| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| Français | |||
| Canon Pali | Commentaires | Sous-commentaires | Autres |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| Deutsch | |||
| Pali-Kanon | Kommentare | Subkommentare | Sonstige |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
1 นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส त्या भगवंतांना, अर्हतांना, सम्यक्संबुद्धांना माझा नमस्कार असो. ทีฆนิกาโย दीघनिकाय ปาถิกวคฺคปาฬิ पाथिकवग्गपाळी ๑. ปาถิกสุตฺตํ १. पाथिकसुत्त สุนกฺขตฺตวตฺถุ सुनक्खत्त कथा ๑. เอวํ [Pg.1] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา มลฺเลสุ วิหรติ อนุปิยํ นาม มลฺลานํ นิคโม. อถ โข ภควา ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย อนุปิยํ ปิณฺฑาย ปาวิสิ. อถ โข ภควโต เอตทโหสิ – ‘‘อติปฺปโค โข ตาว อนุปิยายํ ปิณฺฑาย จริตุํ. ยํนูนาหํ เยน ภคฺควโคตฺตสฺส ปริพฺพาชกสฺส อาราโม, เยน ภคฺควโคตฺโต ปริพฺพาชโก เตนุปสงฺกเมยฺย’’นฺติ. १. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान मल्लांच्या देशात, 'अनुपिय' नावाच्या मल्लांच्या नगरात विहार करत होते. तेव्हा भगवान सकाळच्या वेळी वस्त्रे परिधान करून, पात्र व चीवर घेऊन अनुपिय नगरात भिक्षेसाठी प्रवेश करते झाले. तेव्हा भगवंतांच्या मनात असा विचार आला – 'अनुपिय नगरात भिक्षेसाठी जाण्यास अजून खूप लवकरची वेळ आहे. मी जेथे भग्गवगोत्त परिव्राजकाचा आराम आहे, जेथे भग्गवगोत्त परिव्राजक आहे, तेथे जावे तर बरे होईल.' ๒. อถ โข ภควา เยน ภคฺควโคตฺตสฺส ปริพฺพาชกสฺส อาราโม, เยน ภคฺควโคตฺโต ปริพฺพาชโก เตนุปสงฺกมิ. อถ โข ภคฺควโคตฺโต ปริพฺพาชโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘เอตุ โข, ภนฺเต, ภควา. สฺวาคตํ, ภนฺเต, ภควโต. จิรสฺสํ โข, ภนฺเต, ภควา อิมํ ปริยายมกาสิ ยทิทํ อิธาคมนาย. นิสีทตุ, ภนฺเต, ภควา, อิทมาสนํ ปญฺญตฺต’’นฺติ. นิสีทิ ภควา ปญฺญตฺเต อาสเน. ภคฺควโคตฺโตปิ โข ปริพฺพาชโก อญฺญตรํ นีจํ อาสนํ คเหตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ภคฺควโคตฺโต ปริพฺพาชโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ปุริมานิ, ภนฺเต, ทิวสานิ [Pg.2] ปุริมตรานิ สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต เยนาหํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา มํ เอตทโวจ – ‘ปจฺจกฺขาโต ทานิ มยา, ภคฺคว, ภควา. น ทานาหํ ภควนฺตํ อุทฺทิสฺส วิหรามี’ติ. กจฺเจตํ, ภนฺเต, ตเถว, ยถา สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต อวจา’’ติ? ‘‘ตเถว โข เอตํ, ภคฺคว, ยถา สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต อวจ’’. २. त्यानंतर भगवान जेथे भग्गवगोत्त परिव्राजकाचा आराम होता, जेथे भग्गवगोत्त परिव्राजक होता, तेथे गेले. तेव्हा भग्गवगोत्त परिव्राजक भगवंतांना म्हणाला – 'यावे, भंते, भगवंतांचे स्वागत असो! भंते, भगवंतांनी खूप दिवसांनी येथे येण्याची कृपा केली. भंते, भगवंतांनी आसनावर विराजमान व्हावे, हे आसन तयार केले आहे.' भगवान तयार केलेल्या आसनावर बसले. भग्गवगोत्त परिव्राजक देखील एक लहान आसन घेऊन एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला भग्गवगोत्त परिव्राजक भगवंतांना म्हणाला – 'भंते, काही दिवसांपूर्वी लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्त माझ्याकडे आला होता; आणि येऊन मला म्हणाला – "भग्गवा, आता मी भगवंतांचा त्याग केला आहे. आता मी भगवंतांना उद्देशून राहत नाही." भंते, लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्त जे म्हणाला, ते तसेच आहे काय?' 'भग्गवा, लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्त जे म्हणाला, ते अगदी तसेच आहे.' ๓. ปุริมานิ, ภคฺคว, ทิวสานิ ปุริมตรานิ สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต เยนาหํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข, ภคฺคว, สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต มํ เอตทโวจ – ‘ปจฺจกฺขามิ ทานาหํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ. น ทานาหํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ อุทฺทิสฺส วิหริสฺสามี’ติ. ‘เอวํ วุตฺเต, อหํ, ภคฺคว, สุนกฺขตฺตํ ลิจฺฉวิปุตฺตํ เอตทโวจํ – ‘อปิ นุ ตาหํ, สุนกฺขตฺต, เอวํ อวจํ, เอหิ ตฺวํ, สุนกฺขตฺต, มมํ อุทฺทิสฺส วิหราหี’ติ? ‘โน เหตํ, ภนฺเต’. ‘ตฺวํ วา ปน มํ เอวํ อวจ – อหํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ อุทฺทิสฺส วิหริสฺสามี’ติ? ‘โน เหตํ, ภนฺเต’. ‘อิติ กิร, สุนกฺขตฺต, เนวาหํ ตํ วทามิ – เอหิ ตฺวํ, สุนกฺขตฺต, มมํ อุทฺทิสฺส วิหราหีติ. นปิ กิร มํ ตฺวํ วเทสิ – อหํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ อุทฺทิสฺส วิหริสฺสามีติ. เอวํ สนฺเต, โมฆปุริส, โก สนฺโต กํ ปจฺจาจิกฺขสิ? ปสฺส, โมฆปุริส, ยาวญฺจ เต อิทํ อปรทฺธ’นฺติ. ३. 'भग्गवा, काही दिवसांपूर्वी लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्त माझ्याकडे आला होता; येऊन त्याने मला अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्त मला म्हणाला – "भंते, आता मी भगवंतांचा त्याग करत आहे. भंते, आता मी भगवंतांना उद्देशून राहणार नाही." असे म्हटल्यावर, भग्गवा, मी लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्तला म्हणालो – "सुनक्खत्ता, मी तुला कधी असे म्हटले होते का की, 'ये सुनक्खत्ता, तू माझ्या मार्गदर्शनाखाली राहा'?" "नाही, भंते." "किंवा तू मला कधी असे म्हणाला होतास का की, 'भंते, मी भगवंतांना उद्देशून राहीन'?" "नाही, भंते." "तर मग सुनक्खत्ता, मीही तुला कधी असे म्हटले नाही की, 'ये सुनक्खत्ता, तू माझ्या मार्गदर्शनाखाली राहा'; आणि तूही मला कधी असे म्हणाला नाहीस की, 'भंते, मी भगवंतांना उद्देशून राहीन'. असे असताना, हे मोघपुरुषा, तू कोण आहेस आणि कोणाचा त्याग करत आहेस? हे मोघपुरुषा, बघ तुझा हा किती मोठा अपराध आहे!' ๔. ‘น หิ ปน เม, ภนฺเต, ภควา อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กโรตี’ติ. ‘อปิ นุ ตาหํ, สุนกฺขตฺต, เอวํ อวจํ – เอหิ ตฺวํ, สุนกฺขตฺต, มมํ อุทฺทิสฺส วิหราหิ, อหํ เต อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กริสฺสามี’ติ? ‘โน เหตํ, ภนฺเต’. ‘ตฺวํ วา ปน มํ เอวํ อวจ – อหํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ อุทฺทิสฺส วิหริสฺสามิ, ภควา เม อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กริสฺสตี’ติ? ‘โน เหตํ, ภนฺเต’. ‘อิติ กิร, สุนกฺขตฺต, เนวาหํ ตํ วทามิ – เอหิ ตฺวํ, สุนกฺขตฺต, มมํ อุทฺทิสฺส วิหราหิ, อหํ เต อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กริสฺสามี’ติ; นปิ กิร มํ ตฺวํ วเทสิ – อหํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ อุทฺทิสฺส วิหริสฺสามิ, ภควา เม อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กริสฺสตี’ติ. เอวํ สนฺเต, โมฆปุริส, โก สนฺโต กํ ปจฺจาจิกฺขสิ? ตํ กึ มญฺญสิ, สุนกฺขตฺต, กเต วา อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริเย อกเต วา อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา [Pg.3] อิทฺธิปาฏิหาริเย ยสฺสตฺถาย มยา ธมฺโม เทสิโต โส นิยฺยาติ ตกฺกรสฺส สมฺมา ทุกฺขกฺขยายา’ติ? ‘กเต วา, ภนฺเต, อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริเย อกเต วา อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริเย ยสฺสตฺถาย ภควตา ธมฺโม เทสิโต โส นิยฺยาติ ตกฺกรสฺส สมฺมา ทุกฺขกฺขยายา’ติ. ‘อิติ กิร, สุนกฺขตฺต, กเต วา อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริเย, อกเต วา อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริเย, ยสฺสตฺถาย มยา ธมฺโม เทสิโต, โส นิยฺยาติ ตกฺกรสฺส สมฺมา ทุกฺขกฺขยาย. ตตฺร, สุนกฺขตฺต, กึ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กตํ กริสฺสติ? ปสฺส, โมฆปุริส, ยาวญฺจ เต อิทํ อปรทฺธ’นฺติ. ४. '"पण भंते, भगवान माझ्यासाठी उत्तर-मनुष्यधर्माचे ऋद्धि-प्रातिहार्य दाखवत नाहीत." "सुनक्खत्ता, मी तुला कधी असे म्हटले होते का की, 'ये सुनक्खत्ता, तू माझ्या मार्गदर्शनाखाली राहा, मी तुला उत्तर-मनुष्यधर्माचे ऋद्धि-प्रातिहार्य दाखवीन'?" "नाही, भंते." "किंवा तू मला कधी असे म्हणाला होतास का की, 'भंते, मी भगवंतांना उद्देशून राहीन, जर भगवान मला उत्तर-मनुष्यधर्माचे ऋद्धि-प्रातिहार्य दाखवतील'?" "नाही, भंते." "तर मग सुनक्खत्ता, मीही तुला कधी असे म्हटले नाही की, 'ये सुनक्खत्ता, तू माझ्या मार्गदर्शनाखाली राहा, मी तुला उत्तर-मनुष्यधर्माचे ऋद्धि-प्रातिहार्य दाखवीन'; आणि तूही मला कधी असे म्हणाला नाहीस की, 'भंते, मी भगवंतांना उद्देशून राहीन, जर भगवान मला उत्तर-मनुष्यधर्माचे ऋद्धि-प्रातिहार्य दाखवतील'. असे असताना, हे मोघपुरुषा, तू कोण आहेस आणि कोणाचा त्याग करत आहेस? सुनक्खत्ता, तुला काय वाटते? उत्तर-मनुष्यधर्माचे ऋद्धि-प्रातिहार्य दाखवले गेले असो वा नसो, ज्या हेतूने मी धम्माचा उपदेश केला आहे, तो धम्म त्याचे आचरण करणाऱ्याला पूर्णपणे दुःखाच्या नाशाकडे घेऊन जातो की नाही?" "भंते, उत्तर-मनुष्यधर्माचे ऋद्धि-प्रातिहार्य दाखवले गेले असो वा नसो, भगवंतांनी ज्या हेतूने धम्माचा उपदेश केला आहे, तो धम्म त्याचे आचरण करणाऱ्याला पूर्णपणे दुःखाच्या नाशाकडे घेऊन जातो." "तर मग सुनक्खत्ता, उत्तर-मनुष्यधर्माचे ऋद्धि-प्रातिहार्य दाखवले गेले असो वा नसो, ज्या हेतूने मी धम्माचा उपदेश केला आहे, तो धम्म त्याचे आचरण करणाऱ्याला पूर्णपणे दुःखाच्या नाशाकडे घेऊन जातो. अशा वेळी, सुनक्खत्ता, उत्तर-मनुष्यधर्माचे ऋद्धि-प्रातिहार्य दाखवल्याने काय साध्य होणार आहे? हे मोघपुरुषा, बघ तुझा हा किती मोठा अपराध आहे!"' ๕. ‘น หิ ปน เม, ภนฺเต, ภควา อคฺคญฺญํ ปญฺญเปตี’ติ ? ‘อปิ นุ ตาหํ, สุนกฺขตฺต, เอวํ อวจํ – เอหิ ตฺวํ, สุนกฺขตฺต, มมํ อุทฺทิสฺส วิหราหิ, อหํ เต อคฺคญฺญํ ปญฺญเปสฺสามี’ติ? ‘โน เหตํ, ภนฺเต’. ‘ตฺวํ วา ปน มํ เอวํ อวจ – อหํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ อุทฺทิสฺส วิหริสฺสามิ, ภควา เม อคฺคญฺญํ ปญฺญเปสฺสตี’ติ? ‘โน เหตํ, ภนฺเต’. ‘อิติ กิร, สุนกฺขตฺต, เนวาหํ ตํ วทามิ – เอหิ ตฺวํ, สุนกฺขตฺต, มมํ อุทฺทิสฺส วิหราหิ, อหํ เต อคฺคญฺญํ ปญฺญเปสฺสามีติ. นปิ กิร มํ ตฺวํ วเทสิ – อหํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ อุทฺทิสฺส วิหริสฺสามิ, ภควา เม อคฺคญฺญํ ปญฺญเปสฺสตี’ติ. เอวํ สนฺเต, โมฆปุริส, โก สนฺโต กํ ปจฺจาจิกฺขสิ? ตํ กึ มญฺญสิ, สุนกฺขตฺต, ปญฺญตฺเต วา อคฺคญฺเญ, อปญฺญตฺเต วา อคฺคญฺเญ, ยสฺสตฺถาย มยา ธมฺโม เทสิโต, โส นิยฺยาติ ตกฺกรสฺส สมฺมา ทุกฺขกฺขยายา’ติ? ‘ปญฺญตฺเต วา, ภนฺเต, อคฺคญฺเญ, อปญฺญตฺเต วา อคฺคญฺเญ, ยสฺสตฺถาย ภควตา ธมฺโม เทสิโต, โส นิยฺยาติ ตกฺกรสฺส สมฺมา ทุกฺขกฺขยายา’ติ. ‘อิติ กิร, สุนกฺขตฺต, ปญฺญตฺเต วา อคฺคญฺเญ, อปญฺญตฺเต วา อคฺคญฺเญ, ยสฺสตฺถาย มยา ธมฺโม เทสิโต, โส นิยฺยาติ ตกฺกรสฺส สมฺมา ทุกฺขกฺขยาย. ตตฺร, สุนกฺขตฺต, กึ อคฺคญฺญํ ปญฺญตฺตํ กริสฺสติ? ปสฺส, โมฆปุริส, ยาวญฺจ เต อิทํ อปรทฺธํ’. ५. “पण, भन्ते! भगवान मला विश्वाच्या उत्पत्तीविषयी (अग्गञ्ञ - सुरुवातीविषयी) शिकवत नाहीत.” “सुनेक्खत्त, मी तुला कधी असे म्हटले होते का की—'ये सुनेक्खत्त, माझ्या मार्गदर्शनाखाली राहा, मी तुला विश्वाच्या उत्पत्तीविषयी शिकवीन'?” “नाही, भन्ते!” “किंवा तू तरी मला कधी असे म्हणाला होतास का की—'भन्ते, मी भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली राहीन आणि भगवान मला विश्वाच्या उत्पत्तीविषयी शिकवतील'?” “नाही, भन्ते!” “तर मग सुनेक्खत्त, मीही तुला कधी असे म्हटले नाही की—'ये सुनेक्खत्त, माझ्या मार्गदर्शनाखाली राहा, मी तुला विश्वाच्या उत्पत्तीविषयी शिकवीन.' आणि तूही मला कधी असे म्हणाला नाहीस की—'भन्ते, मी भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली राहीन आणि भगवान मला विश्वाच्या उत्पत्तीविषयी शिकवतील.' असे असताना, हे मोघपुरुषा (व्यर्थ माणसा), तू कोण आहेस आणि कशाचा त्याग करत आहेस? सुनेक्खत्त, तुला काय वाटते? विश्वाच्या उत्पत्तीविषयी शिकवले गेले असो वा नसो, ज्या हेतूने मी धम्माचा उपदेश केला आहे, तो धम्म त्याचे आचरण करणाऱ्याला पूर्णपणे दुःखाचा क्षय करण्याकडे नेतो की नाही?” “भन्ते, विश्वाच्या उत्पत्तीविषयी शिकवले गेले असो वा नसो, भगवंतांनी ज्या हेतूने धम्माचा उपदेश केला आहे, तो धम्म त्याचे आचरण करणाऱ्याला पूर्णपणे दुःखाचा क्षय करण्याकडे नेतो.” “अशा प्रकारे, सुनेक्खत्त, विश्वाच्या उत्पत्तीविषयी शिकवले गेले असो वा नसो, ज्या हेतूने मी धम्माचा उपदेश केला आहे, तो धम्म त्याचे आचरण करणाऱ्याला पूर्णपणे दुःखाचा क्षय करण्याकडे नेतो. मग अशा वेळी, सुनेक्खत्त, विश्वाच्या उत्पत्तीविषयीच्या शिकवणीची काय गरज आहे? हे मोघपुरुषा, बघ तू किती मोठा अपराध केला आहेस!” ๖. ‘อเนกปริยาเยน โข เต, สุนกฺขตฺต, มม วณฺโณ ภาสิโต วชฺชิคาเม – อิติปิ โส ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน สุคโต [Pg.4] โลกวิทู อนุตฺตโร ปุริสทมฺมสารถิ สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควาติ. อิติ โข เต, สุนกฺขตฺต, อเนกปริยาเยน มม วณฺโณ ภาสิโต วชฺชิคาเม. ६. “सुनेक्खत्त, तू वज्जींच्या गावांमध्ये अनेक प्रकारे माझ्या गुणांचे गौरवगान केले आहेस की—'ते भगवान अर्हत, सम्यक संबुद्ध, विद्या व आचरणाने संपन्न (विद्याचरणसंपन्न), सुगत, लोकविदू (लोकांचे ज्ञाते), अदम्य माणसांना वश करणारे अद्वितीय सारथी (अनुत्तर पुरिसदम्मसारथी), देव आणि मानवांचे शास्ता (गुरु), बुद्ध आणि भगवान आहेत.' अशा प्रकारे, सुनेक्खत्त, तू वज्जींच्या गावांमध्ये अनेक प्रकारे माझ्या गुणांचे गौरवगान केले आहेस.” ‘อเนกปริยาเยน โข เต, สุนกฺขตฺต, ธมฺมสฺส วณฺโณ ภาสิโต วชฺชิคาเม – สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม สนฺทิฏฺฐิโก อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหีติ. อิติ โข เต, สุนกฺขตฺต, อเนกปริยาเยน ธมฺมสฺส วณฺโณ ภาสิโต วชฺชิคาเม. “सुनेक्खत्त, तू वज्जींच्या गावांमध्ये अनेक प्रकारे धम्माच्या गुणांचे गौरवगान केले आहेस की—'भगवंतांनी धम्माची सुंदर प्रकारे घोषणा केली आहे (स्वाक्खातो), तो याच जन्मात प्रत्यक्ष अनुभवता येणारा (संदिट्ठिको), तात्काळ फळ देणारा (अकालिको), 'ये आणि स्वतः पाहा' असे सांगण्यास योग्य (एहिपस्सिको), स्वतःच्या कल्याणासाठी आचरणात आणण्याजोगा (ओपनेय्यिको) आणि सुज्ञांनी आपापल्या परीने जाणून घेण्याजोगा (पच्चत्तं वेदितब्बो विञ्ञूहि) आहे.' अशा प्रकारे, सुनेक्खत्त, तू वज्जींच्या गावांमध्ये अनेक प्रकारे धम्माच्या गुणांचे गौरवगान केले आहेस.” ‘อเนกปริยาเยน โข เต, สุนกฺขตฺต, สงฺฆสฺส วณฺโณ ภาสิโต วชฺชิคาเม – สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, อุชุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, ญายปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, สามีจิปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, ยทิทํ จตฺตาริ ปุริสยุคานิ อฏฺฐ ปุริสปุคฺคลา, เอส ภควโต สาวกสงฺโฆ, อาหุเนยฺโย ปาหุเนยฺโย ทกฺขิเณยฺโย อญฺชลิกรณีโย อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสาติ. อิติ โข เต, สุนกฺขตฺต, อเนกปริยาเยน สงฺฆสฺส วณฺโณ ภาสิโต วชฺชิคาเม. “सुनेक्खत्त, तू वज्जींच्या गावांमध्ये अनेक प्रकारे संघाच्या गुणांचे गौरवगान केले आहेस की—'भगवंतांचा श्रावकसंघ सुमार्गाने चालणारा (सुप्पटिपन्नो) आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ सरळ मार्गाने चालणारा (उजुपटिपन्नो) आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ न्याय्य मार्गाने चालणारा (ञायपटिपन्नो) आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ योग्य मार्गाने चालणारा (सामीचिपटिपन्नो) आहे. म्हणजेच, चार पुरुष-युगले (जोड्या) आणि आठ पुरुष-पुद्गल (व्यक्ती) असलेला हा भगवंतांचा श्रावकसंघ आहुती स्वीकारण्यास योग्य (आहुनेय्यो), पाहुणचारास योग्य (पाहुनेय्यो), दान स्वीकारण्यास योग्य (दक्खिणेय्यो), हात जोडून नमस्कार करण्यास योग्य (अञ्जलिकरणीयो) आणि जगातील सर्वश्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र (अनुत्तरं पुञ्ञक्खेत्तं लोकस्स) आहे.' अशा प्रकारे, सुनेक्खत्त, तू वज्जींच्या गावांमध्ये अनेक प्रकारे संघाच्या गुणांचे गौरवगान केले आहेस.” ‘อาโรจยามิ โข เต, สุนกฺขตฺต, ปฏิเวทยามิ โข เต, สุนกฺขตฺต. ภวิสฺสนฺติ โข เต, สุนกฺขตฺต, วตฺตาโร, โน วิสหิ สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต สมเณ โคตเม พฺรหฺมจริยํ จริตุํ, โส อวิสหนฺโต สิกฺขํ ปจฺจกฺขาย หีนายาวตฺโตติ. อิติ โข เต, สุนกฺขตฺต, ภวิสฺสนฺติ วตฺตาโร’ติ. “सुनेक्खत्त, मी तुला सांगतो, मी तुला चेतावणी देतो. सुनेक्खत्त, लोक तुझ्याबद्दल नक्कीच असे बोलतील की—'लिच्छवीपुत्र सुनेक्खत्त श्रमण गोतमांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळण्यास असमर्थ ठरला, आणि असमर्थ ठरल्यामुळे त्याने प्रशिक्षणाचा (सिक्खा) त्याग केला आणि तो पुन्हा हीन (गृहस्थ) जीवनाकडे परतला.' सुनेक्खत्त, लोक तुझ्याबद्दल नक्कीच असे बोलतील.” เอวํ ปิ โข, ภคฺคว, สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต มยา วุจฺจมาโน อปกฺกเมว อิมสฺมา ธมฺมวินยา, ยถา ตํ อาปายิโก เนรยิโก. “भगव, माझ्याकडून असे सांगितले गेले असतानाही, लिच्छवीपुत्र सुनेक्खत्त या धम्म आणि विनयातून तसाच निघून गेला, जसा एखादा नरकात जाण्यास पात्र असलेला प्राणी नरकात जातो.” โกรกฺขตฺติยวตฺถุ कोरक्खत्तिय कथा ๗. ‘‘เอกมิทาหํ, ภคฺคว, สมยํ ถูลูสุ วิหรามิ อุตฺตรกา นาม ถูลูนํ นิคโม. อถ ขฺวาหํ, ภคฺคว, ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สุนกฺขตฺเตน ลิจฺฉวิปุตฺเตน ปจฺฉาสมเณน อุตฺตรกํ ปิณฺฑาย ปาวิสึ. เตน โข ปน สมเยน อเจโล โกรกฺขตฺติโย กุกฺกุรวติโก จตุกฺกุณฺฑิโก ฉมานิกิณฺณํ ภกฺขสํ มุเขเนว ขาทติ, มุเขเนว ภุญฺชติ. อทฺทสา โข, ภคฺคว, สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต อเจลํ โกรกฺขตฺติยํ กุกฺกุรวติกํ [Pg.5] จตุกฺกุณฺฑิกํ ฉมานิกิณฺณํ ภกฺขสํ มุเขเนว ขาทนฺตํ มุเขเนว ภุญฺชนฺตํ. ทิสฺวานสฺส เอตทโหสิ – ‘สาธุรูโป วต, โภ, อยํ สมโณ จตุกฺกุณฺฑิโก ฉมานิกิณฺณํ ภกฺขสํ มุเขเนว ขาทติ, มุเขเนว ภุญฺชตี’ติ. ७. “भगव, एकदा मी थूलू देशातील 'उत्तरका' नावाच्या थूलूंच्या एका नगरात राहत होतो. तेव्हा, भगव, मी सकाळी वस्त्र परिधान करून, पात्र व चीवर घेऊन, लिच्छवीपुत्र सुनेक्खत्त याला माझा अनुचर (मागे चालणारा भिक्खू) बनवून उत्तरका नगरात भिक्षेसाठी प्रवेश केला. त्या वेळी, कोरक्खत्तिय नावाचा एक नग्न अचेलक, जो कुत्र्यासारखे व्रत पाळत होता (कुक्कुरवतिक), चार पायांवर (हात आणि गुडघ्यांवर) चालत जमिनीवर टाकलेले अन्न केवळ तोंडानेच उचलून खात होता. भगव, लिच्छवीपुत्र सुनेक्खत्तने त्या नग्न अचेलक कोरक्खत्तियाला कुत्र्यासारखे व्रत पाळताना, चार पायांवर चालताना आणि जमिनीवर टाकलेले अन्न केवळ तोंडानेच उचलून खाताना पाहिले. ते पाहून त्याच्या मनात असा विचार आला—'अहो! हा श्रमण किती थोर (साधुरूप) आहे, जो चार पायांवर चालतो आणि जमिनीवर टाकलेले अन्न केवळ तोंडानेच उचलून खातो!'” ‘‘อถ ขฺวาหํ, ภคฺคว, สุนกฺขตฺตสฺส ลิจฺฉวิปุตฺตสฺส เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย สุนกฺขตฺตํ ลิจฺฉวิปุตฺตํ เอตทโวจํ – ‘ตฺวมฺปิ นาม, โมฆปุริส, สมโณ สกฺยปุตฺติโย ปฏิชานิสฺสสี’ติ! ‘กึ ปน มํ, ภนฺเต, ภควา เอวมาห – ‘ตฺวมฺปิ นาม, โมฆปุริส, สมโณ สกฺยปุตฺติโย ปฏิชานิสฺสสี’ติ? ‘นนุ เต, สุนกฺขตฺต, อิมํ อเจลํ โกรกฺขตฺติยํ กุกฺกุรวติกํ จตุกฺกุณฺฑิกํ ฉมานิกิณฺณํ ภกฺขสํ มุเขเนว ขาทนฺตํ มุเขเนว ภุญฺชนฺตํ ทิสฺวาน เอตทโหสิ – สาธุรูโป วต, โภ, อยํ สมโณ จตุกฺกุณฺฑิโก ฉมานิกิณฺณํ ภกฺขสํ มุเขเนว ขาทติ, มุเขเนว ภุญฺชตี’ติ? ‘เอวํ, ภนฺเต. กึ ปน, ภนฺเต, ภควา อรหตฺตสฺส มจฺฉรายตี’ติ? ‘น โข อหํ, โมฆปุริส, อรหตฺตสฺส มจฺฉรายามิ. อปิ จ, ตุยฺเหเวตํ ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ อุปฺปนฺนํ, ตํ ปชห. มา เต อโหสิ ทีฆรตฺตํ อหิตาย ทุกฺขาย. ยํ โข ปเนตํ, สุนกฺขตฺต, มญฺญสิ อเจลํ โกรกฺขตฺติยํ – สาธุรูโป อยํ สมโณติ. โส สตฺตมํ ทิวสํ อลสเกน กาลงฺกริสฺสติ. กาลงฺกโต จ กาลกญฺจิกา นาม อสุรา สพฺพนิหีโน อสุรกาโย, ตตฺร อุปปชฺชิสฺสติ. กาลงฺกตญฺจ นํ พีรณตฺถมฺพเก สุสาเน ฉฑฺเฑสฺสนฺติ. อากงฺขมาโน จ ตฺวํ, สุนกฺขตฺต, อเจลํ โกรกฺขตฺติยํ อุปสงฺกมิตฺวา ปุจฺเฉยฺยาสิ – ชานาสิ, อาวุโส โกรกฺขตฺติย, อตฺตโน คตินฺติ? ฐานํ โข ปเนตํ, สุนกฺขตฺต, วิชฺชติ ยํ เต อเจโล โกรกฺขตฺติโย พฺยากริสฺสติ – ชานามิ, อาวุโส สุนกฺขตฺต, อตฺตโน คตึ; กาลกญฺจิกา นาม อสุรา สพฺพนิหีโน อสุรกาโย, ตตฺรามฺหิ อุปปนฺโนติ. त्यानंतर, हे भग्गव! मी माझ्या चित्ताने लिच्छविपुत्र सुनक्खत्ताच्या मनातील विचार जाणून लिच्छविपुत्र सुनक्खत्ताला असे म्हणालो— 'हे मोघपुरुषा! तू स्वतःला शाक्यपुत्रीय श्रमण म्हणवून घेतोस काय?' 'पण भंते! भगवंतांनी मला असे का म्हटले की— 'हे मोघपुरुषा! तू स्वतःला शाक्यपुत्रीय श्रमण म्हणवून घेतोस काय?' 'सुनक्खत्ता, कुत्र्यासारखे व्रत आचरण करणाऱ्या, चार पायांवर चालणाऱ्या, जमिनीवर पडलेले अन्न केवळ तोंडानेच खाणाऱ्या आणि तोंडानेच भक्षण करणाऱ्या या अचेलक कोरक्खत्तियाला पाहून तुझ्या मनात असा विचार आला नव्हता काय की— 'अहो! हा श्रमण किती चांगला आहे, जो चार पायांवर चालतो आणि जमिनीवर पडलेले अन्न केवळ तोंडानेच खातो व तोंडानेच भक्षण करतो'?' 'होय, भंते! पण भंते, भगवंत अर्हतपदाचा मत्सर का करत आहेत?' 'हे मोघपुरुषा, मी अर्हतपदाचा मत्सर करत नाही. उलट, तुझ्या मनातच हा पापी दृष्टिकोन निर्माण झाला आहे, त्याचा तू त्याग कर. तो तुझ्यासाठी दीर्घकाळापर्यंत अहिताचे व दुःखाचे कारण न बनो. सुनक्खत्ता, ज्या अचेलक कोरक्खत्तियाला तू 'हा चांगला श्रमण आहे' असे मानतोस, तो आजपासून सातव्या दिवशी अजीर्णाने मृत्यू पावेल. मृत्यू पावल्यानंतर तो 'कालकंजिक' नावाच्या असुरांमध्ये उत्पन्न होईल, जे असुरांमधील सर्वात कनिष्ठ कुळ आहे. आणि मृत्यूनंतर त्याचे शरीर 'बीरणा' गवताच्या ढिगाऱ्यावर स्मशानात टाकून दिले जाईल. सुनक्खत्ता, जर तुझी इच्छा असेल, तर तू त्या अचेलक कोरक्खत्तियाजवळ जाऊन विचारू शकतोस— 'आवुसो कोरक्खत्तिया, तुला तुझी गती माहीत आहे का?' सुनक्खत्ता, अशी शक्यता नक्कीच आहे की तो अचेलक कोरक्खत्तिय तुला उत्तर देईल— 'आवुसो सुनक्खत्ता, मला माझी गती माहीत आहे; मी कालकंजिक नावाच्या असुरांमध्ये उत्पन्न झालो आहे, जे असुरांमधील सर्वात कनिष्ठ कुळ आहे.' ‘‘อถ โข, ภคฺคว, สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต เยน อเจโล โกรกฺขตฺติโย เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อเจลํ โกรกฺขตฺติยํ เอตทโวจ [Pg.6] – ‘พฺยากโต โขสิ, อาวุโส โกรกฺขตฺติย, สมเณน โคตเมน – อเจโล โกรกฺขตฺติโย สตฺตมํ ทิวสํ อลสเกน กาลงฺกริสฺสติ. กาลงฺกโต จ กาลกญฺจิกา นาม อสุรา สพฺพนิหีโน อสุรกาโย, ตตฺร อุปปชฺชิสฺสติ. กาลงฺกตญฺจ นํ พีรณตฺถมฺพเก สุสาเน ฉฑฺเฑสฺสนฺตี’ติ. เยน ตฺวํ, อาวุโส โกรกฺขตฺติย, มตฺตํ มตฺตญฺจ ภตฺตํ ภุญฺเชยฺยาสิ, มตฺตํ มตฺตญฺจ ปานียํ ปิเวยฺยาสิ. ยถา สมณสฺส โคตมสฺส มิจฺฉา อสฺส วจน’นฺติ. त्यानंतर, हे भग्गव! लिच्छविपुत्र सुनक्खत्त जेथे अचेलक कोरक्खत्तिय होता तेथे गेला; आणि जवळ जाऊन अचेलक कोरक्खत्तियाला म्हणाला— 'आवुसो कोरक्खत्तिया, श्रमण गोतमांनी तुझ्याविषयी असे भाकीत केले आहे की— 'अचेलक कोरक्खत्तिय सातव्या दिवशी अजीर्णाने मृत्यू पावेल. मृत्यू पावल्यानंतर तो कालकंजिक नावाच्या असुरांमध्ये उत्पन्न होईल, जे असुरांमधील सर्वात कनिष्ठ कुळ आहे. आणि मृत्यूनंतर त्याचे शरीर बीरणा गवताच्या ढिगाऱ्यावर स्मशानात टाकून दिले जाईल.' म्हणून आवुसो कोरक्खत्तिया, तू मोजून-मापूनच अन्न खा आणि मोजून-मापूनच पाणी पी, जेणेकरून श्रमण गोतमांचे वचन खोटे ठरेल.' ๘. ‘‘อถ โข, ภคฺคว, สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต เอกทฺวีหิกาย สตฺตรตฺตินฺทิวานิ คเณสิ, ยถา ตํ ตถาคตสฺส อสทฺทหมาโน. อถ โข, ภคฺคว, อเจโล โกรกฺขตฺติโย สตฺตมํ ทิวสํ อลสเกน กาลมกาสิ. กาลงฺกโต จ กาลกญฺจิกา นาม อสุรา สพฺพนิหีโน อสุรกาโย, ตตฺร อุปปชฺชิ. กาลงฺกตญฺจ นํ พีรณตฺถมฺพเก สุสาเน ฉฑฺเฑสุํ. ८. त्यानंतर, हे भग्गव! तथागतांच्या वचनावर विश्वास न ठेवल्यामुळे लिच्छविपुत्र सुनक्खत्त एक-दोन करत सात दिवस व रात्री मोजत राहिला. परंतु, हे भग्गव! तो अचेलक कोरक्खत्तिय सातव्या दिवशी अजीर्णाने मृत्यू पावला. मृत्यू पावल्यानंतर तो कालकंजिक नावाच्या असुरांमध्ये उत्पन्न झाला, जे असुरांमधील सर्वात कनिष्ठ कुळ आहे. आणि मृत्यूनंतर त्याचे शरीर बीरणा गवताच्या ढिगाऱ्यावर स्मशानात टाकून देण्यात आले. ๙. ‘‘อสฺโสสิ โข, ภคฺคว, สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต – ‘อเจโล กิร โกรกฺขตฺติโย อลสเกน กาลงฺกโต พีรณตฺถมฺพเก สุสาเน ฉฑฺฑิโต’ติ. อถ โข, ภคฺคว, สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต เยน พีรณตฺถมฺพกํ สุสานํ, เยน อเจโล โกรกฺขตฺติโย เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อเจลํ โกรกฺขตฺติยํ ติกฺขตฺตุํ ปาณินา อาโกเฏสิ – ‘ชานาสิ, อาวุโส โกรกฺขตฺติย, อตฺตโน คติ’นฺติ? อถ โข, ภคฺคว, อเจโล โกรกฺขตฺติโย ปาณินา ปิฏฺฐึ ปริปุญฺฉนฺโต วุฏฺฐาสิ. ‘ชานามิ, อาวุโส สุนกฺขตฺต, อตฺตโน คตึ. กาลกญฺจิกา นาม อสุรา สพฺพนิหีโน อสุรกาโย, ตตฺรามฺหิ อุปปนฺโน’ติ วตฺวา ตตฺเถว อุตฺตาโน ปปติ. ९. हे भग्गव! लिच्छविपुत्र सुनक्खत्ताने ऐकले की— 'अचेलक कोरक्खत्तिय अजीर्णाने मृत्यू पावला असून त्याचे शरीर बीरणा गवताच्या ढिगाऱ्यावर स्मशानात टाकून दिले आहे.' त्यानंतर, हे भग्गव! लिच्छविपुत्र सुनक्खत्त जेथे ते बीरणा गवताचे स्मशान होते आणि जेथे अचेलक कोरक्खत्तिय होता, तेथे गेला. जवळ जाऊन त्याने अचेलक कोरक्खत्तियाच्या शरीरावर हाताने तीन वेळा थाप मारली आणि विचारले— 'आवुसो कोरक्खत्तिया, तुला तुझी गती माहीत आहे का?' तेव्हा, हे भग्गव! तो अचेलक कोरक्खत्तिय हाताने आपली पाठ चोळत उठून बसला आणि म्हणाला— 'आवुसो सुनक्खत्ता, मला माझी गती माहीत आहे. मी कालकंजिक नावाच्या असुरांमध्ये उत्पन्न झालो आहे, जे असुरांमधील सर्वात कनिष्ठ कुळ आहे.' असे बोलून तो तेथेच उताणा पडला. ๑๐. ‘‘อถ โข, ภคฺคว, สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต เยนาหํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข อหํ, ภคฺคว, สุนกฺขตฺตํ ลิจฺฉวิปุตฺตํ เอตทโวจํ – ‘ตํ กึ มญฺญสิ, สุนกฺขตฺต, ยเถว เต อหํ อเจลํ โกรกฺขตฺติยํ อารพฺภ พฺยากาสึ, ตเถว ตํ วิปากํ, อญฺญถา วา’ติ? ‘ยเถว เม, ภนฺเต, ภควา อเจลํ โกรกฺขตฺติยํ อารพฺภ พฺยากาสิ, ตเถว ตํ วิปากํ, โน อญฺญถา’ติ. ‘ตํ [Pg.7] กึ มญฺญสิ, สุนกฺขตฺต, ยทิ เอวํ สนฺเต กตํ วา โหติ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ, อกตํ วาติ? ‘อทฺธา โข, ภนฺเต, เอวํ สนฺเต กตํ โหติ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ, โน อกต’นฺติ. ‘เอวมฺปิ โข มํ ตฺวํ, โมฆปุริส, อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กโรนฺตํ เอวํ วเทสิ – น หิ ปน เม, ภนฺเต, ภควา อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กโรตีติ. ปสฺส, โมฆปุริส, ยาวญฺจ เต อิทํ อปรทฺธ’นฺติ. ‘‘เอวมฺปิ โข, ภคฺคว, สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต มยา วุจฺจมาโน อปกฺกเมว อิมสฺมา ธมฺมวินยา, ยถา ตํ อาปายิโก เนรยิโก. १०. त्यानंतर, हे भग्गव! लिच्छविपुत्र सुनक्खत्त मी जेथे होतो तेथे आला; आणि मला अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या लिच्छविपुत्र सुनक्खत्ताला मी, हे भग्गव, असे म्हणालो— 'सुनक्खत्ता, तुला काय वाटते? मी अचेलक कोरक्खत्तियाविषयी जसे भाकीत केले होते, त्याचे फळ तसेच मिळाले की काही वेगळे झाले?' 'भंते! भगवंतांनी अचेलक कोरक्खत्तियाविषयी जसे भाकीत केले होते, त्याचे फळ अगदी तसेच मिळाले, काही वेगळे झाले नाही.' 'सुनक्खत्ता, तुला काय वाटते? जर असे आहे, तर मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धि-प्रातिहार्य केले गेले की नाही?' 'नक्कीच भंते! जर असे आहे, तर मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धि-प्रातिहार्य केले गेले आहे, असे नाही की ते केले गेले नाही.' 'हे मोघपुरुषा! मी असे मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धि-प्रातिहार्य करत असतानाही तू मला असे म्हणतोस की— 'भंते, भगवंत माझ्यासाठी मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धि-प्रातिहार्य करत नाहीत.' हे मोघपुरुषा, बघ तुझा हा किती मोठा अपराध आहे!' हे भग्गव! माझ्याद्वारे असे सांगितले गेले असतानाही, लिच्छविपुत्र सुनक्खत्त या धम्म-विनयातून तसाच निघून गेला, जसा एखादा अपायगामी नरकगामी जीव जातो. อเจลกฬารมฏฺฏกวตฺถุ अचेलकळारमट्टकवत्थु (अचेलक काळारमट्टक कथा) ๑๑. ‘‘เอกมิทาหํ, ภคฺคว, สมยํ เวสาลิยํ วิหรามิ มหาวเน กูฏาคารสาลายํ. เตน โข ปน สมเยน อเจโล กฬารมฏฺฏโก เวสาลิยํ ปฏิวสติ ลาภคฺคปฺปตฺโต เจว ยสคฺคปฺปตฺโต จ วชฺชิคาเม. ตสฺส สตฺตวตปทานิ สมตฺตานิ สมาทินฺนานิ โหนฺติ – ‘ยาวชีวํ อเจลโก อสฺสํ, น วตฺถํ ปริทเหยฺยํ, ยาวชีวํ พฺรหฺมจารี อสฺสํ, น เมถุนํ ธมฺมํ ปฏิเสเวยฺยํ, ยาวชีวํ สุรามํเสเนว ยาเปยฺยํ, น โอทนกุมฺมาสํ ภุญฺเชยฺยํ. ปุรตฺถิเมน เวสาลึ อุเทนํ นาม เจติยํ, ตํ นาติกฺกเมยฺยํ, ทกฺขิเณน เวสาลึ โคตมกํ นาม เจติยํ, ตํ นาติกฺกเมยฺยํ, ปจฺฉิเมน เวสาลึ สตฺตมฺพํ นาม เจติยํ, ตํ นาติกฺกเมยฺยํ, อุตฺตเรน เวสาลึ พหุปุตฺตํ นาม เจติยํ ตํ นาติกฺกเมยฺย’นฺติ. โส อิเมสํ สตฺตนฺนํ วตปทานํ สมาทานเหตุ ลาภคฺคปฺปตฺโต เจว ยสคฺคปฺปตฺโต จ วชฺชิคาเม. ११. हे भग्गव, एका वेळी मी वेसाली येथील महावनातील कुटागारशाळेत विहार करत होतो. त्या वेळी कळारमट्टक नावाचा एक अचेलक वेसालीमध्ये वज्जींच्या प्रदेशात अत्यंत लाभ आणि कीर्ती मिळवून राहत होता. त्याने सात व्रत-नियमांचे पूर्णपणे ग्रहण केले होते – 'मी आयुष्यभर अचेलक राहीन, वस्त्र परिधान करणार नाही; आयुष्यभर ब्रह्मचारी राहीन, मैथुन धर्माचे सेवन करणार नाही; आयुष्यभर केवळ मद्य आणि मांसावरच उपजीविका करीन, भात आणि सातूची लापशी खाणार नाही; वेसालीच्या पूर्वेकडील उदेन नावाच्या चेतियाच्या पलीकडे जाणार नाही; वेसालीच्या दक्षिणेकडील गोतमक नावाच्या चेतियाच्या पलीकडे जाणार नाही; वेसालीच्या पश्चिमेकडील सत्तम्ब नावाच्या चेतियाच्या पलीकडे जाणार नाही; वेसालीच्या उत्तरेकडील बहुपुत्त नावाच्या चेतियाच्या पलीकडे जाणार नाही.' या सात व्रत-नियमांच्या समादानामुळे तो वज्जींच्या प्रदेशात अत्यंत लाभ आणि कीर्ती मिळवून राहत होता. ๑๒. ‘‘อถ โข, ภคฺคว, สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต เยน อเจโล กฬารมฏฺฏโก เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อเจลํ กฬารมฏฺฏกํ ปญฺหํ อปุจฺฉิ. ตสฺส อเจโล กฬารมฏฺฏโก ปญฺหํ ปุฏฺโฐ น สมฺปายาสิ. อสมฺปายนฺโต โกปญฺจ โทสญฺจ อปฺปจฺจยญฺจ ปาตฺวากาสิ. อถ โข, ภคฺคว, สุนกฺขตฺตสฺส ลิจฺฉวิปุตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘สาธุรูปํ วต โภ อรหนฺตํ สมณํ อาสาทิมฺหเส. มา วต โน อโหสิ ทีฆรตฺตํ อหิตาย ทุกฺขายา’ติ. १२. त्यानंतर, हे भग्गव, लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्त जेथे अचेलक कळारमट्टक होता तेथे गेला; आणि जवळ जाऊन त्याने अचेलक कळारमट्टकाला प्रश्न विचारला. प्रश्न विचारला असता तो अचेलक कळारमट्टक त्याचे समाधानकारक उत्तर देऊ शकला नाही. उत्तर देता न आल्यामुळे त्याने आपला राग, द्वेष आणि असंतोष प्रकट केला. तेव्हा, हे भग्गव, लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्तच्या मनात असा विचार आला – 'अरेरे! आम्ही एका चांगल्या, अर्हत श्रमणाचा अपमान केला आहे. हे आमच्यासाठी दीर्घकाळापर्यंत अहितकारक आणि दुःखदायक ठरू नये!' ๑๓. ‘‘อถ [Pg.8] โข, ภคฺคว, สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต เยนาหํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข อหํ, ภคฺคว, สุนกฺขตฺตํ ลิจฺฉวิปุตฺตํ เอตทโวจํ – ‘ตฺวมฺปิ นาม, โมฆปุริส, สมโณ สกฺยปุตฺติโย ปฏิชานิสฺสสี’ติ! ‘กึ ปน มํ, ภนฺเต, ภควา เอวมาห – ตฺวมฺปิ นาม, โมฆปุริส, สมโณ สกฺยปุตฺติโย ปฏิชานิสฺสสี’ติ? ‘นนุ ตฺวํ, สุนกฺขตฺต, อเจลํ กฬารมฏฺฏกํ อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺหํ อปุจฺฉิ. ตสฺส เต อเจโล กฬารมฏฺฏโก ปญฺหํ ปุฏฺโฐ น สมฺปายาสิ. อสมฺปายนฺโต โกปญฺจ โทสญฺจ อปฺปจฺจยญฺจ ปาตฺวากาสิ. ตสฺส เต เอตทโหสิ – ‘‘สาธุรูปํ วต, โภ, อรหนฺตํ สมณํ อาสาทิมฺหเส. มา วต โน อโหสิ ทีฆรตฺตํ อหิตาย ทุกฺขายา’ติ. ‘เอวํ, ภนฺเต. กึ ปน, ภนฺเต, ภควา อรหตฺตสฺส มจฺฉรายตี’ติ? ‘น โข อหํ, โมฆปุริส, อรหตฺตสฺส มจฺฉรายามิ, อปิ จ ตุยฺเหเวตํ ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ อุปฺปนฺนํ, ตํ ปชห. มา เต อโหสิ ทีฆรตฺตํ อหิตาย ทุกฺขาย. ยํ โข ปเนตํ, สุนกฺขตฺต, มญฺญสิ อเจลํ กฬารมฏฺฏกํ – สาธุรูโป อยํ สมโณติ, โส นจิรสฺเสว ปริหิโต สานุจาริโก วิจรนฺโต โอทนกุมฺมาสํ ภุญฺชมาโน สพฺพาเนว เวสาลิยานิ เจติยานิ สมติกฺกมิตฺวา ยสา นิหีโน กาลํ กริสฺสตี’ติ. १३. त्यानंतर, हे भग्गव, लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्त माझ्याकडे आला; आणि जवळ येऊन मला अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्तला मी, हे भग्गव, असे म्हणालो – 'अरे मोघपुरुषा, तू स्वतःला शाक्यपुत्रीय श्रमण म्हणवतोस काय?' 'पण भंते, भगवंतांनी मला असे का म्हटले की – अरे मोघपुरुषा, तू स्वतःला शाक्यपुत्रीय श्रमण म्हणवतोस काय?' 'सुनक्खत्त, तू अचेलक कळारमट्टककडे जाऊन त्याला प्रश्न विचारला नव्हतास का? आणि प्रश्न विचारला असता तो अचेलक कळारमट्टक त्याचे उत्तर देऊ शकला नाही, आणि उत्तर देता न आल्यामुळे त्याने आपला राग, द्वेष आणि असंतोष प्रकट केला नाही का? आणि तुझ्या मनात असा विचार आला नाही का की – “अरेरे! आम्ही एका चांगल्या, अर्हत श्रमणाचा अपमान केला आहे. हे आमच्यासाठी दीर्घकाळापर्यंत अहितकारक आणि दुःखदायक ठरू नये!”' 'होय, भंते. पण भंते, भगवंत इतरांच्या अर्हतपदाचा हेवा का करत आहेत?' 'अरे मोघपुरुषा, मी अर्हतपदाचा हेवा करत नाही, तर तुझ्या मनातच हा वाईट गैरसमज निर्माण झाला आहे, त्याचा तू त्याग कर. हे तुझ्यासाठी दीर्घकाळापर्यंत अहितकारक आणि दुःखदायक ठरू नये. सुनक्खत्त, ज्या अचेलक कळारमट्टकाला तू एक चांगला श्रमण मानतोस, तो लवकरच वस्त्र परिधान करून, पत्नीसह फिरत, भात आणि सातूची लापशी खात, वेसालीच्या सर्व चेतियांच्या मर्यादा ओलांडून, आपली कीर्ती गमावून मृत्यू पावेल.' ‘‘‘อถ โข, ภคฺคว, อเจโล กฬารมฏฺฏโก นจิรสฺเสว ปริหิโต สานุจาริโก วิจรนฺโต โอทนกุมฺมาสํ ภุญฺชมาโน สพฺพาเนว เวสาลิยานิ เจติยานิ สมติกฺกมิตฺวา ยสา นิหีโน กาลมกาสิ. त्यानंतर, हे भग्गव, लवकरच तो अचेलक कळारमट्टक वस्त्र परिधान करून, पत्नीसह फिरत, भात आणि सातूची लापशी खात, वेसालीच्या सर्व चेतियांच्या मर्यादा ओलांडून, आपली कीर्ती गमावून मृत्यू पावला. ๑๔. ‘‘อสฺโสสิ โข, ภคฺคว, สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต – ‘อเจโล กิร กฬารมฏฺฏโก ปริหิโต สานุจาริโก วิจรนฺโต โอทนกุมฺมาสํ ภุญฺชมาโน สพฺพาเนว เวสาลิยานิ เจติยานิ สมติกฺกมิตฺวา ยสา นิหีโน กาลงฺกโต’ติ. อถ โข, ภคฺคว, สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต เยนาหํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข อหํ, ภคฺคว, สุนกฺขตฺตํ ลิจฺฉวิปุตฺตํ เอตทโวจํ – ‘ตํ กึ มญฺญสิ, สุนกฺขตฺต, ยเถว เต อหํ อเจลํ กฬารมฏฺฏกํ อารพฺภ พฺยากาสึ, ตเถว ตํ วิปากํ, อญฺญถา วา’ติ? ‘ยเถว เม, ภนฺเต, ภควา อเจลํ กฬารมฏฺฏกํ อารพฺภ พฺยากาสิ, ตเถว ตํ วิปากํ, โน [Pg.9] อญฺญถา’ติ. ‘ตํ กึ มญฺญสิ, สุนกฺขตฺต, ยทิ เอวํ สนฺเต กตํ วา โหติ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ อกตํ วา’ติ? ‘อทฺธา โข, ภนฺเต, เอวํ สนฺเต กตํ โหติ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ, โน อกต’นฺติ. ‘เอวมฺปิ โข มํ ตฺวํ, โมฆปุริส, อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กโรนฺตํ เอวํ วเทสิ – น หิ ปน เม, ภนฺเต, ภควา อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กโรตี’’ติ. ปสฺส, โมฆปุริส, ยาวญฺจ เต อิทํ อปรทฺธ’นฺติ. ‘‘เอว’มฺปิ โข, ภคฺคว, สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต มยา วุจฺจมาโน อปกฺกเมว อิมสฺมา ธมฺมวินยา, ยถา ตํ อาปายิโก เนรยิโก. १४. हे भग्गव, लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्तने ऐकले की – 'अचेलक कळारमट्टक वस्त्र परिधान करून, पत्नीसह फिरत, भात आणि सातूची लापशी खात, वेसालीच्या सर्व चेतियांच्या मर्यादा ओलांडून, आपली कीर्ती गमावून मृत्यू पावला आहे.' तेव्हा, हे भग्गव, लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्त माझ्याकडे आला; आणि जवळ येऊन मला अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्तला मी असे म्हणालो – 'सुनक्खत्त, तुला काय वाटते? मी अचेलक कळारमट्टकविषयी जे भाकीत केले होते, ते तसेच घडले की काही वेगळे घडले?' 'भंते, भगवंतांनी अचेलक कळारमट्टकविषयी जे भाकीत केले होते, ते तसेच घडले, त्यात काहीही फरक पडला नाही.' 'सुनक्खत्त, तुला काय वाटते? जर असे आहे, तर मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धि-प्रातिहार्य घडले की नाही?' 'नक्कीच, भंते, जर असे आहे, तर मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धि-प्रातिहार्य घडले आहे, न घडले असे नाही.' 'अरे मोघपुरुषा, मी मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धि-प्रातिहार्य दाखवत असतानाही तू मला असे म्हणतोस की – “भंते, भगवंत मला मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धि-प्रातिहार्य दाखवत नाहीत.” अरे मोघपुरुषा, बघ तू किती मोठा अपराध केला आहेस!' हे भग्गव, माझ्याकडून असे सांगितले गेले असताही, लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्त या धम्म-विनयातून तसाच निघून गेला, जणू काही तो नरकात जाण्यास पात्र असलेला प्राणीच होता. อเจลปาถิกปุตฺตวตฺถุ अचेलक पाथिकपुत्त कथा ๑๕. ‘‘เอกมิทาหํ, ภคฺคว, สมยํ ตตฺเถว เวสาลิยํ วิหรามิ มหาวเน กูฏาคารสาลายํ. เตน โข ปน สมเยน อเจโล ปาถิกปุตฺโต เวสาลิยํ ปฏิวสติ ลาภคฺคปฺปตฺโต เจว ยสคฺคปฺปตฺโต จ วชฺชิคาเม. โส เวสาลิยํ ปริสติ เอวํ วาจํ ภาสติ – ‘สมโณปิ โคตโม ญาณวาโท, อหมฺปิ ญาณวาโท. ญาณวาโท โข ปน ญาณวาเทน อรหติ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ ทสฺเสตุํ. สมโณ โคตโม อุปฑฺฒปถํ อาคจฺเฉยฺย, อหมฺปิ อุปฑฺฒปถํ คจฺเฉยฺยํ. เต ตตฺถ อุโภปิ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กเรยฺยาม. เอกํ เจ สมโณ โคตโม อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กริสฺสติ, ทฺวาหํ กริสฺสามิ. ทฺเว เจ สมโณ โคตโม อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยานิ กริสฺสติ, จตฺตาราหํ กริสฺสามิ. จตฺตาริ เจ สมโณ โคตโม อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยานิ กริสฺสติ, อฏฺฐาหํ กริสฺสามิ. อิติ ยาวตกํ ยาวตกํ สมโณ โคตโม อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กริสฺสติ, ตทฺทิคุณํ ตทฺทิคุณาหํ กริสฺสามี’ติ. १५. “हे भग्गव, एका वेळी मी वैशालीमध्ये महावनातील कूटागारशाळेतच विहार करत होतो. त्या वेळी पाथिकपुत्त नावाचा एक नग्न अचेलक वैशालीमध्ये वज्जींच्या प्रदेशात अत्यंत लाभ आणि कीर्ती प्राप्त करून राहत होता. तो वैशालीतील सभेत असे बोलत असे – ‘श्रमण गौतम देखील ज्ञानवादी आहेत आणि मीसुद्धा ज्ञानवादी आहे. ज्ञानवादी व्यक्तीने दुसऱ्या ज्ञानवादी व्यक्तीसोबत मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धिप्रातिहार्य दाखवणे योग्य आहे. श्रमण गौतम अर्ध्या वाटेपर्यंत यावेत, मीसुद्धा अर्ध्या वाटेपर्यंत जाईन. तिथे आम्ही दोघेही मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धिप्रातिहार्य दाखवू. जर श्रमण गौतमांनी मानवी धर्मापलीकडील एक ऋद्धिप्रातिहार्य दाखवले, तर मी दोन दाखवीन. जर श्रमण गौतमांनी मानवी धर्मापलीकडील दोन ऋद्धिप्रातिहार्ये दाखवली, तर मी चार दाखवीन. जर श्रमण गौतमांनी मानवी धर्मापलीकडील चार ऋद्धिप्रातिहार्ये दाखवली, तर मी आठ दाखवीन. अशा प्रकारे, श्रमण गौतम जितकी जितकी मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धिप्रातिहार्ये दाखवतील, त्याच्या दुप्पट दुप्पट मी दाखवीन.’ ๑๖. ‘‘อถ โข, ภคฺคว, สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต เยนาหํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข, ภคฺคว, สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต มํ เอตทโวจ – ‘อเจโล, ภนฺเต, ปาถิกปุตฺโต เวสาลิยํ ปฏิวสติ ลาภคฺคปฺปตฺโต เจว ยสคฺคปฺปตฺโต จ วชฺชิคาเม. โส เวสาลิยํ ปริสติ เอวํ วาจํ ภาสติ – สมโณปิ โคตโม [Pg.10] ญาณวาโท, อหมฺปิ ญาณวาโท. ญาณวาโท โข ปน ญาณวาเทน อรหติ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ ทสฺเสตุํ. สมโณ โคตโม อุปฑฺฒปถํ อาคจฺเฉยฺย, อหมฺปิ อุปฑฺฒปถํ คจฺเฉยฺยํ. เต ตตฺถ อุโภปิ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กเรยฺยาม. เอกํ เจ สมโณ โคตโม อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กริสฺสติ, ทฺวาหํ กริสฺสามิ. ทฺเว เจ สมโณ โคตโม อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยานิ กริสฺสติ, จตฺตาราหํ กริสฺสามิ. จตฺตาริ เจ สมโณ โคตโม อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยานิ กริสฺสติ, อฏฺฐาหํ กริสฺสามิ. อิติ ยาวตกํ ยาวตกํ สมโณ โคตโม อุตฺตริ มนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กริสฺสติ, ตทฺทิคุณํ ตทฺทิคุณาหํ กริสฺสามี’’ติ. १६. “त्यानंतर, हे भग्गव, लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्त माझ्याकडे आला; जवळ येऊन त्याने मला अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्त मला म्हणाला – ‘भन्ते, पाथिकपुत्त नावाचा नग्न अचेलक वैशालीमध्ये वज्जींच्या प्रदेशात अत्यंत लाभ आणि कीर्ती प्राप्त करून राहत आहे. तो वैशालीतील सभेत असे बोलतो – “श्रमण गौतम देखील ज्ञानवादी आहेत आणि मीसुद्धा ज्ञानवादी आहे. ज्ञानवादी व्यक्तीने दुसऱ्या ज्ञानवादी व्यक्तीसोबत मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धिप्रातिहार्य दाखवणे योग्य आहे. श्रमण गौतम अर्ध्या वाटेपर्यंत यावेत, मीसुद्धा अर्ध्या वाटेपर्यंत जाईन. तिथे आम्ही दोघेही मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धिप्रातिहार्य दाखवू. जर श्रमण गौतमांनी मानवी धर्मापलीकडील एक ऋद्धिप्रातिहार्य दाखवले, तर मी दोन दाखवीन. जर श्रमण गौतमांनी मानवी धर्मापलीकडील दोन ऋद्धिप्रातिहार्ये दाखवली, तर मी चार दाखवीन. जर श्रमण गौतमांनी मानवी धर्मापलीकडील चार ऋद्धिप्रातिहार्ये दाखवली, तर मी आठ दाखवीन. अशा प्रकारे, श्रमण गौतम जितकी जितकी मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धिप्रातिहार्ये दाखवतील, त्याच्या दुप्पट दुप्पट मी दाखवीन.”’ ‘‘เอวํ วุตฺเต, อหํ, ภคฺคว, สุนกฺขตฺตํ ลิจฺฉวิปุตฺตํ เอตทโวจํ – ‘อภพฺโพ โข, สุนกฺขตฺต, อเจโล ปาถิกปุตฺโต ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา มม สมฺมุขีภาวํ อาคนฺตุํ. สเจปิสฺส เอวมสฺส – อหํ ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา สมณสฺส โคตมสฺส สมฺมุขีภาวํ คจฺเฉยฺยนฺติ, มุทฺธาปิ ตสฺส วิปเตยฺยา’ติ. “असे म्हटल्यावर, हे भग्गव, मी लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्तला म्हणालो – ‘सुनक्खत्त, तो नग्न अचेलक पाथिकपुत्त ते शब्द मागे न घेता, ते विचार न सोडता आणि ती दृष्टी न त्यागता माझ्या समोर येण्यास असमर्थ आहे. जर त्याने असा विचार केला की – “मी ते शब्द मागे न घेता, ते विचार न सोडता आणि ती दृष्टी न त्यागता श्रमण गौतमांच्या समोर जाईन”, तर त्याचे डोके फुटून तुकडे होतील.’ ๑๗. ‘รกฺขเตตํ, ภนฺเต, ภควา วาจํ, รกฺขเตตํ สุคโต วาจ’นฺติ. ‘กึ ปน มํ ตฺวํ, สุนกฺขตฺต, เอวํ วเทสิ – รกฺขเตตํ, ภนฺเต, ภควา วาจํ, รกฺขเตตํ สุคโต วาจ’นฺติ? ‘ภควตา จสฺส, ภนฺเต, เอสา วาจา เอกํเสน โอธาริตา – อภพฺโพ อเจโล ปาถิกปุตฺโต ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา มม สมฺมุขีภาวํ อาคนฺตุํ. สเจปิสฺส เอวมสฺส – อหํ ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา สมณสฺส โคตมสฺส สมฺมุขีภาวํ คจฺเฉยฺยนฺติ, มุทฺธาปิ ตสฺส วิปเตยฺยาติ. อเจโล จ, ภนฺเต, ปาถิกปุตฺโต วิรูปรูเปน ภควโต สมฺมุขีภาวํ อาคจฺเฉยฺย, ตทสฺส ภควโต มุสา’ติ. १७. ‘भन्ते, भगवंतांनी आपल्या या शब्दांचे रक्षण करावे, सुगतांनी आपल्या या शब्दांचे रक्षण करावे!’ ‘पण सुनक्खत्त, तू मला असे का म्हणत आहेस की – भगवंतांनी आपल्या या शब्दांचे रक्षण करावे, सुगतांनी आपल्या या शब्दांचे रक्षण करावे?’ ‘भन्ते, भगवंतांनी पाथिकपुत्ताविषयी हे विधान अत्यंत ठामपणे केले आहे की – “तो नग्न अचेलक पाथिकपुत्त ते शब्द मागे न घेता, ते विचार न सोडता आणि ती दृष्टी न त्यागता माझ्या समोर येण्यास असमर्थ आहे. जर त्याने असा विचार केला की – मी ते शब्द मागे न घेता, ते विचार न सोडता आणि ती दृष्टी न त्यागता श्रमण गौतमांच्या समोर जाईन, तर त्याचे डोके फुटून तुकडे होतील.” परंतु भन्ते, जर तो नग्न अचेलक पाथिकपुत्त एखाद्या बदललेल्या रूपात भगवंतांच्या समोर आला, तर भगवंतांचे हे शब्द खोटे ठरतील!’ ๑๘. ‘อปิ นุ, สุนกฺขตฺต, ตถาคโต ตํ วาจํ ภาเสยฺย ยา สา วาจา ทฺวยคามินี’ติ? ‘กึ ปน, ภนฺเต, ภควตา อเจโล ปาถิกปุตฺโต เจตสา [Pg.11] เจโต ปริจฺจ วิทิโต – อภพฺโพ อเจโล ปาถิกปุตฺโต ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา มม สมฺมุขีภาวํ อาคนฺตุํ. สเจปิสฺส เอวมสฺส – อหํ ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา สมณสฺส โคตมสฺส สมฺมุขีภาวํ คจฺเฉยฺยนฺติ, มุทฺธาปิ ตสฺส วิปเตยฺยา’ติ? १८. ‘सुनक्खत्त, तथागत कधी असे शब्द बोलतील का, जे दुटप्पी असतील?’ ‘पण भन्ते, भगवंतांनी आपल्या चित्ताने त्या नग्न अचेलक पाथिकपुत्ताच्या चित्ताला जाणून हे जाणले आहे का की – “तो नग्न अचेलक पाथिकपुत्त ते शब्द मागे न घेता, ते विचार न सोडता आणि ती दृष्टी न त्यागता माझ्या समोर येण्यास असमर्थ आहे. जर त्याने असा विचार केला की – मी ते शब्द मागे न घेता, ते विचार न सोडता आणि ती दृष्टी न त्यागता श्रमण गौतमांच्या समोर जाईन, तर त्याचे डोके फुटून तुकडे होतील”?’ ‘อุทาหุ, เทวตา ภควโต เอตมตฺถํ อาโรเจสุํ – อภพฺโพ, ภนฺเต, อเจโล ปาถิกปุตฺโต ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา ภควโต สมฺมุขีภาวํ อาคนฺตุํ. สเจปิสฺส เอวมสฺส – อหํ ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา สมณสฺส โคตมสฺส สมฺมุขีภาวํ คจฺเฉยฺยนฺติ, มุทฺธาปิ ตสฺส วิปเตยฺยา’ติ? ‘किंवा देवतेने भगवंतांना ही गोष्ट सांगितली आहे की – “भन्ते, तो नग्न अचेलक पाथिकपुत्त ते शब्द मागे न घेता, ते विचार न सोडता आणि ती दृष्टी न त्यागता भगवंतांच्या समोर येण्यास असमर्थ आहे. जर त्याने असा विचार केला की – मी ते शब्द मागे न घेता, ते विचार न सोडता आणि ती दृष्टी न त्यागता श्रमण गौतमांच्या समोर जाईन, तर त्याचे डोके फुटून तुकडे होतील”?’ ๑๙. ‘เจตสา เจโต ปริจฺจ วิทิโต เจว เม, สุนกฺขตฺต, อเจโล ปาถิกปุตฺโต อภพฺโพ อเจโล ปาถิกปุตฺโต ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา มม สมฺมุขีภาวํ อาคนฺตุํ. สเจปิสฺส เอวมสฺส – อหํ ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา สมณสฺส โคตมสฺส สมฺมุขีภาวํ คจฺเฉยฺยนฺติ, มุทฺธาปิ ตสฺส วิปเตยฺยา’ติ. १९. ‘सुनक्खत्त, मी माझ्या चित्ताने त्या नग्न अचेलक पाथिकपुत्ताच्या चित्ताला जाणूनच हे जाणले आहे की – तो नग्न अचेलक पाथिकपुत्त ते शब्द मागे न घेता, ते विचार न सोडता आणि ती दृष्टी न त्यागता माझ्या समोर येण्यास असमर्थ आहे. जर त्याने असा विचार केला की – “मी ते शब्द मागे न घेता, ते विचार न सोडता आणि ती दृष्टी न त्यागता श्रमण गौतमांच्या समोर जाईन”, तर त्याचे डोके फुटून तुकडे होतील.’ ‘เทวตาปิ เม เอตมตฺถํ อาโรเจสุํ – อภพฺโพ, ภนฺเต, อเจโล ปาถิกปุตฺโต ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา ภควโต สมฺมุขีภาวํ อาคนฺตุํ. สเจปิสฺส เอวมสฺส – อหํ ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา สมณสฺส โคตมสฺส สมฺมุขีภาวํ คจฺเฉยฺยนฺติ, มุทฺธาปิ ตสฺส วิปเตยฺยา’ติ. ‘आणि देवतेनेही मला ही गोष्ट सांगितली आहे की – “भन्ते, तो नग्न अचेलक पाथिकपुत्त ते शब्द मागे न घेता, ते विचार न सोडता आणि ती दृष्टी न त्यागता भगवंतांच्या समोर येण्यास असमर्थ आहे. जर त्याने असा विचार केला की – मी ते शब्द मागे न घेता, ते विचार न सोडता आणि ती दृष्टी न त्यागता श्रमण गौतमांच्या समोर जाईन, तर त्याचे डोके फुटून तुकडे होतील.”’ ‘อชิโตปิ นาม ลิจฺฉวีนํ เสนาปติ อธุนา กาลงฺกโต ตาวตึสกายํ อุปปนฺโน. โสปิ มํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวมาโรเจสิ – อลชฺชี, ภนฺเต, อเจโล ปาถิกปุตฺโต; มุสาวาที, ภนฺเต, อเจโล ปาถิกปุตฺโต. มมฺปิ, ภนฺเต, อเจโล ปาถิกปุตฺโต พฺยากาสิ วชฺชิคาเม – อชิโต ลิจฺฉวีนํ เสนาปติ มหานิรยํ อุปปนฺโนติ. น โข ปนาหํ, ภนฺเต, มหานิรยํ อุปปนฺโน; ตาวตึสกายมฺหิ อุปปนฺโน. อลชฺชี, ภนฺเต, อเจโล ปาถิกปุตฺโต; มุสาวาที, ภนฺเต, อเจโล ปาถิกปุตฺโต; อภพฺโพ จ, ภนฺเต, อเจโล ปาถิกปุตฺโต ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา ภควโต สมฺมุขีภาวํ อาคนฺตุํ. สเจปิสฺส [Pg.12] เอวมสฺส – อหํ ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา สมณสฺส โคตมสฺส สมฺมุขีภาวํ คจฺเฉยฺยนฺติ, มุทฺธาปิ ตสฺส วิปเตยฺยา’ติ. अजित नावाचा लिच्छवींचा सेनापती नुकताच मरण पावून तावतिंस देवलोकात उत्पन्न झाला आहे. त्यानेही माझ्याकडे येऊन मला असे सांगितले – 'भंते, तो नग्न अचेलक पाथिकपुत्त निर्लज्ज आहे; भंते, तो नग्न अचेलक पाथिकपुत्त लबाड आहे. भंते, त्या नग्न अचेलक पाथिकपुत्ताने वज्जींच्या गावात माझ्याविषयीही असे भाकीत केले होते की – लिच्छवींचा सेनापती अजित हा महानरकात उत्पन्न झाला आहे. परंतु भंते, मी महानरकात उत्पन्न झालेलो नाही, तर तावतिंस देवलोकात उत्पन्न झालो आहे. भंते, तो नग्न अचेलक पाथिकपुत्त निर्लज्ज आहे; भंते, तो नग्न अचेलक पाथिकपुत्त लबाड आहे. भंते, तो नग्न अचेलक पाथिकपुत्त आपले ते बोलणे न सोडता, आपले ते मन न बदलता आणि आपली ती दृष्टी न त्यागता भगवंतांच्या समोर येण्यास असमर्थ आहे. जर त्याला असे वाटले की – मी आपले ते बोलणे न सोडता, आपले ते मन न बदलता आणि आपली ती दृष्टी न त्यागता श्रमण गोतमांच्या समोर जाईन, तर त्याचे डोकेही छिन्नविच्छिन्न होऊन पडेल.' ‘อิติ โข, สุนกฺขตฺต, เจตสา เจโต ปริจฺจ วิทิโต เจว เม อเจโล ปาถิกปุตฺโต อภพฺโพ อเจโล ปาถิกปุตฺโต ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา มม สมฺมุขีภาวํ อาคนฺตุํ. สเจปิสฺส เอวมสฺส – อหํ ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา สมณสฺส โคตมสฺส สมฺมุขีภาวํ คจฺเฉยฺยนฺติ, มุทฺธาปิ ตสฺส วิปเตยฺยาติ. เทวตาปิ เม เอตมตฺถํ อาโรเจสุํ – อภพฺโพ, ภนฺเต, อเจโล ปาถิกปุตฺโต ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา ภควโต สมฺมุขีภาวํ อาคนฺตุํ. สเจปิสฺส เอวมสฺส – อหํ ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา สมณสฺส โคตมสฺส สมฺมุขีภาวํ คจฺเฉยฺยนฺติ, มุทฺธาปิ ตสฺส วิปเตยฺยา’ติ. अशा प्रकारे, हे सुनक्खत्त, मी माझ्या मनाने त्याच्या मनाचा विचार जाणून त्या नग्न अचेलक पाथिकपुत्ताला ओळखले आहे की, तो नग्न अचेलक पाथिकपुत्त आपले ते बोलणे न सोडता, आपले ते मन न बदलता आणि आपली ती दृष्टी न त्यागता माझ्या समोर येण्यास असमर्थ आहे. जर त्याला असे वाटले की – मी आपले ते बोलणे न सोडता, आपले ते मन न बदलता आणि आपली ती दृष्टी न त्यागता श्रमण गोतमांच्या समोर जाईन, तर त्याचे डोकेही छिन्नविच्छिन्न होऊन पडेल. देवतांनीही मला हीच गोष्ट सांगितली आहे – 'भंते, तो नग्न अचेलक पाथिकपुत्त आपले ते बोलणे न सोडता, आपले ते मन न बदलता आणि आपली ती दृष्टी न त्यागता भगवंतांच्या समोर येण्यास असमर्थ आहे. जर त्याला असे वाटले की – मी आपले ते बोलणे न सोडता, आपले ते मन न बदलता आणि आपली ती दृष्टी न त्यागता श्रमण गोतमांच्या समोर जाईन, तर त्याचे डोकेही छिन्नविच्छिन्न होऊन पडेल.' ‘โส โข ปนาหํ, สุนกฺขตฺต, เวสาลิยํ ปิณฺฑาย จริตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฺปฏิกฺกนฺโต เยน อเจลสฺส ปาถิกปุตฺตสฺส อาราโม เตนุปสงฺกมิสฺสามิ ทิวาวิหาราย. ยสฺสทานิ ตฺวํ, สุนกฺขตฺต, อิจฺฉสิ, ตสฺส อาโรเจหี’ติ. त्यामुळे, हे सुनक्खत्त, मी वैशालीमध्ये पिंडपातासाठी फिरून, भोजनोत्तर भिक्षाटनाहून परत आल्यावर, जेथे नग्न अचेलक पाथिकपुत्ताचा आराम आहे, तेथे दुपारच्या विश्रांतीसाठी जाईन. आता तुला, हे सुनक्खत्त, ज्या कोणाला सांगायचे असेल, त्याला तू सांगू शकतोस. อิทฺธิปาฏิหาริยกถา ऋद्धि-प्रातिहार्य कथा ๒๐. ‘‘อถ ขฺวาหํ, ภคฺคว, ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย เวสาลึ ปิณฺฑาย ปาวิสึ. เวสาลิยํ ปิณฺฑาย จริตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฺปฏิกฺกนฺโต เยน อเจลสฺส ปาถิกปุตฺตสฺส อาราโม เตนุปสงฺกมึ ทิวาวิหาราย. อถ โข, ภคฺคว, สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต ตรมานรูโป เวสาลึ ปวิสิตฺวา เยน อภิญฺญาตา อภิญฺญาตา ลิจฺฉวี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อภิญฺญาเต อภิญฺญาเต ลิจฺฉวี เอตทโวจ – ‘เอสาวุโส, ภควา เวสาลิยํ ปิณฺฑาย จริตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฺปฏิกฺกนฺโต เยน อเจลสฺส ปาถิกปุตฺตสฺส อาราโม เตนุปสงฺกมิ ทิวาวิหาราย. อภิกฺกมถายสฺมนฺโต อภิกฺกมถายสฺมนฺโต, สาธุรูปานํ สมณานํ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ ภวิสฺสตี’ติ[Pg.13]. อถ โข, ภคฺคว, อภิญฺญาตานํ อภิญฺญาตานํ ลิจฺฉวีนํ เอตทโหสิ – ‘สาธุรูปานํ กิร, โภ, สมณานํ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ ภวิสฺสติ; หนฺท วต, โภ, คจฺฉามา’ติ. เยน จ อภิญฺญาตา อภิญฺญาตา พฺราหฺมณมหาสาลา คหปติเนจยิกา นานาติตฺถิยา สมณพฺราหฺมณา เตนุปสงฺกมิ. อุปสงฺกมิตฺวา อภิญฺญาเต อภิญฺญาเต นานาติตฺถิเย สมณพฺราหฺมเณ เอตทโวจ – ‘เอสาวุโส, ภควา เวสาลิยํ ปิณฺฑาย จริตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฺปฏิกฺกนฺโต เยน อเจลสฺส ปาถิกปุตฺตสฺส อาราโม เตนุปสงฺกมิ ทิวาวิหาราย. อภิกฺกมถายสฺมนฺโต อภิกฺกมถายสฺมนฺโต, สาธุรูปานํ สมณานํ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ ภวิสฺสตี’ติ. อถ โข, ภคฺคว, อภิญฺญาตานํ อภิญฺญาตานํ นานาติตฺถิยานํ สมณพฺราหฺมณานํ เอตทโหสิ – ‘สาธุรูปานํ กิร, โภ, สมณานํ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ ภวิสฺสติ; หนฺท วต, โภ, คจฺฉามา’ติ. २०. त्यानंतर, हे भग्गव, मी सकाळी वस्त्र परिधान करून, पात्र व चीवर घेऊन वैशालीमध्ये पिंडपातासाठी प्रवेश केला. वैशालीमध्ये पिंडपातासाठी फिरून, भोजनोत्तर भिक्षाटनाहून परत आल्यावर, जेथे नग्न अचेलक पाथिकपुत्ताचा आराम होता, तेथे मी दुपारच्या विश्रांतीसाठी गेलो. तेव्हा, हे भग्गव, लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्त घाईघाईने वैशालीमध्ये प्रवेश करून जेथे प्रसिद्ध प्रसिद्ध लिच्छवी होते, तेथे गेला. तेथे जाऊन त्याने त्या प्रसिद्ध प्रसिद्ध लिच्छवींना असे म्हटले – 'मित्रांनो, हे भगवंत वैशालीमध्ये पिंडपातासाठी फिरून, भोजनोत्तर भिक्षाटनाहून परत आल्यावर, जेथे नग्न अचेलक पाथिकपुत्ताचा आराम आहे, तेथे दुपारच्या विश्रांतीसाठी गेले आहेत. चला, पूजनीयहो, चला! उत्तम शीलवान श्रमणांचे उत्तर-मनुष्यधर्माचे ऋद्धि-प्रातिहार्य पाहायला मिळेल.' तेव्हा, हे भग्गव, त्या प्रसिद्ध प्रसिद्ध लिच्छवींच्या मनात असा विचार आला – 'अहो, उत्तम शीलवान श्रमणांचे उत्तर-मनुष्यधर्माचे ऋद्धि-प्रातिहार्य होणार आहे; चला तर मग, आपण जाऊ या!' मग तो जेथे प्रसिद्ध प्रसिद्ध श्रीमंत ब्राह्मण, धनाढ्य गृहपती आणि विविध पंथांचे श्रमण-ब्राह्मण होते, तेथे गेला. तेथे जाऊन त्याने त्या प्रसिद्ध प्रसिद्ध विविध पंथांच्या श्रमण-ब्राह्मणांना असे म्हटले – 'मित्रांनो, हे भगवंत वैशालीमध्ये पिंडपातासाठी फिरून, भोजनोत्तर भिक्षाटनाहून परत आल्यावर, जेथे नग्न अचेलक पाथिकपुत्ताचा आराम आहे, तेथे दुपारच्या विश्रांतीसाठी गेले आहेत. चला, पूजनीयहो, चला! उत्तम शीलवान श्रमणांचे उत्तर-मनुष्यधर्माचे ऋद्धि-प्रातिहार्य पाहायला मिळेल.' तेव्हा, हे भग्गव, त्या प्रसिद्ध प्रसिद्ध विविध पंथांच्या श्रमण-ब्राह्मणांच्या मनात असा विचार आला – 'अहो, उत्तम शीलवान श्रमणांचे उत्तर-मनुष्यधर्माचे ऋद्धि-प्रातिहार्य होणार आहे; चला तर मग, आपण जाऊ या!' ‘‘อถ โข, ภคฺคว, อภิญฺญาตา อภิญฺญาตา ลิจฺฉวี, อภิญฺญาตา อภิญฺญาตา จ พฺราหฺมณมหาสาลา คหปติเนจยิกา นานาติตฺถิยา สมณพฺราหฺมณา เยน อเจลสฺส ปาถิกปุตฺตสฺส อาราโม เตนุปสงฺกมึสุ. สา เอสา, ภคฺคว, ปริสา มหา โหติ อเนกสตา อเนกสหสฺสา. त्यानंतर, हे भग्गव, ते प्रसिद्ध प्रसिद्ध लिच्छवी, प्रसिद्ध प्रसिद्ध श्रीमंत ब्राह्मण, धनाढ्य गृहपती आणि विविध पंथांचे श्रमण-ब्राह्मण जेथे नग्न अचेलक पाथिकपुत्ताचा आराम होता, तेथे गेले. हे भग्गव, ती परिषद शेकडो आणि हजारो लोकांची मिळून खूप मोठी झाली होती. ๒๑. ‘‘อสฺโสสิ โข, ภคฺคว, อเจโล ปาถิกปุตฺโต – ‘อภิกฺกนฺตา กิร อภิญฺญาตา อภิญฺญาตา ลิจฺฉวี, อภิกฺกนฺตา อภิญฺญาตา อภิญฺญาตา จ พฺราหฺมณมหาสาลา คหปติเนจยิกา นานาติตฺถิยา สมณพฺราหฺมณา. สมโณปิ โคตโม มยฺหํ อาราเม ทิวาวิหารํ นิสินฺโน’ติ. สุตฺวานสฺส ภยํ ฉมฺภิตตฺตํ โลมหํโส อุทปาทิ. อถ โข, ภคฺคว, อเจโล ปาถิกปุตฺโต ภีโต สํวิคฺโค โลมหฏฺฐชาโต เยน ตินฺทุกขาณุปริพฺพาชการาโม เตนุปสงฺกมิ. २१. हे भग्गव, नग्न अचेलक पाथिकपुत्ताने ऐकले की – 'प्रसिद्ध प्रसिद्ध लिच्छवी आले आहेत, तसेच प्रसिद्ध प्रसिद्ध श्रीमंत ब्राह्मण, धनाढ्य गृहपती आणि विविध पंथांचे श्रमण-ब्राह्मणही आले आहेत. श्रमण गोतम देखील माझ्या आरामात दुपारच्या विश्रांतीसाठी बसले आहेत.' हे ऐकून त्याला अत्यंत भीती वाटली, त्याचे शरीर थरथर कापायला लागले आणि अंगावर काटा उभा राहिला. तेव्हा, हे भग्गव, तो नग्न अचेलक पाथिकपुत्त घाबरलेला, भयभीत झालेला आणि अंगावर काटा उभा राहिलेल्या अवस्थेत जेथे तिन्दुकखाणू परिव्राजकाचा आराम होता, तेथे पळून गेला. ‘‘อสฺโสสิ โข, ภคฺคว, สา ปริสา – ‘อเจโล กิร ปาถิกปุตฺโต ภีโต สํวิคฺโค โลมหฏฺฐชาโต เยน ตินฺทุกขาณุปริพฺพาชการาโม [Pg.14] เตนุปสงฺกนฺโต’ติ. อถ โข, ภคฺคว, สา ปริสา อญฺญตรํ ปุริสํ อามนฺเตสิ – हे भग्गव, त्या परिषदेने ऐकले की – 'तो नग्न अचेलक पाथिकपुत्त घाबरलेला, भयभीत झालेला आणि अंगावर काटा उभा राहिलेल्या अवस्थेत तिन्दुकखाणू परिव्राजकाच्या आरामात गेला आहे.' तेव्हा, हे भग्गव, त्या परिषदेने एका माणसाला बोलावून सांगितले – ‘เอหิ ตฺวํ, โภ ปุริส, เยน ตินฺทุกขาณุปริพฺพาชการาโม, เยน อเจโล ปาถิกปุตฺโต เตนุปสงฺกม. อุปสงฺกมิตฺวา อเจลํ ปาถิกปุตฺตํ เอวํ วเทหิ – อภิกฺกมาวุโส, ปาถิกปุตฺต, อภิกฺกนฺตา อภิญฺญาตา อภิญฺญาตา ลิจฺฉวี, อภิกฺกนฺตา อภิญฺญาตา อภิญฺญาตา จ พฺราหฺมณมหาสาลา คหปติเนจยิกา นานาติตฺถิยา สมณพฺราหฺมณา, สมโณปิ โคตโม อายสฺมโต อาราเม ทิวาวิหารํ นิสินฺโน; ภาสิตา โข ปน เต เอสา, อาวุโส ปาถิกปุตฺต, เวสาลิยํ ปริสติ วาจา สมโณปิ โคตโม ญาณวาโท, อหมฺปิ ญาณวาโท. ญาณวาโท โข ปน ญาณวาเทน อรหติ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ ทสฺเสตุํ. สมโณ โคตโม อุปฑฺฒปถํ อาคจฺเฉยฺย อหมฺปิ อุปฑฺฒปถํ คจฺเฉยฺยํ. เต ตตฺถ อุโภปิ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กเรยฺยาม. เอกํ เจ สมโณ โคตโม อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กริสฺสติ, ทฺวาหํ กริสฺสามิ. ทฺเว เจ สมโณ โคตโม อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยานิ กริสฺสติ, จตฺตาราหํ กริสฺสามิ. จตฺตาริ เจ สมโณ โคตโม อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยานิ กริสฺสติ, อฏฺฐาหํ กริสฺสามิ. อิติ ยาวตกํ ยาวตกํ สมโณ โคตโม อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กริสฺสติ, ตทฺทิคุณํ ตทฺทิคุณาหํ กริสฺสามี’ติ อภิกฺกมสฺเสว โข; อาวุโส ปาถิกปุตฺต, อุปฑฺฒปถํ. สพฺพปฐมํเยว อาคนฺตฺวา สมโณ โคตโม อายสฺมโต อาราเม ทิวาวิหารํ นิสินฺโน’ติ. ‘हे माणसा, ये! जेथे तिन्दुकखाणु परिव्राजक आराम आहे, जेथे नग्न पाथिकपुत्त आहे, तेथे जा. तेथे जाऊन नग्न पाथिकपुत्ताला असे सांग – ‘मित्रा पाथिकपुत्ता, पुढे ये! प्रसिद्ध आणि नामांकित लिच्छवी, प्रसिद्ध आणि नामांकित महाशाल ब्राह्मण, श्रीमंत गृहपती आणि विविध पंथांचे श्रमण-ब्राह्मण आले आहेत. श्रमण गौतम देखील तुमच्या उद्यानात दुपारच्या विश्रांतीसाठी बसले आहेत. मित्रा पाथिकपुत्ता, तू वैशालीतील परिषदेत असे म्हणाला होतास की – श्रमण गौतम देखील ज्ञानवादी आहेत आणि मीसुद्धा ज्ञानवादी आहे. ज्ञानवादी माणसाने दुसऱ्या ज्ञानवादी माणसासोबत मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धि-प्रातिहार्य दाखवणे योग्य आहे. जर श्रमण गौतम अर्ध्या वाटेवर आले, तर मीसुद्धा अर्ध्या वाटेवर जाईन. तेथे आम्ही दोघेही मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धि-प्रातिहार्य दाखवू. जर श्रमण गौतम मानवी धर्मापलीकडील एक ऋद्धि-प्रातिहार्य दाखवतील, तर मी दोन दाखवीन. जर श्रमण गौतम मानवी धर्मापलीकडील दोन ऋद्धि-प्रातिहार्य दाखवतील, तर मी चार दाखवीन. जर श्रमण गौतम मानवी धर्मापलीकडील चार ऋद्धि-प्रातिहार्य दाखवतील, तर मी आठ दाखवीन. अशा प्रकारे, श्रमण गौतम जेवढे जेवढे मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धि-प्रातिहार्य दाखवतील, त्याच्या दुप्पट-दुप्पट मी दाखवीन.’ म्हणून मित्रा पाथिकपुत्ता, तू अर्ध्या वाटेपर्यंत तरी नक्कीच ये. श्रमण गौतम सर्वांत आधी येऊन तुझ्या उद्यानात दुपारच्या विश्रांतीसाठी बसले आहेत.’ ๒๒. ‘‘เอวํ, โภติ โข, ภคฺคว, โส ปุริโส ตสฺสา ปริสาย ปฏิสฺสุตฺวา เยน ตินฺทุกขาณุปริพฺพาชการาโม, เยน อเจโล ปาถิกปุตฺโต เตนุปสงฺกมิ. อุปสงฺกมิตฺวา อเจลํ ปาถิกปุตฺตํ เอตทโวจ – ‘อภิกฺกมาวุโส ปาถิกปุตฺต, อภิกฺกนฺตา อภิญฺญาตา อภิญฺญาตา ลิจฺฉวี, อภิกฺกนฺตา อภิญฺญาตา อภิญฺญาตา จ พฺราหฺมณมหาสาลา คหปติเนจยิกา นานาติตฺถิยา สมณพฺราหฺมณา. สมโณปิ โคตโม อายสฺมโต อาราเม ทิวาวิหารํ นิสินฺโน. ภาสิตา [Pg.15] โข ปน เต เอสา, อาวุโส ปาถิกปุตฺต, เวสาลิยํ ปริสติ วาจา – สมโณปิ โคตโม ญาณวาโท; อหมฺปิ ญาณวาโท. ญาณวาโท โข ปน ญาณวาเทน อรหติ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ ทสฺเสตุํ…เป… ตทฺทิคุณํ ตทฺทิคุณาหํ กริสฺสามีติ. อภิกฺกมสฺเสว โข, อาวุโส ปาถิกปุตฺต, อุปฑฺฒปถํ. สพฺพปฐมํเยว อาคนฺตฺวา สมโณ โคตโม อายสฺมโต อาราเม ทิวาวิหารํ นิสินฺโน’ติ. २२. “हे भग्गव, त्या परिषदेचे ऐकून त्या माणसाने ‘होय, महाराज’ असे उत्तर दिले आणि जेथे तिन्दुकखाणु परिव्राजक आराम होता, जेथे नग्न पाथिकपुत्त होता, तेथे तो गेला. तेथे जाऊन त्याने नग्न पाथिकपुत्ताला असे म्हटले – ‘मित्रा पाथिकपुत्ता, पुढे ये! प्रसिद्ध आणि नामांकित लिच्छवी, प्रसिद्ध आणि नामांकित महाशाल ब्राह्मण, श्रीमंत गृहपती आणि विविध पंथांचे श्रमण-ब्राह्मण आले आहेत. श्रमण गौतम देखील तुमच्या उद्यानात दुपारच्या विश्रांतीसाठी बसले आहेत. मित्रा पाथिकपुत्ता, तू वैशालीतील परिषदेत असे म्हणाला होतास की – श्रमण गौतम देखील ज्ञानवादी आहेत आणि मीसुद्धा ज्ञानवादी आहे. ज्ञानवादी माणसाने दुसऱ्या ज्ञानवादी माणसासोबत मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धि-प्रातिहार्य दाखवणे योग्य आहे... (तसेच पुढे)... त्याच्या दुप्पट-दुप्पट मी दाखवीन. म्हणून मित्रा पाथिकपुत्ता, तू अर्ध्या वाटेपर्यंत तरी नक्कीच ये. श्रमण गौतम सर्वांत आधी येऊन तुझ्या उद्यानात दुपारच्या विश्रांतीसाठी बसले आहेत.’ ‘‘เอวํ วุตฺเต, ภคฺคว, อเจโล ปาถิกปุตฺโต ‘อายามิ อาวุโส, อายามิ อาวุโส’ติ วตฺวา ตตฺเถว สํสปฺปติ, น สกฺโกติ อาสนาปิ วุฏฺฐาตุํ. อถ โข โส, ภคฺคว, ปุริโส อเจลํ ปาถิกปุตฺตํ เอตทโวจ – ‘กึ สุ นาม เต, อาวุโส ปาถิกปุตฺต, ปาวฬา สุ นาม เต ปีฐกสฺมึ อลฺลีนา, ปีฐกํ สุ นาม เต ปาวฬาสุ อลฺลีนํ? อายามิ อาวุโส, อายามิ อาวุโสติ วตฺวา ตตฺเถว สํสปฺปสิ, น สกฺโกสิ อาสนาปิ วุฏฺฐาตุ’นฺติ. เอวมฺปิ โข, ภคฺคว, วุจฺจมาโน อเจโล ปาถิกปุตฺโต ‘อายามิ อาวุโส, อายามิ อาวุโส’ติ วตฺวา ตตฺเถว สํสปฺปติ, น สกฺโกติ อาสนาปิ วุฏฺฐาตุํ. “असे म्हटले असता, हे भग्गव, नग्न पाथिकपुत्त ‘येतो मित्रा, येतो मित्रा’ असे म्हणून तेथेच धडपडू लागला, पण त्याला आपल्या आसनावरून उठणेही शक्य झाले नाही. तेव्हा, हे भग्गव, तो माणूस नग्न पाथिकपुत्ताला म्हणाला – ‘मित्रा पाथिकपुत्ता, हे काय आहे? तुझे नितंब आसनाला चिकटले आहेत की हे आसनच तुझ्या नितंबांना चिकटले आहे? तू ‘येतो मित्रा, येतो मित्रा’ असे म्हणत आहेस, पण तेथेच धडपडत आहेस, तुला आसनावरून उठणेही शक्य होत नाहीये!’ हे भग्गव, असे वारंवार विचारले असताही, नग्न पाथिकपुत्त ‘येतो मित्रा, येतो मित्रा’ असे म्हणून तेथेच धडपडत राहिला, पण त्याला आसनावरून उठणे शक्य झाले नाही.” ๒๓. ‘‘ยทา โข โส, ภคฺคว, ปุริโส อญฺญาสิ – ‘ปราภูตรูโป อยํ อเจโล ปาถิกปุตฺโต. อายามิ อาวุโส, อายามิ อาวุโสติ วตฺวา ตตฺเถว สํสปฺปติ, น สกฺโกติ อาสนาปิ วุฏฺฐาตุ’นฺติ. อถ ตํ ปริสํ อาคนฺตฺวา เอวมาโรเจสิ – ‘ปราภูตรูโป, โภ, อเจโล ปาถิกปุตฺโต. อายามิ อาวุโส, อายามิ อาวุโสติ วตฺวา ตตฺเถว สํสปฺปติ, น สกฺโกติ อาสนาปิ วุฏฺฐาตุ’นฺติ. เอวํ วุตฺเต, อหํ, ภคฺคว, ตํ ปริสํ เอตทโวจํ – ‘อภพฺโพ โข, อาวุโส, อเจโล ปาถิกปุตฺโต ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา มม สมฺมุขีภาวํ อาคนฺตุํ. สเจปิสฺส เอวมสฺส – ‘อหํ ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา สมณสฺส โคตมสฺส สมฺมุขีภาวํ คจฺเฉยฺย’นฺติ, มุทฺธาปิ ตสฺส วิปเตยฺยาติ. २३. “हे भग्गव, जेव्हा त्या माणसाला समजले की – ‘हा नग्न पाथिकपुत्त पराभूत झाला आहे. तो ‘येतो मित्रा, येतो मित्रा’ असे म्हणत आहे, पण तेथेच धडपडत आहे आणि आसनावरून उठूही शकत नाही.’ तेव्हा तो त्या परिषदेत परत आला आणि त्याने असे सांगितले – ‘महाराज, तो नग्न पाथिकपुत्त पराभूत झाला आहे. तो ‘येतो मित्रा, येतो मित्रा’ असे म्हणत आहे, पण तेथेच धडपडत आहे आणि आसनावरून उठूही शकत नाही.’ असे म्हटले असता, हे भग्गव, मी त्या परिषदेला म्हणालो – ‘मित्रांनो, तो नग्न पाथिकपुत्त आपले ते शब्द मागे घेतल्याशिवाय, तो विचार सोडल्याशिवाय आणि ती चुकीची दृष्टी न त्यागता माझ्या समोर येण्यास असमर्थ आहे. जर त्याला असे वाटले की – ‘मी ते शब्द मागे न घेता, तो विचार न सोडता आणि ती दृष्टी न त्यागता श्रमण गौतमांच्या समोर जाईन’, तर त्याचे मस्तक फुटून तुकडे होतील.” ปฐมภาณวาโร นิฏฺฐิโต. प्रथम भाणवार समाप्त. ๒๔. ‘‘อถ [Pg.16] โข, ภคฺคว, อญฺญตโร ลิจฺฉวิมหามตฺโต อุฏฺฐายาสนา ตํ ปริสํ เอตทโวจ – ‘เตน หิ, โภ, มุหุตฺตํ ตาว อาคเมถ, ยาวาหํ คจฺฉามิ. อปฺเปว นาม อหมฺปิ สกฺกุเณยฺยํ อเจลํ ปาถิกปุตฺตํ อิมํ ปริสํ อาเนตุ’นฺติ. २४. “त्यानंतर, हे भग्गव, एका लिच्छवी महामात्याने आपल्या आसनावरून उठून त्या परिषदेला असे म्हटले – ‘तर मग, गृहस्थहो, मी जाईपर्यंत थोडा वेळ थांबा. कदाचित मी त्या नग्न पाथिकपुत्ताला या परिषदेत आणू शकेन.’” ‘‘อถ โข โส, ภคฺคว, ลิจฺฉวิมหามตฺโต เยน ตินฺทุกขาณุปริพฺพาชการาโม, เยน อเจโล ปาถิกปุตฺโต เตนุปสงฺกมิ. อุปสงฺกมิตฺวา อเจลํ ปาถิกปุตฺตํ เอตทโวจ – ‘อภิกฺกมาวุโส ปาถิกปุตฺต, อภิกฺกนฺตํ เต เสยฺโย, อภิกฺกนฺตา อภิญฺญาตา อภิญฺญาตา ลิจฺฉวี, อภิกฺกนฺตา อภิญฺญาตา อภิญฺญาตา จ พฺราหฺมณมหาสาลา คหปติเนจยิกา นานาติตฺถิยา สมณพฺราหฺมณา. สมโณปิ โคตโม อายสฺมโต อาราเม ทิวาวิหารํ นิสินฺโน. ภาสิตา โข ปน เต เอสา, อาวุโส ปาถิกปุตฺต, เวสาลิยํ ปริสติ วาจา – สมโณปิ โคตโม ญาณวาโท…เป… ตทฺทิคุณํ ตทฺทิคุณาหํ กริสฺสามีติ. อภิกฺกมสฺเสว โข, อาวุโส ปาถิกปุตฺต, อุปฑฺฒปถํ. สพฺพปฐมํเยว อาคนฺตฺวา สมโณ โคตโม อายสฺมโต อาราเม ทิวาวิหารํ นิสินฺโน. ภาสิตา โข ปเนสา, อาวุโส ปาถิกปุตฺต, สมเณน โคตเมน ปริสติ วาจา – อภพฺโพ โข อเจโล ปาถิกปุตฺโต ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา มม สมฺมุขีภาวํ อาคนฺตุํ. สเจปิสฺส เอวมสฺส – อหํ ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา สมณสฺส โคตมสฺส สมฺมุขีภาวํ คจฺเฉยฺยนฺติ, มุทฺธาปิ ตสฺส วิปเตยฺยาติ. อภิกฺกมาวุโส ปาถิกปุตฺต, อภิกฺกมเนเนว เต ชยํ กริสฺสาม, สมณสฺส โคตมสฺส ปราชย’นฺติ. हे भग्गव, त्यानंतर तो लिच्छवी महामात्र जेथे तिन्दुकखाणु परिब्राजकाचा आराम होता आणि जेथे अचेलक पाथिकपुत्त होता, तेथे गेला. जवळ जाऊन तो अचेलक पाथिकपुत्ताला म्हणाला – 'मित्रा पाथिकपुत्ता, पुढे चल. तुझे पुढे जाणेच तुझ्यासाठी श्रेयस्कर आहे. प्रसिद्ध-प्रसिद्ध लिच्छवी राजे आले आहेत; प्रसिद्ध-प्रसिद्ध महाशाल ब्राह्मण, श्रीमंत गृहपती आणि विविध पंथांचे श्रमण-ब्राह्मणही आले आहेत. श्रमण गौतमसुद्धा तुमच्या आरामात दुपारच्या विश्रांतीसाठी बसले आहेत. मित्रा पाथिकपुत्ता, तू वैशालीतील परिषदेत असे म्हणाला होतास की – श्रमण गौतमसुद्धा ज्ञानवादी आहेत...पे... मी त्यांच्यापेक्षा दुप्पट प्रातिहार्य करून दाखवीन. मित्रा पाथिकपुत्ता, तू अर्ध्या वाटेपर्यंत तरी चल. श्रमण गौतम सर्वांच्या आधी येऊन तुमच्या आरामात दुपारच्या विश्रांतीसाठी बसले आहेत. मित्रा पाथिकपुत्ता, श्रमण गौतमांनी परिषदेत असे म्हटले आहे की – अचेलक पाथिकपुत्त आपले ते शब्द मागे न घेता, ते मन न बदलता आणि ती दृष्टी न सोडता माझ्या समोर येण्यास असमर्थ आहे. जर त्याला असे वाटले की – मी ते शब्द मागे न घेता, ते मन न बदलता आणि ती दृष्टी न सोडता श्रमण गौतमांच्या समोर जाईन, तर त्याचे मस्तक धडावेगळे होऊन खाली पडेल. मित्रा पाथिकपुत्ता, पुढे चल. तुझ्या केवळ जाण्यानेच आम्ही तुझा विजय आणि श्रमण गौतमांचा पराजय करू.' ‘‘เอวํ วุตฺเต, ภคฺคว, อเจโล ปาถิกปุตฺโต ‘อายามิ อาวุโส, อายามิ อาวุโส’ติ วตฺวา ตตฺเถว สํสปฺปติ, น สกฺโกติ อาสนาปิ วุฏฺฐาตุํ. อถ โข โส, ภคฺคว, ลิจฺฉวิมหามตฺโต อเจลํ ปาถิกปุตฺตํ เอตทโวจ – ‘กึ สุ นาม เต, อาวุโส ปาถิกปุตฺต, ปาวฬา สุ นาม เต ปีฐกสฺมึ อลฺลีนา, ปีฐกํ สุ นาม เต ปาวฬาสุ อลฺลีนํ[Pg.17]? อายามิ อาวุโส, อายามิ อาวุโสติ วตฺวา ตตฺเถว สํสปฺปสิ, น สกฺโกสิ อาสนาปิ วุฏฺฐาตุ’นฺติ. เอวมฺปิ โข, ภคฺคว, วุจฺจมาโน อเจโล ปาถิกปุตฺโต ‘อายามิ อาวุโส, อายามิ อาวุโส’ติ วตฺวา ตตฺเถว สํสปฺปติ, น สกฺโกติ อาสนาปิ วุฏฺฐาตุํ. हे भग्गव, असे म्हटले असता, अचेलक पाथिकपुत्त 'येतो मित्रा, येतो मित्रा' असे म्हणून तिथेच धडपडत राहिला, पण तो आपल्या आसनावरून उठू शकला नाही. त्यानंतर, हे भग्गव, तो लिच्छवी महामात्र अचेलक पाथिकपुत्ताला म्हणाला – 'मित्रा पाथिकपुत्ता, हे काय आहे? तुझे नितंब आसनाला चिकटले आहेत की आसन तुझ्या नितंबांना चिकटले आहे? तू येतो मित्रा, येतो मित्रा असे म्हणतोस, पण तिथेच धडपडत राहतोस, आसनावरून उठूही शकत नाहीस.' हे भग्गव, असे विचारले असताही, अचेलक पाथिकपुत्त 'येतो मित्रा, येतो मित्रा' असे म्हणून तिथेच धडपडत राहिला, पण तो आपल्या आसनावरून उठू शकला नाही. ๒๕. ‘‘ยทา โข โส, ภคฺคว, ลิจฺฉวิมหามตฺโต อญฺญาสิ – ‘ปราภูตรูโป อยํ อเจโล ปาถิกปุตฺโต อายามิ อาวุโส, อายามิ อาวุโสติ วตฺวา ตตฺเถว สํสปฺปติ, น สกฺโกติ อาสนาปิ วุฏฺฐาตุ’นฺติ. อถ ตํ ปริสํ อาคนฺตฺวา เอวมาโรเจสิ – ‘ปราภูตรูโป, โภ, อเจโล ปาถิกปุตฺโต อายามิ อาวุโส, อายามิ อาวุโสติ วตฺวา ตตฺเถว สํสปฺปติ, น สกฺโกติ อาสนาปิ วุฏฺฐาตุ’นฺติ. เอวํ วุตฺเต, อหํ, ภคฺคว, ตํ ปริสํ เอตทโวจํ – ‘อภพฺโพ โข, อาวุโส, อเจโล ปาถิกปุตฺโต ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา มม สมฺมุขีภาวํ อาคนฺตุํ. สเจปิสฺส เอวมสฺส – อหํ ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา สมณสฺส โคตมสฺส สมฺมุขีภาวํ คจฺเฉยฺยนฺติ, มุทฺธาปิ ตสฺส วิปเตยฺย. สเจ ปายสฺมนฺตานํ ลิจฺฉวีนํ เอวมสฺส – มยํ อเจลํ ปาถิกปุตฺตํ วรตฺตาหิ พนฺธิตฺวา โคยุเคหิ อาวิญฺเฉยฺยามาติ, ตา วรตฺตา ฉิชฺเชยฺยุํ ปาถิกปุตฺโต วา. อภพฺโพ ปน อเจโล ปาถิกปุตฺโต ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา มม สมฺมุขีภาวํ อาคนฺตุํ. สเจปิสฺส เอวมสฺส – อหํ ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา สมณสฺส โคตมสฺส สมฺมุขีภาวํ คจฺเฉยฺยนฺติ, มุทฺธาปิ ตสฺส วิปเตยฺยา’ติ. २५. हे भग्गव, जेव्हा त्या लिच्छवी महामात्राला समजले की – 'हा अचेलक पाथिकपुत्त पराभूत झाला आहे; तो येतो मित्रा, येतो मित्रा असे म्हणतो, पण तिथेच धडपडत राहतो, आसनावरून उठूही शकत नाही.' तेव्हा त्याने त्या परिषदेत येऊन असे सांगितले – 'महाशयांनो, तो अचेलक पाथिकपुत्त पराभूत झाला आहे; तो येतो मित्रा, येतो मित्रा असे म्हणतो, पण तिथेच धडपडत राहतो, आसनावरून उठूही शकत नाही.' हे भग्गव, असे म्हटले असता, मी त्या परिषदेला म्हणालो – 'मित्रांनो, अचेलक पाथिकपुत्त आपले ते शब्द मागे न घेता, ते मन न बदलता आणि ती दृष्टी न सोडता माझ्या समोर येण्यास असमर्थ आहे. जर त्याला असे वाटले की – मी ते शब्द मागे न घेता, ते मन न बदलता आणि ती दृष्टी न सोडता श्रमण गौतमांच्या समोर जाईन, तर त्याचे मस्तक धडावेगळे होऊन खाली पडेल. जर आदरणीय लिच्छवींना असे वाटले की – आम्ही अचेलक पाथिकपुत्ताला चामड्याच्या दोऱ्यांनी बांधून बैलांच्या जोड्यांनी ओढून आणू, तर त्या चामड्याच्या दोऱ्या तुटतील किंवा पाथिकपुत्ताचेच तुकडे होतील. परंतु, अचेलक पाथिकपुत्त आपले ते शब्द मागे न घेता, ते मन न बदलता आणि ती दृष्टी न सोडता माझ्या समोर येण्यास असमर्थ आहे. जर त्याला असे वाटले की – मी ते शब्द मागे न घेता, ते मन न बदलता आणि ती दृष्टी न सोडता श्रमण गौतमांच्या समोर जाईन, तर त्याचे मस्तक धडावेगळे होऊन खाली पडेल.' ๒๖. ‘‘อถ โข, ภคฺคว, ชาลิโย ทารุปตฺติกนฺเตวาสี อุฏฺฐายาสนา ตํ ปริสํ เอตทโวจ – ‘เตน หิ, โภ, มุหุตฺตํ ตาว อาคเมถ, ยาวาหํ คจฺฉามิ; อปฺเปว นาม อหมฺปิ สกฺกุเณยฺยํ อเจลํ ปาถิกปุตฺตํ อิมํ ปริสํ อาเนตุ’’นฺติ. २६. हे भग्गव, त्यानंतर दारुपत्तिकचा (लाकडी पात्र बाळगणाऱ्या परिब्राजकाचा) शिष्य जालिया आपल्या आसनावरून उठला आणि त्या परिषदेला म्हणाला – 'महाशयांनो, तर मग मी जाईपर्यंत क्षणभर थांबा; कदाचित मीसुद्धा त्या अचेलक पाथिकपुत्ताला या परिषदेत आणू शकेन.' ‘‘อถ [Pg.18] โข, ภคฺคว, ชาลิโย ทารุปตฺติกนฺเตวาสี เยน ตินฺทุกขาณุปริพฺพาชการาโม, เยน อเจโล ปาถิกปุตฺโต เตนุปสงฺกมิ. อุปสงฺกมิตฺวา อเจลํ ปาถิกปุตฺตํ เอตทโวจ – ‘อภิกฺกมาวุโส ปาถิกปุตฺต, อภิกฺกนฺตํ เต เสยฺโย. อภิกฺกนฺตา อภิญฺญาตา อภิญฺญาตา ลิจฺฉวี, อภิกฺกนฺตา อภิญฺญาตา อภิญฺญาตา จ พฺราหฺมณมหาสาลา คหปติเนจยิกา นานาติตฺถิยา สมณพฺราหฺมณา. สมโณปิ โคตโม อายสฺมโต อาราเม ทิวาวิหารํ นิสินฺโน. ภาสิตา โข ปน เต เอสา, อาวุโส ปาถิกปุตฺต, เวสาลิยํ ปริสติ วาจา – สมโณปิ โคตโม ญาณวาโท…เป… ตทฺทิคุณํ ตทฺทิคุณาหํ กริสฺสามีติ. อภิกฺกมสฺเสว, โข อาวุโส ปาถิกปุตฺต, อุปฑฺฒปถํ. สพฺพปฐมํเยว อาคนฺตฺวา สมโณ โคตโม อายสฺมโต อาราเม ทิวาวิหารํ นิสินฺโน. ภาสิตา โข ปเนสา, อาวุโส ปาถิกปุตฺต, สมเณน โคตเมน ปริสติ วาจา – อภพฺโพ อเจโล ปาถิกปุตฺโต ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา มม สมฺมุขีภาวํ อาคนฺตุํ. สเจปิสฺส เอวมสฺส – อหํ ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา สมณสฺส โคตมสฺส สมฺมุขีภาวํ คจฺเฉยฺยนฺติ, มุทฺธาปิ ตสฺส วิปเตยฺย. สเจ ปายสฺมนฺตานํ ลิจฺฉวีนํ เอวมสฺส – มยํ อเจลํ ปาถิกปุตฺตํ วรตฺตาหิ พนฺธิตฺวา โคยุเคหิ อาวิญฺเฉยฺยามาติ. ตา วรตฺตา ฉิชฺเชยฺยุํ ปาถิกปุตฺโต วา. อภพฺโพ ปน อเจโล ปาถิกปุตฺโต ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา มม สมฺมุขีภาวํ อาคนฺตุํ. สเจปิสฺส เอวมสฺส – อหํ ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา สมณสฺส โคตมสฺส สมฺมุขีภาวํ อาคจฺเฉยฺยนฺติ, มุทฺธาปิ ตสฺส วิปเตยฺยาติ. อภิกฺกมาวุโส ปาถิกปุตฺต, อภิกฺกมเนเนว เต ชยํ กริสฺสาม, สมณสฺส โคตมสฺส ปราชย’นฺติ. त्यानंतर, हे भग्गव! दारुपत्तिकचा (लाकडी पात्राचा) शिष्य जालिय हा जेथे तिन्दुकखाणु परिव्राजकाचा आराम होता आणि जेथे अचेलक (दिगंबर) पाथिकपुत्त होता, तेथे गेला. तेथे जाऊन त्याने अचेलक पाथिकपुत्ताला असे म्हटले – 'मित्रा पाथिकपुत्ता, पुढे चल, तुझे पुढे जाणेच श्रेयस्कर आहे. प्रसिद्ध-प्रसिद्ध लिच्छवी राजे, प्रसिद्ध-प्रसिद्ध महाशाल ब्राह्मण, श्रीमंत गृहपती आणि विविध पंथांचे श्रमण-ब्राह्मण तेथे गेले आहेत. श्रमण गौतम देखील तुमच्या आरामात दुपारच्या विश्रांतीसाठी बसले आहेत. मित्रा पाथिकपुत्ता, तू वैशालीतील परिषदेमध्ये असे म्हणाला होतास की – श्रमण गौतम देखील ज्ञानवादी आहेत... मी त्यांच्यापेक्षा दुप्पट ऋद्धी-प्रातिहार्य दाखवीन. मित्रा पाथिकपुत्ता, तू अर्ध्या वाटेपर्यंत तरी पुढे चल. श्रमण गौतम सर्वात आधी येऊन तुझ्या आरामात दुपारच्या विश्रांतीसाठी बसले आहेत. मित्रा पाथिकपुत्ता, श्रमण गौतमांनी परिषदेमध्ये असे म्हटले आहे की – अचेलक पाथिकपुत्त आपले ते बोलणे न सोडता, ते चित्त न सोडता आणि ती मिथ्या दृष्टी न त्यागता माझ्या समोर येण्यास असमर्थ आहे. जर त्याला असे वाटले की – मी ते बोलणे न सोडता, ते चित्त न सोडता आणि ती दृष्टी न त्यागता श्रमण गौतमांच्या समोर जाईन, तर त्याचे डोके धडावेगळे होऊन पडेल. आणि जर आदरणीय लिच्छवींना असे वाटले की – आम्ही अचेलक पाथिकपुत्ताला चामड्याच्या दोऱ्यांनी बांधून बैलांच्या जोडीने ओढून आणू, तर त्या दोऱ्या तुटतील किंवा पाथिकपुत्तच छिन्नविच्छिन्न होईल. अचेलक पाथिकपुत्त आपले ते बोलणे न सोडता, ते चित्त न सोडता आणि ती दृष्टी न त्यागता माझ्या समोर येण्यास असमर्थ आहे. जर त्याला असे वाटले की – मी ते बोलणे न सोडता, ते चित्त न सोडता आणि ती दृष्टी न त्यागता श्रमण गौतमांच्या समोर जाईन, तर त्याचे डोके धडावेगळे होऊन पडेल. मित्रा पाथिकपुत्ता, पुढे चल, तुझ्या केवळ जाण्यानेच आम्ही तुझा विजय आणि श्रमण गौतमांचा पराजय घडवून आणू.' ‘‘เอวํ วุตฺเต, ภคฺคว, อเจโล ปาถิกปุตฺโต ‘อายามิ อาวุโส, อายามิ อาวุโส’ติ วตฺวา ตตฺเถว สํสปฺปติ, น สกฺโกติ อาสนาปิ วุฏฺฐาตุํ. อถ โข, ภคฺคว, ชาลิโย ทารุปตฺติกนฺเตวาสี อเจลํ ปาถิกปุตฺตํ เอตทโวจ – ‘กึ สุ นาม เต, อาวุโส ปาถิกปุตฺต, ปาวฬา สุ นาม เต ปีฐกสฺมึ อลฺลีนา, ปีฐกํ สุ นาม เต ปาวฬาสุ อลฺลีนํ? อายามิ อาวุโส, อายามิ อาวุโสติ วตฺวา ตตฺเถว [Pg.19] สํสปฺปสิ, น สกฺโกสิ อาสนาปิ วุฏฺฐาตุ’นฺติ. เอวมฺปิ โข, ภคฺคว, วุจฺจมาโน อเจโล ปาถิกปุตฺโต ‘‘อายามิ อาวุโส, อายามิ อาวุโส’’ติ วตฺวา ตตฺเถว สํสปฺปติ, น สกฺโกติ อาสนาปิ วุฏฺฐาตุนฺติ. हे भग्गव, असे म्हटले असता अचेलक पाथिकपुत्त 'मित्रा, मी येतो, मित्रा, मी येतो' असे म्हणून तेथेच तळमळू लागला, पण तो आपल्या आसनावरून उठू शकला नाही. त्यानंतर, हे भग्गव, दारुपत्तिकचा शिष्य जालिय अचेलक पाथिकपुत्ताला म्हणाला – 'मित्रा पाथिकपुत्ता, काय झाले आहे? तुझे नितंब आसनाला चिकटले आहेत की हे आसनच तुझ्या नितंबांना चिकटले आहे? तू "मित्रा, मी येतो, मित्रा, मी येतो" असे म्हणत तेथेच तळमळत आहेस, पण आसनावरून उठू शकत नाहीस.' हे भग्गव, असे विचारले असताही अचेलक पाथिकपुत्त 'मित्रा, मी येतो, मित्रा, मी येतो' असे म्हणत तेथेच तळमळत राहिला, पण आसनावरून उठू शकला नाही. ๒๗. ‘‘ยทา โข, ภคฺคว, ชาลิโย ทารุปตฺติกนฺเตวาสี อญฺญาสิ – ‘ปราภูตรูโป อยํ อเจโล ปาถิกปุตฺโต ‘อายามิ อาวุโส, อายามิ อาวุโสติ วตฺวา ตตฺเถว สํสปฺปติ, น สกฺโกติ อาสนาปิ วุฏฺฐาตุ’นฺติ, อถ นํ เอตทโวจ – २७. हे भग्गव, जेव्हा दारुपत्तिकचा शिष्य जालिय याला समजले की, 'हा अचेलक पाथिकपुत्त पूर्णपणे पराभूत झाला आहे, तो "मित्रा, मी येतो, मित्रा, मी येतो" असे म्हणत तेथेच तळमळत आहे आणि आसनावरून उठू शकत नाही,' तेव्हा तो त्याला म्हणाला – ‘ภูตปุพฺพํ, อาวุโส ปาถิกปุตฺต, สีหสฺส มิครญฺโญ เอตทโหสิ – ยํนูนาหํ อญฺญตรํ วนสณฺฑํ นิสฺสาย อาสยํ กปฺเปยฺยํ. ตตฺราสยํ กปฺเปตฺวา สายนฺหสมยํ อาสยา นิกฺขเมยฺยํ, อาสยา นิกฺขมิตฺวา วิชมฺเภยฺยํ, วิชมฺภิตฺวา สมนฺตา จตุทฺทิสา อนุวิโลเกยฺยํ, สมนฺตา จตุทฺทิสา อนุวิโลเกตฺวา ติกฺขตฺตุํ สีหนาทํ นเทยฺยํ, ติกฺขตฺตุํ สีหนาทํ นทิตฺวา โคจราย ปกฺกเมยฺยํ. โส วรํ วรํ มิคสํเฆ วธิตฺวา มุทุมํสานิ มุทุมํสานิ ภกฺขยิตฺวา ตเมว อาสยํ อชฺฌุเปยฺย’นฺติ. 'मित्रा पाथिकपुत्ता, पूर्वीची गोष्ट आहे, पशूंचा राजा असलेल्या एका सिंहाच्या मनात असा विचार आला – "मी एका जंगलाचा आश्रय घेऊन तेथे आपली गुहा (निवास) बनवावी. तेथे निवास बनवून संध्याकाळच्या वेळी गुहेतून बाहेर पडावे. गुहेतून बाहेर पडून आळस द्यावा (शरीर ताणावे). आळस देऊन सभोवतालच्या चारही दिशांना न्याहाळावे. चारही दिशांना न्याहाळून तीन वेळा सिंहासारखी गर्जना करावी. तीन वेळा सिंहगर्जना करून शिकारीसाठी निघावे. तेथे चांगल्या-चांगल्या प्राण्यांची शिकार करून करण्याचे कोवळे व मऊ मांस खाऊन पुन्हा आपल्या त्याच गुहेत परत यावे."' ‘อถ โข, อาวุโส, โส สีโห มิคราชา อญฺญตรํ วนสณฺฑํ นิสฺสาย อาสยํ กปฺเปสิ. ตตฺราสยํ กปฺเปตฺวา สายนฺหสมยํ อาสยา นิกฺขมิ, อาสยา นิกฺขมิตฺวา วิชมฺภิ, วิชมฺภิตฺวา สมนฺตา จตุทฺทิสา อนุวิโลเกสิ, สมนฺตา จตุทฺทิสา อนุวิโลเกตฺวา ติกฺขตฺตุํ สีหนาทํ นทิ, ติกฺขตฺตุํ สีหนาทํ นทิตฺวา โคจราย ปกฺกามิ. โส วรํ วรํ มิคสงฺเฆ วธิตฺวา มุทุมํสานิ มุทุมํสานิ ภกฺขยิตฺวา ตเมว อาสยํ อชฺฌุเปสิ. 'त्यानंतर, मित्रा, त्या पशूंचा राजा असलेल्या सिंहाने एका जंगलाचा आश्रय घेऊन तेथे आपली गुहा बनवली. तेथे निवास करून संध्याकाळच्या वेळी तो गुहेतून बाहेर पडला. गुहेतून बाहेर पडून त्याने आळस दिला. आळस देऊन सभोवतालच्या चारही दिशांना न्याहाळले. चारही दिशांना न्याहाळून त्याने तीन वेळा सिंहगर्जना केली. तीन वेळा सिंहगर्जना करून तो शिकारीसाठी निघाला. त्याने चांगल्या-चांगल्या प्राण्यांची शिकार करून त्यांचे कोवळे व मऊ मांस खाल्ले आणि तो पुन्हा आपल्या त्याच गुहेत परत आला.' ๒๘. ‘ตสฺเสว โข, อาวุโส ปาถิกปุตฺต, สีหสฺส มิครญฺโญ วิฆาสสํวฑฺโฒ ชรสิงฺคาโล ทิตฺโต เจว พลวา จ. อถ โข, อาวุโส, ตสฺส ชรสิงฺคาลสฺส เอตทโหสิ – โก จาหํ, โก สีโห มิคราชา. ยํนูนาหมฺปิ อญฺญตรํ วนสณฺฑํ นิสฺสาย อาสยํ กปฺเปยฺยํ. ตตฺราสยํ กปฺเปตฺวา สายนฺหสมยํ อาสยา นิกฺขเมยฺยํ, อาสยา [Pg.20] นิกฺขมิตฺวา วิชมฺเภยฺยํ, วิชมฺภิตฺวา สมนฺตา จตุทฺทิสา อนุวิโลเกยฺยํ, สมนฺตา จตุทฺทิสา อนุวิโลเกตฺวา ติกฺขตฺตุํ สีหนาทํ นเทยฺยํ, ติกฺขตฺตุํ สีหนาทํ นทิตฺวา โคจราย ปกฺกเมยฺยํ. โส วรํ วรํ มิคสงฺเฆ วธิตฺวา มุทุมํสานิ มุทุมํสานิ ภกฺขยิตฺวา ตเมว อาสยํ อชฺฌุเปยฺย’นฺติ. २८. 'मित्रा पाथिकपुत्ता, त्याच पशूंचा राजा असलेल्या सिंहाच्या उष्ट्या अन्नावर (खाऊन उरलेल्या मांसावर) जगणारा एक म्हातारा कोल्हा होता, जो धष्टपुष्ट आणि बलवान झाला होता. त्यानंतर, मित्रा, त्या म्हाताऱ्या कोल्ह्याच्या मनात असा विचार आला – "मी कोण आणि पशूंचा राजा सिंह कोण? मीसुद्धा एका जंगलाचा आश्रय घेऊन तेथे आपली गुहा बनवावी. तेथे निवास बनवून संध्याकाळच्या वेळी गुहेतून बाहेर पडावे. गुहेतून बाहेर पडून आळस द्यावा. आळस देऊन सभोवतालच्या चारही दिशांना न्याहाळावे. चारही दिशांना न्याहाळून तीन वेळा सिंहगर्जना करावी. तीन वेळा सिंहगर्जना करून शिकारीसाठी निघावे. तेथे चांगल्या-चांगल्या प्राण्यांची शिकार करून करण्याचे कोवळे व मऊ मांस खाऊन पुन्हा आपल्या त्याच गुहेत परत यावे."' ‘อถ โข โส, อาวุโส, ชรสิงฺคาโล อญฺญตรํ วนสณฺฑํ นิสฺสาย อาสยํ กปฺเปสิ. ตตฺราสยํ กปฺเปตฺวา สายนฺหสมยํ อาสยา นิกฺขมิ, อาสยา นิกฺขมิตฺวา วิชมฺภิ, วิชมฺภิตฺวา สมนฺตา จตุทฺทิสา อนุวิโลเกสิ, สมนฺตา จตุทฺทิสา อนุวิโลเกตฺวา ติกฺขตฺตุํ สีหนาทํ นทิสฺสามีติ สิงฺคาลกํเยว อนทิ เภรณฺฑกํเยว อนทิ, เก จ ฉเว สิงฺคาเล, เก ปน สีหนาเทติ. 'त्यानंतर, मित्रा, त्या म्हाताऱ्या कोल्ह्याने एका जंगलाचा आश्रय घेऊन तेथे आपली गुहा बनवली. तेथे निवास करून संध्याकाळच्या वेळी तो गुहेतून बाहेर पडला. गुहेतून बाहेर पडून त्याने आळस दिला. आळस देऊन सभोवतालच्या चारही दिशांना न्याहाळले. चारही दिशांना न्याहाळून "मी तीन वेळा सिंहगर्जना करीन" असे म्हणून त्याने गर्जना केली, पण तो केवळ कोल्ह्यासारखाच ओरडला, त्याने अमंगल व कर्कश असा कोल्ह्याचाच आवाज काढला. कुठे तो क्षुद्र कोल्हा आणि कुठे सिंहाची गर्जना!' ‘เอวเมว โข ตฺวํ, อาวุโส ปาถิกปุตฺต, สุคตาปทาเนสุ ชีวมาโน สุคตาติริตฺตานิ ภุญฺชมาโน ตถาคเต อรหนฺเต สมฺมาสมฺพุทฺเธ อาสาเทตพฺพํ มญฺญสิ. เก จ ฉเว ปาถิกปุตฺเต, กา จ ตถาคตานํ อรหนฺตานํ สมฺมาสมฺพุทฺธานํ อาสาทนา’ติ. 'त्याचप्रमाणे, मित्रा पाथिकपुत्ता, तू सुगतांच्या (बुद्धांच्या) शासनातील शिकवणुकीवर जगत असताना आणि सुगतांचे उष्टे (उरलेले अन्न) खात असताना, तथागत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांना आव्हान देण्याचे धाडस करत आहेस. कुठे तुझ्यासारखा क्षुद्र पाथिकपुत्त आणि कुठे तथागत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांना आव्हान देणे!' ๒๙. ‘‘ยโต โข, ภคฺคว, ชาลิโย ทารุปตฺติกนฺเตวาสี อิมินา โอปมฺเมน เนว อสกฺขิ อเจลํ ปาถิกปุตฺตํ ตมฺหา อาสนา จาเวตุํ. อถ นํ เอตทโวจ – २९. हे भग्गव, जेव्हा दारुपत्तिकचा शिष्य जालीय या उपमेनेही त्या अचेलक पाथिकपुत्ताला त्याच्या आसनावरून हलवू शकला नाही, तेव्हा तो त्याला असे म्हणाला – ‘สีโหติ อตฺตานํ สเมกฺขิยาน,อมญฺญิ โกตฺถุ มิคราชาหมสฺมิ; ตเถว โส สิงฺคาลกํ อนทิ,เก จ ฉเว สิงฺคาเล เก ปน สีหนาเท’ติ. ‘स्वतःला सिंह समजून कोल्हा विचार करू लागला की, मी श्वापदांचा राजा आहे; तरीही तो पूर्वीप्रमाणेच कोल्ह्यासारखाच ओरडत राहिला. कुठे तो क्षुद्र कोल्हा आणि कुठे सिंहाची गर्जना!’ ‘เอวเมว โข ตฺวํ, อาวุโส ปาถิกปุตฺต, สุคตาปทาเนสุ ชีวมาโน สุคตาติริตฺตานิ ภุญฺชมาโน ตถาคเต อรหนฺเต สมฺมาสมฺพุทฺเธ อาสาเทตพฺพํ มญฺญสิ. เก จ ฉเว ปาถิกปุตฺเต, กา จ ตถาคตานํ อรหนฺตานํ สมฺมาสมฺพุทฺธานํ อาสาทนา’ติ. ‘त्याचप्रमाणे, हे आवुसो पाथिकपुत्त, तू सुगतांच्या शासनावर उपजीविका करत, सुगतांचे उच्छिष्ट खात असूनही, तथागत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांना आव्हान देण्याचे धाडस करतोस! कुठे तू क्षुद्र पाथिकपुत्त आणि कुठे तथागत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांना आव्हान देणे!’ ๓๐. ‘‘ยโต โข, ภคฺคว, ชาลิโย ทารุปตฺติกนฺเตวาสี อิมินาปิ โอปมฺเมน เนว อสกฺขิ อเจลํ ปาถิกปุตฺตํ ตมฺหา อาสนา จาเวตุํ. อถ นํ เอตทโวจ – ३०. हे भग्गव, जेव्हा दारुपत्तिकचा शिष्य जालीय याही उपमेने त्या अचेलक पाथिकपुत्ताला त्याच्या आसनावरून हलवू शकला नाही, तेव्हा तो त्याला असे म्हणाला – ‘อญฺญํ [Pg.21] อนุจงฺกมนํ, อตฺตานํ วิฆาเส สเมกฺขิย; ยาว อตฺตานํ น ปสฺสติ, โกตฺถุ ตาว พฺยคฺโฆติ มญฺญติ. ‘दुसऱ्याच्या मागे फिरणारा आणि त्याच्या उष्ट्या अन्नावर पुष्ट झालेला कोल्हा, जोपर्यंत स्वतःला जसा आहे तसा पाहत नाही, तोपर्यंत स्वतःला वाघच समजतो. ตเถว โส สิงฺคาลกํ อนทิ; เก จ ฉเว สิงฺคาเล เก ปน สีหนาเท’ติ. तरीही तो पूर्वीप्रमाणेच कोल्ह्यासारखाच ओरडत राहिला. कुठे तो क्षुद्र कोल्हा आणि कुठे सिंहाची गर्जना!’ ‘เอวเมว โข ตฺวํ, อาวุโส ปาถิกปุตฺต, สุคตาปทาเนสุ ชีวมาโน สุคตาติริตฺตานิ ภุญฺชมาโน ตถาคเต อรหนฺเต สมฺมาสมฺพุทฺเธ อาสาเทตพฺพํ มญฺญสิ. เก จ ฉเว ปาถิกปุตฺเต, กา จ ตถาคตานํ อรหนฺตานํ สมฺมาสมฺพุทฺธานํ อาสาทนา’ติ. ‘त्याचप्रमाणे, हे आवुसो पाथिकपुत्त, तू सुगतांच्या शासनावर उपजीविका करत, सुगतांचे उच्छिष्ट खात असूनही, तथागत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांना आव्हान देण्याचे धाडस करतोस! कुठे तू क्षुद्र पाथिकपुत्त आणि कुठे तथागत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांना आव्हान देणे!’ ๓๑. ‘‘ยโต โข, ภคฺคว, ชาลิโย ทารุปตฺติกนฺเตวาสี อิมินาปิ โอปมฺเมน เนว อสกฺขิ อเจลํ ปาถิกปุตฺตํ ตมฺหา อาสนา จาเวตุํ. อถ นํ เอตทโวจ – ३१. हे भग्गव, जेव्हा दारुपत्तिकचा शिष्य जालीय याही उपमेने त्या अचेलक पाथिकपुत्ताला त्याच्या आसनावरून हलवू शकला नाही, तेव्हा तो त्याला असे म्हणाला – ‘ภุตฺวาน เภเก ขลมูสิกาโย,กฏสีสุ ขิตฺตานิ จ โกณปานิ ; มหาวเน สุญฺญวเน วิวฑฺโฒ,อมญฺญิ โกตฺถุ มิคราชาหมสฺมิ. ‘खळ्यातील बेडूक व उंदीर आणि स्मशानात टाकलेली प्रेते खाऊन, महावनात व निर्जन वनात वाढलेला कोल्हा स्वतःला श्वापदांचा राजा समजू लागला. ตเถว โส สิงฺคาลกํ อนทิ; เก จ ฉเว สิงฺคาเล เก ปน สีหนาเท’ติ. तरीही तो पूर्वीप्रमाणेच कोल्ह्यासारखाच ओरडत राहिला. कुठे तो क्षुद्र कोल्हा आणि कुठे सिंहाची गर्जना!’ ‘เอวเมว โข ตฺวํ, อาวุโส ปาถิกปุตฺต, สุคตาปทาเนสุ ชีวมาโน สุคตาติริตฺตานิ ภุญฺชมาโน ตถาคเต อรหนฺเต สมฺมาสมฺพุทฺเธ อาสาเทตพฺพํ มญฺญสิ. เก จ ฉเว ปาถิกปุตฺเต, กา จ ตถาคตานํ อรหนฺตานํ สมฺมาสมฺพุทฺธานํ อาสาทนา’ติ. ‘त्याचप्रमाणे, हे आवुसो पाथिकपुत्त, तू सुगतांच्या शासनावर उपजीविका करत, सुगतांचे उच्छिष्ट खात असूनही, तथागत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांना आव्हान देण्याचे धाडस करतोस! कुठे तू क्षुद्र पाथिकपुत्त आणि कुठे तथागत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांना आव्हान देणे!’ ๓๒. ‘‘ยโต โข, ภคฺคว, ชาลิโย ทารุปตฺติกนฺเตวาสี อิมินาปิ โอปมฺเมน เนว อสกฺขิ อเจลํ ปาถิกปุตฺตํ ตมฺหา อาสนา จาเวตุํ. อถ ตํ ปริสํ อาคนฺตฺวา เอวมาโรเจสิ – ‘ปราภูตรูโป, โภ, อเจโล ปาถิกปุตฺโต อายามิ อาวุโส, อายามิ อาวุโสติ วตฺวา ตตฺเถว สํสปฺปติ, น สกฺโกติ อาสนาปิ วุฏฺฐาตุ’นฺติ. ३२. हे भग्गव, जेव्हा दारुपत्तिकचा शिष्य जालीय याही उपमेने त्या अचेलक पाथिकपुत्ताला त्याच्या आसनावरून हलवू शकला नाही, तेव्हा तो त्या परिषदेत परत आला आणि त्याने असे सांगितले – ‘अहो सज्जनो, अचेलक पाथिकपुत्त पूर्णपणे पराभूत झाला आहे. तो “मी येतो, आवुसो! मी येतो, आवुसो!” असे म्हणत तिथेच लोळत पडला आहे, त्याला आसनावरून उठणेही शक्य होत नाही.’ ๓๓. ‘‘เอวํ [Pg.22] วุตฺเต, อหํ, ภคฺคว, ตํ ปริสํ เอตทโวจํ – ‘อภพฺโพ โข, อาวุโส, อเจโล ปาถิกปุตฺโต ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา มม สมฺมุขีภาวํ อาคนฺตุํ. สเจปิสฺส เอวมสฺส – อหํ ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา สมณสฺส โคตมสฺส สมฺมุขีภาวํ คจฺเฉยฺยนฺติ, มุทฺธาปิ ตสฺส วิปเตยฺย. สเจปายสฺมนฺตานํ ลิจฺฉวีนํ เอวมสฺส – มยํ อเจลํ ปาถิกปุตฺตํ วรตฺตาหิ พนฺธิตฺวา นาเคหิ อาวิญฺเฉยฺยามาติ. ตา วรตฺตา ฉิชฺเชยฺยุํ ปาถิกปุตฺโต วา. อภพฺโพ ปน อเจโล ปาถิกปุตฺโต ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา มม สมฺมุขีภาวํ อาคนฺตุํ. สเจปิสฺส เอวมสฺส – อหํ ตํ วาจํ อปฺปหาย ตํ จิตฺตํ อปฺปหาย ตํ ทิฏฺฐึ อปฺปฏินิสฺสชฺชิตฺวา สมณสฺส โคตมสฺส สมฺมุขีภาวํ คจฺเฉยฺยนฺติ, มุทฺธาปิ ตสฺส วิปเตยฺยา’ติ. ३३. असे म्हटले असता, हे भग्गव, मी त्या परिषदेला असे म्हणालो – ‘हे आवुसो, जोपर्यंत अचेलक पाथिकपुत्त आपले ते शब्द मागे घेत नाही, ते विचार सोडत नाही आणि ती दृष्टी त्यागून देत नाही, तोपर्यंत तो माझ्या समोर येण्यास असमर्थ आहे. जर त्याला असे वाटले की – “मी ते शब्द मागे न घेता, ते विचार न सोडता आणि ती दृष्टी न त्यागता श्रमण गोतमाच्या समोर जाईन,” तर त्याचे मस्तक छिन्नविच्छिन्न होऊन पडेल. जरी आदरणीय लिच्छवींना असे वाटले की – “आम्ही अचेलक पाथिकपुत्ताला चामड्याच्या दोऱ्यांनी बांधून बैलांच्या जोड्यांनी ओढून आणू,” तरी त्या दोऱ्या तुटतील किंवा पाथिकपुत्तच छिन्नविच्छिन्न होईल. परंतु अचेलक पाथिकपुत्त आपले ते शब्द मागे घेतल्याशिवाय, ते विचार सोडल्याशिवाय आणि ती दृष्टी त्यागल्याशिवाय माझ्या समोर येण्यास असमर्थ आहे. जर त्याला असे वाटले की – “मी ते शब्द मागे न घेता, ते विचार न सोडता आणि ती दृष्टी न त्यागता श्रमण गोतमाच्या समोर जाईन,” तर त्याचे मस्तक छिन्नविच्छिन्न होऊन पडेल.’ ๓๔. ‘‘อถ ขฺวาหํ, ภคฺคว, ตํ ปริสํ ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสสึ สมาทเปสึ สมุตฺเตเชสึ สมฺปหํเสสึ, ตํ ปริสํ ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสตฺวา สมาทเปตฺวา สมุตฺเตเชตฺวา สมฺปหํเสตฺวา มหาพนฺธนา โมกฺขํ กริตฺวา จตุราสีติปาณสหสฺสานิ มหาวิทุคฺคา อุทฺธริตฺวา เตโชธาตุํ สมาปชฺชิตฺวา สตฺตตาลํ เวหาสํ อพฺภุคฺคนฺตฺวา อญฺญํ สตฺตตาลมฺปิ อจฺจึ อภินิมฺมินิตฺวา ปชฺชลิตฺวา ธูมายิตฺวา มหาวเน กูฏาคารสาลายํ ปจฺจุฏฺฐาสึ. ३४. त्यानंतर, हे भग्गव, मी त्या परिषदेला धम्म उपदेशाद्वारे योग्य मार्ग दाखवला, धम्मात प्रवृत्त केले, उत्साहित केले आणि आनंदित केले. त्या परिषदेला धम्म उपदेशाद्वारे योग्य मार्ग दाखवून, धम्मात प्रवृत्त करून, उत्साहित करून आणि आनंदित करून, त्यांना महाबंधनातून मुक्त केले आणि चौऱ्याऐंशी हजार प्राण्यांना महासंकटातून बाहेर काढले. त्यानंतर मी तेजोधातूमध्ये समाधीस्त होऊन आकाशात सात ताडझाडांच्या उंचीवर उडालो आणि आणखी सात ताडझाडांच्या उंचीपर्यंत अग्नीची ज्वाला निर्माण करून, ती प्रज्वलित करून व धूर सोडून, महावनातील कुटागारशाळेत परत आलो. ๓๕. ‘‘อถ โข, ภคฺคว, สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต เยนาหํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข อหํ, ภคฺคว, สุนกฺขตฺตํ ลิจฺฉวิปุตฺตํ เอตทโวจํ – ‘ตํ กึ มญฺญสิ, สุนกฺขตฺต, ยเถว เต อหํ อเจลํ ปาถิกปุตฺตํ อารพฺภ พฺยากาสึ, ตเถว ตํ วิปากํ อญฺญถา วา’ติ? ‘ยเถว เม, ภนฺเต, ภควา อเจลํ ปาถิกปุตฺตํ อารพฺภ พฺยากาสิ, ตเถว ตํ วิปากํ, โน อญฺญถา’ติ. ३५. त्यानंतर, हे भग्गव, लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्त माझ्याकडे आला. जवळ येऊन त्याने मला अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्तला, हे भग्गव, मी असे म्हणालो – ‘तुला काय वाटते, सुनक्खत्त? अचेलक पाथिकपुत्ताविषयी मी जसे भाकीत केले होते, तसेच घडले की काही वेगळे घडले?’ ‘भंते, भगवंतांनी अचेलक पाथिकपुत्ताविषयी जसे भाकीत केले होते, तसेच घडले, काही वेगळे घडले नाही.’ ‘ตํ กึ มญฺญสิ, สุนกฺขตฺต, ยทิ เอวํ สนฺเต กตํ วา โหติ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ, อกตํ วา’ติ? ‘อทฺธา โข, ภนฺเต, เอวํ สนฺเต กตํ โหติ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ, โน อกต’นฺติ. ‘เอวมฺปิ โข [Pg.23] มํ ตฺวํ, โมฆปุริส, อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กโรนฺตํ เอวํ วเทสิ – น หิ ปน เม, ภนฺเต, ภควา อุตฺตริมนุสฺสธมฺมา อิทฺธิปาฏิหาริยํ กโรตีติ. ปสฺส, โมฆปุริส, ยาวญฺจ เต อิทํ อปรทฺธํ’ติ. ‘तुला काय वाटते, सुनक्खत्त? जर असे आहे, तर मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धिप्रातिहार्य केले गेले की नाही?’ ‘नक्कीच, भंते, जर असे आहे, तर मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धिप्रातिहार्य केले गेले आहे, न केले गेले असे नाही.’ ‘असे असतानाही, हे मोघपुरुषा, मी मानवी धर्मापलीकडील ऋद्धिप्रातिहार्य करत असतानाही तू मला असे म्हणतोस – “भंते, भगवंत माझ्यासाठी मानवी धर्मापलीकडील कोणतेही ऋद्धिप्रातिहार्य करत नाहीत.” बघ, मोघपुरुषा, तुझा हा अपराध किती मोठा आहे!’ ‘‘เอวมฺปิ โข, ภคฺคว, สุนกฺขตฺโต ลิจฺฉวิปุตฺโต มยา วุจฺจมาโน อปกฺกเมว อิมสฺมา ธมฺมวินยา, ยถา ตํ อาปายิโก เนรยิโก. हे भग्गव, माझ्याद्वारे असे सांगितले गेले असतानाही, लिच्छवीपुत्र सुनक्खत्त या धम्म-विनयातून तसाच निघून गेला, जसा एखादा अपायगामी प्राणी नरकात जातो. อคฺคญฺญปญฺญตฺติกถา अग्गञ्ञपञ्ञत्तिकथा (सृष्टीच्या उत्पत्तीविषयीचे प्रकटन) ๓๖. ‘‘อคฺคญฺญญฺจาหํ, ภคฺคว, ปชานามิ. ตญฺจ ปชานามิ, ตโต จ อุตฺตริตรํ ปชานามิ, ตญฺจ ปชานํ น ปรามสามิ, อปรามสโต จ เม ปจฺจตฺตญฺเญว นิพฺพุติ วิทิตา, ยทภิชานํ ตถาคโต โน อนยํ อาปชฺชติ. ३६. हे भग्गव, मी सृष्टीच्या उत्पत्तीला (अग्गञ्ञ) जाणतो. मी तेही जाणतो आणि त्याहूनही श्रेष्ठ जे आहे तेही जाणतो. आणि ते जाणूनही मी त्यात आसक्त होत नाही. आसक्त न झाल्यामुळे मला स्वतःमध्येच निब्बुती (शांती/निर्वाण) जाणवली आहे, जी जाणून तथागत कधीही दुःखाला प्राप्त होत नाहीत. ๓๗. ‘‘สนฺติ, ภคฺคว, เอเก สมณพฺราหฺมณา อิสฺสรกุตฺตํ พฺรหฺมกุตฺตํ อาจริยกํ อคฺคญฺญํ ปญฺญเปนฺติ. ตฺยาหํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวํ วทามิ – ‘สจฺจํ กิร ตุมฺเห อายสฺมนฺโต อิสฺสรกุตฺตํ พฺรหฺมกุตฺตํ อาจริยกํ อคฺคญฺญํ ปญฺญเปถา’ติ? เต จ เม เอวํ ปุฏฺฐา, ‘อาโม’ติ ปฏิชานนฺติ. ตฺยาหํ เอวํ วทามิ – ‘กถํวิหิตกํ ปน ตุมฺเห อายสฺมนฺโต อิสฺสรกุตฺตํ พฺรหฺมกุตฺตํ อาจริยกํ อคฺคญฺญํ ปญฺญเปถา’ติ? เต มยา ปุฏฺฐา น สมฺปายนฺติ, อสมฺปายนฺตา มมญฺเญว ปฏิปุจฺฉนฺติ. เตสาหํ ปุฏฺโฐ พฺยากโรมิ – ३७. हे भग्गव, काही असे श्रमण व ब्राह्मण आहेत जे ईश्वर-निर्मित, ब्रह्म-निर्मित आणि आचार्यांच्या परंपरेनुसार विश्वाचा आरंभ मानतात. मी त्यांच्याकडे जाऊन असे विचारतो – 'हे आयुष्यमानांनो, हे खरे आहे का की तुम्ही ईश्वर-निर्मित, ब्रह्म-निर्मित आणि आचार्यांच्या परंपरेनुसार विश्वाचा आरंभ मानता?' माझ्या या विचारण्यावर ते 'होय' असे स्वीकारतात. मग मी त्यांना विचारतो – 'पण आयुष्यमानांनो, तुम्ही कोणत्या आधारावर ईश्वर-निर्मित, ब्रह्म-निर्मित आणि आचार्यांच्या परंपरेनुसार विश्वाचा आरंभ मानता?' माझ्याद्वारे असे विचारले असता ते समाधानकारक उत्तर देऊ शकत नाहीत, आणि निरुत्तर होऊन उलट मलाच विचारतात. त्यांनी विचारले असता मी त्यांना असे स्पष्टीकरण देतो – ๓๘. ‘โหติ โข โส, อาวุโส, สมโย ยํ กทาจิ กรหจิ ทีฆสฺส อทฺธุโน อจฺจเยน อยํ โลโก สํวฏฺฏติ. สํวฏฺฏมาเน โลเก เยภุยฺเยน สตฺตา อาภสฺสรสํวตฺตนิกา โหนฺติ. เต ตตฺถ โหนฺติ มโนมยา ปีติภกฺขา สยํปภา อนฺตลิกฺขจรา สุภฏฺฐายิโน จิรํ ทีฆมทฺธานํ ติฏฺฐนฺติ. ३८. 'हे आवुसो, दीर्घ काळानंतर कधीतरी अशी वेळ येते जेव्हा हा लोक संकुचित होतो. जेव्हा लोक संकुचित होत असतो, तेव्हा बहुतांश प्राणी आभास्सर देवलोकात उत्पन्न होतात. ते तिथे मनोमय, प्रीतीभक्षक, स्वयंप्रकाशी, आकाशात विहार करणारे आणि शुभ स्थितीत राहणारे असतात; आणि ते तिथे प्रदीर्घ काळापर्यंत राहतात. ‘โหติ โข โส, อาวุโส, สมโย ยํ กทาจิ กรหจิ ทีฆสฺส อทฺธุโน อจฺจเยน อยํ โลโก วิวฏฺฏติ. วิวฏฺฏมาเน โลเก สุญฺญํ พฺรหฺมวิมานํ ปาตุภวติ. อถ โข อญฺญตโร สตฺโต อายุกฺขยา วา ปุญฺญกฺขยา วา อาภสฺสรกายา จวิตฺวา สุญฺญํ พฺรหฺมวิมานํ อุปปชฺชติ. โส [Pg.24] ตตฺถ โหติ มโนมโย ปีติภกฺโข สยํปโภ อนฺตลิกฺขจโร สุภฏฺฐายี, จิรํ ทีฆมทฺธานํ ติฏฺฐติ. 'हे आवुसो, दीर्घ काळानंतर कधीतरी अशी वेळ येते जेव्हा हा लोक विकसित होतो. जेव्हा लोक विकसित होत असतो, तेव्हा एक शून्य ब्रह्मविमान प्रकट होते. तेव्हा एखादा प्राणी आयुष्य संपल्यामुळे किंवा पुण्य संपल्यामुळे आभास्सर लोकातून च्युत होऊन त्या शून्य ब्रह्मविमानात उत्पन्न होतो. तो तिथे मनोमय, प्रीतीभक्षक, स्वयंप्रकाशी, आकाशात विहार करणारा आणि शुभ स्थितीत राहणारा असतो; आणि तो तिथे प्रदीर्घ काळापर्यंत राहतो. ‘ตสฺส ตตฺถ เอกกสฺส ทีฆรตฺตํ นิวุสิตตฺตา อนภิรติ ปริตสฺสนา อุปฺปชฺชติ – อโห วต อญฺเญปิ สตฺตา อิตฺถตฺตํ อาคจฺเฉยฺยุนฺติ. อถ อญฺเญปิ สตฺตา อายุกฺขยา วา ปุญฺญกฺขยา วา อาภสฺสรกายา จวิตฺวา พฺรหฺมวิมานํ อุปปชฺชนฺติ ตสฺส สตฺตสฺส สหพฺยตํ. เตปิ ตตฺถ โหนฺติ มโนมยา ปีติภกฺขา สยํปภา อนฺตลิกฺขจรา สุภฏฺฐายิโน, จิรํ ทีฆมทฺธานํ ติฏฺฐนฺติ. 'तिथे दीर्घकाळ एकटे राहिल्यामुळे त्या प्राण्याच्या मनात असंतोष आणि व्याकुळता उत्पन्न होते – 'अरेरे! इतर प्राणीही येथे आले तर किती बरे होईल!' त्यानंतर इतर प्राणीही आयुष्य संपल्यामुळे किंवा पुण्य संपल्यामुळे आभास्सर लोकातून च्युत होऊन त्या प्राण्याचे सोबती म्हणून त्या ब्रह्मविमानात उत्पन्न होतात. ते देखील तिथे मनोमय, प्रीतीभक्षक, स्वयंप्रकाशी, आकाशात विहार करणारे आणि शुभ स्थितीत राहणारे असतात; आणि ते तिथे प्रदीर्घ काळापर्यंत राहतात. ๓๙. ‘ตตฺราวุโส, โย โส สตฺโต ปฐมํ อุปปนฺโน, ตสฺส เอวํ โหติ – อหมสฺมิ พฺรหฺมา มหาพฺรหฺมา อภิภู อนภิภูโต อญฺญทตฺถุทโส วสวตฺตี อิสฺสโร กตฺตา นิมฺมาตา เสฏฺโฐ สชิตา วสี ปิตา ภูตภพฺยานํ, มยา อิเม สตฺตา นิมฺมิตา. ตํ กิสฺส เหตุ? มมญฺหิ ปุพฺเพ เอตทโหสิ – อโห วต อญฺเญปิ สตฺตา อิตฺถตฺตํ อาคจฺเฉยฺยุนฺติ; อิติ มม จ มโนปณิธิ. อิเม จ สตฺตา อิตฺถตฺตํ อาคตาติ. ३९. 'हे आवुसो, तिथे जो प्राणी सर्वप्रथम उत्पन्न झाला होता, त्याच्या मनात असा विचार येतो – 'मी ब्रह्मा आहे, महाब्रह्मा आहे, सर्वाभिभू, अजिंक्य, सर्वद्रष्टा, वशवर्ती, ईश्वर, कर्ता, निर्माता, श्रेष्ठ, विधाता, वशी आणि भूत व भविष्यातील प्राण्यांचा पिता आहे. माझ्याद्वारेच हे प्राणी निर्माण केले गेले आहेत. हे कशामुळे? कारण पूर्वी माझ्या मनात असा विचार आला होता – 'अरेरे! इतर प्राणीही येथे आले तर किती बरे होईल!' अशा प्रकारे माझ्या मनातील संकल्पामुळेच हे प्राणी येथे आले आहेत आणि माझ्याद्वारेच हे प्राणी निर्माण झाले आहेत.' ‘เยปิ เต สตฺตา ปจฺฉา อุปปนฺนา, เตสมฺปิ เอวํ โหติ – อยํ โข ภวํ พฺรหฺมา มหาพฺรหฺมา อภิภู อนภิภูโต อญฺญทตฺถุทโส วสวตฺตี อิสฺสโร กตฺตา นิมฺมาตา เสฏฺโฐ สชิตา วสี ปิตา ภูตภพฺยานํ; อิมินา มยํ โภตา พฺรหฺมุนา นิมฺมิตา. ตํ กิสฺส เหตุ? อิมญฺหิ มยํ อทฺทสาม อิธ ปฐมํ อุปปนฺนํ; มยํ ปนามฺห ปจฺฉา อุปปนฺนาติ. 'आणि जे प्राणी नंतर उत्पन्न झाले, त्यांच्या मनातही असा विचार येतो – 'हे पूजनीय ब्रह्मा आहेत, महाब्रह्मा आहेत, सर्वाभिभू, अजिंक्य, सर्वद्रष्टा, वशवर्ती, ईश्वर, कर्ता, निर्माता, श्रेष्ठ, विधाता, वशी आणि भूत व भविष्यातील प्राण्यांचे पिता आहेत. या पूजनीय ब्रह्मानेच आमची निर्मिती केली आहे. हे कशामुळे? कारण आम्ही यांना येथे सर्वप्रथम उत्पन्न झालेले पाहिले आहे आणि आम्ही तर नंतर उत्पन्न झालो आहोत.' ๔๐. ‘ตตฺราวุโส, โย โส สตฺโต ปฐมํ อุปปนฺโน, โส ทีฆายุกตโร จ โหติ วณฺณวนฺตตโร จ มเหสกฺขตโร จ. เย ปน เต สตฺตา ปจฺฉา อุปปนฺนา, เต อปฺปายุกตรา จ โหนฺติ ทุพฺพณฺณตรา จ อปฺเปสกฺขตรา จ. ४०. 'हे आवुसो, तिथे जो प्राणी सर्वप्रथम उत्पन्न झाला होता, तो अधिक दीर्घायुषी, अधिक रूपवान आणि अधिक प्रभावशाली असतो. परंतु जे प्राणी नंतर उत्पन्न झाले, ते अल्पायुषी, कमी रूपवान आणि कमी प्रभावशाली असतात. ‘ฐานํ โข ปเนตํ, อาวุโส, วิชฺชติ, ยํ อญฺญตโร สตฺโต ตมฺหา กายา จวิตฺวา อิตฺถตฺตํ อาคจฺฉติ. อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชติ. อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิโต สมาโน [Pg.25] อาตปฺปมนฺวาย ปธานมนฺวาย อนุโยคมนฺวาย อปฺปมาทมนฺวาย สมฺมามนสิการมนฺวาย ตถารูปํ เจโตสมาธึ ผุสติ, ยถาสมาหิเต จิตฺเต ตํ ปุพฺเพนิวาสํ อนุสฺสรติ; ตโต ปรํ นานุสฺสรติ. 'हे आवुसो, अशी शक्यता आहे की, एखादा प्राणी त्या लोकातून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात जन्म घेतो. या मनुष्यलोकात आल्यावर तो गृहस्थाश्रमाचा त्याग करून अनगारिक होऊन प्रव्रज्या ग्रहण करतो. गृहस्थाश्रमातून बाहेर पडून प्रव्रजित झाल्यावर, तो तीव्र पुरुषार्थ, दृढ प्रयत्न, निरंतर अभ्यास, अप्रमाद आणि सम्यक मनसिकार यांच्या बळावर अशा प्रकारची चित्त-समाधी प्राप्त करतो, की चित्त समाहित झाल्यावर त्याला आपल्या पूर्वजन्माचे स्मरण होते; परंतु त्याहून अधिक मागे तो स्मरण करू शकत नाही. ‘โส เอวมาห – โย โข โส ภวํ พฺรหฺมา มหาพฺรหฺมา อภิภู อนภิภูโต อญฺญทตฺถุทโส วสวตฺตี อิสฺสโร กตฺตา นิมฺมาตา เสฏฺโฐ สชิตา วสี ปิตา ภูตภพฺยานํ, เยน มยํ โภตา พฺรหฺมุนา นิมฺมิตา. โส นิจฺโจ ธุโว สสฺสโต อวิปริณามธมฺโม สสฺสติสมํ ตเถว ฐสฺสติ. เย ปน มยํ อหุมฺหา เตน โภตา พฺรหฺมุนา นิมฺมิตา, เต มยํ อนิจฺจา อทฺธุวา อปฺปายุกา จวนธมฺมา อิตฺถตฺตํ อาคตา’ติ. เอวํวิหิตกํ โน ตุมฺเห อายสฺมนฺโต อิสฺสรกุตฺตํ พฺรหฺมกุตฺตํ อาจริยกํ อคฺคญฺญํ ปญฺญเปถาติ. ‘เต เอวมาหํสุ – เอวํ โข โน, อาวุโส โคตม, สุตํ, ยเถวายสฺมา โคตโม อาหา’ติ. ‘‘อคฺคญฺญญฺจาหํ, ภคฺคว, ปชานามิ. ตญฺจ ปชานามิ, ตโต จ อุตฺตริตรํ ปชานามิ, ตญฺจ ปชานํ น ปรามสามิ, อปรามสโต จ เม ปจฺจตฺตญฺเญว นิพฺพุติ วิทิตา. ยทภิชานํ ตถาคโต โน อนยํ อาปชฺชติ. 'तो असे म्हणतो – 'ते जे पूजनीय ब्रह्मा, महाब्रह्मा, सर्वाभिभू, अजिंक्य, सर्वद्रष्टा, वशवर्ती, ईश्वर, कर्ता, निर्माता, श्रेष्ठ, विधाता, वशी आणि भूत व भविष्यातील प्राण्यांचे पिता आहेत, ज्या पूजनीय ब्रह्माने आमची निर्मिती केली आहे; ते नित्य, ध्रुव, शाश्वत, अपरिवर्तनशील स्वभावाचे आहेत आणि ते सदैव तसेच राहतील. परंतु आम्ही, ज्यांची निर्मिती त्या पूजनीय ब्रह्माने केली आहे, आम्ही अनित्य, अध्रुव, अल्पायुषी, च्युत होणाऱ्या स्वभावाचे आहोत आणि म्हणूनच आम्ही या मनुष्यलोकात आलो आहोत.' हे आयुष्यमानांनो, तुम्ही याच प्रकारे ईश्वर-निर्मित, ब्रह्म-निर्मित आणि आचार्यांच्या परंपरेनुसार विश्वाचा आरंभ मानता का?' त्यावर ते असे म्हणाले – 'हे आवुसो गोतम, आयुष्यमान गोतमांनी जसे सांगितले, तसेच आम्ही ऐकले आहे.' हे भग्गव, मी विश्वाचा आरंभ जाणतो. मी ते तर जाणतोच, पण त्याहूनही श्रेष्ठ जे आहे तेही जाणतो. आणि ते जाणूनही मी त्यात आसक्त होत नाही, आणि आसक्त न झाल्यामुळे मला स्वतःच निर्वाणाची अनुभूती झाली आहे. हे जाणूनच तथागत कोणत्याही संकटात पडत नाहीत. ๔๑. ‘‘สนฺติ, ภคฺคว, เอเก สมณพฺราหฺมณา ขิฑฺฑาปโทสิกํ อาจริยกํ อคฺคญฺญํ ปญฺญเปนฺติ. ตฺยาหํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวํ วทามิ – ‘สจฺจํ กิร ตุมฺเห อายสฺมนฺโต ขิฑฺฑาปโทสิกํ อาจริยกํ อคฺคญฺญํ ปญฺญเปถา’ติ? เต จ เม เอวํ ปุฏฺฐา ‘อาโม’ติ ปฏิชานนฺติ. ตฺยาหํ เอวํ วทามิ – ‘กถํวิหิตกํ ปน ตุมฺเห อายสฺมนฺโต ขิฑฺฑาปโทสิกํ อาจริยกํ อคฺคญฺญํ ปญฺญเปถา’ติ? เต มยา ปุฏฺฐา น สมฺปายนฺติ, อสมฺปายนฺตา มมญฺเญว ปฏิปุจฺฉนฺติ, เตสาหํ ปุฏฺโฐ พฺยากโรมิ – ४१. हे भग्गव, काही असे श्रमण व ब्राह्मण आहेत जे क्रीडा-प्रदोषिक आणि आचार्यांच्या परंपरेनुसार विश्वाचा आरंभ मानतात. मी त्यांच्याकडे जाऊन असे विचारतो – 'हे आयुष्यमानांनो, हे खरे आहे का की तुम्ही क्रीडा-प्रदोषिक आणि आचार्यांच्या परंपरेनुसार विश्वाचा आरंभ मानता?' माझ्या या विचारण्यावर ते 'होय' असे स्वीकारतात. मग मी त्यांना विचारतो – 'पण आयुष्यमानांनो, तुम्ही कोणत्या आधारावर क्रीडा-प्रदोषिक आणि आचार्यांच्या परंपरेनुसार विश्वाचा आरंभ मानता?' माझ्याद्वारे असे विचारले असता ते समाधानकारक उत्तर देऊ शकत नाहीत, आणि निरुत्तर होऊन उलट मलाच विचारतात. त्यांनी विचारले असता मी त्यांना असे स्पष्टीकरण देतो – ๔๒. ‘สนฺตาวุโส, ขิฑฺฑาปโทสิกา นาม เทวา. เต อติเวลํ หสฺสขิฑฺฑารติธมฺมสมาปนฺนา วิหรนฺติ. เตสํ อติเวลํ หสฺสขิฑฺฑารติธมฺมสมาปนฺนานํ วิหรตํ สติ สมฺมุสฺสติ, สติยา สมฺโมสา เต เทวา ตมฺหา กายา จวนฺติ. ४२. 'हे आवुसो, 'क्रीडा-प्रदोषिक' नावाचे देव आहेत. ते अतिप्रमाणात हास्य, क्रीडा आणि विलासात मग्न राहतात. अतिप्रमाणात हास्य, क्रीडा आणि विलासात मग्न राहिल्यामुळे त्यांची स्मृती नष्ट होते, आणि स्मृती नष्ट झाल्यामुळे ते देव त्या देवलोकातून च्युत होतात. ‘ฐานํ [Pg.26] โข ปเนตํ, อาวุโส, วิชฺชติ, ยํ อญฺญตโร สตฺโต ตมฺหา กายา จวิตฺวา อิตฺถตฺตํ อาคจฺฉติ, อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชติ, อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิโต สมาโน อาตปฺปมนฺวาย ปธานมนฺวาย อนุโยคมนฺวาย อปฺปมาทมนฺวาย สมฺมามนสิการมนฺวาย ตถารูปํ เจโตสมาธึ ผุสติ, ยถาสมาหิเต จิตฺเต ตํ ปุพฺเพนิวาสํ อนุสฺสรติ; ตโต ปรํ นานุสฺสรติ. ‘हे आवुसो, अशी शक्यता आहे की एखादा प्राणी त्या लोकांतून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात येतो. मनुष्यलोकात आल्यावर तो घरादाराचा त्याग करून अनगारिक (गृहहीन) प्रवज्जा ग्रहण करतो. गृहहीन प्रवज्जित झाल्यावर तो तीव्र उद्योग (आतप्प), दृढ प्रयत्न (प्रधान), निरंतर अभ्यास (अनुयोग), अप्रमाद (जागरूकता) आणि सम्यक मनसिकार (योग्य विचार) यांच्या बळावर अशा प्रकारची चित्तसमाधी प्राप्त करतो, ज्या समाधीयुक्त चित्ताने तो आपल्या पूर्वजन्मांचे (पूर्वनिवासाचे) स्मरण करू शकतो; परंतु त्यापलीकडचे स्मरण करू शकत नाही.’ ‘โส เอวมาห – เย โข เต โภนฺโต เทวา น ขิฑฺฑาปโทสิกา เต น อติเวลํ หสฺสขิฑฺฑารติธมฺมสมาปนฺนา วิหรนฺติ. เตสํ นาติเวลํ หสฺสขิฑฺฑารติธมฺมสมาปนฺนานํ วิหรตํ สติ น สมฺมุสฺสติ, สติยา อสมฺโมสา เต เทวา ตมฺหา กายา น จวนฺติ, นิจฺจา ธุวา สสฺสตา อวิปริณามธมฺมา สสฺสติสมํ ตเถว ฐสฺสนฺติ. เย ปน มยํ อหุมฺหา ขิฑฺฑาปโทสิกา เต มยํ อติเวลํ หสฺสขิฑฺฑารติธมฺมสมาปนฺนา วิหริมฺหา, เตสํ โน อติเวลํ หสฺสขิฑฺฑารติธมฺมสมาปนฺนานํ วิหรตํ สติ สมฺมุสฺสติ, สติยา สมฺโมสา เอวํ มยํ ตมฺหา กายา จุตา, อนิจฺจา อทฺธุวา อปฺปายุกา จวนธมฺมา อิตฺถตฺตํ อาคตาติ. เอวํวิหิตกํ โน ตุมฺเห อายสฺมนฺโต ขิฑฺฑาปโทสิกํ อาจริยกํ อคฺคญฺญํ ปญฺญเปถา’ติ. ‘เต เอวมาหํสุ – เอวํ โข โน, อาวุโส โคตม, สุตํ, ยเถวายสฺมา โคตโม อาหา’ติ. ‘‘อคฺคญฺญญฺจาหํ, ภคฺคว, ปชานามิ…เป… ยทภิชานํ ตถาคโต โน อนยํ อาปชฺชติ. ‘तो असे म्हणतो— «जे पूजनीय देव खिळ्ळापदोसिक (क्रीडाप्रदोषिक) नाहीत, ते अतिवेळ हसणे, खेळणे व क्रीडारतीमध्ये मग्न होऊन राहत नाहीत. अतिवेळ हसणे, खेळणे व क्रीडारतीमध्ये मग्न न राहिल्यामुळे त्यांची स्मृती नष्ट होत नाही. स्मृती नष्ट न झाल्यामुळे ते देव त्या लोकांतून च्युत होत नाहीत; ते नित्य, ध्रुव, शाश्वत, अपरिवर्तनशील राहतात आणि शाश्वत काळापर्यंत तसेच टिकून राहतील. परंतु आम्ही जे खिळ्ळापदोसिक होतो, आम्ही अतिवेळ हसणे, खेळणे व क्रीडारतीमध्ये मग्न राहिलो. अतिवेळ हसणे, खेळणे व क्रीडारतीमध्ये मग्न राहिल्यामुळे आमची स्मृती नष्ट झाली. स्मृती नष्ट झाल्यामुळे आम्ही त्या लोकांतून च्युत झालो; आम्ही अनित्य, अध्रुव, अल्पायुषी व च्युत होण्याच्या स्वभावाचे झालो आणि या मनुष्यलोकात आलो.» हे आयुष्यमानहो, तुम्ही अशा प्रकारे खिळ्ळापदोसिक देवांच्या संदर्भात सृष्टीच्या आरंभाचा (अग्गञ्ञ) सिद्धांत मांडता का?’ त्यांनी उत्तर दिले— ‘हे आवुसो गोतम, आयुष्यमान गोतमांनी जसे सांगितले, तसेच आम्ही ऐकले आहे.’ «हे भग्गव, मी सृष्टीच्या आरंभाचा (अग्गञ्ञ) सिद्धांत जाणतो... आणि हे जाणून तथागत कधीही संकटात (विनाशात) पडत नाहीत.» ๔๓. ‘‘สนฺติ, ภคฺคว, เอเก สมณพฺราหฺมณา มโนปโทสิกํ อาจริยกํ อคฺคญฺญํ ปญฺญเปนฺติ. ตฺยาหํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวํ วทามิ – ‘สจฺจํ กิร ตุมฺเห อายสฺมนฺโต มโนปโทสิกํ อาจริยกํ อคฺคญฺญํ ปญฺญเปถา’ติ? เต จ เม เอวํ ปุฏฺฐา ‘อาโม’ติ ปฏิชานนฺติ. ตฺยาหํ เอวํ วทามิ – ‘กถํวิหิตกํ ปน ตุมฺเห อายสฺมนฺโต มโนปโทสิกํ อาจริยกํ อคฺคญฺญํ ปญฺญเปถา’ติ? เต มยา ปุฏฺฐา น สมฺปายนฺติ, อสมฺปายนฺตา มมญฺเญว ปฏิปุจฺฉนฺติ. เตสาหํ ปุฏฺโฐ พฺยากโรมิ – ४३. «हे भग्गव, काही असे श्रमण व ब्राह्मण आहेत जे मनोपदोसिक देवांच्या संदर्भात सृष्टीच्या आरंभाचा (अग्गञ्ञ) सिद्धांत मांडतात. मी त्यांच्याकडे जाऊन विचारतो— ‘हे आयुष्यमानहो, हे खरे आहे का की तुम्ही मनोपदोसिक देवांच्या संदर्भात सृष्टीच्या आरंभाचा सिद्धांत मांडता?’ माझ्या या प्रश्नावर ते ‘होय’ असे मान्य करतात. मग मी त्यांना विचारतो— ‘हे आयुष्यमानहो, तुम्ही कोणत्या प्रकारे मनोपदोसिक देवांच्या संदर्भात सृष्टीच्या आरंभाचा सिद्धांत मांडता?’ माझ्या या प्रश्नाचे ते योग्य उत्तर देऊ शकत नाहीत, आणि उत्तर न देता उलट मलाच प्रश्न विचारतात. त्यांनी विचारल्यावर मी त्यांना असे स्पष्टीकरण देतो— ๔๔. ‘สนฺตาวุโส, มโนปโทสิกา นาม เทวา. เต อติเวลํ อญฺญมญฺญํ อุปนิชฺฌายนฺติ. เต อติเวลํ อญฺญมญฺญํ อุปนิชฺฌายนฺตา อญฺญมญฺญมฺหิ จิตฺตานิ [Pg.27] ปทูเสนฺติ. เต อญฺญมญฺญํ ปทุฏฺฐจิตฺตา กิลนฺตกายา กิลนฺตจิตฺตา. เต เทวา ตมฺหา กายา จวนฺติ. ४४. ‘हे आवुसो, मनोपदोसिक नावाचे देव आहेत. ते अतिवेळ एकमेकांकडे द्वेषाने पाहत राहतात. अतिवेळ एकमेकांकडे द्वेषाने पाहिल्यामुळे त्यांच्या मनात एकमेकांबद्दल द्वेष निर्माण होतो. एकमेकांबद्दल द्वेषयुक्त चित्त झाल्यामुळे त्यांचे शरीर थकते आणि चित्तही थकते. त्यामुळे ते देव त्या लोकांतून च्युत होतात.’ ‘ฐานํ โข ปเนตํ, อาวุโส, วิชฺชติ, ยํ อญฺญตโร สตฺโต ตมฺหา กายา จวิตฺวา อิตฺถตฺตํ อาคจฺฉติ. อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชติ. อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิโต สมาโน อาตปฺปมนฺวาย ปธานมนฺวาย อนุโยคมนฺวาย อปฺปมาทมนฺวาย สมฺมามนสิการมนฺวาย ตถารูปํ เจโตสมาธึ ผุสติ, ยถาสมาหิเต จิตฺเต ตํ ปุพฺเพนิวาสํ อนุสฺสรติ, ตโต ปรํ นานุสฺสรติ. ‘हे आवुसो, अशी शक्यता आहे की एखादा प्राणी त्या लोकांतून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात येतो. मनुष्यलोकात आल्यावर तो घरादाराचा त्याग करून अनगारिक (गृहहीन) प्रवज्जा ग्रहण करतो. गृहहीन प्रवज्जित झाल्यावर तो तीव्र उद्योग (आतप्प), दृढ प्रयत्न (प्रधान), निरंतर अभ्यास (अनुयोग), अप्रमाद (जागरूकता) आणि सम्यक मनसिकार (योग्य विचार) यांच्या बळावर अशा प्रकारची चित्तसमाधी प्राप्त करतो, ज्या समाधीयुक्त चित्ताने तो आपल्या पूर्वजन्मांचे स्मरण करू शकतो; परंतु त्यापलीकडचे स्मरण करू शकत नाही.’ ‘โส เอวมาห – เย โข เต โภนฺโต เทวา น มโนปโทสิกา เต นาติเวลํ อญฺญมญฺญํ อุปนิชฺฌายนฺติ. เต นาติเวลํ อญฺญมญฺญํ อุปนิชฺฌายนฺตา อญฺญมญฺญมฺหิ จิตฺตานิ นปฺปทูเสนฺติ. เต อญฺญมญฺญํ อปฺปทุฏฺฐจิตฺตา อกิลนฺตกายา อกิลนฺตจิตฺตา. เต เทวา ตมฺหา กายา น จวนฺติ, นิจฺจา ธุวา สสฺสตา อวิปริณามธมฺมา สสฺสติสมํ ตเถว ฐสฺสนฺติ. เย ปน มยํ อหุมฺหา มโนปโทสิกา, เต มยํ อติเวลํ อญฺญมญฺญํ อุปนิชฺฌายิมฺหา. เต มยํ อติเวลํ อญฺญมญฺญํ อุปนิชฺฌายนฺตา อญฺญมญฺญมฺหิ จิตฺตานิ ปทูสิมฺหา. เต มยํ อญฺญมญฺญํ ปทุฏฺฐจิตฺตา กิลนฺตกายา กิลนฺตจิตฺตา. เอวํ มยํ ตมฺหา กายา จุตา, อนิจฺจา อทฺธุวา อปฺปายุกา จวนธมฺมา อิตฺถตฺตํ อาคตาติ. เอวํวิหิตกํ โน ตุมฺเห อายสฺมนฺโต มโนปโทสิกํ อาจริยกํ อคฺคญฺญํ ปญฺญเปถา’ติ. ‘เต เอวมาหํสุ – เอวํ โข โน, อาวุโส โคตม, สุตํ, ยเถวายสฺมา โคตโม อาหา’ติ. ‘‘อคฺคญฺญญฺจาหํ, ภคฺคว, ปชานามิ…เป… ยทภิชานํ ตถาคโต โน อนยํ อาปชฺชติ. ‘तो असे म्हणतो— «जे पूजनीय देव मनोपदोसिक नाहीत, ते अतिवेळ एकमेकांकडे द्वेषाने पाहत राहत नाहीत. अतिवेळ एकमेकांकडे द्वेषाने न पाहिल्यामुळे त्यांच्या मनात एकमेकांबद्दल द्वेष निर्माण होत नाही. एकमेकांबद्दल द्वेषरहित चित्त असल्यामुळे त्यांचे शरीर थकत नाही आणि चित्तही थकत नाही. ते देव त्या लोकांतून च्युत होत नाहीत; ते नित्य, ध्रुव, शाश्वत, अपरिवर्तनशील राहतात आणि शाश्वत काळापर्यंत तसेच टिकून राहतील. परंतु आम्ही जे मनोपदोसिक होतो, आम्ही अतिवेळ एकमेकांकडे द्वेषाने पाहत राहिलो. अतिवेळ एकमेकांकडे द्वेषाने पाहिल्यामुळे आमच्या मनात एकमेकांबद्दल द्वेष निर्माण झाला. एकमेकांबद्दल द्वेषयुक्त चित्त झाल्यामुळे आमचे शरीर थकले आणि चित्तही थकले. अशा प्रकारे आम्ही त्या लोकांतून च्युत झालो; आम्ही अनित्य, अध्रुव, अल्पायुषी व च्युत होण्याच्या स्वभावाचे झालो आणि या मनुष्यलोकात आलो.» हे आयुष्यमानहो, तुम्ही अशा प्रकारे मनोपदोसिक देवांच्या संदर्भात सृष्टीच्या आरंभाचा (अग्गञ्ञ) सिद्धांत मांडता का?’ त्यांनी उत्तर दिले— ‘हे आवुसो गोतम, आयुष्यमान गोतमांनी जसे सांगितले, तसेच आम्ही ऐकले आहे.’ «हे भग्गव, मी सृष्टीच्या आरंभाचा (अग्गञ्ञ) सिद्धांत जाणतो... आणि हे जाणून तथागत कधीही संकटात (विनाशात) पडत नाहीत.» ๔๕. ‘‘สนฺติ, ภคฺคว, เอเก สมณพฺราหฺมณา อธิจฺจสมุปฺปนฺนํ อาจริยกํ อคฺคญฺญํ ปญฺญเปนฺติ. ตฺยาหํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวํ วทามิ – ‘สจฺจํ กิร ตุมฺเห อายสฺมนฺโต อธิจฺจสมุปฺปนฺนํ อาจริยกํ อคฺคญฺญํ ปญฺญเปถา’ติ? เต จ เม เอวํ ปุฏฺฐา ‘อาโม’ติ ปฏิชานนฺติ. ตฺยาหํ เอวํ วทามิ – ‘กถํวิหิตกํ ปน ตุมฺเห อายสฺมนฺโต อธิจฺจสมุปฺปนฺนํ อาจริยกํ อคฺคญฺญํ ปญฺญเปถา’ติ? เต [Pg.28] มยา ปุฏฺฐา น สมฺปายนฺติ, อสมฺปายนฺตา มมญฺเญว ปฏิปุจฺฉนฺติ. เตสาหํ ปุฏฺโฐ พฺยากโรมิ – ४५. «हे भग्गव, काही असे श्रमण व ब्राह्मण आहेत जे अधिच्चसमुप्पन्न (अकारण किंवा आकस्मिकपणे उत्पन्न होणे) सिद्धांतानुसार सृष्टीच्या आरंभाचा (अग्गञ्ञ) सिद्धांत मांडतात. मी त्यांच्याकडे जाऊन विचारतो— ‘हे आयुष्यमानहो, हे खरे आहे का की तुम्ही अधिच्चसमुप्पन्न सिद्धांतानुसार सृष्टीच्या आरंभाचा सिद्धांत मांडता?’ माझ्या या प्रश्नावर ते ‘होय’ असे मान्य करतात. मग मी त्यांना विचारतो— ‘हे आयुष्यमानहो, तुम्ही कोणत्या प्रकारे अधिच्चसमुप्पन्न सिद्धांतानुसार सृष्टीच्या आरंभाचा सिद्धांत मांडता?’ माझ्या या प्रश्नाचे ते योग्य उत्तर देऊ शकत नाहीत, आणि उत्तर न देता उलट मलाच प्रश्न विचारतात. त्यांनी विचारल्यावर मी त्यांना असे स्पष्टीकरण देतो— ๔๖. ‘สนฺตาวุโส, อสญฺญสตฺตา นาม เทวา. สญฺญุปฺปาทา จ ปน เต เทวา ตมฺหา กายา จวนฺติ. ४६. ‘हे आवुसो, असञ्ञसत्त (असंज्ञीसत्त्व) नावाचे देव आहेत. जेव्हा त्यांच्यामध्ये संज्ञेचा (चेतनेचा) उदय होतो, तेव्हा ते देव त्या लोकांतून च्युत होतात.’ ‘ฐานํ โข ปเนตํ, อาวุโส, วิชฺชติ. ยํ อญฺญตโร สตฺโต ตมฺหา กายา จวิตฺวา อิตฺถตฺตํ อาคจฺฉติ. อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชติ. อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิโต สมาโน อาตปฺปมนฺวาย ปธานมนฺวาย อนุโยคมนฺวาย อปฺปมาทมนฺวาย สมฺมามนสิการมนฺวาย ตถารูปํ เจโตสมาธึ ผุสติ, ยถาสมาหิเต จิตฺเต ตํ สญฺญุปฺปาทํ อนุสฺสรติ, ตโต ปรํ นานุสฺสรติ. ‘हे आवुसो, अशी शक्यता आहे की एखादा प्राणी त्या लोकांतून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात येतो. मनुष्यलोकात आल्यावर तो घरादाराचा त्याग करून अनगारिक (गृहहीन) प्रवज्जा ग्रहण करतो. गृहहीन प्रवज्जित झाल्यावर तो तीव्र उद्योग (आतप्प), दृढ प्रयत्न (प्रधान), निरंतर अभ्यास (अनुयोग), अप्रमाद (जागरूकता) आणि सम्यक मनसिकार (योग्य विचार) यांच्या बळावर अशा प्रकारची चित्तसमाधी प्राप्त करतो, ज्या समाधीयुक्त चित्ताने तो त्या संज्ञेच्या (चेतनेच्या) उदयाचे स्मरण करू शकतो; परंतु त्यापलीकडचे स्मरण करू शकत नाही.’ ‘โส เอวมาห – อธิจฺจสมุปฺปนฺโน อตฺตา จ โลโก จ. ตํ กิสฺส เหตุ? อหญฺหิ ปุพฺเพ นาโหสึ, โสมฺหิ เอตรหิ อหุตฺวา สนฺตตาย ปริณโตติ. เอวํวิหิตกํ โน ตุมฺเห อายสฺมนฺโต อธิจฺจสมุปฺปนฺนํ อาจริยกํ อคฺคญฺญํ ปญฺญเปถา’ติ? ‘เต เอวมาหํสุ – เอวํ โข โน, อาวุโส โคตม, สุตํ ยเถวายสฺมา โคตโม อาหา’ติ. ‘‘อคฺคญฺญญฺจาหํ, ภคฺคว, ปชานามิ ตญฺจ ปชานามิ, ตโต จ อุตฺตริตรํ ปชานามิ, ตญฺจ ปชานํ น ปรามสามิ, อปรามสโต จ เม ปจฺจตฺตญฺเญว นิพฺพุติ วิทิตา. ยทภิชานํ ตถาคโต โน อนยํ อาปชฺชติ. तो असे म्हणाला— 'आत्मा आणि लोक (जग) हे अकारण (अकस्मात) उत्पन्न झाले आहेत. त्याचे कारण काय? कारण मी पूर्वी नव्हतो, तो मी पूर्वी नसताना आता अस्तित्वात आलो आहे.' 'आयुष्यमानांनो, तुम्ही अशा प्रकारच्या अकारण उत्पत्तीलाच सृष्टीच्या उत्पत्तीचे मूळ (अग्रज्ञ) मानून आपल्या आचार्यांचा सिद्धांत म्हणून प्रस्थापित करता का?' त्यांनी असे उत्तर दिले— 'हे आवुसो गोतमा, आयुष्यमान गोतमांनी जसे सांगितले, तसेच आम्ही ऐकले आहे.' 'हे भग्गव, मी सृष्टीच्या उत्पत्तीचे मूळ (अग्रज्ञ) जाणतो आणि त्याहूनही अधिक श्रेष्ठ जे आहे तेही जाणतो. ते जाणूनही मी त्यात आसक्त होत नाही, आणि आसक्त न झाल्यामुळे मला स्वतःमध्येच शांती (निवृत्ती) अनुभवता आली आहे, जी जाणल्यामुळे तथागत कधीही संकटात पडत नाहीत.' ๔๗. ‘‘เอวํวาทึ โข มํ, ภคฺคว, เอวมกฺขายึ เอเก สมณพฺราหฺมณา อสตา ตุจฺฉา มุสา อภูเตน อพฺภาจิกฺขนฺติ – ‘วิปรีโต สมโณ โคตโม ภิกฺขโว จ. สมโณ โคตโม เอวมาห – ยสฺมึ สมเย สุภํ วิโมกฺขํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ, สพฺพํ ตสฺมึ สมเย อสุภนฺตฺเวว ปชานาตี’ติ. น โข ปนาหํ, ภคฺคว, เอวํ วทามิ – ‘ยสฺมึ สมเย สุภํ วิโมกฺขํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ, สพฺพํ ตสฺมึ สมเย อสุภนฺตฺเวว ปชานาตี’ติ. เอวญฺจ ขฺวาหํ, ภคฺคว, วทามิ – ‘ยสฺมึ สมเย สุภํ วิโมกฺขํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ, สุภนฺตฺเวว ตสฺมึ สมเย ปชานาตี’ติ. ४७. “हे भग्गव, असे प्रतिपादन करणाऱ्या आणि असे शिकवणाऱ्या माझ्यावर काही श्रमण व ब्राह्मण असत्य, तुच्छ, खोट्या आणि निराधार आरोपांनी आळ आणतात की— 'श्रमण गोतम आणि त्यांचे भिक्खू विपरीताग्रही आहेत. श्रमण गोतम असे म्हणतात की— ज्या वेळी एखादा भिक्खू शुभ विमोक्षाची प्राप्ती करून विहरतो, त्या वेळी तो सर्व काही केवळ अशुभ म्हणूनच जाणतो.' परंतु हे भग्गव, मी असे म्हणत नाही की— 'ज्या वेळी एखादा भिक्खू शुभ विमोक्षाची प्राप्ती करून विहरतो, त्या वेळी तो सर्व काही केवळ अशुभ म्हणूनच जाणतो.' उलट, हे भग्गव, मी असे म्हणतो की— 'ज्या वेळी एखादा भिक्खू शुभ विमोक्षाची प्राप्ती करून विहरतो, त्या वेळी तो त्या अवस्थेत सर्व काही केवळ शुभ म्हणूनच जाणतो.'” ‘‘เต [Pg.29] จ, ภนฺเต, วิปรีตา, เย ภควนฺตํ วิปรีตโต ทหนฺติ ภิกฺขโว จ. เอวํปสนฺโน อหํ, ภนฺเต, ภควติ. ปโหติ เม ภควา ตถา ธมฺมํ เทเสตุํ, ยถา อหํ สุภํ วิโมกฺขํ อุปสมฺปชฺช วิหเรยฺย’’นฺติ. “भंते, जे भगवंतांवर आणि भिक्खूंवर विपरीततेचा आळ आणतात, ते स्वतःच विपरीत बुद्धीचे आहेत. भंते, माझी भगवंतांवर अशी श्रद्धा आहे की, भगवंत मला अशा प्रकारे धम्म उपदेश करण्यास समर्थ आहेत, जेणेकरून मी शुभ विमोक्षाची प्राप्ती करून विहरू शकेन.” ๔๘. ‘‘ทุกฺกรํ โข เอตํ, ภคฺคว, ตยา อญฺญทิฏฺฐิเกน อญฺญขนฺติเกน อญฺญรุจิเกน อญฺญตฺราโยเคน อญฺญตฺราจริยเกน สุภํ วิโมกฺขํ อุปสมฺปชฺช วิหริตุํ. อิงฺฆ ตฺวํ, ภคฺคว, โย จ เต อยํ มยิ ปสาโท, ตเมว ตฺวํ สาธุกมนุรกฺขา’’ติ. ‘‘สเจ ตํ, ภนฺเต, มยา ทุกฺกรํ อญฺญทิฏฺฐิเกน อญฺญขนฺติเกน อญฺญรุจิเกน อญฺญตฺราโยเคน อญฺญตฺราจริยเกน สุภํ วิโมกฺขํ อุปสมฺปชฺช วิหริตุํ. โย จ เม อยํ, ภนฺเต, ภควติ ปสาโท, ตเมวาหํ สาธุกมนุรกฺขิสฺสามี’’ติ. อิทมโวจ ภควา. อตฺตมโน ภคฺควโคตฺโต ปริพฺพาชโก ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทีติ. ४८. “हे भग्गव, भिन्न दृष्टी, भिन्न क्षंती, भिन्न रुची, भिन्न साधना आणि भिन्न आचार्य असलेल्या तुझ्यासाठी शुभ विमोक्षाची प्राप्ती करून विहरणे खरोखरच कठीण आहे. म्हणून हे भग्गव, तुझी माझ्यावर जी श्रद्धा आहे, तीच तू चांगल्या प्रकारे जपून ठेव.” “भंते, जर भिन्न दृष्टी, भिन्न क्षंती, भिन्न रुची, भिन्न साधना आणि भिन्न आचार्य असलेल्या माझ्यासाठी शुभ विमोक्षाची प्राप्ती करून विहरणे कठीण असेल, तर भंते, माझी भगवंतांवर जी श्रद्धा आहे, तीच मी चांगल्या प्रकारे जपून ठेवीन.” भगवंत असे म्हणाले. भगवगोत्रीय परिव्राजक अत्यंत प्रसन्न झाला आणि त्याने भगवंतांच्या भाषणाचे मनापासून अभिनंदन केले. ปาถิกสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ ปฐมํ. पहिले पाथिक सुत्त समाप्त झाले। ๒. อุทุมฺพริกสุตฺตํ २. उदुम्बरिक सुत्त นิคฺโรธปริพฺพาชกวตฺถุ निग्रोध परिव्राजकाची कथा ๔๙. เอวํ [Pg.30] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ คิชฺฌกูเฏ ปพฺพเต. เตน โข ปน สมเยน นิคฺโรโธ ปริพฺพาชโก อุทุมฺพริกาย ปริพฺพาชการาเม ปฏิวสติ มหติยา ปริพฺพาชกปริสาย สทฺธึ ตึสมตฺเตหิ ปริพฺพาชกสเตหิ. อถ โข สนฺธาโน คหปติ ทิวา ทิวสฺส ราชคหา นิกฺขมิ ภควนฺตํ ทสฺสนาย. อถ โข สนฺธานสฺส คหปติสฺส เอตทโหสิ – ‘‘อกาโล โข ภควนฺตํ ทสฺสนาย. ปฏิสลฺลีโน ภควา. มโนภาวนียานมฺปิ ภิกฺขูนํ อสมโย ทสฺสนาย. ปฏิสลฺลีนา มโนภาวนียา ภิกฺขู. ยํนูนาหํ เยน อุทุมฺพริกาย ปริพฺพาชการาโม, เยน นิคฺโรโธ ปริพฺพาชโก เตนุปสงฺกเมยฺย’’นฺติ. อถ โข สนฺธาโน คหปติ เยน อุทุมฺพริกาย ปริพฺพาชการาโม, เตนุปสงฺกมิ. ४९. असे मी ऐकले आहे— एक वेळ भगवंत राजगृहातील गिद्धकूट पर्वतावर विहरत होते. त्या वेळी निग्रोध परिव्राजक हा उदुम्बरिकेच्या परिव्राजक आरामात सुमारे तीन हजार परिव्राजकांच्या मोठ्या समुदायासोबत राहत होता. तेव्हा संधान गृहपती दुपारी राजगृहाहून भगवंतांच्या दर्शनासाठी निघाला. वाटेत संधान गृहपतीच्या मनात असा विचार आला— 'भगवंतांच्या दर्शनाची ही योग्य वेळ नाही, कारण भगवंत ध्यानस्थ आहेत. आदरणीय भिक्खूंच्या दर्शनाचीही ही योग्य वेळ नाही, कारण तेही ध्यानस्थ आहेत. मग मी उदुम्बरिकेच्या परिव्राजक आरामात निग्रोध परिव्राजकाकडे का जाऊ नये?' त्यानंतर संधान गृहपती उदुम्बरिकेच्या परिव्राजक आरामात जेथे निग्रोध परिव्राजक होता, तेथे गेला। ๕๐. เตน โข ปน สมเยน นิคฺโรโธ ปริพฺพาชโก มหติยา ปริพฺพาชกปริสาย สทฺธึ นิสินฺโน โหติ อุนฺนาทินิยา อุจฺจาสทฺทมหาสทฺทาย อเนกวิหิตํ ติรจฺฉานกถํ กเถนฺติยา. เสยฺยถิทํ – ราชกถํ โจรกถํ มหามตฺตกถํ เสนากถํ ภยกถํ ยุทฺธกถํ อนฺนกถํ ปานกถํ วตฺถกถํ สยนกถํ มาลากถํ คนฺธกถํ ญาติกถํ ยานกถํ คามกถํ นิคมกถํ นครกถํ ชนปทกถํ อิตฺถิกถํ สูรกถํ วิสิขากถํ กุมฺภฏฺฐานกถํ ปุพฺพเปตกถํ นานตฺตกถํ โลกกฺขายิกํ สมุทฺทกฺขายิกํ อิติภวาภวกถํ อิติ วา. ५०. त्या वेळी निग्रोध परिव्राजक हा मोठ्या परिव्राजक समुदायासोबत बसला होता, जे सर्व जण मोठा गोंगाट व आरडाओरडा करत विविध प्रकारच्या निरर्थक गोष्टी (तिरच्छानकथा) बोलण्यात मग्न होते. जसे की— राजांविषयीच्या गोष्टी, चोरांविषयीच्या गोष्टी, मंत्र्यांविषयीच्या गोष्टी, सैन्याविषयीच्या गोष्टी, भयाविषयीच्या गोष्टी, युद्धाविषयीच्या गोष्टी, अन्नाविषयीच्या गोष्टी, पेयांविषयीच्या गोष्टी, वस्त्रांविषयीच्या गोष्टी, शय्येविषयीच्या गोष्टी, माळांविषयीच्या गोष्टी, सुगंधांविषयीच्या गोष्टी, नातेवाइकांविषयीच्या गोष्टी, वाहनांविषयीच्या गोष्टी, गावांविषयीच्या गोष्टी, नगरांविषयीच्या गोष्टी, शहरांविषयीच्या गोष्टी, देशांविषयीच्या गोष्टी, स्त्रियांविषयीच्या गोष्टी, पुरुषांविषयीच्या गोष्टी, शूरवीरांविषयीच्या गोष्टी, गल्लीबोळांतील गोष्टी, पाणवठ्यांवरील गोष्टी, मृत पूर्वजांविषयीच्या गोष्टी, विविध प्रकारच्या निरर्थक गोष्टी, जगाच्या उत्पत्तीविषयीच्या गोष्टी, समुद्राविषयीच्या गोष्टी, आणि अस्तित्त्व व अनस्तित्त्वाविषयीच्या गोष्टी। ๕๑. อทฺทสา โข นิคฺโรโธ ปริพฺพาชโก สนฺธานํ คหปตึ ทูรโตว อาคจฺฉนฺตํ. ทิสฺวา สกํ ปริสํ สณฺฐาเปสิ – ‘‘อปฺปสทฺทา โภนฺโต โหนฺตุ, มา โภนฺโต สทฺทมกตฺถ. อยํ สมณสฺส โคตมสฺส สาวโก อาคจฺฉติ สนฺธาโน คหปติ. ยาวตา โข ปน สมณสฺส โคตมสฺส สาวกา คิหี โอทาตวสนา ราชคเห ปฏิวสนฺติ, อยํ เตสํ อญฺญตโร สนฺธาโน คหปติ. อปฺปสทฺทกามา โข ปเนเต อายสฺมนฺโต อปฺปสทฺทวินีตา[Pg.31], อปฺปสทฺทสฺส วณฺณวาทิโน. อปฺเปว นาม อปฺปสทฺทํ ปริสํ วิทิตฺวา อุปสงฺกมิตพฺพํ มญฺเญยฺยา’’ติ. เอวํ วุตฺเต เต ปริพฺพาชกา ตุณฺหี อเหสุํ. ५१. निग्रोध परिव्राजकाने संधान गृहपतीला दुरूनच येताना पाहिले. त्याला पाहून त्याने आपल्या समुदायाला शांत राहण्यास सांगितले— 'महाशयांनो, शांत व्हा, गोंगाट करू नका. श्रमण गोतमांचे श्रावक संधान गृहपती इकडे येत आहेत. राजगृहात राहणाऱ्या श्रमण गोतमांच्या पांढरे वस्त्र परिधान करणाऱ्या गृहस्थ श्रावकांपैकी हे एक प्रमुख श्रावक आहेत. हे आयुष्यमान शांतताप्रिय आहेत, त्यांना शांततेचीच शिकवण मिळाली आहे आणि ते शांततेचीच प्रशंसा करतात. आपला समुदाय शांत आहे हे पाहून कदाचित ते आपल्याकडे येणे योग्य समजतील.' असे म्हटल्यावर ते सर्व परिव्राजक शांत झाले। ๕๒. อถ โข สนฺธาโน คหปติ เยน นิคฺโรโธ ปริพฺพาชโก เตนุปสงฺกมิ, อุปสงฺกมิตฺวา นิคฺโรเธน ปริพฺพาชเกน สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข สนฺธาโน คหปติ นิคฺโรธํ ปริพฺพาชกํ เอตทโวจ – ‘‘อญฺญถา โข อิเม โภนฺโต อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา สงฺคมฺม สมาคมฺม อุนฺนาทิโน อุจฺจาสทฺทมหาสทฺทา อเนกวิหิตํ ติรจฺฉานกถํ อนุยุตฺตา วิหรนฺติ. เสยฺยถิทํ – ราชกถํ…เป… อิติภวาภวกถํ อิติ วา. อญฺญถา โข ปน โส ภควา อรญฺญวนปตฺถานิ ปนฺตานิ เสนาสนานิ ปฏิเสวติ อปฺปสทฺทานิ อปฺปนิคฺโฆสานิ วิชนวาตานิ มนุสฺสราหสฺเสยฺยกานิ ปฏิสลฺลานสารุปฺปานี’’ติ. ५२. त्यानंतर संधान गृहपती निग्रोध परिव्राजकाकडे गेला. जवळ जाऊन त्याने निग्रोध परिव्राजकाचे कुशल विचारले. आनंददायी व संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या संधान गृहपतीने निग्रोध परिव्राजकाला असे म्हटले— 'हे महाशय, इतर पंथांचे हे परिव्राजक एकत्र जमल्यावर अत्यंत गोंगाट व आरडाओरडा करत विविध प्रकारच्या निरर्थक गोष्टींमध्ये मग्न राहतात. जसे की— राजांविषयीच्या गोष्टी...पे... आणि अस्तित्त्व व अनस्तित्त्वाविषयीच्या गोष्टी. याउलट, ते भगवंत मात्र गोंगाटापासून दूर, शांत, मानवी वर्दळीपासून मुक्त, एकांतात ध्यान करण्यास योग्य अशा निर्जन अरण्यातील व घनदाट जंगलातील निवासस्थानांचा आश्रय घेतात.' ๕๓. เอวํ วุตฺเต นิคฺโรโธ ปริพฺพาชโก สนฺธานํ คหปตึ เอตทโวจ – ‘‘ยคฺเฆ คหปติ, ชาเนยฺยาสิ, เกน สมโณ โคตโม สทฺธึ สลฺลปติ, เกน สากจฺฉํ สมาปชฺชติ, เกน ปญฺญาเวยฺยตฺติยํ สมาปชฺชติ? สุญฺญาคารหตา สมณสฺส โคตมสฺส ปญฺญา อปริสาวจโร สมโณ โคตโม นาลํ สลฺลาปาย. โส อนฺตมนฺตาเนว เสวติ. เสยฺยถาปิ นาม โคกาณา ปริยนฺตจารินี อนฺตมนฺตาเนว เสวติ. เอวเมว สุญฺญาคารหตา สมณสฺส โคตมสฺส ปญฺญา; อปริสาวจโร สมโณ โคตโม; นาลํ สลฺลาปาย. โส อนฺตมนฺตาเนว เสวติ. อิงฺฆ, คหปติ, สมโณ โคตโม อิมํ ปริสํ อาคจฺเฉยฺย, เอกปญฺเหเนว นํ สํสาเทยฺยาม, ตุจฺฉกุมฺภีว นํ มญฺเญ โอโรเธยฺยามา’’ติ. ५३. असे बोलले असता, निग्रोध परिव्राजक संधान गृहपतीला म्हणाला, "हे गृहपती, तुला माहित आहे का, श्रमण गौतम कोणाशी बोलतात? कोणाशी चर्चा करतात? कोणाशी संवाद साधून ते आपल्या बुद्धीचे प्रगल्भत्व दाखवतात? श्रमण गौतमांची बुद्धी एकांतात राहिल्यामुळे नष्ट झाली आहे. ते सभेत जाण्यास धजावत नाहीत, ते संभाषण करण्यास असमर्थ आहेत. ते केवळ निर्जन व एकांत ठिकाणांचाच आश्रय घेतात. ज्याप्रमाणे एका डोळ्याने आंधळी असलेली गाय कळपाच्या कडेकडेने फिरते आणि केवळ कडेच्याच भागांचा आश्रय घेते, त्याचप्रमाणे श्रमण गौतमांची बुद्धी एकांतात राहिल्यामुळे नष्ट झाली आहे; श्रमण गौतम सभेत जाण्यास धजावत नाहीत; ते संभाषण करण्यास असमर्थ आहेत. ते केवळ निर्जन व एकांत ठिकाणांचाच आश्रय घेतात. हे गृहपती, जर श्रमण गौतम या सभेत आले, तर आम्ही त्यांना एकाच प्रश्नाने निरुत्तर करू आणि रिकाम्या घागरीप्रमाणे त्यांना सहज पराभूत करू, असे मला वाटते." ๕๔. อสฺโสสิ โข ภควา ทิพฺพาย โสตธาตุยา วิสุทฺธาย อติกฺกนฺตมานุสิกาย สนฺธานสฺส คหปติสฺส นิคฺโรเธน ปริพฺพาชเกน สทฺธึ อิมํ กถาสลฺลาปํ. อถ โข ภควา คิชฺฌกูฏา ปพฺพตา โอโรหิตฺวา เยน สุมาคธาย ตีเร โมรนิวาโป เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา [Pg.32] สุมาคธาย ตีเร โมรนิวาเป อพฺโภกาเส จงฺกมิ. อทฺทสา โข นิคฺโรโธ ปริพฺพาชโก ภควนฺตํ สุมาคธาย ตีเร โมรนิวาเป อพฺโภกาเส จงฺกมนฺตํ. ทิสฺวาน สกํ ปริสํ สณฺฐาเปสิ – ‘‘อปฺปสทฺทา โภนฺโต โหนฺตุ, มา โภนฺโต สทฺทมกตฺถ, อยํ สมโณ โคตโม สุมาคธาย ตีเร โมรนิวาเป อพฺโภกาเส จงฺกมติ. อปฺปสทฺทกาโม โข ปน โส อายสฺมา, อปฺปสทฺทสฺส วณฺณวาที. อปฺเปว นาม อปฺปสทฺทํ ปริสํ วิทิตฺวา อุปสงฺกมิตพฺพํ มญฺเญยฺย. สเจ สมโณ โคตโม อิมํ ปริสํ อาคจฺเฉยฺย, อิมํ ตํ ปญฺหํ ปุจฺเฉยฺยาม – ‘โก นาม โส, ภนฺเต, ภควโต ธมฺโม, เยน ภควา สาวเก วิเนติ, เยน ภควตา สาวกา วินีตา อสฺสาสปฺปตฺตา ปฏิชานนฺติ อชฺฌาสยํ อาทิพฺรหฺมจริย’นฺติ? เอวํ วุตฺเต เต ปริพฺพาชกา ตุณฺหี อเหสุํ. ५४. भगवंतांनी आपल्या दिव्य, विशुद्ध आणि मानवी मर्यादेपलीकडील श्रवणेंद्रियाने संधान गृहपती आणि निग्रोध परिव्राजक यांच्यातील हा संवाद ऐकला. त्यानंतर भगवान गिद्धकूट पर्वतावरून खाली उतरले आणि सुमागधा तलावाच्या काठावरील मोरांना अन्न देण्याच्या जागेपाशी आले. तिथे येऊन ते सुमागधा तलावाच्या काठावरील मोरांना अन्न देण्याच्या जागेवर उघड्या मैदानावर चंक्रमण करू लागले. निग्रोध परिव्राजकाने भगवंतांना सुमागधा तलावाच्या काठावरील मोरांना अन्न देण्याच्या जागेवर उघड्या मैदानावर चंक्रमण करताना पाहिले. त्यांना पाहून त्याने आपल्या अनुयायांना शांत राहण्यास सांगितले, "सज्जनहो, शांत व्हा! गोंगाट करू नका. हे श्रमण गौतम सुमागधा तलावाच्या काठावरील मोरांना अन्न देण्याच्या जागेवर उघड्या मैदानावर चंक्रमण करत आहेत. ते आयुष्यमान गौतम शांततेचे चाहते आहेत आणि शांततेची प्रशंसा करणारे आहेत. जर त्यांना समजले की ही सभा शांत आहे, तर कदाचित ते आपल्याकडे येणे योग्य समजतील. जर श्रमण गौतम या सभेत आले, तर आपण त्यांना हा प्रश्न विचारू या – 'भंते, भगवंतांचा तो कोणता धम्म आहे, ज्याद्वारे भगवान आपल्या श्रावकांना प्रशिक्षित करतात, आणि ज्या धम्माद्वारे भगवंतांनी प्रशिक्षित केलेले श्रावक परम शांती प्राप्त करून, हाच श्रेष्ठ आश्रय असलेला आदि-ब्रह्मचर्य पूर्ण केल्याचे मान्य करतात?'" असे बोलले असता, ते परिव्राजक शांत झाले. ตโปชิคุจฺฉาวาโท तपो-जिगुच्छावाद ๕๕. อถ โข ภควา เยน นิคฺโรโธ ปริพฺพาชโก เตนุปสงฺกมิ. อถ โข นิคฺโรโธ ปริพฺพาชโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘เอตุ โข, ภนฺเต, ภควา, สฺวาคตํ, ภนฺเต, ภควโต. จิรสฺสํ โข, ภนฺเต, ภควา อิมํ ปริยายมกาสิ ยทิทํ อิธาคมนาย. นิสีทตุ, ภนฺเต, ภควา, อิทมาสนํ ปญฺญตฺต’’นฺติ. นิสีทิ ภควา ปญฺญตฺเต อาสเน. นิคฺโรโธปิ โข ปริพฺพาชโก อญฺญตรํ นีจาสนํ คเหตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข นิคฺโรธํ ปริพฺพาชกํ ภควา เอตทโวจ – ‘‘กาย นุตฺถ, นิคฺโรธ, เอตรหิ กถาย สนฺนิสินฺนา, กา จ ปน โว อนฺตรากถา วิปฺปกตา’’ติ? เอวํ วุตฺเต, นิคฺโรโธ ปริพฺพาชโก ภควนฺตํ เอตทโวจ, ‘‘อิธ มยํ, ภนฺเต, อทฺทสาม ภควนฺตํ สุมาคธาย ตีเร โมรนิวาเป อพฺโภกาเส จงฺกมนฺตํ, ทิสฺวาน เอวํ อโวจุมฺหา – ‘สเจ สมโณ โคตโม อิมํ ปริสํ อาคจฺเฉยฺย, อิมํ ตํ ปญฺหํ ปุจฺเฉยฺยาม – โก นาม โส, ภนฺเต, ภควโต ธมฺโม, เยน ภควา สาวเก วิเนติ, เยน ภควตา สาวกา วินีตา อสฺสาสปฺปตฺตา ปฏิชานนฺติ อชฺฌาสยํ อาทิพฺรหฺมจริย’นฺติ? อยํ โข โน, ภนฺเต, อนฺตรากถา วิปฺปกตา; อถ ภควา อนุปฺปตฺโต’’ติ. ५५. त्यानंतर भगवान निग्रोध परिव्राजकाकडे गेले. तेव्हा निग्रोध परिव्राजक भगवंतांना म्हणाला, "यावे, भंते, भगवंतांचे स्वागत असो! भंते, खूप दिवसांनी भगवंतांनी येथे येथे येण्याची कृपा केली आहे. भंते, भगवंतांनी आसनस्थ व्हावे, हे आसन तयार केले आहे." भगवान तयार केलेल्या आसनावर बसले. निग्रोध परिव्राजकही एक लहान आसन घेऊन एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या निग्रोध परिव्राजकाला भगवान म्हणाले, "निग्रोध, तुम्ही आता कोणत्या विषयावर चर्चा करत बसला होता? आणि तुमची कोणती अर्धवट राहिलेली चर्चा मी आल्यामुळे थांबली आहे?" असे विचारले असता, निग्रोध परिव्राजक भगवंतांना म्हणाला, "भंते, आम्ही भगवंतांना सुमागधा तलावाच्या काठावरील मोरांना अन्न देण्याच्या जागेवर उघड्या मैदानावर चंक्रमण करताना पाहिले आणि पाहून असे म्हणालो – 'जर श्रमण गौतम या सभेत आले, तर आपण त्यांना हा प्रश्न विचारू या – भंते, भगवंतांचा तो कोणता धम्म आहे, ज्याद्वारे भगवान आपल्या श्रावकांना प्रशिक्षित करतात, आणि ज्या धम्माद्वारे भगवंतांनी प्रशिक्षित केलेले श्रावक परम शांती प्राप्त करून, हाच श्रेष्ठ आश्रय असलेला आदि-ब्रह्मचर्य पूर्ण केल्याचे मान्य करतात?' भंते, हीच आमची अर्धवट राहिलेली चर्चा होती, आणि तेवढ्यात भगवंतांचे आगमन झाले." ๕๖. ‘‘ทุชฺชานํ โข เอตํ, นิคฺโรธ, ตยา อญฺญทิฏฺฐิเกน อญฺญขนฺติเกน อญฺญรุจิเกน อญฺญตฺราโยเคน อญฺญตฺราจริยเกน, เยนาหํ สาวเก วิเนมิ[Pg.33], เยน มยา สาวกา วินีตา อสฺสาสปฺปตฺตา ปฏิชานนฺติ อชฺฌาสยํ อาทิพฺรหฺมจริยํ. อิงฺฆ ตฺวํ มํ, นิคฺโรธ, สเก อาจริยเก อธิเชคุจฺเฉ ปญฺหํ ปุจฺฉ – ‘กถํ สนฺตา นุ โข, ภนฺเต, ตโปชิคุจฺฉา ปริปุณฺณา โหติ, กถํ อปริปุณฺณา’ติ? เอวํ วุตฺเต เต ปริพฺพาชกา อุนฺนาทิโน อุจฺจาสทฺทมหาสทฺทา อเหสุํ – ‘‘อจฺฉริยํ วต โภ, อพฺภุตํ วต โภ, สมณสฺส โคตมสฺส มหิทฺธิกตา มหานุภาวตา, ยตฺร หิ นาม สกวาทํ ฐเปสฺสติ, ปรวาเทน ปวาเรสฺสตี’’ติ. ५६. "निग्रोध, तू वेगळ्या दृष्टीचा, वेगळ्या आवडीचा, वेगळ्या प्रवृत्तीचा, वेगळ्या अभ्यासाचा आणि वेगळ्या गुरूचा अनुयायी असल्यामुळे, ज्या धम्माद्वारे मी माझ्या श्रावकांना प्रशिक्षित करतो आणि ज्या धम्माद्वारे माझ्याकडून प्रशिक्षित केलेले श्रावक परम शांती प्राप्त करून, हाच श्रेष्ठ आश्रय असलेला आदि-ब्रह्मचर्य पूर्ण केल्याचे मान्य करतात, तो धम्म समजणे तुझ्यासाठी कठीण आहे. पण निग्रोध, तू मला तुझ्या स्वतःच्या गुरूंच्या सिद्धांताविषयी, म्हणजेच 'अधिजेगुच्छा' (तप आणि पाप-घृणा) याविषयी प्रश्न विचार – 'भंते, तपो-जिगुच्छा कशा प्रकारे पूर्ण होते आणि कशा प्रकारे अपूर्ण राहते?'" असे बोलले असता, ते परिव्राजक मोठ्याने ओरडू लागले आणि गोंगाट करू लागले, "आश्चर्य आहे! खरोखरच अद्भुत आहे! श्रमण गौतमांचे सामर्थ्य आणि प्रभाव किती महान आहे, की ते स्वतःचा सिद्धांत बाजूला ठेवून इतरांना त्यांच्या सिद्धांतावर चर्चा करण्याचे आमंत्रण देत आहेत!" ๕๗. อถ โข นิคฺโรโธ ปริพฺพาชโก เต ปริพฺพาชเก อปฺปสทฺเท กตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘มยํ โข, ภนฺเต, ตโปชิคุจฺฉาวาทา ตโปชิคุจฺฉาสารา ตโปชิคุจฺฉาอลฺลีนา วิหราม. กถํ สนฺตา นุ โข, ภนฺเต, ตโปชิคุจฺฉา ปริปุณฺณา โหติ, กถํ อปริปุณฺณา’’ติ? ५७. त्यानंतर निग्रोध परिव्राजकाने त्या परिव्राजकांना शांत केले आणि भगवंतांना म्हणाला, "भंते, आम्ही तपो-जिगुच्छाचे प्रतिपादन करणारे आहोत, तपो-जिगुच्छालाच श्रेष्ठ मानणारे आहोत आणि तपो-जिगुच्छेचेच आचरण करणारे आहोत. भंते, तपो-जिगुच्छा कशा प्रकारे पूर्ण होते आणि कशा प्रकारे अपूर्ण राहते?" ‘‘อิธ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี อเจลโก โหติ มุตฺตาจาโร, หตฺถาปเลขโน, น เอหิภทฺทนฺติโก, น ติฏฺฐภทฺทนฺติโก, นาภิหฏํ, น อุทฺทิสฺสกตํ, น นิมนฺตนํ สาทิยติ, โส น กุมฺภิมุขา ปฏิคฺคณฺหาติ, น กโฬปิมุขา ปฏิคฺคณฺหาติ, น เอฬกมนฺตรํ, น ทณฺฑมนฺตรํ, น มุสลมนฺตรํ, น ทฺวินฺนํ ภุญฺชมานานํ, น คพฺภินิยา, น ปายมานาย, น ปุริสนฺตรคตาย, น สงฺกิตฺตีสุ, น ยตฺถ สา อุปฏฺฐิโต โหติ, น ยตฺถ มกฺขิกา สณฺฑสณฺฑจารินี, น มจฺฉํ, น มํสํ, น สุรํ, น เมรยํ, น ถุโสทกํ ปิวติ, โส เอกาคาริโก วา โหติ เอกาโลปิโก, ทฺวาคาริโก วา โหติ ทฺวาโลปิโก, สตฺตาคาริโก วา โหติ สตฺตาโลปิโก, เอกิสฺสาปิ ทตฺติยา ยาเปติ, ทฺวีหิปิ ทตฺตีหิ ยาเปติ, สตฺตหิปิ ทตฺตีหิ ยาเปติ; เอกาหิกมฺปิ อาหารํ อาหาเรติ, ทฺวีหิกมฺปิ อาหารํ อาหาเรติ, สตฺตาหิกมฺปิ อาหารํ อาหาเรติ, อิติ เอวรูปํ อทฺธมาสิกมฺปิ ปริยายภตฺตโภชนานุโยคมนุยุตฺโต วิหรติ. โส สากภกฺโข วา โหติ, สามากภกฺโข วา โหติ, นีวารภกฺโข วา โหติ, ททฺทุลภกฺโข วา โหติ, หฏภกฺโข วา โหติ, กณภกฺโข วา โหติ, อาจามภกฺโข วา โหติ, ปิญฺญากภกฺโข วา โหติ, ติณภกฺโข วา โหติ, โคมยภกฺโข วา โหติ; วนมูลผลาหาโร ยาเปติ ปวตฺตผลโภชี. โส สาณานิปิ ธาเรติ[Pg.34], มสาณานิปิ ธาเรติ, ฉวทุสฺสานิปิ ธาเรติ, ปํสุกูลานิปิ ธาเรติ, ติรีฏานิปิ ธาเรติ, อชินมฺปิ ธาเรติ, อชินกฺขิปมฺปิ ธาเรติ, กุสจีรมฺปิ ธาเรติ, วากจีรมฺปิ ธาเรติ, ผลกจีรมฺปิ ธาเรติ, เกสกมฺพลมฺปิ ธาเรติ, วาฬกมฺพลมฺปิ ธาเรติ, อุลูกปกฺขมฺปิ ธาเรติ, เกสมสฺสุโลจโกปิ โหติ เกสมสฺสุโลจนานุโยคมนุยุตฺโต, อุพฺภฏฺฐโกปิ โหติ อาสนปฏิกฺขิตฺโต, อุกฺกุฏิโกปิ โหติ อุกฺกุฏิกปฺปธานมนุยุตฺโต, กณฺฏกาปสฺสยิโกปิ โหติ กณฺฏกาปสฺสเย เสยฺยํ กปฺเปติ, ผลกเสยฺยมฺปิ กปฺเปติ, ถณฺฑิลเสยฺยมฺปิ กปฺเปติ, เอกปสฺสยิโกปิ โหติ รโชชลฺลธโร, อพฺโภกาสิโกปิ โหติ ยถาสนฺถติโก, เวกฏิโกปิ โหติ วิกฏโภชนานุโยคมนุยุตฺโต, อปานโกปิ โหติ อปานกตฺตมนุยุตฺโต, สายตติยกมฺปิ อุทโกโรหนานุโยคมนุยุตฺโต วิหรติ. ตํ กึ มญฺญสิ, นิคฺโรธ, ยทิ เอวํ สนฺเต ตโปชิคุจฺฉา ปริปุณฺณา วา โหติ อปริปุณฺณา วา’’ติ? ‘‘อทฺธา โข, ภนฺเต, เอวํ สนฺเต ตโปชิคุจฺฉา ปริปุณฺณา โหติ, โน อปริปุณฺณา’’ติ. ‘‘เอวํ ปริปุณฺณายปิ โข อหํ, นิคฺโรธ, ตโปชิคุจฺฉาย อเนกวิหิเต อุปกฺกิเลเส วทามี’’ติ. “हे निग्रोध, या जगात एखादा तपस्वी अचेलक (नग्न) असतो, मुक्त आचार पाळणारा असतो, हात चाटणारा असतो. तो 'या, महाराज' असे म्हणून दिलेले अन्न स्वीकारत नाही, 'थांबा, महाराज' असे म्हणून दिलेले अन्न स्वीकारत नाही. तो स्वतःकडे आणलेले अन्न स्वीकारत नाही, स्वतःसाठी उद्देशून बनवलेले अन्न स्वीकारत नाही, आमंत्रण स्वीकारत नाही. तो भांड्याच्या तोंडावरून काढून दिलेले अन्न स्वीकारत नाही, टोपलीच्या तोंडावरून काढून दिलेले अन्न स्वीकारत नाही, उंबरठ्याच्या आतून दिलेले अन्न स्वीकारत नाही, काठीच्या पलीकडून दिलेले अन्न स्वीकारत नाही, मुसळाच्या पलीकडून दिलेले अन्न स्वीकारत नाही, दोन व्यक्ती जेवत असताना त्यातील एकाने उठून दिलेले अन्न स्वीकारत नाही, गरोदर स्त्रीने दिलेले अन्न स्वीकारत नाही, बाळाला दूध पाजणाऱ्या स्त्रीने दिलेले अन्न स्वीकारत नाही, पुरुषाच्या संपर्कात असलेल्या स्त्रीने दिलेले अन्न स्वीकारत नाही, सामूहिकरीत्या गोळा केलेले अन्न स्वीकारत नाही, जेथे कुत्रा उभा असेल तेथील अन्न स्वीकारत नाही, जेथे माश्या घोंघावत असतील तेथील अन्न स्वीकारत नाही. तो मासे खात नाही, मांस खात नाही, सुरा पीत नाही, मेरय पीत नाही, कोंड्याचे पाणी पीत नाही. तो एकाच घराची भिक्षा घेणारा आणि एकच घास खाणारा असतो, किंवा दोन घरांची भिक्षा घेणारा आणि दोन घास खाणारा असतो, किंवा सात घरांची भिक्षा घेणारा आणि सात घास खाणारा असतो. तो एकाच पात्रातील अन्नावर जगतो, किंवा दोन पात्रांतील अन्नावर जगतो, किंवा सात पात्रांतील अन्नावर जगतो. तो एक दिवसाआड अन्न ग्रहण करतो, दोन दिवसाआड अन्न ग्रहण करतो, किंवा सात दिवसाआड अन्न ग्रहण करतो. अशा प्रकारे, तो पंधरवड्यातून एकदा अशा क्रमाने अन्न ग्रहण करण्याच्या तपश्चर्येचे पालन करत विहरतो. तो केवळ पालेभाज्या खाणारा असतो, किंवा सावा तांदूळ खाणारा असतो, किंवा रानटी तांदूळ खाणारा असतो, किंवा चामड्याचे तुकडे खाणारा असतो, किंवा शेवाळ खाणारा असतो, किंवा कोंडा खाणारा असतो, किंवा पेज पिणारा असतो, किंवा पेंड खाणारा असतो, किंवा गवत खाणारा असतो, किंवा शेण खाणारा असतो. तो जंगलातील कंदमुळे आणि फळांवर जगतो आणि गळून पडलेली फळे खाणारा असतो. तो तागाची वस्त्रे परिधान करतो, ताग आणि इतर धागे मिश्रित वस्त्रे परिधान करतो, प्रेताची वस्त्रे परिधान करतो, पांढरी पांसुकूल वस्त्रे परिधान करतो, झाडाच्या सालीची वस्त्रे परिधान करतो, काळवीटाचे चामडे परिधान करतो, काळवीटाच्या चामड्याचे तुकडे जोडून बनवलेले वस्त्र परिधान करतो, कुशा गवताचे वस्त्र परिधान करतो, वल्कले परिधान करतो, लाकडाच्या फळ्यांचे वस्त्र परिधान करतो, मानवी केसांचे घोंगडे परिधान करतो, प्राण्यांच्या केसांचे घोंगडे परिधान करतो, घुबडाच्या पंखांचे वस्त्र परिधान करतो. तो डोक्याचे व दाढीचे केस उपटणारा असतो आणि केस उपटण्याच्या तपश्चर्येत मग्न असतो. तो सतत उभा राहणारा आणि आसन नाकारणारा असतो. तो उकिडवे बसणारा असतो आणि उकिडवे बसण्याच्या तपश्चर्येत मग्न असतो. तो काट्यांच्या अंथरुणावर झोपतो आणि काट्यांच्या अंथरुणाचाच आश्रय घेतो. तो लाकडाच्या फळीवर झोपतो, उघड्या जमिनीवर झोपतो, एकाच कुशीवर झोपतो, अंगावर धूळ व मळ धारण करतो. तो उघड्या आकाशाखाली राहणारा आणि जसे मिळेल तशा अंथरुणावर समाधान मानणारा असतो. तो मलमूत्र खाणारा असतो आणि मलमूत्र खाण्याच्या तपश्चर्येत मग्न असतो. तो पाणी न पिणारा असतो आणि पाणी न पिण्याच्या तपश्चर्येत मग्न असतो. तो संध्याकाळपर्यंत दिवसातून तीन वेळा पाण्यात स्नान करण्याच्या तपश्चर्येत मग्न राहून विहरतो. यावर तुला काय वाटते, निग्रोध? असे असताना तप-जुगुप्सा (तपश्चर्या) परिपूर्ण असते की अपूर्ण?” “भंते, निश्चितच असे असताना तप-जुगुप्सा परिपूर्ण असते, अपूर्ण नाही.” “निग्रोध, अशा परिपूर्ण तप-जुगुप्सेमध्येही मी अनेक प्रकारचे उपक्लेश (दोष) सांगतो.” อุปกฺกิเลโส उपक्लेश (दोष) ๕๘. ‘‘ยถา กถํ ปน, ภนฺเต, ภควา เอวํ ปริปุณฺณาย ตโปชิคุจฺฉาย อเนกวิหิเต อุปกฺกิเลเส วทตี’’ติ? ‘‘อิธ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตปํ สมาทิยติ, โส เตน ตปสา อตฺตมโน โหติ ปริปุณฺณสงฺกปฺโป. ยมฺปิ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตปํ สมาทิยติ, โส เตน ตปสา อตฺตมโน โหติ ปริปุณฺณสงฺกปฺโป. อยมฺปิ โข, นิคฺโรธ, ตปสฺสิโน อุปกฺกิเลโส โหติ. ५८. “पण भंते, भगवान अशा परिपूर्ण तप-जुगुप्सेमध्ये अनेक प्रकारचे उपक्लेश कशा प्रकारे सांगतात?” “निग्रोध, या जगात एखादा तपस्वी तपश्चर्या अंगीकारतो. तो त्या तपश्चर्येमुळे संतुष्ट होतो आणि त्याचे संकल्प पूर्ण झाल्याचे मानतो. निग्रोध, तपस्वी जी तपश्चर्या अंगीकारतो, आणि तिच्यामुळे संतुष्ट होऊन त्याचे संकल्प पूर्ण झाल्याचे मानतो, हा देखील, निग्रोध, तपस्वीचा एक उपक्लेश (दोष) आहे।” ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตปํ สมาทิยติ, โส เตน ตปสา อตฺตานุกฺกํเสติ ปรํ วมฺเภติ. ยมฺปิ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตปํ สมาทิยติ, โส เตน ตปสา อตฺตานุกฺกํเสติ ปรํ วมฺเภติ. อยมฺปิ โข, นิคฺโรธ, ตปสฺสิโน อุปกฺกิเลโส โหติ. “पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी तपश्चर्या अंगीकारतो. तो त्या तपश्चर्येमुळे स्वतःची प्रशंसा करतो आणि इतरांना तुच्छ लेखतो. निग्रोध, तपस्वी जी तपश्चर्या अंगीकारतो, आणि तिच्यामुळे स्वतःची प्रशंसा करतो व इतरांना तुच्छ लेखतो, हा देखील, निग्रोध, तपस्वीचा एक उपक्लेश आहे।” ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตปํ สมาทิยติ, โส เตน ตปสา มชฺชติ มุจฺฉติ ปมาทมาปชฺชติ. ยมฺปิ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตปํ สมาทิยติ, โส [Pg.35] เตน ตปสา มชฺชติ มุจฺฉติ ปมาทมาปชฺชติ. อยมฺปิ โข, นิคฺโรธ, ตปสฺสิโน อุปกฺกิเลโส โหติ. “पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी तपश्चर्या अंगीकारतो. तो त्या तपश्चर्येमुळे गर्वाने उन्मत्त होतो, आसक्त होतो आणि प्रमादाला (बेसावधपणाला) प्राप्त होतो. निग्रोध, तपस्वी जी तपश्चर्या अंगीकारतो, आणि तिच्यामुळे गर्वाने उन्मत्त होतो, आसक्त होतो व प्रमादाला प्राप्त होतो, हा देखील, निग्रोध, तपस्वीचा एक उपक्लेश आहे।” ๕๙. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตปํ สมาทิยติ, โส เตน ตปสา ลาภสกฺการสิโลกํ อภินิพฺพตฺเตติ, โส เตน ลาภสกฺการสิโลเกน อตฺตมโน โหติ ปริปุณฺณสงฺกปฺโป. ยมฺปิ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตปํ สมาทิยติ, โส เตน ตปสา ลาภสกฺการสิโลกํ อภินิพฺพตฺเตติ, โส เตน ลาภสกฺการสิโลเกน อตฺตมโน โหติ ปริปุณฺณสงฺกปฺโป. อยมฺปิ โข, นิคฺโรธ, ตปสฺสิโน อุปกฺกิเลโส โหติ. ५९. “पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी तपश्चर्या अंगीकारतो. तो त्या तपश्चर्येमुळे लाभ, सत्कार आणि कीर्ती मिळवतो. तो त्या लाभ, सत्कार आणि कीर्तीमुळे संतुष्ट होतो आणि त्याचे संकल्प पूर्ण झाल्याचे मानतो. निग्रोध, तपस्वी जी तपश्चर्या अंगीकारतो, आणि तिच्यामुळे लाभ, सत्कार व कीर्ती मिळवतो, आणि त्या लाभ, सत्कार व कीर्तीमुळे संतुष्ट होऊन त्याचे संकल्प पूर्ण झाल्याचे मानतो, हा देखील, निग्रोध, तपस्वीचा एक उपक्लेश आहे।” ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตปํ สมาทิยติ, โส เตน ตปสา ลาภสกฺการสิโลกํ อภินิพฺพตฺเตติ, โส เตน ลาภสกฺการสิโลเกน อตฺตานุกฺกํเสติ ปรํ วมฺเภติ. ยมฺปิ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตปํ สมาทิยติ, โส เตน ตปสา ลาภสกฺการสิโลกํ อภินิพฺพตฺเตติ, โส เตน ลาภสกฺการสิโลเกน อตฺตานุกฺกํเสติ ปรํ วมฺเภติ. อยมฺปิ โข, นิคฺโรธ, ตปสฺสิโน อุปกฺกิเลโส โหติ. “पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी तपश्चर्या अंगीकारतो. तो त्या तपश्चर्येमुळे लाभ, सत्कार आणि कीर्ती मिळवतो. तो त्या लाभ, सत्कार आणि कीर्तीमुळे स्वतःची प्रशंसा करतो आणि इतरांना तुच्छ लेखतो. निग्रोध, तपस्वी जी तपश्चर्या अंगीकारतो, आणि तिच्यामुळे लाभ, सत्कार व कीर्ती मिळवतो, आणि त्या लाभ, सत्कार व कीर्तीमुळे स्वतःची प्रशंसा करतो व इतरांना तुच्छ लेखतो, हा देखील, निग्रोध, तपस्वीचा एक उपक्लेश आहे।” ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตปํ สมาทิยติ, โส เตน ตปสา ลาภสกฺการสิโลกํ อภินิพฺพตฺเตติ, โส เตน ลาภสกฺการสิโลเกน มชฺชติ มุจฺฉติ ปมาทมาปชฺชติ. ยมฺปิ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตปํ สมาทิยติ, โส เตน ตปสา ลาภสกฺการสิโลกํ อภินิพฺพตฺเตติ, โส เตน ลาภสกฺการสิโลเกน มชฺชติ มุจฺฉติ ปมาทมาปชฺชติ. อยมฺปิ โข, นิคฺโรธ, ตปสฺสิโน อุปกฺกิเลโส โหติ. “पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी तपश्चर्या अंगीकारतो. तो त्या तपश्चर्येमुळे लाभ, सत्कार आणि कीर्ती मिळवतो. तो त्या लाभ, सत्कार आणि कीर्तीमुळे गर्वाने उन्मत्त होतो, आसक्त होतो आणि प्रमादाला प्राप्त होतो. निग्रोध, तपस्वी जी तपश्चर्या अंगीकारतो, आणि तिच्यामुळे लाभ, सत्कार व कीर्ती मिळवतो, आणि त्या लाभ, सत्कार व कीर्तीमुळे गर्वाने उन्मत्त होतो, आसक्त होतो व प्रमादाला प्राप्त होतो, हा देखील, निग्रोध, तपस्वीचा एक उपक्लेश आहे।” ๖๐. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี โภชเนสุ โวทาสํ อาปชฺชติ – ‘อิทํ เม ขมติ, อิทํ เม นกฺขมตี’ติ. โส ยญฺจ ขฺวสฺส นกฺขมติ, ตํ สาเปกฺโข ปชหติ. ยํ ปนสฺส ขมติ, ตํ คธิโต มุจฺฉิโต อชฺฌาปนฺโน อนาทีนวทสฺสาวี อนิสฺสรณปญฺโญ ปริภุญฺชติ…เป… อยมฺปิ โข, นิคฺโรธ, ตปสฺสิโน อุปกฺกิเลโส โหติ. ६०. “पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी अन्नामध्ये भेदभाव करतो—'हे मला आवडते, हे मला आवडत नाही.' जे त्याला आवडत नाही, ते तो आसक्ती ठेवूनच त्याग करतो. पण जे त्याला आवडते, ते तो लोभी होऊन, आसक्त होऊन, मोहित होऊन, त्यातील दोष न पाहता आणि त्यातून मुक्त होण्याच्या प्रज्ञेशिवाय ग्रहण करतो... इत्यादी... हा देखील, निग्रोध, तपस्वीचा एक उपक्लेश आहे।” ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตปํ สมาทิยติ ลาภสกฺการสิโลกนิกนฺติเหตุ – ‘สกฺกริสฺสนฺติ มํ ราชาโน ราชมหามตฺตา ขตฺติยา พฺราหฺมณา [Pg.36] คหปติกา ติตฺถิยา’ติ…เป… อยมฺปิ โข, นิคฺโรธ, ตปสฺสิโน อุปกฺกิเลโส โหติ. पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी लाभ, सत्कार आणि कीर्तीच्या तृष्णेमुळे—'राजे, राजमहामात्र, क्षत्रिय, ब्राह्मण, गृहपती आणि अन्य पंथांचे आचार्य माझा सत्कार करतील' असा विचार करून तपश्चर्या अंगीकारतो... निग्रोध, हा सुद्धा तपस्व्याचा एक उपक्किलेस (दोष) आहे. ๖๑. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี อญฺญตรํ สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา อปสาเทตา โหติ – ‘กึ ปนายํ สมฺพหุลาชีโว สพฺพํ สํภกฺเขติ. เสยฺยถิทํ – มูลพีชํ ขนฺธพีชํ ผฬุพีชํ อคฺคพีชํ พีชพีชเมว ปญฺจมํ, อสนิวิจกฺกํ ทนฺตกูฏํ, สมณปฺปวาเทนา’ติ…เป… อยมฺปิ โข, นิคฺโรธ, ตปสฺสิโน อุปกฺกิเลโส โหติ. ६१. पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी इतर कोणत्याही श्रमणाला किंवा ब्राह्मणाला तुच्छ लेखतो—'हा तर भरपूर उपजीविका करणारा आहे, सर्व काही खाऊन फस्त करतो! जसे की—मूळ-बीज, स्कंध-बीज, फळू-बीज, अग्र-बीज आणि पाचवे बीज-बीज; हा आपल्या वज्रसमान जबड्याने सर्व काही चावून खातो आणि तरीही लोक याला श्रमण म्हणतात!'... निग्रोध, हा सुद्धा तपस्व्याचा एक उपक्किलेस (दोष) आहे. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ปสฺสติ อญฺญตรํ สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา กุเลสุ สกฺกริยมานํ ครุกริยมานํ มานิยมานํ ปูชิยมานํ. ทิสฺวา ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อิมญฺหิ นาม สมฺพหุลาชีวํ กุเลสุ สกฺกโรนฺติ ครุํ กโรนฺติ มาเนนฺติ ปูเชนฺติ. มํ ปน ตปสฺสึ ลูขาชีวึ กุเลสุ น สกฺกโรนฺติ น ครุํ กโรนฺติ น มาเนนฺติ น ปูเชนฺตี’ติ, อิติ โส อิสฺสามจฺฉริยํ กุเลสุ อุปฺปาเทตา โหติ…เป… อยมฺปิ โข, นิคฺโรธ, ตปสฺสิโน อุปกฺกิเลโส โหติ. पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी दुसऱ्या एखाद्या श्रमणाला किंवा ब्राह्मणाला कुलांमध्ये सत्कार, आदर, मान आणि पूजा मिळताना पाहतो. हे पाहून त्याच्या मनात असा विचार येतो—'हा भरपूर उपजीविका करणाऱ्याचा कुलांमध्ये सत्कार करतात, आदर करतात, मान देतात आणि पूजा करतात. पण माझ्यासारख्या खडतर जीवन जगणाऱ्या तपस्व्याचा मात्र कुलांमध्ये सत्कार करत नाहीत, आदर करत नाहीत, मान देत नाहीत आणि पूजा करत नाहीत.' अशा प्रकारे तो कुलांच्या बाबतीत ईर्ष्या आणि मत्सर निर्माण करतो... निग्रोध, हा सुद्धा तपस्व्याचा एक उपक्किलेस (दोष) आहे. ๖๒. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี อาปาถกนิสาที โหติ…เป… อยมฺปิ โข, นิคฺโรธ, ตปสฺสิโน อุปกฺกิเลโส โหติ. ६२. पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी लोकांच्या नजरेस पडेल अशा उघड्या जागी बसणारा असतो... निग्रोध, हा सुद्धा तपस्व्याचा एक उपक्किलेस (दोष) आहे. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี อตฺตานํ อทสฺสยมาโน กุเลสุ จรติ – ‘อิทมฺปิ เม ตปสฺมึ อิทมฺปิ เม ตปสฺมิ’นฺติ…เป… อยมฺปิ โข, นิคฺโรธ, ตปสฺสิโน อุปกฺกิเลโส โหติ. पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी कुलांमध्ये स्वतःचे प्रदर्शन करत फिरतो—'हे देखील माझ्या तपश्चर्येचे अंग आहे, ते देखील माझ्या तपश्चर्येचे अंग आहे'... निग्रोध, हा सुद्धा तपस्व्याचा एक उपक्किलेस (दोष) आहे. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี กิญฺจิเทว ปฏิจฺฉนฺนํ เสวติ. โส ‘ขมติ เต อิท’นฺติ ปุฏฺโฐ สมาโน อกฺขมมานํ อาห – ‘ขมตี’ติ. ขมมานํ อาห – ‘นกฺขมตี’ติ. อิติ โส สมฺปชานมุสา ภาสิตา โหติ…เป… อยมฺปิ โข, นิคฺโรธ, ตปสฺสิโน อุปกฺกิเลโส โหติ. पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी गुप्तपणे काहीतरी आचरण करतो. त्याला जेव्हा विचारले जाते—'तुला हे मान्य आहे का?' तेव्हा अमान्य असतानाही तो म्हणतो—'मान्य आहे', आणि मान्य असतानाही म्हणतो—'मान्य नाही'. अशा प्रकारे तो जाणूनबुजून असत्य बोलतो... निग्रोध, हा सुद्धा तपस्व्याचा एक उपक्किलेस (दोष) आहे. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตถาคตสฺส วา ตถาคตสาวกสฺส วา ธมฺมํ เทเสนฺตสฺส สนฺตํเยว ปริยายํ อนุญฺเญยฺยํ นานุชานาติ…เป… อยมฺปิ โข, นิคฺโรธ, ตปสฺสิโน อุปกฺกิเลโส โหติ. पुन्हा आणखी, निग्रोध, जेव्हा तथागत किंवा तथागतांचे श्रावक धम्म उपदेश करत असतात, तेव्हा एखादा तपस्वी त्यांच्या सत्य आणि संमती देण्यायोग्य विधानाला संमती देत नाही... निग्रोध, हा सुद्धा तपस्व्याचा एक उपक्किलेस (दोष) आहे. ๖๓. ‘‘ปุน [Pg.37] จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี โกธโน โหติ อุปนาหี. ยมฺปิ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี โกธโน โหติ อุปนาหี. อยมฺปิ โข, นิคฺโรธ, ตปสฺสิโน อุปกฺกิเลโส โหติ. ६३. पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी क्रोधी आणि वैर बाळगणारा असतो. निग्रोध, तपस्वी जो क्रोधी आणि वैर बाळगणारा असतो, हा सुद्धा तपस्व्याचा एक उपक्किलेस (दोष) आहे. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี มกฺขี โหติ ปฬาสี …เป… อิสฺสุกี โหติ มจฺฉรี… สโฐ โหติ มายาวี… ถทฺโธ โหติ อติมานี… ปาปิจฺโฉ โหติ ปาปิกานํ อิจฺฉานํ วสํ คโต… มิจฺฉาทิฏฺฐิโก โหติ อนฺตคฺคาหิกาย ทิฏฺฐิยา สมนฺนาคโต… สนฺทิฏฺฐิปรามาสี โหติ อาธานคฺคาหี ทุปฺปฏินิสฺสคฺคี. ยมฺปิ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี สนฺทิฏฺฐิปรามาสี โหติ อาธานคฺคาหี ทุปฺปฏินิสฺสคฺคี. อยมฺปิ โข, นิคฺโรธ, ตปสฺสิโน อุปกฺกิเลโส โหติ. पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी गुण-नाशक, मत्सरी... ईर्ष्याळू, कंजूष... ढोंगी, कपटी... हट्टी, अत्यंत अभिमानी... पापी इच्छा बाळगणारा आणि पापी इच्छांच्या आहारी गेलेला... मिथ्यादृष्टी असलेला, टोकाच्या दृष्टीने युक्त असलेला... स्वतःच्याच मताला घट्ट धरून ठेवणारा, दुराग्रही आणि स्वतःचे मत सहज न सोडणारा असतो. निग्रोध, तपस्वी जो स्वतःच्याच मताला घट्ट धरून ठेवणारा, दुराग्रही आणि स्वतःचे मत सहज न सोडणारा असतो, हा सुद्धा तपस्व्याचा एक उपक्किलेस (दोष) आहे. ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, นิคฺโรธ, ยทิเม ตโปชิคุจฺฉา อุปกฺกิเลสา วา อนุปกฺกิเลสา วา’’ติ? ‘‘อทฺธา โข อิเม, ภนฺเต, ตโปชิคุจฺฉา อุปกฺกิเลสา, โน อนุปกฺกิเลสา. ฐานํ โข ปเนตํ, ภนฺเต, วิชฺชติ ยํ อิเธกจฺโจ ตปสฺสี สพฺเพเหว อิเมหิ อุปกฺกิเลเสหิ สมนฺนาคโต อสฺส; โก ปน วาโท อญฺญตรญฺญตเรนา’’ติ. “निग्रोध, तुला काय वाटते? हे जे तपो-जुगुप्सा आहेत, ते उपक्किलेस आहेत की अनुपक्किलेस?” “भन्ते, हे तपो-जुगुप्सा निश्चितच उपक्किलेस आहेत, अनुपक्किलेस नाहीत. भन्ते, अशी स्थिती असू शकते की, या जगात एखादा तपस्वी या सर्व उपक्किलेसांनी युक्त असेल; मग त्यातील एका किंवा दुसऱ्या दोषाने युक्त असण्याबद्दल काय सांगावे!” ปริสุทฺธปปฏิกปฺปตฺตกถา परिसुद्ध-पपटिक-पत्त-कथा (बाह्य आवरणासारख्या शुद्धतेचे निरूपण) ๖๔. ‘‘อิธ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตปํ สมาทิยติ, โส เตน ตปสา น อตฺตมโน โหติ น ปริปุณฺณสงฺกปฺโป. ยมฺปิ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตปํ สมาทิยติ, โส เตน ตปสา น อตฺตมโน โหติ น ปริปุณฺณสงฺกปฺโป. เอวํ โส ตสฺมึ ฐาเน ปริสุทฺโธ โหติ. ६४. “इथे, निग्रोध, एखादा तपस्वी तप आचरतो, पण तो त्या तपाने संतुष्ट होत नाही आणि आपला संकल्प पूर्ण झाला असे मानत नाही. निग्रोध, तपस्वी जो तप आचरतो, आणि त्या तपाने संतुष्ट होत नाही व आपला संकल्प पूर्ण झाला असे मानत नाही, या कारणाने तो त्या बाबतीत शुद्ध असतो. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตปํ สมาทิยติ, โส เตน ตปสา น อตฺตานุกฺกํเสติ น ปรํ วมฺเภติ…เป… เอวํ โส ตสฺมึ ฐาเน ปริสุทฺโธ โหติ. पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी तप आचरतो, पण तो त्या तपाने स्वतःची प्रशंसा करत नाही आणि दुसऱ्याला तुच्छ लेखत नाही... अशा प्रकारे तो त्या बाबतीत शुद्ध असतो. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตปํ สมาทิยติ, โส เตน ตปสา น มชฺชติ น มุจฺฉติ น ปมาทมาปชฺชติ…เป… เอวํ โส ตสฺมึ ฐาเน ปริสุทฺโธ โหติ. पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी तप आचरतो, पण तो त्या तपाने उन्मत्त होत नाही, मोहित होत नाही आणि प्रमादाला प्राप्त होत नाही... अशा प्रकारे तो त्या बाबतीत शुद्ध असतो. ๖๕. ‘‘ปุน [Pg.38] จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตปํ สมาทิยติ, โส เตน ตปสา ลาภสกฺการสิโลกํ อภินิพฺพตฺเตติ, โส เตน ลาภสกฺการสิโลเกน น อตฺตมโน โหติ น ปริปุณฺณสงฺกปฺโป…เป… เอวํ โส ตสฺมึ ฐาเน ปริสุทฺโธ โหติ. ६५. पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी तप आचरतो, आणि त्या तपाने त्याला लाभ, सत्कार व कीर्ती प्राप्त होते. पण तो त्या लाभ, सत्कार आणि कीर्तीने संतुष्ट होत नाही आणि आपला संकल्प पूर्ण झाला असे मानत नाही... अशा प्रकारे तो त्या बाबतीत शुद्ध असतो. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตปํ สมาทิยติ, โส เตน ตปสา ลาภสกฺการสิโลกํ อภินิพฺพตฺเตติ, โส เตน ลาภสกฺการสิโลเกน น อตฺตานุกฺกํเสติ น ปรํ วมฺเภติ…เป… เอวํ โส ตสฺมึ ฐาเน ปริสุทฺโธ โหติ. पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी तप आचरतो, आणि त्या तपाने त्याला लाभ, सत्कार व कीर्ती प्राप्त होते. पण तो त्या लाभ, सत्कार आणि कीर्तीने स्वतःची प्रशंसा करत नाही आणि दुसऱ्याला तुच्छ लेखत नाही... अशा प्रकारे तो त्या बाबतीत शुद्ध असतो. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตปํ สมาทิยติ, โส เตน ตปสา ลาภสกฺการสิโลกํ อภินิพฺพตฺเตติ, โส เตน ลาภสกฺการสิโลเกน น มชฺชติ น มุจฺฉติ น ปมาทมาปชฺชติ…เป… เอวํ โส ตสฺมึ ฐาเน ปริสุทฺโธ โหติ. पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी तप आचरतो, आणि त्या तपाने त्याला लाभ, सत्कार व कीर्ती प्राप्त होते. पण तो त्या लाभ, सत्कार आणि कीर्तीने उन्मत्त होत नाही, मोहित होत नाही आणि प्रमादाला प्राप्त होत नाही... अशा प्रकारे तो त्या बाबतीत शुद्ध असतो. ๖๖. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี โภชเนสุ น โวทาสํ อาปชฺชติ – ‘อิทํ เม ขมติ, อิทํ เม นกฺขมตี’ติ. โส ยญฺจ ขฺวสฺส นกฺขมติ, ตํ อนเปกฺโข ปชหติ. ยํ ปนสฺส ขมติ, ตํ อคธิโต อมุจฺฉิโต อนชฺฌาปนฺโน อาทีนวทสฺสาวี นิสฺสรณปญฺโญ ปริภุญฺชติ…เป… เอวํ โส ตสฺมึ ฐาเน ปริสุทฺโธ โหติ. ६६. पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी भोजनाच्या बाबतीत दुजाभाव करत नाही—'हे मला आवडते, हे मला आवडत नाही'. जे त्याला आवडत नाही, ते तो कोणत्याही आसक्तीशिवाय सोडून देतो. आणि जे त्याला आवडते, ते तो लोभ न बाळगता, मोहित न होता, आसक्त न होता, त्यातील दोष पाहणारा आणि सुटकेचे ज्ञान बाळगणारा होऊन ग्रहण करतो... अशा प्रकारे तो त्या बाबतीत शुद्ध असतो. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี น ตปํ สมาทิยติ ลาภสกฺการสิโลกนิกนฺติเหตุ – ‘สกฺกริสฺสนฺติ มํ ราชาโน ราชมหามตฺตา ขตฺติยา พฺราหฺมณา คหปติกา ติตฺถิยา’ติ…เป… เอวํ โส ตสฺมึ ฐาเน ปริสุทฺโธ โหติ. पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी लाभ, सत्कार आणि कीर्तीच्या आशेने—'राजे, राजमहामात्र, क्षत्रिय, ब्राह्मण, गृहपती आणि अन्य पंथांचे आचार्य माझा सत्कार करतील' असा विचार करून तप आचरत नाही... अशा प्रकारे तो त्या बाबतीत शुद्ध असतो. ๖๗. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี อญฺญตรํ สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา นาปสาเทตา โหติ – ‘กึ ปนายํ สมฺพหุลาชีโว สพฺพํ สํภกฺเขติ. เสยฺยถิทํ – มูลพีชํ ขนฺธพีชํ ผฬุพีชํ อคฺคพีชํ พีชพีชเมว ปญฺจมํ, อสนิวิจกฺกํ ทนฺตกูฏํ, สมณปฺปวาเทนา’ติ…เป… เอวํ โส ตสฺมึ ฐาเน ปริสุทฺโธ โหติ. ६७. पुन्हा आणखी, निग्रोध, एखादा तपस्वी इतर कोणत्याही श्रमणाला किंवा ब्राह्मणाला तुच्छ लेखत नाही (त्याची निंदा करत नाही)—'हा तर भरपूर उपजीविका करणारा आहे, सर्व काही खाऊन फस्त करतो! जसे की—मूळ-बीज, स्कंध-बीज, फळू-बीज, अग्र-बीज आणि पाचवे बीज-बीज; हा आपल्या वज्रसमान जबड्याने सर्व काही चावून खातो आणि तरीही लोक याला श्रमण म्हणतात!'... अशा प्रकारे तो त्या बाबतीत शुद्ध असतो. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ปสฺสติ อญฺญตรํ สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา กุเลสุ สกฺกริยมานํ ครุ กริยมานํ มานิยมานํ ปูชิยมานํ. ทิสฺวา ตสฺส น เอวํ [Pg.39] โหติ – ‘อิมญฺหิ นาม สมฺพหุลาชีวํ กุเลสุ สกฺกโรนฺติ ครุํ กโรนฺติ มาเนนฺติ ปูเชนฺติ. มํ ปน ตปสฺสึ ลูขาชีวึ กุเลสุ น สกฺกโรนฺติ น ครุํ กโรนฺติ น มาเนนฺติ น ปูเชนฺตี’ติ, อิติ โส อิสฺสามจฺฉริยํ กุเลสุ นุปฺปาเทตา โหติ…เป… เอวํ โส ตสฺมึ ฐาเน ปริสุทฺโธ โหติ. पुन्हा आणखी असे की, निग्रोध! तपस्वी पुरुष एखाद्या श्रमणाला किंवा ब्राह्मणाला गृहस्थांच्या कुळांमध्ये आदर-सत्कार केला जात असताना, सन्मानित केला जात असताना, मान दिला जात असताना आणि पूजले जात असताना पाहतो. हे पाहून त्याच्या मनात असा विचार येत नाही— 'विविध मार्गांनी उपजीविका करणाऱ्या या व्यक्तीचा गृहस्थ आदर करतात, सन्मान करतात, मान देतात आणि पूजा करतात; परंतु मजसारख्या खडतर जीवन जगणाऱ्या तपस्व्याचा गृहस्थ आदर करत नाहीत, सन्मान करत नाहीत, मान देत नाहीत आणि पूजा करत नाहीत.' अशा प्रकारे तो गृहस्थांच्या कुळांमध्ये ईर्ष्या आणि मत्सर उत्पन्न करत नाही... अशा प्रकारे तो त्या बाबतीत परिशुद्ध असतो. ๖๘. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี น อาปาถกนิสาที โหติ…เป… เอวํ โส ตสฺมึ ฐาเน ปริสุทฺโธ โหติ. ६८. पुन्हा आणखी असे की, निग्रोध! तपस्वी केवळ लोकांना दाखवण्यासाठी उघड ठिकाणी बसणारा (दिखावा करणारा) नसतो... अशा प्रकारे तो त्या बाबतीत परिशुद्ध असतो. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี น อตฺตานํ อทสฺสยมาโน กุเลสุ จรติ – ‘อิทมฺปิ เม ตปสฺมึ, อิทมฺปิ เม ตปสฺมิ’นฺติ…เป… เอวํ โส ตสฺมึ ฐาเน ปริสุทฺโธ โหติ. पुन्हा आणखी असे की, निग्रोध! तपस्वी गृहस्थांच्या कुळांमध्ये स्वतःचे प्रदर्शन करत फिरत नाही की— 'हे देखील माझे तप आहे, ते देखील माझे तप आहे'... अशा प्रकारे तो त्या बाबतीत परिशुद्ध असतो. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี น กญฺจิเทว ปฏิจฺฉนฺนํ เสวติ, โส – ‘ขมติ เต อิท’นฺติ ปุฏฺโฐ สมาโน อกฺขมมานํ อาห – ‘นกฺขมตี’ติ. ขมมานํ อาห – ‘ขมตี’ติ. อิติ โส สมฺปชานมุสา น ภาสิตา โหติ…เป… เอวํ โส ตสฺมึ ฐาเน ปริสุทฺโธ โหติ. पुन्हा आणखी असे की, निग्रोध! तपस्वी कोणतेही गुप्त किंवा लपून-छपून पापकृत्य करत नाही. जेव्हा त्याला विचारले जाते की, 'तुला हे मान्य आहे का?' तेव्हा अमान्य असल्यास तो 'मान्य नाही' असे सांगतो आणि मान्य असल्यास 'मान्य आहे' असे सांगतो. अशा प्रकारे तो जाणूनबुजून असत्य बोलणारा नसतो... अशा प्रकारे तो त्या बाबतीत परिशुद्ध असतो. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี ตถาคตสฺส วา ตถาคตสาวกสฺส วา ธมฺมํ เทเสนฺตสฺส สนฺตํเยว ปริยายํ อนุญฺเญยฺยํ อนุชานาติ…เป… เอวํ โส ตสฺมึ ฐาเน ปริสุทฺโธ โหติ. पुन्हा आणखी असे की, निग्रोध! जेव्हा तथागत किंवा तथागतांचे श्रावक धम्म उपदेश करत असतात, तेव्हा तपस्वी जे सत्य आणि संमती देण्यायोग्य आहे, त्याला संमती देतो... अशा प्रकारे तो त्या बाबतीत परिशुद्ध असतो. ๖๙. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี อกฺโกธโน โหติ อนุปนาหี. ยมฺปิ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี อกฺโกธโน โหติ อนุปนาหี เอวํ โส ตสฺมึ ฐาเน ปริสุทฺโธ โหติ. ६९. पुन्हा आणखी असे की, निग्रोध! तपस्वी अक्रोधी असतो आणि वैर न बाळगणारा असतो. निग्रोध, तपस्वी जो अक्रोधी असतो आणि वैर न बाळगणारा असतो, अशा प्रकारे तो त्या बाबतीत परिशुद्ध असतो. ‘‘ปุน จปรํ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี อมกฺขี โหติ อปฬาสี…เป… อนิสฺสุกี โหติ อมจฺฉรี… อสโฐ โหติ อมายาวี… อตฺถทฺโธ โหติ อนติมานี… น ปาปิจฺโฉ โหติ น ปาปิกานํ อิจฺฉานํ วสํ คโต… น มิจฺฉาทิฏฺฐิโก โหติ น อนฺตคฺคาหิกาย ทิฏฺฐิยา สมนฺนาคโต… น สนฺทิฏฺฐิปรามาสี โหติ น อาธานคฺคาหี สุปฺปฏินิสฺสคฺคี. ยมฺปิ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี น สนฺทิฏฺฐิปรามาสี โหติ น อาธานคฺคาหี สุปฺปฏินิสฺสคฺคี. เอวํ โส ตสฺมึ ฐาเน ปริสุทฺโธ โหติ. पुन्हा आणखी असे की, निग्रोध! तपस्वी गुण न खोडणारा (अमक्खी) असतो, स्पर्धा न करणारा (अपळासी) असतो... ईर्ष्या न करणारा असतो, मत्सर न करणारा असतो... ढोंगी नसतो, कपटी नसतो... उद्धट नसतो, अति-अभिमानी नसतो... पापी इच्छा बाळगणारा नसतो आणि पापी इच्छांच्या आहारी गेलेला नसतो... मिथ्यादृष्टी नसतो आणि अंतग्राहिका दृष्टीने (अतिरेकी मतांनी) युक्त नसतो... स्वतःच्या मतालाच घट्ट धरून ठेवणारा नसतो, चुकीच्या मताचा हट्ट धरणारा नसतो आणि सहजपणे चुकीचे मत सोडून देणारा असतो. निग्रोध, तपस्वी जो स्वतःच्या मतालाच घट्ट धरून ठेवणारा नसतो, चुकीच्या मताचा हट्ट धरणारा नसतो आणि सहजपणे चुकीचे मत सोडून देणारा असतो, अशा प्रकारे तो त्या बाबतीत परिशुद्ध असतो. ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, นิคฺโรธ, ยทิ เอวํ สนฺเต ตโปชิคุจฺฉา ปริสุทฺธา วา โหติ อปริสุทฺธา วา’’ติ? ‘‘อทฺธา โข, ภนฺเต, เอวํ สนฺเต ตโปชิคุจฺฉา ปริสุทฺธา [Pg.40] โหติ โน อปริสุทฺธา, อคฺคปฺปตฺตา จ สารปฺปตฺตา จา’’ติ. ‘‘น โข, นิคฺโรธ, เอตฺตาวตา ตโปชิคุจฺฉา อคฺคปฺปตฺตา จ โหติ สารปฺปตฺตา จ; อปิ จ โข ปปฏิกปฺปตฺตา โหตี’’ติ. “निग्रोध, तुला काय वाटते? जर असे असेल, तर तपो-जुगुप्सा (तप आचरण) परिशुद्ध असते की अपरिशुद्ध?” “भंते, निश्चितच, जर असे असेल तर तपो-जुगुप्सा परिशुद्ध असते, अपरिशुद्ध नाही; आणि ती सर्वोच्च शिखराला आणि साराला (गाभ्याला) पोहोचलेली असते.” “निग्रोध, केवळ एवढ्यानेच तपो-जुगुप्सा सर्वोच्च शिखराला आणि साराला पोहोचलेली नसते; तर ती केवळ बाहेरील पापुद्र्याला (बाह्य सालीला) पोहोचलेली असते.” ปริสุทฺธตจปฺปตฺตกถา परिशुद्ध बाह्य साल प्राप्त झाल्याची कथा ๗๐. ‘‘กิตฺตาวตา ปน, ภนฺเต, ตโปชิคุจฺฉา อคฺคปฺปตฺตา จ โหติ สารปฺปตฺตา จ? สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา ตโปชิคุจฺฉาย อคฺคญฺเญว ปาเปตุ, สารญฺเญว ปาเปตู’’ติ. ‘‘อิธ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี จาตุยามสํวรสํวุโต โหติ. กถญฺจ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี จาตุยามสํวรสํวุโต โหติ? อิธ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี น ปาณํ อติปาเตติ, น ปาณํ อติปาตยติ, น ปาณมติปาตยโต สมนุญฺโญ โหติ. น อทินฺนํ อาทิยติ, น อทินฺนํ อาทิยาเปติ, น อทินฺนํ อาทิยโต สมนุญฺโญ โหติ. น มุสา ภณติ, น มุสา ภณาเปติ, น มุสา ภณโต สมนุญฺโญ โหติ. น ภาวิตมาสีสติ, น ภาวิตมาสีสาเปติ, น ภาวิตมาสีสโต สมนุญฺโญ โหติ. เอวํ โข, นิคฺโรธ, ตปสฺสี จาตุยามสํวรสํวุโต โหติ. ७०. “परंतु भंते, किती मर्यादेने तपो-जुगुप्सा सर्वोच्च शिखराला आणि साराला पोहोचलेली असते? भंते, हे चांगले होईल की भगवंतांनी मला तपो-जुगुप्साच्या सर्वोच्च शिखरापर्यंत आणि सारापर्यंत पोहोचवावे (त्याचा उपदेश करावा).” “निग्रोध, या धम्मात तपस्वी चतुर्याम संवराने (चार प्रकारच्या संयमाने) संवरित असतो. आणि निग्रोध, तपस्वी चतुर्याम संवराने कसा संवरित असतो? येथे, निग्रोध, तपस्वी प्राणाची हिंसा करत नाही, प्राणाची हिंसा करवत नाही आणि प्राणाची हिंसा करणाऱ्याला संमती देत नाही. न दिलेले (चोरी) घेत नाही, न दिलेले घेण्यास प्रवृत्त करत नाही आणि न दिलेले घेणाऱ्याला संमती देत नाही. असत्य बोलत नाही, असत्य बोलण्यास प्रवृत्त करत नाही आणि असत्य बोलणाऱ्याला संमती देत नाही. पंचकामगुणांचा उपभोग घेत नाही, पंचकामगुणांचा उपभोग घेण्यास प्रवृत्त करत नाही आणि पंचकामगुणांचा उपभोग घेणाऱ्याला संमती देत नाही. अशा प्रकारे, निग्रोध, तपस्वी चतुर्याम संवराने संवरित असतो.” ‘‘ยโต โข, นิคฺโรธ, ตปสฺสี จาตุยามสํวรสํวุโต โหติ, อทุํ จสฺส โหติ ตปสฺสิตาย. โส อภิหรติ โน หีนายาวตฺตติ. โส วิวิตฺตํ เสนาสนํ ภชติ อรญฺญํ รุกฺขมูลํ ปพฺพตํ กนฺทรํ คิริคุหํ สุสานํ วนปตฺถํ อพฺโภกาสํ ปลาลปุญฺชํ. โส ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฺปฏิกฺกนฺโต นิสีทติ ปลฺลงฺกํ อาภุชิตฺวา อุชุํ กายํ ปณิธาย ปริมุขํ สตึ อุปฏฺฐเปตฺวา. โส อภิชฺฌํ โลเก ปหาย วิคตาภิชฺเฌน เจตสา วิหรติ, อภิชฺฌาย จิตฺตํ ปริโสเธติ. พฺยาปาทปฺปโทสํ ปหาย อพฺยาปนฺนจิตฺโต วิหรติ สพฺพปาณภูตหิตานุกมฺปี, พฺยาปาทปฺปโทสา จิตฺตํ ปริโสเธติ. ถินมิทฺธํ ปหาย วิคตถินมิทฺโธ วิหรติ อาโลกสญฺญี สโต สมฺปชาโน, ถินมิทฺธา จิตฺตํ ปริโสเธติ. อุทฺธจฺจกุกฺกุจฺจํ ปหาย อนุทฺธโต วิหรติ อชฺฌตฺตํ วูปสนฺตจิตฺโต, อุทฺธจฺจกุกฺกุจฺจา จิตฺตํ ปริโสเธติ. วิจิกิจฺฉํ ปหาย ติณฺณวิจิกิจฺโฉ วิหรติ อกถํกถี กุสเลสุ ธมฺเมสุ, วิจิกิจฺฉาย จิตฺตํ ปริโสเธติ. “निग्रोध, जेव्हा तपस्वी चतुर्याम संवराने संवरित असतो, तेव्हा त्याच्या तपस्वीपणामुळे हे त्याचे लक्षण (शील) बनते. तो त्या शीलाला वाढवतो, हीन (गृहस्थ) भावाकडे परत फिरत नाही. तो एकांत सेनासनाचा (राहण्याच्या जागेचा) आश्रय घेतो— अरण्य, वृक्षमूळ, पर्वत, कंदरा, गिरीगुहा, स्मशान, वनप्रदेश, उघडे मैदान, गवताचा ढीग. तो भोजनानंतर, पिंडपातावरून परत आल्यावर, मांडी घालून, शरीर सरळ ठेवून, समोर स्मृती (जागरूकता) प्रस्थापित करून बसतो. तो लोकात अभिज्झेचा (लोभाचा) त्याग करून लोभरहित चित्ताने विहरतो, अभिज्झेपासून चित्त परिशुद्ध करतो. व्यापाद आणि प्रदोषाचा (द्वेषाचा) त्याग करून द्वेषरहित चित्ताने, सर्व प्राणिमात्रांच्या कल्याणाची इच्छा करत विहरतो, व्यापादापासून चित्त परिशुद्ध करतो. थिनमिद्धाचा (आळस आणि सुस्तीचा) त्याग करून आळसरहित, प्रकाशसंज्ञी (सजगता असलेला), स्मृतीवान आणि संप्रजन्ययुक्त होऊन विहरतो, थिनमिद्धापासून चित्त परिशुद्ध करतो. उद्धच्च-कुक्कुच्चाचा (अस्वस्थता आणि पश्चात्तापाचा) त्याग करून शांत चित्ताने, अंतर्मनात शांत होऊन विहरतो, उद्धच्च-कुक्कुच्चापासून चित्त परिशुद्ध करतो. विचिकित्सेचा (संशयाचा) त्याग करून, संशयापलीकडे गेलेला, कुशल धम्मांविषयी शंकारहित होऊन विहरतो, विचिकित्सेपासून चित्त परिशुद्ध करतो.” ๗๑. ‘‘โส [Pg.41] อิเม ปญฺจ นีวรเณ ปหาย เจตโส อุปกฺกิเลเส ปญฺญาย ทุพฺพลีกรเณ เมตฺตาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ. ตถา ทุติยํ. ตถา ตติยํ. ตถา จตุตฺถํ. อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ เมตฺตาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. กรุณาสหคเตน เจตสา…เป… มุทิตาสหคเตน เจตสา…เป… อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ. ตถา ทุติยํ. ตถา ตติยํ. ตถา จตุตฺถํ. อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. ७१. “तो चित्ताला मलीन करणाऱ्या आणि प्रज्ञेला दुर्बळ करणाऱ्या या पाच नीवरणांचा त्याग करून, मैत्रीयुक्त चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो. तसेच दुसऱ्या दिशेला, तसेच तिसऱ्या दिशेला, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरके, सर्वत्र, स्वतःप्रमाणेच सर्व प्राणिमात्रांना, संपूर्ण जगाला मैत्रीयुक्त, विशाल, महान, अमर्याद, वैररहित आणि द्वेषरहित चित्ताने व्यापून विहरतो. करुणेने युक्त चित्ताने... मुदितेने युक्त चित्ताने... उपेक्षेने युक्त चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो. तसेच दुसऱ्या दिशेला, तसेच तिसऱ्या दिशेला, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरके, सर्वत्र, स्वतःप्रमाणेच सर्व प्राणिमात्रांना, संपूर्ण जगाला उपेक्षायुक्त, विशाल, महान, अमर्याद, वैररहित आणि द्वेषरहित चित्ताने व्यापून विहरतो.” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, นิคฺโรธ. ยทิ เอวํ สนฺเต ตโปชิคุจฺฉา ปริสุทฺธา วา โหติ อปริสุทฺธา วา’’ติ? ‘‘อทฺธา โข, ภนฺเต, เอวํ สนฺเต ตโปชิคุจฺฉา ปริสุทฺธา โหติ โน อปริสุทฺธา, อคฺคปฺปตฺตา จ สารปฺปตฺตา จา’’ติ. ‘‘น โข, นิคฺโรธ, เอตฺตาวตา ตโปชิคุจฺฉา อคฺคปฺปตฺตา จ โหติ สารปฺปตฺตา จ; อปิ จ โข ตจปฺปตฺตา โหตี’’ติ. “निग्रोध, तुला काय वाटते? जर असे असेल, तर तपो-जुगुप्सा (तप आचरण) परिशुद्ध असते की अपरिशुद्ध?” “भंते, निश्चितच, जर असे असेल तर तपो-जुगुप्सा परिशुद्ध असते, अपरिशुद्ध नाही; आणि ती सर्वोच्च शिखराला आणि साराला (गाभ्याला) पोहोचलेली असते.” “निग्रोध, केवळ एवढ्यानेच तपो-जुगुप्सा सर्वोच्च शिखराला आणि साराला पोहोचलेली नसते; तर ती केवळ बाहेरील सालीला (त्वचेला) पोहोचलेली असते.” ปริสุทฺธเผคฺคุปฺปตฺตกถา परिशुद्ध असारभागाप्रत (फेग्गु) पोहोचल्याची कथा ๗๒. ‘‘กิตฺตาวตา ปน, ภนฺเต, ตโปชิคุจฺฉา อคฺคปฺปตฺตา จ โหติ สารปฺปตฺตา จ? สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา ตโปชิคุจฺฉาย อคฺคญฺเญว ปาเปตุ, สารญฺเญว ปาเปตู’’ติ. ‘‘อิธ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี จาตุยามสํวรสํวุโต โหติ. กถญฺจ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี จาตุยามสํวรสํวุโต โหติ…เป… ยโต โข, นิคฺโรธ, ตปสฺสี จาตุยามสํวรสํวุโต โหติ, อทุํ จสฺส โหติ ตปสฺสิตาย. โส อภิหรติ โน หีนายาวตฺตติ. โส วิวิตฺตํ เสนาสนํ ภชติ…เป… โส อิเม ปญฺจ นีวรเณ ปหาย เจตโส อุปกฺกิเลเส ปญฺญาย ทุพฺพลีกรเณ เมตฺตาสหคเตน เจตสา…เป… กรุณาสหคเตน เจตสา…เป… มุทิตาสหคเตน เจตสา…เป… อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. โส อเนกวิหิตํ ปุพฺเพนิวาสํ อนุสฺสรติ เสยฺยถิทํ – เอกมฺปิ ชาตึ ทฺเวปิ ชาติโย ติสฺโสปิ ชาติโย จตสฺโสปิ ชาติโย ปญฺจปิ ชาติโย ทสปิ ชาติโย วีสมฺปิ ชาติโย ตึสมฺปิ ชาติโย จตฺตาลีสมฺปิ [Pg.42] ชาติโย ปญฺญาสมฺปิ ชาติโย ชาติสตมฺปิ ชาติสหสฺสมฺปิ ชาติสตสหสฺสมฺปิ อเนเกปิ สํวฏฺฏกปฺเป อเนเกปิ วิวฏฺฏกปฺเป อเนเกปิ สํวฏฺฏวิวฏฺฏกปฺเป – ‘อมุตฺราสึ เอวํนาโม เอวํโคตฺโต เอวํวณฺโณ เอวมาหาโร เอวํสุขทุกฺขปฺปฏิสํเวที เอวมายุปริยนฺโต, โส ตโต จุโต อมุตฺร อุทปาทึ, ตตฺราปาสึ เอวํนาโม เอวํโคตฺโต เอวํวณฺโณ เอวมาหาโร เอวํสุขทุกฺขปฺปฏิสํเวที เอวมายุปริยนฺโต, โส ตโต จุโต อิธูปปนฺโน’ติ. อิติ สาการํ สอุทฺเทสํ อเนกวิหิตํ ปุพฺเพนิวาสํ อนุสฺสรติ. ७२. “भन्ते, किती मर्यादेपर्यंत तपो-जिगुच्छा (तपश्चर्या व पापभीरुता) ही सर्वोच्च शिखराला आणि सारतत्त्वाला प्राप्त होते? भन्ते, भगवान मला तपो-जिगुच्छेच्या सर्वोच्च शिखराप्रत आणि सारतत्त्वाप्रतच घेऊन जावोत, ही माझी नम्र प्रार्थना आहे.” “निग्रोध, या जगात तपस्वी पुरुष चार प्रकारच्या संवरांनी (चतुर्याम संवराने) संवरित असतो. आणि निग्रोध, तपस्वी पुरुष कसा काय चार प्रकारच्या संवरांनी संवरित असतो? ...पे०... निग्रोध, जेव्हा तपस्वी पुरुष चार प्रकारच्या संवरांनी संवरित असतो, तेव्हा त्याच्या तपस्वीपणामुळे हे त्याचे लक्षण होते. तो त्या शीलाचे संवर्धन करतो, हीन भावाकडे (गृहस्थ जीवनाकडे) परत वळत नाही. तो एकांत सेनासनाचा (निवासस्थानाचा) आश्रय घेतो... पे०... तो चित्ताला मलीन करणाऱ्या आणि प्रज्ञेला दुर्बळ करणाऱ्या या पाच नीवरणांचा त्याग करून, मैत्रीयुक्त चित्ताने... पे०... करुणायुक्त चित्ताने... पे०... मुदितायुक्त चित्ताने... पे०... उपेक्षायुक्त चित्ताने, जे विस्तीर्ण, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित (द्वेषरहित) आहे, सर्व दिशांना व्यापून विहरतो. तो आपल्या अनेक प्रकारच्या पूर्वजन्मांचे (पुब्बेनिवास) स्मरण करतो, जसे की – एक जन्म, दोन जन्म, तीन जन्म, चार जन्म, पाच जन्म, दहा जन्म, वीस जन्म, तीस जन्म, चाळीस जन्म, पन्नास जन्म, शंभर जन्म, हजार जन्म, लाख जन्म, अनेक संवर्तकल्प (विनाश पावणारे कल्प), अनेक विवर्तकल्प (उत्पन्न होणारे कल्प), अनेक संवर्त-विवर्तकल्प – ‘त्या अमूक जन्मात मी अशा नावाचा, अशा गोत्राचा, अशा वर्णाचा, अशा आहाराचा, अशा सुख-दुःखाचा अनुभव घेणारा आणि एवढ्या आयुष्यमर्यादेचा होतो. तो मी तिथून च्युत (मृत) होऊन अमूक ठिकाणी जन्माला आलो. तिथेही मी अशा नावाचा, अशा गोत्राचा, अशा वर्णाचा, अशा आहाराचा, अशा सुख-दुःखाचा अनुभव घेणारा आणि एवढ्या आयुष्यमर्यादेचा होतो. तो मी तिथून च्युत होऊन इथे उत्पन्न झालो आहे.’ अशा प्रकारे तो आकारासह (तपशीलासह) आणि उद्देशासह (निर्देशासह) अनेक प्रकारच्या पूर्वजन्मांचे स्मरण करतो।” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, นิคฺโรธ, ยทิ เอวํ สนฺเต ตโปชิคุจฺฉา ปริสุทฺธา วา โหติ อปริสุทฺธา วา’’ติ? ‘‘อทฺธา โข, ภนฺเต, เอวํ สนฺเต ตโปชิคุจฺฉา ปริสุทฺธา โหติ, โน อปริสุทฺธา, อคฺคปฺปตฺตา จ สารปฺปตฺตา จา’’ติ. ‘‘น โข, นิคฺโรธ, เอตฺตาวตา ตโปชิคุจฺฉา อคฺคปฺปตฺตา จ โหติ สารปฺปตฺตา จ; อปิ จ โข เผคฺคุปฺปตฺตา โหตี’’ติ. “तुला काय वाटते, निग्रोध? जर असे असेल, तर तपो-जिगुच्छा शुद्ध असते की अशुद्ध?” “नक्कीच, भन्ते! जर असे असेल, तर तपो-जिगुच्छा शुद्ध असते, अशुद्ध नाही; आणि ती सर्वोच्च शिखराला व सारतत्त्वाला प्राप्त झालेली असते.” “निग्रोध, केवळ एवढ्यानेच तपो-जिगुच्छा सर्वोच्च शिखराला आणि सारतत्त्वाला प्राप्त होत नाही; तर ती केवळ असारभागाप्रत (फेग्गु/बाहेरील सालीप्रत) पोहोचलेली असते।” ปริสุทฺธอคฺคปฺปตฺตสารปฺปตฺตกถา परिशुद्ध सर्वोच्च शिखर आणि सारतत्त्व गाठल्याची कथा ๗๓. ‘‘กิตฺตาวตา ปน, ภนฺเต, ตโปชิคุจฺฉา อคฺคปฺปตฺตา จ โหติ สารปฺปตฺตา จ? สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา ตโปชิคุจฺฉาย อคฺคญฺเญว ปาเปตุ, สารญฺเญว ปาเปตู’’ติ. ‘‘อิธ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี จาตุยามสํวรสํวุโต โหติ. กถญฺจ, นิคฺโรธ, ตปสฺสี จาตุยามสํวรสํวุโต โหติ…เป… ยโต โข, นิคฺโรธ, ตปสฺสี จาตุยามสํวรสํวุโต โหติ, อทุํ จสฺส โหติ ตปสฺสิตาย. โส อภิหรติ โน หีนายาวตฺตติ. โส วิวิตฺตํ เสนาสนํ ภชติ…เป… โส อิเม ปญฺจ นีวรเณ ปหาย เจตโส อุปกฺกิเลเส ปญฺญาย ทุพฺพลีกรเณ เมตฺตาสหคเตน เจตสา…เป… อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. โส อเนกวิหิตํ ปุพฺเพนิวาสํ อนุสฺสรติ. เสยฺยถิทํ – เอกมฺปิ ชาตึ ทฺเวปิ ชาติโย ติสฺโสปิ ชาติโย จตสฺโสปิ ชาติโย ปญฺจปิ ชาติโย…เป… อิติ สาการํ สอุทฺเทสํ อเนกวิหิตํ ปุพฺเพนิวาสํ อนุสฺสรติ. โส ทิพฺเพน จกฺขุนา วิสุทฺเธน อติกฺกนฺตมานุสเกน สตฺเต ปสฺสติ จวมาเน อุปปชฺชมาเน หีเน ปณีเต สุวณฺเณ ทุพฺพณฺเณ สุคเต ทุคฺคเต, ยถากมฺมูปเค สตฺเต ปชานาติ – ‘อิเม วต โภนฺโต สตฺตา กายทุจฺจริเตน [Pg.43] สมนฺนาคตา วจีทุจฺจริเตน สมนฺนาคตา มโนทุจฺจริเตน สมนฺนาคตา อริยานํ อุปวาทกา มิจฺฉาทิฏฺฐิกา มิจฺฉาทิฏฺฐิกมฺมสมาทานา. เต กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปนฺนา. อิเม วา ปน โภนฺโต สตฺตา กายสุจริเตน สมนฺนาคตา วจีสุจริเตน สมนฺนาคตา มโนสุจริเตน สมนฺนาคตา อริยานํ อนุปวาทกา สมฺมาทิฏฺฐิกา สมฺมาทิฏฺฐิกมฺมสมาทานา. เต กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปนฺนา’ติ. อิติ ทิพฺเพน จกฺขุนา วิสุทฺเธน อติกฺกนฺตมานุสเกน สตฺเต ปสฺสติ จวมาเน อุปปชฺชมาเน หีเน ปณีเต สุวณฺเณ ทุพฺพณฺเณ สุคเต ทุคฺคเต, ยถากมฺมูปเค สตฺเต ปชานาติ. ७३. “भन्ते, किती मर्यादेपर्यंत तपो-जिगुच्छा सर्वोच्च शिखराला आणि सारतत्त्वाला प्राप्त होते? भन्ते, भगवान मला तपो-जिगुच्छेच्या सर्वोच्च शिखराप्रत आणि सारतत्त्वाप्रतच घेऊन जावोत, ही माझी नम्र प्रार्थना आहे.” “निग्रोध, या जगात तपस्वी पुरुष चार प्रकारच्या संवरांनी संवरित असतो. आणि निग्रोध, तपस्वी पुरुष कसा काय चार प्रकारच्या संवरांनी संवरित असतो? ...पे०... निग्रोध, जेव्हा तपस्वी पुरुष चार प्रकारच्या संवरांनी संवरित असतो, तेव्हा त्याच्या तपस्वीपणामुळे हे त्याचे लक्षण होते. तो त्या शीलाचे संवर्धन करतो, हीन भावाकडे परत वळत नाही. तो एकांत सेनासनाचा आश्रय घेतो... पे०... तो चित्ताला मलीन करणाऱ्या आणि प्रज्ञेला दुर्बळ करणाऱ्या या पाच नीवरणांचा त्याग करून, मैत्रीयुक्त चित्ताने... पे०... उपेक्षायुक्त चित्ताने, जे विस्तीर्ण, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित आहे, सर्व दिशांना व्यापून विहरतो. तो आपल्या अनेक प्रकारच्या पूर्वजन्मांचे स्मरण करतो, जसे की – एक जन्म, दोन जन्म, तीन जन्म, चार जन्म, पाच जन्म... पे०... अशा प्रकारे तो आकारासह आणि उद्देशासह अनेक प्रकारच्या पूर्वजन्मांचे स्मरण करतो. तो मानवी दृष्टीच्या पलीकडे असलेल्या, अत्यंत शुद्ध अशा दिव्य चक्षूंनी (दिब्बचक्खु) प्राण्यांना च्युत (मृत्यू पावत) असताना आणि उत्पन्न होत असताना पाहतो; हीन, प्रणीत (उत्कृष्ट), सुवर्ण (सुंदर), दुर्वर्ण (कुरूप), सुगतीला गेलेले आणि दुर्गतीला गेलेले प्राणी पाहतो. कर्मांनुसार गती प्राप्त करणाऱ्या प्राण्यांना तो ओळखतो – ‘अरेरे! हे प्राणी कायिक दुश्चरित, वाचिक दुश्चरित आणि मानसिक दुश्चरिताने युक्त होते; आर्यांची निंदा करणारे, मिथ्यादृष्टी असलेले आणि मिथ्यादृष्टीच्या कर्मांचे आचरण करणारे होते. ते शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि नरकात उत्पन्न झाले आहेत. किंवा, हे प्राणी कायिक सुचरित, वाचिक सुचरित आणि मानसिक सुचरिताने युक्त होते; आर्यांची निंदा न करणारे, सम्यक् दृष्टी असलेले आणि सम्यक् दृष्टीच्या कर्मांचे आचरण करणारे होते. ते शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न झाले आहेत.’ अशा प्रकारे तो मानवी दृष्टीच्या पलीकडे असलेल्या, अत्यंत शुद्ध अशा दिव्य चक्षूंनी प्राण्यांना च्युत असताना आणि उत्पन्न होत असताना पाहतो; हीन, प्रणीत, सुवर्ण, दुर्वर्ण, सुगतीला गेलेले आणि दुर्गतीला गेलेले प्राणी पाहतो, कर्मांनुसार गती प्राप्त करणाऱ्या प्राण्यांना तो ओळखतो।” ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, นิคฺโรธ, ยทิ เอวํ สนฺเต ตโปชิคุจฺฉา ปริสุทฺธา วา โหติ อปริสุทฺธา วา’’ติ? ‘‘อทฺธา โข, ภนฺเต, เอวํ สนฺเต ตโปชิคุจฺฉา ปริสุทฺธา โหติ โน อปริสุทฺธา, อคฺคปฺปตฺตา จ สารปฺปตฺตา จา’’ติ. “तुला काय वाटते, निग्रोध? जर असे असेल, तर तपो-जिगुच्छा शुद्ध असते की अशुद्ध?” “नक्कीच, भन्ते! जर असे असेल, तर तपो-जिगुच्छा शुद्ध असते, अशुद्ध नाही; आणि ती सर्वोच्च शिखराला व सारतत्त्वाला प्राप्त झालेली असते।” ๗๔. ‘‘เอตฺตาวตา โข, นิคฺโรธ, ตโปชิคุจฺฉา อคฺคปฺปตฺตา จ โหติ สารปฺปตฺตา จ. อิติ โข, นิคฺโรธ, ยํ มํ ตฺวํ อวจาสิ – ‘โก นาม โส, ภนฺเต, ภควโต ธมฺโม, เยน ภควา สาวเก วิเนติ, เยน ภควตา สาวกา วินีตา อสฺสาสปฺปตฺตา ปฏิชานนฺติ อชฺฌาสยํ อาทิพฺรหฺมจริย’นฺติ. อิติ โข ตํ, นิคฺโรธ, ฐานํ อุตฺตริตรญฺจ ปณีตตรญฺจ, เยนาหํ สาวเก วิเนมิ, เยน มยา สาวกา วินีตา อสฺสาสปฺปตฺตา ปฏิชานนฺติ อชฺฌาสยํ อาทิพฺรหฺมจริย’’นฺติ. ७४. “निग्रोध, केवळ एवढ्यानेच तपो-जिगुच्छा सर्वोच्च शिखराला आणि सारतत्त्वाला प्राप्त होते. निग्रोध, तू मला जे विचारले होतेस की – ‘भन्ते, भगवंतांचा तो कोणता धर्म (उपदेश) आहे, ज्याद्वारे भगवान आपल्या श्रावकांना प्रशिक्षित करतात, आणि ज्याद्वारे भगवंतांकडून प्रशिक्षित झालेले श्रावक आश्वस्त (संतुष्ट) होऊन श्रेष्ठ अशा आदि-ब्रह्मचर्याचे (मुख्य आधाराचे) पालन केल्याचे मान्य करतात?’ निग्रोध, ज्याद्वारे मी श्रावकांना प्रशिक्षित करतो आणि ज्याद्वारे माझ्याकडून प्रशिक्षित झालेले श्रावक आश्वस्त होऊन श्रेष्ठ अशा आदि-ब्रह्मचर्याचे पालन केल्याचे मान्य करतात, ती स्थिती (तो धर्म) यापेक्षाही अधिक श्रेष्ठ आणि अधिक प्रणीत (उत्कृष्ट) आहे।” เอวํ วุตฺเต, เต ปริพฺพาชกา อุนฺนาทิโน อุจฺจาสทฺทมหาสทฺทา อเหสุํ – ‘‘เอตฺถ มยํ อนสฺสาม สาจริยกา, น มยํ อิโต ภิยฺโย อุตฺตริตรํ ปชานามา’’ติ. “असे म्हटले असता, ते परिव्राजक गोंधळ घालत आणि मोठमोठ्याने ओरडत म्हणाले – ‘आम्ही आमच्या आचार्यांसह इथेच नष्ट झालो आहोत (आमचे नुकसान झाले आहे), कारण आम्हाला यापेक्षा अधिक श्रेष्ठ आणि उच्च अशा धर्माची माहितीच नाही!’” นิคฺโรธสฺส ปชฺฌายนํ “निग्रोध परिव्राजकाची खिन्नता” ๗๕. ยทา อญฺญาสิ สนฺธาโน คหปติ – ‘‘อญฺญทตฺถุ โข ทานิเม อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา ภควโต ภาสิตํ สุสฺสูสนฺติ, โสตํ โอทหนฺติ, อญฺญาจิตฺตํ อุปฏฺฐาเปนฺตี’’ติ. อถ นิคฺโรธํ ปริพฺพาชกํ เอตทโวจ [Pg.44] – ‘‘อิติ โข, ภนฺเต นิคฺโรธ, ยํ มํ ตฺวํ อวจาสิ – ‘ยคฺเฆ, คหปติ, ชาเนยฺยาสิ, เกน สมโณ โคตโม สทฺธึ สลฺลปติ, เกน สากจฺฉํ สมาปชฺชติ, เกน ปญฺญาเวยฺยตฺติยํ สมาปชฺชติ, สุญฺญาคารหตา สมณสฺส โคตมสฺส ปญฺญา, อปริสาวจโร สมโณ โคตโม นาลํ สลฺลาปาย, โส อนฺตมนฺตาเนว เสวติ; เสยฺยถาปิ นาม โคกาณา ปริยนฺตจารินี อนฺตมนฺตาเนว เสวติ. เอวเมว สุญฺญาคารหตา สมณสฺส โคตมสฺส ปญฺญา, อปริสาวจโร สมโณ โคตโม นาลํ สลฺลาปาย; โส อนฺตมนฺตาเนว เสวติ; อิงฺฆ, คหปติ, สมโณ โคตโม อิมํ ปริสํ อาคจฺเฉยฺย, เอกปญฺเหเนว นํ สํสาเทยฺยาม, ตุจฺฉกุมฺภีว นํ มญฺเญ โอโรเธยฺยามา’ติ. อยํ โข โส, ภนฺเต, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ อิธานุปฺปตฺโต, อปริสาวจรํ ปน นํ กโรถ, โคกาณํ ปริยนฺตจารินึ กโรถ, เอกปญฺเหเนว นํ สํสาเทถ, ตุจฺฉกุมฺภีว นํ โอโรเธถา’’ติ. เอวํ วุตฺเต, นิคฺโรโธ ปริพฺพาชโก ตุณฺหีภูโต มงฺกุภูโต ปตฺตกฺขนฺโธ อโธมุโข ปชฺฌายนฺโต อปฺปฏิภาโน นิสีทิ. ७५. जेव्हा संधान गृहपतीला समजले की, "नक्कीच आता हे अन्यधर्मीय परिव्राजक भगवंतांचे प्रवचन ऐकण्यास उत्सुक आहेत, कान देत आहेत आणि ज्ञान प्राप्त करण्यासाठी आपले चित्त एकाग्र करत आहेत." तेव्हा त्यांनी निग्रोध परिव्राजकाला असे म्हटले – "भन्ते निग्रोध, आपण मला जे म्हणालात की – 'हे गृहपती, तुला माहीत आहे का, श्रमण गौतम कोणाशी बोलतात? कोणाशी चर्चा करतात? कोणाशी संवाद साधून आपल्या प्रज्ञेची प्रगल्भता सिद्ध करतात? श्रमण गौतमांची प्रज्ञा एकांतात राहिल्यामुळे नष्ट झाली आहे, श्रमण गौतम सभेत जाण्यास धजावत नाहीत, ते संभाषण करण्यास असमर्थ आहेत, ते केवळ निर्जन सीमावर्ती भागांचाच आश्रय घेतात. ज्याप्रमाणे एका डोळ्याने आंधळी असलेली गाय सीमावर्ती भागातच फिरते आणि केवळ निर्जन कोपऱ्यांचाच आश्रय घेते, त्याचप्रमाणे श्रमण गौतमांची प्रज्ञा एकांतात राहिल्यामुळे नष्ट झाली आहे, श्रमण गौतम सभेत जाण्यास धजावत नाहीत, ते संभाषण करण्यास असमर्थ आहेत, ते केवळ निर्जन सीमावर्ती भागांचाच आश्रय घेतात. हे गृहपती, जर श्रमण गौतम या सभेत आले, तर आम्ही त्यांना एकाच प्रश्नाने निरुत्तर करू, रिकाम्या घागरीप्रमाणे त्यांना गोंधळात पाडू.' तर भन्ते, ते अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान येथे आले आहेत. आता त्यांना सभेत न बोलणारे करून दाखवा, सीमावर्ती भागात फिरणाऱ्या एका डोळ्याच्या आंधळ्या गाईसारखे करून दाखवा, एकाच प्रश्नाने त्यांना निरुत्तर करा, रिकाम्या घागरीप्रमाणे त्यांना गोंधळात पाडून दाखवा." असे म्हटले असता, निग्रोध परिव्राजक शांत, खिन्न, मान खाली घालून, अधोमुख होऊन, विचारमग्न आणि निरुत्तर होऊन बसून राहिला. ๗๖. อถ โข ภควา นิคฺโรธํ ปริพฺพาชกํ ตุณฺหีภูตํ มงฺกุภูตํ ปตฺตกฺขนฺธํ อโธมุขํ ปชฺฌายนฺตํ อปฺปฏิภานํ วิทิตฺวา นิคฺโรธํ ปริพฺพาชกํ เอตทโวจ – ‘‘สจฺจํ กิร, นิคฺโรธ, ภาสิตา เต เอสา วาจา’’ติ? ‘‘สจฺจํ, ภนฺเต, ภาสิตา เม เอสา วาจา, ยถาพาเลน ยถามูฬฺเหน ยถาอกุสเลนา’’ติ. ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, นิคฺโรธ. กินฺติ เต สุตํ ปริพฺพาชกานํ วุฑฺฒานํ มหลฺลกานํ อาจริยปาจริยานํ ภาสมานานํ – ‘เย เต อเหสุํ อตีตมทฺธานํ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา, เอวํ สุ เต ภควนฺโต สํคมฺม สมาคมฺม อุนฺนาทิโน อุจฺจาสทฺทมหาสทฺทา อเนกวิหิตํ ติรจฺฉานกถํ อนุยุตฺตา วิหรนฺติ. เสยฺยถิทํ – ราชกถํ โจรกถํ…เป… อิติภวาภวกถํ อิติ วา. เสยฺยถาปิ ตฺวํ เอตรหิ สาจริยโก. อุทาหุ, เอวํ สุ เต ภควนฺโต อรญฺญวนปตฺถานิ ปนฺตานิ เสนาสนานิ ปฏิเสวนฺติ อปฺปสทฺทานิ อปฺปนิคฺโฆสานิ วิชนวาตานิ มนุสฺสราหสฺเสยฺยกานิ ปฏิสลฺลานสารุปฺปานิ, เสยฺยถาปาหํ เอตรหี’ติ. ७६. त्यानंतर भगवंतांनी निग्रोध परिव्राजकाला शांत, खिन्न, मान खाली घालून, अधोमुख होऊन, विचारमग्न आणि निरुत्तर होऊन बसलेले पाहून निग्रोध परिव्राजकाला असे म्हटले – "निग्रोध, हे खरे आहे का की तू असे बोलला होतास?" "भन्ते, हे खरे आहे की मी मूर्खपणाने, अज्ञानाने आणि अकुशलतेने असे बोललो होतो." "निग्रोध, तुला काय वाटते? तू वृद्ध, ज्येष्ठ, आचार्यांचे आचार्य असलेल्या परिव्राजकांकडून असे बोलताना कधी ऐकले आहे का की – 'जे भूतकाळात अर्हत, सम्यक्संबुद्ध झाले, ते भगवान एकत्र येऊन, एकत्र जमून, मोठ्या आवाजात गोंगाट करत विविध प्रकारच्या निरर्थक गोष्टींमध्ये (तिरच्छानकथा) मग्न राहत असत? जसे की – राजांविषयीच्या गोष्टी, चोरांविषयीच्या गोष्टी... इत्यादी किंवा अस्तित्वाच्या आणि अनस्तित्वाच्या गोष्टी. जसे की तू सध्या तुझ्या आचार्यांसह राहतोस. की ते भगवान शांत, कोलाहल नसलेल्या, मानवी वस्तीपासून दूर असलेल्या, एकांतात ध्यान करण्यास योग्य अशा अरण्यातील निर्जन सेनासनांचा (निवासस्थानांचा) आश्रय घेत असत, जसा मी आता घेतो?'" ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต. ปริพฺพาชกานํ วุฑฺฒานํ มหลฺลกานํ อาจริยปาจริยานํ ภาสมานานํ – ‘เย เต อเหสุํ อตีตมทฺธานํ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา[Pg.45], น เอวํ สุ เต ภควนฺโต สํคมฺม สมาคมฺม อุนฺนาทิโน อุจฺจาสทฺทมหาสทฺทา อเนกวิหิตํ ติรจฺฉานกถํ อนุยุตฺตา วิหรนฺติ. เสยฺยถิทํ – ราชกถํ โจรกถํ…เป… อิติภวาภวกถํ อิติ วา, เสยฺยถาปาหํ เอตรหิ สาจริยโก. เอวํ สุ เต ภควนฺโต อรญฺญวนปตฺถานิ ปนฺตานิ เสนาสนานิ ปฏิเสวนฺติ อปฺปสทฺทานิ อปฺปนิคฺโฆสานิ วิชนวาตานิ มนุสฺสราหสฺเสยฺยกานิ ปฏิสลฺลานสารุปฺปานิ, เสยฺยถาปิ ภควา เอตรหี’’’ติ. "भन्ते, मी वृद्ध, ज्येष्ठ, आचार्यांचे आचार्य असलेल्या परिव्राजकांकडून असे बोलताना ऐकले आहे की – 'जे भूतकाळात अर्हत, सम्यक्संबुद्ध झाले, ते भगवान एकत्र येऊन, एकत्र जमून, मोठ्या आवाजात गोंगाट करत विविध प्रकारच्या निरर्थक गोष्टींमध्ये (तिरच्छानकथा) मग्न राहत नसत. जसे की – राजांविषयीच्या गोष्टी, चोरांविषयीच्या गोष्टी... इत्यादी किंवा अस्तित्वाच्या आणि अनस्तित्वाच्या गोष्टी, जसा मी सध्या माझ्या आचार्यांसह राहतो. तर ते भगवान शांत, कोलाहल नसलेल्या, मानवी वस्तीपासून दूर असलेल्या, एकांतात ध्यान करण्यास योग्य अशा अरण्यातील निर्जन सेनासनांचा (निवासस्थानांचा) आश्रय घेत असत, जसा भगवान आता घेतात.'" ‘‘ตสฺส เต, นิคฺโรธ, วิญฺญุสฺส สโต มหลฺลกสฺส น เอตทโหสิ – ‘พุทฺโธ โส ภควา โพธาย ธมฺมํ เทเสติ, ทนฺโต โส ภควา ทมถาย ธมฺมํ เทเสติ, สนฺโต โส ภควา สมถาย ธมฺมํ เทเสติ, ติณฺโณ โส ภควา ตรณาย ธมฺมํ เทเสติ, ปรินิพฺพุโต โส ภควา ปรินิพฺพานาย ธมฺมํ เทเสตี’’’ติ? "निग्रोध, तू सुज्ञ आणि प्रौढ असूनही तुझ्या मनात असा विचार आला नाही का की – 'ते भगवान स्वतः बुद्ध असून इतरांना बुद्ध करण्यासाठी धम्माचा उपदेश करतात; ते भगवान स्वतः दमित असून इतरांच्या दमनासाठी धम्माचा उपदेश करतात; ते भगवान स्वतः शांत असून इतरांच्या शांततेसाठी धम्माचा उपदेश करतात; ते भगवान स्वतः तरून गेलेले असून इतरांना तारण्यासाठी धम्माचा उपदेश करतात; ते भगवान स्वतः परिनिर्वाण प्राप्त असून इतरांना परिनिर्वाण प्राप्त करून देण्यासाठी धम्माचा उपदेश करतात'?" พฺรหฺมจริยปริโยสานสจฺฉิกิริยา ब्रह्मचर्याच्या अंतिम ध्येयाची (अर्हत्त्वाची) प्रत्यक्ष अनुभूती ๗๗. เอวํ วุตฺเต, นิคฺโรโธ ปริพฺพาชโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อจฺจโย มํ, ภนฺเต, อจฺจคมา ยถาพาลํ ยถามูฬฺหํ ยถาอกุสลํ, ยฺวาหํ เอวํ ภควนฺตํ อวจาสึ. ตสฺส เม, ภนฺเต, ภควา อจฺจยํ อจฺจยโต ปฏิคฺคณฺหาตุ อายตึ สํวรายา’’ติ. ‘‘ตคฺฆ ตฺวํ, นิคฺโรธ, อจฺจโย อจฺจคมา ยถาพาลํ ยถามูฬฺหํ ยถาอกุสลํ, โย มํ ตฺวํ เอวํ อวจาสิ. ยโต จ โข ตฺวํ, นิคฺโรธ, อจฺจยํ อจฺจยโต ทิสฺวา ยถาธมฺมํ ปฏิกโรสิ, ตํ เต มยํ ปฏิคฺคณฺหาม. วุทฺธิ เหสา, นิคฺโรธ, อริยสฺส วินเย, โย อจฺจยํ อจฺจยโต ทิสฺวา ยถาธมฺมํ ปฏิกโรติ อายตึ สํวรํ อาปชฺชติ. อหํ โข ปน, นิคฺโรธ, เอวํ วทามิ – ७७. असे म्हटले असता, निग्रोध परिव्राजक भगवंतांना म्हणाला – "भन्ते, माझ्याकडून चूक झाली आहे. मी मूर्खपणाने, अज्ञानाने आणि अकुशलतेने भगवंतांविषयी असे बोललो. भन्ते, भगवंतांनी माझी ही चूक चूक म्हणून स्वीकारावी, जेणेकरून भविष्यात मी स्वतःवर नियंत्रण ठेवीन." "नक्कीच निग्रोध, तुझ्याकडून मूर्खपणाने, अज्ञानाने आणि अकुशलतेने चूक झाली आहे, जो तू माझ्याविषयी असे बोललास. परंतु, निग्रोध, जेव्हा तू तुझी चूक चूक म्हणून पाहतोस आणि धम्मानुसार तिचे प्रायश्चित्त करतोस, तेव्हा आम्ही तुझी ती चूक स्वीकारतो. निग्रोध, आर्यांच्या विनयामध्ये हीच प्रगती आहे की, जो आपली चूक चूक म्हणून पाहतो, धम्मानुसार तिचे प्रायश्चित्त करतो आणि भविष्यात स्वतःवर नियंत्रण ठेवतो. निग्रोध, मी तर असे म्हणतो –" ‘เอตุ วิญฺญู ปุริโส อสโฐ อมายาวี อุชุชาติโก, อหมนุสาสามิ อหํ ธมฺมํ เทเสมิ. ยถานุสิฏฺฐํ ตถา ปฏิปชฺชมาโน, ยสฺสตฺถาย กุลปุตฺตา สมฺมเทว อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชนฺติ, ตทนุตฺตรํ พฺรหฺมจริยปริโยสานํ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหริสฺสติ สตฺตวสฺสานิ. ติฏฺฐนฺตุ, นิคฺโรธ, สตฺต วสฺสานิ. เอตุ วิญฺญู ปุริโส อสโฐ อมายาวี อุชุชาติโก, อหมนุสาสามิ อหํ ธมฺมํ เทเสมิ. ยถานุสิฏฺฐํ ตถา ปฏิปชฺชมาโน, ยสฺสตฺถาย กุลปุตฺตา [Pg.46] สมฺมเทว อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชนฺติ, ตทนุตฺตรํ พฺรหฺมจริยปริโยสานํ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหริสฺสติ ฉ วสฺสานิ. ปญฺจ วสฺสานิ… จตฺตาริ วสฺสานิ… ตีณิ วสฺสานิ… ทฺเว วสฺสานิ… เอกํ วสฺสํ. ติฏฺฐตุ, นิคฺโรธ, เอกํ วสฺสํ. เอตุ วิญฺญู ปุริโส อสโฐ อมายาวี อุชุชาติโก อหมนุสาสามิ อหํ ธมฺมํ เทเสมิ. ยถานุสิฏฺฐํ ตถา ปฏิปชฺชมาโน, ยสฺสตฺถาย กุลปุตฺตา สมฺมเทว อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชนฺติ, ตทนุตฺตรํ พฺรหฺมจริยปริโยสานํ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหริสฺสติ สตฺต มาสานิ. ติฏฺฐนฺตุ, นิคฺโรธ, สตฺต มาสานิ… ฉ มาสานิ… ปญฺจ มาสานิ … จตฺตาริ มาสานิ… ตีณิ มาสานิ… ทฺเว มาสานิ… เอกํ มาสํ… อฑฺฒมาสํ. ติฏฺฐตุ, นิคฺโรธ, อฑฺฒมาโส. เอตุ วิญฺญู ปุริโส อสโฐ อมายาวี อุชุชาติโก, อหมนุสาสามิ อหํ ธมฺมํ เทเสมิ. ยถานุสิฏฺฐํ ตถา ปฏิปชฺชมาโน, ยสฺสตฺถาย กุลปุตฺตา สมฺมเทว อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชนฺติ, ตทนุตฺตรํ พฺรหฺมจริยปริโยสานํ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหริสฺสติ สตฺตาหํ’. ‘एखादा बुद्धिमान, निष्कपट, कपटविरहित, सरळ स्वभावाचा मनुष्य माझ्याकडे येवो; मी त्याला उपदेश करीन, मी त्याला धम्माची देशना करीन. उपदेश केल्याप्रमाणे आचरण करून, ज्या ध्येयासाठी कुलपुत्र योग्य प्रकारे घरादाराचा त्याग करून गृहहीन प्रव्रज्या ग्रहण करतात, ते सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मचर्याचे अंतिम ध्येय तो याच जन्मात स्वतःच्या अभिज्ञाने (विशिष्ट ज्ञानाने) जाणून, साक्षात करून आणि त्यात प्रस्थापित होऊन सात वर्षांत प्राप्त करेल. हे निग्रोध, सात वर्षे राहू दे. एखादा बुद्धिमान, निष्कपट, कपटविरहित, सरळ स्वभावाचा मनुष्य माझ्याकडे येवो... तो सहा वर्षांत... पाच वर्षांत... चार वर्षांत... तीन वर्षांत... दोन वर्षांत... एक वर्षात ते ध्येय प्राप्त करेल. हे निग्रोध, एक वर्षही राहू दे... तो सात महिन्यांत... सहा महिन्यांत... पाच महिन्यांत... चार महिन्यांत... तीन महिन्यांत... दोन महिन्यांत... एक महिन्यात... अर्ध्या महिन्यात ते ध्येय प्राप्त करेल. हे निग्रोध, अर्धा महिनाही राहू दे... तो केवळ सात दिवसांत ते ध्येय प्राप्त करेल.’ ปริพฺพาชกานํ ปชฺฌายนํ परिव्राजकांचे खिन्न होणे ๗๘. ‘‘สิยา โข ปน เต, นิคฺโรธ, เอวมสฺส – ‘อนฺเตวาสิกมฺยตา โน สมโณ โคตโม เอวมาหา’ติ. น โข ปเนตํ, นิคฺโรธ, เอวํ ทฏฺฐพฺพํ. โย เอว โว อาจริโย, โส เอว โว อาจริโย โหตุ. สิยา โข ปน เต, นิคฺโรธ, เอวมสฺส – ‘อุทฺเทสา โน จาเวตุกาโม สมโณ โคตโม เอวมาหา’ติ. น โข ปเนตํ, นิคฺโรธ, เอวํ ทฏฺฐพฺพํ. โย เอว โว อุทฺเทโส โส เอว โว อุทฺเทโส โหตุ. สิยา โข ปน เต, นิคฺโรธ, เอวมสฺส – ‘อาชีวา โน จาเวตุกาโม สมโณ โคตโม เอวมาหา’ติ. น โข ปเนตํ, นิคฺโรธ, เอวํ ทฏฺฐพฺพํ. โย เอว โว อาชีโว, โส เอว โว อาชีโว โหตุ. สิยา โข ปน เต, นิคฺโรธ, เอวมสฺส – ‘เย โน ธมฺมา อกุสลา อกุสลสงฺขาตา สาจริยกานํ, เตสุ ปติฏฺฐาเปตุกาโม สมโณ โคตโม เอวมาหา’ติ. น โข ปเนตํ, นิคฺโรธ, เอวํ ทฏฺฐพฺพํ. อกุสลา เจว โว เต ธมฺมา โหนฺตุ อกุสลสงฺขาตา จ สาจริยกานํ. สิยา โข ปน เต[Pg.47], นิคฺโรธ, เอวมสฺส – ‘เย โน ธมฺมา กุสลา กุสลสงฺขาตา สาจริยกานํ, เตหิ วิเวเจตุกาโม สมโณ โคตโม เอวมาหา’ติ. น โข ปเนตํ, นิคฺโรธ, เอวํ ทฏฺฐพฺพํ. กุสลา เจว โว เต ธมฺมา โหนฺตุ กุสลสงฺขาตา จ สาจริยกานํ. อิติ ขฺวาหํ, นิคฺโรธ, เนว อนฺเตวาสิกมฺยตา เอวํ วทามิ, นปิ อุทฺเทสา จาเวตุกาโม เอวํ วทามิ, นปิ อาชีวา จาเวตุกาโม เอวํ วทามิ, นปิ เย โว ธมฺมา อกุสลา อกุสลสงฺขาตา สาจริยกานํ, เตสุ ปติฏฺฐาเปตุกาโม เอวํ วทามิ, นปิ เย โว ธมฺมา กุสลา กุสลสงฺขาตา สาจริยกานํ, เตหิ วิเวเจตุกาโม เอวํ วทามิ. สนฺติ จ โข, นิคฺโรธ, อกุสลา ธมฺมา อปฺปหีนา สํกิเลสิกา โปโนพฺภวิกา สทรา ทุกฺขวิปากา อายตึ ชาติชรามรณิยา, เยสาหํ ปหานาย ธมฺมํ เทเสมิ. ยถาปฏิปนฺนานํ โว สํกิเลสิกา ธมฺมา ปหียิสฺสนฺติ, โวทานียา ธมฺมา อภิวฑฺฒิสฺสนฺติ, ปญฺญาปาริปูรึ เวปุลฺลตฺตญฺจ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหริสฺสถา’’ติ. ७८. “हे निग्रोध, कदाचित तुझ्या मनात असा विचार येईल की, ‘श्रमण गौतम आपल्याला आपले शिष्य बनवण्यासाठी असे म्हणत आहेत.’ परंतु, हे निग्रोध, असे मानू नकोस. जे तुमचे आचार्य आहेत, तेच तुमचे आचार्य राहोत. हे निग्रोध, कदाचित तुझ्या मनात असा विचार येईल की, ‘श्रमण गौतम आपल्याला आपल्या अध्ययनापासून दूर करू इच्छितात म्हणून असे म्हणत आहेत.’ परंतु, हे niग्रोध, असे मानू नकोस. जे तुमचे अध्ययन आहे, तेच तुमचे अध्ययन राहो. हे निग्रोध, कदाचित तुझ्या मनात असा विचार येईल की, ‘श्रमण गौतम आपल्याला आपल्या आजीविकेपासून दूर करू इच्छितात म्हणून असे म्हणत आहेत.’ परंतु, हे निग्रोध, असे मानू नकोस. जी तुमची आजीविका आहे, तीच तुमची आजीविका राहो. हे निग्रोध, कदाचित तुझ्या मनात असा विचार येईल की, ‘तुमच्या आचार्यांसह तुमचे जे अकुशल व अकुशल मानले गेलेले धम्म आहेत, त्यात आपल्याला प्रस्थापित करण्यासाठी श्रमण गौतम असे म्हणत आहेत.’ परंतु, हे निग्रोध, असे मानू नकोस. तुमचे ते अकुशल व अकुशल मानले गेलेले धम्म तुमच्या आचार्यांसह तसेच राहोत. हे निग्रोध, कदाचित तुझ्या मनात असा विचार येईल की, ‘तुमच्या आचार्यांसह तुमचे जे कुशल व कुशल मानले गेलेले धम्म आहेत, त्यापासून आपल्याला दूर करण्यासाठी श्रमण गौतम असे म्हणत आहेत.’ परंतु, हे निग्रोध, असे मानू नकोस. तुमचे ते कुशल व कुशल मानले गेलेले धम्म तुमच्या आचार्यांसह तसेच राहोत. हे निग्रोध, मी तुम्हाला शिष्य बनवण्याच्या इच्छेने असे म्हणत नाही, ना तुमच्या अध्ययनापासून दूर करण्यासाठी, ना तुमच्या आजीविकेपासून दूर करण्यासाठी, ना तुमच्या अकुशल धम्मांमध्ये प्रस्थापित करण्यासाठी, आणि ना तुमच्या कुशल धम्मांपासून तुम्हाला दूर करण्यासाठी असे म्हणत आहे. परंतु, हे निग्रोध, असे काही अकुशल धम्म आहेत जे अद्याप नष्ट झालेले नाहीत, जे संक्लेशकारक (मळकट करणारे) आहेत, पुनर्जन्म देणारे आहेत, संतापजनक आहेत, भविष्यात दुःखद विपाक देणारे आहेत आणि पुढे जन्म, जरा व मरणास कारणीभूत ठरणारे आहेत; त्यांच्या नाशासाठीच मी धम्माचा उपदेश करतो. जर तुम्ही या उपदेशानुसार आचरण केले, तर तुमचे संक्लेशकारक धम्म नष्ट होतील, विशुद्धीकारक धम्मांची वृद्धी होईल आणि तुम्ही याच जन्मात प्रज्ञेची परिपूर्णता व विशालता स्वतःच्या अभिज्ञाने जाणून, साक्षात करून आणि त्यात प्रस्थापित होऊन विहार कराल.” ๗๙. เอวํ วุตฺเต, เต ปริพฺพาชกา ตุณฺหีภูตา มงฺกุภูตา ปตฺตกฺขนฺธา อโธมุขา ปชฺฌายนฺตา อปฺปฏิภานา นิสีทึสุ ยถา ตํ มาเรน ปริยุฏฺฐิตจิตฺตา. อถ โข ภควโต เอตทโหสิ – ‘‘สพฺเพ ปิเม โมฆปุริสา ผุฏฺฐา ปาปิมตา. ยตฺร หิ นาม เอกสฺสปิ น เอวํ ภวิสฺสติ – ‘หนฺท มยํ อญฺญาณตฺถมฺปิ สมเณ โคตเม พฺรหฺมจริยํ จราม, กึ กริสฺสติ สตฺตาโห’’’ติ? อถ โข ภควา อุทุมฺพริกาย ปริพฺพาชการาเม สีหนาทํ นทิตฺวา เวหาสํ อพฺภุคฺคนฺตฺวา คิชฺฌกูเฏ ปพฺพเต ปจฺจุปฏฺฐาสิ. สนฺธาโน ปน คหปติ ตาวเทว ราชคหํ ปาวิสีติ. ७९. असे म्हटले असता, ते परिव्राजक शांत, खिन्न, खांदे पाडलेले, खाली तोंड करून, विचारमग्न आणि निरुत्तर होऊन बसले, जणू काही त्यांचे चित्त माराने ग्रासले होते. तेव्हा भगवंतांच्या मनात विचार आला, ‘हे सर्व मोघपुरुष पापी माराने ग्रस्त झाले आहेत. म्हणूनच यांच्यापैकी एकाच्याही मनात असा विचार आला नाही की—चला, आपण सत्य जाणून घेण्यासाठी श्रमण गौतमांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्याचे आचरण करू या, सात दिवसांत काय बिघडणार आहे?’ त्यानंतर भगवंतांनी उदुंबरिका परिव्राजक आरामात सिंहगर्जना केली आणि आकाशात उड्डाण करून ते गिद्धकूट पर्वतावर जाऊन प्रस्थापित झाले. आणि गृहपती संधान त्याच क्षणी राजगृहात परतले. อุทุมฺพริกสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ ทุติยํ. दुसरे उदुंबरिक सुत्त समाप्त झाले. ๓. จกฺกวตฺติสุตฺตํ ३. चक्कवत्ति सुत्त อตฺตทีปสรณตา स्वतःच स्वतःचे द्वीप व शरण असणे ๘๐. เอวํ [Pg.48] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา มคเธสุ วิหรติ มาตุลายํ. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ภิกฺขโว’’ติ. ‘‘ภทฺทนฺเต’’ติ เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – ‘‘อตฺตทีปา, ภิกฺขเว, วิหรถ อตฺตสรณา อนญฺญสรณา, ธมฺมทีปา ธมฺมสรณา อนญฺญสรณา. กถญฺจ ปน, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อตฺตทีโป วิหรติ อตฺตสรโณ อนญฺญสรโณ, ธมฺมทีโป ธมฺมสรโณ อนญฺญสรโณ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. เวทนาสุ เวทนานุปสฺสี…เป… จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสี…เป… ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อตฺตทีโป วิหรติ อตฺตสรโณ อนญฺญสรโณ, ธมฺมทีโป ธมฺมสรโณ อนญฺญสรโณ. ८०. असे मी ऐकले आहे—एकदा भगवान मगध देशातील मातुल नगरात विहार करत होते. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले, ‘भिक्खूंनो!’ भिक्खूंनी भगवंतांना उत्तर दिले, ‘भदंत!’ भगवान म्हणाले—‘भिक्खूंनो, स्वतःच स्वतःचे द्वीप बना, स्वतःचेच शरण घ्या, दुसऱ्या कोणाचे शरण घेऊ नका; धम्मालाच आपले द्वीप बनवा, धम्माचेच शरण घ्या, दुसऱ्या कशाचेही शरण घेऊ नका. आणि भिक्खूंनो, भिक्खू स्वतःच स्वतःचे द्वीप, स्वतःचेच शरण, दुसऱ्या कोणाचेही शरण न घेता, धम्मालाच आपले द्वीप, धम्माचेच शरण, दुसऱ्या कशाचेही शरण न घेता कसा विहार करतो? येथे, भिक्खूंनो, भिक्खू कायेमध्ये कायेचे अनुदर्शन (कायानुपश्यना) करत, उद्योगी, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान होऊन, लोकांमधील अभिज्झा (लोभ) आणि दोमनस्स (खिन्नता) दूर करून विहार करतो. वेदनांमध्ये वेदनेचे अनुदर्शन करत... चित्तामध्ये चित्ताचे अनुदर्शन करत... धम्मांमध्ये धम्माचे अनुदर्शन करत, उद्योगी, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान होऊन, लोकांमधील अभिज्झा आणि दोमनस्स दूर करून विहार करतो. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे भिक्खू स्वतःच स्वतःचे द्वीप, स्वतःचेच शरण, दुसऱ्या कोणाचेही शरण न घेता, धम्मालाच आपले द्वीप, धम्माचेच शरण, दुसऱ्या कशाचेही शरण न घेता विहार करतो.’ ‘‘โคจเร, ภิกฺขเว, จรถ สเก เปตฺติเก วิสเย. โคจเร, ภิกฺขเว, จรตํ สเก เปตฺติเก วิสเย น ลจฺฉติ มาโร โอตารํ, น ลจฺฉติ มาโร อารมฺมณํ. กุสลานํ, ภิกฺขเว, ธมฺมานํ สมาทานเหตุ เอวมิทํ ปุญฺญํ ปวฑฺฒติ. भिक्खूंनो, तुम्ही स्वतःच्याच क्षेत्रात, आपल्या पूर्वजांच्या भूमीत विहार करा. भिक्खूंनो, स्वतःच्या क्षेत्रात, आपल्या पूर्वजांच्या भूमीत विहार करणाऱ्यांना मार कोणतीही संधी मिळवणार नाही, मार कोणताही आधार मिळवणार नाही. भिक्खूंनो, कुशल धम्मांच्या समादानामुळे अशा प्रकारे हे पुण्य वाढत जाते. ทฬฺหเนมิจกฺกวตฺติราชา चक्रवर्ती राजा दळहनेमी ๘๑. ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, ราชา ทฬฺหเนมิ นาม อโหสิ จกฺกวตฺตี ธมฺมิโก ธมฺมราชา จาตุรนฺโต วิชิตาวี ชนปทตฺถาวริยปฺปตฺโต สตฺตรตนสมนฺนาคโต. ตสฺสิมานิ สตฺต รตนานิ อเหสุํ เสยฺยถิทํ – จกฺกรตนํอุ หตฺถิรตนํ อสฺสรตนํ มณิรตนํ อิตฺถิรตนํ คหปติรตนํ ปริณายกรตนเมว สตฺตมํ. ปโรสหสฺสํ โข ปนสฺส ปุตฺตา อเหสุํ สูรา วีรงฺครูปา ปรเสนปฺปมทฺทนา. โส อิมํ ปถวึ สาครปริยนฺตํ อทณฺเฑน อสตฺเถน ธมฺเมน อภิวิชิย อชฺฌาวสิ. ८१. भिक्खूंनो, प्राचीन काळी दळहनेमी नावाचा एक चक्रवर्ती राजा होऊन गेला, जो धार्मिक, धम्मराजा, चारही दिशांचा विजेता, आपल्या जनपदाला स्थैर्य मिळवून देणारा आणि सात रत्नांनी संपन्न असा होता. त्याच्याकडे ही सात रत्ने होती, ती कोणती? चक्ररत्न, हत्तीरत्न, अश्वरत्न, मणिरत्न, स्त्रीरत्न, गृहपतीरत्न आणि सातवे परिणायकरत्न. त्याला एक हजाराहून अधिक शूर, वीर अंगयष्टी असलेले आणि शत्रूच्या सैन्याचा पराभव करणारे पुत्र होते. त्याने या समुद्रवेढित पृथ्वीवर दंडाशिवाय आणि शस्त्राशिवाय, केवळ धम्माद्वारे विजय मिळवून राज्य केले. ๘๒. ‘‘อถ [Pg.49] โข, ภิกฺขเว, ราชา ทฬฺหเนมิ พหุนฺนํ วสฺสานํ พหุนฺนํ วสฺสสตานํ พหุนฺนํ วสฺสสหสฺสานํ อจฺจเยน อญฺญตรํ ปุริสํ อามนฺเตสิ – ‘ยทา ตฺวํ, อมฺโภ ปุริส, ปสฺเสยฺยาสิ ทิพฺพํ จกฺกรตนํ โอสกฺกิตํ ฐานา จุตํ, อถ เม อาโรเจยฺยาสี’ติ. ‘เอวํ, เทวา’ติ โข, ภิกฺขเว, โส ปุริโส รญฺโญ ทฬฺหเนมิสฺส ปจฺจสฺโสสิ. อทฺทสา โข, ภิกฺขเว, โส ปุริโส พหุนฺนํ วสฺสานํ พหุนฺนํ วสฺสสตานํ พหุนฺนํ วสฺสสหสฺสานํ อจฺจเยน ทิพฺพํ จกฺกรตนํ โอสกฺกิตํ ฐานา จุตํ, ทิสฺวาน เยน ราชา ทฬฺหเนมิ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ราชานํ ทฬฺหเนมึ เอตทโวจ – ‘ยคฺเฆ, เทว, ชาเนยฺยาสิ, ทิพฺพํ เต จกฺกรตนํ โอสกฺกิตํ ฐานา จุต’นฺติ. อถ โข, ภิกฺขเว, ราชา ทฬฺหเนมิ เชฏฺฐปุตฺตํ กุมารํ อามนฺตาเปตฺวา เอตทโวจ – ‘ทิพฺพํ กิร เม, ตาต กุมาร, จกฺกรตนํ โอสกฺกิตํ ฐานา จุตํ. สุตํ โข ปน เมตํ – ยสฺส รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส ทิพฺพํ จกฺกรตนํ โอสกฺกติ ฐานา จวติ, น ทานิ เตน รญฺญา จิรํ ชีวิตพฺพํ โหตีติ. ภุตฺตา โข ปน เม มานุสกา กามา, สมโย ทานิ เม ทิพฺเพ กาเม ปริเยสิตุํ. เอหิ ตฺวํ, ตาต กุมาร, อิมํ สมุทฺทปริยนฺตํ ปถวึ ปฏิปชฺช. อหํ ปน เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาเทตฺวา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสามี’ติ. ८२. त्यानंतर, भिक्खूंनो, अनेक वर्षे, अनेक शतके आणि अनेक सहस्र वर्षे उलटून गेल्यावर राजा दळहनेमीने एका पुरुषाला बोलावून म्हटले—'हे भद्र पुरुषा, जेव्हा तुला दिव्य चक्ररत्न आपल्या स्थानावरून थोडे घसरलेले किंवा च्युत झालेले दिसेल, तेव्हा मला येऊन सांग.' भिक्खूंनो, त्या पुरुषाने राजा दळहनेमीला 'तसेच होईल, महाराज' असे म्हणून होकार दिला. भिक्खूंनो, अनेक वर्षे, अनेक शतके आणि अनेक सहस्र वर्षे उलटून गेल्यावर त्या पुरुषाला ते दिव्य चक्ररत्न आपल्या स्थानावरून थोडे घसरलेले, च्युत झालेले दिसले. ते पाहून तो राजा दळहनेमीकडे गेला आणि राजा दळहनेमीला म्हणाला—'महाराज, आपणास ठाऊक असावे की, आपले दिव्य चक्ररत्न स्थानावरून घसरले आहे, च्युत झाले आहे.' त्यानंतर, भिक्खूंनो, राजा दळहनेमीने आपल्या ज्येष्ठ पुत्राला बोलावून म्हटले—'प्रिय कुमारा, माझे दिव्य चक्ररत्न स्थानावरून घसरले आहे, च्युत झाले आहे, असे ऐकिवात आहे. मी असे ऐकले आहे की, ज्या चक्रवर्ती राजाचे दिव्य चक्ररत्न स्थानावरून घसरते, च्युत होते, तो राजा आता फार काळ जगत नाही. मी मानवी कामभोगांचा उपभोग घेतला आहे, आता मला दिव्य कामभोगांचा शोध घेण्याची वेळ आली आहे. ये, प्रिय कुमारा, तू या समुद्रवेढित पृथ्वीचे शासन सांभाळ. मी मात्र केस आणि दाढी काढून, काषाय वस्त्रे परिधान करून, गृहत्याग करून अनगारिक प्रव्रज्या घेईन.' ๘๓. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, ราชา ทฬฺหเนมิ เชฏฺฐปุตฺตํ กุมารํ สาธุกํ รชฺเช สมนุสาสิตฺวา เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาเทตฺวา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิ. สตฺตาหปพฺพชิเต โข ปน, ภิกฺขเว, ราชิสิมฺหิ ทิพฺพํ จกฺกรตนํ อนฺตรธายิ. ८३. त्यानंतर, भिक्खूंनो, राजा दळहनेमीने आपल्या ज्येष्ठ पुत्राला राज्याभिषेकाविषयी आणि राज्यकारभाराविषयी योग्य प्रकारे उपदेश करून, केस व दाढी काढून, काषाय वस्त्रे परिधान करून, गृहत्याग करून अनगारिक प्रव्रज्या घेतली. भिक्खूंनो, त्या राजर्षीने प्रव्रज्या घेतल्याच्या सातव्या दिवशी ते दिव्य चक्ररत्न अंतर्धान पावले. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, อญฺญตโร ปุริโส เยน ราชา ขตฺติโย มุทฺธาภิสิตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ราชานํ ขตฺติยํ มุทฺธาภิสิตฺตํ เอตทโวจ – ‘ยคฺเฆ, เทว, ชาเนยฺยาสิ, ทิพฺพํ จกฺกรตนํ อนฺตรหิต’นฺติ. อถ โข, ภิกฺขเว, ราชา ขตฺติโย มุทฺธาภิสิตฺโต ทิพฺเพ จกฺกรตเน อนฺตรหิเต อนตฺตมโน อโหสิ, อนตฺตมนตญฺจ ปฏิสํเวเทสิ. โส เยน ราชิสิ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ราชิสึ เอตทโวจ – ‘ยคฺเฆ, เทว, ชาเนยฺยาสิ, ทิพฺพํ จกฺกรตนํ อนฺตรหิต’นฺติ. เอวํ วุตฺเต, ภิกฺขเว, ราชิสิ ราชานํ ขตฺติยํ มุทฺธาภิสิตฺตํ เอตทโวจ – ‘มา โข ตฺวํ, ตาต, ทิพฺเพ [Pg.50] จกฺกรตเน อนฺตรหิเต อนตฺตมโน อโหสิ, มา อนตฺตมนตญฺจ ปฏิสํเวเทสิ, น หิ เต, ตาต, ทิพฺพํ จกฺกรตนํ เปตฺติกํ ทายชฺชํ. อิงฺฆ ตฺวํ, ตาต, อริเย จกฺกวตฺติวตฺเต วตฺตาหิ. ฐานํ โข ปเนตํ วิชฺชติ, ยํ เต อริเย จกฺกวตฺติวตฺเต วตฺตมานสฺส ตทหุโปสเถ ปนฺนรเส สีสํนฺหาตสฺส อุโปสถิกสฺส อุปริปาสาทวรคตสฺส ทิพฺพํ จกฺกรตนํ ปาตุภวิสฺสติ สหสฺสารํ สเนมิกํ สนาภิกํ สพฺพาการปริปูร’นฺติ. त्यानंतर, भिक्खूंनो, एक पुरुष मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजाकडे गेला आणि त्याने मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजाला म्हटले—'महाराज, आपणास ठाऊक असावे की, दिव्य चक्ररत्न अंतर्धान पावले आहे.' भिक्खूंनो, दिव्य चक्ररत्न अंतर्धान पावल्यामुळे तो मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजा अत्यंत दुःखी झाला आणि त्याने आपले दुःख इतरांजवळ व्यक्त केले. तो त्या राजर्षीकडे गेला आणि राजर्षीला म्हणाला—'महाराज, आपणास ठाऊक असावे की, दिव्य चक्ररत्न अंतर्धान पावले आहे.' असे म्हटल्यावर, भिक्खूंनो, राजर्षीने त्या मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजाला म्हटले—'प्रिय वत्सा, दिव्य चक्ररत्न अंतर्धान पावले म्हणून तू दुःखी होऊ नकोस, आणि आपले दुःख इतरांजवळ व्यक्त करू नकोस. कारण, प्रिय वत्सा, हे दिव्य चक्ररत्न तुझा पैतृक वारसा नाही. प्रिय वत्सा, तू आर्य चक्रवर्तीच्या कर्तव्यांचे पालन कर. हे शक्य आहे की, जेव्हा तू आर्य चक्रवर्तीच्या कर्तव्यांचे पालन करत असशील, तेव्हा पंधराव्या दिवशीच्या उपोसथ दिवशी, डोक्यावरून स्नान करून, उपोसथ व्रत पाळत महालाच्या वरच्या मजल्यावर गेलेल्या तुला, एक हजार आरे असलेले, नेमी आणि नाभी यांनी युक्त, सर्व प्रकारे परिपूर्ण असे दिव्य चक्ररत्न प्रकट होईल.' จกฺกวตฺติอริยวตฺตํ चक्रवर्तीचे आर्य कर्तव्य ๘๔. ‘‘‘กตมํ ปน ตํ, เทว, อริยํ จกฺกวตฺติวตฺต’นฺติ? ‘เตน หิ ตฺวํ, ตาต, ธมฺมํเยว นิสฺสาย ธมฺมํ สกฺกโรนฺโต ธมฺมํ ครุํ กโรนฺโต ธมฺมํ มาเนนฺโต ธมฺมํ ปูเชนฺโต ธมฺมํ อปจายมาโน ธมฺมทฺธโช ธมฺมเกตุ ธมฺมาธิปเตยฺโย ธมฺมิกํ รกฺขาวรณคุตฺตึ สํวิทหสฺสุ อนฺโตชนสฺมึ พลกายสฺมึ ขตฺติเยสุ อนุยนฺเตสุ พฺราหฺมณคหปติเกสุ เนคมชานปเทสุ สมณพฺราหฺมเณสุ มิคปกฺขีสุ. มา จ เต, ตาต, วิชิเต อธมฺมกาโร ปวตฺติตฺถ. เย จ เต, ตาต, วิชิเต อธนา อสฺสุ, เตสญฺจ ธนมนุปฺปเทยฺยาสิ. เย จ เต, ตาต, วิชิเต สมณพฺราหฺมณา มทปฺปมาทา ปฏิวิรตา ขนฺติโสรจฺเจ นิวิฏฺฐา เอกมตฺตานํ ทเมนฺติ, เอกมตฺตานํ สเมนฺติ, เอกมตฺตานํ ปรินิพฺพาเปนฺติ, เต กาเลน กาลํ อุปสงฺกมิตฺวา ปริปุจฺเฉยฺยาสิ ปริคฺคณฺเหยฺยาสิ – ‘‘กึ, ภนฺเต, กุสลํ, กึ อกุสลํ, กึ สาวชฺชํ, กึ อนวชฺชํ, กึ เสวิตพฺพํ, กึ น เสวิตพฺพํ, กึ เม กรียมานํ ทีฆรตฺตํ อหิตาย ทุกฺขาย อสฺส, กึ วา ปน เม กรียมานํ ทีฆรตฺตํ หิตาย สุขาย อสฺสา’’ติ? เตสํ สุตฺวา ยํ อกุสลํ ตํ อภินิวชฺเชยฺยาสิ, ยํ กุสลํ ตํ สมาทาย วตฺเตยฺยาสิ. อิทํ โข, ตาต, ตํ อริยํ จกฺกวตฺติวตฺต’นฺติ. ८४. 'पण महाराज, चक्रवर्तीचे ते आर्य कर्तव्य कोणते आहे?' 'तर मग, प्रिय वत्सा, तू धम्माचाच आश्रय घेऊन, धम्माचा आदर करत, धम्माला पूज्य मानत, धम्माचा सन्मान करत, धम्माची पूजा करत, धम्माप्रती नम्र राहत, धम्मालाच आपला ध्वज बनवून, धम्मालाच आपला केतू बनवून, धम्मालाच आपला अधिपती मानून, आपल्या कुटुंबातील लोक, सैन्यदल, क्षत्रिय राजे, मांडलिक, ब्राह्मण व गृहपती, नगरातील व जनपदातील लोक, श्रमण व ब्राह्मण आणि पशू-पक्षी यांच्यासाठी धम्मानुसार योग्य संरक्षण, सुरक्षा व निवारा यांची व्यवस्था कर. प्रिय वत्सा, तुझ्या राज्यात कोणताही अधर्म घडू देऊ नकोस. प्रिय वत्सा, तुझ्या राज्यात जे निर्धन असतील, त्यांना धन प्रदान कर. प्रिय वत्सा, तुझ्या राज्यातील जे श्रमण व ब्राह्मण मद आणि प्रमादापासून अलिप्त आहेत, जे क्षमा आणि सौजन्यामध्ये प्रतिष्ठित आहेत, जे स्वतःच्या मनाचे दमन करतात, स्वतःच्या मनाला शांत करतात, स्वतःच्या मनाला परिनिर्वाण प्राप्त करून देतात, त्यांच्याकडे वेळोवेळी जाऊन विचारपूस कर, त्यांच्याशी चर्चा कर—"भंते, कुशल काय आहे? अकुशल काय आहे? सदोष काय आहे? निर्दोष काय आहे? कशाचे सेवन करावे? कशाचे सेवन करू नये? मी कोणते कृत्य केले असता ते दीर्घकाळापर्यंत माझ्या अहितासाठी व दुःखासाठी ठरेल? किंवा मी कोणते कृत्य केले असता ते दीर्घकाळापर्यंत माझ्या हितासाठी व सुखासाठी ठरेल?" त्यांचे ऐकून घेऊन, जे अकुशल असेल त्याचा त्याग कर आणि जे कुशल असेल त्याचा स्वीकार करून त्यानुसार आचरण कर. प्रिय वत्सा, हेच चक्रवर्तीचे आर्य कर्तव्य आहे.' จกฺกรตนปาตุภาโว दिव्य चक्ररत्नाचा प्रादुर्भाव ๘๕. ‘‘‘เอวํ, เทวา’ติ โข, ภิกฺขเว, ราชา ขตฺติโย มุทฺธาภิสิตฺโต ราชิสิสฺส ปฏิสฺสุตฺวา อริเย จกฺกวตฺติวตฺเต วตฺติ. ตสฺส อริเย จกฺกวตฺติวตฺเต วตฺตมานสฺส ตทหุโปสเถ ปนฺนรเส สีสํนฺหาตสฺส อุโปสถิกสฺส [Pg.51] อุปริปาสาทวรคตสฺส ทิพฺพํ จกฺกรตนํ ปาตุรโหสิ สหสฺสารํ สเนมิกํ สนาภิกํ สพฺพาการปริปูรํ. ทิสฺวาน รญฺโญ ขตฺติยสฺส มุทฺธาภิสิตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘สุตํ โข ปน เมตํ – ยสฺส รญฺโญ ขตฺติยสฺส มุทฺธาภิสิตฺตสฺส ตทหุโปสเถ ปนฺนรเส สีสํนฺหาตสฺส อุโปสถิกสฺส อุปริปาสาทวรคตสฺส ทิพฺพํ จกฺกรตนํ ปาตุภวติ สหสฺสารํ สเนมิกํ สนาภิกํ สพฺพาการปริปูรํ, โส โหติ ราชา จกฺกวตฺตี’ติ. อสฺสํ นุ โข อหํ ราชา จกฺกวตฺตีติ. ८५. भिक्षूंनो, 'तसेच असो, महाराज' असे म्हणून त्या अभिषिक्त क्षत्रिय राजाने राजर्षीचे वचन स्वीकारले आणि तो आर्य चक्रवर्तीच्या कर्तव्यांचे (चक्रवर्ती-व्रताचे) पालन करू लागला. तो आर्य चक्रवर्तीच्या कर्तव्यांचे पालन करत असताना, पंधराव्या दिवशीच्या उपोसथदिनी, डोक्यावरून स्नान करून, उपोसथ व्रत पाळत, आपल्या प्रासादाच्या वरच्या मजल्यावर गेला असता, त्याला हजार आरे असलेले, धाव (नेमी) आणि नाभी (कणा) यांनी युक्त, सर्व प्रकारे परिपूर्ण असे दिव्य चक्ररत्न प्रकट झाले. ते पाहून त्या अभिषिक्त क्षत्रिय राजाच्या मनात असा विचार आला— 'मी असे ऐकले आहे की, ज्या अभिषिक्त क्षत्रिय राजाला पंधराव्या दिवशीच्या उपोसथदिनी, डोक्यावरून स्नान करून, उपोसथ व्रत पाळत, आपल्या प्रासादाच्या वरच्या मजल्यावर गेले असता, हजार आरे असलेले, धाव आणि नाभी यांनी युक्त, सर्व प्रकारे परिपूर्ण असे दिव्य चक्ररत्न प्रकट होते, तो राजा चक्रवर्ती होतो. मग मी खरोखरच चक्रवर्ती राजा झालो आहे काय?' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, ราชา ขตฺติโย มุทฺธาภิสิตฺโต อุฏฺฐายาสนา เอกํสํ อุตราสงฺคํ กริตฺวา วาเมน หตฺเถน ภิงฺการํ คเหตฺวา ทกฺขิเณน หตฺเถน จกฺกรตนํ อพฺภุกฺกิริ – ‘ปวตฺตตุ ภวํ จกฺกรตนํ, อภิวิชินาตุ ภวํ จกฺกรตน’นฺติ. त्यानंतर, भिक्षूंनो, तो अभिषिक्त क्षत्रिय राजा आपल्या आसनावरून उठला, आपले उपरणे एका खांद्यावर घेतले आणि डाव्या हातात सोन्याची झारी धरून, उजव्या हाताने चक्ररत्नावर पाणी शिंपडत म्हणाला— 'हे पूजनीय चक्ररत्न प्रवृत्त होवो (फिरावे), हे पूजनीय चक्ररत्न विजय मिळवो!' ‘‘อถ โข ตํ, ภิกฺขเว, จกฺกรตนํ ปุรตฺถิมํ ทิสํ ปวตฺติ, อนฺวเทว ราชา จกฺกวตฺตี สทฺธึ จตุรงฺคินิยา เสนาย. ยสฺมึ โข ปน, ภิกฺขเว, ปเทเส จกฺกรตนํ ปติฏฺฐาสิ, ตตฺถ ราชา จกฺกวตฺตี วาสํ อุปคจฺฉิ สทฺธึ จตุรงฺคินิยา เสนาย. เย โข ปน, ภิกฺขเว, ปุรตฺถิมาย ทิสาย ปฏิราชาโน, เต ราชานํ จกฺกวตฺตึ อุปสงฺกมิตฺวา เอวมาหํสุ – ‘เอหิ โข, มหาราช, สฺวาคตํ เต มหาราช, สกํ เต, มหาราช, อนุสาส, มหาราชา’ติ. ราชา จกฺกวตฺตี เอวมาห – ‘ปาโณ น หนฺตพฺโพ, อทินฺนํ นาทาตพฺพํ, กาเมสุมิจฺฉา น จริตพฺพา, มุสา น ภาสิตพฺพา, มชฺชํ น ปาตพฺพํ, ยถาภุตฺตญฺจ ภุญฺชถา’ติ. เย โข ปน, ภิกฺขเว, ปุรตฺถิมาย ทิสาย ปฏิราชาโน, เต รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส อนุยนฺตา อเหสุํ. त्यानंतर, भिक्षूंनो, ते चक्ररत्न पूर्व दिशेकडे फिरू लागले आणि चक्रवर्ती राजा आपल्या चतुरंग सेनेसह त्याच्या मागे मागे गेला. भिक्षूंनो, ज्या प्रदेशात ते चक्ररत्न थांबले, तिथे चक्रवर्ती राजाने आपल्या चतुरंग सेनेसह मुक्काम केला. भिक्षूंनो, पूर्व दिशेकडील जे प्रतिराजे होते, त्यांनी चक्रवर्ती राजाकडे येऊन असे म्हटले— 'यावे, महाराज! आपले स्वागत असो, महाराज! हे सर्व आपलेच आहे, महाराज! आपण आमच्यावर शासन करावे, महाराज!' चक्रवर्ती राजाने त्यांना असा उपदेश केला— 'प्राणांची हिंसा करू नये, न दिलेले घेऊ नये, कामभोगांमध्ये व्यभिचार करू नये, असत्य बोलू नये, मद्यपान करू नये आणि पूर्वीप्रमाणेच कर गोळा करून उपभोग घ्या.' भिक्षूंनो, पूर्व दिशेकडील ते प्रतिराजे चक्रवर्ती राजाचे मांडलिक झाले. ๘๖. ‘‘อถ โข ตํ, ภิกฺขเว, จกฺกรตนํ ปุรตฺถิมํ สมุทฺทํ อชฺโฌคาเหตฺวา ปจฺจุตฺตริตฺวา ทกฺขิณํ ทิสํ ปวตฺติ…เป… ทกฺขิณํ สมุทฺทํ อชฺโฌคาเหตฺวา ปจฺจุตฺตริตฺวา ปจฺฉิมํ ทิสํ ปวตฺติ, อนฺวเทว ราชา จกฺกวตฺตี สทฺธึ จตุรงฺคินิยา เสนาย. ยสฺมึ โข ปน, ภิกฺขเว, ปเทเส จกฺกรตนํ ปติฏฺฐาสิ, ตตฺถ ราชา จกฺกวตฺตี วาสํ อุปคจฺฉิ สทฺธึ จตุรงฺคินิยา เสนาย. เย โข ปน, ภิกฺขเว, ปจฺฉิมาย ทิสาย ปฏิราชาโน, เต ราชานํ จกฺกวตฺตึ อุปสงฺกมิตฺวา เอวมาหํสุ – ‘เอหิ โข, มหาราช, สฺวาคตํ เต, มหาราช, สกํ เต, มหาราช, อนุสาส, มหาราชา’ติ. ราชา จกฺกวตฺตี [Pg.52] เอวมาห – ‘ปาโณ น หนฺตพฺโพ, อทินฺนํ นาทาตพฺพํ, กาเมสุมิจฺฉา น จริตพฺพา, มุสา น ภาสิตพฺพา, มชฺชํ น ปาตพฺพํ, ยถาภุตฺตญฺจ ภุญฺชถา’ติ. เย โข ปน, ภิกฺขเว, ปจฺฉิมาย ทิสาย ปฏิราชาโน, เต รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส อนุยนฺตา อเหสุํ. ८६. त्यानंतर, भिक्षूंनो, ते चक्ररत्न पूर्व समुद्रात उतरून, पुन्हा बाहेर पडून दक्षिण दिशेकडे फिरू लागले... (तसेच) दक्षिण समुद्रात उतरून, पुन्हा बाहेर पडून पश्चिम दिशेकडे फिरू लागले. चक्रवर्ती राजा आपल्या चतुरंग सेनेसह त्याच्या मागे मागे गेला. भिक्षूंनो, ज्या प्रदेशात ते चक्ररत्न थांबले, तिथे चक्रवर्ती राजाने आपल्या चतुरंग सेनेसह मुक्काम केला. भिक्षूंनो, पश्चिम दिशेकडील जे प्रतिराजे होते, त्यांनी चक्रवर्ती राजाकडे येऊन असे म्हटले— 'यावे, महाराज! आपले स्वागत असो, महाराज! हे सर्व आपलेच आहे, महाराज! आपण आमच्यावर शासन करावे, महाराज!' चक्रवर्ती राजाने त्यांना असा उपदेश केला— 'प्राणांची हिंसा करू नये, न दिलेले घेऊ नये, कामभोगांमध्ये व्यभिचार करू नये, असत्य बोलू नये, मद्यपान करू नये आणि पूर्वीप्रमाणेच कर गोळा करून उपभोग घ्या.' भिक्षूंनो, पश्चिम दिशेकडील ते प्रतिराजे चक्रवर्ती राजाचे मांडलिक झाले. ๘๗. ‘‘อถ โข ตํ, ภิกฺขเว, จกฺกรตนํ ปจฺฉิมํ สมุทฺทํ อชฺโฌคาเหตฺวา ปจฺจุตฺตริตฺวา อุตฺตรํ ทิสํ ปวตฺติ, อนฺวเทว ราชา จกฺกวตฺตี สทฺธึ จตุรงฺคินิยา เสนาย. ยสฺมึ โข ปน, ภิกฺขเว, ปเทเส จกฺกรตนํ ปติฏฺฐาสิ, ตตฺถ ราชา จกฺกวตฺตี วาสํ อุปคจฺฉิ สทฺธึ จตุรงฺคินิยา เสนาย. เย โข ปน, ภิกฺขเว, อุตฺตราย ทิสาย ปฏิราชาโน, เต ราชานํ จกฺกวตฺตึ อุปสงฺกมิตฺวา เอวมาหํสุ – ‘เอหิ โข, มหาราช, สฺวาคตํ เต, มหาราช, สกํ เต, มหาราช, อนุสาส, มหาราชา’ติ. ราชา จกฺกวตฺตี เอวมาห – ‘ปาโณ น หนฺตพฺโพ, อทินฺนํ นาทาตพฺพํ, กาเมสุมิจฺฉา น จริตพฺพา, มุสา น ภาสิตพฺพา, มชฺชํ น ปาตพฺพํ, ยถาภุตฺตญฺจ ภุญฺชถา’ติ. เย โข ปน, ภิกฺขเว, อุตฺตราย ทิสาย ปฏิราชาโน, เต รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส อนุยนฺตา อเหสุํ. ८७. त्यानंतर, भिक्षूंनो, ते चक्ररत्न पश्चिम समुद्रात उतरून, पुन्हा बाहेर पडून उत्तर दिशेकडे फिरू लागले. चक्रवर्ती राजा आपल्या चतुरंग सेनेसह त्याच्या मागे मागे गेला. भिक्षूंनो, ज्या प्रदेशात ते चक्ररत्न थांबले, तिथे चक्रवर्ती राजाने आपल्या चतुरंग सेनेसह मुक्काम केला. भिक्षूंनो, उत्तर दिशेकडील जे प्रतिराजे होते, त्यांनी चक्रवर्ती राजाकडे येऊन असे म्हटले— 'यावे, महाराज! आपले स्वागत असो, महाराज! हे सर्व आपलेच आहे, महाराज! आपण आमच्यावर शासन करावे, महाराज!' चक्रवर्ती राजाने त्यांना असा उपदेश केला— 'प्राणांची हिंसा करू नये, न दिलेले घेऊ नये, कामभोगांमध्ये व्यभिचार करू नये, असत्य बोलू नये, मद्यपान करू नये आणि पूर्वीप्रमाणेच कर गोळा करून उपभोग घ्या.' भिक्षूंनो, उत्तर दिशेकडील ते प्रतिराजे चक्रवर्ती राजाचे मांडलिक झाले. ‘‘อถ โข ตํ, ภิกฺขเว, จกฺกรตนํ สมุทฺทปริยนฺตํ ปถวึ อภิวิชินิตฺวา ตเมว ราชธานึ ปจฺจาคนฺตฺวา รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส อนฺเตปุรทฺวาเร อตฺถกรณปมุเข อกฺขาหตํ มญฺเญ อฏฺฐาสิ รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส อนฺเตปุรํ อุปโสภยมานํ. त्यानंतर, भिक्षूंनो, ते चक्ररत्न समुद्राच्या सीमेपर्यंतच्या संपूर्ण पृथ्वीवर विजय मिळवून, पुन्हा त्याच राजधानीत परत आले आणि चक्रवर्ती राजाच्या अंतःपुराच्या दाराशी, न्यायनिवाड्याच्या सभागृहाच्या समोर, जणू काही आसाला घट्ट जोडल्यासारखे, चक्रवर्ती राजाच्या अंतःपुराची शोभा वाढवत स्थिर राहिले. ทุติยาทิจกฺกวตฺติกถา दुसऱ्या इत्यादी चक्रवर्ती राजांची कथा ๘๘. ‘‘ทุติโยปิ โข, ภิกฺขเว, ราชา จกฺกวตฺตี…เป… ตติโยปิ โข, ภิกฺขเว, ราชา จกฺกวตฺตี… จตุตฺโถปิ โข, ภิกฺขเว, ราชา จกฺกวตฺตี… ปญฺจโมปิ โข, ภิกฺขเว, ราชา จกฺกวตฺตี… ฉฏฺโฐปิ โข, ภิกฺขเว, ราชา จกฺกวตฺตี… สตฺตโมปิ โข, ภิกฺขเว, ราชา จกฺกวตฺตี พหุนฺนํ วสฺสานํ พหุนฺนํ วสฺสสตานํ พหุนฺนํ วสฺสสหสฺสานํ อจฺจเยน อญฺญตรํ ปุริสํ อามนฺเตสิ – ‘ยทา ตฺวํ, อมฺโภ ปุริส, ปสฺเสยฺยาสิ ทิพฺพํ จกฺกรตนํ โอสกฺกิตํ ฐานา จุตํ, อถ เม อาโรเจยฺยาสี’ติ. ‘เอวํ, เทวา’ติ โข, ภิกฺขเว, โส ปุริโส รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส ปจฺจสฺโสสิ. อทฺทสา โข[Pg.53], ภิกฺขเว, โส ปุริโส พหุนฺนํ วสฺสานํ พหุนฺนํ วสฺสสตานํ พหุนฺนํ วสฺสสหสฺสานํ อจฺจเยน ทิพฺพํ จกฺกรตนํ โอสกฺกิตํ ฐานา จุตํ. ทิสฺวาน เยน ราชา จกฺกวตฺตี เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ราชานํ จกฺกวตฺตึ เอตทโวจ – ‘ยคฺเฆ, เทว, ชาเนยฺยาสิ, ทิพฺพํ เต จกฺกรตนํ โอสกฺกิตํ ฐานา จุต’นฺติ? ८८. भिक्षूंनो, दुसरा चक्रवर्ती राजा देखील... तसेच तिसरा चक्रवर्ती राजा देखील... चौथा चक्रवर्ती राजा देखील... पाचवा चक्रवर्ती राजा देखील... सहावा चक्रवर्ती राजा देखील... सातवा चक्रवर्ती राजा देखील, अनेक वर्षांनंतर, अनेक शतकांनंतर, अनेक सहस्र वर्षांनंतर आपल्या एका सेवकाला बोलावून म्हणाला— 'हे भल्या माणसा, जेव्हा तुला हे दिव्य चक्ररत्न आपल्या स्थानावरून खाली घसरलेले किंवा ढळलेले दिसेल, तेव्हा मला येऊन सांग.' भिक्षूंनो, 'तसेच असो, महाराज' असे म्हणून त्या सेवकाने चक्रवर्ती राजाच्या आज्ञेचे पालन करण्याचे मान्य केले. भिक्षूंनो, अनेक वर्षांनंतर, अनेक शतकांनंतर, अनेक सहस्र वर्षांनंतर त्या सेवकाने ते दिव्य चक्ररत्न आपल्या स्थानावरून खाली घसरलेले, ढळलेले पाहिले. ते पाहून तो चक्रवर्ती राजाकडे गेला आणि त्याला म्हणाला— 'महाराज, आपणास ठाऊक असावे की, आपले दिव्य चक्ररत्न आपल्या स्थानावरून खाली घसरले आहे, ढळले आहे.' ๘๙. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, ราชา จกฺกวตฺตี เชฏฺฐปุตฺตํ กุมารํ อามนฺตาเปตฺวา เอตทโวจ – ‘ทิพฺพํ กิร เม, ตาต กุมาร, จกฺกรตนํ โอสกฺกิตํ, ฐานา จุตํ, สุตํ โข ปน เมตํ – ยสฺส รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส ทิพฺพํ จกฺกรตนํ โอสกฺกติ, ฐานา จวติ, น ทานิ เตน รญฺญา จิรํ ชีวิตพฺพํ โหตีติ. ภุตฺตา โข ปน เม มานุสกา กามา, สมโย ทานิ เม ทิพฺเพ กาเม ปริเยสิตุํ, เอหิ ตฺวํ, ตาต กุมาร, อิมํ สมุทฺทปริยนฺตํ ปถวึ ปฏิปชฺช. อหํ ปน เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาเทตฺวา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสามี’ติ. ८९. त्यानंतर, भिक्खूहो, चक्रवर्ती राजाने आपल्या ज्येष्ठ पुत्राला (राजकुमाराला) बोलावून असे म्हटले – 'प्रिय कुमारा, माझे दिव्य चक्ररत्न आपल्या स्थानावरून घसरले आहे, च्युत झाले आहे. मी असे ऐकले आहे की, ज्या चक्रवर्ती राजाचे दिव्य चक्ररत्न स्थानावरून घसरते, च्युत होते, तो राजा आता फार काळ जगत नाही. मी मानवी कामभोगांचा उपभोग घेतला आहे. आता माझ्यासाठी दिव्य कामभोगांचा शोध घेण्याची वेळ आली आहे. प्रिय कुमारा, ये, तू या समुद्रवेढलेल्या पृथ्वीचे शासन सांभाळ. मी मात्र केस आणि दाढी काढून, काषाय वस्त्रे परिधान करून, घरातून बेघर होऊन अनगारिक (प्रव्रजित) होईन.' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, ราชา จกฺกวตฺตี เชฏฺฐปุตฺตํ กุมารํ สาธุกํ รชฺเช สมนุสาสิตฺวา เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาเทตฺวา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิ. สตฺตาหปพฺพชิเต โข ปน, ภิกฺขเว, ราชิสิมฺหิ ทิพฺพํ จกฺกรตนํ อนฺตรธายิ. त्यानंतर, भिक्खूहो, चक्रवर्ती राजाने आपल्या ज्येष्ठ पुत्राला राज्याभिषेकाविषयी आणि राज्यशासनाविषयी योग्य प्रकारे उपदेश देऊन, केस व दाढी काढून, काषाय वस्त्रे परिधान करून, घरातून बेघर होऊन अनगारिक प्रव्रज्या घेतली. भिक्खूहो, त्या राजर्षीने प्रव्रज्या घेतल्यावर सातव्या दिवशी दिव्य चक्ररत्न अंतर्धान पावले. ๙๐. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, อญฺญตโร ปุริโส เยน ราชา ขตฺติโย มุทฺธาภิสิตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ราชานํ ขตฺติยํ มุทฺธาภิสิตฺตํ เอตทโวจ – ‘ยคฺเฆ, เทว, ชาเนยฺยาสิ, ทิพฺพํ จกฺกรตนํ อนฺตรหิต’นฺติ? อถ โข, ภิกฺขเว, ราชา ขตฺติโย มุทฺธาภิสิตฺโต ทิพฺเพ จกฺกรตเน อนฺตรหิเต อนตฺตมโน อโหสิ. อนตฺตมนตญฺจ ปฏิสํเวเทสิ; โน จ โข ราชิสึ อุปสงฺกมิตฺวา อริยํ จกฺกวตฺติวตฺตํ ปุจฺฉิ. โส สมเตเนว สุทํ ชนปทํ ปสาสติ. ตสฺส สมเตน ชนปทํ ปสาสโต ปุพฺเพนาปรํ ชนปทา น ปพฺพนฺติ, ยถา ตํ ปุพฺพกานํ ราชูนํ อริเย จกฺกวตฺติวตฺเต วตฺตมานานํ. ९०. त्यानंतर, भिक्खूहो, एक मनुष्य ज्या ठिकाणी मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजा होता, तिथे गेला. तिथे जाऊन त्याने मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजाला असे म्हटले – 'महाराज, आपणास ठाऊक असावे की, दिव्य चक्ररत्न अंतर्धान पावले आहे.' तेव्हा, भिक्खूहो, दिव्य चक्ररत्न अंतर्धान पावल्यामुळे मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजा खिन्न (नाखूष) झाला आणि त्याने आपली खिन्नता व्यक्त केली. परंतु, त्याने राजर्षींकडे जाऊन चक्रवर्ती राजाच्या आर्य कर्तव्यांविषयी (चक्रवर्ति-वृत्ताविषयी) विचारले नाही. तो आपल्या स्वतःच्याच बुद्धीने देशाचे शासन करू लागला. स्वतःच्याच बुद्धीने देशाचे शासन करत असताना, त्याचे राज्य पूर्वीसारखे समृद्ध झाले नाही किंवा पुढे वाढले नाही, जसे की पूर्वीच्या चक्रवर्ती राजांच्या आर्य कर्तव्यांचे पालन करणाऱ्या राजांच्या काळात राज्य समृद्ध होत असे. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, อมจฺจา ปาริสชฺชา คณกมหามตฺตา อนีกฏฺฐา โทวาริกา มนฺตสฺสาชีวิโน สนฺนิปติตฺวา ราชานํ ขตฺติยํ มุทฺธาภิสิตฺตํ เอตทโวจุํ – ‘น โข เต, เทว, สมเตน (สุทํ) ชนปทํ ปสาสโต ปุพฺเพนาปรํ [Pg.54] ชนปทา ปพฺพนฺติ, ยถา ตํ ปุพฺพกานํ ราชูนํ อริเย จกฺกวตฺติวตฺเต วตฺตมานานํ. สํวิชฺชนฺติ โข เต, เทว, วิชิเต อมจฺจา ปาริสชฺชา คณกมหามตฺตา อนีกฏฺฐา โทวาริกา มนฺตสฺสาชีวิโน มยญฺเจว อญฺเญ จ เย มยํ อริยํ จกฺกวตฺติวตฺตํ ธาเรม. อิงฺฆ ตฺวํ, เทว, อมฺเห อริยํ จกฺกวตฺติวตฺตํ ปุจฺฉ. ตสฺส เต มยํ อริยํ จกฺกวตฺติวตฺตํ ปุฏฺฐา พฺยากริสฺสามา’ติ. त्यानंतर, भिक्खूहो, अमात्य, सभासद, हिशोबनीस (गणक महामात्र), अंगरक्षक (हत्ती-घोड्यांचे प्रमुख), द्वारपाल आणि सल्लागार (मंत्रोपजीवी) एकत्र आले आणि त्यांनी मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजाला असे म्हटले – 'महाराज, आपण स्वतःच्याच बुद्धीने देशाचे शासन करत असताना, आपले राज्य पूर्वीसारखे समृद्ध होत नाही किंवा पुढे वाढत नाही, जसे की पूर्वीच्या चक्रवर्ती राजांच्या आर्य कर्तव्यांचे पालन करणाऱ्या राजांच्या काळात राज्य समृद्ध होत असे. महाराज, आपल्या राज्यात अमात्य, सभासद, हिशोबनीस, अंगरक्षक, द्वारपाल आणि सल्लागार आहेत, ज्यांच्यामध्ये आम्ही स्वतः आणि इतरही अनेक जण आहोत ज्यांना चक्रवर्ती राजाच्या आर्य कर्तव्यांचे (चक्रवर्ति-वृत्ताचे) ज्ञान आहे. महाराज, आपण आम्हाला चक्रवर्ती राजाच्या आर्य कर्तव्यांविषयी विचारावे. आपण विचारल्यावर आम्ही आपल्याला त्या आर्य कर्तव्यांचे स्पष्टीकरण देऊ.' อายุวณฺณาทิปริยานิกถา आयुष्य, वर्ण इत्यादींच्या ऱ्हासाविषयीचे कथन ๙๑. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, ราชา ขตฺติโย มุทฺธาภิสิตฺโต อมจฺเจ ปาริสชฺเช คณกมหามตฺเต อนีกฏฺเฐ โทวาริเก มนฺตสฺสาชีวิโน สนฺนิปาเตตฺวา อริยํ จกฺกวตฺติวตฺตํ ปุจฺฉิ. ตสฺส เต อริยํ จกฺกวตฺติวตฺตํ ปุฏฺฐา พฺยากรึสุ. เตสํ สุตฺวา ธมฺมิกญฺหิ โข รกฺขาวรณคุตฺตึ สํวิทหิ, โน จ โข อธนานํ ธนมนุปฺปทาสิ. อธนานํ ธเน อนนุปฺปทิยมาเน ทาลิทฺทิยํ เวปุลฺลมคมาสิ. ทาลิทฺทิเย เวปุลฺลํ คเต อญฺญตโร ปุริโส ปเรสํ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยิ. ตเมนํ อคฺคเหสุํ. คเหตฺวา รญฺโญ ขตฺติยสฺส มุทฺธาภิสิตฺตสฺส ทสฺเสสุํ – ‘อยํ, เทว, ปุริโส ปเรสํ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยี’ติ. เอวํ วุตฺเต, ภิกฺขเว, ราชา ขตฺติโย มุทฺธาภิสิตฺโต ตํ ปุริสํ เอตทโวจ – ‘สจฺจํ กิร ตฺวํ, อมฺโภ ปุริส, ปเรสํ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยี’ติ ? ‘สจฺจํ, เทวา’ติ. ‘กึ การณา’ติ? ‘น หิ, เทว, ชีวามี’ติ. อถ โข, ภิกฺขเว, ราชา ขตฺติโย มุทฺธาภิสิตฺโต ตสฺส ปุริสสฺส ธนมนุปฺปทาสิ – ‘อิมินา ตฺวํ, อมฺโภ ปุริส, ธเนน อตฺตนา จ ชีวาหิ, มาตาปิตโร จ โปเสหิ, ปุตฺตทารญฺจ โปเสหิ, กมฺมนฺเต จ ปโยเชหิ, สมณพฺราหฺมเณสุ อุทฺธคฺคิกํ ทกฺขิณํ ปติฏฺฐาเปหิ โสวคฺคิกํ สุขวิปากํ สคฺคสํวตฺตนิก’นฺติ. ‘เอวํ, เทวา’ติ โข, ภิกฺขเว, โส ปุริโส รญฺโญ ขตฺติยสฺส มุทฺธาภิสิตฺตสฺส ปจฺจสฺโสสิ. ९१. त्यानंतर, भिक्खूहो, मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजाने अमात्य, सभासद, हिशोबनीस, अंगरक्षक, द्वारपाल आणि सल्लागार यांना एकत्र बोलावून चक्रवर्ती राजाच्या आर्य कर्तव्यांविषयी विचारले. त्यांनी विचारल्यानुसार राजाला चक्रवर्तीच्या आर्य कर्तव्यांचे स्पष्टीकरण दिले. त्यांचे ऐकून राजाने धार्मिक संरक्षण, आवरण आणि सुरक्षा यांची व्यवस्था केली, परंतु निर्धनांना धन दिले नाही. निर्धनांना धन न मिळाल्यामुळे गरिबी (दारिद्र्य) मोठ्या प्रमाणावर वाढली. गरिबी वाढल्यामुळे एका मनुष्याने दुसऱ्याचे न दिलेले धन चोरीच्या उद्देशाने घेतले (चोरी केली). लोकांनी त्याला पकडले आणि मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजासमोर हजर केले आणि म्हटले – 'महाराज, या मनुष्याने दुसऱ्याचे न दिलेले धन चोरीच्या उद्देशाने घेतले आहे.' असे म्हटल्यावर, भिक्खूहो, मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजाने त्या मनुष्याला विचारले – 'हे मनुष्या, हे खरे आहे का की तू दुसऱ्याचे न दिलेले धन चोरीच्या उद्देशाने घेतले आहेस?' 'होय, महाराज, हे खरे आहे.' 'कोणत्या कारणाने?' 'महाराज, माझ्याकडे उपजीविकेचे साधन नाही.' त्यानंतर, भिक्खूहो, मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजाने त्या मनुष्याला धन दिले आणि म्हटले – 'हे मनुष्या, या धनाने तू स्वतःची उपजीविका कर, माता-पित्यांचे पालनपोषण कर, पत्नी व मुलांचे पालनपोषण कर, उद्योग-व्यवसाय कर आणि श्रमण-ब्राह्मणांना दान दे, जे ऊर्ध्वगामी (उच्च गती देणारे), स्वर्ग देणारे, सुखद विपाक देणारे आणि स्वर्गाप्रत नेणारे ठरेल.' 'फार चांगले, महाराज,' असे म्हणून, भिक्खूहो, त्या मनुष्याने मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजाच्या आज्ञेचा स्वीकार केला. ‘‘อญฺญตโรปิ โข, ภิกฺขเว, ปุริโส ปเรสํ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยิ. ตเมนํ อคฺคเหสุํ. คเหตฺวา รญฺโญ ขตฺติยสฺส มุทฺธาภิสิตฺตสฺส ทสฺเสสุํ – ‘อยํ, เทว, ปุริโส ปเรสํ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยี’ติ. เอวํ วุตฺเต, ภิกฺขเว, ราชา ขตฺติโย มุทฺธาภิสิตฺโต ตํ ปุริสํ เอตทโวจ – ‘สจฺจํ [Pg.55] กิร ตฺวํ, อมฺโภ ปุริส, ปเรสํ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยี’ติ? ‘สจฺจํ, เทวา’ติ. ‘กึ การณา’ติ? ‘น หิ, เทว, ชีวามี’ติ. อถ โข, ภิกฺขเว, ราชา ขตฺติโย มุทฺธาภิสิตฺโต ตสฺส ปุริสสฺส ธนมนุปฺปทาสิ – ‘อิมินา ตฺวํ, อมฺโภ ปุริส, ธเนน อตฺตนา จ ชีวาหิ, มาตาปิตโร จ โปเสหิ, ปุตฺตทารญฺจ โปเสหิ, กมฺมนฺเต จ ปโยเชหิ, สมณพฺราหฺมเณสุ อุทฺธคฺคิกํ ทกฺขิณํ ปติฏฺฐาเปหิ โสวคฺคิกํ สุขวิปากํ สคฺคสํวตฺตนิก’นฺติ. ‘เอวํ, เทวา’ติ โข, ภิกฺขเว, โส ปุริโส รญฺโญ ขตฺติยสฺส มุทฺธาภิสิตฺตสฺส ปจฺจสฺโสสิ. भिक्खूहो, दुसऱ्या एका मनुष्यानेही दुसऱ्याचे न दिलेले धन चोरीच्या उद्देशाने घेतले. लोकांनी त्याला पकडले आणि मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजासमोर हजर केले आणि म्हटले – 'महाराज, या मनुष्याने दुसऱ्याचे न दिलेले धन चोरीच्या उद्देशाने घेतले आहे.' असे म्हटल्यावर, भिक्खूहो, मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजाने त्या मनुष्याला विचारले – 'हे मनुष्या, हे खरे आहे का की तू दुसऱ्याचे न दिलेले धन चोरीच्या उद्देशाने घेतले आहेस?' 'होय, महाराज, हे खरे आहे.' 'कोणत्या कारणाने?' 'महाराज, माझ्याकडे उपजीविकेचे साधन नाही.' त्यानंतर, भिक्खूहो, मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजाने त्या मनुष्याला धन दिले आणि म्हटले – 'हे मनुष्या, या धनाने तू स्वतःची उपजीविका कर, माता-पित्यांचे पालनपोषण कर, पत्नी व मुलांचे पालनपोषण कर, उद्योग-व्यवसाय कर आणि श्रमण-ब्राह्मणांना दान दे, जे ऊर्ध्वगामी (उच्च गती देणारे), स्वर्ग देणारे, सुखद विपाक देणारे आणि स्वर्गाप्रत नेणारे ठरेल.' 'फार चांगले, महाराज,' असे म्हणून, भिक्खूहो, त्या मनुष्याने मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजाच्या आज्ञेचा स्वीकार केला. ๙๒. ‘‘อสฺโสสุํ โข, ภิกฺขเว, มนุสฺสา – ‘เย กิร, โภ, ปเรสํ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยนฺติ, เตสํ ราชา ธนมนุปฺปเทตี’ติ. สุตฺวาน เตสํ เอตทโหสิ – ‘ยํนูน มยมฺปิ ปเรสํ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิเยยฺยามา’ติ. อถ โข, ภิกฺขเว, อญฺญตโร ปุริโส ปเรสํ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยิ. ตเมนํ อคฺคเหสุํ. คเหตฺวา รญฺโญ ขตฺติยสฺส มุทฺธาภิสิตฺตสฺส ทสฺเสสุํ – ‘อยํ, เทว, ปุริโส ปเรสํ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยี’ติ. เอวํ วุตฺเต, ภิกฺขเว, ราชา ขตฺติโย มุทฺธาภิสิตฺโต ตํ ปุริสํ เอตทโวจ – ‘สจฺจํ กิร ตฺวํ, อมฺโภ ปุริส, ปเรสํ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยี’ติ? ‘สจฺจํ, เทวา’ติ. ‘กึ การณา’ติ? ‘น หิ, เทว, ชีวามี’ติ. อถ โข, ภิกฺขเว, รญฺโญ ขตฺติยสฺส มุทฺธาภิสิตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘สเจ โข อหํ โย โย ปเรสํ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยิสฺสติ, ตสฺส ตสฺส ธนมนุปฺปทสฺสามิ, เอวมิทํ อทินฺนาทานํ ปวฑฺฒิสฺสติ. ยํนูนาหํ อิมํ ปุริสํ สุนิเสธํ นิเสเธยฺยํ, มูลฆจฺจํ กเรยฺยํ, สีสมสฺส ฉินฺเทยฺย’นฺติ. อถ โข, ภิกฺขเว, ราชา ขตฺติโย มุทฺธาภิสิตฺโต ปุริเส อาณาเปสิ – ‘เตน หิ, ภเณ, อิมํ ปุริสํ ทฬฺหาย รชฺชุยา ปจฺฉาพาหํ คาฬฺหพนฺธนํ พนฺธิตฺวา ขุรมุณฺฑํ กริตฺวา ขรสฺสเรน ปณเวน รถิกาย รถิกํ สิงฺฆาฏเกน สิงฺฆาฏกํ ปริเนตฺวา ทกฺขิเณน ทฺวาเรน นิกฺขมิตฺวา ทกฺขิณโต นครสฺส สุนิเสธํ นิเสเธถ, มูลฆจฺจํ กโรถ, สีสมสฺส ฉินฺทถา’ติ. ‘เอวํ, เทวา’ติ โข, ภิกฺขเว, เต ปุริสา รญฺโญ ขตฺติยสฺส มุทฺธาภิสิตฺตสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ตํ ปุริสํ ทฬฺหาย รชฺชุยา ปจฺฉาพาหํ คาฬฺหพนฺธนํ พนฺธิตฺวา ขุรมุณฺฑํ กริตฺวา ขรสฺสเรน ปณเวน รถิกาย รถิกํ สิงฺฆาฏเกน สิงฺฆาฏกํ ปริเนตฺวา [Pg.56] ทกฺขิเณน ทฺวาเรน นิกฺขมิตฺวา ทกฺขิณโต นครสฺส สุนิเสธํ นิเสเธสุํ, มูลฆจฺจํ อกํสุ, สีสมสฺส ฉินฺทึสุ. ९२. भिक्खूहो, लोकांनी ऐकले की, 'अहो, जे लोक दुसऱ्यांचे न दिलेले धन चोरीच्या उद्देशाने घेतात, त्यांना राजा धन देतो.' हे ऐकून त्यांच्या मनात विचार आला, 'आम्हीसुद्धा दुसऱ्यांचे न दिलेले धन चोरीच्या उद्देशाने का घेऊ नये?' त्यानंतर, भिक्खूहो, एका माणसाने दुसऱ्याचे न दिलेले धन चोरीच्या उद्देशाने घेतले. लोकांनी त्याला पकडले. पकडून त्यांनी त्याला अभिषिक्त क्षत्रिय राजासमोर हजर केले आणि म्हणाले, 'महाराज, या माणसाने दुसऱ्याचे न दिलेले धन चोरीच्या उद्देशाने घेतले आहे.' असे म्हटल्यावर, भिक्खूहो, अभिषिक्त क्षत्रिय राजाने त्या माणसाला विचारले, 'हे माणसा, हे खरे आहे का की तू दुसऱ्याचे न दिलेले धन चोरीच्या उद्देशाने घेतले आहेस?' 'होय, महाराज, हे खरे आहे.' 'कोणत्या कारणाने?' 'महाराज, माझ्याकडे उपजीविकेचे साधन नाही.' तेव्हा, भिक्खूहो, अभिषिक्त क्षत्रिय राजाच्या मनात विचार आला, 'जर मी जो जो दुसऱ्याचे न दिलेले धन चोरीच्या उद्देशाने घेईल, त्याला त्याला धन देत राहिलो, तर ही चोरी (अदिन्नादान) अधिकाधिक वाढत जाईल. मग मी या माणसाला कडक शिक्षा का करू नये, त्याचा समूळ नाश का करू नये आणि त्याचे मस्तक का कापून टाकू नये?' त्यानंतर, भिक्खूहो, अभिषिक्त क्षत्रिय राजाने आपल्या सेवकांना आज्ञा दिली, 'अरे सेवकांनो, तर मग या माणसाला मजबूत दोरीने पाठीमागे हात बांधून घट्ट बांधा, त्याचे डोके पूर्णपणे मुंडण करा आणि कर्कश आवाजाच्या ढोलाच्या तालावर त्याला एका गल्लीतून दुसऱ्या गल्लीत आणि एका चौकातून दुसऱ्या चौकात फिरवून, दक्षिण दरवाजातून बाहेर नेऊन, नगराच्या दक्षिणेला त्याला कडक शिक्षा करा, त्याचा समूळ नाश करा आणि त्याचे मस्तक कापून टाका!' 'तसेच होईल, महाराज,' असे म्हणून, भिक्खूहो, त्या सेवकांनी अभिषिक्त क्षत्रिय राजाच्या आज्ञेचे पालन केले. त्यांनी त्या माणसाला मजबूत दोरीने पाठीमागे हात बांधून घट्ट बांधले, त्याचे डोके मुंडण केले, कर्कश आवाजाच्या ढोलाच्या तालावर त्याला एका गल्लीतून दुसऱ्या गल्लीत आणि एका चौकातून दुसऱ्या चौकात फिरवले, दक्षिण दरवाजातून बाहेर नेऊन, नगराच्या दक्षिणेला त्याला कडक शिक्षा केली, त्याचा समूळ नाश केला आणि त्याचे मस्तक कापून टाकले. ๙๓. ‘‘อสฺโสสุํ โข, ภิกฺขเว, มนุสฺสา – ‘เย กิร, โภ, ปเรสํ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยนฺติ, เต ราชา สุนิเสธํ นิเสเธติ, มูลฆจฺจํ กโรติ, สีสานิ เตสํ ฉินฺทตี’ติ. สุตฺวาน เตสํ เอตทโหสิ – ‘ยํนูน มยมฺปิ ติณฺหานิ สตฺถานิ การาเปสฺสาม, ติณฺหานิ สตฺถานิ การาเปตฺวา เยสํ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยิสฺสาม, เต สุนิเสธํ นิเสเธสฺสาม, มูลฆจฺจํ กริสฺสาม, สีสานิ เตสํ ฉินฺทิสฺสามา’ติ. เต ติณฺหานิ สตฺถานิ การาเปสุํ, ติณฺหานิ สตฺถานิ การาเปตฺวา คามฆาตมฺปิ อุปกฺกมึสุ กาตุํ, นิคมฆาตมฺปิ อุปกฺกมึสุ กาตุํ, นครฆาตมฺปิ อุปกฺกมึสุ กาตุํ, ปนฺถทุหนมฺปิ อุปกฺกมึสุ กาตุํ. เยสํ เต อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยนฺติ, เต สุนิเสธํ นิเสเธนฺติ, มูลฆจฺจํ กโรนฺติ, สีสานิ เตสํ ฉินฺทนฺติ. ९३. भिक्खूहो, लोकांनी ऐकले की, 'अहो, जे लोक दुसऱ्यांचे न दिलेले धन चोरीच्या उद्देशाने घेतात, त्यांना राजा कडक शिक्षा करतो, त्यांचा समूळ नाश करतो आणि त्यांची मस्तके कापून टाकतो.' हे ऐकून त्यांच्या मनात विचार आला, 'आम्हीसुद्धा धारदार शस्त्रे बनवून का घेऊ नये? धारदार शस्त्रे बनवून घेऊन, आम्ही ज्यांचे न दिलेले धन चोरीच्या उद्देशाने घेऊ, त्यांनाच आम्ही कडक शिक्षा करू, त्यांचा समूळ नाश करू आणि त्यांची मस्तके कापून टाकू.' त्यांनी धारदार शस्त्रे बनवून घेतली. धारदार शस्त्रे बनवून घेऊन त्यांनी गावांवर हल्ले करण्यास, नगरांवर हल्ले करण्यास, महानगरांवर हल्ले करण्यास आणि महामार्गांवर दरोडे घालण्यास सुरुवात केली. ते ज्यांचे न दिलेले धन चोरीच्या उद्देशाने घेत असत, त्यांनाच ते कडक शिक्षा करत, त्यांचा समूळ नाश करत आणि त्यांची मस्तके कापून टाकत. ๙๔. ‘‘อิติ โข, ภิกฺขเว, อธนานํ ธเน อนนุปฺปทิยมาเน ทาลิทฺทิยํ เวปุลฺลมคมาสิ, ทาลิทฺทิเย เวปุลฺลํ คเต อทินฺนาทานํ เวปุลฺลมคมาสิ, อทินฺนาทาเน เวปุลฺลํ คเต สตฺถํ เวปุลฺลมคมาสิ, สตฺเถ เวปุลฺลํ คเต ปาณาติปาโต เวปุลฺลมคมาสิ, ปาณาติปาเต เวปุลฺลํ คเต เตสํ สตฺตานํ อายุปิ ปริหายิ, วณฺโณปิ ปริหายิ. เตสํ อายุนาปิ ปริหายมานานํ วณฺเณนปิ ปริหายมานานํ อสีติวสฺสสหสฺสายุกานํ มนุสฺสานํ จตฺตารีสวสฺสสหสฺสายุกา ปุตฺตา อเหสุํ. ९४. अशा प्रकारे, भिक्खूहो, गरिबांना धन न दिले गेल्यामुळे गरिबी वाढली. गरिबी वाढल्यामुळे चोरी (अदिन्नादान) वाढली. चोरी वाढल्यामुळे शस्त्रांचा वापर वाढला. शस्त्रांचा वापर वाढल्यामुळे प्राणातिपात (जीवहिंसा) वाढला. प्राणातिपात वाढल्यामुळे त्या प्राण्यांचे आयुष्यमान कमी झाले आणि त्यांचे सौंदर्यही नष्ट झाले. त्यांचे आयुष्य आणि सौंदर्य कमी झाल्यामुळे, ज्या माणसांचे आयुष्य ऐंशी हजार वर्षांचे होते, त्यांच्या मुलांचे आयुष्य केवळ चाळीस हजार वर्षांचे झाले. ‘‘จตฺตารีสวสฺสสหสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ อญฺญตโร ปุริโส ปเรสํ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยิ. ตเมนํ อคฺคเหสุํ. คเหตฺวา รญฺโญ ขตฺติยสฺส มุทฺธาภิสิตฺตสฺส ทสฺเสสุํ – ‘อยํ, เทว, ปุริโส ปเรสํ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยี’ติ. เอวํ วุตฺเต, ภิกฺขเว, ราชา ขตฺติโย มุทฺธาภิสิตฺโต ตํ ปุริสํ เอตทโวจ – ‘สจฺจํ กิร ตฺวํ, อมฺโภ ปุริส, ปเรสํ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยี’ติ? ‘น หิ, เทวา’ติ สมฺปชานมุสา อภาสิ. भिक्खूहो, चाळीस हजार वर्षांचे आयुष्य असलेल्या माणसांमध्ये एका माणसाने दुसऱ्याचे न दिलेले धन चोरीच्या उद्देशाने घेतले. लोकांनी त्याला पकडले. पकडून त्यांनी त्याला अभिषिक्त क्षत्रिय राजासमोर हजर केले आणि म्हणाले, 'महाराज, या माणसाने दुसऱ्याचे न दिलेले धन चोरीच्या उद्देशाने घेतले आहे.' असे म्हटल्यावर, भिक्खूहो, अभिषिक्त क्षत्रिय राजाने त्या माणसाला विचारले, 'हे माणसा, हे खरे आहे का की तू दुसऱ्याचे न दिलेले धन चोरीच्या उद्देशाने घेतले आहेस?' 'नाही, महाराज,' असे म्हणून त्याने जाणूनबुजून असत्य (खोटे) सांगितले. ๙๕. ‘‘อิติ [Pg.57] โข, ภิกฺขเว, อธนานํ ธเน อนนุปฺปทิยมาเน ทาลิทฺทิยํ เวปุลฺลมคมาสิ. ทาลิทฺทิเย เวปุลฺลํ คเต อทินฺนาทานํ เวปุลฺลมคมาสิ, อทินฺนาทาเน เวปุลฺลํ คเต สตฺถํ เวปุลฺลมคมาสิ. สตฺเถ เวปุลฺลํ คเต ปาณาติปาโต เวปุลฺลมคมาสิ, ปาณาติปาเต เวปุลฺลํ คเต มุสาวาโท เวปุลฺลมคมาสิ, มุสาวาเท เวปุลฺลํ คเต เตสํ สตฺตานํ อายุปิ ปริหายิ, วณฺโณปิ ปริหายิ. เตสํ อายุนาปิ ปริหายมานานํ วณฺเณนปิ ปริหายมานานํ จตฺตารีสวสฺสสหสฺสายุกานํ มนุสฺสานํ วีสติวสฺสสหสฺสายุกา ปุตฺตา อเหสุํ. ९५. अशा प्रकारे, भिक्खूहो, गरिबांना धन न दिले गेल्यामुळे गरिबी वाढली. गरिबी वाढल्यामुळे चोरी (अदिन्नादान) वाढली. चोरी वाढल्यामुळे शस्त्रांचा वापर वाढला. शस्त्रांचा वापर वाढल्यामुळे प्राणातिपात (जीवहिंसा) वाढला. प्राणातिपात वाढल्यामुळे असत्य बोलणे (मुसावाद) वाढले. असत्य बोलणे वाढल्यामुळे त्या प्राण्यांचे आयुष्यमान कमी झाले आणि त्यांचे सौंदर्यही नष्ट झाले. त्यांचे आयुष्य आणि सौंदर्य कमी झाल्यामुळे, ज्या माणसांचे आयुष्य चाळीस हजार वर्षांचे होते, त्यांच्या मुलांचे आयुष्य केवळ वीस हजार वर्षांचे झाले. ‘‘วีสติวสฺสสหสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ อญฺญตโร ปุริโส ปเรสํ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยิ. ตเมนํ อญฺญตโร ปุริโส รญฺโญ ขตฺติยสฺส มุทฺธาภิสิตฺตสฺส อาโรเจสิ – ‘อิตฺถนฺนาโม, เทว, ปุริโส ปเรสํ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยี’ติ เปสุญฺญมกาสิ. भिक्खूहो, वीस हजार वर्षांचे आयुष्य असलेल्या माणसांमध्ये एका माणसाने दुसऱ्याचे न दिलेले धन चोरीच्या उद्देशाने घेतले. तेव्हा दुसऱ्या एका माणसाने अभिषिक्त क्षत्रिय राजाला जाऊन सांगितले, 'महाराज, अमुक नावाच्या माणसाने दुसऱ्याचे न दिलेले धन चोरीच्या उद्देशाने घेतले आहे,' अशा प्रकारे त्याने चहाडी (पेसुञ्ञ) केली. ๙๖. ‘‘อิติ โข, ภิกฺขเว, อธนานํ ธเน อนนุปฺปทิยมาเน ทาลิทฺทิยํ เวปุลฺลมคมาสิ. ทาลิทฺทิเย เวปุลฺลํ คเต อทินฺนาทานํ เวปุลฺลมคมาสิ, อทินฺนาทาเน เวปุลฺลํ คเต สตฺถํ เวปุลฺลมคมาสิ, สตฺเถ เวปุลฺลํ คเต ปาณาติปาโต เวปุลฺลมคมาสิ, ปาณาติปาเต เวปุลฺลํ คเต มุสาวาโท เวปุลฺลมคมาสิ, มุสาวาเท เวปุลฺลํ คเต ปิสุณา วาจา เวปุลฺลมคมาสิ, ปิสุณาย วาจาย เวปุลฺลํ คตาย เตสํ สตฺตานํ อายุปิ ปริหายิ, วณฺโณปิ ปริหายิ. เตสํ อายุนาปิ ปริหายมานานํ วณฺเณนปิ ปริหายมานานํ วีสติวสฺสสหสฺสายุกานํ มนุสฺสานํ ทสวสฺสสหสฺสายุกา ปุตฺตา อเหสุํ. ९६. “अशा प्रकारे, भिक्खूहो! निर्धनांना धन न दिले गेल्यामुळे दारिद्र्य वाढीस लागले. दारिद्र्य वाढीस लागल्यामुळे अदत्तादान (चोरी) वाढीस लागले. अदत्तादान वाढीस लागल्यामुळे शस्त्र वाढीस लागले. शस्त्र वाढीस लागल्यामुळे प्राणातिपात (जीवहत्या) वाढीस लागला. प्राणातिपात वाढीस लागल्यामुळे मुसावाद (असत्य बोलणे) वाढीस लागला. मुसावाद वाढीस लागल्यामुळे पिसुणा वाचा (चुगली) वाढीस लागली. पिसुणा वाचा वाढीस लागल्यामुळे त्या प्राण्यांचे आयुष्यही क्षीण झाले आणि रूपही क्षीण झाले. त्यांचे आयुष्य आणि रूप क्षीण होत गेल्यामुळे, वीस हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांचे पुत्र दहा हजार वर्षांच्या आयुष्याचे झाले.” ‘‘ทสวสฺสสหสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ เอกิทํ สตฺตา วณฺณวนฺโต โหนฺติ, เอกิทํ สตฺตา ทุพฺพณฺณา. ตตฺถ เย เต สตฺตา ทุพฺพณฺณา, เต วณฺณวนฺเต สตฺเต อภิชฺฌายนฺตา ปเรสํ ทาเรสุ จาริตฺตํ อาปชฺชึสุ. “भिक्खूहो! दहा हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांमध्ये काही लोक रूपवान होते, तर काही कुरूप होते. त्यापैकी जे कुरूप होते, ते रूपवान लोकांचा हेवा (अभिलाषा) करत परस्त्रीगमनाचा (व्यभिचाराचा) मार्ग अवलंबू लागले.” ๙๗. ‘‘อิติ โข, ภิกฺขเว, อธนานํ ธเน อนนุปฺปทิยมาเน ทาลิทฺทิยํ เวปุลฺลมคมาสิ. ทาลิทฺทิเย เวปุลฺลํ คเต…เป… กาเมสุมิจฺฉาจาโร เวปุลฺลมคมาสิ, กาเมสุมิจฺฉาจาเร เวปุลฺลํ คเต เตสํ สตฺตานํ อายุปิ ปริหายิ, วณฺโณปิ ปริหายิ. เตสํ อายุนาปิ ปริหายมานานํ วณฺเณนปิ [Pg.58] ปริหายมานานํ ทสวสฺสสหสฺสายุกานํ มนุสฺสานํ ปญฺจวสฺสสหสฺสายุกา ปุตฺตา อเหสุํ. ९७. “अशा प्रकारे, भिक्खूहो! निर्धनांना धन न दिले गेल्यामुळे दारिद्र्य वाढीस लागले. दारिद्र्य वाढीस लागल्यामुळे... पे... कामेसू मिच्छाचार (व्यभिचार) वाढीस लागला. कामेसू मिच्छाचार वाढीस लागल्यामुळे त्या प्राण्यांचे आयुष्यही क्षीण झाले आणि रूपही क्षीण झाले. त्यांचे आयुष्य आणि रूप क्षीण होत गेल्यामुळे, दहा हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांचे पुत्र पाच हजार वर्षांच्या आयुष्याचे झाले.” ๙๘. ‘‘ปญฺจวสฺสสหสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ ทฺเว ธมฺมา เวปุลฺลมคมํสุ – ผรุสาวาจา สมฺผปฺปลาโป จ. ทฺวีสุ ธมฺเมสุ เวปุลฺลํ คเตสุ เตสํ สตฺตานํ อายุปิ ปริหายิ, วณฺโณปิ ปริหายิ. เตสํ อายุนาปิ ปริหายมานานํ วณฺเณนปิ ปริหายมานานํ ปญฺจวสฺสสหสฺสายุกานํ มนุสฺสานํ อปฺเปกจฺเจ อฑฺฒเตยฺยวสฺสสหสฺสายุกา, อปฺเปกจฺเจ ทฺเววสฺสสหสฺสายุกา ปุตฺตา อเหสุํ. ९८. “भिक्खूहो! पाच हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांमध्ये दोन गोष्टी वाढीस लागल्या – फरुसा वाचा (कठोर बोलणे) आणि संफप्पलाप (व्यर्थ बडबड). या दोन गोष्टी वाढीस लागल्यामुळे त्या प्राण्यांचे आयुष्यही क्षीण झाले आणि रूपही क्षीण झाले. त्यांचे आयुष्य आणि रूप क्षीण होत गेल्यामुळे, पाच हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांचे काही पुत्र अडीच हजार वर्षांच्या आयुष्याचे झाले, तर काही दोन हजार वर्षांच्या आयुष्याचे झाले.” ๙๙. ‘‘อฑฺฒเตยฺยวสฺสสหสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ อภิชฺฌาพฺยาปาทา เวปุลฺลมคมํสุ. อภิชฺฌาพฺยาปาเทสุ เวปุลฺลํ คเตสุ เตสํ สตฺตานํ อายุปิ ปริหายิ, วณฺโณปิ ปริหายิ. เตสํ อายุนาปิ ปริหายมานานํ วณฺเณนปิ ปริหายมานานํ อฑฺฒเตยฺยวสฺสสหสฺสายุกานํ มนุสฺสานํ วสฺสสหสฺสายุกา ปุตฺตา อเหสุํ. ९९. “भिक्खूहो! अडीच हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांमध्ये अभिज्झा (लोभ) आणि व्यापाद (द्वेष) वाढीस लागले. अभिज्झा आणि व्यापाद वाढीस लागल्यामुळे त्या प्राण्यांचे आयुष्यही क्षीण झाले आणि रूपही क्षीण झाले. त्यांचे आयुष्य आणि रूप क्षीण होत गेल्यामुळे, अडीच हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांचे पुत्र एक हजार वर्षांच्या आयुष्याचे झाले.” ๑๐๐. ‘‘วสฺสสหสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ มิจฺฉาทิฏฺฐิ เวปุลฺลมคมาสิ. มิจฺฉาทิฏฺฐิยา เวปุลฺลํ คตาย เตสํ สตฺตานํ อายุปิ ปริหายิ, วณฺโณปิ ปริหายิ. เตสํ อายุนาปิ ปริหายมานานํ วณฺเณนปิ ปริหายมานานํ วสฺสสหสฺสายุกานํ มนุสฺสานํ ปญฺจวสฺสสตายุกา ปุตฺตา อเหสุํ. १००. “भिक्खूहो! एक हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांमध्ये मिच्छादिट्ठी (मिथ्या दृष्टी) वाढीस लागली. मिच्छादिट्ठी वाढीस लागल्यामुळे त्या प्राण्यांचे आयुष्यही क्षीण झाले आणि रूपही क्षीण झाले. त्यांचे आयुष्य आणि रूप क्षीण होत गेल्यामुळे, एक हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांचे पुत्र पाचशे वर्षांच्या आयुष्याचे झाले.” ๑๐๑. ‘‘ปญฺจวสฺสสตายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ ตโย ธมฺมา เวปุลฺลมคมํสุ. อธมฺมราโค วิสมโลโภ มิจฺฉาธมฺโม. ตีสุ ธมฺเมสุ เวปุลฺลํ คเตสุ เตสํ สตฺตานํ อายุปิ ปริหายิ, วณฺโณปิ ปริหายิ. เตสํ อายุนาปิ ปริหายมานานํ วณฺเณนปิ ปริหายมานานํ ปญฺจวสฺสสตายุกานํ มนุสฺสานํ อปฺเปกจฺเจ อฑฺฒเตยฺยวสฺสสตายุกา, อปฺเปกจฺเจ ทฺเววสฺสสตายุกา ปุตฺตา อเหสุํ. १०१. “भिक्खूहो! पाचशे वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांमध्ये तीन गोष्टी वाढीस लागल्या – अधम्मराग (अयोग्य कामवासना), विसमलोभ (अतिलोभ) आणि मिच्छाधम्म (अप्राकृतिक आचरण). या तीन गोष्टी वाढीस लागल्यामुळे त्या प्राण्यांचे आयुष्यही क्षीण झाले आणि रूपही क्षीण झाले. त्यांचे आयुष्य आणि रूप क्षीण होत गेल्यामुळे, पाचशे वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांचे काही पुत्र अडीचशे वर्षांच्या आयुष्याचे झाले, तर काही दोनशे वर्षांच्या आयुष्याचे झाले.” ‘‘อฑฺฒเตยฺยวสฺสสตายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ อิเม ธมฺมา เวปุลฺลมคมํสุ. อมตฺเตยฺยตา อเปตฺเตยฺยตา อสามญฺญตา อพฺรหฺมญฺญตา น กุเล เชฏฺฐาปจายิตา. “भिक्खूहो! अडीचशे वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांमध्ये या गोष्टी वाढीस लागल्या – मातेप्रती आदर न राखणे (अमत्तेय्यता), पित्याप्रती आदर न राखणे (अपेत्तेय्यता), श्रमणांप्रती आदर न राखणे (असामञ्ञता), ब्राह्मणांप्रती आदर न राखणे (अब्रह्मञ्ञता) आणि कुळातील ज्येष्ठांचा आदर न करणे.” ๑๐๒. ‘‘อิติ [Pg.59] โข, ภิกฺขเว, อธนานํ ธเน อนนุปฺปทิยมาเน ทาลิทฺทิยํ เวปุลฺลมคมาสิ. ทาลิทฺทิเย เวปุลฺลํ คเต อทินฺนาทานํ เวปุลฺลมคมาสิ. อทินฺนาทาเน เวปุลฺลํ คเต สตฺถํ เวปุลฺลมคมาสิ. สตฺเถ เวปุลฺลํ คเต ปาณาติปาโต เวปุลฺลมคมาสิ. ปาณาติปาเต เวปุลฺลํ คเต มุสาวาโท เวปุลฺลมคมาสิ. มุสาวาเท เวปุลฺลํ คเต ปิสุณา วาจา เวปุลฺลมคมาสิ. ปิสุณาย วาจาย เวปุลฺลํ คตาย กาเมสุมิจฺฉาจาโร เวปุลฺลมคมาสิ. กาเมสุมิจฺฉาจาเร เวปุลฺลํ คเต ทฺเว ธมฺมา เวปุลฺลมคมํสุ, ผรุสา วาจา สมฺผปฺปลาโป จ. ทฺวีสุ ธมฺเมสุ เวปุลฺลํ คเตสุ อภิชฺฌาพฺยาปาทา เวปุลฺลมคมํสุ. อภิชฺฌาพฺยาปาเทสุ เวปุลฺลํ คเตสุ มิจฺฉาทิฏฺฐิ เวปุลฺลมคมาสิ. มิจฺฉาทิฏฺฐิยา เวปุลฺลํ คตาย ตโย ธมฺมา เวปุลฺลมคมํสุ, อธมฺมราโค วิสมโลโภ มิจฺฉาธมฺโม. ตีสุ ธมฺเมสุ เวปุลฺลํ คเตสุ อิเม ธมฺมา เวปุลฺลมคมํสุ, อมตฺเตยฺยตา อเปตฺเตยฺยตา อสามญฺญตา อพฺรหฺมญฺญตา น กุเล เชฏฺฐาปจายิตา. อิเมสุ ธมฺเมสุ เวปุลฺลํ คเตสุ เตสํ สตฺตานํ อายุปิ ปริหายิ, วณฺโณปิ ปริหายิ. เตสํ อายุนาปิ ปริหายมานานํ วณฺเณนปิ ปริหายมานานํ อฑฺฒเตยฺยวสฺสสตายุกานํ มนุสฺสานํ วสฺสสตายุกา ปุตฺตา อเหสุํ. १०२. “अशा प्रकारे, भिक्खूहो! निर्धनांना धन न दिले गेल्यामुळे दारिद्र्य वाढीस लागले. दारिद्र्य वाढीस लागल्यामुळे अदत्तादान (चोरी) वाढीस लागले. अदत्तादान वाढीस लागल्यामुळे शस्त्र वाढीस लागले. शस्त्र वाढीस लागल्यामुळे प्राणातिपात (जीवहत्या) वाढीस लागला. प्राणातिपात वाढीस लागल्यामुळे मुसावाद (असत्य बोलणे) वाढीस लागला. मुसावाद वाढीस लागल्यामुळे पिसुणा वाचा (चुगली) वाढीस लागली. पिसुणा वाचा वाढीस लागल्यामुळे कामेसू मिच्छाचार (व्यभिचार) वाढीस लागला. कामेसू मिच्छाचार वाढीस लागल्यामुळे दोन गोष्टी वाढीस लागल्या – फरुसा वाचा (कठोर बोलणे) आणि संफप्पलाप (व्यर्थ बडबड). या दोन गोष्टी वाढीस लागल्यामुळे अभिज्झा आणि व्यापाद वाढीस लागले. अभिज्झा आणि व्यापाद वाढीस लागल्यामुळे मिच्छादिट्ठी (मिथ्या दृष्टी) वाढीस लागली. मिच्छादिट्ठी वाढीस लागल्यामुळे तीन गोष्टी वाढीस लागल्या – अधम्मराग, विसमलोभ आणि मिच्छाधम्म. या तीन गोष्टी वाढीस लागल्यामुळे या गोष्टी वाढीस लागल्या – मातेप्रती आदर न राखणे, पित्याप्रती आदर न राखणे, श्रमणांप्रती आदर न राखणे, ब्राह्मणांप्रती आदर न राखणे आणि कुळातील ज्येष्ठांचा आदर न करणे. या गोष्टी वाढीस लागल्यामुळे त्या प्राण्यांचे आयुष्यही क्षीण झाले आणि रूपही क्षीण झाले. त्यांचे आयुष्य आणि रूप क्षीण होत गेल्यामुळे, अडीचशे वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांचे पुत्र शंभर वर्षांच्या आयुष्याचे झाले.” ทสวสฺสายุกสมโย दहा वर्षांच्या आयुष्याचा काळ ๑๐๓. ‘‘ภวิสฺสติ, ภิกฺขเว, โส สมโย, ยํ อิเมสํ มนุสฺสานํ ทสวสฺสายุกา ปุตฺตา ภวิสฺสนฺติ. ทสวสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ ปญฺจวสฺสิกา กุมาริกา อลํปเตยฺยา ภวิสฺสนฺติ. ทสวสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ อิมานิ รสานิ อนฺตรธายิสฺสนฺติ, เสยฺยถิทํ, สปฺปิ นวนีตํ เตลํ มธุ ผาณิตํ โลณํ. ทสวสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ กุทฺรูสโก อคฺคํ โภชนานํ ภวิสฺสติ. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, เอตรหิ สาลิมํโสทโน อคฺคํ โภชนานํ; เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ทสวสฺสายุเกสุ มนุสฺเสสุ กุทฺรูสโก อคฺคํ โภชนานํ ภวิสฺสติ. १०३. “भिक्खूहो! असा एक काळ येईल, जेव्हा या मनुष्यांचे पुत्र केवळ दहा वर्षांच्या आयुष्याचे असतील. भिक्खूहो! दहा वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांमध्ये पाच वर्षांच्या मुली विवाहयोग्य होतील. भिक्खूहो! दहा वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांमध्ये हे उत्तम रस नाहीसे होतील, जसे की – तूप, लोणी, तेल, मध, गूळ आणि मीठ. भिक्खूहो! दहा वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांमध्ये 'कुद्रूसक' (कोद्रूचे अन्न) हेच सर्वात उत्तम भोजन ठरेल. भिक्खूहो! ज्याप्रमाणे आजच्या काळात मांसासह शालिभात हे सर्वात उत्तम भोजन मानले जाते, त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो! दहा वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांमध्ये 'कुद्रूसक' हेच सर्वात उत्तम भोजन ठरेल.” ‘‘ทสวสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ ทส กุสลกมฺมปถา สพฺเพน สพฺพํ อนฺตรธายิสฺสนฺติ, ทส อกุสลกมฺมปถา อติพฺยาทิปฺปิสฺสนฺติ. ทสวสฺสายุเกสุ[Pg.60], ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ กุสลนฺติปิ น ภวิสฺสติ, กุโต ปน กุสลสฺส การโก. ทสวสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ เย เต ภวิสฺสนฺติ อมตฺเตยฺยา อเปตฺเตยฺยา อสามญฺญา อพฺรหฺมญฺญา น กุเล เชฏฺฐาปจายิโน, เต ปุชฺชา จ ภวิสฺสนฺติ ปาสํสา จ. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, เอตรหิ มตฺเตยฺยา เปตฺเตยฺยา สามญฺญา พฺรหฺมญฺญา กุเล เชฏฺฐาปจายิโน ปุชฺชา จ ปาสํสา จ; เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ทสวสฺสายุเกสุ มนุสฺเสสุ เย เต ภวิสฺสนฺติ อมตฺเตยฺยา อเปตฺเตยฺยา อสามญฺญา อพฺรหฺมญฺญา น กุเล เชฏฺฐาปจายิโน, เต ปุชฺชา จ ภวิสฺสนฺติ ปาสํสา จ. भिक्खूहो, दहा वर्षांचे आयुष्य असलेल्या मनुष्यांमध्ये दहा कुशल कर्मपथ पूर्णपणे नाहीसे होतील आणि दहा अकुशल कर्मपथ अत्यंत प्रबळ होतील. भिक्खूहो, दहा वर्षांचे आयुष्य असलेल्या मनुष्यांमध्ये 'कुशल' (पुण्य) असा शब्दही उरणार नाही, मग कुशल कर्म करणारा कोठून असणार? भिक्खूहो, दहा वर्षांचे आयुष्य असलेल्या मनुष्यांमध्ये जे आईचा आदर न करणारे (अमत्तेय्य), वडिलांचा आदर न करणारे (अपत्तेय्य), श्रमणांचा आदर न करणारे (असामण्य), ब्राह्मणांचा आदर न करणारे (अब्रह्मण्य) आणि कुळातील ज्येष्ठांचा मान न राखणारे असतील, तेच पूजनीय आणि प्रशंसनीय ठरतील. भिक्खूहो, ज्याप्रमाणे सध्या आई-वडिलांचा आदर करणारे, श्रमण-ब्राह्मणांचा आदर करणारे आणि कुळातील ज्येष्ठांचा मान राखणारे पूजनीय व प्रशंसनीय ठरतात; त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, दहा वर्षांचे आयुष्य असलेल्या मनुष्यांमध्ये जे आईचा आदर न करणारे, वडिलांचा आदर न करणारे, श्रमणांचा आदर न करणारे, ब्राह्मणांचा आदर न करणारे आणि कुळातील ज्येष्ठांचा मान न राखणारे असतील, तेच पूजनीय व प्रशंसनीय ठरतील. ‘‘ทสวสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ น ภวิสฺสติ มาตาติ วา มาตุจฺฉาติ วา มาตุลานีติ วา อาจริยภริยาติ วา ครูนํ ทาราติ วา. สมฺเภทํ โลโก คมิสฺสติ ยถา อเชฬกา กุกฺกุฏสูกรา โสณสิงฺคาลา. भिक्खूहो, दहा वर्षांचे आयुष्य असलेल्या मनुष्यांमध्ये 'आई', 'मावशी', 'काकी/मामी', 'आचार्यांची पत्नी' किंवा 'गुरुजनांची पत्नी' असा कोणताही आदरयुक्त भेद उरणार नाही. शेळ्या-मेंढ्या, कोंबड्या, डुकरे, कुत्रे आणि कोल्हे यांच्याप्रमाणे हा संसार पूर्णपणे मर्यादाहीन (स्वैराचारी) होईल. ‘‘ทสวสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ เตสํ สตฺตานํ อญฺญมญฺญมฺหิ ติพฺโพ อาฆาโต ปจฺจุปฏฺฐิโต ภวิสฺสติ ติพฺโพ พฺยาปาโท ติพฺโพ มโนปโทโส ติพฺพํ วธกจิตฺตํ. มาตุปิ ปุตฺตมฺหิ ปุตฺตสฺสปิ มาตริ; ปิตุปิ ปุตฺตมฺหิ ปุตฺตสฺสปิ ปิตริ; ภาตุปิ ภคินิยา ภคินิยาปิ ภาตริ ติพฺโพ อาฆาโต ปจฺจุปฏฺฐิโต ภวิสฺสติ ติพฺโพ พฺยาปาโท ติพฺโพ มโนปโทโส ติพฺพํ วธกจิตฺตํ. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, มาควิกสฺส มิคํ ทิสฺวา ติพฺโพ อาฆาโต ปจฺจุปฏฺฐิโต โหติ ติพฺโพ พฺยาปาโท ติพฺโพ มโนปโทโส ติพฺพํ วธกจิตฺตํ; เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ทสวสฺสายุเกสุ มนุสฺเสสุ เตสํ สตฺตานํ อญฺญมญฺญมฺหิ ติพฺโพ อาฆาโต ปจฺจุปฏฺฐิโต ภวิสฺสติ ติพฺโพ พฺยาปาโท ติพฺโพ มโนปโทโส ติพฺพํ วธกจิตฺตํ. มาตุปิ ปุตฺตมฺหิ ปุตฺตสฺสปิ มาตริ; ปิตุปิ ปุตฺตมฺหิ ปุตฺตสฺสปิ ปิตริ; ภาตุปิ ภคินิยา ภคินิยาปิ ภาตริ ติพฺโพ อาฆาโต ปจฺจุปฏฺฐิโต ภวิสฺสติ ติพฺโพ พฺยาปาโท ติพฺโพ มโนปโทโส ติพฺพํ วธกจิตฺตํ. भिक्खूहो, दहा वर्षांचे आयुष्य असलेल्या मनुष्यांमध्ये त्या प्राण्यांमध्ये परस्परांबद्दल तीव्र द्वेष, तीव्र वैर, तीव्र मनाचा प्रदोश (दुष्ट हेतू) आणि तीव्र वध करण्याची बुद्धी (मारण्याची इच्छा) निर्माण होईल. आईची मुलावर आणि मुलाची आईवर; वडिलांची मुलावर आणि मुलाची वडिलांवर; भावाची बहिणीवर आणि बहिणीची भावावर तीव्र द्वेष, तीव्र वैर, तीव्र मनाचा प्रदोश आणि तीव्र वध करण्याची बुद्धी निर्माण होईल. भिक्खूहो, ज्याप्रमाणे एखाद्या व्याधाला (शिकारीला) हरीण पाहून तीव्र द्वेष, तीव्र वैर, तीव्र मनाचा प्रदोश आणि तीव्र मारण्याची इच्छा निर्माण होते; त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, दहा वर्षांचे आयुष्य असलेल्या मनुष्यांमध्ये त्या प्राण्यांमध्ये परस्परांबद्दल तीव्र द्वेष, तीव्र वैर, तीव्र मनाचा प्रदोश आणि तीव्र वध करण्याची बुद्धी निर्माण होईल. आईची मुलावर आणि मुलाची आईवर; वडिलांची मुलावर आणि मुलाची वडिलांवर; भावाची बहिणीवर आणि बहिणीची भावावर तीव्र द्वेष, तीव्र वैर, तीव्र मनाचा प्रदोश आणि तीव्र वध करण्याची बुद्धी निर्माण होईल. ๑๐๔. ‘‘ทสวสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ สตฺตาหํ สตฺถนฺตรกปฺโป ภวิสฺสติ. เต อญฺญมญฺญมฺหิ มิคสญฺญํ ปฏิลภิสฺสนฺติ. เตสํ ติณฺหานิ สตฺถานิ [Pg.61] หตฺเถสุ ปาตุภวิสฺสนฺติ. เต ติณฺเหน สตฺเถน ‘เอส มิโค เอส มิโค’ติ อญฺญมญฺญํ ชีวิตา โวโรเปสฺสนฺติ. १०४. भिक्खूहो, दहा वर्षांचे आयुष्य असलेल्या मनुष्यांमध्ये सात दिवसांचा 'शस्त्रांतरकल्प' (सत्थन्तरकप्प) येईल. ते एकमेकांना वन्य पशू (मृग) समजतील. त्यांच्या हातांमध्ये तीक्ष्ण शस्त्रे प्रकट होतील. ते त्या तीक्ष्ण शस्त्रांनी 'हा पशू आहे, हा पशू आहे' असे म्हणून एकमेकांचे प्राण हरण करतील. ‘‘อถ โข เตสํ, ภิกฺขเว, สตฺตานํ เอกจฺจานํ เอวํ ภวิสฺสติ – ‘มา จ มยํ กญฺจิ, มา จ อมฺเห โกจิ, ยํนูน มยํ ติณคหนํ วา วนคหนํ วา รุกฺขคหนํ วา นทีวิทุคฺคํ วา ปพฺพตวิสมํ วา ปวิสิตฺวา วนมูลผลาหารา ยาเปยฺยามา’ติ. เต ติณคหนํ วา วนคหนํ วา รุกฺขคหนํ วา นทีวิทุคฺคํ วา ปพฺพตวิสมํ วา ปวิสิตฺวา สตฺตาหํ วนมูลผลาหารา ยาเปสฺสนฺติ. เต ตสฺส สตฺตาหสฺส อจฺจเยน ติณคหนา วนคหนา รุกฺขคหนา นทีวิทุคฺคา ปพฺพตวิสมา นิกฺขมิตฺวา อญฺญมญฺญํ อาลิงฺคิตฺวา สภาคายิสฺสนฺติ สมสฺสาสิสฺสนฺติ – ‘ทิฏฺฐา, โภ, สตฺตา ชีวสิ, ทิฏฺฐา, โภ, สตฺตา ชีวสี’ติ. भिक्खूहो, त्यानंतर त्या प्राण्यांपैकी काहींच्या मनात असा विचार येईल – 'आपण कोणालाही मारू नये आणि आपल्यालाही कोणी मारू नये. आपण गवताच्या झाडीत, घनदाट जंगलात, वृक्षांच्या दाटीत, पार करण्यास कठीण अशा नद्यांच्या पात्रात किंवा दुर्गम पर्वतांच्या दऱ्याखोऱ्यात आश्रय घेऊन, जंगलातील कंदमुळे व फळे खाऊन जीवन कंठू या.' ते गवताच्या झाडीत, घनदाट जंगलात, वृक्षांच्या दाटीत, पार करण्यास कठीण अशा नद्यांच्या पात्रात किंवा दुर्गम पर्वतांच्या दऱ्याखोऱ्यात प्रवेश करून सात दिवस जंगलातील कंदमुळे व फळे खाऊन जीवन कंठतील. ते सात दिवस संपल्यानंतर गवताच्या झाडीतून, घनदाट जंगलातून, वृक्षांच्या दाटीतून, नद्यांच्या पात्रातून आणि दुर्गम पर्वतांच्या दऱ्याखोऱ्यातून बाहेर पडतील आणि एकमेकांना मिठी मारून आनंद व्यक्त करतील व एकमेकांना धीर देत म्हणतील – 'हे मित्रा! सुदैवाने तू जिवंत आहेस! हे मित्रा! सुदैवाने तू जिवंत आहेस!' อายุวณฺณาทิวฑฺฒนกถา आयुष्य, वर्ण (सौंदर्य) इत्यादींच्या वृद्धीची कथा ๑๐๕. ‘‘อถ โข เตสํ, ภิกฺขเว, สตฺตานํ เอวํ ภวิสฺสติ – ‘มยํ โข อกุสลานํ ธมฺมานํ สมาทานเหตุ เอวรูปํ อายตํ ญาติกฺขยํ ปตฺตา. ยํนูน มยํ กุสลํ กเรยฺยาม. กึ กุสลํ กเรยฺยาม? ยํนูน มยํ ปาณาติปาตา วิรเมยฺยาม, อิทํ กุสลํ ธมฺมํ สมาทาย วตฺเตยฺยามา’ติ. เต ปาณาติปาตา วิรมิสฺสนฺติ, อิทํ กุสลํ ธมฺมํ สมาทาย วตฺติสฺสนฺติ. เต กุสลานํ ธมฺมานํ สมาทานเหตุ อายุนาปิ วฑฺฒิสฺสนฺติ, วณฺเณนปิ วฑฺฒิสฺสนฺติ. เตสํ อายุนาปิ วฑฺฒมานานํ วณฺเณนปิ วฑฺฒมานานํ ทสวสฺสายุกานํ มนุสฺสานํ วีสติวสฺสายุกา ปุตฺตา ภวิสฺสนฺติ. १०५. भिक्खूहो, त्यानंतर त्या प्राण्यांच्या मनात असा विचार येईल – 'अकुशल धर्मांचे आचरण केल्यामुळेच आपण आपल्या नातेवाईकांच्या अशा मोठ्या विनाशाला सामोरे गेलो आहोत. आता आपण काहीतरी कुशल (चांगले) कर्म करायला हवे. आपण कोणते कुशल कर्म करावे? आपण प्राणातिपातापासून (जीवहिंसेपासून) अलिप्त राहायला हवे, या कुशल धर्माचे ग्रहण करून त्याचे आचरण करायला हवे.' मग ते जीवहिंसेपासून अलिप्त राहतील आणि या कुशल धर्माचे ग्रहण करून त्याचे आचरण करतील. कुशल धर्मांचे आचरण केल्यामुळे त्यांचे आयुष्यही वाढेल आणि वर्ण (सौंदर्य) देखील वाढेल. आयुष्य आणि वर्ण वाढत असलेल्या त्या दहा वर्षांचे आयुष्य असलेल्या मनुष्यांचे पुत्र वीस वर्षांच्या आयुष्याचे होतील. ‘‘อถ โข เตสํ, ภิกฺขเว, สตฺตานํ เอวํ ภวิสฺสติ – ‘มยํ โข กุสลานํ ธมฺมานํ สมาทานเหตุ อายุนาปิ วฑฺฒาม, วณฺเณนปิ วฑฺฒาม. ยํนูน มยํ ภิยฺโยโสมตฺตาย กุสลํ กเรยฺยาม. กึ กุสลํ กเรยฺยาม? ยํนูน มยํ อทินฺนาทานา วิรเมยฺยาม… กาเมสุมิจฺฉาจารา วิรเมยฺยาม… มุสาวาทา วิรเมยฺยาม… ปิสุณาย วาจาย วิรเมยฺยาม… ผรุสาย วาจาย วิรเมยฺยาม… สมฺผปฺปลาปา วิรเมยฺยาม… อภิชฺฌํ ปชเหยฺยาม… พฺยาปาทํ ปชเหยฺยาม… มิจฺฉาทิฏฺฐึ ปชเหยฺยาม… ตโย ธมฺเม ปชเหยฺยาม – อธมฺมราคํ วิสมโลภํ มิจฺฉาธมฺมํ… ยํนูน มยํ มตฺเตยฺยา อสฺสาม เปตฺเตยฺยา สามญฺญา พฺรหฺมญฺญา กุเล เชฏฺฐาปจายิโน, อิทํ กุสลํ ธมฺมํ สมาทาย วตฺเตยฺยามา’ติ. เต มตฺเตยฺยา ภวิสฺสนฺติ เปตฺเตยฺยา สามญฺญา [Pg.62] พฺรหฺมญฺญา กุเล เชฏฺฐาปจายิโน, อิทํ กุสลํ ธมฺมํ สมาทาย วตฺติสฺสนฺติ. भिक्खूहो, त्यानंतर त्या प्राण्यांच्या मनात असा विचार येईल – 'कुशल धर्मांचे आचरण केल्यामुळे आपले आयुष्यही वाढत आहे आणि वर्णही वाढत आहे. आता आपण आणखी मोठ्या प्रमाणावर कुशल कर्मे करायला हवीत. आपण कोणते कुशल कर्म करावे? आपण अदित्नादानापासून (चोरीपासून) अलिप्त राहायला हवे... कामेसू मिच्छाचारापासून (व्यभिचारापासून) अलिप्त राहायला हवे... मुसावादापासून (असत्य बोलण्यापासून) अलिप्त राहायला हवे... पिसुणाय वाचेपासून (चहाडी करण्यापासून) अलिप्त राहायला हवे... फरुसाय वाचेपासून (कठोर बोलण्यापासून) अलिप्त राहायला हवे... सम्फप्पलापापासून (व्यर्थ बडबडीपासून) अलिप्त राहायला हवे... अभिझ्झेचा (लोभाचा) त्याग करायला हवा... व्यापादाचा (द्वेषाचा) त्याग करायला हवा... मिच्छादिट्ठीचा (मिथ्या दृष्टीचा) त्याग करायला हवा... अधम्मराग (अनैतिक कामवासना), विसमलोभ (अतिलोभ) आणि मिच्छाधम्म (अप्राकृतिक कामवासना) या तीन अयोग्य धर्मांचा त्याग करायला हवा... आपण आईचा आदर करणारे (मत्तेय्य), वडिलांचा आदर करणारे (पत्तेय्य), श्रमणांचा आदर करणारे (सामण्य), ब्राह्मणांचा आदर करणारे (ब्रह्मण्य) आणि कुळातील ज्येष्ठांचा मान राखणारे बनायला हवे, या कुशल धर्माचे ग्रहण करून त्याचे आचरण करायला हवे.' मग ते आईचा आदर करणारे, वडिलांचा आदर करणारे, श्रमणांचा आदर करणारे, ब्राह्मणांचा आदर करणारे आणि कुळातील ज्येष्ठांचा मान राखणारे बनतील आणि या कुशल धर्माचे ग्रहण करून त्याचे आचरण करतील. ‘‘เต กุสลานํ ธมฺมานํ สมาทานเหตุ อายุนาปิ วฑฺฒิสฺสนฺติ, วณฺเณนปิ วฑฺฒิสฺสนฺติ. เตสํ อายุนาปิ วฑฺฒมานานํ วณฺเณนปิ วฑฺฒมานานํ วีสติวสฺสายุกานํ มนุสฺสานํ จตฺตารีสวสฺสายุกา ปุตฺตา ภวิสฺสนฺติ… จตฺตารีสวสฺสายุกานํ มนุสฺสานํ อสีติวสฺสายุกา ปุตฺตา ภวิสฺสนฺติ… อสีติวสฺสายุกานํ มนุสฺสานํ สฏฺฐิวสฺสสตายุกา ปุตฺตา ภวิสฺสนฺติ… สฏฺฐิวสฺสสตายุกานํ มนุสฺสานํ วีสติติวสฺสสตายุกา ปุตฺตา ภวิสฺสนฺติ… วีสติติวสฺสสตายุกานํ มนุสฺสานํ จตฺตารีสฉพฺพสฺสสตายุกา ปุตฺตา ภวิสฺสนฺติ. จตฺตารีสฉพฺพสฺสสตายุกานํ มนุสฺสานํ ทฺเววสฺสสหสฺสายุกา ปุตฺตา ภวิสฺสนฺติ… ทฺเววสฺสสหสฺสายุกานํ มนุสฺสานํ จตฺตาริวสฺสสหสฺสายุกา ปุตฺตา ภวิสฺสนฺติ… จตฺตาริวสฺสสหสฺสายุกานํ มนุสฺสานํ อฏฺฐวสฺสสหสฺสายุกา ปุตฺตา ภวิสฺสนฺติ… อฏฺฐวสฺสสหสฺสายุกานํ มนุสฺสานํ วีสติวสฺสสหสฺสายุกา ปุตฺตา ภวิสฺสนฺติ… วีสติวสฺสสหสฺสายุกานํ มนุสฺสานํ จตฺตารีสวสฺสสหสฺสายุกา ปุตฺตา ภวิสฺสนฺติ… จตฺตารีสวสฺสสหสฺสายุกานํ มนุสฺสานํ อสีติวสฺสสหสฺสายุกา ปุตฺตา ภวิสฺสนฺติ… อสีติวสฺสสหสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ ปญฺจวสฺสสติกา กุมาริกา อลํปเตยฺยา ภวิสฺสนฺติ. “कुशल धर्मांचे आचरण केल्यामुळे ते लोक आयुष्याने देखील वाढतील आणि वर्णाने (सौंदर्याने) देखील वाढतील. आयुष्याने आणि वर्णाने वाढणाऱ्या त्या वीस वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांचे पुत्र चाळीस वर्षांच्या आयुष्याचे होतील... चाळीस वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांचे पुत्र ऐंशी वर्षांच्या आयुष्याचे होतील... ऐंशी वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांचे पुत्र एकशे साठ वर्षांच्या आयुष्याचे होतील... एकशे साठ वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांचे पुत्र तीनशे वीस वर्षांच्या आयुष्याचे होतील... तीनशे वीस वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांचे पुत्र सहाशे चाळीस वर्षांच्या आयुष्याचे होतील. सहाशे चाळीस वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांचे पुत्र दोन हजार वर्षांच्या आयुष्याचे होतील... दोन हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांचे पुत्र चार हजार वर्षांच्या आयुष्याचे होतील... चार हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांचे पुत्र आठ हजार वर्षांच्या आयुष्याचे होतील... आठ हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांचे पुत्र वीस हजार वर्षांच्या आयुष्याचे होतील... वीस हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांचे पुत्र चाळीस हजार वर्षांच्या आयुष्याचे होतील... चाळीस हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांचे पुत्र ऐंशी हजार वर्षांच्या आयुष्याचे होतील. भिक्षूहो, ऐंशी हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांमध्ये पाचशे वर्षांच्या कुमारिका विवाहासाठी योग्य होतील.” สงฺขราชอุปฺปตฺติ शंख चक्रवर्ती राजाचा उदय ๑๐๖. ‘‘อสีติวสฺสสหสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ ตโย อาพาธา ภวิสฺสนฺติ, อิจฺฉา, อนสนํ, ชรา. อสีติวสฺสสหสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ อยํ ชมฺพุทีโป อิทฺโธ เจว ภวิสฺสติ ผีโต จ, กุกฺกุฏสมฺปาติกา คามนิคมราชธานิโย. อสีติวสฺสสหสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ อยํ ชมฺพุทีโป อวีจิ มญฺเญ ผุโฏ ภวิสฺสติ มนุสฺเสหิ, เสยฺยถาปิ นฬวนํ วา สรวนํ วา. อสีติวสฺสสหสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ อยํ พาราณสี เกตุมตี นาม ราชธานี ภวิสฺสติ อิทฺธา เจว ผีตา จ พหุชนา จ อากิณฺณมนุสฺสา จ สุภิกฺขา จ. อสีติวสฺสสหสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ [Pg.63] อิมสฺมึ ชมฺพุทีเป จตุราสีตินครสหสฺสานิ ภวิสฺสนฺติ เกตุมตีราชธานีปมุขานิ. อสีติวสฺสสหสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ เกตุมติยา ราชธานิยา สงฺโข นาม ราชา อุปฺปชฺชิสฺสติ จกฺกวตฺตี ธมฺมิโก ธมฺมราชา จาตุรนฺโต วิชิตาวี ชนปทตฺถาวริยปฺปตฺโต สตฺตรตนสมนฺนาคโต. ตสฺสิมานิ สตฺต รตนานิ ภวิสฺสนฺติ, เสยฺยถิทํ, จกฺกรตนํ หตฺถิรตนํ อสฺสรตนํ มณิรตนํ อิตฺถิรตนํ คหปติรตนํ ปริณายกรตนเมว สตฺตมํ. ปโรสหสฺสํ โข ปนสฺส ปุตฺตา ภวิสฺสนฺติ สูรา วีรงฺครูปา ปรเสนปฺปมทฺทนา. โส อิมํ ปถวึ สาครปริยนฺตํ อทณฺเฑน อสตฺเถน ธมฺเมน อภิวิชิย อชฺฌาวสิสฺสติ. १०६. “भिक्षूहो, ऐंशी हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांमध्ये केवळ तीनच आजार असतील: इच्छा (भोजनाची लालसा), अनशन (भूक/अन्नाचा अभाव) आणि जरा (वृद्धत्व). भिक्षूहो, ऐंशी हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांच्या काळात हा जम्बुद्वीप समृद्ध आणि संपन्न होईल; गावे, नगरे आणि राजधानीची शहरे इतकी जवळ असतील की कोंबडी एका छपरावरून दुसऱ्या छपरावर उडून जाऊ शकेल. भिक्षूहो, ऐंशी हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांच्या काळात हा जम्बुद्वीप मनुष्यांनी इतका गजबजलेला असेल की जणू काही अवीची महानरकच, जसे की बोरूचे किंवा गवताचे रान बोरू आणि गवताने गच्च भरलेले असते. भिक्षूहो, ऐंशी हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांच्या काळात ही वाराणसी ‘केतुमती’ नावाची राजधानी होईल, जी समृद्ध, संपन्न, लोकसंख्या जास्त असलेली, विविध प्रकारच्या मनुष्यांनी गजबजलेली आणि सुभिक्ष (अन्नधान्याची सुबत्ता असलेली) असेल. भिक्षूहो, ऐंशी हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांच्या काळात या जम्बुद्वीपात केतुमती राजधानी प्रमुख असलेली चौऱ्याऐंशी हजार नगरे असतील. भिक्षूहो, ऐंशी हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांच्या काळात केतुमती राजधानीमध्ये ‘शंख’ नावाचा राजा उत्पन्न होईल, जो चक्रवर्ती, धार्मिक, धर्मराजा, चारही दिशांचा विजेता, शत्रूंवर विजय मिळवणारा, जनपदांमध्ये स्थैर्य प्रस्थापित करणारा आणि सात रत्नांनी युक्त असेल. त्याच्याकडे ही सात रत्ने असतील, ती म्हणजे: चक्ररत्न, हत्तीरत्न, अश्वरत्न, मणिरत्न, स्त्रीरत्न, गृहपतीरत्न आणि सातवे परिणायकरत्न (सेनापतीरत्न). त्याला एक हजाराहून अधिक पुत्र असतील, जे शूर, वीर अंगयष्टीचे आणि परकीय सैन्याचा पाडाव करणारे असतील. तो समुद्रापर्यंत पसरलेल्या या पृथ्वीवर दंडाशिवाय, शस्त्राशिवाय, धर्माने विजय मिळवून राज्य करेल.” เมตฺเตยฺยพุทฺธุปฺปาโท मैत्रेय बुद्धांचा उदय ๑๐๗. ‘‘อสีติวสฺสสหสฺสายุเกสุ, ภิกฺขเว, มนุสฺเสสุ เมตฺเตยฺโย นาม ภควา โลเก อุปฺปชฺชิสฺสติ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน สุคโต โลกวิทู อนุตฺตโร ปุริสทมฺมสารถิ สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา. เสยฺยถาปาหเมตรหิ โลเก อุปฺปนฺโน อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน สุคโต โลกวิทู อนุตฺตโร ปุริสทมฺมสารถิ สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา. โส อิมํ โลกํ สเทวกํ สมารกํ สพฺรหฺมกํ สสฺสมณพฺราหฺมณึ ปชํ สเทวมนุสฺสํ สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา ปเวเทสฺสติ, เสยฺยถาปาหเมตรหิ อิมํ โลกํ สเทวกํ สมารกํ สพฺรหฺมกํ สสฺสมณพฺราหฺมณึ ปชํ สเทวมนุสฺสํ สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา ปเวเทมิ. โส ธมฺมํ เทเสสฺสติ อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสสฺสติ; เสยฺยถาปาหเมตรหิ ธมฺมํ เทเสมิ อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสมิ. โส อเนกสหสฺสํ ภิกฺขุสํฆํ ปริหริสฺสติ, เสยฺยถาปาหเมตรหิ อเนกสตํ ภิกฺขุสํฆํ ปริหรามิ. १०७. “भिक्षूहो, ऐंशी हजार वर्षांचे आयुष्य असणाऱ्या मनुष्यांच्या काळात जगात ‘मैत्रेय’ नावाचे भगवान उत्पन्न होतील, जे अर्हत, सम्यक्संबुद्ध, विद्याचरणसंपन्न, सुगत, लोकविदू, अनुत्तर पुरुषदम्यसारथी, देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध आणि भगवान असतील. जसा मी आता या जगात उत्पन्न झालो आहे—अर्हत, सम्यक्संबुद्ध, विद्याचरणसंपन्न, सुगत, लोकविदू, अनुत्तर पुरुषदम्यसारथी, देव आणि मनुष्यांचा शास्ता, बुद्ध आणि भगवान. ते देव, मार आणि ब्रह्मासहित या लोकाला, श्रमण-ब्राह्मणांसह या प्रजेला, देव आणि मनुष्यांसह स्वतः अभिज्ञा (विशिष्ट ज्ञानाने) जाणून, साक्षात करून प्रकाशित करतील; जसा मी आता देव, मार आणि ब्रह्मासहित या लोकाला, श्रमण-ब्राह्मणांसह या प्रजेला, देव आणि मनुष्यांसह स्वतः अभिज्ञा जाणून, साक्षात करून प्रकाशित करत आहे. ते आदि-कल्याण (सुरुवातीला कल्याणकारी), मध्य-कल्याण (मध्ये कल्याणकारी), परियोसान-कल्याण (शेवटी कल्याणकारी), अर्थयुक्त, व्यंजनयुक्त (सुस्पष्ट शब्दांत), केवळ परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचा उपदेश करतील आणि ते प्रकाशित करतील; जसा मी आता आदि-कल्याण, मध्य-कल्याण, परियोसान-कल्याण, अर्थयुक्त, व्यंजनयुक्त, केवळ परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचा उपदेश करतो आणि प्रकाशित करतो. ते अनेक हजार भिक्षूंच्या संघाचे नेतृत्व करतील, जसा मी आता अनेक शेकडो भिक्षूंच्या संघाचे नेतृत्व करतो.” ๑๐๘. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, สงฺโข นาม ราชา โย โส ยูโป รญฺญา มหาปนาเทน การาปิโต. ตํ ยูปํ อุสฺสาเปตฺวา อชฺฌาวสิตฺวา ตํ ทตฺวา [Pg.64] วิสฺสชฺชิตฺวา สมณพฺราหฺมณกปณทฺธิกวณิพฺพกยาจกานํ ทานํ ทตฺวา เมตฺเตยฺยสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส สนฺติเก เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาเทตฺวา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสติ. โส เอวํ ปพฺพชิโต สมาโน เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรนฺโต นจิรสฺเสว ยสฺสตฺถาย กุลปุตฺตา สมฺมเทว อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชนฺติ, ตทนุตฺตรํ พฺรหฺมจริยปริโยสานํ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหริสฺสติ. १०८. “त्यानंतर, भिक्षूहो, शंख नावाचा राजा, जो महापनाद राजाने बांधलेला प्रासाद (यूप) होता, तो प्रासाद पुन्हा उभा करून, त्यात राहून, नंतर तो दान देऊन आणि त्याचा त्याग करून, श्रमण, ब्राह्मण, गरीब, प्रवासी, भिकारी आणि याचकांना दान देऊन, भगवान अर्हत सम्यक्संबुद्ध मैत्रेय यांच्या सन्निध आपले केस व दाढी काढून, काषाय वस्त्रे परिधान करून, घरातून बेघर होऊन प्रव्रज्या ग्रहण करेल. तो अशा प्रकारे प्रव्रजित होऊन, एकटा, एकांतात, अप्रमत्त (जागरूक), उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहरत असताना, ज्या ध्येयासाठी कुलपुत्र योग्य प्रकारे घरातून बेघर होऊन प्रव्रजित होतात, ते अनुत्तर ब्रह्मचर्याचे अंतिम फळ (अर्हत्व) याच जन्मात स्वतः अभिज्ञा जाणून, साक्षात करून आणि त्यात प्रतिष्ठित होऊन विहरेल.” ๑๐๙. ‘‘อตฺตทีปา, ภิกฺขเว, วิหรถ อตฺตสรณา อนญฺญสรณา, ธมฺมทีปา ธมฺมสรณา อนญฺญสรณา. กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อตฺตทีโป วิหรติ อตฺตสรโณ อนญฺญสรโณ ธมฺมทีโป ธมฺมสรโณ อนญฺญสรโณ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. เวทนาสุ เวทนานุปสฺสี…เป… จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสี…เป… ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อตฺตทีโป วิหรติ อตฺตสรโณ อนญฺญสรโณ ธมฺมทีโป ธมฺมสรโณ อนญฺญสรโณ. १०९. “भिक्षूहो, स्वतःचेच द्वीप (आश्रय) बना, स्वतःचेच शरण घ्या, दुसऱ्या कोणाचे शरण घेऊ नका; धर्माचे द्वीप बना, धर्माचे शरण घ्या, दुसऱ्या कशाचे शरण घेऊ नका. आणि भिक्षूहो, भिक्षू स्वतःचे द्वीप कसा बनतो, स्वतःचे शरण कसा घेतो, दुसऱ्या कोणाचे शरण न घेता, धर्माचे द्वीप कसा बनतो, धर्माचे शरण कसा घेतो, दुसऱ्या कशाचे शरण न घेता? येथे, भिक्षूहो, भिक्षू कायेमध्ये कायेचे अनुदर्शन करत (कायेवर लक्ष ठेवत) विहरतो—उद्योगी, संप्रजन्ययुक्त (जागरूक) आणि स्मृतिमान होऊन, जगातील अभिज्ज्ञा (लोभ) आणि दौर्मनस्य (दुःख) दूर करून. वेदनांमध्ये वेदनेचे अनुदर्शन करत... चित्तामध्ये चित्ताचे अनुदर्शन करत... धर्मांमध्ये (मानसिक अवस्थांमध्ये) धर्मांचे अनुदर्शन करत विहरतो—उद्योगी, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान होऊन, जगातील अभिज्ज्ञा आणि दौर्मनस्य दूर करून. अशा प्रकारे, भिक्षूहो, भिक्षू स्वतःचे द्वीप बनून विहरतो, स्वतःचे शरण घेतो, दुसऱ्या कोणाचे शरण घेत नाही; धर्माचे द्वीप बनतो, धर्माचे शरण घेतो, दुसऱ्या कशाचे शरण घेत नाही.” ภิกฺขุโนอายุวณฺณาทิวฑฺฒนกถา भिक्षूच्या आयुष्य, वर्ण इत्यादींच्या वृद्धीची कथा ๑๑๐. ‘‘โคจเร, ภิกฺขเว, จรถ สเก เปตฺติเก วิสเย. โคจเร, ภิกฺขเว, จรนฺตา สเก เปตฺติเก วิสเย อายุนาปิ วฑฺฒิสฺสถ, วณฺเณนปิ วฑฺฒิสฺสถ, สุเขนปิ วฑฺฒิสฺสถ, โภเคนปิ วฑฺฒิสฺสถ, พเลนปิ วฑฺฒิสฺสถ. ११०. "भिक्खूंनो, तुम्ही स्वतःच्याच क्षेत्रात, आपल्या पितृक (बुद्धांच्या) गोचरात विहार करा. भिक्खूंनो, स्वतःच्या पितृक गोचरात विहार करत असताना तुमचे आयुष्यही वाढेल, तुमचा वर्ण (सौंदर्य) देखील वाढेल, तुमचे सुखही वाढेल, तुमचा भोग (संपत्ती) देखील वाढेल आणि तुमचे बलही वाढेल." ‘‘กิญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน อายุสฺมึ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ฉนฺทสมาธิปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวติ, วีริยสมาธิปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวติ, จิตฺตสมาธิปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวติ, วีมํสาสมาธิปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวติ. โส อิเมสํ จตุนฺนํ อิทฺธิปาทานํ ภาวิตตฺตา พหุลีกตตฺตา อากงฺขมาโน กปฺปํ วา ติฏฺเฐยฺย กปฺปาวเสสํ วา. อิทํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน อายุสฺมึ. "आणि भिक्खूंनो, भिक्खूच्या आयुष्याची वृद्धी कशात आहे? भिक्खूंनो, या धम्मात भिक्खू छंद-समाधी-प्रधान-संस्कारांनी युक्त अशा इद्धिपादाची भावना करतो; वीर्य-समाधी-प्रधान-संस्कारांनी युक्त अशा इद्धिपादाची भावना करतो; चित्त-समाधी-प्रधान-संस्कारांनी युक्त अशा इद्धिपादाची भावना करतो; आणि विमंसा-समाधी-प्रधान-संस्कारांनी युक्त अशा इद्धिपादाची भावना करतो. या चार इद्धिपादांच्या भावनेमुळे आणि त्यांच्या वारंवार केलेल्या अभ्यासामुळे, तो भिक्खू जर इच्छित असेल, तर संपूर्ण कल्पभर किंवा कल्पाच्या उर्वरित भागापर्यंत जिवंत राहू शकतो. भिक्खूंनो, हेच भिक्खूच्या आयुष्याची वृद्धी करणारे आहे." ‘‘กิญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน วณฺณสฺมึ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สีลวา โหติ, ปาติโมกฺขสํวรสํวุโต วิหรติ อาจารโคจรสมฺปนฺโน, อณุมตฺเตสุ วชฺเชสุ [Pg.65] ภยทสฺสาวี, สมาทาย สิกฺขติ สิกฺขาปเทสุ. อิทํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน วณฺณสฺมึ. "आणि भिक्खूंनो, भिक्खूच्या वर्णाची वृद्धी कशात आहे? भिक्खूंनो, येथे भिक्खू शीलवान असतो, पातिमोक्ख-संवर-संवरुत होऊन विहार करतो, आचार आणि गोचराने संपन्न असतो, अगदी सूक्ष्म दोषांमध्येही भय पाहणारा असतो आणि शिक्षापदांचे ग्रहण करून त्यांनुसार आचरण करतो. भिक्खूंनो, हेच भिक्खूच्या वर्णाची वृद्धी करणारे आहे." ‘‘กิญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน สุขสฺมึ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา…เป… ทุติยํ ฌานํ…เป… ตติยํ ฌานํ…เป… จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน, สุขสฺมึ. "आणि भिक्खूंनो, भिक्खूच्या सुखाची वृद्धी कशात आहे? भिक्खूंनो, येथे भिक्खू कामभोगांपासून अलिप्त होऊन, अकुशल धम्मांपासून अलिप्त होऊन, वितर्क आणि विचारांसह असणाऱ्या, विवेकजन्य प्रीती आणि सुखाने युक्त अशा पहिल्या झाणाचा (ध्यानाचा) लाभ घेऊन विहार करतो. वितर्क आणि विचारांच्या शांत होण्याने... दुसऱ्या झाणाचा... तिसऱ्या झाणाचा... आणि चौथ्या झाणाचा लाभ घेऊन विहार करतो. भिक्खूंनो, हेच भिक्खूच्या सुखाची वृद्धी करणारे आहे." ‘‘กิญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน โภคสฺมึ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เมตฺตาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ ตถา ทุติยํ. ตถา ตติยํ. ตถา จตุตฺถํ. อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ เมตฺตาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. กรุณาสหคเตน เจตสา…เป… มุทิตาสหคเตน เจตสา…เป… อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ. ตถา ทุติยํ. ตถา ตติยํ. ตถา จตุตฺถํ. อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. อิทํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน โภคสฺมึ. "आणि भिक्खूंनो, भिक्खूच्या भोगाची वृद्धी कशात आहे? भिक्खूंनो, येथे भिक्खू मैत्रीपूर्ण चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहार करतो, तसेच दुसऱ्या दिशेला, तिसऱ्या दिशेला आणि चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरपे, सर्वत्र, सर्वात्मभावाने, संपूर्ण जगाला विपुल, महान, अमर्याद, वैररहित आणि द्वेषरहित अशा मैत्रीपूर्ण चित्ताने व्यापून विहार करतो. करुणापूर्ण चित्ताने... मुदितापूर्ण चित्ताने... उपेक्षापूर्ण चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहार करतो, तसेच दुसऱ्या दिशेला, तिसऱ्या दिशेला आणि चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरपे, सर्वत्र, सर्वात्मभावाने, संपूर्ण जगाला विपुल, महान, अमर्याद, वैररहित आणि द्वेषरहित अशा उपेक्षापूर्ण चित्ताने व्यापून विहार करतो. भिक्खूंनो, हेच भिक्खूच्या भोगाची वृद्धी करणारे आहे." ‘‘กิญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน พลสฺมึ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อาสวานํ ขยา อนาสวํ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน พลสฺมึ. "आणि भिक्खूंनो, भिक्खूच्या बलाची वृद्धी कशात आहे? भिक्खूंनो, येथे भिक्खू आसवांच्या क्षयामुळे, आसवरहित अशा चेतोविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्तीला याच जन्मात स्वतः उच्च ज्ञानाने जाणून, प्रत्यक्ष अनुभवून, प्राप्त करून विहार करतो. भिक्खूंनो, हेच भिक्खूच्या बलाची वृद्धी करणारे आहे." ‘‘นาหํ, ภิกฺขเว, อญฺญํ เอกพลมฺปิ สมนุปสฺสามิ ยํ เอวํ ทุปฺปสหํ, ยถยิทํ, ภิกฺขเว, มารพลํ. กุสลานํ, ภิกฺขเว, ธมฺมานํ สมาทานเหตุ เอวมิทํ ปุญฺญํ ปวฑฺฒตี’’ติ. อิทมโวจ ภควา. อตฺตมนา เต ภิกฺขู ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทุนฺติ. "भिक्खूंनो, ज्याला पराभूत करणे इतके कठीण आहे, असे मार-बलासारखे दुसरे कोणतेही एक बल मला दिसत नाही. भिक्खूंनो, कुशल धम्मांचे ग्रहण केल्यामुळे अशा प्रकारे हे पुण्य वाढत जाते. भगवान असे म्हणाले. संतुष्ट झालेल्या त्या भिक्खूंनी भगवंतांच्या भाषणाचे मनापासून अभिनंदन केले." จกฺกวตฺติสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ ตติยํ. "तिसरे चक्कवत्तिसुत्त समाप्त झाले." ๔. อคฺคญฺญสุตฺตํ ४. "अग्गञ्ञसुत्त" วาเสฏฺฐภารทฺวาชา "वासेठ्ठ आणि भारद्वाज" ๑๑๑. เอวํ [Pg.66] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ ปุพฺพาราเม มิคารมาตุปาสาเท. เตน โข ปน สมเยน วาเสฏฺฐภารทฺวาชา ภิกฺขูสุ ปริวสนฺติ ภิกฺขุภาวํ อากงฺขมานา. อถ โข ภควา สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต ปาสาทา โอโรหิตฺวา ปาสาทปจฺฉายายํ อพฺโภกาเส จงฺกมติ. १११. "असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान श्रावस्तीमध्ये पूर्वाराम येथील मिगारमाता प्रासादात विहार करत होते. त्या वेळी वासेठ्ठ आणि भारद्वाज हे भिक्खू बनण्याच्या आकांक्षेने भिक्खूंच्या संघात राहत होते. त्यानंतर भगवान संध्याकाळच्या वेळी ध्यानसाधनेतून उठून, प्रासादातून खाली उतरले आणि प्रासादाच्या सावलीत मोकळ्या जागेत चंक्रमण करू लागले." ๑๑๒. อทฺทสา โข วาเสฏฺโฐ ภควนฺตํ สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิตํ ปาสาทา โอโรหิตฺวา ปาสาทปจฺฉายายํ อพฺโภกาเส จงฺกมนฺตํ. ทิสฺวาน ภารทฺวาชํ อามนฺเตสิ – ‘‘อยํ, อาวุโส ภารทฺวาช, ภควา สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต ปาสาทา โอโรหิตฺวา ปาสาทปจฺฉายายํ อพฺโภกาเส จงฺกมติ. อายามาวุโส ภารทฺวาช, เยน ภควา เตนุปสงฺกมิสฺสาม; อปฺเปว นาม ลเภยฺยาม ภควโต สนฺติกา ธมฺมึ กถํ สวนายา’’ติ. ‘‘เอวมาวุโส’’ติ โข ภารทฺวาโช วาเสฏฺฐสฺส ปจฺจสฺโสสิ. ११२. "वासेठ्ठ यांनी भगवंतांना संध्याकाळच्या वेळी ध्यानसाधनेतून उठून, प्रासादातून खाली उतरून प्रासादाच्या सावलीत मोकळ्या जागेत चंक्रमण करताना पाहिले. पाहून त्यांनी भारद्वाज यांना बोलावले – 'मित्र भारद्वाज, हे भगवान संध्याकाळच्या वेळी ध्यानसाधनेतून उठून, प्रासादातून खाली उतरून प्रासादाच्या सावलीत मोकळ्या जागेत चंक्रमण करत आहेत. चल मित्र भारद्वाज, आपण भगवंतांकडे जाऊ या; कदाचित आपल्याला भगवंतांच्या सन्निध धम्मचर्चा ऐकण्याची संधी लाभेल.' 'तसेच असो, मित्रा,' असे म्हणून भारद्वाज यांनी वासेठ्ठ यांच्या बोलण्याला संमती दिली." ๑๑๓. อถ โข วาเสฏฺฐภารทฺวาชา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ภควนฺตํ จงฺกมนฺตํ อนุจงฺกมึสุ. อถ โข ภควา วาเสฏฺฐํ อามนฺเตสิ – ‘‘ตุมฺเห ขฺวตฺถ, วาเสฏฺฐ, พฺราหฺมณชจฺจา พฺราหฺมณกุลีนา พฺราหฺมณกุลา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิตา, กจฺจิ โว, วาเสฏฺฐ, พฺราหฺมณา น อกฺโกสนฺติ น ปริภาสนฺตี’’ติ? ‘‘ตคฺฆ โน, ภนฺเต, พฺราหฺมณา อกฺโกสนฺติ ปริภาสนฺติ อตฺตรูปาย ปริภาสาย ปริปุณฺณาย, โน อปริปุณฺณายา’’ติ. ‘‘ยถา กถํ ปน โว, วาเสฏฺฐ, พฺราหฺมณา อกฺโกสนฺติ ปริภาสนฺติ อตฺตรูปาย ปริภาสาย ปริปุณฺณาย, โน อปริปุณฺณายา’’ติ? ‘‘พฺราหฺมณา, ภนฺเต, เอวมาหํสุ – ‘พฺราหฺมโณว เสฏฺโฐ วณฺโณ, หีนา อญฺเญ วณฺณา. พฺราหฺมโณว สุกฺโก วณฺโณ[Pg.67], กณฺหา อญฺเญ วณฺณา. พฺราหฺมณาว สุชฺฌนฺติ, โน อพฺราหฺมณา. พฺราหฺมณาว พฺรหฺมุโน ปุตฺตา โอรสา มุขโต ชาตา พฺรหฺมชา พฺรหฺมนิมฺมิตา พฺรหฺมทายาทา. เต ตุมฺเห เสฏฺฐํ วณฺณํ หิตฺวา หีนมตฺถ วณฺณํ อชฺฌุปคตา, ยทิทํ มุณฺฑเก สมณเก อิพฺเภ กณฺเห พนฺธุปาทาปจฺเจ. ตยิทํ น สาธุ, ตยิทํ นปฺปติรูปํ, ยํ ตุมฺเห เสฏฺฐํ วณฺณํ หิตฺวา หีนมตฺถ วณฺณํ อชฺฌุปคตา ยทิทํ มุณฺฑเก สมณเก อิพฺเภ กณฺเห พนฺธุปาทาปจฺเจ’ติ. เอวํ โข โน, ภนฺเต, พฺราหฺมณา อกฺโกสนฺติ ปริภาสนฺติ อตฺตรูปาย ปริภาสาย ปริปุณฺณาย, โน อปริปุณฺณายา’’ติ. ११३. "त्यानंतर वासेठ्ठ आणि भारद्वाज जेथे भगवान होते तेथे गेले; गेल्यानंतर त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि चंक्रमण करणाऱ्या भगवंतांच्या मागे मागे चंक्रमण करू लागले. तेव्हा भगवान वासेठ्ठ यांना म्हणाले – 'वासेठ्ठ, तुम्ही दोघे जन्माने ब्राह्मण आहात, ब्राह्मण कुळात जन्मलेले आहात आणि ब्राह्मण कुळातून गृहत्याग करून अनगारिक झाला आहात. वासेठ्ठ, ब्राह्मण लोक तुमची निंदा आणि निर्भत्सना करत नाहीत का?' 'भगवंत, निश्चितच ब्राह्मण लोक आमची त्यांच्या स्वभावानुसार अत्यंत कठोर आणि पूर्ण निंदेने निर्भत्सना करतात, अपूर्ण निंदेने नाही.' 'पण वासेठ्ठ, ब्राह्मण लोक तुमची त्यांच्या स्वभावानुसार अत्यंत कठोर आणि पूर्ण निंदेने कशा प्रकारे निर्भत्सना करतात?' 'भगवंत, ब्राह्मण लोक असे म्हणतात – "ब्राह्मण हाच श्रेष्ठ वर्ण आहे, इतर वर्ण हीन आहेत. ब्राह्मण हाच शुभ्र वर्ण आहे, इतर वर्ण काळे आहेत. ब्राह्मणच शुद्ध होतात, अब्राह्मण नाही. ब्राह्मणच ब्रह्माचे औरस पुत्र आहेत, त्याच्या मुखातून जन्मलेले, ब्रह्मापासून उत्पन्न झालेले, ब्रह्माने निर्माण केलेले आणि ब्रह्माचे वारसदार आहेत. अशा तुम्ही त्या श्रेष्ठ वर्णाचा त्याग करून या हीन वर्णाचा स्वीकार केला आहे, जे मुंडण केलेले, क्षुद्र श्रमण, सेवक, काळे आणि ब्रह्माच्या पायापासून उत्पन्न झालेले आहेत. तुम्ही श्रेष्ठ वर्णाचा त्याग करून या हीन वर्णाचा स्वीकार करणे हे चांगले नाही, हे अयोग्य आहे." भगवंत, अशा प्रकारे ब्राह्मण लोक आमची त्यांच्या स्वभावानुसार अत्यंत कठोर आणि पूर्ण निंदेने निर्भत्सना करतात, अपूर्ण निंदेने नाही.'" ๑๑๔. ‘‘ตคฺฆ โว, วาเสฏฺฐ, พฺราหฺมณา โปราณํ อสฺสรนฺตา เอวมาหํสุ – ‘พฺราหฺมโณว เสฏฺโฐ วณฺโณ, หีนา อญฺเญ วณฺณา; พฺราหฺมโณว สุกฺโก วณฺโณ, กณฺหา อญฺเญ วณฺณา; พฺราหฺมณาว สุชฺฌนฺติ, โน อพฺราหฺมณา; พฺราหฺมณาว พฺรหฺมุโน ปุตฺตา โอรสา มุขโต ชาตา พฺรหฺมชา พฺรหฺมนิมฺมิตา พฺรหฺมทายาทา’ติ. ทิสฺสนฺติ โข ปน, วาเสฏฺฐ, พฺราหฺมณานํ พฺราหฺมณิโย อุตุนิโยปิ คพฺภินิโยปิ วิชายมานาปิ ปายมานาปิ. เต จ พฺราหฺมณา โยนิชาว สมานา เอวมาหํสุ – ‘พฺราหฺมโณว เสฏฺโฐ วณฺโณ, หีนา อญฺเญ วณฺณา; พฺราหฺมโณว สุกฺโก วณฺโณ, กณฺหา อญฺเญ วณฺณา; พฺราหฺมณาว สุชฺฌนฺติ, โน อพฺราหฺมณา; พฺราหฺมณาว พฺรหฺมุโน ปุตฺตา โอรสา มุขโต ชาตา พฺรหฺมชา พฺรหฺมนิมฺมิตา พฺรหฺมทายาทา’ติ. เต พฺรหฺมานญฺเจว อพฺภาจิกฺขนฺติ, มุสา จ ภาสนฺติ, พหุญฺจ อปุญฺญํ ปสวนฺติ. ११४. हे वासेठ्ठ, खरोखरच ब्राह्मण आपली प्राचीन परंपरा विसरून असे म्हणतात – 'ब्राह्मण हाच श्रेष्ठ वर्ण आहे, इतर वर्ण हीन आहेत; ब्राह्मण हाच शुभ्र वर्ण आहे, इतर वर्ण कृष्ण आहेत; ब्राह्मणच शुद्ध होतात, अब्राह्मण नाही; ब्राह्मणच ब्रह्माचे औरस पुत्र आहेत, जे त्याच्या मुखातून जन्मले आहेत, ब्रह्मापासून उत्पन्न झाले आहेत, ब्रह्माने निर्माण केले आहेत आणि ब्रह्माचे वारसदार आहेत.' परंतु, हे वासेठ्ठ, ब्राह्मणांच्या ब्राह्मण स्त्रिया ऋतुमती होताना, गरोदर होताना, प्रसूती होताना आणि बालकांना स्तनपान करवताना प्रत्यक्ष दिसतात. असे असूनही, योनीतून जन्मलेले हे ब्राह्मण असे म्हणतात – 'ब्राह्मण हाच श्रेष्ठ वर्ण आहे, इतर वर्ण हीन आहेत; ब्राह्मण हाच शुभ्र वर्ण आहे, इतर वर्ण कृष्ण आहेत; ब्राह्मणच शुद्ध होतात, अब्राह्मण नाही; ब्राह्मणच ब्रह्माचे औरस पुत्र आहेत, जे त्याच्या मुखातून जन्मले आहेत, ब्रह्मापासून उत्पन्न झाले आहेत, ब्रह्माने निर्माण केले आहेत आणि ब्रह्माचे वारसदार आहेत.' असे म्हणून ते ब्रह्मावर खोटा आळ आणतात, असत्य बोलतात आणि मोठ्या प्रमाणात अपुण्य (पाप) गोळा करतात. จตุวณฺณสุทฺธิ चार वर्णांची शुद्धी ๑๑๕. ‘‘จตฺตาโรเม, วาเสฏฺฐ, วณฺณา – ขตฺติยา, พฺราหฺมณา, เวสฺสา, สุทฺทา. ขตฺติโยปิ โข, วาเสฏฺฐ, อิเธกจฺโจ ปาณาติปาตี โหติ อทินฺนาทายี กาเมสุมิจฺฉาจารี มุสาวาที ปิสุณวาโจ ผรุสวาโจ สมฺผปฺปลาปี อภิชฺฌาลุ พฺยาปนฺนจิตฺโต มิจฺฉาทิฏฺฐี. อิติ โข, วาเสฏฺฐ, เยเม ธมฺมา อกุสลา อกุสลสงฺขาตา สาวชฺชา สาวชฺชสงฺขาตา อเสวิตพฺพา อเสวิตพฺพสงฺขาตา นอลมริยา นอลมริยสงฺขาตา กณฺหา กณฺหวิปากา วิญฺญุครหิตา, ขตฺติเยปิ เต อิเธกจฺเจ สนฺทิสฺสนฺติ. พฺราหฺมโณปิ โข, วาเสฏฺฐ…เป… เวสฺโสปิ โข, วาเสฏฺฐ…เป… สุทฺโทปิ โข, วาเสฏฺฐ, อิเธกจฺโจ [Pg.68] ปาณาติปาตี โหติ อทินฺนาทายี กาเมสุมิจฺฉาจารี มุสาวาที ปิสุณวาโจ ผรุสวาโจ สมฺผปฺปลาปี อภิชฺฌาลุ พฺยาปนฺนจิตฺโต มิจฺฉาทิฏฺฐี. อิติ โข, วาเสฏฺฐ, เยเม ธมฺมา อกุสลา อกุสลสงฺขาตา…เป… กณฺหา กณฺหวิปากา วิญฺญุครหิตา; สุทฺเทปิ เต อิเธกจฺเจ สนฺทิสฺสนฺติ. ११५. हे वासेठ्ठ, हे चार वर्ण आहेत – क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य आणि शूद्र. हे वासेठ्ठ, या जगात एखादा क्षत्रिय देखील प्राणातिपाती (जीवहिंसा करणारा) असतो, अदिन्नादायी (न दिलेले घेणारा) असतो, कामभोगांमध्ये गैरवर्तन करणारा असतो, असत्य बोलणारा असतो, चहाडी करणारा असतो, कठोर बोलणारा असतो, व्यर्थ बडबड करणारा असतो, अभिलाषा बाळगणारा (लोभी) असतो, द्वेषयुक्त मनाचा असतो आणि मिथ्या दृष्टी असणारा असतो. हे वासेठ्ठ, अशा प्रकारे जे धर्म अकुशल आहेत, अकुशल म्हणून ओळखले जातात, सदोष आहेत, सदोष म्हणून ओळखले जातात, आचरणात न आणण्याजोगे आहेत, आचरणात न आणण्याजोगे म्हणून ओळखले जातात, जे आर्यांना न शोभणारे आहेत, आर्यांना न शोभणारे म्हणून ओळखले जातात, जे कृष्ण (अंधकारमय) आहेत, कृष्ण विपाकाचे (वाईट परिणाम देणारे) आहेत आणि विद्वानांद्वारे निंदिले गेले आहेत; ते अकुशल धर्म या जगात काही क्षत्रियांमध्ये देखील दिसून येतात. हे वासेठ्ठ, ब्राह्मण देखील... हे वासेठ्ठ, वैश्य देखील... हे वासेठ्ठ, एखादा शूद्र देखील या जगात प्राणातिपाती असतो, न दिलेले घेणारा असतो, कामभोगांमध्ये गैरवर्तन करणारा असतो, असत्य बोलणारा असतो, चहाडी करणारा असतो, कठोर बोलणारा असतो, व्यर्थ बडबड करणारा असतो, अभिलाषा बाळगणारा असतो, द्वेषयुक्त मनाचा असतो आणि मिथ्या दृष्टी असणारा असतो. हे वासेठ्ठ, अशा प्रकारे जे धर्म अकुशल आहेत, अकुशल म्हणून ओळखले जातात... जे कृष्ण आहेत, कृष्ण विपाकाचे आहेत आणि विद्वानांद्वारे निंदिले गेले आहेत; ते अकुशल धर्म या जगात काही शूद्रांमध्ये देखील दिसून येतात. ‘‘ขตฺติโยปิ โข, วาเสฏฺฐ, อิเธกจฺโจ ปาณาติปาตา ปฏิวิรโต โหติ, อทินฺนาทานา ปฏิวิรโต, กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรโต, มุสาวาทา ปฏิวิรโต, ปิสุณาย วาจาย ปฏิวิรโต, ผรุสาย วาจาย ปฏิวิรโต, สมฺผปฺปลาปา ปฏิวิรโต, อนภิชฺฌาลุ อพฺยาปนฺนจิตฺโต, สมฺมาทิฏฺฐี. อิติ โข, วาเสฏฺฐ, เยเม ธมฺมา กุสลา กุสลสงฺขาตา อนวชฺชา อนวชฺชสงฺขาตา เสวิตพฺพา เสวิตพฺพสงฺขาตา อลมริยา อลมริยสงฺขาตา สุกฺกา สุกฺกวิปากา วิญฺญุปฺปสตฺถา, ขตฺติเยปิ เต อิเธกจฺเจ สนฺทิสฺสนฺติ. พฺราหฺมโณปิ โข, วาเสฏฺฐ…เป… เวสฺโสปิ โข, วาเสฏฺฐ…เป… สุทฺโทปิ โข, วาเสฏฺฐ, อิเธกจฺโจ ปาณาติปาตา ปฏิวิรโต โหติ…เป… อนภิชฺฌาลุ, อพฺยาปนฺนจิตฺโต, สมฺมาทิฏฺฐี. อิติ โข, วาเสฏฺฐ, เยเม ธมฺมา กุสลา กุสลสงฺขาตา อนวชฺชา อนวชฺชสงฺขาตา เสวิตพฺพา เสวิตพฺพสงฺขาตา อลมริยา อลมริยสงฺขาตา สุกฺกา สุกฺกวิปากา วิญฺญุปฺปสตฺถา; สุทฺเทปิ เต อิเธกจฺเจ สนฺทิสฺสนฺติ. हे वासेठ्ठ, या जगात एखादा क्षत्रिय देखील प्राणातिपातापासून (जीवहिंसेपासून) अलिप्त असतो, अदिन्नादानापासून (न दिलेले घेण्यापासून) अलिप्त असतो, कामभोगांमधील गैरवर्तनापासून अलिप्त असतो, असत्य बोलण्यापासून अलिप्त असतो, चहाडी करण्यापासून अलिप्त असतो, कठोर बोलण्यापासून अलिप्त असतो, व्यर्थ बडबड करण्यापासून अलिप्त असतो, अभिलाषा न बाळगणारा (अलोभी), द्वेषरहित मनाचा आणि सम्यक् दृष्टी असणारा असतो. हे वासेठ्ठ, अशा प्रकारे जे धर्म कुशल आहेत, कुशल म्हणून ओळखले जातात, निर्दोष आहेत, निर्दोष म्हणून ओळखले जातात, आचरणात आणण्याजोगे आहेत, आचरणात आणण्याजोगे म्हणून ओळखले जातात, जे आर्यांना शोभणारे आहेत, आर्यांना शोभणारे म्हणून ओळखले जातात, जे शुक्ल (शुभ्र/प्रकाशमय) आहेत, शुक्ल विपाकाचे (चांगले परिणाम देणारे) आहेत आणि विद्वानांद्वारे प्रशंसिले गेले आहेत; ते कुशल धर्म या जगात काही क्षत्रियांमध्ये देखील दिसून येतात. हे वासेठ्ठ, ब्राह्मण देखील... हे वासेठ्ठ, वैश्य देखील... हे वासेठ्ठ, एखादा शूद्र देखील या जगात प्राणातिपातापासून अलिप्त असतो... अभिलाषा न बाळगणारा, द्वेषरहित मनाचा आणि सम्यक् दृष्टी असणारा असतो. हे वासेठ्ठ, अशा प्रकारे जे धर्म कुशल आहेत, कुशल म्हणून ओळखले जातात, निर्दोष आहेत, निर्दोष म्हणून ओळखले जातात, आचरणात आणण्याजोगे आहेत, आचरणात आणण्याजोगे म्हणून ओळखले जातात, जे आर्यांना शोभणारे आहेत, आर्यांना शोभणारे म्हणून ओळखले जातात, जे शुक्ल आहेत, शुक्ल विपाकाचे आहेत आणि विद्वानांद्वारे प्रशंसिले गेले आहेत; ते कुशल धर्म या जगात काही शूद्रांमध्ये देखील दिसून येतात. ๑๑๖. ‘‘อิเมสุ โข, วาเสฏฺฐ, จตูสุ วณฺเณสุ เอวํ อุภยโวกิณฺเณสุ วตฺตมาเนสุ กณฺหสุกฺเกสุ ธมฺเมสุ วิญฺญุครหิเตสุ เจว วิญฺญุปฺปสตฺเถสุ จ ยเทตฺถ พฺราหฺมณา เอวมาหํสุ – ‘พฺราหฺมโณว เสฏฺโฐ วณฺโณ, หีนา อญฺเญ วณฺณา; พฺราหฺมโณว สุกฺโก วณฺโณ, กณฺหา อญฺเญ วณฺณา; พฺราหฺมณาว สุชฺฌนฺติ, โน อพฺราหฺมณา; พฺราหฺมณาว พฺรหฺมุโน ปุตฺตา โอรสา มุขโต ชาตา พฺรหฺมชา พฺรหฺมนิมฺมิตา พฺรหฺมทายาทา’ติ. ตํ เตสํ วิญฺญู นานุชานนฺติ. ตํ กิสฺส เหตุ? อิเมสญฺหิ, วาเสฏฺฐ, จตุนฺนํ วณฺณานํ โย โหติ ภิกฺขุ อรหํ ขีณาสโว วุสิตวา กตกรณีโย โอหิตภาโร อนุปฺปตฺตสทตฺโถ ปริกฺขีณภวสํโยชโน สมฺมทญฺญาวิมุตฺโต, โส เนสํ อคฺคมกฺขายติ ธมฺเมเนว, โน อธมฺเมน. ธมฺโม หิ, วาเสฏฺฐ, เสฏฺโฐ ชเนตสฺมึ, ทิฏฺเฐ เจว ธมฺเม อภิสมฺปรายญฺจ. ११६. हे वासेठ्ठ, जेव्हा या चार वर्णांमध्ये अशा प्रकारे विद्वानांद्वारे निंदिले गेलेले कृष्ण धर्म आणि विद्वानांद्वारे प्रशंसिले गेलेले शुक्ल धर्म हे दोन्ही मिश्रित स्वरूपात अस्तित्वात आहेत, तेव्हा ब्राह्मणांचे असे म्हणणे की – 'ब्राह्मण हाच श्रेष्ठ वर्ण आहे, इतर वर्ण हीन आहेत; ब्राह्मण हाच शुभ्र वर्ण आहे, इतर वर्ण कृष्ण आहेत; ब्राह्मणच शुद्ध होतात, अब्राह्मण नाही; ब्राह्मणच ब्रह्माचे औरस पुत्र आहेत, जे त्याच्या मुखातून जन्मले आहेत, ब्रह्मापासून उत्पन्न झाले आहेत, ब्रह्माने निर्माण केले आहेत आणि ब्रह्माचे वारसदार आहेत.' हे विद्वानांना मान्य नाही. त्याचे कारण काय? कारण, हे वासेठ्ठ, या चार वर्णांपैकी जो कोणी भिक्खू अर्हत, क्षीणासव, ब्रह्मचर्य पूर्ण केलेला, कृतकरणीय, ओझे उतरवून ठेवलेला, परम ध्येय प्राप्त केलेला, भवबंधने पूर्णपणे नष्ट केलेला आणि सम्यक् ज्ञानाने विमुक्त झालेला असतो, तोच या चार वर्णांमध्ये धर्माच्या आधारे श्रेष्ठ मानला जातो, अधर्माच्या आधारे नाही. कारण, हे वासेठ्ठ, या मनुष्यलोकात इहलोकात आणि परलोकात धर्मच श्रेष्ठ आहे. ๑๑๗. ‘‘ตทมินาเปตํ, วาเสฏฺฐ, ปริยาเยน เวทิตพฺพํ, ยถา ธมฺโมว เสฏฺโฐ ชเนตสฺมึ, ทิฏฺเฐ เจว ธมฺเม อภิสมฺปรายญฺจ. ११७. हे वासेठ्ठ, या मनुष्यलोकात इहलोकात आणि परलोकात धर्मच कसा श्रेष्ठ आहे, हे या उदाहरणावरून समजून घेतले पाहिजे. ‘‘ชานาติ [Pg.69] โข, วาเสฏฺฐ, ราชา ปเสนทิ โกสโล – ‘สมโณ โคตโม อนนฺตรา สกฺยกุลา ปพฺพชิโต’ติ. สกฺยา โข ปน, วาเสฏฺฐ, รญฺโญ ปเสนทิสฺส โกสลสฺส อนุยุตฺตา ภวนฺติ. กโรนฺติ โข, วาเสฏฺฐ, สกฺยา รญฺเญ ปเสนทิมฺหิ โกสเล นิปจฺจการํ อภิวาทนํ ปจฺจุฏฺฐานํ อญฺชลิกมฺมํ สามีจิกมฺมํ. อิติ โข, วาเสฏฺฐ, ยํ กโรนฺติ สกฺยา รญฺเญ ปเสนทิมฺหิ โกสเล นิปจฺจการํ อภิวาทนํ ปจฺจุฏฺฐานํ อญฺชลิกมฺมํ สามีจิกมฺมํ, กโรติ ตํ ราชา ปเสนทิ โกสโล ตถาคเต นิปจฺจการํ อภิวาทนํ ปจฺจุฏฺฐานํ อญฺชลิกมฺมํ สามีจิกมฺมํ, น นํ ‘สุชาโต สมโณ โคตโม, ทุชฺชาโตหมสฺมิ. พลวา สมโณ โคตโม, ทุพฺพโลหมสฺมิ. ปาสาทิโก สมโณ โคตโม, ทุพฺพณฺโณหมสฺมิ. มเหสกฺโข สมโณ โคตโม, อปฺเปสกฺโขหมสฺมี’ติ. อถ โข นํ ธมฺมํเยว สกฺกโรนฺโต ธมฺมํ ครุํ กโรนฺโต ธมฺมํ มาเนนฺโต ธมฺมํ ปูเชนฺโต ธมฺมํ อปจายมาโน เอวํ ราชา ปเสนทิ โกสโล ตถาคเต นิปจฺจการํ กโรติ, อภิวาทนํ ปจฺจุฏฺฐานํ อญฺชลิกมฺมํ สามีจิกมฺมํ. อิมินาปิ โข เอตํ, วาเสฏฺฐ, ปริยาเยน เวทิตพฺพํ, ยถา ธมฺโมว เสฏฺโฐ ชเนตสฺมึ, ทิฏฺเฐ เจว ธมฺเม อภิสมฺปรายญฺจ. हे वासेठ्ठ, कोसलचा राजा प्रसेनजित याला ठाऊक आहे की – 'श्रमण गौतम हे शाक्य कुळातून गृहत्याग करून प्रव्रजित झाले आहेत.' आणि हे वासेठ्ठ, शाक्य हे कोसलचा राजा प्रसेनजित याचे मांडलिक आहेत. हे वासेठ्ठ, शाक्य लोक कोसलचा राजा प्रसेनजित याच्याप्रती नम्रता, अभिवादन, उठून उभे राहणे, हात जोडणे आणि आदरयुक्त सेवा करतात. हे वासेठ्ठ, शाक्य लोक कोसलचा राजा प्रसेनजित याच्याप्रती जी नम्रता, अभिवादन, उठून उभे राहणे, हात जोडणे आणि आदरयुक्त सेवा करतात; तशीच नम्रता, अभिवादन, उठून उभे राहणे, हात जोडणे आणि आदरयुक्त सेवा राजा प्रसेनजित कोसल तथागतांच्या प्रती करतात. ते असे विचार करून हे करत नाहीत की – 'श्रमण गौतम उच्च कुलीन आहेत आणि मी नीच कुलीन आहे; श्रमण गौतम बलवान आहेत आणि मी दुर्बल आहे; श्रमण गौतम दर्शनीय आहेत आणि मी कुरूप आहे; श्रमण गौतम महाप्रतापी आहेत आणि मी अल्पप्रतापी आहे.' तर केवळ धर्माचाच सत्कार करत, धर्माचाच गौरव करत, धर्माचाच मान राखत, धर्माचीच पूजा करत आणि धर्माचाच आदर करत राजा प्रसेनजित कोसल तथागतांच्या प्रती नम्रता, अभिवादन, उठून उभे राहणे, हात जोडणे आणि आदरयुक्त सेवा करतात. हे वासेठ्ठ, यावरून देखील हे समजून घेतले पाहिजे की, या मनुष्यलोकात इहलोकात आणि परलोकात धर्मच श्रेष्ठ आहे. ๑๑๘. ‘‘ตุมฺเห ขฺวตฺถ, วาเสฏฺฐ, นานาชจฺจา นานานามา นานาโคตฺตา นานากุลา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิตา. ‘เก ตุมฺเห’ติ – ปุฏฺฐา สมานา ‘สมณา สกฺยปุตฺติยามฺหา’ติ – ปฏิชานาถ. ยสฺส โข ปนสฺส, วาเสฏฺฐ, ตถาคเต สทฺธา นิวิฏฺฐา มูลชาตา ปติฏฺฐิตา ทฬฺหา อสํหาริยา สมเณน วา พฺราหฺมเณน วา เทเวน วา มาเรน วา พฺรหฺมุนา วา เกนจิ วา โลกสฺมึ, ตสฺเสตํ กลฺลํ วจนาย – ‘ภควโตมฺหิ ปุตฺโต โอรโส มุขโต ชาโต ธมฺมโช ธมฺมนิมฺมิโต ธมฺมทายาโท’ติ. ตํ กิสฺส เหตุ? ตถาคตสฺส เหตํ, วาเสฏฺฐ, อธิวจนํ ‘ธมฺมกาโย’ อิติปิ, ‘พฺรหฺมกาโย’ อิติปิ, ‘ธมฺมภูโต’ อิติปิ, ‘พฺรหฺมภูโต’ อิติปิ. ११८. हे वासेट्ठ, तुम्ही सर्वजण वेगवेगळ्या जातींचे, वेगवेगळ्या नावांचे, वेगवेगळ्या गोत्रांचे आणि वेगवेगळ्या कुळांचे असून, घरदार सोडून अनगारिक (बेघर) प्रवज्जेत दाखल झाला आहात. जेव्हा तुम्हाला विचारले जाते की, 'तुम्ही कोण आहात?' तेव्हा तुम्ही 'आम्ही शाक्यपुत्रीय श्रमण आहोत' अशी कबुली देता. हे वासेट्ठ, ज्याची तथागतांवरील श्रद्धा दृढ, मूळ धरलेली, प्रस्थापित, बळकट आणि या जगात कोणत्याही श्रमणाद्वारे, ब्राह्मणाद्वारे, देवाद्वारे, माराद्वारे, ब्रह्माद्वारे किंवा इतर कोणाद्वारेही डळमळीत न होणारी असते, त्याला असे म्हणणे योग्य आहे की— 'मी भगवंतांचा औरस पुत्र आहे, त्यांच्या मुखातून जन्मलेला, धम्मापासून उत्पन्न झालेला, धम्माद्वारे निर्मित आणि धम्माचा वारसदार आहे.' असे का? कारण, हे वासेट्ठ, 'धम्मकाय', 'ब्रह्मकाय', 'धम्मभूत' आणि 'ब्रह्मभूत' ही तथागतांचीच नावे आहेत. ๑๑๙. ‘‘โหติ โข โส, วาเสฏฺฐ, สมโย ยํ กทาจิ กรหจิ ทีฆสฺส อทฺธุโน อจฺจเยน อยํ โลโก สํวฏฺฏติ. สํวฏฺฏมาเน โลเก เยภุยฺเยน สตฺตา อาภสฺสรสํวตฺตนิกา โหนฺติ. เต ตตฺถ โหนฺติ [Pg.70] มโนมยา ปีติภกฺขา สยํปภา อนฺตลิกฺขจรา สุภฏฺฐายิโน จิรํ ทีฆมทฺธานํ ติฏฺฐนฺติ. ११९. हे वासेट्ठ, दीर्घ काळानंतर कधीतरी अशी वेळ येते जेव्हा हा लोक संकुचित होतो. जेव्हा लोक संकुचित होत असतो, तेव्हा बहुतांश प्राणी आभास्सर ब्रह्मलोकात जन्माला येतात. तिथे ते मनोमय, प्रीतीचे भक्षण करणारे, स्वयंप्रकाशी, आकाशात विहार करणारे आणि वैभवशाली होऊन दीर्घ काळ राहतात. ‘‘โหติ โข โส, วาเสฏฺฐ, สมโย ยํ กทาจิ กรหจิ ทีฆสฺส อทฺธุโน อจฺจเยน อยํ โลโก วิวฏฺฏติ. วิวฏฺฏมาเน โลเก เยภุยฺเยน สตฺตา อาภสฺสรกายา จวิตฺวา อิตฺถตฺตํ อาคจฺฉนฺติ. เตธ โหนฺติ มโนมยา ปีติภกฺขา สยํปภา อนฺตลิกฺขจรา สุภฏฺฐายิโน จิรํ ทีฆมทฺธานํ ติฏฺฐนฺติ. हे वासेट्ठ, दीर्घ काळानंतर कधीतरी अशी वेळ येते जेव्हा हा लोक पुन्हा विकसित होतो. जेव्हा लोक विकसित होत असतो, तेव्हा बहुतांश प्राणी आभास्सर लोकातून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात येतात. इथे ते मनोमय, प्रीतीचे भक्षण करणारे, स्वयंप्रकाशी, आकाशात विहार करणारे आणि वैभवशाली होऊन दीर्घ काळ राहतात. รสปถวิปาตุภาโว रसपृथ्वीचा (स्वादिष्ट भूमीचा) प्रादुर्भाव ๑๒๐. ‘‘เอโกทกีภูตํ โข ปน, วาเสฏฺฐ, เตน สมเยน โหติ อนฺธกาโร อนฺธการติมิสา. น จนฺทิมสูริยา ปญฺญายนฺติ, น นกฺขตฺตานิ ตารกรูปานิ ปญฺญายนฺติ, น รตฺตินฺทิวา ปญฺญายนฺติ, น มาสฑฺฒมาสา ปญฺญายนฺติ, น อุตุสํวจฺฉรา ปญฺญายนฺติ, น อิตฺถิปุมา ปญฺญายนฺติ, สตฺตา สตฺตาตฺเวว สงฺขฺยํ คจฺฉนฺติ. อถ โข เตสํ, วาเสฏฺฐ, สตฺตานํ กทาจิ กรหจิ ทีฆสฺส อทฺธุโน อจฺจเยน รสปถวี อุทกสฺมึ สมตนิ ; เสยฺยถาปิ นาม ปยโส ตตฺตสฺส นิพฺพายมานสฺส อุปริ สนฺตานกํ โหติ, เอวเมว ปาตุรโหสิ. สา อโหสิ วณฺณสมฺปนฺนา คนฺธสมฺปนฺนา รสสมฺปนฺนา, เสยฺยถาปิ นาม สมฺปนฺนํ วา สปฺปิ สมฺปนฺนํ วา นวนีตํ เอวํวณฺณา อโหสิ. เสยฺยถาปิ นาม ขุทฺทมธุํ อเนฬกํ, เอวมสฺสาทา อโหสิ. อถ โข, วาเสฏฺฐ, อญฺญตโร สตฺโต โลลชาติโก – ‘อมฺโภ, กิเมวิทํ ภวิสฺสตี’ติ รสปถวึ องฺคุลิยา สายิ. ตสฺส รสปถวึ องฺคุลิยา สายโต อจฺฉาเทสิ, ตณฺหา จสฺส โอกฺกมิ. อญฺเญปิ โข, วาเสฏฺฐ, สตฺตา ตสฺส สตฺตสฺส ทิฏฺฐานุคตึ อาปชฺชมานา รสปถวึ องฺคุลิยา สายึสุ. เตสํ รสปถวึ องฺคุลิยา สายตํ อจฺฉาเทสิ, ตณฺหา จ เตสํ โอกฺกมิ. १२०. हे वासेट्ठ, त्या वेळी सर्वत्र केवळ पाणीच पाणी झालेले असते आणि सर्वत्र दाट, काळोख अंधार पसरलेला असतो. चंद्र आणि सूर्य दिसत नाहीत, नक्षत्रे आणि तारे दिसत नाहीत, रात्र आणि दिवस समजत नाहीत, महिने आणि पंधरवडे समजत नाहीत, ऋतू आणि वर्षे समजत नाहीत, स्त्री आणि पुरुष असा भेद नसतो; प्राण्यांना केवळ 'प्राणी' म्हणूनच ओळखले जाते. त्यानंतर, हे वासेट्ठ, दीर्घ काळानंतर कधीतरी त्या प्राण्यांसाठी पाण्यावर रसपृथ्वी पसरते. ज्याप्रमाणे गरम दूध थंड होत असताना त्यावर साय धरते, अगदी त्याचप्रमाणे ती प्रकट झाली. ती वर्णसंपन्न, गंधसंपन्न आणि रससंपन्न होती. उत्तम तूप किंवा लोण्यासारखा तिचा रंग होता आणि त्याचा स्वाद शुद्ध रानटी मधासारखा अत्यंत गोड होता. तेव्हा, हे वासेट्ठ, एका लोभी स्वभावाच्या प्राण्याने विचार केला— 'अरे, हे काय असावे?' आणि त्याने आपल्या बोटाने ती रसपृथ्वी चाखली. बोटाने ती रसपृथ्वी चाखताच त्याला तिचा स्वाद अत्यंत आवडला आणि त्याच्यामध्ये तृष्णा उत्पन्न झाली. हे वासेट्ठ, इतर प्राण्यांनीही त्या प्राण्याचे अनुकरण करत आपल्या बोटांनी ती रसपृथ्वी चाखली. त्यांनाही तिचा स्वाद अत्यंत आवडला आणि त्यांच्यामध्येही तृष्णा उत्पन्न झाली. จนฺทิมสูริยาทิปาตุภาโว चंद्र-सूर्यादींचा प्रादुर्भाव ๑๒๑. ‘‘อถ โข เต, วาเสฏฺฐ, สตฺตา รสปถวึ หตฺเถหิ อาลุปฺปการกํ อุปกฺกมึสุ ปริภุญฺชิตุํ. ยโต โข เต, วาเสฏฺฐ, สตฺตา รสปถวึ [Pg.71] หตฺเถหิ อาลุปฺปการกํ อุปกฺกมึสุ ปริภุญฺชิตุํ. อถ เตสํ สตฺตานํ สยํปภา อนฺตรธายิ. สยํปภาย อนฺตรหิตาย จนฺทิมสูริยา ปาตุรเหสุํ. จนฺทิมสูริเยสุ ปาตุภูเตสุ นกฺขตฺตานิ ตารกรูปานิ ปาตุรเหสุํ. นกฺขตฺเตสุ ตารกรูเปสุ ปาตุภูเตสุ รตฺตินฺทิวา ปญฺญายึสุ. รตฺตินฺทิเวสุ ปญฺญายมาเนสุ มาสฑฺฒมาสา ปญฺญายึสุ. มาสฑฺฒมาเสสุ ปญฺญายมาเนสุ อุตุสํวจฺฉรา ปญฺญายึสุ. เอตฺตาวตา โข, วาเสฏฺฐ, อยํ โลโก ปุน วิวฏฺโฏ โหติ. १२१. त्यानंतर, हे वासेट्ठ, ते प्राणी हाताने घास करून ती रसपृथ्वी खाऊ लागले. जेव्हा, हे वासेट्ठ, त्या प्राण्यांनी हाताने घास करून ती रसपृथ्वी खाण्यास सुरुवात केली, तेव्हा त्यांची स्वयंप्रभा नाहीशी झाली. स्वयंप्रभा नाहीशी झाल्यावर चंद्र आणि सूर्य प्रकट झाले. चंद्र आणि सूर्य प्रकट झाल्यावर नक्षत्रे आणि तारे प्रकट झाले. नक्षत्रे आणि तारे प्रकट झाल्यावर रात्र आणि दिवस दिसू लागले. रात्र आणि दिवस दिसू लागल्यावर महिने आणि पंधरवडे दिसू लागले. महिने आणि पंधरवडे दिसू लागल्यावर ऋतू आणि वर्षे दिसू लागली. अशा प्रकारे, हे वासेट्ठ, हा लोक पुन्हा विकसित झाला. ๑๒๒. ‘‘อถ โข เต, วาเสฏฺฐ, สตฺตา รสปถวึ ปริภุญฺชนฺตา ตํภกฺขา ตทาหารา จิรํ ทีฆมทฺธานํ อฏฺฐํสุ. ยถา ยถา โข เต, วาเสฏฺฐ, สตฺตา รสปถวึ ปริภุญฺชนฺตา ตํภกฺขา ตทาหารา จิรํ ทีฆมทฺธานํ อฏฺฐํสุ, ตถา ตถา เตสํ สตฺตานํ (รสปถวึ ปริภุญฺชนฺตานํ) ขรตฺตญฺเจว กายสฺมึ โอกฺกมิ, วณฺณเววณฺณตา จ ปญฺญายิตฺถ. เอกิทํ สตฺตา วณฺณวนฺโต โหนฺติ, เอกิทํ สตฺตา ทุพฺพณฺณา. ตตฺถ เย เต สตฺตา วณฺณวนฺโต, เต ทุพฺพณฺเณ สตฺเต อติมญฺญนฺติ – ‘มยเมเตหิ วณฺณวนฺตตรา, อมฺเหเหเต ทุพฺพณฺณตรา’ติ. เตสํ วณฺณาติมานปจฺจยา มานาติมานชาติกานํ รสปถวี อนฺตรธายิ. รสาย ปถวิยา อนฺตรหิตาย สนฺนิปตึสุ. สนฺนิปติตฺวา อนุตฺถุนึสุ – ‘อโห รสํ, อโห รส’นฺติ! ตเทตรหิปิ มนุสฺสา กญฺจิเทว สุรสํ ลภิตฺวา เอวมาหํสุ – ‘อโห รสํ, อโห รส’นฺติ! ตเทว โปราณํ อคฺคญฺญํ อกฺขรํ อนุสรนฺติ, น ตฺเววสฺส อตฺถํ อาชานนฺติ. १२२. त्यानंतर, हे वासेट्ठ, ते प्राणी ती रसपृथ्वी खात, तिचाच आहार करत दीर्घ काळ राहिले. जसे जसे, हे वासेट्ठ, ते प्राणी ती रसपृथ्वी खात आणि तिचाच आहार करत दीर्घ काळ राहिले, तसतसे त्या प्राण्यांच्या शरीरात कठीणपणा आला आणि त्यांच्या रूपामध्ये फरक दिसू लागला. काही प्राणी देखणे झाले, तर काही कुरूप झाले. त्या प्राण्यांमध्ये जे देखणे होते, ते कुरूप प्राण्यांना तुच्छ लेखू लागले— 'आम्ही यांच्यापेक्षा जास्त सुंदर आहोत, हे आमच्यापेक्षा कुरूप आहेत.' त्यांच्या या रूप-अभिमानामुळे आणि गर्विष्ठ स्वभावामुळे ती रसपृथ्वी नाहीशी झाली. रसपृथ्वी नाहीशी झाल्यावर ते एकत्र जमले. एकत्र जमून ते विलाप करू लागले— 'हाय तो स्वाद! हाय तो स्वाद!' आजच्या काळातही जेव्हा लोकांना एखादा स्वादिष्ट पदार्थ मिळतो, तेव्हा ते म्हणतात— 'काय हा स्वाद! काय हा स्वाद!' ते त्या प्राचीन मूळ शब्दांचेच अनुकरण करत असतात, परंतु त्यांना त्याचा खरा अर्थ माहीत नसतो. ภูมิปปฺปฏกปาตุภาโว भूमीच्या पापुद्र्याचा (भू-पर्पटाचा) प्रादुर्भाव ๑๒๓. ‘‘อถ โข เตสํ, วาเสฏฺฐ, สตฺตานํ รสาย ปถวิยา อนฺตรหิตาย ภูมิปปฺปฏโก ปาตุรโหสิ. เสยฺยถาปิ นาม อหิจฺฉตฺตโก, เอวเมว ปาตุรโหสิ. โส อโหสิ วณฺณสมฺปนฺโน คนฺธสมฺปนฺโน รสสมฺปนฺโน, เสยฺยถาปิ นาม สมฺปนฺนํ วา สปฺปิ สมฺปนฺนํ วา นวนีตํ เอวํวณฺโณ อโหสิ. เสยฺยถาปิ นาม ขุทฺทมธุํ อเนฬกํ, เอวมสฺสาโท อโหสิ. १२३. त्यानंतर, हे वासेट्ठ, त्या प्राण्यांसाठी रसपृथ्वी नाहीशी झाल्यावर भूमीचा पापुद्रा प्रकट झाला. ज्याप्रमाणे भूछत्र उगवते, अगदी त्याचप्रमाणे तो प्रकट झाला. तो वर्णसंपन्न, गंधसंपन्न आणि रससंपन्न होता. उत्तम तूप किंवा लोण्यासारखा त्याचा रंग होता आणि त्याचा स्वाद शुद्ध रानटी मधासारखा अत्यंत गोड होता. ‘‘อถ [Pg.72] โข เต, วาเสฏฺฐ, สตฺตา ภูมิปปฺปฏกํ อุปกฺกมึสุ ปริภุญฺชิตุํ. เต ตํ ปริภุญฺชนฺตา ตํภกฺขา ตทาหารา จิรํ ทีฆมทฺธานํ อฏฺฐํสุ. ยถา ยถา โข เต, วาเสฏฺฐ, สตฺตา ภูมิปปฺปฏกํ ปริภุญฺชนฺตา ตํภกฺขา ตทาหารา จิรํ ทีฆมทฺธานํ อฏฺฐํสุ, ตถา ตถา เตสํ สตฺตานํ ภิยฺโยโส มตฺตาย ขรตฺตญฺเจว กายสฺมึ โอกฺกมิ, วณฺณเววณฺณตา จ ปญฺญายิตฺถ. เอกิทํ สตฺตา วณฺณวนฺโต โหนฺติ, เอกิทํ สตฺตา ทุพฺพณฺณา. ตตฺถ เย เต สตฺตา วณฺณวนฺโต, เต ทุพฺพณฺเณ สตฺเต อติมญฺญนฺติ – ‘มยเมเตหิ วณฺณวนฺตตรา, อมฺเหเหเต ทุพฺพณฺณตรา’ติ. เตสํ วณฺณาติมานปจฺจยา มานาติมานชาติกานํ ภูมิปปฺปฏโก อนฺตรธายิ. “त्यानंतर, हे वासेठ्ठ, ते प्राणी भूमीच्या पापुद्र्याचे (भूमी-पर्पटकाचे) भक्षण करू लागले. त्याचे भक्षण करत, त्यालाच आपले खाद्य व आहार बनवून ते दीर्घकाळपर्यंत राहिले. हे वासेठ्ठ, जसे जसे ते प्राणी भूमीच्या पापुद्र्याचे भक्षण करत, त्यालाच आपले खाद्य व आहार बनवून दीर्घकाळपर्यंत राहिले, तसतसे त्या प्राण्यांच्या शरीरात अधिक प्रमाणात कठीणपणा आला आणि त्यांच्या वर्णामध्ये (रूपांमध्ये) भिन्नता दिसून येऊ लागली. काही प्राणी सुवर्ण (तेजस्वी रूपाचे) झाले, तर काही कुरूप (दुर्वर्ण) झाले. त्यापैकी जे प्राणी सुवर्ण होते, ते कुरूप प्राण्यांचा तिरस्कार करू लागले—‘आम्ही यांच्यापेक्षा अधिक सुंदर आहोत, हे आमच्यापेक्षा अधिक कुरूप आहेत.’ त्यांच्या या रूप-अभिमानामुळे आणि गर्विष्ठ स्वभावामुळे तो भूमीचा पापुद्रा नाहीसा झाला.” ปทาลตาปาตุภาโว मधुर वेलीचा प्रादुर्भाव ๑๒๔. ‘‘ภูมิปปฺปฏเก อนฺตรหิเต ปทาลตา ปาตุรโหสิ, เสยฺยถาปิ นาม กลมฺพุกา, เอวเมว ปาตุรโหสิ. สา อโหสิ วณฺณสมฺปนฺนา คนฺธสมฺปนฺนา รสสมฺปนฺนา, เสยฺยถาปิ นาม สมฺปนฺนํ วา สปฺปิ สมฺปนฺนํ วา นวนีตํ เอวํวณฺณา อโหสิ. เสยฺยถาปิ นาม ขุทฺทมธุํ อเนฬกํ, เอวมสฺสาทา อโหสิ. १२४. “भूमीचा पापुद्रा नाहीसा झाल्यावर एक वेल (पद्-लता) प्रकट झाली. ज्याप्रमाणे अत्यंत गोड कळंबुका (एक प्रकारची वेल) प्रकट होते, त्याचप्रमाणे ती प्रकट झाली. ती वर्णसंपन्न, गंधसंपन्न आणि रससंपन्न होती. ज्याप्रमाणे उत्तम तूप किंवा उत्तम लोणी असते, त्याप्रमाणे तिचा वर्ण होता. आणि ज्याप्रमाणे शुद्ध, दोषरहित मध असतो, त्याप्रमाणे ती चवीला अत्यंत गोड होती.” ‘‘อถ โข เต, วาเสฏฺฐ, สตฺตา ปทาลตํ อุปกฺกมึสุ ปริภุญฺชิตุํ. เต ตํ ปริภุญฺชนฺตา ตํภกฺขา ตทาหารา จิรํ ทีฆมทฺธานํ อฏฺฐํสุ. ยถา ยถา โข เต, วาเสฏฺฐ, สตฺตา ปทาลตํ ปริภุญฺชนฺตา ตํภกฺขา ตทาหารา จิรํ ทีฆมทฺธานํ อฏฺฐํสุ, ตถา ตถา เตสํ สตฺตานํ ภิยฺโยโสมตฺตาย ขรตฺตญฺเจว กายสฺมึ โอกฺกมิ, วณฺณเววณฺณตา จ ปญฺญายิตฺถ. เอกิทํ สตฺตา วณฺณวนฺโต โหนฺติ, เอกิทํ สตฺตา ทุพฺพณฺณา. ตตฺถ เย เต สตฺตา วณฺณวนฺโต, เต ทุพฺพณฺเณ สตฺเต อติมญฺญนฺติ – ‘มยเมเตหิ วณฺณวนฺตตรา, อมฺเหเหเต ทุพฺพณฺณตรา’ติ. เตสํ วณฺณาติมานปจฺจยา มานาติมานชาติกานํ ปทาลตา อนฺตรธายิ. “त्यानंतर, हे वासेठ्ठ, ते प्राणी त्या वेलीचे भक्षण करू लागले. त्याचे भक्षण करत, त्यालाच आपले खाद्य व आहार बनवून ते दीर्घकाळपर्यंत राहिले. हे वासेठ्ठ, जसे जसे ते प्राणी त्या वेलीचे भक्षण करत, त्यालाच आपले खाद्य व आहार बनवून दीर्घकाळपर्यंत राहिले, तसतसे त्या प्राण्यांच्या शरीरात अधिक प्रमाणात कठीणपणा आला आणि त्यांच्या वर्णामध्ये भिन्नता दिसून येऊ लागली. काही प्राणी सुवर्ण झाले, तर काही कुरूप झाले. त्यापैकी जे प्राणी सुवर्ण होते, ते कुरूप प्राण्यांचा तिरस्कार करू लागले—‘आम्ही यांच्यापेक्षा अधिक सुंदर आहोत, हे आमच्यापेक्षा अधिक कुरूप आहेत.’ त्यांच्या या रूप-अभिमानामुळे आणि गर्विष्ठ स्वभावामुळे ती वेल नाहीशी झाली.” ‘‘ปทาลตาย อนฺตรหิตาย สนฺนิปตึสุ. สนฺนิปติตฺวา อนุตฺถุนึสุ – ‘อหุ วต โน, อหายิ วต โน ปทาลตา’ติ! ตเทตรหิปิ มนุสฺสา เกนจิ ทุกฺขธมฺเมน ผุฏฺฐา เอวมาหํสุ – ‘อหุ วต โน, อหายิ [Pg.73] วต โน’ติ! ตเทว โปราณํ อคฺคญฺญํ อกฺขรํ อนุสรนฺติ, น ตฺเววสฺส อตฺถํ อาชานนฺติ. “ती वेल नाहीशी झाल्यावर ते सर्व एकत्र जमले. एकत्र जमून ते शोक करू लागले—‘अरेरे! आपल्याकडे ती वेल होती, अरेरे! आपली ती वेल नष्ट झाली!’ आजही जेव्हा लोक एखाद्या दुःखाने पीडित होतात, तेव्हा ते असेच म्हणतात—‘अरेरे! आपल्याकडे ते (सुख) होते, अरेरे! आपले ते नष्ट झाले!’ ते या प्राचीन, आद्य शब्दांचेच अनुकरण करतात, परंतु त्यांना त्याचा खरा अर्थ माहीत नसतो.” อกฏฺฐปากสาลิปาตุภาโว न नांगरता पिकणाऱ्या शाली-तांदळाचा प्रादुर्भाव ๑๒๕. ‘‘อถ โข เตสํ, วาเสฏฺฐ, สตฺตานํ ปทาลตาย อนฺตรหิตาย อกฏฺฐปาโก สาลิ ปาตุรโหสิ อกโณ อถุโส สุทฺโธ สุคนฺโธ ตณฺฑุลปฺผโล. ยํ ตํ สายํ สายมาสาย อาหรนฺติ, ปาโต ตํ โหติ ปกฺกํ ปฏิวิรูฬฺหํ. ยํ ตํ ปาโต ปาตราสาย อาหรนฺติ, สายํ ตํ โหติ ปกฺกํ ปฏิวิรูฬฺหํ; นาปทานํ ปญฺญายติ. อถ โข เต, วาเสฏฺฐ, สตฺตา อกฏฺฐปากํ สาลึ ปริภุญฺชนฺตา ตํภกฺขา ตทาหารา จิรํ ทีฆมทฺธานํ อฏฺฐํสุ. १२५. “त्यानंतर, हे वासेठ्ठ, ती वेल नाहीशी झाल्यावर त्या प्राण्यांसाठी न नांगरता पिकणारे (अकृष्टपक्व) शाली-धान्य (तांदूळ) प्रकट झाले, जे कोंडा नसलेले, टरफल नसलेले, स्वच्छ, सुगंधी आणि थेट तांदळाचे दाणे देणारे होते. संध्याकाळच्या जेवणासाठी ते जे धान्य घेऊन येत, ते सकाळी पुन्हा पिकलेले आणि उगवलेले असे. जे ते सकाळच्या जेवणासाठी घेऊन येत, ते संध्याकाळी पुन्हा पिकलेले आणि उगवलेले असे; ते कापल्याची कोणतीही खूण दिसत नसे. त्यानंतर, हे वासेठ्ठ, ते प्राणी त्या अकृष्टपक्व शालीचे भक्षण करत, त्यालाच आपले खाद्य व आहार बनवून दीर्घकाळपर्यंत राहिले.” อิตฺถิปุริสลิงฺคปาตุภาโว स्त्री आणि पुरुष लिंगाचा प्रादुर्भाव ๑๒๖. ‘‘ยถา ยถา โข เต, วาเสฏฺฐ, สตฺตา อกฏฺฐปากํ สาลึ ปริภุญฺชนฺตา ตํภกฺขา ตทาหารา จิรํ ทีฆมทฺธานํ อฏฺฐํสุ, ตถา ตถา เตสํ สตฺตานํ ภิยฺโยโสมตฺตาย ขรตฺตญฺเจว กายสฺมึ โอกฺกมิ, วณฺณเววณฺณตา จ ปญฺญายิตฺถ, อิตฺถิยา จ อิตฺถิลิงฺคํ ปาตุรโหสิ ปุริสสฺส จ ปุริสลิงฺคํ. อิตฺถี จ ปุริสํ อติเวลํ อุปนิชฺฌายติ ปุริโส จ อิตฺถึ. เตสํ อติเวลํ อญฺญมญฺญํ อุปนิชฺฌายตํ สาราโค อุทปาทิ, ปริฬาโห กายสฺมึ โอกฺกมิ. เต ปริฬาหปจฺจยา เมถุนํ ธมฺมํ ปฏิเสวึสุ. १२६. “हे वासेठ्ठ, जसे जसे ते प्राणी त्या अकृष्टपक्व शालीचे भक्षण करत, त्यालाच आपले खाद्य व आहार बनवून दीर्घकाळपर्यंत राहिले, तसतसे त्या प्राण्यांच्या शरीरात अधिक प्रमाणात कठीणपणा आला आणि त्यांच्या वर्णामध्ये भिन्नता दिसून येऊ लागली. तसेच, स्त्रीमध्ये स्त्री-लिंग आणि पुरुषामध्ये पुरुष-लिंग प्रकट झाले. स्त्री पुरुषाकडे आणि पुरुष स्त्रीकडे अतिशय निरखून पाहू लागला. एकमेकांकडे अतिशय निरखून पाहिल्यामुळे त्यांच्यात तीव्र कामवासना (राग) निर्माण झाली आणि त्यांच्या शरीरात कामदाह उत्पन्न झाला. त्या कामदाहामुळे ते मैथुन धर्माचे (लैंगिक संबंधांचे) आचरण करू लागले.” ‘‘เย โข ปน เต, วาเสฏฺฐ, เตน สมเยน สตฺตา ปสฺสนฺติ เมถุนํ ธมฺมํ ปฏิเสวนฺเต, อญฺเญ ปํสุํ ขิปนฺติ, อญฺเญ เสฏฺฐึ ขิปนฺติ, อญฺเญ โคมยํ ขิปนฺติ – ‘นสฺส อสุจิ, นสฺส อสุจี’ติ. ‘กถญฺหิ นาม สตฺโต สตฺตสฺส เอวรูปํ กริสฺสตี’ติ! ตเทตรหิปิ มนุสฺสา เอกจฺเจสุ ชนปเทสุ วธุยา นิพฺพุยฺหมานาย อญฺเญ ปํสุํ ขิปนฺติ, อญฺเญ เสฏฺฐึ ขิปนฺติ, อญฺเญ โคมยํ ขิปนฺติ. ตเทว โปราณํ อคฺคญฺญํ อกฺขรํ อนุสรนฺติ, น ตฺเววสฺส อตฺถํ อาชานนฺติ. “हे वासेठ्ठ, त्या काळी जे प्राणी इतरांना मैथुन धर्माचे आचरण करताना पाहत, तेव्हा काही जण त्यांच्यावर धूळ फेकत, काही जण राख फेकत, तर काही जण शेण फेकत आणि म्हणत—‘अशुद्ध नष्ट होवो! अशुद्ध नष्ट होवो!’ ‘एक प्राणी दुसऱ्या प्राण्याशी असे वर्तन कसे काय करू शकतो!’ आजही काही देशांमध्ये जेव्हा नववधूला आणले जाते, तेव्हा काही लोक तिच्यावर धूळ फेकतात, काही राख फेकतात, तर काही शेण फेकतात. ते या प्राचीन, आद्य परंपरेचेच अनुकरण करतात, परंतु त्यांना त्याचा खरा अर्थ माहीत नसतो.” เมถุนธมฺมสมาจาโร मैथुन धर्माचे आचरण ๑๒๗. ‘‘อธมฺมสมฺมตํ [Pg.74] โข ปน, วาเสฏฺฐ, เตน สมเยน โหติ, ตเทตรหิ ธมฺมสมฺมตํ. เย โข ปน, วาเสฏฺฐ, เตน สมเยน สตฺตา เมถุนํ ธมฺมํ ปฏิเสวนฺติ, เต มาสมฺปิ ทฺเวมาสมฺปิ น ลภนฺติ คามํ วา นิคมํ วา ปวิสิตุํ. ยโต โข เต, วาเสฏฺฐ, สตฺตา ตสฺมึ อสทฺธมฺเม อติเวลํ ปาตพฺยตํ อาปชฺชึสุ. อถ อคารานิ อุปกฺกมึสุ กาตุํ ตสฺเสว อสทฺธมฺมสฺส ปฏิจฺฉาทนตฺถํ. อถ โข, วาเสฏฺฐ, อญฺญตรสฺส สตฺตสฺส อลสชาติกสฺส เอตทโหสิ – ‘อมฺโภ, กิเมวาหํ วิหญฺญามิ สาลึ อาหรนฺโต สายํ สายมาสาย ปาโต ปาตราสาย! ยํนูนาหํ สาลึ อาหเรยฺยํ สกึเทว สายปาตราสายา’ติ! १२७. “हे वासेठ्ठ, त्या काळी जे अधर्म मानले जात होते, ते आज धर्म (योग्य) मानले जाते. हे वासेठ्ठ, त्या काळी जे प्राणी मैथुन धर्माचे आचरण करत, त्यांना एक-एक किंवा दोन-दोन महिने गावात किंवा नगरात प्रवेश करण्याची परवानगी नसे. हे वासेठ्ठ, जेव्हा ते प्राणी त्या अधर्मामध्ये अतिशय मग्न झाले, तेव्हा त्या अधर्माला (मैथुन कर्माला) लपवण्यासाठी त्यांनी घरे बांधण्यास सुरुवात केली. त्यानंतर, हे वासेठ्ठ, एका आळशी स्वभावाच्या प्राण्याच्या मनात असा विचार आला—‘अरे मित्रांनो, मी संध्याकाळच्या जेवणासाठी संध्याकाळी आणि सकाळच्या जेवणासाठी सकाळी शाली-धान्य आणून का बरे स्वतःला थकवू? मी एकाच वेळी संध्याकाळच्या आणि सकाळच्या जेवणासाठी शाली-धान्य का आणू नये?’” ‘‘อถ โข โส, วาเสฏฺฐ, สตฺโต สาลึ อาหาสิ สกึเทว สายปาตราสาย. อถ โข, วาเสฏฺฐ, อญฺญตโร สตฺโต เยน โส สตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ สตฺตํ เอตทโวจ – ‘เอหิ, โภ สตฺต, สาลาหารํ คมิสฺสามา’ติ. ‘อลํ, โภ สตฺต, อาหโต เม สาลิ สกึเทว สายปาตราสายา’ติ. อถ โข โส, วาเสฏฺฐ, สตฺโต ตสฺส สตฺตสฺส ทิฏฺฐานุคตึ อาปชฺชมาโน สาลึ อาหาสิ สกึเทว ทฺวีหาย. ‘เอวมฺปิ กิร, โภ, สาธู’ติ. “त्यानंतर, हे वासेठ्ठ, त्या प्राण्याने एकाच वेळी संध्याकाळच्या आणि सकाळच्या जेवणासाठी शाली-धान्य आणले. त्यानंतर, हे वासेठ्ठ, दुसरा एक प्राणी त्या प्राण्याकडे आला आणि त्याला म्हणाला—‘चल मित्रा, आपण शाली-धान्य आणायला जाऊ या.’ तो म्हणाला, ‘नको मित्रा, मी एकाच वेळी संध्याकाळच्या आणि सकाळच्या जेवणासाठी शाली-धान्य आणले आहे.’ त्यानंतर, हे वासेठ्ठ, त्या प्राण्याचे अनुकरण करत, दुसऱ्या प्राण्याने एकाच वेळी दोन दिवसांचे शाली-धान्य आणले आणि म्हणाला, ‘मित्रा, हे देखील खरोखर चांगले आहे!’” ‘‘อถ โข, วาเสฏฺฐ, อญฺญตโร สตฺโต เยน โส สตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ สตฺตํ เอตทโวจ – ‘เอหิ, โภ สตฺต, สาลาหารํ คมิสฺสามา’ติ. ‘อลํ, โภ สตฺต, อาหโต เม สาลิ สกึเทว ทฺวีหายา’ติ. อถ โข โส, วาเสฏฺฐ, สตฺโต ตสฺส สตฺตสฺส ทิฏฺฐานุคตึ อาปชฺชมาโน สาลึ อาหาสิ สกึเทว จตูหาย, ‘เอวมฺปิ กิร, โภ, สาธู’ติ. “त्यानंतर, हे वासेठ्ठ, आणखी एक प्राणी त्या प्राण्याकडे आला आणि त्याला म्हणाला—‘चल मित्रा, आपण शाली-धान्य आणायला जाऊ या.’ तो म्हणाला, ‘नको मित्रा, मी एकाच वेळी दोन दिवसांचे शाली-धान्य आणले आहे.’ त्यानंतर, हे वासेठ्ठ, त्या प्राण्याचे अनुकरण करत, त्याने एकाच वेळी चार दिवसांचे शाली-धान्य आणले आणि म्हणाला, ‘मित्रा, हे देखील खरोखर चांगले आहे!’” ‘‘อถ โข, วาเสฏฺฐ, อญฺญตโร สตฺโต เยน โส สตฺโต เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ สตฺตํ เอตทโวจ – ‘เอหิ, โภ สตฺต, สาลาหารํ คมิสฺสามา’ติ. ‘อลํ, โภ สตฺต, อาหโต เม สาลิ สกิเทว จตูหายา’ติ. อถ โข โส, วาเสฏฺฐ, สตฺโต ตสฺส สตฺตสฺส [Pg.75] ทิฏฺฐานุคตึ อาปชฺชมาโน สาลึ อาหาสิ สกิเทว อฏฺฐาหาย, ‘เอวมฺปิ กิร, โภ, สาธู’ติ. “त्यानंतर, हे वासेठ्ठ, एक प्राणी दुसऱ्या प्राण्याकडे गेला; आणि जवळ जाऊन त्याला म्हणाला – ‘मित्रा, ये, आपण शाली (तांदूळ) आणायला जाऊ या.’ (दुसरा म्हणाला) ‘नको मित्रा, मी एकाच वेळी चार दिवसांसाठी पुरेल एवढी शाली आणली आहे.’ त्यानंतर, हे वासेठ्ठ, तो प्राणी त्या प्राण्याचे अनुकरण करत, ‘हे देखील खरोखर चांगले आहे, मित्रा’ असे म्हणून एकाच वेळी आठ दिवसांसाठी पुरेल एवढी शाली घेऊन आला.” ‘‘ยโต โข เต, วาเสฏฺฐ, สตฺตา สนฺนิธิการกํ สาลึ อุปกฺกมึสุ ปริภุญฺชิตุํ. อถ กโณปิ ตณฺฑุลํ ปริโยนนฺธิ, ถุโสปิ ตณฺฑุลํ ปริโยนนฺธิ; ลูนมฺปิ นปฺปฏิวิรูฬฺหํ, อปทานํ ปญฺญายิตฺถ, สณฺฑสณฺฑา สาลโย อฏฺฐํสุ. “हे वासेठ्ठ, जेव्हा त्या प्राण्यांनी शालीचा साठा करून ती खाण्यास सुरुवात केली, तेव्हा तांदळावर तांबूस कणी (कोंडा) आणि टरफले देखील चढू लागली; कापलेला भाग पुन्हा उगवला नाही, कापलेली जागा स्पष्ट दिसू लागली आणि शालीचे पीक वेगवेगळ्या समूहात (झुडपात) उभे राहिले.” สาลิวิภาโค शाली-विभागणी ๑๒๘. ‘‘อถ โข เต, วาเสฏฺฐ, สตฺตา สนฺนิปตึสุ, สนฺนิปติตฺวา อนุตฺถุนึสุ – ‘ปาปกา วต, โภ, ธมฺมา สตฺเตสุ ปาตุภูตา. มยญฺหิ ปุพฺเพ มโนมยา อหุมฺหา ปีติภกฺขา สยํปภา อนฺตลิกฺขจรา สุภฏฺฐายิโน, จิรํ ทีฆมทฺธานํ อฏฺฐมฺหา. เตสํ โน อมฺหากํ กทาจิ กรหจิ ทีฆสฺส อทฺธุโน อจฺจเยน รสปถวี อุทกสฺมึ สมตนิ. สา อโหสิ วณฺณสมฺปนฺนา คนฺธสมฺปนฺนา รสสมฺปนฺนา. เต มยํ รสปถวึ หตฺเถหิ อาลุปฺปการกํ อุปกฺกมิมฺห ปริภุญฺชิตุํ, เตสํ โน รสปถวึ หตฺเถหิ อาลุปฺปการกํ อุปกฺกมตํ ปริภุญฺชิตุํ สยํปภา อนฺตรธายิ. สยํปภาย อนฺตรหิตาย จนฺทิมสูริยา ปาตุรเหสุํ, จนฺทิมสูริเยสุ ปาตุภูเตสุ นกฺขตฺตานิ ตารกรูปานิ ปาตุรเหสุํ, นกฺขตฺเตสุ ตารกรูเปสุ ปาตุภูเตสุ รตฺตินฺทิวา ปญฺญายึสุ, รตฺตินฺทิเวสุ ปญฺญายมาเนสุ มาสฑฺฒมาสา ปญฺญายึสุ. มาสฑฺฒมาเสสุ ปญฺญายมาเนสุ อุตุสํวจฺฉรา ปญฺญายึสุ. เต มยํ รสปถวึ ปริภุญฺชนฺตา ตํภกฺขา ตทาหารา จิรํ ทีฆมทฺธานํ อฏฺฐมฺหา. เตสํ โน ปาปกานํเยว อกุสลานํ ธมฺมานํ ปาตุภาวา รสปถวี อนฺตรธายิ. รสปถวิยา อนฺตรหิตาย ภูมิปปฺปฏโก ปาตุรโหสิ. โส อโหสิ วณฺณสมฺปนฺโน คนฺธสมฺปนฺโน รสสมฺปนฺโน. เต มยํ ภูมิปปฺปฏกํ อุปกฺกมิมฺห ปริภุญฺชิตุํ. เต มยํ ตํ ปริภุญฺชนฺตา ตํภกฺขา ตทาหารา จิรํ ทีฆมทฺธานํ อฏฺฐมฺหา. เตสํ โน ปาปกานํเยว อกุสลานํ ธมฺมานํ ปาตุภาวา ภูมิปปฺปฏโก อนฺตรธายิ. ภูมิปปฺปฏเก อนฺตรหิเต ปทาลตา ปาตุรโหสิ. สา อโหสิ วณฺณสมฺปนฺนา คนฺธสมฺปนฺนา รสสมฺปนฺนา. เต มยํ ปทาลตํ อุปกฺกมิมฺห ปริภุญฺชิตุํ. เต มยํ ตํ ปริภุญฺชนฺตา ตํภกฺขา ตทาหารา จิรํ ทีฆมทฺธานํ อฏฺฐมฺหา. เตสํ โน ปาปกานํเยว อกุสลานํ ธมฺมานํ ปาตุภาวา [Pg.76] ปทาลตา อนฺตรธายิ. ปทาลตาย อนฺตรหิตาย อกฏฺฐปาโก สาลิ ปาตุรโหสิ อกโณ อถุโส สุทฺโธ สุคนฺโธ ตณฺฑุลปฺผโล. ยํ ตํ สายํ สายมาสาย อาหราม, ปาโต ตํ โหติ ปกฺกํ ปฏิวิรูฬฺหํ. ยํ ตํ ปาโต ปาตราสาย อาหราม, สายํ ตํ โหติ ปกฺกํ ปฏิวิรูฬฺหํ. นาปทานํ ปญฺญายิตฺถ. เต มยํ อกฏฺฐปากํ สาลึ ปริภุญฺชนฺตา ตํภกฺขา ตทาหารา จิรํ ทีฆมทฺธานํ อฏฺฐมฺหา. เตสํ โน ปาปกานํเยว อกุสลานํ ธมฺมานํ ปาตุภาวา กโณปิ ตณฺฑุลํ ปริโยนนฺธิ, ถุโสปิ ตณฺฑุลํ ปริโยนนฺธิ, ลูนมฺปิ นปฺปฏิวิรูฬฺหํ, อปทานํ ปญฺญายิตฺถ, สณฺฑสณฺฑา สาลโย ฐิตา. ยํนูน มยํ สาลึ วิภเชยฺยาม, มริยาทํ ฐเปยฺยามา’ติ! อถ โข เต, วาเสฏฺฐ, สตฺตา สาลึ วิภชึสุ, มริยาทํ ฐเปสุํ. १२८. “त्यानंतर, हे वासेठ्ठ, ते प्राणी एकत्र जमले आणि एकत्र येऊन शोक करू लागले – ‘अरेरे! प्राण्यांमध्ये खरोखरच पापी (वाईट) प्रवृत्ती प्रकट झाल्या आहेत. पूर्वी आपण मनोमय होतो, प्रीतीचे भक्षण करणारे होतो, स्वयंप्रकाशी होतो, आकाशात विहार करणारे होतो, वैभवशाली स्थितीत राहणारे होतो आणि दीर्घकाळपर्यंत तसेच राहिलो. त्या आपल्यासाठी, दीर्घकाळानंतर कधीतरी, पाण्यावर चवदार भूमीचा रस पसरला. तो रंगाने, सुगंधाने आणि चवीने संपन्न होता. आपण तो भूमीचा रस हाताने घास करून खाण्यास सुरुवात केली. आपण तो भूमीचा रस हाताने घास करून खाण्यास सुरुवात केल्यावर आपले स्वयंप्रकाशत्व नाहीसे झाले. स्वयंप्रकाशत्व नाहीसे झाल्यावर चंद्र आणि सूर्य प्रकट झाले. चंद्र आणि सूर्य प्रकट झाल्यावर नक्षत्र आणि तारे प्रकट झाले. नक्षत्र आणि तारे प्रकट झाल्यावर रात्र आणि दिवस समजून येऊ लागले. रात्र आणि दिवस समजून येऊ लागल्यावर महिने आणि पंधरवडे समजून येऊ लागले. महिने आणि पंधरवडे समजून येऊ लागल्यावर ऋतू आणि वर्षे समजून येऊ लागली. आपण तो भूमीचा रस खात, त्याचेच भक्षण करत आणि तोच आहार घेत दीर्घकाळपर्यंत राहिलो. आपल्यामध्ये पापी आणि अकुशल प्रवृत्ती प्रकट झाल्यामुळे तो भूमीचा रस नाहीसा झाला. भूमीचा रस नाहीसा झाल्यावर भूमीचे पटल (भूमी-पर्पटक) प्रकट झाले. ते रंगाने, सुगंधाने आणि चवीने संपन्न होते. आपण ते भूमीचे पटल खाण्यास सुरुवात केली. आपण ते भूमीचे पटल खात, त्याचेच भक्षण करत आणि तोच आहार घेत दीर्घकाळपर्यंत राहिलो. आपल्यामध्ये पापी आणि अकुशल प्रवृत्ती प्रकट झाल्यामुळे ते भूमीचे पटल नाहीसे झाले. भूमीचे पटल नाहीसे झाल्यावर वनलता प्रकट झाली. ती रंगाने, सुगंधाने आणि चवीने संपन्न होती. आपण ती वनलता खाण्यास सुरुवात केली. आपण ती वनलता खात, तिचेच भक्षण करत आणि तोच आहार घेत दीर्घकाळपर्यंत राहिलो. आपल्यामध्ये पापी आणि अकुशल प्रवृत्ती प्रकट झाल्यामुळे ती वनलता नाहीशी झाली. वनलता नाहीशी झाल्यावर न नांगरता पिकणारी शाली प्रकट झाली, जी कणी नसलेली, टरफल नसलेली, शुद्ध, सुगंधी आणि तांदळाचे दाणे असलेली होती. जी आपण संध्याकाळी संध्याकाळच्या जेवणासाठी आणत असू, ती सकाळी पुन्हा पिकलेली आणि उगवलेली असे. जी आपण सकाळी सकाळच्या जेवणासाठी आणत असू, ती संध्याकाळी पुन्हा पिकलेली आणि उगवलेली असे. कापलेला भाग अजिबात दिसत नसे. आपण ती न नांगरता पिकणारी शाली खात, तिचेच भक्षण करत आणि तोच आहार घेत दीर्घकाळपर्यंत राहिलो. आपल्यामध्ये पापी आणि अकुशल प्रवृत्ती प्रकट झाल्यामुळे तांदळावर तांबूस कणी आणि टरफले देखील चढू लागली; कापलेला भाग पुन्हा उगवला नाही, कापलेली जागा स्पष्ट दिसू लागली आणि शालीचे पीक वेगवेगळ्या समूहात उभे राहिले. आता आपण शालीचे विभाजन करून सीमा (मर्यादा) निश्चित केली तर किती बरे होईल!’ त्यानंतर, हे वासेठ्ठ, त्या प्राण्यांनी शालीचे विभाजन केले आणि सीमा निश्चित केल्या.” ๑๒๙. ‘‘อถ โข, วาเสฏฺฐ, อญฺญตโร สตฺโต โลลชาติโก สกํ ภาคํ ปริรกฺขนฺโต อญฺญตรํ ภาคํ อทินฺนํ อาทิยิตฺวา ปริภุญฺชิ. ตเมนํ อคฺคเหสุํ, คเหตฺวา เอตทโวจุํ – ‘ปาปกํ วต, โภ สตฺต, กโรสิ, ยตฺร หิ นาม สกํ ภาคํ ปริรกฺขนฺโต อญฺญตรํ ภาคํ อทินฺนํ อาทิยิตฺวา ปริภุญฺชสิ. มาสฺสุ, โภ สตฺต, ปุนปิ เอวรูปมกาสี’ติ. ‘เอวํ, โภ’ติ โข, วาเสฏฺฐ, โส สตฺโต เตสํ สตฺตานํ ปจฺจสฺโสสิ. ทุติยมฺปิ โข, วาเสฏฺฐ, โส สตฺโต…เป… ตติยมฺปิ โข, วาเสฏฺฐ, โส สตฺโต สกํ ภาคํ ปริรกฺขนฺโต อญฺญตรํ ภาคํ อทินฺนํ อาทิยิตฺวา ปริภุญฺชิ. ตเมนํ อคฺคเหสุํ, คเหตฺวา เอตทโวจุํ – ‘ปาปกํ วต, โภ สตฺต, กโรสิ, ยตฺร หิ นาม สกํ ภาคํ ปริรกฺขนฺโต อญฺญตรํ ภาคํ อทินฺนํ อาทิยิตฺวา ปริภุญฺชสิ. มาสฺสุ, โภ สตฺต, ปุนปิ เอวรูปมกาสี’ติ. อญฺเญ ปาณินา ปหรึสุ, อญฺเญ เลฑฺฑุนา ปหรึสุ, อญฺเญ ทณฺเฑน ปหรึสุ. ตทคฺเค โข, วาเสฏฺฐ, อทินฺนาทานํ ปญฺญายติ, ครหา ปญฺญายติ, มุสาวาโท ปญฺญายติ, ทณฺฑาทานํ ปญฺญายติ. १२९. “त्यानंतर, हे वासेठ्ठ, एका लोभी स्वभावाच्या प्राण्याने स्वतःच्या भागाचे रक्षण करत असताना, दुसऱ्याचा न दिलेला भाग चोरून खाल्ला. त्यांनी त्याला पकडले आणि पकडून असे म्हटले – ‘मित्रा, तू खरोखरच वाईट कर्म करत आहेस, कारण तू स्वतःच्या भागाचे रक्षण करत असताना दुसऱ्याचा न दिलेला भाग चोरून खात आहेस. मित्रा, पुन्हा असे करू नकोस.’ त्यावर, हे वासेठ्ठ, तो प्राणी त्या प्राण्यांना म्हणाला, ‘होय, मित्रांनो.’ दुसऱ्यांदाही, हे वासेठ्ठ, तो प्राणी... आणि तिसऱ्यांदाही, हे वासेठ्ठ, तो प्राणी स्वतःच्या भागाचे रक्षण करत असताना दुसऱ्याचा न दिलेला भाग चोरून खाऊ लागला. त्यांनी त्याला पकडले आणि पकडून असे म्हटले – ‘मित्रा, तू खरोखरच वाईट कर्म करत आहेस, कारण तू स्वतःच्या भागाचे रक्षण करत असताना दुसऱ्याचा न दिलेला भाग चोरून खात आहेस. मित्रा, पुन्हा असे करू नकोस.’ काहींनी त्याला हाताने मारले, काहींनी ढेकळाने मारले, तर काहींनी काठीने मारले. हे वासेठ्ठ, तेव्हापासूनच अदिन्नादान (चोरी) दिसून येऊ लागले, निंदा दिसून येऊ लागली, मुसावाद (असत्य बोलणे) दिसून येऊ लागला आणि दंडदान (शिक्षा देणे) दिसून येऊ लागले.” มหาสมฺมตราชา महासम्मत राजा ๑๓๐. ‘‘อถ โข เต, วาเสฏฺฐ, สตฺตา สนฺนิปตึสุ, สนฺนิปติตฺวา อนุตฺถุนึสุ – ‘ปาปกา วต โภ ธมฺมา สตฺเตสุ ปาตุภูตา, ยตฺร หิ นาม [Pg.77] อทินฺนาทานํ ปญฺญายิสฺสติ, ครหา ปญฺญายิสฺสติ, มุสาวาโท ปญฺญายิสฺสติ, ทณฺฑาทานํ ปญฺญายิสฺสติ. ยํนูน มยํ เอกํ สตฺตํ สมฺมนฺเนยฺยาม, โย โน สมฺมา ขียิตพฺพํ ขีเยยฺย, สมฺมา ครหิตพฺพํ ครเหยฺย, สมฺมา ปพฺพาเชตพฺพํ ปพฺพาเชยฺย. มยํ ปนสฺส สาลีนํ ภาคํ อนุปฺปทสฺสามา’ติ. १३०. “त्यानंतर, हे वासेठ्ठ, ते प्राणी एकत्र जमले आणि एकत्र येऊन शोक करू लागले – ‘अरेरे! प्राण्यांमध्ये खरोखरच पापी प्रवृत्ती प्रकट झाल्या आहेत, कारण आता चोरी दिसून येऊ लागली आहे, निंदा दिसून येऊ लागली आहे, असत्य बोलणे दिसून येऊ लागले आहे आणि शिक्षा देणे दिसून येऊ लागले आहे. आता आपण अशा एका प्राण्याची संमतीने नियुक्ती करू या, जो योग्य रीतीने दोष दाखवण्यास पात्र असलेल्याला दोष दाखवेल, निंदा करण्यास पात्र असलेल्याची निंदा करेल आणि हद्दपार करण्यास पात्र असलेल्याला हद्दपार करेल. आणि आपण त्याला आपल्या शालीचा एक भाग देऊ या.’” ‘‘อถ โข เต, วาเสฏฺฐ, สตฺตา โย เนสํ สตฺโต อภิรูปตโร จ ทสฺสนียตโร จ ปาสาทิกตโร จ มเหสกฺขตโร จ ตํ สตฺตํ อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจุํ – ‘เอหิ, โภ สตฺต, สมฺมา ขียิตพฺพํ ขีย, สมฺมา ครหิตพฺพํ ครห, สมฺมา ปพฺพาเชตพฺพํ ปพฺพาเชหิ. มยํ ปน เต สาลีนํ ภาคํ อนุปฺปทสฺสามา’ติ. ‘เอวํ, โภ’ติ โข, วาเสฏฺฐ, โส สตฺโต เตสํ สตฺตานํ ปฏิสฺสุณิตฺวา สมฺมา ขียิตพฺพํ ขียิ, สมฺมา ครหิตพฺพํ ครหิ, สมฺมา ปพฺพาเชตพฺพํ ปพฺพาเชสิ. เต ปนสฺส สาลีนํ ภาคํ อนุปฺปทํสุ. त्यानंतर, हे वासेठ्ठ, त्या प्राण्यांनी त्यांच्यातील जो प्राणी अधिक देखणा, अधिक दर्शनीय, अधिक प्रसन्न करणारा आणि अधिक प्रभावशाली होता, त्याच्याकडे जाऊन त्याला असे म्हटले – 'या, महाशय! जो निंदा करण्यास पात्र आहे त्याची योग्य प्रकारे निंदा करा, जो दोष देण्यास पात्र आहे त्याला योग्य प्रकारे दोष द्या, आणि जो हाकलून देण्यास पात्र आहे त्याला योग्य प्रकारे हाकलून द्या. आम्ही तुम्हाला आमच्या शाली-तांदळाचा (धान्याचा) हिस्सा देऊ.' हे वासेठ्ठ, 'तसेच असो, महाशय' असे म्हणून त्या प्राण्याने इतर प्राण्यांचे म्हणणे मान्य केले आणि जो निंदा करण्यास पात्र होता त्याची योग्य प्रकारे निंदा केली, जो दोष देण्यास पात्र होता त्याला योग्य प्रकारे दोष दिला, आणि जो हाकलून देण्यास पात्र होता त्याला योग्य प्रकारे हाकलून दिले. आणि त्यांनी त्याला त्याच्या शाली-तांदळाचा हिस्सा दिला. ๑๓๑. ‘‘มหาชนสมฺมโตติ โข, วาเสฏฺฐ, ‘มหาสมฺมโต, มหาสมฺมโต’ ตฺเวว ปฐมํ อกฺขรํ อุปนิพฺพตฺตํ. เขตฺตานํ อธิปตีติ โข, วาเสฏฺฐ, ‘ขตฺติโย, ขตฺติโย’ ตฺเวว ทุติยํ อกฺขรํ อุปนิพฺพตฺตํ. ธมฺเมน ปเร รญฺเชตีติ โข, วาเสฏฺฐ, ‘ราชา, ราชา’ ตฺเวว ตติยํ อกฺขรํ อุปนิพฺพตฺตํ. อิติ โข, วาเสฏฺฐ, เอวเมตสฺส ขตฺติยมณฺฑลสฺส โปราเณน อคฺคญฺเญน อกฺขเรน อภินิพฺพตฺติ อโหสิ เตสํเยว สตฺตานํ, อนญฺเญสํ. สทิสานํเยว, โน อสทิสานํ. ธมฺเมเนว, โน อธมฺเมน. ธมฺโม หิ, วาเสฏฺฐ, เสฏฺโฐ ชเนตสฺมึ ทิฏฺเฐ เจว ธมฺเม อภิสมฺปรายญฺจ. १३१. हे वासेठ्ठ, 'बहुमताने निवडलेला' (महाजनांनी संमत केलेला) या अर्थाने 'महासंमत, महासंमत' ही पहिली संज्ञा (नाव) अस्तित्वात आली. हे वासेठ्ठ, 'शेतांचा (जमिनीचा) अधिपती' या अर्थाने 'खत्तिय (क्षत्रिय), खत्तिय' ही दुसरी संज्ञा अस्तित्वात आली. हे वासेठ्ठ, 'धम्माने इतरांना प्रसन्न करतो' या अर्थाने 'राजा, राजा' ही तिसरी संज्ञा अस्तित्वात आली. अशा प्रकारे, हे वासेठ्ठ, या क्षत्रिय मंडळाची (वर्गाची) उत्पत्ती त्यांच्या प्राचीन आणि मूळ संज्ञांनुसार त्याच प्राण्यांमधून झाली, इतरांपासून नाही; त्यांच्यासारख्याच प्राण्यांमधून झाली, वेगळ्या प्राण्यांमधून नाही; धम्मानेच झाली, अधम्माने नाही. कारण, हे वासेठ्ठ, या लोकांमध्ये धम्मच या जन्मात आणि परलोकातही सर्वश्रेष्ठ आहे. พฺราหฺมณมณฺฑลํ ब्राह्मण मंडळ ๑๓๒. ‘‘อถ โข เตสํ, วาเสฏฺฐ, สตฺตานํเยว เอกจฺจานํ เอตทโหสิ – ‘ปาปกา วต, โภ, ธมฺมา สตฺเตสุ ปาตุภูตา, ยตฺร หิ นาม อทินฺนาทานํ ปญฺญายิสฺสติ, ครหา ปญฺญายิสฺสติ, มุสาวาโท ปญฺญายิสฺสติ, ทณฺฑาทานํ ปญฺญายิสฺสติ, ปพฺพาชนํ ปญฺญายิสฺสติ. ยํนูน มยํ ปาปเก อกุสเล ธมฺเม วาเหยฺยามา’ติ. เต ปาปเก อกุสเล ธมฺเม วาเหสุํ. ปาปเก อกุสเล ธมฺเม วาเหนฺตีติ โข, วาเสฏฺฐ, ‘พฺราหฺมณา, พฺราหฺมณา’ ตฺเวว ปฐมํ อกฺขรํ อุปนิพฺพตฺตํ. เต อรญฺญายตเน ปณฺณกุฏิโย [Pg.78] กริตฺวา ปณฺณกุฏีสุ ฌายนฺติ วีตงฺคารา วีตธูมา ปนฺนมุสลา สายํ สายมาสาย ปาโต ปาตราสาย คามนิคมราชธานิโย โอสรนฺติ ฆาสเมสมานา. เต ฆาสํ ปฏิลภิตฺวา ปุนเทว อรญฺญายตเน ปณฺณกุฏีสุ ฌายนฺติ. ตเมนํ มนุสฺสา ทิสฺวา เอวมาหํสุ – ‘อิเม โข, โภ, สตฺตา อรญฺญายตเน ปณฺณกุฏิโย กริตฺวา ปณฺณกุฏีสุ ฌายนฺติ, วีตงฺคารา วีตธูมา ปนฺนมุสลา สายํ สายมาสาย ปาโต ปาตราสาย คามนิคมราชธานิโย โอสรนฺติ ฆาสเมสมานา. เต ฆาสํ ปฏิลภิตฺวา ปุนเทว อรญฺญายตเน ปณฺณกุฏีสุ ฌายนฺตี’ติ, ฌายนฺตีติ โข, วาเสฏฺฐ, ‘ฌายกา, ฌายกา’ ตฺเวว ทุติยํ อกฺขรํ อุปนิพฺพตฺตํ. เตสํเยว โข, วาเสฏฺฐ, สตฺตานํ เอกจฺเจ สตฺตา อรญฺญายตเน ปณฺณกุฏีสุ ตํ ฌานํ อนภิสมฺภุณมานา คามสามนฺตํ นิคมสามนฺตํ โอสริตฺวา คนฺเถ กโรนฺตา อจฺฉนฺติ. ตเมนํ มนุสฺสา ทิสฺวา เอวมาหํสุ – ‘อิเม โข, โภ, สตฺตา อรญฺญายตเน ปณฺณกุฏีสุ ตํ ฌานํ อนภิสมฺภุณมานา คามสามนฺตํ นิคมสามนฺตํ โอสริตฺวา คนฺเถ กโรนฺตา อจฺฉนฺติ, น ทานิเม ฌายนฺตี’ติ. น ทานิเม ฌายนฺตีติ โข, วาเสฏฺฐ, ‘อชฺฌายกา อชฺฌายกา’ ตฺเวว ตติยํ อกฺขรํ อุปนิพฺพตฺตํ. หีนสมฺมตํ โข ปน, วาเสฏฺฐ, เตน สมเยน โหติ, ตเทตรหิ เสฏฺฐสมฺมตํ. อิติ โข, วาเสฏฺฐ, เอวเมตสฺส พฺราหฺมณมณฺฑลสฺส โปราเณน อคฺคญฺเญน อกฺขเรน อภินิพฺพตฺติ อโหสิ เตสํเยว สตฺตานํ, อนญฺเญสํ สทิสานํเยว โน อสทิสานํ ธมฺเมเนว, โน อธมฺเมน. ธมฺโม หิ, วาเสฏฺฐ, เสฏฺโฐ ชเนตสฺมึ ทิฏฺเฐ เจว ธมฺเม อภิสมฺปรายญฺจ. १३२. त्यानंतर, हे वासेठ्ठ, त्या प्राण्यांपैकी काहींच्या मनात असा विचार आला – 'अरेरे! प्राण्यांमध्ये खरोखरच पापी प्रवृत्ती (अकुशल धम्म) प्रकट झाल्या आहेत, कारण चोरी (न दिलेले घेणे), निंदा, असत्य बोलणे, शिक्षा देणे आणि हद्दपारी दिसून येत आहे. मग आम्ही या पापी अकुशल प्रवृत्तींना दूर का करू नये?' त्यांनी त्या पापी अकुशल प्रवृत्तींना दूर केले (वाहून लावले). हे वासेठ्ठ, 'पापी अकुशल प्रवृत्तींना दूर करणारे' या अर्थाने 'ब्राह्मण, ब्राह्मण' ही पहिली संज्ञा अस्तित्वात आली. त्यांनी अरण्यात पानांच्या कुट्या (झोपड्या) बांधल्या आणि त्या कुट्यांमध्ये ते ध्यान करू लागले. ते निखारे आणि धूर यांपासून मुक्त होते, त्यांनी मुसळ बाजूला ठेवले होते. संध्याकाळी संध्याकाळच्या जेवणासाठी आणि सकाळी सकाळच्या जेवणासाठी ते अन्न शोधत गाव, नगर आणि राजधानीत जात असत. अन्न मिळाल्यावर ते पुन्हा अरण्यातील पानांच्या कुट्यांमध्ये जाऊन ध्यान करत असत. लोकांना हे पाहून ते असे म्हणू लागले – 'हे पहा, महाशय! हे प्राणी अरण्यात पानांच्या कुट्या बांधून ध्यान करत आहेत. ते निखारे आणि धूर यांपासून मुक्त आहेत, त्यांनी मुसळ बाजूला ठेवले आहे. संध्याकाळी संध्याकाळच्या जेवणासाठी आणि सकाळी सकाळच्या जेवणासाठी ते अन्न शोधत गाव, नगर आणि राजधानीत जातात. अन्न मिळाल्यावर ते पुन्हा अरण्यातील पानांच्या कुट्यांमध्ये जाऊन ध्यान करतात.' हे वासेठ्ठ, 'ते ध्यान करतात' या अर्थाने 'झायक (ध्यायी), झायक' ही दुसरी संज्ञा अस्तित्वात आली. हे वासेठ्ठ, त्या प्राण्यांपैकी काही प्राणी अरण्यातील पानांच्या कुट्यांमध्ये ते ध्यान करण्यास असमर्थ ठरले, तेव्हा ते गावांच्या आणि नगरांच्या जवळ येऊन ग्रंथ (वेद) रचत आणि शिकवत राहू लागले. लोकांना हे पाहून ते असे म्हणू लागले – 'हे पहा, महाशय! हे प्राणी अरण्यातील पानांच्या कुट्यांमध्ये ध्यान करण्यास असमर्थ ठरल्यामुळे गावांच्या आणि नगरांच्या जवळ येऊन ग्रंथ रचत आणि शिकवत राहत आहेत. आता हे ध्यान करत नाहीत.' हे वासेठ्ठ, 'आता हे ध्यान करत नाहीत (अ-ध्यायी)' या अर्थाने 'अज्झायक (अध्यापक/अध्येता), अज्झायक' ही तिसरी संज्ञा अस्तित्वात आली. हे वासेठ्ठ, त्या काळी ही संज्ञा कनिष्ठ मानली जात असे, परंतु आज ती श्रेष्ठ मानली जाते. अशा प्रकारे, हे वासेठ्ठ, या ब्राह्मण मंडळाची उत्पत्ती त्यांच्या प्राचीन आणि मूळ संज्ञांनुसार त्याच प्राण्यांमधून झाली, इतरांपासून नाही; त्यांच्यासारख्याच प्राण्यांमधून झाली, वेगळ्या प्राण्यांमधून नाही; धम्मानेच झाली, अधम्माने नाही. कारण, हे वासेठ्ठ, या लोकांमध्ये धम्मच या जन्मात आणि परलोकातही सर्वश्रेष्ठ आहे. เวสฺสมณฺฑลํ वेस्स मंडळ ๑๓๓. ‘‘เตสํเยว โข, วาเสฏฺฐ, สตฺตานํ เอกจฺเจ สตฺตา เมถุนํ ธมฺมํ สมาทาย วิสุกมฺมนฺเต ปโยเชสุํ. เมถุนํ ธมฺมํ สมาทาย วิสุกมฺมนฺเต ปโยเชนฺตีติ โข, วาเสฏฺฐ, ‘เวสฺสา, เวสฺสา’ ตฺเวว อกฺขรํ อุปนิพฺพตฺตํ. อิติ โข, วาเสฏฺฐ, เอวเมตสฺส เวสฺสมณฺฑลสฺส โปราเณน อคฺคญฺเญน อกฺขเรน อภินิพฺพตฺติ อโหสิ เตสญฺเญว สตฺตานํ อนญฺเญสํ สทิสานํเยว[Pg.79], โน อสทิสานํ, ธมฺเมเนว โน อธมฺเมน. ธมฺโม หิ, วาเสฏฺฐ, เสฏฺโฐ ชเนตสฺมึ ทิฏฺเฐ เจว ธมฺเม อภิสมฺปรายญฺจ. १३३. हे वासेठ्ठ, त्या प्राण्यांपैकी काही प्राण्यांनी गृहस्थधर्माचा (मैथुन धम्माचा) स्वीकार केला आणि ते विविध प्रकारचे उद्योग-व्यवसाय (शेती, व्यापार इत्यादी) करू लागले. हे वासेठ्ठ, 'गृहस्थधर्माचा स्वीकार करून विविध व्यवसाय करणारे' या अर्थाने 'वेस्स (वैश्य), वेस्स' ही संज्ञा अस्तित्वात आली. अशा प्रकारे, हे वासेठ्ठ, या वेस्स मंडळाची उत्पत्ती त्यांच्या प्राचीन आणि मूळ संज्ञांनुसार त्याच प्राण्यांमधून झाली, इतरांपासून नाही; त्यांच्यासारख्याच प्राण्यांमधून झाली, वेगळ्या प्राण्यांमधून नाही; धम्मानेच झाली, अधम्माने नाही. कारण, हे वासेठ्ठ, या लोकांमध्ये धम्मच या जन्मात आणि परलोकातही सर्वश्रेष्ठ आहे. สุทฺทมณฺฑลํ सुद्द मंडळ ๑๓๔. ‘‘เตสญฺเญว โข, วาเสฏฺฐ, สตฺตานํ เย เต สตฺตา อวเสสา เต ลุทฺทาจารา ขุทฺทาจารา อเหสุํ. ลุทฺทาจารา ขุทฺทาจาราติ โข, วาเสฏฺฐ, ‘สุทฺทา, สุทฺทา’ ตฺเวว อกฺขรํ อุปนิพฺพตฺตํ. อิติ โข, วาเสฏฺฐ, เอวเมตสฺส สุทฺทมณฺฑลสฺส โปราเณน อคฺคญฺเญน อกฺขเรน อภินิพฺพตฺติ อโหสิ เตสํเยว สตฺตานํ อนญฺเญสํ, สทิสานํเยว โน อสทิสานํ, ธมฺเมเนว, โน อธมฺเมน. ธมฺโม หิ, วาเสฏฺฐ, เสฏฺโฐ ชเนตสฺมึ ทิฏฺเฐ เจว ธมฺเม อภิสมฺปรายญฺจ. १३४. हे वासेठ्ठ, त्या प्राण्यांपैकी जे प्राणी उरले होते, ते क्रूर कर्मांचे आणि क्षुद्र कर्मांचे आचरण करू लागले (शिकार इत्यादी). हे वासेठ्ठ, 'क्रूर आणि क्षुद्र आचरण करणारे' या अर्थाने 'सुद्द (शूद्र), सुद्द' ही संज्ञा अस्तित्वात आली. अशा प्रकारे, हे वासेठ्ठ, या सुद्द मंडळाची उत्पत्ती त्यांच्या प्राचीन आणि मूळ संज्ञांनुसार त्याच प्राण्यांमधून झाली, इतरांपासून नाही; त्यांच्यासारख्याच प्राण्यांमधून झाली, वेगळ्या प्राण्यांमधून नाही; धम्मानेच झाली, अधम्माने नाही. कारण, हे वासेठ्ठ, या लोकांमध्ये धम्मच या जन्मात आणि परलोकातही सर्वश्रेष्ठ आहे. ๑๓๕. ‘‘อหุ โข โส, วาเสฏฺฐ, สมโย, ยํ ขตฺติโยปิ สกํ ธมฺมํ ครหมาโน อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชติ – ‘สมโณ ภวิสฺสามี’ติ. พฺราหฺมโณปิ โข, วาเสฏฺฐ…เป… เวสฺโสปิ โข, วาเสฏฺฐ…เป… สุทฺโทปิ โข, วาเสฏฺฐ, สกํ ธมฺมํ ครหมาโน อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชติ – ‘สมโณ ภวิสฺสามี’ติ. อิเมหิ โข, วาเสฏฺฐ, จตูหิ มณฺฑเลหิ สมณมณฺฑลสฺส อภินิพฺพตฺติ อโหสิ, เตสํเยว สตฺตานํ อนญฺเญสํ, สทิสานํเยว โน อสทิสานํ, ธมฺเมเนว โน อธมฺเมน. ธมฺโม หิ, วาเสฏฺฐ, เสฏฺโฐ ชเนตสฺมึ ทิฏฺเฐ เจว ธมฺเม อภิสมฺปรายญฺจ. १३५. हे वासेठ्ठ, अशी वेळ आली जेव्हा क्षत्रिय देखील आपल्या कर्तव्याची (धम्माची) निंदा करत, 'मी श्रमण होईन' असा विचार करून घराबाहेर पडून अनगारिक (घर नसलेला प्रव्रजित) झाला. हे वासेठ्ठ, ब्राह्मण देखील... तसेच वैश्य देखील... तसेच शूद्र देखील आपल्या कर्तव्याची निंदा करत, 'मी श्रमण होईन' असा विचार करून घराबाहेर पडून अनगारिक झाला. हे वासेठ्ठ, या चारही मंडळांमधून श्रमण मंडळाची उत्पत्ती झाली; ती त्याच प्राण्यांमधून झाली, इतरांपासून नाही; त्यांच्यासारख्याच प्राण्यांमधून झाली, वेगळ्या प्राण्यांमधून नाही; धम्मानेच झाली, अधम्माने नाही. कारण, हे वासेठ्ठ, या लोकांमध्ये धम्मच या जन्मात आणि परलोकातही सर्वश्रेष्ठ आहे. ทุจฺจริตาทิกถา दुश्चरित इत्यादींची कथा ๑๓๖. ‘‘ขตฺติโยปิ โข, วาเสฏฺฐ, กาเยน ทุจฺจริตํ จริตฺวา วาจาย ทุจฺจริตํ จริตฺวา มนสา ทุจฺจริตํ จริตฺวา มิจฺฉาทิฏฺฐิโก มิจฺฉาทิฏฺฐิกมฺมสมาทาโน มิจฺฉาทิฏฺฐิกมฺมสมาทานเหตุ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ. พฺราหฺมโณปิ โข, วาเสฏฺฐ…เป… เวสฺโสปิ โข, วาเสฏฺฐ… สุทฺโทปิ โข, วาเสฏฺฐ… สมโณปิ โข, วาเสฏฺฐ, กาเยน ทุจฺจริตํ จริตฺวา วาจาย ทุจฺจริตํ จริตฺวา มนสา ทุจฺจริตํ จริตฺวา มิจฺฉาทิฏฺฐิโก มิจฺฉาทิฏฺฐิกมฺมสมาทาโน มิจฺฉาทิฏฺฐิกมฺมสมาทานเหตุ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ. १३६. “हे वासेठ्ठ, एखादा क्षत्रिय देखील शरीराने दुराचरण करून, वाणीने दुराचरण करून, मनाने दुराचरण करून, मिथ्यादृष्टी बाळगून, मिथ्यादृष्टीच्या कर्मांचे आचरण करून, त्या मिथ्यादृष्टीच्या कर्मांच्या आचरणामुळे शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होतो. हे वासेठ्ठ, ब्राह्मण देखील... वैश्य देखील... शूद्र देखील... हे वासेठ्ठ, श्रमण देखील शरीराने दुराचरण करून, वाणीने दुराचरण करून, मनाने दुराचरण करून, मिथ्यादृष्टी बाळगून, मिथ्यादृष्टीच्या कर्मांचे आचरण करून, त्या मिथ्यादृष्टीच्या कर्मांच्या आचरणामुळे शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होतो.” ‘‘ขตฺติโยปิ [Pg.80] โข, วาเสฏฺฐ, กาเยน สุจริตํ จริตฺวา วาจาย สุจริตํ จริตฺวา มนสา สุจริตํ จริตฺวา สมฺมาทิฏฺฐิโก สมฺมาทิฏฺฐิกมฺมสมาทาโน สมฺมาทิฏฺฐิกมฺมสมาทานเหตุ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. พฺราหฺมโณปิ โข, วาเสฏฺฐ…เป… เวสฺโสปิ โข, วาเสฏฺฐ… สุทฺโทปิ โข, วาเสฏฺฐ… สมโณปิ โข, วาเสฏฺฐ, กาเยน สุจริตํ จริตฺวา วาจาย สุจริตํ จริตฺวา มนสา สุจริตํ จริตฺวา สมฺมาทิฏฺฐิโก สมฺมาทิฏฺฐิกมฺมสมาทาโน สมฺมาทิฏฺฐิกมฺมสมาทานเหตุ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. “हे वासेठ्ठ, एखादा क्षत्रिय देखील शरीराने सुचरित करून, वाणीने सुचरित करून, मनाने सुचरित करून, सम्यक् दृष्टी बाळगून, सम्यक् दृष्टीच्या कर्मांचे आचरण करून, त्या सम्यक् दृष्टीच्या कर्मांच्या आचरणामुळे शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगती अशा स्वर्गलोकात उत्पन्न होतो. हे वासेठ्ठ, ब्राह्मण देखील... वैश्य देखील... शूद्र देखील... हे वासेठ्ठ, श्रमण देखील शरीराने सुचरित करून, वाणीने सुचरित करून, मनाने सुचरित करून, सम्यक् दृष्टी बाळगून, सम्यक् दृष्टीच्या कर्मांचे आचरण करून, त्या सम्यक् दृष्टीच्या कर्मांच्या आचरणामुळे शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगती अशा स्वर्गलोकात उत्पन्न होतो.” ๑๓๗. ‘‘ขตฺติโยปิ โข, วาเสฏฺฐ, กาเยน ทฺวยการี, วาจาย ทฺวยการี, มนสา ทฺวยการี, วิมิสฺสทิฏฺฐิโก วิมิสฺสทิฏฺฐิกมฺมสมาทาโน วิมิสฺสทิฏฺฐิกมฺมสมาทานเหตุ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุขทุกฺขปฺปฏิสํเวที โหติ. พฺราหฺมโณปิ โข, วาเสฏฺฐ …เป… เวสฺโสปิ โข, วาเสฏฺฐ… สุทฺโทปิ โข, วาเสฏฺฐ… สมโณปิ โข, วาเสฏฺฐ, กาเยน ทฺวยการี, วาจาย ทฺวยการี, มนสา ทฺวยการี, วิมิสฺสทิฏฺฐิโก วิมิสฺสทิฏฺฐิกมฺมสมาทาโน วิมิสฺสทิฏฺฐิกมฺมสมาทานเหตุ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุขทุกฺขปฺปฏิสํเวที โหติ. १३७. “हे वासेठ्ठ, एखादा क्षत्रिय देखील शरीराने दोन्ही प्रकारचे आचरण करणारा, वाणीने दोन्ही प्रकारचे आचरण करणारा, मनाने दोन्ही प्रकारचे आचरण करणारा, मिश्रदृष्टी बाळगून, मिश्रदृष्टीच्या कर्मांचे आचरण करून, त्या मिश्रदृष्टीच्या कर्मांच्या आचरणामुळे शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुख आणि दुःखाचा अनुभव घेणारा होतो. हे वासेठ्ठ, ब्राह्मण देखील... वैश्य देखील... शूद्र देखील... हे वासेठ्ठ, श्रमण देखील शरीराने दोन्ही प्रकारचे आचरण करणारा, वाणीने दोन्ही प्रकारचे आचरण करणारा, मनाने दोन्ही प्रकारचे आचरण करणारा, मिश्रदृष्टी बाळगून, मिश्रदृष्टीच्या कर्मांचे आचरण करून, त्या मिश्रदृष्टीच्या कर्मांच्या आचरणामुळे शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुख आणि दुःखाचा अनुभव घेणारा होतो.” โพธิปกฺขิยภาวนา बोधिपक्खिय भावना ๑๓๘. ‘‘ขตฺติโยปิ โข, วาเสฏฺฐ, กาเยน สํวุโต วาจาย สํวุโต มนสา สํวุโต สตฺตนฺนํ โพธิปกฺขิยานํ ธมฺมานํ ภาวนมนฺวาย ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายติ. พฺราหฺมโณปิ โข, วาเสฏฺฐ…เป… เวสฺโสปิ โข วาเสฏฺฐ… สุทฺโทปิ โข, วาเสฏฺฐ … สมโณปิ โข, วาเสฏฺฐ, กาเยน สํวุโต วาจาย สํวุโต มนสา สํวุโต สตฺตนฺนํ โพธิปกฺขิยานํ ธมฺมานํ ภาวนมนฺวาย ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปรินิพฺพายติ. १३८. “हे वासेठ्ठ, एखादा क्षत्रिय देखील शरीराने संयमित राहून, वाणीने संयमित राहून, मनाने संयमित राहून, सात प्रकारच्या बोधिपक्खिय धर्मांच्या भावनेचा अवलंब करून याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतो. हे वासेठ्ठ, ब्राह्मण देखील... वैश्य देखील... शूद्र देखील... हे वासेठ्ठ, श्रमण देखील शरीराने संयमित राहून, वाणीने संयमित राहून, मनाने संयमित राहून, सात प्रकारच्या बोधिपक्खिय धर्मांच्या भावनेचा अवलंब करून याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतो.” ๑๓๙. ‘‘อิเมสญฺหิ, วาเสฏฺฐ, จตุนฺนํ วณฺณานํ โย โหติ ภิกฺขุ อรหํ ขีณาสโว วุสิตวา กตกรณีโย โอหิตภาโร อนุปฺปตฺตสทตฺโถ ปริกฺขีณภวสํโยชโน [Pg.81] สมฺมทญฺญา วิมุตฺโต โส เนสํ อคฺคมกฺขายติ ธมฺเมเนว. โน อธมฺเมน. ธมฺโม หิ, วาเสฏฺฐ, เสฏฺโฐ ชเนตสฺมึ ทิฏฺเฐ เจว ธมฺเม อภิสมฺปรายญฺจ. १३९. “हे वासेठ्ठ, या चार वर्णांपैकी जो कोणी भिक्खू अर्हत, क्षीणासव, ब्रह्मचर्य पूर्ण केलेला, आपले कर्तव्य पूर्ण केलेला, ओझे उतरवून ठेवलेला, परम ध्येय प्राप्त केलेला, भवबंधने पूर्णपणे नष्ट केलेला आणि सम्यक् ज्ञानाने विमुक्त झालेला असतो, तोच या चार वर्णांमध्ये धर्माच्या दृष्टीने श्रेष्ठ मानला जातो, अधर्माने नव्हे. कारण हे वासेठ्ठ, या लोकांमध्ये या जन्मात आणि परलोकात देखील धर्मच सर्वश्रेष्ठ आहे.” ๑๔๐. ‘‘พฺรหฺมุนา เปสา, วาเสฏฺฐ, สนงฺกุมาเรน คาถา ภาสิตา – १४०. “हे वासेठ्ठ, सनंकुमार ब्रह्मदेवाने देखील ही गाथा म्हटली आहे –” ‘ขตฺติโย เสฏฺโฐ ชเนตสฺมึ, เย โคตฺตปฏิสาริโน; วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน, โส เสฏฺโฐ เทวมานุเส’ติ. ‘जे लोक कुळ आणि गोत्राचा अभिमान बाळगतात, त्यांच्यामध्ये क्षत्रिय श्रेष्ठ आहे; परंतु जो विद्या आणि आचरणाने संपन्न आहे, तोच देव आणि मनुष्यांमध्ये सर्वश्रेष्ठ आहे.’ ‘‘สา โข ปเนสา, วาเสฏฺฐ, พฺรหฺมุนา สนงฺกุมาเรน คาถา สุคีตา, โน ทุคฺคีตา. สุภาสิตา, โน ทุพฺภาสิตา. อตฺถสํหิตา, โน อนตฺถสํหิตา. อนุมตา มยา. อหมฺปิ, วาเสฏฺฐ, เอวํ วทามิ – “हे वासेठ्ठ, सनंकुमार ब्रह्मदेवाने म्हटलेली ती गाथा सुगीत आहे, दुर्गीत नाही; सुभाषित आहे, दुभाषित नाही; ती कल्याणाशी युक्त आहे, अकल्याणाशी नाही. मला ती संमत आहे. हे वासेठ्ठ, मी देखील असेच म्हणतो –” ‘ขตฺติโย เสฏฺโฐ ชเนตสฺมึ, เย โคตฺตปฏิสาริโน; วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน, โส เสฏฺโฐ เทวมานุเส’ติ. ‘जे लोक कुळ आणि गोत्राचा अभिमान बाळगतात, त्यांच्यामध्ये क्षत्रिय श्रेष्ठ आहे; परंतु जो विद्या आणि आचरणाने संपन्न आहे, तोच देव आणि मनुष्यांमध्ये सर्वश्रेष्ठ आहे.’ อิทมโวจ ภควา. อตฺตมนา วาเสฏฺฐภารทฺวาชา ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทุนฺติ. भगवान असे म्हणाले. वासेठ्ठ आणि भारद्वाज यांनी आनंदी मनाने भगवंतांच्या भाषणाचे अभिनंदन केले. อคฺคญฺญสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ จตุตฺถํ. चौथे अग्गञ्ञ सुत्त समाप्त झाले. ๕. สมฺปสาทนียสุตฺตํ ५. सम्प्रसादनीय सुत्त สาริปุตฺตสีหนาโท सारिपुत्तांची सिंहगर्जना ๑๔๑. เอวํ [Pg.82] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา นาฬนฺทายํ วิหรติ ปาวาริกมฺพวเน. อถ โข อายสฺมา สาริปุตฺโต เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา สาริปุตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘เอวํปสนฺโน อหํ, ภนฺเต, ภควติ, น จาหุ น จ ภวิสฺสติ น เจตรหิ วิชฺชติ อญฺโญ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา ภควตา ภิยฺโยภิญฺญตโร ยทิทํ สมฺโพธิย’’นฺติ. १४१. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान नाळंदामध्ये पावारिकाच्या आंबावनात विहार करत होते. तेव्हा आयुष्यमान सारिपुत्त जेथे भगवान होते तेथे आले; आल्यानंतर भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान सारिपुत्तांनी भगवंतांना असे म्हटले – “भंते, माझा भगवंतांवर असा विश्वास आहे की, संबोधीच्या बाबतीत भगवंतांपेक्षा अधिक ज्ञानी असलेला दुसरा कोणताही श्रमण किंवा ब्राह्मण भूतकाळात झाला नाही, भविष्यात होणार नाही आणि वर्तमानातही अस्तित्वात नाही.” ๑๔๒. ‘‘อุฬารา โข เต อยํ, สาริปุตฺต, อาสภี วาจา ภาสิตา, เอกํโส คหิโต, สีหนาโท นทิโต – ‘เอวํปสนฺโน อหํ, ภนฺเต, ภควติ; น จาหุ น จ ภวิสฺสติ น เจตรหิ วิชฺชติ อญฺโญ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา ภควตา ภิยฺโยภิญฺญตโร ยทิทํ สมฺโพธิย’นฺติ. กึ เต, สาริปุตฺต, เย เต อเหสุํ อตีตมทฺธานํ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา, สพฺเพ เต ภควนฺโต เจตสา เจโต ปริจฺจ วิทิตา – ‘เอวํสีลา เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปิ, เอวํธมฺมา เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปิ, เอวํปญฺญา เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปิ, เอวํวิหารี เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปิ, เอวํวิมุตฺตา เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปี’’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. १४२. “सारिपुत्ता, तू ही अत्यंत उदात्त, निर्भय आणि निश्चित अशी सिंहगर्जना केलीस की – ‘भंते, माझा भगवंतांवर असा विश्वास आहे की, संबोधीच्या बाबतीत भगवंतांपेक्षा अधिक ज्ञानी असलेला दुसरा कोणताही श्रमण किंवा ब्राह्मण भूतकाळात झाला नाही, भविष्यात होणार नाही आणि वर्तमानातही अस्तित्वात नाही.’ पण सारिपुत्ता, भूतकाळात जे अर्हत सम्यक् सम्बुद्ध होऊन गेले, त्या सर्व भगवंतांच्या मनाला तू तुझ्या मनाने जाणून घेतले आहेस का, की – ‘ते भगवान अशा शीलाचे होते, अशा धर्माचे होते, अशा प्रज्ञेचे होते, अशा विहाराचे होते, अशा विमुक्तीचे होते’?” “नाही, भंते.” ‘‘กึ ปน เต, สาริปุตฺต, เย เต ภวิสฺสนฺติ อนาคตมทฺธานํ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา, สพฺเพ เต ภควนฺโต เจตสา เจโต ปริจฺจ วิทิตา, `เอวํสีลา เต ภควนฺโต ภวิสฺสนฺติ อิติปิ, เอวํธมฺมา…เป… เอวํปญฺญา… เอวํวิหารี… เอวํวิมุตฺตา เต ภควนฺโต ภวิสฺสนฺติ อิติปี’’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “आणि सारिपुत्ता, भविष्यात जे अर्हत सम्यक् सम्बुद्ध होतील, त्या सर्व भगवंतांच्या मनाला तू तुझ्या मनाने जाणून घेतले आहेस का, की – ‘ते भगवान अशा शीलाचे असतील, अशा धर्माचे असतील, अशा प्रज्ञेचे असतील, अशा विहाराचे असतील, अशा विमुक्तीचे असतील’?” “नाही, भंते.” ‘‘กึ ปน เต, สาริปุตฺต, อหํ เอตรหิ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ เจตสา เจโต ปริจฺจ วิทิโต – ‘เอวํสีโล ภควา อิติปิ, เอวํธมฺโม…เป… เอวํปญฺโญ [Pg.83]… เอวํวิหารี… เอวํวิมุตฺโต ภควา อิติปี’’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “आणि सारिपुत्ता, वर्तमानात अर्हत सम्यक् सम्बुद्ध असलेल्या माझ्या मनाला तू तुझ्या मनाने जाणून घेतले आहेस का, की – ‘भगवान अशा शीलाचे आहेत, अशा धर्माचे आहेत, अशा प्रज्ञेचे आहेत, अशा विहाराचे आहेत, अशा विमुक्तीचे आहेत’?” “नाही, भंते.” ‘‘เอตฺถ จ หิ เต, สาริปุตฺต, อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺเนสุ อรหนฺเตสุ สมฺมาสมฺพุทฺเธสุ เจโตปริยญาณํ นตฺถิ. อถ กึ จรหิ เต อยํ, สาริปุตฺต, อุฬารา อาสภี วาจา ภาสิตา, เอกํโส คหิโต, สีหนาโท นทิโต – ‘เอวํปสนฺโน อหํ, ภนฺเต, ภควติ, น จาหุ น จ ภวิสฺสติ น เจตรหิ วิชฺชติ อญฺโญ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา ภควตา ภิยฺโยภิญฺญตโร ยทิทํ สมฺโพธิย’’’นฺติ? “तर मग, सारिपुत्ता, भूतकाळ, भविष्यकाळ आणि वर्तमानकाळातील अर्हत सम्यक्संबुद्धांच्या मनाचे ज्ञान (चेतोपरियञाण) तुला नाही. मग असे असताना, सारिपुत्ता, तू हे इतके श्रेष्ठ, आत्मविश्वासाने परिपूर्ण आणि दृढ असे सिंहगर्जनेचे वचन का बोललास की—'भन्ते, माझा भगवंतांवर असा दृढ विश्वास आहे की, संबोधीच्या (ज्ञानप्राप्तीच्या) बाबतीत भगवंतांपेक्षा अधिक श्रेष्ठ ज्ञानी असलेला दुसरा कोणताही श्रमण किंवा ब्राह्मण भूतकाळात झाला नाही, भविष्यकाळात होणार नाही आणि वर्तमानकाळातही अस्तित्वात नाही'?” ๑๔๓. ‘‘น โข เม, ภนฺเต, อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺเนสุ อรหนฺเตสุ สมฺมาสมฺพุทฺเธสุ เจโตปริยญาณํ อตฺถิ. อปิ จ, เม ธมฺมนฺวโย วิทิโต. เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, รญฺโญ ปจฺจนฺติมํ นครํ ทฬฺหุทฺธาปํ ทฬฺหปาการโตรณํ เอกทฺวารํ. ตตฺรสฺส โทวาริโก ปณฺฑิโต พฺยตฺโต เมธาวี อญฺญาตานํ นิวาเรตา, ญาตานํ ปเวเสตา. โส ตสฺส นครสฺส สมนฺตา อนุปริยายปถํ อนุกฺกมมาโน น ปสฺเสยฺย ปาการสนฺธึ วา ปาการวิวรํ วา อนฺตมโส พิฬารนิกฺขมนมตฺตมฺปิ. ตสฺส เอวมสฺส – ‘เย โข เกจิ โอฬาริกา ปาณา อิมํ นครํ ปวิสนฺติ วา นิกฺขมนฺติ วา, สพฺเพ เต อิมินาว ทฺวาเรน ปวิสนฺติ วา นิกฺขมนฺติ วา’ติ. เอวเมว โข เม, ภนฺเต, ธมฺมนฺวโย วิทิโต. เย เต, ภนฺเต, อเหสุํ อตีตมทฺธานํ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา, สพฺเพ เต ภควนฺโต ปญฺจ นีวรเณ ปหาย เจตโส อุปกฺกิเลเส ปญฺญาย ทุพฺพลีกรเณ จตูสุ สติปฏฺฐาเนสุ สุปฺปติฏฺฐิตจิตฺตา, สตฺต สมฺโพชฺฌงฺเค ยถาภูตํ ภาเวตฺวา อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุชฺฌึสุ. เยปิ เต, ภนฺเต, ภวิสฺสนฺติ อนาคตมทฺธานํ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา, สพฺเพ เต ภควนฺโต ปญฺจ นีวรเณ ปหาย เจตโส อุปกฺกิเลเส ปญฺญาย ทุพฺพลีกรเณ จตูสุ สติปฏฺฐาเนสุ สุปฺปติฏฺฐิตจิตฺตา, สตฺต สมฺโพชฺฌงฺเค ยถาภูตํ ภาเวตฺวา อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุชฺฌิสฺสนฺติ. ภควาปิ, ภนฺเต, เอตรหิ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ปญฺจ นีวรเณ ปหาย เจตโส อุปกฺกิเลเส ปญฺญาย ทุพฺพลีกรเณ จตูสุ สติปฏฺฐาเนสุ สุปฺปติฏฺฐิตจิตฺโต [Pg.84] สตฺต สมฺโพชฺฌงฺเค ยถาภูตํ ภาเวตฺวา อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุทฺโธ. १४३. “भन्ते, भूतकाळ, भविष्यकाळ आणि वर्तमानकाळातील अर्हत सम्यक्संबुद्धांच्या मनाचे ज्ञान (चेतोपरियञाण) मला नक्कीच नाही. परंतु, मला धम्माचा मार्ग (धम्मान्वय) समजला आहे. भन्ते, ज्याप्रमाणे एखाद्या राजाचे सीमावर्ती नगर मजबूत पाया असलेले, मजबूत तटबंदी व दरवाजे असलेले आणि केवळ एकच प्रवेशद्वार असलेले असावे. तेथे एखादा बुद्धिमान, चतुर, प्राज्ञ आणि अनोळखी लोकांना रोखणारा व ओळखीच्या लोकांना आत सोडणारा द्वारपाल असावा. त्याने त्या नगराच्या तटबंदीभोवती फिरताना तटबंदीमध्ये कुठेही सांधा किंवा फट पाहू नये, अगदी मांजरालाही बाहेर पडता येईल एवढी देखील जागा पाहू नये. त्याला असा विचार येईल—'जे कोणी मोठे प्राणी या नगरात प्रवेश करतात किंवा बाहेर पडतात, ते सर्व याच प्रवेशद्वारातून प्रवेश करतात किंवा बाहेर पडतात.' भन्ते, त्याचप्रमाणे मला धम्माचा मार्ग समजला आहे. भन्ते, भूतकाळात जे अर्हत सम्यक्संबुद्ध झाले, त्या सर्व भगवंतांनी मनाला मलिन करणाऱ्या आणि प्रज्ञेला दुर्बळ करणाऱ्या पाच नीवरणांचा त्याग करून, चार स्मृतिप्रस्थानांमध्ये (सतिपट्ठानांमध्ये) आपले चित्त चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित करून, सात बोध्यंगांची (सत्त संबोज्झंगांची) यथार्थ भावना करून अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त केली. भन्ते, भविष्यकाळात जे अर्हत सम्यक्संबुद्ध होतील, ते सर्व भगवंत देखील मनाला मलिन करणाऱ्या आणि प्रज्ञेला दुर्बळ करणाऱ्या पाच नीवरणांचा त्याग करून, चार स्मृतिप्रस्थानांमध्ये आपले चित्त चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित करून, सात बोध्यंगांची यथार्थ भावना करून अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त करतील. भन्ते, वर्तमानकाळात अर्हत सम्यक्संबुद्ध असलेले भगवंत देखील पाच नीवरणांचा त्याग करून, मनाला मलिन करणाऱ्या आणि प्रज्ञेला दुर्बळ करणाऱ्या विकारांना दूर करून, चार स्मृतिप्रस्थानांमध्ये आपले चित्त चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित करून, सात बोध्यंगांची यथार्थ भावना करून अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त झाले आहेत.” ๑๔๔. ‘‘อิธาหํ, ภนฺเต, เยน ภควา เตนุปสงฺกมึ ธมฺมสฺสวนาย. ตสฺส เม, ภนฺเต, ภควา ธมฺมํ เทเสติ อุตฺตรุตฺตรํ ปณีตปณีตํ กณฺหสุกฺกสปฺปฏิภาคํ. ยถา ยถา เม, ภนฺเต, ภควา ธมฺมํ เทเสสิ อุตฺตรุตฺตรํ ปณีตปณีตํ กณฺหสุกฺกสปฺปฏิภาคํ, ตถา ตถาหํ ตสฺมึ ธมฺเม อภิญฺญา อิเธกจฺจํ ธมฺมํ ธมฺเมสุ นิฏฺฐมคมํ; สตฺถริ ปสีทึ – ‘สมฺมาสมฺพุทฺโธ ภควา, สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม, สุปฺปฏิปนฺโน สาวกสงฺโฆ’ติ. १४४. “भन्ते, मी येथे धम्म ऐकण्यासाठी भगवंतांकडे आलो. भन्ते, भगवंतांनी मला उत्तरोत्तर अधिक श्रेष्ठ, अधिक प्रणीत (उत्कृष्ट) आणि कृष्ण-शुक्ल (काळ्या व पांढऱ्या/अकुशल व कुशल) अशा परस्परविरोधी बाजू स्पष्ट करून धम्म उपदेशिला. भन्ते, जसा जसा भगवंतांनी मला उत्तरोत्तर अधिक श्रेष्ठ, अधिक प्रणीत आणि कृष्ण-शुक्ल बाजू स्पष्ट करून धम्म उपदेशिला, तसा तसा मी त्या धम्माला विशेष ज्ञानाने जाणून घेऊन, या धम्मांमधील एका विशिष्ट धम्मावर (सत्यावर) दृढ निश्चय केला; आणि शास्त्यांवर (बुद्धांवर) माझा विश्वास दृढ झाला की—'भगवंत सम्यक्संबुद्ध आहेत, भगवंतांनी धम्म सुविख्यात (उत्कृष्टपणे) उपदेशिला आहे आणि श्रावकसंघ सन्मार्गावर चालणारा (सुप्रतिपन्न) आहे.'” กุสลธมฺมเทสนา “कुशल धम्माचा उपदेश” ๑๔๕. ‘‘อปรํ ปน, ภนฺเต, เอตทานุตฺตริยํ, ยถา ภควา ธมฺมํ เทเสติ กุสเลสุ ธมฺเมสุ. ตตฺริเม กุสลา ธมฺมา เสยฺยถิทํ, จตฺตาโร สติปฏฺฐานา, จตฺตาโร สมฺมปฺปธานา, จตฺตาโร อิทฺธิปาทา, ปญฺจินฺทฺริยานิ, ปญฺจ พลานิ, สตฺต โพชฺฌงฺคา, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค. อิธ, ภนฺเต, ภิกฺขุ อาสวานํ ขยา อนาสวํ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหรติ. เอตทานุตฺตริยํ, ภนฺเต, กุสเลสุ ธมฺเมสุ. ตํ ภควา อเสสมภิชานาติ, ตํ ภควโต อเสสมภิชานโต อุตฺตริ อภิญฺเญยฺยํ นตฺถิ, ยทภิชานํ อญฺโญ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา ภควตา ภิยฺโยภิญฺญตโร อสฺส, ยทิทํ กุสเลสุ ธมฺเมสุ. १४५. “भन्ते, आणखी एक अनुत्तर (सर्वश्रेष्ठ) गोष्ट अशी आहे की, ज्या प्रकारे भगवंत कुशल धम्मांविषयी धम्म उपदेशितात. त्यातील कुशल धम्म हे आहेत, जसे की—चार स्मृतिप्रस्थान (सतिपट्ठान), चार सम्यक्प्रधान (सम्मदप्पधान), चार ऋद्धिपाद (इद्धिपाद), पाच इंद्रिये, पाच बले, सात बोध्यंग (संबोज्झंग) आणि आर्य अष्टांगिक मार्ग. भन्ते, या शासनात भिक्खू आसवांचा (विकारांचा) क्षय झाल्यामुळे, आसवरहित चित्तविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्ती याच जन्मात स्वतः विशेष ज्ञानाने साक्षात करून, ती प्राप्त करून विहरतो. भन्ते, कुशल धम्मांच्या बाबतीत हा सर्वश्रेष्ठ उपदेश आहे. भगवंत हे पूर्णपणे जाणतात. हे पूर्णपणे जाणणाऱ्या भगवंतांपेक्षा अधिक काही जाणण्यासारखे उरलेले नाही; आणि कुशल धम्मांच्या बाबतीत भगवंतांपेक्षा अधिक श्रेष्ठ ज्ञानी असलेला दुसरा कोणताही श्रमण किंवा ब्राह्मण नाही.” อายตนปณฺณตฺติเทสนา “आयतन प्रज्ञप्तीचा उपदेश” ๑๔๖. ‘‘อปรํ ปน, ภนฺเต, เอตทานุตฺตริยํ, ยถา ภควา ธมฺมํ เทเสติ อายตนปณฺณตฺตีสุ. ฉยิมานิ, ภนฺเต, อชฺฌตฺติกพาหิรานิ อายตนานิ. จกฺขุญฺเจว รูปา จ, โสตญฺเจว สทฺทา จ, ฆานญฺเจว คนฺธา จ, ชิวฺหา เจว รสา จ, กาโย เจว โผฏฺฐพฺพา จ, มโน เจว ธมฺมา จ. เอตทานุตฺตริยํ, ภนฺเต, อายตนปณฺณตฺตีสุ. ตํ ภควา อเสสมภิชานาติ, ตํ ภควโต อเสสมภิชานโต อุตฺตริ อภิญฺเญยฺยํ นตฺถิ, ยทภิชานํ อญฺโญ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา ภควตา ภิยฺโยภิญฺญตโร อสฺส ยทิทํ อายตนปณฺณตฺตีสุ. १४६. “भन्ते, आणखी एक सर्वश्रेष्ठ गोष्ट अशी आहे की, ज्या प्रकारे भगवंत आयतनांच्या प्रज्ञप्तीविषयी (वर्गीकरणाविषयी) धम्म उपदेशितात. भन्ते, ही सहा आध्यात्मिक (अंतर्गत) आणि बाह्य आयतने आहेत. ती म्हणजे—चक्षू (डोळा) आणि रूप, श्रोत्र (कान) आणि शब्द, घ्राण (नाक) आणि गंध, जिव्हा (जीभ) आणि रस, काय (शरीर) आणि स्पर्श, मन आणि धम्म (मानसिक विषय). भन्ते, आयतन प्रज्ञप्तींच्या बाबतीत हा सर्वश्रेष्ठ उपदेश आहे. भगवंत हे पूर्णपणे जाणतात. हे पूर्णपणे जाणणाऱ्या भगवंतांपेक्षा अधिक काही जाणण्यासारखे उरलेले नाही; आणि आयतन प्रज्ञप्तींच्या बाबतीत भगवंतांपेक्षा अधिक श्रेष्ठ ज्ञानी असलेला दुसरा कोणताही श्रमण किंवा ब्राह्मण नाही.” คพฺภาวกฺกนฺติเทสนา “गर्भावक्रांतीचा (गर्भात प्रवेश करण्याचा) उपदेश” ๑๔๗. ‘‘อปรํ [Pg.85] ปน, ภนฺเต, เอตทานุตฺตริยํ, ยถา ภควา ธมฺมํ เทเสติ คพฺภาวกฺกนฺตีสุ. จตสฺโส อิมา, ภนฺเต, คพฺภาวกฺกนฺติโย. อิธ, ภนฺเต, เอกจฺโจ อสมฺปชาโน มาตุกุจฺฉึ โอกฺกมติ; อสมฺปชาโน มาตุกุจฺฉิสฺมึ ฐาติ; อสมฺปชาโน มาตุกุจฺฉิมฺหา นิกฺขมติ. อยํ ปฐมา คพฺภาวกฺกนฺติ. १४७. “भन्ते, आणखी एक सर्वश्रेष्ठ गोष्ट अशी आहे की, ज्या प्रकारे भगवंत गर्भावक्रांतीविषयी (गर्भात प्रवेश करण्याच्या पद्धतींविषयी) धम्म उपदेशितात. भन्ते, गर्भावक्रांतीचे हे चार प्रकार आहेत. भन्ते, येथे एखादा मनुष्य अजाणतेपणे (स्मृती व संप्रजन्य नसताना) मातेच्या गर्भात प्रवेश करतो; अजाणतेपणे मातेच्या गर्भात राहतो; आणि अजाणतेपणे मातेच्या गर्भातून बाहेर पडतो (जन्म घेतो). हा पहिला गर्भावक्रांतीचा प्रकार आहे.” ‘‘ปุน จปรํ, ภนฺเต, อิเธกจฺโจ สมฺปชาโน มาตุกุจฺฉึ โอกฺกมติ; อสมฺปชาโน มาตุกุจฺฉิสฺมึ ฐาติ; อสมฺปชาโน มาตุกุจฺฉิมฺหา นิกฺขมติ. อยํ ทุติยา คพฺภาวกฺกนฺติ. “भन्ते, पुन्हा दुसरे असे की, येथे एखादा मनुष्य जागरूकतेने (स्मृती व संप्रजन्य ठेवून) मातेच्या गर्भात प्रवेश करतो; परंतु अजाणतेपणे मातेच्या गर्भात राहतो; आणि अजाणतेपणे मातेच्या गर्भातून बाहेर पडतो. हा दुसरा गर्भावक्रांतीचा प्रकार आहे.” ‘‘ปุน จปรํ, ภนฺเต, อิเธกจฺโจ สมฺปชาโน มาตุกุจฺฉึ โอกฺกมติ; สมฺปชาโน มาตุกุจฺฉิสฺมึ ฐาติ; อสมฺปชาโน มาตุกุจฺฉิมฺหา นิกฺขมติ. อยํ ตติยา คพฺภาวกฺกนฺติ. “भन्ते, पुन्हा दुसरे असे की, येथे एखादा मनुष्य जागरूकतेने मातेच्या गर्भात प्रवेश करतो; जागरूकतेने मातेच्या गर्भात राहतो; परंतु अजाणतेपणे मातेच्या गर्भातून बाहेर पडतो. हा तिसरा गर्भावक्रांतीचा प्रकार आहे.” ‘‘ปุน จปรํ, ภนฺเต, อิเธกจฺโจ สมฺปชาโน มาตุกุจฺฉึ โอกฺกมติ; สมฺปชาโน มาตุกุจฺฉิสฺมึ ฐาติ; สมฺปชาโน มาตุกุจฺฉิมฺหา นิกฺขมติ. อยํ จตุตฺถา คพฺภาวกฺกนฺติ. เอตทานุตฺตริยํ, ภนฺเต, คพฺภาวกฺกนฺตีสุ. “भन्ते, पुन्हा दुसरे असे की, येथे एखादा मनुष्य जागरूकतेने मातेच्या गर्भात प्रवेश करतो; जागरूकतेने मातेच्या गर्भात राहतो; आणि जागरूकतेने मातेच्या गर्भातून बाहेर पडतो. हा चौथा गर्भावक्रांतीचा प्रकार आहे. भन्ते, गर्भावक्रांतीच्या बाबतीत हा सर्वश्रेष्ठ उपदेश आहे.” อาเทสนวิธาเทสนา “आदेशनाविधीचा (मन जाणण्याच्या पद्धतीचा) उपदेश” ๑๔๘. ‘‘อปรํ ปน, ภนฺเต, เอตทานุตฺตริยํ, ยถา ภควา ธมฺมํ เทเสติ อาเทสนวิธาสุ. จตสฺโส อิมา, ภนฺเต, อาเทสนวิธา. อิธ, ภนฺเต, เอกจฺโจ นิมิตฺเตน อาทิสติ – ‘เอวมฺปิ เต มโน, อิตฺถมฺปิ เต มโน, อิติปิ เต จิตฺต’นฺติ. โส พหุํ เจปิ อาทิสติ, ตเถว ตํ โหติ, โน อญฺญถา. อยํ ปฐมา อาเทสนวิธา. १४८. “भन्ते, आणखी एक सर्वश्रेष्ठ गोष्ट अशी आहे की, ज्या प्रकारे भगवंत आदेशनाविधींविषयी (दुसऱ्यांचे मन जाणण्याच्या पद्धतींविषयी) धम्म उपदेशितात. भन्ते, आदेशनाविधीचे हे चार प्रकार आहेत. भन्ते, येथे एखादा मनुष्य लक्षणांवरून (निमित्तावरून) दुसऱ्याचे मन प्रकट करतो की—'तुझे मन असे विचार करत आहे, तुझ्या मनात असा विचार आहे, तुझे चित्त अशा प्रकारचे आहे.' तो जरी अनेक गोष्टी प्रकट करत असला, तरी त्या तशाच घडतात, त्यापेक्षा वेगळ्या घडत नाहीत. हा पहिला आदेशनाविधीचा प्रकार आहे.” ‘‘ปุน จปรํ, ภนฺเต, อิเธกจฺโจ น เหว โข นิมิตฺเตน อาทิสติ. อปิ จ โข มนุสฺสานํ วา อมนุสฺสานํ วา เทวตานํ วา สทฺทํ สุตฺวา อาทิสติ – ‘เอวมฺปิ เต มโน, อิตฺถมฺปิ เต มโน, อิติปิ เต จิตฺต’นฺติ. โส พหุํ เจปิ อาทิสติ, ตเถว ตํ โหติ, โน อญฺญถา. อยํ ทุติยา อาเทสนวิธา. “पुन्हा आणखी, भन्ते! या जगात एखादी व्यक्ती चिन्हावरून (मनाचे विचार) सांगत नाही. परंतु, मनुष्य, अमनुष्य किंवा देवांचा आवाज ऐकून ती सांगते – ‘तुझे मन असे आहे, तुझे मन या प्रकारे आहे, तुझे चित्त अशा स्वरूपाचे आहे.’ ती व्यक्ती जरी पुष्कळ गोष्टी सांगत असली, तरी ते तसेच घडते, अन्यथा नाही. ही दुसरी आदेशना-पद्धती होय.” ‘‘ปุน จปรํ, ภนฺเต, อิเธกจฺโจ น เหว โข นิมิตฺเตน อาทิสติ, นาปิ มนุสฺสานํ วา อมนุสฺสานํ วา เทวตานํ วา สทฺทํ สุตฺวา อาทิสติ. อปิ จ โข วิตกฺกยโต วิจารยโต วิตกฺกวิปฺผารสทฺทํ สุตฺวา อาทิสติ [Pg.86] – ‘เอวมฺปิ เต มโน, อิตฺถมฺปิ เต มโน, อิติปิ เต จิตฺต’นฺติ. โส พหุํ เจปิ อาทิสติ, ตเถว ตํ โหติ, โน อญฺญถา. อยํ ตติยา อาเทสนวิธา. “पुन्हा आणखी, भन्ते! या जगात एखादी व्यक्ती चिन्हावरून सांगत नाही, तसेच मनुष्य, अमनुष्य किंवा देवांचा आवाज ऐकूनही सांगत नाही. परंतु, विचार व चिंतन करणाऱ्या व्यक्तीच्या विचारांच्या प्रसरणाचा ध्वनी ऐकून ती सांगते – ‘तुझे मन असे आहे, तुझे मन या प्रकारे आहे, तुझे चित्त अशा स्वरूपाचे आहे.’ ती व्यक्ती जरी पुष्कळ गोष्टी सांगत असली, तरी ते तसेच घडते, अन्यथा नाही. ही तिसरी आदेशना-पद्धती होय.” ‘‘ปุน จปรํ, ภนฺเต, อิเธกจฺโจ น เหว โข นิมิตฺเตน อาทิสติ, นาปิ มนุสฺสานํ วา อมนุสฺสานํ วา เทวตานํ วา สทฺทํ สุตฺวา อาทิสติ, นาปิ วิตกฺกยโต วิจารยโต วิตกฺกวิปฺผารสทฺทํ สุตฺวา อาทิสติ. อปิ จ โข อวิตกฺกํ อวิจารํ สมาธึ สมาปนฺนสฺส เจตสา เจโต ปริจฺจ ปชานาติ – ‘ยถา อิมสฺส โภโต มโนสงฺขารา ปณิหิตา. ตถา อิมสฺส จิตฺตสฺส อนนฺตรา อิมํ นาม วิตกฺกํ วิตกฺเกสฺสตี’ติ. โส พหุํ เจปิ อาทิสติ, ตเถว ตํ โหติ, โน อญฺญถา. อยํ จตุตฺถา อาเทสนวิธา. เอตทานุตฺตริยํ, ภนฺเต, อาเทสนวิธาสุ. “पुन्हा आणखी, भन्ते! या जगात एखादी व्यक्ती चिन्हावरून सांगत नाही, मनुष्य, अमनुष्य किंवा देवांचा आवाज ऐकूनही सांगत नाही, तसेच विचार व चिंतन करणाऱ्या व्यक्तीच्या विचारांच्या प्रसरणाचा ध्वनी ऐकूनही सांगत नाही. परंतु, विचाररहित आणि चिंतनविरहित समाधी प्राप्त केलेल्या व्यक्तीच्या चित्ताला स्वतःच्या चित्ताने जाणून ती ओळखते – ‘या पूजनीय व्यक्तीचे मनोसंस्कार ज्या प्रकारे प्रस्थापित झाले आहेत, त्यानुसार या चित्तानंतर लगेचच ते अशा प्रकारचा विचार करतील.’ ती व्यक्ती जरी पुष्कळ गोष्टी सांगत असली, तरी ते तसेच घडते, अन्यथा नाही. ही चौथी आदेशना-पद्धती होय. भन्ते! आदेशना-पद्धतींमध्ये ही सर्वश्रेष्ठ देशना आहे.” ทสฺสนสมาปตฺติเทสนา दस्सनसमाပတ္တီ-देशना ๑๔๙. ‘‘อปรํ ปน, ภนฺเต, เอตทานุตฺตริยํ, ยถา ภควา ธมฺมํ เทเสติ ทสฺสนสมาปตฺตีสุ. จตสฺโส อิมา, ภนฺเต, ทสฺสนสมาปตฺติโย. อิธ, ภนฺเต, เอกจฺโจ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา อาตปฺปมนฺวาย ปธานมนฺวาย อนุโยคมนฺวาย อปฺปมาทมนฺวาย สมฺมามนสิการมนฺวาย ตถารูปํ เจโตสมาธึ ผุสติ, ยถาสมาหิเต จิตฺเต อิมเมว กายํ อุทฺธํ ปาทตลา อโธ เกสมตฺถกา ตจปริยนฺตํ ปูรํ นานปฺปการสฺส อสุจิโน ปจฺจเวกฺขติ – ‘อตฺถิ อิมสฺมึ กาเย เกสา โลมา นขา ทนฺตา ตโจ มํสํ นฺหารุ อฏฺฐิ อฏฺฐิมิญฺชํ วกฺกํ หทยํ ยกนํ กิโลมกํ ปิหกํ ปปฺผาสํ อนฺตํ อนฺตคุณํ อุทริยํ กรีสํ ปิตฺตํ เสมฺหํ ปุพฺโพ โลหิตํ เสโท เมโท อสฺสุ วสา เขโฬ สิงฺฆานิกา ลสิกา มุตฺต’นฺติ. อยํ ปฐมา ทสฺสนสมาปตฺติ. १४९. “पुन्हा आणखी, भन्ते! हे सर्वश्रेष्ठ आहे, ज्या प्रकारे भगवान दर्शनसमापत्तींविषयी (दस्सनसमापत्ती) धम्म उपदेशितात. भन्ते! या चार दर्शनसमापत्ती आहेत. येथे, भन्ते! एखादा श्रमण किंवा ब्राह्मण उद्योग, प्रयत्न, सातत्य, अप्रमाद आणि सम्यक् मनसिकार यांच्या बळावर अशा प्रकारची चित्तसमाधी प्राप्त करतो, की चित्त समाहित झाल्यावर तो याच शरीराचे, पायाच्या तळव्यापासून वर आणि केसांच्या शेंड्यापासून खाली, त्वचेने वेढलेल्या आणि विविध प्रकारच्या अशुद्धीने भरलेल्या शरीराचे असे निरीक्षण करतो – ‘या शरीरात केस, रोम, नखे, दात, त्वचा, मांस, स्नायू, हाडे, अस्थिमज्जा, मूत्रपिंड, हृदय, यकृत, पडदा, प्लीहा, फुफ्फुसे, मोठे आतडे, लहान आतडे, पोटातील अन्न, विष्ठा, पित्त, कफ, पू, रक्त, घाम, मेद, अश्रू, वसा, लाळ, शेंबूड, लसिका, मूत्र आहे.’ ही पहिली दर्शनसमापत्ती होय.” ‘‘ปุน จปรํ, ภนฺเต, อิเธกจฺโจ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา อาตปฺปมนฺวาย…เป… ตถารูปํ เจโตสมาธึ ผุสติ, ยถาสมาหิเต จิตฺเต อิมเมว กายํ อุทฺธํ ปาทตลา อโธ เกสมตฺถกา ตจปริยนฺตํ ปูรํ นานปฺปการสฺส อสุจิโน ปจฺจเวกฺขติ – ‘อตฺถิ อิมสฺมึ กาเย เกสา [Pg.87] โลมา…เป… ลสิกา มุตฺต’นฺติ. อติกฺกมฺม จ ปุริสสฺส ฉวิมํสโลหิตํ อฏฺฐึ ปจฺจเวกฺขติ. อยํ ทุติยา ทสฺสนสมาปตฺติ. “पुन्हा आणखी, भन्ते! या जगात एखादा श्रमण किंवा ब्राह्मण उद्योगाच्या बळावर...पे... अशा प्रकारची चित्तसमाधी प्राप्त करतो, की चित्त समाहित झाल्यावर तो याच शरीराचे, पायाच्या तळव्यापासून वर आणि केसांच्या शेंड्यापासून खाली, त्वचेने वेढलेल्या आणि विविध प्रकारच्या अशुद्धीने भरलेल्या शरीराचे असे निरीक्षण करतो – ‘या शरीरात केस, रोम...पे... लसिका, मूत्र आहे.’ आणि तो त्या व्यक्तीची त्वचा, मांस व रक्त ओलांडून केवळ हाडांचे निरीक्षण करतो. ही दुसरी दर्शनसमापत्ती होय.” ‘‘ปุน จปรํ, ภนฺเต, อิเธกจฺโจ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา อาตปฺปมนฺวาย…เป… ตถารูปํ เจโตสมาธึ ผุสติ, ยถาสมาหิเต จิตฺเต อิมเมว กายํ อุทฺธํ ปาทตลา อโธ เกสมตฺถกา ตจปริยนฺตํ ปูรํ นานปฺปการสฺส อสุจิโน ปจฺจเวกฺขติ – ‘อตฺถิ อิมสฺมึ กาเย เกสา โลมา…เป… ลสิกา มุตฺต’นฺติ. อติกฺกมฺม จ ปุริสสฺส ฉวิมํสโลหิตํ อฏฺฐึ ปจฺจเวกฺขติ. ปุริสสฺส จ วิญฺญาณโสตํ ปชานาติ, อุภยโต อพฺโพจฺฉินฺนํ อิธ โลเก ปติฏฺฐิตญฺจ ปรโลเก ปติฏฺฐิตญฺจ. อยํ ตติยา ทสฺสนสมาปตฺติ. “पुन्हा आणखी, भन्ते! या जगात एखादा श्रमण किंवा ब्राह्मण उद्योगाच्या बळावर...पे... अशा प्रकारची चित्तसमाधी प्राप्त करतो, की चित्त समाहित झाल्यावर तो याच शरीराचे, पायाच्या तळव्यापासून वर आणि केसांच्या शेंड्यापासून खाली, त्वचेने वेढलेल्या आणि विविध प्रकारच्या अशुद्धीने भरलेल्या शरीराचे असे निरीक्षण करतो – ‘या शरीरात केस, रोम...पे... लसिका, मूत्र आहे.’ तो त्या व्यक्तीची त्वचा, मांस व रक्त ओलांडून केवळ हाडांचे निरीक्षण करतो. तसेच तो त्या व्यक्तीच्या विज्ञान-प्रवाहाची (विञ्ञाणसोत) जाणीव करून घेतो, जो दोन्ही बाजूंनी अखंड असून या लोकातही प्रतिष्ठित आहे आणि परलोकातही प्रतिष्ठित आहे. ही तिसरी दर्शनसमापत्ती होय.” ‘‘ปุน จปรํ, ภนฺเต, อิเธกจฺโจ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา อาตปฺปมนฺวาย…เป… ตถารูปํ เจโตสมาธึ ผุสติ, ยถาสมาหิเต จิตฺเต อิมเมว กายํ อุทฺธํ ปาทตลา อโธ เกสมตฺถกา ตจปริยนฺตํ ปูรํ นานปฺปการสฺส อสุจิโน ปจฺจเวกฺขติ – ‘อตฺถิ อิมสฺมึ กาเย เกสา โลมา…เป… ลสิกา มุตฺต’นฺติ. อติกฺกมฺม จ ปุริสสฺส ฉวิมํสโลหิตํ อฏฺฐึ ปจฺจเวกฺขติ. ปุริสสฺส จ วิญฺญาณโสตํ ปชานาติ, อุภยโต อพฺโพจฺฉินฺนํ อิธ โลเก อปฺปติฏฺฐิตญฺจ ปรโลเก อปฺปติฏฺฐิตญฺจ. อยํ จตุตฺถา ทสฺสนสมาปตฺติ. เอตทานุตฺตริยํ, ภนฺเต, ทสฺสนสมาปตฺตีสุ. “पुन्हा आणखी, भन्ते! या जगात एखादा श्रमण किंवा ब्राह्मण उद्योगाच्या बळावर...पे... अशा प्रकारची चित्तसमाधी प्राप्त करतो, की चित्त समाहित झाल्यावर तो याच शरीराचे, पायाच्या तळव्यापासून वर आणि केसांच्या शेंड्यापासून खाली, त्वचेने वेढलेल्या आणि विविध प्रकारच्या अशुद्धीने भरलेल्या शरीराचे असे निरीक्षण करतो – ‘या शरीरात केस, रोम...पे... लसिका, मूत्र आहे.’ तो त्या व्यक्तीची त्वचा, मांस व रक्त ओलांडून केवळ हाडांचे निरीक्षण करतो. तसेच तो त्या व्यक्तीच्या विज्ञान-प्रवाहाची जाणीव करून घेतो, जो दोन्ही बाजूंनी अखंड असून या लोकातही अप्रतिष्ठित आहे आणि परलोकातही अप्रतिष्ठित आहे. ही चौथी दर्शनसमापत्ती होय. भन्ते! दर्शनसमापत्तींमध्ये ही सर्वश्रेष्ठ देशना आहे.” ปุคฺคลปณฺณตฺติเทสนา पुग्गलपण्णत्ती-देशना ๑๕๐. ‘‘อปรํ ปน, ภนฺเต, เอตทานุตฺตริยํ, ยถา ภควา ธมฺมํ เทเสติ ปุคฺคลปณฺณตฺตีสุ. สตฺติเม, ภนฺเต, ปุคฺคลา. อุภโตภาควิมุตฺโต ปญฺญาวิมุตฺโต กายสกฺขี ทิฏฺฐิปฺปตฺโต สทฺธาวิมุตฺโต ธมฺมานุสารี สทฺธานุสารี. เอตทานุตฺตริยํ, ภนฺเต, ปุคฺคลปณฺณตฺตีสุ. १५०. “पुन्हा आणखी, भन्ते! हे सर्वश्रेष्ठ आहे, ज्या प्रकारे भगवान पुद्गलप्रज्ञप्तींविषयी (पुग्गलपण्णत्ती) धम्म उपदेशितात. भन्ते! हे सात प्रकारचे पुद्गल आहेत: उभतोभागविमुक्त, प्रज्ञाविमुक्त, कायसाक्षी, दृष्टीप्राप्त, श्रद्धाविमुक्त, धम्मानुसारी आणि श्रद्धानुसारी. भन्ते! पुद्गलप्रज्ञप्तींमध्ये ही सर्वश्रेष्ठ देशना आहे.” ปธานเทสนา पधान-देशना ๑๕๑. ‘‘อปรํ ปน, ภนฺเต, เอตทานุตฺตริยํ, ยถา ภควา ธมฺมํ เทเสติ ปธาเนสุ. สตฺติเม, ภนฺเต สมฺโพชฺฌงฺคา สติสมฺโพชฺฌงฺโค ธมฺมวิจยสมฺโพชฺฌงฺโค วีริยสมฺโพชฺฌงฺโค ปีติสมฺโพชฺฌงฺโค ปสฺสทฺธิสมฺโพชฺฌงฺโค สมาธิสมฺโพชฺฌงฺโค [Pg.88] อุเปกฺขาสมฺโพชฺฌงฺโค. เอตทานุตฺตริยํ, ภนฺเต, ปธาเนสุ. १५१. “पुन्हा आणखी, भन्ते! हे सर्वश्रेष्ठ आहे, ज्या प्रकारे भगवान प्रधानांकडे (पधान) धम्म उपदेशितात. भन्ते! हे सात संबोध्यंग (सम्बोज्झङ्ग) आहेत: सति-सम्बोज्झङ्ग, धम्मविचय-सम्बोज्झङ्ग, वीरिय-सम्बोज्झङ्ग, पीति-सम्बोज्झङ्ग, पस्सद्धि-सम्बोज्झङ्ग, समाधि-सम्बोज्झङ्ग आणि उपेक्खा-सम्बोज्झङ्ग. भन्ते! प्रधानांकडे (बोध्यंगांविषयीच्या उपदेशात) ही सर्वश्रेष्ठ देशना आहे.” ปฏิปทาเทสนา पटिपदा-देशना ๑๕๒. ‘‘อปรํ ปน, ภนฺเต, เอตทานุตฺตริยํ, ยถา ภควา ธมฺมํ เทเสติ ปฏิปทาสุ. จตสฺโส อิมา, ภนฺเต, ปฏิปทา ทุกฺขา ปฏิปทา ทนฺธาภิญฺญา, ทุกฺขา ปฏิปทา ขิปฺปาภิญฺญา, สุขา ปฏิปทา ทนฺธาภิญฺญา, สุขา ปฏิปทา ขิปฺปาภิญฺญาติ. ตตฺร, ภนฺเต, ยายํ ปฏิปทา ทุกฺขา ทนฺธาภิญฺญา, อยํ, ภนฺเต, ปฏิปทา อุภเยเนว หีนา อกฺขายติ ทุกฺขตฺตา จ ทนฺธตฺตา จ. ตตฺร, ภนฺเต, ยายํ ปฏิปทา ทุกฺขา ขิปฺปาภิญฺญา, อยํ ปน, ภนฺเต, ปฏิปทา ทุกฺขตฺตา หีนา อกฺขายติ. ตตฺร, ภนฺเต, ยายํ ปฏิปทา สุขา ทนฺธาภิญฺญา, อยํ ปน, ภนฺเต, ปฏิปทา ทนฺธตฺตา หีนา อกฺขายติ. ตตฺร, ภนฺเต, ยายํ ปฏิปทา สุขา ขิปฺปาภิญฺญา, อยํ ปน, ภนฺเต, ปฏิปทา อุภเยเนว ปณีตา อกฺขายติ สุขตฺตา จ ขิปฺปตฺตา จ. เอตทานุตฺตริยํ, ภนฺเต, ปฏิปทาสุ. १५२. “अजून एक, भन्ते, हे सर्वश्रेष्ठ (अनुत्तर) आहे, ज्या प्रकारे भगवान प्रतिपदांविषयी (साधनेच्या मार्गांविषयी) धम्म उपदेश करतात. भन्ते, या चार प्रतिपदा आहेत – दुःखा प्रतिपदा दन्धाभिञ्ञा (कष्टकर मार्ग आणि संथ ज्ञान), दुःखा प्रतिपदा खिप्पाभिञ्ञा (कष्टकर मार्ग आणि जलद ज्ञान), सुखा प्रतिपदा दन्धाभिञ्ञा (सुकर मार्ग आणि संथ ज्ञान), आणि सुखा प्रतिपदा खिप्पाभिञ्ञा (सुकर मार्ग आणि जलद ज्ञान). भन्ते, त्यापैकी जी ही दुःखा प्रतिपदा दन्धाभिञ्ञा आहे, ती प्रतिपदा कष्टकर असण्यामुळे आणि संथ असण्यामुळे, या दोन्ही कारणांमुळे कनिष्ठ (हीन) म्हटली जाते. भन्ते, त्यापैकी जी ही दुःखा प्रतिपदा खिप्पाभिञ्ञा आहे, ती प्रतिपदा कष्टकर असण्यामुळे कनिष्ठ म्हटली जाते. भन्ते, त्यापैकी जी ही सुखा प्रतिपदा दन्धाभिञ्ञा आहे, ती प्रतिपदा संथ असण्यामुळे कनिष्ठ म्हटली जाते. भन्ते, त्यापैकी जी ही सुखा प्रतिपदा खिप्पाभिञ्ञा आहे, ती प्रतिपदा सुकर असण्यामुळे आणि जलद असण्यामुळे, या दोन्ही कारणांमुळे उत्कृष्ट (प्रणीत) म्हटली जाते. भन्ते, प्रतिपदांविषयी हे सर्वश्रेष्ठ आहे.” ภสฺสสมาจาราทิเทสนา वाणीच्या सदाचाराविषयी उपदेश ๑๕๓. ‘‘อปรํ ปน, ภนฺเต, เอตทานุตฺตริยํ, ยถา ภควา ธมฺมํ เทเสติ ภสฺสสมาจาเร. อิธ, ภนฺเต, เอกจฺโจ น เจว มุสาวาทุปสญฺหิตํ วาจํ ภาสติ น จ เวภูติยํ น จ เปสุณิยํ น จ สารมฺภชํ ชยาเปกฺโข; มนฺตา มนฺตา จ วาจํ ภาสติ นิธานวตึ กาเลน. เอตทานุตฺตริยํ, ภนฺเต, ภสฺสสมาจาเร. १५३. “अजून एक, भन्ते, हे सर्वश्रेष्ठ आहे, ज्या प्रकारे भगवान वाणीच्या सदाचाराविषयी (भाषण-सदाचाराविषयी) धम्म उपदेश करतात. भन्ते, या जगात एखादी व्यक्ती असत्याशी संबंधित (खोटे) बोलत नाही, भेद पाडणारे (कळलाव्या) बोलत नाही, चहाडी करत नाही, आणि केवळ विजयाच्या आकांक्षेने उद्धटपणे बोलत नाही; ती व्यक्ती विचारपूर्वक, अर्थपूर्ण, अंतःकरणात साठवून ठेवण्याजोगे आणि योग्य वेळीच बोलते. भन्ते, वाणीच्या सदाचाराविषयी हे सर्वश्रेष्ठ आहे.” ‘‘อปรํ ปน, ภนฺเต, เอตทานุตฺตริยํ, ยถา ภควา ธมฺมํ เทเสติ ปุริสสีลสมาจาเร. อิธ, ภนฺเต, เอกจฺโจ สจฺโจ จสฺส สทฺโธ จ, น จ กุหโก, น จ ลปโก, น จ เนมิตฺติโก, น จ นิปฺเปสิโก, น จ ลาเภน ลาภํ นิชิคีสนโก, อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวาโร, โภชเน มตฺตญฺญู, สมการี, ชาคริยานุโยคมนุยุตฺโต, อตนฺทิโต, อารทฺธวีริโย, ฌายี, สติมา, กลฺยาณปฏิภาโน, คติมา, ธิติมา, มติมา, น จ กาเมสุ คิทฺโธ, สโต จ นิปโก จ. เอตทานุตฺตริยํ, ภนฺเต, ปุริสสีลสมาจาเร. “अजून एक, भन्ते, हे सर्वश्रेष्ठ आहे, ज्या प्रकारे भगवान मनुष्याच्या शील-सदाचाराविषयी धम्म उपदेश करतात. भन्ते, या जगात एखादी व्यक्ती सत्यवादी आणि श्रद्धावान असते; ती ढोंगी नसते, बढाया मारणारी नसते, संकेत (निमित्त) करून फसवणारी नसते, निंदा करणारी नसते, आणि लाभाने लाभाची इच्छा धरणारी नसते. ती आपल्या इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवणारी, भोजनात प्रमाण जाणणारी, कायिक-वाचिक-मानसिक कर्मे समतोल ठेवणारी, जागरूकतेच्या अभ्यासात तत्पर राहणारी, आळस न करणारी, दृढ वीर्यवान (प्रयत्नशील), ध्यानी, स्मृतिमान, मधुर व योग्य बोलणारी, प्रज्ञावान, धारणाशक्ती असलेली, विचारशील, कामभोगांमध्ये आसक्त नसलेली, सजग आणि चतुर असते. भन्ते, मनुष्याच्या शील-सदाचाराविषयी हे सर्वश्रेष्ठ आहे.” อนุสาสนวิธาเทสนา अनुशासनाच्या पद्धतींविषयी उपदेश ๑๕๔. ‘‘อปรํ [Pg.89] ปน, ภนฺเต, เอตทานุตฺตริยํ, ยถา ภควา ธมฺมํ เทเสติ อนุสาสนวิธาสุ. จตสฺโส อิมา ภนฺเต อนุสาสนวิธา – ชานาติ, ภนฺเต, ภควา อปรํ ปุคฺคลํ ปจฺจตฺตํ โยนิโสมนสิการา ‘อยํ ปุคฺคโล ยถานุสิฏฺฐํ ตถา ปฏิปชฺชมาโน ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โสตาปนฺโน ภวิสฺสติ อวินิปาตธมฺโม นิยโต สมฺโพธิปรายโณ’ติ. ชานาติ, ภนฺเต, ภควา ปรํ ปุคฺคลํ ปจฺจตฺตํ โยนิโสมนสิการา – ‘อยํ ปุคฺคโล ยถานุสิฏฺฐํ ตถา ปฏิปชฺชมาโน ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา ราคโทสโมหานํ ตนุตฺตา สกทาคามี ภวิสฺสติ, สกิเทว อิมํ โลกํ อาคนฺตฺวา ทุกฺขสฺสนฺตํ กริสฺสตี’ติ. ชานาติ, ภนฺเต, ภควา ปรํ ปุคฺคลํ ปจฺจตฺตํ โยนิโสมนสิการา – ‘อยํ ปุคฺคโล ยถานุสิฏฺฐํ ตถา ปฏิปชฺชมาโน ปญฺจนฺนํ โอรมฺภาคิยานํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โอปปาติโก ภวิสฺสติ ตตฺถ ปรินิพฺพายี อนาวตฺติธมฺโม ตสฺมา โลกา’ติ. ชานาติ, ภนฺเต, ภควา ปรํ ปุคฺคลํ ปจฺจตฺตํ โยนิโสมนสิการา – ‘อยํ ปุคฺคโล ยถานุสิฏฺฐํ ตถา ปฏิปชฺชมาโน อาสวานํ ขยา อนาสวํ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหริสฺสตี’ติ. เอตทานุตฺตริยํ, ภนฺเต, อนุสาสนวิธาสุ. १५४. “अजून एक, भन्ते, हे सर्वश्रेष्ठ आहे, ज्या प्रकारे भगवान अनुशासनाच्या पद्धतींविषयी धम्म उपदेश करतात. भन्ते, अनुशासनाच्या या चार पद्धती आहेत – भन्ते, भगवान आपल्या योग्य मनस्काराने (विचारपूर्वक) दुसऱ्या व्यक्तीविषयी जाणतात की, ‘हा मनुष्य उपदेश केल्याप्रमाणे आचरण करत, तीन संयोजनांचा (बंधनांचा) पूर्ण क्षय झाल्यामुळे, दुर्गतीला न जाणारा, निश्चित गती असलेला आणि संबोधीकडे (ज्ञानाकडे) वाटचाल करणारा सोतापन्न (स्रोतापन्न) होईल.’ भन्ते, भगवान दुसऱ्या व्यक्तीविषयी आपल्या योग्य मनस्काराने जाणतात की, ‘हा मनुष्य उपदेश केल्याप्रमाणे आचरण करत, तीन संयोजनांचा पूर्ण क्षय झाल्यामुळे आणि राग, द्वेष व मोहाच्या मंदतेमुळे सकदागामी (सकृदागामी) होईल, आणि या जगात केवळ एकदाच या भूमीवर येऊन दुःखाचा अंत करेल.’ भन्ते, भगवान दुसऱ्या व्यक्तीविषयी आपल्या योग्य मनस्काराने जाणतात की, ‘हा मनुष्य उपदेश केल्याप्रमाणे आचरण करत, पाच खालच्या (ओरंभागीय) संयोजनांचा पूर्ण क्षय झाल्यामुळे ओपपातिक (स्वयंभू उत्पन्न होणारा) होईल, आणि तेथेच परिनिर्वाण प्राप्त करेल, त्या लोकावरून परत न येणारा अनागामी होईल.’ भन्ते, भगवान दुसऱ्या व्यक्तीविषयी आपल्या योग्य मनस्काराने जाणतात की, ‘हा मनुष्य उपदेश केल्याप्रमाणे आचरण करत, आसवांच्या (चित्तमलांच्या) क्षयामुळे, आसवरहित चेतोविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्ती याच जन्मात स्वतःच्या अभिज्ञाने (विशिष्ट ज्ञानाने) साक्षात करून, प्राप्त करून विहरेल.’ भन्ते, अनुशासनाच्या पद्धतींविषयी हे सर्वश्रेष्ठ आहे.” ปรปุคฺคลวิมุตฺติญาณเทสนา इतर व्यक्तींच्या विमुक्तीच्या ज्ञानाविषयी उपदेश ๑๕๕. ‘‘อปรํ ปน, ภนฺเต, เอตทานุตฺตริยํ, ยถา ภควา ธมฺมํ เทเสติ ปรปุคฺคลวิมุตฺติญาเณ. ชานาติ, ภนฺเต, ภควา ปรํ ปุคฺคลํ ปจฺจตฺตํ โยนิโสมนสิการา – ‘อยํ ปุคฺคโล ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โสตาปนฺโน ภวิสฺสติ อวินิปาตธมฺโม นิยโต สมฺโพธิปรายโณ’ติ. ชานาติ, ภนฺเต, ภควา ปรํ ปุคฺคลํ ปจฺจตฺตํ โยนิโสมนสิการา – ‘อยํ ปุคฺคโล ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา ราคโทสโมหานํ ตนุตฺตา สกทาคามี ภวิสฺสติ, สกิเทว อิมํ โลกํ อาคนฺตฺวา ทุกฺขสฺสนฺตํ กริสฺสตี’ติ. ชานาติ, ภนฺเต, ภควา ปรํ ปุคฺคลํ ปจฺจตฺตํ โยนิโสมนสิการา – ‘อยํ ปุคฺคโล ปญฺจนฺนํ โอรมฺภาคิยานํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โอปปาติโก ภวิสฺสติ ตตฺถ ปรินิพฺพายี อนาวตฺติธมฺโม ตสฺมา โลกา’ติ. ชานาติ, ภนฺเต, ภควา ปรํ ปุคฺคลํ ปจฺจตฺตํ โยนิโสมนสิการา – ‘อยํ ปุคฺคโล อาสวานํ ขยา อนาสวํ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ [Pg.90] ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหริสฺสตี’ติ. เอตทานุตฺตริยํ, ภนฺเต, ปรปุคฺคลวิมุตฺติญาเณ. १५५. “अजून एक, भन्ते, हे सर्वश्रेष्ठ आहे, ज्या प्रकारे भगवान इतर व्यक्तींच्या विमुक्तीच्या ज्ञानाविषयी धम्म उपदेश करतात. भन्ते, भगवान दुसऱ्या व्यक्तीविषयी आपल्या योग्य मनस्काराने जाणतात की, ‘हा मनुष्य तीन संयोजनांच्या पूर्ण क्षयामुळे, दुर्गतीला न जाणारा, निश्चित गती असलेला आणि संबोधीकडे वाटचाल करणारा सोतापन्न होईल.’ भन्ते, भगवान दुसऱ्या व्यक्तीविषयी आपल्या योग्य मनस्काराने जाणतात की, ‘हा मनुष्य तीन संयोजनांच्या पूर्ण क्षयामुळे आणि राग, द्वेष व मोहाच्या मंदतेमुळे सकदागामी होईल, आणि या जगात केवळ एकदाच येऊन दुःखाचा अंत करेल.’ भन्ते, भगवान दुसऱ्या व्यक्तीविषयी आपल्या योग्य मनस्काराने जाणतात की, ‘हा मनुष्य पाच खालच्या संयोजनांच्या पूर्ण क्षयामुळे ओपपातिक होईल, आणि तेथेच परिनिर्वाण प्राप्त करेल, त्या लोकावरून परत न येणारा अनागामी होईल.’ भन्ते, भगवान दुसऱ्या व्यक्तीविषयी आपल्या योग्य मनस्काराने जाणतात की, ‘हा मनुष्य आसवांच्या क्षयामुळे, आसवरहित चेतोविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्ती याच जन्मात स्वतःच्या अभिज्ञाने साक्षात करून, प्राप्त करून विहरेल.’ भन्ते, इतर व्यक्तींच्या विमुक्तीच्या ज्ञानाविषयी हे सर्वश्रेष्ठ आहे.” สสฺสตวาทเทสนา शाश्वतवादाविषयी उपदेश ๑๕๖. ‘‘อปรํ ปน, ภนฺเต, เอตทานุตฺตริยํ, ยถา ภควา ธมฺมํ เทเสติ สสฺสตวาเทสุ. ตโยเม, ภนฺเต, สสฺสตวาทา. อิธ, ภนฺเต, เอกจฺโจ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา อาตปฺปมนฺวาย…เป… ตถารูปํ เจโตสมาธึ ผุสติ, ยถาสมาหิเต จิตฺเต อเนกวิหิตํ ปุพฺเพนิวาสํ อนุสฺสรติ. เสยฺยถิทํ, เอกมฺปิ ชาตึ ทฺเวปิ ชาติโย ติสฺโสปิ ชาติโย จตสฺโสปิ ชาติโย ปญฺจปิ ชาติโย ทสปิ ชาติโย วีสมฺปิ ชาติโย ตึสมฺปิ ชาติโย จตฺตาลีสมฺปิ ชาติโย ปญฺญาสมฺปิ ชาติโย ชาติสตมฺปิ ชาติสหสฺสมฺปิ ชาติสตสหสฺสมฺปิ อเนกานิปิ ชาติสตานิ อเนกานิปิ ชาติสหสฺสานิ อเนกานิปิ ชาติสตสหสฺสานิ, ‘อมุตฺราสึ เอวํนาโม เอวํโคตฺโต เอวํวณฺโณ เอวมาหาโร เอวํสุขทุกฺขปฺปฏิสํเวที เอวมายุปริยนฺโต, โส ตโต จุโต อมุตฺร อุทปาทึ; ตตฺราปาสึ เอวํนาโม เอวํโคตฺโต เอวํวณฺโณ เอวมาหาโร เอวํสุขทุกฺขปฺปฏิสํเวที เอวมายุปริยนฺโต, โส ตโต จุโต อิธูปปนฺโน’ติ. อิติ สาการํ สอุทฺเทสํ อเนกวิหิตํ ปุพฺเพนิวาสํ อนุสฺสรติ. โส เอวมาห – ‘อตีตํปาหํ อทฺธานํ ชานามิ – สํวฏฺฏิ วา โลโก วิวฏฺฏิ วาติ. อนาคตํปาหํ อทฺธานํ ชานามิ – สํวฏฺฏิสฺสติ วา โลโก วิวฏฺฏิสฺสติ วาติ. สสฺสโต อตฺตา จ โลโก จ วญฺโฌ กูฏฏฺโฐ เอสิกฏฺฐายิฏฺฐิโต. เต จ สตฺตา สนฺธาวนฺติ สํสรนฺติ จวนฺติ อุปปชฺชนฺติ, อตฺถิตฺเวว สสฺสติสม’นฺติ. อยํ ปฐโม สสฺสตวาโท. १५६. “शिवाय, भन्ते, हे अनुत्तर आहे, ज्या प्रकारे भगवान शाश्वतवादांविषयी धम्म देशना देतात. भन्ते, हे तीन शाश्वतवाद आहेत. येथे, भन्ते, एखादा श्रमण किंवा ब्राह्मण तीव्र प्रयत्न करून... अशा प्रकारची चित्तसमाधी प्राप्त करतो, ज्या समाहित चित्ताने तो आपल्या अनेक प्रकारच्या पूर्वजन्मांचे स्मरण करतो. जसे की - एक जन्म, दोन जन्म, तीन जन्म, चार जन्म, पाच जन्म, दहा जन्म, वीस जन्म, तीस जन्म, चाळीस जन्म, पन्नास जन्म, शंभर जन्म, हजार जन्म, लाख जन्म, अनेक शेकडो जन्म, अनेक हजारो जन्म, अनेक लाखो जन्म: ‘तिथे मी अशा नावाचा, अशा गोत्राचा, अशा वर्णाचा, अशा आहाराचा, अशा सुख-दुःखाचा अनुभव घेणारा आणि एवढ्या आयुष्याची मर्यादा असलेला होतो. तो मी तिथून च्युत होऊन अमूक ठिकाणी जन्माला आलो; तिथेही मी अशा नावाचा, अशा गोत्राचा, अशा वर्णाचा, अशा आहाराचा, अशा सुख-दुःखाचा अनुभव घेणारा आणि एवढ्या आयुष्याची मर्यादा असलेला होतो. तो मी तिथून च्युत होऊन येथे उत्पन्न झालो आहे.’ अशा प्रकारे तो सविस्तर आणि निर्देशासहित आपल्या अनेक प्रकारच्या पूर्वजन्मांचे स्मरण करतो. तो असे म्हणतो – ‘मी भूतकाळाला जाणतो – लोक संकुचित झाले किंवा विकसित झाले. मी भविष्यकाळालाही जाणतो – लोक संकुचित होईल किंवा विकसित होईल. आत्मा आणि लोक शाश्वत आहेत, वंध्य आहेत, पर्वताच्या शिखरासारखे स्थिर आहेत, खांबासारखे अढळ आहेत. आणि ते प्राणीच धावतात, संसरण करतात, च्युत होतात आणि पुन्हा उत्पन्न होतात, परंतु ते शाश्वत वस्तूंसारखे सदैव अस्तित्वात राहतात.’ हा पहिला शाश्वतवाद आहे.” ‘‘ปุน จปรํ, ภนฺเต, อิเธกจฺโจ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา อาตปฺปมนฺวาย…เป… ตถารูปํ เจโตสมาธึ ผุสติ, ยถาสมาหิเต จิตฺเต อเนกวิหิตํ ปุพฺเพนิวาสํ อนุสฺสรติ. เสยฺยถิทํ, เอกมฺปิ สํวฏฺฏวิวฏฺฏํ ทฺเวปิ สํวฏฺฏวิวฏฺฏานิ ตีณิปิ สํวฏฺฏวิวฏฺฏานิ จตฺตาริปิ สํวฏฺฏวิวฏฺฏานิ ปญฺจปิ สํวฏฺฏวิวฏฺฏานิ ทสปิ สํวฏฺฏวิวฏฺฏานิ, ‘อมุตฺราสึ เอวํนาโม เอวํโคตฺโต [Pg.91] เอวํวณฺโณ เอวมาหาโร เอวํสุขทุกฺขปฺปฏิสํเวที เอวมายุปริยนฺโต, โส ตโต จุโต อมุตฺร อุทปาทึ; ตตฺราปาสึ เอวํนาโม เอวํโคตฺโต เอวํวณฺโณ เอวมาหาโร เอวํสุขทุกฺขปฺปฏิสํเวที เอวมายุปริยนฺโต, โส ตโต จุโต อิธูปปนฺโน’ติ. อิติ สาการํ สอุทฺเทสํ อเนกวิหิตํ ปุพฺเพนิวาสํ อนุสฺสรติ. โส เอวมาห – ‘อตีตํปาหํ อทฺธานํ ชานามิ สํวฏฺฏิ วา โลโก วิวฏฺฏิ วาติ. อนาคตํปาหํ อทฺธานํ ชานามิ สํวฏฺฏิสฺสติ วา โลโก วิวฏฺฏิสฺสติ วาติ. สสฺสโต อตฺตา จ โลโก จ วญฺโฌ กูฏฏฺโฐ เอสิกฏฺฐายิฏฺฐิโต. เต จ สตฺตา สนฺธาวนฺติ สํสรนฺติ จวนฺติ อุปปชฺชนฺติ, อตฺถิตฺเวว สสฺสติสม’นฺติ. อยํ ทุติโย สสฺสตวาโท. “पुन्हा दुसरे, भन्ते, येथे एखादा श्रमण किंवा ब्राह्मण तीव्र प्रयत्न करून... अशा प्रकारची चित्तसमाधी प्राप्त करतो, ज्या समाहित चित्ताने तो आपल्या अनेक प्रकारच्या पूर्वजन्मांचे स्मरण करतो. जसे की - एक संवर्त-विवर्त, दोन संवर्त-विवर्त, तीन संवर्त-विवर्त, चार संवर्त-विवर्त, पाच संवर्त-विवर्त, दहा संवर्त-विवर्त: ‘तिथे मी अशा नावाचा, अशा गोत्राचा, अशा वर्णाचा, अशा आहाराचा, अशा सुख-दुःखाचा अनुभव घेणारा आणि एवढ्या आयुष्याची मर्यादा असलेला होतो. तो मी तिथून च्युत होऊन अमूक ठिकाणी जन्माला आलो; तिथेही मी अशा नावाचा, अशा गोत्राचा, अशा वर्णाचा, अशा आहाराचा, अशा सुख-दुःखाचा अनुभव घेणारा आणि एवढ्या आयुष्याची मर्यादा असलेला होतो. तो मी तिथून च्युत होऊन येथे उत्पन्न झालो आहे.’ अशा प्रकारे तो सविस्तर आणि निर्देशासहित आपल्या अनेक प्रकारच्या पूर्वजन्मांचे स्मरण करतो. तो असे म्हणतो – ‘मी भूतकाळाला जाणतो – लोक संकुचित झाले किंवा विकसित झाले. मी भविष्यकाळालाही जाणतो – लोक संकुचित होईल किंवा विकसित होईल. आत्मा आणि लोक शाश्वत आहेत, वंध्य आहेत, पर्वताच्या शिखरासारखे स्थिर आहेत, खांबासारखे अढळ आहेत. आणि ते प्राणीच धावतात, संसरण करतात, च्युत होतात आणि पुन्हा उत्पन्न होतात, परंतु ते शाश्वत वस्तूंसारखे सदैव अस्तित्वात राहतात.’ हा दुसरा शाश्वतवाद आहे.” ‘‘ปุน จปรํ, ภนฺเต, อิเธกจฺโจ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา อาตปฺปมนฺวาย…เป… ตถารูปํ เจโตสมาธึ ผุสติ, ยถาสมาหิเต จิตฺเต อเนกวิหิตํ ปุพฺเพนิวาสํ อนุสฺสรติ. เสยฺยถิทํ, ทสปิ สํวฏฺฏวิวฏฺฏานิ วีสมฺปิ สํวฏฺฏวิวฏฺฏานิ ตึสมฺปิ สํวฏฺฏวิวฏฺฏานิ จตฺตาลีสมฺปิ สํวฏฺฏวิวฏฺฏานิ, ‘อมุตฺราสึ เอวํนาโม เอวํโคตฺโต เอวํวณฺโณ เอวมาหาโร เอวํสุขทุกฺขปฺปฏิสํเวที เอวมายุปริยนฺโต, โส ตโต จุโต อมุตฺร อุทปาทึ; ตตฺราปาสึ เอวํนาโม เอวํโคตฺโต เอวํวณฺโณ เอวมาหาโร เอวํสุขทุกฺขปฺปฏิสํเวที เอวมายุปริยนฺโต, โส ตโต จุโต อิธูปปนฺโน’ติ. อิติ สาการํ สอุทฺเทสํ อเนกวิหิตํ ปุพฺเพนิวาสํ อนุสฺสรติ. โส เอวมาห – ‘อตีตํปาหํ อทฺธานํ ชานามิ สํวฏฺฏิปิ โลโก วิวฏฺฏิปีติ; อนาคตํปาหํ อทฺธานํ ชานามิ สํวฏฺฏิสฺสติปิ โลโก วิวฏฺฏิสฺสติปีติ. สสฺสโต อตฺตา จ โลโก จ วญฺโฌ กูฏฏฺโฐ เอสิกฏฺฐายิฏฺฐิโต. เต จ สตฺตา สนฺธาวนฺติ สํสรนฺติ จวนฺติ อุปปชฺชนฺติ, อตฺถิตฺเวว สสฺสติสม’นฺติ. อยํ ตติโย สสฺสตวาโท, เอตทานุตฺตริยํ, ภนฺเต, สสฺสตวาเทสุ. “पुन्हा दुसरे, भन्ते, येथे एखादा श्रमण किंवा ब्राह्मण तीव्र प्रयत्न करून... अशा प्रकारची चित्तसमाधी प्राप्त करतो, ज्या समाहित चित्ताने तो आपल्या अनेक प्रकारच्या पूर्वजन्मांचे स्मरण करतो. जसे की - दहा संवर्त-विवर्त, वीस संवर्त-विवर्त, तीस संवर्त-विवर्त, चाळीस संवर्त-विवर्त: ‘तिथे मी अशा नावाचा, अशा गोत्राचा, अशा वर्णाचा, अशा आहाराचा, अशा सुख-दुःखाचा अनुभव घेणारा आणि एवढ्या आयुष्याची मर्यादा असलेला होतो. तो मी तिथून च्युत होऊन अमूक ठिकाणी जन्माला आलो; तिथेही मी अशा नावाचा, अशा गोत्राचा, अशा वर्णाचा, अशा आहाराचा, अशा सुख-दुःखाचा अनुभव घेणारा आणि एवढ्या आयुष्याची मर्यादा असलेला होतो. तो मी तिथून च्युत होऊन येथे उत्पन्न झालो आहे.’ अशा प्रकारे तो सविस्तर आणि निर्देशासहित आपल्या अनेक प्रकारच्या पूर्वजन्मांचे स्मरण करतो. तो असे म्हणतो – ‘मी भूतकाळाला जाणतो – लोक संकुचितही होतो आणि विकसितही होतो. मी भविष्यकाळालाही जाणतो – लोक संकुचितही होईल आणि विकसितही होईल. आत्मा आणि लोक शाश्वत आहेत, वंध्य आहेत, पर्वताच्या शिखरासारखे स्थिर आहेत, खांबासारखे अढळ आहेत. आणि ते प्राणीच धावतात, संसरण करतात, च्युत होतात आणि पुन्हा उत्पन्न होतात, परंतु ते शाश्वत वस्तूंसारखे सदैव अस्तित्वात राहतात.’ हा तिसरा शाश्वतवाद आहे, भन्ते, शाश्वतवादांमध्ये हे अनुत्तर आहे.” ปุพฺเพนิวาสานุสฺสติญาณเทสนา पूर्वनिवासानुस्मृती ज्ञान देशना ๑๕๗. ‘‘อปรํ ปน, ภนฺเต, เอตทานุตฺตริยํ, ยถา ภควา ธมฺมํ เทเสติ ปุพฺเพนิวาสานุสฺสติญาเณ. อิธ, ภนฺเต, เอกจฺโจ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา อาตปฺปมนฺวาย…เป… ตถารูปํ เจโตสมาธึ ผุสติ, ยถาสมาหิเต จิตฺเต อเนกวิหิตํ ปุพฺเพนิวาสํ อนุสฺสรติ. เสยฺยถิทํ, เอกมฺปิ ชาตึ ทฺเวปิ ชาติโย ติสฺโสปิ ชาติโย จตสฺโสปิ ชาติโย ปญฺจปิ ชาติโย ทสปิ ชาติโย วีสมฺปิ ชาติโย ตึสมฺปิ ชาติโย จตฺตาลีสมฺปิ [Pg.92] ชาติโย ปญฺญาสมฺปิ ชาติโย ชาติสตมฺปิ ชาติสหสฺสมฺปิ ชาติสตสหสฺสมฺปิ อเนเกปิ สํวฏฺฏกปฺเป อเนเกปิ วิวฏฺฏกปฺเป อเนเกปิ สํวฏฺฏวิวฏฺฏกปฺเป, ‘อมุตฺราสึ เอวํนาโม เอวํโคตฺโต เอวํวณฺโณ เอวมาหาโร เอวํสุขทุกฺขปฺปฏิสํเวที เอวมายุปริยนฺโต, โส ตโต จุโต อมุตฺร อุทปาทึ; ตตฺราปาสึ เอวํนาโม เอวํโคตฺโต เอวํวณฺโณ เอวมาหาโร เอวํสุขทุกฺขปฺปฏิสํเวที เอวมายุปริยนฺโต, โส ตโต จุโต อิธูปปนฺโน’ติ. อิติ สาการํ สอุทฺเทสํ อเนกวิหิตํ ปุพฺเพนิวาสํ อนุสฺสรติ. สนฺติ, ภนฺเต, เทวา, เยสํ น สกฺกา คณนาย วา สงฺขาเนน วา อายุ สงฺขาตุํ. อปิ จ, ยสฺมึ ยสฺมึ อตฺตภาเว อภินิวุฏฺฐปุพฺโพ โหติ ยทิ วา รูปีสุ ยทิ วา อรูปีสุ ยทิ วา สญฺญีสุ ยทิ วา อสญฺญีสุ ยทิ วา เนวสญฺญีนาสญฺญีสุ. อิติ สาการํ สอุทฺเทสํ อเนกวิหิตํ ปุพฺเพนิวาสํ อนุสฺสรติ. เอตทานุตฺตริยํ, ภนฺเต, ปุพฺเพนิวาสานุสฺสติญาเณ. १५७. “शिवाय, भन्ते, हे अनुत्तर आहे, ज्या प्रकारे भगवान पूर्वनिवासानुस्मृती ज्ञानात धम्म देशना देतात. येथे, भन्ते, एखादा श्रमण किंवा ब्राह्मण तीव्र प्रयत्न करून... अशा प्रकारची चित्तसमाधी प्राप्त करतो, ज्या समाहित चित्ताने तो आपल्या अनेक प्रकारच्या पूर्वजन्मांचे स्मरण करतो. जसे की - एक जन्म, दोन जन्म, three जन्म, चार जन्म, पाच जन्म, दहा जन्म, वीस जन्म, तीस जन्म, चाळीस जन्म, पन्नास जन्म, शंभर जन्म, हजार जन्म, लाख जन्म, अनेक संवर्तकल्प, अनेक विवर्तकल्प, अनेक संवर्त-विवर्तकल्प: ‘तिथे मी अशा नावाचा, अशा गोत्राचा, अशा वर्णाचा, अशा आहाराचा, अशा सुख-दुःखाचा अनुभव घेणारा आणि एवढ्या आयुष्याची मर्यादा असलेला होतो. तो मी तिथून च्युत होऊन अमूक ठिकाणी जन्माला आलो; तिथेही मी अशा नावाचा, अशा गोत्राचा, अशा वर्णाचा, अशा आहाराचा, अशा सुख-दुःखाचा अनुभव घेणारा आणि एवढ्या आयुष्याची मर्यादा असलेला होतो. तो मी तिथून च्युत होऊन येथे उत्पन्न झालो आहे.’ अशा प्रकारे तो सविस्तर आणि निर्देशासहित आपल्या अनेक प्रकारच्या पूर्वजन्मांचे स्मरण करतो. भन्ते, असे देव आहेत, ज्यांचे आयुष्य मोजणीने किंवा गणिताने मोजणे शक्य नाही. तरीही, ज्या ज्या आत्मभावात तो पूर्वी राहिला होता – मग ते रूपी असो वा अरूपी असो, संज्ञी असो वा असंज्ञी असो, किंवा नैवसंज्ञी-नासंज्ञी असो. अशा प्रकारे तो सविस्तर आणि निर्देशासहित आपल्या अनेक प्रकारच्या पूर्वजन्मांचे स्मरण करतो. पूर्वनिवासानुस्मृती ज्ञानात हे अनुत्तर आहे, भन्ते.” จุตูปปาตญาณเทสนา च्युती-उत्पत्ती ज्ञानाची देशना ๑๕๘. ‘‘อปรํ ปน, ภนฺเต, เอตทานุตฺตริยํ, ยถา ภควา ธมฺมํ เทเสติ สตฺตานํ จุตูปปาตญาเณ. อิธ, ภนฺเต, เอกจฺโจ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา อาตปฺปมนฺวาย…เป… ตถารูปํ เจโตสมาธึ ผุสติ, ยถาสมาหิเต จิตฺเต ทิพฺเพน จกฺขุนา วิสุทฺเธน อติกฺกนฺตมานุสเกน สตฺเต ปสฺสติ จวมาเน อุปปชฺชมาเน หีเน ปณีเต สุวณฺเณ ทุพฺพณฺเณ สุคเต ทุคฺคเต ยถากมฺมูปเค สตฺเต ปชานาติ – ‘อิเม วต โภนฺโต สตฺตา กายทุจฺจริเตน สมนฺนาคตา วจีทุจฺจริเตน สมนฺนาคตา มโนทุจฺจริเตน สมนฺนาคตา อริยานํ อุปวาทกา มิจฺฉาทิฏฺฐิกา มิจฺฉาทิฏฺฐิกมฺมสมาทานา. เต กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปนฺนา. อิเม วา ปน โภนฺโต สตฺตา กายสุจริเตน สมนฺนาคตา วจีสุจริเตน สมนฺนาคตา มโนสุจริเตน สมนฺนาคตา อริยานํ อนุปวาทกา สมฺมาทิฏฺฐิกา สมฺมาทิฏฺฐิกมฺมสมาทานา. เต กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปนฺนา’ติ. อิติ ทิพฺเพน จกฺขุนา วิสุทฺเธน อติกฺกนฺตมานุสเกน สตฺเต ปสฺสติ จวมาเน อุปปชฺชมาเน หีเน ปณีเต [Pg.93] สุวณฺเณ ทุพฺพณฺเณ สุคเต ทุคฺคเต ยถากมฺมูปเค สตฺเต ปชานาติ. เอตทานุตฺตริยํ, ภนฺเต, สตฺตานํ จุตูปปาตญาเณ. १५८. शिवाय, भन्ते, प्राण्यांच्या च्युती आणि उत्पत्तीच्या (मृत्यू आणि पुनर्जन्माच्या) ज्ञानाच्या बाबतीत भगवान ज्या प्रकारे धम्माचा उपदेश करतात, ते अनुत्तर (सर्वश्रेष्ठ) आहे. येथे, भन्ते, एखादा श्रमण किंवा ब्राह्मण तीव्र पुरुषार्थ करून... अशा प्रकारची चित्त-समाधी प्राप्त करतो, ज्यामध्ये चित्त समाहित झाल्यावर तो मानवी दृष्टीच्या पलीकडे गेलेल्या, अत्यंत शुद्ध अशा दिव्य चक्षूने प्राण्यांना च्युत होताना (मरताना) आणि उत्पन्न होताना (पुनर्जन्म घेताना) पाहतो; हीन आणि प्रणीत (उच्च), सुवर्ण (सुंदर) आणि दुर्विण (कुरूप), सुगती आणि दुर्गती प्राप्त करणाऱ्या प्राण्यांना त्यांच्या कर्मानुसार गती मिळताना जाणतो – 'अरेरे! हे प्राणी कायिक दुश्चरित्राने, वाचिक दुश्चरित्राने आणि मानसिक दुश्चरित्राने युक्त होते; ते आर्यांची निंदा करणारे, मिथ्यादृष्टी असणारे आणि मिथ्यादृष्टीच्या कर्मांचे आचरण करणारे होते. ते शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि नरकात उत्पन्न झाले आहेत. किंवा पुन्हा, हे प्राणी कायिक सुचरित्राने, वाचिक सुचरित्राने आणि मानसिक सुचरित्राने युक्त होते; ते आर्यांची निंदा न करणारे, सम्यक दृष्टी असणारे आणि सम्यक दृष्टीच्या कर्मांचे आचरण करणारे होते. ते शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती आणि स्वर्गलोकात उत्पन्न झाले आहेत.' अशा प्रकारे, मानवी दृष्टीच्या पलीकडे गेलेल्या, अत्यंत शुद्ध अशा दिव्य चक्षूने तो प्राण्यांना च्युत होताना आणि उत्पन्न होताना पाहतो; हीन आणि प्रणीत, सुवर्ण आणि दुर्विण, सुगती आणि दुर्गती प्राप्त करणाऱ्या प्राण्यांना त्यांच्या कर्मानुसार गती मिळताना जाणतो. भन्ते, प्राण्यांच्या च्युती आणि उत्पत्तीच्या ज्ञानाच्या बाबतीत हे अनुत्तर आहे. อิทฺธิวิธเทสนา ऋद्धिविध देशना (ऋद्धीच्या प्रकारांविषयी उपदेश) ๑๕๙. ‘‘อปรํ ปน, ภนฺเต, เอตทานุตฺตริยํ, ยถา ภควา ธมฺมํ เทเสติ อิทฺธิวิธาสุ. ทฺเวมา, ภนฺเต, อิทฺธิวิธาโย – อตฺถิ, ภนฺเต, อิทฺธิ สาสวา สอุปธิกา, ‘โน อริยา’ติ วุจฺจติ. อตฺถิ, ภนฺเต, อิทฺธิ อนาสวา อนุปธิกา ‘อริยา’ติ วุจฺจติ. ‘‘กตมา จ, ภนฺเต, อิทฺธิ สาสวา สอุปธิกา, ‘โน อริยา’ติ วุจฺจติ? อิธ, ภนฺเต, เอกจฺโจ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา อาตปฺปมนฺวาย…เป… ตถารูปํ เจโตสมาธึ ผุสติ, ยถาสมาหิเต จิตฺเต อเนกวิหิตํ อิทฺธิวิธํ ปจฺจนุโภติ. เอโกปิ หุตฺวา พหุธา โหติ, พหุธาปิ หุตฺวา เอโก โหติ; อาวิภาวํ ติโรภาวํ ติโรกุฏฺฏํ ติโรปาการํ ติโรปพฺพตํ อสชฺชมาโน คจฺฉติ เสยฺยถาปิ อากาเส. ปถวิยาปิ อุมฺมุชฺชนิมุชฺชํ กโรติ, เสยฺยถาปิ อุทเก. อุทเกปิ อภิชฺชมาเน คจฺฉติ, เสยฺยถาปิ ปถวิยํ. อากาเสปิ ปลฺลงฺเกน กมติ, เสยฺยถาปิ ปกฺขี สกุโณ. อิเมปิ จนฺทิมสูริเย เอวํมหิทฺธิเก เอวํมหานุภาเว ปาณินา ปรามสติ ปริมชฺชติ. ยาว พฺรหฺมโลกาปิ กาเยน วสํ วตฺเตติ. อยํ, ภนฺเต, อิทฺธิ สาสวา สอุปธิกา, ‘โน อริยา’ติ วุจฺจติ. १५९. शिवाय, भन्ते, ऋद्धीच्या प्रकारांच्या (चमत्कारी शक्तींच्या) बाबतीत भगवान ज्या प्रकारे धम्माचा उपदेश करतात, ते अनुत्तर आहे. भन्ते, या दोन प्रकारच्या ऋद्धी आहेत – भन्ते, एक ऋद्धी अशी आहे जी सास्रव (आस्रवांसह) आणि सोपाधिक (उपाधींसह) आहे, जिला 'अनार्य' (नो अरिया) म्हटले जाते. आणि भन्ते, दुसरी ऋद्धी अशी आहे जी अनास्रव (आस्रवविरहित) आणि निरूपाधिक (उपाधीविरहित) आहे, जिला 'आर्य' म्हटले जाते. भन्ते, सास्रव, सोपाधिक आणि 'अनार्य' म्हटली जाणारी ऋद्धी कोणती आहे? येथे, भन्ते, एखादा श्रमण किंवा ब्राह्मण तीव्र पुरुषार्थ करून... अशा प्रकारची चित्त-समाधी प्राप्त करतो, ज्यामध्ये चित्त समाहित झाल्यावर तो अनेक प्रकारच्या ऋद्धींचा अनुभव घेतो. तो एक असूनही अनेक रूपे धारण करतो, आणि अनेक रूपे धारण करून पुन्हा एक रूप बनतो; तो प्रकट होतो आणि अदृश्य होतो; भिंत, कुंपण किंवा पर्वत यांमधून न अडकता पार निघून जातो, जणू काही आकाशातून जात असावा. तो जमिनीवरही पाण्यात बुडी मारल्यासारखा आणि वर आल्यासारखा प्रवेश करतो. तो पाण्याच्या पृष्ठभागाचा भेद न करता त्यावर जमिनीसारखा चालतो. तो आकाशातही पंख असलेल्या पक्षाप्रमाणे मांडी घालून (पद्मासनात) उडतो. तो इतके महा-ऋद्धिवान आणि महा-तेजस्वी असणाऱ्या चंद्र आणि सूर्यालाही हाताने स्पर्श करतो आणि कुरवाळतो. तो शरीराने ब्रह्मलोकापर्यंत आपले नियंत्रण ठेवतो. भन्ते, ही सास्रव, सोपाधिक आणि 'अनार्य' म्हटली जाणारी ऋद्धी आहे. ‘‘กตมา ปน, ภนฺเต, อิทฺธิ อนาสวา อนุปธิกา, ‘อริยา’ติ วุจฺจติ? อิธ, ภนฺเต, ภิกฺขุ สเจ อากงฺขติ – ‘ปฏิกูเล อปฺปฏิกูลสญฺญี วิหเรยฺย’นฺติ, อปฺปฏิกูลสญฺญี ตตฺถ วิหรติ. สเจ อากงฺขติ – ‘อปฺปฏิกูเล ปฏิกูลสญฺญี วิหเรยฺย’นฺติ, ปฏิกูลสญฺญี ตตฺถ วิหรติ. สเจ อากงฺขติ – ‘ปฏิกูเล จ อปฺปฏิกูเล จ อปฺปฏิกูลสญฺญี วิหเรยฺย’นฺติ, อปฺปฏิกูลสญฺญี ตตฺถ วิหรติ. สเจ อากงฺขติ – ‘ปฏิกูเล จ อปฺปฏิกูเล จ ปฏิกูลสญฺญี วิหเรยฺย’นฺติ, ปฏิกูลสญฺญี ตตฺถ วิหรติ. สเจ อากงฺขติ – ‘ปฏิกูลญฺจ อปฺปฏิกูลญฺจ ตทุภยํ อภินิวชฺเชตฺวา อุเปกฺขโก วิหเรยฺยํ สโต สมฺปชาโน’ติ, อุเปกฺขโก ตตฺถ วิหรติ สโต สมฺปชาโน. อยํ, ภนฺเต, อิทฺธิ อนาสวา อนุปธิกา ‘อริยา’ติ วุจฺจติ. เอตทานุตฺตริยํ, ภนฺเต, อิทฺธิวิธาสุ. ตํ ภควา อเสสมภิชานาติ, ตํ ภควโต อเสสมภิชานโต อุตฺตริ อภิญฺเญยฺยํ นตฺถิ, ยทภิชานํ อญฺโญ สมโณ [Pg.94] วา พฺราหฺมโณ วา ภควตา ภิยฺโยภิญฺญตโร อสฺส ยทิทํ อิทฺธิวิธาสุ. परंतु भन्ते, अनास्रव, निरूपाधिक आणि 'आर्य' म्हटली जाणारी ऋद्धी कोणती आहे? येथे, भन्ते, जर भिक्खूची अशी इच्छा असेल की – 'मी प्रतिकूल (किळसवाण्या) गोष्टींमध्ये अनुकूलतेची (अ-किळसवाणी) संज्ञा ठेवून विहरावे', तर तो तिथे अनुकूलतेची संज्ञा ठेवून विहरतो. जर त्याची अशी इच्छा असेल की – 'मी अनुकूल गोष्टींमध्ये प्रतिकुलतेची संज्ञा ठेवून विहरावे', तर तो तिथे प्रतिकूलतेची संज्ञा ठेवून विहरतो. जर त्याची अशी इच्छा असेल की – 'मी प्रतिकूल आणि अनुकूल अशा दोन्ही गोष्टींमध्ये अनुकूलतेची संज्ञा ठेवून विहरावे', तर तो तिथे अनुकूलतेची संज्ञा ठेवून विहरतो. जर त्याची अशी इच्छा असेल की – 'मी प्रतिकूल आणि अनुकूल अशा दोन्ही गोष्टींमध्ये प्रतिकूलतेची संज्ञा ठेवून विहरावे', तर तो तिथे प्रतिकूलतेची संज्ञा ठेवून विहरतो. जर त्याची अशी इच्छा असेल की – 'मी प्रतिकूल आणि अनुकूल या दोन्ही गोष्टींचा त्याग करून, स्मृतीवान आणि संप्रजन्ययुक्त (जागरूक) राहून उपेक्षक (तटस्थ) भावाने विहरावे', तर तो तिथे स्मृतीवान आणि संप्रजन्ययुक्त राहून उपेक्षक भावाने विहरतो. भन्ते, ही अनास्रव, निरूपाधिक आणि 'आर्य' म्हटली जाणारी ऋद्धी आहे. भन्ते, ऋद्धीच्या प्रकारांच्या बाबतीत हे अनुत्तर आहे. भगवान हे पूर्णपणे जाणतात, आणि भगवंतांनी हे पूर्णपणे जाणल्यामुळे याहून अधिक जाणण्यासारखे काही उरलेले नाही; आणि या ऋद्धीच्या प्रकारांच्या बाबतीत भगवंतांपेक्षा अधिक जाणणारा किंवा अधिक प्रबुद्ध असा दुसरा कोणताही श्रमण किंवा ब्राह्मण नाही. อญฺญถาสตฺถุคุณทสฺสนํ शास्त्यांच्या इतर गुणांचे प्रकटीकरण ๑๖๐. ‘‘ยํ ตํ, ภนฺเต, สทฺเธน กุลปุตฺเตน ปตฺตพฺพํ อารทฺธวีริเยน ถามวตา ปุริสถาเมน ปุริสวีริเยน ปุริสปรกฺกเมน ปุริสโธรยฺเหน, อนุปฺปตฺตํ ตํ ภควตา. น จ, ภนฺเต, ภควา กาเมสุ กามสุขลฺลิกานุโยคมนุยุตฺโต หีนํ คมฺมํ โปถุชฺชนิกํ อนริยํ อนตฺถสํหิตํ, น จ อตฺตกิลมถานุโยคมนุยุตฺโต ทุกฺขํ อนริยํ อนตฺถสํหิตํ. จตุนฺนญฺจ ภควา ฌานานํ อาภิเจตสิกานํ ทิฏฺฐธมฺมสุขวิหารานํ นิกามลาภี อกิจฺฉลาภี อกสิรลาภี. १६०. भन्ते, श्रद्धावान, दृढनिश्चयी, मानवी पराक्रम, मानवी वीर्य, मानवी पुरुषार्थ आणि धुरंधरत्व (जबाबदारी पेलण्याची क्षमता) असणाऱ्या कुलपुत्राने जे काही प्राप्त करणे शक्य आहे, ते सर्व भगवंतांनी प्राप्त केले आहे. आणि भन्ते, भगवान कामासक्तीमध्ये सुख शोधणाऱ्या 'कामसुखल्लिकानुयोगात' मग्न नसतात, जो हीन, ग्राम्य, सामान्य माणसांचा (पृथग्जनांचा), अनार्य आणि अनर्थकारक आहे; तसेच ते स्वतःला क्लेश देणाऱ्या 'अत्तकिलमथानुयोगात' देखील मग्न नसतात, जो दुःखद, अनार्य आणि अनर्थकारक आहे. भगवान या चारही उच्च चित्ताच्या (अभिचेतसिक), याच जन्मात सुख देणाऱ्या (दृष्टधम्मसुखविहार) ध्यानांचे सहजपणे, विनासायास आणि वपुलेतेने लाभ घेणारे आहेत. อนุโยคทานปฺปกาโร प्रश्नोत्तराची पद्धत ๑๖๑. ‘‘สเจ มํ, ภนฺเต, เอวํ ปุจฺเฉยฺย – ‘กึ นุ โข, อาวุโส สาริปุตฺต, อเหสุํ อตีตมทฺธานํ อญฺเญ สมณา วา พฺราหฺมณา วา ภควตา ภิยฺโยภิญฺญตรา สมฺโพธิย’นฺติ, เอวํ ปุฏฺโฐ อหํ, ภนฺเต, ‘โน’ติ วเทยฺยํ. ‘กึ ปนาวุโส สาริปุตฺต, ภวิสฺสนฺติ อนาคตมทฺธานํ อญฺเญ สมณา วา พฺราหฺมณา วา ภควตา ภิยฺโยภิญฺญตรา สมฺโพธิย’นฺติ, เอวํ ปุฏฺโฐ อหํ, ภนฺเต, ‘โน’ติ วเทยฺยํ. ‘กึ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อตฺเถตรหิ อญฺโญ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา ภควตา ภิยฺโยภิญฺญตโร สมฺโพธิย’นฺติ, เอวํ ปุฏฺโฐ อหํ, ภนฺเต, ‘โน’ติ วเทยฺยํ. १६१. भन्ते, जर मला कोणी असा प्रश्न विचारला की – 'हे आवुसो सारिपुत्त, भूतकाळात भगवंतांपेक्षा संबोधीच्या (ज्ञानाच्या) बाबतीत अधिक श्रेष्ठ असणारे इतर श्रमण किंवा ब्राह्मण होऊन गेले आहेत का?' तर भन्ते, असा प्रश्न विचारल्यावर मी उत्तर देईन, 'नाही.' 'हे आवुसो सारिपुत्त, भविष्यकाळात भगवंतांपेक्षा संबोधीच्या बाबतीत अधिक श्रेष्ठ असणारे इतर श्रमण किंवा ब्राह्मण होतील का?' तर भन्ते, असा प्रश्न विचारल्यावर मी उत्तर देईन, 'नाही.' 'हे आवुसो सारिपुत्त, वर्तमानकाळात भगवंतांपेक्षा संबोधीच्या बाबतीत अधिक श्रेष्ठ असणारा दुसरा एखादा श्रमण किंवा ब्राह्मण आहे का?' तर भन्ते, असा प्रश्न विचारल्यावर मी उत्तर देईन, 'नाही.' ‘‘สเจ ปน มํ, ภนฺเต, เอวํ ปุจฺเฉยฺย – ‘กึ นุ โข, อาวุโส สาริปุตฺต, อเหสุํ อตีตมทฺธานํ อญฺเญ สมณา วา พฺราหฺมณา วา ภควตา สมสมา สมฺโพธิย’นฺติ, เอวํ ปุฏฺโฐ อหํ, ภนฺเต, ‘เอว’นฺติ วเทยฺยํ. ‘กึ ปนาวุโส สาริปุตฺต, ภวิสฺสนฺติ อนาคตมทฺธานํ อญฺเญ สมณา วา พฺราหฺมณา วา ภควตา สมสมา สมฺโพธิย’นฺติ, เอวํ ปุฏฺโฐ อหํ, ภนฺเต, ‘‘เอว’’นฺติ วเทยฺยํ. ‘กึ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อตฺเถตรหิ อญฺเญ สมณา วา พฺราหฺมณา วา ภควตา สมสมา สมฺโพธิย’นฺติ, เอวํ ปุฏฺโฐ อหํ ภนฺเต ‘โน’ติ วเทยฺยํ. परंतु भन्ते, जर मला कोणी असा प्रश्न विचारला की – 'हे आवुसो सारिपुत्त, भूतकाळात भगवंतांच्या समान संबोधी असणारे इतर श्रमण किंवा ब्राह्मण होऊन गेले आहेत का?' तर भन्ते, असा प्रश्न विचारल्यावर मी उत्तर देईन, 'होय, होऊन गेले आहेत.' 'हे आवुसो सारिपुत्त, भविष्यकाळात भगवंतांच्या समान संबोधी असणारे इतर श्रमण किंवा ब्राह्मण होतील का?' तर भन्ते, असा प्रश्न विचारल्यावर मी उत्तर देईन, 'होय, होतील.' 'हे आवुसो सारिपुत्त, वर्तमानकाळात भगवंतांच्या समान संबोधी असणारे इतर श्रमण किंवा ब्राह्मण आहेत का?' तर भन्ते, असा प्रश्न विचारल्यावर मी उत्तर देईन, 'नाही.' ‘‘สเจ ปน มํ, ภนฺเต, เอวํ ปุจฺเฉยฺย – ‘กึ ปนายสฺมา สาริปุตฺโต เอกจฺจํ อพฺภนุชานาติ, เอกจฺจํ น อพฺภนุชานาตี’ติ, เอวํ ปุฏฺโฐ อหํ, ภนฺเต, เอวํ พฺยากเรยฺยํ [Pg.95] – ‘สมฺมุขา เมตํ, อาวุโส, ภควโต สุตํ, สมฺมุขา ปฏิคฺคหิตํ – ‘‘อเหสุํ อตีตมทฺธานํ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา มยา สมสมา สมฺโพธิย’’นฺติ. สมฺมุขา เมตํ, อาวุโส, ภควโต สุตํ, สมฺมุขา ปฏิคฺคหิตํ – ‘‘ภวิสฺสนฺติ อนาคตมทฺธานํ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา มยา สมสมา สมฺโพธิย’’นฺติ. สมฺมุขา เมตํ, อาวุโส, ภควโต สุตํ สมฺมุขา ปฏิคฺคหิตํ – ‘‘อฏฺฐานเมตํ อนวกาโส ยํ เอกิสฺสา โลกธาตุยา ทฺเว อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา อปุพฺพํ อจริมํ อุปฺปชฺเชยฺยุํ, เนตํ ฐานํ วิชฺชตี’’’ติ. "पण जर, भन्ते, मला असे विचारले गेले की—'आयुष्यमान सारिपुत्त काहींना मान्यता देतात आणि काहींना मान्यता देत नाहीत?' तर असे विचारले असता, भन्ते, मी असे उत्तर देईन—'हे आवुसो, मी भगवंतांच्या प्रत्यक्ष ऐकले आहे, त्यांच्याकडून ग्रहण केले आहे की—"भूतकाळात माझ्याशी संबोधीमध्ये समान असणारे अर्हत सम्यक्संबुद्ध होऊन गेले आहेत." हे आवुसो, मी भगवंतांच्या प्रत्यक्ष ऐकले आहे, त्यांच्याकडून ग्रहण केले आहे की—"भविष्यकाळात माझ्याशी संबोधीमध्ये समान असणारे अर्हत सम्यक्संबुद्ध होतील." हे आवुसो, मी भगवंतांच्या प्रत्यक्ष ऐकले आहे, त्यांच्याकडून ग्रहण केले आहे की—"हे अशक्य आहे, असा कोणताही प्रसंग उद्भवू शकत नाही की एकाच लोकधातूमध्ये दोन अर्हत सम्यक्संबुद्ध एकाच वेळी उत्पन्न होतील, अशी शक्यता अस्तित्वात नाही."'" ‘‘กจฺจาหํ, ภนฺเต, เอวํ ปุฏฺโฐ เอวํ พฺยากรมาโน วุตฺตวาที เจว ภควโต โหมิ, น จ ภควนฺตํ อภูเตน อพฺภาจิกฺขามิ, ธมฺมสฺส จานุธมฺมํ พฺยากโรมิ, น จ โกจิ สหธมฺมิโก วาทานุวาโท คารยฺหํ ฐานํ อาคจฺฉตี’’ติ? ‘‘ตคฺฆ ตฺวํ, สาริปุตฺต, เอวํ ปุฏฺโฐ เอวํ พฺยากรมาโน วุตฺตวาที เจว เม โหสิ, น จ มํ อภูเตน อพฺภาจิกฺขสิ, ธมฺมสฺส จานุธมฺมํ พฺยากโรสิ, น จ โกจิ สหธมฺมิโก วาทานุวาโท คารยฺหํ ฐานํ อาคจฺฉตี’’ติ. "'भन्ते, असे विचारले असता आणि असे उत्तर दिले असता, मी भगवंतांच्या वचनांनुसार बोलणारा ठरतो ना? आणि भगवंतांवर असत्याचा आरोप तर करत नाही ना? मी धर्माला अनुसरूनच धर्माचे स्पष्टीकरण करतो ना? आणि माझ्या कोणत्याही सहधर्मीयाचा वाद किंवा प्रतिवाद निंदनीय ठरणार नाही ना?' 'नक्कीच, सारिपुत्त! असे विचारले असता आणि असे उत्तर दिले असता, तू माझ्या वचनांनुसारच बोलणारा ठरतोस, माझ्यावर असत्याचा आरोप करत नाहीस, धर्माला अनुसरूनच धर्माचे स्पष्टीकरण करतोस आणि तुझ्या कोणत्याही सहधर्मीयाचा वाद किंवा प्रतिवाद निंदनीय ठरणार नाही.'" อจฺฉริยอพฺภุตํ "आश्चर्यकारक आणि अद्भुत" ๑๖๒. เอวํ วุตฺเต, อายสฺมา อุทายี ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต, ตถาคตสฺส อปฺปิจฺฉตา สนฺตุฏฺฐิตา สลฺเลขตา. ยตฺร หิ นาม ตถาคโต เอวํมหิทฺธิโก เอวํมหานุภาโว, อถ จ ปน เนวตฺตานํ ปาตุกริสฺสติ! เอกเมกญฺเจปิ อิโต, ภนฺเต, ธมฺมํ อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา อตฺตนิ สมนุปสฺเสยฺยุํ, เต ตาวตเกเนว ปฏากํ ปริหเรยฺยุํ. อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต, ตถาคตสฺส อปฺปิจฺฉตา สนฺตุฏฺฐิตา สลฺเลขตา. ยตฺร หิ นาม ตถาคโต เอวํ มหิทฺธิโก เอวํมหานุภาโว. อถ จ ปน เนวตฺตานํ ปาตุกริสฺสตี’’ติ! १६२. "असे म्हटले असता, आयुष्यमान उदायी भगवंतांना म्हणाले—'भन्ते, हे आश्चर्यकारक आहे! भन्ते, हे अद्भुत आहे! तथागतांची ही अल्पेच्छता, संतुष्टता आणि संलेखता! कारण तथागत इतके महाऋद्धिवान आणि महानुभाव असूनही स्वतःचे प्रदर्शन करत नाहीत! भन्ते, जर इतर पंथांच्या परिव्राजकांनी स्वतःमध्ये या गुणांपैकी एक जरी गुण पाहिला असता, तर तेवढ्यावरूनच ते ध्वज उभारून मिरवले असते. भन्ते, हे आश्चर्यकारक आहे! भन्ते, हे अद्भुत आहे! तथागतांची ही अल्पेच्छता, संतुष्टता आणि संलेखता! कारण तथागत इतके महाऋद्धिवान आणि महानुभाव असूनही स्वतःचे प्रदर्शन करत नाहीत!'" ‘‘ปสฺส โข ตฺวํ, อุทายิ, ‘ตถาคตสฺส อปฺปิจฺฉตา สนฺตุฏฺฐิตา สลฺเลขตา. ยตฺร หิ นาม ตถาคโต เอวํมหิทฺธิโก เอวํมหานุภาโว, อถ จ ปน เนวตฺตานํ ปาตุกริสฺสติ’! เอกเมกญฺเจปิ อิโต, อุทายิ, ธมฺมํ อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา อตฺตนิ สมนุปสฺเสยฺยุํ, เต ตาวตเกเนว ปฏากํ [Pg.96] ปริหเรยฺยุํ. ปสฺส โข ตฺวํ, อุทายิ, ‘ตถาคตสฺส อปฺปิจฺฉตา สนฺตุฏฺฐิตา สลฺเลขตา. ยตฺร หิ นาม ตถาคโต เอวํมหิทฺธิโก เอวํมหานุภาโว, อถ จ ปน เนวตฺตานํ ปาตุกริสฺสตี’’’ติ! "'उदायी, तथागतांची ही अल्पेच्छता, संतुष्टता आणि संलेखता तू स्वतःच पाहा! तथागत इतके महाऋद्धिवान आणि महानुभाव असूनही स्वतःचे प्रदर्शन करत नाहीत!' उदायी, जर इतर पंथांच्या परिव्राजकांनी स्वतःमध्ये या गुणांपैकी एक जरी गुण पाहिला असता, तर तेवढ्यावरूनच ते ध्वज उभारून मिरवले असते. 'उदायी, तथागतांची ही अल्पेच्छता, संतुष्टता आणि संलेखता तू स्वतःच पाहा! तथागत इतके महाऋद्धिवान आणि महानुभाव असूनही स्वतःचे प्रदर्शन करत नाहीत!'" ๑๖๓. อถ โข ภควา อายสฺมนฺตํ สาริปุตฺตํ อามนฺเตสิ – ‘‘ตสฺมา ติห ตฺวํ, สาริปุตฺต, อิมํ ธมฺมปริยายํ อภิกฺขณํ ภาเสยฺยาสิ ภิกฺขูนํ ภิกฺขุนีนํ อุปาสกานํ อุปาสิกานํ. เยสมฺปิ หิ, สาริปุตฺต, โมฆปุริสานํ ภวิสฺสติ ตถาคเต กงฺขา วา วิมติ วา, เตสมิมํ ธมฺมปริยายํ สุตฺวา ตถาคเต กงฺขา วา วิมติ วา, สา ปหียิสฺสตี’’ติ. อิติ หิทํ อายสฺมา สาริปุตฺโต ภควโต สมฺมุขา สมฺปสาทํ ปเวเทสิ. ตสฺมา อิมสฺส เวยฺยากรณสฺส สมฺปสาทนียํ ตฺเวว อธิวจนนฺติ. १६३. "त्यानंतर भगवंतांनी आयुष्यमान सारिपुत्तांना संबोधित केले—'त्यामुळे, सारिपुत्त, तू हा धर्मपर्याय भिक्खू, भिक्खुनी, उपासक आणि उपासिकांना वारंवार सांगावास. सारिपुत्त, ज्या मोघपुरुषांच्या मनात तथागतांबद्दल शंका किंवा संभ्रम असेल, त्यांना हा धर्मपर्याय ऐकल्यानंतर तथागतांबद्दलची ती शंका किंवा संभ्रम नष्ट होईल.' अशा प्रकारे आयुष्यमान सारिपुत्तांनी भगवंतांच्या प्रत्यक्ष प्रसन्नता प्रकट केली. म्हणूनच या व्याकरणाला 'सम्पसादनिय' असे नाव मिळाले आहे." สมฺปสาทนียสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ ปญฺจมํ. "पाचवे सम्पसादनिय सुत्त समाप्त झाले." ๖. ปาสาทิกสุตฺตํ ६. "पासादिक सुत्त" ๑๖๔. เอวํ [Pg.97] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สกฺเกสุ วิหรติ เวธญฺญา นาม สกฺยา, เตสํ อมฺพวเน ปาสาเท. १६४. "मी असे ऐकले आहे—एकदा भगवंत शाक्य देशात, वेधञ्ञ नावाच्या शाक्यांच्या आंब्याच्या बागेतील प्रासादात राहत होते." นิคณฺฐนาฏปุตฺตกาลงฺกิริยา "निगण्ठ नाठपुत्ताचा मृत्यू" เตน โข ปน สมเยน นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต ปาวายํ อธุนากาลงฺกโต โหติ. ตสฺส กาลงฺกิริยาย ภินฺนา นิคณฺฐา ทฺเวธิกชาตา ภณฺฑนชาตา กลหชาตา วิวาทาปนฺนา อญฺญมญฺญํ มุขสตฺตีหิ วิตุทนฺตา วิหรนฺติ – ‘‘น ตฺวํ อิมํ ธมฺมวินยํ อาชานาสิ, อหํ อิมํ ธมฺมวินยํ อาชานามิ, กึ ตฺวํ อิมํ ธมฺมวินยํ อาชานิสฺสสิ? มิจฺฉาปฏิปนฺโน ตฺวมสิ, อหมสฺมิ สมฺมาปฏิปนฺโน. สหิตํ เม, อสหิตํ เต. ปุเรวจนียํ ปจฺฉา อวจ, ปจฺฉาวจนียํ ปุเร อวจ. อธิจิณฺณํ เต วิปราวตฺตํ, อาโรปิโต เต วาโท, นิคฺคหิโต ตฺวมสิ, จร วาทปฺปโมกฺขาย, นิพฺเพเฐหิ วา สเจ ปโหสี’’ติ. วโธเยว โข มญฺเญ นิคณฺเฐสุ นาฏปุตฺติเยสุ วตฺตติ. เยปิ นิคณฺฐสฺส นาฏปุตฺตสฺส สาวกา คิหี โอทาตวสนา, เตปิ นิคณฺเฐสุ นาฏปุตฺติเยสุ นิพฺพินฺนรูปา วิรตฺตรูปา ปฏิวานรูปา, ยถา ตํ ทุรกฺขาเต ธมฺมวินเย ทุปฺปเวทิเต อนิยฺยานิเก อนุปสมสํวตฺตนิเก อสมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิเต ภินฺนถูเป อปฺปฏิสรเณ. "त्या वेळी निगण्ठ नाठपुत्त पावा येथे नुकताच मरण पावला होता. त्याच्या मृत्यूनंतर निगण्ठ दुभंगले होते, दोन गटांत विभागले गेले होते, भांडत होते, कलह करत होते, वाद घालत होते आणि एकमेकांवर शब्दांचे भाले फेकत होते—'तुला हा धम्म-विनय समजत नाही, मला हा धम्म-विनय समजतो. तुला हा धम्म-विनय काय समजणार? तू चुकीच्या मार्गाने चालणारा आहेस, मी योग्य मार्गाने चालणारा आहे. माझे बोलणे सुसंगत आहे, तुझे विसंगत आहे. जे आधी बोलायला हवे होते ते तू नंतर बोललास, आणि जे नंतर बोलायला हवे होते ते आधी बोललास. तुझा दीर्घकाळ अभ्यासलेला वाद उलटवला गेला आहे, तुझ्या वादातील दोष मी दाखवून दिला आहे, तू पराभूत झाला आहेस. जा, स्वतःच्या मताचे रक्षण कर, जर शक्य असेल तर यातून स्वतःची सुटका करून घे!' नाठपुत्ताचे शिष्य असणाऱ्या निगण्ठामध्ये जणू एकमेकांना मारण्याचीच प्रवृत्ती चालू होती. निगण्ठ नाठपुत्ताचे जे पांढरे वस्त्र परिधान करणारे गृहस्थ शिष्य होते, तेसुद्धा नाठपुत्ताच्या निगण्ठ शिष्यांबद्दल अत्यंत विरक्त, उदासीन आणि विन्मुख झाले होते; कारण त्यांचा धम्म-विनय वाईट रीतीने सांगितलेला, वाईट रीतीने प्रकट केलेला, संसारातून मुक्त न करणारा, क्लेशांच्या शमनास कारणीभूत न ठरणारा, सम्यक्संबुद्धांनी न सांगितलेला, भग्न स्तूप आणि आश्रय नसलेला असा होता." ๑๖๕. อถ โข จุนฺโท สมณุทฺเทโส ปาวายํ วสฺสํวุฏฺโฐ เยน สามคาโม, เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข จุนฺโท สมณุทฺเทโส อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตทโวจ – ‘‘นิคณฺโฐ, ภนฺเต, นาฏปุตฺโต ปาวายํ อธุนากาลงฺกโต. ตสฺส กาลงฺกิริยาย ภินฺนา นิคณฺฐา ทฺเวธิกชาตา…เป… ภินฺนถูเป อปฺปฏิสรเณ’’ติ. १६५. "त्यानंतर, पावा येथे वर्षावास पूर्ण करून चुन्द समणुद्देस जेथे सामागाम गाव होते आणि जेथे आयुष्यमान आनंद होते, तेथे आला. आल्यानंतर त्याने आयुष्यमान आनंदांना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चुन्द समणुद्देसाने आयुष्यमान आनंदांना असे म्हटले—'भन्ते, निगण्ठ नाठपुत्त पावा येथे नुकताच मरण पावला आहे. त्याच्या मृत्यूनंतर निगण्ठ दुभंगले आहेत, दोन गटांत विभागले गेले आहेत... (पूर्ववत)... भग्न स्तूप आणि आश्रय नसलेले झाले आहेत.'" เอวํ วุตฺเต, อายสฺมา อานนฺโท จุนฺทํ สมณุทฺเทสํ เอตทโวจ – ‘‘อตฺถิ โข อิทํ, อาวุโส จุนฺท, กถาปาภตํ ภควนฺตํ ทสฺสนาย. อายามาวุโส [Pg.98] จุนฺท, เยน ภควา เตนุปสงฺกมิสฺสาม; อุปสงฺกมิตฺวา เอตมตฺถํ ภควโต อาโรเจสฺสามา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข จุนฺโท สมณุทฺเทโส อายสฺมโต อานนฺทสฺส ปจฺจสฺโสสิ. "असे म्हटले असता, आयुष्यमान आनंदांनी चुन्द समणुद्देसाला म्हटले—'आवुसो चुन्द, भगवंतांच्या दर्शनासाठी आणि त्यांच्याशी चर्चा करण्यासाठी हा एक चांगला विषय आहे. चल आवुसो चुन्द, आपण भगवंतांकडे जाऊ या आणि भगवंतांना ही सर्व हकीकत सांगू या.' 'होय, भन्ते,' असे म्हणून चुन्द समणुद्देसाने आयुष्यमान आनंदांच्या बोलण्यास संमती दिली." อถ โข อายสฺมา จ อานนฺโท จุนฺโท จ สมณุทฺเทโส เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อยํ, ภนฺเต, จุนฺโท สมณุทฺเทโส เอวมาห, ‘นิคณฺโฐ, ภนฺเต, นาฏปุตฺโต ปาวายํ อธุนากาลงฺกโต, ตสฺส กาลงฺกิริยาย ภินฺนา นิคณฺฐา…เป… ภินฺนถูเป อปฺปฏิสรเณ’’’ติ. त्यानंतर आयुष्यमान आनंद आणि चुन्द समणुद्देस जेथे भगवान होते तेथे गेले; तिथे जाऊन भगवंतांना वंदन करून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसल्यावर आयुष्यमान आनंदांनी भगवंतांना असे म्हटले – “भन्ते, हा चुन्द समणुद्देस असे म्हणतो की, ‘भन्ते, नाटपुत्त निगण्ठ नुकतेच पावा येथे काळाच्या पडद्याआड गेले आहेत (मृत्यू पावले आहेत). त्यांच्या मृत्यूनंतर निगण्ठ आपापसात दुभंगले आहेत... पे... ते छिन्नभिन्न झाले असून निराधार झाले आहेत.’” อสมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิตธมฺมวินโย असम्यक्संबुद्धाने प्रवेदित केलेला धम्म-विनय ๑๖๖. ‘‘เอวํ เหตํ, จุนฺท, โหติ ทุรกฺขาเต ธมฺมวินเย ทุปฺปเวทิเต อนิยฺยานิเก อนุปสมสํวตฺตนิเก อสมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิเต. อิธ, จุนฺท, สตฺถา จ โหติ อสมฺมาสมฺพุทฺโธ, ธมฺโม จ ทุรกฺขาโต ทุปฺปเวทิโต อนิยฺยานิโก อนุปสมสํวตฺตนิโก อสมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิโต, สาวโก จ ตสฺมึ ธมฺเม น ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺโน วิหรติ น สามีจิปฺปฏิปนฺโน น อนุธมฺมจารี, โวกฺกมฺม จ ตมฺหา ธมฺมา วตฺตติ. โส เอวมสฺส วจนีโย – ‘ตสฺส เต, อาวุโส, ลาภา, ตสฺส เต สุลทฺธํ, สตฺถา จ เต อสมฺมาสมฺพุทฺโธ, ธมฺโม จ ทุรกฺขาโต ทุปฺปเวทิโต อนิยฺยานิโก อนุปสมสํวตฺตนิโก อสมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิโต. ตฺวญฺจ ตสฺมึ ธมฺเม น ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺโน วิหรสิ, น สามีจิปฺปฏิปนฺโน, น อนุธมฺมจารี, โวกฺกมฺม จ ตมฺหา ธมฺมา วตฺตสี’ติ. อิติ โข, จุนฺท, สตฺถาปิ ตตฺถ คารยฺโห, ธมฺโมปิ ตตฺถ คารยฺโห, สาวโก จ ตตฺถ เอวํ ปาสํโส. โย โข, จุนฺท, เอวรูปํ สาวกํ เอวํ วเทยฺย – ‘เอตายสฺมา ตถา ปฏิปชฺชตุ, ยถา เต สตฺถารา ธมฺโม เทสิโต ปญฺญตฺโต’ติ. โย จ สมาทเปติ, ยญฺจ สมาทเปติ, โย จ สมาทปิโต ตถตฺตาย ปฏิปชฺชติ. สพฺเพ เต พหุํ อปุญฺญํ ปสวนฺติ. ตํ กิสฺส เหตุ? เอวํ เหตํ, จุนฺท, โหติ ทุรกฺขาเต ธมฺมวินเย ทุปฺปเวทิเต อนิยฺยานิเก อนุปสมสํวตฺตนิเก อสมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิเต. १६६. “चुन्द, जो धम्म-विनय वाईट रीतीने उपदेशिला आहे, वाईट रीतीने प्रवेदित केला आहे, जो मुक्त करणारा नाही, जो क्लेशांच्या शमनास कारणीभूत ठरत नाही आणि जो असम्यक्संबुद्धाने प्रवेदित केला आहे, त्या धम्म-विनयात असेच घडते. चुन्द, येथे शास्ता असम्यक्संबुद्ध असतो, धम्म वाईट रीतीने उपदेशिला, वाईट रीतीने प्रवेदित केलेला, मुक्त न करणारा, क्लेशांच्या शमनास कारणीभूत न ठरणारा आणि असम्यक्संबुद्धाने प्रवेदित केलेला असतो; आणि श्रावक त्या धम्मामध्ये धम्मानुकूल आचरण करत नाही, योग्य आचरण करत नाही, धम्मानुसार चालत नाही, तर त्या धम्मापासून विन्मुख होऊन वागतो. त्याला असे म्हटले पाहिजे – ‘मित्रा, हा तुझा लाभ आहे, हे तुला सुदैवाने मिळाले आहे, कारण तुझा शास्ता असम्यक्संबुद्ध आहे आणि धम्म वाईट रीतीने उपदेशिला, वाईट रीतीने प्रवेदित केलेला, मुक्त न करणारा, क्लेशांच्या शमनास कारणीभूत न ठरणारा आणि असम्यक्संबुद्धाने प्रवेदित केलेला आहे. आणि तू त्या धम्मामध्ये धम्मानुकूल आचरण करत नाहीस, योग्य आचरण करत नाहीस, धम्मानुसार चालत नाहीस, तर त्या धम्मापासून विन्मुख होऊन वागत आहेस.’ अशा प्रकारे, चुन्द, तेथे शास्ता निंदनीय ठरतो, धम्मही निंदनीय ठरतो, परंतु श्रावक मात्र प्रशंसनीय ठरतो. चुन्द, जो कोणी अशा श्रावकाला असे म्हणेल – ‘आयुष्यमानाने तसेच आचरण करावे, जसा धम्म तुमच्या शास्त्याने उपदेशिला व प्रज्ञप्त केला आहे.’ आणि जो प्रवृत्त करतो, ज्याला प्रवृत्त केले जाते, आणि जो प्रवृत्त केल्यावर त्यानुसार आचरण करतो, ते सर्व जण पुष्कळ अपुण्य (पाप) गोळा करतात. त्याचे कारण काय? चुन्द, वाईट रीतीने उपदेशिलेल्या, वाईट रीतीने प्रवेदित केलेल्या, मुक्त न करणाऱ्या, क्लेशांच्या शमनास कारणीभूत न ठरणाऱ्या आणि असम्यक्संबुद्धाने प्रवेदित केलेल्या धम्म-विनयात असेच घडते।” ๑๖๗. ‘‘อิธ [Pg.99] ปน, จุนฺท, สตฺถา จ โหติ อสมฺมาสมฺพุทฺโธ, ธมฺโม จ ทุรกฺขาโต ทุปฺปเวทิโต อนิยฺยานิโก อนุปสมสํวตฺตนิโก อสมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิโต, สาวโก จ ตสฺมึ ธมฺเม ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺโน วิหรติ สามีจิปฺปฏิปนฺโน อนุธมฺมจารี, สมาทาย ตํ ธมฺมํ วตฺตติ. โส เอวมสฺส วจนีโย – ‘ตสฺส เต, อาวุโส, อลาภา, ตสฺส เต ทุลฺลทฺธํ, สตฺถา จ เต อสมฺมาสมฺพุทฺโธ, ธมฺโม จ ทุรกฺขาโต ทุปฺปเวทิโต อนิยฺยานิโก อนุปสมสํวตฺตนิโก อสมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิโต. ตฺวญฺจ ตสฺมึ ธมฺเม ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺโน วิหรสิ สามีจิปฺปฏิปนฺโน อนุธมฺมจารี, สมาทาย ตํ ธมฺมํ วตฺตสี’ติ. อิติ โข, จุนฺท, สตฺถาปิ ตตฺถ คารยฺโห, ธมฺโมปิ ตตฺถ คารยฺโห, สาวโกปิ ตตฺถ เอวํ คารยฺโห. โย โข, จุนฺท, เอวรูปํ สาวกํ เอวํ วเทยฺย – ‘อทฺธายสฺมา ญายปฺปฏิปนฺโน ญายมาราเธสฺสตี’ติ. โย จ ปสํสติ, ยญฺจ ปสํสติ, โย จ ปสํสิโต ภิยฺโยโส มตฺตาย วีริยํ อารภติ. สพฺเพ เต พหุํ อปุญฺญํ ปสวนฺติ. ตํ กิสฺส เหตุ? เอวญฺเหตํ, จุนฺท, โหติ ทุรกฺขาเต ธมฺมวินเย ทุปฺปเวทิเต อนิยฺยานิเก อนุปสมสํวตฺตนิเก อสมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิเต. १६७. “परंतु चुन्द, येथे जर शास्ता असम्यक्संबुद्ध असेल, धम्म वाईट रीतीने उपदेशिला, वाईट रीतीने प्रवेदित केलेला, मुक्त न करणारा, क्लेशांच्या शमनास कारणीभूत न ठरणारा आणि असम्यक्संबुद्धाने प्रवेदित केलेला असेल; आणि श्रावक त्या धम्मामध्ये धम्मानुकूल आचरण करत असेल, योग्य आचरण करत असेल, धम्मानुसार चालत असेल, तो धम्म स्वीकारून त्यानुसार वागत असेल. तर त्याला असे म्हटले पाहिजे – ‘मित्रा, हा तुझा अलाभ आहे, हे तुला दुर्दैवाने मिळाले आहे, कारण तुझा शास्ता असम्यक्संबुद्ध आहे आणि धम्म वाईट रीतीने उपदेशिला, वाईट रीतीने प्रवेदित केलेला, मुक्त न करणारा, क्लेशांच्या शमनास कारणीभूत न ठरणारा आणि असम्यक्संबुद्धाने प्रवेदित केलेला आहे. आणि तू त्या धम्मामध्ये धम्मानुकूल आचरण करत आहेस, योग्य आचरण करत आहेस, धम्मानुसार चालत आहेस, तो धम्म स्वीकारून त्यानुसार वागत आहेस.’ अशा प्रकारे, चुन्द, तेथे शास्ता निंदनीय ठरतो, धम्मही निंदनीय ठरतो आणि श्रावकही तेथे निंदनीयच ठरतो. चुन्द, जो कोणी अशा श्रावकाला असे म्हणेल – ‘नक्कीच आयुष्यमान योग्य मार्गावर चालत असून तो ध्येय साध्य करेल.’ आणि जो प्रशंसा करतो, ज्याची प्रशंसा केली जाते, आणि ज्याची प्रशंसा केल्यावर जो अधिक जोमाने वीर्य (प्रयत्न) आरंभितो, ते सर्व जण पुष्कळ अपुण्य (पाप) गोळा करतात. त्याचे कारण काय? चुन्द, वाईट रीतीने उपदेशिलेल्या, वाईट रीतीने प्रवेदित केलेल्या, मुक्त न करणाऱ्या, क्लेशांच्या शमनास कारणीभूत न ठरणाऱ्या आणि असम्यक्संबुद्धाने प्रवेदित केलेल्या धम्म-विनयात असेच घडते।” สมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิตธมฺมวินโย सम्यक्संबुद्धाने प्रवेदित केलेला धम्म-विनय ๑๖๘. ‘‘อิธ ปน, จุนฺท, สตฺถา จ โหติ สมฺมาสมฺพุทฺโธ, ธมฺโม จ สฺวากฺขาโต สุปฺปเวทิโต นิยฺยานิโก อุปสมสํวตฺตนิโก สมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิโต, สาวโก จ ตสฺมึ ธมฺเม น ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺโน วิหรติ, น สามีจิปฺปฏิปนฺโน, น อนุธมฺมจารี, โวกฺกมฺม จ ตมฺหา ธมฺมา วตฺตติ. โส เอวมสฺส วจนีโย – ‘ตสฺส เต, อาวุโส, อลาภา, ตสฺส เต ทุลฺลทฺธํ, สตฺถา จ เต สมฺมาสมฺพุทฺโธ, ธมฺโม จ สฺวากฺขาโต สุปฺปเวทิโต นิยฺยานิโก อุปสมสํวตฺตนิโก สมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิโต. ตฺวญฺจ ตสฺมึ ธมฺเม น ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺโน วิหรสิ, น สามีจิปฺปฏิปนฺโน, น อนุธมฺมจารี, โวกฺกมฺม จ ตมฺหา ธมฺมา วตฺตสี’ติ. อิติ โข, จุนฺท, สตฺถาปิ ตตฺถ ปาสํโส, ธมฺโมปิ ตตฺถ ปาสํโส, สาวโก จ ตตฺถ เอวํ คารยฺโห. โย โข, จุนฺท, เอวรูปํ สาวกํ เอวํ วเทยฺย – ‘เอตายสฺมา ตถา ปฏิปชฺชตุ ยถา เต สตฺถารา ธมฺโม เทสิโต ปญฺญตฺโต’ติ. โย จ สมาทเปติ, ยญฺจ สมาทเปติ, โย จ สมาทปิโต ตถตฺตาย ปฏิปชฺชติ. สพฺเพ เต พหุํ ปุญฺญํ ปสวนฺติ. ตํ กิสฺส เหตุ? เอวญฺเหตํ[Pg.100], จุนฺท, โหติ สฺวากฺขาเต ธมฺมวินเย สุปฺปเวทิเต นิยฺยานิเก อุปสมสํวตฺตนิเก สมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิเต. १६८. “परंतु चुन्द, येथे जर शास्ता सम्यक्संबुद्ध असेल, धम्म सुविख्यात (उत्कृष्ट रीतीने उपदेशिला), चांगल्या प्रकारे प्रवेदित केलेला, मुक्त करणारा, क्लेशांच्या शमनास कारणीभूत ठरणारा आणि सम्यक्संबुद्धाने प्रवेदित केलेला असेल; आणि श्रावक त्या धम्मामध्ये धम्मानुकूल आचरण करत नसेल, योग्य आचरण करत नसेल, धम्मानुसार चालत नसेल, तर त्या धम्मापासून विन्मुख होऊन वागत असेल. तर त्याला असे म्हटले पाहिजे – ‘मित्रा, हा तुझा अलाभ आहे, हे तुला दुर्दैवाने मिळाले आहे, कारण तुझा शास्ता सम्यक्संबुद्ध आहे आणि धम्म सुविख्यात, चांगल्या प्रकारे प्रवेदित केलेला, मुक्त करणारा, क्लेशांच्या शमनास कारणीभूत ठरणारा आणि सम्यक्संबुद्धाने प्रवेदित केलेला आहे. आणि तू त्या धम्मामध्ये धम्मानुकूल आचरण करत नाहीस, योग्य आचरण करत नाहीस, धम्मानुसार चालत नाहीस, तर त्या धम्मापासून विन्मुख होऊन वागत आहेस.’ अशा प्रकारे, चुन्द, तेथे शास्ता प्रशंसनीय ठरतो, धम्मही प्रशंसनीय ठरतो, परंतु श्रावक मात्र तेथे निंदनीय ठरतो. चुन्द, जो कोणी अशा श्रावकाला असे म्हणेल – ‘आयुष्यमानाने तसेच आचरण करावे, जसा धम्म तुमच्या शास्त्याने उपदेशिला व प्रज्ञप्त केला आहे.’ आणि जो प्रवृत्त करतो, ज्याला प्रवृत्त केले जाते, आणि जो प्रवृत्त केल्यावर त्यानुसार आचरण करतो, ते सर्व जण पुष्कळ पुण्य गोळा करतात. त्याचे कारण काय? चुन्द, चांगल्या रीतीने उपदेशिलेल्या, चांगल्या रीतीने प्रवेदित केलेल्या, मुक्त करणाऱ्या, क्लेशांच्या शमनास कारणीभूत ठरणाऱ्या आणि सम्यक्संबुद्धाने प्रवेदित केलेल्या धम्म-विनयात असेच घडते।” ๑๖๙. ‘‘อิธ ปน, จุนฺท, สตฺถา จ โหติ สมฺมาสมฺพุทฺโธ, ธมฺโม จ สฺวากฺขาโต สุปฺปเวทิโต นิยฺยานิโก อุปสมสํวตฺตนิโก สมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิโต, สาวโก จ ตสฺมึ ธมฺเม ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺโน วิหรติ สามีจิปฺปฏิปนฺโน อนุธมฺมจารี, สมาทาย ตํ ธมฺมํ วตฺตติ. โส เอวมสฺส วจนีโย – ‘ตสฺส เต, อาวุโส, ลาภา, ตสฺส เต สุลทฺธํ, สตฺถา จ เต สมฺมาสมฺพุทฺโธ, ธมฺโม จ สฺวากฺขาโต สุปฺปเวทิโต นิยฺยานิโก อุปสมสํวตฺตนิโก สมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิโต. ตฺวญฺจ ตสฺมึ ธมฺเม ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺโน วิหรสิ สามีจิปฺปฏิปนฺโน อนุธมฺมจารี, สมาทาย ตํ ธมฺมํ วตฺตสี’ติ. อิติ โข, จุนฺท, สตฺถาปิ ตตฺถ ปาสํโส, ธมฺโมปิ ตตฺถ ปาสํโส, สาวโกปิ ตตฺถ เอวํ ปาสํโส. โย โข, จุนฺท, เอวรูปํ สาวกํ เอวํ วเทยฺย – ‘อทฺธายสฺมา ญายปฺปฏิปนฺโน ญายมาราเธสฺสตี’ติ. โย จ ปสํสติ, ยญฺจ ปสํสติ, โย จ ปสํสิโต ภิยฺโยโส มตฺตาย วีริยํ อารภติ. สพฺเพ เต พหุํ ปุญฺญํ ปสวนฺติ. ตํ กิสฺส เหตุ? เอวญฺเหตํ, จุนฺท, โหติ สฺวากฺขาเต ธมฺมวินเย สุปฺปเวทิเต นิยฺยานิเก อุปสมสํวตฺตนิเก สมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิเต. १६९. परंतु चुन्द, या जगात जेव्हा शास्ता सम्यक्संबुद्ध असतात, आणि धम्म सुविख्यात, सुप्रवेदित, निय्यानिक (संसारदुःखातून मुक्त करणारा), उपसमसंवर्तनिक (क्लेश शांत करणारा) आणि सम्यक्संबुद्धांद्वारे प्रवेदित केलेला असतो; आणि श्रावक त्या धम्मामध्ये धम्मानुधम्मप्रतिपन्न (धम्माला अनुसरून आचरण करणारा), सामीचीप्रतिपन्न (योग्य आचरण करणारा) आणि अनुधम्मचारी होऊन विहरतो, त्या धम्माचे ग्रहण करून त्यानुसार वर्तन करतो. त्या श्रावकाला असे म्हटले पाहिजे – 'हे आवुसो, हा तुझा लाभ आहे, हे तुला सुलब्ध मिळाले आहे, कारण तुझे शास्ता सम्यक्संबुद्ध आहेत, आणि धम्म सुविख्यात, सुप्रवेदित, निय्यानिक, उपसमसंवर्तनिक व सम्यक्संबुद्धांद्वारे प्रवेदित केलेला आहे. आणि तू देखील त्या धम्मामध्ये धम्मानुधम्मप्रतिपन्न, सामीचीप्रतिपन्न व अनुधम्मचारी होऊन विहरत आहेस, त्या धम्माचे ग्रहण करून त्यानुसार वर्तन करत आहेस.' अशा प्रकारे, चुन्द, तेथे शास्ता देखील प्रशंसनीय ठरतात, धम्म देखील प्रशंसनीय ठरतो आणि श्रावक देखील अशा प्रकारे प्रशंसनीय ठरतो. चुन्द, जो कोणी अशा प्रकारच्या श्रावकाला असे म्हणेल – 'निश्चयच हे आयुष्यमान योग्य मार्गाचे आचरण करणारे आहेत, ते योग्य मार्गाची प्राप्ती करतील.' जो प्रशंसा करतो, ज्याची प्रशंसा केली जाते, आणि जो प्रशंसित होऊन अधिक प्रमाणात वीर्य (प्रयत्न) आरंभितो; हे सर्व जण विपुल पुण्याची प्राप्ती करतात. त्याचे कारण काय? चुन्द, सुविख्यात, सुप्रवेदित, निय्यानिक, उपसमसंवर्तनिक आणि सम्यक्संबुद्धांद्वारे प्रवेदित केलेल्या धम्म-विनयामध्ये असेच पुण्यवर्धन होते. สาวกานุตปฺปสตฺถุ श्रावकांना अनुताप देणारे शास्ता ๑๗๐. ‘‘อิธ ปน, จุนฺท, สตฺถา จ โลเก อุทปาทิ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ, ธมฺโม จ สฺวากฺขาโต สุปฺปเวทิโต นิยฺยานิโก อุปสมสํวตฺตนิโก สมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิโต, อวิญฺญาปิตตฺถา จสฺส โหนฺติ สาวกา สทฺธมฺเม, น จ เตสํ เกวลํ ปริปูรํ พฺรหฺมจริยํ อาวิกตํ โหติ อุตฺตานีกตํ สพฺพสงฺคาหปทกตํ สปฺปาฏิหีรกตํ ยาว เทวมนุสฺเสหิ สุปฺปกาสิตํ. อถ เนสํ สตฺถุโน อนฺตรธานํ โหติ. เอวรูโป โข, จุนฺท, สตฺถา สาวกานํ กาลงฺกโต อนุตปฺโป โหติ. ตํ กิสฺส เหตุ? สตฺถา จ โน โลเก อุทปาทิ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ, ธมฺโม จ สฺวากฺขาโต สุปฺปเวทิโต นิยฺยานิโก อุปสมสํวตฺตนิโก สมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิโต, อวิญฺญาปิตตฺถา จมฺห สทฺธมฺเม, น จ โน เกวลํ ปริปูรํ พฺรหฺมจริยํ อาวิกตํ โหติ [Pg.101] อุตฺตานีกตํ สพฺพสงฺคาหปทกตํ สปฺปาฏิหีรกตํ ยาว เทวมนุสฺเสหิ สุปฺปกาสิตํ. อถ โน สตฺถุโน อนฺตรธานํ โหตีติ. เอวรูโป โข, จุนฺท, สตฺถา สาวกานํ กาลงฺกโต อนุตปฺโป โหติ. १७०. परंतु चुन्द, या जगात जेव्हा अर्हत, सम्यक्संबुद्ध शास्ता जन्माला येतात, आणि धम्म सुविख्यात, सुप्रवेदित, निय्यानिक, उपसमसंवर्तनिक व सम्यक्संबुद्धांद्वारे प्रवेदित केलेला असतो; परंतु त्यांचे श्रावक सद्धम्मामध्ये अर्थाला पूर्णपणे जाणू शकलेले नसतात, आणि त्यांच्यासाठी संपूर्ण परिपूर्ण असे ब्रह्मचर्य प्रगट केलेले नसते, स्पष्ट केलेले नसते, सर्वसंग्राहक पदांनी युक्त केलेले नसते, प्रातिहार्ययुक्त केलेले नसते आणि देव-मनुष्यांपर्यंत चांगल्या प्रकारे प्रकाशित केलेले नसते. त्यानंतर त्यांच्या शास्त्यांचे अंतर्धान होते. चुन्द, अशा प्रकारचे शास्ता काळाच्या पडद्याआड गेल्यास श्रावकांसाठी अनुतापाचे (पश्चात्तापाचे) कारण ठरतात. त्याचे कारण काय? 'आमच्यासाठी जगात अर्हत, सम्यक्संबुद्ध शास्ता जन्माला आले होते, धम्म सुविख्यात, सुप्रवेदित, निय्यानिक, उपसमसंवर्तनिक व सम्यक्संबुद्धांद्वारे प्रवेदित केलेला होता; परंतु आम्ही सद्धम्मामध्ये अर्थाला पूर्णपणे जाणू शकलो नाही, आणि आमच्यासाठी संपूर्ण परिपूर्ण असे ब्रह्मचर्य प्रगट केले गेले नव्हते, स्पष्ट केले गेले नव्हते, सर्वसंग्राहक पदांनी युक्त केले गेले नव्हते, प्रातिहार्ययुक्त केले गेले नव्हते आणि देव-मनुष्यांपर्यंत चांगल्या प्रकारे प्रकाशित केले गेले नव्हते. आणि आता आमच्या शास्त्यांचे अंतर्धान झाले आहे!' चुन्द, अशा प्रकारचे शास्ता काळाच्या पडद्याआड गेल्यास श्रावकांसाठी अनुतापाचे कारण ठरतात. สาวกานนุตปฺปสตฺถุ श्रावकांना अनुताप न देणारे शास्ता ๑๗๑. ‘‘อิธ ปน, จุนฺท, สตฺถา จ โลเก อุทปาทิ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ. ธมฺโม จ สฺวากฺขาโต สุปฺปเวทิโต นิยฺยานิโก อุปสมสํวตฺตนิโก สมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิโต. วิญฺญาปิตตฺถา จสฺส โหนฺติ สาวกา สทฺธมฺเม, เกวลญฺจ เตสํ ปริปูรํ พฺรหฺมจริยํ อาวิกตํ โหติ อุตฺตานีกตํ สพฺพสงฺคาหปทกตํ สปฺปาฏิหีรกตํ ยาว เทวมนุสฺเสหิ สุปฺปกาสิตํ. อถ เนสํ สตฺถุโน อนฺตรธานํ โหติ. เอวรูโป โข, จุนฺท, สตฺถา สาวกานํ กาลงฺกโต อนนุตปฺโป โหติ. ตํ กิสฺส เหตุ? สตฺถา จ โน โลเก อุทปาทิ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ. ธมฺโม จ สฺวากฺขาโต สุปฺปเวทิโต นิยฺยานิโก อุปสมสํวตฺตนิโก สมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิโต. วิญฺญาปิตตฺถา จมฺห สทฺธมฺเม, เกวลญฺจ โน ปริปูรํ พฺรหฺมจริยํ อาวิกตํ โหติ อุตฺตานีกตํ สพฺพสงฺคาหปทกตํ สปฺปาฏิหีรกตํ ยาว เทวมนุสฺเสหิ สุปฺปกาสิตํ. อถ โน สตฺถุโน อนฺตรธานํ โหตีติ. เอวรูโป โข, จุนฺท, สตฺถา สาวกานํ กาลงฺกโต อนนุตปฺโป โหติ. १७१. परंतु चुन्द, या जगात जेव्हा अर्हत, सम्यक्संबुद्ध शास्ता जन्माला येतात, आणि धम्म सुविख्यात, सुप्रवेदित, निय्यानिक, उपसमसंवर्तनिक व सम्यक्संबुद्धांद्वारे प्रवेदित केलेला असतो; आणि त्यांचे श्रावक सद्धम्मामध्ये अर्थाला पूर्णपणे जाणणारे असतात, आणि त्यांच्यासाठी संपूर्ण परिपूर्ण असे ब्रह्मचर्य प्रगट केलेले असते, स्पष्ट केलेले असते, सर्वसंग्राहक पदांनी युक्त केलेले असते, प्रातिहार्ययुक्त केलेले असते आणि देव-मनुष्यांपर्यंत चांगल्या प्रकारे प्रकाशित केलेले असते. त्यानंतर त्यांच्या शास्त्यांचे अंतर्धान होते. चुन्द, अशा प्रकारचे शास्ता काळाच्या पडद्याआड गेल्यास श्रावकांसाठी अनुताप न देणारे (पश्चात्ताप न घडवणारे) ठरतात. त्याचे कारण काय? 'आमच्यासाठी जगात अर्हत, सम्यक्संबुद्ध शास्ता जन्माला आले होते, धम्म सुविख्यात, सुप्रवेदित, निय्यानिक, उपसमसंवर्तनिक व सम्यक्संबुद्धांद्वारे प्रवेदित केलेला होता; आणि आम्ही सद्धम्मामध्ये अर्थाला पूर्णपणे जाणणारे झालो, आणि आमच्यासाठी संपूर्ण परिपूर्ण असे ब्रह्मचर्य प्रगट केले गेले होते, स्पष्ट केले गेले होते, सर्वसंग्राहक पदांनी युक्त केले गेले होते, प्रातिहार्ययुक्त केले गेले होते आणि देव-मनुष्यांपर्यंत चांगल्या प्रकारे प्रकाशित केले गेले होते. आणि आता आमच्या शास्त्यांचे अंतर्धान झाले आहे!' चुन्द, अशा प्रकारचे शास्ता काळाच्या पडद्याआड गेल्यास श्रावकांसाठी अनुताप न देणारे ठरतात. พฺรหฺมจริยอปริปูราทิกถา ब्रह्मचर्य अपूर्ण असणे इत्यादींविषयीची कथा ๑๗๒. ‘‘เอเตหิ เจปิ, จุนฺท, องฺเคหิ สมนฺนาคตํ พฺรหฺมจริยํ โหติ, โน จ โข สตฺถา โหติ เถโร รตฺตญฺญู จิรปพฺพชิโต อทฺธคโต วโยอนุปฺปตฺโต. เอวํ ตํ พฺรหฺมจริยํ อปริปูรํ โหติ เตนงฺเคน. १७२. चुन्द, जरी ब्रह्मचर्य या (वर सांगितलेल्या) अंगांनी युक्त असले, परंतु जर शास्ता स्थवीर, बहुश्रुत (दीर्घकालीन), चिरप्रव्रजित, वयोवृद्ध आणि अंतिम वयाला पोहोचलेले नसतील, तर ते ब्रह्मचर्य त्या अंगाच्या अभावामुळे अपूर्णच राहते. ‘‘ยโต จ โข, จุนฺท, เอเตหิ เจว องฺเคหิ สมนฺนาคตํ พฺรหฺมจริยํ โหติ, สตฺถา จ โหติ เถโร รตฺตญฺญู จิรปพฺพชิโต อทฺธคโต วโยอนุปฺปตฺโต. เอวํ ตํ พฺรหฺมจริยํ ปริปูรํ โหติ เตนงฺเคน. परंतु चुन्द, जेव्हा ब्रह्मचर्य या अंगांनी युक्त असते, आणि शास्ता देखील स्थवीर, बहुश्रुत, चिरप्रव्रजित, वयोवृद्ध आणि अंतिम वयाला पोहोचलेले असतात, तेव्हा ते ब्रह्मचर्य त्या अंगाच्या उपस्थितीमुळे परिपूर्ण होते. ๑๗๓. ‘‘เอเตหิ เจปิ, จุนฺท, องฺเคหิ สมนฺนาคตํ พฺรหฺมจริยํ โหติ, สตฺถา จ โหติ เถโร รตฺตญฺญู จิรปพฺพชิโต อทฺธคโต วโยอนุปฺปตฺโต, โน จ ขฺวสฺส เถรา ภิกฺขู สาวกา โหนฺติ วิยตฺตา วินีตา วิสารทา ปตฺตโยคกฺเขมา. อลํ สมกฺขาตุํ สทฺธมฺมสฺส, อลํ อุปฺปนฺนํ [Pg.102] ปรปฺปวาทํ สหธมฺเมหิ สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา สปฺปาฏิหาริยํ ธมฺมํ เทเสตุํ. เอวํ ตํ พฺรหฺมจริยํ อปริปูรํ โหติ เตนงฺเคน. १७३. चुन्द, जरी ब्रह्मचर्य या अंगांनी युक्त असले, आणि शास्ता देखील स्थवीर, बहुश्रुत, चिरप्रव्रजित, वयोवृद्ध आणि अंतिम वयाला पोहोचलेले असले, परंतु जर त्यांचे स्थवीर भिक्खू श्रावक हे विद्वान, विनीत, विशारद आणि योगक्षेम (अर्हतपद) प्राप्त केलेले नसतील; जे सद्धम्माचे योग्य प्रकारे व्याख्यान करण्यास समर्थ नसतील, आणि उद्भवलेल्या पर-मतांचे धम्मानुसार चांगल्या प्रकारे खंडन करून प्रातिहार्ययुक्त धम्माचा उपदेश करण्यास समर्थ नसतील, तर ते ब्रह्मचर्य त्या अंगाच्या अभावामुळे अपूर्णच राहते. ‘‘ยโต จ โข, จุนฺท, เอเตหิ เจว องฺเคหิ สมนฺนาคตํ พฺรหฺมจริยํ โหติ, สตฺถา จ โหติ เถโร รตฺตญฺญู จิรปพฺพชิโต อทฺธคโต วโยอนุปฺปตฺโต, เถรา จสฺส ภิกฺขู สาวกา โหนฺติ วิยตฺตา วินีตา วิสารทา ปตฺตโยคกฺเขมา. อลํ สมกฺขาตุํ สทฺธมฺมสฺส, อลํ อุปฺปนฺนํ ปรปฺปวาทํ สหธมฺเมหิ สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา สปฺปาฏิหาริยํ ธมฺมํ เทเสตุํ. เอวํ ตํ พฺรหฺมจริยํ ปริปูรํ โหติ เตนงฺเคน. परंतु चुन्द, जेव्हा ब्रह्मचर्य या अंगांनी युक्त असते, आणि शास्ता देखील स्थवीर, बहुश्रुत, चिरप्रव्रजित, वयोवृद्ध distraction आणि अंतिम वयाला पोहोचलेले असतात, आणि त्यांचे स्थवीर भिक्खू श्रावक देखील विद्वान, विनीत, विशारद आणि योगक्षेम प्राप्त केलेले असतात; जे सद्धम्माचे योग्य प्रकारे व्याख्यान करण्यास समर्थ असतात, आणि उद्भवलेल्या पर-मतांचे धम्मानुसार चांगल्या प्रकारे खंडन करून प्रातिहार्ययुक्त धम्माचा उपदेश करण्यास समर्थ असतात, तेव्हा ते ब्रह्मचर्य त्या अंगाच्या उपस्थितीमुळे परिपूर्ण होते. ๑๗๔. ‘‘เอเตหิ เจปิ, จุนฺท, องฺเคหิ สมนฺนาคตํ พฺรหฺมจริยํ โหติ, สตฺถา จ โหติ เถโร รตฺตญฺญู จิรปพฺพชิโต อทฺธคโต วโยอนุปฺปตฺโต, เถรา จสฺส ภิกฺขู สาวกา โหนฺติ วิยตฺตา วินีตา วิสารทา ปตฺตโยคกฺเขมา. อลํ สมกฺขาตุํ สทฺธมฺมสฺส, อลํ อุปฺปนฺนํ ปรปฺปวาทํ สหธมฺเมหิ สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา สปฺปาฏิหาริยํ ธมฺมํ เทเสตุํ. โน จ ขฺวสฺส มชฺฌิมา ภิกฺขู สาวกา โหนฺติ…เป… มชฺฌิมา จสฺส ภิกฺขู สาวกา โหนฺติ, โน จ ขฺวสฺส นวา ภิกฺขู สาวกา โหนฺติ…เป… นวา จสฺส ภิกฺขู สาวกา โหนฺติ, โน จ ขฺวสฺส เถรา ภิกฺขุนิโย สาวิกา โหนฺติ…เป… เถรา จสฺส ภิกฺขุนิโย สาวิกา โหนฺติ, โน จ ขฺวสฺส มชฺฌิมา ภิกฺขุนิโย สาวิกา โหนฺติ…เป… มชฺฌิมา จสฺส ภิกฺขุนิโย สาวิกา โหนฺติ, โน จ ขฺวสฺส นวา ภิกฺขุนิโย สาวิกา โหนฺติ…เป… นวา จสฺส ภิกฺขุนิโย สาวิกา โหนฺติ, โน จ ขฺวสฺส อุปาสกา สาวกา โหนฺติ คิหี โอทาตวสนา พฺรหฺมจาริโน…เป… อุปาสกา จสฺส สาวกา โหนฺติ คิหี โอทาตวสนา พฺรหฺมจาริโน, โน จ ขฺวสฺส อุปาสกา สาวกา โหนฺติ คิหี โอทาตวสนา กามโภคิโน…เป… อุปาสกา จสฺส สาวกา โหนฺติ คิหี โอทาตวสนา กามโภคิโน, โน จ ขฺวสฺส อุปาสิกา สาวิกา โหนฺติ คิหินิโย โอทาตวสนา พฺรหฺมจารินิโย…เป… อุปาสิกา จสฺส สาวิกา โหนฺติ คิหินิโย โอทาตวสนา พฺรหฺมจารินิโย, โน จ ขฺวสฺส อุปาสิกา สาวิกา โหนฺติ คิหินิโย โอทาตวสนา กามโภคินิโย…เป… อุปาสิกา จสฺส สาวิกา โหนฺติ คิหินิโย โอทาตวสนา กามโภคินิโย, โน จ ขฺวสฺส พฺรหฺมจริยํ โหติ อิทฺธญฺเจว ผีตญฺจ วิตฺถาริกํ พาหุชญฺญํ ปุถุภูตํ ยาว เทวมนุสฺเสหิ สุปฺปกาสิตํ…เป… พฺรหฺมจริยญฺจสฺส โหติ อิทฺธญฺเจว ผีตญฺจ วิตฺถาริกํ พาหุชญฺญํ ปุถุภูตํ ยาว [Pg.103] เทวมนุสฺเสหิ สุปฺปกาสิตํ, โน จ โข ลาภคฺคยสคฺคปฺปตฺตํ. เอวํ ตํ พฺรหฺมจริยํ อปริปูรํ โหติ เตนงฺเคน. १७४. “चुंदा, जर हे ब्रह्मचर्य या अंगांनी युक्त असेल, आणि शास्ता हे स्थवीर, दीर्घानुभवी, चिरप्रव्रजित, वयोवृद्ध आणि अंतिम वयाला पोहोचलेले असतील; आणि त्यांचे स्थवीर भिक्खू श्रावक हे कुशल, विनीत, विशारद आणि योगक्षेम प्राप्त केलेले असतील; जे सद्धम्माचे योग्य प्रकारे प्रतिपादन करण्यास समर्थ असतील, उद्भवलेल्या परप्रवादाचे धम्माच्या आधारे उत्तम प्रकारे खंडन करून प्रातिहार्ययुक्त धम्माचा उपदेश करण्यास समर्थ असतील; परंतु जर त्यांचे मध्यम भिक्खू श्रावक नसतील... किंवा मध्यम भिक्खू श्रावक असतील, पण नवशिके भिक्खू श्रावक नसतील... किंवा नवशिके भिक्खू श्रावक असतील, पण स्थवीर भिक्खुनी श्राविका नसतील... किंवा स्थवीर भिक्खुनी श्राविका असतील, पण मध्यम भिक्खुनी श्राविका नसतील... किंवा मध्यम भिक्खुनी श्राविका असतील, पण नवशिका भिक्खुनी श्राविका नसतील... किंवा नवशिका भिक्खुनी श्राविका असतील, पण पांढरे वस्त्र परिधान करणारे, ब्रह्मचारी गृहस्थ उपासक श्रावक नसतील... किंवा पांढरे वस्त्र परिधान करणारे, ब्रह्मचारी गृहस्थ उपासक श्रावक असतील, पण पांढरे वस्त्र परिधान करणारे, कामोपभोग घेणारे गृहस्थ उपासक श्रावक नसतील... किंवा पांढरे वस्त्र परिधान करणारे, कामोपभोग घेणारे गृहस्थ उपासक श्रावक असतील, पण पांढरे वस्त्र परिधान करणाऱ्या, ब्रह्मचारिणी गृहस्थ उपासिका श्राविका नसतील... किंवा पांढरे वस्त्र परिधान करणाऱ्या, ब्रह्मचारिणी गृहस्थ उपासिका श्राविका असतील, पण पांढरे वस्त्र परिधान करणाऱ्या, कामोपभोग घेणाऱ्या गृहस्थ उपासिका श्राविका नसतील... किंवा पांढरे वस्त्र परिधान करणाऱ्या, कामोपभोग घेणाऱ्या गृहस्थ उपासिका श्राविका असतील, परंतु हे ब्रह्मचर्य समृद्ध, स्फित, विस्तृत, बहुजनमान्य, विशाल आणि देव-मनुष्यांमध्ये चांगल्या प्रकारे प्रकाशित झालेले नसेल... किंवा हे ब्रह्मचर्य समृद्ध, स्फित, विस्तृत, बहुजनमान्य, विशाल आणि देव-मनुष्यांमध्ये चांगल्या प्रकारे प्रकाशित झालेले असेल, परंतु लाभ आणि यशाच्या शिखरावर पोहोचलेले नसेल; तर अशा प्रकारे ते ब्रह्मचर्य त्या अंगाच्या अभावामुळे अपूर्णच राहते.” ‘‘ยโต จ โข, จุนฺท, เอเตหิ เจว องฺเคหิ สมนฺนาคตํ พฺรหฺมจริยํ โหติ, สตฺถา จ โหติ เถโร รตฺตญฺญู จิรปพฺพชิโต อทฺธคโต วโยอนุปฺปตฺโต, เถรา จสฺส ภิกฺขู สาวกา โหนฺติ วิยตฺตา วินีตา วิสารทา ปตฺตโยคกฺเขมา. อลํ สมกฺขาตุํ สทฺธมฺมสฺส, อลํ อุปฺปนฺนํ ปรปฺปวาทํ สหธมฺเมหิ สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา สปฺปาฏิหาริยํ ธมฺมํ เทเสตุํ. มชฺฌิมา จสฺส ภิกฺขู สาวกา โหนฺติ…เป… นวา จสฺส ภิกฺขู สาวกา โหนฺติ…เป… เถรา จสฺส ภิกฺขุนิโย สาวิกา โหนฺติ…เป… มชฺฌิมา จสฺส ภิกฺขุนิโย สาวิกา โหนฺติ…เป… นวา จสฺส ภิกฺขุนิโย สาวิกา โหนฺติ…เป… อุปาสกา จสฺส สาวกา โหนฺติ…เป… คิหี โอทาตวสนา พฺรหฺมจาริโน. อุปาสกา จสฺส สาวกา โหนฺติ คิหี โอทาตวสนา กามโภคิโน…เป… อุปาสิกา จสฺส สาวิกา โหนฺติ คิหินิโย โอทาตวสนา พฺรหฺมจารินิโย…เป… อุปาสิกา จสฺส สาวิกา โหนฺติ คิหินิโย โอทาตวสนา กามโภคินิโย…เป… พฺรหฺมจริยญฺจสฺส โหติ อิทฺธญฺเจว ผีตญฺจ วิตฺถาริกํ พาหุชญฺญํ ปุถุภูตํ ยาว เทวมนุสฺเสหิ สุปฺปกาสิตํ, ลาภคฺคปฺปตฺตญฺจ ยสคฺคปฺปตฺตญฺจ. เอวํ ตํ พฺรหฺมจริยํ ปริปูรํ โหติ เตนงฺเคน. “परंतु जेव्हा, चुंदा, हे ब्रह्मचर्य या सर्व अंगांनी युक्त असते, आणि शास्ता हे स्थवीर, दीर्घानुभवी, चिरप्रव्रजित, वयोवृद्ध आणि अंतिम वयाला पोहोचलेले असतात; आणि त्यांचे स्थवीर भिक्खू श्रावक हे कुशल, विनीत, विशारद आणि योगक्षेम प्राप्त केलेले असतात; जे सद्धम्माचे योग्य प्रकारे प्रतिपादन करण्यास समर्थ असतात, उद्भवलेल्या परप्रवादाचे धम्माच्या आधारे उत्तम प्रकारे खंडन करून प्रातिहार्ययुक्त धम्माचा उपदेश करण्यास समर्थ असतात; आणि त्यांचे मध्यम भिक्खू श्रावक असतात... नवशिके भिक्खू श्रावक असतात... स्थवीर भिक्खुनी श्राविका असतात... मध्यम भिक्खुनी श्राविका असतात... नवशिका भिक्खुनी श्राविका असतात... पांढरे वस्त्र परिधान करणारे, ब्रह्मचारी गृहस्थ उपासक श्रावक असतात... पांढरे वस्त्र परिधान करणारे, कामोपभोग घेणारे गृहस्थ उपासक श्रावक असतात... पांढरे वस्त्र परिधान करणाऱ्या, ब्रह्मचारिणी गृहस्थ उपासिका श्राविका असतात... पांढरे वस्त्र परिधान करणाऱ्या, कामोपभोग घेणाऱ्या गृहस्थ उपासिका श्राविका असतात... आणि त्यांचे हे ब्रह्मचर्य समृद्ध, स्फित, विस्तृत, बहुजनमान्य, विशाल, देव-मनुष्यांमध्ये चांगल्या प्रकारे प्रकाशित झालेले असते, तसेच लाभ आणि यशाच्या शिखरावर पोहोचलेले असते; तेव्हा अशा प्रकारे ते ब्रह्मचर्य त्या अंगांनी परिपूर्ण होते.” ๑๗๕. ‘‘อหํ โข ปน, จุนฺท, เอตรหิ สตฺถา โลเก อุปฺปนฺโน อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ. ธมฺโม จ สฺวากฺขาโต สุปฺปเวทิโต นิยฺยานิโก อุปสมสํวตฺตนิโก สมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิโต. วิญฺญาปิตตฺถา จ เม สาวกา สทฺธมฺเม, เกวลญฺจ เตสํ ปริปูรํ พฺรหฺมจริยํ อาวิกตํ อุตฺตานีกตํ สพฺพสงฺคาหปทกตํ สปฺปาฏิหีรกตํ ยาว เทวมนุสฺเสหิ สุปฺปกาสิตํ. อหํ โข ปน, จุนฺท, เอตรหิ สตฺถา เถโร รตฺตญฺญู จิรปพฺพชิโต อทฺธคโต วโยอนุปฺปตฺโต. १७५. “परंतु, चुंदा, मी आता या जगात अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध शास्ता म्हणून उत्पन्न झालो आहे. धम्म हा सुविख्यात, सुस्पष्ट, मुक्तीदायक, शांती देणारा आणि सम्यक्सम्बुद्धांनी प्रवेदित केलेला आहे. माझे श्रावक सद्धम्मामध्ये निष्णात झाले आहेत, आणि त्यांच्यासाठी हे संपूर्ण, परिपूर्ण ब्रह्मचर्य प्रकट केले गेले आहे, सुस्पष्ट केले गेले आहे, सर्व संग्राहक पदांनी युक्त केले गेले आहे, प्रातिहार्ययुक्त केले गेले आहे आणि देव-मनुष्यांमध्ये चांगल्या प्रकारे प्रकाशित केले गेले आहे. शिवाय, चुंदा, मी आता शास्ता म्हणून स्थवीर, दीर्घानुभवी, चिरप्रव्रजित, वयोवृद्ध आणि अंतिम वयाला पोहोचलेला आहे.” ‘‘สนฺติ โข ปน เม, จุนฺท, เอตรหิ เถรา ภิกฺขู สาวกา โหนฺติ วิยตฺตา วินีตา วิสารทา ปตฺตโยคกฺเขมา. อลํ สมกฺขาตุํ สทฺธมฺมสฺส, อลํ อุปฺปนฺนํ ปรปฺปวาทํ สหธมฺเมหิ สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา สปฺปาฏิหาริยํ ธมฺมํ เทเสตุํ. สนฺติ โข ปน เม, จุนฺท, เอตรหิ มชฺฌิมา ภิกฺขู สาวกา…เป… สนฺติ โข ปน เม, จุนฺท, เอตรหิ นวา ภิกฺขู สาวกา…เป… สนฺติ โข ปน เม, จุนฺท, เอตรหิ เถรา ภิกฺขุนิโย สาวิกา…เป… สนฺติ โข [Pg.104] ปน เม, จุนฺท, เอตรหิ มชฺฌิมา ภิกฺขุนิโย สาวิกา…เป… สนฺติ โข ปน เม, จุนฺท, เอตรหิ นวา ภิกฺขุนิโย สาวิกา…เป… สนฺติ โข ปน เม, จุนฺท, เอตรหิ อุปาสกา สาวกา คิหี โอทาตวสนา พฺรหฺมจาริโน…เป… สนฺติ โข ปน เม, จุนฺท, เอตรหิ อุปาสกา สาวกา คิหี โอทาตวสนา กามโภคิโน…เป… สนฺติ โข ปน เม, จุนฺท, เอตรหิ อุปาสิกา สาวิกา คิหินิโย โอทาตวสนา พฺรหฺมจารินิโย…เป… สนฺติ โข ปน เม, จุนฺท, เอตรหิ อุปาสิกา สาวิกา คิหินิโย โอทาตวสนา กามโภคินิโย…เป… เอตรหิ โข ปน เม, จุนฺท, พฺรหฺมจริยํ อิทฺธญฺเจว ผีตญฺจ วิตฺถาริกํ พาหุชญฺญํ ปุถุภูตํ ยาว เทวมนุสฺเสหิ สุปฺปกาสิตํ. “आणि, चुंदा, माझ्याकडे आता असे स्थवीर भिक्खू श्रावक आहेत जे कुशल, विनीत, विशारद आणि योगक्षेम प्राप्त केलेले आहेत; जे सद्धम्माचे योग्य प्रकारे प्रतिपादन करण्यास समर्थ आहेत, उद्भवलेल्या परप्रवादाचे धम्माच्या आधारे उत्तम प्रकारे खंडन करून प्रातिहार्ययुक्त धम्माचा उपदेश करण्यास समर्थ आहेत. तसेच, चुंदा, माझ्याकडे आता मध्यम भिक्खू श्रावक आहेत... माझ्याकडे आता नवशिके भिक्खू श्रावक आहेत... माझ्याकडे आता स्थवीर भिक्खुनी श्राविका आहेत... माझ्याकडे आता मध्यम भिक्खुनी श्राविका आहेत... माझ्याकडे आता नवशिका भिक्खुनी श्राविका आहेत... माझ्याकडे आता पांढरे वस्त्र परिधान करणारे, ब्रह्मचारी गृहस्थ उपासक श्रावक आहेत... माझ्याकडे आता पांढरे वस्त्र परिधान करणारे, कामोपभोग घेणारे गृहस्थ उपासक श्रावक आहेत... माझ्याकडे आता पांढरे वस्त्र परिधान करणाऱ्या, ब्रह्मचारिणी गृहस्थ उपासिका श्राविका आहेत... माझ्याकडे आता पांढरे वस्त्र परिधान करणाऱ्या, कामोपभोग घेणाऱ्या गृहस्थ उपासिका श्राविका आहेत. आणि, चुंदा, माझे हे ब्रह्मचर्य आता समृद्ध, स्फित, विस्तृत, बहुजनमान्य, विशाल आणि देव-मनुष्यांमध्ये चांगल्या प्रकारे प्रकाशित झालेले आहे.” ๑๗๖. ‘‘ยาวตา โข, จุนฺท, เอตรหิ สตฺถาโร โลเก อุปฺปนฺนา, นาหํ, จุนฺท, อญฺญํ เอกสตฺถารมฺปิ สมนุปสฺสามิ เอวํลาภคฺคยสคฺคปฺปตฺตํ ยถริวาหํ. ยาวตา โข ปน, จุนฺท, เอตรหิ สงฺโฆ วา คโณ วา โลเก อุปฺปนฺโน; นาหํ, จุนฺท, อญฺญํ เอกํ สํฆมฺปิ สมนุปสฺสามิ เอวํลาภคฺคยสคฺคปฺปตฺตํ ยถริวายํ, จุนฺท, ภิกฺขุสงฺโฆ. ยํ โข ตํ, จุนฺท, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘สพฺพาการสมฺปนฺนํ สพฺพาการปริปูรํ อนูนมนธิกํ สฺวากฺขาตํ เกวลํ ปริปูรํ พฺรหฺมจริยํ สุปฺปกาสิต’นฺติ. อิทเมว ตํ สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘สพฺพาการสมฺปนฺนํ…เป… สุปฺปกาสิต’นฺติ. १७६. हे चुन्द, सध्या या जगात जेवढे शास्ते उत्पन्न झाले आहेत, त्या सर्वांमध्ये माझ्याइतकी लाभ आणि यशाची सर्वोच्च शिखरे गाठलेला दुसरा कोणताही एक शास्ता मला दिसत नाही. तसेच, हे चुन्द, सध्या या जगात जेवढे संघ किंवा गण उत्पन्न झाले आहेत, त्या सर्वांमध्ये माझ्या या भिक्खू संघासारखा लाभ आणि यशाची सर्वोच्च शिखरे गाठलेला दुसरा कोणताही एक संघ मला दिसत नाही. हे चुन्द, जर कोणी एखाद्या ब्रह्मचर्याचे यथायोग्य वर्णन करताना असे म्हणेल की— 'ते सर्व प्रकारे संपन्न, सर्व प्रकारे परिपूर्ण, उणे नसलेले, अधिक नसलेले, सुविख्यात आणि पूर्णपणे शुद्ध ब्रह्मचर्य चांगल्या प्रकारे प्रकाशित केले गेले आहे', तर ते केवळ याच ब्रह्मचर्याचे यथायोग्य वर्णन करत असेल. ‘‘อุทโก สุทํ, จุนฺท, รามปุตฺโต เอวํ วาจํ ภาสติ – ‘ปสฺสํ น ปสฺสตี’ติ. กิญฺจ ปสฺสํ น ปสฺสตีติ? ขุรสฺส สาธุนิสิตสฺส ตลมสฺส ปสฺสติ, ธารญฺจ ขฺวสฺส น ปสฺสติ. อิทํ วุจฺจติ – ‘ปสฺสํ น ปสฺสตี’ติ. ยํ โข ปเนตํ, จุนฺท, อุทเกน รามปุตฺเตน ภาสิตํ หีนํ คมฺมํ โปถุชฺชนิกํ อนริยํ อนตฺถสํหิตํ ขุรเมว สนฺธาย. ยญฺจ ตํ, จุนฺท, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘ปสฺสํ น ปสฺสตี’ติ, อิทเมว ตํ สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘ปสฺสํ น ปสฺสตี’ติ. กิญฺจ ปสฺสํ น ปสฺสตีติ? เอวํ สพฺพาการสมฺปนฺนํ สพฺพาการปริปูรํ อนูนมนธิกํ สฺวากฺขาตํ เกวลํ ปริปูรํ พฺรหฺมจริยํ สุปฺปกาสิตนฺติ, อิติ เหตํ ปสฺสติ. อิทเมตฺถ อปกฑฺเฒยฺย, เอวํ ตํ ปริสุทฺธตรํ อสฺสาติ, อิติ เหตํ น ปสฺสติ. อิทเมตฺถ อุปกฑฺเฒยฺย, เอวํ ตํ ปริปูรํ อสฺสาติ, อิติ [Pg.105] เหตํ น ปสฺสติ. อิทํ วุจฺจติ จุนฺท – ‘ปสฺสํ น ปสฺสตี’ติ. ยํ โข ตํ, จุนฺท, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘สพฺพาการสมฺปนฺนํ…เป… พฺรหฺมจริยํ สุปฺปกาสิต’นฺติ. อิทเมว ตํ สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘สพฺพาการสมฺปนฺนํ สพฺพาการปริปูรํ อนูนมนธิกํ สฺวากฺขาตํ เกวลํ ปริปูรํ พฺรหฺมจริยํ สุปฺปกาสิต’นฺติ. हे चुन्द, रामपुत्र उदक असे म्हणत असे की— 'पाहूनही पाहत नाही.' पण पाहूनही काय पाहत नाही? चांगल्या प्रकारे धार लावलेल्या वस्तऱ्याचे पाते तो पाहतो, पण त्याची धार मात्र तो पाहत नाही. यालाच 'पाहूनही पाहत नाही' असे म्हटले जाते. हे चुन्द, रामपुत्र उदकाने जे हे सांगितले आहे, ते हीन, ग्राम्य, सामान्य माणसांचे (पृथग्जनांचे), अनार्य आणि अनर्थकारक आहे, कारण ते केवळ वस्तऱ्याच्या संदर्भात आहे. परंतु, हे चुन्द, जर कोणी 'पाहूनही पाहत नाही' या वचनाचा यथायोग्य वापर करू इच्छित असेल, तर त्याने याच ब्रह्मचर्याच्या संदर्भात 'पाहूनही पाहत नाही' असे म्हटले पाहिजे. आणि पाहूनही काय पाहत नाही? अशा प्रकारे सर्व बाजूंनी संपन्न, सर्व बाजूंनी परिपूर्ण, उणे नसलेले, अधिक नसलेले, सुविख्यात आणि पूर्णपणे शुद्ध ब्रह्मचर्य चांगल्या प्रकारे प्रकाशित केले गेले आहे, हे तो पाहतो. 'यातून काहीतरी काढून टाकावे, जेणेकरून ते अधिक शुद्ध होईल' असे काढून टाकण्यासारखे काहीही त्याला यात दिसत नाही. 'यात काहीतरी मिळवावे, जेणेकरून ते अधिक परिपूर्ण होईल' असे मिळवण्यासारखे काहीही त्याला यात दिसत नाही. हे चुन्द, यालाच 'पाहूनही पाहत नाही' असे म्हटले जाते. म्हणून, हे चुन्द, जर कोणी यथायोग्य वर्णन करताना असे म्हणेल की— 'सर्व प्रकारे संपन्न...पे... ब्रह्मचर्य चांगल्या प्रकारे प्रकाशित केले गेले आहे', तर ते केवळ याच ब्रह्मचर्याचे यथायोग्य वर्णन करत असेल की— 'सर्व प्रकारे संपन्न, सर्व प्रकारे परिपूर्ण, उणे नसलेले, अधिक नसलेले, सुविख्यात, पूर्णपणे शुद्ध ब्रह्मचर्य चांगल्या प्रकारे प्रकाशित केले गेले आहे'. สงฺคายิตพฺพธมฺโม एकत्र संगायन करण्याचे धम्म ๑๗๗. ตสฺมาติห, จุนฺท, เย โว มยา ธมฺมา อภิญฺญา เทสิตา, ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคมฺม สมาคมฺม อตฺเถน อตฺถํ พฺยญฺชเนน พฺยญฺชนํ สงฺคายิตพฺพํ น วิวทิตพฺพํ, ยถยิทํ พฺรหฺมจริยํ อทฺธนิยํ อสฺส จิรฏฺฐิติกํ, ตทสฺส พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. กตเม จ เต, จุนฺท, ธมฺมา มยา อภิญฺญา เทสิตา, ยตฺถ สพฺเพเหว สงฺคมฺม สมาคมฺม อตฺเถน อตฺถํ พฺยญฺชเนน พฺยญฺชนํ สงฺคายิตพฺพํ น วิวทิตพฺพํ, ยถยิทํ พฺรหฺมจริยํ อทฺธนิยํ อสฺส จิรฏฺฐิติกํ, ตทสฺส พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ? เสยฺยถิทํ – จตฺตาโร สติปฏฺฐานา, จตฺตาโร สมฺมปฺปธานา, จตฺตาโร อิทฺธิปาทา, ปญฺจินฺทฺริยานิ, ปญฺจ พลานิ, สตฺต โพชฺฌงฺคา, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค. อิเม โข เต, จุนฺท, ธมฺมา มยา อภิญฺญา เทสิตา. ยตฺถ สพฺเพเหว สงฺคมฺม สมาคมฺม อตฺเถน อตฺถํ พฺยญฺชเนน พฺยญฺชนํ สงฺคายิตพฺพํ น วิวทิตพฺพํ, ยถยิทํ พฺรหฺมจริยํ อทฺธนิยํ อสฺส จิรฏฺฐิติกํ, ตทสฺส พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. १७७. म्हणूनच, हे चुन्द, जे धम्म मी तुम्हाला स्वतःच्या अभिज्ञेने उपदेशिले आहेत, त्या धम्मांच्या बाबतीत तुम्ही सर्वांनी एकत्र येऊन, संघटित होऊन, अर्थाशी अर्थ आणि व्यंजनाशी व्यंजन जुळवून संगायन केले पाहिजे, आपसात वाद घालू नये; जेणेकरून हे ब्रह्मचर्य दीर्घकाळ टिकणारे आणि चिरस्थायी होईल, आणि ते बहुजनहिताय, बहुजनसुखाय, जगावरील अनुकंपेसाठी, तसेच देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी व सुखासाठी ठरेल. आणि हे चुन्द, ते कोणते धम्म आहेत जे मी स्वतःच्या अभिज्ञेने उपदेशिले आहेत, जिथे सर्वांनी एकत्र येऊन, संघटित होऊन, अर्थाशी अर्थ आणि व्यंजनाशी व्यंजन जुळवून संगायन केले पाहिजे, वाद घालू नये, जेणेकरून हे ब्रह्मचर्य दीर्घकाळ टिकणारे व चिरस्थायी होईल, आणि ते बहुजनहिताय, बहुजनसुखाय, जगावरील अनुकंपेसाठी, तसेच देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी व सुखासाठी ठरेल? ते खालीलप्रमाणे आहेत— चार सतिपट्ठान, चार सम्मप्पधान, चार इद्धिपाद, पाच इंद्रिये, पाच बले, सात बोज्झंग आणि आर्य अष्टांगिक मार्ग. हेच ते धम्म आहेत, हे चुन्द, जे मी स्वतःच्या अभिज्ञेने उपदेशिले आहेत, जिथे सर्वांनी एकत्र येऊन, संघटित होऊन, अर्थाशी अर्थ आणि व्यंजनाशी व्यंजन जुळवून संगायन केले पाहिजे, वाद घालू नये, जेणेकरून हे ब्रह्मचर्य दीर्घकाळ टिकणारे व चिरस्थायी होईल, आणि ते बहुजनहिताय, बहुजनसुखाय, जगावरील अनुकंपेसाठी, तसेच देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी व सुखासाठी ठरेल. สญฺญาเปตพฺพวิธิ समजावून सांगण्याची पद्धत ๑๗๘. ‘‘เตสญฺจ โว, จุนฺท, สมคฺคานํ สมฺโมทมานานํ อวิวทมานานํ สิกฺขตํ อญฺญตโร สพฺรหฺมจารี สงฺเฆ ธมฺมํ ภาเสยฺย. ตตฺร เจ ตุมฺหากํ เอวมสฺส – ‘อยํ โข อายสฺมา อตฺถญฺเจว มิจฺฉา คณฺหาติ, พฺยญฺชนานิ จ มิจฺฉา โรเปตี’ติ. ตสฺส เนว อภินนฺทิตพฺพํ น ปฏิกฺโกสิตพฺพํ, อนภินนฺทิตฺวา อปฺปฏิกฺโกสิตฺวา โส เอวมสฺส วจนีโย – ‘อิมสฺส นุ โข, อาวุโส, อตฺถสฺส อิมานิ วา พฺยญฺชนานิ เอตานิ วา พฺยญฺชนานิ กตมานิ โอปายิกตรานิ, อิเมสญฺจ พฺยญฺชนานํ อยํ วา อตฺโถ เอโส วา อตฺโถ [Pg.106] กตโม โอปายิกตโร’ติ? โส เจ เอวํ วเทยฺย – ‘อิมสฺส โข, อาวุโส, อตฺถสฺส อิมาเนว พฺยญฺชนานิ โอปายิกตรานิ, ยา เจว เอตานิ; อิเมสญฺจ พฺยญฺชนานํ อยเมว อตฺโถ โอปายิกตโร, ยา เจว เอโส’ติ. โส เนว อุสฺสาเทตพฺโพ น อปสาเทตพฺโพ, อนุสฺสาเทตฺวา อนปสาเทตฺวา สฺเวว สาธุกํ สญฺญาเปตพฺโพ ตสฺส จ อตฺถสฺส เตสญฺจ พฺยญฺชนานํ นิสนฺติยา. १७८. हे चुन्द, जेव्हा तुम्ही सर्वजण एकोप्याने, आनंदाने आणि वाद न घालता धम्माचा अभ्यास करत असाल, तेव्हा जर एखादा सब्रह्मचारी संघामध्ये धम्म उपदेश करत असेल, आणि तिथे तुम्हाला असे वाटले की— 'हे आयुष्यमान अर्थही चुकीचा ग्रहण करत आहेत आणि व्यंजने देखील चुकीच्या पद्धतीने मांडत आहेत', तर त्यांच्या त्या बोलण्याचे अभिनंदनही करू नये आणि त्याचा निषेधही करू नये. अभिनंदन किंवा निषेध न करता, त्यांना असे म्हणावे— 'आवुसो, या अर्थासाठी ही व्यंजने अधिक योग्य आहेत की ती व्यंजने? कोणती व्यंजने अधिक योग्य वाटतात? आणि या व्यंजनांचा हा अर्थ अधिक योग्य आहे की तो अर्थ? कोणता अर्थ अधिक योग्य वाटतो?' जर त्यांनी असे उत्तर दिले की— 'आवुसो, या अर्थासाठी हीच व्यंजने अधिक योग्य आहेत, जी मी वापरली आहेत; आणि या व्यंजनांचा हाच अर्थ अधिक योग्य आहे, जो मी सांगितला आहे', तर त्यांना ना चढवून बोलावे ना त्यांचा अपमान करावा. चढवून न बोलता किंवा अपमान न करता, त्यांना तो अर्थ आणि ती व्यंजने नीट समजून घेण्यासाठी चांगल्या प्रकारे समजावून सांगावे. ๑๗๙. ‘‘อปโรปิ เจ, จุนฺท, สพฺรหฺมจารี สงฺเฆ ธมฺมํ ภาเสยฺย. ตตฺร เจ ตุมฺหากํ เอวมสฺส – ‘อยํ โข อายสฺมา อตฺถญฺหิ โข มิจฺฉา คณฺหาติ พฺยญฺชนานิ สมฺมา โรเปตี’ติ. ตสฺส เนว อภินนฺทิตพฺพํ น ปฏิกฺโกสิตพฺพํ, อนภินนฺทิตฺวา อปฺปฏิกฺโกสิตฺวา โส เอวมสฺส วจนีโย – ‘อิเมสํ นุ โข, อาวุโส, พฺยญฺชนานํ อยํ วา อตฺโถ เอโส วา อตฺโถ กตโม โอปายิกตโร’ติ? โส เจ เอวํ วเทยฺย – ‘อิเมสํ โข, อาวุโส, พฺยญฺชนานํ อยเมว อตฺโถ โอปายิกตโร, ยา เจว เอโส’ติ. โส เนว อุสฺสาเทตพฺโพ น อปสาเทตพฺโพ, อนุสฺสาเทตฺวา อนปสาเทตฺวา สฺเวว สาธุกํ สญฺญาเปตพฺโพ ตสฺเสว อตฺถสฺส นิสนฺติยา. १७९. तसेच, हे चुन्द, जर दुसरा एखादा सब्रह्मचारी संघामध्ये धम्म उपदेश करत असेल, आणि तिथे तुम्हाला असे वाटले की— 'हे आयुष्यमान अर्थ तर चुकीचा ग्रहण करत आहेत, पण व्यंजने मात्र योग्य प्रकारे मांडत आहेत', तर त्यांच्या त्या बोलण्याचे अभिनंदनही करू नये आणि त्याचा निषेधही करू नये. अभिनंदन किंवा निषेध न करता, त्यांना असे म्हणावे— 'आवुसो, या व्यंजनांचा हा अर्थ अधिक योग्य आहे की तो अर्थ? कोणता अर्थ अधिक योग्य वाटतो?' जर त्यांनी असे उत्तर दिले की— 'आवुसो, या व्यंजनांचा हाच अर्थ अधिक योग्य आहे, जो मी सांगितला आहे', तर त्यांना ना चढवून बोलावे ना त्यांचा अपमान करावा. चढवून न बोलता किंवा अपमान न करता, त्यांना तोच अर्थ नीट समजून घेण्यासाठी चांगल्या प्रकारे समजावून सांगावे. ๑๘๐. ‘‘อปโรปิ เจ, จุนฺท, สพฺรหฺมจารี สงฺเฆ ธมฺมํ ภาเสยฺย. ตตฺร เจ ตุมฺหากํ เอวมสฺส – ‘อยํ โข อายสฺมา อตฺถญฺหิ โข สมฺมา คณฺหาติ พฺยญฺชนานิ มิจฺฉา โรเปตี’ติ. ตสฺส เนว อภินนฺทิตพฺพํ น ปฏิกฺโกสิตพฺพํ; อนภินนฺทิตฺวา อปฺปฏิกฺโกสิตฺวา โส เอวมสฺส วจนีโย – ‘อิมสฺส นุ โข, อาวุโส, อตฺถสฺส อิมานิ วา พฺยญฺชนานิ เอตานิ วา พฺยญฺชนานิ กตมานิ โอปายิกตรานี’ติ? โส เจ เอวํ วเทยฺย – ‘อิมสฺส โข, อาวุโส, อตฺถสฺส อิมาเนว พฺยญฺชนานิ โอปยิกตรานิ, ยานิ เจว เอตานี’ติ. โส เนว อุสฺสาเทตพฺโพ น อปสาเทตพฺโพ; อนุสฺสาเทตฺวา อนปสาเทตฺวา สฺเวว สาธุกํ สญฺญาเปตพฺโพ เตสญฺเญว พฺยญฺชนานํ นิสนฺติยา. १८०. “हे चुन्द, जर दुसरा एखादा सब्रह्मचारी संघामध्ये धम्माचा उपदेश करत असेल, आणि तिथे तुम्हाला असे वाटले की— ‘हे आयुष्यमान अर्थ तर योग्य प्रकारे ग्रहण करत आहेत, परंतु व्यंजने (शब्दरचना) चुकीच्या पद्धतीने मांडत आहेत.’ तर त्यांच्या त्या भाषणाचे अभिनंदनही करू नये आणि त्याचा निषेधही करू नये. अभिनंदन न करता आणि निषेधही न करता, त्यांना असे विचारले पाहिजे— ‘हे आवुसो, या अर्थासाठी ही व्यंजने किंवा ती व्यंजने, यांपैकी कोणती अधिक योग्य आहेत?’ जर त्यांनी असे म्हटले की— ‘हे आवुसो, या अर्थासाठी हीच व्यंजने अधिक योग्य आहेत, जी ही आहेत.’ तर त्यांना फार चढवूनही बोलू नये आणि त्यांचा अपमानही करू नये. त्यांना न चढवता आणि त्यांचा अपमान न करता, त्या व्यंजनांच्या योग्य आकलनासाठी त्यांना चांगल्या प्रकारे समजावून सांगावे.” ๑๘๑. ‘‘อปโรปิ เจ, จุนฺท, สพฺรหฺมจารี สงฺเฆ ธมฺมํ ภาเสยฺย. ตตฺร เจ ตุมฺหากํ เอวมสฺส – ‘อยํ โข อายสฺมา อตฺถญฺเจว สมฺมา คณฺหาติ พฺยญฺชนานิ [Pg.107] จ สมฺมา โรเปตี’ติ. ตสฺส ‘สาธู’ติ ภาสิตํ อภินนฺทิตพฺพํ อนุโมทิตพฺพํ; ตสฺส ‘สาธู’ติ ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา โส เอวมสฺส วจนีโย – ‘ลาภา โน อาวุโส, สุลทฺธํ โน อาวุโส, เย มยํ อายสฺมนฺตํ ตาทิสํ สพฺรหฺมจารึ ปสฺสาม เอวํ อตฺถุเปตํ พฺยญฺชนุเปต’นฺติ. १८१. “हे चुन्द, जर दुसरा एखादा सब्रह्मचारी संघामध्ये धम्माचा उपदेश करत असेल, आणि तिथे तुम्हाला असे वाटले की— ‘हे आयुष्यमान अर्थही योग्य प्रकारे ग्रहण करत आहेत आणि व्यंजनेही योग्य प्रकारे मांडत आहेत.’ तर ‘साधू’ (उत्तम) म्हणून त्यांच्या भाषणाचे अभिनंदन केले पाहिजे आणि त्याचे अनुमोदन केले पाहिजे. त्यांच्या भाषणाचे अभिनंदन व अनुमोदन करून त्यांना असे म्हणावे— ‘हे आवुसो, हा आपला लाभ आहे, हे आपले परम भाग्य आहे की, आम्हाला आपल्यासारखे अर्थयुक्त आणि व्यंजनयुक्त सब्रह्मचारी आयुष्यमान पाहायला मिळत आहेत.’” ปจฺจยานุญฺญาตการณํ “चार प्रत्ययांच्या अनुमतीचे कारण” ๑๘๒. ‘‘น โว อหํ, จุนฺท, ทิฏฺฐธมฺมิกานํเยว อาสวานํ สํวราย ธมฺมํ เทเสมิ. น ปนาหํ, จุนฺท, สมฺปรายิกานํเยว อาสวานํ ปฏิฆาตาย ธมฺมํ เทเสมิ. ทิฏฺฐธมฺมิกานํ เจวาหํ, จุนฺท, อาสวานํ สํวราย ธมฺมํ เทเสมิ; สมฺปรายิกานญฺจ อาสวานํ ปฏิฆาตาย. ตสฺมาติห, จุนฺท, ยํ โว มยา จีวรํ อนุญฺญาตํ, อลํ โว ตํ – ยาวเทว สีตสฺส ปฏิฆาตาย, อุณฺหสฺส ปฏิฆาตาย, ฑํสมกสวาตาตปสรีสป สมฺผสฺสานํ ปฏิฆาตาย, ยาวเทว หิริโกปีนปฏิจฺฉาทนตฺถํ. โย โว มยา ปิณฺฑปาโต อนุญฺญาโต, อลํ โว โส ยาวเทว อิมสฺส กายสฺส ฐิติยา ยาปนาย วิหึสูปรติยา พฺรหฺมจริยานุคฺคหาย, อิติ ปุราณญฺจ เวทนํ ปฏิหงฺขามิ, นวญฺจ เวทนํ น อุปฺปาเทสฺสามิ, ยาตฺรา จ เม ภวิสฺสติ อนวชฺชตา จ ผาสุวิหาโร จ. ยํ โว มยา เสนาสนํ อนุญฺญาตํ, อลํ โว ตํ ยาวเทว สีตสฺส ปฏิฆาตาย, อุณฺหสฺส ปฏิฆาตาย, ฑํสมกสวาตาตปสรีสปสมฺผสฺสานํ ปฏิฆาตาย, ยาวเทว อุตุปริสฺสยวิโนทน ปฏิสลฺลานารามตฺถํ. โย โว มยา คิลานปจฺจยเภสชฺช ปริกฺขาโร อนุญฺญาโต, อลํ โว โส ยาวเทว อุปฺปนฺนานํ เวยฺยาพาธิกานํ เวทนานํ ปฏิฆาตาย อพฺยาปชฺชปรมตาย. १८२. “हे चुन्द, मी तुम्हाला केवळ याच जन्मातील (ऐहिक) आसवांच्या संवरासाठी धम्माचा उपदेश करत नाही. तसेच, हे चुन्द, मी केवळ परलोकातील आसवांच्या नाशासाठी धम्माचा उपदेश करत नाही. तर, हे चुन्द, मी याच जन्मातील आसवांच्या संवरासाठी आणि परलोकातील आसवांच्या नाशासाठी धम्माचा उपदेश करतो. म्हणून, हे चुन्द, मी तुम्हाला ज्या चीवराची अनुमती दिली आहे, ते तुम्हाला केवळ थंडीचे निवारण करण्यासाठी, उष्णतेचे निवारण करण्यासाठी, डास, माश्या, वारा, ऊन आणि सरपटणारे प्राणी यांच्या स्पर्शापासून स्वतःचे रक्षण करण्यासाठी आणि केवळ लज्जा झाकण्यासाठी पुरेसे आहे. मी तुम्हाला ज्या पिंडपाताची अनुमती दिली आहे, तो तुम्हाला केवळ या शरीराच्या स्थितीसाठी, यात्रेसाठी (जीवनयात्रा चालवण्यासाठी), भुकेची पीडा शांत करण्यासाठी आणि ब्रह्मचर्याच्या अनुग्रहासाठी पुरेसा आहे, जेणेकरून ‘मी जुन्या वेदनेचे निवारण करीन आणि नवीन वेदना उत्पन्न होऊ देणार नाही; माझी जीवनयात्रा सुरळीत चालेल, मी निर्दोष राहीन आणि सुखाने विहरेन.’ मी तुम्हाला ज्या सेनासनाची अनुमती दिली आहे, ते तुम्हाला केवळ थंडीचे निवारण करण्यासाठी, उष्णतेचे निवारण करण्यासाठी, डास, माश्या, वारा, ऊन आणि सरपटणारे प्राणी यांच्या स्पर्शापासून स्वतःचे रक्षण करण्यासाठी, ऋतूंच्या त्रासाचे निवारण करण्यासाठी आणि एकांतात ध्यान करण्यासाठी पुरेसे आहे. मी तुम्हाला ज्या ग्लानप्रत्यय-भैषज्य-परिकाराची (औषधोपचाराची) अनुमती दिली आहे, तो तुम्हाला केवळ उत्पन्न झालेल्या व्याधींच्या वेदनांचे निवारण करण्यासाठी आणि निरोगी राहण्यासाठी पुरेसा आहे.” สุขลฺลิกานุโยโค “सुखल्लिकाणुयोग (सुखोपभोगाची आसक्ती)” ๑๘๓. ‘‘ฐานํ โข ปเนตํ, จุนฺท, วิชฺชติ ยํ อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ วเทยฺยุํ – ‘สุขลฺลิกานุโยคมนุยุตฺตา สมณา สกฺยปุตฺติยา วิหรนฺตี’ติ. เอวํวาทิโน, จุนฺท, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวมสฺสุ วจนียา – ‘กตโม โส[Pg.108], อาวุโส, สุขลฺลิกานุโยโค? สุขลฺลิกานุโยคา หิ พหู อเนกวิหิตา นานปฺปการกา’ติ. १८३. “हे चुन्द, असे घडू शकते की, इतर पंथांचे परिव्राजक असे म्हणतील— ‘शाक्यपुत्रीय श्रमण सुखल्लिकाणुयोगात (सुखोपभोगाच्या आसक्तीत) मग्न राहून विहार करतात.’ हे चुन्द, असे बोलणाऱ्या इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे विचारले पाहिजे— ‘हे आवुसो, तो सुखल्लिकाणुयोग कोणता आहे? कारण सुखल्लिकाणुयोग अनेक प्रकारचे, विविध स्वरूपांचे आणि नानाविध पद्धतींचे असतात.’” ‘‘จตฺตาโรเม, จุนฺท, สุขลฺลิกานุโยคา หีนา คมฺมา โปถุชฺชนิกา อนริยา อนตฺถสํหิตา น นิพฺพิทาย น วิราคาย น นิโรธาย น อุปสมาย น อภิญฺญาย น สมฺโพธาย น นิพฺพานาย สํวตฺตนฺติ. กตเม จตฺตาโร? “हे चुन्द, हे चार सुखल्लिकाणुयोग आहेत जे हीन, ग्राम्य, पृथग्जनांचे, अनार्य आणि अहितकारक आहेत; जे निर्वेदासाठी (वैराग्यासाठी), विरागासाठी, निरोधासाठी, उपशमासाठी, अभिज्ञेसाठी, संबोधीसाठी आणि निर्वाणासाठी कारणीभूत ठरत नाहीत. ते चार कोणते आहेत?” ‘‘อิธ, จุนฺท, เอกจฺโจ พาโล ปาเณ วธิตฺวา วธิตฺวา อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ. อยํ ปฐโม สุขลฺลิกานุโยโค. “इथे, हे चुन्द, एखादा मूर्ख मनुष्य प्राण्यांची हत्या करून करून स्वतःला सुखी करतो, तृप्त करतो. हा पहिला सुखल्लिकाणुयोग होय.” ‘‘ปุน จปรํ, จุนฺท, อิเธกจฺโจ อทินฺนํ อาทิยิตฺวา อาทิยิตฺวา อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ. อยํ ทุติโย สุขลฺลิกานุโยโค. “पुन्हा, हे चुन्द, इथे एखादा मनुष्य न दिलेले (चोरीचे) धन ग्रहण करून करून स्वतःला सुखी करतो, तृप्त करतो. हा दुसरा सुखल्लिकाणुयोग होय.” ‘‘ปุน จปรํ, จุนฺท, อิเธกจฺโจ มุสา ภณิตฺวา ภณิตฺวา อตฺตานํ สุเขติ ปีเณติ. อยํ ตติโย สุขลฺลิกานุโยโค. “पुन्हा, हे चुन्द, इथे एखादा मनुष्य असत्य (खोटे) बोलून बोलून स्वतःला सुखी करतो, तृप्त करतो. हा तिसरा सुखल्लिकाणुयोग होय.” ‘‘ปุน จปรํ, จุนฺท, อิเธกจฺโจ ปญฺจหิ กามคุเณหิ สมปฺปิโต สมงฺคีภูโต ปริจาเรติ. อยํ จตุตฺโถ สุขลฺลิกานุโยโค. “पुन्हा, हे चुन्द, इथे एखादा मनुष्य पाच कामगुणांनी युक्त होऊन, त्यात मग्न होऊन उपभोग घेतो. हा चौथा सुखल्लिकाणुयोग होय.” ‘‘อิเม โข, จุนฺท, จตฺตาโร สุขลฺลิกานุโยคา หีนา คมฺมา โปถุชฺชนิกา อนริยา อนตฺถสํหิตา น นิพฺพิทาย น วิราคาย น นิโรธาย น อุปสมาย น อภิญฺญาย น สมฺโพธาย น นิพฺพานาย สํวตฺตนฺติ. “हे चुन्द, हे चार सुखल्लिकाणुयोग आहेत जे हीन, ग्राम्य, पृथग्जनांचे, अनार्य आणि अहितकारक आहेत; जे निर्वेदासाठी, विरागासाठी, निरोधासाठी, उपशमासाठी, अभिज्ञेसाठी, संबोधीसाठी आणि निर्वाणासाठी कारणीभूत ठरत नाहीत.” ‘‘ฐานํ โข ปเนตํ, จุนฺท, วิชฺชติ ยํ อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ วเทยฺยุํ – ‘‘อิเม จตฺตาโร สุขลฺลิกานุโยเค อนุยุตฺตา สมณา สกฺยปุตฺติยา วิหรนฺตี’ติ. เต โว ‘มาเหวํ’ ติสฺสุ วจนียา. น เต โว สมฺมา วทมานา วเทยฺยุํ, อพฺภาจิกฺเขยฺยุํ อสตา อภูเตน. “हे चुन्द, असे घडू शकते की, इतर पंथांचे परिव्राजक असे म्हणतील— ‘शाक्यपुत्रीय श्रमण या चार सुखल्लिकाणुयोगांमध्ये मग्न राहून विहार करतात.’ त्यांना तुम्ही असे म्हटले पाहिजे— ‘असे बोलू नका.’ असे बोलून ते तुमच्याविषयी योग्य बोलत नसतील, तर ते असत्य आणि खोट्या विधानांनी तुमच्यावर खोटा आळ आणत असतील.” ๑๘๔. ‘‘จตฺตาโรเม, จุนฺท, สุขลฺลิกานุโยคา เอกนฺตนิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย อุปสมาย อภิญฺญาย สมฺโพธาย นิพฺพานาย สํวตฺตนฺติ. กตเม จตฺตาโร? १८४. “हे चुन्द, हे चार सुखल्लिकाणुयोग आहेत जे एकांततः निर्वेदासाठी, विरागासाठी, निरोधासाठी, उपशमासाठी, अभिज्ञेसाठी, संबोधीसाठी आणि निर्वाणासाठी कारणीभूत ठरतात. ते चार कोणते आहेत?” ‘‘อิธ, จุนฺท, ภิกฺขุ วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ ปฐโม สุขลฺลิกานุโยโค. “इथे, हे चुन्द, भिक्षू कामांपासून (इंद्रियभोगांपासून) अलिप्त होऊन, अकुशल धम्मांपासून अलिप्त होऊन, सवितर्क, सविचार, विवेकजन्य प्रीती आणि सुखाने युक्त अशा पहिल्या ध्यानाचे संपादन करून विहार करतो. हा पहिला सुखल्लिकाणुयोग होय.” ‘‘ปุน [Pg.109] จปรํ, จุนฺท, ภิกฺขุ วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา…เป… ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ ทุติโย สุขลฺลิกานุโยโค. “पुन्हा, हे चुन्द, भिक्षू वितर्क आणि विचारांच्या उपशमामुळे... दुसऱ्या ध्यानाचे संपादन करून विहार करतो. हा दुसरा सुखल्लिकाणुयोग होय.” ‘‘ปุน จปรํ, จุนฺท, ภิกฺขุ ปีติยา จ วิราคา…เป… ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ ตติโย สุขลฺลิกานุโยโค. “पुन्हा, हे चुन्द, भिक्षू प्रीतीचा विराग झाल्यामुळे... तिसऱ्या ध्यानाचे संपादन करून विहार करतो. हा तिसरा सुखल्लिकाणुयोग होय.” ‘‘ปุน จปรํ, จุนฺท, ภิกฺขุ สุขสฺส จ ปหานา ทุกฺขสฺส จ ปหานา…เป… จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ จตุตฺโถ สุขลฺลิกานุโยโค. “पुन्हा, हे चुन्द, भिक्षू सुखाचा त्याग केल्यामुळे आणि दुःखाचा त्याग केल्यामुळे... चौथ्या ध्यानाचे संपादन करून विहार करतो. हा चौथा सुखल्लिकाणुयोग होय.” ‘‘อิเม โข, จุนฺท, จตฺตาโร สุขลฺลิกานุโยคา เอกนฺตนิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย อุปสมาย อภิญฺญาย สมฺโพธาย นิพฺพานาย สํวตฺตนฺติ. “हे चुन्द, हे चार सुखल्लिकाणुयोग आहेत जे एकांततः निर्वेदासाठी, विरागासाठी, निरोधासाठी, उपशमासाठी, अभिज्ञेसाठी, संबोधीसाठी आणि निर्वाणासाठी कारणीभूत ठरतात.” ‘‘ฐานํ โข ปเนตํ, จุนฺท, วิชฺชติ ยํ อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ วเทยฺยุํ – ‘‘อิเม จตฺตาโร สุขลฺลิกานุโยเค อนุยุตฺตา สมณา สกฺยปุตฺติยา วิหรนฺตี’ติ. เต โว ‘เอวํ’ ติสฺสุ วจนียา. สมฺมา เต โว วทมานา วเทยฺยุํ, น เต โว อพฺภาจิกฺเขยฺยุํ อสตา อภูเตน. चुन्द, अशी शक्यता आहे की इतर पंथांचे परिव्राजक असे म्हणतील – 'हे शाक्यपुत्रीय श्रमण या चार प्रकारच्या सुखोपभोगाच्या (सुखल्लिकानुयोग) अभ्यासात मग्न राहून विहार करतात.' त्यांना तुम्ही 'होय, हे असेच आहे' असे उत्तर दिले पाहिजे. असे म्हणताना ते तुमच्याबद्दल योग्य तेच बोलत असतील, ते तुमच्यावर असत्य किंवा खोटा आरोप करत नसतील. สุขลฺลิกานุโยคานิสํโส सुखल्लिकानुयोगाचे लाभ (फायदे) ๑๘๕. ‘‘ฐานํ โข ปเนตํ, จุนฺท, วิชฺชติ, ยํ อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ วเทยฺยุํ – ‘อิเม ปนาวุโส, จตฺตาโร สุขลฺลิกานุโยเค อนุยุตฺตานํ วิหรตํ กติ ผลานิ กตานิสํสา ปาฏิกงฺขา’ติ? เอวํวาทิโน, จุนฺท, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวมสฺสุ วจนียา – ‘อิเม โข, อาวุโส, จตฺตาโร สุขลฺลิกานุโยเค อนุยุตฺตานํ วิหรตํ จตฺตาริ ผลานิ จตฺตาโร อานิสํสา ปาฏิกงฺขา. กตเม จตฺตาโร? อิธาวุโส, ภิกฺขุ ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โสตาปนฺโน โหติ อวินิปาตธมฺโม นิยโต สมฺโพธิปรายโณ. อิทํ ปฐมํ ผลํ, ปฐโม อานิสํโส. ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา ราคโทสโมหานํ ตนุตฺตา สกทาคามี โหติ, สกิเทว อิมํ โลกํ อาคนฺตฺวา ทุกฺขสฺสนฺตํ กโรติ. อิทํ ทุติยํ ผลํ, ทุติโย อานิสํโส. ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ ปญฺจนฺนํ โอรมฺภาคิยานํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โอปปาติโก โหติ, ตตฺถ ปรินิพฺพายี อนาวตฺติธมฺโม ตสฺมา โลกา. อิทํ ตติยํ ผลํ, ตติโย อานิสํโส. ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ อาสวานํ ขยา อนาสวํ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิทํ จตุตฺถํ ผลํ จตุตฺโถ อานิสํโส. อิเม [Pg.110] โข, อาวุโส, จตฺตาโร สุขลฺลิกานุโยเค อนุยุตฺตานํ วิหรตํ อิมานิ จตฺตาริ ผลานิ, จตฺตาโร อานิสํสา ปาฏิกงฺขา’’ติ. १८५. चुन्द, अशी शक्यता आहे की इतर पंथांचे परिव्राजक असे विचारतील – 'पण आवुसो, या चार प्रकारच्या सुखोपभोगाच्या अभ्यासात मग्न राहून विहार करणाऱ्या व्यक्तींना किती फळे आणि किती लाभ अपेक्षित असू शकतात?' चुन्द, असे विचारणाऱ्या इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे उत्तर दिले पाहिजे – 'आवुसो, या चार प्रकारच्या सुखोपभोगाच्या अभ्यासात मग्न राहून विहार करणाऱ्या व्यक्तींना चार फळे आणि चार लाभ अपेक्षित असू शकतात. कोणते चार? येथे, आवुसो, एखादा भिक्खू तीन संयोजनांच्या (बंधनांच्या) क्षयामुळे सोतापन्न होतो, तो दुर्गतीला न जाणारा, नियत आणि संबोधीकडे जाणारा होतो. हे पहिले फळ आणि पहिला लाभ आहे. पुन्हा, आवुसो, एखादा भिक्खू तीन संयोजनांच्या क्षयामुळे आणि राग, द्वेष व मोहाच्या मंदतेमुळे सकदागामी होतो, आणि या जगात केवळ एकदाच परत येऊन दुःखाचा अंत करतो. हे दुसरे फळ आणि दुसरा लाभ आहे. पुन्हा, आवुसो, एखादा भिक्खू पाच खालच्या (ओरंभागीय) संयोजनांच्या क्षयामुळे ओपपातिक होतो, आणि तेथेच परिनिर्वाण प्राप्त करतो, त्या लोकातून परत न येणारा होतो. हे तिसरे फळ आणि तिसरा लाभ आहे. पुन्हा, आवुसो, एखादा भिक्खू आसवांच्या क्षयामुळे आसवरहित अशा चेतोविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्तीला याच जन्मात स्वतः अभिज्ञेने जाणून, साक्षात करून आणि त्यात प्रतिष्ठित होऊन विहार करतो. हे चौथे फळ आणि चौथा लाभ आहे. आवुसो, या चार प्रकारच्या सुखोपभोगाच्या अभ्यासात मग्न राहून विहार करणाऱ्या व्यक्तींना ही चार फळे आणि चार लाभ अपेक्षित असू शकतात.' ขีณาสวอภพฺพฐานํ खीणासवाच्या (आसवरहित अरहंताच्या) अयोग्य गोष्टी ๑๘๖. ‘‘ฐานํ โข ปเนตํ, จุนฺท, วิชฺชติ ยํ อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ วเทยฺยุํ – ‘อฏฺฐิตธมฺมา สมณา สกฺยปุตฺติยา วิหรนฺตี’ติ. เอวํวาทิโน, จุนฺท, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวมสฺสุ วจนียา – ‘อตฺถิ โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน สาวกานํ ธมฺมา เทสิตา ปญฺญตฺตา ยาวชีวํ อนติกฺกมนียา. เสยฺยถาปิ, อาวุโส, อินฺทขีโล วา อโยขีโล วา คมฺภีรเนโม สุนิขาโต อจโล อสมฺปเวธี. เอวเมว โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน สาวกานํ ธมฺมา เทสิตา ปญฺญตฺตา ยาวชีวํ อนติกฺกมนียา. โย โส, อาวุโส, ภิกฺขุ อรหํ ขีณาสโว วุสิตวา กตกรณีโย โอหิตภาโร อนุปฺปตฺตสทตฺโถ ปริกฺขีณภวสํโยชโน สมฺมทญฺญา วิมุตฺโต, อภพฺโพ โส นว ฐานานิ อชฺฌาจริตุํ. อภพฺโพ, อาวุโส, ขีณาสโว ภิกฺขุ สญฺจิจฺจ ปาณํ ชีวิตา โวโรเปตุํ; อภพฺโพ ขีณาสโว ภิกฺขุ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยิตุํ; อภพฺโพ ขีณาสโว ภิกฺขุ เมถุนํ ธมฺมํ ปฏิเสวิตุํ; อภพฺโพ ขีณาสโว ภิกฺขุ สมฺปชานมุสา ภาสิตุํ; อภพฺโพ ขีณาสโว ภิกฺขุ สนฺนิธิการกํ กาเม ปริภุญฺชิตุํ เสยฺยถาปิ ปุพฺเพ อาคาริกภูโต; อภพฺโพ ขีณาสโว ภิกฺขุ ฉนฺทาคตึ คนฺตุํ; อภพฺโพ ขีณาสโว ภิกฺขุ โทสาคตึ คนฺตุํ; อภพฺโพ ขีณาสโว ภิกฺขุ โมหาคตึ คนฺตุํ; อภพฺโพ ขีณาสโว ภิกฺขุ ภยาคตึ คนฺตุํ. โย โส, อาวุโส, ภิกฺขุ อรหํ ขีณาสโว วุสิตวา กตกรณีโย โอหิตภาโร อนุปฺปตฺตสทตฺโถ ปริกฺขีณภวสํโยชโน สมฺมทญฺญา วิมุตฺโต, อภพฺโพ โส อิมานิ นว ฐานานิ อชฺฌาจริตุ’’นฺติ. १८६. चुन्द, अशी शक्यता आहे की इतर पंथांचे परिव्राजक असे म्हणतील – 'शाक्यपुत्रीय श्रमण अस्थिर धर्माचे (अस्थिर आचरणाचे) होऊन विहार करतात.' चुन्द, असे म्हणणाऱ्या इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे उत्तर दिले पाहिजे – 'आवुसो, त्या भगवंतांनी – जे जाणणारे, पाहणारे, अरहंत आणि सम्यक्संबुद्ध आहेत – आपल्या श्रावकांसाठी असे धर्म उपदेशिले आहेत आणि प्रज्ञप्त केले आहेत, जे आयुष्यभर उल्लंघन न करण्याजोगे आहेत. आवुसो, ज्याप्रमाणे एखादा इंद्रखील किंवा लोखंडी खांब खोल पाया असलेला, घट्ट रोवलेला, अचल आणि न डगमगणारा असतो; त्याचप्रमाणे, आवुसो, त्या भगवंतांनी – जे जाणणारे, पाहणारे, अरहंत आणि सम्यक्संबुद्ध आहेत – आपल्या श्रावकांसाठी जे धर्म उपदेशिले आहेत आणि प्रज्ञप्त केले आहेत, ते आयुष्यभर उल्लंघन न करण्याजोगे आहेत. आवुसो, जो भिक्खू अरहंत आहे, ज्याचे आसव नष्ट झाले आहेत (खीणासव), ज्याने ब्रह्मचर्य पूर्ण केले आहे, ज्याने आपले कर्तव्य पूर्ण केले आहे, ज्याने ओझे उतरवून ठेवले आहे, ज्याने आपले परम कल्याण साध्य केले आहे, ज्याचे भव-संयोजन पूर्णपणे नष्ट झाले आहे आणि जो सम्यक ज्ञानाने विमुक्त झाला आहे, तो नऊ गोष्टींचे उल्लंघन करण्यास असमर्थ असतो. आवुसो, खीणासव भिक्खू जाणूनबुजून कोणत्याही प्राण्याचा जीव घेण्यास असमर्थ असतो; खीणासव भिक्खू न दिलेली वस्तू चोरीच्या उद्देशाने घेण्यास असमर्थ असतो; खीणासव भिक्खू मैथुन धर्माचे सेवन करण्यास असमर्थ असतो; खीणासव भिक्खू जाणूनबुजून असत्य बोलण्यास असमर्थ असतो; खीणासव भिक्खू पूर्वी गृहस्थाश्रमात असताना करत असे त्याप्रमाणे उपभोगाच्या वस्तूंचा साठा करून त्यांचा उपभोग घेण्यास असमर्थ असतो; खीणासव भिक्खू छंदागती जाण्यास असमर्थ असतो; खीणासव भिक्खू दोषागती जाण्यास असमर्थ असतो; खीणासव भिक्खू मोहागती जाण्यास असमर्थ असतो; खीणासव भिक्खू भयागती जाण्यास असमर्थ असतो. आवुसो, जो भिक्खू अरहंत आहे, ज्याचे आसव नष्ट झाले आहेत, ज्याने ब्रह्मचर्य पूर्ण केले आहे, ज्याने आपले कर्तव्य पूर्ण केले आहे, ज्याने ओझे उतरवून ठेवले आहे, ज्याने आपले परम कल्याण साध्य केले आहे, ज्याचे भव-संयोजन पूर्णपणे नष्ट झाले आहे आणि जो सम्यक ज्ञानाने विमुक्त झाला आहे, तो या नऊ गोष्टींचे उल्लंघन करण्यास असमर्थ असतो.' ปญฺหาพฺยากรณํ प्रश्नोत्तरे ๑๘๗. ‘‘ฐานํ โข ปเนตํ, จุนฺท, วิชฺชติ, ยํ อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ วเทยฺยุํ – ‘อตีตํ โข อทฺธานํ อารพฺภ สมโณ โคตโม อตีรกํ ญาณทสฺสนํ ปญฺญเปติ, โน จ โข อนาคตํ อทฺธานํ อารพฺภ อตีรกํ ญาณทสฺสนํ ปญฺญเปติ, ตยิทํ กึสุ ตยิทํ กถํสู’ติ? เต จ อญฺญติตฺถิยา [Pg.111] ปริพฺพาชกา อญฺญวิหิตเกน ญาณทสฺสเนน อญฺญวิหิตกํ ญาณทสฺสนํ ปญฺญเปตพฺพํ มญฺญนฺติ ยถริว พาลา อพฺยตฺตา. อตีตํ โข, จุนฺท, อทฺธานํ อารพฺภ ตถาคตสฺส สตานุสาริ ญาณํ โหติ; โส ยาวตกํ อากงฺขติ ตาวตกํ อนุสฺสรติ. อนาคตญฺจ โข อทฺธานํ อารพฺภ ตถาคตสฺส โพธิชํ ญาณํ อุปฺปชฺชติ – ‘อยมนฺติมา ชาติ, นตฺถิทานิ ปุนพฺภโว’ติ. ‘อตีตํ เจปิ, จุนฺท, โหติ อภูตํ อตจฺฉํ อนตฺถสํหิตํ, น ตํ ตถาคโต พฺยากโรติ. อตีตํ เจปิ, จุนฺท, โหติ ภูตํ ตจฺฉํ อนตฺถสํหิตํ, ตมฺปิ ตถาคโต น พฺยากโรติ. อตีตํ เจปิ จุนฺท, โหติ ภูตํ ตจฺฉํ อตฺถสํหิตํ, ตตฺร กาลญฺญู ตถาคโต โหติ ตสฺส ปญฺหสฺส เวยฺยากรณาย. อนาคตํ เจปิ, จุนฺท, โหติ อภูตํ อตจฺฉํ อนตฺถสํหิตํ, น ตํ ตถาคโต พฺยากโรติ…เป… ตสฺส ปญฺหสฺส เวยฺยากรณาย. ปจฺจุปฺปนฺนํ เจปิ, จุนฺท, โหติ อภูตํ อตจฺฉํ อนตฺถสํหิตํ, น ตํ ตถาคโต พฺยากโรติ. ปจฺจุปฺปนฺนํ เจปิ, จุนฺท, โหติ ภูตํ ตจฺฉํ อนตฺถสํหิตํ, ตมฺปิ ตถาคโต น พฺยากโรติ. ปจฺจุปฺปนฺนํ เจปิ, จุนฺท, โหติ ภูตํ ตจฺฉํ อตฺถสํหิตํ, ตตฺร กาลญฺญู ตถาคโต โหติ ตสฺส ปญฺหสฺส เวยฺยากรณาย. १८७. चुन्द, अशी शक्यता आहे की इतर पंथांचे परिव्राजक असे म्हणतील – 'श्रमण गोतम भूतकाळाविषयी तर अमर्याद ज्ञानदर्शन प्रज्ञप्त करतात, परंतु भविष्यकाळाविषयी मात्र अमर्याद ज्ञानदर्शन प्रज्ञप्त करत नाहीत. हे असे का? हे कशामुळे?' ते इतर पंथांचे परिव्राजक मूर्ख आणि अज्ञानी लोकांप्रमाणे असे मानतात की एका विषयाच्या ज्ञानदर्शनाने दुसऱ्या विषयाचे ज्ञानदर्शन प्रज्ञप्त केले पाहिजे. चुन्द, भूतकाळाविषयी तथागतांकडे स्मृतीचे अनुकरण करणारे ज्ञान (सतानुसारी ज्ञान) असते; तथागत जितके इच्छितात तितके स्मरण करू शकतात. आणि भविष्यकाळाविषयी तथागतांना संबोधीतून उत्पन्न झालेले (बोधिज) ज्ञान प्राप्त होते – 'हा अंतिम जन्म आहे, आता पुन्हा जन्म नाही.' चुन्द, भूतकाळाविषयी जर एखादी गोष्ट असत्य, अवास्तव आणि निरर्थक असेल, तर तथागत तिचे स्पष्टीकरण करत नाहीत. चुन्द, भूतकाळाविषयी जर एखादी गोष्ट सत्य आणि वास्तव असली, पण निरर्थक असेल, तर तथागत तिचेही स्पष्टीकरण करत नाहीत. चुन्द, भूतकाळाविषयी जर एखादी गोष्ट सत्य, वास्तव आणि सार्थ असेल, तर तथागत त्या प्रश्नाचे उत्तर देण्यासाठी योग्य वेळ जाणणारे असतात. चुन्द, भविष्यकाळाविषयी जर एखादी गोष्ट असत्य, अवास्तव आणि निरर्थक असेल, तर तथागत तिचे स्पष्टीकरण करत नाहीत... (तसेच इतर पर्यायांच्या बाबतीतही)... त्या प्रश्नाचे उत्तर देण्यासाठी तथागत योग्य वेळ जाणणारे असतात. चुन्द, वर्तमानकाळाविषयी जर एखादी गोष्ट असत्य, अवास्तव आणि निरर्थक असेल, तर तथागत तिचे स्पष्टीकरण करत नाहीत. चुन्द, वर्तमानकाळाविषयी जर एखादी गोष्ट सत्य आणि वास्तव असली, पण निरर्थक असेल, तर तथागत तिचेही स्पष्टीकरण करत नाहीत. चुन्द, वर्तमानकाळाविषयी जर एखादी गोष्ट सत्य, वास्तव आणि सार्थ असेल, तर तथागत त्या प्रश्नाचे उत्तर देण्यासाठी योग्य वेळ जाणणारे असतात. ๑๘๘. ‘‘อิติ โข, จุนฺท, อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺเนสุ ธมฺเมสุ ตถาคโต กาลวาที ภูตวาที อตฺถวาที ธมฺมวาที วินยวาที, ตสฺมา ‘ตถาคโต’ติ วุจฺจติ. ยญฺจ โข, จุนฺท, สเทวกสฺส โลกสฺส สมารกสฺส สพฺรหฺมกสฺส สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย ทิฏฺฐํ สุตํ มุตํ วิญฺญาตํ ปตฺตํ ปริเยสิตํ อนุวิจริตํ มนสา, สพฺพํ ตถาคเตน อภิสมฺพุทฺธํ, ตสฺมา ‘ตถาคโต’ติ วุจฺจติ. ยญฺจ, จุนฺท, รตฺตึ ตถาคโต อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุชฺฌติ, ยญฺจ รตฺตึ อนุปาทิเสสาย นิพฺพานธาตุยา ปรินิพฺพายติ, ยํ เอตสฺมึ อนฺตเร ภาสติ ลปติ นิทฺทิสติ. สพฺพํ ตํ ตเถว โหติ โน อญฺญถา, ตสฺมา ‘ตถาคโต’ติ วุจฺจติ. ยถาวาที, จุนฺท, ตถาคโต ตถาการี, ยถาการี ตถาวาที. อิติ ยถาวาที ตถาการี, ยถาการี ตถาวาที, ตสฺมา ‘ตถาคโต’ติ วุจฺจติ. สเทวเก โลเก, จุนฺท, สมารเก สพฺรหฺมเก สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย ตถาคโต อภิภู อนภิภูโต อญฺญทตฺถุทโส วสวตฺตี, ตสฺมา ‘ตถาคโต’ติ วุจฺจติ. १८८. “हे चुन्द, अशा प्रकारे भूत, भविष्य आणि वर्तमान काळातील धर्मांविषयी (गोष्टींविषयी) तथागत योग्य वेळी बोलणारे (कालवादी), सत्य बोलणारे (भूतवादी), अर्थपूर्ण बोलणारे (अत्थवादी), धम्माला धरून बोलणारे (धम्मवादी) आणि विनयाला धरून बोलणारे (विनयवादी) आहेत; म्हणूनच त्यांना ‘तथागत’ म्हटले जाते. हे चुन्द, देव, मार आणि ब्रह्मासह या लोकात, श्रमण, ब्राह्मण, राजे आणि प्रजेसह या मनुष्यलोकात जे काही पाहिले गेले, ऐकले गेले, जाणले गेले, विज्ञानाने जाणले गेले, प्राप्त केले गेले, शोधले गेले आणि मनाने विचार केला गेला, ते सर्व तथागतांनी पूर्णपणे जाणले आहे; म्हणूनच त्यांना ‘तथागत’ म्हटले जाते. हे चुन्द, ज्या रात्री तथागतांनी अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त केली आणि ज्या रात्री ते अनुपधिशेष निर्वाणधातूमध्ये परिनिर्वाण पावले, या दरम्यान त्यांनी जे काही भाष्य केले, सांगितले आणि स्पष्ट केले, ते सर्व तसेच होते, त्याहून वेगळे नाही; म्हणूनच त्यांना ‘तथागत’ म्हटले जाते. हे चुन्द, तथागत जसे बोलतात तसेच करतात आणि जसे करतात तसेच बोलतात. अशा प्रकारे जसे बोलतात तसेच करतात आणि जसे करतात तसेच बोलतात; म्हणूनच त्यांना ‘तथागत’ म्हटले जाते. हे चुन्द, देव, मार आणि ब्रह्मासह या लोकात, श्रमण, ब्राह्मण, राजे आणि प्रजेसह या मनुष्यलोकात तथागत हे सर्वांना जिंकणारे (अभिभू), कोणाकडूनही न जिंकले जाणारे (अनभिभूतो), सर्व काही पाहणारे (अञ्ञदत्थुदसो) आणि वश करणारे (वसवत्ती) आहेत; म्हणूनच त्यांना ‘तथागत’ म्हटले जाते.” อพฺยากตฏฺฐานํ अव्याकृत विषय ๑๘๙. ‘‘ฐานํ [Pg.112] โข ปเนตํ, จุนฺท, วิชฺชติ ยํ อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ วเทยฺยุํ – ‘กึ นุ โข, อาวุโส, โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา, อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’นฺติ? เอวํวาทิโน, จุนฺท, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวมสฺสุ วจนียา – ‘อพฺยากตํ โข, อาวุโส, ภควตา – ‘‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา, อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’’’นฺติ. १८९. “हे चुन्द, अशी शक्यता आहे की अन्य पंथांचे परिव्राजक असे म्हणतील—‘हे आवुसो (मित्रांनो), काय तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहतात? हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे?’ असे बोलणाऱ्या अन्य पंथांच्या परिव्राजकांना असे सांगावे—‘हे आवुसो, भगवंतांनी हे अव्याकृत (स्पष्ट न केलेले) ठेवले आहे की—“तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहतात, हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे.”’” ‘‘ฐานํ โข ปเนตํ, จุนฺท, วิชฺชติ, ยํ อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ วเทยฺยุํ – ‘กึ ปนาวุโส, น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา, อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’นฺติ? เอวํวาทิโน, จุนฺท, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวมสฺสุ วจนียา – ‘เอตมฺปิ โข, อาวุโส, ภควตา อพฺยากตํ – ‘‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา, อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’’’นฺติ. “हे चुन्द, अशी शक्यता आहे की अन्य पंथांचे परिव्राजक असे म्हणतील—‘हे आवुसो, काय तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहत नाहीत? हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे?’ असे बोलणाऱ्या अन्य पंथांच्या परिव्राजकांना असे सांगावे—‘हे आवुसो, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की—“तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहत नाहीत, हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे.”’” ‘‘ฐานํ โข ปเนตํ, จุนฺท, วิชฺชติ, ยํ อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ วเทยฺยุํ – ‘กึ ปนาวุโส, โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา, อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’นฺติ? เอวํวาทิโน, จุนฺท, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวมสฺสุ วจนียา – ‘อพฺยากตํ โข เอตํ, อาวุโส, ภควตา – ‘‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา, อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’’’นฺติ. “हे चुन्द, अशी शक्यता आहे की अन्य पंथांचे परिव्राजक असे म्हणतील—‘हे आवुसो, काय तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहतात आणि राहतही नाहीत? हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे?’ असे बोलणाऱ्या अन्य पंथांच्या परिव्राजकांना असे सांगावे—‘हे आवुसो, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की—“तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहतात आणि राहतही नाहीत, हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे.”’” ‘‘ฐานํ โข ปเนตํ, จุนฺท, วิชฺชติ, ยํ อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ วเทยฺยุํ – ‘กึ ปนาวุโส, เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา, อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’นฺติ? เอวํวาทิโน, จุนฺท, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวมสฺสุ วจนียา – ‘เอตมฺปิ โข, อาวุโส, ภควตา อพฺยากตํ – ‘‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา, อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’’’นฺติ. “हे चुन्द, अशी शक्यता आहे की अन्य पंथांचे परिव्राजक असे म्हणतील—‘हे आवुसो, काय तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहतही नाहीत आणि असेही नाही की ते राहत नाहीत? हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे?’ असे बोलणाऱ्या अन्य पंथांच्या परिव्राजकांना असे सांगावे—‘हे आवुसो, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की—“तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहतही नाहीत आणि असेही नाही की ते राहत नाहीत, हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे.”’” ‘‘ฐานํ โข ปเนตํ, จุนฺท, วิชฺชติ, ยํ อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ วเทยฺยุํ – ‘กสฺมา ปเนตํ, อาวุโส, สมเณน โคตเมน อพฺยากต’นฺติ? เอวํวาทิโน, จุนฺท, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวมสฺสุ วจนียา – ‘น เหตํ, อาวุโส, อตฺถสํหิตํ น ธมฺมสํหิตํ น อาทิพฺรหฺมจริยกํ น นิพฺพิทาย น วิราคาย น นิโรธาย น อุปสมาย น อภิญฺญาย น สมฺโพธาย น นิพฺพานาย สํวตฺตติ, ตสฺมา ตํ ภควตา อพฺยากต’นฺติ. “हे चुन्द, अशी शक्यता आहे की अन्य पंथांचे परिव्राजक असे म्हणतील—‘हे आवुसो, श्रमण गोतमांनी हे अव्याकृत का ठेवले आहे?’ असे बोलणाऱ्या अन्य पंथांच्या परिव्राजकांना असे सांगावे—‘हे आवुसो, कारण हे कल्याणाशी (अर्थाशी) संबंधित नाही, धम्माशी संबंधित नाही, श्रेष्ठ ब्रह्मचर्याच्या आरंभासाठी नाही, आणि हे वैराग्यासाठी (निर्वेदासाठी), अनासक्तीसाठी, निरोधासाठी, उपशमासाठी (शांततेसाठी), अभिज्ञासाठी (उच्च ज्ञानासाठी), संबोधीसाठी आणि निर्वाणासाठी पूरक ठरत नाही. म्हणूनच भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे.’” พฺยากตฏฺฐานํ व्याकृत विषय ๑๙๐. ‘‘ฐานํ [Pg.113] โข ปเนตํ, จุนฺท, วิชฺชติ, ยํ อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ วเทยฺยุํ – ‘กึ ปนาวุโส, สมเณน โคตเมน พฺยากต’นฺติ? เอวํวาทิโน, จุนฺท, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวมสฺสุ วจนียา – ‘อิทํ ทุกฺขนฺติ โข, อาวุโส, ภควตา พฺยากตํ, อยํ ทุกฺขสมุทโยติ โข, อาวุโส, ภควตา พฺยากตํ, อยํ ทุกฺขนิโรโธติ โข, อาวุโส, ภควตา พฺยากตํ, อยํ ทุกฺขนิโรธคามินี ปฏิปทาติ โข, อาวุโส, ภควตา พฺยากต’นฺติ. १९०. “हे चुन्द, अशी शक्यता आहे की अन्य पंथांचे परिव्राजक असे म्हणतील—‘हे आवुसो, मग श्रमण गोतमांनी काय व्याकृत (स्पष्ट) केले आहे?’ असे बोलणाऱ्या अन्य पंथांच्या परिव्राजकांना असे सांगावे—‘हे आवुसो, भगवंतांनी हे स्पष्ट केले आहे की—“हे दुःख आहे”; भगवंतांनी हे स्पष्ट केले आहे की—“हा दुःखसमुदय (दुःखाचे कारण) आहे”; भगवंतांनी हे स्पष्ट केले आहे की—“हा दुःखनिरोध आहे”; आणि भगवंतांनी हे स्पष्ट केले आहे की—“ही दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदा (दुःख निरोधाचा मार्ग) आहे.”’” ‘‘ฐานํ โข ปเนตํ, จุนฺท, วิชฺชติ, ยํ อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวํ วเทยฺยุํ – ‘กสฺมา ปเนตํ, อาวุโส, สมเณน โคตเมน พฺยากต’นฺติ? เอวํวาทิโน, จุนฺท, อญฺญติตฺถิยา ปริพฺพาชกา เอวมสฺสุ วจนียา – ‘เอตญฺหิ, อาวุโส, อตฺถสํหิตํ, เอตํ ธมฺมสํหิตํ, เอตํ อาทิพฺรหฺมจริยกํ เอกนฺตนิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย อุปสมาย อภิญฺญาย สมฺโพธาย นิพฺพานาย สํวตฺตติ. ตสฺมา ตํ ภควตา พฺยากต’นฺติ. “हे चुन्द, अशी शक्यता आहे की अन्य पंथांचे परिव्राजक असे म्हणतील—‘हे आवुसो, श्रमण गोतमांनी हे का स्पष्ट केले आहे?’ असे बोलणाऱ्या अन्य पंथांच्या परिव्राजकांना असे सांगावे—‘हे आवुसो, कारण हे कल्याणाशी (अर्थाशी) संबंधित आहे, धम्माशी संबंधित आहे, श्रेष्ठ ब्रह्मचर्याच्या आरंभासाठी आहे, आणि हे पूर्ण वैराग्यासाठी (निर्वेदासाठी), अनासक्तीसाठी, निरोधासाठी, उपशमासाठी, अभिज्ञासाठी, संबोधीसाठी आणि निर्वाणासाठी पूरक ठरते. म्हणूनच भगवंतांनी हे स्पष्ट केले आहे.’” ปุพฺพนฺตสหคตทิฏฺฐินิสฺสยา पूर्वांताशी संबंधित दृष्टींचे आश्रय ๑๙๑. ‘‘เยปิ เต, จุนฺท, ปุพฺพนฺตสหคตา ทิฏฺฐินิสฺสยา, เตปิ โว มยา พฺยากตา, ยถา เต พฺยากาตพฺพา. ยถา จ เต น พฺยากาตพฺพา, กึ โว อหํ เต ตถา พฺยากริสฺสามิ? เยปิ เต, จุนฺท, อปรนฺตสหคตา ทิฏฺฐินิสฺสยา, เตปิ โว มยา พฺยากตา, ยถา เต พฺยากาตพฺพา. ยถา จ เต น พฺยากาตพฺพา, กึ โว อหํ เต ตถา พฺยากริสฺสามิ? กตเม จ เต, จุนฺท, ปุพฺพนฺตสหคตา ทิฏฺฐินิสฺสยา, เย โว มยา พฺยากตา, ยถา เต พฺยากาตพฺพา. (ยถา จ เต น พฺยากาตพฺพา, กึ โว อหํ เต ตถา พฺยากริสฺสามิ) ? สนฺติ โข, จุนฺท, เอเก สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘สสฺสโต อตฺตา จ โลโก จ, อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’นฺติ. สนฺติ ปน, จุนฺท, เอเก สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘อสสฺสโต อตฺตา จ โลโก จ…เป… สสฺสโต จ อสสฺสโต จ อตฺตา จ โลโก จ… เนว สสฺสโต นาสสฺสโต อตฺตา จ โลโก จ… สยํกโต อตฺตา จ โลโก จ… ปรํกโต อตฺตา จ โลโก จ… สยํกโต จ [Pg.114] ปรํกโต จ อตฺตา จ โลโก จ… อสยํกาโร อปรํกาโร อธิจฺจสมุปฺปนฺโน อตฺตา จ โลโก จ, อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’นฺติ. สสฺสตํ สุขทุกฺขํ… อสสฺสตํ สุขทุกฺขํ… สสฺสตญฺจ อสสฺสตญฺจ สุขทุกฺขํ… เนวสสฺสตํ นาสสฺสตํ สุขทุกฺขํ… สยํกตํ สุขทุกฺขํ… ปรํกตํ สุขทุกฺขํ… สยํกตญฺจ ปรํกตญฺจ สุขทุกฺขํ… อสยํการํ อปรํการํ อธิจฺจสมุปฺปนฺนํ สุขทุกฺขํ, อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’นฺติ. १९१. “हे चुन्द, भूतकाळाशी संबंधित जी काही दृष्टी-आश्रय आहेत, ती मी तुम्हाला ज्या प्रकारे स्पष्ट करायला हवीत, त्या प्रकारे स्पष्ट केली आहेत. आणि ज्या प्रकारे ती स्पष्ट करायला नकोत, त्या प्रकारे मी ती तुम्हाला का स्पष्ट करू? हे चुन्द, भविष्यकाळाशी संबंधित जी काही दृष्टी-आश्रय आहेत, ती देखील मी तुम्हाला ज्या प्रकारे स्पष्ट करायला हवीत, त्या प्रकारे स्पष्ट केली आहेत. आणि ज्या प्रकारे ती स्पष्ट करायला नकोत, त्या प्रकारे मी ती तुम्हाला का स्पष्ट करू? आणि हे चुन्द, भूतकाळाशी संबंधित ती दृष्टी-आश्रय कोणती आहेत, जी मी तुम्हाला ज्या प्रकारे स्पष्ट करायला हवीत, त्या प्रकारे स्पष्ट केली आहेत? (आणि ज्या प्रकारे ती स्पष्ट करायला नकोत, त्या प्रकारे मी ती तुम्हाला का स्पष्ट करू?) हे चुन्द, काही श्रमण व ब्राह्मण असे प्रतिपादन करणारे व अशी दृष्टी असणारे आहेत की— ‘आत्मा आणि लोक शाश्वत आहेत, हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे.’ परंतु, हे चुन्द, काही श्रमण व ब्राह्मण असे प्रतिपादन करणारे व अशी दृष्टी असणारे आहेत की— ‘आत्मा आणि लोक अशाश्वत आहेत... पे... आत्मा आणि लोक शाश्वत व अशाश्वत दोन्ही आहेत... आत्मा आणि लोक शाश्वतही नाहीत आणि अशाश्वतही नाहीत... आत्मा आणि लोक स्वयंकृत आहेत... आत्मा आणि लोक परकृत आहेत... आत्मा आणि लोक स्वयंकृत व परकृत दोन्ही आहेत... आत्मा आणि लोक स्वयंकृतही नाहीत आणि परकृतही नाहीत, तर ते अहेतुकपणे उत्पन्न झाले आहेत, हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे.’ ‘सुख-दुःख शाश्वत आहे... सुख-दुःख अशाश्वत आहे... सुख-दुःख शाश्वत आणि अशाश्वत दोन्ही आहे... सुख-दुःख शाश्वतही नाही आणि अशाश्वतही नाही... सुख-दुःख स्वयंकृत आहे... सुख-दुःख परकृत आहे... सुख-दुःख स्वयंकृत आणि परकृत दोन्ही आहे... सुख-दुःख स्वयंकृतही नाही आणि परकृतही नाही, तर ते अहेतुकपणे उत्पन्न झाले आहे, हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे.’” ๑๙๒. ‘‘ตตฺร, จุนฺท, เย เต สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘สสฺสโต อตฺตา จ โลโก จ, อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’นฺติ. ตฺยาหํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวํ วทามิ – ‘อตฺถิ นุ โข อิทํ, อาวุโส, วุจฺจติ – ‘‘สสฺสโต อตฺตา จ โลโก จา’’ติ? ยญฺจ โข เต เอวมาหํสุ – ‘อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’นฺติ. ตํ เตสํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อญฺญถาสญฺญิโนปิ เหตฺถ, จุนฺท, สนฺเตเก สตฺตา. อิมายปิ โข อหํ, จุนฺท, ปญฺญตฺติยา เนว อตฺตนา สมสมํ สมนุปสฺสามิ กุโต ภิยฺโย. อถ โข อหเมว ตตฺถ ภิยฺโย ยทิทํ อธิปญฺญตฺติ. १९२. “तेथे, हे चुन्द, जे श्रमण व ब्राह्मण असे प्रतिपादन करणारे व अशी दृष्टी असणारे आहेत की— ‘आत्मा आणि लोक शाश्वत आहेत, हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे.’ त्यांच्याजवळ जाऊन मी असे विचारतो— ‘हे आवुसो, तुम्ही जे म्हणता की, “आत्मा आणि लोक शाश्वत आहेत”, हे खरोखरच असे आहे का?’ आणि ते जे असे म्हणतात की— ‘हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे’, ते मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? कारण, हे चुन्द, या जगात इतर प्रकारे समजणारे काही प्राणी देखील आहेत. हे चुन्द, या प्रज्ञप्तीमध्ये मी माझ्या समान कोणालाही पाहत नाही, मग माझ्यापेक्षा श्रेष्ठ कोठून असणार? उलट, जी ही अधिप्रज्ञप्ती आहे, तिच्यामध्ये मीच श्रेष्ठ आहे.” ๑๙๓. ‘‘ตตฺร, จุนฺท, เย เต สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘อสสฺสโต อตฺตา จ โลโก จ…เป… สสฺสโต จ อสสฺสโต จ อตฺตา จ โลโก จ… เนวสสฺสโต นาสสฺสโต อตฺตา จ โลโก จ… สยํกโต อตฺตา จ โลโก จ… ปรํกโต อตฺตา จ โลโก จ… สยํกโต จ ปรํกโต จ อตฺตา จ โลโก จ… อสยํกาโร อปรํกาโร อธิจฺจสมุปฺปนฺโน อตฺตา จ โลโก จ… สสฺสตํ สุขทุกฺขํ… อสสฺสตํ สุขทุกฺขํ… สสฺสตญฺจ อสสฺสตญฺจ สุขทุกฺขํ… เนวสสฺสตํ นาสสฺสตํ สุขทุกฺขํ… สยํกตํ สุขทุกฺขํ… ปรํกตํ สุขทุกฺขํ… สยํกตญฺจ ปรํกตญฺจ สุขทุกฺขํ… อสยํการํ อปรํการํ อธิจฺจสมุปฺปนฺนํ สุขทุกฺขํ, อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’นฺติ. ตฺยาหํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวํ วทามิ – ‘อตฺถิ นุ โข อิทํ, อาวุโส, วุจฺจติ – ‘‘อสยํการํ อปรํการํ อธิจฺจสมุปฺปนฺนํ สุขทุกฺข’’’นฺติ? ยญฺจ โข เต เอวมาหํสุ – ‘อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’นฺติ. ตํ เตสํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อญฺญถาสญฺญิโนปิ เหตฺถ, จุนฺท, สนฺเตเก สตฺตา. อิมายปิ โข อหํ, จุนฺท, ปญฺญตฺติยา เนว อตฺตนา สมสมํ สมนุปสฺสามิ กุโต ภิยฺโย. อถ โข อหเมว ตตฺถ ภิยฺโย ยทิทํ อธิปญฺญตฺติ. อิเม โข เต, จุนฺท, ปุพฺพนฺตสหคตา ทิฏฺฐินิสฺสยา, เย โว มยา พฺยากตา, ยถา เต พฺยากาตพฺพา[Pg.115]. ยถา จ เต น พฺยากาตพฺพา, กึ โว อหํ เต ตถา พฺยากริสฺสามีติ ? १९३. “तेथे, हे चुन्द, जे श्रमण व ब्राह्मण असे प्रतिपादन करणारे व अशी दृष्टी असणारे आहेत की— ‘आत्मा आणि लोक अशाश्वत आहेत... पे... आत्मा आणि लोक शाश्वत व अशाश्वत दोन्ही आहेत... आत्मा आणि लोक शाश्वतही नाहीत आणि अशाश्वतही नाहीत... आत्मा आणि लोक स्वयंकृत आहेत... आत्मा आणि लोक परकृत आहेत... आत्मा आणि लोक स्वयंकृत व परकृत दोन्ही आहेत... आत्मा आणि लोक स्वयंकृतही नाहीत आणि परकृतही नाहीत, तर ते अहेतुकपणे उत्पन्न झाले आहेत... सुख-दुःख शाश्वत आहे... सुख-दुःख अशाश्वत आहे... सुख-दुःख शाश्वत आणि अशाश्वत दोन्ही आहे... सुख-दुःख शाश्वतही नाही आणि अशाश्वतही नाही... सुख-दुःख स्वयंकृत आहे... सुख-दुःख परकृत आहे... सुख-दुःख स्वयंकृत आणि परकृत दोन्ही आहे... सुख-दुःख स्वयंकृतही नाही आणि परकृतही नाही, तर ते अहेतुकपणे उत्पन्न झाले आहे, हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे.’ त्यांच्याजवळ जाऊन मी असे विचारतो— ‘हे आवुसो, तुम्ही जे म्हणता की, “सुख-दुःख स्वयंकृतही नाही आणि परकृतही नाही, तर ते अहेतुकपणे उत्पन्न झाले आहे”, हे खरोखरच असे आहे का?’ आणि ते जे असे म्हणतात की— ‘हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे’, ते मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? कारण, हे चुन्द, या जगात इतर प्रकारे समजणारे काही प्राणी देखील आहेत. हे चुन्द, या प्रज्ञप्तीमध्ये मी माझ्या समान कोणालाही पाहत नाही, मग माझ्यापेक्षा श्रेष्ठ कोठून असणार? उलट, जी ही अधिप्रज्ञप्ती आहे, तिच्यामध्ये मीच श्रेष्ठ आहे. हे चुन्द, भूतकाळाशी संबंधित ती दृष्टी-आश्रय हीच आहेत, जी मी तुम्हाला ज्या प्रकारे स्पष्ट करायला हवीत, त्या प्रकारे स्पष्ट केली आहेत. आणि ज्या प्रकारे ती स्पष्ट करायला नकोत, त्या प्रकारे मी ती तुम्हाला का स्पष्ट करू?” อปรนฺตสหคตทิฏฺฐินิสฺสยา भविष्यकाळाशी संबंधित दृष्टी-आश्रय ๑๙๔. ‘‘กตเม จ เต, จุนฺท, อปรนฺตสหคตา ทิฏฺฐินิสฺสยา, เย โว มยา พฺยากตา, ยถา เต พฺยากาตพฺพา. (ยถา จ เต น พฺยากาตพฺพา, กึ โว อหํ เต ตถา พฺยากริสฺสามี) ? สนฺติ, จุนฺท, เอเก สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘รูปี อตฺตา โหติ อโรโค ปรํ มรณา, อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’นฺติ. สนฺติ ปน, จุนฺท, เอเก สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘อรูปี อตฺตา โหติ…เป… รูปี จ อรูปี จ อตฺตา โหติ… เนวรูปี นารูปี อตฺตา โหติ… สญฺญี อตฺตา โหติ… อสญฺญี อตฺตา โหติ… เนวสญฺญีนาสญฺญี อตฺตา โหติ… อตฺตา อุจฺฉิชฺชติ วินสฺสติ น โหติ ปรํ มรณา, อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’นฺติ. ตตฺร, จุนฺท, เย เต สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘รูปี อตฺตา โหติ อโรโค ปรํ มรณา, อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’นฺติ. ตฺยาหํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวํ วทามิ – ‘อตฺถิ นุ โข อิทํ, อาวุโส, วุจฺจติ – ‘‘รูปี อตฺตา โหติ อโรโค ปรํ มรณา’’’ติ? ยญฺจ โข เต เอวมาหํสุ – ‘อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’นฺติ. ตํ เตสํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อญฺญถาสญฺญิโนปิ เหตฺถ, จุนฺท, สนฺเตเก สตฺตา. อิมายปิ โข อหํ, จุนฺท, ปญฺญตฺติยา เนว อตฺตนา สมสมํ สมนุปสฺสามิ กุโต ภิยฺโย. อถ โข อหเมว ตตฺถ ภิยฺโย ยทิทํ อธิปญฺญตฺติ. १९४. “आणि हे चुन्द, भविष्यकाळाशी संबंधित ती दृष्टी-आश्रय कोणती आहेत, जी मी तुम्हाला ज्या प्रकारे स्पष्ट करायला हवीत, त्या प्रकारे स्पष्ट केली आहेत? (आणि ज्या प्रकारे ती स्पष्ट करायला नकोत, त्या प्रकारे मी ती तुम्हाला का स्पष्ट करू?) हे चुन्द, काही श्रमण व ब्राह्मण असे प्रतिपादन करणारे व अशी दृष्टी असणारे आहेत की— ‘मृत्यूनंतर आत्मा रूपी आणि निरोगी असतो, हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे.’ परंतु, हे चुन्द, काही श्रमण व ब्राह्मण असे प्रतिपादन करणारे व अशी दृष्टी असणारे आहेत की— ‘आत्मा अरूपी असतो... पे... आत्मा रूपी आणि अरूपी दोन्ही असतो... आत्मा रूपीही नसतो आणि अरूपीही नसतो... आत्मा संज्ञी असतो... आत्मा असंज्ञी असतो... आत्मा संज्ञीही नसतो आणि असंज्ञीही नसतो... मृत्यू झाल्यावर आत्म्याचा उच्छेद होतो, तो नष्ट होतो, मृत्यूनंतर तो अस्तित्वात राहत नाही, हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे.’ तेथे, हे चुन्द, जे श्रमण व ब्राह्मण असे प्रतिपादन करणारे व अशी दृष्टी असणारे आहेत की— ‘मृत्यूनंतर आत्मा रूपी आणि निरोगी असतो, हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे.’ त्यांच्याजवळ जाऊन मी असे विचारतो— ‘हे आवुसो, तुम्ही जे म्हणता की, “मृत्यूनंतर आत्मा रूपी आणि निरोगी असतो”, हे खरोखरच असे आहे का?’ आणि ते जे असे म्हणतात की— ‘हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे’, ते मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? कारण, हे चुन्द, या जगात इतर प्रकारे समजणारे काही प्राणी देखील आहेत. हे चुन्द, या प्रज्ञप्तीमध्ये मी माझ्या समान कोणालाही पाहत नाही, मग माझ्यापेक्षा श्रेष्ठ कोठून असणार? उलट, जी ही अधिप्रज्ञप्ती आहे, तिच्यामध्ये मीच श्रेष्ठ आहे.” ๑๙๕. ‘‘ตตฺร, จุนฺท, เย เต สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – ‘อรูปี อตฺตา โหติ…เป… รูปี จ อรูปี จ อตฺตา โหติ… เนวรูปีนารูปี อตฺตา โหติ… สญฺญี อตฺตา โหติ… อสญฺญี อตฺตา โหติ… เนวสญฺญีนาสญฺญี อตฺตา โหติ… อตฺตา อุจฺฉิชฺชติ วินสฺสติ น โหติ ปรํ มรณา, อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’นฺติ. ตฺยาหํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวํ วทามิ – ‘อตฺถิ นุ โข อิทํ, อาวุโส, วุจฺจติ – ‘‘อตฺตา อุจฺฉิชฺชติ วินสฺสติ น โหติ ปรํ มรณา’’’ติ? ยญฺจ โข เต, จุนฺท, เอวมาหํสุ – ‘อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’นฺติ. ตํ เตสํ นานุชานามิ. ตํ กิสฺส เหตุ? อญฺญถาสญฺญิโนปิ เหตฺถ, จุนฺท, สนฺเตเก สตฺตา. อิมายปิ โข อหํ, จุนฺท, ปญฺญตฺติยา เนว อตฺตนา [Pg.116] สมสมํ สมนุปสฺสามิ, กุโต ภิยฺโย. อถ โข อหเมว ตตฺถ ภิยฺโย ยทิทํ อธิปญฺญตฺติ. อิเม โข เต, จุนฺท, อปรนฺตสหคตา ทิฏฺฐินิสฺสยา, เย โว มยา พฺยากตา, ยถา เต พฺยากาตพฺพา. ยถา จ เต น พฺยากาตพฺพา, กึ โว อหํ เต ตถา พฺยากริสฺสามีติ ? १९५. चुन्द, त्या श्रमण-ब्राह्मणांपैकी जे असे प्रतिपादन करणारे व अशी दृष्टी बाळगणारे आहेत की – 'आत्मा अरूपी (अमूर्त) असतो...पे... आत्मा रूपी (मूर्त) आणि अरूपी दोन्ही असतो... आत्मा रूपीही नसतो आणि अरूपीही नसतो... आत्मा संज्ञी (सचेतन) असतो... आत्मा असंज्ञी (अचेतन) असतो... आत्मा संज्ञीही नसतो आणि असंज्ञीही नसतो... मृत्यूच्या नंतर आत्मा उच्छिन्न होतो, नष्ट होतो, अस्तित्वात राहत नाही; हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे.' त्यांच्याजवळ जाऊन मी त्यांना असे विचारतो – 'हे आवुसो (मित्रांनो), तुम्ही जे असे म्हणता की – "मृत्यूनंतर आत्मा उच्छिन्न होतो, नष्ट होतो, अस्तित्वात राहत नाही," हे खरोखरच असे आहे का?' आणि चुन्द, ते जे असे म्हणतात की – 'हेच सत्य आहे आणि इतर सर्व व्यर्थ आहे,' त्यांच्या या विधानाला मी संमती देत नाही. त्याचे कारण काय? कारण, चुन्द, या जगात इतर प्रकारे विचार करणारे (भिन्न मत बाळगणारे) काही प्राणी देखील अस्तित्वात आहेत. चुन्द, या सिद्धांताच्या बाबतीत मी स्वतःच्या समान दर्जाचा कोणी पाहत नाही, मग श्रेष्ठ असण्याचा तर प्रश्नच कुठे येतो! उलट, या बाबतीत मीच श्रेष्ठ आहे, ज्याला 'अधिप्रज्ञा' (उच्च प्रज्ञा) असे म्हणतात. चुन्द, हे भविष्यकाळाशी संबंधित (अपरान्तसहगत) दृष्टीचे आश्रय (मिथ्या दृष्टिकोनांचे आधार) आहेत, जे मी तुम्हाला स्पष्ट करून सांगितले आहेत, ज्या प्रकारे ते स्पष्ट केले पाहिजेत. आणि ज्या प्रकारे ते स्पष्ट केले जाऊ नयेत, त्या प्रकारे मी ते तुम्हाला का स्पष्ट करू? ๑๙๖. ‘‘อิเมสญฺจ, จุนฺท, ปุพฺพนฺตสหคตานํ ทิฏฺฐินิสฺสยานํ อิเมสญฺจ อปรนฺตสหคตานํ ทิฏฺฐินิสฺสยานํ ปหานาย สมติกฺกมาย เอวํ มยา จตฺตาโร สติปฏฺฐานา เทสิตา ปญฺญตฺตา. กตเม จตฺตาโร? อิธ, จุนฺท, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. เวทนาสุ เวทนานุปสฺสี…เป… จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสี… ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา, วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. อิเมสญฺจ จุนฺท, ปุพฺพนฺตสหคตานํ ทิฏฺฐินิสฺสยานํ อิเมสญฺจ อปรนฺตสหคตานํ ทิฏฺฐินิสฺสยานํ ปหานาย สมติกฺกมาย. เอวํ มยา อิเม จตฺตาโร สติปฏฺฐานา เทสิตา ปญฺญตฺตา’’ติ. १९६. आणि चुन्द, भूतकाळाशी संबंधित (पूर्वान्तसहगत) या मिथ्या दृष्टिकोनांच्या आणि भविष्यकाळाशी संबंधित (अपरान्तसहगत) या मिथ्या दृष्टिकोनांच्या प्रहाणासाठी (त्याग करण्यासाठी) व त्यांच्या पलीकडे जाण्यासाठी मी चार सतिपट्ठान (स्मृतीचे प्रस्थान) उपदेशिले आहेत, प्रज्ञप्त केले आहेत. ते चार कोणते? येथे, चुन्द, भिक्खू कायेमध्ये कायेचे अनुदर्शन करत (कायेवर लक्ष ठेवत), उद्योगी (आतपी), संप्रजन्ययुक्त (जागरूक) आणि स्मृतिमान होऊन, लोकांमधील अभिज्झा (लोभ) आणि दोमनस्स (दौर्मनस्य/खिन्नता) दूर करून विहरतो. वेदनांमध्ये वेदनांचे अनुदर्शन करत...पे... चित्तामध्ये चित्ताचे अनुदर्शन करत... धम्मांमध्ये धम्मांचे अनुदर्शन करत, उद्योगी, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान होऊन, लोकांमधील अभिज्झा आणि दोमनस्स दूर करून विहरतो. चुन्द, भूतकाळाशी संबंधित या मिथ्या दृष्टिकोनांच्या आणि भविष्यकाळाशी संबंधित या मिथ्या दृष्टिकोनांच्या प्रहाणासाठी व त्यांच्या पलीकडे जाण्यासाठी मी हे चार सतिपट्ठान उपदेशिले आहेत, प्रज्ञप्त केले आहेत. ๑๙๗. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา อุปวาโณ ภควโต ปิฏฺฐิโต ฐิโต โหติ ภควนฺตํ พีชยมาโน. อถ โข อายสฺมา อุปวาโณ ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต! ปาสาทิโก วตายํ, ภนฺเต, ธมฺมปริยาโย; สุปาสาทิโก วตายํ ภนฺเต, ธมฺมปริยาโย, โก นามายํ ภนฺเต ธมฺมปริยาโย’’ติ? ‘‘ตสฺมาติห ตฺวํ, อุปวาณ, อิมํ ธมฺมปริยายํ ‘ปาสาทิโก’ ตฺเวว นํ ธาเรหี’’ติ. อิทมโวจ ภควา. อตฺตมโน อายสฺมา อุปวาโณ ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทีติ. १९७. त्या वेळी आयुष्यमान उपवाण भगवंतांच्या मागे उभे राहून त्यांना पंख्याने वारा घालत होते. तेव्हा आयुष्यमान उपवाण भगवंतांना असे म्हणाले – 'आश्चर्य आहे, भन्ते! अद्भुत आहे, भन्ते! भन्ते, हा धम्मपर्याय (धम्म प्रवचन) अत्यंत प्रसन्नता देणारा आहे; भन्ते, हा धम्मपर्याय अतिशय चित्तप्रसन्नकारक आहे. भन्ते, या धम्मपर्यायाचे नाव काय आहे?' 'म्हणूनच, उपवाण, तू या धम्मपर्यायाला "पासादिक" (प्रसन्नता देणारा) याच नावाने लक्षात ठेव.' भगवंत असे म्हणाले. संतुष्ट झालेल्या आयुष्यमान उपवाण यांनी भगवंतांच्या भाषणाचे मनापासून अभिनंदन (स्वागत) केले. ปาสาทิกสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ ฉฏฺฐํ. सहावे पासादिक सुत्त समाप्त झाले. ๗. ลกฺขณสุตฺตํ ७. लक्खण सुत्त ทฺวตฺตึสมหาปุริสลกฺขณานิ महापुरुषाची बत्तीस लक्षणे ๑๙๘. เอวํ [Pg.117] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ภิกฺขโว’’ติ. ‘‘ภทฺทนฺเต’’ติ เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – १९८. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवंत श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहरत होते. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – 'हे भिक्खूहो!' 'भन्ते!' असे म्हणून त्या भिक्खूंनी भगवंतांना प्रतिसाद दिला. भगवंत असे म्हणाले – ๑๙๙. ‘‘ทฺวตฺตึสิมานิ, ภิกฺขเว, มหาปุริสสฺส มหาปุริสลกฺขณานิ, เยหิ สมนฺนาคตสฺส มหาปุริสสฺส ทฺเวว คติโย ภวนฺติ อนญฺญา. สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี ธมฺมิโก ธมฺมราชา จาตุรนฺโต วิชิตาวี ชนปทตฺถาวริยปฺปตฺโต สตฺตรตนสมนฺนาคโต. ตสฺสิมานิ สตฺต รตนานิ ภวนฺติ; เสยฺยถิทํ, จกฺกรตนํ หตฺถิรตนํ อสฺสรตนํ มณิรตนํ อิตฺถิรตนํ คหปติรตนํ ปริณายกรตนเมว สตฺตมํ. ปโรสหสฺสํ โข ปนสฺส ปุตฺตา ภวนฺติ สูรา วีรงฺครูปา ปรเสนปฺปมทฺทนา. โส อิมํ ปถวึ สาครปริยนฺตํ อทณฺเฑน อสตฺเถน ธมฺเมน อภิวิชิย อชฺฌาวสติ. สเจ โข ปน อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชติ, อรหํ โหติ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก วิวฏฺฏจฺฉโท. १९९. भिक्खूहो, महापुरुषाची ही बत्तीस महापुरुष लक्षणे आहेत, ज्यांनी युक्त असलेल्या महापुरुषाला केवळ दोनच गती (मार्ग) प्राप्त होतात, तिसरी नाही. जर तो गृहस्थाश्रमात राहिला, तर तो चक्रवर्ती राजा होतो – धार्मिक, धम्मराजा, चारही दिशांवर विजय मिळवणारा, आपल्या राज्याला स्थैर्य देणारा आणि सात रत्नांनी संपन्न असलेला. त्याच्याकडे ही सात रत्ने असतात; ती म्हणजे – चक्ररत्न, हत्तीरत्न, अश्वरत्न, मणिरत्न, स्त्रीरत्न, गृहपतीरत्न आणि सातवे परिणायकरत्न (सल्लागार/सेनापती रत्न). त्याला एक हजाराहून अधिक शूर, वीर, पराक्रमी आणि शत्रूच्या सैन्याचा पाडाव करणारे पुत्र असतात. तो या समुद्रापर्यंत पसरलेल्या पृथ्वीवर दंडाशिवाय आणि शस्त्राशिवाय, केवळ धम्माच्या आधारे विजय मिळवून राज्य करतो. परंतु, जर त्याने घराचा त्याग करून अनगारिक (प्रव्रजित) अवस्था स्वीकारली, तर तो जगात अराहत, सम्यक्संबुद्ध होतो, जो जगावरील अज्ञानाचा पडदा दूर करतो. ๒๐๐. ‘‘กตมานิ จ ตานิ, ภิกฺขเว, ทฺวตฺตึส มหาปุริสสฺส มหาปุริสลกฺขณานิ, เยหิ สมนฺนาคตสฺส มหาปุริสสฺส ทฺเวว คติโย ภวนฺติ อนญฺญา? สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี…เป… สเจ โข ปน อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชติ, อรหํ โหติ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก วิวฏฺฏจฺฉโท. २००. आणि भिक्खूहो, महापुरुषाची ती बत्तीस महापुरुष लक्षणे कोणती आहेत, ज्यांनी युक्त असलेल्या महापुरुषाला केवळ दोनच गती प्राप्त होतात, तिसरी नाही? जर तो गृहस्थाश्रमात राहिला, तर तो चक्रवर्ती राजा होतो...पे... परंतु, जर त्याने घराचा त्याग करून अनगारिक अवस्था स्वीकारली, तर तो जगात अराहत, सम्यक्संबुद्ध होतो, जो जगावरील अज्ञानाचा पडदा दूर करतो. ‘‘อิธ, ภิกฺขเว, มหาปุริโส สุปฺปติฏฺฐิตปาโท โหติ. ยมฺปิ, ภิกฺขเว, มหาปุริโส สุปฺปติฏฺฐิตปาโท โหติ, อิทมฺปิ, ภิกฺขเว, มหาปุริสสฺส มหาปุริสลกฺขณํ ภวติ. येथे, भिक्खूहो, महापुरुषाचे पाऊल जमिनीवर समतोलपणे आणि व्यवस्थितपणे टेकणारे (सुप्रतिष्ठितपाद) असते. भिक्खूहो, महापुरुषाचे पाऊल जे समतोलपणे टेकणारे असते, हे देखील महापुरुषाचे एक महापुरुष लक्षण आहे. ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, มหาปุริสสฺส เหฏฺฐาปาทตเลสุ จกฺกานิ ชาตานิ โหนฺติ สหสฺสารานิ สเนมิกานิ สนาภิกานิ สพฺพาการปริปูรานิ. ยมฺปิ[Pg.118], ภิกฺขเว, มหาปุริสสฺส เหฏฺฐาปาทตเลสุ จกฺกานิ ชาตานิ โหนฺติ สหสฺสารานิ สเนมิกานิ สนาภิกานิ สพฺพาการปริปูรานิ, อิทมฺปิ, ภิกฺขเว, มหาปุริสสฺส มหาปุริสลกฺขณํ ภวติ. पुन्हा आणखी असे की, भिक्खूहो, महापुरुषाच्या दोन्ही पायांच्या तळव्यांवर हजार आरे (कणा) असलेली, धाव (नेमी) आणि कणा (नाभी) यांनी युक्त असलेली आणि सर्व प्रकारे परिपूर्ण अशी चक्रे उमटलेली असतात. भिक्खूहो, महापुरुषाच्या पायांच्या तळव्यांवर हजार आरे असलेली, धाव आणि कणा यांनी युक्त असलेली आणि सर्व प्रकारे परिपूर्ण अशी चक्रे उमटलेली असतात, हे देखील महापुरुषाचे एक महापुरुष लक्षण आहे. ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, มหาปุริโส อายตปณฺหิ โหติ…เป… ทีฆงฺคุลิ โหติ… มุทุตลุนหตฺถปาโท โหติ… ชาลหตฺถปาโท โหติ… อุสฺสงฺขปาโท โหติ… เอณิชงฺโฆ โหติ… ฐิตโกว อโนนมนฺโต อุโภหิ ปาณิตเลหิ ชณฺณุกานิ ปริมสติ ปริมชฺชติ… โกโสหิตวตฺถคุยฺโห โหติ… สุวณฺณวณฺโณ โหติ กญฺจนสนฺนิภตฺตโจ… สุขุมจฺฉวิ โหติ, สุขุมตฺตา ฉวิยา รโชชลฺลํ กาเย น อุปลิมฺปติ… เอเกกโลโม โหติ, เอเกกานิ โลมานิ โลมกูเปสุ ชาตานิ… อุทฺธคฺคโลโม โหติ, อุทฺธคฺคานิ โลมานิ ชาตานิ นีลานิ อญฺชนวณฺณานิ กุณฺฑลาวฏฺฏานิ ทกฺขิณาวฏฺฏกชาตานิ … พฺรหฺมุชุคตฺโต โหติ… สตฺตุสฺสโท โหติ… สีหปุพฺพทฺธกาโย โหติ… จิตนฺตรํโส โหติ… นิคฺโรธปริมณฺฑโล โหติ, ยาวตกฺวสฺส กาโย ตาวตกฺวสฺส พฺยาโม ยาวตกฺวสฺส พฺยาโม ตาวตกฺวสฺส กาโย… สมวฏฺฏกฺขนฺโธ โหติ… รสคฺคสคฺคี โหติ… สีหหนุ โหติ… จตฺตาลีสทนฺโต โหติ … สมทนฺโต โหติ… อวิรฬทนฺโต โหติ… สุสุกฺกทาโฐ โหติ… ปหูตชิวฺโห โหติ… พฺรหฺมสฺสโร โหติ กรวีกภาณี… อภินีลเนตฺโต โหติ… โคปขุโม โหติ… อุณฺณา ภมุกนฺตเร ชาตา โหติ, โอทาตา มุทุตูลสนฺนิภา. ยมฺปิ, ภิกฺขเว, มหาปุริสสฺส อุณฺณา ภมุกนฺตเร ชาตา โหติ, โอทาตา มุทุตูลสนฺนิภา, อิทมฺปิ, ภิกฺขเว, มหาปุริสสฺส มหาปุริสลกฺขณํ ภวติ. पुन्हा आणखी, भिक्खूहो! महापुरुष लांब टाचा असलेले असतात... लांब बोटे असलेले असतात... मऊ आणि कोमल हात-पाय असलेले असतात... जाळीदार हात-पाय असलेले असतात... उंचावलेले घोटे असलेले असतात... एणी हरणासारख्या जंघा असलेले असतात... न वाकता सरळ उभे राहून दोन्ही हातांच्या तळव्यांनी गुडघ्यांना स्पर्श करू शकणारे व चोळू शकणारे असतात... कोशात झाकलेले गुप्तेंद्रिय असलेले असतात... सुवर्णवर्णीय आणि सोन्यासारखी त्वचा असलेले असतात... अतिशय सुकुमार त्वचा असलेले असतात, ज्याच्या सुकुमारतेमुळे शरीराला धूळ व मळ चिकटत नाही... शरीरावर एक-एक रोमछिद्रात एक-एकच केस असलेले असतात... वरच्या दिशेने वाढणारे केस असलेले असतात, जे गडद निळे, काजळासारख्या रंगाचे, उजवीकडे वळलेले आणि प्रदक्षिणाकार वेटोळे असलेले असतात... ब्रह्मदेवासारखे सरळ शरीर असलेले असतात... सात ठिकाणी मांसल व भरदार अवयव असलेले असतात... सिंहाच्या पुढील भागासारखे शरीर असलेले असतात... दोन्ही खांद्यांमधील भाग भरदार असलेले असतात... वटवृक्षासारखे परिमंडळ असलेले असतात, जितकी त्यांच्या शरीराची उंची असते तितकाच त्यांच्या पसरलेल्या हातांचा विस्तार असतो आणि जितका पसरलेल्या हातांचा विस्तार असतो तितकीच त्यांच्या शरीराची उंची असते... समप्रमाणात गोल खांदे असलेले असतात... उत्कृष्ट रसवाहिन्या असलेले असतात... सिंहासारखा जबडा असलेले असतात... चाळीस दात असलेले असतात... समान दात असलेले असतात... दाटीव (विरळ नसलेले) दात असलेले असतात... अतिशय पांढरे शुभ्र सुळे असलेले असतात... लांब व विस्तीर्ण जीभ असलेले असतात... ब्रह्मदेवासारखा गंभीर आवाज असलेले आणि करवीक पक्षासारखे मधुर बोलणारे असतात... अतिशय गडद निळे डोळे असलेले असतात... गायीच्या पापण्यांसारख्या पापण्या असलेले असतात... दोन्ही भुवयांच्या मध्ये मऊ कापसासारखी पांढरी शुभ्र 'उर्णा' (लोकर/केस) उगवलेली असते. भिक्खूहो, महापुरुषाच्या दोन्ही भुवयांच्या मध्ये जी मऊ कापसासारखी पांढरी शुभ्र उर्णा उगवलेली असते, हेसुद्धा, भिक्खूहो, महापुरुषाचे महापुरुषलक्षण आहे. ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, มหาปุริโส อุณฺหีสสีโส โหติ. ยมฺปิ, ภิกฺขเว, มหาปุริโส อุณฺหีสสีโส โหติ, อิทมฺปิ, ภิกฺขเว, มหาปุริสสฺส มหาปุริสลกฺขณํ ภวติ. पुन्हा आणखी, भिक्खूहो! महापुरुष उष्णीष-शीर्ष (मुकुट घातल्यासारखे किंवा पगडीसारखे शिर) असलेले असतात. भिक्खूहो, महापुरुष जे उष्णीष-शीर्ष असलेले असतात, हेसुद्धा, भिक्खूहो, महापुरुषाचे महापुरुषलक्षण आहे. ‘‘อิมานิ โข ตานิ, ภิกฺขเว, ทฺวตฺตึส มหาปุริสสฺส มหาปุริสลกฺขณานิ, เยหิ สมนฺนาคตสฺส มหาปุริสสฺส ทฺเวว คติโย ภวนฺติ อนญฺญา. สเจ [Pg.119] อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี…เป… สเจ โข ปน อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชติ, อรหํ โหติ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก วิวฏฺฏจฺฉโท. भिक्खूहो, हीच ती महापुरुषाची बत्तीस महापुरुषलक्षणे आहेत, ज्यांनी युक्त असलेल्या महापुरुषाच्या केवळ दोनच गती (मार्ग) असतात, तिसरी नाही. जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर चक्रवर्ती राजा होतात... आणि जर त्यांनी घराचा त्याग करून गृहहीन प्रव्रज्या घेतली, तर ते लोकात अज्ञानरूपी पडदा दूर करणारे अर्हत, सम्यक सम्बुद्ध होतात. ‘‘อิมานิ โข, ภิกฺขเว, ทฺวตฺตึส มหาปุริสสฺส มหาปุริสลกฺขณานิ พาหิรกาปิ อิสโย ธาเรนฺติ, โน จ โข เต ชานนฺติ – ‘อิมสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา อิทํ ลกฺขณํ ปฏิลภตี’ติ. भिक्खूहो, महापुरुषाची ही बत्तीस महापुरुषलक्षणे बाहेरील (इतर पंथांचे) ऋषीसुद्धा लक्षात ठेवतात; परंतु त्यांना हे माहीत नसते की, 'कोणत्या कर्माच्या आचरणामुळे हे लक्षण प्राप्त होते'. (๑) สุปฺปติฏฺฐิตปาทตาลกฺขณํ (१) सुप्रतिष्ठित पादता लक्षण (समपातळीवर पाय टेकण्याचे लक्षण) ๒๐๑. ‘‘ยมฺปิ, ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ ปุริมํ ภวํ ปุริมํ นิเกตํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน ทฬฺหสมาทาโน อโหสิ กุสเลสุ ธมฺเมสุ, อวตฺถิตสมาทาโน กายสุจริเต วจีสุจริเต มโนสุจริเต ทานสํวิภาเค สีลสมาทาเน อุโปสถุปวาเส มตฺเตยฺยตาย เปตฺเตยฺยตาย สามญฺญตาย พฺรหฺมญฺญตาย กุเล เชฏฺฐาปจายิตาย อญฺญตรญฺญตเรสุ จ อธิกุสเลสุ ธมฺเมสุ. โส ตสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา อุปจิตตฺตา อุสฺสนฺนตฺตา วิปุลตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. โส ตตฺถ อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคฺคณฺหาติ ทิพฺเพน อายุนา ทิพฺเพน วณฺเณน ทิพฺเพน สุเขน ทิพฺเพน ยเสน ทิพฺเพน อาธิปเตยฺเยน ทิพฺเพหิ รูเปหิ ทิพฺเพหิ สทฺเทหิ ทิพฺเพหิ คนฺเธหิ ทิพฺเพหิ รเสหิ ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. โส ตโต จุโต อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมํ มหาปุริสลกฺขณํ ปฏิลภติ. สุปฺปติฏฺฐิตปาโท โหติ. สมํ ปาทํ ภูมิยํ นิกฺขิปติ, สมํ อุทฺธรติ, สมํ สพฺพาวนฺเตหิ ปาทตเลหิ ภูมึ ผุสติ. २०१. भिक्खूहो, तथागत जेव्हा पूर्वजन्मात, पूर्वभवात, पूर्ववासात मनुष्यरूपात होते, तेव्हा ते कुशल धर्मांचे दृढतेने आचरण करणारे होते. ते कायिक सुचरित, वाचिक सुचरित, मानसिक सुचरित, दान व वाटप, शील ग्रहण करणे, उपोसथ व्रत पाळणे, माता-पित्यांची सेवा करणे, श्रमण व ब्राह्मणांचा आदर करणे, कुळातील ज्येष्ठांचा मान राखणे आणि इतर विविध अति-कुशल धर्मांचे दृढतेने व न डगमगता आचरण करणारे होते. त्या कर्माचे आचरण केल्यामुळे, ते संचित केल्यामुळे, विपुल व विस्तृत केल्यामुळे, शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर ते सुगती अशा स्वर्गलोकात उत्पन्न झाले. तिथे त्यांनी इतर देवांना दहा बाबींमध्ये मागे टाकले—दिव्य आयुष्य, दिव्य वर्ण, दिव्य सुख, दिव्य यश, दिव्य आधिपत्य, दिव्य रूप, दिव्य शब्द, दिव्य गंध, दिव्य रस आणि दिव्य स्पर्श. तिथून च्युत होऊन (मृत्यू पावून) या मनुष्यलोकात आल्यावर त्यांना हे महापुरुषलक्षण प्राप्त झाले—ते सुप्रतिष्ठित पाद (समपातळीवर पाय टेकणारे) झाले. ते आपला पाय जमिनीवर समप्रमाणात ठेवतात, समप्रमाणात उचलतात आणि संपूर्ण पाऊल जमिनीला समप्रमाणात स्पर्श करते. ๒๐๒. ‘‘โส เตน ลกฺขเณน สมนฺนาคโต สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี ธมฺมิโก ธมฺมราชา จาตุรนฺโต วิชิตาวี ชนปทตฺถาวริยปฺปตฺโต สตฺตรตนสมนฺนาคโต. ตสฺสิมานิ สตฺต รตนานิ ภวนฺติ; เสยฺยถิทํ, จกฺกรตนํ หตฺถิรตนํ อสฺสรตนํ มณิรตนํ อิตฺถิรตนํ คหปติรตนํ ปริณายกรตนเมว สตฺตมํ. ปโรสหสฺสํ โข ปนสฺส ปุตฺตา ภวนฺติ สูรา วีรงฺครูปา ปรเสนปฺปมทฺทนา. โส อิมํ ปถวึ สาครปริยนฺตํ อขิลมนิมิตฺตมกณฺฏกํ อิทฺธํ ผีตํ เขมํ สิวํ นิรพฺพุทํ อทณฺเฑน อสตฺเถน ธมฺเมน อภิวิชิย อชฺฌาวสติ[Pg.120]. ราชา สมาโน กึ ลภติ? อกฺขมฺภิโย โหติ เกนจิ มนุสฺสภูเตน ปจฺจตฺถิเกน ปจฺจามิตฺเตน. ราชา สมาโน อิทํ ลภติ. ‘‘สเจ โข ปน อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชติ, อรหํ โหติ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก วิวฏฺฏจฺฉโท. พุทฺโธ สมาโน กึ ลภติ? อกฺขมฺภิโย โหติ อพฺภนฺตเรหิ วา พาหิเรหิ วา ปจฺจตฺถิเกหิ ปจฺจามิตฺเตหิ ราเคน วา โทเสน วา โมเหน วา สมเณน วา พฺราหฺมเณน วา เทเวน วา มาเรน วา พฺรหฺมุนา วา เกนจิ วา โลกสฺมึ. พุทฺโธ สมาโน อิทํ ลภติ’’. เอตมตฺถํ ภควา อโวจ. २०२. या लक्षणाने युक्त होऊन जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर ते चक्रवर्ती राजा होतात—धार्मिक, धर्मराजे, चारही दिशांचे विजेते, जनपदांमध्ये स्थैर्य प्रस्थापित करणारे आणि सप्त रत्नांनी युक्त. त्यांच्याकडे ही सात रत्ने असतात, ती म्हणजे—चक्ररत्न, हत्तीरत्न, अश्वरत्न, मणिरत्न, स्त्रीरत्न, गृहपतीरत्न आणि सातवे परिणायकरत्न (सेनापतीरत्न). त्यांना एक हजाराहून अधिक शूर, वीर, शत्रूच्या सैन्याचा नाश करणारे पुत्र असतात. ते या समुद्रापर्यंत पसरलेल्या पृथ्वीला दंडाशिवाय, शस्त्राशिवाय, केवळ धर्माने जिंकून निष्कंटक, समृद्ध, सुरक्षित, कल्याणकारी आणि उपद्रवमुक्त करून राज्य करतात. राजा असताना त्यांना काय लाभ होतो? कोणत्याही मानवी शत्रूकडून किंवा विरोधकाकडून त्यांना बाधा पोहोचवली जाऊ शकत नाही. राजा असताना त्यांना हा लाभ मिळतो. आणि जर त्यांनी घराचा त्याग करून गृहहीन प्रव्रज्या घेतली, तर ते लोकात अज्ञानरूपी पडदा दूर करणारे अर्हत, सम्यक सम्बुद्ध होतात. बुद्ध झाल्यावर त्यांना काय लाभ होतो? राग, द्वेष किंवा मोहासारख्या अंतर्गत शत्रूंकडून किंवा बाहेरील शत्रूंकडून, कोणत्याही श्रमण, ब्राह्मण, देव, मार, ब्रह्मदेव किंवा जगातील कोणत्याही प्राण्याकडून त्यांना बाधा पोहोचवली जाऊ शकत नाही. बुद्ध झाल्यावर त्यांना हा लाभ मिळतो." भगवंतांनी हा अर्थ सांगितला. ๒๐๓. ตตฺเถตํ วุจฺจติ – २०३. या संदर्भात हे म्हटले आहे— ‘‘สจฺเจ จ ธมฺเม จ ทเม จ สํยเม,โสเจยฺยสีลาลยุโปสเถสุ จ; ทาเน อหึสาย อสาหเส รโต,ทฬฺหํ สมาทาย สมตฺตมาจริ. सत्य, धर्म, इंद्रियसंयम आणि आत्मसंयम, शुचिता, शीलरूपी आश्रय आणि उपोसथ व्रत; दान, अहिंसा आणि अक्रोध यात मग्न राहून, त्यांनी या कल्याणकारी मार्गाचे दृढतेने व पूर्णपणे आचरण केले. ‘‘โส เตน กมฺเมน ทิวํ สมกฺกมิ,สุขญฺจ ขิฑฺฑารติโย จ อนฺวภิ ; ตโต จวิตฺวา ปุนราคโต อิธ,สเมหิ ปาเทหิ ผุสี วสุนฺธรํ. त्या कर्माच्या प्रभावाने ते स्वर्गलोकात गेले, तिथे त्यांनी सुख आणि क्रीडारतीचा (आनंदाचा) उपभोग घेतला. तिथून च्युत होऊन जेव्हा ते पुन्हा या मनुष्यलोकात आले, तेव्हा त्यांच्या समपातळीवरील पावलांनी पृथ्वीला स्पर्श केला. ‘‘พฺยากํสุ เวยฺยญฺชนิกา สมาคตา,สมปฺปติฏฺฐสฺส น โหติ ขมฺภนา; คิหิสฺส วา ปพฺพชิตสฺส วา ปุน,ตํ ลกฺขณํ ภวติ ตทตฺถโชตกํ. एकत्र आलेल्या लक्षणवेत्त्यांनी (भविष्य सांगणाऱ्यांनी) भाकीत केले की, 'ज्यांचे पाय जमिनीवर समप्रमाणात टेकतात, त्यांना कोणीही रोखू शकत नाही; मग ते गृहस्थ असोत वा प्रव्रजित, हे लक्षण याच अर्थाचे द्योतक आहे.' ‘‘อกฺขมฺภิโย โหติ อคารมาวสํ,ปราภิภู สตฺตุภิ นปฺปมทฺทโน; มนุสฺสภูเตนิธ โหติ เกนจิ,อกฺขมฺภิโย ตสฺส ผเลน กมฺมุโน. गृहस्थाश्रमात राहिल्यास ते अजिंक्य होतात, इतरांना पराभूत करणारे आणि शत्रूंकडून न दबणारे होतात. या जगात कोणत्याही मानवाकडून त्यांना रोखले जाऊ शकत नाही, हे त्यांच्या कर्माचेच फळ आहे. ‘‘สเจ [Pg.121] จ ปพฺพชฺชมุเปติ ตาทิโส,เนกฺขมฺมฉนฺทาภิรโต วิจกฺขโณ; อคฺโค น โส คจฺฉติ ชาตุ ขมฺภนํ,นรุตฺตโม เอส หิ ตสฺส ธมฺมตา’’ติ. आणि जर अशा लक्षणांनी युक्त व्यक्तीने प्रव्रज्या घेतली, तर ते नैष्क्रम्य-अभिलाषी (गृहत्यागाची आवड असलेले), बुद्धिमान आणि सर्वश्रेष्ठ होतात. ते कधीही पराभूत होत नाहीत; हा नरश्रेष्ठ पुरुषाचा स्वभावच (नियमच) आहे." (๒) ปาทตลจกฺกลกฺขณํ (२) पादतल चक्र लक्षण (पावलांच्या तळव्यांवरील चक्राचे लक्षण) ๒๐๔. ‘‘ยมฺปิ, ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ ปุริมํ ภวํ ปุริมํ นิเกตํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน พหุชนสฺส สุขาวโห อโหสิ, อุพฺเพคอุตฺตาสภยํ อปนุทิตา, ธมฺมิกญฺจ รกฺขาวรณคุตฺตึ สํวิธาตา, สปริวารญฺจ ทานํ อทาสิ. โส ตสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา อุปจิตตฺตา อุสฺสนฺนตฺตา วิปุลตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ…เป… โส ตโต จุโต อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมํ มหาปุริสลกฺขณํ ปฏิลภติ. เหฏฺฐาปาทตเลสุ จกฺกานิ ชาตานิ โหนฺติ สหสฺสารานิ สเนมิกานิ สนาภิกานิ สพฺพาการปริปูรานิ สุวิภตฺตนฺตรานิ. २०४. भिक्खूहो, तथागत जेव्हा पूर्वजन्मी, पूर्वभवात, पूर्व निवासस्थानात पूर्वी मनुष्यरूपात असताना बहुजनांच्या सुखाला वाहून आणणारे (सुखदायक) होते; त्यांनी भय, उद्वेग आणि संत्रास दूर केला होता, धार्मिक संरक्षण, आवरण व सुरक्षा प्रदान केली होती आणि आपल्या परिवारासह दान दिले होते. त्या कर्माच्या आचरणाने, संचयनाने, वृद्धीने आणि विपुलतेने, शरीराच्या भेदानंतर (मृत्यूनंतर) ते सुगती अशा स्वर्गलोकात उत्पन्न झाले...पे... तेथून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात आले असता, त्यांना हे महापुरुष लक्षण प्राप्त झाले. त्यांच्या दोन्ही पायांच्या तळव्यांवर हजार आरे असलेले, नेमी (धाव) आणि नाभीसह सर्व प्रकारे परिपूर्ण व सुविभक्त अंतर असलेले चक्र निर्माण झाले. ‘‘โส เตน ลกฺขเณน สมนฺนาคโต สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี…เป… ราชา สมาโน กึ ลภติ? มหาปริวาโร โหติ; มหาสฺส โหนฺติ ปริวารา พฺราหฺมณคหปติกา เนคมชานปทา คณกมหามตฺตา อนีกฏฺฐา โทวาริกา อมจฺจา ปาริสชฺชา ราชาโน โภคิยา กุมารา. ราชา สมาโน อิทํ ลภติ. สเจ โข ปน อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชติ, อรหํ โหติ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก วิวฏฺฏจฺฉโท. พุทฺโธ สมาโน กึ ลภติ? มหาปริวาโร โหติ; มหาสฺส โหนฺติ ปริวารา ภิกฺขู ภิกฺขุนิโย อุปาสกา อุปาสิกาโย เทวา มนุสฺสา อสุรา นาคา คนฺธพฺพา. พุทฺโธ สมาโน อิทํ ลภติ’’. เอตมตฺถํ ภควา อโวจ. या लक्षणाने युक्त होऊन जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर ते चक्रवर्ती राजा होतात...पे... राजा असताना त्यांना काय लाभ होतो? ते महापरिवाराने युक्त होतात; ब्राह्मण, गृहपती, नगरातील व जनपदातील लोक, कोषाध्यक्ष, महामात्र, हत्ती-घोड्यांचे सैनिक, द्वारपाल, अमात्य, सभासद, मांडलिक राजे, भोगी आणि राजकुमार हा त्यांचा मोठा परिवार असतो. राजा असताना त्यांना हा लाभ होतो. परंतु, जर त्यांनी घराचा त्याग करून अनगारिक (प्रव्रज्या) पत्करली, तर ते लोकात अराहत, सम्यक्संबुद्ध आणि अज्ञानाचा पडदा दूर करणारे होतात. बुद्ध असताना त्यांना काय लाभ होतो? ते महापरिवाराने युक्त होतात; भिक्खू, भिक्खुणी, उपासक, उपासिका, देव, मनुष्य, असुर, नाग आणि गंधर्व हा त्यांचा मोठा परिवार असतो. बुद्ध असताना त्यांना हा लाभ होतो. भगवंतांनी हे सांगितले. ๒๐๕. ตตฺเถตํ วุจฺจติ – २०५. या संदर्भात असे म्हटले आहे – ‘‘ปุเร ปุรตฺถา ปุริมาสุ ชาติสุ,มนุสฺสภูโต พหุนํ สุขาวโห; อุพฺเภคอุตฺตาสภยาปนูทโน,คุตฺตีสุ รกฺขาวรเณสุ อุสฺสุโก. पूर्वीच्या काळी, पूर्वजन्मांमध्ये मनुष्य असताना त्यांनी बहुतांश लोकांचे कल्याण केले; भय, उद्वेग आणि संत्रास दूर केला आणि लोकांच्या संरक्षणासाठी व रक्षणासाठी ते सदैव तत्पर राहिले. ‘‘โส [Pg.122] เตน กมฺเมน ทิวํ สมกฺกมิ,สุขญฺจ ขิฑฺฑารติโย จ อนฺวภิ; ตโต จวิตฺวา ปุนราคโต อิธ,จกฺกานิ ปาเทสุ ทุเวสุ วินฺทติ. त्या कर्मामुळे ते स्वर्गलोकात गेले, तेथे त्यांनी सुख आणि क्रीडारतीचा उपभोग घेतला; तेथून च्युत होऊन पुन्हा येथे आले असता, त्यांच्या दोन्ही पायांवर चक्रांचे चिन्ह प्राप्त झाले. ‘‘สมนฺตเนมีนิ สหสฺสรานิ จ,พฺยากํสุ เวยฺยญฺชนิกา สมาคตา; ทิสฺวา กุมารํ สตปุญฺญลกฺขณํ,ปริวารวา เหสฺสติ สตฺตุมทฺทโน. सर्व बाजूंनी नेमी असलेले आणि हजार आरे असलेले हे चक्र पाहून, एकत्रित आलेल्या लक्षणशास्त्रज्ञ ब्राह्मणांनी शंभर पुण्याच्या लक्षणांनी युक्त असलेल्या या कुमाराला पाहून भाकीत केले की, हा मोठ्या परिवाराने युक्त आणि शत्रूंचे दमन करणारा होईल. ตถา หี จกฺกานิ สมนฺตเนมินิ,สเจ น ปพฺพชฺชมุเปติ ตาทิโส; วตฺเตติ จกฺกํ ปถวึ ปสาสติ,ตสฺสานุยนฺตาธ ภวนฺติ ขตฺติยา. कारण त्यांच्या पायांवर सर्व बाजूंनी नेमी असलेले चक्र आहे. जर असा पुरुष प्रव्रज्या घेत नाही, तर तो चक्र फिरवतो आणि पृथ्वीवर शासन करतो; या जगात क्षत्रिय त्याचे अनुयायी बनतात. ‘‘มหายสํ สํปริวารยนฺติ นํ,สเจ จ ปพฺพชฺชมุเปติ ตาทิโส; เนกฺขมฺมฉนฺทาภิรโต วิจกฺขโณ,เทวามนุสฺสาสุรสกฺกรกฺขสา. मोठ्या कीर्तीने युक्त असलेले लोक त्यांना वेढून राहतात. आणि जर असा बुद्धिमान पुरुष नैष्क्रम्य-अभिलाषी होऊन प्रव्रज्या घेतो, तर देव, मनुष्य, असुर, शक्र, राक्षस, ‘‘คนฺธพฺพนาคา วิหคา จตุปฺปทา,อนุตฺตรํ เทวมนุสฺสปูชิตํ; มหายสํ สํปริวารยนฺติ น’’นฺติ. गंधर्व, नाग, पक्षी आणि चतुष्पाद देखील देव आणि मनुष्यांद्वारे पूजनीय, अनुत्तर आणि महाकीर्तीवान असलेल्या त्यांना सर्व बाजूंनी वेढून राहतात. (๓-๕) อายตปณฺหิตาทิติลกฺขณํ (३-५) दीर्घ टाच इत्यादी तीन लक्षणे ๒๐๖. ‘‘ยมฺปิ, ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ ปุริมํ ภวํ ปุริมํ นิเกตํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน ปาณาติปาตํ ปหาย ปาณาติปาตา ปฏิวิรโต อโหสิ นิหิตทณฺโฑ นิหิตสตฺโถ ลชฺชี ทยาปนฺโน, สพฺพปาณภูตหิตานุกมฺปี วิหาสิ. โส ตสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา อุปจิตตฺตา อุสฺสนฺนตฺตา วิปุลตฺตา…เป… โส ตโต จุโต อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมานิ ตีณิ มหาปุริสลกฺขณานิ ปฏิลภติ. อายตปณฺหิ จ โหติ, ทีฆงฺคุลิ จ พฺรหฺมุชุคตฺโต จ. २०६. भिक्खूहो, तथागत जेव्हा पूर्वजन्मी, पूर्वभवात, पूर्व निवासस्थानात पूर्वी मनुष्यरूपात असताना प्राणातिपात सोडून प्राणातिपातापासून अलिप्त राहिले होते; त्यांनी दंड आणि शस्त्रे टाकून दिली होती, ते लज्जाशील, दयाळू आणि सर्व प्राणिमात्रांच्या कल्याणाची चिंता करणारे बनून राहिले होते. त्या कर्माच्या आचरणाने, संचयनाने, वृद्धीने आणि विपुलतेने...पे... तेथून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात आले असता, त्यांना ही तीन महापुरुष लक्षणे प्राप्त झाली: त्यांची टाच दीर्घ आहे, बोटे लांब आहेत आणि शरीर ब्रह्मासारखे सरळ आहे. ‘‘โส [Pg.123] เตหิ ลกฺขเณหิ สมนฺนาคโต สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี…เป… ราชา สมาโน กึ ลภติ? ทีฆายุโก โหติ จิรฏฺฐิติโก, ทีฆมายุํ ปาเลติ, น สกฺกา โหติ อนฺตรา ชีวิตา โวโรเปตุํ เกนจิ มนุสฺสภูเตน ปจฺจตฺถิเกน ปจฺจามิตฺเตน. ราชา สมาโน อิทํ ลภติ… พุทฺโธ สมาโน กึ ลภติ? ทีฆายุโก โหติ จิรฏฺฐิติโก, ทีฆมายุํ ปาเลติ, น สกฺกา โหติ อนฺตรา ชีวิตา โวโรเปตุํ ปจฺจตฺถิเกหิ ปจฺจามิตฺเตหิ สมเณน วา พฺราหฺมเณน วา เทเวน วา มาเรน วา พฺรหฺมุนา วา เกนจิ วา โลกสฺมึ. พุทฺโธ สมาโน อิทํ ลภติ’’. เอตมตฺถํ ภควา อโวจ. या लक्षणांनी युक्त होऊन जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर ते चक्रवर्ती राजा होतात...पे... राजा असताना त्यांना काय लाभ होतो? ते दीर्घायुषी होतात, दीर्घकाळ टिकून राहतात, दीर्घ आयुष्याचे रक्षण करतात आणि कोणत्याही मानवी शत्रू किंवा विरोधकाकडून त्यांचे आयुष्य मध्येच हिरावून घेतले जाऊ शकत नाही. राजा असताना त्यांना हा लाभ होतो... बुद्ध असताना त्यांना काय लाभ होतो? ते दीर्घायुषी होतात, दीर्घकाळ टिकून राहतात, दीर्घ आयुष्याचे रक्षण करतात आणि या जगात कोणताही शत्रू, विरोधक, श्रमण, ब्राह्मण, देव, मार, ब्रह्मा किंवा इतर कोणीही त्यांचे आयुष्य मध्येच हिरावून घेऊ शकत नाही. बुद्ध असताना त्यांना हा लाभ होतो. भगवंतांनी हे सांगितले. ๒๐๗. ตตฺเถตํ วุจฺจติ – २०७. या संदर्भात असे म्हटले आहे – ‘‘มารณวธภยตฺตโน วิทิตฺวา,ปฏิวิรโต ปรํ มารณายโหสิ; เตน สุจริเตน สคฺคมคมา,สุกตผลวิปากมนุโภสิ. स्वतःला होणाऱ्या मृत्यूच्या आणि हिंसेच्या भयाची जाणीव ठेवून, त्यांनी इतरांच्या हिंसेपासून स्वतःला परावृत्त केले; त्या सुचरितामुळे ते स्वर्गलोकात गेले आणि त्यांनी सत्कर्माच्या फळाचा उपभोग घेतला. ‘‘จวิย ปุนริธาคโต สมาโน,ปฏิลภติ อิธ ตีณิ ลกฺขณานิ; ภวติ วิปุลทีฆปาสณฺหิโก,พฺรหฺมาว สุชุ สุโภ สุชาตคตฺโต. तेथून च्युत होऊन पुन्हा येथे आले असता, त्यांना या जगात तीन लक्षणे प्राप्त झाली; त्यांची टाच रुंद व दीर्घ झाली, आणि त्यांचे शरीर ब्रह्मासारखे सरळ, सुंदर व सुगठित झाले. ‘‘สุภุโช สุสุ สุสณฺฐิโต สุชาโต,มุทุตลุนงฺคุลิยสฺส โหนฺติ; ทีฆา ตีภิ ปุริสวรคฺคลกฺขเณหิ,จิรยปนาย กุมารมาทิสนฺติ. त्यांचे बाहू सुंदर, तरुण, सुगठित आणि सुजात आहेत, त्यांच्या हातापायांची बोटे मऊ, कोमल आणि लांब आहेत. या तीन श्रेष्ठ महापुरुष लक्षणांमुळे ज्ञानी लोक या कुमाराच्या दीर्घायुष्याचे भाकीत करतात. ‘‘ภวติ ยทิ คิหี จิรํ ยเปติ,จิรตรํ ปพฺพชติ ยทิ ตโต หิ; ยาปยติ จ วสิทฺธิภาวนาย,อิติ ทีฆายุกตาย ตํ นิมิตฺต’’นฺติ. जर हा गृहस्थ राहिला तर दीर्घकाळ जगू शकेल, आणि जर त्याने प्रव्रज्या घेतली तर त्याहूनही अधिक काळ जगेल; आणि तो वशित्व भावनेने आपले आयुष्य वाढवू शकेल. अशा प्रकारे ही तीन लक्षणे दीर्घायुष्याचे कारण आहेत, असे ते सांगतात. (๖) สตฺตุสฺสทตาลกฺขณํ (६) सत्तुस्सद लक्षण ๒๐๘. ‘‘ยมฺปิ[Pg.124], ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ ปุริมํ ภวํ ปุริมํ นิเกตํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน ทาตา อโหสิ ปณีตานํ รสิตานํ ขาทนียานํ โภชนียานํ สายนียานํ เลหนียานํ ปานานํ. โส ตสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา…เป… โส ตโต จุโต อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมํ มหาปุริสลกฺขณํ ปฏิลภติ, สตฺตุสฺสโท โหติ, สตฺตสฺส อุสฺสทา โหนฺติ; อุโภสุ หตฺเถสุ อุสฺสทา โหนฺติ, อุโภสุ ปาเทสุ อุสฺสทา โหนฺติ, อุโภสุ อํสกูเฏสุ อุสฺสทา โหนฺติ, ขนฺเธ อุสฺสโท โหติ. २०८. भिक्खूहो, तथागत जेव्हा पूर्वजन्मी, पूर्वभवात, पूर्व निवासस्थानात पूर्वी मनुष्यरूपात असताना उत्तम, चवदार खाद्यपदार्थ, भोज्यपदार्थ, आस्वाद घेण्याजोगे पदार्थ, चाटून खाण्याचे पदार्थ आणि पेये यांचे दान देणारे होते. त्या कर्माच्या आचरणाने...पे... तेथून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात आले असता, त्यांना हे महापुरुष लक्षण प्राप्त झाले: ते सात ठिकाणी मांसल आहेत, त्यांच्या शरीरावर सात ठिकाणी मांस वाढलेले आहे; दोन्ही हातांवर मांस पुष्ट आहे, दोन्ही पायांवर मांस पुष्ट आहे, दोन्ही खांद्यांवर मांस पुष्ट आहे आणि मानेवर मांस पुष्ट आहे. ‘‘โส เตน ลกฺขเณน สมนฺนาคโต สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี…เป… ราชา สมาโน กึ ลภติ? ลาภี โหติ ปณีตานํ รสิตานํ ขาทนียานํ โภชนียานํ สายนียานํ เลหนียานํ ปานานํ. ราชา สมาโน อิทํ ลภติ… พุทฺโธ สมาโน กึ ลภติ? ลาภี โหติ ปณีตานํ รสิตานํ ขาทนียานํ โภชนียานํ สายนียานํ เลหนียานํ ปานานํ. พุทฺโธ สมาโน อิทํ ลภติ’’. เอตมตฺถํ ภควา อโวจ. या लक्षणाने युक्त होऊन जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर ते चक्रवर्ती राजा होतात...पे... राजा असताना त्यांना काय लाभ होतो? त्यांना उत्तम, चवदार खाद्यपदार्थ, भोज्यपदार्थ, आस्वाद घेण्याजोगे पदार्थ, चाटून खाण्याचे पदार्थ आणि पेये प्राप्त होतात. राजा असताना त्यांना हा लाभ होतो... बुद्ध असताना त्यांना काय लाभ होतो? त्यांना उत्तम, चवदार खाद्यपदार्थ, भोज्यपदार्थ, आस्वाद घेण्याजोगे पदार्थ, चाटून खाण्याचे पदार्थ आणि पेये प्राप्त होतात. बुद्ध असताना त्यांना हा लाभ होतो. भगवंतांनी हे सांगितले. ๒๐๙. ตตฺเถตํ วุจฺจติ – २०९. या संदर्भात असे म्हटले आहे – ‘‘ขชฺชโภชฺชมถ เลยฺย สายิยํ,อุตฺตมคฺครสทายโก อหุ; เตน โส สุจริเตน กมฺมุนา,นนฺทเน จิรมภิปฺปโมทติ. खाद्य, भोज्य, तसेच लेह्य आणि आस्वाद घेण्याजोगे पदार्थ, अशा उत्तम व श्रेष्ठ रसांचे ते दान देणारे होते; त्या सुचरित कर्मामुळे ते नंदनवनात दीर्घकाळपर्यंत आनंदित राहिले. ‘‘สตฺต จุสฺสเท อิธาธิคจฺฉติ,หตฺถปาทมุทุตญฺจ วินฺทติ; อาหุ พฺยญฺชนนิมิตฺตโกวิทา,ขชฺชโภชฺชรสลาภิตาย นํ. या जगात त्यांना सात ठिकाणी मांसल पुष्टता प्राप्त झाली, आणि त्यांचे हात व पाय मऊ झाले; लक्षणशास्त्र आणि चिन्हांमध्ये निपुण असलेल्या ब्राह्मणांनी भाकीत केले की, त्यांना उत्तम खाद्य, भोज्य आणि रसांचा लाभ होईल. ‘‘ยํ คิหิสฺสปิ ตทตฺถโชตกํ,ปพฺพชฺชมฺปิ จ ตทาธิคจฺฉติ; ขชฺชโภชฺชรสลาภิรุตฺตมํ,อาหุ สพฺพคิหิพนฺธนจฺฉิท’’นฺติ. "जे पुण्यकर्म गृहस्थाश्रमात असतानाही त्या फलाला प्रकट करते, आणि प्रव्रज्या ग्रहण केल्यावरही ते प्राप्त होते; सर्व गृहस्थबंधनांचा छेद करणाऱ्या (बुद्धांना) उत्तम खाद्य-भोज्य रसांचा लाभ होतो, असे ज्ञानी म्हणतात." (๗-๘) กรจรณมุทุชาลตาลกฺขณานิ (७-८) "मृदू आणि जाळीदार हात व पाय असण्याची लक्षणे (मृदुतळुणहत्थपाद आणि जालहत्थपाद लक्षणे)" ๒๑๐. ‘‘ยมฺปิ[Pg.125], ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ ปุริมํ ภวํ ปุริมํ นิเกตํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน จตูหิ สงฺคหวตฺถูหิ ชนํ สงฺคาหโก อโหสิ – ทาเนน เปยฺยวชฺเชน อตฺถจริยาย สมานตฺตตาย. โส ตสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา…เป… โส ตโต จุโต อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมานิ ทฺเว มหาปุริสลกฺขณานิ ปฏิลภติ. มุทุตลุนหตฺถปาโท จ โหติ ชาลหตฺถปาโท จ. २१०. "भिक्खूहो, तथागत जेव्हा पूर्वजन्मात, पूर्वभवात, पूर्ववासात पूर्वी मनुष्यरूपात असताना चार संग्रहवस्तूंनी—दान, प्रियवचन, अर्थचर्या (कल्याणकारी आचरण) आणि समानशीलता (समानता) याद्वारे लोकांचे कल्याण करणारे होते. त्या कर्माच्या आचरणाने... पे... तेथून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात आल्यावर त्यांना महापुरुषाची ही दोन लक्षणे प्राप्त होतात—त्यांचे हात आणि पाय अत्यंत मृदू व कोमल असतात, आणि त्यांचे हात व पाय जाळीदार असतात." ‘‘โส เตหิ ลกฺขเณหิ สมนฺนาคโต สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี…เป… ราชา สมาโน กึ ลภติ? สุสงฺคหิตปริชโน โหติ, สุสงฺคหิตาสฺส โหนฺติ พฺราหฺมณคหปติกา เนคมชานปทา คณกมหามตฺตา อนีกฏฺฐา โทวาริกา อมจฺจา ปาริสชฺชา ราชาโน โภคิยา กุมารา. ราชา สมาโน อิทํ ลภติ… พุทฺโธ สมาโน กึ ลภติ? สุสงฺคหิตปริชโน โหติ, สุสงฺคหิตาสฺส โหนฺติ ภิกฺขู ภิกฺขุนิโย อุปาสกา อุปาสิกาโย เทวา มนุสฺสา อสุรา นาคา คนฺธพฺพา. พุทฺโธ สมาโน อิทํ ลภติ’’. เอตมตฺถํ ภควา อโวจ. "या लक्षणांनी युक्त होऊन जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर चक्रवर्ती राजा होतात... पे... राजा असताना त्यांना काय लाभ होतो? त्यांचे अनुयायी त्यांच्याशी अत्यंत एकनिष्ठ व संघटित असतात. ब्राह्मण, गृहपती, नगरातील व जनपदातील लोक, कोषाध्यक्ष, सेनापती, द्वारपाल, अमात्य, सभासद, मांडलिक राजे, जहागीरदार आणि राजकुमार हे सर्व त्यांच्याशी एकनिष्ठ असतात. राजा असताना त्यांना हा लाभ मिळतो... बुद्ध झाल्यावर त्यांना काय लाभ होतो? त्यांचे अनुयायी अत्यंत एकनिष्ठ व संघटित असतात. भिक्खू, भिक्खुणी, उपासक, उपासिका, देव, मनुष्य, असुर, नाग आणि गंधर्व हे सर्व त्यांच्याशी अत्यंत एकनिष्ठ असतात. बुद्ध झाल्यावर त्यांना हा लाभ मिळतो." भगवंतांनी हे सांगितले. ๒๑๑. ตตฺเถตํ วุจฺจติ – २११. "या संदर्भात असे म्हटले आहे—" ‘‘ทานมฺปิ จตฺถจริยตญฺจ,ปิยวาทิตญฺจ สมานตฺตตญฺจ ; กริยจริยสุสงฺคหํ พหูนํ,อนวมเตน คุเณน ยาติ สคฺคํ. "दान, अर्थचर्या (कल्याणकारी आचरण), प्रियभाषण आणि समानता यांद्वारे बहुसंख्य लोकांचे कल्याण करून, त्या प्रशंसनीय गुणांमुळे ते मृत्यूनंतर स्वर्गात गेले." ‘‘จวิย ปุนริธาคโต สมาโน,กรจรณมุทุตญฺจ ชาลิโน จ; อติรุจิรสุวคฺคุทสฺสเนยฺยํ,ปฏิลภติ ทหโร สุสุ กุมาโร. "तेथून च्युत होऊन पुन्हा या मनुष्यलोकात आल्यावर, तो लहान बालक अत्यंत देखणा, प्रियदर्शन आणि मनमोहक असा होतो; त्याला अत्यंत मऊ, कोमल आणि जाळीदार हात व पाय प्राप्त होतात." ‘‘ภวติ [Pg.126] ปริชนสฺสโว วิเธยฺโย,มหิมํ อาวสิโต สุสงฺคหิโต; ปิยวทู หิตสุขตํ ชิคีสมาโน,อภิรุจิตานิ คุณานิ อาจรติ. "या पृथ्वीवर राज्य करताना त्याचे अनुयायी आज्ञाधारक आणि वश असणारे असतात; तो प्रिय बोलणारा, लोकांच्या सुख-कल्याणाचे वहन केले जाण्याची इच्छा करणारा आणि अत्यंत प्रशंसनीय गुणांचे आचरण करणारा होतो." ‘‘ยทิ จ ชหติ สพฺพกามโภคํ,กถยติ ธมฺมกถํ ชิโน ชนสฺส; วจนปฏิกรสฺสาภิปฺปสนฺนา,สุตฺวาน ธมฺมานุธมฺมมาจรนฺตี’’ติ. "आणि जर त्याने सर्व कामभोगांचा त्याग केला, तर तो 'जिन' (विजेता बुद्ध) बनून लोकांना धम्मदेशना करतो; त्याचे वचन ऐकून लोक अत्यंत प्रसन्न होतात आणि धम्माच्या अनुषंगाने योग्य आचरण (धम्मानुधम्मपटिपत्ती) करतात." (๙-๑๐) อุสฺสงฺขปาทอุทฺธคฺคโลมตาลกฺขณานิ (९-१०) "उंचावलेले घोटे आणि वरच्या दिशेने वाढणारे रोम असण्याची लक्षणे (उस्सङ्खपाद आणि उद्धग्गलोम लक्षणे)" ๒๑๒. ‘‘ยมฺปิ, ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ ปุริมํ ภวํ ปุริมํ นิเกตํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน อตฺถูปสํหิตํ ธมฺมูปสํหิตํ วาจํ ภาสิตา อโหสิ, พหุชนํ นิทํเสสิ, ปาณีนํ หิตสุขาวโห ธมฺมยาคี. โส ตสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา…เป… โส ตโต จุโต อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมานิ ทฺเว มหาปุริสลกฺขณานิ ปฏิลภติ. อุสฺสงฺขปาโท จ โหติ, อุทฺธคฺคโลโม จ. २१२. "भिक्खूहो, तथागत जेव्हा पूर्वजन्मात, पूर्वभवात, पूर्ववासात पूर्वी मनुष्यरूपात असताना अर्थयुक्त आणि धम्मयुक्त भाषण करणारे होते, त्यांनी बहुसंख्य लोकांना धम्माचा मार्ग दाखवला, प्राण्यांच्या सुख-कल्याणाचे वहन केले आणि धम्मदान देणारे होते. त्या कर्माच्या आचरणाने... पे... तेथून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात आल्यावर त्यांना महापुरुषाची ही दोन लक्षणे प्राप्त होतात—त्यांचे घोटे उंचावलेले असतात आणि त्यांचे रोम वरच्या दिशेने वळलेले असतात." ‘‘โส เตหิ ลกฺขเณหิ สมนฺนาคโต, สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี…เป… ราชา สมาโน กึ ลภติ? อคฺโค จ โหติ เสฏฺโฐ จ ปาโมกฺโข จ อุตฺตโม จ ปวโร จ กามโภคีนํ. ราชา สมาโน อิทํ ลภติ… พุทฺโธ สมาโน กึ ลภติ? อคฺโค จ โหติ เสฏฺโฐ จ ปาโมกฺโข จ อุตฺตโม จ ปวโร จ สพฺพสตฺตานํ. พุทฺโธ สมาโน อิทํ ลภติ’’. เอตมตฺถํ ภควา อโวจ. "या लक्षणांनी युक्त होऊन जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर चक्रवर्ती राजा होतात... पे... राजा असताना त्यांना काय लाभ होतो? ते सर्व कामभोग घेणाऱ्यांमध्ये अग्रगण्य, श्रेष्ठ, प्रमुख, उत्तम आणि सर्वोत्कृष्ट ठरतात. राजा असताना त्यांना हा लाभ मिळतो... बुद्ध झाल्यावर त्यांना काय लाभ होतो? ते सर्व प्राण्यांमध्ये अग्रगण्य, श्रेष्ठ, प्रमुख, उत्तम आणि सर्वोत्कृष्ट ठरतात. बुद्ध झाल्यावर त्यांना हा लाभ मिळतो." भगवंतांनी हे सांगितले. ๒๑๓. ตตฺเถตํ วุจฺจติ – २१३. "या संदर्भात असे म्हटले आहे—" ‘‘อตฺถธมฺมสหิตํ ปุเร คิรํ,เอรยํ พหุชนํ นิทํสยิ; ปาณินํ หิตสุขาวโห อหุ,ธมฺมยาคมยชี อมจฺฉรี. "पूर्वीच्या जन्मात त्यांनी नेहमी अर्थ आणि धम्माने युक्त अशी वाणी उच्चारली, बहुसंख्य लोकांना सन्मार्ग दाखवला, प्राण्यांच्या सुख-कल्याणाचे वहन केले आणि मत्सररहित होऊन धम्मयज्ञाचे (धम्मदानाचे) यजन केले." ‘‘เตน [Pg.127] โส สุจริเตน กมฺมุนา,สุคฺคตึ วชติ ตตฺถ โมทติ; ลกฺขณานิ จ ทุเว อิธาคโต,อุตฺตมปฺปมุขตาย วินฺทติ. "त्या सुचरित कर्मामुळे ते सुगतीला गेले आणि तेथे त्यांनी आनंद उपभोगला; तेथून पुन्हा येथे आल्यावर, सर्वश्रेष्ठ आणि प्रमुख होण्यासाठी त्यांना दोन लक्षणे प्राप्त झाली." ‘‘อุพฺภมุปฺปติตโลมวา สโส,ปาทคณฺฐิรหุ สาธุสณฺฐิตา; มํสโลหิตาจิตา ตโจตฺถตา,อุปริจรณโสภนา อหุ. "त्यांच्या अंगावरील रोम वरच्या दिशेने वळलेले असतात, त्यांचे घोटे मांस आणि रक्ताने सुपुष्ट असून त्वचेने झाकलेले व सुस्थित असतात; त्यांचे पाय वरच्या बाजूने अत्यंत सुंदर दिसतात." ‘‘เคหมาวสติ เจ ตถาวิโธ,อคฺคตํ วชติ กามโภคินํ; เตน อุตฺตริตโร น วิชฺชติ,ชมฺพุทีปมภิภุยฺย อิริยติ. "अशा प्रकारचा पुरुष जर गृहस्थाश्रमात राहिला, तर तो कामभोग घेणाऱ्यांमध्ये सर्वश्रेष्ठ पदाला पोहोचतो; त्याच्यापेक्षा श्रेष्ठ दुसरा कोणी नसतो, तो संपूर्ण जंबुद्वीपावर आपले साम्राज्य गाजवतो." ‘‘ปพฺพชมฺปิ จ อโนมนิกฺกโม,อคฺคตํ วชติ สพฺพปาณินํ; เตน อุตฺตริตโร น วิชฺชติ,สพฺพโลกมภิภุยฺย วิหรตี’’ติ. "आणि जर त्यांनी प्रव्रज्या घेतली, तर ते महान पराक्रमी होऊन सर्व प्राण्यांमध्ये सर्वश्रेष्ठ पदाला पोहोचतात; त्यांच्यापेक्षा श्रेष्ठ दुसरा कोणी नसतो, ते संपूर्ण जगाला जिंकून विहार करतात." (๑๑) เอณิชงฺฆลกฺขณํ (११) "हरणासारखी जंघा असण्याचे लक्षण (एणिजङ्घ लक्षण)" ๒๑๔. ‘‘ยมฺปิ, ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ ปุริมํ ภวํ ปุริมํ นิเกตํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน สกฺกจฺจํ วาเจตา อโหสิ สิปฺปํ วา วิชฺชํ วา จรณํ วา กมฺมํ วา – ‘กึ ติเม ขิปฺปํ วิชาเนยฺยุํ, ขิปฺปํ ปฏิปชฺเชยฺยุํ, น จิรํ กิลิสฺเสยฺยุ’’นฺติ. โส ตสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา…เป… โส ตโต จุโต อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมํ มหาปุริสลกฺขณํ ปฏิลภติ. เอณิชงฺโฆ โหติ. २१४. "भिक्खूहो, तथागत जेव्हा पूर्वजन्मात, पूर्वभवात, पूर्ववासात पूर्वी मनुष्यरूपात असताना शिल्प, विद्या, आचरण किंवा कर्म अत्यंत आदराने शिकवणारे होते—'हे लोक कसे बरे लवकर शिकतील, लवकर आचरण करतील आणि दीर्घकाळ त्रास सहन करणार नाहीत?' या विचाराने ते शिकवत असत. त्या कर्माच्या आचरणाने... पे... तेथून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात आल्यावर त्यांना महापुरुषाचे हे लक्षण प्राप्त होते—त्यांची जंघा एणी हरणासारखी असते." ‘‘โส เตน ลกฺขเณน สมนฺนาคโต สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี…เป… ราชา สมาโน กึ ลภติ? ยานิ ตานิ ราชารหานิ ราชงฺคานิ ราชูปโภคานิ ราชานุจฺฉวิกานิ ตานิ ขิปฺปํ ปฏิลภติ. ราชา สมาโน อิทํ ลภติ… พุทฺโธ สมาโน กึ ลภติ? ยานิ [Pg.128] ตานิ สมณารหานิ สมณงฺคานิ สมณูปโภคานิ สมณานุจฺฉวิกานิ, ตานิ ขิปฺปํ ปฏิลภติ. พุทฺโธ สมาโน อิทํ ลภติ’’. เอตมตฺถํ ภควา อโวจ. "या लक्षणाने युक्त होऊन जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर चक्रवर्ती राजा होतात... पे... राजा असताना त्यांना काय लाभ होतो? राजाला योग्य असणाऱ्या, राजाची अंगे असणाऱ्या, राजाच्या उपभोगाच्या आणि राजाला अनुकूल असणाऱ्या ज्या काही गोष्टी आहेत, त्या त्यांना त्वरित प्राप्त होतात. राजा असताना त्यांना हा लाभ मिळतो... बुद्ध झाल्यावर त्यांना काय लाभ होतो? श्रमणांना योग्य असणाऱ्या, श्रमणांची अंगे असणाऱ्या, श्रमणांच्या उपभोगाच्या आणि श्रमणांना अनुकूल असणाऱ्या ज्या काही गोष्टी आहेत, त्या त्यांना त्वरित प्राप्त होतात. बुद्ध झाल्यावर त्यांना हा लाभ मिळतो." भगवंतांनी हे सांगितले. ๒๑๕. ตตฺเถตํ วุจฺจติ – २१५. "या संदर्भात असे म्हटले आहे—" ‘‘สิปฺเปสุ วิชฺชาจรเณสุ กมฺเมสุ,กถํ วิชาเนยฺยุํ ลหุนฺติ อิจฺฉติ; ยทูปฆาตาย น โหติ กสฺสจิ,วาเจติ ขิปฺปํ น จิรํ กิลิสฺสติ. "शिल्प, विद्या, आचरण आणि कर्मे यांमध्ये 'हे लोक लवकर कसे शिकतील?' अशी त्यांची इच्छा असे; ज्या विद्येने कोणाचेही नुकसान होत नाही, ती विद्या ते लोकांना त्वरित शिकवत असत आणि त्यांना दीर्घकाळ कष्ट होऊ देत नसत." ‘‘ตํ กมฺมํ กตฺวา กุสลํ สุขุทฺรยํ,ชงฺฆา มนุญฺญา ลภเต สุสณฺฐิตา; วฏฺฏา สุชาตา อนุปุพฺพมุคฺคตา,อุทฺธคฺคโลมา สุขุมตฺตโจตฺถตา. "ते सुखकारक फळ देणारे कुशल कर्म करून, त्यांना सुंदर, सुगठित, गोल, सुजात, क्रमशः वरच्या बाजूला सुदृढ होत गेलेल्या, वरच्या दिशेने वळलेले रोम असणाऱ्या आणि सुकुमार त्वचेने झाकलेल्या जंघा प्राप्त होतात." ‘‘เอเณยฺยชงฺโฆติ ตมาหุ ปุคฺคลํ,สมฺปตฺติยา ขิปฺปมิธาหุ ลกฺขณํ; เคหานุโลมานิ ยทาภิกงฺขติ,อปพฺพชํ ขิปฺปมิธาธิคจฺฉติ. "अशा व्यक्तीला ज्ञानी लोक 'एणिजंघा' म्हणतात; हे लक्षण या जगात त्वरित यशाचे लक्षण मानले जाते. जर त्यांनी प्रव्रज्या घेतली नाही, तर गृहस्थाश्रमात अनुकूल असणाऱ्या सर्व गोष्टी त्यांना त्वरित प्राप्त होतात." ‘‘สเจ จ ปพฺพชฺชมุเปติ ตาทิโส,เนกฺขมฺมฉนฺทาภิรโต วิจกฺขโณ; อนุจฺฉวิกสฺส ยทานุโลมิกํ,ตํ วินฺทติ ขิปฺปมโนมวิกฺกโม ’’ติ. "आणि जर असा प्रज्ञावान पुरुष नैष्क्रम्य घेण्याच्या इच्छेने प्रव्रज्या ग्रहण करतो, तर तो महान पराक्रमी पुरुष प्रव्रजिताला योग्य आणि अनुकूल असणाऱ्या सर्व गोष्टी त्वरित प्राप्त करतो." (๑๒) สุขุมจฺฉวิลกฺขณํ (१२) "मऊ व सुकुमार त्वचा असण्याचे लक्षण (सुखुमच्छवि लक्षण)" ๒๑๖. ‘‘ยมฺปิ, ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ ปุริมํ ภวํ ปุริมํ นิเกตํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน สมณํ วา พฺราหฺมณํ วา อุปสงฺกมิตฺวา ปริปุจฺฉิตา อโหสิ – ‘‘กึ, ภนฺเต, กุสลํ, กึ อกุสลํ, กึ สาวชฺชํ, กึ อนวชฺชํ, กึ เสวิตพฺพํ, กึ น เสวิตพฺพํ, กึ เม กรียมานํ ทีฆรตฺตํ อหิตาย ทุกฺขาย อสฺส, กึ วา ปน เม กรียมานํ ทีฆรตฺตํ หิตาย สุขาย [Pg.129] อสฺสา’’ติ. โส ตสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา…เป… โส ตโต จุโต อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมํ มหาปุริสลกฺขณํ ปฏิลภติ. สุขุมจฺฉวิ โหติ, สุขุมตฺตา ฉวิยา รโชชลฺลํ กาเย น อุปลิมฺปติ. २१६. “भिक्खूहो, तथागत जेव्हा पूर्वजन्मी, पूर्वभवात, पूर्व निवासस्थानात पूर्वी मनुष्यरूपात असताना, श्रमण किंवा ब्राह्मणांकडे जाऊन वारंवार विचारत असत – ‘भंते, कुशल काय आहे? अकुशल काय आहे? सदोष काय आहे? निर्दोष काय आहे? काय आचरणात आणावे? काय आचरणात आणू नये? मी काय केले असता ते दीर्घकाळापर्यंत माझ्या अहितासाठी व दुःखासाठी होईल? किंवा मी काय केले असता ते दीर्घकाळापर्यंत माझ्या हितासाठी व सुखासाठी होईल?’ त्या कर्माच्या आचरणामुळे...पे०... तिथून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात आल्यावर ते महापुरुषाचे हे लक्षण प्राप्त करतात. त्यांची त्वचा अत्यंत सुकुमार असते. त्वचेच्या सुकुमारतेमुळे त्यांच्या शरीराला धूळ व मळ चिकटत नाही.” ‘‘โส เตน ลกฺขเณน สมนฺนาคโต สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี…เป… ราชา สมาโน กึ ลภติ? มหาปญฺโญ โหติ, นาสฺส โหติ โกจิ ปญฺญาย สทิโส วา เสฏฺโฐ วา กามโภคีนํ. ราชา สมาโน อิทํ ลภติ… พุทฺโธ สมาโน กึ ลภติ? มหาปญฺโญ โหติ ปุถุปญฺโญ หาสปญฺโญ ชวนปญฺโญ ติกฺขปญฺโญ นิพฺเพธิกปญฺโญ, นาสฺส โหติ โกจิ ปญฺญาย สทิโส วา เสฏฺโฐ วา สพฺพสตฺตานํ. พุทฺโธ สมาโน อิทํ ลภติ’’. เอตมตฺถํ ภควา อโวจ. “या लक्षणाने युक्त होऊन जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर चक्रवर्ती राजा होतात...पे०... राजा असताना त्यांना काय प्राप्त होते? ते महाप्रज्ञावान होतात. कामभोगांमध्ये मग्न असणाऱ्यांमध्ये प्रज्ञेच्या बाबतीत त्यांच्या समान किंवा त्यांच्यापेक्षा श्रेष्ठ कोणीही नसतो. राजा असताना त्यांना हे प्राप्त होते... बुद्ध झाल्यावर त्यांना काय प्राप्त होते? ते महाप्रज्ञ, पृथुप्रज्ञ, हासप्रज्ञ, जवनप्रज्ञ, तीक्ष्णप्रज्ञ आणि निर्वेधिकप्रज्ञ होतात. सर्व प्राण्यांमध्ये प्रज्ञेच्या बाबतीत त्यांच्या समान किंवा त्यांच्यापेक्षा श्रेष्ठ कोणीही नसतो. बुद्ध झाल्यावर त्यांना हे प्राप्त होते.” भगवंतांनी हे सांगितले. ๒๑๗. ตตฺเถตํ วุจฺจติ – २१७. या संदर्भात हे म्हटले आहे – ‘‘ปุเร ปุรตฺถา ปุริมาสุ ชาติสุ,อญฺญาตุกาโม ปริปุจฺฉิตา อหุ; สุสฺสูสิตา ปพฺพชิตํ อุปาสิตา,อตฺถนฺตโร อตฺถกถํ นิสามยิ. “पूर्वीच्या काळी, पूर्वजन्मांमध्ये, जाणून घेण्याच्या इच्छेने ते वारंवार विचारणारे होते; ते ऐकण्यास उत्सुक असत, प्रव्रजितांची सेवा करत असत, आणि कल्याणाची इच्छा बाळगून कल्याणाशी संबंधित उपदेश लक्षपूर्वक ऐकत असत. ‘‘ปญฺญาปฏิลาภคเตน กมฺมุนา,มนุสฺสภูโต สุขุมจฺฉวี อหุ; พฺยากํสุ อุปฺปาทนิมิตฺตโกวิทา,สุขุมานิ อตฺถานิ อเวจฺจ ทกฺขิติ. “प्रज्ञा प्राप्तीसाठी केलेल्या कर्मामुळे, मनुष्यलोकात जन्मल्यावर त्यांची त्वचा सुकुमार झाली. लक्षणे व चिन्हे ओळखण्यात निष्णात असणाऱ्या भविष्यवेत्त्यांनी भाकीत केले की, ‘हा बालक सूक्ष्म अर्थांचे स्पष्टपणे आकलन करील.’ ‘‘สเจ น ปพฺพชฺชมุเปติ ตาทิโส,วตฺเตติ จกฺกํ ปถวึ ปสาสติ; อตฺถานุสิฏฺฐีสุ ปริคฺคเหสุ จ,น เตน เสยฺโย สทิโส จ วิชฺชติ. “असा बालक जर प्रव्रज्या ग्रहण करणार नाही, तर तो चक्र फिरवील (चक्रवर्ती होईल) आणि पृथ्वीवर राज्य करील. कल्याणाचा उपदेश करण्यात आणि योग्य-अयोग्य गोष्टींचे परीक्षण करण्यात त्याच्यापेक्षा श्रेष्ठ किंवा त्याच्या समान कोणीही असणार नाही. ‘‘สเจ จ ปพฺพชฺชมุเปติ ตาทิโส,เนกฺขมฺมฉนฺทาภิรโต วิจกฺขโณ; ปญฺญาวิสิฏฺฐํ ลภเต อนุตฺตรํ,ปปฺโปติ โพธึ วรภูริเมธโส’’ติ. “आणि जर असा बालक प्रव्रज्या ग्रहण करील, तर तो नैष्क्रम्य-अभिलाषी व अत्यंत चतुर होईल. तो अनुत्तर अशी विशिष्ट प्रज्ञा प्राप्त करील आणि तो श्रेष्ठ व विस्तीर्ण बुद्धीचा स्वामी होऊन संबोधी प्राप्त करील.” (๑๓) สุวณฺณวณฺณลกฺขณํ (१३) सुवर्णवर्ण लक्षण ๒๑๘. ‘‘ยมฺปิ[Pg.130], ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ ปุริมํ ภวํ ปุริมํ นิเกตํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน อกฺโกธโน อโหสิ อนุปายาสพหุโล, พหุมฺปิ วุตฺโต สมาโน นาภิสชฺชิ น กุปฺปิ น พฺยาปชฺชิ น ปติตฺถียิ, น โกปญฺจ โทสญฺจ อปฺปจฺจยญฺจ ปาตฺวากาสิ. ทาตา จ อโหสิ สุขุมานํ มุทุกานํ อตฺถรณานํ ปาวุรณานํ โขมสุขุมานํ กปฺปาสิกสุขุมานํ โกเสยฺยสุขุมานํ กมฺพลสุขุมานํ. โส ตสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา อุปจิตตฺตา…เป… โส ตโต จุโต อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมํ มหาปุริสลกฺขณํ ปฏิลภติ. สุวณฺณวณฺโณ โหติ กญฺจนสนฺนิภตฺตโจ. २१८. “भिक्खूहो, तथागत जेव्हा पूर्वजन्मी, पूर्वभवात, पूर्व निवासस्थानात पूर्वी मनुष्यरूपात असताना, अक्रोधक (राग न करणारे) व मनःशांती असणारे होते. पुष्कळ काही बोलले गेले तरीही ते चिडत नसत, रागावत नसत, मनात द्वेष धरत नसत, सूडबुद्धी ठेवत नसत, आणि त्यांनी कधीही राग, द्वेष किंवा अप्रसन्नता प्रकट केली नाही. तसेच ते सुकुमार, मऊ अंथरूणे व पांघरूणे, तलम सुती वस्त्रे, रेशमी वस्त्रे आणि लोकरीची वस्त्रे दान करणारे होते. त्या कर्माच्या आचरणाने व संचय केल्याने...पे०... तिथून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात आल्यावर ते महापुरुषाचे हे लक्षण प्राप्त करतात. ते सुवर्णवर्णाचे होतात आणि त्यांची त्वचा सोन्यासारखी तेजस्वी असते.” ‘‘โส เตน ลกฺขเณน สมนฺนาคโต สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี…เป… ราชา สมาโน กึ ลภติ? ลาภี โหติ สุขุมานํ มุทุกานํ อตฺถรณานํ ปาวุรณานํ โขมสุขุมานํ กปฺปาสิกสุขุมานํ โกเสยฺยสุขุมานํ กมฺพลสุขุมานํ. ราชา สมาโน อิทํ ลภติ… พุทฺโธ สมาโน กึ ลภติ? ลาภี โหติ สุขุมานํ มุทุกานํ อตฺถรณานํ ปาวุรณานํ โขมสุขุมานํ กปฺปาสิกสุขุมานํ โกเสยฺยสุขุมานํ กมฺพลสุขุมานํ. พุทฺโธ สมาโน อิทํ ลภติ’’. เอตมตฺถํ ภควา อโวจ. “या लक्षणाने युक्त होऊन जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर चक्रवर्ती राजा होतात...पे०... राजा असताना त्यांना काय प्राप्त होते? त्यांना सुकुमार, मऊ अंथरूणे व पांघरूणे, तलम सुती वस्त्रे, रेशमी वस्त्रे आणि लोकरीची वस्त्रे प्राप्त होतात. राजा असताना त्यांना हे प्राप्त होते... बुद्ध झाल्यावर त्यांना काय प्राप्त होते? त्यांना सुकुमार, मऊ अंथरूणे व पांघरूणे, तलम सुती वस्त्रे, रेशमी वस्त्रे आणि लोकरीची वस्त्रे प्राप्त होतात. बुद्ध झाल्यावर त्यांना हे प्राप्त होते.” भगवंतांनी हे सांगितले. ๒๑๙. ตตฺเถตํ วุจฺจติ – २१९. या संदर्भात हे म्हटले आहे – ‘‘อกฺโกธญฺจ อธิฏฺฐหิ อทาสิ,ทานญฺจ วตฺถานิ สุขุมานิ สุจฺฉวีนิ; ปุริมตรภเว ฐิโต อภิวิสฺสชิ,มหิมิว สุโร อภิวสฺสํ. “पूर्वजन्मात असताना त्यांनी अक्रोध धारण केला आणि सुकुमार व सुंदर रंगाच्या वस्त्रांचे दान दिले; जणू पर्जन्यदेव पृथ्वीवर मुसळधार पाऊस पाडतो, त्याप्रमाणे त्यांनी मुक्तहस्ते दान दिले. ‘‘ตํ กตฺวาน อิโต จุโต ทิพฺพํ,อุปปชฺชิ สุกตผลวิปากมนุภุตฺวา; กนกตนุสนฺนิโภ อิธาภิภวติ,สุรวรตโรริว อินฺโท. “ते पुण्यकर्म करून येथून च्युत झाल्यावर ते देवलोकात उत्पन्न झाले आणि तेथे त्यांनी सुकृत कर्माच्या फळाचा उपभोग घेतला. आता येथे आल्यावर सोन्यासारख्या कांतीचे शरीर धारण करून ते देवांमध्ये श्रेष्ठ असणाऱ्या इंद्राप्रमाणे शोभून दिसतात. ‘‘เคหญฺจาวสติ [Pg.131] นโร อปพฺพชฺช,มิจฺฉํ มหติมหึ อนุสาสติ ; ปสยฺห สหิธ สตฺตรตนํ,ปฏิลภติ วิมล สุขุมจฺฉวึ สุจิญฺจ. “जर असा मनुष्य प्रव्रज्या न घेता गृहस्थाश्रमात राहिला, तर तो या विस्तीर्ण पृथ्वीवर विजय मिळवून राज्य करतो. तो येथे सप्त रत्ने प्राप्त करतो आणि त्याची त्वचा निर्मळ, सुकुमार व स्वच्छ असते. ‘‘ลาภี อจฺฉาทนวตฺถโมกฺขปาวุรณานํ,ภวติ ยทิ อนาคาริยตํ อุเปติ; สหิโต ปุริมกตผลํ อนุภวติ,น ภวติ กตสฺส ปนาโส’’ติ. “आणि जर तो अनगारिक अवस्था स्वीकारतो, तर त्याला उत्तम वस्त्रे, अंथरूणे व पांघरूणे प्राप्त होतात. पूर्वजन्मात केलेल्या कर्माच्या फळाचा तो उपभोग घेतो; कारण केलेल्या पुण्याचा कधीही नाश होत नाही.” (๑๔) โกโสหิตวตฺถคุยฺหลกฺขณํ (१४) कोसोहितवत्थगुय्ह लक्षण ๒๒๐. ยมฺปิ, ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ ปุริมํ ภวํ ปุริมํ นิเกตํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน จิรปฺปนฏฺเฐ สุจิรปฺปวาสิโน ญาติมิตฺเต สุหชฺเช สขิโน สมาเนตา อโหสิ. มาตรมฺปิ ปุตฺเตน สมาเนตา อโหสิ, ปุตฺตมฺปิ มาตรา สมาเนตา อโหสิ, ปิตรมฺปิ ปุตฺเตน สมาเนตา อโหสิ, ปุตฺตมฺปิ ปิตรา สมาเนตา อโหสิ, ภาตรมฺปิ ภาตรา สมาเนตา อโหสิ, ภาตรมฺปิ ภคินิยา สมาเนตา อโหสิ, ภคินิมฺปิ ภาตรา สมาเนตา อโหสิ, ภคินิมฺปิ ภคินิยา สมาเนตา อโหสิ, สมงฺคีกตฺวา จ อพฺภนุโมทิตา อโหสิ. โส ตสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา…เป… โส ตโต จุโต อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมํ มหาปุริสลกฺขณํ ปฏิลภติ – โกโสหิตวตฺถคุยฺโห โหติ. २२०. “भिक्खूहो, तथागत जेव्हा पूर्वजन्मी, पूर्वभवात, पूर्व निवासस्थानात पूर्वी मनुष्यरूपात असताना, दीर्घकाळापासून दुरावलेल्या व दीर्घकाळ परदेशी राहिलेल्या नातेवाईकांना, मित्रांना, हितचिंतकांना व सख्यांना एकत्र आणणारे होते. त्यांनी आईला मुलाशी एकत्र आणले, मुलाला आईशी एकत्र आणले; वडिलांना मुलाशी एकत्र आणले, मुलाला वडिलांशी एकत्र आणले; भावाला भावाशी एकत्र आणले; भावाला बहिणीशी एकत्र आणले, बहिणीला भावाशी एकत्र आणले; बहिणीला बहिणीशी एकत्र आणले. त्यांना एकत्र आणून ते आनंदित होत असत. त्या कर्माच्या आचरणाने...पे०... तिथून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात आल्यावर ते महापुरुषाचे हे लक्षण प्राप्त करतात – त्यांचे गुह्यांग कोशात (त्वचेच्या आवरणात) झाकलेले असते.” ‘‘โส เตน ลกฺขเณน สมนฺนาคโต สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี…เป… ราชา สมาโน กึ ลภติ? ปหูตปุตฺโต โหติ, ปโรสหสฺสํ โข ปนสฺส ปุตฺตา ภวนฺติ สูรา วีรงฺครูปา ปรเสนปฺปมทฺทนา. ราชา สมาโน อิทํ ลภติ… พุทฺโธ สมาโน กึ ลภติ? ปหูตปุตฺโต โหติ, อเนกสหสฺสํ โข ปนสฺส ปุตฺตา ภวนฺติ สูรา วีรงฺครูปา ปรเสนปฺปมทฺทนา. พุทฺโธ สมาโน อิทํ ลภติ’’. เอตมตฺถํ ภควา อโวจ. “या लक्षणाने युक्त होऊन जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर चक्रवर्ती राजा होतात...पे०... राजा असताना त्यांना काय प्राप्त होते? त्यांना पुष्कळ पुत्र प्राप्त होतात. त्यांचे एक हजाराहून अधिक पुत्र असतात, जे शूर, वीर, पराक्रमी आणि शत्रूच्या सैन्याचा नाश करणारे असतात. राजा असताना त्यांना हे प्राप्त होते... बुद्ध झाल्यावर त्यांना काय प्राप्त होते? त्यांना पुष्कळ पुत्र (शिष्य) प्राप्त होतात. त्यांचे अनेक हजार पुत्र (शिष्य) असतात, जे शूर, वीर, पराक्रमी आणि शत्रूच्या सैन्याचा नाश करणारे असतात. बुद्ध झाल्यावर त्यांना हे प्राप्त होते.” भगवंतांनी हे सांगितले. ๒๒๑. ตตฺเถตํ [Pg.132] วุจฺจติ – २२१. या संदर्भात हे म्हटले आहे – ‘‘ปุเร ปุรตฺถา ปุริมาสุ ชาติสุ,จิรปฺปนฏฺเฐ สุจิรปฺปวาสิโน; ญาตี สุหชฺเช สขิโน สมานยิ,สมงฺคิกตฺวา อนุโมทิตา อหุ. “पूर्वीच्या काळी, पूर्वजन्मांमध्ये, दीर्घकाळापासून दुरावलेल्या व दीर्घकाळ परदेशी राहिलेल्या नातेवाईकांना, हितचिंतकांना व सख्यांना त्यांनी एकत्र आणले; त्यांना एकत्र आणून ते आनंदित झाले. ‘‘โส เตน กมฺเมน ทิวํ สมกฺกมิ,สุขญฺจ ขิฑฺฑารติโย จ อนฺวภิ; ตโต จวิตฺวา ปุนราคโต อิธ,โกโสหิตํ วินฺทติ วตฺถฉาทิยํ. “त्या पुण्यकर्माने ते स्वर्गलोकात गेले आणि तेथे त्यांनी सुख व क्रीडा-रतींचा उपभोग घेतला. तेथून च्युत होऊन पुन्हा येथे आल्यावर, त्यांना कोशात झाकलेले गुह्यांग प्राप्त झाले. ‘‘ปหูตปุตฺโต ภวตี ตถาวิโธ,ปโรสหสฺสญฺจ ภวนฺติ อตฺรชา; สูรา จ วีรา จ อมิตฺตตาปนา,คิหิสฺส ปีตึชนนา ปิยํวทา. “अशा प्रकारच्या व्यक्तीला पुष्कळ पुत्र प्राप्त होतात. त्यांचे एक हजाराहून अधिक पुत्र असतात, जे शूर, वीर, शत्रूला संताप देणारे, गृहस्थाला आनंद देणारे आणि प्रिय बोलणारे असतात.” ‘‘พหูตรา ปพฺพชิตสฺส อิริยโต,ภวนฺติ ปุตฺตา วจนานุสาริโน; คิหิสฺส วา ปพฺพชิตสฺส วา ปุน,ตํ ลกฺขณํ ชายติ ตทตฺถโชตก’’นฺติ. "प्रव्रजित होऊन (उत्कृष्ट) आचरण करणाऱ्या त्यांचे वचन ऐकणारे पुष्कळ पुत्र (शिष्य) होतात. गृहस्थ असो वा प्रव्रजित, पुन्हा ते लक्षण त्या अर्थाला (फलाला) प्रकट करणारे ठरते." ปฐมภาณวาโร นิฏฺฐิโต. प्रथम भाणवार समाप्त. (๑๕-๑๖) ปริมณฺฑลอโนนมชณฺณุปริมสนลกฺขณานิ (१५-१६) परिमंडल आणि न वाकता गुडघ्याला स्पर्श करण्याचे लक्षण ๒๒๒. ‘‘ยมฺปิ, ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ ปุริมํ ภวํ ปุริมํ นิเกตํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน มหาชนสงฺคหํ สเมกฺขมาโน สมํ ชานาติ สามํ ชานาติ, ปุริสํ ชานาติ ปุริสวิเสสํ ชานาติ – ‘อยมิทมรหติ อยมิทมรหตี’ติ ตตฺถ ตตฺถ ปุริสวิเสสกโร อโหสิ. โส ตสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา…เป… โส ตโต จุโต อิตฺถตฺตํ [Pg.133] อาคโต สมาโน อิมานิ ทฺเว มหาปุริสลกฺขณานิ ปฏิลภติ. นิคฺโรธ ปริมณฺฑโล จ โหติ, ฐิตโกเยว จ อโนนมนฺโต อุโภหิ ปาณิตเลหิ ชณฺณุกานิ ปริมสติ ปริมชฺชติ. २२२. "हे भिक्षूहो, तथागत जेव्हा पूर्वजन्मी, पूर्वभवी, पूर्ववासात पूर्वी मनुष्यरूपात असताना, महाजन-संग्रहाचा (लोकांच्या कल्याणाचा) विचार करत, कोणाशी काय समान आहे हे जाणत असत, स्वतः जाणत असत, पुरुषाला जाणत असत आणि पुरुषांमधील विशेषाला जाणत असत की—'हा याला पात्र आहे, हा त्याला पात्र आहे.' त्या त्या जन्मात त्यांनी पुरुषांमधील विशेषाचा आदर केला. त्या कर्माच्या आचरणाने...पे... तेथून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात आले असता, त्यांना महापुरुषाची ही दोन लक्षणे प्राप्त होतात: त्यांचे शरीर वडाच्या झाडासारखे परिमंडळ (प्रमाणबद्ध) असते आणि ते न वाकता सरळ उभे राहूनच आपल्या दोन्ही हातांच्या तळव्यांनी गुडघ्यांना स्पर्श करू शकतात व चोळू शकतात." ‘‘โส เตหิ ลกฺขเณหิ สมนฺนาคโต สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี…เป… ราชา สมาโน กึ ลภติ? อฑฺโฒ โหติ มหทฺธโน มหาโภโค ปหูตชาตรูปรชโต ปหูตวิตฺตูปกรโณ ปหูตธนธญฺโญ ปริปุณฺณโกสโกฏฺฐาคาโร. ราชา สมาโน อิทํ ลภติ…เป… พุทฺโธ สมาโน กึ ลภติ? อฑฺโฒ โหติ มหทฺธโน มหาโภโค. ตสฺสิมานิ ธนานิ โหนฺติ, เสยฺยถิทํ, สทฺธาธนํ สีลธนํ หิริธนํ โอตฺตปฺปธนํ สุตธนํ จาคธนํ ปญฺญาธนํ. พุทฺโธ สมาโน อิทํ ลภติ’’. เอตมตฺถํ ภควา อโวจ. "या लक्षणांनी युक्त होऊन जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर चक्रवर्ती राजा होतात...पे... राजा झाल्यावर त्यांना काय लाभ होतो? ते अत्यंत धनवान, महाधनी, महाभोगी होतात; त्यांच्याकडे विपुल सुवर्ण-चांदी, विपुल सुखसोयींची साधने, विपुल धनधान्य आणि परिपूर्ण खजिना व कोठारे असतात. राजा झाल्यावर त्यांना हा लाभ होतो...पे... बुद्ध झाल्यावर त्यांना काय लाभ होतो? ते धनवान, महाधनी आणि महाभोगी होतात. त्यांच्याकडे ही धने असतात, जसे की—श्रद्धाधन, शीलधन, हिरीधन (पापाची लाज वाटणे), ओत्तप्पधन (पापाची भीती वाटणे), श्रुतधन (ज्ञान), त्यागधन आणि प्रज्ञाधन. बुद्ध झाल्यावर त्यांना हा लाभ होतो." हे भगवान म्हणाले. ๒๒๓. ตตฺเถตํ วุจฺจติ – २२३. यावर हे म्हटले आहे— ‘‘ตุลิย ปฏิวิจย จินฺตยิตฺวา,มหาชนสงฺคหนํ สเมกฺขมาโน; อยมิทมรหติ ตตฺถ ตตฺถ,ปุริสวิเสสกโร ปุเร อโหสิ. "तुलना करून, विचार करून आणि चिंतन करून, महाजन-संग्रहाचा विचार करत, 'हा याला पात्र आहे' असे जाणून, ते पूर्वी त्या त्या जन्मात पुरुषांमधील विशेषाचा आदर करणारे (त्यांच्या योग्यतेनुसार दान देणारे) होते." ‘‘มหิญฺจ ปน ฐิโต อโนนมนฺโต,ผุสติ กเรหิ อุโภหิ ชณฺณุกานิ; มหิรุหปริมณฺฑโล อโหสิ,สุจริตกมฺมวิปากเสสเกน. "आणि पृथ्वीवर सरळ उभे राहून, न वाकता, ते आपल्या दोन्ही हातांनी गुडघ्यांना स्पर्श करतात. सुचरित कर्माच्या विपाकाच्या शेषाने त्यांचे शरीर वटवृक्षासारखे परिमंडळ (प्रमाणबद्ध) झाले." ‘‘พหุวิวิธนิมิตฺตลกฺขณญฺญู,อตินิปุณา มนุชา พฺยากรึสุ; พหุวิวิธา คิหีนํ อรหานิ,ปฏิลภติ ทหโร สุสุ กุมาโร. "अनेक प्रकारच्या निमित्त व लक्षणांचे ज्ञाते असलेल्या अत्यंत निपुण मनुष्यांनी (भविष्यवेत्त्यांनी) भाकीत केले: 'हा लहान सुकुमार बालक गृहस्थांना योग्य असणारे अनेक प्रकारचे विपुल भोग प्राप्त करेल." ‘‘อิธ จ มหีปติสฺส กามโภคี,คิหิปติรูปกา พหู ภวนฺติ; ยทิ จ ชหติ สพฺพกามโภคํ,ลภติ อนุตฺตรํ อุตฺตมธนคฺค’’นฺติ. "आणि जर ते या पृथ्वीचे स्वामी (राजे) झाले, तर गृहस्थाला योग्य असणारे अनेक कामभोग त्यांना प्राप्त होतील; आणि जर त्यांनी सर्व कामभोगांचा त्याग केला, तर ते अनुत्तर, सर्वोत्तम प्रज्ञाधन प्राप्त करतील.'" (๑๗-๑๙) สีหปุพฺพทฺธกายาทิติลกฺขณํ (१७-१९) सिंहासारखा पूर्वार्ध शरीर इत्यादी तीन लक्षणे ๒๒๔. ‘‘ยมฺปิ[Pg.134], ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ ปุริมํ ภวํ ปุริมํ นิเกตํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน พหุชนสฺส อตฺถกาโม อโหสิ หิตกาโม ผาสุกาโม โยคกฺเขมกาโม – ‘กินฺติเม สทฺธาย วฑฺเฒยฺยุํ, สีเลน วฑฺเฒยฺยุํ, สุเตน วฑฺเฒยฺยุํ, จาเคน วฑฺเฒยฺยุํ, ธมฺเมน วฑฺเฒยฺยุํ, ปญฺญาย วฑฺเฒยฺยุํ, ธนธญฺเญน วฑฺเฒยฺยุํ, เขตฺตวตฺถุนา วฑฺเฒยฺยุํ, ทฺวิปทจตุปฺปเทหิ วฑฺเฒยฺยุํ, ปุตฺตทาเรหิ วฑฺเฒยฺยุํ, ทาสกมฺมกรโปริเสหิ วฑฺเฒยฺยุํ, ญาตีหิ วฑฺเฒยฺยุํ, มิตฺเตหิ วฑฺเฒยฺยุํ, พนฺธเวหิ วฑฺเฒยฺยุ’นฺติ. โส ตสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา…เป… โส ตโต จุโต อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมานิ ตีณิ มหาปุริสลกฺขณานิ ปฏิลภติ. สีหปุพฺพทฺธกาโย จ โหติ จิตนฺตรํโส จ สมวฏฺฏกฺขนฺโธ จ. २२४. "हे भिक्षूहो, तथागत जेव्हा पूर्वजन्मी, पूर्वभवी, पूर्ववासात पूर्वी मनुष्यरूपात असताना, बहुजनांचे कल्याण इच्छिणारे, हित इच्छिणारे, सुख इच्छिणारे आणि योगक्षेम (मुक्ती) इच्छिणारे होते—'हे लोक कसे बरे श्रद्धेने वाढतील, शीलाने वाढतील, श्रुताने (ज्ञानाने) वाढतील, त्यागाने वाढतील, धम्माने वाढतील, प्रज्ञेने वाढतील, धनधान्याने वाढतील, शेतजमिनीने वाढतील, द्विपद-चतुष्पदांनी (पशूंनी) वाढतील, पुत्र-पत्नीने वाढतील, दास-सेवक-मजूर वर्गाने वाढतील, ज्ञाती-बांधवांनी वाढतील, मित्रांनी वाढतील, नातेवाईकांनी वाढतील?' त्या कर्माच्या आचरणाने...पे... तेथून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात आले असता, त्यांना महापुरुषाची ही तीन लक्षणे प्राप्त होतात: त्यांचे शरीर सिंहाच्या पूर्वार्धासारखे (छातीचा भाग भव्य) असते, त्यांच्या दोन्ही खांद्यांमधील भाग भरलेला असतो आणि त्यांची मान गोल व सुबक असते." ‘‘โส เตหิ ลกฺขเณหิ สมนฺนาคโต สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี…เป… ราชา สมาโน กึ ลภติ? อปริหานธมฺโม โหติ, น ปริหายติ ธนธญฺเญน เขตฺตวตฺถุนา ทฺวิปทจตุปฺปเทหิ ปุตฺตทาเรหิ ทาสกมฺมกรโปริเสหิ ญาตีหิ มิตฺเตหิ พนฺธเวหิ, น ปริหายติ สพฺพสมฺปตฺติยา. ราชา สมาโน อิทํ ลภติ… พุทฺโธ สมาโน กึ ลภติ? อปริหานธมฺโม โหติ, น ปริหายติ สทฺธาย สีเลน สุเตน จาเคน ปญฺญาย, น ปริหายติ สพฺพสมฺปตฺติยา. พุทฺโธ สมาโน อิทํ ลภติ’’. เอตมตฺถํ ภควา อโวจ. "या लक्षणांनी युक्त होऊन जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर चक्रवर्ती राजा होतात...पे... राजा झाल्यावर त्यांना काय लाभ होतो? ते अपरिहाणधर्मी (कधीही ऱ्हास न होणारे) होतात; त्यांचे धनधान्य, शेतजमीन, द्विपद-चतुष्पद प्राणी, पुत्र-पत्नी, दास-सेवक-मजूर, ज्ञाती-बांधव, मित्र आणि नातेवाईक यांचा कधीही ऱ्हास होत नाही, त्यांच्या सर्व संपत्तीचा कधीही ऱ्हास होत नाही. राजा झाल्यावर त्यांना हा लाभ होतो... बुद्ध झाल्यावर त्यांना काय लाभ होतो? ते अपरिहाणधर्मी होतात; त्यांची श्रद्धा, शील, श्रुत, त्याग आणि प्रज्ञा यांचा कधीही ऱ्हास होत नाही, त्यांच्या सर्व संपत्तीचा कधीही ऱ्हास होत नाही. बुद्ध झाल्यावर त्यांना हा लाभ होतो." हे भगवान म्हणाले. ๒๒๕. ตตฺเถตํ วุจฺจติ – २२५. यावर हे म्हटले आहे— ‘‘สทฺธาย สีเลน สุเตน พุทฺธิยา,จาเคน ธมฺเมน พหูหิ สาธุหิ; ธเนน ธญฺเญน จ เขตฺตวตฺถุนา,ปุตฺเตหิ ทาเรหิ จตุปฺปเทหิ จ. "श्रद्धा, शील, श्रुत, बुद्धी, त्याग, धम्म आणि इतर अनेक कल्याणकारी गुणांनी; तसेच धन, धान्य, शेतजमीन, पुत्र, पत्नी आणि चतुष्पद प्राण्यांनी;" ‘‘ญาตีหิ มิตฺเตหิ จ พนฺธเวหิ จ,พเลน วณฺเณน สุเขน จูภยํ; กถํ น หาเยยฺยุํ ปเรติ อิจฺฉติ,อตฺถสฺส มิทฺธี จ ปนาภิกงฺขติ. "ज्ञाती-बांधव, मित्र, नातेवाईक, बल, वर्ण आणि सुख या दोन्ही गोष्टींनी इतर लोकांचा कधीही ऱ्हास होऊ नये, अशी ते इच्छा करत असत आणि त्यांच्या कल्याणाची व समृद्धीचीच आकांक्षा बाळगत असत." ‘‘ส [Pg.135] สีหปุพฺพทฺธสุสณฺฐิโต อหุ,สมวฏฺฏกฺขนฺโธ จ จิตนฺตรํโส; ปุพฺเพ สุจิณฺเณน กเตน กมฺมุนา,อหานิยํ ปุพฺพนิมิตฺตมสฺส ตํ. "पूर्वी केलेल्या सुचरित कर्मामुळे त्यांचे शरीर सिंहाच्या पूर्वार्धासारखे सुगठित झाले, त्यांची मान गोल व सुबक झाली आणि खांद्यांचा भाग भरलेला झाला. हे त्यांच्या (कल्याणाचा) ऱ्हास न होण्याचे पूर्वनिमित्त होते." ‘‘คิหีปิ ธญฺเญน ธเนน วฑฺฒติ,ปุตฺเตหิ ทาเรหิ จตุปฺปเทหิ จ; อกิญฺจโน ปพฺพชิโต อนุตฺตรํ,ปปฺโปติ โพธึ อสหานธมฺมต’’นฺติ. "गृहस्थ राहिले तरी ते धान्य, धन, पुत्र, पत्नी आणि चतुष्पद प्राण्यांनी समृद्ध होतात; आणि जर अकिंचन (सर्वसंगपरित्यागी) होऊन प्रव्रजित झाले, तर ते अनुत्तर, कधीही ऱ्हास न पावणारी बोधी प्राप्त करतात.'" (๒๐) รสคฺคสคฺคิตาลกฺขณํ (२०) उत्कृष्ट रससंवेदनशीलता (रसग्गसग्गिता) लक्षण ๒๒๖. ‘‘ยมฺปิ, ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ ปุริมํ ภวํ ปุริมํ นิเกตํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน สตฺตานํ อวิเหฐกชาติโก อโหสิ ปาณินา วา เลฑฺฑุนา วา ทณฺเฑน วา สตฺเถน วา. โส ตสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา อุปจิตตฺตา…เป… โส ตโต จุโต อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมํ มหาปุริสลกฺขณํ ปฏิลภติ, รสคฺคสคฺคี โหติ, อุทฺธคฺคาสฺส รสหรณีโย คีวาย ชาตา โหนฺติ สมาภิวาหินิโย. २२६. "हे भिक्षूहो, तथागत जेव्हा पूर्वजन्मी, पूर्वभवी, पूर्ववासात पूर्वी मनुष्यरूपात असताना, प्राण्यांना हाताने, दगडाने, काठीने किंवा शस्त्राने न छळणाऱ्या स्वभावाचे होते. त्या कर्माच्या आचरणाने व संचयनाने...पे... तेथून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात आले असता, त्यांना महापुरुषाचे हे लक्षण प्राप्त होते: ते उत्कृष्ट रससंवेदी (चव जाणणारे) असतात; त्यांच्या गळ्यामध्ये वरच्या देशाने गेलेल्या रसवाहिन्या असतात, ज्या सर्व बाजूंनी समान रीतीने रस वाहून नेतात." ‘‘โส เตน ลกฺขเณน สมนฺนาคโต สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี…เป… ราชา สมาโน กึ ลภติ? อปฺปาพาโธ โหติ อปฺปาตงฺโก, สมเวปากินิยา คหณิยา สมนฺนาคโต นาติสีตาย นาจฺจุณฺหาย. ราชา สมาโน อิทํ ลภติ… พุทฺโธ สมาโน กึ ลภติ? อปฺปาพาโธ โหติ อปฺปาตงฺโก สมเวปากินิยา คหณิยา สมนฺนาคโต นาติสีตาย นาจฺจุณฺหาย มชฺฌิมาย ปธานกฺขมาย. พุทฺโธ สมาโน อิทํ ลภติ’’. เอตมตฺถํ ภควา อโวจ. "या लक्षणाने युक्त होऊन जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर चक्रवर्ती राजा होतात...पे... राजा झाल्यावर त्यांना काय लाभ होतो? ते अल्प-आजारी, अल्प-व्याधीयुक्त असतात; त्यांची पचनशक्ती (जठराग्नी) समतोल असते, जी अतिशय थंडही नसते आणि अतिशय उष्णही नसते. राजा झाल्यावर त्यांना हा लाभ होतो... बुद्ध झाल्यावर त्यांना काय लाभ होतो? ते अल्प-आजारी, अल्प-व्याधीयुक्त असतात; त्यांची पचनशक्ती समतोल असते, जी अतिशय थंडही नसते आणि अतिशय उष्णही नसते, जी मध्यम स्वरूपाची आणि ध्यानासाठी (तपश्चर्येसाठी) अनुकूल असते. बुद्ध झाल्यावर त्यांना हा लाभ होतो." हे भगवान म्हणाले. ๒๒๗. ตตฺเถตํ วุจฺจติ – २२७. यावर हे म्हटले आहे— ‘‘น ปาณิทณฺเฑหิ ปนาถ เลฑฺฑุนา,สตฺเถน วา มรณวเธน วา ปน; อุพฺพาธนาย ปริตชฺชนาย วา,น เหฐยี ชนตมเหฐโก อหุ. "त्यांनी हाताने, काठीने, दगडाने, शस्त्राने किंवा जीवे मारून कोणालाही त्रास दिला नाही; तसेच कोणालाही बंदी बनवून किंवा धमकावून छळले नाही. ते लोकांचे अ-हिंसक (न छळणारे) रक्षक होते." ‘‘เตเนว [Pg.136] โส สุคติมุเปจฺจ โมทติ,สุขปฺผลํ กริย สุขานิ วินฺทติ; สโมชสา รสหรณี สุสณฺฐิตา,อิธาคโต ลภติ รสคฺคสคฺคิตํ. "त्याच कर्मामुळे सुगतीला प्राप्त होऊन ते आनंदित होतात; सुखाचे फळ देणारे कर्म करून ते सुखाचा अनुभव घेतात. या मनुष्यलोकात आले असता, त्यांना उत्कृष्ट रससंवेदनशीलता प्राप्त होते आणि त्यांच्या गळ्यामध्ये समतोल रस वाहून नेणाऱ्या रसवाहिन्या चांगल्या प्रकारे स्थित असतात." ‘‘เตนาหุ นํ อตินิปุณา วิจกฺขณา,อยํ นโร สุขพหุโล ภวิสฺสติ; คิหิสฺส วา ปพฺพชิตสฺส วา ปุน,ตํ ลกฺขณํ ภวติ ตทตฺถโชตก’’นฺติ. त्यामुळेच, अत्यंत निपुण आणि बुद्धिमान लोक त्या (बालका)विषयी म्हणतात: 'हा मनुष्य अत्यंत सुखी होईल; गृहस्थ असो वा प्रव्रजित, हे लक्षण त्या त्या स्थितीतील कल्याणाचा निर्देश करते.' (๒๑-๒๒) อภินีลเนตฺตโคปขุมลกฺขณานิ (२१-२२) अभिनिलनेत्त-गोपखुम लक्षणे (अत्यंत गडद निळे डोळे आणि गायीच्या पापण्यांसारख्या पापण्या असण्याचे लक्षण) ๒๒๘. ‘‘ยมฺปิ, ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ ปุริมํ ภวํ ปุริมํ นิเกตํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน น จ วิสฏํ, น จ วิสาจิ, น จ ปน วิเจยฺย เปกฺขิตา, อุชุํ ตถา ปสฏมุชุมโน, ปิยจกฺขุนา พหุชนํ อุทิกฺขิตา อโหสิ. โส ตสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา…เป… โส ตโต จุโต อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมานิ ทฺเว มหาปุริสลกฺขณานิ ปฏิลภติ. อภินีลเนตฺโต จ โหติ โคปขุโม จ. २२८. भिक्खूहो, तथागत जेव्हा पूर्वजन्मात, पूर्वभवात, पूर्ववासात मनुष्य रूपात होते, तेव्हा त्यांनी कोणाकडेही क्रोधाने डोळे वटारून पाहिले नाही, तिरक्या नजरेने पाहिले नाही, किंवा लपून-छपून पाहिले नाही; तर सरळ, मोकळेपणाने आणि सरळ मनाने, प्रेमळ नजरेने बहुजन समाजाकडे पाहिले. त्या कर्माच्या आचरणामुळे... तेथून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात आल्यावर त्यांना महापुरुषाची ही दोन लक्षणे प्राप्त झाली: त्यांचे डोळे अत्यंत गडद निळे (अभिनिलनेत्त) आहेत आणि त्यांच्या पापण्या गायीच्या पापण्यांसारख्या (गोपखुम) आहेत. ‘‘โส เตหิ ลกฺขเณหิ สมนฺนาคโต, สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี…เป… ราชา สมาโน กึ ลภติ? ปิยทสฺสโน โหติ พหุโน ชนสฺส, ปิโย โหติ มนาโป พฺราหฺมณคหปติกานํ เนคมชานปทานํ คณกมหามตฺตานํ อนีกฏฺฐานํ โทวาริกานํ อมจฺจานํ ปาริสชฺชานํ ราชูนํ โภคิยานํ กุมารานํ. ราชา สมาโน อิทํ ลภติ…เป… พุทฺโธ สมาโน กึ ลภติ? ปิยทสฺสโน โหติ พหุโน ชนสฺส, ปิโย โหติ มนาโป ภิกฺขูนํ ภิกฺขุนีนํ อุปาสกานํ อุปาสิกานํ เทวานํ มนุสฺสานํ อสุรานํ นาคานํ คนฺธพฺพานํ. พุทฺโธ สมาโน อิทํ ลภติ’’. เอตมตฺถํ ภควา อโวจ. या लक्षणांनी युक्त होऊन जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर चक्रवर्ती राजा होतील... राजा झाल्यावर त्यांना काय प्राप्त होते? ते बहुजन समाजासाठी प्रियदर्शन (पाहण्यास अत्यंत प्रिय) होतात; ब्राह्मण, गृहपती, नगरातील व जनपदातील लोक, कोषाधिकारी, महामात्र, हत्ती-घोडेस्वार, द्वारपाल, अमात्य, सभासद, मांडलिक राजे, जहागीरदार आणि राजकुमार या सर्वांचे ते प्रिय व आवडते होतात. राजा झाल्यावर त्यांना हा लाभ मिळतो... बुद्ध झाल्यावर त्यांना काय प्राप्त होते? ते बहुजन समाजासाठी प्रियदर्शन होतात; भिक्खू, भिक्खुनी, उपासक, उपासिका, देव, मनुष्य, असुर, नाग आणि गंधर्व या सर्वांचे ते प्रिय व मनपसंत होतात. बुद्ध झाल्यावर त्यांना हा लाभ मिळतो. भगवान असे म्हणाले. ๒๒๙. ตตฺเถตํ วุจฺจติ – २२९. या संदर्भात असे म्हटले आहे – ‘‘น จ วิสฏํ น จ วิสาจิ, น จ ปน วิเจยฺยเปกฺขิตา; อุชุํ ตถา ปสฏมุชุมโน, ปิยจกฺขุนา พหุชนํ อุทิกฺขิตา. त्यांनी क्रोधाने डोळे वटारून पाहिले नाही, तिरक्या नजरेने पाहिले नाही, किंवा लपून-छपून पाहिले नाही; तर सरळ, मोकळेपणाने आणि सरळ मनाने, प्रेमळ नजरेने बहुजन समाजाकडे पाहिले. ‘‘สุคตีสุ [Pg.137] โส ผลวิปากํ,อนุภวติ ตตฺถ โมทติ; อิธ จ ปน ภวติ โคปขุโม,อภินีลเนตฺตนยโน สุทสฺสโน. त्यांनी सुगतीमध्ये (स्वर्गात) कर्माच्या फळाचा विपाक अनुभवला आणि तेथे आनंद घेतला; आणि आता या मनुष्यलोकात आल्यावर त्यांच्या पापण्या गायीच्या पापण्यांसारख्या सुंदर आहेत, डोळे अत्यंत गडद निळे आहेत आणि ते अत्यंत दर्शनीय (सुदस्सन) आहेत. ‘‘อภิโยคิโน จ นิปุณา,พหู ปน นิมิตฺตโกวิทา; สุขุมนยนกุสลา มนุชา,ปิยทสฺสโนติ อภินิทฺทิสนฺติ นํ. अनेक निपुण लक्षणशास्त्रज्ञ, शकुन व चिन्हे ओळखण्यात कुशल असलेले विद्वान आणि सूक्ष्म दृष्टीचे पारखी लोक त्या बालकाचे वर्णन 'प्रियदर्शन' (सर्वांना पाहण्यास प्रिय असणारा) असे करतात. ‘‘ปิยทสฺสโน คิหีปิ สนฺโต จ,ภวติ พหุชนปิยายิโต; ยทิ จ น ภวติ คิหี สมโณ โหติ,ปิโย พหูนํ โสกนาสโน’’ติ. हा प्रियदर्शन बालक जर गृहस्थ राहिला, तर बहुजन समाजाचा अत्यंत लाडका होईल; आणि जर तो गृहस्थ न राहता श्रमण (संन्यासी) झाला, तर तो बहुतांचा प्रिय आणि त्यांच्या शोकाचा नाश करणारा होईल, असे ते भाकीत करतात. (๒๓) อุณฺหีสสีสลกฺขณํ (२३) उण्हिससीस लक्षण (मुकुट किंवा पगडी घातल्यासारखे मस्तक असण्याचे लक्षण) ๒๓๐. ‘‘ยมฺปิ, ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ ปุริมํ ภวํ ปุริมํ นิเกตํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน พหุชนปุพฺพงฺคโม อโหสิ กุสเลสุ ธมฺเมสุ พหุชนปาโมกฺโข กายสุจริเต วจีสุจริเต มโนสุจริเต ทานสํวิภาเค สีลสมาทาเน อุโปสถุปวาเส มตฺเตยฺยตาย เปตฺเตยฺยตาย สามญฺญตาย พฺรหฺมญฺญตาย กุเล เชฏฺฐาปจายิตาย อญฺญตรญฺญตเรสุ จ อธิกุสเลสุ ธมฺเมสุ. โส ตสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา…เป… โส ตโต จุโต อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมํ มหาปุริสลกฺขณํ ปฏิลภติ – อุณฺหีสสีโส โหติ. २३०. भिक्खूहो, तथागत जेव्हा पूर्वजन्मात, पूर्वभवात, पूर्ववासात मनुष्य रूपात होते, तेव्हा ते कुशल धर्मांमध्ये बहुजन समाजाचे अग्रगामी (पुढारी) आणि प्रमुख होते; जसे की कायसुचरित (शरीराचे सदाचरण), वचीसुचरित (वाणीचे सदाचरण), मनोसुचरित (मनाचे सदाचरण), दानधर्म व वाटप, शील संवर्धन, उपोसथ व्रत पाळणे, माता-पित्यांची सेवा करणे, श्रमण व ब्राह्मणांचा आदर करणे, कुळातील थोरामोठ्यांचा सन्मान करणे आणि इतर विविध श्रेष्ठ कुशल धर्मांमध्ये ते लोकांचे मार्गदर्शक व नेते होते. त्या कर्माच्या आचरणामुळे... तेथून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात आल्यावर त्यांना महापुरुषाचे हे लक्षण प्राप्त झाले: त्यांचे मस्तक मुकुट किंवा पगडी धारण केल्यासारखे (उण्हिससीस) आहे. ‘‘โส เตน ลกฺขเณน สมนฺนาคโต สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี…เป… ราชา สมาโน กึ ลภติ? มหาสฺส ชโน อนฺวายิโก โหติ, พฺราหฺมณคหปติกา เนคมชานปทา คณกมหามตฺตา อนีกฏฺฐา โทวาริกา อมจฺจา ปาริสชฺชา ราชาโน โภคิยา กุมารา. ราชา สมาโน อิทํ ลภติ… พุทฺโธ สมาโน กึ ลภติ? มหาสฺส ชโน อนฺวายิโก โหติ, ภิกฺขู ภิกฺขุนิโย อุปาสกา อุปาสิกาโย เทวา มนุสฺสา อสุรา นาคา คนฺธพฺพา. พุทฺโธ สมาโน อิทํ ลภติ’’. เอตมตฺถํ ภควา อโวจ. या लक्षणाने युक्त होऊन जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर चक्रवर्ती राजा होतील... राजा झाल्यावर त्यांना काय प्राप्त होते? बहुजन समाज त्यांच्या आज्ञेत राहतो; जसे की ब्राह्मण, गृहपती, नगरातील व जनपदातील लोक, कोषाधिकारी, महामात्र, हत्ती-घोडेस्वार, द्वारपाल, अमात्य, सभासद, मांडलिक राजे, जहागीरदार आणि राजकुमार हे सर्व त्यांच्या मागे चालणारे (अनुयायी) होतात. राजा झाल्यावर त्यांना हा लाभ मिळतो... बुद्ध झाल्यावर त्यांना काय प्राप्त होते? बहुजन समाज त्यांच्या आज्ञेत राहतो; भिक्खू, भिक्खुनी, उपासक, उपासिका, देव, मनुष्य, असुर, नाग आणि गंधर्व हे सर्व त्यांच्या शिकवणुकीचे अनुकरण करणारे होतात. बुद्ध झाल्यावर त्यांना हा लाभ मिळतो. भगवान असे म्हणाले. ๒๓๑. ตตฺเถตํ [Pg.138] วุจฺจติ – २३१. या संदर्भात असे म्हटले आहे – ‘‘ปุพฺพงฺคโม สุจริเตสุ อหุ,ธมฺเมสุ ธมฺมจริยาภิรโต; อนฺวายิโก พหุชนสฺส อหุ,สคฺเคสุ เวทยิตฺถ ปุญฺญผลํ. ते पूर्वी सदाचरणात अग्रगामी होते, धार्मिक जीवन जगण्यात मग्न होते. त्यामुळे बहुजन समाज त्यांच्या मागे चालणारा झाला आणि त्यांनी स्वर्गात आपल्या पुण्याचे फळ उपभोगले. ‘‘เวทิตฺวา โส สุจริตสฺส ผลํ,อุณฺหีสสีสตฺตมิธชฺฌคมา; พฺยากํสุ พฺยญฺชนนิมิตฺตธรา,ปุพฺพงฺคโม พหุชนํ เหสฺสติ. सदाचरणाचे ते फळ उपभोगून, या मनुष्यलोकात त्यांनी मुकुटसदृश मस्तक (उण्हिससीसत्व) प्राप्त केले. शारीरिक चिन्हे व लक्षणे जाणणाऱ्यांनी भाकीत केले की, 'हा बालक बहुजन समाजाचा नेता होईल.' ‘‘ปฏิโภคิยา มนุเชสุ อิธ,ปุพฺเพว ตสฺส อภิหรนฺติ ตทา; ยทิ ขตฺติโย ภวติ ภูมิปติ,ปฏิหารกํ พหุชเน ลภติ. या मनुष्यलोकातही लोक बालपणापासूनच त्यांची सेवा व आदर करतील. जर ते क्षत्रिय राजे झाले, तर त्यांना बहुजन समाजाची एकनिष्ठ सेवा व निष्ठा प्राप्त होईल. ‘‘อถ เจปิ ปพฺพชติ โส มนุโช,ธมฺเมสุ โหติ ปคุโณ วิสวี; ตสฺสานุสาสนิคุณาภิรโต,อนฺวายิโก พหุชโน ภวตี’’ติ. आणि जर त्या मनुष्याने प्रव्रज्या घेतली, तर ते धर्मामध्ये निपुण व वशित्व प्राप्त केलेले बुद्ध होतील. बहुजन समाज त्यांच्या उपदेशावर व गुणांवर अनुरक्त होऊन त्यांच्या आज्ञेचे पालन करेल. (๒๔-๒๕) เอเกกโลมตาอุณฺณาลกฺขณานิ (२४-२५) एकेकलोमता आणि उण्णा लक्षणे (प्रत्येक छिद्रात एकच लव असणे आणि भुवयांच्या मध्ये पांढरी मऊ लोकरसदृश उर्ण असण्याचे लक्षण) ๒๓๒. ‘‘ยมฺปิ, ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ ปุริมํ ภวํ ปุริมํ นิเกตํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน มุสาวาทํ ปหาย มุสาวาทา ปฏิวิรโต อโหสิ, สจฺจวาที สจฺจสนฺโธ เถโต ปจฺจยิโก อวิสํวาทโก โลกสฺส. โส ตสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา อุปจิตตฺตา…เป… โส ตโต จุโต อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมานิ ทฺเว มหาปุริสลกฺขณานิ ปฏิลภติ. เอเกกโลโม จ โหติ, อุณฺณา จ ภมุกนฺตเร ชาตา โหติ โอทาตา มุทุตูลสนฺนิภา. २३२. भिक्खूहो, तथागत जेव्हा पूर्वजन्मात, पूर्वभवात, पूर्ववासात मनुष्य रूपात होते, तेव्हा त्यांनी असत्य बोलणे सोडून दिले होते आणि ते असत्यापासून अलिप्त राहिले होते. ते नेहमी सत्य बोलणारे, सत्याशी बांधील असणारे, विश्वासू, स्थिर आणि जगाला न फसवणारे होते. त्या कर्माच्या आचरणामुळे व संचयामुळे... तेथून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात आल्यावर त्यांना महापुरुषाची ही दोन लक्षणे प्राप्त झाली: त्यांच्या शरीरावरील प्रत्येक छिद्रात एकच लव (एकेकलोम) आहे आणि त्यांच्या दोन्ही भुवयांच्या मध्ये कापसासारखी मऊ व पांढरी शुभ्र उर्ण (उण्णा) उत्पन्न झाली आहे. ‘‘โส เตหิ ลกฺขเณหิ สมนฺนาคโต, สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี…เป… ราชา สมาโน กึ ลภติ? มหาสฺส ชโน อุปวตฺตติ, พฺราหฺมณคหปติกา เนคมชานปทา คณกมหามตฺตา อนีกฏฺฐา โทวาริกา อมจฺจา ปาริสชฺชา ราชาโน โภคิยา กุมารา. ราชา [Pg.139] สมาโน อิทํ ลภติ… พุทฺโธ สมาโน กึ ลภติ? มหาสฺส ชโน อุปวตฺตติ, ภิกฺขู ภิกฺขุนิโย อุปาสกา อุปาสิกาโย เทวา มนุสฺสา อสุรา นาคา คนฺธพฺพา. พุทฺโธ สมาโน อิทํ ลภติ’’. เอตมตฺถํ ภควา อโวจ. या लक्षणांनी युक्त होऊन जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर चक्रवर्ती राजा होतील... राजा झाल्यावर त्यांना काय प्राप्त होते? बहुजन समाज त्यांच्या इच्छेनुसार वागतो; जसे की ब्राह्मण, गृहपती, नगरातील व जनपदातील लोक, कोषाधिकारी, महामात्र, हत्ती-घोडेस्वार, द्वारपाल, अमात्य, सभासद, मांडलिक राजे, जहागीरदार आणि राजकुमार हे सर्व त्यांच्या इच्छेचे पालन करतात. राजा झाल्यावर त्यांना हा लाभ मिळतो... बुद्ध झाल्यावर त्यांना काय प्राप्त होते? बहुजन समाज त्यांच्या इच्छेनुसार वागतो; भिक्खू, भिक्खुनी, उपासक, उपासिका, देव, मनुष्य, असुर, नाग आणि गंधर्व हे सर्व त्यांच्या इच्छेचे पालन करतात. बुद्ध झाल्यावर त्यांना हा लाभ मिळतो. भगवान असे म्हणाले. ๒๓๓. ตตฺเถตํ วุจฺจติ – २३३. या संदर्भात असे म्हटले आहे – ‘‘สจฺจปฺปฏิญฺโญ ปุริมาสุ ชาติสุ,อทฺเวชฺฌวาโจ อลิกํ วิวชฺชยิ; น โส วิสํวาทยิตาปิ กสฺสจิ,ภูเตน ตจฺเฉน ตเถน ภาสยิ. ते पूर्वजन्मांमध्ये आपल्या वचनाशी प्रामाणिक होते, त्यांच्या बोलण्यात दुटूपीपणा नव्हता आणि त्यांनी असत्याचा त्याग केला होता. त्यांनी कोणालाही कधी फसवले नाही; ते नेहमी जे सत्य, यथार्थ आणि तथ्यपूर्ण होते तेच बोलले. ‘‘เสตา สุสุกฺกา มุทุตูลสนฺนิภา,อุณฺณา สุชาตา ภมุกนฺตเร อหุ; น โลมกูเปสุ ทุเว อชายิสุํ,เอเกกโลมูปจิตงฺควา อหุ. त्या कर्मामुळे त्यांच्या दोन्ही भुवयांच्या मध्ये कापसासारखी मऊ, पांढरी शुभ्र आणि सुंदर उर्ण (उण्णा) उत्पन्न झाली. त्यांच्या शरीरावरील एकाही छिद्रातून दोन लव एकत्र उगवल्या नाहीत, तर प्रत्येक छिद्रात एकच लव उगवून त्यांचे शरीर सुशोभित झाले. ‘‘ตํ ลกฺขณญฺญู พหโว สมาคตา,พฺยากํสุ อุปฺปาทนิมิตฺตโกวิทา; อุณฺณา จ โลมา จ ยถา สุสณฺฐิตา,อุปวตฺตตี อีทิสกํ พหุชฺชโน. अनेक लक्षणशास्त्रज्ञ आणि शकुन ओळखण्यात पटाईत असलेल्या विद्वानांनी एकत्र येऊन भाकीत केले: 'ज्या बालकाच्या भुवयांच्या मध्ये उर्ण आणि शरीरावर एकेक लव इतक्या सुंदर रीतीने स्थित आहे, अशा बालकाच्या इच्छेचे बहुजन समाज पालन करेल.' ‘‘คิหิมฺปิ สนฺตํ อุปวตฺตตี ชโน,พหุ ปุรตฺถาปกเตน กมฺมุนา; อกิญฺจนํ ปพฺพชิตํ อนุตฺตรํ,พุทฺธมฺปิ สนฺตํ อุปวตฺตติ ชโน’’ติ. पूर्वजन्मात केलेल्या पुण्यामुळे, हा बालक जर गृहस्थ (चक्रवर्ती राजा) राहिला, तरी बहुजन समाज त्याच्या इच्छेचे पालन करेल; आणि जर त्याने सर्वसंगपरित्याग करून प्रव्रज्या घेतली, तर तो अनुपमेय बुद्ध होईल आणि सर्व लोक त्याच्या इच्छेचे पालन करतील, असे त्यांनी सांगितले. (๒๖-๒๗) จตฺตาลีสอวิรฬทนฺตลกฺขณานิ (२६-२७) चत्तालीस-अविरळदंत लक्षणे (चाळीस दात असणे आणि दातांमध्ये फटी नसणे ही लक्षणे) ๒๓๔. ‘‘ยมฺปิ, ภิกฺขเว ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ ปุริมํ ภวํ ปุริมํ นิเกตํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน ปิสุณํ วาจํ ปหาย ปิสุณาย วาจาย ปฏิวิรโต อโหสิ. อิโต สุตฺวา น อมุตฺร อกฺขาตา อิเมสํ เภทาย, อมุตฺร วา สุตฺวา น อิเมสํ อกฺขาตา อมูสํ เภทาย[Pg.140], อิติ ภินฺนานํ วา สนฺธาตา, สหิตานํ วา อนุปฺปทาตา, สมคฺคาราโม สมคฺครโต สมคฺคนนฺที สมคฺคกรณึ วาจํ ภาสิตา อโหสิ. โส ตสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา…เป… โส ตโต จุโต อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมานิ ทฺเว มหาปุริสลกฺขณานิ ปฏิลภติ. จตฺตาลีสทนฺโต จ โหติ อวิรฬทนฺโต จ. २३४. “भिक्षूंनो, तथागत जेव्हा पूर्वजन्मी, पूर्वभवात, पूर्व निवासस्थानात पूर्वी मनुष्यरूपात असताना, त्यांनी चहाडी (कडवट/चहाडीयुक्त बोलणे) सोडून दिली होती आणि चहाडी करण्यापासून ते अलिप्त राहिले होते. इकडून ऐकून त्यांच्यात फूट पाडण्यासाठी तिकडे सांगत नसत, किंवा तिकडून ऐकून यांच्यात फूट पाडण्यासाठी इकडे सांगत नसत. अशा प्रकारे ते दुभंगलेल्यांना जोडणारे, एकोपा असलेल्यांना प्रोत्साहन देणारे, ऐक्यात रमणारे, ऐक्यात आनंद मानणारे, ऐक्याची आवड असणारे आणि ऐक्य निर्माण करणारीच वाणी बोलणारे होते. त्या कर्माच्या आचरणामुळे... तेथून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात आले असता, त्यांना महापुरुषाची ही दोन लक्षणे प्राप्त होतात: त्यांचे चाळीस दात असतात आणि दातांमध्ये फटी नसतात (सलग दात असतात).” ‘‘โส เตหิ ลกฺขเณหิ สมนฺนาคโต สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี…เป… ราชา สมาโน กึ ลภติ? อเภชฺชปริโส โหติ, อเภชฺชาสฺส โหนฺติ ปริสา, พฺราหฺมณคหปติกา เนคมชานปทา คณกมหามตฺตา อนีกฏฺฐา โทวาริกา อมจฺจา ปาริสชฺชา ราชาโน โภคิยา กุมารา. ราชา สมาโน อิทํ ลภติ … พุทฺโธ สมาโน กึ ลภติ? อเภชฺชปริโส โหติ, อเภชฺชาสฺส โหนฺติ ปริสา, ภิกฺขู ภิกฺขุนิโย อุปาสกา อุปาสิกาโย เทวา มนุสฺสา อสุรา นาคา คนฺธพฺพา. พุทฺโธ สมาโน อิทํ ลภติ’’. เอตมตฺถํ ภควา อโวจ. “या लक्षणांनी युक्त होऊन जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर ते चक्रवर्ती राजा होतात... राजा असताना त्यांना काय लाभ होतो? त्यांची परिषद अभेद्य (कोणीही न फोडू शकणारी) असते. त्यांचे अनुयायी अभेद्य असतात, जसे की ब्राह्मण, गृहपती, नगरातील व जनपदातील लोक, हिशोबनीस व महामात्र (अमात्य), हत्ती व घोडदळाचे योद्धे, द्वारपाल, मंत्री, सभासद, मांडलिक राजे, जहागीरदार आणि राजकुमार. राजा असताना त्यांना हा लाभ मिळतो... बुद्ध झाल्यावर त्यांना काय लाभ होतो? त्यांची परिषद अभेद्य असते. त्यांचे अनुयायी अभेद्य असतात, जसे की भिक्षू, भिक्षुणी, उपासक, उपासिका, देव, मनुष्य, असुर, नाग आणि गंधर्व. बुद्ध झाल्यावर त्यांना हा लाभ मिळतो.” भगवंतांनी हे सांगितले. ๒๓๕. ตตฺเถตํ วุจฺจติ – २३५. या संदर्भात हे म्हटले आहे – ‘‘เวภูติยํ สหิตเภทการึ,เภทปฺปวฑฺฒนวิวาทการึ; กลหปฺปวฑฺฒนอากิจฺจการึ,สหิตานํ เภทชนนึ น ภณิ. “ते पूर्वजन्मात ऐक्य असलेल्यांमध्ये फूट पाडणारे, फूट वाढवणारे व वाद निर्माण करणारे, कलह वाढवणारे व अयोग्य कृत्य करणारे, आणि मित्रांमध्ये फूट पाडणारे चहाडीचे शब्द बोलले नाहीत. ‘‘อวิวาทวฑฺฒนกรึ สุคิรํ,ภินฺนานุสนฺธิชนนึ อภณิ; กลหํ ชนสฺส ปนุที สมงฺคี,สหิเตหิ นนฺทติ ปโมทติ จ. ते वाद न वाढवणारी, मधुर आणि दुभंगलेल्यांना जोडणारी वाणी बोलले; त्यांनी लोकांचा कलह दूर केला, ते ऐक्य घडवून आणणारे होते, आणि ऐक्य असलेल्यांसोबत ते आनंदित व प्रफुल्लित होत असत. ‘‘สุคตีสุ โส ผลวิปากํ,อนุภวติ ตตฺถ โมทติ; ทนฺตา อิธ โหนฺติ อวิรฬา สหิตา,จตุโร ทสสฺส มุขชา สุสณฺฐิตา. सुगतीमध्ये (स्वर्गात) त्यांनी त्या कर्माच्या फळाचा उपभोग घेतला आणि तेथे ते आनंदित राहिले. आता येथे त्यांचे दात सलग, दाट आणि मुखात चाळीस दात सुव्यवस्थितपणे स्थित आहेत. ‘‘ยทิ [Pg.141] ขตฺติโย ภวติ ภูมิปติ,อวิเภทิยาสฺส ปริสา ภวติ; สมโณ จ โหติ วิรโช วิมโล,ปริสาสฺส โหติ อนุคตา อจลา’’ติ. जर ते पृथ्वीचे राजे क्षत्रिय झाले, तर त्यांची परिषद अभेद्य होते; आणि जर ते रागरहित, निष्कलंक श्रमण (बुद्ध) झाले, तर त्यांचे अनुयायी त्यांच्या मागे जाणारे आणि अचल (दृढ) असतात.” (๒๘-๒๙) ปหูตชิวฺหาพฺรหฺมสฺสรลกฺขณานิ (२८-२९) प्रभूतजिव्हा व ब्रह्मस्वर लक्षणे (विशाल जीभ आणि ब्रह्मासारखा आवाज) ๒๓๖. ‘‘ยมฺปิ, ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ ปุริมํ ภวํ ปุริมํ นิเกตํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน ผรุสํ วาจํ ปหาย ผรุสาย วาจาย ปฏิวิรโต อโหสิ. ยา สา วาจา เนลา กณฺณสุขา เปมนียา หทยงฺคมา โปรี พหุชนกนฺตา พหุชนมนาปา, ตถารูปึ วาจํ ภาสิตา อโหสิ. โส ตสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา อุปจิตตฺตา…เป… โส ตโต จุโต อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมานิ ทฺเว มหาปุริสลกฺขณานิ ปฏิลภติ. ปหูตชิวฺโห จ โหติ พฺรหฺมสฺสโร จ กรวีกภาณี. २३६. “भिक्षूंनो, तथागत जेव्हा पूर्वजन्मी, पूर्वभवात, पूर्व निवासस्थानात पूर्वी मनुष्यरूपात असताना, त्यांनी कठोर बोलणे (परुष वाणी) सोडून दिले होते आणि कठोर बोलण्यापासून ते अलिप्त राहिले होते. जी वाणी निर्दोष, कानाला सुखद वाटणारी, प्रेमळ, हृदयाला भिडणारी, शिष्टसंमत (सभ्य), बहुजनांना प्रिय आणि बहुजनांचे मन रिझवणारी होती, अशीच वाणी ते बोलत असत. त्या कर्माच्या आचरणामुळे व संचयामुळे... तेथून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात आले असता, त्यांना महापुरुषाची ही दोन लक्षणे प्राप्त होतात: त्यांची जीभ विशाल (लांब व मऊ) असते आणि त्यांचा आवाज ब्रह्मासारखा (गंभीर) व कोकिळेसारखा (करवीक पक्षासारखा) मधुर असतो.” ‘‘โส เตหิ ลกฺขเณหิ สมนฺนาคโต สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี…เป… ราชา สมาโน กึ ลภติ? อาเทยฺยวาโจ โหติ, อาทิยนฺติสฺส วจนํ พฺราหฺมณคหปติกา เนคมชานปทา คณกมหามตฺตา อนีกฏฺฐา โทวาริกา อมจฺจา ปาริสชฺชา ราชาโน โภคิยา กุมารา. ราชา สมาโน อิทํ ลภติ… พุทฺโธ สมาโน กึ ลภติ? อาเทยฺยวาโจ โหติ, อาทิยนฺติสฺส วจนํ ภิกฺขู ภิกฺขุนิโย อุปาสกา อุปาสิกาโย เทวา มนุสฺสา อสุรา นาคา คนฺธพฺพา. พุทฺโธ สมาโน อิทํ ลภติ’’. เอตมตฺถํ ภควา อโวจ. “या लक्षणांनी युक्त होऊन जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर ते चक्रवर्ती राजा होतात... राजा असताना त्यांना काय लाभ होतो? त्यांची वाणी स्वीकारार्ह (प्रभावशाली) असते. त्यांचे शब्द ब्राह्मण, गृहपती, नगरातील व जनपदातील लोक, हिशोबनीस व महामात्र, हत्ती व घोडदळाचे योद्धे, द्वारपाल, मंत्री, सभासद, मांडलिक राजे, जहागीरदार आणि राजकुमार शिरसावंद्य मानतात (स्वीकारतात). राजा असताना त्यांना हा लाभ मिळतो... बुद्ध झाल्यावर त्यांना काय लाभ होतो? त्यांची वाणी स्वीकारार्ह असते. त्यांचे शब्द भिक्षू, भिक्षुणी, उपासक, उपासिका, देव, मनुष्य, असुर, नाग आणि गंधर्व शिरसावंद्य मानतात. बुद्ध झाल्यावर त्यांना हा लाभ मिळतो.” भगवंतांनी हे सांगितले. ๒๓๗. ตตฺเถตํ วุจฺจติ – २३७. या संदर्भात हे म्हटले आहे – ‘‘อกฺโกสภณฺฑนวิเหสการึ,อุพฺพาธิกํ พหุชนปฺปมทฺทนํ; อพาฬฺหํ คิรํ โส น ภณิ ผรุสํ,มธุรํ ภณิ สุสํหิตํ สขิลํ. “ते शिवीगाळ, भांडण व छळ करणारी, मनाला क्लेश देणारी, बहुजनांना पीडा देणारी आणि अत्यंत कठोर असणारी वाणी बोलले नाहीत; तर ते मधुर, हितकारक आणि सौम्य वाणी बोलले. ‘‘มนโส [Pg.142] ปิยา หทยคามินิโย,วาจา โส เอรยติ กณฺณสุขา; วาจาสุจิณฺณผลมนุภวิ,สคฺเคสุ เวทยถ ปุญฺญผลํ. मनाला प्रिय वाटणारी, हृदयाला भिडणारी आणि कानाला सुखद वाटणारी वाणी ते बोलत असत. त्यांनी सुभाषितातून (चांगल्या वाणीतून) मिळणाऱ्या फळाचा अनुभव घेतला आणि स्वर्गात पुण्याच्या फळाचा उपभोग घेतला. ‘‘เวทิตฺวา โส สุจริตสฺส ผลํ,พฺรหฺมสฺสรตฺตมิธมชฺฌคมา; ชิวฺหาสฺส โหติ วิปุลา ปุถุลา,อาเทยฺยวากฺยวจโน ภวติ. सदाचाराच्या फळाचा उपभोग घेऊन त्यांनी या मनुष्यलोकात ब्रह्मस्वरत्व (ब्रह्मासारखा आवाज) प्राप्त केले. त्यांची जीभ विशाल व रुंद आहे आणि त्यांची वाणी सर्वांना मान्य होणारी (स्वीकारार्ह) आहे. ‘‘คิหิโนปิ อิชฺฌติ ยถา ภณโต,อถ เจ ปพฺพชติ โส มนุโช; อาทิยนฺติสฺส วจนํ ชนตา,พหุโน พหุํ สุภณิตํ ภณโต’’ติ. गृहस्थ असतानाही ते जे बोलतात ते यशस्वी होते; आणि जर तो मनुष्य गृहत्याग करून प्रव्रजित झाला, तर लोक त्यांचे शब्द शिरसावंद्य मानतात, कारण ते बहुजनांच्या कल्याणासाठी सुभाषित (उत्कृष्ट उपदेश) बोलतात.” (๓๐) สีหหนุลกฺขณํ (३०) सिंहहनु लक्षण (सिंहासारखा जबडा) ๒๓๘. ‘‘ยมฺปิ, ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ ปุริมํ ภวํ ปุริมํ นิเกตํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน สมฺผปฺปลาปํ ปหาย สมฺผปฺปลาปา ปฏิวิรโต อโหสิ กาลวาที ภูตวาที อตฺถวาที ธมฺมวาที วินยวาที, นิธานวตึ วาจํ ภาสิตา อโหสิ กาเลน สาปเทสํ ปริยนฺตวตึ อตฺถสํหิตํ. โส ตสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา…เป… โส ตโต จุโต อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมํ มหาปุริสลกฺขณํ ปฏิลภติ, สีหหนุ โหติ. २३८. “भिक्षूंनो, तथागत जेव्हा पूर्वजन्मी, पूर्वभवात, पूर्व निवासस्थानात पूर्वी मनुष्यरूपात असताना, त्यांनी निरर्थक बडबड (व्यर्थ प्रलाप) सोडून दिली होती आणि निरर्थक बडबडीपासून ते अलिप्त राहिले होते. ते योग्य वेळी बोलणारे (कालवादी), सत्य बोलणारे (भूतवादी), अर्थपूर्ण बोलणारे (अर्थवादी), धम्म सुसंगत बोलणारे (धम्मवादी) आणि विनय सुसंगत बोलणारे (विनयवादी) होते. ते योग्य वेळी, सकारण, मर्यादित, हितकारक आणि मनात साठवून ठेवण्याजोगी वाणी बोलत असत. त्या कर्माच्या आचरणामुळे... तेथून च्युत होऊन या मनुष्यलोकात आले असता, त्यांना महापुरुषाचे हे लक्षण प्राप्त होते: त्यांचा जबडा सिंहासारखा असतो.” ‘‘โส เตน ลกฺขเณน สมนฺนาคโต สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี…เป… ราชา สมาโน กึ ลภติ? อปฺปธํสิโย โหติ เกนจิ มนุสฺสภูเตน ปจฺจตฺถิเกน ปจฺจามิตฺเตน. ราชา สมาโน อิทํ ลภติ… พุทฺโธ สมาโน กึ ลภติ? อปฺปธํสิโย โหติ อพฺภนฺตเรหิ วา พาหิเรหิ วา ปจฺจตฺถิเกหิ ปจฺจามิตฺเตหิ, ราเคน วา โทเสน วา โมเหน วา สมเณน วา พฺราหฺมเณน วา เทเวน วา มาเรน วา พฺรหฺมุนา วา เกนจิ วา โลกสฺมึ. พุทฺโธ สมาโน อิทํ ลภติ’’. เอตมตฺถํ ภควา อโวจ. “या लक्षणाने युक्त होऊन जर ते गृहस्थाश्रमात राहिले, तर ते चक्रवर्ती राजा होतात... राजा असताना त्यांना काय लाभ होतो? त्यांना कोणताही मानवी शत्रू किंवा विरोधी पराभूत करू शकत नाही (ते अजिंक्य असतात). राजा असताना त्यांना हा लाभ मिळतो... बुद्ध झाल्यावर त्यांना काय लाभ होतो? ते अंतर्गत किंवा बाह्य शत्रू व विरोधकांकडून, तसेच राग (आसक्ती), द्वेष, मोह, किंवा जगातील कोणताही श्रमण, ब्राह्मण, देव, मार, ब्रह्मा किंवा इतर कोणाकडूनही पराभूत केले जाऊ शकत नाहीत. बुद्ध झाल्यावर त्यांना हा लाभ मिळतो.” भगवंतांनी हे सांगितले. ๒๓๙. ตตฺเถตํ [Pg.143] วุจฺจติ – २३९. या संदर्भात हे म्हटले आहे – ‘‘น สมฺผปฺปลาปํ น มุทฺธตํ,อวิกิณฺณวจนพฺยปฺปโถ อโหสิ; อหิตมปิ จ อปนุทิ,หิตมปิ จ พหุชนสุขญฺจ อภณิ. “ते निरर्थक किंवा मूर्खपणाचे बोलले नाहीत, त्यांची वाणी विखुरलेली (असंगत) नव्हती; त्यांनी अहितकारक गोष्टी दूर केल्या आणि बहुजनांच्या कल्याणाचे व सुखाचे शब्द बोलले. ‘‘ตํ กตฺวา อิโต จุโต ทิวมุปปชฺชิ,สุกตผลวิปากมนุโภสิ; จวิย ปุนริธาคโต สมาโน,ทฺวิทุคมวรตรหนุตฺตมลตฺถ. ते कर्म करून, येथून च्युत झाल्यावर ते स्वर्गात उत्पन्न झाले आणि त्यांनी सत्कर्माच्या फळाचा उपभोग घेतला. तेथून च्युत होऊन पुन्हा येथे आले असता, त्यांनी चौपायांमध्ये श्रेष्ठ असणाऱ्या सिंहासारखा जबडा प्राप्त केला. ‘‘ราชา โหติ สุทุปฺปธํสิโย,มนุชินฺโท มนุชาธิปติ มหานุภาโว; ติทิวปุรวรสโม ภวติ,สุรวรตโรริว อินฺโท. ते अत्यंत अजिंक्य, मानवांचे स्वामी, मानवांचे अधिपती आणि महान प्रभावशाली राजा होतात; ते त्रैलोक्याच्या स्वामीसारखे, देवांमध्ये श्रेष्ठ असणाऱ्या इंद्रासारखे तेजस्वी होतात. ‘‘คนฺธพฺพาสุรยกฺขรกฺขเสภิ,สุเรหิ น หิ ภวติ สุปฺปธํสิโย; ตถตฺโต ยทิ ภวติ ตถาวิโธ,อิธ ทิสา จ ปฏิทิสา จ วิทิสา จา’’ติ. गंधर्व, असुर, यक्ष, राक्षस किंवा देवांकडूनही ते पराभूत केले जाऊ शकत नाहीत; जर ते अशा लक्षणांनी युक्त होऊन येथे (बुद्ध) झाले, तर त्यांना पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण आणि सर्व दिशा-उपदिशांमधील कोणीही पराभूत करू शकत नाही.” (๓๑-๓๒) สมทนฺตสุสุกฺกทาฐาลกฺขณานิ (३१-३२) समदंत व सुशुक्लदाढा लक्षणे (समान दात आणि अत्यंत पांढरे सुळे) ๒๔๐. ‘‘ยมฺปิ, ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ ปุริมํ ภวํ ปุริมํ นิเกตํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน มิจฺฉาชีวํ ปหาย สมฺมาอาชีเวน ชีวิกํ กปฺเปสิ, ตุลากูฏ กํสกูฏ มานกูฏ อุกฺโกฏน วญฺจน นิกติ สาจิโยค เฉทน วธ พนฺธน วิปราโมส อาโลป สหสาการา ปฏิวิรโต อโหสิ. โส ตสฺส กมฺมสฺส กฏตฺตา อุปจิตตฺตา อุสฺสนฺนตฺตา วิปุลตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. โส ตตฺถ อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหาติ ทิพฺเพน อายุนา ทิพฺเพน วณฺเณน ทิพฺเพน สุเขน ทิพฺเพน ยเสน ทิพฺเพน อาธิปเตยฺเยน ทิพฺเพหิ รูเปหิ ทิพฺเพหิ สทฺเทหิ ทิพฺเพหิ คนฺเธหิ ทิพฺเพหิ รเสหิ [Pg.144] ทิพฺเพหิ โผฏฺฐพฺเพหิ. โส ตโต จุโต อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมานิ ทฺเว มหาปุริสลกฺขณานิ ปฏิลภติ, สมทนฺโต จ โหติ สุสุกฺกทาโฐ จ. २४०. भिक्खूहो, तथागतांनी आपल्या पूर्व जन्मात, पूर्व भवात, पूर्व निवासस्थानात, पूर्वी मनुष्य असताना, चुकीची उपजीविका (मिच्छाजीव) सोडून सम्यक उपजीविकेने (सम्माआजीव) जीवन कंठले होते. ते वजन-मापातील फसवणूक, नाण्यांमधील खोटेपणा, मोजमापातील लबाडी, लाचखोरी, फसवणूक, कपट, कुटिलता, अवयव तोडणे, हत्या करणे, बंधनात टाकणे, दरोडेखोरी, लूटमार आणि बळजबरीने हिरावून घेणे या सर्व गोष्टींपासून अलिप्त राहिले होते. त्या कर्माचे आचरण केल्यामुळे, ते संचित केल्यामुळे, वाढविल्यामुळे आणि विपुल केल्यामुळे, शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर ते सुगती अशा स्वर्गलोकात उत्पन्न झाले. तिथे त्यांनी इतर देवांना दहा गोष्टींमध्ये मागे टाकले—दिव्य आयुष्य, दिव्य वर्ण, दिव्य सुख, दिव्य यश, दिव्य अधिपत्य, दिव्य रूप, दिव्य शब्द, दिव्य गंध, दिव्य रस आणि दिव्य स्पर्श. तिथून च्युत होऊन (मृत्यू पावून) या मनुष्यलोकात आल्यावर त्यांना महापुरुषांची ही दोन लक्षणे प्राप्त झाली—त्यांचे दात सम (समान) आहेत आणि त्यांच्या सुळ्यांचे दात अत्यंत शुभ्र आहेत. ‘‘โส เตหิ ลกฺขเณหิ สมนฺนาคโต สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี ธมฺมิโก ธมฺมราชา จาตุรนฺโต วิชิตาวี ชนปทตฺถาวริยปฺปตฺโต สตฺตรตนสมนฺนาคโต. ตสฺสิมานิ สตฺต รตนานิ ภวนฺติ, เสยฺยถิทํ – จกฺกรตนํ หตฺถิรตนํ อสฺสรตนํ มณิรตนํ อิตฺถิรตนํ คหปติรตนํ ปริณายกรตนเมว สตฺตมํ. ปโรสหสฺสํ โข ปนสฺส ปุตฺตา ภวนฺติ สูรา วีรงฺครูปา ปรเสนปฺปมทฺทนา. โส อิมํ ปถวึ สาครปริยนฺตํ อขิลมนิมิตฺตมกณฺฏกํ อิทฺธํ ผีตํ เขมํ สิวํ นิรพฺพุทํ อทณฺเฑน อสตฺเถน ธมฺเมน อภิวิชิย อชฺฌาวสติ. ราชา สมาโน กึ ลภติ? สุจิปริวาโร โหติ สุจิสฺส โหนฺติ ปริวารา พฺราหฺมณคหปติกา เนคมชานปทา คณกมหามตฺตา อนีกฏฺฐา โทวาริกา อมจฺจา ปาริสชฺชา ราชาโน โภคิยา กุมารา. ราชา สมาโน อิทํ ลภติ. या लक्षणांनी युक्त असलेले ते जर गृहस्थाश्रमात राहिले, तर ते चक्रवर्ती राजा होतात—धार्मिक, धर्मराजे, चारही दिशांचे विजेते, जनपदाला स्थैर्य देणारे आणि सप्त रत्नांनी युक्त. त्यांच्याकडे ही सात रत्ने असतात, जसे की—चक्ररत्न, हत्तीरत्न, अश्वरत्न, मणिरत्न, स्त्रीरत्न, गृहपतीरत्न आणि सातवे परिणायकरत्न (सेनापतीरत्न). त्यांना एक हजाराहून अधिक शूर, वीर अंगरूप असलेले आणि शत्रूच्या सैन्याचा पाडाव करणारे पुत्र असतात. ते या समुद्रापर्यंत पसरलेल्या पृथ्वीवर, दरोडेखोर व उपद्रवांपासून मुक्त, समृद्ध, संपन्न, सुरक्षित, शांत आणि निरुपद्रवी अशा राज्यावर कोणत्याही दंडाशिवाय, शस्त्राशिवाय, केवळ धर्माने विजय मिळवून राज्य करतात. राजा असताना त्यांना काय लाभ होतो? त्यांचे अनुयायी (परिवार) शुद्ध असतात. त्यांचे शुद्ध अनुयायी म्हणजे—ब्राह्मण, गृहपती, नगरातील व जनपदातील लोक, हिशोबनीस, महामात्र, सैनिक, द्वारपाल, अमात्य, सभासद, मांडलिक राजे, जहागीरदार आणि राजकुमार. राजा असताना त्यांना हा लाभ मिळतो. ‘‘สเจ โข ปน อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชติ, อรหํ โหติ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก วิวฏฺฏจฺฉโท. พุทฺโธ สมาโน กึ ลภติ? สุจิปริวาโร โหติ, สุจิสฺส โหนฺติ ปริวารา, ภิกฺขู ภิกฺขุนิโย อุปาสกา อุปาสิกาโย เทวา มนุสฺสา อสุรา นาคา คนฺธพฺพา. พุทฺโธ สมาโน อิทํ ลภติ’’. เอตมตฺถํ ภควา อโวจ. परंतु, जर त्यांनी गृहस्थाश्रमाचा त्याग करून अनगारिक (प्रव्रजित) अवस्था स्वीकारली, तर ते जगात अराहत, सम्यक संबुद्ध होतात, ज्यांनी अज्ञानाचे पटल दूर केले आहे. बुद्ध असताना त्यांना काय लाभ होतो? त्यांचे अनुयायी शुद्ध असतात. त्यांचे शुद्ध अनुयायी म्हणजे—भिक्खू, भिक्खुणी, उपासक, उपासिका, देव, मनुष्य, असुर, नाग आणि गंधर्व. बुद्ध असताना त्यांना हा लाभ मिळतो. भगवंतांनी हे सांगितले. ๒๔๑. ตตฺเถตํ วุจฺจติ – २४१. या संदर्भात असे म्हटले आहे— ‘‘มิจฺฉาชีวญฺจ อวสฺสชิ สเมน วุตฺตึ,สุจินา โส ชนยิตฺถ ธมฺมิเกน; อหิตมปิ จ อปนุทิ,หิตมปิ จ พหุชนสุขญฺจ อจริ. त्यांनी चुकीची उपजीविका (मिच्छाजीव) सोडून दिली आणि धार्मिक व शुद्ध अशा सम्यक उपजीविकेने जीवन व्यतीत केले. त्यांनी अहितकारक गोष्टी दूर केल्या आणि बहुजनांच्या हितासाठी व सुखासाठी कार्य केले. ‘‘สคฺเค เวทยติ นโร สุขปฺผลานิ,กริตฺวา นิปุเณภิ วิทูหิ สพฺภิ; วณฺณิตานิ ติทิวปุรวรสโม,อภิรมติ รติขิฑฺฑาสมงฺคี. शहाण्या आणि कुशल विद्वानांनी प्रशंसिलेल्या कर्मांचे आचरण करून, ते मनुष्य स्वर्गात सुखाचे फळ भोगतात. त्रैलोक्याच्या अधिपतीप्रमाणे (इंद्राप्रमाणे) ते तिथे दिव्य क्रीडा आणि आनंदाने परिपूर्ण होऊन रममाण होतात. ‘‘ลทฺธานํ [Pg.145] มานุสกํ ภวํ ตโต,จวิตฺวาน สุกตผลวิปากํ; เสสเกน ปฏิลภติ ลปนชํ,สมมปิ สุจิสุสุกฺกํ. तिथून च्युत झाल्यावर, सत्कर्मांच्या उर्वरित फळामुळे मानवी जन्म प्राप्त करून, त्यांना मुखात समान, स्वच्छ आणि अत्यंत शुभ्र असे दात प्राप्त होतात. ‘‘ตํ เวยฺยญฺชนิกา สมาคตา พหโว,พฺยากํสุ นิปุณสมฺมตา มนุชา; สุจิชนปริวารคโณ ภวติ,ทิชสมสุกฺกสุจิโสภนทนฺโต. एकत्र आलेल्या अनेक लक्षणवेत्त्यांनी आणि कुशल विद्वानांनी भाकीत केले की, 'समान, शुभ्र, स्वच्छ आणि सुंदर दात असलेला हा बालक शुद्ध लोकांच्या परिवाराने वेढलेला असेल.' ‘‘รญฺโญ โหติ พหุชโน,สุจิปริวาโร มหตึ มหึ อนุสาสโต; ปสยฺห น จ ชนปทตุทนํ,หิตมปิ จ พหุชนสุขญฺจ จรนฺติ. जर ते राजा झाले, तर या विस्तीर्ण पृथ्वीवर शासन करताना त्यांचे अनुयायी शुद्ध आणि बहुसंख्य असतील. ते बळजबरीने जनपदाला पीडा देणार नाहीत, आणि सर्व लोक एकमेकांच्या हितासाठी व सुखासाठी झटतील. ‘‘อถ เจ ปพฺพชติ ภวติ วิปาโป,สมโณ สมิตรโช วิวฏฺฏจฺฉโท; วิคตทรถกิลมโถ,อิมมปิ จ ปรมปิ จ ปสฺสติ โลกํ. परंतु, जर त्यांनी प्रव्रज्या घेतली, तर ते निष्पाप, क्लेशांचे रज शांत केलेले, अज्ञानाचे पटल दूर केलेले आणि सर्व थकवा व संताप दूर झालेले श्रमण बनतात; आणि ते या लोकाला व परलोकालाही पाहतात. ‘‘ตสฺโสวาทกรา พหุคิหี จ ปพฺพชิตา จ,อสุจึ ครหิตํ ธุนนฺติ ปาปํ; ส หิ สุจิภิ ปริวุโต ภวติ,มลขิลกลิกิเลเส ปนุเทหี’’ติ. त्यांच्या उपदेशाचे पालन करणारे अनेक गृहस्थ आणि प्रव्रजित लोक अशुद्ध व निंदनीय पापांचा नाश करतात. ते स्वतः शुद्ध अनुयायांनी वेढलेले असतात आणि मनातील मळ, दोष व सर्व क्लेश दूर करतात. อิทมโวจ ภควา. อตฺตมนา เต ภิกฺขู ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทุนฺติ. भगवंत असे म्हणाले. ते भिक्खू भगवंतांच्या भाषणाने संतुष्ट झाले आणि त्यांनी त्याचा आनंदपूर्वक स्वीकार केला. ลกฺขณสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ สตฺตมํ. सातवे लक्खणसुत्त समाप्त झाले. ๘. สิงฺคาลสุตฺตํ ८. सिंगालसुत्त (सिगालोवाद सुत्त) ๒๔๒. เอวํ [Pg.146] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป. เตน โข ปน สมเยน สิงฺคาลโก คหปติปุตฺโต กาลสฺเสว อุฏฺฐาย ราชคหา นิกฺขมิตฺวา อลฺลวตฺโถ อลฺลเกโส ปญฺชลิโก ปุถุทิสา นมสฺสติ – ปุรตฺถิมํ ทิสํ ทกฺขิณํ ทิสํ ปจฺฉิมํ ทิสํ อุตฺตรํ ทิสํ เหฏฺฐิมํ ทิสํ อุปริมํ ทิสํ. २४२. असे मी ऐकले आहे—एकदा भगवंत राजगृह येथे वेळुवनातील कलंदकनिवाप (खारुतांना अन्न देण्याची जागा) येथे विहार करत होते. त्या वेळी सिंगाल नावाचा एक गृहपतीपुत्र पहाटेच उठून, राजगृहाबाहेर पडून, ओल्या वस्त्रांनी व ओल्या केसांनी, हात जोडून विविध दिशांना नमस्कार करत होता—पूर्व दिशा, दक्षिण दिशा, पश्चिम दिशा, उत्तर दिशा, अधोदिशा (खालील दिशा) आणि ऊर्ध्वदिशा (वरील दिशा). ๒๔๓. อถ โข ภควา ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย ราชคหํ ปิณฺฑาย ปาวิสิ. อทฺทสา โข ภควา สิงฺคาลกํ คหปติปุตฺตํ กาลสฺเสว วุฏฺฐาย ราชคหา นิกฺขมิตฺวา อลฺลวตฺถํ อลฺลเกสํ ปญฺชลิกํ ปุถุทิสา นมสฺสนฺตํ – ปุรตฺถิมํ ทิสํ ทกฺขิณํ ทิสํ ปจฺฉิมํ ทิสํ อุตฺตรํ ทิสํ เหฏฺฐิมํ ทิสํ อุปริมํ ทิสํ. ทิสฺวา สิงฺคาลกํ คหปติปุตฺตํ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข ตฺวํ, คหปติปุตฺต, กาลสฺเสว อุฏฺฐาย ราชคหา นิกฺขมิตฺวา อลฺลวตฺโถ อลฺลเกโส ปญฺชลิโก ปุถุทิสา นมสฺสสิ – ปุรตฺถิมํ ทิสํ ทกฺขิณํ ทิสํ ปจฺฉิมํ ทิสํ อุตฺตรํ ทิสํ เหฏฺฐิมํ ทิสํ อุปริมํ ทิส’’นฺติ? ‘‘ปิตา มํ, ภนฺเต, กาลํ กโรนฺโต เอวํ อวจ – ‘ทิสา, ตาต, นมสฺเสยฺยาสี’ติ. โส โข อหํ, ภนฺเต, ปิตุวจนํ สกฺกโรนฺโต ครุํ กโรนฺโต มาเนนฺโต ปูเชนฺโต กาลสฺเสว อุฏฺฐาย ราชคหา นิกฺขมิตฺวา อลฺลวตฺโถ อลฺลเกโส ปญฺชลิโก ปุถุทิสา นมสฺสามิ – ปุรตฺถิมํ ทิสํ ทกฺขิณํ ทิสํ ปจฺฉิมํ ทิสํ อุตฺตรํ ทิสํ เหฏฺฐิมํ ทิสํ อุปริมํ ทิส’’นฺติ. २४३. त्यानंतर भगवंतांनी सकाळी चिवर परिधान करून, पात्र व चिवर घेऊन राजगृहात भिक्षेसाठी प्रवेश केला. भगवंतांनी सिंगाल गृहपतीपुत्राला पहाटेच उठून राजगृहाबाहेर पडून, ओल्या वस्त्रांनी व ओल्या केसांनी, हात जोडून विविध दिशांना—पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, अधोदिशा आणि ऊर्ध्वदिशा यांना नमस्कार करताना पाहिले. त्याला पाहून भगवंत म्हणाले, "गृहपतीपुत्रा, तू पहाटेच उठून राजगृहाबाहेर पडून, ओल्या वस्त्रांनी व ओल्या केसांनी, हात जोडून पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, अधोदिशा आणि ऊर्ध्वदिशा अशा विविध दिशांना का नमस्कार करत आहेस?" सिंगाल म्हणाला, "भंते, माझ्या वडिलांनी मृत्यूसमयी मला सांगितले होते की—'बाळा, तू दिशांना नमस्कार करत जा.' म्हणून, भंते, मी माझ्या वडिलांच्या शब्दांचा आदर करत, त्यांचा सन्मान करत, पूज्य मानत पहाटेच उठून राजगृहाबाहेर पडून, ओल्या वस्त्रांनी व ओल्या केसांनी, हात जोडून पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, अधोदिशा आणि ऊर्ध्वदिशा अशा विविध दिशांना नमस्कार करत आहे." ฉ ทิสา सहा दिशा ๒๔๔. ‘‘น โข, คหปติปุตฺต, อริยสฺส วินเย เอวํ ฉ ทิสา นมสฺสิตพฺพา’’ติ. ‘‘ยถา กถํ ปน, ภนฺเต, อริยสฺส วินเย ฉ ทิสา นมสฺสิตพฺพา? สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา ตถา ธมฺมํ เทเสตุ, ยถา อริยสฺส วินเย ฉ ทิสา นมสฺสิตพฺพา’’ติ. २४४. "गृहपतीपुत्रा, आर्यांच्या विनयामध्ये (धम्म नियमावलीत) अशा प्रकारे सहा दिशांना नमस्कार केला जात नाही." सिंगाल म्हणाला, "तर मग भंते, आर्यांच्या विनयामध्ये सहा दिशांना कशा प्रकारे नमस्कार केला पाहिजे? भंते, भगवंतांनी मला अशा प्रकारे धम्माचा उपदेश करावा, जेणेकरून आर्यांच्या विनयानुसार सहा दिशांना नमस्कार कसा करावा हे मला समजेल." ‘‘เตน หิ, คหปติปุตฺต สุโณหิ สาธุกํ มนสิกโรหิ ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข สิงฺคาลโก คหปติปุตฺโต ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. ภควา เอตทโวจ – "तर मग, गृहपतीपुत्रा, नीट ऐक आणि मनात नीट धारण कर, मी सांगेन." सिंगाल गृहपतीपुत्राने भगवंतांना उत्तर दिले, "होय, भंते." भगवंत म्हणाले— ‘‘ยโต [Pg.147] โข, คหปติปุตฺต, อริยสาวกสฺส จตฺตาโร กมฺมกิเลสา ปหีนา โหนฺติ, จตูหิ จ ฐาเนหิ ปาปกมฺมํ น กโรติ, ฉ จ โภคานํ อปายมุขานิ น เสวติ, โส เอวํ จุทฺทส ปาปกาปคโต ฉทฺทิสาปฏิจฺฉาที อุโภโลกวิชยาย ปฏิปนฺโน โหติ. ตสฺส อยญฺเจว โลโก อารทฺโธ โหติ ปโร จ โลโก. โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. “हे गृहपतिपुत्रा, जेव्हा आर्यश्रावकाचे चार कम्मकिलेस (कर्म-क्लेश) नष्ट झालेले असतात, आणि तो चार कारणांनी पापकृत्य करत नाही, तसेच संपत्तीचा नाश करणाऱ्या सहा अपायमुखांचे (नाशाच्या मार्गांचे) सेवन करत नाही; तेव्हा तो अशा प्रकारे चौदा प्रकारच्या पापांपासून मुक्त होऊन, सहा दिशांचे रक्षण करत, दोन्ही लोकांवर विजय मिळवण्यासाठी मार्गस्थ होतो. त्याला हा लोक आणि परलोक दोन्ही साध्य होतात. तो शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतो.” จตฺตาโรกมฺมกิเลสา चार कम्मकिलेस (कर्म-क्लेश) ๒๔๕. ‘‘กตมสฺส จตฺตาโร กมฺมกิเลสา ปหีนา โหนฺติ? ปาณาติปาโต โข, คหปติปุตฺต, กมฺมกิเลโส, อทินฺนาทานํ กมฺมกิเลโส, กาเมสุมิจฺฉาจาโร กมฺมกิเลโส, มุสาวาโท กมฺมกิเลโส. อิมสฺส จตฺตาโร กมฺมกิเลสา ปหีนา โหนฺตี’’ติ. อิทมโวจ ภควา, อิทํ วตฺวาน สุคโต อถาปรํ เอตทโวจ สตฺถา – २४५. “कोणते चार कम्मकिलेस नष्ट झालेले असतात? हे गृहपतिपुत्रा, प्राणातिपात (जीवहिंसा) हा कम्मकिलेस आहे, अदिन्नादान (चोरी) हा कम्मकिलेस आहे, कामेसुमिच्छाचार (व्यभिचार) हा कम्मकिलेस आहे, आणि मुसावाद (असत्य बोलणे) हा कम्मकिलेस आहे. त्याचे हे चार कम्मकिलेस नष्ट झालेले असतात.” भगवान असे म्हणाले. सुगत असे बोलल्यानंतर, शास्त्यांनी पुढे हे म्हटले – ‘‘ปาณาติปาโต อทินฺนาทานํ, มุสาวาโท จ วุจฺจติ; ปรทารคมนญฺเจว, นปฺปสํสนฺติ ปณฺฑิตา’’ติ. “प्राणातिपात, अदिन्नादान, मुसावाद आणि परस्त्रीगमन (व्यभिचार) यांना कम्मकिलेस म्हटले जाते; ज्ञानी लोक यांची प्रशंसा करत नाहीत.” จตุฏฺฐานํ चार कारणे (अगति) ๒๔๖. ‘‘กตเมหิ จตูหิ ฐาเนหิ ปาปกมฺมํ น กโรติ? ฉนฺทาคตึ คจฺฉนฺโต ปาปกมฺมํ กโรติ, โทสาคตึ คจฺฉนฺโต ปาปกมฺมํ กโรติ, โมหาคตึ คจฺฉนฺโต ปาปกมฺมํ กโรติ, ภยาคตึ คจฺฉนฺโต ปาปกมฺมํ กโรติ. ยโต โข, คหปติปุตฺต, อริยสาวโก เนว ฉนฺทาคตึ คจฺฉติ, น โทสาคตึ คจฺฉติ, น โมหาคตึ คจฺฉติ, น ภยาคตึ คจฺฉติ; อิเมหิ จตูหิ ฐาเนหิ ปาปกมฺมํ น กโรตี’’ติ. อิทมโวจ ภควา, อิทํ วตฺวาน สุคโต อถาปรํ เอตทโวจ สตฺถา – २४६. “कोणत्या चार कारणांनी तो पापकृत्य करत नाही? छंदागतीला (आसक्तीमुळे चुकीच्या मार्गाला) जाऊन मनुष्य पापकृत्य करतो, दोषागतीला (द्वेषामुळे चुकीच्या मार्गाला) जाऊन पापकृत्य करतो, मोहागतीला (अज्ञानामुळे चुकीच्या मार्गाला) जाऊन पापकृत्य करतो, आणि भयागतीला (भयामुळे चुकीच्या मार्गाला) जाऊन पापकृत्य करतो. हे गृहपतिपुत्रा, जेव्हा आर्यश्रावक छंदागतीला जात नाही, दोषागतीला जात नाही, मोहागतीला जात नाही आणि भयागतीलाही जात नाही; तेव्हा तो या चार कारणांनी पापकृत्य करत नाही.” भगवान असे म्हणाले. सुगत असे बोलल्यानंतर, शास्त्यांनी पुढे हे म्हटले – ‘‘ฉนฺทา โทสา ภยา โมหา, โย ธมฺมํ อติวตฺตติ; นิหียติ ยโส ตสฺส, กาฬปกฺเขว จนฺทิมา. “जो छंद, द्वेष, भय आणि मोहामुळे धर्माचे उल्लंघन करतो; त्याची कीर्ती कृष्णपक्षातील चंद्राप्रमाणे दिवसेंदिवस क्षीण होत जाते.” ‘‘ฉนฺทา โทสา ภยา โมหา, โย ธมฺมํ นาติวตฺตติ; อาปูรติ ยโส ตสฺส, สุกฺกปกฺเขว จนฺทิมา’’ติ. “जो छंद, द्वेष, भय आणि मोहामुळे धर्माचे उल्लंघन करत नाही; त्याची कीर्ती शुक्लपक्षातील चंद्राप्रमाणे दिवसेंदिवस वाढत जाते.” ฉ อปายมุขานิ सहा अपायमुखे (संपत्तीच्या नाशाचे मार्ग) ๒๔๗. ‘‘กตมานิ [Pg.148] ฉ โภคานํ อปายมุขานิ น เสวติ? สุราเมรยมชฺชปฺปมาทฏฺฐานานุโยโค โข, คหปติปุตฺต, โภคานํ อปายมุขํ, วิกาลวิสิขาจริยานุโยโค โภคานํ อปายมุขํ, สมชฺชาภิจรณํ โภคานํ อปายมุขํ, ชูตปฺปมาทฏฺฐานานุโยโค โภคานํ อปายมุขํ, ปาปมิตฺตานุโยโค โภคานํ อปายมุขํ, อาลสฺยานุโยโค โภคานํ อปายมุขํ. २४७. “तो संपत्तीचा नाश करणाऱ्या कोणत्या सहा अपायमुखांचे सेवन करत नाही? हे गृहपतिपुत्रा, सुरा-मेरय-मज्ज (मद्यपान) आणि प्रमादाच्या (बेसावधपणाच्या) स्थानांमध्ये मग्न राहणे हे संपत्तीच्या नाशाचे मार्ग आहेत; अवेळी गल्लीबोळांतून भटकणे हे संपत्तीच्या नाशाचे मार्ग आहेत; जत्रा-उत्सव-नाचगाण्यांच्या कार्यक्रमांना वारंवार जाणे हे संपत्तीच्या नाशाचे मार्ग आहेत; जुगार खेळण्याच्या व्यसनात मग्न राहणे हे संपत्तीच्या नाशाचे मार्ग आहेत; वाईट मित्रांच्या संगतीत राहणे हे संपत्तीच्या नाशाचे मार्ग आहेत; आणि आळसात मग्न राहणे हे संपत्तीच्या नाशाचे मार्ग आहेत.” สุราเมรยสฺส ฉ อาทีนวา मद्यपानाचे सहा दुष्परिणाम (आदीनव) ๒๔๘. ‘‘ฉ โขเม, คหปติปุตฺต, อาทีนวา สุราเมรยมชฺชปฺปมาทฏฺฐานานุโยเค. สนฺทิฏฺฐิกา ธนชานิ, กลหปฺปวฑฺฒนี, โรคานํ อายตนํ, อกิตฺติสญฺชนนี, โกปีนนิทํสนี, ปญฺญาย ทุพฺพลิกรณีตฺเวว ฉฏฺฐํ ปทํ ภวติ. อิเม โข, คหปติปุตฺต, ฉ อาทีนวา สุราเมรยมชฺชปฺปมาทฏฺฐานานุโยเค. २४८. “हे गृहपतिपुत्रा, सुरा-मेरय-मज्ज आणि प्रमादाच्या स्थानांमध्ये मग्न राहण्याचे हे सहा दुष्परिणाम आहेत: प्रत्यक्ष डोळ्यांसमोर संपत्तीचा नाश होणे, भांडण-तंटे वाढणे, रोगांचे माहेरघर बनणे, अपकीर्ती पसरणे, लज्जास्पद अंगांचे प्रदर्शन होणे (निर्लज्जपणा वाढणे), आणि प्रज्ञा दुर्बळ होणे हा सहावा दुष्परिणाम आहे. हे गृहपतिपुत्रा, मद्यपानाच्या व्यसनात मग्न राहण्याचे हे सहा दुष्परिणाम आहेत.” วิกาลจริยาย ฉ อาทีนวา अवेळी भटकण्याचे सहा दुष्परिणाम ๒๔๙. ‘‘ฉ โขเม, คหปติปุตฺต, อาทีนวา วิกาลวิสิขาจริยานุโยเค. อตฺตาปิสฺส อคุตฺโต อรกฺขิโต โหติ, ปุตฺตทาโรปิสฺส อคุตฺโต อรกฺขิโต โหติ, สาปเตยฺยํปิสฺส อคุตฺตํ อรกฺขิตํ โหติ, สงฺกิโย จ โหติ ปาปเกสุ ฐาเนสุ, อภูตวจนญฺจ ตสฺมึ รูหติ, พหูนญฺจ ทุกฺขธมฺมานํ ปุรกฺขโต โหติ. อิเม โข, คหปติปุตฺต, ฉ อาทีนวา วิกาลวิสิขาจริยานุโยเค. २४९. “हे गृहपतिपुत्रा, अवेळी गल्लीबोळांतून भटकण्याचे हे सहा दुष्परिणाम आहेत: तो स्वतः असुरक्षित आणि अरक्षित राहतो; त्याचे स्त्री-मुलगेही असुरक्षित and अरक्षित राहतात; त्याची मालमत्ताही असुरक्षित आणि अरक्षित राहते; वाईट कृत्यांच्या बाबतीत त्याच्यावर संशय घेतला जातो; त्याच्यावर खोटे आळ (आरोप) येतात; आणि तो अनेक प्रकारच्या दुःखांना सामोरे जातो. हे गृहपतिपुत्रा, अवेळी भटकण्याचे हे सहा दुष्परिणाम आहेत.” สมชฺชาภิจรณสฺส ฉ อาทีนวา उत्सव-नाचगाण्यांच्या कार्यक्रमांना वारंवार जाण्याचे सहा दुष्परिणाम ๒๕๐. ‘‘ฉ โขเม, คหปติปุตฺต, อาทีนวา สมชฺชาภิจรเณ. กฺว นจฺจํ, กฺว คีตํ, กฺว วาทิตํ, กฺว อกฺขานํ, กฺว ปาณิสฺสรํ, กฺว กุมฺภถุนนฺติ. อิเม โข, คหปติปุตฺต, ฉ อาทีนวา สมชฺชาภิจรเณ. २५०. “हे गृहपतिपुत्रा, उत्सव-नाचगाण्यांच्या कार्यक्रमांना वारंवार जाण्याचे हे सहा दुष्परिणाम आहेत. तो नेहमी विचारत फिरतो: 'नृत्य कुठे आहे? गाणे कुठे आहे? वादन कुठे आहे? कथाकथन कुठे आहे? टाळ्या वाजवण्याचा कार्यक्रम कुठे आहे? ढोल-ताशांचा आवाज कुठे आहे?' हे गृहपतिपुत्रा, उत्सवांना वारंवार जाण्याचे हे सहा दुष्परिणाम आहेत.” ชูตปฺปมาทสฺส ฉ อาทีนวา जुगाराच्या व्यसनाचे सहा दुष्परिणाम ๒๕๑. ‘‘ฉ [Pg.149] โขเม, คหปติปุตฺต, อาทีนวา ชูตปฺปมาทฏฺฐานานุโยเค. ชยํ เวรํ ปสวติ, ชิโน วิตฺตมนุโสจติ, สนฺทิฏฺฐิกา ธนชานิ, สภาคตสฺส วจนํ น รูหติ, มิตฺตามจฺจานํ ปริภูโต โหติ, อาวาหวิวาหกานํ อปตฺถิโต โหติ – ‘อกฺขธุตฺโต อยํ ปุริสปุคฺคโล นาลํ ทารภรณายา’ติ. อิเม โข, คหปติปุตฺต, ฉ อาทีนวา ชูตปฺปมาทฏฺฐานานุโยเค. २५१. “हे गृहपतिपुत्रा, जुगाराच्या व्यसनात मग्न राहण्याचे हे सहा दुष्परिणाम आहेत: जिंकणारा शत्रू निर्माण करतो; हरणारा गमावलेल्या संपत्तीबद्दल शोक करतो; प्रत्यक्ष डोळ्यांसमोर संपत्तीचा नाश होतो; सभेत त्याच्या शब्दाला मान मिळत नाही (त्याचे बोलणे ग्राह्य धरले जात नाही); मित्र आणि मंत्र्यांकडून त्याचा अनादर होतो; आणि विवाहसंबंध जोडणारे लोक त्याला नापसंत करतात, कारण 'हा माणूस जुगारी आहे, हा पत्नीचे पालनपोषण करण्यास असमर्थ आहे.' हे गृहपतिपुत्रा, जुगाराच्या व्यसनाचे हे सहा दुष्परिणाम आहेत.” ปาปมิตฺตตาย ฉ อาทีนวา कुसंगतीचे (वाईट मित्रांचे) सहा दुष्परिणाम ๒๕๒. ‘‘ฉ โขเม, คหปติปุตฺต, อาทีนวา ปาปมิตฺตานุโยเค. เย ธุตฺตา, เย โสณฺฑา, เย ปิปาสา, เย เนกติกา, เย วญฺจนิกา, เย สาหสิกา. ตฺยาสฺส มิตฺตา โหนฺติ เต สหายา. อิเม โข, คหปติปุตฺต, ฉ อาทีนวา ปาปมิตฺตานุโยเค. २५२. “हे गृहपतिपुत्रा, कुसंगतीचे हे सहा दुष्परिणाम आहेत. जे जुगारी आहेत, जे विषयासक्त आहेत, जे मद्यपी आहेत, जे कपटी आहेत, जे फसवणूक करणारे आहेत, आणि जे हिंसक (धाडसी गुन्हेगार) आहेत; तेच त्याचे मित्र आणि सोबती बनतात. हे गृहपतिपुत्रा, कुसंगतीचे हे सहा दुष्परिणाम आहेत.” อาลสฺยสฺส ฉ อาทีนวา आळसाचे सहा दुष्परिणाम ๒๕๓. ‘‘ฉ โขเม, คหปติปุตฺต, อาทีนวา อาลสฺยานุโยเค. อติสีตนฺติ กมฺมํ น กโรติ, อติอุณฺหนฺติ กมฺมํ น กโรติ, อติสายนฺติ กมฺมํ น กโรติ, อติปาโตติ กมฺมํ น กโรติ, อติฉาโตสฺมีติ กมฺมํ น กโรติ, อติธาโตสฺมีติ กมฺมํ น กโรติ. ตสฺส เอวํ กิจฺจาปเทสพหุลสฺส วิหรโต อนุปฺปนฺนา เจว โภคา นุปฺปชฺชนฺติ, อุปฺปนฺนา จ โภคา ปริกฺขยํ คจฺฉนฺติ. อิเม โข, คหปติปุตฺต, ฉ อาทีนวา อาลสฺยานุโยเค’’ติ. อิทมโวจ ภควา, อิทํ วตฺวาน สุคโต อถาปรํ เอตทโวจ สตฺถา – २५३. “हे गृहपतिपुत्रा, आळसात मग्न राहण्याचे हे सहा दुष्परिणाम आहेत: 'खूप थंडी आहे' म्हणून तो काम करत नाही; 'खूप उष्णता आहे' म्हणून तो काम करत नाही; 'खूप संध्याकाळ झाली आहे' म्हणून तो काम करत नाही; 'खूप सकाळ झाली आहे (खूप लवकर आहे)' म्हणून तो काम करत नाही; 'मला खूप भूक लागली आहे' म्हणून तो काम करत नाही; 'माझे पोट खूप भरले आहे' म्हणून तो काम करत नाही. अशा प्रकारे कामाची अनेक कारणे (बहाणे) सांगून जगणाऱ्या त्या माणसाची न मिळालेली संपत्ती मिळत नाही आणि मिळालेली संपत्ती नष्ट होऊन जाते. हे गृहपतिपुत्रा, आळसाचे हे सहा दुष्परिणाम आहेत.” भगवान असे म्हणाले. सुगत असे बोलल्यानंतर, शास्त्यांनी पुढे हे म्हटले – ‘‘โหติ ปานสขา นาม,โหติ สมฺมิยสมฺมิโย; โย จ อตฺเถสุ ชาเตสุ,สหาโย โหติ โส สขา. “काही केवळ मद्यपानापुरतेच मित्र असतात, काही तोंडावर 'मित्रा, मित्रा' म्हणणारे असतात; परंतु जो संकटसमयी किंवा गरजेच्या वेळी मदत करतो, तोच खरा मित्र असतो.” ‘‘อุสฺสูรเสยฺยา [Pg.150] ปรทารเสวนา,เวรปฺปสโว จ อนตฺถตา จ; ปาปา จ มิตฺตา สุกทริยตา จ,เอเต ฉ ฐานา ปุริสํ ธํสยนฺติ. “उशिरापर्यंत झोपणे, परस्त्रीगमन (व्यभिचार), वैर वाढवणे, अनर्थ (नुकसान) करणे, वाईट मित्रांची संगत आणि अतिशय कंजूषपणा; या सहा गोष्टी माणसाचा नाश करतात.” ‘‘ปาปมิตฺโต ปาปสโข,ปาปอาจารโคจโร; อสฺมา โลกา ปรมฺหา จ,อุภยา ธํสเต นโร. “ज्याला वाईट मित्र आहेत, वाईट सोबती आहेत आणि ज्याचे आचरण व संगती वाईट आहे; असा माणूस या लोकातून आणि परलोकातून, दोन्ही लोकांतून नष्ट होतो.” ‘‘อกฺขิตฺถิโย วารุณี นจฺจคีตํ,ทิวา โสปฺปํ ปาริจริยา อกาเล; ปาปา จ มิตฺตา สุกทริยตา จ,เอเต ฉ ฐานา ปุริสํ ธํสยนฺติ. “जुगार, स्त्रियांचे व्यसन, मद्यपान, नाचगाणे, दिवसा झोपणे, अवेळी भटकणे, वाईट मित्रांची संगत आणि अतिशय कंजूषपणा; या सहा गोष्टी माणसाचा नाश करतात.” ‘‘อกฺเขหิ ทิพฺพนฺติ สุรํ ปิวนฺติ,ยนฺติตฺถิโย ปาณสมา ปเรสํ; นิหีนเสวี น จ วุทฺธเสวี,นิหียเต กาฬปกฺเขว จนฺโท. “जे जुगार खेळतात, मद्यपान करतात, इतरांच्या प्राणाप्रिय पत्नींकडे (व्यभिचारासाठी) जातात, जे नीच लोकांची संगत करतात आणि प्रज्ञावंतांची संगत करत नाहीत; त्यांचा ऱ्हास कृष्णपक्षातील चंद्राप्रमाणे होतो.” ‘‘โย วารุณี อทฺธโน อกิญฺจโน,ปิปาโส ปิวํ ปปาคโต ; อุทกมิว อิณํ วิคาหติ,อกุลํ กาหิติ ขิปฺปมตฺตโน. “जो मद्यपी, निर्धन आणि कफल्लक असतो, जो नेहमी मद्य पिण्याची इच्छा धरून मद्यशाळेत जातो; तो पाण्यात बुडणाऱ्या दगडाप्रमाणे कर्जात बुडतो आणि लवकरच स्वतःच्या कुटुंबाला संकटात टाकतो.” ‘‘น ทิวา โสปฺปสีเลน, รตฺติมุฏฺฐานเทสฺสินา ; นิจฺจํ มตฺเตน โสณฺเฑน, สกฺกา อาวสิตุํ ฆรํ. “दिवसा झोपण्याची सवय असलेला, रात्री उठण्यास कंटाळा करणारा, नेहमी मद्यधुंद आणि विषयासक्त असलेला माणूस गृहस्थाश्रम चालवण्यास असमर्थ असतो.” ‘‘อติสีตํ อติอุณฺหํ, อติสายมิทํ อหุ; อิติ วิสฺสฏฺฐกมฺมนฺเต, อตฺถา อจฺเจนฺติ มาณเว. "खूप थंडी आहे, खूप उष्णता आहे, खूप संध्याकाळ झाली आहे," असे म्हणून जे तरुण आपली कामे सोडून देतात, त्यांचे हितकारक लाभ (संधी) निघून जातात. ‘‘โยธ [Pg.151] สีตญฺจ อุณฺหญฺจ, ติณา ภิยฺโย น มญฺญติ; กรํ ปุริสกิจฺจานิ, โส สุขํ น วิหายตี’’ติ. "परंतु जो मनुष्य थंडी आणि उष्णता यांना गवताच्या काडीपेक्षाही कमी लेखतो आणि आपली कर्तव्ये पार पाडतो, तो सुखापासून कधीही वंचित होत नाही." มิตฺตปติรูปกา मित्रप्रतिरूपक (मित्राच्या रूपातील शत्रू) ๒๕๔. ‘‘จตฺตาโรเม, คหปติปุตฺต, อมิตฺตา มิตฺตปติรูปกา เวทิตพฺพา. อญฺญทตฺถุหโร อมิตฺโต มิตฺตปติรูปโก เวทิตพฺโพ, วจีปรโม อมิตฺโต มิตฺตปติรูปโก เวทิตพฺโพ, อนุปฺปิยภาณี อมิตฺโต มิตฺตปติรูปโก เวทิตพฺโพ, อปายสหาโย อมิตฺโต มิตฺตปติรูปโก เวทิตพฺโพ. २५४. "गृहपतीच्या पुत्रा, हे चार प्रकारचे लोक मित्राच्या रूपातील अमित्र (शत्रू) समजावेत: केवळ स्वतःचाच स्वार्थ साधणारा (घेणाराच) अमित्र मित्रप्रतिरूपक समजावा, केवळ तोंडी गप्पा मारणारा (वाचाळ) अमित्र मित्रप्रतिरूपक समजावा, गोड बोलून मन राखणारा (खुशमस्कऱ्या) अमित्र मित्रप्रतिरूपक समजावा, आणि विनाशाच्या मार्गावर सोबत करणारा (व्यसनी साथीदार) अमित्र मित्रप्रतिरूपक समजावा." ๒๕๕. ‘‘จตูหิ โข, คหปติปุตฺต, ฐาเนหิ อญฺญทตฺถุหโร อมิตฺโต มิตฺตปติรูปโก เวทิตพฺโพ. २५५. "गृहपतीच्या पुत्रा, चार कारणांनी केवळ स्वतःचाच स्वार्थ साधणारा अमित्र मित्रप्रतिरूपक समजावा." ‘‘อญฺญทตฺถุหโร โหติ, อปฺเปน พหุมิจฺฉติ; ภยสฺส กิจฺจํ กโรติ, เสวติ อตฺถการณา. "तो केवळ स्वतःसाठीच घेऊन जातो, थोडं देऊन खूप मिळवण्याची इच्छा धरतो, भीतीपोटी आपले काम करतो, आणि स्वतःच्या स्वार्थासाठीच मैत्री करतो." ‘‘อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, จตูหิ ฐาเนหิ อญฺญทตฺถุหโร อมิตฺโต มิตฺตปติรูปโก เวทิตพฺโพ. "गृहपतीच्या पुत्रा, या चार कारणांनी केवळ स्वतःचाच स्वार्थ साधणारा अमित्र मित्रप्रतिरूपक समजावा." ๒๕๖. ‘‘จตูหิ โข, คหปติปุตฺต, ฐาเนหิ วจีปรโม อมิตฺโต มิตฺตปติรูปโก เวทิตพฺโพ. อตีเตน ปฏิสนฺถรติ, อนาคเตน ปฏิสนฺถรติ, นิรตฺถเกน สงฺคณฺหาติ, ปจฺจุปฺปนฺเนสุ กิจฺเจสุ พฺยสนํ ทสฺเสติ. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, จตูหิ ฐาเนหิ วจีปรโม อมิตฺโต มิตฺตปติรูปโก เวทิตพฺโพ. २५६. "गृहपतीच्या पुत्रा, चार कारणांनी केवळ तोंडी गप्पा मारणारा (वाचाळ) अमित्र मित्रप्रतिरूपक समजावा. तो भूतकाळातील गोष्टींनी आदरातिथ्य करतो, भविष्यकाळातील गोष्टींनी आदरातिथ्य करतो, निरर्थक गोष्टींनी स्वागत करतो, आणि वर्तमानकाळातील कामाची वेळ आली की स्वतःची अडचण किंवा संकट दाखवतो. गृहपतीच्या पुत्रा, या चार कारणांनी केवळ तोंडी गप्पा मारणारा अमित्र मित्रप्रतिरूपक समजावा." ๒๕๗. ‘‘จตูหิ โข, คหปติปุตฺต, ฐาเนหิ อนุปฺปิยภาณี อมิตฺโต มิตฺตปติรูปโก เวทิตพฺโพ. ปาปกํปิสฺส อนุชานาติ, กลฺยาณํปิสฺส อนุชานาติ, สมฺมุขาสฺส วณฺณํ ภาสติ, ปรมฺมุขาสฺส อวณฺณํ ภาสติ. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, จตูหิ ฐาเนหิ อนุปฺปิยภาณี อมิตฺโต มิตฺตปติรูปโก เวทิตพฺโพ. २५७. "गृहपतीच्या पुत्रा, चार कारणांनी गोड बोलून मन राखणारा (खुशमस्कऱ्या) अमित्र मित्रप्रतिरूपक समजावा. तो वाईट कृत्यालाही संमती देतो, चांगल्या कृत्यालाही संमती देतो, समोर स्तुती करतो, आणि पाठीमागे निंदा करतो. गृहपतीच्या पुत्रा, या चार कारणांनी गोड बोलून मन राखणारा अमित्र मित्रप्रतिरूपक समजावा." ๒๕๘. ‘‘จตูหิ [Pg.152] โข, คหปติปุตฺต, ฐาเนหิ อปายสหาโย อมิตฺโต มิตฺตปติรูปโก เวทิตพฺโพ. สุราเมรย มชฺชปฺปมาทฏฺฐานานุโยเค สหาโย โหติ, วิกาล วิสิขา จริยานุโยเค สหาโย โหติ, สมชฺชาภิจรเณ สหาโย โหติ, ชูตปฺปมาทฏฺฐานานุโยเค สหาโย โหติ. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, จตูหิ ฐาเนหิ อปายสหาโย อมิตฺโต มิตฺตปติรูปโก เวทิตพฺโพ’’ติ. २५८. "गृहपतीच्या पुत्रा, चार कारणांनी विनाशाच्या मार्गावर सोबत करणारा (व्यसनी साथीदार) अमित्र मित्रप्रतिरूपक समजावा. तो मद्य आणि मादक पदार्थांच्या सेवनात साथीदार होतो, अवेळी गल्लीबोळात भटकण्यात साथीदार होतो, जत्रा-उत्सवांमध्ये भटकण्यात साथीदार होतो, आणि जुगार खेळण्याच्या व्यसनात साथीदार होतो. गृहपतीच्या पुत्रा, या चार कारणांनी विनाशाच्या मार्गावर सोबत करणारा अमित्र मित्रप्रतिरूपक समजावा." ๒๕๙. อิทมโวจ ภควา, อิทํ วตฺวาน สุคโต อถาปรํ เอตทโวจ สตฺถา – २५९. भगवान बुद्ध असे म्हणाले. सुगत शास्त्यांनी हे सांगितल्यानंतर पुढे असे म्हटले – ‘‘อญฺญทตฺถุหโร มิตฺโต, โย จ มิตฺโต วจีปโร ; อนุปฺปิยญฺจ โย อาห, อปาเยสุ จ โย สขา. "जो मित्र केवळ स्वतःचाच स्वार्थ साधणारा आहे, जो मित्र केवळ तोंडी गप्पा मारणारा आहे, जो मित्र केवळ गोड बोलून मन राखणारा आहे, आणि जो मित्र विनाशाच्या मार्गावर साथीदार आहे;" เอเต อมิตฺเต จตฺตาโร, อิติ วิญฺญาย ปณฺฑิโต; อารกา ปริวชฺเชยฺย, มคฺคํ ปฏิภยํ ยถา’’ติ. "या चार अमित्र मित्रांना ओळखून सुज्ञ माणसाने त्यांच्यापासून तसेच दूर राहावे, जसे एखाद्या भयप्रद मार्गापासून दूर राहिले जाते." สุหทมิตฺโต सुहृद मित्र (सच्चा मित्र) ๒๖๐. ‘‘จตฺตาโรเม, คหปติปุตฺต, มิตฺตา สุหทา เวทิตพฺพา. อุปกาโร มิตฺโต สุหโท เวทิตพฺโพ, สมานสุขทุกฺโข มิตฺโต สุหโท เวทิตพฺโพ, อตฺถกฺขายี มิตฺโต สุหโท เวทิตพฺโพ, อนุกมฺปโก มิตฺโต สุหโท เวทิตพฺโพ. २६०. "गृहपतीच्या पुत्रा, हे चार प्रकारचे मित्र सुहृद (सच्चे मित्र) समजावेत: उपकार करणारा (मदत करणारा) सुहृद मित्र समजावा, सुखात आणि दुःखात समान असणारा सुहृद मित्र समजावा, हिताचा मार्ग दाखवणारा सुहृद मित्र समजावा, आणि अनुकंपा (सहानुभूती) बाळगणारा सुहृद मित्र समजावा." ๒๖๑. ‘‘จตูหิ โข, คหปติปุตฺต, ฐาเนหิ อุปกาโร มิตฺโต สุหโท เวทิตพฺโพ. ปมตฺตํ รกฺขติ, ปมตฺตสฺส สาปเตยฺยํ รกฺขติ, ภีตสฺส สรณํ โหติ, อุปฺปนฺเนสุ กิจฺจกรณีเยสุ ตทฺทิคุณํ โภคํ อนุปฺปเทติ. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, จตูหิ ฐาเนหิ อุปกาโร มิตฺโต สุหโท เวทิตพฺโพ. २६१. "गृहपतीच्या पुत्रा, चार कारणांनी उपकार करणारा सुहृद मित्र समजावा. तो गाफील (प्रमत्त) असलेल्या मित्राचे रक्षण करतो, त्याच्या संपत्तीचे रक्षण करतो, तो घाबरलेल्या मित्राचा आधार होतो, आणि काही काम उद्भवल्यास गरजेपेक्षा दुप्पट संपत्ती देऊन मदत करतो. गृहपतीच्या पुत्रा, या चार कारणांनी उपकार करणारा सुहृद मित्र समजावा." ๒๖๒. ‘‘จตูหิ โข, คหปติปุตฺต, ฐาเนหิ สมานสุขทุกฺโข มิตฺโต สุหโท เวทิตพฺโพ. คุยฺหมสฺส อาจิกฺขติ, คุยฺหมสฺส ปริคูหติ, อาปทาสุ น วิชหติ, ชีวิตํปิสฺส อตฺถาย ปริจฺจตฺตํ โหติ. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, จตูหิ ฐาเนหิ สมานสุขทุกฺโข มิตฺโต สุหโท เวทิตพฺโพ. २६२. "गृहपतीच्या पुत्रा, चार कारणांनी सुखात आणि दुःखात समान असणारा सुहृद मित्र समजावा. तो आपले गुपित मित्राला सांगतो, मित्राचे गुपित गुप्त ठेवतो, संकटाच्या वेळी त्याला सोडून जात नाही, आणि मित्राच्या हितासाठी स्वतःच्या प्राणांचेही बलिदान देण्यास तयार असतो. गृहपतीच्या पुत्रा, या चार कारणांनी सुखात आणि दुःखात समान असणारा सुहृद मित्र समजावा." ๒๖๓. ‘‘จตูหิ [Pg.153] โข, คหปติปุตฺต, ฐาเนหิ อตฺถกฺขายี มิตฺโต สุหโท เวทิตพฺโพ. ปาปา นิวาเรติ, กลฺยาเณ นิเวเสติ, อสฺสุตํ สาเวติ, สคฺคสฺส มคฺคํ อาจิกฺขติ. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, จตูหิ ฐาเนหิ อตฺถกฺขายี มิตฺโต สุหโท เวทิตพฺโพ. २६३. "गृहपतीच्या पुत्रा, चार कारणांनी हिताचा मार्ग दाखवणारा सुहृद मित्र समजावा. तो पापापासून परावृत्त करतो, कल्याणाच्या (चांगल्या) मार्गावर लावतो, जे ऐकले नाही ते ऐकवतो (ज्ञान देतो), आणि स्वर्गाचा (सुगतीचा) मार्ग दाखवतो. गृहपतीच्या पुत्रा, या चार कारणांनी हिताचा मार्ग दाखवणारा सुहृद मित्र समजावा." ๒๖๔. ‘‘จตูหิ โข, คหปติปุตฺต, ฐาเนหิ อนุกมฺปโก มิตฺโต สุหโท เวทิตพฺโพ. อภเวนสฺส น นนฺทติ, ภเวนสฺส นนฺทติ, อวณฺณํ ภณมานํ นิวาเรติ, วณฺณํ ภณมานํ ปสํสติ. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, จตูหิ ฐาเนหิ อนุกมฺปโก มิตฺโต สุหโท เวทิตพฺโพ’’ติ. २६४. "गृहपतीच्या पुत्रा, चार कारणांनी अनुकंपा बाळगणारा सुहृद मित्र समजावा. तो मित्राच्या अवनतीने आनंदी होत नाही, त्याच्या प्रगतीने आनंदी होतो, मित्राची निंदा करणाऱ्याला रोखतो, आणि मित्राची स्तुती करणाऱ्याची प्रशंसा करतो. गृहपतीच्या पुत्रा, या चार कारणांनी अनुकंपा बाळगणारा सुहृद मित्र समजावा." ๒๖๕. อิทมโวจ ภควา, อิทํ วตฺวาน สุคโต อถาปรํ เอตทโวจ สตฺถา – २६५. भगवान बुद्ध असे म्हणाले. सुगत शास्त्यांनी हे सांगितल्यानंतर पुढे असे म्हटले – ‘‘อุปกาโร จ โย มิตฺโต, สุเข ทุกฺเข จ โย สขา ; อตฺถกฺขายี จ โย มิตฺโต, โย จ มิตฺตานุกมฺปโก. "जो मित्र उपकार करणारा आहे, जो सुखात आणि दुःखात सोबत करणारा आहे, जो हिताचा मार्ग दाखवणारा आहे, आणि जो मित्रावर अनुकंपा बाळगणारा आहे;" ‘‘เอเตปิ มิตฺเต จตฺตาโร, อิติ วิญฺญาย ปณฺฑิโต; สกฺกจฺจํ ปยิรุปาเสยฺย, มาตา ปุตฺตํ ว โอรสํ; ปณฺฑิโต สีลสมฺปนฺโน, ชลํ อคฺคีว ภาสติ. "या चार प्रकारच्या खऱ्या मित्रांना ओळखून सुज्ञ माणसाने त्यांची तशीच काळजीपूर्वक सेवा करावी, जशी माता आपल्या पोटच्या मुलाची करते. शीलसंपन्न सुज्ञ मनुष्य पेटलेल्या अग्नीप्रमाणे प्रकाशमान होतो." ‘‘โภเค สํหรมานสฺส, ภมรสฺเสว อิรียโต; โภคา สนฺนิจยํ ยนฺติ, วมฺมิโกวุปจียติ. "मधमाशी जशी (फुलांना इजा न करता) मध गोळा करते, तशीच धर्ममार्गाने संपत्ती गोळा करणाऱ्या माणसाची संपत्ती वारुळासारखी वाढत जाते." ‘‘เอวํ โภเค สมาหตฺวา, อลมตฺโต กุเล คิหี; จตุธา วิภเช โภเค, ส เว มิตฺตานิ คนฺถติ. "अशा प्रकारे संपत्ती गोळा करून, गृहस्थी चालवण्यास समर्थ असलेल्या कुलपुत्राने आपल्या संपत्तीचे चार भाग करावेत. यामुळे तो मित्रांना आपल्याशी जोडून ठेवू शकतो." ‘‘เอเกน โภเค ภุญฺเชยฺย, ทฺวีหิ กมฺมํ ปโยชเย; จตุตฺถญฺจ นิธาเปยฺย, อาปทาสุ ภวิสฺสตี’’ติ. "एका भागाने त्याने उपभोग घ्यावा (जीवन जगावे), दोन भाग व्यापारात किंवा कामात गुंतवावेत, आणि चौथा भाग भविष्यातील संकटांच्या वेळी उपयोगी पडेल म्हणून सुरक्षित ठेवावा." ฉทฺทิสาปฏิจฺฉาทนกณฺฑํ सहा दिशांचे रक्षण करण्याचा विभाग ๒๖๖. ‘‘กถญฺจ, คหปติปุตฺต, อริยสาวโก ฉทฺทิสาปฏิจฺฉาที โหติ? ฉ อิมา, คหปติปุตฺต, ทิสา เวทิตพฺพา. ปุรตฺถิมา ทิสา มาตาปิตโร เวทิตพฺพา, ทกฺขิณา ทิสา อาจริยา เวทิตพฺพา, ปจฺฉิมา ทิสา [Pg.154] ปุตฺตทารา เวทิตพฺพา, อุตฺตรา ทิสา มิตฺตามจฺจา เวทิตพฺพา, เหฏฺฐิมา ทิสา ทาสกมฺมกรา เวทิตพฺพา, อุปริมา ทิสา สมณพฺราหฺมณา เวทิตพฺพา. २६६. "आणि गृहपतीच्या पुत्रा, आर्यश्रावक सहा दिशांचे रक्षण कसे करतो? गृहपतीच्या पुत्रा, या सहा दिशा समजल्या पाहिजेत. पूर्व दिशा म्हणजे माता-पिता समजावेत, दक्षिण दिशा म्हणजे आचार्य (शिक्षक) समजावेत, पश्चिम दिशा म्हणजे पत्नी आणि मुले समजावीत, उत्तर दिशा म्हणजे मित्र आणि सोबती समजावेत, खालची दिशा म्हणजे दास आणि सेवक समजावेत, आणि वरची दिशा म्हणजे श्रमण व ब्राह्मण समजावेत." ๒๖๗. ‘‘ปญฺจหิ โข, คหปติปุตฺต, ฐาเนหิ ปุตฺเตน ปุรตฺถิมา ทิสา มาตาปิตโร ปจฺจุปฏฺฐาตพฺพา – ภโต เน ภริสฺสามิ, กิจฺจํ เนสํ กริสฺสามิ, กุลวํสํ ฐเปสฺสามิ, ทายชฺชํ ปฏิปชฺชามิ, อถ วา ปน เปตานํ กาลงฺกตานํ ทกฺขิณํ อนุปฺปทสฺสามีติ. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, ปญฺจหิ ฐาเนหิ ปุตฺเตน ปุรตฺถิมา ทิสา มาตาปิตโร ปจฺจุปฏฺฐิตา ปญฺจหิ ฐาเนหิ ปุตฺตํ อนุกมฺปนฺติ. ปาปา นิวาเรนฺติ, กลฺยาเณ นิเวเสนฺติ, สิปฺปํ สิกฺขาเปนฺติ, ปติรูเปน ทาเรน สํโยเชนฺติ, สมเย ทายชฺชํ นิยฺยาเทนฺติ. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, ปญฺจหิ ฐาเนหิ ปุตฺเตน ปุรตฺถิมา ทิสา มาตาปิตโร ปจฺจุปฏฺฐิตา อิเมหิ ปญฺจหิ ฐาเนหิ ปุตฺตํ อนุกมฺปนฺติ. เอวมสฺส เอสา ปุรตฺถิมา ทิสา ปฏิจฺฉนฺนา โหติ เขมา อปฺปฏิภยา. २६७. हे गृहपतीपुत्रा, पाच कारणांनी पुत्राने पूर्व दिशा असलेल्या माता-पित्यांची सेवा-शुश्रूषा करावी – (१) त्यांनी माझे पालनपोषण केले आहे, म्हणून मी त्यांचे पालनपोषण करीन, (२) मी त्यांची कर्तव्ये पार पाडीन, (३) मी कुळपरंपरा टिकवून ठेवीन, (४) मी वारसा मिळण्यास स्वतःला पात्र बनवीन, आणि (५) मृत्यूनंतर दिवंगत झालेल्या माता-पित्यांच्या उद्देशाने मी दानधर्म (दक्षिणा) करीन. हे गृहपतीपुत्रा, पुत्राने या पाच कारणांनी पूर्व दिशा असलेल्या माता-पित्यांची सेवा केली असता, ते माता-पिता पाच कारणांनी पुत्रावर अनुकंपा करतात – ते त्याला पापापासून परावृत्त करतात, कल्याणाच्या मार्गाला लावतात, त्याला विद्या किंवा कौशल्य शिकवतात, योग्य वधूसोबत त्याचा विवाह करून देतात, आणि योग्य वेळी त्याला वारसा सुपूर्द करतात. हे गृहपतीपुत्रा, पुत्राने या पाच कारणांनी पूर्व दिशा असलेल्या माता-पित्यांची सेवा केली असता, माता-पिता या पाच कारणांनी पुत्रावर अनुकंपा करतात. अशा प्रकारे त्याची ही पूर्व दिशा सुरक्षित, शांत आणि भयमुक्त होते. ๒๖๘. ‘‘ปญฺจหิ โข, คหปติปุตฺต, ฐาเนหิ อนฺเตวาสินา ทกฺขิณา ทิสา อาจริยา ปจฺจุปฏฺฐาตพฺพา – อุฏฺฐาเนน อุปฏฺฐาเนน สุสฺสุสาย ปาริจริยาย สกฺกจฺจํ สิปฺปปฏิคฺคหเณน. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, ปญฺจหิ ฐาเนหิ อนฺเตวาสินา ทกฺขิณา ทิสา อาจริยา ปจฺจุปฏฺฐิตา ปญฺจหิ ฐาเนหิ อนฺเตวาสึ อนุกมฺปนฺติ – สุวินีตํ วิเนนฺติ, สุคฺคหิตํ คาหาเปนฺติ, สพฺพสิปฺปสฺสุตํ สมกฺขายิโน ภวนฺติ, มิตฺตามจฺเจสุ ปฏิยาเทนฺติ, ทิสาสุ ปริตฺตาณํ กโรนฺติ. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, ปญฺจหิ ฐาเนหิ อนฺเตวาสินา ทกฺขิณา ทิสา อาจริยา ปจฺจุปฏฺฐิตา อิเมหิ ปญฺจหิ ฐาเนหิ อนฺเตวาสึ อนุกมฺปนฺติ. เอวมสฺส เอสา ทกฺขิณา ทิสา ปฏิจฺฉนฺนา โหติ เขมา อปฺปฏิภยา. २६८. हे गृहपतीपुत्रा, पाच कारणांनी शिष्याने दक्षिण दिशा असलेल्या आचार्यांची (गुरूंची) सेवा-शुश्रूषा करावी – (१) त्यांच्या आदरासाठी आसनावरून उठून उभे राहून, (२) त्यांच्या सेवेसाठी उपस्थित राहून, (३) त्यांची शिकवण ऐकण्याची इच्छा ठेवून, (४) त्यांची वैयक्तिक सेवा करून, आणि (५) आदराने विद्या ग्रहण करून. हे गृहपतीपुत्रा, शिष्याने या पाच कारणांनी दक्षिण दिशा असलेल्या आचार्यांची सेवा केली असता, ते आचार्य पाच कारणांनी शिष्यावर अनुकंपा करतात – ते त्याला उत्तम प्रकारे विनीत (सुसंस्कृत) करतात, त्याला विद्या चांगल्या प्रकारे ग्रहण करायला शिकवतात, सर्व विद्यांचे ज्ञान त्याला पूर्णपणे देतात, आपल्या मित्र आणि सहकाऱ्यांकडे त्याची शिफारस करतात, आणि सर्व दिशांना त्याचे रक्षण करतात. हे गृहपतीपुत्रा, शिष्याने या पाच कारणांनी दक्षिण दिशा असलेल्या आचार्यांची सेवा केली असता, आचार्य या पाच कारणांनी शिष्यावर अनुकंपा करतात. अशा प्रकारे त्याची ही दक्षिण दिशा सुरक्षित, शांत आणि भयमुक्त होते. ๒๖๙. ‘‘ปญฺจหิ โข, คหปติปุตฺต, ฐาเนหิ สามิเกน ปจฺฉิมา ทิสา ภริยา ปจฺจุปฏฺฐาตพฺพา – สมฺมานนาย อนวมานนาย อนติจริยาย อิสฺสริยโวสฺสคฺเคน อลงฺการานุปฺปทาเนน. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, ปญฺจหิ ฐาเนหิ สามิเกน ปจฺฉิมา ทิสา ภริยา ปจฺจุปฏฺฐิตา ปญฺจหิ ฐาเนหิ [Pg.155] สามิกํ อนุกมฺปติ – สุสํวิหิตกมฺมนฺตา จ โหติ, สงฺคหิตปริชนา จ, อนติจารินี จ, สมฺภตญฺจ อนุรกฺขติ, ทกฺขา จ โหติ อนลสา สพฺพกิจฺเจสุ. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, ปญฺจหิ ฐาเนหิ สามิเกน ปจฺฉิมา ทิสา ภริยา ปจฺจุปฏฺฐิตา อิเมหิ ปญฺจหิ ฐาเนหิ สามิกํ อนุกมฺปติ. เอวมสฺส เอสา ปจฺฉิมา ทิสา ปฏิจฺฉนฺนา โหติ เขมา อปฺปฏิภยา. २६९. हे गृहपतीपुत्रा, पाच कारणांनी पतीने पश्चिम दिशा असलेल्या पत्नीची सेवा-शुश्रूषा (आदर) करावी – (१) तिचा सन्मान करून, (२) तिचा अनादर न करून, (३) तिच्याशी एकनिष्ठ राहून (व्यभिचार न करून), (४) तिला गृहव्यवस्थेचे अधिकार सोपवून, आणि (५) तिला वस्त्र-अलंकार देऊन. हे गृहपतीपुत्रा, पतीने या पाच कारणांनी पश्चिम दिशा असलेल्या पत्नीचा आदर केला असता, ती पत्नी पाच कारणांनी पतीवर अनुकंपा करते – ती घरातील कामे उत्तम प्रकारे व्यवस्थापित करते, नोकरचाकर व कुटुंबियांचा चांगला सांभाळ करते, पतीशी एकनिष्ठ राहते, पतीने मिळवलेल्या संपत्तीचे रक्षण करते, आणि सर्व कामांमध्ये ती चतुर व आळस न करणारी असते. हे गृहपतीपुत्रा, पतीने या पाच कारणांनी पश्चिम दिशा असलेल्या पत्नीचा आदर केला असता, पत्नी या पाच कारणांनी पतीवर अनुकंपा करते. अशा प्रकारे त्याची ही पश्चिम दिशा सुरक्षित, शांत आणि भयमुक्त होते. ๒๗๐. ‘‘ปญฺจหิ โข, คหปติปุตฺต, ฐาเนหิ กุลปุตฺเตน อุตฺตรา ทิสา มิตฺตามจฺจา ปจฺจุปฏฺฐาตพฺพา – ทาเนน เปยฺยวชฺเชน อตฺถจริยาย สมานตฺตตาย อวิสํวาทนตาย. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, ปญฺจหิ ฐาเนหิ กุลปุตฺเตน อุตฺตรา ทิสา มิตฺตามจฺจา ปจฺจุปฏฺฐิตา ปญฺจหิ ฐาเนหิ กุลปุตฺตํ อนุกมฺปนฺติ – ปมตฺตํ รกฺขนฺติ, ปมตฺตสฺส สาปเตยฺยํ รกฺขนฺติ, ภีตสฺส สรณํ โหนฺติ, อาปทาสุ น วิชหนฺติ, อปรปชา จสฺส ปฏิปูเชนฺติ. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, ปญฺจหิ ฐาเนหิ กุลปุตฺเตน อุตฺตรา ทิสา มิตฺตามจฺจา ปจฺจุปฏฺฐิตา อิเมหิ ปญฺจหิ ฐาเนหิ กุลปุตฺตํ อนุกมฺปนฺติ. เอวมสฺส เอสา อุตฺตรา ทิสา ปฏิจฺฉนฺนา โหติ เขมา อปฺปฏิภยา. २७०. हे गृहपतीपुत्रा, पाच कारणांनी कुलपुत्राने उत्तर दिशा असलेल्या मित्र आणि सहकाऱ्यांची सेवा-शुश्रूषा करावी – (१) दान देऊन (उदारतेने), (२) प्रिय बोलून, (३) त्यांच्या कल्याणासाठी कार्य करून, (४) त्यांना स्वतःसमान मानून, आणि (५) त्यांच्याशी प्रामाणिक राहून (वचन पाळून). हे गृहपतीपुत्रा, कुलपुत्राने या पाच कारणांनी उत्तर दिशा असलेल्या मित्र आणि सहकाऱ्यांची सेवा केली असता, ते मित्र आणि सहकारी पाच कारणांनी कुलपुत्रावर अनुकंपा करतात – तो गाफील (प्रमत्त) असताना त्याचे रक्षण करतात, तो गाफील असताना त्याच्या मालमत्तेचे रक्षण करतात, तो भयभीत असताना त्याला आश्रय देतात, संकटाच्या वेळी त्याला सोडून जात नाहीत, आणि त्याच्या संततीचाही आदर व सांभाळ करतात. हे गृहपतीपुत्रा, कुलपुत्राने या पाच कारणांनी उत्तर दिशा असलेल्या मित्र आणि सहकाऱ्यांची सेवा केली असता, मित्र आणि सहकारी या पाच कारणांनी कुलपुत्रावर अनुकंपा करतात. अशा प्रकारे त्याची ही उत्तर दिशा सुरक्षित, शांत आणि भयमुक्त होते. ๒๗๑. ‘‘ปญฺจหิ โข, คหปติปุตฺต, ฐาเนหิ อยฺยิรเกน เหฏฺฐิมา ทิสา ทาสกมฺมกรา ปจฺจุปฏฺฐาตพฺพา – ยถาพลํ กมฺมนฺตสํวิธาเนน ภตฺตเวตนานุปฺปทาเนน คิลานุปฏฺฐาเนน อจฺฉริยานํ รสานํ สํวิภาเคน สมเย โวสฺสคฺเคน. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, ปญฺจหิ ฐาเนหิ อยฺยิรเกน เหฏฺฐิมา ทิสา ทาสกมฺมกรา ปจฺจุปฏฺฐิตา ปญฺจหิ ฐาเนหิ อยฺยิรกํ อนุกมฺปนฺติ – ปุพฺพุฏฺฐายิโน จ โหนฺติ, ปจฺฉา นิปาติโน จ, ทินฺนาทายิโน จ, สุกตกมฺมกรา จ, กิตฺติวณฺณหรา จ. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, ปญฺจหิ ฐาเนหิ อยฺยิรเกน เหฏฺฐิมา ทิสา ทาสกมฺมกรา ปจฺจุปฏฺฐิตา อิเมหิ ปญฺจหิ ฐาเนหิ อยฺยิรกํ อนุกมฺปนฺติ. เอวมสฺส เอสา เหฏฺฐิมา ทิสา ปฏิจฺฉนฺนา โหติ เขมา อปฺปฏิภยา. २७१. हे गृहपतीपुत्रा, पाच कारणांनी मालकाने अधोदिशा (खालील दिशा) असलेल्या दास आणि कामगारांची काळजी घ्यावी – (१) त्यांच्या क्षमतेनुसार त्यांना काम देऊन, (२) त्यांना अन्न आणि वेतन देऊन, (३) ते आजारी असताना त्यांची शुश्रूषा करून, (४) त्यांना विशेष चवदार अन्नपदार्थ वाटून देऊन, आणि (५) योग्य वेळी त्यांना सुट्टी देऊन. हे गृहपतीपुत्रा, मालकाने या पाच कारणांनी अधोदिशा असलेल्या दास आणि कामगारांची काळजी घेतली असता, ते दास आणि कामगार पाच कारणांनी मालकावर अनुकंपा करतात – ते मालकाच्या आधी उठतात, मालकाच्या नंतर झोपतात, केवळ दिलेलेच स्वीकारतात, आपले काम चोखपणे करतात, आणि मालकाची कीर्ती व प्रशंसा पसरवतात. हे गृहपतीपुत्रा, मालकाने या पाच कारणांनी अधोदिशा असलेल्या दास आणि कामगारांची काळजी घेतली असता, ते दास आणि कामगार या पाच कारणांनी मालकावर अनुकंपा करतात. अशा प्रकारे त्याची ही अधोदिशा सुरक्षित, शांत आणि भयमुक्त होते. ๒๗๒. ‘‘ปญฺจหิ โข, คหปติปุตฺต, ฐาเนหิ กุลปุตฺเตน อุปริมา ทิสา สมณพฺราหฺมณา ปจฺจุปฏฺฐาตพฺพา – เมตฺเตน กายกมฺเมน เมตฺเตน วจีกมฺเมน เมตฺเตน [Pg.156] มโนกมฺเมน อนาวฏทฺวารตาย อามิสานุปฺปทาเนน. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, ปญฺจหิ ฐาเนหิ กุลปุตฺเตน อุปริมา ทิสา สมณพฺราหฺมณา ปจฺจุปฏฺฐิตา ฉหิ ฐาเนหิ กุลปุตฺตํ อนุกมฺปนฺติ – ปาปา นิวาเรนฺติ, กลฺยาเณ นิเวเสนฺติ, กลฺยาเณน มนสา อนุกมฺปนฺติ, อสฺสุตํ สาเวนฺติ, สุตํ ปริโยทาเปนฺติ, สคฺคสฺส มคฺคํ อาจิกฺขนฺติ. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, ปญฺจหิ ฐาเนหิ กุลปุตฺเตน อุปริมา ทิสา สมณพฺราหฺมณา ปจฺจุปฏฺฐิตา อิเมหิ ฉหิ ฐาเนหิ กุลปุตฺตํ อนุกมฺปนฺติ. เอวมสฺส เอสา อุปริมา ทิสา ปฏิจฺฉนฺนา โหติ เขมา อปฺปฏิภยา’’ติ. २७२. हे गृहपतीपुत्रा, पाच कारणांनी कुलपुत्राने ऊर्ध्वदिशा (वरील दिशा) असलेल्या श्रमण आणि ब्राह्मणांची सेवा-शुश्रूषा करावी – (१) मैत्रीपूर्ण कायिक कर्माने (शारीरिक कृतींनी), (२) मैत्रीपूर्ण वाचिक कर्माने (वाणीने), (३) मैत्रीपूर्ण मानसिक कर्माने (विचारांनी), (४) त्यांच्यासाठी घराची दारे नेहमी उघडी ठेवून, आणि (५) त्यांना अन्न इत्यादी आमिष (भौतिक गरजा) अर्पण करून. हे गृहपतीपुत्रा, कुलपुत्राने या पाच कारणांनी ऊर्ध्वदिशा असलेल्या श्रमण आणि ब्राह्मणांची सेवा केली असता, ते श्रमण आणि ब्राह्मण सहा कारणांनी कुलपुत्रावर अनुकंपा करतात – ते त्याला पापापासून परावृत्त करतात, कल्याणाच्या मार्गाला लावतात, मैत्रीपूर्ण अंतःकरणाने त्याच्यावर अनुकंपा करतात, त्याने आधी न ऐकलेला धम्म त्याला ऐकवतात, ऐकलेला धम्म अधिक स्पष्ट व शुद्ध करतात, आणि स्वर्गाचा (सुगतीचा) मार्ग दाखवतात. हे गृहपतीपुत्रा, कुलपुत्राने या पाच कारणांनी ऊर्ध्वदिशा असलेल्या श्रमण आणि ब्राह्मणांची सेवा केली असता, ते श्रमण आणि ब्राह्मण या सहा कारणांनी कुलपुत्रावर अनुकंपा करतात. अशा प्रकारे त्याची ही ऊर्ध्वदिशा सुरक्षित, शांत आणि भयमुक्त होते. ๒๗๓. อิทมโวจ ภควา. อิทํ วตฺวาน สุคโต อถาปรํ เอตทโวจ สตฺถา – २७३. भगवान बुद्ध असे म्हणाले. सुगत शास्त्यांनी हे सांगितल्यानंतर पुढे असे म्हटले – ‘‘มาตาปิตา ทิสา ปุพฺพา, อาจริยา ทกฺขิณา ทิสา; ปุตฺตทารา ทิสา ปจฺฉา, มิตฺตามจฺจา จ อุตฺตรา. माता-पिता ही पूर्व दिशा आहेत, आचार्य ही दक्षिण दिशा आहेत; पत्नी आणि मुले ही पश्चिम दिशा आहेत, आणि मित्र व सहकारी ही उत्तर दिशा आहेत. ‘‘ทาสกมฺมกรา เหฏฺฐา, อุทฺธํ สมณพฺราหฺมณา; เอตา ทิสา นมสฺเสยฺย, อลมตฺโต กุเล คิหี. दास आणि कामगार ही अधोदिशा आहेत, श्रमण आणि ब्राह्मण ही ऊर्ध्वदिशा आहेत; कुटुंबात राहणाऱ्या समर्थ गृहस्थाने या सर्व दिशांना वंदन करावे (त्यांचा आदर करावा). ‘‘ปณฺฑิโต สีลสมฺปนฺโน, สณฺโห จ ปฏิภานวา; นิวาตวุตฺติ อตฺถทฺโธ, ตาทิโส ลภเต ยสํ. जो मनुष्य बुद्धिमान (पंडित), शीलसंपन्न, मृदू आणि प्रतिभावान असतो; जो नम्र वृत्तीचा आणि गर्वरहित असतो, असा मनुष्य कीर्ती मिळवतो. ‘‘อุฏฺฐานโก อนลโส, อาปทาสุ น เวธติ; อจฺฉินฺนวุตฺติ เมธาวี, ตาทิโส ลภเต ยสํ. जो उद्योगी (परिश्रमी), आळस न करणारा, संकटात न डगमगणारा, सातत्याने प्रयत्नशील राहणारा आणि प्रज्ञावान असतो, असा मनुष्य कीर्ती मिळवतो. ‘‘สงฺคาหโก มิตฺตกโร, วทญฺญู วีตมจฺฉโร; เนตา วิเนตา อนุเนตา, ตาทิโส ลภเต ยสํ. जो इतरांचा संग्रह करणारा (मदत करणारा), चांगले मित्र जोडणारा, उदार, मत्सररहित (दानशूर), मार्गदर्शक, शिक्षक आणि समजावून सांगणारा (नेतृत्व करणारा) असतो, असा मनुष्य कीर्ती मिळवतो. ‘‘ทานญฺจ เปยฺยวชฺชญฺจ, อตฺถจริยา จ ยา อิธ; สมานตฺตตา จ ธมฺเมสุ, ตตฺถ ตตฺถ ยถารหํ; เอเต โข สงฺคหา โลเก, รถสฺสาณีว ยายโต. दान (उدارता), प्रिय बोलणे, परोपकार (कल्याणकारी कार्य) आणि सर्व बाबतीत सर्वांशी समानतेने वागणे; या जगात योग्य ठिकाणी योग्य प्रकारे आचरलेले हे चार 'संग्रहवस्तू' (संग्रहधर्म) धावणाऱ्या रथाच्या कण्यातील (चाकाच्या) खिळ्यासारखे आहेत (ज्यामुळे जग सुरळीत चालते). ‘‘เอเต จ สงฺคหา นาสฺสุ, น มาตา ปุตฺตการณา; ลเภถ มานํ ปูชํ วา, ปิตา วา ปุตฺตการณา. "जर हे संग्रह (कल्याणकारी आचरण) नसतील, तर आईला आपल्या मुलाकडून आदर किंवा पूजा (सन्मान) मिळणार नाही, आणि वडिलांनाही आपल्या मुलाकडून आदर किंवा पूजा मिळणार नाही." ‘‘ยสฺมา จ สงฺคหา เอเต, สมฺมเปกฺขนฺติ ปณฺฑิตา; ตสฺมา มหตฺตํ ปปฺโปนฺติ, ปาสํสา จ ภวนฺติ เต’’ติ. "परंतु, ज्याअर्थी ज्ञानी लोक या संग्रहांचे (कल्याणकारी आचरणांचे) योग्य प्रकारे अवलोकन करतात, त्याअर्थी ते मोठेपणाला (महानतेला) प्राप्त होतात आणि प्रशंसनीय ठरतात." ๒๗๔. เอวํ [Pg.157] วุตฺเต, สิงฺคาลโก คหปติปุตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต! อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต! เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย, ปฏิจฺฉนฺนํ วา วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย ‘จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตี’ติ. เอวเมวํ ภควตา อเนกปริยาเยน ธมฺโม ปกาสิโต. เอสาหํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ สรณํ คจฺฉามิ ธมฺมญฺจ ภิกฺขุสํฆญฺจ. อุปาสกํ มํ ภควา ธาเรตุ, อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. २७४. "असे म्हटले असता, गृहपतीचा मुलगा सिंगालक भगवंतांना म्हणाला – \"अतिशय सुंदर, भंते! अतिशय सुंदर, भंते! भंते, जसे कोणी उपडे केलेले भांडे उताणे करावे, किंवा झाकलेले उघडे करावे, किंवा वाट चुकलेल्याला वाट दाखवावी, किंवा अंधारात तेलाचा दिवा धरावा जेणेकरून डोळे असणाऱ्यांना रूपे दिसतील; त्याचप्रमाणे भगवंतांनी अनेक प्रकारे धम्म प्रकाशित केला आहे. भंते, मी भगवंतांना, धम्माला आणि भिक्खू संघाला शरण जात आहे. भगवंतांनी मला आजपासून जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे.\"" สิงฺคาลสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ อฏฺฐมํ. "आठवे सिंगाल सुत्त समाप्त झाले." ๙. อาฏานาฏิยสุตฺตํ ९. "आटानाटीय सुत्त" ปฐมภาณวาโร "प्रथम भाणवार" ๒๗๕. เอวํ [Pg.158] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ คิชฺฌกูเฏ ปพฺพเต. อถ โข จตฺตาโร มหาราชา มหติยา จ ยกฺขเสนาย มหติยา จ คนฺธพฺพเสนาย มหติยา จ กุมฺภณฺฑเสนาย มหติยา จ นาคเสนาย จตุทฺทิสํ รกฺขํ ฐเปตฺวา จตุทฺทิสํ คุมฺพํ ฐเปตฺวา จตุทฺทิสํ โอวรณํ ฐเปตฺวา อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺณา เกวลกปฺปํ คิชฺฌกูฏํ ปพฺพตํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เตปิ โข ยกฺขา อปฺเปกจฺเจ ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ, อปฺเปกจฺเจ ภควตา สทฺธึ สมฺโมทึสุ, สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ, อปฺเปกจฺเจ เยน ภควา เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ, อปฺเปกจฺเจ นามโคตฺตํ สาเวตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ, อปฺเปกจฺเจ ตุณฺหีภูตา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. २७५. "असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान राजगृह येथे गिद्धकूट पर्वतावर विहार करत होते. तेव्हा चार महाराज (चार लोकपाल देव) मोठ्या यक्षसेनेसह, मोठ्या गंधर्वसेनेसह, मोठ्या कुंभांडसेनेसह आणि मोठ्या नागसेनेसह चारही दिशांना रक्षक ठेवून, चारही दिशांना सैन्य तुकड्या ठेवून, चारही दिशांना पहारे ठेवून, रात्र संपत आली असता, अत्यंत देदीप्यमान रूपाने संपूर्ण गिद्धकूट पर्वत प्रकाशित करून जेथे भगवान होते तेथे आले; आणि भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. ते यक्ष देखील, काही भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले, काही भगवंतांशी कुशल-मंगल बोलले आणि आनंददायी व स्मरणीय संभाषण करून एका बाजूला बसले, काही भगवंतांच्या दिशेने हात जोडून एका बाजूला बसले, काही आपले नाव व गोत्र सांगून एका बाजूला बसले, तर काही शांत राहून एका बाजूला बसले." ๒๗๖. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข เวสฺสวโณ มหาราชา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สนฺติ หิ, ภนฺเต, อุฬารา ยกฺขา ภควโต อปฺปสนฺนา. สนฺติ หิ, ภนฺเต, อุฬารา ยกฺขา ภควโต ปสนฺนา. สนฺติ หิ, ภนฺเต, มชฺฌิมา ยกฺขา ภควโต อปฺปสนฺนา. สนฺติ หิ, ภนฺเต, มชฺฌิมา ยกฺขา ภควโต ปสนฺนา. สนฺติ หิ, ภนฺเต, นีจา ยกฺขา ภควโต อปฺปสนฺนา. สนฺติ หิ, ภนฺเต, นีจา ยกฺขา ภควโต ปสนฺนา. เยภุยฺเยน โข ปน, ภนฺเต, ยกฺขา อปฺปสนฺนาเยว ภควโต. ตํ กิสฺส เหตุ? ภควา หิ, ภนฺเต, ปาณาติปาตา เวรมณิยา ธมฺมํ เทเสติ, อทินฺนาทานา เวรมณิยา ธมฺมํ เทเสติ, กาเมสุมิจฺฉาจารา เวรมณิยา ธมฺมํ เทเสติ, มุสาวาทา เวรมณิยา ธมฺมํ เทเสติ, สุราเมรยมชฺชปฺปมาทฏฺฐานา เวรมณิยา ธมฺมํ เทเสติ. เยภุยฺเยน โข ปน, ภนฺเต, ยกฺขา อปฺปฏิวิรตาเยว ปาณาติปาตา, อปฺปฏิวิรตา อทินฺนาทานา, อปฺปฏิวิรตา กาเมสุมิจฺฉาจารา, อปฺปฏิวิรตา มุสาวาทา, อปฺปฏิวิรตา สุราเมรยมชฺชปฺปมาทฏฺฐานา. เตสํ ตํ โหติ อปฺปิยํ อมนาปํ. สนฺติ หิ, ภนฺเต, ภควโต สาวกา อรญฺญวนปตฺถานิ ปนฺตานิ [Pg.159] เสนาสนานิ ปฏิเสวนฺติ อปฺปสทฺทานิ อปฺปนิคฺโฆสานิ วิชนวาตานิ มนุสฺสราหสฺเสยฺยกานิ ปฏิสลฺลานสารุปฺปานิ. ตตฺถ สนฺติ อุฬารา ยกฺขา นิวาสิโน, เย อิมสฺมึ ภควโต ปาวจเน อปฺปสนฺนา. เตสํ ปสาทาย อุคฺคณฺหาตุ, ภนฺเต, ภควา อาฏานาฏิยํ รกฺขํ ภิกฺขูนํ ภิกฺขุนีนํ อุปาสกานํ อุปาสิกานํ คุตฺติยา รกฺขาย อวิหึสาย ผาสุวิหารายา’’ติ. อธิวาเสสิ ภควา ตุณฺหีภาเวน. २७६. "एका बाजूला बसलेले वेस्सवण महाराज भगवंतांना म्हणाले – \"भंते, भगवंतांविषयी अप्रसन्न (श्रद्धा नसलेले) असे मोठे (शक्तिशाली) यक्ष आहेत. भंते, भगवंतांविषयी प्रसन्न (श्रद्धा असलेले) मोठे यक्षही आहेत. भंते, मध्यम दर्जाचे यक्ष आहेत जे भगवंतांविषयी अप्रसन्न आहेत, आणि काही प्रसन्न आहेत. भंते, कनिष्ठ दर्जाचे यक्ष आहेत जे भगवंतांविषयी अप्रसन्न आहेत, आणि काही प्रसन्न आहेत. परंतु भंते, बहुतांश यक्ष भगवंतांविषयी अप्रसन्नच आहेत. त्याचे कारण काय? कारण भंते, भगवान प्राणातिपातापासून (जीवहिंसेपासून) विरत राहण्याचा धम्म शिकवतात, अदिन्नादानापासून (चोरीपासून) विरत राहण्याचा धम्म शिकवतात, कामेसू मिच्छाचारापासून (व्यभिचारापासून) विरत राहण्याचा धम्म शिकवतात, मुसावादापासून (असत्य बोलण्यापासून) विरत राहण्याचा धम्म शिकवतात, सुरा-मेरय-मज्ज-पमादठ्ठानापासून (मद्यपानापासून) विरत राहण्याचा धम्म शिकवतात. परंतु भंते, बहुतांश यक्ष प्राणातिपातापासून विरत नसतात, अदिन्नादानापासून विरत नसतात, कामेसू मिच्छाचारापासून विरत नसतात, मुसावादापासून विरत नसतात, सुरा-मेरय-मज्ज-पमादठ्ठानापासून विरत नसतात. त्यांना हा धम्म अप्रिय आणि नापसंत वाटतो. भंते, भगवंतांचे जे श्रावक अरण्यातील निर्जन व शांत ठिकाणी, मानवी वर्दळीपासून दूर, एकांतात ध्यान करण्यास योग्य अशा निवासस्थानांचा (सेनासनांचा) आश्रय घेतात, तेथे राहणारे काही मोठे यक्ष आहेत जे भगवंतांच्या या शासनाविषयी (धम्माविषयी) अप्रसन्न आहेत. त्यांच्या मनात श्रद्धा निर्माण करण्यासाठी आणि भिक्खू, भिक्खुनी, उपासक व उपासिका यांच्या संरक्षणासाठी, सुरक्षेसाठी, अहिंसेसाठी आणि सुखावह विहारासाठी भगवंतांनी 'आटानाटीय' संरक्षणाचा (परित्ताचा) स्वीकार करावा.\" भगवंतांनी मौन राहून संमती दिली." อถ โข เวสฺสวโณ มหาราชา ภควโต อธิวาสนํ วิทิตฺวา ตายํ เวลายํ อิมํ อาฏานาฏิยํ รกฺขํ อภาสิ – "त्यानंतर वेस्सवण महाराजांनी भगवंतांची संमती जाणून घेऊन, त्या वेळी हे आटानाटीय संरक्षण (परित्त) म्हटले –" ๒๗๗. ‘‘วิปสฺสิสฺส จ นมตฺถุ, จกฺขุมนฺตสฺส สิรีมโต. २७७. "\"दिव्य दृष्टी असणाऱ्या आणि वैभवशाली विपस्सी बुद्धांना माझा नमस्कार असो.\"" สิขิสฺสปิ จ นมตฺถุ, สพฺพภูตานุกมฺปิโน. "\"सर्व प्राण्यांवर अनुकंपा करणाऱ्या शिखी बुद्धांनाही माझा नमस्कार असो.\"" ‘‘เวสฺสภุสฺส จ นมตฺถุ, นฺหาตกสฺส ตปสฺสิโน; นมตฺถุ กกุสนฺธสฺส, มารเสนาปมทฺทิโน. "\"क्लेश धुवून टाकणाऱ्या आणि तपस्वी वेस्सभू बुद्धांना माझा नमस्कार असो. मारसेनेचा पराभव करणाऱ्या ककुसंध बुद्धांना माझा नमस्कार असो.\"" ‘‘โกณาคมนสฺส นมตฺถุ, พฺราหฺมณสฺส วุสีมโต; กสฺสปสฺส จ นมตฺถุ, วิปฺปมุตฺตสฺส สพฺพธิ. "\"पापरहित आणि ब्रह्मचर्य पूर्ण केलेल्या कोणागमन बुद्धांना माझा नमस्कार असो. सर्व प्रकारे क्लेशांमधून मुक्त झालेल्या कस्सप बुद्धांना माझा नमस्कार असो.\"" ‘‘องฺคีรสสฺส นมตฺถุ, สกฺยปุตฺตสฺส สิรีมโต; โย อิมํ ธมฺมํ เทเสสิ, สพฺพทุกฺขาปนูทนํ. "\"तेजस्वी आणि शाक्यपुत्र असणाऱ्या वैभवशाली अंगीरसांना (गौतम बुद्धांना) माझा नमस्कार असो, ज्यांनी सर्व दुःखांचे निवारण करणाऱ्या या धम्माचा उपदेश केला.\"" ‘‘เย จาปิ นิพฺพุตา โลเก, ยถาภูตํ วิปสฺสิสุํ; เต ชนา อปิสุณาถ, มหนฺตา วีตสารทา. "\"आणि जे या जगात क्लेशांपासून मुक्त (निर्वाण प्राप्त) झाले आहेत, ज्यांनी सत्याचे यथार्थ दर्शन घेतले आहे, जे चहाडी न करणारे, महान आणि भयमुक्त आहेत;\"" ‘‘หิตํ เทวมนุสฺสานํ, ยํ นมสฺสนฺติ โคตมํ; วิชฺชาจรณสมฺปนฺนํ, มหนฺตํ วีตสารทํ. "\"देव आणि मानवांचे कल्याण करणाऱ्या, विद्या व चरणाने संपन्न असणाऱ्या, महान आणि भयमुक्त अशा ज्या गौतम बुद्धांना सर्व नमस्कार करतात, त्यांना माझा नमस्कार असो.\"" ๒๗๘. ‘‘ยโต อุคฺคจฺฉติ สูริโย, อาทิจฺโจ มณฺฑลี มหา. २७८. "\"ज्या दिशेकडून सूर्य उगवतो, जो आदित्याचा पुत्र आणि विशाल मंडल असलेला आहे,\"" ยสฺส จุคฺคจฺฉมานสฺส, สํวรีปิ นิรุชฺฌติ; ยสฺส จุคฺคเต สูริเย, ‘ทิวโส’ติ ปวุจฺจติ. "\"ज्याच्या उगवण्याने अंधकार नाहीसा होतो, आणि ज्या सूर्याच्या उगवण्यावर 'दिवस' असे म्हटले जाते,\"" ‘‘รหโทปิ [Pg.160] ตตฺถ คมฺภีโร, สมุทฺโท สริโตทโก; เอวํ ตํ ตตฺถ ชานนฺติ, ‘สมุทฺโท สริโตทโก’. "\"तेथे खोल पाण्याचा साठा असलेला, नद्यांचे पाणी मिळणारा समुद्र आहे; लोक त्याला तेथे 'नद्यांचे पाणी असलेला समुद्र' म्हणून ओळखतात.\"" ‘‘อิโต ‘สา ปุริมา ทิสา’, อิติ นํ อาจิกฺขตี ชโน; ยํ ทิสํ อภิปาเลติ, มหาราชา ยสสฺสิ โส. "\"येथून ती 'पूर्व दिशा' आहे असे लोक म्हणतात; ज्या दिशेचे रक्षण तो कीर्तिमान महाराज करतो,\"" ‘‘คนฺธพฺพานํ อธิปติ, ‘ธตรฏฺโฐ’ติ นามโส; รมตี นจฺจคีเตหิ, คนฺธพฺเพหิ ปุรกฺขโต. "\"जो गंधर्वांचा अधिपती असून 'धतरठ्ठ' (धृतराष्ट्र) या नावाने ओळखला जातो; तो गंधर्वांनी वेढलेला असून नृत्य आणि गीतांमध्ये रममाण होतो.\"" ‘‘ปุตฺตาปิ ตสฺส พหโว, เอกนามาติ เม สุตํ; อสีติ ทส เอโก จ, อินฺทนามา มหพฺพลา. "\"त्याला अनेक पुत्र आहेत आणि त्यांचे नाव एकच आहे असे मी ऐकले आहे; ते नव्वद आणि एक (एक्क्याण्णव) पुत्र असून 'इंद्र' या नावाचे व महाबलाढ्य आहेत.\"" เต จาปิ พุทฺธํ ทิสฺวาน, พุทฺธํ อาทิจฺจพนฺธุนํ; ทูรโตว นมสฺสนฺติ, มหนฺตํ วีตสารทํ. "\"ते देखील बुद्धांना, सूर्याचे बांधव असणाऱ्या बुद्धांना पाहून, दुरूनच त्या महान आणि भयमुक्त बुद्धांना नमस्कार करतात:\"" ‘‘นโม เต ปุริสาชญฺญ, นโม เต ปุริสุตฺตม; กุสเลน สเมกฺขสิ, อมนุสฺสาปิ ตํ วนฺทนฺติ; สุตํ เนตํ อภิณฺหโส, ตสฺมา เอวํ วเทมเส. "\"‘हे पुरुषश्रेष्ठा! तुम्हाला नमस्कार असो. हे पुरुषोत्तमा! तुम्हाला नमस्कार असो. तुम्ही कुशलतेने (करुणेने) सर्वांकडे पाहता.’ अमानुष (यक्ष) देखील त्यांना वंदन करतात; हे आम्ही वारंवार ऐकले आहे, म्हणूनच आम्ही असे म्हणतो:\"" ‘‘‘ชินํ วนฺทถ โคตมํ, ชินํ วนฺทาม โคตมํ; วิชฺชาจรณสมฺปนฺนํ, พุทฺธํ วนฺทาม โคตมํ’. "\"‘तुम्ही विजयी गौतम बुद्धांना वंदन करा, आम्ही विजयी गौतम बुद्धांना वंदन करतो; विद्या व चरणाने संपन्न असणाऱ्या गौतम बुद्धांना आम्ही वंदन करतो.’\"" ๒๗๙. ‘‘เยน เปตา ปวุจฺจนฺติ, ปิสุณา ปิฏฺฐิมํสิกา. २७९. "\"ज्या दिशेला प्रेत (मृत लोक), चहाडी करणारे आणि पाठीमागे निंदा करणारे लोक नेले जातात असे म्हणतात,\"" ปาณาติปาติโน ลุทฺทา, โจรา เนกติกา ชนา. "\"तसेच प्राणातिपात (जीवहिंसा) करणारे, शिकारी, चोर आणि कपटी लोक ज्या दिशेला नेले जातात,\"" ‘‘อิโต ‘สา ทกฺขิณา ทิสา’, อิติ นํ อาจิกฺขตี ชโน; ยํ ทิสํ อภิปาเลติ, มหาราชา ยสสฺสิ โส. "\"येथून ती 'दक्षिण दिशा' आहे असे लोक म्हणतात; ज्या दिशेचे रक्षण तो कीर्तिमान महाराज करतो,\"" ‘‘กุมฺภณฺฑานํ อธิปติ, ‘วิรูฬฺโห’ อิติ นามโส; รมตี นจฺจคีเตหิ, กุมฺภณฺเฑหิ ปุรกฺขโต. कुंभांड लोकांचा अधिपती, ज्याचे नाव 'विरूळ्हक' आहे; तो कुंभांडांनी वेढलेला असून, नृत्य आणि संगीतामध्ये रममाण होतो. ‘‘ปุตฺตาปิ ตสฺส พหโว, เอกนามาติ เม สุตํ; อสีติ ทส เอโก จ, อินฺทนามา มหพฺพลา. त्याला अनेक पुत्र आहेत, त्यांचे नाव एकच आहे असे मी ऐकले आहे; ते एक्याण्णव (९१) असून, 'इंद्र' नावाचे आणि महाबली आहेत. เต จาปิ พุทฺธํ ทิสฺวาน, พุทฺธํ อาทิจฺจพนฺธุนํ; ทูรโตว นมสฺสนฺติ, มหนฺตํ วีตสารทํ. ते पुत्र देखील आदित्याचे (सूर्याचे) बांधव असलेल्या, महान आणि भयमुक्त अशा बुद्धांना पाहून दुरूनच वंदन करतात. ‘‘นโม [Pg.161] เต ปุริสาชญฺญ, นโม เต ปุริสุตฺตม; กุสเลน สเมกฺขสิ, อมนุสฺสาปิ ตํ วนฺทนฺติ; สุตํ เนตํ อภิณฺหโส, ตสฺมา เอวํ วเทมเส. 'हे नरश्रेष्ठा! आपल्याला नमस्कार असो. हे पुरुषोत्तमा! आपल्याला नमस्कार असो. आपण कुशलतेने सर्वांकडे पाहता. अमनुष्य देखील आपल्याला वंदन करतात.' हे आम्ही वारंवार ऐकले आहे, म्हणूनच आम्ही असे म्हणतो. ‘‘‘ชินํ วนฺทถ โคตมํ, ชินํ วนฺทาม โคตมํ; วิชฺชาจรณสมฺปนฺนํ, พุทฺธํ วนฺทาม โคตมํ’. 'तुम्ही त्या जिन गौतम बुद्धांना वंदन करा. आम्ही त्या जिन गौतम बुद्धांना वंदन करतो. विद्या आणि चरणाने संपन्न असलेल्या त्या बुद्ध गौतमांना आम्ही वंदन करतो.' ๒๘๐. ‘‘ยตฺถ โจคฺคจฺฉติ สูริโย, อาทิจฺโจ มณฺฑลี มหา. २८०. ज्या दिशेला महामंडलाकार, तेजस्वी सूर्य मावळतो, ยสฺส โจคฺคจฺฉมานสฺส, ทิวโสปิ นิรุชฺฌติ; ยสฺส โจคฺคเต สูริเย, ‘สํวรี’ติ ปวุจฺจติ. ज्याच्या मावळण्याने दिवसाचा अंत होतो आणि ज्याच्या मावळण्यानंतर जिला 'रात्र' म्हटले जाते, ‘‘รหโทปิ ตตฺถ คมฺภีโร, สมุทฺโท สริโตทโก; เอวํ ตํ ตตฺถ ชานนฺติ, ‘สมุทฺโท สริโตทโก’. तेथे एक खोल जलाशय आहे, जो नद्यांच्या पाण्याने भरलेला समुद्र आहे; लोक त्याला 'नद्यांच्या पाण्याने भरलेला समुद्र' म्हणून ओळखतात. ‘‘อิโต ‘สา ปจฺฉิมา ทิสา’, อิติ นํ อาจิกฺขตี ชโน; ยํ ทิสํ อภิปาเลติ, มหาราชา ยสสฺสิ โส. येथून ती 'पश्चिम दिशा' आहे, असे लोक तिला म्हणतात. ज्या दिशेचे रक्षण तो यशस्वी महाराज करतो, ‘‘นาคานญฺจ อธิปติ, ‘วิรูปกฺโข’ติ นามโส; รมตี นจฺจคีเตหิ, นาเคเหว ปุรกฺขโต. तो नागांचा अधिपती आहे, ज्याचे नाव 'विरूपाक्ष' आहे; तो नागांनी वेढलेला असून, नृत्य आणि संगीतामध्ये रममाण होतो. ‘‘ปุตฺตาปิ ตสฺส พหโว, เอกนามาติ เม สุตํ; อสีติ ทส เอโก จ, อินฺทนามา มหพฺพลา. त्याला अनेक पुत्र आहेत, त्यांचे नाव एकच आहे असे मी ऐकले आहे; ते एक्याण्णव (९१) असून, 'इंद्र' नावाचे आणि महाबली आहेत. เต จาปิ พุทฺธํ ทิสฺวาน, พุทฺธํ อาทิจฺจพนฺธุนํ; ทูรโตว นมสฺสนฺติ, มหนฺตํ วีตสารทํ. ते पुत्र देखील आदित्याचे (सूर्याचे) बांधव असलेल्या, महान आणि भयमुक्त अशा बुद्धांना पाहून दुरूनच वंदन करतात. ‘‘นโม เต ปุริสาชญฺญ, นโม เต ปุริสุตฺตม; กุสเลน สเมกฺขสิ, อมนุสฺสาปิ ตํ วนฺทนฺติ; สุตํ เนตํ อภิณฺหโส, ตสฺมา เอวํ วเทมเส. 'हे नरश्रेष्ठा! आपल्याला नमस्कार असो. हे पुरुषोत्तमा! आपल्याला नमस्कार असो. आपण कुशलतेने सर्वांकडे पाहता. अमनुष्य देखील आपल्याला वंदन करतात.' हे आम्ही वारंवार ऐकले आहे, म्हणूनच आम्ही असे म्हणतो. ‘‘‘ชินํ วนฺทถ โคตมํ, ชินํ วนฺทาม โคตมํ; วิชฺชาจรณสมฺปนฺนํ, พุทฺธํ วนฺทาม โคตมํ’. 'तुम्ही त्या जिन गौतम बुद्धांना वंदन करा. आम्ही त्या जिन गौतम बुद्धांना वंदन करतो. विद्या आणि चरणाने संपन्न असलेल्या त्या बुद्ध गौतमांना आम्ही वंदन करतो.' ๒๘๑. ‘‘เยน อุตฺตรกุรุวฺโห, มหาเนรุ สุทสฺสโน. २८१. ज्या दिशेला 'उत्तरकुरु' नावाचा प्रदेश आहे, जेथे सुदर्शन महानेरू शोभून दिसतो, มนุสฺสา ตตฺถ ชายนฺติ, อมมา อปริคฺคหา. तेथे जन्मणारे मनुष्य 'ममत्वरहित' (माझेपणाची भावना नसलेले) आणि 'अपरिग्रही' (मालकी हक्क न सांगणारे) असतात. ‘‘น [Pg.162] เต พีชํ ปวปนฺติ, นปิ นียนฺติ นงฺคลา; อกฏฺฐปากิมํ สาลึ, ปริภุญฺชนฺติ มานุสา. ते बी पेरणी करत नाहीत आणि नांगरही चालवत नाहीत; न नांगरलेल्या जमिनीत स्वतःहून पिकणारे शालिधान्य ते लोक खातात. ‘‘อกณํ อถุสํ สุทฺธํ, สุคนฺธํ ตณฺฑุลปฺผลํ; ตุณฺฑิกีเร ปจิตฺวาน, ตโต ภุญฺชนฺติ โภชนํ. कण आणि टरफले नसलेले, स्वच्छ, सुगंधी असे तांदूळ ते मातीच्या भांड्यात शिजवून मग ते अन्न ग्रहण करतात. ‘‘คาวึ เอกขุรํ กตฺวา, อนุยนฺติ ทิโสทิสํ; ปสุํ เอกขุรํ กตฺวา, อนุยนฺติ ทิโสทิสํ. गाईला एकखुरी वाहन बनवून ते दिशादिशांमध्ये फिरतात; इतर पशूंना एकखुरी वाहन बनवून ते दिशादिशांमध्ये फिरतात. ‘‘อิตฺถึ วา วาหนํ กตฺวา, อนุยนฺติ ทิโสทิสํ; ปุริสํ วาหนํ กตฺวา, อนุยนฺติ ทิโสทิสํ. स्त्रीला वाहन बनवून ते दिशादिशांमध्ये फिरतात; पुरुषाला वाहन बनवून ते दिशादिशांमध्ये फिरतात. ‘‘กุมารึ วาหนํ กตฺวา, อนุยนฺติ ทิโสทิสํ; กุมารํ วาหนํ กตฺวา, อนุยนฺติ ทิโสทิสํ. कुमारीला वाहन बनवून ते दिशादिशांमध्ये फिरतात; कुमाराला वाहन बनवून ते दिशादिशांमध्ये फिरतात. ‘‘เต ยาเน อภิรุหิตฺวา,สพฺพา ทิสา อนุปริยายนฺติ ; ปจารา ตสฺส ราชิโน. त्या राजाचे सेवक त्या वाहनांवर आरूढ होऊन सर्व दिशांमध्ये फिरतात. ‘‘หตฺถิยานํ อสฺสยานํ, ทิพฺพํ ยานํ อุปฏฺฐิตํ; ปาสาทา สิวิกา เจว, มหาราชสฺส ยสสฺสิโน. त्या यशस्वी महाराजासाठी हत्तींचे वाहन, घोड्यांचे वाहन आणि दिव्य वाहने उपलब्ध असतात; तसेच प्रासाद आणि पालख्या देखील सज्ज असतात. ‘‘ตสฺส จ นครา อหุ,อนฺตลิกฺเข สุมาปิตา; อาฏานาฏา กุสินาฏา ปรกุสินาฏา,นาฏสุริยา ปรกุสิฏนาฏา. आणि अंतरीक्षातु त्याची उत्तम प्रकारे निर्माण केलेली शहरे आहेत: आटानाटा, कुसिनाटा, परकुसिनाटा, नाटसुरिया आणि परकुसिटनाटा. ‘‘อุตฺตเรน กสิวนฺโต,ชโนฆมปเรน จ; นวนวุติโย อมฺพรอมฺพรวติโย,อาฬกมนฺทา นาม ราชธานี. उत्तरेला 'कसीवंत' शहर आहे, आणि त्याच्या पश्चिमेला 'जनोध' शहर आहे; तसेच 'नवनवुतिय', 'अंबर-अंबरवतिय' आणि 'आळकमंदा' नावाची राजधानी आहे. ‘‘กุเวรสฺส โข ปน, มาริส, มหาราชสฺส วิสาณา นาม ราชธานี; ตสฺมา กุเวโร มหาราชา, ‘เวสฺสวโณ’ติ ปวุจฺจติ. हे महाशया, कुवेर महाराजाची 'विसाणा' नावाची राजधानी आहे; म्हणूनच कुवेर महाराजाला 'वेस्सवण' असे म्हटले जाते. ‘‘ปจฺเจสนฺโต [Pg.163] ปกาเสนฺติ, ตโตลา ตตฺตลา ตโตตลา; โอชสิ เตชสิ ตโตชสี, สูโร ราชา อริฏฺโฐ เนมิ. त्याच्या आज्ञांचे पालन करणारे आणि संदेश पोहोचवणारे यक्ष आहेत: ततोला, तत्तला, ततोतला, ओजसी, तेजसी, ततोजसी, सूरो, राजा, अरिट्ठो आणि नेमी. ‘‘รหโทปิ ตตฺถ ธรณี นาม, ยโต เมฆา ปวสฺสนฺติ; วสฺสา ยโต ปตายนฺติ, สภาปิ ตตฺถ สาลวตี นาม. तेथे 'धरणी' नावाचा एक जलाशय देखील आहे, ज्यातून ढग पाणी घेऊन पाऊस पाडतात आणि पावसाचे पाणी वाहून जाते; तेथे 'सालावती' नावाचे सभागृह देखील आहे. ‘‘ยตฺถ ยกฺขา ปยิรุปาสนฺติ, ตตฺถ นิจฺจผลา รุกฺขา; นานา ทิชคณา ยุตา, มยูรโกญฺจาภิรุทา; โกกิลาทีหิ วคฺคุหิ. जिथे यक्ष एकत्र जमतात, तिथे नेहमी फळांनी बहरलेले वृक्ष आहेत; जे विविध पक्ष्यांच्या थव्यांनी युक्त आहेत, जिथे मोर आणि क्रौंच पक्षी मधुर साद घालतात आणि कोकिळांचे सुश्राव्य कूजन ऐकू येते. ‘‘ชีวญฺชีวกสทฺเทตฺถ, อโถ โอฏฺฐวจิตฺตกา; กุกฺกุฏกา กุฬีรกา, วเน โปกฺขรสาตกา. तेथे 'जीवंजीवक' पक्षी आणि 'उट्ठवचित्तक' पक्षी ओरडतात; तसेच रानकोंबडे, सुवर्ण-खेकडे आणि वनातील 'पोक्खरसातक' पक्षी देखील आहेत. ‘‘สุกสาฬิกสทฺเทตฺถ, ทณฺฑมาณวกานิ จ; โสภติ สพฺพกาลํ สา, กุเวรนฬินี สทา. तेथे पोपट आणि साळुंक्यांचे आवाज ऐकू येतात, तसेच मानवी चेहऱ्यासारखे तोंड असलेले 'दंडमाणवक' पक्षीही आहेत; कुवेराची ती कमळांची विहीर नेहमी शोभून दिसते. ‘‘อิโต ‘สา อุตฺตรา ทิสา’, อิติ นํ อาจิกฺขตี ชโน; ยํ ทิสํ อภิปาเลติ, มหาราชา ยสสฺสิ โส. येथून ती 'उत्तर दिशा' आहे, असे लोक तिला म्हणतात. ज्या दिशेचे रक्षण तो यशस्वी महाराज करतो, ‘‘ยกฺขานญฺจ อธิปติ, ‘กุเวโร’ อิติ นามโส; รมตี นจฺจคีเตหิ, ยกฺเขเหว ปุรกฺขโต. तो यक्षांचा अधिपती आहे, ज्याचे नाव 'कुवेर' आहे; तो यक्षांनी वेढलेला असून, नृत्य आणि संगीतामध्ये रममाण होतो. ‘‘ปุตฺตาปิ ตสฺส พหโว, เอกนามาติ เม สุตํ; อสีติ ทส เอโก จ, อินฺทนามา มหพฺพลา. त्याला अनेक पुत्र आहेत, त्यांचे नाव एकच आहे असे मी ऐकले आहे; ते एक्याण्णव (९१) असून, 'इंद्र' नावाचे आणि महाबली आहेत. ‘‘เต จาปิ พุทฺธํ ทิสฺวาน, พุทฺธํ อาทิจฺจพนฺธุนํ; ทูรโตว นมสฺสนฺติ, มหนฺตํ วีตสารทํ. ते पुत्र देखील आदित्याचे (सूर्याचे) बांधव असलेल्या, महान आणि भयमुक्त अशा बुद्धांना पाहून दुरूनच वंदन करतात. ‘‘นโม เต ปุริสาชญฺญ, นโม เต ปุริสุตฺตม; กุสเลน สเมกฺขสิ, อมนุสฺสาปิ ตํ วนฺทนฺติ; สุตํ เนตํ อภิณฺหโส, ตสฺมา เอวํ วเทมเส. 'हे नरश्रेष्ठा! आपल्याला नमस्कार असो. हे पुरुषोत्तमा! आपल्याला नमस्कार असो. आपण कुशलतेने सर्वांकडे पाहता. अमनुष्य देखील आपल्याला वंदन करतात.' हे आम्ही वारंवार ऐकले आहे, म्हणूनच आम्ही असे म्हणतो. ‘‘‘ชินํ วนฺทถ โคตมํ, ชินํ วนฺทาม โคตมํ; วิชฺชาจรณสมฺปนฺนํ, พุทฺธํ วนฺทาม โคตม’’’นฺติ. 'तुम्ही त्या जिन गौतम बुद्धांना वंदन करा. आम्ही त्या जिन गौतम बुद्धांना वंदन करतो. विद्या आणि चरणाने संपन्न असलेल्या त्या बुद्ध गौतमांना आम्ही वंदन करतो.' ‘‘อยํ โข สา, มาริส, อาฏานาฏิยา รกฺขา ภิกฺขูนํ ภิกฺขุนีนํ อุปาสกานํ อุปาสิกานํ คุตฺติยา รกฺขาย อวิหึสาย ผาสุวิหาราย. हे महाशया, हीच ती 'आटानाटिया रक्षा' आहे, जी भिक्खू, भिक्खुनी, उपासक आणि उपासिका यांच्या सुरक्षिततेसाठी, रक्षणासाठी, अहिंसेसाठी आणि सुखावह विहारासाठी आहे. ๒๘๒. ‘‘ยสฺส [Pg.164] กสฺสจิ, มาริส, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา อุปาสกสฺส วา อุปาสิกาย วา อยํ อาฏานาฏิยา รกฺขา สุคฺคหิตา ภวิสฺสติ สมตฺตา ปริยาปุตา. ตํ เจ อมนุสฺโส ยกฺโข วา ยกฺขินี วา ยกฺขโปตโก วา ยกฺขโปติกา วา ยกฺขมหามตฺโต วา ยกฺขปาริสชฺโช วา ยกฺขปจาโร วา, คนฺธพฺโพ วา คนฺธพฺพี วา คนฺธพฺพโปตโก วา คนฺธพฺพโปติกา วา คนฺธพฺพมหามตฺโต วา คนฺธพฺพปาริสชฺโช วา คนฺธพฺพปจาโร วา, กุมฺภณฺโฑ วา กุมฺภณฺฑี วา กุมฺภณฺฑโปตโก วา กุมฺภณฺฑโปติกา วา กุมฺภณฺฑมหามตฺโต วา กุมฺภณฺฑปาริสชฺโช วา กุมฺภณฺฑปจาโร วา, นาโค วา นาคี วา นาคโปตโก วา นาคโปติกา วา นาคมหามตฺโต วา นาคปาริสชฺโช วา นาคปจาโร วา, ปทุฏฺฐจิตฺโต ภิกฺขุํ วา ภิกฺขุนึ วา อุปาสกํ วา อุปาสิกํ วา คจฺฉนฺตํ วา อนุคจฺเฉยฺย, ฐิตํ วา อุปติฏฺเฐยฺย, นิสินฺนํ วา อุปนิสีเทยฺย, นิปนฺนํ วา อุปนิปชฺเชยฺย. น เม โส, มาริส, อมนุสฺโส ลเภยฺย คาเมสุ วา นิคเมสุ วา สกฺการํ วา ครุการํ วา. น เม โส, มาริส, อมนุสฺโส ลเภยฺย อาฬกมนฺทาย นาม ราชธานิยา วตฺถุํ วา วาสํ วา. น เม โส, มาริส, อมนุสฺโส ลเภยฺย ยกฺขานํ สมิตึ คนฺตุํ. อปิสฺสุ นํ, มาริส, อมนุสฺสา อนาวยฺหมฺปิ นํ กเรยฺยุํ อวิวยฺหํ. อปิสฺสุ นํ, มาริส, อมนุสฺสา อตฺตาหิปิ ปริปุณฺณาหิ ปริภาสาหิ ปริภาเสยฺยุํ. อปิสฺสุ นํ, มาริส, อมนุสฺสา ริตฺตํปิสฺส ปตฺตํ สีเส นิกฺกุชฺเชยฺยุํ. อปิสฺสุ นํ, มาริส, อมนุสฺสา สตฺตธาปิสฺส มุทฺธํ ผาเลยฺยุํ. २८२. “हे मारिस, ज्या कोणा भिक्खूने, भिक्खुणीने, उपासकाने किंवा उपासिकेने हे 'आटानाटिया' संरक्षण (परित्त) चांगल्या प्रकारे ग्रहण केले असेल, पूर्णपणे आत्मसात केले असेल आणि त्याचा वारंवार अभ्यास केला असेल; आणि जर एखादा अमनुष्य—यक्ष किंवा यक्षिणी, यक्षपुत्र किंवा यक्षपुत्री, यक्ष-महामात्र (मुख्य अधिकारी), यक्ष-परिषद (सभासद) किंवा यक्ष-सेवक; अथवा गंधर्व किंवा गंधर्वी, गंधर्वपुत्र किंवा गंधर्वपुत्री, गंधर्व-महामात्र, गंधर्व-परिषद किंवा गंधर्व-सेवक; अथवा कुंभांड किंवा कुंभांडी, कुंभांडपुत्र किंवा कुंभांडपुत्री, कुंभांड-महामात्र, कुंभांड-परिषद किंवा कुंभांड-सेवक; अथवा नाग किंवा नागी, नागपुत्र किंवा नागपुत्री, नाग-महामात्र, नाग-परिषद किंवा नाग-सेवक—दुष्ट बुद्धीने (द्वेषपूर्ण मनाने) त्या भिक्खू, भिक्खुणी, उपासक किंवा उपासिकेचा, तो चालत असताना पाठलाग करेल, किंवा उभा असताना त्याच्याजवळ उभा राहील, किंवा बसलेला असताना त्याच्याजवळ बसेल, किंवा झोपलेला असताना त्याच्याजवळ झोपेल; तर हे मारिस, त्या अमनुष्याला कोणत्याही गावात किंवा नगरात आदर किंवा सन्मान मिळणार नाही. हे मारिस, त्या अमनुष्याला माझ्या 'आळकमंदा' नावाच्या राजधानीत राहण्यासाठी जागा किंवा निवासस्थान मिळणार नाही. हे मारिस, त्या अमनुष्याला यक्षांच्या सभेत प्रवेश मिळणार नाही. इतकेच नव्हे तर, हे मारिस, इतर अमनुष्य त्याच्याशी विवाहसंबंध जोडणार नाहीत (त्याला मुलगी देणार नाहीत किंवा त्याची मुलगी घेणार नाहीत). हे मारिस, इतर अमनुष्य त्याच्या स्वतःच्या स्वरूपावरून (कुरूपतेवरून) अत्यंत कठोर शब्दांत त्याची निर्भत्सना करतील. हे मारिस, इतर अमनुष्य त्याच्या डोक्यावर रिकामे भांडे पालथे घालतील. हे मारिस, इतर अमनुष्य त्याच्या डोक्याचे सात तुकडे करतील.” ‘‘สนฺติ หิ, มาริส, อมนุสฺสา จณฺฑา รุทฺธา รภสา, เต เนว มหาราชานํ อาทิยนฺติ, น มหาราชานํ ปุริสกานํ อาทิยนฺติ, น มหาราชานํ ปุริสกานํ ปุริสกานํ อาทิยนฺติ. เต โข เต, มาริส, อมนุสฺสา มหาราชานํ อวรุทฺธา นาม วุจฺจนฺติ. เสยฺยถาปิ, มาริส, รญฺโญ มาคธสฺส วิชิเต มหาโจรา. เต เนว รญฺโญ มาคธสฺส อาทิยนฺติ, น รญฺโญ มาคธสฺส ปุริสกานํ อาทิยนฺติ, น รญฺโญ มาคธสฺส ปุริสกานํ ปุริสกานํ อาทิยนฺติ. เต โข เต, มาริส, มหาโจรา รญฺโญ มาคธสฺส อวรุทฺธา นาม วุจฺจนฺติ. เอวเมว โข, มาริส, สนฺติ อมนุสฺสา จณฺฑา รุทฺธา รภสา, เต เนว มหาราชานํ อาทิยนฺติ, น มหาราชานํ ปุริสกานํ อาทิยนฺติ, น มหาราชานํ ปุริสกานํ ปุริสกานํ อาทิยนฺติ. เต [Pg.165] โข เต, มาริส, อมนุสฺสา มหาราชานํ อวรุทฺธา นาม วุจฺจนฺติ. โย หิ โกจิ, มาริส, อมนุสฺโส ยกฺโข วา ยกฺขินี วา…เป… คนฺธพฺโพ วา คนฺธพฺพี วา … กุมฺภณฺโฑ วา กุมฺภณฺฑี วา… นาโค วา นาคี วา นาคโปตโก วา นาคโปติกา วา นาคมหามตฺโต วา นาคปาริสชฺโช วา นาคปจาโร วา ปทุฏฺฐจิตฺโต ภิกฺขุํ วา ภิกฺขุนึ วา อุปาสกํ วา อุปาสิกํ วา คจฺฉนฺตํ วา อนุคจฺเฉยฺย, ฐิตํ วา อุปติฏฺเฐยฺย, นิสินฺนํ วา อุปนิสีเทยฺย, นิปนฺนํ วา อุปนิปชฺเชยฺย. อิเมสํ ยกฺขานํ มหายกฺขานํ เสนาปตีนํ มหาเสนาปตีนํ อุชฺฌาเปตพฺพํ วิกฺกนฺทิตพฺพํ วิรวิตพฺพํ – ‘อยํ ยกฺโข คณฺหาติ, อยํ ยกฺโข อาวิสติ, อยํ ยกฺโข เหเฐติ, อยํ ยกฺโข วิเหเฐติ, อยํ ยกฺโข หึสติ, อยํ ยกฺโข วิหึสติ, อยํ ยกฺโข น มุญฺจตี’ติ. “कारण, हे मारिस, काही अमनुष्य अत्यंत क्रूर, हिंसक आणि भयानक असतात. ते महाराज (चार महाराज) यांचे ऐकत नाहीत, महाराजांच्या अधिकाऱ्यांचे ऐकत नाहीत, आणि महाराजांच्या सेवकांचेही ऐकत नाहीत. हे मारिस, अशा अमनुष्यांना महाराजांचे बंडखोर (शत्रू) म्हटले जाते. हे मारिस, ज्याप्रमाणे मगधराज बिंबिसाराच्या राज्यात काही दरोडेखोर (महाचोर) असतात, जे मगधराजाचे ऐकत नाहीत, मगधराजाच्या अधिकाऱ्यांचे ऐकत नाहीत, आणि मगधराजाच्या सेवकांचेही ऐकत नाहीत; हे मारिस, त्या महाचोरांना मगधराजाचे बंडखोर म्हटले जाते. तसेच, हे मारिस, काही अमनुष्य अत्यंत क्रूर, हिंसक आणि भयानक असतात. ते महाराजांचे ऐकत नाहीत, महाराजांच्या अधिकाऱ्यांचे ऐकत नाहीत, आणि महाराजांच्या सेवकांचेही ऐकत नाहीत. हे मारिस, अशा अमनुष्यांना महाराजांचे बंडखोर म्हटले जाते. हे मारिस, जर कोणताही अमनुष्य—यक्ष किंवा यक्षिणी... गंधर्व किंवा गंधर्वी... कुंभांड किंवा कुंभांडी... नाग किंवा नागी, नागपुत्र किंवा नागपुत्री, नाग-महामात्र, नाग-परिषद किंवा नाग-सेवक—दुष्ट बुद्धीने एखाद्या भिक्खू, भिक्खुणी, उपासक किंवा उपासिकेचा, तो चालत असताना पाठलाग करेल, उभा असताना जवळ उभा राहील, बसलेला असताना जवळ बसेल, किंवा झोपलेला असताना जवळ झोपेल; तर या यक्षांच्या, महायक्षांच्या, सेनापतींच्या आणि महासेनापतींच्या नावाने ओरडून, आक्रोश करून, मोठ्याने पुकारून सांगावे की—'हा यक्ष मला पकडत आहे, हा यक्ष माझ्या शरीरात प्रवेश करत आहे, हा यक्ष मला पीडा देत आहे, हा यक्ष माझा छळ करत आहे, हा यक्ष माझी हिंसा करत आहे, हा यक्ष माझी घोर हिंसा करत आहे, हा यक्ष मला सोडत नाही!'” ๒๘๓. ‘‘กตเมสํ ยกฺขานํ มหายกฺขานํ เสนาปตีนํ มหาเสนาปตีนํ? २८३. “ते यक्ष, महायक्ष, सेनापती आणि महासेनापती कोण आहेत?” ‘‘อินฺโท โสโม วรุโณ จ, ภารทฺวาโช ปชาปติ; จนฺทโน กามเสฏฺโฐ จ, กินฺนุฆณฺฑุ นิฆณฺฑุ จ. “इंद्र, सोम, वरुण, भारद्वाज, प्रजापती, चंदन, कामसेठ, किन्नुघंडू आणि निघंडू.” ‘‘ปนาโท โอปมญฺโญ จ, เทวสูโต จ มาตลิ; จิตฺตเสโน จ คนฺธพฺโพ, นโฬ ราชา ชเนสโภ. “पनाद, ओपमण्य, देवांचा दूत मातली, चित्तसेन गंधर्व, नळ राजा आणि जनेषभ.” ‘‘สาตาคิโร เหมวโต, ปุณฺณโก กรติโย คุโฬ; สิวโก มุจลินฺโท จ, เวสฺสามิตฺโต ยุคนฺธโร. “सातागीर, हेमवत, पुण्णक, करतीय, गुळ, शिवक, मुचलिंद आणि वेस्सामित्त (वैश्वामित्र), युगंधर.” ‘‘โคปาโล สุปฺปโรโธ จ, หิริ เนตฺติ จ มนฺทิโย; ปญฺจาลจณฺโฑ อาฬวโก, ปชฺชุนฺโน สุมโน สุมุโข; ทธิมุโข มณิ มาณิวโร ทีโฆ, อโถ เสรีสโก สห. “गोपाल, सुप्परोध, हिरी, नेत्ती, मंदिय, पांचालचंड, आळवक, पज्जुन्न (पर्जन्य), सुमन, सुमुख, दधिमुख, मणी, मणिवर, दीर्घ आणि त्यांच्यासोबत सेरीसक.” ‘‘อิเมสํ ยกฺขานํ มหายกฺขานํ เสนาปตีนํ มหาเสนาปตีนํ อุชฺฌาเปตพฺพํ วิกฺกนฺทิตพฺพํ วิรวิตพฺพํ – ‘อยํ ยกฺโข คณฺหาติ, อยํ ยกฺโข อาวิสติ, อยํ ยกฺโข เหเฐติ, อยํ ยกฺโข วิเหเฐติ, อยํ ยกฺโข หึสติ, อยํ ยกฺโข วิหึสติ, อยํ ยกฺโข น มุญฺจตี’ติ. “या यक्षांच्या, महायक्षांच्या, सेनापतींच्या आणि महासेनापतींच्या नावाने ओरडून, आक्रोश करून, मोठ्याने पुकारून सांगावे की—'हा यक्ष मला पकडत आहे, हा यक्ष माझ्या शरीरात प्रवेश करत आहे, हा यक्ष मला पीडा देत आहे, हा यक्ष माझा छळ करत आहे, हा यक्ष माझी हिंसा करत आहे, हा यक्ष माझी घोर हिंसा करत आहे, हा यक्ष मला सोडत नाही!'” ‘‘อยํ [Pg.166] โข สา, มาริส, อาฏานาฏิยา รกฺขา ภิกฺขูนํ ภิกฺขุนีนํ อุปาสกานํ อุปาสิกานํ คุตฺติยา รกฺขาย อวิหึสาย ผาสุวิหาราย. หนฺท จ ทานิ มยํ, มาริส, คจฺฉาม พหุกิจฺจา มยํ พหุกรณียา’’ติ. ‘‘ยสฺสทานิ ตุมฺเห มหาราชาโน กาลํ มญฺญถา’’ติ. “हे मारिस, हेच ते 'आटानाटिया' संरक्षण आहे, जे भिक्खू, भिक्खुणी, उपासक आणि उपासिका यांच्या रक्षणासाठी, सुरक्षेसाठी, अहिंसेसाठी (पीडा न होण्यासाठी) आणि सुखावह विहारासाठी आहे. आणि आता, हे मारिस, आम्ही निघतो; आम्हाला बरीच कामे आहेत, अनेक कर्तव्ये पार पाडायची आहेत.” (भगवान म्हणाले—) “महाराजांनो, आता तुम्हाला जी योग्य वेळ वाटेल, त्याप्रमाणे तुम्ही करावे.” ๒๘๔. อถ โข จตฺตาโร มหาราชา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายึสุ. เตปิ โข ยกฺขา อุฏฺฐายาสนา อปฺเปกจฺเจ ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายึสุ. อปฺเปกจฺเจ ภควตา สทฺธึ สมฺโมทึสุ, สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายึสุ. อปฺเปกจฺเจ เยน ภควา เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายึสุ. อปฺเปกจฺเจ นามโคตฺตํ สาเวตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายึสุ. อปฺเปกจฺเจ ตุณฺหีภูตา ตตฺเถวนฺตรธายึสูติ. २८४. त्यानंतर ते चारही महाराज आपापल्या आसनांवरून उठले, त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि ते तिथेच अंतर्धान पावले. ते यक्षही आपापल्या आसनांवरून उठले; त्यांपैकी काहींनी भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि ते तिथेच अंतर्धान पावले. काहींनी भगवंतांसोबत आनंददायी संभाषण केले, आणि मैत्रीपूर्ण व संस्मरणीय चर्चा संपवून ते तिथेच अंतर्धान पावले. काहींनी भगवंतांच्या दिशेने हात जोडून नमस्कार केला आणि ते तिथेच अंतर्धान पावले. काहींनी आपले नाव व गोत्र सांगून तिथेच अंतर्धान पावले. तर काही जण शांत राहून तिथेच अंतर्धान पावले. ปฐมภาณวาโร นิฏฺฐิโต. पहिला भाणवार (पठण विभाग) समाप्त झाला. ทุติยภาณวาโร दुसरा भाणवार (पठण विभाग) ๒๘๕. อถ โข ภควา ตสฺสา รตฺติยา อจฺจเยน ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘อิมํ, ภิกฺขเว, รตฺตึ จตฺตาโร มหาราชา มหติยา จ ยกฺขเสนาย มหติยา จ คนฺธพฺพเสนาย มหติยา จ กุมฺภณฺฑเสนาย มหติยา จ นาคเสนาย จตุทฺทิสํ รกฺขํ ฐเปตฺวา จตุทฺทิสํ คุมฺพํ ฐเปตฺวา จตุทฺทิสํ โอวรณํ ฐเปตฺวา อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺณา เกวลกปฺปํ คิชฺฌกูฏํ ปพฺพตํ โอภาเสตฺวา เยนาหํ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เตปิ โข, ภิกฺขเว, ยกฺขา อปฺเปกจฺเจ มํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. อปฺเปกจฺเจ มยา สทฺธึ สมฺโมทึสุ, สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. อปฺเปกจฺเจ เยนาหํ เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. อปฺเปกจฺเจ นามโคตฺตํ สาเวตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. อปฺเปกจฺเจ ตุณฺหีภูตา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. २८५. त्यानंतर, ती रात्र संपल्यावर भगवान भिक्खूंना उद्देशून म्हणाले – "भिक्खूंनो, आज रात्री चार महाराज (चार लोकपाल देव) मोठ्या यक्षसेनेसह, मोठ्या गंधर्वसेनेसह, मोठ्या कुंभांडसेनेसह आणि मोठ्या नागसेनेसह चारही दिशांना रक्षक ठेवून, चारही दिशांना पहारेकरी ठेवून, चारही दिशांना तटबंदी ठेवून, रात्र संपत आली असताना, अत्यंत विलोभनीय कांतीने संपूर्ण गिद्धकूट पर्वत प्रकाशित करून माझ्याकडे आले. जवळ येऊन त्यांनी मला अभिवादन केले आणि ते एका बाजूला बसले. भिक्खूंनो, ते यक्षसुद्धा – काही मला अभिवादन करून एका बाजूला बसले; काही माझ्याशी कुशलक्षेम विचारून, आनंददायी व संस्मरणीय संभाषण करून एका बाजूला बसले; काही मी जेथे होतो त्या दिशेने हात जोडून एका बाजूला बसले; काही आपले नाव व गोत्र सांगून एका बाजूला बसले; तर काही शांत राहून एका बाजूला बसले." ๒๘๖. ‘‘เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข, ภิกฺขเว, เวสฺสวโณ มหาราชา มํ เอตทโวจ – ‘สนฺติ หิ, ภนฺเต, อุฬารา ยกฺขา ภควโต อปฺปสนฺนา…เป… สนฺติ หิ[Pg.167], ภนฺเต นีจา ยกฺขา ภควโต ปสนฺนา. เยภุยฺเยน โข ปน, ภนฺเต, ยกฺขา อปฺปสนฺนาเยว ภควโต. ตํ กิสฺส เหตุ? ภควา หิ, ภนฺเต, ปาณาติปาตา เวรมณิยา ธมฺมํ เทเสติ… สุราเมรยมชฺชปฺปมาทฏฺฐานา เวรมณิยา ธมฺมํ เทเสติ. เยภุยฺเยน โข ปน, ภนฺเต, ยกฺขา อปฺปฏิวิรตาเยว ปาณาติปาตา… อปฺปฏิวิรตา สุราเมรยมชฺชปฺปมาทฏฺฐานา. เตสํ ตํ โหติ อปฺปิยํ อมนาปํ. สนฺติ หิ, ภนฺเต, ภควโต สาวกา อรญฺญวนปตฺถานิ ปนฺตานิ เสนาสนานิ ปฏิเสวนฺติ อปฺปสทฺทานิ อปฺปนิคฺโฆสานิ วิชนวาตานิ มนุสฺสราหสฺเสยฺยกานิ ปฏิสลฺลานสารุปฺปานิ. ตตฺถ สนฺติ อุฬารา ยกฺขา นิวาสิโน, เย อิมสฺมึ ภควโต ปาวจเน อปฺปสนฺนา, เตสํ ปสาทาย อุคฺคณฺหาตุ, ภนฺเต, ภควา อาฏานาฏิยํ รกฺขํ ภิกฺขูนํ ภิกฺขุนีนํ อุปาสกานํ อุปาสิกานํ คุตฺติยา รกฺขาย อวิหึสาย ผาสุวิหารายา’ติ. อธิวาเสสึ โข อหํ, ภิกฺขเว, ตุณฺหีภาเวน. อถ โข, ภิกฺขเว, เวสฺสวโณ มหาราชา เม อธิวาสนํ วิทิตฺวา ตายํ เวลายํ อิมํ อาฏานาฏิยํ รกฺขํ อภาสิ – २८६. "एका बाजूला बसलेला वैश्रवण महाराज मला म्हणाला – 'भंते, भगवंतांच्या धम्मावर श्रद्धा नसलेले (अप्रसन्न) असे मोठे (उच्च दर्जाचे) यक्ष आहेत... पे... भगवंतांवर श्रद्धा असलेले (प्रसन्न) असे कनिष्ठ दर्जाचे यक्ष आहेत. परंतु, भंते, बहुतांश यक्ष भगवंतांवर अप्रसन्नच आहेत. त्याचे कारण काय? कारण, भंते, भगवान प्राणातिपातापासून (जीवहिंसेपासून) विरत राहण्याचा धम्म शिकवतात... सुरा-मेरय-मज्ज-प्रमादस्थानापासून विरत राहण्याचा धम्म शिकवतात. परंतु, भंते, बहुतांश यक्ष प्राणातिपातापासून विरत राहिलेले नाहीत... सुरा-मेरय-मज्ज-प्रमादस्थानापासून विरत राहिलेले नाहीत. त्यांना हा धम्म अप्रिय आणि नापसंत वाटतो. भंते, भगवंतांचे जे श्रावक अरण्यातील निर्जन व शांत अशा वनप्रस्थांमध्ये, मानवी वर्दळ नसलेल्या, एकांतासाठी योग्य अशा शयनासनांचा (निवासस्थानांचा) आश्रय घेतात, तेथे राहणारे मोठे यक्ष आहेत, जे भगवंतांच्या या शासनावर (धम्मावर) अप्रसन्न आहेत. त्यांच्या प्रसन्नतेसाठी, भंते, भगवंतांनी भिक्खू, भिक्खुणी, उपासक आणि उपासिका यांच्या रक्षणासाठी, सुरक्षेसाठी, अहिंसेसाठी आणि सुखावह विहारासाठी 'आटानाटिय' संरक्षणाचा (परित्ताचा) स्वीकार करावा.' भिक्खूंनो, मी शांत राहून संमती दिली. त्यानंतर, भिक्खूंनो, वैश्रवण महाराजांनी माझी संमती जाणून घेऊन त्या वेळी हे 'आटानाटिय' संरक्षण म्हटले –" ๒๘๗. ‘วิปสฺสิสฺส จ นมตฺถุ, จกฺขุมนฺตสฺส สิรีมโต. २८७. "दिव्य चक्षू असलेल्या आणि वैभवशाली अशा विपस्सी बुद्धांना माझे नमन असो." สิขิสฺสปิ จ นมตฺถุ, สพฺพภูตานุกมฺปิโน. "सर्व प्राणिमात्रांवर अनुकंपा करणाऱ्या शिखी बुद्धांनाही माझे नमन असो." ‘เวสฺสภุสฺส จ นมตฺถุ, นฺหาตกสฺส ตปสฺสิโน; นมตฺถุ กกุสนฺธสฺส, มารเสนาปมทฺทิโน. "क्लेश धुवून टाकलेल्या आणि तपस्वी अशा वेस्सभू बुद्धांना माझे नमन असो; मारसेनेचा पराभव करणाऱ्या ककुसंध बुद्धांना माझे नमन असो." ‘โกณาคมนสฺส นมตฺถุ, พฺราหฺมณสฺส วุสีมโต; กสฺสปสฺส จ นมตฺถุ, วิปฺปมุตฺตสฺส สพฺพธิ. "पापांचा त्याग केलेल्या आणि ब्रह्मचर्य पूर्ण केलेल्या कोणागमन बुद्धांना माझे नमन असो; सर्व प्रकारे क्लेशांपासून मुक्त झालेल्या कस्सप बुद्धांना माझे नमन असो." ‘องฺคีรสสฺส นมตฺถุ, สกฺยปุตฺตสฺส สิรีมโต; โย อิมํ ธมฺมํ เทเสสิ, สพฺพทุกฺขาปนูทนํ. "तेजस्वी आणि वैभवशाली अशा शाक्यपुत्र अंगीरसांना (गौतम बुद्धांना) माझे नमन असो, ज्यांनी सर्व दुःखांचे निवारण करणाऱ्या या धम्माचा उपदेश केला." ‘เย จาปิ นิพฺพุตา โลเก, ยถาภูตํ วิปสฺสิสุํ; เต ชนา อปิสุณาถ, มหนฺตา วีตสารทา. "या जगात जे परिनिर्वाण पावले आहेत आणि ज्यांनी सत्याचे यथार्थ दर्शन घेतले आहे, ते चहाडी न करणारे, महान आणि भयमुक्त पुरुष आहेत." ‘หิตํ เทวมนุสฺสานํ, ยํ นมสฺสนฺติ โคตมํ; วิชฺชาจรณสมฺปนฺนํ, มหนฺตํ วีตสารทํ. "देव आणि मानवांचे कल्याण करणाऱ्या, विद्या व चरणाने संपन्न असलेल्या, महान आणि भयमुक्त अशा ज्या गौतम बुद्धांना सर्व जण वंदन करतात (त्यांना माझे नमन असो)." ๒๘๘. ‘ยโต อุคฺคจฺฉติ สูริโย, อาทิจฺโจ มณฺฑลี มหา. २८८. "ज्या दिशेकडून विशाल मंडल असलेला तेजस्वी सूर्य उगवतो," ยสฺส จุคฺคจฺฉมานสฺส, สํวรีปิ นิรุชฺฌติ; ยสฺส จุคฺคเต สูริเย, ‘‘ทิวโส’’ติ ปวุจฺจติ. "ज्याच्या उगवण्याने रात्रीचा अंधार नाहीसा होतो आणि ज्याच्या उगवण्यावर 'दिवस' झाला असे म्हटले जाते," ‘รหโทปิ [Pg.168] ตตฺถ คมฺภีโร, สมุทฺโท สริโตทโก; เอวํ ตํ ตตฺถ ชานนฺติ, ‘‘สมุทฺโท สริโตทโก’’. "तेथे नद्यांच्या पाण्याने भरलेला खोल जलाशय म्हणजेच समुद्र आहे; लोक त्याला 'पाण्याने भरलेला समुद्र' म्हणून ओळखतात." ‘อิโต ‘‘สา ปุริมา ทิสา’’, อิติ นํ อาจิกฺขตี ชโน; ยํ ทิสํ อภิปาเลติ, มหาราชา ยสสฺสิ โส. "येथून ती 'पूर्व दिशा' म्हणून ओळखली जाते; ज्या दिशेचे रक्षण तो कीर्तिमान महाराज करतो," ‘คนฺธพฺพานํ อธิปติ, ‘‘ธตรฏฺโฐ’’ติ นามโส; รมตี นจฺจคีเตหิ, คนฺธพฺเพหิ ปุรกฺขโต. "जो गंधर्वांचा अधिपती असून 'धृतराष्ट्र' (धतरट्ठ) या नावाने ओळखला जातो; तो गंधर्वांनी वेढलेला असून नृत्य आणि संगीतात रममाण होतो." ‘ปุตฺตาปิ ตสฺส พหโว, เอกนามาติ เม สุตํ; อสีติ ทส เอโก จ, อินฺทนามา มหพฺพลา. "त्याला अनेक पुत्र आहेत आणि त्यांचे नाव एकच आहे असे मी ऐकले आहे; ते नव्वद आणि एक (९१) पुत्र असून 'इंद्र' या नावाने ओळखले जातात व अत्यंत बलवान आहेत." ‘เต จาปิ พุทฺธํ ทิสฺวาน, พุทฺธํ อาทิจฺจพนฺธุนํ; ทูรโตว นมสฺสนฺติ, มหนฺตํ วีตสารทํ. "तेसुद्धा सूर्यवंशी, महान आणि भयमुक्त अशा बुद्धांना पाहून दुरूनच वंदन करतात." ‘นโม เต ปุริสาชญฺญ, นโม เต ปุริสุตฺตม; กุสเลน สเมกฺขสิ, อมนุสฺสาปิ ตํ วนฺทนฺติ; สุตํ เนตํ อภิณฺหโส, ตสฺสา เอวํ วเทมเส. "'हे पुरुषश्रेष्ठा, तुम्हाला नमन असो! हे पुरुषोत्तमा, तुम्हाला नमन असो! तुम्ही कुशलतेने (सर्वज्ञतेने) सर्वांकडे पाहता.' अमानुष (यक्ष-देव) देखील तुम्हाला वंदन करतात. आम्ही हे वारंवार ऐकले आहे, म्हणून आम्ही असे म्हणतो:" ‘‘ชินํ วนฺทถ โคตมํ, ชินํ วนฺทาม โคตมํ; วิชฺชาจรณสมฺปนฺนํ, พุทฺธํ วนฺทาม โคตมํ’’. "'विजेत्या गौतम बुद्धांना वंदन करा, आम्ही विजेत्या गौतम बुद्धांना वंदन करतो; विद्या व चरणाने संपन्न असलेल्या गौतम बुद्धांना आम्ही वंदन करतो.'" ๒๘๙. ‘เยน เปตา ปวุจฺจนฺติ, ปิสุณา ปิฏฺฐิมํสิกา. २८९. "ज्या दिशेला प्रेत, चहाडी करणारे, पाठीमागे निंदा करणारे," ปาณาติปาติโน ลุทฺทา, โจรา เนกติกา ชนา. "प्राणघातक शिकारी, चोर आणि कपटी लोक पाठवले जातात (असे म्हटले जाते)," ‘อิโต ‘‘สา ทกฺขิณา ทิสา’’, อิติ นํ อาจิกฺขตี ชโน; ยํ ทิสํ อภิปาเลติ, มหาราชา ยสสฺสิ โส. "येथून ती 'दक्षिण दिशा' म्हणून ओळखली जाते; ज्या दिशेचे रक्षण तो कीर्तिमान महाराज करतो," ‘กุมฺภณฺฑานํ อธิปติ, ‘‘วิรูฬฺโห’’ อิติ นามโส; รมตี นจฺจคีเตหิ, กุมฺภณฺเฑหิ ปุรกฺขโต. "जो कुंभांडांचा अधिपती असून 'विरूढक' (विरूळ्ह) या नावाने ओळखला जातो; तो कुंभांडांनी वेढलेला असून नृत्य आणि संगीतात रममाण होतो." ‘ปุตฺตาปิ ตสฺส พหโว, เอกนามาติ เม สุตํ; อสีติ ทส เอโก จ, อินฺทนามา มหพฺพลา. "त्याला अनेक पुत्र आहेत आणि त्यांचे नाव एकच आहे असे मी ऐकले आहे; ते नव्वद आणि एक (९१) पुत्र असून 'इंद्र' या नावाने ओळखले जातात व अत्यंत बलवान आहेत." ‘เต จาปิ พุทฺธํ ทิสฺวาน, พุทฺธํ อาทิจฺจพนฺธุนํ; ทูรโตว นมสฺสนฺติ, มหนฺตํ วีตสารทํ. "तेसुद्धा सूर्यवंशी, महान आणि भयमुक्त अशा बुद्धांना पाहून दुरूनच वंदन करतात." ‘นโม [Pg.169] เต ปุริสาชญฺญ, นโม เต ปุริสุตฺตม; กุสเลน สเมกฺขสิ, อมนุสฺสาปิ ตํ วนฺทนฺติ; สุตํ เนตํ อภิณฺหโส, ตสฺมา เอวํ วเทมเส. "'हे पुरुषश्रेष्ठा, तुम्हाला नमन असो! हे पुरुषोत्तमा, तुम्हाला नमन असो! तुम्ही कुशलतेने सर्वांकडे पाहता.' अमानुष देखील तुम्हाला वंदन करतात. आम्ही हे वारंवार ऐकले आहे, म्हणून आम्ही असे म्हणतो:" ‘‘ชินํ วนฺทถ โคตมํ, ชินํ วนฺทาม โคตมํ; วิชฺชาจรณสมฺปนฺนํ, พุทฺธํ วนฺทาม โคตมํ’’. "'विजेत्या गौतम बुद्धांना वंदन करा, आम्ही विजेत्या गौतम बुद्धांना वंदन करतो; विद्या व चरणाने संपन्न असलेल्या गौतम बुद्धांना आम्ही वंदन करतो.'" ๒๙๐. ‘ยตฺถ โจคฺคจฺฉติ สูริโย, อาทิจฺโจ มณฺฑลี มหา. २९०. "ज्या दिशेला विशाल मंडल असलेला तेजस्वी सूर्य मावळतो (अस्त पावतो)," ยสฺส โจคฺคจฺฉมานสฺส, ทิวโสปิ นิรุชฺฌติ; ยสฺส โจคฺคเต สูริเย, ‘‘สํวรี’’ติ ปวุจฺจติ. "ज्याच्या मावळण्याने दिवसाचा अंत होतो आणि ज्याच्या मावळण्यावर 'रात्र' झाली असे म्हटले जाते," ‘รหโทปิ ตตฺถ คมฺภีโร, สมุทฺโท สริโตทโก; เอวํ ตํ ตตฺถ ชานนฺติ, สมุทฺโท สริโตทโก. "तेथे नद्यांच्या पाण्याने भरलेला खोल जलाशय म्हणजेच समुद्र आहे; लोक त्याला 'पाण्याने भरलेला समुद्र' म्हणून ओळखतात." ‘อิโต ‘‘สา ปจฺฉิมา ทิสา’’, อิติ นํ อาจิกฺขตี ชโน; ยํ ทิสํ อภิปาเลติ, มหาราชา ยสสฺสิ โส. "येथून ती 'पश्चिम दिशा' म्हणून ओळखली जाते; ज्या दिशेचे रक्षण तो कीर्तिमान महाराज करतो," ‘นาคานญฺจ อธิปติ, ‘‘วิรูปกฺโข’’ติ นามโส; รมตี นจฺจคีเตหิ, นาเคเหว ปุรกฺขโต. "जो नागांचा अधिपती असून 'विरूपाक्ष' (विरूपक्ख) या नावाने ओळखला जातो; तो नागांनी वेढलेला असून नृत्य आणि संगीतात रममाण होतो." ‘ปุตฺตาปิ ตสฺส พหโว, เอกนามาติ เม สุตํ; อสีติ ทส เอโก จ, อินฺทนามา มหพฺพลา. "त्याला अनेक पुत्र आहेत आणि त्यांचे नाव एकच आहे असे मी ऐकले आहे; ते नव्वद आणि एक (९१) पुत्र असून 'इंद्र' या नावाने ओळखले जातात व अत्यंत बलवान आहेत." ‘เต จาปิ พุทฺธํ ทิสฺวาน, พุทฺธํ อาทิจฺจพนฺธุนํ; ทูรโตว นมสฺสนฺติ, มหนฺตํ วีตสารทํ. "तेसुद्धा सूर्यवंशी, महान आणि भयमुक्त अशा बुद्धांना पाहून दुरूनच वंदन करतात." ‘นโม เต ปุริสาชญฺญ, นโม เต ปุริสุตฺตม; กุสเลน สเมกฺขสิ, อมนุสฺสาปิ ตํ วนฺทนฺติ; สุตํ เนตํ อภิณฺหโส, ตสฺมา เอวํ วเทมเส. हे पुरुषश्रेष्ठ (आजानेय पुरुष), आपणास नमस्कार असो! हे पुरुषोत्तम, आपणास नमस्कार असो! आपण आपल्या कुशलतेने (सर्व प्राण्यांकडे) पाहता. अमनुष्य (देव) देखील आपणास वंदन करतात. आम्ही हे वारंवार ऐकले आहे, म्हणूनच आम्ही असे म्हणतो (वंदन करतो). ‘‘ชินํ วนฺทถ โคตมํ, ชินํ วนฺทาม โคตมํ; วิชฺชาจรณสมฺปนฺนํ, พุทฺธํ วนฺทาม โคตมํ’’. ‘तुम्ही त्या जिन (विजेते) गौतम बुद्धांना वंदन करा!’ (असे आम्ही ऐकतो). आम्ही त्या जिन गौतम बुद्धांना वंदन करतो. विद्या आणि चरणाने संपन्न असलेल्या त्या बुद्ध गौतमांना आम्ही वंदन करतो. ๒๙๑. ‘เยน อุตฺตรกุรุวฺโห, มหาเนรุ สุทสฺสโน. २९१. ज्या दिशेला उत्तरकुरु नावाचा द्वीप आहे आणि जेथे सुदर्शन महानेरु (मेरू पर्वत) आहे. มนุสฺสา ตตฺถ ชายนฺติ, อมมา อปริคฺคหา. तेथे जे मनुष्य जन्माला येतात, ते ममत्वरहित (आसक्ती नसलेले) आणि अपरिग्रही (संग्रह न करणारे) असतात. ‘น [Pg.170] เต พีชํ ปวปนฺติ, นาปิ นียนฺติ นงฺคลา; อกฏฺฐปากิมํ สาลึ, ปริภุญฺชนฺติ มานุสา. ते लोक बी पेरणी करत नाहीत आणि नांगरही शेतात नेत नाहीत. न नांगरलेल्या जमिनीत आपोआप पिकणारे शाली तांदूळ ते मनुष्य खातात. ‘อกณํ อถุสํ สุทฺธํ, สุคนฺธํ ตณฺฑุลปฺผลํ; ตุณฺฑิกีเร ปจิตฺวาน, ตโต ภุญฺชนฺติ โภชนํ. कण विरहित, कोंडा नसलेले, शुद्ध आणि सुगंधी असे तांदूळ ते भांड्यात शिजवून, नंतर ते अन्न ग्रहण करतात. ‘คาวึ เอกขุรํ กตฺวา, อนุยนฺติ ทิโสทิสํ; ปสุํ เอกขุรํ กตฺวา, อนุยนฺติ ทิโสทิสํ. ते गाईला एकखूर असलेल्या वाहनासारखे करून वेगवेगळ्या दिशांना प्रवास करतात. इतर पशूंनाही एकखूर असलेल्या वाहनासारखे करून वेगवेगळ्या दिशांना प्रवास करतात. ‘อิตฺถึ วา วาหนํ กตฺวา, อนุยนฺติ ทิโสทิสํ; ปุริสํ วาหนํ กตฺวา, อนุยนฺติ ทิโสทิสํ. ते स्त्रीला वाहन करून वेगवेगळ्या दिशांना प्रवास करतात. पुरुषाला वाहन करून वेगवेगळ्या दिशांना प्रवास करतात. ‘กุมารึ วาหนํ กตฺวา, อนุยนฺติ ทิโสทิสํ; กุมารํ วาหนํ กตฺวา, อนุยนฺติ ทิโสทิสํ. ते कुमारीला वाहन करून वेगवेगळ्या दिशांना प्रवास करतात. कुमाराला वाहन करून वेगवेगळ्या दिशांना प्रवास करतात. ‘เต ยาเน อภิรุหิตฺวา,สพฺพา ทิสา อนุปริยายนฺติ; ปจารา ตสฺส ราชิโน. त्या राजाचे (वेस्सवाणाचे) सेवक त्या वाहनांवर आरूढ होऊन सर्व दिशांना फिरतात. ‘หตฺถิยานํ อสฺสยานํ,ทิพฺพํ ยานํ อุปฏฺฐิตํ; ปาสาทา สิวิกา เจว,มหาราชสฺส ยสสฺสิโน. त्या यशस्वी महाराजासाठी हत्तीचे वाहन, घोड्याचे वाहन आणि दिव्य वाहने उपलब्ध असतात. तसेच प्रासाद (वाडे) आणि पालख्याही उपलब्ध असतात. ‘ตสฺส จ นครา อหุ,อนฺตลิกฺเข สุมาปิตา; อาฏานาฏา กุสินาฏา ปรกุสินาฏา,นาฏสุริยา ปรกุสิฏนาฏา. आणि त्याची अंतरीक्षात (आकाशात) उत्तम प्रकारे निर्माण केलेली नगरे आहेत: आटानाटा, कुसिनाटा, परकुसिनाटा, नाटासुरिया आणि परकुसिटनाटा. ‘อุตฺตเรน กสิวนฺโต,ชโนฆมปเรน จ; นวนวุติโย อมฺพรอมฺพรวติโย,อาฬกมนฺทา นาม ราชธานี. उत्तर दिशेला कसीवंत नगर आहे, पश्चिमेला जनोध नगर आहे. इतर नवनावुतिय, अंबर-अंबरवतिय आणि आळकमंदा नावाची राजधानी आहे. ‘กุเวรสฺส โข ปน, มาริส, มหาราชสฺส วิสาณา นาม ราชธานี; ตสฺมา กุเวโร มหาราชา, ‘‘เวสฺสวโณ’’ติ ปวุจฺจติ. हे महाशय, कुवेर महाराजांची विसाणा नावाची राजधानी आहे. म्हणूनच कुवेर महाराजांना 'वेस्सवण' असे म्हटले जाते. ‘ปจฺเจสนฺโต [Pg.171] ปกาเสนฺติ, ตโตลา ตตฺตลา ตโตตลา; โอชสิ เตชสิ ตโตชสี, สูโร ราชา อริฏฺโฐ เนมิ. जे यक्ष (माहिती) शोधून आणून त्या वेस्सवण महाराजांना सांगतात, ते यक्ष म्हणजे: ततोला, तत्तला, ततोतला, ओजसी, तेजसी, ततोजसी, सूरो, राजा, अरिट्ठो आणि नेमी हे आहेत. ‘รหโทปิ ตตฺถ ธรณี นาม, ยโต เมฆา ปวสฺสนฺติ; วสฺสา ยโต ปตายนฺติ, สภาปิ ตตฺถ สาลวตี นาม. तेथे धरणी नावाचा एक मोठा जलाशय (तलाव) देखील आहे, ज्यातून ढग पाणी घेऊन पाऊस पाडतात. जेथून पावसाचे पाणी वाहून जाते. तेथे सालावती नावाची सभा (मंडप) देखील आहे. ‘ยตฺถ ยกฺขา ปยิรุปาสนฺติ, ตตฺถ นิจฺจผลา รุกฺขา; นานา ทิชคณา ยุตา, มยูรโกญฺจาภิรุทา; โกกิลาทีหิ วคฺคุหิ. ज्या ठिकाणी यक्ष एकत्र येतात, तेथे नेहमी फळांनी बहरलेले वृक्ष असतात. तेथे विविध पक्ष्यांचे थवे असतात, मोर आणि क्रौंच पक्ष्यांचे मधुर आवाज घुमतात आणि कोकिळा इत्यादी पक्षी मधुर कूजन करतात. ‘ชีวญฺชีวกสทฺเทตฺถ, อโถ โอฏฺฐวจิตฺตกา; กุกฺกุฏกา กุฬีรกา, วเน โปกฺขรสาตกา. येथे जीवंजीवक पक्ष्यांचे आवाज ऐकू येतात, तसेच 'उट्ठेहि चित्त' असे ओरडणारे पक्षीही फिरतात. वनात रानकोंबडे, सुवर्ण खेकडे आणि पोक्खरसातक नावाचे पक्षी असतात. ‘สุกสาฬิก สทฺเทตฺถ, ทณฺฑมาณวกานิ จ; โสภติ สพฺพกาลํ สา, กุเวรนฬินี สทา. येथे पोपट आणि साळुंक्यांचे आवाज ऐकू येतात, तसेच मानवी चेहऱ्यासारखे तोंड असलेले पक्षीही असतात. कुवेराची कमळांनी भरलेली ती धरणी नावाची पुष्करिणी (तलाव) नेहमी शोभून दिसते. ‘อิโต ‘‘สา อุตฺตรา ทิสา’’, อิติ นํ อาจิกฺขตี ชโน; ยํ ทิสํ อภิปาเลติ, มหาราชา ยสสฺสิ โส. या स्थानापासून ती 'उत्तर दिशा' आहे असे लोक म्हणतात. ज्या दिशेचे रक्षण तो यशस्वी महाराज करतो. ‘ยกฺขานญฺจ อธิปติ, ‘‘กุเวโร’’ อิติ นามโส; รมตี นจฺจคีเตหิ, ยกฺเขเหว ปุรกฺขโต. आणि यक्षांचा अधिपती, ज्याचे नाव 'कुवेर' आहे, तो यक्षांनी वेढलेला असून नृत्य आणि संगीतामध्ये रममाण होतो. ‘ปุตฺตาปิ ตสฺส พหโว, เอกนามาติ เม สุตํ; อสีติ ทส เอโก จ, อินฺทนามา มหพฺพลา. त्याला अनेक पुत्र आहेत आणि त्यांची नावे सारखीच आहेत असे मी ऐकले आहे. त्यांचे नाव 'इंद्र' असून ते महाबली आहेत, त्यांची संख्या नव्वद आणि एक (९१) आहे. ‘เต จาปิ พุทฺธํ ทิสฺวาน, พุทฺธํ อาทิจฺจพนฺธุนํ; ทูรโตว นมสฺสนฺติ, มหนฺตํ วีตสารทํ. ते देखील बुद्धांना, आदित्यबंधू (सूर्याचे नातेवाईक) असलेल्या बुद्धांना पाहून, जे महान आणि भयमुक्त आहेत, त्यांना दूरवरूनच नमस्कार करतात. ‘นโม เต ปุริสาชญฺญ, นโม เต ปุริสุตฺตม; กุสเลน สเมกฺขสิ, อมนุสฺสาปิ ตํ วนฺทนฺติ; สุตํ เนตํ อภิณฺหโส, ตสฺมา เอวํ วเทมเส. हे-पुरुषश्रेष्ठ (आजानेय पुरुष), आपणास नमस्कार असो! हे-पुरुषोत्तम, आपणास नमस्कार असो! आपण आपल्या कुशलतेने (सर्व प्राण्यांकडे) पाहता. अमनुष्य (देव) देखील आपणास वंदन करतात. आम्ही हे वारंवार ऐकले आहे, म्हणूनच आम्ही असे म्हणतो (वंदन करतो). ‘‘ชินํ วนฺทถ โคตมํ, ชินํ วนฺทาม โคตมํ; วิชฺชาจรณสมฺปนฺนํ, พุทฺธํ วนฺทาม โคตม’’นฺติ. ‘तुम्ही त्या जिन (विजेते) गौतम बुद्धांना वंदन करा!’ (असे आम्ही ऐकतो). आम्ही त्या जिन गौतम बुद्धांना वंदन करतो. विद्या आणि चरणाने संपन्न असलेल्या त्या बुद्ध गौतमांना आम्ही वंदन करतो. ๒๙๒. ‘อยํ โข สา, มาริส, อาฏานาฏิยา รกฺขา ภิกฺขูนํ ภิกฺขุนีนํ อุปาสกานํ อุปาสิกานํ คุตฺติยา รกฺขาย อวิหึสาย ผาสุวิหาราย. ยสฺส กสฺสจิ, มาริส, ภิกฺขุสฺส วา ภิกฺขุนิยา วา อุปาสกสฺส วา อุปาสิกาย [Pg.172] วา อยํ อาฏานาฏิยา รกฺขา สุคฺคหิตา ภวิสฺสติ สมตฺตา ปริยาปุตา ตํ เจ อมนุสฺโส ยกฺโข วา ยกฺขินี วา…เป… คนฺธพฺโพ วา คนฺธพฺพี วา…เป… กุมฺภณฺโฑ วา กุมฺภณฺฑี วา…เป… นาโค วา นาคี วา นาคโปตโก วา นาคโปติกา วา นาคมหามตฺโต วา นาคปาริสชฺโช วา นาคปจาโร วา, ปทุฏฺฐจิตฺโต ภิกฺขุํ วา ภิกฺขุนึ วา อุปาสกํ วา อุปาสิกํ วา คจฺฉนฺตํ วา อนุคจฺเฉยฺย, ฐิตํ วา อุปติฏฺเฐยฺย, นิสินฺนํ วา อุปนิสีเทยฺย, นิปนฺนํ วา อุปนิปชฺเชยฺย. น เม โส, มาริส, อมนุสฺโส ลเภยฺย คาเมสุ วา นิคเมสุ วา สกฺการํ วา ครุการํ วา. น เม โส, มาริส, อมนุสฺโส ลเภยฺย อาฬกมนฺทาย นาม ราชธานิยา วตฺถุํ วา วาสํ วา. น เม โส, มาริส, อมนุสฺโส ลเภยฺย ยกฺขานํ สมิตึ คนฺตุํ. อปิสฺสุ นํ, มาริส, อมนุสฺสา อนาวยฺหมฺปิ นํ กเรยฺยุํ อวิวยฺหํ. อปิสฺสุ นํ, มาริส, อมนุสฺสา อตฺตาหิ ปริปุณฺณาหิ ปริภาสาหิ ปริภาเสยฺยุํ. อปิสฺสุ นํ, มาริส, อมนุสฺสา ริตฺตํปิสฺส ปตฺตํ สีเส นิกฺกุชฺเชยฺยุํ. อปิสฺสุ นํ, มาริส, อมนุสฺสา สตฺตธาปิสฺส มุทฺธํ ผาเลยฺยุํ. สนฺติ หิ, มาริส, อมนุสฺสา จณฺฑา รุทฺธา รภสา, เต เนว มหาราชานํ อาทิยนฺติ, น มหาราชานํ ปุริสกานํ อาทิยนฺติ, น มหาราชานํ ปุริสกานํ ปุริสกานํ อาทิยนฺติ. เต โข เต, มาริส, อมนุสฺสา มหาราชานํ อวรุทฺธา นาม วุจฺจนฺติ. เสยฺยถาปิ, มาริส, รญฺโญ มาคธสฺส วิชิเต มหาโจรา. เต เนว รญฺโญ มาคธสฺส อาทิยนฺติ, น รญฺโญ มาคธสฺส ปุริสกานํ อาทิยนฺติ, น รญฺโญ มาคธสฺส ปุริสกานํ ปุริสกานํ อาทิยนฺติ. เต โข เต, มาริส, มหาโจรา รญฺโญ มาคธสฺส อวรุทฺธา นาม วุจฺจนฺติ. เอวเมว โข, มาริส, สนฺติ อมนุสฺสา จณฺฑา รุทฺธา รภสา, เต เนว มหาราชานํ อาทิยนฺติ, น มหาราชานํ ปุริสกานํ อาทิยนฺติ, น มหาราชานํ ปุริสกานํ ปุริสกานํ อาทิยนฺติ. เต โข เต, มาริส, อมนุสฺสา มหาราชานํ อวรุทฺธา นาม วุจฺจนฺติ. โย หิ โกจิ, มาริส, อมนุสฺโส ยกฺโข วา ยกฺขินี วา…เป… คนฺธพฺโพ วา คนฺธพฺพี วา…เป… กุมฺภณฺโฑ วา กุมฺภณฺฑี วา…เป… นาโค วา นาคี วา…เป… ปทุฏฺฐจิตฺโต ภิกฺขุํ วา ภิกฺขุนึ วา อุปาสกํ วา อุปาสิกํ วา คจฺฉนฺตํ วา อุปคจฺเฉยฺย, ฐิตํ วา อุปติฏฺเฐยฺย, นิสินฺนํ วา อุปนิสีเทยฺย, นิปนฺนํ วา อุปนิปชฺเชยฺย. อิเมสํ ยกฺขานํ มหายกฺขานํ เสนาปตีนํ มหาเสนาปตีนํ อุชฺฌาเปตพฺพํ วิกฺกนฺทิตพฺพํ วิรวิตพฺพํ – ‘อยํ ยกฺโข คณฺหาติ, อยํ ยกฺโข อาวิสติ, อยํ ยกฺโข [Pg.173] เหเฐติ, อยํ ยกฺโข วิเหเฐติ, อยํ ยกฺโข หึสติ, อยํ ยกฺโข วิหึสติ, อยํ ยกฺโข น มุญฺจตี’ติ. २९२. “हे मारिष (प्रिय महोदय), हे आटानाटिया संरक्षण भिक्खू, भिक्खुनी, उपासक आणि उपासिका यांच्या रक्षणासाठी, सुरक्षेसाठी, अहिंसेसाठी आणि सुखावह विहारासाठी आहे. हे मारिष, ज्या कोणा भिक्खूने, भिक्खुनीने, उपासकाने किंवा उपासिकेने हे आटानाटिया संरक्षण चांगल्या प्रकारे ग्रहण केले असेल, पूर्ण केले असेल आणि आत्मसात केले असेल; आणि जर एखादा दुष्ट बुद्धीचा अमनुष्य—यक्ख किंवा यक्खिनी असो...पे... गंधब्ब किंवा गंधब्बी असो...पे... कुंभंड किंवा कुंभंडी असो...पे... नाग किंवा नागी असो, नागपुत्र असो, नागकन्या असो, नागाचा महामात्य असो, नागाचा सभासद असो किंवा नागाचा सेवक असो—त्या चालणाऱ्या भिक्खू, भिक्खुनी, उपासक किंवा उपासिकेच्या मागे जात असेल, किंवा उभे असताना जवळ उभा राहत असेल, किंवा बसलेले असताना जवळ बसत असेल, किंवा झोपलेले असताना जवळ झोपत असेल; तर हे मारिष, त्या अमनुष्याला गावांमध्ये किंवा नगरांमध्ये सत्कार किंवा आदर मिळणार नाही. हे मारिष, त्या अमनुष्याला आलकमंदा नावाच्या राजधानीत राहण्यासाठी जागा किंवा निवास मिळणार नाही. हे मारिष, त्या अमनुष्याला यक्खांच्या सभेत जाण्याची परवानगी मिळणार नाही. इतकेच नव्हे तर, हे मारिष, इतर अमनुष्य त्याच्याशी विवाहसंबंध जोडणार नाहीत (मुलगी देणार नाहीत किंवा घेणार नाहीत). हे मारिष, इतर अमनुष्य त्याला अत्यंत कठोर शब्दांत शिवीगाळ करतील. हे मारिष, इतर अमनुष्य त्याच्या डोक्यावर रिकामे पात्र पालथे घालतील. हे मारिष, इतर अमनुष्य त्याच्या डोक्याचे सात तुकडे करतील. कारण, हे मारिष, काही अमनुष्य क्रूर, उग्र आणि हिंसक असतात; ते महाराजांचे (चार लोकपालांचे) ऐकत नाहीत, महाराजांच्या सेवकांचे ऐकत नाहीत, आणि महाराजांच्या सेवकांच्या सेवकांचेही ऐकत नाहीत. हे मारिष, अशा अमनुष्यांना महाराजांचे बंडखोर (अवरुद्ध) म्हटले जाते. हे मारिष, ज्याप्रमाणे मगध राजाच्या राज्यात मोठे दरोडेखोर असतात, जे मगध राजाचे ऐकत नाहीत, मगध राजाच्या सेवकांचे ऐकत नाहीत, आणि मगध राजाच्या सेवकांच्या सेवकांचेही ऐकत नाहीत; हे मारिष, त्या मोठ्या दरोडेखोरांना मगध राजाचे बंडखोर म्हटले जाते. त्याचप्रमाणे, हे मारिष, काही अमनुष्य क्रूर, उग्र आणि हिंसक असतात; ते महाराजांचे ऐकत नाहीत, महाराजांच्या सेवकांचे ऐकत नाहीत, आणि महाराजांच्या सेवकांच्या सेवकांचेही ऐकत नाहीत. हे मारिष, अशा अमनुष्यांना महाराजांचे बंडखोर म्हटले जाते. हे मारिष, जर कोणताही दुष्ट बुद्धीचा अमनुष्य—यक्ख किंवा यक्खिनी असो...पे... गंधब्ब किंवा गंधब्बी असो...पे... कुंभंड किंवा कुंभंडी असो...पे... नाग किंवा नागी असो...पे... चालणाऱ्या भिक्खू, भिक्खुनी, उपासक किंवा उपासिकेच्या जवळ जात असेल, या उभे असताना जवळ उभा राहत असेल, किंवा बसलेले असताना जवळ बसत असेल, किंवा झोपलेले असताना जवळ झोपत असेल; तर या यक्खांच्या, महायक्खांच्या, सेनापतींच्या आणि महासेनापतींच्या जवळ तक्रार केली पाहिजे, आक्रोश केला पाहिजे, ओरडून सांगितले पाहिजे की—'हा यक्ख पकडत आहे, हा यक्ख शरीरात प्रवेश करत आहे, हा यक्ख छळत आहे, हा यक्ख अत्यंत छळत आहे, हा यक्ख हिंसा करत आहे, हा यक्ख अत्यंत हिंसा करत आहे, हा यक्ख सोडत नाही!'” ๒๙๓. ‘กตเมสํ ยกฺขานํ มหายกฺขานํ เสนาปตีนํ มหาเสนาปตีนํ? २९३. “कोणत्या यक्खांकडे, महायक्खांकडे, सेनापतींकडे आणि महासेनापतींकडे तक्रार केली पाहिजे?” ‘อินฺโท โสโม วรุโณ จ, ภารทฺวาโช ปชาปติ; จนฺทโน กามเสฏฺโฐ จ, กินฺนุฆณฺฑุ นิฆณฺฑุ จ. “इंद्र, सोम, वरुण, भारद्वाज, प्रजापती, चंदन, कामसेठ, किन्नुघंडू आणि निघंडू.” ‘ปนาโท โอปมญฺโญ จ, เทวสูโต จ มาตลิ; จิตฺตเสโน จ คนฺธพฺโพ, นโฬ ราชา ชเนสโภ. “पनाद, ओपमञ्ञ (औपमन्य), देवांचा दूत मातली, चित्तसेन गंधब्ब, नळ राजा आणि जनेसब (जनेश्वर).” ‘สาตาคิโร เหวมโต, ปุณฺณโก กรติโย คุโฬ; สิวโก มุจลินฺโท จ, เวสฺสามิตฺโต ยุคนฺธโร. “सातागीर, हेमावत, पुण्णक, करतीय, गुळ, शिवक, मुचलिंद, वेस्सामित्त (विश्वामित्र) आणि युगंधर.” ‘โคปาโล สุปฺปโรโธ จ, หิริ เนตฺติ จ มนฺทิโย; ปญฺจาลจณฺโฑ อาฬวโก, ปชฺชุนฺโน สุมโน สุมุโข; ทธิมุโข มณิ มาณิวโร ทีโฆ, อโถ เสรีสโก สห. “गोपाल, सुप्परोध, हिरी, नेत्ती, मंदिय, पंचालचंड, आळवक, पज्जुन्न, सुमन, सुमुख, दधिमुख, मणी, माणिवर, दीघ आणि त्यांच्यासोबत सेरीसक.” ‘อิเมสํ ยกฺขานํ มหายกฺขานํ เสนาปตีนํ มหาเสนาปตีนํ อุชฺฌาเปตพฺพํ วิกฺกนฺทิตพฺพํ วิรวิตพฺพํ – ‘‘อยํ ยกฺโข คณฺหาติ, อยํ ยกฺโข อาวิสติ, อยํ ยกฺโข เหเฐติ, อยํ ยกฺโข วิเหเฐติ, อยํ ยกฺโข หึสติ, อยํ ยกฺโข วิหึสติ, อยํ ยกฺโข น มุญฺจตี’’ติ. อยํ โข, มาริส, อาฏานาฏิยา รกฺขา ภิกฺขูนํ ภิกฺขุนีนํ อุปาสกานํ อุปาสิกานํ คุตฺติยา รกฺขาย อวิหึสาย ผาสุวิหาราย. หนฺท จ ทานิ มยํ, มาริส, คจฺฉาม, พหุกิจฺจา มยํ พหุกรณียา’’’ติ. ‘‘‘ยสฺส ทานิ ตุมฺเห มหาราชาโน กาลํ มญฺญถา’’’ติ. “या यक्खांकडे, महायक्खांकडे, सेनापतींकडे आणि महासेनापतींकडे तक्रार केली पाहिजे, आक्रोश केला पाहिजे, ओरडून सांगितले पाहिजे की—'हा यक्ख पकडत आहे, हा यक्ख शरीरात प्रवेश करत आहे, हा यक्ख छळत आहे, हा यक्ख अत्यंत छळत आहे, हा यक्ख हिंसा करत आहे, हा यक्ख अत्यंत हिंसा करत आहे, हा यक्ख सोडत नाही!' हे मारिष, हे आटानाटिया संरक्षण भिक्खू, भिक्खुनी, उपासक आणि उपासिका यांच्या रक्षणासाठी, सुरक्षेसाठी, अहिंसेसाठी आणि सुखावह विहारासाठी आहे. आता, हे मारिष, आम्ही निघतो. आम्हाला पुष्कळ कामे आहेत, पुष्कळ कर्तव्ये आहेत.” (भगवान म्हणाले—) “महाराजांनो, आता तुम्हाला जी योग्य वेळ वाटेल ती करा (तुम्ही जाऊ शकता).” ๒๙๔. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, จตฺตาโร มหาราชา อุฏฺฐายาสนา มํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายึสุ. เตปิ โข, ภิกฺขเว, ยกฺขา อุฏฺฐายาสนา อปฺเปกจฺเจ มํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายึสุ. อปฺเปกจฺเจ มยา สทฺธึ สมฺโมทึสุ, สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายึสุ. อปฺเปกจฺเจ เยนาหํ เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายึสุ. อปฺเปกจฺเจ นามโคตฺตํ [Pg.174] สาเวตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายึสุ. อปฺเปกจฺเจ ตุณฺหีภูตา ตตฺเถวนฺตรธายึสุ. २९४. “त्यानंतर, भिक्खूंनो, ते चार महाराज आपापल्या आसनांवरून उठले, त्यांनी मला अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि तेथेच अंतर्धान पावले. भिक्खूंनो, ते यक्ख देखील आपापल्या आसनांवरून उठले; त्यांपैकी काहींनी मला अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि तेथेच अंतर्धान पावले. काहींनी माझ्याशी आनंददायी संभाषण केले, आनंददायी व संस्मरणीय गोष्टींची देवाणघेवाण करून ते तेथेच अंतर्धान पावले. काहींनी मी ज्या ठिकाणी होतो त्या दिशेने हात जोडून नमस्कार केला आणि ते तेथेच अंतर्धान पावले. काहींनी आपले नाव व गोत्र सांगून तेथेच अंतर्धान पावले. तर काही जण शांत राहून तेथेच अंतर्धान पावले.” ๒๙๕. ‘‘อุคฺคณฺหาถ, ภิกฺขเว, อาฏานาฏิยํ รกฺขํ. ปริยาปุณาถ, ภิกฺขเว, อาฏานาฏิยํ รกฺขํ. ธาเรถ, ภิกฺขเว, อาฏานาฏิยํ รกฺขํ. อตฺถสํหิตา, ภิกฺขเว, อาฏานาฏิยา รกฺขา ภิกฺขูนํ ภิกฺขุนีนํ อุปาสกานํ อุปาสิกานํ คุตฺติยา รกฺขาย อวิหึสาย ผาสุวิหารายา’’ติ. อิทมโวจ ภควา. อตฺตมนา เต ภิกฺขู ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทุนฺติ. २९५. “भिक्खूंनो, आटानाटिया संरक्षणाचे ग्रहण करा. भिक्खूंनो, आटानाटिया संरक्षणाचा सराव करा. भिक्खूंनो, आटानाटिया संरक्षण स्मरणात ठेवा. भिक्खूंनो, आटानाटिया संरक्षण हे हितकारक आहे; ते भिक्खू, भिक्खुनी, उपासक आणि उपासिका यांच्या रक्षणासाठी, सुरक्षेसाठी, अहिंसेसाठी आणि सुखावह विहारासाठी कारणीभूत ठरते.” भगवान असे म्हणाले. ते भिक्खू आनंदी झाले आणि त्यांनी भगवंतांच्या भाषणाचा मनापासून स्वीकार केला. อาฏานาฏิยสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ นวมํ. नववे आटानाटिय सुत्त समाप्त झाले. ๑๐. สงฺคีติสุตฺตํ १०. संगीति सुत्त ๒๙๖. เอวํ [Pg.175] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา มลฺเลสุ จาริกํ จรมาโน มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ ปญฺจมตฺเตหิ ภิกฺขุสเตหิ เยน ปาวา นาม มลฺลานํ นครํ ตทวสริ. ตตฺร สุทํ ภควา ปาวายํ วิหรติ จุนฺทสฺส กมฺมารปุตฺตสฺส อมฺพวเน. २९६. असे मी ऐकले आहे—एकदा भगवान मल्लांच्या देशात चारिका (धर्मयात्रा) करत असताना, सुमारे पाचशे भिक्खूंच्या मोठ्या भिक्खूसंघासह मल्लांचे 'पावा' नावाचे जे नगर होते, तेथे पोहोचले. तेथे भगवान पावा नगरामध्ये चुंद नावाच्या लोहाराच्या आंबराईत (आम्रवनात) राहत होते. อุพฺภตกนวสนฺธาคารํ उब्भटक नावाचे नवीन सभागृह ๒๙๗. เตน โข ปน สมเยน ปาเวยฺยกานํ มลฺลานํ อุพฺภตกํ นาม นวํ สนฺธาคารํ อจิรการิตํ โหติ อนชฺฌาวุฏฺฐํ สมเณน วา พฺราหฺมเณน วา เกนจิ วา มนุสฺสภูเตน. อสฺโสสุํ โข ปาเวยฺยกา มลฺลา – ‘‘ภควา กิร มลฺเลสุ จาริกํ จรมาโน มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ ปญฺจมตฺเตหิ ภิกฺขุสเตหิ ปาวํ อนุปฺปตฺโต ปาวายํ วิหรติ จุนฺทสฺส กมฺมารปุตฺตสฺส อมฺพวเน’’ติ. อถ โข ปาเวยฺยกา มลฺลา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข ปาเวยฺยกา มลฺลา ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘อิธ, ภนฺเต, ปาเวยฺยกานํ มลฺลานํ อุพฺภตกํ นาม นวํ สนฺธาคารํ อจิรการิตํ โหติ อนชฺฌาวุฏฺฐํ สมเณน วา พฺราหฺมเณน วา เกนจิ วา มนุสฺสภูเตน. ตญฺจ โข, ภนฺเต, ภควา ปฐมํ ปริภุญฺชตุ, ภควตา ปฐมํ ปริภุตฺตํ ปจฺฉา ปาเวยฺยกา มลฺลา ปริภุญฺชิสฺสนฺติ. ตทสฺส ปาเวยฺยกานํ มลฺลานํ ทีฆรตฺตํ หิตาย สุขายา’’ติ. อธิวาเสสิ โข ภควา ตุณฺหีภาเวน. २९७. त्या वेळी पावा येथील मल्लांचे 'उब्भटक' नावाचे एक नवीन सभागृह नुकतेच बांधून पूर्ण झाले होते. तिथे अद्याप कोणत्याही श्रमणाने, ब्राह्मणाने किंवा इतर कोणत्याही मनुष्याने वास्तव्य केले नव्हते. पावा येथील मल्लांनी ऐकले की, 'भगवान मल्ल देशात चारिका करत पाचशे भिक्खूंच्या मोठ्या भिक्खू संघासह पावा येथे आले असून ते सुवर्णकारपुत्र चुंदाच्या आम्रवनात राहत आहेत.' तेव्हा पावा येथील मल्ल जेथे भगवान होते तेथे गेले. तेथे जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या पावा येथील मल्लांनी भगवंतांना असे म्हटले – 'भंते, येथे पावा येथील मल्लांचे 'उब्भटक' नावाचे नवीन सभागृह नुकतेच बांधून पूर्ण झाले आहे, ज्यामध्ये अद्याप कोणत्याही श्रमणाने, ब्राह्मणाने किंवा इतर कोणत्याही मनुष्याने वास्तव्य केलेले नाही. भंते, भगवंतांनी सर्वप्रथम त्याचा वापर करावा. भगवंतांनी सर्वप्रथम वापर केल्यानंतर, पावा येथील मल्ल त्याचा वापर करतील. ते पावा येथील मल्लांच्या दीर्घकालीन हितासाठी आणि सुखासाठी होईल.' भगवंतांनी मौन बाळगून संमती दिली. ๒๙๘. อถ โข ปาเวยฺยกา มลฺลา ภควโต อธิวาสนํ วิทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา เยน สนฺธาคารํ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา สพฺพสนฺถรึ สนฺธาคารํ สนฺถริตฺวา ภควโต อาสนานิ ปญฺญาเปตฺวา อุทกมณิกํ ปติฏฺฐเปตฺวา เตลปทีปํ อาโรเปตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐํสุ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข เต ปาเวยฺยกา มลฺลา ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘สพฺพสนฺถริสนฺถตํ, ภนฺเต, สนฺธาคารํ, ภควโต อาสนานิ [Pg.176] ปญฺญตฺตานิ, อุทกมณิโก ปติฏฺฐาปิโต, เตลปทีโป อาโรปิโต. ยสฺสทานิ, ภนฺเต, ภควา กาลํ มญฺญตี’’ติ. २९८. त्यानंतर पावा येथील मल्लांनी भगवंतांची संमती जाणून घेतली आणि ते आपापल्या आसनांवरून उठले. त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि जेथे ते सभागृह होते तेथे गेले. तेथे जाऊन त्यांनी संपूर्ण सभागृहात चटया पसरवल्या, भगवंतांसाठी आसने मांडली, पाण्याचा घडा ठेवला आणि तेलाचा दिवा लावला. त्यानंतर ते पुन्हा जेथे भगवान होते तेथे आले. तेथे येऊन त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि ते एका बाजूला उभे राहिले. एका बाजूला उभे राहिलेल्या त्या पावा येथील मल्लांनी भगवंतांना असे म्हटले – 'भंते, सभागृहात सर्वत्र चटया पसरवल्या आहेत, भगवंतांसाठी आसने मांडली आहेत, पाण्याचा घडा ठेवला आहे आणि तेलाचा दिवा लावला आहे. भंते, आता भगवंतांना जसा योग्य वेळ वाटेल तसे करावे.' ๒๙๙. อถ โข ภควา นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สทฺธึ ภิกฺขุสงฺเฆน เยน สนฺธาคารํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปาเท ปกฺขาเลตฺวา สนฺธาคารํ ปวิสิตฺวา มชฺฌิมํ ถมฺภํ นิสฺสาย ปุรตฺถาภิมุโข นิสีทิ. ภิกฺขุสงฺโฆปิ โข ปาเท ปกฺขาเลตฺวา สนฺธาคารํ ปวิสิตฺวา ปจฺฉิมํ ภิตฺตึ นิสฺสาย ปุรตฺถาภิมุโข นิสีทิ ภควนฺตํเยว ปุรกฺขตฺวา. ปาเวยฺยกาปิ โข มลฺลา ปาเท ปกฺขาเลตฺวา สนฺธาคารํ ปวิสิตฺวา ปุรตฺถิมํ ภิตฺตึ นิสฺสาย ปจฺฉิมาภิมุขา นิสีทึสุ ภควนฺตํเยว ปุรกฺขตฺวา. อถ โข ภควา ปาเวยฺยเก มลฺเล พหุเทว รตฺตึ ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสตฺวา สมาทเปตฺวา สมุตฺเตเชตฺวา สมฺปหํเสตฺวา อุยฺโยเชสิ – ‘‘อภิกฺกนฺตา โข, วาเสฏฺฐา, รตฺติ. ยสฺสทานิ ตุมฺเห กาลํ มญฺญถา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข ปาเวยฺยกา มลฺลา ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกมึสุ. २९९. त्यानंतर भगवंतांनी वस्त्रे परिधान केली, पात्र व चीवर घेतले आणि भिक्खू संघासह ते सभागृहाकडे गेले. तेथे जाऊन त्यांनी आपले पाय धुतले, सभागृहात प्रवेश केला आणि मध्यवर्ती खांबाला टेकून पूर्वेकडे तोंड करून ते बसले. भिक्खू संघानेही आपले पाय धुतले, सभागृहात प्रवेश केला आणि पश्चिमेकडील भिंतीला टेकून, भगवंतांना समोर ठेवून पूर्वेकडे तोंड करून ते बसले. पावा येथील मल्लांनीही आपले पाय धुतले, सभागृहात प्रवेश केला आणि पूर्वेकडील भिंतीला टेकून, भगवंतांना समोर ठेवून पश्चिमेकडे तोंड करून ते बसले. त्यानंतर भगवंतांनी पावा येथील मल्लांना रात्रीच्या बऱ्याच वेळेपर्यंत धम्मकथेने उपदेश केला, त्यांना धम्मात प्रवृत्त केले, त्यांना उत्साहित केले आणि आनंदित केले. त्यानंतर त्यांनी त्यांना निरोप देत म्हटले – 'वासेठ्ठहो! रात्र बरीच उलटून गेली आहे. आता तुम्हाला जसा योग्य वेळ वाटेल तसे करावे.' पावा येथील मल्लांनी 'तसेच असो, भंते' असे म्हणून भगवंतांच्या शब्दांचा स्वीकार केला. ते आपापल्या आसनांवरून उठले, त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि ते निघून गेले. ๓๐๐. อถ โข ภควา อจิรปกฺกนฺเตสุ ปาเวยฺยเกสุ มลฺเลสุ ตุณฺหีภูตํ ตุณฺหีภูตํ ภิกฺขุสํฆํ อนุวิโลเกตฺวา อายสฺมนฺตํ สาริปุตฺตํ อามนฺเตสิ – ‘‘วิคตถินมิทฺโธ โข, สาริปุตฺต, ภิกฺขุสงฺโฆ. ปฏิภาตุ ตํ, สาริปุตฺต, ภิกฺขูนํ ธมฺมีกถา. ปิฏฺฐิ เม อาคิลายติ. ตมหํ อายมิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา สาริปุตฺโต ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. อถ โข ภควา จตุคฺคุณํ สงฺฆาฏึ ปญฺญเปตฺวา ทกฺขิเณน ปสฺเสน สีหเสยฺยํ กปฺเปสิ ปาเท ปาทํ อจฺจาธาย, สโต สมฺปชาโน อุฏฺฐานสญฺญํ มนสิ กริตฺวา. ३००. त्यानंतर पावा येथील मल्ल निघून गेल्यावर काही वेळातच, भगवंतांनी शांत बसलेल्या भिक्खू संघाकडे पाहिले आणि आयुष्यमान सारिपुत्तांना संबोधित केले – 'सारिपुत्ता, भिक्खू संघ आळस आणि डुलकी (थीन-मिद्ध) यांपासून मुक्त आहे. सारिपुत्ता, तू भिक्खूंना धम्मकथा सांग. माझी पाठ दुखत आहे, मी जरा पाठ टेकवतो.' आयुष्यमान सारिपुत्तांनी 'तसेच असो, भंते' असे म्हणून भगवंतांच्या शब्दांचा स्वीकार केला. त्यानंतर भगवंतांनी आपल्या संघाटीची चार पदरी घडी घालून ती पसरवली आणि उजव्या कुशीवर सिंहशयन केले – एका पायावर दुसरा पाय ठेवून, स्मृती व संप्रजन्य (जागरूकता) जागृत ठेवून आणि उठण्याची वेळ मनात निश्चित करून. ภินฺนนิคณฺฐวตฺถุ भिन्न्-निगंठ-वत्थु (निगंठांच्या फुटीचे प्रकरण) ๓๐๑. เตน โข ปน สมเยน นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต ปาวายํ อธุนากาลงฺกโต โหติ. ตสฺส กาลงฺกิริยาย ภินฺนา นิคณฺฐา ทฺเวธิกชาตา ภณฺฑนชาตา กลหชาตา วิวาทาปนฺนา อญฺญมญฺญํ [Pg.177] มุขสตฺตีหิ วิตุทนฺตา วิหรนฺติ – ‘‘น ตฺวํ อิมํ ธมฺมวินยํ อาชานาสิ, อหํ อิมํ ธมฺมวินยํ อาชานามิ, กึ ตฺวํ อิมํ ธมฺมวินยํ อาชานิสฺสสิ! มิจฺฉาปฏิปนฺโน ตฺวมสิ, อหมสฺมิ สมฺมาปฏิปนฺโน. สหิตํ เม, อสหิตํ เต. ปุเรวจนียํ ปจฺฉา อวจ, ปจฺฉาวจนียํ ปุเร อวจ. อธิจิณฺณํ เต วิปราวตฺตํ, อาโรปิโต เต วาโท, นิคฺคหิโต ตฺวมสิ, จร วาทปฺปโมกฺขาย, นิพฺเพเฐหิ วา สเจ ปโหสี’’ติ. วโธเยว โข มญฺเญ นิคณฺเฐสุ นาฏปุตฺติเยสุ วตฺตติ. เยปิ นิคณฺฐสฺส นาฏปุตฺตสฺส สาวกา คิหี โอทาตวสนา, เตปิ นิคณฺเฐสุ นาฏปุตฺติเยสุ นิพฺพินฺนรูปา วิรตฺตรูปา ปฏิวานรูปา, ยถา ตํ ทุรกฺขาเต ธมฺมวินเย ทุปฺปเวทิเต อนิยฺยานิเก อนุปสมสํวตฺตนิเก อสมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิเต ภินฺนถูเป อปฺปฏิสรเณ. ३०१. त्या वेळी निगंठ नातपुत्त पावा येथे नुकतेच मरण पावले होते. त्यांच्या मृत्यूनंतर निगंठ दुभंगले, त्यांचे दोन गट पडले, ते आपापसात भांडू लागले, कलह करू लागले, वादात पडले आणि एकमेकांवर वाक्-बाणांनी प्रहार करू लागले – 'तुला हा धम्म-विनय समजत नाही, मला हा धम्म-विनय समजतो. तुला हा धम्म-विनय काय समजणार! तू चुकीच्या मार्गाने चालणारा आहेस, मी योग्य मार्गाने चालणारा आहे. माझे बोलणे सुसंगत आहे, तुझे बोलणे विसंगत आहे. जे आधी बोलायला हवे होते ते तू नंतर बोललास आणि जे नंतर बोलायला हवे होते ते तू आधी बोललास. तुझा अभ्यास चुकीचा ठरला आहे, तुझ्या सिद्धांतात दोष दाखवला गेला आहे, तू पराभूत झाला आहेस. आता स्वतःचा बचाव करण्यासाठी मार्ग शोध किंवा शक्य असेल तर उत्तर दे!' नातपुत्ताच्या निगंठ शिष्यांमध्ये जणू काही एकमेकांचा संहारच सुरू होता. निगंठ नातपुत्ताचे जे पांढरे वस्त्र परिधान करणारे गृहस्थ अनुयायी होते, तेसुद्धा निगंठ नातपुत्ताच्या शिष्यांबद्दल अत्यंत विरक्त, उदासीन आणि विन्मुख झाले होते. कारण तो धम्म-विनय वाईट रीतीने सांगितलेला, अयोग्य रीतीने प्रतिपादन केलेला, संसारातून मुक्त न करणारा, क्लेशांच्या शमनास कारणीभूत न ठरणारा, सम्यक संबुद्धाने न सांगितलेला, आधार नष्ट झालेला आणि आश्रय नसलेला असा होता. ๓๐๒. อถ โข อายสฺมา สาริปุตฺโต ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘นิคณฺโฐ, อาวุโส, นาฏปุตฺโต ปาวายํ อธุนากาลงฺกโต, ตสฺส กาลงฺกิริยาย ภินฺนา นิคณฺฐา ทฺเวธิกชาตา…เป… ภินฺนถูเป อปฺปฏิสรเณ’’. ‘‘เอวญฺเหตํ, อาวุโส, โหติ ทุรกฺขาเต ธมฺมวินเย ทุปฺปเวทิเต อนิยฺยานิเก อนุปสมสํวตฺตนิเก อสมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิเต. อยํ โข ปนาวุโส อมฺหากํ ภควตา ธมฺโม สฺวากฺขาโต สุปฺปเวทิโต นิยฺยานิโก อุปสมสํวตฺตนิโก สมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิโต. ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ, น วิวทิตพฺพํ, ยถยิทํ พฺรหฺมจริยํ อทฺธนิยํ อสฺส จิรฏฺฐิติกํ, ตทสฺส พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. ३०२. त्यानंतर आयुष्यमान सारिपुत्तांनी भिक्खूंना संबोधित केले – 'आवुसो, निगंठ नातपुत्त पावा येथे नुकतेच मरण पावले आहेत. त्यांच्या मृत्यूनंतर निगंठ दुभंगले आहेत, त्यांचे दोन गट पडले आहेत... (तसेच)... आधार नष्ट झालेला आणि आश्रय नसलेला असा तो धम्म-विनय आहे. आवुसो, वाईट रीतीने सांगितलेल्या, अयोग्य रीतीने प्रतिपादन केलेल्या, संसारातून मुक्त न करणाऱ्या, क्लेशांच्या शमनास कारणीभूत न ठरणाऱ्या आणि सम्यक संबुद्धाने न सांगितलेल्या धम्म-विनयामध्ये असेच घडते. परंतु, आवुसो, आपल्या भगवंतांनी धम्माचे उत्तम रीतीने आख्यान (सुव्याख्यात) केले आहे, तो चांगल्या प्रकारे प्रतिपादन केला आहे, तो संसारातून मुक्त करणारा, क्लेशांचे शमन करणारा आणि सम्यक संबुद्धाने प्रकाशित केलेला आहे. म्हणून आपण सर्वांनी मिळून या धम्माचे संगायन (एकत्र पठण) केले पाहिजे, आपापसात वाद घालता कामा नये; जेणेकरून हे ब्रह्मचर्य दीर्घकाळ टिकेल आणि चिरस्थायी होईल. ते बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेसाठी आणि देव-मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी व सुखासाठी ठरेल.' ‘‘กตโม จาวุโส, อมฺหากํ ภควตา ธมฺโม สฺวากฺขาโต สุปฺปเวทิโต นิยฺยานิโก อุปสมสํวตฺตนิโก สมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิโต; ยตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ, น วิวทิตพฺพํ, ยถยิทํ พฺรหฺมจริยํ อทฺธนิยํ อสฺส จิรฏฺฐิติกํ, ตทสฺส พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ? “मित्रांनो, आपल्या भगवंतांनी चांगल्या प्रकारे उपदेशिलेला, सुस्पष्टपणे प्रवेदित केलेला, (संसारातून) मुक्त करणारा, क्लेश शांत करणारा आणि सम्यक संबुद्धांनी प्रवेदित केलेला तो धर्म कोणता आहे; ज्यामध्ये आपण सर्वांनी एकत्र येऊन संगायन केले पाहिजे, वाद घालता कामा नये, जेणेकरून हे ब्रह्मचर्य दीर्घकाळ टिकणारे आणि चिरस्थायी होईल, आणि ते बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेसाठी, तसेच देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी व सुखासाठी ठरेल?” เอกกํ “एकक (एक-एक धर्मांचा गट)” ๓๐๓. ‘‘อตฺถิ [Pg.178] โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน เอโก ธมฺโม สมฺมทกฺขาโต. ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ, น วิวทิตพฺพํ, ยถยิทํ พฺรหฺมจริยํ อทฺธนิยํ อสฺส จิรฏฺฐิติกํ, ตทสฺส พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. กตโม เอโก ธมฺโม? สพฺเพ สตฺตา อาหารฏฺฐิติกา. สพฺเพ สตฺตา สงฺขารฏฺฐิติกา. อยํ โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน เอโก ธมฺโม สมฺมทกฺขาโต. ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ, น วิวทิตพฺพํ, ยถยิทํ พฺรหฺมจริยํ อทฺธนิยํ อสฺส จิรฏฺฐิติกํ, ตทสฺส พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. ३०३. “मित्रांनो, जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत आणि सम्यक संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी चांगल्या प्रकारे उपदेशिलेला एक धर्म आहे. त्यामध्ये आपण सर्वांनी एकत्र येऊन संगायन केले पाहिजे, वाद घालता कामा नये, जेणेकरून हे ब्रह्मचर्य दीर्घकाळ टिकणारे आणि चिरस्थायी होईल, आणि ते बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेसाठी, तसेच देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी व सुखासाठी ठरेल. तो एक धर्म कोणता? ‘सर्व प्राणी आहाराच्या आधारे टिकून आहेत.’ ‘सर्व प्राणी संस्कारांच्या आधारे टिकून आहेत.’ मित्रांनो, जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत आणि सम्यक संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी चांगल्या प्रकारे उपदेशिलेला हाच तो एक धर्म आहे. त्यामध्ये आपण सर्वांनी एकत्र येऊन संगायन केले पाहिजे, वाद घालता कामा नये, जेणेकरून हे ब्रह्मचर्य दीर्घकाळ टिकणारे आणि चिरस्थायी होईल, आणि ते बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेसाठी, तसेच देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी व सुखासाठी ठरेल.” ทุกํ “दुक (दोन-दोन धर्मांचे गट)” ๓๐๔. ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน ทฺเว ธมฺมา สมฺมทกฺขาตา. ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ, น วิวทิตพฺพํ, ยถยิทํ พฺรหฺมจริยํ อทฺธนิยํ อสฺส จิรฏฺฐิติกํ, ตทสฺส พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. กตเม ทฺเว ? ३०४. “मित्रांनो, जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत आणि सम्यक संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी चांगल्या प्रकारे उपदेशिलेले दोन धर्म आहेत. त्यामध्ये आपण सर्वांनी एकत्र येऊन संगायन केले पाहिजे, वाद घालता कामा नये, जेणेकरून हे ब्रह्मचर्य दीर्घकाळ टिकणारे आणि चिरस्थायी होईल, आणि ते बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेसाठी, तसेच देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी व सुखासाठी ठरेल. ते दोन कोणते?” ‘‘นามญฺจ รูปญฺจ. “नाम आणि रूप.” ‘‘อวิชฺชา จ ภวตณฺหา จ. “अविद्या (अज्ञान) आणि भवतण्हा (अस्तित्वाची तृष्णा).” ‘‘ภวทิฏฺฐิ จ วิภวทิฏฺฐิ จ. “भवदृष्टी (शाश्वतवादाची दृष्टी) आणि विभवदृष्टी (उच्छेदवादाची दृष्टी).” ‘‘อหิริกญฺจ อโนตฺตปฺปญฺจ. “अहिरिक (पापाची लाज न वाटणे) आणि अनोत्तप्प (पापाची भीती न वाटणे).” ‘‘หิรี จ โอตฺตปฺปญฺจ. “हिरी (पापाची लाज वाटणे) आणि ओत्तप्प (पापाची भीती वाटणे).” ‘‘โทวจสฺสตา จ ปาปมิตฺตตา จ. “दुर्वचता (उद्धटपणा) आणि पापमित्रता (वाईट मित्रांची संगत).” ‘‘โสวจสฺสตา จ กลฺยาณมิตฺตตา จ. “सुवचता (नम्रता) आणि कल्याणमित्रता (चांगल्या मित्रांची संगत).” ‘‘อาปตฺติกุสลตา จ อาปตฺติวุฏฺฐานกุสลตา จ. “आपत्ती-कुशलता (नियमांच्या उल्लंघनाचे ज्ञान असणे) आणि आपत्ती-वुत्थान-कुशलता (त्या उल्लंघनातून मुक्त होण्याच्या पद्धतीचे ज्ञान असणे).” ‘‘สมาปตฺติกุสลตา จ สมาปตฺติวุฏฺฐานกุสลตา จ. “समापत्ती-कुशलता (ध्यानात प्रवेश करण्याचे कौशल्य) आणि समापत्ती-वुत्थान-कुशलता (ध्यानातून बाहेर पडण्याचे कौशल्य).” ‘‘ธาตุกุสลตา [Pg.179] จ มนสิการกุสลตา จ. “धातू-कुशलता (अठरा धातूंचे ज्ञान असणे) आणि मनसिकार-कुशलता (त्यांच्यावर योग्य प्रकारे मनन करण्याचे कौशल्य).” ‘‘อายตนกุสลตา จ ปฏิจฺจสมุปฺปาทกุสลตา จ. “आयतन-कुशलता (बारा आयतनांचे ज्ञान असणे) आणि पटिच्चसमुत्पाद-कुशलता (प्रतीत्यसमुत्पादाचे ज्ञान असणे).” ‘‘ฐานกุสลตา จ อฏฺฐานกุสลตา จ. “स्थान-कुशलता (काय शक्य आहे याचे ज्ञान) आणि अस्थान-कुशलता (काय अशक्य आहे याचे ज्ञान).” ‘‘อชฺชวญฺจ ลชฺชวญฺจ. “आर्जव (सरळपणा) आणि लाघव (नम्रता).” ‘‘ขนฺติ จ โสรจฺจญฺจ. “क्षमा (सहनशीलता) आणि सौजन्य (मृदु स्वभाव).” ‘‘สาขลฺยญฺจ ปฏิสนฺถาโร จ. “मधुर भाषण आणि प्रतिसंथार (आदरातिथ्य).” ‘‘อวิหึสา จ โสเจยฺยญฺจ. “अहिंसा (अविहिंसा) आणि शुचिता (शुद्धता).” ‘‘มุฏฺฐสฺสจฺจญฺจ อสมฺปชญฺญญฺจ. “स्मृतीचा अभाव (असावधपणा) आणि संप्रजन्याचा अभाव (अस्पष्ट जाणीव).” ‘‘สติ จ สมฺปชญฺญญฺจ. “स्मृती (सती) आणि संप्रजन्य (स्पष्ट जाणीव).” ‘‘อินฺทฺริเยสุ อคุตฺตทฺวารตา จ โภชเน อมตฺตญฺญุตา จ. “इंद्रियांचे दरवाजे असंयत ठेवणे आणि भोजनात प्रमाणाचे भान न ठेवणे.” ‘‘อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวารตา จ โภชเน มตฺตญฺญุตา จ. “इंद्रियांचे दरवाजे संयत ठेवणे आणि भोजनात प्रमाणाचे भान ठेवणे.” ‘‘ปฏิสงฺขานพลญฺจ ภาวนาพลญฺจ. “प्रतिसंख्यान-बल (चिंतन करण्याचे बल) आणि भावना-बल (ध्यान-साधनेचे बल).” ‘‘สติพลญฺจ สมาธิพลญฺจ. “स्मृती-बल (सती-बल) आणि समाधी-बल.” ‘‘สมโถ จ วิปสฺสนา จ. “शमथ आणि विपश्यना.” ‘‘สมถนิมิตฺตญฺจ ปคฺคหนิมิตฺตญฺจ. “शमथ-निमित्त (चित्त शांत करण्याचे निमित्त) आणि प्रग्रह-निमित्त (प्रयत्नाचे निमित्त).” ‘‘ปคฺคโห จ อวิกฺเขโป จ. “प्रग्रह (प्रयत्न) आणि अविक्षेप (चित्ताची स्थिरता).” ‘‘สีลวิปตฺติ จ ทิฏฺฐิวิปตฺติ จ. “शील-विपत्ती (शीलाचा ऱ्हास) आणि दृष्टी-विपत्ती (दृष्टीचा ऱ्हास).” ‘‘สีลสมฺปทา จ ทิฏฺฐิสมฺปทา จ. “शील-संपदा (शीलाची समृद्धी) आणि दृष्टी-संपदा (दृष्टीची समृद्धी).” ‘‘สีลวิสุทฺธิ จ ทิฏฺฐิวิสุทฺธิ จ. “शील-विशुद्धी आणि दृष्टी-विशुद्धी.” ‘‘ทิฏฺฐิวิสุทฺธิ โข ปน ยถา ทิฏฺฐิสฺส จ ปธานํ. “दृष्टी-विशुद्धी आणि त्या दृष्टीनुसार योग्य प्रयत्न (प्रधान).” ‘‘สํเวโค จ สํเวชนีเยสุ ฐาเนสุ สํวิคฺคสฺส จ โยนิโส ปธานํ. “संवेग निर्माण करणाऱ्या प्रसंगी संवेग (गंभीरता) वाटणे आणि संवेग प्राप्त झालेल्या व्यक्तीचा योग्य दिशेने प्रयत्न (प्रधान).” ‘‘อสนฺตุฏฺฐิตา จ กุสเลสุ ธมฺเมสุ อปฺปฏิวานิตา จ ปธานสฺมึ. “कुशल धर्मांच्या बाबतीत असंतुष्टता (तृप्त न होणे) आणि प्रयत्नांमध्ये माघार न घेणे.” ‘‘วิชฺชา [Pg.180] จ วิมุตฺติ จ. “विद्या आणि विमुक्ती.” ‘‘ขเยญาณํ อนุปฺปาเทญาณํ. “क्षय-ज्ञान (क्लेशांच्या क्षयाचे ज्ञान) आणि अनुत्पाद-ज्ञान (क्लेश पुन्हा उत्पन्न न होण्याचे ज्ञान).” ‘‘อิเม โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน ทฺเว ธมฺมา สมฺมทกฺขาตา. ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ, น วิวทิตพฺพํ, ยถยิทํ พฺรหฺมจริยํ อทฺธนิยํ อสฺส จิรฏฺฐิติกํ, ตทสฺส พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. “मित्रांनो, जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत आणि सम्यक संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी चांगल्या प्रकारे उपदेशिलेले हे दोन धर्म आहेत. त्यामध्ये आपण सर्वांनी एकत्र येऊन संगायन केले पाहिजे, वाद घालता कामा नये, जेणेकरून हे ब्रह्मचर्य दीर्घकाळ टिकणारे आणि चिरस्थायी होईल, आणि ते बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेसाठी, तसेच देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी व सुखासाठी ठरेल.” ติกํ “त्रिक (तीन-तीन धर्मांचे गट)” ๓๐๕. ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน ตโย ธมฺมา สมฺมทกฺขาตา. ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ…เป… อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. กตเม ตโย? ३०५. “आवुसो (मित्रांनो), त्या जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत आणि सम्यक्संबुद्ध भगवंतांनी तीन धर्मांचे उत्तम प्रकारे प्रकटन (उपदेश) केले आहे. त्यामध्ये सर्वांनी मिळून संगायन (एकत्र पठण) केले पाहिजे... जेणेकरून ते देव आणि मनुष्यांच्या हितासाठी, कल्याणासाठी आणि सुखासाठी होईल. ते तीन कोणते?” ‘‘ตีณิ อกุสลมูลานิ – โลโภ อกุสลมูลํ, โทโส อกุสลมูลํ, โมโห อกุสลมูลํ. “तीन अकुशल मुळे – लोभ हे अकुशल मूळ, द्वेष (दोस) हे अकुशल मूळ, आणि मोह हे अकुशल मूळ.” ‘‘ตีณิ กุสลมูลานิ – อโลโภ กุสลมูลํ, อโทโส กุสลมูลํ, อโมโห กุสลมูลํ. “तीन कुशल मुळे – अलोभ हे कुशल मूळ, अद्वेष (अदोस) हे कुशल मूळ, आणि अमोह हे कुशल मूळ.” ‘‘ตีณิ ทุจฺจริตานิ – กายทุจฺจริตํ, วจีทุจฺจริตํ, มโนทุจฺจริตํ. “तीन दुश्चरिते (वाईट आचरण) – काय-दुश्चरित (शारीरिक वाईट आचरण), वची-दुश्चरित (वाचिक वाईट आचरण), आणि मनो-दुश्चरित (मानसिक वाईट आचरण).” ‘‘ตีณิ สุจริตานิ – กายสุจริตํ, วจีสุจริตํ, มโนสุจริตํ. “तीन सुचरिते (चांगले आचरण) – काय-सुचरित (शारीरिक चांगले आचरण), वची-सुचरित (वाचिक चांगले आचरण), आणि मनो-सुचरित (मानसिक चांगले आचरण).” ‘‘ตโย อกุสลวิตกฺกา – กามวิตกฺโก, พฺยาปาทวิตกฺโก, วิหึสาวิตกฺโก. “तीन अकुशल वितर्क (वाईट विचार) – काम-वितर्क (इंद्रियभोगांचे विचार), व्यापाद-वितर्क (द्वेषाचे विचार), आणि विहिंसा-वितर्क (हिंसेचे विचार).” ‘‘ตโย กุสลวิตกฺกา – เนกฺขมฺมวิตกฺโก, อพฺยาปาทวิตกฺโก, อวิหึสาวิตกฺโก. “तीन कुशल वितर्क (चांगले विचार) – नैष्क्रम्य-वितर्क (त्यागाचे विचार), अव्यापाद-वितर्क (अद्वेषाचे विचार), आणि अविहिंसा-वितर्क (अहिंसेचे विचार).” ‘‘ตโย อกุสลสงฺกปฺปา – กามสงฺกปฺโป, พฺยาปาทสงฺกปฺโป, วิหึสาสงฺกปฺโป. “तीन अकुशल संकल्प – काम-संकल्प, व्यापाद-संकल्प, आणि विहिंसा-संकल्प.” ‘‘ตโย กุสลสงฺกปฺปา – เนกฺขมฺมสงฺกปฺโป, อพฺยาปาทสงฺกปฺโป, อวิหึสาสงฺกปฺโป. “तीन कुशल संकल्प – नैष्क्रम्य-संकल्प, अव्यापाद-संकल्प, आणि अविहिंसा-संकल्प.” ‘‘ติสฺโส [Pg.181] อกุสลสญฺญา – กามสญฺญา, พฺยาปาทสญฺญา, วิหึสาสญฺญา. “तीन अकुशल संज्ञा (वाईट धारणा) – काम-संज्ञा, व्यापाद-संज्ञा, आणि विहिंसा-संज्ञा.” ‘‘ติสฺโส กุสลสญฺญา – เนกฺขมฺมสญฺญา, อพฺยาปาทสญฺญา, อวิหึสาสญฺญา. “तीन कुशल संज्ञा (चांगल्या धारणा) – नैष्क्रम्य-संज्ञा, अव्यापाद-संज्ञा, आणि अविहिंसा-संज्ञा.” ‘‘ติสฺโส อกุสลธาตุโย – กามธาตุ, พฺยาปาทธาตุ, วิหึสาธาตุ. “तीन अकुशल धातू – काम-धातू, व्यापाद-धातू, आणि विहिंसा-धातू.” ‘‘ติสฺโส กุสลธาตุโย – เนกฺขมฺมธาตุ, อพฺยาปาทธาตุ, อวิหึสาธาตุ. “तीन कुशल धातू – नैष्क्रम्य-धातू, अव्यापाद-धातू, आणि अविहिंसा-धातू.” ‘‘อปราปิ ติสฺโส ธาตุโย – กามธาตุ, รูปธาตุ, อรูปธาตุ. “इतर तीन धातू – काम-धातू, रूप-धातू, आणि अरूप-धातू.” ‘‘อปราปิ ติสฺโส ธาตุโย – รูปธาตุ, อรูปธาตุ, นิโรธธาตุ. “इतर तीन धातू – रूप-धातू, अरूप-धातू, आणि निरोध-धातू.” ‘‘อปราปิ ติสฺโส ธาตุโย – หีนธาตุ, มชฺฌิมธาตุ, ปณีตธาตุ. “इतर तीन धातू – हीन धातू (कनिष्ठ), मध्यम धातू, आणि प्रणीत धातू (उत्कृष्ट).” ‘‘ติสฺโส ตณฺหา – กามตณฺหา, ภวตณฺหา, วิภวตณฺหา. “तीन तृष्णा (तण्हा) – काम-तृष्णा, भव-तृष्णा, आणि विभव-तृष्णा.” ‘‘อปราปิ ติสฺโส ตณฺหา – กามตณฺหา, รูปตณฺหา, อรูปตณฺหา. “इतर तीन तृष्णा – काम-तृष्णा, रूप-तृष्णा, आणि अरूप-तृष्णा.” ‘‘อปราปิ ติสฺโส ตณฺหา – รูปตณฺหา, อรูปตณฺหา, นิโรธตณฺหา. “इतर तीन तृष्णा – रूप-तृष्णा, अरूप-तृष्णा, आणि निरोध-तृष्णा.” ‘‘ตีณิ สํโยชนานิ – สกฺกายทิฏฺฐิ, วิจิกิจฺฉา, สีลพฺพตปรามาโส. “तीन संयोजने (बंधने) – सत्काय-दृष्टी (सक्कायदिठ्ठि), विचिकित्सा (शंका/संदेह), आणि शीलव्रत-परामर्श (सीलब्बतपरामासो).” ‘‘ตโย อาสวา – กามาสโว, ภวาสโว, อวิชฺชาสโว. “तीन आसव – कामासव, भवासव, आणि अविद्यासव.” ‘‘ตโย ภวา – กามภโว, รูปภโว, อรูปภโว. “तीन भव – काम-भव, रूप-भव, आणि अरूप-भव.” ‘‘ติสฺโส เอสนา – กาเมสนา, ภเวสนา, พฺรหฺมจริเยสนา. “तीन एषणा (शोध/इच्छा) – काम-एषणा, भव-एषणा, आणि ब्रह्मचर्य-एषणा.” ‘‘ติสฺโส วิธา – เสยฺโยหมสฺมีติ วิธา, สทิโสหมสฺมีติ วิธา, หีโนหมสฺมีติ วิธา. “तीन प्रकारचे मान (अभिमान) – 'मी श्रेष्ठ आहे' असा मान (सेय्योहमस्मीति विधा), 'मी समान आहे' असा मान (सदिसोहमस्मीति विधा), आणि 'मी कनिष्ठ आहे' असा मान (हीनोहमस्मीति विधा).” ‘‘ตโย อทฺธา – อตีโต อทฺธา, อนาคโต อทฺธา, ปจฺจุปฺปนฺโน อทฺธา. “तीन काळ (अध्व) – भूतकाळ (अतीतो अद्धा), भविष्यकाळ (अनागतो अद्धा), आणि वर्तमानकाळ (पच्चुप्पन्नो अद्धा).” ‘‘ตโย อนฺตา – สกฺกาโย อนฺโต, สกฺกายสมุทโย อนฺโต, สกฺกายนิโรโธ อนฺโต. “तीन अंत (सीमा/भाग) – सत्काय हा अंत, सत्काय-समुदय हा अंत, आणि सत्काय-निरोध हा अंत.” ‘‘ติสฺโส เวทนา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา. “तीन वेदना – सुखद वेदना, दुःखद वेदना, आणि अदुःख-असुखद (उपेक्षित/तटस्थ) वेदना.” ‘‘ติสฺโส ทุกฺขตา – ทุกฺขทุกฺขตา, สงฺขารทุกฺขตา, วิปริณามทุกฺขตา. “तीन प्रकारची दुःखता – दुःख-दुःखता, संस्कार-दुःखता, आणि विपरिणाम-दुःखता.” ‘‘ตโย ราสี [Pg.182] – มิจฺฉตฺตนิยโต ราสิ, สมฺมตฺตนิยโต ราสิ, อนิยโต ราสิ. “तीन राशी (समूह) – मिथ्यात्वाने नियत (निश्चित) झालेली राशी, सम्यक्त्वाने नियत झालेली राशी, आणि अनियत (अनिश्चित) राशी.” ‘‘ตโย ตมา – อตีตํ วา อทฺธานํ อารพฺภ กงฺขติ วิจิกิจฺฉติ นาธิมุจฺจติ น สมฺปสีทติ, อนาคตํ วา อทฺธานํ อารพฺภ กงฺขติ วิจิกิจฺฉติ นาธิมุจฺจติ น สมฺปสีทติ, เอตรหิ วา ปจฺจุปฺปนฺนํ อทฺธานํ อารพฺภ กงฺขติ วิจิกิจฺฉติ นาธิมุจฺจติ น สมฺปสีทติ. “तीन अंधकार (संभ्रम/शंका) – भूतकाळाविषयी शंका घेतो, संभ्रमात पडतो, निश्चय करू शकत नाही आणि प्रसन्न (स्थिर) होत नाही; भविष्यकाळाविषयी शंका घेतो, संभ्रमात पडतो, निश्चय करू शकत नाही आणि प्रसन्न होत नाही; किंवा सध्याच्या वर्तमानकाळाविषयी शंका घेतो, संभ्रमात पडतो, निश्चय करू शकत नाही आणि प्रसन्न होत नाही.” ‘‘ตีณิ ตถาคตสฺส อรกฺเขยฺยานิ – ปริสุทฺธกายสมาจาโร อาวุโส ตถาคโต, นตฺถิ ตถาคตสฺส กายทุจฺจริตํ, ยํ ตถาคโต รกฺเขยฺย – ‘มา เม อิทํ ปโร อญฺญาสี’ติ. ปริสุทฺธวจีสมาจาโร อาวุโส, ตถาคโต, นตฺถิ ตถาคตสฺส วจีทุจฺจริตํ, ยํ ตถาคโต รกฺเขยฺย – ‘มา เม อิทํ ปโร อญฺญาสี’ติ. ปริสุทฺธมโนสมาจาโร, อาวุโส, ตถาคโต, นตฺถิ ตถาคตสฺส มโนทุจฺจริตํ ยํ ตถาคโต รกฺเขยฺย – ‘มา เม อิทํ ปโร อญฺญาสี’ติ. “तथागतांच्या बाबतीत रक्षण न करावे लागणाऱ्या (लपवावे न लागणाऱ्या) तीन गोष्टी – आवुसो, तथागत हे अत्यंत शुद्ध शारीरिक आचरण असणारे आहेत. तथागतांचे असे कोणतेही शारीरिक दुश्चरित (वाईट आचरण) नसते, ज्याचे त्यांनी रक्षण करावे (लपवावे) की 'माझे हे कृत्य दुसऱ्या कोणाला समजू नये'. आवुसो, तथागत हे अत्यंत शुद्ध वाचिक आचरण असणारे आहेत. तथागतांचे असे कोणतेही वाचिक दुश्चरित नसते, ज्याचे त्यांनी रक्षण करावे की 'माझे हे कृत्य दुसऱ्या कोणाला समजू नये'. आवुसो, तथागत हे अत्यंत शुद्ध मानसिक आचरण असणारे आहेत. तथागतांचे असे कोणतेही मानसिक दुश्चरित नसते, ज्याचे त्यांनी रक्षण करावे की 'माझे हे कृत्य दुसऱ्या कोणाला समजू नये'.” ‘‘ตโย กิญฺจนา – ราโค กิญฺจนํ, โทโส กิญฺจนํ, โมโห กิญฺจนํ. “तीन किंचन (अडथळे/मळ) – राग (आसक्ती) हे किंचन, द्वेष हे किंचन, आणि मोह हे किंचन.” ‘‘ตโย อคฺคี – ราคคฺคิ, โทสคฺคิ, โมหคฺคิ. “तीन अग्नी – रागाग्नी (आसक्तीचा अग्नी), द्वेषाग्नी, आणि मोहाग्नी.” ‘‘อปเรปิ ตโย อคฺคี – อาหุเนยฺยคฺคิ, คหปตคฺคิ, ทกฺขิเณยฺยคฺคิ. “इतर तीन अग्नी – आहुनेय्य-अग्नी (माता-पिता रूपी पूजनीय अग्नी), गृहपती-अग्नी (कुटुंबप्रमुख/पती रूपी अग्नी), आणि दक्षिणेय्य-अग्नी (दान स्वीकारण्यास पात्र असणारे श्रमण-ब्राह्मण रूपी अग्नी).” ‘‘ติวิเธน รูปสงฺคโห – สนิทสฺสนสปฺปฏิฆํ รูปํ, อนิทสฺสนสปฺปฏิฆํ รูปํ, อนิทสฺสนอปฺปฏิฆํ รูปํ. “तीन प्रकारे रूपाचा संग्रह (वर्गीकरण) होतो – सनिदर्शन-सप्रतिघ रूप (दिसणारे आणि अडथळा निर्माण करणारे), अनिदर्शन-सप्रतिघ रूप (न दिसणारे पण अडथळा निर्माण करणारे), आणि अनिदर्शन-अप्रतिघ रूप (न दिसणारे आणि अडथळा निर्माण न करणारे).” ‘‘ตโย สงฺขารา – ปุญฺญาภิสงฺขาโร, อปุญฺญาภิสงฺขาโร, อาเนญฺชาภิสงฺขาโร. “तीन संस्कार (अभिसंस्कार) – पुण्याभिसंस्कार, अपुण्याभिसंस्कार, आणि आनेञ्जाभिसंस्कार (अचल/स्थिर संस्कार).” ‘‘ตโย ปุคฺคลา – เสกฺโข ปุคฺคโล, อเสกฺโข ปุคฺคโล, เนวเสกฺโขนาเสกฺโข ปุคฺคโล. “तीन पुद्गल (व्यक्ती) – शैक्ष पुद्गल (शिकणारा), अशैक्ष पुद्गल (पूर्णत्व प्राप्त झालेला/अर्हत), आणि नैवशैक्ष-नाशैक्ष पुद्गल (जो शैक्षही नाही आणि अशैक्षही नाही, म्हणजेच सामान्य पृथग्जन).” ‘‘ตโย เถรา – ชาติเถโร, ธมฺมเถโร, สมฺมุติเถโร. “तीन थेर (स्थवीर/ज्येष्ठ) – जाती-थेर (वयाने ज्येष्ठ), धम्म-थेर (गुणांनी ज्येष्ठ), आणि संमूर्ती-थेर (लोकमान्यतेने ज्येष्ठ).” ‘‘ตีณิ ปุญฺญกิริยวตฺถูนิ – ทานมยํ ปุญฺญกิริยวตฺถุ, สีลมยํ ปุญฺญกิริยวตฺถุ, ภาวนามยํ ปุญฺญกิริยวตฺถุ. “तीन पुण्यक्रियावस्तू (पुण्य कर्मांचे आधार) – दानमय पुण्यक्रियावस्तू, शीलमय पुण्यक्रियावस्तू, आणि भावनामय पुण्यक्रियावस्तू.” ‘‘ตีณิ โจทนาวตฺถูนิ – ทิฏฺเฐน, สุเตน, ปริสงฺกาย. “तीन चोदनावस्तू (दोषारोप करण्याचे आधार) – पाहिलेल्या गोष्टीवरून (दृष्टाने), ऐकलेल्या गोष्टीवरून (श्रुताने), आणि संशयावरून (परिशंकेने).” ‘‘ติสฺโส [Pg.183] กามูปปตฺติโย – สนฺตาวุโส สตฺตา ปจฺจุปฏฺฐิตกามา, เต ปจฺจุปฏฺฐิเตสุ กาเมสุ วสํ วตฺเตนฺติ, เสยฺยถาปิ มนุสฺสา เอกจฺเจ จ เทวา เอกจฺเจ จ วินิปาติกา. อยํ ปฐมา กามูปปตฺติ. สนฺตาวุโส, สตฺตา นิมฺมิตกามา, เต นิมฺมินิตฺวา นิมฺมินิตฺวา กาเมสุ วสํ วตฺเตนฺติ, เสยฺยถาปิ เทวา นิมฺมานรตี. อยํ ทุติยา กามูปปตฺติ. สนฺตาวุโส สตฺตา ปรนิมฺมิตกามา, เต ปรนิมฺมิเตสุ กาเมสุ วสํ วตฺเตนฺติ, เสยฺยถาปิ เทวา ปรนิมฺมิตวสวตฺตี. อยํ ตติยา กามูปปตฺติ. तीन काम-उत्पत्ती (कामभोगाच्या प्राप्ती) आहेत – हे आवुसो (बंधूंनो), असे काही प्राणी आहेत जे उपस्थित असलेल्या कामभोगांचा उपभोग घेतात आणि त्या उपस्थित कामभोगांवर आपले नियंत्रण ठेवतात; जसे की मनुष्य, काही देव आणि काही विनिपातिक (नरक किंवा दुर्गतीमधील प्राणी). ही पहिली काम-उत्पत्ती होय. हे आवुसो, असे काही प्राणी आहेत जे स्वतः निर्माण केलेल्या कामभोगांचा उपभोग घेतात; ते वारंवार (नवीन कामभोग) निर्माण करून त्या कामभोगांवर आपले नियंत्रण ठेवतात; जसे की 'निम्माणरती' (निर्माण करण्यात रमणारे) देव. ही दुसरी काम-उत्पत्ती होय. हे आवुसो, असे काही प्राणी आहेत जे इतरांनी निर्माण केलेल्या कामभोगांचा उपभोग घेतात; ते इतरांनी निर्माण केलेल्या कामभोगांवर आपले नियंत्रण ठेवतात; जसे की 'परनिम्मितवसवत्ती' (इतरांनी निर्माण केलेल्या भोगांवर नियंत्रण ठेवणारे) देव. ही तिसरी काम-उत्पत्ती होय. ‘‘ติสฺโส สุขูปปตฺติโย – สนฺตาวุโส สตฺตา อุปฺปาเทตฺวา อุปฺปาเทตฺวา สุขํ วิหรนฺติ, เสยฺยถาปิ เทวา พฺรหฺมกายิกา. อยํ ปฐมา สุขูปปตฺติ. สนฺตาวุโส, สตฺตา สุเขน อภิสนฺนา ปริสนฺนา ปริปูรา ปริปฺผุฏา. เต กทาจิ กรหจิ อุทานํ อุทาเนนฺติ – ‘อโห สุขํ, อโห สุข’นฺติ, เสยฺยถาปิ เทวา อาภสฺสรา. อยํ ทุติยา สุขูปปตฺติ. สนฺตาวุโส, สตฺตา สุเขน อภิสนฺนา ปริสนฺนา ปริปูรา ปริปฺผุฏา. เต สนฺตํเยว ตุสิตา สุขํ ปฏิสํเวเทนฺติ, เสยฺยถาปิ เทวา สุภกิณฺหา. อยํ ตติยา สุขูปปตฺติ. तीन सुख-उत्पत्ती (सुखाच्या प्राप्ती) आहेत – हे आवुसो, असे काही प्राणी आहेत जे वारंवार सुख उत्पन्न करून सुखात विहार करतात; जसे की 'ब्रह्मकायिक' देव (ब्रह्मलोकातील देव). ही पहिली सुख-उत्पत्ती होय. हे आवुसो, असे काही प्राणी आहेत जे सुखाने ओतप्रोत भरलेले, सर्व बाजूंनी भिजलेले, परिपूर्ण आणि व्याप्त आहेत. ते कधीतरी आनंदाने असे उद्गार (उदान) काढतात – 'अहो सुख! अहो सुख!'; जसे की 'आभस्सर' (तेजस्वी) देव. ही दुसरी सुख-उत्पत्ती होय. हे आवुसो, असे काही प्राणी आहेत जे सुखाने ओतप्रोत भरलेले, सर्व बाजूंनी भिजलेले, परिपूर्ण आणि व्याप्त आहेत. ते अत्यंत संतुष्ट होऊन केवळ शांत अशा मानसिक सुखाचा अनुभव घेतात; जसे की 'सुभकिण्ह' (शुभकीर्ण) देव. ही तिसरी सुख-उत्पत्ती होय. ‘‘ติสฺโส ปญฺญา – เสกฺขา ปญฺญา, อเสกฺขา ปญฺญา, เนวเสกฺขานาเสกฺขา ปญฺญา. तीन प्रकारच्या प्रज्ञा आहेत – सेक्ख प्रज्ञा (शिक्षार्थी प्रज्ञा), असेक्ख प्रज्ञा (अशिक्षार्थी/अर्हत प्रज्ञा), आणि नेवसेक्खनासेक्ख प्रज्ञा (जी शिक्षार्थीही नाही आणि अशिक्षार्थीही नाही अशी प्रज्ञा). ‘‘อปราปิ ติสฺโส ปญฺญา – จินฺตามยา ปญฺญา, สุตมยา ปญฺญา, ภาวนามยา ปญฺญา. आणखी तीन प्रकारच्या प्रज्ञा आहेत – चिंतामयी प्रज्ञा (चिंतनातून निर्माण होणारी), सुतमयी प्रज्ञा (श्रवणातून निर्माण होणारी), आणि भावनामयी प्रज्ञा (भावनेतून/ध्यानातून निर्माण होणारी). ‘‘ตีณาวุธานิ – สุตาวุธํ, ปวิเวกาวุธํ, ปญฺญาวุธํ. तीन शस्त्रे आहेत – सुत-शस्त्र (श्रुत/ज्ञानाचे शस्त्र), पविवेक-शस्त्र (एकांत/विवेक शस्त्र), आणि प्रज्ञा-शस्त्र. ‘‘ตีณินฺทฺริยานิ – อนญฺญาตญฺญสฺสามีตินฺทฺริยํ, อญฺญินฺทฺริยํ, อญฺญาตาวินฺทฺริยํ. तीन इंद्रिये आहेत – अनंन्यातञ्ञस्सामीतिन्द्रिय (अज्ञात सत्य जाणून घेण्याची इच्छा असणाऱ्याचे इंद्रिय), अंञिन्द्रिय (सर्वोच्च ज्ञानाचे इंद्रिय), आणि अंञाताविन्द्रिय (पूर्ण ज्ञान प्राप्त केलेल्याचे इंद्रिय). ‘‘ตีณิ จกฺขูนิ – มํสจกฺขุ, ทิพฺพจกฺขุ, ปญฺญาจกฺขุ. तीन चक्षू (डोळे) आहेत – मांसचक्षू (भौतिक डोळा), दिव्यचक्षू (दिव्य डोळा), आणि प्रज्ञाचक्षू (ज्ञानाचा डोळा). ‘‘ติสฺโส สิกฺขา – อธิสีลสิกฺขา, อธิจิตฺตสิกฺขา, อธิปญฺญาสิกฺขา. तीन शिक्षा (प्रशिक्षणे) आहेत – अधिशील-शिक्षा (उच्च शील), अधिचित्त-शिक्षा (उच्च चित्त/समाधी), आणि अधिप्रज्ञा-शिक्षा (उच्च प्रज्ञा). ‘‘ติสฺโส ภาวนา – กายภาวนา, จิตฺตภาวนา, ปญฺญาภาวนา. तीन भावना (विकास/साधना) आहेत – काय-भावना (शरीराची साधना), चित्त-भावना (मनाची साधना), आणि प्रज्ञा-भावना (प्रज्ञेची साधना). ‘‘ตีณิ [Pg.184] อนุตฺตริยานิ – ทสฺสนานุตฺตริยํ, ปฏิปทานุตฺตริยํ, วิมุตฺตานุตฺตริยํ. तीन अनुत्तरिये (सर्वोच्च गोष्टी) आहेत – दस्सनानुत्तरिय (सर्वोच्च दर्शन/दृष्टी), पटिपदानुत्तरिय (सर्वोच्च आचरण/मार्ग), आणि विमुत्तानुत्तरिय (सर्वोच्च मुक्ती). ‘‘ตโย สมาธี – สวิตกฺกสวิจาโร สมาธิ, อวิตกฺกวิจารมตฺโต สมาธิ, อวิตกฺกอวิจาโร สมาธิ. तीन समाधी आहेत – सवितक्क-सविचार समाधी (वितर्क आणि विचारासह समाधी), अवितक्क-विचारमत्त समाधी (वितर्करहित केवळ विचारासह समाधी), आणि अवितक्क-अविचार समाधी (वितर्क आणि विचार दोन्ही नसलेली समाधी). ‘‘อปเรปิ ตโย สมาธี – สุญฺญโต สมาธิ, อนิมิตฺโต สมาธิ, อปฺปณิหิโต สมาธิ. आणखी तीन समाधी आहेत – सुञ्ञत समाधी (शून्यता समाधी), अनिमित्त समाधी (निमित्तरहित समाधी), आणि अप्पणिहित समाधी (प्रणिधिरहित/इच्छारहित समाधी). ‘‘ตีณิ โสเจยฺยานิ – กายโสเจยฺยํ, วจีโสเจยฺยํ, มโนโสเจยฺยํ. तीन शौचे (शुद्धता) आहेत – काय-शौच (शारीरिक शुद्धता), वची-शौच (वाचेची शुद्धता), आणि मन-शौच (मानसिक शुद्धता). ‘‘ตีณิ โมเนยฺยานิ – กายโมเนยฺยํ, วจีโมเนยฺยํ, มโนโมเนยฺยํ. तीन मौने (मुनींचे आचरण) आहेत – काय-मौन (शारीरिक मौन), वची-मौन (वाचेचे मौन), आणि मनो-मौन (मानसिक मौन). ‘‘ตีณิ โกสลฺลานิ – อายโกสลฺลํ, อปายโกสลฺลํ, อุปายโกสลฺลํ. तीन कौशल्ये आहेत – आय-कौशल्य (उन्नतीचे कौशल्य), अपाय-कौшал्य (अवनतीचे कौशल्य), आणि उपाय-कौशल्य (उपायांचे कौशल्य). ‘‘ตโย มทา – อาโรคฺยมโท, โยพฺพนมโท, ชีวิตมโท. तीन मद (अहंकार) आहेत – आरोग्य-मद (निरोगीपणाचा मद), यौवन-मद (तरुणपणाचा मद), आणि जीवित-मद (जीवनाचा/आयुष्याचा मद). ‘‘ตีณิ อาธิปเตยฺยานิ – อตฺตาธิปเตยฺยํ, โลกาธิปเตยฺยํ, ธมฺมาธิปเตยฺยํ. तीन आधिपत्ये (प्रमुख प्रभाव) आहेत – अत्ताधिपत्य (स्वतःचे आधिपत्य), लोकाधिपत्य (जगाचे आधिपत्य), आणि धम्माधिपत्य (धम्माचे आधिपत्य). ‘‘ตีณิ กถาวตฺถูนิ – อตีตํ วา อทฺธานํ อารพฺภ กถํ กเถยฺย – ‘เอวํ อโหสิ อตีตมทฺธาน’นฺติ; อนาคตํ วา อทฺธานํ อารพฺภ กถํ กเถยฺย – ‘เอวํ ภวิสฺสติ อนาคตมทฺธาน’นฺติ; เอตรหิ วา ปจฺจุปฺปนฺนํ อทฺธานํ อารพฺภ กถํ กเถยฺย – ‘เอวํ โหติ เอตรหิ ปจฺจุปฺปนฺนํ อทฺธาน’นฺติ. तीन कथावस्तू (चर्चेचे विषय) आहेत – भूतकाळाविषयी चर्चा करताना म्हणावे, 'भूतकाळात असे झाले होते'; किंवा भविष्यकाळाविषयी चर्चा करताना म्हणावे, 'भविष्यकाळात असे होईल'; किंवा वर्तमानकाळाविषयी चर्चा करताना म्हणावे, 'सध्या वर्तमानकाळात असे होत आहे'. ‘‘ติสฺโส วิชฺชา – ปุพฺเพนิวาสานุสฺสติญาณํ วิชฺชา, สตฺตานํ จุตูปปาเตญาณํ วิชฺชา, อาสวานํ ขเยญาณํ วิชฺชา. तीन विद्या आहेत – पुब्बेनिवासानुस्सतिञाण (पूर्वजन्मांचे स्मरण करण्याचे ज्ञान) ही विद्या, सत्तानं चुतूपपातञाण (प्राण्यांच्या च्युती आणि उत्पत्तीचे म्हणजेच मृत्यू आणि जन्माचे ज्ञान) ही विद्या, आणि आसवानं खयञाण (आसवांच्या क्षयाचे ज्ञान) ही विद्या. ‘‘ตโย วิหารา – ทิพฺโพ วิหาโร, พฺรหฺมา วิหาโร, อริโย วิหาโร. तीन विहार (निवास/अवस्था) आहेत – दिव्य विहार, ब्रह्म विहार, आणि आर्य विहार. ‘‘ตีณิ ปาฏิหาริยานิ – อิทฺธิปาฏิหาริยํ, อาเทสนาปาฏิหาริยํ, อนุสาสนีปาฏิหาริยํ. तीन प्रातिहार्ये (चमत्कार/अद्भूत शक्ती) आहेत – इद्धिप्रातिहार्य (ऋद्धी-प्रातिहार्य/ऋद्धीचे प्रदर्शन), आदेसनाप्रातिहार्य (आदेशना-प्रातिहार्य/मन जाणणे), आणि अनुसासनीप्रातिहार्य (अनुशासणी-प्रातिहार्य/धम्मोपदेश देणे). ‘‘อิเม โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน ตโย ธมฺมา สมฺมทกฺขาตา. ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ…เป… อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. हे आवुसो, सर्वज्ञ असणाऱ्या, सर्व पाहणाऱ्या, अर्हत आणि सम्यक्संबुद्ध असणाऱ्या त्या भगवंतांनी हे तीन धम्म चांगल्या प्रकारे सांगितले आहेत. त्या तीन धम्मांचे आपण सर्वांनी मिळून संगायन (एकत्र वाचन) केले पाहिजे... जेणेकरून ते देव आणि मनुष्यांच्या हितासाठी, कल्याणासाठी आणि सुखासाठी होईल. จตุกฺกํ चतुष्क (चार-चारचे गट) ๓๐๖. ‘‘อตฺถิ [Pg.185] โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน จตฺตาโร ธมฺมา สมฺมทกฺขาตา. ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ, น วิวทิตพฺพํ…เป… อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. กตเม จตฺตาโร? ३०६. हे आवुसो, सर्वज्ञ असणाऱ्या, सर्व पाहणाऱ्या, अर्हत आणि सम्यक्संबुद्ध असणाऱ्या त्या भगवंतांनी हे चार धम्म चांगल्या प्रकारे सांगितले आहेत. त्या चार धम्मांचे आपण सर्वांनी मिळून संगायन केले पाहिजे, त्यात वाद घालता कामा नये... जेणेकरून ते देव आणि मनुष्यांच्या हितासाठी, कल्याणासाठी आणि सुखासाठी होईल. ते चार कोणते? ‘‘จตฺตาโร สติปฏฺฐานา. อิธาวุโส, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา, วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. เวทนาสุ เวทนานุปสฺสี…เป… จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสี…เป… ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. चार सतिपट्ठान (स्मृतीचे प्रस्थान) आहेत. हे आवुसो, या धम्म-विनयात भिक्खू शरीरामध्ये शरीराचे वारंवार दर्शन घेत (कायानुपश्यी होऊन), उद्योगी (आतपी), संप्रजन्ययुक्त (जागरूक) आणि स्मृतिमान होऊन, लोकांमधील अभिज्झा (लोभ) आणि डोमनस्स (दौर्मनस्य/दुःख) दूर करून विहार करतो. वेदनांमध्ये वेदनांचे वारंवार दर्शन घेत (वेदनानुपश्यी होऊन)... चित्तामध्ये चित्ताचे वारंवार दर्शन घेत (चित्तानुपश्यी होऊन)... धम्मांमध्ये धम्मांचे वारंवार दर्शन घेत (धम्मानुपश्यी होऊन) उद्योगी, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान होऊन, लोकांमधील अभिज्झा आणि डोमनस्स दूर करून विहार करतो. ‘‘จตฺตาโร สมฺมปฺปธานา. อิธาวุโส, ภิกฺขุ อนุปฺปนฺนานํ ปาปกานํ อกุสลานํ ธมฺมานํ อนุปฺปาทาย ฉนฺทํ ชเนติ วายมติ วีริยํ อารภติ จิตฺตํ ปคฺคณฺหาติ ปทหติ. อุปฺปนฺนานํ ปาปกานํ อกุสลานํ ธมฺมานํ ปหานาย ฉนฺทํ ชเนติ วายมติ วีริยํ อารภติ จิตฺตํ ปคฺคณฺหาติ ปทหติ. อนุปฺปนฺนานํ กุสลานํ ธมฺมานํ อุปฺปาทาย ฉนฺทํ ชเนติ วายมติ วีริยํ อารภติ จิตฺตํ ปคฺคณฺหาติ ปทหติ. อุปฺปนฺนานํ กุสลานํ ธมฺมานํ ฐิติยา อสมฺโมสาย ภิยฺโยภาวาย เวปุลฺลาย ภาวนาย ปาริปูริยา ฉนฺทํ ชเนติ วายมติ วีริยํ อารภติ จิตฺตํ ปคฺคณฺหาติ ปทหติ. चार सम्मप्पधान (सम्यक व्यायाम/प्रयत्न) आहेत. हे आवुसो, या धम्म-विनयात भिक्खू अनुत्पन्न (अद्याप उत्पन्न न झालेल्या) पापयुक्त अकुशल धम्मांना उत्पन्न न होऊ देण्यासाठी छंद (इच्छा) निर्माण करतो, प्रयत्न करतो, वीर्य (ऊर्जा) आरंभितो, चित्ताला प्रगत करतो आणि दृढ निश्चय करतो. उत्पन्न झालेल्या पापयुक्त अकुशल धम्मांच्या प्रहाणासाठी (नाशासाठी) छंद निर्माण करतो, प्रयत्न करतो, वीर्य आरंभितो, चित्ताला प्रगत करतो आणि दृढ निश्चय करतो. अनुत्पन्न कुशल धम्मांना उत्पन्न करण्यासाठी छंद निर्माण करतो, प्रयत्न करतो, वीर्य आरंभितो, चित्ताला प्रगत करतो आणि दृढ निश्चय करतो. उत्पन्न झालेल्या कुशल धम्मांच्या स्थितीसाठी, ते नष्ट न होण्यासाठी, त्यांच्या वृद्धीसाठी, विपुलतेसाठी, भावनेसाठी आणि परिपूर्णतेसाठी छंद निर्माण करतो, प्रयत्न करतो, वीर्य आरंभितो, चित्ताला प्रगत करतो आणि दृढ निश्चय करतो. ‘‘จตฺตาโร อิทฺธิปาทา. อิธาวุโส, ภิกฺขุ ฉนฺทสมาธิปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวติ. จิตฺตสมาธิปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวติ. วีริยสมาธิปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวติ. วีมํสาสมาธิปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวติ. चार इद्धिपाद (ऋद्धीचे आधार) आहेत. हे आवुसो, या धम्म-विनयात भिक्खू छंद-समाधी-प्रधानसंस्कारांनी युक्त अशा इद्धिपादाची भावना (साधना) करतो. चित्त-समाधी-प्रधानसंस्कारांनी युक्त अशा इद्धिपादाची भावना करतो. वीर्य-समाधी-प्रधानसंस्कारांनी युक्त अशा इद्धिपादाची भावना करतो. वीमंसा-समाधी-प्रधानसंस्कारांनी युक्त अशा इद्धिपादाची भावना करतो. ‘‘จตฺตาริ ฌานานิ. อิธาวุโส, ภิกฺขุ วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา อชฺฌตฺตํ สมฺปสาทนํ เจตโส เอโกทิภาวํ อวิตกฺกํ อวิจารํ สมาธิชํ ปีติสุขํ ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. ปีติยา จ วิราคา อุเปกฺขโก จ วิหรติ สโต จ สมฺปชาโน, สุขญฺจ [Pg.186] กาเยน ปฏิสํเวเทติ, ยํ ตํ อริยา อาจิกฺขนฺติ – ‘อุเปกฺขโก สติมา สุขวิหารี’ติ ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. สุขสฺส จ ปหานา ทุกฺขสฺส จ ปหานา, ปุพฺเพว โสมนสฺสโทมนสฺสานํ อตฺถงฺคมา, อทุกฺขมสุขํ อุเปกฺขาสติปาริสุทฺธึ จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. चार ध्यान. मित्रांनो, येथे भिक्खू कामभोगांपासून अलिप्त होऊनच, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, वितर्क आणि विचारांसह असणारे, विवेकापासून उत्पन्न झालेले, प्रीती आणि सुखाने युक्त असलेले पहिले ध्यान प्राप्त करून विहरतो. वितर्क आणि विचारांच्या शांत होण्याने, अध्यात्मिक प्रसन्नता आणि चित्ताची एकाग्रता असणारे, वितर्करहित, विचाररहित, समाधीपासून उत्पन्न झालेले, प्रीती आणि सुखाने युक्त असलेले दुसरे ध्यान प्राप्त करून विहरतो. प्रीतीचाही विराग झाल्यामुळे तो उपेक्षक (तटस्थ) होऊन विहरतो आणि स्मृतिमान व संप्रजन्ययुक्त राहून शरीराने सुखाचा अनुभव घेतो, ज्याच्याविषयी आर्य म्हणतात की—'तो उपेक्षक, स्मृतिमान आणि सुखविहारी आहे'—असे तिसरे ध्यान प्राप्त करून विहरतो. सुखाचा त्याग केल्यामुळे आणि दुःखाचा त्याग केल्यामुळे, तसेच पूर्वीच सोमनस्य (आनंद) आणि दोमनस्य (खिन्नता) नष्ट झाल्यामुळे, सुखही नाही आणि दुःखही नाही अशा उपेक्षा व स्मृतीच्या शुद्धतेने युक्त असलेले चौथे ध्यान प्राप्त करून विहरतो. ๓๐๗. ‘‘จตสฺโส สมาธิภาวนา. อตฺถาวุโส, สมาธิภาวนา ภาวิตา พหุลีกตา ทิฏฺฐธมฺมสุขวิหาราย สํวตฺตติ. อตฺถาวุโส, สมาธิภาวนา ภาวิตา พหุลีกตา ญาณทสฺสนปฏิลาภาย สํวตฺตติ. อตฺถาวุโส สมาธิภาวนา ภาวิตา พหุลีกตา สติสมฺปชญฺญาย สํวตฺตติ. อตฺถาวุโส สมาธิภาวนา ภาวิตา พหุลีกตา อาสวานํ ขยาย สํวตฺตติ. ३०७. चार समाधी-भावना. मित्रांनो, अशी समाधी-भावना आहे जी विकसित आणि वारंवार अभ्यासली असता या जन्मात सुखाने विहरण्यासाठी कारणीभूत ठरते. मित्रांनो, अशी समाधी-भावना आहे जी विकसित आणि वारंवार अभ्यासली असता ज्ञान-दर्शन प्राप्त होण्यासाठी कारणीभूत ठरते. मित्रांनो, अशी समाधी-भावना आहे जी विकसित आणि वारंवार अभ्यासली असता स्मृती आणि संप्रजन्यासाठी कारणीभूत ठरते. मित्रांनो, अशी समाधी-भावना आहे जी विकसित आणि वारंवार अभ्यासली असता आसवांच्या क्षयासाठी कारणीभूत ठरते. ‘‘กตมา จาวุโส, สมาธิภาวนา ภาวิตา พหุลีกตา ทิฏฺฐธมฺมสุขวิหาราย สํวตฺตติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ…เป… จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ, อาวุโส, สมาธิภาวนา ภาวิตา พหุลีกตา ทิฏฺฐธมฺมสุขวิหาราย สํวตฺตติ. आणि मित्रांनो, कोणती समाधी-भावना विकसित आणि वारंवार अभ्यासली असता या जन्मात सुखाने विहरण्यासाठी कारणीभूत ठरते? मित्रांनो, येथे भिक्खू कामभोगांपासून अलिप्त होऊनच, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, वितर्कासह... (पेय्यालं)... चौथे ध्यान प्राप्त करून विहरतो. मित्रांनो, ही ती समाधी-भावना आहे जी विकसित आणि वारंवार अभ्यासली असता या जन्मात सुखाने विहरण्यासाठी कारणीभूत ठरते. ‘‘กตมา จาวุโส, สมาธิภาวนา ภาวิตา พหุลีกตา ญาณทสฺสนปฏิลาภาย สํวตฺตติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ อาโลกสญฺญํ มนสิ กโรติ, ทิวาสญฺญํ อธิฏฺฐาติ ยถา ทิวา ตถา รตฺตึ, ยถา รตฺตึ ตถา ทิวา. อิติ วิวเฏน เจตสา อปริโยนทฺเธน สปฺปภาสํ จิตฺตํ ภาเวติ. อยํ, อาวุโส สมาธิภาวนา ภาวิตา พหุลีกตา ญาณทสฺสนปฏิลาภาย สํวตฺตติ. आणि मित्रांनो, कोणती समाधी-भावना विकसित आणि वारंवार अभ्यासली असता ज्ञान-दर्शन प्राप्त होण्यासाठी कारणीभूत ठरते? मित्रांनो, येथे भिक्खू प्रकाशाच्या संज्ञेचे (आलोकसंज्ञा) मनन करतो, दिवसाच्या संज्ञेचा निश्चय करतो—जसे दिवसा तसे रात्री, आणि जसे रात्री तसे दिवसा. अशा प्रकारे, उघड्या आणि अनाच्छादित चित्ताने तो प्रकाशमान चित्त विकसित करतो. मित्रांनो, ही ती समाधी-भावना आहे जी विकसित आणि वारंवार अभ्यासली असता ज्ञान-दर्शन प्राप्त होण्यासाठी कारणीभूत ठरते. ‘‘กตมา จาวุโส, สมาธิภาวนา ภาวิตา พหุลีกตา สติสมฺปชญฺญาย สํวตฺตติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุโน วิทิตา เวทนา อุปฺปชฺชนฺติ, วิทิตา อุปฏฺฐหนฺติ, วิทิตา อพฺภตฺถํ คจฺฉนฺติ. วิทิตา สญฺญา อุปฺปชฺชนฺติ, วิทิตา อุปฏฺฐหนฺติ, วิทิตา อพฺภตฺถํ คจฺฉนฺติ. วิทิตา วิตกฺกา อุปฺปชฺชนฺติ, วิทิตา อุปฏฺฐหนฺติ, วิทิตา อพฺภตฺถํ คจฺฉนฺติ. อยํ, อาวุโส, สมาธิภาวนา ภาวิตา พหุลีกตา สติสมฺปชญฺญาย สํวตฺตติ. आणि मित्रांनो, कोणती समाधी-भावना विकसित आणि वारंवार अभ्यासली असता स्मृती आणि संप्रजन्यासाठी कारणीभूत ठरते? मित्रांनो, येथे भिक्खूला वेदना स्पष्टपणे जाणवत उत्पन्न होतात, स्पष्टपणे जाणवत टिकून राहतात, स्पष्टपणे जाणवत नष्ट होतात. संज्ञा स्पष्टपणे जाणवत उत्पन्न होतात, स्पष्टपणे जाणवत टिकून राहतात, स्पष्टपणे जाणवत नष्ट होतात. वितर्क स्पष्टपणे जाणवत उत्पन्न होतात, स्पष्टपणे जाणवत टिकून राहतात, स्पष्टपणे जाणवत नष्ट होतात. मित्रांनो, ही ती समाधी-भावना आहे जी विकसित आणि वारंवार अभ्यासली असता स्मृती आणि संप्रजन्यासाठी कारणीभूत ठरते. ‘‘กตมา [Pg.187] จาวุโส, สมาธิภาวนา ภาวิตา พหุลีกตา อาสวานํ ขยาย สํวตฺตติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ ปญฺจสุ อุปาทานกฺขนฺเธสุ อุทยพฺพยานุปสฺสี วิหรติ. อิติ รูปํ, อิติ รูปสฺส สมุทโย, อิติ รูปสฺส อตฺถงฺคโม. อิติ เวทนา…เป… อิติ สญฺญา… อิติ สงฺขารา… อิติ วิญฺญาณํ, อิติ วิญฺญาณสฺส สมุทโย, อิติ วิญฺญาณสฺส อตฺถงฺคโม. อยํ, อาวุโส, สมาธิภาวนา ภาวิตา พหุลีกตา อาสวานํ ขยาย สํวตฺตติ. आणि मित्रांनो, कोणती समाधी-भावना विकसित आणि वारंवार अभ्यासली असता आसवांच्या क्षयासाठी कारणीभूत ठरते? मित्रांनो, येथे भिक्खू पाच उपादानस्कंधांच्या उदय आणि व्ययाचे (उत्पत्ती आणि विनाशाचे) अनुदर्शन करत विहरतो: 'असे रूप आहे, असा रूपाचा उदय आहे, असा रूपाचा अस्त आहे. अशी वेदना आहे... अशी संज्ञा आहे... असे संस्कार आहेत... असे विज्ञान आहे, असा विज्ञानाचा उदय आहे, असा विज्ञानाचा अस्त आहे.' मित्रांनो, ही ती समाधी-भावना आहे जी विकसित आणि वारंवार अभ्यासली असता आसवांच्या क्षयासाठी कारणीभूत ठरते. ๓๐๘. ‘‘จตสฺโส อปฺปมญฺญา. อิธาวุโส, ภิกฺขุ เมตฺตาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ. ตถา ทุติยํ. ตถา ตติยํ. ตถา จตุตฺถํ. อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ เมตฺตาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. กรุณาสหคเตน เจตสา…เป… มุทิตาสหคเตน เจตสา…เป… อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ. ตถา ทุติยํ. ตถา ตติยํ. ตถา จตุตฺถํ. อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. ३०८. चार अप्रमाण (अप्पमञ्ञा). मित्रांनो, येथे भिक्खू मैत्रीपूर्ण चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो. तसेच दुसऱ्या दिशेला, तसेच तिसऱ्या दिशेला, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, सभोवताली, सर्वत्र, स्वतःप्रमाणेच सर्वांना मानून, संपूर्ण जगाला मैत्रीपूर्ण चित्ताने, जे विशाल, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित आहे, त्याने व्यापून विहरतो. करुणेने युक्त चित्ताने... (पेय्यालं)... मुदितेने युक्त चित्ताने... (पेय्यालं)... उपेक्षेने युक्त चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो. तसेच दुसऱ्या दिशेला, तसेच तिसऱ्या दिशेला, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, सभोवताली, सर्वत्र, स्वतःप्रमाणेच सर्वांना मानून, संपूर्ण जगाला उपेक्षापूर्ण चित्ताने, जे विशाल, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित आहे, त्याने व्यापून विहरतो. ‘‘จตฺตาโร อารุปฺปา. อิธาวุโส, ภิกฺขุ สพฺพโส รูปสญฺญานํ สมติกฺกมา ปฏิฆสญฺญานํ อตฺถงฺคมา นานตฺตสญฺญานํ อมนสิการา ‘อนนฺโต อากาโส’ติ อากาสานญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. สพฺพโส อากาสานญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘อนนฺตํ วิญฺญาณ’นฺติ วิญฺญาณญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘นตฺถิ กิญฺจี’ติ อากิญฺจญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. สพฺพโส อากิญฺจญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. चार अरूप अवस्था. मित्रांनो, येथे भिक्खू सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांचे पूर्णपणे उल्लंघन केल्यामुळे, प्रतिघसंज्ञांच्या (द्वेषयुक्त संज्ञांच्या) अस्तामुळे, नानात्वसंज्ञांकडे (विविधतेच्या संज्ञांकडे) दुर्लक्ष केल्यामुळे, 'आकाश अनंत आहे' अशा भावनेने आकाशानंत्यायतनात प्रवेश करून विहरतो. सर्व प्रकारे आकाशानंत्यायतनाचे उल्लंघन करून, 'विज्ञान अनंत आहे' अशा भावनेने विज्ञानानंत्यायतनात प्रवेश करून विहरतो. सर्व प्रकारे विज्ञानानंत्यायतनाचे उल्लंघन करून, 'काहीही नाही' अशा भावनेने आकिंचन्यायतनात प्रवेश करून विहरतो. सर्व प्रकारे आकिंचन्यायतनाचे उल्लंघन करून नैवसंज्ञानासंज्ञायतनात प्रवेश करून विहरतो. ‘‘จตฺตาริ อปสฺเสนานิ. อิธาวุโส, ภิกฺขุ สงฺขาเยกํ ปฏิเสวติ, สงฺขาเยกํ อธิวาเสติ, สงฺขาเยกํ ปริวชฺเชติ, สงฺขาเยกํ วิโนเทติ. चार आश्रय (अपस्सेन). मित्रांनो, येथे भिक्खू विचारपूर्वक एका गोष्टीचे सेवन करतो, विचारपूर्वक एका गोष्टीचा स्वीकार करतो, विचारपूर्वक एका गोष्टीचा त्याग करतो, विचारपूर्वक एका गोष्टीचे निवारण करतो. ๓๐๙. ‘‘จตฺตาโร [Pg.188] อริยวํสา. อิธาวุโส, ภิกฺขุ สนฺตุฏฺโฐ โหติ อิตรีตเรน จีวเรน, อิตรีตรจีวรสนฺตุฏฺฐิยา จ วณฺณวาที, น จ จีวรเหตุ อเนสนํ อปฺปติรูปํ อาปชฺชติ; อลทฺธา จ จีวรํ น ปริตสฺสติ, ลทฺธา จ จีวรํ อคธิโต อมุจฺฉิโต อนชฺฌาปนฺโน อาทีนวทสฺสาวี นิสฺสรณปญฺโญ ปริภุญฺชติ; ตาย จ ปน อิตรีตรจีวรสนฺตุฏฺฐิยา เนวตฺตานุกฺกํเสติ น ปรํ วมฺเภติ. โย หิ ตตฺถ ทกฺโข อนลโส สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต, อยํ วุจฺจตาวุโส – ‘ภิกฺขุ โปราเณ อคฺคญฺเญ อริยวํเส ฐิโต’. ३०९. चार आर्यवंश. मित्रांनो, येथे भिक्खू जसे मिळेल तशा चीवराने (वस्त्राने) संतुष्ट असतो, आणि जशा चीवराने संतुष्ट असण्याच्या गुणाची प्रशंसा करतो; चीवराच्या कारणाने तो अयोग्य व अयोग्य मार्गाने उपजीविका (अनेसना) करत नाही; चीवर न मिळाल्यास तो व्याकुळ होत नाही, आणि चीवर मिळाल्यास तो आसक्त न होता, मोहित न होता, गुंतून न पडता, त्यातील दोष पाहणारा आणि मुक्तीची प्रज्ञा ठेवून त्याचा उपभोग घेतो; आणि त्या चीवराच्या संतुष्टतेमुळे तो स्वतःची प्रशंसा करत नाही आणि इतरांना तुच्छ लेखत नाही. जो कोणी यामध्ये कुशल, आळस नसलेला, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान असतो, त्याला मित्रांनो, 'प्राचीन, श्रेष्ठ अशा आर्यवंशात स्थित असलेला भिक्खू' असे म्हटले जाते. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ สนฺตุฏฺโฐ โหติ อิตรีตเรน ปิณฺฑปาเตน, อิตรีตรปิณฺฑปาตสนฺตุฏฺฐิยา จ วณฺณวาที, น จ ปิณฺฑปาตเหตุ อเนสนํ อปฺปติรูปํ อาปชฺชติ; อลทฺธา จ ปิณฺฑปาตํ น ปริตสฺสติ, ลทฺธา จ ปิณฺฑปาตํ อคธิโต อมุจฺฉิโต อนชฺฌาปนฺโน อาทีนวทสฺสาวี นิสฺสรณปญฺโญ ปริภุญฺชติ; ตาย จ ปน อิตรีตรปิณฺฑปาตสนฺตุฏฺฐิยา เนวตฺตานุกฺกํเสติ น ปรํ วมฺเภติ. โย หิ ตตฺถ ทกฺโข อนลโส สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต, อยํ วุจฺจตาวุโส – ‘ภิกฺขุ โปราเณ อคฺคญฺเญ อริยวํเส ฐิโต’. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू जशा मिळतील तशा पिंडपाताने (भिक्षान्नाने) संतुष्ट असतो, आणि जशा मिळतील तशा पिंडपाताने संतुष्ट राहण्याच्या गुणाची प्रशंसा करणारा असतो. पिंडपाताच्या कारणाने तो अयोग्य व अयोग्य मार्गाने उपजीविका करत नाही. पिंडपात न मिळाल्यास तो उद्विग्न होत नाही, आणि पिंडपात मिळाल्यास तो आसक्त न होता, मोहित न होता, बद्ध न होता, त्यातील दोष पाहणारा आणि मुक्तीच्या प्रज्ञेने त्याचा उपभोग घेतो. आणि त्या जशा मिळतील तशा पिंडपाताच्या संतुष्टीमुळे तो स्वतःची प्रशंसा करत नाही आणि इतरांना तुच्छ लेखत नाही. जो भिक्खू यामध्ये कुशल, आळस नसलेला, सजग आणि स्मृतिमान असतो; आवुसो, अशा भिक्खूला 'प्राचीन, श्रेष्ठ अशा अरियवंशात स्थित असलेला भिक्खू' असे म्हटले जाते. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ สนฺตุฏฺโฐ โหติ อิตรีตเรน เสนาสเนน, อิตรีตรเสนาสนสนฺตุฏฺฐิยา จ วณฺณวาที, น จ เสนาสนเหตุ อเนสนํ อปฺปติรูปํ อาปชฺชติ; อลทฺธา จ เสนาสนํ น ปริตสฺสติ, ลทฺธา จ เสนาสนํ อคธิโต อมุจฺฉิโต อนชฺฌาปนฺโน อาทีนวทสฺสาวี นิสฺสรณปญฺโญ ปริภุญฺชติ; ตาย จ ปน อิตรีตรเสนาสนสนฺตุฏฺฐิยา เนวตฺตานุกฺกํเสติ น ปรํ วมฺเภติ. โย หิ ตตฺถ ทกฺโข อนลโส สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต, อยํ วุจฺจตาวุโส – ‘ภิกฺขุ โปราเณ อคฺคญฺเญ อริยวํเส ฐิโต’. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू जशा मिळतील तशा सेनासनाने (राहण्याच्या जागेने) संतुष्ट असतो, आणि जशा मिळतील तशा सेनासनाने संतुष्ट राहण्याच्या गुणाची प्रशंसा करणारा असतो. सेनासनाच्या कारणाने तो अयोग्य व अयोग्य मार्गाने उपजीविका करत नाही. सेनासन न मिळाल्यास तो उद्विग्न होत नाही, आणि सेनासन मिळाल्यास तो आसक्त न होता, मोहित न होता, बद्ध न होता, त्यातील दोष पाहणारा आणि मुक्तीच्या प्रज्ञेने त्याचा उपभोग घेतो. आणि त्या जशा मिळतील तशा सेनासनाच्या संतुष्टीमुळे तो स्वतःची प्रशंसा करत नाही आणि इतरांना तुच्छ लेखत नाही. जो भिक्खू यामध्ये कुशल, आळस नसलेला, सजग आणि स्मृतिमान असतो; आवुसो, अशा भिक्खूला 'प्राचीन, श्रेष्ठ अशा अरियवंशात स्थित असलेला भिक्खू' असे म्हटले जाते. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ ปหานาราโม โหติ ปหานรโต, ภาวนาราโม โหติ ภาวนารโต; ตาย จ ปน ปหานารามตาย ปหานรติยา ภาวนารามตาย ภาวนารติยา เนวตฺตานุกฺกํเสติ น ปรํ วมฺเภติ. โย หิ ตตฺถ ทกฺโข อนลโส สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต อยํ วุจฺจตาวุโส – ‘ภิกฺขุ โปราเณ อคฺคญฺเญ อริยวํเส ฐิโต’. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू प्रहाणात (अकुशल धर्मांच्या त्यागात) रमणारा, प्रहाणात लीन असणारा असतो; भावनेत (कुशल धर्मांच्या विकासात) रमणारा, भावनेत लीन असणारा असतो. त्या प्रहाणप्रियतेमुळे, प्रहाणातील आनंदाने, भावनाप्रियतेमुळे आणि भावनेतील आनंदाने तो स्वतःची प्रशंसा करत नाही आणि इतरांना तुच्छ लेखत नाही. जो भिक्खू यामध्ये कुशल, आळस नसलेला, सजग आणि स्मृतिमान असतो; आवुसो, अशा भिक्खूला 'प्राचीन, श्रेष्ठ अशा अरियवंशात स्थित असलेला भिक्खू' असे म्हटले जाते. ๓๑๐. ‘‘จตฺตาริ [Pg.189] ปธานานิ. สํวรปธานํ ปหานปธานํ ภาวนาปธานํ อนุรกฺขณาปธานํ. กตมญฺจาวุโส, สํวรปธานํ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา น นิมิตฺตคฺคาหี โหติ นานุพฺยญฺชนคฺคาหี. ยตฺวาธิกรณเมนํ จกฺขุนฺทฺริยํ อสํวุตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อนฺวาสฺสเวยฺยุํ, ตสฺส สํวราย ปฏิปชฺชติ, รกฺขติ จกฺขุนฺทฺริยํ, จกฺขุนฺทฺริเย สํวรํ อาปชฺชติ. โสเตน สทฺทํ สุตฺวา… ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตฺวา… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา… กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสิตฺวา… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย น นิมิตฺตคฺคาหี โหติ นานุพฺยญฺชนคฺคาหี. ยตฺวาธิกรณเมนํ มนินฺทฺริยํ อสํวุตํ วิหรนฺตํ อภิชฺฌาโทมนสฺสา ปาปกา อกุสลา ธมฺมา อนฺวาสฺสเวยฺยุํ, ตสฺส สํวราย ปฏิปชฺชติ, รกฺขติ มนินฺทฺริยํ, มนินฺทฺริเย สํวรํ อาปชฺชติ. อิทํ วุจฺจตาวุโส, สํวรปธานํ. ३१०. चार प्रधान (प्रयत्न) आहेत: संवर-प्रधान, प्रहाण-प्रधान, भावना-प्रधान आणि अनुरक्षण-प्रधान. आणि आवुसो, संवर-प्रधान कोणते आहे? येथे, आवुसो, भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहून त्याच्या बाह्य स्वरूपाचे (निमित्त) ग्रहण करत नाही किंवा त्याच्या तपशीलांचे (अनुव्यंजन) ग्रहण करत नाही. ज्या कारणाने, चक्षुरिंद्रिय असंयत ठेवून विहरणाऱ्या या भिक्खूमध्ये अभिज्झा (लोभ) आणि दोमनस्स (दौर्मनस्य) हे पापी अकुशल धर्म उत्पन्न होऊ शकतात, त्या चक्षुरिंद्रियाच्या संवरासाठी तो प्रयत्न करतो, चक्षुरिंद्रियाचे रक्षण करतो आणि चक्षुरिंद्रियाचा संवर साध्य करतो. कानाने शब्द ऐकून... नाकाने गंध घेऊन... जिभेने रस चाखून... शरीराने स्पर्श अनुभवून... मनाने धर्म जाणून तो बाह्य स्वरूपाचे ग्रहण करत नाही किंवा त्याच्या तपशीलांचे ग्रहण करत नाही. ज्या कारणाने, मनेंद्रिय असंयत ठेवून विहरणाऱ्या या भिक्खूमध्ये अभिज्झा आणि दोमनस्स हे पापी अकुशल धर्म उत्पन्न होऊ शकतात, त्या मनेंद्रियाच्या संवरासाठी तो प्रयत्न करतो, मनेंद्रियाचे रक्षण करतो आणि मनेंद्रियाचा संवर साध्य करतो. आवुसो, याला संवर-प्रधान असे म्हटले जाते. ‘‘กตมญฺจาวุโส, ปหานปธานํ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ อุปฺปนฺนํ กามวิตกฺกํ นาธิวาเสติ ปชหติ วิโนเทติ พฺยนฺตึ กโรติ อนภาวํ คเมติ. อุปฺปนฺนํ พฺยาปาทวิตกฺกํ…เป… อุปฺปนฺนํ วิหึสาวิตกฺกํ… อุปฺปนฺนุปฺปนฺเน ปาปเก อกุสเล ธมฺเม นาธิวาเสติ ปชหติ วิโนเทติ พฺยนฺตึ กโรติ อนภาวํ คเมติ. อิทํ วุจฺจตาวุโส, ปหานปธานํ. आणि आवुसो, प्रहाण-प्रधान कोणते आहे? येथे, आवुसो, भिक्खू मनात उत्पन्न झालेल्या कामवितर्काला थारा देत नाही, त्याचा त्याग करतो, त्याला दूर करतो, नष्ट करतो आणि पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्थितीला पोहोचवतो. उत्पन्न झालेल्या व्यापादवितर्काला... उत्पन्न झालेल्या विहिंसावितर्काला... वेळोवेळी उत्पन्न होणाऱ्या पापी अकुशल धर्मांना तो थारा देत नाही, त्यांचा त्याग करतो, त्यांना दूर करतो, नष्ट करतो आणि पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्थितीला पोहोचवतो. आवुसो, याला प्रहाण-प्रधान असे म्हटले जाते. ‘‘กตมญฺจาวุโส, ภาวนาปธานํ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ สติสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิตํ วิราคนิสฺสิตํ นิโรธนิสฺสิตํ โวสฺสคฺคปริณามึ. ธมฺมวิจยสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ… วีริยสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ… ปีติสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ… ปสฺสทฺธิสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ… สมาธิสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ… อุเปกฺขาสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิตํ วิราคนิสฺสิตํ นิโรธนิสฺสิตํ โวสฺสคฺคปริณามึ. อิทํ วุจฺจตาวุโส, ภาวนาปธานํ. आणि आवुसो, भावना-प्रधान कोणते आहे? येथे, आवुसो, भिक्खू विवेक-निश्रित, विराग-निश्रित, nirodha-निश्रित आणि त्याग-परिणामी सति-संबोज्झंगाची भावना करतो. धम्मविचय-संबोज्झंगाची भावना करतो... वीरिय-संबोज्झंगाची भावना करतो... पीति-संबोज्झंगाची भावना करतो... पस्सद्धि-संबोज्झंगाची भावना करतो... समाधि-संबोज्झंगाची भावना करतो... विवेक-निश्रित, विराग-निश्रित, nirodha-निश्रित आणि त्याग-परिणामी उपेक्खा-संबोज्झंगाची भावना करतो. आवुसो, याला भावना-प्रधान असे म्हटले जाते. ‘‘กตมญฺจาวุโส, อนุรกฺขณาปธานํ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ อุปฺปนฺนํ ภทฺรกํ สมาธินิมิตฺตํ อนุรกฺขติ – อฏฺฐิกสญฺญํ, ปุฬุวกสญฺญํ, วินีลกสญฺญํ, วิจฺฉิทฺทกสญฺญํ, อุทฺธุมาตกสญฺญํ. อิทํ วุจฺจตาวุโส, อนุรกฺขณาปธานํ. आणि आवुसो, अनुरक्षण-प्रधान कोणते आहे? येथे, आवुसो, भिक्खू उत्पन्न झालेल्या कल्याणकारी समाधी-निमित्ताचे रक्षण करतो – जसे की अस्थि-संज्ञा (हाडांचा सांगाडा), पुळुवक-संज्ञा (किड्यांनी भरलेले प्रेत), विनीलक-संज्ञा (निळसर पडलेले प्रेत), विच्छिद्द्क-संज्ञा (छिन्नविच्छिन्न झालेले प्रेत), उद्धुमातक-संज्ञा (फुगलेले प्रेत). आवुसो, याला अनुरक्षण-प्रधान असे म्हटले जाते. ‘‘จตฺตาริ ญาณานิ – ธมฺเม ญาณํ, อนฺวเย ญาณํ, ปริเย ญาณํ, สมฺมุติยา ญาณํ. चार ज्ञाने आहेत – धम्मज्ञान, अन्वयज्ञान, परियज्ञान (परचित्तज्ञान) आणि संमृतिज्ञान. ‘‘อปรานิปิ [Pg.190] จตฺตาริ ญาณานิ – ทุกฺเข ญาณํ, ทุกฺขสมุทเย ญาณํ, ทุกฺขนิโรเธ ญาณํ, ทุกฺขนิโรธคามินิยา ปฏิปทาย ญาณํ. इतरही चार ज्ञाने आहेत – दुःखाचे ज्ञान, दुःखसमुदयाचे ज्ञान, दुःखनिरोधाचे ज्ञान आणि दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदेचे ज्ञान. ๓๑๑. ‘‘จตฺตาริ โสตาปตฺติยงฺคานิ – สปฺปุริสสํเสโว, สทฺธมฺมสฺสวนํ, โยนิโสมนสิกาโร, ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปตฺติ. ३११. चार सोतापत्तीची अंगे आहेत – सत्पुरुषांची संगत, सद्धम्माचे श्रवण, योनिशो मनसिकार आणि धम्मानुधम्म प्रतिपत्ती. ‘‘จตฺตาริ โสตาปนฺนสฺส องฺคานิ. อิธาวุโส, อริยสาวโก พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคโต โหติ – ‘อิติปิ โส ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน สุคโต โลกวิทู อนุตฺตโร ปุริสทมฺมสารถิ สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ, ภควา’ติ. ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคโต โหติ – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม สนฺทิฏฺฐิโก อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคโต โหติ – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ อุชุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ ญายปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ สามีจิปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ ยทิทํ จตฺตาริ ปุริสยุคานิ อฏฺฐ ปุริสปุคฺคลา, เอส ภควโต สาวกสงฺโฆ อาหุเนยฺโย ปาหุเนยฺโย ทกฺขิเณยฺโย อญฺชลิกรณีโย อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสา’ติ. อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคโต โหติ อขณฺเฑหิ อจฺฉิทฺเทหิ อสพเลหิ อกมฺมาเสหิ ภุชิสฺเสหิ วิญฺญุปฺปสตฺเถหิ อปรามฏฺเฐหิ สมาธิสํวตฺตนิเกหิ. सोतापन्नाची चार अंगे आहेत. येथे, आवुसो, आर्यश्रावक बुद्धांच्या ठिकाणी अचल श्रद्धेने युक्त असतो – 'ते भगवान असे आहेत: ते अर्हत, सम्यक सम्बुद्ध, विद्या आणि चरणाने संपन्न, सुगत, लोकविदू, अनुत्तर पुरुषदम्यसारथी, देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध आणि भगवान आहेत.' धम्माच्या ठिकाणी अचल श्रद्धेने युक्त असतो – 'भगवंतांनी धम्म सुंदर रीतीने सांगितला आहे, तो याच जन्मात प्रत्यक्ष फळ देणारा, तात्काळ फळ देणारा, 'ये आणि स्वतः पाहा' असे म्हणण्यास योग्य, स्वतःच्या कल्याणासाठी आचरणात आणण्याजोगा आणि सुज्ञांनी आपापल्या परीने अनुभवण्याजोगा आहे.' संघाच्या ठिकाणी अचल श्रद्धेने युक्त असतो – 'भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ ऋजुप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ न्यायप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ सामीचीप्रतिपन्न आहे. म्हणजेच हे जे चार पुरुषयुग आणि आठ पुरुषपुद्गल आहेत, हा भगवंतांचा श्रावकसंघ आहुनेय, पाहुनेय, दक्खिणेय, अंजलिकरणीय आणि जगातील सर्वश्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र आहे.' तो आर्यांना प्रिय असणाऱ्या, अखंड, अछिद्र, डाग नसलेल्या, निष्कलंक, बंधनांतून मुक्त करणाऱ्या, विद्वानांनी प्रशंसिलेल्या, तृष्णा व दृष्टीने स्पर्श न केलेल्या आणि समाधीला पोषक असणाऱ्या शीलांनी संपन्न असतो. ‘‘จตฺตาริ สามญฺญผลานิ – โสตาปตฺติผลํ, สกทาคามิผลํ, อนาคามิผลํ, อรหตฺตผลํ. चार श्रामण्यफळे आहेत – सोतापत्ति-फल, सकदागामि-फल, अनागामि-फल आणि अरहत्त-फल. ‘‘จตสฺโส ธาตุโย – ปถวีธาตุ, อาโปธาตุ, เตโชธาตุ, วาโยธาตุ. चार धातू आहेत – पठवीधातू, आपोधातू, तेजोधातू आणि वायोधातू. ‘‘จตฺตาโร อาหารา – กพฬีกาโร อาหาโร โอฬาริโก วา สุขุโม วา, ผสฺโส ทุติโย, มโนสญฺเจตนา ตติยา, วิญฺญาณํ จตุตฺถํ. चार आहार आहेत – पहिला कबाळीकार आहार (कवळ करून खाल्ला जाणारा स्थूल किंवा सूक्ष्म अन्नपदार्थ), दुसरा फस्स (स्पर्श), तिसरा मनोसंचेतना (मानसिक संकल्प) आणि चौथा विज्ञाण (चेतना). ‘‘จตสฺโส วิญฺญาณฏฺฐิติโย. รูปูปายํ วา, อาวุโส, วิญฺญาณํ ติฏฺฐมานํ ติฏฺฐติ รูปารมฺมณํ รูปปฺปติฏฺฐํ นนฺทูปเสจนํ วุทฺธึ วิรูฬฺหึ เวปุลฺลํ อาปชฺชติ; เวทนูปายํ [Pg.191] วา อาวุโส…เป… สญฺญูปายํ วา, อาวุโส…เป… สงฺขารูปายํ วา, อาวุโส, วิญฺญาณํ ติฏฺฐมานํ ติฏฺฐติ สงฺขารารมฺมณํ สงฺขารปฺปติฏฺฐํ นนฺทูปเสจนํ วุทฺธึ วิรูฬฺหึ เวปุลฺลํ อาปชฺชติ. चार विज्ञान-स्थिती (विज्ञानाची राहण्याची ठिकाणे) आहेत. हे आवुसो (मित्रांनो), रूप हेच ज्याचे साधन (आश्रय) आहे, रूप हेच ज्याचे आलंबन (विषय) आहे, रूप हेच ज्याचे अधिष्ठान आहे, असे विज्ञान (रूपामध्ये) प्रतिष्ठित होऊन राहते; आणि तृष्णेच्या सिंचनाने ते वाढीस, वृद्धीस व विशालतेस प्राप्त होते. हे आवुसो, वेदना हेच ज्याचे साधन आहे... हे आवुसो, संज्ञा हेच ज्याचे साधन आहे... हे आवुसो, संस्कार हेच ज्याचे साधन आहे, संस्कार हेच ज्याचे आलंबन आहे, संस्कार हेच ज्याचे अधिष्ठान आहे, असे विज्ञान (संस्कारांमध्ये) प्रतिष्ठित होऊन राहते; आणि तृष्णेच्या सिंचनाने ते वाढीस, वृद्धीस व विशालतेस प्राप्त होते. ‘‘จตฺตาริ อคติคมนานิ – ฉนฺทาคตึ คจฺฉติ, โทสาคติ คจฺฉติ, โมหาคตึ คจฺฉติ, ภยาคตึ คจฺฉติ. चार अगतिक मार्ग (चुकीच्या मार्गाने जाणे) आहेत – छंदाने (आसक्तीने) चुकीच्या मार्गाने जाणे, द्वेषाने चुकीच्या मार्गाने जाणे, मोहाने चुकीच्या मार्गाने जाणे, भयाने चुकीच्या मार्गाने जाणे. ‘‘จตฺตาโร ตณฺหุปฺปาทา – จีวรเหตุ วา, อาวุโส, ภิกฺขุโน ตณฺหา อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชติ; ปิณฺฑปาตเหตุ วา, อาวุโส, ภิกฺขุโน ตณฺหา อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชติ; เสนาสนเหตุ วา, อาวุโส, ภิกฺขุโน ตณฺหา อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชติ; อิติภวาภวเหตุ วา, อาวุโส, ภิกฺขุโน ตณฺหา อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชติ. चार तृष्णा-उत्पत्तीची कारणे आहेत – हे आवुसो, भिक्खूला चीवराच्या कारणाने तृष्णा उत्पन्न होते; पिंडपाताच्या (अन्नाच्या) कारणाने भिक्खूला तृष्णा उत्पन्न होते; सेनासनाच्या (निवासस्थानाच्या) कारणाने भिक्खूला तृष्णा उत्पन्न होते; आणि इती-भवाभव (अस्तित्व आणि अन-अस्तित्व किंवा उत्तमोत्तम वस्तूंच्या प्राप्तीसाठी) कारणाने भिक्खूला तृष्णा उत्पन्न होते. ‘‘จตสฺโส ปฏิปทา – ทุกฺขา ปฏิปทา ทนฺธาภิญฺญา, ทุกฺขา ปฏิปทา ขิปฺปาภิญฺญา, สุขา ปฏิปทา ทนฺธาภิญฺญา, สุขา ปฏิปทา ขิปฺปาภิญฺญา. चार प्रतिपदा (साधना मार्ग) आहेत – दुःखद प्रतिपदा मंद-अभिज्ञा (मंद आकलन असणारी), दुःखद प्रतिपदा क्षिप्र-अभिज्ञा (शीघ्र आकलन असणारी), सुखद प्रतिपदा मंद-अभिज्ञा, आणि सुखद प्रतिपदा क्षिप्र-अभिज्ञा. ‘‘อปราปิ จตสฺโส ปฏิปทา – อกฺขมา ปฏิปทา, ขมา ปฏิปทา, ทมา ปฏิปทา, สมา ปฏิปทา. इतरही चार प्रतिपदा आहेत – असहिष्णू प्रतिपदा (थंडी-उन्हादी सहन न करणारी), सहिष्णू प्रतिपदा (सहन करणारी), दमन करणारी प्रतिपदा (इंद्रिय संयम करणारी), आणि शमन करणारी प्रतिपदा (विचारांचे शमन करणारी). ‘‘จตฺตาริ ธมฺมปทานิ – อนภิชฺฌา ธมฺมปทํ, อพฺยาปาโท ธมฺมปทํ, สมฺมาสติ ธมฺมปทํ, สมฺมาสมาธิ ธมฺมปทํ. चार धम्मपदे (धम्माचे घटक) आहेत – अनभिध्या (लोभ नसणे) धम्मपद, अव्यापाद (द्वेष नसणे) धम्मपद, सम्यक स्मृती धम्मपद, आणि सम्यक समाधी धम्मपद. ‘‘จตฺตาริ ธมฺมสมาทานานิ – อตฺถาวุโส, ธมฺมสมาทานํ ปจฺจุปฺปนฺนทุกฺขญฺเจว อายติญฺจ ทุกฺขวิปากํ. อตฺถาวุโส, ธมฺมสมาทานํ ปจฺจุปฺปนฺนทุกฺขํ อายตึ สุขวิปากํ. อตฺถาวุโส, ธมฺมสมาทานํ ปจฺจุปฺปนฺนสุขํ อายตึ ทุกฺขวิปากํ. อตฺถาวุโส, ธมฺมสมาทานํ ปจฺจุปฺปนฺนสุขญฺเจว อายติญฺจ สุขวิปากํ. चार धम्म-समादान (धम्माचे आचरण करण्याचे प्रकार) आहेत – हे आवुसो, असे धम्म-समादान आहे जे वर्तमानात दुःखद असते आणि भविष्यातही दुःखद विपाक (परिणाम) देणारे असते. हे आवुसो, असे धम्म-समादान आहे जे वर्तमानात दुःखद असते पण भविष्यात सुखद विपाक देणारे असते. हे आवुसो, असे धम्म-समादान आहे जे वर्तमानात सुखद असते पण भविष्यात दुःखद विपाक देणारे असते. हे आवुसो, असे धम्म-समादान आहे जे वर्तमानातही सुखद असते आणि भविष्यातही सुखद विपाक देणारे असते. ‘‘จตฺตาโร ธมฺมกฺขนฺธา – สีลกฺขนฺโธ, สมาธิกฺขนฺโธ, ปญฺญากฺขนฺโธ, วิมุตฺติกฺขนฺโธ. चार धम्मस्कंध (धम्माचे समूह) आहेत – शीलस्कंध, समाधीस्कंध, प्रज्ञास्कंध, आणि विमुक्तीस्कंध. ‘‘จตฺตาริ พลานิ – วีริยพลํ, สติพลํ, สมาธิพลํ, ปญฺญาพลํ. चार बले (शक्ती) आहेत – वीर्यबल (ऊर्जा/प्रयत्न), स्मृतीबल, समाधीबल, आणि प्रज्ञाबल. ‘‘จตฺตาริ อธิฏฺฐานานิ – ปญฺญาธิฏฺฐานํ, สจฺจาธิฏฺฐานํ, จาคาธิฏฺฐานํ, อุปสมาธิฏฺฐานํ. चार अधिष्ठान (निश्चय/दृढ संकल्प) आहेत – प्रज्ञा-अधिष्ठान, सत्य-अधिष्ठान, त्याग-अधिष्ठान (दान), आणि उपशम-अधिष्ठान (शांती). ๓๑๒. ‘‘จตฺตาริ [Pg.192] ปญฺหพฺยากรณานิ – เอกํสพฺยากรณีโย ปญฺโห, ปฏิปุจฺฉาพฺยากรณีโย ปญฺโห, วิภชฺชพฺยากรณีโย ปญฺโห, ฐปนีโย ปญฺโห. ३१२. चार प्रश्न-व्याकरण (प्रश्नांची उत्तरे देण्याच्या पद्धती) आहेत – एकांश-व्याकरणीय प्रश्न (थेट उत्तर देण्याचा प्रश्न), प्रतिपृच्छा-व्याकरणीय प्रश्न (उलट प्रश्न विचारून उत्तर देण्याचा प्रश्न), विभज्ज-व्याकरणीय प्रश्न (विश्लेषण करून उत्तर देण्याचा प्रश्न), आणि ठापनीय प्रश्न (बाजूला ठेवून देण्याचा/उत्तर न देण्याचा प्रश्न). ‘‘จตฺตาริ กมฺมานิ – อตฺถาวุโส, กมฺมํ กณฺหํ กณฺหวิปากํ; อตฺถาวุโส, กมฺมํ สุกฺกํ สุกฺกวิปากํ; อตฺถาวุโส, กมฺมํ กณฺหสุกฺกํ กณฺหสุกฺกวิปากํ; อตฺถาวุโส, กมฺมํ อกณฺหอสุกฺกํ อกณฺหอสุกฺกวิปากํ กมฺมกฺขยาย สํวตฺตติ. चार कर्मे आहेत – हे आवुसो, कृष्ण (काळे) कर्म ज्याचा कृष्ण विपाक (काळा परिणाम) असतो; हे आवुसो, शुक्ल (पांढरे) कर्म ज्याचा शुक्ल विपाक असतो; हे आवुसो, कृष्ण-शुक्ल (मिश्र) कर्म ज्याचा कृष्ण-शुक्ल विपाक असतो; आणि हे आवुसो, अकृष्ण-अशुक्ल कर्म ज्याचा अकृष्ण-अशुक्ल विपाक असतो, जे कर्माच्या क्षयासाठी कारणीभूत ठरते. ‘‘จตฺตาโร สจฺฉิกรณียา ธมฺมา – ปุพฺเพนิวาโส สติยา สจฺฉิกรณีโย; สตฺตานํ จุตูปปาโต จกฺขุนา สจฺฉิกรณีโย; อฏฺฐ วิโมกฺขา กาเยน สจฺฉิกรณียา; อาสวานํ ขโย ปญฺญาย สจฺฉิกรณีโย. चार साक्षात्करणीय धम्म (प्रत्यक्ष अनुभव घेण्याजोगे धम्म) आहेत – पूर्वनिवास (मागील जन्मांचे स्मरण) स्मृतीद्वारे साक्षात्करणीय आहे; प्राण्यांचे च्युती-उत्पत्ती (मृत्यू आणि जन्म) दिव्य-चक्षूंद्वारे साक्षात्करणीय आहे; आठ विमोक्ष नामकायाने (चित्ताने) साक्षात्करणीय आहेत; आणि आसवांचा क्षय प्रज्ञेद्वारे साक्षात्करणीय आहे. ‘‘จตฺตาโร โอฆา – กาโมโฆ, ภโวโฆ, ทิฏฺโฐโฆ, อวิชฺโชโฆ. चार ओघ (महापूर) आहेत – कामौघ (कामासक्तीचा पूर), भवाौघ (अस्तित्वाचा पूर), दिठ्ठौघ (चुकीच्या दृष्टीचा पूर), आणि अविद्याौघ (अज्ञानाचा पूर). ‘‘จตฺตาโร โยคา – กามโยโค, ภวโยโค, ทิฏฺฐิโยโค, อวิชฺชาโยโค. चार योग (बंधने) आहेत – कामयोग, भवयोग, दिठ्ठियोग, आणि अविद्यायोग. ‘‘จตฺตาโร วิสญฺโญคา – กามโยควิสญฺโญโค, ภวโยควิสญฺโญโค, ทิฏฺฐิโยควิสญฺโญโค, อวิชฺชาโยควิสญฺโญโค. चार विसंयोग (बंधनांतून सुटका) आहेत – कामयोग-विसंयोग, भवयोग-विसंयोग, दिठ्ठियोग-विसंयोग, आणि अविद्यायोग-विसंयोग. ‘‘จตฺตาโร คนฺถา – อภิชฺฌา กายคนฺโถ, พฺยาปาโท กายคนฺโถ, สีลพฺพตปรามาโส กายคนฺโถ, อิทํสจฺจาภินิเวโส กายคนฺโถ. चार ग्रंथ (गाठी/बंधने) आहेत – अभिध्या कायग्रंथ (लोभाची शारीरिक गाठ), व्यापाद कायग्रंथ (द्वेषाची शारीरिक गाठ), शीलव्रत-परामर्श कायग्रंथ (कर्मकांडांच्या आसक्तीची शारीरिक गाठ), आणि 'हेच सत्य आहे' असा अभिनिवेश असणारा कायग्रंथ (हट्टाग्रहाची शारीरिक गाठ). ‘‘จตฺตาริ อุปาทานานิ – กามุปาทานํ, ทิฏฺฐุปาทานํ, สีลพฺพตุปาทานํ, อตฺตวาทุปาทานํ. चार उपादाने (तीव्र आसक्ती/पकड) आहेत – कामुपादान, दिठ्ठुपादान (दृष्टी-उपादान), शीलव्रतुपादान, आणि आत्मवादुपादान. ‘‘จตสฺโส โยนิโย – อณฺฑชโยนิ, ชลาพุชโยนิ, สํเสทชโยนิ, โอปปาติกโยนิ. चार योनी (उत्पत्तीचे प्रकार) आहेत – अंडज योनी (अंड्यातून जन्मणारे), जरायुज योनी (गर्भाशयातून जन्मणारे), संस्वेदज योनी (दमटपणा किंवा घामातून जन्मणारे), आणि औपपातिक योनी (अचानक प्रकट होणारे/स्वयंभू). ‘‘จตสฺโส คพฺภาวกฺกนฺติโย. อิธาวุโส, เอกจฺโจ อสมฺปชาโน มาตุกุจฺฉึ โอกฺกมติ, อสมฺปชาโน มาตุกุจฺฉิสฺมึ ฐาติ, อสมฺปชาโน มาตุกุจฺฉิมฺหา นิกฺขมติ, อยํ ปฐมา คพฺภาวกฺกนฺติ. ปุน จปรํ, อาวุโส, อิเธกจฺโจ [Pg.193] สมฺปชาโน มาตุกุจฺฉึ โอกฺกมติ, อสมฺปชาโน มาตุกุจฺฉิสฺมึ ฐาติ, อสมฺปชาโน มาตุกุจฺฉิมฺหา นิกฺขมติ, อยํ ทุติยา คพฺภาวกฺกนฺติ. ปุน จปรํ, อาวุโส, อิเธกจฺโจ สมฺปชาโน มาตุกุจฺฉึ โอกฺกมติ, สมฺปชาโน มาตุกุจฺฉิสฺมึ ฐาติ, อสมฺปชาโน มาตุกุจฺฉิมฺหา นิกฺขมติ, อยํ ตติยา คพฺภาวกฺกนฺติ. ปุน จปรํ, อาวุโส, อิเธกจฺโจ สมฺปชาโน มาตุกุจฺฉึ โอกฺกมติ, สมฺปชาโน มาตุกุจฺฉิสฺมึ ฐาติ, สมฺปชาโน มาตุกุจฺฉิมฺหา นิกฺขมติ, อยํ จตุตฺถา คพฺภาวกฺกนฺติ. चार गर्भावक्रांती (गर्भात प्रवेश करण्याचे प्रकार) आहेत. हे आवुसो, या जगात एखादी व्यक्ती अजाणतेपणे (असंप्रजन्य अवस्थेत) मातेच्या गर्भात प्रवेश करते, अजाणतेपणे गर्भात राहते आणि अजाणतेपणेच गर्भातून बाहेर पडते; ही पहिली गर्भावक्रांती होय. पुन्हा, हे आवुसो, एखादी व्यक्ती जाणतेपणे (संप्रजन्य अवस्थेत) मातेच्या गर्भात प्रवेश करते, पण अजाणतेपणे गर्भात राहते आणि अजाणतेपणेच गर्भातून बाहेर पडते; ही दुसरी गर्भावक्रांती होय. पुन्हा, हे आवुसो, एखादी व्यक्ती जाणतेपणे मातेच्या गर्भात प्रवेश करते, जाणतेपणे गर्भात राहते, पण अजाणतेपणे गर्भातून बाहेर पडते; ही तिसरी गर्भावक्रांती होय. पुन्हा, हे आवुसो, एखादी व्यक्ती जाणतेपणे मातेच्या गर्भात प्रवेश करते, जाणतेपणे गर्भात राहते आणि जाणतेपणेच गर्भातून बाहेर पडते; ही चौथी गर्भावक्रांती होय. ‘‘จตฺตาโร อตฺตภาวปฏิลาภา. อตฺถาวุโส, อตฺตภาวปฏิลาโภ, ยสฺมึ อตฺตภาวปฏิลาเภ อตฺตสญฺเจตนาเยว กมติ, โน ปรสญฺเจตนา. อตฺถาวุโส, อตฺตภาวปฏิลาโภ, ยสฺมึ อตฺตภาวปฏิลาเภ ปรสญฺเจตนาเยว กมติ, โน อตฺตสญฺเจตนา. อตฺถาวุโส, อตฺตภาวปฏิลาโภ, ยสฺมึ อตฺตภาวปฏิลาเภ อตฺตสญฺเจตนา เจว กมติ ปรสญฺเจตนา จ. อตฺถาวุโส, อตฺตภาวปฏิลาโภ, ยสฺมึ อตฺตภาวปฏิลาเภ เนว อตฺตสญฺเจตนา กมติ, โน ปรสญฺเจตนา. चार आत्मभाव-प्रतिलाभ (नवीन अस्तित्व किंवा शरीर प्राप्त होणे) आहेत. हे आवुसो, असा आत्मभाव-प्रतिलाभ आहे, ज्यामध्ये केवळ स्वतःचीच चेतना (इच्छा) कार्य करते, दुसऱ्याची नाही. हे आवुसो, असा आत्मभाव-प्रतिलाभ आहे, ज्यामध्ये केवळ दुसऱ्याचीच चेतना कार्य करते, स्वतःची नाही. हे आवुसो, असा आत्मभाव-प्रतिलाभ आहे, ज्यामध्ये स्वतःची आणि दुसऱ्याची, दोघांचीही चेतना कार्य करते. हे आवुसो, असा आत्मभाव-प्रतिलाभ आहे, ज्यामध्ये ना स्वतःची चेतना कार्य करते, ना दुसऱ्याची. ๓๑๓. ‘‘จตสฺโส ทกฺขิณาวิสุทฺธิโย. อตฺถาวุโส, ทกฺขิณา ทายกโต วิสุชฺฌติ โน ปฏิคฺคาหกโต. อตฺถาวุโส, ทกฺขิณา ปฏิคฺคาหกโต วิสุชฺฌติ โน ทายกโต. อตฺถาวุโส, ทกฺขิณา เนว ทายกโต วิสุชฺฌติ โน ปฏิคฺคาหกโต. อตฺถาวุโส, ทกฺขิณา ทายกโต เจว วิสุชฺฌติ ปฏิคฺคาหกโต จ. ३१३. चार दक्षिणा-विशुद्धी (दानाच्या शुद्धतेचे प्रकार) आहेत. हे आवुसो, अशी दक्षिणा (दान) आहे जी दात्यामुळे शुद्ध होते, पण प्रतिग्राहकामुळे (दान स्वीकारणाऱ्यामुळे) नाही. हे आवुसो, अशी दक्षिणा आहे जी प्रतिग्राहकामुळे शुद्ध होते, पण दात्यामुळे नाही. हे आवुसो, अशी दक्षिणा आहे जी ना दात्यामुळे शुद्ध होते, ना प्रतिग्राहकामुळे. हे आवुसो, अशी दक्षिणा आहे जी दात्यामुळेही शुद्ध होते आणि प्रतिग्राहकामुळेही. ‘‘จตฺตาริ สงฺคหวตฺถูนิ – ทานํ, เปยฺยวชฺชํ, อตฺถจริยา, สมานตฺตตา. चार संग्रहवस्तू (लोकांमध्ये सलोखा निर्माण करण्याचे मार्ग) आहेत – दान, प्रियवचन (गोड बोलणे), अर्थचर्या (कल्याणकारी आचरण), आणि समानार्थता (समानतेची वागणूक). ‘‘จตฺตาโร อนริยโวหารา – มุสาวาโท, ปิสุณาวาจา, ผรุสาวาจา, สมฺผปฺปลาโป. चार अनार्य व्यवहार (अयोग्य संभाषण) आहेत – मृषावाद (खोटे बोलणे), पिशुनवाचा (चहाडी करणे), परुषवाचा (कठोर/उद्धट बोलणे), आणि संफप्पलाप (व्यर्थ बडबड करणे). ‘‘จตฺตาโร อริยโวหารา – มุสาวาทา เวรมณี, ปิสุณาย วาจาย เวรมณี, ผรุสาย วาจาย เวรมณี, สมฺผปฺปลาปา เวรมณี. चार आर्य व्यवहार (योग्य संभाषण) आहेत – मृषावादापासून विरत राहणे (खोटे न बोलणे), पिशुनवाचेपासून विरत राहणे (चहाडी न करणे), परुषवाचेपासून विरत राहणे (कठोर न बोलणे), आणि संफप्पलापापासून विरत राहणे (व्यर्थ बडबड न करणे). ‘‘อปเรปิ จตฺตาโร อนริยโวหารา – อทิฏฺเฐ ทิฏฺฐวาทิตา, อสฺสุเต สุตวาทิตา, อมุเต มุตวาทิตา, อวิญฺญาเต วิญฺญาตวาทิตา. इतरही चार अनार्य व्यवहार आहेत – न पाहिलेल्या गोष्टीला 'पाहिले' असे सांगणे, न ऐकलेल्या गोष्टीला 'ऐकले' असे सांगणे, अनुभव न घेतलेल्या गोष्टीला 'अनुभव घेतला' असे सांगणे, आणि न समजलेल्या गोष्टीला 'समजले' असे सांगणे. ‘‘อปเรปิ [Pg.194] จตฺตาโร อริยโวหารา – อทิฏฺเฐ อทิฏฺฐวาทิตา, อสฺสุเต อสฺสุตวาทิตา, อมุเต อมุตวาทิตา, อวิญฺญาเต อวิญฺญาตวาทิตา. इतरही चार आर्य-व्यवहार (बोलण्याचे मार्ग) आहेत – न पाहिलेल्या गोष्टीला 'पाहिले नाही' असे सांगणे, न ऐकलेल्या गोष्टीला 'ऐकले नाही' असे सांगणे, न अनुभवलेल्या गोष्टीला 'अनुभवले नाही' असे सांगणे, आणि न जाणलेल्या गोष्टीला 'जाणले नाही' असे सांगणे. ‘‘อปเรปิ จตฺตาโร อนริยโวหารา – ทิฏฺเฐ อทิฏฺฐวาทิตา, สุเต อสฺสุตวาทิตา, มุเต อมุตวาทิตา, วิญฺญาเต อวิญฺญาตวาทิตา. इतरही चार अनार्य-व्यवहार आहेत – पाहिलेल्या गोष्टीला 'पाहिले नाही' असे सांगणे, ऐकलेल्या गोष्टीला 'ऐकले नाही' असे सांगणे, अनुभवलेल्या गोष्टीला 'अनुभवले नाही' असे सांगणे, आणि जाणलेल्या गोष्टीला 'जाणले नाही' असे सांगणे. ‘‘อปเรปิ จตฺตาโร อริยโวหารา – ทิฏฺเฐ ทิฏฺฐวาทิตา, สุเต สุตวาทิตา, มุเต มุตวาทิตา, วิญฺญาเต วิญฺญาตวาทิตา. इतरही चार आर्य-व्यवहार आहेत – पाहिलेल्या गोष्टीला 'पाहिले आहे' असे सांगणे, ऐकलेल्या गोष्टीला 'ऐकले आहे' असे सांगणे, अनुभवलेल्या गोष्टीला 'अनुभवले आहे' असे सांगणे, आणि जाणलेल्या गोष्टीला 'जाणले आहे' असे सांगणे. ๓๑๔. ‘‘จตฺตาโร ปุคฺคลา. อิธาวุโส, เอกจฺโจ ปุคฺคโล อตฺตนฺตโป โหติ อตฺตปริตาปนานุโยคมนุยุตฺโต. อิธาวุโส, เอกจฺโจ ปุคฺคโล ปรนฺตโป โหติ ปรปริตาปนานุโยคมนุยุตฺโต. อิธาวุโส, เอกจฺโจ ปุคฺคโล อตฺตนฺตโป จ โหติ อตฺตปริตาปนานุโยคมนุยุตฺโต, ปรนฺตโป จ ปรปริตาปนานุโยคมนุยุตฺโต. อิธาวุโส, เอกจฺโจ ปุคฺคโล เนว อตฺตนฺตโป โหติ น อตฺตปริตาปนานุโยคมนุยุตฺโต น ปรนฺตโป น ปรปริตาปนานุโยคมนุยุตฺโต. โส อนตฺตนฺตโป อปรนฺตโป ทิฏฺเฐว ธมฺเม นิจฺฉาโต นิพฺพุโต สีตีภูโต สุขปฺปฏิสํเวที พฺรหฺมภูเตน อตฺตนา วิหรติ. ३१४. चार प्रकारचे व्यक्ती असतात. आवुसो (मित्रांनो), या जगात एखादी व्यक्ती स्वतःला छळणारी (स्वतःला ताप देणारी) असते आणि स्वतःला क्लेश देण्याच्या अभ्यासात मग्न असते. आवुसो, एखादी व्यक्ती दुसऱ्यांना छळणारी (दुसऱ्याला ताप देणारी) असते आणि दुसऱ्यांना क्लेश देण्याच्या अभ्यासात मग्न असते. आवुसो, एखादी व्यक्ती स्वतःलाही छळणारी असते आणि स्वतःला क्लेश देण्याच्या अभ्यासात मग्न असते, तसेच दुसऱ्यांनाही छळणारी असते आणि दुसऱ्यांना क्लेश देण्याच्या अभ्यासात मग्न असते. आवुसो, एखादी व्यक्ती स्वतःलाही छळत नाही आणि स्वतःला क्लेश देण्याच्या अभ्यासात मग्न नसते, तसेच दुसऱ्यांनाही छळत नाही आणि दुसऱ्यांना क्लेश देण्याच्या अभ्यासात मग्न नसते. ती व्यक्ती स्वतःला न छळणारी, दुसऱ्यांना न छळणारी, याच जन्मात तृष्णारहित (निच्छातो), शांत (निब्बुतो), शीतल झालेली (सीतीभूतो), सुखाचा अनुभव घेणारी आणि ब्रह्मस्वरूप झालेल्या स्वतःच्या अंतःकरणाने जीवन जगते. ‘‘อปเรปิ จตฺตาโร ปุคฺคลา. อิธาวุโส, เอกจฺโจ ปุคฺคโล อตฺตหิตาย ปฏิปนฺโน โหติ โน ปรหิตาย. อิธาวุโส, เอกจฺโจ ปุคฺคโล ปรหิตาย ปฏิปนฺโน โหติ โน อตฺตหิตาย. อิธาวุโส, เอกจฺโจ ปุคฺคโล เนว อตฺตหิตาย ปฏิปนฺโน โหติ โน ปรหิตาย. อิธาวุโส, เอกจฺโจ ปุคฺคโล อตฺตหิตาย เจว ปฏิปนฺโน โหติ ปรหิตาย จ. इतरही चार प्रकारचे व्यक्ती असतात. आवुसो, या जगात एखादी व्यक्ती स्वतःच्या हितासाठी तत्पर असते, पण दुसऱ्यांच्या हितासाठी नाही. आवुसो, एखादी व्यक्ती दुसऱ्यांच्या हितासाठी तत्पर असते, पण स्वतःच्या हितासाठी नाही. आवुसो, एखादी व्यक्ती स्वतःच्या हितासाठीही तत्पर नसते आणि दुसऱ्यांच्या हितासाठीही नाही. आवुसो, एखादी व्यक्ती स्वतःच्या हितासाठीही तत्पर असते आणि दुसऱ्यांच्या हितासाठीही. ‘‘อปเรปิ จตฺตาโร ปุคฺคลา – ตโม ตมปรายโน, ตโม โชติปรายโน, โชติ ตมปรายโน, โชติ โชติปรายโน. इतरही चार प्रकारचे व्यक्ती असतात – अंधारात राहणारा आणि अंधाराकडेच जाणारा (तमो तमपरायणो), अंधारात राहणारा आणि प्रकाशाकडे जाणारा (तमो जोतिपरायणो), प्रकाशात राहणारा आणि अंधाराकडे जाणारा (जोति तमपरायणो), आणि प्रकाशात राहणारा आणि प्रकाशाकडेच जाणारा (जोति जोतिपरायणो). ‘‘อปเรปิ จตฺตาโร ปุคฺคลา – สมณมจโล, สมณปทุโม, สมณปุณฺฑรีโก, สมเณสุ สมณสุขุมาโล. इतरही चार प्रकारचे व्यक्ती असतात – अचल श्रमण (समणमचलो), नीलकमल श्रमण (समणपदुमो), श्वेतकमल श्रमण (समणपुण्डरीको), आणि श्रमणांमध्ये अत्यंत सुकुमार श्रमण (समणेसु समणसुखुमालो). ‘‘อิเม [Pg.195] โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน จตฺตาโร ธมฺมา สมฺมทกฺขาตา; ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ…เป… อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. आवुसो, सर्वज्ञ, दिव्यचक्षूने पाहणाऱ्या, अर्हत आणि सम्यक संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी या चार धम्मांचे उत्तम प्रकारे प्रतिपादन केले आहे; तिथे आपण सर्वांनी मिळून संगायन (एकत्र पाठ) केले पाहिजे... जेणेकरून ते देव आणि मानवांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी ठरेल. ปฐมภาณวาโร นิฏฺฐิโต. प्रथम भाणवार (पहिले वाचन) समाप्त झाले. ปญฺจกํ पंचक (पाच गोष्टींचा समूह) ๓๑๕. ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน ปญฺจ ธมฺมา สมฺมทกฺขาตา. ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ…เป… อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. กตเม ปญฺจ? ३१५. आवुसो, सर्वज्ञ, दिव्यचक्षूने पाहणाऱ्या, अर्हत आणि सम्यक संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी पाच धम्मांचे उत्तम प्रकारे प्रतिपादन केले आहे. तिथे आपण सर्वांनी मिळून संगायन केले पाहिजे... जेणेकरून ते देव आणि मानवांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी ठरेल. ते पाच कोणते? ‘‘ปญฺจกฺขนฺธา. รูปกฺขนฺโธ เวทนากฺขนฺโธ สญฺญากฺขนฺโธ สงฺขารกฺขนฺโธ วิญฺญาณกฺขนฺโธ. पाच स्कंध (पंचस्कंध) – रूपस्कंध, वेदनास्कंध, संज्ञास्कंध, संस्कारस्कंध आणि विज्ञानस्कंध. ‘‘ปญฺจุปาทานกฺขนฺธา. รูปุปาทานกฺขนฺโธ เวทนุปาทานกฺขนฺโธ สญฺญุปาทานกฺขนฺโธ สงฺขารุปาทานกฺขนฺโธ วิญฺญาณุปาทานกฺขนฺโธ. पाच उपादानस्कंध – रूपोपादानस्कंध, वेदनोपादानस्कंध, संज्ञोपादानस्कंध, संस्कारोपादानस्कंध आणि विज्ञानोपादानस्कंध. ‘‘ปญฺจ กามคุณา. จกฺขุวิญฺเญยฺยา รูปา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสญฺหิตา รชนียา, โสตวิญฺเญยฺยา สทฺทา… ฆานวิญฺเญยฺยา คนฺธา… ชิวฺหาวิญฺเญยฺยา รสา… กายวิญฺเญยฺยา โผฏฺฐพฺพา อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา ปิยรูปา กามูปสญฺหิตา รชนียา. पाच कामगुण – डोळ्यांनी जाणता येणारे, इष्ट, कांत (प्रिय), मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे रूप; कानांनी जाणता येणारे... शब्द; नाकाने जाणता येणारे... गंध; जिभेने जाणता येणारे... रस; आणि शरीराने जाणता येणारे, इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे स्पर्श (फोट्ठब्ब). ‘‘ปญฺจ คติโย – นิรโย, ติรจฺฉานโยนิ, เปตฺติวิสโย, มนุสฺสา, เทวา. पाच गती – नरक (निरय), तिर्यकयोनी (प्राणीयोनी), प्रेतयोनी (पेत्तिविसय), मनुष्यलोक आणि देवलोक. ‘‘ปญฺจ มจฺฉริยานิ – อาวาสมจฺฉริยํ, กุลมจฺฉริยํ, ลาภมจฺฉริยํ, วณฺณมจฺฉริยํ, ธมฺมมจฺฉริยํ. पाच प्रकारचे मात्सर्य (कंजूषपणा) – निवासस्थानाविषयी मात्सर्य (आवासमच्छरियं), कुळाविषयी मात्सर्य (कुलमच्छरियं), लाभाविषयी मात्सर्य (लाभमच्छरियं), वर्णाविषयी/कीर्तीविषयी मात्सर्य (वण्णमच्छरियं) आणि धम्माविषयी मात्सर्य (धम्ममच्छरियं). ‘‘ปญฺจ นีวรณานิ – กามจฺฉนฺทนีวรณํ, พฺยาปาทนีวรณํ, ถินมิทฺธนีวรณํ, อุทฺธจฺจกุกฺกุจฺจนีวรณํ, วิจิกิจฺฉานีวรณํ. पाच नीवरण (अडथळे) – कामच्छंद नीवरण (इंद्रियसुखाची आसक्ती), व्यापाद नीवरण (द्वेष/क्रोध), थिनमिद्ध नीवरण (आळस आणि डुलकी), उद्धच्च-कुक्कुच्च नीवरण (अस्वस्थता आणि पश्चात्ताप) आणि विचिकित्सा नीवरण (संशय). ‘‘ปญฺจ โอรมฺภาคิยานิ สญฺโญชนานิ – สกฺกายทิฏฺฐิ, วิจิกิจฺฉา, สีลพฺพตปรามาโส, กามจฺฉนฺโท, พฺยาปาโท. पाच खालच्या स्तरावरील बंधने (ओरंभागिय संयोजने) – सत्कायदृष्टी (सक्कायदिठ्ठि), विचिकित्सा (संशय), शीलव्रत-परामर्श (कर्मकांडांवरील विश्वास), कामच्छंद (इंद्रियसुखाची आसक्ती) आणि व्यापाद (द्वेष). ‘‘ปญฺจ [Pg.196] อุทฺธมฺภาคิยานิ สญฺโญชนานิ – รูปราโค, อรูปราโค, มาโน, อุทฺธจฺจํ, อวิชฺชา. पाच वरच्या स्तरावरील बंधने (उद्धंभागिय संयोजने) – रूपराग (रूपात्मक अस्तित्वाची आसक्ती), अरूपराग (अरूपात्मक अस्तित्वाची आसक्ती), मान (अहंकार), उद्धच्च (अस्वस्थता) आणि अविद्या (अज्ञान). ‘‘ปญฺจ สิกฺขาปทานิ – ปาณาติปาตา เวรมณี, อทินฺนาทานา เวรมณี, กาเมสุมิจฺฉาจารา เวรมณี, มุสาวาทา เวรมณี, สุราเมรยมชฺชปฺปมาทฏฺฐานา เวรมณี. पाच शीलतत्वे (सिक्खापदे) – प्राणातिपातापासून (जीवहिंसेपासून) अलिप्त राहणे, अदिन्नादानापासून (चोरी करण्यापासून) अलिप्त राहणे, कामेसू मिच्छाचारापासून (व्यभिचारापासून) अलिप्त राहणे, मुसावादापासून (असत्य बोलण्यापासून) अलिप्त राहणे, आणि सुरा-मेरय-मज्ज-पमादट्ठानापासून (मद्य व मादक पदार्थांच्या सेवनापासून) अलिप्त राहणे. ๓๑๖. ‘‘ปญฺจ อภพฺพฏฺฐานานิ. อภพฺโพ, อาวุโส, ขีณาสโว ภิกฺขุ สญฺจิจฺจ ปาณํ ชีวิตา โวโรเปตุํ. อภพฺโพ ขีณาสโว ภิกฺขุ อทินฺนํ เถยฺยสงฺขาตํ อาทิยิตุํ. อภพฺโพ ขีณาสโว ภิกฺขุ เมถุนํ ธมฺมํ ปฏิเสวิตุํ. อภพฺโพ ขีณาสโว ภิกฺขุ สมฺปชานมุสา ภาสิตุํ. อภพฺโพ ขีณาสโว ภิกฺขุ สนฺนิธิการกํ กาเม ปริภุญฺชิตุํ, เสยฺยถาปิ ปุพฺเพ อาคาริกภูโต. ३१६. पाच अशक्य गोष्टी. आवुसो, आसवमुक्त (खीणासव/अर्हत) भिक्खू जाणीवपूर्वक कोणत्याही प्राण्याचा जीव घेण्यास असमर्थ असतात. आसवमुक्त भिक्खू चोरीच्या उद्देशाने न दिलेली वस्तू घेण्यास असमर्थ असतात. आसवमुक्त भिक्खू मैथुन धर्म आचरण्यास असमर्थ असतात. आसवमुक्त भिक्खू जाणूनबुजून असत्य बोलण्यास असमर्थ असतात. आसवमुक्त भिक्खू पूर्वी गृहस्थाश्रमात असताना करत असत त्याप्रमाणे कामभोगांच्या वस्तू साठवून ठेवून त्यांचा उपभोग घेण्यास असमर्थ असतात. ‘‘ปญฺจ พฺยสนานิ – ญาติพฺยสนํ, โภคพฺยสนํ, โรคพฺยสนํ, สีลพฺยสนํ, ทิฏฺฐิพฺยสนํ. นาวุโส, สตฺตา ญาติพฺยสนเหตุ วา โภคพฺยสนเหตุ วา โรคพฺยสนเหตุ วา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชนฺติ. สีลพฺยสนเหตุ วา, อาวุโส, สตฺตา ทิฏฺฐิพฺยสนเหตุ วา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชนฺติ. पाच प्रकारच्या हानी (व्यसने) – नातेवाईकांची हानी (ज्ञातिव्यसन), संपत्तीची हानी (भोगव्यसन), आरोग्याची हानी (रोगव्यसन), शीलाची हानी (शीलव्यसन) आणि दृष्टीची (सम्यक दृष्टीची) हानी (दृष्टिव्यसन). आवुसो, नातेवाईकांच्या हानीमुळे, संपत्तीच्या हानीमुळे किंवा आरोग्याच्या हानीमुळे प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर दुर्गतीला, नरकाला (निरय) प्राप्त होत नाहीत. परंतु आवुसो, शीलाच्या हानीमुळे किंवा दृष्टीच्या हानीमुळे प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर दुर्गतीला, नरकाला प्राप्त होतात. ‘‘ปญฺจ สมฺปทา – ญาติสมฺปทา, โภคสมฺปทา, อาโรคฺยสมฺปทา, สีลสมฺปทา, ทิฏฺฐิสมฺปทา. นาวุโส, สตฺตา ญาติสมฺปทาเหตุ วา โภคสมฺปทาเหตุ วา อาโรคฺยสมฺปทาเหตุ วา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. สีลสมฺปทาเหตุ วา, อาวุโส, สตฺตา ทิฏฺฐิสมฺปทาเหตุ วา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. पाच प्रकारच्या संपदा (समृद्धी) – नातेवाईकांची संपदा (ज्ञातिसंपदा), संपत्तीची संपदा (भोगसंपदा), आरोग्याची संपदा (आरोग्यसंपदा), शीलाची संपदा (शीलसंपदा) आणि दृष्टीची संपदा (दृष्टिसंपदा). आवुसो, नातेवाईकांच्या संपदेमुळे, संपत्तीच्या संपदेमुळे किंवा आरोग्याच्या संपदेमुळे प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होत नाहीत. परंतु आवुसो, शीलाच्या संपदेमुळे किंवा दृष्टीच्या संपदेमुळे प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ‘‘ปญฺจ อาทีนวา ทุสฺสีลสฺส สีลวิปตฺติยา. อิธาวุโส, ทุสฺสีโล สีลวิปนฺโน ปมาทาธิกรณํ มหตึ โภคชานึ นิคจฺฉติ, อยํ ปฐโม อาทีนโว ทุสฺสีลสฺส สีลวิปตฺติยา. ปุน จปรํ, อาวุโส, ทุสฺสีลสฺส สีลวิปนฺนสฺส ปาปโก กิตฺติสทฺโท อพฺภุคฺคจฺฉติ, อยํ ทุติโย อาทีนโว ทุสฺสีลสฺส สีลวิปตฺติยา. ปุน จปรํ, อาวุโส, ทุสฺสีโล สีลวิปนฺโน [Pg.197] ยญฺญเทว ปริสํ อุปสงฺกมติ ยทิ ขตฺติยปริสํ ยทิ พฺราหฺมณปริสํ ยทิ คหปติปริสํ ยทิ สมณปริสํ, อวิสารโท อุปสงฺกมติ มงฺกุภูโต, อยํ ตติโย อาทีนโว ทุสฺสีลสฺส สีลวิปตฺติยา. ปุน จปรํ, อาวุโส, ทุสฺสีโล สีลวิปนฺโน สมฺมูฬฺโห กาลํ กโรติ, อยํ จตุตฺโถ อาทีนโว ทุสฺสีลสฺส สีลวิปตฺติยา. ปุน จปรํ, อาวุโส, ทุสฺสีโล สีลวิปนฺโน กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ, อยํ ปญฺจโม อาทีนโว ทุสฺสีลสฺส สีลวิปตฺติยา. शीलहीन व्यक्तीच्या शीलभ्रष्टतेचे (शीलविपत्तीचे) पाच दुष्परिणाम आहेत. हे आवुसो, या जगात शीलहीन, शीलभ्रष्ट व्यक्ती प्रमादामुळे (बेसावधपणामुळे) मोठ्या प्रमाणावर संपत्तीच्या नाशाला प्राप्त होते. शीलहीन व्यक्तीच्या शीलभ्रष्टतेचा हा पहिला दुष्परिणाम आहे. पुन्हा दुसरे असे की, हे आवुसो, शीलहीन, शीलभ्रष्ट व्यक्तीची अपकीर्ती सर्वत्र पसरते. शीलहीन व्यक्तीच्या शीलभ्रष्टतेचा हा दुसरा दुष्परिणाम आहे. पुन्हा दुसरे असे की, हे आवुसो, शीलहीन, शीलभ्रष्ट व्यक्ती ज्या ज्या सभेत जाते—मग ती क्षत्रियांची सभा असो, ब्राह्मणांची सभा असो, गृहपतींची सभा असो वा श्रमणांची सभा असो—तिथे ती आत्मविश्वासाशिवाय आणि ओशाळलेल्या चेहऱ्याने प्रवेश करते. शीलहीन व्यक्तीच्या शीलभ्रष्टतेचा हा तिसरा दुष्परिणाम आहे. पुन्हा दुसरे असे की, हे आवुसो, शीलहीन, शीलभ्रष्ट व्यक्ती संभ्रमित अवस्थेत मृत्यू पावते. शीलहीन व्यक्तीच्या शीलभ्रष्टतेचा हा चौथा दुष्परिणाम आहे. पुन्हा दुसरे असे की, हे आवुसो, शीलहीन, शीलभ्रष्ट व्यक्ती शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते. शीलहीन व्यक्तीच्या शीलभ्रष्टतेचा हा पाचवा दुष्परिणाम आहे. ‘‘ปญฺจ อานิสํสา สีลวโต สีลสมฺปทาย. อิธาวุโส, สีลวา สีลสมฺปนฺโน อปฺปมาทาธิกรณํ มหนฺตํ โภคกฺขนฺธํ อธิคจฺฉติ, อยํ ปฐโม อานิสํโส สีลวโต สีลสมฺปทาย. ปุน จปรํ, อาวุโส, สีลวโต สีลสมฺปนฺนสฺส กลฺยาโณ กิตฺติสทฺโท อพฺภุคฺคจฺฉติ, อยํ ทุติโย อานิสํโส สีลวโต สีลสมฺปทาย. ปุน จปรํ, อาวุโส, สีลวา สีลสมฺปนฺโน ยญฺญเทว ปริสํ อุปสงฺกมติ ยทิ ขตฺติยปริสํ ยทิ พฺราหฺมณปริสํ ยทิ คหปติปริสํ ยทิ สมณปริสํ, วิสารโท อุปสงฺกมติ อมงฺกุภูโต, อยํ ตติโย อานิสํโส สีลวโต สีลสมฺปทาย. ปุน จปรํ, อาวุโส, สีลวา สีลสมฺปนฺโน อสมฺมูฬฺโห กาลํ กโรติ, อยํ จตุตฺโถ อานิสํโส สีลวโต สีลสมฺปทาย. ปุน จปรํ, อาวุโส, สีลวา สีลสมฺปนฺโน กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ, อยํ ปญฺจโม อานิสํโส สีลวโต สีลสมฺปทาย. शीलवान व्यक्तीच्या शीलसंपदेचे (शीलसंपन्नतेचे) पाच फायदे आहेत. हे आवुसो, या जगात शीलवान, शीलसंपन्न व्यक्ती अप्रमादामुळे (जागरूकतेमुळे) मोठ्या प्रमाणावर संपत्तीचा संचय प्राप्त करते. शीलवान व्यक्तीच्या शीलसंपदेचा हा पहिला फायदा आहे. पुन्हा दुसरे असे की, हे आवुसो, शीलवान, शीलसंपन्न व्यक्तीची उत्तम कीर्ती सर्वत्र पसरते. शीलवान व्यक्तीच्या शीलसंपदेचा हा दुसरा फायदा आहे. पुन्हा दुसरे असे की, हे आवुसो, शीलवान, शीलसंपन्न व्यक्ती ज्या ज्या सभेत जाते—मग ती क्षत्रियांची सभा असो, ब्राह्मणांची सभा असो, गृहपतींची सभा असो वा श्रमणांची सभा असो—तिथे ती आत्मविश्वासाने आणि प्रसन्न चेहऱ्याने प्रवेश करते. शीलवान व्यक्तीच्या शीलसंपदेचा हा तिसरा फायदा आहे. पुन्हा दुसरे असे की, हे आवुसो, शीलवान, शीलसंपन्न व्यक्ती असंभ्रमित चित्ताने मृत्यू पावते. शीलवान व्यक्तीच्या शीलसंपदेचा हा चौथा फायदा आहे. पुन्हा दुसरे असे की, हे आवुसो, शीलवान, शीलसंपन्न व्यक्ती शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगती अशा स्वर्गलोकात उत्पन्न होते. शीलवान व्यक्तीच्या शीलसंपदेचा हा पाचवा फायदा आहे. ‘‘โจทเกน, อาวุโส, ภิกฺขุนา ปรํ โจเทตุกาเมน ปญฺจ ธมฺเม อชฺฌตฺตํ อุปฏฺฐเปตฺวา ปโร โจเทตพฺโพ. กาเลน วกฺขามิ โน อกาเลน, ภูเตน วกฺขามิ โน อภูเตน, สณฺเหน วกฺขามิ โน ผรุเสน, อตฺถสํหิเตน วกฺขามิ โน อนตฺถสํหิเตน, เมตฺตจิตฺเตน วกฺขามิ โน โทสนฺตเรนาติ. โจทเกน, อาวุโส, ภิกฺขุนา ปรํ โจเทตุกาเมน อิเม ปญฺจ ธมฺเม อชฺฌตฺตํ อุปฏฺฐเปตฺวา ปโร โจเทตพฺโพ. हे आवुसो, दुसऱ्यावर दोषारोप करू इच्छिणाऱ्या भिक्खूने स्वतःच्या अंतःकरणात पाच गोष्टी प्रस्थापित करूनच दुसऱ्यावर दोषारोप केला पाहिजे: 'मी योग्य वेळी बोलेन, अवेळी बोलणार नाही; मी सत्य बोलेन, असत्य बोलणार नाही; मी सौम्यपणे बोलेन, कठोरपणे बोलणार नाही; मी हितकारक बोलेन, अहितकारक बोलणार नाही; मी मैत्रीपूर्ण चित्ताने बोलेन, द्वेषपूर्ण चित्ताने बोलणार नाही.' हे आवुसो, दुसऱ्यावर दोषारोप करू इच्छिणाऱ्या भिक्खूने या पाच गोष्टी स्वतःच्या अंतःकरणात प्रस्थापित करूनच दुसऱ्यावर दोषारोप केला पाहिजे. ๓๑๗. ‘‘ปญฺจ [Pg.198] ปธานิยงฺคานิ. อิธาวุโส, ภิกฺขุ สทฺโธ โหติ, สทฺทหติ ตถาคตสฺส โพธึ – ‘อิติปิ โส ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน สุคโต, โลกวิทู อนุตฺตโร ปุริสทมฺมสารถิ สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. อปฺปาพาโธ โหติ อปฺปาตงฺโก, สมเวปากินิยา คหณิยา สมนฺนาคโต นาติสีตาย นาจฺจุณฺหาย มชฺฌิมาย ปธานกฺขมาย. อสโฐ โหติ อมายาวี, ยถาภูตํ อตฺตานํ อาวิกตฺตา สตฺถริ วา วิญฺญูสุ วา สพฺรหฺมจารีสุ. อารทฺธวีริโย วิหรติ อกุสลานํ ธมฺมานํ ปหานาย กุสลานํ ธมฺมานํ อุปสมฺปทาย ถามวา ทฬฺหปรกฺกโม อนิกฺขิตฺตธุโร กุสเลสุ ธมฺเมสุ. ปญฺญวา โหติ อุทยตฺถคามินิยา ปญฺญาย สมนฺนาคโต อริยาย นิพฺเพธิกาย สมฺมาทุกฺขกฺขยคามินิยา. ३१७. साधनेची (प्रयत्नाची) पाच अंगे आहेत. हे आवुसो, या शासनात भिक्खू श्रद्धावान असतो, तो तथागतांच्या बोधीवर श्रद्धा ठेवतो: 'ते भगवान अर्हत, सम्यक्संबुद्ध, विद्याचरणसंपन्न, सुगत, लोकविदू, अनुत्तर पुरुषदम्यसारथी, देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध आणि भगवान आहेत.' तो निरोगी असतो, त्याला कोणताही आजार नसतो, त्याची पचनशक्ती समतोल असते—जी अतिशय थंडही नसते आणि अतिशय उष्णही नसते, तर मध्यम स्वरूपाची व साधनेसाठी अनुकूल असते. तो निष्कपट आणि मायावी नसलेला असतो, तो शास्त्यांकडे किंवा विद्वानांकडे किंवा आपल्या सहकारी ब्रह्मचाऱ्यांकडे स्वतःला जसा आहे तसाच प्रकट करतो. तो अकुशल धर्मांचा त्याग करण्यासाठी आणि कुशल धर्मांच्या प्राप्तीसाठी दृढ प्रयत्नशील राहतो; तो कुशल धर्मांच्या बाबतीत उत्साही, दृढ पराक्रमी आणि ध्येय न सोडणारा असतो. तो प्रज्ञावान असतो; तो उदय आणि अस्त जाणणाऱ्या, आर्य, भेदक आणि दुःखाचा पूर्ण क्षय करणाऱ्या सम्यक प्रज्ञेने संपन्न असतो. ๓๑๘. ‘‘ปญฺจ สุทฺธาวาสา – อวิหา, อตปฺปา, สุทสฺสา, สุทสฺสี, อกนิฏฺฐา. ३१८. पाच शुद्धावास आहेत—अविह, अतप्प, सुदस्स, सुदस्सी आणि अकनिठ्ठ. ‘‘ปญฺจ อนาคามิโน – อนฺตราปรินิพฺพายี, อุปหจฺจปรินิพฺพายี, อสงฺขารปรินิพฺพายี, สสงฺขารปรินิพฺพายี, อุทฺธํโสโตอกนิฏฺฐคามี. पाच प्रकारचे अनागामी असतात—अंतरापरिनिब्बायी (आयुष्याच्या मध्यकाळात परिनिर्वाण प्राप्त करणारे), उपहच्चपरिनिब्बायी (आयुष्याचा मध्यकाळ ओलांडून परिनिर्वाण प्राप्त करणारे), असंखारपरिनिब्बायी (विनासायास परिनिर्वाण प्राप्त करणारे), ससंखारपरिनिब्बायी (प्रयत्नपूर्वक परिनिर्वाण प्राप्त करणारे) आणि उद्धंसोत-अकनिठ्ठगामी (वरच्या प्रवाहात अकनिठ्ठ लोकामध्ये जाऊन परिनिर्वाण प्राप्त करणारे). ๓๑๙. ‘‘ปญฺจ เจโตขิลา. อิธาวุโส, ภิกฺขุ สตฺถริ กงฺขติ วิจิกิจฺฉติ นาธิมุจฺจติ น สมฺปสีทติ. โย โส, อาวุโส, ภิกฺขุ สตฺถริ กงฺขติ วิจิกิจฺฉติ นาธิมุจฺจติ น สมฺปสีทติ, ตสฺส จิตฺตํ น นมติ อาตปฺปาย อนุโยคาย สาตจฺจาย ปธานาย, ยสฺส จิตฺตํ น นมติ อาตปฺปาย อนุโยคาย สาตจฺจาย ปธานาย, อยํ ปฐโม เจโตขิโล. ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ ธมฺเม กงฺขติ วิจิกิจฺฉติ…เป… สงฺเฆ กงฺขติ วิจิกิจฺฉติ… สิกฺขาย กงฺขติ วิจิกิจฺฉติ… สพฺรหฺมจารีสุ กุปิโต โหติ อนตฺตมโน อาหตจิตฺโต ขิลชาโต. โย โส, อาวุโส, ภิกฺขุ สพฺรหฺมจารีสุ กุปิโต โหติ อนตฺตมโน อาหตจิตฺโต ขิลชาโต, ตสฺส จิตฺตํ น นมติ อาตปฺปาย อนุโยคาย สาตจฺจาย ปธานาย, ยสฺส จิตฺตํ น นมติ อาตปฺปาย อนุโยคาย สาตจฺจาย ปธานาย, อยํ ปญฺจโม เจโตขิโล. ३१९. पाच चेतोखिल (चित्तातील अडथळे) आहेत. हे आवुसो, या शासनात भिक्खू शास्त्यांच्या बाबतीत शंका घेतो, संशय बाळगतो, निश्चय करू शकत नाही आणि प्रसन्न होत नाही. हे आवुसो, जो भिक्खू शास्त्यांच्या बाबतीत शंका घेतो, संशय बाळगतो, निश्चय करू शकत नाही आणि प्रसन्न होत नाही, त्याचे चित्त साधनेसाठी, अभ्यासासाठी, सातत्यासाठी आणि प्रयत्नासाठी प्रवृत्त होत नाही. ज्याचे चित्त साधनेसाठी, अभ्यासासाठी, सातत्यासाठी आणि प्रयत्नासाठी प्रवृत्त होत नाही, हा पहिला चेतोखिल आहे. पुन्हा दुसरे असे की, हे आवुसो, भिक्खू धम्माच्या बाबतीत शंका घेतो, संशय बाळगतो... संघात शंका घेतो, संशय बाळगतो... शिक्षेच्या (साधनेच्या नियमांच्या) बाबतीत शंका घेतो, संशय बाळगतो... आपल्या सहकारी ब्रह्मचाऱ्यांवर क्रुद्ध होतो, असंतुष्ट होतो, मनात आकस धरतो आणि त्यांच्याशी शत्रुत्वाने वागतो. हे आवुसो, जो भिक्खू आपल्या सहकारी ब्रह्मचाऱ्यांवर क्रुद्ध होतो, असंतुष्ट होतो, मनात आकस धरतो आणि त्यांच्याशी शत्रुत्वाने वागतो, त्याचे चित्त साधनेसाठी, अभ्यासासाठी, सातत्यासाठी आणि प्रयत्नासाठी प्रवृत्त होत नाही. ज्याचे चित्त साधनेसाठी, अभ्यासासाठी, सातत्यासाठी आणि प्रयत्नासाठी प्रवृत्त होत नाही, हा पाचवा चेतोखिल आहे. ๓๒๐. ‘‘ปญฺจ เจตโสวินิพนฺธา. อิธาวุโส, ภิกฺขุ กาเมสุ อวีตราโค โหติ อวิคตจฺฉนฺโท อวิคตเปโม อวิคตปิปาโส อวิคตปริฬาโห [Pg.199] อวิคตตณฺโห. โย โส, อาวุโส, ภิกฺขุ กาเมสุ อวีตราโค โหติ อวิคตจฺฉนฺโท อวิคตเปโม อวิคตปิปาโส อวิคตปริฬาโห อวิคตตณฺโห, ตสฺส จิตฺตํ น นมติ อาตปฺปาย อนุโยคาย สาตจฺจาย ปธานาย. ยสฺส จิตฺตํ น นมติ อาตปฺปาย อนุโยคาย สาตจฺจาย ปธานาย. อยํ ปฐโม เจตโส วินิพนฺโธ. ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ กาเย อวีตราโค โหติ…เป… รูเป อวีตราโค โหติ…เป… ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ ยาวทตฺถํ อุทราวเทหกํ ภุญฺชิตฺวา เสยฺยสุขํ ปสฺสสุขํ มิทฺธสุขํ อนุยุตฺโต วิหรติ…เป… ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ อญฺญตรํ เทวนิกายํ ปณิธาย พฺรหฺมจริยํ จรติ – ‘อิมินาหํ สีเลน วา วเตน วา ตเปน วา พฺรหฺมจริเยน วา เทโว วา ภวิสฺสามิ เทวญฺญตโร วา’ติ. โย โส, อาวุโส, ภิกฺขุ อญฺญตรํ เทวนิกายํ ปณิธาย พฺรหฺมจริยํ จรติ – ‘อิมินาหํ สีเลน วา วเตน วา ตเปน วา พฺรหฺมจริเยน วา เทโว วา ภวิสฺสามิ เทวญฺญตโร วา’ติ, ตสฺส จิตฺตํ น นมติ อาตปฺปาย อนุโยคาย สาตจฺจาย ปธานาย. ยสฺส จิตฺตํ น นมติ อาตปฺปาย อนุโยคาย สาตจฺจาย ปธานาย. อยํ ปญฺจโม เจตโส วินิพนฺโธ. ३२०. “पाच चेतोविनिबंध (मनाचे बंध) आहेत. आवुसो, येथे भिक्खू कामभोगांविषयी वीतराग झालेला नसतो, त्याची इच्छा (छंद) नष्ट झालेली नसते, त्याचे प्रेम नष्ट झालेले नसते, त्याची पिपासा (तहान) नष्ट झालेली नसते, त्याचा परिळाह (दाह) नष्ट झालेला नसतो, त्याची तण्हा (तृष्णा) नष्ट झालेली नसते. आवुसो, जो भिक्खू कामभोगांविषयी वीतराग झालेला नसतो, ज्याची इच्छा नष्ट झालेली नसते, ज्याचे प्रेम नष्ट झालेले नसते, ज्याची पिपासा नष्ट झालेली नसते, ज्याचा परिळाह नष्ट झालेला नसतो, ज्याची तण्हा नष्ट झालेली नसते, त्याचे चित्त आतप (उत्साह), अनुयोग (सतत प्रयत्न), सातत्य आणि प्रधान (परिश्रम) यांसाठी प्रवृत्त होत नाही. ज्याचे चित्त आतप, अनुयोग, सातत्य आणि प्रधानाचा ध्यास घेण्यासाठी प्रवृत्त होत नाही, हा पहिला चेतोविनिबंध आहे. पुन्हा पुढे, आवुसो, भिक्खू शरीराविषयी (कायेविषयी) वीतराग झालेला नसतो... पे... रूपाविषयी वीतराग झालेला नसतो... पे... पुन्हा पुढे, आवुसो, भिक्खू पोटभर जेवून पाठीवर झोपण्याचे सुख, कुशीवर झोपण्याचे सुख आणि आळसाचे सुख उपभोगण्यात मग्न राहतो... पे... पुन्हा पुढे, आवुसो, भिक्खू एखाद्या देवलोकात जन्म घेण्याच्या आकांक्षेने ब्रह्मचर्य पाळतो – ‘मी या शीलाने, व्रताने, तपाने किंवा ब्रह्मचर्याने देव किंवा देवांपैकी एक होईन.’ आवुसो, जो भिक्खू एखाद्या देवलोकात जन्म घेण्याच्या आकांक्षेने ब्रह्मचर्य पाळतो... त्याचे चित्त आतप, अनुयोग, सातत्य आणि प्रधानाचा ध्यास घेण्यासाठी प्रवृत्त होत नाही. ज्याचे चित्त प्रवृत्त होत नाही, हा पाचवा चेतोविनिबंध आहे.” ‘‘ปญฺจินฺทฺริยานิ – จกฺขุนฺทฺริยํ, โสตินฺทฺริยํ, ฆานินฺทฺริยํ, ชิวฺหินฺทฺริยํ, กายินฺทฺริยํ. “पाच इंद्रिये आहेत – चक्षुरिंद्रिय (डोळे), श्रोत्रेंद्रिय (कान), घ्राणेंद्रिय (नाक), जिव्हेंद्रिय (जीभ), कायेंद्रिय (शरीर).” ‘‘อปรานิปิ ปญฺจินฺทฺริยานิ – สุขินฺทฺริยํ, ทุกฺขินฺทฺริยํ, โสมนสฺสินฺทฺริยํ, โทมนสฺสินฺทฺริยํ, อุเปกฺขินฺทฺริยํ. “आणखी पाच इंद्रिये आहेत – सुखेंद्रिय, दुःखेंद्रिय, सौमनस्येंद्रिय, दौर्मनस्येंद्रिय, उपेक्षेंद्रिय.” ‘‘อปรานิปิ ปญฺจินฺทฺริยานิ – สทฺธินฺทฺริยํ, วีริยินฺทฺริยํ, สตินฺทฺริยํ, สมาธินฺทฺริยํ, ปญฺญินฺทฺริยํ. “आणखी पाच इंद्रिये आहेत – श्रद्धेंद्रिय, वीर्येंद्रिय, स्मृतींद्रिय, समाधींद्रिय, प्रज्ञेंद्रिय.” ๓๒๑. ‘‘ปญฺจ นิสฺสรณิยา ธาตุโย. อิธาวุโส, ภิกฺขุโน กาเม มนสิกโรโต กาเมสุ จิตฺตํ น ปกฺขนฺทติ น ปสีทติ น สนฺติฏฺฐติ น วิมุจฺจติ. เนกฺขมฺมํ โข ปนสฺส มนสิกโรโต เนกฺขมฺเม จิตฺตํ ปกฺขนฺทติ ปสีทติ สนฺติฏฺฐติ วิมุจฺจติ. ตสฺส ตํ จิตฺตํ สุคตํ สุภาวิตํ สุวุฏฺฐิตํ สุวิมุตฺตํ วิสํยุตฺตํ กาเมหิ. เย จ กามปจฺจยา อุปฺปชฺชนฺติ อาสวา วิฆาตา ปริฬาหา, มุตฺโต โส เตหิ, น โส ตํ เวทนํ เวเทติ. อิทมกฺขาตํ กามานํ นิสฺสรณํ. ३२१. “पाच निस्सरणीय धातू (मुक्त करणाऱ्या धातू) आहेत. आवुसो, येथे जेव्हा भिक्खू कामभोगांचे मनन करतो, तेव्हा त्याचे चित्त कामभोगांमध्ये झेपावत नाही, प्रसन्न होत नाही, स्थिर होत नाही, मुक्त होत नाही. परंतु, जेव्हा तो नैष्क्रम्याचे (कामभोगांच्या त्यागाचे) मनन करतो, तेव्हा त्याचे चित्त नैष्क्रम्यामध्ये झेपावते, प्रसन्न होते, स्थिर होते, मुक्त होते. त्याचे ते चित्त सुगत, सुभावित, सुउत्थित, सुविमुक्त आणि कामभोगांपासून विसंयुक्त (अलिप्त) असते. कामभोगांच्या कारणाने जे आसव (आस्रव), विघात (दुःख) आणि परिळाह (दाह) उत्पन्न होतात, त्यांपासून तो मुक्त होतो आणि तो त्या वेदनेचा अनुभव घेत नाही. याला कामभोगांतून सुटका (निस्सरण) असे म्हटले गेले आहे.” ‘‘ปุน [Pg.200] จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน พฺยาปาทํ มนสิกโรโต พฺยาปาเท จิตฺตํ น ปกฺขนฺทติ น ปสีทติ น สนฺติฏฺฐติ น วิมุจฺจติ. อพฺยาปาทํ โข ปนสฺส มนสิกโรโต อพฺยาปาเท จิตฺตํ ปกฺขนฺทติ ปสีทติ สนฺติฏฺฐติ วิมุจฺจติ. ตสฺส ตํ จิตฺตํ สุคตํ สุภาวิตํ สุวุฏฺฐิตํ สุวิมุตฺตํ วิสํยุตฺตํ พฺยาปาเทน. เย จ พฺยาปาทปจฺจยา อุปฺปชฺชนฺติ อาสวา วิฆาตา ปริฬาหา, มุตฺโต โส เตหิ, น โส ตํ เวทนํ เวเทติ. อิทมกฺขาตํ พฺยาปาทสฺส นิสฺสรณํ. “पुन्हा पुढे, आवुसो, जेव्हा भिक्खू व्यापादाचे (द्वेषाचे) मनन करतो, तेव्हा त्याचे चित्त व्यापादामध्ये झेपावत नाही, प्रसन्न होत नाही, स्थिर होत नाही, मुक्त होत नाही. परंतु, जेव्हा तो अव्यापादाचे (अद्वेषाचे) मनन करतो, तेव्हा त्याचे चित्त अव्यापादामध्ये झेपावते, प्रसन्न होते, स्थिर होते, मुक्त होते. त्याचे ते चित्त सुगत, सुभावित, सुउत्थित, सुविमुक्त आणि व्यापादापासून विसंयुक्त असते. व्यापादाच्या कारणाने जे आसव, विघात आणि परिळाह उत्पन्न होतात, त्यांपासून तो मुक्त होतो आणि तो त्या वेदनेचा अनुभव घेत नाही. याला व्यापादातून सुटका (निस्सरण) असे म्हटले गेले आहे.” ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน วิเหสํ มนสิกโรโต วิเหสาย จิตฺตํ น ปกฺขนฺทติ น ปสีทติ น สนฺติฏฺฐติ น วิมุจฺจติ. อวิเหสํ โข ปนสฺส มนสิกโรโต อวิเหสาย จิตฺตํ ปกฺขนฺทติ ปสีทติ สนฺติฏฺฐติ วิมุจฺจติ. ตสฺส ตํ จิตฺตํ สุคตํ สุภาวิตํ สุวุฏฺฐิตํ สุวิมุตฺตํ วิสํยุตฺตํ วิเหสาย. เย จ วิเหสาปจฺจยา อุปฺปชฺชนฺติ อาสวา วิฆาตา ปริฬาหา, มุตฺโต โส เตหิ, น โส ตํ เวทนํ เวเทติ. อิทมกฺขาตํ วิเหสาย นิสฺสรณํ. “पुन्हा पुढे, आवुसो, जेव्हा भिक्खू विहिंसेचे (पीडा देण्याचे) मनन करतो, तेव्हा त्याचे चित्त विहिंसेमध्ये झेपावत नाही, प्रसन्न होत नाही, स्थिर होत नाही, मुक्त होत नाही. परंतु, जेव्हा तो अविहिंसेचे (पीडा न देण्याचे) मनन करतो, तेव्हा त्याचे चित्त अविहिंसेमध्ये झेपावते, प्रसन्न होते, स्थिर होते, मुक्त होते. त्याचे ते चित्त सुगत, सुभावित, सुउत्थित, सुविमुक्त आणि विहिंसेपासून विसंयुक्त असते. विहिंसेच्या कारणाने जे आसव, विघात आणि परिळाह उत्पन्न होतात, त्यांपासून तो मुक्त होतो आणि तो त्या वेदनेचा अनुभव घेत नाही. याला विहिंसेतून सुटका (निस्सरण) असे म्हटले गेले आहे.” ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน รูเป มนสิกโรโต รูเปสุ จิตฺตํ น ปกฺขนฺทติ น ปสีทติ น สนฺติฏฺฐติ น วิมุจฺจติ. อรูปํ โข ปนสฺส มนสิกโรโต อรูเป จิตฺตํ ปกฺขนฺทติ ปสีทติ สนฺติฏฺฐติ วิมุจฺจติ. ตสฺส ตํ จิตฺตํ สุคตํ สุภาวิตํ สุวุฏฺฐิตํ สุวิมุตฺตํ วิสํยุตฺตํ รูเปหิ. เย จ รูปปจฺจยา อุปฺปชฺชนฺติ อาสวา วิฆาตา ปริฬาหา, มุตฺโต โส เตหิ, น โส ตํ เวทนํ เวเทติ. อิทมกฺขาตํ รูปานํ นิสฺสรณํ. “पुन्हा पुढे, आवुसो, जेव्हा भिक्खू रूपाचे (भौतिक रूपांचे) मनन करतो, तेव्हा त्याचे चित्त रूपांमध्ये झेपावत नाही, प्रसन्न होत नाही, स्थिर होत नाही, मुक्त होत नाही. परंतु, जेव्हा तो अरूपाचे (अभौतिक तत्त्वांचे) मनन करतो, तेव्हा त्याचे चित्त अरूपामध्ये झेपावते, प्रसन्न होते, स्थिर होते, मुक्त होते. त्याचे ते चित्त सुगत, सुभावित, सुउत्थित, सुविमुक्त आणि रूपांपासून विसंयुक्त असते. रूपांच्या कारणाने जे आसव, विघात आणि परिळाह उत्पन्न होतात, त्यांपासून तो मुक्त होतो आणि तो त्या वेदनेचा अनुभव घेत नाही. याला रूपांतून सुटका (निस्सरण) असे म्हटले गेले आहे.” ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน สกฺกายํ มนสิกโรโต สกฺกาเย จิตฺตํ น ปกฺขนฺทติ น ปสีทติ น สนฺติฏฺฐติ น วิมุจฺจติ. สกฺกายนิโรธํ โข ปนสฺส มนสิกโรโต สกฺกายนิโรเธ จิตฺตํ ปกฺขนฺทติ ปสีทติ สนฺติฏฺฐติ วิมุจฺจติ. ตสฺส ตํ จิตฺตํ สุคตํ สุภาวิตํ สุวุฏฺฐิตํ สุวิมุตฺตํ วิสํยุตฺตํ สกฺกาเยน. เย จ สกฺกายปจฺจยา อุปฺปชฺชนฺติ อาสวา วิฆาตา ปริฬาหา, มุตฺโต โส เตหิ, น โส ตํ เวทนํ เวเทติ. อิทมกฺขาตํ สกฺกายสฺส นิสฺสรณํ. “पुन्हा पुढे, आवुसो, जेव्हा भिक्खू सक्कायाचे (सत्काय/पंच उपादानस्कंधांचे) मनन करतो, तेव्हा त्याचे चित्त सक्कायामध्ये झेपावत नाही, प्रसन्न होत नाही, स्थिर होत नाही, मुक्त होत नाही. परंतु, जेव्हा तो सक्कायनिरोधाचे (पंच उपादानस्कंधांच्या निरोधाचे) मनन करतो, तेव्हा त्याचे चित्त सक्कायनिरोधामध्ये झेपावते, प्रसन्न होते, स्थिर होते, मुक्त होते. त्याचे ते चित्त सुगत, सुभावित, suvuṭṭhitaṃ, सुविमुक्त आणि सक्कायापासून विसंयुक्त असते. सक्कायाच्या कारणाने जे आसव, विघात आणि परिळाह उत्पन्न होतात, त्यांपासून तो मुक्त होतो आणि तो त्या वेदनेचा अनुभव घेत नाही. याला सक्कायापासून सुटका (निस्सरण) असे म्हटले गेले आहे.” ๓๒๒. ‘‘ปญฺจ วิมุตฺตายตนานิ. อิธาวุโส, ภิกฺขุโน สตฺถา ธมฺมํ เทเสติ อญฺญตโร วา ครุฏฺฐานิโย สพฺรหฺมจารี. ยถา ยถา, อาวุโส, ภิกฺขุโน สตฺถา ธมฺมํ เทเสติ อญฺญตโร วา ครุฏฺฐานิโย สพฺรหฺมจารี[Pg.201]. ตถา ตถา โส ตสฺมึ ธมฺเม อตฺถปฏิสํเวที จ โหติ ธมฺมปฏิสํเวที จ. ตสฺส อตฺถปฏิสํเวทิโน ธมฺมปฏิสํเวทิโน ปาโมชฺชํ ชายติ, ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ, ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ, ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวเทติ, สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อิทํ ปฐมํ วิมุตฺตายตนํ. ३२२. “पाच विमुक्तायतने (मुक्तीची स्थाने) आहेत. आवुसो, येथे शास्ता (बुद्ध) किंवा इतर कोणी आदरणीय सब्रह्मचारी भिक्खूला धम्माचा उपदेश करतात. आवुसो, ज्या ज्या प्रकारे शास्ता किंवा इतर कोणी आदरणीय सब्रह्मचारी भिक्खूला धम्माचा उपदेश करतात, त्या त्या प्रकारे तो त्या धम्मातील अर्थाचा अनुभव घेतो (अर्थ समजतो) आणि धम्माचा (शब्दांचा) अनुभव घेतो. अर्थ आणि धम्म समजल्यामुळे त्याला प्रमोद (आनंद) होतो; प्रमोद झालेल्या भिक्खूला प्रीती (हर्ष) प्राप्त होते; प्रीतीयुक्त चित्त असलेल्या भिक्खूची काया (शरीर) शांत होते; शांत काया असलेला भिक्खू सुखाचा अनुभव घेतो; आणि सुखी असलेल्या भिक्खूचे चित्त समाधीस्त होते. हे पहिले विमुक्तायतन आहे.” ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน น เหว โข สตฺถา ธมฺมํ เทเสติ อญฺญตโร วา ครุฏฺฐานิโย สพฺรหฺมจารี, อปิ จ โข ยถาสุตํ ยถาปริยตฺตํ ธมฺมํ วิตฺถาเรน ปเรสํ เทเสติ…เป… อปิ จ โข ยถาสุตํ ยถาปริยตฺตํ ธมฺมํ วิตฺถาเรน สชฺฌายํ กโรติ…เป… อปิ จ โข ยถาสุตํ ยถาปริยตฺตํ ธมฺมํ เจตสา อนุวิตกฺเกติ อนุวิจาเรติ มนสานุเปกฺขติ…เป… อปิ จ ขฺวสฺส อญฺญตรํ สมาธินิมิตฺตํ สุคฺคหิตํ โหติ สุมนสิกตํ สูปธาริตํ สุปฺปฏิวิทฺธํ ปญฺญาย. ยถา ยถา, อาวุโส, ภิกฺขุโน อญฺญตรํ สมาธินิมิตฺตํ สุคฺคหิตํ โหติ สุมนสิกตํ สูปธาริตํ สุปฺปฏิวิทฺธํ ปญฺญาย ตถา ตถา โส ตสฺมึ ธมฺเม อตฺถปฏิสํเวที จ โหติ ธมฺมปฏิสํเวที จ. ตสฺส อตฺถปฏิสํเวทิโน ธมฺมปฏิสํเวทิโน ปาโมชฺชํ ชายติ, ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ, ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ, ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวเทติ, สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อิทํ ปญฺจมํ วิมุตฺตายตนํ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खूला शास्ता (बुद्ध) धर्मोपदेश देत नाहीत किंवा इतर कोणी आदरणीय सब्रह्मचारीही धर्मोपदेश देत नाहीत, परंतु त्याने जसा ऐकला आहे, जसा अभ्यासला आहे, तसा तो धर्म इतरांना विस्ताराने उपदेशितो... किंवा जसा ऐकला आहे, जसा अभ्यासला आहे, तसा तो धर्म विस्ताराने सज्झाय (सस्वर पठण) करतो... किंवा जसा ऐकला आहे, जसा अभ्यासला आहे, तशा धर्माचे तो मनाने अनुवितर्क करतो, अनुविचार करतो आणि मनाने अनुपेक्षण करतो... किंवा त्याने एखादे समाधिनिमित्त चांगल्या प्रकारे ग्रहण केलेले असते, मनात नीट रुजविलेले असते, चांगल्या प्रकारे धारण केलेले असते आणि प्रज्ञेने त्याचा चांगल्या प्रकारे वेध घेतलेला असतो. आवुसो, ज्या ज्या प्रकारे भिक्खूने एखादे समाधिनिमित्त चांगल्या प्रकारे ग्रहण केलेले असते, मनात नीट रुजविलेले असते, चांगल्या प्रकारे धारण केलेले असते आणि प्रज्ञेने त्याचा चांगल्या प्रकारे वेध घेतलेला असतो, त्या त्या प्रकारे त्याला त्या धर्मामध्ये अर्थप्रतिसंवेदी (अर्थाचा अनुभव घेणारा) आणि धर्मप्रतिसंवेदी (धर्माचा अनुभव घेणारा) होतो. त्या अर्थप्रतिसंवेदी आणि धर्मप्रतिसंवेदी भिक्खूच्या ठिकाणी प्रामोद्य (आनंद) उत्पन्न होते. प्रमुदित झालेल्या भिक्खूच्या ठिकाणी प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मन असलेल्या भिक्खूची काय (शरीर/नामकाय) शांत होते. शांत काय असलेला भिक्खू सुख अनुभवतो. सुखी भिक्खूचे चित्त समाधीत होते. हे पाचवे विमुत्तायतन (विमुक्तीचे स्थान) होय. ‘‘ปญฺจ วิมุตฺติปริปาจนียา สญฺญา – อนิจฺจสญฺญา, อนิจฺเจ ทุกฺขสญฺญา, ทุกฺเข อนตฺตสญฺญา, ปหานสญฺญา, วิราคสญฺญา. विमुक्ती परिपक्व करणाऱ्या पाच संज्ञा – अनित्य-संज्ञा, अनित्यामध्ये दुःख-संज्ञा, दुःखात अनात्म-संज्ञा, प्रहाण-संज्ञा आणि विराग-संज्ञा. ‘‘อิเม โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน ปญฺจ ธมฺมา สมฺมทกฺขาตา; ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ…เป… อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. आवुसो, त्या जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवंतांनी हे पाच धर्म चांगल्या प्रकारे सांगितले आहेत; तेथे सर्वांनी मिळून संगायन केले पाहिजे... देव आणि मनुष्यांच्या हितासाठी, कल्याणासाठी आणि सुखासाठी. ฉกฺกํ षट्क (सहाचा गट) ๓๒๓. ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน ฉ ธมฺมา สมฺมทกฺขาตา; ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ…เป… อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. กตเม ฉ? ३२३. आवुसो, त्या जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवंतांनी हे सहा धर्म चांगल्या प्रकारे सांगितले आहेत; तेथे सर्वांनी मिळून संगायन केले पाहिजे... देव आणि मनुष्यांच्या हितासाठी, कल्याणासाठी आणि सुखासाठी. ते सहा कोणते? ‘‘ฉ อชฺฌตฺติกานิ [Pg.202] อายตนานิ – จกฺขายตนํ, โสตายตนํ, ฆานายตนํ, ชิวฺหายตนํ, กายายตนํ, มนายตนํ. सहा आध्यात्मिक (अंतर्गत) आयतने – चक्षु-आयतन, श्रोत्र-आयतन, घ्राण-आयतन, जिव्हा-आयतन, काय-आयतन आणि मन-आयतन. ‘‘ฉ พาหิรานิ อายตนานิ – รูปายตนํ, สทฺทายตนํ, คนฺธายตนํ, รสายตนํ, โผฏฺฐพฺพายตนํ, ธมฺมายตนํ. सहा बाह्य आयतने – रूप-आयतन, शब्द-आयतन, गंध-आयतन, रस-आयतन, स्प्रष्टव्य-आयतन आणि धर्म-आयतन. ‘‘ฉ วิญฺญาณกายา – จกฺขุวิญฺญาณํ, โสตวิญฺญาณํ, ฆานวิญฺญาณํ, ชิวฺหาวิญฺญาณํ, กายวิญฺญาณํ, มโนวิญฺญาณํ. सहा विज्ञान-काय – चक्षु-विज्ञान, श्रोत्र-विज्ञान, घ्राण-विज्ञान, जिव्हा-विज्ञान, काय-विज्ञान आणि मनो-विज्ञान. ‘‘ฉ ผสฺสกายา – จกฺขุสมฺผสฺโส, โสตสมฺผสฺโส, ฆานสมฺผสฺโส, ชิวฺหาสมฺผสฺโส, กายสมฺผสฺโส, มโนสมฺผสฺโส. सहा स्पर्श-काय – चक्षु-संस्पर्श, श्रोत्र-संस्पर्श, घ्राण-संस्पर्श, जिव्हा-संस्पर्श, काय-संस्पर्श आणि मन-संस्पर्श. ‘‘ฉ เวทนากายา – จกฺขุสมฺผสฺสชา เวทนา, โสตสมฺผสฺสชา เวทนา, ฆานสมฺผสฺสชา เวทนา, ชิวฺหาสมฺผสฺสชา เวทนา, กายสมฺผสฺสชา เวทนา, มโนสมฺผสฺสชา เวทนา. सहा वेदना-काय – चक्षु-संस्पर्शजन्य वेदना, श्रोत्र-संस्पर्शजन्य वेदना, घ्राण-संस्पर्शजन्य वेदना, जिव्हा-संस्पर्शजन्य वेदना, काय-संस्पर्शजन्य वेदना आणि मन-संस्पर्शजन्य वेदना. ‘‘ฉ สญฺญากายา – รูปสญฺญา, สทฺทสญฺญา, คนฺธสญฺญา, รสสญฺญา, โผฏฺฐพฺพสญฺญา, ธมฺมสญฺญา. सहा संज्ञा-काय – रूप-संज्ञा, शब्द-संज्ञा, gंध-संज्ञा, रस-संज्ञा, स्प्रष्टव्य-संज्ञा आणि धर्म-संज्ञा. ‘‘ฉ สญฺเจตนากายา – รูปสญฺเจตนา, สทฺทสญฺเจตนา, คนฺธสญฺเจตนา, รสสญฺเจตนา, โผฏฺฐพฺพสญฺเจตนา, ธมฺมสญฺเจตนา. सहा संचेतना-काय – रूप-संचेतना, शब्द-संचेतना, गंध-संचेतना, रस-संचेतना, स्प्रष्टव्य-संचेतना आणि धर्म-संचेतना. ‘‘ฉ ตณฺหากายา – รูปตณฺหา, สทฺทตณฺหา, คนฺธตณฺหา, รสตณฺหา, โผฏฺฐพฺพตณฺหา, ธมฺมตณฺหา. सहा तृष्णा-काय – रूप-तृष्णा, शब्द-तृष्णा, गंध-तृष्णा, रस-तृष्णा, स्प्रष्टव्य-तृष्णा आणि धर्म-तृष्णा. ๓๒๔. ‘‘ฉ อคารวา. อิธาวุโส, ภิกฺขุ สตฺถริ อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส; ธมฺเม อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส; สงฺเฆ อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส; สิกฺขาย อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส; อปฺปมาเท อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส; ปฏิสนฺถาเร อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส. ३२४. सहा अनादर (अगौरव). आवुसो, येथे भिक्खू शास्त्यांविषयी अनादर बाळगून आणि नम्रता न ठेवता राहतो; धर्माविषयी अनादर बाळगून आणि नम्रता न ठेवता राहतो; संघाविषयी अनादर बाळगून... शिक्षेविषयी... अप्रमादाविषयी... प्रतिसंथाराविषयी अनादर बाळगून आणि नम्रता न ठेवता राहतो. ‘‘ฉ คารวา. อิธาวุโส, ภิกฺขุ สตฺถริ สคารโว วิหรติ สปฺปติสฺโส; ธมฺเม สคารโว วิหรติ สปฺปติสฺโส; สงฺเฆ สคารโว วิหรติ สปฺปติสฺโส; สิกฺขาย สคารโว วิหรติ สปฺปติสฺโส; อปฺปมาเท สคารโว วิหรติ สปฺปติสฺโส; ปฏิสนฺถาเร สคารโว วิหรติ สปฺปติสฺโส. सहा आदर (गौरव). आवुसो, येथे भिक्खू शास्त्यांविषयी आदर बाळगून आणि नम्रता ठेवून राहतो; धर्माविषयी आदर बाळगून आणि नम्रता ठेवून राहतो; संघाविषयी आदर बाळगून... शिक्षेविषयी... अप्रमादाविषयी... प्रतिसंथाराविषयी आदर बाळगून आणि नम्रता ठेवून राहतो. ‘‘ฉ โสมนสฺสูปวิจารา[Pg.203]. จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา โสมนสฺสฏฺฐานิยํ รูปํ อุปวิจรติ; โสเตน สทฺทํ สุตฺวา… ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตฺวา… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา… กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสิตฺวา. มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย โสมนสฺสฏฺฐานิยํ ธมฺมํ อุปวิจรติ. सहा सोमनस्य-उपविचार. डोळ्यांनी रूप पाहून, आनंदाला कारणीभूत असणाऱ्या रूपाचे चिंतन करतो; कानाने शब्द ऐकून... नाकाने गंध घेऊन... जिभेने रस चाखून... शरीराने स्पर्श अनुभवून... मनाने धर्म जाणून, आनंदाला कारणीभूत असणाऱ्या धर्माचे चिंतन करतो. ‘‘ฉ โทมนสฺสูปวิจารา. จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา โทมนสฺสฏฺฐานิยํ รูปํ อุปวิจรติ…เป… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย โทมนสฺสฏฺฐานิยํ ธมฺมํ อุปวิจรติ. सहा दोमनस्य-उपविचार. डोळ्यांनी रूप पाहून, दुःखाला कारणीभूत असणाऱ्या रूपाचे चिंतन करतो... मनाने धर्म जाणून, दुःखाला कारणीभूत असणाऱ्या धर्माचे चिंतन करतो. ‘‘ฉ อุเปกฺขูปวิจารา. จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา อุเปกฺขาฏฺฐานิยํ รูปํ อุปวิจรติ…เป… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย อุเปกฺขาฏฺฐานิยํ ธมฺมํ อุปวิจรติ. सहा उपेक्षा-उपविचार. डोळ्यांनी रूप पाहून, उपेक्षेला कारणीभूत असणाऱ्या रूपाचे चिंतन करतो... मनाने धर्म जाणून, उपेक्षेला कारणीभूत असणाऱ्या धर्माचे चिंतन करतो. ‘‘ฉ สารณียา ธมฺมา. อิธาวุโส, ภิกฺขุโน เมตฺตํ กายกมฺมํ ปจฺจุปฏฺฐิตํ โหติ สพฺรหฺมจารีสุ อาวิ เจว รโห จ. อยมฺปิ ธมฺโม สารณีโย ปิยกรโณ ครุกรโณ สงฺคหาย อวิวาทาย สามคฺคิยา เอกีภาวาย สํวตฺตติ. सहा सारणीय धर्म. आवुसो, येथे भिक्खूचे आपल्या सब्रह्मचाऱ्यांविषयी प्रत्यक्ष आणि परोक्ष मैत्रीपूर्ण कायकर्म प्रस्थापित असते. हा धर्म देखील सारणीय, प्रिय करणारा, आदर निर्माण करणारा असून, तो संग्रहासाठी, विवादाचा अभाव होण्यासाठी, सामंजस्यासाठी आणि ऐक्यासाठी कारणीभूत ठरतो. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน เมตฺตํ วจีกมฺมํ ปจฺจุปฏฺฐิตํ โหติ สพฺรหฺมจารีสุ อาวิ เจว รโห จ. อยมฺปิ ธมฺโม สารณีโย…เป… เอกีภาวาย สํวตฺตติ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खूचे आपल्या सब्रह्मचाऱ्यांविषयी प्रत्यक्ष आणि परोक्ष मैत्रीपूर्ण वचीकर्म प्रस्थापित असते. हा धर्म देखील सारणीय... ऐक्यासाठी कारणीभूत ठरतो. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน เมตฺตํ มโนกมฺมํ ปจฺจุปฏฺฐิตํ โหติ สพฺรหฺมจารีสุ อาวิ เจว รโห จ. อยมฺปิ ธมฺโม สารณีโย…เป… เอกีภาวาย สํวตฺตติ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खूचे आपल्या सब्रह्मचाऱ्यांविषयी प्रत्यक्ष आणि परोक्ष मैत्रीपूर्ण मनोकर्म प्रस्थापित असते. हा धर्म देखील सारणीय... ऐक्यासाठी कारणीभूत ठरतो. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ เย เต ลาภา ธมฺมิกา ธมฺมลทฺธา อนฺตมโส ปตฺตปริยาปนฺนมตฺตมฺปิ, ตถารูเปหิ ลาเภหิ อปฺปฏิวิภตฺตโภคี โหติ สีลวนฺเตหิ สพฺรหฺมจารีหิ สาธารณโภคี. อยมฺปิ ธมฺโม สารณีโย…เป… เอกีภาวาย สํวตฺตติ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खूला जे काही धार्मिक आणि न्याय्य मार्गाने लाभ मिळतात, अगदी भिक्षापात्रात पडलेल्या अन्नाइतके का असेना, अशा लाभांचा तो एकट्यानेच उपभोग न घेता, शीलवान सब्रह्मचाऱ्यांसोबत सामायिकपणे उपभोग घेतो. हा धर्म देखील सारणीय... ऐक्यासाठी कारणीभूत ठरतो. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ ยานิ ตานิ สีลานิ อขณฺฑานิ อจฺฉิทฺทานิ อสพลานิ อกมฺมาสานิ ภุชิสฺสานิ วิญฺญุปฺปสตฺถานิ อปรามฏฺฐานิ สมาธิสํวตฺตนิกานิ, ตถารูเปสุ สีเลสุ สีลสามญฺญคโต วิหรติ สพฺรหฺมจารีหิ อาวิ เจว รโห จ. อยมฺปิ ธมฺโม สารณีโย…เป… เอกีภาวาย สํวตฺตติ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खूची जी शील अखंड, अछिद्र, डाग नसलेली, निष्कलंक, बंधनांमधून मुक्त करणारी, विद्वानांनी प्रशंसिलेली, तृष्णा व दृष्टीने दूषित न झालेली आणि समाधीला पोषक असणारी असतात, अशा शीलांचे तो आपल्या सब्रह्मचाऱ्यांसोबत प्रत्यक्ष आणि परोक्ष समानतेने पालन करून राहतो. हा धर्म देखील सारणीय... ऐक्यासाठी कारणीभूत ठरतो. ‘‘ปุน [Pg.204] จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ ยายํ ทิฏฺฐิ อริยา นิยฺยานิกา นิยฺยาติ ตกฺกรสฺส สมฺมา ทุกฺขกฺขยาย, ตถารูปาย ทิฏฺฐิยา ทิฏฺฐิสามญฺญคโต วิหรติ สพฺรหฺมจารีหิ อาวิ เจว รโห จ. อยมฺปิ ธมฺโม สารณีโย ปิยกรโณ ครุกรโณ สงฺคหาย อวิวาทาย สามคฺคิยา เอกีภาวาย สํวตฺตติ. पुन्हा आणखी, बंधूंनो, जो भिक्खू अशा दृष्टीने युक्त असतो, जी आर्य (श्रेष्ठ) आणि मुक्ती देणारी (निय्यानिक) आहे, जी त्यानुसार आचरण करणाऱ्याला दुःखाच्या पूर्ण नाशाकडे घेऊन जाते; अशा दृष्टीने युक्त होऊन तो आपल्या सहधर्माचाऱ्यांसोबत प्रत्यक्ष आणि अप्रत्यक्षपणे समान दृष्टी ठेवून राहतो. हा देखील असा धर्म आहे जो स्मरणीय, प्रिय करणारा, पूजनीय करणारा असून, संघटन, वादविवाद नसणे, सामंजस्य आणि ऐक्य निर्माण करण्यास कारणीभूत ठरतो. ๓๒๕. ฉ วิวาทมูลานิ. อิธาวุโส, ภิกฺขุ โกธโน โหติ อุปนาหี. โย โส, อาวุโส, ภิกฺขุ โกธโน โหติ อุปนาหี, โส สตฺถริปิ อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส, ธมฺเมปิ อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส, สงฺเฆปิ อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส, สิกฺขายปิ น ปริปูรการี โหติ. โย โส, อาวุโส, ภิกฺขุ สตฺถริ อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส, ธมฺเม อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส, สงฺเฆ อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส, สิกฺขาย น ปริปูรการี, โส สงฺเฆ วิวาทํ ชเนติ. โย โหติ วิวาโท พหุชนอหิตาย พหุชนอสุขาย อนตฺถาย อหิตาย ทุกฺขาย เทวมนุสฺสานํ. เอวรูปํ เจ ตุมฺเห, อาวุโส, วิวาทมูลํ อชฺฌตฺตํ วา พหิทฺธา วา สมนุปสฺเสยฺยาถ. ตตฺร ตุมฺเห, อาวุโส, ตสฺเสว ปาปกสฺส วิวาทมูลสฺส ปหานาย วายเมยฺยาถ. เอวรูปํ เจ ตุมฺเห, อาวุโส, วิวาทมูลํ อชฺฌตฺตํ วา พหิทฺธา วา น สมนุปสฺเสยฺยาถ. ตตฺร ตุมฺเห, อาวุโส, ตสฺเสว ปาปกสฺส วิวาทมูลสฺส อายตึ อนวสฺสวาย ปฏิปชฺเชยฺยาถ. เอวเมตสฺส ปาปกสฺส วิวาทมูลสฺส ปหานํ โหติ. เอวเมตสฺส ปาปกสฺส วิวาทมูลสฺส อายตึ อนวสฺสโว โหติ. ३२५. वादाची सहा मुळे आहेत. येथे, बंधूंनो, एखादा भिक्खू क्रोधी आणि वैर बाळगणारा असतो. बंधूंनो, जो भिक्खू क्रोधी आणि वैर बाळगणारा असतो, तो शास्त्यांबद्दल आदर व सन्मान न बाळगता राहतो, धम्माबद्दल आदर व सन्मान न बाळगता राहतो, संघाबद्दल आदर व सन्मान न बाळगता राहतो आणि शिक्षेचे पूर्ण पालन करत नाही. बंधूंनो, जो भिक्खू शास्त्यांबद्दल, धम्माबद्दल आणि संघाबद्दल आदर व सन्मान न बाळगता राहतो आणि शिक्षेचे पूर्ण पालन करत नाही, तो संघामध्ये कलह निर्माण करतो. हा कलह बहुजनांच्या अहितासाठी, बहुजनांच्या दुःखासाठी, देव आणि मनुष्यांच्या अनर्थासाठी, अहितासाठी आणि दुःखासाठी कारणीभूत ठरतो. बंधूंनो, जर तुम्हाला स्वतःमध्ये किंवा इतरांमध्ये असे कलहाचे मूळ दिसून आले, तर तुम्ही त्या पापी कलहाच्या मुळाचा नाश करण्यासाठी प्रयत्न केला पाहिजे. आणि बंधूंनो, जर तुम्हाला स्वतःमध्ये किंवा इतरांमध्ये असे कलहाचे मूळ दिसून आले नाही, तर भविष्यात त्या पापी कलहाच्या मुळाची उत्पत्ती होऊ नये म्हणून तुम्ही आचरण केले पाहिजे. अशा प्रकारे या पापी कलहाच्या मुळाचा प्रहाण होतो आणि भविष्यात त्याची पुनरावृत्ती होत नाही. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ มกฺขี โหติ ปฬาสี…เป… อิสฺสุกี โหติ มจฺฉรี…เป… สโฐ โหติ มายาวี… ปาปิจฺโฉ โหติ มิจฺฉาทิฏฺฐี… สนฺทิฏฺฐิปรามาสี โหติ อาธานคฺคาหี ทุปฺปฏินิสฺสคฺคี…เป… โย โส, อาวุโส, ภิกฺขุ สนฺทิฏฺฐิปรามาสี โหติ อาธานคฺคาหี ทุปฺปฏินิสฺสคฺคี, โส สตฺถริปิ อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส, ธมฺเมปิ อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส, สงฺเฆปิ อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส, สิกฺขายปิ น ปริปูรการี โหติ. โย โส, อาวุโส, ภิกฺขุ สตฺถริ อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส, ธมฺเม อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส, สงฺเฆ อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส[Pg.205], สิกฺขาย น ปริปูรการี, โส สงฺเฆ วิวาทํ ชเนติ. โย โหติ วิวาโท พหุชนอหิตาย พหุชนอสุขาย อนตฺถาย อหิตาย ทุกฺขาย เทวมนุสฺสานํ. เอวรูปํ เจ ตุมฺเห, อาวุโส, วิวาทมูลํ อชฺฌตฺตํ วา พหิทฺธา วา สมนุปสฺเสยฺยาถ. ตตฺร ตุมฺเห, อาวุโส, ตสฺเสว ปาปกสฺส วิวาทมูลสฺส ปหานาย วายเมยฺยาถ. เอวรูปํ เจ ตุมฺเห, อาวุโส, วิวาทมูลํ อชฺฌตฺตํ วา พหิทฺธา วา น สมนุปสฺเสยฺยาถ. ตตฺร ตุมฺเห, อาวุโส, ตสฺเสว ปาปกสฺส วิวาทมูลสฺส อายตึ อนวสฺสวาย ปฏิปชฺเชยฺยาถ. เอวเมตสฺส ปาปกสฺส วิวาทมูลสฺส ปหานํ โหติ. เอวเมตสฺส ปาปกสฺส วิวาทมูลสฺส อายตึ อนวสฺสโว โหติ. पुन्हा आणखी, बंधूंनो, एखादा भिक्खू गुण नासविणारा (मक्खी) आणि बरोबरी करू पाहणारा (पळासी)... हेवा करणारा (इस्सकी) आणि कद्रू (मच्छरी)... लबाड (सठो) आणि कपटी (मायावी)... वाईट इच्छा बाळगणारा (पापिच्छो) आणि मिथ्यादृष्टी असणारा... स्वतःच्याच मताला चिकटून राहणारा (संदिट्ठिपरामासी), हट्टी (आधानग्गाही) आणि आपले मत सहज न सोडणारा (duppaṭinissaggī) असतो. बंधूंनो, जो भिक्खू स्वतःच्याच मताला चिकटून राहणारा, हट्टी आणि आपले मत सहज न सोडणारा असतो, तो शास्त्यांबद्दल आदर व सन्मान न बाळगता राहतो, धम्माबद्दल आदर व सन्मान न बाळगता राहतो, संघाबद्दल आदर व सन्मान न बाळगता राहतो आणि शिक्षेचे पूर्ण पालन करत नाही. बंधूंनो, जो भिक्खू शास्त्यांबद्दल, धम्माबद्दल आणि संघाबद्दल आदर व सन्मान न बाळगता राहतो आणि शिक्षेचे पूर्ण पालन करत नाही, तो संघामध्ये कलह निर्माण करतो. हा कलह बहुजनांच्या अहितासाठी, बहुजनांच्या दुःखासाठी, देव आणि मनुष्यांच्या अनर्थासाठी, अहितासाठी आणि दुःखासाठी कारणीभूत ठरतो. बंधूंनो, जर तुम्हाला स्वतःमध्ये किंवा इतरांमध्ये असे कलहाचे मूळ दिसून आले, तर तुम्ही त्या पापी कलहाच्या मुळाचा नाश करण्यासाठी प्रयत्न केला पाहिजे. आणि बंधूंनो, जर तुम्हाला स्वतःमध्ये किंवा इतरांमध्ये असे कलहाचे मूळ दिसून आले नाही, तर भविष्यात त्या पापी कलहाच्या मुळाची उत्पत्ती होऊ नये म्हणून तुम्ही आचरण केले पाहिजे. अशा प्रकारे या पापी कलहाच्या मुळाचा प्रहाण होतो आणि भविष्यात त्याची पुनरावृत्ती होत नाही. ‘‘ฉ ธาตุโย – ปถวีธาตุ, อาโปธาตุ, เตโชธาตุ, วาโยธาตุ, อากาสธาตุ, วิญฺญาณธาตุ. सहा धातू - पृथ्वीधातू, आपधातू, तेजोधातू, वायोधातू, आकाशधातू आणि विज्ञाणधातू. ๓๒๖. ‘‘ฉ นิสฺสรณิยา ธาตุโย. อิธาวุโส, ภิกฺขุ เอวํ วเทยฺย – ‘เมตฺตา หิ โข เม เจโตวิมุตฺติ ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา, อถ จ ปน เม พฺยาปาโท จิตฺตํ ปริยาทาย ติฏฺฐตี’ติ. โส ‘มา เหวํ’, ติสฺส วจนีโย, ‘มายสฺมา เอวํ อวจ, มา ภควนฺตํ อพฺภาจิกฺขิ, น หิ สาธุ ภควโต อพฺภกฺขานํ, น หิ ภควา เอวํ วเทยฺย. อฏฺฐานเมตํ, อาวุโส, อนวกาโส, ยํ เมตฺตาย เจโตวิมุตฺติยา ภาวิตาย พหุลีกตาย ยานีกตาย วตฺถุกตาย อนุฏฺฐิตาย ปริจิตาย สุสมารทฺธาย. อถ จ ปนสฺส พฺยาปาโท จิตฺตํ ปริยาทาย ฐสฺสติ, เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. นิสฺสรณํ เหตํ, อาวุโส, พฺยาปาทสฺส, ยทิทํ เมตฺตา เจโตวิมุตฺตี’ติ. ३२६. सहा मुक्ती देणारे धातू. येथे, बंधूंनो, एखादा भिक्खू असे म्हणू शकेल – 'मी मैत्रीयुक्त चेतोविमुक्तीचा विकास केला आहे, तिचा वारंवार सराव केला आहे, तिला आपले वाहन बनवले आहे, तिला आपला आधार बनवले आहे, तिला दृढ केले आहे, तिचा परिचय करून घेतला आहे आणि ती चांगल्या प्रकारे आरंभली आहे; तरीही व्यापाद माझ्या चित्ताला व्यापून राहिला आहे.' त्याला असे म्हटले पाहिजे – 'असे म्हणू नकोस! आयुष्मान, असे बोलू नकोस. भगवंतांवर खोटा आळ आणू नकोस. भगवंतांवर खोटा आरोप करणे योग्य नाही, कारण भगवंत असे कधीच बोलणार नाहीत. बंधूंनो, हे अशक्य आहे, याला काही वाव नाही की, मैत्रीयुक्त चेतोविमुक्तीचा विकास केला असताना, तिचा वारंवार सराव केला असताना, तिला वाहन बनवले असताना, तिला आधार बनवले असताना, तिला दृढ केले असताना, तिचा परिचय करून घेतला असताना आणि ती चांगल्या प्रकारे आरंभली असताना देखील व्यापाद चित्ताला व्यापून राहील; अशी कोणतीही शक्यता नाही. कारण बंधूंनो, ही मैत्रीयुक्त चेतोविमुक्ती म्हणजेच व्यापादापासून मुक्त होण्याचा मार्ग आहे.' ‘‘อิธ ปนาวุโส, ภิกฺขุ เอวํ วเทยฺย – ‘กรุณา หิ โข เม เจโตวิมุตฺติ ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา. อถ จ ปน เม วิเหสา จิตฺตํ ปริยาทาย ติฏฺฐตี’ติ, โส ‘มา เหวํ’ ติสฺส วจนีโย ‘มายสฺมา เอวํ อวจ, มา ภควนฺตํ อพฺภาจิกฺขิ, น หิ สาธุ ภควโต อพฺภกฺขานํ, น หิ ภควา เอวํ วเทยฺย. อฏฺฐานเมตํ อาวุโส, อนวกาโส, ยํ กรุณาย เจโตวิมุตฺติยา ภาวิตาย พหุลีกตาย ยานีกตาย วตฺถุกตาย [Pg.206] อนุฏฺฐิตาย ปริจิตาย สุสมารทฺธาย, อถ จ ปนสฺส วิเหสา จิตฺตํ ปริยาทาย ฐสฺสติ, เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. นิสฺสรณํ เหตํ, อาวุโส, วิเหสาย, ยทิทํ กรุณา เจโตวิมุตฺตี’ติ. येथे पुन्हा, बंधूंनो, एखादा भिक्खू असे म्हणू शकेल – 'मी करुणेने युक्त चेतोविमुक्तीचा विकास केला आहे, तिचा वारंवार सराव केला आहे, तिला आपले वाहन बनवले आहे, तिला आपला आधार बनवले आहे, तिला दृढ केले आहे, तिचा परिचय करून घेतला आहे आणि ती चांगल्या प्रकारे आरंभली आहे; तरीही विहेसा माझ्या चित्ताला व्यापून राहिली आहे.' त्याला असे म्हटले पाहिजे – 'असे म्हणू नकोस! आयुष्मान, असे बोलू नकोस. भगवंतांवर खोटा आळ आणू नकोस. भगवंतांवर खोटा आरोप करणे योग्य नाही, कारण भगवंत असे कधीच बोलणार नाहीत. बंधूंनो, हे अशक्य आहे, याला काही वाव नाही की, करुणेने युक्त चेतोविमुक्तीचा विकास केला असताना, तिचा वारंवार सराव केला असताना, तिला वाहन बनवले असताना, तिला आधार बनवले असताना, तिला दृढ केले असताना, तिचा परिचय करून घेतला असताना आणि ती चांगल्या प्रकारे आरंभली असताना देखील विहेसा चित्ताला व्यापून राहील; अशी कोणतीही शक्यता नाही. कारण बंधूंनो, ही करुणेने युक्त चेतोविमुक्ती म्हणजेच विहेसेपासून मुक्त होण्याचा मार्ग आहे.' ‘‘อิธ ปนาวุโส, ภิกฺขุ เอวํ วเทยฺย – ‘มุทิตา หิ โข เม เจโตวิมุตฺติ ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา. อถ จ ปน เม อรติ จิตฺตํ ปริยาทาย ติฏฺฐตี’ติ, โส ‘มา เหวํ’ ติสฺส วจนีโย ‘‘มายสฺมา เอวํ อวจ, มา ภควนฺตํ อพฺภาจิกฺขิ, น หิ สาธุ ภควโต อพฺภกฺขานํ, น หิ ภควา เอวํ วเทยฺย. อฏฺฐานเมตํ, อาวุโส, อนวกาโส, ยํ มุทิตาย เจโตวิมุตฺติยา ภาวิตาย พหุลีกตาย ยานีกตาย วตฺถุกตาย อนุฏฺฐิตาย ปริจิตาย สุสมารทฺธาย, อถ จ ปนสฺส อรติ จิตฺตํ ปริยาทาย ฐสฺสติ, เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. นิสฺสรณํ เหตํ, อาวุโส, อรติยา, ยทิทํ มุทิตา เจโตวิมุตฺตี’ติ. येथे पुन्हा, बंधूंनो, एखादा भिक्खू असे म्हणू शकेल – 'मी मुदितेने युक्त चेतोविमुक्तीचा विकास केला आहे, तिचा वारंवार सराव केला आहे, तिला आपले वाहन बनवले आहे, तिला आपला आधार बनवले आहे, तिला दृढ केले आहे, तिचा परिचय करून घेतला आहे आणि ती चांगल्या प्रकारे आरंभली आहे; तरीही अरती माझ्या चित्ताला व्यापून राहिली आहे.' त्याला असे म्हटले पाहिजे – 'असे म्हणू नकोस! आयुष्मान, असे बोलू नकोस. भगवंतांवर खोटा आळ आणू नकोस. भगवंतांवर खोटा आरोप करणे योग्य नाही, कारण भगवंत असे कधीच बोलणार नाहीत. बंधूंनो, हे अशक्य आहे, याला काही वाव नाही की, मुदितेने युक्त चेतोविमुक्तीचा विकास केला असताना, तिचा वारंवार सराव केला असताना, तिला वाहन बनवले असताना, तिला आधार बनवले असताना, तिला दृढ केले असताना, तिचा परिचय करून घेतला असताना आणि ती चांगल्या प्रकारे आरंभली असताना देखील अरती चित्ताला व्यापून राहील; अशी कोणतीही शक्यता नाही. कारण बंधूंनो, ही मुदितेने युक्त चेतोविमुक्ती म्हणजेच अरतीपासून मुक्त होण्याचा मार्ग आहे.' ‘‘อิธ ปนาวุโส, ภิกฺขุ เอวํ วเทยฺย – ‘อุเปกฺขา หิ โข เม เจโตวิมุตฺติ ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา. อถ จ ปน เม ราโค จิตฺตํ ปริยาทาย ติฏฺฐตี’ติ. โส ‘มา เหวํ’ ติสฺส วจนีโย ‘มายสฺมา เอวํ อวจ, มา ภควนฺตํ อพฺภาจิกฺขิ, น หิ สาธุ ภควโต อพฺภกฺขานํ, น หิ ภควา เอวํ วเทยฺย. อฏฺฐานเมตํ, อาวุโส, อนวกาโส, ยํ อุเปกฺขาย เจโตวิมุตฺติยา ภาวิตาย พหุลีกตาย ยานีกตาย วตฺถุกตาย อนุฏฺฐิตาย ปริจิตาย สุสมารทฺธาย, อถ จ ปนสฺส ราโค จิตฺตํ ปริยาทาย ฐสฺสติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. นิสฺสรณํ เหตํ, อาวุโส, ราคสฺส, ยทิทํ อุเปกฺขา เจโตวิมุตฺตี’ติ. शिवाय, आवुसो, जर एखादा भिक्खू असे म्हणाला की— 'मी उपेक्षा चेतोविमुक्तीची भावना केली आहे, तिचा वारंवार सराव केला आहे, तिला आपले वाहन बनवले आहे, तिला आपले अधिष्ठान बनवले आहे, तिचे अनुष्ठान केले आहे, तिचा परिचय करून घेतला आहे आणि ती चांगल्या प्रकारे आरंभीली आहे. तरीही राग माझ्या चित्ताला व्यापून राहतो.' तर त्याला असे म्हटले पाहिजे— 'आयुष्मान, असे म्हणू नका. भगवंतांवर खोटा आरोप करू नका. भगवंतांवर खोटा आरोप करणे चांगले नाही. कारण भगवंत असे कधीच बोलणार नाहीत. आवुसो, हे अशक्य आहे, असा कोणताही वाव नाही की, ज्याने उपेक्षा चेतोविमुक्तीची भावना केली आहे, तिचा वारंवार सराव केला आहे, तिला आपले वाहन बनवले आहे, तिला आपले अधिष्ठान बनवले आहे, तिचे अनुष्ठान केले आहे, तिचा परिचय करून घेतला आहे आणि ती चांगल्या प्रकारे आरंभीली आहे, तरीही राग त्याच्या चित्ताला व्यापून राहील; अशी कोणतीही शक्यता अस्तित्वात नाही. कारण, आवुसो, उपेक्षा चेतोविमुक्ती हेच रागापासून मुक्त होण्याचे साधन आहे.' ‘‘อิธ ปนาวุโส, ภิกฺขุ เอวํ วเทยฺย – ‘อนิมิตฺตา หิ โข เม เจโตวิมุตฺติ ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา. อถ จ ปน เม นิมิตฺตานุสาริ วิญฺญาณํ โหตี’ติ. โส ‘มา เหวํ’ ติสฺส วจนีโย ‘มายสฺมา เอวํ อวจ, มา ภควนฺตํ อพฺภาจิกฺขิ, น หิ สาธุ ภควโต อพฺภกฺขานํ, น หิ ภควา เอวํ วเทยฺย. อฏฺฐานเมตํ, อาวุโส, อนวกาโส, ยํ อนิมิตฺตาย เจโตวิมุตฺติยา ภาวิตาย พหุลีกตาย ยานีกตาย วตฺถุกตาย อนุฏฺฐิตาย ปริจิตาย สุสมารทฺธาย, อถ จ ปนสฺส นิมิตฺตานุสาริ [Pg.207] วิญฺญาณํ ภวิสฺสติ, เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. นิสฺสรณํ เหตํ, อาวุโส, สพฺพนิมิตฺตานํ, ยทิทํ อนิมิตฺตา เจโตวิมุตฺตี’ติ. शिवाय, आवुसो, जर एखादा भिक्खू असे म्हणाला की— 'मी अनिमित्त चेतोविमुक्तीची भावना केली आहे, तिचा वारंवार सराव केला आहे, तिला आपले वाहन बनवले आहे, तिला आपले अधिष्ठान बनवले आहे, तिचे अनुष्ठान केले आहे, तिचा परिचय करून घेतला आहे आणि ती चांगल्या प्रकारे आरंभीली आहे. तरीही माझे विज्ञान निमित्तांचे अनुकरण करणारे बनते.' तर त्याला असे म्हटले पाहिजे— 'आयुष्मान, असे म्हणू नका. भगवंतांवर खोटा आरोप करू नका. भगवंतांवर खोटा आरोप करणे चांगले नाही. कारण भगवंत असे कधीच बोलणार नाहीत. आवुसो, हे अशक्य आहे, असा कोणताही वाव नाही की, ज्याने अनिमित्त चेतोविमुक्तीची भावना केली आहे, तिचा वारंवार सराव केला आहे, तिला आपले वाहन बनवले आहे, तिला आपले अधिष्ठान बनवले आहे, तिचे अनुष्ठान केले आहे, तिचा परिचय करून घेतला आहे आणि ती चांगल्या प्रकारे आरंभीली आहे, तरीही त्याचे विज्ञान निमित्तांचे अनुकरण करणारे राहील; अशी कोणतीही शक्यता अस्तित्वात नाही. कारण, आवुसो, अनिमित्त चेतोविमुक्ती हेच सर्व निमित्तांपासून मुक्त होण्याचे साधन आहे.' ‘‘อิธ ปนาวุโส, ภิกฺขุ เอวํ วเทยฺย – ‘อสฺมีติ โข เม วิคตํ, อยมหมสฺมีติ น สมนุปสฺสามิ, อถ จ ปน เม วิจิกิจฺฉากถงฺกถาสลฺลํ จิตฺตํ ปริยาทาย ติฏฺฐตี’ติ. โส ‘มา เหวํ’ ติสฺส วจนีโย ‘มายสฺมา เอวํ อวจ, มา ภควนฺตํ อพฺภาจิกฺขิ, น หิ สาธุ ภควโต อพฺภกฺขานํ, น หิ ภควา เอวํ วเทยฺย. อฏฺฐานเมตํ, อาวุโส, อนวกาโส, ยํ อสฺมีติ วิคเต อยมหมสฺมีติ อสมนุปสฺสโต, อถ จ ปนสฺส วิจิกิจฺฉากถงฺกถาสลฺลํ จิตฺตํ ปริยาทาย ฐสฺสติ, เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. นิสฺสรณํ เหตํ, อาวุโส, วิจิกิจฺฉากถงฺกถาสลฺลสฺส, ยทิทํ อสฺมิมานสมุคฺฆาโต’ติ. शिवाय, आवुसो, जर एखादा भिक्खू असे म्हणाला की— 'माझा "मी आहे" हा मान नाहीसा झाला आहे, "मी हा आहे" असे मी पाहत नाही, तरीही संशय आणि शंकांचे शल्य माझ्या चित्ताला व्यापून राहते.' तर त्याला असे म्हटले पाहिजे— 'आयुष्मान, असे म्हणू नका. भगवंतांवर खोटा आरोप करू नका. भगवंतांवर खोटा आरोप करणे चांगले नाही. कारण भगवंत असे कधीच बोलणार नाहीत. आवुसो, हे अशक्य आहे, असा कोणताही वाव नाही की, "मी आहे" हा मान नाहीसा झाल्यावर आणि "मी हा आहे" असे न पाहणाऱ्या भिक्खूच्या चित्ताला संशय आणि शंकांचे शल्य व्यापून राहील; अशी कोणतीही शक्यता अस्तित्वात नाही. कारण, आवुसो, अस्मि-मानाचा समूळ नाश हेच संशय आणि शंकांच्या शल्यापासून मुक्त होण्याचे साधन आहे.' ๓๒๗. ‘‘ฉ อนุตฺตริยานิ – ทสฺสนานุตฺตริยํ, สวนานุตฺตริยํ, ลาภานุตฺตริยํ, สิกฺขานุตฺตริยํ, ปาริจริยานุตฺตริยํ, อนุสฺสตานุตฺตริยํ. ३२७. सहा अनुत्तरिये— दर्शन-अनुत्तरिय, श्रवण-अनुत्तरिय, लाभ-अनुत्तरिय, शिक्षा-अनुत्तरिय, परिचर्या-अनुत्तरिय, आणि अनुस्मृती-अनुत्तरिय. ‘‘ฉ อนุสฺสติฏฺฐานานิ – พุทฺธานุสฺสติ, ธมฺมานุสฺสติ, สงฺฆานุสฺสติ, สีลานุสฺสติ, จาคานุสฺสติ, เทวตานุสฺสติ. सहा अनुस्मृती-स्थाने— बुद्धानुस्मृती, धम्मानुस्मृती, संघानुस्मृती, शीलानुस्मृती, त्यागानुस्मृती, आणि देवतानुस्मृती. ๓๒๘. ‘‘ฉ สตตวิหารา. อิธาวุโส, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา เนว สุมโน โหติ น ทุมฺมโน, อุเปกฺขโก วิหรติ สโต สมฺปชาโน. โสเตน สทฺทํ สุตฺวา…เป… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย เนว สุมโน โหติ น ทุมฺมโน, อุเปกฺขโก วิหรติ สโต สมฺปชาโน. ३२८. सहा सतत-विहार. आवुसो, येथे भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहून ना हर्षित होतो ना खिन्न होतो; तो स्मृतिमान आणि संप्रजन्यवान राहून उपेक्षक भावाने विहार करतो. कानाने शब्द ऐकून... (पे)... मनाने धम्म जाणून ना हर्षित होतो ना खिन्न होतो; तो स्मृतिमान आणि संप्रजन्यवान राहून उपेक्षक भावाने विहार करतो. ๓๒๙. ‘‘ฉฬาภิชาติโย. อิธาวุโส, เอกจฺโจ กณฺหาภิชาติโก สมาโน กณฺหํ ธมฺมํ อภิชายติ. อิธ ปนาวุโส, เอกจฺโจ กณฺหาภิชาติโก สมาโน สุกฺกํ ธมฺมํ อภิชายติ. อิธ ปนาวุโส, เอกจฺโจ กณฺหาภิชาติโก สมาโน อกณฺหํ อสุกฺกํ นิพฺพานํ อภิชายติ. อิธ ปนาวุโส, เอกจฺโจ สุกฺกาภิชาติโก สมาโน สุกฺกํ ธมฺมํ อภิชายติ. อิธ ปนาวุโส, เอกจฺโจ สุกฺกาภิชาติโก สมาโน กณฺหํ ธมฺมํ อภิชายติ. อิธ ปนาวุโส, เอกจฺโจ สุกฺกาภิชาติโก สมาโน [Pg.208] อกณฺหํ อสุกฺกํ นิพฺพานํ อภิชายติ. ३२९. सहा अभिजाती. आवुसो, येथे एखादा कृष्ण-अभिजातीचा असून कृष्ण धम्माला जन्म देतो. आवुसो, येथे एखादा कृष्ण-अभिजातीचा असून शुक्ल धम्माला जन्म देतो. आवुसो, येथे एखादा कृष्ण-अभिजातीचा असून अकृष्ण-अशुक्ल अशा निर्वाणाला प्राप्त करतो. आवुसो, येथे एखादा शुक्ल-अभिजातीचा असून शुक्ल धम्माला जन्म देतो. आवुसो, येथे एखादा शुक्ल-अभिजातीचा असून कृष्ण धम्माला जन्म देतो. आवुसो, येथे एखादा शुक्ल-अभिजातीचा असून अकृष्ण-अशुक्ल अशा निर्वाणाला प्राप्त करतो. ‘‘ฉ นิพฺเพธภาคิยา สญฺญา – อนิจฺจสญฺญา อนิจฺเจ, ทุกฺขสญฺญา ทุกฺเข, อนตฺตสญฺญา, ปหานสญฺญา, วิราคสญฺญา, นิโรธสญฺญา. सहा निब्बेधभागीय संज्ञा (प्रज्ञावेध घडवून आणणाऱ्या संज्ञा)— अनित्यामध्ये अनित्य-संज्ञा, दुःखात दुःख-संज्ञा, अनात्म-संज्ञा, प्रहाण-संज्ञा, विराग-संज्ञा, आणि निरोध-संज्ञा. ‘‘อิเม โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน ฉ ธมฺมา สมฺมทกฺขาตา; ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ…เป… อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. आवुसो, जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत आणि सम्यक संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी हे सहा धम्म चांगल्या प्रकारे सांगितले आहेत. तेथे सर्वांनी मिळून संगायन केले पाहिजे... (पे)... जेणेकरून ते देव आणि मनुष्यांच्या हितासाठी, कल्याणासाठी आणि सुखासाठी होईल. สตฺตกํ सप्तक ๓๓๐. ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน สตฺต ธมฺมา สมฺมทกฺขาตา; ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ…เป… อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. กตเม สตฺต? ३३०. आवुसो, जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत आणि सम्यक संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी हे सात धम्म चांगल्या प्रकारे सांगितले आहेत. तेथे सर्वांनी मिळून संगायन केले पाहिजे... (पे)... जेणेकरून ते देव आणि मनुष्यांच्या हितासाठी, कल्याणासाठी आणि सुखासाठी होईल. ते सात कोणते? ‘‘สตฺต อริยธนานิ – สทฺธาธนํ, สีลธนํ, หิริธนํ, โอตฺตปฺปธนํ, สุตธนํ, จาคธนํ, ปญฺญาธนํ. सात आर्य धन— श्रद्धा-धन, शील-धन, हिरी-धन, ओत्तप्प-धन, श्रुत-धन, त्याग-धन, आणि प्रज्ञा-धन. ‘‘สตฺต โพชฺฌงฺคา – สติสมฺโพชฺฌงฺโค, ธมฺมวิจยสมฺโพชฺฌงฺโค, วีริยสมฺโพชฺฌงฺโค, ปีติสมฺโพชฺฌงฺโค, ปสฺสทฺธิสมฺโพชฺฌงฺโค, สมาธิสมฺโพชฺฌงฺโค, อุเปกฺขาสมฺโพชฺฌงฺโค. सात बोध्यंग— सती-संबोध्यंग, धम्मविचय-संबोध्यंग, वीर्य-संबोध्यंग, प्रीती-संबोध्यंग, प्रस्सद्धि-संबोध्यंग, समाधी-संबोध्यंग, आणि उपेक्षा-संबोध्यंग. ‘‘สตฺต สมาธิปริกฺขารา – สมฺมาทิฏฺฐิ, สมฺมาสงฺกปฺโป, สมฺมาวาจา, สมฺมากมฺมนฺโต, สมฺมาอาชีโว, สมฺมาวายาโม, สมฺมาสติ. समाधीचे सात परिकार— सम्यक दृष्टी, सम्यक संकल्प, सम्यक वाचा, सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, आणि सम्यक स्मृती. ‘‘สตฺต อสทฺธมฺมา – อิธาวุโส, ภิกฺขุ อสฺสทฺโธ โหติ, อหิริโก โหติ, อโนตฺตปฺปี โหติ, อปฺปสฺสุโต โหติ, กุสีโต โหติ, มุฏฺฐสฺสติ โหติ, ทุปฺปญฺโญ โหติ. सात असद्धम्म— आवुसो, येथे भिक्खू अश्रद्ध असतो, निर्लज्ज असतो, भीतिहीन असतो, अल्पश्रुत असतो, आळशी असतो, स्मृतिहीन असतो, आणि प्रज्ञाहीन असतो. ‘‘สตฺต สทฺธมฺมา – อิธาวุโส, ภิกฺขุ สทฺโธ โหติ, หิริมา โหติ, โอตฺตปฺปี โหติ, พหุสฺสุโต โหติ, อารทฺธวีริโย โหติ, อุปฏฺฐิตสฺสติ โหติ, ปญฺญวา โหติ. सात सद्धम्म— आवुसो, येथे भिक्खू श्रद्धावान असतो, लज्जावान असतो, भय बाळगणारा असतो, बहुश्रुत असतो, प्रयत्नशील असतो, स्मृतिमान असतो, आणि प्रज्ञावान असतो. ‘‘สตฺต สปฺปุริสธมฺมา – อิธาวุโส, ภิกฺขุ ธมฺมญฺญู จ โหติ อตฺถญฺญู จ อตฺตญฺญู จ มตฺตญฺญู จ กาลญฺญู จ ปริสญฺญู จ ปุคฺคลญฺญู จ. सत्पुरुषांचे सात धम्म— आवुसो, येथे भिक्खू धम्म जाणणारा, अर्थ जाणणारा, स्वतःला जाणणारा, मात्रा जाणणारा, काळ जाणणारा, परिषद जाणणारा, आणि व्यक्ती जाणणारा असतो. ๓๓๑. ‘‘สตฺต [Pg.209] นิทฺทสวตฺถูนิ. อิธาวุโส, ภิกฺขุ สิกฺขาสมาทาเน ติพฺพจฺฉนฺโท โหติ, อายติญฺจ สิกฺขาสมาทาเน อวิคตเปโม. ธมฺมนิสนฺติยา ติพฺพจฺฉนฺโท โหติ, อายติญฺจ ธมฺมนิสนฺติยา อวิคตเปโม. อิจฺฉาวินเย ติพฺพจฺฉนฺโท โหติ, อายติญฺจ อิจฺฉาวินเย อวิคตเปโม. ปฏิสลฺลาเน ติพฺพจฺฉนฺโท โหติ, อายติญฺจ ปฏิสลฺลาเน อวิคตเปโม. วีริยารมฺเภ ติพฺพจฺฉนฺโท โหติ, อายติญฺจ วีริยารมฺเภ อวิคตเปโม. สติเนปกฺเก ติพฺพจฺฉนฺโท โหติ, อายติญฺจ สติเนปกฺเก อวิคตเปโม. ทิฏฺฐิปฏิเวเธ ติพฺพจฺฉนฺโท โหติ, อายติญฺจ ทิฏฺฐิปฏิเวเธ อวิคตเปโม. ३३१. सात प्रशंसनीय गोष्टी (निद्देसवत्थू). आवुसो (बंधूंनो), येथे भिक्खू शिक्षेचे (शील-समाधी-प्रज्ञा इत्यादींचे) ग्रहण करण्यामध्ये तीव्र छंद (इच्छा) बाळगतो आणि भविष्यातही शिक्षेच्या ग्रहणाविषयी त्याचे प्रेम कायम असते. धम्माचे चिंतन-मनन करण्यामध्ये तीव्र छंद बाळगतो आणि भविष्यातही धम्माच्या चिंतनाविषयी त्याचे प्रेम कायम असते. तृष्णेचा त्याग करण्यामध्ये तीव्र छंद बाळगतो आणि भविष्यातही तृष्णेच्या त्यागाविषयी त्याचे प्रेम कायम असते. एकांतात राहण्यामध्ये तीव्र छंद बाळगतो आणि भविष्यातही एकांताविषयी त्याचे प्रेम कायम असते. वीर्य (प्रयत्न) आरंभ करण्यामध्ये तीव्र छंद बाळगतो आणि भविष्यातही वीर्य आरंभाविषयी त्याचे प्रेम कायम असते. स्मृती आणि प्रज्ञा (सति-नेपक्क) विकसित करण्यामध्ये तीव्र छंद बाळगतो आणि भविष्यातही स्मृती व प्रज्ञेविषयी त्याचे प्रेम कायम असते. दृष्टीचा प्रतिवेध (सत्य दर्शन) करण्यामध्ये तीव्र छंद बाळगतो आणि भविष्यातही दृष्टीच्या प्रतिवेधाविषयी त्याचे प्रेम कायम असते. ‘‘สตฺต สญฺญา – อนิจฺจสญฺญา, อนตฺตสญฺญา, อสุภสญฺญา, อาทีนวสญฺญา, ปหานสญฺญา, วิราคสญฺญา, นิโรธสญฺญา. सात संज्ञा – अनित्य संज्ञा, अनात्म संज्ञा, अशुभ संज्ञा, आदीनव संज्ञा (दोषांची जाणीव), प्रहाण संज्ञा (त्यागाची जाणीव), विराग संज्ञा आणि निरोध संज्ञा. ‘‘สตฺต พลานิ – สทฺธาพลํ, วีริยพลํ, หิริพลํ, โอตฺตปฺปพลํ, สติพลํ, สมาธิพลํ, ปญฺญาพลํ. सात बले – श्रद्धा बल, वीर्य बल, हिरी बल (पाप करण्याची लाज वाटणे), ओत्तप्प बल (पाप करण्याचे भय वाटणे), स्मृती बल, समाधी बल आणि प्रज्ञा बल. ๓๓๒. ‘‘สตฺต วิญฺญาณฏฺฐิติโย. สนฺตาวุโส, สตฺตา นานตฺตกายา นานตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ มนุสฺสา เอกจฺเจ จ เทวา เอกจฺเจ จ วินิปาติกา. อยํ ปฐมา วิญฺญาณฏฺฐิติ. ३३२. सात विज्ञानाचे तळ (विज्ञानाची ठाणी). आवुसो, असे प्राणी आहेत जे शरीराने भिन्न आहेत आणि संज्ञेनेही भिन्न आहेत; जसे की मनुष्य, काही देव आणि काही विनिपातिक (असुर). हे पहिले विज्ञान-स्थान आहे. ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา นานตฺตกายา เอกตฺตสญฺญิโน เสยฺยถาปิ เทวา พฺรหฺมกายิกา ปฐมาภินิพฺพตฺตา. อยํ ทุติยา วิญฺญาณฏฺฐิติ. आवुसो, असे प्राणी आहेत जे शरीराने भिन्न आहेत पण संज्ञेने एक आहेत; जसे की प्रथम ध्यानात उत्पन्न झालेले ब्रह्मकायिक देव. हे दुसरे विज्ञान-स्थान आहे. ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา เอกตฺตกายา นานตฺตสญฺญิโน เสยฺยถาปิ เทวา อาภสฺสรา. อยํ ตติยา วิญฺญาณฏฺฐิติ. आवुसो, असे प्राणी आहेत जे शरीराने एक आहेत पण संज्ञेने भिन्न आहेत; जसे की आभास्सर देव. हे तिसरे विज्ञान-स्थान आहे. ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา เอกตฺตกายา เอกตฺตสญฺญิโน เสยฺยถาปิ เทวา สุภกิณฺหา. อยํ จตุตฺถี วิญฺญาณฏฺฐิติ. आवुसो, असे प्राणी आहेत जे शरीराने एक आहेत आणि संज्ञेनेही एक आहेत; जसे की सुभकिण्ह देव. हे चौथे विज्ञान-स्थान आहे. ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา สพฺพโส รูปสญฺญานํ สมติกฺกมา ปฏิฆสญฺญานํ อตฺถงฺคมา นานตฺตสญฺญานํ อมนสิการา ‘อนนฺโต อากาโส’ติ อากาสานญฺจายตนูปคา. อยํ ปญฺจมี วิญฺญาณฏฺฐิติ. आवुसो, असे प्राणी आहेत जे सर्व प्रकारे रूप-संज्ञांचे उल्लंघन करून, प्रतिघ-संज्ञांचा अस्त करून, नानात्व-संज्ञांकडे दुर्लक्ष करून, 'आकाश अनंत आहे' अशा भावनेने आकासानंचायतनात पोहोचलेले आहेत. हे पाचवे विज्ञान-स्थान आहे. ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา สพฺพโส อากาสานญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘อนนฺตํ วิญฺญาณ’นฺติ วิญฺญาณญฺจายตนูปคา. อยํ ฉฏฺฐี วิญฺญาณฏฺฐิติ. आवुसो, असे प्राणी आहेत जे सर्व प्रकारे आकासानंचायतनाचे उल्लंघन करून, 'विज्ञान अनंत आहे' अशा भावनेने विज्ञाणंचायतनात पोहोचलेले आहेत. हे सहावे विज्ञान-स्थान आहे. ‘‘สนฺตาวุโส[Pg.210], สตฺตา สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘นตฺถิ กิญฺจี’ติ อากิญฺจญฺญายตนูปคา. อยํ สตฺตมี วิญฺญาณฏฺฐิติ. आवुसो, असे प्राणी आहेत जे सर्व प्रकारे विज्ञाणंचायतनाचे उल्लंघन करून, 'येथे काहीही नाही' अशा भावनेने आकिंचन्यायतनात पोहोचलेले आहेत. हे सातवे विज्ञान-स्थान आहे. ‘‘สตฺต ปุคฺคลา ทกฺขิเณยฺยา – อุภโตภาควิมุตฺโต, ปญฺญาวิมุตฺโต, กายสกฺขิ, ทิฏฺฐิปฺปตฺโต, สทฺธาวิมุตฺโต, ธมฺมานุสารี, สทฺธานุสารี. सात दान देण्यास योग्य व्यक्ती (दक्षिणेय पुद्गल) – उभतोभागविमुक्त, प्रज्ञाविमुक्त, कायसाक्षी, दृष्टिप्राप्त, श्रद्धाविमुक्त, धम्मानुसारी आणि श्रद्धानुसारी. ‘‘สตฺต อนุสยา – กามราคานุสโย, ปฏิฆานุสโย, ทิฏฺฐานุสโย, วิจิกิจฺฉานุสโย, มานานุสโย, ภวราคานุสโย, อวิชฺชานุสโย. सात अनुशय (सुप्त क्लेश) – कामराग-अनुशय, प्रतिघ-अनुशय, दृष्टी-अनुशय, विचिकित्सा-अनुशय, मान-अनुशय, भवराग-अनुशय आणि अविद्या-अनुशय. ‘‘สตฺต สญฺโญชนานิ – อนุนยสญฺโญชนํ, ปฏิฆสญฺโญชนํ, ทิฏฺฐิสญฺโญชนํ, วิจิกิจฺฉาสญฺโญชนํ, มานสญฺโญชนํ, ภวราคสญฺโญชนํ, อวิชฺชาสญฺโญชนํ. सात संयोजने (बंधने) – अनुनय-संयोजन (आसक्ती), प्रतिघ-संयोजन (द्वेष), दृष्टी-संयोजन, विचिकित्सा-संयोजन, मान-संयोजन, भवराग-संयोजन आणि अविद्या-संयोजन. ‘‘สตฺต อธิกรณสมถา – อุปฺปนฺนุปฺปนฺนานํ อธิกรณานํ สมถาย วูปสมาย สมฺมุขาวินโย ทาตพฺโพ, สติวินโย ทาตพฺโพ, อมูฬฺหวินโย ทาตพฺโพ, ปฏิญฺญาย กาเรตพฺพํ, เยภุยฺยสิกา, ตสฺสปาปิยสิกา, ติณวตฺถารโก. सात अधिकरण-शमथ (विवाद शांत करण्याचे सात नियम) – उत्पन्न झालेल्या विवादांच्या शांततेसाठी व समाधानासाठी: संमुखा-विनय (प्रत्यक्ष उपस्थितीत निर्णय), स्मृती-विनय, अमूढ-विनय (वेडेपणाच्या स्थितीत केलेल्या कृत्याबद्दल माफी), प्रतिज्ञेनुसार (कबुलीनुसार) कारवाई करणे, येभूय्यसिका (बहुमताने निर्णय), तस्स-पापिय्यसिका (गुन्हेगाराच्या वाईट वर्तनानुसार शिक्षा) आणि तिणवत्थारक (गवताने झाकल्याप्रमाणे वाद मिटवणे). ‘‘อิเม โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน สตฺต ธมฺมา สมฺมทกฺขาตา; ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ…เป… อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. आवुसो, त्या सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवंतांनी या सात धम्मांचे उत्तम प्रकारे प्रतिपादन केले आहे; तेथे सर्वांनी मिळून संगायन (एकत्र पाठ) केले पाहिजे... जेणेकरून ते देव आणि मनुष्यांच्या हितासाठी, कल्याणासाठी आणि सुखासाठी होईल. ทุติยภาณวาโร นิฏฺฐิโต. दुसरा भाणवार समाप्त. อฏฺฐกํ अष्टक (आठ गोष्टींचे समूह) ๓๓๓. ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน อฏฺฐ ธมฺมา สมฺมทกฺขาตา; ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ…เป… อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. กตเม อฏฺฐ? ३३३. आवुसो, त्या सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवंतांनी आठ धम्मांचे उत्तम प्रकारे प्रतिपादन केले आहे; तेथे सर्वांनी मिळून संगायन केले पाहिजे... जेणेकरून ते देव आणि मनुष्यांच्या हितासाठी, कल्याणासाठी आणि सुखासाठी होईल. ते आठ कोणते? ‘‘อฏฺฐ มิจฺฉตฺตา – มิจฺฉาทิฏฺฐิ, มิจฺฉาสงฺกปฺโป, มิจฺฉาวาจา, มิจฺฉากมฺมนฺโต, มิจฺฉาอาชีโว, มิจฺฉาวายาโม มิจฺฉาสติ, มิจฺฉาสมาธิ. आठ मिथ्यात्व (चुकीचे मार्ग) – मिथ्या दृष्टी, मिथ्या संकल्प, मिथ्या वाचा, मिथ्या कर्मान्त, मिथ्या आजीव, मिथ्या व्यायाम (प्रयत्न), मिथ्या स्मृती आणि मिथ्या समाधी. ‘‘อฏฺฐ [Pg.211] สมฺมตฺตา – สมฺมาทิฏฺฐิ, สมฺมาสงฺกปฺโป, สมฺมาวาจา, สมฺมากมฺมนฺโต, สมฺมาอาชีโว, สมฺมาวายาโม, สมฺมาสติ, สมฺมาสมาธิ. आठ सम्यक्त्व (योग्य मार्ग) – सम्यक दृष्टी, सम्यक संकल्प, सम्यक वाचा, सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृती आणि सम्यक समाधी. ‘‘อฏฺฐ ปุคฺคลา ทกฺขิเณยฺยา – โสตาปนฺโน, โสตาปตฺติผลสจฺฉิกิริยาย ปฏิปนฺโน; สกทาคามี, สกทาคามิผลสจฺฉิกิริยาย ปฏิปนฺโน; อนาคามี, อนาคามิผลสจฺฉิกิริยาย ปฏิปนฺโน; อรหา, อรหตฺตผลสจฺฉิกิริยาย ปฏิปนฺโน. आठ दान देण्यास योग्य व्यक्ती (दक्षिणेय पुद्गल) – स्रोतापन्न आणि स्रोतापत्ती-फळ साक्षात्कारासाठी प्रतिपन्न (प्रयत्नशील); सकृदागामी आणि सकृदागामी-फळ साक्षात्कारासाठी प्रतिपन्न; अनागामी आणि अनागामी-फळ साक्षात्कारासाठी प्रतिपन्न; अर्हत आणि अर्हत्व-फळ साक्षात्कारासाठी प्रतिपन्न. ๓๓๔. ‘‘อฏฺฐ กุสีตวตฺถูนิ. อิธาวุโส, ภิกฺขุนา กมฺมํ กาตพฺพํ โหติ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘กมฺมํ โข เม กาตพฺพํ ภวิสฺสติ, กมฺมํ โข ปน เม กโรนฺตสฺส กาโย กิลมิสฺสติ, หนฺทาหํ นิปชฺชามี’ติ! โส นิปชฺชติ น วีริยํ อารภติ อปฺปตฺตสฺส ปตฺติยา อนธิคตสฺส อธิคมาย อสจฺฉิกตสฺส สจฺฉิกิริยาย. อิทํ ปฐมํ กุสีตวตฺถุ. ३३४. आठ आळसाची कारणे (कुसीतवत्थू). आवुसो, येथे भिक्खूला एखादे काम करायचे असते. तेव्हा तो असा विचार करतो – 'मला काम करावे लागणार आहे, आणि काम करताना माझे शरीर थकून जाईल, म्हणून आता मी झोपतो!' असे म्हणून तो झोपून राहतो आणि जे प्राप्त झाले नाही ते प्राप्त करण्यासाठी, जे मिळवले नाही ते मिळवण्यासाठी, ज्याचा साक्षात्कार झाला नाही त्याचा साक्षात्कार करण्यासाठी वीर्य (प्रयत्न) आरंभ करत नाही. हे पहिले आळसाचे कारण आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุนา กมฺมํ กตํ โหติ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อหํ โข กมฺมํ อกาสึ, กมฺมํ โข ปน เม กโรนฺตสฺส กาโย กิลนฺโต, หนฺทาหํ นิปชฺชามี’ติ! โส นิปชฺชติ น วีริยํ อารภติ…เป… อิทํ ทุติยํ กุสีตวตฺถุ. पुन्हा दुसरे, आवुसो, भिक्खूने काम केलेले असते. तेव्हा तो असा विचार करतो – 'मी काम केले आहे, आणि काम केल्यामुळे माझे शरीर थकले आहे, म्हणून आता मी झोपतो!' असे म्हणून तो झोपून राहतो आणि वीर्य आरंभ करत नाही... हे दुसरे आळसाचे कारण आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุนา มคฺโค คนฺตพฺโพ โหติ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘มคฺโค โข เม คนฺตพฺโพ ภวิสฺสติ, มคฺคํ โข ปน เม คจฺฉนฺตสฺส กาโย กิลมิสฺสติ, หนฺทาหํ นิปชฺชามี’ติ! โส นิปชฺชติ น วีริยํ อารภติ… อิทํ ตติยํ กุสีตวตฺถุ. पुन्हा दुसरे, आवुसो, भिक्खूला प्रवासाला जायचे असते. तेव्हा तो असा विचार करतो – 'मला प्रवासाला जावे लागणार आहे, आणि प्रवास करताना माझे शरीर थकून जाईल, म्हणून आता मी झोपतो!' असे म्हणून तो झोपून राहतो आणि वीर्य आरंभ करत नाही... हे तिसरे आळसाचे कारण आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุนา มคฺโค คโต โหติ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อหํ โข มคฺคํ อคมาสึ, มคฺคํ โข ปน เม คจฺฉนฺตสฺส กาโย กิลนฺโต, หนฺทาหํ นิปชฺชามี’ติ! โส นิปชฺชติ น วีริยํ อารภติ… อิทํ จตุตฺถํ กุสีตวตฺถุ. पुन्हा दुसरे, आवुसो, भिक्खूने प्रवास केलेला असतो. तेव्हा तो असा विचार करतो – 'मी प्रवास केला आहे, आणि प्रवास केल्यामुळे माझे शरीर थकले आहे, म्हणून आता मी झोपतो!' असे म्हणून तो झोपून राहतो आणि वीर्य आरंभ करत नाही... हे चौथे आळसाचे कारण आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ คามํ วา นิคมํ วา ปิณฺฑาย จรนฺโต น ลภติ ลูขสฺส วา ปณีตสฺส วา โภชนสฺส ยาวทตฺถํ ปาริปูรึ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อหํ โข คามํ วา นิคมํ วา ปิณฺฑาย จรนฺโต นาลตฺถํ ลูขสฺส วา ปณีตสฺส วา โภชนสฺส ยาวทตฺถํ ปาริปูรึ, ตสฺส เม กาโย กิลนฺโต อกมฺมญฺโญ, หนฺทาหํ นิปชฺชามี’ติ! โส นิปชฺชติ น วีริยํ อารภติ… อิทํ ปญฺจมํ กุสีตวตฺถุ. पुन्हा आणखी, आवुसो, एखादा भिक्खू गावामध्ये किंवा नगरामध्ये पिंडाचारासाठी फिरत असताना त्याला हवे तितके पोटभर कोरडे किंवा उत्तम भोजन मिळत नाही. त्याला असा विचार येतो – 'मी गावामध्ये किंवा नगरामध्ये पिंडाचारासाठी फिरत असताना मला हवे तितके पोटभर कोरडे किंवा उत्तम भोजन मिळाले नाही. त्यामुळे माझे शरीर थकले आहे आणि अकार्यक्षम झाले आहे. चला, आता मी झोपतो!' तो झोपून राहतो आणि वीर्य आरंभित नाही... हे पाचवे कुसीतवत्थू आहे. ‘‘ปุน [Pg.212] จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ คามํ วา นิคมํ วา ปิณฺฑาย จรนฺโต ลภติ ลูขสฺส วา ปณีตสฺส วา โภชนสฺส ยาวทตฺถํ ปาริปูรึ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อหํ โข คามํ วา นิคมํ วา ปิณฺฑาย จรนฺโต อลตฺถํ ลูขสฺส วา ปณีตสฺส วา โภชนสฺส ยาวทตฺถํ ปาริปูรึ, ตสฺส เม กาโย ครุโก อกมฺมญฺโญ, มาสาจิตํ มญฺเญ, หนฺทาหํ นิปชฺชามี’ติ! โส นิปชฺชติ น วีริยํ อารภติ… อิทํ ฉฏฺฐํ กุสีตวตฺถุ. पुन्हा आणखी, आवुसो, एखादा भिक्खू गावामध्ये किंवा नगरामध्ये पिंडाचारासाठी फिरत असताना त्याला हवे तितके पोटभर कोरडे किंवा उत्तम भोजन मिळते. त्याला असा विचार येतो – 'मी गावामध्ये किंवा नगरामध्ये पिंडाचारासाठी फिरत असताना मला हवे तितके पोटभर कोरडे किंवा उत्तम भोजन मिळाले आहे. त्यामुळे माझे शरीर जड आणि अकार्यक्षम झाले आहे, जणू काही ओल्या उडदाने भरलेले पोतेच! चला, आता मी झोपतो!' तो झोपून राहतो आणि वीर्य आरंभित नाही... हे सहावे कुसीतवत्थू आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน อุปฺปนฺโน โหติ อปฺปมตฺตโก อาพาโธ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อุปฺปนฺโน โข เม อยํ อปฺปมตฺตโก อาพาโธ; อตฺถิ กปฺโป นิปชฺชิตุํ, หนฺทาหํ นิปชฺชามี’ติ! โส นิปชฺชติ น วีริยํ อารภติ… อิทํ สตฺตมํ กุสีตวตฺถุ. पुन्हा आणखी, आवुसो, एखाद्या भिक्खूला थोडासा आजार उद्भवतो. त्याला असा विचार येतो – 'मला हा थोडासा आजार उद्भवला आहे. आता झोपून राहणे योग्य आहे. चला, मी झोपतो!' तो झोपून राहतो आणि वीर्य आरंभित नाही... हे सातवे कुसीतवत्थू आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ คิลานา วุฏฺฐิโต โหติ อจิรวุฏฺฐิโต เคลญฺญา. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อหํ โข คิลานา วุฏฺฐิโต อจิรวุฏฺฐิโต เคลญฺญา, ตสฺส เม กาโย ทุพฺพโล อกมฺมญฺโญ, หนฺทาหํ นิปชฺชามี’ติ! โส นิปชฺชติ น วีริยํ อารภติ อปฺปตฺตสฺส ปตฺติยา อนธิคตสฺส อธิคมาย อสจฺฉิกตสฺส สจฺฉิกิริยาย. อิทํ อฏฺฐมํ กุสีตวตฺถุ. पुन्हा आणखी, आवुसो, एखादा भिक्खू आजारातून नुकताच बरा झालेला असतो. त्याला असा विचार येतो – 'मी आजारातून नुकताच बरा झालो आहे. माझे शरीर अजून दुर्बळ आणि अकार्यक्षम आहे. चला, आता मी झोपतो!' तो झोपून राहतो आणि जे प्राप्त झाले नाही ते प्राप्त करण्यासाठी, जे अधिगत झाले नाही ते अधिगत करण्यासाठी, जे साक्षात केले नाही ते साक्षात करण्यासाठी वीर्य आरंभित नाही. हे आठवे कुसीतवत्थू आहे. ๓๓๕. ‘‘อฏฺฐ อารมฺภวตฺถูนิ. อิธาวุโส, ภิกฺขุนา กมฺมํ กาตพฺพํ โหติ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘กมฺมํ โข เม กาตพฺพํ ภวิสฺสติ, กมฺมํ โข ปน เม กโรนฺเตน น สุกรํ พุทฺธานํ สาสนํ มนสิ กาตุํ, หนฺทาหํ วีริยํ อารภามิ อปฺปตฺตสฺส ปตฺติยา อนธิคตสฺส อธิคมาย, อสจฺฉิกตสฺส สจฺฉิกิริยายา’ติ! โส วีริยํ อารภติ อปฺปตฺตสฺส ปตฺติยา, อนธิคตสฺส อธิคมาย อสจฺฉิกตสฺส สจฺฉิกิริยาย. อิทํ ปฐมํ อารมฺภวตฺถุ. ३३५. आठ आरंभवत्थू आहेत. येथे, आवुसो, भिक्खूला काही काम करायचे असते. त्याला असा विचार येतो – 'मला काम करावे लागणार आहे. काम करत असताना बुद्धांच्या शासनाचे मनन करणे सोपे असणार नाही. चला, जे प्राप्त झाले नाही ते प्राप्त करण्यासाठी, जे अधिगत झाले नाही ते अधिगत करण्यासाठी, जे साक्षात केले नाही ते साक्षात करण्यासाठी मी आताच वीर्य आरंभितो!' तो जे प्राप्त झाले नाही ते प्राप्त करण्यासाठी, जे अधिगत झाले नाही ते अधिगत करण्यासाठी, जे साक्षात केले नाही ते साक्षात करण्यासाठी वीर्य आरंभितो. हे पहिले आरंभवत्थू आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุนา กมฺมํ กตํ โหติ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อหํ โข กมฺมํ อกาสึ, กมฺมํ โข ปนาหํ กโรนฺโต นาสกฺขึ พุทฺธานํ สาสนํ มนสิ กาตุํ, หนฺทาหํ วีริยํ อารภามิ…เป… โส วีริยํ อารภติ… อิทํ ทุติยํ อารมฺภวตฺถุ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खूने काम पूर्ण केलेले असते. त्याला असा विचार येतो – 'मी काम पूर्ण केले आहे. काम करत असताना मला बुद्धांच्या शासनाचे मनन करणे शक्य झाले नाही. चला, आता मी वीर्य आरंभितो...' तो वीर्य आरंभितो... हे दुसरे आरंभवत्थू आहे. ‘‘ปุน [Pg.213] จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุนา มคฺโค คนฺตพฺโพ โหติ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘มคฺโค โข เม คนฺตพฺโพ ภวิสฺสติ, มคฺคํ โข ปน เม คจฺฉนฺเตน น สุกรํ พุทฺธานํ สาสนํ มนสิ กาตุํ. หนฺทาหํ วีริยํ อารภามิ…เป… โส วีริยํ อารภติ… อิทํ ตติยํ อารมฺภวตฺถุ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खूला प्रवासाला जायचे असते. त्याला असा विचार येतो – 'मला प्रवासाला जावे लागणार आहे. प्रवास करत असताना बुद्धांच्या शासनाचे मनन करणे सोपे असणार नाही. चला, आता मी वीर्य आरंभितो...' तो वीर्य आरंभितो... हे तिसरे आरंभवत्थू आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุนา มคฺโค คโต โหติ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อหํ โข มคฺคํ อคมาสึ, มคฺคํ โข ปนาหํ คจฺฉนฺโต นาสกฺขึ พุทฺธานํ สาสนํ มนสิ กาตุํ, หนฺทาหํ วีริยํ อารภามิ…เป… โส วีริยํ อารภติ… อิทํ จตุตฺถํ อารมฺภวตฺถุ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खूने प्रवास पूर्ण केलेला असतो. त्याला असा विचार येतो – 'मी प्रवास पूर्ण केला आहे. प्रवास करत असताना मला बुद्धांच्या शासनाचे मनन करणे शक्य झाले नाही. चला, आता मी वीर्य आरंभितो...' तो वीर्य आरंभितो... हे चौथे आरंभवत्थू आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ คามํ วา นิคมํ วา ปิณฺฑาย จรนฺโต น ลภติ ลูขสฺส วา ปณีตสฺส วา โภชนสฺส ยาวทตฺถํ ปาริปูรึ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อหํ โข คามํ วา นิคมํ วา ปิณฺฑาย จรนฺโต นาลตฺถํ ลูขสฺส วา ปณีตสฺส วา โภชนสฺส ยาวทตฺถํ ปาริปูรึ, ตสฺส เม กาโย ลหุโก กมฺมญฺโญ, หนฺทาหํ วีริยํ อารภามิ…เป… โส วีริยํ อารภติ… อิทํ ปญฺจมํ อารมฺภวตฺถุ. पुन्हा आणखी, आवुसो, एखादा भिक्खू गावामध्ये किंवा नगरामध्ये पिंडाचारासाठी फिरत असताना त्याला हवे तितके पोटभर कोरडे किंवा उत्तम भोजन मिळत नाही. त्याला असा विचार येतो – 'मी गावामध्ये किंवा नगरामध्ये पिंडाचारासाठी फिरत असताना मला हवे तितके पोटभर कोरडे किंवा उत्तम भोजन मिळाले नाही. त्यामुळे माझे शरीर हलके आणि कार्यक्षम झाले आहे. चला, आता मी वीर्य आरंभितो...' तो वीर्य आरंभितो... हे पाचवे आरंभवत्थू आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ คามํ วา นิคมํ วา ปิณฺฑาย จรนฺโต ลภติ ลูขสฺส วา ปณีตสฺส วา โภชนสฺส ยาวทตฺถํ ปาริปูรึ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อหํ โข คามํ วา นิคมํ วา ปิณฺฑาย จรนฺโต อลตฺถํ ลูขสฺส วา ปณีตสฺส วา โภชนสฺส ยาวทตฺถํ ปาริปูรึ, ตสฺส เม กาโย พลวา กมฺมญฺโญ, หนฺทาหํ วีริยํ อารภามิ…เป… โส วีริยํ อารภติ… อิทํ ฉฏฺฐํ อารมฺภวตฺถุ. पुन्हा आणखी, आवुसो, एखादा भिक्खू गावामध्ये किंवा नगरामध्ये पिंडाचारासाठी फिरत असताना त्याला हवे तितके पोटभर कोरडे किंवा उत्तम भोजन मिळते. त्याला असा विचार येतो – 'मी गावामध्ये किंवा नगरामध्ये पिंडाचारासाठी फिरत असताना मला हवे तितके पोटभर कोरडे किंवा उत्तम भोजन मिळाले आहे. त्यामुळे माझे शरीर बलवान आणि कार्यक्षम झाले आहे. चला, आता मी वीर्य आरंभितो...' तो वीर्य आरंभितो... हे सहावे आरंभवत्थू आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน อุปฺปนฺโน โหติ อปฺปมตฺตโก อาพาโธ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อุปฺปนฺโน โข เม อยํ อปฺปมตฺตโก อาพาโธ, ฐานํ โข ปเนตํ วิชฺชติ ยํ เม อาพาโธ ปวฑฺเฒยฺย, หนฺทาหํ วีริยํ อารภามิ…เป… โส วีริยํ อารภติ… อิทํ สตฺตมํ อารมฺภวตฺถุ. पुन्हा आणखी, आवुसो, एखाद्या भिक्खूला थोडासा आजार उद्भवतो. त्याला असा विचार येतो – 'मला हा थोडासा आजार उद्भवला आहे. अशी शक्यता आहे की माझा हा आजार वाढू शकतो. चला, आता मी वीर्य आरंभितो...' तो वीर्य आरंभितो... हे सातवे आरंभवत्थू आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ คิลานา วุฏฺฐิโต โหติ อจิรวุฏฺฐิโต เคลญฺญา. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อหํ โข คิลานา วุฏฺฐิโต อจิรวุฏฺฐิโต เคลญฺญา, ฐานํ โข ปเนตํ วิชฺชติ ยํ เม อาพาโธ ปจฺจุทาวตฺเตยฺย, หนฺทาหํ วีริยํ อารภามิ อปฺปตฺตสฺส ปตฺติยา อนธิคตสฺส อธิคมาย อสจฺฉิกตสฺส สจฺฉิกิริยายา’’ติ! โส วีริยํ อารภติ อปฺปตฺตสฺส ปตฺติยา [Pg.214] อนธิคตสฺส อธิคมาย อสจฺฉิกตสฺส สจฺฉิกิริยาย. อิทํ อฏฺฐมํ อารมฺภวตฺถุ. पुन्हा आणखी, आवुसो, एखादा भिक्खू आजारातून नुकताच बरा झालेला असतो. त्याला असा विचार येतो – 'मी आजारातून नुकताच बरा झालो आहे. अशी शक्यता आहे की माझा आजार पुन्हा उद्भवू शकतो. चला, जे प्राप्त झाले नाही ते प्राप्त करण्यासाठी, जे अधिगत झाले नाही ते अधिगत करण्यासाठी, जे साक्षात केले नाही ते साक्षात करण्यासाठी मी आताच वीर्य आरंभितो!' तो जे प्राप्त झाले नाही ते प्राप्त करण्यासाठी, जे अधिगत झाले नाही ते अधिगत करण्यासाठी, जे साक्षात केले नाही ते साक्षात करण्यासाठी वीर्य आरंभितो. हे आठवे आरंभवत्थू आहे. ๓๓๖. ‘‘อฏฺฐ ทานวตฺถูนิ. อาสชฺช ทานํ เทติ, ภยา ทานํ เทติ, ‘อทาสิ เม’ติ ทานํ เทติ, ‘ทสฺสติ เม’ติ ทานํ เทติ, ‘สาหุ ทาน’นฺติ ทานํ เทติ, ‘อหํ ปจามิ, อิเม น ปจนฺติ, นารหามิ ปจนฺโต อปจนฺตานํ ทานํ น ทาตุ’นฺติ ทานํ เทติ, ‘อิทํ เม ทานํ ททโต กลฺยาโณ กิตฺติสทฺโท อพฺภุคฺคจฺฉตี’ติ ทานํ เทติ. จิตฺตาลงฺการ-จิตฺตปริกฺขารตฺถํ ทานํ เทติ. ३३६. आठ दानवत्थू आहेत. एखादा याचक समोर आल्यावर दान देतो, भयापोटी दान देतो, 'याने मला पूर्वी दिले होते' असा विचार करून दान देतो, 'हा मला भविष्यात देईल' असा विचार करून दान देतो, 'दान देणे उत्तम आहे' असा विचार करून दान देतो, 'मी स्वतः स्वयंपाक करतो, हे लोक स्वयंपाक करत नाहीत; स्वयंपाक करणाऱ्या माझ्यासाठी स्वयंपाक न करणाऱ्यांना दान न देणे योग्य नाही' असा विचार करून दान देतो, 'हे दान दिल्याने माझी चांगली कीर्ती सर्वत्र पसरू दे' असा विचार करून दान देतो, आणि चित्ताच्या अलंकारासाठी व चित्ताच्या परिष्कारासाठी दान देतो. ๓๓๗. ‘‘อฏฺฐ ทานูปปตฺติโย. อิธาวุโส, เอกจฺโจ ทานํ เทติ สมณสฺส วา พฺราหฺมณสฺส วา อนฺนํ ปานํ วตฺถํ ยานํ มาลาคนฺธวิเลปนํ เสยฺยาวสถปทีเปยฺยํ. โส ยํ เทติ ตํ ปจฺจาสีสติ. โส ปสฺสติ ขตฺติยมหาสาลํ วา พฺราหฺมณมหาสาลํ วา คหปติมหาสาลํ วา ปญฺจหิ กามคุเณหิ สมปฺปิตํ สมงฺคีภูตํ ปริจารยมานํ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อโห วตาหํ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ขตฺติยมหาสาลานํ วา พฺราหฺมณมหาสาลานํ วา คหปติมหาสาลานํ วา สหพฺยตํ อุปปชฺเชยฺย’นฺติ! โส ตํ จิตฺตํ ทหติ, ตํ จิตฺตํ อธิฏฺฐาติ, ตํ จิตฺตํ ภาเวติ, ตสฺส ตํ จิตฺตํ หีเน วิมุตฺตํ อุตฺตริ อภาวิตํ ตตฺรูปปตฺติยา สํวตฺตติ. ตญฺจ โข สีลวโต วทามิ โน ทุสฺสีลสฺส. อิชฺฌตาวุโส, สีลวโต เจโตปณิธิ วิสุทฺธตฺตา. ३३७. दानामुळे मिळणाऱ्या पुनर्जन्माच्या आठ उत्पत्ती (दानोपपत्ती) आहेत. येथे, हे आवुसो, एखादी व्यक्ती श्रमणाला किंवा ब्राह्मणाला अन्न, पेय, वस्त्र, वाहन, पुष्पमाला, गंध, विलेपन, शय्या, निवासस्थान आणि प्रकाश साधने (दीप) यांचे दान देते. तो जे दान देतो, त्या बदल्यात फळाची आकांक्षा धरतो. तो एखाद्या श्रीमंत क्षत्रियाला, श्रीमंत ब्राह्मणाला किंवा श्रीमंत गृहपतीला पाच कामगुणांनी परिपूर्ण होऊन त्यांचा उपभोग घेताना पाहतो. त्याच्या मनात असा विचार येतो – 'अहाहा! शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, मी श्रीमंत क्षत्रियांच्या किंवा श्रीमंत ब्राह्मणांच्या किंवा श्रीमंत गृहपतींच्या सहवासात जन्माला यावे!' तो त्या विचारावर आपले चित्त केंद्रित करतो, त्या चित्ताचा अधिष्ठान करतो, त्या चित्ताची भावना करतो. त्याचे ते चित्त हीन (कामगुणांमध्ये) गुंतलेले असल्यामुळे आणि उच्च स्तरावर (मार्ग-फळासाठी) विकसित न केल्यामुळे, त्याला तिथेच जन्म मिळण्यास कारणीभूत ठरते. परंतु, हे मी शीलवानाच्या बाबतीत सांगतो, दुःशीलाच्या बाबतीत नाही. हे आवुसो, शीलवानाच्या चित्ताचा संकल्प त्याच्या शुद्धतेमुळे यशस्वी होतो। ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, อิเธกจฺโจ ทานํ เทติ สมณสฺส วา พฺราหฺมณสฺส วา อนฺนํ ปานํ…เป… เสยฺยาวสถปทีเปยฺยํ. โส ยํ เทติ ตํ ปจฺจาสีสติ. ตสฺส สุตํ โหติ – ‘จาตุมหาราชิกา เทวา ทีฆายุกา วณฺณวนฺโต สุขพหุลา’’ติ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อโห วตาหํ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา จาตุมหาราชิกานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺเชยฺย’’นฺติ! โส ตํ จิตฺตํ ทหติ, ตํ จิตฺตํ อธิฏฺฐาติ, ตํ จิตฺตํ ภาเวติ, ตสฺส ตํ จิตฺตํ หีเน วิมุตฺตํ อุตฺตริ อภาวิตํ ตตฺรูปปตฺติยา สํวตฺตติ. ตญฺจ โข สีลวโต วทามิ โน ทุสฺสีลสฺส. อิชฺฌตาวุโส, สีลวโต เจโตปณิธิ วิสุทฺธตฺตา. पुन्हा दुसरे असे की, हे आवुसो, येथे एखादी व्यक्ती श्रमणाला किंवा ब्राह्मणाला अन्न, पेय... पे... शय्या, निवासस्थान आणि प्रकाश साधने यांचे दान देते. तो जे दान देतो, त्या बदल्यात फळाची आकांक्षा धरतो. त्याने ऐकलेले असते की – 'चातुमहाराजिक देव दीर्घायुषी, रूपवान आणि अत्यंत सुखी असतात.' त्याच्या मनात असा विचार येतो – 'अहाहा! शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, मी चातुमहाराजिक देवांच्या सहवासात जन्माला यावे!' तो त्या विचारावर आपले चित्त केंद्रित करतो, त्या चित्ताचा अधिष्ठान करतो, त्या चित्ताची भावना करतो. त्याचे ते चित्त हीन (कामगुणांमध्ये) गुंतलेले असल्यामुळे आणि उच्च स्तरावर विकसित न केल्यामुळे, त्याला तिथेच जन्म मिळण्यास कारणीभूत ठरते. परंतु, हे मी शीलवानाच्या बाबतीत सांगतो, दुःशीलाच्या बाबतीत नाही. हे आवुसो, शीलवानाच्या चित्ताचा संकल्प त्याच्या शुद्धतेमुळे यशस्वी होतो। ‘‘ปุน [Pg.215] จปรํ, อาวุโส, อิเธกจฺโจ ทานํ เทติ สมณสฺส วา พฺราหฺมณสฺส วา อนฺนํ ปานํ…เป… เสยฺยาวสถปทีเปยฺยํ. โส ยํ เทติ ตํ ปจฺจาสีสติ. ตสฺส สุตํ โหติ – ‘ตาวตึสา เทวา…เป… ยามา เทวา…เป… ตุสิตา เทวา …เป… นิมฺมานรตี เทวา…เป… ปรนิมฺมิตวสวตฺตี เทวา ทีฆายุกา วณฺณวนฺโต สุขพหุลา’ติ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อโห วตาหํ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ปรนิมฺมิตวสวตฺตีนํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺเชยฺย’’นฺติ! โส ตํ จิตฺตํ ทหติ, ตํ จิตฺตํ อธิฏฺฐาติ, ตํ จิตฺตํ ภาเวติ, ตสฺส ตํ จิตฺตํ หีเน วิมุตฺตํ อุตฺตริ อภาวิตํ ตตฺรูปปตฺติยา สํวตฺตติ. ตญฺจ โข สีลวโต วทามิ โน ทุสฺสีลสฺส. อิชฺฌตาวุโส, สีลวโต เจโตปณิธิ วิสุทฺธตฺตา. पुन्हा दुसरे असे की, हे आवुसो, येथे एखादी व्यक्ती श्रमणाला किंवा ब्राह्मणाला अन्न, पेय... पे... शय्या, निवासस्थान आणि प्रकाश साधने यांचे दान देते. तो जे दान देतो, त्या बदल्यात फळाची आकांक्षा धरतो. त्याने ऐकलेले असते की – 'तावतींस देव... पे... याम देव... पे... तुसित देव... पे... निम्माणरती देव... पे... परनिर्मितवसवत्ती देव दीर्घायुषी, रूपवान आणि अत्यंत सुखी असतात.' त्याच्या मनात असा विचार येतो – 'अहाहा! शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, मी परनिर्मितवसवत्ती देवांच्या सहवासात जन्माला यावे!' तो त्या विचारावर आपले चित्त केंद्रित करतो, त्या चित्ताचा अधिष्ठान करतो, त्या चित्ताची भावना करतो. त्याचे ते चित्त हीन (कामगुणांमध्ये) गुंतलेले असल्यामुळे आणि उच्च स्तरावर विकसित न केल्यामुळे, त्याला तिथेच जन्म मिळण्यास कारणीभूत ठरते. परंतु, हे मी शीलवानाच्या बाबतीत सांगतो, दुःशीलाच्या बाबतीत नाही. हे आवुसो, शीलवानाच्या चित्ताचा संकल्प त्याच्या शुद्धतेमुळे यशस्वी होतो। ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, อิเธกจฺโจ ทานํ เทติ สมณสฺส วา พฺราหฺมณสฺส วา อนฺนํ ปานํ วตฺถํ ยานํ มาลาคนฺธวิเลปนํ เสยฺยาวสถปทีเปยฺยํ. โส ยํ เทติ ตํ ปจฺจาสีสติ. ตสฺส สุตํ โหติ – ‘พฺรหฺมกายิกา เทวา ทีฆายุกา วณฺณวนฺโต สุขพหุลา’ติ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อโห วตาหํ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา พฺรหฺมกายิกานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺเชยฺย’นฺติ! โส ตํ จิตฺตํ ทหติ, ตํ จิตฺตํ อธิฏฺฐาติ, ตํ จิตฺตํ ภาเวติ, ตสฺส ตํ จิตฺตํ หีเน วิมุตฺตํ อุตฺตริ อภาวิตํ ตตฺรูปปตฺติยา สํวตฺตติ. ตญฺจ โข สีลวโต วทามิ โน ทุสฺสีลสฺส; วีตราคสฺส โน สราคสฺส. อิชฺฌตาวุโส, สีลวโต เจโตปณิธิ วีตราคตฺตา. पुन्हा दुसरे असे की, हे आवुसो, येथे एखादी व्यक्ती श्रमणाला किंवा ब्राह्मणाला अन्न, पेय, वस्त्र, वाहन, पुष्पमाला, गंध, विलेपन, शय्या, निवासस्थान आणि प्रकाश साधने यांचे दान देते. तो जे दान देतो, त्या बदल्यात फळाची आकांक्षा धरतो. त्याने ऐकलेले असते की – 'ब्रह्मकायिक देव दीर्घायुषी, रूपवान आणि अत्यंत सुखी असतात.' त्याच्या मनात असा विचार येतो – 'अहाहा! शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, मी ब्रह्मकायिक देवांच्या सहवासात जन्माला यावे!' तो त्या विचारावर आपले चित्त केंद्रित करतो, त्या चित्ताचा अधिष्ठान करतो, त्या चित्ताची भावना करतो. त्याचे ते चित्त हीन (कामगुणांमध्ये) गुंतलेले असल्यामुळे आणि उच्च स्तरावर विकसित न केल्यामुळे, त्याला तिथेच जन्म मिळण्यास कारणीभूत ठरते. परंतु, हे मी शीलवानाच्या बाबतीत सांगतो, दुःशीलाच्या बाबतीत नाही; आणि वीतरागाच्या (रागरहित व्यक्तीच्या) बाबतीत सांगतो, सरागाच्या (रागयुक्त व्यक्तीच्या) बाबतीत नाही. हे आवुसो, शीलवानाच्या चित्ताचा संकल्प त्याच्या रागरहिततेमुळे यशस्वी होतो। ‘‘อฏฺฐ ปริสา – ขตฺติยปริสา, พฺราหฺมณปริสา, คหปติปริสา, สมณปริสา, จาตุมหาราชิกปริสา, ตาวตึสปริสา, มารปริสา, พฺรหฺมปริสา. आठ परिषदा आहेत – क्षत्रिय परिषद, ब्राह्मण परिषद, गृहपती परिषद, श्रमण परिषद, चातुमहाराजिक परिषद, तावतींस परिषद, मार परिषद आणि ब्रह्म परिषद। ‘‘อฏฺฐ โลกธมฺมา – ลาโภ จ, อลาโภ จ, ยโส จ, อยโส จ, นินฺทา จ, ปสํสา จ, สุขญฺจ, ทุกฺขญฺจ. आठ लोकधर्म आहेत – लाभ आणि अलाभ, यश आणि अपयश, निंदा आणि प्रशंसा, सुख आणि दुःख। ๓๓๘. ‘‘อฏฺฐ อภิภายตนานิ. อชฺฌตฺตํ รูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ ปริตฺตานิ สุวณฺณทุพฺพณฺณานิ, ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ ปฐมํ อภิภายตนํ. ३३८. आठ अभिभायतने आहेत. अध्यात्मतः रूपसंज्ञी असलेला एखादा मनुष्य बाह्य रूपांना पाहतो, जी मर्यादित आणि सुवर्ण किंवा दुर्वर्ण असतात. 'त्या रूपांवर मात करून मी जाणतो आणि पाहतो' अशी त्याची संज्ञा असते. हे पहिले अभिभायतन आहे। ‘‘อชฺฌตฺตํ [Pg.216] รูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ อปฺปมาณานิ สุวณฺณทุพฺพณฺณานิ, ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ – เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ ทุติยํ อภิภายตนํ. अध्यात्मतः रूपसंज्ञी असलेला एखादा मनुष्य बाह्य रूपांना पाहतो, जी अमर्याद आणि सुवर्ण किंवा दुर्वर्ण असतात. 'त्या रूपांवर मात करून मी जाणतो आणि पाहतो' अशी त्याची संज्ञा असते. हे दुसरे अभिभायतन आहे। ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ ปริตฺตานิ สุวณฺณทุพฺพณฺณานิ, ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ ตติยํ อภิภายตนํ. अध्यात्मतः अरूपसंज्ञी असलेला एखादा मनुष्य बाह्य रूपांना पाहतो, जी मर्यादित आणि सुवर्ण किंवा दुर्वर्ण असतात. 'त्या रूपांवर मात करून मी जाणतो आणि पाहतो' अशी त्याची संज्ञा असते. हे तिसरे अभिभायतन आहे। ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ อปฺปมาณานิ สุวณฺณทุพฺพณฺณานิ, ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ จตุตฺถํ อภิภายตนํ. अध्यात्मतः अरूपसंज्ञी असलेला एखादा मनुष्य बाह्य रूपांना पाहतो, जी अमर्याद आणि सुवर्ण किंवा दुर्वर्ण असतात. 'त्या रूपांवर मात करून मी जाणतो आणि पाहतो' अशी त्याची संज्ञा असते. हे चौथे अभिभायतन आहे। ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ นีลานิ นีลวณฺณานิ นีลนิทสฺสนานิ นีลนิภาสานิ. เสยฺยถาปิ นาม อุมาปุปฺผํ นีลํ นีลวณฺณํ นีลนิทสฺสนํ นีลนิภาสํ, เสยฺยถา วา ปน ตํ วตฺถํ พาราณเสยฺยกํ อุภโตภาควิมฏฺฐํ นีลํ นีลวณฺณํ นีลนิทสฺสนํ นีลนิภาสํ. เอวเมว อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ นีลานิ นีลวณฺณานิ นีลนิทสฺสนานิ นีลนิภาสานิ, ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ ปญฺจมํ อภิภายตนํ. अध्यात्मतः अरूपसंज्ञी असलेला एखादा मनुष्य बाह्य रूपांना पाहतो, जी निळी, नीलवर्णाची, नील दर्शवणारी आणि नीलप्रभा असणारी असतात. जसे की, एखादे गोकर्णीचे फूल निळे, नीलवर्णाचे, नील दर्शवणारे आणि नीलप्रभा असणारे असते; किंवा जसे वाराणसीचे दोन्ही बाजूंनी गुळगुळीत केलेले वस्त्र निळे, नीलवर्णाचे, नील दर्शवणारे आणि नीलप्रभा असणारे असते. त्याचप्रमाणे, अध्यात्मतः अरूपसंज्ञी असलेला एखादा मनुष्य बाह्य रूपांना पाहतो, जी निळी, नीलवर्णाची, नील दर्शवणारी आणि नीलप्रभा असणारी असतात. 'त्या रूपांवर मात करून मी जाणतो आणि पाहतो' अशी त्याची संज्ञा असते. हे पाचवे अभिभायतन आहे। ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ ปีตานิ ปีตวณฺณานิ ปีตนิทสฺสนานิ ปีตนิภาสานิ. เสยฺยถาปิ นาม กณิการปุปฺผํ ปีตํ ปีตวณฺณํ ปีตนิทสฺสนํ ปีตนิภาสํ, เสยฺยถา วา ปน ตํ วตฺถํ พาราณเสยฺยกํ อุภโตภาควิมฏฺฐํ ปีตํ ปีตวณฺณํ ปีตนิทสฺสนํ ปีตนิภาสํ. เอวเมว อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ ปีตานิ ปีตวณฺณานิ ปีตนิทสฺสนานิ ปีตนิภาสานิ, ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ ฉฏฺฐํ อภิภายตนํ. अध्यात्मतः अरूपसंज्ञी असलेला एखादा मनुष्य बाह्य रूपांना पाहतो, जी पिवळी, पीतवर्णाची, पीत दर्शवणारी आणि पीतप्रभा असणारी असतात. जसे की, एखादे कर्णिकार फूल पिवळे, पीतवर्णाचे, पीत दर्शवणारे आणि पीतप्रभा असणारे असते; किंवा जसे वाराणसीचे दोन्ही बाजूंनी गुळगुळीत केलेले वस्त्र पिवळे, पीतवर्णाचे, पीत दर्शवणारे आणि पीतप्रभा असणारे असते. त्याचप्रमाणे, अध्यात्मतः अरूपसंज्ञी असलेला एखादा मनुष्य बाह्य रूपांना पाहतो, जी पिवळी, पीतवर्णाची, पीत दर्शवणारी आणि पीतप्रभा असणारी असतात. 'त्या रूपांवर मात करून मी जाणतो आणि पाहतो' अशी त्याची संज्ञा असते. हे सहावे अभिभायतन आहे। ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ โลหิตกานิ โลหิตกวณฺณานิ โลหิตกนิทสฺสนานิ โลหิตกนิภาสานิ. เสยฺยถาปิ นาม พนฺธุชีวกปุปฺผํ โลหิตกํ โลหิตกวณฺณํ โลหิตกนิทสฺสนํ โลหิตกนิภาสํ, เสยฺยถา วา ปน ตํ วตฺถํ พาราณเสยฺยกํ อุภโตภาควิมฏฺฐํ โลหิตกํ โลหิตกวณฺณํ โลหิตกนิทสฺสนํ โลหิตกนิภาสํ. เอวเมว อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก [Pg.217] พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ โลหิตกานิ โลหิตกวณฺณานิ โลหิตกนิทสฺสนานิ โลหิตกนิภาสานิ, ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ สตฺตมํ อภิภายตนํ. एखादा मनुष्य स्वतःच्या ठिकाणी रूपाची संज्ञा नसलेला होऊन, बाहेर लाल रंगाची, लाल वर्णाची, लाल दिसणारी आणि लाल प्रभा असणारी रूपे पाहतो. ज्याप्रमाणे तांबडे (बंधुजीवक) फूल हे लाल, लाल वर्णाचे, लाल दिसणारे आणि लाल प्रभा असणारे असते; किंवा ज्याप्रमाणे वाराणसीमध्ये विणलेले, दोन्ही बाजूंनी गुळगुळीत केलेले वस्त्र हे लाल, लाल वर्णाचे, लाल दिसणारे आणि लाल प्रभा असणारे असते. त्याचप्रमाणे, स्वतःच्या ठिकाणी रूपाची संज्ञा नसलेला एखादा मनुष्य बाहेर लाल रंगाची, लाल वर्णाची, लाल दिसणारी आणि लाल प्रभा असणारी रूपे पाहतो; आणि 'त्या रूपांवर मात करून मी जाणतो, मी पाहतो' अशी त्याची संज्ञा असते. हे सातवे अभिभायतन होय. ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ โอทาตานิ โอทาตวณฺณานิ โอทาตนิทสฺสนานิ โอทาตนิภาสานิ. เสยฺยถาปิ นาม โอสธิตารกา โอทาตา โอทาตวณฺณา โอทาตนิทสฺสนา โอทาตนิภาสา, เสยฺยถา วา ปน ตํ วตฺถํ พาราณเสยฺยกํ อุภโตภาควิมฏฺฐํ โอทาตํ โอทาตวณฺณํ โอทาตนิทสฺสนํ โอทาตนิภาสํ. เอวเมว อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ โอทาตานิ โอทาตวณฺณานิ โอทาตนิทสฺสนานิ โอทาตนิภาสานิ, ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ อฏฺฐมํ อภิภายตนํ. एखादा मनुष्य स्वतःच्या ठिकाणी रूपाची संज्ञा नसलेला होऊन, बाहेर पांढऱ्या रंगाची, पांढऱ्या वर्णाची, पांढरी दिसणारी आणि पांढरी प्रभा असणारी रूपे पाहतो. ज्याप्रमाणे ओषधी तारा (शुक्र तारा) हा पांढरा, पांढऱ्या वर्णाचा, पांढरा दिसणारा आणि पांढरी प्रभा असणारा असतो; किंवा ज्याप्रमाणे वाराणसीमध्ये विणलेले, दोन्ही बाजूंनी गुळगुळीत केलेले वस्त्र हे पांढरे, पांढऱ्या वर्णाचे, पांढरे दिसणारे आणि पांढरी प्रभा असणारे असते. त्याचप्रमाणे, स्वतःच्या ठिकाणी रूपाची संज्ञा नसलेला एखादा मनुष्य बाहेर पांढऱ्या रंगाची, पांढऱ्या वर्णाची, पांढरी दिसणारी आणि पांढरी प्रभा असणारी रूपे पाहतो; आणि 'त्या रूपांवर मात करून मी जाणतो, मी पाहतो' अशी त्याची संज्ञा असते. हे आठवे अभिभायतन होय. ๓๓๙. ‘‘อฏฺฐ วิโมกฺขา. รูปี รูปานิ ปสฺสติ. อยํ ปฐโม วิโมกฺโข. ३३९. आठ विमोक्ष आहेत. रूपी (स्वतःमध्ये रूप असणारा) बाहेरील रूपे पाहतो. हा पहिला विमोक्ष होय. ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ. อยํ ทุติโย วิโมกฺโข. स्वतःच्या ठिकाणी रूपाची संज्ञा नसलेला होऊन बाहेर रूपे पाहतो. हा दुसरा विमोक्ष होय. ‘‘สุภนฺเตว อธิมุตฺโต โหติ. อยํ ตติโย วิโมกฺโข. 'हे शुभ (सुंदर) आहे' अशाच भावनेने तो अधिमुक्त होतो. हा तिसरा विमोक्ष होय. ‘‘สพฺพโส รูปสญฺญานํ สมติกฺกมา ปฏิฆสญฺญานํ อตฺถงฺคมา นานตฺตสญฺญานํ อมนสิการา ‘อนนฺโต อากาโส’ติ อากาสานญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ จตุตฺโถ วิโมกฺโข. सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांचे उल्लंघन करून, प्रतिघसंज्ञांचा अस्त झाल्यामुळे आणि नानात्वसंज्ञांकडे मन न दिल्यामुळे, 'आकाश अनंत आहे' अशा भावनेने आकाशानंत्यायतनात प्रवेश करून विहरतो. हा चौथा विमोक्ष होय. ‘‘สพฺพโส อากาสานญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘อนนฺตํ วิญฺญาณ’นฺติ วิญฺญาณญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ ปญฺจโม วิโมกฺโข. सर्व प्रकारे आकाशानंत्यायतन ओलांडून, 'विज्ञान अनंत आहे' अशा भावनेने विज्ञानानंत्यायतनात प्रवेश करून विहरतो. हा पाचवा विमोक्ष होय. ‘‘สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘นตฺถิ กิญฺจี’ติ อากิญฺจญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ ฉฏฺโฐ วิโมกฺโข. सर्व प्रकारे विज्ञानानंत्यायतन ओलांडून, 'काहीही नाही' अशा भावनेने आकिंचन्यायतनात प्रवेश करून विहरतो. हा सहावा विमोक्ष होय. ‘‘สพฺพโส อากิญฺจญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ สตฺตโม วิโมกฺโข. सर्व प्रकारे आकिंचन्यायतन ओलांडून नैवसंज्ञानासंज्ञायतनात प्रवेश करून विहरतो. हा सातवा विमोक्ष होय. ‘‘สพฺพโส เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม สญฺญาเวทยิต นิโรธํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ อฏฺฐโม วิโมกฺโข. सर्व प्रकारे नैवसंज्ञानासंज्ञायतन ओलांडून संज्ञावेदयितनिरोधात प्रवेश करून विहरतो. हा आठवा विमोक्ष होय. ‘‘อิเม [Pg.218] โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน อฏฺฐ ธมฺมา สมฺมทกฺขาตา; ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ…เป… อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. हे बंधूंनो, सर्व काही जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत आणि सम्यक्संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी हे आठ धर्म चांगल्या प्रकारे सांगितले आहेत; त्याविषयी सर्वांनी मिळून संगायन केले पाहिजे... जेणेकरून ते देव आणि मनुष्यांच्या हितासाठी, कल्याणासाठी आणि सुखासाठी होईल. นวกํ नवक (नऊ गोष्टींचा गट) ๓๔๐. ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน นว ธมฺมา สมฺมทกฺขาตา; ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ…เป… อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. กตเม นว? ३४०. हे बंधूंनो, सर्व काही जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत आणि सम्यक्संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी नऊ धर्म चांगल्या प्रकारे सांगितले आहेत; त्याविषयी सर्वांनी मिळून संगायन केले पाहिजे... जेणेकरून ते देव आणि मनुष्यांच्या हितासाठी, कल्याणासाठी आणि सुखासाठी होईल. ते नऊ कोणते? ‘‘นว อาฆาตวตฺถูนิ. ‘อนตฺถํ เม อจรี’ติ อาฆาตํ พนฺธติ; ‘อนตฺถํ เม จรตี’ติ อาฆาตํ พนฺธติ; ‘อนตฺถํ เม จริสฺสตี’ติ อาฆาตํ พนฺธติ; ‘ปิยสฺส เม มนาปสฺส อนตฺถํ อจรี’ติ อาฆาตํ พนฺธติ…เป… อนตฺถํ จรตีติ อาฆาตํ พนฺธติ…เป… อนตฺถํ จริสฺสตีติ อาฆาตํ พนฺธติ; ‘อปฺปิยสฺส เม อมนาปสฺส อตฺถํ อจรี’ติ อาฆาตํ พนฺธติ…เป… อตฺถํ จรตีติ อาฆาตํ พนฺธติ…เป… อตฺถํ จริสฺสตีติ อาฆาตํ พนฺธติ. नऊ आघातवस्तू आहेत. 'त्याने माझे अहित केले' म्हणून तो वैर धरतो; 'तो माझे अहित करत आहे' म्हणून तो वैर धरतो; 'तो माझे अहित करेल' म्हणून तो वैर धरतो. 'माझ्या प्रिय व आवडत्या व्यक्तीचे त्याने अहित केले' म्हणून तो वैर धरतो... 'तो अहित करत आहे' म्हणून तो वैर धरतो... 'तो अहित करेल' म्हणून तो वैर धरतो. 'माझ्या अप्रिय व नावडत्या व्यक्तीचे त्याने हित केले' म्हणून तो वैर धरतो... 'तो हित करत आहे' म्हणून तो वैर धरतो... 'तो हित करेल' म्हणून तो वैर धरतो. ‘‘นว อาฆาตปฏิวินยา. ‘อนตฺถํ เม อจริ, ตํ กุเตตฺถ ลพฺภา’ติ อาฆาตํ ปฏิวิเนติ; ‘อนตฺถํ เม จรติ, ตํ กุเตตฺถ ลพฺภา’ติ อาฆาตํ ปฏิวิเนติ; ‘อนตฺถํ เม จริสฺสติ, ตํ กุเตตฺถ ลพฺภา’ติ อาฆาตํ ปฏิวิเนติ; ‘ปิยสฺส เม มนาปสฺส อนตฺถํ อจริ…เป… อนตฺถํ จรติ…เป… อนตฺถํ จริสฺสติ, ตํ กุเตตฺถ ลพฺภา’ติ อาฆาตํ ปฏิวิเนติ; ‘อปฺปิยสฺส เม อมนาปสฺส อตฺถํ อจริ…เป… อตฺถํ จรติ…เป… อตฺถํ จริสฺสติ, ตํ กุเตตฺถ ลพฺภา’ติ อาฆาตํ ปฏิวิเนติ. नऊ आघातप्रतिविनय आहेत. 'त्याने माझे अहित केले, पण त्यात काय करता येणे शक्य आहे?' असा विचार करून तो वैर दूर करतो; 'तो माझे अहित करत आहे, पण त्यात काय करता येणे शक्य आहे?' असा विचार करून तो वैर दूर करतो; 'तो माझे अहित करेल, पण त्यात काय करता येणे शक्य आहे?' असा विचार करून तो वैर दूर करतो. 'माझ्या प्रिय व आवडत्या व्यक्तीचे त्याने अहित केले... तो अहित करत आहे... तो अहित करेल, पण त्यात काय करता येणे शक्य आहे?' असा विचार करून तो वैर दूर करतो. 'माझ्या अप्रिय व नावडत्या व्यक्तीचे त्याने हित केले... तो हित करत आहे... तो हित करेल, पण त्यात काय करता येणे शक्य आहे?' असा विचार करून तो वैर दूर करतो. ๓๔๑. ‘‘นว สตฺตาวาสา. สนฺตาวุโส, สตฺตา นานตฺตกายา นานตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ มนุสฺสา เอกจฺเจ จ เทวา เอกจฺเจ จ วินิปาติกา. อยํ ปฐโม สตฺตาวาโส. ३४१. नऊ सत्त्वावास आहेत. हे बंधूंनो, असे प्राणी आहेत ज्यांचे शरीर भिन्न आहे आणि संज्ञाही भिन्न आहे; जसे की मनुष्य, काही देव आणि काही विनिपातिक. हा पहिला सत्त्वावास होय. ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา นานตฺตกายา เอกตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ เทวา พฺรหฺมกายิกา ปฐมาภินิพฺพตฺตา. อยํ ทุติโย สตฺตาวาโส. हे बंधूंनो, असे प्राणी आहेत ज्यांचे शरीर भिन्न आहे पण संज्ञा एकच आहे; जसे की प्रथम ध्यानात उत्पन्न झालेले ब्रह्मकायिक देव. हा दुसरा सत्त्वावास होय. ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา เอกตฺตกายา นานตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ เทวา อาภสฺสรา. อยํ ตติโย สตฺตาวาโส. हे बंधूंनो, असे प्राणी आहेत ज्यांचे शरीर एकच आहे पण संज्ञा भिन्न आहे; जसे की आभास्वर देव. हा तिसरा सत्त्वावास होय. ‘‘สนฺตาวุโส[Pg.219], สตฺตา เอกตฺตกายา เอกตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ เทวา สุภกิณฺหา. อยํ จตุตฺโถ สตฺตาวาโส. हे बंधूंनो, असे प्राणी आहेत ज्यांचे शरीर एकच आहे आणि संज्ञाही एकच आहे; जसे की शुभकिण्ह देव. हा चौथा सत्त्वावास होय. ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา อสญฺญิโน อปฺปฏิสํเวทิโน, เสยฺยถาปิ เทวา อสญฺญสตฺตา. อยํ ปญฺจโม สตฺตาวาโส. हे बंधूंनो, असे प्राणी आहेत जे संज्ञारहित आणि ज्यांना कोणतीही वेदना किंवा अनुभव नसतो; जसे की असंज्ञसत्त देव. हा पाचवा सत्त्वावास होय. ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา สพฺพโส รูปสญฺญานํ สมติกฺกมา ปฏิฆสญฺญานํ อตฺถงฺคมา นานตฺตสญฺญานํ อมนสิการา ‘อนนฺโต อากาโส’ติ อากาสานญฺจายตนูปคา. อยํ ฉฏฺโฐ สตฺตาวาโส. हे बंधूंनो, असे प्राणी आहेत जे सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांचे उल्लंघन करून, प्रतिघसंज्ञांचा अस्त झाल्यामुळे आणि नानात्वसंज्ञांकडे मन न दिल्यामुळे, 'आकाश अनंत आहे' अशा भावनेने आकाशानंत्यायतनात पोहोचलेले असतात. हा सहावा सत्त्वावास होय. ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา สพฺพโส อากาสานญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘อนนฺตํ วิญฺญาณ’นฺติ วิญฺญาณญฺจายตนูปคา. อยํ สตฺตโม สตฺตาวาโส. हे बंधूंनो, असे प्राणी आहेत जे सर्व प्रकारे आकाशानंत्यायतन ओलांडून, 'विज्ञान अनंत आहे' अशा भावनेने विज्ञानानंत्यायतनात पोहोचलेले असतात. हा सातवा सत्त्वावास होय. ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘นตฺถิ กิญฺจี’ติ อากิญฺจาญฺญายตนูปคา. อยํ อฏฺฐโม สตฺตาวาโส. हे बंधूंनो, असे प्राणी आहेत जे सर्व प्रकारे विज्ञानानंत्यायतन ओलांडून, 'काहीही नाही' अशा भावनेने आकिंचन्यायतनात पोहोचलेले असतात. हा आठवा सत्त्वावास होय. ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา สพฺพโส อากิญฺจญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม เนวสญฺญานาสญฺญายตนูปคา. อยํ นวโม สตฺตาวาโส. हे बंधूंनो, असे प्राणी आहेत जे सर्व प्रकारे आकिंचन्यायतन ओलांडून नैवसंज्ञानासंज्ञायनतात पोहोचलेले असतात. हा नववा सत्त्वावास होय. ๓๔๒. ‘‘นว อกฺขณา อสมยา พฺรหฺมจริยวาสาย. อิธาวุโส, ตถาคโต จ โลเก อุปฺปนฺโน โหติ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ, ธมฺโม จ เทสิยติ โอปสมิโก ปรินิพฺพานิโก สมฺโพธคามี สุคตปฺปเวทิโต. อยญฺจ ปุคฺคโล นิรยํ อุปปนฺโน โหติ. อยํ ปฐโม อกฺขโณ อสมโย พฺรหฺมจริยวาสาย. ३४२. ब्रह्मचर्यवासासाठी नऊ अक्षण आणि असमय आहेत. हे बंधूंनो, या जगात अर्हत, सम्यक्संबुद्ध असे तथागत उत्पन्न झालेले असतात आणि क्लेशांचे शमन करणारा, परिनिर्वाणाकडे नेणारा, संबोधीप्रत पोहोचवणारा आणि सुगतांनी उपदेशिलेला धर्मही देशिला जात असतो; परंतु हा मनुष्य नरकात उत्पन्न झालेला असतो. ब्रह्मचर्यवासासाठी हा पहिला अक्षण आणि असमय होय. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ตถาคโต จ โลเก อุปฺปนฺโน โหติ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ, ธมฺโม จ เทสิยติ โอปสมิโก ปรินิพฺพานิโก สมฺโพธคามี สุคตปฺปเวทิโต. อยญฺจ ปุคฺคโล ติรจฺฉานโยนึ อุปปนฺโน โหติ. อยํ ทุติโย อกฺขโณ อสมโย พฺรหฺมจริยวาสาย. “पुन्हा आणखी, आवुसो, जगात तथागत, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध उत्पन्न झालेले असतात आणि क्लेशांचे शमन करणारा, परिनिर्वाणाकडे नेणारा, संबोधीप्रत पोहचवणारा, सुगतांनी प्रवेदित केलेला धम्म देशिला (उपदेशिला) जात असतो. परंतु हा मनुष्य तिर्यक योनीत (प्राणी योनीत) उत्पन्न झालेला असतो. ब्रह्मचर्य वासासाठी हा दुसरा अक्षण (अयोग्य काळ) आणि असमय (अयोग्य वेळ) आहे.” ‘‘ปุน จปรํ…เป… เปตฺติวิสยํ อุปปนฺโน โหติ. อยํ ตติโย อกฺขโณ อสมโย พฺรหฺมจริยวาสาย. “पुन्हा आणखी... तो प्रेत योनीत उत्पन्न झालेला असतो. ब्रह्मचर्य वासासाठी हा तिसरा अक्षण आणि असमय आहे.” ‘‘ปุน [Pg.220] จปรํ…เป… อสุรกายํ อุปปนฺโน โหติ. อยํ จตุตฺโถ อกฺขโณ อสมโย พฺรหฺมจริยวาสาย. “पुन्हा आणखी... तो असुर योनीत उत्पन्न झालेला असतो. ब्रह्मचर्य वासासाठी हा चौथा अक्षण आणि असमय आहे.” ‘‘ปุน จปรํ…เป… อญฺญตรํ ทีฆายุกํ เทวนิกายํ อุปปนฺโน โหติ. อยํ ปญฺจโม อกฺขโณ อสมโย พฺรหฺมจริยวาสาย. “पुन्हा आणखी... तो एका दीर्घायुषी देवलोकात उत्पन्न झालेला असतो. ब्रह्मचर्य वासासाठी हा पाचवा अक्षण आणि असमय आहे.” ‘‘ปุน จปรํ…เป… ปจฺจนฺติเมสุ ชนปเทสุ ปจฺจาชาโต โหติ มิลกฺเขสุ อวิญฺญาตาเรสุ, ยตฺถ นตฺถิ คติ ภิกฺขูนํ ภิกฺขุนีนํ อุปาสกานํ อุปาสิกานํ. อยํ ฉฏฺโฐ อกฺขโณ อสมโย พฺรหฺมจริยวาสาย. “पुन्हा आणखी... तो सीमावर्ती प्रदेशात, रानटी व अज्ञानी लोकांमध्ये जन्मलेला असतो, जेथे भिक्खू, भिक्खुनी, उपासक आणि उपासिका यांचे जाणे-येणे नसते. ब्रह्मचर्य वासासाठी हा सहावा अक्षण आणि असमय आहे.” ‘‘ปุน จปรํ…เป… มชฺฌิเมสุ ชนปเทสุ ปจฺจาชาโต โหติ. โส จ โหติ มิจฺฉาทิฏฺฐิโก วิปรีตทสฺสโน – ‘นตฺถิ ทินฺนํ, นตฺถิ ยิฏฺฐํ, นตฺถิ หุตํ, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก, นตฺถิ อยํ โลโก, นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ มาตา, นตฺถิ ปิตา, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ โลเก สมณพฺราหฺมณา สมฺมคฺคตา สมฺมาปฏิปนฺนา เย อิมญฺจ โลกํ ปรญฺจ โลกํ สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา ปเวเทนฺตี’ติ. อยํ สตฺตโม อกฺขโณ อสมโย พฺรหฺมจริยวาสาย. “पुन्हा आणखी... तो मध्य देशात जन्मलेला असतो, परंतु तो मिथ्यादृष्टी आणि विपरीत दृष्टी असलेला असतो – ‘दान देण्याला काही अर्थ नाही, यज्ञाला काही अर्थ नाही, हवनाला काही अर्थ नाही, चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक नसतो, हा लोक नाही, परलोक नाही, माता नाही, पिता नाही, औपपातिक (स्वयं उत्पन्न होणारे) प्राणी नसतात; जगात असे कोणतेही सम्यक मार्गावर चालणारे, सम्यक प्रतिपन्न श्रमण व ब्राह्मण नाहीत, ज्यांनी स्वतःच्या उच्च ज्ञानाने (अभिज्ञेने) या लोकाचा आणि परलोकाचा साक्षात्कार करून तो प्रवेदित (प्रकट) केला आहे.’ ब्रह्मचर्य वासासाठी हा सातवा अक्षण आणि असमय आहे.” ‘‘ปุน จปรํ…เป… มชฺฌิเมสุ ชนปเทสุ ปจฺจาชาโต โหติ. โส จ โหติ ทุปฺปญฺโญ ชโฬ เอฬมูโค, นปฺปฏิพโล สุภาสิตทุพฺภาสิตานมตฺถมญฺญาตุํ. อยํ อฏฺฐโม อกฺขโณ อสมโย พฺรหฺมจริยวาสาย. “पुन्हा आणखी... तो मध्य देशात जन्मलेला असतो, परंतु तो प्रज्ञाहीन, जड आणि एडमूक (मुका-बहिरा) असतो, जो सुभाषित आणि दुभाषित यांतील अर्थ समजण्यास असमर्थ असतो. ब्रह्मचर्य वासासाठी हा आठवा अक्षण आणि असमय आहे.” ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ตถาคโต จ โลเก น อุปฺปนฺโน โหติ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ, ธมฺโม จ น เทสิยติ โอปสมิโก ปรินิพฺพานิโก สมฺโพธคามี สุคตปฺปเวทิโต. อยญฺจ ปุคฺคโล มชฺฌิเมสุ ชนปเทสุ ปจฺจาชาโต โหติ, โส จ โหติ ปญฺญวา อชโฬ อเนฬมูโค, ปฏิพโล สุภาสิต-ทุพฺภาสิตานมตฺถมญฺญาตุํ. อยํ นวโม อกฺขโณ อสมโย พฺรหฺมจริยวาสาย. “पुन्हा आणखी, आवुसो, जगात तथागत, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध उत्पन्न झालेले नसतात आणि क्लेशांचे शमन करणारा, परिनिर्वाणाकडे नेणारा, संबोधीप्रत पोहचवणारा, सुगतांनी प्रवेदित केलेला धम्म देशिला जात नसतो. परंतु हा मनुष्य मध्य देशात जन्मलेला असतो, आणि तो प्रज्ञावान, सजग (मूर्ख नसलेला) आणि अनएडमूक (मुका-बहिरा नसलेला) असतो, जो सुभाषित आणि दुभाषित यांतील अर्थ समजण्यास समर्थ असतो. ब्रह्मचर्य वासासाठी हा नववा अक्षण आणि असमय आहे.” ๓๔๓. ‘‘นว อนุปุพฺพวิหารา. อิธาวุโส, ภิกฺขุ วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา…เป… ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. ปีติยา จ วิราคา…เป… ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. สุขสฺส จ ปหานา [Pg.221] …เป… จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. สพฺพโส รูปสญฺญานํ สมติกฺกมา…เป… อากาสานญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. สพฺพโส อากาสานญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘อนนฺตํ วิญฺญาณ’นฺติ วิญฺญาณญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘นตฺถิ กิญฺจี’ติ อากิญฺจญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. สพฺพโส อากิญฺจญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. สพฺพโส เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม สญฺญาเวทยิตนิโรธํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. ३४३. “नऊ अनुक्रमिक विहार. येथे, आवुसो, भिक्खू कामांपासून अलिप्त होऊन, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, वितर्क आणि विचारांसह, विवेकापासून उत्पन्न झालेले प्रीती व सुख असणारे पहिले ध्यान प्राप्त करून विहार करतो. वितर्क आणि विचारांच्या शमनाने... दुसरे ध्यान प्राप्त करून विहार करतो. प्रीतीचा विराग झाल्याने... तिसरे ध्यान प्राप्त करून विहार करतो. सुखाचा त्याग केल्याने... चौथे ध्यान प्राप्त करून विहार करतो. सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांचे अतिक्रमण करून... आकाशानंचायतन प्राप्त करून विहार करतो. सर्व प्रकारे आकाशानंचायतनाचे अतिक्रमण करून, ‘विज्ञान अनंत आहे’ अशा भावनेने विज्ञाणंचायतन प्राप्त करून विहार करतो. सर्व प्रकारे विज्ञाणंचायतनाचे अतिक्रमण करून, ‘काहीही नाही’ अशा भावनेने आकिंचन्यायतन प्राप्त करून विहार करतो. सर्व प्रकारे आकिंचन्यायतनाचे अतिक्रमण करून नेवसंज्ञानासंज्ञायतन प्राप्त करून विहार करतो. सर्व प्रकारे नेवसंज्ञानासंज्ञायतनाचे अतिक्रमण करून संज्ञावेदयितनिरोध प्राप्त करून विहार करतो.” ๓๔๔. ‘‘นว อนุปุพฺพนิโรธา. ปฐมํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส กามสญฺญา นิรุทฺธา โหติ. ทุติยํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วิตกฺกวิจารา นิรุทฺธา โหนฺติ. ตติยํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส ปีติ นิรุทฺธา โหติ. จตุตฺถํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส อสฺสาสปสฺสาสฺสา นิรุทฺธา โหนฺติ. อากาสานญฺจายตนํ สมาปนฺนสฺส รูปสญฺญา นิรุทฺธา โหติ. วิญฺญาณญฺจายตนํ สมาปนฺนสฺส อากาสานญฺจายตนสญฺญา นิรุทฺธา โหติ. อากิญฺจญฺญายตนํ สมาปนฺนสฺส วิญฺญาณญฺจายตนสญฺญา นิรุทฺธา โหติ. เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ สมาปนฺนสฺส อากิญฺจญฺญายตนสญฺญา นิรุทฺธา โหติ. สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺนสฺส สญฺญา จ เวทนา จ นิรุทฺธา โหนฺติ. ३४४. “नऊ अनुक्रमिक निरोध. पहिल्या ध्यानात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची कामसंज्ञा निरुद्ध होते. दुसऱ्या ध्यानात समापन्न झालेल्या व्यक्तीचे वितर्क आणि विचार निरुद्ध होतात. तिसऱ्या ध्यानात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची प्रीती निरुद्ध होते. चौथ्या ध्यानात समापन्न झालेल्या व्यक्तीचे श्वासोच्छ्वास निरुद्ध होतात. आकाशानंचायतनात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची रूपसंज्ञा निरुद्ध होते. विज्ञाणंचायतनात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची आकाशानंचायतनसंज्ञा निरुद्ध होते. आकिंचन्यायतनात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची विज्ञाणंचायतनसंज्ञा निरुद्ध होते. नेवसंज्ञानासंज्ञायतनात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची आकिंचन्यायतनसंज्ञा निरुद्ध होते. संज्ञावेदयितनिरोधात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची संज्ञा आणि वेदना निरुद्ध होतात.” ‘‘อิเม โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน นว ธมฺมา สมฺมทกฺขาตา. ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ…เป… อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. “हे नऊ धर्म, आवुसो, त्या जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवंतांनी चांगल्या प्रकारे उपदेशिले आहेत. तेथे सर्वांनी मिळून संगायन केले पाहिजे... जेणेकरून ते देव आणि मनुष्यांच्या हितासाठी, कल्याणासाठी आणि सुखासाठी होईल.” ทสกํ “दशक” ๓๔๕. ‘‘อตฺถิ โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน ทส ธมฺมา สมฺมทกฺขาตา. ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ…เป… อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. กตเม ทส? ३४५. “आवुसो, त्या जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवंतांनी दहा धर्म चांगल्या प्रकारे उपदेशिले आहेत. तेथे सर्वांनी मिळून संगायन केले पाहिजे... जेणेकरून ते देव आणि मनुष्यांच्या हितासाठी, कल्याणासाठी आणि सुखासाठी होईल. ते दहा कोणते?” ‘‘ทส นาถกรณา ธมฺมา. อิธาวุโส, ภิกฺขุ สีลวา โหติ. ปาติโมกฺขสํวรสํวุโต วิหรติ อาจารโคจรสมฺปนฺโน, อณุมตฺเตสุ วชฺเชสุ ภยทสฺสาวี สมาทาย สิกฺขติ สิกฺขาปเทสุ. ยํปาวุโส, ภิกฺขุ [Pg.222] สีลวา โหติ, ปาติโมกฺขสํวรสํวุโต วิหรติ, อาจารโคจรสมฺปนฺโน, อณุมตฺเตสุ วชฺเชสุ ภยทสฺสาวี สมาทาย สิกฺขติ สิกฺขาปเทสุ. อยมฺปิ ธมฺโม นาถกรโณ. “दहा नाथकरण (आश्रय देणारे) धर्म. येथे, आवुसो, भिक्खू शीलवान असतो. तो प्रातिमोक्ष-संवर-संवरित होऊन विहार करतो, आचार आणि गोचराने संपन्न असतो, सूक्ष्म दोषांमध्येही भय पाहणारा असतो आणि शिक्षापदांचे ग्रहण करून त्यात स्वतःला प्रशिक्षित करतो. आवुसो, ज्या अर्थी भिक्खू शीलवान असतो, प्रातिमोक्ष-संवर-संवरित होऊन विहार करतो, आचार-गोचर-संपन्न असतो, सूक्ष्म दोषांमध्येही भय पाहणारा असतो आणि शिक्षापदांचे ग्रहण करून त्यात स्वतःला प्रशिक्षित करतो, हा धर्म देखील नाथकरण आहे.” ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ พหุสฺสุโต โหติ สุตธโร สุตสนฺนิจโย. เย เต ธมฺมา อาทิกลฺยาณา มชฺเฌกลฺยาณา ปริโยสานกลฺยาณา สาตฺถา สพฺยญฺชนา เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ อภิวทนฺติ, ตถารูปาสฺส ธมฺมา พหุสฺสุตา โหนฺติ ธาตา วจสา ปริจิตา มนสานุเปกฺขิตา ทิฏฺฐิยา สุปฺปฏิวิทฺธา, ยํปาวุโส, ภิกฺขุ พหุสฺสุโต โหติ…เป… ทิฏฺฐิยา สุปฺปฏิวิทฺธา. อยมฺปิ ธมฺโม นาถกรโณ. “पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू बहुश्रुत असतो, श्रुतधर आणि श्रुतसंनिचय असतो. जे धर्म सुरुवातीला कल्याणकारी, मध्ये कल्याणकारी आणि शेवटी कल्याणकारी आहेत, जे अर्थयुक्त आणि व्यंजनयुक्त आहेत, जे केवळ परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचे प्रतिपादन करतात, अशा प्रकारचे धर्म त्याने बहुश्रुत केलेले असतात, धारण केलेले असतात, वाणीने परिचित केलेले असतात, मनाने अनुपेक्षित केलेले असतात आणि दृष्टीने सुप्रतिविद्ध केलेले असतात. आवुसो, ज्या अर्थी भिक्खू बहुश्रुत असतो... दृष्टीने सुप्रतिविद्ध असतो, हा धर्म देखील नाथकरण आहे.” ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ กลฺยาณมิตฺโต โหติ กลฺยาณสหาโย กลฺยาณสมฺปวงฺโก. ยํปาวุโส, ภิกฺขุ กลฺยาณมิตฺโต โหติ กลฺยาณสหาโย กลฺยาณสมฺปวงฺโก. อยมฺปิ ธมฺโม นาถกรโณ. “पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू कल्याणमित्र, कल्याणसहायी आणि कल्याणसंपवंक असतो. आवुसो, ज्या अर्थी भिक्खू कल्याणमित्र असतो, कल्याणसहायी असतो, कल्याणसंपवंक असतो, हा धर्म देखील नाथकरण आहे.” ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ สุวโจ โหติ โสวจสฺสกรเณหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต ขโม ปทกฺขิณคฺคาหี อนุสาสนึ. ยํปาวุโส, ภิกฺขุ สุวโจ โหติ…เป… ปทกฺขิณคฺคาหี อนุสาสนึ. อยมฺปิ ธมฺโม นาถกรโณ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू हा सुवच (नम्र/सहजपणे उपदेश ऐकणारा) असतो, नम्रता निर्माण करणाऱ्या गुणांनी युक्त असतो, सहनशील असतो आणि उपदेशाचे आदराने ग्रहण करणारा असतो. आवुसो, ज्या अर्थी भिक्खू सुवच असतो...पे... उपदेशाचे आदराने ग्रहण करणारा असतो, हा धर्म देखील नाथकरण (आश्रय देणारा) आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ ยานิ ตานิ สพฺรหฺมจารีนํ อุจฺจาวจานิ กึกรณียานิ, ตตฺถ ทกฺโข โหติ อนลโส ตตฺรุปายาย วีมํสาย สมนฺนาคโต, อลํ กาตุํ อลํ สํวิธาตุํ. ยํปาวุโส, ภิกฺขุ ยานิ ตานิ สพฺรหฺมจารีนํ…เป… อลํ สํวิธาตุํ. อยมฺปิ ธมฺโม นาถกรโณ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू आपल्या सब्रह्मचाऱ्यांच्या (सहकाऱ्यांच्या) लहान-मोठ्या कर्तव्यांमध्ये (कामांमध्ये) कुशल असतो, आळस न करणारा असतो, त्या उपायांचा विचार करणाऱ्या प्रज्ञेने युक्त असतो, ती कामे करण्यास आणि त्यांचे नियोजन करण्यास समर्थ असतो. आवुसो, ज्या अर्थी भिक्खू सब्रह्मचाऱ्यांच्या...पे... नियोजन करण्यास समर्थ असतो, हा धर्म देखील नाथकरण आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ ธมฺมกาโม โหติ ปิยสมุทาหาโร, อภิธมฺเม อภิวินเย อุฬารปาโมชฺโช. ยํปาวุโส, ภิกฺขุ ธมฺมกาโม โหติ…เป… อุฬารปาโมชฺโช. อยมฺปิ ธมฺโม นาถกรโณ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू हा धम्माची आवड असणारा (धम्मकामी) असतो, प्रिय संभाषण करणारा असतो, अभिधम्म आणि अभिविनयामध्ये अत्यंत आनंद मिळवणारा असतो. आवुसो, ज्या अर्थी भिक्खू धम्मकामी असतो...पे... अत्यंत आनंद मिळवणारा असतो, हा धर्म देखील नाथकरण आहे. ‘‘ปุน [Pg.223] จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ สนฺตุฏฺโฐ โหติ อิตรีตเรหิ จีวรปิณฺฑปาตเสนาสนคิลานปฺปจฺจยเภสชฺชปริกฺขาเรหิ. ยํปาวุโส, ภิกฺขุ สนฺตุฏฺโฐ โหติ…เป… ปริกฺขาเรหิ. อยมฺปิ ธมฺโม นาถกรโณ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू हा जसे मिळतील तशा चीवर, पिंडपात, सेनासन आणि आजारपणातील औषधोपचार रूपी परिष्कारांनी (साधनांनी) संतुष्ट असतो. आवुसो, ज्या अर्थी भिक्खू संतुष्ट असतो...पे... परिष्कारांनी संतुष्ट असतो, हा धर्म देखील नाथकरण आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ อารทฺธวีริโย วิหรติ อกุสลานํ ธมฺมานํ ปหานาย กุสลานํ ธมฺมานํ อุปสมฺปทาย, ถามวา ทฬฺหปรกฺกโม อนิกฺขิตฺตธุโร กุสเลสุ ธมฺเมสุ. ยํปาวุโส, ภิกฺขุ อารทฺธวีริโย วิหรติ…เป… อนิกฺขิตฺตธุโร กุสเลสุ ธมฺเมสุ. อยมฺปิ ธมฺโม นาถกรโณ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू अकुशल धर्मांचा त्याग करण्यासाठी आणि कुशल धर्मांच्या प्राप्तीसाठी आरब्धवीर्य (प्रयत्नशील) होऊन विहरतो; तो बलवान, दृढ पराक्रमी आणि कुशल धर्मांच्या बाबतीत जबाबदारी न झटकणारा (अनिक्खित्तधुर) असतो. आवुसो, ज्या अर्थी भिक्खू आरब्धवीर्य होऊन विहरतो...पे... कुशल धर्मांच्या बाबतीत जबाबदारी न झटकणारा असतो, हा धर्म देखील नाथकरण आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ สติมา โหติ ปรเมน สติเนปกฺเกน สมนฺนาคโต จิรกตมฺปิ จิรภาสิตมฺปิ สริตา อนุสฺสริตา. ยํปาวุโส, ภิกฺขุ สติมา โหติ…เป… สริตา อนุสฺสริตา. อยมฺปิ ธมฺโม นาถกรโณ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू हा स्मृतिमान (जागरूक) असतो, परम स्मृति आणि प्रज्ञेने युक्त असतो, फार पूर्वी केलेले काम आणि फार पूर्वी बोललेले बोलणे आठवणारा व वारंवार स्मरण करणारा असतो. आवुसो, ज्या अर्थी भिक्खू स्मृतिमान असतो...पे... आठवणारा व वारंवार स्मरण करणारा असतो, हा धर्म देखील नाथकरण आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ ปญฺญวา โหติ, อุทยตฺถคามินิยา ปญฺญาย สมนฺนาคโต อริยาย นิพฺเพธิกาย สมฺมาทุกฺขกฺขยคามินิยา. ยํปาวุโส, ภิกฺขุ ปญฺญวา โหติ…เป… สมฺมาทุกฺขกฺขยคามินิยา. อยมฺปิ ธมฺโม นาถกรโณ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू हा प्रज्ञावान असतो, उदय आणि अस्त (उत्पत्ती आणि विनाश) जाणणाऱ्या, आर्य, भेदक (कलेशांचा नाश करणाऱ्या) आणि दुःखाचा पूर्ण क्षय करणाऱ्या प्रज्ञेने युक्त असतो. आवुसो, ज्या अर्थी भिक्खू प्रज्ञावान असतो...पे... दुःखाचा पूर्ण क्षय करणाऱ्या प्रज्ञेने युक्त असतो, हा धर्म देखील नाथकरण आहे. ๓๔๖. ทส กสิณายตนานิ. ปถวีกสิณเมโก สญฺชานาติ, อุทฺธํ อโธ ติริยํ อทฺวยํ อปฺปมาณํ. อาโปกสิณเมโก สญฺชานาติ…เป… เตโชกสิณเมโก สญฺชานาติ… วาโยกสิณเมโก สญฺชานาติ… นีลกสิณเมโก สญฺชานาติ… ปีตกสิณเมโก สญฺชานาติ… โลหิตกสิณเมโก สญฺชานาติ… โอทาตกสิณเมโก สญฺชานาติ… อากาสกสิณเมโก สญฺชานาติ… วิญฺญาณกสิณเมโก สญฺชานาติ, อุทฺธํ อโธ ติริยํ อทฺวยํ อปฺปมาณํ. ३४६. दहा कसिणायतने (कसिण-आयतन) आहेत. कोणी एक भिक्खू वर, खाली, सभोवताली, अद्वय (दुसरे काही नसलेले) आणि अमर्याद अशा पृथ्वी-कसिणाला जाणतो. कोणी एक आप-कसिणाला (जल-कसिण) जाणतो...पे... तेज-कसिणाला जाणतो... वायू-कसिणाला जाणतो... नील-कसिणाला जाणतो... पीत-कसिणाला जाणतो... लोहित-कसिणाला जाणतो... ओदात-कसिणाला (श्वेत-कसिण) जाणतो... आकाश-कसिणाला जाणतो... कोणी एक वर, खाली, सभोवताली, अद्वय आणि अमर्याद अशा विज्ञाण-कसिणाला जाणतो. ๓๔๗. ‘‘ทส อกุสลกมฺมปถา – ปาณาติปาโต, อทินฺนาทานํ, กาเมสุมิจฺฉาจาโร, มุสาวาโท, ปิสุณา วาจา, ผรุสา วาจา, สมฺผปฺปลาโป, อภิชฺฌา, พฺยาปาโท, มิจฺฉาทิฏฺฐิ. ३४७. दहा अकुशल कर्मपथ आहेत – प्राणातिपात (जीवहत्या), अदिन्नादान (चोरी), कामेसू मिच्छाचार (व्यभिचार), मुसावाद (असत्य बोलणे), पिसुणा वाचा (चहाडी करणे), फरुसा वाचा (कठोर बोलणे), सम्फप्पलाप (व्यर्थ बडबड), अभिज्झा (लोभ/दुसऱ्याच्या संपत्तीची हाव), ब्यापाद (द्वेष/दुष्ट हेतू), मिच्छादिट्ठी (मिथ्या दृष्टी). ‘‘ทส [Pg.224] กุสลกมฺมปถา – ปาณาติปาตา เวรมณี, อทินฺนาทานา เวรมณี, กาเมสุมิจฺฉาจารา เวรมณี, มุสาวาทา เวรมณี, ปิสุณาย วาจาย เวรมณี, ผรุสาย วาจาย เวรมณี, สมฺผปฺปลาปา เวรมณี, อนภิชฺฌา, อพฺยาปาโท, สมฺมาทิฏฺฐิ. दहा कुशल कर्मपथ आहेत – प्राणातिपातापासून विरती (जीवहत्येपासून दूर राहणे), अदिन्नादानापासून विरती, कामेसू मिच्छाचारापासून विरती, मुसावादापासून विरती, पिसुणा वाचेपासून विरती, फरुसा वाचेपासून विरती, सम्फप्पलापापासून विरती, अनभिज्झा (अलोभ), अब्यापाद (अद्वेष), सम्मादिट्ठी (सम्यक दृष्टी). ๓๔๘. ‘‘ทส อริยวาสา. อิธาวุโส, ภิกฺขุ ปญฺจงฺควิปฺปหีโน โหติ, ฉฬงฺคสมนฺนาคโต, เอการกฺโข, จตุราปสฺเสโน, ปณุนฺนปจฺเจกสจฺโจ, สมวยสฏฺเฐสโน, อนาวิลสงฺกปฺโป, ปสฺสทฺธกายสงฺขาโร, สุวิมุตฺตจิตฺโต, สุวิมุตฺตปญฺโญ. ३४८. दहा आर्यवास (आर्यांचे निवास/विहार) आहेत. आवुसो, या शासनात भिक्खू हा पाच अंगांचा त्याग केलेला (पंचंगविप्पहीनो) असतो, सहा अंगांनी युक्त (छळंगसमन्नागतो) असतो, एकच रक्षक असलेला (एकारक्खो) असतो, चार आश्रय घेणारा (चतुरापस्सेनो) असतो, वैयक्तिक सत्ये दूर सारलेला (पणुन्नपच्चेकसच्चो) असतो, सर्व प्रकारच्या शोधनांचा त्याग केलेला (समवयसट्ठेसनो) असतो, निर्मळ संकल्प असणारा (अनाविलसंकप्पो) असतो, शांत कायसंस्कार असणारा (पस्सद्धकायसंखारो) असतो, चित्त पूर्णपणे विमुक्त असलेला (सुविमुत्तचित्तो) असतो आणि प्रज्ञा पूर्णपणे विमुक्त असलेला (सुविमुत्तपञ्ञो) असतो. ‘‘กถญฺจาวุโส, ภิกฺขุ ปญฺจงฺควิปฺปหีโน โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุโน กามจฺฉนฺโท ปหีโน โหติ, พฺยาปาโท ปหีโน โหติ, ถินมิทฺธํ ปหีนํ โหติ, อุทฺธจฺจกุกุจฺจํ ปหีนํ โหติ, วิจิกิจฺฉา ปหีนา โหติ. เอวํ โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ปญฺจงฺควิปฺปหีโน โหติ. आणि आवुसो, भिक्खू पाच अंगांचा त्याग केलेला कसा असतो? आवुसो, या शासनात भिक्खूचा कामच्छंद (इंद्रियसुखाची इच्छा) नष्ट झालेला असतो, व्यापाद (द्वेष) नष्ट झालेला असतो, थिनमिद्ध (आळस आणि डुलकी) नष्ट झालेले असते, उद्धच्चकुक्कुच्च (अस्वस्थता आणि पश्चात्ताप) नष्ट झालेले असते आणि विचिकित्सा (शंका) नष्ट झालेली असते. अशा प्रकारे, आवुसो, भिक्खू पाच अंगांचा त्याग केलेला असतो. ‘‘กถญฺจาวุโส, ภิกฺขุ ฉฬงฺคสมนฺนาคโต โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา เนว สุมโน โหติ น ทุมฺมโน, อุเปกฺขโก วิหรติ สโต สมฺปชาโน. โสเตน สทฺทํ สุตฺวา…เป… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย เนว สุมโน โหติ น ทุมฺมโน, อุเปกฺขโก วิหรติ สโต สมฺปชาโน. เอวํ โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ฉฬงฺคสมนฺนาคโต โหติ. आणि आवुसो, भिक्खू सहा अंगांनी युक्त कसा असतो? आवुसो, या शासनात भिक्खू डोळ्याने रूप पाहून हर्षितही होत नाही आणि खिन्नही होत नाही, तर तो स्मृतिमान आणि संप्रजन्ययुक्त (जागरूक) राहून उपेक्षक (तटस्थ) भावनेने विहरतो. कानाने शब्द ऐकून...पे... मनाने धम्माला (विचाराला) जाणून हर्षितही होत नाही आणि खिन्नही होत नाही, तर तो स्मृतिमान आणि संप्रजन्ययुक्त राहून उपेक्षक भावनेने विहरतो. अशा प्रकारे, आवुसो, भिक्खू सहा अंगांनी युक्त असतो. ‘‘กถญฺจาวุโส, ภิกฺขุ เอการกฺโข โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ สตารกฺเขน เจตสา สมนฺนาคโต โหติ. เอวํ โข, อาวุโส, ภิกฺขุ เอการกฺโข โหติ. आणि आवुसो, भिक्खू एकच रक्षक असलेला कसा असतो? आवुसो, या शासनात भिक्खू स्मृतीच्या रक्षणाने युक्त अशा चित्ताने संपन्न असतो. अशा प्रकारे, आवुसो, भिक्खू एकच रक्षक असलेला असतो. ‘‘กถญฺจาวุโส, ภิกฺขุ จตุราปสฺเสโน โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ สงฺขาเยกํ ปฏิเสวติ, สงฺขาเยกํ อธิวาเสติ, สงฺขาเยกํ ปริวชฺเชติ, สงฺขาเยกํ วิโนเทติ. เอวํ โข, อาวุโส, ภิกฺขุ จตุราปสฺเสโน โหติ. आणि आवुसो, भिक्खू चार आश्रय घेणारा कसा असतो? आवुसो, या शासनात भिक्खू विचारपूर्वक एका गोष्टीचे सेवन करतो, विचारपूर्वक एका गोष्टीचे सहन करतो, विचारपूर्वक एका गोष्टीचा त्याग करतो (टाळतो), विचारपूर्वक एका गोष्टीचे निवारण करतो. अशा प्रकारे, आवुसो, भिक्खू चार आश्रय घेणारा असतो. ‘‘กถญฺจาวุโส, ภิกฺขุ ปณุนฺนปจฺเจกสจฺโจ โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุโน ยานิ ตานิ ปุถุสมณพฺราหฺมณานํ ปุถุปจฺเจกสจฺจานิ, สพฺพานิ ตานิ นุนฺนานิ โหนฺติ ปณุนฺนานิ จตฺตานิ วนฺตานิ มุตฺตานิ ปหีนานิ ปฏินิสฺสฏฺฐานิ. เอวํ โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ปณุนฺนปจฺเจกสจฺโจ โหติ. आणि आवुसो, भिक्खू वैयक्तिक सत्ये दूर सारलेला कसा असतो? आवुसो, या शासनात भिक्खूने, विविध श्रमण आणि ब्राह्मणांची जी विविध वैयक्तिक सत्ये आहेत, ती सर्व दूर सारलेली असतात, पूर्णपणे नष्ट केलेली असतात, सोडलेली असतात, ओकून टाकलेली असतात, मुक्त केलेली असतात, त्यागलेली असतात आणि सोडून दिलेली असतात. अशा प्रकारे, आवुसो, भिक्खू वैयक्तिक सत्ये दूर सारलेला असतो. ‘‘กถญฺจาวุโส[Pg.225], ภิกฺขุ สมวยสฏฺเฐสโน โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุโน กาเมสนา ปหีนา โหติ, ภเวสนา ปหีนา โหติ, พฺรหฺมจริเยสนา ปฏิปฺปสฺสทฺธา. เอวํ โข, อาวุโส, ภิกฺขุ สมวยสฏฺเฐสโน โหติ. आणि आवुसो, भिक्खू सर्व प्रकारच्या शोधनांचा (एषणांचा) त्याग केलेला कसा असतो? आवुसो, या शासनात भिक्खूची काम-एषणा (इंद्रियसुखाचा शोध) नष्ट झालेली असते, भव-एषणा (अस्तित्वाचा शोध) नष्ट झालेली असते आणि ब्रह्मचर्य-एषणा शांत झालेली असते. अशा प्रकारे, आवुसो, भिक्खू सर्व प्रकारच्या शोधनांचा त्याग केलेला असतो. ‘‘กถญฺจาวุโส, ภิกฺขุ อนาวิลสงฺกปฺโป โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุโน กามสงฺกปฺโป ปหีโน โหติ, พฺยาปาทสงฺกปฺโป ปหีโน โหติ, วิหึสาสงฺกปฺโป ปหีโน โหติ. เอวํ โข, อาวุโส, ภิกฺขุ อนาวิลสงฺกปฺโป โหติ. आणि आवुसो, भिक्खू निर्मळ संकल्प असणारा कसा असतो? आवुसो, या शासनात भिक्खूचा काम-संकल्प नष्ट झालेला असतो, व्यापाद-संकल्प नष्ट झालेला असतो आणि विहिंसा-संकल्प (हिंसेचा विचार) नष्ट झालेला असतो. अशा प्रकारे, आवुसो, भिक्खू निर्मळ संकल्प असणारा असतो. ‘‘กถญฺจาวุโส, ภิกฺขุ ปสฺสทฺธกายสงฺขาโร โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ สุขสฺส จ ปหานา ทุกฺขสฺส จ ปหานา ปุพฺเพว โสมนสฺสโทมนสฺสานํ อตฺถงฺคมา อทุกฺขมสุขํ อุเปกฺขาสติปาริสุทฺธึ จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. เอวํ โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ปสฺสทฺธกายสงฺขาโร โหติ. आणि आवुसो, भिक्खू शांत कायसंस्कार असणारा कसा असतो? आवुसो, या शासनात भिक्खू सुखाचा त्याग केल्यामुळे आणि दुःखाचा त्याग केल्यामुळे, तसेच पूर्वीच सोमनस्य (हर्ष) आणि दोमनस्य (खिन्नता) नष्ट झाल्यामुळे, दुःखही नसलेल्या आणि सुखही नसलेल्या, उपेक्षेमुळे स्मृतीची शुद्धता असणाऱ्या चौथ्या ध्यानाचे (चतुत्थ झान) संपादन करून विहरतो. अशा प्रकारे, आवुसो, भिक्खू शांत कायसंस्कार असणारा असतो. ‘‘กถญฺจาวุโส, ภิกฺขุ สุวิมุตฺตจิตฺโต โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุโน ราคา จิตฺตํ วิมุตฺตํ โหติ, โทสา จิตฺตํ วิมุตฺตํ โหติ, โมหา จิตฺตํ วิมุตฺตํ โหติ. เอวํ โข, อาวุโส, ภิกฺขุ สุวิมุตฺตจิตฺโต โหติ. "आवुसो (मित्रांनो), भिक्खू कशा प्रकारे सुविमुक्तचित्त (चित्ताने पूर्णपणे मुक्त) होतो? आवुसो, येथे भिक्खूचे चित्त रागापासून मुक्त असते, द्वेषापासून मुक्त असते, मोहापासून मुक्त असते. आवुसो, अशा प्रकारे भिक्खू सुविमुक्तचित्त होतो." ‘‘กถญฺจาวุโส, ภิกฺขุ สุวิมุตฺตปญฺโญ โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ ‘ราโค เม ปหีโน อุจฺฉินฺนมูโล ตาลาวตฺถุกโต อนภาวํกโต อายตึ อนุปฺปาทธมฺโม’ติ ปชานาติ. ‘โทโส เม ปหีโน อุจฺฉินฺนมูโล ตาลาวตฺถุกโต อนภาวํกโต อายตึ อนุปฺปาทธมฺโม’ติ ปชานาติ. ‘โมโห เม ปหีโน อุจฺฉินฺนมูโล ตาลาวตฺถุกโต อนภาวํกโต อายตึ อนุปฺปาทธมฺโม’ติ ปชานาติ. เอวํ โข, อาวุโส, ภิกฺขุ สุวิมุตฺตปญฺโญ โหติ. "आवुसो, भिक्खू कशा प्रकारे सुविमुक्तप्रज्ञ (प्रज्ञेने पूर्णपणे मुक्त) होतो? आवुसो, येथे भिक्खू जाणतो की, 'माझा राग नष्ट झाला आहे, मुळासकट उपटून टाकला गेला आहे, ताडाच्या झाडाच्या बुंध्यासारखा (पुन्हा न उगवणारा) केला गेला आहे, नामशेष केला गेला आहे आणि भविष्यात पुन्हा न उत्पन्न होणाऱ्या स्वभावाचा झाला आहे.' तो जाणतो की, 'माझा द्वेष नष्ट झाला आहे, मुळासकट उपटून टाकला गेला आहे, ताडाच्या झाडाच्या बुंध्यासारखा केला गेला आहे, नामशेष केला गेला आहे आणि भविष्यात पुन्हा न उत्पन्न होणाऱ्या स्वभावाचा झाला आहे.' तो जाणतो की, 'माझा मोह नष्ट झाला आहे, मुळासकट उपटून टाकला गेला आहे, ताडाच्या झाडाच्या बुंध्यासारखा केला गेला आहे, नामशेष केला गेला आहे आणि भविष्यात पुन्हा न उत्पन्न होणाऱ्या स्वभावाचा झाला आहे.' आवुसो, अशा प्रकारे भिक्खू सुविमुक्तप्रज्ञ होतो." ‘‘ทส อเสกฺขา ธมฺมา – อเสกฺขา สมฺมาทิฏฺฐิ, อเสกฺโข สมฺมาสงฺกปฺโป, อเสกฺขา สมฺมาวาจา, อเสกฺโข สมฺมากมฺมนฺโต, อเสกฺโข สมฺมาอาชีโว, อเสกฺโข สมฺมาวายาโม, อเสกฺขา สมฺมาสติ, อเสกฺโข สมฺมาสมาธิ, อเสกฺขํ สมฺมาญาณํ, อเสกฺขา สมฺมาวิมุตฺติ. "दहा असेख (अशैक्ष्य - अर्हताचे) धर्म आहेत – असेख सम्यक दृष्टी, असेख सम्यक संकल्प, असेख सम्यक वाचा, असेख सम्यक कर्मान्त, असेख सम्यक आजीव, असेख सम्यक व्यायाम, असेख सम्यक स्मृती, असेख सम्यक समाधी, असेख सम्यक ज्ञान, असेख सम्यक विमुक्ती." ‘‘อิเม โข, อาวุโส, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน ทส ธมฺมา สมฺมทกฺขาตา. ตตฺถ สพฺเพเหว สงฺคายิตพฺพํ น [Pg.226] วิวทิตพฺพํ, ยถยิทํ พฺรหฺมจริยํ อทฺธนิยํ อสฺส จิรฏฺฐิติกํ, ตทสฺส พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสาน’’นฺติ. "आवुसो, त्या जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत, सम्यक सम्बुद्ध भगवंतांनी या दहा धर्मांचे उत्तम प्रकारे प्रतिपादन केले आहे. तेथे सर्वांनी मिळून संगायन (एकत्र पाठ) केले पाहिजे, वाद घालता कामा नये; जेणेकरून हे ब्रह्मचर्य दीर्घकाळ टिकणारे आणि चिरस्थायी होईल, आणि ते बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकम्पेसाठी, देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी व सुखासाठी होईल." ๓๔๙. อถ โข ภควา อุฏฺฐหิตฺวา อายสฺมนฺตํ สาริปุตฺตํ อามนฺเตสิ – ‘สาธุ สาธุ, สาริปุตฺต, สาธุ โข ตฺวํ, สาริปุตฺต, ภิกฺขูนํ สงฺคีติปริยายํ อภาสี’ติ. อิทมโวจายสฺมา สาริปุตฺโต, สมนุญฺโญ สตฺถา อโหสิ. อตฺตมนา เต ภิกฺขู อายสฺมโต สาริปุตฺตสฺส ภาสิตํ อภินนฺทุนฺติ. ३४९. "त्यानंतर भगवान (आसनावून) उठले आणि आयुष्यमान सारिपुत्तांना म्हणाले – 'साधू, साधू, सारिपुत्त! सारिपुत्त, तू भिक्खूंना संगीति-परियाय (संगीति सुत्त) खूप चांगल्या प्रकारे सांगितले आहेस.' आयुष्यमान सारिपुत्त असे म्हणाले. शास्त्यांनी (बुद्धांनी) त्याला संमती दिली. ते भिक्खू आनंदी झाले आणि त्यांनी आयुष्यमान सारिपुत्तांच्या भाषणाचे मनापासून अभिनंदन (स्वीकार) केले." สงฺคีติสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ ทสมํ. "दहावे संगीति सुत्त समाप्त झाले." ๑๑. ทสุตฺตรสุตฺตํ ११. "दसुत्तर सुत्त" ๓๕๐. เอวํ [Pg.227] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา จมฺปายํ วิหรติ คคฺคราย โปกฺขรณิยา ตีเร มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ ปญฺจมตฺเตหิ ภิกฺขุสเตหิ. ตตฺร โข อายสฺมา สาริปุตฺโต ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘อาวุโส ภิกฺขเว’’ติ! ‘‘อาวุโส’’ติ โข เต ภิกฺขู อายสฺมโต สาริปุตฺตสฺส ปจฺจสฺโสสุํ. อายสฺมา สาริปุตฺโต เอตทโวจ – ३५०. "असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान चम्पा नगरीत गग्गरा पुष्करणीच्या (कमळांच्या तलावाच्या) तीरावर सुमारे पाचशे भिक्खूंच्या मोठ्या भिक्खू संघासह विहार करत होते. तेथे आयुष्यमान सारिपुत्तांनी भिक्खूंना संबोधित केले – 'आवुसो भिक्खू!' त्या भिक्खूंनी आयुष्यमान सारिपुत्तांना 'आवुसो' म्हणून प्रतिसाद दिला. आयुष्यमान सारिपुत्त असे म्हणाले –" ‘‘ทสุตฺตรํ ปวกฺขามิ, ธมฺมํ นิพฺพานปตฺติยา; ทุกฺขสฺสนฺตกิริยาย, สพฺพคนฺถปฺปโมจนํ’’. "मी निर्वाण प्राप्तीसाठी, दुःखाचा अंत करण्यासाठी आणि सर्व ग्रंथांमधून (बंधनांमधून) मुक्त करणाऱ्या 'दसुत्तर' धर्माचा उपदेश करीन." เอโก ธมฺโม "एक धर्म" ๓๕๑. ‘‘เอโก, อาวุโส, ธมฺโม พหุกาโร, เอโก ธมฺโม ภาเวตพฺโพ, เอโก ธมฺโม ปริญฺเญยฺโย, เอโก ธมฺโม ปหาตพฺโพ, เอโก ธมฺโม หานภาคิโย, เอโก ธมฺโม วิเสสภาคิโย, เอโก ธมฺโม ทุปฺปฏิวิชฺโฌ, เอโก ธมฺโม อุปฺปาเทตพฺโพ, เอโก ธมฺโม อภิญฺเญยฺโย, เอโก ธมฺโม สจฺฉิกาตพฺโพ. ३५१. "आवुसो, एक धर्म बहुकारक (अतिशय उपकारक) आहे, एक धर्म भावना करण्याजोगा (विकसित करण्याजोगा) आहे, एक धर्म परिज्ञेय (पूर्णपणे जाणून घेण्याजोगा) आहे, एक धर्म प्रहातव्य (त्याग करण्याजोगा) आहे, एक धर्म हानभागीय (अधोगतीला नेणारा) आहे, एक धर्म विशेषभागीय (प्रगतीला नेणारा) आहे, एक धर्म दुष्प्रतिवेध्य (कठीणतेने समजणारा) आहे, एक धर्म उत्पादनीय (उत्पन्न करण्याजोगा) आहे, एक धर्म अभिज्ञेय (विशिष्ट ज्ञानाने जाणण्याजोगा) आहे, एक धर्म साक्षात्करणीय (साक्षात्कार करण्याजोगा) आहे." (ก) ‘‘กตโม เอโก ธมฺโม พหุกาโร? อปฺปมาโท กุสเลสุ ธมฺเมสุ. อยํ เอโก ธมฺโม พหุกาโร. "(क) कोणता एक धर्म बहुकारक आहे? कुशल धर्मांमध्ये अप्रमाद (जागरूकता/सतर्कता). हा एक धर्म बहुकारक आहे." (ข) ‘‘กตโม เอโก ธมฺโม ภาเวตพฺโพ? กายคตาสติ สาตสหคตา. อยํ เอโก ธมฺโม ภาเวตพฺโพ. "(ख) कोणता एक धर्म भावना करण्याजोगा आहे? सुखासहगत (सुखद संवेदनेने युक्त) कायगतास्मृती (शरीरावर ठेवलेली स्मृती). हा एक धर्म भावना करण्याजोगा आहे." (ค) ‘‘กตโม เอโก ธมฺโม ปริญฺเญยฺโย? ผสฺโส สาสโว อุปาทานิโย. อยํ เอโก ธมฺโม ปริญฺเญยฺโย. "(ग) कोणता एक धर्म परिज्ञेय आहे? आसवयुक्त आणि उपादानयुक्त असणारा स्पर्श (फस्स). हा एक धर्म परिज्ञेय आहे." (ฆ) ‘‘กตโม เอโก ธมฺโม ปหาตพฺโพ? อสฺมิมาโน. อยํ เอโก ธมฺโม ปหาตพฺโพ. "(घ) कोणता एक धर्म प्रहातव्य आहे? अस्मिमान (अहंकार/मी-पणा). हा एक धर्म प्रहातव्य आहे." (ง) ‘‘กตโม เอโก ธมฺโม หานภาคิโย? อโยนิโส มนสิกาโร. อยํ เอโก ธมฺโม หานภาคิโย. "(ङ) कोणता एक धर्म हानभागीय आहे? अयोनिशो मनसिकार (अयोग्य विचार/अयोग्य लक्ष देणे). हा एक धर्म हानभागीय आहे." (จ) ‘‘กตโม เอโก ธมฺโม วิเสสภาคิโย? โยนิโส มนสิกาโร. อยํ เอโก ธมฺโม วิเสสภาคิโย. "(च) कोणता एक धर्म विशेषभागीय आहे? योनिशो मनसिकार (योग्य विचार/योग्य लक्ष देणे). हा एक धर्म विशेषभागीय आहे." (ฉ) ‘‘กตโม [Pg.228] เอโก ธมฺโม ทุปฺปฏิวิชฺโฌ? อานนฺตริโก เจโตสมาธิ. อยํ เอโก ธมฺโม ทุปฺปฏิวิชฺโฌ. "(छ) कोणता एक धर्म दुष्प्रतिवेध्य आहे? आनंतरिक चेतोसमाधी (तात्काळ फळ देणारी चित्ताची एकाग्रता). हा एक धर्म दुष्प्रतिवेध्य आहे." (ช) ‘‘กตโม เอโก ธมฺโม อุปฺปาเทตพฺโพ? อกุปฺปํ ญาณํ. อยํ เอโก ธมฺโม อุปฺปาเทตพฺโพ. "(ज) कोणता एक धर्म उत्पादनीय आहे? अकुप्प ज्ञान (अकंपित/अविनाशी ज्ञान). हा एक धर्म उत्पादनीय आहे." (ฌ) ‘‘กตโม เอโก ธมฺโม อภิญฺเญยฺโย? สพฺเพ สตฺตา อาหารฏฺฐิติกา. อยํ เอโก ธมฺโม อภิญฺเญยฺโย. "(झ) कोणता एक धर्म अभिज्ञेय आहे? सर्व प्राणी आहारावर टिकून आहेत. हा एक धर्म अभिज्ञेय आहे." (ญ) ‘‘กตโม เอโก ธมฺโม สจฺฉิกาตพฺโพ? อกุปฺปา เจโตวิมุตฺติ. อยํ เอโก ธมฺโม สจฺฉิกาตพฺโพ. "(ञ) कोणता एक धर्म साक्षात्करणीय आहे? अकुप्पा चेतोविमुत्ती (अकंपित चित्तमुक्ती). हा एक धर्म साक्षात्करणीय आहे." ‘‘อิติ อิเม ทส ธมฺมา ภูตา ตจฺฉา ตถา อวิตถา อนญฺญถา สมฺมา ตถาคเตน อภิสมฺพุทฺธา. "अशा प्रकारे, हे दहा धर्म सत्य, यथार्थ, जसे आहेत तसे, अचूक आणि अनन्य आहेत, ज्यांचा तथागतांनी सम्यक प्रकारे साक्षात्कार केला आहे." ทฺเว ธมฺมา "दोन धर्म" ๓๕๒. ‘‘ทฺเว ธมฺมา พหุการา, ทฺเว ธมฺมา ภาเวตพฺพา, ทฺเว ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา, ทฺเว ธมฺมา ปหาตพฺพา, ทฺเว ธมฺมา หานภาคิยา, ทฺเว ธมฺมา วิเสสภาคิยา, ทฺเว ธมฺมา ทุปฺปฏิวิชฺฌา, ทฺเว ธมฺมา อุปฺปาเทตพฺพา, ทฺเว ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา, ทฺเว ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา. ३५२. "दोन धर्म बहुकारक आहेत, दोन धर्म भावना करण्याजोगे आहेत, दोन धर्म परिज्ञेय आहेत, दोन धर्म प्रहातव्य आहेत, दोन धर्म हानभागीय आहेत, दोन धर्म विशेषभागीय आहेत, दोन धर्म दुष्प्रतिवेध्य आहेत, दोन धर्म उत्पादनीय आहेत, दोन धर्म अभिज्ञेय आहेत, दोन धर्म साक्षात्करणीय आहेत." (ก) ‘‘กตเม ทฺเว ธมฺมา พหุการา? สติ จ สมฺปชญฺญญฺจ. อิเม ทฺเว ธมฺมา พหุการา. "(क) कोणते दोन धर्म बहुकारक आहेत? स्मृती (सती) आणि संप्रजन्य (जागरूकता). हे दोन धर्म बहुकारक आहेत." (ข) ‘‘กตเม ทฺเว ธมฺมา ภาเวตพฺพา? สมโถ จ วิปสฺสนา จ. อิเม ทฺเว ธมฺมา ภาเวตพฺพา. "(ख) कोणते दोन धर्म भावना करण्याजोगे आहेत? शमथ आणि विपश्यना. हे दोन धर्म भावना करण्याजोगे आहेत." (ค) ‘‘กตเม ทฺเว ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา? นามญฺจ รูปญฺจ. อิเม ทฺเว ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา. "(ग) कोणते दोन धर्म परिज्ञेय आहेत? नाम आणि रूप. हे दोन धर्म परिज्ञेय आहेत." (ฆ) ‘‘กตเม ทฺเว ธมฺมา ปหาตพฺพา? อวิชฺชา จ ภวตณฺหา จ. อิเม ทฺเว ธมฺมา ปหาตพฺพา. "(घ) कोणते दोन धर्म प्रहातव्य आहेत? अविद्या आणि भवतृष्णा. हे दोन धर्म प्रहातव्य आहेत." (ง) ‘‘กตเม ทฺเว ธมฺมา หานภาคิยา? โทวจสฺสตา จ ปาปมิตฺตตา จ. อิเม ทฺเว ธมฺมา หานภาคิยา. "(ङ) कोणते दोन धर्म हानभागीय आहेत? दुर्वचता (उद्धटपणा/उपदेश न मानणे) आणि पापमित्रता (वाईट संगती). हे दोन धर्म हानभागीय आहेत." (จ) ‘‘กตเม ทฺเว ธมฺมา วิเสสภาคิยา? โสวจสฺสตา จ กลฺยาณมิตฺตตา จ. อิเม ทฺเว ธมฺมา วิเสสภาคิยา. "(च) कोणते दोन धर्म विशेषभागीय आहेत? सुवचता (नम्रता/उपदेश मानणे) आणि कल्याणमित्रता (चांगली संगती). हे दोन धर्म विशेषभागीय आहेत." (ฉ) ‘‘กตเม [Pg.229] ทฺเว ธมฺมา ทุปฺปฏิวิชฺฌา? โย จ เหตุ โย จ ปจฺจโย สตฺตานํ สํกิเลสาย, โย จ เหตุ โย จ ปจฺจโย สตฺตานํ วิสุทฺธิยา. อิเม ทฺเว ธมฺมา ทุปฺปฏิวิชฺฌา. "(छ) कोणते दोन धर्म दुष्प्रतिवेध्य आहेत? प्राण्यांच्या संक्लेशाचा (मळकटपणाचा) जो हेतू आणि प्रत्यय (कारण व परिस्थिती) आहे तो, आणि प्राण्यांच्या विशुद्धीचा जो हेतू आणि प्रत्यय आहे तो. हे दोन धर्म दुष्प्रतिवेध्य आहेत." (ช) ‘‘กตเม ทฺเว ธมฺมา อุปฺปาเทตพฺพา? ทฺเว ญาณานิ – ขเย ญาณํ, อนุปฺปาเท ญาณํ. อิเม ทฺเว ธมฺมา อุปฺปาเทตพฺพา. "(ज) कोणते दोन धर्म उत्पादनीय आहेत? दोन ज्ञाने – क्षय ज्ञान (आसवांच्या क्षयाचे ज्ञान) आणि अनुत्पाद ज्ञान (पुन्हा उत्पन्न न होण्याचे ज्ञान). हे दोन धर्म उत्पादनीय आहेत." (ฌ) ‘‘กตเม ทฺเว ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา? ทฺเว ธาตุโย – สงฺขตา จ ธาตุ อสงฺขตา จ ธาตุ. อิเม ทฺเว ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา. "(झ) कोणते दोन धर्म अभिज्ञेय आहेत? दोन धातू – संस्कृत धातू (संस्कारित/उत्पन्न झालेली स्थिती) आणि असंस्कृत धातू (असंस्कारित/निर्वाण). हे दोन धर्म अभिज्ञेय आहेत." (ญ) ‘‘กตเม ทฺเว ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา? วิชฺชา จ วิมุตฺติ จ. อิเม ทฺเว ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา. "(ञ) कोणते दोन धर्म साक्षात्करणीय आहेत? विद्या आणि विमुक्ती. हे दोन धर्म साक्षात्करणीय आहेत." ‘‘อิติ อิเม วีสติ ธมฺมา ภูตา ตจฺฉา ตถา อวิตถา อนญฺญถา สมฺมา ตถาคเตน อภิสมฺพุทฺธา. "अशा प्रकारे, हे वीस धर्म सत्य, यथार्थ, जसे आहेत तसे, अचूक आणि अनन्य आहेत, ज्यांचा तथागतांनी सम्यक प्रकारे साक्षात्कार केला आहे." ตโย ธมฺมา "तीन धर्म" ๓๕๓. ‘‘ตโย ธมฺมา พหุการา, ตโย ธมฺมา ภาเวตพฺพา…เป… ตโย ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา. ३५३. "तीन धर्म बहुकारक आहेत, तीन धर्म भावना करण्याजोगे आहेत... (पेयालम)... तीन धर्म साक्षात्करणीय आहेत." (ก) ‘‘กตเม ตโย ธมฺมา พหุการา? สปฺปุริสสํเสโว, สทฺธมฺมสฺสวนํ, ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปตฺติ. อิเม ตโย ธมฺมา พหุการา. (क) “कोणते तीन धर्म अत्यंत उपकारक आहेत? सत्पुरुषांची संगत (सत्संग), सद्धम्माचे श्रवण आणि धम्मानुकूल आचरण (धम्मानुधम्मपटिपत्ती). हे तीन धर्म अत्यंत उपकारक आहेत.” (ข) ‘‘กตเม ตโย ธมฺมา ภาเวตพฺพา? ตโย สมาธี – สวิตกฺโก สวิจาโร สมาธิ, อวิตกฺโก วิจารมตฺโต สมาธิ, อวิตกฺโก อวิจาโร สมาธิ. อิเม ตโย ธมฺมา ภาเวตพฺพา. (ख) “कोणते तीन धर्म विकसित (भावित) केले पाहिजेत? तीन समाधी – सवितर्क सविचार समाधी, अवितर्क विचारमात्र समाधी आणि अवितर्क अविचार समाधी. हे तीन धर्म विकसित केले पाहिजेत.” (ค) ‘‘กตเม ตโย ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา? ติสฺโส เวทนา – สุขา เวทนา, ทุกฺขา เวทนา, อทุกฺขมสุขา เวทนา. อิเม ตโย ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา. (ग) “कोणते तीन धर्म पूर्णपणे जाणले पाहिजेत (परिज्ञेय आहेत)? तीन वेदना – सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख (उपेक्षा) वेदना. हे तीन धर्म पूर्णपणे जाणले पाहिजेत.” (ฆ) ‘‘กตเม ตโย ธมฺมา ปหาตพฺพา? ติสฺโส ตณฺหา – กามตณฺหา, ภวตณฺหา, วิภวตณฺหา. อิเม ตโย ธมฺมา ปหาตพฺพา. (घ) “कोणते तीन धर्म त्यागले पाहिजेत (प्रहाण केले पाहिजेत)? तीन तृष्णा – कामतृष्णा, भवतृष्णा आणि विभवतृष्णा. हे तीन धर्म त्यागले पाहिजेत.” (ง) ‘‘กตเม ตโย ธมฺมา หานภาคิยา? ตีณิ อกุสลมูลานิ – โลโภ อกุสลมูลํ, โทโส อกุสลมูลํ, โมโห อกุสลมูลํ. อิเม ตโย ธมฺมา หานภาคิยา. (ङ) “कोणते तीन धर्म अधोगतीला नेणारे (हानभागीय) आहेत? तीन अकुशल मुळे – लोभ हे अकुशल मूळ, द्वेष हे अकुशल मूळ आणि मोह हे अकुशल मूळ. हे तीन धर्म अधोगतीला नेणारे आहेत.” (จ) ‘‘กตเม [Pg.230] ตโย ธมฺมา วิเสสภาคิยา? ตีณิ กุสลมูลานิ – อโลโภ กุสลมูลํ, อโทโส กุสลมูลํ, อโมโห กุสลมูลํ. อิเม ตโย ธมฺมา วิเสสภาคิยา. (च) “कोणते तीन धर्म प्रगतीला नेणारे (विशेषभागीय) आहेत? तीन कुशल मुळे – अलोभ हे कुशल मूळ, अद्वेष हे कुशल मूळ आणि अमोह हे कुशल मूळ. हे तीन धर्म प्रगतीला नेणारे आहेत.” (ฉ) ‘‘กตเม ตโย ธมฺมา ทุปฺปฏิวิชฺฌา? ติสฺโส นิสฺสรณิยา ธาตุโย – กามานเมตํ นิสฺสรณํ ยทิทํ เนกฺขมฺมํ, รูปานเมตํ นิสฺสรณํ ยทิทํ อรูปํ, ยํ โข ปน กิญฺจิ ภูตํ สงฺขตํ ปฏิจฺจสมุปฺปนฺนํ, นิโรโธ ตสฺส นิสฺสรณํ. อิเม ตโย ธมฺมา ทุปฺปฏิวิชฺฌา. (छ) “कोणते तीन धर्म समजण्यास कठीण (दुर्बोध) आहेत? तीन मुक्तीचे धातू (निस्सरणीय धातू) – कामांपासून मुक्ती म्हणजे नैष्क्रम्य (नेक्खम्म), रूपांपासून मुक्ती म्हणजे अरूप, आणि जे काही उत्पन्न झालेले, संस्कृत (संस्कारित) व प्रतीत्यसमुत्पन्न आहे, त्याचा निरोध हीच त्यापासून मुक्ती होय. हे तीन धर्म समजण्यास कठीण आहेत.” (ช) ‘‘กตเม ตโย ธมฺมา อุปฺปาเทตพฺพา? ตีณิ ญาณานิ – อตีตํเส ญาณํ, อนาคตํเส ญาณํ, ปจฺจุปฺปนฺนํเส ญาณํ. อิเม ตโย ธมฺมา อุปฺปาเทตพฺพา. (ज) “कोणते तीन धर्म उत्पन्न केले पाहिजेत? तीन ज्ञाने – भूतकाळाविषयीचे ज्ञान, भविष्यकाळाविषयीचे ज्ञान आणि वर्तमानकाळाविषयीचे ज्ञान. हे three धर्म उत्पन्न केले पाहिजेत.” (ฌ) ‘‘กตเม ตโย ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา? ติสฺโส ธาตุโย – กามธาตุ, รูปธาตุ, อรูปธาตุ. อิเม ตโย ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา. (झ) “कोणते तीन धर्म अभिज्ञेय (उच्च ज्ञानाने जाणण्याजोगे) आहेत? तीन धातू – कामधातू, रूपधातू आणि अरूपधातू. हे तीन धर्म अभिज्ञेय आहेत.” (ญ) ‘‘กตเม ตโย ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา? ติสฺโส วิชฺชา – ปุพฺเพนิวาสานุสฺสติญาณํ วิชฺชา, สตฺตานํ จุตูปปาเต ญาณํ วิชฺชา, อาสวานํ ขเย ญาณํ วิชฺชา. อิเม ตโย ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา. (ञ) “कोणते तीन धर्म साक्षात केले पाहिजेत? तीन विद्या – पूर्वजन्मांच्या स्मृतीचे ज्ञान (पुब्बेनिवासानुस्सतिज्ञान) ही विद्या, प्राण्यांच्या च्युती (मृत्यू) व उत्पत्तीचे ज्ञान (चुतूपपातज्ञान) ही विद्या आणि आसवांच्या क्षयाचे ज्ञान (आसवक्खयज्ञान) ही विद्या. हे तीन धर्म साक्षात केले पाहिजेत.” ‘‘อิติ อิเม ตึส ธมฺมา ภูตา ตจฺฉา ตถา อวิตถา อนญฺญถา สมฺมา ตถาคเตน อภิสมฺพุทฺธา. “अशा प्रकारे, हे तीस धर्म सत्य, यथार्थ, तथ्यपूर्ण, अचूक आणि अपरिवर्तनीय आहेत, ज्यांचा तथागतांनी सम्यक प्रकारे साक्षात्कार केला आहे.” จตฺตาโร ธมฺมา चार धर्म ๓๕๔. ‘‘จตฺตาโร ธมฺมา พหุการา, จตฺตาโร ธมฺมา ภาเวตพฺพา…เป… จตฺตาโร ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา. ३५४. “चार धर्म अत्यंत उपकारक आहेत, चार धर्म विकसित केले पाहिजेत... (पेयाला)... चार धर्म साक्षात केले पाहिजेत.” (ก) ‘‘กตเม จตฺตาโร ธมฺมา พหุการา? จตฺตาริ จกฺกานิ – ปติรูปเทสวาโส, สปฺปุริสูปนิสฺสโย, อตฺตสมฺมาปณิธิ, ปุพฺเพ จ กตปุญฺญตา. อิเม จตฺตาโร ธมฺมา พหุการา. (क) “कोणते चार धर्म अत्यंत उपकारक आहेत? चार चक्रे – अनुकूल प्रदेशात निवास करणे, सत्पुरुषांचा आश्रय घेणे, स्वतःला योग्य मार्गावर प्रस्थापित करणे आणि पूर्वजन्मी केलेले पुण्य. हे चार धर्म अत्यंत उपकारक आहेत.” (ข) ‘‘กตเม จตฺตาโร ธมฺมา ภาเวตพฺพา? จตฺตาโร สติปฏฺฐานา – อิธาวุโส, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. เวทนาสุ…เป… จิตฺเต… ธมฺเมสุ [Pg.231] ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. อิเม จตฺตาโร ธมฺมา ภาเวตพฺพา. (ख) “कोणते चार धर्म विकसित केले पाहिजेत? चार स्मृतिप्रस्थान (सतिपट्ठान) – येथे, हे आवुसो (बंधूंनो), भिक्खू कायेमध्ये कायेचे सतत दर्शन घेत (कायानुपस्सी) राहतो; तो उद्योगी (आतापी), जागरूक (संपजानो) आणि स्मृतिमान (सतिमा) होऊन, लोकांमधील अभिज्झा (लोभ) आणि डोमनस्स (दौर्मनस्य/दुःख) दूर करून विहरतो. वेदनांमध्ये... (पेयाला)... चित्तामध्ये... धर्मांमध्ये धर्मांचे सतत दर्शन घेत (धम्मानुपस्सी) राहतो; तो उद्योगी, जागरूक आणि स्मृतिमान होऊन, लोकांमधील अभिज्झा आणि डोमनस्स दूर करून विहरतो. हे चार धर्म विकसित केले पाहिजेत.” (ค) ‘‘กตเม จตฺตาโร ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา? จตฺตาโร อาหารา – กพฬีกาโร อาหาโร โอฬาริโก วา สุขุโม วา, ผสฺโส ทุติโย, มโนสญฺเจตนา ตติยา, วิญฺญาณํ จตุตฺถํ. อิเม จตฺตาโร ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา. (ग) “कोणते चार धर्म पूर्णपणे जाणले पाहिजेत? चार आहार – पहिला कवलिकार (कवळांचा/स्थूल) आहार, जो स्थूल किंवा सूक्ष्म असतो; दुसरा स्पर्श (फस्स) आहार; तिसरा मनोसंचेतना आहार; आणि चौथा विज्ञान (विञ्ञाण) आहार. हे चार धर्म पूर्णपणे जाणले पाहिजेत.” (ฆ) ‘‘กตเม จตฺตาโร ธมฺมา ปหาตพฺพา? จตฺตาโร โอฆา – กาโมโฆ, ภโวโฆ, ทิฏฺโฐโฆ, อวิชฺโชโฆ. อิเม จตฺตาโร ธมฺมา ปหาตพฺพา. (घ) “कोणते चार धर्म त्यागले पाहिजेत? चार ओघ (पूर) – कामौघ, भवौघ, दृष्ट्यौघ आणि अविद्यौघ. हे चार धर्म त्यागले पाहिजेत.” (ง) ‘‘กตเม จตฺตาโร ธมฺมา หานภาคิยา? จตฺตาโร โยคา – กามโยโค, ภวโยโค, ทิฏฺฐิโยโค, อวิชฺชาโยโค. อิเม จตฺตาโร ธมฺมา หานภาคิยา. (ङ) “कोणते चार धर्म अधोगतीला नेणारे आहेत? चार योग (बंधने) – कामयोग, भवयोग, दृष्टियोग आणि अविद्यायोग. हे चार धर्म अधोगतीला नेणारे आहेत.” (จ) ‘‘กตเม จตฺตาโร ธมฺมา วิเสสภาคิยา? จตฺตาโร วิสญฺโญคา – กามโยควิสํโยโค, ภวโยควิสํโยโค, ทิฏฺฐิโยควิสํโยโค, อวิชฺชาโยควิสํโยโค. อิเม จตฺตาโร ธมฺมา วิเสสภาคิยา. (च) “कोणते चार धर्म प्रगतीला नेणारे आहेत? चार विसंयोग (बंधनांतून मुक्ती) – कामयोग विसंयोग, भवयोग विसंयोग, दृष्टियोग विसंयोग आणि अविद्यायोग विसंयोग. हे चार धर्म प्रगतीला नेणारे आहेत.” (ฉ) ‘‘กตเม จตฺตาโร ธมฺมา ทุปฺปฏิวิชฺฌา? จตฺตาโร สมาธี – หานภาคิโย สมาธิ, ฐิติภาคิโย สมาธิ, วิเสสภาคิโย สมาธิ, นิพฺเพธภาคิโย สมาธิ. อิเม จตฺตาโร ธมฺมา ทุปฺปฏิวิชฺฌา. (छ) “कोणते चार धर्म समजण्यास कठीण आहेत? चार समाधी – अधोगतीला नेणारी (हानभागीय) समाधी, स्थिर ठेवणारी (स्थितिभागीय) समाधी, प्रगतीला नेणारी (विशेषभागीय) समाधी आणि भेदक (निर्वेधभागीय) समाधी. हे चार धर्म समजण्यास कठीण आहेत.” (ช) ‘‘กตเม จตฺตาโร ธมฺมา อุปฺปาเทตพฺพา? จตฺตาริ ญาณานิ – ธมฺเม ญาณํ, อนฺวเย ญาณํ, ปริเย ญาณํ, สมฺมุติยา ญาณํ. อิเม จตฺตาโร ธมฺมา อุปฺปาเทตพฺพา. (ज) “कोणते चार धर्म उत्पन्न केले पाहिजेत? चार ज्ञाने – धम्माविषयीचे ज्ञान (धम्मे ज्ञान), अन्वयाविषयीचे ज्ञान (अन्वये ज्ञान), इतरांच्या चित्ताचे ज्ञान (परिये ज्ञान) आणि संवृत्तीचे (लोकव्यवहाराचे) ज्ञान (संमुती ज्ञान). हे चार धर्म उत्पन्न केले पाहिजेत.” (ฌ) ‘‘กตเม จตฺตาโร ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา? จตฺตาริ อริยสจฺจานิ – ทุกฺขํ อริยสจฺจํ, ทุกฺขสมุทยํ อริยสจฺจํ, ทุกฺขนิโรธํ อริยสจฺจํ, ทุกฺขนิโรธคามินี ปฏิปทา อริยสจฺจํ. อิเม จตฺตาโร ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา. (झ) “कोणते चार धर्म अभिज्ञेय आहेत? चार आर्यसत्ये – दुःख आर्यसत्य, दुःखसमुदय आर्यसत्य, दुःखनिरोध आर्यसत्य आणि दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदा (मार्ग) आर्यसत्य. हे चार धर्म अभिज्ञेय आहेत.” (ญ) ‘‘กตเม จตฺตาโร ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา? จตฺตาริ สามญฺญผลานิ – โสตาปตฺติผลํ, สกทาคามิผลํ, อนาคามิผลํ, อรหตฺตผลํ. อิเม จตฺตาโร ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา. (ञ) “कोणते चार धर्म साक्षात केले पाहिजेत? चार श्रामण्यफळे – स्रोतापत्तीफळ, सकृदागामीफळ, अनागामीफळ आणि अर्हत्त्वफळ. हे चार धर्म साक्षात केले पाहिजेत.” ‘‘อิติ [Pg.232] อิเม จตฺตารีสธมฺมา ภูตา ตจฺฉา ตถา อวิตถา อนญฺญถา สมฺมา ตถาคเตน อภิสมฺพุทฺธา. “अशा प्रकारे, हे चाळीस धर्म सत्य, यथार्थ, तथ्यपूर्ण, अचूक आणि अपरिवर्तनीय आहेत, ज्यांचा तथागतांनी सम्यक प्रकारे साक्षात्कार केला आहे.” ปญฺจ ธมฺมา पाच धर्म ๓๕๕. ‘‘ปญฺจ ธมฺมา พหุการา…เป… ปญฺจ ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา. ३५५. “पाच धर्म अत्यंत उपकारक आहेत... (पेयाला)... पाच धर्म साक्षात केले पाहिजेत.” (ก) ‘‘กตเม ปญฺจ ธมฺมา พหุการา? ปญฺจ ปธานิยงฺคานิ – อิธาวุโส, ภิกฺขุ สทฺโธ โหติ, สทฺทหติ ตถาคตสฺส โพธึ – ‘อิติปิ โส ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน สุคโต โลกวิทู อนุตฺตโร ปุริสทมฺมสารถิ สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. อปฺปาพาโธ โหติ อปฺปาตงฺโก สมเวปากินิยา คหณิยา สมนฺนาคโต นาติสีตาย นาจฺจุณฺหาย มชฺฌิมาย ปธานกฺขมาย. อสโฐ โหติ อมายาวี ยถาภูตมตฺตานํ อาวีกตฺตา สตฺถริ วา วิญฺญูสุ วา สพฺรหฺมจารีสุ. อารทฺธวีริโย วิหรติ อกุสลานํ ธมฺมานํ ปหานาย, กุสลานํ ธมฺมานํ อุปสมฺปทาย, ถามวา ทฬฺหปรกฺกโม อนิกฺขิตฺตธุโร กุสเลสุ ธมฺเมสุ. ปญฺญวา โหติ อุทยตฺถคามินิยา ปญฺญาย สมนฺนาคโต อริยาย นิพฺเพธิกาย สมฺมา ทุกฺขกฺขยคามินิยา. อิเม ปญฺจ ธมฺมา พหุการา. (क) “कोणते पाच धर्म अत्यंत उपकारक आहेत? पाच प्रधान अंगे (प्रयत्नाची अंगे) – येथे, हे आवुसो, भिक्खू श्रद्धावान असतो, तो तथागतांच्या बोधीवर श्रद्धा ठेवतो – ‘ते भगवान खरोखर अर्हत, सम्यक संबुद्ध, विद्याचरणसंपन्न, सुगत, लोकविदू, अनुत्तर पुरुषदम्यसारथी, देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध आणि भगवान आहेत.’ तो निरोगी आणि व्याधीमुक्त असतो, त्याची पचनशक्ती (जठराग्नी) समतोल असते, जी अतिशय थंडही नसते आणि अतिशय उष्णही नसते, तर मध्यम व साधनेसाठी अनुकूल असते. तो निष्कपट आणि मायारहित असतो, तो शास्त्यांसमोर (बुद्धांसमोर), विद्वानांसमोर किंवा आपल्या सहकारी ब्रह्मचाऱ्यांसमोर स्वतःला जसा आहे तसा प्रामाणिकपणे प्रकट करतो. तो अकुशल धर्मांचा त्याग करण्यासाठी आणि कुशल धर्मांच्या प्राप्तीसाठी दृढ प्रयत्नशील (आरद्धवीर्य) राहतो; तो कुशल धर्मांच्या बाबतीत उत्साही, दृढ पराक्रमी आणि जबाबदारी न टाळणारा असतो. तो प्रज्ञावान असतो, तो उदय आणि अस्त (उत्पत्ती आणि विनाश) जाणणाऱ्या, आर्य, भेदक आणि दुःखाचा सम्यक क्षय करणाऱ्या प्रज्ञेने युक्त असतो. हे पाच धर्म अत्यंत उपकारक आहेत.” (ข) ‘‘กตเม ปญฺจ ธมฺมา ภาเวตพฺพา? ปญฺจงฺคิโก สมฺมาสมาธิ – ปีติผรณตา, สุขผรณตา, เจโตผรณตา, อาโลกผรณตา, ปจฺจเวกฺขณนิมิตฺตํ. อิเม ปญฺจ ธมฺมา ภาเวตพฺพา. कोणते पाच धर्म भावना केले पाहिजेत (विकसित केले पाहिजेत)? पाच अंगांनी युक्त सम्यक समाधी (पंचंगिक सम्यक समाधी) – प्रीती-व्याप्तता (पीतिफरणता), सुख-व्याप्तता (सुखफरणता), चित्त-व्याप्तता (चेतोफरणता), आलोक-व्याप्तता (आलोकफरणता) आणि प्रत्यावेक्षण निमित्त (पच्चवेक्खणनिमित्त). हे पाच धर्म भावना केले पाहिजेत. (ค) ‘‘กตเม ปญฺจ ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา? ปญฺจุปาทานกฺขนฺธา – รูปุปาทานกฺขนฺโธ, เวทนุปาทานกฺขนฺโธ, สญฺญุปาทานกฺขนฺโธ, สงฺขารุปาทานกฺขนฺโธ วิญฺญาณุปาทานกฺขนฺโธ. อิเม ปญฺจ ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา. कोणते पाच धर्म परिज्ञेय आहेत (पूर्णपणे जाणले पाहिजेत)? पाच उपादानस्कंध – रूप-उपादानस्कंध, वेदना-उपादानस्कंध, संज्ञा-उपादानस्कंध, संस्कार-उपादानस्कंध आणि विज्ञान-उपादानस्कंध. हे पाच धर्म परिज्ञेय आहेत. (ฆ) ‘‘กตเม ปญฺจ ธมฺมา ปหาตพฺพา? ปญฺจ นีวรณานิ – กามจฺฉนฺทนีวรณํ, พฺยาปาทนีวรณํ, ถินมิทฺธนีวรณํ, อุทฺธจฺจกุกุจฺจนีวรณํ, วิจิกิจฺฉานีวรณํ. อิเม ปญฺจ ธมฺมา ปหาตพฺพา. कोणते पाच धर्म प्रहाण केले पाहिजेत (त्यागले पाहिजेत)? पाच नीवरण – कामच्छंद नीवरण, व्यापाद नीवरण, थिनमिद्ध नीवरण, उद्धच्च-कुक्कुच्च नीवरण आणि विचिकित्सा नीवरण. हे पाच धर्म प्रहाण केले पाहिजेत. (ง) ‘‘กตเม ปญฺจ ธมฺมา หานภาคิยา? ปญฺจ เจโตขิลา – อิธาวุโส, ภิกฺขุ สตฺถริ กงฺขติ วิจิกิจฺฉติ นาธิมุจฺจติ น สมฺปสีทติ. โย โส, อาวุโส, ภิกฺขุ สตฺถริ กงฺขติ วิจิกิจฺฉติ นาธิมุจฺจติ น สมฺปสีทติ, ตสฺส [Pg.233] จิตฺตํ น นมติ อาตปฺปาย อนุโยคาย สาตจฺจาย ปธานาย. ยสฺส จิตฺตํ น นมติ อาตปฺปาย อนุโยคาย สาตจฺจาย ปธานาย. อยํ ปฐโม เจโตขิโล. ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ ธมฺเม กงฺขติ วิจิกิจฺฉติ…เป… สงฺเฆ กงฺขติ วิจิกิจฺฉติ…เป… สิกฺขาย กงฺขติ วิจิกิจฺฉติ…เป… สพฺรหฺมจารีสุ กุปิโต โหติ อนตฺตมโน อาหตจิตฺโต ขิลชาโต, โย โส, อาวุโส, ภิกฺขุ สพฺรหฺมจารีสุ กุปิโต โหติ อนตฺตมโน อาหตจิตฺโต ขิลชาโต, ตสฺส จิตฺตํ น นมติ อาตปฺปาย อนุโยคาย สาตจฺจาย ปธานาย. ยสฺส จิตฺตํ น นมติ อาตปฺปาย อนุโยคาย สาตจฺจาย ปธานาย. อยํ ปญฺจโม เจโตขิโล. อิเม ปญฺจ ธมฺมา หานภาคิยา. कोणते पाच धर्म हानीला कारणीभूत ठरणारे (हानभागीय) आहेत? पाच चेतोखिल (चित्तातील खिळे) – येथे, आवुसो, भिक्खू शास्त्याविषयी (बुद्धांविषयी) शंका घेतो, संशय बाळगतो, अधिमुक्त होत नाही (श्रद्धा ठेवत नाही), प्रसन्न होत नाही. आवुसो, जो भिक्खू शास्त्याविषयी शंका घेतो, संशय बाळगतो, अधिमुक्त होत नाही, प्रसन्न होत नाही, त्याचे चित्त आतप (उत्साह), अनुयोग (सतत प्रयत्न), सातत्य आणि प्रधानाचा (परिश्रमाचा) निश्चय करण्यासाठी प्रवृत्त होत नाही. ज्याचे चित्त आतप, अनुयोग, सातत्य आणि प्रधानाचा निश्चय करण्यासाठी प्रवृत्त होत नाही, हा पहिला चेतोखिल आहे. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू धर्माविषयी शंका घेतो, संशय बाळगतो... पे... संघाविषयी शंका घेतो, संशय बाळगतो... पे... सिक्खा (प्रशिक्षण) विषयी शंका घेतो, संशय बाळगतो... पे... सब्रह्मचाऱ्यांवर (सहकाऱ्यांवर) क्रुद्ध होतो, अप्रसन्न होतो, आघातयुक्त चित्त असलेला आणि खिळायुक्त चित्त असलेला होतो. आवुसो, जो भिक्खू सब्रह्मचाऱ्यांवर क्रुद्ध होतो, अप्रसन्न होतो, आघातयुक्त चित्त असलेला आणि खिळायुक्त चित्त असलेला होतो, त्याचे चित्त आतप, अनुयोग, सातत्य आणि प्रधानाचा निश्चय करण्यासाठी प्रवृत्त होत नाही. ज्याचे चित्त आतप, अनुयोग, सातत्य आणि प्रधानाचा निश्चय करण्यासाठी प्रवृत्त होत नाही, हा पाचवा चेतोखिल आहे. हे पाच धर्म हानीला कारणीभूत ठरणारे (हानभागीय) आहेत. (จ) ‘‘กตเม ปญฺจ ธมฺมา วิเสสภาคิยา? ปญฺจินฺทฺริยานิ – สทฺธินฺทฺริยํ, วีริยินฺทฺริยํ, สตินฺทฺริยํ, สมาธินฺทฺริยํ, ปญฺญินฺทฺริยํ. อิเม ปญฺจ ธมฺมา วิเสสภาคิยา. कोणते पाच धर्म विशेषाला कारणीभूत ठरणारे (विशेषभागीय) आहेत? पाच इंद्रिये – श्रद्धेंद्रिय, वीर्येंद्रिय, स्मृतींद्रिय, समाधींद्रिय आणि प्रज्ञेंद्रिय. हे पाच धर्म विशेषाला कारणीभूत ठरणारे (विशेषभागीय) आहेत. (ฉ) ‘‘กตเม ปญฺจ ธมฺมา ทุปฺปฏิวิชฺฌา? ปญฺจ นิสฺสรณิยา ธาตุโย – อิธาวุโส, ภิกฺขุโน กาเม มนสิกโรโต กาเมสุ จิตฺตํ น ปกฺขนฺทติ น ปสีทติ น สนฺติฏฺฐติ น วิมุจฺจติ. เนกฺขมฺมํ โข ปนสฺส มนสิกโรโต เนกฺขมฺเม จิตฺตํ ปกฺขนฺทติ ปสีทติ สนฺติฏฺฐติ วิมุจฺจติ. ตสฺส ตํ จิตฺตํ สุคตํ สุภาวิตํ สุวุฏฺฐิตํ สุวิมุตฺตํ วิสํยุตฺตํ กาเมหิ. เย จ กามปจฺจยา อุปฺปชฺชนฺติ อาสวา วิฆาตา ปริฬาหา, มุตฺโต โส เตหิ. น โส ตํ เวทนํ เวเทติ. อิทมกฺขาตํ กามานํ นิสฺสรณํ. कोणते पाच धर्म आकलन करण्यास कठीण (दुष्प्रतिवेध्य) आहेत? पाच निस्सरणीय धातू (मुक्त करणाऱ्या धातू) – येथे, आवुसो, भिक्खू जेव्हा कामांचा (कामभोगांचा) विचार करतो, तेव्हा त्याचे चित्त कामांकडे धाव घेत नाही, प्रसन्न होत नाही, स्थिर होत नाही, विमुक्त होत नाही. परंतु, जेव्हा तो नैष्क्रम्याचा (कामभोगांच्या त्यागाचा) विचार करतो, तेव्हा त्याचे चित्त नैष्क्रम्याकडे धाव घेते, प्रसन्न होते, स्थिर होते, विमुक्त होते. त्याचे ते चित्त कामांपासून सुगत (चांगल्या प्रकारे प्रवृत्त), सुभावित (चांगल्या प्रकारे विकसित), सुउत्थित (चांगल्या प्रकारे वर उठलेले), सुविमुक्त (चांगल्या प्रकारे मुक्त) आणि विसंयुक्त (अलिप्त) झालेले असते. कामभोगांच्या प्रत्ययाने (कारणाने) जे आसव, विघात (त्रास) आणि परिदाह (जळजळ) उत्पन्न होतात, त्यांपासून तो मुक्त होतो. तो त्या वेदनेचा अनुभव घेत नाही. हे कामांचे निस्सरण (कामभोगांतून सुटका) म्हटले गेले आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน พฺยาปาทํ มนสิกโรโต พฺยาปาเท จิตฺตํ น ปกฺขนฺทติ น ปสีทติ น สนฺติฏฺฐติ น วิมุจฺจติ. อพฺยาปาทํ โข ปนสฺส มนสิกโรโต อพฺยาปาเท จิตฺตํ ปกฺขนฺทติ ปสีทติ สนฺติฏฺฐติ วิมุจฺจติ. ตสฺส ตํ จิตฺตํ สุคตํ สุภาวิตํ สุวุฏฺฐิตํ สุวิมุตฺตํ วิสํยุตฺตํ พฺยาปาเทน. เย จ พฺยาปาทปจฺจยา อุปฺปชฺชนฺติ อาสวา วิฆาตา ปริฬาหา, มุตฺโต โส เตหิ. น โส ตํ เวทนํ เวเทติ. อิทมกฺขาตํ พฺยาปาทสฺส นิสฺสรณํ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू जेव्हा व्यापादाचा (द्वेषाचा) विचार करतो, तेव्हा त्याचे चित्त व्यापादाकडे धाव घेत नाही, प्रसन्न होत नाही, स्थिर होत नाही, विमुक्त होत नाही. परंतु, जेव्हा तो अव्यापादाचा (अद्वेषाचा) विचार करतो, तेव्हा त्याचे चित्त अव्यापादाकडे धाव घेते, प्रसन्न होते, स्थिर होते, विमुक्त होते. त्याचे ते चित्त व्यापादापासून सुगत, सुभावित, सुउत्थित, सुविमुक्त आणि विसंयुक्त झालेले असते. व्यापादाच्या प्रत्ययाने जे आसव, विघात आणि परिदाह उत्पन्न होतात, त्यांपासून तो मुक्त होतो. तो त्या वेदनेचा अनुभव घेत नाही. हे व्यापादाचे निस्सरण (द्वेषातून सुटका) म्हटले गेले आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน วิเหสํ มนสิกโรโต วิเหสาย จิตฺตํ น ปกฺขนฺทติ น ปสีทติ น สนฺติฏฺฐติ น วิมุจฺจติ. อวิเหสํ โข ปนสฺส มนสิกโรโต อวิเหสาย จิตฺตํ ปกฺขนฺทติ ปสีทติ สนฺติฏฺฐติ วิมุจฺจติ[Pg.234]. ตสฺส ตํ จิตฺตํ สุคตํ สุภาวิตํ สุวุฏฺฐิตํ สุวิมุตฺตํ วิสํยุตฺตํ วิเหสาย. เย จ วิเหสาปจฺจยา อุปฺปชฺชนฺติ อาสวา วิฆาตา ปริฬาหา, มุตฺโต โส เตหิ. น โส ตํ เวทนํ เวเทติ. อิทมกฺขาตํ วิเหสาย นิสฺสรณํ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू जेव्हा विहिंसेचा (पीडा देण्याचा) विचार करतो, तेव्हा त्याचे चित्त विहिंसेकडे धाव घेत नाही, प्रसन्न होत नाही, स्थिर होत नाही, विमुक्त होत नाही. परंतु, जेव्हा तो अविहिंसेचा (पीडा न देण्याचा) विचार करतो, तेव्हा त्याचे चित्त अविहिंसेकडे धाव घेते, प्रसन्न होते, स्थिर होते, विमुक्त होते. त्याचे ते चित्त विहिंसेपासून सुगत, सुभावित, सुउत्थित, सुविमुक्त आणि विसंयुक्त झालेले असते. विहिंसेच्या प्रत्ययाने जे आसव, विघात आणि परिदाह उत्पन्न होतात, त्यांपासून तो मुक्त होतो. तो त्या वेदनेचा अनुभव घेत नाही. हे विहिंसेचे निस्सरण (पीडा देण्यापासून सुटका) म्हटले गेले आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน รูเป มนสิกโรโต รูเปสุ จิตฺตํ น ปกฺขนฺทติ น ปสีทติ น สนฺติฏฺฐติ น วิมุจฺจติ. อรูปํ โข ปนสฺส มนสิกโรโต อรูเป จิตฺตํ ปกฺขนฺทติ ปสีทติ สนฺติฏฺฐติ วิมุจฺจติ. ตสฺส ตํ จิตฺตํ สุคตํ สุภาวิตํ สุวุฏฺฐิตํ สุวิมุตฺตํ วิสํยุตฺตํ รูเปหิ. เย จ รูปปจฺจยา อุปฺปชฺชนฺติ อาสวา วิฆาตา ปริฬาหา, มุตฺโต โส เตหิ. น โส ตํ เวทนํ เวเทติ. อิทมกฺขาตํ รูปานํ นิสฺสรณํ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू जेव्हा रूपाचा विचार करतो, तेव्हा त्याचे चित्त रूपांकडे धाव घेत नाही, प्रसन्न होत नाही, स्थिर होत नाही, विमुक्त होत नाही. परंतु, जेव्हा तो अरूपाचा (अरूप धर्मांचा) विचार करतो, तेव्हा त्याचे चित्त अरूपाकडे धाव घेते, प्रसन्न होते, स्थिर होते, विमुक्त होते. त्याचे ते चित्त रूपांपासून सुगत, सुभावित, सुउत्थित, सुविमुक्त आणि विसंयुक्त झालेले असते. रूपाच्या प्रत्ययाने जे आसव, विघात आणि परिदाह उत्पन्न होतात, त्यांपासून तो मुक्त होतो. तो त्या वेदनेचा अनुभव घेत नाही. हे रूपांचे निस्सरण (रूपांतून सुटका) म्हटले गेले आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน สกฺกายํ มนสิกโรโต สกฺกาเย จิตฺตํ น ปกฺขนฺทติ น ปสีทติ น สนฺติฏฺฐติ น วิมุจฺจติ. สกฺกายนิโรธํ โข ปนสฺส มนสิกโรโต สกฺกายนิโรเธ จิตฺตํ ปกฺขนฺทติ ปสีทติ สนฺติฏฺฐติ วิมุจฺจติ. ตสฺส ตํ จิตฺตํ สุคตํ สุภาวิตํ สุวุฏฺฐิตํ สุวิมุตฺตํ วิสํยุตฺตํ สกฺกาเยน. เย จ สกฺกายปจฺจยา อุปฺปชฺชนฺติ อาสวา วิฆาตา ปริฬาหา, มุตฺโต โส เตหิ. น โส ตํ เวทนํ เวเทติ. อิทมกฺขาตํ สกฺกายสฺส นิสฺสรณํ. อิเม ปญฺจ ธมฺมา ทุปฺปฏิวิชฺฌา. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू जेव्हा सत्कायाचा (पंच उपादानस्कंधांचा) विचार करतो, तेव्हा त्याचे चित्त सत्कायाकडे धाव घेत नाही, प्रसन्न होत नाही, स्थिर होत नाही, विमुक्त होत नाही. परंतु, जेव्हा तो सत्काय-निरोधाचा विचार करतो, तेव्हा त्याचे चित्त सत्काय-निरोधाकडे धाव घेते, प्रसन्न होते, स्थिर होते, विमुक्त होते. त्याचे ते चित्त सत्कायापासून सुगत, सुभावित, सुउत्थित, सुविमुक्त आणि विसंयुक्त झालेले असते. सत्कायाच्या प्रत्ययाने जे आसव, विघात आणि परिदाह उत्पन्न होतात, त्यांपासून तो मुक्त होतो. तो त्या वेदनेचा अनुभव घेत नाही. हे सत्कायाचे निस्सरण (सत्कायापासून सुटका) म्हटले गेले आहे. हे पाच धर्म आकलन करण्यास कठीण (दुष्प्रतिवेध्य) आहेत. (ช) ‘‘กตเม ปญฺจ ธมฺมา อุปฺปาเทตพฺพา? ปญฺจ ญาณิโก สมฺมาสมาธิ – ‘อยํ สมาธิ ปจฺจุปฺปนฺนสุโข เจว อายติญฺจ สุขวิปาโก’ติ ปจฺจตฺตํเยว ญาณํ อุปฺปชฺชติ. ‘อยํ สมาธิ อริโย นิรามิโส’ติ ปจฺจตฺตญฺเญว ญาณํ อุปฺปชฺชติ. ‘อยํ สมาธิ อกาปุริสเสวิโต’ติ ปจฺจตฺตํเยว ญาณํ อุปฺปชฺชติ. ‘อยํ สมาธิ สนฺโต ปณีโต ปฏิปฺปสฺสทฺธลทฺโธ เอโกทิภาวาธิคโต, น สสงฺขารนิคฺคยฺหวาริตคโต’ติ ปจฺจตฺตํเยว ญาณํ อุปฺปชฺชติ. ‘โส โข ปนาหํ อิมํ สมาธึ สโตว สมาปชฺชามิ สโต วุฏฺฐหามี’ติ ปจฺจตฺตํเยว ญาณํ อุปฺปชฺชติ. อิเม ปญฺจ ธมฺมา อุปฺปาเทตพฺพา. कोणते पाच धर्म उत्पन्न केले पाहिजेत? पाच ज्ञानांनी युक्त सम्यक समाधी (पंचज्ञानयुक्त सम्यक समाधी) – 'हा समाधी वर्तमानकाळात सुख देणारा आहे आणि भविष्यातही सुखद विपाक देणारा आहे' असे स्वतःमध्येच ज्ञान उत्पन्न होते. 'हा समाधी आर्य आणि निरामिश (लौकिक आसक्तीरहित) आहे' असे स्वतःमध्येच ज्ञान उत्पन्न होते. 'हा समाधी सत्पुरुषांद्वारे (अकापुरुष) आचरिला गेला आहे' असे स्वतःमध्येच ज्ञान उत्पन्न होते. 'हा समाधी शांत, प्रणीत, प्रतिप्रश्रब्धता (क्लेश शांत झाल्यामुळे) प्राप्त झालेला, एकोदीभाव (एकाग्रता) प्राप्त झालेला आहे, आणि तो ससंस्काराने (बळजबरीने) निग्रह करून किंवा अडवून प्राप्त केलेला नाही' असे स्वतःमध्येच ज्ञान उत्पन्न होते. 'तो मी स्वतः या समाधीमध्ये स्मृतीपूर्वकच समापन्न होतो (प्रवेश करतो) आणि स्मृतीपूर्वकच त्यातून व्युत्थित होतो (बाहेर पडतो)' असे स्वतःमध्येच ज्ञान उत्पन्न होते. हे पाच धर्म उत्पन्न केले पाहिजेत. (ฌ) ‘‘กตเม ปญฺจ ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา? ปญฺจ วิมุตฺตายตนานิ – อิธาวุโส, ภิกฺขุโน สตฺถา ธมฺมํ เทเสติ อญฺญตโร วา ครุฏฺฐานิโย สพฺรหฺมจารี. ยถา [Pg.235] ยถา, อาวุโส, ภิกฺขุโน สตฺถา ธมฺมํ เทเสติ, อญฺญตโร วา ครุฏฺฐานิโย สพฺรหฺมจารี, ตถา ตถา โส ตสฺมึ ธมฺเม อตฺถปฺปฏิสํเวที จ โหติ ธมฺมปฏิสํเวที จ. ตสฺส อตฺถปฺปฏิสํเวทิโน ธมฺมปฏิสํเวทิโน ปาโมชฺชํ ชายติ, ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ, ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ, ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวเทติ, สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อิทํ ปฐมํ วิมุตฺตายตนํ. (झ) कोणते पाच धर्म विशेष ज्ञानाने जाणण्यासारखे (अभिज्ञेय) आहेत? पाच विमुक्तायतने (मुक्तीची कारणे) आहेत. आवुसो, येथे भिक्खूला शास्ता (बुद्ध) धर्म उपदेशितात किंवा दुसरा कोणी आदरणीय सब्रह्मचारी धर्म उपदेशितो. आवुसो, ज्या ज्या प्रकारे भिक्खूला शास्ता धर्म उपदेशितात किंवा दुसरा कोणी आदरणीय सब्रह्मचारी धर्म उपदेशितो, त्या त्या प्रकारे तो त्या धर्मामध्ये अर्थाचा अनुभव घेणारा (अर्थप्रतिसंवेदी) आणि धर्माचा अनुभव घेणारा (धम्मप्रतिसंवेदी) होतो. त्या अर्थप्रतिसंवेदी व धम्मप्रतिसंवेदी भिक्खूला प्रमोद (आनंद) उत्पन्न होतो; प्रमुदित झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते; प्रीतीयुक्त मनाच्या भिक्खूची काया शांत होते; शांत काया असलेला सुख अनुभवतो; सुखी असलेल्याचे चित्त समाहित होते. हे पहिले विमुक्तायतन आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน น เหว โข สตฺถา ธมฺมํ เทเสติ, อญฺญตโร วา ครุฏฺฐานิโย สพฺรหฺมจารี, อปิ จ โข ยถาสุตํ ยถาปริยตฺตํ ธมฺมํ วิตฺถาเรน ปเรสํ เทเสติ ยถา ยถา, อาวุโส, ภิกฺขุ ยถาสุตํ ยถาปริยตฺตํ ธมฺมํ วิตฺถาเรน ปเรสํ เทเสติ. ตถา ตถา โส ตสฺมึ ธมฺเม อตฺถปฺปฏิสํเวที จ โหติ ธมฺมปฏิสํเวที จ. ตสฺส อตฺถปฺปฏิสํเวทิโน ธมฺมปฏิสํเวทิโน ปาโมชฺชํ ชายติ, ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ, ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ, ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวเทติ, สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อิทํ ทุติยํ วิมุตฺตายตนํ. पुन्हा, आवुसो, भिक्खूला शास्ता धर्म उपदेशित नाहीत किंवा दुसरा कोणी आदरणीय सब्रह्मचारीही उपदेशित नाही, परंतु तो जसा ऐकलेला व जसा अभ्यासलेला धर्म आहे, तसा तो विस्ताराने इतरांना उपदेशितो. आवुसो, ज्या ज्या प्रकारे भिक्खू जसा ऐकलेला व जसा अभ्यासलेला धर्म विस्ताराने इतरांना उपदेशितो, त्या त्या प्रकारे तो त्या धर्मामध्ये अर्थाचा अनुभव घेणारा आणि धर्माचा अनुभव घेणारा होतो. त्या अर्थप्रतिसंवेदी व धम्मप्रतिसंवेदी भिक्खूला प्रमोद उत्पन्न होतो; प्रमुदित झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते; प्रीतीयुक्त मनाच्या भिक्खूची काया शांत होते; शांत काया असलेला सुख अनुभवतो; सुखी असलेल्याचे चित्त समाहित होते. हे दुसरे विमुक्तायतन आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน น เหว โข สตฺถา ธมฺมํ เทเสติ, อญฺญตโร วา ครุฏฺฐานิโย สพฺรหฺมจารี, นาปิ ยถาสุตํ ยถาปริยตฺตํ ธมฺมํ วิตฺถาเรน ปเรสํ เทเสติ. อปิ จ โข, ยถาสุตํ ยถาปริยตฺตํ ธมฺมํ วิตฺถาเรน สชฺฌายํ กโรติ. ยถา ยถา, อาวุโส, ภิกฺขุ ยถาสุตํ ยถาปริยตฺตํ ธมฺมํ วิตฺถาเรน สชฺฌายํ กโรติ ตถา ตถา โส ตสฺมึ ธมฺเม อตฺถปฺปฏิสํเวที จ โหติ ธมฺมปฏิสํเวที จ. ตสฺส อตฺถปฺปฏิสํเวทิโน ธมฺมปฏิสํเวทิโน ปาโมชฺชํ ชายติ, ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ, ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ, ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวเทติ, สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อิทํ ตติยํ วิมุตฺตายตนํ. पुन्हा, आवुसो, भिक्खूला शास्ता धर्म उपदेशित नाहीत किंवा दुसरा कोणी आदरणीय सब्रह्मचारीही उपदेशित नाही, आणि तो जसा ऐकलेला व जसा अभ्यासलेला धर्म विस्ताराने इतरांनाही उपदेशित नाही, परंतु तो जसा ऐकलेला व जसा अभ्यासलेला धर्म विस्ताराने सज्झाय (सस्वर पाठ) करतो. आवुसो, ज्या ज्या प्रकारे भिक्खू जसा ऐकलेला व जसा अभ्यासलेला धर्म विस्ताराने सज्झाय करतो, त्या त्या प्रकारे तो त्या धर्मामध्ये अर्थाचा अनुभव घेणारा आणि धर्माचा अनुभव घेणारा होतो. त्या अर्थप्रतिसंवेदी व धम्मप्रतिसंवेदी भिक्खूला प्रमोद उत्पन्न होतो; प्रमुदित झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते; प्रीतीयुक्त मनाच्या भिक्खूची काया शांत होते; शांत काया असलेला सुख अनुभवतो; सुखी असलेल्याचे चित्त समाहित होते. हे तिसरे विमुक्तायतन आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน น เหว โข สตฺถา ธมฺมํ เทเสติ, อญฺญตโร วา ครุฏฺฐานิโย สพฺรหฺมจารี, นาปิ ยถาสุตํ ยถาปริยตฺตํ ธมฺมํ วิตฺถาเรน ปเรสํ เทเสติ, นาปิ ยถาสุตํ ยถาปริยตฺตํ ธมฺมํ วิตฺถาเรน สชฺฌายํ กโรติ. อปิ จ โข, ยถาสุตํ ยถาปริยตฺตํ ธมฺมํ เจตสา อนุวิตกฺเกติ อนุวิจาเรติ มนสานุเปกฺขติ. ยถา ยถา[Pg.236], อาวุโส, ภิกฺขุ ยถาสุตํ ยถาปริยตฺตํ ธมฺมํ เจตสา อนุวิตกฺเกติ อนุวิจาเรติ มนสานุเปกฺขติ ตถา ตถา โส ตสฺมึ ธมฺเม อตฺถปฺปฏิสํเวที จ โหติ ธมฺมปฏิสํเวที จ. ตสฺส อตฺถปฺปฏิสํเวทิโน ธมฺมปฏิสํเวทิโน ปาโมชฺชํ ชายติ, ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ, ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ, ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวเทติ, สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อิทํ จตุตฺถํ วิมุตฺตายตนํ. पुन्हा, आवुसो, भिक्खूला शास्ता धर्म उपदेशित नाहीत किंवा दुसरा कोणी आदरणीय सब्रह्मचारीही उपदेशित नाही, आणि तो जसा ऐकलेला व जसा अभ्यासलेला धर्म विस्ताराने इतरांनाही उपदेशित नाही, आणि तो जसा ऐकलेला व जसा अभ्यासलेला धर्म विस्ताराने सज्झायही करत नाही, परंतु तो जसा ऐकलेला व जसा अभ्यासलेला धर्म आहे, त्यावर मनाने वारंवार विचार करतो (अनुवितर्क करतो), वारंवार चिंतन करतो (अनुविचार करतो) आणि मनाने त्याचे वारंवार निरीक्षण करतो (अनुप्रेक्षा करतो). आवुसो, ज्या ज्या प्रकारे भिक्खू जसा ऐकलेला व जसा अभ्यासलेला धर्म मनाने वारंवार विचार करतो, वारंवार चिंतन करतो आणि मनाने त्याचे वारंवार निरीक्षण करतो, त्या त्या प्रकारे तो त्या धर्मामध्ये अर्थाचा अनुभव घेणारा आणि धर्माचा अनुभव घेणारा होतो. त्या अर्थप्रतिसंवेदी व धम्मप्रतिसंवेदी भिक्खूला प्रमोद उत्पन्न होतो; प्रमुदित झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते; प्रीतीयुक्त मनाच्या भिक्खूची काया शांत होते; शांत काया असलेला सुख अनुभवतो; सुखी असलेल्याचे चित्त समाहित होते. हे चौथे विमुक्तायतन आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน น เหว โข สตฺถา ธมฺมํ เทเสติ, อญฺญตโร วา ครุฏฺฐานิโย สพฺรหฺมจารี, นาปิ ยถาสุตํ ยถาปริยตฺตํ ธมฺมํ วิตฺถาเรน ปเรสํ เทเสติ, นาปิ ยถาสุตํ ยถาปริยตฺตํ ธมฺมํ วิตฺถาเรน สชฺฌายํ กโรติ, นาปิ ยถาสุตํ ยถาปริยตฺตํ ธมฺมํ เจตสา อนุวิตกฺเกติ อนุวิจาเรติ มนสานุเปกฺขติ; อปิ จ ขฺวสฺส อญฺญตรํ สมาธินิมิตฺตํ สุคฺคหิตํ โหติ สุมนสิกตํ สูปธาริตํ สุปฺปฏิวิทฺธํ ปญฺญาย. ยถา ยถา, อาวุโส, ภิกฺขุโน อญฺญตรํ สมาธินิมิตฺตํ สุคฺคหิตํ โหติ สุมนสิกตํ สูปธาริตํ สุปฺปฏิวิทฺธํ ปญฺญาย ตถา ตถา โส ตสฺมึ ธมฺเม อตฺถปฺปฏิสํเวที จ โหติ ธมฺมปฺปฏิสํเวที จ. ตสฺส อตฺถปฺปฏิสํเวทิโน ธมฺมปฺปฏิสํเวทิโน ปาโมชฺชํ ชายติ, ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ, ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ, ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวเทติ, สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ. อิทํ ปญฺจมํ วิมุตฺตายตนํ. อิเม ปญฺจ ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา. पुन्हा, आवुसो, भिक्खूला शास्ता धर्म उपदेशित नाहीत किंवा दुसरा कोणी आदरणीय सब्रह्मचारीही उपदेशित नाही, आणि तो जसा ऐकलेला व जसा अभ्यासलेला धर्म विस्ताराने इतरांनाही उपदेशित नाही, आणि तो जसा ऐकलेला व जसा अभ्यासलेला धर्म विस्ताराने सज्झायही करत नाही, आणि तो जसा ऐकलेला व जसा अभ्यासलेला धर्म मनाने वारंवार विचार करत नाही, वारंवार चिंतन करत नाही, मनाने त्याचे वारंवार निरीक्षणही करत नाही; परंतु त्याने एखादे समाधिनिमित्त चांगल्या प्रकारे ग्रहण केलेले असते (सुगृहीत केलेले असते), चांगल्या प्रकारे मनन केलेले असते (सुमनसिकृत केलेले असते), चांगल्या प्रकारे धारण केलेले असते (सूपधारित केलेले असते) आणि प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे भेदून जाणलेले असते (सुप्रतिविद्ध केलेले असते). आवुसो, ज्या ज्या प्रकारे भिक्खूने एखादे समाधिनिमित्त चांगल्या प्रकारे ग्रहण केलेले असते, चांगल्या प्रकारे मनन केलेले असते, चांगल्या प्रकारे धारण केलेले असते आणि प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे भेदून जाणलेले असते, त्या त्या प्रकारे तो त्या धर्मामध्ये अर्थाचा अनुभव घेणारा आणि धर्माचा अनुभव घेणारा होतो. त्या अर्थप्रतिसंवेदी व धम्मप्रतिसंवेदी भिक्खूला प्रमोद उत्पन्न होतो; प्रमुदित झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते; प्रीतीयुक्त मनाच्या भिक्खूची काया शांत होते; शांत काया असलेला सुख अनुभवतो; सुखी असलेल्याचे चित्त समाहित होते. हे पाचवे विमुक्तायतन आहे. हे पाच धर्म विशेष ज्ञानाने जाणण्यासारखे (अभिज्ञेय) आहेत. (ญ) ‘‘กตเม ปญฺจ ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา? ปญฺจ ธมฺมกฺขนฺธา – สีลกฺขนฺโธ, สมาธิกฺขนฺโธ, ปญฺญากฺขนฺโธ, วิมุตฺติกฺขนฺโธ, วิมุตฺติญาณทสฺสนกฺขนฺโธ. อิเม ปญฺจ ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา. (ञ) कोणते पाच धर्म साक्षात करण्यासारखे (साक्षात्करणीय) आहेत? पाच धर्मस्कंध - शीलस्कंध, समाधिस्कंध, प्रज्ञास्कंध, विमुक्तिस्कंध आणि विमुक्तिज्ञानदर्शनस्कंध. हे पाच धर्म साक्षात करण्यासारखे आहेत. ‘‘อิติ อิเม ปญฺญาส ธมฺมา ภูตา ตจฺฉา ตถา อวิตถา อนญฺญถา สมฺมา ตถาคเตน อภิสมฺพุทฺธา. अशा प्रकारे, हे पन्नास धर्म सत्य, यथार्थ, तथ्य, अवितथ (अपरिवर्तनीय) आणि अनन्यथा (दुसऱ्या प्रकारे नसलेले) आहेत, ज्यांचे तथागतांनी सम्यक प्रकारे अभिसंबोधन (पूर्ण ज्ञान) केले आहे. ฉ ธมฺมา सहा धर्म ๓๕๖. ‘‘ฉ ธมฺมา พหุการา…เป… ฉ ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา. ३५६. सहा धर्म बहुकारक (अतिशय उपकारक) आहेत... पे... सहा धर्म साक्षात करण्यासारखे आहेत. (ก) ‘‘กตเม ฉ ธมฺมา พหุการา? ฉ สารณียา ธมฺมา. อิธาวุโส, ภิกฺขุโน เมตฺตํ กายกมฺมํ ปจฺจุปฏฺฐิตํ โหติ สพฺรหฺมจารีสุ อาวิ เจว รโห [Pg.237] จ, อยมฺปิ ธมฺโม สารณีโย ปิยกรโณ ครุกรโณ สงฺคหาย อวิวาทาย สามคฺคิยา เอกีภาวาย สํวตฺตติ. (क) कोणते सहा धर्म बहुकारक (अतिशय उपकारक) आहेत? सहा सारणीय (स्मरणीय) धर्म. आवुसो, येथे भिक्खूचे आपल्या सब्रह्मचाऱ्यांविषयी (सहधर्मींविषयी) समक्ष आणि परोक्ष देखील मैत्रीपूर्ण कायकर्म (शारीरिक कर्म) प्रस्थापित झालेले असते. हा धर्म देखील सारणीय (स्मरणीय), प्रियकारक, आदरकारक असून तो परस्परांच्या संग्रहासाठी (एकतेसाठी), विवादाच्या अभावासाठी (अविवादासाठी), सामंजस्यासाठी (सामग्रीसाठी) आणि ऐक्यासाठी (एकभावासाठी) कारणीभूत ठरतो. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน เมตฺตํ วจีกมฺมํ…เป… เอกีภาวาย สํวตฺตติ. पुन्हा, आवुसो, भिक्खूचे मैत्रीपूर्ण वचीकर्म (वाणीचे कर्म)... पे... ऐक्यासाठी कारणीभूत ठरतो. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน เมตฺตํ มโนกมฺมํ…เป… เอกีภาวาย สํวตฺตติ. पुन्हा, आवुसो, भिक्खूचे मैत्रीपूर्ण मनोकर्म (मनाचे कर्म)... पे... ऐक्यासाठी कारणीभूत ठरतो. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ เย เต ลาภา ธมฺมิกา ธมฺมลทฺธา อนฺตมโส ปตฺตปริยาปนฺนมตฺตมฺปิ, ตถารูเปหิ ลาเภหิ อปฺปฏิวิภตฺตโภคี โหติ สีลวนฺเตหิ สพฺรหฺมจารีหิ สาธารณโภคี, อยมฺปิ ธมฺโม สารณีโย…เป… เอกีภาวาย สํวตฺตติ. पुन्हा, आवुसो, भिक्खूला जे काही धार्मिक (धर्माला अनुसरून) आणि धर्मपूर्वक मिळालेले लाभ होतात, अगदी भिक्षापात्रात आलेल्या अन्नाइतके देखील, अशा लाभांचा तो स्वतःसाठीच केवळ उपभोग न घेता (अप्रतिविभक्तभोगी राहून), शीलवान सब्रह्मचाऱ्यांसोबत मिळून-मिसळून उपभोग घेणारा (साधारणभोगी) होतो. हा धर्म देखील सारणीय... पे... ऐक्यासाठी कारणीभूत ठरतो. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ, ยานิ ตานิ สีลานิ อขณฺฑานิ อจฺฉิทฺทานิ อสพลานิ อกมฺมาสานิ ภุชิสฺสานิ วิญฺญุปฺปสตฺถานิ อปรามฏฺฐานิ สมาธิสํวตฺตนิกานิ, ตถารูเปสุ สีเลสุ สีลสามญฺญคโต วิหรติ สพฺรหฺมจารีหิ อาวิ เจว รโห จ, อยมฺปิ ธมฺโม สารณีโย…เป… เอกีภาวาย สํวตฺตติ. पुन्हा दुसरे असे की, आवुसो, भिक्खू जी ती शीले अखंड, अछिद्र, डाग नसलेली, कलंकरहित, बंधनांतून मुक्त करणारी, विद्वानांनी प्रशंसिलेली, (तृष्णा व दृष्टीने) अपरामृष्ट (अदूषित) आणि समाधीला पोषक असणारी आहेत; अशा प्रकारच्या शीलांमध्ये तो आपल्या सब्रह्मचाऱ्यांसोबत प्रत्यक्ष आणि अप्रत्यक्षपणे (उघडपणे व खाजगीत) शील-समानतेने युक्त होऊन राहतो. हा देखील धर्म स्मरणीय आहे... पे... एकतेसाठी कारणीभूत ठरतो. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ ยายํ ทิฏฺฐิ อริยา นิยฺยานิกา นิยฺยาติ ตกฺกรสฺส สมฺมา ทุกฺขกฺขยาย, ตถารูปาย ทิฏฺฐิยา ทิฏฺฐิ สามญฺญคโต วิหรติ สพฺรหฺมจารีหิ อาวิ เจว รโห จ, อยมฺปิ ธมฺโม สารณีโย ปิยกรโณ ครุกรโณ, สงฺคหาย อวิวาทาย สามคฺคิยา เอกีภาวาย สํวตฺตติ. อิเม ฉ ธมฺมา พหุการา. पुन्हा दुसरे असे की, आवुसो, भिक्खूची जी दृष्टी आर्य, (संसारदुःखातून) बाहेर काढणारी आणि तिचे आचरण करणाऱ्याला पूर्णपणे दुःखक्षयाकडे नेणारी आहे; अशा प्रकारच्या दृष्टीमध्ये तो आपल्या सब्रह्मचाऱ्यांसोबत प्रत्यक्ष आणि अप्रत्यक्षपणे (उघडपणे व खाजगीत) दृष्टी-समानतेने युक्त होऊन राहतो. हा देखील धर्म स्मरणीय, प्रिय करणारा, आदर निर्माण करणारा असून तो संग्रह (एकजूट), अविवाद (कलह नसणे), सामग्गी (एकता) आणि एकीभावासाठी कारणीभूत ठरतो. हे सहा धर्म अत्यंत उपकारक आहेत. (ข) ‘‘กตเม ฉ ธมฺมา ภาเวตพฺพา? ฉ อนุสฺสติฏฺฐานานิ – พุทฺธานุสฺสติ, ธมฺมานุสฺสติ, สงฺฆานุสฺสติ, สีลานุสฺสติ, จาคานุสฺสติ, เทวตานุสฺสติ. อิเม ฉ ธมฺมา ภาเวตพฺพา. (ख) कोणते सहा धर्म भावना करण्याजोगे (विकसित करण्याजोगे) आहेत? सहा अनुस्मृती-स्थाने – बुद्धानुस्मृती, धम्मानुस्मृती, संघानुस्मृती, शीलानुस्मृती, त्यागानुस्मृती आणि देवतानुस्मृती. हे सहा धर्म भावना करण्याजोगे आहेत. (ค) ‘‘กตเม ฉ ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา? ฉ อชฺฌตฺติกานิ อายตนานิ – จกฺขายตนํ, โสตายตนํ, ฆานายตนํ, ชิวฺหายตนํ, กายายตนํ, มนายตนํ. อิเม ฉ ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา. (ग) कोणते सहा धर्म परिज्ञेय (पूर्णपणे जाणण्याजोगे) आहेत? सहा आध्यात्मिक आयतने – चक्षु-आयतन, श्रोत-आयतन, घ्राण-आयतन, जिव्हा-आयतन, काय-आयतन आणि मन-आयतन. हे सहा धर्म परिज्ञेय आहेत. (ฆ) ‘‘กตเม ฉ ธมฺมา ปหาตพฺพา? ฉ ตณฺหากายา – รูปตณฺหา, สทฺทตณฺหา, คนฺธตณฺหา, รสตณฺหา, โผฏฺฐพฺพตณฺหา, ธมฺมตณฺหา. อิเม ฉ ธมฺมา ปหาตพฺพา. (घ) कोणते सहा धर्म प्रहातव्य (त्याग करण्याजोगे) आहेत? सहा तृष्णा-समूह – रूप-तृष्णा, शब्द-तृष्णा, गंध-तृष्णा, रस-तृष्णा, स्प्रष्टव्य-तृष्णा आणि धम्म-तृष्णा. हे सहा धर्म प्रहातव्य आहेत. (ง) ‘‘กตเม [Pg.238] ฉ ธมฺมา หานภาคิยา? ฉ อคารวา – อิธาวุโส, ภิกฺขุ สตฺถริ อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส. ธมฺเม…เป… สงฺเฆ… สิกฺขาย… อปฺปมาเท… ปฏิสนฺถาเร อคารโว วิหรติ อปฺปติสฺโส. อิเม ฉ ธมฺมา หานภาคิยา. (ङ) कोणते सहा धर्म हानीला कारणीभूत ठरणारे आहेत? सहा प्रकारचे अनादर – आवुसो, या शासनात भिक्खू शास्त्याविषयी अनादर बाळगतो, अप्रतिश (अनादरयुक्त) होऊन राहतो. धम्माविषयी... पे... संघाविषयी... शिक्षेविषयी... अप्रमादाविषयी... प्रतिसंथाराविषयी अनादर बाळगतो, अप्रतिश होऊन राहतो. हे सहा धर्म हानीला कारणीभूत ठरणारे आहेत. (จ) ‘‘กตเม ฉ ธมฺมา วิเสสภาคิยา? ฉ คารวา – อิธาวุโส, ภิกฺขุ สตฺถริ สคารโว วิหรติ สปฺปติสฺโส ธมฺเม…เป… สงฺเฆ… สิกฺขาย… อปฺปมาเท… ปฏิสนฺถาเร สคารโว วิหรติ สปฺปติสฺโส. อิเม ฉ ธมฺมา วิเสสภาคิยา. (च) कोणते सहा धर्म विशेषाला कारणीभूत ठरणारे आहेत? सहा प्रकारचे आदर – आवुसो, या शासनात भिक्खू शास्त्याविषयी आदर बाळगतो, सप्रतिश (आदरयुक्त) होऊन राहतो. धम्माविषयी... पे... संघाविषयी... शिक्षेविषयी... अप्रमादाविषयी... प्रतिसंथाराविषयी आदर बाळगतो, सप्रतिश होऊन राहतो. हे सहा धर्म विशेषाला कारणीभूत ठरणारे आहेत. (ฉ) ‘‘กตเม ฉ ธมฺมา ทุปฺปฏิวิชฺฌา? ฉ นิสฺสรณิยา ธาตุโย – อิธาวุโส, ภิกฺขุ เอวํ วเทยฺย – ‘เมตฺตา หิ โข เม, เจโตวิมุตฺติ ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา, อถ จ ปน เม พฺยาปาโท จิตฺตํ ปริยาทาย ติฏฺฐตี’ติ. โส ‘มา เหวํ’ ติสฺส วจนีโย ‘มายสฺมา เอวํ อวจ, มา ภควนฺตํ อพฺภาจิกฺขิ. น หิ สาธุ ภควโต อพฺภกฺขานํ, น หิ ภควา เอวํ วเทยฺย. อฏฺฐานเมตํ อาวุโส อนวกาโส ยํ เมตฺตาย เจโตวิมุตฺติยา ภาวิตาย พหุลีกตาย ยานีกตาย วตฺถุกตาย อนุฏฺฐิตาย ปริจิตาย สุสมารทฺธาย. อถ จ ปนสฺส พฺยาปาโท จิตฺตํ ปริยาทาย ฐสฺสตีติ, เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. นิสฺสรณํ เหตํ, อาวุโส, พฺยาปาทสฺส, ยทิทํ เมตฺตาเจโตวิมุตฺตี’ติ. (छ) कोणते सहा धर्म कठीणतेने जाणण्याजोगे आहेत? सुटकेचे सहा धातू – आवुसो, या शासनात जर एखादा भिक्खू असे म्हणाला की, 'मी मैत्रीयुक्त चेतोविमुक्तीची भावना केली आहे, तिचा वारंवार सराव केला आहे, तिला वाहनासारखे केले आहे, तिला अधिष्ठान बनवले आहे, तिचा संचय केला आहे, तिचा चांगला आरंभ केला आहे; तरीही व्यापाद माझ्या चित्ताला व्यापून राहतो.' तर त्याला असे सांगावे की, 'असे म्हणू नकोस! आयुष्यमानाने असे म्हणू नये, भगवंतांवर खोटा आळ आणू नये. भगवंतांवर खोटा आळ आणणे चांगले नाही, कारण भगवंत असे कधीच सांगणार नाहीत. आवुसो, हे अशक्य आहे, अशी कोणतीही संधी नाही की, ज्याने मैत्रीयुक्त चेतोविमुक्तीची भावना केली आहे, तिचा वारंवार सराव केला आहे, तिला वाहनासारखे केले आहे, तिला अधिष्ठान बनवले आहे, तिचा संचय केला आहे, तिचा चांगला आरंभ केला आहे; तरीही व्यापाद त्याच्या चित्ताला व्यापून राहील, हे कधीच शक्य नाही. कारण आवुसो, व्यापादापासून सुटका मिळवण्याचा मार्ग म्हणजे ही मैत्रीयुक्त चेतोविमुक्तीच आहे.' ‘‘อิธ ปนาวุโส, ภิกฺขุ เอวํ วเทยฺย – ‘กรุณา หิ โข เม เจโตวิมุตฺติ ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา. อถ จ ปน เม วิเหสา จิตฺตํ ปริยาทาย ติฏฺฐตี’ติ. โส – ‘มา เหวํ’ ติสฺส วจนีโย, ‘มายสฺมา เอวํ อวจ, มา ภควนฺตํ อพฺภาจิกฺขิ…เป… นิสฺสรณํ เหตํ, อาวุโส, วิเหสาย, ยทิทํ กรุณาเจโตวิมุตฺตี’ติ. तसेच आवुसो, या शासनात जर एखादा भिक्खू असे म्हणाला की, 'मी करुणा-चेतोविमुक्तीची भावना केली आहे, तिचा वारंवार सराव केला आहे, तिला वाहनासारखे केले आहे, तिला अधिष्ठान बनवले आहे, तिचा संचय केला आहे, तिचा चांगला आरंभ केला आहे; तरीही विहिंसा माझ्या चित्ताला व्यापून राहते.' तर त्याला असे सांगावे की, 'असे म्हणू नकोस! आयुष्यमानाने असे म्हणू नये, भगवंतांवर खोटा आळ आणू नये... पे... कारण आवुसो, विहिंसेपासून सुटका मिळवण्याचा मार्ग म्हणजे ही करुणा-चेतोविमुक्तीच आहे.' ‘‘อิธ ปนาวุโส, ภิกฺขุ เอวํ วเทยฺย – ‘มุทิตา หิ โข เม เจโตวิมุตฺติ ภาวิตา…เป… อถ จ ปน เม อรติ จิตฺตํ ปริยาทาย ติฏฺฐตี’ติ. โส – ‘มา เหวํ’ ติสฺส วจนีโย ‘มายสฺมา เอวํ อวจ…เป… นิสฺสรณํ เหตํ, อาวุโส อรติยา, ยทิทํ มุทิตาเจโตวิมุตฺตี’ติ. तसेच आवुसो, या शासनात जर एखादा भिक्खू असे म्हणाला की, 'मी मुदिता-चेतोविमुक्तीची भावना केली आहे... पे... तरीही अरती माझ्या चित्ताला व्यापून राहते.' तर त्याला असे सांगावे की, 'असे म्हणू नकोस! आयुष्यमानाने असे म्हणू नये... पे... कारण आवुसो, अरतीपासून सुटका मिळवण्याचा मार्ग म्हणजे ही मुदिता-चेतोविमुक्तीच आहे.' ‘‘อิธ [Pg.239] ปนาวุโส, ภิกฺขุ เอวํ วเทยฺย – ‘อุเปกฺขา หิ โข เม เจโตวิมุตฺติ ภาวิตา…เป… อถ จ ปน เม ราโค จิตฺตํ ปริยาทาย ติฏฺฐตี’ติ. โส – ‘มา เหวํ’ ติสฺส วจนีโย ‘มายสฺมา เอวํ อวจ…เป… นิสฺสรณํ เหตํ, อาวุโส, ราคสฺส ยทิทํ อุเปกฺขาเจโตวิมุตฺตี’ติ. तसेच आवुसो, या शासनात जर एखादा भिक्खू असे म्हणाला की, 'मी उपेक्षा-चेतोविमुक्तीची भावना केली आहे... पे... तरीही राग माझ्या चित्ताला व्यापून राहतो.' तर त्याला असे सांगावे की, 'असे म्हणू नकोस! आयुष्यमानाने असे म्हणू नये... पे... कारण आवुसो, रागापासून सुटका मिळवण्याचा मार्ग म्हणजे ही उपेक्षा-चेतोविमुक्तीच आहे.' ‘‘อิธ ปนาวุโส, ภิกฺขุ เอวํ วเทยฺย – ‘อนิมิตฺตา หิ โข เม เจโตวิมุตฺติ ภาวิตา…เป… อถ จ ปน เม นิมิตฺตานุสาริ วิญฺญาณํ โหตี’ติ. โส – ‘มา เหวํ’ ติสฺส วจนีโย ‘มายสฺมา เอวํ อวจ…เป… นิสฺสรณํ เหตํ, อาวุโส, สพฺพนิมิตฺตานํ ยทิทํ อนิมิตฺตา เจโตวิมุตฺตี’ติ. तसेच आवुसो, या शासनात जर एखादा भिक्खू असे म्हणाला की, 'मी अनिमित्त-चेतोविमुक्तीची भावना केली आहे... पे... तरीही माझे विज्ञान निमित्तांचे अनुकरण करणारे होते.' तर त्याला असे सांगावे की, 'असे म्हणू नकोस! आयुष्यमानाने असे म्हणू नये... पे... कारण आवुसो, सर्व निमित्तांपासून सुटका मिळवण्याचा मार्ग म्हणजे ही अनिमित्त-चेतोविमुक्तीच आहे.' ‘‘อิธ ปนาวุโส, ภิกฺขุ เอวํ วเทยฺย – ‘อสฺมีติ โข เม วิคตํ, อยมหมสฺมีติ น สมนุปสฺสามิ, อถ จ ปน เม วิจิกิจฺฉากถํกถาสลฺลํ จิตฺตํ ปริยาทาย ติฏฺฐตี’ติ. โส – ‘มา เหวํ’ ติสฺส วจนีโย ‘มายสฺมา เอวํ อวจ, มา ภควนฺตํ อพฺภาจิกฺขิ, น หิ สาธุ ภควโต อพฺภกฺขานํ, น หิ ภควา เอวํ วเทยฺย. อฏฺฐานเมตํ, อาวุโส, อนวกาโส ยํ อสฺมีติ วิคเต อยมหมสฺมีติ อสมนุปสฺสโต. อถ จ ปนสฺส วิจิกิจฺฉากถํกถาสลฺลํ จิตฺตํ ปริยาทาย ฐสฺสติ, เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. นิสฺสรณํ เหตํ, อาวุโส, วิจิกิจฺฉากถํกถาสลฺลสฺส, ยทิทํ อสฺมิมานสมุคฺฆาโฏ’ติ. อิเม ฉ ธมฺมา ทุปฺปฏิวิชฺฌา. तसेच आवुसो, या शासनात जर एखादा भिक्खू असे म्हणाला की, 'माझा "मी आहे" हा भाव नष्ट झाला आहे, "हा मी आहे" असे मी पाहत नाही; तरीही संशय आणि शंकेचे शल्य माझ्या चित्ताला व्यापून राहते.' तर त्याला असे सांगावे की, 'असे म्हणू नकोस! आयुष्यमानाने असे म्हणू नये, भगवंतांवर खोटा आळ आणू नये, भगवंतांवर खोटा आळ आणणे चांगले नाही, कारण भगवंत असे कधीच सांगणार नाहीत. आवुसो, हे अशक्य आहे, अशी कोणतीही संधी नाही की, ज्याचा "मी आहे" हा भाव नष्ट झाला आहे, जो "हा मी आहे" असे पाहत नाही; तरीही संशय आणि शंकेचे शल्य त्याच्या चित्ताला व्यापून राहील, हे कधीच शक्य नाही. कारण आवुसो, संशय आणि शंकेच्या शल्यापासून सुटका मिळवण्याचा मार्ग म्हणजे "अस्मि-मान" (अहंकार) पूर्णपणे नष्ट करणे हाच आहे.' हे सहा धर्म कठीणतेने जाणण्याजोगे आहेत. (ช) ‘‘กตเม ฉ ธมฺมา อุปฺปาเทตพฺพา? ฉ สตตวิหารา. อิธาวุโส, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา เนว สุมโน โหติ น ทุมฺมโน, อุเปกฺขโก วิหรติ สโต สมฺปชาโน. โสเตน สทฺทํ สุตฺวา…เป… ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตฺวา… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา… กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสิตฺวา… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย เนว สุมโน โหติ น ทุมฺมโน, อุเปกฺขโก วิหรติ สโต สมฺปชาโน. อิเม ฉ ธมฺมา อุปฺปาเทตพฺพา. (ज) कोणते सहा धर्म उत्पन्न करण्याजोगे आहेत? सहा सतत-विहार. आवुसो, या शासनात भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहून आनंदीही होत नाही आणि दुःखीही होत नाही, तो स्मृतिमान व संप्रजन्ययुक्त राहून उपेक्षक राहतो. कानाने शब्द ऐकून... पे... नाकाने गंध घेऊन... जिभेने रस चाखून... शरीराने स्पर्श अनुभवून... मनाने धम्म जाणून आनंदीही होत नाही आणि दुःखीही होत नाही, तो स्मृतिमान व संप्रजन्ययुक्त राहून उपेक्षक राहतो. हे सहा धर्म उत्पन्न करण्याजोगे आहेत. (ฌ) ‘‘กตเม ฉ ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา? ฉ อนุตฺตริยานิ – ทสฺสนานุตฺตริยํ, สวนานุตฺตริยํ, ลาภานุตฺตริยํ, สิกฺขานุตฺตริยํ, ปาริจริยานุตฺตริยํ, อนุสฺสตานุตฺตริยํ. อิเม ฉ ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา. (झ) कोणते सहा धर्म अभिज्ञेय आहेत? सहा अनुोत्तरिये – दर्शनानुत्तरिय, श्रवणानुत्तरिय, लाभानुत्तरिय, शिक्षानुत्तरिय, परिचर्येनुत्तरिय आणि अनुस्मृतीनुत्तरिय. हे सहा धर्म अभिज्ञेय आहेत. (ญ) ‘‘กตเม ฉ ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา? ฉ อภิญฺญา – อิธาวุโส, ภิกฺขุ อเนกวิหิตํ อิทฺธิวิธํ ปจฺจนุโภติ – เอโกปิ หุตฺวา พหุธา โหติ, พหุธาปิ หุตฺวา เอโก โหติ. อาวิภาวํ ติโรภาวํ. ติโรกุฏฺฏํ ติโรปาการํ ติโรปพฺพตํ อสชฺชมาโน คจฺฉติ เสยฺยถาปิ อากาเส[Pg.240]. ปถวิยาปิ อุมฺมุชฺชนิมุชฺชํ กโรติ เสยฺยถาปิ อุทเก. อุทเกปิ อภิชฺชมาเน คจฺฉติ เสยฺยถาปิ ปถวิยํ. อากาเสปิ ปลฺลงฺเกน กมติ เสยฺยถาปิ ปกฺขี สกุโณ. อิเมปิ จนฺทิมสูริเย เอวํมหิทฺธิเก เอวํมหานุภาเว ปาณินา ปรามสติ ปริมชฺชติ. ยาว พฺรหฺมโลกาปิ กาเยน วสํ วตฺเตติ. (ञ) “कोणते सहा धर्म साक्षात करावयाचे आहेत? सहा अभिज्ञा (उच्च ज्ञान) – येथे, आवुसो (बंधूंनो), भिक्खू अनेक प्रकारच्या ऋद्धींचा (अलौकिक शक्तींचा) अनुभव घेतो – एक असूनही तो अनेक होतो, आणि अनेक होऊनही पुन्हा एक होतो. तो प्रकट होतो आणि अदृश्य होतो. भिंत, तट किंवा डोंगर यांमधून तो न अडकता पार निघून जातो, जणू काही आकाशातून जात असावा. तो जमिनीमध्येही पाण्यात डुबकी मारावी तशी वर-खाली (बुडी मारणे व वर येणे) करतो. तो पाण्यावरही जमिनीवर चालल्यासारखा न बुडता चालतो. तो आकाशातही मांडी घालून उडतो, जणू काही पंख असलेला पक्षी असावा. तो एवढ्या मोठ्या ऋद्धी असलेल्या आणि एवढ्या मोठ्या प्रभाव असलेल्या या चंद्र आणि सूर्यालाही हाताने स्पर्श करतो आणि कुरवाळतो. तो ब्रह्मलोकापर्यंत आपल्या शरीराने वश (नियंत्रण) चालवतो.” ‘‘ทิพฺพาย โสตธาตุยา วิสุทฺธาย อติกฺกนฺตมานุสิกาย อุโภ สทฺเท สุณาติ ทิพฺเพ จ มานุเส จ, เย ทูเร สนฺติเก จ. “तो अत्यंत शुद्ध आणि मानवी मर्यादेपलीकडे असलेल्या दिव्य श्रोत्रधातूने (दिव्य कानाने) दोन्ही प्रकारचे शब्द ऐकतो – दिव्य आणि मानवी, जे दूर असोत की जवळ असोत.” ‘‘ปรสตฺตานํ ปรปุคฺคลานํ เจตสา เจโต ปริจฺจ ปชานาติ, สราคํ วา จิตฺตํ สราคํ จิตฺตนฺติ ปชานาติ …เป… อวิมุตฺตํ วา จิตฺตํ อวิมุตฺตํ จิตฺตนฺติ ปชานาติ. “तो इतर प्राण्यांच्या आणि इतर पुद्गलांच्या (व्यक्तींच्या) मनाला आपल्या मनाने जाणून घेतो; रागासहित असलेल्या चित्ताला ‘हे रागासहित चित्त आहे’ असे जाणतो... पे... विमुक्त न झालेल्या चित्ताला ‘हे विमुक्त न झालेले चित्त आहे’ असे जाणतो.” ‘‘โส อเนกวิหิตํ ปุพฺเพนิวาสํ อนุสฺสรติ, เสยฺยถิทํ เอกมฺปิ ชาตึ…เป… อิติ สาการํ สอุทฺเทสํ อเนกวิหิตํ ปุพฺเพนิวาสํ อนุสฺสรติ. “तो अनेक प्रकारच्या पूर्वजन्मांचे स्मरण करतो, जसे की – एक जन्म... पे... अशा प्रकारे तो सविस्तर आणि सकारण अनेक प्रकारच्या पूर्वजन्मांचे स्मरण करतो.” ‘‘ทิพฺเพน จกฺขุนา วิสุทฺเธน อติกฺกนฺตมานุสเกน สตฺเต ปสฺสติ จวมาเน อุปปชฺชมาเน หีเน ปณีเต สุวณฺเณ ทุพฺพณฺเณ สุคเต ทุคฺคเต ยถากมฺมูปเค สตฺเต ปชานาติ …เป… “तो मानवी दृष्टीपलीकडे असलेल्या अत्यंत शुद्ध दिव्य चक्षूने (दिव्य दृष्टीने) प्राण्यांना मरताना आणि जन्म घेताना पाहतो; हीन, प्रणीत (उत्कृष्ट), सुवर्ण (सुंदर), दुर्धर्ष (कुरूप), सुगतीला गेलेले, दुर्गतीला गेलेले आणि आपापल्या कर्मांनुसार गती प्राप्त करणाऱ्या प्राण्यांना तो जाणतो... पे...” ‘‘อาสวานํ ขยา อนาสวํ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิเม ฉ ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา. “आसवांचा (विकारांचा) क्षय झाल्यामुळे, तो आसवरहित चित्तविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्ती याच जन्मात स्वतः अभिज्ञाने (उच्च ज्ञानाने) साक्षात करून, ती प्राप्त करून विहरतो. हे सहा धर्म साक्षात करावयाचे आहेत.” ‘‘อิติ อิเม สฏฺฐิ ธมฺมา ภูตา ตจฺฉา ตถา อวิตถา อนญฺญถา สมฺมา ตถาคเตน อภิสมฺพุทฺธา. “अशा प्रकारे हे साठ धर्म सत्य, यथार्थ, तथ्य, अवितथ (अपरिवर्तनीय), अनन्यथा (न बदलणारे) आहेत, ज्यांचे तथागतांनी सम्यक प्रकारे अभिसंबोधन (पूर्ण ज्ञान) केले आहे.” สตฺต ธมฺมา सात धर्म ๓๕๗. ‘‘สตฺต ธมฺมา พหุการา…เป… สตฺต ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา. ३५७. “सात धर्म बहुकारक (अतिशय उपकारक) आहेत... पे... सात धर्म साक्षात करावयाचे आहेत.” (ก) ‘‘กตเม สตฺต ธมฺมา พหุการา? สตฺต อริยธนานิ – สทฺธาธนํ, สีลธนํ, หิริธนํ, โอตฺตปฺปธนํ, สุตธนํ, จาคธนํ, ปญฺญาธนํ. อิเม สตฺต ธมฺมา พหุการา. (क) “कोणते सात धर्म बहुकारक आहेत? सात आर्यधन – श्रद्धाधन, शीलधन, हिरीधन (पापाची लाज वाटणे), ओत्तप्पधन (पापाची भीती वाटणे), श्रुतधन (ज्ञानधन), त्यागधन आणि प्रज्ञाधन. हे सात धर्म बहुकारक आहेत.” (ข) ‘‘กตเม [Pg.241] สตฺต ธมฺมา ภาเวตพฺพา? สตฺต สมฺโพชฺฌงฺคา – สติสมฺโพชฺฌงฺโค, ธมฺมวิจยสมฺโพชฺฌงฺโค, วีริยสมฺโพชฺฌงฺโค, ปีติสมฺโพชฺฌงฺโค, ปสฺสทฺธิสมฺโพชฺฌงฺโค, สมาธิสมฺโพชฺฌงฺโค, อุเปกฺขาสมฺโพชฺฌงฺโค. อิเม สตฺต ธมฺมา ภาเวตพฺพา. (ख) “कोणते सात धर्म भावना करावयाचे (विकसित करावयाचे) आहेत? सात संबोध्यंग (ज्ञानप्राप्तीची अंगे) – स्मृति-संबोध्यंग, धर्मविचय-संबोध्यंग, वीर्य-संबोध्यंग, प्रीति-संबोध्यंग, प्रश्रब्धि-संबोध्यंग, समाधि-संबोध्यंग आणि उपेक्षा-संबोध्यंग. हे सात धर्म भावना करावयाचे आहेत.” (ค) ‘‘กตเม สตฺต ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา? สตฺต วิญฺญาณฏฺฐิติโย – สนฺตาวุโส, สตฺตา นานตฺตกายา นานตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ มนุสฺสา เอกจฺเจ จ เทวา เอกจฺเจ จ วินิปาติกา. อยํ ปฐมา วิญฺญาณฏฺฐิติ. (ग) “कोणते सात धर्म परिज्ञेय (पूर्णपणे जाणून घेण्याजोगे) आहेत? विज्ञानाच्या सात स्थिती (विज्ञानाचे आधार) – आवुसो, असे प्राणी आहेत ज्यांचे शरीर भिन्न आहे आणि संज्ञाही भिन्न आहे; जसे की मनुष्य, काही देव आणि काही विनिपातिक (असुर इत्यादी). ही पहिली विज्ञान-स्थिती होय.” ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา นานตฺตกายา เอกตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ เทวา พฺรหฺมกายิกา ปฐมาภินิพฺพตฺตา. อยํ ทุติยา วิญฺญาณฏฺฐิติ. “आवुसो, असे प्राणी आहेत ज्यांचे शरीर भिन्न आहे पण संज्ञा एकच आहे; जसे की प्रथम ध्यानात उत्पन्न झालेले ब्रह्मकायिक देव. ही दुसरी विज्ञान-स्थिती होय.” ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา เอกตฺตกายา นานตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ เทวา อาภสฺสรา. อยํ ตติยา วิญฺญาณฏฺฐิติ. “आवुसो, असे प्राणी आहेत ज्यांचे शरीर एकच आहे पण संज्ञा भिन्न आहे; जसे की आभास्वर देव. ही तिसरी विज्ञान-स्थिती होय.” ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา เอกตฺตกายา เอกตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ เทวา สุภกิณฺหา. อยํ จตุตฺถี วิญฺญาณฏฺฐิติ. “आवुसो, असे प्राणी आहेत ज्यांचे शरीर एकच आहे आणि संज्ञाही एकच आहे; जसे की शुभकिण्ह देव. ही चौथी विज्ञान-स्थिती होय.” ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา สพฺพโส รูปสญฺญานํ สมติกฺกมา…เป… ‘อนนฺโต อากาโส’ติ อากาสานญฺจายตนูปคา. อยํ ปญฺจมี วิญฺญาณฏฺฐิติ. “आवुसो, असे प्राणी आहेत जे सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांचे उल्लंघन करून... पे... ‘आकाश अनंत आहे’ अशा भावनेने आकाशांनंत्यायतन भूमीत पोहोचलेले आहेत. ही पाचवी विज्ञान-स्थिती होय.” ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา สพฺพโส อากาสานญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘อนนฺตํ วิญฺญาณ’นฺติ วิญฺญาณญฺจายตนูปคา. อยํ ฉฏฺฐี วิญฺญาณฏฺฐิติ. “आवुसो, असे प्राणी आहेत जे सर्व प्रकारे आकाशांनंत्यायतन भूमीचे उल्लंघन करून ‘विज्ञान अनंत आहे’ अशा भावनेने विज्ञानांत्यायतन भूमीत पोहोचलेले आहेत. ही सहावी विज्ञान-स्थिती होय.” ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘นตฺถิ กิญฺจี’ติ อากิญฺจญฺญายตนูปคา. อยํ สตฺตมี วิญฺญาณฏฺฐิติ. อิเม สตฺต ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา. “आवुसो, असे प्राणी आहेत जे सर्व प्रकारे विज्ञानांत्यायतन भूमीचे उल्लंघन करून ‘काहीही नाही’ अशा भावनेने आकिंचन्यायतन भूमीत पोहोचलेले आहेत. ही सातवी विज्ञान-स्थिती होय. हे सात धर्म परिज्ञेय आहेत.” (ฆ) ‘‘กตเม สตฺต ธมฺมา ปหาตพฺพา? สตฺตานุสยา – กามราคานุสโย, ปฏิฆานุสโย, ทิฏฺฐานุสโย, วิจิกิจฺฉานุสโย, มานานุสโย, ภวราคานุสโย, อวิชฺชานุสโย. อิเม สตฺต ธมฺมา ปหาตพฺพา. (घ) “कोणते सात धर्म प्रहातव्य (त्याग करण्याजोगे) आहेत? सात अनुशय (सुप्त वासना) – कामराग-अनुशय, प्रतिघ-अनुशय (द्वेष), दृष्टी-अनुशय, विचिकित्सा-अनुशय (शंका), मान-अनुशय (अहंकार), भवराग-अनुशय आणि अविद्या-अनुशय. हे सात धर्म प्रहातव्य आहेत.” (ง) ‘‘กตเม สตฺต ธมฺมา หานภาคิยา? สตฺต อสทฺธมฺมา – อิธาวุโส, ภิกฺขุ อสฺสทฺโธ โหติ, อหิริโก โหติ, อโนตฺตปฺปี โหติ, อปฺปสฺสุโต [Pg.242] โหติ, กุสีโต โหติ, มุฏฺฐสฺสติ โหติ, ทุปฺปญฺโญ โหติ. อิเม สตฺต ธมฺมา หานภาคิยา. (ङ) “कोणते सात धर्म हानीला कारणीभूत ठरणारे (हानिभागीय) आहेत? सात असद्धर्म (वाईट गुण) – येथे, आवुसो, भिक्खू अश्रद्ध (श्रद्धारहित) असतो, अहिरिक (लज्जारहित) असतो, अनोत्तप्पी (पापाचे भय न बाळगणारा) असतो, अल्पश्रुत (कमी ऐकलेला/अल्पज्ञानी) असतो, आळशी असतो, विस्मरणशील (स्मृतिभ्रष्ट) असतो आणि दुर्प्रज्ञ (बुद्धी नसलेला) असतो. हे सात धर्म हानीला कारणीभूत ठरणारे आहेत.” (จ) ‘‘กตเม สตฺต ธมฺมา วิเสสภาคิยา? สตฺต สทฺธมฺมา – อิธาวุโส, ภิกฺขุ สทฺโธ โหติ, หิริมา โหติ, โอตฺตปฺปี โหติ, พหุสฺสุโต โหติ, อารทฺธวีริโย โหติ, อุปฏฺฐิตสฺสติ โหติ, ปญฺญวา โหติ. อิเม สตฺต ธมฺมา วิเสสภาคิยา. (च) “कोणते सात धर्म विशेषाला (प्रगतीला) कारणीभूत ठरणारे आहेत? सात सद्धर्म (चांगले गुण) – येथे, आवुसो, भिक्खू श्रद्धावान असतो, लज्जावान (पापाची लाज बाळगणारा) असतो, ओत्तप्पी (पापाचे भय बाळगणारा) असतो, बहुश्रुत असतो, उद्योगी (वीर्यवान) असतो, जागृत स्मृती असलेला असतो आणि प्रज्ञावान असतो. हे सात धर्म प्रगतीला कारणीभूत ठरणारे आहेत.” (ฉ) ‘‘กตเม สตฺต ธมฺมา ทุปฺปฏิวิชฺฌา? สตฺต สปฺปุริสธมฺมา – อิธาวุโส, ภิกฺขุ ธมฺมญฺญู จ โหติ อตฺถญฺญู จ อตฺตญฺญู จ มตฺตญฺญู จ กาลญฺญู จ ปริสญฺญู จ ปุคฺคลญฺญู จ. อิเม สตฺต ธมฺมา ทุปฺปฏิวิชฺฌา. (छ) “कोणते सात धर्म कठीणतेने समजणारे (दुर्बोध) आहेत? सात सत्पुरुष-धर्म – येथे, आवुसो, भिक्खू धर्म जाणणारा (धम्मज्ञ), अर्थ जाणणारा (अर्थज्ञ), स्वतःला जाणणारा (आत्मज्ञ), मात्रा (मर्यादा) जाणणारा (मात्रज्ञ), काळ जाणणारा (कालज्ञ), परिषद (सभा) जाणणारा (परिषदज्ञ) आणि पुद्गल (व्यक्ती) जाणणारा (पुद्गलज्ञ) असतो. हे सात धर्म कठीणतेने समजणारे आहेत.” (ช) ‘‘กตเม สตฺต ธมฺมา อุปฺปาเทตพฺพา? สตฺต สญฺญา – อนิจฺจสญฺญา, อนตฺตสญฺญา, อสุภสญฺญา, อาทีนวสญฺญา, ปหานสญฺญา, วิราคสญฺญา, นิโรธสญฺญา. อิเม สตฺต ธมฺมา อุปฺปาเทตพฺพา. (ज) “कोणते सात धर्म उत्पन्न करावयाचे आहेत? सात संज्ञा – अनित्य-संज्ञा, अनात्म-संज्ञा, अशुचि-संज्ञा (अशुभ-संज्ञा), आदीनव-संज्ञा (दोषांची जाणीव), प्रहाण-संज्ञा (त्यागाची जाणीव), विराग-संज्ञा आणि निरोध-संज्ञा. हे सात धर्म उत्पन्न करावयाचे आहेत.” (ฌ) ‘‘กตเม สตฺต ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา? สตฺต นิทฺทสวตฺถูนิ – อิธาวุโส, ภิกฺขุ สิกฺขาสมาทาเน ติพฺพจฺฉนฺโท โหติ, อายติญฺจ สิกฺขาสมาทาเน อวิคตเปโม. ธมฺมนิสนฺติยา ติพฺพจฺฉนฺโท โหติ, อายติญฺจ ธมฺมนิสนฺติยา อวิคตเปโม. อิจฺฉาวินเย ติพฺพจฺฉนฺโท โหติ, อายติญฺจ อิจฺฉาวินเย อวิคตเปโม. ปฏิสลฺลาเน ติพฺพจฺฉนฺโท โหติ, อายติญฺจ ปฏิสลฺลาเน อวิคตเปโม. วีริยารมฺเม ติพฺพจฺฉนฺโท โหติ, อายติญฺจ วีริยารมฺเม อวิคตเปโม. สติเนปกฺเก ติพฺพจฺฉนฺโท โหติ, อายติญฺจ สติเนปกฺเก อวิคตเปโม. ทิฏฺฐิปฏิเวเธ ติพฺพจฺฉนฺโท โหติ, อายติญฺจ ทิฏฺฐิปฏิเวเธ อวิคตเปโม. อิเม สตฺต ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา. (झ) “कोणते सात धर्म अभिज्ञेय (उच्च ज्ञानाने जाणण्याजोगे) आहेत? सात प्रशंसनीय स्थाने (निर्दशवस्तू) – येथे, आवुसो, भिक्खू शिक्षा ग्रहण करण्यामध्ये तीव्र छंद (इच्छा) बाळगतो आणि भविष्यातही शिक्षा ग्रहण करण्याविषयी त्याचे प्रेम कमी होत नाही. तो धर्माचे चिंतन करण्यामध्ये तीव्र छंद बाळगतो आणि भविष्यातही धर्माचे चिंतन करण्याविषयी त्याचे प्रेम कमी होत नाही. तो तृष्णेचा नाश करण्यामध्ये तीव्र छंद बाळगतो आणि भविष्यातही तृष्णेचा नाश करण्याविषयी त्याचे प्रेम कमी होत नाही. तो एकांतात राहण्यामध्ये तीव्र छंद बाळगतो आणि भविष्यातही एकांतात राहण्याविषयी त्याचे प्रेम कमी होत नाही. तो वीर्य (प्रयत्न) आरंभ करण्यामध्ये तीव्र छंद बाळगतो आणि भविष्यातही वीर्य आरंभ करण्याविषयी त्याचे प्रेम कमी होत नाही. तो स्मृती आणि प्रज्ञा जागृत ठेवण्यामध्ये तीव्र छंद बाळगतो आणि भविष्यातही स्मृती आणि प्रज्ञा जागृत ठेवण्याविषयी त्याचे प्रेम कमी होत नाही. तो सम्यक दृष्टीचा वेध घेण्यामध्ये (सत्य जाणण्यामध्ये) तीव्र छंद बाळगतो आणि भविष्यातही सम्यक दृष्टीचा वेध घेण्याविषयी त्याचे प्रेम कमी होत नाही. हे सात धर्म अभिज्ञेय आहेत.” (ญ) ‘‘กตเม สตฺต ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา? สตฺต ขีณาสวพลานิ – อิธาวุโส, ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน อนิจฺจโต สพฺเพ สงฺขารา ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย สุทิฏฺฐา โหนฺติ. ยํปาวุโส, ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน อนิจฺจโต สพฺเพ สงฺขารา ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย สุทิฏฺฐา โหนฺติ, อิทมฺปิ ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน พลํ โหติ, ยํ พลํ อาคมฺม ขีณาสโว ภิกฺขุ อาสวานํ ขยํ ปฏิชานาติ – ‘ขีณา เม อาสวา’ติ. “कोणते सात धर्म साक्षात्कृत करावेत (प्रत्यक्ष अनुभवावेत)? अर्हताची (क्षीणासवांची) सात बळे - येथे, हे आवुसो (मित्रांनो), आसव नष्ट केलेल्या (क्षीणासव) भिक्खूने सर्व संस्कारांना अनित्यतेने, जसे आहे तसे (यथाभूत), सम्यक प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिलेले असते. हे आवुसो, क्षीणासव भिक्खूने सर्व संस्कारांना अनित्यतेने, जसे आहे तसे, सम्यक प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिलेले असणे, हे देखील क्षीणासव भिक्खूचे एक बळ आहे, ज्या बळाचा आश्रय घेऊन क्षीणासव भिक्खू आसवांच्या क्षयाचा दावा करतो (जाणतो) की - 'माझे आसव नष्ट झाले आहेत'.” ‘‘ปุน [Pg.243] จปรํ, อาวุโส, ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน องฺคารกาสูปมา กามา ยถาภูตํ สมฺมปฺปญฺญาย สุทิฏฺฐา โหนฺติ. ยํปาวุโส…เป… ‘ขีณา เม อาสวา’ติ. “पुन्हा आणखी, आवुसो, क्षीणासव भिक्खूने कामभोगांना धगधगत्या कोळशांच्या खड्ड्यासारखे (अंगारकासूपम) जसे आहे तसे, सम्यक प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिलेले असते. हे आवुसो... पे... 'माझे आसव नष्ट झाले आहेत'.” ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน วิเวกนินฺนํ จิตฺตํ โหติ วิเวกโปณํ วิเวกปพฺภารํ วิเวกฏฺฐํ เนกฺขมฺมาภิรตํ พฺยนฺตีภูตํ สพฺพโส อาสวฏฺฐานิเยหิ ธมฺเมหิ. ยํปาวุโส…เป… ‘ขีณา เม อาสวา’ติ. “पुन्हा आणखी, आवुसो, क्षीणासव भिक्खूचे चित्त विवेकाकडे (एकांत/निर्वाणाकडे) झुकलेले, विवेकाकडे प्रवण झालेले, विवेकाकडे झुकलेले, विवेकात स्थित असलेले, नैष्क्रम्यात (निक्खम्मात) रममाण असणारे आणि आसवांना कारणीभूत असणाऱ्या सर्व धर्मांपासून पूर्णपणे मुक्त झालेले असते. हे आवुसो... पे... 'माझे आसव नष्ट झाले आहेत'.” ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน จตฺตาโร สติปฏฺฐานา ภาวิตา โหนฺติ สุภาวิตา. ยํปาวุโส…เป… ‘ขีณา เม อาสวา’ติ. “पुन्हा आणखी, आवुसो, क्षीणासव भिक्खूने चार सतीपट्ठान (स्मृतीप्रस्थान) विकसित केलेले असतात, उत्तम प्रकारे विकसित केलेले असतात. हे आवुसो... पे... 'माझे आसव नष्ट झाले आहेत'.” ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน ปญฺจินฺทฺริยานิ ภาวิตานิ โหนฺติ สุภาวิตานิ. ยํปาวุโส…เป… ‘ขีณา เม อาสวา’ติ. “पुन्हा आणखी, आवुसो, क्षीणासव भिक्खूने पाच इंद्रिये विकसित केलेली असतात, उत्तम प्रकारे विकसित केलेली असतात. हे आवुसो... पे... 'माझे आसव नष्ट झाले आहेत'.” ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน สตฺต โพชฺฌงฺคา ภาวิตา โหนฺติ สุภาวิตา. ยํปาวุโส…เป… ‘ขีณา เม อาสวา’ติ. “पुन्हा आणखी, आवुसो, क्षीणासव भिक्खूने सात बोज्झंग (बोध्यंग) विकसित केलेले असतात, उत्तम प्रकारे विकसित केलेले असतात. हे आवुसो... पे... 'माझे आसव नष्ट झाले आहेत'.” ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค ภาวิโต โหติ สุภาวิโต. ยํปาวุโส, ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค ภาวิโต โหติ สุภาวิโต, อิทมฺปิ ขีณาสวสฺส ภิกฺขุโน พลํ โหติ, ยํ พลํ อาคมฺม ขีณาสโว ภิกฺขุ อาสวานํ ขยํ ปฏิชานาติ – ‘ขีณา เม อาสวา’ติ. อิเม สตฺต ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา. “पुन्हा आणखी, आवुसो, क्षीणासव भिक्खूने आर्य अष्टांगिक मार्ग विकसित केलेला असतो, उत्तम प्रकारे विकसित केलेला असतो. हे आवुसो, क्षीणासव भिक्खूने आर्य अष्टांगिक मार्ग विकसित केलेला असणे, उत्तम प्रकारे विकसित केलेला असणे, हे देखील क्षीणासव भिक्खूचे एक बळ आहे, ज्या बळाचा आश्रय घेऊन क्षीणासव भिक्खू आसवांच्या क्षयाचा दावा करतो की - 'माझे आसव नष्ट झाले आहेत'. हे सात धर्म साक्षात्कृत करावेत.” ‘‘อิติเม สตฺตติ ธมฺมา ภูตา ตจฺฉา ตถา อวิตถา อนญฺญถา สมฺมา ตถาคเตน อภิสมฺพุทฺธา. “अशा प्रकारे हे सत्तर धर्म सत्य, यथार्थ, तथ्य, अवितथ (अपरिवर्तनीय), अनन्यथा (दुसरे काही नसलेले) आहेत, जे तथागतांनी सम्यक प्रकारे जाणले आहेत.” ปฐมภาณวาโร นิฏฺฐิโต. प्रथम भाणवार समाप्त. อฏฺฐ ธมฺมา आठ धर्म ๓๕๘. ‘‘อฏฺฐ ธมฺมา พหุการา…เป… อฏฺฐ ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา. ३५८. “आठ धर्म बहुउपकारी आहेत... पे... आठ धर्म साक्षात्कृत करावेत.” (ก) ‘‘กตเม อฏฺฐ ธมฺมา พหุการา? อฏฺฐ เหตู อฏฺฐ ปจฺจยา อาทิพฺรหฺมจริยิกาย ปญฺญาย อปฺปฏิลทฺธาย ปฏิลาภาย ปฏิลทฺธาย ภิยฺโยภาวาย [Pg.244] เวปุลฺลาย ภาวนาย ปาริปูริยา สํวตฺตนฺติ. กตเม อฏฺฐ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ สตฺถารํ อุปนิสฺสาย วิหรติ อญฺญตรํ วา ครุฏฺฐานิยํ สพฺรหฺมจารึ, ยตฺถสฺส ติพฺพํ หิโรตฺตปฺปํ ปจฺจุปฏฺฐิตํ โหติ เปมญฺจ คารโว จ. อยํ ปฐโม เหตุ ปฐโม ปจฺจโย อาทิพฺรหฺมจริยิกาย ปญฺญาย อปฺปฏิลทฺธาย ปฏิลาภาย. ปฏิลทฺธาย ภิยฺโยภาวาย เวปุลฺลาย ภาวนาย ปาริปูริยา สํวตฺตติ. “(क) कोणते आठ धर्म बहुउपकारी आहेत? आठ हेतू आणि आठ प्रत्यय (कारण/परिस्थिती) आहेत, जे ब्रह्मचर्याच्या सुरुवातीला आवश्यक असणाऱ्या, अद्याप प्राप्त न झालेल्या प्रज्ञेच्या प्राप्तीसाठी आणि प्राप्त झालेल्या प्रज्ञेच्या वृद्धीसाठी, विस्तारासाठी, भावनेसाठी (विकासासाठी) व परिपूर्तीसाठी कारणीभूत ठरतात. ते आठ कोणते? येथे, हे आवुसो, भिक्खू शास्त्यांच्या (गुरूंच्या) किंवा गुरूस्थानी असणाऱ्या एखाद्या सब्रह्मचाऱ्याच्या (सहकाऱ्याच्या) आश्रयाने राहतो, ज्यांच्याविषयी त्याच्या मनात तीव्र हिरी (लज्जा) आणि ओत्तप्प (भय) उपस्थित असते, तसेच प्रेम आणि आदरही असतो. हा पहिला हेतू, पहिला प्रत्यय आहे, जो ब्रह्मचर्याच्या सुरुवातीला आवश्यक असणाऱ्या, अद्याप प्राप्त न झालेल्या प्रज्ञेच्या प्राप्तीसाठी आणि प्राप्त झालेल्या प्रज्ञेच्या वृद्धीसाठी, विस्तारासाठी, भावनेसाठी व परिपूर्तीसाठी कारणीभूत ठरतो.” ‘‘ตํ โข ปน สตฺถารํ อุปนิสฺสาย วิหรติ อญฺญตรํ วา ครุฏฺฐานิยํ สพฺรหฺมจารึ, ยตฺถสฺส ติพฺพํ หิโรตฺตปฺปํ ปจฺจุปฏฺฐิตํ โหติ เปมญฺจ คารโว จ. เต กาเลน กาลํ อุปสงฺกมิตฺวา ปริปุจฺฉติ ปริปญฺหติ – ‘อิทํ, ภนฺเต, กถํ? อิมสฺส โก อตฺโถ’ติ? ตสฺส เต อายสฺมนฺโต อวิวฏญฺเจว วิวรนฺติ, อนุตฺตานีกตญฺจ อุตฺตานี กโรนฺติ, อเนกวิหิเตสุ จ กงฺขาฏฺฐานิเยสุ ธมฺเมสุ กงฺขํ ปฏิวิโนเทนฺติ. อยํ ทุติโย เหตุ ทุติโย ปจฺจโย อาทิพฺรหฺมจริยิกาย ปญฺญาย อปฺปฏิลทฺธาย ปฏิลาภาย, ปฏิลทฺธาย ภิยฺโยภาวาย, เวปุลฺลาย ภาวนาย ปาริปูริยา สํวตฺตติ. “तो त्या शास्त्यांच्या किंवा गुरूस्थानी असणाऱ्या एखाद्या सब्रह्मचाऱ्याच्या आश्रयाने राहतो, ज्यांच्याविषयी त्याच्या मनात तीव्र हिरी आणि ओत्तप्प उपस्थित असते, तसेच प्रेम आणि आदरही असतो. तो वेळोवेळी त्यांच्याकडे जाऊन विचारपूस करतो, प्रश्न विचारतो - 'भंते, हे कसे आहे? याचा अर्थ काय आहे?' ते आयुष्यमान त्याच्यासाठी जे अप्रकट (गुप्त) आहे ते प्रकट करतात, जे अस्पष्ट आहे ते स्पष्ट करतात आणि अनेक प्रकारच्या शंकास्पद गोष्टींमध्ये त्याच्या शंकांचे निरसन करतात. हा दुसरा हेतू, दुसरा प्रत्यय आहे, जो ब्रह्मचर्याच्या सुरुवातीला आवश्यक असणाऱ्या, अद्याप प्राप्त न झालेल्या प्रज्ञेच्या प्राप्तीसाठी आणि प्राप्त झालेल्या प्रज्ञेच्या वृद्धीसाठी, विस्तारासाठी, भावनेसाठी व परिपूर्तीसाठी कारणीभूत ठरतो.” ‘‘ตํ โข ปน ธมฺมํ สุตฺวา ทฺวเยน วูปกาเสน สมฺปาเทติ – กายวูปกาเสน จ จิตฺตวูปกาเสน จ. อยํ ตติโย เหตุ ตติโย ปจฺจโย อาทิพฺรหฺมจริยิกาย ปญฺญาย อปฺปฏิลทฺธาย ปฏิลาภาย, ปฏิลทฺธาย ภิยฺโยภาวาย เวปุลฺลาย ภาวนาย ปาริปูริยา สํวตฺตติ. “तो तो धम्म ऐकून दोन प्रकारच्या उपशमाने (विवेक/एकांततेने) युक्त होतो - कायिक उपशम (शारीरिक एकांतता) आणि मानसिक उपशम (चित्ताची शांतता). हा तिसरा हेतू, तिसरा प्रत्यय आहे, जो ब्रह्मचर्याच्या सुरुवातीला आवश्यक असणाऱ्या, अद्याप प्राप्त न झालेल्या प्रज्ञेच्या प्राप्तीसाठी आणि प्राप्त झालेल्या प्रज्ञेच्या वृद्धीसाठी, विस्तारासाठी, भावनेसाठी व परिपूर्तीसाठी कारणीभूत ठरतो.” ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ สีลวา โหติ, ปาติโมกฺขสํวรสํวุโต วิหรติ อาจารโคจรสมฺปนฺโน, อณุมตฺเตสุ วชฺเชสุ ภยทสฺสาวี สมาทาย สิกฺขติ สิกฺขาปเทสุ. อยํ จตุตฺโถ เหตุ จตุตฺโถ ปจฺจโย อาทิพฺรหฺมจริยิกาย ปญฺญาย อปฺปฏิลทฺธาย ปฏิลาภาย, ปฏิลทฺธาย ภิยฺโยภาวาย เวปุลฺลาย ภาวนาย ปาริปูริยา สํวตฺตติ. “पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू शीलवान असतो, पातिमोक्ख संवराने संवरित (संयमित) होऊन राहतो, आचार आणि गोचराने संपन्न असतो, अगदी लहान दोषांमध्येही भय पाहणारा असतो आणि शिक्षापदांचे ग्रहण करून त्यात प्रशिक्षण घेतो. हा चौथा हेतू, चौथा प्रत्यय आहे, जो ब्रह्मचर्याच्या सुरुवातीला आवश्यक असणाऱ्या, अद्याप प्राप्त न झालेल्या प्रज्ञेच्या प्राप्तीसाठी आणि प्राप्त झालेल्या प्रज्ञेच्या वृद्धीसाठी, विस्तारासाठी, भावनेसाठी व परिपूर्तीसाठी कारणीभूत ठरतो.” ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ พหุสฺสุโต โหติ สุตธโร สุตสนฺนิจโย. เย เต ธมฺมา อาทิกลฺยาณา มชฺเฌกลฺยาณา ปริโยสานกลฺยาณา สาตฺถา สพฺยญฺชนา เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ อภิวทนฺติ, ตถารูปาสฺส ธมฺมา พหุสฺสุตา โหนฺติ ธาตา วจสา [Pg.245] ปริจิตา มนสานุเปกฺขิตา ทิฏฺฐิยา สุปฺปฏิวิทฺธา. อยํ ปญฺจโม เหตุ ปญฺจโม ปจฺจโย อาทิพฺรหฺมจริยิกาย ปญฺญาย อปฺปฏิลทฺธาย ปฏิลาภาย, ปฏิลทฺธาย ภิยฺโยภาวาย เวปุลฺลาย ภาวนาย ปาริปูริยา สํวตฺตติ. “पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू बहुश्रुत (बहुस्सुत) असतो, श्रुत धरून ठेवणारा (स्मरण ठेवणारा) आणि श्रुताचा संचय करणारा असतो. जे धर्म सुरुवातीला कल्याणकारी, मध्ये कल्याणकारी आणि शेवटी कल्याणकारी आहेत, जे अर्थासह आणि व्यंजनासह (शब्दांसह) आहेत, जे केवळ परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचे प्रतिपादन करतात, अशा प्रकारचे धर्म त्याने पुष्कळ ऐकलेले असतात, लक्षात ठेवलेले असतात, वाणीने त्यांचा सराव केलेला असतो, मनाने त्यांचे चिंतन केलेले असते आणि प्रज्ञेने (दृष्टीने) त्यांचा चांगला वेध घेतलेला असतो. हा पाचवा हेतू, पाचवा प्रत्यय आहे, जो ब्रह्मचर्याच्या सुरुवातीला आवश्यक असणाऱ्या, अद्याप प्राप्त न झालेल्या प्रज्ञेच्या प्राप्तीसाठी आणि प्राप्त झालेल्या प्रज्ञेच्या वृद्धीसाठी, विस्तारासाठी, भावनेसाठी व परिपूर्तीसाठी कारणीभूत ठरतो.” ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ อารทฺธวีริโย วิหรติ อกุสลานํ ธมฺมานํ ปหานาย, กุสลานํ ธมฺมานํ อุปสมฺปทาย, ถามวา ทฬฺหปรกฺกโม อนิกฺขิตฺตธุโร กุสเลสุ ธมฺเมสุ. อยํ ฉฏฺโฐ เหตุ ฉฏฺโฐ ปจฺจโย อาทิพฺรหฺมจริยิกาย ปญฺญาย อปฺปฏิลทฺธาย ปฏิลาภาย, ปฏิลทฺธาย ภิยฺโยภาวาย เวปุลฺลาย ภาวนาย ปาริปูริยา สํวตฺตติ. “पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू अकुशल धर्मांच्या प्रहाणासाठी (त्यागासाठी) आणि कुशल धर्मांच्या प्राप्तीसाठी आरब्धवीर्य (प्रयत्नशील) होऊन राहतो, तो बलवान, दृढ पराक्रमी आणि कुशल धर्मांच्या बाबतीत कधीही धुरा (जबाबदारी) खाली न ठेवणारा असतो. हा सहावा हेतू, सहावा प्रत्यय आहे, जो ब्रह्मचर्याच्या सुरुवातीला आवश्यक असणाऱ्या, अद्याप प्राप्त न झालेल्या प्रज्ञेच्या प्राप्तीसाठी आणि प्राप्त झालेल्या प्रज्ञेच्या वृद्धीसाठी, विस्तारासाठी, भावनेसाठी व परिपूर्तीसाठी कारणीभूत ठरतो.” ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ สติมา โหติ ปรเมน สติเนปกฺเกน สมนฺนาคโต. จิรกตมฺปิ จิรภาสิตมฺปิ สริตา อนุสฺสริตา. อยํ สตฺตโม เหตุ สตฺตโม ปจฺจโย อาทิพฺรหฺมจริยิกาย ปญฺญาย อปฺปฏิลทฺธาย ปฏิลาภาย, ปฏิลทฺธาย ภิยฺโยภาวาย เวปุลฺลาย ภาวนาย ปาริปูริยา สํวตฺตติ. “पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू स्मृतिमान (सतिमा) असतो, परम स्मृती आणि प्रज्ञेने (सतिनेपक्केन) युक्त असतो. खूप पूर्वी केलेले काम किंवा खूप पूर्वी बोललेले बोलणे देखील तो आठवू शकतो, वारंवार आठवू शकतो. हा सातवा हेतू, सातवा प्रत्यय आहे, जो ब्रह्मचर्याच्या सुरुवातीला आवश्यक असणाऱ्या, अद्याप प्राप्त न झालेल्या प्रज्ञेच्या प्राप्तीसाठी आणि प्राप्त झालेल्या प्रज्ञेच्या वृद्धीसाठी, विस्तारासाठी, भावनेसाठी व परिपूर्तीसाठी कारणीभूत ठरतो.” ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ ปญฺจสุ อุปาทานกฺขนฺเธสุ, อุทยพฺพยานุปสฺสี วิหรติ – ‘อิติ รูปํ อิติ รูปสฺส สมุทโย อิติ รูปสฺส อตฺถงฺคโม; อิติ เวทนา อิติ เวทนาย สมุทโย อิติ เวทนาย อตฺถงฺคโม; อิติ สญฺญา อิติ สญฺญาย สมุทโย อิติ สญฺญาย อตฺถงฺคโม; อิติ สงฺขารา อิติ สงฺขารานํ สมุทโย อิติ สงฺขารานํ อตฺถงฺคโม; อิติ วิญฺญาณํ อิติ วิญฺญาณสฺส สมุทโย อิติ วิญฺญาณสฺส อตฺถงฺคโม’ติ. อยํ อฏฺฐโม เหตุ อฏฺฐโม ปจฺจโย อาทิพฺรหฺมจริยิกาย ปญฺญาย อปฺปฏิลทฺธาย ปฏิลาภาย, ปฏิลทฺธาย ภิยฺโยภาวาย เวปุลฺลาย ภาวนาย ปาริปูริยา สํวตฺตติ. อิเม อฏฺฐ ธมฺมา พหุการา. "पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू पाच उपादानस्कंधांच्या उदय आणि अस्त यावर वारंवार अनुदर्शन करत विहरतो – 'असे रूप आहे, असा रूपाचा उदय आहे, असा रूपाचा अस्त आहे; अशी वेदना आहे, असा वेदनेचा उदय आहे, असा वेदनेचा अस्त आहे; अशी संज्ञा आहे, असा संज्ञेचा उदय आहे, असा संज्ञेचा अस्त आहे; असे संस्कार आहेत, असा संस्कारांचा उदय आहे, असा संस्कारांचा अस्त आहे; असे विज्ञान आहे, असा विज्ञानाचा उदय आहे, असा विज्ञानाचा अस्त आहे.' हा आठवा हेतू आणि आठवा प्रत्यय आहे, जो ब्रह्मचर्याच्या आरंभीच्या न मिळालेल्या प्रज्ञेच्या प्राप्तीसाठी, आणि मिळालेल्या प्रज्ञेच्या वृद्धीसाठी, विपुलतेसाठी, भावनेच्या परिपूर्णतेसाठी कारणीभूत ठरतो. हे आठ धर्म अत्यंत उपकारक आहेत." (ข) ‘‘กตเม อฏฺฐ ธมฺมา ภาเวตพฺพา? อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ, สมฺมาสงฺกปฺโป, สมฺมาวาจา, สมฺมากมฺมนฺโต, สมฺมาอาชีโว, สมฺมาวายาโม, สมฺมาสติ, สมฺมาสมาธิ. อิเม อฏฺฐ ธมฺมา ภาเวตพฺพา. "(ख) कोणते आठ धर्म भावना करण्याजोगे आहेत? आर्य अष्टांगिक मार्ग; जसे की – सम्यक दृष्टी, सम्यक संकल्प, सम्यक वाचा, सम्यक कर्मांत, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक सती, सम्यक समाधी. हे आठ धर्म भावना करण्याजोगे आहेत." (ค) ‘‘กตเม อฏฺฐ ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา? อฏฺฐ โลกธมฺมา – ลาโภ จ, อลาโภ จ, ยโส จ, อยโส จ, นินฺทา จ, ปสํสา จ, สุขญฺจ, ทุกฺขญฺจ. อิเม อฏฺฐ ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา. "(ग) कोणते आठ धर्म परिज्ञेय आहेत? आठ लोकधर्म – लाभ आणि अलाभ, यश आणि अपयश, निंदा आणि प्रशंसा, सुख आणि दुःख. हे आठ धर्म परिज्ञेय आहेत." (ฆ) ‘‘กตเม [Pg.246] อฏฺฐ ธมฺมา ปหาตพฺพา? อฏฺฐ มิจฺฉตฺตา – มิจฺฉาทิฏฺฐิ, มิจฺฉาสงฺกปฺโป, มิจฺฉาวาจา, มิจฺฉากมฺมนฺโต, มิจฺฉาอาชีโว, มิจฺฉาวายาโม, มิจฺฉาสติ, มิจฺฉาสมาธิ. อิเม อฏฺฐ ธมฺมา ปหาตพฺพา. "(घ) कोणते आठ धर्म प्रहाण करण्याजोगे आहेत? आठ मिथ्यात्व – मिथ्या दृष्टी, मिथ्या संकल्प, मिथ्या वाचा, मिथ्या कर्मांत, मिथ्या आजीव, मिथ्या व्यायाम, मिथ्या सती, मिथ्या समाधी. हे आठ धर्म प्रहाण करण्याजोगे आहेत." (ง) ‘‘กตเม อฏฺฐ ธมฺมา หานภาคิยา? อฏฺฐ กุสีตวตฺถูนิ. อิธาวุโส, ภิกฺขุนา กมฺมํ กาตพฺพํ โหติ, ตสฺส เอวํ โหติ – ‘กมฺมํ โข เม กาตพฺพํ ภวิสฺสติ, กมฺมํ โข ปน เม กโรนฺตสฺส กาโย กิลมิสฺสติ, หนฺทาหํ นิปชฺชามี’ติ. โส นิปชฺชติ, น วีริยํ อารภติ อปฺปตฺตสฺส ปตฺติยา อนธิคตสฺส อธิคมาย อสจฺฉิกตสฺส สจฺฉิกิริยาย. อิทํ ปฐมํ กุสีตวตฺถุ. "(ङ) कोणते आठ धर्म हानीला कारणीभूत ठरणारे आहेत? आळसाची आठ कारणे. आवुसो, येथे भिक्खूला एखादे काम करायचे असते, तेव्हा त्याच्या मनात असा विचार येतो – 'मला काम करावे लागणार आहे, पण काम करताना माझे शरीर थकून जाईल; चला, मी आता झोपतो.' तो झोपून राहतो आणि अप्राप्त गोष्टीच्या प्राप्तीसाठी, न मिळालेल्याच्या प्राप्तीसाठी, साक्षात न केलेल्याच्या साक्षात्कारासाठी वीर्य आरंभत नाही. हे पहिले आळसाचे कारण आहे." ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุนา กมฺมํ กตํ โหติ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อหํ โข กมฺมํ อกาสึ, กมฺมํ โข ปน เม กโรนฺตสฺส กาโย กิลนฺโต, หนฺทาหํ นิปชฺชามี’ติ. โส นิปชฺชติ, น วีริยํ อารภติ…เป… อิทํ ทุติยํ กุสีตวตฺถุ. "पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खूने काम केलेले असते. तेव्हा त्याच्या मनात असा विचार येतो – 'मी काम केले आहे, आणि काम केल्यामुळे माझे शरीर थकले आहे; चला, मी आता झोपतो.' तो झोपून राहतो आणि वीर्य आरंभत नाही...पे... हे दुसरे आळसाचे कारण आहे." ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุนา มคฺโค คนฺตพฺโพ โหติ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘มคฺโค โข เม คนฺตพฺโพ ภวิสฺสติ, มคฺคํ โข ปน เม คจฺฉนฺตสฺส กาโย กิลมิสฺสติ, หนฺทาหํ นิปชฺชามี’ติ. โส นิปชฺชติ, น วีริยํ อารภติ…เป… อิทํ ตติยํ กุสีตวตฺถุ. "पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खूला प्रवासाला जायचे असते. तेव्हा त्याच्या मनात असा विचार येतो – 'मला प्रवासाला जावे लागणार आहे, पण प्रवास करताना माझे शरीर थकून जाईल; चला, मी आता झोपतो.' तो झोपून राहतो आणि वीर्य आरंभत नाही...पे... हे तिसरे आळसाचे कारण आहे." ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุนา มคฺโค คโต โหติ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อหํ โข มคฺคํ อคมาสึ, มคฺคํ โข ปน เม คจฺฉนฺตสฺส กาโย กิลนฺโต, หนฺทาหํ นิปชฺชามี’ติ. โส นิปชฺชติ, น วีริยํ อารภติ…เป… อิทํ จตุตฺถํ กุสีตวตฺถุ. "पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खूने प्रवास केलेला असतो. तेव्हा त्याच्या मनात असा विचार येतो – 'मी प्रवास केला आहे, आणि प्रवास केल्यामुळे माझे शरीर थकले आहे; चला, मी आता झोपतो.' तो झोपून राहतो आणि वीर्य आरंभत नाही...पे... हे चौथे आळसाचे कारण आहे." ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ คามํ วา นิคมํ วา ปิณฺฑาย จรนฺโต น ลภติ ลูขสฺส วา ปณีตสฺส วา โภชนสฺส ยาวทตฺถํ ปาริปูรึ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อหํ โข คามํ วา นิคมํ วา ปิณฺฑาย จรนฺโต นาลตฺถํ ลูขสฺส วา ปณีตสฺส วา โภชนสฺส ยาวทตฺถํ ปาริปูรึ, ตสฺส เม กาโย กิลนฺโต อกมฺมญฺโญ, หนฺทาหํ นิปชฺชามี’ติ…เป… อิทํ ปญฺจมํ กุสีตวตฺถุ. "पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू गावामध्ये किंवा नगरामध्ये पिंडपातासाठी फिरताना त्याला हवे तितके पोटभर साधे किंवा उत्तम भोजन मिळत नाही. तेव्हा त्याच्या मनात असा विचार येतो – 'मी गावामध्ये किंवा नगरामध्ये पिंडपातासाठी फिरलो, पण मला हवे तितके पोटभर साधे किंवा उत्तम भोजन मिळाले नाही. त्यामुळे माझे शरीर थकले आहे आणि अकार्यक्षम झाले आहे; चला, मी आता झोपतो.' ...पे... हे पाचवे आळसाचे कारण आहे." ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ คามํ วา นิคมํ วา ปิณฺฑาย จรนฺโต ลภติ ลูขสฺส วา ปณีตสฺส วา โภชนสฺส ยาวทตฺถํ ปาริปูรึ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อหํ โข คามํ วา นิคมํ วา ปิณฺฑาย จรนฺโต อลตฺถํ ลูขสฺส [Pg.247] วา ปณีตสฺส วา โภชนสฺส ยาวทตฺถํ ปาริปูรึ, ตสฺส เม กาโย ครุโก อกมฺมญฺโญ, มาสาจิตํ มญฺเญ, หนฺทาหํ นิปชฺชามี’ติ. โส นิปชฺชติ…เป… อิทํ ฉฏฺฐํ กุสีตวตฺถุ. "पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू गावामध्ये किंवा नगरामध्ये पिंडपातासाठी फिरताना त्याला हवे तितके पोटभर साधे किंवा उत्तम भोजन मिळते. तेव्हा त्याच्या मनात असा विचार येतो – 'मी गावामध्ये किंवा नगरामध्ये पिंडपातासाठी फिरलो आणि मला हवे तितके पोटभर साधे किंवा उत्तम भोजन मिळाले आहे. त्यामुळे माझे शरीर जड झाले आहे, अकार्यक्षम झाले आहे, जणू काही ओल्या उडदाच्या पोत्यासारखे जड झाले आहे; चला, मी आता झोपतो.' तो झोपून राहतो...पे... हे सहावे आळसाचे कारण आहे." ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน อุปฺปนฺโน โหติ อปฺปมตฺตโก อาพาโธ, ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อุปฺปนฺโน โข เม อยํ อปฺปมตฺตโก อาพาโธ อตฺถิ กปฺโป นิปชฺชิตุํ, หนฺทาหํ นิปชฺชามี’ติ. โส นิปชฺชติ…เป… อิทํ สตฺตมํ กุสีตวตฺถุ. "पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खूला थोडासा आजार उद्भवतो. तेव्हा त्याच्या मनात असा विचार येतो – 'मला हा थोडासा आजार उद्भवला आहे, आता झोपणेच योग्य आहे; चला, मी आता झोपतो.' तो झोपून राहतो...पे... हे सातवे आळसाचे कारण आहे." ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ คิลานาวุฏฺฐิโต โหติ อจิรวุฏฺฐิโต เคลญฺญา. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อหํ โข คิลานาวุฏฺฐิโต อจิรวุฏฺฐิโต เคลญฺญา. ตสฺส เม กาโย ทุพฺพโล อกมฺมญฺโญ, หนฺทาหํ นิปชฺชามี’ติ. โส นิปชฺชติ…เป… อิทํ อฏฺฐมํ กุสีตวตฺถุ. อิเม อฏฺฐ ธมฺมา หานภาคิยา. "पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू आजारातून नुकताच बरा झालेला असतो. तेव्हा त्याच्या मनात असा विचार येतो – 'मी आजारातून नुकताच बरा झालो आहे. त्यामुळे माझे शरीर दुर्बळ आणि अकार्यक्षम आहे; चला, मी आता झोपतो.' तो झोपून राहतो...पे... हे आठवे आळसाचे कारण आहे. हे आठ धर्म हानीला कारणीभूत ठरणारे आहेत." (จ) ‘‘กตเม อฏฺฐ ธมฺมา วิเสสภาคิยา? อฏฺฐ อารมฺภวตฺถูนิ. อิธาวุโส, ภิกฺขุนา กมฺมํ กาตพฺพํ โหติ, ตสฺส เอวํ โหติ – ‘กมฺมํ โข เม กาตพฺพํ ภวิสฺสติ, กมฺมํ โข ปน เม กโรนฺเตน น สุกรํ พุทฺธานํ สาสนํ มนสิกาตุํ, หนฺทาหํ วีริยํ อารภามิ อปฺปตฺตสฺส ปตฺติยา อนธิคตสฺส อธิคมาย อสจฺฉิกตสฺส สจฺฉิกิริยายา’ติ. โส วีริยํ อารภติ อปฺปตฺตสฺส ปตฺติยา อนธิคตสฺส อธิคมาย อสจฺฉิกตสฺส สจฺฉิกิริยาย. อิทํ ปฐมํ อารมฺภวตฺถุ. "(च) कोणते आठ धर्म विशेषाला कारणीभूत ठरणारे आहेत? उद्योगशीलतेची आठ कारणे. आवुसो, येथे भिक्खूला एखादे काम करायचे असते, तेव्हा त्याच्या मनात असा विचार येतो – 'मला काम करावे लागणार आहे, परंतु काम करताना बुद्धांच्या शासनाचे मनन करणे सोपे असणार नाही. म्हणून, मी आताच अप्राप्त गोष्टीच्या प्राप्तीसाठी, न मिळालेल्याच्या प्राप्तीसाठी, साक्षात न केलेल्याच्या साक्षात्कारासाठी वीर्य आरंभतो.' तो अप्राप्त गोष्टीच्या प्राप्तीसाठी, न मिळालेल्याच्या प्राप्तीसाठी, साक्षात न केलेल्याच्या साक्षात्कारासाठी वीर्य आरंभतो. हे पहिले प्रयत्नाचे कारण आहे." ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุนา กมฺมํ กตํ โหติ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อหํ โข กมฺมํ อกาสึ, กมฺมํ โข ปนาหํ กโรนฺโต นาสกฺขึ พุทฺธานํ สาสนํ มนสิกาตุํ, หนฺทาหํ วีริยํ อารภามิ…เป… อิทํ ทุติยํ อารมฺภวตฺถุ. "पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खूने काम केलेले असते. तेव्हा त्याच्या मनात असा विचार येतो – 'मी काम केले आहे, परंतु काम करताना मला बुद्धांच्या शासनाचे मनन करणे शक्य झाले नाही. म्हणून, मी आता वीर्य आरंभतो.' ...पे... हे दुसरे प्रयत्नाचे कारण आहे." ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุนา มคฺโค คนฺตพฺโพ โหติ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘มคฺโค โข เม คนฺตพฺโพ ภวิสฺสติ, มคฺคํ โข ปน เม คจฺฉนฺเตน น สุกรํ พุทฺธานํ สาสนํ มนสิกาตุํ, หนฺทาหํ วีริยํ อารภามิ…เป… อิทํ ตติยํ อารมฺภวตฺถุ. "पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खूला प्रवासाला जायचे असते. तेव्हा त्याच्या मनात असा विचार येतो – 'मला प्रवासाला जावे लागणार आहे, परंतु प्रवास करताना बुद्धांच्या शासनाचे मनन करणे सोपे असणार नाही. म्हणून, मी आता वीर्य आरंभतो.' ...पे... हे तिसरे प्रयत्नाचे कारण आहे." ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุนา มคฺโค คโต โหติ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อหํ โข มคฺคํ อคมาสึ, มคฺคํ โข ปนาหํ คจฺฉนฺโต นาสกฺขึ พุทฺธานํ สาสนํ มนสิกาตุํ, หนฺทาหํ วีริยํ อารภามิ…เป… อิทํ จตุตฺถํ อารมฺภวตฺถุ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खूने प्रवास केलेला असतो. त्याला असा विचार येतो – 'मी प्रवास केला आहे. प्रवास करत असताना मला बुद्धांच्या शासनाचे मनन करणे शक्य झाले नाही. आता मी वीर्य आरंभ करतो...' तो वीर्य आरंभ करतो. हे चौथे आरंभवत्थु आहे. ‘‘ปุน [Pg.248] จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ คามํ วา นิคมํ วา ปิณฺฑาย จรนฺโต น ลภติ ลูขสฺส วา ปณีตสฺส วา โภชนสฺส ยาวทตฺถํ ปาริปูรึ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อหํ โข คามํ วา นิคมํ วา ปิณฺฑาย จรนฺโต นาลตฺถํ ลูขสฺส วา ปณีตสฺส วา โภชนสฺส ยาวทตฺถํ ปาริปูรึ, ตสฺส เม กาโย ลหุโก กมฺมญฺโญ, หนฺทาหํ วีริยํ อารภามิ…เป… อิทํ ปญฺจมํ อารมฺภวตฺถุ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू गावामध्ये किंवा नगरामध्ये पिंडपातासाठी फिरत असताना त्याला हलके किंवा उत्तम भोजन पोटभर मिळत नाही. त्याला असा विचार येतो – 'मी गावामध्ये किंवा नगरामध्ये पिंडपातासाठी फिरत असताना मला हलके किंवा उत्तम भोजन पोटभर मिळाले नाही. त्यामुळे माझे शरीर हलके आणि कर्मक्षम आहे. आता मी वीर्य आरंभ करतो...' तो वीर्य आरंभ करतो. हे पाचवे आरंभवत्थु आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ คามํ วา นิคมํ วา ปิณฺฑาย จรนฺโต ลภติ ลูขสฺส วา ปณีตสฺส วา โภชนสฺส ยาวทตฺถํ ปาริปูรึ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อหํ โข คามํ วา นิคมํ วา ปิณฺฑาย จรนฺโต อลตฺถํ ลูขสฺส วา ปณีตสฺส วา โภชนสฺส ยาวทตฺถํ ปาริปูรึ. ตสฺส เม กาโย พลวา กมฺมญฺโญ, หนฺทาหํ วีริยํ อารภามิ…เป… อิทํ ฉฏฺฐํ อารมฺภวตฺถุ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू गावामध्ये किंवा नगरामध्ये पिंडपातासाठी फिरत असताना त्याला हलके किंवा उत्तम भोजन पोटभर मिळते. त्याला असा विचार येतो – 'मी गावामध्ये किंवा नगरामध्ये पिंडपातासाठी फिरत असताना मला हलके किंवा उत्तम भोजन पोटभर मिळाले आहे. त्यामुळे माझे शरीर बलवान आणि कर्मक्षम आहे. आता मी वीर्य आरंभ करतो...' तो वीर्य आरंभ करतो. हे सहावे आरंभवत्थु आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุโน อุปฺปนฺโน โหติ อปฺปมตฺตโก อาพาโธ. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อุปฺปนฺโน โข เม อยํ อปฺปมตฺตโก อาพาโธ ฐานํ โข ปเนตํ วิชฺชติ, ยํ เม อาพาโธ ปวฑฺเฒยฺย, หนฺทาหํ วีริยํ อารภามิ…เป… อิทํ สตฺตมํ อารมฺภวตฺถุ. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खूला थोडासा आजार उद्भवतो. त्याला असा विचार येतो – 'मला हा थोडासा आजार उद्भवला आहे. अशी शक्यता आहे की माझा हा आजार वाढू शकतो. आता मी वीर्य आरंभ करतो...' तो वीर्य आरंभ करतो. हे सातवे आरंभवत्थु आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ คิลานา วุฏฺฐิโต โหติ อจิรวุฏฺฐิโต เคลญฺญา. ตสฺส เอวํ โหติ – ‘อหํ โข คิลานา วุฏฺฐิโต อจิรวุฏฺฐิโต เคลญฺญา, ฐานํ โข ปเนตํ วิชฺชติ, ยํ เม อาพาโธ ปจฺจุทาวตฺเตยฺย, หนฺทาหํ วีริยํ อารภามิ อปฺปตฺตสฺส ปตฺติยา อนธิคตสฺส อธิคมาย อสจฺฉิกตสฺส สจฺฉิกิริยายา’ติ. โส วีริยํ อารภติ อปฺปตฺตสฺส ปตฺติยา อนธิคตสฺส อธิคมาย อสจฺฉิกตสฺส สจฺฉิกิริยาย. อิทํ อฏฺฐมํ อารมฺภวตฺถุ. อิเม อฏฺฐ ธมฺมา วิเสสภาคิยา. पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू आजारातून बरा झालेला असतो, आजारातून बरा होऊन फार काळ झालेला नसतो. त्याला असा विचार येतो – 'मी आजारातून बरा झालो आहे, आजारातून बरा होऊन फार काळ झालेला नाही. अशी शक्यता आहे की माझा हा आजार पुन्हा उद्भवू शकतो. आता मी जे प्राप्त झाले नाही ते प्राप्त करण्यासाठी, जे अधिगत झाले नाही ते अधिगत करण्यासाठी, जे साक्षात केले नाही ते साक्षात करण्यासाठी वीर्य आरंभ करतो.' तो जे प्राप्त झाले नाही ते प्राप्त करण्यासाठी, जे अधिगत झाले नाही ते अधिगत करण्यासाठी, जे साक्षात केले नाही ते साक्षात करण्यासाठी वीर्य आरंभ करतो. हे आठवे आरंभवत्थु आहे. हे आठ धर्म विशेषभागीय आहेत. (ฉ) ‘‘กตเม อฏฺฐ ธมฺมา ทุปฺปฏิวิชฺฌา? อฏฺฐ อกฺขณา อสมยา พฺรหฺมจริยวาสาย. อิธาวุโส, ตถาคโต จ โลเก อุปฺปนฺโน โหติ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ, ธมฺโม จ เทสิยติ โอปสมิโก ปรินิพฺพานิโก สมฺโพธคามี สุคตปฺปเวทิโต. อยญฺจ ปุคฺคโล นิรยํ อุปปนฺโน โหติ. อยํ ปฐโม อกฺขโณ อสมโย พฺรหฺมจริยวาสาย. (छ) कोणते आठ धर्म दुर्बोध आहेत? ब्रह्मचर्यवासासाठी आठ अक्षण आणि असमय आहेत. येथे, आवुसो, जगात तथागत, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध उत्पन्न झालेले असतात आणि शांतता देणारा, परिनिर्वाणाकडे नेणारा, संबोधीकडे नेणारा, सुगतांनी प्रवेदित केलेला धर्म देशिला जात असतो. परंतु हा व्यक्ती निरयात उत्पन्न झालेला असतो. ब्रह्मचर्यवासासाठी हा पहिला अक्षण आणि असमय आहे. ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ตถาคโต จ โลเก อุปฺปนฺโน โหติ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ, ธมฺโม จ เทสิยติ โอปสมิโก ปรินิพฺพานิโก สมฺโพธคามี [Pg.249] สุคตปฺปเวทิโต, อยญฺจ ปุคฺคโล ติรจฺฉานโยนึ อุปปนฺโน โหติ. อยํ ทุติโย อกฺขโณ อสมโย พฺรหฺมจริยวาสาย. पुन्हा आणखी, आवुसो, जगात तथागत, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध उत्पन्न झालेले असतात आणि शांतता देणारा, परिनिर्वाणाकडे नेणारा, संबोधीकडे नेणारा, सुगतांनी प्रवेदित केलेला धर्म देशिला जात असतो. परंतु हा व्यक्ती तिर्यकयोनीत उत्पन्न झालेला असतो. ब्रह्मचर्यवासासाठी हा दुसरा अक्षण आणि असमय आहे. ‘‘ปุน จปรํ…เป… เปตฺติวิสยํ อุปปนฺโน โหติ. อยํ ตติโย อกฺขโณ อสมโย พฺรหฺมจริยวาสาย. पुन्हा आणखी... पे... तो पेतविसयात उत्पन्न झालेला असतो. ब्रह्मचर्यवासासाठी हा तिसरा अक्षण आणि असमय आहे. ‘‘ปุน จปรํ…เป… อญฺญตรํ ทีฆายุกํ เทวนิกายํ อุปปนฺโน โหติ. อยํ จตุตฺโถ อกฺขโณ อสมโย พฺรหฺมจริยวาสาย. पुन्हा आणखी... पे... तो दीर्घायुषी देवलोकात उत्पन्न झालेला असतो. ब्रह्मचर्यवासासाठी हा चौथा अक्षण आणि असमय आहे. ‘‘ปุน จปรํ…เป… ปจฺจนฺติเมสุ ชนปเทสุ ปจฺจาชาโต โหติ มิลกฺเขสุ อวิญฺญาตาเรสุ, ยตฺถ นตฺถิ คติ ภิกฺขูนํ ภิกฺขุนีนํ อุปาสกานํ อุปาสิกานํ. อยํ ปญฺจโม อกฺขโณ อสมโย พฺรหฺมจริยวาสาย. पुन्हा आणखी... पे... तो सीमावर्ती जनपदांमध्ये, म्लेंच्छ आणि अज्ञानी लोकांमध्ये जन्मलेला असतो, जेथे भिक्खू, भिक्खुनी, उपासक आणि उपासिका यांचे अस्तित्व नसते. ब्रह्मचर्यवासासाठी हा पाचवा अक्षण आणि असमय आहे. ‘‘ปุน จปรํ…เป… อยญฺจ ปุคฺคโล มชฺฌิเมสุ ชนปเทสุ ปจฺจาชาโต โหติ, โส จ โหติ มิจฺฉาทิฏฺฐิโก วิปรีตทสฺสโน – ‘นตฺถิ ทินฺนํ, นตฺถิ ยิฏฺฐํ, นตฺถิ หุตํ, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก, นตฺถิ อยํ โลโก, นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ มาตา, นตฺถิ ปิตา, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ โลเก สมณพฺราหฺมณา สมฺมคฺคตา สมฺมาปฏิปนฺนา เย อิมญฺจ โลกํ ปรญฺจ โลกํ สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา ปเวเทนฺตี’ติ. อยํ ฉฏฺโฐ อกฺขโณ อสมโย พฺรหฺมจริยวาสาย. पुन्हा आणखी... पे... हा व्यक्ती मध्य जनपदांमध्ये जन्मलेला असतो, परंतु तो मिच्छादिट्ठिक आणि विपरीत दर्शन असलेला असतो – 'दान देण्याचे काही फळ नाही, यज्ञाचे काही फळ नाही, हवनाचे काही फळ नाही, चांगल्या-वाईट कर्मांचे काही फळ किंवा विपाक नाही, हा लोक नाही, परलोक नाही, माता नाही, पिता नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत, जगात असे समण-ब्राह्मण नाहीत जे योग्य मार्गाने चालणारे, योग्य प्रतिपन्न असणारे आहेत आणि जे या लोकाचा व परलोकाचा स्वतः अभिज्ञा साक्षात करून उपदेश करतात.' ब्रह्मचर्यवासासाठी हा सहावा अक्षण आणि असमय आहे. ‘‘ปุน จปรํ…เป… อยญฺจ ปุคฺคโล มชฺฌิเมสุ ชนปเทสุ ปจฺจาชาโต โหติ, โส จ โหติ ทุปฺปญฺโญ ชโฬ เอฬมูโค, นปฺปฏิพโล สุภาสิตทุพฺภาสิตานมตฺถมญฺญาตุํ. อยํ สตฺตโม อกฺขโณ อสมโย พฺรหฺมจริยวาสาย. पुन्हा आणखी... पे... हा व्यक्ती मध्य जनपदांमध्ये जन्मलेला असतो, परंतु तो दुप्प्रज्ञ, जड आणि एडमूक असतो; सुभाषित आणि दुभाषित यांतील अर्थ समजण्यास तो असमर्थ असतो. ब्रह्मचर्यवासासाठी हा सातवा अक्षण आणि असमय आहे. ‘‘ปุน จปรํ…เป… อยญฺจ ปุคฺคโล มชฺฌิเมสุ ชนปเทสุ ปจฺจาชาโต โหติ, โส จ โหติ ปญฺญวา อชโฬ อเนฬมูโค, ปฏิพโล สุภาสิตทุพฺภาสิตานมตฺถมญฺญาตุํ. อยํ อฏฺฐโม อกฺขโณ อสมโย พฺรหฺมจริยวาสาย. อิเม อฏฺฐ ธมฺมา ทุปฺปฏิวิชฺฌา. पुन्हा आणखी... पे... (तथागत जगात उत्पन्न झालेले नसतात आणि धर्म देशिला जात नसतो), परंतु हा व्यक्ती मध्य जनपदांमध्ये जन्मलेला असतो, तो प्रज्ञावान, अ-जड आणि अ-एडमूक असतो; सुभाषित आणि दुभाषित यांतील अर्थ समजण्यास तो समर्थ असतो. ब्रह्मचर्यवासासाठी हा आठवा अक्षण आणि असमय आहे. हे आठ धर्म दुर्बोध आहेत. (ช) ‘‘กตเม อฏฺฐ ธมฺมา อุปฺปาเทตพฺพา? อฏฺฐ มหาปุริสวิตกฺกา – อปฺปิจฺฉสฺสายํ ธมฺโม, นายํ ธมฺโม มหิจฺฉสฺส. สนฺตุฏฺฐสฺสายํ ธมฺโม, นายํ ธมฺโม อสนฺตุฏฺฐสฺส. ปวิวิตฺตสฺสายํ ธมฺโม, นายํ ธมฺโม สงฺคณิการามสฺส. อารทฺธวีริยสฺสายํ ธมฺโม, นายํ ธมฺโม กุสีตสฺส. อุปฏฺฐิตสติสฺสายํ ธมฺโม, นายํ ธมฺโม มุฏฺฐสฺสติสฺส. สมาหิตสฺสายํ ธมฺโม, นายํ ธมฺโม อสมาหิตสฺส[Pg.250]. ปญฺญวโต อยํ ธมฺโม, นายํ ธมฺโม ทุปฺปญฺญสฺส. นิปฺปปญฺจสฺสายํ ธมฺโม, นายํ ธมฺโม ปปญฺจารามสฺสาติ อิเม อฏฺฐ ธมฺมา อุปฺปาเทตพฺพา. (ज) कोणते आठ धर्म उत्पन्न केले पाहिजेत? आठ महापुरुषवितक्क – हा धर्म अल्पेच्छ व्यक्तीसाठी आहे, महेच्छ व्यक्तीसाठी नाही. हा धर्म संतुष्ट व्यक्तीसाठी आहे, असंतुष्ट व्यक्तीसाठी नाही. हा धर्म प्रविविक्त व्यक्तीसाठी आहे, संगणिकाराम व्यक्तीसाठी नाही. हा धर्म आरब्धवीर्य व्यक्तीसाठी आहे, कुसीत व्यक्तीसाठी नाही. हा धर्म उपस्थितस्मृती व्यक्तीसाठी आहे, मुट्ठस्मृती व्यक्तीसाठी नाही. हा धर्म समाहित व्यक्तीसाठी आहे, असमाहित व्यक्तीसाठी नाही. हा धर्म प्रज्ञावान व्यक्तीसाठी आहे, दुष्प्रज्ञ व्यक्तीसाठी नाही. हा धर्म निष्प्रपंच व्यक्तीसाठी आहे, प्रपंचाराम व्यक्तीसाठी नाही. हे आठ धर्म उत्पन्न केले पाहिजेत. (ฌ) ‘‘กตเม อฏฺฐ ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา? อฏฺฐ อภิภายตนานิ – อชฺฌตฺตํ รูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ ปริตฺตานิ สุวณฺณทุพฺพณฺณานิ, ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ – เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ ปฐมํ อภิภายตนํ. (झ) कोणते आठ धर्म अभिज्ञेय आहेत? आठ अभिभायतन – एखादा व्यक्ती स्वतःच्या शरीरात रूपाची संज्ञा ठेवून बाहेर सुवर्ण आणि दुर्वर्ण अशी मर्यादित रूपे पाहतो, आणि 'त्या रूपांवर विजय मिळवून मी जाणतो, मी पाहतो' अशी त्याची संज्ञा असते. हे पहिले अभिभायतन आहे. ‘‘อชฺฌตฺตํ รูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ อปฺปมาณานิ สุวณฺณทุพฺพณฺณานิ, ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ – เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ ทุติยํ อภิภายตนํ. एखादा व्यक्ती स्वतःच्या शरीरात रूपाची संज्ञा ठेवून बाहेर सुवर्ण आणि दुर्वर्ण अशी अमर्याद रूपे पाहतो, आणि 'त्या रूपांवर विजय मिळवून मी जाणतो, मी पाहतो' अशी त्याची संज्ञा असते. हे दुसरे अभिभायतन आहे. ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ ปริตฺตานิ สุวณฺณทุพฺพณฺณานิ, ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ ตติยํ อภิภายตนํ. एक व्यक्ती स्वतःच्या शरीरात रूपाची संज्ञा न बाळगता (अध्यात्मतः अरूपसंज्ञी होऊन), बाह्य रूपांना पाहते, जी मर्यादित (परित्त) आणि सुवर्ण किंवा दुर्वर्ण (सुंदर किंवा कुरूप) असतात. 'त्या रूपांवर मात करून मी जाणतो आणि पाहतो' अशी त्याची संज्ञा असते. हे तिसरे अभिभायतन होय. ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ อปฺปมาณานิ สุวณฺณทุพฺพณฺณานิ, ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ จตุตฺถํ อภิภายตนํ. एक व्यक्ती स्वतःच्या शरीरात रूपाची संज्ञा न बाळगता, बाह्य रूपांना पाहते, जी अमर्याद (अप्पमाण) आणि सुवर्ण किंवा दुर्वर्ण (सुंदर किंवा कुरूप) असतात. 'त्या रूपांवर मात करून मी जाणतो आणि पाहतो' अशी त्याची संज्ञा असते. हे चौथे अभिभायतन होय. ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ นีลานิ นีลวณฺณานิ นีลนิทสฺสนานิ นีลนิภาสานิ. เสยฺยถาปิ นาม อุมาปุปฺผํ นีลํ นีลวณฺณํ นีลนิทสฺสนํ นีลนิภาสํ. เสยฺยถา วา ปน ตํ วตฺถํ พาราณเสยฺยกํ อุภโตภาควิมฏฺฐํ นีลํ นีลวณฺณํ นีลนิทสฺสนํ นีลนิภาสํ, เอวเมว อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ นีลานิ นีลวณฺณานิ นีลนิทสฺสนานิ นีลนิภาสานิ, ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ ปญฺจมํ อภิภายตนํ. एक व्यक्ती स्वतःच्या शरीरात रूपाची संज्ञा न बाळगता, बाह्य रूपांना पाहते, जी निळी, निळ्या रंगाची, निळेपणा दर्शवणारी आणि निळी चमक असणारी असतात. ज्याप्रमाणे अळशीचे फूल (उमापुप्फ) निळे, निळ्या रंगाचे, निळेपणा दर्शवणारे आणि निळी चमक असणारे असते; किंवा ज्याप्रमाणे वाराणसीमध्ये विणलेले, दोन्ही बाजूंनी गुळगुळीत केलेले वस्त्र निळे, निळ्या रंगाचे, निळेपणा दर्शवणारे आणि निळी चमक असणारे असते; त्याचप्रमाणे, एक व्यक्ती स्वतःच्या शरीरात रूपाची संज्ञा न बाळगता, बाह्य रूपांना पाहते, जी निळी, निळ्या रंगाची, निळेपणा दर्शवणारी आणि निळी चमक असणारी असतात. 'त्या रूपांवर मात करून मी जाणतो आणि पाहतो' अशी त्याची संज्ञा असते. हे पाचवे अभिभायतन होय. ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ ปีตานิ ปีตวณฺณานิ ปีตนิทสฺสนานิ ปีตนิภาสานิ. เสยฺยถาปิ นาม กณิการปุปฺผํ ปีตํ ปีตวณฺณํ ปีตนิทสฺสนํ ปีตนิภาสํ. เสยฺยถา วา ปน ตํ วตฺถํ พาราณเสยฺยกํ [Pg.251] อุภโตภาควิมฏฺฐํ ปีตํ ปีตวณฺณํ ปีตนิทสฺสนํ ปีตนิภาสํ, เอวเมว อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ ปีตานิ ปีตวณฺณานิ ปีตนิทสฺสนานิ ปีตนิภาสานิ, ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ ฉฏฺฐํ อภิภายตนํ. एक व्यक्ती स्वतःच्या शरीरात रूपाची संज्ञा न बाळगता, बाह्य रूपांना पाहते, जी पिवळी, पिवळ्या रंगाची, पिवळेपणा दर्शवणारी आणि पिवळी चमक असणारी असतात. ज्याप्रमाणे कर्णिकार फूल (कणिकारपुप्फ) पिवळे, पिवळ्या रंगाचे, पिवळेपणा दर्शवणारे आणि पिवळी चमक असणारे असते; किंवा ज्याप्रमाणे वाराणसीमध्ये विणलेले, दोन्ही बाजूंनी गुळगुळीत केलेले वस्त्र पिवळे, पिवळ्या रंगाचे, पिवळेपणा दर्शवणारे आणि पिवळी चमक असणारे असते; त्याचप्रमाणे, एक व्यक्ती स्वतःच्या शरीरात रूपाची संज्ञा न बाळगता, बाह्य रूपांना पाहते, जी पिवळी, पिवळ्या रंगाची, पिवळेपणा दर्शवणारी आणि पिवळी चमक असणारी असतात. 'त्या रूपांवर मात करून मी जाणतो आणि पाहतो' अशी त्याची संज्ञा असते. हे सहावे अभिभायतन होय. ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ โลหิตกานิ โลหิตกวณฺณานิ โลหิตกนิทสฺสนานิ โลหิตกนิภาสานิ. เสยฺยถาปิ นาม พนฺธุชีวกปุปฺผํ โลหิตกํ โลหิตกวณฺณํ โลหิตกนิทสฺสนํ โลหิตกนิภาสํ, เสยฺยถา วา ปน ตํ วตฺถํ พาราณเสยฺยกํ อุภโตภาควิมฏฺฐํ โลหิตกํ โลหิตกวณฺณํ โลหิตกนิทสฺสนํ โลหิตกนิภาสํ, เอวเมว อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ โลหิตกานิ โลหิตกวณฺณานิ โลหิตกนิทสฺสนานิ โลหิตกนิภาสานิ, ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ สตฺตมํ อภิภายตนํ. एक व्यक्ती स्वतःच्या शरीरात रूपाची संज्ञा न बाळगता, बाह्य रूपांना पाहते, जी लाल, लाल रंगाची, लालसरपणा दर्शवणारी आणि लाल चमक असणारी असतात. ज्याप्रमाणे दुपारीचे फूल (बंधुजीवकपुप्फ) लाल, लाल रंगाचे, लालसरपणा दर्शवणारे आणि लाल चमक असणारे असते; किंवा ज्याप्रमाणे वाराणसीमध्ये विणलेले, दोन्ही बाजूंनी गुळगुळीत केलेले वस्त्र लाल, लाल रंगाचे, लालसरपणा दर्शवणारे आणि लाल चमक असणारे असते; त्याचप्रमाणे, एक व्यक्ती स्वतःच्या शरीरात रूपाची संज्ञा न बाळगता, बाह्य रूपांना पाहते, जी लाल, लाल रंगाची, लालसरपणा दर्शवणारी आणि लाल चमक असणारी असतात. 'त्या रूपांवर मात करून मी जाणतो आणि पाहतो' अशी त्याची संज्ञा असते. हे सातवे अभिभायतन होय. ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ โอทาตานิ โอทาตวณฺณานิ โอทาตนิทสฺสนานิ โอทาตนิภาสานิ. เสยฺยถาปิ นาม โอสธิตารกา โอทาตา โอทาตวณฺณา โอทาตนิทสฺสนา โอทาตนิภาสา, เสยฺยถา วา ปน ตํ วตฺถํ พาราณเสยฺยกํ อุภโตภาควิมฏฺฐํ โอทาตํ โอทาตวณฺณํ โอทาตนิทสฺสนํ โอทาตนิภาสํ, เอวเมว อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ โอทาตานิ โอทาตวณฺณานิ โอทาตนิทสฺสนานิ โอทาตนิภาสานิ, ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ อฏฺฐมํ อภิภายตนํ. อิเม อฏฺฐ ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา. एक व्यक्ती स्वतःच्या शरीरात रूपाची संज्ञा न बाळगता, बाह्य रूपांना पाहते, जी पांढरी, पांढऱ्या रंगाची, पांढरेपणा दर्शवणारी आणि पांढरी चमक असणारी असतात. ज्याप्रमाणे ओसधी तारा (शुक्राचा तारा) पांढरा, पांढऱ्या रंगाचा, पांढरेपणा दर्शवणारा आणि पांढरी चमक असणारा असतो; किंवा ज्याप्रमाणे वाराणसीमध्ये विणलेले, दोन्ही बाजूंनी गुळगुळीत केलेले वस्त्र पांढरे, पांढऱ्या रंगाचे, पांढरेपणा दर्शवणारे आणि पांढरी चमक असणारे असते; त्याचप्रमाणे, एक व्यक्ती स्वतःच्या शरीरात रूपाची संज्ञा न बाळगता, बाह्य रूपांना पाहते, जी पांढरी, पांढऱ्या रंगाची, पांढरेपणा दर्शवणारी आणि पांढरी चमक असणारी असतात. 'त्या रूपांवर मात करून मी जाणतो आणि पाहतो' अशी त्याची संज्ञा असते. हे आठवे अभिभायतन होय. हे आठ धर्म अभिज्ञेय आहेत. (ญ) ‘‘กตเม อฏฺฐ ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา? อฏฺฐ วิโมกฺขา – รูปี รูปานิ ปสฺสติ. อยํ ปฐโม วิโมกฺโข. (ञ) कोणते आठ धर्म साक्षात करायचे आहेत? आठ विमोक्ष – रूपी बाह्य रूपांना पाहतो. हा पहिला विमोक्ष होय. ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ. อยํ ทุติโย วิโมกฺโข. स्वत स्वतःच्या शरीरात रूपाची संज्ञा न बाळगता, बाह्य रूपांना पाहते. हा दुसरा विमोक्ष होय. ‘‘สุภนฺเตว อธิมุตฺโต โหติ. อยํ ตติโย วิโมกฺโข. 'हे शुभ आहे' अशाच भावनेने तो अधिमुक्त होतो. हा तिसरा विमोक्ष होय. ‘‘สพฺพโส รูปสญฺญานํ สมติกฺกมา ปฏิฆสญฺญานํ อตฺถงฺคมา นานตฺตสญฺญานํ อมนสิการา ‘อนนฺโต อากาโส’ติ อากาสานญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ จตุตฺโถ วิโมกฺโข. सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांचे उल्लंघन करून, प्रतिघसंज्ञांचा अस्त झाल्यामुळे, नानात्वसंज्ञांकडे मन न वळवल्यामुळे, 'आकाश अनंत आहे' असे जाणत आकाशानांचायतन प्राप्त करून विहरतो. हा चौथा विमोक्ष होय. ‘‘สพฺพโส [Pg.252] อากาสานญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘อนนฺตํ วิญฺญาณ’นฺติ วิญฺญาณญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ ปญฺจโม วิโมกฺโข. सर्व प्रकारे आकाशानांचायतनाचे उल्लंघन करून, 'विज्ञान अनंत आहे' असे जाणत विज्ञानांचायतन प्राप्त करून विहरतो. हा पाचवा विमोक्ष होय. ‘‘สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘นตฺถิ กิญฺจี’ติ อากิญฺจญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ ฉฏฺโฐ วิโมกฺโข. सर्व प्रकारे विज्ञानांचायतनाचे उल्लंघन करून, 'येथे काहीही नाही' असे जाणत आकिंचन्यायतन प्राप्त करून विहरतो. हा सहावा विमोक्ष होय. ‘‘สพฺพโส อากิญฺจญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ สตฺตโม วิโมกฺโข. सर्व प्रकारे आकिंचन्यायतनाचे उल्लंघन करून नैवसंज्ञानासंज्ञायतन प्राप्त करून विहरतो. हा सातवा विमोक्ष होय. ‘‘สพฺพโส เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม สญฺญาเวทยิตนิโรธํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ อฏฺฐโม วิโมกฺโข. อิเม อฏฺฐ ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา. सर्व प्रकारे नैवसंज्ञानासंज्ञायतनाचे उल्लंघन करून संज्ञा-वेदयित-निरोध प्राप्त करून विहरतो. हा आठवा विमोक्ष होय. हे आठ धर्म साक्षात करायचे आहेत. ‘‘อิติ อิเม อสีติ ธมฺมา ภูตา ตจฺฉา ตถา อวิตถา อนญฺญถา สมฺมา ตถาคเตน อภิสมฺพุทฺธา. अशा प्रकारे, हे ऐंशी धर्म सत्य, यथार्थ, तथ्य, अचूक, अपरिवर्तनीय आहेत आणि तथागतांनी सम्यक प्रकारे जाणले आहेत. นว ธมฺมา नऊ धर्म ๓๕๙. ‘‘นว ธมฺมา พหุการา…เป… นว ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา. ३५९. नऊ धर्म बहुउपकारी आहेत... पे... नऊ धर्म साक्षात करायचे आहेत. (ก) ‘‘กตเม นว ธมฺมา พหุการา? นว โยนิโสมนสิการมูลกา ธมฺมา, โยนิโสมนสิกโรโต ปาโมชฺชํ ชายติ, ปมุทิตสฺส ปีติ ชายติ, ปีติมนสฺส กาโย ปสฺสมฺภติ, ปสฺสทฺธกาโย สุขํ เวเทติ, สุขิโน จิตฺตํ สมาธิยติ, สมาหิเต จิตฺเต ยถาภูตํ ชานาติ ปสฺสติ, ยถาภูตํ ชานํ ปสฺสํ นิพฺพินฺทติ, นิพฺพินฺทํ วิรชฺชติ, วิราคา วิมุจฺจติ. อิเม นว ธมฺมา พหุการา. (क) कोणते नऊ धर्म बहुउपकारी आहेत? योनीसोमनसिकार मूळ असलेले नऊ धर्म. योनीसोमनसिकार करणाऱ्या व्यक्तीमध्ये प्रमोद उत्पन्न होतो; प्रमुदित झालेल्या व्यक्तीमध्ये प्रीती उत्पन्न होते; प्रीतीयुक्त मन असलेल्या व्यक्तीची काया शांत होते; शांत काया असणारी व्यक्ती सुख अनुभवते; सुखी व्यक्तीचे चित्त समाधीस्थ होते; चित्त समाधीस्थ झाल्यावर तो जसे आहे तसे जाणतो व पाहतो; यथाभूत जाणणारा व पाहणारा विरक्त होतो; विरक्त झाल्यावर तो वैराग्य प्राप्त करतो; वैराग्यामुळे तो मुक्त होतो. हे नऊ धर्म बहुउपकारी आहेत. (ข) ‘‘กตเม นว ธมฺมา ภาเวตพฺพา? นว ปาริสุทฺธิปธานิยงฺคานิ – สีลวิสุทฺธิ ปาริสุทฺธิปธานิยงฺคํ, จิตฺตวิสุทฺธิ ปาริสุทฺธิปธานิยงฺคํ, ทิฏฺฐิวิสุทฺธิ ปาริสุทฺธิปธานิยงฺคํ, กงฺขาวิตรณวิสุทฺธิ ปาริสุทฺธิปธานิยงฺคํ, มคฺคามคฺคญาณทสฺสน – วิสุทฺธิ ปาริสุทฺธิปธานิยงฺคํ, ปฏิปทาญาณทสฺสนวิสุทฺธิ ปาริสุทฺธิปธานิยงฺคํ, ญาณทสฺสนวิสุทฺธิ ปาริสุทฺธิปธานิยงฺคํ, ปญฺญาวิสุทฺธิ ปาริสุทฺธิปธานิยงฺคํ, วิมุตฺติวิสุทฺธิ ปาริสุทฺธิปธานิยงฺคํ. อิเม นว ธมฺมา ภาเวตพฺพา. (ख) कोणते नऊ धर्म भावना करायचे आहेत? परिशुद्धीसाठीच्या प्रयत्नांची नऊ अंगे – शीलविशुद्धी हे परिशुद्धीच्या प्रयत्नाचे अंग, चित्तविशुद्धी हे परिशुद्धीच्या प्रयत्नाचे अंग, दृष्टीविशुद्धी हे परिशुद्धीच्या प्रयत्नाचे अंग, आकांक्षावितरणविशुद्धी हे परिशुद्धीच्या प्रयत्नाचे अंग, मार्गामार्गज्ञानदर्शनविशुद्धी हे परिशुद्धीच्या प्रयत्नाचे अंग, प्रतिपदाज्ञानदर्शनविशुद्धी हे परिशुद्धीच्या प्रयत्नाचे अंग, ज्ञानदर्शनविशुद्धी हे परिशुद्धीच्या प्रयत्नाचे अंग, प्रज्ञाविशुद्धी हे परिशुद्धीच्या प्रयत्नाचे अंग, आणि विमुक्तीविशुद्धी हे परिशुद्धीच्या प्रयत्नाचे अंग होय. हे नऊ धर्म भावना करायचे आहेत. (ค) ‘‘กตเม นว ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา? นว สตฺตาวาสา – สนฺตาวุโส, สตฺตา นานตฺตกายา นานตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ มนุสฺสา เอกจฺเจ จ เทวา เอกจฺเจ จ วินิปาติกา. อยํ ปฐโม สตฺตาวาโส. (ग) कोणते नऊ धर्म परिज्ञेय आहेत? नऊ सत्त्वावास – हे आवुसो, असे काही प्राणी आहेत ज्यांची शरीरे भिन्न आहेत आणि संज्ञाही भिन्न आहेत; जसे की मनुष्य, काही देव आणि काही विनिपातिक. हा पहिला सत्त्वावास होय. ‘‘สนฺตาวุโส[Pg.253], สตฺตา นานตฺตกายา เอกตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ เทวา พฺรหฺมกายิกา ปฐมาภินิพฺพตฺตา. อยํ ทุติโย สตฺตาวาโส. “हे आवुसो, असे प्राणी आहेत जे शरीराने भिन्न आहेत परंतु ज्यांची संज्ञा (जाणीव) एकच आहे, जसे की पहिल्या ध्यानात उत्पन्न झालेले ब्रह्मकायिक देव. हा दुसरा सत्त्वावास (प्राण्यांचे निवासस्थान) आहे.” ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา เอกตฺตกายา นานตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ เทวา อาภสฺสรา. อยํ ตติโย สตฺตาวาโส. “हे आवुसो, असे प्राणी आहेत जे शरीराने एक आहेत परंतु ज्यांची संज्ञा भिन्न आहे, जसे की आभास्सर देव. हा तिसरा सत्त्वावास आहे.” ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา เอกตฺตกายา เอกตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ เทวา สุภกิณฺหา. อยํ จตุตฺโถ สตฺตาวาโส. “हे आवुसो, असे प्राणी आहेत जे शरीराने एक आहेत आणि ज्यांची संज्ञाही एकच आहे, जसे की सुभकिण्ह देव. हा चौथा सत्त्वावास आहे.” ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา อสญฺญิโน อปฺปฏิสํเวทิโน, เสยฺยถาปิ เทวา อสญฺญสตฺตา. อยํ ปญฺจโม สตฺตาวาโส. “हे आवुसो, असे प्राणी आहेत जे संज्ञारहित (असंज्ञी) आहेत आणि वेदनेचा अनुभव न घेणारे (अप्रतिसंवेदी) आहेत, जसे की असंज्ञसत्त देव. हा पाचवा सत्त्वावास आहे.” ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา สพฺพโส รูปสญฺญานํ สมติกฺกมา ปฏิฆสญฺญานํ อตฺถงฺคมา นานตฺตสญฺญานํ อมนสิการา ‘อนนฺโต อากาโส’ติ อากาสานญฺจายตนูปคา. อยํ ฉฏฺโฐ สตฺตาวาโส. “हे आवुसो, असे प्राणी आहेत जे सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांचे उल्लंघन करून, प्रतिघसंज्ञांचा अस्त करून आणि नानात्वसंज्ञांकडे मनस्कार न करता, ‘आकाश अनंत आहे’ असे जाणून आकासानंचायतनात पोहोचले आहेत. हा सहावा सत्त्वावास आहे.” ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา สพฺพโส อากาสานญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘อนนฺตํ วิญฺญาณ’นฺติ วิญฺญาณญฺจายตนูปคา. อยํ สตฺตโม สตฺตาวาโส. “हे आवुसो, असे प्राणी आहेत जे सर्व प्रकारे आकासानंचायतनाचे उल्लंघन करून, ‘विज्ञान अनंत आहे’ असे जाणून विज्ञाणंचायतनात पोहोचले आहेत. हा सातवा सत्त्वावास आहे.” ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘นตฺถิ กิญฺจี’ติ อากิญฺจญฺญายตนูปคา. อยํ อฏฺฐโม สตฺตาวาโส. “हे आवुसो, असे प्राणी आहेत जे सर्व प्रकारे विज्ञाणंचायतनाचे उल्लंघन करून, ‘काहीही नाही’ असे जाणून आकिंचन्यायतनात पोहोचले आहेत. हा आठवा सत्त्वावास आहे.” ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา สพฺพโส อากิญฺจญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม เนวสญฺญานาสญฺญายตนูปคา. อยํ นวโม สตฺตาวาโส. อิเม นว ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา. “हे आवुसो, असे प्राणी आहेत जे सर्व प्रकारे आकिंचन्यायतनाचे उल्लंघन करून नेवसंज्ञानासंज्ञायतनात पोहोचले आहेत. हा नववा सत्त्वावास आहे. हे नऊ धर्म परिज्ञेय (पूर्णपणे जाणण्याजोगे) आहेत.” (ฆ) ‘‘กตเม นว ธมฺมา ปหาตพฺพา? นว ตณฺหามูลกา ธมฺมา – ตณฺหํ ปฏิจฺจ ปริเยสนา, ปริเยสนํ ปฏิจฺจ ลาโภ, ลาภํ ปฏิจฺจ วินิจฺฉโย, วินิจฺฉยํ ปฏิจฺจ ฉนฺทราโค, ฉนฺทราคํ ปฏิจฺจ อชฺโฌสานํ, อชฺโฌสานํ ปฏิจฺจ ปริคฺคโห, ปริคฺคหํ ปฏิจฺจ มจฺฉริยํ, มจฺฉริยํ ปฏิจฺจ อารกฺโข, อารกฺขาธิกรณํ ทณฺฑาทานสตฺถาทานกลหวิคฺคหวิวาทตุวํตุวํเปสุญฺญมุสาวาทา อเนเก ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สมฺภวนฺติ. อิเม นว ธมฺมา ปหาตพฺพา. “(घ) कोणते नऊ धर्म त्यागण्याजोगे (प्रहातव्य) आहेत? तृष्णामूलक नऊ धर्म – तृष्णेमुळे शोध (पर्येषणा) उत्पन्न होतो, शोधामुळे लाभ होतो, लाभामुळे निश्चय (विनिर्णय) होतो, निश्चयामुळे छंदराग (इच्छा व आसक्ती) उत्पन्न होतो, छंदरागामुळे अध्यवसान (तीव्र आसक्ती) उत्पन्न होते, अध्यवसानामुळे परिग्रह (मालकी हक्क) उत्पन्न होतो, परिग्रहामुळे मत्सर (कृपणता) उत्पन्न होतो, मत्सरामुळे संरक्षण (आरक्षा) उत्पन्न होते, आणि संरक्षणाच्या कारणाने काठी उचलणे, शस्त्र उचलणे, भांडण, कलह, वादविवाद, ‘तू-तू मी-मी’ करणे, चहाडी आणि असत्य बोलणे यांसारखे अनेक पापी अकुशल धर्म उत्पन्न होतात. हे नऊ धर्म त्यागण्याजोगे आहेत.” (ง) ‘‘กตเม [Pg.254] นว ธมฺมา หานภาคิยา? นว อาฆาตวตฺถูนิ – ‘อนตฺถํ เม อจรี’ติ อาฆาตํ พนฺธติ, ‘อนตฺถํ เม จรตี’ติ อาฆาตํ พนฺธติ, ‘อนตฺถํ เม จริสฺสตี’ติ อาฆาตํ พนฺธติ; ‘ปิยสฺส เม มนาปสฺส อนตฺถํ อจรี’ติ อาฆาตํ พนฺธติ…เป… ‘อนตฺถํ จรตี’ติ อาฆาตํ พนฺธติ…เป… ‘อนตฺถํ จริสฺสตี’ติ อาฆาตํ พนฺธติ; ‘อปฺปิยสฺส เม อมนาปสฺส อตฺถํ อจรี’ติ อาฆาตํ พนฺธติ…เป… ‘อตฺถํ จรตี’ติ อาฆาตํ พนฺธติ…เป… ‘อตฺถํ จริสฺสตี’ติ อาฆาตํ พนฺธติ. อิเม นว ธมฺมา หานภาคิยา. “(ङ) कोणते नऊ धर्म हानीला कारणीभूत ठरणारे (हानभागीय) आहेत? आघाताची (द्वेषाची) नऊ कारणे – ‘त्याने माझे अहित केले’ म्हणून तो द्वेष बाळगतो, ‘तो माझे अहित करत आहे’ म्हणून तो द्वेष बाळगतो, ‘तो माझे अहित करेल’ म्हणून तो द्वेष बाळगतो; ‘त्याने माझ्या प्रिय व आवडत्या व्यक्तीचे अहित केले’ म्हणून तो द्वेष बाळगतो...पे... ‘तो अहित करत आहे’ म्हणून तो द्वेष बाळगतो...पे... ‘तो अहित करेल’ म्हणून तो द्वेष बाळगतो; ‘त्याने माझ्या अप्रिय व नावडत्या व्यक्तीचे हित केले’ म्हणून तो द्वेष बाळगतो...पे... ‘तो हित करत आहे’ म्हणून तो द्वेष बाळगतो...पे... ‘तो हित करेल’ म्हणून तो द्वेष बाळगतो. हे नऊ धर्म हानीला कारणीभूत ठरणारे आहेत.” (จ) ‘‘กตเม นว ธมฺมา วิเสสภาคิยา? นว อาฆาตปฏิวินยา – ‘อนตฺถํ เม อจริ, ตํ กุเตตฺถ ลพฺภา’ติ อาฆาตํ ปฏิวิเนติ; ‘อนตฺถํ เม จรติ, ตํ กุเตตฺถ ลพฺภา’ติ อาฆาตํ ปฏิวิเนติ; ‘อนตฺถํ เม จริสฺสติ, ตํ กุเตตฺถ ลพฺภา’ติ อาฆาตํ ปฏิวิเนติ; ‘ปิยสฺส เม มนาปสฺส อนตฺถํ อจริ…เป… อนตฺถํ จรติ…เป… อนตฺถํ จริสฺสติ, ตํ กุเตตฺถ ลพฺภา’ติ อาฆาตํ ปฏิวิเนติ; ‘อปฺปิยสฺส เม อมนาปสฺส อตฺถํ อจริ…เป… อตฺถํ จรติ…เป… อตฺถํ จริสฺสติ, ตํ กุเตตฺถ ลพฺภา’ติ อาฆาตํ ปฏิวิเนติ. อิเม นว ธมฺมา วิเสสภาคิยา. “(च) कोणते नऊ धर्म विशेषाला (प्रगतीला) कारणीभूत ठरणारे (विशेषभागीय) आहेत? आघात दूर करण्याचे (द्वेष शमवण्याचे) नऊ उपाय – ‘त्याने माझे अहित केले, पण ते कसे टाळता आले असते?’ असे विचार करून तो द्वेष शमवतो; ‘तो माझे अहित करत आहे, पण ते कसे टाळता आले असते?’ असे विचार करून तो द्वेष शमवतो; ‘तो माझे अहित करेल, पण ते कसे टाळता आले असते?’ असे विचार करून तो द्वेष शमवतो; ‘त्याने माझ्या प्रिय व आवडत्या व्यक्तीचे अहित केले...पे... तो अहित करत आहे...पे... तो अहित करेल, पण ते कसे टाळता आले असते?’ असे विचार करून तो द्वेष शमवतो; ‘त्याने माझ्या अप्रिय व नावडत्या व्यक्तीचे हित केले...पे... तो हित करत आहे...पे... तो हित करेल, पण ते कसे टाळता आले असते?’ असे विचार करून तो द्वेष शमवतो. हे नऊ धर्म विशेषाला कारणीभूत ठरणारे आहेत.” (ฉ) ‘‘กตเม นว ธมฺมา ทุปฺปฏิวิชฺฌา? นว นานตฺตา – ธาตุนานตฺตํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ผสฺสนานตฺตํ, ผสฺสนานตฺตํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ เวทนานานตฺตํ, เวทนานานตฺตํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สญฺญานานตฺตํ, สญฺญานานตฺตํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สงฺกปฺปนานตฺตํ, สงฺกปฺปนานตฺตํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ฉนฺทนานตฺตํ, ฉนฺทนานตฺตํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ปริฬาหนานตฺตํ, ปริฬาหนานตฺตํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ปริเยสนานานตฺตํ, ปริเยสนานานตฺตํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ ลาภนานตฺตํ. อิเม นว ธมฺมา ทุปฺปฏิวิชฺฌา. “(छ) कोणते नऊ धर्म दुर्बोध (दुष्प्रतिवेध्य) आहेत? नऊ नानात्व (भिन्नता) – धातूंच्या भिन्नतेमुळे स्पर्शाची भिन्नता उत्पन्न होते, स्पर्शाच्या भिन्नतेमुळे वेदनेची भिन्नता उत्पन्न होते, वेदनेच्या भिन्नतेमुळे संज्ञेची भिन्नता उत्पन्न होते, संज्ञेच्या भिन्नतेमुळे संकल्पाची भिन्नता उत्पन्न होते, संकल्पाच्या भिन्नतेमुळे छंदाची (इच्छेची) भिन्नता उत्पन्न होते, छंदाच्या भिन्नतेमुळे परिळाहाची (उत्तेजना/तापाची) भिन्नता उत्पन्न होते, परिळाहाच्या भिन्नतेमुळे पर्येषणेची (शोधाची) भिन्नता उत्पन्न होते, पर्येषणेच्या भिन्नतेमुळे लाभाची भिन्नता उत्पन्न होते. हे नऊ धर्म दुर्बोध आहेत.” (ช) ‘‘กตเม นว ธมฺมา อุปฺปาเทตพฺพา? นว สญฺญา – อสุภสญฺญา, มรณสญฺญา, อาหาเรปฏิกูลสญฺญา, สพฺพโลเกอนภิรติสญฺญา, อนิจฺจสญฺญา, อนิจฺเจ ทุกฺขสญฺญา, ทุกฺเข อนตฺตสญฺญา, ปหานสญฺญา, วิราคสญฺญา. อิเม นว ธมฺมา อุปฺปาเทตพฺพา. “(ज) कोणते नऊ धर्म उत्पन्न करण्याजोगे (उत्पादितव्य) आहेत? नऊ संज्ञा – अशुभाची संज्ञा (अशुभसंज्ञा), मरणाची संज्ञा (मरणसंज्ञा), आहाराविषयी प्रतिकूलतेची संज्ञा (आहारे प्रतिकूलसंज्ञा), सर्व लोकाविषयी अनासक्तीची संज्ञा (सर्वलोके अनभिरतसंज्ञा), अनित्याची संज्ञा (अनित्यसंज्ञा), अनित्यामध्ये दुःखाची संज्ञा (अनित्ये दुःखसंज्ञा), दुःखामध्ये अनात्म्याची संज्ञा (दुःखे अनात्मसंज्ञा), प्रहाणाची (त्यागाची) संज्ञा (प्रहाणसंज्ञा), विरागाची संज्ञा (विरागसंज्ञा). हे नऊ धर्म उत्पन्न करण्याजोगे आहेत.” (ฌ) ‘‘กตเม นว ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา? นว อนุปุพฺพวิหารา – อิธาวุโส, ภิกฺขุ วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ [Pg.255] ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา…เป… ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. ปีติยา จ วิราคา …เป… ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. สุขสฺส จ ปหานา…เป… จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. สพฺพโส รูปสญฺญานํ สมติกฺกมา…เป… อากาสานญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. สพฺพโส อากาสานญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘อนนฺตํ วิญฺญาณ’นฺติ วิญฺญาณญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘นตฺถิ กิญฺจี’ติ อากิญฺจญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. สพฺพโส อากิญฺจญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. สพฺพโส เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม สญฺญาเวทยิตนิโรธํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อิเม นว ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา. “(झ) कोणते नऊ धर्म अभिज्ञेय (विशेष ज्ञानाने जाणण्याजोगे) आहेत? नऊ अनुक्रमिक विहार (अनुपूर्वविहार) – हे आवुसो, येथे भिक्खू कामांपासून अलिप्त होऊन, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, सवितर्क, सविचार, विवेकजन्य प्रीती व सुख असणाऱ्या पहिल्या ध्यानात (प्रथम ध्यान) प्रवेश करून विहरतो. वितर्क व विचारांच्या शमनाने...पे... दुसऱ्या ध्यानात प्रवेश करून विहरतो. प्रीतीचा विराग झाल्याने...पे... तिसऱ्या ध्यानात प्रवेश करून विहरतो. सुखाचा त्याग केल्याने...पे... चौथ्या ध्यानात प्रवेश करून विहरतो. सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांचे उल्लंघन करून...पे... आकासानंचायतनात प्रवेश करून विहरतो. सर्व प्रकारे आकासानंचायतनाचे उल्लंघन करून, ‘विज्ञान अनंत आहे’ असे जाणून विज्ञाणंचायतनात प्रवेश करून विहरतो. सर्व प्रकारे विज्ञाणंचायतनाचे उल्लंघन करून, ‘काहीही नाही’ असे जाणून आकिंचन्यायतनात प्रवेश करून विहरतो. सर्व प्रकारे आकिंचन्यायतनाचे उल्लंघन करून नेवसंज्ञानासंज्ञायतनात प्रवेश करून विहरतो. सर्व प्रकारे नेवसंज्ञानासंज्ञायतनाचे उल्लंघन करून संज्ञा-वेदयित-निरोधात (संज्ञा व वेदनेच्या निरोधात) प्रवेश करून विहरतो. हे नऊ धर्म अभिज्ञेय आहेत.” (ญ) ‘‘กตเม นว ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา? นว อนุปุพฺพนิโรธา – ปฐมํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส กามสญฺญา นิรุทฺธา โหติ, ทุติยํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส วิตกฺกวิจารา นิรุทฺธา โหนฺติ, ตติยํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส ปีติ นิรุทฺธา โหติ, จตุตฺถํ ฌานํ สมาปนฺนสฺส อสฺสาสปสฺสาสฺสา นิรุทฺธา โหนฺติ, อากาสานญฺจายตนํ สมาปนฺนสฺส รูปสญฺญา นิรุทฺธา โหติ, วิญฺญาณญฺจายตนํ สมาปนฺนสฺส อากาสานญฺจายตนสญฺญา นิรุทฺธา โหติ, อากิญฺจญฺญายตนํ สมาปนฺนสฺส วิญฺญาณญฺจายตนสญฺญา นิรุทฺธา โหติ, เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ สมาปนฺนสฺส อากิญฺจญฺญายตนสญฺญา นิรุทฺธา โหติ, สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺนสฺส สญฺญา จ เวทนา จ นิรุทฺธา โหนฺติ. อิเม นว ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา. (ञ) "कोणते नऊ धर्म साक्षात करावयाचे आहेत? नऊ अनुक्रमिक निरोध - प्रथम ध्यान समापन्न झालेल्या पुद्गलाची कामसंज्ञा निरुद्ध होते, द्वितीय ध्यान समापन्न झालेल्या पुद्गलाचे वितर्क आणि विचार निरुद्ध होतात, तृतीय ध्यान समापन्न झालेल्या पुद्गलाची प्रीती निरुद्ध होते, चतुर्थ ध्यान समापन्न झालेल्या पुद्गलाचे श्वासोच्छ्वास निरुद्ध होतात, आकासानञ्चायतन समापन्न झालेल्या पुद्गलाची रूपसंज्ञा निरुद्ध होते, विञ्ञाणञ्चायतन समापन्न झालेल्या पुद्गलाची आकासानञ्चायतनसंज्ञा निरुद्ध होते, आकिञ्चञ्ञायतन समापन्न झालेल्या पुद्गलाची विञ्ञाणञ्चायतनसंज्ञा निरुद्ध होते, नेवसञ्ञानासञ्ञायतन समापन्न झालेल्या पुद्गलाची आकिञ्चञ्ञायतनसंज्ञा निरुद्ध होते, संज्ञा-वेदना-निरोध समापन्न झालेल्या पुद्गलाची संज्ञा आणि वेदना दोन्ही निरुद्ध होतात. हे नऊ धर्म साक्षात करावयाचे आहेत." ‘‘อิติ อิเม นวุติ ธมฺมา ภูตา ตจฺฉา ตถา อวิตถา อนญฺญถา สมฺมา ตถาคเตน อภิสมฺพุทฺธา. "अशा प्रकारे, हे नव्वद धर्म सत्य, यथार्थ, तथ्य, अवितथ, अनन्यथा आहेत, जे तथागतांनी सम्यक प्रकारे जाणले आहेत." ทส ธมฺมา दहा धर्म ๓๖๐. ‘‘ทส ธมฺมา พหุการา…เป… ทส ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา. ३६०. "दहा धर्म बहुकारक आहेत... पे... दहा धर्म साक्षात करावयाचे आहेत." (ก) ‘‘กตเม ทส ธมฺมา พหุการา? ทส นาถกรณาธมฺมา – อิธาวุโส, ภิกฺขุ สีลวา โหติ, ปาติโมกฺขสํวรสํวุโต วิหรติ อาจารโคจรสมฺปนฺโน, อณุมตฺเตสุ วชฺเชสุ ภยทสฺสาวี สมาทาย สิกฺขติ สิกฺขาปเทสุ, ยํปาวุโส, ภิกฺขุ สีลวา โหติ…เป… สิกฺขติ สิกฺขาปเทสุ. อยมฺปิ ธมฺโม นาถกรโณ. (क) "कोणते दहा धर्म बहुकारक आहेत? दहा नाथकरण धर्म - येथे, आवुसो, भिक्खू शीलवान असतो, पातिमोक्ख संवराने संवृत होऊन विहरतो, आचार आणि गोचराने संपन्न असतो, सूक्ष्म दोषांमध्येही भय पाहणारा असतो, शिक्षापदांचे ग्रहण करून त्यात प्रशिक्षण घेतो. आवुसो, जो भिक्खू शीलवान असतो... पे... शिक्षापदांमध्ये प्रशिक्षण घेतो, हा धर्म देखील नाथकरण आहे." ‘‘ปุน [Pg.256] จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ พหุสฺสุโต …เป… ทิฏฺฐิยา สุปฺปฏิวิทฺธา, ยํปาวุโส, ภิกฺขุ พหุสฺสุโต…เป… อยมฺปิ ธมฺโม นาถกรโณ. "पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू बहुश्रुत असतो... पे... दृष्टीने सुप्रतिविद्ध असतो. आवुसो, जो भिक्खू बहुश्रुत असतो... पे... हा धर्म देखील नाथकरण आहे." ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ กลฺยาณมิตฺโต โหติ กลฺยาณสหาโย กลฺยาณสมฺปวงฺโก. ยํปาวุโส, ภิกฺขุ…เป… กลฺยาณสมฺปวงฺโก. อยมฺปิ ธมฺโม นาถกรโณ. "पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू कल्याणमित्र असणारा, कल्याणसहायक असणारा, कल्याणप्रवण असतो. आवुसो, जो भिक्खू... पे... कल्याणप्रवण असतो, हा धर्म देखील नाथकरण आहे." ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ สุวโจ โหติ โสวจสฺสกรเณหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต, ขโม ปทกฺขิณคฺคาหี อนุสาสนึ. ยํปาวุโส, ภิกฺขุ…เป… อนุสาสนึ. อยมฺปิ ธมฺโม นาถกรโณ. "पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू सुवच असतो, सुवच बनवणाऱ्या गुणांनी युक्त असतो, क्षमाशील असतो, उपदेशाचे आदरपूर्वक ग्रहण करणारा असतो. आवुसो, जो भिक्खू... पे... उपदेशाचे आदरपूर्वक ग्रहण करतो, हा धर्म देखील नाथकरण आहे." ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ ยานิ ตานิ สพฺรหฺมจารีนํ อุจฺจาวจานิ กึกรณียานิ ตตฺถ ทกฺโข โหติ อนลโส ตตฺรุปายาย วีมํสาย สมนฺนาคโต, อลํ กาตุํ, อลํ สํวิธาตุํ. ยํปาวุโส, ภิกฺขุ…เป… อลํ สํวิธาตุํ. อยมฺปิ ธมฺโม นาถกรโณ. "पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू आपल्या सब्रह्मचाऱ्यांच्या लहान-मोठ्या कामांमध्ये कुशल असतो, आळस न करणारा असतो, योग्य उपायांचा विचार करणाऱ्या प्रज्ञेने युक्त असतो, ती कामे करण्यास आणि त्यांची व्यवस्था लावण्यास समर्थ असतो. आवुसो, जो भिक्खू... पे... व्यवस्था लावण्यास समर्थ असतो, हा धर्म देखील नाथकरण आहे." ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ ธมฺมกาโม โหติ ปิยสมุทาหาโร อภิธมฺเม อภิวินเย อุฬารปาโมชฺโช. ยํปาวุโส, ภิกฺขุ…เป… อุฬารปาโมชฺโช. อยมฺปิ ธมฺโม นาถกรโณ. "पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू धम्मप्रेमी असतो, प्रिय संभाषण करणारा असतो, अभिधम्म आणि अभिविनयात अत्यंत आनंद मिळवणारा असतो. आवुसो, जो भिक्खू... पे... अत्यंत आनंद मिळवणारा असतो, हा धर्म देखील नाथकरण आहे." ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ สนฺตุฏฺโฐ โหติ อิตรีตเรหิ จีวรปิณฺฑปาตเสนาสนคิลานปฺปจฺจยเภสชฺชปริกฺขาเรหิ. ยํปาวุโส, ภิกฺขุ …เป… อยมฺปิ ธมฺโม นาถกรโณ. "पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू जसे मिळेल तसे चीवर, पिंडपात, सेनासन आणि ग्लानप्रत्यय-भैषज्य-परिष्कारांनी संतुष्ट असतो. आवुसो, जो भिक्खू... पे... हा धर्म देखील नाथकरण आहे." ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ อารทฺธวีริโย วิหรติ…เป… กุสเลสุ ธมฺเมสุ. ยํปาวุโส, ภิกฺขุ…เป… อยมฺปิ ธมฺโม นาถกรโณ. "पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू कुशल धर्मांमध्ये दृढ वीर्य करून विहरतो... पे... आवुसो, जो भिक्खू... पे... हा धर्म देखील नाथकरण आहे." ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ สติมา โหติ, ปรเมน สติเนปกฺเกน สมนฺนาคโต, จิรกตมฺปิ จิรภาสิตมฺปิ สริตา อนุสฺสริตา. ยํปาวุโส, ภิกฺขุ…เป… อยมฺปิ ธมฺโม นาถกรโณ. "पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू स्मृतिमान असतो, परम स्मृती आणि प्रज्ञेने युक्त असतो, फार पूर्वी केलेले काम किंवा फार पूर्वी बोललेले संभाषण देखील स्मरण आणि अनुस्मरण करण्यास समर्थ असतो. आवुसो, जो भिक्खू... पे... हा धर्म देखील नाथकरण आहे." ‘‘ปุน จปรํ, อาวุโส, ภิกฺขุ ปญฺญวา โหติ อุทยตฺถคามินิยา ปญฺญาย สมนฺนาคโต, อริยาย นิพฺเพธิกาย สมฺมา ทุกฺขกฺขยคามินิยา. ยํปาวุโส, ภิกฺขุ…เป… อยมฺปิ ธมฺโม นาถกรโณ. อิเม ทส ธมฺมา พหุการา. "पुन्हा आणखी, आवुसो, भिक्खू प्रज्ञावान असतो, उदय आणि अस्ताचा वेध घेणाऱ्या, आर्या, भेदक आणि सम्यक दुःखक्षयाकडे नेणाऱ्या प्रज्ञेने युक्त असतो. आवुसो, जो भिक्खू... पे... हा धर्म देखील नाथकरण आहे. हे दहा धर्म बहुकारक आहेत." (ข) ‘‘กตเม [Pg.257] ทส ธมฺมา ภาเวตพฺพา? ทส กสิณายตนานิ – ปถวีกสิณเมโก สญฺชานาติ อุทฺธํ อโธ ติริยํ อทฺวยํ อปฺปมาณํ. อาโปกสิณเมโก สญฺชานาติ…เป… เตโชกสิณเมโก สญฺชานาติ… วาโยกสิณเมโก สญฺชานาติ… นีลกสิณเมโก สญฺชานาติ… ปีตกสิณเมโก สญฺชานาติ… โลหิตกสิณเมโก สญฺชานาติ… โอทาตกสิณเมโก สญฺชานาติ… อากาสกสิณเมโก สญฺชานาติ… วิญฺญาณกสิณเมโก สญฺชานาติ อุทฺธํ อโธ ติริยํ อทฺวยํ อปฺปมาณํ. อิเม ทส ธมฺมา ภาเวตพฺพา. (ख) "कोणते दहा धर्म भावना करावयाचे आहेत? दहा कसिण आयतने - एखादा भिक्खू वर, खाली, आजूबाजूला, अद्वय आणि अमर्याद अशा पृथ्वीकसिणाला जाणतो. एखादा आपोकसिणाला जाणतो... पे... एखादा तेजोकसिणाला जाणतो... एखादा वायोकसिणाला जाणतो... एखादा नीलकसिणाला जाणतो... एखादा पीतकसिणाला जाणतो... एखादा लोहितकसिणाला जाणतो... एखादा ओदातकसिणाला जाणतो... एखादा आकासकसिणाला जाणतो... एखादा वर, खाली, आजूबाजूला, अद्वय आणि अमर्याद अशा विञ्ञाणकसिणाला जाणतो. हे दहा धर्म भावना करावयाचे आहेत." (ค) ‘‘กตเม ทส ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา? ทสายตนานิ – จกฺขายตนํ, รูปายตนํ, โสตายตนํ, สทฺทายตนํ, ฆานายตนํ, คนฺธายตนํ, ชิวฺหายตนํ, รสายตนํ, กายายตนํ, โผฏฺฐพฺพายตนํ. อิเม ทส ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา. (ग) "कोणते दहा धर्म परिज्ञेय आहेत? दहा आयतने - चक्षु-आयतन, रूप-आयतन, श्रोत्र-आयतन, शब्द-आयतन, घ्राण-आयतन, गंध-आयतन, जिव्हा-आयतन, रस-आयतन, काय-आयतन, स्प्रष्टव्य-आयतन. हे दहा धर्म परिज्ञेय आहेत." (ฆ) ‘‘กตเม ทส ธมฺมา ปหาตพฺพา? ทส มิจฺฉตฺตา – มิจฺฉาทิฏฺฐิ, มิจฺฉาสงฺกปฺโป, มิจฺฉาวาจา, มิจฺฉากมฺมนฺโต, มิจฺฉาอาชีโว, มิจฺฉาวายาโม, มิจฺฉาสติ, มิจฺฉาสมาธิ, มิจฺฉาญาณํ, มิจฺฉาวิมุตฺติ. อิเม ทส ธมฺมา ปหาตพฺพา. (घ) "कोणते दहा धर्म प्रहाण करावयाचे आहेत? दहा मिथ्यात्व - मिथ्या दृष्टी, मिथ्या संकल्प, मिथ्या वाचा, मिथ्या कर्मान्त, मिथ्या आजीव, मिथ्या व्यायाम, मिथ्या स्मृती, मिथ्या समाधी, मिथ्या ज्ञान, मिथ्या विमुक्ती. हे दहा धर्म प्रहाण करावयाचे आहेत." (ง) ‘‘กตเม ทส ธมฺมา หานภาคิยา? ทส อกุสลกมฺมปถา – ปาณาติปาโต, อทินฺนาทานํ, กาเมสุมิจฺฉาจาโร, มุสาวาโท, ปิสุณา วาจา, ผรุสา วาจา, สมฺผปฺปลาโป, อภิชฺฌา, พฺยาปาโท, มิจฺฉาทิฏฺฐิ. อิเม ทส ธมฺมา หานภาคิยา. (ङ) "कोणते दहा धर्म हानीला कारणीभूत ठरणारे आहेत? दहा अकुशल कर्मपथ - प्राणातिपात, अदिन्नादान, कामेसू मिच्छाचार, मुसावाद, पिसुणा वाचा, फरुसा वाचा, सम्फप्पलाप, अभिध्या, व्यापाद, मिथ्या दृष्टी. हे दहा धर्म हानीला कारणीभूत ठरणारे आहेत." (จ) ‘‘กตเม ทส ธมฺมา วิเสสภาคิยา? ทส กุสลกมฺมปถา – ปาณาติปาตา เวรมณี, อทินฺนาทานา เวรมณี, กาเมสุมิจฺฉาจารา เวรมณี, มุสาวาทา เวรมณี, ปิสุณาย วาจาย เวรมณี, ผรุสาย วาจาย เวรมณี, สมฺผปฺปลาปา เวรมณี, อนภิชฺฌา, อพฺยาปาโท, สมฺมาทิฏฺฐิ. อิเม ทส ธมฺมา วิเสสภาคิยา. (च) "कोणते दहा धर्म विशेषाला कारणीभूत ठरणारे आहेत? दहा कुशल कर्मपथ - प्राणातिपातापासून विरती, अदिन्नादानापासून विरती, कामेसू मिच्छाचारापासून विरती, मुसावादापासून विरती, पिसुणा वाचेपासून विरती, फरुसा वाचेपासून विरती, सम्फप्पलापापासून विरती, अनभिध्या, अव्यापाद, सम्यक दृष्टी. हे दहा धर्म विशेषाला कारणीभूत ठरणारे आहेत." (ฉ) ‘‘กตเม ทส ธมฺมา ทุปฺปฏิวิชฺฌา? ทส อริยวาสา – อิธาวุโส, ภิกฺขุ ปญฺจงฺควิปฺปหีโน โหติ, ฉฬงฺคสมนฺนาคโต, เอการกฺโข, จตุราปสฺเสโน, ปณุนฺนปจฺเจกสจฺโจ, สมวยสฏฺเฐสโน, อนาวิลสงฺกปฺโป, ปสฺสทฺธกายสงฺขาโร, สุวิมุตฺตจิตฺโต, สุวิมุตฺตปญฺโญ. (छ) "कोणते दहा धर्म दुर्बोध आहेत? दहा आर्यवास - येथे, आवुसो, भिक्खू पाच अंगांनी विप्रहीन असतो, सहा अंगांनी युक्त असतो, एकच रक्षक असणारा असतो, चार आश्रय घेणारा असतो, वैयक्तिक सत्ये दूर सारणारा असतो, सर्व प्रकारच्या शोधनांचा त्याग केलेला असतो, अनाविल संकल्पाचा असतो, शांत कायसंस्कार असणारा असतो, सुविमुक्त चित्त असणारा असतो आणि सुविमुक्त प्रज्ञा असणारा असतो." ‘‘กถญฺจาวุโส[Pg.258], ภิกฺขุ ปญฺจงฺควิปฺปหีโน โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุโน กามจฺฉนฺโท ปหีโน โหติ, พฺยาปาโท ปหีโน โหติ, ถินมิทฺธํ ปหีนํ โหติ, อุทฺธจฺจกุกฺกุจฺจํ ปหีนํ โหติ, วิจิกิจฺฉา ปหีนา โหติ. เอวํ โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ปญฺจงฺควิปฺปหีโน โหติ. “आणि आवुसो (मित्रांनो), भिक्खू पाच अंगे सोडलेला कसा होतो? येथे, आवुसो, भिक्खूचा कामच्छंद (इंद्रियसुखाची इच्छा) नष्ट झालेला असतो, व्यापाद (द्वेष) नष्ट झालेला असतो, थिनमिद्ध (आळस आणि सुस्ती) नष्ट झालेले असते, उद्धच्च-कुक्कुच्च (अस्वस्थता आणि पश्चात्ताप) नष्ट झालेले असते, आणि विचिकित्सा (शंका) नष्ट झालेली असते. अशा प्रकारे, आवुसो, भिक्खू पाच अंगे सोडलेला होतो.” ‘‘กถญฺจาวุโส, ภิกฺขุ ฉฬงฺคสมนฺนาคโต โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา เนว สุมโน โหติ น ทุมฺมโน, อุเปกฺขโก วิหรติ สโต สมฺปชาโน. โสเตน สทฺทํ สุตฺวา…เป… ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตฺวา… ชิวฺหาย รสํ สายิตฺวา… กาเยน โผฏฺฐพฺพํ ผุสิตฺวา… มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย เนว สุมโน โหติ น ทุมฺมโน, อุเปกฺขโก วิหรติ สโต สมฺปชาโน. เอวํ โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ฉฬงฺคสมนฺนาคโต โหติ. “आणि आवुसो, भिक्खू सहा अंगांनी युक्त कसा होतो? येथे, आवुसो, भिक्खू डोळ्याने रूप पाहून आनंदीही होत नाही की दुःखीही होत नाही; तो सजग आणि जागरूक राहून उपेक्षक (तटस्थ) राहतो. कानाने शब्द ऐकून... नाकाने गंध घेऊन... जिभेने रस चाखून... शरीराने स्पर्श स्पर्शून... मनाने धम्माला (विचारांना) जाणून आनंदीही होत नाही की दुःखीही होत नाही; तो सजग आणि जागरूक राहून उपेक्षक राहतो. अशा प्रकारे, आवुसो, भिक्खू सहा अंगांनी युक्त होतो.” ‘‘กถญฺจาวุโส, ภิกฺขุ เอการกฺโข โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ สตารกฺเขน เจตสา สมนฺนาคโต โหติ. เอวํ โข, อาวุโส, ภิกฺขุ เอการกฺโข โหติ. “आणि आवुसो, भिक्खू एकाच संरक्षणाने युक्त कसा होतो? येथे, आवुसो, भिक्खू स्मृतीच्या (सती) संरक्षणाने युक्त अशा चित्ताने संपन्न असतो. अशा प्रकारे, आवुसो, भिक्खू एकाच संरक्षणाने युक्त होतो.” ‘‘กถญฺจาวุโส, ภิกฺขุ จตุราปสฺเสโน โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ สงฺขาเยกํ ปฏิเสวติ, สงฺขาเยกํ อธิวาเสติ, สงฺขาเยกํ ปริวชฺเชติ, สงฺขาเยกํ วิโนเทติ. เอวํ โข, อาวุโส, ภิกฺขุ จตุราปสฺเสโน โหติ. “आणि आवुसो, भिक्खू चार प्रकारच्या आश्रयांनी युक्त कसा होतो? येथे, आवुसो, भिक्खू विचारपूर्वक एका गोष्टीचे सेवन करतो, विचारपूर्वक एका गोष्टीचा सहन करतो, विचारपूर्वक एका गोष्टीचा त्याग करतो, आणि विचारपूर्वक एका गोष्टीचे निवारण करतो. अशा प्रकारे, आवुसो, भिक्खू चार प्रकारच्या आश्रयांनी युक्त होतो.” ‘‘กถญฺจาวุโส, ภิกฺขุ ปณุนฺนปจฺเจกสจฺโจ โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุโน ยานิ ตานิ ปุถุสมณพฺราหฺมณานํ ปุถุปจฺเจกสจฺจานิ, สพฺพานิ ตานิ นุนฺนานิ โหนฺติ ปณุนฺนานิ จตฺตานิ วนฺตานิ มุตฺตานิ ปหีนานิ ปฏินิสฺสฏฺฐานิ. เอวํ โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ปณุนฺนปจฺเจกสจฺโจ โหติ. “आणि आवुसो, भिक्खू वैयक्तिक सत्ये पूर्णपणे दूर केलेला कसा होतो? येथे, आवुसो, विविध श्रमण आणि ब्राह्मणांची जी विविध वैयक्तिक सत्ये असतात, ती सर्व त्याने दूर केलेली असतात, पूर्णपणे उपटून टाकलेली असतात, सोडलेली असतात, ओकून टाकलेली असतात, मुक्त केलेली असतात, नष्ट केलेली असतात आणि पूर्णपणे त्यागलेली असतात. अशा प्रकारे, आवुसो, भिक्खू वैयक्तिक सत्ये पूर्णपणे दूर केलेला होतो.” ‘‘กถญฺจาวุโส, ภิกฺขุ สมวยสฏฺเฐสโน โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุโน กาเมสนา ปหีนา โหติ, ภเวสนา ปหีนา โหติ, พฺรหฺมจริเยสนา ปฏิปฺปสฺสทฺธา. เอวํ โข, อาวุโส, ภิกฺขุ สมวยสฏฺเฐสโน โหติ. “आणि आवुसो, भिक्खू सर्व शोध (एषणा) पूर्णपणे सोडलेला कसा होतो? येथे, आवुसो, भिक्खूची काम-एषणा (इंद्रियसुखाचा शोध) नष्ट झालेली असते, भव-एषणा (अस्तित्वाचा शोध) नष्ट झालेली असते, आणि ब्रह्मचर्य-एषणा (धार्मिक जीवनाचा शोध) शांत झालेली असते. अशा प्रकारे, आवुसो, भिक्खू सर्व शोध पूर्णपणे सोडलेला होतो.” ‘‘กถญฺจาวุโส[Pg.259], ภิกฺขุ อนาวิลสงฺกปฺปา โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุโน กามสงฺกปฺโป ปหีโน โหติ, พฺยาปาทสงฺกปฺโป ปหีโน โหติ, วิหึสาสงฺกปฺโป ปหีโน โหติ. เอวํ โข, อาวุโส, ภิกฺขุ อนาวิลสงฺกปฺโป โหติ. “आणि आवुसो, भिक्खू निर्मळ संकल्पाचा कसा होतो? येथे, आवुसो, भिक्खूचा कामसंकल्प नष्ट झालेला असतो, व्यापादसंकल्प नष्ट झालेला असतो, आणि विहिंसासंकल्प नष्ट झालेला असतो. अशा प्रकारे, आवुसो, भिक्खू निर्मळ संकल्पाचा होतो.” ‘‘กถญฺจาวุโส, ภิกฺขุ ปสฺสทฺธกายสงฺขาโร โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ สุขสฺส จ ปหานา ทุกฺขสฺส จ ปหานา ปุพฺเพว โสมนสฺสโทมนสฺสานํ อตฺถงฺคมา อทุกฺขมสุขํ อุเปกฺขาสติปาริสุทฺธึ จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. เอวํ โข, อาวุโส, ภิกฺขุ ปสฺสทฺธกายสงฺขาโร โหติ. “आणि आवुसो, भिक्खू शांत झालेल्या कायसंस्कारांनी युक्त कसा होतो? येथे, आवुसो, भिक्खू सुखाचा त्याग केल्यामुळे आणि दुःखाचा त्याग केल्यामुळे, तसेच पूर्वीच सोमनस्य (आनंद) आणि दोमनस्य (खिन्नता) नष्ट झाल्यामुळे, दुःखही नाही आणि सुखही नाही अशा, उपेक्षा आणि स्मृतीच्या शुद्धतेने युक्त चौथ्या ध्यानात प्रवेश करून विहरतो. अशा प्रकारे, आवुसो, भिक्खू शांत झालेल्या कायसंस्कारांनी युक्त होतो.” ‘‘กถญฺจาวุโส, ภิกฺขุ สุวิมุตฺตจิตฺโต โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุโน ราคา จิตฺตํ วิมุตฺตํ โหติ, โทสา จิตฺตํ วิมุตฺตํ โหติ, โมหา จิตฺตํ วิมุตฺตํ โหติ. เอวํ โข, อาวุโส, ภิกฺขุ สุวิมุตฺตจิตฺโต โหติ. “आणि आवुसो, भिक्खू सुविमुक्त चित्ताचा कसा होतो? येथे, आवुसो, भिक्खूचे चित्त रागापासून मुक्त झालेले असते, चित्त द्वेषापासून मुक्त झालेले असते, आणि चित्त मोहापासून मुक्त झालेले असते. अशा प्रकारे, आवुसो, भिक्खू सुविमुक्त चित्ताचा होतो.” ‘‘กถญฺจาวุโส, ภิกฺขุ สุวิมุตฺตปญฺโญ โหติ? อิธาวุโส, ภิกฺขุ ‘ราโค เม ปหีโน อุจฺฉินฺนมูโล ตาลาวตฺถุกโต อนภาวํกโต อายตึ อนุปฺปาทธมฺโม’ติ ปชานาติ. ‘โทโส เม ปหีโน…เป… อายตึ อนุปฺปาทธมฺโม’ติ ปชานาติ. ‘โมโห เม ปหีโน …เป… อายตึ อนุปฺปาทธมฺโม’ติ ปชานาติ. เอวํ โข, อาวุโส, ภิกฺขุ สุวิมุตฺตปญฺโญ โหติ. อิเม ทส ธมฺมา ทุปฺปฏิวิชฺฌา. “आणि आवुसो, भिक्खू सुविमुक्त प्रज्ञेचा कसा होतो? येथे, आवुसो, भिक्खू जाणतो की, 'माझा राग नष्ट झाला आहे, मुळासकट उपटून टाकला आहे, ताडाच्या झाडासारखा समूळ नष्ट केला आहे, अस्तित्वातून नाहीसा केला आहे आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाचा झाला आहे.' तो जाणतो की, 'माझा द्वेष नष्ट झाला आहे... भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाचा झाला आहे.' तो जाणतो की, 'माझा मोह नष्ट झाला आहे... भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाचा झाला आहे.' अशा प्रकारे, आवुसो, भिक्खू सुविमुक्त प्रज्ञेचा होतो. हे दहा धम्म समजण्यास कठीण आहेत.” (ช) ‘‘กตเม ทส ธมฺมา อุปฺปาเทตพฺพา? ทส สญฺญา – อสุภสญฺญา, มรณสญฺญา, อาหาเรปฏิกูลสญฺญา, สพฺพโลเกอนภิรติสญฺญา, อนิจฺจสญฺญา, อนิจฺเจ ทุกฺขสญฺญา, ทุกฺเข อนตฺตสญฺญา, ปหานสญฺญา, วิราคสญฺญา, นิโรธสญฺญา. อิเม ทส ธมฺมา อุปฺปาเทตพฺพา. (ज) “कोणते दहा धम्म उत्पन्न केले पाहिजेत? दहा संज्ञा – अशुभाची संज्ञा, मरणाची संज्ञा, आहाराविषयीच्या प्रतिकूलतेची संज्ञा, सर्व लोकाविषयीच्या अनासक्तीची संज्ञा, अनित्याची संज्ञा, अनित्यामध्ये दुःखाची संज्ञा, दुःखामध्ये अनात्मतेची संज्ञा, त्यागाची संज्ञा, विरागाची संज्ञा आणि निरोधाची संज्ञा. हे दहा धम्म उत्पन्न केले पाहिजेत.” (ฌ) ‘‘กตเม ทส ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา? ทส นิชฺชรวตฺถูนิ – สมฺมาทิฏฺฐิสฺส มิจฺฉาทิฏฺฐิ นิชฺชิณฺณา โหติ. เย จ มิจฺฉาทิฏฺฐิปจฺจยา อเนเก ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สมฺภวนฺติ, เต จสฺส นิชฺชิณฺณา โหนฺติ. สมฺมาสงฺกปฺปสฺส มิจฺฉาสงฺกปฺโป…เป… สมฺมาวาจสฺส มิจฺฉาวาจา… สมฺมากมฺมนฺตสฺส มิจฺฉากมฺมนฺโต… สมฺมาอาชีวสฺส มิจฺฉาอาชีโว… สมฺมาวายามสฺส มิจฺฉาวายาโม… สมฺมาสติสฺส มิจฺฉาสติ… สมฺมาสมาธิสฺส มิจฺฉาสมาธิ… สมฺมาญาณสฺส มิจฺฉาญาณํ นิชฺชิณฺณํ โหติ. สมฺมาวิมุตฺติสฺส มิจฺฉาวิมุตฺติ [Pg.260] นิชฺชิณฺณา โหติ. เย จ มิจฺฉาวิมุตฺติปจฺจยา อเนเก ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สมฺภวนฺติ, เต จสฺส นิชฺชิณฺณา โหนฺติ. อิเม ทส ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา. (झ) “कोणते दहा धम्म अभिज्ञेय (विशेष ज्ञानाने जाणण्याजोगे) आहेत? दहा झीज होण्याचे (नष्ट होण्याचे) विषय – सम्यक् दृष्टी असलेल्या व्यक्तीची मिथ्या दृष्टी नष्ट होते. आणि मिथ्या दृष्टीच्या प्रत्ययाने जे अनेक पापी, अकुशल धम्म उत्पन्न होतात, तेही त्याचे नष्ट होतात. सम्यक् संकल्पाने मिथ्या संकल्प... सम्यक् वाचेने मिथ्या वाचा... सम्यक् कर्मांताने मिथ्या कर्मांत... सम्यक् आजीविकेने मिथ्या आजीविका... सम्यक् व्यायामाने मिथ्या व्यायाम... सम्यक् स्मृतीने मिथ्या स्मृती... सम्यक् समाधीने मिथ्या समाधी... सम्यक् ज्ञानाने मिथ्या ज्ञान नष्ट होते. सम्यक् विमुक्तीने मिथ्या विमुक्ती नष्ट होते. आणि मिथ्या विमुक्तीच्या प्रत्ययाने जे अनेक पापी, अकुशल धम्म उत्पन्न होतात, तेही त्याचे नष्ट होतात. हे दहा धम्म अभिज्ञेय आहेत.” (ญ) ‘‘กตเม ทส ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา? ทส อเสกฺขา ธมฺมา – อเสกฺขา สมฺมาทิฏฺฐิ, อเสกฺโข สมฺมาสงฺกปฺโป, อเสกฺขา สมฺมาวาจา, อเสกฺโข สมฺมากมฺมนฺโต, อเสกฺโข สมฺมาอาชีโว, อเสกฺโข สมฺมาวายาโม, อเสกฺขา สมฺมาสติ, อเสกฺโข สมฺมาสมาธิ, อเสกฺขํ สมฺมาญาณํ, อเสกฺขา สมฺมาวิมุตฺติ. อิเม ทส ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพา. (ञ) “कोणते दहा धम्म साक्षात केले पाहिजेत? दहा असेक्ख (अर्हतांचे) धम्म – असेक्ख सम्यक् दृष्टी, असेक्ख सम्यक् संकल्प, असेक्ख सम्यक् वाचा, असेक्ख सम्यक् कर्मांत, असेक्ख सम्यक् आजीविका, असेक्ख सम्यक् व्यायाम, असेक्ख सम्यक् स्मृती, असेक्ख सम्यक् समाधी, असेक्ख सम्यक् ज्ञान आणि असेक्ख सम्यक् विमुक्ती. हे दहा धम्म साक्षात केले पाहिजेत.” ‘‘อิติ อิเม สตธมฺมา ภูตา ตจฺฉา ตถา อวิตถา อนญฺญถา สมฺมา ตถาคเตน อภิสมฺพุทฺธา’’ติ. อิทมโวจายสฺมา สาริปุตฺโต. อตฺตมนา เต ภิกฺขู อายสฺมโต สาริปุตฺตสฺส ภาสิตํ อภินนฺทุนฺติ. “अशा प्रकारे, हे शंभर धम्म सत्य, यथार्थ, जसे आहेत तसे, अचूक, अपरिवर्तनीय आहेत, जे तथागतांनी सम्यक् प्रकारे जाणले आहेत.” आयुष्यमान सारिपुत्त असे म्हणाले. ते भिक्खू आनंदी झाले आणि त्यांनी आयुष्यमान सारिपुत्तांच्या भाषणाचे मनापासून अभिनंदन केले. ทสุตฺตรสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ เอกาทสมํ. अकरावे दसुत्तर सुत्त समाप्त झाले. ปาถิกวคฺโค นิฏฺฐิโต. पाथिकवग्ग समाप्त झाला. ตสฺสุทฺทานํ – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – ปาถิโก จ อุทุมฺพรํ, จกฺกวตฺติ อคฺคญฺญกํ; สมฺปสาทนปาสาทํ, มหาปุริสลกฺขณํ. पाथिक सुत्त, उदुम्बरिक सुत्त, चक्कवत्ति सुत्त, अग्गञ्ञ सुत्त, सम्पसादनीय सुत्त, पासादिक सुत्त, महापुरिसलक्खण सुत्त, สิงฺคาลาฏานาฏิยกํ, สงฺคีติ จ ทสุตฺตรํ; เอกาทสหิ สุตฺเตหิ, ปาถิกวคฺโคติ วุจฺจติ. सिंगाल सुत्त, आटानाटिय सुत्त, संगीति सुत्त आणि दसुत्तर सुत्त; या अकरा सुत्तांमुळे याला 'पाथिकवग्ग' असे म्हटले जाते. ปาถิกวคฺคปาฬิ นิฏฺฐิตา. पाथिकवग्गपाळी समाप्त झाली. ตีหิ วคฺเคหิ ปฏิมณฺฑิโต สกโล तीन वग्गांनी सुशोभित झालेला संपूर्ण ทีฆนิกาโย สมตฺโต. दीघनिकाय समाप्त झाला. | |||
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |