရူပဇ္ဈာနေသု ပန ဧကသ္မိမ္ပိ သတိ ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တောယေဝ နာမ ဟောတိ. တေန ဟိ အဋ္ဌဝိမောက္ခေကဒေသေန တံနာမဒါနသမတ္ထေန အဋ္ဌဝိမောက္ခလာဘီတွေဝ ဝုစ္စတိ. သမုဒါယေ ဟိ ပဝတ္တော ဝေါဟာရော အဝယဝေပိ ဒိဿတိ ယထာ ‘‘သတ္တိသယော’’တိ. ပါဠီတိ အဘိဓမ္မပါဠိ. ဧတ္ထာတိ ဧတိဿံ ပညာဝိမုတ္တိကထာယံ. အဋ္ဌဝိမောက္ခပဋိက္ခေပဝသေနေဝါတိ အဝဓာရဏေန ဣဓာပိ ပဋိက္ခေပဝသေနေဝ အာဂတဘာဝံ ဒဿေတိ. တေနာဟ ‘‘ကာယေန ဖုသိတွာ ဝိဟရတီ’’တိ. 'प्रज्ञाविमुक्त' का अर्थ है जो विशेष रूप से प्रज्ञा से ही विमुक्त है, न कि उसके आधारभूत आठ विमोक्ष संज्ञक अतिशय समाधि से। जो आर्य आठ विमोक्षों को प्राप्त किए बिना ही पूर्णतः आस्रवों से विमुक्त हो गया है, यह उसी का नाम है। रूप-ध्यान रूपी विमोक्ष प्राप्त होने पर भी वह अतिशय समाधि के आश्रित नहीं होता, इसलिए उसके कारण वह 'उभतोभागविमुक्त' नहीं होता - यह अर्थ कहा गया है। अरूप ध्यानों में से एक के भी होने पर वह 'उभतोभागविमुक्त' ही कहलाता है। इसलिए आठ विमोक्षों के एक अंश से, जो उस नाम को देने में समर्थ है, उसे 'आठ विमोक्षों का लाभ करने वाला' ही कहा जाता है। समुदाय में प्रयुक्त व्यवहार अवयव (अंश) में भी देखा जाता है, जैसे 'सत्तिसयो' (सौ का समूह)। 'पालि' का अर्थ है अभिधम्म पालि। 'यहाँ' का अर्थ है इस प्रज्ञाविमुक्ति की कथा में। 'आठ विमोक्षों के प्रतिषेध के वश से ही' - इस अवधारणा से यहाँ भी प्रतिषेध के वश से ही आए हुए भाव को दर्शाता है। इसीलिए कहा गया है - 'काया से स्पर्श कर विहार करता है'। ဖုဋ္ဌန္တံ သစ္ဆိကရောတီတိ ဖုဋ္ဌာနံ အန္တော ဖုဋ္ဌန္တော, ဖုဋ္ဌာနံ အရူပဇ္ဈာနာနံ အနန္တရော ကာလောတိ အဓိပ္ပာယော. အစ္စန္တသံယောဂေ စေတံ ဥပယောဂဝစနံ, ဖုဋ္ဌာနန္တရကာလမေဝ သစ္ဆိကရောတိ သစ္ဆိကာတဗ္ဗောပါယေနာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဘာဝနပုံသကံ ဝါ ဧတံ ‘‘ဧကမန္တံ နိသီဒီ’’တိအာဒီသု (ပါရာ. ၂) ဝိယ. ယော ဟိ အရူပဇ္ဈာနေန ရူပကာယတော နာမကာယေကဒေသတော စ ဝိက္ခမ္ဘနဝိမောက္ခေန ဝိမုတ္တော, တေန နိရောဓသင်္ခါတော ဝိမောက္ခော အာလောစိတော ပကာသိတော ဝိယ ဟောတိ, န ပန ကာယေန သစ္ဆိကတော, နိရောဓံ ပန အာရမ္မဏံ ကတွာ ဧကစ္စေသု အာသဝေသု ခေပိတေသု တေန သော သစ္ဆိကတော ဟောတိ, တသ္မာ သော သစ္ဆိကာတဗ္ဗံ နိရောဓံ ယထာအာလောစိတံ နာမကာယေန သစ္ဆိကရောတီတိ ‘‘ကာယသက္ခီ’’တိ ဝုစ္စတိ, န တု ‘‘ဝိမုတ္တော’’တိ ဧကစ္စာနံ အာသဝါနံ အပရိက္ခီဏတ္တာ. တေနာဟ [Pg.87] – ‘‘ဈာနဖဿံ ပဌမံ ဖုသတိ, ပစ္ဆာ နိရောဓံ နိဗ္ဗာနံ သစ္ဆိကရောတီ’’တိ. အယံ စတုန္နံ အရူပသမာပတ္တီနံ ဧကေကတော ဝုဋ္ဌာယ သင်္ခါရေ သမ္မသိတွာ ကာယသက္ခိဘာဝံ ပတ္တာနံ စတုန္နံ, နိရောဓာ ဝုဋ္ဌာယ အဂ္ဂမဂ္ဂပ္ပတ္တအနာဂါမိနော စ ဝသေန ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တော ဝိယ ပဉ္စဝိဓော နာမ ဟောတိ. တေန ဝုတ္တံ အဘိဓမ္မဋီကာယံ ‘‘ကာယသက္ခိမှိပိ ဧသေဝ နယော’’တိ. 'फुट्टन्तं सच्चिकरोति' (स्पर्श के अन्त का साक्षात्कार करता है) का अर्थ है स्पर्शों का अन्त 'फुट्टन्तो' है, जिसका अभिप्राय अरूप ध्यानों के स्पर्श के ठीक बाद का समय है। यह 'अत्यन्तसंयोग' में द्वितीया विभक्ति है, जिसका अर्थ है कि वह साक्षात्कार करने योग्य उपाय से स्पर्श के ठीक बाद के काल में ही साक्षात्कार करता है। अथवा यह 'एकं अन्त' (एक ओर) की तरह भाव-नपुंसक है। जो अरूप ध्यान के द्वारा रूप-काय से और नाम-काय के एक भाग से विक्खम्भन-विमुक्ति (दबाने वाली विमुक्ति) के माध्यम से मुक्त है, उसके द्वारा निरोध नामक विमुक्ति मानो देखी गई या प्रकाशित की गई होती है, किन्तु काय (शरीर) से साक्षात्कृत नहीं होती। निरोध को आलम्बन बनाकर कुछ आस्रवों के क्षीण होने पर उसके द्वारा वह साक्षात्कृत होता है, इसलिए वह साक्षात्कार करने योग्य निरोध को जैसा देखा गया है वैसा नाम-काय से साक्षात्कार करता है, अतः उसे 'कायसक्खी' (काय-साक्षी) कहा जाता है, न कि 'विमुक्त', क्योंकि कुछ आस्रव अभी क्षीण नहीं हुए हैं। इसीलिए कहा गया है - 'पहले ध्यान-स्पर्श का स्पर्श करता है, बाद में निरोध-निर्वाण का साक्षात्कार करता है।' यह चार अरूप समापत्तियों में से एक-एक से उठकर संस्कारों का सम्मर्शन कर काय-साक्षी भाव को प्राप्त चार व्यक्तियों और निरोध से उठकर अग्र-मार्ग (अर्हत् मार्ग) को प्राप्त अनागामी के भेद से 'उभतोभागविमुक्त' के समान पाँच प्रकार का होता है। इसीलिए अभिधम्म-टीका में कहा गया है - 'काय-साक्षी में भी यही नियम है।' ဒိဋ္ဌန္တံ ပတ္တောတိ ဒဿနသင်္ခါတဿ သောတာပတ္တိမဂ္ဂဉာဏဿ အနန္တရံ ပတ္တောတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ‘‘ဒိဋ္ဌတ္တာ ပတ္တော’’တိပိ ပါဌော. ဧတေန စတုသစ္စဒဿနသင်္ခါတာယ ဒိဋ္ဌိယာ နိရောဓဿ ပတ္တတံ ဒီပေတိ. တေနာဟ ‘‘ဒုက္ခာ သင်္ခါရာ, သုခေါ နိရောဓောတိ ဉာတံ ဟောတီ’’တိ. တတ္ထ ပညာယာတိ မဂ္ဂပညာယ. ပဌမဖလဋ္ဌတော ယာဝ အဂ္ဂမဂ္ဂဋ္ဌာ, တာဝ ဒိဋ္ဌိပ္ပတ္တော. တေနာဟ ‘‘သောပိ ကာယသက္ခိ ဝိယ ဆဗ္ဗိဓော ဟောတီ’’တိ. ယထာ ပန ပညာဝိမုတ္တော ပဉ္စဝိဓော ဝုတ္တော, ဧဝံ အယမ္ပိ သုက္ခဝိပဿကော, စတူဟိ ရူပဇ္ဈာနေဟိ ဝုဋ္ဌာယ ဒိဋ္ဌိပ္ပတ္တဘာဝပ္ပတ္တာ စတ္တာရော စာတိ ပဉ္စဝိဓော ဟောတီတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. သဒ္ဓါဝိမုတ္တေပိ ဧသေဝ နယော. ဣဒံ ဒုက္ခန္တိ ဧတ္တကံ ဒုက္ခံ, န ဣတော ဥဒ္ဓံ ဒုက္ခန္တိ. ယထာဘူတံ ပဇာနာတီတိ ဌပေတွာ တဏှံ ဥပါဒါနက္ခန္ဓပဉ္စကံ ဒုက္ခသစ္စန္တိ ယာထာဝတော ပဇာနာတိ. ယသ္မာ ပန တဏှာ ဒုက္ခံ ဇနေတိ နိဗ္ဗတ္တေတိ, တတော တံ ဒုက္ခံ သမုဒေတိ, တသ္မာ နံ ‘‘အယံ ဒုက္ခသမုဒယော’’တိ ယထာဘူတံ ပဇာနာတိ ယသ္မာ ပန ဣဒံ ဒုက္ခံ သမုဒယော စ နိဗ္ဗာနံ ပတွာ နိရုဇ္ဈတိ အပ္ပဝတ္တိံ ဂစ္ဆတိ, တသ္မာ ‘‘အယံ ဒုက္ခနိရောဓော’’တိ ယထာဘူတံ ပဇာနာတိ. အရိယော ပန အဋ္ဌင်္ဂိကော မဂ္ဂေါ တံ ဒုက္ခနိရောဓံ ဂစ္ဆတိ, တေန ‘‘အယံ ဒုက္ခနိရောဓဂါမိနိပဋိပဒါ’’တိ ယထာဘူတံ ပဇာနာတိ. ဧတ္တာဝတာ နာနက္ခဏေ သစ္စဝဝတ္ထာနံ ဒဿိတံ. ဣဒါနိ တံ ဧကက္ခဏေ ဒဿေတုံ ‘‘တထာဂတပ္ပဝေဒိတာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ, တဿတ္ထော အာဂမိဿတိ. 'दिट्ठन्तं पत्तो' (दृष्टि के अन्त को प्राप्त) का अर्थ है दर्शन नामक स्रोतापत्ति-मार्ग-ज्ञान के ठीक बाद प्राप्त होना। 'दिट्ठत्ता पत्तो' (दृष्टि के कारण प्राप्त) ऐसा भी पाठ है। इससे चार सत्यों के दर्शन रूपी दृष्टि के द्वारा निरोध की प्राप्ति को दर्शाया गया है। इसीलिए कहा गया है - 'संस्कार दुःख हैं, निरोध सुख है - ऐसा ज्ञात होता है।' वहाँ 'प्रज्ञा से' का अर्थ मार्ग-प्रज्ञा से है। प्रथम फल (स्रोतापत्ति फल) में स्थित होने से लेकर अग्र-मार्ग (अर्हत् मार्ग) में स्थित होने तक वह 'दिट्ठिप्पत्तो' (दृष्टि-प्राप्त) है। इसीलिए कहा गया है - 'वह भी काय-साक्षी के समान छह प्रकार का होता है।' जैसे प्रज्ञा-विमुक्त पाँच प्रकार का कहा गया है, वैसे ही यह भी - एक शुद्ध-विपश्यक (सुक्खविपस्सको) और चार रूप-ध्यानों से उठकर दृष्टि-प्राप्त भाव को प्राप्त चार व्यक्ति - इस प्रकार पाँच प्रकार का होता है, ऐसा समझना चाहिए। श्रद्धा-विमुक्त में भी यही नियम है। 'यह दुःख है' का अर्थ है इतना ही दुःख है, इससे ऊपर दुःख नहीं है। 'यथाभूत जानता है' का अर्थ है तृष्णा को छोड़कर पाँच उपादान स्कन्धों को दुःख-सत्य के रूप में यथार्थतः जानता है। चूँकि तृष्णा दुःख को उत्पन्न करती है, जन्म देती है, उससे वह दुःख उत्पन्न होता है, इसलिए उसे 'यह दुःख-समुदय है' ऐसा यथाभूत जानता है। चूँकि यह दुःख और समुदय निर्वाण को प्राप्त कर निरुद्ध हो जाते हैं, अप्रवृत्ति को प्राप्त होते हैं, इसलिए 'यह दुःख-निरोध है' ऐसा यथाभूत जानता है। आर्य अष्टांगिक मार्ग उस दुःख-निरोध की ओर ले जाता है, इसलिए 'यह दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपदा है' ऐसा यथाभूत जानता है। यहाँ तक विभिन्न क्षणों में सत्यों का निर्धारण दिखाया गया है। अब उसे एक ही क्षण में दिखाने के लिए 'तथागतप्पवेदिता' आदि कहा गया है, जिसका अर्थ आगे आएगा। သဒ္ဓါယ ဝိမုတ္တောတိ ဧတေန သဗ္ဗထာ အဝိမုတ္တဿပိ သဒ္ဓါမတ္တေန ဝိမုတ္တဘာဝေါ ဒီပိတော ဟောတိ. သဒ္ဓါဝိမုတ္တောတိ ဝါ သဒ္ဓါယ အဓိမုတ္တောတိ အတ္ထော. ဝုတ္တနယေနေဝါတိ ‘‘သောတာပတ္တိဖလ’’န္တိအာဒိနာ ဝုတ္တနယေန. သဒ္ဒဟန္တဿာတိ ‘‘ဧကံသတော အယံ ပဋိပဒါ ကိလေသက္ခယံ အာဝဟတိ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေန ဘာသိတတ္တာ’’တိ ဧဝံ သဒ္ဒဟန္တဿ. ယသ္မာ ပနဿ အနိစ္စာနုပဿနာဒီဟိ [Pg.88] နိစ္စသညာပဟာနဝသေန ဘာဝနာယ ပုဗ္ဗေနာပရံ ဝိသေသံ ပဿတော တတ္ထ တတ္ထ ပစ္စက္ခတာပိ အတ္ထိ, တသ္မာ ဝုတ္တံ ‘‘သဒ္ဒဟန္တဿ ဝိယာ’’တိ. သေသပဒဒွယံ တဿေဝ ဝေဝစနံ. ဧတ္ထ စ ပုဗ္ဗဘာဂမဂ္ဂဘာဝနာတိ ဝစနေန အာဂမနီယပဋိပဒါနာနတ္တေန သဒ္ဓါဝိမုတ္တဒိဋ္ဌိပ္ပတ္တာနံ ပညာနာနတ္တံ ဟောတီတိ ဒဿိတံ. အဘိဓမ္မဋ္ဌကထာယမ္ပိ (ပု. ပ. အဋ္ဌ. ၂၈) ‘‘နေသံ ကိလေသပ္ပဟာနေ နာနတ္တံ နတ္ထိ, ပညာယ နာနတ္တံ အတ္ထိယေဝါ’’တိ ဝတွာ – ‘‘အာဂမနီယနာနတ္တေနေဝ သဒ္ဓါဝိမုတ္တော ဒိဋ္ဌိပ္ပတ္တံ န ပါပုဏာတီတိ သန္နိဋ္ဌာနံ ကတ’’န္တိ ဝုတ္တံ. 'सद्धाय विमुत्तो' (श्रद्धा से मुक्त) इससे पूरी तरह मुक्त न होने पर भी केवल श्रद्धा मात्र से मुक्त होने का भाव दर्शाया गया है। अथवा 'सद्धाविमुत्तो' का अर्थ है श्रद्धा में अधिमुक्त (दृढ़ निश्चयी)। 'उसी रीति से' का अर्थ है 'स्रोतापत्ति-फल' आदि के द्वारा बताई गई रीति से। 'श्रद्धा रखने वाले का' का अर्थ है - 'निश्चित रूप से यह प्रतिपदा क्लेशों के क्षय को लाने वाली है क्योंकि यह सम्यक्सम्बुद्ध द्वारा कही गई है' - इस प्रकार श्रद्धा रखने वाले का। चूँकि अनित्यानुपश्यना आदि के द्वारा नित्य-संज्ञा के प्रहाण के कारण भावना में पहले और बाद के विशेष को देखते हुए उसे वहाँ-वहाँ प्रत्यक्षता भी होती है, इसलिए 'श्रद्धा रखने वाले के समान' कहा गया है। शेष दो पद उसी के पर्यायवाची हैं। और यहाँ 'पूर्व-भाग-मार्ग-भावना' इस वचन से यह दिखाया गया है कि आगमनीय प्रतिपदा की भिन्नता से श्रद्धा-विमुक्त और दृष्टि-प्राप्त व्यक्तियों की प्रज्ञा में भिन्नता होती है। अभिधम्म-अट्ठकथा में भी 'उनके क्लेश-प्रहाण में कोई भिन्नता नहीं है, प्रज्ञा में भिन्नता है ही' ऐसा कहकर - 'आगमनीय (प्रतिपदा) की भिन्नता के कारण ही श्रद्धा-विमुक्त दृष्टि-प्राप्त को प्राप्त नहीं होता, ऐसा निश्चय किया गया है' - यह कहा गया है। ပညာသင်္ခါတံ ဓမ္မံ အဓိမတ္တတာယ ပုဗ္ဗင်္ဂမံ ဟုတွာ ပဝတ္တံ အနုဿရတီတိ ဓမ္မာနုသာရီ. တေနာဟ ‘‘ဓမ္မော’’တိအာဒိ. သဒ္ဓံ အနုဿရတိ သဒ္ဓါပုဗ္ဗင်္ဂမံ မဂ္ဂံ ဘာဝေတီတိ ဣမမတ္ထံ ‘‘ဧသေဝ နယော’’တိ အတိဒိသတိ. ပညံ ဝါဟေတီတိ ပညာဝါဟီ, ပညံ သာတိသယံ ပဝတ္တေတီတိ အတ္ထော. တေနာဟ ‘‘ပညာပုဗ္ဗင်္ဂမံ အရိယမဂ္ဂံ ဘာဝေတီ’’တိ. သဒ္ဓါဝါဟိန္တိ ဧတ္ထ ဝုတ္တနယေန အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တာဒိကထာတိ ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တာဒီသု အာဂမနတော ပဋ္ဌာယ ဝတ္တဗ္ဗကထာ. ဧတေသန္တိ ယထာဝုတ္တာနံ ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တာဒီနံ. ဣဓာတိ ဣမသ္မိံ ကီဋာဂိရိသုတ္တေ. နနု စ အဋ္ဌသမာပတ္တိလာဘိဝသေန ဥဘတောဘာဂဝိမုတ္တော ကာယသက္ခီအာဒယော စ အဘိဓမ္မေ အာဂတာ, ကထမိဓ အရူပဇ္ဈာနလာဘီဝသေနေဝ ဥဒ္ဓဋာတိ စောဒနံ သန္ဓာယာဟ ‘‘ယသ္မာ’’တိအာဒိ. प्रज्ञा नामक धर्म की अधिकता के कारण उसे प्रधान बनाकर प्रवृत्त होने वाले का अनुसरण करता है, इसलिए 'धम्मानुसारी' (धर्मानुसारी) है। इसीलिए 'धम्मो' आदि कहा गया है। श्रद्धा का अनुसरण करता है, श्रद्धा को प्रधान बनाकर मार्ग की भावना करता है - इस अर्थ में 'यही नियम है' ऐसा अतिदेश (निर्देश) किया गया है। प्रज्ञा को वहन करता है, इसलिए 'प्रज्ञावाही' है, अर्थात् प्रज्ञा को अतिशय रूप से प्रवृत्त करता है। इसीलिए कहा गया है - 'प्रज्ञा को प्रधान बनाकर आर्य मार्ग की भावना करता है'। 'सद्धावाही' (श्रद्धावाही) का अर्थ यहाँ बताई गई रीति से ही समझना चाहिए। 'उभतोभागविमुत्तादि कथा' का अर्थ है उभतोभागविमुक्त आदि के विषय में आगम (शास्त्र) के अनुसार कही जाने वाली कथा। 'इनका' अर्थात् यथाकथित उभतोभागविमुक्त आदि का। 'यहाँ' अर्थात् इस कीटागिरि सुत्त में। क्या आठ समापत्तियों के लाभ के कारण उभतोभागविमुक्त और काय-साक्षी आदि अभिधम्म में नहीं आए हैं, फिर यहाँ केवल अरूप-ध्यान के लाभ के वश से ही उन्हें क्यों उद्धृत किया गया है - इस आक्षेप को ध्यान में रखकर 'यस्मा' (चूँकि) आदि कहा गया है। ဖုသိတွာ ပတွာ. ပညာယ စဿ ဒိသွာ အာသဝါ ပရိက္ခီဏာ ဟောန္တီတိ န အာသဝါ ပညာယ ပဿီယန္တိ, ဒဿနကာရဏာ ပညာယ ပရိက္ခီဏာ ‘‘ဒိသွာ ပညာယ ပရိက္ခီဏာ’’တိ ဝုတ္တာ. ဒဿနာယတ္တပရိက္ခယတ္တာ ဧဝ ဟိ ဒဿနံ အာသဝါနံ ခယဿ ပုရိမကိရိယာ ဟောတီတိ. တထာဂတေန ပဝေဒိတာတိ ဗောဓိမဏ္ဍေ နိသီဒိတွာ တထာဂတေန ပဋိဝိဒ္ဓါ ဝိဒိတာ ပစ္ဆာ ပရေသံ ပါကဋီကတာ. ‘‘စတုသစ္စဓမ္မာ’’တိ ဝတွာ တဒန္တောဂဓတ္တာ သီလာဒီနံ ‘‘ဣမသ္မိံ ဌာနေ သီလံ ကထိတ’’န္တိအာဒိ ဝုတ္တံ. အတ္ထေနာတိ အဝိပ္ပဋိသာရာဒိပယောဇနေန တသ္မိံ တသ္မိံ ပီတိအာဒိကေန အတ္ထေန. ကာရဏေနာတိ သပ္ပုရိသူပနိဿယာဒိနာ ကာရဏေန တသ္မိံ တသ္မိံ သမာဓိအာဒိပဒဋ္ဌာနတာယ သီလာဒိ [Pg.89] ကာရဏေ. စိဏ္ဏစရိတတ္တာတိ သဒ္ဓါစိဏ္ဏဘာဝေန သမ္ဗောဓာဝဟဘာဝေ. တတ္ထ တတ္ထ ဝိစရိတာ ဝိသေသေန စရိတာ, တေသု တေန ပညာ သုဋ္ဌု စရာပိတာတိ အတ္ထော. ပတိဋ္ဌိတာ ဟောတိ မဂ္ဂေန အာဂတတ္တာ. မတ္တာယ ပရိတ္တပ္ပမာဏေန. ဩလောကနံ ခမန္တိ, ပညာယ ဂဟေတဗ္ဗတံ ဥပေန္တိ. 'फुसित्वा' का अर्थ है प्राप्त करके। 'प्रज्ञा से देखकर उसके आस्रव क्षीण हो जाते हैं' - यहाँ आस्रव प्रज्ञा से देखे नहीं जाते, बल्कि प्रज्ञा के द्वारा दर्शन (देखने) के कारण वे क्षीण हो जाते हैं, इसलिए 'प्रज्ञा से देखकर क्षीण हो गए' ऐसा कहा गया है। क्योंकि दर्शन के अधीन क्षय होने के कारण, दर्शन ही आस्रवों के क्षय की पूर्व-क्रिया होती है। 'तथागत द्वारा प्रवेदित' का अर्थ है बोधिमण्ड पर बैठकर तथागत द्वारा प्रतिविद्ध (साक्षात्कृत), ज्ञात और बाद में दूसरों के लिए प्रकट किया गया। 'चार आर्य सत्य' कहकर, उनके अंतर्गत होने के कारण शील आदि के विषय में 'इस स्थान पर शील कहा गया है' आदि कहा गया है। 'अर्थ से' का अर्थ है अविप्रतिसार (पश्चाताप रहित होना) आदि प्रयोजन से, उस-उस प्रीति आदि अर्थ से। 'कारण से' का अर्थ है सत्पुरुषों के संसर्ग आदि कारण से, उस-उस समाधि आदि के पदस्थान होने के कारण शील आदि कारणों में। 'चीर्ण-चरित होने से' का अर्थ है श्रद्धा के आचरण के भाव से, सम्बोधि को लाने वाले भाव में। वहाँ-वहाँ विचरण किया गया, विशेष रूप से आचरण किया गया, उनमें उसके द्वारा प्रज्ञा को अच्छी तरह प्रवृत्त किया गया, यह अर्थ है। 'प्रतिष्ठित होती है' क्योंकि वह मार्ग से आई है। 'मात्रा से' का अर्थ है अल्प परिमाण से। 'अवलोकन को सहते हैं' का अर्थ है प्रज्ञा द्वारा ग्रहण किए जाने योग्य होते हैं। တယောတိ ကာယသက္ခိဒိဋ္ဌိပ္ပတ္တသဒ္ဓါဝိမုတ္တာ. ယထာဌိတောဝ ပါဠိအတ္ထော, န တတ္ထ ကိဉ္စိ နိဒ္ဓါရေတွာ ဝတ္တဗ္ဗံ အတ္ထီတိ သုတ္တန္တပရိယာယေန အဝုတ္တံ ဝဒတိ. တဿ မဂ္ဂဿာတိ သောတာပတ္တိမဂ္ဂဿ ယံ ကာတဗ္ဗံ, တဿ အဓိဂတတ္တာ. ဥပရိ ပန တိဏ္ဏံ မဂ္ဂါနံ အတ္ထာယ သေဝမာနာ အနုလောမသေနာသနံ, ဘဇမာနာ ကလျာဏမိတ္တေ, သမန္နာနယမာနာ ဣန္ဒြိယာနိ အနုပုဗ္ဗေန ဘာဝနာမဂ္ဂပ္ပဋိပါဋိယာ အရဟတ္တံ ပါပုဏိဿန္တိ မဂ္ဂဿ အနေကစိတ္တက္ခဏိကတာယာတိ အယမေတ္ထ သုတ္တပဒေသေ ပါဠိယာ အတ္ထော. 'तीन' का अर्थ है कायसाक्षी, दृष्टि प्राप्त और श्रद्धाविमुक्त। पालि का अर्थ जैसा है वैसा ही है, वहाँ कुछ भी अलग से निर्धारित करके कहने योग्य नहीं है, ऐसा सुत्तन्त पर्याय से जो नहीं कहा गया है, वह कहता है। 'उस मार्ग का' का अर्थ है स्रोतापत्ति मार्ग का जो कर्तव्य है, उसे प्राप्त कर लेने के कारण। किन्तु ऊपर के तीन मार्गों के लिए अनुकूल शयनासन का सेवन करते हुए, कल्याणमित्रों का भजन करते हुए, इन्द्रियों को समन्वित करते हुए, अनुक्रम से भावना-मार्ग की परिपाटी से अर्हत्व को प्राप्त करेंगे, क्योंकि मार्ग अनेक चित्त-क्षणों वाला होता है - यह इस सुत्त-प्रदेश में पालि का अर्थ है। ဣမမေဝ ပါဠိံ ဂဟေတွာတိ ‘‘ကတမော စ ပုဂ္ဂလော သဒ္ဓါနုသာရီ’’တိ မဂ္ဂဋ္ဌေ ပုဂ္ဂလေ ဝတွာ ‘‘ဣမဿ ခေါ အဟံ, ဘိက္ခဝေ’’တိအာဒိနာ တေသံ ဝသေန အနုလောမသေနာသနသေဝနာဒီနံ ဝုတ္တတ္တာ ဣမမေဝ ယထာဝုတ္တံ ပါဠိပဒေသံ ဂဟေတွာ ‘‘လောကုတ္တရဓမ္မော ဗဟုစိတ္တက္ခဏိကော’’တိ ဝဒတိ. သော ဝတ္တဗ္ဗောတိ သော ဝိတဏ္ဍဝါဒီ ဧဝံ ဝတ္တဗ္ဗော. ယဒိ မဂ္ဂဋ္ဌပုဂ္ဂလေ ဝတွာ အနုလောမိကသေနာသနသေဝနာဒိ ပါဠိယံ ဝုတ္တန္တိ မဂ္ဂသမင်္ဂိနော ဧဝ ဟုတွာ တေ တထာ ပဋိပဇ္ဇန္တိ, ဧဝံ သန္တေ သေနာသနပဋိသံယုတ္တရူပါဒိဝိပဿနဂ္ဂဟဏသ္မိံ တဝ မတေန မဂ္ဂသမင်္ဂိနော ဧဝ အာပဇ္ဇေယျုံ, န စေတံ ဧဝံ ဟောတိ, တသ္မာ သုတ္တံ မေ လဒ္ဓန္တိ ယံ ကိဉ္စိ မာ ကထေဟီတိ ဝါရေတဗ္ဗော. တေနာဟ ‘‘ယဒိ အညေန စိတ္တေနာ’’တိအာဒိ. တတ္ထ ဧဝံ သန္တေတိ နာနာစိတ္တေနေဝ သေနာသနပဋိသေဝနာဒိကေ သတိ. တတ္ထ ပါဠိယံ ယဒိ လောကုတ္တရဓမ္မသမင်္ဂိနော ဧဝ ပဉ္စဝိညာဏသမင်္ဂိကာလေပိ လောကုတ္တရသမင်္ဂိတံ သစေ သမ္ပဋိစ္ဆသိ, သတ္ထာရာ သဒ္ဓိံ ပဋိဝိရုဇ္ဈသိ သုတ္တဝိရောဓဒီပနတော. တေနာဟ ‘‘သတ္ထာရာ ဟီ’’တိအာဒိ. ဓမ္မဝိစာရဏာ နာမ တုယှံ အဝိသယော, တသ္မာ ယာဂုံ ပိဝါဟီတိ ဥယျောဇေတဗ္ဗော. 'इसी पालि को लेकर' का अर्थ है 'कौन सा पुद्गल श्रद्धानुसारि है' - इस प्रकार मार्गस्थ पुद्गलों को कहकर 'भिक्षुओं, इसके लिए मैं' आदि के द्वारा उनके वश से अनुकूल शयनासन के सेवन आदि के कहे जाने के कारण, इसी यथोक्त पालि-पद को लेकर वह कहता है कि 'लोकोत्तर धर्म बहु-चित्त-क्षण वाला है'। 'उसे कहना चाहिए' का अर्थ है उस वितण्डावादी को ऐसा कहना चाहिए। यदि मार्गस्थ पुद्गलों को कहकर पालि में अनुकूल शयनासन सेवन आदि कहा गया है, तो मार्ग-समंगी (मार्ग से युक्त) होकर ही वे वैसा प्रतिपन्न होते हैं; ऐसा होने पर, शयनासन से संबंधित रूप आदि की विपश्यना के ग्रहण में तुम्हारे मत के अनुसार वे मार्ग-समंगी ही हो जाएँगे, और ऐसा नहीं होता है, इसलिए 'मुझे सुत्त मिल गया है' ऐसा कहकर कुछ भी मत कहो - इस प्रकार उसे रोकना चाहिए। इसीलिए कहा गया है 'यदि अन्य चित्त से' आदि। वहाँ 'ऐसा होने पर' का अर्थ है नाना चित्तों से ही शयनासन के प्रतिसेवन आदि के होने पर। वहाँ पालि में यदि लोकोत्तर धर्म से युक्त व्यक्ति ही पंच-विज्ञान से युक्त होने के समय भी लोकोत्तर-युक्तता को स्वीकार करते हो, तो तुम शास्ता के साथ विरोध करते हो, क्योंकि यह सुत्त के विरुद्ध है। इसीलिए कहा गया है 'शास्ता के साथ ही' आदि। धर्म-विचारणा तुम्हारा विषय नहीं है, इसलिए 'कांजी (यागु) पियो' कहकर उसे विदा कर देना चाहिए। ၁၈၃. အာဒိကေနေဝါတိ ပဌမေနေဝ. အနုပုဗ္ဗသိက္ခာတိ အနုပုဗ္ဗေနေဝ ပဝတ္တသိက္ခာယ. တေနာဟ ‘‘ကရဏတ္ထေ ပစ္စတ္တဝစန’’န္တိ. သဒ္ဓါ ဇာတာ ဧတဿာတိ သဒ္ဓါဇာတော, အဂျာဟိတာတိပက္ခေပေန ဇာတ-သဒ္ဒဿ ပစ္ဆာဝစနံ[Pg.90]. ဧဝမေတန္တိ အဓိမုစ္စနံ ဩကပ္ပနိယသဒ္ဓါ. သန္တိကေ နိသီဒတိ ဥပဋ္ဌာနဝသေန. သာဓုကံ ကတွာ ဓာရေတီတိ ယထာသုတံ ဓမ္မံ ဝါစုဂ္ဂတကရဏဝသေန တံ ပဂုဏံ ကတွာ သာရဝသေန ဓာရေတိ. ဆန္ဒော ဇာယတီတိ ဓမ္မေသု နိဇ္ဈာနက္ခမေသု ဣမေ ဓမ္မေ ဘာဝနာပညာယ ပစ္စက္ခတော ဥဿာမီတိ ကတ္တုကမျတာကုသလစ္ဆန္ဒော ဇာယတိ. ဥဿဟတီတိ ဆန္ဒော ဥပ္ပာဒမတ္တေ အဋ္ဌတွာ တတော ဘာဝနာရမ္ဘဝသေန ဥဿဟတိ. တုလယတိတိ သမ္မသနဝသေန သင်္ခါရေ. တီရဏဝိပဿနာယ တုလယန္တောတိ တီရဏပရိညာယ ဇာနိတွာ ဥပရိ ပဟာနပရိညာယ ဝသေန ပရိတုလယန္တော ပဋိဇာနန္တော. မဂ္ဂပဓာနံ ပဒဟတီတိ မဂ္ဂလက္ခဏံ ပဓာနိကံ မဂ္ဂံ ပဒဟတိ. ပေသိတစိတ္တောတိ နိဗ္ဗာနံ ပတိ ပေသိတစိတ္တော. နာမကာယေနာတိ မဂ္ဂပ္ပဋိပါဋိယာ တံတံမဂ္ဂသမ္ပယုတ္တနာမကာယေန. န ပန ကိဉ္စိ အာဟာတိ ဒူရတာယ သမာနံ န ကိဉ္စိ ဝစနံ ဘဂဝါ အာဟ တေ ဒဠှတရံ နိဂ္ဂဏှိတုံ. १८३. 'आदि से ही' का अर्थ है प्रथम से ही। 'अनुक्रमिक शिक्षा' का अर्थ है अनुक्रम से ही प्रवृत्त शिक्षा। इसीलिए कहा गया है 'करण अर्थ में प्रथमा विभक्ति'। 'जिसकी श्रद्धा उत्पन्न हुई है' वह 'श्रद्धाजात' है, यहाँ 'जात' शब्द का प्रयोग बाद में किया गया है। 'ऐसा ही है' यह अधिमुक्ति (निश्चय) रूपी ओकप्पनीय (दृढ़) श्रद्धा है। 'पास बैठता है' सेवा के भाव से। 'भली-भाँति धारण करता है' का अर्थ है सुने हुए धर्म को कण्ठस्थ करने के द्वारा उसे अभ्यस्त करके सार रूप में धारण करता है। 'छन्द उत्पन्न होता है' का अर्थ है निध्यान-क्षम (चिंतन योग्य) धर्मों में 'इन धर्मों को भावना-प्रज्ञा से प्रत्यक्ष करूँगा' - इस प्रकार करने की इच्छा रूपी कुशल छन्द उत्पन्न होता है। 'उत्साह करता है' का अर्थ है केवल छन्द के उत्पन्न होने पर ही न रुककर, उसके बाद भावना के आरम्भ के द्वारा उत्साह करता है। 'तुलना करता है' का अर्थ है सम्मसन (परीक्षण) के द्वारा संस्कारों की। 'तीरण-विपश्यना से तुलना करते हुए' का अर्थ है तीरण-परिज्ञा से जानकर, ऊपर प्रहाण-परिज्ञा के वश से तुलना करते हुए, प्रतिज्ञान करते हुए। 'मार्ग-प्रधान का प्रयत्न करता है' का अर्थ है मार्ग-लक्षण वाले प्रधान मार्ग का प्रयत्न करता है। 'प्रेषित-चित्त' का अर्थ है निर्वाण की ओर प्रेषित चित्त वाला। 'नामकाय से' का अर्थ है मार्ग की परिपाटी से उस-उस मार्ग से सम्प्रयुक्त नामकाय से। 'किन्तु कुछ नहीं कहा' का अर्थ है दूर होने के कारण भगवान् ने तुम्हें और अधिक दृढ़ता से निगृहीत करने के लिए कोई वचन नहीं कहा। ၁၈၄. ပဏေန ဝေါဟာရေန ဗျာကရဏံ ပဏဝိယာ, ပဏဝိယာ အဘာဝေန ဩပဏဝိယာ, န ဥပေတီတိ န ယုဇ္ဇတိ. တန္တိ ဣဒံ ဣဓ အဓိပ္ပေတံ ပဏော ပဏဝိယံ ဒဿေတုံ. တယိဒံ သဗ္ဗံ ဘဂဝါ ‘‘မယံ ခေါ, အာဝုသော, သာယဉ္စေဝ ဘုဉ္ဇာမာ’’တိ အဿဇိပုနဗ္ဗသုကေဟိ ဝုတ္တံ သိက္ခာယ အဝတ္တနဘာဝဒီပနဝစနံ သန္ဓာယ ဝဒတိ. १८४. 'पण' अर्थात् व्यवहार के द्वारा व्याख्या 'पणविया' है, 'पणविया' के अभाव से 'ओपणविया' है, 'नहीं पहुँचता' का अर्थ है युक्त नहीं होता। 'वह' यह यहाँ 'पण' और 'पणविया' को दिखाने के लिए अभिप्रेत है। यह सब भगवान् ने 'आयुष्मन्, हम तो शाम को ही भोजन करते हैं' - इस प्रकार अस्सजि और पुनब्बसुक द्वारा कहे गए शिक्षा के प्रति अनादर भाव को प्रकट करने वाले वचनों के सन्दर्भ में कहा है। ဥက္ခိပိတွာတိ သီသေန ဂဟေတွာ ဝိယ သမာဒါယ. အနုဓမ္မောတိ အနုရူပေါ သဘာဝေါ, သာဝကဘာဝဿ အနုစ္ဆဝိကာ ပဋိပတ္တိ. ရောဟနီယန္တိ ဝိရုဠှိဘာဝံ. သိနိယှတိ ဧတ္ထ, ဧတေန ဝါတိ သိနေဟော, ကာရဏံ. တံ ဧတ္ထ အတ္ထီတိ သိနေဟဝန္တံ, ပါဒကန္တိ အတ္ထော. တစော ဧကံ အင်္ဂန္တိ တစော ဝီရပက္ခဘာဝေ ဧကမင်္ဂံ. ပဓာနံ အနုယုဉ္ဇန္တဿ ဟိ တစေ ပလုဇ္ဇမာနေပိ တံနိမိတ္တံ အဝေါသာနံ အနာပဇ္ဇနကဿေဝ ဝီရိယဿ ဧကံ အင်္ဂံ ဧကံ ကာရဏံ. ဧဝံ သေသေသု ဝတ္တဗ္ဗံ. တေနာဟ – ‘‘အရဟတ္တံ အပ္ပတွာ န ဝုဋ္ဌဟိဿာမီတိ ဧဝံ ပဋိပဇ္ဇတီ’’တိ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. 'उठाकर' (उक्खिपित्वा) का अर्थ है सिर से पकड़ने के समान ग्रहण कर। 'अनुधम्म' का अर्थ है अनुरूप स्वभाव, श्रावक भाव के योग्य प्रतिपत्ति। 'रोहनीय' का अर्थ है वृद्धि भाव। 'स्नेह' (सिनेहो) वह है जिसमें या जिसके द्वारा स्नेह किया जाता है, अर्थात कारण। 'स्नेहवान' का अर्थ है जिसमें वह (स्नेह) है, अर्थात पादक (आधार)। 'त्वचा एक अंग है' का अर्थ है वीर पक्ष में त्वचा एक अंग है। प्रधान (प्रयत्न) में लगे हुए व्यक्ति के लिए त्वचा के नष्ट होने पर भी उस कारण से हार न मानने वाले वीर्य का वह एक अंग, एक कारण है। इसी प्रकार शेष के विषय में भी कहना चाहिए। इसीलिए कहा गया है - 'अर्हत्व प्राप्त किए बिना नहीं उठूँगा, इस प्रकार प्रतिपन्न होता है'। शेष सुविज्ञेय ही है। ကီဋာဂိရိသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. कीटागिरि सुत्त की व्याख्या में लीनत्थप्पकासना (गूढ़ अर्थ का प्रकाशन) समाप्त हुई। နိဋ္ဌိတာ စ ဘိက္ခုဝဂ္ဂဝဏ္ဏနာ. और भिक्खु वग्ग की व्याख्या समाप्त हुई। ၃. ပရိဗ္ဗာဇကဝဂ္ဂေါ ३. परिब्बाजक वग्ग। ၁. တေဝိဇ္ဇဝစ္ဆသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. तेविज्जवच्छ सुत्त की व्याख्या। ၁၈၅. တတ္ထာတိ [Pg.91] ဧကပုဏ္ဍရီကသညိတေ ပရိဗ္ဗာဇကာရာမေ. အနာဂတပုဗ္ဗော လောကိယသမုဒါဟာရဝသေန ‘‘စိရဿံ ခေါ, ဘန္တေ’’တိအာဒိနာ ဝုစ္စတိ, အယံ ပနေတ္ထ အာဂတပုဗ္ဗတံ ဥပါဒါယ တထာ ဝုတ္တော. ဘဂဝါ ဟိ ကေသဉ္စိ ဝိမုတ္တိဇနနတ္ထံ, ကေသဉ္စိ ဣန္ဒြိယပရိပါကတ္ထံ, ကေသဉ္စိ ဝိသေသာဓိဂမတ္ထံ ကဒါစိ တိတ္ထိယာရာမံ ဥပဂစ္ဆတိ. အနနုညာယ ဌတွာတိ အနနုဇာနိတဗ္ဗေ ဌတွာ. အနုဇာနိတဗ္ဗံ သိယာ အနညာတဿ ဉေယျဿ အဘာဝတော. ယာဝတကဉှိ ဉေယျံ, တာဝတကံ ဘဂဝတော ဉာဏံ, ယာဝတကဉ္စ ဘဂဝတော ဉာဏံ တာဝတကံ ဉေယျံ. တေနေဝါဟ – ‘‘န တဿ အဒိဋ္ဌမိဓတ္ထိ ကိဉ္စိ, အထော အဝိညာတမဇာနိတဗ္ဗ’’န္တိအာဒိ (မဟာနိ. ၁၅၆; စူဠနိ. ဓောတကမာဏဝပုစ္ဆာနိဒ္ဒေသ ၃၂; ပဋိ. မ. ၁.၁၂၁). သဗ္ဗညုတညာဏေန ဟိ ဘဂဝါ အာဝဇ္ဇေတွာ ပဇာနာတိ. ဝုတ္တဉှေတံ ‘‘အာဝဇ္ဇနပဋိဗဒ္ဓံ ဗုဒ္ဓဿ ဘဂဝတော ဉာဏ’’န္တိ (မိ. ပ. ၄.၁.၂). ယဒိ ဧဝံ ‘‘စရံ သမာဟိတော နာဂေါ, တိဋ္ဌံ နာဂေါ သမာဟိတော’’တိ (အ. နိ. ၆.၄၃) ဣဒံ သုတ္တပဒံ ကထန္တိ? ဝိက္ခေပါဘာဝဒီပနပဒမေတံ, န အနာဝဇ္ဇနေနပိ ဉာဏာနံ ပဝတ္တိပရိဒီပနံ. ယံ ပနေတ္ထ ဝတ္တဗ္ဗံ, တံ ဟေဋ္ဌာ ဝိတ္ထာရတော ဝုတ္တမေဝ. १८५. 'वहाँ' (तत्थ) का अर्थ है एकपुण्डरीक नामक परिव्राजक आराम में। जो पहले कभी नहीं आया, उसे लौकिक व्यवहार के वश में 'बहुत समय बाद, भन्ते' आदि कहा जाता है, यहाँ यह पहले आने के आधार पर वैसा कहा गया है। भगवान कभी किसी की विमुक्ति उत्पन्न करने के लिए, कभी किसी की इन्द्रियों की परिपक्वता के लिए, कभी किसी की विशेष उपलब्धि के लिए तीर्थिकों के आराम में जाते हैं। 'अननुज्ञा में स्थित होकर' का अर्थ है जो अनुमत नहीं है उसमें स्थित होकर। अनुमत तब होता जब कोई अज्ञात ज्ञेय शेष होता। जितना ज्ञेय है, उतना ही भगवान का ज्ञान है, और जितना भगवान का ज्ञान है, उतना ही ज्ञेय है। इसीलिए कहा गया है - 'उनका यहाँ कुछ भी अनदेखा नहीं है, और न ही कुछ अनजाना या न जानने योग्य है' आदि। सर्वज्ञता ज्ञान से ही भगवान आवर्जन (ध्यान) कर जानते हैं। यह कहा भी गया है - 'बुद्ध भगवान का ज्ञान आवर्जन पर निर्भर है'। यदि ऐसा है, तो 'चलता हुआ नाग समाहित है, खड़ा हुआ नाग समाहित है' - यह सुत्त पद कैसे है? यह विक्षेप के अभाव को दर्शाने वाला पद है, न कि बिना आवर्जन के भी ज्ञानों की प्रवृत्ति को दर्शाने वाला। यहाँ जो कहना चाहिए, वह नीचे विस्तार से कहा ही गया है। ၁၈၆. ယာဝဒေဝါတိ ဣဒံ ယထာရုစိ ပဝတ္တိ ဝိယ အပရာပရုပ္ပတ္တိပိ ဣစ္ဆိတဗ္ဗာတိ တဒဘာဝံ ဒဿေန္တော အာဟ – ‘‘သကိံ ခီဏာနံ အာသဝါနံ ပုန ခေပေတဗ္ဗာဘာဝါ’’တိ. ပစ္စုပ္ပန္နဇာနနဂုဏန္တိ ဣဒံ ဒိဗ္ဗစက္ခုဉာဏဿ ပရိဘဏ္ဍဉာဏံ အနာဂတံသဉာဏံ အနာဒိယိတွာ ဝုတ္တံ, တဿ ပန ဝသေန အနာဂတံသဉာဏဂုဏံ ဒဿေတီတိ ဝတ္တဗ္ဗံ သိယာ. १८६. 'जब तक ही' (यावदेव) - यह जैसे रुचि के अनुसार प्रवृत्ति होती है, वैसे ही बार-बार उत्पत्ति भी इच्छित होनी चाहिए, उसके अभाव को दिखाते हुए कहा - 'एक बार आस्रवों के क्षीण हो जाने पर पुनः क्षीण करने की आवश्यकता नहीं होने से'। 'वर्तमान को जानने का गुण' - यह दिव्यचक्षु ज्ञान के सहायक ज्ञान अनागतंश ज्ञान को ग्रहण किए बिना कहा गया है, किन्तु उसके द्वारा अनागतंश ज्ञान के गुण को दर्शाता है - ऐसा कहना चाहिए। ဂိဟိပရိက္ခာရေသူတိ ဝတ္ထာဘရဏာဒိဓနဓညာဒိဂိဟိပရိက္ခာရေသု. ဂိဟိလိင်္ဂံ ပန အပ္ပမာဏံ, တသ္မာ ဂိဟိဗန္ဓနံ ဆိန္ဒိတွာ ဒုက္ခဿန္တကရာ ဟောန္တိယေဝ. သတိ ပန ဒုက္ခဿန္တကိရိယာယ ဂိဟိလိင်္ဂေ တေ န တိဋ္ဌန္တိယေဝါတိ ဒဿေန္တော ‘‘ယေပီ’’တိအာဒိမာဟ. သုက္ခာပေတွာ သမုစ္ဆိန္ဒိတွာ. အရဟတ္တံ ပတ္တဒိဝသေယေဝ ပဗ္ဗဇနံ ဝါ ပရိနိဗ္ဗာနံ ဝါတိ အယံ နယော န သဗ္ဗသာဓာရဏောတိ အာဟ ‘‘ဘူမဒေဝတာ ပန တိဋ္ဌန္တီ’’တိ. တတ္ထ ကာရဏဝစနံ [Pg.92] ‘‘နိလီယနောကာသဿ အတ္ထိတာယာ’’တိ. အရညပဗ္ဗတာဒိပဝိဝေကဋ္ဌာနံ နိလီယနောကာသော. သေသကာမဘဝေတိ ကာမလောကေ. လဠိတဇနဿာတိ အာဘရဏာလင်္ကာရနစ္စဂီတာဒိဝသေန ဝိလာသယုတ္တဇနဿ. 'गृहस्थ के परिष्कारों में' का अर्थ है वस्त्र, आभूषण, धन, धान्य आदि गृहस्थ की सामग्रियों में। गृहस्थ का लिंग (वेष) प्रमाण नहीं है, इसलिए गृहस्थ के बंधन को काटकर वे दुःख का अंत करने वाले होते ही हैं। दुःख का अंत होने पर वे गृहस्थ वेष में नहीं रहते, यह दिखाने के लिए 'जो भी' (येपि) आदि कहा। 'सुखाकर' का अर्थ है समूल नष्ट कर। 'अर्हत्व प्राप्त करने के दिन ही प्रव्रज्या या परिनिर्वाण' - यह नियम सबके लिए समान नहीं है, इसलिए कहा 'किन्तु भूम-देवता ठहरते हैं'। वहाँ कारण बताया गया है - 'छिपने के स्थान (निलय) की विद्यमानता के कारण'। अरण्य, पर्वत आदि विवेकपूर्ण स्थान छिपने के स्थान हैं। 'शेष काम-भव में' का अर्थ है कामलोक में। 'ललित जन का' का अर्थ है आभूषण, अलंकार, नृत्य, गीत आदि के कारण विलासयुक्त जन का। သောပီတိ ‘‘သော အညတြ ဧကေနာ’’တိ ဝုတ္တော သောပိ. ကရတော န ကရီယတိ ပါပန္တိ ဧဝံ န ကိရိယံ ပဋိဗာဟတိ. ယဒိ အတ္တာနံယေဝ ဂဟေတွာ ကထေတိ, အထ ကသ္မာ မဟာသတ္တော တဒါ အာဇီဝကပဗ္ဗဇ္ဇံ ဥပဂစ္ဆီတိ အာဟ ‘‘တဒါ ကိရာ’’တိအာဒိ. တဿပီတိ န ကေဝလံ အညေသံ ဧဝ ပါသဏ္ဍာနံ, တဿပိ. ဝီရိယံ န ဟာပေသီတိ တပေါဇိဂုစ္ဆဝါဒံ သမာဒိယိတွာ ဌိတော ဝိရာဂတ္ထာယ တံ သမာဒိဏ္ဏဝတ္တံ န ပရိစ္စဇိ, သတ္ထုသာသနံ န ဆဍ္ဍေသိ. တေနာဟ – ‘‘ကိရိယဝါဒီ ဟုတွာ သဂ္ဂေ နိဗ္ဗတ္တတီ’’တိ. "सोपीति" का अर्थ है "वह एक के अतिरिक्त अन्य" कहा गया वह भी। "करतो न करीयति पापन्ति" इस प्रकार वह क्रिया का निषेध करता है। यदि वह केवल अपने बारे में कहता है, तो फिर महासत्व ने उस समय आजीवक प्रव्रज्या क्यों ग्रहण की? इसलिए कहा "तदा किरा" आदि। "तस्सपीति" न केवल अन्य पाखण्डियों का, बल्कि उसका भी। "वीरियं न हापेसीति" तप-जुगुप्सावाद को ग्रहण कर स्थित होकर विराग के लिए उस ग्रहण किए हुए व्रत का परित्याग नहीं किया, शास्ता के शासन को नहीं छोड़ा। इसीलिए कहा - "क्रियावादी होकर स्वर्ग में उत्पन्न होता है।" တေဝိဇ္ဇဝစ္ဆသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. तेविज्जवच्छसुत्त की व्याख्या में लीनत्थप्पकासना (गूढ़ार्थ प्रकाशनी) समाप्त हुई। ၂. အဂ္ဂိဝစ္ဆသုတ္တဝဏ္ဏနာ २. अग्निवच्छसुत्त की व्याख्या ၁၈၇. လောကဿ သဿတတာပဝတ္တိပဋိက္ခေပဝသေန ပဝတ္တော ဝါဒေါ ဥစ္ဆေဒဝါဒေါ ဧဝ ဟောတီတိ သဿတဂ္ဂါဟာဘာဝေ ဥစ္ဆေဒဂ္ဂါဟဘာဝတော ပုန ပရိဗ္ဗာဇကေန ‘‘အသဿတော လောကော’’တိ ဝဒန္တေန ဥစ္ဆေဒဂ္ဂါဟော ပုစ္ဆိတော, ဘဂဝတာပိ သော ဧဝ ပဋိက္ခိတ္တောတိ အာဟ ‘‘ဒုတိယေ နာဟံ ဥစ္ဆေဒဒိဋ္ဌိကော’’တိ. အန္တာနန္တိကာဒိဝသေနာတိ ဧတ္ထ အန္တာနန္တိကဂ္ဂဟဏေန အန္တဝါ လောကော အနန္တဝါ လောကောတိ ဣမံ ဝါဒဒွယမာဟ. အာဒိ-သဒ္ဒေန ‘‘တံ ဇီဝံ တံ သရီရ’’န္တိအာဒိဝါဒစတုက္ကံ သင်္ဂဏှာတိ, ဣတရံ ပန ဒွယံ သရူပေနေဝ ဂဟိတန္တိ. ပဋိက္ခေပေါ ဝေဒိတဗ္ဗောတိ ‘‘တတိယေ နာဟံ အန္တဝါဒိဋ္ဌိကော, စတုတ္ထေ နာဟံ အနန္တဝါဒိဋ္ဌိကော’’တိ ဧဝမာဒိနာ ပဋိက္ခေပေါ ဝေဒိတဗ္ဗော. ‘‘ဟောတိ တထာဂတော ပရံ မရဏာ’’တိ အယမ္ပိ သဿတဝါဒေါ, သော စ ခေါ အပရန္တကပ္ပိကဝသေန, ‘‘သဿတော လောကော’’တိ ပန ပုဗ္ဗန္တကပ္ပိကဝသေနာတိ အယမေတေသံ ဝိသေသော. ‘‘န ဟောတိ တထာဂတော ပရံ မရဏာ’’တိ အယမ္ပိ ဥစ္ဆေဒဝါဒေါ, သော စ ခေါ သတ္တဝသေန, ‘‘အသဿတော လောကော’’တိ ပန သတ္တသင်္ခါရဝသေနာတိ ဝဒန္တိ. १८७. लोक की शाश्वतता की प्रवृत्ति के प्रतिषेध के कारण जो वाद प्रवृत्त होता है, वह उच्छेदवाद ही होता है, क्योंकि शाश्वत-ग्राह के अभाव में उच्छेद-ग्राह का भाव होता है। पुनः "लोक अशाश्वत है" कहने वाले परिव्राजक द्वारा उच्छेद-ग्राह पूछा गया, भगवान् ने भी उसका प्रतिषेध किया, इसलिए कहा "दूसरे में मैं उच्छेददृष्टि वाला नहीं हूँ।" "अन्तानन्तिकादिवसेनाति" यहाँ 'अन्तानन्तिक' ग्रहण से "लोक अन्तवान है, लोक अनन्त है" - यह वाद-द्वय कहा है। 'आदि' शब्द से "वही जीव है वही शरीर है" आदि चार वादों का संग्रह होता है, अन्य दो को उनके अपने रूप में ही ग्रहण किया गया है। प्रतिषेध समझना चाहिए - "तीसरे में मैं अन्तवादी दृष्टि वाला नहीं हूँ, चौथे में मैं अनन्तवादी दृष्टि वाला नहीं हूँ" इस प्रकार प्रतिषेध समझना चाहिए। "तथागत मरने के बाद होते हैं" यह भी शाश्वतवाद है, और वह अपरान्त-कल्पना के वश में है, किन्तु "लोक शाश्वत है" यह पूर्वान्त-कल्पना के वश में है - यह इनमें विशेष है। "तथागत मरने के बाद नहीं होते हैं" यह भी उच्छेदवाद है, और वह 'सत्व' के वश में है, किन्तु "लोक अशाश्वत है" यह 'सत्व-संस्कार' के वश में है - ऐसा कहते हैं। ၁၈၉. သပ္ပတိဘယံ [Pg.93] ဥပ္ပဇ္ဇနတော သဟ ဒုက္ခေနာတိ သဒုက္ခံ. တေနာဟ ‘‘ကိလေသဒုက္ခေနာ’’တိအာဒိ. တေသံယေဝါတိ ကိလေသဒုက္ခဝိပါကဒုက္ခာနံယေဝ. သဥပဃာတကန္တိ သဗာဓံ. သဥပါယာသန္တိ သပရိဿမံ သဥပတာပံ သပီဠံ. သပရိဠာဟန္တိ သဒရထံ. १८९. स-प्रतिभय (भय सहित) उत्पन्न होने से दुःख के साथ है, इसलिए 'सदुक्खं'। इसीलिए कहा "क्लेश-दुःख से" आदि। "तेसंयेवाति" उन्हीं क्लेश-दुःख और विपाक-दुःख का। "सउपघातकन्ति" बाधा सहित। "सउपायसान्ति" परिश्रम सहित, उपताप सहित, पीड़ा सहित। "सपरिळाहन्ति" दरथ (बेचैनी) सहित। ကိဉ္စိ ဒိဋ္ဌိဂတန္တိ ဣမာ တာဝ အဋ္ဌ ဒိဋ္ဌိယော မာ ဟောန္တု, အတ္ထိ ပန, ဘော ဂေါတမ, ယံ ကိဉ္စိ ဒိဋ္ဌိဂတံ ဂဟိတံ. န ဟိ တာယ ဒိဋ္ဌိယာ ဝိနာ ကဉ္စိ သမယံ ပဝတ္တေတုံ ယုဇ္ဇတီတိ အဓိပ္ပာယေန ပုစ္ဆတိ. အပဝိဒ္ဓန္တိ သမုစ္ဆေဒပ္ပဟာနဝသေန ဆဍ္ဍိတံ. ပညာယ ဒိဋ္ဌန္တိ ဝိပဿနာပညာသဟိတာယ မဂ္ဂပညာယ ဘဂဝတာ ပဋိဝိဒ္ဓံ. ယတ္ထ ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ, တံ သတ္တံ မထေန္တိ သမ္မဒ္ဒန္တီတိ မထိတာတိ အာဟ ‘‘မထိတာနန္တိ တေသံယေဝ ဝေဝစန’’န္တိ. ကဉ္စိ ဓမ္မန္တိ ရူပဓမ္မံ အရူပဓမ္မံ ဝါ. အနုပါဒိယိတွာတိ အဂ္ဂဟေတွာ. "किञ्चि दिट्ठिगतन्ति" - ये आठ दृष्टियाँ तो न हों, किन्तु हे गौतम! क्या कोई भी दृष्टिगत (मत) ग्रहण किया गया है? क्योंकि उस दृष्टि के बिना किसी समय (सिद्धान्त) को प्रवृत्त करना उचित नहीं है - इस अभिप्राय से पूछता है। "अपविद्धन्ति" समुच्छेद-प्रहाण के वश से छोड़ा हुआ। "पञ्ञाय दिट्ठन्ति" विपश्यना-प्रज्ञा सहित मार्ग-प्रज्ञा द्वारा भगवान् द्वारा प्रतिवेध किया गया। जहाँ उत्पन्न होते हैं, उस सत्व का मन्थन करते हैं, मर्दन करते हैं, इसलिए 'मथित' हैं; इसीलिए कहा "मथितानं उन्हीं का पर्यायवाची है।" "कञ्चि धम्मन्ति" रूप धर्म या अरूप धर्म को। "अनुपादियित्वाति" बिना ग्रहण किए। ၁၉၀. န ဥပေတီတိ သင်္ခံ န ဂစ္ဆတီတိ အတ္ထောတိ အာဟ ‘‘န ယုဇ္ဇတီ’’တိ. အနုဇာနိတဗ္ဗံ သိယာ အနုပါဒါဝိမုတ္တဿ ကဉ္စိပိ ဥပ္ပတ္တိယာ အဘာဝတော. ‘‘ဧဝံ ဝိမုတ္တစိတ္တော န ဥပပဇ္ဇတီ’’တိ ကာမဉ္စေတံ သဘာဝပဝေဒနံ ပရိနိဗ္ဗာနံ, ဧကေ ပန ဥစ္ဆေဒဝါဒိနော ‘‘မယမ္ပိ ‘သတ္တော အာယတိံ န ဥပပဇ္ဇတီ’တိ ဝဒါမ, သမဏော ဂေါတမောပိ တထာ ဝဒတီ’’တိ ဥစ္ဆေဒဘာဝေယေဝ ပတိဋ္ဌဟိဿန္တိ, တသ္မာ ဘဂဝါ ‘‘န ဥပပဇ္ဇတီတိ ခေါ ဝစ္ဆ န ဥပေတီ’’တိ အာဟ. ‘‘ဥပပဇ္ဇတီ’’တိ ပန ဝုတ္တေ သဿတမေဝ ဂဏှေယျာတိ ယောဇနာ. သေသဒွယေပိ ဧသေဝ နယော. အပ္ပတိဋ္ဌောတိ ဥစ္ဆေဒဝါဒါဒိဝသေန ပတိဋ္ဌာရဟိတော. အနာလမ္ဗောတိ တေသံယေဝ ဝါဒါနံ ဩလမ္ဗာရမ္မဏဿ အဘာဝေန အနာလမ္ဗော. သုခပဝေသနဋ္ဌာနန္တိ တေသညေဝ ဝါဒါနံ သုခပဝေသနောကာသံ မာ လဘတူတိ. အနနုညာယ ဌတွာတိ ‘‘န ဥပပဇ္ဇတီ’’တိအာဒိနာ အနုဇာနိတဗ္ဗာယ ပဋိညာယ ဌာနဟေတု. အနုညမ္ပီတိ အနုဇာနိတဗ္ဗမ္ပိ ဒုတိယပဉှံ ပဋိက္ခိပိ. ပရိယတ္တော ပန ဓမ္မော အတ္ထတော ပစ္စယာကာရော ဧဝါတိ အာဟ ‘‘ဓမ္မောတိ ပစ္စယာကာရဓမ္မော’’တိ. အညတ္ထ ပယောဂေနာတိ ဣမမှာ နိယျာနိကသာသနာ အညသ္မိံ မိစ္ဆာသမယေ ပဝတ္တပ္ပယောဂေန, အနိယျာနိကံ ဝိဝိဓံ မိစ္ဆာပဋိပတ္တိံ ပဋိပဇ္ဇန္တေနာတိ အတ္ထော. ‘‘အညဝါဒိယကေနာ’’တိပိ ပါဌော, ပစ္စယာကာရတော အညာကာရဒီပကအာစရိယဝါဒံ ပဂ္ဂယှ တိဋ္ဌန္တေနာတိ အတ္ထော. १९०. "न उपेतीति" संख्या में नहीं जाता है, यह अर्थ है; इसीलिए कहा "न युज्जतीति" (उचित नहीं है)। अनुज्ञात किया जाना चाहिए क्योंकि उपादान-रहित विमुक्त के लिए किसी भी उत्पत्ति का अभाव है। "इस प्रकार विमुक्त चित्त वाला उत्पन्न नहीं होता है" - यद्यपि यह स्वभाव का कथन परिनिर्वाण है, फिर भी कुछ उच्छेदवादी "हम भी कहते हैं कि 'सत्व भविष्य में उत्पन्न नहीं होता', श्रमण गौतम भी वैसा ही कहते हैं" - इस प्रकार उच्छेद-भाव में ही प्रतिष्ठित हो जाएँगे, इसलिए भगवान् ने कहा "वच्छ! 'उत्पन्न नहीं होता' यह लागू नहीं होता।" यदि "उत्पन्न होता है" कहा जाता, तो वह शाश्वत को ही ग्रहण करता - यह योजना है। शेष दो में भी यही न्याय है। "अप्पतिट्ठो" उच्छेदवाद आदि के कारण प्रतिष्ठा-रहित। "अनालम्बो" उन्हीं वादों के आलम्बन-आरम्भण के अभाव के कारण अनालम्बन। "सुखपवेसनट्ठानन्ति" उन्हीं वादों को सुखपूर्वक प्रवेश का अवसर न मिले। "अननुञ्ञाय ठत्वाति" "उत्पन्न नहीं होता" आदि के द्वारा अनुज्ञात की जाने वाली प्रतिज्ञा के स्थान के कारण। "अनुञ्ञम्पि" अनुज्ञात किए जाने योग्य दूसरे प्रश्न को भी प्रतिषेध किया। पर्यत्त धर्म अर्थतः प्रत्ययाकार (प्रतीत्यसमुत्पाद) ही है, इसीलिए कहा "धम्मोति प्रत्ययाकार धर्म"। "अञ्ञत्थ पयोगेनाति" इस निर्याणिक शासन से अन्य मिथ्या समय (मत) में प्रवृत्त प्रयोग से, अनिर्याणिक विविध मिथ्या प्रतिपत्ति का पालन करने से - यह अर्थ है। "अञ्ञवादियकेना" भी पाठ है, प्रत्ययाकार से अन्य आकार को दिखाने वाले आचार्य-वाद को पकड़कर स्थित होने से - यह अर्थ है। ၁၉၁. အပ္ပစ္စယောတိ [Pg.94] အနုပါဒါနော, နိရိန္ဓနောတိ အတ္ထော. १९१. "अप्पचयो" का अर्थ है अनुपादान (उपादान रहित), "निरिन्धो" (ईंधन रहित) यह अर्थ है। ၁၉၂. ယေန ရူပေနာတိ ယေန ဘူတုပါဒါဒိဘေဒေန ရူပဓမ္မေန. တံ ရူပံ တပ္ပဋိဗဒ္ဓသံယောဇနပ္ပဟာနေန ခီဏာသဝ-တထာဂတဿ ပဟီနံ အနုပ္ပတ္တိဓမ္မတံ အာပန္နံ. တေန ဝုတ္တံ ပါဠိယံ ‘‘အနုပ္ပာဒဓမ္မ’’န္တိအာဒိ. အညေသံ ဇာနနာယ အဘာဝဂုဏတာယ ဂုဏဂမ္ဘီရော. ‘‘ဧတ္တကာ ဂုဏာ’’တိ ပမာဏံ ဂဏှိတုံ န သက္ကုဏေယျော. ‘‘ဤဒိသာ ဧတဿ ဂုဏာ’’တိ ပရိယောဂါဟိတုံ အသက္ကုဏေယျတာယ ဒုပ္ပရိယောဂါဠှောတိ. ဒုဇ္ဇာနောတိ အဂါဓတာယ ဂမ္ဘီရော ‘‘ဧတ္တကာနိ ဥဒကဠှကသတာနီ’’တိအာဒိနာ ပမေတုံ န သက္ကာတိ အပ္ပမေယျော, တတော ဧဝ ဒုဇ္ဇာနော. ဧဝမေဝါန္တိ ယထာ မဟာသမုဒ္ဒေါ ဂမ္ဘီရော အပ္ပမေယျော ဒုဇ္ဇာနော, ဧဝမေဝ ခီဏာသဝေါပိ ဂုဏဝသေန, တသ္မာ အယံ ရူပါဒိံ ဂဟေတွာ ရူပီတိအာဒိဝေါဟာရော ဘဝေယျ, ပရိနိဗ္ဗုတဿ ပန တဒဘာဝါ တထာ ပညာပေတုံ န သက္ကာ, တတော တံ အာရဗ္ဘ ဥပပဇ္ဇတီတိအာဒိ န ယုဇ္ဇေယျ. ယထာ ပန ဝိဇ္ဇမာနော ဧဝ ဇာတဝေဒေါ ဗျတ္တေန ပုရိသေန နီယမာနော ပုရတ္ထိမာဒိဒိသံ ဂတောတိ ဝုစ္စေယျ, န နိဗ္ဗုတော, ဧဝံ ခီဏာသဝေါပီတိ ဒဿေန္တော ‘‘ဧဝမေဝါ’’တိအာဒိမာဟ. १९२. “येन रूपेनाति” का अर्थ है जिस भूतोपादादि भेद वाले रूपधर्म से। वह रूप, उस (रूप) से सम्बद्ध संयोजनों के प्रहाण से क्षीणास्रव-तथागत के लिए प्रहीण (नष्ट) हो गया है और अनुत्पत्ति-धर्मता को प्राप्त हो गया है। इसीलिए पालि में “अनुत्पादधम्मा” आदि कहा गया है। दूसरों के लिए जानने योग्य न होने के कारण वह गुणों में गम्भीर है। “इतने गुण हैं” इस प्रकार प्रमाण ग्रहण करना सम्भव नहीं है। “इसके ऐसे गुण हैं” इस प्रकार अवगाहन न कर पाने की योग्यता के कारण वह “दुष्पर्यवगाह” (कठिनता से अवगाहन करने योग्य) है। अगाध होने के कारण वह गम्भीर है, “इतने सौ जल-पात्र हैं” आदि के द्वारा मापा नहीं जा सकता, इसलिए वह “अप्रमेय” है, और इसी कारण “दुर्ज्ञेय” (कठिनता से जानने योग्य) है। “एवमेवाति” जैसे महासमुद्र गम्भीर, अप्रमेय और दुर्ज्ञेय है, वैसे ही क्षीणास्रव भी गुणों के कारण है; इसलिए यह रूपादि को ग्रहण कर “रूपी” आदि व्यवहार हो सकता है, परन्तु परिनिर्वृत के लिए उसका अभाव होने से वैसा प्रज्ञप्त करना सम्भव नहीं है, इसलिए उसके विषय में “उत्पन्न होता है” आदि कहना उचित नहीं होगा। जैसे विद्यमान अग्नि को ही चतुर पुरुष द्वारा ले जाते समय “पूर्व आदि दिशा में गया” कहा जा सकता है, बुझ जाने पर नहीं, वैसे ही क्षीणास्रव के विषय में भी दिखाने के लिए “एवमेवाति” आदि कहा गया है। အနိစ္စတာတိ ဧတ္ထ အနိစ္စတာဂဟဏံ အသာရနိဒဿနံ. တေန ယထာ သော သာလရုက္ခော သာခါပလာသာဒိအသာရာပဂမေန သုဒ္ဓေါ သာရေ ပတိဋ္ဌိတော, ဧဝမယံ ဓမ္မဝိနယော သာသဝသင်္ခါတအသာရဝိဂမေန လောကုတ္တရဓမ္မသာရေ ပတိဋ္ဌိတောတိ ဒဿေတိ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. “अनिच्चताति” यहाँ अनित्यता का ग्रहण असारता के निदर्शन के लिए है। उससे, जैसे वह साल का वृक्ष शाखा-पलाश आदि असार भागों के हट जाने से शुद्ध होकर सार (मज्जा) में प्रतिष्ठित होता है, वैसे ही यह धर्म-विनय सास्त्रव (आस्रव सहित) रूपी असार के दूर हो जाने से लोकोत्तर धर्म-सार में प्रतिष्ठित है, यह दर्शाता है। शेष सुविज्ञेय ही है। အဂ္ဂိဝစ္ဆသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. अग्निवच्छसुत्त की व्याख्या के लीनार्थ (गूढ़ अर्थ) का प्रकाशन समाप्त हुआ। ၃. မဟာဝစ္ဆသုတ္တဝဏ္ဏနာ ३. महावच्छसुत्त की व्याख्या। ၁၉၃. သဟ ကထာ ဧတဿ အတ္ထီတိ သဟကထီ, ‘‘မယံ ပုစ္ဆာဝသေန တုမှေ ဝိဿဇ္ဇနဝသေနာ’’တိ ဧဝံ သဟပဝတ္တကထောတိ အတ္ထော. ဧတဿေဝ ကထိတာနိ, တတ္ထ ပဌမေ ဝိဇ္ဇာတ္တယံ ဒေသိတံ, ဒုတိယေ အဂ္ဂိနာ ဒဿိတန္တိ တေဝိဇ္ဇဝစ္ဆသုတ္တံ အဂ္ဂိဝစ္ဆသုတ္တန္တိ နာမံ ဝိသေသေတွာ ဝုတ္တံ. သီဃံ လဒ္ဓိံ န ဝိဿဇ္ဇေန္တိ, ယသ္မာ သင်္ခါရာနံ နိယတောယံ ဝိနာသော အနညသမုပ္ပာဒေါ, ဟေတုသမုပ္ပန္နာပိ န စိရေန နိဇ္ဈာနံ ခမန္တိ, န လဟုံ. တေနာဟ ‘‘ဝသာတေလ [Pg.95] …ပေ… သုဇ္ဈန္တီ’’တိ. ပစ္ဆိမဂမနံ ဉာဏဿ ပရိပါကံ ဂတတ္တာ. ယဋ္ဌိံ အာလမ္ဗိတွာ ဥဒကံ တရိတုံ ဩတရန္တော ပုရိသော ‘‘ယဋ္ဌိံ ဩတရိတွာ ဥဒကေ ပတမာနော’’တိ ဝုတ္တော. ကမ္မပထဝသေန ဝိတ္ထာရဒေသနန္တိ သံခိတ္တဒေသနံ ဥပါဒါယ ဝုတ္တံ. တေနာဟ ‘‘မူလဝသေန စေတ္ထာ’’တိအာဒိ. ဝိတ္ထာရသဒိသာတိ ကမ္မပထဝသေန ဣဓ ဒေသိတဒေသနာဝ မူလဝသေန ဒေသိတဒေသနံ ဥပါဒါယ ဝိတ္ထာရသဒိသာ. ဝိတ္ထာရဒေသနာ နာမ နတ္ထီတိ န ကေဝလံ အယမေဝ, အထ ခေါ သဗ္ဗာပိ ဗုဒ္ဓါနံ နိပ္ပရိယာယေန ဥဇုကေန နိရဝသေသတော ဝိတ္ထာရဒေသနာ နာမ နတ္ထိ ဒေသနာဉာဏဿ မဟာဝိသယတာယ ကရဏသမ္ပတ္တိယာ စ တဇ္ဇာယ မဟာနုဘာဝတ္တာ သဗ္ဗညုတညာဏဿ. သဗ္ဗညုတညာဏသမင်္ဂိတာယ ဟိ အဝသေသပဋိသမ္ဘိဒါနုဘာဝိတာယ အပရိမိတကာလသမ္ဘတဉာဏသမ္ဘာရသမုဒါဂတာယ ကဒါစိပိ ပရိက္ခယာနရဟာယ အနညသာဓာရဏာယ ပဋိဘာနပဋိသမ္ဘိဒါယ ပဟူတဇိဝှာဒိတဒနုရူပရူပကာယသမ္ပတ္တိသမ္ပဒါယ ဝိတ္ထာရိယမာနာ ဘဂဝတော ဒေသနာ ကထံ ပရိမိတာ ပရိစ္ဆိန္နာ ဘဝေယျ, မဟာကာရုဏိကတာယ ပန ဘဂဝါ ဝေနေယျဇ္ဈာသယာနုရူပံ တတ္ထ တတ္ထ ပရိမိတံ ပရိစ္ဆိန္နံ ကတွာ နိဋ္ဌပေတိ. အယဉ္စ အတ္ထော မဟာသီဟနာဒသုတ္တေန (မ. နိ. ၁.၁၄၆ အာဒယော) ဒီပေတဗ္ဗော. သဗ္ဗံ သံခိတ္တမေဝ အတ္တဇ္ဈာသယဝသေန အကထေတွာ ဗောဓနေယျပုဂ္ဂလဇ္ဈာသယဝသေန ဒေသနာယ နိဋ္ဌာပိတတ္တာ. န စေတ္ထ ဓမ္မသာသနဝိရောဓော ပရိယာယံ အနိဿာယ ယထာဓမ္မံ ဓမ္မာနံ ဗောဓိတတ္တာ သဗ္ဗလဟုတ္တာ စာတိ. १९३. “सह कथा एतस्स अत्थीति सहकथी” - जिसके साथ कथा (बातचीत) हो, वह सहकथी है; “हम प्रश्न के माध्यम से और आप उत्तर के माध्यम से” इस प्रकार साथ-साथ चलने वाली कथा वाला, यह अर्थ है। इसी के लिए (कथाएँ) कही गई हैं, उनमें पहले में तीन विद्याओं का उपदेश दिया गया है, दूसरे में अग्नि के द्वारा दर्शाया गया है, इसलिए ‘तेविज्जवच्छसुत्त’ और ‘अग्निवच्छसुत्त’ नाम विशेष रूप से कहे गए हैं। वे शीघ्र ही अपनी लब्धि (दृष्टि) को नहीं छोड़ते, क्योंकि संस्कारों का यह विनाश निश्चित है और अन्य से उत्पन्न नहीं होता, हेतु से उत्पन्न होने पर भी वे शीघ्र ही निज्झान (ध्यान/क्षय) को प्राप्त नहीं होते, जल्दी नहीं। इसीलिए कहा “वसातेल ...पे... सुज्झन्ती” आदि। पीछे जाना ज्ञान के परिपक्व होने के कारण है। लाठी का सहारा लेकर जल पार करने के लिए उतरता हुआ पुरुष “लाठी लेकर जल में गिरता हुआ” कहा गया है। कर्मपथ के वश से विस्तारपूर्वक उपदेश को संक्षिप्त उपदेश के आधार पर कहा गया है। इसीलिए कहा “मूलवसेन चेत्था” आदि। विस्तार के समान - कर्मपथ के वश से यहाँ उपदिष्ट उपदेश ही मूल के वश से उपदिष्ट उपदेश के आधार पर विस्तार के समान है। “विस्तार देशना” नाम की कोई चीज़ नहीं है - ऐसा नहीं है कि केवल यही, बल्कि बुद्धों की सभी देशनाएँ निष्पर्याय रूप से, सीधे और पूर्ण रूप से “विस्तार देशना” नहीं कहलातीं, क्योंकि देशना-ज्ञान का विषय महान है और उसके अनुरूप सर्वज्ञता-ज्ञान का महान प्रभाव है। सर्वज्ञता-ज्ञान से युक्त होने के कारण, शेष प्रतिसंभिदाओं के प्रभाव से, अपरिमित काल तक संचित ज्ञान-संभार से उत्पन्न होने के कारण, कभी क्षय न होने वाली और अन्यों के लिए असाधारण प्रतिसंभिदा के कारण, और प्रचुर जिह्वा आदि उसके अनुरूप रूपकाय की सम्पत्ति से युक्त होने के कारण, भगवान की विस्तार की जाने वाली देशना कैसे परिमित या परिच्छिन्न हो सकती है? परन्तु महाकारुणिक होने के कारण भगवान विनेय (शिष्यों) के आशय के अनुरूप जहाँ-तहाँ परिमित और परिच्छिन्न करके समाप्त करते हैं। और यह अर्थ महासीहनादसुत्त के द्वारा स्पष्ट किया जाना चाहिए। सब कुछ संक्षिप्त ही है, क्योंकि अपने आशय के वश से न कहकर बोध प्राप्त करने वाले पुद्गलों के आशय के वश से देशना को समाप्त किया गया है। यहाँ धर्म-शासन का कोई विरोध नहीं है क्योंकि पर्याय का आश्रय लिए बिना यथाधर्म धर्मों का बोध कराया गया है और वे अत्यंत लघु (शीघ्र बोधगम्य) हैं। ၁၉၄. သတ္တ ဓမ္မာ ကာမာဝစရာ သမ္ပတ္တသမာဒါနဝိရတီနံ ဣဓာဓိပ္ပေတတ္တာ. १९४. सात धर्म कामावचर हैं क्योंकि यहाँ सम्प्राप्त और समादान विरतियों का अभिप्राय है। အနိယမေတွာတိ ‘‘သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ, သာဝကော’’တိ ဝါ နိယမံ ဝိသေသေန အကတွာ. အတ္တာနမေဝ…ပေ… ဝေဒိတဗ္ဗံ, တထာ ဟိ ပရိဗ္ဗာဇကော ‘‘တိဋ္ဌတု ဘဝံ ဂေါတမော’’တိ အာဟ. “अनियमेत्वाति” - “सम्यक्सम्बुद्ध” या “श्रावक” इस प्रकार विशेष रूप से नियम (निर्धारण) न करके। “अत्तानामेव...पे... वेदितब्बं” (स्वयं को ही... जानना चाहिए), क्योंकि वह परिव्राजक कहता है “भवन्त गौतम ठहरें”। ၁၉၅. သတ္ထာဝ အရဟာ ဟောတိ ပဋိပတ္တိယာ ပါရိပူရိဘာဝတော. တသ္မိံ ဗျာကတေတိ တသ္မိံ ‘‘ဧကဘိက္ခုပိ သာဝကော’’တိအာဒိနာ သုဋ္ဌု ပဉှေ ကထိတေ. १९५. प्रतिपत्ति (साधना) की परिपूर्णता के कारण शास्ता ही अर्हत् होते हैं। “तस्मिं ब्याकतेति” - उस “एक भिक्षु भी श्रावक है” आदि प्रश्नों के भली-भाँति उत्तर दिए जाने पर। ၁၉၆. သမ္ပာဒကောတိ ပဋိပတ္တိသမ္ပာဒကော. १९६. “सम्पादको” का अर्थ है प्रतिपत्ति (साधना) को सिद्ध करने वाला। ၁၉၇. သေခါယ [Pg.96] ဝိဇ္ဇာယာတိ သေခလက္ခဏပ္ပတ္တာယ မဂ္ဂပညာယ သာတိသယံ ကတွာ ကရဏဝသေန ဝုတ္တာ, ဖလပညာ ပန တာယ ပတ္တဗ္ဗတ္တာ ကမ္မဘာဝေန ဝုတ္တာ. တေနာဟ ‘‘ဟေဋ္ဌိမဖလတ္တယံ ပတ္တဗ္ဗ’’န္တိ. ဣမံ ပနေတ္ထ အဝိပရီတမတ္ထံ ပါဠိတော ဧဝ ဝိညာယမာနံ အပ္ပဋိဝိဇ္ဈနတော ဝိတဏ္ဍဝါဒီ ‘‘ယာဝတကံ သေခေန ပတ္တဗ္ဗံ, အနုပ္ပတ္တံ တံ မယာ’’တိ ဝစနလေသံ ဂဟေတွာ ‘‘အရဟတ္တမဂ္ဂေါပိ အနေန ပတ္တောယေဝါ’’တိ ဝဒတိ. ဧဝန္တိ ဣဒါနိ ဝုစ္စမာနာယ ဂါထာယ. १९७. “सेखाय विज्जायति” - शैक्ष लक्षणों को प्राप्त मार्ग-प्रज्ञा के द्वारा, इसे अतिशय रूप से करण (साधन) के रूप में कहा गया है, जबकि फल-प्रज्ञा उसके द्वारा प्राप्तव्य होने के कारण कर्म के रूप में कही गई है। इसीलिए कहा “हेट्ठिमफलत्तयं पत्तब्बं” (नीचे के तीन फलों को प्राप्त करना चाहिए)। यहाँ इस अविपरीत अर्थ को पालि से ही जानते हुए भी, उसका प्रतिवेध (साक्षात्कार) न करने के कारण वितण्डावादी “शैक्ष द्वारा जितना प्राप्त किया जाना चाहिए, वह मैंने प्राप्त कर लिया है” इस वचन के बहाने को पकड़कर कहता है कि “अर्हत्त्व मार्ग भी इसके द्वारा प्राप्त ही है”। “एवं” - अब कही जाने वाली गाथा के द्वारा। ကိလေသာနိ ပဟာယ ပဉ္စာတိ ပဉ္စောရမ္ဘာဂိယသံယောဇနသင်္ခါတေ သံကိလေသေ ပဟာယ ပဇဟိတွာ, ပဟာနဟေတု ဝါ. ပရိပုဏ္ဏသေခေါတိ သဗ္ဗသော ဝဍ္ဎိတသေခဓမ္မော. အပရိဟာနဓမ္မောတိ အပရိဟာနသဘာဝေါ. န ဟိ ယဿ ဖာတိဂတေဟိ သီလာဒိဓမ္မေဟိ ပရိဟာနိ အတ္ထိ, သမာဓိမှိ ပရိပူရကာရိတာယ စေတောဝသိပ္ပတ္တော. တေနာဟ ‘‘သမာဟိတိန္ဒြိယော’’တိ. အပရိဟာနဓမ္မတ္တာဝ ဌိတတ္တော. 'पाँच क्लेशों को त्यागकर' का अर्थ है पाँच ओराम्भागीय संयोजनों के रूप में संक्लेशों को त्यागकर, छोड़ कर, अथवा त्याग के कारण। 'परिपूर्ण शैक्ष' का अर्थ है सभी प्रकार से विकसित शैक्ष-धर्म वाला। 'अपरिहाणधर्मा' का अर्थ है जिसका स्वभाव पतनशील न हो। क्योंकि जिसकी शील आदि धर्मों में वृद्धि हुई है, उसकी हानि नहीं होती, समाधि में परिपूर्णता के कारण वह चित्त की वशवर्तिता को प्राप्त होता है। इसीलिए कहा गया है— 'समाहित इन्द्रियों वाला'। अपरिहाणधर्मा होने के कारण ही वह 'स्थित-आत्मा' है। အနာဂါမိနာ ဟိ အသေခဘာဝါဝဟာ ဓမ္မာ ပရိပူရေတဗ္ဗာ, န သေခဘာဝါဝဟာတိ သော ဧကန္တပရိပုဏ္ဏေ သေခေါ ဝုတ္တော. ဧတံ န ဗုဒ္ဓဝစနန္တိ ‘‘မဂ္ဂေါ ဗဟုစိတ္တက္ခဏိကော’’တိ ဧတံ ဝစနံ န ဗုဒ္ဓဝစနံ အနန္တရေကန္တဝိပါကဒါနတော, ဗဟုက္ခတ္တုံ ပဝတ္တနေ ပယောဇနာဘာဝတော စ လောကုတ္တရကုသလဿ, ‘‘သမာဓိမာနန္တရိကညမာဟု (ခု. ပါ. ၆.၅; သု. နိ. ၂၂၈), န ပါရံ ဒိဂုဏံ ယန္တီ’’တိ (သု. နိ. ၇၁၉) ဧဝမာဒီနိ သုတ္တပဒါနိ ဧတဿတ္ထသာဓကာနိ. ဩရမ္ဘာဂိယသံယောဇနပ္ပဟာနေန သေက္ခဓမ္မပရိပူရိဘာဝဿ ဝုတ္တတာယ အတ္ထော တဝ ဝစနေန ဝိရုဇ္ဈတီတိ. အဿ အာယသ္မတော ဝစ္ဆဿ. क्योंकि अनागामी द्वारा अशैक्ष-भाव को लाने वाले धर्मों को परिपूर्ण किया जाना चाहिए, न कि शैक्ष-भाव को लाने वाले धर्मों को, इसलिए उसे 'एकान्ततः परिपूर्ण शैक्ष' कहा गया है। 'यह बुद्धवचन नहीं है'— 'मार्ग बहुत चित्त-क्षणों वाला होता है', यह वचन बुद्धवचन नहीं है, क्योंकि लोकोत्तर कुशल अनन्तर और निश्चित रूप से विपाक देने वाला होता है और उसे बार-बार प्रवृत्त करने का कोई प्रयोजन नहीं होता। 'जिस समाधि को अनन्तरिक कहते हैं' और 'वे दूसरी बार पार नहीं जाते'— इस प्रकार के सूत्र-पद इस अर्थ को सिद्ध करते हैं। ओराम्भागीय संयोजनों के प्रहाण से शैक्ष-धर्मों की परिपूर्णता के कहे जाने के कारण, (आपका) अर्थ आपके वचन से विरुद्ध होता है। यह आयुष्मान् वच्छ का (वचन) है। ၁၉၈. အဘိညာ ဝါ ကာရဏန္တိ ယဉှိ တံ တတြ တတြ သက္ခိဘဗ္ဗတာသင်္ခါတံ ဣဒ္ဓိဝိဓပစ္စနုဘဝနာဒိ, တဿ အဘိညာ ကာရဏံ. အထ ဣဒ္ဓိဝိဓပစ္စနုဘဝနာဒိ အဘိညာ, ဧဝံ သတိ အဘိညာပါဒကဇ္ဈာနံ ကာရဏံ. အဝသာနေ ဆဋ္ဌာဘိညာယ ပန အရဟတ္တံ. ဧတ္ထ စ ယသ္မာ ပဌမသုတ္တေ အာသဝက္ခယော အဓိပ္ပေတော, အာသဝါ ခီဏာ ဧဝ, န ပုန ခေပေတဗ္ဗာ, တသ္မာ တတ္ထ ‘‘ယာဝဒေဝါ’’တိ န ဝုတ္တံ. ဣဓ ဖလသမာပတ္တိ အဓိပ္ပေတာ, သာ စ ပုနပ္ပုနံ သမာပဇ္ဇီယတိ, တသ္မာ ‘‘ယာဝဒေဝါ’’တိ ဝုတ္တံ. တတော ဧဝ ဟိ ‘‘အရဟတ္တံ ဝါ ကာရဏ’’န္တိ ဝုတ္တံ. တဉှိ ‘‘ကုဒါဿု နာမာဟံ တဒါယတနံ ဥပသမ္ပဇ္ဇ ဝိဟရိဿာမိ, [Pg.97] ယဒရိယာ ဧတရဟိ ဥပသမ္ပဇ္ဇ ဝိဟရန္တီ’’တိ (မ. နိ. ၁.၄၆၅; ၃.၃၀၇) အနုတ္တရေသု ဝိမောက္ခေသု ပိဟံ ဥပဋ္ဌပေတွာ အဘိညာ နိဗ္ဗတ္တေန္တဿ ကာရဏံ, တယိဒံ သဗ္ဗသာဓာရဏံ န ဟောတီတိ သာဓာရဏဝသေန နံ ဒဿေန္တော ‘‘အရဟတ္တဿ ဝိပဿနာ ဝါ’’တိ အာဟ. १९८. 'अभिज्ञा ही कारण है' का अर्थ है कि जो वहाँ-वहाँ साक्षात् करने की योग्यता के रूप में ऋद्धिविध का अनुभव आदि है, उसका कारण अभिज्ञा है। यदि ऋद्धिविध का अनुभव आदि ही अभिज्ञा है, तो ऐसी स्थिति में अभिज्ञा-पादक ध्यान कारण है। अंत में छठी अभिज्ञा के लिए अर्हत्व (कारण) है। और यहाँ क्योंकि प्रथम सूत्र में आस्रव-क्षय अभिप्रेत है, आस्रव क्षीण ही हो चुके हैं, उन्हें पुनः क्षीण नहीं करना है, इसलिए वहाँ 'जब तक' नहीं कहा गया। यहाँ फल-समापत्ति अभिप्रेत है, और वह बार-बार प्राप्त की जाती है, इसलिए 'जब तक' कहा गया है। इसीलिए 'अर्हत्व ही कारण है' ऐसा कहा गया है। क्योंकि 'कब मैं उस आयतन को प्राप्त कर विहार करूँगा, जिसमें आर्य अभी विहार करते हैं'— इस प्रकार अनुत्तर विमोक्षों में इच्छा रखते हुए अभिज्ञा उत्पन्न करने वाले के लिए वह कारण है, और यह सबके लिए साधारण नहीं होता, इसलिए साधारण रूप से उसे दिखाते हुए 'अर्हत्व की विपश्यना अथवा' ऐसा कहा। ၂၀၀. ပရိစရန္တိ နာမ ဝိပ္ပကတဗြဟ္မစရိယဝါသတ္တာ. ပရိစိဏ္ဏော ဟောတိ သာဝကေန နာမ သတ္ထု ဓမ္မေ ကတ္တဗ္ဗာ ပရိစရိယာ သမ္မဒေဝ နိဋ္ဌာပိတတ္တာ. တေနာဟ ‘‘ဣတိ…ပေ… ထေရော ဧဝမာဟာ’’တိ. တေသံ ဂုဏာနန္တိ တေသံ အသေက္ခဂုဏာနံ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. २००. 'परिचरण करते हैं' का अर्थ है ब्रह्मचर्य वास के अपूर्ण होने के कारण। 'परिचर्या की गई होती है' का अर्थ है श्रावक द्वारा शास्ता के धर्म में की जाने वाली सेवा का भली-भाँति समापन कर दिया जाना। इसीलिए कहा— 'इस प्रकार... पे... स्थविर ने ऐसा कहा'। 'उन गुणों का' का अर्थ है उन अशैक्ष गुणों का। शेष सुविज्ञ ही है। မဟာဝစ္ဆသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. महावच्छ-सुत्त की व्याख्या की लीनत्थप्पकासना समाप्त हुई। ၄. ဒီဃနခသုတ္တဝဏ္ဏနာ ४. दीघनख-सुत्त की व्याख्या। ၂၀၁. ခနနံ ခတံ, သူကရဿ ခတံ ဧတ္ထ အတ္ထီတိ သူကရခတာ, သူကရဿ ဝါ ဣမသ္မိံ ဗုဒ္ဓုပ္ပာဒေ ပဌမံ ခတံ ဥပါဒါယ သူကရခတာ, တာယ. ဧဝံနာမကေတိ ဧဝံ ဣတ္ထိလိင်္ဂဝသေန လဒ္ဓနာမကေ. ပံသုဓောတေတိ ဓောတပံသုကေ. ဩတရိတွာ အဘိရုဟိတဗ္ဗန္တိ ပကတိဘူမိတော အနေကေဟိ သောပါနဖလကေဟိ ဩတရိတွာ ပုန လေဏဒွါရံ ကတိပယေဟိ အဘိရုဟိတဗ္ဗံ. २०१. 'खनन' का अर्थ है खोदा हुआ, जहाँ सूअर द्वारा खोदा गया स्थान हो वह 'सूकरखता' है, अथवा इस बुद्ध-उत्पाद काल में सूअर द्वारा पहले खोदे जाने के कारण 'सूकरखता' (गुफा), उसके द्वारा। 'इस नाम वाली' का अर्थ है इस प्रकार स्त्रीलिंग के रूप में प्राप्त नाम वाली। 'पांसुधोते' का अर्थ है धुली हुई धूल वाली। 'उतरकर चढ़ना चाहिए' का अर्थ है प्राकृतिक भूमि से अनेक सीढ़ियों के पायदानों से उतरकर पुनः गुफा के द्वार तक कुछ (सीढ़ियों) से चढ़ना चाहिए। ဌိတကောဝါတိ မာတုလဿ ဌိတတ္တာ တတ္ထ သဂါရဝသပတိဿဝသေန ဌိတကောဝ. ကိဉ္စာပိ သဗ္ဗ-သဒ္ဒေါ အဝိသေသတော အနဝသေသပရိယာဒါယကော, ဝတ္ထုအဓိပ္ပာယာနုရောဓီ ပန သဒ္ဒပ္ပယောဂေါတိ တမတ္ထံ သန္ဓာယ ပရိဗ္ဗာဇကော ‘‘သဗ္ဗံ မေ နက္ခမတီ’’တိ အာဟ. ယာ လောကေ မနုဿဥပပတ္တိယောတိအာဒိကာ ဥပပတ္တိယော, တာ အနတ္ထသမုဒါဂတာ တတ္ထ တတ္ထေဝ သတ္တာနံ ဥစ္ဆိဇ္ဇနတော, တသ္မာ သမယဝါဒီဟိ ဝုစ္စမာနာ သဗ္ဗာ အာယတိံ ဥပ္ပဇ္ဇနဥပပတ္တိ န ဟောတိ. ဇလဗုဗ္ဗုဠကာ ဝိယ ဟိ ဣမေ သတ္တာ တတ္ထ တတ္ထ သမယေ ဥပ္ပဇ္ဇိတွာ ဘိဇ္ဇန္တိ, တေသံ တတ္ထ ပဋိသန္ဓိ နတ္ထီတိ အဿ အဓိပ္ပာယော. တေနာဟ ‘‘ပဋိသန္ဓိယော’’တိအာဒိ. အဿ အဓိပ္ပာယံ မုဉ္စိတွာတိ ယေနာဓိပ္ပာယေန ပရိဗ္ဗာဇကော ‘‘သဗ္ဗံ မေ နက္ခမတီ’’တိ အာဟ, တံ တဿ အဓိပ္ပာယံ ဇာနန္တောပိ အဇာနန္တော ဝိယ ဟုတွာ တဿ အက္ခရေ တာဝ ဒေါသံ ဒဿေန္တောတိ [Pg.98] ပဒေသသဗ္ဗံ သန္ဓာယ တေန ဝုတ္တံ, သဗ္ဗသဗ္ဗဝိသယံ ကတွာ တတ္ထ ဒေါသံ ဂဏှန္တော. ယထာ လောကေ ကေနစိ ‘‘သဗ္ဗံ ဝုတ္တံ, တံ မုသာ’’တိ ဝုတ္တေ တဿ ဝစနဿ သဗ္ဗန္တောဂဓတ္တာ မုသာဘာဝေါ အာပဇ္ဇေယျ, ဧဝံ ဣမဿပိ ‘‘သဗ္ဗံ မေ နက္ခမတီ’’တိ ဝဒတော တထာ ပဝတ္တာ ဒိဋ္ဌိပိ နက္ခမတီတိ အတ္ထတော အာပန္နမေဝ ဟောတိ. တေနာဟ ဘဂဝါ – ‘‘ဧသာပိ တေ ဒိဋ္ဌိ နက္ခမတီ’’တိ. ယထာ ပန ကေနစိ ‘‘သဗ္ဗံ ဝုတ္တံ မုသာ’’တိ ဝုတ္တေ အဓိပ္ပာယာနုရောဓိနီ သဒ္ဒပ္ပဝတ္တိ, တဿ ဝစနံ မုဉ္စိတွာ တဒညေသမေဝ မုသာဘာဝေါ ဉာယာဂတော, ဧဝမိဓာပိ ‘‘သဗ္ဗံ မေ နက္ခမတီ’’တိ ဝစနတော ယဿာ ဒိဋ္ဌိယာ ဝသေန ‘‘သဗ္ဗံ မေ နက္ခမတီ’’တိ တေန ဝုတ္တံ, တံ ဒိဋ္ဌိံ မုဉ္စိတွာ တဒညမေဝ ယထာဓိပ္ပေတံ သဗ္ဗံ နက္ခမတီတိ အယမတ္ထော ဉာယာဂတော, ဘဂဝါ ပန ဝါဒီဝရော သုခုမာယ အာဏိယာ ထူလံ အာဏိံ နီဟရန္တော ဝိယ ဥပါယေန တဿ ဒိဋ္ဌိဂတံ နီဟရိတုံ တဿ အဓိပ္ပာယေန အဝတွာ သဒ္ဒဝသေန တာဝ လဗ္ဘမာနံ ဒေါသံ ဒဿေန္တော ‘‘ယာပိ ခေါ တေ’’တိအာဒိမာဟ. တေန ဝုတ္တံ – ‘‘အဿ အဓိပ္ပာယံ မုဉ္စိတွာ အက္ခရေ တာဝ ဒေါသံ ဒဿေန္တော’’တိ. ‘स्थितको’ (खड़े हुए ही) का अर्थ है कि मामा के खड़े होने के कारण वहाँ गौरव और सम्मान के साथ खड़ा हुआ ही। यद्यपि ‘सब्ब’ (सब) शब्द सामान्य रूप से बिना किसी शेष के सबको ग्रहण करने वाला है, फिर भी शब्द का प्रयोग विषय के अभिप्राय के अनुसार होता है, उस अर्थ को ध्यान में रखते हुए परिव्राजक ने कहा— ‘मुझे सब कुछ स्वीकार नहीं है’। लोक में जो मनुष्य-उत्पत्ति आदि उत्पत्तियाँ हैं, वे अनर्थ से युक्त हैं क्योंकि वहाँ-वहाँ ही सत्त्वों का उच्छेद हो जाता है, इसलिए समयवादियों (सिद्धान्तवादियों) द्वारा कही गई भविष्य में होने वाली सभी उत्पत्तियाँ नहीं होतीं। जल के बुलबुलों की तरह ये सत्त्व उस-उस समय में उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं, उनकी वहाँ प्रतिसन्धि (पुनर्जन्म) नहीं होती—यह उसका अभिप्राय है। इसीलिए कहा गया— ‘प्रतिसन्धियाँ’ आदि। ‘उसके अभिप्राय को छोड़कर’ का अर्थ है कि जिस अभिप्राय से परिव्राजक ने ‘मुझे सब कुछ स्वीकार नहीं है’ कहा था, उस अभिप्राय को जानते हुए भी अनजान की तरह होकर, उसके शब्दों में दोष दिखाते हुए, उसने जो आंशिक ‘सब’ के संदर्भ में कहा था, उसे पूर्ण ‘सब’ का विषय बनाकर उसमें दोष ग्रहण करते हुए। जैसे लोक में किसी के द्वारा ‘सब कहा गया झूठ है’ कहने पर, उसके वचन के भी ‘सब’ के अंतर्गत होने के कारण उसका झूठ होना सिद्ध हो जाता है, वैसे ही इसके भी ‘मुझे सब कुछ स्वीकार नहीं है’ कहने पर, उस प्रकार प्रवृत्त हुई दृष्टि भी स्वीकार नहीं है—यह अर्थतः सिद्ध ही हो जाता है। इसीलिए भगवान ने कहा— ‘तुम्हें यह दृष्टि भी स्वीकार नहीं है’। किन्तु जैसे किसी के द्वारा ‘सब कहा गया झूठ है’ कहने पर शब्द की प्रवृत्ति अभिप्राय के अनुसार होती है, उसके वचन को छोड़कर अन्य वचनों का ही झूठ होना न्यायसंगत है, वैसे ही यहाँ भी ‘मुझे सब कुछ स्वीकार नहीं है’ इस वचन से, जिस दृष्टि के कारण उसने ‘मुझे सब कुछ स्वीकार नहीं है’ कहा था, उस दृष्टि को छोड़कर अन्य ही सब कुछ जैसा कि अभिप्रेत है, स्वीकार नहीं है—यह अर्थ न्यायसंगत है। किन्तु वादियों में श्रेष्ठ भगवान ने सूक्ष्म कील से स्थूल कील को निकालने के समान उपाय से उसके दृष्टिगत को निकालने के लिए, उसके अभिप्राय के अनुसार न कहकर, शब्द के आधार पर प्राप्त होने वाले दोष को दिखाते हुए ‘जो तुम्हारी यह (दृष्टि) है’ आदि कहा। इसीलिए कहा गया— ‘उसके अभिप्राय को छोड़कर शब्दों में दोष दिखाते हुए’। ပရိဗ္ဗာဇကော ပန ယံ သန္ဓာယ ‘‘သဗ္ဗံ မေ နက္ခမတီ’’တိ မယာ ဝုတ္တံ, ‘‘အယံ သော’’တိ ယထာဝုတ္တဒေါသပရိဟရဏတ္ထံ တသ္မိံ အတ္ထေ ဝုစ္စမာနေ ဧသ ဒေါသော သဗ္ဗော န ဟောတိ, ဧဝမ္ပိ သမဏော ဂေါတမော မမ ဝါဒေ ဒေါသမေဝ အာရောပေယျာတိ အတ္တနော အဇ္ဈာသယံ နိဂုဟိတွာ ယထာဝုတ္တဒေါသံ ပရိဟရိတုကာမော ‘‘ဧသာ မေ’’တိအာဒိမာဟ. တတ္ထ တမ္ပဿ တာဒိသမေဝါတိ ယံ ‘‘သဗ္ဗံ မေ နက္ခမတီ’’တိ ဂဟိတံ ဝတ္ထု, တမ္ပိ တာဒိသမေဝ ဘဝေယျာတိ. အယဉ္စ သဗ္ဗန္တောဂဓဒိဋ္ဌိ မယှမ္ပိ ဒိဋ္ဌိဝတ္ထု, တံ မေ ခမေယျဝါတိ. ယသ္မာ ပန ‘‘ဧသာပိ ဒိဋ္ဌိ တုယှံ နက္ခမတီ’’တိ ယာပိ ဒိဋ္ဌိ ဝုတ္တာ ဘဝတာ ဂေါတမေန, သာပိ မယှံ နက္ခမတိ, တသ္မာ သဗ္ဗံ မေ နက္ခမတေဝါတိ ပရိဗ္ဗာဇကဿ အဓိပ္ပာယော. တေနာဟ – ‘‘တံ ပရိဟရာမီတိ သညာယ ဝဒတီ’’တိ. တထာ စ ဝက္ခတိ ‘‘တသ္မာပိ ဥစ္ဆေဒဒိဋ္ဌိ မယှံ နက္ခမတီ’’တိ. ‘‘ဧသာ မေ ဒိဋ္ဌီ’’တိ ယာ ဌိတိဘူတာ ဒိဋ္ဌိ, တာယ ‘‘သဗ္ဗံ မေ နက္ခမတီ’’တိ ပနေတ္ထ သဗ္ဗဂ္ဂဟဏေန ဂဟိတတ္တာ အာဟ – ‘‘အတ္ထတော ပနဿ ဧသာ ဒိဋ္ဌိ န မေ ခမတီတိ အာပဇ္ဇတီ’’တိ. အယံ ဒေါသောတိ ဒဿေန္တော အာဟ ‘‘ယဿ ပနာ’’တိအာဒိ. ဧသာတိ ဒိဋ္ဌိ. ရုစိတန္တိ ဒိဋ္ဌိဒဿနေန အဘိနိဝိသိတွာ ရောစေတွာ ဂဟိတံ. တေန ဟိ ဒိဋ္ဌိအက္ခမေန အရုစိတေန ဘဝိတဗ္ဗန္တိ သတိ ဒိဋ္ဌိယာ အက္ခမဘာဝေ တတော တာယ ဂဟိတာယ ခမေယျ ရုစ္စေယျ ယထာ, ဧဝံ သဗ္ဗဿ အက္ခမဘာဝေတိ [Pg.99] အပရဘာဂေ သဗ္ဗံ ခမတိ ရုစ္စတီတိ အာပဇ္ဇတိ. န ပနေသ တံ သမ္ပဋိစ္ဆတီတိ ဧသ ‘‘သဗ္ဗံ မေ နက္ခမတီ’’တိ ဧဝံ ဝဒန္တော ဥစ္ဆေဒဝါဒီ တံ ဝုတ္တနယေန သဗ္ဗဿ ခမနံ ရုစ္စနံ န သမ္ပဋိစ္ဆတိ. ဉာယေန ဝုတ္တမတ္ထံ ကထံ န သမ္ပဋိစ္ဆတီတိ အာဟ ‘‘ကေဝလံ တဿာပိ ဥစ္ဆေဒဒိဋ္ဌိယာ ဥစ္ဆေဒမေဝ ဂဏှာတီ’’တိ. သဗ္ဗေသဉှိ ဓမ္မာနံ အာယတိံ ဥပ္ပာဒံ အရုစ္စိတွာ တံ သန္ဓာယ အယံ ‘‘သဗ္ဗံ မေ နက္ခမတီ’’တိ ဝဒတိ, ဥစ္ဆေဒဒိဋ္ဌိကေသု စ ဥစ္ဆိန္နေသု ကုတော ဥစ္ဆေဒဒိဋ္ဌိသဘာဝေါတိ. परिव्राजक ने तो जिस संदर्भ में ‘मुझे सब कुछ स्वीकार नहीं है’ कहा था, ‘यह वह है’—इस प्रकार कहे गए दोष के परिहार के लिए उस अर्थ के कहे जाने पर यह सारा दोष नहीं होता, फिर भी श्रमण गौतम मेरे वाद में दोष ही लगायेंगे—ऐसा सोचकर अपने आशय को छिपाकर, कहे गए दोष का परिहार करने की इच्छा से ‘यह मेरी’ आदि कहा। वहाँ ‘वह भी उसके लिए वैसा ही है’ का अर्थ है कि जो ‘मुझे सब कुछ स्वीकार नहीं है’ ऐसा ग्रहण किया गया विषय है, वह भी वैसा ही हो। और यह सब के अंतर्गत आने वाली दृष्टि मेरे लिए भी दृष्टि का विषय है, क्या वह मुझे स्वीकार होगी? क्योंकि ‘यह दृष्टि भी तुम्हें स्वीकार नहीं है’—जो दृष्टि आप गौतम द्वारा कही गई है, वह भी मुझे स्वीकार नहीं है, इसलिए मुझे सब कुछ स्वीकार ही नहीं है—यह परिव्राजक का अभिप्राय है। इसीलिए कहा गया— ‘मैं उसका परिहार करता हूँ, इस संज्ञा (विचार) से कहता है’। और वैसा ही कहेगा— ‘इसलिए उच्छेद-दृष्टि भी मुझे स्वीकार नहीं है’। ‘यह मेरी दृष्टि है’—जो स्थिर हुई दृष्टि है, उसके द्वारा ‘मुझे सब कुछ स्वीकार नहीं है’ यहाँ ‘सब’ के ग्रहण से गृहीत होने के कारण कहा— ‘अर्थतः उसकी यह दृष्टि मुझे स्वीकार नहीं है, ऐसा सिद्ध होता है’। ‘यह दोष है’—यह दिखाते हुए कहा ‘जिसकी तो’ आदि। ‘यह’ का अर्थ है दृष्टि। ‘रुचित’ का अर्थ है दृष्टि-दर्शन से अभिनिवेश करके, पसंद करके ग्रहण किया गया। इसलिए दृष्टि के अस्वीकार (अरुचित) होने पर, दृष्टि के अस्वीकार होने की स्थिति में, उससे ग्रहण किए गए के प्रति जैसे स्वीकार या रुचि हो, वैसे ही सबके अस्वीकार होने पर बाद में ‘सब स्वीकार है, रुचिकर है’—यह सिद्ध हो जाता है। ‘वह उसे स्वीकार नहीं करता’ का अर्थ है कि यह ‘मुझे सब कुछ स्वीकार नहीं है’ ऐसा कहने वाला उच्छेदवादी, उक्त रीति से सबके स्वीकार या रुचि को स्वीकार नहीं करता। न्याय से कहे गए अर्थ को वह क्यों स्वीकार नहीं करता? इसके लिए कहा— ‘केवल उस उच्छेद-दृष्टि से भी उच्छेद को ही ग्रहण करता है’। क्योंकि सभी धर्मों की भविष्य में उत्पत्ति को नापसंद करके, उस संदर्भ में यह ‘मुझे सब कुछ स्वीकार नहीं है’ कहता है, और उच्छेदवादियों के उच्छिन्न हो जाने पर उच्छेद-दृष्टि का स्वभाव कहाँ रहेगा? တေနာတိ တေန ကာရဏေန, ယသ္မာ ဣဓေကစ္စေ သတ္တာ ဤဒိသံ ဒိဋ္ဌိံ ပဂ္ဂယှ တိဋ္ဌန္တိ, တသ္မာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ပဇဟနကေန ဝါ စိတ္တေန ဧကဇ္ဈံ ဂဟေတွာ ပဇဟနကေဟိ အပ္ပဇဟနကေ နိဒ္ဓါရေတုံ ဘဂဝါ ‘‘အတော…ပေ… ဗဟုတရာ’’တိ အဝေါစာတိ အာဟ – ‘‘ပဇဟနကေသု နိဿက္က’’န္တိ ယထာ ‘‘ပဉ္စသီလေဟိ ပဘာဝနာ ပညဝန္တတရာ’’တိ. ‘‘ဗဟူ’’တိ ဝတွာ န ကေဝလံ ဗဟူ, အထ ခေါ အတိဝိယ ဗဟူတိ ဒဿေန္တော ‘‘ဗဟုတရာ’’တိ အာဟ. ‘‘ဗဟူ ဟီ’’တိ နယိဒံ နိဿက္ကဝစနံ, အထ ခေါ ပစ္စတ္တဝစနံ. ကထံ ဟိ-သဒ္ဒေါတိ အာဟ ‘‘ဟိ-ကာရော နိပါတမတ္တ’’န္တိ. အနိဿက္ကဝစနံ တာဝ တဿ ပဇဟနကာနံ ဗဟုဘာဝတော တေပိ ပရတော ‘‘ဗဟုတရာ’’တိ ဝုစ္စီယန္တိ. မူလဒဿနန္တိ ယေ တာဒိသံ ဒဿနံ ပဌမံ ဥပါဒိယန္တိ, တဇ္ဇာတိကမေဝ ပစ္ဆာ ဂဟိတဒဿနံ. ဝိဇာတိယဉှိ ပဌမံ ဂဟိတဒဿနံ အပ္ပဟာယ ဝိဇာတိယဿ ဂဟဏံ န သမ္ဘဝတိ ဝိရုဒ္ဓဿ အဘိနိဝေသဿ သဟ အနဝဋ္ဌာနတော. အဝိရုဒ္ဓံ ပန မူလဒဿနံ အဝိဿဇ္ဇိတွာ ဝိသယာဒိဘေဒဘိန္နံ အပရဒဿနံ ဂဟေတုံ လဗ္ဘတိ. တေနာဟ ‘‘ဧတ္ထ စာ’’တိအာဒိ. "तेनाति" का अर्थ है "उस कारण से", क्योंकि यहाँ कुछ प्राणी ऐसी दृष्टि को अपनाकर स्थित रहते हैं, इसलिए ऐसा कहा गया है। प्रहाण करने वाले चित्त के साथ एक साथ ग्रहण करके, प्रहाण करने वालों में से न प्रहाण करने वालों को पृथक करने के लिए भगवान ने "अतो... पे... बहुतरा" (इससे... बहुत अधिक) कहा - "प्रहाण करने वालों में अपादान" जैसे "पंचशीलों से भावना प्रज्ञावानों के लिए अधिक है"। "बहू" (बहुत) कहकर न केवल बहुत, बल्कि "अतिशय बहुत" दिखाने के लिए "बहुततर" कहा। "बहू हि" यह अपादान वचन नहीं है, बल्कि यह प्रथमा विभक्ति है। "हि" शब्द निपात मात्र है। अपादान वचन न होने पर भी, प्रहाण करने वालों की बहुलता के कारण उन्हें भी बाद में "बहुततर" कहा जाता है। "मूलदर्शन" का अर्थ है जो वैसी दृष्टि को पहले ग्रहण करते हैं, बाद में ग्रहण की गई दृष्टि उसी जाति की होती है। विजातीय पहले ग्रहण की गई दृष्टि को बिना छोड़े विजातीय का ग्रहण संभव नहीं है क्योंकि विरुद्ध अभिनिवेश एक साथ नहीं रह सकते। अविरुद्ध मूलदर्शन को बिना छोड़े विषयादि के भेद से भिन्न अन्य दर्शन को ग्रहण करना संभव है। इसीलिए "एत्थ च" आदि कहा गया है। တတ္ထ ကိဉ္စာပိ ဧကစ္စသဿတဝါဒေါ သဿတုစ္ဆေဒါဘိနိဝေသာနံ ဝသေန ယထာက္ကမံ သဿတုစ္ဆေဒဂ္ဂါဟနဇာတိကော, ဥစ္ဆေဒဂ္ဂါဟေန ပန သဿတာဘိနိဝေသဿ တံဂါဟေန စ အသဿတာဘိနိဝေသဿ ဝိရုဇ္ဈနတော ဥဘယတ္ထပိ ‘‘ဧကစ္စသဿတံ ဝါ ဂဟေတုံ န သက္ကာ’’တိ ဝုတ္တံ, တထာ ‘‘သဿတံ ဝါ ဥစ္ဆေဒံ ဝါ န သက္ကာ ဂဟေတု’’န္တိ စ. မူလသဿတဉှိ ပဌမံ ဂဟိတံ. အာယတနေသုပိ ယောဇေတဗ္ဗန္တိ ပဌမံ စက္ခာယတနံ သဿတန္တိ ဂဟေတွာ အပရဘာဂေ န ကေဝလံ စက္ခာယတနမေဝ သဿတံ, သောတာယတနမ္ပိ သဿတံ, ဃာနာယတနာဒိပိ သဿတန္တိ ဂဏှာတီတိအာဒိနာ ယောဇေတဗ္ဗံ. အာယတနေသုပီတိ ပိ-သဒ္ဒေန ဓာတူနံ ဣန္ဒြိယာနမ္ပိ ဂါဟော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ဣဒံ သန္ဓာယာတိ [Pg.100] ‘‘မူလေ သဿတ’’န္တိအာဒိနာ ဝုတ္တပဌမဂ္ဂါဟဿ သမာနဇာတိယံ အပရဂ္ဂါဟံ သန္ဓာယ. वहाँ यद्यपि एकच्च-शाश्वतवाद शाश्वत और उच्छेद के अभिनिवेश के वश से यथाक्रम शाश्वत और उच्छेद को ग्रहण करने के स्वभाव वाला है, परन्तु उच्छेद के ग्रहण से शाश्वत के अभिनिवेश का और उसके ग्रहण से अशाश्वत के अभिनिवेश का विरोध होने के कारण दोनों ही स्थितियों में "एकच्च-शाश्वत को ग्रहण करना संभव नहीं है" ऐसा कहा गया है, वैसे ही "शाश्वत या उच्छेद को ग्रहण करना संभव नहीं है" ऐसा भी। मूल शाश्वत ही पहले ग्रहण किया गया है। "आयतनों में भी योजित करना चाहिए" इसमें पहले चक्षु-आयतन शाश्वत है ऐसा ग्रहण करके, बाद में न केवल चक्षु-आयतन ही शाश्वत है, बल्कि श्रोत्र-आयतन भी शाश्वत है, घ्राण-आयतन आदि भी शाश्वत हैं - इस प्रकार योजित करना चाहिए। "आयतनों में भी" यहाँ 'अपि' शब्द से धातुओं और इन्द्रियों का ग्रहण भी समझना चाहिए। "इसे लक्ष्य करके" अर्थात् "मूल में शाश्वत है" इत्यादि द्वारा कहे गए प्रथम ग्रहण के समान जाति वाले उत्तरवर्ती ग्रहण को लक्ष्य करके। ဒုတိယဝါရေ ပဌမဝါရေ ဝုတ္တသဒိသံ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗံ. တတ္ထ အာဒီနဝံ ဒိသွာတိ ‘‘ယဒိ ရူပံ သဿတံ သိယာ, နယိဒံ အာဗာဓာယ သံဝတ္တေယျ. ယသ္မာ စ ခေါ ဣဒံ ရူပံ အသဿတံ, တသ္မာ အဘိဏှပဋိပီဠနဋ္ဌေန ဥဒယဝယဝန္တတာယ ရူပံ အနိစ္စံ သင်္ခတံ ပဋိစ္စသမုပ္ပန္နံ, သဿတာဘိနိဝေသော မိစ္ဆာ’’တိအာဒိနာ တတ္ထ သဿတဝါဒေ အာဒီနဝံ ဒေါသံ ဒိသွာ. ဩဠာရိကန္တိ တသ္မာ ပဋိပီဠနဋ္ဌေန အယာထာဝဂ္ဂါဟတာယ ရူပံ န သဏှံ ဩဠာရိကမေဝ. ဝေဒနာဒီနမ္ပိ အနိစ္စာဒိဘာဝဒဿနံ ရူပဝေဒနာအာဒီနံ သမာနယောဂက္ခမတ္တာ. ဝိဿဇ္ဇေတီတိ ပဇဟတိ. दूसरे अवसर पर पहले अवसर में कहे गए के समान ही कहे गए न्याय से समझना चाहिए। वहाँ "आदीनव को देखकर" अर्थात् "यदि रूप शाश्वत होता, तो यह व्याधि के लिए प्रवृत्त नहीं होता। चूँकि यह रूप अशाश्वत है, इसलिए निरंतर पीड़ित होने के अर्थ में, उदय और व्यय वाला होने के कारण रूप अनित्य, संस्कृत, प्रतीत्यसमुत्पन्न है, शाश्वत का अभिनिवेश मिथ्या है" इत्यादि रूप में उस शाश्वतवाद में आदीनव दोष को देखकर। "औदारिक" इसलिए पीड़ित होने के अर्थ में यथार्थ ग्रहण न होने के कारण रूप सूक्ष्म नहीं है, औदारिक ही है। वेदना आदि का भी अनित्यता आदि के रूप में दर्शन रूप-वेदना आदि के समान योग-क्षेम होने के कारण है। "विसज्जेति" का अर्थ है त्यागता है। တိဿော လဒ္ဓိယောတိ သဿတုစ္ဆေဒဧကစ္စသဿတဒိဋ္ဌိယော. ယသ္မာ သဿတဒိဋ္ဌိကာ ဝဋ္ဋေ ရဇ္ဇနဿ အာသန္နာ. တထာ ဟိ တေ ဩလီယန္တီတိ ဝုစ္စန္တိ, ဘဝါဘဝဒိဋ္ဌီနံ ဝသေန ဣမေသံ သတ္တာနံ သံသာရတော သီသုက္ခိပနံ နတ္ထီတိ ဧတာဝ တိဿော ဝိသေသတော ဂဟေတဗ္ဗာ. "तीन लब्धियाँ" अर्थात् शाश्वत, उच्छेद और एकच्च-शाश्वत दृष्टियाँ। चूँकि शाश्वत-दृष्टि वाले संसार में आसक्त होने के निकट होते हैं। वैसे ही वे "लीन होते हैं" कहे जाते हैं, भव और अभाव की दृष्टियों के वश से इन प्राणियों का संसार से उद्धार नहीं है, इसलिए ये तीन विशेष रूप से ग्रहण करने योग्य हैं। ဣဓလောကံ ပရလောကဉ္စ အတ္ထီတိ ဇာနာတီတိ ဧတ္တာဝတာ သဿတဒဿနဿ အပ္ပသာဝဇ္ဇတာကာရဏမာဟ, ဝဋ္ဋံ အဿာဒေတိ, အဘိနန္ဒတီတိ ဣမိနာ ဒန္ဓဝိရာဂတာယ. တေနာဟ ‘‘တသ္မာ’’တိအာဒိ. ဣဓလောကံ ပရလောကဉ္စ အတ္ထီတိ ဇာနာတီတိ ဣမိနာ တာသု တာသု ဂတီသု သတ္တာနံ သံသရဏံ ပဋိက္ခိပတီတိ ဒဿေတိ, သုကတဒုက္ကဋာနံ ကမ္မာနံ ဖလံ အတ္ထီတိ ဇာနာတီတိ ဣမိနာ ကမ္မဖလံ. ကုသလံ န ကရောတီတိ ဣမိနာ ကမ္မံ, အကုသလံ ကရောန္တော န ဘာယတီတိ ဣမိနာ ပုညာပုညာနိ သဘာဝတော ဇာယန္တီတိ ဒဿေတိ. ဝဋ္ဋံ အဿာဒေတိ အဘိနန္ဒတိ တန္နိန္နဘာဝတော. သီဃံ လဒ္ဓိံ ဇဟိတုံ န သက္ကောတိ ဝဋ္ဋုပစ္ဆေဒဿ အရုစ္စနတော. ဥစ္ဆေဒဝါဒီ ဟိ တသ္မိံ ဘဝေ ဥစ္ဆေဒံ မညတိ. တတော ပရံ ဣဓလောကံ ပရလောကဉ္စ အတ္ထီတိ ဇာနာတိ သုကတဒုက္ကဋာနံ ဖလံ အတ္ထီတိ ဇာနာတိ ကမ္မဖလဝါဒီဘာဝတော. ယေဘုယျေန ဟိ ဥစ္ဆေဒဝါဒီ သဘာဝနိယတိယဒိစ္ဆာဘိနိဝေသေသု အညတြာဘိနိဝေသော ဟောတိ. သီဃံ ဒဿနံ ပဇဟတိ ဝဋ္ဋာဘိရတိယာ အဘာဝတော. ပါရမိယော ပူရေတုံ သက္ကောန္တော ပစ္စေကဗုဒ္ဓေါ ဟုတွာ, လောကဝေါဟာရမတ္တေနေဝ သော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ ဟုတွာ ပရိနိဗ္ဗာယတီတိ ယောဇနာ. အသက္ကောန္တောတိ ဗုဒ္ဓေါ ဟောတုံ အသက္ကောန္တော. အဘိနီဟာရံ [Pg.101] ကတွာ အဂ္ဂသာဝကာဒိဘာဝဿ အဘိနီဟာရံ သမ္ပာဒေတွာ. သာဝကော ဟုတွာတိ အဂ္ဂသာဝကော မဟာသာဝကော ဟုတွာ, တတ္ထာပိ တေဝိဇ္ဇော ဆဠဘိညော ပဋိသမ္ဘိဒါပ္ပတ္တော ဝါ သုက္ခဝိပဿကော ဧဝ ဝါ ဗုဒ္ဓသာဝကော ဟုတွာ ပရိနိဗ္ဗာယတိ. သဗ္ဗမိဒံ ဥစ္ဆေဒဝါဒိနော ကလျာဏမိတ္တနိဿယေန သမ္မတ္တနိယာမောက္ကမနေ ခိပ္ပဝိရာဂတာဒဿနတ္ထံ အာဂတံ. တေနာဟ ‘‘တသ္မာ’’တိအာဒိ. "इहलोक और परलोक है" ऐसा जानता है - इतने से शाश्वत दर्शन के अल्प-दोषपूर्ण होने का कारण कहा है, "संसार का आस्वादन करता है, अभिनन्दन करता है" इससे मन्द-विरागता के कारण। इसीलिए "तस्मा" आदि कहा गया है। "इहलोक और परलोक है" ऐसा जानता है - इससे उन-उन गतियों में प्राणियों के संसरण का निषेध करता है, "सुकृत और दुष्कृत कर्मों का फल है" ऐसा जानता है - इससे कर्मफल को। "कुशल नहीं करता" इससे कर्म को, "अकुशल करते हुए नहीं डरता" इससे पुण्य-अपुण्य स्वभाव से उत्पन्न होते हैं, यह दिखाता है। संसार का आस्वादन करता है और अभिनन्दन करता है क्योंकि वह उसी की ओर झुका हुआ है। "शीघ्र लब्धि को छोड़ने में समर्थ नहीं होता" क्योंकि संसार के उच्छेद में उसकी रुचि नहीं है। उच्छेदवादी तो उस भव में उच्छेद मानता है। उसके बाद "इहलोक और परलोक है" ऐसा जानता है, "सुकृत-दुष्कृत का फल है" ऐसा जानता है क्योंकि वह कर्मफलवादी है। प्रायः उच्छेदवादी स्वभाव-नियत-यदृच्छा के अभिनिवेशों में से किसी अन्य में अभिनिविष्ट होता है। वह शीघ्र दर्शन को छोड़ देता है क्योंकि संसार में उसकी अभिरति नहीं होती। पारमिताओं को पूर्ण करने में समर्थ होकर प्रत्येकबुद्ध होकर, लोक-व्यवहार मात्र से वह सम्यक्सम्बुद्ध होकर परिनिर्वाण प्राप्त करता है - ऐसा योजन है। "असमर्थ" अर्थात् बुद्ध होने में असमर्थ। "अभिनिहार करके" अर्थात् अग्रश्रावक आदि होने का संकल्प पूरा करके। "श्रावक होकर" अर्थात् अग्रश्रावक या महाश्रावक होकर, वहाँ भी त्रैविद्य, षडभिज्ञ, प्रतिसंभिदाप्राप्त या केवल शुष्कविपश्यक बुद्धश्रावक होकर परिनिर्वाण प्राप्त करता है। यह सब उच्छेदवादी के कल्याणमित्र के आश्रय से सम्यक्त्व-नियम में प्रवेश करने पर शीघ्र विरागता दिखाने के लिए आया है। इसीलिए "तस्मा" आदि कहा गया है। ၂၀၂. ကဉ္ဇိယေနေဝါတိ အာရနာဠေန. ကဉ္ဇိယသဒိသေန ဥစ္ဆေဒဒဿနေန. ပူရိတောတိ ပရိပုဏ္ဏဇ္ဈာသယော. သောတိ ပရိဗ္ဗာဇကော. အပ္ပဟာယာတိ အဘိန္ဒိတွာ. ဝိဂ္ဂဟောတိ ကလဟော ဣဒမေဝ သစ္စံ, မောဃမညန္တိ အညမညံ ဝိရုဒ္ဓဂ္ဂါဟောတိ ကတွာ. ဝိဝါဒန္တိ ဝိရုဒ္ဓဝါဒံ. ဝိဃာတန္တိ ဝိရောဓဟေတုကံ စိတ္တဝိဃာတံ. ဝိဟေသန္တိ ဝိဂ္ဂဟဝိဝါဒနိမိတ္တံ ကာယိကံ စေတသိကဉ္စ ကိလမထံ. အာဒီနဝံ ဒိသွာတိ ဧတာသံ ဒိဋ္ဌီနံ ဧဝရူပေါ အာဒီနဝေါ, အနိယျာနိကဘာဝတာယ ပန သမ္ပတိ အာယတိဉ္စ မဟာဒီနဝေါတိ ဧဝံ အာဒီနဝံ ဒိသွာ. २०२. 'कञ्जियेनेवा' का अर्थ है आरनाल (खट्टी कांजी) से। कांजी के समान उच्छेद-दृष्टि से। 'पूरितो' का अर्थ है परिपूर्ण आशय वाला। 'सो' वह परिव्राजक है। 'अप्पहाय' का अर्थ है बिना छोड़े (बिना तोड़े)। 'विग्गहो' का अर्थ है कलह, 'यही सत्य है, अन्य सब व्यर्थ है' - इस प्रकार परस्पर विरोधी ग्रहण करना। 'विवाद' का अर्थ है विरुद्ध वाद। 'विघात' का अर्थ है विरोध के कारण होने वाला चित्त का विघात। 'विहेसा' का अर्थ है विग्रह और विवाद के कारण होने वाली कायिक और चैतसिक थकान। 'आदीनवं दिस्वा' का अर्थ है इन दृष्टियों में इस प्रकार का दोष देखकर, और अनिय्यानिक (मुक्ति न देने वाला) होने के कारण वर्तमान और भविष्य में महान दोष देखकर। ၂၀၅. ‘‘ဧသောဟမသ္မိ, ဧသော မေ အတ္တာ’’တိအာဒိနာ (မ. နိ. ၁.၂၄၁; သံ. နိ. ၃.၈) ကာယံ အနွေတီတိ ကာယနွယော, သောယေဝ, တဿ ဝါ သမူဟော ကာယနွယတာ, ကာယပဋိဗဒ္ဓေါ ကိလေသော. တေနာဟ ‘‘ကာယံ…ပေ… အတ္ထော’’တိ. २०५. "यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है" इत्यादि के द्वारा जो शरीर का अनुसरण करता है, वह 'कायान्वय' है। वही, अथवा उसका समूह 'कायान्वयता' है, जो शरीर से सम्बद्ध क्लेश है। इसीलिए कहा गया है - "शरीर... पे... अर्थ"। အသမ္မိဿဘာဝန္တိ အသင်္ကရတော ဝဝတ္ထိတဘာဝံ. တေန တာသံ ယထာသကံ ပစ္စယာနံ ဥပ္ပဇ္ဇိတွာ ဝိဂမံ ဒဿေတိ. ဧဝဉှိ တာသံ ကဒါစိပိ သင်္ကရော နတ္ထိ. တေနာဟ ‘‘တတြာယံ သင်္ခေပတ္ထော’’တိအာဒိ. သရူပံ အဂ္ဂဟေတွာ ‘‘အညာ ဝေဒနာ’’တိ အနိယမေန ဝုတ္တတ္တာ တမေဝ ဝိဂမံ ဒဿေန္တော ‘‘အနုပ္ပန္နာဝ ဟောန္တိ အန္တရဟိတာ ဝါ’’တိ အာဟ. သရူပတော နိယမေတွာ ဝုစ္စမာနေ ကာစိ အနုပ္ပန္နာ ဝါ ဟောတိ, ကာစိ အန္တရဟိတာ ဝါတိ. စုဏ္ဏဝိစုဏ္ဏဘာဝဒဿနတ္ထန္တိ ခဏေ ခဏေ ဘိဇ္ဇမာနဘာဝဒဿနတ္ထံ. 'असम्मिसभावं' का अर्थ है असङ्कर (मिश्रण रहित) रूप से व्यवस्थित भाव। उससे उन (वेदनाओं) के अपने-अपने प्रत्ययों से उत्पन्न होकर नष्ट होने को दिखाता है। इस प्रकार उनमें कभी भी संकर (मिश्रण) नहीं होता। इसीलिए कहा गया है - "तत्रायं सङ्खेपत्थो" इत्यादि। स्वरूप को ग्रहण न करके "अन्य वेदना" इस प्रकार अनियम से कहे जाने के कारण उसी विनाश को दिखाते हुए "अनुत्पन्न ही होती हैं या अन्तर्हित हो जाती हैं" ऐसा कहा। स्वरूप से नियमपूर्वक कहे जाने पर कोई अनुत्पन्न होती है, कोई अन्तर्हित होती है। 'चुण्णविचुण्णभावदस्सनत्थं' का अर्थ है क्षण-क्षण में भंग होने वाले भाव को दिखाने के लिए। န ကေနစိ သံဝဒတီတိ ကေနစိ ပုဂ္ဂလေန သဒ္ဓိံ ဒိဋ္ဌိရာဂဝသေန သံကိလိဋ္ဌစိတ္တော န ဝဒတိ. တေနာဟ ‘‘သဿတံ ဂဟေတွာ’’တိအာဒိ. န ဝိဝဒတီတိ ဝိရုဒ္ဓဘာဝေါ ဟုတွာ န ဝိဝဒတိ. ပရိဝတ္တေတွာတိ ဥစ္ဆေဒံ ဂဟေတွာ ဧကစ္စသဿတံ ဂဟေတွာ ဧဝံ ဝုတ္တနယေန တယောပိ ဝါဒါ ပရိဝတ္တေတွာ ယောဇေတဗ္ဗာ[Pg.102]. တေန ဝေါဟရတီတိ တေန လောကဝေါဟာရေန လောကသမညံ အနတိဓာဝန္တော သတ္တော ပုရိသော ပုဂ္ဂလောတိအာဒိနာ ဝေါဟရတိ, န ပန ဣတော ဗာဟိရကာ ဝိယ အဘိနိဝိသတိ. တေနာဟ ‘‘အပရာမသန္တော’’တိ. ကဉ္စိ ဓမ္မန္တိ ရူပါဒီသု ဧကံ ဓမ္မမ္ပိ. ပရာမာသဂ္ဂါဟေန အဂ္ဂဏှန္တောတိ ‘‘နိစ္စ’’န္တိအာဒိနာ, ‘‘ဧတံ မမာ’’တိအာဒိနာ စ ဓမ္မသဘာဝံ အတိက္ကမိတွာ ပရတော အာမသိတွာ ဂဟဏေန အဂ္ဂဏှန္တော. 'न केनचि संवदति' का अर्थ है किसी भी पुद्गल के साथ दृष्टि-राग के वश में होकर संक्लिष्ट चित्त से नहीं बोलता। इसीलिए कहा गया है - "शाश्वत को ग्रहण करके" इत्यादि। 'न विवदति' का अर्थ है विरुद्ध भाव वाला होकर विवाद नहीं करता। 'परिवत्तेत्वा' का अर्थ है उच्छेद को ग्रहण करके, एकदेशीय शाश्वत को ग्रहण करके, इस प्रकार कहे गए तरीके से तीनों वादों को बदलकर जोड़ना चाहिए। 'तेन वोहरति' का अर्थ है उस लोक-व्यवहार से, लोक-संज्ञा का उल्लंघन न करते हुए 'सत्त्व, पुरुष, पुद्गल' इत्यादि के रूप में व्यवहार करता है, किन्तु यहाँ बाहरी लोगों की तरह अभिनिवेश (आग्रह) नहीं करता। इसीलिए कहा गया है - "अपरामसन्तो" (बिना परामर्श/पकड़ के)। 'कञ्चि धम्मं' का अर्थ है रूपादि में से एक धर्म को भी। 'परामसग्गाहेन अग्गण्हन्तो' का अर्थ है "नित्य" इत्यादि के रूप में, और "यह मेरा है" इत्यादि के रूप में धर्म-स्वभाव का अतिक्रमण करके, परतः (बाहर से) स्पर्श करके ग्रहण न करते हुए। ကတာဝီတိ ကတကိစ္စော. သော ဝဒေယျာတိ ခီဏာသဝေါ ဘိက္ခု အဟင်္ကာရမမင်္ကာရေသု သဗ္ဗသော သမုစ္ဆိန္နေသုပိ အဟံ ဝဒါမီတိ ဝဒေယျ. တတ္ထ အဟန္တိ နိယကဇ္ဈတ္တသန္တာနေ. မမန္တိ တဿ သန္တကဘူတေ ဝတ္ထုသ္မိံ လောကနိရုဠှေ. သမညန္တိ တတ္ထ သုကုသလတာယ လောကေ သမညာ ကုသလော ဝိဒိတွာ. ဝေါဟာရမတ္တေနာတိ ကေဝလံ ပစ္စေကဗုဒ္ဓေါ ဟုတွာ မဟာဗောဓိပါရမိယော ပူရေတုံ အသက္ကောန္တော သာဝကော ဟုတွာ ဒေသဝေါဟာရမတ္တေန န အပ္ပဟီနတဏှော ဝိယ အန္ဓပုထုဇ္ဇနော အဘိနိဝေသနဝသေန. 'कतावी' का अर्थ है कृतकृत्य। 'सो वदेय्या' का अर्थ है क्षीणास्त्रव भिक्षु, अहंकार और ममतारूपी संस्कारों के सर्वथा नष्ट हो जाने पर भी "मैं कहता हूँ" ऐसा कह सकता है। वहाँ 'अहं' (मैं) अपने आध्यात्मिक सन्तान (प्रवाह) के लिए है। 'मम' (मेरा) उसके अपने स्वामित्व वाली वस्तु के लिए लोक-प्रसिद्ध अर्थ में है। 'समञ्ञं' का अर्थ है वहाँ सुकुशल होने के कारण लोक में प्रचलित संज्ञा को कुशल जानकर। 'वोहारमत्तेन' का अर्थ है केवल, प्रत्येकबुद्ध होकर महाबोधि पारमिताओं को पूर्ण करने में असमर्थ श्रावक होकर देश-व्यवहार मात्र से, न कि प्रहीण न हुई तृष्णा वाले अन्ध-पृथग्जन की तरह अभिनिवेश के वश में। ၂၀၆. သဿတာဒီသူတိ သဿတာဘိနိဝေသာဒီသု. တေသံ တေသံ ဓမ္မာနန္တိ နိဒ္ဓါရဏေ သာမိဝစနံ. သဿတံ အဘိညာယာတိ သဿတဒိဋ္ဌိံ သမုဒယတော အတ္ထင်္ဂမတော အဿာဒတော နိဿရဏတော အဘိဝိသိဋ္ဌာယ ပညာယ ပဋိဝိဇ္ဈိတွာ. ပဟာနန္တိ အစ္စန္တပ္ပဟာနံ သမုစ္ဆေဒံ. ရူပဿ ပဟာနန္တိ ရူပဿ တပ္ပဋိဗဒ္ဓသညောဇနပ္ပဟာနေန ပဟာနံ. အနုပ္ပာဒနိရောဓေန နိရုဒ္ဓေဟိ အာသဝေဟိ အဂ္ဂဟေတွာဝ စိတ္တံ ဝိမုစ္စိ. ‘‘အာသဝေဟိ စိတ္တံ ဝိမုစ္စီ’’တိ ဧတ္ထ ကိဉ္စိပိ အဂ္ဂဟေတွာ အသေသေတွာ. သောဠသ ပညာတိ မဟာပညာဒိကာ သောဠသ ပညာ. စတုရင်္ဂသမန္နာဂတောတိ ပုဏ္ဏဥပေါသထဒိဝသတာ, ကေနစိ အနာမန္တိတမေဝ အနေကသတာနံယေဝ အနေကသဟဿာနံ ဝါ ဘိက္ခူနံ သန္နိပတိတတာ, သဗ္ဗေသံ ဧဟိဘိက္ခုဘာဝေန ဥပသမ္ပန္နတာ, ဆဠဘိညတာ စာတိ. တေနာဟ ‘‘တတြိမာနိ အင်္ဂါနီ’’တိအာဒိ. ယံ ပနေတ္ထ အတ္ထတော အဝိဘတ္တံ, တံ သုဝိညေယျမေဝ. २०६. 'सस्सतादीसू' का अर्थ है शाश्वत-अभिनिवेश आदि में। 'तेसं तेसं धम्मानं' यहाँ निर्धारण में षष्ठी विभक्ति है। 'सस्सतं अभिञ्ञाय' का अर्थ है शाश्वत दृष्टि को उसके उदय, अस्त, आस्वाद और निस्सरण के रूप में विशिष्ट प्रज्ञा से जानकर। 'पहानं' का अर्थ है अत्यन्त प्रहाण (समच्छेद)। 'रूपस्स पहानं' का अर्थ है रूप से सम्बद्ध संयोजनों के प्रहाण द्वारा प्रहाण। अनुत्पाद-निरोध द्वारा निरुद्ध हुए आस्रवों को ग्रहण न करते हुए ही चित्त विमुक्त हो गया। "आस्रवों से चित्त विमुक्त हो गया" यहाँ कुछ भी ग्रहण न करके, शेष न रखकर। 'सोळस पञ्ञा' का अर्थ है महाप्रज्ञा आदि सोलह प्रज्ञाएँ। 'चतुरङ्गसमन्नागतो' का अर्थ है - पूर्ण उपोसथ का दिन होना, किसी के द्वारा बिना बुलाए ही अनेक सौ या अनेक हजार भिक्षुओं का एकत्रित होना, सभी का 'एहि भिक्षु' भाव से उपसम्पन्न होना, और षडभिज्ञ होना। इसीलिए कहा गया है - "तत्रिमानि अङ्गानि" इत्यादि। जो यहाँ अर्थतः अविभक्त है, वह सुविज्ञेय ही है। ဒီဃနခသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. दीघनख-सुत्त की वर्णना में लीनत्थप्पकासना (गूढ़ अर्थ का प्रकाशन) समाप्त हुई। ၅. မာဂဏ္ဍိယသုတ္တဝဏ္ဏနာ ५. मागण्डिय-सुत्त की वर्णना। ၂၀၇. ဒွေ [Pg.103] မာဂဏ္ဍိယာတိ ဒွေ မာဂဏ္ဍိယနာမကာ. ဒေဝဂဗ္ဘသဒိသန္တိ ဒေဝါနံ ဝသနဩဝရကသဒိသံ. ဧတံ ဝုတ္တန္တိ ‘‘ဘာရဒွါဇဂေါတ္တဿ ဗြာဟ္မဏဿ အဂျာဂါရေ တိဏသန္ထာရကေ’’တိ ဧတံ ဝုတ္တံ. န ကေဝလံ တံ ဒိဝသမေဝါတိ ယံ ဒိဝသံ မာဂဏ္ဍိယော ပရိဗ္ဗာဇကော တိဏသန္ထာရကံ ပညတ္တံ, န ကေဝလံ တံ ဒိဝသမေဝ ဘဂဝါ ယေနညတရော ဝနသဏ္ဍော, တေနုပသင်္ကမီတိ ယောဇနာ. ဂါမူပစာရေတိ ဂါမသမီပေ. သညာဏံ ကတွာတိ သညာဏံ ကတွာ ဝိယ. န ဟိ ဘဂဝတော တဿ သညာဏကရဏေ ပယောဇနံ အတ္ထိ. २०७. 'द्वे मागण्डिया' का अर्थ है मागण्डिय नाम के दो व्यक्ति। 'देवगब्भसदिसं' का अर्थ है देवों के निवास कक्ष के समान। "भारद्वाजगोत्र के ब्राह्मण के अग्नि-शाला में तृण-संस्तर (घास का बिछौना) पर" - यह कहा गया है। "न केवलं तं दिवसमेव" का अर्थ है जिस दिन मागण्डिय परिव्राजक के लिए तृण-संस्तर बिछाया गया था, न केवल उसी दिन भगवान जहाँ कोई वन-खण्ड था, वहाँ पहुँचे - ऐसा अर्थ जोड़ना चाहिए। 'गामूपचारे' का अर्थ है गाँव के समीप। 'सञ्ञाणं कत्वा' का अर्थ है मानो संकेत (चिह्न) करके। क्योंकि भगवान के लिए उस संकेत को करने का कोई प्रयोजन नहीं है। သမဏသေယျာနုရူပန္တိ သမဏဿ အနုစ္ဆဝိကာ သေယျာ. ပါသံသတ္ထော ဟိ အယံ ရူပ-သဒ္ဒေါ. တေနာဟ ‘‘ဣမံ တိဏသန္ထာရက’’န္တိအာဒိ. အနာကိဏ္ဏောတိ ဝိလုဠိတော အဃဋ္ဋိတော. ဟတ္ထပါဒသီသေဟိ တတ္ထ တတ္ထ ပဟဋေန န စလိတော အဘိန္နော, အစလိတတ္တာ ဧဝ အဘိန္နံ အတ္ထရဏံ. ပရိစ္ဆိန္ဒိတွာ ပညတ္တော ဝိယာတိ အယံ ဆေကေန စိတ္တကာရေန စိန္တေတွာ တုလိကာယ ပရိစ္ဆိန္နလေခါယ ပရိစ္ဆိန္ဒိတွာ လိခိတာ စိတ္တကတသေယျာ ဝိယ. ဘူနံ ဝုစ္စတိ ဝဍ္ဎိတံ, တံ ဟန္တီတိ ဘူနဟုနော. တေနာဟ ‘‘ဟတဝဍ္ဎိနော’’တိ. တံ ပနာယံ စက္ခာဒီသု သံဝရဝိဓာနံ ဝဍ္ဎိဟနနံ မညတိ. တေနာဟ ‘‘မရိယာဒကာရကဿာ’’တိ. ဗြူဟေတဗ္ဗန္တိ ဥဠာရဝိသယူပဟာရေန ဝဍ္ဎေတဗ္ဗံ ပီဏေတဗ္ဗံ. တံ ပန အနနုဘူတာနုဘဝနေန ဟောတီတိ အာဟ ‘‘အဒိဋ္ဌံ ဒက္ခိတဗ္ဗ’’န္တိ. အနုဘူတံ ပန အပဏီတံ ဟောတီတိ ဝုတ္တံ ‘‘ဒိဋ္ဌံ သမတိက္ကမိတဗ္ဗ’’န္တိ. သေသဝါရေသုပိ ဧသေဝ နယော. ပရမဒိဋ္ဌဓမ္မနိဗ္ဗာနဝါဒီ ကိရေသ ပရိဗ္ဗာဇကော, တသ္မာ ဧဝံ ဆသု ဒွါရေသု ဝဍ္ဎိံ ပညပေတိ. ယသ္မာ ယံ ဆန္နမ္ပိ စက္ခာဒီနံ ယထာသကံ ဝိသယဂ္ဂဟဏံ ပဋိက္ခိပန္တော လောကဿ အဝဍ္ဎိတံ ဝိနာသမေဝ ပညပေတိ, တသ္မာ သော သယမ္ပိ ဝဍ္ဎိဟတော ဟတဝဍ္ဎိတော. ‘श्रमणशय्यानुरूप’ का अर्थ है श्रमण के योग्य शय्या। यहाँ ‘रूप’ शब्द प्रशंसा के अर्थ में है। इसीलिए कहा गया है ‘यह तृण-संस्तारक’ आदि। ‘अनाकीर्ण’ का अर्थ है अव्यवस्थित या अघट्टित (न हिलाया हुआ)। हाथ, पैर और सिर से यहाँ-वहाँ प्रहार न किए जाने के कारण जो विचलित नहीं हुआ, वह ‘अभिन्न’ है; विचलित न होने के कारण ही वह ‘अभिन्न आस्तरण’ (बिछौना) है। ‘परिच्छिन्दित्वा पञ्ञत्तो विय’ (मानो काटकर बिछाया गया हो) का अर्थ है जैसे किसी चतुर चित्रकार ने सोच-समझकर तूलिका से परिच्छिन्न रेखा द्वारा काटकर चित्रित की गई चित्रमय शय्या हो। ‘भून’ का अर्थ है वृद्धि, उसे जो नष्ट करता है वह ‘भूनहु’ है। इसीलिए कहा गया है ‘हतवृद्धि’ (जिसकी वृद्धि नष्ट हो गई हो)। वह (परिव्राजक) चक्षु आदि इन्द्रियों में संवर के विधान को वृद्धि का विनाश मानता है। इसीलिए कहा गया है ‘मर्यादाकारक का’। ‘ब्रूहेतब्बं’ का अर्थ है उदार विषयों के उपभोग से बढ़ाना चाहिए, तृप्त करना चाहिए। वह अननुभूत (न भोगे हुए) के अनुभव से होता है, इसीलिए कहा ‘अदृष्ट को देखना चाहिए’। अनुभूत (भोगे हुए) का त्याग करना चाहिए, इसीलिए कहा ‘दृष्ट का अतिक्रमण करना चाहिए’। शेष वारों (प्रसंगों) में भी यही न्याय है। सुना जाता है कि यह परिव्राजक परम-दृष्टधर्म-निर्वाणवादी है, इसलिए वह इन छह द्वारों में वृद्धि की प्रज्ञापना करता है। चूँकि वह छहों चक्षु आदि इन्द्रियों के अपने-अपने विषयों के ग्रहण का प्रतिषेध करते हुए लोक के लिए अवृद्धि और विनाश की ही प्रज्ञापना करता है, इसलिए वह स्वयं भी वृद्धि-हत (हतवृद्धि) है। သံကိလေသတော အာရကတ္တာ အရိယော နိယျာနိကဓမ္မဘာဝတော ဉာယော ဓမ္မော. ဝဇ္ဇလေသဿပိ အဘာဝတော ကုသလော. တေနာဟ ‘‘ပရိသုဒ္ဓေ ကာရဏဓမ္မေ အနဝဇ္ဇေ’’တိ. ဥဂ္ဂတဿာတိ ဥစ္စကုလီနတာဒိနာ ဥဠာရဿ. မုခေ အာရက္ခံ ဌပေတွာတိ မုခေန သံယတော ဟုတွာ. အမ္ဗဇမ္ဗူအာဒီနိ ဂဟေတွာ ဝိယ အပူရယမာနောတိ အမ္ဗဇမ္ဗူအာဒီနိ အညမညဝိသဒိသာနိ ဝိယ ပူရဏကထာနယေန ယံ ကိဉ္စိ အကထေတွာ. တေနာဟ ‘‘မယာ ကထိတနိယာမေနာ’’တိ. संक्लेश से दूर होने के कारण ‘आर्य’ है, और निर्याणिक धर्म होने के कारण ‘न्याय’ धर्म है। दोष के लेश मात्र का भी अभाव होने के कारण ‘कुशल’ है। इसीलिए कहा गया है ‘परिशुद्ध, कारण-धर्म और अनवद्य (दोषरहित) में’। ‘उग्गतस्स’ का अर्थ है उच्च कुलीनता आदि के कारण उदार (महान) व्यक्ति का। ‘मुखे आरक्खं ठपेत्वा’ का अर्थ है मुख से संयमित होकर। ‘अम्बजम्बूआदीनि गहेत्वा विय अपूरयमानो’ का अर्थ है जैसे आम, जामुन आदि परस्पर भिन्न फलों को भरने की कथा के समान कुछ भी न कहते हुए। इसीलिए कहा गया है ‘मेरे द्वारा कहे गए नियम के अनुसार’। ၂၀၈. ဖလသမာပတ္တိယာ [Pg.104] ဝုဋ္ဌိတောတိ ဒိဝါဝိဟာရတော ဝုဋ္ဌိတောတိ အတ္ထော. ဒိဝါဝိဟာရောပိ ဟိ ‘‘ပဋိသလ္လာန’’န္တိ ဝုစ္စတိ ‘‘ရဟောဂတဿ ပဋိသလ္လီနဿ ဧဝံ စေတသော ပရိဝိတက္ကော ဥဒပါဒီ’’တိအာဒီသု (ပါရာ. ၁၈). ဘဂဝါ ဟိ ဖလသမာပတ္တိတော ဝုဋ္ဌာနုတ္တရကာလံ တေသံ ကထာသလ္လာပံ သုတွာ ဒိဝါဝိဟာရတော ဝုဋ္ဌာယ တတ္ထ ဂတော. သံဝေဂေါ နာမ သဟောတ္တပ္ပဉာဏံ, တံ နိဗ္ဗိန္ဒနဝသေနပိ ဟောတိ, သံဝေဂနိဿိတံ သန္ဓာယာဟ ‘‘ပီတိသံဝေဂေန သံဝိဂ္ဂေါ’’တိ. သော ပန ယသ္မာ ပုရိမာဝတ္ထာယ စလနံ ဟောတိ စိတ္တဿ, တသ္မာ အာဟ ‘‘စလိတော ကမ္ပိတော’’တိ. တိခိဏသောတေန ပုရိသေနာတိ ဘဂဝန္တံ သန္ဓာယာဟ. २०८. ‘फलसमापत्ति से उठे हुए’ का अर्थ है दिवा-विहार (दिन के विश्राम) से उठे हुए। दिवा-विहार को भी ‘प्रतिसंलयन’ कहा जाता है, जैसे ‘एकान्त में प्रतिसंलीन (ध्यानस्थ) के मन में ऐसा वितर्क उत्पन्न हुआ’ आदि में (पाराजिक १८)। भगवान फलसमापत्ति से उठने के बाद उनकी बातचीत सुनकर दिवा-विहार से उठकर वहाँ गए। ‘संवेग’ का अर्थ है ओत्तप्प (पाप-भीरुता) युक्त ज्ञान, वह निर्वेद (वैराग्य) के वश में भी होता है; संवेग-निश्रित के संदर्भ में कहा गया है ‘प्रीति-संवेग से संविग्न’। चूँकि वह चित्त की पूर्व अवस्था से विचलन है, इसलिए कहा ‘चलित, कम्पित’। ‘तीक्ष्ण-श्रोत्र वाले पुरुष द्वारा’ यह भगवान के संदर्भ में कहा गया है। ၂၀၉. ဓမ္မဒေသနံ အာရဘိ ယထာ ဝိနေယျဒမနကုသလော ဝသနဋ္ဌာနဋ္ဌေနာတိ ဣဒံ အာရမိတဗ္ဗဘာဝဿ ဘာဝလက္ခဏဝစနံ. အာရမတိ ဧတ္ထာတိ အာရာမော, ရူပံ အာရာမော ဧတဿာတိ ရူပါရာမံ, တတော ဧဝ တန္နိန္နဘာဝေန ရူပေ ရတန္တိ ရူပရတံ, တေန သမ္မော ဒုပ္ပတ္တိယာ ရူပေန သမ္မုဒိတန္တိ ရူပသမ္မုဒိတံ, တဒေတံ တဒဘိဟတဇဝနကိစ္စံ တတ္ထ အာရောပေတွာ ဝုတ္တံ. ဒန္တန္တိအာဒီသုပိ ဧသေဝ နယော. ဒန္တံ ဒမိတံ. နိဗ္ဗိသေဝနန္တိ ဝိဂတဝိသုကာယိကံ. ဂုတ္တန္တိ သတိယာ ဂုတ္တံ. ရက္ခိတန္တိ တဿေဝ ဝေဝစနံ. သံဝုတန္တိ အပနီတံ ပဝေသနိဝါရဏေန. တေနာဟ ‘‘ပိဟိတ’’န္တိ. २०९. विनेय जनों के दमन में कुशल (भगवान) ने धर्मदेशना आरम्भ की। ‘वसनास्थान’ के अर्थ में यह आरम्भ किए जाने योग्य भाव का भाव-लक्षण वचन है। ‘जहाँ रमण करते हैं’ वह ‘आराम’ है; रूप ही जिसका आराम है वह ‘रूपाराम’ है; उसी के प्रति प्रवण होने के कारण जो रूप में रत है वह ‘रूपरत’ है; उससे सम्मोह की प्राप्ति के कारण जो रूप से सम्मुदित (हर्षित) है वह ‘रूपसम्मूदित’ है; यह उस (रूप) से अभिहत जवन-कृत्य को वहाँ आरोपित करके कहा गया है। ‘दान्त’ आदि में भी यही न्याय है। ‘दान्त’ का अर्थ है दमित। ‘निब्बिसेवनं’ का अर्थ है विकृत चेष्टाओं से रहित। ‘गुत्तं’ का अर्थ है स्मृति से सुरक्षित। ‘रक्खितं’ उसी का पर्यायवाची है। ‘संवृत’ का अर्थ है प्रवेश के निवारण द्वारा हटाया गया। इसीलिए कहा गया है ‘पिहित’ (ढका हुआ या बंद)। ၂၁၀. ဥပ္ပဇ္ဇနပရိဠာဟန္တိ ဥပ္ပဇ္ဇနကိလေသပရိဠာဟံ. ကိံ ဝစနံ ဝတ္တဗ္ဗံ အဿာတိ ရူပါရမ္မဏံ အနုဘဝိတွာ သမုဒယာဒိပဟာနံ ပရိဂ္ဂဏှိတွာ ပရိနိဗ္ဗိန္ဒိတွာ ဝိရဇ္ဇိတွာ ယော ဝိမုတ္တော, တတ္ထ ကိံ ဝုဒ္ဓိဟတပရိယာယော အဝဿံ လဘတိ န လဘတီတိ ပုစ္ဆတိ. ပရိဗ္ဗာဇကော တာဒိသေ သာရဗဒ္ဓဝိမုတ္တိကေ ဝုဒ္ဓိဟတောတိ န ဝဒေယျာတိ အာဟ ‘‘န ကိဉ္စိ, ဘော, ဂေါတမာ’’တိ. २१०. ‘उत्पन्न होने वाला परिदाह’ का अर्थ है उत्पन्न होने वाला क्लेश-परिदाह। ‘उसके विषय में क्या कहना चाहिए’ का अर्थ है कि जिसने रूप-आरम्बन का अनुभव कर, समुदय आदि के प्रहाण को जानकर, निर्वेद प्राप्त कर और विरक्त होकर जो विमुक्त हुआ है, क्या उसके विषय में ‘वृद्धि-हत’ शब्द का प्रयोग निश्चित रूप से किया जा सकता है या नहीं—यह पूछता है। परिव्राजक ऐसे सारबद्ध विमुक्त पुरुष को ‘वृद्धि-हत’ नहीं कहेगा, इसलिए उसने कहा— ‘हे गौतम! कुछ नहीं’ (अर्थात उसे वृद्धि-हत नहीं कहा जा सकता)। ၂၁၁. တေတိ တယာ, အယမေဝ ဝါ ပါဌော. ဝဿံ ဝါသော ဝဿံ ဥတ္တရပဒလောပေန, ဝဿိတုံ အရဟတီတိ ဝဿိကော, ဝဿကာလေ နိဝါသာနုစ္ဆဝိကောတိ အတ္ထော. २११. ‘ते’ का अर्थ है ‘तुम्हारे द्वारा’, अथवा यही पाठ है। ‘वस्सं’ का अर्थ है ‘वस्स-वासो’ (वर्षावास), यहाँ उत्तर पद का लोप हुआ है। ‘वस्सितुं अरहति’ (जो वर्षा ऋतु में रहने योग्य हो) वह ‘वस्सिको’ है, अर्थात वर्षा काल में निवास के योग्य। နာတိဥစ္စော ဟောတိ နာတိနီစောတိ ဂိမှိကော ဝိယ ဥစ္စော, ဟေမန္တိကော ဝိယ နီစော န ဟောတိ, အထ ခေါ တဒုဘယဝေမဇ္ဈလက္ခဏတာယ နာတိဥစ္စော ဟောတိ နာတိနီစော. နာတိတနူနီတိ [Pg.105] ဟေမန္တိကဿ ဝိယ န ခုဒ္ဒကာနိ. နာတိဗဟူနီတိ ဂိမှိကဿ ဝိယ န အတိဗဟူနိ. မိဿကာနေဝါတိ ဟေမန္တိကဂိမှိကေသု ဝုတ္တလက္ခဏဝေါမိဿကာနိ. ဥဏှပဝေသနတ္ထာယာတိ နိယူဟေသု ပုရေဘတ္တံ ပစ္ဆာဘတ္တဉ္စ ပတိတသူရိယောဘာသဝသေန ဥဏှဿ အဗ္ဘန္တရပဝေသနတ္ထာယ. ဘိတ္တိနိယူဟာနိ နီဟရီယန္တီတိ ဒက္ခိဏပဿေ ဘိတ္တီသု နိယူဟာနိ နီဟရိတွာ ကရီယန္တိ. ဝိပုလဇာလာနီတိ ပုထုလဆိဒ္ဒါနိ. ဥဒကယန္တာနီတိ ဥဒကဝါဟကယန္တာနိ. ‘न बहुत ऊँचा होता है न बहुत नीचा’ का अर्थ है कि वह ग्रीष्मकालीन (प्रासाद) की तरह ऊँचा और हेमन्तकालीन (प्रासाद) की तरह नीचा नहीं होता, बल्कि उन दोनों के मध्यवर्ती लक्षण वाला होने के कारण न बहुत ऊँचा होता है न बहुत नीचा। ‘न बहुत छोटे’ का अर्थ है हेमन्तकालीन के समान छोटे नहीं। ‘न बहुत अधिक’ का अर्थ है ग्रीष्मकालीन के समान बहुत अधिक नहीं। ‘मिश्रित ही’ का अर्थ है हेमन्त और ग्रीष्मकालीन प्रासादों में बताए गए लक्षणों का मिश्रण। ‘उष्णता के प्रवेश के लिए’ का अर्थ है गवाक्षों (झरोखों) में भोजन से पूर्व और भोजन के पश्चात पड़ने वाले सूर्य के प्रकाश के कारण उष्णता के भीतर प्रवेश के लिए। ‘भित्ति-निर््यूह निकाले जाते हैं’ का अर्थ है दक्षिण दिशा की दीवारों में निर््यूह (झरोखे या छज्जे) निकालकर बनाए जाते हैं। ‘विपुल जाल’ का अर्थ है बड़े छिद्र। ‘उदक-यन्त्र’ का अर्थ है जल ले जाने वाले यन्त्र। နီလုပ္ပလဂစ္ဆကေ ကတွာတိ ဝိကသိတေဟိ နီလုပ္ပလေဟိ ဂစ္ဆကေ နဠိနိကေ ကတွာ. ဂန္ဓကလလန္တိ ဂန္ဓမိဿကကဒ္ဒမံ. ယမကဘိတ္တီတိ ယုဂဠဘိတ္တိ, တဿာ အန္တရေ နာဠိ, ယတော ဥဒကံ အဘိရုဟတိ. လောဟနာဠိန္တိ လောဟမယယန္တနာဠိံ. ဇာလန္တိ တမ္ဗလောဟမယံ ဇာလံ. ဟေဋ္ဌာ ယန္တံ ပရိဝတ္တေန္တီတိ ဟေဋ္ဌာဘာဂေ ဥဒကယန္တံ ဂမေန္တိ. ဥဒကဖုသိတေ တေမေန္တေ ဝိဝဏ္ဏတာ မာဟောသီတိ နီလပဋံ နိဝါသေတိ. ဒိဝါကာလေတိ ဒိဝသဝေလာယ. အဇ္ဈတ္တံ ဝူပသန္တစိတ္တော ဝိဟရာမီတိ ဧတေန အတ္တနော ဖလသမာပတ္တိဝိဟာရော ဘဂဝတာ ဒဿိတောတိ အာဟ – ‘‘တာယ ရတိယာ ရမမာနောတိ ဣဒံ စတုတ္ထဇ္ဈာနိကဖလသမာပတ္တိရတိံ သန္ဓာယ ဝုတ္တ’’န္တိ. ‘नीलुप्पल-गच्छके कत्वा’ का अर्थ है खिले हुए नीलकमलों के गुच्छे (नालिनिका) बनाकर। ‘गन्धकलल’ का अर्थ है सुगन्धित द्रव्यों से मिश्रित कीचड़। ‘यमकभित्ति’ का अर्थ है दोहरी दीवार, जिसके बीच में एक नली होती है जिससे पानी ऊपर चढ़ता है। ‘लोहनालिं’ का अर्थ है लोहे की बनी यंत्र-नली। ‘जालं’ का अर्थ है तांबे का बना जाल। ‘हेट्ठा यन्तं परिवर्तन्ती’ का अर्थ है निचले भाग में जल-यंत्र को चलाना। ‘उदकफुसिते तेमेन्ते विवण्णता माहोसी’ (पानी की बूंदों से भीगने पर रंग फीका न पड़ जाए) इसलिए नीला कपड़ा ओढ़ाते हैं। ‘दिवाकाले’ का अर्थ है दिन के समय। ‘अज्झत्तं वूपसन्तचित्तो विहरामि’ (अध्यात्म में उपशान्त चित्त होकर विहार करता हूँ) - इसके द्वारा भगवान ने अपने फल-समापत्ति विहार को दर्शाया है, इसलिए कहा गया है - ‘ताय रतिया रममानो’ यह चौथे ध्यान की फल-समापत्ति की रति (आनन्द) के संदर्भ में कहा गया है। ၂၁၂. မဟာ စ နေသံ ပပဉ္စောတိ နေသံ ရာဇူနံ မဟာပပဉ္စော ရာဇိဒ္ဓိဝသေန သဗ္ဗဒါ သမ္ပတ္တိဝိသယော စ, အနုဘဝိတုံ န လဘန္တီတိ အဓိပ္ပာယော. မန္တေ ဂဝေသန္တာ ဝိစရန္တိ, န ဘောဂသုခံ. ဂဏနာ နာမ အစ္ဆိန္နဂဏနာ, န ဝိဂဏဂဏနာ န ပဏဂဏနာ. အာဝဋ္ဋောတိ ယထာဓိဂတေ ဒိဗ္ဗေ ကာမေ ပဟာယ ကာမဟေတု အာဝဋ္ဋော နိဝတ္တော ပရိဝတ္တိတော ဘဝေယျ. ဧဝံ မာနုသကာ ကာမာတိ ယထာ ကောစိ ကုသဂ္ဂေန ဥဒကံ ဂဟေတွာ မဟာသမုဒ္ဒေ ဥဒကံ မိနေယျ. တတ္ထ မဟာသမုဒ္ဒေ ဥဒကမေဝ မဟန္တံ ဝိပုလံ ပဏီတဉ္စ, ဧဝံ ဒိဗ္ဗာနံ ကာမာနံ သမီပေ ဥပနိဓာယ မာနုသကာ ကာမာ အပ္ပမတ္တကာ ဩရမတ္တကာ နိဟီနာ, ဒိဗ္ဗာဝ ကာမာ မဟန္တာ ဝိပုလာ ဥဠာရာ ပဏီတာ. သမဓိဂယှာတိ သမ္မာ အဓိဂမနဝသေန နိဂ္ဂယှ ဒိဗ္ဗမ္ပိ သုခံ ဟီနံ ကတွာ တိဋ္ဌတိ. २१२. ‘महा च नेसं पपञ्चो’ का अर्थ है उन राजाओं का महान प्रपंच, जो राज-ऋद्धि के कारण सदैव संपत्ति का विषय होता है, और वे उसे भोग नहीं पाते - यह अभिप्राय है। वे मंत्रों (नीतियों) की खोज में घूमते हैं, भोग-सुख में नहीं। ‘गणना’ का अर्थ है अटूट गणना, न कि विकृत गणना या पण-गणना। ‘आवृत्तो’ का अर्थ है जैसे प्राप्त दिव्य काम-भोगों को छोड़कर काम के कारण लौटा हुआ या मुड़ा हुआ हो। ‘एवं मानुसका कामा’ का अर्थ है जैसे कोई कुश की नोक से पानी लेकर महासमुद्र के पानी को मापे। वहाँ महासमुद्र का पानी ही महान, विपुल और श्रेष्ठ है; इसी प्रकार दिव्य काम-भोगों की तुलना में मानवीय काम-भोग अल्प, तुच्छ और हीन हैं, जबकि दिव्य काम-भोग ही महान, विपुल, उदार और श्रेष्ठ हैं। ‘समधिगय्ह’ का अर्थ है सम्यक् प्राप्ति के द्वारा दिव्य सुख को भी हीन करके स्थित होना। ၂၁၃. အာရောဂျဟေတုကံ သုခံ အဿ အတ္ထီတိ သုခီ, တံ ပနဿ ရောဂဝိဂမတောဝါတိ အာဟ ‘‘ပဌမံ ဒုက္ခိတော ပစ္ဆာ သုခိတော’’တိ. သေရီ နာမ အတ္တာဓီနဝုတ္တီတိ အာဟ ‘‘သေရီ ဧကကော ဘဝေယျာ’’တိ. အတ္တနော ဝသော [Pg.106] သယံဝသော, သော ဧတဿ အတ္ထီတိ သယံဝသီ. အင်္ဂါရကပလ္လံ ဝိယ ကာမဝတ္ထုပရိဠာဟဟေတုတော. တစ္ဆေတွာတိ ဃဋ္ဋေတွာ, ကဏ္ဍူယိတွာတိ အတ္ထော. २१३. जिसे आरोग्य के कारण सुख प्राप्त है, वह ‘सुखी’ है, और वह उसे रोग के दूर होने से मिलता है, इसलिए कहा गया है - ‘पहले दुखी, बाद में सुखी’। ‘सेरी’ का अर्थ है अपने अधीन रहने वाला, इसलिए कहा गया है - ‘सेरी (स्वतंत्र) अकेला रहे’। अपना वश ‘स्वयं-वश’ है, और जो इसका स्वामी है वह ‘स्वयं-वशी’ है। काम-वस्तुओं के परिदाह (जलन) के कारण अंगारों के कड़ाहे के समान। ‘तच्छेत्वा’ का अर्थ है रगड़कर या खुजलाकर। ၂၁၄. ယေန ကာယော မဓုရကဇာတော ဟောတိ, တံ ကိရ ကုဋ္ဌံ ဆဝိံ ဝိနာသေတိ, စမ္မံ ဆိဒ္ဒဇာတံ ဝိယ ဟောတိ. တေနေဝါဟ ‘‘ဥပဟတကာယပ္ပသာဒေါ’’တိ. ပစ္စလတ္ထာတိ ပဋိလဘိ. အဝိဇ္ဇာဘိဘူတတာယ ဝိရောဓိပစ္စယသမာယောဂေန ပညိန္ဒြိယဿ ဥပဟတတ္တာ. အာယတိံ ဒုက္ခဖလတာယ ဧတရဟိ စ ကိလေသဒုက္ခဗဟုလတာယ ကာမာနံ ဒုက္ခသမ္ဖဿတာ, တဒုဘယသံယုတ္တေသု တေသု စ တံ အသလ္လက္ခိတွာ ဧကန္တသုခါဘိနိဝေသော ဝိပရီတသညာယ, န ကေဝလာယ သုခဝေဒနာယ သုခါတိ ပဝတ္တသညီ. २१४. जिससे शरीर मधुरक (एक प्रकार का कुष्ठ) से ग्रस्त हो जाता है, वह कुष्ठ त्वचा को नष्ट कर देता है और चर्म छिद्रयुक्त जैसा हो जाता है। इसीलिए कहा गया है - ‘उपहत-काय-प्रसाद’ (शरीर की इंद्रिय शक्ति का नष्ट होना)। ‘पच्चलत्था’ का अर्थ है प्राप्त किया। अविद्या से अभिभूत होने के कारण और विरोधी प्रत्ययों के संयोग से प्रज्ञा-इंद्रिय के नष्ट होने के कारण। भविष्य में दुःखद फल देने वाले होने से और वर्तमान में क्लेश-दुःख की बहुलता के कारण काम-भोगों का स्पर्श दुःखद है; उन दोनों (भविष्य और वर्तमान के दुःख) से युक्त होने पर भी, उसे न पहचानकर विपरीत संज्ञा के कारण एकांत सुख का अभिनिवेश होता है, न कि केवल सुख-वेदना के कारण ‘सुख’ ऐसी संज्ञा प्रवृत्त होती है। ၂၁၅. တာနီတိ ကုဋ္ဌသရီရေ ဝဏမုခါနိ. အသုစီနီတိ အသုဘာနိ. ဒုဂ္ဂန္ဓာနီတိ ဝိဿဂန္ဓာနိ. ပူတီနီတိ ကုဏပဘူတာနိ. ဣဒါနီတိ ဧတရဟိ. နခေဟိ ဝိပ္ပတစ္ဆနအဂ္ဂိပရိတာပနေဟိ အတိနိပ္ပီဠနကာလေ ပါဏကာ…ပေ… ပဂ္ဃရန္တိ, တေန ဝေဒနာ တနုကာ ဟောတိ. ဧဝန္တိ ဝုတ္တနယေန ဝေဒနာယ တနုကဘာဝတော. २१५. ‘तानि’ का अर्थ है कुष्ठ रोगी के शरीर के घावों के मुख। ‘असुचीनि’ का अर्थ है अशुभ। ‘दुग्गन्धानि’ का अर्थ है दुर्गन्धयुक्त। ‘पूतीनि’ का अर्थ है सड़े हुए शव के समान। ‘इदानि’ का अर्थ है इस समय। नाखूनों से खुरचने और आग से तपाने के समय अत्यधिक दबाने पर कीड़े... आदि... बहते हैं, जिससे वेदना कम हो जाती है। ‘एवं’ का अर्थ है उक्त विधि से वेदना के कम होने के कारण। အာရောဂျဘာဝေ ဓနလာဘာဒိလာဘုပ္ပတ္တိတော, အသတိ စ အာရောဂျေ လာဘဿ နိရတ္ထကဘာဝတော, ဒိဋ္ဌဓမ္မိကာဒိသဗ္ဗသမ္ပတ္တီနံ လာဘဿ နိမိတ္တဘာဝတော စ အာရောဂျပရမာ လာဘာ. နိဗ္ဗာနေ သုခုပ္ပတ္တိတော, အသတိ စ နိဗ္ဗာနာဓိဂမေ တာဒိသဿ သုခဿ အနုပလဗ္ဘနတော, သဗ္ဗသင်္ခတဝိဝိတ္တတ္တာ စ သဗ္ဗသော စ သံသာရဒုက္ခာဘာဝတော, အဓိဂတေ စ တသ္မိံ သကလဝဋ္ဋဒုက္ခာဘာဝတော စ နိဗ္ဗာနံ ပရမံ သုခံ. ပုဗ္ဗဘာဂမဂ္ဂါနန္တိ ကာယာနုပဿနာဒိဘေဒဘိန္နာနံ အရိယမဂ္ဂဿ ပုဗ္ဗဘာဂိယာနံ မဂ္ဂါနံ. တေသဉ္စ အမတဂါမိတာ နာမ တန္နိန္နတာဝသေနေဝ သစ္ဆိကိရိယာဝသေနာတိ အာဟ ‘‘ပုဗ္ဗဘာဂဂမနေနေဝ အမတဂါမိန’’န္တိ. အဋ္ဌင်္ဂိကော အရိယမဂ္ဂေါ ခေမော သဗ္ဗပရိဿယသမုဂ္ဃာတနေန အနုပဒ္ဒုတတ္တာ, တံသမင်္ဂီနံ သဗ္ဗသော အနုပဒ္ဒုတတ္တာ တံသမင်္ဂီနံ သဗ္ဗသော အနုပဒ္ဒဝဟေတုတော စ. လဒ္ဓိဝသေန ဂဟိတာတိ သဿတဝါဒါဒီဟိ ကေဝလံ တေသံ လဒ္ဓိဝသေန တထာ ဂဟိတာ. ခေမအမတဂါမိနန္တိ ဣမိနာ ဟိ ‘‘ခေမံအမတဂါမိန’’န္တိ ဝိဘတ္တိအလောပေန နိဒ္ဒေသော, အတ္ထော ပန ဝိဘတ္တိလောပေန ဒဋ္ဌဗ္ဗောတိ ဒဿေတိ. आरोग्य होने पर धन-लाभ आदि की प्राप्ति होने से, और आरोग्य न होने पर लाभ के निरर्थक होने से, तथा दृष्ट-धार्मिक (इसी जन्म की) आदि सभी संपत्तियों के लाभ का कारण होने से ‘आरोग्य परम लाभ’ है। निर्वाण में सुख की उत्पत्ति होने से, और निर्वाण की प्राप्ति न होने पर उस प्रकार के सुख की अनुपलब्धि होने से, सभी संस्कृत (संस्कारों) से विरक्त होने और पूरी तरह से संसार-दुःख के अभाव के कारण, तथा उसकी प्राप्ति होने पर संपूर्ण वट्ट (चक्र) दुःख के अभाव के कारण ‘निर्वाण परम सुख’ है। ‘पुब्बभागमग्गानं’ का अर्थ है कायानुपश्यना आदि भेदों में विभक्त आर्यमार्ग के पूर्वभागीय मार्गों का। उनकी ‘अमृतगामिता’ का अर्थ है उसकी ओर झुकाव होने के कारण ही साक्षात्कार होना, इसलिए कहा गया है - ‘पूर्वभाग में गमन करने से ही अमृतगामी’। अष्टांगिक आर्यमार्ग ‘क्षेम’ है क्योंकि यह सभी उपद्रवों के विनाश के कारण सुरक्षित है, और इससे युक्त व्यक्ति पूरी तरह से उपद्रव रहित होता है। ‘लब्धिवश गृहीत’ का अर्थ है शाश्वतवाद आदि के द्वारा केवल उनके मत (सिद्धांत) के अनुसार वैसा ग्रहण किया गया। ‘खेमअमतगामिनं’ के द्वारा ‘खेमं अमतगामिनं’ इस प्रकार विभक्ति-लोप के बिना निर्देश है, परन्तु अर्थ विभक्ति-लोप के साथ देखा जाना चाहिए - यह दर्शाता है। ၂၁၆. အနောမဇ္ဇတီတိ [Pg.107] အနု အနု ဩမဇ္ဇတိ. အပရာပရံ ဟတ္ထံ ဟေဋ္ဌာ ဩတာရေန္တော မဇ္ဇတိ. २१६. ‘अनोमज्जति’ का अर्थ है बार-बार नीचे की ओर झुकना। बार-बार हाथ को नीचे उतारते हुए डूबना या झुकना। ၂၁၇. ဆေကန္တိ ဃနဘာဝေန ဝီတံ. ဃနမဋ္ဌဘာဝေန သုန္ဒရံ ဟောတီတိ အာဟ ‘‘သမ္ပန္န’’န္တိ. သာဓူဟိ ပရမပ္ပိစ္ဆသန္တုဋ္ဌေဟိ လာတော ဂဟိတောတိ သာဟုဠိ. သင်္ကာရစောဠကံ နိစ္စကာဠကံ. २१७. ‘छेकं’ का अर्थ है सघनता से बुना हुआ। सघन और चिकना होने के कारण सुंदर होता है, इसलिए कहा गया है - ‘सम्पन्नं’। परम अल्पेच्छ और संतुष्ट साधुओं द्वारा लिया गया (ग्रहण किया गया) ‘साहुळि’ कहलाता है। कूड़े के ढेर से उठाया गया कपड़ा जो हमेशा काला रहता है। ၂၁၈. တတ္ထ တတ္ထ ရုဇနဋ္ဌေန ဝိဗာဓနဋ္ဌေန ရောဂေါဝ ဘူတော. ဝိပဿနာဉာဏေနပိ သိခါပ္ပတ္တေန အာရောဂျံ ဧကဒေသေန ပဿတိ, နိဗ္ဗာနဉ္စ ဝဋ္ဋပဋိပက္ခတောတိ အာဟ ‘‘ဝိပဿနာဉာဏဉ္စေဝါ’’တိ. २१८. जगह-जगह पीड़ा होने और बाधा होने के कारण वह रोग के समान ही हो गया है। शिखर पर पहुँचे हुए विपश्यना-ज्ञान के द्वारा भी आरोग्य को एक अंश में देखता है, और निर्वाण को संसार-चक्र के प्रतिपक्ष के रूप में देखता है, इसलिए कहा गया है - ‘विपश्यना-ज्ञान ही’। ၂၁၉. အန္တရာတိ ပဌမုပ္ပတ္တိ ဇရာမရဏာနံ ဝေမဇ္ဈေ. ဥပဟတောတိ ပိတ္တသေမှာဒိဒေါသေဟိ ဒူသိတဘာဝေန ကထိတော. ပိတ္တာဒိဒေါသေ ပန ဘေသဇ္ဇသေဝနာယ နိဝတ္တေန္တော ဥပဟတံ ပဋိပါကတိကံ ကရောန္တော စက္ခူနိ ဥပ္ပာဒေတိ နာမ. ဝိနဋ္ဌာနီတိ အနုပ္ပတ္တိဓမ္မတံ အာပန္နာနိ. २१९. ‘अन्तरा’ का अर्थ है प्रथम उत्पत्ति और जरा-मरण के बीच में। ‘उपहत’ का अर्थ है पित्त, श्लेष्म आदि दोषों से दूषित होना। पित्त आदि दोषों को औषधि सेवन से दूर करते हुए, दूषित को पुनः सामान्य करते हुए ‘चक्षु उत्पन्न करता है’ ऐसा कहा जाता है। ‘विनट्ठानि’ का अर्थ है अनुत्पत्ति-धर्म (पुनः उत्पन्न न होने की अवस्था) को प्राप्त। ၂၂၀. ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တေ သာဟုဠိယစီရေ. ဝဋ္ဋေ အနုဂတစိတ္တေနာတိ အနမတဂ္ဂေ သံသာရဝဋ္ဋေ အနာဒီနဝဒဿိတာယ အနုဂါမိစိတ္တေန. २२०. पूर्व में कहे गए ‘साहुळि’ चीवर में। ‘वट्टे अनुगतचित्तेन’ का अर्थ है अनादि संसार-चक्र में दोष न देखने के कारण उसके पीछे चलने वाले चित्त से। ၂၂၁. ဓမ္မဿာတိ နိဗ္ဗာနဿ. အနုဓမ္မန္တိ အနုရူပံ နိယျာနဓမ္မံ. တေနာဟ ‘‘အနုစ္ဆဝိကံ ပဋိပဒ’’န္တိ. ပဉ္စက္ခန္ဓေတိ ပဉ္စုပါဒါနက္ခန္ဓေ ဒဿေတိ. ‘‘ဒီဃရတ္တံ ဝတ, ဘော’’တိအာဒိနာ ပါဠိယံ ဝိဝဋ္ဋံ ဒဿိတံ. တေနာဟ ‘‘ဥပါဒါနနိရောဓာတိ ဝိဝဋ္ဋံ ဒဿေန္တော’’တိ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. २२१. 'धम्मस्स' का अर्थ है निर्वाण का। 'अनुधम्म' का अर्थ है अनुरूप निर्याण-धर्म (मुक्ति का मार्ग)। इसीलिए कहा गया है 'अनुरूप प्रतिपदा'। 'पञ्चक्खन्धे' से पाँच उपादान-स्कन्धों को दर्शाता है। 'दीघरत्तं वत, भो' आदि के द्वारा पालि में विवर्त (संसार से निवृत्ति) को दिखाया गया है। इसीलिए कहा गया है 'उपादान-निरोध से विवर्त को दिखाते हुए'। शेष सुविज्ञेय ही है। မာဂဏ္ဍိယသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. मागण्डिय-सुत्त की व्याख्या के लीनत्थप्पकासना (गूढ़ अर्थ का प्रकाशन) समाप्त हुई। ၆. သန္ဒကသုတ္တဝဏ္ဏနာ ६. सन्डक-सुत्त की व्याख्या। ၂၂၃. ဒေဝေန ဝဿေန ကတော သောဗ္ဘော ဒေဝကတသောဗ္ဘော. တေနာဟ ‘‘ဝဿော…ပေ… ရဟဒေါ’’တိ. ဂုဟာတိ ပံသုဂုဟာ ပါသာဏဂုဟာ မိဿကဂုဟာတိ တိဿော ဂုဟာ. တတ္ထ ပံသုဂုဟာ ဥဒကမုတ္တဋ္ဌာနေ အဟောသိ နိန္နဋ္ဌာနံ ပန ဥဒကေန အဇ္ဈောတ္ထတံ. ဥမင်္ဂံ ကတွာတိ ဟေဋ္ဌာ သုဒုဂ္ဂံ ကတွာ. အနမတဂ္ဂိယံ [Pg.108] ပစ္စဝေက္ခိတွာတိ ‘‘န ခေါ သော သတ္တာဝါသော သုလဘရူပေါ, ယော ဣမိနာ ဒီဃေန အဒ္ဓုနာ အနာဝုဋ္ဌပုဗ္ဗော’’တိအာဒိနာ (မ. နိ. ၁.၁၆၀) ဣဒဉ္စ တဠာကံ မယာ ဝုတ္ထပုဗ္ဗံ ဘဝိဿတိ, တမ္ပိ ဌာနံ သော စ အတ္တဘာဝေါ အပညတ္တိကဘာဝံ ဂတောတိ ဧဝံ အနမတဂ္ဂိယံ ပစ္စဝေက္ခိတွာ တာဒိသံ ဌာနံ ဂန္တုံ ဝဋ္ဋတိ. ဣမိနာ နယေန သမုဒ္ဒပဗ္ဗတဒဿနာဒီသုပိ ပစ္စဝေက္ခဏာဝိဓိ ဝေဒိတဗ္ဗော. २२३. देव (वर्षा) के द्वारा किया गया गड्ढा 'देवकृत-सोब्भ' है। इसीलिए कहा गया है 'वर्षा...पे... दह (सरोवर)'। 'गुहा' का अर्थ है मिट्टी की गुफा, पत्थर की गुफा और मिश्रित गुफा—ये तीन गुफाएँ। वहाँ मिट्टी की गुफा जल से मुक्त स्थान पर थी, लेकिन निचला स्थान जल से भरा हुआ था। 'उमङ्गं कत्वा' का अर्थ है नीचे बहुत दुर्गम बनाकर। 'अनमतग्गियं पच्चवेक्खित्वा' का अर्थ है—'वह सत्त्वावास सुलभ नहीं है, जो इस दीर्घ काल में पहले कभी न बसा हो' आदि (म. नि. 1.160) और यह तालाब भी मेरे द्वारा पहले बसाया गया होगा, वह स्थान और वह आत्मभाव भी प्रज्ञप्ति-रहित (अस्तित्वहीन) हो गया है—इस प्रकार अनमतग्गिय (अनादि संसार) का प्रत्यवेक्षण करके वैसे स्थान पर जाना चाहिए। इसी पद्धति से समुद्र, पर्वत आदि को देखने में भी प्रत्यवेक्षण की विधि समझनी चाहिए। ဥစ္စံ နဒမာနာယာတိ ဥစ္စံ ကတွာ သဒ္ဒံ ကရောန္တိယာ ကာမဿာဒဘဝဿာဒါဒိဝတ္ထုန္တိ ‘‘အယဉ္စ အယဉ္စ ကာမော ဣဋ္ဌော ကန္တော မနာပေါ, အသုကော ဘဝေါ ဣဋ္ဌော ကန္တော မနာပေါ, ဧဝမယံ လောကော ပိယေဟိ ပိယတရော’’တိ ဧဝံ ကာမဿာဒဘဝဿာဒလောကဿာဒါဒိသင်္ခါတံ ဝတ္ထုံ. ဒုဂ္ဂတိတော သံသာရတော စ နိယျာတိ ဧတေနာတိ နိယျာနံ, သဂ္ဂမဂ္ဂေါ မောက္ခမဂ္ဂေါ စ, တံ နိယျာနံ အရဟတိ, နိယျာနေ ဝါ နိယုတ္တာတိ နိယျာနိကာ, နိယျာနံ ဝါ ဖလံ ဧတိဿာ အတ္ထီတိ နိယျာနိကာ, ဝစီဒုစ္စရိတာဒိသံကိလေသတော နိယျာတီတိ ဝါ နိယျာနီယာ, ဤ-ကာရဿ ရဿတ္တံ ယ-ကာရဿ စ က-ကာရံ ကတွာ နိယျာနိကာ, စေတနာယ သဒ္ဓိံ သမ္ဖပ္ပလာပါ ဝေရမဏိ. တပ္ပဋိပက္ခတော အနိယျာနိကာ, တဿာ ဘာဝေါ အနိယျာနိကတ္တံ, တသ္မာ အနိယျာနိကတ္တာ. တိရစ္ဆာနဘူတာတိ တိရောကရဏဘူတာ. ဂေဟဿိတကထာတိ ကာမပဋိသံယုတ္တကထာ. ကမ္မဋ္ဌာနဘာဝေတိ အနိစ္စတာပဋိသံယုတ္တစတုသစ္စကမ္မဋ္ဌာနဘာဝေ. သဟ အတ္ထေနာတိ သာတ္ထကံ, ဟိတပဋိသံယုတ္တန္တိ အတ္ထော. ဝိသိခါတိ ဃရသန္နိဝေသော, ဝိသိခါဂဟဏေန စ တန္နိဝါသိနော ဂဟိတာ ‘‘ဂါမော အာဂတော’’တိအာဒီသု (သာရတ္ထ. ဋီ. ၁.အာစရိယပရမ္ပရကထာဝဏ္ဏနာ) ဝိယ. တေနေဝါဟ ‘‘သူရာ သမတ္ထာ’’တိ ‘‘သဒ္ဓါ ပသန္နာ’’တိ စ. ကုမ္ဘဋ္ဌာနပ္ပဒေသေန ကုမ္ဘဒါသိယော ဝုတ္တာတိ အာဟ ‘‘ကုမ္ဘဒါသိကထာ ဝါ’’တိ. 'उच्चं नदमानाय' का अर्थ है ऊँचा शब्द करती हुई। 'कामास्वाद-भवास्वाद आदि वस्तु' का अर्थ है—'यह और यह काम इष्ट, कान्त, मनाप है, अमुक भव इष्ट, कान्त, मनाप है, इस प्रकार यह लोक प्रियों से अधिक प्रिय है'—इस प्रकार कामास्वाद, भवास्वाद, लोकास्वाद आदि कही जाने वाली वस्तु। जिससे दुर्गति और संसार से निकला जाता है, वह 'निर्याण' है, अर्थात् स्वर्गमार्ग और मोक्षमार्ग; उस निर्याण के योग्य है, अथवा निर्याण में नियुक्त है, इसलिए 'नैर्याणिक' है; अथवा जिसका फल निर्याण है, वह 'नैर्याणिक' है; अथवा जो वचो-दुश्चरित आदि संक्लेशों से निकलती है, वह 'निर्याणीय' है, 'ई' कार को ह्रस्व और 'य' कार को 'क' कार करके 'नैर्याणिक' बना है, जो चेतना के साथ सम्फप्पलाप (व्यर्थ प्रलाप) से विरति है। इसके विपरीत 'अनैयाणिक' है, उसका भाव अनैयाणिकता है, उस अनैयाणिकता से। 'तिरच्छानभूता' का अर्थ है तिरस्कार करने वाली (आवरण करने वाली)। 'गेहस्सितकथा' का अर्थ है काम-सम्बन्धी कथा। 'कम्मट्ठानभावे' का अर्थ है अनित्यता-सम्बन्धी चतुःसत्य-कर्मस्थान के भाव में। 'सह अत्थेन' का अर्थ है सार्थक, अर्थात् हित-सम्बन्धी। 'विसिखा' का अर्थ है घरों का विन्यास (गली), और 'विसिखा' ग्रहण करने से वहाँ के निवासी ग्रहण किए जाते हैं, जैसे 'गाँव आया' आदि में। इसीलिए कहा गया है 'शूर समर्थ' और 'श्रद्धा से प्रसन्न'। कुम्भ-स्थान के प्रदेश से कुम्भदासियाँ कही गई हैं, इसलिए कहा 'अथवा कुम्भदासी कथा'। ၂၂၈. ဝေါဟာရော ဝိယ တေသံ တထာ ဝေါဟာရမတ္တံ ဂဟေတွာ ဝုတ္တံ ‘‘ဗြဟ္မစရိယဝါသေ’’တိ. အကတာတိ သမေန, ဝိသမေန ဝါ ကေနစိ ဟေတုနာ န ကတာ န ဝိဟိတာ. ကတဝိဓော ကရဏဝိဓိ နတ္ထိ ဧတေသန္တိ အကဋဝိဓာ. ပဒဒွယေနပိ လောကေ ကေနစိ ဟေတုပစ္စယေန နေသံ အနိဗ္ဗတ္တတံ ဒဿေတိ. ဣဒ္ဓိယာပိ န နိမ္မိတာတိ ကဿစိ ဣဒ္ဓိမတော စေတောဝသိပ္ပတ္တဿ ဒေဝဿ, ဣဿရာဒိနော ဝါ ဣဒ္ဓိယာပိ န နိမ္မိတာ. အနိမ္မာတာတိ ကဿစိ အနိမ္မာပိတာ. ရူပါဒိဇနကဘာဝန္တိ ရူပသဒ္ဒါဒီနံ ပစ္စယဘာဝံ, ရူပါဒယောပိ ပထဝိယာဒီဟိ [Pg.109] အပ္ပဋိဗဒ္ဓဝုတ္တိကာတိ တဿ အဓိပ္ပာယော. ယထာ ပဗ္ဗတကူဋံ ကေနစိ အနိဗ္ဗတ္တိတံ ကဿစိ စ အနိဗ္ဗတ္တနကံ, ဧဝမေတေပီတိ အာဟ ‘‘ပဗ္ဗတကူဋာ ဝိယ ဌိတာတိ ကူဋဋ္ဌာ’’တိ. ယမိဒံ ဗီဇတော အင်္ကုရာဒိ ဇာယတီတိ ဝုစ္စတိ, တံ ဝိဇ္ဇမာနမေဝ တတော နိက္ခမတိ နာဝိဇ္ဇမာနံ, အညထာ အညတောပိ အညဿ ဥပလဒ္ဓိ သိယာတိ အဓိပ္ပာယော. ဧဝံ ဌိတာတိ ဧဝံ နိဗ္ဗိကာရာ ဌိတာ. ဥဘယေနပီတိ အတ္ထဒွယေနပီတိ ဝဒန္တိ. ‘‘ကူဋဋ္ဌာ ဧသိကဋ္ဌာယိဋ္ဌိတာ’’တိ ပဒဒွယေနပိ. တေသံ သတ္တန္နံ ကာယာနံ. ဌိတတ္တာတိ နိဗ္ဗိကာရာဘာဝေန ဌိတတ္တာ. န စလန္တီတိ ဝိကာရံ နာပဇ္ဇန္တိ. ဝိကာရာဘာဝတော ဟိ တေသံ သတ္တန္နံ ကာယာနံ ဧသိကဋ္ဌာယိဋ္ဌိတတာ. အနိဉ္ဇနဉ္စ အတ္ထတော ပကတိယာ အဝဋ္ဌာနမေဝါတိ ဒဿေတုံ ‘‘န ဝိပရိဏာမေန္တီ’’တိ ဝုတ္တံ. တထာ အဝိပရိဏာမဓမ္မတ္တာ ဧဝ တေ အညမညံ န ဗျာဗာဓေန္တိ. သတိ ဟိ ဝိကာရံ အာပါဒေတဗ္ဗတာယ ဗျာဗာဓကတာပိ သိယာ, တထာ အနုဂ္ဂဟေတဗ္ဗတာယ အနုဂ္ဂါဟကတာတိ တဒဘာဝံ ဒဿေတုံ ပါဠိယံ ‘‘နာလ’’န္တိအာဒိ ဝုတ္တံ. २२८. उनके व्यवहार के समान, वैसे व्यवहार मात्र को लेकर 'ब्रह्मचर्यवास में' कहा गया है। 'अकता' का अर्थ है सम या विषम किसी हेतु से न की गई, न रची गई। जिनमें करने की कोई विधि नहीं है, वे 'अकटविधा' हैं। दोनों पदों से लोक में किसी हेतु-प्रत्यय से उनकी अनुत्पत्ति को दर्शाता है। 'ऋद्धि से भी निर्मित नहीं' का अर्थ है किसी ऋद्धिमान्, चेतोवशि प्राप्त देव या ईश्वर आदि की ऋद्धि से भी निर्मित नहीं। 'अनिम्माता' का अर्थ है किसी के द्वारा न बनवाया गया। 'रूपादि-जनक-भाव' का अर्थ है रूप-शब्द आदि का प्रत्यय-भाव; रूप आदि भी पृथ्वी आदि से असम्बद्ध वृत्ति वाले हैं—यह उसका अभिप्राय है। जैसे पर्वत-कूट किसी के द्वारा उत्पन्न नहीं किया गया और न ही किसी के द्वारा उत्पन्न होने वाला है, वैसे ही ये भी हैं—इसलिए कहा 'पर्वत-कूट के समान स्थित होने से कूटस्थ'। जो यह कहा जाता है कि बीज से अंकुर आदि उत्पन्न होते हैं, वह विद्यमान ही उससे निकलता है, अविद्यमान नहीं; अन्यथा किसी अन्य से किसी अन्य की उपलब्धि हो जाती—यह अभिप्राय है। 'एवं ठिता' का अर्थ है इस प्रकार निर्विकार स्थित। 'उभयेनपि' का अर्थ है दोनों अर्थों से भी, ऐसा कहते हैं। 'कूटट्ठा एसिकट्ठायिट्ठिता' इन दोनों पदों से भी। उन सात निकायों के। 'ठितत्ता' का अर्थ है निर्विकार भाव से स्थित होने के कारण। 'न चलन्ति' का अर्थ है विकार को प्राप्त नहीं होते। विकार के अभाव के कारण ही उन सात निकायों की 'एषिका-स्तम्भ के समान स्थिरता' है। 'अनिञ्जन' (अकंपन) का अर्थ वास्तव में प्रकृति में अवस्थान ही है, यह दिखाने के लिए 'विपरिणाम (परिवर्तन) नहीं करते' कहा गया है। उसी प्रकार, अपरिवर्तनधर्मी होने के कारण ही वे एक-दूसरे को बाधा नहीं पहुँचाते। यदि विकार उत्पन्न करने की योग्यता होती, तो बाधकपना भी होता, और अनुग्रह करने की योग्यता होती, तो अनुग्राहकपना भी होता; उस (विकार) के अभाव को दिखाने के लिए पालि में 'नालं' (समर्थ नहीं) आदि कहा गया है। ပထဝီ ဧဝ ကာယေကဒေသတ္တာ ပထဝီကာယော. ဟန္တုံ ဝါ ဃာတေတုံ ဝါ သမတ္ထော နာမ နတ္ထိ ဇီဝသတ္တမာနံ ကာယာနံ နိစ္စတာယ နိဗ္ဗိကာရဘာဝတော, ဧတေနေဝ နေသမဟန္တဗ္ဗတာ အဃာတေတဗ္ဗတာ အတ္ထတော ဝုတ္တာယေဝါတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. တထာ ဟိ ဝုတ္တံ ‘‘သတ္တန္နံတွေဝ ကာယာန’’န္တိအာဒိ. သောတုံ ဝါ သာဝေတုံ ဝါ သမတ္ထော နာမ နတ္ထီတိ ပစ္စေကံ နေသံ သဝနေသု အသမတ္ထတ္တာ တဒေကဒေသာဒီသုပိ အသမတ္ထတံ ဒီပေတိ. ယဒိ ကောစိ ဟန္တာ နတ္ထိ, ကထံ သတ္ထပ္ပဟာရောတိ အာဟ ‘‘ယထာ မုဂ္ဂရာသိအာဒီသူ’’တိအာဒိ. ကေဝလံ သညာမတ္တမေဝ ဟောတိ, ဟနနဃာတနာဒိ ပန ပရမတ္ထတော နတ္ထေဝ ကာယာနံ အဝိကောပနီယဘာဝတောတိ အဓိပ္ပာယော. ကေဝလံ တက္ကမတ္တေန နိရတ္ထကံ ဒိဋ္ဌိံ ဒီပေတီတိ ဧတေန ယသ္မာ တက္ကိကာ နိရင်္ကုသတာယ ပရိကပ္ပနဿ ယံ ကိဉ္စိ အတ္တနာ ပရိကပ္ပိတံ သာရတော မညမာနာ တထေဝ အဘိနိဝိဿ တက္ကဒိဋ္ဌိဂ္ဂါဟံ ဂဏှန္တိ, တသ္မာ န တေသံ ဒိဋ္ဌိဝတ္ထုသ္မိံ ဝိညူဟိ ဝိစာရဏာ ကတ္တဗ္ဗာတိ ဒဿေတိ. ကေစီတိ သာရသမာသာစရိယာ. ပဉ္စိန္ဒြိယဝသေနာတိ ပဉ္စရူပိန္ဒြိယဝသေန. ကမ္မန္တိ လဒ္ဓိ ကမ္မဘာဝေန သုပါကဋတ္တာ. အဝင်္ကကထာတာရဏာဒိကာ ဒွါသဋ္ဌိ ပဋိပဒါ. ဧကသ္မိံ ကပ္ပေတိ ဧကသ္မိံ မဟာကပ္ပေ. पृथ्वी ही शरीर का एक भाग होने के कारण 'पृथ्वी-काय' है। मारने या मरवाने में कोई समर्थ नहीं है, क्योंकि जीव और सत्त्व माने जाने वाले ये काय नित्य और निर्विकार हैं; इसी से उनकी अवध्यता और अघातनीयता अर्थतः कह दी गई है, ऐसा समझना चाहिए। जैसा कि कहा गया है— 'सात कायों का ही' इत्यादि। सुनने या सुनाने में कोई समर्थ नहीं है, इसका अर्थ है कि उनमें से प्रत्येक के सुनने में असमर्थ होने के कारण उनके एक भाग आदि में भी असमर्थता प्रकट होती है। यदि कोई मारने वाला नहीं है, तो शस्त्र का प्रहार कैसे होता है? इसके लिए कहा— 'जैसे मूंग की राशि आदि में' इत्यादि। केवल संज्ञा मात्र ही होती है, किन्तु परमार्थतः हनन-घातन आदि नहीं होता, क्योंकि कायों का स्वभाव अविकोपनीय (अपरिवर्तनीय) है, यह अभिप्राय है। केवल तर्क मात्र से निरर्थक दृष्टि को प्रकट करता है— इससे यह दर्शाया गया है कि चूंकि तार्किक लोग अनियंत्रित कल्पना के कारण अपनी कल्पित वस्तु को ही सार मानकर उसमें अभिनिवेश करते हुए तर्क-दृष्टि का ग्रहण करते हैं, इसलिए विद्वानों को उनके दृष्टि-विषय पर विचार नहीं करना चाहिए। 'केचि' (कुछ लोग) का अर्थ सारसमास के आचार्य हैं। 'पञ्चिन्द्रियवशेन' का अर्थ पाँच रूप-इन्द्रियों के वश से है। 'कर्म' का अर्थ लब्धि (सिद्धांत) है, क्योंकि वह कर्म-भाव से सुप्रकट है। 'अवक-कथा-तारण' आदि बासठ प्रतिपदाएँ (मार्ग) हैं। 'एकस्मिं कप्पे' का अर्थ एक महाकल्प में है। ပုရိသဘူမိယောတိ [Pg.110] ပဓာနပုဂ္ဂလေန နိဒ္ဒေသော, ဣတ္ထီနမ္ပေတာ ဘူမိယော ဣစ္ဆန္တေဝ. ဘိက္ခု စ ပန္နကောတိအာဒိ တေသံ ပါဠိယေဝ. တတ္ထ ပန္နကောတိ ဘိက္ခာယ ဝိစရဏကောတိ ဝဒန္တိ, တေသံ ဝါ ပဋိပတ္တိံ ပဋိပန္နကော. ဇိနောတိ ဇိဏ္ဏော, ဇရာဝသေန နိဟီနဓာတုကောတိ ဝဒန္တိ, အတ္တနော ဝါ ပဋိပတ္တိယာ ပဋိပက္ခံ ဇိနိတွာ ဌိတော. သော ကိရ တထာဘူတော ကဿစိပိ ဓမ္မံ န ကထေတိ, တေနာဟ ‘‘န ကိဉ္စိ အာဟာ’’တိ. အလာဘိန္တိ ‘‘သော န ကုမ္ဘိမုခါ ပဋိဂ္ဂဏှတီ’’တိအာဒိနာ (ဒီ. နိ. ၁.၃၉၄) နယေန ဝုတ္တအလာဘဟေတုသမာယောဂေန အလာဘိံ. တတော ဧဝ ဇိဃစ္ဆာဒုဗ္ဗလပရေတတာယ သယနပရာယဏံ သမဏံ ပန္နဘူမီတိ ဝဒတိ. 'पुरुष-भूमियाँ' प्रधान पुद्गल के द्वारा निर्देश है, स्त्रियों के लिए भी ये भूमियाँ अभीष्ट ही हैं। 'भिक्षु और पन्नक' आदि उनकी पालि ही है। वहाँ 'पन्नक' का अर्थ भिक्षा के लिए विचरण करने वाला कहते हैं, अथवा उनकी प्रतिपत्ति (साधना) पर चलने वाला। 'जिन' का अर्थ जीर्ण है, बुढ़ापे के कारण हीन धातु वाला कहते हैं, अथवा अपनी साधना से प्रतिपक्ष को जीतकर स्थित। वह वैसा होकर किसी को धर्म नहीं कहता, इसलिए कहा— 'कुछ नहीं कहा'। 'अलाभी' का अर्थ 'वह कुम्भ के मुख से प्रतिग्रहण नहीं करता' आदि (दी. नि. 1.394) न्याय से कहे गए अलाभ के कारणों के संयोग से अलाभी है। उसी कारण से भूख और दुर्बलता से ग्रस्त होकर शयन-परायण श्रमण को 'पन्न-भूमि' कहते हैं। အာဇီဝဝုတ္တိသတာနီတိ သတ္တာနံ အာဇီဝဘူတာနိ ဇီဝိကာဝုတ္တိသတာနိ. ပသုဂ္ဂဟဏေန ဧဠကဇာတိ ဂဟိတာ, မိဂဂ္ဂဟဏေန ရုရုဂဝယာဒိသဗ္ဗမိဂဇာတိ. ဗဟူ ဒေဝါတိ စာတုမဟာရာဇိကာဒိဗြဟ္မကာယိကာဒိဝသေန နေသံ အန္တရဘေဒဝသေန ဗဟူ ဒေဝါ. တတ္ထ စာတုမဟာရာဇိကာနံ ဧကစ္စော အန္တရဘေဒေါ ‘‘မဟာသမယသုတ္တေန’’ (ဒီ. နိ. ၂.၃၃၁ အာဒယော) ဒီပေတဗ္ဗော. မာနုသာပိ အနန္တာတိ ဒီပဒေသကုလဝံသာဇီဝါဒိဝိဘာဂဝသေန မာနုသာပိ အနန္တဘေဒါ. ပိသာစာ ဧဝ ပေသာစာ, တေ အပရပေတာဒယော မဟန္တာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. 'आजीव-वृत्ति-शतानि' का अर्थ सत्त्वों की आजीविका रूप सौ जीविका-वृत्तियाँ हैं। 'पशु' ग्रहण करने से भेड़ की जाति ली गई है, 'मृग' ग्रहण करने से रुरु, गवय आदि सभी मृग-जातियाँ। 'बहु देवा' का अर्थ चातुर्महाराजिक और ब्रह्मकायिक आदि के भेद से उनके आंतरिक भेदों के कारण बहुत से देव हैं। वहाँ चातुर्महाराजिकों का एक आंतरिक भेद 'महासमय सुत्त' (दी. नि. 2.331 आदि) के द्वारा स्पष्ट किया जाना चाहिए। 'मनुष्य भी अनन्त हैं' का अर्थ द्वीप, देश, कुल, वंश, आजीविका आदि के विभाग से मनुष्यों के भी अनन्त भेद हैं। 'पिशाच' ही 'पेसाच' हैं, उन्हें अपर-प्रेत आदि महान समझना चाहिए। ဆဒ္ဒန္တဒဟမန္ဒာကိနိယော ကုဠီရမုစလိန္ဒနာမေန ဝဒတိ. ဂဏ္ဌိကာတိ ပဗ္ဗဂဏ္ဌိကာ. ပဏ္ဍိတောပိ…ပေ… ဥဒ္ဓံ န ဂစ္ဆတိ, ကသ္မာ? သတ္တာနံ သံသရဏကာလဿ နိယတဘာဝတော. षड्दन्त दह और मन्दाकिनी को कुलीर और मुचलिन्द के नाम से कहते हैं। 'गण्ठिका' का अर्थ पर्व-गाँठ (पब्ब-गण्ठिका) है। 'पण्डित भी... पे... ऊपर नहीं जाता', क्यों? सत्त्वों के संसार-काल की नियतता (निश्चितता) के कारण। အပရိပက္ကံ သံသရဏနိမိတ္တံ သီလာဒိနာ ပရိပါစေတိ နာမ သီဃံယေဝ ဝိသုဒ္ဓိပ္ပတ္တိယာ. ပရိပက္ကံ ဖုဿ ဖုဿ ပတွာ ပတွာ ပရိပက္ကဘာဝါပါဒနေန ဗျန္တိံ ကရောတိ နာမ. သုတ္တဂုဠေတိ သုတ္တဝဋ္ဋိယံ. နိဗ္ဗေဌိယမာနမေဝ ပလေတီတိ ဥပမာယ သတ္တာနံ သံသာရော အနုက္ကမေန ခီယတေဝ, န တဿ ဝဒ္ဓီတိ ဒဿေတိ ပရိစ္ဆိန္နရူပတ္တာ. अपरिपक्व संसार-निमित्त को शील आदि के द्वारा परिपक्व करता है, शीघ्र ही विशुद्धि की प्राप्ति के लिए। परिपक्व को स्पर्श कर-करके, प्राप्त कर-करके, परिपक्व भाव को प्राप्त कराकर समाप्त (व्यन्ती) करता है। 'सुत्तगुले' का अर्थ सूत का गोला है। 'खुलते हुए ही गिरता है'— इस उपमा से यह दर्शाया गया है कि सत्त्वों का संसार अनुक्रम से क्षीण ही होता है, उसकी वृद्धि नहीं होती, क्योंकि वह परिच्छिन्न (सीमित) रूप वाला है। ၂၂၉. နိယတိဝါဒေ ပက္ခိပန္တောတိ သဗ္ဗညုတံ ပဋိဇာနိတွာပိ ပဒေသညုတာယ အသမ္ပာယမာနော တတ္ထ အတ္တနော အညာဏကိရိယံ ပရိဟရိတုံ အသက္ကောန္တော စ ‘‘ဧဝမေသာ နိယတီ’’တိ နိယတိဝါဒေ ပက္ခိပန္တော. २२९. 'नियतिवाद में डालता हुआ' का अर्थ है— सर्वज्ञता की प्रतिज्ञा करके भी प्रदेशज्ञता (अल्पज्ञता) के कारण सफल न होते हुए और वहाँ अपनी अज्ञान-क्रिया का परिहार करने में असमर्थ होते हुए 'यह ऐसी ही नियति है' कहकर नियतिवाद में डालता हुआ। ၂၃၀. ဓမ္မကထာယ [Pg.111] အပဿယဘူတော အနုဿဝေါ ဧတဿ အတ္ထီတိ အနုဿဝီ, တေနေဝဿ အပဿယဝါဒံ ဒဿေတုံ ‘‘အနုဿဝနိဿိတော’’တိ အာဟ. သဝနံ သစ္စတောတိ ယံ ကိဉ္စိ အနုဿဝံ, တံ သဝနံ သစ္စန္တိ ဂဟေတွာ ဌိတော. ပိဋကသမ္ပဒါယာတိ ဂန္ထသမ္ပာဒနေန, တာဒိသံ ဂန္ထံ ပဂုဏံ ဝါစုဂ္ဂတံ ကတွာ တံ နိဿာယ ဓမ္မံ ကထေတိ. တေနာဟ ‘‘ဝဂ္ဂပဏ္ဏာသကာယာ’’တိအာဒိ. २३०. धर्मकथा के लिए आधारभूत अनुश्रव (परम्परागत श्रुति) जिसका है, वह 'अनुश्रवी' है, इसीलिए उसके आधार-वाद को दर्शाने के लिए 'अनुश्रव-निश्रित' कहा। 'श्रवण को सत्य मानकर' का अर्थ है— जो कुछ अनुश्रव है, उस श्रवण को सत्य मानकर स्थित। 'पिटक-सम्पदा' का अर्थ ग्रन्थ-सम्पादन से है, वैसे ग्रन्थ को प्रगुण (कण्ठस्थ) करके उसे आधार बनाकर धर्म कहता है। इसीलिए कहा— 'वर्ग-पञ्चाशक' आदि। ၂၃၂. မန္ဒပညောတိ ပရိတ္တပညော. မောမူဟောတိ သမ္မုယှကော. ‘‘ဧဝန္တိပိ မေ နော’’တိအာဒိနာ ဝိဝိဓော နာနပ္ပကာရော ခေပေါ ဝါစာယ ပရဝါဒါနံ ခီပနံ ဝါစာဝိက္ခေပေါ, တံ ဝါစာဝိက္ခေပံ, န မရတိ န ပစ္ဆိဇ္ဇတိ ယထာဝုတ္တော ဝါဒဝိက္ခေပေါ ဧတာယာတိ အမရာ, တတ္ထ ပဝတ္တာ ဒိဋ္ဌိ အမရာဝိက္ခေပေါ, တံ အမရာဝိက္ခေပံ. အပရိယန္တဝိက္ခေပန္တိ ‘‘ဧဝမ္ပိ မေ နော’’တိအာဒိနာ ပုစ္ဆိတဿ အပရိယောသာပနဝသေန ဝိက္ခေပံ. ဣတော စိတော စ သန္ဓာဝတိ ဧကသ္မိံ သဘာဝေ အနဝဋ္ဌာနတော. ဂါဟံ န ဥပဂစ္ဆတီတိ မိစ္ဆာဂါဟတာယ ဥတ္တရဝိဓာနာယ ပုရိမပက္ခံ ဌပေတွာ ဂါဟံ န ဥပဂစ္ဆတိ. အမရာသဒိသာယ အမရာယ ဝိက္ခေပေါတိ အမရာဝိက္ခေပေါ. २३२. 'मन्दप्रज्ञ' का अर्थ अल्प बुद्धि वाला है। 'मोमूह' का अर्थ अत्यन्त मोहित होने वाला है। 'ऐसा भी मुझे नहीं' आदि के द्वारा विविध प्रकार का विक्षेप, वाणी से पर-वादों का खण्डन 'वाचा-विक्षेप' है, उस वाचा-विक्षेप को; जो मरता नहीं, नष्ट नहीं होता, वह यथोक्त वाद-विक्षेप जिससे होता है वह 'अमरा' है, उसमें प्रवृत्त दृष्टि 'अमरा-विक्षेप' है, उस अमरा-विक्षेप को। 'अपर्यन्त-विक्षेप' का अर्थ 'ऐसा भी मुझे नहीं' आदि के द्वारा पूछे गए प्रश्न का समापन न करने के कारण विक्षेप है। एक स्वभाव में न ठहरने के कारण इधर-उधर दौड़ता है। 'पकड़ (ग्रह) में नहीं आता' का अर्थ मिथ्या-ग्रह के कारण उत्तर विधान के लिए पूर्व पक्ष को रखकर पकड़ में नहीं आता। मछली (अमरा) के समान विक्षेप 'अमरा-विक्षेप' है। ဣဒံ ကုသလန္တိ ဧတ္ထ ဣတိ-သဒ္ဒေါ ပကာရတ္ထော, ဣမိနာ ပကာရေနာတိ အတ္ထော. အမရာဝိက္ခေပိကော ယထာ ကုသလေ, ဧဝံ အညသ္မိံ ယံ ကိဉ္စိ ကေနစိ ပုစ္ဆိတံ အတ္ထံ အတ္တနော အရုစ္စနတာယ ‘‘ဧဝန္တိပိ မေ နော’’တိအာဒိနာ တတ္ထ တတ္ထ ဝိက္ခေပညေဝ အာပဇ္ဇတိ, တသ္မာ ‘‘ဧဝန္တိပိ မေ နော’’တိအာဒိ တတ္ထ တတ္ထ ပုစ္ဆိတာကာရပဋိသေဓနဝသေန ဝိက္ခိပနာကာရဒဿနံ. နနု စေတ္ထ ဝိက္ခေပဝါဒိနော ဝိက္ခေပပက္ခဿ အနနုဇာနနံ ဝိက္ခေပပက္ခေ အဝဋ္ဌာနံ ယုတ္တန္တိ? န, တတ္ထာပိ တဿ သမ္မူဠှဿ ပဋိက္ခေပဝသေနေဝ ဝိက္ခေပဝါဒဿ ပဝတ္တနတော. တေန ဝုတ္တံ ‘‘နော’’တိ. တထာ ဟိ သဉ္စယော ဗေလဋ္ဌပုတ္တော ရညာ အဇာတသတ္တုနာ သန္ဒိဋ္ဌိကံ သာမညဖလံ ပုဋ္ဌော ပရလောကတ္တိကာဒီနံ ပဋိသေဓနမုခေန ဝိက္ခေပံ ဗျာကာသိ. यहाँ 'इदं कुसलं' (यह कुशल है) में 'इति' शब्द प्रकार के अर्थ में है, जिसका अर्थ है 'इस प्रकार से'। जैसे अमरविक्खेपिक (अमर-विक्षेपवादी) कुशल के विषय में, वैसे ही किसी अन्य विषय में भी, जब किसी के द्वारा कोई अर्थ पूछा जाता है, तो अपनी अरुचि के कारण 'एवन्तिपि मे नो' (मेरे लिए ऐसा भी नहीं है) आदि के द्वारा वहाँ-वहाँ विक्षेप (उलझन) ही उत्पन्न करता है, इसलिए 'एवन्तिपि मे नो' आदि वहाँ-वहाँ पूछे गए प्रकार के प्रतिषेध के माध्यम से विक्षेप के प्रकार का प्रदर्शन है। क्या यहाँ विक्षेपवादी का विक्षेप-पक्ष को स्वीकार न करना विक्षेप-पक्ष में अवस्थान (स्थित होना) उचित नहीं है? नहीं, क्योंकि वहाँ भी उस सम्मूढ़ (मोहित) व्यक्ति का प्रतिषेध के माध्यम से ही विक्षेपवाद प्रवृत्त होता है। इसीलिए 'नो' (नहीं) कहा गया है। जैसे संजय बेलट्ठिपुत्त ने राजा अजातशत्रु द्वारा सांदृष्टिक सामञ्ञफल (श्रमणत्व का प्रत्यक्ष फल) पूछे जाने पर परलोक आदि के प्रतिषेध के मुख से विक्षेप की व्याख्या की थी। ဧတ္ထာဟ – ‘‘နနု စာယံ သဗ္ဗောပိ အမရာဝိက္ခေပိကော ကုသလာဒယော ဓမ္မေ ပရလောကတ္တိကာဒီနိ စ ယထာဘူတံ အနဝဗုဇ္ဈမာနော တတ္ထ တတ္ထ ပဉှံ ပုဋ္ဌော သမာနော ပုစ္ဆာယ ဝိက္ခေပမတ္တံ အာပဇ္ဇတိ, တဿ ကထံ ဒိဋ္ဌိဂတဘာဝေါ. န ဟိ အဝတ္တုကာမဿ ဝိယ ပုစ္ဆိတမတ္ထံ အဇာနန္တဿ ဝိက္ခေပကရဏမတ္တေန [Pg.112] တဿ ဒိဋ္ဌိဂတိကတာ ယုတ္တာ’’တိ? ဝုစ္စတေ – န ဟေဝ ခေါ ပုစ္ဆာယ ဝိက္ခေပကရဏမတ္တေန တဿ ဒိဋ္ဌိဂတိကတာ, အထ ခေါ မိစ္ဆာဘိနိဝေသဝသေန. သဿတာဘိနိဝေသေန မိစ္ဆာဘိနိဝိဋ္ဌောယေဝ ဟိ ပုဂ္ဂလော မန္ဒဗုဒ္ဓိတာယ ကုသလာဒိဓမ္မေ ပရလောကတ္တိကာဒီနိ စ ယာထာဝတော အပ္ပဋိပဇ္ဇမာနော အတ္တနာ အဝိညာတဿ အတ္ထဿ ပရံ ဝိညာပေတုံ အသက္ကုဏေယျတာယ မုသာဝါဒဘယေန စ ဝိက္ခေပံ အာပဇ္ဇတီတိ. အထ ဝါ ပုညပါပါနံ တဗ္ဗိပါကာနဉ္စ အနဝဗောဓေန အသဒ္ဒဟနေန စ တဗ္ဗိသယာယ ပုစ္ဆာယ ဝိက္ခေပကရဏံယေဝ သုန္ဒရန္တိ ခန္တိံ ရုစိံ ဥပ္ပာဒေတွာ အဘိနိဝိသန္တဿ ဥပ္ပန္နာ ဝိသုံယေဝ သာ ဧကာ ဒိဋ္ဌိ သတ္တဘင်္ဂဒိဋ္ဌိ ဝိယာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ, ဣန္ဒြိယဗဒ္ဓတော စ တတိယဋ္ဌာနဘာဝေ ဒဿိတော. यहाँ कहा गया है - 'क्या यह सभी अमरविक्खेपिक कुशल आदि धर्मों और परलोक आदि को यथार्थ रूप से न जानते हुए, वहाँ-वहाँ प्रश्न पूछे जाने पर केवल प्रश्न का विक्षेप (टालमटोल) ही करते हैं, तो उनका दृष्टिगत-भाव (मिथ्या दृष्टि होना) कैसे है? क्योंकि जो बोलना नहीं चाहता या जो पूछे गए अर्थ को नहीं जानता, उसके द्वारा केवल विक्षेप करने मात्र से उसे दृष्टिगतिक (मिथ्यादृष्टि वाला) कहना उचित नहीं है।' उत्तर दिया जाता है - केवल प्रश्न का विक्षेप करने मात्र से वह दृष्टिगतिक नहीं होता, बल्कि मिथ्या अभिनिवेश (गलत आग्रह) के कारण होता है। शाश्वत-अभिनिवेश से मिथ्या अभिनिविष्ट व्यक्ति ही मंदबुद्धि होने के कारण कुशल आदि धर्मों और परलोक आदि को यथार्थतः प्राप्त न करते हुए, अपने द्वारा अज्ञात अर्थ को दूसरे को समझाने में असमर्थ होने के कारण और मृषावाद (झूठ) के भय से विक्षेप को प्राप्त होता है। अथवा पुण्य-पाप और उनके विपाक के अबोध और अश्रद्धा के कारण उस विषयक प्रश्न का विक्षेप करना ही 'सुंदर' है, ऐसी क्षान्ति (सहनशीलता) और रुचि उत्पन्न कर अभिनिवेश करने वाले की उत्पन्न हुई वह एक अलग ही दृष्टि है, जिसे सप्तभंगी दृष्टि के समान देखना चाहिए; और इन्द्रियबद्ध होने से इसे तीसरे स्थान के रूप में दिखाया गया है। ၂၃၄. သန္နိဓိကာရကံ ကာမေတိ ဧတ္ထ အနိန္ဒြိယဗဒ္ဓါနိ အဓိပ္ပေတာနီတိ တိလတဏ္ဍုလာဒိဂ္ဂဟဏံ, တဿ လောကဿ အပ္ပသာဒပရိဟာရတ္ထံ ကဒါစိ တဏ္ဍုလနာဠိအာဒိသင်္ဂဟဏကရဏံ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ ‘‘တိလတဏ္ဍုလာဒယော ပညာယန္တီ’’တိ. २३४. 'सन्निधिकारकं कामेति' (संग्रह करने की इच्छा करता है) यहाँ अनिन्द्रियबद्ध (अचेतन वस्तुएँ) अभिप्रेत हैं, जैसे तिल, चावल आदि का ग्रहण; उस लोक के अप्रसाद (अश्रद्धा) के परिहार के लिए कभी चावल की नाली (पात्र) आदि के संग्रह करने के संदर्भ में कहा गया है - 'तिल-चावल आदि दिखाई देते हैं'। ၂၃၆. အာဇီဝကာ မတာ နာမာတိ ဣမေ အာဇီဝကာ သဗ္ဗသော သမ္မာပဋိပတ္တိရဟိတာ မိစ္ဆာ ဧဝ စ ပဋိပဇ္ဇမာနာ အဓိသီလသင်္ခါတဿ သီလဇီဝိတဿ အဘာဝေန မတာ နာမ. ပုတ္တမတာတိ မတပုတ္တာ. သမဏေ ဂေါတမေ ဗြဟ္မစရိယဝါသော အတ္ထီတိ သမဏံ ဧဝ ဂေါတမံ ပရိသုဒ္ဓေါ သုပရိပုဏ္ဏော တက္ကရဿ သမ္မာ ဒုက္ခက္ခယာဝဟော ဗြဟ္မစရိယဝါသော အတ္ထိ. ဧတေနေတ္ထ ဓမ္မသုဓမ္မတာဒိဒီပနေန ဗုဒ္ဓသုဗုဒ္ဓတဉ္စ ဒီပေတိ, အညတ္ထ နတ္ထီတိ ဣမိနာ ဗာဟိရကေသု တဿ အဘာဝံ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. २३६. 'आजीवका मता नामा' (आजीवक मृत के समान हैं) - ये आजीवक पूरी तरह से सम्यक् प्रतिपत्ति (सही आचरण) से रहित हैं और मिथ्या प्रतिपत्ति करने के कारण अधिशील संज्ञक शील-जीवित के अभाव में 'मृत' कहलाते हैं। 'पुत्तमता' का अर्थ है मृत पुत्र। 'श्रमण गौतम में ब्रह्मचर्य वास है' - श्रमण गौतम में ही परिशुद्ध, सुपरिपूर्ण और उस (दुःख) को करने वाले के लिए सम्यक् दुःख-क्षयकारी ब्रह्मचर्य वास है। यहाँ धर्म की सुधर्मता आदि को प्रकाशित करने से बुद्ध की सुबुद्धता को भी प्रकाशित करते हैं; 'अन्यत्र नहीं है' इसके द्वारा बाहरी (अन्य मतों) में उसके अभाव को दर्शाया गया है। शेष सुविज्ञेय (आसानी से समझने योग्य) ही है। သန္ဒကသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. सन्दक सुत्त की वर्णना में लीनत्थप्पकासना (गूढ़ अर्थ का प्रकाशन) समाप्त हुई। ၇. မဟာသကုလုဒါယိသုတ္တဝဏ္ဏနာ ७. महासकुलुदायि सुत्त की वर्णना। ၂၃၇. အဘိညာတာတိ ဧဒိသော ဧဒိသော စာတိ အဘိလက္ခဏဝသေန ဉာတာ. အပ္ပသဒ္ဒဿ ဝိနီတော, အပ္ပသဒ္ဒတာယ မန္ဒဘာဏိတာယ ဝိနီတောတိ စ အပ္ပသဒ္ဒဝိနီတောတိ ဝုစ္စမာနေ အညေန ဝိနီတဘာဝေါ ဒီပိတော ဟောတိ, ဘဂဝါ ပန သယမ္ဘုဉာဏေန သယမေဝ ဝိနီတော. တသ္မာ ပါဠိယံ ‘‘အပ္ပသဒ္ဒဝိနီတော’’တိ န ဝုတ္တံ. တေနာဟ ‘‘န ဟိ ဘဂဝါ အညေန ဝိနီတော’’တိ. २३७. 'अभिञ्ञाता' (अभिज्ञात) का अर्थ है - 'ऐसा है और ऐसा है' इस प्रकार लक्षणों के वश से ज्ञात। 'अप्पसद्द' (अल्पशब्द) में विनीत, अल्पशब्दता (कम बोलने) और मंदभाणिता (धीरे बोलने) में विनीत होने के कारण 'अप्पसद्दविनीतो' कहे जाने पर दूसरे के द्वारा विनीत होना सूचित होता है, परंतु भगवान स्वयं के स्वयंभू-ज्ञान से ही विनीत हैं। इसलिए पालि में 'अप्पसद्दविनीतो' नहीं कहा गया है। इसीलिए कहा गया है - 'भगवान किसी अन्य के द्वारा विनीत नहीं किए गए हैं'। ၂၃၈. ဟိယျောဒိဝသံ [Pg.113] ဥပါဒါယ တတော အာသန္နာနိ ကတိပယာနိ ဒိဝသာနိ ပုရိမာနိ နာမ ဟောန္တိ, ပုရိမာနီတိ စ ပုဗ္ဗကာနိ, အတီတာနီတိ အတ္ထော. တတော ပရန္တိ ယထာ ဝုတ္တအတီတဒိဝသတော အနန္တရံ ပရံ ပုရိမတရံ အတိသယေန ပုရိမတ္တာ. ဣတိ ဣမေသု ဒွီသု ပဝတ္တိတော ယထာက္ကမံ ပုရိမပုရိမတရဘာဝေါ, ဧဝံ သန္တေပိ ယဒေတ္ထ ‘‘ပုရိမတရ’’န္တိ ဝုတ္တံ, တတော ပဘုတိ ယံ ယံ ဩရံ, တံ တံ ပရံ, ယံ ယံ ပရံ, တံ တံ ‘‘ပုရိမတရ’’န္တိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ကုတူဟလယုတ္တာ သာလာ ကုတူဟလသာလာ ယထာ ‘‘အာဇညရထော’’တိ. ဣမေ ဒဿနာဒယော. २३८. कल के दिन को लेकर उससे समीप के कुछ दिन 'पुरिम' (पूर्व के) कहलाते हैं, और 'पुरिम' का अर्थ है पहले के, यानी 'अतीत'। 'ततो परं' (उसके बाद) का अर्थ है - जैसा कि कहा गया है, अतीत दिनों के ठीक बाद वाला, जो अतिशय पूर्व होने के कारण 'पुरिमतर' है। इस प्रकार इन दोनों में क्रमशः पूर्व और पूर्वतर भाव प्रवृत्त होता है, फिर भी यहाँ जो 'पुरिमतर' कहा गया है, उसके बाद जो-जो निकट (ओरं) है वह 'पर' है, और जो-जो दूर (परं) है वह 'पुरिमतर' कहा गया है। 'कुतूहलयुत्ता साला' (कौतूहल युक्त शाला) 'कुतूहलसाला' है, जैसे 'आजञ्ञरथो' (आजानेय रथ)। ये दर्शन आदि हैं। အယထာဘူတဂုဏေဟီတိ အယထာဘူတံ မိစ္ဆာဒီပိတအတ္ထမတ္တေနေဝ ဥဂ္ဃောသိတဂုဏေဟိ သမုဂ္ဂတော ဃောသိတော. တရန္တိ အတိက္ကမန္တိ ဧတေနာတိ တိတ္ထံ, အဂ္ဂမဂ္ဂေါ. ဒိဋ္ဌိဂတိကမဂ္ဂေါ ပန အယထာဘူတောပိ တေသံ တထာ ဝိတရဏံ ဥပါဒါယ တိတ္ထန္တိ ဝေါဟရီယတီတိ တံ ကရောန္တာ တိတ္ထကရာ. ဩသရတီတိ ပဝိသတိ. 'अयथाभूतगुणेहि' का अर्थ है - अयथार्थ, केवल मिथ्या रूप से प्रकाशित अर्थ मात्र से घोषित गुणों द्वारा उद्घोषित। जिससे पार करते हैं (अतिक्रमण करते हैं), वह 'तित्थ' (तीर्थ) है, जैसे अग्र मार्ग। किंतु दृष्टिगतिक मार्ग (मिथ्या दृष्टि का मार्ग) अयथार्थ होने पर भी उनके द्वारा वैसे पार उतरने के कारण 'तीर्थ' कहलाता है, और उसे बनाने वाले 'तीर्थकर' हैं। 'ओसरति' का अर्थ है प्रवेश करता है। ၂၃၉. သဟိတန္တိ ပုဗ္ဗာပရာဝိရုဒ္ဓံ. န ကိဉ္စိ ဇာတန္တိ ပဋိညာဒေါသဟေတုဒေါသဥဒါဟရဏဒေါသဒုဋ္ဌဒေါသတာယ န ကိဉ္စိ ဇာတံ. တေနာဟ ‘‘အာရောပိတော တေ ဝါဒေါ’’တိ. ဝဒန္တိ တေန ပရိဘာသန္တီတိ ဝါဒေါ ဒေါသော. သဘာဝက္ကောသေနာတိ သဘာဝတော ပဝတ္တကောဋ္ဌာသေန. २३९. 'सहितं' का अर्थ है पूर्वापर (पहले और बाद के) विरोध से रहित। 'न किञ्चि जातं' (कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ) का अर्थ है - प्रतिज्ञा दोष, हेतु दोष, उदाहरण दोष और दुष्ट दोष के कारण कुछ भी (सिद्ध) नहीं हुआ। इसीलिए कहा गया है - 'तेरा वाद आरोपित है'। जिससे बोलते हैं या जिससे निंदा करते हैं, वह 'वाद' यानी दोष है। 'सभावक्कोसेन' का अर्थ है स्वभाव से प्रवृत्त होने वाले भाग (कोष्ठास) से। ၂၄၀. ပီဠေယျာတိ မဓုဘဏ္ဍေန သဟ ဘာဇနေ ပီဠေတွာ ဒဒေယျ. သဗြဟ္မစာရီဟိ သမ္ပယောဇေတွာတိ သဟဓမ္မိကေဟိ ဝိဟေဌနပယောဂံ ကတွာ, တေနာဟ ‘‘ဝိဝါဒံ ကတွာ’’တိ. २४०. 'पीळेय्य' (पीड़ा दे) का अर्थ है - मधु के बर्तन के साथ पात्र में दबाकर दे। 'सब्रह्मचारीहि सम्पयोजेत्वा' का अर्थ है - सधार्मिकों (साथ रहने वाले भिक्षुओं) के साथ विहेठना (परेशान करने) का प्रयोग करके, इसीलिए कहा गया है - 'विवाद करके'। ၂၄၁. ဣတရီတရေနာတိ ပဏီတတော ဣတရေန. တေနာဟ ‘‘လာမကလာမကေနာ’’တိ. २४१. 'इतरीतरेन' का अर्थ है प्रणीत (श्रेष्ठ) से इतर (भिन्न)। इसीलिए कहा गया है - 'तुच्छ से तुच्छ के द्वारा'। ၂၄၂. ဘတ္တကောသကေနာတိ ကောသကဘတ္တေန, ခုဒ္ဒကသရာဝဘတ္တကေနာတိ အတ္ထော. ဗေလုဝမတ္တဘတ္တာဟာရာတိ ဗိလ္လပမာဏဘတ္တဘောဇနာ. ဩဋ္ဌဝဋ္ဋိယာတိ မုခဝဋ္ဋိယာ. သဗ္ဗာကာရေနေဝါတိ သဗ္ဗပ္ပကာရေနေဝ. အနပ္ပာဟာရောတိ န ဝတ္တဗ္ဗော ကဒါစိ အပ္ပာဟာရောတိ ကတွာ. တတ္ထ အတိဝိယ အညေဟိ အဝိသယှံ အပ္ပာဟာရတံ ဘဂဝတော ဒဿေတုံ ‘‘ပဓာနဘူမိယ’’န္တိအာဒိ ဝုတ္တံ. မယာတိ နိဿက္ကဝစနံ. ဝိသေသတရာတိ တေန ဓမ္မေန ဝိသေသဝန္တတရာ. २४२. 'भत्तकोसकेन' अर्थात् पात्र के भोजन से, 'खुद्दक-सराव-भत्तकेन' (छोटे सकोरे के भोजन) यह अर्थ है। 'बेलुवमत्त-भत्ताहारा' अर्थात् बेल के फल के परिमाण के बराबर भोजन करने वाले। 'ओट्ठवट्टिया' अर्थात् मुख की परिधि (किनारे) से। 'सब्बाकारेनेव' अर्थात् सभी प्रकारों से ही। 'अनप्पाहारो' अर्थात् कभी भी 'अल्पाहार' ऐसा नहीं कहना चाहिए। वहाँ भगवान् के दूसरों के लिए असह्य अत्यधिक अल्पाहार को दिखाने के लिए 'पधानभूमियं' आदि कहा गया है। 'मया' यह अपादान (निसक्क) वचन है। 'विसेसतरा' अर्थात् उस धर्म के कारण विशेष विशिष्टता वाले। ဝတသမာဒါနဝသေနေဝ [Pg.114] ပံသုကူလံ ဓာရေန္တီတိ ပံသုကူလိကာတိ အာဟ – ‘‘သမာဒိန္နပံသုကူလိကင်္ဂါ’’တိ, သဒ္ဒတ္ထော ပန ‘‘ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂေ’’ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၁.၂၄) ဝုတ္တနယေန ဝေဒိတဗ္ဗော. ပိဏ္ဍပါတိကာ သပဒါနစာရိနောတိအာဒီသုပိ ဧသေဝ နယော. တတ္ထ တတ္ထ သတ္ထေန ဆိန္ဒိတတ္တာ သတ္ထလူခါနိ. ယံ ယံ သပ္ပာယံ, တဿေဝ ဂဟဏံ ဥစ္စိနန္တိ အာဟ ‘‘ဥစ္စိနိတွာ…ပေ… ထိရဋ္ဌာနမေဝ ဂဟေတွာ’’တိ. အလာဗုလောမသာနီတိ အလာဗုလောမာနိ ဝိယ သုခုမတရာနိ စီဝရသုတ္တံသူနိ ဧတေသံ သန္တီတိ အလာဗုလောမသာနိ. ပါတိတသာဏပံသုကူလန္တိ ကဠေဝရေန သဒ္ဓိံ ဆဍ္ဍိတသာဏမယံ ပံသုကူလံ, ယံ တုမ္ဗမတ္တေ ပုဠဝေ ဩဓုနိတွာ သတ္ထာ ဂဏှိ. व्रत के समादान के वश से ही पांशुकूल (चिथड़ों) को धारण करते हैं, इसलिए 'पांशुकूलिक' कहा गया है - 'समादिन्न-पंसुकूलिकङ्गा' (पांशुकूलिक अंग को स्वीकार करने वाले), इसका शब्दार्थ 'विशुद्धिमग्ग' में बताए गए तरीके से समझना चाहिए। 'पिण्डपातिक' और 'सपदानचारी' आदि में भी यही नियम है। वहाँ-वहाँ शस्त्र (चाकू) से काटे जाने के कारण 'सत्थलूखानि' (शस्त्र-रूक्ष) हैं। जो-जो अनुकूल (सप्पाय) है, उसी का ग्रहण चुनते हैं, इसलिए कहा - 'चुनकर...पे... केवल स्थिर भाग को ही लेकर'। 'अलाबुलोमसानि' अर्थात् जिनके चीवर के धागे लौकी के रोओं की तरह अत्यंत सूक्ष्म होते हैं, वे 'अलाबुलोमसानि' हैं। 'पातितसाणपंसुकूलं' अर्थात् शव के साथ फेंका गया सण (पटुआ) से बना पांशुकूल, जिसे शास्ता ने तुम्बे के बराबर परिमाण वाले कीड़ों को झाड़कर ग्रहण किया था। ‘‘ယထာပိ ဘမရော ပုပ္ဖ’’န္တိအာဒိနာ (ဓ. ပ. ၄၉) ဝုတ္တံ မဓုကရဘိက္ခာစာရဝတံ ‘‘ပိဏ္ဍိယာလောပဘောဇနံ နိဿာယ ပဗ္ဗဇ္ဇာ’’တိ (မဟာဝ. ၇၃, ၁၂၈) ဝစနတော ဘိက္ခူနံ ပကတိဘူတံ ဝတန္တိ ဝုတ္တံ ‘‘ဥဉ္ဆာသကေ ဝတေ ရတာ’’တိ. ဝတ-သဒ္ဒေါ စေတ္ထ ပကတိဝတသင်္ခါတံ သကဝတံ ဝဒတိ. တေနာဟ ‘‘ဥဉ္ဆာစရိယသင်္ခါတေ ဘိက္ခူနံ ပကတိဝတေ’’တိ. ဥစ္စနီစဃရဒွါရဋ္ဌာယိနောတိ မဟန္တခုဒ္ဒကဂေဟာနံ ဗဟိဒွါရကောဋ္ဌကဋ္ဌာယိနော. ကဗရမိဿကံ ဘတ္တံ သံဟရိတွာတိ ကဏာဇကမိဿကံ ဘတ္တံ သမ္ပိဏ္ဍိတွာ. ဥမ္မာရတော ပဋ္ဌာယာတိ ဃရုမ္မာရတော ပဋ္ဌာယ. 'यथापि भमरो पुप्फं' (धम्मपद ४९) आदि के द्वारा कहे गए मधुकर-भिक्षाचर्या व्रत को, 'पिण्डियालोपभोजनं निस्साय पब्बज्जा' (महावग्ग ७३, १२८) इस वचन के कारण भिक्षुओं का स्वाभाविक व्रत कहा गया है - 'उञ्छासके वते रता' (भिक्षाटन रूपी व्रत में रत)। यहाँ 'वत' शब्द स्वाभाविक व्रत के रूप में अपने व्रत को कहता है। इसीलिए कहा - 'उञ्छाचर्य-संखाते भिक्खुनं पकतिवते' (भिक्षुओं के स्वाभाविक भिक्षाटन रूपी व्रत में)। 'उच्चनीचघरद्वारट्ठायिनो' अर्थात् बड़े और छोटे घरों के बाहरी द्वार-कोष्ठकों पर खड़े होने वाले। 'कबरमिस्सकं भत्तं संहरित्वा' अर्थात् कण और भूसी मिश्रित भात को इकट्ठा करके। 'उम्मारतो पट्ठाय' अर्थात् घर की देहरी (चौखट) से लेकर। စီဝရာနုဂ္ဂဟတ္ထန္တိ စီဝရာနုရက္ခဏတ္ထံ. ဧတ္ထ စ ယသ္မာ ဗုဒ္ဓါ နာမ သဒေဝကေ လောကေ အနုတ္တရံ ပုညက္ခေတ္တံ, သာ စဿ ပုညက္ခေတ္တတာ ပရမုက္ကံသဂတာ, တသ္မာ သတ္တာနံ တာဒိသံ ဥပကာရံ အာစိက္ခိတွာ တေ စ အနုဂ္ဂဏှန္တာ ဂဟပတိစီဝရံ သာဒိယန္တိ, စတုပစ္စယသန္တောသေ ပန နေ ပရမုက္ကံသဂတာ ဧဝါတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. 'चीवरानुग्गहत्थं' अर्थात् चीवर की रक्षा के लिए। और यहाँ चूँकि बुद्ध देवलोक सहित संसार में अनुत्तर पुण्यक्षेत्र हैं, और उनकी वह पुण्यक्षेत्रता परम उत्कर्ष को प्राप्त है, इसलिए सत्त्वों (प्राणियों) को उस प्रकार के उपकार का उपदेश देकर और उन पर अनुग्रह करते हुए वे गृहपति-चीवर स्वीकार करते हैं, किन्तु चार प्रत्ययों के सन्तोष में वे परम उत्कर्ष को प्राप्त ही हैं, ऐसा समझना चाहिए। ၂၄၄. သပ္ပစ္စယန္တိ သဟေတုကံ သကာရဏံ ဟုတွာ ဓမ္မံ ဒေသေတီတိ အယမေတ္ထ အတ္ထော. စောဒကော ပန အဓိပ္ပာယံ အဇာနန္တော ‘‘ကိံ ပနာ’’တိအာဒိမာဟ. ဣတရော ‘‘နော န ဒေသေတီ’’တိအာဒိနာ အဓိပ္ပာယံ ဝိဝရတိ. နိဒါနန္တိ စေတ္ထ ဉာပကံ ဥပ္ပတ္တိကာရဏံ အဓိပ္ပေတံ, တဉ္စ တဿ တဿ အနုပ္ပတ္တိယုတ္တဿ အတ္ထဿ ပဋိပက္ခဟရဏတော ‘‘သပ္ပာဋိဟာရိယ’’န္တိ ဝုစ္စတီတိ အာဟ ‘‘ပုရိမဿေဝေတံ ဝေဝစန’’န္တိ. ရာဂါဒီနံ ဝါ ပဋိဟရဏံ ပဋိဟာရိယံ, တဒေဝ ပါဋိဟာရိယံ, သဟ ပါဋိဟာရိယေနာတိ သပ္ပာဋိဟာရိယံ. ရာဂါဒိပဋိသေဓဝသေနေဝ ဟိ သတ္ထာ ဓမ္မံ ဒေသေတိ. २४४. 'सप्पच्चयं' अर्थात् हेतु और कारण के साथ धर्म का उपदेश देते हैं, यह यहाँ अर्थ है। किन्तु चोदक (आक्षेप करने वाला) अभिप्राय को न जानते हुए 'किं पना' (क्या फिर) आदि कहता है। दूसरा 'नो न देसेति' (नहीं, ऐसा नहीं कि उपदेश नहीं देते) आदि के द्वारा अभिप्राय को स्पष्ट करता है। 'निदानं' यहाँ ज्ञापक (बोधक) उत्पत्ति-कारण अभिप्रेत है, और वह उस-उस अप्राप्त अर्थ के प्रतिपक्ष को दूर करने के कारण 'सप्पाटिहारियं' (प्रातिहार्य सहित) कहा जाता है, इसलिए कहा - 'पुरिमस्सेवेतं वेवचनं' (यह पहले वाले का ही पर्यायवाची है)। अथवा राग आदि का निवारण करना 'पटिहारिय' है, वही 'पाटिहारिय' है, पाटिहारिय के साथ 'सप्पाटिहारिय' है। राग आदि के प्रतिषेध के वश से ही शास्ता धर्म का उपदेश देते हैं। ၂၄၅. တဿ [Pg.115] တဿ ပဉှဿာတိ ယံ ယံ ပဉှံ ပရော အဘိသင်္ခရိတွာ ဘဂဝန္တံ ဥပသင်္ကမိတွာ ပုစ္ဆတိ, တဿ တဿ ပဉှဿ. ဥပရိ အာဂမနဝါဒပထန္တိ ဝိဿဇ္ဇနေ ကတေ တတော ဥပရိ အာဂစ္ဆနကံ ဝါဒမဂ္ဂံ. ဝိသေသေတွာ ဝဒန္တောတိ ဝတ္တတိ, ‘‘ဘော ဂေါတမ, ဝတ္တုမရဟတီ’’တိ အတ္တနော ဝါဒဘေဒနတ္ထံ အာဟတံ ကာရဏံ အတ္တနော မာရဏတ္ထံ အာဝုဓံ နိဒဿေန္တော ဝိယ ဝိသေသေတွာ ဝဒန္တော ပဟာရကေန ဝစနေန. အန္တရန္တရေတိ မယာ ဝုစ္စမာနကထာပဗန္ဓဿ အန္တရန္တရေ. ဒဒေယျ ဝဒေယျ. ဧဝရူပေသု ဌာနေသူတိ ပရဝါဒီဟိ သဒ္ဓိံ ဝါဒပဋိဝါဒဋ္ဌာနေသု. တေ နိဂ္ဂဟေတုံ မယာ ဒေသိတံ သုတ္တပဒံ အာနေတွာ မမယေဝ အနုသာသနိံ ဩဝါဒံ ပစ္စာသီသန္တိ. २४५. 'तस्स तस्स पञ्हस्स' अर्थात् जिस-जिस प्रश्न को दूसरा व्यक्ति तैयार करके भगवान् के पास आकर पूछता है, उस-उस प्रश्न का। 'उपरि आगमनवादपथं' अर्थात् उत्तर दिए जाने पर उसके ऊपर आने वाले वाद-मार्ग को। 'विसेसत्वा वदन्तो' (विशेष रूप से बोलते हुए) यह प्रयुक्त होता है, 'भो गोतम, वत्तुमरहति' (हे गौतम, आप कहने के योग्य हैं) - इस प्रकार अपने वाद के खण्डन के लिए लाए गए कारण को, मानो अपने वध के लिए शस्त्र को दिखाते हुए, प्रहार करने वाले वचनों से विशेष रूप से बोलते हुए। 'अन्तरन्तरे' अर्थात् मेरे द्वारा कहे जा रहे कथा-प्रबन्ध के बीच-बीच में। 'ददेय्य' अर्थात् कहे। 'एवरूपेसु ठानेसु' अर्थात् परवादियों के साथ वाद-प्रतिवाद के स्थानों में। उन्हें निगृहीत (पराजित) करने के लिए मेरे द्वारा उपदिष्ट सूत्र-पद को लाकर मेरे ही अनुशासन और ओवाद (उपदेश) की प्रतीक्षा करते हैं। ၂၄၆. သမ္ပာဒေမီတိ မနောရထံ သမ္ပာဒေမိ. ပရိပူရေမီတိ အဇ္ဈာသယံ ပရိပူရေမိ. အဓိသီလေတိ အဓိကေ ဥတ္တမသီလေ. သာဝကသီလတော စ ပစ္စေကဗုဒ္ဓသီလတော စ ဗုဒ္ဓါနံ သီလံ အဓိကံ ဥက္ကဋ္ဌံ ပရမုက္ကံသတော အနညသာဓာရဏဘာဝတော. တေနာဟ ‘‘ဗုဒ္ဓသီလံ နာမ ကထိတ’’န္တိ. ဌာနုပ္ပတ္တိကပညာတိ တတ္ထ တတ္ထ ဌာနသော ဥပ္ပန္နပညာ. တေနာဟ ‘‘တတ္ထာ’’တိအာဒိ. အဝသေသာ ပညာတိ ဣဓ ပါဠိယံ အာဂတာ အနာဂတာ စ ယထာဝုတ္တဉာဏဒွယဝိနိမုတ္တာ ပညာ. २४६. 'सम्पादेमि' अर्थात् मनोरथ को सिद्ध करता हूँ। 'परिपूरेमि' अर्थात् आशय को पूर्ण करता हूँ। 'अधिसीले' अर्थात् अधिक, उत्तम शील में। श्रावक-शील और प्रत्येकबुद्ध-शील से बुद्धों का शील अधिक और उत्कृष्ट है, क्योंकि वह परम उत्कर्ष के कारण अनन्य-साधारण (अद्वितीय) है। इसीलिए कहा - 'बुद्धसीलं नाम कथितं' (बुद्ध-शील कहा गया है)। 'ठानुप्पत्तिकपञ्ञा' अर्थात् उस-उस स्थान (अवसर) पर उत्पन्न प्रज्ञा। इसीलिए 'तत्था' आदि कहा गया। 'अवसेसा पञ्ञा' अर्थात् यहाँ पालि में आई हुई और न आई हुई, पूर्वोक्त दो प्रकार के ज्ञानों से मुक्त (बची हुई) प्रज्ञा। ၂၄၇. ဝိသေသာဓိဂမာနန္တိ သတိပဋ္ဌာနာဒီနံ အဓိဂန္ဓဗ္ဗဝိသေသာနံ. အဘိညာ နာမ ဆ အဘိညာ, တာသု ဥက္ကဋ္ဌနိဒ္ဒေသေန ဆဠဘိညာရဟတောဝ အဂ္ဂမဂ္ဂပညာ ဣဓ အဘိညာတိ အဓိပ္ပေတာ, တဿ ဝေါသာနံ ပရိယောသာနံ ပါရမီ ပရမုက္ကံသာတိ အဝကံသာတိ စ အဂ္ဂဖလံ ဝုစ္စတီတိ အာဟ ‘‘အဘိညာ…ပေ… အရဟတ္တံ ပတ္တာ’’တိ. २४७. 'विसेसाधिगमानं' अर्थात् स्मृतिप्रस्थान आदि प्राप्त करने योग्य विशेष अधिगमो का। 'अभिञ्ञा' नाम की छह अभिज्ञाएँ हैं, उनमें उत्कृष्ट निर्देश के द्वारा छह अभिज्ञाओं के योग्य अग्र-मार्ग की प्रज्ञा ही यहाँ 'अभिज्ञा' के रूप में अभिप्रेत है, उसकी 'वोसानं' अर्थात् समाप्ति, 'पारमी' अर्थात् परम उत्कर्ष और 'अवकासा' अर्थात् अग्रफल (अर्हत्त्व) कहा जाता है, इसलिए कहा - 'अभिञ्ञा...पे... अरहत्तं पत्ता' (अभिज्ञा... अर्हत्त्व को प्राप्त)। ဥပါယပဓာနေတိ အရိယဖလာဓိဂမနဿ ဥပါယဘူတေ ပဓာနေ. ‘‘အနုပ္ပန္နပါပကာနုပ္ပာဒါဒိအတ္ထာ’’တိ ဂဟိတာ တထေဝ ဟောန္တိ, တံ အတ္ထံ သာဓေန္တိယေဝါတိ ဧတဿ အတ္ထဿ ဒီပကော သမ္မာ-သဒ္ဒေါတိ ယထာအဓိပ္ပေတတ္ထဿ အနုပ္ပန္နပါပကာနုပ္ပာဒါဒိနော ဥပါယဘူတေ, ပဓာနဥပါယဘူတေတိ အတ္ထော. သမ္မာ-သဒ္ဒဿ ဝါ ယောနိသော အတ္ထဒီပကတံ သန္ဓာယ ‘‘ယောနိသော ပဓာနေ’’တိ ဝုတ္တံ. ဆန္ဒံ ဇနေတီတိ ကတ္တုကမျတာကုသလစ္ဆန္ဒံ ဥပ္ပာဒေတိ ပဝတ္တေတိ ဝါ. ဝါယမတီတိ ပယောဂပရက္ကမံ ကရောတိ. ဝီရိယံ အာရဘတီတိ ကာယိကစေတသိကဝီရိယံ ကရောတိ. စိတ္တံ ဥက္ခိပတီတိ [Pg.116] တေနေဝ သဟဇာတဝီရိယေန ကောသဇ္ဇပက္ခတော စိတ္တံ ဥက္ခိပတိ. ပဒဟတီတိ သမ္မပ္ပဓာနဘူတံ ဝီရိယံ ပဝတ္တေတိ. ပဋိပါဋိယာ ပနေတာနိ စတ္တာရိ ပဒါနိ အာသေဝနာဘာဝနာဗဟုလီကမ္မသာတစ္စကိရိယာဟိ ယောဇေတဗ္ဗာနိ. ‘‘ပဒဟတီ’’တိ ဝါ ဣမိနာ အာသေဝနာဒီဟိ သဒ္ဓိံ သိခါပတ္တံ ဥဿောဠှိဝီရိယံ ယောဇေတဗ္ဗံ. ဝဍ္ဎိယာ ပရိပူရဏတ္ထန္တိ ယာဝတာ ဘာဝနာပါရိပူရိယာ ပရိပူရဏတ္ထံ. ယာ ဌိတီတိ ယာ ကုသလာနံ ဓမ္မာနံ ပဋိပက္ခဝိဂမေန အဝဋ္ဌိတိ. သော အသမ္မောသောတိ သော အဝိနာသော. ယံ ဝေပုလ္လန္တိ ယော သဗ္ဗသော ဝိပုလဘာဝေါ မဟန္တတာ. ဘာဝနာပါရိပူရီတိ ဘာဝနာယ ပရိပူရိတာ. အတ္ထောတိပိ ဝေဒိတဗ္ဗံ ပုရိမပစ္ဆိမပဒါနံ သမာနတ္ထဘာဝတော. 'उपायप्रधाने' का अर्थ है आर्य फल की प्राप्ति के उपायभूत प्रधान (प्रयत्न) में। 'अनुत्पन्न पापों के अनुत्पाद आदि के लिए' - यह ग्रहण किए गए अर्थ वैसे ही होते हैं, उस अर्थ को सिद्ध करने वाला ही 'सम्मा' (सम्यक्) शब्द है। इसका अर्थ है - जैसा अभिप्रेत अर्थ है, वैसे अनुत्पन्न पापों के अनुत्पाद आदि के उपायभूत प्रधान में। अथवा 'सम्मा' शब्द की योनिशः (उचित) अर्थ-द्योतकता को ध्यान में रखते हुए 'योनिशः प्रधान में' कहा गया है। 'छन्द उत्पन्न करता है' का अर्थ है करने की इच्छा रूपी कुशल छन्द को उत्पन्न करता है या प्रवृत्त करता है। 'व्यायाम करता है' का अर्थ है प्रयोग-पराक्रम करता है। 'वीर्य आरम्भ करता है' का अर्थ है कायिक और चैतसिक वीर्य करता है। 'चित्त को उठाता है' का अर्थ है उसी सहजात वीर्य के द्वारा आलस्य के पक्ष से चित्त को ऊपर उठाता है। 'प्रदहन करता है' (पदहति) का अर्थ है सम्यक् प्रधान रूप वीर्य को प्रवृत्त करता है। क्रम से इन चार पदों को आसेवन, भावना, बहुलीकरण और सातत्य-क्रिया के साथ जोड़ना चाहिए। अथवा 'प्रदहन करता है' इस पद के द्वारा आसेवन आदि के साथ शिखर पर पहुँचे हुए उत्साहपूर्ण वीर्य को जोड़ना चाहिए। 'वृद्धि की परिपूर्णता के लिए' का अर्थ है जहाँ तक भावना की परिपूर्णता के लिए आवश्यक हो। 'जो स्थिति है' का अर्थ है जो कुशल धर्मों की प्रतिपक्ष के दूर होने से अवस्थिति है। 'वह असम्मोह है' का अर्थ है वह अविनाश है। 'जो वैपुल्य है' का अर्थ है जो पूर्णतः विपुल भाव या महानता है। 'भावना की परिपूर्णता' का अर्थ है भावना के द्वारा परिपूर्णता। पूर्व और बाद के पदों के समानार्थक होने के कारण इसे अर्थतः भी जानना चाहिए। ပုဗ္ဗဘာဂပဋိပဒါ ကထိတာတံတံဝိသေသာဓိဂမဿ ပဋိပဒါဝိဘာဝနာယ အာရဒ္ဓတ္တာ. အကုသလာနံ ဓမ္မာနံ အနုပ္ပဇ္ဇနေန အနတ္ထာဝဟတာ နာမ နတ္ထီတိ ဝုတ္တံ – ‘‘ဥပ္ပဇ္ဇမာနာ’’တိ ဝစနံ ဥပ္ပန္နာနံ ရာသန္တရဘာဝေန ဂဟိတတ္တာ. တထာ ကုသလာနံ ဓမ္မာနံ ဥပ္ပဇ္ဇနေနာတိ ဝုတ္တံ – အနုပ္ပဇ္ဇမာနာတိ ဝစနံ ဥပ္ပန္နာနံ ရာသန္တရဘာဝေန ဂဟိတတ္တာ. နိရုဇ္ဈမာနာတိ ပဋိပက္ခသမာယောဂေန ဝိနဿမာနာ, န ခဏနိရောဓဝသေန နိရုဇ္ဈမာနာ. 'पूर्वभाग प्रतिपदा' उन-उन विशेष अधिगमो (प्राप्तियों) की प्रतिपदा को स्पष्ट करने के लिए आरम्भ की गई है, ऐसा कहा गया है। अकुशल धर्मों के उत्पन्न न होने से अनर्थकारी होना नहीं होता - ऐसा कहा गया है; 'उत्पन्न होते हुए' यह वचन उत्पन्न हुए धर्मों के अन्य राशि भाव से ग्रहण किए जाने के कारण है। उसी प्रकार कुशल धर्मों के उत्पन्न होने से (अर्थ होता है) - ऐसा कहा गया है; 'अनुत्पन्न होते हुए' यह वचन उत्पन्न हुए धर्मों के अन्य राशि भाव से ग्रहण किए जाने के कारण है। 'निरुद्ध होते हुए' का अर्थ है प्रतिपक्ष के संयोग से विनष्ट होते हुए, न कि क्षणिक निरोध के वश से निरुद्ध होते हुए। လောဘာဒယော ဝေဒိတဗ္ဗာ, ယေ အာရဒ္ဓဝိပဿကာနံ ဥပ္ပဇ္ဇနာရဟာ. သကိံ ဥပ္ပဇ္ဇိတွာတိ သဘာဝကထနမတ္တမေတံ. ဧကဝါရမေဝ ဟိ မဂ္ဂေါ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. နိရုဇ္ဈမာနောတိ သရသေနေဝ နိရုဇ္ဈမာနော. န ဟိ တဿ ပဋိပက္ခသမာယောဂေါ နာမ အတ္ထိ. ဖလဿာတိ အနန္တရကာလေဝ ဥပ္ပဇ္ဇနကဖလဿ. ပစ္စယံ ဒတွာဝ နိရုဇ္ဈတီတိ ဣမိနာ မဂ္ဂေါ သမ္ပတိ အာယတိဉ္စ ဧကန္တေနေဝ အတ္ထာဝဟောတိ ဒဿေတိ. ပုရိမသ္မိမ္ပီတိ ‘‘အနုပ္ပန္နာ မေ ကုသလာ ဓမ္မာ အနုပ္ပဇ္ဇမာနာ အနတ္ထာယ သံဝတ္တေယျု’’န္တိ ဧတသ္မိံ တတိယဝါရေပိ. ‘‘သမထဝိပဿနာ ဂဟေတဗ္ဗာ’’တိ ဝုတ္တံ အဋ္ဌကထာယံ, တံ ပန မဂ္ဂဿ အနုပ္ပန္နတာယ သဗ္ဘာဝတော, အနုပ္ပဇ္ဇမာနေ စ တသ္မိံ ဝဋ္ဋာနတ္ထသဗ္ဘာဝတောတိ မဂ္ဂဿပိ သာဓာရဏဘာဝတော န ယုတ္တန္တိ ပဋိက္ခိပတိ. ယဒိ သမထဝိပဿနာနမ္ပိ အနုပ္ပတ္တိ အနတ္ထာဝဟာ, မဂ္ဂဿ အနုပ္ပတ္တိယာ ဝတ္တဗ္ဗံ နတ္ထီတိ. लोभ आदि को जानना चाहिए, जो आरब्ध-विपश्यकों (विपश्यना आरम्भ करने वालों) में उत्पन्न होने योग्य हैं। 'एक बार उत्पन्न होकर' - यह केवल स्वभाव का कथन मात्र है। क्योंकि मार्ग एक ही बार उत्पन्न होता है। 'निरुद्ध होता हुआ' का अर्थ है अपने स्वभाव से ही निरुद्ध होता हुआ। क्योंकि उसका कोई प्रतिपक्ष-संयोग नहीं होता। 'फल का' का अर्थ है अनन्तर काल में ही उत्पन्न होने वाले फल का। 'प्रत्यय देकर ही निरुद्ध होता है' - इसके द्वारा यह दिखाया गया है कि मार्ग वर्तमान और भविष्य में निश्चित रूप से अर्थ (हित) लाने वाला होता है। 'पूर्व में भी' का अर्थ है 'मेरे अनुत्पन्न कुशल धर्म उत्पन्न न होते हुए अनर्थ के लिए संवर्तित होंगे' - इस तीसरी बार में भी। अट्ठकथा में कहा गया है कि 'समथ और विपश्यना को ग्रहण करना चाहिए', किन्तु मार्ग की अनुत्पन्नता के कारण उसकी सत्ता होने पर, और उसके उत्पन्न न होने पर संसार रूपी अनर्थ की सत्ता होने से, मार्ग के भी साधारण होने के कारण यह युक्त नहीं है - ऐसा कहकर प्रतिषेध किया जाता है। यदि समथ और विपश्यना की अनुत्पत्ति भी अनर्थकारी है, तो मार्ग की अनुत्पत्ति के विषय में तो कहना ही क्या है। မဟန္တံ[Pg.117], ဂါရဝံ ဟောတိ, တသ္မာ ‘‘သံဃဂါရဝေန ယထာရုစိ ဝန္ဒိတုံ န လဘာမီ’’တိ သံဃေန သဟ န နိက္ခမိ. ဧတ္တကံ ဓာတူနံ နိဓာနံ နာမ အညတြ နတ္ထိ, မဟာဓာတုနိဓာနတော ဟိ နီဟရိတွာ ကတိပယာ ဓာတုယော တတ္ထ တတ္ထ စေတိယေ ဥပနီတာ, ဣဓ ပန ရာမဂါမထူပေ ဝိနဋ္ဌေ နာဂဘဝနံ ပဝိဋ္ဌာ ဒေါဏမတ္တာ ဓာတုယော ဥပနီတာ. အတိမန္ဒာနိ နောတိ နနု အတိဝိယ မန္ဒာနိ. महान गौरव होता है, इसलिए 'संघ के गौरव के कारण अपनी रुचि के अनुसार वन्दना करने का अवसर नहीं मिलता' - ऐसा सोचकर वह संघ के साथ नहीं निकला। धातुओं का इतना बड़ा निधान अन्यत्र कहीं नहीं है, क्योंकि महाधातु निधान से निकालकर कुछ ही धातुएँ यहाँ-वहाँ चैत्यों में ले जाई गई हैं, किन्तु यहाँ रामग्राम स्तूप के नष्ट होने पर नागभवन में प्रविष्ट हुई द्रोण मात्र धातुएँ लाई गई हैं। 'अतिमन्द' का अर्थ है क्या वे अत्यधिक मन्द नहीं हैं? သံဝိဇ္ဇိတွာတိ ‘‘ကထဉှိ နာမ မာဒိသော ဤဒိသံ အနတ္ထံ ပါပုဏိဿတီ’’တိ သံဝေဂံ ဇနေတွာ. ဤဒိသံ နာမ မာဒိသံ အာရဗ္ဘ ဝတ္တဗ္ဗန္တိ ကိံ ဝဒတီတိ တံ ဝစနံ အနာဒိယန္တော. 'संविज्जित्वा' का अर्थ है 'मुझ जैसा व्यक्ति इस प्रकार के अनर्थ को कैसे प्राप्त होगा' - ऐसा संवेग उत्पन्न करके। 'मुझ जैसे के विषय में ऐसा कहना चाहिए' - ऐसा क्या कहता है, उस वचन पर ध्यान न देते हुए। သန္တသမာပတ္တိတော အညံ သန္ထမ္ဘနကာရဏံ ဗလဝံ နတ္ထီတိ တတော ပရိဟီနော သမ္မာပဋိပတ္တိယံ ပတိဋ္ဌာ ကထံ ဘဝိဿတီတိ အာဟ ‘‘သန္တာယ…ပေ… န သက္ကောတီ’’တိ. န ဟိ မဟာရဇ္ဇုယာ ဆိန္နာယ သုတ္တတန္တူ သန္ထမ္ဘေတုံ သက္ကောန္တီတိ. သမထေ ဒဿေတွာ တေန သမာနဂတိကာ ဣမသ္မိံ ဝိသယေ ဝိပဿနာပီတိ ဣမိနာ အဓိပ္ပာယေနာဟ ‘‘ဧဝံ ဥပ္ပန္နာ သမထဝိပဿနာ…ပေ… သံဝတ္တန္တီ’’တိ. शान्त समापत्ति के अतिरिक्त स्थिरता का दूसरा कोई बलवान कारण नहीं है, इसलिए उससे रहित होने पर सम्यक् प्रतिपत्ति में प्रतिष्ठा कैसे होगी? - इसलिए कहा 'शान्त... पे... समर्थ नहीं होता'। जैसे बड़ी रस्सी के टूट जाने पर सूत के धागे थामने में समर्थ नहीं होते। समथ को दिखाकर, इस विषय में विपश्यना भी उसी गति वाली है - इस अभिप्राय से कहा 'इस प्रकार उत्पन्न समथ-विपश्यना... पे... संवर्तित होते हैं'। ကာသာဝန္တိ ကာသာဝဝတ္ထံ. ကစ္ဆံ ပီဠေတွာ နိဝတ္ထန္တိ ပစ္ဆိမံ ဩဝဋ္ဋိကံ ပီဠေန္တော ဝိယ ဒဠှံ ကတွာ နိဝတ္ထံ အဒ္ဒသံသူတိ ယောဇနာ. 'कासावं' का अर्थ है काषाय वस्त्र (गेरुआ वस्त्र)। 'कच्छं पीळेत्वा निवत्थं' का अर्थ है पिछली ओवट्ठिका (लाँग) को दबाते हुए के समान दृढ़ करके पहने हुए देखा - ऐसा योजन है। ဝုတ္တနယေနာတိ (အ. နိ. ဋီ. ၁.၁.၃၉၄) ‘‘ကာမာ နာမေတေ အနိစ္စာ ဒုက္ခာ ဝိပရိဏာမဓမ္မာ’’တိအာဒိနာ ဝတ္ထုကာမကိလေသကာမေသု အာဒီနဝဒဿနပုဗ္ဗကနေက္ခမ္မပဋိပတ္တိယာ ဆန္ဒရာဂံ ဝိက္ခမ္ဘယတော သမုစ္ဆိန္ဒန္တဿ စ ‘‘အနုပ္ပန္နော စ ကာမာသဝေါ န ဥပ္ပဇ္ဇတီ’’တိအာဒိနာ ဟေဋ္ဌာ သဗ္ဗာသဝသုတ္တဝဏ္ဏနာဒီသု (မ. နိ. ၁.၁၅ အာဒယော; မ. နိ. အဋ္ဌ. ၁.၁၅ အာဒယော) ဝုတ္တနယေန. အာရမ္မဏရသံ အနုဘဝိတွာ နိရုဒ္ဓဝိပါကောတိ တဒါရမ္မဏမာဟ. အနုဘဝိတွာ ဘဝိတွာ စ ဝိဂတံ ဘူတဝိဂတံ. အနုဘူတဘူတာ ဟိ ဘူတတာသာမညေန ဘူတ-သဒ္ဒေန ဝုတ္တာ. သာမညမေဝ ဟိ ဥပသဂ္ဂေန ဝိသေသီယတီတိ. အနုဘူတသဒ္ဒေါ စ ကမ္မဝစနိစ္ဆာယ အဘာဝတော အနုဘဝကဝါစကော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ဝိပါကော အာရမ္မဏေ ဥပ္ပဇ္ဇိတွာ နိရုဒ္ဓေါ ဘုတွာဝိဂတောတိ ဝတ္တဗ္ဗတံ အရဟတိ, [Pg.118] ဝိကပ္ပဂါဟဝသေန ရာဂါဒီဟိ တဗ္ဗိပက္ခေဟိ စ အကုသလံ ကုသလဉ္စ ကမ္မံ အာရမ္မဏရသံ အနုဘဝိတွာ ဝိဂတန္တိ ဝတ္တဗ္ဗတံ အရဟတိ. ယထာဝုတ္တော ပန ဝိပါကော ကေဝလံ အာရမ္မဏရသာနုဘဝနဝသေနေဝ ပဝတ္တတီတိ အနုဘဝိတွာ ဝိဂတတ္တာ နိပ္ပရိယာယေနေဝ ဝုတ္တော, တဿ စ တထာ ဝုတ္တတ္တာ ကမ္မံ ဘဝိတွာ ဝိဂတပရိယာယေန, ယံ ‘‘ဥပ္ပန္နာနံ အကုသလာနံ ဓမ္မာနံ ပဟာနာယ, ဥပ္ပန္နာနံ ကုသလာနံ ဓမ္မာနံ ဌိတိယာ’’တိ ဧတ္ထ ‘‘ဥပ္ပန္န’’န္တိ ဂဟေတွာ တံသဒိသာနံ ပဟာနံ, ဝုဒ္ဓိ စ ဝုတ္တာ. ဝိပစ္စိတုံ ဩကာသကရဏဝသေန ဥပ္ပတိတံ အတီတကမ္မဉ္စ တတော ဥပ္ပဇ္ဇိတုံ အာရဒ္ဓေါ အနာဂတော ဝိပါကော စ ‘‘ဩကာသကတုပ္ပန္နော’’တိ ဝုတ္တော. ယံ ဥပ္ပန္နသဒ္ဒေန ဝိနာပိ ဝိညာယမာနံ ဥပ္ပန္နံ သန္ဓာယ ‘‘နာဟံ, ဘိက္ခဝေ, သဉ္စေတနိကာန’’န္တိအာဒိ (အ. နိ. ၁၀.၂၁၇, ၂၁၉) ဝုတ္တံ. कथित विधि से (अं. नि. टी. 1.1.394) 'ये काम अनित्य, दुःख और विपरिणामधर्मी हैं' इत्यादि के द्वारा वस्तु-काम और क्लेश-काम में दोष-दर्शन पूर्वक नैष्क्रम्य-प्रतिपत्ति से छन्द-राग को विक्षिप्त (दबाने) और समूच्छिन्न करने वाले के लिए 'अनुत्पन्न कामासव उत्पन्न नहीं होता' इत्यादि के द्वारा नीचे सब्बासवसुत्त की व्याख्या आदि में (म. नि. 1.15 आदि; म. नि. अट्ठ. 1.15 आदि) कथित विधि के अनुसार। 'आलम्बन के रस का अनुभव करके निरुद्ध विपाक' - यह तदारम्मण को कहता है। अनुभव करके और होकर जो विगत हो गया, वह 'भूतविगत' है। अनुभूत और भूत (हुए) को भूतता के सामान्य होने से 'भूत' शब्द से कहा गया है। सामान्य ही उपसर्ग द्वारा विशेषित होता है। 'अनुभूत' शब्द कर्मवाच्य की इच्छा के अभाव में अनुभव करने वाले का वाचक समझना चाहिए। विपाक आलम्बन में उत्पन्न होकर निरुद्ध होकर 'भूतविगत' कहलाने योग्य है; विकल्प-ग्रहण के वश से राग आदि और उनके विपक्षियों द्वारा अकुशल और कुशल कर्म आलम्बन के रस का अनुभव करके विगत होने के कारण 'विगत' कहलाने योग्य हैं। किन्तु यथाकथित विपाक केवल आलम्बन-रस के अनुभव के वश से ही प्रवृत्त होता है, इसलिए अनुभव करके विगत होने के कारण निष्पर्याय (मुख्य रूप) से कहा गया है, और उसके वैसा कहे जाने के कारण कर्म 'होकर विगत' होने के पर्याय से, जो 'उत्पन्न अकुशल धर्मों के प्रहाण के लिए, उत्पन्न कुशल धर्मों की स्थिति के लिए' यहाँ 'उत्पन्न' ग्रहण करके उनके समान धर्मों का प्रहाण और वृद्धि कही गई है। विपाक देने का अवसर प्रदान करने के वश से उत्पन्न अतीत कर्म और उससे उत्पन्न होने के लिए आरम्भ हुआ अनागत विपाक 'अवकाशकृत-उत्पन्न' कहा गया है। जो 'उत्पन्न' शब्द के बिना भी समझा जाने वाला 'उत्पन्न' के सन्दर्भ में 'भिक्षुओं, मैं संचेतनिक (कर्मों का)...' आदि (अं. नि. 10.217, 219) कहा गया है। တေသူတိ ဝိပဿနာယ ဘူမိဘူတေသု ခန္ဓေသု. အနုသယိတကိလေသာတိ အနုသယဝသေန ပဝတ္တာ အပ္ပဟီနာ မဂ္ဂေန ပဟာတဗ္ဗာ ကိလေသာ အဓိပ္ပေတာ. တေနာဟ ‘‘အတီတာ…ပေ… န ဝတ္တဗ္ဗာ’’တိ. တေသဉှိ အမ္ဗရုက္ခောပမာယ ဝတ္တမာနာဒိတာ န ဝတ္တဗ္ဗာ မဂ္ဂေန ပဟာတဗ္ဗာနံ တာဒိသဿ ဝိဘာဂဿ အနုပ္ပဇ္ဇနတော. အပ္ပဟီနာဝ ဟောန္တီတိ ဣမိနာ အပ္ပဟီနဋ္ဌေန အနုသယဋ္ဌောတိ ဒဿေတိ. ဣဒံ ဘူမိလဒ္ဓုပ္ပန္နံ နာမာတိ ဣဒံ တေသု ခန္ဓေသု ဥပ္ပတ္တိရဟကိလေသဇာတံ တာယ ဧဝ ဥပ္ပတ္တိရဟတာယ ဘူမိလဒ္ဓုပ္ပန္နံ နာမ, တေဘူမကဘူမိလဒ္ဓါ နာမ ဟောတီတိ အတ္ထော. တာသု တာသု ဘူမီသူတိ မနုဿဒေဝါဒိအတ္တဘာဝသင်္ခါတေသု ဥပါဒါနက္ခန္ဓေသု. တသ္မိံ တသ္မိံ သန္တာနေ အနုပ္ပတ္တိအနာပါဒိတတာယ အသမုဂ္ဃာတိတာ. ဧတ္ထ စ လဒ္ဓဘူမိကံ ဘူမိလဒ္ဓန္တိ ဝုတ္တံ အဂ္ဂိအာဟိတော ဝိယ. 'उनमें' अर्थात् विपश्यना की भूमि-स्वरूप स्कन्धों में। 'अनुशयित क्लेश' अर्थात् अनुशय के रूप में प्रवृत्त, अप्रहीण (न त्यागे गए), मार्ग द्वारा प्रहातव्य (त्यागने योग्य) क्लेश अभिप्रेत हैं। इसीलिए कहा— 'अतीत... पे... नहीं कहना चाहिए'। क्योंकि आम के वृक्ष की उपमा के अनुसार उनकी वर्तमानता आदि नहीं कहनी चाहिए, क्योंकि मार्ग द्वारा प्रहातव्य क्लेशों का वैसा विभाग उत्पन्न नहीं होता। 'वे अप्रहीण ही होते हैं'— इससे अप्रहीण होने के अर्थ में अनुशय का अर्थ दिखाता है। 'यह भूमिलब्ध-उत्पन्न नाम है'— यह उन स्कन्धों में उत्पत्ति के योग्य क्लेश-समूह अपनी उस उत्पत्ति की योग्यता के कारण 'भूमिलब्ध-उत्पन्न' नाम वाला है, त्रैभूमिक भूमि को प्राप्त करने वाला होता है, यह अर्थ है। 'उन-उन भूमियों में' अर्थात् मनुष्य-देव आदि आत्मभाव संज्ञक उपादान स्कन्धों में। उन-उन सन्तानों में अनुत्पत्ति और अप्राप्ति के कारण जो समूच्छिन्न (नष्ट) नहीं हुए हैं। यहाँ 'लब्धभूमिक' को 'भूमिलब्ध' कहा गया है, जैसे 'अग्नि-आहित' (अग्नि स्थापित)। ဩကာသကတုပ္ပန္န-သဒ္ဒေပိ စ ဩကာသော ကတော ဧတေနာတိ ဩကာသော ကတော ဧတဿာတိ စ အတ္ထဒွယေပိ ကတ-သဒ္ဒဿ ပရနိပါတော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. အာဟတခီရရုက္ခော ဝိယ နိမိတ္တဂ္ဂါဟဝသေန အဓိဂ္ဂဟိတံ အာရမ္မဏံ, အနာဟတခီရရုက္ခော ဝိယ အဝိက္ခမ္ဘိတတာယ အန္တောဂဓကိလေသံ အာရမ္မဏံ. နိမိတ္တဂ္ဂါဟကာဝိက္ခမ္ဘိတကိလေသာ ဝါ ပုဂ္ဂလာ အာဟတာနာဟတခီရရုက္ခသဒိသာ. ပုရိမနယေနေဝါတိ အဝိက္ခမ္ဘိတုပ္ပန္နေ ဝိယ ‘‘ဣမသ္မိံ နာမ ဌာနေ နုပ္ပဇ္ဇိဿန္တီတိ န ဝတ္တဗ္ဗာ. ကသ္မာ? အသမုဂ္ဃာတိတတ္တာ’’တိ ယောဇေတွာ ဝိတ္ထာရေတဗ္ဗံ. 'अवकाशकृत-उत्पन्न' शब्द में भी 'इसके द्वारा अवसर बनाया गया' और 'इसके लिए अवसर बनाया गया'— इन दोनों अर्थों में 'कृत' शब्द का परनिपात (बाद में प्रयोग) समझना चाहिए। जैसे आहत (चोट खाया हुआ) दूध वाला वृक्ष, वैसे ही निमित्त-ग्रहण के वश से अधिग्रहित आलम्बन है; जैसे अनाहत (बिना चोट खाया) दूध वाला वृक्ष, वैसे ही अविष्खम्भित (न दबाए जाने) के कारण अन्तर्निहित क्लेश वाला आलम्बन है। अथवा निमित्त-ग्रहण करने वाले और अविष्खम्भित क्लेशों वाले पुद्गल आहत और अनाहत दूध वाले वृक्ष के समान हैं। 'पूर्व विधि के अनुसार ही'— जैसे अविष्खम्भित-उत्पन्न में 'इस स्थान पर उत्पन्न नहीं होंगे, ऐसा नहीं कहना चाहिए। क्यों? समूच्छिन्न न होने के कारण'— ऐसा जोड़कर विस्तार करना चाहिए। ဝုတ္တံ ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂေ. တတ္ထ စ မဂ္ဂေန ပဟီနကိလေသာနမေဝ တိဓာ နဝတ္တဗ္ဗတံ အပါကဋံ သုပါကဋံ ကာတုံ အဇာတဖလရုက္ခော ဥပမာဘာဝေန အာဂတော[Pg.119]. အတီတာဒီနံ အပ္ပဟီနတာ ဒဿနတ္ထမ္ပိ ‘‘ဇာတဖလရုက္ခေန ဒီပေတဗ္ဗ’’န္တိ ဝုတ္တံ. တတ္ထ ယထာ အစ္ဆိန္နေ ရုက္ခေ နိဗ္ဗတ္တာရဟာနိ ဖလာနိ ဆိန္နေ အနုပ္ပဇ္ဇမာနာနိ န ကဒါစိ သသဘာဝါနိ အဟေသုံ ဟောန္တိ ဘဝိဿန္တိ စာတိ တာနိ အတီတာဒိဘာဝေန န ဝတ္တဗ္ဗာနိ, ဧဝံ မဂ္ဂေန ပဟီနကိလေသာ စ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. ယထာ ဆေဒေ အသတိ ဖလာနိ ဥပ္ပဇ္ဇိဿန္တိ, သတိ စ နုပ္ပဇ္ဇိဿန္တီတိ ဆေဒဿ သာတ္ထကတာ, ဧဝံ မဂ္ဂဘာဝနာယ စ သာတ္ထကတာ ယောဇေတဗ္ဗာ. प्रतिसम्भिदामग्ग में कहा गया है। वहाँ मार्ग द्वारा प्रहीण क्लेशों की ही तीन प्रकार से 'न कहने योग्यता' को जो स्पष्ट नहीं थी, उसे सुस्पष्ट करने के लिए 'अजात-फल-वृक्ष' (जिस पर फल न आए हों) उपमा के रूप में आया है। अतीत आदि की अप्रहीणता दिखाने के लिए भी 'जात-फल-वृक्ष' (जिस पर फल आए हों) द्वारा प्रकाशित करना चाहिए, ऐसा कहा गया है। वहाँ जैसे वृक्ष के न कटने पर उत्पन्न होने योग्य फल, वृक्ष के कट जाने पर उत्पन्न न होते हुए कभी भी स्वभावतः न थे, न हैं और न होंगे— इसलिए उन्हें अतीत आदि भाव से नहीं कहना चाहिए, वैसे ही मार्ग द्वारा प्रहीण क्लेशों को समझना चाहिए। जैसे छेद (कटने) के अभाव में फल उत्पन्न होंगे, और होने पर उत्पन्न नहीं होंगे— इस प्रकार छेद की सार्थकता है, वैसे ही मार्ग-भावना की सार्थकता जोड़नी चाहिए। တေပိ ပဇဟတိယေဝ ကိလေသပ္ပဟာနေနေဝ တေသမ္ပိ အနုပ္ပတ္တိဓမ္မတာပါဒနတော. အဘိသင်္ခါရဝိညာဏဿာတိ ပဋိသန္ဓိဝိညာဏဿ. ဥပါဒိန္နအနုပါဒိန္နတောတိ ဥပါဒိန္နခန္ဓတော စေဝ ကိလေသတော စ. ဥပပတ္တိဝသေန ဝုဋ္ဌာနံ ဒဿေတုမာဟ – ‘‘ဘဝဝသေန ပနာ’’တိအာဒိ. ယေ သောတာပန္နဿ သတ္တ ဘဝါ အပ္ပဟီနာ, တတော ပဉ္စ ဌပေတွာ ဣတရေ ဒွေ ‘‘သုဂတိဘဝေကဒေသာ’’တိ အဓိပ္ပေတာ. သုဂတိကာမဘဝတောတိ သုဂတိဘဝေကဒေသဘူတကာမဘဝတော. အရဟတ္တမဂ္ဂေါ ရူပါရူပဘဝတော ဝုဋ္ဌာတိ ဥဒ္ဓမ္ဘာဂိယသံယောဇနသမုဂ္ဃာတဘာဝတော. ယဒိ အရဟတ္တမဂ္ဂေါ ဧဝ အရိယမဂ္ဂေါ သိယာ, သော ဧဝ သဗ္ဗကိလေသေ ပဇဟေယျ, သဗ္ဗဘဝေဟိပိ ဝုဋ္ဌဟေယျ. ယသ္မာ ပန ဩဓိသောဝ ကိလေသာ ပဟီယန္တိ, တသ္မာ ဟေဋ္ဌိမဟေဋ္ဌိမမဂ္ဂေဟိ ပဟီနာဝသေသေ ကိလေသေ သော ပဇဟတိ, ဣတိ ဣမံ သာမတ္ထိယံ သန္ဓာယ ‘‘သဗ္ဗဘဝေဟိ ဝုဋ္ဌာတိယေဝါတိပိ ဝဒန္တီ’’တိ ဝုတ္တံ. တထာ ဟိ သော ဧဝ ‘‘ဝဇိရူပမော’’တိ ဝုတ္တော. उन्हें भी त्यागता ही है, क्लेशों के प्रहाण से ही उनकी भी अनुत्पत्ति-धर्मिता सिद्ध होने के कारण। 'अभिसंस्कार-विज्ञान का' अर्थात् प्रतिसन्धि-विज्ञान का। 'उपात्त और अनुपात्त से' अर्थात् उपादान स्कन्धों से और क्लेशों से। उत्पत्ति के वश से उत्थान दिखाने के लिए कहा— 'भव के वश से तो' आदि। स्रोतआपन्न के जो सात भव अप्रहीण हैं, उनमें से पाँच को छोड़कर शेष दो 'सुगति-भव के एक अंश' अभिप्रेत हैं। 'सुगति-कामभव से' अर्थात् सुगति-भव के एक अंश रूप कामभव से। अर्हत्-मार्ग रूप और अरूप भव से उत्थान करता है, क्योंकि वह ऊर्ध्वभागीय संयोजनों का समूच्छेद करने वाला है। यदि अर्हत्-मार्ग ही आर्यमार्ग हो, तो वही सभी क्लेशों को त्यागेगा, सभी भवों से उत्थान करेगा। किन्तु चूँकि क्लेश सीमाबद्ध (क्रमशः) प्रहीण होते हैं, इसलिए वह नीचे-नीचे के मार्गों द्वारा प्रहीण होने से बचे हुए क्लेशों को त्यागता है, इस सामर्थ्य को ध्यान में रखकर 'सभी भवों से उत्थान करता ही है, ऐसा भी कहते हैं'— यह कहा गया है। क्योंकि उसे ही 'वज्रोपम' कहा गया है। ဟောတု တာဝ ဝုတ္တနယေန အနုပ္ပန္နာနံ အကုသလာနံ အနုပ္ပာဒါယ, ဥပ္ပန္နာနံ ဥပ္ပန္နသဒိသာနံ ပဟာနာယ အနုပ္ပတ္တိဓမ္မတာပါဒနာယ မဂ္ဂဘာဝနာ, အထ မဂ္ဂက္ခဏေ ကထံ အနုပ္ပန္နာနံ ကုသလာနံ ဥပ္ပာဒါယ ဥပ္ပန္နာနဉ္စ ဌိတိယာ ဘာဝနာ ဟောတိ ဧကစိတ္တက္ခဏိကတ္တာ တဿာတိ စောဒေတိ, ဣတရော ‘‘မဂ္ဂပ္ပဝတ္တိယာယေဝါ’’တိ ပရိဟာရမာဟ. မဂ္ဂေါ ဟိ ကာမဉ္စေကစိတ္တက္ခဏိကော, တထာရူပေါ ပနဿ ပဝတ္တိဝိသေသော, ယံ အနုပ္ပန္နာ ကုသလာ ဓမ္မာ သာတိသယံ ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ, ဥပ္ပန္နာ စ သဝိသေသံ ပါရိပူရိံ ပါပုဏန္တိ. တေနာဟ ‘‘မဂ္ဂေါ ဟီ’’တိအာဒိ. ကိဉ္စာပိ အရိယမဂ္ဂေါ ဝတ္တမာနက္ခဏေ အနုပ္ပန္နော နာမ န ဟောတိ, အနုပ္ပန္နပုဗ္ဗတံ ဥပါဒါယ ဥပစာရဝသေန တထာ ဝုစ္စတီတိ ဒဿေတုံ ‘‘အနာဂတပုဗ္ဗံ ဟီ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. အယမေဝါတိ အယံ မဂ္ဂဿ ယထာပစ္စယပဝတ္တိ [Pg.120] ဧဝ ဌိတိ နာမာတိ, မဂ္ဂသမင်္ဂီ ပုဂ္ဂလော မဂ္ဂမ္ပိ ဘာဝေန္တော ဧဝ တဿ ဌိတိယာ ဘာဝေတီတိ ဝတ္တုံ ဝဋ္ဋတိ. कहे गए तरीके से अनुत्पन्न अकुशलों के अनुत्पाद के लिए, उत्पन्न और उत्पन्न के समान (अकुशलों) के प्रहाण के लिए और अनुत्पत्तिधर्मता की प्राप्ति के लिए मार्ग-भावना हो; फिर मार्ग-क्षण में अनुत्पन्न कुशलों के उत्पाद के लिए और उत्पन्न कुशलों की स्थिति के लिए भावना कैसे होती है, क्योंकि वह (मार्ग) एक चित्त-क्षण वाला होता है—ऐसा आक्षेप करने पर, दूसरे (आचार्य) ने ‘मार्ग की प्रवृत्ति से ही’ ऐसा परिहार (उत्तर) कहा। मार्ग यद्यपि निश्चित रूप से एक चित्त-क्षण वाला है, फिर भी उसकी प्रवृत्ति का विशेष ऐसा है कि जिससे अनुत्पन्न कुशल धर्म अतिशय के साथ उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न कुशल धर्म विशेष रूप से परिपूर्णता को प्राप्त होते हैं। इसीलिए ‘मार्ग ही’ इत्यादि कहा गया है। यद्यपि आर्यमार्ग वर्तमान क्षण में ‘अनुत्पन्न’ नहीं कहलाता, फिर भी पहले कभी उत्पन्न न होने की अपेक्षा से उपचारवश ऐसा कहा जाता है—यह दिखाने के लिए ‘जो पहले कभी उत्पन्न नहीं हुआ’ इत्यादि कहा गया है। ‘यही है’—अर्थात मार्ग की यह प्रत्यय-अनुसार प्रवृत्ति ही ‘स्थिति’ कहलाती है; अतः मार्ग से युक्त पुद्गल मार्ग की भावना करते हुए ही उसकी स्थिति के लिए भावना करता है, ऐसा कहना उचित है। ဥပသမမာနံ ဂစ္ဆတီတိ ဝိက္ခမ္ဘနဝသေန သမုစ္ဆေဒဝသေန ကိလေသေ ဥပသမေန္တံ ဝတ္တတိ. ပုဗ္ဗဘာဂိန္ဒြိယာနိ ဧဝ ဝါ အဓိပ္ပေတာနိ. တေနေဝါဟ ‘‘ကိလေသူပသမတ္ထံ ဝါ ဂစ္ဆတီ’’တိ. ‘उपशम को प्राप्त होता है’—विक्खम्भन (दबाने) के द्वारा और समुच्छेद (जड़ से मिटाने) के द्वारा क्लेशों को शान्त करते हुए प्रवृत्त होता है। अथवा पूर्वभाग की इन्द्रियाँ ही अभिप्रेत हैं। इसीलिए कहा गया है—‘अथवा क्लेशों के उपशम के लिए जाता है’। ၂၄၈. အဓိမုစ္စနဋ္ဌေနာတိ (ဒီ. နိ. ဋီ. ၂.၁၂၉; အ. နိ. ဋီ. ၃.၈.၆၆) အဓိကံ သဝိသေသံ မုစ္စနဋ္ဌေန, တေနာဟ ‘‘သုဋ္ဌု မုစ္စနဋ္ဌော’’တိ. ဧတေန သတိပိ သဗ္ဗဿပိ ရူပါဝစရဇ္ဈာနဿ ဝိက္ခမ္ဘနဝသေန ပဋိပက္ခတော ဝိမုတ္တဘာဝေ ယေန ဘာဝနာဝိသေသေန တံ ဈာနံ သာတိသယံ ပဋိပက္ခတော ဝိမုစ္စိတွာ ပဝတ္တတိ, သော ဘာဝနာဝိသေသော ဒီပိတော. ဘဝတိ ဟိ သမာနဇာတိယုတ္တောပိ ဘာဝနာဝိသေသေန ပဝတ္တိအာကာရဝိသေသော. ယထာ တံ သဒ္ဓါဝိမုတ္တတော ဒိဋ္ဌိပ္ပတ္တဿ, တထာ ပစ္စနီကဓမ္မေဟိ သုဋ္ဌု ဝိမုတ္တတာယ ဧဝ အနိဂ္ဂဟိတဘာဝေန နိရာသင်္ကတာယ အဘိရတိဝသေန သုဋ္ဌု အဓိမုစ္စနဋ္ဌေနပိ ဝိမောက္ခော. တေနာဟ ‘‘အာရမ္မဏေ စာ’’တိအာဒိ. အယံ ပနတ္ထောတိ အယံ အဓိမုစ္စနတ္ထော ပစ္ဆိမဝိမောက္ခေ နိရောဓေ နတ္ထိ. ကေဝလော ဝိမုတ္တတ္ထော ဧဝ တတ္ထ လဗ္ဘတိ, တံ သယမေဝ ပရတော ဝက္ခတိ. २४८. ‘अधिमुच्चनट्ठेन’ (अधिमुक्ति के अर्थ में)—अधिक विशेष रूप से मुक्त होने के अर्थ में, इसीलिए कहा गया है ‘अच्छी तरह मुक्त होने का अर्थ’। इससे, यद्यपि समस्त रूपावचर ध्यान विक्खम्भन के द्वारा प्रतिपक्ष से मुक्त होते हैं, फिर भी जिस भावना-विशेष से वह ध्यान अतिशय रूप से प्रतिपक्ष से मुक्त होकर प्रवृत्त होता है, वह भावना-विशेष यहाँ दर्शाया गया है। समान जाति से युक्त होने पर भी भावना-विशेष के कारण प्रवृत्ति के आकार में विशेषता होती है। जैसे श्रद्धाविमुक्त से दृष्टि प्राप्त (पुद्गल) की विशेषता होती है, वैसे ही प्रत्यनीक (विपक्षी) धर्मों से अच्छी तरह मुक्त होने के कारण ही, दमित न होने से और नि:शंक होने से, अभिरति के वश से ‘अच्छी तरह अधिमुक्ति के अर्थ’ में भी विमोक्ष होता है। इसीलिए ‘आलम्बन में च’ इत्यादि कहा गया है। ‘यह अर्थ है’—अर्थात यह अधिमुक्ति का अर्थ अन्तिम विमोक्ष (निरोध) में नहीं है। वहाँ केवल ‘विमुक्त’ होने का अर्थ ही प्राप्त होता है, जिसे वह स्वयं आगे कहेंगे। ရူပီတိ ယေနာယံ သသန္တတိပရိယာပန္နေန ရူပေန သမန္နာဂတော, တံ ယဿ ဈာနဿ ဟေတုဘာဝေန ဝိသိဋ္ဌံ ရူပံ ဟောတိ. ယေန ဝိသိဋ္ဌေန ရူပေန ‘‘ရူပီ’’တိ ဝုစ္စေယျ ရူပီ-သဒ္ဒဿ အတိသယတ္ထဒီပနတော, တဒေဝ သသန္တတိပရိယာပန္နရူပနိမိတ္တံ ဈာနမိဝ ပရမတ္ထတော ရူပီဘာဝသာဓကန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. တေနာဟ ‘‘အဇ္ဈတ္တ’’န္တိအာဒိ. ရူပဇ္ဈာနံ ရူပံ ဥတ္တရပဒလောပေန. ရူပါနီတိ ပနေတ္ထ ပုရိမပဒလောပေါ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. တေန ဝုတ္တံ ‘‘နီလကသိဏာဒီနိ ရူပါနီ’’တိ. ‘रूपी’—जिस अपनी सन्तान में समाहित रूप से यह युक्त है, वह जिस ध्यान के लिए हेतु होने से विशिष्ट रूप होता है। जिस विशिष्ट रूप के कारण ‘रूपी’ कहा जाए—रूपी शब्द के अतिशय अर्थ को प्रकट करने से—उसी अपनी सन्तान में समाहित रूप-निमित्त को ध्यान के समान परमार्थतः ‘रूपी-भाव’ का साधक समझना चाहिए। इसीलिए ‘अध्यात्म’ इत्यादि कहा गया है। उत्तरपद का लोप होने से ‘रूप-ध्यान’ ही ‘रूप’ है। ‘रूपों को’ यहाँ पूर्वपद का लोप समझना चाहिए। इसीलिए कहा गया है—‘नील-कसिण आदि रूपों को’। အန္တောအပ္ပနာယံ သုဘန္တိ အာဘောဂေါ နတ္ထီတိ ဣမိနာ ပုဗ္ဗာဘောဂဝသေန အဓိမုတ္တိ သိယာတိ ဒဿေတိ. ဧဝဉှေတ္ထ တထာဝတ္တဗ္ဗတာပတ္တိစောဒနာ အနဝကာသာ ဟောတိ. ယသ္မာ သုဝိသုဒ္ဓေသု နီလာဒီသု ဝဏ္ဏကသိဏေသု တတ္ထ ကတာဓိကာရာနံ အဘိရတိဝသေန သုဋ္ဌု အဓိမုတ္တိ သိယာ, တသ္မာ အဋ္ဌကထာယံ တထာ တတိယော ဝိမောက္ခော သံဝဏ္ဏိတော. ယသ္မာ ပန မေတ္တာဒိဝသေန ပဝတ္တမာနာ ဘာဝနာ သတ္တေ အပ္ပဋိကူလတော ဒဟတိ, [Pg.121] တေ သုဘတော အဓိမုစ္စိတွာဝ ပဝတ္တတိ, တသ္မာ ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂေ (ပဋိ. မ. ၁.၂၁၂) ဗြဟ္မဝိဟာရဘာဝနာ ‘‘သုဘဝိမောက္ခော’’တိ ဝုတ္တာ, တယိဒံ ဥဘယမ္ပိ တေန တေန ပရိယာယေန ဝုတ္တတ္တာ န ဝိရုဇ္ဈတီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ‘अर्पणा के भीतर शुभ है’—इसमें आभोग (प्रयत्न) नहीं है, इससे यह दर्शाते हैं कि पूर्व-आभोग के वश से अधिमुक्ति हो सकती है। इस प्रकार यहाँ ‘वैसा कहने की आपत्ति’ का आक्षेप निराधार हो जाता है। क्योंकि सुविशुद्ध नील आदि वर्ण-कसिणों में, वहाँ किए गए अभ्यास के कारण अभिरति के वश से अच्छी तरह अधिमुक्ति हो सकती है, इसलिए अट्ठकथा में तीसरे विमोक्ष की वैसी व्याख्या की गई है। परन्तु क्योंकि मैत्री आदि के वश से प्रवृत्त होने वाली भावना सत्त्वों को अप्रतिकूल रूप में देखती है, और उन्हें शुभ मानकर अधिमुक्त होकर ही प्रवृत्त होती है, इसलिए पटिसम्भिदामग्ग में ब्रह्मविहार-भावना को ‘शुभ-विमोक्ष’ कहा गया है। यह दोनों ही बातें उस-उस सन्दर्भ (पर्याय) से कहे जाने के कारण विरुद्ध नहीं हैं, ऐसा समझना चाहिए। သဗ္ဗသောတိ အနဝသေသတော. န ဟိ စတုန္နံ အရူပက္ခန္ဓာနံ ဧကဒေသောပိ တတ္ထ အဝသိဋ္ဌောတိ. ဝိဿဋ္ဌတ္တာတိ ယထာပရိစ္ဆိန္နေ ကာလေ နိရောဓိတတ္တာ. ဥတ္တမော ဝိမောက္ခော နာမ အရိယေဟေဝ သမာပဇ္ဇိတဗ္ဗတော, အရိယဖလပရိယောသာနတ္တာ ဒိဋ္ဌေဝ ဓမ္မေ နိဗ္ဗာနပ္ပတ္တိဘာဝတော စ. ‘सब्बसो’ (सब प्रकार से)—बिना किसी शेष के। क्योंकि वहाँ चार अरूप स्कन्धों का एक अंश भी शेष नहीं रहता है। ‘विस्सट्ठत्ता’—यथा-निश्चित समय में निरुद्ध होने के कारण। ‘उत्तम विमोक्ष’ नाम इसलिए है क्योंकि यह केवल आर्यों द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है, आर्यफल की पराकाष्ठा होने से और इसी जन्म में निर्वाण की प्राप्ति के स्वरूप होने से। ၂၄၉. အဘိဘဝတီတိ အဘိဘု (ဒီ. နိ. ဋီ. ၂.၁၇၃; အ. နိ. ဋီ. ၃.၆.၆၁-၆၅) ပရိကမ္မံ, ဉာဏံ ဝါ. အဘိဘု အာယတနံ ဧတဿာတိ အဘိဘာယတနံ, ဈာနံ. အဘိဘဝိတဗ္ဗံ ဝါ အာရမ္မဏသင်္ခါတံ အာယတနံ ဧတဿာတိ အဘိဘာယတနံ, ဈာနံ. အာရမ္မဏာဘိဘဝနတော အဘိဘု စ တံ အာယတနဉ္စ ယောဂိနော သုခဝိသေသာနံ အဓိဋ္ဌာနဘာဝတော မနာယတနဓမ္မာယတနဘာဝတော စာတိပိ သသမ္ပယုတ္တံ ဈာနံ အဘိဘာယတနံ. တေနာဟ ‘‘အဘိဘဝနကာရဏာနီ’’တိအာဒိ. တာနီတိ အဘိဘာယတနသညိတာနိ ဈာနာနိ. သမာပတ္တိတော ဝုဋ္ဌိတဿ အာဘောဂေါ ပုဗ္ဗဘာဂဘာဝနာဝသေန ဈာနက္ခဏေ ပဝတ္တံ အဘိဘဝနာကာရံ ဂဟေတွာ ပဝတ္တောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ပရိကမ္မဝသေန အဇ္ဈတ္တံ ရူပသညီ, န အပ္ပနာဝသေန. န ဟိ ပဋိဘာဂနိမိတ္တာရမ္မဏာ အပ္ပနာ အဇ္ဈတ္တဝိသယာ သမ္ဘဝတိ. တံ ပန အဇ္ဈတ္တ ပရိကမ္မဝသေန လဒ္ဓံ ကသိဏနိမိတ္တံ အသုဝိသုဒ္ဓမေဝ ဟောတိ, န ဗဟိဒ္ဓါ ပရိကမ္မဝသေန လဒ္ဓံ ဝိယ ဝိသုဒ္ဓံ. २४९. ‘अभिभवति’ (अभिभूत करता है) इति ‘अभिभू’—परिकर्म अथवा ज्ञान। ‘अभिभू’ आयतन है जिसका, वह ‘अभिभायतन’—ध्यान है। अथवा अभिभूत करने योग्य आलम्बन-संज्ञक आयतन है जिसका, वह ‘अभिभायतन’—ध्यान है। आलम्बन को अभिभूत करने के कारण ‘अभिभू’ और वह आयतन भी है क्योंकि वह योगी के सुख-विशेषों का अधिष्ठान है और मनायतन-धम्मायतन स्वरूप है, इसलिए सम्प्रयुक्त धर्मों सहित ध्यान ‘अभिभायतन’ है। इसीलिए ‘अभिभूत करने के कारण’ इत्यादि कहा गया है। ‘वे’—अर्थात अभिभायतन संज्ञक ध्यान। समापत्ति से उठे हुए व्यक्ति का आभोग, पूर्वभाग-भावना के वश से ध्यान के क्षण में प्रवृत्त अभिभवन-आकार को ग्रहण करके प्रवृत्त होता है, ऐसा समझना चाहिए। परिकर्म के वश से ‘अध्यात्म रूप-संज्ञी’ होता है, अर्पणा के वश से नहीं। क्योंकि प्रतिभाग-निमित्त आलम्बन वाली अर्पणा अध्यात्म-विषयक नहीं हो सकती। वह अध्यात्म परिकर्म के वश से प्राप्त कसिण-निमित्त अशुद्ध ही होता है, बाहर परिकर्म के वश से प्राप्त निमित्त की तरह शुद्ध नहीं। ပရိတ္တာနီတိ ယထာလဒ္ဓါနိ သုပ္ပသရာဝမတ္တာနိ. တေနာဟ ‘‘အဝဍ္ဎိတာနီ’’တိ. ပရိတ္တဝသေနေဝါတိ ဝဏ္ဏဝသေန အာဘောဂေ ဝိဇ္ဇမာနေပိ ပရိတ္တဝသေနေဝ ဣဒမဘိဘာယတနံ ဝုတ္တံ. ပရိတ္တတာ ဟေတ္ထ အဘိဘဝနဿ ကာရဏံ. ဝဏ္ဏာဘောဂေ သတိပိ အသတိပိ အဘိဘာယတနဘာဝနာ နာမ တိက္ခပညဿေဝ သမ္ဘဝတိ, န ဣတရဿာတိ ‘‘ဉာဏုတ္တရိကော ပုဂ္ဂလော’’တိ. အဘိဘဝိတွာ သမာပဇ္ဇတီတိ ဧတ္ထ အဘိဘဝနံ သမာပဇ္ဇနဉ္စ ဥပစာရဇ္ဈာနာဓိဂမသမနန္တရမေဝ အပ္ပနာဈာနုပ္ပာဒနန္တိ အာဟ ‘‘သဟ နိမိတ္တုပ္ပာဒေနေဝေတ္ထ အပ္ပနံ ပါပေတီ’’တိ. သဟ နိမိတ္တုပ္ပာဒေနာတိ စ အပ္ပနာပရိဝါသာဘာဝဿ လက္ခဏဝစနမေတံ. ယော ‘‘ခိပ္ပာဘိညော’’တိ ဝုစ္စတိ[Pg.122], တတောပိ ဉာဏုတ္တရဿေဝ အဘိဘာယတနဘာဝနာ. ဧတ္ထာတိ ဧတသ္မိံ နိမိတ္တေ. အပ္ပနံ ပါပေတီတိ ဘာဝနာ အပ္ပနံ နေတိ. परित्त का अर्थ है यथाप्राप्त छोटे सकोरे (शराव) के समान। इसीलिए 'अवर्धित' कहा गया है। 'परित्त के वश से ही' - वर्ण के वश से आभोग (ध्यान) विद्यमान होने पर भी परित्त के वश से ही यह अभिभायतन कहा गया है। यहाँ अभिभव (अभिभूत करने) का कारण परित्तता (लघुता) है। वर्ण के आभोग के होने या न होने पर भी अभिभायतन की भावना केवल तीक्ष्ण प्रज्ञा वाले को ही संभव होती है, दूसरे को नहीं, इसीलिए 'ज्ञानोत्तरिक पुद्गल' कहा गया है। 'अभिभूत कर समापन्न होता है' - यहाँ अभिभव और समापत्ति उपचार ध्यान की प्राप्ति के ठीक बाद अर्पणा ध्यान की उत्पत्ति है, इसीलिए कहा गया है - 'निमित्त की उत्पत्ति के साथ ही यहाँ अर्पणा को प्राप्त कराता है'। 'निमित्त की उत्पत्ति के साथ' - यह अर्पणा के लिए प्रतीक्षा (परिवास) के अभाव का लक्षण-वचन है। जिसे 'क्षिपाभिज्ञ' कहा जाता है, उससे भी अधिक ज्ञानोत्तर वाले की ही यह अभिभायतन भावना है। 'यहाँ' - इस निमित्त में। 'अर्पणा को प्राप्त कराता है' - भावना अर्पणा तक ले जाती है। ဧတ္ထ စ ကေစိ ‘‘ဥပ္ပန္နေ ဥပစာရဇ္ဈာနေ တံ အာရဗ္ဘ ယေ ဟေဋ္ဌိမန္တေန ဒွေ တယော ဇဝနဝါရာ ပဝတ္တန္တိ, တေ ဥပစာရဇ္ဈာန ပက္ခိကာ ဧဝ, တဒနန္တရဉ္စ ဘဝင်္ဂပရိဝါသေန ဥပစာရာသေဝနာယ စ ဝိနာ အပ္ပနာ ဟောတိ, သဟ နိမိတ္တုပ္ပာဒေနေဝ အပ္ပနံ ပါပေတီ’’တိ ဝဒန္တိ, တံ တေသံ မတိမတ္တံ. န ဟိ ပါရိဝါသိကပရိကမ္မေန အပ္ပနာဝါရော ဣစ္ဆိတော, နာပိ မဟဂ္ဂတပ္ပမာဏဇ္ဈာနေသု ဝိယ ဥပစာရဇ္ဈာနေ ဧကန္တတော ပစ္စဝေက္ခဏာ ဣစ္ဆိတဗ္ဗာ, တသ္မာ ဥပစာရဇ္ဈာနာဓိဂမတော ပရံ ကတိပယဘဝင်္ဂစိတ္တာဝသာနေ အပ္ပနံ ပါပုဏန္တော ‘‘သဟ နိမိတ္တုပ္ပာဒေနေဝေတ္ထ အပ္ပနံ ပါပေတီ’’တိ ဝုတ္တော. ‘‘သဟ နိမိတ္တုပ္ပာဒေနာ’’တိ စ အဓိပ္ပာယိကမိဒံ ဝစနံ, န နီတတ္ထံ, အဓိပ္ပာယော ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. और यहाँ कुछ लोग कहते हैं - 'उपचार ध्यान उत्पन्न होने पर, उसे आरम्भ कर जो कम से कम दो-तीन जवन-वार प्रवृत्त होते हैं, वे उपचार ध्यान के पक्ष के ही हैं, और उसके बाद भवङ्ग-परिवास और उपचार-आसेवना के बिना ही अर्पणा होती है, निमित्त की उत्पत्ति के साथ ही अर्पणा को प्राप्त कराता है', यह उनका केवल मत मात्र है। क्योंकि प्रतीक्षा वाले परिकर्म के बिना अर्पणा-वार इष्ट नहीं है, और न ही महग्गत प्रमाण वाले ध्यानों के समान उपचार ध्यान में एकान्ततः प्रत्यवेक्षण इष्ट होना चाहिए, इसलिए उपचार ध्यान की प्राप्ति के बाद कुछ भवङ्ग-चित्तों के समाप्त होने पर अर्पणा प्राप्त करने वाले को 'निमित्त की उत्पत्ति के साथ ही यहाँ अर्पणा को प्राप्त कराता है' कहा गया है। 'निमित्त की उत्पत्ति के साथ' - यह वचन अभिप्राय के अनुसार है, नीतार्थ (शाब्दिक) नहीं, अभिप्राय उक्त रीति से ही समझना चाहिए। န အန္တောသမာပတ္တိယံ တဒါ တထာရူပဿ အာဘောဂဿ အသမ္ဘဝတော, သမာပတ္တိတော ဝုဋ္ဌိတဿ အာဘောဂေါ ပုဗ္ဗဘာဂဘာဝနာဝသေန ဈာနက္ခဏေ ပဝတ္တံ အဘိဘဝနာကာရံ ဂဟေတွာ ပဝတ္တောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. အဘိဓမ္မဋ္ဌကထာယံ (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၂၀၄) ပန ‘‘ဣမိနာ ပနဿ ပုဗ္ဗဘာဂေါ ကထိတော’’တိ ဝုတ္တံ. အန္တောသမာပတ္တိယံ တထာ အာဘောဂါဘာဝေ ကသ္မာ ‘‘ဈာနသညာယပီ’’တိ ဝုတ္တန္တိ အာဟ ‘‘အဘိဘဝ…ပေ… အတ္ထီ’’တိ. समापत्ति के भीतर नहीं, क्योंकि तब उस प्रकार के आभोग (चिन्तन) का होना असंभव है; समापत्ति से व्युत्थित (निकले हुए) व्यक्ति का आभोग पूर्वभाग-भावना के वश से ध्यान के क्षण में प्रवृत्त अभिभव के आकार को ग्रहण कर प्रवृत्त होता है, ऐसा समझना चाहिए। अभिधम्म-अट्ठकथा में तो 'इससे इसका पूर्वभाग कहा गया है' ऐसा कहा गया है। यदि समापत्ति के भीतर वैसा आभोग नहीं है, तो 'ध्यान-संज्ञा से भी' ऐसा क्यों कहा गया? इसके उत्तर में 'अभिभव... पे... अत्थि' कहा गया है। ဝဍ္ဎိတပ္ပမာဏာနီတိ ဝိပုလပ္ပမာဏာနီတိ အတ္ထော, န ဧကင်္ဂုလဒွင်္ဂုလာဒိဝသေန ဝဍ္ဎိတပ္ပမာဏာနီတိ တထာ ဝဍ္ဎနဿေဝေတ္ထ အသမ္ဘဝတော. တေနာဟ ‘‘မဟန္တာနီ’’တိ. वर्धित-प्रमाण का अर्थ है विपुल प्रमाण वाले, न कि एक-दो अंगुल आदि के वश से बढ़ाए गए प्रमाण वाले, क्योंकि यहाँ उस प्रकार के वर्धन का होना असंभव है। इसीलिए 'महान्त' (बड़े) कहा गया है। ရူပေ သညာ ရူပသညာ, သာ အဿ အတ္ထီတိ ရူပသညီ, န ရူပသညီ အရူပသညီ. သညာသီသေန ဈာနံ ဝဒတိ. ရူပသညာယ အနုပ္ပာဒနမေဝေတ္ထ အလာဘိတာ. ဗဟိဒ္ဓါဝ ဥပ္ပန္နန္တိ ဗဟိဒ္ဓါဝတ္ထုသ္မိံယေဝ ဥပ္ပန္နံ. အဘိဓမ္မေ ပန ‘‘အဇ္ဈတ္တံ အရူပသညီ ဗဟိဒ္ဓါ ရူပါနိ ပဿတိ ပရိတ္တာနိ သုဝဏ္ဏဒုဗ္ဗဏ္ဏာနိ, အပ္ပမာဏာနိ သုဝဏ္ဏဒုဗ္ဗဏ္ဏာနီ’’တိ ဧဝံ စတုန္နံ အဘိဘာယတနာနံ အာဂတတ္တာ အဘိဓမ္မဋ္ဌကထာယံ (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၂၀၄) ‘‘ကသ္မာ ပန ယထာ သုတ္တန္တေ – ‘အဇ္ဈတ္တံ ရူပသညီ ဧကော ဗဟိဒ္ဓါ ရူပါနိ ပဿတိ ပရိတ္တာနီ’တိအာဒိ ဝုတ္တံ, ဧဝံ အဝတွာ ဣဓ စတူသုပိ အဘိဘာယတနေသု အဇ္ဈတ္တံ [Pg.123] အရူပသညိတာဝ ဝုတ္တာ’’တိ စောဒနံ ကတွာ ‘‘အဇ္ဈတ္တရူပါနံ အနဘိဘဝနီယတော’’တိ ကာရဏံ ဝတွာ ‘‘တတ္ထ ဝါ ဟိ ဣဓ ဝါ ဗဟိဒ္ဓါရူပါနေဝ အဘိဘဝိတဗ္ဗာနိ, တသ္မာ တာနိ နိယမတော ဝတ္တဗ္ဗာနီတိ တတြာပိ ဣဓာပိ ဝုတ္တာနိ. ‘အဇ္ဈတ္တံ အရူပသညီ’တိ ဣဒံ ပန သတ္ထု ဒေသနာဝိလာသမတ္တမေဝါ’’တိ ဝုတ္တံ. रूप में संज्ञा 'रूपसंज्ञा' है, वह जिसकी है वह 'रूपसंज्ञी' है; जो रूपसंज्ञी नहीं है वह 'अरूपसंज्ञी' है। संज्ञा के प्रधानत्व से यहाँ ध्यान को कहा गया है। रूपसंज्ञा का उत्पन्न न होना ही यहाँ अलाभिता है। 'बाहर ही उत्पन्न' - बाहर की वस्तु में ही उत्पन्न। अभिधम्म में तो 'अध्यात्म में अरूपसंज्ञी बाहर के रूपों को देखता है - परित्त, सुवर्ण-दुर्वर्ण, अप्रमाण, सुवर्ण-दुर्वर्ण' - इस प्रकार चार अभिभायतनों के आने के कारण अभिधम्म-अट्ठकथा में यह शंका करके कि 'जैसे सुत्तन्त में - अध्यात्म में रूपसंज्ञी एक बाहर के रूपों को देखता है परित्त आदि कहा गया है, वैसा न कहकर यहाँ चारों ही अभिभायतनों में अध्यात्म में अरूपसंज्ञिता ही क्यों कही गई है?', 'अध्यात्म रूपों के अनभिभवनीय होने के कारण' यह कारण बताकर, 'वहाँ या यहाँ बाहर के रूपों को ही अभिभूत करना चाहिए, इसलिए उन्हें नियमतः कहना चाहिए, इसीलिए वहाँ भी और यहाँ भी वे कहे गए हैं। अध्यात्म में अरूपसंज्ञी - यह तो शास्ता की देशना का विलास मात्र है' ऐसा कहा गया है। ဧတ္ထ စ ဝဏ္ဏာဘောဂရဟိတာနိ သဟိတာနိ စ သဗ္ဗာနိ ‘‘ပရိတ္တာနိ သုဝဏ္ဏဒုဗ္ဗဏ္ဏာနီ’’တိ ဝုတ္တာနိ, တထာ ‘‘အပ္ပမာဏာနီ’’တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗာနိ. အတ္ထိ ဟိ ဧသော ပရိယာယော ‘‘ပရိတ္တာနိ အဘိဘုယျ တာနိ စေ ကဒါစိ ဝဏ္ဏဝသေန အာဘုဇိတာနိ ဟောန္တိ သုဝဏ္ဏဒုဗ္ဗဏ္ဏာနိ အဘိဘုယျာ’’တိ. ပရိယာယကထာ ဟိ သုတ္တန္တဒေသနာတိ. အဘိဓမ္မေ ပန နိပ္ပရိယာယဒေသနတ္တာ ဝဏ္ဏာဘောဂရဟိတာနိ ဝိသုံ ဝုတ္တာနိ, တထာ သဟိတာနိ. အတ္ထိ ဟိ ဥဘယတ္ထ အဘိဘဝနပရိယာယောတိ ‘‘အဇ္ဈတ္တံ ရူပသညီ’’တိအာဒိနာ ပဌမဒုတိယအဘိဘာယတနေသု ပဌမဝိမောက္ခော, တတိယစတုတ္ထာဘိဘာယတနေသု ဒုတိယဝိမောက္ခော, ဝဏ္ဏာဘိဘာယတနေသု တတိယဝိမောက္ခော စ အဘိဘဝနပ္ပဝတ္တိတော သင်္ဂဟိတော, အဘိဓမ္မေ ပန နိပ္ပရိယာယဒေသနတ္တာ ဝိမောက္ခာဘိဘာယတနာနိ အသင်္ကရတော ဒဿေတုံ ဝိမောက္ခေ ဝဇ္ဇေတွာ အဘိဘာယတနာနိ ကထိတာနိ, သဗ္ဗာနိ စ ဝိမောက္ခကိစ္စာနိ ဈာနာနိ ဝိမောက္ခဒေသနာယံ ဝုတ္တာနိ. တဒေတံ ‘‘အဇ္ဈတ္တံ ရူပသညီ’’တိ အာဂတဿ အဘိဘာယတနဒွယဿ အဘိဓမ္မေ အဘိဘာယတနေသု အဝစနတော ‘‘ရူပီ ရူပါနိ ပဿတီ’’တိအာဒီနဉ္စ သဗ္ဗဝိမောက္ခကိစ္စသာဓာရဏဝစနဘာဝတော ဝဝတ္ထာနံ ကတန္တိ ဝိညာယတိ. और यहाँ वर्ण-आभोग से रहित और सहित सभी को 'परित्त सुवर्ण-दुर्वर्ण' कहा गया है, वैसे ही 'अप्रमाण' समझना चाहिए। यह पर्याय (विधि) है - 'परित्तों को अभिभूत कर, यदि वे कभी वर्ण के वश से आभोगित होते हैं, तो सुवर्ण-दुर्वर्णों को अभिभूत कर'। सुत्तन्त देशना पर्याय-कथा है। अभिधम्म में तो निष्पर्याय देशना होने के कारण वर्ण-आभोग से रहित अलग कहे गए हैं, और सहित अलग। दोनों जगह अभिभव का पर्याय है, इसलिए 'अध्यात्म में रूपसंज्ञी' आदि के द्वारा प्रथम और द्वितीय अभिभायतनों में प्रथम विमोक्ष, तृतीय और चतुर्थ अभिभायतनों में द्वितीय विमोक्ष, और वर्ण-अभिभायतनों में तृतीय विमोक्ष अभिभव की प्रवृत्ति के कारण संगृहीत हैं। किन्तु अभिधम्म में निष्पर्याय देशना होने के कारण विमोक्ष और अभिभायतनों को बिना मिलाए (असंकर) दिखाने के लिए विमोक्षों को छोड़कर अभिभायतन कहे गए हैं, और विमोक्ष-देशना में सभी विमोक्ष-कृत्य वाले ध्यान कहे गए हैं। वह यह 'अध्यात्म में रूपसंज्ञी' इस प्रकार आए हुए दो अभिभायतनों का अभिधम्म के अभिभायतनों में न कहा जाना, और 'रूपी रूपों को देखता है' आदि वचनों का सभी विमोक्ष-कृत्यों के लिए साधारण वचन होना - इस प्रकार व्यवस्था की गई है, ऐसा समझना चाहिए। ‘‘အဇ္ဈတ္တရူပါနံ အနဘိဘဝနီယတော’’တိ ဣဒံ အဘိဓမ္မေ ကတ္ထစိပိ ‘‘အဇ္ဈတ္တံ ရူပါနိ ပဿတီ’’တိ အဝတွာ သဗ္ဗတ္ထ ယံ ဝုတ္တံ ‘‘ဗဟိဒ္ဓါရူပါနိ ပဿတီ’’တိ, တဿ ကာရဏဝစနံ. တေန ယံ အညဟေတုကံ, တံ တေန ဟေတုနာ ဝုတ္တံ, ယံ ပန ဒေသနာဝိလာသဟေတုကံ အဇ္ဈတ္တံ အရူပသညိတာယ ဧဝ အဘိဓမ္မေ ဝစနံ, န တဿ အညံ ကာရဏံ မဂ္ဂိတဗ္ဗန္တိ ဒဿေတိ. အဇ္ဈတ္တရူပါနံ အနဘိဘဝနီယတာ စ တေသံ ဗဟိဒ္ဓါရူပါနံ ဝိယ အဝိဘူတတ္တာ, ဒေသနာဝိလာသော စ ယထာဝုတ္တဝဝတ္ထာနဝသေန ဝေဒိတဗ္ဗော, ဝေနေယျဇ္ဈာသယဝသေန ဝိဇ္ဇမာနပရိယာယကထနဘာဝတော. ‘‘သုဝဏ္ဏဒုဗ္ဗဏ္ဏာနီ’’တိ ဧတေနေဝ သိဒ္ဓတ္တာ နီလာဒိအဘိဘာယတနာနိ န ဝတ္တဗ္ဗာနီတိ စေ? န, နီလာဒီသု [Pg.124] ကတာဓိကာရာနံ နီလာဒိဘာဝဿေဝ အဘိဘဝနကာရဏတ္တာ. န ဟိ တေသံ ပရိသုဒ္ဓါပရိသုဒ္ဓဝဏ္ဏာနံ ပရိတ္တတာ တဒပ္ပမာဏတာ ဝါ အဘိဘဝနကာရဏံ, အထ ခေါ နီလာဒိဘာဝေါ ဧဝါတိ. ဧတေသု စ ပရိတ္တာဒိကသိဏရူပေသု ယံ စရိတဿ ဣမာနိ အဘိဘာယတနာနိ ဣဇ္ဈန္တိ, တံ ဒဿေတုံ ‘‘ဣမေသု ပနာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. ‘‘अध्यात्म-रूपों के अनभिभवनीय होने से’’ - यह अभिधम्म में कहीं भी ‘‘अध्यात्म में रूपों को देखता है’’ ऐसा न कहकर सर्वत्र जो ‘‘बाह्य रूपों को देखता है’’ कहा गया है, उसका कारण-वचन है। उससे जो अन्य हेतु वाला है, वह उस हेतु से कहा गया है, किन्तु जो देशना-विलास के हेतु से अध्यात्म में अरूप-संज्ञी होने के कारण ही अभिधम्म में वचन है, उसका अन्य कोई कारण नहीं खोजना चाहिए - ऐसा दिखाता है। अध्यात्म-रूपों की अनभिभवनीयता उन बाह्य रूपों के समान स्पष्ट न होने के कारण है, और देशना-विलास को यथोक्त व्यवस्था के वश से समझना चाहिए, क्योंकि यह विनेय (शिष्य) के आशय के वश से विद्यमान पर्याय-कथन भाव से है। ‘‘सुवर्ण-दुर्वर्ण’’ (सुन्दर-कुरूप) इससे ही सिद्ध होने के कारण नीलादि अभिभायतन नहीं कहने चाहिए - यदि ऐसा कहें? तो नहीं, क्योंकि नीले आदि में किए गए अधिकार वालों के लिए नीलादि भाव ही अभिभव (अभिभूत करने) का कारण है। उन परिशुद्ध-अपरिशुद्ध वर्णों की लघुता या उनका अप्रमाण होना अभिभव का कारण नहीं है, बल्कि नीलादि भाव ही है। और इन परीत्त (लघु) आदि कसिण रूपों में जिस चरित वाले के ये अभिभायतन सिद्ध होते हैं, उसे दिखाने के लिए ‘‘इनमें तो’’ इत्यादि कहा गया है। သဗ္ဗသင်္ဂါဟိကဝသေနာတိ သကလနီလဝဏ္ဏနီလနိဒဿနနီလနိဘာသာနံ သာဓာရဏဝသေန. ဝဏ္ဏဝသေနာတိ သဘာဝဝဏ္ဏဝသေန. နိဒဿနဝသေနာတိ ပဿိတဗ္ဗတာဝသေန. ဩဘာသဝသေနာတိ သပ္ပဘာသတာယ အဝဘာသနဝသေန. ဥမာပုပ္ဖန္တိ အတသိပုပ္ဖံ. နီလမေဝ ဟောတိ ဝဏ္ဏသင်္ကရာဘာဝတော. ဗာရာဏသိယံ ဘဝန္တိ ဗာရာဏသိယံ သမုဋ္ဌိတံ. ‘‘सबके संग्रह के वश से’’ अर्थात् समस्त नील वर्ण, नील निदर्शन और नील आभा के साधारण वश से। ‘‘वर्ण के वश से’’ अर्थात् स्वभाव वर्ण के वश से। ‘‘निदर्शन के वश से’’ अर्थात् देखे जाने योग्य होने के वश से। ‘‘आभा के वश से’’ अर्थात् प्रभा सहित होने के कारण आभासित होने के वश से। ‘‘उमापुष्प’’ अर्थात् अलसी का फूल। वर्णों के संकर (मिश्रण) के अभाव के कारण वह नीला ही होता है। ‘‘वाराणसी में होते हैं’’ अर्थात् वाराणसी में उत्पन्न। တေ ဓမ္မေတိ တေ သတိပဋ္ဌာနာဒိဓမ္မေ စေဝ အဋ္ဌဝိမောက္ခဓမ္မေ စ. စိဏ္ဏဝသီဘာဝါယေဝ တတ္ထ အဘိဝိသိဋ္ဌာယ ပညာယ ပရိယောသာနုတ္တရံ သတံ ဂတာ အဘိညာဝေါသာနပါရမိပ္ပတ္တာ. ‘‘उन धर्मों को’’ अर्थात् उन स्मृतिप्रस्थान आदि धर्मों को और आठ विमोक्ष धर्मों को। अभ्यास और वशीभाव के कारण ही वहाँ अभिविशिष्ट प्रज्ञा द्वारा अन्त तक पहुँचे हुए, अभिज्ञा की समाप्ति और पारमिता को प्राप्त हुए। ၂၅၀. သကလဋ္ဌေနာတိ (ဒီ. နိ. ဋီ. ၃.၃၄၆; အ. နိ. ဋီ. ၃.၁၀.၂၅) သကလဘာဝေန, အသုဘနိမိတ္တာဒီသု ဝိယ ဧကဒေသေ အဋ္ဌတွာ အနဝသေသတော ဂဟေတဗ္ဗဋ္ဌေနာတိ အတ္ထော. ယထာ ခေတ္တံ သဿာနံ ဥပ္ပတ္တိဋ္ဌာနံ ဝဍ္ဎိဋ္ဌာနဉ္စ, ဧဝမေဝ တံတံသမ္ပယုတ္တဓမ္မာနန္တိ အာဟ ‘‘ခေတ္တဋ္ဌေနာ’’တိ. ပရိစ္ဆိန္ဒိတွာတိ ဣဒံ ဥဒ္ဓံ အဓော တိရိယန္တိ ယောဇေတဗ္ဗံ. ပရိစ္ဆိန္ဒိတွာ ဧဝ ဟိ သဗ္ဗတ္ထ ကသိဏံ ဝဍ္ဎေတဗ္ဗံ. တေန တေန ကာရဏေနာတိ ဥပရိအာဒီသု တေန တေန ကသိဏေန. ယထာ ကိန္တိ အာဟ – ‘‘အာလောကမိဝ ရူပဒဿနကာမော’’တိ, ယထာ ဒိဗ္ဗစက္ခုနာ ဥဒ္ဓံ စေ ရူပံ ဒဋ္ဌုကာမော, ဥဒ္ဓံ အာလောကံ ပသာရေတိ, အဓော စေ, အဓော, သမန္တတော စေ ရူပံ ဒဋ္ဌုကာမော, သမန္တတော အာလောကံ ပသာရေတိ, ဧဝံ သဗ္ဗကသိဏန္တိ အတ္ထော. ဧကဿာတိ ပထဝီကသိဏာဒီသု ဧကေကဿ. အညဘာဝါနုပဂမနတ္ထန္တိ အညကသိဏဘာဝါနုပဂမနဒီပနတ္ထံ, အညဿ ဝါ ကသိဏဘာဝါနုပဂမနဒီပနတ္ထံ. န ဟိ အညေန ပသာရိတကသိဏံ တတော အညေန ပသာရိတကသိဏဘာဝံ ဥပဂစ္ဆတိ, ဧဝမ္ပိ နေသံ အညကသိဏသမ္ဘေဒါဘာဝေါ ဝေဒိတဗ္ဗော. န အညံ ပထဝီအာဒိ. န ဟိ ဥဒကေန ဌိတဋ္ဌာနေ သသမ္ဘာရပထဝီ အတ္ထိ. အညကသိဏသမ္ဘေဒေါတိ အာပေါကသိဏာဒိနာ သင်္ကရော[Pg.125]. သဗ္ဗတ္ထာတိ သဗ္ဗေသု သေသကသိဏေသု. ဧကဒေသေ အဋ္ဌတွာ အနဝသေသဖရဏံ ပမာဏဿ အဂ္ဂဟဏတော အပ္ပမာဏံ. တေနေဝ ဟိ နေသံ ကသိဏသမညာ. တထာ ဟိ ‘‘တဉှီ’’တိအာဒိမာဟ. တတ္ထ စေတသာ ဖရန္တောတိ ဘာဝနာစိတ္တေန အာရမ္မဏံ ကရောန္တော. ဘာဝနာစိတ္တဉှိ ကသိဏံ ပရိတ္တံ ဝါ ဝိပုလံ ဝါ သကလမေဝ မနသိ ကရောတိ. २५०. ‘‘सकल अर्थ से’’ अर्थात् सकल भाव से, अशुभ निमित्त आदि के समान एक देश (हिस्से) में न रहकर पूर्ण रूप से ग्रहण करने योग्य होने के अर्थ में। जैसे खेत फसलों की उत्पत्ति और वृद्धि का स्थान है, वैसे ही वह उन-उन सम्प्रयुक्त धर्मों का (स्थान) है - इसलिए ‘‘क्षेत्र के अर्थ में’’ कहा। ‘‘परिच्छिन्न करके’’ इसे ऊपर, नीचे, तिरछा - ऐसे जोड़ना चाहिए। परिच्छिन्न करके ही सर्वत्र कसिण को बढ़ाना चाहिए। ‘‘उस-उस कारण से’’ अर्थात् ऊपर आदि में उस-उस कसिण से। ‘‘कैसे’’ - इसके लिए कहा - ‘‘आलोक के समान रूप देखने का इच्छुक’’। जैसे दिव्यचक्षु से यदि ऊपर रूप देखना चाहता है, तो ऊपर आलोक फैलाता है, यदि नीचे तो नीचे, यदि चारों ओर रूप देखना चाहता है, तो चारों ओर आलोक फैलाता है, वैसे ही सभी कसिणों के विषय में समझना चाहिए। ‘‘एक के’’ अर्थात् पृथ्वी-कसिण आदि में से एक-एक के। ‘‘अन्य भाव को प्राप्त न होने के लिए’’ अर्थात् अन्य कसिण भाव को प्राप्त न होने को दिखाने के लिए, या अन्य के कसिण भाव को प्राप्त न होने को दिखाने के लिए। क्योंकि एक के द्वारा फैलाया गया कसिण दूसरे के द्वारा फैलाए गए कसिण भाव को प्राप्त नहीं होता, इस प्रकार भी उनका अन्य कसिणों के साथ संभेद (मिश्रण) का अभाव समझना चाहिए। ‘‘अन्य नहीं’’ अर्थात् पृथ्वी आदि नहीं। क्योंकि जल के स्थित होने के स्थान पर स-सम्भार पृथ्वी नहीं होती। ‘‘अन्य कसिण संभेद’’ अर्थात् आपो-कसिण आदि के साथ मिश्रण। ‘‘सर्वत्र’’ अर्थात् शेष सभी कसिणों में। एक देश में न रहकर पूर्ण रूप से व्याप्त होना, प्रमाण का ग्रहण न होने से ‘‘अप्रमाण’’ है। उसी कारण से उनकी ‘‘कसिण’’ संज्ञा है। इसीलिए ‘‘वह ही’’ इत्यादि कहा। वहाँ ‘‘चित्त से व्याप्त करता हुआ’’ अर्थात् भावना-चित्त से आलम्बन बनाता हुआ। क्योंकि भावना-चित्त कसिण को छोटा या बड़ा, पूर्ण रूप से ही मन में करता है। ကသိဏုဂ္ဃာဋိမာကာသေ ပဝတ္တံ ဝိညာဏံ ဖရဏအပ္ပမာဏဝသေန ‘‘ဝိညာဏကသိဏ’’န္တိ ဝုတ္တံ. တထာ ဟိ တံ ‘‘ဝိညာဏ’’န္တိ ဝုစ္စတိ. ကသိဏဝသေနာတိ ဥဂ္ဃာဋိတကသိဏဝသေန ကသိဏုဂ္ဃာဋိမာကာသေ ဥဒ္ဓံအဓောတိရိယတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ယတ္တကဉှိ ဌာနံ ကသိဏံ ပသာရိတံ, တတ္တကံ အာကာသဘာဝနာဝသေန အာကာသံ ဟောတီတိ. ဧဝံ ယတ္တကံ ဌာနံ အာကာသံ ဟုတွာ ဥပဋ္ဌိတံ, တတ္တကံ အာကာသမေဝ ဟုတွာ ဝိညာဏဿ ပဝတ္တနတော အာဂမနဝသေန ဝိညာဏကသိဏေပိ ဥဒ္ဓံအဓောတိရိယတာ ဝုတ္တာတိ ‘‘ကသိဏုဂ္ဃာဋိမာကာသဝသေန တတ္ထ ပဝတ္တဝိညာဏေ ဥဒ္ဓံအဓောတိရိယတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ’’တိ အာဟ. ‘‘कसिण-उद्घाटित आकाश में प्रवृत्त विज्ञान को विस्तार की अप्रमाणता के वश से ‘विज्ञान-कसिण’ कहा गया है। क्योंकि उसे ‘विज्ञान’ कहा जाता है। ‘कसिण के वश से’ अर्थात् उद्घाटित कसिण के वश से कसिण-उद्घाटित आकाश में ऊपर-नीचे-तिरछा समझना चाहिए। क्योंकि जितने स्थान में कसिण फैलाया गया है, उतना स्थान आकाश-भावना के वश से आकाश होता है। इस प्रकार जितना स्थान आकाश होकर उपस्थित हुआ है, उतने स्थान में आकाश ही होकर विज्ञान के प्रवृत्त होने से, आगमन के वश से विज्ञान-कसिण में भी ऊपर-नीचे-तिरछा कहा गया है - इसलिए ‘कसिण-उद्घाटित आकाश के वश से वहाँ प्रवृत्त विज्ञान में ऊपर-नीचे-तिरछा समझना चाहिए’ ऐसा कहा। ၂၅၂. ဝုတ္တောယေဝ ဝမ္မိကသုတ္တေ. နိဿိတဉ္စ ဆဝတ္ထုနိဿိတတ္တာ ဝိပဿနာဉာဏဿ. ပဋိဗဒ္ဓဉ္စ တေန ဝိနာ အပ္ပဝတ္တနတော ကာယသညိတာနံ ရူပဓမ္မာနံ အာရမ္မဏကရဏတော စ. သုဋ္ဌု ဘာတိ ဩဘာသတီတိ ဝါ သုဘော. ကုရုဝိန္ဒဇာတိအာဒိဇာတိဝိသေသောပိ မဏိ အာကရပါရိသုဒ္ဓိမူလကော ဧဝါတိ အာဟ ‘‘သုပရိသုဒ္ဓအာကရသမုဋ္ဌိတော’’တိ. ဒေါသနီဟရဏဝသေန ပရိကမ္မနိပ္ဖတ္တီတိ အာဟ ‘‘သုဋ္ဌု ကတပရိကမ္မော အပနီတပါသာဏသက္ခရော’’တိ. ဓောဝနဝေဓနာဒီဟီတိ စတူသု ပါသာဏေသု ဓောဝနေန စေဝ ကာဠကာဒိအပဟရဏတ္ထာယ သုတ္တေန အာဝုနနတ္ထာယ စ ဝိဇ္ဈနေန. တာပသဏှကရဏာဒီနံ သင်္ဂဟော အာဒိ-သဒ္ဒေန. ဝဏ္ဏသမ္ပတ္တိန္တိ သုတ္တဿ ဝဏ္ဏသမ္ပတ္တိံ. २५२. ‘‘वम्मिक सुत्त में ही कहा गया है। ‘निश्रित’ क्योंकि विपश्यना ज्ञान छह वस्तुओं (इन्द्रियों) पर आश्रित है। और ‘प्रतिबद्ध’ क्योंकि उसके बिना प्रवृत्त न होने से और ‘काय-संज्ञित’ रूप धर्मों को आलम्बन बनाने से। अच्छी तरह भासित होता है या चमकता है, इसलिए ‘शुभ’। कुरुविन्द आदि जाति विशेष वाला मणि भी आकर (खान) की परिशुद्धता के मूल वाला ही होता है, इसलिए ‘सुपरिशुद्ध आकर से उत्पन्न’ कहा। दोषों को दूर करने के वश से परिकर्म की निष्पत्ति होती है, इसलिए ‘अच्छी तरह परिकर्म किया हुआ, पत्थर और कंकड़ निकाला हुआ’ कहा। ‘धोने और छेदने आदि से’ अर्थात् चार पत्थरों पर धोने से और कालिमा आदि दूर करने के लिए तथा सूत्र (धागा) पिरोने के लिए छेदने से। ‘आदि’ शब्द से तपाने और चिकना करने आदि का संग्रह होता है। ‘वर्ण-सम्पत्ति’ अर्थात् सूत्र की वर्ण-सम्पत्ति।’’ မဏိ ဝိယ ကရဇကာယော ပစ္စဝေက္ခိတဗ္ဗတော. အာဝုတသုတ္တံ ဝိယ ဝိပဿနာဉာဏံ အနုပဝိသိတွာ ဌိတတ္တာ. စက္ခုမာ ပုရိသော ဝိယ ဝိပဿနာလာဘီ ဘိက္ခု သမ္မဒေဝ တဿ ဒဿနတော. တဒါရမ္မဏာနန္တိ ရူပဓမ္မာရမ္မဏာနံ. ဖဿပဉ္စမကစိတ္တစေတသိကဂ္ဂဟဏေန ဂဟိတဓမ္မာပိ ဝိပဿနာစိတ္တုပ္ပာဒပရိယာပန္နာ ဧဝါတိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ဧဝဉှိ တေသံ ဝိပဿနာဉာဏဂတိကတ္တာ ‘‘အာဝုတသုတ္တံ ဝိယ ဝိပဿနာဉာဏ’’န္တိ ဝစနံ အဝိရောဓိတံ ဟောတိ. मणि के समान इस भौतिक शरीर का प्रत्यवेक्षण करना चाहिए। जैसे पिरोया हुआ धागा हो, वैसे ही विपश्यना-ज्ञान इसमें अनुप्रविष्ट होकर स्थित है। जैसे चक्षुमान पुरुष (आँखों वाला व्यक्ति) देखता है, वैसे ही विपश्यना प्राप्त भिक्षु इसे भली-भाँति देखता है। 'तदारम्मणानं' का अर्थ है रूप-धर्म रूपी आलम्बनों का। स्पर्श-पंचमक (स्पर्श आदि पाँच) चित्त और चैतसिकों के ग्रहण से जो धर्म गृहीत हैं, उन्हें भी विपश्यना-चित्तोत्पाद के अन्तर्गत ही समझना चाहिए। इस प्रकार, उनके विपश्यना-ज्ञान की गति वाला होने के कारण 'पिरोये हुए धागे के समान विपश्यना-ज्ञान' यह वचन संगत है। ဉာဏဿာတိ [Pg.126] ပစ္စဝေက္ခဏဉာဏဿ. ယဒိ ဧဝံ ဉာဏဿ ဝသေန ဝတ္တဗ္ဗံ, န ပုဂ္ဂလဿာတိ အာဟ ‘‘တဿ ပနာ’’တိအာဒိ. မဂ္ဂဿ အနန္တရံ, တသ္မာ လောကိယာဘိညာနံ ပရတော ဆဋ္ဌာဘိညာယ ပုရတော ဝတ္တဗ္ဗံ ဝိပဿနာဉာဏံ. ဧဝံ သန္တေပီတိ ယဒိပါယံ ဉာဏာနုပုဗ္ဗဋ္ဌိတိ, ဧဝံ သန္တေပိ ဧတဿ အန္တရာ ဝါရော နတ္ထီတိ ပဉ္စသု လောကိယာဘိညာသု ကထိတာသု အာကင်္ခေယျသုတ္တာဒီသု (မ. နိ. ၁.၆၄ အာဒယော) ဝိယ ဆဋ္ဌာဘိညာ ကထေတဗ္ဗာတိ ဧတဿ အနဘိညာလက္ခဏဿ ဝိပဿနာဉာဏဿ တာသံ အန္တရာ ဝါရော န ဟောတိ, တသ္မာ တတ္ထ အဝသရာဘာဝတော ဣဓေဝ ရူပါဝစရစတုတ္ထဇ္ဈာနာနန္တရမေဝ ဒဿိတံ ဝိပဿနာဉာဏံ. ယသ္မာ စာတိ စ-သဒ္ဒေါ သမုစ္စယတ္ထော. တေန န ကေဝလံ တဒေဝ, အထ ခေါ ဣဒမ္ပိ ကာရဏံ ဝိပဿနာဉာဏဿ ဣဓေဝ ဒဿနေတိ ဣမမတ္ထံ ဒီပေတိ. ဒိဗ္ဗေန စက္ခုနာ ဘေရဝရူပံ ပဿတောတိ ဧတ္ထ ဣဒ္ဓိဝိဓဉာဏေန ဘေရဝံ ရူပံ နိမ္မိနိတွာ စက္ခုနာ ပဿတောတိ ဝတ္တဗ္ဗံ, ဧဝမ္ပိ အဘိညာလာဘိနော အပရိညာဏဝတ္ထုကဿ ဘယသန္တာသော ဥပ္ပဇ္ဇတိ ဥစ္စဝါလိကဝါသီမဟာနာဂတ္ထေရဿ ဝိယ. ဣဓာပီတိ ဣမသ္မိံ ဝိပဿနာဉာဏေပိ, န သတိပဋ္ဌာနာဒီသု ဧဝါတိ အဓိပ္ပာယော. 'ज्ञानस्य' का अर्थ है प्रत्यवेक्षण-ज्ञान का। यदि ऐसा है, तो ज्ञान के वश से कहना चाहिए, पुद्गल के वश से नहीं, इसलिए 'तस्स पना' आदि कहा गया। मार्ग के अनन्तर, इसलिए लौकिक अभिज्ञाओं के बाद और छठी अभिज्ञा से पहले विपश्यना-ज्ञान कहा जाना चाहिए। ऐसा होने पर भी, यदि यह ज्ञान का अनुक्रम है, तो भी इसके बीच में कोई अवसर नहीं है, जैसे पाँच लौकिक अभिज्ञाओं के कहे जाने पर 'आकङ्खेय्य सुत्त' आदि में छठी अभिज्ञा कही जानी चाहिए, वैसे ही इस अनभिज्ञा-लक्षण वाले विपश्यना-ज्ञान का उनके बीच में अवसर नहीं होता। इसलिए वहाँ अवसर के अभाव के कारण यहाँ रूपावचर चतुर्थ ध्यान के तुरन्त बाद ही विपश्यना-ज्ञान दिखाया गया है। 'यस्मा च' में 'च' शब्द समुच्चय के अर्थ में है। उससे न केवल वही, बल्कि यह भी कारण है कि विपश्यना-ज्ञान को यहीं दिखाया गया है, इस अर्थ को स्पष्ट करता है। 'दिव्य चक्षु से भयानक रूप को देखते हुए' यहाँ ऋद्धिविध-ज्ञान से भयानक रूप का निर्माण कर चक्षु से देखता है, ऐसा कहना चाहिए। ऐसा होने पर भी, अभिज्ञा प्राप्त व्यक्ति को, जिसका विषय पूर्णतः ज्ञात नहीं है, भय और सन्त्रास उत्पन्न होता है, जैसे उच्चवालिकवासी महानाग स्थविर को हुआ था। 'इधापि' का अर्थ है इस विपश्यना-ज्ञान में भी, न कि केवल स्मृतिप्रस्थान आदि में ही, यह अभिप्राय है। ၂၅၃. မနောမယိဒ္ဓိယံ စိဏ္ဏဝသိတာယ အဘိညာ ဝေါသာနပါရမိပ္ပတ္တတာ ဝေဒိတဗ္ဗာတိ ယောဇနာ. မနေန နိဗ္ဗတ္တန္တိ အဘိညာမနေန နိဗ္ဗတ္တိတံ. တံ သဒိသဘာဝဒဿနတ္ထမေဝါတိ သဏ္ဌာနတောပိ ဝဏ္ဏတောပိ အဝယဝဝိသေသတောပိ သဒိသဘာဝဒဿနတ္ထမေဝ. သဇာတိယံ ဌိတော, န နာဂိဒ္ဓိယာ အညဇာတိရူပေါ. သုပရိကမ္မကတမတ္တိကာဒယော ဝိယ ဣဒ္ဓိဝိဓဉာဏံ ဝိကုဗ္ဗနကိရိယာယ နိဿယဘာဝတော. २५३. 'मनोमय ऋद्धि' में अभ्यास की वशवर्तिता के कारण अभिज्ञा की पूर्णता और पारमिता की प्राप्ति समझनी चाहिए - यह योजना है। 'मन से निर्मित' का अर्थ है अभिज्ञा-मन से निर्मित। 'उसकी समानता दिखाने के लिए ही' का अर्थ है आकृति, रंग और अंगों की विशिष्टता से भी समानता दिखाने के लिए ही। वह अपनी ही जाति में स्थित है, नाग-ऋद्धि की तरह अन्य जाति के रूप वाला नहीं। जैसे भली-भाँति तैयार की गई मिट्टी आदि होती है, वैसे ही ऋद्धिविध-ज्ञान विकुर्वण (रूप बदलने) की क्रिया के लिए आश्रय होने के कारण है। ၂၅၅. အပ္ပကသိရေနေဝါတိ အကိစ္ဆေနေဝ. २५५. 'अप्पकसिरेनेव' का अर्थ है बिना किसी कठिनाई के (अक्लेशपूर्वक)। ၂၅၆. မန္ဒော ဥတ္တာနသေယျကဒါရကောပိ ‘‘ဒဟရော’’တိ ဝုစ္စတီတိ တတော ဝိသေသနတ္ထံ ‘‘ယုဝါ’’တိ ဝုတ္တံ. ယုဝါပိ ကောစိ အနိစ္ဆနတော အမဏ္ဍနသီလော ဟောတီတိ တတော ဝိသေသနတ္ထံ ‘‘မဏ္ဍနကဇာတိကော’’တိ ဝုတ္တံ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘ယုဝါပီ’’တိအာဒိ. ကာဠတိလပ္ပမာဏာ ဗိန္ဒဝေါ ကာဠတိလကာနိ. နာတိကမ္မာသတိလပ္ပမာဏာ ဗိန္ဒဝေါ တိလကာနိ. ဝင်္ကံ နာမ ပိယင်္ဂံ. ယောဗ္ဗနပီဠကာဒယော မုခဒူသိပီဠကာ. မုခဂတော ဒေါသော မုခဒေါသော, လက္ခဏဝစနဉ္စေတံ မုခေ အဒေါသဿပိ ပါကဋဘာဝဿ အဓိပ္ပေတတ္တာ[Pg.127]. ယထာ ဝါ မုခေ ဒေါသော, ဧဝံ မုခေ အဒေါသောပိ မုခဒေါသော သရလောပေန, မုခဒေါသော စ မုခဒေါသော စ မုခဒေါသောတိ ဧကသေသနယေနပေတ္ထ အတ္ထော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ဧဝဉှိ ပရေသံ သောဠသဝိဓံ စိတ္တံ ပါကဋံ ဟောတီတိ ဝစနံ သမတ္ထိတံ ဟောတိ. २५६. मन्द (अल्पायु) और पीठ के बल लेटने वाले बालक को भी 'दहर' कहा जाता है, उससे अलग करने के लिए 'युवा' कहा गया है। कोई युवा भी इच्छा न होने के कारण श्रृंगार न करने वाला हो सकता है, उससे अलग करने के लिए 'मण्डनकजातिक' कहा गया है। इसीलिए 'युवापि' आदि कहा गया। काले तिल के समान बिन्दुओं को 'कालतिलक' कहते हैं। जो तिल के आकार से अधिक बड़े न हों, उन बिन्दुओं को 'तिलक' कहते हैं। 'वङ्क' का अर्थ प्रियंगु है। यौवन-पिड़का आदि मुख को दूषित करने वाली फुंसियाँ हैं। मुख में स्थित दोष 'मुखदोष' है, और यह एक लाक्षणिक वचन है क्योंकि मुख में दोष न होने पर भी स्पष्टता का अभिप्राय है। अथवा जैसे मुख में दोष है, वैसे ही मुख में अदोष भी स्वर-लोप के कारण 'मुखदोष' है; 'मुखदोष और मुखदोष और मुखदोष' - इस प्रकार एकशेष न्याय से भी यहाँ अर्थ देखना चाहिए। इस प्रकार दूसरों का सोलह प्रकार का चित्त प्रकट होता है, यह कथन सिद्ध होता है। ၂၅၉. ပဋိပဒါဝသေနာတိ ယထာရဟံ သမထဝိပဿနာမဂ္ဂပဋိပဒါဝသေန. အဋ္ဌသု ကောဋ္ဌာသေသူတိ သတိပဋ္ဌာနာဒီသု ဗောဓိပက္ခိယဓမ္မကောဋ္ဌာသေသု, ဝိမောက္ခကောဋ္ဌာသေသု ဝါတိ ဣမေသု အဋ္ဌသု ကောဋ္ဌာသေသု. သေသေသူတိ ဝုတ္တာဝသေသေသု အဘိဘာယတနကောဋ္ဌာသာဒီသု. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. २५९. 'प्रतिपदावशेन' का अर्थ है यथायोग्य शमथ-विपश्यना मार्ग की प्रतिपदा के वश से। 'आठ कोष्ठों में' का अर्थ है स्मृतिप्रस्थान आदि बोधिपाक्षिक धर्मों के भागों में, अथवा विमोक्ष के भागों में - इन आठ भागों में। 'शेषेषु' का अर्थ है कहे गए से बचे हुए अभिभायतन आदि भागों में। शेष सुविज्ञेय ही है। မဟာသကုလုဒါယိသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. महासकुलुदायी सुत्त की वर्णना की लीनत्थप्पकासना (गूढ़ार्थ-प्रकाशिनी टीका) समाप्त हुई। ၈. သမဏမုဏ္ဍိကာပုတ္တသုတ္တဝဏ္ဏနာ ८. समणमुण्डिकापुत्त सुत्त की वर्णना। ၂၆၀. ဥဂ္ဂဟိတုန္တိ သိက္ခိတုံ. ဥဂ္ဂါဟေတုန္တိ သိက္ခာပေတုံ, ပါဌတော အတ္တနာ ယထာဥဂ္ဂဟိတမတ္ထံ တဗ္ဗိဘာဝနတ္ထာယ ဥစ္စာရဏဝသေန ပရေသံ ဂါဟေတုန္တိ အတ္ထော. သမယန္တိ ဒိဋ္ဌိံ. သာ ဟိ သံယောဇနဘာဝတော သမေတိ သမ္ဗန္ဓာ ဧတိ ပဝတ္တတိ, ဒဠှဂ္ဂဟဏဘာဝတော ဝါ သံယုတ္တာ အယန္တိ ပဝတ္တန္တိ သတ္တာ ယထာဘိနိဝေသံ ဧတေနာတိ သမယောတိ ဝုစ္စတိ. ဒိဋ္ဌိသံယောဇနေန ဟိ သတ္တာ အတိဝိယ ဗဇ္ဈန္တီတိ. သူရိယဿ ဥဂ္ဂမနတော အတ္ထင်္ဂမာ အယံ ဧတ္တကော ကာလော ရတ္တန္ဓကာရဝိဓမနတော ဒိဝါ နာမ, တဿ ပန မဇ္ဈိမပဟာရသညိတော ကာလော သမုဇ္ဇလိတပဘာတေဇဒဟနဘာဝေန ဒိဝါ နာမ. တေနာဟ ‘‘ဒိဝသဿပိ ဒိဝါဘူတေ’’တိ. ပဋိသံဟရိတွာတိ နိဝတ္တေတွာ. ဧဝံ စိတ္တဿ ပဋိသံဟရဏံ နာမ ဂေါစရက္ခေတ္တေ ဌပနန္တိ အာဟ ‘‘ဈာနရတိသေဝနဝသေန ဧကီဘာဝံ ဂတော’’တိ. ဧတေန ကာယဝိဝေကပုဗ္ဗကံ စိတ္တဝိဝေကမာဟ. သီလာဒိဂုဏဝိသေသယောဂတော မနသာ သမ္ဘာဝနီယာ, တေ ပန ယသ္မာ အတ္တနော သီလာဒိဂုဏေဟိ ဝိညူနံ မနာပါ ဟောန္တိ (ကိလေသအနိဂ္ဂဟဿ ပဉ္စပသာဒါယတ္တတ္တာ,) တသ္မာ အာဟ ‘‘မနဝဍ္ဎနကာန’’န္တိအာဒိ. တတ္ထ ဥန္နမတီတိ ဥဒဂ္ဂံ ဟောတိ. ဝဍ္ဎတီတိ သဒ္ဓါဝသေန ဝဍ္ဎတိ. တေနာဟ ဘဂဝါ – ‘‘အနုဿရဏမ္ပဟံ, ဘိက္ခဝေ, တေသံ ဘိက္ခူနံ ဗဟူပကာရံ ဝဒါမီ’’တိ (ဣတိဝု. ၁၀၄; သံ. နိ. ၅.၁၈၄). २६०. 'उग्गहितुं' का अर्थ है सीखना। 'उग्गाहेतुं' का अर्थ है सिखाना; पाठ से स्वयं के द्वारा जैसे अर्थ ग्रहण किया गया है, उसकी व्याख्या के लिए उच्चारण के माध्यम से दूसरों को ग्रहण कराना - यह अर्थ है। 'समयं' का अर्थ है दृष्टि। वह संयोजन होने के कारण 'समेति', सम्बन्ध से 'एति' प्रवर्तित होती है, अथवा दृढ़ता से ग्रहण करने के कारण जिससे प्राणी अपने अभिनिवेश के अनुसार संयुक्त होकर चलते हैं, उसे 'समय' कहा जाता है। दृष्टि-संयोजन से प्राणी अत्यधिक बँध जाते हैं। सूर्य के उदय से अस्त होने तक का यह इतना समय, रात्रि के अन्धकार को दूर करने के कारण 'दिवा' कहलाता है; किन्तु उसका मध्यम प्रहर के रूप में ज्ञात समय, प्रज्वलित प्रभा, तेज और दाहक होने के कारण 'दिवा' कहलाता है। इसीलिए कहा गया - 'दिवसस्सपि दिवाभूते'। 'पटिसंहरित्वा' का अर्थ है हटाकर। इस प्रकार चित्त को हटाना, गोचर-क्षेत्र में स्थापित करना है, इसलिए कहा - 'ध्यान की रति के सेवन के कारण एकाग्रता को प्राप्त'। इससे काय-विवेक पूर्वक चित्त-विवेक को कहा गया है। शील आदि विशेष गुणों के योग से वे मन से सम्माननीय होते हैं, और चूँकि वे अपने शील आदि गुणों से विद्वानों के मन के अनुकूल होते हैं, इसलिए कहा - 'मनवड्ढनकानं' आदि। वहाँ 'उन्नमति' का अर्थ है प्रफुल्लित होना। 'वड्ढति' का अर्थ है श्रद्धा के वश से बढ़ना। इसीलिए भगवान ने कहा - "भिक्षुओं! मैं उन भिक्षुओं के अनुस्मरण को बहुत उपकारी कहता हूँ।" ၂၆၁. ပညပေမီတိ [Pg.128] ပဇာနနဘာဝေန ဉာပေမိ တထာ ဝဝတ္ထပေမိ. တေနာဟ ‘‘ဒဿေမိ ဌပေမီ’’တိ. ပရိပုဏ္ဏကုသလန္တိ သဗ္ဗသော ပုဏ္ဏကုသလဓမ္မံ, ဥတ္တမကုသလန္တိ ဥတ္တမဘာဝံ သေဋ္ဌဘာဝံ ပတ္တကုသလဓမ္မံ. အယောဇ္ဈန္တိ ဝါဒယုဒ္ဓေန အယောဓနီယံ, ဝါဒယုဒ္ဓံ ဟောတု, တေန ပရာဇယော န ဟောတီတိ ဒဿေတိ, တေနာဟ ‘‘ဝါဒယုဒ္ဓေနာ’’တိအာဒိ. သံဝရပ္ပဟာနန္တိ ပဉ္စသု သံဝရေသု ယေန ကေနစိ သံဝရေန သံဝရလက္ခဏံ ပဟာနံ. ပဋိသေဝနပ္ပဟာနံ ဝါတိ ဝါ-သဒ္ဒေန ပရိဝဇ္ဇနပ္ပဟာနာဒိံ သင်္ဂဏှာတိ. သေသပဒေသူတိ ‘‘န ဘာသတီ’’တိအာဒီသု ပဒေသု. ဧသေဝ နယောတိ ဣမိနာ ‘‘အဘာသနမတ္တမေဝ ဝဒတီ’’တိ ဧဝမာဒိံ အတိဒိသတိ. २६१. ‘प्रज्ञापयमि’ (प्रज्ञापित करता हूँ) का अर्थ है जानने के भाव से ज्ञापित करता हूँ और उसी प्रकार व्यवस्थित करता हूँ। इसीलिए कहा गया है ‘दिखाता हूँ, स्थापित करता हूँ’। ‘परिपूर्णकुशल’ का अर्थ है पूरी तरह से पूर्ण कुशल धर्म, ‘उत्तमकुशल’ का अर्थ है उत्तम भाव या श्रेष्ठ भाव को प्राप्त कुशल धर्म। ‘अयोध्य’ का अर्थ है जो वाद-युद्ध (तर्क-वितर्क) द्वारा पराजित न किया जा सके; वाद-युद्ध हो, पर उससे पराजय न हो, यह दर्शाता है, इसीलिए ‘वाद-युद्ध द्वारा’ आदि कहा गया है। ‘संवरप्रहाण’ का अर्थ है पाँच संवरों में से किसी भी संवर के द्वारा संवर-लक्षण वाला प्रहाण (त्याग)। ‘प्रतिसेवनप्रहाण वा’ में ‘वा’ शब्द से परिवर्जनप्रहाण आदि का संग्रह होता है। ‘शेष पदों में’ का अर्थ है ‘नहीं बोलता है’ आदि पदों में। ‘यही नय है’ इससे ‘केवल न बोलना ही कहता है’ इत्यादि का अतिदेश (विस्तार) करता है। နာဘိနန္ဒီတိ န သမ္ပဋိစ္ဆိ. သာသနေ တိဏ္ဏံ ဒုစ္စရိတာနံ မိစ္ဆာဇီဝဿ ဝိဝဇ္ဇနံ ဝဏ္ဏီယတိ, အယဉ္စ ဧဝံ ကထေတိ, တသ္မာ သာသနဿ အနုလောမံ ဝိယ ဝဒတိ, ဝဒန္တော စ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေ ဓမ္မေ စဿ အပ္ပသာဒံ န ဒဿေတိ, တသ္မာ ပသန္နကာရမ္ပိ ဝဒတီတိ မညမာနော တဿ ဝါဒံ န ပဋိသေဓေတိ. ‘नाभिनन्दी’ का अर्थ है स्वीकार नहीं किया। शासन (बुद्ध के उपदेश) में तीन दुश्चरितों और मिथ्या आजीव के त्याग की प्रशंसा की जाती है, और यह भी वैसा ही कहता है, इसलिए वह शासन के अनुकूल ही बोलता है, और बोलते हुए वह सम्यक्सम्बुद्ध और उनके धर्म के प्रति अप्रसन्नता प्रकट नहीं करता है, इसलिए ‘प्रसन्नतापूर्वक ही बोल रहा है’ ऐसा मानते हुए उसके वाद का निषेध नहीं करते हैं। ၂၆၂. ယထာ တဿ ဝစနံ, ဧဝံ သန္တေတိ ယထာ တဿ ပရိဗ္ဗာဇကဿ ဝစနံ, ဧဝံ သမဏဘာဝေ သန္တေ လဗ္ဘမာနေ. မယံ ပန ဧဝံ န ဝဒါမာတိ ဧတေန သမဏဘာဝေါ နာမ ဧဝံ န ဟောတီတိ ဒဿေတိ. ယော ဟိ ဓမ္မော ယာဒိသော, တထေဝ တံ ဗုဒ္ဓါ ဒီပေန္တိ. ဝိသေသဉာဏံ န ဟောတီတိ ကာယဝိသေသဝိသယဉာဏံ တဿ တဒါ နတ္ထိ, ယတော ပရကာယေ ဥပက္ကမံ ကရေယျာတိ ဒဿေတိ, တဿ ပန တတ္ထ ဝိသေသဉာဏမ္ပိ နတ္ထေဝါတိ. ယသ္မာ ကာယပဋိဗဒ္ဓံ ကာယကမ္မံ, တသ္မာ တံ နိဝတ္တေန္တော အာဟ ‘‘အညတြ ဖန္ဒိတမတ္တာ’’တိ. ကိလေသသဟဂတစိတ္တေနေဝါတိ ဒုက္ခသမ္ဖဿဿ အသဟနနိမိတ္တေန ဒေါမနဿသဟဂတစိတ္တေနေဝ. ဒုတိယဝါရေပိ ဧသေဝ နယော. ဇိဃစ္ဆာပိပါသဒုက္ခဿ အသဟနနိမိတ္တေန ဒေါမနဿေနေဝ. ဝိကူဇိတမတ္တာတိ ဧတ္ထ ဝိရူပံ ကူဇိတံ ဝိကူဇိတံ ပုဗ္ဗေနိဝါသသန္နိဿယံ ဥပယံ, တံ ပနေတ္ထ ရောဒနဟသနသမုဋ္ဌာပကစိတ္တသဟဂတန္တိ ဒေါသသဟဂတံ လောဘသဟဂတဉ္စာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. စိတ္တန္တိ ကုသလစိတ္တံ. အကုသလစိတ္တံ ပန အတီတာရမ္မဏံ ပဝတ္တတီတိ ဝတ္တဗ္ဗမေဝ နတ္ထိ. သရိတွာတိ ယာဝ န သတိသဏ္ဌာပနာ ဓမ္မာ ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ, တာဝ သုပိနန္တေ အနုဘူတံ ဝိယ ဒုက္ခံ သရိတွာ ရောဒန္တိ. ဟသန္တီတိ ဧတ္ထာပိ ဧသေဝ နယော. အယဉ္စ နယော ယေ လဒ္ဓသုခါရမ္မဏာ ဟုတွာ ဂဟိတပဋိသန္ဓိကာ မာတုကုစ္ဆိတောပိ သုခေနေဝ နိက္ခမန္တိ, တေသံ ဝသေန ဝုတ္တောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ပါယန္တိယာတိ အတ္တနော ဇနပဒဒေသရူပေန [Pg.129] ပါယန္တိယာ. အယမ္ပီတိ အာဇီဝေါပိ မာတု အညဝိဟိတကာလေ စ လောကဿာဒဝသေန ကိလေသသဟဂတစိတ္တေနေဝ ဟောတိ. २६२. ‘जैसा उसका वचन है, वैसा होने पर’ का अर्थ है जैसा उस परिव्राजक का वचन है, वैसा श्रमण-भाव होने पर प्राप्त होने पर। ‘किन्तु हम ऐसा नहीं कहते’ इससे यह दर्शाते हैं कि श्रमण-भाव वास्तव में ऐसा नहीं होता। जो धर्म जैसा है, बुद्ध उसे वैसा ही प्रकाशित करते हैं। ‘विशेष ज्ञान नहीं होता’ का अर्थ है कि उसे तब शरीर के विशेष विषय का ज्ञान नहीं होता, जिससे वह दूसरे के शरीर पर आक्रमण कर सके, और उसे वहाँ विशेष ज्ञान भी नहीं होता। चूँकि काय-कर्म शरीर से सम्बद्ध है, इसलिए उसे हटाते हुए कहा ‘फड़कने मात्र के अतिरिक्त’। ‘क्लेश-सहगत चित्त से ही’ का अर्थ है दुःखद स्पर्श को न सह पाने के कारण उत्पन्न दौर्मनस्य-सहगत चित्त से ही। दूसरी बार भी यही नय है। भूख और प्यास के दुःख को न सह पाने के कारण उत्पन्न दौर्मनस्य से ही। ‘विकूजित मात्र’ यहाँ विकृत कूजन (आवाज) विकूजित है, जो पूर्व-निवास के आश्रित उपाय है, उसे यहाँ रोने और हँसने को उत्पन्न करने वाले चित्त के साथ होने के कारण द्वेष-सहगत और लोभ-सहगत समझना चाहिए। ‘चित्त’ का अर्थ है कुशल चित्त। अकुशल चित्त तो अतीत के आलम्बन वाला होता है, यह कहने की आवश्यकता ही नहीं है। ‘स्मरण करके’ का अर्थ है जब तक स्मृति-स्थापना वाले धर्म उत्पन्न नहीं होते, तब तक स्वप्न में अनुभव किए गए दुःख की तरह स्मरण करके रोते हैं। ‘हँसते हैं’ यहाँ भी यही नय है। और यह नय उनके लिए कहा गया है जो सुखद आलम्बन प्राप्त कर प्रतिसन्धि ग्रहण करने वाले होते हैं और माता की कोख से भी सुखपूर्वक निकलते हैं। ‘पिलाते समय’ का अर्थ है अपने जनपद की भाषा/रूप के अनुसार दूध पिलाते समय। ‘यह भी’ का अर्थ है आजीव भी माता के अन्य कार्यों में व्यस्त रहने के समय लोक-आस्वाद के वश में क्लेश-सहगत चित्त से ही होता है। ၂၆၃. သမဓိဂယှာတိ သမ္မာ အဓိဂတဘာဝေန ဂဟေတွာ အဘိဘဝိတွာ ဝိသေသေတွာ ဝိသိဋ္ဌော ဟုတွာ. ခီဏာသဝံ သန္ဓာယာတိ ဗျတိရေကဝသေန ခီဏာသဝံ သန္ဓာယ. အယဉှေတ္ထ အတ္ထော – ခီဏာသဝမ္ပိ သောတာပန္နကုသလံ ပညပေတိ သေက္ခဘူမိယံ ဌိတတ္တာ. သေသပဒေသုပိ ဧသေဝ နယော. २६३. ‘समधिगृह्य’ का अर्थ है सम्यक् रूप से प्राप्त भाव से ग्रहण करके, अभिभूत करके, विशेषित करके या विशिष्ट होकर। ‘क्षीणास्रव के सन्दर्भ में’ का अर्थ है व्यतिरेक (भेद) के वश से क्षीणास्रव के सन्दर्भ में। यहाँ यह अर्थ है - क्षीणास्रव भी स्रोतापन्न के कुशल को प्रज्ञापित करता है क्योंकि वह शैक्ष-भूमि में स्थित है। शेष पदों में भी यही नय है। တီဏိ ပဒါနိ နိဿာယာတိ န ကာယေန ပါပကံ ကမ္မံ ကရောတိ, န ပါပကံ ဝါစံ ဘာသတိ, န ပါပကံ အာဇီဝံ အာဇီဝတီတိ ဣမာနိ တီဏိ ပဒါနိ နိဿာယ ကုသလသီလမူလကာ စ အကုသလသီလမူလကာ စာတိ ဒွေ ပဌမစတုက္ကာ ဌပိတာ. ဧကံ ပဒံ နိဿာယာတိ န ပါပကံ သင်္ကပ္ပံ သင်္ကပ္ပေတီတိ ဣမံ ဧကပဒံ နိဿာယ ကုသလသင်္ကပ္ပမူလကာ အကုသလသင်္ကပ္ပမူလကာ စာတိ ဣမေ ဒွေ ပစ္ဆိမစတုက္ကာ ဌပိတာ. ‘तीन पदों के आश्रय से’ का अर्थ है शरीर से पाप कर्म नहीं करता, पापमयी वाणी नहीं बोलता, पापमयी आजीविका नहीं जीता - इन तीन पदों के आश्रय से कुशल-शील-मूलक और अकुशल-शील-मूलक ये दो प्रथम चतुष्क स्थापित किए गए हैं। ‘एक पद के आश्रय से’ का अर्थ है पापमयी संकल्प नहीं करता - इस एक पद के आश्रय से कुशल-संकल्प-मूलक और अकुशल-संकल्प-मूलक ये दो अन्तिम चतुष्क स्थापित किए गए हैं। ၂၆၄. ဝိစိကိစ္ဆုဒ္ဓစ္စသဟဂတစိတ္တဒွယမ္ပိ ဝဋ္ဋတိ ဗလဝတာ မောဟေန သမန္နာဂတတ္တာ. တထာ ဟိ တာနိ ‘‘မောမူဟစိတ္တာနီ’’တိ ဝုစ္စန္တိ. २६४. विचिकित्सा (संदेह) और औद्धत्य (चंचलता) से युक्त दोनों चित्त भी प्रबल मोह से युक्त होने के कारण (यहाँ) उपयुक्त हैं। इसीलिए उन्हें ‘मोमूह चित्त’ (अत्यधिक मोहयुक्त चित्त) कहा जाता है। ကုဟိန္တိ ကိံနိမိတ္တံ. ကတရံဌာနံ ပါပုဏိတွာတိ ကိံ ကာရဏံ အာဂမ္မ. ဧတ္ထေတေတိ ဧတ္ထာတိ ကာယဝစီမနောသုစရိတဘာဝနာသာဇီဝနိပ္ဖတ္တိယံ. သာ ပန ဟေဋ္ဌိမကောဋိယာ သောတာပတ္တိဖလေန ဒီပေတဗ္ဗာတိ အာဟ ‘‘သောတာပတ္တိဖလေ ဘုမ္မ’’န္တိ. ယသ္မာ အာဇီဝဋ္ဌမကံ အဝသိဋ္ဌဉ္စ သီလံ ပါတိမောက္ခသံဝရသီလဿ စ ပါရိသုဒ္ဓိပါတိမောက္ခာဓိဂမေန သောတာပတ္တိဖလပ္ပတ္တိယာ သိဒ္ဓေါ ဟောတီတိ အာဟ – ‘‘ပါတိမောက္ခ…ပေ… နိရုဇ္ဈတီ’’တိ. ‘‘သုခသီလော ဒုက္ခသီလော’’တိအာဒီသု ဝိယ ပကတိအတ္ထသီလသဒ္ဒံ ဂဟေတွာ ဝုတ္တံ ‘‘အကုသလသီလ’’န္တိအာဒိ. ‘कहाँ’ का अर्थ है किस निमित्त से। ‘किस स्थान को प्राप्त करके’ का अर्थ है किस कारण से आकर। ‘यहाँ’ का अर्थ है काय, वाणी और मन के सुचरित की भावना और आजीव की निष्पत्ति में। वह (निष्पत्ति) निम्नतम कोटि में स्रोतापत्ति-फल के द्वारा प्रकाशित की जानी चाहिए, इसलिए कहा ‘स्रोतापत्ति-फल में सप्तमी (भूम)’। चूँकि आजीव-अष्टमक और शेष शील, प्रातिमोक्ष-संवर-शील की परिशुद्धि और प्रातिमोक्ष की प्राप्ति के साथ स्रोतापत्ति-फल की प्राप्ति से सिद्ध होते हैं, इसलिए कहा - ‘प्रातिमोक्ष...पे... निरुद्ध होता है’। ‘सुख-शील, दुःख-शील’ आदि की तरह स्वभाव के अर्थ में शील शब्द को लेकर ‘अकुशल शील’ आदि कहा गया है। ၂၆၅. ကာမာဝစရကုသလစိတ္တမေဝ ဝုတ္တံ သမ္ပတ္တသမာဒါနဝိရတိပုဗ္ဗကဿ သီလဿ အဓိပ္ပေတတ္တာ. တေနာဟ – ‘‘ဧတေန ဟိ ကုသလသီလံ သမုဋ္ဌာတီ’’တိ. २६५. कामावचर कुशल चित्त ही कहा गया है क्योंकि यहाँ सम्प्राप्त-विरति और समादान-विरति पूर्वक शील अभिप्रेत है। इसीलिए कहा - ‘इससे ही कुशल शील समुत्थित होता है’। သီလဝါတိ ဧတ္ထ ဝါ-သဒ္ဒေါ ပါသံသတ္ထောဝ ဝေဒိတဗ္ဗောတိ အာဟ ‘‘သီလသမ္ပန္နော ဟောတီ’’တိ. ယော သီလမတ္တေ ပတိဋ္ဌိတော, န သမာဓိပညာသု, သော [Pg.130] သီလမယဓမ္မပူရိတတာယ သီလမယော. တေနာဟ ‘‘အလမေတ္တာဝတာ’’တိအာဒိ. ယတ္ထာတိ ယဿံ စေတောဝိမုတ္တိယံ ပညာဝိမုတ္တိယဉ္စ. တဒုဘယဉ္စ ယသ္မာ အရဟတ္တဖလေ သင်္ဂဟိတံ, တသ္မာ ဝုတ္တံ ‘‘အရဟတ္တဖလေ ဘုမ္မ’’န္တိ. အသေသံ နိရုဇ္ဈတိ သုခဝိပါကဘာဝဿ သဗ္ဗသော ပဋိပ္ပဿမ္ဘနတော. ‘शीलवान’ यहाँ ‘वा’ शब्द प्रशंसा के अर्थ में ही समझना चाहिए, इसलिए कहा ‘शील-सम्पन्न होता है’। जो केवल शील में प्रतिष्ठित है, समाधि और प्रज्ञा में नहीं, वह शीलमय धर्मों से पूर्ण होने के कारण ‘शीलमय’ है। इसीलिए ‘इतने मात्र से पर्याप्त है’ आदि कहा गया है। ‘जहाँ’ का अर्थ है जिस चेतोविमुक्ति और प्रज्ञाविमुक्ति में। चूँकि वे दोनों अर्हत्-फल में संगृहीत हैं, इसलिए कहा ‘अर्हत्-फल में सप्तमी (भूम)’। ‘अशेष निरुद्ध होता है’ क्योंकि सुख-विपाक भाव का पूरी तरह से उपशमन हो जाता है। ၂၆၆. ကာမပဋိသံယုတ္တာ သညာ ကာမသညာ. သေသေသုပိ ဧသေဝ နယော. ဣတရာ ဒွေတိ ဗျာပါဒဝိဟိံသာသညာ. २६६. काम से संबंधित संज्ञा 'काम-संज्ञा' है। शेष में भी यही नियम है। अन्य दो 'व्यापाद-संज्ञा' और 'विहिंसा-संज्ञा' हैं। အနာဂါမိဖလပဌမဇ္ဈာနန္တိ အနာဂါမိဖလသဟဂတံ ပဌမဇ္ဈာနံ. ဧတ္ထာတိ ယထာဝုတ္တေ ပဌမဇ္ဈာနေ. ဧတ္ထ စ ဥဇုဝိပစ္စနီကေန ပဋိပက္ခပ္ပဟာနံ သာတိသယန္တိ ပဌမဇ္ဈာနဂ္ဂဟဏံ. တေနာဟ ‘‘အပရိသေသာ နိရုဇ္ဈန္တီ’’တိ. နေက္ခမ္မသညာနံ ကာမာဝစရစိတ္တသဟဂတတာ တဿ သီလဿ သမုဋ္ဌာနတာ စ သမ္ပယုတ္တနယေန ဝေဒိတဗ္ဗာ. 'अनागामिफल-प्रथम-ध्यान' का अर्थ है अनागामिफल के साथ होने वाला प्रथम ध्यान। 'यहाँ' (एत्थ) का अर्थ है यथाकथित प्रथम ध्यान में। और यहाँ सीधे विरोधी (प्रतिपक्ष) के प्रहाण की अतिशयता के कारण प्रथम ध्यान का ग्रहण किया गया है। इसीलिए कहा गया है— "बिना शेष रहे निरुद्ध हो जाते हैं।" नैष्क्रम्य-संज्ञाओं की कामावचर चित्त के साथ सहगामिता और उस शील की समुत्थानता को सम्प्रयुक्त नय (विधि) से जानना चाहिए। ၂၆၇. ကုသလသင်္ကပ္ပနိရောဓဒုတိယဇ္ဈာနိကအရဟတ္တဖလအကုသလသင်္ကပ္ပနိရောဓ- ပဌမဇ္ဈာနိကအနာဂါမိဖလဂ္ဂဟဏေန သမဏော ဒဿိတော. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. २६७. कुशल संकल्पों के निरोध वाले द्वितीय ध्यान के अर्हत्-फल और अकुशल संकल्पों के निरोध वाले प्रथम ध्यान के अनागामि-फल के ग्रहण द्वारा 'श्रमण' को दिखाया गया है। शेष सुविज्ञेय (आसानी से समझने योग्य) ही है। သမဏမုဏ္ဍိကာပုတ္တသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. श्रमणमुण्डिकापुत्त सुत्त की व्याख्या में लीनत्थप्पकासना (गूढ़ अर्थ का प्रकाशन) समाप्त हुई। ၉. စူဠသကုလုဒါယိသုတ္တဝဏ္ဏနာ ९. चूलसकुलुदायी सुत्त की व्याख्या। ၂၇၁. ပဉှောတိ ဉာတုံ ဣစ္ဆိတော အတ္ထော, တဒေဝ ဓမ္မဒေသနာယ နိမိတ္တဘာဝတော ကာရဏံ. ဥပဋ္ဌာတူတိ ဉာဏဿ ဂေါစရဘာဝံ ဥပဂစ္ဆတု. ယေန ကာရဏေနာတိ ယေန တုယှံ ဥပဋ္ဌိတေန ကာရဏေန ဓမ္မဒေသနာ ဥပဋ္ဌဟေယျ, တံ ပန ပရိဗ္ဗာဇကဿ အဇ္ဈာသယဝသေန တထာ ဝုတ္တံ. တေနာဟ ‘‘ဧတေန ဟိ…ပေ… ဒီပေတီ’’တိ. ဧကင်္ဂဏာနီတိ ပိဓာနာဘာဝေန ဧကင်္ဂဏသဒိသာနိ. တေနာဟ ‘‘ပါကဋာနီ’’တိ. २७१. 'प्रश्न' का अर्थ है जानने की इच्छा वाला विषय, वही धर्म-देशना के निमित्त होने के कारण 'कारण' है। 'उपस्थित हो' (उपट्टाठु) का अर्थ है ज्ञान के गोचर भाव (विषय) को प्राप्त हो। 'जिस कारण से' का अर्थ है जिस तुम्हारे उपस्थित कारण से धर्म-देशना उपस्थित हो, वह परिव्राजक के आशय के वश में वैसा कहा गया है। इसीलिए कहा— "इससे ही... पे... प्रकाशित करता है।" 'एक-आंगन' (एकङ्गणानि) का अर्थ है आवरण (ढक्कन) के अभाव के कारण एक आंगन के समान। इसीलिए कहा— "प्रकट हैं।" ဇာနန္တောတိ အတ္တနော တထာဘာဝံ သယံ ဇာနန္တော. သက္ကစ္စံ သုဿူသတီတိ ‘‘တထာဘူတံယေဝ မံ တထာ အဝေါစာ’’တိ သာဒရံ သုဿူသတိ. တသ္မာတိ ဒိဗ္ဗစက္ခုလာဘိနော အနာဂတံသဉာဏလာဘတော. ဧဝမာဟာတိ ‘‘ယော [Pg.131] ခေါ, ဥဒါယိ, ဒိဗ္ဗေန စက္ခုနာ’’တိ အာရဘိတွာ ‘‘သော ဝါ မံ အပရန္တံ အာရဗ္ဘ ပဉှံ ပုစ္ဆေယျာ’’တိ ဧဝံ အဝေါစ. 'जानते हुए' का अर्थ है अपने तथा-भाव (वास्तविक स्थिति) को स्वयं जानते हुए। 'सत्कारपूर्वक सुनने की इच्छा करता है' का अर्थ है "मुझ तथाभूत (यथार्थ) को ही वैसा कहा" इस प्रकार आदर के साथ सुनने की इच्छा करता है। 'उससे' का अर्थ है दिव्य-चक्षु के लाभ वाले और अनागत-अंश ज्ञान के लाभ वाले से। 'ऐसा कहा' का अर्थ है "जो खलु, उदायी, दिव्य चक्षु से" यहाँ से आरम्भ कर "वह मुझसे अपरान्त (भविष्य) के विषय में प्रश्न पूछे" ऐसा कहा। ဣတရန္တိ အဝသိဋ္ဌံ ဣမသ္မိံ ဌာနေ ဝတ္တဗ္ဗံ. ဝုတ္တနယမေဝါတိ ‘‘ယော ဟိ လာဘီ’’တိအာဒိနာ ဝုတ္တနယမေဝ. အတီတေတိ ပုဗ္ဗေနိဝါသာနုဿတိဉာဏဿ ဝိသယဘူတေ အတ္ထေ. အနာဂတေတိ အနာဂတံသဉာဏဿ ဝိသယဘူတေ အနာဂတေ အတ္ထေ. 'इतर' का अर्थ है इस स्थान पर कहा जाने वाला अवशिष्ट (शेष)। 'कहे गए नय (विधि) के अनुसार ही' का अर्थ है "जो ही लाभ प्राप्त करने वाला है" इत्यादि द्वारा कहे गए नय के अनुसार ही। 'अतीत में' का अर्थ है पूर्वनिवास-अनुस्मृति-ज्ञान के विषयभूत अर्थों में। 'अनागत में' का अर्थ है अनागत-अंश ज्ञान के विषयभूत भविष्य के अर्थों में। ပံသုပဒေသေ နိဗ္ဗတ္တနတော ပံသုသမောကိဏ္ဏသရီရတာယ ပံသုပိသာစကံ. ဧကံ မူလံ ဂဟေတွာတိ ဒီဃသော ဟေဋ္ဌိမန္တေန စတုရင်္ဂုလံ, ဥပရိမန္တေန ဝိဒတ္ထိကံ ရုက္ခဂစ္ဆလတာဒီသု ယဿ ကဿစိ ဧကံ မူလံ ဂဟေတွာ အညဇာတိကာနံ အဒိဿမာနကာယော ဟောတိ. အယံ ကိရ နေသံ ဇာတိသိဒ္ဓါ ဓမ္မတာ. တတြာတိ တဿ မူလဝသေန အဒိဿမာနကတာယ. န ဒိဿတိ ဉာဏေန န ပဿတိ. धूल भरे प्रदेश में उत्पन्न होने के कारण और धूल से व्याप्त शरीर होने के कारण 'पांसु-पिशाचक' (धूल-पिशाच) है। 'एक मूल को पकड़कर' का अर्थ है लंबाई में नीचे की ओर चार अंगुल और ऊपर की ओर एक बित्ता (विदत्थि), वृक्ष, झाड़ी, लता आदि में से किसी एक मूल को पकड़कर अन्य जाति वालों के लिए अदृश्य शरीर वाला हो जाता है। यह उनकी जाति-सिद्ध धर्मता (स्वभाव) है। 'वहाँ' का अर्थ है उस मूल के कारण अदृश्य होने से। 'नहीं दिखता' का अर्थ है ज्ञान से नहीं देखता। ၂၇၂. န စ အတ္ထံ ဒီပေယျာတိ အဓိပ္ပေတမတ္ထံ သာ ဝါစာ သရူပတော န စ ဒီပေယျ, ကေဝလံ ဝါစာမတ္တမေဝါတိ အဓိပ္ပာယော. ပဋိဟရိတဗ္ဗဋ္ဌေန ပရသန္တာနေ နေတဗ္ဗဋ္ဌေန ပဋိဟာရိယ-သဒ္ဒဒွါရေန ဝိညာတဗ္ဗော ဘာဝတ္ထော, သောဝ ပါဋိဟီရကော နိရုတ္တိနယေန, နတ္ထိ ဧတဿ ပါဋိဟီရကန္တိ အပ္ပာဋိဟီရကတံ, တ-သဒ္ဒေန ပဒံ ဝဍ္ဎေတွာ တထာ ဝုတ္တံ, အနိယျာနံ. တေနာဟ ‘‘နိရတ္ထကံ သမ္ပဇ္ဇတီ’’တိ. သုဘကိဏှဒေဝလောကေ ခန္ဓာ ဝိယ ဇောတေတီတိ ဣမိနာ – ‘‘ဒိဗ္ဗော ရူပီ မနောမယော သဗ္ဗင်္ဂပစ္စင်္ဂီ အဟီနိန္ဒြိယော အတ္တာ’’တိ ဣမမတ္ထံ ဒဿေတိ. २७२. 'और अर्थ को प्रकाशित न करे' का अर्थ है वह वाणी अभिप्रेत अर्थ को स्वरूप से प्रकाशित न करे, केवल वाणी मात्र ही रहे—यह अभिप्राय है। परिहार (निवारण) करने के अर्थ में और दूसरे की संतान (चित्त-धारा) में ले जाने के अर्थ में 'पातिहारिय' शब्द के द्वारा भावार्थ जानना चाहिए, वही निरुक्ति-नय से 'पातिहीरक' है; जिसका यह पातिहीरक नहीं है वह 'अपातिहीरकता' है, 'त' शब्द से पद को बढ़ाकर वैसा कहा गया है, जो अनिय्यान (मुक्ति न देने वाला) है। इसीलिए कहा— "निरर्थक हो जाता है।" 'शुभकिण्ह देवलोक में स्कन्धों के समान चमकता है'—इससे "दिव्य, रूपवान, मनोमय, सभी अंगों-प्रत्यंगों से युक्त, इंद्रियों से हीन न होने वाला आत्मा" इस अर्थ को दिखाता है। ၂၇၃. သဥပသဂ္ဂပဒဿ အတ္ထော ဥပသဂ္ဂေန ဝိနာပိ ဝိညာယတီတိ အာဟ ‘‘ဝိဒ္ဓေတိ ဥဗ္ဗိဒ္ဓေ’’တိ. သာ စဿ ဥဗ္ဗိဒ္ဓတာ ဥပက္ကိလေသဝိဂမေန သုစိဘာဝေန ဥပဋ္ဌာနန္တိ အာဟ ‘‘မေဃဝိဂမေန ဒူရီဘူတေ’’တိ. ဣန္ဒနီလမဏိ ဝိယ ဒိဗ္ဗတိ ဇောတေတီတိ ဒေဝေါ, အာကာသော. ‘‘အဍ္ဎရတ္တသမယေ’’တိ ဝတ္တဗ္ဗေ ဘုမ္မတ္ထေ ဝိဟိတဝစနာနံ အစ္စန္တသံယောဂါဘာဝါ ဥပယောဂဝစနံ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ပုဏ္ဏမာသိယဉှိ ဂဂနမဇ္ဈဿ ပုရတော ဝါ ပစ္ဆတော ဝါ အန္တေ ဌိတေ အဍ္ဎရတ္တေ သမယော ဘိန္နော နာမ ဟောတိ, မဇ္ဈေ ဧဝ ပန ဌိတော အဘိန္နော နာမ. တေနာဟ ‘‘အဘိန္နေ အဍ္ဎရတ္တသမယေ’’တိ. २७३. उपसर्ग सहित पद का अर्थ उपसर्ग के बिना भी जाना जाता है, इसलिए कहा— "'विद्ध' का अर्थ 'उद्विद्ध' (ऊँचा उठा हुआ) है।" और उसकी वह उद्विद्धता उपक्लेशों के दूर होने से शुचि-भाव (पवित्रता) से उपस्थित होना है, इसलिए कहा— "बादलों के हटने से दूर हुए।" इंद्रनील मणि के समान चमकता है, इसलिए 'देव' अर्थात् आकाश। 'अर्धरात्रि के समय' (अड्ढरत्तसमये) ऐसा कहे जाने योग्य होने पर, सप्तमी विभक्ति (भूमत्थ) में विहित वचनों के अत्यंत संयोग के अभाव के कारण द्वितीया विभक्ति (उपयोगवचन) समझना चाहिए। क्योंकि पूर्णिमा को आकाश के मध्य के आगे या पीछे अंत में स्थित होने पर अर्धरात्रि का समय 'भिन्न' कहलाता है, परंतु मध्य में ही स्थित होने पर 'अभिन्न' कहलाता है। इसीलिए कहा— "अभिन्न अर्धरात्रि के समय में।" ယေ အနုဘောန္တီတိ ယေ ဒေဝါ စန္ဒိမသူရိယာနံ အာဘာ အနုဘောန္တိ ဝိနိဘုဉ္ဇန္တိ ဝဠဉ္ဇန္တိ စ တေဟိ ဒေဝေဟိ ဗဟူ စေဝ ဗဟုတရာ စ စန္ဒိမသူရိယာနံ အာဘာ [Pg.132] အနနုဘောန္တော. တေနာဟ – ‘‘အတ္တနော သရီရောဘာသေနေဝ အာလောကံ ဖရိတွာ ဝိဟရန္တီ’’တိ. 'जो अनुभव करते हैं' का अर्थ है जो देव चन्द्रमा और सूर्य की आभा का अनुभव करते हैं, उपभोग करते हैं और प्रयोग करते हैं, उन देवों से बहुत और बहुत अधिक चन्द्रमा और सूर्य की आभा का अनुभव न करने वाले। इसीलिए कहा— "अपने शरीर के प्रकाश से ही आलोक फैलाकर विहार करते हैं।" ၂၇၄. ပုစ္ဆာမူဠှော ပန ဇာတော ‘‘အယံ ပရမော ဝဏ္ဏော’’တိ ဂဟိတပဒဿ ဝိဓမနေန. အစေလကပါဠိန္တိ ‘‘အစေလကော ဟောတိ မုတ္တာစာရော’’တိအာဒိနယပ္ပဝတ္တံ (ဒီ. နိ. ၁.၃၉၄) အစေလကပဋိပတ္တိဒီပကဂန္ထံ, ဂန္ထသီသေနေဝ တေန ပကာသိတဝါဒါနိ ဝဒတိ. သုရာမေရယပါနမနုယုတ္တပုဂ္ဂလဿ သုရာပါနတော ဝိရတိ တဿ ကာယံ စိတ္တဉ္စ တာပေန္တီ သံဝတ္တတီတိ သုရာပါနဝိရတိ (တပေါ, သောယေဝ ဂုဏော. တေနာဟ ‘‘သုရာပါနဝိရတီတိ အတ္ထော’’တိ). २७४. "यह परम वर्ण है"—इस ग्रहण किए गए पद के खंडन से वह पूछने में मूढ़ (भ्रमित) हो गया। 'अचेलक-पालि' का अर्थ है "अचेलक होता है, मुक्त-आचार वाला होता है" इत्यादि नय से प्रवृत्त अचेलक-प्रतिपत्ति को प्रकाशित करने वाला ग्रंथ; उस ग्रंथ के शीर्षक से ही वह प्रकाशित वादों को कहता है। सुरा-मेरय पान में लगे हुए व्यक्ति की सुरापान से विरति उसके काय और चित्त को तपाती हुई प्रवृत्त होती है, इसलिए सुरापान-विरति ही तप है, वही गुण है। इसीलिए कहा— "सुरापान-विरति ही अर्थ है।" ၂၇၅. ဧကန္တံ အစ္စန္တမေဝ သုခံ အဿာတိ ဧကန္တသုခံ. ပဉ္စသု ဓမ္မေသူတိ ‘‘ပါဏာတိပါတာ ပဋိဝိရတီ’’တိအာဒီသု ပဉ္စသု သီလာစာရဓမ္မေသု. န ဇာနိံသူတိ သမ္မောသေန အနုပဋ္ဌဟန္တိ တဒတ္ထံ န ဗုဇ္ဈန္တိ. ဗုဒ္ဓုပ္ပာဒေန ကိရ ဝိဟတတေဇာနိ မဟာနုဘာဝါနိ မန္တပဒါနိ ဝိယ ဗာဟိရကာနံ ယောဂါဝစရဂန္ထေန သဒ္ဓိံ ယောဂါဝစရပဋိပဒါ နဿတိ. ဥဂ္ဂဏှိံသူတိ ‘‘ပဉ္စ ပုဗ္ဗဘာဂဓမ္မေ’’တိအာဒိဝစနမတ္တံ ဥဂ္ဂဏှိံသု. တတိယဇ္ဈာနတောတိ ကာရဏောပစာရေန ဖလံ ဝဒတိ, ဖလဘူတတော တတိယဇ္ဈာနတော. २७५. 'एकान्त' अर्थात् अत्यंत ही सुख जिसका हो, वह 'एकान्त-सुख' है। 'पाँच धर्मों में' का अर्थ है "प्राणातिपात से विरति" इत्यादि पाँच शीलाचार धर्मों में। 'नहीं जाना' का अर्थ है सम्मोह (भ्रम) के कारण उपस्थित नहीं होते, उस अर्थ को नहीं समझते। बुद्ध के उत्पाद से मानो तेज नष्ट हो गया हो, ऐसे महानुभाव मंत्र-पदों के समान बाह्य लोगों के योगावचर ग्रंथ के साथ योगावचर प्रतिपदा नष्ट हो जाती है। 'ग्रहण किया' का अर्थ है "पाँच पूर्वभाग धर्म" इत्यादि वचन मात्र को ग्रहण किया। 'तृतीय ध्यान से'—यहाँ कारण के उपचार से फल को कहता है, फलभूत तृतीय ध्यान से। ၂၇၆. ဧကန္တသုခဿ လောကဿ ပဋိလာဘေန ပတ္တိယာ တတ္ထ နိဗ္ဗတ္တိ ပဋိလာဘသစ္ဆိကိရိယာ. ဧကန္တသုခေ လောကေ အနဘိနိဗ္ဗတ္တိတွာ ဧဝ ဣဒ္ဓိယာ တတ္ထ ဂန္တွာ တဿ သတ္တလောကဿ ဘာဇနလောကဿ စ ပစ္စက္ခတော ဒဿနံ ပစ္စက္ခသစ္ဆိကိရိယာ. တေနာဟ ‘‘တတ္ထာ’’တိအာဒိ. २७६. एकान्तसुख वाले लोक की प्राप्ति के द्वारा वहाँ उत्पन्न होना 'प्रतिलाभ-साक्षात्क्रिया' है। एकान्तसुख वाले लोक में उत्पन्न हुए बिना ही ऋद्धि के द्वारा वहाँ जाकर उस सत्त्वलोक और भाजनलोक का प्रत्यक्ष दर्शन करना 'प्रत्यक्ष-साक्षात्क्रिया' है। इसीलिए 'तत्य' (वहाँ) आदि कहा गया है। ၂၇၇. ဥဒဉ္စနိကောတိ ဥဒဉ္စနော. ဝိဉ္ဈုပဗ္ဗတပဿေ ဂါမာနံ အနိဝိဋ္ဌတ္တာ တိံသယောဇနမတ္တံ ဌာနံ အဋဝီ နာမ, တတ္ထ သေနာသနံ, တသ္မိံ အဋဝိသေနာသနေ ပဓာနကမ္မိကာနံ ဘိက္ခူနံ ဗဟူနံ တတ္ထ နိဝါသေန ဧကံ ပဓာနဃရံ အဟောသိ. २७७. 'उदञ्चनिको' का अर्थ 'उदञ्चनो' है। विन्ध्य पर्वत के पार्श्व में गाँवों के न बसे होने के कारण तीस योजन मात्र का स्थान 'अटवी' (वन) कहलाता है, वहाँ शयनासन था। उस अटवी-शयनासन में प्रधानकर्म (ध्यान) करने वाले बहुत से भिक्षुओं के निवास के कारण एक 'प्रधानघर' (ध्यान-कक्ष) था। စူဠသကုလုဒါယိသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. चूलसकुलुदायि-सुत्त की वर्णना की लीनत्थप्पकासना (गूढ़ार्थ-प्रकाशिनी टीका) समाप्त हुई। ၁၀. ဝေခနသသုတ္တဝဏ္ဏနာ १०. वेखनस-सुत्त की वर्णना। ၂၈၀. သဟ [Pg.133] ဝတ္ထုကာမေန ကိလေသကာမော ဂရု ဂရုကာတဗ္ဗော ဧတဿာတိ ကာမဂရု. တေသွေဝ ကာမေသု နိန္နပေါဏပဗ္ဘာရဇ္ဈာသယောတိ ကာမာဓိမုတ္တော. ပဗ္ဗဇ္ဇာပဌမဇ္ဈာနာဒိကံ နေက္ခမ္မံ ဂရု ဂရုကာတဗ္ဗံ ဧတဿာတိ နေက္ခမ္မဂရု. တတ္ထ နိန္နပေါဏပဗ္ဘာရဇ္ဈာသယော နေက္ခမ္မာဓိမုတ္တော သွာယမတ္ထော ယထာ ဧကစ္စေ ဂဟဋ္ဌေ လဗ္ဘတိ, ဧဝံ ဧကစ္စေ အနဂါရေပီတိ အာဟ ‘‘ပဗ္ဗဇိတောပီ’’တိအာဒိ. အယံ ပန ဝေခနသော ပရိဗ္ဗာဇကော. သော ဟိ ဝေခနသတာပသပဗ္ဗဇ္ဇံ ဥပဂန္တွာ ဝေခနသေန ဣမိနာ ဒိဋ္ဌိမာဒါယ သမာဒိယိတွာ ဌိတတ္တာ ‘‘ဝေခနသော’’တိ ဝုစ္စတိ. ယထာ လောကော သယံ ဧကာဒသဟိ အဂ္ဂီဟိ အာဒိတ္တောပိ သမာနော ပစ္စက္ခတော အနုဘဝိယမာနံ သာလာကိကံ အဂ္ဂိသန္တာပံ ဝိယ အနာဒိကာလာနုဂတသမ္မာကဝစရသန္တာပံ အာဒိတ္တတာယ န သလ္လက္ခေတိ, သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေန ပန မဟာကရုဏာသမုဿာဟိတမာနသေန ‘‘သဗ္ဗံ, ဘိက္ခဝေ, အာဒိတ္တ’’န္တိ အာဒိတ္တပရိယာယေ (သံ. နိ. ၄.၂၈; မဟာဝ. ၅၄) ဒေသိယမာနေ သလ္လက္ခေတိ, ဧဝံ အယမ္ပိ အနာဒိကာလပရိဘာဝိတံ အတ္တအဇ္ဈာသယေ အဝဋ္ဌိတံ ကာမာဓိမုတ္တံ သရသေန အနုပဓာရေန္တော သတ္ထာရာ – ‘‘ပဉ္စ ခေါ ဣမေ, ကစ္စာန, ကာမဂုဏာ’’တိအာဒိနာ ကာမဂုဏေသု ကာမသုခေ ဘာသိယမာနေ ‘‘ကာမာဓိမုတ္တံ ဝတ ပဗ္ဗဇိတဿ စိတ္တ’’န္တိ ဥပဓာရေဿတီတိ အာဟ – ‘‘ဣမာယ ကထာယ ကထိယမာနာယ အတ္တနော ကာမာဓိမုတ္တတံ သလ္လက္ခေဿတီ’’တိ. ကာမဂ္ဂသုခန္တိ ကာမေတဗ္ဗဝတ္ထူဟိ အဂ္ဂဘူတံ သုခံ. သဗ္ဗေ ဟိ တေဘူမကဓမ္မာ ကာမနီယဋ္ဌေန ကာမာ, တေ ပဋိစ္စ ဥပ္ပဇ္ဇနသုခတော နိဗ္ဗာနသုခမေဝ အဂ္ဂဘူတံ သုခံ. ယထာဟ – ‘‘ယာဝတာ, ဘိက္ခဝေ, ဓမ္မာ သင်္ခတာ ဝါ အသင်္ခတာ ဝါ, ဝိရာဂေါ တေသံ အဂ္ဂမက္ခာယတီ’’တိ (ဣတိဝု. ၉၀; အ. နိ. ၄.၃၄) – ‘‘နိဗ္ဗာနံ ပရမံ သုခ’’န္တိ (မ. နိ. ၂.၂၁၅, ၂၁၇; ဓ. ပ. ၂၀၃) စ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘နိဗ္ဗာနံ အဓိပ္ပေတ’’န္တိ. २८०. वस्तु-काम के साथ क्लेश-काम जिसके लिए भारी (महत्वपूर्ण) है, वह 'कामगरु' है। उन्हीं कामों में निम्न, प्रवण और प्राग्भार (झुकाव) वाले आशय वाला 'कामाधिमुक्त' है। प्रव्रज्या और प्रथम ध्यान आदि रूप नैष्क्रम्य जिसके लिए भारी (महत्वपूर्ण) है, वह 'नैष्क्रम्यगरु' है। वहाँ निम्न, प्रवण और प्राग्भार वाले आशय वाला 'नैष्क्रम्याधिमुक्त' है; यह अर्थ जैसे कुछ गृहस्थों में पाया जाता है, वैसे ही कुछ अनगारिकों (प्रव्रजितों) में भी, इसीलिए 'पब्बजितोपि' (प्रव्रजित भी) आदि कहा गया है। यह वेखनस तो परिव्राजक है। वह वेखनस-तापस-प्रव्रज्या को प्राप्त कर, इस वेखनस-दृष्टि को ग्रहण कर और उसमें स्थित होने के कारण 'वेखनस' कहलाता है। जैसे लोक स्वयं ग्यारह अग्नियों से प्रज्वलित होने पर भी, प्रत्यक्ष अनुभव की जाने वाली शलाका की अग्नि के संताप के समान, अनादि काल से चले आ रहे सम्यक्-कवचर-संताप को प्रज्वलित होने के रूप में नहीं देखता, परन्तु महाकरुणा से उत्साहित मन वाले सम्यक्-सम्बुद्ध द्वारा 'भिक्षुओं, सब कुछ प्रज्वलित है' इस प्रकार आदित्य-पर्याय में उपदेश दिए जाने पर देखता है; वैसे ही यह भी अनादि काल से भावित अपने आशय में स्थित कामाधिमुक्तता को स्वयं नहीं विचारता हुआ, शास्ता द्वारा—'हे कच्चान, ये पाँच कामगुण हैं' आदि के द्वारा कामगुणों में कामसुख के कहे जाने पर—'निश्चित ही प्रव्रजित का चित्त कामाधिमुक्त है' ऐसा विचारेगा, इसीलिए कहा—'इस कथा के कहे जाने पर अपनी कामाधिमुक्तता को देखेगा'। 'कामग्गसुखं' का अर्थ है काम्य वस्तुओं में श्रेष्ठ सुख। वे सभी त्रैभूमिक धर्म कामनीय होने के कारण 'काम' हैं, उनकी अपेक्षा उत्पन्न होने वाले सुख से निर्वाण-सुख ही श्रेष्ठ सुख है। जैसा कि कहा गया है—'भिक्षुओं, जितने भी धर्म संस्कृत या असंस्कृत हैं, उनमें विराग श्रेष्ठ कहा जाता है' और 'निर्वाण परम सुख है'। इसीलिए कहा गया 'निर्वाण अभिप्रेत है'। ၂၈၁. ပုဗ္ဗေနိဝါသဉာဏလာဘိနော ပုဗ္ဗန္တံ အာရဗ္ဘ ဝုစ္စမာနကထာ အနုစ္ဆဝိကာ တဒတ္ထဿ ပစ္စက္ခဘာဝတော, တဒဘာဝတော ဝေခနသဿ အနနုစ္ဆဝိကာတိ အာဟ ‘‘ယသ္မာ…ပေ… နတ္ထီ’’တိ. အနာဂတကထာယ…ပေ… နတ္ထီတိ ဧတ္ထာပိ ဧသေဝ နယော. အာရက္ခတ္ထာယာတိ ဒေဝတာဟိ မန္တပဒေဟိ သဟ ဌိတာ [Pg.134] တတ္ထ အာရက္ခတ္ထာယ. အဝိဇ္ဇာယာတိ ဣဒံ လက္ခဏဝစနံ, တံမူလကတ္တာ ဝါ သဗ္ဗကိလေသဓမ္မာနံ အဝိဇ္ဇာဝ ဂဟိတာ. ဇာနနံ ပဟီနကိလေသပစ္စဝေက္ခဏဉာဏေန. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. २८१. पूर्वनिवास-ज्ञान प्राप्त करने वालों के लिए पूर्वान्त (अतीत) के विषय में कही जाने वाली कथा उचित है क्योंकि वह अर्थ उनके लिए प्रत्यक्ष है, उसके अभाव के कारण वेखनस के लिए वह अनुचित है, इसीलिए कहा 'यस्मा...पे... नत्थि' (क्योंकि... नहीं है)। अनागत कथा के विषय में भी यही न्याय है। 'आरक्खत्थाय' (रक्षा के लिए) का अर्थ है देवताओं द्वारा मन्त्र-पदों के साथ वहाँ रक्षा के लिए स्थित होना। 'अविज्जाय' (अविद्या से) यह लक्षण-वचन है, अथवा सभी क्लेश-धर्मों का मूल होने के कारण अविद्या ही ग्रहण की गई है। 'जाननं' का अर्थ प्रहीण-क्लेशों के प्रत्यवेक्षण-ज्ञान से जानना है। शेष सुविज्ञेय ही है। ဝေခနသသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. वेखनस-सुत्त की वर्णना की लीनत्थप्पकासना समाप्त हुई। နိဋ္ဌိတာ စ ပရိဗ္ဗာဇကဝဂ္ဂဝဏ္ဏနာ. और परिव्राजक-वर्ग की वर्णना समाप्त हुई। ၄. ရာဇဝဂ္ဂေါ ४. राज-वर्ग। ၁. ဃဋိကာရသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. घटिकार-सुत्त की वर्णना। ၂၈၂. စရိယန္တိ [Pg.135] ဗောဓိစရိယံ, ဗောဓိသမ္ဘာရသမ္ဘရဏဝသေန ပဝတ္တိတံ ဗောဓိသတ္တပဋိပတ္တိန္တိ အတ္ထော. သုကာရဏန္တိ ဗောဓိပရိပါစနဿ ဧကန္တိကံ သုန္ဒရံ ကာရဏံ, ကဿပဿ ဘဂဝတော ပယိရုပါသနာဒိံ သန္ဓာယ ဝဒတိ. တဉှိ တေန သဒ္ဓိံ မယာ ဣဓ ကတန္တိ ဝတ္တဗ္ဗတံ လဘတိ. မန္ဒဟသိတန္တိ ဤသကံ ဟသိတံ. ကုဟံ ကုဟန္တိ ဟာသ-သဒ္ဒဿ အနုကရဏမေတံ. ဟဋ္ဌပဟဋ္ဌာကာရမတ္တန္တိ ဟဋ္ဌပဟဋ္ဌမတ္တံ. ယထာ ဂဟိတသင်္ကေတာ ‘‘ပဟဋ္ဌော ဘဂဝါ’’တိ သဉ္ဇာနန္တိ, ဧဝံ အာကာရဒဿနမတ္တံ. २८२. 'चरियं' का अर्थ बोधिचर्या है, जो बोधि-सम्भारों के संचय के रूप में प्रवृत्त बोधिसत्त्व की प्रतिपत्ति (साधना) है। 'सुकारणं' का अर्थ बोधि की परिपक्वता का एकान्तिक सुन्दर कारण है, जो कश्यप भगवान् की पर्युपासना (सेवा) आदि के सन्दर्भ में कहा गया है। वह (चर्या) उनके साथ 'मेरे द्वारा यहाँ की गई' ऐसा कहने योग्य होती है। 'मन्दहसितं' का अर्थ है ईषत् (थोड़ा) हँसना। 'कुहं कुहं' यह 'हास' शब्द का अनुकरण है। 'हट्ठपहट्ठकारमत्तं' का अर्थ है केवल हर्षित होने का आकार मात्र। जैसे संकेत ग्रहण करने वाले 'भगवान् हर्षित हैं' ऐसा जान लेते हैं, वैसे ही केवल आकार का प्रदर्शन। ဣဒါနိ ဣမိနာ ပသင်္ဂေန တာသံ သမုဋ္ဌာနံ ဝိဘာဂတော ဒဿေတုံ ‘‘ဟသိတဉ္စ နာမေတ’’န္တိအာဒိ အာရဒ္ဓံ. တတ္ထ အဇ္ဈုပေက္ခနဝသေနပိ ဟာသော န သမ္ဘဝတိ, ပဂေဝ ဒေါမနဿဝသေနာတိ အာဟ ‘‘တေရသဟိ သောမနဿသဟဂတစိတ္တေဟီ’’တိ. နနု စ ကေစိ ကောဓဝသေနပိ ဟသန္တီတိ? န, တေသမ္ပိ ယံ တံ ကောဓဝတ္ထု, တဿ မယံ ဒါနိ ယထာကာမကာရိတံ အာပဇ္ဇိဿာမာတိ ဒုဝိညေယျန္တရေန သောမနဿစိတ္တေနေဝ ဟာသဿ ဥပ္ပဇ္ဇနတော. တေသူတိ ပဉ္စသု သောမနဿသဟဂတစိတ္တေသု. ဗလဝါရမ္မဏေတိ ဥဠာရအာရမ္မဏေ ယမကမဟာပါဋိဟာရိယသဒိသေ. ဒုဗ္ဗလာရမ္မဏေတိ အနုဠာရေ အာရမ္မဏေ. ဣမသ္မိံ ပန ဌာနေ…ပေ… ဥပ္ပာဒေသီတိ ဣဒံ ပေါရာဏဋ္ဌကထာယံ တထာ အာဂတတ္တာ ဝုတ္တံ. န အဟေတုကသောမနဿသဟဂတစိတ္တေန ဘဂဝတော သိတံ ဟောတီတိ ဒဿနတ္ထံ. अब इस प्रसंग से उनकी उत्पत्ति को विभागपूर्वक दिखाने के लिए 'हसितञ्च नामेतं' आदि आरम्भ किया गया। वहाँ उपेक्षा के वश में भी हास सम्भव नहीं है, तो दौर्मनस्य (दुःख) के वश में तो कहना ही क्या, इसीलिए कहा 'तेरह प्रकार के सोमनस्य-सहगत चित्तों से'। क्या कुछ लोग क्रोध के वश में भी नहीं हँसते? नहीं, उनके लिए भी जो वह क्रोध का विषय है, 'हम अब उस पर इच्छानुसार व्यवहार करेंगे' इस प्रकार के दुर्विज्ञेय सोमनस्य-चित्त से ही हास उत्पन्न होता है। 'तेसु' का अर्थ उन पाँच सोमनस्य-सहगत चित्तों में है। 'बलवारम्मणे' का अर्थ यमक-महाप्रातिहार्य के समान उदार (विशाल) आलम्बन में है। 'दुब्बलारम्मणे' का अर्थ अनुदार (साधारण) आलम्बन में है। 'इस स्थान पर... उत्पन्न किया' यह पुरानी अट्ठकथा में वैसा आने के कारण कहा गया है। यह दिखाने के लिए कि भगवान् की मुस्कान अहेतुक-सोमनस्य-सहगत चित्त से नहीं होती है। အဘိဓမ္မဋီကာယံ (ဓ. သ. မူလဋီ. ၅၆၈) ပန ‘‘အတီတံသာဒီသု အပ္ပဋိဟတံ ဉာဏံ ဝတွာ ‘ဣမေဟိ တီဟိ ဓမ္မေဟိ သမန္နာဂတဿ ဗုဒ္ဓဿ ဘဂဝတော သဗ္ဗံ ကာယကမ္မံ ဉာဏပုဗ္ဗင်္ဂမံ ဉာဏာနုပရိဝတ္တ’န္တိအာဒိဝစနတော (မဟာနိ. ၆၉, ၁၅၆; စူဠနိ. မာဃရာဇမာဏဝပုစ္ဆာနိဒ္ဒေသ ၈၅; ပဋိ. မ. ၃.၅; နေတ္တိ. ၁၅; ဒီ. နိ. အဋ္ဌ. ၃.၃၀၅; ဝိဘ. မူလဋီ. သုတ္တန္တဘာဇနီယဝဏ္ဏနာ; ဒီ. နိ. ဋီ. ၃.၁၄၁, ၃၀၅) ‘ဘဂဝတော ဣဒံ စိတ္တံ ဥပ္ပဇ္ဇတီ’တိ ဝုတ္တဝစနံ ဝိစာရေတဗ္ဗ’’န္တိ ဝုတ္တံ. တတ္ထ ဣမိနာ ဟသိတုပ္ပာဒစိတ္တေန ပဝတ္တိယမာနမ္ပိ ဘဂဝတော သိတကရဏံ ပုဗ္ဗေနိဝါသ-အနာဂတံသ-သဗ္ဗညုတညာဏာနံ အနုဝတ္တကတ္တာ ဉာဏာနုပရိဝတ္တိယေဝါတိ, ဧဝံ ပန ဉာဏာနုပရိဝတ္တိဘာဝေ သတိ န ကောစိ ပါဠိအဋ္ဌကထာနံ ဝိရောဓော. တထာ ဟိ အဘိဓမ္မဋ္ဌကထာယံ (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၅၆၈) ‘‘တေသံ [Pg.136] ဉာဏာနံ စိဏ္ဏပရိယန္တေ ဣဒံ စိတ္တံ ဥပ္ပဇ္ဇတီ’’တိ ဝုတ္တံ. အဝဿဉ္စ ဧတံ ဧဝံ ဣစ္ဆိတဗ္ဗံ, အညထာ အာဝဇ္ဇနဿပိ ဘဂဝတော ပဝတ္တိ တထာရူပေ ကာလေ န သံယုဇ္ဇေယျ, တဿပိ ဟိ ဝိညတ္တိသမုဋ္ဌာပကဘာဝဿ ဣစ္ဆိတတ္တာ, တထာ ဟိ ဝုတ္တံ – ‘‘ဧဝဉ္စ ကတွာ မနောဒွါရာဝဇ္ဇနဿပိ ဝိညတ္တိသမုဋ္ဌာပကတ္တံ ဥပပန္နံ ဟောတီ’’တိ, န စ ဝိညတ္တိသမုဋ္ဌာပကတ္တေ တံသမုဋ္ဌိတာယ ဝိညတ္တိယာ ကာယကမ္မာဒိဘာဝံ အာပဇ္ဇနဘာဝေါ ဝိဗန္ဓတီတိ တမေဝ သန္ဓာယ ဝဒတိ. တေနာဟ ‘‘ဧဝံ အပ္ပမတ္တကမ္ပီ’’တိ. သတေရိတာ ဝိဇ္ဇုလတာ နာမ သတေရတာဝိဇ္ဇုလတာ. သာ ဟိ ဣတရဝိဇ္ဇုလတာ ဝိယ ခဏဋ္ဌိတိကာ သီဃနိရောဓာ စ န ဟောတိ, အပိစ ခေါ ဒန္ဓနိရောဓာ, တဉ္စ သဗ္ဗကာလံ စတုဒီပိကမဟာမေဃတောဝ နိစ္ဆရတိ တေနာဟ ‘‘စာတုဒ္ဒီပိကမဟာမေဃမုခတော’’တိ. အယံ ကိရ တာသံ ရသ္မိဝဋ္ဋီနံ ဓမ္မတာ, ယဒိဒံ တိက္ခတ္တုံ သိရဝရံ ပဒက္ခိဏံ ကတွာ ဒါဌဂ္ဂေသုယေဝ အန္တရဓာနံ. अभिधम्मटीका (ध. सं. मूलटी. 568) में कहा गया है कि 'अतीत आदि के विषय में अप्रतिहत ज्ञान' कहकर, 'इन तीन धर्मों से युक्त बुद्ध भगवान के सभी काय-कर्म ज्ञान के पूर्वगामी और ज्ञान के अनुगामी होते हैं' आदि वचनों के कारण, 'भगवान को यह चित्त उत्पन्न होता है' इस कथन पर विचार किया जाना चाहिए। वहाँ, इस हसितुप्पाद चित्त (हास्योत्पादक चित्त) द्वारा प्रवर्तित होने पर भी भगवान का मुस्कराना पूर्वनिवास, अनागत और सर्वज्ञता ज्ञान का अनुगामी होने के कारण 'ज्ञान का अनुगामी' ही है; इस प्रकार ज्ञान का अनुगामी होने पर पालि और अट्ठकथाओं में कोई विरोध नहीं है। क्योंकि अभिधम्म-अट्ठकथा में कहा गया है— 'उन ज्ञानों के अभ्यास के अंत में यह चित्त उत्पन्न होता है।' और इसे अवश्य ही इस प्रकार स्वीकार किया जाना चाहिए, अन्यथा आवर्जन (चित्त) की भी भगवान में प्रवृत्ति ऐसे समय में संगत नहीं होगी, क्योंकि उसके भी विज्ञप्ति-समुत्थापक (विज्ञप्ति को उत्पन्न करने वाला) होने की इच्छा की गई है। और विज्ञप्ति-समुत्थापक होने पर उससे उत्पन्न विज्ञप्ति के काय-कर्म आदि होने में कोई बाधा नहीं आती, इसी को लक्ष्य करके वह कहता है। इसीलिए कहा— 'इस प्रकार थोड़ा सा भी।' 'सतेरिता विज्जुलता' का अर्थ 'सतेरता विज्जुलता' (बिजली की चमक) है। वह अन्य बिजलियों की तरह क्षणिक स्थिति वाली और शीघ्र नष्ट होने वाली नहीं होती, बल्कि धीरे-धीरे नष्ट होने वाली होती है, और वह हमेशा चारों द्वीपों वाले महामेघ से ही निकलती है, इसीलिए कहा— 'चातुद्दी पिकमहामेघमुखतो' (चारों द्वीपों वाले महामेघ के मुख से)। यह उन रश्मि-पुंजों की स्वाभाविकता (धम्मता) है कि वे तीन बार श्रेष्ठ सिर की प्रदक्षिणा करके दाढ़ों के अग्रभाग में ही अंतर्धान हो जाते हैं। ၂၈၃. ယဒိပိ စတ္တာရိ အသင်္ချေယျာနိ ကပ္ပာနံ သတသဟဿဉ္စ ပညာပါရမိတာ ပရိဘာဝိတာ, တထာပိ ဣဒါနိ တံ ဗုဒ္ဓန္တရံ တဿာ ပဋိပါဒေတဗ္ဗတ္တာ ဝုတ္တံ ‘‘အပရိပက္ကဉာဏတ္တာ’’တိ. ကာမဉ္စဿ ဉာဏာယ ဣဒါနိပိ ပဋိပါဒေတဗ္ဗတာ အတ္ထိ, ဧဝံ သန္တေပိ နနု သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေသု ပသာဒေန သမ္ဘာဝနာယ ဘဝိတဗ္ဗံ တထာ စိရကာလံ ပရိဘာဝိတတ္တာ, ကထံ တတ္ထ ဟီဠနာတိ အာဟ ‘‘ဗြာဟ္မဏကုလေ’’တိအာဒိ. စိရကာလပရိစိတာပိ ဟိ ဂုဏဘာဝနာ အပ္ပကေနပိ အကလျာဏမိတ္တသံသဂ္ဂေန ဝိပရိဝတ္တတိ အညထတ္တံ ဂစ္ဆတိ. တေန မဟာသတ္တောပိ ဇာတိသိဒ္ဓါယံ လဒ္ဓိယံ ဌတွာ ဇာတိသိဒ္ဓေန မာနေန ဧဝမာဟ – ‘‘ကိံ ပန တေန မုဏ္ဍကေန သမဏကေန ဒိဋ္ဌေနာ’’တိ. တထာ ဟိ ဝုတ္တံ အဋ္ဌကထာယံ – २८३. यद्यपि चार असंख्येय और एक लाख कल्पों तक प्रज्ञा-पारमिता का अभ्यास किया गया था, फिर भी अब उस बुद्ध-काल में उसे प्रतिपादित (सिद्ध) किया जाना था, इसलिए 'अपरिपक्व ज्ञान के कारण' ऐसा कहा गया है। यद्यपि उनके ज्ञान के लिए अब भी प्रतिपादन की आवश्यकता है, फिर भी क्या सम्यक्सम्बुद्धों के प्रति श्रद्धा और सम्मान नहीं होना चाहिए क्योंकि उन्होंने इतने लंबे समय तक अभ्यास किया था? वहाँ निंदा कैसे हो सकती है? इसीलिए 'ब्राह्मण कुल में' आदि कहा गया है। क्योंकि लंबे समय तक संचित गुणों की भावना भी थोड़े से अकल्याण-मित्र (बुरे मित्र) के संसर्ग से बदल जाती है और अन्यथा हो जाती है। इसी कारण महासत्व (बोधिसत्व) ने भी जाति-सिद्ध धारणा में स्थित होकर और जाति-सिद्ध मान (अभिमान) के कारण ऐसा कहा— 'उस मुंडक श्रमण को देखने से क्या लाभ?' जैसा कि अट्ठकथा में कहा गया है— ‘‘တသ္မာ အကလျာဏဇနံ, အာသီဝိသမိဝေါရဂံ,အာရကာ ပရိဝဇ္ဇေယျ, ဘူတိကာမော ဝိစက္ခဏော’’တိ. (ဒီ. နိ. အဋ္ဌ. ၁.၁၇၀-၁၇၂); 'इसलिए, कल्याण चाहने वाले बुद्धिमान व्यक्ति को अकल्याणकारी व्यक्ति (बुरे व्यक्ति) से उसी प्रकार दूर रहना चाहिए जैसे विषैले सर्प से।' နှာနစုဏ္ဏေန သုတ္တေန ကတာ သောတ္တိ, ကုရုဝိန္ဒဂုဠိကာ, သာ ဧဝ သိနာယန္တိ ကာယံ ဝိသောဓေန္တိ ဧတာယာတိ သိနာနံ. တေနာဟ – ‘‘သောတ္တိ သိနာနန္တိ သိနာနတ္ထာယ ကတသောတ္တိ’’န္တိ. स्नान-चूर्ण और धागे से बनी हुई 'सोत्ति' (एक प्रकार का उबटन या उपकरण), कुरुविन्द-गुटिका, जिससे वे स्नान करते हैं और शरीर को शुद्ध करते हैं, वह 'सिनान' (स्नान-सामग्री) है। इसीलिए कहा— 'सोत्ति सिनानं' अर्थात् स्नान के लिए बनाई गई सोत्ति। ၂၈၄. အရိယပရိဟာရေနာတိ အရိယာနံ ပရိဟာရေန, အနာဂါမီနံ နှာနကာလေ အတ္တနော ကာယဿ ပရိဟာရနိယာမေနာတိ အတ္ထော. အတ္တနော [Pg.137] ဉာဏသမ္ပတ္တိယာ ဝိဘဝသမ္ပတ္တိယာ ပသန္နကာရံ ကာတုံ သက္ခိဿတိ. ဧတဒတ္ထန္တိ ‘‘အဟိတနိဝါရဏံ, ဟိတေ နိယောဇနံ ဗျသနေ ပရိဝဇ္ဇန’’န္တိ ယဒိဒံ, ဧတဒတ္ထံ မိတ္တာ နာမ ဟောန္တိ. ကေစိ ‘‘ယာဝေတ္ထ အဟုပီ’’တိ ပဌန္တိ, တေသံ ယာဝ ဧတ္ထ ကေသဂ္ဂဂဟဏံ တာဝ အယံ နိဗန္ဓော အဟုပီတိ အတ္ထော. २८४. 'अरिपपरिहारेन' का अर्थ है आर्यों के परिहार (देखभाल/आचरण) द्वारा, अर्थात् अनागामियों के स्नान के समय अपने शरीर की देखभाल के नियम के अनुसार। वह अपनी ज्ञान-संपत्ति और विभव-संपत्ति से प्रसन्नता उत्पन्न करने में समर्थ होगा। 'एतदत्थं' का अर्थ है— 'अहित का निवारण, हित में नियोजन, और विपत्ति में त्याग न करना', इसी प्रयोजन के लिए मित्र होते हैं। कुछ लोग 'यावेत्थ अहुपी' पाठ पढ़ते हैं, उनके अनुसार जब तक यहाँ केश-ग्रहण (बाल पकड़ना) हुआ, तब तक यह बंधन रहा, यह अर्थ है। ၂၈၅. သတိပဋိလာဘတ္ထာယာတိ ဗောဓိယာ မဟာဘိနီဟာရံ ကတွာ ဗောဓိသမ္ဘာရပဋိပဒါယ ပူရဏဘာဝေ သတိယာ ပဋိလာဘတ္ထာယ. ဣဒါနိ တဿ သတုပ္ပာဒနီယကထာယ ပဝတ္တိတာကာရံ သင်္ခေပေနေဝ ဒဿေတုံ ‘‘တဿ ဟီ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. တတ္ထ န လာမကဋ္ဌာနံ ဩတိဏ္ဏသတ္တောတိ ဣမိနာ မဟာသတ္တဿ ပဏီတာဓိမုတ္တတံ ဒဿေတွာ ဧဝံ ပဏီတာဓိမုတ္တိကဿ ပမာဒကိရိယာ န ယုတ္တာတိ ဒဿေန္တော ‘‘တာဒိသဿ နာမ ပမာဒဝိဟာရော န ယုတ္တော’’တိ အာဟ. တဒါ ဗောဓိသတ္တဿ နေက္ခမ္မဇ္ဈာသယော တေလပ္ပဒီပေါ ဝိယ ဝိသေသတော နိဗ္ဗတ္တိ, တံ ဒိသွာ ဘဂဝါ တဒနုရူပံ ဓမ္မကထံ ကရောန္တော ‘‘တာဒိသဿ…ပေ… ကထေသီ’’တိ. ပရသမုဒ္ဒဝါသီ ထေရာ အညထာ ဝဒန္တိ. အဋ္ဌကထာယံ ပန နာယံ ဗုဒ္ဓါနံ ဘာရော, ယဒိဒံ ပူရိတပါရမီနံ ဗောဓိသတ္တာနံ တထာ ဓမ္မဒေသနာ တေသံ မဟာဘိနီဟာရသမနန္တရမ္ပိ ဗောဓိသမ္ဘာရဿ သယမ္ဘုဉာဏေနေဝ ပဋိဝိဒိတတ္တာ. တသ္မာ ဗောဓိသတ္တဘာဝပဝေဒနမေဝ တဿ ဘဂဝါ အကာသီတိ ဒဿေတုံ ‘‘သတိပဋိလာဘတ္ထာယာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. သတိပဋိလာဘတ္ထာယာတိ သမ္မာပဋိပတ္တိယာ ဥဇ္ဇလနေ ပါကဋကရသတိပဋိလာဘာယ. २८५. 'सतिपटिलाभत्थाय' का अर्थ है— बोधि के लिए महाभिनिहार (महान संकल्प) करके बोधिसंभार-प्रतिपदा (पुण्य-ज्ञान संचय की साधना) के पूर्ण होने पर स्मृति (सति) की प्राप्ति के लिए। अब उसकी स्मृति उत्पन्न करने वाली कथा के प्रवर्तित होने के प्रकार को संक्षेप में दिखाने के लिए 'तस्स ही' आदि कहा गया है। वहाँ 'नीच स्थान में न उतरा हुआ सत्त्व' इसके द्वारा महासत्व की उत्तम अधिमुक्ति (रुचि) को दिखाकर, ऐसी उत्तम अधिमुक्ति वाले के लिए प्रमाद करना उचित नहीं है, यह दिखाते हुए 'वैसे व्यक्ति के लिए प्रमाद-विहार उचित नहीं है' ऐसा कहा। तब बोधिसत्व का नैष्क्रम्य-अध्याशय (वैराग्य का भाव) तेल के दीपक की तरह विशेष रूप से प्रकट हुआ, उसे देखकर भगवान ने उसके अनुरूप धर्मकथा करते हुए 'तादिसस्स... पे... कथेसि' कहा। समुद्र पार रहने वाले स्थविर (थेर) अन्यथा (कुछ और) कहते हैं। अट्ठकथा में तो यह बुद्धों का भार (कार्य) नहीं है, क्योंकि पारमिताओं को पूर्ण करने वाले बोधिसत्वों को उस प्रकार की धर्मदेशना उनके महाभिनिहार के तुरंत बाद ही बोधिसंभार के स्वयंभू-ज्ञान द्वारा ही ज्ञात हो जाती है। इसलिए भगवान ने उसे केवल बोधिसत्व-भाव का ज्ञान कराया, यह दिखाने के लिए 'सतिपटिलाभत्थाय' आदि कहा गया है। 'सतिपटिलाभत्थाय' का अर्थ है— सम्यक् प्रतिपत्ति (सही आचरण) के प्रज्वलित होने पर स्पष्ट रस वाली स्मृति की प्राप्ति के लिए। ၂၈၆. ဉာဏဉှိ ကိလေသဓမ္မဝိဒါလနပဒါလနေဟိ သိင်္ဂံ ဝိယာတိ သိင်္ဂံ. တဉှိ ပဋိပတ္တိယာ ဥပတ္ထမ္ဘိတံ ဥဿိတံ နာမ ဟောတိ, တဒဘာဝေ ပတိတံ နာမ. ကေစိ ပန ဝီရိယံ သိင်္ဂန္တိ ဝဒန္တိ. တသ္မိံ သမ္မပ္ပဓာနဝသေန ပဝတ္တေ ဗာဟိရပဗ္ဗဇ္ဇံ ဥပဂတာပိ မဟာသတ္တာ ဝိသုဒ္ဓါသယာ အပ္ပိစ္ဆတာဒိဂုဏသမင်္ဂိနော ယထာရဟံ ဂန္ထဓုရံ ဝါသဓုရဉ္စ ပရိဗြူဟယန္တာ ဝိဟရန္တိ, ပဂေဝ ဗုဒ္ဓသာသနေ အပ္ပိစ္ဆတာဒီဟီတိ အာဟ ‘‘စတုပါရိသုဒ္ဓိသီလေ ပနာ’’တိအာဒိ. ဝိပဿနံ ဗြူဟေန္တာ သိခါပ္ပတ္တဝိပဿနာ ဟောန္တီတိ ဝုတ္တံ – ‘‘ယာဝ အနုလောမဉာဏံ အာဟစ္စ တိဋ္ဌန္တီ’’တိ, အနုလောမဉာဏတော ဩရမေဝ ဝိပဿနံ ဌပေန္တီတိ အတ္ထော. မဂ္ဂဖလတ္ထံ ဝါယာမံ န ကရောန္တိ ပညာပါရမိတာယ သဗ္ဗညုတညာဏဂဗ္ဘဿ အပရိပုဏ္ဏတ္တာ အပရိပက္ကတ္တာ စ. २८६. ज्ञान ही क्लेश-धर्मों को विदीर्ण करने और नष्ट करने के कारण 'शृंग' (सींग) के समान होने से 'शृंग' है। वह प्रतिपत्ति (साधना) द्वारा समर्थित होने पर 'उन्नत' (उठा हुआ) कहलाता है, और उसके अभाव में 'पतित' (गिरा हुआ) कहलाता है। कुछ लोग वीर्य को 'शृंग' कहते हैं। उस सम्यक्-प्रधान के वश में प्रवृत्त होने पर, बाह्य प्रव्रज्या को प्राप्त हुए भी विशुद्ध आशय वाले महासत्त्व, जो अल्पेच्छता आदि गुणों से युक्त हैं, यथाशक्ति ग्रन्थ-धुर और वास-धुर को बढ़ाते हुए विहार करते हैं, तो फिर बुद्ध-शासन में अल्पेच्छता आदि के साथ (विहार करने) के विषय में क्या कहना, इसीलिए 'चतुपारिसुद्धि-शील में तो' इत्यादि कहा गया है। विपश्यना को बढ़ाते हुए वे 'शिखा-प्राप्त विपश्यना' वाले होते हैं, ऐसा कहा गया है - 'जब तक अनुलोम-ज्ञान तक पहुँचकर स्थित होते हैं', अर्थात् अनुलोम-ज्ञान से पहले ही विपश्यना को स्थापित करते हैं। वे मार्ग-फल के लिए प्रयत्न नहीं करते क्योंकि प्रज्ञा-पारमिता द्वारा सर्वज्ञता-ज्ञान का गर्भ अपूर्ण और अपरिपक्व होता है। ၂၈၇. ထေရေဟီတိ [Pg.138] ဝုဒ္ဓတရေဟိ. နိဝါသေ သတီတိ ယသ္မိံ ဌာနေ ပဗ္ဗဇိတော, တတ္ထေဝ နိဝါသေ. ဝပ္ပကာလတောတိ သဿာနံ ဝပ္ပကာလတော. ပုဗ္ဗေ ဝိယ တတော ပရံ တိခိဏေန သူရိယသန္တာပေန ပယောဇနံ နတ္ထီတိ ဝုတ္တံ – ‘‘ဝပ္ပကာလေ ဝိတာနံ ဝိယ ဥပရိ ဝတ္ထကိလဉ္ဇံ ဗန္ဓိတွာ’’တိ. ပုဋကေတိ ကလာပေ. २८७. 'स्थविरों द्वारा' अर्थात् वृद्धतरों द्वारा। 'निवास होने पर' अर्थात् जिस स्थान पर प्रव्रजित हुए, उसी स्थान पर निवास करने पर। 'बुवाई के समय से' अर्थात् फसलों की बुवाई के समय से। पहले की तरह उसके बाद सूर्य के तीक्ष्ण ताप की आवश्यकता नहीं है, इसलिए कहा गया है - 'बुवाई के समय वितान (चंदोवे) की तरह ऊपर कपड़े की चटाई बाँधकर'। 'पुटक' अर्थात् पोटली में। ၂၈၈. ပစ္စယသာမဂ္ဂိဟေတုကတ္တာ ဓမ္မပ္ပတ္တိယာ ပဒေသတော ပရိညာဝတ္ထုကာပိ အရိယာ ဥပဋ္ဌိတေ စိတ္တဝိဃာတပစ္စယေ ယဒေတံ နာတိသာဝဇ္ဇံ, တဒေဝံ ဂဏှန္တီတိ အယမေတ္ထ ဓမ္မတာတိ အာဟ – ‘‘အလာဘံ အာရဗ္ဘ စိတ္တညထတ္တ’’န္တိအာဒိ. သောတိ ကိကီ ကာသိရာဇာ. ဗြာဟ္မဏဘတ္တောတိ ဗြာဟ္မဏေသု ဘတ္တော. ဒေဝေတိ ဗြာဟ္မဏေ သန္ဓာယာဟ. ဘူမိဒေဝါတိ တေသံ သမညာ, တဒါ ဗြာဟ္မဏဂရုကော လောကော. တဒါ ဟိ ကဿပေါပိ ဘဂဝါ ဗြာဟ္မဏကုလေ နိဗ္ဗတ္တိ. ဓီတု အဝဏ္ဏံ ဝတွာတိ, ‘‘မဟာရာဇ, တဝ ဓီတာ ဗြာဟ္မဏသမယံ ပဟာယ မုဏ္ဍပါသဏ္ဍိကသမယံ ဂဏှီ’’တိအာဒိနာ ရာဇပုတ္တိယာ အဂုဏံ ဝတွာ. ဝရံ ဂဏှိံသု ဉာတကာ. ရဇ္ဇံ နိယျာတေသိ ‘‘မာ မေ ဝစနံ မုသာ အဟောသိ, အဋ္ဌမေ ဒိဝသေ နိဂ္ဂဏှိဿာမီ’’တိ. २८८. प्रत्यय-सामग्री के कारण धर्म-प्राप्ति होने से, आंशिक रूप से परिज्ञा (पूर्ण ज्ञान) के विषय होने पर भी, आर्यों के चित्त में व्याकुलता के प्रत्यय उपस्थित होने पर, जो यह बहुत दोषपूर्ण नहीं है, उसे वे इस प्रकार ग्रहण करते हैं, यही यहाँ की धर्मता (नियम) है, इसीलिए कहा गया है - 'लाभ न होने के कारण चित्त की अन्यथा अवस्था' इत्यादि। वह काशिराज कृकी है। 'ब्राह्मण-भक्त' अर्थात् ब्राह्मणों में श्रद्धा रखने वाला। 'देव' शब्द यहाँ ब्राह्मणों के लिए प्रयुक्त हुआ है। 'भूमिदेव' उनकी संज्ञा है, क्योंकि उस समय संसार ब्राह्मणों को गुरु मानता था। उस समय भगवान कश्यप भी ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुए थे। 'पुत्री का अवर्ण (निंदा) कहकर' अर्थात् 'महाराज, आपकी पुत्री ने ब्राह्मण मत को छोड़कर मुण्ड-पाषण्डिक (भिक्षु) मत ग्रहण कर लिया है' इत्यादि कहकर राजकुमारी के अवगुण बताए। संबंधियों ने वर (वरदान) प्राप्त किया। उसने राज्य सौंप दिया (यह सोचकर कि) 'मेरा वचन मिथ्या न हो, आठवें दिन मैं निग्रह करूँगा'। ပါဝနအသ္မနယနဝသေန သမ္မာ ပါဝီကတတ္တာ ပရိသုဒ္ဓတဏ္ဍုလာနိ. ပါဠိယံ တဏ္ဍုလပဋိဘသ္တာနီတိ တဏ္ဍုလခဏ္ဍာနိ. မုဂ္ဂပဋိဘသ္တကဠာယပဋိဘသ္တေသုပိ ဧသေဝ နယော. पवन (फटकने) और पत्थर निकालने के द्वारा भली-भाँति साफ किए जाने के कारण वे 'परिशुद्ध तण्डुल' (चावल) हैं। पालि में 'तण्डुल-पटिभस्त' का अर्थ चावल के टुकड़े (कण) है। मूंग और मटर के टुकड़ों के विषय में भी यही नियम है। ၂၈၉. ကော နု ခေါတိ ဘုမ္မတ္ထေ ပစ္စတ္တဝစနန္တိ အာဟ – ‘‘ကုဟိံ နု ခေါ’’တိ ပါရိပူရိံ ယောဇီယန္တိ ဗျဉ္ဇနဘောဇနာနိ ဧတ္ထာတိ ပရိယောဂေါ, တတော ပရိယောဂါ. တေနာဟ ‘‘သူပဘာဇနတော’’တိ. သညံ ဒတွာတိ ဝုတ္တံ သဗ္ဗံ အာစိက္ခိတွာ တုမှာကံ အတ္ထာယ သမ္ပာဒေတွာ နိက္ခိတ္တော ဥပဋ္ဌာကောတိ ဘဂဝတော အာရောစေထာတိ သညံ ဒတွာ. အတိဝိဿတ္ထောတိ အတိဝိယ ဝိဿတ္ထော. ပဉ္စဝဏ္ဏာတိ ခုဒ္ဒိကာဒိဝသေန ပဉ္စပ္ပကာရာ. २८९. 'को नु खो' (कौन है) यहाँ सप्तमी विभक्ति के अर्थ में प्रथमा विभक्ति है, इसलिए कहा - 'कहाँ है'। जहाँ व्यंजन और भोजन मिलाए जाते हैं, वह 'परियोग' (पात्र) है, उस परियोग से। इसीलिए कहा 'सूप-भाजन (दाल के बर्तन) से'। 'संज्ञा देकर' अर्थात् सब कुछ बताकर और 'आपके लिए तैयार करके रखा गया है' ऐसा उपासक भगवान को सूचित करे, इस प्रकार संज्ञा देकर। 'अतिविस्सत्थो' अर्थात् अत्यंत विश्वस्त। 'पंचवर्णा' अर्थात् छोटे आदि के भेद से पाँच प्रकार के। ၂၉၀. ကိန္တိ နိဿက္ကေ ပစ္စတ္တဝစနံ, ကသ္မာတိ အတ္ထော? ဓမ္မိကောတိ ဣမိနာ အာဂမနသုဒ္ဓိံ ဒဿေတိ[Pg.139]. ဘိက္ခူနံ ပတ္တေ ဘတ္တသဒိသောတိ ဣမိနာ ဥပါသကေန သတ္ထု ပရိစ္စတ္တဘာဝံ တတ္ထ သတ္ထုနော စ အပရိသင်္ကတံ ဒဿေတိ. သိက္ခာပဒဝေလာ နာမ နတ္ထီတိ ဓမ္မဿာမိဘာဝတော သိက္ခာပဒမရိယာဒါ နာမ နတ္ထိ ပဏ္ဏတ္တိဝဇ္ဇေ, ပကတိဝဇ္ဇေ ပန သေတုဃာတော ဧဝ. २९०. 'किं' (क्या) यहाँ अपादान के अर्थ में प्रथमा विभक्ति है, इसका अर्थ है 'किसलिए'? 'धार्मिक' इस शब्द से वह प्राप्ति की शुद्धता को दर्शाता है। 'भिक्षुओं के पात्र में भोजन के समान' इससे उपासक द्वारा शास्ता (बुद्ध) के प्रति त्याग का भाव और वहाँ शास्ता की निर्दोषता को दर्शाता है। 'शिक्षापद की वेला (सीमा) नहीं है' क्योंकि धर्म-स्वामी होने के कारण प्रज्ञप्ति-वज्य (नियमों के उल्लंघन) में शिक्षापद की मर्यादा नहीं है, किंतु प्रकृति-वज्य (स्वाभाविक पाप) में तो मर्यादा का उल्लंघन वर्जित ही है। ၂၉၁. ဆဒနဋ္ဌာနေ ယဒါကာသံ, တဒေဝ တဿ ဂေဟဿ ဆဒနန္တိ အာကာသစ္ဆဒနံ. ပကတိယာ ဥတုဖရဏမေဝါတိ ဆာဒိတေ ယာဒိသံ ဥတု, ဆဒနေ ဥတ္တိဏဘာဝေပိ တမှိ ဂေဟေ တာဒိသမေဝ ဥတုဖရဏံ အဟောသိ. တေသံယေဝါတိ တေသံ ဃဋိကာရဿ မာတာပိတူနံ ဧဝ. २९१. छत के स्थान पर जो आकाश है, वही उस घर की छत है, इसलिए वह 'आकाश-छदन' (आकाश रूपी छत वाला) है। 'स्वाभाविक रूप से ऋतु का प्रभाव ही' अर्थात् छत होने पर जैसी ऋतु (तापमान) होती है, छत न होने पर भी उस घर में वैसा ही ऋतु-प्रभाव रहता था। 'उन्हीं का' अर्थात् उन्हीं घटिकार के माता-पिता का ही। ၂၉၂. ‘‘စတဿော မုဋ္ဌိယော ဧကော ကုဍုဝေါ, စတ္တာရော ကုဍုဝါ ဧကော ပတ္ထော, စတ္တာရော ပတ္ထာ ဧကော အာဠှကော, စတ္တာရော အာဠှကာ ဧကံ ဒေါဏံ, စတ္တာရိ ဒေါဏာနိ ဧကာ မာနိကာ, စတဿော မာနိကာ ဧကာ ခါရီ, ဝီသတိ ခါရိကာ ဧကော ဝါဟောတိ တဒေဝ ဧကသကဋ’’န္တိ သုတ္တနိပါတဋ္ဌကထာဒီသု (သု. နိ. အဋ္ဌ. ၂.၆၆၂) ဝုတ္တံ, ဣဓ ပန ‘‘ဒွေ သကဋာနိ ဧကော ဝါဟော’’တိ ဝုတ္တံ. တေလဖာဏိတာဒိန္တိ အာဒိ-သဒ္ဒေန သပ္ပိအာဒိံ မရိစာဒိကဋုကဘဏ္ဍဉ္စ သင်္ဂဏှာတိ. နာဟံ ရညာ ဒိဋ္ဌပုဗ္ဗော, ကုတော ပရိပ္ဖဿောတိ အဓိပ္ပာယော. နစ္စိတွာတိ နစ္စံ ဒတွာ. २९२. ''चार मुट्ठी का एक कुडुव, चार कुडुव का एक प्रस्थ, चार प्रस्थ का एक आढ़क, चार आढ़क का एक द्रोण, चार द्रोण की एक मानिका, चार मानिका की एक खारी, और बीस खारी का एक वाह होता है, वही एक शकट (गाड़ी) है'' ऐसा सुत्तनिपात-अट्ठकथा आदि में कहा गया है, किंतु यहाँ 'दो शकट का एक वाह' कहा गया है। 'तेल-फाणित' आदि में 'आदि' शब्द से घी आदि और मिर्च आदि तीखे पदार्थों का संग्रह होता है। 'मैंने राजा को पहले कभी नहीं देखा, तो संपर्क कहाँ से होगा' यह अभिप्राय है। 'नच्चित्वा' अर्थात् नृत्य करके। ဃဋိကာရသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. घटिकार-सुत्त की व्याख्या में लीनत्थप्पकासना (गूढ़ार्थ का प्रकाशन) समाप्त हुई। ၂. ရဋ္ဌပါလသုတ္တဝဏ္ဏနာ २. रट्ठपाल-सुत्त की व्याख्या। ၂၉၃. ထူလမေဝ ထုလ္လံ, ထုလ္လာ ဝိပုလာ မဟန္တာ ကောဋ္ဌာ ဇာတာ ဣမဿာတိ ထုလ္လကောဋ္ဌိကန္တိ ဩဒနပူပပဟူတဝသေန လဒ္ဓနာမော နိဂမော. အဋ္ဌကထာယံ ပန ထုလ္လကောဋ္ဌန္တိ အတ္ထော ဝုတ္တော. တေန ပါဠိယံ ဣက-သဒ္ဒေန ပဒဝဍ္ဎနံ ကတန္တိ ဒဿေတိ. २९३. स्थूल ही 'थुल्ल' है, जिसके पास बड़े, विशाल और महान कोष्ठ (अन्न भंडार) उत्पन्न हुए हैं, वह 'थुल्लकोट्ठिक' है - यह भात और पुआ की प्रचुरता के कारण प्राप्त हुआ निगम (कस्बा) का नाम है। अट्ठकथा में 'थुल्लकोट्ठ' अर्थ कहा गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि पालि में 'इक' प्रत्यय लगाकर शब्द का विस्तार किया गया है। ၂၉၄. ရဋ္ဌပါလောတိ ဣဒံ တဿ ကုလပုတ္တဿ နာမံ. ပဝေဏိဝသေန အာဂတကုလဝံသာနုဂတန္တိ သမုဒါဂမတော ပဋ္ဌာယ ဒဿေတုံ ‘‘ကသ္မာ ရဋ္ဌပါလော’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. သန္ဓာရေတုန္တိ ဝိနာသနတော ပုဗ္ဗေ ယာဒိသံ, တထေဝ သမ္မဒေဝ ဓာရေတုံ သမတ္ထော. သဒ္ဓါတိ ကမ္မဖလသဒ္ဓါယ သမ္ပန္နာ. သာမဏေရံ ဒိသွာတိ သိက္ခာကာမတာယ ဧတဒဂ္ဂေ ဌပိယမာနံ ဒိသွာ. २९४. 'रट्ठपाल' यह उस कुलपुत्र का नाम है। परंपरा से आए हुए कुल-वंश के अनुगत होने के कारण, उसकी उत्पत्ति से ही दिखाने के लिए 'रट्ठपाल क्यों' इत्यादि कहा गया है। 'धारण करने के लिए' अर्थात् विनाश से पहले जैसा था, वैसा ही भली-भाँति धारण करने में समर्थ। 'श्रद्धा' अर्थात् कर्म-फल की श्रद्धा से संपन्न। 'सामणेर को देखकर' अर्थात् शिक्षा की अभिलाषा के कारण उसे इस (शिक्षा) में श्रेष्ठ पद पर स्थापित होते देखकर। သဟ [Pg.140] ရညာတိ သရာဇိကံ, ရညာ သဒ္ဓိံ ရာဇပရိသံ. စာတုဝဏ္ဏန္တိ ဗြာဟ္မဏာဒိစတုဝဏ္ဏသမုဒါယံ. ပေါသေတုန္တိ ဝဒ္ဓေတုံ ဒါနာဒီဟိ သင်္ဂဟဝတ္ထူဟိ သင်္ဂဏှိတုံ. ယံ ကုလံ. ပဟောဿတီတိ သက္ခိဿတိ. 'राजा के साथ' अर्थात् राजा सहित, राजा के साथ राज-परिषद। 'चातुर्वर्ण' अर्थात् ब्राह्मण आदि चारों वर्णों का समुदाय। 'पोषण करने के लिए' अर्थात् दान आदि संग्रह-वस्तुओं द्वारा अनुग्रह करने के लिए। 'जो कुल'। 'समर्थ होगा' अर्थात् कर सकेगा। တေန တေန မေ ဥပပရိက္ခတောတိ ‘‘ကာမာ နာမေတေ အနိစ္စာ ဒုက္ခာ ဝိပရိဏာမဓမ္မာ, အဋ္ဌိကင်္ကလူပမာ’’တိ (မ. နိ. ၁.၂၃၄; ပါစိ. ၄၁၇; မဟာနိ. ၃, ၆) စ အာဒိနာ ယေန ယေန အာကာရေန ကာမေသု အာဒီနဝံ ဩကာရံ သံကိလေသံ, တဗ္ဗိပရိယာယတော နေက္ခမ္မေ အာနိသံသံ ဂုဏံ ပကာသေန္တံ ဘဂဝတာ ဓမ္မံ ဒေသိတံ အာဇာနာမိ, တေန တေန ပကာရေန ဥပပရိက္ခတော ဝီမံသန္တဿ မယှံ ဧဝံ ဟောတိ ဧဝံ ဥပဋ္ဌာတိ. သိက္ခတ္တယဗြဟ္မစရိယန္တိ အဓိသီလာဒိသိက္ခတ္တယသင်္ဂဟံ သေဋ္ဌစရိယံ. အခဏ္ဍာဒိဘာဝါပါဒနေန အခဏ္ဍံ လက္ခဏဝစနဉှေတံ. ကဉ္စိပိ သိက္ခေကဒေသံ အသေသေတွာ ဧကန္တေနေဝ ပရိပူရေတဗ္ဗတာယ ဧကန္တပရိပုဏ္ဏံ. စိတ္တုပ္ပာဒမတ္တမ္ပိ သံကိလေသမလံ အနုပ္ပာဒေတွာ အစ္စန္တမေဝ ဝိသုဒ္ဓံ ကတွာ ပရိဟရိတဗ္ဗတာယ ဧကန္တပရိသုဒ္ဓံ. တတော ဧဝ သင်္ခံ ဝိယ လိခိတန္တိ သင်္ခလိခိတံ. တေနာဟ ‘‘လိခိတသင်္ခသဒိသ’’န္တိ. ဒါဌိကာပိ မဿုဂ္ဂဟဏေနေဝ ဂဟေတွာ ‘‘မဿု’’တွေဝ ဝုတ္တံ, ဥတ္တရာဓရမဿုန္တိ အတ္ထော. ကသာယေန ရတ္တာနိ ကာသာယာနိ. အနနုညာတံ ပုတ္တံ န ပဗ္ဗာဇေတိ ‘‘မာတာပိတူနံ လောကိယမဟာဇနဿ စိတ္တညထတ္တံ မာ ဟောတူ’’တိ. တထာ ဟိ သုဒ္ဓေါဒနမဟာရာဇဿ တထာ ဝရော ဒိန္နော. उस-उस प्रकार से मेरे द्वारा विचार करने पर कि 'ये काम (भोग) अनित्य, दुःखद और विपरिणामधर्मी हैं, वे अस्थि-पंजर के समान हैं' इत्यादि के माध्यम से, जिस-जिस प्रकार से भगवान द्वारा काम-भोगों में दोष, नीचता और संक्लेश को, तथा उसके विपरीत नैष्क्रम्य (संन्यास) में आनृशंस (लाभ) और गुणों को प्रकाशित करते हुए धर्म का उपदेश दिया गया है, उसे मैं जानता हूँ; उस-उस प्रकार से विचार और मीमांसा करते हुए मुझे ऐसा होता है, ऐसा प्रतीत होता है। 'सिक्खत्तयब्रह्मचरियं' का अर्थ है अधिशील आदि त्रिविध शिक्षाओं का संग्रह, जो श्रेष्ठ चर्या है। अखण्ड आदि भावों को प्राप्त करने के कारण यह 'अखण्ड' है, यह लक्षणवाचक शब्द है। किसी भी शिक्षा के अंश को शेष न छोड़कर पूर्णतः परिपूर्ण होने के कारण यह 'एकान्तपरिपूण' है। चित्त के उत्पाद मात्र के संक्लेश रूपी मल को भी उत्पन्न न होने देकर अत्यंत विशुद्ध करके पालन किए जाने के कारण यह 'एकान्तपरिसुद्ध' है। इसी कारण शंख के समान घिसा हुआ (चमकदार) होने से इसे 'संखलिखित' कहा गया है। इसीलिए कहा गया है— 'लिखे हुए शंख के सदृश'। दाढ़ी को भी मूँछ के ग्रहण के साथ ही ग्रहण करके 'मस्सु' (मूँछ) ही कहा गया है, जिसका अर्थ ऊपरी और निचली मूँछ है। कषाय (गेरुए रंग) से रंगे हुए वस्त्र 'कासायानि' हैं। 'माता-पिता और लौकिक महाजनों के चित्त में अन्यथा भाव (दुःख) न हो'—इस उद्देश्य से बिना अनुमति के पुत्र को प्रव्रजित नहीं किया जाता है। क्योंकि महाराज शुद्धोदन को वैसा वरदान दिया गया था। ၂၉၅. ပိယာယိတဗ္ဗတော ပိယောတိ အာဟ ‘‘ပီတိဇနကော’’တိ. မနဿ အပ္ပာယနတော မနာပေါတိ အာဟ ‘‘မနဝဍ္ဎနကော’’တိ. သုခေဓိတော တရုဏဒါရကကာလေ. တတော ပရဉ္စ သပ္ပိခီရာဒိသာဒုရသမနုညဘောဇနာဒိအာဟာရသမ္ပတ္တိယာ သုခပရိဘတော. အထ ဝါ ဒဠှဘတ္တိကဓာတိဇနာဒိပရိဇနသမ္ပတ္တိယာ စေဝ ပရိစ္ဆဒသမ္ပတ္တိယာ စ ဥဠာရပဏီတသုခပစ္စယူပဟာရေဟိ စ သုခေဓိတော, အကိစ္ဆေနေဝ ဒုက္ခပ္ပစ္စယဝိနောဒနေန သုခပရိဘတော. အဇ္ဈတ္တိကင်္ဂသမ္ပတ္တိယာ ဝါ သုခေဓိတော, ဗာဟိရင်္ဂသမ္ပတ္တိယာ သုခပရိဘတော. ကဿစီတိ ဥပယောဂတ္ထေ သာမိဝစနံ, ကိဉ္စီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ, အယမေဝ ဝါ ပါဌော. တထာ ဟိ ‘‘အပ္ပမတ္တကမ္ပိ ကလဘာဂံ ဒုက္ခဿ န ဇာနာသီ’’တိ အတ္ထော ဝုတ္တော. ဧဝံ သန္တေတိ နနု မယံ ရဋ္ဌပါလ မရဏာဒီသု ကေနစိ ဥပါယေန အပ္ပတီကာရေန မရဏေနပိ တယာ အကာမကာပိ [Pg.141] ဝိနာ ဘဝိဿာမ, ဧဝံ သတိ. ယေနာတိ ယေန ကာရဏေန. ကိံ ပနာတိ ဧတ္ထ ကိန္တိ ကာရဏတ္ထေ ပစ္စတ္တဝစနန္တိ ဒဿေန္တော အာဟ ‘‘ကေန ပန ကာရဏေနာ’’တိ. २९५. प्रिय होने के योग्य होने से 'प्रिय' है, इसलिए कहा— 'प्रीतिजनक'। मन को तृप्त करने वाला होने से 'मनाप' है, इसलिए कहा— 'मन को बढ़ाने वाला'। 'सुखेधितो' का अर्थ है शैशवावस्था में सुखपूर्वक पला हुआ। उसके बाद भी घी, दूध आदि स्वादिष्ट और मनपसंद भोजन आदि की प्राप्ति से सुखपूर्वक पोषित। अथवा, दृढ़ भक्ति वाले धाय-जनों आदि परिचारकों की संपन्नता, परिच्छद (वस्त्र-आभूषण) की संपन्नता और उदार एवं प्रणीत सुख के साधनों के उपहारों से सुखपूर्वक बढ़ा हुआ, बिना किसी कठिनाई के दुःख के कारणों को दूर करते हुए सुखपूर्वक पोषित। अथवा आंतरिक अंगों की पूर्णता से 'सुखेधित' और बाहरी अंगों की संपन्नता से 'सुखपरिभत' है। 'कस्सचि' यहाँ षष्ठी विभक्ति उपभोग के अर्थ में है, जिसका अर्थ 'किञ्चि' (कुछ भी) है, अथवा यही पाठ है। जैसा कि कहा गया है— 'तुम दुःख के थोड़े से अंश को भी नहीं जानते'। 'ऐसा होने पर' का अर्थ है— हे राष्ट्रपाल! क्या हम मृत्यु आदि के किसी ऐसे उपाय से, जिसका कोई प्रतिकार नहीं है, मृत्यु के द्वारा तुम्हारी इच्छा न होने पर भी तुमसे अलग नहीं हो जाएँगे? 'येन' का अर्थ है जिस कारण से। 'किं पन' यहाँ 'किं' शब्द कारण के अर्थ में प्रथमा विभक्ति है, यह दर्शाते हुए कहा— 'किस कारण से'। ၂၉၆. ပရိစာရေဟီတိ ပရိတော တတ္ထ တတ္ထ ယထာသကံ ဝိသယေသု စာရေဟိ. တေနာဟ ‘‘ဣတော စိတော စ ဥပနေဟီ’’တိ. ပရိစာရေဟီတိ ဝါ သုခူပကရဏေဟိ အတ္တာနံ ပရိစာရေဟိ, အတ္တနော ပရိစရဏံ ကာရေဟိ. တထာဘူတော စ ယသ္မာ လဠန္တော ကီဠန္တော နာမ ဟောတိ, တသ္မာ ‘‘လဠာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. နိစ္စဒါနံ ဒါနံ နာမ, ဥပေါသထဒိဝသာဒီသု ဒါတဗ္ဗံ အတိရေကဒါနံ ပဒါနံ နာမ. ပဝေဏီရက္ခဏဝသေန ဝါ ဒီယမာနံ ဒါနံ နာမ, အတ္တနာဝ ပဋ္ဌပေတွာ ဒီယမာနံ ပဒါနံ နာမ. ပစုရဇနသာဓာရဏံ ဝါ နာတိဥဠာရံ ဒါနံ နာမ, အနညသာဓာရဏံ အတိဥဠာရံ ပဒါနံ နာမ. ဥဒ္ဒဿေတဗ္ဗာတိ ဥဒ္ဓံ ဒဿေတဗ္ဗာ. ကုတော ဥဒ္ဓံ တေ ဒဿေတဗ္ဗာ? ပဗ္ဗဇိတတော ဥဒ္ဓံ အတ္တာနံ မာတာပိတရော ဒဿေတဗ္ဗာ, တေနာဟ ‘‘ယထာ’’တိအာဒိ. २९६. 'परिचारेहि' का अर्थ है चारों ओर वहाँ-वहाँ अपने-अपने विषयों में विचरण करो। इसीलिए कहा— 'इधर-उधर से लाओ'। अथवा 'परिचारेहि' का अर्थ है सुख के साधनों से स्वयं का मनोरंजन करो, अपनी सेवा कराओ। और वैसा होने पर चूँकि वह विलास और क्रीड़ा करने वाला होता है, इसलिए 'लळा' आदि कहा गया है। 'दान' का अर्थ है नित्य दान, और उपोसथ आदि दिनों में दिया जाने वाला अतिरिक्त दान 'प्रदान' कहलाता है। अथवा परंपरा की रक्षा के वश में दिया जाने वाला 'दान' है, और स्वयं आरम्भ करके दिया जाने वाला 'प्रदान' है। अथवा सामान्य जनों के लिए साधारण दान 'दान' है, और दूसरों के लिए असाधारण एवं अत्यंत उदार दान 'प्रदान' है। 'उद्दस्सेतब्बा' का अर्थ है ऊपर (सामने) दिखाई जानी चाहिए। तुम्हें कहाँ से ऊपर (सामने) दिखाया जाना चाहिए? प्रव्रजित होने के बाद माता-पिता को स्वयं को दिखाना चाहिए, इसीलिए 'यथा' आदि कहा गया है। ၂၉၉. ဗလံ ဂဟေတွာတိ ဧတ္ထ ဗလဂ္ဂဟဏံ နာမ ကာယဗလဿ ဥပ္ပာဒနမေဝါတိ အာဟ ‘‘ကာယဗလံ ဇနေတွာ’’တိ. ဧဝံ ဝိဟရန္တောတိ ယထာ ပါဠိယံ ဝုတ္တံ ဧဝံ ဧကော ဝူပကဋ္ဌော အပ္ပမတ္တော ဝိဟရန္တော. တသ္မာတိ ယသ္မာ နေယျော, န ဥဂ္ဃဋိတညူ, န စ ဝိပဉ္စိတညူ, တသ္မာ. စိရေန ပဗ္ဗဇိတော ဒွါဒသမေ ဝဿေ အရဟတ္တံ ပါပုဏိ. ယံ ပန ဝုတ္တံ ပါဠိယံ ‘‘န စိရဿေဝါ’’တိ, တံ သဋ္ဌိ ဝဿာနိ တတော အဓိကမ္ပိ ဝိပဿနာပရိဝါသံ ဝသန္တေ ဥပါဒါယ ဝုတ္တံ. २९९. 'बलं गहेत्वा' यहाँ बल ग्रहण करने का अर्थ शारीरिक बल उत्पन्न करना ही है, इसलिए कहा— 'कायिक बल उत्पन्न करके'। 'एवं विहरन्तो' का अर्थ है जैसा कि पालि में कहा गया है, इस प्रकार अकेला, एकांतवासी और अप्रमादी होकर विहार करते हुए। 'तस्मा' क्योंकि वह 'नेय्य' (बोधगम्य) था, न कि 'उग्घटितञ्ञू' (शीघ्र बोध वाला) और न ही 'विपञ्चितञ्ञू' (विस्तार से बोध वाला), इसलिए। प्रव्रजित होने के बारहवें वर्ष में उसने अर्हत्व प्राप्त किया। पालि में जो 'न चिरस्सेव' (शीघ्र ही) कहा गया है, वह साठ वर्ष या उससे अधिक समय तक विपश्यना-वास करने वालों की तुलना में कहा गया है। သတ္တဒွါရကောဋ္ဌကဿာတိ သတ္တဂဗ္ဘန္တရဒွါရကောဋ္ဌကသီသေန ဂဗ္ဘန္တရာနိ ဝဒတိ. ပဟရာပေတီတိ ဝယောဝုဍ္ဎာနုရူပံ ကပ္ပာပနာဒိနာ အလင်္ကာရာပေတိ. အန္တောဇာတတာယ ဉာတိသဒိသီ ဒါသီ ဉာတိဒါသီ. ပူတိဘာဝေနေဝ လက္ခိတဗ္ဗော ဒေါသော ဝါ အဘိဒေါသော, သောဝ အာဘိဒေါသိကော, အဘိဒေါသံ ဝါ ပစ္စူသကာလံ ဂတော ပတ္တော အတိက္ကန္တောတိ အာဘိဒေါသိကော. တေနာဟ ‘‘ဧကရတ္တာတိက္ကန္တဿာ’’တိအာဒိ. အပရိဘောဂါရဟော ပူတိဘူတဘာဝေန. အရိယဝေါဟာရေနာတိ အရိယသမုဒါစာရေန. အရိယာ ဟိ မာတုဂါမံ ဘဂိနိဝါဒေန သမုဒါစရန္တိ. နိဿဋ္ဌပရိဂ္ဂဟန္တိ ပရိစ္စတ္တာလယံ. ဝတ္တုံ ဝဋ္ဋတီတိ နိရပေက္ခဘာဝတော ဝုတ္တံ, ဣဓ ပန ဝိသေသတော အပရိဘောဂါရဟတ္တာဝ ဝတ္ထုနော. နိမီယတိ သညာယတီတိ နိမိတ္တံ, တထာသလ္လက္ခိတော အာကာရောတိ အာဟ ‘‘အာကာရံ အဂ္ဂဟေသီ’’တိ. 'सत्तद्वारकोट्ठकस्स' का अर्थ है सात भीतरी कक्षों के द्वारों के माध्यम से भीतरी कक्षों को कहता है। 'पहरापेति' का अर्थ है आयु और अवस्था के अनुरूप बाल काटने आदि के द्वारा अलंकृत कराना। घर में ही उत्पन्न होने के कारण संबंधी के समान दासी 'ज्ञातिदासी' है। दुर्गंधयुक्त होने से ही जो दोष लक्षित हो वह 'दोष' या 'अभिदोष' है, वही 'आभिदोसिक' है; अथवा जो 'अभिदोष' यानी प्रत्युष काल (भोर) को प्राप्त हो गया हो या बीत गया हो, वह 'आभिदोसिक' है। इसीलिए कहा— 'एक रात बीत जाने पर' इत्यादि। दुर्गंधयुक्त होने के कारण वह उपभोग के अयोग्य है। 'अरियवोहारने' का अर्थ है आर्यों के शिष्टाचार से। क्योंकि आर्य स्त्रियों को 'भगिनी' (बहन) कहकर संबोधित करते हैं। 'निस्सट्ठपरिग्गहं' का अर्थ है छोड़ा हुआ मोह (आलय)। 'वत्तुं वट्टति' यह निरपेक्ष भाव से कहा गया है, परंतु यहाँ विशेष रूप से वस्तु के उपभोग के अयोग्य होने के कारण कहा गया है। जिससे जाना या पहचाना जाए वह 'निमित्त' है, वैसा लक्षित आकार, इसीलिए कहा— 'आकार को ग्रहण किया'। ၃၀၀. ဃရံ [Pg.142] ပဝိသိတွာတိ ဂေဟသာမိနိယာ နိသီဒိတဗ္ဗဋ္ဌာနဘူတံ အန္တောဂေဟံ ပဝိသိတွာ. အာလပနေတိ ဒါသိဇနဿ အာလပနေ. ဗဟိ နိက္ခမန္တာတိ ယထာဝုတ္တအန္တောဂေဟတော ဗဟိ နိက္ခမန္တိယော. ဃရေသု သာလာ ဟောန္တီတိ ဃရေသု ဧကမန္တေ ဘောဇနသာလာ ဟောန္တိ ပါကာရပရိက္ခိတ္တာ သုသံဝိဟိတဒွါရဗန္ဓာ သုသမ္မဋ္ဌဝါလိကင်္ဂဏာ. ३००. 'घरं पविसित्वा' का अर्थ है घर की स्वामिनी के बैठने के स्थान रूपी भीतरी घर में प्रवेश करके। 'आलपने' का अर्थ है दासियों के बुलाने पर। 'बहि निक्खमन्ता' का अर्थ है पूर्वोक्त भीतरी घर से बाहर निकलती हुई। 'घरों में शालाएँ होती हैं' का अर्थ है घरों के एक कोने में भोजनशालाएँ होती हैं, जो प्राचीर (दीवार) से घिरी हुई, सुव्यवस्थित द्वार-बंधनों वाली और अच्छी तरह बुहारी हुई बालू वाले आँगन वाली होती हैं। အနောကပ္ပနံ အသဒ္ဒဟနံ. အမရိသနံ အသဟနံ. အနာဂတဝစနံ အနာဂတသဒ္ဒပ္ပယောဂေါ, အတ္ထော ပန ဝတ္တမာနကာလိကောဝ. တေနာဟ ‘‘ပစ္စက္ခမ္ပီ’’တိ. အရိယိဒ္ဓိယန္တိ ‘‘ပဋိကူလေ အပဋိကူလသညီ ဝိဟရတီ’’တိ (အ. နိ. ၅.၁၄၄) ဧဝံ ဝုတ္တအရိယိဒ္ဓိယံ. 'अनोकप्पनं' का अर्थ है 'अश्रद्धा' (विश्वास न करना)। 'अमरिसनं' का अर्थ है 'असहना' (सहन न करना)। 'अनागतवचनं' भविष्य काल के शब्द का प्रयोग है, परन्तु अर्थ वर्तमान काल का ही है। इसीलिए कहा गया है— 'पच्चक्खम्पि' (प्रत्यक्ष भी)। 'अरियिद्धियं' का अर्थ है— "प्रतिकूल में अप्रतिकूल की संज्ञा वाला होकर विहार करता है" (अं. नि. 5.144), इस प्रकार कही गई आर्य ऋद्धि। ပူတိကုမ္မာသော ဆဍ္ဍနီယဓမ္မော တဿ ဂေဟတော လဒ္ဓေါပိ န ဒါတဗ္ဗယုတ္တကော ဒါသိဇနေန ဒိန္နောတိ အာဟ ‘‘ဒေယျဓမ္မဝသေန နေဝ ဒါနံ အလတ္ထမှာ’’တိ. ‘‘ဣမေဟိ မုဏ္ဍကေဟီ’’တိအာဒိနာ နိတ္ထုနနဝစနေန ပစ္စက္ခာနံ အတ္ထတော လဒ္ဓမေဝ, တဿ ပန ဥဇုကဖာသုသမာစာရဝသေန အလဒ္ဓတ္တာ ဝုတ္တံ ‘‘န ပစ္စက္ခာန’’န္တိ. တေနာဟ – ‘‘ပဋိသန္ထာရဝသေန ပစ္စက္ခာနမ္ပိ န အလတ္ထမှာ’’တိ. ‘‘နေဝ ဒါန’’န္တိအာဒိ ပစ္စာသီသာယ အက္ခန္တိယာ စ ဝုတ္တံ ဝိယ ပစုရဇနော မညေယျာတိ တန္နိဝတ္တနတ္ထံ အဓိပ္ပာယမဿ ဝိဝရိတုံ ‘‘ကသ္မာ ပနာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. သုတ္တိကာပဋိစ္ဆန္နန္တိ သိပ္ပိကာဆဒါဟိ ဆန္နံ. 'पूतिकुम्मासो' (सड़ा हुआ सत्तू) फेंकने योग्य वस्तु है, उसके घर से प्राप्त होने पर भी वह देने योग्य नहीं था, दासी द्वारा दिया गया था, इसीलिए कहा— "देयधर्म के रूप में हमने दान प्राप्त नहीं किया"। "इन मुण्डकों (मुंडितों) के द्वारा" आदि निंदात्मक वचनों से तिरस्कार वास्तव में प्राप्त ही था, परन्तु सीधे और सुखद व्यवहार के रूप में वह प्राप्त नहीं हुआ, इसलिए कहा गया— "तिरस्कार नहीं"। इसीलिए कहा— "कुशल-क्षेम (प्रतिसंथार) के रूप में हमने तिरस्कार भी प्राप्त नहीं किया"। "दान ही नहीं" आदि शब्द प्रत्याशा (आशा) और अक्षान्ति (अधैर्य) के कारण कहे गए हैं, ऐसा सामान्य लोग न समझें, इस निवारण के लिए उसके अभिप्राय को स्पष्ट करने हेतु "कस्मा पना" (परन्तु क्यों) आदि कहा गया है। 'सुत्तिकापटिच्छन्नं' का अर्थ है सीपियों के आवरण से ढका हुआ। ဥက္ကဋ္ဌဧကာသနိကတာယာတိ ဣဒံ ဘူတကထနမတ္တံ ထေရဿ တထာဘာဝဒီပနတော. မုဒုကဿပိ ဟိ ဧကာသနိကဿ ယာယ နိသဇ္ဇာယ ကိဉ္စိမတ္တံ ဘောဇနံ ဘုတ္တံ, ဝတ္တသီသေနပိ တတော ဝုဋ္ဌိတဿ ပုန ဘုဉ္ဇိတုံ န ဝဋ္ဋတိ. တေနာဟ တိပိဋကစူဠာဘယတ္ထေရော ‘‘အာသနံ ဝါ ရက္ခေယျ ဘောဇနံ ဝါ’’တိ. ဥက္ကဋ္ဌသပဒါနစာရိကောတိ ပုရတော ပစ္ဆတော စ အာဟဋဘိက္ခမ္ပိ အဂ္ဂဟေတွာ ဗဟိဒွါရေ ဌတွာ ပတ္တဝိဿဇ္ဇနမေဝ ကရောတိ. ဧတေနေဝ ထေရဿ ဥက္ကဋ္ဌပိဏ္ဍပါတိကဘာဝေါ ဒီပိတော. တေနာဟ – ‘‘သွာတနာယ ဘိက္ခံ နာမ နာဓိဝါသေတီ’’တိ. အထ ကသ္မာ အဓိဝါသေသီတိ အာဟ ‘‘မာတု အနုဂ္ဂဟေနာ’’တိအာဒိ. ပဏ္ဍိတာ ဟိ မာတာပိတူနံ အာစရိယုပဇ္ဈာယာနံ ဝါ ကာတဗ္ဗံ အနုဂ္ဂဟံ အဇ္ဈုပေက္ခိတွာ ဓုတင်္ဂသုဒ္ဓိကာ န ဘဝန္တိ. 'उक्कट्ठएकासनिकताया' (उत्कृष्ट एकासनिक होने से)—यह स्थविर के उस स्वभाव को दर्शाने के लिए केवल यथार्थ कथन है। कोमल (मृदु) एकासनिक के लिए भी, जिस आसन पर बैठकर थोड़ा भी भोजन किया गया हो, व्रत के नियम से वहाँ से उठने के बाद पुनः भोजन करना उचित नहीं है। इसीलिए त्रिपिटक चुल अभय स्थविर ने कहा— "या तो आसन की रक्षा करे या भोजन की"। 'उक्कट्ठसपदानचारिक' वह है जो आगे या पीछे से लाए गए भिक्षा को स्वीकार न कर, बाहर द्वार पर खड़े होकर केवल पात्र में डाले गए को ही ग्रहण करता है। इससे स्थविर का उत्कृष्ट पिण्डपातिक होना सूचित होता है। इसीलिए कहा— "वह अगले दिन के लिए भिक्षा स्वीकार नहीं करते"। फिर क्यों स्वीकार किया? तो कहा— "माता के अनुग्रह के लिए" आदि। क्योंकि विद्वान लोग माता-पिता या आचार्य-उपाध्याय के प्रति किए जाने वाले अनुग्रह की उपेक्षा करके धुतंग-शुद्धि वाले नहीं होते। ၃၀၁. ပယုတ္တန္တိ ဝဒ္ဓိဝသေန ပယောဇိတံ, တဒ္ဓိတလောပံ ကတွာ ဝုတ္တန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ ယထာ အညတ္ထာပိ ‘‘ပိတာမဟံ ဓနံ လဒ္ဓါ, သုခံ ဇီဝတိ သဉ္စယော’’တိ[Pg.143]. ဇေဋ္ဌကိတ္ထိယောတိ ပဓာနိတ္ထိယော. ဣတောတိ ဣမသ္မိံ ကုလေ အနုဘဝိတဗ္ဗဝိဘဝသမ္ပတ္တိတော. အညတောတိ ဣမဿ ဒိန္နတ္တာ အညသ္မိံ ကုလေ အနုဘဝိတဗ္ဗသမ္ပတ္တိတော. ३०१. 'पयुत्तं' का अर्थ है ब्याज (वृद्धि) के लिए लगाया गया; यह तद्धित प्रत्यय का लोप करके कहा गया समझना चाहिए, जैसे अन्यत्र भी— "पितामह के धन को प्राप्त कर, संचय सुखपूर्वक जीता है"। 'जेट्ठकित्थियो' का अर्थ है प्रधान स्त्रियाँ। 'इतो' का अर्थ है इस कुल में अनुभव की जाने वाली विभव-सम्पत्ति से। 'अञ्ञतो' का अर्थ है इसे दिए जाने के कारण दूसरे कुल में अनुभव की जाने वाली सम्पत्ति से। ၃၀၂. စိတ္တဝိစိတ္တန္တိ ကပ္ပနာယ စေဝ အရဟရူပေန အလင်္ကာရာဒိနာ စ စိတ္တိတဉ္စေဝ ဝိစိတ္တိတဉ္စ. ဝဏကာယန္တိ ဝဏဘူတံ ကာယံ. သမန္တတော ဥဿိတန္တိ ဟေဋ္ဌိမကာယဝသေန ဟေဋ္ဌာ ဥပရိ စ သန္နိဿိတံ. နိစ္စာတုရန္တိ အဘိဏှပ္ပဋိပီဠိတံ, သဒါ ဒုက္ခိတံ ဝါ. ဗဟုသင်္ကပ္ပန္တိ ရာဂဝတ္ထုဘာဝေန အဘိဇနေဟိ ဟာဝဘာဝဝိလာသဝသေန, အာမိသဝသေန စ သောဏသိင်္ဂါလာဒီဟိ ဗဟူဟိ သင်္ကပ္ပေတဗ္ဗံ. ဌိတီတိ အဝဋ္ဌာနံ အဝိပရိဏာမော နတ္ထိ. တေနာဟ – ‘‘ဘိဇ္ဇနဓမ္မတာဝ နိယတာ’’တိ, ပရိဿဝဘာဝါပတ္တိ စေဝ ဝိနာသပတ္တိ စ ဧကန္တိကာတိ အတ္ထော. ३०२. 'चित्तविचित्तं' का अर्थ है कल्पना के द्वारा और योग्य रूप में अलंकारों आदि के द्वारा चित्रित और विचित्रित। 'वणकायं' का अर्थ है घाव रूप शरीर। 'समन्ततो उस्सितं' का अर्थ है नीचे के शरीर के कारण नीचे और ऊपर आश्रित। 'निच्चातुरं' का अर्थ है निरंतर पीड़ित या सदा दुखी। 'बहुसङ्कप्पं' का अर्थ है राग का विषय होने के कारण लोगों द्वारा हाव-भाव और विलास के वश में, तथा मांस (आमिष) के कारण कुत्तों-सियारों आदि बहुतों द्वारा संकल्प (इच्छा) किया जाने योग्य। 'ठिति' का अर्थ है स्थिरता या अपरिवर्तनशीलता नहीं है। इसीलिए कहा— "भंग होने का स्वभाव ही निश्चित है", अर्थात् स्राव होना और विनाश होना एकांतिक (निश्चित) है। စိတ္တကတမ္ပီတိ ဂန္ဓာဒီဟိ စိတ္တကတမ္ပိ. ရူပန္တိ သရီရံ. 'चित्तकतम्पि' का अर्थ है गंध आदि के द्वारा सजाया हुआ भी। 'रूपं' का अर्थ है शरीर। အလတ္တကကတာတိ ပိဏ္ဍိအလတ္တကေန သုဝဏ္ဏကတာ. တေနာဟ ‘‘အလတ္တကေန ရဉ္ဇိတာ’’တိ. စုဏ္ဏကမက္ခိတန္တိ ဒေါသနီဟရဏေဟိ တာပဒဟနာဒီဟိ ကတာဘိသင်္ခါရမုခံ ဂေါရောစနာဒီဟိ ဩဘာသနကစုဏ္ဏေဟိ မက္ခိတံ, တေနာဟ ‘‘သာသပကက္ကေနာ’’တိအာဒိ. 'अलत्तककता' का अर्थ है पिंडी-अलक्तक (महावर) से सुंदर बनाया गया। इसीलिए कहा— "अलक्तक से रंजित"। 'चुण्णकमक्खितं' का अर्थ है दोषों को दूर करने वाले ताप-दहन आदि के द्वारा किए गए संस्कार के मुख पर गोरोचन आदि चमकाने वाले चूर्णों से लिप्त; इसीलिए कहा— "सरसों के कल्क (लेप) से" आदि। ရသောဒကေနာတိ သရလနိယျာသရသမိဿေန ဥဒကေန. အာဝတ္တနပရိဝတ္တေ ကတွာတိ အာဝတ္တနပရိဝတ္တနဝသေန နတေ ကတွာ. အဋ္ဌပဒကရစနာယာတိ ဘိတ္တိကူဋဒ္ဓစန္ဒာဒိဝိဘာဂါယ အဋ္ဌပဒကရစနာယ. 'रसोदकेन' का अर्थ है सरल (चीड़) के निर्यास (गोंद) के रस से मिश्रित जल से। 'आवत्तनपरिवत्ते कत्वा' का अर्थ है घुमाने और पलटने के कारण झुका हुआ करके। 'अट्ठपदकरचनाय' का अर्थ है दीवार, शिखर, अर्धचन्द्र आदि के विभाग वाली अष्टपद (शतरंज के बोर्ड जैसी) रचना से। ဝိရဝမာနေတိ ‘‘အယံ ပလာယတိ, ဂဏှ ဂဏှာ’’တိ ဝိရဝမာနေ. ဟိရညသုဝဏ္ဏဩရောဓေတိ ဝတ္တဗ္ဗံ. 'विरवमाने' का अर्थ है "यह भाग रहा है, पकड़ो पकड़ो" इस प्रकार चिल्लाते हुए। 'हिरञ्ञसुवण्णओरोधे' ऐसा कहना चाहिए। ၃၀၃. ဥဿိတာယ ဥဿိတာယာတိ ကုလဝိဘဝဗာဟုသစ္စပညာသမ္ပတ္တိယာ ဥဂ္ဂတာယ ဥဂ္ဂတာယ. အဘိလက္ခိတော ဥဠာရဘာဝေန. ३०३. 'उस्सिताय उस्सिताय' का अर्थ है कुल, विभव (सम्पत्ति), बहुश्रुतता और प्रज्ञा की सम्मपत्ति से उन्नत-उन्नत। उदार भाव से अभिलक्षित। ၃၀၄. ပရိဇုညာနီတိ ပရိဟာနာနိ. ယေ ဗျာဓိနာ အဘိဘူတာ သတ္တာ ဇိဏ္ဏကပ္ပာ ဝယောဟာနိသတ္တာ ဝိယ ဟောန္တိ, တတော နိဝတ္တေန္တော ‘‘ဇရာဇိဏ္ဏော’’တိ အာဟ. ဝယောဝုဍ္ဎော, န သီလာဒိဝုဍ္ဎော. မဟတ္တံ လာတိ ဂဏှာတီတိ မဟလ္လကော, ဇာတိယာ မဟလ္လကော, န ဝိဘဝါဒိနာတိ ဇာတိမဟလ္လကော[Pg.144]. ဒွတ္တိရာဇပရိဝတ္တသင်္ခါတံ အဒ္ဓါနံ ကာလံ ဂတော ဝီတိဝတ္တောတိ အဒ္ဓဂတော. တထာ စ ပဌမဝယံ မဇ္ဈိမဝယဉ္စ အတီတော ဟောတီတိ အာဟ ‘‘အဒ္ဓါနံ အတိက္ကန္တော’’တိ. ဇိဏ္ဏာဒိပဒေဟိ ပဌမဝယမဇ္ဈိမဝယဿ ဗောဓိတတ္တာ အနုပ္ပတ္တတာဝိသိဋ္ဌော ဝယ-သဒ္ဒေါ ဩသာနဝယဝိသယောတိ အာဟ ‘‘ပစ္ဆိမဝယံ အနုပ္ပတ္တော’’တိ. ३०४. 'परिजुञ्ञानि' का अर्थ है हानियाँ। जो प्राणी व्याधि से अभिभूत होकर जीर्ण के समान आयु की हानि वाले प्राणियों जैसे होते हैं, उनसे अलग करने के लिए "जराजीर्ण" कहा। आयु से वृद्ध, न कि शील आदि से वृद्ध। जो महत्ता को प्राप्त करता है वह 'महल्लक' है; जन्म से वृद्ध, न कि विभव आदि से, इसलिए 'जातिमहल्लक'। दो-तीन राजाओं के परिवर्तन रूपी लम्बे समय को पार कर गया, वह 'अद्धगतो' है। और वैसे ही प्रथम अवस्था और मध्यम अवस्था को पार कर चुका होता है, इसलिए कहा— "अध्वानं अतिक्कन्तो" (मार्ग/समय को पार किया हुआ)। 'जीर्ण' आदि पदों से प्रथम और मध्यम अवस्था का बोध होने के कारण, 'अनुप्पत्त' (प्राप्त) शब्द से विशिष्ट 'वय' शब्द अंतिम अवस्था के विषय में है, इसलिए कहा— "पश्चिम वय (अंतिम अवस्था) को प्राप्त"। ‘‘အပ္ပိစ္ဆော, အပ္ပဍံသမကသဝါတာတပသရီသပသမ္ဖဿော’’တိ (အ. နိ. ၁၀.၁၁) ဧဝမာဒီသု ဝိယ အပ္ပ-သဒ္ဒေါ အဘာဝတ္ထောတိ အဓိပ္ပာယေနာဟ ‘‘အပ္ပာဗာဓောတိ အရောဂေါ, အပ္ပာတင်္ကောတိ နိဒ္ဒုက္ခော’’တိ. အပ္ပတ္ထော ဝါ ဣဓ, တတ္ထာပိ အပ္ပ-သဒ္ဒေါ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ဧဝဉှိ ‘‘ယော ဟိ, ဂဟပတိ, ဣမံ ပူတိကာယံ ပရိဟရန္တော မုဟုတ္တမ္ပိ အာရောဂျံ ပဋိဇာနေယျ ကိမညတြ ဗာလျာ’’တိ (သံ. နိ. ၃.၁) သုတ္တပဒံ သမတ္ထိတံ ဟောတိ. ဝိပစ္စနံ ဝိပါကော, သော ဧဝ ဝေပါကော. သမော ဝေပါကော ဧတိဿာ အတ္ထီတိ သမဝေပါကိနီ, တာယ. တေနေဝ သမဝေပါကိနိဘာဝေန သဗ္ဗမ္ပိ သမ္မဒေဝ ဂဏှာတိ ဓာရေတီတိ ဂဟဏီ. ဂဟဏိသမ္ပတ္တိယာ ဟိ ယထာဘုတ္တအာဟာရော သမ္မဒေဝ ဇီရန္တော သရီရေ တိဋ္ဌတိ, နော အညထာ ဘုတ္တဘုတ္တော အာဟာရော ဇီရတိ ဂဟဏိယာ တိက္ခဘာဝေန. တထေဝ တိဋ္ဌတီတိ ဘုတ္တာကာရေနေဝ တိဋ္ဌတိ ဂဟဏိယာ မန္ဒဘာဝတော. ဘတ္တစ္ဆန္ဒော ဥပ္ပဇ္ဇတေဝ ဘုတ္တအာဟာရဿ သမ္မာ ပရိဏာမံ ဂတတ္တာ. တေနေဝါတိ သမဝေပါကိနိဘာဝေနေဝ. ပတ္တာနံ ဘောဂါနံ ပရိက္ခိယမာနံ န သဟသာ ဧကဇ္ဈံယေဝ ပရိက္ခယံ ဂစ္ဆန္တိ, အထ ခေါ အနုက္ကမေန, တထာ ဉာတယောပီတိ အာဟ ‘‘အနုပုဗ္ဗေနာ’’တိ. ဆာတကဘယာဒိနာတိ အာဒိ-သဒ္ဒေန ဗျာဓိဘယာဒိံ သင်္ဂဏှာတိ. "अल्पेच्छ, डंस-मच्छर-वायु-धूप-सरीसृप के स्पर्श से रहित" (अं. नि. 10.11) इत्यादि में 'अप्प' शब्द अभाव के अर्थ में है, इसी अभिप्राय से कहा गया है— "अप्पाबाधो (अल्प-बाधा) अर्थात् अरोग, अप्पातङ्को (अल्प-आतंक) अर्थात् दुःख-रहित"। अथवा यहाँ 'अल्प' अर्थ में भी 'अप्प' शब्द को देखा जाना चाहिए। इस प्रकार "हे गृहपति, जो इस दुर्गन्धित शरीर को धारण करते हुए क्षण भर के लिए भी आरोग्य का दावा करे, वह अज्ञानता के अतिरिक्त और क्या है" (सं. नि. 3.1) यह सूत्र-पद समर्थित होता है। 'विपच्चन' (पकना) ही 'विपाको' है, वही 'वेपाको' है। जिसका विपाक (पाचन) सम (समान) हो, वह 'समवेपाकिनी' है, उसके द्वारा। उसी समवेपाकिनी भाव के कारण जो सब कुछ भली-भांति ग्रहण करती है और धारण करती है, वह 'ग्रहणी' (पाचन शक्ति) है। ग्रहणी की पूर्णता से खाया हुआ आहार भली-भांति पचता हुआ शरीर में ठहरता है, अन्यथा ग्रहणी की तीक्ष्णता के कारण खाया हुआ आहार (शीघ्र) पच जाता है। 'तथैव तिष्ठति' का अर्थ है कि ग्रहणी की मन्दता के कारण खाए हुए रूप में ही बना रहता है। खाए हुए आहार के भली-भांति परिणत (पच) जाने के कारण भोजन की इच्छा (भत्तच्छन्द) उत्पन्न होती ही है। 'तेनेव' का अर्थ है उसी समवेपाकिनी भाव से ही। प्राप्त भोगों के क्षीण होने पर वे अचानक एक साथ ही क्षय को प्राप्त नहीं होते, बल्कि अनुक्रम से होते हैं, वैसे ही ज्ञाति (सम्बन्धी) भी, इसीलिए कहा— "अनुपुब्बेन" (क्रमशः)। 'छात्तकभयादिना' में 'आदि' शब्द से व्याधि-भय आदि का संग्रह होता है। ၃၀၅. ဥဒ္ဒေသသီသေန နိဒ္ဒေသော ဂဟိတောတိ အာဟ ‘‘ဓမ္မနိဒ္ဒေသာ ဥဒ္ဒိဋ္ဌာ’’တိ. ယသ္မာ ဝါ ယေ ဓမ္မာ ဥဒ္ဒိသိတဗ္ဗဋ္ဌေန ‘‘ဥဒ္ဒေသာ’’တိ ဝုစ္စန္တိ. တေဝ ဓမ္မာ နိဒ္ဒိသိတဗ္ဗဋ္ဌေန နိဒ္ဒေသာတိ ‘‘ဓမ္မနိဒ္ဒေသာ ဥဒ္ဒိဋ္ဌာ’’တိ အတ္ထော ဝုတ္တော. အထ ဝါ ယေ ဓမ္မာ အနိစ္စတာဒိဝိဘာဝနဝသေန ဥဒ္ဓံ ဥဒ္ဓံ ဒေသေဿန္တိ, တေ ဓမ္မာ တထေဝ နိဿေသတော ဒေသေဿန္တီတိ ဧဝံ ဥဒ္ဒေသနိဒ္ဒေသပဒါနံ အနတ္ထန္တရတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. တတ္ထာတိ ဇရာမရဏသန္တိကေ. အဒ္ဓုဝေါတိ နိဒ္ဓုဝေါ န ထိရော, အနိစ္စောတိ အတ္ထော. တေနာဟ ‘‘ဓုဝဋ္ဌာနဝိရဟိတော’’တိ, အဇာတာဘူတာသင်္ခတဓုဝဘာဝကာရဏဝိဝိတ္တောတိ အတ္ထော. ဥပနီယျတီတိ ဝါ [Pg.145] ဇရာမရဏေန လောကော သမ္မာ နီယတိ, တသ္မာ အဒ္ဓုဝေါတိ ဧဝမေတ္ထ အတ္ထော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. တာယိတုန္တိ ဇာတိအာဒိဗျသနတော ရက္ခိတုံ သမတ္ထေန ဣဿရေန အတ္တနာ ဝိရဟိတောတိ. ‘‘ဣမံ လောကံ ဣတော ဝဋ္ဋဒုက္ခတော မောစေဿာမိ, ဇရာဗျာဓိမရဏာနံ တံ အဓိဘဝိတုံ န ဒဿာမီ’’တိ ဧဝံ အဘိသရတီတိ အဘိဿရဏံ, လောကဿ သုခဿ ဒါတာ ဟိတဿ ဝိဓာတာ ကောစိ ဣဿရော, တဒဘာဝတော အာဟ ‘‘အနဘိဿရောတိ အသရဏော’’တိ. နိဿကော မမာယိတဗ္ဗဝတ္ထုအဘာဝတော, တေနာဟ ‘‘သကဘဏ္ဍဝိရဟိတော’’တိအာဒိ. တဏှာယ ဝသေ ဇာတော တဏှာယ ဝိဇိတောတိ ကတွာ ‘‘တဏှာယ ဒါသော’’တိ ဝုတ္တံ. ३०५. 'उद्देश' (संक्षेप) के शीर्षक से 'निर्देश' (विस्तार) ग्रहण किया गया है, इसलिए कहा— "धम्मनिद्देसा उद्दिट्ठा" (धर्म-निर्देश निर्दिष्ट किए गए)। अथवा जिन धर्मों को संक्षेप में कहे जाने के कारण 'उद्देश' कहा जाता है, उन्हीं धर्मों को विस्तार से कहे जाने के कारण 'निर्देश' कहा गया है, यही "धम्मनिद्देसा उद्दिट्ठा" का अर्थ है। अथवा जिन धर्मों का अनित्यता आदि की व्याख्या के वश ऊपर-ऊपर उपदेश किया जाएगा, उन्हीं धर्मों का उसी प्रकार पूर्णतः उपदेश किया जाएगा, इस प्रकार 'उद्देश' और 'निर्देश' पदों की अभिन्नता समझनी चाहिए। 'तत्थ' का अर्थ है जरा-मरण के समीप। 'अद्धुवो' का अर्थ है अस्थिर, न स्थिर, अर्थात् अनित्य। इसीलिए कहा— "ध्रुव स्थान से रहित", अर्थात् अजात, अभूत, असंस्कृत ध्रुव भाव के कारण से रहित। अथवा 'उपनीयति' का अर्थ है कि जरा-मरण के द्वारा लोक को भली-भांति ले जाया जाता है, इसलिए वह 'अद्धुवो' (अध्रुव) है, ऐसा यहाँ अर्थ देखना चाहिए। 'तायितुं' का अर्थ है जाति आदि व्यसनों से रक्षा करने में समर्थ ईश्वर या स्वयं से रहित। "मैं इस लोक को इस वट-दुःख (संसार दुःख) से मुक्त करूँगा, इसे जरा-व्याधि-मरण के वश में नहीं होने दूँगा"—इस प्रकार जो रक्षा के लिए आता है वह 'अभिसरण' है, लोक को सुख देने वाला और हित करने वाला कोई ईश्वर; उसके अभाव के कारण कहा— "अनभिस्सरो अर्थात् अशरण"। 'निस्सको' का अर्थ है ममता करने योग्य वस्तु के अभाव के कारण, इसीलिए कहा— "स्वकीय वस्तु से रहित" इत्यादि। तृष्णा के वश में उत्पन्न होने और तृष्णा द्वारा विजित होने के कारण "तृष्णा का दास" कहा गया है। ၃၀၆. ဟတ္ထိဝိသယတ္တာ ဟတ္ထိသန္နိဿိတတ္တာ ဝါ ဟတ္ထိသိပ္ပံ ‘‘ဟတ္ထီ’’တိ ဂဟိတန္တိ အာဟ – ‘‘ဟတ္ထိသ္မိန္တိ ဟတ္ထိသိပ္ပေ’’တိ, သေသပဒေသုပိ ဧသေဝ နယော. သာတိသယံ ဦရုဗလံ ဧတဿ အတ္ထီတိ ဦရုဗလီတိ အာဟ – ‘‘ဦရုဗလသမ္ပန္နော’’တိ, တမေဝတ္ထံ ပါကဋံ ကတွာ ဒဿေတုံ ‘‘ယဿ ဟီ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. အဘိန္နံ ပရသေနံ ဘိန္ဒတော ဘိန္နံ သကသေနံ သန္ဓာရယတော ဥပတ္ထမ္ဘယတော. ဗာဟုဗလီတိ ဧတ္ထာပိ ‘‘ယဿ ဟိ ဖလကဉ္စ အာဝုဓဉ္စ ဂဟေတွာ’’တိအာဒိနာ အတ္ထော ဝတ္တဗ္ဗော, ဣဓ ပန ပရဟတ္ထဂတံ ရဇ္ဇံ အာဟရိတုံ ဗာဟုဗလန္တိ ယောဇနာ. ယထာ ဟိ ‘‘ဦရုဗလီ’’တိ ဧတ္ထာပိ ဗာဟုဗလံ အနာမသိတွာ အတ္ထော, ဧဝံ ‘‘ဗာဟုဗလီ’’တိ ဧတ္ထ ဦရုဗလံ အနာမသိတွာ အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော, အာဟိတော အဟံမာနော ဧတ္ထာတိ အတ္တာ, အတ္တဘာဝေါ. အလံ သမတ္ထော အတ္တာ ဧတဿာတိ အလမတ္ထောတိ အာဟ ‘‘သမတ္ထအတ္တဘာဝေါ’’တိ. ३०६. हाथी के विषय होने के कारण या हाथी पर आश्रित होने के कारण हाथी-शिल्प (हस्ति-विद्या) को 'हत्थी' के रूप में ग्रहण किया गया है, इसलिए कहा— "हत्थिस्मिं अर्थात् हस्ति-शिल्प में", शेष पदों में भी यही न्याय है। जिसके पास अतिशय जंघा-बल (ऊरु-बल) हो वह 'ऊरुबली' है, इसलिए कहा— "ऊरुबल-सम्पन्न", उसी अर्थ को स्पष्ट करने के लिए "यस्स हि" इत्यादि कहा गया है। जो शत्रु की अखण्ड सेना को छिन्न-भिन्न कर देता है और अपनी छिन्न-भिन्न सेना को संगठित और सहारा देता है। 'बाहुबली' यहाँ भी "जिसके द्वारा ढाल और शस्त्र ग्रहण करके" इत्यादि अर्थ कहना चाहिए, किन्तु यहाँ दूसरे के हाथ में गए राज्य को वापस लाने के लिए 'बाहुबल' का प्रयोग है। जैसे 'ऊरुबली' में बाहुबल का उल्लेख किए बिना अर्थ है, वैसे ही 'बाहुबली' में ऊरुबल का उल्लेख किए बिना अर्थ समझना चाहिए। जिसमें 'अहंकार' (मैं-पन) स्थापित है वह 'अत्ता' (आत्मा) अर्थात् आत्मभाव है। जिसके लिए आत्मा पर्याप्त या समर्थ है वह 'अलमत्थो' है, इसलिए कहा— "समर्थ आत्मभाव वाला"। ပရိယောဓာယာတိ ဝါ ပရိတော အာရက္ခံ ဩဒဟိတွာ. ‘‘သံဝိဇ္ဇန္တေ ခေါ, ဘော ရဋ္ဌပါလ, ဣမသ္မိံ ရာဇကုလေ ဟတ္ထိကာယာပိ…ပေ… ဝတ္တိဿန္တီ’’တိ ဣဒမ္ပိ သော ရာဇာ ဥပရိ ဓမ္မုဒ္ဒေသဿ ကာရဏံ အာဟရန္တော အာဟ. 'परियोधाय' का अर्थ है चारों ओर रक्षा (घेरा) स्थापित करके। "हे राष्ट्रपाल, इस राजकुल में हाथी-सेना भी विद्यमान है...पे... प्रवृत्त होंगे"—यह भी वह राजा ऊपर कहे गए धर्म-उद्देश के कारण को प्रस्तुत करते हुए कहता है। ဝုတ္တဿေဝ အနု ပစ္ဆာ ဂါယနဝသေန ကထနံ အနုဂီတိ. တာ ပန ဂါထာ ဓမ္မုဒ္ဒေသာနံ ဒေသနာနုပုဗ္ဗိံ အနာဒိယိတွာပိ ယထာရဟံ သင်္ဂဏှနဝသေန အနုဂီတာတိ အာဟ ‘‘စတုန္နံ ဓမ္မုဒ္ဒေသာနံ အနုဂီတိ’’န္တိ. कहे हुए के ही पीछे (अनु) गायन के रूप में कथन करना 'अनुगीति' है। वे गाथाएँ धर्म-उद्देशों के उपदेश-क्रम का अनुसरण न करते हुए भी यथायोग्य संग्रह करने के कारण 'अनुगीति' हैं, इसीलिए कहा— "चार धर्म-उद्देशों की अनुगीति"। ၃၀၇. ဧကန္တိ ဧကဇာတိယံ. ဝတ္ထုကာမကိလေသကာမာ ဝိသယဘေဒေန ဘိန္ဒိတွာ တထာ ဝုတ္တာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ३०७. 'एकं' का अर्थ है एक ही प्रकार का। वस्तु-काम और क्लेश-काम को विषय-भेद से विभाजित करके वैसा कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। သာဂရန္တေနာတိ [Pg.146] သာဂရပရိယန္တေန. 'सागरन्तेन' का अर्थ है सागर की सीमा तक (सागर-पर्यन्त)। အဟော ဝတာတိ သောစနေ နိပါတော, ‘‘အဟော ဝတ ပါပံ ကတံ မယာ’’တိအာဒီသု ဝိယ. အမရာတိအာဒီသု အာဟူတိ ကထေန္တိ. မတံ ဥဒ္ဒိဿ ‘‘အမှ’’န္တိ ဝတ္တဗ္ဗေ သောကဝသေန ‘‘အမရ’’န္တိ ဝုစ္စတိ. 'अहो वत' शोक के अर्थ में निपात है, जैसे "अहो वत! मैंने पाप किया" इत्यादि में। 'अमरा' इत्यादि में 'आहू' का अर्थ है कहते हैं। मृतक के उद्देश्य से 'अम्ह' (हमारा) कहना चाहिए, किन्तु शोक के कारण 'अमर' कहा जाता है। ဝေါသာနန္တိ နိဋ္ဌံ, ပရိယောသာနန္တိ အတ္ထော. သာဝါတိ ပညာ ဧဝ. ဓနတောတိ သဗ္ဗဓနတော. ဥတ္တမတရာ သေဋ္ဌာ, တေနေဝါဟ ‘‘ပညာဇီဝိံ ဇီဝိတမာဟု သေဋ္ဌ’’န္တိ (သံ. နိ. ၁.၂၄၆; သု. နိ. ၁၈၄). 'वोसानं' का अर्थ है निष्ठा (समाप्ति) या पर्यवसान। 'सा' का अर्थ प्रज्ञा ही है। 'धनतो' का अर्थ सब धनों से है। 'उत्तमतर' का अर्थ श्रेष्ठ है, इसीलिए कहा— "प्रज्ञा से जीने वाले के जीवन को श्रेष्ठ कहा गया है" (सं. नि. 1.246; सु. नि. 184)। တေသု ပါပံ ကရောန္တေသု သတ္တေသု, နိဒ္ဓါရဏေ စေတံ ဘုမ္မဝစနံ. ပရမ္ပရာယာတိ အတ္တဘာဝပရမ္ပရာယ. သံသာရံ အာပဇ္ဇိတွာတိ ဘဝါဒီသု သံသာရဿ အာပဇ္ဇနဟေတုံ အာပဇ္ဇန္တော ပရလောကံ ဥပေတိ, ပရလောကံ ဥပေန္တောဝ ဗဟုဝိဓဒုက္ခသင်္ခါတံ ဂဗ္ဘဉ္စ ဥပေတိ. တာဒိသဿာတိ တထာရူပဿ ဂဗ္ဘဝါသဒုက္ခာဒီနံ အဓိဋ္ဌာနဘူတဿ အပ္ပပညဿ အညော အပ္ပပညော စ အဘိသဒ္ဒဟန္တော ဟိတသုခါဝဟန္တိ ပတ္တိယာယန္တော. उन पाप करने वाले सत्त्वों में, यह 'तेसु' (उनमें) निर्धारण के अर्थ में सप्तमी विभक्ति है। 'परम्पराय' का अर्थ है आत्मभाव (जन्म) की परम्परा से। 'संसारं आपज्जित्वा' का अर्थ है भव आदि में संसार की प्राप्ति के हेतु को प्राप्त करते हुए परलोक को प्राप्त होता है, और परलोक को प्राप्त होते हुए ही अनेक प्रकार के दुखों से युक्त गर्भ को प्राप्त होता है। 'तादिसस्स' का अर्थ है उस प्रकार के गर्भवास के दुखों आदि के अधिष्ठान स्वरूप अल्पप्रज्ञ (कम बुद्धि वाले) का, और दूसरा अल्पप्रज्ञ उस पर श्रद्धा करते हुए उसे हित और सुख पहुँचाने वाला मान लेता है। ‘‘ပါပဓမ္မော’’တိ ဝုတ္တတ္တာ တာဒိသဿ ပရလောကော နာမ ဒုဂ္ဂတိ ဧဝါတိ အာဟ ‘‘ပရမှိ အပါယလောကေ’’တိ. 'पापधम्मो' (पापधर्मी) कहे जाने के कारण, उस प्रकार के व्यक्ति के लिए परलोक निश्चित रूप से दुर्गति ही है, इसीलिए 'परम्हि अपायलोके' (परलोक के अपाय जगत में) कहा गया है। ဝိဝိဓရူပေနာတိ ရူပသဒ္ဒါဒိဝသေန တတ္ထပိ ပဏီတတရာဒိဝသေန ဗဟုဝိဓရူပေန. 'विविधरूपेन' का अर्थ है रूप, शब्द आदि के वश से और वहाँ भी श्रेष्ठतर आदि के वश से अनेक प्रकार के रूपों से। သာမညမေဝါတိ သမဏဘာဝေါ ဧဝ သေယျော. ဧတ္ထ စ အာဒိတော ဒွီဟိ ဂါထာဟိ စတုတ္ထော ဓမ္မုဒ္ဒေသော အနုဂီတော. စတုတ္ထဂါထာယ တတိယော. ပဉ္စမဂါထာယ ဒုတိယော. ဆဋ္ဌဂါထာယ ဒုတိယတတိယာ. သတ္တမဂါထာယ ပဌမော ဓမ္မုဒ္ဒေသော အနုဂီတော, အဋ္ဌမာဒီဟိ ပဝတ္တိနိဝတ္တီသု ကာမေသု နေက္ခမ္မေ စ ယထာရဟံ အာဒီနဝါနိသံသံ ဝိဘာဝေတွာ အတ္တနော ပဗ္ဗဇ္ဇကာရဏံ ပရမတော ဒဿေန္တော ယထာဝုတ္တဓမ္မုဒ္ဒေသံ နိဂမေတိ, တေန ဝုတ္တံ ‘‘တာ ပန ဂါထာ ဓမ္မုဒ္ဒေသာနံ ဒေသနာနုပုဗ္ဗိံ အနာဒိယိတွာပိ ယထာရဟံ သင်္ဂဏှနဝသေန အနုဂီတာ’’တိ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. 'सामञ्ञमेव' का अर्थ है श्रमणभाव ही श्रेष्ठ है। यहाँ आरम्भ की दो गाथाओं से चतुर्थ धम्मुद्देस (धर्म-उद्देश) का अनुगायन किया गया है। चौथी गाथा से तीसरा, पाँचवीं गाथा से दूसरा, छठी गाथा से दूसरे और तीसरे, तथा सातवीं गाथा से प्रथम धम्मुद्देस का अनुगायन किया गया है। आठवीं आदि गाथाओं से प्रवृत्ति और निवृत्ति में, कामभोगों और नैष्क्रम्य (संन्यास) में यथाशक्ति दोषों और लाभों का विवेचन कर, अपने प्रव्रज्या के कारण को श्रेष्ठता से दिखाते हुए, पूर्वोक्त धम्मुद्देस का उपसंहार करते हैं। इसीलिए कहा गया है— 'वे गाथाएँ धम्मुद्देसों के देशना-क्रम का अनुसरण न करते हुए भी यथायोग्य संग्रह के वश से अनुगीत हैं।' शेष स्पष्ट ही है। ရဋ္ဌပါလသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. रट्ठपाल सुत्त की वर्णना की लीनत्थप्पकासना (गूढ़ार्थ प्रकाशिनी टीका) समाप्त हुई। ၃. မဃဒေဝသုတ္တဝဏ္ဏနာ ३. मघदेव सुत्त की वर्णना। ၃၀၈. ပုဗ္ဗေ [Pg.147] မဃဒေဝေါ နာမ ရာဇာတိ အတီတကာလေ ဣမသ္မိံယေဝ ကပ္ပေ အနေကဝဿသဟဿာယုကေသု မနုဿေသု ပဋိပါဋိယာ ဥပ္ပန္နာနံ စတုရာသီတိသဟဿာနံ စက္ကဝတ္တိရာဇူနံ အာဒိပုရိသော မဃဒေဝေါတိ ဧဝံနာမော ရာဇာ. ३०८. 'पुब्बे मघदेवो नाम राजा' का अर्थ है— अतीत काल में इसी कल्प में, अनेक सहस्र वर्षों की आयु वाले मनुष्यों के बीच, क्रम से उत्पन्न हुए चौरासी हजार चक्रवर्ती राजाओं के आदि पुरुष (प्रथम पुरुष) मघदेव नामक राजा थे। ဓမ္မောတိ ရာဇဓမ္မောတိ လောကိကာ ဝဒန္တိ. မဟာဗောဓိနိဓာနပါရမိတာသင်္ခါတော ပန ဓမ္မော အတ္ထီတိ ဓမ္မိကော. ဓမ္မေနာတိ ဉာယေန. တဒါ ဗြဟ္မဝိဟာရာဒိဘာဝနာဓမ္မဿ ရညော အနဓိဂတတ္တာ တဿပိ ဝါ အနဘိဇ္ဈာဒီဟိ သမာနယောဂက္ခမတ္တာ ဝုတ္တံ ‘‘ဒသကုသလကမ္မပထေ ဌိတော’’တိ. ဓမ္မန္တိ ဓမ္မတော အနပေတံ. တထာ ဟိ စ သော ပက္ခပါတာဘာဝတော ‘‘သမော’’တိ ဝုစ္စတီတိ အာဟ ‘‘သမံ စရတီ’’တိ. ပကတိနိယာမေနေဝါတိ ပဝေဏိယာ အာဂတနိယာမေနေဝ. ယသ္မာ နိဂမဇနပဒေသု ယေဘုယျေန ဂဟပတီနံ သင်္ဂဟော, တသ္မာ အဋ္ဌကထာယံ ‘‘ဂဟပတိကာန’’န္တွေဝ ဝုတ္တံ. ပါဠိယံ ပန အညမေဝ နာဂရစာရိတ္တံ, အညံ နေဂမဇနပဒစာရိတ္တန္တိ တေ ဝိသုံ ဂဟိတာ ‘‘နေဂမေသု စေဝ ဇနပဒေသု စာ’’တိ. ပစ္စုဂ္ဂမနနိဂ္ဂမနဝသေန ဥပေါသထဿ ပဋိဟရဏံ ပါဋိဟာရိယော, သော ဧဝ ပါဋိဟာရိကော, ပက္ခော. ဣမေ ဒိဝသာတိ ဣမေ စတ္တာရော ဒိဝသာ. 'धम्मो' को लौकिक लोग 'राजधर्म' कहते हैं। किन्तु महाबोधि के संचय और पारमिताओं के रूप में जो धर्म है, उससे युक्त होने के कारण वह 'धम्मिको' (धार्मिक) है। 'धम्मेन' का अर्थ है न्याय से। उस समय राजा द्वारा ब्रह्मविहार आदि भावना रूपी धर्म को प्राप्त न करने के कारण, अथवा अनभिध्या (लोभ-रहित) आदि के समान होने के कारण 'दसकुसलकम्मपथे ठितो' (दस कुशल कर्मपथों में स्थित) कहा गया है। 'धम्मं' का अर्थ है धर्म से च्युत न होना। क्योंकि वह पक्षपात के अभाव के कारण 'समो' (समान/निष्पक्ष) कहा जाता है, इसलिए 'समं चरति' (समान आचरण करता है) कहा गया है। 'पकतिनियामेनेव' का अर्थ है परम्परा से आए हुए नियम के अनुसार ही। चूँकि निगमों और जनपदों में प्रायः गृहपतियों का ही संग्रह होता है, इसलिए अट्ठकथा में 'गहपतिकानं' ही कहा गया है। किन्तु पालि में नगर का आचरण अलग है और निगम-जनपद का आचरण अलग, इसलिए उन्हें 'नेगमेसु चेव जनपदेसु च' (निगमों और जनपदों में) के रूप में अलग-अलग ग्रहण किया गया है। प्रत्युद्गमन (अगवानी) और निर्गमन के वश से उपोसथ का पालन करना 'पाटिहारियो' है, वही 'पाटिहारिको' (प्रातिहारिक) पक्ष है। 'इमे दिवसा' का अर्थ है ये चार दिन। ၃၀၉. ဒေဝေါတိ မစ္စု အဘိဘဝနဋ္ဌေန. ယထာ ဟိ ဒေဝေါ ပကတိသတ္တေ အဘိဘဝတိ, ဧဝံ မစ္စု သတ္တေ အဘိဘဝတိ. ‘‘အဟံ အသုကံ မဒ္ဒိတုံ အာဂမိဿာမိ, တွံ တဿ ကေသေ ဂဟေတွာ မာ ဝိဿဇ္ဇေဟီ’’တိ မစ္စုဒေဝဿ အာဏာကရာ ဒူတာ ဝိယာတိ ဒူတာတိ ဝုစ္စန္တိ. အလင်္ကတပဋိယတ္တာယာတိ ဣဒံ အတ္တနော ဒိဗ္ဗာနုဘာဝံ အာဝိကတွာ ဌိတာယာတိ ဒဿေတုံ ဝုတ္တံ. ဒေဝတာဗျာကရဏသဒိသမေဝ ဟောတိ န စိရေနေဝ မရဏသမ္ဘဝတော. ဝိသုဒ္ဓိဒေဝါနန္တိ ခီဏာသဝဗြဟ္မာနံ. တေ ဟိ စရိမဘဝေ ဗောဓိသတ္တာနံ ဇိဏ္ဏာဒိကေ ဒဿေန္တိ. ३०९. अभिभूत करने (दबाने) के अर्थ में 'देवो' का अर्थ मृत्यु है। जैसे देव सामान्य प्राणियों को अभिभूत कर देता है, वैसे ही मृत्यु प्राणियों को अभिभूत कर देती है। 'मैं अमुक को कुचलने आऊँगा, तुम उसके बाल पकड़ लो और छोड़ना मत'—इस प्रकार मृत्यु-देव की आज्ञा मानने वाले दूतों के समान होने के कारण उन्हें 'दूता' (दूत) कहा जाता है। 'अलङ्कतपटियत्ताय' यह अपने दिव्य प्रभाव को प्रकट कर खड़ी हुई (देवता) को दिखाने के लिए कहा गया है। यह देवता की भविष्यवाणी के समान ही होता है क्योंकि इसके शीघ्र बाद ही मृत्यु की संभावना होती है। 'विसुद्धिदेवानं' का अर्थ है क्षीणासव (अर्हत्) ब्रह्मा। वे ही अन्तिम जन्म वाले बोधिसत्त्वों को वृद्ध आदि (निमित्त) दिखाते हैं। ဒုခိတဉ္စ ဗျာဓိတန္တိ ဗျာဓိဘာဝေန သဉ္ဇာတဒုက္ခန္တိ အတ္ထော. အန္တိမဘဝိကဗောဓိသတ္တာနံ ဝိသုဒ္ဓိဒေဝေဟိ ဥပဋ္ဌာပိတဘာဝံ ဥပါဒါယ တဒညေသံ တေဟိ အနုပဋ္ဌာပိတာနမ္ပိ ပဏ္ဍိတာနံ တထာ ဝေါဟရိတဗ္ဗတာ ပရိယာယသိဒ္ဓါတိ အာဟ ‘‘ဣမိနာ ပရိယာယေနာ’’တိ. 'दुखितञ्च ब्याधितन्ति' का अर्थ है व्याधि (रोग) के कारण उत्पन्न दुःख। अन्तिम जन्म वाले बोधिसत्त्वों के लिए विशुद्धि-देवों द्वारा (निमित्तों को) उपस्थित किए जाने के तथ्य को लेकर, उनके अतिरिक्त अन्य पण्डितों के लिए भी, भले ही उनके सामने वे उपस्थित न किए गए हों, वैसा व्यवहार करना पर्याय (विधि) से सिद्ध है, इसीलिए 'इमिना परियायेन' (इस पर्याय से) कहा गया है। ဒိသမ္ပတီတိ [Pg.148] ဝိဘတ္တိအလောပေန နိဒ္ဒေသော, ဒိသာသီသေန ဒေသာ ဝုတ္တာတိ ဒေသာနံ အဓိပတိရာဇာတိ အတ္ထော. ဥတ္တမင်္ဂေ သိရသိ ရုဟန္တီတိ ဥတ္တမင်္ဂရုဟာ, ကေသာ. တေ ပနေတ္ထ ယသ္မာ ပလိတတ္တာ အဝိသေသတော သဗ္ဗပစ္ဆိမဝယသန္ဒဿကာ ဟောန္တိ, တသ္မာ ‘‘ဝယောဟရာ’’တိ ဝုတ္တာ. 'दिसम्पती' विभक्ति के लोप के साथ निर्देश है, 'दिसा' (दिशाओं) के माध्यम से देशों को कहा गया है, अतः इसका अर्थ है देशों का अधिपति राजा। 'उत्तमङ्गे' अर्थात् सिर पर उगने के कारण 'उत्तमङ्गरुहा' बाल हैं। वे यहाँ चूँकि सफेद होने के कारण सामान्य रूप से अन्तिम अवस्था को दर्शाने वाले होते हैं, इसलिए उन्हें 'वयोहरा' (अवस्था को हरने वाले) कहा गया है। ပုရိသယုဂေါ ယသ္မာ တသ္မိံ ဝံသေ သဉ္ဇာတပုရိသဋ္ဌိတိယာ ပရိစ္ဆိန္နော, တသ္မာ အာဟ ‘‘ဝံသသမ္ဘဝေ ပုရိသေ’’တိ. ရာဇဂေဟတော အာဟဋဘိက္ခာယ ယာပေန္တောတိ ဣမိနာ ကုမာရကပဗ္ဗဇ္ဇာယ ဥပဂတဘာဝံ ဒဿေတိ. चूँकि 'पुरिसयुगो' (पुरुष-युग) उस वंश में उत्पन्न पुरुषों की स्थिति से परिच्छिन्न (निर्धारित) है, इसलिए 'वंससम्भवे पुरिसे' (वंश में उत्पन्न पुरुष) कहा गया है। 'राजभवन से लाए गए भिक्षा-अन्न पर जीवन यापन करते हुए'—इससे कुमार-प्रव्रज्या (दीक्षा) को प्राप्त होने की अवस्था को दर्शाया गया है। ပရိဟရိယမာနောဝါတိ အညေန အညေန ပရိဟရိယမာနော ဝိယ ဝေလာယ ဝေလာယ တေန မဟတာ ပရိဇနေန ဥပဋ္ဌိယမာနော ကုမာရကီဠံ ကီဠီတိ အတ္ထော. ကေစိ ပန ‘‘ပရိဟရိယမာနော ဧဝါ’’တိ အဝဓာရဏဝသေန အတ္ထံ ဝဒန္တိ, တထာ သတိ စတုရာသီတိဝဿသဟဿာနိ ထညပါယီ တရုဏဒါရကော အဟောသီတိ အာပဇ္ဇတီတိ တဒယုတ္တံ. ကုမာရကာလံ ဝတွာ တဒနန္တရံ ဩပရဇ္ဇဝစနတော ဝိရုဒ္ဓဉ္စေတံ. (ပဉ္စမင်္ဂလဝစနေန ဥန္နင်္ဂလမင်္ဂလဥက္ကန္တနမင်္ဂလကမ္မဟာယမင်္ဂလဒုဿမင်္ဂလာနိ သမုပဂတာနိ ဧဝ အဟေသုန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ). 'परिहरियमानो' का अर्थ है— मानो अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा परिचर्या किया जाता हुआ, समय-समय पर उस विशाल परिजन द्वारा सेवा किया जाता हुआ कुमार-क्रीड़ाएँ खेलता था। कुछ लोग 'परिहरियमानो एव' (परिचर्या किया जाता हुआ ही) इस प्रकार अवधारण (निश्चय) के साथ अर्थ करते हैं, वैसा होने पर यह आपत्ति आएगी कि वह चौरासी हजार वर्षों तक स्तनपान करने वाला छोटा बालक ही रहा, जो कि अयुक्त है। कुमार-काल को कहकर उसके बाद उपराज-पद (युवराज काल) के कथन से भी यह विरुद्ध है। (पाँच मांगलिक कार्यों के कथन से यह समझना चाहिए कि हल-मंगल, केशान्त-मंगल, कर्णवेध-मंगल आदि सम्पन्न हुए ही थे)। ၃၁၁. သဝံသဝသေန အာဂတာ ပုတ္တနတ္တုအာဒယော ပုတ္တာ စ ပပုတ္တာ စ ဧတိဿာတိ ပုတ္တပပုတ္တကာ ပရမ္ပရာ. နိဟတန္တိ နိဟိတံ ဌပိတံ, ပဝတ္တိတန္တိ အတ္ထော. နိဟတန္တိ ဝါ သတတံ ပတိဋ္ဌိတဘာဝေန ဝဠဉ္ဇိတန္တိ အတ္ထော. တေနာဟ ‘‘ကလျာဏဝတ္တ’’န္တိ. အတိရေကတရာ ဒွေ ဂုဏာတိ မဟာသတ္တဿ မဃဒေဝကာလတော အတိရေကတရာ ဒွေ ဂုဏာ ဣတရရာဇူဟိ ပန အတိရေကတရာ အနေကသတသဟဿပ္ပဘေဒါ ဧဝ ဂုဏာ အဟေသုန္တိ. ३११. अपने वंश के क्रम से आए हुए पुत्र, पौत्र आदि और प्रपौत्र जिसके हैं, वह 'पुत्र-प्रपौत्रक परंपरा' है। 'निहतं' का अर्थ है रखा हुआ या स्थापित किया हुआ, अर्थात् प्रवृत्त किया हुआ। अथवा 'निहतं' का अर्थ है निरंतर प्रतिष्ठित भाव से उपयोग किया गया। इसीलिए कहा गया है 'कल्याणवत' (कल्याणकारी व्रत)। 'अतिरेकतर दो गुण' का अर्थ है महासत्व के मघदेव के काल से अधिक दो गुण; अन्य राजाओं की तुलना में तो उनके गुण अनेक लाख प्रकार के अधिक ही थे। ၃၁၂. တေတ္တိံသ သဟပုညကာရိနော ဧတ္ထ နိဗ္ဗတ္တာတိ တံသဟစရိတဋ္ဌာနံ တေတ္တိံသံ, တဒေဝ တာဝတိံသံ, တံနိဝါသော ဧတေသန္တိ တာဝတိံသာ. နိဝါသဘာဝေါ စ တေသံ တတ္ထ နိဗ္ဗတ္တနပုဗ္ဗကောတိ အာဟ – ‘‘ဒေဝါနံ တာဝတိံသာနန္တိ တာဝတိံသဘဝနေ နိဗ္ဗတ္တဒေဝါန’’န္တိ. ရညောတိ နိမိမဟာရာဇဿ. ဩဝါဒေ ဌတွာတိ ‘‘သီလံ အရက္ခန္တော မမ သန္တိကံ မာ အာဂစ္ဆတူ’’တိ နိဂ္ဂဏှနဝသေနပိ, ‘‘ဧကန္တတော မမ ဝိဇိတေ ဝသန္တေန သီလံ ရက္ခိတဗ္ဗ’’န္တိ ဧဝံ ပဝတ္တိတဩဝါဒဝသေနပိ ဩဝါဒေ ဌတွာ. ३१२. यहाँ तैंतीस पुण्यकारी साथ में उत्पन्न हुए, इसलिए वह सहचरित स्थान 'तैंतीस' (तेत्तिंस) है, वही 'तावतेंस' है, और उनका निवास होने के कारण वे 'तावतेंस' (देव) हैं। उनका वहाँ निवास भाव वहाँ उत्पन्न होने के कारण है, इसीलिए कहा— 'तावतेंस देवों का' अर्थात् तावतेंस भवन में उत्पन्न देवों का। 'राजा के' अर्थात् निमि महाराज के। 'उपदेश में स्थित होकर' अर्थात् 'शील की रक्षा न करते हुए मेरे पास मत आना'—इस प्रकार निग्रह करने के वश से भी, और 'निश्चित रूप से मेरे राज्य में रहने वाले को शील की रक्षा करनी चाहिए'—इस प्रकार प्रवृत्त उपदेश के वश से भी उपदेश में स्थित होकर। အထ [Pg.149] နန္တိ မဟာဇုတိကံ မဟာဝိပ္ဖာရံ မဟာနုဘာဝံ နိမိရာဇာနံ. ‘‘သက္ကောဟမသ္မိ ဒေဝိန္ဒော, တဝ သန္တိကမာဂတော’’တိ အတ္တနော သက္ကဘာဝံ ပဝေဒေတွာ ‘‘ကင်္ခံ တေ ပဋိဝိနောဒေဿာမီ’’တိ အာဟ. တေနာဟ ‘‘သဗ္ဗဘူတာနမိဿရာ’’တိအာဒိ. तब उस महाद्युतिमान, महाविस्तार वाले और महानुभाव राजा निमि से। 'मैं देवराज शक्र हूँ, तुम्हारे पास आया हूँ'—इस प्रकार अपना शक्र-भाव प्रकट करके 'मैं तुम्हारी शंका दूर करूँगा'—ऐसा कहा। इसीलिए 'सब्बभूतानमिस्सरा' (सब प्राणियों के ईश्वर) आदि कहा गया है। သီလံ ဥပါဒါယ ဩမကတာယ ‘‘ကိ’’န္တိ ဟီဠေန္တော ဝဒတိ. ဂုဏဝိသိဋ္ဌတာယာတိ လာဘယသာဒီနဉ္စေဝ ပိယမနာပတာဒီနဉ္စ အာသဝက္ခယပရိယောသာနာနံ နိမိတ္တဘာဝေန ဥတ္တမဂုဏတာယ. တဒါ သက္ကော အနုရုဒ္ဓတ္ထေရော, သော အတ္တနော ပုရိမဇာတိယံ ပစ္စက္ခသိဒ္ဓံဝ ဒါနတော သီလံ မဟန္တံ ဝိဘာဝေန္တော ‘‘အဟဉှီ’’တိအာဒိမာဟ. တတ္ထ အတ္တနာ ဝသိယမာနံ ကာမာဝစရဒေဝလောကံ သန္ဓာယ ‘‘ပေတ္တိဝိသယတော’’တိ ဝုတ္တံ. တဿ ဟိ ကပ္ပသတသဟဿံ ဝိဝဋ္ဋဇ္ဈာသယဿ ပူရိတပါရမိဿ ဒေဝလောကော ပေတလောကော ဝိယ ဥပဋ္ဌာသိ. တေနေဝါဟ ‘‘အစ္ဆရာဂဏသံဃုဋ္ဌံ, ပိသာစဂဏသေဝိတ’’န္တိ (သံ. နိ. ၁.၄၆). शील की तुलना में (दान की) हीनता के कारण 'क्या' कहकर निंदा करते हुए कहते हैं। 'गुणों की विशिष्टता से' अर्थात् लाभ, यश आदि और प्रिय-अप्रिय आदि के तथा आस्रवों के क्षय की समाप्ति के निमित्त होने से उत्तम गुण होने के कारण। उस समय शक्र अनुरुद्ध थेर थे, उन्होंने अपने पूर्व जन्म में प्रत्यक्ष सिद्ध दान की अपेक्षा शील की महानता को विभक्त करते हुए 'अहं हि' आदि कहा। वहाँ अपने द्वारा वश में किए गए कामावचर देवलोक के संदर्भ में 'प्रेत विषय से' कहा गया है। क्योंकि लाख कल्पों तक विवर्त (मुक्ति) की इच्छा रखने वाले और पारमिताओं को पूर्ण करने वाले उनके लिए देवलोक प्रेतलोक के समान प्रतीत हुआ। इसीलिए उन्होंने कहा— 'अप्सराओं के समूह से गुंजायमान, पिशाच समूहों द्वारा सेवित' (सं. नि. 1.46)। ခတ္တိယေတိ ခတ္တိယဇာတိယံ. ဝိသုဇ္ဈတီတိ ဗြဟ္မလောကူပပတ္တိံ သန္ဓာယ ဝဒတိ ကာမသံကိလေသဝိသုဇ္ဈနတော. ကာယာတိ စ ဗြဟ္မကာယမာဟ. 'क्षत्रिय में' अर्थात् क्षत्रिय जाति में। 'शुद्ध होता है'—यह ब्रह्मलोक में उत्पत्ति के संदर्भ में कहते हैं, क्योंकि वह काम-संक्लेशों से शुद्धि है। 'काया' से ब्रह्म-काया (ब्रह्म-समूह) को कहा गया है। ဣမဿ မမ အဒိဋ္ဌပုဗ္ဗရူပံ ဒိသွာ ‘‘အဟုဒေဝ ဘယ’’န္တိ စိန္တေတွာ အာဟ ‘‘အဝိကမ္ပမာနော’’တိ. ဘာယန္တော ဟိ စိတ္တဿ အညထတ္တေန ကာယဿ စ ဆမ္ဘိတတ္တေန ဝိကမ္ပတိ နာမ. တေနာဟ ‘‘အဘာယမာနော’’တိ. သုခံ ကထေတုံ ဟောတီတိ ပုညဖလံ ကထေတုံ သုခံ ဟောတိ. 'मेरे इस पहले कभी न देखे गए रूप को देखकर भय हुआ होगा'—ऐसा सोचकर 'अविकम्पमान' (न कांपते हुए) कहा। क्योंकि डरने वाला चित्त की विकृति और शरीर की थरथराहट से कांपता है। इसीलिए 'अभयमान' (न डरते हुए) कहा। 'सुखपूर्वक कहना होता है' अर्थात् पुण्य के फल को कहना सुखद होता है। ၃၁၃. မနံ အာဂမ္မ ယုတ္တာယေဝ ဟောန္တီတိ မာတလိဿ သက္ကဿေဝ စိတ္တံ ဇာနိတွာ ယုတ္တာ ဝိယ ဟောန္တိ, ရထေ ယုတ္တအာဇာနီယကိစ္စံ ကရောန္တိ ဒေဝပုတ္တာ. ဧဝံ တာဒိသေ ကာလေ တထာ ပဋိပဇ္ဇန္တိ, ယထာ ဧရာဝဏော ဒေဝပုတ္တော ဟတ္ထိကိစ္စံ. နဒ္ဓိတော ပဋ္ဌာယာတိ ရထပဉ္ဇရပရိယန္တေန အက္ခဿ သမ္ဗန္ဓဋ္ဌာနံ နဒ္ဓီ, တတော ပဋ္ဌာယ. အက္ခော ဗဇ္ဈတိ ဧတ္ထာတိ အက္ခဗဒ္ဓေါ, အက္ခေန ရထဿ ဗဒ္ဓဋ္ဌာနံ. ယထာ ဒေဝလောကတော ယာဝ စန္ဒမဏ္ဍလဿ ဂမနဝီထိ, တာဝ အတ္တနော အာနုဘာဝေန ဟေဋ္ဌာမုခမေဝ ရထံ ပေသေသိ, ဧဝံ စန္ဒမဏ္ဍလဿ ဂမနဝီထိတော ယာဝ ရညော ပါသာဒေါ, တာဝ တထေဝ ပေသေသိ. ဒွေ မဂ္ဂေ ဒဿေတွာတိ ပတောဒလဋ္ဌိယာ အာကာသံ ဝိလိခန္တော ဝိယ အတ္တနော အာနုဘာဝေန နိရယဂါမီ ဒေဝလောကဂါမီ စာတိ ဒွေ မဂ္ဂေ [Pg.150] ဒဿေတွာ. ကတမေနာတိအာဒိ ဒေသနာမတ္တံ, ယထာ တေန ရထေန ဂစ္ဆန္တဿ နိရယော ဒေဝလောကော စ ပါကဋာ ဟောန္တိ, တထာ ကရဏံ အဓိပ္ပေတံ. ३१३. 'मन के अनुसार ही युक्त होते हैं' अर्थात् मातलि और शक्र के ही चित्त को जानकर युक्त के समान होते हैं, देवपुत्र रथ में जुते हुए आजानीय (उत्तम घोड़ों) का कार्य करते हैं। इस प्रकार उस समय वे वैसा ही आचरण करते हैं, जैसे ऐरावण देवपुत्र हाथी का कार्य करता है। 'नद्ध' से लेकर अर्थात् रथ के पिंजरे के किनारे से धुरी के संबंध स्थान तक 'नद्धी' है, वहाँ से लेकर। 'धुरी यहाँ बाँधी जाती है' इसलिए 'अक्षबद्ध' है, धुरी से रथ के बँधने का स्थान। जैसे देवलोक से चन्द्रमण्डल के मार्ग तक अपने प्रभाव से रथ को नीचे की ओर ही भेजा, वैसे ही चन्द्रमण्डल के मार्ग से राजा के महल तक वैसे ही भेजा। 'दो मार्ग दिखाकर' अर्थात् प्रतोद-लाठी (चाबुक) से आकाश को कुरेदते हुए अपने प्रभाव से 'नरक जाने वाला' और 'देवलोक जाने वाला'—ये दो मार्ग दिखाकर। 'किसके द्वारा' आदि केवल देशना मात्र है; जिस प्रकार उस रथ से जाने वाले को नरक और देवलोक स्पष्ट दिखाई देते हैं, वैसा करना ही अभिप्रेत है। ဝုတ္တကာရဏမေဝ သန္ဓာယာဟ မဟာသတ္တော ‘‘ဥဘယေနေဝ မံ မာတလိ နေဟီ’’တိ. ဒုဂ္ဂန္တိ ဒုဂ္ဂမံ. ဝေတ္တရဏိန္တိ ဧဝံနာမကံ နိရယံ. ကုထိတန္တိ ပက္ကုထိတံ နိပက္ကတေလသဒိသဇာလံ. ခါရသံယုတ္တန္တိ ခါရောဒကသဒိသံ. उक्त कारण के संदर्भ में ही महासत्व ने कहा— 'हे मातलि! मुझे दोनों ही (मार्गों) से ले चलो'। 'दुर्ग' अर्थात् दुर्गम। 'वेत्तरणी' इस नाम का नरक। 'कुथित' अर्थात् खौलता हुआ, अच्छी तरह पकाए गए तेल के समान ज्वाला वाला। 'क्षार-संयुक्त' अर्थात् क्षार-युक्त जल के समान। ရထံ နိဝတ္တေတွာတိ နိရယာဘိမုခတော နိဝတ္တေတွာ. ဗီရဏီဒေဝဓီတာယာတိ ‘‘ဗီရဏီ’’တိ ဧဝံနာမိကာယ အစ္ဆရာယ. သောဏဒိန္နဒေဝပုတ္တဿာတိ ‘‘သောဏဒိန္နော’’တိ ဧဝံနာမကဿ ဒေဝပုတ္တဿ. ဂဏဒေဝပုတ္တာနန္တိ ဂဏဝသေန ပုညံ ကတွာ ဂဏဝသေနေဝ နိဗ္ဗတ္တဒေဝပုတ္တာနံ. 'रथ को लौटाकर' अर्थात् नरक की ओर से लौटाकर। 'बीराणी देवपुत्री के' अर्थात् 'बीराणी' नाम की अप्सरा के। 'सोणदिन्न देवपुत्र के' अर्थात् 'सोणदिन्न' नाम के देवपुत्र के। 'गण-देवपुत्रों के' अर्थात् समूह के रूप में पुण्य करके समूह के रूप में ही उत्पन्न देवपुत्रों के। ပတ္တကာလေတိ ဥပကဋ္ဌာယ ဝေလာယ. အတိထိန္တိ ပစ္စေကသမ္ဗုဒ္ဓံ. ကဿပဿ ဘဂဝတော သာသနေ ဧကံ ခီဏာသဝတ္ထေရန္တိပိ ဝဒန္တိ. မာတာဝ ပုတ္တံ သကိမာဘိနန္ဒီတိ ယထာ ပဝါသတော အာဂတံ ပုတ္တံ မာတာ သကိံ ဧကဝါရံ အာဂတကာလေ အဘိနန္ဒတိ, တထာ နိစ္စကာလေ အဘိနန္ဒိ သက္ကစ္စံ ပရိဝိသိ. သံယမာ သံဝိဘာဂါတိ သီလသံယမာ သံဝိဘာဂသီလာ. ဇာတကေတိ နိမိဇာတကေ. 'प्राप्त काल में' अर्थात् निकट समय में। 'अतिथि को' अर्थात् प्रत्येकबुद्ध को। भगवान काश्यप के शासन में एक क्षीणास्रव स्थविर को भी (अतिथि) कहते हैं। 'माता जैसे पुत्र का एक बार अभिनंदन करती है'—जैसे परदेश से आए पुत्र का माता एक बार आने के समय अभिनंदन करती है, वैसे ही (उसने) सदा सत्कारपूर्वक सेवा की। 'संयम और संविभाग' अर्थात् शील-संयम और दान-शील। 'जातक में' अर्थात् निमि जातक में। စိတ္တကူဋန္တိ ဒေဝနဂရဿ ဒက္ခိဏဒိသာယ ဒွါရကောဋ္ဌကံ. သက္ကော စိတ္တံ သန္ဓာရေတုံ အသက္ကောန္တောတိ မဟာသတ္တေ ပဝတ္တံ ဒေဝတာနံ သက္ကာရသမ္မာနံ ပဋိစ္စ ဥပ္ပန္နံ အတ္တနော ဥသူယစိတ္တံ ဗဟိ အနာဝိကတွာ အဗ္ဘန္တရေယေဝ စ နံ ဌပေတုံ အသက္ကောန္တော. အညေသံ ပုညေန ဝသာဟီတိ သက္ကဿ မဟာသတ္တံ ရောသေတုကာမတာယ အာရာဓနံ နိဒဿေတိ. ပုရာဏသက္ကော ဒီဃာယုကော, တံ ဥပါဒါယ ဇရာဇိဏ္ဏံ ဝိယ ကတွာ ‘‘ဇရသက္ကော’’တိ ဝုတ္တံ. 'चित्तकूट' अर्थात् देव-नगर की दक्षिण दिशा का द्वार-कोष्ठक। 'शक्र अपने चित्त को धारण करने में असमर्थ होते हुए' अर्थात् महासत्व के प्रति देवताओं के सत्कार और सम्मान को देखकर उत्पन्न अपने ईर्ष्या-चित्त को बाहर प्रकट न करके भीतर ही उसे रखने में असमर्थ होते हुए। 'दूसरों के पुण्य से रहो'—यह शक्र द्वारा महासत्व को क्रोधित करने की इच्छा से की गई आराधना को दर्शाता है। पुराना शक्र दीर्घायु वाला है, उसे लेकर जरा-जीर्ण के समान करके 'जरा-शक्र' कहा गया है। ၃၁၅. သေသံ သဗ္ဗန္တိ ပဗ္ဗဇ္ဇုပဂမနာ သေသံ အတ္တနော ဝံသေ ပေါရာဏရာဇူနံ ရာဇစာရိတ္တံ. ပါကတိကန္တိ ပုန သဘာဝတ္တမေဝ ဂတော အဟောသိ, အပဗ္ဗဇိတဘာဝဝစနေနေဝဿ ဗြဟ္မဝိဟာရဘာဝနာဒီနံ ပဗ္ဗဇ္ဇာဂုဏာနံ အဘာဝေါ ဒီပိတော ဟောတိ. ३१५. "शेष सब" का अर्थ है प्रव्रज्या ग्रहण करने के बाद अपने वंश के प्राचीन राजाओं का राज-चरित्र। "प्राकृतिक" का अर्थ है पुनः अपने स्वभाव को प्राप्त हो गया, प्रव्रज्या न लेने के वचन से ही उसके ब्रह्मविहार भावना आदि प्रव्रज्या के गुणों का अभाव सूचित होता है। ၃၁၆. ဝီရိယံ အကရောန္တော သမုစ္ဆိန္ဒတိ, န တာဝ သမုစ္ဆိန္နံ, ကလျာဏမိတ္တသံသဂ္ဂါဒိပစ္စယသမဝါယေ သတိ သီလဝတံ ကလျာဏဝတ္တံ ပဝတ္တေတုံ သက္ကောတိ[Pg.151]. ဒုဿီလေန သမုစ္ဆိန္နံ နာမ ဟောတိ တဿ တတ္ထ နိရာသဘာဝေန ပဋိပတ္တိယာ ဧဝ အသမ္ဘဝတော. သတ္တ သေခါ ပဝတ္တေန္တိ ကလျာဏဝတ္တဿ အပရိနိဋ္ဌိတကိစ္စတ္တာ. ခီဏာသဝေန ပဝတ္တိတံ နာမ ပရိနိဋ္ဌိတကိစ္စတ္တာ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. ३१६. वीर्य (प्रयत्न) न करते हुए वह समूच्छेद (विनाश) करता है, अभी समूच्छिन्न नहीं हुआ है, कल्याणमित्र के संसर्ग आदि प्रत्ययों के मिलने पर शीलवानों के कल्याण-व्रत को प्रवर्तित करने में समर्थ होता है। दुशील व्यक्ति द्वारा वह समूच्छिन्न कहलाता है क्योंकि वहाँ उसकी निराशा के कारण प्रतिपत्ति (साधना) ही असंभव होती है। सात शैक्ष (साधक) कल्याण-व्रत को प्रवर्तित करते हैं क्योंकि उनका कार्य अभी पूर्ण नहीं हुआ है। क्षीणास्त्रव (अर्हत) द्वारा वह प्रवर्तित कहलाता है क्योंकि उनका कार्य पूर्ण हो चुका है। शेष सुविज्ञेय (आसानी से समझने योग्य) ही है। မဃဒေဝသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. मघदेव सुत्त की वर्णना की लीनत्थप्पकासना (गूढ़ अर्थों का प्रकाशन) समाप्त हुई। ၄. မဓုရသုတ္တဝဏ္ဏနာ ४. मधुर सुत्त की वर्णना। ၃၁၇. မဓုရာယန္တိ ဥတ္တရမဓုရာယံ. ဂုန္ဒာဝနေတိ ကာဠသိပ္ပလိဝနေ. အတိမုတ္တကဝနေတိ စ ဝဒန္တိ. စတူသု ဝဏ္ဏေသု ဗြာဟ္မဏောဝ သေဋ္ဌော ဝဏ္ဏော. ပဏ္ဍရောတိ ပရိသုဒ္ဓေါ. ကာဠကောတိ အပရိသုဒ္ဓေါ. ဇာတိဂေါတ္တာဒိပညာပနဋ္ဌာနေသူတိ ဇာတိဂေါတ္တာဒိဝသေန သုဒ္ဓစိန္တာယံ ဗြာဟ္မဏာ ဧဝ သုဒ္ဓဇာတိကာ, န ဣတရေတိ အဓိပ္ပာယော. သံသာရတော ဝါ သုဒ္ဓစိန္တာယံ ဗြာဟ္မဏာဝ သုဇ္ဈန္တိ ဝေဒဝိဟိတဿ သုဒ္ဓဝိဓိနော အညေသံ အဝိသယတ္တာတိ အဓိပ္ပာယော. တံ ပနေတံ တေသံ ဝိရုဇ္ဈတိ ခတ္တိယဝေဿာနမ္ပိ မန္တဇ္ဈေနဿ အနုညာတတ္တာ, မန္တဇ္ဈေနဝိဓိနာ စ သံသာရသုဒ္ဓိယာဘာဝတော. ပုတ္တာ နာမ အနောရသာပိ ဟောန္တိ, န တထာ ဣမေတိ အာဟ ‘‘ဩရသာ’’တိ. ဥရေ သံဝဍ္ဎိတပုတ္တောပိ ‘‘ဩရသ’’န္တိ ဝုစ္စတိ. ဣမေ ပန မုခတော နိဂ္ဂတော ဟုတွာ ဥရေ သံဝဍ္ဎာတိ ဒဿေတုံ ‘‘ဩရသာ မုခတော ဇာတာ’’တိ ဝုတ္တံ. တတော ဧဝ ဗြဟ္မတော ဇာတာတိ ဗြဟ္မဇာ, ဗြဟ္မသမ္ဘူတာပိ ‘‘ဗြဟ္မဇာ’’တိ ဝုစ္စန္တိ, န တထာ ဣမေ. ဣမေ ပန ပစ္စက္ခတော ဗြဟ္မုနာ နိမ္မိတာတိ ဗြဟ္မနိမ္မိတာ, တတော ဧဝ ဗြဟ္မတော လဒ္ဓဗ္ဗဝိဇ္ဇာဒိဒါယဇ္ဇဒါယာဒါတိ ဗြဟ္မဒါယာဒါတိ သဗ္ဗမေတံ ဗြာဟ္မဏာနံ ကတ္ထနာပလာပသဒိသံ ဝိညူနံ အပ္ပမာဏံ အဝိမဒ္ဒက္ခမံ ဝါစာဝတ္ထုမတ္တံ ဗြဟ္မကုတ္တဿေဝ အဘာဝတော. ယံ ပနေတ္ထ ဝတ္တဗ္ဗံ, တံ ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂဝဏ္ဏနာယံ ဝုတ္တမေဝ. တေနာဟ ‘‘ဃောသောယေဝါ’’တိအာဒိ. ဝေါဟာရမတ္တမေဝေတန္တိ ဧတံ ‘‘ဗြာဟ္မဏောဝ သေဋ္ဌော ဝဏ္ဏော’’တိအာဒိ ဝစနမတ္တမေဝ, န တဿ အတ္ထော တေဟိ အဓိပ္ပေတပ္ပကာရော အတ္ထိ. ३१७. "मधुरा में" का अर्थ है उत्तर मधुरा में। "गुन्दावन में" का अर्थ है कालसिप्पलि वन में। इसे अतिमुक्तक वन भी कहते हैं। "चारों वर्णों में ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है।" "पाण्डर" का अर्थ है परिशुद्ध। "कालक" का अर्थ है अपरिशुद्ध। "जाति-गोत्र आदि की प्रज्ञापना के स्थानों में" का अर्थ है जाति-गोत्र आदि के वश से शुद्धि के विचार में ब्राह्मण ही शुद्ध जाति के हैं, अन्य नहीं - यह अभिप्राय है। अथवा संसार से शुद्धि के विचार में ब्राह्मण ही शुद्ध होते हैं क्योंकि वेदों में विहित शुद्धि की विधि दूसरों के विषय में नहीं है - यह अभिप्राय है। किन्तु यह उनका कथन विरुद्ध है क्योंकि क्षत्रियों और वैश्यों को भी मन्त्रों के अध्ययन की अनुमति है, और मन्त्र-अध्ययन की विधि से संसार से शुद्धि नहीं होती। पुत्र औरस (सगे) के अतिरिक्त भी होते हैं, किन्तु ये वैसे नहीं हैं, इसलिए कहा "औरस"। हृदय (छाती) पर संवर्धित पुत्र को भी "औरस" कहा जाता है। किन्तु ये मुख से निकलकर हृदय पर संवर्धित हुए हैं, यह दिखाने के लिए "मुख से उत्पन्न औरस" कहा गया है। उसी ब्रह्मा से उत्पन्न होने के कारण "ब्रह्मज" हैं, ब्रह्मा से सम्भूत होने वाले भी "ब्रह्मज" कहे जाते हैं, किन्तु ये वैसे नहीं हैं। ये तो प्रत्यक्ष रूप से ब्रह्मा द्वारा निर्मित हैं इसलिए "ब्रह्म-निर्मित" हैं, उसी ब्रह्मा से प्राप्त होने वाली विद्या आदि के उत्तराधिकारी होने के कारण "ब्रह्म-दायाद" हैं - यह सब ब्राह्मणों के आत्म-प्रशंसात्मक प्रलाप के समान है, जो विद्वानों के लिए अप्रमाणिक, तर्कहीन और केवल वाणी का विषय मात्र है, क्योंकि ब्रह्मा का कोई अस्तित्व ही नहीं है। यहाँ जो कुछ कहना है, वह विशुद्धिमार्ग की वर्णना में कहा ही गया है। इसीलिए कहा "घोष ही है" इत्यादि। "यह केवल व्यवहार मात्र ही है" - यह "ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है" आदि केवल वचन मात्र है, उसका वह अर्थ नहीं है जो उनके द्वारा अभिप्रेत है। ၃၁၈. သမိဇ္ဈေယျာတိ ဒိဋ္ဌိဒီပနဝသေန အတ္တနော အဇ္ဈာသယော နိပ္ဖဇ္ဇေယျ. တေနာဟ ‘‘မနောရထော ပူရေယျာ’’တိ. ခတ္တိယောပီတိ ပရခတ္တိယောပိ[Pg.152]. အဿာတိ သမိဒ္ဓဓနာဒိံ ပတ္တဿ. တေနာဟ – ‘‘ဣဿရိယသမ္ပတ္တဿာ’’တိ နေသန္တိ ဧတေသံ စတုန္နံ ဝဏ္ဏာနံ ဧတ္ထ ပုဗ္ဗုဋ္ဌာယိဘာဝါဒိနာ ဣတရေဟိ ဥပစရိတဗ္ဗတာယ န ကိဉ္စိ နာနာကရဏန္တိ ယောဇနာ. ३१८. "सिद्ध हो" का अर्थ है दृष्टि के प्रकाशन के वश से अपना आशय निष्पन्न हो। इसीलिए कहा "मनोरथ पूर्ण हो"। "क्षत्रिय भी" का अर्थ है दूसरा क्षत्रिय भी। "उसका" का अर्थ है समृद्ध धन आदि प्राप्त करने वाले का। इसीलिए कहा - "ऐश्वर्य-सम्पत्ति वाले का"। "इनका" का अर्थ है इन चारों वर्णों का यहाँ पहले उठने आदि के द्वारा दूसरों से सेवा कराने के विषय में कोई भेद नहीं है - यह योजना है। ၃၂၂. အဟံ စီဝရာဒီဟိ ဥပဋ္ဌာကော, တုမှာကံ ဣစ္ဆိတစ္ဆိတက္ခဏေ ဝဒေယျာထ ယေနတ္ထောတိ ယောဇနာ. စောရာဒိဥပဒ္ဒဝနိသေဓနေန ရက္ခာဂုတ္တိ, ဒါနာဒိနိမိတ္တဥပဒ္ဒဝနိသေဓနေန အာဝရဏဂုတ္တိ. ပစ္စုပ္ပန္နာနတ္ထနိသေဓနေန ဝါ ရက္ခာဂုတ္တိ, အာဂါမိအနတ္ထနိသေဓနေန အာဝရဏဂုတ္တိ. ဧတ္ထ စ ခတ္တိယာဒီသု ယော ယော ဣဿရော, တဿ ဣတရေန အနုဝတ္တေတဗ္ဗဘာဝေ, ကုသလာကုသလကရဏေန နေသံ ဝသေန လဒ္ဓဗ္ဗအဘိသမ္ပရာယေ, ပဗ္ဗဇိတေဟိ လဒ္ဓဗ္ဗသာမီစိကိရိယာယ စ အဏုမတ္တောပိ ဝိသေသော နတ္ထိ, တသ္မာ သော ဝိသေသာဘာဝေါ ပါဠိယံ တတ္ထ တတ္ထ ဝါရေ ‘‘ဧဝံ သန္တေ’’တိအာဒိနာ ဝိဘာဝိတော. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. ३२२. "मैं चीवर आदि से उपस्थाक (सेवक) हूँ, आप अपनी इच्छानुसार जिस समय जिस वस्तु की आवश्यकता हो, कहें" - यह योजना है। चोर आदि के उपद्रव के निषेध से "रक्षा-गुप्ति" होती है, दान आदि के निमित्त होने वाले उपद्रव के निषेध से "आवरण-गुप्ति" होती है। अथवा वर्तमान अनर्थ के निषेध से "रक्षा-गुप्ति" और भविष्य के अनर्थ के निषेध से "आवरण-गुप्ति" होती है। और यहाँ क्षत्रिय आदि में जो-जो स्वामी (ईश्वर) है, उसका दूसरों द्वारा अनुसरण किए जाने के भाव में, कुशल-अकुशल कर्म करने से उनके वश प्राप्त होने वाले परलोक में, और प्रव्रजितों द्वारा प्राप्त की जाने वाली सामीची-क्रिया (उचित सत्कार) में अणुमात्र भी विशेष (भेद) नहीं है, इसलिए वह विशेषता का अभाव पालि में जगह-जगह "ऐसा होने पर" आदि के द्वारा स्पष्ट किया गया है। शेष सुविज्ञेय ही है। မဓုရသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. मधुर सुत्त की वर्णना की लीनत्थप्पकासना समाप्त हुई। ၅. ဗောဓိရာဇကုမာရသုတ္တဝဏ္ဏနာ ५. बोधिराजकुमार सुत्त की वर्णना। ၃၂၄. ဩလောကနကပဒုမန္တိ လီလာအရဝိန္ဒံ. တသ္မာတိ ကောကနဒသဏ္ဌာနတ္တာ ကောကနဒေါတိ သင်္ခံ လဘိ. ३२४. "अवलोकन-पद्म" का अर्थ है लीला-कमल। "उससे" का अर्थ है कोकनद (लाल कमल) के आकार का होने के कारण "कोकनद" यह संज्ञा प्राप्त की। ၃၂၅. ယာဝ ပစ္ဆိမ…ပေ… ဖလကံ ဝုတ္တံ တဿ သဗ္ဗပစ္ဆာ သန္ထတတ္တာ. ဥပရိမဖလဂတဉှိ သောပါနမတ္ထကံ. ဩလောကနတ္ထံယေဝါတိ န ကေဝလံ ဘဂဝတော အာဂမနညေဝ ဩလောကနတ္ထံ, အထ ခေါ အတ္တနော ပတ္ထနာယ သန္ထရာပိတာယ စေလပဋိကာယ အက္ကမနဿပိ. ३२५. "अन्तिम तक... पे... फलक" कहा गया है क्योंकि वह सबसे अन्त में बिछाया गया था। सीढ़ी का ऊपरी हिस्सा ऊपरी फलक पर स्थित है। "देखने के लिए ही" का अर्थ है न केवल भगवान के आगमन को देखने के लिए, बल्कि अपनी प्रार्थना के लिए बिछाई गई वस्त्र-पट्टिका पर उनके पैर रखने को देखने के लिए भी। သကုဏပေါတကေတိ ကာဒမ္ဗဋိဋ္ဋိဘပုတ္တကေ. အညောဝ ဘဝေယျာတိ တသ္မိံ အတ္တဘာဝေ မာတုဂါမတော အညော ဣဒါနိ ဘရိယာဘူတော မာတုဂါမော ဘဝေယျ. ပုတ္တံ လဘေယျာတိ အတ္တနော ကမ္မဝသေန ပုတ္တံ, နော တဿ. ဥဘောဟီတိ ဣမေဟိ ဧဝ ဥဘောဟိ. ဣမေဟိ ကာရဏေဟီတိ တဿ ရာဇကုမာရဿ ဗုဒ္ဓံ ပဋိစ္စ မိစ္ဆာဂဟဏံ, တိတ္ထိယာနံ ဥဇ္ဈာယနံ, အနာဂတေ မနုဿာနံ ဘိက္ခူနံ ဥဒ္ဒိဿ ဝိပ္ပဋိသာရောတိ ဣမေဟိ တီဟိ ကာရဏေဟိ. ပညတ္တန္တိ သန္ထတံ စေလပဋိကံ. မင်္ဂလံ ဣစ္ဆန္တီတိ မင်္ဂလိကာ. "पक्षी के शावक" का अर्थ है कादम्ब और टिट्टिभ के बच्चे। "अन्य ही होगा" का अर्थ है उस आत्मभाव (जन्म) में मातृग्राम (स्त्री) से भिन्न अब भार्या रूप मातृग्राम होगा। "पुत्र प्राप्त करे" का अर्थ है अपने कर्म के वश से पुत्र, उसका नहीं। "दोनों से" का अर्थ है इन दोनों से ही। "इन कारणों से" का अर्थ है उस राजकुमार का बुद्ध के प्रति मिथ्या-ग्रहण, तीर्थिकों का उलाहना, और भविष्य में मनुष्यों का भिक्षुओं के प्रति पश्चाताप - इन तीन कारणों से। "प्रज्ञप्त" का अर्थ है बिछाई गई वस्त्र-पट्टिका। "मंगल चाहने वाले" का अर्थ है मांगलिक। ၃၂၆. တတိယံ [Pg.153] ကာရဏန္တိ ဣမိနာ ဘိက္ခူသု ဝိပ္ပဋိသာရာနုပ္ပာဒနမာဟ. ယံ ကိဉ္စိ ပရိဘုဉ္ဇန-သုခံ ကာမသုခလ္လိကာနုယောဂေါတိ အဓိပ္ပာယေန ကာမသုခလ္လိကာနုယောဂသညီ ဟုတွာ…ပေ… မညမာနော ဧဝမာဟ. ३२६. "तीसरा कारण" इससे भिक्षुओं में पश्चाताप उत्पन्न न होने की बात कही गई है। "जो कुछ भी उपभोग का सुख है वह कामसुखल्लिकानुयोग (काम-सुखों में लिप्त रहना) है" - इस अभिप्राय से कामसुखल्लिकानुयोग की संज्ञा वाला होकर... पे... मानते हुए ऐसा कहा। ၃၂၇. အထ နံ ဘဂဝါ တတော မိစ္ဆာဘိနိဝေသတော ဝိဝေစေတုကာမော ‘‘သော ခေါ အဟ’’န္တိအာဒိနာ အတ္တနော ဒုက္ကရစရိယံ ဒဿေတုံ အာရဘိ. မဟာသစ္စကေ(မ. နိ. ၁.၃၆၄ အာဒယော) ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗံ ‘‘သော ခေါ အဟ’’န္တိအာဒိပါဌဿ တတ္ထ အာဂတနိယာမေနေဝ အာဂတတ္တာ. ပါသရာသိသုတ္တေ (မ. နိ. ၁.၂၇၂ အာဒယော) ဝုတ္တနယေနာတိ ဧတ္ထာပိ ဧသေဝ နယော. ३२७. तब भगवान ने उसे उस मिथ्या अभिनिवेश से अलग करने की इच्छा से 'वह मैं ही था' इत्यादि के द्वारा अपनी दुष्करचर्या को दिखाना आरम्भ किया। जैसा महासच्चक सुत्त (म. नि. १.३६४ आदि) में कहा गया है, वैसा ही यहाँ भी समझना चाहिए, क्योंकि 'वह मैं ही था' इत्यादि पाठ वहाँ आए हुए नियम के अनुसार ही यहाँ आया है। पासरासि सुत्त (म. नि. १.२७२ आदि) में कहे गए तरीके के अनुसार ही यहाँ भी यही नियम है। ၃၄၃. အင်္ကုသံ ဂဏှန္တိ ဧတေန တဿ ဂဟဏေ ဆေကော ဟောတီတိ အင်္ကုသဂဟဏသိပ္ပံ. မေဃဥတုန္တိ မေဃံ ပဋိစ္စ ဥပ္ပန္နသီတဥတုံ. ပဗ္ဗတဥတုန္တိ ပဗ္ဗတံ ပဋိစ္စ ဥဏှဥတုံ. ဥဘယဝသေန စ တဿ တထာ သီတုဏှဥတုတော ဧနော အာဂတောတိ တ-ကာရဿ ဒ-ကာရံ ကတွာ ဥဒေနောတိ နာမံ အကာသိ. ३४३. जिससे अंकुश पकड़ते हैं और उसके पकड़ने में जो कुशल होता है, वह 'अंकुश-ग्रहण-शिल्प' है। 'मेघ-ऋतु' का अर्थ है मेघों के कारण उत्पन्न शीत ऋतु। 'पर्वत-ऋतु' का अर्थ है पर्वतों के कारण उत्पन्न उष्ण ऋतु। इन दोनों के प्रभाव से, उस प्रकार की शीत और उष्ण ऋतु से वह आया, इसलिए 'त' कार को 'द' कार करके 'उदेन' नाम रखा गया। တာပသော ဩဂါဠှဉာဏဝသေန ရညော မတဘာဝံ ဉတွာ. အာဒိတော ပဋ္ဌာယာတိ ကောသမ္ဗိနဂရေ ပရန္တပရညော အဂ္ဂမဟေသိဘာဝတော ပဋ္ဌာယ. ပုဗ္ဗေတိ သီလဝန္တကာလေ. ဟတ္ထိဂန္ထန္တိ ဟတ္ထီနံ အတ္တနော ဝသေ ဝတ္တာပနသတ္ထံ. တေနေဝဿ တံ သိက္ခာပေတိ, ကိစ္စဉ္စ ဣဇ္ဈတိ. तापस ने अपने गहरे ज्ञान के बल से राजा की मृत्यु के बारे में जानकर। 'आदि से लेकर' का अर्थ है कौशाम्बी नगर में राजा परन्तप की अग्र-महिषी होने के समय से लेकर। 'पहले' का अर्थ है शीलवान होने के समय में। 'हस्ति-ग्रन्थ' का अर्थ है हाथियों को अपने वश में करने का शास्त्र। उसी से वह उसे सिखाता है और कार्य सिद्ध होता है। ၃၄၄. ပဒဟနဘာဝေါတိ ဘာဝနာနုယောဂေါ. ပဓာနေ ဝါ နိယုတ္တော ပဓာနိယော, ပဓာနိယဿ ဘိက္ခုနော, တဿေဝ ပဓာနိယဘာဝဿ အင်္ဂါနိ ကာရဏာနိ ပဓာနိယင်္ဂါနိ. သဒ္ဓါ ဧတဿ အတ္ထီတိ သဒ္ဓေါ. ကိဉ္စာပိ ပစ္စေကဗောဓိသတ္တာနမ္ပိ အဘိနီဟာရတော ပဋ္ဌာယ အာဂတာ အာဂမနသဒ္ဓါ ဧဝ, မဟာဗောဓိသတ္တာနံ ပန သဒ္ဓါ ဂရုတရာတိ သာ ဧဝ ဂဟိတာ. အစလဘာဝေန ဩကပ္ပနံ ‘‘သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ ဘဂဝါ, သွာချာတော ဓမ္မော, သုပ္ပဋိပန္နော သံဃော’’တိ ကေနစိ အကမ္ပိယဘာဝေန ရတနတ္တယဂုဏေ ဩဂါဟိတွာ ကပ္ပနံ. ပသာဒုပ္ပတ္တိ ရတနတ္တယေ ပသီဒနမေဝ. ဗောဓိန္တိ စတုမဂ္ဂဉာဏန္တိ ဝုတ္တံ တံနိမိတ္တတ္တာ သဗ္ဗညုတညာဏဿ, ဗောဓီတိ ဝါ သမ္မာသမ္ဗောဓိ. သဗ္ဗညုတညာဏပဒဋ္ဌာနဉှိ မဂ္ဂဉာဏံ, မဂ္ဂဉာဏပဒဋ္ဌာနဉ္စ သဗ္ဗညုတညာဏံ ‘‘သမ္မာသမ္ဗောဓီ’’တိ ဝုစ္စတိ. နိစ္ဆိတသုဗုဒ္ဓတာယ ဓမ္မဿ သုဓမ္မတာ သံဃဿ သုပ္ပဋိပတ္တိ ဝိနိစ္ဆိတာ ဧဝ [Pg.154] ဟောတီတိ အာဟ ‘‘ဒေသနာသီသမေဝ စေတ’’န္တိအာဒိ. တဿ ပဓာနံ ဝီရိယံ ဣဇ္ဈတိ ရတနတ္တယသဒ္ဓါယ ‘‘ဣမာယ ပဋိပဒါယ ဇရာမရဏတော မုစ္စိဿာမီ’’တိ ပဓာနာနုယောဂေ အဝံမုခသမ္ဘဝတော. ३४४. 'प्रदहन-भाव' का अर्थ है भावना का अनुयोग। अथवा जो प्रधान (प्रयत्न) में लगा हो वह 'प्रधानीय' है; प्रधानीय भिक्षु के, उसी प्रधानीय भाव के जो अंग (कारण) हैं, वे 'प्रधानीय अंग' हैं। जिसके पास श्रद्धा है वह 'श्रद्धालु' है। यद्यपि प्रत्येक बुद्धों की भी अभिनिहार से लेकर आई हुई 'आगमन-श्रद्धा' ही होती है, किन्तु महाबोधिसत्वों की श्रद्धा अधिक गुरुतर होती है, इसलिए वही यहाँ ली गई है। अचल भाव से स्वीकार करना कि 'भगवान सम्यक्सम्बुद्ध हैं, धर्म स्वाख्यात है, संघ सुप्रतिपन्न है'—इस प्रकार किसी के द्वारा भी विचलित न होने वाले भाव से रत्नत्रय के गुणों में अवगाहन करके निश्चय करना। 'प्रसादोत्पत्ति' का अर्थ रत्नत्रय में प्रसन्न होना ही है। 'बोधि' का अर्थ चार मार्ग-ज्ञान कहा गया है क्योंकि वह सर्वज्ञता-ज्ञान का निमित्त है; अथवा बोधि का अर्थ 'सम्यक्सम्बोधि' है। सर्वज्ञता-ज्ञान का पदस्थान मार्ग-ज्ञान है, और मार्ग-ज्ञान का पदस्थान सर्वज्ञता-ज्ञान है, जिसे 'सम्यक्सम्बोधि' कहा जाता है। बुद्धत्व के निश्चित होने से धर्म की सुधर्मता और संघ की सुप्रतिपत्ति निश्चित ही होती है, इसीलिए कहा गया है 'यह देशना का शीर्ष ही है' इत्यादि। रत्नत्रय में श्रद्धा होने के कारण उसका प्रधान (प्रयत्न) और वीर्य सिद्ध होता है, क्योंकि 'इस प्रतिपदा से मैं जरा-मरण से मुक्त हो जाऊँगा'—इस प्रकार प्रधान-अनुयोग में तत्परता उत्पन्न होती है। အပ္ပာဗာဓောတိအာဒိ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တမေဝ. အဂုဏံ ပကာသေတာ အာယတိံ သံဝရံ အာပဇ္ဇိတာ သမ္မာပဋိပတ္တိယာ ဝိသောဓနတ္ထံ. ဥဒယဉ္စ အတ္ထဉ္စ ဂန္တုန္တိ ‘‘အဝိဇ္ဇာသမုဒယာ’’တိအာဒိနာ ပဉ္စန္နံ ဥပါဒါနက္ခန္ဓာနံ ဥဒယဉ္စ ဝယဉ္စ ဇာနိတုံ. တေနာဟ ‘‘ဧတေနာ’’တိအာဒိ. ပရိသုဒ္ဓါယ ဥပက္ကိလေသဝိနိမုတ္တာယ. နိဗ္ဗိဇ္ဈိတုန္တိ တဒင်္ဂဝသေန ပဇဟိတုံ သမုစ္ဆေဒပ္ပဟာနဿ ပစ္စယော ဘဝိတုံ. ယံ ဒုက္ခံ ခီယတီတိ ကိလေသေသု အပ္ပဟီနေသု တေန တဒုပနိဿယကမ္မံ ပဋိစ္စ ယံ ဒုက္ခံ ဥပ္ပဇ္ဇေယျ, တံ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ. 'अल्पाबाध' आदि पहले ही कहा जा चुका है। अपने अवगुणों को प्रकट करने वाला, भविष्य में संयम धारण करने वाला, सम्यक् प्रतिपत्ति द्वारा शुद्धि के लिए। 'उदय और अस्त को प्राप्त करने के लिए' का अर्थ है 'अविद्या के उदय से' इत्यादि के द्वारा पाँच उपादान-स्कन्धों के उदय और व्यय को जानना। इसीलिए कहा गया है 'इससे' इत्यादि। 'परिशुद्ध' का अर्थ है उपक्लेशों से मुक्त। 'निर्वेध' (भेदने) के लिए का अर्थ है तदंग-वश त्याग करना और समुच्छेद-प्रहाण का प्रत्यय बनना। 'जो दुःख क्षीण होता है'—क्लेशों के न हटने पर उनके उपनिश्रय कर्म के कारण जो दुःख उत्पन्न हो सकता है, उसे लक्ष्य करके यह कहा गया है। ၃၄၅. သေသဒိဝသေတိ သတ္တဒိဝသတော ပဋ္ဌာယ ယာဝ ဒွေ ရတ္တိန္ဒိဝါ. ३४५. 'शेष दिनों में' का अर्थ है सातवें दिन से लेकर दो रात-दिन तक। ၃၄၆. ကုစ္ဆိသန္နိဿိတော ဂဗ္ဘော နိဿယဝေါဟာရေန ‘‘ကုစ္ဆီ’’တိ ဝုစ္စတိ, သော ဧတိဿာ အတ္ထီတိ ကုစ္ဆိမတီ. တေနာဟ ‘‘အာပန္နသတ္တာ’’တိ. အာရက္ခော ပနဿ ပစ္စုပဋ္ဌိတော ဟောတီတိ မာတရာ ဂဟိတသရဏံ ဂဗ္ဘဝုဋ္ဌိတဿ တဿ သရဏဂမနံ ပဝေဒယိတဿ ကုသလံ သရဏံ နာမ, မာတု ကတရက္ခော ပုတ္တဿပိ ပစ္စုပဋ္ဌိတောတိ. မဟလ္လကကာလေတိ ဝစနတ္ထံ ဇာနနကာလေ. သာရေန္တီတိ ယထာဒိဋ္ဌံ ယထာဗလံ ရတနတ္တယဂုဏပတိဋ္ဌာပနဝသေန အဿ သာရေန္တိ. သလ္လက္ခေတွာတိ ဝုတ္တမတ္ထံ ဥပဓာရေတွာ. သရဏံ ဂဟိတံ နာမ ဟောတိ ရတနတ္တယဿ သရဏဘာဝသလ္လက္ခဏပုဗ္ဗကတန္နိန္နစိတ္တဘာဝတောဝ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. ३४६. कोख में स्थित गर्भ को उपचार से 'कुक्षि' कहा जाता है, वह जिसके पास है वह 'कुक्षिमती' है। इसीलिए कहा गया है 'आपन्नसत्त्वा' (गर्भवती)। उसकी रक्षा उपस्थित होती है—माता द्वारा ग्रहण की गई शरण, गर्भ से बाहर निकले हुए बालक के लिए शरण-गमन के रूप में बताई गई कुशल शरण है; माता द्वारा की गई रक्षा पुत्र के लिए भी उपस्थित होती है। 'वृद्धावस्था के समय' का अर्थ है वचनों का अर्थ समझने के समय। 'स्मरण कराते हैं' का अर्थ है जैसा देखा गया और जैसी शक्ति हो, उसके अनुसार रत्नत्रय के गुणों में प्रतिष्ठित करने के माध्यम से उसे स्मरण कराते हैं। 'लक्ष्य करके' का अर्थ है कहे गए अर्थ को धारण करके। रत्नत्रय के शरण-भाव को लक्ष्य करने के बाद उसमें तल्लीन चित्त होने से ही 'शरण ग्रहण किया' ऐसा कहा जाता है। शेष सुविज्ञेय ही है। ဗောဓိရာဇကုမာရသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. बोधिराजकुमार सुत्त की वर्णना के लीनत्थप्पकासना समाप्त हुई। ၆. အင်္ဂုလိမာလသုတ္တဝဏ္ဏနာ ६. अंगुलिमाल सुत्त की वर्णना। ၃၄၇. အင်္ဂုလီနံ မာလံ ဓာရေတီတိ ဣမိနာ အနွတ္ထာ တဿ သမညာတိ ဒဿေတိ. တတြာတိ တသ္မိံ အာစရိယဝစနေန အင်္ဂုလိမာလဿ ဓာရဏေ. ကရီသသဟဿခေတ္တေ ဧကသာလိသီသံ ဝိယ အပညာယမာနသကကိစ္စော ဟောတီတိ အဓိပ္ပာယော. တက္ကသီလံ ပေသယိံသု ‘‘တာဒိသဿ အာစရိယဿ သန္တိကေ [Pg.155] သိပ္ပုဂ္ဂဟသမ္မာပယောဂေန ဒိဋ္ဌဓမ္မိကေ သမ္ပရာယိကေ စ အတ္ထေ ဇာနန္တော ဘာရိယံ န ကရေယျာ’’တိ. ဗာဟိရကာ အဟေသုံ အဟိံသကဿ ဝတ္တသမ္ပတ္တိယာ အာစရိယဿ စိတ္တသဘာဝတော နိဗ္ဗတ္တနတိဘာဝေန. သိနေဟေနေဝ ဝဒန္တေတိ သိနေဟေန ဝိယ ဝဒန္တေ. ३४७. 'अंगुलियों की माला धारण करता है'—इससे उसकी संज्ञा के सार्थक होने को दिखाया गया है। 'वहाँ' का अर्थ है आचार्य के वचनों के कारण अंगुलिमाल को धारण करने में। जैसे हजार करीष के खेत में एक शाली का सिरा नहीं पहचाना जाता, वैसे ही उसका अपना कार्य लुप्त हो गया था—यही अभिप्राय है। उसे तक्षशिला भेजा गया कि 'ऐसे आचार्य के पास शिल्प-ग्रहण के सम्यक् प्रयोग से इहलौकिक और पारलौकिक अर्थों को जानते हुए वह भार उत्पन्न नहीं करेगा'। अहिंसक की व्रत-सम्पत्ति के कारण आचार्य के चित्त के स्वभाव से उत्पन्न अतिशयता के कारण अन्य लोग बाहरी हो गए। 'स्नेह से ही बोलते हुए' का अर्थ है मानो स्नेह से बोल रहे हों। ဂဏနမ္ပိ န ဥဂ္ဂဏှာတီတိ ဂဏနဝိဓိမ္ပိ န သလ္လက္ခေတိ. တတ္ထ ကာရဏမာဟ ‘‘ပကတိယာ’’တိအာဒိနာ. ဌပိတဋ္ဌာနေတိ ရုက္ခဂစ္ဆန္တရာဒိကေ ဌပိတဋ္ဌာနေ သကုန္တသိင်္ဂါလာနံ ဝသေန အင်္ဂုလိယော ဝိနဿန္တိ. ဘဂ္ဂဝေါတိ ကောသလရညော ပုရောဟိတံ ဂေါတ္တေန ဝဒတိ. စောရော အဝိဿာသနီယော သာဟသိကဘာဝတော. ပုရာဏသန္ထတာ သာခါ အဝိဿာသနီယာ ဝိစ္ဆိကာဒီနံ ပဝေသနယောဂျတ္တာ. ရာဇာ အဝိဿာသနီယော ဣဿရိယမဒေန ဓနလောဘေန စ ကဒါစိ ဇီဝိတေ သင်္ကာဘာဝတော. ဣတ္ထီ အဝိဿာသနီယာ လောလသီလစိတ္တဘာဝတော. အနုဒ္ဓရဏီယော ဘဝိဿတိ သံသာရပင်္ကတော. 'गणना भी नहीं सीखता' का अर्थ है गणना की विधि पर भी ध्यान नहीं देता। वहाँ कारण बताते हैं 'प्रकृति से' इत्यादि। 'रखे हुए स्थान पर'—वृक्षों और झाड़ियों के बीच रखे हुए स्थान पर पक्षियों और सियार के कारण अंगुलियाँ नष्ट हो जाती हैं। 'भार्गव'—कोशल नरेश के पुरोहित को उनके गोत्र से संबोधित करते हैं। चोर अपने साहसी स्वभाव के कारण अविश्वसनीय होता है। पुरानी बिछी हुई शाखाएँ बिच्छू आदि के प्रवेश के योग्य होने के कारण अविश्वसनीय होती हैं। राजा ऐश्वर्य के मद और धन के लोभ के कारण, तथा कभी भी जीवन के प्रति शंका होने के कारण अविश्वसनीय होता है। स्त्री अपने चंचल स्वभाव और चित्त के कारण अविश्वसनीय होती है। वह संसार रूपी कीचड़ से उद्धार के योग्य नहीं होगा। ၃၄၈. သင်္ကရိတွာတိ ‘‘မယံ ဧကဇ္ဈံ သန္နိပတိတွာ စောရံ မာရေတွာ ဝါ ပလာပေတွာ ဂမိဿာမာ’’တိ သင်္ကရံ ကတွာ. ဣဒ္ဓါဘိသင်္ခါရန္တိ အဘိသင်္ခရဏံ အဓိဋ္ဌာနံ. အဘိသင်္ခါသီတိ အဓိဋ္ဌဟိ. သံဟရိတွာတိ သံခိပိတွာ. ဩရဘာဂေတိ စောရဿ ဩရဘာဂေ. ३४८. 'संकरित्वा' (Saṅkaritvā) का अर्थ है 'हम एक साथ इकट्ठा होकर चोर को मारकर या भगाकर जाएंगे' - ऐसा संकल्प करके। 'इद्धाभिसङ्खारं' (Iddhābhisaṅkhāraṃ) का अर्थ है अभिसंस्करण या अधिष्ठान। 'अभिसङ्खासि' (Abhisaṅkhāsi) का अर्थ है अधिष्ठान किया। 'संहरित्वा' (Saṃharitvā) का अर्थ है संक्षिप्त करके। 'ओरभागे' (Orabhāge) का अर्थ है चोर के इस ओर (निकट भाग में)। ၃၄၉. ဒဏ္ဍောတိ ပဟရဏဟတ္ထစ္ဆေဒနာဒိကော ဒဏ္ဍနသင်္ခါတော ဒဏ္ဍော. ပဝတ္တယိတဗ္ဗောတိ အာနေတဗ္ဗော. အပနေတွာတိ အတ္တနော သန္တာနတော သမုစ္ဆေဒဝသေန ပဟာယ. ပဋိသင်္ခါယာတိ ပဋိသင်္ခါနေန. အဝိဟိံသာယာတိ ကရုဏာယ. သာရဏီယဓမ္မေသူတိ ဆသုပိ သာရဏီယဓမ္မေသု, ဌိတော အဋ္ဌိတာနံ ပါပဓမ္မာနံ ဗောဓိမူလေ ဧဝ သမုစ္ဆိန္နတ္တာ. ယထာ အတီတေ အပရိမိတံ ကာလံ သန္ဓာဝိတံ, ဧဝံ ဣမာယ ပဋိပတ္တိယာ အနာဂတေပိ သန္ဓာဝိဿတီတိ ဒဿေန္တော ‘‘ဣဒါနီ’’တိအာဒိမာဟ. ३४९. 'दण्डो' (Daṇḍo) का अर्थ है प्रहार करना, हाथ काटना आदि दण्ड के रूप में जाना जाने वाला दण्ड। 'पवत्तयितब्बो' (Pavattayitabbo) का अर्थ है लाया जाना चाहिए। 'अपनेत्वा' (Apanetvā) का अर्थ है अपनी सन्तान (प्रवाह) से समूच्छेद के द्वारा त्याग कर। 'पटिसङ्खाया' (Paṭisaṅkhāya) का अर्थ है प्रतिसंख्यान (विवेकपूर्ण विचार) के द्वारा। 'अविहिंसाय' (Avihiṃsāya) का अर्थ है करुणा के द्वारा। 'सारणीयधम्मेसु' (Sāraṇīyadhammesu) का अर्थ है छहों सारणीय धर्मों में; जो स्थित है, क्योंकि अस्थित पाप-धर्म बोधि-मूल में ही समूच्छिन्न (नष्ट) हो गए हैं। जैसे अतीत में अपरिमित काल तक संसार में भटके, वैसे ही इस प्रतिपत्ति (आचरण) से भविष्य में भी भटकेंगे - यह दिखाते हुए 'इदानी' (अब) आदि कहा। ဣတွေဝါတိ ဣတိ ဧဝ, ဣတိ-သဒ္ဒေါ နိဒဿနတ္ထော. တေနာဟ ‘‘ဧဝံ ဝတွာ ယေဝါ’’တိ. အကိရီတိ အာကိရိ, ပဉ္စပိ အာဝုဓာနိ ဝိကိရိ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘ခိပိ ဆဍ္ဍေသီ’’တိ. 'इत्वेवा' (Itvevāti) का अर्थ है 'इति एव', यहाँ 'इति' शब्द निदर्शन (उदाहरण) के अर्थ में है। इसीलिए कहा 'ऐसा कहकर ही'। 'अकिरि' (Akiri) का अर्थ है बिखेर दिया, पाँचों आयुधों (शस्त्रों) को बिखेर दिया। इसीलिए कहा गया 'फेंक दिया, त्याग दिया'। ၃၅၀. ဧတ္တောဝါတိ အတော ဧဝ အာဂတမဂ္ဂေနေဝ သာဝတ္ထိံ ဂတာ. အဓိဝါသေဿတီတိ ‘‘စောရံ ပဋိသေဓေတုံ ဂမိဿာမီ’’တိ ဝုတ္တေ တုဏှီ ဘဝိဿတိ[Pg.156]. ဒါရုဏကမ္မေန ဥပ္ပန္နနာမန္တိ ‘‘အင်္ဂုလိမာလော’’တိ ဣမံ နာမံ သန္ဓာယ ဝဒတိ. ३५०. 'एत्तोवा' (Ettovā) का अर्थ है 'अतो एव' (यहीं से), जिस मार्ग से आए थे उसी मार्ग से श्रावस्ती गए। 'अधिवासेस्सति' (Adhivāsessati) का अर्थ है 'चोर को रोकने के लिए जाऊँगा' - ऐसा कहने पर मौन रहेगा। 'दारुणकम्मेन उप्पन्ननामं' (क्रूर कर्म से उत्पन्न नाम) - यह 'अङ्गुलिमाल' इस नाम के सन्दर्भ में कहा गया है। ၃၅၁. ဟတ္ထီ အရညဟတ္ထီ ဟောန္တိ မနုဿာနံ တတ္ထ ဂန္တုံ အသက္ကုဏေယျတ္တာ, ဧဝံ အဿာပိ. ကူဋသဟဿာနံ ဘိဇ္ဇနကာရဏံ ဟောတိ ထေရဿ အာဂမနဘယေန ဃဋေ ဆဍ္ဍေတွာ ပလာယနေန. ဂဗ္ဘမူဠှာယာတိ ဗျာကုလဂဗ္ဘာယ. ပဗ္ဗဇ္ဇာဗလေနာတိ ဝုတ္တံ, သတ္ထု ဒေသနာနုဘာဝေနာတိ ပန ဝတ္တဗ္ဗံ. သော ဟိ တဿာပိ ကာရဏန္တိ. အရိယာ နာမ ဇာတိ ပဗ္ဗဇ္ဇာ အရိယဘာဝတ္ထာယ ဇာတီတိ ကတွာ. ३५१. हाथी 'अरण्य-हाथी' (जंगली हाथी) होते हैं क्योंकि मनुष्यों का वहाँ जाना असंभव होता है, घोड़ों के लिए भी ऐसा ही है। हजारों घड़ों के टूटने का कारण स्थविर (अङ्गुलिमाल) के आने के भय से घड़ों को छोड़कर भागना है। 'गब्भमूळ्हाय' (Gabbhamūḷhāya) का अर्थ है व्याकुल गर्भ वाली (प्रसव पीड़ा से ग्रस्त)। 'पब्बज्जाबलेन' (प्रव्रज्या के बल से) कहा गया है, किन्तु 'सत्थु देसनानभावेन' (शास्ता के उपदेश के अनुभाव से) कहना चाहिए। क्योंकि वह (उपदेश) ही उसका भी कारण है। 'अरिया नाम जाति' (आर्य जाति) का अर्थ है प्रव्रज्या, जो आर्य भाव के लिए जन्म है। မဟာပရိတ္တံ နာမေတန္တိ မဟာနုဘာဝံ ပရိတ္တံ နာမေတံ. တထာ ဟိ နံ ထေရော သဗ္ဗဘာဝေန အရိယာယ ဇာတော သစ္စာဓိဋ္ဌာနေန အကာသိ. တေနာဟ ‘‘သစ္စကိရိယကတဋ္ဌာနေ’’တိ. ဂဗ္ဘမူဠှန္တိ မူဠှဂဗ္ဘံ. ဂဗ္ဘော ဟိ ပရိပက္ကော သမ္ပဇ္ဇမာနော ဝိဇာယနကာလေ ကမ္မဇဝါတေဟိ သဉ္စာလေတွာ ပရိဝတ္တိတော ဥဒ္ဓံပါဒေါ အဓောသီသော ဟုတွာ ယောနိမုခါဘိမုခေါ ဟောတိ, ဧဝံ သော ကဿစိ အလဂ္ဂေါ သောတ္ထိနာ ဗဟိ နိက္ခမတိ, ဝိပဇ္ဇမာနော ပန ဝိပရိဝတ္တနဝသေန ယောနိမဂ္ဂံ ပိဒဟိတွာ တိရိယံ နိပဇ္ဇတိ, တထာ ယဿာ ယောနိမဂ္ဂေါ ပိဒဟတိ, သာ တတ္ထ ကမ္မဇဝါတေဟိ အပရာပရံ ပရိဝတ္တမာနာ ဗျာကုလာ မူဠှဂဗ္ဘာတိ ဝုစ္စတိ, တံ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ ‘‘ဂဗ္ဘမူဠှ’’န္တိ. 'महापरित्तं नामेतं' का अर्थ है यह महान अनुभाव वाला परित्त (रक्षा सूत्र) है। क्योंकि स्थविर ने पूर्ण रूप से आर्य जाति में उत्पन्न होकर सत्य के अधिष्ठान से इसे किया। इसीलिए कहा 'सच्चकिरियकतट्ठाने' (सत्य-क्रिया किए गए स्थान पर)। 'गब्भमूळ्हं' (Gabbhamūḷhaṃ) का अर्थ है मूढ़ गर्भ (अवरुद्ध गर्भ)। गर्भ जब परिपक्व होकर प्रसव के समय कर्मज वायु के द्वारा संचालित होकर पलट जाता है, तब पैर ऊपर और सिर नीचे होकर योनि-मुख की ओर हो जाता है, इस प्रकार वह बिना किसी रुकावट के कुशलतापूर्वक बाहर निकल आता है। किन्तु विपत्ति के समय, उलटने के कारण योनि-मार्ग को अवरुद्ध कर तिरछा हो जाता है, जिससे योनि-मार्ग बंद हो जाता है, वह स्त्री वहाँ कर्मज वायु के द्वारा बार-बार व्याकुल होकर 'मूढ़-गर्भा' कहलाती है, उसी के सन्दर्भ में 'गब्भमूळ्हं' कहा गया है। သစ္စကိရိယာ နာမ ဗုဒ္ဓါသယံ အတ္တနော သီလံ ပစ္စဝေက္ခိတွာ ကတာ, တသ္မာ သစ္စကိရိယာ ဝေဇ္ဇကမ္မံ န ဟောတီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ထေရဿပိ စာတိအာဒိနာ ဥပသင်္ကမိတဗ္ဗကာရဏံ ဝဒတိ. ဣမေ ဒွေ ဟေတူ ပဋိစ္စ ဘဂဝါ ထေရံ သစ္စကိရိယံ ကာရေသိ. ဇာတိန္တိ မူလဇာတိံ. 'सच्चकिरिया' (सत्य-क्रिया) बुद्ध के आशय के अनुसार अपने शील का प्रत्यवेक्षण (अवलोकन) करके की जाती है, इसलिए यह समझना चाहिए कि सत्य-क्रिया कोई वैद्य-कर्म (चिकित्सा) नहीं है। 'थेरस्सपि च' (Therassapi ca) आदि के द्वारा पास जाने का कारण बताया गया है। इन दो हेतुओं के कारण भगवान ने स्थविर से सत्य-क्रिया करवाई। 'जातिं' का अर्थ है मूल जाति। ၃၅၂. ပရိယာဒါယ အာဟစ္စ ဘိန္နေန သီသေန. သဘာဂဒိဋ္ဌဓမ္မဝေဒနီယကမ္မန္တိ နိရယေ နိဗ္ဗတ္တနသကကမ္မသဘာဂဘူတံ ဒိဋ္ဌဓမ္မဝေဒနီယကမ္မံ. သဘာဂတာ စ သမာနဝတ္ထုကတာ သမာနာရမ္မဏတာဧကဝီထိပရိယာပန္နတာဒိဝသေန သဗ္ဗထာ သရိက္ခတာ, သဒိသမ္ပိ စ နာမ တဒေဝါဟရီယတိ ယထာ ‘‘တဿေဝ ကမ္မဿ ဝိပါကော’’တိ စ ‘‘သာ ဧဝ တိတ္တိရီ တာနေဝ ဩသဓာနီ’’တိ စ. ဣဒါနိ တမေဝ သဘာဂတံ ဒဿေတုံ ‘‘ကမ္မံ ဟီ’’တိအာဒိ အာရဒ္ဓံ. ကရိယမာနမေဝါတိ ပစ္စယသမဝါယေန ပဋိပါဋိယာ နိဗ္ဗတ္တိယမာနမေဝ. တယော ကောဋ္ဌာသေ ပူရေတိ, ဒိဋ္ဌဓမ္မဝေဒနီယအပရာပရိယာယဝေဒနီယဥပပဇ္ဇဝေဒနီယသင်္ခါတေ တယော ဘာဂေ ပူရေတိ, တေသံ တိဏ္ဏံ ဘာဂါနံ ဝသေန ပဝတ္တတိ. ३५२. 'परियादाय' (Pariyādāya) का अर्थ है प्रहार करके फटे हुए सिर के साथ। 'सभागदिट्ठधम्मवेदनीयकम्मं' का अर्थ है नरक में उत्पन्न होने वाले अपने कर्म के समान (सभाग) इस जन्म में अनुभव किया जाने वाला कर्म। 'सभागता' (समानता) का अर्थ है समान वस्तु, समान आलम्बन और एक ही वीथि (चित्त-प्रवाह) में सम्मिलित होने आदि के कारण पूरी तरह से समानता; और सदृश होने पर भी उसे वही कहा जाता है, जैसे 'उसी कर्म का विपाक' और 'वही तीतर, वही औषधियाँ'। अब उसी सभागता को दिखाने के लिए 'कम्मं हि' (Kammaṃ hi) आदि आरम्भ किया गया। 'करियमानमेव' (Kariyamānameva) का अर्थ है प्रत्ययों के समूह से क्रमपूर्वक उत्पन्न होता हुआ ही। 'तीन भागों को पूरा करता है' - दृष्टधर्मवेदनीय, उपपद्यवेदनीय और अपरापर्पयवेदनीय नामक तीन भागों को पूरा करता है, उन तीन भागों के वश से प्रवृत्त होता है। ဒိဋ္ဌဓမ္မော [Pg.157] ဝုစ္စတိ ပစ္စက္ခဘူတော ပစ္စုပ္ပန္နော အတ္တဘာဝေါ, တတ္ထ ဝေဒိတဗ္ဗဖလံ ကမ္မံ ဒိဋ္ဌဓမ္မဝေဒနီယံ. ပစ္စုပ္ပန္နဘဝတော အနန္တရံ ဝေဒိတဗ္ဗဖလံ ကမ္မံ ဥပပဇ္ဇဝေဒနီယံ. ဒိဋ္ဌဓမ္မာနန္တရဘဝတော အညသ္မိံ အတ္တဘာဝပရိယာယေ အတ္တဘာဝပရိဝတ္တေ ဝေဒိတဗ္ဗဖလံ ကမ္မံ အပရာပရိယာယဝေဒနီယံ. ပဋိပက္ခေဟိ အနဘိဘူတတာယ, ပစ္စယဝိသေသေန ပဋိလဒ္ဓဝိသေသတာယ စ ဗလဝဘာဝပ္ပတ္တာ တာဒိသဿ ပုဗ္ဗာဘိသင်္ခါရဿ ဝသေန သာတိသယာ ဟုတွာ ပဝတ္တာ ပဌမဇဝနစေတနာ တသ္မိံယေဝ အတ္တဘာဝေ ဖလဒါယိနီ ဒိဋ္ဌဓမ္မဝေဒနီယာ နာမ. သာ ဟိ ဝုတ္တာကာရေန ဗလဝတိ ဇဝနသန္တာနေ ဂုဏဝိသေသယုတ္တေသု ဥပကာရာနုပကာရဝသပ္ပဝတ္တိယာ အာသေဝနာလာဘေန အပ္ပဝိပါကတာယ စ ဣတရဒွယံ ဝိယ ပဝတ္တသန္တာနုပရမာပေက္ခံ ဩကာသလာဘာပေက္ခဉ္စ ကမ္မံ န ဟောတီတိ ဣဓေဝ ပုပ္ဖမတ္တံ ဝိယ ပဝတ္တိဝိပါကမတ္တံ ဖလံ ဒေတိ. 'दिट्ठधम्मो' (Diṭṭhadhammo) प्रत्यक्ष वर्तमान आत्मभाव (जीवन) को कहा जाता है, उसमें अनुभव किए जाने वाले फल वाला कर्म 'दृष्टधर्मवेदनीय' है। वर्तमान भव के ठीक बाद (अगले जन्म में) अनुभव किए जाने वाले फल वाला कर्म 'उपपद्यवेदनीय' है। दृष्टधर्म के बाद वाले भव से भिन्न अन्य आत्मभावों के चक्र में अनुभव किए जाने वाले फल वाला कर्म 'अपरापर्पयवेदनीय' है। विपक्षियों (बाधाओं) द्वारा पराजित न होने के कारण और विशेष प्रत्ययों से विशिष्टता प्राप्त कर बलवान होने के कारण, वैसे पूर्व-अभिसंस्कार के वश से अतिशय होकर प्रवृत्त हुई 'प्रथम जवन चेतना' उसी आत्मभाव में फल देने वाली होने के कारण 'दृष्टधर्मवेदनीय' कहलाती है। वह उक्त प्रकार से बलवान जवन-सन्तान में, गुणों से युक्त व्यक्तियों के प्रति उपकार या अपकार के रूप में प्रवृत्त होने से, आसेवन (पुनरावृत्ति) प्राप्त न होने के कारण और अल्प विपाक वाली होने के कारण, अन्य दो (कर्मों) की तरह भविष्य के भव की प्रतीक्षा या अवसर की प्रतीक्षा करने वाला कर्म नहीं होती, बल्कि यहीं फूल के समान केवल प्रवृत्ति-विपाक मात्र फल देती है। တထာ အသက္ကောန္တန္တိ ကမ္မဿ ဖလဒါနံ နာမ ဥပဓိပယောဂါဒိပစ္စယန္တရသမဝါယေနေဝ ဟောတီတိ တဒဘာဝတော တသ္မိံယေဝ အတ္တဘာဝေ ဝိပါကံ ဒါတုံ အသက္ကောန္တံ. အဟောသိကမ္မန္တိ ကမ္မံယေဝ အဟောသိ, န တဿ ဝိပါကော အဟောသိ, အတ္ထိ ဘဝိဿတိ ဝါတိ ဧဝံ ဝတ္တဗ္ဗံ ကမ္မံ. အတ္ထသာဓိကာတိ ဒါနာဒိပါဏာတိပါတာဒိအတ္ထဿ နိပ္ဖာဒိကာ. ကာ ပန သာတိ အာဟ ‘‘သတ္တမဇဝနစေတနာ’’တိ. သာ ဟိ သန္နိဋ္ဌာပကစေတနာ ဝုတ္တနယေန ပဋိလဒ္ဓဝိသေသာ ပုရိမဇဝနစေတနာဟိ လဒ္ဓါသေဝနာ စ သမာနာ အနန္တရေ အတ္တဘာဝေ ဝိပါကဒါယိနီ ဥပပဇ္ဇဝေဒနီယကမ္မံ နာမ. တေနာဟ ‘‘အနန္တရေ အတ္တဘာဝေ ဝိပါကံ ဒေတီ’’တိ. သတိ သံသာရပ္ပဝတ္တိယာတိ ဣမိနာ အသတိ သံသာရပ္ပဝတ္တိယာ အဟောသိကမ္မပက္ခေ တိဋ္ဌတိ ဝိပစ္စနောကာသဿ အဘာဝတောတိ. ‘तथा असक्कोन्तं’ (उसी प्रकार असमर्थ होते हुए) का अर्थ है कि कर्म का फलदान उपधि और प्रयोग आदि अन्य प्रत्ययों के समवाय (मिलन) से ही होता है, अतः उनके अभाव में उसी आत्मभाव (जन्म) में विपाक देने में असमर्थ। ‘अहोसिकम्मं’ (हुआ कर्म) वह कर्म है जो केवल कर्म मात्र था, उसका विपाक न हुआ है, न है और न होगा—ऐसा जिसके विषय में कहा जाना चाहिए। ‘अत्थसाधिका’ का अर्थ है दान आदि या प्राणातिपात आदि प्रयोजनों को सिद्ध करने वाली। वह क्या है? तो कहा—‘सातवीं जवन चेतना’। वह निश्चय करने वाली चेतना, बताए गए तरीके से विशेष अवस्था को प्राप्त और पूर्व की जवन चेतनाओं से आसेवन प्राप्त होने के कारण, अनन्तर आत्मभाव (अगले जन्म) में विपाक देने वाली होने से ‘उपपज्जवेदनीय कर्म’ कहलाती है। इसीलिए कहा—‘अनन्तर आत्मभाव में विपाक देता है’। ‘सति संसारप्पवत्तिया’ (संसार की प्रवृत्ति होने पर) इस कथन से यह स्पष्ट है कि संसार की प्रवृत्ति न होने पर, विपाक के अवसर के अभाव के कारण, वह ‘अहोसिकर्म’ के पक्ष में स्थित हो जाता है। သမုဂ္ဃာဋိတာနိ ဝိပစ္စနောကာသဿ အနုပ္ပတ္တိဓမ္မတာပါဒနေန. ဒိဋ္ဌဓမ္မဝေဒနီယံ အတ္ထိ ဝိပါကာရဟာဘာဝဿ အနိဗ္ဗတ္တိတတ္တာ ဝိပစ္စနောကာသဿ အနုပစ္ဆိန္နတ္တာ. ကတူပစိတဉှိ ကမ္မံ သတိ ဝိပစ္စနောကာသေ ယာဝ န ဖလံ ဒေတိ, တာဝ အတ္ထေဝ နာမ ဝိပါကာရဟဘာဝတော. ‘‘ယဿ ခေါ’’တိ ဣဒံ အနိယမာကာရဝစနံ ဘဂဝတာ ကမ္မသရိက္ခတာဝသေန သာဓာရဏတော ဝုတ္တန္တိ အာဟ ‘‘ယာဒိသဿ ခေါ’’တိ. विपाक के अवसर की अप्राप्ति की धर्मता को प्राप्त करा देने से वे (कर्म) समूद्घाटित (नष्ट) हो जाते हैं। ‘दिट्ठधम्मवेदनीय’ (इसी जन्म में वेद्य) कर्म तब तक विद्यमान रहता है जब तक विपाक की अयोग्यता उत्पन्न नहीं होती और विपाक का अवसर छिन्न नहीं होता। क्योंकि किया गया और संचित किया गया कर्म, विपाक का अवसर होने पर, जब तक फल नहीं देता, तब तक विपाक की योग्यता के कारण वह विद्यमान ही कहलाता है। ‘यस्स खो’ (जिसके लिए) यह अनियमवाचक वचन भगवान द्वारा कर्म की समानता के आधार पर सामान्य रूप से कहा गया है, इसीलिए कहा—‘यादिसस्स खो’ (जिस प्रकार के व्यक्ति के लिए)। ပမာဒကိလေသဝိမုတ္တောတိ ပမာဒဟေတုကေဟိ သဗ္ဗေဟိ ကိလေသေဟိ ဝိမုတ္တော. ‘पमादकिलेसविमुत्तो’ का अर्थ है प्रमाद के कारण होने वाले सभी क्लेशों से मुक्त। ပါပဿ [Pg.158] ပိဓာနံ နာမ အဝိပါကဓမ္မတာပါဒနန္တိ အာဟ ‘‘အပ္ပဋိသန္ဓိကံ ကရီယတီ’’တိ. ဗုဒ္ဓသာသနေတိ သိက္ခာတ္တယသင်္ဂဟေ ဗုဒ္ဓဿ ဘဂဝတော သာသနေ. ယုတ္တပ္ပယုတ္တော ဝိဟရတီတိ အကတ္တဗ္ဗဿ အကရဏဝသေန, ကတ္တဗ္ဗဿ စ ပရိပူရဏဝသေန ပဝတ္တတိ. पाप का ‘पिधान’ (ढकना) विपाक न देने वाली धर्मता को प्राप्त करा देना है, इसीलिए कहा—‘अप्पटिसन्धिकं करीयती’ (पुनर्जन्म रहित कर दिया जाता है)। ‘बुद्धसासने’ का अर्थ है त्रिशिक्षा के संग्रह स्वरूप भगवान बुद्ध के शासन में। ‘युत्तप्पयुत्तो विहरती’ का अर्थ है न करने योग्य कार्यों को न करने के द्वारा और करने योग्य कार्यों की परिपूर्णता के द्वारा प्रवृत्त होना। ဒိဿန္တိ ကုဇ္ဈန္တီတိ ဒိသာ, ပဋိပက္ခာတိ အာဟ ‘‘သပတ္တာ’’တိ. တပ္ပသံသပကာရန္တိ မေတ္တာနိသံသကိတ္တနာကာရံ. ကာလေနာတိ အာမေဍိတလောပေန နိဒ္ဒေသောတိ အာဟ ‘‘ခဏေ ခဏေ’’တိ. အနုကရောန္တူတိ ယေသံ ကလျာဏမိတ္တာနံ သန္တိကေ သုဏန္တိ, ယထာသုတံ ဓမ္မံ တေသံ အနုကရောန္တု ဒိဋ္ဌာနုဂတိကရဏံ အာပဇ္ဇန္တု, အတ္တနော ဝေရိပုဂ္ဂလာနမ္ပိ ဘဂဝတော သန္တိကေ ဓမ္မဿဝနံ သမ္မာပဋိပတ္တိဉ္စ ပစ္စာသီသတိ. ‘दिस्सन्ति कुज्झन्तीति दिसा’—जो द्वेष करते हैं वे दिशाएँ (शत्रु) हैं, वे प्रतिपक्ष हैं, इसीलिए कहा—‘सपत्ता’ (शत्रु)। ‘तप्पसंसापकारं’ का अर्थ है मैत्री के नृशंस (लाभों) के कीर्तन का प्रकार। ‘कालेन’ यहाँ पुनरुक्ति के लोप के साथ निर्देश है, इसीलिए कहा—‘खणे खणे’ (क्षण-क्षण में)। ‘अनुकरोन्तु’ का अर्थ है जिन कल्याणमित्रों के समीप वे सुनते हैं, सुने हुए धर्म के अनुसार उनका अनुकरण करें, उनके दृष्टान्त का अनुसरण करें; वह अपने वैरी व्यक्तियों के लिए भी भगवान के समीप धर्म-श्रवण और सम्यक् प्रतिपत्ति (सही आचरण) की आशा करता है। တသန္တိ ဂတိံ ပတ္ထယန္တီတိ တသာ ဘဝန္တရာဒီသု သံသရဏဘာဝတော. တေနာဟ ‘‘တသာ ဝုစ္စန္တိ သတဏှာ’’တိ. ‘तसन्ति’ (काँपते हैं) अर्थात् गति की इच्छा करते हैं, इसलिए वे ‘तसा’ कहलाते हैं, क्योंकि वे भवान्तर आदि में संसरण करते हैं। इसीलिए कहा गया है—‘तृष्णा सहित प्राणियों को त्रस (तसा) कहा जाता है’। နေတဗ္ဗဋ္ဌာနံ ဥဒကံ နယန္တီတိ နေတ္တိကာ. ဗန္ဓိတွာတိ ဒဠှံ ဗန္ဓိတွာ. တေလကဉ္ဇိကေနာတိ တေလမိဿိတေန ကဉ္ဇိကေန. जो जल को ले जाने योग्य स्थान पर ले जाते हैं, वे ‘नेत्तिका’ (नहर बनाने वाले) हैं। ‘बन्धित्वा’ का अर्थ है दृढ़ता से बाँधकर। ‘तेलकञ्जिकेन’ का अर्थ है तेल मिश्रित कांजी (खट्टे चावल के पानी) से। ယာဒိသောဝ အနိဋ္ဌေ, တာဒိသောဝ ဣဋ္ဌေတိ ဣဋ္ဌာနိဋ္ဌေ နိဗ္ဗိကာရေန တာဒီ. ယေသံ ပန ကာမာမိသာဒီနံ ဝန္တတ္တာ ရာဂါဒီနံ စတ္တတ္တာ ကာမောဃာဒီနံ တိဏ္ဏတ္တာ တာဒိဘာဝေါ ဘဝေယျ, တေသံ ဘဂဝတာ သဗ္ဗသော ဝန္တာ စတ္တာ တိဏ္ဏာ, တသ္မာ ဘဂဝါ ဝန္တာဝီတိ တာဒီ, စတ္တာဝီတိ တာဒီ, တိဏ္ဏာဝီတိ တာဒီ, ယေဟိ အနညသာဓာရဏေဟိ သီလာဒိဂုဏေဟိ သမန္နာဂတတ္တာ ဘဂဝါ တာဒိဘာဝေန ဥက္ကံသပါရမိပ္ပတ္တော တံနိဒ္ဒေသော, တေဟိ ဂုဏေဟိ ယာထာဝတော နိဒ္ဒိသိတဗ္ဗတောပိ တာဒီ. ယထာ ယန္တရဇ္ဇုယာ ယန္တံ နီယတိ, ဧဝံ ယာယ တဏှာယ ဘဝေါ နီယတိ, သာ ‘‘ဘဝနေတ္တိ ဘဝရဇ္ဇူ’’တိ ဝုတ္တာ. တေနာဟ ‘‘တာယ ဟီ’’တိအာဒိ, ကမ္မာနိ ကုသလာဒီနိ ဝိပစ္စယန္တိ အပစ္စယန္တိ ဧတာယာတိ ကမ္မဝိပါကော. အပစ္စယဘာဝေါ နာမ အရိယမဂ္ဂစေတနာယာတိ အာဟ ‘‘မဂ္ဂစေတနာယာ’’တိ. ယာဝ န ကိလေသာ ပဟီယန္တိ, တာဝ ဣမေ သတ္တာ သဣဏာ ဧဝ အသေရိဝိဟာရဘာဝတောတိ အာဟ ‘‘အဏဏော နိက္ကိလေသော ဇာတော’’တိ. जैसा अनिष्ट में, वैसा ही इष्ट में—इस प्रकार इष्ट और अनिष्ट में निर्विकार रहने वाला ‘तादी’ है। जिन कामामिष आदि के वमन (त्याग) कर देने से, राग आदि के त्याग देने से और कामौघ आदि के तर जाने से ‘तादी-भाव’ होता है, उन सबको भगवान ने पूरी तरह वमन कर दिया है, त्याग दिया है और वे तर गए हैं; इसलिए भगवान ‘वन्तावी’ होने से तादी हैं, ‘चत्तावी’ होने से तादी हैं, ‘तिण्णावी’ होने से तादी हैं। जिन असाधारण शील आदि गुणों से युक्त होने के कारण भगवान तादी-भाव में उत्कर्ष की पराकाष्ठा (पारमी) को प्राप्त हुए हैं, यह उनका निर्देश है; उन गुणों के द्वारा यथार्थ रूप से निर्दिष्ट किए जाने योग्य होने के कारण भी वे ‘तादी’ हैं। जैसे यन्त्र की रस्सी से यन्त्र खींचा जाता है, वैसे ही जिस तृष्णा से भव खींचा जाता है, उसे ‘भवनैत्री’ या ‘भवरज्जु’ कहा गया है। इसीलिए ‘ताय ही’ आदि कहा गया। कुशल आदि कर्म जिसके द्वारा विपाक देते हैं या नहीं देते, वह ‘कर्मविपाक’ है। प्रत्यय का अभाव (अपच्चयभाव) आर्यमार्ग की चेतना में होता है, इसीलिए कहा—‘मग्गचेतनाया’ (मार्ग चेतना के द्वारा)। जब तक क्लेश प्रहीण नहीं होते, तब तक ये सत्त्व ‘स-ऋण’ (ऋणी) ही हैं क्योंकि वे स्वतन्त्र विहार नहीं कर सकते; इसीलिए कहा—‘अणणो निक्किलेसो जातो’ (निष्क्लेश होकर वह अनृण/ऋणमुक्त हो गया)। ထေယျပရိဘောဂေါ (ဝိသုဒ္ဓိ. ဋီ. ၁.၉၁) နာမ သာမိပရိဘောဂါဘာဝတော. ဘဂဝတာပိ ဟိ အတ္တနော သာသနေ သီလဝတော ပစ္စယာ အနုညာတာ, န ဒုဿီလဿ, ဒါယကာနံ [Pg.159] သီလဝတောယေဝ ပရိစ္စာဂေါ, န ဒုဿီလဿ အတ္တနော ကာရာနံ မဟပ္ဖလဘာဝဿ ပစ္စာသီသနတော. ဣတိ သတ္ထာရာ အနနုညာတတ္တာ ဒါယကေဟိ စ အပရိစ္စတ္တတ္တာ ‘‘ဒုဿီလဿ ပရိဘောဂေါ ထေယျပရိဘောဂေါ နာမာ’’တိ ဝုတ္တံ. ဣဏဝသေန ပရိဘောဂေါ ဣဏပရိဘောဂေါ. ပဋိဂ္ဂါဟကတော ဒက္ခိဏာဝိသုဒ္ဓိယာ အဘာဝတော ဣဏံ ဂဟေတွာ ပရိဘောဂေါ ဝိယာတိ အတ္ထော. ယသ္မာ သေက္ခာ ဘဂဝတော ဩရသပုတ္တာ, တသ္မာ တေ ပိတုသန္တကာနံ ပစ္စယာနံ ဒါယာဒါ ဟုတွာ တေ ပစ္စယေ ပရိဘုဉ္ဇန္တီတိ တေသံ ပရိဘောဂေါ ဒါယဇ္ဇပရိဘောဂေါ နာမ. ကိံ ပန တေ ဘဂဝတော ပစ္စယေ ပရိဘုဉ္ဇန္တိ, ဥဒါဟု ဂိဟီဟိ ဒိန္နန္တိ? ဂိဟီဟိ ဒိန္နာပိ တေ ဘဂဝတာ အနုညာတတ္တာ ဘဂဝတော သန္တကာ ဟောန္တိ အနနုညာတေသု သဗ္ဗေန သဗ္ဗံ ပရိဘောဂါဘာဝတော အနုညာတေသုယေဝ ပရိဘောဂသမ္ဘဝတော. ဓမ္မဒါယာဒသုတ္တဉ္စေတ္ထ (မ. နိ. ၁.၂၉ အာဒယော) သာဓကံ. ‘थेय्यपरिभोगो’ (स्तेय-परिभोग/चोरी का उपभोग) वह है जो स्वामी के अधिकार के बिना किया जाए। भगवान ने भी अपने शासन में शीलवान के लिए ही प्रत्ययों (आवश्यकताओं) की अनुमति दी है, दुःशील के लिए नहीं; दायक (दान देने वाले) भी शीलवान को ही त्याग (दान) करते हैं, दुःशील को नहीं, क्योंकि वे अपने कर्मों के महाफल होने की आशा करते हैं। इस प्रकार शास्ता द्वारा अननुज्ञात (अनुमति न दिए जाने) के कारण और दायकों द्वारा (दुःशील के लिए) अर्पित न होने के कारण ‘दुःशील का परिभोग चोरी का परिभोग है’—ऐसा कहा गया है। ऋण के रूप में परिभोग ‘इणपरिभोग’ है। प्रतिग्राहक की ओर से दक्षिणा की शुद्धि न होने के कारण, यह ऋण लेकर उपभोग करने के समान है। चूँकि शैक्ष (साधक) भगवान के औरस पुत्र हैं, इसलिए वे पिता की सम्पत्ति रूपी प्रत्ययों के दायाद (उत्तराधिकारी) होकर उन प्रत्ययों का उपभोग करते हैं, अतः उनका परिभोग ‘दायज्जपरिभोग’ (दायाद-परिभोग) कहलाता है। क्या वे भगवान के प्रत्ययों का उपभोग करते हैं या गृहस्थों द्वारा दिए गए? यद्यपि वे गृहस्थों द्वारा दिए गए हैं, फिर भी भगवान द्वारा अनुमत होने के कारण वे भगवान की सम्पत्ति ही होते हैं, क्योंकि अननुज्ञात वस्तुओं का सर्वथा उपभोग नहीं हो सकता, केवल अनुमत वस्तुओं का ही उपभोग सम्भव है। यहाँ ‘धम्मदयाद सुत्त’ इसका प्रमाण है। အဝီတရာဂါနံ တဏှာပရဝသတာယ ပစ္စယပရိဘောဂေ သာမိဘာဝေါ နတ္ထိ, တဒဘာဝေန ဝီတရာဂါနံ တတ္ထ သာမိဘာဝေါ ယထာရုစိ ပရိဘောဂသမ္ဘဝတော. တထာ ဟိ တေ ပဋိကူလမ္ပိ အပ္ပဋိကူလာကာရေန, အပ္ပဋိကူလမ္ပိ ပဋိကူလာကာရေန တဒုဘယံ ဝိဝဇ္ဇေတွာ ဥပေက္ခာကာရေန စ ပစ္စယေ ပရိဘုဉ္ဇန္တိ, ဒါယကာနဉ္စ မနောရထံ ပရိပူရေန္တိ. သေသမေတ္ထ ယံ ဝတ္တဗ္ဗံ, တံ ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂေ, တံသံဝဏ္ဏနာသု စ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ကိလေသဣဏာနံ အဘာဝံ သန္ဓာယ ‘‘အဏဏော’’တိ ဝုတ္တံ, န ပစ္စဝေက္ခိတပရိဘောဂမတ္တံ. တေနာဟ အာယသ္မာ စ ဗာကုလော – ‘‘သတ္တာဟမေဝ ခေါ အဟံ, အာဝုသော, သရဏော ရဋ္ဌပိဏ္ဍံ ဘုဉ္ဇိ’’န္တိ (မ. နိ. ၃.၂၁၁). राग से मुक्त न होने वालों का तृष्णा के वशीभूत होने के कारण प्रत्ययों के उपभोग में स्वामित्व नहीं है, उसके अभाव में रागमुक्त जनों का वहाँ अपनी रुचि के अनुसार उपभोग संभव होने से स्वामित्व है। क्योंकि वे प्रतिकूल को भी अनुकूल के रूप में, और अनुकूल को भी प्रतिकूल के रूप में, उन दोनों को त्यागकर उपेक्षा के भाव से प्रत्ययों का उपभोग करते हैं, और दानदाताओं के मनोरथ को पूरा करते हैं। यहाँ शेष जो कुछ कहना है, वह विशुद्धिमार्ग और उसकी व्याख्याओं में कहे गए तरीके से ही समझना चाहिए। क्लेश रूपी ऋणों के अभाव के संदर्भ में 'ऋणमुक्त' (अणणो) कहा गया है, न कि केवल प्रत्यवेक्षण पूर्वक उपभोग मात्र को। इसीलिए आयुष्मान बाकुल ने कहा - "हे आयुष्मानों, मैं केवल सात दिन ही राष्ट्र के पिण्ड का ऋणी होकर (सराणो) भोक्ता रहा।" ဝတ္ထုကာမကိလေသကာမေဟိ တဏှာယ ပဝတ္တိအာကာရံ ပဋိစ္စ အတ္ထိ ရမဏဝေါဟာရောတိ အာဟ – ‘‘ဒုဝိဓေသုပိ ကာမေသု တဏှာရတိသန္ထဝ’’န္တိ. မန္တိတန္တိ ကထိတံ. ဥပ္ပန္နေဟိ သတ္ထုပဋိညေဟိ. သံဝိဘတ္တာတိ ကုသလာဒိဝသေန ခန္ဓာဒီဟိ အာကာရေဟိ ဝိဘတ္တာ. သုန္ဒရံ အာဂမနန္တိ သွာဂတံ. တတော ဧဝ န ကုစ္ဆိတံ အာဂတံ. သောဠသဝိဓကိစ္စဿ ပရိယောသိတတ္တာ အာဟ ‘‘တံ သဗ္ဗံ မယာ ကတ’’န္တိ. မဂ္ဂပညာယမေဝ တတိယဝိဇ္ဇာသမညာတိ အာဟ – ‘‘တီဟိ ဝိဇ္ဇာဟိ နဝဟိ စ လောကုတ္တရဓမ္မေဟီ’’တိ. वस्तु-काम और क्लेश-काम के प्रति तृष्णा की प्रवृत्ति के आकार के कारण 'रमण' (आनंद) का व्यवहार होता है, इसलिए कहा - "दोनों प्रकार के कामों में तृष्णा की रति का संसर्ग"। 'मन्तितं' का अर्थ है कहा गया। उत्पन्न हुए शास्ता होने की प्रतिज्ञा करने वालों के द्वारा। 'संविभत्ता' का अर्थ है कुशल आदि के भेद से स्कन्ध आदि आकारों में विभक्त। 'सुन्दर आगमन' का अर्थ है स्वागत। इसीलिए वह कुत्सित (बुरा) आगमन नहीं है। सोलह प्रकार के कृत्यों की समाप्ति होने के कारण कहा "वह सब मेरे द्वारा किया गया"। मार्ग-प्रज्ञा में ही तीसरी विद्या की संज्ञा है, इसलिए कहा - "तीन विद्याओं और नौ लोकोत्तर धर्मों के साथ"। အင်္ဂုလိမာလသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. अङ्गुलिमाल सुत्त की व्याख्या के लीनत्थप्पकासना (गूढ़ अर्थ का प्रकाशन) समाप्त हुई। ၇. ပိယဇာတိကသုတ္တဝဏ္ဏနာ ७. पियजातिक सुत्त की व्याख्या ၃၅၃. ပကတိနိယာမေနာတိ [Pg.160] ယထာ သောကုပ္ပတ္တိတော ပုဗ္ဗေ ဣတိ ကတ္တဗ္ဗေသု အသမ္မောဟဝသေန စိတ္တံ ပက္ခန္ဒတိ, တာနိ စဿ ဥပဋ္ဌဟန္တိ, န ဧဝံ သောကဿ စိတ္တသင်္ကောစသဘာဝတော. တေန ဝုတ္တံ ‘‘ပကတိနိယာမေန ပန န ပဋိဘန္တီ’’တိ. ကေစိ ပန ‘‘သာမန္တာ ကတိပယေ န ကုဋုမ္ဗံ သန္ဓာရေတိ. တေနာဟ ‘န သဗ္ဗေန သဗ္ဗံ ပဋိဘန္တီ’တိ’’ ဝဒန္တိ. ဧတ္ထာတိ ဒုတိယပဒေ. အနေကတ္ထတ္တာ ဓာတူနံ ‘‘န ပဋိဘာတီ’’တိ ပဒဿ ‘‘န ရုစ္စတီ’’တိ အတ္ထမာဟ. န ပဋိဘာတီတိ ဝါ ဘုဉ္ဇိတုကာမတာစိတ္တံ န ဥပဋ္ဌိတန္တိ အတ္ထော. ပတိဋ္ဌိတောကာသန္တိ ဣန္ဒြိယာဝိဋ္ဌဋ္ဌာနံ ဝဒတိ. ပိယာယိတဗ္ဗတော ပိယော ဇာတိ ဥပ္ပတ္တိဋ္ဌာနံ ဧတေသန္တိ ပိယဇာတိကာ. ပိယော ပဘုတိ ဧတေသန္တိ ပိယပ္ပဘုတိကာတိ ဝတ္တဗ္ဗေ, ဥ-ကာရဿ ဝ-ကာရံ, တ-ကာရဿ စ လောပံ ကတွာ ‘‘ပိယပ္ပဘာဝိကာ’’တိ ဝုတ္တံ. တေနာဟ ‘‘ပိယတော ပဘဝန္တီ’’တိ. ३५३. 'प्रकृति-नियम से' का अर्थ है कि जैसे शोक की उत्पत्ति से पूर्व 'यह करना चाहिए' इस प्रकार के कार्यों में सम्मोह रहित होने के कारण चित्त प्रवृत्त होता है और वे कार्य उसे उपस्थित (याद) रहते हैं, शोक के समय चित्त के संकुचित होने के स्वभाव के कारण वैसा नहीं होता। इसीलिए कहा गया "प्रकृति-नियम से वे प्रतिभासित नहीं होते"। कुछ लोग कहते हैं कि "समीप के कुछ लोग कुटुम्ब को नहीं सँभालते। इसीलिए कहा 'पूरी तरह से प्रतिभासित नहीं होते'।" यहाँ दूसरे पद में। धातुओं के अनेक अर्थ होने के कारण "प्रतिभासित नहीं होता" (न पटिभाति) इस पद का "रुचिकर नहीं लगता" (न रुच्चति) यह अर्थ कहा है। अथवा "प्रतिभासित नहीं होता" का अर्थ है कि भोजन करने की इच्छा वाला चित्त उपस्थित नहीं हुआ। 'प्रतिष्ठित स्थान' का अर्थ इन्द्रियों के अधिष्ठान को कहते हैं। प्रिय होने योग्य होने से 'प्रिय', जाति का अर्थ उत्पत्ति स्थान है जिनका, वे 'पियजातिका' हैं। प्रिय जिनसे आरम्भ होता है वे 'पियप्पभूतिका' कहना चाहिए था, किन्तु 'उ' कार का 'व' कार और 'त' कार का लोप करके 'पियप्पभाविका' कहा गया है। इसीलिए कहा "प्रिय से उत्पन्न होते हैं"। ၃၅၅. ပရ-သဒ္ဒေန သမာနတ္ထံ အဇ္ဈတ္တိကဘာဝနိသေဓနတ္ထံ ‘‘ပိရေ’’တိ ပဒန္တိ အာဟ ‘‘အမှာကံ ပရေ’’တိ. ပိရေတိ ဝါ ‘‘ပရတော’’တိ ဣမိနာ သမာနတ္ထံ နိပါတပဒန္တိ အာဟ ‘‘စရ ပိရေတိ ပရတော ဂစ္ဆာ’’တိ. ३५५. 'पर' शब्द के समान अर्थ में, आध्यात्मिक भाव के निषेध के लिए 'पिरे' पद है, ऐसा कहा "हमारे पर (दूसरे)"। अथवा 'पिरे' यह 'परतो' (परे) के समान अर्थ वाला निपात पद है, ऐसा कहा "चलो पिरे (परे), दूर जाओ"। ၃၅၆. ဒွိဓာ ဆေတွာတိ ဧတ္ထ ယဒိ ဣတ္ထီ တဿ ပုရိသဿ ပိယာ, ကထံ ဒွိဓာ ဆိန္ဒတီတိ အာဟ ‘‘ယဒိ ဟီ’’တိအာဒိ. ३५६. 'दो भागों में काटकर' यहाँ यदि वह स्त्री उस पुरुष की प्रिया है, तो वह उसे दो भागों में कैसे काटता है, इसके लिए "यदि हि" आदि कहा गया है। ၃၅၇. ကထံ ကထေယျန္တိ ယထာ ဘဂဝါ ဧတဿ ဗြာဟ္မဏဿ ကထေသိ, သော စ မေ ကထေသိ, တထာ စာဟံ ကထေယျံ. မရဏဝသေန ဝိပရိဏာမော အတ္တဘာဝဿ ပရိဝတ္တတ္တာ. ပလာယိတွာ ဂမနဝသေန အညထာဘာဝေါ မိတ္တသန္ထဝဿ သမာဂမဿ စ အညထာဘူတတ္တာ. ३५७. 'कैसे कहूँ' का अर्थ है जैसे भगवान ने इस ब्राह्मण से कहा, और उसने मुझसे कहा, वैसे ही मैं कहूँ। मरण के कारण आत्मभाव (शरीर) के बदल जाने से 'विपरिणाम' होता है। भाग जाने के कारण मित्र-संसर्ग और समागम के बदल जाने से 'अन्यथाभाव' होता है। ဆဍ္ဍိတဘာဝေနာတိ ပရိဝတ္တိတဘာဝေန. ဟတ္ထဂမနဝသေန အညထာဘာဝေါ ပုဗ္ဗေ သဝသေ ဝတ္တိတာနံ ဣဒါနိ ဝသေ အဝတ္တနဘာဝေန. 'छोड़ दिए जाने के भाव से' का अर्थ है परिवर्तित भाव से। दूसरे के हाथ में चले जाने के कारण 'अन्यथाभाव' होता है, जो पहले अपने वश में थे, अब वश में न रहने के कारण। အာစမေဟီတိ အာစမနံ မုခဝိက္ခာလနံ ကာရေဟိ. ယသ္မာ မုခံ ဝိက္ခာလေန္တာ ဟိ ဟတ္ထပါဒေ ဓောဝိတွာ ဝိက္ခာလေန္တိ, တသ္မာ ‘‘အာစမိတွာ’’တိ ဝတွာ ပစ္ဆာပိ တဿ အတ္ထံ ဒဿေန္တော ‘‘မုခံ ဝိက္ခာလေတွာ’’တိ အာဟ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. 'आचमन कराओ' का अर्थ है मुख प्रक्षालन (मुँह धोना) कराओ। चूँकि मुख प्रक्षालन करने वाले हाथ-पैर धोकर ही मुख प्रक्षालन करते हैं, इसलिए 'आचमन करके' कहकर बाद में उसका अर्थ दिखाते हुए 'मुख प्रक्षालन करके' कहा। शेष सुविज्ञेय (आसानी से समझने योग्य) ही है। ပိယဇာတိကသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. पियजातिक सुत्त की व्याख्या के लीनत्थप्पकासना समाप्त हुई। ၈. ဗာဟိတိကသုတ္တဝဏ္ဏနာ ८. बाहितिक सुत्त की व्याख्या ၃၅၉. သာဝဇ္ဇတာယ [Pg.161] ဥပါရမ္ဘံ အရဟတီတိ ဩပါရမ္ဘော. တေနာဟ ‘‘ဒေါသံ အာရောပနာရဟော’’တိ. ဗာလာ ဥပါရမ္ဘဝတ္ထုမညံ အမူလကမ္ပိ နံ အာရောပေန္တာ ဥဂ္ဃောသေန္တိ, တသ္မာ တေ အနာမသိတွာ ‘‘ဝိညူဟီ’’တိ ဣဒံ ပဒံ ဂဟေတွာ ပဉှေန ဉာတုံ ဣစ္ဆိတေန အတ္ထေန ဥပါရမ္ဘာဒီနံ ဥပရိ ဥတ္တရံ ပရိပူရေတုံ နာသက္ခိမှာ. တံ ကာရဏန္တိ တံ ဥပ္ပတ္တိကာရဏံ. ယဒိ ဟိ မယာ ‘‘ဝိညူဟီ’’တိ ပဒံ ပက္ခိပိတွာ ဝုတ္တံ ဘဝေယျ, ပဉှာ မေ ပရိပုဏ္ဏာ ဘဝေယျ, န ပန ဝုတ္တာ. ဣဒါနိ ပန တံ ကာရဏံ ဥတ္တရံ အာယသ္မတာ အာနန္ဒေန ‘‘ဝိညူဟီ’’တိ ဧဝံ ဝဒန္တေန ပရိပူရိတံ. ३५९. सदोष होने के कारण जो उपालम्भ (निन्दा) के योग्य है, वह 'ओपालम्भो' है। इसीलिए कहा "दोषारोपण के योग्य"। मूर्ख लोग उपालम्भ की वस्तु को अन्य अमूलक (बिना आधार के) होने पर भी आरोपित करके शोर मचाते हैं, इसलिए उन्हें न छूकर (छोड़कर) 'विज्ञों द्वारा' (विञ्ञूहि) इस पद को लेकर, प्रश्न से जानने की इच्छा वाले अर्थ से उपालम्भ आदि के ऊपर उत्तर पूरा करने में हम समर्थ नहीं हुए। 'वह कारण' का अर्थ है वह उत्पत्ति का कारण। यदि मेरे द्वारा 'विज्ञों द्वारा' पद को डालकर कहा गया होता, तो मेरा प्रश्न परिपूर्ण होता, किन्तु वैसा नहीं कहा गया। अब वह कारण रूपी उत्तर आयुष्मान आनन्द द्वारा 'विज्ञों द्वारा' ऐसा कहते हुए पूरा किया गया है। ၃၆၀. ကောသလ္လပဋိပက္ခတော အကောသလ္လံ ဝုစ္စတိ အဝိဇ္ဇာ, တံသမုဋ္ဌာနတော အကောသလ္လသမ္ဘူတော. အဝဇ္ဇံ ဝုစ္စတိ ဂရဟိတဗ္ဗံ, သဟ အဝဇ္ဇေဟီတိ သာဝဇ္ဇော, ဂါရယှော. ရာဂါဒိဒေါသေဟိ သဒေါသော. တေဟိ ဧဝ သဗျာဗဇ္ဈော, တတော ဧဝ သမ္ပတိ အာယတိဉ္စ သဒုက္ခော. သဗျာဗဇ္ဈာဒိကော နိဿန္ဒဝိပါကော. ३६०. कुशलता के प्रतिपक्ष होने से अकुशलता 'अविद्या' को कहा जाता है, उससे समुत्थान होने के कारण 'अकुशल-सम्भूत' है। 'अवज्ज' (वर्ज्य) निन्दनीय को कहा जाता है, दोषों (अवज्ज) के साथ होने से 'सावज्ज' (सदोष) है, जो गर्हणीय है। राग आदि दोषों के कारण 'सदोष' है। उन्हीं के कारण 'सब्याबज्झ' (व्याधि/पीड़ा युक्त) है, उसी से वर्तमान और भविष्य में 'दुःख सहित' है। 'सब्याबज्झ' आदि निष्यन्द फल (परिणाम) हैं। တထာ အတ္ထော ဝုတ္တော ဘဝေယျာတိ ပုစ္ဆာသဘာဂေနပိ အတ္ထော ဝုတ္တော ဘဝေယျ, ပုစ္ဆန္တဿ ပန န တာဝ စိတ္တာရာဓနံ. တေနာဟ – ‘‘ဧဝံ ဗျာကရဏံ ပန န ဘာရိယ’’န္တိ, ဂရုကရဏံ န ဟောတိ ဝိသာရဇ္ဇံ န သိယာတိ အဓိပ္ပာယော. တေနာဟ – ‘‘အပ္ပဟီနအကုသလောပိ ဟိ ပဟာနံ ဝဏ္ဏေယျာ’’တိ. ဧဝရူပေါ ပန ယထာကာရီ တထာဝါဒီ န ဟောတိ, န ဧဝံ ဘဂဝါတိ အာဟ ‘‘ဘဂဝါ’’တိအာဒိ. ဧဝံ ဗျာကာသီတိ ‘‘သဗ္ဗာကုသလဓမ္မပဟီနော ခေါ, မဟာရာဇ, တထာဂတော’’တိ ဧဝံ ဗျာကာသိ. သုက္ကပက္ခေပိ ဧသေဝ နယောတိ ဣမိနာ ‘‘သဗ္ဗေသံယေဝ ကုသလာနံ ဓမ္မာနံ ဥပသမ္ပဒံ ဝဏ္ဏေတီ’’တိ ဝုတ္တေ ယထာ ပုစ္ဆာ, တထာ အတ္ထော ဝုတ္တော ဘဝေယျ, ဧဝံ ဗျာကရဏံ ပန န ဘာရိယံ, အသမ္ပာဒိတကုသလဓမ္မောပိ ဥပသမ္ပဒံ ဝဏ္ဏေယျ. ဘဂဝါ ပန သမ္မဒေဝ သမ္ပာဒိတကုသလတ္တာ ယထာကာရီ တထာဝါဒီတိ ဒဿေတုံ ‘‘ဧဝံ ဗျာကာသီ’’တိ ဣမမတ္ထံ ဒဿေတိ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. "तथा अर्थ कहा गया होगा" - इस प्रकार प्रश्न के अनुरूप भी अर्थ कहा गया होगा, परन्तु पूछने वाले के चित्त की संतुष्टि तब तक नहीं होती। इसलिए कहा - "इस प्रकार का व्याकरण (उत्तर) भारी नहीं है", इसका अभिप्राय है कि गौरव (कठिनाई) नहीं होती और वैशारद्य (आत्मविश्वास) नहीं होता। इसलिए कहा - "अप्रहीण अकुशल वाला भी प्रहाण की प्रशंसा कर सकता है।" इस प्रकार का व्यक्ति 'यथाकारी तथावादी' नहीं होता, भगवान ऐसे नहीं हैं, इसलिए 'भगवान' आदि कहा। "इस प्रकार उत्तर दिया" - "महाराज, तथागत ने सभी अकुशल धर्मों का प्रहाण कर दिया है", इस प्रकार उत्तर दिया। शुक्ल पक्ष में भी यही नय (विधि) है - "सभी कुशल धर्मों की उपसम्पदा की प्रशंसा करते हैं", ऐसा कहने पर जैसा प्रश्न है, वैसा ही अर्थ कहा गया होगा, इस प्रकार का व्याकरण भारी नहीं है, जिसने कुशल धर्मों को सम्पादित नहीं किया है, वह भी उपसम्पदा की प्रशंसा कर सकता है। परन्तु भगवान ने सम्यक् रूप से कुशल धर्मों को सम्पादित किया होने के कारण वे 'यथाकारी तथावादी' हैं, यह दिखाने के लिए "इस प्रकार उत्तर दिया" यह अर्थ दिखाया गया है। शेष सुविज्ञेय (आसानी से समझने योग्य) ही है। ဗာဟိတိကသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. बाहितिकसुत्त की वर्णना (व्याख्या) की लीनत्थप्पकासना (गूढ़ार्थ प्रकाशिनी टीका) समाप्त हुई। ၉. ဓမ္မစေတိယသုတ္တဝဏ္ဏနာ ९. धम्मचेतियसुत्त की वर्णना। ၃၆၄. မေဒဝဏ္ဏာ [Pg.162] ဥဠုပဝဏ္ဏာ စ တတ္ထ တတ္ထ ပါသာဏာ ဥဿန္နာ အဟေသုန္တိ မေဒါဠုပန္တိ ဂါမဿ သမညာ ဇာတာ. ဥဠုပဝဏ္ဏာတိ စန္ဒသမာနဝဏ္ဏတာယ မေဒပါသာဏာ ဝုတ္တာတိ ကေစိ. အဋ္ဌကထာယံ ပန ‘‘မေဒဝဏ္ဏာ ပါသာဏာ ကိရေတ္ထ ဥဿန္နာ အဟေသု’’န္တိ ဣဒံ ဝုတ္တံ. အဿာတိ သေနာပတိဿ. ကထာသမုဋ္ဌာပနတ္ထန္တိ မလ္လိကာယ သောကဝိနောဒနဓမ္မကထာသမုဋ္ဌာပနတ္ထံ. ३६४. वहाँ-वहाँ मेद (चर्बी) के रंग के और उळुप (एक प्रकार की घास या चन्द्रमा) के रंग के पत्थर प्रचुर मात्रा में थे, इसलिए गाँव का नाम 'मेदाळुप' पड़ा। 'उळुपवण्णा' का अर्थ कुछ लोग चन्द्रमा के समान वर्ण वाले मेद-पत्थर कहते हैं। अट्ठकथा में तो यह कहा गया है - "यहाँ मेद के रंग के पत्थर प्रचुर मात्रा में थे।" 'अस्स' का अर्थ सेनापति का। 'कथासमुट्ठापनत्थं' का अर्थ मल्लिका के शोक को दूर करने के लिए धम्मकथा आरम्भ करने के लिए। ရညာတိ ပသေနဒီကောသလရညာ. မဟစ္စာတိ မဟတိယာ. ပဒဝိပလ္လာသေန စေတံ ဝုတ္တံ. ပသာဒမရဟန္တီတိ ပါသာဒိကာနိ. တေနာဟ ‘‘သဟ ရဉ္ဇနကာနီ’’တိ. ယာနိ ပန ပါသာဒိကာနိ, တာနိ ပဿိတုံ ယုတ္တာနိ. ပါသာဒိကာနီတိ ဝါ သဒ္ဒဟနသဟိတာနိ. တေနာဟ ‘‘ပသာဒဇနကာနီ’’တိ. ‘‘အပ္ပာဗာဓ’’န္တိ အာဒီသု ဝိယ အပ္ပသဒ္ဒေါ အဘာဝတ္ထောတိ အာဟ ‘‘နိဿဒ္ဒါနီ’’တိ. အနိယမတ္ထဝါစီ ယ-သဒ္ဒေါ အနိယမာကာရဝါစကောပိ ဟောတီတိ ‘‘ယတ္ထာ’’တိ ပဒဿ ‘‘ယာဒိသေသူ’’တိအာဒိမာဟ. တထာ ဟိ အင်္ဂုလိမာလသုတ္တေ (မ. နိ. အဋ္ဌ. ၂.၃၄၇ အာဒယော) ‘‘ယဿ ခေါ’’တိ ပဒဿ ‘‘ယာဒိသဿ ခေါ’’တိ အတ္ထော ဝုတ္တော. 'राज्ञा' का अर्थ राजा पसेनदि कोसल द्वारा। 'महच्चा' का अर्थ महती (बड़ी) से। यह पद-विपर्यास (शब्दों के उलटफेर) से कहा गया है। 'पसादं अरहन्तीति' का अर्थ प्रासादिक (मनोहर/प्रसन्नता देने वाले)। इसलिए कहा - "रंजन करने वालों के साथ।" जो प्रासादिक हैं, वे देखने योग्य हैं। अथवा 'प्रासादिक' का अर्थ श्रद्धा सहित। इसलिए कहा - "प्रसाद (प्रसन्नता) उत्पन्न करने वाले।" 'अप्पाबाधं' आदि के समान 'अप्प' शब्द अभाव के अर्थ में है, इसलिए कहा - "निःशब्द (शान्त)।" अनियम अर्थ को बताने वाला 'य' शब्द अनियम के प्रकार को बताने वाला भी होता है, इसलिए 'यत्थ' पद के लिए 'यादिसेसु' (जिस प्रकार के) आदि कहा। जैसे कि अंगुलिमाल सुत्त में 'यस्स खो' पद का अर्थ 'यादिसस्स खो' (जिस प्रकार के का) कहा गया है। ၃၆၆. ပဋိစ္ဆဒန္တိ ပဋိစ္ဆာဒကံ. ရာဇကကုဓဘဏ္ဍာနီတိ ရာဇဘဏ္ဍဘူတာနိ. ရဟာယတီတိ ရဟော ကရောတိ, မံ အဇ္ဈေသတီတိ အတ္ထော. ३६६. 'पटिच्छदं' का अर्थ आच्छादक (ढकने वाला)। 'राजककुधभण्डानी' का अर्थ राज-चिह्न रूपी वस्तुएँ। 'रहायति' का अर्थ एकान्त करता है, 'मुझसे प्रार्थना करता है' यह अर्थ है। ၃၆၇. ယထာသဘာဝတော ဉေယျံ ဓာရေတိ အဝဓာရေတီတိ ဓမ္မော, ဉာဏန္တိ အာဟ ‘‘ပစ္စက္ခဉာဏသင်္ခါတဿ ဓမ္မဿာ’’တိ. အနုနယောတိ အနုဂစ္ဆနကော. ဒိဋ္ဌေန ဟိ အဒိဋ္ဌဿ အနုမာနံ. တေနာဟ ‘‘အနုမာနံ အနုဗုဒ္ဓီ’’တိ. အာပါဏကောဋိကန္တိ ယာဝ ပါဏကောဋိ, တာဝ ဇီဝိတပရိယောသာနံ. ဧတန္တိ ဓမ္မနွယသင်္ခါတံ အနုမာနံ. ဧဝန္တိ ‘‘ဣဓ ပနာဟ’’န္တိ ဝုတ္တပ္ပကာရေန. ३६७. जो ज्ञेय (जानने योग्य) को यथास्वभाव धारण करता है या अवधारण करता है, वह 'धम्म' है, वह ज्ञान है, इसलिए कहा - "प्रत्यक्ष ज्ञान संज्ञक धर्म का।" 'अनुनय' का अर्थ पीछे चलने वाला। देखे हुए से अनदेखे का अनुमान होता है। इसलिए कहा - "अनुमान अनुबुद्धि है।" 'आपाणकोटि' का अर्थ प्राणों की कोटि तक, जीवन के अन्त तक। 'एतं' का अर्थ धर्म-अन्वय संज्ञक अनुमान। 'एवं' का अर्थ "यहाँ तो कहा" इस प्रकार से। ၃၆၉. စက္ခုံ အဗန္ဓန္တေ ဝိယာတိ အပါသာဒိကတာယ ပဿန္တာနံ စက္ခုံ အတ္တနိ အဗန္ဓန္တေ ဝိယ. ကုလသန္တာနာနုဗန္ဓော ရောဂေါ ကုလရောဂေါ. ဥဠာရန္တိ သာနုဘာဝံ. ယော ဟိ အာနုဘာဝသမ္ပန္နော, တံ ‘‘မဟေသက္ခ’’န္တိ ဝဒန္တိ. အရဟတ္တံ ဂဏှန္တောတိ ဥက္ကဋ္ဌနိဒ္ဒေသောယံ, ဟေဋ္ဌိမဖလာနိ ဂဏှန္တောပိ. ३६९. 'चक्षु को न बाँधने वाले के समान' का अर्थ अप्रासादिक (अप्रिय) होने के कारण देखने वालों की आँखों को अपनी ओर न खींचने वाले के समान। कुल की परम्परा से चला आ रहा रोग 'कुलरोग' है। 'उळारं' का अर्थ महानुभाव (प्रभावशाली)। जो अनुभाव (प्रभाव) से सम्पन्न होता है, उसे 'महेसक्ख' (महेशाख्य) कहते हैं। 'अर्हत्व को ग्रहण करता हुआ' यह उत्कृष्ट निर्देश है, निचले फलों को ग्रहण करने वाला भी (इसमें शामिल है)। ၃၇၃. ဇီဝိကာ [Pg.163] ဇီဝိတဝုတ္တိ. ३७३. 'जीविका' का अर्थ जीवन-वृत्ति (आजीविका)। ၃၇၄. ဓမ္မံ စေတေတိ သံဝေဒေတိ ဧတေဟီတိ ဓမ္မစေတိယာနိ, ဓမ္မဿ ပူဇာဝစနာနိ. နနု စေတာနိ ဗုဒ္ဓသံဃဂုဏဒီပနာနိပိ သန္တိ? ကထံ ‘‘ဓမ္မစေတိယာနီတိ ဓမ္မဿ စိတ္တီကာရဝစနာနီ’’တိ ဝုတ္တန္တိ အာဟ ‘‘တီသု ဟီ’’တိအာဒိ. တတ္ထ ယသ္မာ ဗုဒ္ဓရတနမူလကာနိ သေသရတနာနိ တဿ ဝသေန လဒ္ဓဗ္ဗတော. ကောသလရညာ စေတ္ထ ဗုဒ္ဓဂါရဝေန ဓမ္မသံဃဂါရဝံ ပဝေဒိတံ, တသ္မာ ‘‘ဘဂဝတိ စိတ္တီကာရေ ကတေ ဓမ္မောပိ ကတောဝ ဟောတီ’’တိ ဝုတ္တံ. ယသ္မာ စ ရတနတ္တယပသာဒပုဗ္ဗိကာ သာသနေ သမ္မာပဋိပတ္တိ, တသ္မာ ဝုတ္တံ – ‘‘အာဒိဗြဟ္မစရိယကာနီတိ မဂ္ဂဗြဟ္မစရိယဿ အာဒိဘူတာနီ’’တိ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. ३७४. जिनसे धर्म का चिंतन या संवेदन किया जाता है, वे 'धम्मचेतिय' हैं, धर्म की पूजा के वचन। क्या ये बुद्ध और संघ के गुणों को प्रकाशित करने वाले नहीं हैं? "धम्मचेतिय धर्म के आदर के वचन हैं" ऐसा क्यों कहा गया? इसके उत्तर में कहा - "तीनों में ही" आदि। वहाँ क्योंकि बुद्ध-रत्न ही मूल है, शेष रत्न उसी के कारण प्राप्त होते हैं। कोसल नरेश द्वारा यहाँ बुद्ध के प्रति गौरव से धर्म और संघ के प्रति गौरव प्रकट किया गया है, इसलिए कहा गया - "भगवान का आदर करने पर धर्म का भी आदर हो ही जाता है।" और क्योंकि रत्नत्रय में प्रसन्नता ही शासन में सम्यक् प्रतिपत्ति (अभ्यास) का आधार है, इसलिए कहा - "आदिब्रह्मचर्यक" का अर्थ मार्ग-ब्रह्मचर्य के आदि (प्रारम्भ) स्वरूप। शेष सुविज्ञेय ही है। ဓမ္မစေတိယသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. धम्मचेतियसुत्त की वर्णना की लीनत्थप्पकासना समाप्त हुई। ၁၀. ကဏ္ဏကတ္ထလသုတ္တဝဏ္ဏနာ १०. कण्णकत्थलसुत्त की वर्णना। ၃၇၅. အနန္တရသုတ္တေ ဝုတ္တကရဏီယေနေဝါတိ ‘‘ပါသာဒေ ဝါ နာဋကေသု ဝါ စိတ္တဿာဒံ အလဘမာနော တတ္ထ တတ္ထ ဝိစရိတုံ အာရဒ္ဓေါ’’တိ ဝုတ္တကရဏီယေန. အပ္ပဒုဋ္ဌပဒေါသီနဉှိ ဧဝံ ဟောတီတိ. ३७५. अनन्तर (पिछले) सुत्त में कहे गए करणीय से ही - "प्रासाद में या नाटकों में चित्त का आस्वाद न पाते हुए वहाँ-वहाँ विचरने लगा", इस कहे गए करणीय से। अल्प-प्रदोष (कम द्वेष) वालों का ऐसा ही होता है। ၃၇၆. ပုစ္ဆိတောတိ ‘‘အညံ ဒူတံ နာလတ္ထု’’န္တိ ပုစ္ဆိတော. သောတိ ရာဇာ. တာသံ ဝန္ဒနာ သစေ ဥတ္တရကာလံ, အတ္တနော အာဂမနကာရဏံ ကထေဿတိ. ३७६. 'पूछा गया' का अर्थ "क्या दूसरा दूत नहीं मिला" ऐसा पूछा गया। 'स' का अर्थ वह राजा। उनकी वन्दना यदि बाद में होगी, तो वह अपने आने का कारण कहेगा। ၃၇၈. ဧကာဝဇ္ဇနေနာတိ ဧကဝီထိဇဝနေန. တေန ဧကစိတ္တံ တာဝ တိဋ္ဌတု, ဧကစိတ္တဝီထိယာပိ သဗ္ဗံ ဇာနိတုံ န သက္ကာတိ ဒဿေတိ. ‘‘ဣဒံ နာမ အတီတံ ဇာနိဿာမီ’’တိ အနိယမေတွာ အာဝဇ္ဇတော ယံ ကိဉ္စိ အတီတံ ဇာနာတိ, နိယမိတေ ပန နိယမိတမေဝါတိ အာဟ – ‘‘ဧကေန ဟိ…ပေ… ဧကဒေသမေဝ ဇာနာတီ’’တိ. တေန စိတ္တေနာတိ ‘‘အတီတံ သဗ္ဗံ ဇာနိဿာမီ’’တိ ဧဝံ ပဝတ္တစိတ္တေန. ဣတရေသူတိ အနာဂတပစ္စုပ္ပန္နေသု. ကာရဏဇာတိကန္တိ ယုတ္တိသဘာဝံ, ယုတ္တိယာ ယုတ္တန္တိ အတ္ထော. သမ္ပရာယဂုဏန္တိ သမ္ပရာယေ ကတကမ္မဿ ဝိသေသံ. ३७८. 'एक आवर्जन से' का अर्थ एक वीथि-जवन से। उससे एक चित्त की बात तो दूर रहे, एक चित्त-वीथि से भी सब कुछ जानना सम्भव नहीं है, यह दिखाता है। "मैं इस नाम के अतीत को जानूँगा" ऐसा नियम न करके आवर्जन (ध्यान) करने वाले को जो कुछ भी अतीत है वह जान पड़ता है, परन्तु नियम करने पर नियम किया हुआ ही (जान पड़ता है), इसलिए कहा - "एक से ही...पे... एक देश (अंश) को ही जानता है।" 'उस चित्त से' का अर्थ "मैं सब अतीत को जानूँगा" इस प्रकार प्रवृत्त चित्त से। 'दूसरों में' का अर्थ अनागत (भविष्य) और प्रत्युत्पन्न (वर्तमान) में। 'कारणजातिकं' का अर्थ युक्ति-स्वभाव वाला, युक्ति से युक्त यह अर्थ है। 'साम्परायिक गुण' का अर्थ परलोक में किए गए कर्म का विशेष (फल)। ၃၇၉. လောကုတ္တရမိဿကာနိ ကထိတာနိ ဗောဓိရာဇကုမာရသုတ္တေ ဝိယ လောကိယာ စေဝ လောကုတ္တရာ စ. ယထာလာဘဝသေန စေတ္ထ ပဓာနိယင်္ဂါနံ [Pg.164] လောကုတ္တရဂ္ဂဟဏံ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ပစ္စေကံ ဧဝ နေသဉ္စ ပဓာနိယင်္ဂတာ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ ယထာ ‘‘အဋ္ဌဝိမောက္ခာ သန္ဒိဿန္တိ လောကုတ္တရမိဿကာ’’တိ. လောကုတ္တရာနေဝါတိ စေတ္ထ ယံ ဝတ္တဗ္ဗံ, တံ ပရတော အာဝိ ဘဝိဿတိ. ပဓာနနာနတ္တန္တိ ပဒဟနနာနတ္တံ, ဘာဝနာနုယောဂဝိသေသန္တိ အတ္ထော. သင်္ခါရေ ပရိမဒ္ဒိတွာ ပဋိပက္ခဓမ္မေ ဧကဒေသတော ပဇဟိတွာ ဌိတဿ ဘာဝနာနုယောဂေါ သဗ္ဗေန သဗ္ဗံ အပရိမဒ္ဒိတသင်္ခါရဿ အပ္ပဟီနပဋိပက္ခဿ ဘာဝနာနုယောဂတော သုခုမော ဝိသဒေါဝ ဟောတိ, သစ္စာဘိသမယေန သန္တာနဿ အာဟိတဝိသေသတ္တာတိ အာဟ – ‘‘အညာဒိသမေဝ ဟိ ပုထုဇ္ဇနဿ ပဓာနံ, အညာဒိသံ သောတာပန္နဿာ’’တိအာဒိ. အယဉ္စ ဝိသေသော န ကေဝလံ အနရိယအရိယပုဂ္ဂလတော ဧဝ, အထ ခေါ အရိယေသုပိ သေက္ခာဒိဝိသေသတောပိ လဗ္ဘတိ အဘိသင်္ခါရဝိသေသတော အဘိနီဟာရတော စ ဣဇ္ဈနတောတိ ဒဿေန္တော ‘‘အညာဒိသံ သကဒါဂါမိနော’’တိအာဒိမာဟ. န ပါပုဏာတီတိ ယသ္မာ ပုထုဇ္ဇနော သဗ္ဗထာဝ ပဓာနံ ပဒဟန္တော သောတာပတ္တိမဂ္ဂံ အဓိဂစ္ဆတိ, သောတာပန္နော စ သကဒါဂါမိမဂ္ဂန္တိ ဟေဋ္ဌိမံ ဥပရိမတော ဩဠာရိကံ, ဥပရိမဉ္စ ဣတရတော သုခုမံ တေန ပဟာတုံ အသက္ကုဏေယျဿ ပဇဟနတော, ဣတိ အဓိဂန္တဗ္ဗဝိသေသေန စ အဓိဂမပဋိပဒါယ သဏှသုခုမတာ တိက္ခဝိသဒတာ စ ဝိညာယတီတိ အာဟ – ‘‘ပုထုဇ္ဇနဿ ပဓာနံ သောတာပန္နဿ ပဓာနံ န ပါပုဏာတီ’’တိအာဒိ. ३७९. बोधिराजकुमारसुत्त की तरह यहाँ भी लौकिक और लोकोत्तर दोनों का मिश्रित वर्णन किया गया है। यथालाभ के अनुसार यहाँ प्रधान अंगों (प्रयत्न के अंगों) का लोकोत्तर ग्रहण समझना चाहिए। प्रत्येक की प्रधानता को वैसे ही देखना चाहिए जैसे 'आठ विमोक्ष लोकोत्तर मिश्रित दिखाई देते हैं'। 'लोकोत्तर ही' के विषय में जो कहना है, वह आगे स्पष्ट होगा। 'प्रधाननानात्तं' का अर्थ है प्रधान (प्रयत्न) की भिन्नता, अर्थात् भावना के अभ्यास की विशेषता। संस्कारों का मर्दन कर और प्रतिपक्ष धर्मों को एक अंश में त्याग कर स्थित व्यक्ति का भावना-अभ्यास, उन संस्कारों के भावना-अभ्यास से अधिक सूक्ष्म और स्पष्ट होता है जिन्होंने संस्कारों का बिल्कुल मर्दन नहीं किया है और प्रतिपक्षों का त्याग नहीं किया है, क्योंकि सत्य के साक्षात्कार से संतान (चित्त-संतति) में एक विशेष गुण आ जाता है। इसीलिए कहा गया है - 'पृथग्जन का प्रधान (प्रयत्न) एक प्रकार का होता है, और स्रोतआपन्न का दूसरे प्रकार का' आदि। और यह विशेषता न केवल अनार्य और आर्य पुद्गलों के बीच है, बल्कि आर्यों में भी शैक्ष आदि के भेद से, अभिसंस्कार की विशेषता से और अभिनिहार (संकल्प) की सिद्धि से प्राप्त होती है, यह दिखाते हुए 'सकृदागामी का दूसरे प्रकार का' आदि कहा गया है। 'न पापुणाति' (नहीं पहुँचता) का अर्थ है कि चूँकि पृथग्जन पूरी तरह प्रयत्न करते हुए स्रोतआपत्ति मार्ग प्राप्त करता है, और स्रोतआपन्न सकृदागामी मार्ग को, इस प्रकार नीचे वाला ऊपर वाले से स्थूल है और ऊपर वाला दूसरे से सूक्ष्म है, क्योंकि वह उस (स्थूल) का त्याग करने में समर्थ है जिसे त्यागा नहीं जा सका था। इस प्रकार प्राप्त होने वाली विशेषता और प्राप्ति की प्रतिपदा (मार्ग) की सूक्ष्मता और तीक्ष्णता जानी जाती है, इसीलिए कहा गया है - 'पृथग्जन का प्रधान स्रोतआपन्न के प्रधान तक नहीं पहुँचता' आदि। အကူဋကရဏန္တိ အဝဉ္စနကိရိယံ. အနဝစ္ဆိန္ဒနန္တိ အတိယာနံ. အဝိဉ္ဆနံ န အာကဍ္ဎနံ, နိယုတ္တတံ ဝိနိဝေဌေတွာ သမန္တာ ဝိပရိဝတ္တိတွာ သမဓာရာယ ဆဍ္ဍနံ ဝါ. တဿ ကာရဏံ တံကာရဏံ, တံ ကာရဏန္တိ ဝါ တံ ကိရိယံ တံ အဓိကာရံ. ဒန္တေဟိ ဂန္တဗ္ဗဘူမိန္တိ ဒန္တေဟိ ပတ္တဗ္ဗဋ္ဌာနံ, ပတ္တဗ္ဗဝတ္ထုံ ဝါ. စတ္တာရောပိ အဿဒ္ဓါ နာမ ဥပရိမဥပရိမသဒ္ဓါယ အဘာဝတော. ယေန ဟိ ယံ အပ္ပတ္တံ, တဿ တံ နတ္ထိ. အရိယသာဝကဿ…ပေ… နတ္ထိ ပဌမမဂ္ဂေနေဝ မာယာသာဌေယျာနံ ပဟာတဗ္ဗတ္တာ. တေနေဝါတိ သမ္မဒေဝ ဝိရုဒ္ဓပက္ခာနံ သဒ္ဓါဒီနံ ဣဓာဓိပ္ပေတတ္တာ. ယဒိ ဧဝံ ကထံ မိဿကကထာတိ အာဟ ‘‘အဿခဠုင်္ကသုတ္တန္တေ ပနာ’’တိအာဒိ. စတ္တာရောဝ ဟောန္တိ ပုထုဇ္ဇနာဒိဝသေန. 'अकूटकरणं' का अर्थ है ठगने की क्रिया न करना। 'अनवच्छिंदनं' का अर्थ है अतिक्रमण करना। 'अविञ्छनं' का अर्थ है न खींचना, नियुक्तता को खोलकर, चारों ओर घुमाकर समान रूप से छोड़ देना। 'तस्स कारणं' का अर्थ है उसका कारण, या वह क्रिया, वह अधिकार। 'दन्तेहि गन्तब्बभूमिं' का अर्थ है शिक्षित (हाथियों) द्वारा प्राप्त करने योग्य स्थान या वस्तु। चारों ही 'अश्रद्ध' कहलाते हैं क्योंकि उनमें ऊपर-ऊपर की श्रद्धा का अभाव होता है। जिसके पास जो नहीं पहुँचा है, उसके पास वह नहीं है। आर्यश्रावक के... आदि... नहीं है क्योंकि प्रथम मार्ग (स्रोतआपत्ति मार्ग) से ही माया और शाठ्य (छल-कपट) का त्याग कर दिया जाता है। इसीलिए, यहाँ सम्यक् रूप से विरुद्ध पक्षों (श्रद्धा आदि) का ही अभिप्राय है। यदि ऐसा है तो मिश्रित कथा कैसे है? इसलिए कहा 'अस्सखळुङ्कसुत्तन्ते पन' आदि। पृथग्जन आदि के भेद से चार ही होते हैं। ဩပမ္မသံသန္ဒနေ အဒန္တဟတ္ထိအာဒယော ဝိယာတိအာဒိနာ ကဏှပက္ခေ, ယထာ ပန ဒန္တဟတ္ထိအာဒယောတိအာဒိနာ သုက္ကပက္ခေ စ သာဓာရဏတော ဧကဇ္ဈံ [Pg.165] ကတွာ ဝုတ္တံ, အသာဓာရဏတော ဘိန္ဒိတွာ ဒဿေတုံ ‘‘ဣဒံ ဝုတ္တံ ဟောတီ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. उपमा की तुलना में 'अशिक्षित हाथी आदि की तरह' आदि के द्वारा कृष्ण पक्ष (अकुशल पक्ष) में, और 'जैसे शिक्षित हाथी आदि' आदि के द्वारा शुक्ल पक्ष (कुशल पक्ष) में साधारण रूप से एक साथ कहा गया है, उसे असाधारण रूप से अलग करके दिखाने के लिए 'इदं वृत्तं होति' (यह कहा गया है) आदि कहा गया है। ၃၈၀. သမ္မပ္ပဓာနာ နိဗ္ဗိသိဋ္ဌဝီရိယာ. တေနာဟ – ‘‘န ကိဉ္စိ နာနာကရဏံ ဝဒါမိ, ယဒိဒံ ဝိမုတ္တိယာ ဝိမုတ္တိ’’န္တိ. န ဟိ သုက္ခဝိပဿကတေဝိဇ္ဇဆဠဘိညာနံ ဝိမုတ္တိယာ နာနာကရဏံ အတ္ထိ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘ယံ ဧကဿာ’’တိအာဒိ. ကိံ တွံ န ဇာနာသီတိ သမ္ဗန္ဓော. အာဂစ္ဆန္တီတိ ဥပ္ပဇ္ဇနဝသေန အာဂစ္ဆန္တိ. နာဂစ္ဆန္တီတိ ဧတ္ထာပိ ဧသေဝ နယော. ဣဒံ ပုစ္ဆန္တောတိ ဣဒံ ပုစ္ဆာမီတိ ဒဿေန္တော. အပ္ပဟီနစေတသိကဒုက္ခာ အနဓိဂတအနာဂါမိတာ. တေနာဟ ‘‘ဥပပတ္တိဝသေန အာဂန္တာရော’’တိ. သမုစ္ဆိန္နဒုက္ခာတိ သမုဂ္ဃာဋိတစေတသိကဒုက္ခာ. ३८०. सम्यक् प्रधान विशिष्ट वीर्य वाले होते हैं। इसीलिए कहा - 'मैं कोई अंतर नहीं कहता, जो कि विमुक्ति की विमुक्ति है'। क्योंकि शुष्क-विपश्यक, त्रैविद्य और षडभिज्ञों की विमुक्ति में कोई अंतर नहीं है। इसीलिए कहा गया 'यं एकस्स' आदि। 'क्या तुम नहीं जानते' यह संबंध है। 'आगच्छन्ति' का अर्थ है उत्पन्न होने के कारण आते हैं। 'नागच्छन्ति' में भी यही नियम है। 'इदं pucchantoti' का अर्थ है 'यह पूछता हूँ' यह दिखाते हुए। जिनके चैतसिक दुःख नष्ट नहीं हुए हैं, वे अनागामी पद को प्राप्त नहीं हुए हैं। इसीलिए कहा 'उत्पत्ति के वश से आने वाले'। 'समुच्छिन्नदुक्खा' का अर्थ है जिनके चैतसिक दुःख समूल नष्ट हो गए हैं। ၃၈၁. တမှာ ဌာနာတိ တတော ယထာဓိဂတဣဿရိယဋ္ဌာနတော. ပုန တမှာ ဌာနာတိ တတော ဒုဂ္ဂတာ. သမ္ပန္နကာမဂုဏန္တိ ဥဠာရကာမဂုဏသမန္နာဂတံ. ३८१. 'तम्हा ठाना' का अर्थ है उस यथा-प्राप्त ऐश्वर्य के स्थान से। 'पुन तम्हा ठाना' का अर्थ है वहाँ से दुर्गति को प्राप्त। 'सम्पन्नकामगुणं' का अर्थ है उदार काम-गुणों से युक्त। တတ္ထာတိ ကာမဒေဝလောကေ. ဌာနဘာဝတောတိ အရဟတ္တဉ္စေ အဓိဂတံ, တာဝဒေဝ ပရိနိဗ္ဗာနတော. ဥပရိဒေဝေ စာတိ ဥပရူပရိ ဘူမိဝါသေ ဒေဝေ စ, စက္ခုဝိညာဏဒဿနေနပိ ဒဿနာယ နပ္ပဟောန္တီတိ ယောဇနာ. 'तत्थ' का अर्थ है कामदेवलोक में। 'स्थानभाव' से यदि अर्हत्व प्राप्त कर लिया है, तो वहीं परिनिर्वाण होने के कारण। 'उपरि देवे च' का अर्थ है ऊपर-ऊपर के लोकों में रहने वाले देवों में भी, चक्षु-विज्ञान के दर्शन से भी देखने में समर्थ नहीं होते - ऐसा योजन है। ၃၈၂. ဝုတ္တနယေနေဝါတိ ဒေဝပုစ္ဆာယ ဝုတ္တေနေဝ နယေန. သာ ကိရ ကထာတိ ‘‘နတ္ထိ သော သမဏော ဝါ ဗြာဟ္မဏော ဝါ, ယော သကိဒေဝ သဗ္ဗံ နေယျ’’န္တိ ကထာ. တေတိ ဝိဋဋူဘသဉ္ဇယာ. ဣမသ္မိံယေဝ ဌာနေတိ ဣမသ္မိံ မိဂဒါယေယေဝ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. ३८२. 'वृत्त नयेन एव' का अर्थ है देवों के प्रश्न में कहे गए तरीके से ही। 'सा किर कथा' का अर्थ है वह कथा कि 'ऐसा कोई श्रमण या ब्राह्मण नहीं है, जो एक ही बार में सब कुछ जान ले'। 'ते' का अर्थ है विडूडभ और संजय। 'इमस्मिंयेव ठाने' का अर्थ है इसी मृगदाव में ही। शेष स्पष्ट ही है। ကဏ္ဏကတ္ထလသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. कण्णकत्थल सुत्त की वर्णना की लीनत्थप्पकासना (टीका) समाप्त हुई। နိဋ္ဌိတာ စ ရာဇဝဂ္ဂဝဏ္ဏနာ. और राजवग्ग की वर्णना समाप्त हुई। ၅. ဗြာဟ္မဏဝဂ္ဂေါ ५. ब्राह्मणवग्ग ၁. ဗြဟ္မာယုသုတ္တဝဏ္ဏနာ १. ब्रह्मायुसुत्त की वर्णना ၃၈၃. ‘‘မဟာသတ္တော [Pg.166] မဟိဒ္ဓိကော မဟာနုဘာဝေါ’’တိအာဒီသု (မဟာဝ. ၃၈) ဥဠာရတာ ဝိသယော, ‘‘မဟာဇနကာယော သန္နိပတီ’’တိအာဒီသု သမ္ဗဟုလဘာဝဝိသယော, ဣဓ ပန တဒုဘယမ္ပိဿ အတ္ထောတိ ‘‘မဟတာတိ ဂုဏမဟတ္တေနပိ မဟတာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. အပ္ပိစ္ဆတာဒီတိ အာဒိ-သဒ္ဒေန သန္တုဋ္ဌိသလ္လေခပဝိဝေကအသံသဂ္ဂဝီရိယာရမ္ဘာဒီနံ သင်္ဂဟော. ဒိဋ္ဌိသီလသာမညသံဃာတသင်္ခါတေနာတိ ဧတ္ထ ‘‘နိယတော သမ္ဗောဓိပရာယဏော’’ (သံ. နိ. ၂.၄၁; ၃.၉၉၈, ၁၀၀၄) – ‘‘အဋ္ဌာနမေတံ, ဘိက္ခဝေ, အနဝကာသော, ယံ ဒိဋ္ဌိသမ္ပန္နော ပုဂ္ဂလော သဉ္စိစ္စ ပါဏံ ဇီဝိတာ ဝေါရောပေယျာတိ နေတံ ဌာနံ ဝိဇ္ဇတီ’’တိအာဒိဝစနတော ဒိဋ္ဌိသီလာနံ နိယတသဘာဝတ္တာ သောတာပန္နာပိ အညမညံ ဒိဋ္ဌိသီလသာမညေန သံဟတာ, ပဂေဝ သကဒါဂါမိအာဒယော. ‘‘တထာရူပါယ ဒိဋ္ဌိယာ ဒိဋ္ဌိသာမညဂတော ဝိဟရတိ (ဒီ. နိ. ၃.၃၂၄, ၃၅၆; မ. နိ. ၁.၄၉၂; ၃.၅၄; အ. နိ. ၆.၁၁; ပရိ. ၂၇၄) တထာရူပေဟိ သီလေဟိ သီလသာမညဂတော ဝိဟရတီ’’တိ (ဒီ. နိ. ၃.၃၂၄; မ. နိ. ၁.၄၉၂; ၃.၅၄; အ. နိ. ၆.၁၂; ပရိ. ၂၇၄) ဝစနတော ပုထုဇ္ဇနာနမ္ပိ ဒိဋ္ဌိသီလသာမညေန သံဟတဘာဝေါ လဗ္ဘတိယေဝ. ३८३. 'महासत्त्व, महाऋद्धिमान, महानुभाव' इत्यादि (महाव. 38) में 'महान' शब्द का विषय उदारता (श्रेष्ठता) है, 'महाजनकाय (बड़ी भीड़) एकत्रित हुई' इत्यादि में इसका विषय बहुलता (संख्या) है, परन्तु यहाँ इसके दोनों ही अर्थ हैं, इसलिए 'महान के द्वारा, गुणों की महानता से भी महान' इत्यादि कहा गया है। 'अल्पेच्छता' आदि में 'आदि' शब्द से संतोष, सल्लेख, प्रविवेक (एकान्त), असंसर्ग (मेल-जोल न रखना), वीर्यारम्भ (पुरुषार्थ) आदि का संग्रह होता है। 'दृष्टि-शील-सामान्यता के समूह' के विषय में यहाँ 'नियत, सम्बोधिपरायण' (सं. नि. 2.41) - 'भिक्षुओं, यह स्थान नहीं है, यह अवसर नहीं है कि दृष्टि-सम्पन्न (स्रोतापन्न) व्यक्ति जानबूझकर किसी प्राणी के प्राण ले ले, ऐसा संभव नहीं है' इत्यादि वचनों से दृष्टि और शील के नियत स्वभाव होने के कारण स्रोतापन्न भी परस्पर दृष्टि और शील की समानता से संगठित होते हैं, फिर सकृदागामी आदि के बारे में तो कहना ही क्या। 'वैसी ही दृष्टि से दृष्टि-सामान्यता को प्राप्त होकर विहार करता है, वैसे ही शीलों से शील-सामान्यता को प्राप्त होकर विहार करता है' (दी. नि. 3.324) इस वचन से पृथग्जनों में भी दृष्टि और शील की समानता से संगठित होने का भाव प्राप्त होता ही है। ဩဋ္ဌပဟတကရဏဝသေန အတ္ထဝိဘာဂဝသေန. သနိဃဏ္ဍုကေဋုဘာနန္တိ ဧတ္ထ နိဃဏ္ဍူတိ ဝစနီယဝါစကဘာဝေန အတ္ထံ သဒ္ဒဉ္စ ခဏ္ဍတိ ဝိဘဇ္ဇ ဒဿေတီတိ နိခဏ္ဍု. သော ဧဝ ဣဓ ခ-ကာရဿ ဃ-ကာရံ ကတွာ ‘‘နိဃဏ္ဍူ’’တိ ဝုတ္တော. ကိဋတိ ဂမေတိ ကိရိယာဒိဝိဘာဂံ, တံ ဝါ အနဝသေသပရိယာဒါနတော ဂမေန္တော ပူရေတီတိ ကေဋုဘံ. ဝေဝစနပ္ပကာသကန္တိ ပရိယာယသဒ္ဒဒီပကံ, ဧကေကဿ အတ္ထဿ အနေကပရိယာယဝစနဝိဘာဝကန္တိ အတ္ထော. နိဒဿနမတ္တဉ္စေတံ အနေကေသမ္ပိ အတ္ထာနံ ဧကသဒ္ဒဝစနီယတာဝိဘာဝနဝသေနပိ တဿ ဂန္ထဿ ပဝတ္တတ္တာ. ဝစီဘေဒါဒိလက္ခဏာ ကိရိယာ ကပ္ပီယတိ ဧတေနာတိ ကိရိယာကပ္ပော, သော ပန ဝဏ္ဏပဒသမ္ဗန္ဓပဒတ္ထဝိဘာဂတော ဗဟုဝိကပ္ပောတိ အာဟ ‘‘ကိရိယာကပ္ပဝိကပ္ပော’’တိ. ဣဒဉ္စ မူလကိရိယာကပ္ပဂန္ထံ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ. သော ဟိ သတသဟဿပရိမာဏော နလစရိယာဒိပကရဏံ. ဌာနကရဏာဒိဝိဘာဂတော [Pg.167] နိဗ္ဗစနဝိဘာဂတော စ အက္ခရာ ပဘေဒီယန္တိ ဧတေဟီတိ အက္ခရပ္ပဘေဒါ, သိက္ခာနိရုတ္တိယော. ဧတေသန္တိ ဝေဒါနံ. တေ ဧဝ ဝေဒေ ပဒသော ကာယတီတိ ပဒကော. တံ တံ သဒ္ဒံ တဒတ္ထဉ္စ ဗျာကရောတိ ဗျာစိက္ခတိ ဧတေနာတိ ဗျာကရဏံ, သဒ္ဒသတ္ထံ. အာယတိံ ဟိတံ တေန လောကော န ယတတိ န ဤဟတီတိ လောကာယတံ. တဉှိ ဂန္ထံ နိဿာယ သတ္တာ ပုညကိရိယာယ စိတ္တမ္ပိ န ဥပ္ပာဒေန္တိ. ဝယတီတိ ဝယော, န ဝယော အဝယော, န အဝယော အနဝယော, အာဒိမဇ္ဈပရိယောသာနေသု ကတ္ထစိ အပရိကိလန္တော အဝိတ္ထာယန္တော တေ ဂန္ထေ သန္ဓာရေတိ ပူရေတီတိ အတ္ထော. ဒွေ ပဋိသေဓာ ပကတိံ ဂမေန္တီတိ ဒဿေန္တော ‘‘အဝယော န ဟောတီ’’တိ ဝတွာ တတ္ထ အဝယံ ဒဿေတုံ ‘‘အဝယော…ပေ… န သက္ကောတီ’’တိ ဝုတ္တံ. ओष्ठों के प्रहार (उच्चारण) के वश से और अर्थ के विभाग के वश से। 'सनिघण्डुकेटुभानं' (निघण्टु और केटुभ सहित) यहाँ 'निघण्टु' का अर्थ है - जो वाच्य-वाचक भाव से अर्थ और शब्द को खण्डित (विभाजित) कर दिखाता है, वह 'निखण्डु' है। वही यहाँ 'ख' कार को 'घ' कार करके 'निघण्टु' कहा गया है। जो क्रिया आदि के विभाग को प्राप्त कराता है (किटाति), अथवा उसे पूर्ण रूप से ग्रहण कराते हुए पूरा करता है, वह 'केटुभ' है। 'वेवचनप्रकाशक' का अर्थ है पर्यायवाची शब्दों को प्रकाशित करने वाला, अर्थात् एक-एक अर्थ के अनेक पर्यायवाची वचनों का विभाग करने वाला। यह मात्र एक उदाहरण है, क्योंकि वह ग्रन्थ अनेक अर्थों के एक शब्द द्वारा वाच्य होने के विभाग के वश से भी प्रवृत्त है। जिसके द्वारा वाणी के भेद आदि लक्षण वाली क्रिया कल्पित (निश्चित) की जाती है, वह 'क्रियाकल्प' है; वह वर्ण, पद, सम्बन्ध और पदार्थ के विभाग से बहुत प्रकार का (बहुविकल्प) है, इसलिए 'क्रियाकल्प-विकल्प' कहा गया है। यह मूल क्रियाकल्प ग्रन्थ के सन्दर्भ में कहा गया है। वह एक लाख परिमाण वाला नलचर्या आदि प्रकरण है। स्थान, करण आदि के विभाग से और व्यञ्जन के विभाग से जिनसे अक्षर प्रभेदित (विभाजित) होते हैं, वे 'अक्षरप्रभेद' हैं, अर्थात् शिक्षा और निरुक्त। 'इनके' अर्थात् वेदों के। जो उन वेदों को पद-पद करके गाता है, वह 'पदक' है। जो उस-उस शब्द और उसके अर्थ की व्याख्या (व्याकरण) करता है, वह 'व्याकरण' है, अर्थात् शब्दशास्त्र। जिससे भविष्य के हित के लिए लोक यत्न नहीं करता, चेष्टा नहीं करता, वह 'लोकायत्त' है। क्योंकि उस ग्रन्थ के सहारे प्राणी पुण्य कर्म के लिए चित्त भी उत्पन्न नहीं करते। 'वयति' (जाता है) इति 'वय', जो 'वय' नहीं है वह 'अवय', जो 'अवय' नहीं है वह 'अनवय' है; आदि, मध्य और अन्त में कहीं भी थके बिना और बिना विस्तार के उन ग्रन्थों को धारण करता है और पूर्ण करता है, यह अर्थ है। दो निषेध (नकार) मूल प्रकृति को प्राप्त कराते हैं, यह दिखाते हुए 'अवय नहीं होता' कहकर, वहाँ 'अवय' को दिखाने के लिए 'अवय... पे... समर्थ नहीं होता' कहा गया है। ၃၈၄. ဂရူတိ ဘာရိယံ အတ္တာနံ တတော မောစေတွာ ဂမနံ ဒုက္ကရံ ဟောတိ. အနတ္ထောပိ ဥပ္ပဇ္ဇတိ နိန္ဒာဗျာရောသဥပါရမ္ဘာဒိ. အဗ္ဘုဂ္ဂတောတိ ဧတ္ထ အဘိသဒ္ဒယောဂေန ဣတ္ထမ္ဘူတာချာနတ္ထေ ဥပယောဂဝစနံ. ३८४. 'गुरू' का अर्थ है भारी, जिससे स्वयं को मुक्त कर निकलना कठिन होता है। अनर्थ भी उत्पन्न होता है जैसे निन्दा, क्रोध, उलाहना आदि। 'अभ्युद्गत' यहाँ 'अभि' शब्द के योग से 'इत्थंभूत-आख्यान' (इस प्रकार की स्थिति का कथन) के अर्थ में द्वितीया विभक्ति (उपयोगवचन) है। လက္ခဏာနီတိ လက္ခဏဒီပနာနိ မန္တပဒါနိ. အန္တရဓာယန္တီတိ န ကေဝလံ လက္ခဏမန္တာနိယေဝ, အညာနိပိ ဗြာဟ္မဏာနံ ဉာဏဗလာဘာဝေန အနုက္ကမေန အန္တရဓာယန္တိ. တထာ ဟိ ဝဒန္တိ ‘‘ဧကသတံ အဒ္ဓရိယံ ဒိပညာသမတ္တတော သာမာ’’တိအာဒိ. ပဏိဓိမဟတော သမာဒါနမဟတောတိအာဒိနာ ပစ္စေကံ မဟ-သဒ္ဒေါ ယောဇေတဗ္ဗော. ပဏိဓိမဟန္တတာဒိ စဿ ဗုဒ္ဓဝံသစရိယာပိဋကဝဏ္ဏနာဒိဝသေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. နိဋ္ဌာတိ နိပ္ဖတ္တိယော. ဇာတိသာမညတောတိ လက္ခဏဇာတိယာ လက္ခဏဘာဝေန သမာနဘာဝတော. ယထာ ဟိ ဗုဒ္ဓါနံ လက္ခဏာနိ သုဝိသုဒ္ဓါနိ သုပရိဗျတ္တာနိ ပရိပုဏ္ဏာနိ စ ဟောန္တိ, န ဧဝံ စက္ကဝတ္တီနံ. တေနာဟ ‘‘န တေဟေဝ ဗုဒ္ဓေါ ဟောတီ’’တိ. 'लक्षण' का अर्थ है लक्षणों को प्रकाशित करने वाले मन्त्र-पद। 'अन्तर्धान होते हैं' का अर्थ है कि न केवल लक्षण-मन्त्र ही, बल्कि ब्राह्मणों के ज्ञान-बल के अभाव के कारण अन्य (विद्याएँ) भी क्रमशः लुप्त हो जाती हैं। जैसा कि वे कहते हैं - 'एक सौ अध्वर्यु, बावन साम' इत्यादि। 'प्रणिधि-महान' (महान संकल्प), 'समादान-महान' इत्यादि के साथ प्रत्येक में 'महा' शब्द जोड़ना चाहिए। उसकी प्रणिधि की महानता आदि को बुद्धवंश और चर्यापिटक की व्याख्या आदि के अनुसार समझना चाहिए। 'निष्ठा' का अर्थ है निष्पत्तियाँ (पूर्णता)। 'जाति-सामान्यता से' का अर्थ है लक्षण-जाति के लक्षण-भाव से समान होने के कारण। जैसे बुद्धों के लक्षण सुविशुद्ध, सुस्पष्ट और परिपूर्ण होते हैं, वैसे चक्रवर्तियों के नहीं होते। इसीलिए कहा गया है - 'केवल उन्हीं (लक्षणों) से बुद्ध नहीं होता।' အဘိရူပတာ ဒီဃာယုကတာ, အပ္ပာတင်္ကတာ ဗြာဟ္မဏာဒီနံ ပိယမနာပတာတိ စတူဟိ အစ္ဆရိယဓမ္မေဟိ. ဒါနံ ပိယဝစနံ အတ္ထစရိယာ သမာနတ္တတာတိ ဣမေဟိ စတူဟိ သင်္ဂဟဝတ္ထူဟိ. ရဉ္ဇနတောတိ ပီတိဇနနတော. စက္ကံ စက္ကရတနံ ဝတ္တေတိ ပဝတ္တေတီတိ စက္ကဝတ္တီ, သမ္ပတ္တိစက္ကေဟိ သယံ ဝတ္တေတိ, တေဟိ စ ပရံ သတ္တနိကာယံ ဝတ္တေတိ ပဝတ္တေတီတိ စက္ကဝတ္တီ, ပရဟိတာဝဟော ဣရိယာပထစက္ကာနံ ဝတ္တော ဝတ္တနံ ဧတဿ အတ္ထီတိ စက္ကဝတ္တီ, အပ္ပဋိဟတံ ဝါ [Pg.168] အာဏာသင်္ခါတံ စက္ကံ ဝတ္တေတီတိ စက္ကဝတီ, အပ္ပဋိဟတံ ဝါ အာဏာသင်္ခါတံ စက္ကံ ဝတ္တေတီတိ စက္ကဝတ္တီ, ခတ္တိယမဏ္ဍလာဒိသညိတံ စက္ကံ သမူဟံ အတ္တနော ဝသေ ဝတ္တေတီတိ စက္ကဝတ္တီ. ဓမ္မံ စရတီတိ ဓမ္မိကော. ဓမ္မတော အနပေတတ္တာ ဓမ္မော ရဉ္ဇနတ္ထေန ရာဇာတိ ဓမ္မရာဇာ. ကောပါဒီတိ အာဒိ-သဒ္ဒေန ကာမလောဘမာနမဒါဒိကေ သင်္ဂဏှာတိ. ဝိဇိတာဝီတိ ဝိဇိတဝါ. ကေနစိ အကမ္ပိယဋ္ဌေန ဇနပဒတ္ထာဝရိယပ္ပတ္တော. ဒဠှဘတ္တိဘာဝတော ဝါ ဇနပဒေါ ထာဝရိယံ ပတ္တော ဧတ္ထာတိ ဇနပဒတ္ထာဝရိယပ္ပတ္တော. စိတ္တီကတဘာဝါဒိနာပိ (ခု. ပါ. အဋ္ဌ. ၆.၃; ဒီ. နိ. အဋ္ဌ. ၂.၃၃; သံ. နိ. အဋ္ဌ. ၃.၅.၂၂၃; သု. နိ. အဋ္ဌ. ၁.၂၂၆; မဟာနိ. အဋ္ဌ. ၅၀) စက္ကဿ ရတနဋ္ဌော ဝေဒိတဗ္ဗော. ဧသ နယော သေသေသုပိ. ရတိနိမိတ္တတာယ ဝါ စိတ္တီကတာဒိဘာဝဿ ရတိဇနနဋ္ဌေန ဧကသင်္ဂဟတာယ ဝိသုံ အဂ္ဂဟဏံ. अभिरूपता (सुन्दरता), दीर्घायु होना, नीरोगता, और ब्राह्मण आदि के लिए प्रिय एवं मनभावन होना—इन चार आश्चर्यजनक धर्मों के कारण। दान, प्रियवचन, अर्थचर्या और समानार्थता—इन चार संग्रह-वस्तुओं के कारण। 'रञ्जनतो' का अर्थ है प्रीति उत्पन्न करने से। 'चक्कवत्ती' (चक्रवर्ती) वह है जो चक्र-रत्न को चलाता है या प्रवृत्त करता है; वह स्वयं संपत्ति-चक्रों से चलता है और उनके द्वारा दूसरे प्राणी-निकायों को चलाता है या प्रवृत्त करता है; परहितकारी ईर्यापथ-चक्रों का प्रवर्तन जिसमें हो; अथवा जो अप्रतिहत आज्ञा-रूपी चक्र को चलाता है; अथवा जो क्षत्रिय-मण्डल आदि संज्ञक चक्र (समूह) को अपने वश में रखता है। जो धर्म का आचरण करता है, वह 'धम्मिको' (धार्मिक) है। धर्म से विचलित न होने के कारण 'धम्मो' और प्रजा को प्रसन्न करने के कारण 'राजा'—इस प्रकार वह 'धम्मराजा' है। 'कोपादि' में 'आदि' शब्द से काम, लोभ, मान, मद आदि का ग्रहण होता है। 'विजितावी' का अर्थ है विजय प्राप्त करने वाला। किसी के द्वारा न डिगाए जा सकने के कारण 'जनपदत्थावरियप्पत्तो' (जनपद में स्थिरता प्राप्त)। अथवा दृढ़ भक्ति भाव के कारण जहाँ जनपद स्थिरता को प्राप्त हुआ हो, वह 'जनपदत्थावरियप्पत्तो' है। चक्र के 'रत्न' होने का अर्थ उसके सम्मानित होने आदि से भी समझना चाहिए। यही नियम शेष रत्नों पर भी लागू होता है। रति (प्रसन्नता) का निमित्त होने से या सम्मानित होने आदि के भाव से रति उत्पन्न करने के कारण, एक ही संग्रह में होने पर भी इसे अलग से ग्रहण किया गया है। ဣမေဟိ ပန ရတနေဟိ ရာဇာ စက္ကဝတ္တီ ယံ ယမတ္ထံ ပစ္စနုဘောတိ, တံ တံ ဒဿေတုံ ‘‘ဣမေသု ပနာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. အဇိတံ ဇိနာတိ မဟေသက္ခတာသံဝတ္တနိယကမ္မနိဿန္ဒဘာဝတော. ဝိဇိတေ ယထာသုခံ အနုဝိစရတိ ဟတ္ထိရတနံ အဿရတနဉ္စ အဘိရုဟိတွာ တေသံ အာနုဘာဝေန အန္တောပါတရာသေယေဝ သကလံ ပထဝိံ အနုသံယာယိတွာ ရာဇဓာနိယံ ပစ္စာဂမနတော. ပရိဏာယကရတနေန ဝိဇိတမနုရက္ခတိ တေန တတ္ထ တတ္ထ ကတ္တဗ္ဗကိစ္စဿ သံဝိဓာနတော. သေသေဟီတိ မဏိရတနဣတ္ထိရတနဂဟပတိရတနေဟိ. တတ္ထ မဏိရတနေန ယောဇနပ္ပမာဏေ ဒေသေ အန္ဓကာရံ ဝိဓမိတွာ အာလောကဒဿနာဒိနာ သုခမနုဘဝတိ, ဣတ္ထိရတနေန အတိက္ကန္တမာနုသရူပသမ္ပတ္တိဒဿနာဒိဝသေန, ဂဟပတိရတနေန ဣစ္ဆိတိစ္ဆိတမဏိကနကရဇတာဒိဓနပ္ပဋိလာဘဝသေန. ဥဿာဟသတ္တိယောဂေါ ယေန ကေနစိ အပ္ပဋိဟတာဏာစက္ကဘာဝသိဒ္ဓိတော. ဟတ္ထိအဿရတနာဒီနံ မဟာနုဘာဝတ္တာ ကောသသမ္ပတ္တိယာပိ ပဘာဝသမ္ပတ္တိသိဒ္ဓိတော ‘‘ဟတ္ထိ…ပေ… ယောဂေါ’’တိ ဝုတ္တံ. ကောသော ဟိ နာမ သတိ ဥဿာဟသမ္ပတ္တိယံ (ဥဂ္ဂတေဇဿ သုကုမာရပရက္ကမဿ ပသန္နမုခဿ သမ္မုခေ ပါပုဏာတိ). ပစ္ဆိမေနာတိ ပရိဏာယကရတနေန. တဉှိ သဗ္ဗရာဇကိစ္စေသု ကုသလံ အဝိရဇ္ဈနပယောဂံ. တေနာဟ ‘‘မန္တသတ္တိယောဂေါ’’တိ. တိဝိဓသတ္တိယောဂဖလံ ပရိပုဏ္ဏံ ဟောတီတိ သမ္ဗန္ဓော. သေသေဟီတိ သေသေဟိ ပဉ္စဟိ ရတနေဟိ. အဒေါသကုသလမူလဇနိတကမ္မာနုဘာဝေနာတိ အဒေါသသင်္ခါတေန ကုသလမူလေန သဟဇာတာဒိပစ္စယဝသေန ဥပ္ပာဒိတကမ္မဿ [Pg.169] အာနုဘာဝေန သမ္ပဇ္ဇန္တိ သောမ္မတရရတနဇာတိကတ္တာ. မဇ္ဈိမာနိ မဏိဣတ္ထိဂဟပတိရတနာနိ. အလောဘ…ပေ… ကမ္မာနုဘာဝေန သမ္ပဇ္ဇန္တိ ဥဠာရဓနဿ ဥဠာရဓနပဋိလာဘကာရဏဿ စ ပရိစ္စာဂသမ္ပဒါဟေတုကတ္တာ. ပစ္ဆိမန္တိ ပရိဏာယကရတနံ. တဉှိ အမောဟ…ပေ… ကမ္မာနုဘာဝေန သမ္ပဇ္ဇတိ မဟာပညေနေဝ စက္ကဝတ္တိရာဇကိစ္စဿ ပရိဏေတဗ္ဗတ္တာ. इन रत्नों के द्वारा चक्रवर्ती राजा जिस-जिस प्रयोजन का अनुभव करता है, उसे दिखाने के लिए 'इमेसु पना' आदि कहा गया है। महान ऐश्वर्य प्रदान करने वाले कर्मों के विपाक के कारण वह अविजित को जीतता है। वह हस्ति-रत्न और अश्व-रत्न पर आरूढ़ होकर उनके प्रभाव से प्रातःकाल के भोजन से पूर्व ही सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा कर अपनी राजधानी लौट आता है, इस प्रकार वह विजित राज्य में सुखपूर्वक विचरण करता है। परिणायक-रत्न (मंत्री) के द्वारा वह विजित राज्य की रक्षा करता है, क्योंकि वह वहाँ-वहाँ किए जाने वाले कार्यों का विधान करता है। 'सेसेहि' का अर्थ है—मणि-रत्न, स्त्री-रत्न और गृहपति-रत्न के द्वारा। वहाँ मणि-रत्न के द्वारा एक योजन के क्षेत्र में अंधकार को दूर कर प्रकाश देखने आदि का सुख अनुभव करता है; स्त्री-रत्न के द्वारा मानुषी रूप-संपत्ति से बढ़कर सौंदर्य देखने आदि के माध्यम से; और गृहपति-रत्न के द्वारा इच्छित मणि, स्वर्ण, रजत आदि धन की प्राप्ति के माध्यम से। 'उत्साह-शक्ति-योग' का अर्थ है—जिसके द्वारा किसी से भी न रुकने वाले आज्ञा-चक्र की सिद्धि होती है। हस्ति, अश्व आदि रत्नों के महानुभाव होने से और कोष-संपत्ति से भी 'प्रभाव-शक्ति' की सिद्धि होने के कारण 'हत्थि...पे... योगो' कहा गया है। उत्साह-संपत्ति होने पर ही कोष प्राप्त होता है। 'पच्छिमेन' का अर्थ है परिणायक-रत्न के द्वारा। वह सभी राज-कार्यों में कुशल और अचूक प्रयोग वाला होता है। इसीलिए 'मन्त्र-शक्ति-योग' कहा गया है। तीनों प्रकार की शक्तियों के योग का फल परिपूर्ण होता है—यह संबंध है। 'सेसेहि' का अर्थ शेष पाँच रत्नों से है। 'अद्वेष' रूपी कुशल मूल से जनित कर्म के प्रभाव से सौम्य रत्न-जातियाँ प्राप्त होती हैं। मध्यम रत्न—मणि, स्त्री और गृहपति रत्न हैं। ये 'अलोभ' आदि कर्म के प्रभाव से प्राप्त होते हैं, क्योंकि ये विशाल धन और विशाल धन की प्राप्ति के कारणभूत त्याग-संपदा के हेतु हैं। 'पच्छिमं' (अंतिम) परिणायक-रत्न है। वह 'अमोह' आदि कर्म के प्रभाव से प्राप्त होता है, क्योंकि महाप्रज्ञा के द्वारा ही चक्रवर्ती के राज-कार्यों का संचालन किया जाना चाहिए। သရဏတော ပဋိပက္ခဝိဓမနတော သူရာ. တေနာဟ ‘‘အဘီရုကဇာတိကာ’’တိ. အသုရေ ဝိဇိနိတွာ ဌိတတ္တာ ဝီရော, သက္ကော ဒေဝါနမိန္ဒော, တဿ အင်္ဂံ ဒေဝပုတ္တော သေနင်္ဂဘာဝတောတိ ဝုတ္တံ ‘‘ဝီရင်္ဂရူပါတိ ဒေဝပုတ္တသဒိသကာယာ’’တိ. သဘာဝေါတိ သဘာဝဘူတော အတ္ထော. ဝီရကာရဏန္တိ ဝီရဘာဝကာရဏံ. ဝီရိယမယသရီရာ ဝိယာတိ သဝိဂ္ဂဟဝီရိယသဒိသာ သဝိဂ္ဂဟဉ္စေ ဝီရိယံ သိယာ, တံသဒိသာတိ အတ္ထော. နနု ရညော စက္ကဝတ္တိဿ ပဋိသေနာ နာမ နတ္ထိ, ယမဿ ပုတ္တာ ပမဒ္ဒေယျုံ, အထ ကသ္မာ ‘‘ပရသေနပမဒ္ဒနာ’’တိ ဝုတ္တန္တိ စောဒနံ သန္ဓာယာဟ ‘‘သစေ’’တိအာဒိ. တေန ပရသေနာ ဟောတု ဝါ မာ ဝါ, တေ ပန ဧဝံ မဟာနုဘာဝါတိ ဒဿေတိ. ဓမ္မေနာတိ ကတူပစိတေန အတ္တနော ပုညဓမ္မေန. တေန ဟိ သဉ္စောဒိတာ ပထဝိယံ သဗ္ဗရာဇာနော ပစ္စုဂ္ဂန္တွာ ‘‘သွာဂတံ တေ မဟာရာဇာ’’တိအာဒိံ ဝတွာ အတ္တနော ရဇ္ဇံ ရညော စက္ကဝတ္တိဿ နိယျာဒေန္တိ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘သော ဣမံ…ပေ… အဇ္ဈာဝသတီ’’တိ. အဋ္ဌကထာယံ ပန တဿ ယထာဝုတ္တဓမ္မဿ စိရတရံ ဝိပစ္စိတုံ ပစ္စယဘူတံ စက္ကဝတ္တိဝတ္တသမုဒါဂတံ ပယောဂသမ္ပတ္တိသင်္ခါတံ ဓမ္မံ ဒဿေတုံ ‘‘ပါဏော န ဟန္တဗ္ဗောတိအာဒိနာ ပဉ္စသီလဓမ္မေနာ’’တိ ဝုတ္တံ. ဧဝဉှိ ‘‘အဒဏ္ဍေန အသတ္ထေနာ’’တိ ဣဒံ ဝစနံ သုဋ္ဌုတရံ သမတ္ထိတံ ဟောတိ, ယသ္မာ ရာဂါဒယော ပါပဓမ္မာ ဥပ္ပဇ္ဇမာနာ သတ္တသန္တာနံ ဆာဒေတွာ ပရိယောနန္ဓိတွာ တိဋ္ဌန္တိ, ကုသလပဝတ္တိံ နိဝါရေန္တိ, တသ္မာ တေ ‘‘ဆဒနာ, ဆဒါ’’တိ စ ဝုတ္တာ. शरण (गति) और प्रतिपक्ष के विनाश के कारण वे 'शूर' हैं। इसीलिए 'अभीरुकजातिका' (स्वभाव से निर्भय) कहा गया है। असुरों को जीतकर स्थित होने के कारण देवराज शक्र 'वीर' हैं, उनके अंग के समान देवपुत्र सेना के अंग होने के कारण 'वीराङ्गरूपा' (देवपुत्रों के समान शरीर वाले) कहे गए हैं। 'सभावो' का अर्थ है स्वभावभूत अर्थ। 'वीरकारण' का अर्थ है वीरता का कारण। 'वीर्यमय शरीर वाले' का अर्थ है मानो साक्षात् वीर्य के समान; यदि वीर्य का कोई शरीर होता, तो वे उसके सदृश होते। प्रश्न उठता है कि चक्रवर्ती राजा की कोई शत्रु-सेना तो होती नहीं जिसे उसके पुत्र कुचलें, फिर 'परसेनप्पमद्दना' (शत्रु-सेना का मर्दन करने वाले) क्यों कहा गया? इस शंका के समाधान में 'सचे' आदि कहा गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि शत्रु-सेना हो या न हो, वे इतने महानुभाव होते हैं। 'धम्मेन' का अर्थ है अपने द्वारा संचित पुण्य-धर्म से। उससे प्रेरित होकर पृथ्वी के सभी राजा अगवानी करते हुए 'महाराज, आपका स्वागत है' आदि कहकर अपना राज्य चक्रवर्ती राजा को सौंप देते हैं। इसीलिए 'सो इमं...पे... अज्झावसति' कहा गया है। अट्ठकथा में उस उक्त धर्म के चिरकाल तक विपाक देने के लिए प्रत्यय-भूत, चक्रवर्ती-व्रत से सिद्ध प्रयोग-संपत्ति संज्ञक धर्म को दिखाने के लिए 'प्राणि-हिंसा नहीं करनी चाहिए' आदि पंचशील धर्म कहा गया है। इस प्रकार 'अदण्डेन असत्थेन' (बिना दण्ड और बिना शस्त्र के) यह वचन भली-भाँति समर्थित होता है। चूँकि राग आदि पाप-धर्म उत्पन्न होकर सत्त्वों की संतान को ढककर और आवृत करके स्थित रहते हैं तथा कुशल की प्रवृत्ति को रोकते हैं, इसलिए उन्हें 'छदना' और 'छदा' (आवरण) कहा गया है। ဝိဝဋ္ဋေတွာ ပရိဝတ္တေတွာ. ပူဇာရဟတာ ဝုတ္တာ ‘‘အရဟတီတိ အရဟ’’န္တိ. တဿာတိ ပူဇာရဟတာယ. ယသ္မာ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ, တသ္မာ အရဟန္တိ. ဗုဒ္ဓတ္တဟေတုဘူတာ ဝိဝဋ္ဋစ္ဆဒတာ ဝုတ္တာ သဝါသနသဗ္ဗကိလေသပ္ပဟာနပုဗ္ဗကတ္တာ ဗုဒ္ဓဘာဝသိဒ္ဓိယာ. အရဟံ ဝဋ္ဋာဘာဝေနာတိ ဖလေန ဟေတုအနုမာနဒဿနံ. သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ ဆဒနာဘာဝေနာတိ ဟေတုနာ ဖလာနုမာနဒဿနံ. ဟေတုဒွယံ ဝုတ္တံ ‘‘ဝိဝဋ္ဋော ဝိစ္ဆဒေါ စာ’’တိ. ဒုတိယဝေသာရဇ္ဇေနာတိ ‘‘ခီဏာသဝဿ တေ ပဋိဇာနတော’’တိအာဒိနာ (မ. နိ. ၁.၁၅၀) အာဂတေန ဝေသာရဇ္ဇေန. ပုရိမသိဒ္ဓီတိ [Pg.170] ပုရိမဿ ပဒဿ အတ္ထသိဒ္ဓိ. ပဌမေနာတိ ‘‘သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ တေ ပဋိဇာနတော’’တိအာဒိနာ (မ. နိ. ၁.၁၅၀) အာဂတေန ဝေသာရဇ္ဇေန. ဒုတိယသိဒ္ဓီတိ ဗုဒ္ဓတ္တသိဒ္ဓိ. တတိယစတုတ္ထေဟီတိ ‘‘ယေ ခေါ ပန တေ အန္တရာယိကာ ဓမ္မာ’’တိအာဒိနာ (မ. နိ. ၁.၁၅၀), ‘‘ယဿ ခေါ ပန တေ အတ္ထာယာ’’တိအာဒိနာ (မ. နိ. ၁.၁၅၀) စ အာဂတေဟိ တတိယစတုတ္ထေဟိ ဝေသာရဇ္ဇေဟိ. တတိယသိဒ္ဓီတိ ဝိဝဋ္ဋစ္ဆဒနတာ သိဒ္ဓိ. ယာထာဝတော အန္တရာယိကနိယျာနိကဓမ္မာပဒေသေန ဟိ သတ္ထု ဝိဝဋ္ဋစ္ဆဒဘာဝေါ လောကေ ပါကဋော အဟောသိ. ပုရိမံ ဓမ္မစက္ခုန္တိ ပုရိမပဒံ ဘဂဝတော ဓမ္မစက္ခုံ သာဓေတိ ကိလေသာရီနံ သံသာရစက္ကဿ စ အရာနံ ဟတဘာဝဒီပနတော. ဒုတိယံ ပဒံ ဗုဒ္ဓစက္ခုံ သာဓေတိ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿေဝ တံ သမ္ဘဝတော. တတိယံ ပဒံ သမန္တစက္ခုံ သာဓေတိ သဝါသနသဗ္ဗကိလေသပ္ပဟာနဒီပနတော. ‘‘သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ’’တိ ဟိ ဝတွာ ‘‘ဝိဝဋ္ဋစ္ဆဒေါ’’တိ ဝစနံ ဗုဒ္ဓဘာဝါဝဟမေဝ သဗ္ဗကိလေသပ္ပဟာနံ ဝိဘာဝေတီတိ. သူရဘာဝန္တိ လက္ခဏဝိဘာဝနေန ဝိသဒဉာဏတံ. विवट्टेतवा (खोलकर) और परिवट्टेतवा (घुमाकर)। पूजा की अर्हता के कारण 'अरहति इति अरहं' (जो योग्य है वह अरहंत है) कहा गया है। 'तस्स' का अर्थ पूजा की अर्हता से है। चूँकि वे सम्यक्सम्बुद्ध हैं, इसलिए वे अरहंत हैं। बुद्धत्व का हेतुभूत 'विवट्टच्छदता' (आवरण का हटना) कहा गया है, क्योंकि वासना सहित सभी क्लेशों के प्रहाण पूर्वक बुद्धत्व की सिद्धि होती है। 'अरहं' संसार-चक्र (वट्ट) के अभाव के कारण है - यह फल से हेतु का अनुमान दिखाना है। 'सम्मासम्बुद्ध' आवरण (छदन) के अभाव के कारण है - यह हेतु से फल का अनुमान दिखाना है। दो हेतु कहे गए हैं - 'विवट्ट' (विवृत्त) और 'विच्छद' (आवरण रहित)। 'द्वितीय वैशारद्य' से तात्पर्य 'खीणासवस्स ते पटिजानतो' (म. नि. 1.150) आदि से आए वैशारद्य से है। 'पुरिमसिद्धि' का अर्थ पूर्व पद की अर्थ-सिद्धि है। 'प्रथम' से तात्पर्य 'सम्मासम्बुद्धस्स ते पटिजानतो' (म. नि. 1.150) आदि से आए वैशारद्य से है। 'द्वितीय सिद्धि' का अर्थ बुद्धत्व की सिद्धि है। 'तृतीय और चतुर्थ' से तात्पर्य 'ये खो पन ते अन्तरायिका धम्मा' (म. नि. 1.150) और 'यस्स खो पन ते अत्थाया' (म. नि. 1.150) आदि से आए तीसरे और चौथे वैशारद्य से है। 'तृतीय सिद्धि' का अर्थ विवट्टच्छदनता की सिद्धि है। यथार्थ रूप से अन्तरायिक और नैर्याणिक धर्मों के उपदेश से ही शास्ता का 'विवट्टच्छद' भाव लोक में प्रकट हुआ। 'पूर्व धम्मचक्खु' का अर्थ है कि पूर्व पद भगवान के धर्मचक्षु को सिद्ध करता है, क्योंकि यह क्लेश रूपी शत्रुओं और संसार-चक्र के अरों (तीलियों) के विनाश को दर्शाता है। दूसरा पद 'बुद्धचक्षु' को सिद्ध करता है क्योंकि वह केवल सम्यक्सम्बुद्ध में ही संभव है। तीसरा पद 'समन्तचक्षु' को सिद्ध करता है क्योंकि वह वासना सहित सभी क्लेशों के प्रहाण को दर्शाता है। 'सम्मासम्बुद्ध' कहकर 'विवट्टच्छदो' कहना बुद्धत्व को लाने वाले सभी क्लेशों के प्रहाण को ही स्पष्ट करता है। 'सूरभाव' का अर्थ लक्षणों के विवेचन द्वारा स्पष्ट ज्ञान होना है। ၃၈၅. ဂဝေသီတိ (ဒီ. နိ. ဋီ. ၁.၂၈၇) ဉာဏေန ပရိယေသနံ အကာသိ. သမာနယီတိ ဉာဏေန သင်္ကလေန္တော သမာနံ အာနယိ သမာဟရိ. န သက္ကောတိ သံကုစိတေ ဣရိယာပထေ ယေဘုယျေန တေသံ ဒုဗ္ဗိဘာဝနတော. ကင်္ခတီတိ ပဒဿ အာကင်္ခတီတိ အယမတ္ထောတိ အာဟ – ‘‘အဟော ဝတ ပဿေယျန္တိ ပတ္ထနံ ဥပ္ပာဒေတီ’’တိ. ကိစ္ဆတီတိ ကိလမတိ. ‘‘ကင်္ခတီ’’တိ ပဒဿ ပုဗ္ဗေ အာသီသနတ္ထတံ ဝတွာ ဣဒါနိ တဿ သံသယတ္ထတ္တမေဝ ဝိကပ္ပန္တရဝသေန ဒဿေန္တော ‘‘ကင်္ခါယ ဝါ ဒုဗ္ဗလာ ဝိမတိ ဝုတ္တာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. တီဟိ ဓမ္မေဟိ တိပ္ပကာရေဟိ သံသယဓမ္မေဟိ. ကာလုဿိယဘာဝေါတိ အပ္ပသန္နတာယ ဟေတုဘူတော အာဝိလဘာဝေါ. ယသ္မာ ဘဂဝတော ကောသောဟိတံ သဗ္ဗဗုဒ္ဓါဝေဏိကံ ဝတ္ထဂုယှံ သုဝိသုဒ္ဓကဉ္စနမဏ္ဍလသန္နိကာသံ အတ္တနော သဏ္ဌာနသန္နိဝေသသုန္ဒရတာယ အာဇာနေယျဂန္ဓဟတ္ထိနော ဝရင်္ဂစာရုဘာဝံ ဝိကသမာနတပနိယာရဝိန္ဒသမုဇ္ဇလကေသရာဝတ္တဝိလာသံ သဉ္ဈာပဘာနုရဉ္ဇိတဇလဝနန္တရာဘိလက္ခိတ-သမ္ပုဏ္ဏစန္ဒမဏ္ဍလသောဘဉ္စ အတ္တနော သိရိယာ အဘိဘုယျ ဝိရာဇတိ, ယံ ဗာဟိရဗ္ဘန္တရမလေဟိ အနုပက္ကိလိဋ္ဌတာယ စိရကာလံ သုပရိစိတဗြဟ္မစရိယာဓိကာရတာယ သုသဏ္ဌိတသဏ္ဌာနသမ္ပတ္တိယာ စ ကောပီနမ္ပိ သန္တံ အကောပီနမေဝ, တသ္မာ ဝုတ္တံ ‘‘ဘဂဝတော ဟီ’’တိအာဒိ. ပဟူတဘာဝန္တိ [Pg.171] ပုထုလဘာဝံ. ဧတ္ထေဝ ဟိ တဿ သံသယော, တနုမုဒုသုကုမာရတာဒီသု ပနဿ ဂုဏေသု တဿ ဝိစာရဏာ ဧဝ နာဟောသိ. ३८५. 'गवेसी' (दी. नि. टी. 1.287) का अर्थ है ज्ञान से अन्वेषण किया। 'समानयी' का अर्थ है ज्ञान से संकलन करते हुए समान रूप से लाया या संग्रह किया। संकुचित ईर्यापथ में प्रायः उनका स्पष्ट ज्ञान न होने के कारण वह समर्थ नहीं होता। 'कङ्खति' पद का अर्थ 'आकांक्षति' (इच्छा करता है) है, यह कहते हुए कहा - 'अहो! काश मैं देख पाता' ऐसी प्रार्थना उत्पन्न करता है। 'किच्छति' का अर्थ है थकना या कष्ट पाना। 'कङ्खति' पद का पहले आशींसन (इच्छा) अर्थ बताकर, अब उसके संशय अर्थ को ही विकल्पान्तर से दिखाते हुए 'काङ्क्षा या दुर्बल विमति कही गई है' आदि कहा गया है। 'तीन धर्मों' से तात्पर्य तीन प्रकार के संशय धर्मों से है। 'कालुस्सियभाव' का अर्थ है अप्रसन्नता का कारणभूत मलिनता। चूँकि भगवान का कोशगत (म्यान में ढका हुआ) और सभी बुद्धों का असाधारण 'वत्थगुय्ह' (गुह्य अंग), जो अत्यंत शुद्ध स्वर्ण-मण्डल के समान है, अपनी बनावट और विन्यास की सुंदरता से श्रेष्ठ गंधहस्ती के श्रेष्ठ अंग की सुंदरता को, विकसित होते हुए तप्त स्वर्ण-कमल के प्रज्वलित केसर-भँवर के विलास को, और संध्या की प्रभा से रंजित जल एवं वन के बीच दिखाई देने वाले पूर्ण चन्द्रमण्डल की शोभा को अपनी श्री (शोभा) से अभिभूत कर सुशोभित होता है; जो बाह्य और आंतरिक मलों से अदूषित होने के कारण, चिरकाल तक भली-भाँति आचरित ब्रह्मचर्य के प्रभाव से और सुगठित शारीरिक संरचना की संपत्ति के कारण, गुप्त अंग होते हुए भी गुप्त जैसा (असुखद) नहीं है, इसीलिए 'भगवतो हि' आदि कहा गया है। 'पहूतभाव' का अर्थ है विशालता। उसे केवल इसी में संशय था, जबकि सूक्ष्मता, कोमलता और सुकुमारता आदि गुणों के विषय में तो उसका कोई विचार ही नहीं था। ဟိရိကရဏောကာသန္တိ ဟိရိယိတဗ္ဗဋ္ဌာနံ. ဆာယန္တိ ပဋိဗိမ္ဗံ. ကီဒိသန္တိ အာဟ ‘‘ဣဒ္ဓိယာ’’တိအာဒိ. ဆာယာရူပန္တိ ဘဂဝတော ပဋိဗိမ္ဗရူပံ. တဉ္စ ခေါ ဗုဒ္ဓသန္တာနတော ဝိနိမုတ္တံ ရူပကမတ္တံ ဘဂဝတော သရီရဝဏ္ဏသဏ္ဌာနာဝယဝံ ဣဒ္ဓိမယံ ဗိမ္ဗကမတ္တံ, တံ ပန ဒဿေန္တော ဘဂဝါ ယထာ အတ္တနော ဗုဒ္ဓရူပံ န ဒိဿတိ, တထာ ကတွာ ဒဿေတိ. နီဟရိတွာတိ ဖရိတွာ. 'हिरिकरणोकासं' का अर्थ है लज्जा करने योग्य स्थान। 'छायां' का अर्थ है प्रतिबिम्ब। कैसा? इसके लिए 'इद्धिया' (ऋद्धि से) आदि कहा। 'छायारूपं' का अर्थ है भगवान का प्रतिबिम्ब रूप। और वह बुद्ध-सन्तान से विमुक्त केवल एक रूप मात्र है, जो भगवान के शरीर के वर्ण, संस्थान और अवयवों वाला ऋद्धिमय बिम्ब मात्र है; उसे दिखाते हुए भगवान इस प्रकार दिखाते हैं जिससे उनका अपना बुद्ध-रूप न दिखे। 'नीहरित्वा' का अर्थ है फैलाकर (स्फुरित करके)। ကဏ္ဏသောတာနံ ဥပစိတတနုတမ္ဗလောမတာယ ဓောတရဇတပနာဠိကာသဒိသတာ ဝုတ္တာ. မုခပရိယန္တေတိ ကေသန္တေ. कान के छिद्रों की सघन, सूक्ष्म और ताम्रवर्ण की रोमराजि के कारण उनकी तुलना धुली हुई चाँदी की नलिकाओं से की गई है। 'मुखपरियन्ते' का अर्थ है केशों के अंत (सीमा) में। ကိရိယာကရဏန္တိ ကိရိယာယ ကာယိကဿ ဝါစသိကဿ ပဋိပတ္တိ. တတ္ထာတိ တေသု ကိစ္စေသု. ဓမ္မကထိကာနံ ဝတ္တံ ဒဿေတုံ ဗီဇနိဂ္ဂဟဏံ ကတံ. န ဟိ အညထာ သဗ္ဗဿပိ လောကဿ အလင်္ကာရဘူတံ ပရမုက္ကံသဂတံ သိက္ခာသံယမာနံ ဗုဒ္ဓါနံ မုခစန္ဒမဏ္ဍလံ ပဋိစ္ဆာဒေတဗ္ဗံ ဟောတိ. 'किरियाकरणं' का अर्थ है क्रिया की, यानी कायिक और वाचिक प्रतिपत्ति (आचरण)। 'तत्थ' का अर्थ है उन कृत्यों में। धर्मकथिकों के व्रत (कर्तव्य) को दिखाने के लिए पंखा (बीजनी) ग्रहण करना कहा गया है। अन्यथा, समस्त लोक के अलंकार स्वरूप, परम उत्कर्ष को प्राप्त, शिक्षा और संयम से युक्त बुद्धों के मुख-चन्द्रमण्डल को ढकने की कोई आवश्यकता नहीं होती। ပတ္ထရိတဝိတာနဩလမ္ဗိတဂန္ဓဒါမကုသုမဒါမကေ ဂန္ဓမဏ္ဍလမာဠေ. ပုဗ္ဗဘာဂေန ပရိစ္ဆိန္ဒိတွာတိ ‘‘ဧတ္တကံ ဝေလံ သမာပတ္တိယာ ဝီတိနာမေဿာမီ’’တိ ဧဝံ ပဝတ္တေန ပုဗ္ဗဘာဂေန ကာလံ ပရိစ္ဆိန္ဒိတွာ. ပစ္စယဒါယကေသု အနုရောဓဝသေန ပရိသံ ဥဿာဒေန္တော ဝါ ပဂ္ဂဏှန္တော, အဒါယကေသု ဝိရောဓဝသေန ပရိသံ အပသာဒေန္တော ဝါ. फैले हुए वितान (चंदोवे) और लटकती हुई गंध-मालाओं तथा पुष्प-मालाओं वाले गंध-मण्डप में। 'पुब्बभागेन परिच्छिन्दित्वा' का अर्थ है - 'इतने समय तक समापत्ति में रहूँगा' इस प्रकार पूर्व भाग में ही काल का निर्धारण करके। प्रत्यय (दान) देने वालों के प्रति अनुग्रह के वश में परिषद को प्रोत्साहित करते हुए, और न देने वालों के प्रति विरोध के वश में परिषद को निरुत्साहित करते हुए। ယောဂက္ခေမံ အန္တရာယာဘာဝံ. သဘာဝဂုဏေနေဝါတိ ယထာဝုတ္တဂုဏေနေဝ. ဘောတော ဂေါတမဿ ဂုဏံ သဝိဂ္ဂဟံ စက္ကဝါဠံ အတိသမ္ဗာဓံ ဝိတ္ထာရေန သန္ဓာရေတုံ အပ္ပဟောန္တတော. ဘဝဂ္ဂံ အတိနီစံ ဥပရူပရိ သန္ဓာရေတုံ အပ္ပဟောန္တတော. 'योगक्खेमं' का अर्थ है अंतरायों (बाधाओं) का अभाव। 'सभावगुणेनेव' का अर्थ है यथोक्त गुण से ही। भगवान गौतम के सदेह गुण को धारण करने के लिए चक्रवाल अत्यंत संकीर्ण होने के कारण विस्तार से धारण करने में असमर्थ होने से। भवाग्र के अत्यंत नीचा होने के कारण ऊपर-ऊपर धारण करने में असमर्थ होने से। ၃၈၆. ဌာနဂမနာဒီသု (ဒီ. နိ. ဋီ. ၂.၃၅) ဘူမိယံ သုဋ္ဌု သမံပတိဋ္ဌိတာ ပါဒါ ဧတဿာတိ သုပ္ပတိဋ္ဌိတပါဒေါ. တံ ပန ဘဂဝတော သုပ္ပတိဋ္ဌိတပါဒတံ ဗျတိရေကမုခေန ဝိဘာဝေတုံ ‘‘ယထာ ဟီ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. တတ္ထ အဂ္ဂတလန္တိ အဂ္ဂပါဒတလံ. ပဏှီတိ ပဏှိတလံ. ပဿန္တိ ပါဒတလဿ ဒွီသု ပဿေသု ဧကေကံ, ဥဘယမေဝ ဝါ ပရိယန္တံ ပဿံ. သုဝဏ္ဏပါဒုကတလံ ဝိယ ဥဇုကံ နိက္ခိပိယမာနံ. ဧကပ္ပဟာရေနေဝါတိ ဧကက္ခဏေယေဝ. သကလံ ပါဒတလံ ဘူမိံ ဖုသတိ နိက္ခိပနေ. ဧကပ္ပဟာရေနေဝ သကလံ ပါဒတလံ ဘူမိတော ဥဋ္ဌဟတီတိ ယောဇနာ. ३८६. स्थान-गमन आदि में (दी. नि. टी. 2.35) भूमि पर अच्छी तरह समान रूप से स्थित पैर इसके हैं, इसलिए वह 'सुप्रतिष्ठितपाद' है। भगवान की उस सुप्रतिष्ठितपादता को व्यतिरेक मुख से स्पष्ट करने के लिए 'यथा ही' आदि कहा गया है। वहाँ 'अग्गतल' का अर्थ अग्र-पादतल है। 'पण्हि' का अर्थ एड़ी का तल है। 'पस्स' का अर्थ पादतल के दोनों पार्श्वों में से एक-एक, या दोनों ही पर्यन्त पार्श्व है। सुवर्ण की पादुका के तल के समान सीधा रखा जाता हुआ। 'एकप्पहारेनेव' का अर्थ एक क्षण में ही है। रखने पर सारा पादतल भूमि को स्पर्श करता है। एक ही प्रहार (क्षण) में सारा पादतल भूमि से ऊपर उठता है - यह योजना है। တတြာတိ [Pg.172] တာယ သုပ္ပတိဋ္ဌိတပါဒတာယ အနုပုဗ္ဗနိန္နာဝ အစ္ဆရိယဗ္ဘုတံ ဣဒံ ဝုစ္စမာနံ နိဿန္ဒဖလံ. ဝုတ္တမေဝတ္ထံ သတ္ထု တိဒိဝဂမနေန သုပါကဋံ ကာတုံ ‘‘တထာ ဟီ’’တိအာဒိံ ဝတွာ ‘‘န ဟီ’’တိအာဒိနာ တံ သမတ္ထေတိ. တေန ပဌမလက္ခဏတောပိ ဒုတိယလက္ခဏံ မဟာနုဘာဝန္တိ ဒဿေတိ. တထာ ဟိ ဝက္ခတိ ‘‘အန္တမသော စက္ကဝတ္တိရညော ပရိသံ ဥပါဒါယ သဗ္ဗောပိ စက္ကလက္ခဏဿေဝ ပရိဝါရော’’တိ. ယုဂန္ဓရပဗ္ဗတဿ တာဝတိံသဘဝနဿ စ ပကတိပဒနိက္ခေပဋ္ဌာနုပသင်္ကမနေ နေဝ ဗုဒ္ဓါနံ, န ဒေဝတာနံ အာနုဘာဝေါ, အထ ခေါ ဗုဒ္ဓါနံ လက္ခဏာနုဘာဝေါတိ ဣမမတ္ထံ နိဒဿိတံ. သီလတေဇေန…ပေ… ဒသန္နံ ပါရမီနံ အာနုဘာဝေနာတိ ဣဒမ္ပိ လက္ခဏနိဗ္ဗတ္တကမ္မဝိသေသကိတ္တနမေဝါတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. သဗ္ဗာဝန္တေဟီတိ သဗ္ဗပဒေသဝန္တေဟိ. वहाँ उस सुप्रतिष्ठितपादता के कारण अनुक्रम से निम्न (ढालू) न होना, यह कहा जाने वाला आश्चर्यजनक और अद्भुत निस्यन्द-फल है। शास्ता के स्वर्ग-गमन से इसी अर्थ को सुस्पष्ट करने के लिए 'तथा ही' आदि कहकर 'न ही' आदि से उसका समर्थन करते हैं। उससे प्रथम लक्षण की अपेक्षा द्वितीय लक्षण को महानुभाव वाला दिखाते हैं। जैसा कि कहेंगे - 'अन्ततः चक्रवर्ती राजा की परिषद को लेकर सब भी चक्र-लक्षण का ही परिवार है'। युगन्धर पर्वत और तावतिंस भवन में सामान्य पद-निक्षेप के स्थान पर पहुँचना न तो बुद्धों का और न ही देवताओं का अनुभाव है, बल्कि वह बुद्धों के लक्षण का अनुभाव है - यह अर्थ दिखाया गया है। 'शील के तेज से... पे... दस पारमिताओं के अनुभाव से' - यह भी लक्षण को उत्पन्न करने वाले कर्म-विशेष का कीर्तन ही है, ऐसा समझना चाहिए। 'सब्बावन्तेहि' का अर्थ सभी प्रदेशों वाले से है। နာဘိပရိစ္ဆိန္နာတိ နာဘိယံ ပရိစ္ဆိန္နာ ပရိစ္ဆေဒဝသေန ဌိတာ. နာဘိမုခပရိက္ခေပပဋ္ဋောတိ ပကတိစက္ကဿ အက္ခဗ္ဘာဟတပရိဟရဏတ္ထံ နာဘိမုခေ ဌပေတဗ္ဗပရိက္ခေပပဋ္ဋော. နေမိမဏိကာတိ နေမိယံ အာဝဠိဘာဝေန ဌိတမဏိကာလေခါ. 'नाभिपरिच्छिन्ना' का अर्थ नाभि में परिच्छिन्न (सीमित), परिच्छेद के वश से स्थित। 'नाभिमखपरिक्खेपपट्टो' का अर्थ स्वाभाविक चक्र के अक्ष (धुरी) के आघात के परिहार के लिए नाभि के मुख पर रखे जाने वाला घेरे का पट्टा है। 'नेमिमणिका' का अर्थ नेमि (परिधि) में पंक्तिबद्ध रूप से स्थित मणियों की रेखाएँ हैं। သမ္ဗဟုလဝါရောတိ ဗဟုဝိဓလေခင်္ဂဝိဘာဝနဝါရော. သတ္တီတိ အာဝုဓသတ္တိ. သိရိဝစ္ဆောတိ သိရိမုခံ. နန္ဒီတိ ဒက္ခိဏာဝဋ္ဋံ. သောဝတ္တိကောတိ သောဝတ္တိအင်္ကော. ဝဋံသကောတိ အာဝေဠံ. ဝဍ္ဎမာနကန္တိ ပုရိသဟာရိ ပုရိသင်္ဂံ. မောရဟတ္ထကောတိ မောရပိဉ္ဆကလာပေါ, မောရပိဉ္ဆ ပရိသိဗ္ဗိတော ဝါ ဗီဇနိဝိသေသော. ဝါလဗီဇနီတိ စာမရိဝါလံ. သိဒ္ဓတ္ထာဒိ ပုဏ္ဏဃဋပုဏ္ဏပါတိယော. ‘‘စက္ကဝါဠော’’တိ ဝတွာ တဿ ပဓာနာဝယဝေ ဒဿေတုံ ‘‘ဟိမဝါ သိနေရု…ပေ… သဟဿာနီ’’တိ ဝုတ္တံ. 'सम्बहुलवारो' का अर्थ बहुत प्रकार के रेखा-अंगों को स्पष्ट करने वाला वार है। 'सत्ति' का अर्थ आयुध-शक्ति (भाला) है। 'सिरिवच्छो' का अर्थ श्रीमुख है। 'नन्दी' का अर्थ दक्षिणावर्त है। 'सोवत्तिको' का अर्थ स्वस्तिक चिह्न है। 'वटंसको' का अर्थ अवतंसक (माला/कुण्डल) है। 'वड्ढमानकं' का अर्थ पुरुषों को प्रिय पुरुष-अंग (वर्धमानक चिह्न) है। 'मोरहत्थको' का अर्थ मयूर-पिच्छ का समूह, या मयूर-पिच्छ से सिला हुआ पंखा विशेष है। 'वालबीजनी' का अर्थ चँवर के बाल हैं। 'सिद्धार्थ' आदि सरसों, पूर्णघट और पूर्णपात्र हैं। 'चक्कवाळो' कहकर उसके प्रधान अवयवों को दिखाने के लिए 'हिमवा सिनेरु... पे... सहस्सानी' कहा गया है। အာယတပဏှီတိ ဣဒံ အညေသံ ပဏှိတော ဒီဃတံ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ, န ပန အတိဒီဃတန္တိ အာဟ ‘‘ပရိပုဏ္ဏပဏှီ’’တိ. ယထာ ပန ပဏှိလက္ခဏံ ပရိပုဏ္ဏံ နာမ ဟောတိ, တံ ဗျတိရေကမုခေန ဒဿေတုံ ‘‘ယထာ ဟီ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. အာရဂ္ဂေနာတိ မဏ္ဍလာယ သိခါယ. ဝဋ္ဋေတွာတိ ယထာ သုဝဋ္ဋံ ဟောတိ, ဧဝံ ဝဋ္ဋေတွာ. ရတ္တကမ္ဗလဂေဏ္ဍုကသဒိသာတိ ရတ္တကမ္ဗလမယဂေဏ္ဍုကသဒိသာ. 'आयतपण्हि' यह दूसरों की एड़ी की अपेक्षा दीर्घता के सन्दर्भ में कहा गया है, न कि अति-दीर्घता के लिए, इसलिए कहा - 'परिपुण्णपण्हि' (परिपूर्ण एड़ी)। जिस प्रकार एड़ी का लक्षण परिपूर्ण होता है, उसे व्यतिरेक मुख से दिखाने के लिए 'यथा ही' आदि कहा गया है। 'आरग्गेन' का अर्थ मण्डलाकार शिखा से है। 'वट्टेत्वा' का अर्थ जैसे अच्छी तरह गोल हो, वैसे गोल करके। 'रत्तकम्बलगेण्डुकसदिस' का अर्थ लाल कम्बल की गेंद के समान है। မက္ကဋဿေဝါတိ ဝါနရဿ ဝိယ. ဒီဃဘာဝေန သမတံ သန္ဓာယေတံ ဝုတ္တံ. နိယျာသတေလေနာတိ ဆဒိကနိယျာသာဒိနိယျာသသမ္မိဿေန တေလေန. 'मक्कठस्सेव' का अर्थ वानर के समान है। दीर्घता के कारण समानता के सन्दर्भ में यह कहा गया है। 'निय्यासतलेन' का अर्थ राल (निर्यास) और तेल आदि के मिश्रण वाले तेल से है। တလုနာတိ [Pg.173] သုကုမာရာ. 'तलुना' का अर्थ सुकुमार (कोमल) है। စမ္မေနာတိ အင်္ဂုလန္တရဝေဌိတစမ္မေန. ပဋိဗဒ္ဓအင်္ဂုလန္တရောတိ ဧကတော သမ္ဗဒ္ဓအင်္ဂုလန္တရော. ဧကပ္ပမာဏာတိ ဒီဃတော သမာနပ္ပမာဏာ. ယဝလက္ခဏန္တိ အဗ္ဘန္တရတော အင်္ဂုလိပဗ္ဗေဌိတံ ယဝလက္ခဏံ. ပဋိဝိဇ္ဈိတွာတိ တံတံပဗ္ဗာနံ သမာနဒေသတာယ အင်္ဂုလီနံ ပသာရိတကာလေ အညမညံ ဝိဇ္ဈိတာနိ ဝိယ ဖုသိတွာ တိဋ္ဌန္တိ. 'चम्मेन' का अर्थ अंगुलियों के बीच वेष्टित चर्म (झिल्ली) से है। 'पटिबद्धअङ्गुलन्तरो' का अर्थ एक साथ जुड़ी हुई अंगुलियों के बीच वाला। 'एकप्पमाणा' का अर्थ लम्बाई में समान परिमाण वाली। 'यवलक्खणं' का अर्थ भीतर से अंगुलियों के पोरों में वेष्टित यव (जौ) का लक्षण। 'पटिविज्झित्वा' का अर्थ उन-उन पोरों के समान स्थान पर होने से अंगुलियों को फैलाने के समय एक-दूसरे को बेधती हुई सी स्पर्श करके स्थित होती हैं। သင်္ခါ ဝုစ္စန္တိ ဂေါပ္ဖကာ, ဥဒ္ဓံ သင်္ခါ ဧတေသန္တိ ဥဿင်္ခါ, ပါဒါ. ပိဋ္ဌိပါဒေတိ ပိဋ္ဌိပါဒသမီပေ. သုခေန ပါဒါ ပရိဝတ္တန္တိ ပါဒနာမနာဒီသု, တေနေဝ ဂစ္ဆန္တာနံ တေသံ ဟေဋ္ဌာ ပါဒတလာနိ ဒိဿန္တိ. တေနာတိ ဂေါပ္ဖကာနံ ပိဋ္ဌိပါဒတော ဥဒ္ဓံ ပတိဋ္ဌိတတ္တာ. စတုရင်္ဂုလမတ္တဉှိ တာနိ ဥဒ္ဓံ အာရောဟိတွာ ပတိဋ္ဌဟန္တိ, နိဂုဠှာနိ စ ဟောန္တိ, န အညေသံ ဝိယ ပညာယမာနာနိ. သတိပိ ဒေသန္တရပ္ပဝတ္တိယံ နိစ္စလောတိ ဒဿနတ္ထံ နာဘိဂ္ဂဟဏံ. शंख टखनों (गुल्फों) को कहा जाता है, जिनके शंख ऊपर हों वे 'उस्सङ्खा' (उच्च-गुल्फ) पैर हैं। 'पिट्ठिपादे' का अर्थ पीठ-पाद (पैर के ऊपरी भाग) के समीप। पैर मोड़ने आदि में पैर सुखपूर्वक घूमते हैं, इसीलिए चलते हुए उनके नीचे के पादतल दिखाई देते हैं। 'तेन' का अर्थ टखनों के पीठ-पाद से ऊपर स्थित होने के कारण है। वे चार अंगुल मात्र ऊपर चढ़कर स्थित होते हैं, और 'निगूढ़' (छिपे हुए) होते हैं, दूसरों के समान दिखाई देने वाले नहीं होते। देशान्तर में प्रवृत्ति होने पर भी निश्चल है, यह दिखाने के लिए 'नाभि' का ग्रहण है। ယသ္မာ ဧဏီမိဂဿ သမန္တတော ဧကသဒိသမံသာ အနုက္ကမေန ဥဒ္ဓံ ထူလာ ဇင်္ဃာ ဟောန္တိ, တသ္မာ ဝုတ္တံ ‘‘ဧဏီမိဂသဒိသဇင်္ဃာ’’တိ. ပရိပုဏ္ဏဇင်္ဃောတိ သမန္တတော မံသူပစယေန ပရိပုဏ္ဏဇင်္ဃော. တေနာဟ ‘‘န ဧကတော’’တိအာဒိ. चूँकि एणी मृग की चारों ओर से एक समान मांस वाली जंघाएँ क्रमशः ऊपर की ओर स्थूल (मोटी) होती हैं, इसलिए 'एणीमिगसदिसजङ्घा' कहा गया है। 'परिपुण्णजङ्घो' का अर्थ चारों ओर से मांस के संचय से परिपूर्ण जंघा वाला। इसीलिए कहा 'न एकतो' आदि। ဧတေနာတိ ‘‘အနောနမန္တော’’တိအာဒိဝစနေန, ဇာဏုဖာသုဘာဝဒီပနေနာတိ အတ္ထော. အဝသေသဇနာတိ ဣမိနာ လက္ခဏေန ရဟိတာ ဇနာ. ခုဇ္ဇာ ဝါ ဟောန္တိ ဟေဋ္ဌိမကာယတော ဥပရိမကာယဿ ရဿတာယ. ဝါမနာ ဝါ ဥပရိမကာယတော ဟေဋ္ဌိမကာယဿ ရဿတာယ. ဧတေန ဌပေတွာ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓံ စက္ကဝတ္တိနဉ္စ ဣတရေ သတ္တာ ခုဇ္ဇာ ဝါမနာ စာတိ ဒဿေတိ. 'एतेन' का अर्थ 'अनो नमन्तो' (बिना झुके) आदि वचन से, जानु (घुटने) की सुलभता को प्रकट करने से है। 'अवसेसजना' का अर्थ इस लक्षण से रहित लोग। वे या तो निचले शरीर की अपेक्षा ऊपरी शरीर के छोटा होने से 'कुबड़े' (खुज्ज) होते हैं, या ऊपरी शरीर की अपेक्षा निचले शरीर के छोटा होने से 'बौने' (वामन) होते हैं। इससे सम्यक्सम्बुद्ध और चक्रवर्ती को छोड़कर शेष प्राणी कुबड़े या बौने हैं, यह दिखाता है। ဩဟိတန္တိ သမောဟိတံ အန္တောဂဓံ. တထာဘူတံ ပန တံ တေန ဆန္နံ ဟောတီတိ အာဟ ‘‘ပဋိစ္ဆန္န’’န္တိ. 'ओहितं' का अर्थ समोहित (अन्दर स्थित) है। वैसा होने पर भी वह उससे ढका होता है, इसलिए कहा 'पटिच्छन्नं' (प्रच्छन्न/कोशगत)। သုဝဏ္ဏဝဏ္ဏောတိ သုဝဏ္ဏဝဏ္ဏဝဏ္ဏောတိ အယမေတ္ထ အတ္ထောတိ အာဟ ‘‘ဇာတိဟိင်္ဂုလကေနာ’’တိအာဒိ. သွာယမတ္ထော အာဝုတ္တိဉာယေန စ ဝေဒိတဗ္ဗော. သရီရပရိယာယော ဣဓ ဝဏ္ဏသဒ္ဒေါတိ အဓိပ္ပာယေန ပဌမဝိကပ္ပံ ဝတွာ တထာရူပါယ ပန ရုဠှိယာ အဘာဝံ မနသိ ကတွာ ဝဏ္ဏဓာတုပရိယာယမေဝ ဝဏ္ဏသဒ္ဒံ ဂဟေတွာ ဒုတိယဝိကပ္ပော ဝုတ္တော. 'सुवण्णवण्णो' का अर्थ सुवर्ण के वर्ण जैसा वर्ण वाला, यह यहाँ अर्थ है, इसलिए 'जातिहिङ्गुलकेन' आदि कहा। यह अर्थ आवृत्ति के न्याय से समझना चाहिए। यहाँ 'वण्ण' शब्द शरीर का पर्यायवाची है, इस अभिप्राय से प्रथम विकल्प कहकर, फिर उस प्रकार की रूढ़ि के अभाव को मन में रखकर 'वण्ण' शब्द को वर्ण-धातु (रंग) का पर्यायवाची मानकर द्वितीय विकल्प कहा गया है। ရဇောတိ [Pg.174] သုခုမရဇော. ဇလ္လန္တိ မလီနဘာဝါဝဟော ရေဏုသဉ္စယော. တေနာဟ ‘‘မလံ ဝါ’’တိ. ယဒိ ဝိဝဋ္ဋတိ, ကထံ နှာနာဒီတိ အာဟ ‘‘ဟတ္ထဓောဝနာ’’တိအာဒိ. 'रजो' का अर्थ सूक्ष्म धूल है। 'जल्ल' का अर्थ मलिनता लाने वाला धूल का संचय है। इसीलिए कहा गया है "अथवा मल"। यदि वह (धूल) हट जाती है, तो स्नान आदि कैसे? इसीलिए "हाथ धोना" आदि कहा गया है। အာဝဋ္ဋပရိယောသာနေတိ ပဒက္ခိဏာဝဋ္ဋာယ အန္တေ. 'आवट्ठपरियोसाने' का अर्थ है प्रदक्षिणावर्त (घड़ी की सुई की दिशा में) घुमाव के अंत में। ဗြဟ္မုနော သရီရံ ပုရတော ဝါ ပစ္ဆတော ဝါ အနောနမိတွာ ဥဇုကမေဝ ဥဂ္ဂတန္တိ အာဟ ‘‘ဗြဟ္မာ ဝိယ ဥဇုဂတ္တော’’တိ. ပဿဝင်္ကာတိ ဒက္ခိဏပဿေန ဝါ ဝါမပဿေန ဝါ ဝင်္ကာ. ब्रह्मा का शरीर आगे या पीछे झुके बिना सीधा ही ऊपर उठा होता है, इसीलिए कहा गया है "ब्रह्मा के समान सीधे शरीर वाले"। 'पस्सवाङ्का' का अर्थ है दाहिनी ओर से या बाईं ओर से टेढ़ा। ဟတ္ထပိဋ္ဌိအာဒိဝသေန သတ္တ ဥဿဒါ ဧတဿာတိ သတ္တုဿဒေါ. हाथों के पृष्ठ भाग आदि के कारण जिसके सात उभार (उन्नत स्थान) हों, वह 'सत्तुस्सदो' (सप्त-उत्सद) है। သီဟဿ ပုဗ္ဗဒ္ဓံ သီဟပုဗ္ဗဒ္ဓံ, ပရိပုဏ္ဏာဝယဝတာယ သီဟပုဗ္ဗဒ္ဓံ ဝိယ သကလော ကာယော အဿာတိ သီဟပုဗ္ဗဒ္ဓကာယော. သီဟဿေဝါတိ သီဟဿ ဝိယ. သဏ္ဌန္တီတိ သဏ္ဌဟန္တိ. နာနာစိတ္တေနာတိ ဝိဝိဓစိတ္တေန. ပုညစိတ္တေနာတိ ပါရမိတာပုညစိတ္တရူပေန. စိတ္တိတောတိ သဉ္ဇာတစိတ္တဘာဝေါ. सिंह का पूर्वार्ध (अगला आधा भाग) 'सीहपुब्बद्धं' है। अंगों की परिपूर्णता के कारण जिसका संपूर्ण शरीर सिंह के पूर्वार्ध के समान हो, वह 'सीहपुब्बद्धकायो' है। 'सीहस्सेव' का अर्थ है सिंह के समान। 'सण्ठन्ति' का अर्थ है स्थित होते हैं। 'नानाचित्तेन' का अर्थ है विविध चित्त से। 'पुञ्ञचित्तेन' का अर्थ है पारमिता-पुण्य-चित्त रूप से। 'चित्तितो' का अर्थ है उत्पन्न चित्त-भाव। ဒွိန္နံ ကောဋ္ဋာနမန္တရန္တိ ဒွိန္နံ ပိဋ္ဌိဗာဟာနံ ဝေမဇ္ဈံ, ပိဋ္ဌိမဇ္ဈဿ ဥပရိဘာဂေါ. စိတံ ပရိပုဏ္ဏန္တိ အနိန္နဘာဝေန စိတံ, ဒွီဟိ ကောဋ္ဋေဟိ သမတလတာယ ပရိပုဏ္ဏံ. ဥဂ္ဂမ္မာတိ ဥဂ္ဂန္တွာ. 'द्विन्नं कोट्टानमन्तरं' का अर्थ है दोनों पीठ की हड्डियों (स्कंध-फलकों) के बीच का भाग, पीठ के मध्य का ऊपरी हिस्सा। 'चितं परिपुण्णं' का अर्थ है न धँसे होने के कारण भरा हुआ, दोनों भागों के साथ समतलता के कारण परिपूर्ण। 'उग्गम्मा' का अर्थ है ऊपर उठकर। နိဂြောဓပရိမဏ္ဍလော ဝိယ ပရိမဏ္ဍလော နိဂြောဓပရိမဏ္ဍလော ဧကဿ ပရိမဏ္ဍလသဒ္ဒဿ လောပံ ကတွာ. န ဟိ သဗ္ဗော နိဂြောဓော မဏ္ဍလော. တေနာဟ ‘‘သမက္ခန္ဓသာခေါ နိဂြောဓော’’တိ. ပရိမဏ္ဍလသဒ္ဒသန္နိဓာနေန ဝါ ပရိမဏ္ဍလောဝ နိဂြောဓော ဂယှတီတိ ပရိမဏ္ဍလသဒ္ဒဿ လောပေန ဝိနာပိ အယမတ္ထော လဗ္ဘတီတိ အာဟ ‘‘နိဂြောဓော ဝိယ ပရိမဏ္ဍလော’’တိ. ယာဝတကွဿာတိ ဩ-ကာရဿ ဝ-ကာရာဒေသံ ကတွာ ဝုတ္တံ. न्यग्रोध (बरगद) के परिमंडल के समान जो परिमंडल है, वह 'निग्रोधपरिमण्डलो' है, यहाँ एक 'परिमण्डल' शब्द का लोप करके ऐसा बना है। क्योंकि सभी न्यग्रोध मंडल (वृत्ताकार) नहीं होते। इसीलिए कहा गया है "समान स्कंध और शाखाओं वाला न्यग्रोध"। अथवा 'परिमण्डल' शब्द के सान्निध्य से परिमंडल रूप न्यग्रोध ही ग्रहण किया जाता है, इस प्रकार 'परिमण्डल' शब्द के लोप के बिना भी यह अर्थ प्राप्त होता है, इसीलिए कहा गया है "न्यग्रोध के समान परिमंडल वाला"। 'यावतक्वस्स' यह 'ओ' कार के स्थान पर 'व' कार आदेश करके कहा गया है। သမဝဋ္ဋိတက္ခန္ဓောတိ သမံ သုဝဋ္ဋိတက္ခန္ဓော. ကောဉ္စာ ဝိယ ဒီဃဂလာ, ဗကာ ဝိယ ဝင်္ကဂလာ, ဝရာဟာ ဝိယ ပုထုလဂလာတိ ယောဇနာ. သုဝဏ္ဏာလိင်္ဂသဒိသောတိ သုဝဏ္ဏမယခုဒ္ဒကမုဒိင်္ဂသဒိသော. 'समवट्टितक्खन्धो' का अर्थ है समान रूप से सुवृत्त (सुडौल) ग्रीवा वाला। योजना इस प्रकार है: क्रौंच के समान लंबी गर्दन वाले, बगुले के समान टेढ़ी गर्दन वाले, और वराह (सूअर) के समान चौड़ी गर्दन वाले। 'सुवण्णालिङ्गसदिसो' का अर्थ है सुवर्णमय छोटे मृदंग के समान। ရသဂ္ဂသဂ္ဂီတိ မဓုရာဒိဘေဒံ ရသံ ဂသန္တိ အန္တော ပဝေသန္တီတိ ရသဂ္ဂသာ, ရသဂ္ဂသာနံ အဂ္ဂါ ရသဂ္ဂသဂ္ဂါ, တာ ဧတဿ သန္တီတိ ရသဂ္ဂသဂ္ဂီ. တေနာတိ ဩဇာယ အဖရဏေန, ဟီနဓာတုကတ္တာ တေ ဗဟွာဗာဓာ ဟောန္တိ. 'रसग्गसग्गी': मधुर आदि भेदों वाले रस को जो निगलती हैं या भीतर प्रवेश कराती हैं, वे 'रसग्गसा' (रस-वाहिनियाँ) हैं; उन रस-वाहिनियों के जो अग्र भाग हैं, वे 'रसग्गसग्गा' हैं; वे जिसके पास हैं, वह 'रसग्गसग्गी' है। 'तेन' का अर्थ है ओज (रस-तत्व) के न फैलने से; हीन धातु वाले होने के कारण वे बहुत रोगों वाले होते हैं। ‘‘ဟနူ’’တိ [Pg.175] သန္နိဿယဒန္တာဓာရဿ သမညာ, တံ ဘဂဝတော သီဟဟနုသဒိသံ, တသ္မာ ဘဂဝါ သီဟဟနု. တတ္ထ ယသ္မာ ဗုဒ္ဓါနံ ရူပကာယဿ ဓမ္မကာယဿ စ ဥပမာ နာမ နိဟီနုပမာဝ, နတ္ထိ သမာနုပမာ, ကုတော အဓိကူပမာ, တသ္မာ အယမ္ပိ နိဟီနုပမာတိ ဒဿေတုံ ‘‘တတ္ထာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. တိဘာဂဝသေန မဏ္ဍလတာယ ဒွါဒသိယံ ပက္ခဿ စန္ဒသဒိသာနိ. 'हनू' दाँतों के आधारभूत आश्रय का सामान्य नाम है, वह भगवान का सिंह की ठुड्डी (जबड़े) के समान है, इसलिए भगवान 'सीहहनु' हैं। वहाँ, चूँकि बुद्धों के रूपकाय और धर्मकाय की उपमा वस्तुतः हीन उपमा (न्यून उपमा) ही होती है, कोई समान उपमा नहीं है, फिर अधिक उपमा तो कहाँ से होगी, इसलिए यह भी हीन उपमा ही है, यह दिखाने के लिए "तत्य" आदि कहा गया है। तीन भागों के अनुसार गोलाई में वे पक्ष की द्वादशी के चंद्रमा के समान हैं। ဒန္တာနံ ဥစ္စနီစတာ အဗ္ဘန္တရဗာဟိရပဿဝသေနပိ ဝေဒိတဗ္ဗာ, န အဂ္ဂဝသေနေဝ. တေနာဟ ‘‘အယပဋ္ဋဆိန္နသင်္ခပဋလံ ဝိယာ’’တိ. အယပဋ္ဋန္တိ စ ကကစံ အဓိပ္ပေတံ. ဝိသမာတိ ဝိသမသဏ္ဌာနာ. दाँतों का ऊँचा-नीचा होना केवल अग्र भाग से ही नहीं, बल्कि आंतरिक और बाहरी पार्श्वों से भी जानना चाहिए। इसीलिए कहा गया है "लोहे की पट्टी से काटे गए शंख-पटल के समान"। 'अयपट्ट' से यहाँ आरा (करवत) अभिप्रेत है। 'विसमा' का अर्थ है विषम आकृति वाले। ဝိစ္ဆိန္ဒိတွာ ဝိစ္ဆိန္ဒိတွာ ပဝတ္တသရတာယ ဆိန္နဿရာပိ. အနေကာကာရတာယ ဘိန္နဿရာပိ. ကာကဿ ဝိယ အမနုညသရတာယ ကာကဿရာပိ. အပလိဗုဒ္ဓတ္တာတိ အနုပဒ္ဒုတဝတ္ထုကတ္တာ. ဝတ္ထုန္တိ စ အက္ခရုပ္ပတ္တိဋ္ဌာနမာဟ. အဋ္ဌင်္ဂသမန္နာဂတောတိ ဧတ္ထ အဋ္ဌင်္ဂါနိ ပရတော အာဂမိဿန္တိ. မဉ္ဇုဃောသောတိ မဓုရဿရော. बार-बार रुक-रुक कर स्वर के प्रवृत्त होने के कारण 'छिन्नस्सरा' (टूटा हुआ स्वर) भी। अनेक प्रकार के होने के कारण 'भिन्नस्सरा' (फटा हुआ स्वर) भी। कौवे के समान अप्रिय स्वर होने के कारण 'काकस्सरा' (कौवे जैसा स्वर) भी। 'अपलिबुद्धत्ता' का अर्थ है आधार (स्थान) के उपद्रव-रहित होने के कारण। 'वत्थु' से अक्षरों की उत्पत्ति के स्थान को कहा गया है। 'अट्ठङ्गसमन्नागतो' के विषय में आठ अंग आगे आएँगे। 'मञ्जुघसो' का अर्थ है मधुर स्वर वाला। ကရဝီကသဒ္ဒေါ ယေသံ သတ္တာနံ သောတပထံ ဥပဂစ္ဆတိ, တေ အတ္တနော သရသမ္ပတ္တိယာ ပကတိံ ဇဟာပေတွာ အဝသေ ကရောန္တော အတ္တနော ဝသေ ဝတ္တေတိ, ဧဝံ မဓုရောတိ ဒဿေန္တော ‘‘တတြိဒ’’န္တိအာဒိမာဟ. တံ ပီတိန္တိ တံ ဗုဒ္ဓဂတံ ပီတိံ. တေနေဝ နီဟာရေန ပုနပ္ပုနံ ပဝတ္တန္တံ အဝိဇဟိတွာ ဝိက္ခမ္ဘိတကိလေသာ ထေရာနံ သန္တိကေ လဒ္ဓဓမ္မဿဝနသပ္ပာယာ ဥပနိဿယသမ္ပတ္တိယာ ပရိပက္ကဉာဏတာယ ‘‘သတ္တဟိ…ပေ… ပတိဋ္ဌာသီ’’တိ. သတ္တသတမတ္တေန ဩရောဓဇနေန သဒ္ဓိံ ပဒသာဝ ထေရာနံ သန္တိကံ ဥပဂတတ္တာ ‘‘သတ္တဟိ ဇင်္ဃာသတေဟိ သဒ္ဓိ’’န္တိ ဝုတ္တံ. करवीक पक्षी का शब्द जिन प्राणियों के कान के मार्ग तक पहुँचता है, वह अपनी स्वर-संपत्ति से उन्हें अपनी प्रकृति (स्वभाव) छुड़ाकर विवश करते हुए अपने वश में कर लेता है, इस प्रकार वह मधुर है, यह दिखाते हुए "तत्रिदं" आदि कहा गया है। 'उस प्रीति को' अर्थात् उस बुद्ध-विषयक प्रीति को। उसी रीति से बार-बार प्रवृत्त होते हुए, बिना छोड़े, विक्षिप्त (दबे हुए) क्लेशों वाले, स्थविरों के पास धर्म-श्रवण का अनुकूल अवसर प्राप्त कर, उपनिश्रय-संपत्ति से परिपक्व ज्ञान होने के कारण "सात... प्रतिष्ठित हुए"। सात सौ की संख्या वाली अंतःपुर की स्त्रियों के साथ पैदल ही स्थविरों के पास जाने के कारण "सात सौ जंघाओं (पैरों) के साथ" कहा गया है। အဘိနီလနေတ္တောတိ အဓိကနီလနေတ္တော. အဓိကနီလတာ စ သာတိသယံ နီလဘာဝေန ဝေဒိတဗ္ဗာ, န နေတ္တေ နီလဝဏ္ဏဿေဝ အဓိကဘာဝတောတိ အာဟ ‘‘န သကလနီလနေတ္တောဝါ’’တိအာဒိ. ပီတလောဟိတဝဏ္ဏာ သေတမဏ္ဍလဂတရာဇိဝသေန, နီလသေတကာဠဝဏ္ဏာ ပန တံတံမဏ္ဍလဝသေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗာ. 'अभिनीलनेत्तो' का अर्थ है अत्यंत नीले नेत्रों वाला। अत्यंत नीलिमा को नीलेपन की अतिशयता से जानना चाहिए, न कि पूरे नेत्र में केवल नीले रंग की अधिकता से; इसीलिए कहा गया है "न कि पूर्णतः नीले नेत्रों वाला" आदि। पीले और लाल रंग श्वेत मंडल में स्थित रेखाओं के कारण हैं, जबकि नीले, सफेद और काले रंग उन-उन मंडलों के कारण ही जानने चाहिए। စက္ခုဘဏ္ဍန္တိ အက္ခိဒလန္တိ ကေစိ, အက္ခိဒလပတ္တန္တိ အညေ. အက္ခိဒလေဟိ ပန သဒ္ဓိံ အက္ခိဗိမ္ဗန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ဧဝဉှိ ဝိနိဂ္ဂတဂမ္ဘီရဇောတနာပိ ယုတ္တာ ဟောတိ. 'चक्खुभण्डं': कुछ लोग इसे पलक कहते हैं, अन्य इसे पलक का पत्ता (बरौनी) कहते हैं। किंतु इसे पलकों के साथ नेत्र-गोलक समझना चाहिए। इस प्रकार बाहर निकलती हुई गंभीर ज्योति का प्रकट होना भी उचित होता है। ဥဏ္ဏာသဒ္ဒေါ [Pg.176] လောကေ အဝိသေသတော လောမပရိယာယော, ဣဓ ပန လောမဝိသေသဝါစကောတိ အာဟ ‘‘ဥဏ္ဏလောမ’’န္တိ. နလာဋမဇ္ဈဇာတာတိ နလာဋမဇ္ဈဂတာ. ဩဒါတတာယ ဥပမာ, န မုဒုတာယ. ရဇတပုဗ္ဗုဠကာတိ ရဇတမယတာရကာ. लोक में 'उण्णा' शब्द सामान्यतः रोम (बाल) का पर्यायवाची है, किंतु यहाँ यह विशेष रोम का वाचक है, इसीलिए "उण्ण-लोम" कहा गया है। 'नलाटमज्झजाता' का अर्थ है ललाट (माथे) के मध्य में उत्पन्न। उपमा श्वेतता (सफेदी) के लिए है, कोमलता के लिए नहीं। 'रजतपुब्बुळका' का अर्थ है चाँदी के बुलबुलों (या तारों) के समान। ဒွေ အတ္ထဝသေ ပဋိစ္စ ဝုတ္တန္တိ ယသ္မာ ဗုဒ္ဓါ စက္ကဝတ္တိနော စ ပရိပုဏ္ဏနလာဋတာယ ပရိပုဏ္ဏသီသဗိမ္ဗတာယ စ ‘‘ဥဏှီသသီသာ’’တိ ဝုစ္စန္တိ, တသ္မာ တေ ဒွေ အတ္ထဝသေ ပဋိစ္စ ‘‘ဥဏှီသသီသော’’တိ ဣဒံ ဝုတ္တံ. ဣဒါနိ တံ အတ္ထဒွယံ ဘဂဝတိ သုပ္ပတိဋ္ဌိတန္တိ ဒဿေတုံ ‘‘တထာဂတဿဟီ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. သဏှတမတာယ သုဝဏ္ဏဝဏ္ဏတာယ စ ရညော ဗဒ္ဓဥဏှီသပဋ္ဋော ဝိယ ဝိရောစတိ. ကပ္ပသီသာတိ ဒွိဓာဘူတသီသာ. ဖလသီသာတိ ဖလသဒိသသီသာ. အဋ္ဌိသီသာတိ မံသဿ အဘာဝတော တစောပရိယောနဒ္ဓအဋ္ဌိမတ္တသီသာ. တုမ္ဗသီသာတိ လာဗုသဒိသသီသာ. ပဗ္ဘာရသီသာတိ ပိဋ္ဌိဘာဂေန ဩလမ္ဗမာနသီသာ. ပုရိမနယေနာတိ ပရိပုဏ္ဏနလာဋတာပက္ခေန. ဥဏှီသဝေဌိတသီသော ဝိယာတိ ဥဏှီသပဋ္ဋေန ဝေဌိတသီသပဒေသော ဝိယ. ဥဏှီသံ ဝိယာတိ ဆေကေန သိပ္ပိနာ ဝိရစိတဥဏှီသမဏ္ဍလံ ဝိယ. दो अर्थवशों (कारणों) के कारण कहा गया है—चूँकि बुद्ध और चक्रवर्ती अपने परिपूर्ण ललाट और परिपूर्ण सिर के घेरे के कारण 'उष्णीष-शीर्ष' कहे जाते हैं, इसलिए उन दो अर्थवशों के कारण 'उष्णीष-शीर्ष' यह कहा गया है। अब वह अर्थ-द्वय भगवान में सुप्रतिष्ठित है, यह दिखाने के लिए 'तथागतस्स ही' आदि कहा गया है। सूक्ष्मता और स्वर्ण-वर्ण होने के कारण, वह राजा के बंधे हुए उष्णीष-पट्ट (पगड़ी) के समान सुशोभित होता है। 'कप्पसीसा' का अर्थ है दो भागों में विभक्त सिर। 'फलसीसा' का अर्थ है फल के समान सिर। 'अट्ठिसीसा' का अर्थ है मांस के अभाव के कारण केवल त्वचा से ढकी हड्डियों वाला सिर। 'तुम्बसीसा' का अर्थ है लौकी के समान सिर। 'पब्भारसीसा' का अर्थ है पीछे की ओर झुका हुआ सिर। 'पुरिमनयेन' का अर्थ है परिपूर्ण ललाट के पक्ष से। 'उष्णीष से लिपटे सिर के समान' का अर्थ है उष्णीष-पट्ट से लिपटे हुए सिर के प्रदेश के समान। 'उष्णीष के समान' का अर्थ है चतुर शिल्पी द्वारा निर्मित उष्णीष-मण्डल के समान। ကမ္မန္တိ ယေန ယေန ကမ္မေန ယံ ယံ လက္ခဏံ နိဗ္ဗတ္တံ, တံ တံ ကမ္မံ. ကမ္မသရိက္ခကန္တိ တဿ တဿ လက္ခဏဿ တံကမ္မာနုရူပတာ. လက္ခဏန္တိ တဿ မဟာပုရိသလက္ခဏဿ အဝိပရီတသဘာဝေါ. လက္ခဏာနိသံသန္တိ တံ လက္ခဏပဋိလာဘေန လဒ္ဓဗ္ဗဂုဏော. ဣမာနိ ကမ္မာဒီနီတိ ဣမာနိ အနန္တရံ ဝုတ္တာနိ ကမ္မကမ္မသရိက္ခကာဒီနိ ဒဿေတွာ တံ သရူပတော ဝိဘာဝေတွာ ကထေတဗ္ဗာနိ သံဝဏ္ဏကေန. 'कर्म' का अर्थ है जिस-जिस कर्म से जो-जो लक्षण उत्पन्न हुआ, वह-वह कर्म। 'कर्म-सदृश' (कम्मसरिक्खक) का अर्थ है उस-उस लक्षण की उस कर्म के अनुरूपता। 'लक्षण' का अर्थ है उस महापुरुष लक्षण का अपरिवर्तित स्वभाव। 'लक्षणाशंस' का अर्थ है उस लक्षण की प्राप्ति से प्राप्त होने वाला गुण। 'ये कर्मादि'—इन पूर्वोक्त कर्म, कर्म-सदृश आदि को दिखाकर, व्याख्याकार द्वारा उनके स्वरूप का विस्तार से वर्णन किया जाना चाहिए। ရတနဝိစိတ္တသုဝဏ္ဏတောရဏံ တသ္မိံ ကာလေ မနုဿလောကေ နတ္ထီတိ ဝုတ္တံ ‘‘ဒေဝနဂရေ’’တိ. သဗ္ဗသော သုပုပ္ဖိတသာလရုက္ခော အသာဓာရဏသောဘော မနုဿူပစာရေ န လဗ္ဘတီတိ အာဟ ‘‘သေလန္တရမှီ’’တိ. ကိရိယာစာရန္တိ ကာယိကဝါစသိကကိရိယာပဝတ္တိံ. रत्नों से विचित्र स्वर्ण-तोरण उस समय मनुष्य लोक में नहीं था, इसलिए 'देवनगर' कहा गया है। पूरी तरह से खिला हुआ साल का वृक्ष, जिसकी शोभा असाधारण है, मनुष्यों के निवास स्थान में सुलभ नहीं होता, इसलिए 'शैलान्तर (पहाड़ों के बीच)' कहा गया है। 'क्रियाचार' का अर्थ है कायिक और वाचिक क्रियाओं की प्रवृत्ति। ၃၈၇. သတတပါဋိဟာရိယန္တိ သတတံ စရိမဘဝေ သဗ္ဗကာလံ လက္ခဏနိဗ္ဗတ္တကကမ္မာနုဘာဝဟေတုကံ ဗုဒ္ဓါဝေဏိကံ ပါဋိဟာရိယံ. ဗုဒ္ဓါနံ အတိဒူရေ ပါဒံ နိက္ခိပိတုကာမာနမ္ပိ နာတိဒူရေ ဧဝ နိက္ခိပနံ ဟောတီတိ ‘‘န အတိဒူရေ ဌပေဿာမီတိ [Pg.177] ဥဒ္ဓရတီ’’တိ ဝုတ္တံ. ပကတိသဉ္စရဏဝသေနေတံ ဝုတ္တံ, တာဒိသေန ပါဒေန အနေကယောဇနေ ဌပေဿာမီတိ ဥဒ္ဓရဏမ္ပိ ဟောတိယေဝ. အတိဒူရံ ဟီတိအာဒိ ပမာဏာတိက္ကမေ ဒေါသဒဿနံ. ဧဝံ သတီတိ ဧဝံ ဒက္ခိဏပါဒဝါမပါဒါနံ ယထာဓိပ္ပေတပတိဋ္ဌိတဋ္ဌာနေ သတိ. ပဒဝိစ္ဆေဒေါတိ ပဒဝါရဝိစ္ဆေဒေါ. ယာဒိသံ ပသာရေန္တော ဝါမပါဒဿ ဥဒ္ဓရဏံ ပတိဋ္ဌာနဉ္စ, ဒက္ခိဏပါဒဿ တာဒိသမေဝ, ဣတိ နေသံ ဥဒ္ဓရဏပတိဋ္ဌာနာနံ သမာနတော အညမညဘာဝေန အနူနာနဓိကတာယ ဝုတ္တံ ‘‘ဒက္ခိဏပါဒကိစ္စံ ဝါမပါဒေန နိယမိတံ, ဝါမပါဒကိစ္စံ ဒက္ခိဏပါဒေန နိယမိတ’’န္တိ. ३८७. 'सतत प्रातिहार्य' का अर्थ है अंतिम जन्म में सदा, लक्षणों को उत्पन्न करने वाले कर्मों के प्रभाव के कारण होने वाला बुद्धों का असाधारण (आवेणिक) प्रातिहार्य। बुद्धों का बहुत दूर पैर रखने की इच्छा होने पर भी बहुत दूर पैर नहीं पड़ता, इसलिए 'बहुत दूर नहीं रखूँगा' ऐसा सोचकर (पैर) उठाते हैं, यह कहा गया है। यह स्वाभाविक चलने के वश से कहा गया है, वैसे पैर से अनेक योजन दूर रखने के लिए उठाना भी होता ही है। 'अतिदूरं हि' आदि में प्रमाण के उल्लंघन में दोष दिखाया गया है। ऐसा होने पर, अर्थात् दाहिने और बाएँ पैरों के इच्छित स्थान पर स्थित होने पर। 'पदविच्छेद' का अर्थ है पद-वार का विच्छेद। जैसा (बाएँ पैर को) फैलाते समय बाएँ पैर का उठाना और टिकना होता है, दाहिने पैर का भी वैसा ही होता है; इस प्रकार उनके उठाने और टिकने की समानता के कारण, एक-दूसरे के भाव में न्यूनता या अधिकता न होने से कहा गया है—'दाहिने पैर का कार्य बाएँ पैर द्वारा नियमित है, और बाएँ पैर का कार्य दाहिने पैर द्वारा नियमित है'। ဒိဝါတိ ဥပကဋ္ဌာယ ဝေလာယ. ဝိဟာရဘတ္တတ္ထာယာတိ ဝိဟာရေ ယထာဝုဒ္ဓံ ဂဟေတဗ္ဗဘတ္တတ္ထာယ. ပစ္ဆတော အာဂစ္ဆန္တောတိ ပကတိဂမနေန ပစ္ဆတော အာဂစ္ဆန္တော. ဩကာသံ န လဘတီတိ ပဒနိက္ခေပဋ္ဌာနံ န လဘတိ. ဦရုပရိယာယော ဣဓ သတ္ထိ-သဒ္ဒေါတိ အာဟ ‘‘န ဦရုံ ဥန္နာမေတီ’’တိ. ဒဏ္ဍင်္ကုသံ ဝုစ္စတိ ဒီဃဒဏ္ဍော အင်္ကုသော, တေန ရုက္ခသာခံ ဆိန္ဒတော ပုရိသဿ ယထာ ပစ္ဆာဘာဂေန ပါဒါနံ ဩသက္ကနံ ဟောတိ, ဧဝံ ဘဂဝတော ပါဒါ န ဩသက္ကန္တီတိ အာဟ ‘‘ရုက္ခသာခါဆေဒန…ပေ… ဩသက္ကာပေတီ’’တိ. ဩဗဒ္ဓါနာဗဒ္ဓဋ္ဌာနေဟိ ပါဒံ ကောဋ္ဋေန္တော ဝိယာတိ အာဗဒ္ဓဋ္ဌာနေန အနာဗဒ္ဓဋ္ဌာနေန စ ပါဒခဏ္ဍံ ကောဋ္ဋေတွာ ထဒ္ဓံ ကရောန္တော ဝိယ. န ဣတော စိတော စ စာလေတီတိ အပရာပရံ န စာလေတိ. ဥဿင်္ခပါဒတာယ သုခေနေဝ ပါဒါနံ ပရိဝတ္တနတော နာဘိတော ပဋ္ဌာယ ဥပရိမကာယော န ဣဉ္ဇတီတိ ဟေဋ္ဌိမကာယောဝ ဣဉ္ဇတိ. တေနာဟ ‘‘ဥပရိမ…ပေ… နိစ္စလော ဟောတီ’’တိ. န ဇာနာတိ အနိဉ္ဇနတော. ကာယဗလေနာတိ ဂမနပယောဂသင်္ခါတေန ကာယဂတေန ဝိသေသဗလေန. ဇဝဂမနဟေတုဘူတေန ဝါ ကာယဗလေန. တေနာဟ ‘‘ဗာဟာ ခိပန္တော’’တိအာဒိ. ဇဝေန ဂစ္ဆန္တော ဟိ ဗာဟာ ခိပတိ, သရီရတော သေဒါ မုစ္စန္တိ. နာဂါပလောကိတဝသေနာတိ နာဂဿ အပလောကနမိဝ သကလကာယေနေဝ ပရိဝတ္တေတွာ အပလောကနဝသေန. 'दिवा' का अर्थ है निकट समय में। 'विहार-भत्तत्थाय' का अर्थ है विहार में वरिष्ठता के अनुसार ग्रहण किए जाने वाले भोजन के लिए। 'पीछे से आता हुआ' का अर्थ है स्वाभाविक गति से पीछे से आता हुआ। 'अवकाश नहीं प्राप्त करता' का अर्थ है पैर रखने का स्थान नहीं पाता। यहाँ 'सत्थि' शब्द का अर्थ जंघा का घेरा है, इसलिए कहा—'जंघा को ऊँचा नहीं करते'। 'दण्ड-अंकुश' लंबे डंडे वाले अंकुश को कहते हैं, उससे वृक्ष की शाखा काटने वाले पुरुष के पैर जैसे पीछे की ओर खिसकते हैं, वैसे भगवान के पैर पीछे नहीं खिसकते, इसलिए कहा—'वृक्ष की शाखा काटना...पे... पीछे खिसकाता है'। 'बंधे और न बंधे स्थानों से पैर को कूटने के समान' का अर्थ है बंधे और न बंधे भाग से पैर के टुकड़े को कूटकर स्तब्ध करने के समान। 'इधर-उधर नहीं हिलाते' का अर्थ है आगे-पीछे नहीं हिलाते। टखनों के ऊपर पैर होने (उस्सङ्खपाद) के कारण पैरों के आसानी से मुड़ने से, नाभि से ऊपर का शरीर नहीं हिलता, केवल नीचे का शरीर ही हिलता है। इसीलिए कहा—'ऊपरी...पे... निश्चल होता है'। न हिलने के कारण (कोई) नहीं जानता। 'काय-बल' का अर्थ है चलने के प्रयोग रूपी शरीर के विशेष बल से। अथवा वेग से चलने के हेतुभूत शारीरिक बल से। इसीलिए कहा—'बाँहें फेंकते हुए' आदि। वेग से चलने वाला ही बाँहें फेंकता है और शरीर से पसीना निकलता है। 'नाग-अपलोकित' के वश से, अर्थात् हाथी के देखने के समान पूरे शरीर को घुमाकर देखने के कारण। အနာဝရဏဉာဏဿာတိ အနာဝရဏဉာဏဗလေန ဒဿနဿ. အနာဝရဏဝါရော ပန ကာယေ ပတိဋ္ဌိတရူပဒဿနမ္ပိ အနာဝရဏမေဝါတိ ဒဿနတ္ထံ ဝုတ္တော. ဣန္ဒခီလတော ပဋ္ဌာယာတိ နဂရဒွါရေ ဣန္ဒခီလတော ပဋ္ဌာယ. ပကတိဣရိယာပထေနေဝါတိ [Pg.178] ဩနမနာဒိံ အကတွာ ဥဇုကဂမနာဒိနာ ဧဝ. ယဒိ ဧဝံ ကောဋ္ဌကဒွါရဂေဟပ္ပဝေသေ ကထန္တိ အာဟ ‘‘ဒလိဒ္ဒမနုဿာန’’န္တိအာဒိ. ပရိဝတ္တေန္တေနာတိ နိပဇ္ဇနတ္ထံ ကာယံ ပရိဝတ္တေန္တေန. 'अनावरण ज्ञान' का अर्थ है अनावरण ज्ञान के बल से देखना। 'अनावरण वार' शरीर में स्थित रूप के दर्शन को भी अनावरण ही दिखाने के लिए कहा गया है। 'इन्द्रकील से लेकर' का अर्थ है नगर द्वार के इन्द्रकील से आरम्भ करके। 'स्वाभाविक ईर्यापथ से ही' का अर्थ है झुकने आदि को न करके सीधे चलने आदि से ही। यदि ऐसा है, तो कोष्ठक-द्वार और घर में प्रवेश कैसे होता है? इस पर कहा—'दरिद्र मनुष्यों का' आदि। 'परिवर्तन करते हुए' का अर्थ है लेटने के लिए शरीर को घुमाते हुए। ဟတ္ထေဟိ ဂဟေတွာတိ ဥဘောဟိ ဟတ္ထေဟိ ဥဘောသု ကဋိပ္ပဒေသေသု ပရိဂ္ဂဟေတွာ. ပတတိ နိသီဒနဋ္ဌာနေ နိပဇ္ဇနဝသေန ပတတိ. ဩရိမံ အင်္ဂံ နိဿာယ နိသိန္နောတိ ပလ္လင်္ကမာဘုဇိတွာ ဥက္ကုဋိကနိသဇ္ဇာယ ဥပရိမကာယံ ဟေဋ္ဌိမကာယေ ပတိဋ္ဌပေန္တောယေဝ ဘာရီကရဏဝသေန ဩရိမင်္ဂံ နိဿာယ နိသိန္နော. ဃံသန္တောတိ အာနိသဒဒေသေန အာသနဋ္ဌာနံ ဃံသန္တော. ပါရိမင်္ဂန္တိ သတ္ထိဘာဂသမ္မဒ္ဒံ အာနိသဒပဒေသံ. တထေဝါတိ ဃံသန္တော ဧဝ. ဩလမ္ဗကံ ဓာရေန္တော ဝိယာတိ ဩလမ္ဗကသုတ္တံ ဩတာရေန္တော ဝိယ. တေန ဥဇုကမေဝ နိသီဒနမာဟ. သရီရဿ ဂရုကဘာဝဟေတူနံ ဒူရတော သမုပါယိတဘာဝေန သလ္လဟုကဘာဝတော တူလပိစုံ ဌပေန္တော ဝိယ. "हाथों से पकड़कर" का अर्थ है दोनों हाथों से दोनों कटि-प्रदेशों (कमर के हिस्सों) में पकड़कर। "गिरता है" का अर्थ है बैठने के स्थान पर लेटने के समान गिरना। "निचले अंग के सहारे बैठा हुआ" का अर्थ है पालथी मारकर उकड़ू बैठने में ऊपरी शरीर को निचले शरीर पर ही स्थापित करते हुए, भारीपन के कारण निचले अंग के सहारे बैठा हुआ। "घिसते हुए" का अर्थ है नितम्ब भाग से आसन के स्थान को घिसते हुए। "पारिमंग" का अर्थ है जाँघों के भाग के मर्दन वाला नितम्ब प्रदेश। "उसी प्रकार" का अर्थ है घिसते हुए ही। "लम्बक (साहुल) को धारण करने वाले के समान" का अर्थ है जैसे साहुल के धागे को नीचे उतारते हुए। इससे सीधे बैठने को ही कहा गया है। शरीर के भारीपन के कारणों के दूर से हट जाने के कारण, हल्का होने से जैसे रुई के फाहे को रखते हुए। အပ္ပေသက္ခာနံ မဟာနုဘာဝဂေဟပ္ပဝေသေ သိယာ ဆမ္ဘိတတ္တံ, စိတ္တက္ခောဘော, ဒရထဝသေန နာနပ္ပကာရကပ္ပနံ, ဘယဝသေန တဏှာဝသေန ပရိတဿနံ, တံ သဗ္ဗံ ဘဂဝတော နတ္ထီတိ ဒဿေတုံ ပါဠိယံ ‘‘န ဆမ္ဘတီ’’တိအာဒိ (မ. နိ. ၂.၃၈၇) ဝုတ္တန္တိ အာဟ ‘‘န ဆမ္ဘတီ’’တိအာဒိ. अल्प-प्रभावशाली व्यक्तियों का महानुभावों के घर में प्रवेश करने पर स्तब्धता (काँपना), चित्त का क्षोभ, थकावट के कारण अनेक प्रकार की कल्पनाएँ, भय और तृष्णा के कारण व्याकुलता हो सकती है; वह सब भगवान् में नहीं है, यह दिखाने के लिए पालि में "न छम्भति" (नहीं काँपते) आदि कहा गया है, ऐसा कहा गया है। ဥဒကံ ဒီယတိ ဧတေနာတိ ဥဒကဒါနံ, ဘိင်္ကာရာဒိ ဥဒကဘာဇနံ. ဗဒ္ဓံ ကတွာတိ ဟတ္ထဂတမတ္တိကံ ဝိယ အတ္တနော ဝသေ အဝတ္တန္တံ ကတွာ. ပရိဝတ္တေတွာတိ ကုဇ္ဇိတွာ. ဝိဆဍ္ဍယမာနော ဥဒကဿ ဝိက္ခိပနဝသေန ဆဍ္ဍယမာနော. "जिससे जल दिया जाता है" वह जलदान है, जैसे भृंगार (झारी) आदि जल के पात्र। "बद्ध करके" का अर्थ है हाथ में आई मिट्टी के समान अपने वश में न रहने वाला बनाकर। "पलटकर" का अर्थ है झुकाकर। "फेंकते हुए" का अर्थ है जल को बिखेरने के रूप में छोड़ते हुए। တထာ န ဂဏှာတိ, ဗျဉ္ဇနမတ္တာယ ဧဝ ဂဏှန္တော. ဘတ္တံ ဝါ အမနာပန္တိ အာနေတွာ ယောဇနာ. ဗျဉ္ဇနေန အာလောပအတိနာမနံ, အာလောပေန ဗျဉ္ဇနအတိနာမနန္တိ ဣမေသု ပန ဒွီသု ပဌမမေဝ အသာရုပ္ပတာယ အနိဋ္ဌံ ဝဇ္ဇေတဗ္ဗန္တိ ပါဠိယံ ပဋိက္ခိတ္တန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. သဗ္ဗတ္ထေဝါတိ သဗ္ဗသ္မိံ အာဟရိတဗ္ဗဝတ္ထုသ္မိံ သုပဏီတဘာဝေန ရသော ပါကဋော ဟောတိ ဉာဏေန ပရိညာတတ္တာ. ရသဂေဓော ပန နတ္ထိ သေတုဃာတတ္တာ. उस प्रकार नहीं ग्रहण करते हैं, केवल व्यंजन (शाक-भाजी) के साथ ही ग्रहण करते हुए। "भोजन या अरुचिकर" को लाकर जोड़ना चाहिए। व्यंजन से ग्रास को ढकना, और ग्रास से व्यंजन को ढकना—इन दोनों में से पहले वाले को ही अनुपयुक्त होने के कारण अनिष्ट मानकर छोड़ देना चाहिए, ऐसा पालि में निषिद्ध समझना चाहिए। "सब जगह ही" का अर्थ है सभी लानी जाने वाली वस्तुओं में सुसंस्कृत होने के कारण रस प्रकट होता है क्योंकि वह ज्ञान के द्वारा परिज्ञात है। किन्तु 'सेतुघात' (तृष्णा का विनाश) होने के कारण रस में आसक्ति नहीं है। အဿာတိ ‘‘နေဝ ဒဝါယာ’’တိအာဒိပဒဿ. ဝုတ္တမေတန္တိ ‘‘ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂေ ဝိနိစ္ဆယော အာဂတော’’တိ သဗ္ဗာသဝသုတ္တေ (မ. နိ. ၁.၂၃) သံဝဏ္ဏယန္တေန ဝုတ္တမေတံ, တသ္မာ [Pg.179] န ဧတ္ထ တံ ဝတ္တဗ္ဗန္တိ အဓိပ္ပာယော, တသ္မာ ယော တသ္မိံ တသ္မိံ ဝိနိစ္ဆယေ ဝိသေသဝါဒေါ ဣစ္ဆိတဗ္ဗော. သော ပရမတ္ထမဉ္ဇူသာယ ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂဝဏ္ဏနာယ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. ပတ္တဿ ဂဟဏဋ္ဌာနန္တိ ဟတ္ထေန ပတ္တဿ ဂဟဏပဒေသံ. ဝိနိဝတ္တိတွာတိ ပတ္တေ သဗ္ဗံ အာမိသဂတံ သဒ္ဓိံ ဘတ္တေန ဝိနိဝတ္တိတွာ ဂစ္ဆတိ. ပမာဏာတိက္ကန္တန္တိ ကေလာယနဝသေန အတိက္ကန္တပမာဏံ အာရက္ခံ ဌပေတိ. စီဝရဘောဂန္တရန္တိ စီဝရပဋလန္တရံ. ဥဒရေန အက္ကမိတွာတိ ဥဒရေနေဝ သန္နိရုမ္ဘိတွာ. "इसका" का अर्थ है "न ही क्रीड़ा के लिए" आदि पद का। "यह कहा गया है" का अर्थ है "विशुद्धिमार्ग में विनिश्चय आया है"—ऐसा सब्बासव सुत्त की व्याख्या करते हुए कहा गया है, इसलिए यहाँ उसे नहीं कहना चाहिए, यह अभिप्राय है। अतः उन-उन विनिश्चयों में जो विशेष कथन अभीष्ट है, उसे 'परमत्थमञ्जूसा' (विशुद्धिमार्ग-टीका) में कहे गए ढंग से ही समझना चाहिए। "पात्र के पकड़ने का स्थान" का अर्थ है हाथ से पात्र को पकड़ने का प्रदेश। "पलटकर" का अर्थ है पात्र में भोजन के साथ आए हुए सभी आमिष (व्यंजन) को पलटकर जाता है। "प्रमाण का अतिक्रमण" का अर्थ है आसक्ति के कारण सुरक्षा की सीमा को पार कर रखना। "चीवर के परतों के बीच" का अर्थ है चीवर के पटलों के बीच। "पेट से दबाकर" का अर्थ है पेट से ही अच्छी तरह रोककर। အပ္ပတ္တကာလံ အဘိမုခံ နာမေတိ ဥပနာမေတီတိ အတိနာမေတိ, ပတ္တကာလံ အတိက္ကာမေန္တော နာမေတိ အပနေတီတိ အတိနာမေတိ. ဥဘယမ္ပိ ဧကဇ္ဈံ ဂဟေတွာ ပါဠိယံ ‘‘န စ အနုမောဒနဿ ကာလမတိနာမေတီ’’တိ ဝုတ္တန္တိ ဒဿေန္တော ‘‘ယော ဟီ’’တိအာဒိမာဟ. अप्राप्त काल को सम्मुख झुकाता है या पास लाता है, उसे 'अतिनामेति' कहते हैं; प्राप्त काल को बिताते हुए झुकाता है या हटाता है, उसे 'अतिनामेति' कहते हैं। दोनों को ही एक साथ लेकर पालि में "अनुमोदन के समय को नहीं बिताते हैं" ऐसा कहा गया है, यह दिखाने के लिए "जो ही" आदि कहा। ဝေဂဂမနေန ပဋိသံမုဉ္စိတွာ ဓာဝိတွာ ဂစ္ဆတိ. အစ္စုက္ကဋ္ဌန္တိ အတိဝိယ ဥဒ္ဓံ ကတွာ ကဍ္ဎိတပါရုတံ. တေနာဟ ‘‘ယော ဟိ ယာဝ ဟနုကဋ္ဌိတော…ပေ… ဟောတီ’’တိ. အစ္စောက္ကဋ္ဌန္တိ အတိဝိယ ဟေဋ္ဌာ ကတွာ ကဍ္ဎိတပါရုတံ. တေနာဟ ‘‘ယာဝ ဂေါပ္ဖကာ ဩတာရေတွာ’’တိ. ဥဘတော ဥက္ခိပိတွာတိ ဒက္ခိဏတော ဝါမတောတိ ဥဘောသု ပဿေသု ဥတ္တရာသင်္ဂံ ဥက္ခိပိတွာ. ထနန္တိ ဒက္ခိဏထနံ. तीव्र गति से समेटकर दौड़ते हुए जाता है। "अत्यधिक ऊपर" का अर्थ है बहुत ऊपर करके खींचा हुआ और ओढ़ा हुआ। इसीलिए कहा— "जो ठोड़ी तक स्थित... पे... होता है।" "अत्यधिक नीचे" का अर्थ है बहुत नीचे करके खींचा हुआ और ओढ़ा हुआ। इसीलिए कहा— "टखनों तक उतारकर।" "दोनों ओर से उठाकर" का अर्थ है दाहिनी ओर से या बाईं ओर से, दोनों पार्श्वों से उत्तरासंग को उठाकर। "स्तन" का अर्थ है दाहिना स्तन। ဝိဿဋ္ဌောတိ ဝိမုတ္တော. တေနာဟ ‘‘ဝိဿဋ္ဌတ္တာယေဝ စေသ ဝိညေယျော’’တိ. ယသ္မာ အမုတ္တဝါဒိနော ဝစနံ အဝိဿဋ္ဌတာယ န သိနိယှတိ, န ဧဝံ မုတ္တဝါဒိနောတိ အာဟ ‘‘သိနိဒ္ဓေါ’’တိ. ဝိညေယျောတိ သုပရိဗျတ္တတာယ အက္ခရတော စ ဗျဉ္ဇနတော စ ဝိညာတုံ သက္ကုဏေယျော. တေနာဟ ‘‘ပါကဋော’’တိ. ဝိညာပနိယောတိ ဝိဇာနိတဗ္ဗော. ဗျဉ္ဇနဝသေနေဝ စေတ္ထ ဝိညေယျတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ ဃောသဿ အဓိပ္ပေတတ္တာ. မဓုရောတိ ပိယော ပေမနီယော အပလိဗုဒ္ဓေါ. သဝနမရဟတိ, သဝနဿ သောတဿ ဟိတောတိ ဝါ သဝနီယော. သမ္ပိဏ္ဍိတောတိ သဟိတော. ဘဂဝတော ဟိ သဒ္ဒေါ ဥပ္ပတ္တိဋ္ဌာနကတာသဉ္စိတတ္တာ သဟိတာကာရေနေဝ အာပါထမာဂစ္ဆတိ, န အယောသလာကာယ ပဟဋကံသထာလံ ဝိယ ဝိပ္ပကိဏ္ဏော. တေနာဟ ‘‘အဝိသာရီ’’တိ. ဂမ္ဘီရောတိ ယထာ ဂမ္ဘီရဝတ္ထုပရိစ္ဆိန္ဒနေန ဉာဏဿ ဂမ္ဘီရသမညာ, ဧဝံ ဂမ္ဘီရဋ္ဌာနသမ္ဘဝတော သဒ္ဒဿ ဂမ္ဘီရသမညာတိ အာဟ ‘‘ဂမ္ဘီရောတိ ဂမ္ဘီရသမုဋ္ဌိတော’’တိ[Pg.180]. နိန္နာဒဝါတိ သဝိသေသံ နိန္နာဒဝါ. သွာယံ ဝိသေသော ဂမ္ဘီရဘာဝသိဒ္ဓေါတိ အာဟ ‘‘ဂမ္ဘီရတ္တာယေဝ စေသ နိန္နာဒီ’’တိ. ဧဝမေတ္ထ စတ္တာရိ အင်္ဂါနိ စတုရင်္ဂနိပ္ဖာဒီနိ ဝေဒိတဗ္ဗာနိ. အကာရဏာ မာ နဿီတိ ဗုဒ္ဓါနုဘာဝေန ဝိယ သရဿ ပရိသပရိယန္တတာ ဝုတ္တာ, ဓမ္မတာဝသေနေဝ ပန သာ ဝေဒိတဗ္ဗာ တဿ မူလကာရဏဿ တထာ အဝဋ္ဌိတတ္တာ. "विसृष्ट" का अर्थ है मुक्त (स्पष्ट)। इसीलिए कहा— "विसृष्ट होने के कारण ही यह विज्ञेय है।" चूँकि असत्यवादी का वचन विसृष्ट न होने के कारण स्निग्ध नहीं होता, किन्तु सत्यवादी का वैसा नहीं होता, इसलिए कहा— "स्निग्ध"। "विज्ञेय" का अर्थ है भली-भाँति स्पष्ट होने के कारण अक्षरों और व्यंजनों से जानने योग्य। इसीलिए कहा— "प्रकट"। "विज्ञापनीय" का अर्थ है विशेष रूप से जानने योग्य। यहाँ व्यंजन के कारण ही विज्ञेयता समझनी चाहिए क्योंकि यहाँ 'घोष' (ध्वनि) अभिप्रेत है। "मधुर" का अर्थ है प्रिय, प्रेमपूर्ण और बाधा-रहित। "श्रवणीय" का अर्थ है सुनने योग्य, अथवा कान के लिए हितकारी। "सम्पिण्डित" का अर्थ है संगठित। भगवान् का शब्द उत्पत्ति-स्थान की सुगठितता के कारण संगठित रूप में ही श्रवण-गोचर होता है, लोहे की शलाका से पीटे गए काँसे के पात्र की तरह बिखरा हुआ नहीं। इसीलिए कहा— "अविसारी"। "गम्भीर" का अर्थ है—जैसे गम्भीर वस्तु के परिच्छेद से ज्ञान की 'गम्भीर' संज्ञा होती है, वैसे ही गम्भीर स्थान से उत्पन्न होने के कारण शब्द की 'गम्भीर' संज्ञा है, इसलिए कहा— "गम्भीर का अर्थ है गम्भीर स्थान से उठा हुआ।" "निनादवान्" का अर्थ है विशेष रूप से गूँजने वाला। वह विशेषता गम्भीर होने से ही सिद्ध होती है, इसलिए कहा— "गम्भीर होने के कारण ही यह निनादी है।" इस प्रकार यहाँ चार अंग और चार अंगों से निष्पन्न समझने चाहिए। "बिना कारण नष्ट न हो" इस प्रकार बुद्ध के अनुभाव से स्वर की परिषद्-पर्यन्तता कही गई है, किन्तु उसे धम्मता के वश से ही समझना चाहिए क्योंकि उसका मूल कारण वैसा ही व्यवस्थित है। ပစ္စောသက္ကိတွာတိ ပဋိနိဝတ္တိတွာ. သမုဿိတကဉ္စနပဗ္ဗတံ ဝိယ ဥပရိ ဣန္ဒနီလရတနဝိတတသိခံ ဝိဇ္ဇုလ္လတာဘူသိတံ. မဟာပထဝီအာဒယော သတ္ထုဂုဏပဋိဘာဂတာယ နိဒဿနံ, ကေဝလံ မဟန္တတာမတ္တံ ဥပါဒါယ နိဒဿိတာ. "पीछे हटकर" का अर्थ है लौटकर। जैसे ऊँचे उठे हुए स्वर्ण-पर्वत के ऊपर इन्द्रनील मणि का शिखर फैला हो और वह बिजली की लता से सुशोभित हो। महापृथ्वी आदि शास्ता के गुणों की उपमा के लिए उदाहरण हैं, जो केवल महानता के आधार पर दिखाए गए हैं। ၃၉၀. အပ္ပဋိသံဝိဒိတောတိ အနာရောစိတော. အာဂမနဝသေန စေတ္ထ ပဋိသံဝေဒိတန္တိ အာဟ ‘‘အဝိညာတအာဂမနော’’တိ. ဥဂ္ဂတဘာဝန္တိ ကုလဘောဂဝိဇ္ဇာဒီဟိ ဥဠာရဘာဝံ. အနုဒ္ဒယသမ္ပန္နာတိ ကာရုဏိကာ. ३९०. 'Appaṭisaṃvidito' का अर्थ है 'बिना सूचित किया हुआ'। यहाँ आगमन के वश से 'paṭisaṃvedita' कहा गया है, इसलिए 'aviññātaāgamano' (जिसका आगमन ज्ञात न हो) कहा गया है। 'Uggatabhāvaṃ' का अर्थ है कुल, भोग, विद्या आदि से उदार (महान) होना। 'Anuddayasampannā' का अर्थ है 'करुणामयी'। ၃၉၁. သဟသာဝ ဩကာသကရဏေန ဥစ္စကုလီနတာ ဒီပိတာ ဟောတီတိ အာဟ ‘‘ဝေဂေန ဥဋ္ဌာယ ဒွိဓာ ဘိဇ္ဇိတွာ’’တိအာဒိ. ३९१. अचानक स्थान देने से उच्च कुलीनता प्रकट होती है, इसलिए 'vegena uṭṭhāya dvidhā bhijjitvā' (वेग से उठकर दो भागों में विभाजित होकर) आदि कहा गया है। နာရိသမာနနာမန္တိ ဣတ္ထိအတ္ထဇောတကနာမံ. တေနာဟ ‘‘ဣတ္ထိလိင်္ဂ’’န္တိ. အဝှာတဗ္ဗာတိ ကထေတဗ္ဗာ. 'Nārisamānanāmaṃ' का अर्थ है स्त्री-अर्थ को प्रकाशित करने वाला नाम। इसीलिए 'itthiliṅgaṃ' (स्त्रीलिंग) कहा गया है। 'Avhātabbā' का अर्थ है 'कही जाने वाली'। ၃၉၄. ဧကနီဟာရေနေဝ အဋ္ဌ ပဉှေ ဗျာကရောန္တော. ‘‘ပုဗ္ဗေနိဝါသံ…ပေ… ပဝုစ္စတီ’’တိ ဣမိနာ ပုဗ္ဗေနိဝါသဿ ဝိဒိတကာရဏံ ဝုတ္တန္တိ အာဟ ‘‘တဿ ပုဗ္ဗေနိဝါသော ပါကဋော’’တိ. ဒိဗ္ဗစက္ခုဉာဏံ ကထိတံ တဿ ပရိဘဏ္ဍဉာဏဘာဝတော ယထာကမ္မူပဂဉာဏဿ. ‘‘ဇာတိက္ခယံ ပတ္တော, အဘိညာ ဝေါသိတော’’တိ စ ဝုတ္တတ္တာ မုနီတိ အသေက္ခမုနိ ဣဓာဓိပ္ပေတောတိ အာဟ ‘‘အရဟတ္တဉာဏမောနေယျေန သမန္နာဂတော’’တိ. ३९४. एक ही विधि से आठ प्रश्नों की व्याख्या करते हुए। 'Pubbenivāsaṃ...pe... pavuccatī' इसके द्वारा पूर्वनिवास के ज्ञात होने का कारण कहा गया है, इसलिए 'tassa pubbenivāso pākaṭo' (उसका पूर्वनिवास प्रकट है) कहा गया है। दिव्यचक्षु-ज्ञान कहा गया है क्योंकि वह यथाकर्मोपग-ज्ञान का सहायक (परिमंडल) ज्ञान है। 'Jātikkhayaṃ patto, abhiññā vosito' (जाति-क्षय को प्राप्त, अभिज्ञा में निष्णात) कहे जाने के कारण यहाँ 'मुनि' से 'अशैक्ष्य मुनि' अभिप्रेत है, इसलिए 'arahattañāṇamoneyyena samannāgato' (अर्हत्व-ज्ञान रूपी मौनेय से संपन्न) कहा गया है। ကိလေသရာဂေဟိ ကိလေသဝိဝဏ္ဏတာဟိ. ဇာတိက္ခယပ္ပတ္တတ္တာ ‘‘အထော ဇာတိက္ခယံ ပတ္တော’’တိ ဝုတ္တတ္တာ. အဘိဇာနိတွာတိ အဘိဝိသိဋ္ဌတာယ အဂ္ဂမဂ္ဂပညာယ ဉတွာ. ဣဒါနိ ပဋိသမ္ဘိဒါယံ အာဂတနယေန ပရိညာပဟာနဘာဝနာသစ္ဆိကိရိယာသမာပတ္တီနံ ပါရဂမနေန ပါရဂူတိ အယမေတ္ထ အတ္ထောတိ ဒဿေတုံ ‘‘ပါရဂူတိ ဝါ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. အဘိညေယျဓမ္မာနံ ဇာနနဝသေန အဘိညာပါရဂူ. တာဒိသောတိ ယာဒိသော ‘‘ပါရဂူ သဗ္ဗဓမ္မာန’’န္တိ ပဒဒွယေန [Pg.181] ဝုတ္တော, တာဒိသော. ဆဟိ အာကာရေဟီတိ ပဇာနနာဒီဟိ ယထာဝုတ္တေဟိ ဆဟိ အာကာရေဟိ. क्लेश-रागों से, क्लेश-विवर्णताओं से। जाति-क्षय को प्राप्त होने के कारण 'atho jātikkhayaṃ patto' कहा गया है। 'Abhijānitvā' का अर्थ है विशिष्ट अग्र-मार्ग प्रज्ञा से जानकर। अब प्रतिसंभिदामार्ग में आए हुए नय के अनुसार परिज्ञा, प्रहाण, भावना और साक्षात्क्रिया की समापत्तियों के पार जाने से 'पारगू' (पारगामी) है, यह अर्थ यहाँ दिखाने के लिए 'pāragūti vā' आदि कहा गया है। अभिज्ञेय धर्मों को जानने के कारण 'अभिज्ञा-पारगू' है। 'Tādiso' (वैसा) का अर्थ है जैसा 'pāragū sabbadhammānaṃ' इन दो पदों द्वारा कहा गया है, वैसा। 'छह आकारों से' का अर्थ है प्रजानन (भली-भाँति जानना) आदि यथाकथित छह आकारों से। ကာမဉ္စေတ္ထ ဒွေ ဧဝ ပုစ္ဆာဂါထာ ဒွေ စ ဝိဿဇ္ဇနာဂါထာ, ပုစ္ဆာပဋိပါဋိယာ ပန အသင်္ကရတော စ ဝိဿဇ္ဇနံ ပဝတ္တတိ, တံ နိဒ္ဓါရေတုံ ကိံ ပနာတိအာဒိ ဝုတ္တံ. ဝေဒေဟိ ဂတတ္တာတိ ဝေဒေဟိ မဂ္ဂဉာဏေဟိ ပါရင်္ဂတတ္တာ. ပုဗ္ဗေနိဝါသန္တိအာဒီဟိ ဝိဇ္ဇာနံ အတ္ထိတာယ ဗောဓိတတ္တာ. ပါပဓမ္မာနန္တိ ဆတ္တိံသပါပဓမ္မာနံ သောတ္ထာနံ မဂ္ဂံ ပါပနေန နိဿေသတော သောဓိတတ္တာ. यद्यपि यहाँ केवल दो ही प्रश्न-गाथाएँ और दो ही उत्तर-गाथाएँ हैं, फिर भी प्रश्नों के क्रम के अनुसार बिना संकर (मिश्रण) के उत्तर प्रवृत्त होता है, उसे निर्धारित करने के लिए 'kiṃ pana' आदि कहा गया है। 'Vedehi gatattā' का अर्थ है वेदों (मार्ग-ज्ञानों) के द्वारा पारंगत होने के कारण। 'Pubbenivāsa' आदि विद्याओं के होने से बुद्ध होने के कारण। 'Pāpadhammānaṃ' का अर्थ है छत्तीस पाप-धर्मों के स्रोतों को मार्ग द्वारा प्राप्त कर पूर्णतः शुद्ध करने के कारण। ၃၉၅. ဓမ္မော နာမ အရဟတ္တမဂ္ဂေါ ကုသလဓမ္မေသု ဥက္ကံသပါရမိပ္ပတ္တိယာ ဥက္ကဋ္ဌနိဒ္ဒေသေန. တဿ အနုရူပဓမ္မဘာဝတော အနုဓမ္မော နာမ ဟေဋ္ဌိမမဂ္ဂဖလဓမ္မာ. ယော သတ္ထု သန္တိကေ ဓမ္မံ သုတွာ ယထာနုသိဋ္ဌံ န ပဋိပဇ္ဇတိ, သော တထာဂတံ ဓမ္မာဓိကရဏံ ဝိဟေဌေတိ နာမ. ယော ပန ပဋိပဇ္ဇန္တော စ ဒန္ဓာဘိညတာယ ကမ္မဋ္ဌာနသောဓနတ္ထံ အန္တရန္တရာ ဘဂဝန္တံ ဥပသင်္ကမိတွာ အနေကဝါရံ ကထာပေတိ, သော ဧတ္တာဝတာ ဓမ္မာဓိကရဏံ တထာဂတံ ဝိဟေဌေတီတိ န ဝတ္တဗ္ဗော. န ဟိ ဘဂဝတော ဓမ္မဒေသနာယ ပရိဿမော အတ္ထိ, အယဉ္စ အတ္ထော မဟာသုဒဿနသုတ္တာဒီဟိ (ဒီ. နိ. ၂.၂၄၁ အာဒယော) ဒီပေတဗ္ဗော, တသ္မာ – ‘‘သစ္စဓမ္မဿ အနုဓမ္မ’’န္တိ ဝတ္တဗ္ဗေ ဝုတ္တမေဝ ဗျတိရေကမုခေန ဝိဘာဝေတုံ ‘‘န စ မံ ဓမ္မာဓိကရဏံ ဝိဟေသေသီ’’တိ ဝုတ္တန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. တတ္ထ ပရိနိဗ္ဗာယီတိ ပရကာလေ စေတ္ထ ပရိနိဗ္ဗာနမ္ပိ သင်္ဂယှတိ, တံ ပန ဣမသ္မိံ ဂဟိတမေဝ ဟောတီတိ အာဟ ‘‘ဒေသနာယ အရဟတ္တေနေဝ ကူဋံ ဂဟိတ’’န္တိ. ३९५. 'धम्म' का अर्थ अर्हत्व-मार्ग है, जो कुशल धर्मों में उत्कर्ष-पारमिता की प्राप्ति के कारण उत्कृष्ट निर्देश है। उसके अनुरूप धर्म होने के कारण 'अनुधम्म' का अर्थ निचले मार्ग और फल के धर्म हैं। जो शास्ता के समीप धर्म सुनकर उपदेशानुसार प्रतिपत्ति (आचरण) नहीं करता, वह तथागत को धर्म के विषय में विहेठित (परेशान) करता है। लेकिन जो प्रतिपत्ति करते हुए भी मंद-अभिज्ञा होने के कारण कर्मस्थान के शोधन के लिए बीच-बीच में भगवान के पास जाकर अनेक बार प्रश्न पूछता है, वह इतने मात्र से तथागत को धर्म के विषय में विहेठित करता है, ऐसा नहीं कहना चाहिए। क्योंकि भगवान को धर्म-देशना में कोई परिश्रम नहीं होता, और यह अर्थ महासुदस्सन-सुत्त आदि से स्पष्ट किया जाना चाहिए, इसलिए - 'सच्चधम्मस्स अनुधम्मं' ऐसा कहे जाने पर, जो कहा गया है उसे ही व्यतिरेक मुख से स्पष्ट करने के लिए 'na ca maṃ dhammādhikaraṇaṃ vihesesī' (और तुमने मुझे धर्म के विषय में विहेठित नहीं किया) कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। वहाँ 'परिनिब्बायी' का अर्थ है कि बाद के काल में होने वाला परिनिर्वाण भी यहाँ संगृहीत है, किंतु वह इसी में गृहीत हो जाता है, इसलिए कहा गया है - 'देशना द्वारा अर्हत्व से ही शिखर को ग्रहण किया गया है'। ဗြဟ္မာယုသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. ब्रह्मायु-सुत्त की व्याख्या की लीनत्थप्पकासना (टीका) समाप्त हुई। ၂. သေလသုတ္တဝဏ္ဏနာ २. सेल-सुत्त की व्याख्या। ၃၉၆. ကေဏိယောတိ တဿ နာမံ, ပုဗ္ဗေ ကေဏိယာ ဇီဝိကာကပ္ပနတောတိ ဝဒန္တိ. ဇဋိလောတိ ဇဋာဓရော. ဗြာဟ္မဏဇာတိကတ္တာ ကောဋိသာရတာယ စ ဗြာဟ္မဏမဟာသာလော. ပယောဇေတွာ နိဿယော ဟုတွာ ဝသတိ, ရတ္တိံ ကာမသမ္ပတ္တိံ အနုဘဝတီတိ ဝါ ယောဇနာ. သုသင်္ခတန္တိ သပ္ပိမဓုသက္ကရာဒီဟိ စေဝ မရိစသိင်္ဂီဝေရာဒီဟိ စ သုဋ္ဌု အဘိသင်္ခတံ. ३९६. 'Keṇiyo' उसका नाम है, कहते हैं कि पहले 'केणी' (नौका) से जीविका चलाने के कारण ऐसा कहा गया। 'Jaṭilo' का अर्थ है जटाधारी। ब्राह्मण जाति का होने और करोड़ों की संपत्ति होने के कारण वह 'ब्राह्मण महाशाल' है। 'Payojetvā' का अर्थ है आश्रय लेकर रहता है, अथवा रात में काम-संपत्ति का अनुभव करता है, यह योजना है। 'Susaṅkhataṃ' का अर्थ है घी, मधु, शक्कर आदि से तथा मिर्च, अदरक आदि से भली-भाँति तैयार किया गया। ပဋိက္ခေပပသန္နတာယာတိ [Pg.182] အဟောဝတာယံ အပ္ပိစ္ဆော, ယော နိမန္တိယမာနောပိ န သာဒိယတီတိ ဥပနိမန္တိယမာနဿ ပဋိက္ခေပေ တိတ္ထိယာနံ ပသန္နဘာဝတောတိ. တံ ကထံ? ဝိရုဒ္ဓမေတန္တိ ‘‘အကာရဏမေတ’’န္တိ ပဋိက္ခိပတိ. 'Paṭikkhepapasannatāyā' का अर्थ है - 'अहो! यह कितना अल्पेच्छ है, जो निमंत्रित किए जाने पर भी स्वीकार नहीं करता' - इस प्रकार निमंत्रण के अस्वीकार करने पर तीर्थिकों की प्रसन्नता के कारण। वह कैसे? 'Viruddhametaṃ' का अर्थ है 'यह अकारण है', ऐसा कहकर वह अस्वीकार करता है। ၃၉၈. ကပ္ပသဟဿေဟိပိ…ပေ… အဟောသီတိ ဣဒံ နာနုဿဝသိဒ္ဓံ အနုမာနဂ္ဂဟဏံ သန္ဓာယာဟ. ပဒေတိ ဥတ္တရပဒလောပေန နိဒ္ဒေသောတိ အာဟ ‘‘ပဒပ္ပမာဏေ’’တိ. ပဇ္ဇတိ နိက္ခိပတိ ဧတ္ထာတိ ဝါ ပဒံ ပကတိယာ ပါဒနိက္ခိပဋ္ဌာနံ, တသ္မိံ ပဒေ. ကီဠာပသုတတာဒိနာ ပမာဒံ အာပဇ္ဇတိ. ဗောဓိသတ္တစာရိကန္တိ ဒုက္ကရစရိယံ သန္ဓာယ ဝဒတိ. ३९८. 'Kappasahassehipi...pe... ahosī' यह अनेक श्रुतियों (परंपराओं) से सिद्ध अनुमान-ग्रहण के संदर्भ में कहा गया है। 'Pade' यह उत्तरपद के लोप के साथ निर्देश है, इसलिए 'padappamāṇe' (पद के प्रमाण में) कहा गया है। 'Pajjati' का अर्थ है जहाँ पैर रखा जाता है, अथवा 'पद' का अर्थ स्वभावतः पैर रखने का स्थान है, उस पद में। क्रीड़ा में आसक्त होने आदि से प्रमाद को प्राप्त होता है। 'Bodhisattacārikaṃ' दुष्करचर्या के संदर्भ में कहा गया है। ၃၉၉. ပရိပုဏ္ဏတာယာတိ အနူနတာယ. အဟီနင်္ဂတာယာတိ အဝေကလ္လဘာဝတော. ရောစတီတိ ရုစိ, ဒေဟပ္ပဘာ, သောဘဏာ ရုစိ ဧတဿာတိ သုရုစိ. အာရောဟသမ္ပတ္တိ ကာယဿ ပမာဏယုတ္တဥစ္စတာ. ပရိဏာဟသမ္ပတ္တိ ကိသထူလဘာဝဝဇ္ဇိတပရိဏာဟတာ. သဏ္ဌာနသမ္ပတ္တိ အဝယဝါနံ သုသဏ္ဌိတတာ. စာရုဒဿနောတိ ပိယဒဿနော တေနာဟ ‘‘သုစိရမ္ပီ’’တိအာဒိ. သုဝဏ္ဏသဒိသဝဏ္ဏောတိ ဇာတိဟိင်္ဂုလကေန မဒ္ဒိတွာ သိလာနိဃံသေနေဝ ပရိကမ္မံ ကတွာ ဌပိတဃနသုဝဏ္ဏရူပဝဏ္ဏော. မဟာပုရိသဘာဝံ ဗျဉ္ဇေန္တိ ပကာသေန္တီတိ ဗျဉ္ဇနာနိ, မဟာပုရိသလက္ခဏာနီတိ အာဟ ‘‘ပဌမံ ဝုတ္တဗျဉ္ဇနာနေဝါ’’တိ. ३९९. 'Paripuṇṇatāyā' का अर्थ है न्यूनता रहित होने से। 'Ahīnaṅgatāyā' का अर्थ है अंगों की विकलता न होने से। 'Rocati' से 'रुचि' (दीप्ति) शब्द बना है, जिसका अर्थ है देह की प्रभा; जिसकी रुचि (प्रभा) शोभनीय है वह 'सुरुचि' है। 'आरोह-संपत्ति' का अर्थ है शरीर की प्रमाणयुक्त ऊँचाई। 'परिणाह-संपत्ति' का अर्थ है दुबलेपन या मोटेपन से रहित घेरा (विस्तार)। 'संस्थान-संपत्ति' का अर्थ है अंगों की सुडौलता। 'Cārudassano' का अर्थ है प्रियदर्शन, इसीलिए 'sucirampi' (बहुत देर तक भी) आदि कहा गया है। 'Suvaṇṇasadisavaṇṇo' का अर्थ है शुद्ध हिंगुल से मलकर पत्थर के घर्षण से ही परिष्कृत की गई ठोस स्वर्ण-प्रतिमा के समान वर्ण वाला। महापुरुष-भाव को जो व्यंजित (प्रकट) करते हैं वे 'व्यंजन' हैं, अर्थात् महापुरुष-लक्षण, इसीलिए 'paṭhamaṃ vuttabyañjanāneva' (पहले कहे गए व्यंजन ही) कहा गया है। ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တန္တိ ‘‘သုရုစီ’’တိ ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တံ, ‘‘အာဒိစ္စောဝ ဝိရောစသီ’’တိ ပုန ဝုတ္တံ. ‘‘စာရုဒဿနော သုဝဏ္ဏဝဏ္ဏောသီ’’တိ ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တံ, ‘‘ကလျာဏဒဿနော ဘိက္ခု ကဉ္စနာဘတ္တစော’’တိ ပုန ဝုတ္တန္တိ ဣမမတ္ထံ သန္ဓာယာဟ ‘‘ဥတ္တရဂါထာယပိ ဧသေဝ နယော’’တိ. သာတိသယံ ဥတ္တမဝဏ္ဏေ ဝဏ္ဏေတွာ ဥတ္တမဝဏ္ဏိနောတိ ပဒေန သန္တံ ပကာသေတီတိ အာဟ ‘‘ဥတ္တမဝဏ္ဏသမ္ပန္နဿာ’’တိ. ဥတ္တမသာရထီတိ သေဋ္ဌပုရိသသာရထိ. တတ္ထ တတ္ထ ဇမ္ဗုဝနသဏ္ဍမဏ္ဍိတတာယ ဇမ္ဗုဒီပေါ ‘‘ဇမ္ဗုသဏ္ဍော’’တိ ဝုစ္စတိ. ဣဿရိယန္တိ စက္ကဝတ္တိဿရိယံ. "पूर्व में कहा गया" का अर्थ है कि "सुरुचि" पहले कहा गया है, और "सूर्य के समान चमकते हो" पुनः कहा गया है। "सुंदर दर्शन वाले, स्वर्ण वर्ण वाले हो" पहले कहा गया है, और "कल्याणकारी दर्शन वाले भिक्षु, कंचन जैसी त्वचा वाले" पुनः कहा गया है - इस अर्थ को ध्यान में रखते हुए कहा गया है कि "उत्तर गाथा में भी यही नियम है"। अतिशय उत्तम वर्ण का वर्णन करके 'उत्तमवर्णी' पद से जो विद्यमान है उसे प्रकाशित करते हुए कहा गया है "उत्तम वर्ण से संपन्न"। 'उत्तम सारथी' का अर्थ है श्रेष्ठ पुरुषों का सारथी। वहाँ-वहाँ जम्बुवन के समूहों से सुशोभित होने के कारण जम्बुद्वीप को "जम्बुसण्ड" कहा जाता है। 'ऐश्वर्य' का अर्थ है चक्रवर्ती का ऐश्वर्य। ဇာတိခတ္တိယာတိ ဇာတိမန္တော ခတ္တိယာ. ရာဇာဘိရာဇာတိ ဧတ္ထ အဘိ-သဒ္ဒေါ ပူဇတ္ထောတိ အာဟ ‘‘ရာဇူနံ ပူဇနီယော’’တိ. 'जातिखत्तिया' का अर्थ है उच्च कुल में उत्पन्न क्षत्रिय। 'राजाधिराज' (राजाभिराजा) में यहाँ 'अभि' शब्द पूजा के अर्थ में है, इसलिए कहा गया है "राजाओं द्वारा पूजनीय"। အပ္ပမာဏာတိ အပရိမာဏာ လောကဓာတုယော. ‘‘ယာဝတာ ပန အာကင်္ခေယျာ’’တိ (အ. နိ. ၃.၈၁) ဟိ ဝုတ္တံ. ဓမ္မရာဇာ အနုတ္တရောတိ ဧတ္ထ ဝုတ္တအနုတ္တရဘာဝံ ‘‘ယာဝတာ [Pg.183] ဟီ’’တိအာဒိနာ ပါကဋတရံ ကတွာ ဓမ္မရာဇဘာဝံ ဝိဘာဝေတုံ ‘‘သွာဟ’’န္တိအာဒိ ဝုတ္တံ. ဓမ္မေနာတိ ပဋိဝေဓဓမ္မေန. တေနာဟ ‘‘အနုတ္တရေနေဝါ’’တိ. အနုတ္တရေနာတိ ဝိသိဋ္ဌေန ဥတ္တမေန. ဣမသ္မိံ ပက္ခေ ဓမ္မေနာတိ ပဋိပတ္တိဓမ္မေနာတိပိ သင်္ဂယှတိ. ပရိယတ္တိဓမ္မေနာတိ ဒေသနာဓမ္မေန အာဏာစက္ကံ ပဝတ္တေမီတိ ယောဇနာ. ဒေသနာဉာဏပဋိဝေဓဉာဏဝိဘာဂံ ဓမ္မစက္ကမေဝ ဝါ. အပ္ပဋိဝတ္တိယန္တိ ပဋိဝတ္တိတုံ အသက္ကုဏေယျံ. 'अप्रमाण' का अर्थ है अपरिमित लोकधातुएँ। जैसा कि कहा गया है "जहाँ तक वह चाहे"। 'अनुत्तर धर्मराज' में यहाँ कहे गए अनुत्तर भाव को "जहाँ तक ही" आदि के द्वारा और अधिक स्पष्ट करके धर्मराज भाव को विभक्त करने के लिए "वह मैं हूँ" (स्वाहनं) आदि कहा गया है। 'धर्म से' का अर्थ है प्रतिवेध धर्म से। इसीलिए कहा गया है "अनुत्तर से ही"। 'अनुत्तर' का अर्थ है विशिष्ट उत्तम से। इस पक्ष में 'धर्म से' का अर्थ प्रतिपत्ति धर्म से भी ग्रहण किया जाता है। 'पर्यप्ति धर्म' से अर्थात् देशना धर्म से 'आज्ञा चक्र प्रवर्तित करता हूँ' - ऐसा योजन है। देशना-ज्ञान और प्रतिवेध-ज्ञान का विभाग ही धर्मचक्र है। 'अप्रतिवर्त्य' का अर्थ है जिसे पीछे न लौटाया जा सके। တထာဂတေန ဇာတောတိ တထာဂတေန ဟေတုနာ အရိယာယ ဇာတိယာ ဇာတော. ဟေတုအတ္ထေ ကရဏဝစနံ. အနုဇာတောတိ စ ဝုတ္တေ အနု-သဒ္ဒဿ ဝသေန တထာဂတန္တိ စ ဥပယောဂဝစနမေဝ ဟောတိ, သော စ အနု-သဒ္ဒေါ ဟေတုအတ္ထဇောတကောတိ အာဟ ‘‘တထာဂတံ ဟေတုံ အနုဇာတော’’တိ. အဝညာတဗ္ဗဘာဝေန ဇာတောတိ အဝဇာတော ဒုပ္ပဋိပန္နတ္တာ. တေနာဟ ‘‘ဒုဿီလော’’တိ. တထာ ဟိ ဝုတ္တံ ကောကာလိကံ အာရဗ္ဘ ‘‘ပုရိသန္တကလိ အဝဇာတော’’တိ. ပုတ္တော နာမ န ဟောတိ တဿ ဩဝါဒါနုသာသနိယံ အဋ္ဌိတတ္တာ. ဧဝမာဟာတိ ‘‘အနုဇာတော တထာဂတ’’န္တိ ဧဝမာဟ. 'तथागत से उत्पन्न' का अर्थ है तथागत के कारण आर्य जाति में उत्पन्न। यहाँ करण कारक (तथागतेन) हेतु के अर्थ में है। 'अनुजात' कहने पर 'अनु' शब्द के कारण 'तथागत' में द्वितीया विभक्ति (उपयोग वचन) ही होती है, और वह 'अनु' शब्द हेतु के अर्थ का द्योतक है, इसलिए कहा गया है "तथागत रूपी हेतु के पीछे उत्पन्न"। तिरस्कार के योग्य होने के कारण उत्पन्न होना 'अवजात' है, क्योंकि वह गलत मार्ग पर चलने वाला है। इसीलिए कहा गया है "दुःशील"। जैसा कि कोकालिक के संदर्भ में कहा गया है "पुरुषों में अधम, अवजात"। वह पुत्र नहीं कहलाता क्योंकि वह उनके उपदेश और अनुशासन में स्थित नहीं रहता। "तथागत के पीछे उत्पन्न" - ऐसा कहा गया है। ဝိဇ္ဇာတိ မဂ္ဂဝိဇ္ဇာ. ဥက္ကဋ္ဌနိဒ္ဒေသေန ဝိမုတ္တီတိ ဖလဝိမုတ္တိ. နနု စ မဂ္ဂေါ ဘာဝေတဗ္ဗေန ဂဟိတောတိ? သစ္စံ ဂဟိတော, သဗ္ဗေ စ ပန သတ္တ ဓမ္မာ အဘိညေယျာတိ ဝိဇ္ဇာယ အဘိညေယျဘာဝေါ ဝုတ္တော. ဣမိနာ ဝါ နယေန သဗ္ဗေသမ္ပိ အဘိညေယျဘာဝေါ ဝုတ္တော ဧဝါတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. ဖလေန ဝိနာ ဟေတုဘာဝဿေဝ အဘာဝတော ဟေတုဝစနေန ဖလသိဒ္ဓိ, နိရောဓဿ စ သမ္ပာပနေန မဂ္ဂဿ ဟေတုဘာဝေါ. ဒုက္ခဿ နိဗ္ဗတ္တနေန တဏှာယ သမုဒယဘာဝေါတိ ဣမမတ္ထံ သင်္ဂဟိတမေဝ အတ္ထတော အာပန္နတ္တာ. ယုတ္တဟေတုနာတိ ယုတ္တိယုတ္တေန ဟေတုနာ ဗုဒ္ဓဘာဝံ သာဓေတိ သစ္စဝိနိမုတ္တဿ ဗုဇ္ဈိတဗ္ဗဿ အဘာဝတော သစ္စသမ္ဗောဓနေနေဝ စ တဿ အနဝသေသတော ဗုဒ္ဓတ္တာ. အတ္ထဝစနဉ္စေတံ, ပယောဂဝစနာနိ ပန – ဗြာဟ္မဏ, အဟံ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ သဗ္ဗထာ အဝိပရီတဓမ္မဒေသနော, သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓတ္တာ သဗ္ဗတ္ထ အဝိပရီတမာစိက္ခတိ ယထာဟံ သဗ္ဗမဂ္ဂဒေသကောတိ. ကိံ ပန ဘဂဝါ သယမေဝ အတ္တနော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဘာဝံ အာရောစေတီတိ? မဟာကရုဏာယ အညေသံ မဟာဝိသယတော. တတ္ထ ‘‘ဧကောမှိ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ, သဗ္ဗာဘိဘူ သဗ္ဗဝိဒူဟမသ္မီ’’တိအာဒီနိ (မဟာဝ. ၁၁; မ. နိ. ၁.၂၈၅; ၂.၃၄၁; ကထာ. ၄၀၅) သုတ္တပဒါနိ ဣဒမေဝ စ သုတ္တပဒံ ဧတဿ အတ္ထဿ သာဓကံ. 'विद्या' का अर्थ है मार्ग-विद्या। उत्कृष्ट निर्देश से 'विमुक्ति' का अर्थ फल-विमुक्ति है। क्या मार्ग 'भावितव्य' (भावना करने योग्य) के रूप में ग्रहण नहीं किया गया है? सत्य है, ग्रहण किया गया है, और सभी सत्त्वों के धर्म 'अभिज्ञेय' (जानने योग्य) हैं, इसलिए विद्या का अभिज्ञेय भाव कहा गया है। इस पद्धति से सभी का अभिज्ञेय भाव ही कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। फल के बिना हेतु-भाव का अभाव होने से हेतु के कथन से फल की सिद्धि होती है, और निरोध की प्राप्ति कराने से मार्ग का हेतु-भाव सिद्ध होता है। दुःख की उत्पत्ति से तृष्णा का समुदाय-भाव सिद्ध होता है - इस अर्थ को अर्थतः प्राप्त होने के कारण संगृहीत ही किया गया है। 'युक्त हेतु' से अर्थात् युक्तिसंगत हेतु से बुद्धत्व को सिद्ध करते हैं, क्योंकि सत्यों से मुक्त कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं है, और सत्यों के सम्बोधन से ही उनका पूर्ण बुद्धत्व है। यह अर्थ-वचन है, और प्रयोग-वचन ये हैं - "हे ब्राह्मण, मैं सम्यक्सम्बुद्ध हूँ, सर्वथा अविपरीत (यथार्थ) धर्म का उपदेशक हूँ, सम्यक्सम्बुद्ध होने के कारण सर्वत्र यथार्थ का ही निर्देश करता हूँ, जैसे कि मैं सभी मार्गों का उपदेशक हूँ।" क्या भगवान स्वयं अपने सम्यक्सम्बुद्ध होने की घोषणा करते हैं? महाकरुणा के कारण दूसरों के महान विषय के लिए। वहाँ "मैं अकेला सम्यक्सम्बुद्ध हूँ, मैं सर्वाभिभू और सर्वविद् हूँ" आदि सूत्रपद और यही सूत्रपद इस अर्थ के साधक हैं। သလ္လကန္တနောတိ [Pg.184] သလ္လာနံ သမုစ္ဆိန္နတ္တာ. ရောဂဿာတိ ကိလေသရောဂဿ. တသ္မာတိ အပုနပဝတ္တိပါဒနေန တိကိစ္ဆနတော. ဗြဟ္မံ ဝါ သေဋ္ဌံ သမ္မာသမ္ဗောဓိံ ပတ္တောတိ ဗြဟ္မဘူတော. ဧဝံ အာဂတာယာတိ ဣမိနာ – 'शल्यकर्तन' का अर्थ है शल्यों (काँटों) को समूल काट देने के कारण। 'रोग का' अर्थात् क्लेश रूपी रोग का। इसलिए, पुनः उत्पन्न न होने देने के रूप में चिकित्सा करने के कारण। 'ब्रह्म' या श्रेष्ठ सम्यक्सम्बोधि को प्राप्त होने के कारण 'ब्रह्मभूत' हैं। इस प्रकार आए हुए इस (गाथा) के द्वारा - ‘‘ကာမာ တေ ပဌမာ သေနာ, ဒုတိယာ အရတိ ဝုစ္စတိ; တတိယာ ခုပ္ပိပါသာ တေ, စတုတ္ထီ တဏှာ ပဝုစ္စတိ. "काम तुम्हारी पहली सेना है, दूसरी अरति (अरुचि) कही जाती है; तीसरी तुम्हारी क्षुधा-पिपासा (भूख-प्यास) है, चौथी तृष्णा कही जाती है।" ထိနမိဒ္ဓံ တေပဉ္စမံ ထိနမိဒ္ဓံ တေ, ဆဋ္ဌာ ဘီရူ ပဝုစ္စတိ; သတ္တမီ ဝိစိကိစ္ဆာ တေ, မက္ခော ထမ္ဘော တေ အဋ္ဌမော. "स्त्यान-मिद्ध (आलस्य-तन्द्रा) तुम्हारी पाँचवीं सेना है, छठी भीरुता (डर) कही जाती है; सातवीं तुम्हारी विचिकित्सा (संदेह) है, आठवाँ मक्ख (कृतघ्नता) और स्तम्भ (जड़ता) है।" လာဘော သိလောကော သက္ကာရော, မိစ္ဆာလဒ္ဓေါ စ ယော ယသော; ယော စတ္တာနံ သမုက္ကံသေ, ပရေ စ အဝဇာနတိ; ဧသာ နမုစိ တေ သေနာ, ကဏှဿာဘိပ္ပဟာရိနီ’’တိ. (သု. နိ. ၄၃၈-၄၄၁); "लाभ, श्लोक (यश), सत्कार और जो मिथ्या रूप से प्राप्त कीर्ति है; जो स्वयं की प्रशंसा करता है और दूसरों का अपमान करता है; हे नमुचि (मार)! यह तुम्हारी सेना है, जो कृष्ण (अंधकारमय मार) की प्रहार करने वाली है।" ဧဝံ ဝုတ္တံ နဝဝိဓံ သေနံ သင်္ဂယှတိ. ဝသေ ဝတ္တေတွာတိ သမုစ္ဆိန္ဒနေန အနုပ္ပာဒတာပါဒနေန ဝသေ ဝတ္တေတွာ. ကုတောစိ အဘယော နိဗ္ဘယော. इस प्रकार कही गई नौ प्रकार की सेना संगृहीत होती है। 'वश में करके' का अर्थ है समूल नष्ट करके और पुनः उत्पन्न न होने देकर वश में करके। 'कहीं से भी भय न होना' निर्भयता है। သယမေဝ ဒဋ္ဌဗ္ဗန္တိ ယေန ယေန အဓိဂတော, တေန တေန ပရသဒ္ဓါယ ဂန္တဗ္ဗံ ဟိတွာ အသမ္မောဟတော ပစ္စဝေက္ခဏာဉာဏေနေဝ သာမံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. တေနာဟ ‘‘ပစ္စက္ခ’’န္တိ. ပသဋ္ဌာ ဒိဋ္ဌိ သန္ဒိဋ္ဌိ. ယထာ ရထေန ဇယတီတိ ရထိကော, ဧဝံ ဣဒံ မဂ္ဂဗြဟ္မစရိယံ သန္ဒိဋ္ဌိယာ ဇယတီတိ သန္ဒိဋ္ဌိကံ. အထ ဝါ ဒိဋ္ဌန္တိ ဒဿနံ ဝုစ္စတိ, ဒိဋ္ဌမေဝ သန္ဒိဋ္ဌံ, သန္ဒဿနန္တိ အတ္ထော. သန္ဒိဋ္ဌံ အရဟတီတိ သန္ဒိဋ္ဌိကော ယထာ ဝတ္ထယုဂံ အရဟတီတိ ဝတ္ထယုဂိကော. သန္ဒိဋ္ဌိကံ ဖလဒါနံ သန္ဓာယ နာဿ ကာလောတိ အကာလံ, အကာလမေဝ အကာလိကံ, န ကာလန္တရံ ခေပေတွာ ဖလံ ဒေတိ, အတ္တနော ပန ပဝတ္တိသမနန္တရမေဝ ဖလံ ဒေတီတိ အတ္ထော. အထ ဝါ အတ္တနော ဖလပ္ပဒါနေ ပကဋ္ဌော ကာလော ပတ္တော အဿာတိ ကာလိကော, လောကိယော ကုသလဓမ္မော, ဣဒံ ပန သမနန္တရဖလတ္တာ န ကာလိကံ. 'स्वयं ही देखना चाहिए' का अर्थ है कि जिसके द्वारा जो प्राप्त किया गया है, उसे दूसरों की श्रद्धा पर चलना छोड़कर, बिना मोह के प्रत्यावेक्षण ज्ञान (paccavekkhaṇāñāṇa) के द्वारा स्वयं ही देखना चाहिए। इसीलिए कहा गया है— 'प्रत्यक्ष' (paccakkha)। प्रशंसित दृष्टि ही 'संदिट्ठि' (sandiṭṭhi) है। जैसे रथ से जीतने वाला 'रथिक' कहलाता है, वैसे ही यह मार्ग-ब्रह्मचर्य संदिट्ठि (सम्यक् दृष्टि) से जीतने के कारण 'सांदृष्टिक' (sandiṭṭhika) है। अथवा 'दिट्ठ' दर्शन को कहा जाता है, 'दिट्ठ' ही 'संदिट्ठ' है, जिसका अर्थ 'संदर्शन' है। जो संदिट्ठ (दर्शन) के योग्य है, वह 'सांदृष्टिक' है, जैसे जो वस्त्र-युगल के योग्य है, वह 'वत्थयुगिक' कहलाता है। फल देने के संदर्भ में जिसका कोई (विलंबकारी) काल नहीं है, वह 'अकाल' है, 'अकाल' ही 'अकालिक' (akālika) है; इसका अर्थ है कि यह समय का अंतराल बिताए बिना फल देता है, बल्कि अपनी उत्पत्ति के तुरंत बाद ही फल देता है। अथवा, अपने फल प्रदान करने में जिसे उत्कृष्ट काल प्राप्त हो, वह 'कालिक' है, जैसे लौकिक कुशल धर्म; परंतु यह (मार्ग) तुरंत फल देने वाला होने के कारण 'अकालिक' है। ၄၀၀. ‘‘မဟာယညံ ပဝတ္တယီ’’တိအာဒီသု ကေဝလံ ဒါနဓမ္မာဒီသု ယညပရိယာယသမ္ဘဝတော ‘‘ဗြာဟ္မဏာနံ ယညာဘာဝတော’’တိ ဝုတ္တံ. ဗြာဟ္မဏာ ဟိ ‘‘အဂ္ဂိမုခါ ဒေဝါ’’တိ အဂ္ဂိဇုဟနပုဗ္ဗကံ ယညံ ဝိဒဟန္တိ. တေနာဟ ‘‘အဂ္ဂိဇုဟနပ္ပဓာနာတိ အတ္ထော’’တိ ‘‘ဘူရ္ဘုဝ? သွ?’’ ဣတိ သာဝိတ္တီ ပုဗ္ဗကတ္တာ မုခံ ပုဗ္ဗင်္ဂမံ[Pg.185]. ‘‘မုခမိဝ မုခ’’န္တိအာဒီသု ဝိယ ဣဓာပိ ပဓာနပရိယာယော မုခသဒ္ဒေါတိ ဒဿေန္တော ‘‘မနုဿာနံ သေဋ္ဌတော ရာဇာ ‘မုခ’န္တိ ဝုတ္တော’’တိ အာဟ. အာဓာရတောတိ ဩဂါဟန္တီနံ နဒီနံ အာဓာရဘာဝတော ပဋိသရဏတော ဂန္တဗ္ဗဋ္ဌာနဘာဝတော. သညာဏတောတိ စန္ဒယောဂဝသေန အဇ္ဇ အသုကနက္ခတ္တန္တိ ပညာယနတော. အာလောကကရဏတောတိ နက္ခတ္တာနိ အဘိဘဝိတွာ အာလောကကရဏတော. သောမ္မဘာဝတောတိ သီတဟိမဝါသီတဝါတူပက္ခရဘာဝတော. တပန္တာနန္တိ ဒီပသိခါ အဂ္ဂိဇာလာ အသနိဝိစက္ကန္တိ ဧဝမာဒီနံ ဝိဇ္ဇလန္တာနံ. အာယမုခံ အဂ္ဂဒက္ခိဏေယျဘာဝေန. ४००. 'महायज्ञं पवत्तयी' (महायज्ञ प्रवृत्त किया) आदि में केवल दान-धर्म आदि में यज्ञ शब्द के प्रयोग की संभावना होने से 'ब्राह्मणों के यज्ञ के अभाव से' ऐसा कहा गया है। क्योंकि ब्राह्मण 'अग्निमुख देवा' (अग्नि देवताओं का मुख है) मानकर अग्नि-हवन पूर्वक यज्ञ करते हैं। इसीलिए कहा गया है— 'अग्नि-हवन प्रधान है, यही अर्थ है'। 'भूर्भुवः स्वः' इस सावित्री (गायत्री) के पहले होने के कारण वह 'मुख' (प्रधान/अग्रगामी) है। 'मुख के समान मुख' आदि के समान यहाँ भी 'मुख' शब्द प्रधानता के अर्थ में है, यह दिखाते हुए कहा— 'मनुष्यों में श्रेष्ठ होने के कारण राजा को मुख कहा गया है'। 'आधारतः' का अर्थ है— प्रवेश करने वाली नदियों का आधार होने से, शरण होने से, गंतव्य स्थान होने से। 'संज्ञानतः' का अर्थ है— चन्द्रमा के योग के वश से 'आज अमुक नक्षत्र है' ऐसा ज्ञात होने से। 'आलोककरणतः' का अर्थ है— नक्षत्रों को अभिभूत कर प्रकाश करने से। 'सौम्यभावतः' का अर्थ है— शीतल ओस और शीतल वायु के उपकरण होने से। 'तपन्तानं' (तपते हुओं में) का अर्थ है— दीपक की लौ, अग्नि की ज्वाला, वज्र-चक्र आदि जलते हुए पदार्थों में। 'आयमुखं' का अर्थ है— श्रेष्ठ दक्षिणा के योग्य होने के कारण। ဒိဗ္ဗစက္ခု ဓမ္မစက္ခု ပညာစက္ခု ဗုဒ္ဓစက္ခု သမန္တစက္ခူတိ ဣမေဟိ ပဉ္စဟိ စက္ခူဟိ. တေ သရဏဿာတိ တေ သရဏဿ စ, တေ သရဏဘာဝမူလကတ္တာ ဣတရဒွယဿ စ, ယထာဝုတ္တ တေ-ပဒေန ဝုတ္တတ္ထတော ပရဿ စာတိ အတ္ထော. ဣဒံ ဝုတ္တံ ဟောတိ – ‘‘တေ တုယှံ, ဣတရဿ စ သရဏဿ အဟော အာနုဘာဝေါ’’တိ. အာဝုတ္တိဝသေန ဝါ တေ သရဏဿာတိ ဧတ္ထ အတ္ထော ဝိဘာဝေတဗ္ဗော – တုယှံ သရဏဘူတဿ စ ဣတရသရဏဿ စ အာနုဘာဝေါတိ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. दिव्यचक्षु, धर्मचक्षु, प्रज्ञाचक्षु, बुद्धचक्षु और समन्तचक्षु—इन पाँच चक्षुओं के द्वारा। 'ते सरणस्स' का अर्थ है— वे तुम्हारे शरण के लिए और उन (बुद्ध) के शरण होने के मूल कारण होने से अन्य दो (धर्म और संघ) के लिए भी, जैसा कि 'ते' पद से कहे गए अर्थ के अनुसार दूसरे के लिए भी है। यह कहा गया है— 'वे तुम्हारे और अन्य शरण के, अहो! क्या ही अनुभाव (प्रभाव) हैं'। अथवा आवृत्ति के वश से 'ते सरणस्स' यहाँ यह अर्थ स्पष्ट करना चाहिए— तुम्हारे शरणभूत और अन्य शरण के अनुभाव। शेष सुविज्ञ (आसानी से समझने योग्य) ही है। သေလသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. सेल सुत्त की वर्णना की लीनत्थप्पकासना (गूढ़ार्थ प्रकाशिनी टीका) समाप्त हुई। ၃. အဿလာယနသုတ္တဝဏ္ဏနာ ३. अस्सलायन सुत्त की वर्णना। ၄၀၁. အညမညဝိသိဋ္ဌတ္တာ ဝိသဒိသံ ရဇ္ဇံ ဝိရဇ္ဇံ, ဝိရဇ္ဇတော အာဂတာ, တတ္ထ ဇာတာတိ ဝါ ဝေရဇ္ဇကာ, ဧဝံ ဇာတာ ခေါ ပန တေ, ယသ္မာ ဝတ္ထာဘရဏာဒိဝိဘာဂေန နာနပ္ပကာရာ ဟောန္တိ, တသ္မာ ဝုတ္တံ ‘‘နာနာဝေရဇ္ဇကာန’’န္တိ. အဋ္ဌကထာယံ ပန ဝေရဇ္ဇဿေဝ ဝသေန နာနပ္ပကာရတာ ဝုတ္တာ. ယညုပါသနာဒိနာတိ ယညာနုဘဝနမန္တဇ္ဈေနဒက္ခိဏပရိယေသနာဒိနာ. စတုဝဏ္ဏသာဓာရဏန္တိ ခတ္တိယာဒီနံ စတုန္နံ ဝဏ္ဏာနံ သာဓာရဏံ သံသာရသုဒ္ဓိပါပတဿနံ. နှာနသုဒ္ဓိယာတိ တိတ္ထသမုဒ္ဒခါတေသု မန္တဇပ္ပနပုဗ္ဗကံ သာယံတတိယဥဒကောရောဟနာဒိနှာနသုဒ္ဓိယာ. ဘာဝနာသုဒ္ဓိယာတိ ပရမဇောတိဘူတာယ ပုရိသဘာဝနာသင်္ခါတာယ သုဒ္ဓိယာ. ဝါပိတသိရောတိ ဩရောပိတကေသော. တမေဝ ဟိ သိရော ဝါပိတန္တိ ဝုစ္စတိ. ४०१. एक-दूसरे से विशिष्ट होने के कारण विसदृश राज्य 'विराज्य' है, विराज्य से आए हुए अथवा वहाँ उत्पन्न हुए लोग 'वेरज्जक' हैं; और वे इस प्रकार उत्पन्न हुए हैं कि वस्त्र-आभूषण आदि के भेद से अनेक प्रकार के होते हैं, इसलिए 'नानावेरज्जकानां' (विभिन्न राज्यों के) कहा गया है। अट्ठकथा में तो 'विराज्य' के कारण ही अनेक प्रकारता कही गई है। 'यज्ञोपासनादिना' का अर्थ है— यज्ञ का अनुभव करना, मंत्रों का अध्ययन करना, दक्षिणा खोजना आदि के द्वारा। 'चातुर्वर्ण्यसाधारणं' का अर्थ है— क्षत्रिय आदि चारों वर्णों के लिए साधारण संसार-शुद्धि और पाप-दर्शन। 'स्नानशुद्धिया' का अर्थ है— तीर्थों, समुद्रों और जलाशयों में मंत्र-जप पूर्वक शाम और सुबह जल में उतरने आदि की स्नान-शुद्धि के द्वारा। 'भावनाशुद्धिया' का अर्थ है— परम ज्योति स्वरूप पुरुष-भावना नामक शुद्धि के द्वारा। 'वापितसिरो' का अर्थ है— मुंडित सिर वाला। उसे ही 'सिर वापित' (सिर मुंडाया हुआ) कहा जाता है। သဘာဝဝါဒီတိ [Pg.186] ယထာဘူတဝါဒီ. ပဗ္ဗဇန္တာတိ ဗြာဟ္မဏပဗ္ဗဇ္ဇံ ဥပဂစ္ဆန္တာ, တသ္မာ ဗြာဟ္မဏာနံ ပဗ္ဗဇ္ဇာဝိဓာနံ သိက္ခန္တေန ဘောတာ ‘‘ဗြာဟ္မဏာဝ သုဇ္ဈန္တိ, နော အဗြာဟ္မဏာ’’တိ အယံ ဝိဓိ သဟေတုကော သဥပါဒါနော သက္ကစ္စံ ဥဂ္ဂဟိတော, တသ္မာ တုယှံ ပရာဇယော နတ္ထိ…ပေ… ဧဝမာဟံသု. 'स्वभाववादी' का अर्थ है— यथाभूतवादी (जैसा है वैसा कहने वाला)। 'पब्बजन्ता' का अर्थ है— ब्राह्मण-प्रव्रज्या को प्राप्त करने वाले; इसलिए ब्राह्मणों के प्रव्रज्या-विधान को सीखने वाले आप (भवन्त) के द्वारा 'ब्राह्मण ही शुद्ध होते हैं, अब्राह्मण नहीं'—यह विधि हेतु सहित और आधार सहित आदरपूर्वक ग्रहण की गई है, इसलिए आपकी पराजय नहीं है... इत्यादि उन्होंने कहा। ၄၀၂. လဒ္ဓိဘိန္ဒနတ္ထန္တိ ‘‘ဗြာဟ္မဏာဝ ဗြဟ္မုနော ပုတ္တာ ဩရသာ မုခတော ဇာတာ ဗြဟ္မဇာ’’တိ ဧဝံ ပဝတ္တလဒ္ဓိယာ ဝိနိဝေဌနတ္ထံ. ပုတ္တပဋိလာဘတ္ထာယာတိ ‘‘ဧဝံ မယံ ပေတ္တိကံ ဣဏဓာရံ သောဓေယျာမာ’’တိ လဒ္ဓိယံ ဌတွာ ပုတ္တပဋိလာဘတ္ထာယ. အယဉှေတ္ထ အဓမ္မိကာနံ ဗြာဟ္မဏာနံ အဇ္ဈာသယော. နေသန္တိ ဗြာဟ္မဏာနံ. သစ္စဝစနံ သိယာတိ ‘‘ဗြဟ္မုနော ပုတ္တာ’’တိအာဒိဝစနံ သစ္စံ ယဒိ သိယာ ဗြာဟ္မဏီနံ…ပေ… ဘဝေယျ, န စေတံ အတ္ထိ. မဟာဗြဟ္မုနော မုခတော ဇာတောတိ ဝါဒစ္ဆေဒကဝါဒေါ မုခတောဇာတစ္ဆေကဝါဒေါ. အဿလာယနောဝိညူ ဇာတိကော ‘‘နိရက္ခေပံ သမဏေန ဂေါတမေန ဝုတ္တ’’န္တိ ဇာနန္တောပိ သဟဂတာနံ ဗြာဟ္မဏာနံ စိတ္တာနုရက္ခဏတ္ထံ ‘‘ကိဉ္စာပိ ဘဝံ ဂေါတမော’’တိအာဒိမာဟ. ४०२. 'लब्धि-भिन्दनार्थं' का अर्थ है— 'ब्राह्मण ही ब्रह्मा के पुत्र हैं, औरस हैं, मुख से उत्पन्न हैं, ब्रह्मज हैं'—इस प्रकार प्रचलित धारणा (लब्धि) के खंडन के लिए। 'पुत्र-प्रतिलाभार्थ' का अर्थ है— 'इस प्रकार हम पैतृक ऋण के भार को शोधेंगे'—इस धारणा में स्थित होकर पुत्र प्राप्ति के लिए। यहाँ यह अधार्मिक ब्राह्मणों का आशय है। 'नेसं' का अर्थ है— ब्राह्मणों का। 'सच्चवचनं सिया' का अर्थ है— 'ब्रह्मा के पुत्र' आदि वचन यदि सत्य हों तो ब्राह्मणियों के... इत्यादि... होता, पर ऐसा नहीं है। 'महाब्रह्मा के मुख से उत्पन्न'—इस वाद को काटने वाला वाद 'मुखतोजातच्छेदकवाद' है। अस्सलायन बुद्धिमान स्वभाव का था, 'श्रमण गौतम ने अकाट्य बात कही है'—यह जानते हुए भी साथ आए ब्राह्मणों के चित्त की रक्षा के लिए 'यद्यपि आप गौतम...' आदि कहा। ၄၀၃. ဣဒါနိ ဗြာဟ္မဏောဝ သေဋ္ဌော ဝဏ္ဏောတိ ဝါဒံ ဘိန္ဒိတုံ ‘‘သုတံ တေ ယောနကကမ္ဗောဇေသူ’’တိအာဒိ အာရဒ္ဓံ. ယဒိ ဗြာဟ္မဏောဝ သေဋ္ဌော ဝဏ္ဏော, သဗ္ဗတ္ထ ဗြာဟ္မဏောဝ သေဋ္ဌော ဘဝေယျ, အထ ကသ္မာ ယောနကကမ္ဗောဇာဒိဇနပဒေသု ဗြာဟ္မဏာနံ သေဋ္ဌဘာဝေါ နတ္ထိ? ဧဝဉှိ တတ္ထ ဝဏ္ဏာ, တသ္မာ ‘‘ဗြာဟ္မဏောဝ သေဋ္ဌော’’တိ လဒ္ဓိမတ္တမေတံ. တေသု ဟိ ဇနပဒေသု ဇနာ ဧကဇ္ဈံ သန္နိပတိတွာ သမ္မန္တယိတွာ ကတိကံ အကံသု, ဒါသံ သာမိကံ ကတွာ ဣတရေ သဗ္ဗေ တံ ပူဇေတွာ တဿ ဝသေ ဝတ္တန္တိ, ယော တေသံ အယျော ဟောတိ ဣတရေ သဗ္ဗေ တဿ ဒါသာ ဟောန္တိ, တေ ကတိပယသံဝစ္ဆရာတိက္ကမေန တဿ ကိဉ္စိ ဒေါသံ ဒိသွာ တံ တတော ဌာနတော အပနေတွာ အညံ ဌပေန္တိ, ဣတိ သော အယျော ဟုတွာ ဒါသော ဟောတိ, ဣတရော ဒါသော ဟုတွာ အယျော ဟောတိ, ဧဝံ တာဝ ကေစိ ‘‘အယျော ဟုတွာ ဒါသော ဟောတိ, ဒါသော ဟုတွာ အယျော ဟောတီ’’တိ ဧတ္ထ အတ္ထံ ဝဒန္တိ. အဋ္ဌကထာယံ ပန ပုရိမဝသေနေဝ တမတ္ထံ ဒဿေတုံ ‘‘ဗြာဟ္မဏော သဘရိယော’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. ဝယပ္ပတ္တေ ပုတ္တေ အသတီတိ ဣဒံ ဝက္ခမာနဿ ဒါရကဿ ဒါယဇ္ဇသာမိကဘာဝဿ တာဝ ဒဿနံ. မာတိတော သုဒ္ဓေါတိ ဧတ္ထ [Pg.187] ယော မာတိတော သုဒ္ဓတ္တာ အယျော, ပိတိတော အသုဒ္ဓတ္တာ ဒါသော ဟောတိ, သော ဧဝ ပိတိတော အသုဒ္ဓတ္တာ ဒါသော ဟုတွာ မာတိတော အယျော ဟောတီတိ ဇာတိံ သမ္ဘေဒေတိ. သောဝ သဗ္ဗေန သဗ္ဗံ ဟောတီတိ န သက္ကာ ဝတ္တုန္တိ အပရေ. ကော ထာမောတိ မဟန္တေ လောကသန္နိဝါသေ အနမတဂ္ဂေ အတီတေ ကာလေ ဣတ္ထီနံ ဝါ စိတ္တေ အနဝဋ္ဌိတေ ဒါသာ ဒါသာ ဧဝ ဟောန္တိ, အယျာ အယျာ ဧဝ ဟောန္တီတိ ဧတ္ထ ကော ဧကန္တိကော သဟေတုကော အဝဿယော, တဿ သာဓကော သိဒ္ဓန္တော, ကိံ နိဒဿနန္တိ အတ္ထော. ४०३. अब 'ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है' इस वाद को खंडित करने के लिए 'सुतं ते योनककम्बोजेसू' आदि आरम्भ किया गया है। यदि ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण होता, तो सर्वत्र ब्राह्मण ही श्रेष्ठ होता, फिर क्यों योनक-कम्बोज आदि जनपदों में ब्राह्मणों की श्रेष्ठता नहीं है? क्योंकि वहाँ (केवल दो ही) वर्ण हैं, इसलिए 'ब्राह्मण ही श्रेष्ठ है' यह केवल एक धारणा मात्र है। उन जनपदों में लोग एक साथ एकत्रित होकर, विचार-विमर्श कर यह नियम बनाते हैं कि दास को स्वामी बनाकर शेष सभी उसकी पूजा करते हुए उसके वश में रहते हैं; जो उनका आर्य (स्वामी) होता है, शेष सभी उसके दास होते हैं। वे कुछ वर्षों के बीतने पर उसमें कोई दोष देखकर उसे उस स्थान से हटाकर दूसरे को स्थापित करते हैं, इस प्रकार वह आर्य होकर दास हो जाता है और दूसरा दास होकर आर्य हो जाता है। इस प्रकार कुछ लोग यहाँ 'आर्य होकर दास होता है, दास होकर आर्य होता है' इसका अर्थ बताते हैं। परन्तु अट्ठकथा में पूर्व के समान ही उस अर्थ को दिखाने के लिए 'ब्राह्मणो सब्भरियो' आदि कहा गया है। 'वयप्पत्ते पुत्ते असति' (पुत्र के युवा होने पर न होने पर) यह आगे कहे जाने वाले बालक के दायभाग (उत्तराधिकार) के स्वामित्व को दिखाने के लिए है। 'मातितो सुद्धो' यहाँ जो माता की ओर से शुद्ध होने के कारण आर्य है और पिता की ओर से अशुद्ध होने के कारण दास है, वह पिता की ओर से अशुद्ध होने के कारण दास होकर माता की ओर से आर्य होता है - इस प्रकार जाति का संकर (मिश्रण) होता है। 'वह पूर्णतः सब कुछ होता है' ऐसा नहीं कहा जा सकता - ऐसा अन्य (आचार्य) कहते हैं। 'को थामो' (क्या बल है) - इस विशाल लोक-सन्निवेश में, अनादि काल से स्त्रियों के चित्त के अस्थिर होने पर, 'दास दास ही होते हैं, आर्य आर्य ही होते हैं' - इसमें क्या एकांतिक सहेतुक आधार है, उसका साधक सिद्धांत क्या है, क्या प्रमाण है - यह अर्थ है। ၄၀၄. သုက္ကစ္ဆေဒကဝါဒေါ နာမာတိ ‘‘ဗြာဟ္မဏောဝ သုက္ကော ဝဏ္ဏော’’တိ ဧဝံ ဝုတ္တော သုက္ကစ္ဆေဒကဝါရော နာမ. ४०४. 'सुक्कच्छेदकवादो' का अर्थ है - 'ब्राह्मण ही शुक्ल (शुद्ध) वर्ण है', इस प्रकार कहा गया 'सुक्कच्छेदकवार'। ၄၀၈. သဗ္ဗသ္မိံ အဂ္ဂိကိစ္စံ ကရောန္တေတိ ဧတေန ယထာ ယတော ကုတောစိ နိဿယတော ဥပ္ပန္နော အဂ္ဂိဥပါဒါနသမ္ပန္နော အဂ္ဂိကိစ္စံ ကရောတိ, ဧဝံ ယသ္မိံ ကသ္မိဉ္စိ ဒါသကုလေ ဇာတော ဥပနိဿယသမ္ပန္နော သမ္မာပဋိပဇ္ဇမာနော သံသာရတော သုဇ္ဈတိ ဧဝါတိ ဒဿေတိ. ४०८. 'सब्बस्मिं अग्गिकिच्चं करोन्ते' (सभी में अग्नि-कार्य करते हुए) - इससे यह दिखाते हैं कि जैसे किसी भी आश्रय (लकड़ी) से उत्पन्न अग्नि, ईंधन से युक्त होकर अग्नि का कार्य करती है, वैसे ही किसी भी दास-कुल में उत्पन्न व्यक्ति, उपनिश्रय (साधनों) से संपन्न होकर सम्यक् प्रतिपत्ति (आचरण) करते हुए संसार से शुद्ध हो जाता है। ၄၀၉. ပါဒသိကဝဏ္ဏောတိ အန္တရာဠဝဏ္ဏော. ဧတေသန္တိ ခတ္တိယကုမာရေန ဗြာဟ္မဏကညာယ ဥပ္ပန္နပုတ္တော, ဗြာဟ္မဏကုမာရေန ခတ္တိယကညာယ ဥပ္ပန္နပုတ္တောတိ ဧတေသံ ဒွိန္နံ မာဏဝကာနံ. မတကဘတ္တေတိ မတေ ဥဒ္ဒိဿ ကတဘတ္တေ. ထာလိပါကေတိ ကတမင်္ဂလဘတ္တေ. ४०९. 'पादसिकवण्णो' का अर्थ है अन्तराल वर्ण (मिश्रित वर्ण)। 'एतेसं' का अर्थ है - क्षत्रिय कुमार और ब्राह्मण कन्या से उत्पन्न पुत्र, तथा ब्राह्मण कुमार और क्षत्रिय कन्या से उत्पन्न पुत्र - इन दो माणवकों (युवकों) का। 'मतकभत्ते' का अर्थ है मृतक के उद्देश्य से किया गया भोज। 'थालिपाके' का अर्थ है मांगलिक भोज। ၄၁၀. တုမှေတိ ဇာတိသာမညတော မာဏဝံ ဗြာဟ္မဏေဟိ သဒ္ဓိံ ဧကဇ္ဈံ သင်္ဂဏှန္တော အာဟ. ကော နု ခေါတိ အဝံသိရော ဣသိဝါဒေါ, တေသံ ဗြာဟ္မဏီသီနံ အသာမတ္ထိယဒဿနေန ဇာတိယာ အပ္ပမာဏတံ ဝိဘာဝေတုံ ဂါမဒါရကဝေသေန ဥပဂစ္ဆိ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘ဂါမဏ္ဍလရူပေါ ဝိယာ’’တိ. ကောဏ္ဍဒမကောတိ အဒန္တဒမကော. ४१०. 'तुम्हे' (तुम) - यहाँ जाति की समानता के कारण बुद्ध माणवक (अस्सलायन) को ब्राह्मणों के साथ एक समूह में लेते हुए कहते हैं। 'को नु खो' - यह अधोमुख (गंभीर) ऋषियों का कथन है; उन ब्राह्मणी ऋषियों की असमर्थता दिखाने के लिए और जाति की अप्रमाणिकता को स्पष्ट करने के लिए (असित देवल) ग्राम-बालक के वेश में आए। इसीलिए कहा गया - 'गामण्डलरूपो विय' (ग्राम-बालक के रूप में)। 'कोण्डदमको' का अर्थ है अदम्य को दमन करने वाला। ၄၁၁. ဇနေတီတိ ဇနိကာ ဇနေတ္တိ. ဇနကော ပိတာတိ ဧတ္ထာပိ ဧသေဝ နယော. ဂန္ဓဗ္ဗပဉှန္တိ ဂန္ဓဗ္ဗဿ မာတုကုစ္ဆိယံ ဥပ္ပဇ္ဇနကသတ္တဿ ခတ္တိယဘာဝါဒိပုစ္ဆံ. ဒဗ္ဗိဂဟဏသိပ္ပမ္ပိ ဧကာ ဝိဇ္ဇာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. တတ္ထ ကိရ ကုသလော ယံ ကိဉ္စိ အာဟာရူပဂပဏ္ဏပုပ္ဖဖလဗီဇံ အန္တမသော ဧလာလုကမ္ပိ ဂဟေတွာ ဘေသဇ္ဇေဟိ ယောဇေတွာ ပစန္တော သပ္ပိမဓုဖာဏိတေဟိ သမာနရသံ ကတွာ သမ္ပာဒေတုံ [Pg.188] သက္ကောတိ, ပုဏ္ဏောပိ တာဒိသော, တေန ဉာတံ တွံ ဒဗ္ဗိဂဟဏသိပ္ပမတ္တမ္ပိ န ဇာနာသီတိ သမ္ဗန္ဓော. သဒ္ဓေါတိ ကမ္မဖလသဒ္ဓါယ သဒ္ဓေါ, ပေါထုဇ္ဇနိကေနေဝ ရတနတ္တယပသာဒေန ပသန္နော. တေနေဝါဟ – ‘‘ဥပါသကံ မံ ဘဝံ…ပေ… သရဏံ ဂတ’’န္တိ. ४११. 'जनेती' का अर्थ है जनिका (माता), जनयित्री। 'जनको पिता' यहाँ भी यही अर्थ है। 'गन्धब्बपञ्हं' का अर्थ है गन्धर्व (माता की कोख में उत्पन्न होने वाले सत्त्व) के क्षत्रियत्व आदि के विषय में प्रश्न। 'दब्बिग्गहणसिप्पं' (कड़छी पकड़ने का शिल्प) भी एक विद्या समझनी चाहिए। वहाँ कहते हैं कि उसमें कुशल व्यक्ति किसी भी खाद्य योग्य पत्ते, फूल, फल, बीज, यहाँ तक कि ककड़ी को भी लेकर औषधियों के साथ मिलाकर पकाते हुए, उसे घी, मधु और गुड़ के समान रस वाला बनाकर तैयार कर सकता है। पुण्ण भी वैसा ही था, इसलिए सम्बन्ध है कि 'तुम कड़छी पकड़ने के शिल्प मात्र को भी नहीं जानते'। 'सद्धो' का अर्थ है कर्म-फल की श्रद्धा के कारण श्रद्धालु, जो पृथग्जन के योग्य रत्नत्रय के प्रसाद से प्रसन्न है। इसीलिए कहा - 'आप मुझे उपासक (स्वीकार करें)... जो शरण गया है'। အဿလာယနသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. अस्सलायन सुत्त की वर्णना (व्याख्या) में लीनत्थप्पकासना (टीका) समाप्त हुई। ၄. ဃောဋမုခသုတ္တဝဏ္ဏနာ ४. घोटमुख सुत्त की वर्णना। ၄၁၂. ခေမိယာ နာမ ရညော ဒေဝိယာ ရောပိတတ္တာ တံ အမ္ဗဝနံ ခေမိယမ္ဗဝနန္တိ ဝုစ္စတီတိ ဝဒန္တိ. ဓမ္မိကောတိ ဓမ္မယုတ္တော သဗ္ဗသောဝ အဓမ္မံ ပဟာယ ဓမ္မေ ဌိတော. ပရိဗ္ဗဇတိ ပဗ္ဗဇတိ ဧတေနာတိ ပရိဗ္ဗဇော, ဃရာဝါသတော နိက္ခမနပုဗ္ဗကံ လိင်္ဂဂ္ဂဟဏဝသေန သီလသမာဒါနံ. ဧတ္ထာတိ ဧတသ္မိံ ပရိဗ္ဗဇေ. သဘာဝေါတိ တံ ပရိဗ္ဗာဇနိယံ, တေဟိ တေဟိ ပရိဗ္ဗာဇကေဟိ အနုဋ္ဌာတဗ္ဗော ပဋိပတ္တိဓမ္မသင်္ခါတော သဘာဝေါ. ဓမ္မောဝ ပမာဏန္တိ ဧတေန မယံ အဟိရိမနာ စိတ္တဿ ယထာဥပဋ္ဌိတံ ကထေမ, တသ္မာ တံ အပ္ပမာဏံ, ယော ပနေတ္ထ အဝိတထော ဓမ္မော, တဒေဝ ပမာဏံ. အဓိဂတပဋိပတ္တိသင်္ခါတော သဘာဝေါ အတ္ထိ, တဿ တုမှေဟိ တုမှေဟိ ဗဟုနာ နာနာသန္ဒဿနာဒိ ကမ္မေန ဣဓ ဘဝိတဗ္ဗံ, ဗဟုဒေဝေတ္ထ ဝတ္တဗ္ဗန္တိ အဓိပ္ပာယော. ४१२. खेमिया नामक राजा की देवी (रानी) द्वारा रोपित होने के कारण उस आम्रवन को 'खेमियम्बवन' कहा जाता है - ऐसा कहते हैं। 'धम्मिको' का अर्थ है धर्मयुक्त, जो पूर्णतः अधर्म को त्याग कर धर्म में स्थित है। 'परिब्बजति' (प्रव्रजित होता है) जिससे, वह 'परिब्बजो' है - घर के आवास से निकलने के बाद लिंग (वेष) ग्रहण करने के रूप में शील का समादान। 'एत्थ' का अर्थ है इस परिव्राजक धर्म में। 'सभावो' का अर्थ है वह परिव्राजनीय (आचरणीय), उन-उन परिव्राजकों द्वारा अनुष्ठान करने योग्य प्रतिपत्ति-धर्म संज्ञक स्वभाव। 'धम्मव पमाणं' (धर्म ही प्रमाण है) - इससे हम मन में जैसा उपस्थित होता है वैसा कहते हैं, इसलिए वह अप्रमाण है; जो यहाँ यथार्थ धर्म है, वही प्रमाण है। अधिगत प्रतिपत्ति संज्ञक स्वभाव है, उसका आप लोगों के द्वारा बहुत से नाना सन्दर्शन आदि कार्यों के द्वारा यहाँ होना चाहिए, यहाँ बहुत कुछ कहना चाहिए - यह अभिप्राय है। ၄၁၄. သာရတ္တရတ္တာတိ သာရဇ္ဇနဝသေန ရတ္တာ, ဗဟုလရာဂဝသေန အဘိရတ္တာတိ အတ္ထော. အတ္တနာ ဉာပေတဗ္ဗမတ္ထံ အနုဂ္ဂဟာပေတိ ဗောဓေတီတိ အနုဂ္ဂဟော, ဉာပိတကာရဏံ, သဟ အနုဂ္ဂဟေနာတိ သာနုဂ္ဂဟာ. တေနာဟ ‘‘သကာရဏာ’’တိ. ကိံ ပန တံ ကာရဏံ? ဣမဿာဓိပ္ပာယော ‘‘နတ္ထိ ဓမ္မိကော ပရိဗ္ဗဇော’’တိ မယာ ဝုတ္တော, အဒ္ဓါ ပနာယသ္မာ ဥဒေနော ယာထာဝတော ဓမ္မိကံ ပရိဗ္ဗဇံ မေ အာစိက္ခတီတိ. တေနာဟ ‘‘ဝုတ္တဉှေတ’’န္တိအာဒိ. ४१४. 'सारत्तरत्ता' का अर्थ है आसक्ति के कारण रक्त (रंगे हुए), अत्यधिक राग के कारण अनुरक्त। अपने द्वारा ज्ञापित किए जाने वाले अर्थ को जो ग्रहण कराता है या बोध कराता है, वह 'अनुग्गहो' (अनुग्रह) है, अर्थात् ज्ञापित कारण; अनुग्रह के साथ 'सानुग्गहा' है। इसीलिए कहा - 'सकारणा' (कारण सहित)। वह कारण क्या है? 'धार्मिक परिव्राजक नहीं है' - यह मेरा अभिप्राय कहा गया है, निश्चय ही आयुष्मान उदेन मुझे यथार्थ धार्मिक परिव्राजक के बारे में बता रहे हैं। इसीलिए 'वुत्तञ्हेतं' आदि कहा गया है। ၄၂၁. သဗ္ဗမိဒံ ထာဝရဇင်္ဂမံ ပုရိသကတံ, တသ္မာ ယံ ကိဉ္စိ ကတွာ အတ္တာ ပေါသေတဗ္ဗော ရက္ခိတဗ္ဗောတိ လောကာယတနိဿိတော နီတိမဂ္ဂေါ ဃောဋမုခကန္တော, တသ္မာ အာဟ ‘‘ဧတဿ ကိရ ဇာနနသိပ္ပေ’’တိအာဒိ. သဂ္ဂေ [Pg.189] နိဗ္ဗတ္တော နာမ နတ္ထိ အကတ္တဗ္ဗမေဝ ကရဏတော. ဒေဝလောကပရိယာပန္နဓနံ မနုဿာနံ ဥပကပ္ပပုညာဘာဝတော ပုဗ္ဗေ အတ္တနာ နိဟိတဓနံ ‘‘အသုကေ စာ’’တိ အာစိက္ခိတွာ ဂတော. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. ४२१. यह सब स्थावर और जंगम (अचल और चल) पुरुष-कृत है, इसलिए जो कुछ भी करके स्वयं का पोषण और रक्षण करना चाहिए - यह लोकायत पर आश्रित नीति-मार्ग घोटमुख को प्रिय है, इसलिए कहा 'उसके ज्ञान-शिल्प में' इत्यादि। स्वर्ग में उत्पन्न होना नाम की कोई चीज़ नहीं है, क्योंकि न करने योग्य कार्य ही किए जाते हैं। देवलोक से संबंधित धन मनुष्यों के लिए पुण्य के अभाव के कारण उपयोगी नहीं होता, इसलिए पहले स्वयं के द्वारा रखे गए धन को 'अमुक स्थान पर है' ऐसा बताकर चला गया। शेष सुविज्ञेय (आसानी से समझने योग्य) ही है। ဃောဋမုခသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. घोटमुख-सुत्त की वर्णना (व्याख्या) में लीनत्थप्पकासना (गूढ़ अर्थ का प्रकाशन) समाप्त हुई। ၅. စင်္ကီသုတ္တဝဏ္ဏနာ ५. चङ्की-सुत्त की वर्णना (व्याख्या)। ၄၂၂. တသ္မိန္တိ သာလဝနေ. ဥတ္တရေန ဩပါသာဒန္တိ ဩပါသာဒဂါမဿ ဥတ္တရဒိသာယံ. ဥတ္တရေနာတိ ဧန-သဒ္ဒယောဂေန ဟိ ဩပါသာဒန္တိ ဥပယောဂဝစနံ. အဇ္ဈာဝသတီတိ ဧတ္ထ အဓိ-အာ-သဒ္ဒါနံ အနတ္ထန္တရတံ ဟဒယေ ကတွာ အာဟ ‘‘ဝသတီ’’တိ. ဣဒါနိ တေသံ အတ္ထဝိသေသဘာဝိတံ ဒဿေန္တော ‘‘အဘိဘဝိတွာ ဝါ အာဝသတီ’’တိအာဒိမာဟ. ဧတ္ထာတိ ဩပါသာဒပဒေ. သတ္တုဿဒန္တိအာဒီသု ပန ကထန္တိ အာဟ – ‘‘တဿ အနုပ္ပယောဂတ္တာဝ သေသပဒေသူ’’တိ. ဥပ-အနု-အဓိ-ဣတိ-ဧဝံ-ပုဗ္ဗကေ ဝသနကိရိယယာဋ္ဌာနေ ဥပယောဂဝစနမေဝ ပါပုဏာတီတိ သဒ္ဒဝိဒူ ဣစ္ဆန္တီတိ အာဟ ‘‘လက္ခဏံ သဒ္ဒသတ္ထတော ပရိယေသိတဗ္ဗ’’န္တိ. တထာ ဟိ ဝုတ္တံ ‘‘ဥပသဂ္ဂဝသေန ပနေတ္ထ ဘုမ္မတ္ထေ ဥပယောဂဝစနံ ဝေဒိတဗ္ဗ’’န္တိ. ဥဿဒတာ နာမေတ္ထ ဗဟုလတာတိ တံ ဗဟုလတံ ဒဿေတုံ ‘‘ဗဟုဇန’’န္တိအာဒိ ဝုတ္တံ. အာဝဇ္ဇိတွာတိ ပရိက္ခိပိတွာ. ४२२. उस सालवन में। 'उत्तरेण ओपासादं' का अर्थ है ओपासाद ग्राम की उत्तर दिशा में। 'उत्तरेण' इस 'एन'-शब्द के योग से 'ओपासादं' में द्वितीया विभक्ति (उपयोगवचन) है। 'अज्झावसति' यहाँ 'अधि' और 'आ' शब्दों के एक ही अर्थ होने को ध्यान में रखकर कहा 'वसति' (बसता है)। अब उनके अर्थ की विशिष्टता को दर्शाते हुए 'अभिभूत करके बसता है' इत्यादि कहा। यहाँ 'ओपासाद' पद में। 'सत्तुस्सद' आदि पदों में (विभक्ति) कैसे है? तो कहा - 'उसके अनु-प्रयोग के कारण ही शेष पदों में'। 'उप', 'अनु', 'अधि' - इन उपसर्गों से युक्त 'वस' धातु के रहने पर द्वितीया विभक्ति ही होती है, ऐसा वैयाकरण मानते हैं, इसलिए कहा 'लक्षण शब्द-शास्त्र से खोजना चाहिए'। वैसा ही कहा गया है - 'उपसर्ग के प्रभाव से यहाँ सप्तमी के अर्थ में द्वितीया विभक्ति समझनी चाहिए'। 'उस्सदता' का अर्थ यहाँ बहुलता है, उस बहुलता को दिखाने के लिए 'बहुजन' आदि कहा गया है। 'आवाज्जित्वा' का अर्थ है घेरकर। ရညာ ဝိယ ဘုဉ္ဇိတဗ္ဗန္တိ ဝါ ရာဇဘောဂ္ဂံ. ရညော ဒါယဘူတန္တိ ကုလပရမ္ပရာယ ဘောဂ္ဂဘာဝေန ရညာ လဒ္ဓဒါယဘူတံ. တေနာဟ ‘‘ဒါယဇ္ဇန္တိ အတ္ထော’’တိ. ရာဇနီဟာရေန ပရိဘုဉ္ဇိတဗ္ဗတော ဥဒ္ဓံ ပရိဘောဂလာဘဿ သေဋ္ဌဒေယျတာ နာမ နတ္ထီတိ အာဟ – ‘‘ဆတ္တံ ဥဿာပေတွာ ရာဇသင်္ခေပေန ပရိဘုဉ္ဇိတဗ္ဗ’’န္တိ. တိတ္ထပဗ္ဗတာဒီသူတိ နဒီတိတ္ထပဗ္ဗတပါဒဂါမဒွါရအဋဝီမုခါဒီသု. နိဿဋ္ဌပရိစ္စတ္တန္တိ မုတ္တစာဂဝသေန ပရိစ္စတ္တံ ကတွာ. ဧတေသံ ဗြာဟ္မဏဂဟပတိကာနံ. राजा के समान भोगने योग्य होने के कारण अथवा 'राजभोग्य' है। राजा का दाय (उत्तराधिकार) होने के कारण, कुल-परम्परा से भोग-भाव के रूप में राजा द्वारा प्राप्त दाय-भाग है। इसीलिए कहा 'दायाद्य अर्थ है'। राजा की रीति से उपभोग करने योग्य होने के कारण, उपभोग के लाभ की इससे श्रेष्ठ देयता और कुछ नहीं है, इसलिए कहा - 'छत्र उठाकर संक्षेप में राजा के समान उपभोग करने योग्य'। 'तित्थपब्बत' आदि में - नदी के घाट, पर्वत की तलहटी, गाँव के द्वार, जंगल के मुहाने आदि में। 'निस्सट्ठपरच्चत्तं' का अर्थ है मुक्त-त्याग की भावना से परित्यक्त कर देना। इन ब्राह्मण-गृहपतियों का। ၄၂၃. တိ သန္နိပတိတာ. ယော ကောစိ ဝိညူနံ ဣစ္ဆိတော ပဉှော, တဿ ပုစ္ဆိတဿ ယာထာဝတော ကထနသမတ္ထော ပုစ္ဆိတပဉှဗျာကရဏသမတ္ထော.ကုလာပဒေသာဒိနာ မဟတီ မတ္တာ ဧတဿာတိ မဟာမတ္တော. ४२३. इकट्ठे हुए। विद्वानों द्वारा चाहा गया जो कोई भी प्रश्न हो, उस पूछे गए प्रश्न का यथार्थ रूप से कथन करने में समर्थ, पूछे गए प्रश्न की व्याख्या करने में समर्थ। कुल के व्यपदेश (नाम) आदि के कारण जिसकी मात्रा (मर्यादा/पद) महान है, वह 'महामात्र' है। ၄၂၄. တေတိ [Pg.190] ‘‘နာနာဝေရဇ္ဇကာ’’တိ ဝုတ္တဗြာဟ္မဏာ. ‘‘ဥဘတော သုဇာတော’’တိ (ဒီ. နိ. ဋီ. ၁.၃၀၃; အ. နိ. ဋီ. ၃.၅.၁၃၄) ဧတ္တကေ ဝုတ္တေ ယေဟိ ကေဟိစိ ဒွီဟိ ဘာဂေဟိ သုဇာတတာ ဝိညာယေယျ, သုဇာတသဒ္ဒေါ စ ‘‘သုဇာတော စာရုဒဿနော’’တိအာဒီသု (မ. နိ. ၂.၃၉၉; သု. နိ. ၅၅၃; ထေရဂါ. ၈၁၈) အာရောဟပရိဏာဟသမ္ပတ္တိပရိယာယောတိ ဇာတိဝသေနေဝ သုဇာတတံ ဝိဘာဝေတုံ ‘‘မာတိတော စ ပိတိတော စာ’’တိ ဝုတ္တံ. အနောရသပုတ္တဝသေနပိ လောကေ မာတုပိတုသမညာ ဒိဿတိ, ဣဓ ပနဿ ဩရသပုတ္တဝသေနေဝ ဣစ္ဆီယတီတိ ဒဿေတုံ ‘‘သံသုဒ္ဓဂဟဏီကော’’တိ ဝုတ္တံ. ပိတာ စ မာတာ စ ပိတရော, ပိတူနံ ပိတရော ပိတာမဟာ, တေသံ ယုဂေါ ပိတာမဟယုဂေါ, တသ္မာ ယာဝ သတ္တမာ ပိတာမဟယုဂါတိ ဧဝမေတ္ထ အတ္ထော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ယုဂသဒ္ဒေါ စေတ္ထ ဧကသေသနယေန ဒဋ္ဌဗ္ဗော ‘‘ယုဂေါ စ ယုဂေါ စ ယုဂါ’’တိ. ဧဝဉှိ တတ္ထ တတ္ထ ဒွိန္နံ ဂဟိတမေဝ ဟောတိ. တေနာဟ – ‘‘တတော ဥဒ္ဓံ သဗ္ဗေပိ ပုဗ္ဗပုရိသာ ပိတာမဟဂ္ဂဟဏေနေဝ ဂဟိတာ’’တိ. ပုရိသဂ္ဂဟဏဉ္စေတ္ထ ဥက္ကဋ္ဌနိဒ္ဒေသဝသေန ကတန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ဧဝဉှိ ‘‘မာတိတော’’တိ ပါဠိဝစနံ သမတ္ထိတံ ဟောတိ. အက္ခိတ္တောတိ အပ္ပတ္တခေပေါ. အနဝက္ခိတ္တောတိ သဒ္ဓထာလိပါကာဒီသု န အဝက္ခိတ္တော. ဇာတိဝါဒေနာတိ ဟေတုမှိ ကရဏဝစနန္တိ ဒဿေတုံ ‘‘ကေန ကာရဏေနာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. ဧတ္ထ စ ဥဘတော…ပေ… ပိတာမဟယုဂါတိ ဧတေန ဗြာဟ္မဏဿ ယောနိဒေါသာဘာဝေါ ဒဿိတော သံသုဒ္ဓဂဟဏိကဘာဝကိတ္တနတော. အက္ခိတ္တောတိ ဣမိနာ ကိရိယာပရာဓာဘာဝေါ. ကိရိယာပရာဓေန ဟိ သတ္တာ ခေပံ ပါပုဏန္တိ. အနုပကုဋ္ဌောတိ ဣမိနာ အယုတ္တသံသဂ္ဂါဘာဝေါ. အယုတ္တသံသဂ္ဂမ္ပိ ဟိ ပဋိစ္စ သတ္တာ အက္ကောသံ လဘန္တိ. ४२४. 'वे' यानी 'नानावेरज्जका' (विभिन्न प्रदेशों के) कहे गए ब्राह्मण। 'दोनों ओर से सुजात' - इतना कहने पर जिन किन्हीं दो भागों से सुजातता जानी जाए, और 'सुजात' शब्द 'सुजातो चारुदस्सनो' आदि में शरीर की सुडौलता (आरोह-परिणाह) की पूर्णता का पर्याय है, इसलिए जाति के आधार पर ही सुजातता को स्पष्ट करने के लिए 'माता और पिता की ओर से' कहा गया है। लोक में औरस पुत्र न होने पर भी माता-पिता की संज्ञा देखी जाती है, किन्तु यहाँ औरस पुत्र के रूप में ही अभीष्ट है, यह दिखाने के लिए 'संशुद्ध-ग्रहणी वाला' (शुद्ध गर्भ वाला) कहा गया है। पिता और माता 'पितर' हैं, पिताओं के पिता 'पितामह' हैं, उनका युग 'पितामह-युग' है, इसलिए सातवें पितामह-युग तक - यहाँ ऐसा अर्थ देखना चाहिए। यहाँ 'युग' शब्द को एकशेष न्याय से देखना चाहिए - 'युग और युग मिलकर युगा'। इस प्रकार वहाँ-वहाँ दोनों का ग्रहण ही होता है। इसीलिए कहा - 'उससे ऊपर के सभी पूर्वज पितामह शब्द के ग्रहण से ही गृहीत हैं'। यहाँ 'पुरुष' का ग्रहण उत्कृष्ट निर्देश के वश से किया गया है, ऐसा समझना चाहिए। इस प्रकार 'माता की ओर से' यह पालि वचन समर्थित होता है। 'अक्खित्तो' का अर्थ है आक्षेप (निंदा) न प्राप्त होना। 'अनवक्खित्तो' का अर्थ है श्राद्ध के थाली-पाक आदि में जिसे निकाला न गया हो। 'जातिवादेन' यहाँ हेतु में करण विभक्ति है, यह दिखाने के लिए 'किस कारण से' आदि कहा गया है। और यहाँ 'दोनों ओर से... सातवें पितामह-युग तक' - इससे ब्राह्मण के योनि-दोष का अभाव दिखाया गया है, क्योंकि संशुद्ध-ग्रहणी होने का कीर्तन किया गया है। 'अक्खित्तो' इससे क्रिया-अपराध का अभाव है। क्रिया-अपराध के कारण ही प्राणी आक्षेप प्राप्त करते हैं। 'अनुपकुट्ठो' इससे अयुक्त संसर्ग (अनुचित मेल-जोल) का अभाव है। अयुक्त संसर्ग के कारण भी प्राणी आक्रोश प्राप्त करते हैं। ဣဿရောတိ အဓိပတေယျသံဝတ္တနိယကမ္မဖလေန ဤသနသီလော. သာ ပနဿ ဣဿရတာ ဝိဘဝသမ္ပတ္တိပစ္စယာ ပါကဋာ ဇာတာတိ အဍ္ဎတာပရိယာယဘာဝေန ဝဒန္တော ‘‘အဍ္ဎောတိ ဣဿရော’’တိ အာဟ. မဟန္တံ ဓနမဿ ဘူမိဂတဉ္စေဝ ဝေဟာသဋ္ဌဉ္စာတိ မဟဒ္ဓနော. တဿာတိ တဿ တဿ. ဝဒန္တိ ‘‘အနွယတော ဗျတိရေကတော စ အနုပသင်္ကမနကာရဏံ ကိတ္တေမာ’’တိ. 'ईश्वर' वह है जो आधिपत्य-संवर्तनीय कर्म के फल से शासन करने के स्वभाव वाला है। उसकी वह ईश्वरता (प्रभुता) विभव-सम्पत्ति के कारण प्रकट हुई है, इसलिए 'आढ्यता' (धनी होने) के पर्याय के रूप में कहते हुए 'आढ्य ही ईश्वर है' ऐसा कहा। जिसका महान धन भूमिगत और आकाशस्थ (ऊपर रखा हुआ) है, वह 'महाधन' है। 'तस्स' यानी उस-उसका। कहते हैं 'अन्वय और व्यतिरेक से पास न आने के कारण का वर्णन करते हैं'। အဓိကရူပေါတိ ဝိသိဋ္ဌရူပေါ ဥတ္တမသရီရော. ဒဿနံ အရဟတီတိ ဒဿနီယော. တေနာဟ ‘‘ဒဿနယောဂ္ဂေါ’’တိ. ပသာဒံ အာဝဟတီတိ ပါသာဒိကော. တေနာဟ ‘‘စိတ္တပသာဒဇနနတော’’တိ. ဝဏ္ဏဿာတိ ဝဏ္ဏဓာတုယာ[Pg.191]. သရီရန္တိ သန္နိဝေသဝိသိဋ္ဌော ကရစရဏဂီဝါသီသာဒိ အဝယဝသမုဒါယော, သော စ သဏ္ဌာနမုခေန ဂယှတီတိ ‘‘ပရမာယ ဝဏ္ဏပေါက္ခရတာယာတိ ပရမာယ…ပေ… သမ္ပတ္တိယာ စာ’’တိ ဝုတ္တံ. သဗ္ဗဝဏ္ဏေသု သုဝဏ္ဏဝဏ္ဏောဝ ဥတ္တမောတိ ဝုတ္တံ ‘‘သေဋ္ဌေန သုဝဏ္ဏဝဏ္ဏေန သမန္နာဂတော’’တိ. တထာ ဟိ ဗုဒ္ဓါ စက္ကဝတ္တိနော စ သုဝဏ္ဏဝဏ္ဏာဝ ဟောန္တိ. ဗြဟ္မဝစ္ဆသီတိ ဥတ္တမသရီရာဘော သုဝဏ္ဏာဘောတိ အတ္ထော. ဣမမေဝ ဟိ အတ္ထံ သန္ဓာယာဟ ‘‘မဟာဗြဟ္မုနော သရီရသဒိသေန သရီရေန သမန္နာဂတော’’တိ. န ဗြဟ္မုဇုဂတ္တတံ. အခုဒ္ဒါဝကာသော ဒဿနာယာတိ အာရောဟပရိဏာဟသမ္ပတ္တိယာ အဝယဝပါရိပူရိယာ စ ဒဿနာယ ဩကာသော န ခုဒ္ဒကော. တေနာဟ ‘‘သဗ္ဗာနေဝါ’’တိအာဒိ. 'अधिरूप' का अर्थ है विशिष्ट रूप वाला, उत्तम शरीर वाला। 'दर्शन के योग्य' होने के कारण 'दर्शनीय' है। इसीलिए कहा गया है 'दर्शन के योग्य'। 'प्रसाद (प्रसन्नता) लाने वाला' होने के कारण 'प्रासादिक' है। इसीलिए कहा गया है 'चित्त में प्रसन्नता उत्पन्न करने वाला'। 'वर्ण का' का अर्थ है वर्ण-धातु का। 'शरीर' का अर्थ है हाथ, पैर, गर्दन, सिर आदि अंगों का विशिष्ट विन्यास (समुदाय), और वह संस्थान (आकृति) के माध्यम से ग्रहण किया जाता है, इसलिए 'परम वर्ण-पुष्करता से' का अर्थ 'परम... पे... सम्पत्ति से' कहा गया है। सभी वर्णों में सुवर्ण-वर्ण ही उत्तम है, इसलिए कहा गया है 'श्रेष्ठ सुवर्ण-वर्ण से युक्त'। क्योंकि बुद्ध और चक्रवर्ती सुवर्ण-वर्ण के ही होते हैं। 'ब्रह्मवर्चसी' का अर्थ है उत्तम शरीर की आभा वाला, सुवर्ण जैसी आभा वाला। इसी अर्थ को ध्यान में रखकर कहा गया है 'महाब्रह्मा के शरीर के समान शरीर से युक्त'। न कि ब्रह्मा जैसी ऋजुता (सीधापन)। 'दर्शन के लिए अक्षुद्र अवकाश' का अर्थ है ऊँचाई और चौड़ाई की पूर्णता तथा अंगों की परिपूर्णता के कारण दर्शन के लिए अवकाश (स्थान) छोटा नहीं है। इसीलिए 'सभी ही' आदि कहा गया है। ယမနိယမလက္ခဏံ သီလမဿ အတ္ထီတိ သီလဝါ, တံ ပနဿ ရတ္တညုတာယ ဝုဒ္ဓံ ဝဍ္ဎိတံ သီလံ အဿ အတ္ထီတိ ဝုဒ္ဓသီလီ, တေန စ သဗ္ဗဒါ သမာယောဂတော ဝုဍ္ဎသီလေန သမန္နာဂတော. ပဉ္စသီလမတ္တမေဝ သန္ဓာယ ဝဒန္တိ တတော ပရံ သီလဿ တတ္ထ အဘာဝတော တေသဉ္စ အဇာနနတော. 'यम-नियम के लक्षण वाला शील जिसका है, वह शीलवान है', और वह शील उसकी चिरकाल की अनुभवता (रत्तञ्ञुता) के कारण वृद्ध (विकसित) हुआ है, इसलिए वह 'वृद्धशीली' है, और उससे सदा युक्त होने के कारण 'वृद्धशील से समन्वित' है। वे केवल पंचशील को ही ध्यान में रखकर कहते हैं, क्योंकि उसके आगे के शील का वहाँ अभाव है और वे उसे जानते नहीं हैं। ဌာနကရဏသမ္ပတ္တိယာ သိက္ခာသမ္ပတ္တိယာ စ ကတ္ထစိပိ အနူနတာယ ပရိမဏ္ဍလပဒါနိ ဗျဉ္ဇနာနိ အက္ခရာနိ ဧတိဿာတိ ပရိမဏ္ဍလပဒဗျဉ္ဇနာ. အထ ဝါ ပဇ္ဇတိ အတ္ထော ဧတေနာတိ ပဒံ, နာမာဒိ, ယထာဓိပ္ပေတမတ္ထံ ဗျဉ္ဇေတီတိ ဗျဉ္ဇနံ ဝါကျံ, တေသံ ပရိပုဏ္ဏတာယ ပရိမဏ္ဍလပဒဗျဉ္ဇနာ. အတ္ထဉာပနသာဓနတာယ ဝါစာဝ ကရဏန္တိ ဝါက္ကရဏံ, ဥဒါဟရဏဃောသော. ဂုဏပရိပုဏ္ဏဘာဝေန တဿ ဗြာဟ္မဏဿ, တေန ဝါ ဘာသိတဗ္ဗအတ္ထဿ. ပူရေ ပုဏ္ဏဘာဝေ. ပူရေတိ စ ပုရိမသ္မိံ အတ္ထေ အာဓာရေ ဘုမ္မံ, ဒုတိယသ္မိံ ဝိသယေ. သုခုမာလတ္တနေနာတိ ဣမိနာ တဿာ ဝါစာယ မုဒုသဏှဘာဝမာဟ. အပလိဗုဒ္ဓါယ ပိတ္တသေမှာဒီဟိ. သန္ဒိဋ္ဌံ သဗ္ဗံ ဒဿေတွာ ဝိယ ဧကဒေသကထနံ. ဝိလမ္ဗိတံ သဏိကံ စိရာယိတွာ ကထနံ. ‘‘သန္ဒိဒ္ဓဝိလမ္ဗိတာဒီ’’တိ ဝါ ပါဌော. တတ္ထ သန္ဒိဒ္ဓံ သန္ဒေဟဇနကံ. အာဒိ-သဒ္ဒေန ခလိတာနုကဍ္ဎိတာဒိံ သင်္ဂဏှာတိ. အာဒိမဇ္ဈပရိယောသာနံ ပါကဋံ ကတွာတိ ဣမိနာ စဿ ဝါစာယ အတ္ထပါရိပူရိံ ဝဒန္တိ. स्थान और करण की सम्पत्ति तथा शिक्षा की सम्पत्ति के कारण कहीं भी न्यूनता न होने से जिसके पद, व्यंजन और अक्षर परिमण्डल (पूर्ण) हैं, वह 'परिमण्डल-पद-व्यंजन' है। अथवा, जिससे अर्थ प्राप्त होता है वह 'पद' है, जैसे नाम आदि; जो अभिप्रेत अर्थ को प्रकट करता है वह 'व्यंजन' है, जैसे वाक्य; उनकी परिपूर्णता के कारण 'परिमण्डल-पद-व्यंजन' है। अर्थ बताने का साधन होने के कारण वाणी ही करण है, इसलिए 'वाक्-करण' (बोलना), उच्चारण की ध्वनि। गुणों की परिपूर्णता के कारण उस ब्राह्मण का, या उसके द्वारा कहे जाने वाले अर्थ का। 'पूरे' का अर्थ पूर्ण भाव में। 'पूरे' शब्द पहले अर्थ में आधार अर्थ में सप्तमी है, और दूसरे में विषय अर्थ में। 'सुकुमारता से' इसके द्वारा उसकी वाणी की कोमलता और चिकनापन कहा गया है। पित्त, कफ आदि से 'अप्रतिबद्ध' (रुकावट रहित)। 'संदिष्ट' का अर्थ है मानो सब कुछ दिखाते हुए एक अंश का कथन। 'विलम्बित' का अर्थ है धीरे-धीरे रुककर कहना। 'संदिग्ध-विलम्बित-आदि' ऐसा भी पाठ है। वहाँ 'संदिग्ध' का अर्थ है संदेह उत्पन्न करने वाला। 'आदि' शब्द से स्खलित (लड़खड़ाना), अनुकृष्ट (खींचना) आदि का संग्रह होता है। 'आदि, मध्य और अंत को स्पष्ट करके' इसके द्वारा उसकी वाणी की अर्थ-परिपूर्णता को कहते हैं। ၄၂၅. သဒိသာတိ ဧကဒေသေန သဒိသာ. န ဟိ ဗုဒ္ဓါနံ ဂုဏေဟိ သဗ္ဗထာ သဒိသာ ကေစိပိ ဂုဏာ အညေသု လဗ္ဘန္တိ. ဣတရေတိ အတ္တနော ဂုဏေဟိ အသဒိသဂုဏေ. ဣဒန္တိ ဣဒံ အတ္ထဇာတံ. ဂေါပဒကန္တိ ဂါဝိယာ ပဒေ ဌိတဥဒကံ. ကုလပရိယာယေနာတိ ကုလာနုက္ကမေန. ४२५. 'सदृश' का अर्थ है एक अंश में समान। क्योंकि बुद्धों के गुणों के साथ सर्वथा समान कोई भी गुण दूसरों में नहीं पाए जाते। 'इतर' का अर्थ है अपने गुणों से असमान गुण वाले। 'इदं' का अर्थ है यह अर्थ-समूह। 'गोपदक' का अर्थ है गाय के खुर के निशान में स्थित जल। 'कुल-पर्याय से' का अर्थ है कुल के अनुक्रम से। တတ္ထာတိ [Pg.192] မဉ္စကေ. သီဟသေယျံ ကပ္ပေသီတိ ယထာ ရာဟု အသုရိန္ဒော အာယာမတော ဝိတ္ထာရတော ဥဗ္ဗေဓတော စ ဘဂဝတော ရူပကာယဿ ပရိစ္ဆေဒံ ဂဟေတုံ န သက္ကောတိ, တထာရူပံ ဣဒ္ဓါဘိသင်္ခါရံ အဘိသင်္ခရောန္တော သီဟသေယျံ ကပ္ပေသိ. 'वहाँ' का अर्थ है मंच (शैया) पर। 'सिंह-शय्या लगाई' का अर्थ है जैसे असुरेन्द्र राहु लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई में भगवान के रूपकाय की सीमा को नहीं माप सकता, वैसे ही ऋद्धि-अभिसंस्कार करते हुए सिंह-शय्या लगाई। ပရိသုဒ္ဓဋ္ဌေန အရိယန္တိ အာဟ ‘‘အရိယံ ဥတ္တမံ ပရိသုဒ္ဓ’’န္တိ. အနဝဇ္ဇဋ္ဌေန ကုသလံ, န သုခဝိပါကဋ္ဌေန. ကတ္ထစိ စတုရာသီတိ ပါဏသဟဿာနိ ကတ္ထစိ အပရိမာဏာပိ ဒေဝမနုဿာ ယသ္မာ စတုဝီသတိယာ ဌာနေသု အသင်္ချေယျာ အပရိမေယျာ မဂ္ဂဖလာမတံ ပိဝန္တိ. ကောဋိသတသဟဿာဒိပရိမာဏေနပိ ဗဟူ ဧဝ. တသ္မာ အနုတ္တရာစာရသိက္ခာပနဝသေနေဝ ဘဂဝါ ဗဟူနံ အာစရိယော. တေတိ ကာမရာဂတော အညေ ဘဂဝတာ ပဟီနကိလေသေ. परिशुद्ध होने के कारण 'आर्य' है, इसलिए कहा 'आर्य, उत्तम, परिशुद्ध'। निर्दोष होने के कारण 'कुशल' है, न कि सुख-विपाक के कारण। कहीं चौरासी हजार प्राणी, कहीं अपरिमेय देव और मनुष्य, क्योंकि चौबीस स्थानों पर असंख्य और अपरिमेय प्राणी मार्ग-फल रूपी अमृत का पान करते हैं। सौ करोड़ हजार आदि की गणना से भी वे बहुत ही हैं। इसलिए अनत्तर आचार की शिक्षा देने के कारण ही भगवान बहुतों के आचार्य हैं। 'वे' का अर्थ है कामराग के अतिरिक्त भगवान द्वारा प्रहीण (नष्ट) किए गए अन्य क्लेश। အပါပပုရေက္ခာရောတိ အပါပေဟိ ပုရက္ခရီယတိ, န ဝါ ပါပံ ပုရတော ကရောတီတိပိ အပါပပုရေက္ခာရောတိ ဣမမတ္ထံ ဒဿေတုံ ‘‘အပါပေ နဝ လောကုတ္တရဓမ္မေ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. တတ္ထ အပါပေတိ ပါပပပဋိပက္ခေ ပါပရဟိတေ စ. ဗြဟ္မနိ ဘဝါ, ဗြဟ္မုနော ဝါ ဟိတာ ဂရုကရဏာဒိနာ, ဗြဟ္မာနံ ဝါ မဂ္ဂံ ဇာနာတီတိ ဗြဟ္မညာ, တဿာ ဗြဟ္မညာယ ပဇာယ. 'अपाप-पुरेक्खार' का अर्थ है जो निष्पाप लोगों द्वारा आगे किया जाता है, अथवा जो पाप को आगे नहीं करता है, इस अर्थ को दिखाने के लिए 'अपाप नौ लोकोत्तर धर्म' आदि कहा गया है। वहाँ 'अपाप' का अर्थ है पाप के प्रतिपक्ष और पाप रहित। ब्रह्म में होने वाली, अथवा आदर-सत्कार आदि के द्वारा ब्रह्म (श्रेष्ठ) के लिए हितकारी, अथवा जो ब्रह्मों के मार्ग को जानती है, वह 'ब्रह्मण्या' है, उस ब्रह्मण्या प्रजा के लिए। တိရောရဋ္ဌာ တိရောဇနပဒါတိ ဧတ္ထ ရဇ္ဇံ ရဋ္ဌံ ရာဇန္တိ ရာဇာနော ဧတေနာတိ ကတွာ. တဒေကဒေသဘူတာ ပဒေသာ ပန ဇနပဒေါ ဇနာ ပဇ္ဇန္တိ ဧတ္ထ သုခဇီဝိကံ ပါပုဏန္တီတိ ကတွာ. ပုစ္ဆာယ ဒေါသံ သလ္လက္ခေတွာတိ သမ္ဗန္ဓော. ဘဂဝါ ဝိဿဇ္ဇေတိ တေသံ ဥပနိဿယသမ္ပတ္တိံ စိန္တေတွာတိ အဓိပ္ပာယော. နဝကာတိ အာဂန္တုကဘာဝေန အမှာကံ အဘိနဝါ. 'तिरो-रट्ठ' (दूसरे राज्यों से) और 'तिरो-जनपद' (दूसरे जनपदों से) - यहाँ राज्य ही 'राष्ट्र' है, क्योंकि इसके द्वारा राजा शासन करते हैं। उसके एक अंश रूप प्रदेश 'जनपद' हैं, क्योंकि यहाँ लोग सुखपूर्वक जीवन प्राप्त करते हैं। 'प्रश्न के दोष को देखकर' यह संबंध है। भगवान उनकी उपनिश्रय-सम्पत्ति का विचार करके उत्तर देते हैं, यह अभिप्राय है। 'नवक' का अर्थ है आगंतुक होने के कारण हमारे लिए नए। ၄၂၆. ဩပါတေတိ နိပ္ပာတေတီတိ အတ္ထော. တထာဘူတော စ တတ္ထ ပေသိတာ ဟောတီတိ ဝုတ္တံ ‘‘ပဝေသေတီ’’တိ. သံပုရက္ခရောန္တီတိ သက္ကစ္စံ ပုဗ္ဗင်္ဂမံ ကရောန္တိ. တေနာဟ ‘‘ပုရတော ကတွာ ဝိစရန္တီ’’တိ. ४२६. 'ओपातेति' का अर्थ है नीचे गिराना (प्रवेश कराना)। और वैसा होकर वहाँ भेजा गया होता है, इसलिए कहा गया है 'प्रवेश कराता है'। 'संपुरक्खरोन्ति' का अर्थ है आदरपूर्वक आगे करते हैं। इसीलिए कहा गया है 'आगे करके विचरते हैं'। ၄၂၇. သုဒ္ဒေ ဗဟိ ကတွာ ရဟော သာသိတဗ္ဗဋ္ဌေန မန္တာ ဧဝ တံတံအတ္ထပဋိပတ္တိဟေတုတာယ ပဒန္တိ မန္တပဒံ ဝေဒံ. တေနာဟ ‘‘ဝေဒေါ’’တိ. ဧဝံ ကိရာတိ ပရမ္ပရဘာဝေန အာဘတန္တိ အာစရိယပရမ္ပရာယ အာဘတံ. ပါဝစနသင်္ခါတသမ္ပတ္တိယာတိ [Pg.193] ပမုခဝစနမှိ ဥဒတ္တာဒိသမ္ပတ္တိယာ. သာဝိတ္တိအာဒီဟိ ဆန္ဒဗန္ဓေဟိ ဝဂ္ဂဗန္ဓေဟိ စာတိ ဂါယတ္တီအာဒီဟိ အဇ္ဈာယာနုဝါကာဒီဟိ ဆန္ဒဗန္ဓေဟိ စ ဝဂ္ဂဗန္ဓေဟိ စ. သမ္ပာဒေတွာတိ ပဒသမ္ပတ္တိံ အဟာပေတွာ. ပဝတ္တာရောတိ ဝါ ပါဝစနဝသေန ဝတ္တာရော. သဇ္ဈာယိတန္တိ ဂါယနဝသေန သဇ္ဈာယိတံ, တံ ပန ပဒေနေဝ ဣစ္ဆိတန္တိ အာဟ ‘‘ပဒသမ္ပတ္တိဝသေနာ’’တိ. အညေသံ ဝုတ္တန္တိ ပါဝစနဝသေန အညေသံ ဝုတ္တံ. ရာသိကတန္တိ ဣရုဝေဒယဇုဝေဒသာမဝေဒါဒိဝသေန, တတ္ထာပိ ပစ္စေကံ မန္တဗြဟ္မာဒိဝသေန အဇ္ဈာယာနုဝါကာဒိဝသေန ရာသိကတံ. ဒိဗ္ဗေန စက္ခုနာ ဩလောကေတွာတိ ဒိဗ္ဗစက္ခုပရိဘဏ္ဍေန ယထာကမ္မူပဂဉာဏေန သတ္တာနံ ကမ္မဿကတံ, ပစ္စက္ခတော ဒဿနဋ္ဌေန ဒိဗ္ဗစက္ခုသဒိသေန ပုဗ္ဗေနိဝါသဉာဏေန အတီတကပ္ပေ ဗြာဟ္မဏာနံ မန္တဇ္ဈေနဝိဓိဉ္စ ဩလောကေတွာ. ပါဝစနေန သဟ သံသန္ဒေတွာတိ ကဿပသမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ ယံ ဝစနံ ဝဋ္ဋသန္နိဿိတံ, တေန သဟ အဝိရုဒ္ဓံ ကတွာ. န ဟိ တေသံ ဝိဝဋ္ဋသန္နိဿိတော အတ္ထော ပစ္စက္ခော ဟောတိ. အပရာပရေတိ အဋ္ဌကာဒီဟိ အပရာပရေ, ပစ္ဆိမာ ဩက္ကာကရာဇကာလာဒီသု ဥပ္ပန္နာ. ပက္ခိပိတွာတိ အဋ္ဌကာဒီဟိ ဂန္ထိတမန္တပဒေသု ကိလေသသန္နိဿိတပဒါနံ တတ္ထ တတ္ထ ပဒေ ပက္ခိပနံ ကတွာ. ဝိရုဒ္ဓေ အကံသူတိ ဗြာဟ္မဏဓမ္မိကသုတ္တာဒီသု (ခု. နိ. ဗြာဟ္မဏဓမ္မိကသုတ္တံ) အာဂတနယေနေဝ သံကိလေသိကတ္ထဒီပနတော ပစ္စနီကဘူတေ အကံသု. ४२७. शुद्ध (पवित्र) को बाहर करके एकांत में उपदेश दिए जाने के अर्थ में 'मन्त्र' ही उन-उन अर्थों की प्राप्ति का कारण होने से 'पद' है, अतः 'मन्त्रपद' वेद है। इसीलिए कहा गया है— 'वेद'। 'ऐसा सुना जाता है' (एवं किर) का अर्थ है— परंपरा से लाया गया, अर्थात् आचार्य परंपरा से प्राप्त। 'पावचन' (प्रवचन) नामक संपत्ति से, अर्थात् मुख्य वचन में उदात्त आदि की संपत्ति से। 'सावित्री' आदि छन्दों के बंधों और वर्गों के बंधों से, अर्थात् गायत्री आदि छन्दों के बंधों और अध्यायों, अनुवाकों आदि के वर्गों के बंधों से। 'सम्पादित करके' का अर्थ है— पद-संपत्ति को बिना छोड़े। 'प्रवर्तक' का अर्थ है— प्रवचन के रूप में बोलने वाले। 'सज्झायित' (स्वाध्याय किया गया) का अर्थ है— गायन के रूप में स्वाध्याय किया गया, किन्तु उसे पदों के माध्यम से ही चाहा गया है, इसीलिए कहा— 'पद-संपत्ति के वश से'। 'दूसरों के लिए कहा गया' का अर्थ है— प्रवचन के रूप में दूसरों के लिए कहा गया। 'राशिबद्ध' (समूहबद्ध) का अर्थ है— ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद आदि के रूप में, और वहाँ भी प्रत्येक मन्त्र, ब्राह्मण आदि के रूप में तथा अध्याय, अनुवाक आदि के रूप में राशिबद्ध किया गया। 'दिव्य चक्षु से देखकर' का अर्थ है— दिव्य चक्षु के उपकरण रूप 'यथाकम्मूपग ज्ञान' (कर्मानुसार गति जानने वाला ज्ञान) से सत्त्वों की कर्म-स्वकीयता को, प्रत्यक्ष दर्शन के अर्थ में दिव्य चक्षु के समान 'पुब्बेनिवास ज्ञान' (पूर्व जन्मों के स्मरण का ज्ञान) से अतीत कल्पों में ब्राह्मणों की मन्त्र-अध्ययन विधि को देखकर। 'प्रवचन के साथ तुलना करके' का अर्थ है— कश्यप सम्यक्सम्बुद्ध का जो वचन संसार (वट्ट) से संबंधित था, उसके साथ अविरुद्ध (संगत) करके। क्योंकि उन्हें निर्वाण (विवट्ट) से संबंधित अर्थ प्रत्यक्ष नहीं होता। 'बाद के' (अपरापर) का अर्थ है— अष्टक आदि ऋषियों के बाद के, जो बाद में ओक्काक राजा के काल आदि में उत्पन्न हुए। 'प्रक्षिप्त करके' का अर्थ है— अष्टक आदि द्वारा रचित मन्त्र-पदों में क्लेश-युक्त पदों को जहाँ-तहाँ पदों में प्रक्षिप्त करके। 'विरुद्ध किया' का अर्थ है— 'ब्राह्मणधम्मिक सुत्त' आदि में आए हुए तरीके से ही संक्लेशिक (मलिन) अर्थों को प्रकाशित करने के कारण प्रतिकूल बनाया। ၄၂၈. ပဋိပါဋိယာ ဃဋိတာတိ ပဋိပါဋိယာ သမ္ဗဒ္ဓါ. ပရမ္ပရသံသတ္တာတိ အာဒါနိယာယ ယဋ္ဌိယာ သံသတ္တာ. တေနာဟ ‘‘ယဋ္ဌိဂ္ဂါဟကေန စက္ခုမတာ’’တိ. ပုရိမဿာတိ မဏ္ဍလာကာရေန ဌိတာယ အန္ဓဝေဏိယာ သဗ္ဗပုရိမဿ ဟတ္ထေန သဗ္ဗပစ္ဆိမဿ ကစ္ဆံ ဂဏှာပေတွာ. ဒိဝသမ္ပီတိ အနေကဒိဝသမ္ပိ. စက္ခုဿ အနာဂတဘဝံ ဉတွာ ယထာအက္ကန္တဋ္ဌာနေယေဝ အနုပတိတွာ အက္ကမနံဝ သလ္လက္ခေတွာ ‘‘ကဟံ စက္ခုမာ ကဟံ မဂ္ဂေါ’’တိ ပရိဝေဒိတွာ. ४२८. 'क्रम से जुड़ी हुई' (परिपटिया घटिता) का अर्थ है— क्रम से संबद्ध। 'परंपरा से संसक्त' का अर्थ है— पकड़ी हुई लाठी से जुड़ी हुई। इसीलिए कहा गया है— 'लाठी पकड़ने वाले चक्षुमान (नेत्रवान) व्यक्ति के द्वारा'। 'पहले वाले का' का अर्थ है— मण्डलाकार (घेरे में) खड़ी अंधों की पंक्ति में सबसे पहले वाले के हाथ से सबसे पीछे वाले के कच्छ (कमर या वस्त्र का छोर) को पकड़वाकर। 'दिन को भी' का अर्थ है— अनेक दिनों तक भी। चक्षु (नेत्र) की अनुपस्थिति को जानकर, जैसे-जैसे कदम रखे गए स्थानों पर ही पीछे-पीछे चलकर, कदम रखने को ही लक्षित कर 'कहाँ चक्षुमान है, कहाँ मार्ग है'— इस प्रकार विलाप करके। ပါဠိအာဂတေသု ဒွီသူတိ သဒ္ဓါ အနုဿဝေါတိ ဣမေသု ဒွီသု. ဧဝရူပေတိ ယထာ သဒ္ဓါနုဿဝါ, ဧဝရူပေ ဧဝ ပစ္စက္ခဂါဟိနောတိ အတ္ထော. တယောတိ ရုစိအာကာရပရိဝိတက္ကဒိဋ္ဌိနိဇ္ဈာနက္ခန္တိယော. ဘူတဝိပါကာတိ ဘူတတ္ထနိဋ္ဌာယကာ အဓိပ္ပေတတ္ထသာဓကာ, ဝုတ္တဝိပရိယာယေန အဘူတတ္ထဝိပါကာ ဝေဒိတဗ္ဗာ[Pg.194]. ဧတ္ထာတိ ဧတေသု သဒ္ဓါယိတာဒိဝတ္ထူသု. ဧကံသေနေဝ နိဋ္ဌံ ဂန္တုံ နာလံ အနေကန္တိကတ္တာ သဒ္ဓါဒိဂ္ဂါဟဿ. ဥပရိ ပုစ္ဆာယ မဂ္ဂံ ဝိဝရိတွာ ဌပေသိ သစ္စာနုရက္ခာယ ဉာတုကာမတာယ ဥပ္ပာဒိတတ္တာ. ပဿတိ ဟိ ဘဂဝါ – မယာ ‘‘သစ္စမနုရက္ခတာ…ပေ… နိဋ္ဌံ ဂန္တု’’န္တိ ဝုတ္တေ သစ္စာနုရက္ခဏံ ဉာတုကာမော မာဏဝေါ ‘‘ကိတ္တာဝတာ’’တိအာဒိနာ ပုစ္ဆိဿတိ, တဿ တံ ဝိဿဇ္ဇေတွာ သစ္စာနုဗောဓေ ပုစ္ဆာယ အဝသရံ ဒတွာ တဿ ဥပနိဿယေ ဥပကာရဓမ္မေ ကထေဿာမီတိ. တေန ဝုတ္တံ – ‘‘ဥပရိ ပုစ္ဆာယ မဂ္ဂံ ဝိဝရိတွာ ဌပေသီ’’တိ. 'पालि में आए हुए दो में' का अर्थ है— श्रद्धा और अनुश्रव (सुनी-सुनाई बात), इन दो में। 'इस प्रकार के' का अर्थ है— जैसे श्रद्धा और अनुश्रव हैं, इस प्रकार के ही प्रत्यक्ष ग्रहण करने वाले, यह अर्थ है। 'तीन' का अर्थ है— रुचि, आकार-परिवितर्क (तर्क-वितर्क) और दृष्टि-निज्झानक्खन्ति (विचारों के प्रति सहनशीलता)। 'भूतविपाक' का अर्थ है— यथार्थ अर्थ को सिद्ध करने वाले, अभीष्ट अर्थ को साधने वाले; इसके विपरीत 'अभूतविपाक' समझना चाहिए। 'यहाँ' का अर्थ है— इन श्रद्धा आदि विषयों में। श्रद्धा आदि के ग्रहण के अनैकांतिक (अनिश्चित) होने के कारण केवल एक ही पक्ष में निष्कर्ष पर पहुँचना पर्याप्त नहीं है। आगे के प्रश्न के लिए मार्ग खोलकर रखा, क्योंकि सत्य की रक्षा के लिए जानने की इच्छा उत्पन्न हुई थी। भगवान देखते हैं कि— जब मेरे द्वारा 'सत्य की रक्षा करते हुए... (पे)... निष्कर्ष पर पहुँचना' कहा जाएगा, तब सत्य की रक्षा को जानने का इच्छुक माणवक (युवक) 'कितने से' (कित्तावता) आदि के द्वारा पूछेगा, उसे उसका उत्तर देकर सत्य के अनुबोध (बोध) के विषय में प्रश्न का अवसर देकर, उसके उपनिषय (सहायक कारणों) और उपकारक धर्मों को कहूँगा। इसीलिए कहा गया— 'आगे के प्रश्न के लिए मार्ग खोलकर रखा'। ၄၃၀. အတ္တာနညေဝ သန္ဓာယ ဝဒတိ, ယတော ဝုတ္တံ ပါဠိယံ – ‘‘ယံ ခေါ ပနာယမာယသ္မာ ဓမ္မံ ဒေသေတိ, ဂမ္ဘီရော သော ဓမ္မော ဒုဒ္ဒသော ဒုရနုဗောဓော’’တိအာဒိ. လုဗ္ဘန္တီတိ လောဘနီယာ ယထာ ‘‘အပါယဂမနီယာ’’တိ အာဟ ‘‘လောဘနီယေသု ဓမ္မေသူတိ လောဘဓမ္မေသူ’’တိ. ယထာ ဝါ ရူပါဒိဓမ္မာ လောဘနီယာ, ဧဝံ လောဘောတိ အာဟ ‘‘လောဘနီယေသု ဓမ္မေသူတိ လောဘဓမ္မေသူ’’တိ. တေနေဝါဟ – ‘‘ယံ လောကေ ပိယရူပံ သာတရူပံ, ဧတ္ထေသာ တဏှာ ဥပ္ပဇ္ဇမာနာ ဥပ္ပဇ္ဇတိ, ဧတ္ထ နိဝိသမာနာ နိဝိသတီ’’တိ (ဒီ. နိ. ၂.၄၀၀; မ. နိ. ၁.၁၃၃; ဝိဘ. ၂၀၃). ဧသေ နယော သေသပဒဒွယေပိ. ४३०. अपने आप को ही लक्ष्य करके कहते हैं, जैसा कि पालि में कहा गया है— 'यह आयुष्मान जो धर्म उपदेशित करते हैं, वह धर्म गंभीर है, दुर्दर्श (कठिनता से दिखने वाला) है, दुरनुबोध (कठिनता से समझने योग्य) है' आदि। 'लुब्भन्ति' (लोभ करते हैं) का अर्थ है— लोभनीय, जैसे 'अपायगमनीया' (अपाय को ले जाने वाले), वैसे ही कहा— 'लोभनीय धर्मों में, अर्थात् लोभ-धर्मों में'। अथवा जैसे रूप आदि धर्म लोभनीय हैं, वैसे ही लोभ है, इसीलिए कहा— 'लोभनीय धर्मों में, अर्थात् लोभ-धर्मों में'। इसीलिए कहा गया— 'लोक में जो प्रिय रूप और सातरूप (सुखद रूप) है, वहीं यह तृष्णा उत्पन्न होती हुई उत्पन्न होती है, वहीं निवास करती हुई निवास करती है'। यही नियम शेष दो पदों में भी है। ၄၃၂. နိဝေသေတီတိ ဌပေတိ ပဋ္ဌပေတိ. ပယိရုပါသတီတိ ဥပဋ္ဌာနဝသေန ဥပဂန္တွာ နိသီဒတိ. သုယျတိ ဧတေနာတိ သောတန္တိ အာဟ ‘‘ပသာဒသောတ’’န္တိ. တဉှိ သဝနာယ ဩဒဟိတဗ္ဗန္တိ. ဓာရေတိ သန္ဓာရေတိ တတ္ထေဝ မနံ ဌပေတိ. အတ္ထတောတိ ယထာဝုတ္တဿ ဓမ္မဿ အတ္ထတော. ကာရဏတောတိ ယုတ္တိတော ဟေတုဒါဟရဏေဟိ ဥပပတ္တိတော. ဩလောကနန္တိ ဧဝမေတန္တိ ယထာသဘာဝတော ပညာစက္ခုနာ ဒဋ္ဌဗ္ဗတံ ခမန္တိ, တဉ္စ မဟန္တဿ မဏိနော ပဇ္ဇလန္တဿ ဝိယ အာဝိကတွာ အတ္ထဿ စိတ္တေ ဥပဋ္ဌာနန္တိ အာဟ ‘‘ဣဓာ’’တိအာဒိ. ကတ္တုကမျတာဆန္ဒောတိ ကတ္တုကာမတာသင်္ခါတော ကုသလစ္ဆန္ဒော. ဝါယမတီတိအာဒိတော စတုန္နမ္ပိ ဝီရိယာနံ ဝသေန ဝါယာမံ ပရက္ကမံ ကရောတိ. မဂ္ဂပဓာနံ ပဒဟတီတိ မဂ္ဂါဝဟံ မဂ္ဂပရိယာပန္နဉ္စ သမ္မပ္ပဓာနံ ပဒဟတိ, ပဒဟနဝသေန တံ ပရိပူရေတိ. ပရမသစ္စန္တိ အမောဃဓမ္မတ္တာ ပရမတ္ထသစ္စံ. သဟဇာတနာမကာယေနာတိ မဂ္ဂပညာသဟဇာတနာမကာယေန. တဒေဝါတိ တဒေဝ ပရမသစ္စံ နိဗ္ဗာနံ. တေနေဝါဟ – ‘‘သစ္ဆိကိရိယာဘိသမယေန ဝိဘူတံ ပါကဋံ ကရောန္တော ပဿတီ’’တိ. ४३२. 'निवेशेति' का अर्थ है— स्थापित करता है, प्रतिष्ठित करता है। 'पयिरुपासति' (पर्युपासना करता है) का अर्थ है— सेवा के भाव से पास जाकर बैठता है। जिसके द्वारा सुना जाता है, वह 'सोत' (कान) है, इसीलिए कहा— 'प्रसाद-सोत' (निर्मल कान)। उसे सुनने के लिए लगाना चाहिए। 'धारयति' का अर्थ है— धारण करता है, वहीं मन को टिकाता है। 'अर्थतः' का अर्थ है— यथाकथित धर्म के अर्थ से। 'कारणतः' का अर्थ है— युक्ति से, हेतु और उदाहरणों की उपपत्ति (सिद्धि) से। 'अवलोकन' का अर्थ है— 'यह ऐसा ही है'— इस प्रकार स्वभाव के अनुसार प्रज्ञा-चक्षु से देखे जाने योग्य होने को स्वीकार करना, और उसे जलते हुए महान मणि के समान स्पष्ट करके अर्थ का चित्त में उपस्थित होना, इसीलिए 'यहाँ' (इध) आदि कहा। 'कत्तुकम्यताछन्द' का अर्थ है— कुछ करने की इच्छा रूपी कुशल छन्द। 'व्यायाम करता है' (वायमति) आदि के द्वारा चारों ही वीर्यों (प्रयत्नों) के वश से व्यायाम और पराक्रम करता है। 'मार्ग-प्रधान का उद्योग करता है' का अर्थ है— मार्ग को लाने वाले और मार्ग के अंतर्गत 'सम्यक् प्रधान' (सही प्रयत्न) का उद्योग करता है, उद्योग के द्वारा उसे परिपूर्ण करता है। 'परम सत्य' का अर्थ है— अमोघ धर्म होने के कारण परमार्थ सत्य। 'सहजात नामकाय' के द्वारा, अर्थात् मार्ग-प्रज्ञा के साथ उत्पन्न होने वाले नामकाय (मानसिक स्कंधों) के द्वारा। 'वही' का अर्थ है— वही परम सत्य निर्वाण। इसीलिए कहा गया— 'साक्षात् क्रिया और अभिसमय के द्वारा स्पष्ट और प्रकट करते हुए देखता है'। ၄၃၃-၄. မဂ္ဂါနုဗောဓောတိ [Pg.195] မဂ္ဂပဋိပါဋိယာ ဗောဓော ဗုဇ္ဈနံ, ယေသံ ကိလေသာနံ သမုစ္ဆိန္ဒနဝသေန မဂ္ဂပ္ပဋိဝေဓော, တေသံ ပဋိပဿမ္ဘနဝသေန ပဝတ္တမာနံ သာမညဖလံ, မဂ္ဂေန ပဋိဝိဒ္ဓါနိ သစ္စာနိ, ပရမတ္ထသစ္စမေဝ ဝါ အနုရူပဗုဇ္ဈနန္တိ အဓိပ္ပာယော. ‘‘သစ္စာနုပ္ပတ္တီတိ ဖလသစ္ဆိကိရိယာ’’တိ ဝုတ္တံ. ဧဝဉှိ သတိ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တာ သဒ္ဓါပဋိလာဘာဒယော ဒွါဒသ ဓမ္မာ သစ္စာနုပ္ပတ္တိယာ ဥပကာရာ ဟောန္တိ, တသ္မာ ဝုတ္တံ ‘‘တေသံယေဝါတိ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တာနံ ဒွါဒသန္န’’န္တိ. နာယံ ‘‘တေသံယေဝါ’’တိ ပဒဿ အတ္ထော. သတိပိ ကုသလဝိပါကာဒိဘာဝေန နာနတ္တေ ဝတ္ထာရမ္မဏဘူမိကိစ္စာဒိဝသေန ပန သဒိသာတိ ဥပါယတောဝ မဂ္ဂဓမ္မာ အာသေဝိတာ ဗဟုလီကတာ ဖလဘူတာတိ ဝတ္တဗ္ဗတံ အရဟတီတိ တံသဒိသေ တဗ္ဗောဟာရံ ကတွာ ‘‘တေသံ မဂ္ဂသမ္ပယုတ္တဓမ္မာန’’န္တိ ဝုတ္တံ. ဧဝဉှိ အာသေဝနာဂဟဏံ သမတ္ထိတံ, န အညထာ. န ဟိ ဧကစိတ္တက္ခဏိကာနံ မဂ္ဂဓမ္မာနံ အာသေဝနာ, ဗဟုလီကမ္မံ ဝါ အတ္ထီတိ. တုလနာတိ ဝိပဿနာ. သာ ဟိ ဝုဋ္ဌာနဂါမိနိဘူတာ မဂ္ဂပ္ပဓာနဿ ဗဟုကာရာ တဿ အဘာဝေ မဂ္ဂပ္ပဓာနဿေဝ အဘာဝတော, ဧဝံ ဥဿာဟော တုလနာယ ဆန္ဒော ဥဿာဟဿ ဗဟုကာရောတိအာဒိနာ ဟေဋ္ဌိမဿ ဥပရိမူပကာရတံ သုဝိညေယျမေဝါတိ အာဟ – ‘‘ဣမိနာ နယေန သဗ္ဗပဒေသု အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော’’တိ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. मग्गानुबोध का अर्थ है मार्ग-परम्परा का बोध या समझना। जिन क्लेशों के समूच्छेदन (पूर्ण विनाश) के द्वारा मार्ग-प्रतिवेध होता है, उनके प्रतिप्रश्रब्धि (शान्त होने) के वश से प्रवर्तमान सामञ्ञफल, मार्ग के द्वारा प्रतिविद्ध सत्य, अथवा परमार्थ सत्य का ही अनुरूप बोध—यही अभिप्राय है। 'सच्चानुप्पत्ति (सत्य की अनुप्राप्ति) फल-साक्षात्करण है'—ऐसा कहा गया है। ऐसा होने पर, नीचे कहे गए श्रद्धा-प्रतिलाभ आदि बारह धर्म सत्य की अनुप्राप्ति के लिए उपकारक होते हैं, इसलिए 'तेसंयेवाति' (उन्हीं का) अर्थात् नीचे कहे गए बारह धर्मों का—यह कहा गया है। यह 'तेसंयेव' पद का अर्थ नहीं है। कुशल-विपाक आदि भाव से भिन्नता होने पर भी वस्तु, आलम्बन, भूमि और कृत्य आदि के वश से वे समान हैं, इसलिए उपाय से ही मार्ग-धर्मों का आसेवन और बहुलीकरण किया गया फल-भूत होता है—ऐसा कहने के योग्य होने के कारण, उनके सदृश व्यवहार करते हुए 'तेसं मग्गसम्पयुत्तधम्मानं' (उन मार्ग-सम्प्रयुक्त धर्मों का) कहा गया है। इस प्रकार आसेवन का ग्रहण समर्थित होता है, अन्यथा नहीं। क्योंकि एक-चित्त-क्षणिक मार्ग-धर्मों का आसेवन या बहुलीकरण नहीं होता है। 'तुलना' का अर्थ विपश्यना है। वह (विपश्यना) वुत्थानगामिनी (मार्ग की ओर ले जाने वाली) होने से मार्ग-प्रधान के लिए बहुत उपकारक है, उसके अभाव में मार्ग-प्रधान का ही अभाव होने से; इसी प्रकार उत्साह तुलना के लिए और छन्द उत्साह के लिए बहुत उपकारक है—इत्यादि क्रम से नीचे के धर्मों की ऊपर के धर्मों के प्रति उपकारकता सुविज्ञेय ही है—ऐसा कहा गया है—'इस नय (पद्धति) से सभी पदों में अर्थ समझना चाहिए'। शेष सुविज्ञेय ही है। စင်္ကီသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. चङ्की-सुत्त-वर्णना की लीनत्थप्पकासना (गूढ़ अर्थ का प्रकाशन) समाप्त हुई। ၆. ဧသုကာရီသုတ္တဝဏ္ဏနာ ६. एसुकारी-सुत्त-वर्णना (एसुकारी सुत्त की व्याख्या)। ၄၃၇. ကောဋ္ဌာသန္တိ မံသဘာဂံ. လဂ္ဂါပေယျုန္တိ နှာရုနာ ဝါ ဝါကေန ဝါ ဗန္ဓိတွာ ပုရိသဿ ဟတ္ထေ ဝါ ဝသနဂေဟေ ဝါ ဩလမ္ဗနဝသေန ဗန္ဓေယျုံ. သတ္ထဓမ္မန္တိ သတ္ထိကေသု သတ္ထဝါဟေန ပဏေတဗ္ဗံ အာဏာဓမ္မံ. တဿ နိက္ခမနတ္ထန္တိ တံ မူလံ သတ္ထိကေဟိ နိတ္ထရဏတ္ထံ. ပါပံ အဿာတိ ပရိစရန္တဿ ပါရိစရိယာယ အဟိတံဝ အဿ. တေနာဟ ‘‘န သေယျော’’တိ. ဥစ္စကုလီနာဒယော ဒုတိယဝါရာဒီဟိ ဝုစ္စန္တိ, ဣဓ ဥပဓိဝိပတ္တိသမ္ပတ္တိယော ပါပိယာဒိပဒေဟိ ဝုတ္တာတိ အဓိပ္ပာယော. တေနာဟ – ‘‘ပါပိယောတိ ပါပကော လာမကော အတ္တဘာဝေါ အဿာ’’တိ. သေယျံသောတိ ဟိတကောဋ္ဌာသော, ဟိတသဘာဝေါတိ အတ္ထော. ဥစ္စကုလီနတာတိ ကရဏတ္ထေ ပစ္စတ္တဝစနန္တိ အာဟ ‘‘ဥစ္စာကုလီနတ္တေနာ’’တိ. ‘‘ဝဏ္ဏော န ခီယေထ တထာဂတဿာ’’တိအာဒီသု [Pg.196] (ဒီ. နိ. အဋ္ဌ. ၁.၃၀၅; ၃.၁၄၁; မ. နိ. အဋ္ဌ. ၂.၄၂၅; ဥဒါ. ၅၃; အပ. အဋ္ဌ. ၂.၇.၂၀; ဗု. ဝံ. အဋ္ဌ. ၄.၄; စရိယာ. အဋ္ဌ. ၁.နိဒါနကထာ; ၂.ပကိဏ္ဏကကထာ; ဒီ. နိ. ဋီ. ၁.ဂန္ထာရမ္ဘကထာဝဏ္ဏနာ; သံ. နိ. ဋီ. ၁.၂.၁; အ. နိ. ဋီ. ၁.၁.၁; ဝဇိရ. ဋီ. ဂန္ထာရမ္ဘကထာဝဏ္ဏနာ; သာရတ္ထ. ဋီ. ၁.ဂန္ထာရမ္ဘကထာဝဏ္ဏနာ; နေတ္တိ. ဋီ. ဂန္ထာရမ္ဘကထာဝဏ္ဏနာ; မ. နိ. ဋီ. ၁.၁) ဝိယ ဝဏ္ဏသဒ္ဒေါ ဣဓ ပသံသာပရိယာယောတိ အာဟ ‘‘ဝေဿောပိ ဟိ ဥဠာရဝဏ္ဏော ဟောတီ’’တိ. ४३७. कोट्टासं का अर्थ है मांस का भाग। लग्गापेय्युं का अर्थ है स्नायु (नस) या वल्कल (छाल) से बाँधकर पुरुष के हाथ में या निवास-गृह में लटकाने के लिए बाँध देना। सत्थधम्मं का अर्थ है सार्थवाह (व्यापारिक काफिले के नेता) द्वारा सार्थिकों (व्यापारियों) पर लागू किया जाने वाला आज्ञा-नियम। तस्स निक्खमणत्थं का अर्थ है उस मूल (पूँजी) को सार्थिकों द्वारा निकालने के लिए। पापं अस्सा का अर्थ है परिचर्या करने वाले के लिए उसकी सेवा अहितकर ही हो। इसीलिए कहा गया है—'न सेय्यो' (श्रेष्ठ नहीं है)। उच्चकुलीन आदि दूसरे वार (प्रसंग) आदि में कहे गए हैं, यहाँ 'पापिय' आदि पदों से उपधि-विपत्ति और उपधि-संपत्ति कही गई है—यही अभिप्राय है। इसीलिए कहा गया है—'पापियो' अर्थात् उसका आत्मभाव (शरीर) पापी और अधम हो। सेय्यंसो का अर्थ है हित-भाग, अर्थात् हित-स्वभाव वाला। 'उच्चकुलीनता' यहाँ करण अर्थ में प्रथमा विभक्ति है, इसलिए कहा—'उच्चाकुलीनेन' (उच्चकुलीन होने से)। 'तथागत का वर्ण (यश) क्षीण नहीं होता' इत्यादि की तरह यहाँ 'वर्ण' शब्द प्रशंसा का पर्यायवाची है, इसलिए कहा—'वेस्सपि हि उळारवण्णो होति' (वैश्य भी उदार वर्ण/प्रशंसा वाला होता है)। ၄၄၀. ‘‘နိရဝေါ ပဒသဒ္ဒေါ သောဠာရဂေါတ္တဿ အကိဏ္ဏမတ္တိကာပတ္တော တိဋ္ဌေယျ အသင်္ဂစာရီ’’တိ ဝုတ္တတ္တာ ဘိက္ခာ စရိတဗ္ဗာဝ, အယံ တေသံ ကုလဓမ္မောတိ အဓိပ္ပာယော. ဟရိတွာတိ အပနေတွာ. သတ္တဇီဝေါ သတ္တဝါဏိဇကော. ဂေါပေတိ ရက္ခတီတိ ဂေါပေါ, အာရက္ခာဓိကာရေ နိယုတ္တော. အသန္တိ လူနန္တိ တေနာတိ အသိတံ, လဝိတ္တံ. ဝိဝိဓံ ဘာရံ အာဘဉ္ဇန္တိ ဩလမ္ဗန္တိ ဧတ္ထာတိ ဗျာဘင်္ဂီ, ကာဇံ. ४४०. 'निरवो पदसद्दो...' इत्यादि कहे जाने के कारण भिक्षाटन करना ही चाहिए, यह उनका कुल-धर्म है—यही अभिप्राय है। हरित्वा का अर्थ है हटाकर। सत्तजीवो का अर्थ है प्राणियों का व्यापारी। गोपयति रक्खतीति गोपो—जो रक्षा करता है वह गोप है, जो रक्षा के कार्य में नियुक्त है। असन्ति लूनन्ति तेनाति असितं—जिससे काटते हैं वह असित (हँसिया) है। विविहं भारं आभञ्जन्ति...—जिसमें विविध भार लटकाते हैं वह ब्याभङ्गी (काँवर) है। ၄၄၁. အနုဿရတောတိ အနုဿရဏဟေတု ကုလဝံသာနုဿရဏက္ခဏေ ခတ္တိယောတိအာဒိနာ သင်္ချံ ဂစ္ဆတိ. တေနာဟ ‘‘ပေါရာဏေ…ပေ… အနုဿရိယမာနေ’’တိ. ဥစ္စနီစတ္တဇာနနတ္ထဉ္စ ကုလဝဝတ္ထာနံ ကတံ ဟောတီတိ ခတ္တိယာဒိကုလကမ္မုနာ တေသံ စတုန္နံ ဝဏ္ဏာနံ သန္ဓနံ ဇီဝိကံ ပညပေန္တိ ဗြာဟ္မဏာ, တထာဂတော ပန လောကုတ္တရဓမ္မမေဝ ပုရိသဿ သန္ဓနံ ပညပေတိ တေန သတ္တဿ လောကဂ္ဂဘာဝသိဒ္ဓိတော. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. ४४१. अनुस्सरतो का अर्थ है अनुस्मरण के कारण, कुल-वंश के अनुस्मरण के क्षण में 'क्षत्रिय' आदि संज्ञा को प्राप्त होता है। इसीलिए कहा—'पुराने... अनुस्मरण किए जाने पर'। ऊँच-नीच के ज्ञान के लिए कुल का निर्धारण किया गया है, इसलिए ब्राह्मण क्षत्रिय आदि के कुल-कर्म के द्वारा उन चारों वर्णों के सन्धान (जीविका/सम्पत्ति) की व्यवस्था करते हैं; किन्तु तथागत पुरुष के लिए लोकोत्तर धर्म को ही सन्धान (सम्पत्ति) बताते हैं, क्योंकि उससे सत्त्व की लोक-अग्रता (संसार में श्रेष्ठता) सिद्ध होती है। शेष सुविज्ञेय ही है। ဧသုကာရီသုတ္တဝဏ္ဏနာ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. एसुकारी-सुत्त-वर्णना की लीनत्थप्पकासना समाप्त हुई। ၇. ဓနဉ္ဇာနိသုတ္တဝဏ္ဏနာ ७. धनञ्जानि-सुत्त-वर्णना। ၄၄၅. ရာဇဂဟံ ပရိက္ခိပိတွာ ဌိတပဗ္ဗတဿာတိ ပဏ္ဍဝပဗ္ဗတံ သန္ဓာယာဟ. ရာဇဂဟနဂရဿ ဒက္ခိဏဒိသာဘာဂေ ပဗ္ဗတဿ သမီပေ ဌိတော ဇနပဒေါ ဒက္ခိဏာဂိရိ. တဏ္ဍုလပုဋကာနံ ပါလိ ဧတ္ထာတိ တဏ္ဍုလပါလိ. တဿ [Pg.197] ကိရ ဒွါရသမီပေ တဏ္ဍုလဝါဏိဇာ တဏ္ဍုလပသိဗ္ဗကေ ဝိဝရိတွာ ပဋိပါဋိယာ ဌပေတွာ နိသီဒန္တိ, တေနဿ ‘‘တဏ္ဍုလပါလိဒွါရ’’န္တိ သမညာ အဟောသိ. သဗ္ဗမေဝ သဿံ ဂဏှာတီတိ ဒလိဒ္ဒကဿကာနံ ဒိဝသပရိဗ္ဗယမတ္တမေဝ ဝိဿဇ္ဇေတွာ သဗ္ဗမေဝ အာယတော နိပ္ဖန္နံ ဓညံ ဂဏှာတိ. မန္ဒသဿာနီတိ မန္ဒနိပ္ဖတ္တိကာနိ သဿာနိ. ४४५. राजगृह को घेरकर स्थित पर्वत का—यह पाण्डव पर्वत के सन्दर्भ में कहा गया है। राजगृह नगर के दक्षिण दिशा के भाग में पर्वत के समीप स्थित जनपद 'दक्षिणागिरि' है। जहाँ तण्डुल-पुटकों (चावल की पोटलियों) की पंक्ति (पालि) हो, वह 'तण्डुलपालि' है। उसके द्वार के समीप चावल के व्यापारी चावल के थैलों को खोलकर पंक्तिबद्ध रखकर बैठते हैं, इसलिए उसकी 'तण्डुलपालि-द्वार' यह संज्ञा हुई। सब्बमेव सस्सं गण्हाति का अर्थ है दरिद्र किसानों के लिए केवल दिन भर के खर्च मात्र को छोड़कर, उत्पन्न हुए सारे अनाज को ले लेता है। मन्दसस्सानी का अर्थ है कम पैदावार वाली फसलें। ၄၄၆. ဣမိနာ နယေနာတိ ဒါသကမ္မကရဿ နိဝါသနဘတ္တဝေတ္တနာနုပ္ပဒါနေန မင်္ဂလဒိဝသေသု ဓနဝတ္ထာလင်္ကာရာနုပ္ပဒါနာဒိနာ စ ပေါသေတဗ္ဗော. မိတ္တာမစ္စာနံ ပိယဝစနအတ္ထစရိယာသမာနတ္တတာဒိ မိတ္တာမစ္စကရဏီယံ ကတ္တဗ္ဗံ, တထာ ဉာတိသာလောဟိတာနံ. တတ္ထ အာဝါဟဝိဝါဟသမ္ဗဒ္ဓေန ‘‘အမှာကံ ဣမေ’’တိ ဉာယန္တီတိ ဉာတီ, မာတာပိတာဒိသမ္ဗဒ္ဓတာယ သမာနလောဟိတာတိ သာလောဟိတာ. သမ္မာ ဒဒန္တေသုပိ အသဇ္ဇနတော နတ္ထိ ဧတေသံ တိထီတိ အတိထိ, တေသံ အတ္တနာ သမာနပရိဘောဂဝသေန အတိထိကရဏီယံ ကာတဗ္ဗံ, အတိထိဗလီတိ အတ္ထော. ဉာတကဘူတပုဗ္ဗာ ပေတ္တိဝိသယံ ဥပဂတာ ပုဗ္ဗပေတာ, ဒက္ခိဏေယျေသု ကာလေန ကာလံ ဒါနံ ဒတွာ တေသံ ဥဒ္ဒိသနံ ပုဗ္ဗပေတကရဏီယံ, ပေတဗလီတိ အတ္ထော. ဂန္ဓပုပ္ဖဝိလေပနဇာလာဘတ္တေဟိ ကာလေန ကာလံ ဒေဝတာနံ ပူဇာ ဒေဝတာကရဏီယံ, ဒေဝတာဗလီတိ အတ္ထော, ရာဇကိစ္စကရဏံ ဥပဋ္ဌာနံ ရာဇကရဏီယံ. အယမ္ပိ ကာယောတိ အတ္တနော ကာယံ သန္ဓာယ ဝဒတိ. ဣမမတ္ထံ သန္ဓာယာဟ ‘‘ဣမိနာ နယေန အတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော’’တိ. ४४६. "इस विधि से" का अर्थ है कि दास और कर्मकारों को निवास, भोजन और वेतन प्रदान करके, तथा मांगलिक अवसरों पर धन, वस्त्र और अलंकारों आदि के दान द्वारा उनका पोषण करना चाहिए। मित्रों और अमात्यों के प्रति प्रिय वचन, अर्थचर्या और समानता आदि मित्र-अमात्य के कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, और वैसा ही ज्ञाति-संबंधियों के प्रति भी। वहाँ, विवाह-संबंध से जुड़े होने के कारण जिन्हें "ये हमारे हैं" ऐसा जाना जाता है, वे 'ज्ञाति' हैं; माता-पिता आदि के संबंध से समान रक्त वाले होने के कारण वे 'सालोहित' हैं। सम्यक् रूप से दान देने पर भी जो सज्जन न होने के कारण (निश्चित तिथि पर नहीं आते), उनकी कोई तिथि नहीं होती, वे 'अतिथि' हैं; उनके प्रति अपने समान उपभोग के माध्यम से अतिथि-कर्तव्य करना चाहिए, इसका अर्थ 'अतिथि-बलि' है। जो पहले संबंधी थे और अब प्रेत-योनि को प्राप्त हो गए हैं, वे 'पूर्वप्रेत' हैं; दक्षिणीय (पात्रों) को समय-समय पर दान देकर उन्हें पुण्य समर्पित करना 'पूर्वप्रेत-कर्तव्य' है, इसका अर्थ 'प्रेत-बलि' है। गंध, पुष्प, विलेपन और दीपों के अर्पण द्वारा समय-समय पर देवताओं की पूजा करना 'देवता-कर्तव्य' है, इसका अर्थ 'देवता-बलि' है; राजकीय कार्यों का संपादन और सेवा करना 'राज-कर्तव्य' है। "यह काया भी" - यहाँ वह अपनी काया के संदर्भ में कहता है। इसी अर्थ के संदर्भ में कहा गया है - "इस विधि से अर्थ समझना चाहिए"। ၄၄၇. ပဉ္စ ဒုဿီလျကမ္မာနီတိ နိစ္စသီလပဋိပက္ခဓမ္မာ. ဒသ အကုသလကမ္မပထဓမ္မာ ဒသ ဒုဿီလျကမ္မာနိ. အဓမ္မစာရီ ဧဝ ဝိသမစာရီ ကာယဝိသမာဒိစရဏတောတိ ဝိသမစာရီပဒဿ အတ္ထော ဝိသုံ န ဝုတ္တော. ४४७. "पाँच दुःशील कर्म" का अर्थ है नित्य-शील के प्रतिपक्ष (विरोधी) धर्म। दस अकुशल कर्मपथ ही दस दुःशील कर्म हैं। "अधर्मचारी ही विषमचारी है" - काया की विषमता आदि के आचरण के कारण 'विषमचारी' पद का अर्थ अलग से नहीं कहा गया है। ၄၄၈-၄၅၃. ဩသရန္တိ အပသက္ကန္တိ, ခီယန္တီတိ အတ္ထော. တေနာဟ ‘‘ပရိဟာယန္တီ’’တိ. အဘိသရန္တီတိ အဘိဝဍ္ဎနဝသေန ပဝတ္တန္တိ. တေနာဟ ‘‘ဝဍ္ဎန္တီ’’တိ. တတြာတိ ဗြဟ္မလောကေ. အဿာတိ ဗြဟ္မလောကေ ဥပ္ပန္နဿ ဓနဉ္ဇာနိဿ. တတော ပဋ္ဌာယာတိ ယဒါ ဘဂဝတာ ‘‘ဧသော, ဘိက္ခဝေ, သာရိပုတ္တော’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ, တတော ပဋ္ဌာယ. စတုသစ္စဝိနိမုတ္တန္တိ နိဒ္ဓါရေတွာ ဝိဘဇိတွာ ဝုစ္စမာနေဟိ သစ္စေဟိ ဝိမုတ္တံ. အတ္ထတော ပန တတော ပုဗ္ဗေပိ သစ္စဝိမုတ္တံ ကထံ န ကထေသိယေဝ သစ္စဝိမုတ္တဿ နိယျာနဿ အဘာဝတော. ४४८-४५३. 'ओसरन्ति' का अर्थ है पीछे हटना, क्षीण होना। इसीलिए कहा गया है - "परिहायन्ति" (हानि होना)। 'अभिसरन्ति' का अर्थ है अभिवृद्धि के रूप में प्रवृत्त होना। इसीलिए कहा गया है - "वढन्ति" (बढ़ना)। 'तत्र' का अर्थ है ब्रह्मलोक में। 'अस्स' का अर्थ है ब्रह्मलोक में उत्पन्न हुए धनञ्जानि का। 'ततो पट्ठाय' का अर्थ है जब भगवान ने "भिक्षुओं, यह सारिपुत्र है" आदि कहा, तब से लेकर। "चतुसच्चविनिमुत्तं" का अर्थ है - निर्धारित और विभाजित करके कहे जाने वाले सत्यों से मुक्त। अर्थ की दृष्टि से तो उससे पहले भी सत्य-विमुक्त (कथा) क्यों नहीं कही गई? क्योंकि सत्य-विमुक्त (निर्वाण) के बिना निर्याण (मुक्ति) का अभाव होता है। ဓနဉ္ဇာနိသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. धनञ्जानि-सुत्त की व्याख्या के लीनत्थप्पकासना (गूढ़ार्थ-प्रकाशिनी टीका) समाप्त हुई। ၈. ဝါသေဋ္ဌသုတ္တဝဏ္ဏနာ ८. वासेट्ठ-सुत्त की व्याख्या। ၄၅၄. ဇာတိံ [Pg.198] သောဓေတုကာမာ ဟောန္တီတိ သဟဝါသီနံ ဗြာဟ္မဏာနံ ကိရိယာ ပရာဓေန ဝါ အသာရုပ္ပတ္တေန ဝါ ဇာတိယာ ဥပက္ကိလေသံ အာသင်္ကာယ တံ သောဓေတုကာမာ ဟောန္တိ. မန္တေ သောဓေတုကာမာ ဟောန္တီတိ မန္တဝစနေ အာစရိယမတိစောဒနာယ အညေန ဝါကျေန ကေနစိ ကာရဏေန သံသယေ ဥပ္ပန္နေ တံ သောဓေတုကာမာ ဟောန္တိ. အန္တရာတိ ဝေမဇ္ဈေ, အညတ္ထေဝါ အန္တရာသဒ္ဒေါတိ တဿ အညာ ကထာတိ ဝစနံ အဝဂန္တဗ္ဗံ. ခန္တီမေတ္တာနုဒ္ဒယာဒိဂုဏသမ္ပန္နော ဧဝ ‘‘သီလဝါတိ ဂုဏဝါ’’တိအာဟ. တေဟိ သီလဿ ဝိဿဇ္ဇနကာလေပိ ‘‘သီလဝါ’’တိ ဝုစ္စတိ. သမ္ပန္နသီလတ္တာ ဝါ တေဟိ သမန္နာဂတော ဧဝ ဟောတီတိ အာဟ ‘‘သီလဝါတိ ဂုဏဝါ’’တိ. အာစာရသမ္ပန္နောတိ သာဓု အာစာရဝတ္တော. ४५४. "जाति को शुद्ध करना चाहते हैं" का अर्थ है कि साथ रहने वाले ब्राह्मणों की क्रिया के दोष से या अयोग्यता से जाति में अशुद्धि की आशंका होने पर वे उसे शुद्ध करना चाहते हैं। "मंत्रों को शुद्ध करना चाहते हैं" का अर्थ है कि मंत्रों के उच्चारण में आचार्य की प्रेरणा से या किसी अन्य वाक्य के कारण संदेह उत्पन्न होने पर वे उसे शुद्ध करना चाहते हैं। 'अन्तरा' का अर्थ है मध्य में; 'अन्तरा' शब्द का अन्य अर्थ में प्रयोग होने पर "उसकी अन्य कथा" - यह वचन समझना चाहिए। क्षमा, मैत्री और दया आदि गुणों से संपन्न होने के कारण ही "शीलवान ही गुणवान है" ऐसा कहा गया है। उनके द्वारा शील के त्याग के समय भी "शीलवान" कहा जाता है। अथवा संपन्न शील होने के कारण वे उनसे युक्त ही होते हैं, इसलिए कहा - "शीलवान ही गुणवान है"। "आचार-संपन्न" का अर्थ है उत्तम आचरण वाला। ၄၅၅. သိက္ခိတာတိ တေဝိဇ္ဇာနံ သိက္ခိတာ တုမှေ, န ဒါနိ တုမှေဟိ ကိဉ္စိ ကတ္တဗ္ဗံ အတ္ထီတိ အတ္ထော. ပဋိညာတာတိ ပဋိဇာနိတွာ ဌိတာ. ४५५. "शिक्षित" का अर्थ है कि तुम त्रैविद्य (तीन वेदों) में शिक्षित हो, अब तुम्हारे लिए कुछ भी करना शेष नहीं है। "प्रतिज्ञात" का अर्थ है प्रतिज्ञा करके स्थित। ဝေဒတ္တယသင်္ခါတာ တိဿော ဝိဇ္ဇာ အဇ္ဈယန္တီတိ တေဝိဇ္ဇာ. တေနာဟ ‘‘တိဝေဒါန’’န္တိ. တယော ဝေဒေ အဏန္တိ အဇ္ဈယန္တီတိ ဗြာဟ္မဏာ, တေသံ. ယံ ဧကံ ပဒမ္ပိ အက္ခာတံ, တံ အတ္ထတော ဗျဉ္ဇနတော စ ကေဝလိနော အဓိယိနော အပ္ပပယောဂေန. နိဋ္ဌာဂတမှာတိ နိပ္ဖတ္တိံ ဂတာ အမှာ တေဝိဇ္ဇာယ သကသမယဿ ကထနေ. तीन वेदों के रूप में जानी जाने वाली तीन विद्याओं का अध्ययन करने वाले 'त्रैविद्य' (तेविज्जा) कहलाते हैं। इसीलिए कहा - "तिवेदानं" (तीन वेदों का)। तीन वेदों का पाठ (अध्ययन) करने वाले ब्राह्मण हैं, उनका। जो एक पद भी कहा गया है, वह अर्थ और व्यंजन की दृष्टि से पूर्णतः अध्ययन करने वालों के अल्प प्रयोग से है। "निष्ठा को प्राप्त हुए" का अर्थ है कि हम त्रैविद्य के अपने सिद्धांत के कथन में पूर्णता को प्राप्त हुए हैं। မနောကမ္မတော ဟိ ဝတ္တသမ္ပဒါတိကာရဏူပစာရေနာယမတ္ထော ဝုတ္တောတိ အာဟ – ‘‘တေန သမန္နာဂတော ဟိ အာစာရသမ္ပန္နော ဟောတီ’’တိ. क्योंकि मनःकर्म से ही व्रत-संपदा आदि के कारण के उपचार से यह अर्थ कहा गया है, इसलिए कहा - "उससे युक्त होने पर ही वह आचार-संपन्न होता है"। ခယာတီတန္တိ ဝဍ္ဎိပက္ခေ ဌိတန္တိ အတ္ထော. သုက္ကပက္ခပါဋိပဒတော ပဋ္ဌာယ ဟိ စန္ဒော ဝဍ္ဎတီတိ ဝုစ္စတိ, န ခီယတီတိ. ဝန္ဒမာနာ ဇနာ နမက္ကာရံ ကရောန္တိ. "क्षयातीत" का अर्थ है वृद्धि पक्ष में स्थित। शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से चंद्रमा बढ़ता है, क्षीण नहीं होता। वंदना करने वाले लोग नमस्कार करते हैं। အတ္ထဒဿနေနာတိ ဝိဝရဏေန ဒဿနပရိဏာယကဋ္ဌေန လောကဿ စက္ခု ဟုတွာ သမုပ္ပန္နံ. "अर्थ-दर्शन से" का अर्थ है विवरण के द्वारा, दर्शन के नेतृत्व के अर्थ में लोक का चक्षु बनकर उत्पन्न हुआ। ၄၅၆. တိဋ္ဌတု တာဝ ဗြာဟ္မဏစိန္တာတိ – ‘‘ကိံ ဇာတိယာ ဗြာဟ္မဏော ဟောတိ ဥဒါဟု ဘဝတိ ကမ္မုနာ’’တိ အယံ ဗြာဟ္မဏဝိစာရော တာဝ တိဋ္ဌတု[Pg.199]. ဇာတိဒဿနတ္ထံ တိဏရုက္ခကီဋပဋင်္ဂတော ပဋ္ဌာယ လောကေ ဇာတိဝိဘင်္ဂံ ဝိတ္ထာရတော ကထေဿာမီတိ တေသံ စိတ္တသမ္ပဟံသနတ္ထံ ဒေသေတဗ္ဗမတ္ထံ ပဋိဇာနာတိ. တတ္ထ အညမညာ ဟိ ဇာတိယောတိ ဣဒံ ကာရဏဝစနံ, ယသ္မာ ဣမာ ဇာတိယော နာမ အညမညံ ဝိသိဋ္ဌာ, တသ္မာ ဇာတိဝိဘင်္ဂံ ဗျာကရိဿာမီတိ. ४५६. "ब्राह्मण-चिंता अभी रहने दें" का अर्थ है - "जाति से ब्राह्मण होता है या कर्म से" - यह ब्राह्मण संबंधी विचार अभी रहने दें। जाति दिखाने के लिए तृण, वृक्ष, कीट और पतंगों से लेकर लोक में जाति-विभाजन का विस्तार से वर्णन करूँगा - ऐसा उनके चित्त को प्रसन्न करने के लिए उपदेश दिए जाने वाले अर्थ की प्रतिज्ञा करते हैं। वहाँ "जातियाँ परस्पर भिन्न हैं" - यह कारण-वचन है; क्योंकि ये जातियाँ परस्पर विशिष्ट (अलग) हैं, इसलिए मैं जाति-विभाजन की व्याख्या करूँगा। ယသ္မာ ဣဓ ဥပါဒိန္နကဇာတိ ဗျာကာတဗ္ဗဘာဝေန အာဂတာ, တဿာ ပန နိဒဿနဘာဝေန ဣတရာ, တသ္မာ ‘‘ဇာတိဝိဘင်္ဂံ ပါဏာန’’န္တိ ပါဠိယံ ဝုတ္တံ. တေသံ တေသံ ပါဏာနံ ဇာတိယောတိ အတ္ထော. ဧဝန္တိ နိဒဿနံ ကထေတွာ နိဒဿိတဗ္ဗေ ကထိယမာနေ. တဿာတိ ဝါသေဋ္ဌဿ. ကာမံ ‘‘တေသံ ဝေါဟံ ဗျက္ခိဿ’’န္တိ ဥဘောပိ မာဏဝေ နိဿာယ ဒေသနာ အာဂတာ, တထာပိ တတ္ထ တတ္ထ ‘‘ဧဝံ, ဝါသေဋ္ဌ, ဇာနာဟီ’’တိအာဒိနာ ဝါသေဋ္ဌမေဝ အာလပန္တော ဘဂဝါ တမေဝ ဣမိနာ နိယာမေန ပမုခံ အကာသိ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘တဿာတိ ဝါသေဋ္ဌဿာ’’တိ. ဇာတိဘေဒေါ ဇာတိဝိသေသော, ဇာတိယာ ဘေဒေါ ပါကဋော ဘဝိဿတိ နိဒဿနေန ဝိဘူတဘာဝံ အာပါဒိတေန ပဋိညာတဿ အတ္ထဿ ဝိဘူတဘာဝါပတ္တိတော. အာမ န ဝဋ္ဋတီတိ ကမ္မနာနတာယ ဧဝ ဥပါဒိန္နနာနတာယ ပဋိက္ခေပပဒမေတံ, န ဗီဇနာနတာယ အနုပါဒိန္နနာနတာယ ပဋိက္ခေပပဒန္တိ ဒဿေတုံ ‘‘ကမ္မံ ဟီ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. တဿတ္ထော – တံတံယောနိခိပနမတ္တံ ကမ္မဿ သာမတ္ထိယံ, တံတံယောနိနိယတာ ပန ယေ ဝဏ္ဏဝိသေသာ, တေ တံတံယောနိသိဒ္ဓိယာဝ သိဒ္ဓါ ဟောန္တီတိ တံ ပန ယောနိခိပနကမ္မံ တံတံယောနိဝိသိဋ္ဌ-ဝိသေသာဘိဘူတာယ ပယောဂနိပ္ဖတ္တိယာ, အသံမုစ္ဆိတာယ ဧဝ ဝါ ပစ္စယဘူတာယ ဘဝပတ္ထနာယ အဘိသင်္ခတမေဝါတိ ဝိညာတဗ္ဗပစ္စယဝိသေသေန ဝိနာ ဖလဝိသေသာဘာဝတော ဧတံ သမီဟိတကမ္မံ ပတ္ထနာဒီဟိ စ ဘိန္နသတ္တိတံ ဝိသိဋ္ဌသာမတ္ထိယံ ဝါ အာပဇ္ဇိတွာ စက္ခုန္ဒြိယာဒိဝိသိဋ္ဌဖလနိဗ္ဗတ္တကံ ဇာယတိ, ဧဝံ ယောနိခိပနတံယောနိနိယတဝိသေသာဝဟတာ ဟောတီတိ. ထေရေန ဟိ ဗီဇနာနတာ ဝိယ ကမ္မနာနတာပိ ဥပါဒိန္နကနာနတာယ သိယာ နု ခေါ ပစ္စယောတိ စောဒနံ ပဋိက္ခိပိတွာ ပစ္စယဝိသေသဝိသိဋ္ဌာ ကမ္မနာနတာ ပန ပစ္စယောတိ နိစ္ဆိတန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. चूँकि यहाँ उपादिन्नक जाति (गृहीत जन्म) व्याख्या करने योग्य होने के कारण आई है, और दूसरी उसके उदाहरण के रूप में, इसलिए पालि में 'प्राणियों का जाति-विभंग' कहा गया है। इसका अर्थ है उन-उन प्राणियों की जातियाँ। 'एवं' (इस प्रकार) कहकर उदाहरण बताकर, उदाहरण दिए जाने वाले के विषय में कहा जा रहा है। 'तस्स' (उसका) अर्थात् वासेट्ठ का। यद्यपि 'मैं उन्हें तुम्हारे लिए स्पष्ट करूँगा' ऐसा कहकर दोनों माणवकों (युवकों) के आश्रय से देशना आई है, फिर भी वहाँ-वहाँ 'हे वासेट्ठ, इस प्रकार जानो' आदि के द्वारा वासेट्ठ को ही सम्बोधित करते हुए भगवान ने इस नियम से उसे ही प्रमुख बनाया। इसीलिए 'तस्स' का अर्थ 'वासेट्ठ का' कहा गया है। जाति-भेद अर्थात् जाति-विशेष; उदाहरण द्वारा स्पष्ट किए जाने पर प्रतिज्ञात अर्थ की स्पष्टता होने से जाति का भेद प्रकट हो जाएगा। 'आमा न वत्तति' (हाँ, नहीं होता) यह कर्म की नानात्व (विविधता) के कारण ही उपादिन्न (गृहीत) की नानात्व के प्रतिषेध का पद है, बीज की नानात्व या अनुपादिन्न की नानात्व के प्रतिषेध का पद नहीं है, यह दिखाने के लिए 'कम्मं हि' आदि कहा गया है। उसका अर्थ है - उस-उस योनि में क्षेपण (फेंकना) मात्र कर्म का सामर्थ्य है, किन्तु उस-उस योनि में नियत जो वर्ण-विशेष हैं, वे उस-उस योनि की सिद्धि से ही सिद्ध होते हैं; वह योनि-क्षेपण कर्म उस-उस योनि के विशिष्ट विशेषों से अभिभूत प्रयोग की निष्पत्ति से, अथवा असंमूर्च्छित (स्पष्ट) प्रत्ययभूत भव-प्रार्थना से अभिसंस्कृत ही है - ऐसा विज्ञेय प्रत्यय-विशेष के बिना फल-विशेष के अभाव के कारण, यह अभीष्ट कर्म प्रार्थना आदि के द्वारा भिन्न शक्ति वाला या विशिष्ट सामर्थ्य वाला होकर चक्षु-इन्द्रिय आदि विशिष्ट फलों को उत्पन्न करने वाला होता है, इस प्रकार योनि-क्षेपण उस-उस योनि के नियत विशेषों को लाने वाला होता है। स्थविर के द्वारा बीज-नानात्व की तरह कर्म-नानात्व भी उपादिन्नक-नानात्व का प्रत्यय (कारण) हो सकता है क्या, इस आक्षेप का निषेध करके प्रत्यय-विशेष से विशिष्ट कर्म-नानात्व ही प्रत्यय है, ऐसा निश्चित समझना चाहिए। နာနာဝဏ္ဏာတိ နာနပ္ပကာရဝဏ္ဏာ. တာလနာဠိကေရာဒီနံ လောကေ အဘိညာတတိဏဇာတိဘာဝတော ဝိသေသေန ဂယှတိ အဘိညာတသောတနယေန. ဇာတိယာ ဗြာဟ္မဏောဝါတိ အဋ္ဌာနပယုတ္တော ဧဝ-သဒ္ဒေါ, ဇာတိယာဝ [Pg.200] ဗြာဟ္မဏော ဘဝေယျာတိ ယောဇနာ. န စ ဂယှတီတိ တိဏရုက္ခာဒီသု ဝိယ ဗြာဟ္မဏေသု ဇာတိနိယတဿ လိင်္ဂဿ အနုပလဗ္ဘနတော, ပိဝနဘုဉ္ဇနကထနဟသနာဒိကိရိယာယ ဗြာဟ္မဏဘာဝေန ဧကန္တိကလိင်္ဂနိယတာယ မန္တဇ္ဈေနာဒိံ ဝိနာ အနုပလဗ္ဘနတော စ. ဝစီဘေဒေနေဝါတိ အာဟစ္စဝစနေနေဝ. 'नानावण्णा' का अर्थ है अनेक प्रकार के वर्ण (रंग/रूप)। ताड़, नारियल आदि के लोक में प्रसिद्ध तृण-जाति (घास की प्रजाति) होने के कारण, प्रसिद्ध श्रुति-परम्परा के अनुसार विशेष रूप से ग्रहण किया जाता है। 'जाति से ही ब्राह्मण है' - यहाँ 'एव' शब्द अस्थान में प्रयुक्त है, 'जाति से ही ब्राह्मण हो' ऐसा योजन (अन्वय) है। और तृण-वृक्ष आदि की तरह ब्राह्मणों में जाति-नियत लिंग (चिह्न) उपलब्ध नहीं होता, और पीने, खाने, बोलने, हँसने आदि की क्रियाओं में ब्राह्मण होने के कारण एकान्तिक लिंग-नियतता मन्त्र-अध्ययन आदि के बिना उपलब्ध नहीं होती, इसलिए (जाति से ब्राह्मण) ग्रहण नहीं किया जाता। 'वचीभेदेनेव' का अर्थ है साक्षात् वचन से ही। ကီဋေ ပဋင်္ဂေတိအာဒီသု ဇာတိနာနတာ လဗ္ဘတိ အညမညလိင်္ဂဝိသိဋ္ဌတာဒဿနာ. ကုန္ထာ ကီဋကာ, ခဇ္ဇခါဒကာ ကိပိလ္လိကာ. ဥပ္ပတိတွာတိ ဥဍ္ဍေတွာ ဥဍ္ဍေတွာ. ပဋဘာဝံ ဂစ္ဆန္တီတိ ဝါ ပဋင်္ဂါ, န ခုဒ္ဒကပါဏကာ ကီဋာ နာမ. တေသမ္ပိ ကီဋကာနံ. 'कीटों और पतंगों' आदि में एक-दूसरे के विशिष्ट लिंगों (चिह्नों) के देखे जाने से जाति-नानात्व (जाति की विविधता) प्राप्त होती है। 'कुन्थ' छोटे कीट हैं, 'खज्जखादक' चींटियाँ हैं। 'उप्पतित्वा' का अर्थ है उड़-उड़कर। 'पट' भाव को प्राप्त होते हैं इसलिए 'पतंग' कहलाते हैं, वे छोटे प्राणी कीट नहीं हैं। उन कीटों का भी। ကာဠကာဒယောတိ ကလန္ဒကာဒယော. 'कालक' आदि का अर्थ है गिलहरी आदि। ဥဒရံယေဝ နေသံ ပါဒါ ဥဒရေနေဝ သမ္ပဇ္ဇနတော. पेट ही उनके पैर हैं, क्योंकि वे पेट के बल ही चलते (उत्पन्न होते) हैं। သညာပုဗ္ဗကော ဝိဓိ အနိစ္စောတိ ဒဿေန္တော ‘‘ဥဒကေ’’တိ အာဟ ယထာ ‘‘ဝီရဿ ဘာဝေါ ဝီရိယ’’န္တိ. संज्ञा-पूर्वक विधि अनित्य है, यह दिखाते हुए 'उदके' (जल में) कहा, जैसे 'वीर का भाव वीर्य' है। ပတ္တသမုဒါယေ ပက္ခသဒ္ဒေါတိ ‘‘ပတ္တေဟိ ယန္တီ’’တိ ဝုတ္တံ. န ဟိ အဝယဝဗျတိရေကေန သမုဒါယော အတ္ထိ. पंखों के समूह के लिए 'पक्ष' शब्द है, इसलिए 'पंखों से जाते हैं' ऐसा कहा गया है। क्योंकि अवयवों (अंगों) के बिना कोई समुदाय (समूह) नहीं होता। သင်္ခေပေန ဝုတ္တော ‘‘ဇာတိဝသေန နာနာ’’တိအာဒိနာ. ဧတ္ထ ပဒတ္ထေ ဒုဗ္ဗိညေယျံ နတ္ထီတိ သမ္ဗန္ဓမတ္တံ ဒဿေတုံ ‘‘တတြာယံ ယောဇနာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. ‘‘န ဟိ ဗြာဟ္မဏာနံ ဧဒိသံ သီသံ ဟောတိ, ခတ္တိယာနံ ဧဒိသန္တိ နိယမော အတ္ထိ ယထာ ဟတ္ထိအဿမိဂါဒီန’’န္တိ ဣဒမေဝ ဝါကျံ သဗ္ဗတ္ထ နေတဗ္ဗံ. တံ သံင်္ခိပိတွာ ဒဿေန္တော ‘‘ဣမိနာ နယေန သဗ္ဗံ ယောဇေတဗ္ဗ’’န္တိ အာဟ. 'जाति के कारण नाना' आदि के द्वारा संक्षेप में कहा गया है। यहाँ पदों के अर्थ में कुछ भी दुर्बोध (कठिन) नहीं है, इसलिए केवल सम्बन्ध दिखाने के लिए 'वहाँ यह योजना है' आदि कहा गया है। 'ब्राह्मणों का ऐसा सिर होता है, क्षत्रियों का ऐसा - ऐसा कोई नियम नहीं है जैसा कि हाथी, घोड़े, मृग आदि में होता है' - इसी वाक्य को सर्वत्र ले जाना चाहिए। उसे संक्षेप में दिखाते हुए 'इस न्याय से सबको जोड़ना चाहिए' ऐसा कहा। တဿာတိ ယထာဝုတ္တနိဂမနဝစနဿ အယံ ယောဇနာ ဣဒါနိ ဝုစ္စမာနာ ယောဇနာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. 'तस्स' का अर्थ है - यथाकथित निगमन वचन की यह योजना, जो अब कही जा रही है, उसे समझना चाहिए। ၄၅၇. ဝေါကာရန္တိ ဝေါကရဏံ, ယေန ဝိသိဋ္ဌတာယ န ဝေါကရီယတိ ဇာတိဘေဒေါတိ အတ္ထော. တေနာဟ ‘‘နာနတ္တ’’န္တိ. ४५७. 'वोकार' का अर्थ है पृथक्करण (भेद), जिससे विशिष्टता के कारण जाति-भेद पृथक् नहीं किया जाता - यह अर्थ है। इसीलिए 'नानात्व' कहा। ဂေါရက္ခာဒိဥပဇီဝနေန အာဇီဝဝိပန္နော, ဟိံသာဒိနာ သီလဝိပန္နော, နိက္ခိတ္တဝတ္တတာဒိနာ အာစာရဝိပန္နောတိ. သာမညဇောတနာ ဝိသေသေ နိဝိဋ္ဌာ ဟောတီတိ အာဟ ‘‘ဂေါရက္ခန္တိ ခေတ္တရက္ခ’’န္တိ. ‘‘ဂေါတိ ဟိ ပထဝိယာ နာမ’’န္တိ. တေဟိ တေဟိ ဥပါယေဟိ သိက္ခိတဗ္ဗဋ္ဌေန သိပ္ပံ, တတ္ထ ကောသလ္လံ. ပရေသံ [Pg.201] ဤသနဋ္ဌေန ဟိံသနဋ္ဌေန ဣဿော, သော အဿ အတ္ထီတိ ဣဿော ယောဓာဇီဝိကော, ဣဿဿ ကမ္မံ ပဟရဏံ, ဥသုံ သတ္တိဉ္စ နိဿာယ ပဝတ္တာ ဇီဝိကာ ဣဿတ္တံ. တေနာဟ ‘‘အာဝုဓဇီဝိက’’န္တိ. ယံ နိဿာယ အဿ ဇီဝိကာ, တဒေဝ ဒဿေတုံ ‘‘ဥသုဉ္စ သတ္တိဉ္စာ’’တိ ဝုတ္တံ. गो-रक्षा (पशुपालन) आदि की जीविका से आजीविका-विपन्न, हिंसा आदि से शील-विपन्न, और व्रतों के त्याग आदि से आचार-विपन्न। सामान्य कथन विशेष में स्थित होता है, इसलिए कहा - 'गोरक्षा अर्थात् खेत की रक्षा'। 'गो' पृथ्वी का भी नाम है। उन-उन उपायों से सीखने योग्य होने के कारण 'शिल्प' है, उसमें कुशलता। दूसरों पर शासन करने के अर्थ में या हिंसा करने के अर्थ में 'इस्स' (ईश/स्वामी) है, वह जिसका हो वह 'इस्स' योद्धा है; ईश का कर्म प्रहार करना है, धनुष और शक्ति (भाला) के आश्रय से चलने वाली जीविका 'इस्सत्त' (धनुर्विद्या/प्रभुता) है। इसीलिए 'आयुध-जीविका' कहा। जिसके आश्रय से उसकी जीविका है, उसे ही दिखाने के लिए 'धनुष और शक्ति' कहा गया है। ဗြဟ္မံ ဝုစ္စတိ ဝေဒေါ, တံ အဏတိ ဇာနာတီတိ ဗြာဟ္မဏော, ဇာနနဉ္စ ပေါရာဏေဟိ ဗြာဟ္မဏေဟိ ဝိဟိတနိယာမေန ဗြာဟ္မဏေဟိ ကတောပသမေန အနုဋ္ဌာနတပေန ယထာ ‘‘အာဇီဝသီလာစာရဝိပန္နော နတ္ထီ’’တိ ဗြာဟ္မဏဓမ္မိကေဟိ လောကိယပဏ္ဍိတေဟိ စ သမ္ပဋိစ္ဆိတော, တထာ ပဋိပဇ္ဇနမေဝါတိ အာဟ ‘‘ဧဝံ ဗြာဟ္မဏသမယေန…ပေ… သာဓေတွာ’’တိ. ဧဝံ သန္တေတိ ဧဝံ အာဇီဝသီလာစာရဝိပန္နဿ အဗြာဟ္မဏဘာဝေ သတိ န ဇာတိယာ ဗြာဟ္မဏော ဟောတိ, ဂုဏေဟိ ပန အာဇီဝသီလာစာရသမ္ပတ္တိသင်္ခါတေဟိ ဗြာဟ္မဏော ဟောတိ, တသ္မာ ဂုဏာနံယေဝ ဗြာဟ္မဏဘာဝကရဏတော စတုဝဏ္ဏဝိဘာဂေ ယတ္ထ ကတ္ထစိ ကုလေ ဇာတော ယော သီလာဒိဂုဏသမ္ပန္နတာယ ဂုဏဝါ, သော ဝုတ္တလက္ခဏေန နိပ္ပရိယာယတော ဗာဟိတပါပတာယ ဗြာဟ္မဏောတိ အယမေတ္ထ ဗြာဟ္မဏဘာဝေ ဉာယောတိ, ဧဝံ ဉာယံ အတ္ထတော အာပန္နံ ကတွာ. နန္တိ တမေဝ ယထာဝုတ္တံ ဉာယံ. ယော ဗြာဟ္မဏဿ သံဝဏ္ဏိတာယာတိ မာတုယာ ဥဘတောသုဇာတတာဒိကုလဝဏ္ဏေန သံဝဏ္ဏိတာယ ပသတ္ထာယ ယထာရူပါယ ဗြာဟ္မဏဿ မာတာ ဘဝိတုံ ယုတ္တာ, တထာရူပါယ မာတရိသမ္ဘူတော. ဧတေန စတုန္နံ ယောနီနံ ယတ္ထ ကတ္ထစိ ဝိသေသနိဋ္ဌာ ကတာ. တေနာဟ ‘‘တတြာပိ ဝိသေသေနာ’’တိ. ဧဝံ သာမညတော ဝိသေသနိဋ္ဌာဝသေန ‘‘ယောနိဇံ မတ္တိသမ္ဘဝ’’န္တိ ပဒဿ အတ္ထံ ဝတွာ ဣဒါနိ သာမညဇောတနံ အနာဒိယိတွာ ဝိသေသဇောတနာဝသေနေဝ အတ္ထံ ဝတ္တုံ ‘‘ယာစာယ’’န္တိအာဒိ ဝုတ္တံ. ပရိသုဒ္ဓဥပ္ပတ္တိမဂ္ဂသင်္ခါတာ ယောနိ ဝုတ္တာတိ အနုပက္ကုဋ္ဌဘာဝေန ပရိသုဒ္ဓဥပ္ပတ္တိမဂ္ဂသင်္ခါတာ ယာ စာယံ ယောနိ ဝုတ္တာတိ သမ္ဗန္ဓော. တတောပိ ဇာတသမ္ဘူတတ္တာတိ တတော ယောနိတော ဇာတတ္တာ မာတာပေတ္တိသမ္ပတ္တိတော သမ္ဘူတတ္တာ. 'ब्रह्म' वेदों को कहा जाता है, उसे जो जानता है वह 'ब्राह्मण' है। प्राचीन ब्राह्मणों द्वारा विहित नियम के अनुसार, ब्राह्मणों द्वारा किए गए उपशम और अनुष्ठान-तप के माध्यम से, जैसा कि 'आजीविका, शील और आचार से भ्रष्ट कोई (ब्राह्मण) नहीं है'—ऐसा ब्राह्मण-धार्मिकों और लौकिक पंडितों द्वारा स्वीकार किया गया है, वैसा ही आचरण करना 'इस प्रकार ब्राह्मण समय (सिद्धांत) के अनुसार... आदि सिद्ध करके' कहा गया है। ऐसा होने पर, इस प्रकार आजीविका, शील और आचार से भ्रष्ट व्यक्ति के अब्राह्मण होने पर, वह जन्म से ब्राह्मण नहीं होता है, बल्कि आजीविका और शील-आचार की संपत्ति रूपी गुणों से ब्राह्मण होता है। इसलिए गुणों के ही ब्राह्मणत्व का कारण होने से, चारों वर्णों के विभाग में जहाँ कहीं भी किसी कुल में उत्पन्न जो शील आदि गुणों से संपन्न होने के कारण गुणवान है, वह उक्त लक्षण के अनुसार साक्षात् रूप से पापों को बाहर निकाल देने के कारण 'ब्राह्मण' है—यही यहाँ ब्राह्मणत्व के विषय में न्याय (तर्क) है, इस प्रकार अर्थतः प्राप्त न्याय को करके। 'नन्ति' का अर्थ उसी यथोक्त न्याय को है। 'ब्राह्मण की प्रशंसा' से तात्पर्य है कि माता की ओर से दोनों पक्षों (माता-पिता) से सुजात होने के कारण कुल और वर्ण से प्रशंसित, जिस रूप में ब्राह्मण की माता होने के योग्य हो, वैसी माता से उत्पन्न। इससे चारों योनियों में जहाँ कहीं भी विशेष निश्चय किया गया है। इसीलिए कहा— 'वहाँ भी विशेष रूप से'। इस प्रकार सामान्य रूप से विशेष निश्चय के वश में 'योनिजं मत्तिसंभवं' पद का अर्थ कहकर, अब सामान्य अर्थ को न लेकर विशेष अर्थ को ही प्रकट करने के लिए 'याचायं' आदि कहा गया है। 'परिशुद्ध उत्पत्ति मार्ग रूपी योनि कही गई है'—इसका संबंध इस प्रकार है कि दोषरहित होने के कारण परिशुद्ध उत्पत्ति मार्ग रूपी जो यह योनि कही गई है। 'ततोपि जातसंभूतत्ता' का अर्थ है उस योनि से उत्पन्न होने के कारण और माता-पिता की संपत्ति से संभूत होने के कारण। ဝိသိဋ္ဌတ္တာတိ သမုဒါယဘူတာ မနုဿာ ရာဂါဒိနာ ဝိသိဋ္ဌတ္တာ. ရာဂါဒိနာ သဟ ကိဉ္စနေနာတိ သကိဉ္စနော. တထေဝ ရာဂါဒိသင်္ခါတေန ပလိဗောဓနဋ္ဌေန သဟ ပလိဗောဓေနာတိ သပလိဗောဓော. သဗ္ဗဂဟဏပဋိနိဿဂ္ဂေနာတိ ဥပါဒါနသင်္ခါတဿ သဗ္ဗဿ ဂဟဏဿ ပဋိနိဿဇ္ဇနေန. ယသ္မာ ဗာဟိတပါပေါ အတ္တနော သန္တာနတော ဗဟိကတပါပေါ, တသ္မာ တမဟံ ဗြူမိ ဗြာဟ္မဏန္တိ [Pg.202] အတ္ထော ဝတ္တဗ္ဗော. ဧဝရူပေါ ဧတိဿာ ကထာယ ဥပဒေသော နာနပ္ပကာရတော ဝိဘတ္တော, တသ္မာ တတ္ထ တတ္ထ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. 'विशिष्टत्वात्' का अर्थ है कि समुदाय रूप मनुष्य राग आदि के कारण विशिष्ट (अलग-अलग) हैं। राग आदि रूपी 'किंचन' (परिग्रह) के साथ होने से 'सकिंचन' है। वैसे ही राग आदि रूपी बाधा (पलिबोध) के अर्थ के साथ होने से 'सपलिबोध' है। 'सब ग्रहणों के प्रतिनिसर्ग से' का अर्थ है उपादान रूपी सभी ग्रहणों के परित्याग से। चूँकि उसने पापों को बाहर निकाल दिया है, अपने सन्तान (चित्त-प्रवाह) से पापों को दूर कर दिया है, इसलिए 'उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ'—यह अर्थ कहना चाहिए। इस प्रकार का इस कथा का उपदेश अनेक प्रकार से विभक्त है, इसलिए उसे जहाँ-तहाँ कहे गए नियमों के अनुसार ही समझना चाहिए। ၄၅၈. ဂဟိတဒဏ္ဍေသူတိ ပရေသံ ဒဏ္ဍေန ဝိဟေဌနံ အနိဓာယ အာဒိန္နဒဏ္ဍေသု. ४५८. 'गृहीतदण्डों में' का अर्थ है दूसरों को दण्ड से प्रताड़ित करने के विचार को न त्यागकर दण्ड धारण करने वालों में। ၄၅၉. ကိဉ္စိ ဂဟဏန္တိ တဏှာဂါဟာဒီသု ကိဉ္စိ ဂါဟံ. ४५९. 'किंचि ग्रहणं' का अर्थ है तृष्णा-ग्रहण आदि में से कोई भी ग्रहण। ယေန ကာမဘဝေန မာနုသကေဟိ ပဉ္စဟိ ကာမဂုဏေဟိ ယုဉ္ဇတိ, တံ မာနုသကံ ယောဂံ. ‘‘မာနုသကံ ယောဂ’’န္တိ ဧတ္ထ စ ဧကဒေသံ ဂဟေတွာ ဝုတ္တံ, ဧသ နယော ‘‘ဒိဗ္ဗယောဂ’’န္တိ ဧတ္ထာပိ. သဗ္ဗယောဂဝိသံယုတ္တန္တိ ပဒဒွယေန ဝုတ္တေဟိ သဗ္ဗကိလေသယောဂေဟိ ဝိပ္ပယုတ္တံ. जिस काम-भव के द्वारा मनुष्य पाँच काम-गुणों से जुड़ता है, वह 'मानुषिक योग' है। यहाँ 'मानुषिक योग' में एक अंश को लेकर कहा गया है, यही नियम 'दिव्य योग' में भी है। 'सब्बयोगविसंयुत्तं' इन दो पदों से कहे गए सभी क्लेश-योगों से विप्रयुक्त (अलग) को। ရတိန္တိ အဘိရတိံ အာသတ္တိံ. ကုသလဘာဝနာယာတိ ကာယဘာဝနာဒိ ကုသလဓမ္မဘာဝနာယ ဥက္ကဏ္ဌိတံ. ဝီရိယဝန္တန္တိ ဝီရိယသဗ္ဘာဝေန ဝီရံ နိဒ္ဒိသတိ, ဝီရဘာဝေါ ဟိ ဝီရိယန္တိ. 'रति' का अर्थ है अभिरति या आसक्ति। 'कुशल भावना' का अर्थ है काय-भावना आदि कुशल धर्मों की भावना से उत्कंठित। 'वीर्यवान' के द्वारा वीर्य की विद्यमानता के कारण वीर को निर्दिष्ट करता है, क्योंकि वीर होना ही वीर्य है। သုန္ဒရံ ဌာနန္တိ နိဗ္ဗာနံ. သုန္ဒရာယ ပဋိပတ္တိယာ အရိယပဋိပတ္တိယာ. 'सुन्दर स्थान' का अर्थ है निर्वाण। 'सुन्दर प्रतिपत्ति' का अर्थ है आर्य प्रतिपत्ति (आर्य अष्टांगिक मार्ग)। နိဗ္ဗတ္တိန္တိ ပရိယောသာနံ. အတီတေတိ အတီတကောဋ္ဌာသေ. ကိဉ္စနကာရကောတိ ပလိဗောဓဟေတုဘူတော. 'निब्बत्ति' का अर्थ है पर्यवसान (समाप्ति)। 'अतीत' का अर्थ है अतीत के भाग में। 'किंचनकारक' का अर्थ है बाधा (पलिबोध) का हेतु बनने वाला। အသေက္ခေ သီလက္ခန္ဓာဒိကေ မဟန္တေ ဂုဏေ. ပဉ္စန္နံ မာရာနံ ဝိဇိတတ္တာ ဝိဇိတဝိဇယံ. अशैक (अर्हत्) के शील-स्कन्ध आदि महान गुणों में। पाँच मारों को जीत लेने के कारण 'विजित-विजय' (जिसने विजय प्राप्त कर ली है)। ၄၆၀. ဣဒံ အဇာနန္တာတိ ‘‘ဇာတိယာ ဗြာဟ္မဏော’’တိ ဣဒံ လောကသမညာမတ္တန္တိ အဇာနန္တာ. ယေ ဗြာဟ္မဏေသု နာမဂေါတ္တံ နာမ တတိယံ ဒိဋ္ဌာဘိနိဝေသံ ဇနေန္တိ, သာဝ နေသံ ဒိဋ္ဌိ. ကတံ အဘိသင်္ခတန္တိ ပရိကပ္ပနဝသေနေဝ ကတံ ဌပိတံ တဒုပစိတံ, န ဟေတုပစ္စယသမာယောဂေန. သမုစ္စာတိ သမ္မုတိယာ. ကာ ပန သာ သမ္မုတီတိ အာဟ ‘‘သမညာယာ’’တိ, လောကသမညာတေနာတိ အတ္ထော. သမ္မာ ပန ပရမတ္ထတော အဇာနန္တာနံ နာမဂေါတ္တံ ဧဝံ ကပ္ပေတီတိ အာဟ ‘‘နော စေ’’တိအာဒိ. တံ ပန အသန္တမ္ပိ ပရမတ္ထတော သန္တတာယေဝ အဘိနိဝိသန္တိ, တေသမယံ ဒေါသောတိ ဒဿေတုံ ‘‘ဧဝံ ပကပ္ပိတ’’န္တိအာဒိ ဝုတ္တံ. တေနာဟ ဘဂဝါ – ‘‘ဇနပဒနိရုတ္တိံ နာဘိနိဝေသေယျာ’’တိ [Pg.203] (မ. နိ. ၃.၃၃၁). အဇာနန္တာ နောတိ ဧတ္ထ နော-သဒ္ဒေါ အဝဓာရဏတ္ထော – ‘‘န နော သမံ အတ္ထိ တထာဂတေနာ’’တိအာဒီသု (ခု. ပါ. ၆.၃) ဝိယာတိ အာဟ ‘‘အဇာနန္တာဝ ဧဝံ ဝဒန္တီ’’တိ. ४६०. इसे न जानते हुए कि 'जन्म से ब्राह्मण होना' यह केवल लोक-संज्ञा मात्र है। जो ब्राह्मणों में नाम और गोत्र के प्रति (दृष्टि-अभिनिवेश) धारणा उत्पन्न करते हैं, वही उनकी दृष्टि है। यह केवल कल्पना के वश में बनाया गया (स्थापित) और संचित किया गया है, न कि हेतु-प्रत्यय के संयोग से। 'समुच्चा' का अर्थ है सम्मति (लोक-प्रसिद्धि) से। वह सम्मति क्या है? इसके लिए कहा— 'संज्ञा से', अर्थात् लोक-संज्ञा से। जो वास्तव में परमार्थतः नहीं जानते, उनके लिए नाम-गोत्र की ऐसी कल्पना होती है, इसीलिए 'नो चे' आदि कहा गया। वह परमार्थतः असत्य होने पर भी उसे सत्य की तरह ही ग्रहण करते हैं, यह उनका दोष है—यह दिखाने के लिए 'इस प्रकार कल्पित' आदि कहा गया। इसीलिए भगवान ने कहा है— 'जनपद की निरुक्ति (बोली) में अभिनिवेश नहीं करना चाहिए'। 'अजानन्ता नो' यहाँ 'नो' शब्द अवधारण (निश्चय) के अर्थ में है—जैसे 'न नो समं अत्थि तथागतेन' आदि में, इसीलिए कहा 'न जानते हुए ही ऐसा कहते हैं'। နိပ္ပရိယာယန္တိ ဘာဝနပုံသကနိဒ္ဒေသော, နိပ္ပရိယာယေန ဥဇုကမေဝါတိ အတ္ထော, န ပုဗ္ဗေ ဝိယ ‘‘ယော ဟိ ကောစီ’’တိ ပရိယာယဝသေန. ‘‘န ဇစ္စာ’’တိ ဂါထာယ ပုဗ္ဗဒ္ဓေန ဇာတိဝါဒံ ပဋိက္ခိပန္တော ပစ္ဆိမဒ္ဓေန ကမ္မဝါဒံ ပတိဋ္ဌပေန္တော. တတ္ထာတိ တိဿံ ဂါထာယံ. ဥပဍ္ဎဂါထာယ ဝိတ္ထာရဏတ္ထန္တိ ဥပဍ္ဎဂါထာယ အတ္ထံ ဝိတ္ထာရေတုံ ‘‘ကဿကော ကမ္မုနာ’’တိ ဝုတ္တံ. တတ္ထ ပုရိမာယ စတူဟိ ပါဒေဟိ, ပစ္ဆိမေ ဒွီဟိ ဒွိန္နမ္ပိ သာဓာရဏတော အတ္ထော ဝိတ္ထာရိတော. တတ္ထ ကသိကမ္မာဒီတိ အာဒိ-သဒ္ဒေန သိပ္ပကမ္မဝါဏိဇာဒိ သင်္ဂဟော. 'निष्पर्याय' यह भाव-नपुंसक निर्देश है, इसका अर्थ है निष्पर्याय रूप से सीधे ही, न कि पहले की तरह 'जो कोई भी' जैसे पर्याय के वश में। 'न जच्चा' (न जन्म से) इस गाथा के पूर्वार्ध से जातिवाद का निषेध करते हुए और उत्तरार्ध से कर्मवाद की स्थापना करते हुए। 'वहाँ' अर्थात् उस गाथा में। 'अर्ध-गाथा के विस्तार के लिए' अर्थात् अर्ध-गाथा के अर्थ को विस्तार से बताने के लिए 'कृषक कर्म से होता है' कहा गया है। वहाँ पूर्व के चार पदों से और बाद के दो पदों से, दोनों का ही सामान्य रूप से अर्थ विस्तारित किया गया है। वहाँ 'कृषि-कर्म आदि' में 'आदि' शब्द से शिल्प-कर्म, वाणिज्य आदि का संग्रह होता है। ပဋိစ္စသမုပ္ပာဒပဓာနဝစနဝိညေယျော ပစ္စယော ပဋိစ္စသမုပ္ပာဒသဒ္ဒဿ အတ္ထော ပစ္စယုပ္ပန္နာပေက္ခာယ ဟောတီတိ အာဟ – ‘‘ဣမိနာ ပစ္စယေန ဧတံ ဟောတီ’’တိ. ယံ ပနေတ္ထ ဝတ္တဗ္ဗံ, တံ ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂေ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၅၇၀) တံသံဝဏ္ဏနာယဉ္စ (ဝိသုဒ္ဓိ. မဟာဋီ. ၂.၅၇၀) ဝုတ္တနယေန ဝေဒိတဗ္ဗံ. သမ္မာနာဝမာနာရဟကုလေတိ သမ္မာနာရဟေ ခတ္တိယာဒိကုလေ, အဝမာနာရဟေ စဏ္ဍာလာဒိကုလေ ကမ္မဝသေန ဥပပတ္တိ ဟောတိ ကမ္မဿ ဝိပစ္စမာနောကာသကရတာယ ဝိနာ တာဒိသာယ ဥစ္စနီစကုလနိဗ္ဗတ္တိယာ အဘာဝတော. အဍ္ဎဒလိဒ္ဒတာဒိ အညာပိ ဟီနပဏီတတာ. प्रतीत्यसमुत्पाद के प्रधान वचन से जानने योग्य प्रत्यय (कारण) है। प्रतीत्यसमुत्पाद शब्द का अर्थ प्रत्ययसमुत्पन्न (कार्य) की अपेक्षा से होता है, इसलिए कहा गया है - "इस प्रत्यय से यह होता है।" यहाँ जो कुछ कहना है, वह विशुद्धिमार्ग और उसकी व्याख्या (महाटीका) में कहे गए तरीके से जानना चाहिए। 'समान-अपमान के योग्य कुलों में' का अर्थ है - सम्मान के योग्य क्षत्रिय आदि कुलों में और अपमान के योग्य चण्डाल आदि कुलों में कर्म के वश से उत्पत्ति होती है, क्योंकि कर्म के विपाक के अवसर के बिना वैसी उच्च-नीच कुलों में उत्पत्ति का अभाव होता है। धनवान-दरिद्र आदि अन्य भी हीनता और श्रेष्ठता (कर्म के कारण ही होती है)। ကမ္မုနာတိ စေတ္ထ ယထာ လောကပဇာသတ္တသဒ္ဒေဟိ ဧကော ဧဝတ္ထော ဝုတ္တော, ဧဝံ သေသသဒ္ဒေဟိပိ, အဓိပ္ပာယဝိသေသော ပန တတ္ထ အတ္ထီတိ ဒဿေတုံ ‘‘ပုရိမပဒေန စေတ္ထာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. နာယံ လောကော ဗြဟ္မနိမ္မိတော ကမ္မေန ဥပ္ပဇ္ဇနတော. န ဟိ သန္နိဟိတကာရဏာနံ ဖလာနံ အညေန ဥပ္ပတ္တိဒိဋ္ဌိ ယုဇ္ဇတိ. တေနာဟ ‘‘ဒိဋ္ဌိယာ ပဋိသေဓော ဝေဒိတဗ္ဗော’’တိ. ယံ ပနေတ္ထ ဝတ္တဗ္ဗံ တံ ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂသံဝဏ္ဏနာဒီသုဝုတ္တနယေန ဝေဒိတဗ္ဗံ. တထာ လောကဿ ပဌမုပ္ပတ္တိ န ဗြဟ္မုနာတိ ‘‘ကမ္မုနာ ဟိ တာသု တာသူ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. တတိယေန ‘‘အယံ လောကော အာဒိတော ပဘုတိ ပဘဝကမ္မုနာ ဝတ္တတီ’’တိ ဝုတ္တမတ္ထံ နိဂမေတိ.ဝုတ္တဿေဝတ္ထဿ သူစနဉှိ နိဂမနံ. တံ ပန နိယမတ္ထံ ဟောတီတိ အာဟ ‘‘ကမ္မေနေဝ ဗဒ္ဓါ ဟုတွာ ပဝတ္တန္တိ, န အညထာ’’တိ[Pg.204]. စတုတ္ထေန ပဒေန. ယာယတောတိ ဂစ္ဆတော. နိဗ္ဗတ္တတောတိ နိဗ္ဗတ္တန္တဿ. ပဝတ္တတောတိ ပဝတ္တန္တဿ. 'कर्मणा' (कर्म से) यहाँ जैसे लोक, प्रजा और सत्त्व शब्दों से एक ही अर्थ कहा गया है, वैसे ही शेष शब्दों से भी; परन्तु वहाँ अभिप्राय का विशेष दिखाने के लिए "यहाँ प्रथम पद से" इत्यादि कहा गया है। यह लोक ब्रह्म-निर्मित नहीं है क्योंकि यह कर्म से उत्पन्न होता है। सन्निहित कारणों के फलों की किसी अन्य (ईश्वर आदि) से उत्पत्ति की दृष्टि (मान्यता) युक्तियुक्त नहीं है। इसीलिए कहा गया है - "दृष्टि का प्रतिषेध जानना चाहिए।" यहाँ जो कुछ कहना है वह विशुद्धिमार्ग की व्याख्या आदि में कहे गए तरीके से जानना चाहिए। वैसे ही लोक की प्रथम उत्पत्ति ब्रह्मा से नहीं है, इसलिए "कर्मणा हि तासु तासु" (कर्म से ही उन-उन में) इत्यादि कहा गया है। तीसरे (पद) से "यह लोक आदि से लेकर प्रभव-कर्म (उत्पादक कर्म) से प्रवर्तित होता है" इस कहे गए अर्थ का निगमन (निष्कर्ष) करते हैं। कहे गए अर्थ की सूचना देना ही निगमन है। वह नियम के अर्थ में होता है, इसलिए कहा - "कर्म से ही बद्ध होकर प्रवर्तित होते हैं, अन्यथा नहीं।" चौथे पद से - 'यायतो' का अर्थ है जाते हुए का, 'निब्बत्ततो' का अर्थ है उत्पन्न होते हुए का, 'पवत्ततो' का अर्थ है प्रवर्तित होते हुए का। ဓုတဓမ္မာ ဝိသေသတော တဏှာယ သန္တတ္တဝသေန ဝတ္တန္တီတိ အာဟ ‘‘တပေနာတိ ဓုတင်္ဂတပေနာ’’တိ. မေထုနဝိရတိ ဝိသေသတော ဗြာဟ္မဏာနံ ဗြဟ္မစရိယန္တိ သာ ဣဓ ဗြဟ္မစရိယေနာတိ အဓိပ္ပေတာတိ အာဟ ‘‘ဗြဟ္မစရိယေနာတိ မေထုနဝိရတိယာ’’တိ. ဧတေနာတိ ဣမိနာ ‘‘တပေနာ’’တိအာဒီဟိ စတူဟိ ပဒေဟိ ဝုတ္တေန. သေဋ္ဌေနာတိ ဥတ္တမေန. သံကိလေသဝိသုဒ္ဓိယာ ပရိသုဒ္ဓေန. ဗြဟ္မန္တိ ဗြဟ္မဘာဝံ သေဋ္ဌဘာဝံ. သော ပနေတ္ထ အတ္ထတော ဗြာဟ္မဏဘာဝေါတိ အာဟ ‘‘ဗြာဟ္မဏဘာဝံ အာဝဟတီ’’တိ. धुतधर्म विशेष रूप से तृष्णा के संताप के वश में (उसे शांत करने के लिए) प्रवर्तित होते हैं, इसलिए कहा - "तप से अर्थात् धुताङ्ग रूपी तप से।" मैथुन से विरति विशेष रूप से ब्राह्मणों का ब्रह्मचर्य है, वह यहाँ 'ब्रह्मचर्येण' पद से अभिप्रेत है, इसलिए कहा - "ब्रह्मचर्य से अर्थात् मैथुन-विरति से।" 'एतेन' (इससे) अर्थात् इन 'तपेन' आदि चार पदों से कहे गए (साधनों) से। 'सेट्ठेन' (श्रेष्ठ से) अर्थात् उत्तम से। संक्लेश की विशुद्धि से परिशुद्ध (साधन) से। 'ब्रह्म' अर्थात् ब्रह्म-भाव या श्रेष्ठ-भाव। वह यहाँ अर्थतः ब्राह्मण-भाव है, इसलिए कहा - "ब्राह्मण-भाव को प्राप्त कराता है।" ဗြဟ္မာ စ သက္ကော စာတိ သက္ကဂရုကာနံ သက္ကော သက္ကေနပိ ဂရုကာတဗ္ဗတော, ဗြဟ္မဂရုကာနံ ဗြဟ္မာ ဗြဟ္မုနာပိ ဂရုကာတဗ္ဗတော. ဝိဇာနတန္တိ ပရမတ္ထဗြာဟ္မဏဿ ဝိသေသံ ဇာနန္တာနံ ဝိညူနံ. အဝိညုနော ဟိ အပ္ပမာဏံ. တေနာဟ – ‘‘ပဏ္ဍိတာန’’န္တိ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. 'ब्रह्मा और शक्र' - शक्र को गुरु मानने वालों के लिए शक्र (आदरणीय है), क्योंकि शक्र के द्वारा भी (परमार्थ ब्राह्मण) आदरणीय है; ब्रह्मा को गुरु मानने वालों के लिए ब्रह्मा (आदरणीय है), क्योंकि ब्रह्मा के द्वारा भी (परमार्थ ब्राह्मण) आदरणीय है। 'विजानतं' (जानने वालों के लिए) अर्थात् परमार्थ ब्राह्मण की विशेषता को जानने वाले विद्वानों के लिए। क्योंकि अज्ञानियों के लिए (इसका) कोई प्रमाण नहीं है। इसीलिए कहा - "पण्डितों के लिए।" शेष सुविज्ञ (आसानी से समझने योग्य) ही है। ဝါသေဋ္ဌသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. वासेट्ठ सुत्त की व्याख्या की लीनत्थप्पकासना (गूढ़ार्थ प्रकाशिनी टीका) समाप्त हुई। ၉. သုဘသုတ္တဝဏ္ဏနာ ९. सुभ सुत्त की व्याख्या। ၄၆၂. တုဒိသညာတော ဂါမော နိဂမော ဧတဿာတိ တောဒေယျော, တဿ အတ္တဇော တောဒေယျပုတ္တောတိ အာဟ ‘‘တုဒိဂါမာ’’တိအာဒိ. အာရာဓကောတိ သံရာဓကော. ဓမ္မနိသန္တိ ယသ္မာ သမ္ပာဒနေန ပရိပူရဏေန ဣစ္ဆိတာ, တသ္မာ ဝုတ္တံ ‘‘သမ္ပာဒကော ပရိပူရကော’’တိ. ဉာယတိ နိစ္ဆယေန ဂမေတိ နိဗ္ဗာနံ, တံ ဝါ ဉာယတိ ပဋိဝိဇ္ဈီယတိ ဧတေနာတိ ဉာယော, တတော ဧတဿ သမ္ပာဒကဟေတုဘာဝတော ဉာယော ဓမ္မော အရိယမဂ္ဂေါ တံ ဉာယံ ဓမ္မံ. တေနာဟ ‘‘ကာရဏဓမ္မ’’န္တိ. အနဝဇ္ဇန္တိ အဝဇ္ဇပဋိပက္ခံ. ४६२. 'तुदि' नाम का गाँव या निगम जिसका है, वह 'तोदेय्य' है, उसका पुत्र 'तोदेय्यपुत्त' है, इसलिए कहा - "तुदि गाँव से" इत्यादि। 'आराधक' का अर्थ है संराधक (सिद्ध करने वाला)। 'धम्मनीस' क्योंकि सम्पादन (पूरा करने) से इच्छित वस्तुओं की परिपूर्णता होती है, इसलिए कहा गया - "सम्पादक, परिपूरक।" 'न्याय' (निश्चय) से जाना जाता है या निर्वाण को प्राप्त कराता है, अथवा इसके द्वारा (निर्वाण) जाना जाता है या प्रतिवेध किया जाता है, इसलिए यह 'न्याय' है; उस (निर्वाण) के सम्पादक हेतु होने के कारण 'न्याय धर्म' आर्यमार्ग है, उस न्याय धर्म को। इसीलिए कहा - "कारण धर्म को।" 'अनवज्ज' (निर्दोष) का अर्थ है 'अवज्ज' (दोषयुक्त) का प्रतिपक्ष। ၄၆၃. ဝဋ္ဋစာရကတော နိယျာတီတိ နိယျာနိကံ ဤကာရဿ ရဿတ္တံ ယ-ကာရဿ စ က-ကာရံ ကတွာ. နိယျာနေ ဝါ နိယုတ္တံ, နိယျာနံ သီလန္တိ ဝါ နိယျာနိကံ, တပ္ပဋိပက္ခတော အနိယျာနိကံ. သာ ပန အတ္ထတော အကုသလကိရိယာတိ အာဟ ‘‘အကုသလပဋိပဒ’’န္တိ. ४६३. जो संसार चक्र से बाहर निकालता है, वह 'नैर्याणिक' है - यहाँ 'ई' कार को ह्रस्व और 'य' कार को 'क' कार करके (शब्द बना है)। अथवा जो निर्याण (मुक्ति) में नियुक्त है, या जिसका स्वभाव निर्याण है, वह 'नैर्याणिक' है; उसके विपरीत 'अनैयाणिक' है। वह अर्थतः अकुशल प्रतिपदा (गलत मार्ग) है, इसलिए कहा - "अकुशल प्रतिपदा।" ဗဟုဘာဝဝါစကော [Pg.205] ဣဓ မဟာသဒ္ဒေါ ‘‘မဟာဇနော’’တိအာဒီသုဝိယာတိ အာဟ ‘‘မဟန္တေဟိ ဗဟူဟီ’’တိ. အတ္ထောတိ ပယောဇနံ. မဟန္တာနီတိ ဗဟုလာနိ. ကိစ္စာနီတိ ကာတဗ္ဗာနိ. အဓိကရဏာနီတိ အဓိကာရဇီဝိကာရူပါနိ. ဃရာဝါသကမ္မမေဝ ပဉ္စဗလိကရဏဒသအတ္ထဋ္ဌာနဘာဝတော လောကယာတြာယ စ သမ္ပဝတ္တိဋ္ဌာနဘာဝတော ဇီဝိတဝုတ္တိယာ ဝါ ဟေတုဘာဝတော ဃရာဝါသကမ္မဋ္ဌာနံ. यहाँ 'महा' शब्द 'महाजन' आदि की तरह बहुत्व (अधिकता) का वाचक है, इसलिए कहा - "महान् (अधिक) बहुतों के द्वारा।" 'अत्थो' का अर्थ प्रयोजन है। 'महान्तानि' का अर्थ बहुत अधिक है। 'किच्चानि' का अर्थ करने योग्य कार्य हैं। 'अधिकरणानि' का अर्थ अधिकार, जीविका के रूप हैं। गृहस्थ जीवन के कार्य ही पाँच बलि (यज्ञ) करने और दस अर्थ-स्थानों के होने से, लोक-यात्रा के प्रवर्तन का स्थान होने से, अथवा जीवन वृत्ति का हेतु होने से 'घर-आवास कर्मस्थान' (गृहस्थी के कार्य) हैं। ‘‘အပ္ပကေနပိ မေဓာဝီ, ပါဘတေန ဝိစက္ခဏော; သမုဋ္ဌာပေတိ အတ္တာနံ, အဏုံ အဂ္ဂိံဝ သန္ဓမ’’န္တိ. (ဇာ. ၁.၁.၄); "बुद्धिमान और चतुर व्यक्ति थोड़े से भी साधन (पूँजी) से अपने आप को वैसे ही ऊपर उठा लेता है, जैसे फूँक मारकर छोटी सी अग्नि को (प्रज्वलित कर लिया जाता है)।" ဂါထာယ ဝုတ္တနယေန စူဠန္တေဝါသိကဿ ဝိယ. गाथा में कहे गए तरीके से, जैसे 'चूळन्तेवासिक' (छोटे शिष्य) के विषय में (कहा गया है)। ၄၆၄. အယောနိသော ပဝတ္တိတံ ဝါဏိဇ္ဇကမ္မံ ဝိယ အပါယဘူတံ ကသိကမ္မံ နိဒဿနဘာဝေ ဌပေတွာ အယောနိသောမနသိကရဏဝသေန ပဝတ္တံ ဃရာဝါသကိစ္စံ သန္ဓာယာဟ – ‘‘ယထာ ကသိ…ပေ… ဧဝံ ဃရာဝါသကမ္မဋ္ဌာနမ္ပီ’’တိ. ဗြာဟ္မဏဘတ္တော အဟောသီတိ သော ကိရ ဗဟူ ဗြာဟ္မဏေ ဓနံ ဒတွာ ယညံ ကာရေသိ. ဥပရီတိ ‘‘ဥပရိ ဥပဋ္ဌာတီတိ ဝဒေဟီ’’တိ ဗြာဟ္မဏေဟိ အတ္တနော သမယေန အာစိက္ခာပိတောပိ ယထာ ဥပဋ္ဌိတမေဝ ကထေတွာ ကာလံ ကတွာ နိရယေ နိဗ္ဗတ္တော, အထ ဗြာဟ္မဏာ – ‘‘ဣမိနာ အမှာကံ ယညေ ဒေါသော ဒိန္နော’’တိ ကုဇ္ဈိတွာ တဿ ကဠေဝရံ သုသာနံ နေတုံ နာဒံသု. အထဿ ဉာတကေဟိ သဟဿေ ဒိန္နေ တံ သဟဿံ ဂဟေတွာ ဂေဟတော နီဟရိတုံ အဒံသု. ကဿပသမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓကာလေ ဆတ္တိံသ ဣတ္ထိယော ‘‘ဧကာ ဝတ္ထံ အဒါသိ, ဧကာ ဂန္ဓံ, ဧကာ သုမနမာလ’’န္တိအာဒိနာ တံ တံ ဒါနမယံ ပုညံ ကတွာ အာယုပရိယောသာနေ တာဝတိံသဘဝနေ သက္ကဿ ဒေဝရညော ပရိစာရိကာ ဟုတွာ နိဗ္ဗတ္တိံသု သဟဿအစ္ဆရာပရိဝါရိကာ, သက္ကဿ ဒေဝရညော ဝေဇယန္တရထံ ပေသေတွာ ပက္ကောသာပိတေန ဂုတ္တိလာစရိယဘူတေန မဟာဗောဓိသတ္တေန ပုစ္ဆိတာ တံ တံ အတ္တနာ ကတံ ပုညံ ဗျာကရိံသု. တံ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ ‘‘သကလာယ ဂုတ္တိလဝိမာနကထာယ ဒီပေတဗ္ဗ’’န္တိ. ဝဏိဇ္ဇကမ္မဋ္ဌာနံ ဝိပဇ္ဇမာနန္တိ ဧတ္ထ တဿ ဝိပဇ္ဇမာနာကာရော ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တော. ဧဝံ ပဗ္ဗဇ္ဇကမ္မဋ္ဌာနမ္ပိ ဝိပဇ္ဇမာနံ အပ္ပဖလံ ဟောတီတိ အာနေတွာ သမ္ဗန္ဓော. သီလေသု အပရိပူရကာရိနောတိအာဒိ တဿ ဝိပဇ္ဇနာကာရဒဿနံ. ဈာနာဒိသုခန္တိ ဧတ္ထ အာဒိ-သဒ္ဒေန အဘိညာဝိပဿနာဒိသုခဿ ဝိယ သဗြဟ္မစာရီဟိ သဒ္ဓိံ သီလသမ္ပဒါဒိသုခဿ [Pg.206] သင်္ဂဟော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. အရဟတ္တမ္ပိ ပါပုဏာတိ ပဂေဝ သေက္ခပုထုဇ္ဇနသမ္ပတ္တိယောတိ အဓိပ္ပာယော. ४६४. अनुचित रूप से प्रवर्तित व्यापार के समान अपायभूत कृषि-कर्म को उदाहरण के रूप में रखकर, अयोनिसो मनसिकार के वश में प्रवर्तित गृहस्थ जीवन के कार्यों के संदर्भ में कहा गया है - 'जैसे कृषि... पे... वैसे ही गृहस्थ-कर्मस्थान भी'। 'ब्राह्मणभक्त था' - वह कहते हैं कि उसने बहुत से ब्राह्मणों को धन देकर यज्ञ कराया। 'ऊपर' - 'ऊपर सेवा करता है, ऐसा कहो' - ब्राह्मणों द्वारा अपने समय (सिद्धांत) के अनुसार सिखाए जाने पर भी, जैसा उपस्थित था वैसा ही कहकर काल (मृत्यु) प्राप्त कर नरक में उत्पन्न हुआ। तब ब्राह्मणों ने - 'इसने हमारे यज्ञ में दोष दिया है' - ऐसा क्रोधित होकर उसके शव को श्मशान ले जाने नहीं दिया। तब उसके रिश्तेदारों द्वारा हजार (मुद्राएं) देने पर, उस हजार को लेकर घर से बाहर निकालने दिया। कस्सप सम्यक्सम्बुद्ध के काल में छत्तीस स्त्रियों ने 'एक ने वस्त्र दिया, एक ने गंध, एक ने सुमन-माला' इत्यादि प्रकार से वह-वह दानमय पुण्य करके आयु के अंत में तावतिंस भवन में शक्र देवराज की परिचारिका होकर उत्पन्न हुईं, जो हजार अप्सराओं के परिवार वाली थीं। शक्र देवराज के वैजयन्त रथ को भेजकर बुलाए गए गुत्तिल आचार्य रूपी महाबोधिसत्व द्वारा पूछे जाने पर उन्होंने अपने द्वारा किए गए उस-उस पुण्य की व्याख्या की। उसी के संदर्भ में कहा गया है - 'संपूर्ण गुत्तिल विमान कथा द्वारा स्पष्ट किया जाना चाहिए'। 'व्यापार-कर्मस्थान विफल होता हुआ' - यहाँ उसके विफल होने का प्रकार नीचे कहा गया है। इसी प्रकार प्रव्रज्या-कर्मस्थान भी विफल होता हुआ अल्प फल वाला होता है - ऐसा लाकर संबंध है। 'शीलों में अपरिपूर्णकारी' इत्यादि उसके विफल होने के प्रकार का दर्शन है। 'ध्यानादि सुख' - यहाँ 'आदि' शब्द से अभिज्ञ-विपश्यना आदि के सुख के समान ही सब्रह्मचारियों के साथ शील-संपदा आदि के सुख का संग्रह देखना चाहिए। 'अर्हत्व को भी प्राप्त करता है, शैक्ष-पृथग्जन संपत्ति की तो बात ही क्या' - यह अभिप्राय है। စာဂသီသေနာတိ ပဓာနဘူတေန စာဂေန ဒါနေန တံ အဝဿယံ ကတွာ. ဧတ္ထ တေ န ကောစိ အဖာသုကဘာဝေါတိ. ဥဇုကံ ကတွာ အဝိရုဒ္ဓံ ကတွာ, သမ္ပယောဇေတွာတိ အတ္ထော. တပစရိယန္တိ အဂ္ဂိပရိစရဏံ, တပစရိယဉ္စ ဗြဟ္မစရိယဂ္ဂဟဏာ ဒုဋ္ဌုလ္လဘာဝတော. 'त्याग की प्रधानता से' - प्रधानभूत त्याग (दान) के द्वारा उसे आश्रय बनाकर। 'यहाँ तुम्हें कोई असुविधा नहीं है'। 'सीधा करके' अर्थात् अविरुद्ध करके, संयुक्त करके - यह अर्थ है। 'तपचर्या' अर्थात् अग्नि की परिचर्या, और तपचर्या का ग्रहण ब्रह्मचर्य के ग्रहण से (अलग है) क्योंकि वह दुष्टता (स्थूलता) के कारण है। ၄၆၆. အဇာနနဘာဝန္တိ အသဗ္ဗညုဘာဝံ. ဘဂဝတော ပန သဗ္ဗညုဘာဝေါ သဒေဝကေ လောကေ ဇလတလေ ပက္ခိတ္တတေလံ ဝိယ ပတ္ထရိတွာ ဌိတော, န မေ ဣဒံ ပတိရူပံ, တတော ပရိဝတ္တိဿာမီတိ ‘‘ဗြာဟ္မဏော, ဘော, ဂေါတမာ’’တိအာဒိမာဟ. ပစ္စာဟရိတုံ ပဋိပက္ခေန အပဟရိတုံ. သေတပေါက္ခရသဒိသောတိ ပုဏ္ဍရီကပတ္တသဒိသဝဏ္ဏော. သုဝဋ္ဋိတာတိ ဝဋ္ဋဘာဝယုတ္တဋ္ဌာနေ သုဝဋ္ဋာ. နာမကံယေဝါတိ နာမမတ္တမေဝ ဝစနမတ္တမေဝ. တထာဘူတာနံ ဘာဝဿပိ အဘာဝေန နိဟီနံ နာမ ဟောတိ, နာမ-သဒ္ဒေါ နိဟီနပရိယာယော. တေနာဟ – ‘‘လာမကံယေဝါ’’တိ. ४६६. 'अज्ञान भाव' अर्थात् असर्वज्ञ भाव। भगवान का सर्वज्ञ भाव तो देवलोक सहित संसार में जल की सतह पर डाले गए तेल के समान फैला हुआ स्थित है, 'यह मेरे लिए उचित नहीं है, उससे मैं लौटूँगा' - ऐसा सोचकर 'हे गौतम, ब्राह्मण' इत्यादि कहा। 'वापस लेने के लिए' अर्थात् प्रतिपक्ष द्वारा दूर करने के लिए। 'श्वेत कमल के समान' अर्थात् पुण्डरीक के पत्ते के समान वर्ण वाला। 'सुवर्तित' अर्थात् गोल होने योग्य स्थानों पर भली-भांति गोल। 'नाम मात्र ही' अर्थात् केवल नाम मात्र, केवल वचन मात्र। तथाभूत भाव के भी अभाव के कारण वह 'हीन' नाम वाला होता है, 'नाम' शब्द हीन का पर्यायवाची है। इसीलिए कहा - 'तुच्छ ही'। ၄၆၇. ကတမာ ဝါစာ တေသံ သေယျောတိ တေသံ စင်္ကိယာဒီနံ ဗြာဟ္မဏမဟာသာလာနံ ဝုစ္စမာနဝိဘာဂါသု ဝါစာသု ကတမာ ဝါစာ သေယျောတိ. ‘‘သေယျာ’’တိ လိင်္ဂဝိပလ္လာသေန ဝုတ္တံ. သမ္မုတိယာတိ အဝိလင်္ဃိတသာဓုမရိယာဒါယ လောကသမ္မုတိယာ. တေနာဟ ‘‘လောကဝေါဟာရေနာ’’တိ. မန္တာတိ မန္တာသင်္ခါတာယ ပညာယ မန္တေတွာ ဇာနိတွာ. တေနာဟ ‘‘တုလယိတွာ’’တိ. အတ္ထသံဟိတန္တိ ဟေတုသဉှိတံ. တံ ပန ဧကံသတော ယုတ္တိယုတ္တံ ဟောတီတိ အာဟ – ‘‘ကာရဏနိဿိတ’’န္တိ. အာဝုတောတိအာဒီသု အာဒိတော အဘိမုခံ ဉာဏဂတိယာ ဝိဗန္ဓနေန အာဝုတော, အာဝရိယေန ဝိသေသတော ဉာဏဂတိယာ နိဗန္ဓနေန နိဝုတော, ဧဝံ ဩဖုဋော ပလိဂုဏ္ဌိတော. ပရိယောနဒ္ဓေါတိ သမန္တတော ဩနဒ္ဓေါ ဆာဒိတော. တေနာဟ ‘‘ပလိဝေဌိတော’’တိ. ४६७. 'उनकी कौन सी वाणी श्रेष्ठ है' - उन चंकी आदि ब्राह्मण महाशालों की कही जाने वाली विभिन्न वाणियों में से कौन सी वाणी श्रेष्ठ है। 'सेय्या' (श्रेष्ठ) यह लिंग-विपर्यास के साथ कहा गया है। 'सम्मति से' अर्थात् उल्लंघन न की गई श्रेष्ठ मर्यादा वाली लोक-सम्मति से। इसीलिए कहा 'लोक-व्यवहार से'। 'मन्ता' अर्थात् मन्ता नामक प्रज्ञा से विचार कर, जानकर। इसीलिए कहा 'तौलकर'। 'अर्थ-संहित' अर्थात् हेतु-संहित। वह निश्चित रूप से युक्ति-युक्त होता है, इसलिए कहा - 'कारण-निश्रित'। 'आवृत्त' इत्यादि में, आदि से सामने ज्ञान की गति में बाधा के कारण 'आवृत्त' है, आवरण से विशेष रूप से ज्ञान की गति के बंधन के कारण 'निवृत्त' है, इस प्रकार ढका हुआ, लिपटा हुआ है। 'परियोनद्ध' अर्थात् सब ओर से ढका हुआ, आच्छादित। इसीलिए कहा 'लपेटा हुआ'। ၄၆၈. သစေ ဧတံ ကာရဏမတ္ထီတိ ‘‘နိဿဋ္ဌတိဏကဋ္ဌုပါဒါနော အဂ္ဂိ ဇလတီ’’တိ ဧတံ ကာရဏံ သစေ အတ္ထိ ယဒိ သိယာ, သော အပရော တိဏကဋ္ဌုပါဒါနော အဂ္ဂိ ယဒိ ဘဝေယျ. သဒေါသော သာဒီနဝေါ သပရိက္ကိလေသော. ပရိသုဒ္ဓေါတိ ဥပက္ကိလေသာဘာဝေန သဗ္ဗသော သုဒ္ဓေါ. ဇာတိ အာဒီနံ အဘာဝေနာတိ ဇာတိပစ္စယာနံ ကမ္မကိလေသာနံ နိဂ္ဂမေန. ४६८. 'यदि यह कारण है' - 'घास और लकड़ी के ईंधन के बिना अग्नि जलती है' - यदि यह कारण हो, यदि ऐसा हो, तो वह दूसरा घास और लकड़ी के ईंधन वाला अग्नि यदि हो। 'सदोष' अर्थात् दोष सहित, आदिम (खतरे) सहित, परिक्लेश सहित। 'परिशुद्ध' अर्थात् उपक्लेशों के अभाव के कारण पूर्णतः शुद्ध। 'जाति आदि के अभाव से' अर्थात् जाति के प्रत्यय रूपी कर्म-क्लेशों के निकल जाने से। ၄၆၉. န [Pg.207] နိစ္စလာ တိဋ္ဌန္တီတိ တတ္ထ ပက္ခိပိတဗ္ဗဿ လဗ္ဘမာနတ္တာ ယထာပညတ္တံ ဟုတွာ နိစ္စလာ အကမ္ပိယာ န တိဋ္ဌန္တိ. တံ ဒေါသံ တံ ဦနတာဒေါသံ. ४६९. 'निश्चल नहीं ठहरते' - वहाँ डाले जाने वाले (पदार्थ) के प्राप्त होने के कारण, जैसा प्रज्ञप्त है वैसा होकर निश्चल और अकंपित नहीं ठहरते। 'उस दोष को' अर्थात् उस न्यूनता के दोष को। အညသ္မိံ အသတီတိ အတ္ထဘဉ္ဇကမုသာဝါဒေ အသတိ. သော ဟိ အတ္တနော သန္တကဿ အဒါတုကာမတာဒိဝသေန ပဝတ္တဿ အကမ္မပထပ္ပတ္တဿ မုသာဝါဒဘာဝဿ ဝိပရီတော အညော ဣဓ အဓိပ္ပေတော. တထာ ဟိ ဣတရော ယေဘုယျေန ဝဠဉ္ဇိတဗ္ဗတော ဝေါဟရိတဗ္ဗတော ဝဠဉ္ဇကမုသာဝါဒေါတိ အာဟ. န ကဒါစိ မုသာဝါဒီတိ ဒွေ ကထာ န ကထေန္တိ. ဗာဟိရကာနံ အနဝဇ္ဇတပသမ္မတာယပိ နိဿိတောတိ ဝတ္တုံ အာဟ ‘‘သီလဝါ တပနိဿိတကော ဟောတိ’’တိ. ဝိဝဋမုခါ မန္တဇ္ဈေနမဏ္ဍိတာ သဗ္ဗသော သဇ္ဈာယာ ဟောန္တိ, န ဣတရေတိ အာဟ ‘‘ပဗ္ဗဇိတာ နိစ္စံ သဇ္ဈာယန္တီ’’တိ. 'दूसरे के न होने पर' - अर्थ-भंजक मृषावाद के न होने पर। वह अपने पास की वस्तु को न देने की इच्छा आदि के वश में प्रवृत्त, अकर्मपथ को प्राप्त मृषावाद के विपरीत, यहाँ दूसरा अभिप्रेत है। क्योंकि दूसरा प्रायः व्यवहार में आने के कारण 'व्यवहारिक मृषावाद' कहा जाता है। 'कभी झूठ नहीं बोलने वाले' अर्थात् दो बातें नहीं कहते। बाह्य (मतों) के निर्दोष तप के रूप में सम्मत होने पर भी 'आश्रित' है, यह कहने के लिए कहा - 'शीलवान तप-निश्रित होता है'। खुले मुख वाले, मंत्रों के अध्ययन से अलंकृत, पूर्णतः स्वाध्याय करने वाले होते हैं, दूसरे नहीं - इसलिए कहा 'प्रव्रजित नित्य स्वाध्याय करते हैं'। ၄၇၀. စိရံ နိက္ခန္တောတိ နိဂ္ဂတော ဟုတွာ စိရကာလေ. န သဗ္ဗသော ပစ္စက္ခာ ဟောန္တိ သတိသမ္မောဟတော မဂ္ဂါနဉ္စ အညထာ ကရဏတော. စိရာယိတတ္တန္တိ ‘‘အယံ မဂ္ဂေါ’’တိ ကထနဿ စိရာယနံ. ဝိတ္ထာယိတတ္တန္တိ အသပ္ပဋိဘာနံ. တံ ပန သဥပမာဟ ဒဿေတုံ ‘‘ယထာ’’တိအာဒိ ဝုတ္တံ. ४७०. 'चिर काल से निकला हुआ' - निकलकर लंबे समय के बाद। स्मृति के सम्मोह के कारण और मार्गों को अन्यथा कर देने के कारण वे पूर्णतः प्रत्यक्ष नहीं होते। 'देर करना' अर्थात् 'यह मार्ग है' ऐसा कहने में विलंब करना। 'विस्तार करना' अर्थात् अप्रतिभान। उसे उपमा के साथ दिखाने के लिए 'जैसे' इत्यादि कहा गया है। ဗလသမ္ပန္နောတိ ကာယဗလေန သမန္နာဂတော. ပမာဏကတံ ကမ္မံ နာမ ပမာဏကရာနံ ရာဂါဒိကိလေသာနံ အဝိက္ခမ္ဘိတတ္တာ ‘‘ပမာဏကတံ ကမ္မံ နာမ ကာမာဝစရ’’န္တိ အာဟ, တေသံ ပန ဝိက္ခမ္ဘိတတ္တာ ဝုတ္တံ ‘‘အပ္ပမာဏကတံ ကမ္မံ နာမ ရူပါရူပါဝစရ’’န္တိ. တတ္ထာပိ ဝိသေသတော အပ္ပမညာဘာဝနာ သမ္ဘဝတီတိ အာဟ ‘‘တေသုပီ’’တိအာဒိ. နိရီဟကတ္တာ ယထာ အပ္ပမာဏသမညာ လဗ္ဘတိ, တံ ဒဿေတုံ ‘‘ပမာဏံ…ပေ… ဝုစ္စတီ’’တိ အာဟ. န ဩဟီယတိ န တိဋ္ဌတီတိ ကတူပစိတမ္ပိ ကာမာဝစရကမ္မံ ယထာဓိဂတေ မဟဂ္ဂတဇ္ဈာနေ အပရိဟီနေ တံ အဘိဘဝိတွာ အာသီဒေတွာ ပဿေ ဩဟီယကံ ကတွာ ပဋိသန္ဓိံ ဒါတုံ သမတ္ထဘာဝေန န တိဋ္ဌတိ. လဂ္ဂိတုန္တိ အာဝရိတုံ. ဌာတုန္တိ ပတိဋ္ဌာတုံ. ဖရိတွာတိ ပဋိပ္ဖရိတွာ. ပရိယာဒိယိတွာတိ တဿ သာမတ္ထိယံ ခေပေတွာ. ကမ္မဿ ပရိယာဒိယနံ နာမ ဝိပါကုပ္ပာဒဗန္ဓနမေဝါတိ အာဟ – ‘‘တဿ ဝိပါကံ ပဋိဗာဟိတွာ’’တိ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. "बलसम्पन्न" का अर्थ है कायिक बल से युक्त। "प्रमाणकृत कर्म" का अर्थ है कामावचर कर्म, क्योंकि राग आदि क्लेशों का दमन (विक्खम्भन) नहीं हुआ है। उनके दमन होने पर "अप्रमाणकृत कर्म" रूपावचर और अरूपावचर कर्म कहे जाते हैं। वहाँ भी विशेष रूप से अप्रमाण (ब्रह्मविहार) भावना संभव होती है, इसलिए "तेसुपि" आदि कहा गया है। निरीहता के कारण जैसे अप्रमाण संज्ञा प्राप्त होती है, उसे दिखाने के लिए "प्रमाणं...पे... वुच्चति" कहा गया है। "न ओहीयति न तिट्ठति" का अर्थ है कि किया हुआ और संचित किया हुआ कामावचर कर्म भी, यथाप्राप्त महग्गत ध्यान के अपरिहीण (नष्ट न होने) पर, उसे अभिभूत कर, दबाकर और पीछे छोड़कर प्रतिसन्धि देने में समर्थ होकर नहीं ठहरता। "लग्गितुं" का अर्थ है रोकना। "ठातुं" का अर्थ है प्रतिष्ठित होना। "फरित्वा" का अर्थ है व्याप्त होकर। "परियादियित्वा" का अर्थ है उसकी सामर्थ्य को समाप्त करके। कर्म का परियादियन (समाप्त करना) उसके विपाक की उत्पत्ति के बन्धन को ही कहा गया है - "उसके विपाक को रोककर"। शेष सुविज्ञेय ही है। သုဘသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. सुभ सुत्त की व्याख्या के लीनत्थप्पकासना (गूढ़ अर्थ का प्रकाशन) समाप्त हुई। ၁၀. သင်္ဂါရဝသုတ္တဝဏ္ဏနာ १०. सङ्गारव सुत्त की व्याख्या। ၄၇၃. အဘိပ္ပသန္နာတိ [Pg.208] အဘိသမေစ္စ ပသန္နာ. တေနာဟ – ‘‘အဝေစ္စပ္ပသာဒဝသေန ပသန္နာ’’တိ. ဗြာဟ္မဏီ ဝိဂတမလမစ္ဆေရတာယ ‘‘တုယှံ ဒေယျဓမ္မံ ရုစ္စနကဋ္ဌာနေ ဒေဟီ’’တိ အာဟ. မဂ္ဂေနေဝ ဟိဿာ မစ္ဆရိယဿ ပဟီနတ္တာ ဗုဒ္ဓပက္ခဗြာဟ္မဏပက္ခဝသေန ဥဘတောပက္ခိကာ. ४७३. "अभिप्पसन्ना" का अर्थ है पूर्णतः जानकर प्रसन्न (श्रद्धावान)। इसीलिए कहा गया है - "अवेच्चप्पसाद (अचल श्रद्धा) के वश से प्रसन्न"। ब्राह्मणी ने मत्सर (कंजूसी) के मल से रहित होने के कारण कहा - "अपनी दान की वस्तु को जहाँ तुम्हें अच्छा लगे, वहाँ दो"। मार्ग (आर्य मार्ग) के द्वारा ही उसके मात्सर्य का प्रहाण हो जाने से वह बुद्ध पक्ष और ब्राह्मण पक्ष, दोनों पक्षों वाली थी। ကိံသူတိ ကိန္တိ ပုစ္ဆာဝစနံ. ဆေတွာ အနာဒိယိတွာ ဝိနာသေတွာ. သုခံ သေတီတိ စိတ္တသန္တာပါဘာဝေန သုခေန သုပတိ. န သောစတီတိ တတော ဧဝ သောကံ နာမ ဝိနာသေတိ. ကောဓန္တိ ကုဇ္ဈနလက္ခဏံ ကောဓံ. ဆေတွာ သမုစ္ဆိန္ဒိတွာ. သုခံ သေတီတိ ကောဓပရိဠာဟေန အပရိဍယှမာနတ္တာ သုခံ သုပတိ. ကောဓဝိနာသေန ဝိနဋ္ဌဒေါမနဿတ္တာ န သောစတိ. ဝိသမူလဿာတိ ဒုက္ခဝိပါကဿ. မဓုရဂ္ဂဿာတိ အက္ကောသကဿ ပစ္စက္ကောသနေန, ပဟာရကဿ ပဋိပ္ပဟရဏေန ယံ သုခံ ဥပ္ပဇ္ဇတိ, တံ သန္ဓာယေဝ ‘‘မဓုရဂ္ဂေါ’’တိ ဝုတ္တော. ဣမသ္မိဉှိ ဌာနေ ပရိယောသာနံ ‘‘အဂ္ဂ’’န္တိ ဝုတ္တံ. အရိယာတိ ဗုဒ္ဓါဒယော အရိယာ. "किंसु" यह "किं" (क्या) प्रश्नवाचक शब्द है। "छेत्वा" का अर्थ है अनादर कर, विनाश कर। "सुखं सेति" का अर्थ है चित्त के संताप के अभाव के कारण सुखपूर्वक सोता है। "न सोचति" का अर्थ है उसी कारण से शोक का विनाश करता है। "कोधं" का अर्थ है क्रोध, जिसका लक्षण कुपित होना है। "छेत्वा" का अर्थ है समूल नष्ट कर। "सुखं सेति" का अर्थ है क्रोध के परिदाह से न जलने के कारण सुखपूर्वक सोता है। क्रोध के विनाश से दौर्मनस्य के नष्ट हो जाने के कारण शोक नहीं करता। "विषमूलस्य" का अर्थ है दुःख रूपी विपाक वाला। "मधुरग्गस्य" का अर्थ है गाली देने वाले को प्रति-गाली देने से, प्रहार करने वाले को प्रति-प्रहार करने से जो सुख उत्पन्न होता है, उसी के सन्दर्भ में "मधुरग्ग" (मधुर अग्र वाला) कहा गया है। यहाँ "अग्र" शब्द का अर्थ "पर्यवसान" (अन्त) कहा गया है। "अरिया" का अर्थ है बुद्ध आदि आर्य। ပဉှံ ကထေသီတိ ဗြာဟ္မဏော ကိရ စိန္တေသိ – ‘‘သမဏော ဂေါတမော လောကပူဇိတော, န သက္ကာ ယံ ဝါ တံ ဝါ ဝတွာ သန္တဇ္ဇေတုံ, ဧကံ သဏှပဉှံ ပုစ္ဆိဿာမီ’’တိ. သော ဧကံ ပုစ္ဆာဂါထံ အဘိသင်္ခရိတွာ ‘‘သစေ အသုကဿ နာမ ဝဓံ ရောစေမီတိ ဝက္ခတိ, ယေ တုယှံ န ရုစ္စန္တိ, တေ မာရေတုကာမောသိ, လောကဝဓာယ ဥပ္ပန္နော ကိံ တုယှံ သမဏဘာဝေနာတိ နိဂ္ဂဟေဿာမိ. သစေ န ကဿစိ ဝဓံ ရောစေမီတိ ဝက္ခတိ, အထ နံ တွံ ရာဂါဒီနမ္ပိ ဝဓံ န ဣစ္ဆသိ, တသ္မာ သမဏော ဟုတွာ အာဟိဏ္ဍသီတိ နိဂ္ဂဏှိဿာမီတိ ဣမံ ဥဘတောကောဋိကံ ပဉှံ ပုဋ္ဌော သမဏော ဂေါတမော နေဝ ဂိလိတုံ န ဥဂ္ဂိလိတုံ သက္ခိဿတီ’’တိ ဧဝံ စိန္တေတွာ ဣမံ ပယှံ ပုစ္ဆိ. တဿ ဘဂဝါ အဇ္ဈာသယာနုရူပံ ကထေသိ. သော ပဉှဗျာကရဏေန အာရာဓိတစိတ္တော ပဗ္ဗဇ္ဇံ ယာစိ. သတ္ထာ တံ ပဗ္ဗာဇေသိ, သော ပဗ္ဗဇ္ဇာကိစ္စံ မတ္ထကံ ပါပေသိ. တေန ဝုတ္တံ ‘‘ပဗ္ဗဇိတွာ အရဟတ္တံ ပတ္တော’’တိ. "प्रश्न कहा" का अर्थ है कि ब्राह्मण ने सोचा - "श्रमण गौतम लोक-पूजित हैं, उन्हें जो कुछ भी कहकर डराया नहीं जा सकता, मैं एक सूक्ष्म प्रश्न पूछूँगा"। उसने एक प्रश्न-गाथा तैयार की और सोचा - "यदि वे कहेंगे कि मैं अमुक के वध को पसंद करता हूँ, तो मैं उन्हें निरुत्तर करूँगा कि तुम जिन्हें पसंद नहीं करते उन्हें मारना चाहते हो, लोक-वध के लिए उत्पन्न हुए तुम्हारा श्रमण भाव क्या है? यदि वे कहेंगे कि मैं किसी के वध को पसंद नहीं करता, तो मैं उन्हें निरुत्तर करूँगा कि तुम राग आदि के वध की भी इच्छा नहीं करते, तो फिर श्रमण होकर क्यों घूमते हो? इस प्रकार इस दो कोटि वाले प्रश्न के पूछे जाने पर श्रमण गौतम न तो इसे निगल सकेंगे और न उगल सकेंगे"। ऐसा सोचकर उसने यह प्रश्न पूछा। भगवान ने उसके आशय के अनुरूप उत्तर दिया। वह प्रश्न के उत्तर से संतुष्ट होकर प्रव्रज्या की याचना करने लगा। शास्ता ने उसे प्रव्रजित किया, और उसने प्रव्रज्या के कार्य को पूर्णता (अर्हत्व) तक पहुँचाया। इसीलिए कहा गया है - "प्रव्रजित होकर अर्हत्व प्राप्त किया"। အဝဘူတာတိ အဓောဘူတာ. အဓောဘာဝေါ သတ္တာနံ အဝဍ္ဎိ အဝမင်္ဂလန္တိ အာဟ – ‘‘အဝဍ္ဎိဘူတာ အဝမင်္ဂလဘူတာယေဝါ’’တိ. ပရိဘူတာတိ ပရိဘဝပ္ပတ္တာ. ဝိဇ္ဇမာနာနန္တိ ပါဠိယံ အနာဒရေ သာမိဝစနန္တိ တဒတ္ထံ ဒဿေန္တော ‘‘ဝိဇ္ဇမာနေသူ’’တိအာဟ. ပကဋ္ဌံ, ပဝဍ္ဎံ ဝါ ဉာဏန္တိ ပညာဏန္တိ ဘဂဝတော ဉာဏံ ဝိသေသေတွာ ဝုတ္တံ. "अवभूता" का अर्थ है अधोभूत (नीचे गिरा हुआ)। प्राणियों का अधोभाव अवनति और अमंगल है, इसीलिए कहा - "अवनतिभूत और अमंगलभूत ही"। "परिभूता" का अर्थ है तिरस्कार को प्राप्त। "विज्जमानानं" यह पालि में अनादर अर्थ में षष्ठी विभक्ति है, उसी अर्थ को दर्शाते हुए "विज्जमानेसु" कहा। "प्रकृष्ट या प्रवृद्ध ज्ञान" को "प्रज्ञान" कहते हैं, यह भगवान के ज्ञान की विशेषता बताने के लिए कहा गया है। ၄၇၄. အဘိဇာနိတွာတိ [Pg.209] အဘိဝိသိဋ္ဌေန ဉာဏေန ဇာနိတွာ. ဝေါသိတဝေါသာနာတိ ကတကရဏီယတာယ သဗ္ဗသော ပရိသောသိတနိဋ္ဌာ. ပါရမိသင်္ခါတန္တိ ပရမုက္ကံသဘာဝတော ပါရမီတိ သင်္ခါတံ. တေနာဟ ‘‘သဗ္ဗဓမ္မာနံ ပါရဘူတ’’န္တိ. ဗြဟ္မစရိယဿာတိ သာသနဗြဟ္မစရိယဿ အာဒိဘူတံ. တေနာဟ ‘‘ဥပ္ပာဒကာ ဇနကာ’’တိ. ‘‘ဣဒမေဝံ ဘဝိဿတိ ဣဒမေဝ’’န္တိ တက္ကနံ တက္ကော, သော ဧတဿ အတ္ထီတိ တက္ကီ. ယသ္မာ သော တံ တံ ဝတ္ထုံ တထာ တထာ တက္ကိတွာ ဂဏှတိ, တသ္မာ ဝုတ္တံ ‘‘တက္ကဂါဟီ’’တိ. ဝီမံသနသီလော ဝီမံသီ ပစ္စက္ခဘူတမတ္ထံ ဝီမံသနဘူတာယ ပညာယ ကေဝလံ ဝီမံသနတော. တေနာဟ ‘‘ပညာစာရံ စရာပေတွာ ဧဝံဝါဒီ’’တိ. ယထာဝုတ္တတက္ကီဝီမံသီဘာဝေန တက္ကပရိယာဟတံ ဝီမံသာနုစရိတံ သယံပဋိဘာနံ ဧဝမေတန္တိ ဝတွာ. ४७४. "अभिज्ञानित्वा" का अर्थ है अति-विशिष्ट ज्ञान से जानकर। "वोसितवोसाना" का अर्थ है कृतकृत्य होने के कारण पूर्णतः परिशोधित निष्ठा। "पारमी-संख्यात" का अर्थ है परम उत्कर्ष भाव होने के कारण "पारमी" नाम से ज्ञात। इसीलिए कहा - "सब धर्मों के पार पहुँचे हुए"। "ब्रह्मचर्य" का अर्थ है शासन-ब्रह्मचर्य का आदिभूत। इसीलिए कहा - "उत्पादक, जनक"। "यह ऐसा होगा, यह ऐसा ही होगा" - इस प्रकार के तर्क को "तर्क" कहते हैं, वह जिसके पास है वह "तर्की" है। चूँकि वह उस-उस वस्तु को वैसे-वैसे तर्क करके ग्रहण करता है, इसलिए "तर्कग्राही" कहा गया है। मीमांसा करने के स्वभाव वाला "मीमांसी" है, जो प्रत्यक्ष हुए अर्थ को मीमांसा रूपी प्रज्ञा से केवल मीमांसा करने के कारण होता है। इसीलिए कहा - "प्रज्ञा के आचरण को चलाकर ऐसा कहने वाला"। यथाकथित तर्की और मीमांसी होने के कारण, तर्क द्वारा प्राप्त और मीमांसा द्वारा अनुचरित स्वयं की प्रतिभा से "यह ऐसा ही है" ऐसा कहकर। ၄၈၅. အဋ္ဌိတပဓာနဝတန္တိ အညတ္ထ ကိသ္မိဉ္စိ ပုဂ္ဂလေ အဋ္ဌိတပဓာနဝတံ အနညသာဓာရဏံ ဘောတော ဂေါတမဿ ပဓာနံ အဟောသိ. သပ္ပုရိသပဓာနဝတံ အဟောသိ သပ္ပုရိသပဓာနဝတာဓိဂတာနံ ဧတာဒိသာနံ အရဟတံ အစ္ဆရိယပုဂ္ဂလာနံယေဝ အာဝေဏိကပဓာနဝတံ အဟောသိ. အဇာနန္တောဝ ပကာသေတီတိ အယံ ပုစ္ဆိတမတ္ထံ သယံ ပစ္စက္ခတော အဇာနန္တော ဧဝ ကေဝလံ သဒ္ဒံ ဥပ္ပာဒေတွာဝ ပကာသေသီတိ သညာယ အာဟ. အဇာနနဘာဝေ သန္တေတိ ဣမေ အဓိဒေဝါတိ ပစ္စက္ခတော ဇာနနေ အသတိ. ပဏ္ဍိတေန မနုဿေနာတိ လောကဝေါဟာရကုသလေန မနုဿေန, တွံ ပန လောကဝေါဟာရေပိ အကုသလော. ဝစနတ္ထဉှိ အဇာနန္တော ယံ ကိဉ္စိ ဝဒတိ. ဥစ္စေန သမ္မတန္တိ ဥစ္စံ သုပါကဋံ သဗ္ဗသော တရုဏဒါရကေဟိပိ သမ္မတံ. ဉာတမေတံ ယဒိဒံ အတ္ထိ ဒေဝါတိ. တေနာဟ ‘‘သုသုဒါရကာပီ’’တိအာဒိ. ဒေဝါတိ ဥပပတ္တိဒေဝါ. အဓိဒေဝါ နာမ သမ္မုတိဒေဝေဟိ အဓိကဒေဝါတိ ကတွာ, တဒညေ စ မနုဿေ အဓိကဘာဝေ ကိမေဝ ဝတ္တဗ္ဗံ. သေသံ သုဝိညေယျမေဝ. ४८५. अट्ठितपधानवतन्ति - किसी अन्य व्यक्ति में न रहने वाला, असाधारण प्रधान (प्रयत्न) भगवान गौतम का था। यह सत्पुरुष-प्रधान-व्रत था, जो सत्पुरुष-प्रधान-व्रत से प्राप्त होने वाले ऐसे अर्हतों और आश्चर्यजनक व्यक्तियों का ही विशिष्ट (आवेणिक) प्रधान-व्रत था। 'अजानन्तोव पकासेति' - यह पूछे गए अर्थ को स्वयं प्रत्यक्ष रूप से न जानते हुए ही केवल शब्द उत्पन्न करके प्रकाशित करते हैं, इस धारणा से कहा। 'अजाननभावे सन्ते' - 'ये अधिदेव हैं' ऐसा प्रत्यक्ष ज्ञान न होने पर। 'पण्डितेन मनुस्सेनाति' - लोक-व्यवहार में कुशल मनुष्य के द्वारा, किन्तु तुम तो लोक-व्यवहार में भी अकुशल हो; क्योंकि वचन के अर्थ को न जानते हुए जो कुछ भी बोल देते हो। 'उच्चेन सम्मतन्ति' - उच्च, सुप्रकट, सभी छोटे बालकों द्वारा भी सम्मत। 'ज्ञातमेतं यदिदं अत्थि देवाति'। इसीलिए कहा 'सुसुदारकापी' आदि। 'देवा' अर्थात् उपपत्ति-देव। 'अधिदेवा' नाम सम्मति-देवों से अधिक (श्रेष्ठ) देव होने के कारण, तो अन्य मनुष्यों से श्रेष्ठ होने के बारे में क्या कहना। शेष सुविज्ञेय ही है। ပပဉ္စသူဒနိယာ မဇ္ဈိမနိကာယဋ္ဌကထာယ मज्झिमनिकाय की अट्ठकथा पपञ्चसूदनी का। သင်္ဂါရဝသုတ္တဝဏ္ဏနာယ လီနတ္ထပ္ပကာသနာ သမတ္တာ. सङ्गारव-सुत्त की व्याख्या की लीनत्थप्पकासना (टीका) समाप्त हुई। နိဋ္ဌိတာ စ ဗြာဟ္မဏဝဂ္ဂဝဏ္ဏနာ. और ब्राह्मण-वग्ग की व्याख्या समाप्त हुई। မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသဋီကာ သမတ္တာ. मज्झिमपण्णास-टीका समाप्त हुई। | |||
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |